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श्रावक प्रतिक्रमण

नथमल · 2009/09

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श्रावक प्रतिक्रमण
(छाया, शब्दार्थ, भावार्थ एवं विवेचन युक्त)
टीकाकार:
मुनिश्री नथमलजी
संकलनकर्ता
श्री टीकमचन्दजी डागा
प्रकाशक:
आदर्ण साहित्य संचार
सरदारशहर (राजस्थान)

प्रकाशक:
आदर्श-साहित्य-संघ
सरदारशहर (राजस्थान)
दीपावली, वीरनिर्वाण सवत् २४७७
प्रथमावृत्ति १५००
मूल्य ३J
मुद्रक:
मदनकुमार मेहता
रेफिल आर्ट प्रेस
(आदर्श-साहित्य-संघ द्वारा संचालित)
३१, वडतल्ला स्ट्रीट
कलकात्ता।

विषय-सूची १ नमस्कार सूत्र २ वन्दन-विधि ३ सामायिक-प्रतिज्ञा ह ४ ईपिथिक सूत्र २१ २६ ३१ ३६ ४२ ६ ४४ ४६ ५ कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा ६ चतुर्विशतिस्तव ७ शक्रस्तुति ८ प्रतिक्रमण-प्रतिज्ञा ह अतिचार चितन पाठ १०.६६ अतिचारों का ध्यान ११ सुगुरु वन्दन विधि १२ तस्स सव्वस्स १३ चत्तारि मंगलं १४ ज्ञानातिचार पाठ १५ दर्शन-स्वरूप १६ अहिंसा अणुव्रत १७ सत्य अणुव्रत १८ अचौर्य अणुनत १६ स्वदारसंतोप अणुव्रत २० इच्छा-परिमाण अणुव्रत २१ दिगनव २२ भोगोपभोग व्रत w ७६ १०२ ११२ १२१ १२६ १४० १६० १६८ १७२ १७६ १८५ १६१ १६५ २३ अनर्थदण्ड विरति व्रत २४ सामायिक व्रत २५ देशावकाशिक व्रत २६ पौषधोपवास व्रत २७ अतिथिसंविभाग व्रत २८ संलेखना विचार २६ तस्स धम्मस्स ३० खामणा ३१ ८४ लाख जीवयोनि ३२ सामायिक पारण विधि ३३ देवसिक प्रायश्चित्त ३३ परिशिष्ट- (अ) पंच पद वन्दन (ब) प्रतिक्रमण विधि १६७ १६८ १६७ २०० २०३ प्रकाशकीय चिरकालसे समाज जिस महान् ग्रन्थ की प्रतीक्षा में था, उसको प्रकाशित करते हुए आज हम अत्यन्त हर्ष अनुभव कर रहे है । यद्यपि यह एक वर्ष पूर्व ही पाठकोके कर-कमलो में पहुच जाता परन्तु कुछ कठिनाइयो के कारण हम समय पर निकालने में असफल रहे। प्रस्तुत ग्रन्थ जैन साहित्य की एक अमूल्य निधि है । टीकाकारने विस्तृत विवेचन के साथ सामयिक प्रश्नोको भी छूआ है तथा उसमें प्राण भर दिये है। प्रतिक्रमणके महत्वके विपयमें यहा कुछ लिखना अनुपयुक्त होगा । क्योकि सम्पूर्ण ग्रन्थ इसकी विस्तृत व्याख्या ही है। फिर भी प्रतिक्रमण जीवन-विकास का सूचक है। यह पय-भ्रष्ट मनुष्यको दीपस्तम्भके सदृश ज्ञानालोक द्वारा सत्यपथ प्रदर्शित करता है तथा पूर्वकृत पापो की आलोचना करा, जीवन को निर्मल बनाता है। इस वृहत् ग्रन्थ के टीकाकार मुनिश्री नथमलजी से सारा समाज परिचित है। अपने अगाध पाण्डित्य तथा गभीर अध्ययनके द्वारा लघु वयमें ही अच्छी स्याति प्राप्त की है। प्रस्तुत ग्रन्थके सकलन में श्री टीकमचन्दजी डागा ने अत्यन्त श्रम किया है अत आदर्श साहित्य सघ की ओरसे वे धन्यवाद के पात्र है। यदि पाठकोने इससे लाभ उठाया तथा इसके द्वारा अपने जीवन को श्रेय पथ की ओर ले जाने का प्रयत्न किया तो हम अपने श्रम को सफल समझेंगे। भवदीय साहित्य-मंत्री आदर्श-साहित्य-सघ O श्रावक प्रतिक्रमण आ त्म दर्शन मा ला का तृतीय पुष्प है। जिसका उद्देश्य विशुद्ध तत्त्व-ज्ञान के साथ भारतीय और जैन-दर्शन का प्रचार करना है, जिसके सुशृखलित प्रकाशन में बुरू (राजस्थान.) के अनन्य साहित्य- प्रेमी श्री हनूतमलजी सुराणा ने अपने स्व. पिता श्री मन्नालालजी की पुनीत स्मृतिमें नैतिक सहयोग के साथ आर्थिक योग देकर अपनी सास्कृतिक व साहित्य-सुरुचि का परिचय दिया है, जो सबके लिए अनुकरणीय है। हम आदर्श-साहित्य-सघ की ओर से सादर आभार प्रकट करते है। -प्रकाशन मंत्री , शुक्तौ गतो मौक्तिकमम्वुविन्दुर्मूल्याईमाकाक्षितमङ्गभृद्धिः । अम्भोद ! किं विस्मयनीयमत्र स्वातेरगम्यो महिमा न बुद्ध. ॥१॥ यदर्घमात्रोपयुता हि वर्णाः पूर्णत्वमायान्ति विना प्रयासम् । सेोऽन्तःस्थितानामुचितस्वराणा चित्रो विधि. केोऽस्य भिलक्षणीयः। मत्सन्निभस्तुच्छमतिर्मनुष्यआवश्यकं यद् विवृणोत्यनिद्रः । सोऽयं प्रभावस्तुलसी प्रभूणामादेशवर्ती सकलोऽधिगम्य ॥३॥ शक्ति मुह में गिरा सलिल-बिन्दु मौक्तिक बन जाता। क्या माश्चर्य? ओ जलधर | इसमें, है अगम्य स्वाति की महिमा ।। आधी मात्रावाले व्यञ्जन, पूर्ण सहज बन जाते। वह अन्त स्थित स्वर की महिमा, है उससे अनभिज्ञ कौन जन ।। तुच्छबुद्धि मुझ जैसा मानव, आवश्यक को टीका करता। क्या मेरा उसमें विनियोजन, है आदेश सकल तुलसी का ॥ -

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प्राकथन- आत्म-चिन्तन अध्यात्मवाद का प्रमुख अङ्ग है। उच्च श्रेणीवाली आत्माएँ निरन्तर सावधान रहती है। उनके लिए आत्म-चिन्तन कोई पृथक तत्त्व नहीं, पर साधारण मनुष्य साधना की प्रारम्भिक दशा मे उस दशा को नहीं पा सकते। उन पर प्रमाद की एक गहरी छाप रहती है। उसके द्वारा वह चलते चलते स्खलित हो जाते है। अतएव उनको अपनी स्थिति पर वापिस लोट आने के लिए आत्म-चिन्तन करना नितान्त आवश्यक रहता है। मात्म- समय आत्म-चिन्तन का अर्थ केवल ध्यान धरना ही नहीं, उसका अर्थ है आचरण और मर्यादाओं का अवलोकन करना, आचार चिन्तन का की भूल को सुधारने के लिये प्रायश्चित्त करना। उसके लिये संध्याकाल सबसे उचित है। दिन की भूल को देखने के लिए सूर्यास्त के बाद का समय और रात की त्रुटियों को देखने के लिए सूर्योदय का पहला समय (प्रातः, संध्या) निर्धारित किया हुआ है। यह कालमान परम्परा के अनुसार एक एक मुहूर्त का है।

( २ ) आत्म- आवश्यक आवश्यक - जो काम अवश्य किया जाए उसका नाम आवश्यक है। चिन्तन और आवश्यक क्रिया प्रत्येक व्यक्ति के लिए, प्रत्येक दृष्टिकोण से भिन्न होती है। एक ही वस्तु हरएक के लिये हरएक दशा में आवश्यक नहीं होती। आत्म-साधक के लिये अपनी त्रुटियों को देखना एवं उनके संशोधन के लिये कुछ-न-कुछ क्रिया करना आवश्यक है। अतएव इस आत्म-चिन्तन का नाम आवश्यक है। प्रस्तुत शास्त्र उस आवश्यक क्रिया का साधन है अतएव इसका नाम भी "आवश्यक सूत्र" है। प्रतिक्रमण शब्द का अर्थ है वापिस लौट आना। प्रमाद- और वश आत्मा निजी स्थान से शुभ योग से विचलित होकर पर- प्रतिक्रमण स्थान मे-अशुभयोग में चली जाती है, उस आत्मा को फिर शुभयोग में स्थापित करने वाली आवश्यक क्रिया का नाम प्रति- क्रमण है। अतएव आवश्यक का दूसरा नाम प्रतिक्रमण भी है। प्रतिक्रमण की सीधे शब्दों में, अपनी भूलों को देखना और उनका प्रायश्चित्त करना यही उपयुक्त परिभाषा हो सकती है। साधक दो श्रेणी के होते हैं-गृहस्थ-श्रावक और मुनि । प्रतिक्रमण सावध प्रवृत्ति को यथाशक्ति त्यागने वाले श्रावक कहलाते हैं और पूर्ण रूप से त्यागने वाले मुनि। मुनियों के आवश्यक में सब प्रकार की सावध वृत्तियों से लगनेवाले दोपों का चिन्तन किया जाता है और श्रावक के आवश्यक में त्यागी हुई सावध वृत्तियों से लगने वाले दोषों का प्रायश्चित्त करना होता है। प्रस्तुत शास्त्र मे श्रावक के आवश्यक आत्म-चिन्तन का विधान किया है इसीलिये इसका नाम श्रावक-प्रतिक्रमण है। श्रावक-

आवश्यक
के विभाग
( ३
आवश्यक के विभाग छ है :-
(१) सामायिक
(२) चतुर्विशतिस्तव
(३) वन्दन
(४) प्रतिक्रमण
(१) कायोत्सर्ग
(६) प्रत्याख्यान
सामायिक :--राग-द्वष रहित आचरण का नाम सामायिक है,
अथवा राग-द्वप रहित वृत्ति का, समता का, सावद्य-प्रवृत्तियों को
त्यागने का नाम सामायिक है। सामायिक के दो भेद है-देश
विरति और सर्वविरति! शक्ति के
अनुसार जो सावद्यवृत्ति
त्यागी जाती है, वह देशविरति सामायिक है। सावधवृत्ति का
सर्वथा त्याग करना-सर्वविरति सामायिक है। देशविरति का
अधिकारी श्रावक होता है और सर्वविरति का मुनि ।
चतुर्पिशतिस्तव :-भगवान् आदिनाथ से लेकर भगवान्
महावीर तक के चौबीस तीर्थङ्करों की स्तुति करना।
वन्दन :-गुरु को बन्दन-नमस्कार करना ।
प्रतिक्रमण :-अतिचारों की शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त करना।
"तस्स मिच्छामि दुकर्ड वह पाप मेरे लिए निष्फल हो, इस
प्रकार चिन्तन करना।
कायोत्सर्ग :-शरीर को स्थिर कर, मौन रहकर ध्यान करना।
प्रत्याख्यान :-आगामी पापकारी प्रवृत्तियों को रोकने के लिये
प्रत्याख्यान करना, आत्म-संयम करना।
m

सार्थकता । (४) सबसे पहले समता का पालन करना जरूरी है। समता को अपनाए बिना सद्गुणों से प्रेम और अवगुणों से ग्लानि नहीं हो सकती। राग और द्वष ये दोनों विषमता और पक्षपात के पिता है। मोह में फंसा रहने वाला मनुष्य एक से स्नेह और एक से द्वेष कर सकता है, पर उनके गुण दोप की परख या विश्लेपण नहीं। जबतक अपनेपन एवं दूसरेपन का पर्दा आखों से नहीं हटता अर्थात् जबतक अस्थायी या दैहिक सम्बन्धों को नहीं भुलाया जाता, तबतक आत्मिक गुणों के प्रति मनुष्य श्रद्धा नहीं रख सकता अथवा गुणों की पूजा करना नहीं सीख सकता। इसीलिए शास्त्रकारों ने सामायिक को सबसे पहला स्थान दिया समता को ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रथम सोपान कहा है। समता को अपनानेवाला पुरुष गुणी पुरुषों के गुणों को आदर की दृष्टि से निहार सकता है--गा सकता है उन्हें अपने जीवन में उतार सकता है। इसीलिए सामायिकके बाद चौवीस तीर्थंकरों को स्तुति करने का विधान किया गया है । गुण का महत्त्व समझ लेने के बाद ही मनुष्य गुणी के सामने सिर झुकाता है- गुरुजनों को वन्दना करता है। जबतक गुणों को वास्तविकता को न लिया जाय तबतक मन सरल नहीं होता। और मन के सरल हुए बिना श्रद्धापूर्वक नमस्कार नहीं हो सकता। इसीलिए चतुर्वि- शतिस्तवके बाद 'वंदन' को स्थान मिला है। जिसका मन, वाणी और शरीर विनम्र हो जाता है, वह अनाचार का सेवन करना नही चाहता, प्रमाद के कारण यदि कोई दोष लंग भी जाए तो वह उसे दवाने की कोशिश न कर अपना पापकर्म धो डालने के लिए अपनी भूलों का प्रायश्चित्त करना ही चाहता है.। अतएव ।

वन्दन के बाद प्रतिक्रमण का स्थान नियत किया गया है। भूलों को याद करनेके लिए एवं उनसे छुटकारा पाने के लिए कायोत्सर्ग करना अर्थात् शरीर को स्थिर रखना अत्यन्त जरूरी है। शरीर की स्थिरता मन की स्थिरता का श्रेष्ठतम साधन है। इसीलिए प्रतिक्रमण के बाद कायोत्सर्ग का उल्लेख हुआ है। स्थिर वृत्ति का अभ्यास करने वाला मनुष्य ही आत्मिक संयम को अपना सकता है। जिसका मन डांवाडोल होता है, जो शरीर पर काबू नहीं पा लेता है, वह प्रत्याख्यान नहीं कर सकता यानी आगामी दोषों से बचने के लिए दृढ संकल्प नहीं कर सकता। इसी कारण से प्रत्याख्यान को कायोत्सर्ग के बाद में रक्खा है। इनका फलितार्थ यह है कि सामायिक आत्म-शोधनका प्राण- भूत तत्त्व है । गुणी एवं संयमी पुरुषों के स्तवन और वन्दन हमारी साधना के आदर्श एवं हमे लक्ष्य की ओर अग्रसर करने वाले है। प्रतिक्रमण साधक को अपनी भूल से बिसरी हुई साधना की स्थिति में फिरसे लौट आने का उपाय है। कायोत्सर्ग प्राय- श्चित्त करने में सहारा देने वाला है। भविष्यमें वैसी ही सदाचार एवं सद्भावना की स्थिति को कायम रखने के लिये प्रत्याख्यान है। और इन सब का एकीकरण आत्मशोधन का एक अमोघ मन्त्र है। कई लोगों को प्रतिक्रमण के विषय मे यह सन्देह रहता है कि इसके प्रत्येक अङ्ग मे पुनरुक्तियां भरी पड़ी है। एक २ पाटी की पुनरावृत्ति होती ही रहती है। अब इसमें संशोधन की आव- श्यकता है और गुञ्जाइश भी। पुनरुक्तियों को हटा देने से यह और भी अधिक उपयोगी एवं सुव्यवस्थित बन जाएगा। पर आवश्यक का फलितार्थ आवश्यक और पुनरुक्ति यह शङ्का वस्तुस्थिति को न समझने का परिणाम है। पुनरुक्ति सब जगह दोष नहीं है। पुनरुक्तिदोष साहित्य के चुने हुए क्षेत्रों मे ही माना गया है। हम निम्न पंक्तियों में जो एक श्लोक उद्धृत कर रहे हैं, उसमें यह साफ २ कहा है कि अमुक २ स्थलों में पुनरुक्ति दोष नहीं माना जाता, प्रत्युत वह उनका गुण "अनुवादादरवीप्सा, भृशार्थविनियोगहेत्वसूयासु । ईषत्सभ्रमविस्मय, गणनस्मरणे न पुनरुक्तम् ।। प्रतिक्रमण स्मरण है-आत्म-चिन्तन है। उसमें यदि एक ही पाठ अनेक बार आये तो भी यह पुनरुक्त दोष नहीं हो सकता। और दूसरी बात यह है कि जो एक बार आया हुआ पाठ दूसरी बार फिर आता है, वह सम्बन्ध के बिना ही नहीं, किन्तु किसी खास उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही आता है । साधारण बातों पर भी हम निगाह डालें तो यह शङ्का दूर हो जाती है। जैसे हम नमस्कार मन्त्र की माला जपते है। उसमें क्या होता है। एक ही मन्त्र दो चार बार ही नहीं, एकसौ आठ बार बोला जाता है। पर वह दोष नहीं, आत्म-चिन्तन, स्मरण, ध्यान का यही मार्ग है। तिक्रमण प्रतिक्रमण करने का समय एक मुहूर्त का निश्चित है। यह तो पहले ही बताया जा चुका है, अब हमें यह निष्कर्ष निकालना कालमान है कि यह क्यों ? आगम-सूत्रों में प्रतिक्रमण का काल-मान कितना होना चाहिये, इसकी कोई चर्चा नहीं मिलती। आगम के उत्तरवर्ती ग्रन्थों में इसका काल-मान एक मुहूते का मिलता है और यह शास्त्रीय दृष्टिकोणों से उचित भी है। शास्त्रों में का छद्मस्थ-पुरुष की एकाग्रता की स्थिति अन्तर्मुहूर्त की बतलाई है। अन्तर्मुहूर्त के बाद उसमे कुछ न कुछ अन्तर आ जाता है। प्रतिक्रमण करने वाला एक सरीखी एकाग्रता से अपने दोषां की आलोचना करे, अतएव यह समय-परिमाण स्थापित किया गया है। कई कई आचार्यों ने यह सिद्धान्त रूप से स्वीकार किया है कि आगम मे जिन का मान-काल न मिले, उन सबकी अवधि अन्तर्मुहूर्त की समझनी चाहिये। जैसे नमस्कारसहिता ( नवकारसी) एवं सामायिक की काल मर्यादा आगम मे वर्णित नहीं है तो भी उनका परिमाण अन्तर्मुहूर्त माना जाता है। श्रीमज्जयाचार्य ने आगम के सूक्ष्म रहस्यान्वेषण द्वारा ही उक्त काल-व्यवस्था प्रमाणित की है। वह यों है। उत्तराध्ययन के २६ वें अध्ययन मे साधु-समाचारी का वर्णन करते हुए बतलाया गया है कि साधु दिन के अन्त में प्रतिक्रमण करे और उसके वाद स्वाध्याय करने के लिए (कालं तु पडिलेहए) काल प्रति- लेखन करे-स्वाध्याय के उपयुक्त समय की जांच करे। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रतिक्रमण का समय सूर्यास्त से विकाल वेलो तक का है। विकाल वेला में अस्वाध्यायी रहती है। विकाल-अस्वाध्यायी का समय एक मुहूर्त का है। उसके बाद प्रतिक्रमण करने के बाद स्वाध्याय करने का विधान है, अतः प्रतिक्रमण-कालमान एक मुहूर्त का स्वयं सिद्ध हो जाता है। आवश्यक की भाषा के विषय मे भी बहुत से लोग कहा प्रतिक्रमण करते है कि आज भी हमारे संध्यासूत्र की वही भाषा है जिसका और भाषा युग कई शताब्दियोंके पूर्व ही बीत चुका है। आज तो हमारा पाठमन्त्र हमारी मातृभाषा मे ही होना चाहिये ; जिससे हम उसके तथ्य को समझ सकें। इस विषय मे इतना ही कहना काफी होगा कि नो विचार जिस भाषा के, जिन शब्दों में प्रकट होते है, उनमें जो मौलिकता होती है, वह उनके अनुवाद में नहीं रह सकती। इसीलिये इसका मूल पाठ तो ज्यों का त्यों सुरक्षित रक्खा जाता है और उसका अर्थ समझने के लिए मातृभाषा मे शव्दार्थ और भावार्थ है हो। जैसे "तस्सुत्तरी” का पाठ पहले आवश्यक में भी आता है और पांचवं मे भी। इस पाठ का दोनों जगह आना जरूरी है, क्योंकि दोनों आवश्यकों में कायोत्सर्ग किया जाता है और तस्सुत्तरी का पाठ कायोत्सर्ग की प्रतिज्ञा कराने वाला है। अतएव जितनी बार कायोत्सर्ग किया जाय उतनी बार ही इसका आना जरूरी है। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि "खमासमणा" का पाठ दो बार क्यों बोला जाता है ? अधिक बार क्यों नहीं ? क्योंकि वह सो गुरु-वन्दन है, अत: दो बार की तरह चार वार बोला साय तो क्या आपत्ति है ? ऐसी शङ्काओं के बारे मे हमे यह समझना चाहिये कि प्रतिक्रमणका काल-मान एक मुहूर्त का नियत है। उसको ध्यान में रखकर ही इसकी यह व्यवस्था हुई है। आवश्यक किस के लिए उपयोगी है और किसे करना चाहिए। इस पर भी सब एक मत नहीं है। कई लोगों का विचार है कि प्रतिक्रमण उन्हें ही करना चाहिए जिनके बारह व्रत धारण किये हुए हों। जिनके प्रत धारण किये हुए नहीं होते है, उनके लिए भला प्रतिक्रमण की क्या आवश्यकता १ प्रायश्चित्त त्याग के भङ्ग से उपजे दोषों की शुद्धि के लिए है। त्याग ही नहीं तो क्या तो दोष और क्या उनका प्रायश्चित्त ? पर उनका प्रतिक्रमण का अधिकारी कौन?

(६) यह दृष्टिकोण ठीक नहीं। चाहे व्रत स्वीकार किये हों चाहे न किये हों, प्रतिक्रमण करना तो अच्छा ही है। व्रत में कोई स्खलना हो गई हो तो उसकी शुद्धि हो जाती है और जो ऐसे ही करता है, उससे भी कम से कम आत्म निरीक्षण का मौका तो मिलता है। मन और वाणी की शुद्ध प्रवृत्ति होती है । स्वाध्याय और कायोत्सर्ग होता है। त्याग के प्रति रुचि पैदा होती है। अतएव प्राचीन आचार्यों ने लिखा है- प्रतिक्रमणप्येव, सतिदोषे प्रमादत । तृतीयौपधकल्पत्वाद्, द्विसध्यमथवाऽसति ।। अर्थात:-औषधि तीन तरह की होती है-एक औषधि रोग में ली गई लाभ पहुंचाती है और रोग के विना हानि । दूसरी श्रेणी की दवा रोग मे लाभ करती है और रोग के विना न तो लाभ करती है और न हानि। तोसरी श्रेणी की औषधि वह है, जो रोग में फायदा करती है और उसके बिना भी शरीर को स्वस्थ, पुष्ट और तेजस्वी बनाती है। प्रतिक्रमण ठोक इस तीसरी श्रेणी की दवा के समान है । यदि अतिचार लगने पर किया जाय तो उससे अतिचार की शुद्धि हो जाती है, और यदि अतिचार के बिना किया जाय तो भी उससे शुद्ध प्रवृत्ति होती है, आत्म-उत्थान होता है । इसलिए प्रतिक्रमण प्रत्येक स्थिति में लाभकारक है और व्रत में हुए छिद्रों को रौंधने का उद्देश्य तो मुख्य है ही। उत्तरा- ध्ययन के २८ वें अध्ययन मे स्पष्ट कहा गया है-- "पडिक्कमणेण वयछिद्धाइ पिहेइ।" प्रती पुरुष प्रतिक्रमण के द्वारा व्रत के छिद्रों को रौंधते है अर्थात् त्याग मे जो कोई त्रुटि होती है, वह आलोचना से सुधारी जा ( १० ) सकती है। इत्यादि अनेक हेतुओं से प्रतिक्रमण का सर्वतोमुखी महत्त्व जाना जाता है। সরিক্ষা प्रतिक्रमण क्यों करना चाहिये, यह कोई गूढ बात नहीं, क्यो? तो भी. इसके सम्बन्ध में थोड़ासा लिखना जरूरी है। आदमी स्नान क्यों करता है ? शरीर को साफ एवं स्वस्थ रखने के लिये।, प्रतिक्रमण भी मानसिक अवस्था को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने के लिये आत्म-स्नान है। जिसका मन मलिन और दुर्बल होता है वह नैतिक जीवन की भूमिका से गिर जाता है। - मन अपने दोषों से ही मैला बनता है।. आपसी विरोध, एक दूसरे की. निन्दा, एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या, आक्षेप, आदि ऐसे बडे २ दोष है, जो मन को साफ सुथरा नहीं रहने देते . , उसका काम ज्यों त्यों उसमें विकार पैदा करना ही है। इन दोषों से छुट- कारा पाने के लिये प्रतिक्रमण एक सफल साधन-सहायक है। प्रतिक्रमण की प्रथम प्रतिज्ञा में अतिचारों-दोपों की आलोचना करने का दृढ़ संकल्प होता है। उसी लक्ष्य के. अनुसार प्रतिक्रमण मे मुख्यता दो बातें होती हैं- अपने दोषों को देखना, और उनका प्रायश्चित्त करना । - समूचा प्रतिक्रमण मैत्री. की भावना से ओतप्रोत है.।, प्राणिमात्र के प्रति सद्भावना एवं सहृदयता का वर्ताव करने की कुञ्जी है। प्रतिक्रमण हरएक काम में सावधानी' की अपेक्षा रहती है। प्रतिक्रमण और भाव के लिये भी वह जरूरी है सावधानी का पहला कारण तो यह है कि हम जो करना चाहें, उससे पहले उसकी असलियत को समझे। प्रतिक्रमण करने से पूर्व ही उसके उद्देश्य को सामने रख लेना चाहिए और उद्देश्य को अटल रखते हुए आखिरी पंक्तियों । । .

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( ११
तक चला जाना चाहिये। जब लक्ष्य में शिथिलता आ जाती
है तब मन इधर उधर दौडने लग जाता है, मन की अस्थिरता
से आवश्यक क्रिया भावरूप न रह कर द्रव्यरूप हो जाती
है अर्थात् 'वास्तविकता से व्यावहारिकता में चली जाती है।
इसीलिए प्रतिक्रमण करनेवाले को उसके प्रत्येक शब्द के अर्थ
को हृदयंगम कर लेना चाहिये और प्रतिक्रमण करते समय ध्यान
को स्थिर रखना चाहिये।
प्रतिक्रमण की संस्कृत टीकाए बड़ी २ लिखी हुई पडी है ।
प्रतिक्रमण
पर वह प्रत्यक्ष रूप से आज के युग की मार्ग को पूरा नहीं कर और हिन्दी
सकतीं। 'कारण कि संस्कृत पढनेवाले आज बहुत कम है। विवेचन
इसीलिये साधारण लोग उसकी अमूल्य विचारनिधि से कोई
लाभ नहीं उठा सकते। ' इसी कारण से प्रतिक्रमण के मुख्यं २
पहलुओं को चालू भोपा मे समझाने की आवश्यकता हुई।
और यह प्रस्तुत विवेचन उसका ही परिणाम है। इसकी एक
टीका तो मारवाडी मै आचार्यश्री के आदेशानुसार स्वामी
गणेशमलजी ने इससे पहले ही बना ली थी। जिससे इसके
लिखने में बहुत सहायता मिली है। अन्यान्य'प्रान्तवासियों को
मारवाड़ी समझने में कठिनाई होती है। इसी उद्देश्य को सामने
रखकर आचार्यश्री ने इसकी हिन्दी टीका लिखने का आदेश
देमे की कृपा की-उसेही मैं कायरूप मे परिणत' कर सका हूं।
मानव जीवन के 'मुख्य दो पहलू है। एक तो आचार प्रतिक्रमण
और दूसरा विचार । विचारशास्त्र के द्वारा मनुष्य गंतव्य पथ आचार को
का निश्चय करते है और आचारशास्त्र के द्वारा आचरणों का
कुजी है
अभ्यास। यद्यपि प्रत्यक्ष रूप से प्रतिक्रमण आचारशास्त्र की

(१२) कोटि का ग्रन्थ नहीं है। इसमें आचार पद्धति का निरूपण भी नहीं है। विशुद्ध रूप से यह प्रायश्चित्त शास्त्र है। तो भी हम आचार-विशुद्धि का हेतु होने के कारण इसे आचार की कुञ्जी कह सकते हैं। जब तक अतिचार एवं अनाचार की जानकारी नहीं हो पाती है तब तक कोई भी मनुष्य आचार पालने में कुशल नहीं हो पाता। प्रस्तुत ग्रन्थ में आचार के दोषों का विस्तृत वर्णन है। इन दोषों के वर्जने से आचार अपनेआप विशुद्ध बन जाता है। इसमें परोक्षरूप से कहे हुए आचार के अनुसार चलनेवाले मनुष्य निःसन्देह अपने को ऊँचा उठा सकते हैं। जो बारह व्रतों का उपदेश है, वह मानो विशुद्ध जीवन का अनूठा चित्र है । उसमें एक उपयोगी समाज का दिगदर्शन या रूपरेखा है। प्रतिक्रमण धर्म का विशुद्ध अङ्ग है। इसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर को कितना ऊँचा उठा सकता है, यह पाठक स्वयं समझ सकगे, पर जो मनुष्य धार्मिक आचरण न हुए यह आरोप लगाते है कि धर्म से हमें कोई लाभ नहीं मिलता, वह उनकी कमजोरी है, धर्म का कोई दोष नहीं उसको कोई पाले ही नहीं तो उससे लाभ कैसे मिले ? अस्तु-इस प्रसंग में मैं एक उस अप्रासंगिक बातकी भी चर्चा करना जरूरी समझता हूं, जिसमे आश्चर्य और खेद का सम्मि- श्रण है। बहुधा सुनने एवं पढ़ने को मिलता है कि धर्म आज के युग के लिये उपयोगी नहीं, वह चाहे जैन हो या कोई दूसरा हो। जो दर्शन जिसलिये चले थे, वे अपना काम कर चुके । आज उनसे हमें कोई सहायता नहीं मिल सकती। खैर, उनके कथनानुसार धर्म से समाज को कोई बल मिले या न मिले-वह ( १३ ) तो एक दूसरी बात है । पर जब हम धर्मकीमूल भित्तिको देखते हैं, धर्म हमें क्यों मान्य है, इस पर दृष्टि पसारते हैं, तब उक्त शंका अपने आप निर्मूल हो जाती है। आर्थिक उन्नति के लिये, भौतिक साधनों का विकास करने के लिये, धर्म की आवश्यकता न तो कभी पहले ही महसूस की गई और न आज भी की जाती है और न की जानी चाहिये। समाज एवं शासन को व्यव- स्थित वनाये रखने के उद्देश्य से ही जैसा कि कई लोगों का ख्याल है--न तो वह चला और न अव चलना ही चाहिए। व्यवस्था सामूहिक जीवन का एक आवश्यक अङ्ग है, उसमें धर्म का क्या सवाल? उसके बिना कोई टिक नहीं सकता। वह अनिवार्य है। उसके लिए धर्म की क्या आवश्यकता हुई और आज भो क्या हो सकती है ? जो वस्तु जिसके बिना ही वन सके, उसके लिए उसकी कल्पना करना व्यर्थ है। धर्म के विना ही जब व्यवस्था हो सकती है तब उसके लिए धर्म की कल्पना करने की जरूरत ही क्या ? और जो जरूरत समझते है, उनके लिए धर्म व्यवस्था का ही पर्यायवाची शब्द है, इसके आगे कुछ भी नहीं। वह ऐसा माननेवाले अपने आपको चाहे आस्तिक समझते हों; चाहे नास्तिक ; वस्तुतः आत्मा को न माननेवाले हो समझने चाहिये। जो सच्चा आस्तिक है-जिसे आत्मा पर दृढ़ विश्वास होता है, वह धर्म को व्यवस्था की सीढ़ी से आगे की वस्तु मानता है। उसकी दृष्टि मे धर्म का उद्देश्य व्यक्ति का आत्म-विकास करने का होता है। दर्शन की वाणी मे जिसका नाम मोक्ष है। हां। धर्म से व्यवस्था को बल मिलता है पर वह उसका गौण फल है। वह भी उसी हालत में जवकि सव । ( १४.). लोग हृदय से धर्म को पालनेवाले बन जाय। अन्यथा वह भी नहीं। क्योंकि व्यवस्था को कायम रखने के लिये किसी न किसी रूप में बल-प्रयोग करना ही पड़ता है। धर्म को वह कतई नामंजूर है। धर्म से समाज एवं शासन की व्यवस्था न तो कभी पहले ही चली और न आज भी चल सकती है। धर्म तो केवल व्यक्ति-व्यक्ति की आत्मा की सयवस्था कर सकता है। जबर्दस्ती एवं दण्ड-विधान से बांधेजानेवाले समष्टि के विचारों की नहीं। अतएव यह कहा जा सकता है कि धर्म की उद्देश्यानुसारी उपयोगिता जो पहले थी, वह आज भी है और आज है, वह पहले थी; 'उसमें कोई अन्तर नहीं आ सकता। जैसाकि वर्तमान आचार्यश्रीने लिखा है-"अपरिवर्तनीय स्वरूपत्वेन"। लौकिक कर्तव्यों से धर्म को भिन्न मानने 'के अनेक हेतुओं में से यह भी एक हेतु है, जिस समय जहाँ जैसी जरूरी व्यवस्था। जान पड़ती है वहा वैसी ही बन जाती है। जैसे सामूहिक जीवन' के प्रारम्भ में कुलपतियों की आवश्यकता हुई थी। उसके बाद जब सामूहिक अन्याय बढ़ने लगे तब राजतन्त्र का जन्म हुआ। राजतन्त्र की मनमानी में जब साम्राज्यवाद पनपने लगा, जनसाधारण के हितों की ओर ध्यान नहीं दिया जाने लगा तब जनतन्त्र में सुख की आभा मिली। जनतन्त्र को भी लोकहित के लिये अधूरा माननेवाले व्यक्तियों ने समानता के आधार पर समाजवाद को जन्म दिया। इस प्रकार ज्यों २ समय बीतता चला गया त्यों २ लोकमत का प्रतिनिधित्व करनेवाली व्यवस्था भी बदलती रही और रहेगी। चूकि सासन-नियम भौतिक सुखों को पाने के लिये बनाये जाते है। वह देश, काल और भूमि की . ।

की आवाज ( १५ ) परिस्थितियों से अलग २ होते हैं।' भिन्न २ देशवासियों की उपयोगिताएं भी भिन्न २ और उन्हें साधने के तरीके भी भिन्न- भिन्न है। अतः उनमें परिवर्तन होना स्वाभाविक है। इसके विपरीत धर्म का लक्ष्य सदा और सबके लिये एक है-आत्म- साधन है। इसीलिए वह अभिन्न और अपरिवर्तनीय है। इस दशा मे समाज एवं शासन-व्यवस्था की त्रुटियों के कारण धर्म को बदनाम करना, और धर्म हमारेलिये आज कोई काम की चीज नहीं-ऐसा कहना एकान्त अविवेकपूर्ण है। प्रतिक्रमण का प्रत्येक शब्द शुद्ध भावना का अग्रदूत है। प्रतिक्रमण अतिक्रमण, करनेवालों का दिल साफ होना चाहिए। वह शुद्ध शुद्ध हृदय हृदय की आवाज है, रूढ़ि नहीं। कलह-कदाग्रह करना, है-रूढ़ि वैमनस्य-वैर विरोघ रखना, दुसरों की निन्दा करना आदि २ चाते प्रायश्चित्त का महत्त्व समझनेवालों को शोभा नहीं देतीं । एक ओर हम "खामि सक्वेजीवा, सम्वे जीवा खमतुमे" का ध्यान धरते है, दूसरी ओर किसी से अनुचित व्यवहार करके माफी मागने से हिचकिचाते है। इसे प्रतिक्रमण की सार्थकता नहीं कह सकते। यह समझ की त्रुटि है। इसका अर्थ तो यह हुआ केवल प्रतिक्रमण के शब्द जपते. है, अर्थ नहीं समझते। वरना . "खामेमि सब्वे जीवा" के अर्थ को समझने वाला ऐसा नहीं कर सकता। इन शब्दों मे हम इस भावना को स्पष्ट करते है कि मैं सब जीवों से, मेरे अनुचित व्यवहार की माफी चाहता हूं और दूसरों के अनुचित व्यवहारों को मैं साफ दिल से माफ करता हूं। फिर हमे अपने दोषों को स्वीकार करने में एवं उनके लिए क्षमा मांगने में क्यों आपत्ति होनी नही कि हम । ( १६ ) चाहिए। क्यों छोटी २ बातों के लिए समाज की शृङ्खला को छिन्न-भिन्न करना चाहिये। यह बातें ऐसे तो तुच्छ है पर समाज संगठन के लिए बहुत बाधक है। श्रावकों के लिए यह नितान्त विचारणीय है। महामान्य आचार्य श्री “तुलसी गणी" का कृपापूर्ण आदेश ही इस टीका-निर्माण का हेतु है। हमारी संस्था के नियमानुसार शरीर और वाणी ही नहीं अपितु मन तक आचार्यदेव के चरणों में समर्पित है। अक्षरबोध से लेकर जो कुछ है, वह सब उन्हीं की देन है। अतएव मैं श्रीचरणों का उपकार या आभार मानने की बात कैसे कहूं ? मैं स्वयं उन्हीं का हूं- और मेरा जो कुछ प्रयास है, वह सवही उन आर्य चरणों की पुनीत उपासना का फल मात्र है। सम्वत् २००२ पौप कृष्णा १ -मुनि नथमल ?

श्रावक प्रतिक्रमण

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यामुक्कार सुतं
(नमस्कार सूत्र)
सिद्धाणं।
णमो अरिहंताणं ।
णमो
णमो आयरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं।
णमो लोए सव्वसाहूणं ।
(छाया)
नमः अरिहन्तृभ्यः नमः सिद्ध भ्यः
नमः आचार्येभ्यः
नमः उपाध्यायेभ्यः
नमः लोके सर्वसाधुभ्यः

२
नमस्कार मत्र
नमस्कार
शब्दार्थ
णमो अरिहंताण- मै अरिहन्त भगवान् को नमस्कार करता हू ।
णमो सिद्धाणं-मै सिद्ध भगवान् को नमस्कार करता है।
णमो आयरियाणं-में आचार्य महराज को नमस्कार करता हूँ।
णमो अवमायाणं-मै उपाध्याय महाराज को नमस्कार करता हूँ ।
णमो लोए सव्यसाहूणं-में लोक के सर्व साधुओ को नमस्कार
करता है।
भावार्थ- इसका नाम नमस्कार महामन्त्र है। इसमें पांच
श्रेणी की परम आत्माओं को नमस्कार करने का विधान है।
नमस्कार पूज्य आत्माओं को करना चाहिये । पूज्य
किसे करना आत्माओं की परीक्षा के लिये हमें प्रत्येक आत्मा के गुणों पर
चाहिये?
दृष्टिपात करना होगा। तत्पश्चात् उन गुणों के आधार पर सत्र
आत्माओं का विभाजन और वर्गीकरण करना पड़ेगा। मिथ्यात्व,
सम्यक्त्व, चारित्र और पूर्ण कर्मक्षय, इन चार लक्षणों से आत्माओं
के चार विभाग होते है। यथा-
(१) वहिरात्मा,
(२) अन्तरात्मा,
(३) साधक परमात्मा,
(४) सिद्ध परमात्मा।
---जिनको आत्मा आदि तत्वों का यथावत् भान नहीं है, वह
आत्माएं मिथ्यात्त्व के कारण बहिरात्मा कहलाती हैं।
-~-जिन्हें आत्मा आदि का भान है, वह आत्मायें सम्यक्त्व के
कारण अन्तरात्मा कहलाती हैं।
~जिन्होंने आत्मा को जड़ पदार्थ से पृथक करने के लिए सब
1

श्रावक प्रतिक्रमण MY पापकारी प्रवृत्तियों का परित्याग किया है, वह आत्माएं चारित्र के कारण साधक परम-आत्मा कहलाती है -सव कर्मों का नाश कर जिन्होने आत्मा का शुद्ध स्वरूप मोक्ष पा लिया है वह आत्माएं सर्वोच्च विशुद्धि की प्राप्ति के कारण सिद्ध परम-आत्मा कहलाती है। इन चार कक्षाओं में सब आत्माओं का वर्गीकरण है। अध्यात्मदृष्टि में परमात्मा ही नमस्कार के योग्य है। चाहे वह साधक हों, चाहे सिद्ध हों। सिद्ध परमात्मा सर्वथा मल रहित होते है इसलिये उन्हें नमस्कार किया जाता है। साधक परमात्माओं की मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक प्रवृत्तियों हिंसा, असत्य आदि दोषोंको पूर्ण रूपेण त्याग देती हैं अतएव वह पूज्य- नमस्कार के योग्य बन पाते है। इस नमस्कार सूत्र में इन दो श्रेणी की परमात्माओं को ही नमस्कार किया जाता है। जैसे- "णमो सिद्धाण, णमो लोए सव्व साहूण" । अरिहन्त, आचार्य, और उपाध्याय साधु-श्रेणीगत ही है। इनका पृथक् निर्देश केवल पदवी की अपेक्षा से है। इनके अतिरिक्त पहली दो श्रेणी की आत्माओं को प्रणाम किया जाता है, वह लौकिक दृष्टि का कार्य है। * द्रव्य और भाव उभय चारित्र सम्पन्न मुनि ही वद्य है, (आ० नि. गा० ११६), बन्दनीय तथा अवन्दनीय के सम्बन्ध में सिक्के की चतुभंगी प्रसिद्ध है (आ० नि० गा० ११-३८), वन्दनीय सिर्फ वही है, जो शुद्ध चान्दी तथा शुद्ध मोहर वाले सिक्के के समान द्रव्य और भाव उभयलिङ्ग सम्पन्न है (आ० नि. गा० ११-३९), असयम आदि दोषो के अनुमोदन द्वारा कर्मबन्ध होता है (आ० नि० ११-९)।

श्रावक प्रतिक्रमण नमस्कार परमात्माओं को नमस्कार ऐहिक या पारलौकिक पौगलिक किस भावना सुख की प्राप्ति के लिये, मान, प्रतिष्ठा, सत्कार, सन्मान एवं यश से करना चाहिये? कामना के लिए नहीं ; केवल आत्मा को विशुद्ध करने के लिए- कर्ममल को दूर करने के लिए ही करना चाहिये। धर्मदृष्टि में आत्मशुद्धि का महत्त्व है; पौद्गलिक सुख का नहीं। इसलिये लक्ष्य पर चलना ही हित का परम साधन है । हां! वह पौगलिक सुख-लक्ष्य के अनुगामी जनों को स्वयं प्राप्त हो जाता है। पर उन्हें इसे प्राप्त करनेके लिये अलग प्रयास करने की कोई आव- श्यकता नहीं। चूंकि पौद्गलिक सुख का हेतु पुण्य है। पुण्य का हेतु शुभ योग है। नमस्कार करना शुभ योग की प्रवृत्ति है। नमस्कार करने से पुण्य-वन्ध अपने आप हो जाता है। इसलिये नमस्कार केवल आत्म-उज्वलता के लिये ही करना चाहिये। नमस्कार करने का फल आत्मशुद्धि है और गौण फल करने से हमे पुण्य का वन्ध है। उक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते है कि अध्यात्म दृष्टि में नमस्कार करने का लक्ष्य और फल मिलता है? लौकिक दृष्टि से भिन्न है। इसलिये आत्मशुद्धि के लिये नमस्कार करते समय योग्य अयोग्य की परीक्षा करना नितान्त आवश्यक है। यह सब निर्णय हो जानेके पश्चात हमें उन पूज्य आत्माओं के विपय में भी एक दृष्टि डालनी चाहिये, जिन्हें नमस्कार करने के लिये हम उत्सुक है। अरिहत हमारे नमस्कार मन्त्र के पांच पद है। पहले पद के अधि- कारी अरिहन्त हैं। अरिहन्त का अर्थ है शत्र को मारने वाला। हमारा लक्ष्य आत्मशुद्धि हैं। हमारे नमस्कार के पात्र परमात्मा है। 'उनको हिसक शब्द के द्वारा सम्बोधित करते हुए क्या, हम नमस्कार क्या फल नमस्कार मत्र ५ विपरीत दिशा को नहीं जा रहे है ? हमे चाहिये था कि हम उन्हें एक पुनीत शब्द से नमस्कार करते, पर ऐसा नहीं किया गया। क्या इसमे कोई गृढ तत्त्व है? हां, यह एक तत्त्व-समीक्षा है। वस्तुत: अरिहन्त शब्द हिंसक वृत्ति का सूचक नहीं। हिंसक वृत्ति होने का हेतु राग-द्वप है। अरिहन्त राग-द्वप रहित होते है। राग-द्वप रहित वृत्ति से ही शत्रु का नाश कर सकते है। अच्छा होगा, यदि हम पहले शत्रु को समझ लें। हमारा शत्रु कोई मनुष्य नहीं, पशु नहीं, पक्षी नहीं, हमारी आत्मा ही हमारा शत्रु है। आत्मा की राग-द्व परूप दुष्प्रवृत्ति ही शत्रु है। मनुष्य एवं पशु-पक्षी को शत्रु मान लेना-मन की भ्रान्ति के सिवाय कुछ नहीं है। प्राणी प्राणी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। विगाड़ करने वाली एक मात्र आत्मीय दुष्प्रवृत्ति ही है। इसी आशय से भगवान् ने फरमाया है- "अप्पामित्तममित्त च दुप्पट्टिन सुपट्टिम" सदाचार में प्रवृत्त होने वाली आत्मा मित्र है, दुराचार में प्रवृत्त होने वाली आत्मा अमित्र है-शत्रु है। गोतम स्वामी ने केशी स्वामी को स्पष्ट शब्दों में कहा है- "एगप्पा अजिए सत्तु कसाया इन्द्रियाणिय"। अर्थात् अवश आत्मा, पाय और इन्द्रिय विकार शत्र है। नमी राजर्पि ने इन्द्र को उत्तर देते हुए कहा है- "अकारिणो एत्य वज्झन्ति, मुच्चइ कारगो जणो"। हमारा अपराध नहीं करने वाले चोर लुटेरों को हम दण्ड देते है और हमारी सद्गुण राशि को लूटने वाले क्रोध आदि अवगुणों को दण्डित करने मे हम उपेक्षा रखते है। इस विवेक- Hor श्रावक प्रतिक्रमण ज्ञान से हम असलो शत्रु को पकड़ सकते हैं। अरिहन्त इसी लिये हमारे उपास्य है कि उन्होंने सच्चे शत्रुओं का वध कर डाला । अरिहन्त शब्द हमें सिखाता है कि शत्रु को शत्रु समझो, मित्र को नहीं। तत्व को पहचानने के बाद अरिहन्त शब्द की पवित्रता में संदेह नहीं हो सकता। पहले पद का अरिहन्त शब्द तीर्थङ्कर का बोधक है। तीर्थङ्कर धर्म के प्रवर्तक एवं चार तीर्थ साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका के संस्थापक होते हैं। आठ कमों में से चार घातिक कर्मों का क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त करते हैं। चार कर्मरूपी शत्रुओं का क्षय करने के कारण वे अरिहन्त कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में हम उन्हें सशरीरी पर- मात्मा भी कह सकते हैं। अरिहन्त उसो जन्म में शेष आयु आदि चार कर्मों का क्षय कर मोक्ष पा लेते हैं। दूसरे पद में सिद्ध हैं। सब कर्मों का नाश कर जो मुक्त जाते हैं-वे सिद्ध कहलाते हैं। इन्हें साधनकी कोई आव- श्यकता नहीं होती है। सिद्ध शब्द मुक्तावस्था का द्योतक है मुक्तावस्था अनन्त, अपुनरावृत्ति एवं अजर अमर है। तीसरे पद में आचार्य हैं। "आचारकुशलत्वादाचार्य " आचार मे कुशल होने से आचार्य कहलाते है। आचार साधु- वृत्ति का आचरण है। उसमें साधु भी कुशल होते हैं। पर आचार्य की विलक्षणता है। आचार्य स्वयं सावधान रहते हैं और दूसरे साधुओं को सचेत रखते हैं। उनका अनुशासन आचार की शिक्षा एवं दीक्षा से परिपूर्ण होता है। अरिहन्त की अनुपस्थिति में उनका सब भार आचार्य के कन्धों पर ही होता है। अतएव आचार्य धर्मधुरन्धर, धर्म-सार्थवाह आदि शब्दों से सिद्ध भाचार्य नमस्कार मत्र सम्बोधित किये जाते हैं। चौथे पद के अधिष्ठाता उपाध्याय हैं। आचार्य के द्वारा उपाध्याय उनकी उस पद पर नियुक्ति होती है। अध्ययन-अध्यापन का सारा काम इनके अधिकार में होता है। पाचवे पद के अधिनायक साधु हैं। "सानोति मोक्ष स्व-पर साघु कार्याणि वा साधु" मोक्ष एवं स्व-पर के कार्यों को साधने वाले साधु कहलाते हैं। पांच महाव्रत-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रहको विधिवत् पालनेवाले व्यक्ति ही साधु होते हैं। साधु जन्मसिद्ध या जातिसिद्ध नहीं हो सकते। पांच महावत के रक्षा म्वरूप आठ नियम और भी उनके लिये अनिवार्य है। वे हैं पाच समिति और तीन गुप्ति। समिति का अर्थ है सम्यक प्रवृत्ति और *गुप्ति का अर्थ है-निवृत्ति। समिति पांच है- (१) ईर्या-देखकर चलना। (२) भाषा-पापरहित वोलना। (३) एपणा-दोपरहित आहार लेना। (४) आदान-निक्षेप-वस्त्र आदि को सावधानी से लेना और सावधानी से रखना। (५) उत्सर्ग- मल, मूत्र, श्लेष्म आदि का जीव रहित भूमि में उत्सर्जन त्याग करना। अहिंस सच्च च अतेणग च, ततो अवम अपरिगह च । परिवज्जिया पच महान्वयाइ, चरिज धम्म जिणदेसिम विउ ।। -उत्तराध्ययन * सयमानुकूलाप्रवृत्ति समिति जैन सिद्धान्त दीपिका * सम्यग् योगनिग्रहो गुप्ति - -

श्रावक प्रतिक्रमण
गुप्ति तीन हैं ।। मन, वचन और शरीर का निग्रह करना
क्रमशः मनोगुप्ति, वचन गुप्ति और काय गुप्ति है। महावत,
समिति और गुप्ति को संख्याबद्ध करने से तेरह होते हैं। इस
प्रकार उक्त पांच नियम और आठ उपनियम साधुओं के लिये
अवश्य पालनीय हैं। नमस्कार महामंत्र का उपसंहार करते हुए
हमें फिर उसी बात को स्मृति में लाना चाहिये कि इस मंत्र में
नमस्कार करने योग्य सब आत्माओं का समावेश है। इसका
स्मरण करने से आत्मा का कर्ममल दूर होता है और आत्मा पवित्र
बन जाती है। यह मङ्गल का बीज, समस्त विघ्नसमूह का नाशक,
अविकार और सत्पथ की ओर अग्रसर करनेवाला महामंत्र है।
** एयायो पचसमिइओ, चरणस्स पवत्तणे ।
गुत्ति नियत्तणे बुत्ता, असुभत्थे सु सम्बसो ।।
-उत्तराध्ययन

लिक्खुत्तो पाठ
गुरु वन्दन विधि
मूल पाठ
तिक्खुत्तो । आयाहिणं । पयाहिणं । (करेमि)
बन्दामि । नमसामि । सकारेमि । सम्माणेमि ।
कल्लाणं । मङ्गलं। देवयं । चेइयं पञ्जुवासामि ।
(मत्थएण वंदामि)।
छाया
त्रिः कृत्वः, आदक्षिण-प्रदक्षिणं (करोमि), वंदे, नमस्यामि,
सत्करोमि, सन्मानयामि, कल्याण, मंगलं दैवतं, चैत्यं, पर्युपासे
(मस्तकेन वंदे)।

१० श्रावक प्रतिक्रमण मंगलं-मगल करेमि करता हूँ। शब्दार्थ तिक्खुत्तो-तीन बार आयाहिणं-दाई से बाई ओर देवयं-धर्मदेव । पयाहिणं--प्रदक्षिणा चेइयश-वैत्य-ज्ञानवान्- चित्तालादक वंदामि-स्तुति करता है। पज्जुवासामि-गुरुदेव में नमंसामि नमस्कार करता हू । आपको पर्युपासना-सेवा सकारेमि-सत्कार करता है। करता हूँ। सम्भाणेमि-सम्मान करता हू मत्थएण-वंदामि और मैं आपको कल्लाणं-कल्याण मस्तकसे वन्दना करता हूँ। अर्थ- मैं दक्षिणी तरफ से आरम्भ कर, तीन बार प्रदक्षिणा देते हुए गुरुदेव की स्तुति करता हूं, उनको नमस्कार करता हूं, सत्कार करता हूं, उनका सम्मान करता हूं। वे गुरु महाराज कल्याण है, मंगल हैं, धर्मदेव हैं, ज्ञानवन्त हैं, चित्त को प्रसन्न करने वाले हैं। ऐसे गुरूदेव की मैं सेवा करता हूं, मस्तक झुका कर बन्दना करता हूं। विवेचन यह गुरु को वन्दना करने की विधि है। गुरु को वन्दना करते समय किस प्रकार नम्र होना चाहिये, उसका उपदेश है। नम्रता अहंकार को प्रतिपक्षिणो है। नम्रता से गुरु के गुणों के प्रति ध्यान आकृष्ट होता है और उनका अनुसरण करने की भावना प्रवल हो उठत्ती है। विनय एक महान गुण है, उसका 4 * सुप्रशस्त मनोहेतुत्वात गुरु वन्दन विधि ११ सम्बन्ध मन, वचन और शरीर इन तीनों से है। अतएव वंदन- सूत्र मे इन तीनों को सरल करने का विधान है। तीन वार दाहिनी ओर से दोनों हाथों को जोड कर प्रदक्षिणा करना शरीर की नम्रता है। गुरुदेव ! मैं आपको बन्दना करता हूं: नमस्कार करता हूँ सत्कार करता हूं; सम्मान करता हूं, यह वाचिक विनय है। गुरुदेव ! आप कल्याण हैं-श्रेयस के साधन हैं। कल्याण का अर्थ प्रातःस्मरणीय भी होता है। जैसे अमर कोप राहार५ मे भानुजी दीक्षित ने लिखा है : "कल्ये प्रात काले अण्यते भण्यते इति कल्याणम्" अर्थात् जो प्रात.काल पुकारा जाता है, वह प्रात.स्मरणीय है। गुरुदेवका नाम प्रातःकाल उठते ही अगम्य हृदयकी सद्भावनाओं के साथ साथ स्मृतिमे आ उतरता है अतः गुरुदेव प्रात स्मरणीय हैं ही। सुप्रसिद्ध आगम टीकाकारोने कल्याण का अर्थ "नीरोगता प्रदान करनेवाला" किया है। जैसे- "कल्य अत्यन्त नीरुक्तया मोक्ष , तमाणयति प्रापयति इति कल्याण मुक्तिहेतो" इसका आशय यह है कि कल्य यानी रोगमुक्तस्थान मोक्ष क्योकि उसमे ही आत्मा पूर्णरुपेण कर्मरोग से मुक्त रह सकती है। उस नीरोगदशा-मोक्ष को प्राप्त करानेवाला कल्याण कहलाता है। गुरु मोक्षपथके दर्शक हैं अत: उनको कल्याण कहना उनके कार्यके अनुरूप है। गुरुदेव । आप मंगल हैं। मंगल शब्द भी बाहरीरूपसे तो कल्याण से मिलता जुलता सा है किंतु इसका आन्तरिक तत्त्व कुछ और है। संसारिक जनता द्रव्य मंगल-दूर्वा, कुंकुम; अथवा १२. थावक प्रतिक्रमण सांसारिक देवता, इन अवास्तविकं मंगलों के चक्रमें फंसकर वास्तविक मंगल, जो अध्यात्म मंगल है, उसको भूलसी गई है अतः उस भूलको सुधारने के लिए, आत्मजागरण में लीन रहनेके लिए गुरुदेव के साथ मंगल शब्द जोड़ा गया है । इसका अर्थ यह है कि गुरुदेव ! मुझे संसारचक्र-जन्ममरण-परंपरा से छुड़ानेवाले आप ही है अत: मेरे लिए आपही वास्तविक मंगल हैं। जैसा कि मंगल शब्द की व्युत्पत्ति बतलाते हुए आचार्य हरिभद्र ने लिखा है- "मा गालयति भवादिति मगलम्, ससारादपनयति" जो मुझे मेरी आत्मा को संसार बंधन से मुक्त करता है, वह मंगल है। यह विशेषण गुरु के साथ समुचितरूप से घटता है। गुरुदेव ! आप धर्मदेव हैं। जैनदर्शन हमें उन भोगी-विलासी देवताओं की उपासना करना नहीं सिखाता। अध्यात्म-मार्ग उन्हीं देवताओं की अराधना करना सिखाता है, जो "दिव्यन्ति स्वरूपे देवा." आत्मस्वरूप में देदीप्यमान हैं, जिनकी आत्मा में विशुद्ध चारित्र की लौ जगी हुई है। गुरु के लिए देव शब्द का प्रयोग करना अत्युक्ति नहीं। गुरु का स्थान तो देवता से कहीं और अधिक ऊंचा है। गुरुको हम नमस्कार महामन्त्रमें परमेष्टी या परमात्मा कहते है तो फिर क्या 'देवता' का परमात्मा से भी अधिक महत्त्व है? एक बात और भी आश्चर्य की है कि जब आचार्य को तीर्थकर के समान भगवान् या पूज्य परमेश्वर कहा जाता है तब बहुत से जैनी भी असमंजस में पड़ जाते हैं परन्तु गम्भीरता से काम लिया जाय तो इसमें विचार करने जैसी कोई भी बात नहीं। सामायिक-ग्रहण के समय गुरु को 'भन्ते' गुरु वन्दनविधि १३ शब्द से सम्बोधित किया जाता है, जिसका अर्थ है 'भगवन् । इसके अतिरिक्त आचार्यों को "अजिणा जिणसक्कासा" जिन नहीं किन्तु जिनके समान कहा गया है। जैनधर्म के सिवाय वैदिक धर्म में भी संसार से उदासीन महात्मा को दूसरा परमेश्वर कहा है। जैसे- कान्ताकाञ्चनचक्रेपु, भ्राम्यति भुवनत्रयम् । तासु तेषु विरक्तो यो, द्वितीय परमेश्वर ॥ अतः उपरोक्त शब्दों से आचार्य को सम्बोधित करना सर्वथा उचित है। गुरुदेव ! आप चैत्य है ; अर्थात् ज्ञानसहित हैं। चैत्य शब्द अनेकार्थक है। प्रस्तुत पाठ की टीका करते हुए भिन्न भिन्न आचार्यों ने भिन्न २ अर्थ किये है, जैसे:- चैत्य-चित्त को आह्लादित करनेवाले। चैत्य-मनके सुप्रशस्त होने के हेतु । कई आचार्य चैत्य का अर्थ प्रतिमा भी करते हैं परन्तु उसका गुरुवन्दन के साथ मेल नहीं बैठता। इस प्रकार की हृदयवर्तिनी शुद्ध भावना मानसिक विनय है। आप इस प्रकार गुण सम्पन्न धर्ममूर्ति है। अतएव मैं आपके तप पून चरणों मे सबसे उत्तम अङ्ग सिर को मुका कर प्रणाम करता हूं। कार्य कारण के अनुरूप ही करना चाहिये। यही औचित्य और सद्विवेक है कि गुण सम्पन्न आत्माओं का विशाल गुण गौरव हमें वन्दना की ओर प्रेरित कर सके, चूकि नमस्कार जीवन की एक अमूल्य निधि है । * चित्ताहादकत्वाद् बा चैत्य-ठा० ठा० ४ १० २ अभयदेवसूरि +चत्य सुप्रशस्तमनोहेतुन्चात्-राजप्रश्नीय सूर्याभदेवताधिकार ।

सामाश्य पडिन्ना सामायिक-प्रतिज्ञा [ सामायिक विधि ] मूल पाठ करेमि भंते ! सामाइयं सावज्जं जोगं पच्च- क्खामि जाव नियम (मुहुत्त एगं) पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । छाया करोमि भगवन् ! सामायिकं सावध योग प्रत्याख्यामि यावन्नियम (मुहूर्तम् एकम् ) पर्युपासे द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन। तमपि भगवन् ! प्रति- क्रमामि निन्दामि गहें आत्मानं व्युत्सृजामि ।

सामायिक-प्रतिज्ञा शब्दार्थ करेमि-करता हूँ। न कारवेमि-न कराऊगा। भन्ते। हे भगवन् मणसा-मन से सामाइयं-सामायिक वयसा-वाणी से सावज्जंजोग-सावध योग का कायसा-शरीर से पञ्चक्खामि-प्रत्यास्यान करता हू । तस्स भन्ते!-पूर्वकृत सावध जाव नियम--समायिक का जितना योग से हे भगवन् (एक मुहूर्त तक) पडिकमामि-निवृत्त होता हूँ। काल है। निन्दामि-निन्दा करता हूँ। पन्जुवासामि-पालन करताहू। गरिहामि-गर्दा करता हूँ। दुविहं-दो कारण अप्पाण- आत्मको तिविहेणं -तीन योग से वोसिरामि-पाप से दूर न करेमि-न करूगा। करता हूँ। अर्थ . हे भगवन् । मैं समता रूप सायायिक व्रत ग्रहण करता हूं। सामायिक प्रतिज्ञा पापमय कार्यों का त्याग करता हूं। एक मुहूर्त (४८ मिनिट) तक मैं पापमय कार्यों का, दो करण तीन योग से (न करून कराऊ, मन से, वचन से, काया से ) त्याग करता हूं! पूर्व कृत पापों से भी हे भगवन् । मैं निवृत्त होता हूं। उनकी निन्दा करता हूं, उनसे घृणा करता हूं और उनसे दूर होता हूं। * तस्यापि शब्द लोपात् पप्ठी च द्वितीयाणे अतीत सावद्य- योगमपि।

१६ १ श्रावक प्रतिक्रमण सामायिक से विवेचन सामायिक शब्द जैन जगत् में आबालवृद्ध प्रसिद्ध है। प्रायः धार्मिक स्त्री-पुरुषों में सामायिक करने की प्रबल उत्कण्ठा रहती है। सामायिक, दिनचर्या का एक प्रधान अङ्ग है। बहुत गृहस्थ दिन की पहल सामायिक से ही करते है। सामायिक वस्तुतः अभ्यास के उपयुक्त है। इससे जीवन- वृत्तियां शुद्ध बनती है। संयमी-जीवन का अनुभव होता है। आत्मा को शुद्ध, सरल और उन्नत होने में इससे असाधारण प्रेरणा मिलती है। एक मुहूर्त तक हिंसा, असत्य, चौर्य, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि पापकारी प्रवृत्तियों को त्याग देने का नाम सामायिक है। जिस प्रकार इन दुष्प्रवृत्तियों का सेवन निज को मन, वचन एवं शरीर से त्यागना पड़ता है, उसी प्रकार दूसरों के पास मनसा, वाचा, कर्मणा, पापमय कार्य न कराऊँ, यह भी प्रत्याख्यान करना पड़ता है* 1 सामायिक आत्म-संयम है। अशुभ आचरणों की निवृत्ति है। सामायिक क्या है? - * सामायिक का प्रत्याख्यान छ: कोटि से करने का विधान है और उसका पालन करने की परम्परा आठ कोटि से है। यदि' सामायिक व्रत का आठ कोटि से प्रत्याख्यान किया जाय तो भी कोई आपत्ति नहीं है। जैसे सावध कार्य न करूं मन से, वचन से, काया से, न कराऊँ मन से, वचन से, काया से, न अनुमोद् वचन से, . - - काया से।

समायिक प्रतिज्ञा १७ लाभ सामायिक से जो लाम होता है वह सामायिक शब्द मे ही सामायिकसे अवतरित है। जिस अनुष्ठान से समता का लाभ मिले वह सामायिक है। सामायिक करने से गृहस्थ साधु की तरह संयमी बन जाता है । साधु का संयम पूर्ण होता है और गृहस्थ का संयम आशिक, तो भी 'समुद्रवत्तडाग' के अनुसार सामायिकत्रत गृहस्थ को साधुवृत्ति का उपमेय वना देता है। सामायिक का लाभ बतलाते हुए प्राचीन आचार्यों ने लिखा है गृही उसस्थावरजन्तुराशिपु, सदैव तप्तायसगोलकोपमा । सामायिकावस्थित एप निश्चित, मुहूर्तमात्र भवतीह तत्मख ॥ अर्थात् गृहस्थ उस और स्थावर दोनों प्रकार के प्राणियो के लिये अग्नितप्त लोहे के गोले के समान है। चूकि गृहस्थ सासा- रिक प्रवृत्तियों में फंसे रहने कारण सब प्रकार के प्राणियो की हिंसा करने में तत्पर रहता है। हिंसा-तत्पर होने के कारण निस्सन्देह सब प्राणियों का शत्रु है। वही गृहस्थ सामायिकस्थ होते हो एक मुहूर्त के लिये सब प्राणियों का सखा बन जाता है, इससे बढ़ कर और क्या लाभ हो सकता है ? यह निरारम्भ धृत्ति की उपासना का हो फल है कि एक गृहस्थ भी सवको अभय दान दे देता है और सबका मित्र बन जाता है। इसके अतिरिक्त सामायिक से पूर्व संचित कर्मों का नाश होता है और आत्मा उज्ज्वल बनती है। सामायिक साधना है, सिद्धि नहीं। सामायिक का पालन सामायिक जैसे उपयोगी है, वैसे ही उसका असली स्वरूप जानना भी उप अभ्यास है योगी है। सामायिक को स्वीकार कर क्या करना चाहिये ? यह अवश्य ज्ञातव्य है। अन्यथा निज को भी सामायिक के

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१८
श्रावक प्रतिक्रमण
महत्त्व का भान नहीं होगा और आसपास के पड़ोसी भी उसे
उपहास की सामग्री बना देंगे। शून्य-चित्त की क्रिया तो जैसी
होती है वैसी ही होती है। सामायिक आत्मा को सावधान
करने का साधन है। अतः इसका अनुशीलन साधकों को पूरी
सावधानी से करना चाहिये। सामायिक के उचित कर्तव्यों
का उल्लेख करते हुए शास्त्रकारों ने लिखा है-
सामायिकस्थ. प्रवरागमार्थ, पृच्छन् महात्माचरित स्मरेच्च ।
आलस्य निद्रा विकथादि दोषान्, विवर्जयेच्छुद्धमना दयालुः ॥
सामायिक में गृहस्थ
को गुरु के समक्ष आगम के अर्थ पूछने
चाहिये। उन पर मनन करना चाहिये। मनुष्य क्यों दुखी
वनता है ? सुख की प्राप्ति कैसे हो सकती है ? अनित्य चितन,
एकत्व चिंतन प्रमुख बारह भावनाओं का चिंतन करना
चाहिये। महापुरुषों के आचरणों का स्मरण करना चाहिये,
जिससे सामायिक का लक्ष्य अटल रह सके। सामायिक में
आलस्य, विकथा, निद्रा आदि दोष वर्जनीय है। सामायिक मे
मानसिक, वाचिक और कायिक प्रवृत्तियों पर पूरा २ संयम होना
आवश्यक है। बिना देखे चलना-फिरना और अनुचित ढङ्ग से
बैठना, आदि कायिक दोप है। बुरे वचन बोलना, बिना विचारे
बोलना, हिंसामिश्रित बोलना, कलहोत्पादक वाणी बोलना,
विकथा करना, आने जाने का आदेश देना आदि वाचिक दोष
है। कोप करना, यश की अभिलापा करना, अहंकार करना
आदि मानसिक दोप है। सब का सारांश यही है कि सामा-
यिक को स्वीकार कर उसके पालन करने में यत्नशील रहना
चाहिये। केवल समय की पूर्ति और प्रथा का अनुसरण मात्र
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सामायिकप्रतिज्ञा १६ हो आदेय नहीं होना चाहिये। धम विनय-प्रधान है । सामयिक व्रत स्वीकार करते सामायिक में समय श्रद्धालु गृहस्थ गुरु से आदेश लेता है। गुरुसाक्षो पूर्वक आत्म-ऋजुता समायिक प्रतिज्ञा-पाठ का उच्चारण करता है। आत्मा को नि शल्य बनाने के लिये वह बोलता है-'हे भगवन् । आज से पहिले मैंने जो कुछ पापो का आचरण किया है-उनसे मैं निवृत्त होता है। आत्म-साक्षी से उनको मै निन्दा करता है। गुरुदेव । आपकी साक्षी से उस पापाचरण की गर्दा करता हूं और वर्तमान मे दुष्प्रवृत्तिमय आत्मा को त्यागतो हूँ"उक्त प्रकारेण अतीत सावद्याचार की निन्दा और वर्तमान एवं भविष्य में उसका प्रत्याख्यान करने वाले की आत्मा में सरलता का स्रोत उमड़ पड़ता है। यह कितनी महानता और कितना औदार्य है। मानव-प्रकृति दूसरों के अवगुण देखने मे ही तत्पर रहती है, दूसरों को निन्दा में ही मनुष्य संतुष्ट रहता है। पर सामायिक का अभ्यास आत्मा के अवगुणों को देखना सिखाता है। पर- निन्दा से बचने के लिये आत्म-निन्दा का सत्पथ दिखलाता है और भविष्य को उज्ज्वल और साधनामय बनाता है। आत्म- सरलता से सामायिक का घनिष्ट सम्बन्ध है। बहुत से लोग इस आशंका को लिये हुए सामायिक करने से समायिक के हिचकते हैं कि क्या कर, मनतो स्थिर रहता नहीं, फिर केवल प्रति सामायिक करनेसे ही क्या लाभ है ? इसके बारे मे सूत्र रूपसे तो औदासीन्य पहले ही कहा जा चुका है कि सामायिक अभ्यास है-साधना है, साध्य नहीं। अध्यात्मसाधक के सन्मुख पूर्ण आत्मविकास- मोक्ष साध्य होता है। साध्य ठीक है तो फिर उसकी साधनामे २० श्रावक प्रतिक्रमण जो कहीं स्खलना हो जाय, उससे घबराने की तब आवश्यकता नहीं। स्खलना के भय से साधना को छोड़ देना वनभूल है। घाटे के भयसे व्यापारीवर्ग व्यापार करना छोड़दे और फसल खराब होने की आशङ्का से कृषकवर्ग बीज बोना छोड़दे तो क्या वे अपना जीवन निर्वाह कर सकते है ? आत्मसाधक भी साधना मे हो जानेवाली कुछ त्रुटियों से घबड़ाकर समूची साधना को ठुकरादे, यह उचित नहीं। इसके विपरीत उसे उन त्रुटियों पर विजय पाने की चेष्टा करते रहना चाहिए । मानलो कि सामायिक में मन स्थिर न रहा तो उसका पूर्ण लाम नहीं मिला पर वह बिल्कुल वेकार तो नहीं हुई। सामायिक में शरीर, वचन और मन इन तीनों की पापमय प्रवृत्ति करनेका त्याग होता है। मानसिक दोप लगने से समायिक का भंग नहीं होता, किन्तु उसमे दोप लगता है। इसके अतिरिक्त शरीर और वाणी पर नियन्त्रण रहता है, उनका पापमय व्यापार नहीं होता है, यह कोई कम वात नहीं है। विवेकी मनुष्य पूरा लाभ न मिलने की दशामे अधुरा लाभ मिले, उसे छोड़ता नहीं। हा, साधक का लक्ष्य सामायिक में मानसिक दोप सेवन का नहीं होना चाहिए। यदि दोप लगजाये तो उसकी विशुद्धिकेलिए प्रायश्चित्त करले किन्तु इसके बहाने सामायिक करना न छोड़े, क्योंकि साधना करते- करते मन पर विजय होगी तथा पूर्ण विशुद्धि का द्वार भो खुल जावेगा। और संयोगवशात् किसीका मन आजीवन भी वशमे न हो, तो भी वह शरीर और वचनको पाप कमों से अलग रखने वाला एवं मानस- विजय की साधना में लगा रहनेवाला टोटेमें नहीं रहता।

इरियाकहियं सुतं
[ ईर्यापथिक सूत्र]
मूल पाठ
मक्कड़ा-संताणा
इच्छामि पडिकमिउं इरियावहियाए विराहणाए
गमणागमणे पाणक्कमणे बीअकमणे हरियकमणे
ओसा-उत्तिम-पणग-दग-मट्टी
संकमणे जे मे जीवा विराहिया एगिदिया, बेइंदिया,
तेइंदिया, चउरिदिया, पंचिदिया, अभिहया
त्तिया लेसिया सघाइया संघट्टिया परियाविया
किलामिया उद्दविया ठाणाओ ठाणं संकामिया
जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छामि दुकडं।

२२
श्रावक प्रतिक्रमण
छाया
इच्छोमि प्रतिक्रमितुं ईर्यापथिक्यां विराधनायां गमना-
गमने प्राणाक्रमणे वीजाक्रमणे हरिताक्रमणे अवश्यायोतिंगपनको-
दकमृतिकामर्कटसन्तानाः (तेषाम) संक्रमणे ये मया जीवाः विरा-
धिताः एकेन्द्रियाः द्वीन्द्रियाः त्रीन्द्रियाः चतुरिन्द्रियाः पचेन्द्रिया:
अभिहताः वर्तिताः श्लेषिताः सङ्घातिताः सङ्घट्टिताः परितापिताः
क्लामिता: अवदाविताः स्थानात स्थानं संक्रामिता: जीवितात
व्यपरोपिताः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ।
शब्दार्थ
इच्छामि-मै इच्छा करता हूँ। मट्टी-मिट्टी
पडिक्कमिउं-निवृत्त होने की- मक्कडा संताणा--मकडी के जाल
वचने की।
संकमणे-आक्रमण हुआ हो
इरियावहियाए-मार्ग पर चलने जे मे जीवा-जो मेरेसे जीवोकी
आदिसे होने वाली। चिराहिया-विराधाना हुई हो-
विराहणाए-विराधना से। एगिदिया-एक इन्द्रियवाले-
गमणागमणे-जाने आने में बेईदिया-दो इन्द्रित्रवाले
पाणक्कमणे-किसी प्राणी को तेइंदिया-तीन इन्द्रियवाले-
चउरिदिया-चार इन्द्रियवाले
बीअकमणे-बीज को दवाकर पंचिंदिया-पाच इन्द्रियवाले
हरियकमणे-वनस्पति दवाकर। अभिया--सम्मुख आने से
ओसा-ओस
चोट पहुंचाई हो
उत्तिंग-कीडियोके विल, वत्तिया-धूल आदि से ढके हो
पणग-पाच वर्ण की काई। लेसिया-भूमि पर मसले हो
संघाइया- इकट्ठे किये हो
दवाकर।
दग-पानी।

ईर्यापथिक सूत्र
संघट्टिया-छूए हो
परियाचिया-कष्ट पहुचाया हो
किलामिया-मृततुल्य किये हो
उदविया-भयभीत किये हो
ठाणाओ-एक स्थान से
ठाणं-दूसरे स्थान में
संकामिया-अयला से रखे हो
जीवियाओ-प्राणसे
ववरोविया-रहित किये हो
तस्स-उसका
मिच्छामि-निष्फल हो मेरे लिये
दुक्कडं--पाप।
भावार्थ
हे भगवन् ! रास्ते में चलते फिरते समय जो मेरे से जीव ईर्यापथिक
हिंसा हुई हो, उस हिंसा से होनेवाले अतिचार से निवृत्त होने की सूत्र
मै इच्छा करता हूं। मार्ग में आते जाते समय भूतकाल में मैंने
यदि किसी जीव को दवाया हो, कुचल डाला हो, किसी जीव
सहित बीज, हरी वनस्पति, ओस की बूदे, चोटियों के विल, पांच
वर्ण की फूलन, जीव सहित पानी, जीव सहित मिट्टी तथा मकड़ियों
के जाल आदि को दबाया हो, कुचल डाला हो, जीव हिंसा की
हो, किसी एक इन्द्रियवाले, दो इन्द्रियवाले, तीन इन्द्रियवाले, चार
इन्द्रियवाले, पाँच इन्द्रियवाले जीव को चोट पहुंचाई हो, उनको
धूलि आदि से ढका हो, जमीन पर उनको आपस में मसल कर,
इकट्ठा कर, उनका ढ़ेर-समूह किया हो, उनको कष्ट पहुंचाया हो,
उनको मृतकवत् कर डाला हो, उनको भयभीत किया हो, उनको
एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान में अयत्न पूर्वक रखकर उनका
जीवन नष्ट किया हो। इस प्रकार जान में या अनजान मे जो
भी हिंसा मेरे से हुई हो, पाप कर्म बंधा हो तो उसके लिए मैं हृदय
पश्चाताप करता हूं, ताकि उस पाप का फल निष्फल हो सके।

२४ श्रावक प्रतिक्रमण विश्व-मैत्री ईयोपथिक सूत्र में समता का हृदयग्राही उपदेश है। इसके चिन्तन से हृदय अहिसा का उपासक बन जाता है। यह वैषम्य के साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का अनुपम साधन है। जनसमूह ने मनुष्य के सुखों का ही महत्त्व समझ रक्खा है। मनुष्य के लिये चाहे कितना ही अनर्थ क्यों न कर लिया जाय, वह क्षम्य है। इससे कुछ आगे चलें तो कई विचारकों ने चलते फिरते प्राणियों के प्रति अहिंसा का संकेत किया है परन्तु पृथ्वी-जल- वनस्पति आदि के मूक जीवों के प्रति सबने उदासीनता दिखाई है। इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों ने आगे चलकर इनका वध करना सहज एवं प्रकृति-सिद्ध मान लिया। गृहस्थ इनकी हिंसा से सर्वथा विलग नहीं रह सकता-यह निश्चित है, तो भी बिलकुल उपेक्षा रखना अनुचित है। इनकी हिसा भी हिसा है। गृहस्थ को चाहिये कि इनकी हिंसा का संकोच करे। प्रयोजन से गृहस्थ को अशक्य कोटि की हिंसा करनी पड़े तो अनर्थ हिंसा से तो दूर रहने की कोशिश करे। गृहस्थ के लिये ईपिथिक सूत्र का चिंतन इसीलिए उपयोगी है कि वह एकेन्द्रिय जीवों की अनर्थ हिंसा करने का प्रत्याख्यान करता है और अर्थ हिंसा पर नियन्त्रण करता है। यह समता का बीज है और जगन्मैत्री का अनूठा आदर्श है। मिच्छामि 'मिच्छामि दुक्कडम्' में "मिथ्या मे दुष्कृतम्" ये तीन शब्द दुक्कडम् हैं। यह साधारण दोषो का प्रायश्चित्त है। इसका अर्थ है- मेरे पाप मिथ्या हो, निष्फल हों। "मिथ्या मे दुष्कृतम्" केवल वाड् (वचन) मात्र ही नहीं है। यह पाप शुद्धि के लिये रहस्य भरा मन्त्र है। मिथ्या मे दुष्कृतम् में हृदय की शुद्धि भरी पड़ी है।

ईपिथिक सूत्र २५ यद्यपि इसका व्यवहार साधारण से साधारण है तथापि यह एक बडी महत्त्व की वस्तु है। मनुष्यों में सबसे बड़ा यह अवगुण होता है कि वह अपने दोष को दोष नहीं समझते। कोई विरला आदमी अपने दोष को दोष जान भी लेता है, तो भी वह दम्भ भरे हृदय से अपने दोष को प्रकट नहीं करता। वे मनुष्य विरले ही होते है जो अपने दोष को दोष जान लेते है, सरल हृदय से उसे प्रकट कर देते हैं और उसके प्रायश्चित्तस्वरूप "मिथ्या मे- दुष्कृतम्" के समान सरल और शुद्ध भावना स्वीकार करते हैं। "मिथ्या मे दुष्कृतम्" कहना महान् आत्मा का काम है, सरल हृदय का काम है। कुटिल हृदय "मिथ्या मे दुष्कृतम्' कंदापि नहीं कह सकता। प्रथा के रूपमें या लोक दिखाऊ यदि कह भी देतो वह शब्दालाप मात्र होगा। "मिथ्या मे दुष्कृतम्" वस्तुतः निजी दोषों के प्रति पश्चात्ताप की भावना से कहना चाहिये। आत्म-दोषों को देखते हुए और उनके प्रति घृणा करते हुए कहना चाहिये। उसी दशा मे यह दोषों से मुक्ति पाने में महान सहायक और एक महा मन्त्र का काम कर सकता है।

काङसम्म पडिन्ना
कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा
मूल पाठ
उत्तरीकरणणं पायच्छित्तकरणणं
विसोहिकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं
निग्घायणट्ठाए ठामि काउस्सग्गंअन्नत्थ ऊससिएणं,
नीससिएणं खासिएणं. छोएणं जंभाइएणं
'उड्डुएणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए
सुहुमेहिं अंपसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहि
सुहुमेहिं दिहिसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहि
अभग्गो अविराहिओ हुज मे काउस्सग्गो जाव
अरिहंताणं भगवंताणं नमुक्कारेणं न पारेमि
ताव कायं ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं
वोसिरामि ।

कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा २७ छाया तस्य उत्तरीकरणेन प्रायश्चित्तकरणेन विशोधिकरणेन विशल्यीकरणेन पापानां कर्मणां निर्घातनार्थाय तिष्ठामि कायो- त्सर्गम् अन्यत्र उच्छ्वसितेन निःश्वसितेन कासितेन क्षुतेन जृम्भितेन उद्गारितेन वातनिसर्गेण भ्रमर्या पित्तमूर्छया सूक्ष्मः अङ्गसञ्चालैः सूक्ष्मः श्लेष्मसञ्चालैः सूक्ष्मैः दृष्टिसञ्चालैः एवमा- दिभिः आकारैः अभन्नः अविराघितः भवतु मम कायोत्सर्ग: यावद् महतां भगवतों नमस्कारेण न पारयामि तावत् कार्य स्थानेन मौनेन ध्यानेन आत्मीयं व्युत्सृजामि । शब्दार्थ तस्स-उसको अन्नत्थ-इन आगारो के बिना उत्तरीकरणणं-श्रेष्ठ-उत्कृष्ट ऊससिएणं-उछ्वास बनानेके निमित्त नीससिएणं-नि श्वास पायच्छित्तकरणणं-प्रायश्चित्त- खासिएणं-खासी आलोचना करने के लिये छीएणं-छीक विसोहिकरणेणं-विशेष रूप से जंभाइएणं-जम्हाई शुद्धि करने के लिये उड्डुएणं-डकार विसल्लीकरणेणं-तीन शल्य का वायनिसग्गेणं-अधोवाय त्याग करने के लिये भमलीए-चक्कर पावाणं कम्माणं-पाप-कर्मों का पित्तमुच्छाए-पित्तविकार- निग्घायणवाए-नाश करने जनित मूर्छा के लिये सुहुमेहि-सूक्ष्म, थोडा अगसञ्चालेहि अगसचार कारस्समग कायोत्सर्ग-ध्यान सुहुमेहिं—सूक्ष्म ठामि करता हू २८ श्रावक प्रतिक्रमण न करू। ताव-तब तक . जाव-जवतक खेलसंचालेहि-श्लेष्म, कफसचार भगवंताण-भगवन्तको सुहुमेहि-सूक्ष्म नमुक्कारेणं-नमस्कार करके दिहिसंचालेहिं--दृष्टिसचार एवमाइएहि-इत्यादि पारेमि-पारू सम्पूर्ण ध्यान आगारेहि-आगारोसे अभग्गो-भग नही अविराहिओ-अविराधित, कार्य-काया को अखण्डित 'ठाणणं-स्थिर रख कर मोणेणं-मौन रह कर मे मेरा माणेणं-ध्यान घर कर काउस्सगो-ध्यान-कायोत्सर्ग. अप्पाणं-आत्मा को वोसिरामि-पापमय प्रवृतियो अरिहंताणं-अरिहत को टोडता हूँ। भावार्थ रास्ते में चलते फिरते. समय मुझसे जो हिंसा हुई है और उससे जो मेरी आत्मा मलीन हुई है, उसके लिये मैंने 'मिच्छामि दुक्कड' किया है। परन्तु सिर्फ उससे यदि मेरी आत्मा निर्मल न हुई हो तो आत्मा को अधिक निर्मल करने के लिये प्रायश्चित्त करना परमावश्यक है। प्रायश्चित्त के विना परिणामों की विशुद्धि हो नहीं सकती। परिणामों की विशुद्धि शल्य का त्याग करने से होती है। शल्यका त्याग एवं पाप कर्मका नाश, कायोत्सर्ग अर्थात् ध्यान से होता है। अतएव मैं कायोत्सर्ग-ध्यान करता हूं। मैं नीचे लिखे आगारों को छोड़ कर, शरीर को स्थिर रक्खूगा हिलाऊँगा नहीं। श्वासोछ्वास, खांसी, छींक, जम्हाई, डकार, अधोवायु, कायो.सर्ग तितज्ञा कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा . २९ कायोत्सर्ग मस्तक आदि में चक्कर, पित्तविकार से मूर्छा, अंग का सूक्ष्म संचालन,दृष्टि का संचालन, कफ, थूक आदि का संचार इत्यादि स्वयमेव होने वाली शरीरिक क्रिया के होने पर भी मेरा ध्यान भंग न हो, अखण्ड रहे एवं जबतक अरिहन्त भगवंत को ‘णमो अरिहताण' शब्द से नमस्कार करके ध्यानको पूर्ण न करूं, तबतक शरीर को स्थिर रख कर, वचन से मौन रह कर तथा मन से शुभ ध्यान धर कर मैं अपनी आत्मा को वोसिराता हूं। शरीर की वृत्तियों को स्थिर करने का नाम कायोत्सर्ग है। ध्यान और कायोत्सर्ग मे कुछ अन्तर है। ध्यान का मुख्य काम मन को एकाग्र करना है और कायोत्सर्ग का मुख्य काम शरीर की अस्थिरता को रोकना है। गौण रूप से ध्यान और कायोत्सर्ग का पारस्परिक सम्बन्ध है। जैसे ध्यानावस्था में शरीर को स्थिर • करना आवश्यक है और कायोत्सर्ग में मन की एकाग्रता नितान्त चांछनीय है। कायोत्सर्ग में शरीर को अडोल कर दोनों आँखें मूद कर बिना बोले मानसिक एकाग्रता पूर्वक ईर्यापथिक सूत्र का चिंतन किया जाता है। एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तकके जीवों को कष्ट पहुंचाने, भयभीत करने या कुचल डालने आदि कार्यों से जो दोष लगता है उसकी शुद्धिके लिये यह चिंतन प्रायश्चित्तस्वरूप है। कायोत्सर्ग का मुख्यध्येय स्वकृत दोषों का अवलोकन और उनके प्रति प्रायश्चित्त करना है। मन और शरीर का गाढ़ सम्बन्ध है। कायिक चंचलता को स्थिर करनेसे मन शान्त होता है। मन की शान्ति से विचार पवित्र बन जाते है। पवित्र विचार से पूर्व कृत दोषों की निवृत्ति हो जाती है। दोप निवृत्ति से आत्मा उज्ज्वल होती है। ।

३० 'अप्पाण श्रावक प्रतिक्रमण 'अप्पाणं बोसिरामि' का अर्थ है आत्म-व्युत्सर्जन-आत्मा वोसिरामि' को त्यागना । आत्माको कैसे त्यागा जा सकता है ? वह तो जीव का पर्यायवाची शब्द है। यहां आत्मव्युत्सर्ग से आत्मा का हिंसा आदि असद् आचरणरूप दुष्प्रवृत्ति को त्यागने का अर्थ लेना चाहिये। आत्मा' त्यागर्ने योग्य नहीं, आत्मा की दुष्प्रवृत्ति त्याज्य है।

उकित्तणं उत्कीर्तनं चतुर्विंशतिस्तव चौबीस तीर्थंकरो का स्तवन मूल पाठ लोगस्स उज्जोअगरे, धम्मतित्थयरे जिणे । अरिहंते कित्तइस्स, चउवीसंपि केवली ॥१॥ उसभमजियं च वन्दे, संभवमभिणंदणं च सुमइं च पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चन्दप्पहं वंदे ॥२॥ सुविहिं च पुप्फदंत, सीयल सिज्जंस वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्म संतिं च वंदामि ॥ ३ ॥ कुंथु अरं च मल्लि, वंदे मुणिसुव्यं नमिजिणं च। वंदामि रिहनेमि, पासं तह बद्धमाणं च ॥१॥ एवं मए अभिथुआ, विहुअरयमला पहीणजरमरणा।

३२ श्रावक प्रतिक्रमण चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥ कित्तियशवंदियमहिया,जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरुग्गबोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दितु ॥६॥ चंदेसु निम्मलयरा; आइच्चेसु अहियं पयासयरा, सागरवरगंभीरा सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥७॥ छाया लोकस्य उद्योतकरान् धर्मतीर्थकरान् जिनान् अरिहन्तुन कीर्तयिष्यामि चतुर्विशतिम्-अपि-केवलिनः पमम् अजितं च वन्दे सम्भवम् अभिनन्दनं च सुमतिं च पद्मप्रभं सुपाय जिनं घ चन्द्रप्रभ वन्दे मुविधिं च पुष्पदन्तं शीतलश्रेयांसवासुपूज्यान ध विमलम् अनन्तं च जिनं धर्म शान्ति च बंदामि कुन्थुम् अरंच मल्लिं वन्दे मुनिसुव्रतं नामिजिनं च वन्दे अरिष्टनेमि पाव तथा वर्धमानं च एवं मया अभिष्टुताः विधूतरजोमला: प्रहीणजरामरणाः चतुर्विंशतिः अपि जिनवरा: तीर्थकरा: मम प्रसीदन्तु कीर्तितवन्दित महिताः ये एते लोकस्य उत्तमाः सिद्धाः आरोग्यबोधिलाभ समा- धिवर उत्तम दद्तु चन्द्र भ्यः निर्मलतरा: आदित्येभ्यः अधिक प्रकाशकरा: सागरवरगम्भीराः सिद्धाः सिद्धिं मम दिशन्तुः । *कित्तियावदिया भए इत्यपि पाठः चंनुर्विशतिस्तव ३३ वासुपूज्य को - , शब्दार्थ लोगस्स-लोक में सीयलसिन सवासुपुब्न-शीतल उज्जोअगरे-उद्योत करनेवाले नाथ को, श्रेयासनाथको, धम्मत्थियरे जिणे-धर्मरूपी तीर्थ को स्थापित करनेवाले,राग-द्वेष च-और जीतनेवाले विमलमणत-विमलनाथ को अरिहंते कित्तइस्स-तीर्थकरी का और अनन्तनाथ को में स्तवन करता हूँ । च जिणं-जिनको चवीसपि केवली-चौबीस धम्म संति चवंदामि-धर्मनाथ केवली को, शातिनाय को वन्दना उसभमजियं च वंदे-ऋषभ को करता हूँ। और अजितको वन्दना करता हूँ । कुंथु अरंच मल्लि चंदे कृथु- संभवमभिणंदणं-सभवनाथ को, नाथकी, अरनाथ को और अभिनन्दन स्वामी को मल्लिनाथको वन्दना करता हूँ । च-पुन मुंणिसुब्वयं-मुनि सुव्रत को सुमई च -सुमति नाथ को नमि जिणं-मिनाथ जिनको पउमप्पई-पप्रमको च-और सुपासं-सुपार्श्वनाथ को वंदामि वन्दना करता हूँ। जिणं-जिन टिनेमि पासंतह वद्धमाणं च- अरिष्टनेमि, पार्श्वनाथ तथा चंदप्पहं वंदे-चद्रप्रमको बन्दना 'वर्द्धमान-महावीर भगवानको करता हूँ। एवंमए अमिथुआ इस प्रकार सुविहिं चे पुप्फेदंत-सुविधिनाथकों से मेरे द्वारा स्तवन (दूसरा नाम) पुष्पदत को किये गये - ३४ श्रावक प्रतिक्रमण सम्यक्त्व का लाभ और मरण से मुक्त मे-मुझपर विहुअरयमला-पापरूपी रज आरुग्गयोहिलाम-आरोग्य- के मल से रहित पहीणजरमरणा-जरा-वृद्धावस्था समाहिवरमुत्तमंदितु-समाधि का वर उत्तम-श्रेष्ठ दें चउवीसं पि जिणवरा-वीसो चंदेसु निम्मलयरा-चन्द्रो से जिनवर विशेष निर्मल तित्थयरा-तीर्थकर देव आइच्चेसु-सूर्य से अहियं अधिक पसीयंतु-प्रसन्न हो पयासयरा-प्रकाश कित्तियवंदियमहिया-कीर्तन, करनेवाले वन्दन औरभाव से पूजन सागरवरगंभीरा-महासमुद्र के को प्राप्त हुए है समान गभीर जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा-जो सिद्धा सिद्धिमम दिसंतु-सिद्ध वे लोक के प्रधान सिद्ध है भगवान मुझको मोक्ष देवे। भावार्थ चोवीम लोक में उद्योत-प्रकाश करनेवाले, धर्म रूपी तीर्थ की स्था- तीर्थकरो का पना करनेवाले, राग-द्वप को जीतनेवाले तीर्थकरों की मैं स्तुति करता हूं। ऐसे तीर्थंकर केवली चौवीस हैं यथा-श्री ऋपभनाथ, श्री अजितनाथ, श्री संभवनाथ, श्री अभिनन्दन, श्री सुमतिनाथ, श्रीपद्मप्रभ, श्रीसुपार्श्वनाथ, श्रीचन्द्रप्रम, श्रीसुविधिनाथ, (पुष्पदंत) श्री शीतलनाथ, श्री श्रेयांसनाथ, श्री वासुपूज्य, श्री विमलनाथ, श्री अनंतनाथ, श्री धर्मनाथ, श्री शांतिनाथ भी कुंथुनाथ, श्री अर- नाथ, श्रीमल्लिनाथ, श्री मुनिसुव्रत, श्री नमिनाथ, श्री अरिष्टनेमि, श्री पार्श्वनाथ, श्री वर्द्धमान स्वामी। ये तीर्थकर कर्म मल रहित स्तवन । लोगस्स चतुर्विंशतिस्तव ३५ है, जरा और मरण से मुक्त है। तीर्थों के प्रवर्तक हैं। ऐसे चौवीस तीर्थकर मेरे पर प्रसन्न हों। इनकी मैं वचन से कीर्ति- प्रशंसा करता हूं, कायासे वन्दना करता हूं, मन से भाव-पूजा करता हूं। ये सम्पूर्ण लोक में उत्तम है। ये सिद्ध हो चुके हैं । ऐसे भगवान् मुझे आरोग्य सम्यक्त्व तथा समाधि का श्रेष्ट वर दें। सिद्ध भगवान् सर्व चन्द्रों से विशेष निर्मल हैं, सर्व सूर्यों से विशेष प्रकाशमान है। स्वयंभु-रमण नामक महासमुद्र के समान गम्भीर है-इनके आलम्बन से मुझे सिद्धि या मोक्ष प्राप्त हो। एक ओर जैनदर्शन आत्मा को ही कर्ता हर्चा मानता है। दूसरी ओर, ऐसे भगवान् मुझे आरोग्य, सम्यक्त्र तथा समाधि का श्रेष्ठ वर दें, मुक्त आत्माओं से वरदान की याचना करना सिखाता है, यह विरोधाभास क्यों ? यह सत्य है कि जैन दर्शन मुक्त आत्माओं को कर्ता नहीं मानता। हम उनसे कोई भी फल- प्राप्ति करवाने की आशा नहीं रखते। मुक्त आत्माएँ हमें श्रेष्ट वरदान दें, यह हमारी मंगल कामना है। हम सिद्ध भगवान के आदर्शों को सामने रखकर उनके पद चिह्नों का अनुसरण करते है। उनके गुणों की याद करते है। उनकी साधना के आचरण जीवन में उतारने की चेष्टा करते हैं। इस प्रकर वे सिद्ध भगवान् हमारे अभ्युदय के हेतु बनते है, अवलम्बन बनते है। सम्यक्त्व और समाधि के लाभ की कर्ता तो हमारी आत्मा सकधुई शक्र-स्तुति नमुत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं । आइगराणं तित्थयराणं सयंसंबुद्धाण । पुरिसुत्तमाणं पुरिस- सीहाणं पुरिसवरपंडरीयाणं पुरिसवरगंधहत्थीणं । लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लागपज्जोअगराणं । अभयदयाणं चक्खुदयाणं मगगदयाणं सरणदयाणं बोहिदयाणं । जीवदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाण धम्मनायगाणं धम्म- सारहीणं धम्मवरचउरतचकवट्टीणं । दीवोत्ताणं सरणगइपइहाणं अप्पडिहयवरनाणदसणधरणं वियदृछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाण बुद्धाणं बोहयाणं मुस्ताणं मोअगाणं शक्र-स्तुति सव्वनूणं सव्वदरिसीणं सिवमयल-मरुअमणंत- मक्खय-मव्वाबाह-मपुणरावित्ति सिद्धिगइनामधेयं ठाणं (संपाविउकामाणं ) संपत्ताणं । नमो जिणाणं, जियभयाणं ॥ छाया नगःअस्तु अरिहन्तृभ्यः भगवद्भ्यः आदिकरेभ्यः तीर्थकरेभ्यः स्वयंसम्बुद्ध भ्यः पुरुषोत्तमेभ्यः पुरुषसिंहेभ्यः पुरुषवरपुण्डरीकेभ्यः पुरुषवरगन्धहस्तिभ्यः लोकोत्तमेभ्यः लोकनाथेभ्यः लोकहितेभ्यः लोकप्रदीपेभ्यः लोकप्रद्योतकरेभ्यः अभयदयेभ्यः चक्षुर्दयेभ्यः मार्गदयेभ्यः शरणदयेभ्यः बोधिदयेभ्यः जीवदयेभ्यः धर्मदयेभ्यः धर्मदेशकेभ्यः धर्मनायकेभ्यः धर्मसारथिभ्यः धर्मवरचातुरन्त- चक्रवर्तिभ्यः द्वीपात्राणं शरणगतिप्रविष्ठा अप्रतिहतवरज्ञानदर्शन- घरेभ्यः व्यावृत्तच्छमभ्यः जिनेभ्यः जापकेभ्यः तोर्णेभ्यः तारकेभ्यः बुद्धेभ्यः वोधकेभ्यः मुक्त भ्यः मोचकेभ्यः सर्वज्ञेभ्यः सर्वदर्शिभ्यः शिवम् अचलम् अरुजम् अनन्तम् अक्षयम अव्यावाधम् अपुनरा- वृत्ति सिद्धिगतिनामधेयं स्थानं संप्राप्तुकामेभ्यः संप्राप्तेभ्यः नमः जिनेभ्यः जितभयेभ्यः शब्दार्थ नमुत्थुणं नमस्कार हो तित्थयराणं-धर्मतीर्थ की अरिहताणं-अरिहन्त स्थापना करनेवाले भगवंताण-भगवत को सयंसंबुद्धाणं अपने आप वोध (वे भगवान कैसे है) आइगराण-धर्म के आदि कर्ता पुरिसुत्तमाणं-पुरुपो में उत्तम को प्राप्त हुए के समान રૂટે श्रावक प्रतिक्रमण पुरिससीहाण-पुरुपो में सिंह धम्मदेसयाण-धर्मोपदेशक धम्मनायगार्ण-धर्मके नायक पुरिसवरपुंडरीयाणं-पुरुषो में धम्मसारहीर्ण-धर्मरूपी रथ के पुण्डरीक कमल के समान निर्लेप सारथी पुरिसवरगंधहत्थीणं-पुरुषो में धम्मवरचउरंतचकवट्टोणं-धर्ममें प्रधान गधहस्तीके समान प्रधान और चार गति का नाश लोगुत्तमाणं-लोक में उत्तम करनेवाले, अतएव चक्रवर्ती, के लोगनाहाणं-लोक के नाथ समान लोगहियाणं-लोकके हितकारी दीवोत्ताणं-ससार समुद्र में द्वीप लोगपईवाणं-लोकमें प्रदीपके के समान और रक्षक समान सरणमइपछा-आप शरण देने लोगपज्जोअगराणं-लोकमें वाले है, गति है, प्रतिष्ठा है उद्योत करनेवाले अप्पडिहयवरनाणदंसणधराण- अभयदयाण-अभयदान देनेवाले अप्रतिहत, कही भी स्खलित न चक्खुदयाणं-ज्ञानरूपी नेत्रो को हो, ऐसे श्रेष्ठ ज्ञान दर्शनके देनेवाले घरने वाले भग्गदयाण-मोक्ष मार्गको देनेवाले वियट्टछउमाणे-छद्म अर्थात् सरणदयार्ण-सर्व जीवो के घातिक कर्मों से रहित शरण भूत जिणार्ण-राग द्वेषको जीतनेवाले योहिदयाणं बोधि वीजको जावयाणं-राग द्वेष को देनेवाले जिताने वाले जीवदयाणं-संयमरूपी तिनाणं-ससार समुद्र से स्वयं जीवनके दाता धम्मदयाणं-धर्मके दाता तारयाण-दूसरो को तारनेवाले तरते हुए ३ शुक्र-स्तुति ३६ बुद्धार्ण-स्वय बुद्ध अपुणरावित्तिः-पुनरागन योहयाणं-दूसरोको वोघदेनेवाले रहित, पुनर्जन्म रहित (ऐसे) मुत्तार्ण-स्वय कर्मों से मुक्त सिद्धिगइनामधेयं-सिद्धि गति मोमगाणे-औरो को कर्म मुक्त नामक स्थान को करनेवाले ठाणं- स्थान को सज्वनूर्ण-सर्वज्ञ संपाविउकामाणं-प्राप्त करने सम्बदरिसीण-सर्वदर्शी वाले अर्थात् करेंगे शिव-कल्याण संपत्ताण-प्राप्त हुए (ऐसे) अयलं-स्थिर नमोजिणाणं-नमस्कार हो अरुम-रोगरहित जिन भगवान् को अर्णत-अनन्त जियभयाणं-भयो को अन्याबाई-अव्यावाध,वाधा पीडा जीतनेवालेको रहित अर्थ- मैं अरिहन्त देवों को नमस्कार करता हूं। वे ज्ञानवान है। शक्र-स्तुति धर्म सृष्टि के करने वाले है। साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका रूप चार तीर्थों के कर्ता है। जिन्होंने बिना किसी उपदेश के स्वयं ज्ञान प्राप्त किया है, जो सर्व पुरुषों में उत्तम हैं, सिंह के समान निर्भीक है, कमल के समान सुन्दर, शोभायमान एवं अलिप्त है, लोक के नाथ है, लोक के हितकार है। जो दीप-ज्योति के समान लोकरूपी हृदयमन्दिर में प्रकाश के करने वाले है एवं जो लोक के अज्ञान रूपी अधकार को नाश करने वाले हैं। जो सर्व जीवों को अभयदान देने वाले है, जो ज्ञान-हीन को ज्ञान रूपी चक्षु देने वाले है, जो अच्छे मार्गसे भ्रष्ट हुए लोगों को अच्छा श्रावक प्रतिक्रमण मार्ग दिखाने वाले है, जो धर्महीन को धर्मदान देने वाले हैं, जो धर्म के उपदेशक हैं, धर्म के नायक है, धर्म रूपो रथकै सारथी है, जो धर्म में श्रेष्ठ है तथा चक्रवर्ती के समान चतुरंत है। जिस प्रकार चक्रवर्ती चार दिशाओं में विजय प्राप्त करने के कारण चतुरंत कहलाता है उसी प्रकार अरिहन्त चारों गतियों का अन्त कर डालने के कारण चतुरंत कहलाते हैं। संसाररूपी समुद्र में डूबते हुए प्राणियोंके लिये द्वीप के समान सहायक होने से अरिहंत 'द्वीप' है। सर्व आपदाओं से रक्षा करनेवाले होने से अरिहंत 'त्राण' है। अरिहन्त सम्पत्ति के दातार है अतः 'शरण' है। कल्याण के लिये आपका आश्रय ग्रहण किया जाता है अतः आप 'गति' हैं। आप में सर्वगुण प्रतिष्ठित है अतः आप 'प्रतिष्ठा' हैं। आप केवल-ज्ञान, केवल-दर्शन के धारण करने वाले हैं। आप चार घाति-कर्म रूपी आवरण से रहित है। आप स्वयं राग द्वेष को जीतने वाले तथा दूसरों को जितानेवाले है। आप स्वयं संसार समुद्र से तरने वाले तथा दूसरों को भी तारने वाले हैं। आप स्वयं ज्ञानवान हैं तथा दूसरों को भी ज्ञानवान करने वाले हैं। आप स्वयं मुक्त हैं तथा दूसरों को भी मुक्त करने वाले है। आप सर्वज्ञ हैं, सर्वदर्शी हैं, उपद्रव रहित, अचलायमान, रोग-व्याधि रहित, अनन्त, अक्षय, बाधा-पीड़ा रहित, पुन- जन्म रहित मोक्ष को आप प्राप्त करने वाले हैं। सर्व प्रकारके भय को आपने जीत लिया है, ऐसे जिनेश्वर को मैं नमस्कार करता हूं। सिद्ध भगवान् जहाँ रहते हैं, उसस्थान का नाम सिद्धगति है। सिद्धगति का दूसरा नाम मुक्ति या मोक्ष है। यह स्थान ऊर्ध्व लोक विवेचन श्रावक प्रतिक्रमण ४१ के अन्त में है। इसके परे अलोकाकाश के सिवाय कुछ नहीं है। सिद्ध भगवान् मुक्त होते ही वहा चले जाते है। स्वभाव से ही आत्मा उर्ध्वगामी है। कर्म के भार से दबी हुई आत्मा ही तिर्यग् या नीचे जाती है। कर्मभार का दबाब छूटते ही, आत्मा निजो स्वभावानुसार लोक की सीमा तक, जहाँ तक जा सकती है, चली जाती है। वस्तुतः सिद्धगति या मोक्ष का अर्थ मुक्त आत्मा है। उपचार से मुक्त आत्माओं के रहने के स्थान को भी मिद्धगति, मोक्ष आदि नामों से सम्बोधित करते है। मुक्त आत्माओं और उनके रहने के स्थान को एक मान कर ही सिद्ध- गतिके पूर्व शिव, अचल, अरूज, अक्षय, अनन्त, अव्यावाध और अपुनरावृत्ति इतने विशेषण जोड़े है। इतने विशेपणो को जोड़ने का मतलब स्वर्ग और मोक्ष का अन्तर दिखलाना है। साधारण लोग स्वर्ग और मोक्ष को एक ही मानते है। कोई कोई तो मुक्त आत्माओं को वापिस लौटाने तक का साहस कर बैठते हैं। उनके निराकरण के लिये इन विशेषणों की सार्थकता है। मुक्त आत्माओं का पुनरावर्तन मानना अयुक्त है । पुनर्जन्म सहेतुक है। निर्हेतुक नहीं। पुनर्जन्म का हेतु कर्म है। मुक्त आत्माएँ कर्म का समूल नाश कर डालती है 'कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्ष' का अर्थ है सम्पूर्ण कर्मों को क्षय होने से आत्म स्वरूप का प्रकट होना। मुक्त जीव कर्म रहित होते है। कर्मके अभाव से पुनर्भवके अंकुर का रोहण नहीं हो सकता। जैसे- दग्वे बीजे यथात्यन्त, प्रादुर्भवति नाकुर । कर्मबीजे तथा दग्धे, नरोहति भवाकुर ॥ वीज को जलाकर राख कर डालने से अङ्कुर पैदा नहीं होता, उसी प्रकार कर्म चीजके नाश हो जाने से भव-अङ्गुर पैदा नहीं होता। - फटिकमगाफडिन्ना प्रतिक्रमण-प्रतिज्ञा मूल पाठ अवस्सही इच्छाकारेण संदिसह भयवं देवसियं पडिक्कमणं ठाएमि देवसिय णाण-दसण-चरित्ताच- रित्त तव-अइयारचिंतवणट्ठ करेमि काउस्सग्गं । छाया आवश्यम् इच्छाकारेण संदिशत भगवन् देवसिकं प्रतिक्रमणं तिष्ठामि देवसिक-ज्ञान-दर्शन-चरित्राचरित्र-तपोऽतिचारचिन्तनाथ करोमि कायोत्सर्गम। शब्दार्थ आवस्सही--अवश्यमेव भयवं-हे भगवन् । इच्छकारेण-आपकी देवसियं-मैं दिवस सम्बन्धी इच्छानुसार पडिक्कमण-प्रतिक्रमण संदिसह-आज्ञा दे ठाएमि-करता हूँ

प्रतिक्रमण-प्रतिज्ञा
देवसिय-दिवस सम्बन्धी अइयारचिंतवण?-अनिचारोके
णाण-दसण-ज्ञान दर्शन
चितन के लिए
चरित्नाचरित्त-चरित्राचरित्र
करेमि-करता हू
तब-तप के
काउत्सगं-कायोत्सर्ग
भावार्थ
जिन शासन मे गुरु की आज्ञा सर्वोच्च है। गुरु के आदेशा-
नुमोदित धर्माचरण निर्विघ्न फलीभूत होते है। अतीत दोषों से
निवृत्त होने के अवसर पर शिष्य गुरु से प्रार्थना करता है। हे
भगवन् । आप मुझे आदेश दें। आपके आदेशानुसार मैं
दैनिक अतिचारो से निवृत्त होने के लिए प्रतिक्रमण करूंगा।
भगवन् । मैंने आपके आदेश से मोक्ष के साधन ज्ञान, दर्शन
और आशिक रूपेण चारित्र को जीवन में उतारने का प्रयत्न किया
है। उनमे कोई अविचार दोष लगा हो तो उसकी मैं याद करूंगा
और उसकी शुद्धि के लिये कायोत्सर्ग करूंगा। अर्थात् शरीर को
स्थिर बना कर ई-पथिक सूत्र का ध्यान कर "मिच्छामि दुक्कड"
का प्रायश्चित करूंगा।

अइयार चिन्तन पाठ
अतिचार चिंतन पाठ
मूल पाठ
इच्छामि ठाइउं काउस्सग्गं (पडिकमि)
(आलोइउं) जो मे देवसिओ अइयारो को
काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उमग्गो
अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुन्विचिंत्तिो
अणोयारो अणिच्छिअव्वो असावगपाउग्गो नाणे
तह दंसणे चरित्ता-चरिते सुए सामाइए तिण्हं
गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हमणुब्बयाणं तिण्हं
गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं वारसविहस्स
सावग धम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं तस्स
मिच्छामि दुक्कडं।

अतिचार चिंतन पाठ ४५ छाया इच्छामि स्थातुं कायोत्सर्गम् (प्रतिक्रमितुं) (आलोचितुं) यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः कायिकः वाचिकः मानसिकः उत्सूत्रः उन्मार्ग: अकल्प्यः अकरणीयः दुर्ध्यातः दुर्विचिन्तितः अनाचारः अनेष्टव्यः अनावकमायोग्यःज्ञाने तथा दर्शने चरित्रा- चरित्रे श्रुते सामायिके तिसृणां गुप्तीनां चतुर्णां कषायाणां पञ्चा- नामणुव्रतानां त्रयाणा गुणव्रतानां चतुर्णा शिक्षावतानाम् द्वादश- विधस्य श्रावक धर्मस्य यत् खण्डितं यद् विराधितं तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम्। शब्दार्थ इच्छामि-म इच्छा करता है। उत्सुतो-सूत्रसे विरुद्ध कथन ठाइ-करनेकी किया हो। काउत्सर्ग-कायोत्सर्ग उम्मग्गो-मार्गसे विरुद्ध कथन (पडिकमि)-आलोचना करने किया हो। के लिए अकप्पो-याचार से विरुद्ध काम (आलोइङ)-दुष्प्रवृत्ति से निवृत्त किया हो। होने के लिए अकरणिज्जो न करने योग्य जो मे देवसियो-जो मैने दिवस कार्य किया हो। सम्बन्धी दुज्झाओ-अशुद्ध ध्यान किया है।। अइयारो अतिचार दुविचिंत्तिओ-अशुद्ध चिन्तन कओ-किया हो काइओ-शरीर सम्बन्धी अणायारो-अनाचार नियमो वाइओ-वचन सम्बन्धी का सर्वथा भग माणसिओ-मन सम्बन्धी किया हो। किया हो।

४६ श्रावक प्रेतिक्रमण अणिच्छिअब्बो-अवाछनीय गुणव्वयाणं-गुणवत मे पदार्थों की इच्छा की हो।' चउण्हं-चार' असावग्गपाउग्गो-श्रावक वृत्तिसे सिक्खाक्याणं-शिक्षाव्रत में अनुचित कार्य किया हो। वारसविहस्सः इस प्रकार नाणे तहा-ज्ञान मे तथा वारह व्रतरूप दसणे-दर्शन में सावग-श्रावक चरित्ताचरिते-देश विरति में धम्मस्स-धर्म का सुए-अकाल में आवश्यक करने मे जंजो सामाइए सामायिक में खडियं-देशत. खण्डन किया हों तिण्हं गुत्तोणं-तीन गुप्ति मे जं-जो चउण्ह-चार विराहियं सर्वथा विराधना कसायाण-कषाय की निवृत्ति मे की हो। पंचण्हमणुब्बयाणं-पाच तस्स-उसका अणुव्रत में मिच्छामि-निष्फल होवे तिह-तीन दुक्कडं-सव पाप भावार्थ मैं चित्त एवं शरीर को स्थिर कर अतिचारों की आलोचना करने के लिये, दुष्प्रवृत्तियों से निवृत्त होने के लिये, कायोत्सर्ग करना चाहता हूं। प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है-मन की, वचन की और शरीर की। प्रत्येक प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है-शुभ और अशुभ। हिंसा आदि असद् आचरणों में होने वाली प्रवृत्ति अशुभ कहलाती है और अहिसा आदि सद् आच- रणों में होने वाली प्रवृति शुभ कहलाती है। साधना की प्रारम्भिक दशा में अशुभ आचरणों का प्रत्याख्यान होता है।

अतिचार चिन्तन पाठ उस प्रत्याख्यान में किसी प्रकार की त्रुटि हो जाती है यानी त्यागे हुए अशुभ आचरणों में प्रवृत्ति होने के लिये तदनुकूल सामग्री जुटाली जाती है। उसकी विशुद्धि के लिये अर्थात् पुनः शुभ आचरणों में प्रवृत्त होने के लिए कायोत्सर्ग करना नितान्त आव- श्यक है। मन वचन और शरीर की दुष्प्रवृत्तियों के कितनेक प्रकार निम्न पंक्तियों में बतलाये गये है, जैसे:- १-उत्सूत्र-सर्वज्ञ प्रणीत सिद्धान्तोंके प्रतिकूल प्ररूपणा करना। चूकि ज्ञान अनन्तहै, अल्प बुद्धि मे वह सारा का सारा नहीं समा सकता । उस सम्पूर्ण ज्ञान के विना सब पदार्थों का पूरा पूरा ज्ञान नहीं हो सकता। अतएव यह उचित है कि हम सर्वज्ञ-कथित शास्त्रों के अनुसार विश्व-स्थिति को समझे, तर्क को बलवान बनावें और तदनुकूल आचरण करें। २-उन्मार्ग-उन्मार्ग मे प्रवृत्ति करना अर्थात् मोक्ष मार्ग के प्रतिकूल आचरण करना। मोक्ष के चार मार्ग है ज्ञान* दर्शन चारित्र और तपस्या । ३-अकल्प्य-श्रावक के आचार के प्रतिकूल काम करना । निर- पराधी बस जीवों की हिंसा नहीं करना, स्थूल असत्य से निवृत्त होना आदि श्रावक का कल्प है। ४-अकरणीयन करने योग्य कार्य करना। महारंभ और महा परिग्रहवाला काम धंधा करना। जैसे-मास का व्यापार करना, अनन्तकाय का व्यापार करना आदि श्रावक के लिये अकरणीय है। * जिससे पदार्थों का ज्ञान होता है, जैसे- मति ज्ञान आदि । - सम्यक् तत्त्व रुचि। *सावध योग का प्रत्याख्यान करना।

श्रावक प्रतिक्रमण
५-दुर्ध्यान- आत-रौद्र ध्यान करना । प्रिय का वियोग और
अप्रिय का संयोग होने पर प्रिय की प्राप्ति के लिये और
अप्रिय के नाश के लिये चिंतन करना आतध्यान है ।
हिंसा, झूठ और विषयवासना सम्बन्धी चिन्तन करना रौद्र
ध्यान है।
६-दुर्विचिन्तन-चित्तसे अशुभ विचार करना । इन अतिचारों
में उत्सूत्र, उन्मागे, अकल्प्य, अकरणीय ये चार मुख्यतया
मन से सम्बन्धित है। ये तीनों प्रकार के मानसिक, वाचिक
और कायिक, अतिचार श्रावक के लिये योग्य नहीं, अतएव
अनाचरणीय और अवांछनीय है।
७-श्रुत-सूत्र सिद्धान्त।
८-सामायिक—देशविरति, या समतारूप ।
इन सम्बन्धी
अतिचार सेवन किया हो, मन, वचन और शरीर को वश में
न रखा हो। क्रोध, मान, माया, लोभ इन चार कपायों का
दमन न किया हो। पांच अणुव्रत-स्थूल हिंसा का त्याग,
स्थूल असत्य का त्याग, स्थूल
चोरो का त्याग, स्थूल मैथुन का
त्याग, स्थूल परिग्रह क त्याग। तीन गुणवत-दिगवत,
उपभोग परिभोग परिमाणव्रत, अनर्थदण्डत्यामत्रत । चार
शिक्षाव्रत-सामायिकवत, देशावकासिकवत, पोषधोपवास
व्रत, अतिथिसंविभागवत । इस प्रकार श्रावक के बारह
व्रतों का आंशिक खण्डन किया हो अथवा पूर्ण विराधन
किया हो तो इससे उत्पन्न मेरा सब पाप निष्फल हो।

अयारमा
निन्नानवे अतिचार का ध्यान
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि ।
छाया
स्थानेन मौनेन ध्यानेन आस्मान व्युत्सृजामि ।
मूलार्थ
स्थिर रहकर, मौन रहकर, ध्यान धरकर, पास्मा को प्रात्मा की
पापमय प्रवृत्तियो को छोडता है।
आगम तीन प्रकार का कहा है जैसे-
(१) सूत्रागम
ज्ञान के १४
प्रतिचार
(२) अर्थागम
(३) शब्द और अर्थ इन दोनों रूप आगम
ऐसे ज्ञान के अन्दर जो कोई अतिचार-दोष लगा हो उसकी
मैं आलोचना करतो हूँ।
(१) सूत्र का पठन अस्त-व्यस्त किया हो।

५०
श्रावक प्रतिक्रमण
(२) दूसरा सूत्र साथ में मिलाकर पढा हो।
(३) अक्षरों को छोड़कर पढ़ा हो।
(४) अधिक अक्षर मिलाकर पढ़ा हो।
(५) पदहीन पढ़ा हो।
(६) विनय रहित पढ़ा हो।
(७) स्वर रहित पढ़ा हो।
(८) शुभयोग रहित पढ़ा हो
() भाजन से अधिक ज्ञान दिया हो।
(१०) गुरु ने ज्ञान दिया, उसे उल्टा ग्रहण किया हो।
(११) अकाल में स्वाध्याय किया हो।
(१२) स्वाध्याग के काल (समय) में स्वाध्याय न किया हो।
(१३) अस्वाध्याय में स्वाध्याय किया हो।
(१४) स्वाध्यायमै स्वाध्याय न किया हो।
पढ़ते समय, मनन करते समय या विचार करते समय, ज्ञान
की अथवा ज्ञानवंत की आशातना की हो। इत्यादि जो मैंने
दिवस सम्बंधी अतिचार किये हों, मेरे वे सब दोष निष्फल हों।
सम्यक्त्व के
अरिहन्त मेरे देव हैं। जीवन पर्यंत शुद्ध साधु (वर्तमान
५ अतिचार आचार्य श्री तुलसीगणी ) मेरे गुरु हैं। जिन भाषित संवर
निर्जरारूप मेरा धर्म है। यह सम्यक्त्व मैंने ग्रहण किया है।
ऐसे सम्यक्त्व में जो कोई अतिचार-दोष लगा हो तो उसकी मैं
आलोचना करता हूं।
१ श्री जिंनभापित तत्त्व में शंका की हो।
२ वाह्याडम्बरादि देखकर पर-मत की वांछा की हो।
क्रिया के फल में सन्देह किया हो।
३

निन्नानवे अतिचार का ध्यान ४ पर-पाषंड की प्रशसा की हो। ५ पर-पापंड से परिचय किया हो। सम्यक्त्वरूपी रन अपर मिथ्यात्व रूपो रज-मैल लगा हो, जो मैंने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोप किये हों, मेरे वे सब दोष निष्फल हो। देश चारित्र के सम्बन्ध मे जो कोई अतिचार-दोप लगा हो तो उसकी मैं आलोचना करता हूं। १- पहिले स्थूल प्राणातिपात-विरमणव्रत मे जो कोई अतिचार- दोप लगा हो तो उसकी मै आलोचना करता हूं। (क) क्रोधादिवश त्रस जीवों को गाढ़े ( कठिन) वन्धन से बाधा हो। (ख) गहरा घाव किया हो । (ग) अवयव का छेदन किया हो। (घ) अधिक भार लादा हो। (ड) आहार पानी का विच्छेद किया हो। जो मैंने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोप किये हों, मेरे वे सब दोप निष्फल हों। २-दूसरे स्थूल मृपावाद विरमणव्रत में जो कोई अतिचार-दोष लगा हो उसकी मैं आलोचना करता हूं। (क) सहसात्कार-किसी के प्रति झूठा कलङ्क लगाया हो। (ख) रहस्य करते देखकर कलङ्क लगाया हो। (ग) स्त्री- -पुरुप के मर्म प्रगट किये हों। (घ) मृपा उपदेश दिया हो। (ड) झूठे लेख लिखे हों।

श्रावक प्रतिक्रमण जो मैंने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोष किये हों, मेरे वे सब दोष निष्फल हों। ३-तीसरे स्थूल अदत्तादान विरमणव्रत में जो कोई अतिचार- दोप लगा हो, उसकी मैं आलोचना करता हूं। (क) चोर की चुराई हुई वस्तु ली हो। (ख) चोर को सहायता की हो। (ग) विरोधी राज्य में व्यापारादि के लिये प्रवेश किया हो। (घ) झूठा माप-तोल किया हो। (ड) सरस वस्तु में निःसार वस्तु मिलाई हो । जो मैंने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोष किये हों, मेरे वे सव दोप निष्फल हों। ४-चौथे स्थूल मैथुन विरमणवत मे जो कोई अतिचार-दोष लगा हो, उसकी मैं आलोचना करता हूं। (क) पर स्त्री को भाड़े - किराये आदि के वश करके आलाप- संलाप रूप गमन किया हो। * (ख) वेश्या आदिके साथ आलाप-संलाप रूप गमनकिया हो !* (ग) काम-कुचेष्टाएं की हों। (घ) दूसरों के विवाह करवाये हों। (ङ) काम-भोग तीन अभिलाषा से सेवन किया हो। जो मैंने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोष किये हों वे सब दोष निष्फल हों। *पहिले तथा दूसरे अतिचार में श्राविकामो को निम्नलिखित अतिचार कहना चाहिये-पर-पुरुष के साथ पालाप-सलाप रूप गमन किया हो।

निन्नानवे अतिचार का ध्यान
-
५-पांचव स्थूल परिग्रहविरमणव्रत में जो कोई अतिचार-दोष
लगा हो तो उसकी मैं आलोचना करता हूं-
(क) खेत, घर आदि की मर्यादा का अतिक्रमण किया हो।
(ख) सोने, चांदी की मर्यादा का अतिक्रमण किया हो।
(ग) धन, धान्य की मर्यादा का अतिक्रमण किया हो।
(घ) द्विपद-चौपद की मर्यादा का अतिक्रमण किया हो।
(ङ) सोने, चांदी के सिवाय अन्य धातु अथवा गृह-सामग्री
की मर्यादा का अतिक्रमण किया हो।
जो मैंने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोष किये हों। मेरे वे सब
दोष निष्फल हों।
६-छठे दिशिवत मे जो कोई अतिचार-दोष लगा हो, उसकी मैं
आलोचना करता हूं।
(क) ऊँची दिशा के परिमाण का अतिक्रमण किया हो।
(ख) नीची दिशा के परिमाण का अतिक्रमण किया हो।
(ग) तिरछी दिशा के परिमाण का अतिक्रमण किया हो।
(घ) एक किसी दिशा परिमाण को बढ़ाया हो।
(ड) पथ में सन्देह सहित चलकर प्रमाणातिरेक किया हो।
जो मैने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोष किये हों, मेरे वे सब
दोष निष्फल हों।
सातवें उपभोग परिभोग परिमाणव्रत मे भोजन सम्बन्धी जो
कोई अतिचार-दोष लगा हो, उसकी मैं आलोचना करता हूं।
(क) प्रत्याख्यान उपरान्त सचित्त का आहार किया हो।
(ख) सचिस संयुक्त (अचित्त खजूर फलादि सचिच गुठली
सहित) का आहार किया हो।

श्रावक प्रतिक्रमण
(ग) अपक्क धान्यादि का भक्षण किया हो।
(घ) दुष्पक धान्यादि का भक्षण किया हो।
(ड) असार फलादि का भक्षण किया हो।
जो मैंने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोप किये हों, मेरे वे सब
दोप निष्फल हों।
पन्द्रह कर्मादान सम्बन्धी जो कोई अतिचार-दोप लगा हो,
उसकी मैं आलोचना करता हूं।
(१) इंगालकम्मे, (२) वणकम्मे,
(३) साड़ीकम्मे,
(४) भाड़ोकम्मे, (५) फोड़ीकम्मे, (६) दंतवणिज्जे, (७) केस
वणिज्जे, (८) रसवणिज्जे, (६) लक्ख वणिज्जे, (१०) विप
वणिज्जे, (११) जंतपोलणकम्मे, (१२) निल्लंछणकम्मे,
(१३) दवग्गिदावणया, (१४) सरदहतलायपरिसोसणया,
(१५) असइजणपोसणिया।
जो मैंने दिवससम्बन्धी अतिचार-दोप किये हों, मेरे वे सब
दोप निष्फल हो।
८-आठवें अनर्थदंड विरमणव्रत में जो कोई अतिचार-दोष लगा
हो तो उसकी मैं आलोचना करता हूं।
(क) कंदर्प सम्बन्धी वार्तालाप किया हो।
(ख) भांड की तरह कुचेष्टाएं की हों।
(ग) विना प्रयोजन अधिक बोला हो।
(घ) अधिकरण-शस्त्र का जोड़ किया हो।
(ङ) उपभोग परिभोग अधिक बढ़ाया हो।
जो मैंने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोष किये हों, मेरे वे
सब दोष निष्फल हों।

निन्नानवे अतिचार का ध्यान
8- नवमें सामायिकव्रत में जो कोई अतिचार-दोष लगा हो तो
उसकी मैं आलोचना करता हूं।
(क) मनयोग सावध कार्यों में प्रवाया हो।
(ख) वचनयोग सावध कायों में प्रवाया हो।
(ग) कायायोग सावध कार्यों में प्रवाया हो।
(घ) सामायिक की सार सम्भाल न की हो।
(ड) सामायिक का काल पूरा हुए बिना समायिक का पारण
किया हो।
जो मैंने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोप किये हों। मेरे वे
सव दोष निष्फल हों।
१०-दसवें देशावकासिकबत मे जो कोई अतिचार-दोष लगा
हो, उसकी मैं आलोचना करता हूं।
(क) मर्यादित क्षेत्र से बाहरकी वस्तु मंगाई हो।
(ख) मर्यादित क्षेत्र से बाहर वस्तु भेजी हो।
(ग) शब्द के द्वारा भाव प्रदर्शित किये हों।
(घ) रूप दिखाकर भाव प्रदर्शित किये हों।
(ड) कोई पौद्गलिक वस्तु डाल कर भाव प्रदर्शित किये हों।
जो मैंने दिवस सम्बन्धी अतिचार-दोष किये हों, मेरे वे सव
दोष निष्फल हों।
११-ग्यारहवें पौपधव्रत मे जो कोई अतिचार दोप लगा हो
तो मैं उसकी आलोचना करता हूं।
(क) शय्या-संथारे का प्रतिलेखन नहीं किया हो अथवा
आसावधानी से किया हो।
(ख) शय्या-संथारेका प्रमार्जन नहीं किया हो अथवा
.
-

श्रावक प्रतिक्रमण
आसावधानी से किया हो।
(ग) उच्चारप्रसवण भूमि (उत्सगे भूमि) का प्रतिलेखन नहीं
किया हो अथवा आसावधानी से किया हो।
उधार-प्रसवण भूमिका प्रमार्जन नहीं किया हो अथवा
असावधानी से किया हो।
(ड) पौषधव्रत का सम्यक् प्रकार से पालन न किया हो।
जो मैंने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोष किये हों, मेरे वे सब
दोष निष्फल हों।
१२-बारहवें यथा-संविभाग व्रत में जो कोई अतिचार-दोष
लगा हो तो उसकी मैं आलोचना करता हूं।
(क) सूमती (साधुओंके कल्पनीय) वस्तु सचित्तपर रखी हो।
(ख) अचित्त वस्तु को सचित वस्तु से ढक दिया हो।
(ग) काल का अतिक्रमण किया हो।
(घ) अपनी वस्तु को दूसरे की बताया हो ।
(ड) मत्सर भाव से दान दिया हो।
जो मैंने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोष किये हों मेरे वे सव
दोष निष्फल हों।
संलेखना के सम्बंध में जो कोई अतिचार-दोष लगा हो उसकी
मैं आलोचना करता हूं-
(क) इस लोक सम्बंधी चक्रवर्ती आदि के सुखों की वॉछा
की हो।
(ख) परलोक सम्बंधी इन्द्रादि के सुखों की वांछा की हो।
(ग) असंयम जीवितव्य को वांछा की हो।
(घ) बालमरण की वांछा की हो।
संलेखना के
५ अतिचार

निन्नानवे अतिचार का ध्यान
५७
(ड) काम भोग की वांछा की हो।
जो मैने दिवस सम्बंधी अतिचार-दोष किये हों मेरे वे सब
दोष निष्फल हों।
१ प्राणातिपात
१० राग
अठारह
२मृपावाद
पाप स्थानक
३ अदत्तादान
१२ कलह
४ मैथुन
१३ अभ्याख्यान
११ द्वष
१४ पैशुन्य
५ परिग्रह
६ क्रोध
१५ परपरिवाद
७मान
१६ रति अरति
८ माया
१७ मायमृपावाद
१८ मिथ्यादर्शनशल्य
जो मैंने अठारह पाप सेवन किये हो मेरे वे सब पाप
निष्फल हों।
लोभ

सुगुरु बन्दा विहि
सुगुरु वदन विधि
मूल पाठ
इच्छामि खमासमणो बंदिउँ जावणिज्जाए
निसीहिआए अणुज्जाणह में मिउगहं निसीहि,
अहोकायं कायसंफासं खमणिज्जो भे किलामो
अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कतो जत्ता
भेजावणिज च भे खामेमि खमासमणो देवसियं
वइक्कम्मं आवस्सियाए पडिकमामि खमासमणाणं
देवसिआए आसायणाए
तित्तिसन्नयराए
जंकिंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए
कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए

सुगुरु वदन विधि ५ सव्वकालियाए 'सवमिच्छोवयराए सव्वधम्माइक्क- मणाए आसायणाए जो मे अइयारो को तस्स खमासमणो पडिक्कमामि निन्दामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । छाया -- इच्छामि क्षमाश्रमण । वन्दितु यापनीयया नैषेधिक्या अनु- जानीत मम मितावग्रहम् निषेधी अध काय कायसंस्पर्शम् क्षमणीय भवद्भिः क्लामः अल्पक्चात्तानो बहुशुभेन भवतो दिवसो व्यतिक्रान्त यात्रा भवताम् यापनीयं च भवताम क्षमयामिक्षमाश्रमण देसिकम व्यतिक्रमम आवश्यक्या प्रतिक्रामामि क्षमाश्रमणानदेवसिक्या अशातनया त्रयस्त्रिंशदन्यवरया यत्किञ्चिन्मिथ्यया मनोदुष्कृतया चचोदुष्कृतया कायदुष्कृतया.सर्वमिथ्योपचारया सर्वधर्मातिक्रम- णया आशातनया यो मया अतिचारः कृतः क्षमाश्रमण | प्रति- कामामि चिन्दामि गहें आत्मानं व्युत्सृजामि। । शब्दार्थ . इच्छामि में इच्छा करता हू । अणुजाणह--आदेश दे खमासम्णो हे क्षमावान श्रमण | मे-मुझे वंदिउं वन्दना करने की मिउग्गह-परिमित स्थान में जावणिज्जाए-शक्ति के अनुसार प्रवेश करने का निसीहिसाए शरीर को पाप निसीहि-पाप.क्रिया को रोकनेवाला N TI क्रिया से हटाकर में रहकर श्रावक प्रतिक्रमण अहोकायं-मैं आपके चरण का आवस्सियाए-आवश्यक क्रिया कायसंफास-मेरे शरीर से के करने में जो विपरीत आचरण मस्तक से स्पर्श करता हूं। हुआ हो उससे खमणिजो-आप क्षमा करने पडिकमामि-निवृत्त होता है। योग्य है अतः क्षमा करें खमासमणाणं-आप, भे-आपको क्षमाश्रमण को किलामो लाम अर्थात् कण्ट देवसिआए-दिवस सम्बन्धी हुआ तो भासायणाए-आशातना से अप्पकिलंताणं-अग्लान अवस्या तित्तिसन्नयराए-तेतीस में से किसीसे भी बहुसुभेण-~-बहुत शुभ क्रिया से जं किचि-और जो कोई भे-आपने मिच्छाए-मिथ्या भावसे की हुई दिवसो-दिवस मणदुकडाए-दुष्ट मनसे की हुई वहतो-विताया वयदुकडाए-दुष्ट वचनसे की हुई जता-सयमरूपी यात्रा मे-निर्वाध है आपकी दुःचेष्टा से की हुई जावणिन-शरीर मन तथा कोहाए-क्रोध से की हुई इन्द्रियो की पीड़ा से रहित है। माणाए-मान से की हुई च-और मायाए-माया से की हुई भे-आपको लोभाएलोभ से की हुई खामेमि-खमाता हूं। सव्वकालियाए-सर्वकाल खमासमणो-हे क्षमाश्रमण | सम्बन्धी देवसियं-दिवस सम्बन्धी सव्वमिच्छोवयराए-सब प्रकार इकाम-अपराध को के मिथ्या माचरणो से परिपूर्ण कायदुकडाए-शरीर की सुगुरु वंदन विधि सव्वधम्माइक्रमणाए-सर्वप्रकार खमासमणो हे क्षमाश्रमण ! केषर्म का उल्लघन पडिकमामि-निवृत्त होता हूं। करनेवाली निन्दामि-उसको निन्दा आसायणाए-आशातना से करता हूं। जो-जो गरिहामि-गुरु साक्षी से गहीं मे--मुझसे करता हूं। अइयारो-अतिचार अप्पाणं-आत्माके सावध कओ-किया गया है। व्यापारको तस्स-उसे वोसिरामि-त्यागता हूँ। भावार्थ गुरु के प्रति शिष्य का कैसा बर्ताव होना चाहिये, इसका क्षमाश्रमणसुत्र में सुन्दरतम उपदेश है। हम इसके अनुसार चलकर अपने जीवन को नत्र और आदर्श बना सकते है। नत्र जीवन एकान्त सुन्दर होता है। अहंकार भावना से जीवन कुटिल और अमिलनसार बन जाता है। हमें निजी आचरणों को सरल बनाना चाहिए, यही इसे पढने का लाभ है। शिष्य गुरु के न अति निकट और न अति दूर खडा रहकर गुरुसे प्रार्थना करता है। हे क्षमा श्रमण | मैं मेरे शरीर को पाप-क्रिया से हटाकर आपको वन्दना करना चाहता हूँ। इसलिये आप मुझे आपके चारों ओर शरीरप्रमाण क्षेत्रमें, आपका जो स्थान निर्धारित है, उसमें प्रवेश करने की आज्ञा दें। (गुरु के समीप जाने के लिये गुरु का श्रादेश लेना शिष्य का कर्तव्य है) गुरु शिष्यकी विनीत भावना को देखकर उसे वन्दना करने की आज्ञा देते हैं। तब शिष्य वहां उपस्थित होकर फिर गुरुसे प्रार्थना करता है -प्रभो ।

६२
श्रावकं प्रतिक्रमण
आप मुझे आज्ञा दें, मैं आपके चरणका मस्तकसे स्पर्श करूं।
(गुरु की आज्ञा लेकर.गुरु के चरणों को सिर से स्पर्श करता है)
चरण-स्पर्श करने के बाद गुरु से क्षमा-याचना करता है ।
हे गुरुदेव ! आपके चरणों को छूने से आपको कष्ट पहुंचा हो
तो मैं आपका क्षमा-प्रार्थी हूं।
शिष्य-क्या आपने अग्लान अवस्था में रहकर बहुत शुभं
क्रियापूर्वक दिन विताया १
गुरु-हाँ, मैंने दिन को शुभ अनुष्ठान से सफल किया है।
शिष्य-आपकी संयम यात्रा सब प्रकार को वाधाओं से
रहित है ? आपका शरीर मन की चंचलता और इन्द्रियों के
विकारों से अबाधित है?
इसके बाद शिष्य अपने अपराध की क्षमा याचना करता
हुआ कहता है-हे क्षमा श्रमण ! दिन में या रात मे, जान मे या
अनजान में आपका कोई भी अपराध किया हो तो उसके लिये
आप मुझे क्षमा करं। भगवन्! आप मुझे आज्ञा दें-अपनी
आवश्यक क्रियाओं के प्रतिकूल जो कोई आचरण किया हो
उससे मैं निवृत्त होऊँ (विशेष आग्रह पूर्वक ) हे क्षमाश्रमण-!
आपकी तेतीस प्रकार की आशातनाओं में कोई भी दिन-सम्बन्धी
या रात्रि-सम्बन्धी आशातना से मैंने अतिचार सेवन किया हो तो
उससे मैं निवृत्त होता हूं। अविनय होने के कारणों का उल्लेख
करता हुआ शिष्य कहता है-प्रभो! अविनय होने के इतने
कारण है-मिथ्या, भावना, मन की बुरी प्रवृत्ति, शरीर की बुरी
प्रवृत्ति, क्रोध, अहंकार, छल, कपट, लोभ, आसक्ति। इन कारणों
में से किसी भी कारण से मैंने आपका अविनय किया हो तो

सुगुरुवदन विधि ६ उससे मैं निवृत्त होता हूं। एव दिन या रात किसी भी क्षण मे वर्तमान, भूत या भविष्य मे (भविष्य में गुरु के अनिष्ट करने का संकल्ल कर लेना) सब प्रकार के मिथ्याचरणों से होने वाली या सब प्रकार के धर्म का अतिक्रमण करने वाली आशातना के द्वारा मैंने जो कोई अतिचार सेवन किया हो तो उसे भी मैं निवृत्त होता हूं और इस प्रकार दृढ़ संकल्प करता हूं कि भविष्य में कोई आशातना नहीं करूंगा। अतीत में मैंने जो कुछ अति- चार सेवन किया, उसकी मैं निन्दा करता हूं, गर्दा करता हूं यानी विशेषरूप से निन्दा करता हूं।

तरस खच्चर पाठ
मूल पाठ]
तस्स सव्वस्स देवसियस्स अइयारस्स दुञ्चितिय
दुब्भासिय दुचिट्ठियस्स आलोयंतो पडिकमामि
निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥
छाया
तस्य सर्वस्य देवसिकस्य अतिचारस्य दुश्चिन्तित दुर्भाषित
दुःस्थितस्य आलोचयन् प्रतिक्रामामि निन्दामि गहें आत्मान
व्युत्सृजामि ।
शब्दार्थ
तस्स-उस
देवसियरस-दिवस सम्बन्धी
अइयारस्स-अतिचार की
सव्वरस-सभी

तस्स सव्वस पाठ दुञ्चितिय-दुष्ट विचार निन्दामि-आत्म-निन्दा करता हू। दुव्भासिय-दुर्वचन गरिहामि-गुरुसाक्षी से गाँ दुचिट्ठियस्स-शरीरकी कुचेष्टारूप करता हूँ। आलोयंतो-आलोचना करता हुआ अप्पाणं-पापकारी आत्मा को पडिकमामि-निवृत्त होता है। वोसिरामि-न्यागता हूँ। भावार्थ मन में बुरे विचार कर, बुरे वचन बोल कर एवं शरीर की पापकारी प्रवृत्ति कर जो दिन मे अतिचार किये हों, उन सब की आलोचना करता हुआ निवृत्त होता हूं। आत्मा की निन्दा करता हूं, गर्दा करना हूं। पापमय आचरणों को त्यागता हूं। मानव मन की वृत्तियों का दास होता है। मन पर विजय पानेवाला मनुष्य वचन और शरीर पर सहज ही विजय पा लेता है। वचन और शरीर की दुष्प्रवृत्तियों में मन का बड़ा हाथ है। अतएव मन का स्थान सबसे पहला है। वचन और शरीर उसके अनुगामी है। यद्यपि तत्त्वतः इन तीनोंकी प्रवृत्तियां स्वतन्त्र है ; नथापि बहुधा एक का दूसरे पर असर होता है। इन तीनों में एक की या तीनों की दुष्प्रवृत्तियों से जो अतिचार- दोष लगता है-उसकी शुद्धि के तीन साधन बतलाये है:- (१) आत्मनिन्दा (२) आत्मगहीं (३) दुष्प्रवृत्ति का प्रत्याख्यान अपने अवगुणों की निन्दा करना बड़ा कठिन है। गुरु के समक्ष आत्म-दोषों को प्रकट करना उससे भी कठिन है। आत्म- श्रावक प्रतिक्रमण दुष्कार्यों का निरोप तो सबसे कठिन है। आत्म-निन्दा और आत्म-गहरे से भाव शुद्ध होते हैं। शुद्ध भावना से कर्ममल दूर होते हैं और आत्मा पूर्वकृत दोषों से निवृत्त हो जाती है। इस प्रकार ये दोनों अतीत दोषों की शुद्धि के उपाय हैं। दुष्प्रवृत्ति का प्रत्याख्यान करना, वर्तमान और भविष्य में लगनेवाले दोषों से पृथक् रहने के उपाय हैं। अतीत दोषों का प्रायश्चित्त करना, वर्तमान और भविष्य के दोषों का निरोध करना ही आत्म-शुद्धि का श्रेष्ठ उपाय है।

बत्तारि मंगल
चार मगल
मूल पाठ
चत्तारि मंगलं-अरिहन्ता मंगलं, सिद्धा मंगलं,
साहू मंगलं, केवलिपन्नतो धम्मो मंगलं, चत्तारि
लोगुत्तमा-अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा,
साहू लोगुत्तमा, केवलिपन्नतो धम्मो लोगुत्तमा,
चत्तारि सरणं पवजामि, अरिहंता सरणं पवज्जामि,
सिद्धा सरणं पवज्जामि -साहू सरणं पवजामि,
केवलिपन्नतं धम्म सरणं पवज्जामि ।
छाया
चत्वारो मङ्गलम्-अर्हन्तो मङ्गलम, सिद्धाः मङ्गलम, साधवो
मङ्गलम, केवलिप्रप्तो धर्मोमङ्गलम्, चत्वारो लोकोत्तमाः-अहन्तो
लोकोचमाः, सिद्धाः लोकोत्तमाः, साधवो लोकोत्तमाः, केवलिप्रज्ञप्तो
धर्मोलोकोत्तमः चतुरः शरणं प्रपद्य, अर्हतः शरणं प्रपद्य सिद्धान्
शरणं प्रपद्ये साधून शरणं प्रपद्य, केवलिप्रज्ञप्तधर्म शरणं प्रपद्ये।

६८ श्रावक प्रतिक्रमण शब्दार्थ चत्तारि मंगलं-चार मगल है धम्मो लोगुत्तमा-धर्म लोकोत्तम अरिहंता मंगलं-अरिहत मगल चत्तारि सरणं पवज्जामि-चार सिद्धा मंगलं-सिद्ध मगल शरण को ग्रहण करता हूँ। साहू मंगलं-साधु मगल अरिहंता सरणं पवज्जामि- केवलिपन्नतो-केवली-कथित अरिहतकी शरण ग्रहण धम्मो मंगलं-धर्म मगल करता हूँ। चत्तारि लोगुत्तमा–चार पदार्थ सिद्धा सरणं पवज्जामि-मिद्ध लोकमे उत्तम है। भगवानकी शरण ग्रहण करता हूँ। अरिहंता लोगुत्तमा-अरिहन्त साहू सरणं पवज्जामि-साधुवर्ग लोकोत्तम की शरण ग्रहण करता हूँ। सिद्धा लोगुत्तमा-सिद्ध लोकोत्तम केवलिपन्नतं केवली-कथित साहू लोगुत्तमा-साधु लोकोत्तम धम्म सरणं पवजामि-धर्मकी केवलिपन्नतो केवली-कथित शरण ग्रहण करता हूँ। मङ्गल का अर्थ है विन्न का नाश करना। विघ्न होने का हेतु कर्मफल है। कर्मोदय होने के कारण ही यथेष्ट सिद्धि में बाधायें उपस्थित होती हैं। विशुद्ध आत्माओं का स्मरण, उपासना एवं विशुद्ध आचरण कासमूहों का क्षय करने वाले है। अतः यह मंगल है। मंगल दो प्रकार के होते हैं द्रव्य मंगल और भाव मंगल। दो प्रकार गुण शून्य मंगल को द्रव्य मंगल कहते हैं । यह वस्तुतः मंगल नहीं, केवल उपचार मात्र है। जैसे-दूर्वा, रोली आदि पदार्थ लोक- दृष्टि से मंगल माने जाते हैं। भाव मंगल से सगुण मंगल को तात्पर्य है , यह परमार्थ रूप से मंगल है । मगल मगल के चारमगल ६६ अरिहन्त, सिद्ध, साधु और केवलीभाषितधर्म मंगल क्यों यह मगल क्यो? है, यह तो स्पष्ट ही है, क्योंकि अरिहंत संयमी होते है और धाति कर्मों से रहित होते है, सिद्ध सब कर्मों से रहित होते हैं। साधु छः जीवकाय के रक्षक तथा संयमी होते है। इनकी उपासना से या स्मृति से कर्मक्षय होता है अतः यह मंगल है । धर्म संवर या निर्जरा रूप है। संवर कर्म-निषेध करने वाली आत्मा की अवस्था है और निर्जरा पंधे हुए कर्मों को तोड़ने वाली शुभ प्रवृत्ति-रूप आत्मा की अवस्था है। संवर से कर्म का निरोध होता है एवं निर्जरा से आत्मा उज्ज्वल होती है। अतएव धर्म मङ्गल है। ये सब मङ्गल करने वाले है, इसीलिये लोक में उत्तम हैं, और लोक मे उत्तम है, इसीलिये इनकी शरण ग्राह्य है। एक छोटे से दोहे मे कहा है- ए चारों शरणा समा, और न सगो कोय। जे भवी प्राणी आदरे, अक्षय अमर पद होय ।।

नाजाइयारे पाठ ज्ञानातिचार पाठ मूल पाठ आगमे तिविहे पन्नते। तंजहा सुत्तागमे, अत्थागमे, तदुभयागमे । एअस्स सिरिनाणस्स जो मे अइयारो को तं आलोएमि । जंबाइई, वच्चामेलियं, हीणक्खरियं, अच्च- क्खरियं, पयहीणं, विणयहीणं घोसहीणं, जोगहीणं, सुठुदिन्न, दुठुपडिच्छियं,अकालेकओ सझाओ, काले न कओ सज्झाओ, असज्झाए सज्झाइअं, सज्झाए न सज्झाइअं, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

ज्ञानातिचार ७१ छाया आगमः त्रिविधः प्रज्ञप्तः। तद्यथा सुत्रागमः अर्थागमः तदुभया- गमः। एतस्य श्री ज्ञानस्य योमया अविचारः कृतः आलोचयामि व्याविद्धं-ज्यत्यानंडित,हीनाक्षरिकम्,अत्यक्षरिकम्, पदहीन, विनय- हीनं, घोषहीन, योगहीन, सुष्ठुदत्तं, दुष्ठुप्रतीच्छितं, अकाले कृतः स्वाध्यायः, काले न कृतः स्वाध्यायः, अस्वाध्याये स्वाध्यायितं- स्वाध्याये न स्वाध्यायितं, यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् शब्दार्थ आगमे-आगम कओ-किया हो तो तिविहे-तीन प्रकार का तं-उसकी पन्नते-कहा है आलोएमि-पालोचना करता है। तंजहा-जैसे जवाइद्ध-सूत्र के पाठ उल्ट पल्ट सुत्तागमे-(१) सूवागम-मूल पढ़े हो। पाठ रूप या शब्दरूप आगम वचामेलियं-सूत्र के पाठ के साथ अस्थागमे-(२) अर्थागम दूसरे पाठ जोड कर पढ़ें हो। अर्थरूप मागम हीणक्खरियं-हीन अक्षरयुक्त सूत्र तदुभयागमे-शब्द और अर्थ इन पाठ पढे हो। दोनो रूप मागम अधक्खरियं-अधिक अक्षरयुक्त एअस्स-इस पाठ पढ़े हो। सिरिनाणस्स-श्रीयुत मागम का पयहीणं-पदहीनसूत्र पाठ पढे हो। जो-जो. विणयहीणं-विनय रहित पठन किया हो। अइयारो-अतिचार घोसहीणं -घोषहीन पढा हो।

श्रावक प्रतिक्रमण जोगहीणं-योग रहित पढा हो। सभाओ-स्वाध्याय सुट्ठुदिन्नं-अयोग्य को अधिक असज्माए-अस्वाध्याय काल में ज्ञान दिया हो। न सज्झाइयं-न स्वाध्याय दु/पडिच्छिय -गुरु से प्राप्त किया हो। ज्ञान विपरीत रूपसे ग्रहण जो मे-जो मैने किया हो। देवसिओ-दिवस सम्बन्धी अकाले-अकाल मे अइयारो-अतिचार कओ-किया हो। कओ-किया हो। सभाओ-स्वाध्याय तस्स-उसका काले न-काल मे नहीं मिच्छामि-निष्फल हो। कओ-किया हो। दुक्कडं-पाप भावार्थ ज्ञान "रसायनमनौषधम्", बिना औषध का रसायन है। औषधि में केवल दैहिक रोगों को मिटाने की क्षमता है। ज्ञान मानसिक रोगों का भी नाशक है। शरीर-रोग तो मानसिक विकारों के अभाव में स्वतः ही नामशेष हो जाते है। ज्ञान विशुद्ध जीवन का निर्माता और सदुआचरणों का दर्शक है । ज्ञान के बिना सत् क्रियाओं का पूरा पूरा भान नहीं हो सकता। ज्ञान कहीं दूसरी जगहों से नहीं आता है। वह हमारी आत्मा का गुण है। आगम-सिद्धान्त हमारे ज्ञान को जागृत करने का साधन है। सिद्धान्त के अनुसार हम सद्भावनाओं को बलवान् बना सकते हैं। अतः सिद्धान्त का स्थान हमारी दृष्टि में अति महत्त्वपूर्ण है। हमारे लक्ष्यभूत सिद्धान्त, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी भगवान महावीर के विचार हैं और सुधर्मा स्वामी का गुम्फन ज्ञानातिचार पाठ ७३ है। दूसरे शब्दों मे भगवान महावीर के स्फुट अर्थ सुधर्मा म्वामी द्वारा संकलित किये हुए हैं। सूत्र के मूल पाठों का अध्ययन करना सिद्धान्त-पठन है। अर्थ का और इन दोनों (सूत्र और अर्थ) का अध्ययन करना भी सिद्धान्त-पठन है। सिद्धान्त- पठन के सम्बन्ध मे जो चवदह वाते वर्जनीय है, उनका इस जानातिचार सूत्र में स्पष्ट उल्लेख है। (१) सूत्र के शब्द और वाक्य जिस प्रकार है, उनको अंट-संट ढंग से पढाना प्रथम ज्ञानातिचार है। (२) अपनी बुद्धि से बनाये हुए पाठों का प्रक्षेप कर सूत्र पढना दूसरा ज्ञानातिचार है । चूकि इससे सिद्धान्त की प्रामाणिकता मे वाधा आ आती है। (३) अक्षरों को छोड़ कर सूत्र पढ़ना तीसरा ज्ञानातिचार है। क्योंकि अक्षरों को छोड़कर पढ़ने से उसका अर्थ ही समझ मे नहीं आ सकता, और उसका स्वरूप भी विकृत हो जाता है। (४) अधिक अक्षरों को जोड कर सूत्र पढ़ना चौथा ज्ञानातिचार है। (५) पदों को छोड़ कर सूत्र पढ़ना पांचवां ज्ञानातिचार है । विभक्ति अन्तवाले शब्दों को पद कहते है । यथा “लोगस्स" यह पष्ठी विभक्ति अन्तपद है। विभक्ति का अर्थ विभाग है। इससे एक शब्द से दूसरे शब्द का और एक अर्थ से दूसरे अर्थ का विभाजन होता है। लोगस्स यह लोक शब्द के अन्त मे पष्ठी विभक्ति है। इसका अर्थ है लोक का। 'उन्झोयगरे' यह द्वितीया विभक्ति है, इसकाअर्थ है उद्योत करने वालों को। पदों को यथावत् न पढ़ने से सूत्र-अर्थ का विपर्यास हो जाता है। (६) विनयहीन छट्ठा ज्ञानातिचार है।

श्रावक प्रतिक्रमण
(७) घोषहीन-सातवा ज्ञानातिचार हैं
(८) योगहीन-आठवां ज्ञानातिचार है।
विनय का अर्थ है आशातना को वर्जना या भक्ति-बहुमान
करना।
घोष-उदात्त-अनुदात्त आदि व्याकरण निर्दिष्ठ स्वरों के
उच्चारण है। जैसे किसी स्वर को धीमे बोलना और किसी को
जोर से बोलना इत्यादि।
योग-मन, वचन और शरीर की प्रवृत्ति करना। (योग
रहित से शुभयोग रहित सूत्र पढने का तात्पर्य है)।
(8) अल्पज्ञान के योग्य व्यक्ति को अधिक ज्ञान सिखाना नौवां
अतिचार है। इस विषय में कई लोगों को सन्देह रहता है
कि अयोग्य को ज्ञान देना अतिचार क्यों ? अयोग्य व्यक्ति
भी ज्ञान देने से योग्य बन सकते हैं। ज्ञान के अभाव में
तो सब अयोग्य ही होते है। इसका उत्तर यह है, कम
ज्ञान वाले अयोग्य होते है, और अधिक ज्ञान वाले योग्य
होते है, यह मानना अनुचित है। योग्यता और अयोग्यता
सिर्फ ज्ञान पर ही निर्भर नहीं, इनकी कसौटी पुरुप की सद्-
भावना, सद्विवेक और ज्ञान का सदुपयोग है। जो पुरुष
अविनीत, उच्छवल और अविवेकी होता है तथा दुर्भावना
को फलित करना ही जिसका एकमात्र ज्ञान पढ़ने का लक्ष्य
रहता है, वह ज्ञान का अपात्र है। इसप्रकार के
ज्ञान देना साँप को
दूध
पिलाने वाली लोकोक्ति को चरितार्थ
करना है। अयोग्य के हृदय में अधिक ज्ञान समा नहीं
सकता। वह किसी न किसी रूप मे उसका दुरुपयोग कर ही
पुरुप को

ज्ञानातिचार
,
डालता है, जिससे न केवल उसकी ही अवगणना होती
है, अपितु ज्ञान और ज्ञानदाता की भी भर्त्सना होती है।
अतः पात्रापात्र परीक्षापूर्वक ज्ञान देना सर्वथा उचित और
सद्विवेकपूर्ण कार्य है।
(१०) गुरु के दिये हुए ज्ञान को प्रतिकूल बुद्धि से लेना दसवा
ज्ञानातिचार है।
(१२) अकाल मे स्वाध्याय करना
(१२) काल में स्वाध्याय न करनी।
(१३) अस्वाध्याय में स्वाध्याय करना।
(१४) स्वाध्याय मे स्वाध्याय न करना ।
क्रमशः ११, १२, १३, १४, ज्ञानातिचार है । उक्त रीत्या
चवदह प्रकार से ज्ञान पढ़ने मे जो अतिचार सेवन किया हो तो
उस सम्बन्धी मेरे सब पाप निष्फल हों।
.

दखना सहवं अद्यारे दर्शन-स्वरूप अतिचार मूल पाठ- अरिहंतो महदेवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो। जिणपप्णत्तं तत्तं, इय सम्मतं मए गहियं ! एअस्स सम्मत्तस्स समणोवासएणं पंच अइयारा पेयाला जाणियन्वा न समायरियव्वा तंजहा १ संका २ कंखा ३ वितिगिच्छा ४ परपासंडिपसंसा ५ परपासंडिसंथवो जो मे देवसिओ अइआरो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं। छाया अर्हन् मम देव., यावज्जीवं सुसाधवो गुरवः, जिनप्रज्ञप्त तत्त्वम्, इति सम्यक्त्वं मया गृहीतम् ।

दर्शन-स्वरूप अतिचार ७७ एतस्य सम्यक्त्वस्य श्रमणोपासकैः पञ्च अतिचाराः प्रधाना: ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा शंका काड्डा विचिकित्सा परपाषण्डिप्रशंसा परपाषण्डिसंस्तवः यो मया देवसिकः अतिचार: कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् । शब्दार्थ अरिहंतो महदेवो-अरिहत तंजहा-वे इस प्रकार है भगवान् मेरे देव है। संका-केवली के बचनो में शका जावज्जीव-जीवन पर्यन्त करना सुसाहुणो गुरुणो उत्तम साधु कंखा--अवीतराग-कथित मार्गकी वाछा करना जिणपण्णत-जिन-केवली वितिगिच्छा-धर्म के फल में प्ररूपित सदेह करना तत्त-तत्त्व धर्म है परपासंडिपसंसा-परपापडी की इय सम्मतं-इस समयक्त्व को प्रशसा करना मए गहियं-मैने ग्रहण किया है परपासंडिसंथवो-परपाषंडी का एअस्स-इस परिचय करना सम्मत्तस्स-सम्यकत्व के जो मे-जो मैने (इस सम्बन्ध में) समणोवासएणं-श्रमणोपासक को देवसियो-देवसिक पंच अइयारा-पाच अतिचार अइयोरो-अतिचार पेयाला--प्रधान को-किया हो जाणियन्वा--जानने चाहिये तस्स--उसका न-नही। मिच्छामि दुकई-पाप मेरे लिये समायरियव्वा-आचरण करना निष्फल हो। चाहिए L धावक प्रतिक्रमण . सम्यक्त्व भावार्थ जैन दर्शन में सम्यक्त्व का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मोक्ष के चार मार्ग बतलाये गये है। उनमें इसका स्थान सबसे पहला है। वस्तुत: होना ही चाहिये। क्योंकि जबतक हमारा कोई एक निश्चित लक्ष्य नहीं बनता तबतक हम कुछ भी नहीं कर सकते। सम्यक्त्व जैन दृष्टिकोण का स्थिरलक्ष्य या मध्यविन्दु है। इसी के सहारे मुमुक्षु पुरुप आत्म-साधना की ओर अग्रसर होते है । कोई पुरुप आत्म-मुक्ति के लिए जो आचार पालना चाहें. उसमें उसका विश्वास ही नहीं, तो वह उस दिशा में सफल नहीं हो सकता। यह एक अकाट्य नियम है कि हम वही काम करना चाहेंगे कि जिसमें हमारी रुचि पैदा हुई, एवं जिसमें हमारा विश्वास है। बिना इनके प्रथम तो हम कोई काम कर ही नहीं सकते, और यदि परिस्थितियों के कारण करना पड़े तो उसमे सफलता नहीं मिल सकती। अतएव सर्व प्रथम हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि इम जो करना चाहें, उसमें पहले रुचि एवं विश्वास पैदा करें और बाद में उसमें जुट जायं। सम्यकत्व ठीक यही चीज है। आत्म-साधक का जो सही लक्ष्य एवं सत्यमें विश्वास है, वही सम्यक्त्व है। आत्म-साधक का लक्ष्य आत्म- मुक्ति होता है। अगर उसे आत्मा एवं मुक्ति में विश्वास न हो तो वह आत्म-साधना क्यों कर; इसलिए सर्वप्रथम आत्मादि तत्त्वों पर यथार्थ विश्वास होना चाहिये। इसके बाद आत्म-मुक्तिके जो उपाय हैं जिन्हें धर्मकहते हैं, उन परसही श्रद्धा होनी चाहिये । सबके सब मनुष्य अपने भाप इन तत्त्वों की असलियत तक पहुंच नहीं सकते। अतः इनका पथ-प्रदर्शन करने वाले साधुओं दर्शन-स्वरूप अतिचार ७६ । के प्रति भी आत्म-विश्वास होना जरूरी है। इसे संक्षेप में यों कह सकते हैं कि देव, गुरु और धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा करना जरूरी है और वही सम्यक्त्व है। देव पर हमें विश्वास इसलिए करना होगा कि वह हमारी आत्म-साधना के मार्ग-दर्शक हैं। वह सदा जीवित नहीं रहते अतः उनके अनुगामी एवं उनके तत्वों की व्याख्या करने वाले शुद्धाचारी साधुओं पर विश्वास करना होगा जो हमारे धर्मगुरु होते है । धर्म जोहमारी आत्म-मुक्ति का साधन है। उस पर विश्वास होना तो स्वाभाविक है। सम्यक्त्व सम्यग् ज्ञान एवं सम्यग् चारित्र की जड़ है, इसके बिना न तो सम्यग् ज्ञान हो सकता है न सम्यग चारित्र । यायों यह सकते हैं कि सम्यक्त्व आत्म-साधना की पहली मंजिल है। इसको तय किये बिना दूसरी मंजिल (जो चारित्र की है ) पर नहीं पहुंच सकते। इसका कारण यह है कि चारित्र का स्थान दूसरा है और सत्य-विश्वास का पहला। सत्य-विश्वास तो चारित्र के विना भी हो सकता है, परन्तु चारित्र उसके बिना नहीं हो सकता, अतएव यह सिद्धान्त उपयुक्त है कि धर्माचरण में कोई समर्थ हो सके या नहीं, तो भी कम से कम सत्य-विश्वासी तो बने। सत्य श्रद्धा होने से सदा- चरणो मे प्रवृत्त होना सुलभ हो जाता है। केवलज्ञानवानहन् देवः शासनके अधिष्ठाताको देव कहते है। हमारे देव अरिहन्त- तीर्थङ्कर हैं। हमे किसी व्यक्ति या नाम का पक्षपाती नहीं होना चाहिए। हम गुण के उपासक है । गुण की प्रतिष्ठा करना हमारा कर्तव्य है, इसीलिए हम उसी महापुरुष को देव मानते हैं, जो अरिहन्त है, जो राग-द्वेष रहित है और सत्य धर्म के प्रवर्तक है।

८० श्रावक प्रतिक्रमण - गुरु - यथा- "सर्वज्ञो वीतरागादिदोप, स्त्रलोन्यपूजित, । यथास्थितार्थवादी च, देवोर्हन् परमेश्वर" ॥ जो सर्वज्ञ हैं, केवलज्ञानसे सब पदार्थोको यथावत् जानते हैं, राग-द्वप आदि दोपों का जिन्होंने क्षय कर डाला है, जो तीन लोक से पूजित हैं, जो यथास्थितिवादी है अर्थात् पदार्थो का जैसा स्वरूप है, वैसा ही उपदेश करते है , वह पुरुषोत्तम मनुष्य देव है, अर्हन्त है, परमेश्वर है। "महाव्रतधर. साघुर्गुरु." देव-कथित धर्म की अराधना करनेवाले तथा पांच महाव्रत पालने वाले निम्रन्थ गुरु कहलाते है। यथा- "महाव्रतधरा धीरा, भैक्षमात्रोपजीविन । सामायिकस्थाधर्मोपदेशका गुरुवोमत्ता.॥ महाव्रत धरनेवाले, भिक्षासे जीवन निर्वाह करनेवाले-शात, दांत, धर्मोपदेशक, निर्ग्रन्थ हमारे गुरु है। हमारे वर्तमान गुरु श्री तुलसी गणिराज है। "आत्मशृद्धिसाधन धर्म." अरिहन्त-भाषित सत् प्रवृत्ति और असत् निवृत्तिरूप जो आत्मशुद्धि का साधन है, वही धर्म है। इस प्रकारका सम्यक्त्व मैंने स्वीकार किया है। इस सम्यक्त्व के पांच अतिचार है। वह केवल श्रावकों के लिए जानने योग्य हैं, आचरण करने योग्य नहीं। ज्ञान और आचरण का यह कितना अन्तर है ? अच्छी और बुरी सब वस्तुएं जानना ज्ञान का काम है। पर आचरण केवल हितकर वस्तुओं का ही होना धर्म अतिचार दर्शन-स्वरूप अतिचार ८१ चाहिए। अतएव तत्त्वज्ञेय सव है और आदेय सिर्फ सबर, निर्जरा, मोक्ष ये नीन ही है। पांच अतिचार निम्न प्रकार है. (१) शका--सर्वज्ञ कथित तत्त्व मे संदेह करना । यथा- आत्मा नहीं है, परलोक नहीं है इत्यादि । शंका का अर्थ यह नहीं जान लेना चाहिए कि वस्तुस्थिति को समझने के लिए तर्क- वितर्क या विचार-विनिमय करना ही शंका नाम का अतिचार है। मनुष्य जन्म-सिद्ध विद्वान् नहीं होता। जानकार होनेका साधन विद्याध्ययन है। ऊहापोह शिक्षा का मुख्य अङ्ग है। जिन वस्तुओं को हम यथावत् नहीं जानते उनके विषय मे शंका उठती है और उसका हम गुरु के समक्ष समाधान करते है। इससे सम्यक्त्व का कोई विरोध नहीं है। शंका से यहा हमारा तात्पर्य अविश्वास से है। गागर मे सागर नहीं समा सकता। अल्पज्ञ मनुष्य सव पदार्थों को प्रत्यक्ष नहीं जान सकता। उसे चाहिए कि वह अपनी शक्ति के अनुसार पदार्थों को जानने की चेष्टा करे। इसके उपरान्त भी यदि कोई तत्त्व समझ में नहीं आये तो उस पर विश्वास करे। एक सुई के अग्रभाग तुल्य कन्दमूल मे अनन्त जीव होते है। यह तक सिद्ध है, सब कुछ है। किन्तु यदि कोई प्रत्यक्ष से देखना चाहे तो यह प्रयास असफल होगा। उस दशा मे उस मनुष्य को सर्वज्ञ के वचनों पर विश्वास रखना होगा। इस प्रक्रिया के विपरीत वह मनुष्य संदिग्ध रहे कि यह हो कैसे सकता है, यह हमारी समझ में नहीं आता अतः ऐसा नहीं होना चाहिए, इत्यादि विचार शंकातिचार के अन्तर्गत है। श्रीमद् भिक्षु स्वामी ने इसका बहुत सरल शब्दों मे उपदेश दिया है कि किसी साधु या भाषक के कोई गूढ़ तत्त्व समझ में न आवे

८२
श्रावक प्रतिक्रमण
तो वह उसकी गुरु के सामने चर्चा करे। ऐसा करने पर भी
यदि वह अपनी बुद्धि में न समा सके तो उसे अपने को अल्प
बुद्धि मान कर केवलीगम्य समझ ले, पर उस पर न तो हठ करे
और न शंका करता रहे। वितण्डा के निवारण का यह सर्वो-
त्तम उपाय है।
(२) कांक्षा-जो धर्म वीतराग-कथित नहीं, पर सरल है,
आनन्दपूर्वक भोगोपभोगों में रक्त रहने पर भी मुक्ति प्राप्त करा
देने का दावा करता है, उसे स्वीकार करने की इच्छा करना
कांक्षा नाम का दूसरा अतिचार है। भोग-विलास की ओर
आत्मा की सहज ही गति रहती है और फिर धर्म के नाम से
उपदेश मिल जाती है ; तब फिर क्यों कोई त्याग-तपस्या का कष्ट
उठावे ? इस प्रकार के मोह प्रभोलनों मे न फंसना और उनसे
आकर्पित न होना ही सम्यक्त्व का आचार है ।
(३) विचिकित्सा-त्याग, तपस्या आदि आचरणों के फल मे
सन्देह करना। मैं इतना धर्म करता हूं, इसका मुझे फल मिलेगा
या नहीं इत्यादि ? ऐसी ऐसी शंकाओं से कई लोग धर्म भ्रष्ट हो
जाते है। किन्तु उनको यह जानना चाहिए कि धर्म कभी
निष्फल नहीं जाता, उसका फल अवश्य मिलता है। उससे हमारी
आत्म-शुद्धि होगी और वही हमारे जीवन का सार है। उसकी
आराधना हम धन-धान्य ऐश्वर्य आदि फल की प्राप्ति के लिए
नहीं करते। हमारा लक्ष्य सिर्फ उसके सहारे मोक्ष प्राप्त करने
का है । विचिकित्सा का दूसरा अथे घृणा है। साधु-सतियों के
मैले कपड़े देखकर घृणा करना इत्यादि ।
पर पापंडिप्रशंसा एवं पर पापंडिसंस्तव,ये क्रमशः चौथे

दर्शन-स्वरूप अतिचार ८३ और पाचवें अतिचार है। इन दोनों का तात्पर्य यह है कि मिथ्यात्वी की ऐसी प्रशंसा और उससे ऐसा परिचय नहीं करना चाहिए कि जिससे अपनी सम्यक्त्व में बाधा आ सके एवं मिथ्यात्व को प्रोत्साहन मिले। गुण की प्रशंसा और गुण का परिचय निषिद्ध नहीं हो सकता। यह निषेव मिथ्या आचार-विचार को प्रसा- रित करने का है। इससे हमे यह शिक्षा मिलती है कि हम किसी तरह भी मिथ्यात्वी के प्रभाव में आकर या उसे प्रसन्न करने के लिये उसके मिथ्या आचार विचार की प्रशंसा न कर। धार्मिक विचारों में हमारो सार्वभौम स्वतंत्रता का उपभोग करें। इन अतिचारों के सेवन से मुझे पाप लगा हो, वह सब मेरे लिये निष्फल हो।

अणुचतानि (महाव्रत की अपेक्षा छोटे व्रत) प्रथम अणुव्रत मूल पाठ पढमं अणुव्वयं-थूलाओ पाणाइवायाओ वेरमणं तसजीवे बेइंदिय - तेइंदिय - चउरिदिय- पंचिंदिये संकप्पओ हणण - हणावण - पचक्खाणं स-सरीर सविसेस-पीड़ाकारिणो-स-संबंधि-सविसेस- पीड़ाकारिणो वा वजिऊण जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एअरस थूलग - पाणाइवाय-वेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइयारा पेयाला जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा-१ बंधे २ वहे ३ छविच्छेए ४ अइभारे ५ भत्तपाणविच्छेए जो मे देवसिओ अइआरो की तस्स मिच्छामिदुक्कडं ।

प्रथम अणुव्रत छाया प्रथमं अणुव्रतं-स्थूलात प्राणातिपाताद विरमणं त्रसजीवानाम् द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रय-पञ्चेन्द्रियाणाम् संकल्पतः हनन- घातन प्रत्याख्यानम् स्व-शरीर-सविशेप-पीडाकारिण-स्व-संबन्धि- सविशेष-पीडाकारिणः वा वर्जयित्वा यावज्जीवं द्विविधं त्रिवेधेन (स्थूलहिंसां ) न करोमि न कारयामि मनमा वचसा कायेन एतस्य स्थूलकप्राणातिपात-विरमणस्य श्रमणोपासकेन पञ्च अतिचाग: प्रधानाः ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ बन्धः २ वधः ३ छविच्छेदः ४ अतिभारः ५ भक्तपान विच्छेद यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् । शब्दार्थ पढम-प्रथम हणावण-मरवाने का अणुव्वयं-अणुव्रत पचक्खाणं-प्रत्याख्यान है थूलाओ-स्थूल ससरीर-निज के शरीर को पाणाडवायाओ-प्रणातिपात- सविसेस-विशेप जीव-हिंसा से पोडाकारिणो वा-पीडा देनेवाले वेरमणं-विरत होना-अलग होना तसजीवे त्रस जीव पजिऊण-वर्जकर वेई दिय-द्वीन्द्रिय जावन्जोवाए-जीवनपर्यन्त तेइंदिय-वीन्द्रिय दुविहं-दो करण चरिद्रिय-चतुरिन्द्रिय तिविहेणं-तीन योगसे। पचिंदिये-पञ्चेन्द्रिय को । (स्थूलहिंसा) संकप्पओ-सकल्प पूर्वका । न करेमि-नही कल हणण-मारने का न कारवेमि नही कराऊँ को अथवा - . । .

श्रावक प्रतिक्रमण मणसा-मन से तंजहा-वे इस प्रकार है वयसा-वचनसे १ घंधे-बाधना कायसा-शरीर से २ वहे-निर्दयता से मारना एअस्स-इस पीटना थूलग-स्थूल ३ छविच्छे ए—गहरा घाव पाणाइवाय-प्राणातिपात करना, शरीरके अवयवो का वेरमणस्स-विरमणव्रत के छेद करना समणोवासएणं-श्रमणोपासक को ४ अइभारे-अतिभार लादना पंच-पाच भत्तपाणविच्छेए-खाने-पीने में अइयारा-अतिचार रुकावट डालना पीड़ा कारिणो-पीडा देनेवालेको। जो मे-जो मैने स-संबंधि-अपने सबन्धी जनोको देवसियो-दिन सम्बन्धी सविसेस-विशेष । अइयारो-अतिचार पेयाला-प्रधान कओ-किया हो तो जाणियव्वा-जानने योग्य है तस्स-उसका न-नहीं है मिच्छामि-निष्फल हो समायरियम्वा-आचरण करने दुकर्ड -पाप योग्य भावार्थ प्रथम अणुव्रत स्थूल प्राणातिपातविरमण-हे गुरुदेव ! मैं सर्वप्रथम पहले अणुव्रत में स्थूल जीव-हिंसासे निवृत्त होता हूँ। मेरे निज के या मेरे सम्बन्धियों के अपराधियोंको छोड़कर शेष सब स्थूल द्वीन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीवों की संकल्प- पूर्वक (मारने की बुद्धि से) हिंसा करने का एवं करवाने का प्रत्या- प्रथम अणुव्रत ख्यान करता हूं। मैं जीवन पर्यन्त इनकी हिंसा, मनसा-वाचा- कर्मणा न करूंगा और न कराऊँगा । विवेचन साधु और गृहस्थ का धर्म-मोक्ष साधना का पथ-पृथग अणुव्रत पृथग नहीं है, एक ही है। अन्तर केवल इतना ही है कि मुनि का साधना-पथ पूर्ण है और गृहस्थ का अपूर्ण। साधु के पांच महावत हैं-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह। इस दशा में गृहस्थ के पाच अणुनत है-महानत की अपेक्षा छोटे व्रत-स्थूल अहिंसा, स्थूल सत्य, स्थूल अचौर्य, स्थूल ब्रह्मचर्य, स्थूल अपरिग्रह। शेष सात व्रत तो इनको ही पुष्ट करने वाले है। प्राणातिपात आत्मा अमर है । उसको मृत्यु नहीं होती। यह सर्व साधारण मे प्रसिद्ध है। पर तत्त्वदृष्टि से यह चिन्तनीय है। चूकि आत्मा एकान्त नित्य नहीं-परिणामी-नित्य है अर्थात् उत्पाद- व्यय सहित नित्य है। केवल आत्मा ही क्या, विश्व के समस्त पदार्थों का यही स्वरूप है। कोई भी पदार्थ केवल नित्य या केवल अनित्य नहीं हो सकता। सभी पदार्थ अपने रूप का त्याग न करने के कारण नित्य है और नानाप्रकार की अवस्थाओं के प्राप्त होते रहने के कारण अनित्य है। या यों कहिये द्रव्यरूप में सब पदार्थ नित्य है और पर्याय रूप मे अनित्य हैं। नित्य का फलितार्थ है-अपने रूप को न त्यागना । अनित्य का फलितार्थ है क्रमशः एक-एक अवस्था को छोड़ते रहना और दूसरी-दूसरी अवस्था को पाते रहना। आत्मा अपने स्वरूप को नहीं त्यागती, अतः नित्य है--अमर है और एक शरीर को छोडती है, दूसरे को पाती है, इत्यादि अवस्थाओं से अनित्य है-उसकी मृत्यु होती ।

श्रावक प्रतिक्रमण है। आत्मा की प्राण-शक्तियों का शरीर के साथ सम्बन्ध होता उसका नाम जन्म है और उनका शरीर से पियोग होने का नाम मृत्यु है। जन्म और मृत्यु ये दोनों आत्मा की अवस्था है। मृत्यु से आत्मा का अत्यन्त नाश नहीं होता। केवल उसकी अवस्था का परिवर्तन होता है। यथा- 'जीव जीवे अनादिकाल रो, मरे तिणरी हो पर्याय पलटी जाण' इसलिए शरीर के वियोग होने से आत्मा की मृत्यु कहने में हमे कोई भी संकोच नहीं होना चाहिए। प्राण शक्तियां दश है- पाच इन्द्रिय प्राण, ६ मनोबल, ७ वचनबल, ८कायबल, ह श्वासोच्छवास प्राण, १० आयुज्य प्राण। राग-द्वप प्रमादात्मक प्रवृत्ति से इनका शरीर से अतिपात- वियोग करने का नाम प्राणातिपात-हिंसा है। अथवा आत्मा की जितनी असत-प्रवृत्ति है, वह सब हिसा है। अतएव हिंसा वस्तुतः अपनी असत् प्रवृत्ति पर ही निर्भर है। प्राण शक्तियों का शरीर से सर्वथा वियोग करना सर्व हिंसा और उन्हें कष्ट देना देश हिंसा है-आंशिक हिंसा है। सूक्ष्म जीव-एकेन्द्रिय की हिंसा करना सूक्ष्म हिंसा है। स्थूल जीव- द्वीन्द्रिय से पञ्चेन्द्रिय तक की हिंसा करना स्थूलहिंसा है। खाने- पीने में, भोजन पकाने मे, व्यापार करने में, खेती करने में, * श्री भिक्षुस्वामी हिंसा के प्रकार

प्रथम अणुव्रत
८६
अहिंसा
मकान बनाने आदि-आदि कार्यों में होने वाली हिंसा आरम्भना
हिंसा है। बिना प्रयोजन संकल्पपूर्वक हिंसा करना संकल्पना
हिंसा है। अपराध करने वाले को मारना अपराधी हिसा है।
विना अपराध किये मार डालनो निरपराध हिंसा है। अपराध
की आशंका से मार डालना सापेक्ष हिसा है। अपराध की
आशंका के विना ही मार डालना निरपेक्ष हिंसा है।
अहिसा हिंसा का विरोधी शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ
यही है कि हिंसा नहीं करना। परन्तु परिभाषा मे केवल निषेध
का ही अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए। परिभाषा के रूप मे
अहिसा का अर्थ क्रियात्मक है।
'सर्वथा सर्वजीवेष्वजिघासुवृत्तिरहिंसा'
अहिसा में दया के सारे भाव भरे है। प्राणीमात्र को मैत्री
का अमोघ दान देना अहिंसा है और वही महान् दया है। दया
विधानात्मक शब्द है । इसका शब्दानुसारी अर्थ है-जीवों की
रक्षा करना। नहीं मारने से जीवों की रक्षा सहज ही हो जाती
। इसी आशय से श्री भिक्षु स्वामी ने फरमाया है।
नहीं मारे हो, ते दया गुणखान'।
अहिंसाही शुद्ध दया है । अहिंसा ही अभयदान है।
अहिंसा का लक्षण समता है। असमता से अहिंसा का
विरोध है। अहिंसा मे मनुष्य की रक्षा और अन्य प्राणियों की
उपेक्षा करने का उपदेश आदेय नहीं हो सकता। मनुष्य हमारे
जैसा है, मनुष्य अधिक बुद्धिमान है, अन्य दार्शनिको के शब्दों में
"ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी है, जो मनुष्येतर प्राणियों को नहीं
दी," इत्यादि विचारों से मनुष्य से भिन्न वराक जीवों का
समता

६०
श्रावक प्रतिक्रमण
नावक
अहिसा
निघृण-नाश करना अहिंसा पथ से च्युत होना है। हिसा हिंसा
ही रहेगी, चाहे एकेन्द्रिय भी क्यों न हो १ हिंसा क्षम्य नहीं हो
सकती। कार्यवश की जाने वाली हिसा हिंसा ही है। हिंसा
की जितनी विरति होती है, वह अहिसा है। यह नहीं माना
जा सकता कि गृहवास में रहता हुआ मनुष्य पूर्ण अहिंसक हो
सकता है। गृहवास का जीवन हिसामय है। उसमें तो जितनी
विरति की जावे, वह अहिंसा है।
मुनि की अहिंसा पूर्ण है। इस दशा में श्रावक की अहिंसा
अपूर्ण है। मुनि की तरह श्रावक सब प्रकार की हिसा से मुक्त
नहीं रह सकता। मुनि की अपेक्षा श्रावक को अहिंसा का परि-
माण बहुत कम है । उदाहरण के रूप मे मुनि की अहिंसा बीस
विस्वा है तो श्रावक की अहिसा सवा विस्वा है। इसका कारण
यह है कि श्रावक त्रस जोव की हिंसा को छोड़ सकता है,
बादर-स्थावर जीवों की हिसा को नहीं । इससे उसकी अहिंसा
का परिमाण आधा रह जाता है। दश विस्वा रह जाता है।
इसमें भो श्रावक त्रस जीवों की संकल्पपूर्वक हिसा का त्याग
करता है-आरम्भजा हिंसा का नहीं। 'अतः इसका परिमाण
उससे भी आधा अर्थात पांच विस्वा रह जाता है।
इरादापूर्वक हिंसा भी उन्हीं बस जीवों की त्यागी जाती है,
जो निरपराधी है। सापराधी त्रस जीवों की हिसा से श्रावक
मुक्त नहीं हो सकता। इससे वह अहिंसा अढाई विस्त्रा रह
* पूर्ण अहिंसा के वीस अश है, उनमें से श्रावक की अहिंसा का
सवा अश है।
* पृथ्वी, पानी, अग्नि, हवा, वनस्पति । ,

प्रथम अगुवा अर्थ-१- जाती हैं। निरपराध त्रस जीवो को भी निरपेक्ष हिंसा को श्रावक त्यागता है। सापेक्ष हिंसा तो उससे हो जाती है। इस प्रकार श्रावक की अहिसा का परिमाण सवा विस्वा रह जाता है। एक प्राचीन गाथा में इसे संक्षेप में कहा है। 'जीवा सुहुमाथूला, सकप्पा, आरम्भा भवे दुविहा सावराह निरवराहा, सविक्खा चेव निरविक्खा।' -१-सूक्ष्म जोव हिंसा, २ स्थूल जीव हिंसा, ३-संकल्प हिंसा, ४-आरम्भ हिंसा, ५- सापराध हिंसा, ६-निरपराध हिंसा, ७-सापेक्ष हिंसा, ८-निरपेक्ष हिंसा, हिंसा के ये आठ प्रकार है। श्रावक इनमे से चार प्रकार की (१,३,५,७) हिंसा का त्याग करता है । अतः श्रावक की अहिंसा अपूर्ण है। स्थावर जीव दो प्रकार के होते है। (१) सूक्ष्म स्थावर और (२) बादर स्थावर । सूक्ष्म स्थावर इतने सूक्ष्म होते है कि वे किसी के योग से नहीं मरते है। अतएव उनकी हिंसा का त्याग श्रावक को अवश्य कर देना चाहिए । चादर स्थावर को हिंसा का पहले अणुव्रत मे निर्देश नहीं किया है। चूकि श्रावक वादर स्थावर जीवों की सार्थ (अर्थ सहित ) हिंसा का त्याग कर नहीं सकता। गृहवास मे इस प्रकार की सूक्ष्म हिंसा का प्रतिषेध अशक्य है। शरीर, कुटुम्ब आदि के निर्वाहार्थ श्रावक को यह करनी पड़ती है । तथापि इनकी निरर्थक हिंसा का त्याग तो श्रावक को अवश्य ही करना चाहिए। 'निरथिका न कुर्वीत, जीवेषु स्थावरेष्वपि हिंसामहिंसाधर्मश काममोक्षमुपासक' म्यावन अहिंसा श्रावक प्रतिक्रमण अहिसा का प्राधान्य अर्थात् मोक्षाभिलाषी अहिंसा मर्मज्ञ श्रावक को स्थावर जीवों की भी निरर्थक हिसा नहीं करनी चाहिए। अहिंसा धर्म सावधानी में है, विभ्रान्ति में नहीं। बारह व्रतों में अहिंसा व्रत सबसे प्रधान है। अतएव सर्व प्रथम इसका उपदेश प्राप्त है। अहिंसा से सब व्रतों का समन्वय है। शेप सब व्रत इसकी शृङ्खला से बद्ध है। इसकी मर्यादा सर्वत्र अनुल्लंघनीय है । यह सब में व्याप्त है। पूर्ववर्ती आचार्यों ने यहां तक लिखा है कि तीर्थंकरों ने केवल अहिंसा का ही उपदेश दिया है "अवसेसा तस्स रक्खठा'। शेष व्रत तो उसकी रक्षा के हेतु ही बतलाये है। अहिंसावत एक राजा है तो शेप सब उसके सैनिक है। अहिंसा व्रत एक धान भरा खेत है तो वाको के सब वाड़ है। इसके बारे में जितना कहा जा सके उतना ही उचित है। जैन धर्म की मूल भोत्ति, जीवन-प्राण जो कुछ है, वह सब अहिंसा ही है। अहिंसा का प्रयोग एक बड़ी विकट समस्या है। गृहस्थ को अहिंसा का उपयोग किस जगह और किस दशा में करना चाहिए इसके बारे में अनेक मत है। कई कहते है कि हमें सब जगह अहिंसा का प्रयोग करना चाहिए। बिना इसके हम किसी भी क्षेत्रमें आगे नहीं बढ़ सकते। हमारे जीवन मे जो कुछ सार वस्तु है वह अहिंसा ही है। अहिंसा का आदर हमारा आदर है और उसकी उपेक्षा हमारी उपेक्षा। दूसरे इसके प्रतिकूल सिह- गर्जना करते हैं कि अहिंसा और अहिंसा के उपदेशकों ने * यह टीका विदेशी शासन काल में की गई थी इसीलिए लेखक ने भारत की परतन्त्रता का उल्लेख किया है। . वर्तमान सनस्या प्रथम अणुवत ६३ हमारा सवस्व छीन लिया। हमारे स्वत्व का नाश कर डाला। अहिंसा अहिंसा की रट मे हम दास बन गये। देश को गुलाम बना दिया। हम आज परतन्त्र है, मुहताज है, विवशता की वेड़ियों से जकड़े हुए है। आज दुनिया में हमारा कोई सन्मान नहीं, कोई स्थान नहीं, हमारी कोई आवाज नहीं, हम नगण्य है। आज हम कुछ नहीं कर सकते। गुलामों का क्या धर्म ? दासत्व से मुक्ति पाये बिना क्या अहिंसा १ इस दशा में हम अहिंसा को चर्दाश्त नहीं कर सकते। अहिंसा का स्वागत उसी दिन करेंगे जिस दिन हम हमारे परों पर खडे हो जायंगे, अन्यथा नहीं। इस प्रकार के विषम, विषमतम विचारों का जैन दर्शन अनेकान्त दृष्टि से किस प्रकार समन्वय कस्ता है, वह भी हमारे मनन करने का विषय है। हमे सब का सार लेना है और असार को त्यागनो है। इस पद्धति से ही हम सत्य को देख सकेंगे। जैन दर्शन के अनुसार गृहस्थ के विचारों का केन्द्र मुनि की तरह केवल धार्मिक क्षेत्र ही नहीं है । राजनैतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में भी उसको गति अबाध होती है। उनकी मर्यादा का उचित ध्यान रखे बिना उसके गृहस्थसम्बन्धी औचित्य का निर्वाह नहीं हो सकता। अतः गृहस्थ के कार्यक्षेत्र हिंसात्मक और अहिंसात्मक दोनों ही हैं। वर्तमानके राजनैतिक वातावरण मे अहिंसा को पल्लवित करने की चेष्टा की जा रही है। यह कोई नई बात नहीं। इसमे कोई आश्चर्य नहीं । अहिंसा का प्रयोग प्रत्येक क्षेत्र मे किया जा सकता है। उसका क्षेत्र कोई पृथक् निर्वाचित नहीं है। वह सर्वथा स्वतंत्र है। सत्प्रवृत्ति और निवृत्ति मे उसका एकाधिकार-आधिपत्य है। जीवन की अनिवार्य आवश्यक ६४ श्रावक प्रतिक्रमण ताओं में भी अहिंसा प्रयोज्य है । खाने पीने में भी अहिंसा का ख्याल रखना लाभप्रद है। पर हिसा और अहिंसा का विवेक यथावत् होना चाहिये ; अन्यथा दोनों का सम्मिश्रण लाभ के बदले हानिकारक हो जाता है। भगवान् महावीर का उपासक तत्कालीन राजा चेटक विशाला के राज्य का सूत्रधार और गण- तन्त्र का प्रमुख था । भगवान् की अमग्ध वाणी से उसने अहिसा का अमूल्य पाठ सीखा था। निरपराधी जीवों के प्रति उसकी भावना मे दया का प्रवाह था। वह तो श्रावकत्व का सूचक है ही, किन्तु सापराध प्राणी भी उसके सफल बाण से एक दिन में एक से अधिक मृत्यु का आलिङ्गन नहीं कर पाते थे। इतना मनोबल सर्व साधारण मै होसकता है, यह संभव नहीं। व्रत विधान सर्व साधारण को अहिसा की ओर प्रेरित करने के लिये है। अतः इसका विधान सार्वजनिकता के दृष्टिकोण से सर्वथा समुचित है। इसमें अहिंसा का परिमाण यह बताया गया है कि श्रावक निरपराध त्रस प्राणी (न केवल मनुष्य ) को मारने की बुद्धि से नहीं मारता। यह अहिंसा का मध्यम मार्ग है। गृहस्थ के लिये उपयोगी है। इसमें न तो गृहस्थ के औचित्य संरक्षण में भी वाधा आती है और न व्यर्थ हिंसा करने की राक्षसी वृत्ति भी प्रोत्साहित होने पाती है। यदि हिंसा का विलकुल त्याग न करे तो मनुष्य राक्षस बन जाता है और वह हिंसा को सर्वथा त्याग दे तो गृहस्थपन नहीं चल सकता। इस परिस्थिति में यह मध्यम मार्ग श्रावक के लिए अधिक श्रेयस्कर है। इसका अर्थ यह नहीं कि गृहस्थ इस हद के उपरान्त हिंसाका त्याग कर ही नहीं सकता। यदि किसी गृहस्थ में अधिक साहस हो, अधिक मनोबल हो तो प्रथम अणुक्त वह सापराध और निपराध दोनों की हिंसा का त्याग कर सकता है। पर सर्व साधारण में कहां इतना मनोपल, कहां इतना धैर्य और कहाँ इतना साहस कि वह अपराधी को भी क्षमा कर सके ? हिंसक बल के सामने अपने भौतिक अधिकारों की रक्षा कर सके ? नीतिभ्रष्ट लोगों से अपने स्वत्व को बचा सके ? अहिंसा का प्रयोग प्रधानतः आत्मा को शुद्धि के लिए है। राज्य आदि कार्यों मे हिंसा से जितना बचाव हो सके, उतना वचाव करे, यह राज- नीति में अहिंसा का प्रयोग है। किन्तु जो वल आदि का व्यवहार होता है, वह हिंसा ही है। अहिंसा मात्म-साधना में है, भौतिक सुख साधना मे नहीं। दूसरो विचारधारा के अनुसार अहिंसा से देश का पतन हुआ, यह सत्य से अछूता है। देश की अवनति पारस्परिक ईर्ष्या, द्वप, कलह आदि से हुई है न कि अहिसासे। अहिंसा एक मात्र उत्थान का सावन है, पतन का नहीं। अहिंसा मनोवल है। इससे कायरता का नाश होता है। यह वोरत्व का द्वार है। अनजान आदमी ही यह कह सकता है कि अहिसा ने हमे कायर बना दिया। जानकार यह कभी नहीं मान सकता । अहिंसा और बुजदिली का सम्बन्ध ही क्या ? अहिसक सव को अभय दान देता है, उससे किसी को भय नही होता है, जहा भय नहीं, वहा कायरता कैसे ? कायरता भयजन्य है। अभय और आतंक का जन्मजात विरोध है। जो केवल तलवार के बलपर ही रहता है वह तलवार से ही परास्त होता है । उसका वल दूसरों के लिए आतंक है और दूसरों का उसके लिए । अणुवम इस प्रतिस्पर्धा का ही फल है। यही तो विश्व अशाति का चक्र है। अहिंसा का मार्ग प्रशस्त है, इसमें प्रतिम्पर्धा और द्वेष को स्थान नहीं। अहिंसा .

cour श्रावक प्रतिक्रमण ही एकमात्र ऐसा सत्य तत्त्व है जो समूचे विश्व के प्राणियों को मैत्री की एक श्रृंखला में पिरो सकता है। आर्य मनुष्य भी म्लेच्छों की तरह यदि हिसा को अपनी दृष्टि का वेध बना लेंगे तो फिर आर्य और म्लेच्छों की भेद-रेखा ही क्या होगी ? आयत्व और म्लेच्छव का विभाजक मुख्यरूपेण आचरण ही होता है। म्लेच्छ की भावनाएं हिसा प्रधान होती है और आर्य की भावनाएं अहिंसा प्रधान। म्लेच्छ हिसा करने को उत्सुक रहता है। आर्य को कार्यवश हिंसा करनी पड़े तो भी वह उसे हिसा ही समझता है, वह हिंसा के लिए अपने को विवश मानता है। जैसे ऐतिहासिक युग मे वहुत से आर्य श्रावक-राजा अहिसा-रत थे। उनके पास सैन्य वल था, हिंसा के सव साधन थे, सब कुछ था, पर वे उसे राज्य मर्यादा के औचित्य का संरक्षण मानते थे। जनपद की रक्षा के लिए उसका प्रयोग भी करते थे। बाहरी आक्रमणों को रोकते भी थे। पर उस सामर्थ्य से किसी दूसरे को व्यर्थ संतप्त करना उनका काम न था। यदि आज के मनुष्य भी अहिंसा की अवहेलना कर हिंसा को प्रधानता देंगे तो अपने आप को म्लेच्छ होने से कैसे रोक सकेंगे गृहस्थावास में हिंसा की अनिवा- यंता को जानते हुए भी जो मनुष्य अहिंसा की उपादेयता को मान्य समझेंगे, वे ही अपने आर्यत्व की रक्षा करने में समर्थ हो सकेंगे। इससे कोई यह भी न समझ ले कि अहिंसा सर्वत्र उपादेय या प्रयोज्य नहीं है। अहिंसा का स्वरूप सब जगह समान है, पर वह पूर्णरूप से तभी सफल हो सकता है जब कि अहिंसा का प्रभाव सारे विश्व में फैल चुका हो। हिंसक शक्तियों के सामने अहिंसा आत्म-स्वत्व बचा सकती है, भौतिक स्वत्व को प्रथम अणुव्रत ६७ नहीं। भौतिक स्वत्व की रक्षा में तुले हुए गृहस्थ सर्वत्र अहिंसा का प्रयोग नहीं कर सकते। यदि सब जगह उन्हें अहिंसा का पालन करना है तो भौतिक अधिकारो को उन्हें तिलाञ्जलि देनी होगी, इससे विपरीत कार्य मे अहिंसा को। भौतिक रक्षण और अहिंसा इन दोनो का संतुलन नहीं हो सकता। इस व्रत के पाच अतिचार है, श्रावकों को यह वर्जने चाहिये। अतिचार १ बन्ध-क्रोधादिवश मनुष्य या तिर्यक्षको गाढ़े बन्धन से नहीं वाधना चाहिये। २ वध-क्रोधादिवश मनुष्य या तिर्यज के लाठी आदिसे गहरे धाव नहीं करने चाहिये, कोड़े आदि से मारना पीटना नहीं चाहिये। ३ छविच्छेद-क्रोधादिवश मनुष्य या तिर्यक्ष के शरीर के अवयवों का छेदन नहीं करना चाहिये। बन्ध, वध और छवि- च्छेद, इन तीनों के दो दो भेद होते हैं, सापेक्ष और निरपेक्ष । जैसे गाय भैंस, आदि को उनकी रक्षा के निमित्त बांधना सापेक्ष वन्ध है और क्रोधादिवश गाढ़ बन्धनसे बांध देना निरपेक्ष बन्ध है। आवश्यकता होने पर मर्म स्थान पर चोट न लगाते उनके हित को रक्षा करते हुए मारना सापेक्ष वध है और क्रोधा- दिवस मारना निरपेक्ष वध है। प्रयोजन से रोग-चिकित्सा के निमित्त अंगोपाङ्ग काटना सापेक्ष छविच्छेद है। क्रोधादिवश अवयवच्छेद करना निरपेक्ष छविच्छेद है। श्रावक के निरपेक्ष बन्ध, वध और छविच्छेद अविचार है, सापेक्ष नहीं। ४ आतभार-क्रोधषश, लोभवश, ऊंट, घोड़ा आदि भार ६८ व्रत मर्यादा श्रावक प्रतिक्रमण ढोने वाले पशुओं पर उनकी शक्तिसे अधिक (प्रमाणातिरेको भार नहीं लादना चाहिये। ५ भक्तपानविच्छेद-क्रोधवश या लोभवश अपनें आश्रित प्राणियों के खाने-पीने में रुकावट नहीं डालना चाहिये। नियत समय पर वेतन नहीं देना, बिना कारण किसी जीवका नाश करना, नियत समय पर छुट्टी नहीं देना, हल, गाड़ी वगैरहसे बैलों को नियत समय पर नहीं छोड़ना आदि इस अतिचार के अन्तर्गत है। रोग निवृत्ति निमित्त आदि प्रयोजन से आहार पानी नहीं देना श्रावक के अतिचार नहीं है। आलोचना-इनसे कोई पाप लगे हों तो वह मेरे लिये निष्फल हों। व्रत की मर्यादा भंग करने के चार प्रकार हैं। अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार और अनाचार। यह चारों ही त्याज्य है। त्यागे हए कार्य को करने का विचार करना अतिक्रम है उस कार्य की पूर्ति के लिये साधन एकत्रित करना व्यतिक्रम है। व्रत भङ्ग की तैयारी कर रखी है, परन्तु जब तक व्रत भङ्ग नहीं किये, तब तक अतिचार है अथवा व्रत की अपेक्षा रखते हुए कुछ अंश मे व्रत का भङ्ग करना अतिचार है। व्रत की अपेक्षा न रखते हुए संकल्प पूर्वक व्रत भङ्ग करना अनाचार है। इस व्रत मे श्रावक निपराध त्रस जीव को मारने की चेष्टा से मारने का त्याग करता है, इस दशा में बन्ध आदि अतिचार क्यों ?* इसका समाधान निम्न प्रकार है। यह सत्य है कि * न मारयामीति कृतव्रतस्य, विनैव निगद्यतेय कुपितो वधादीन्, 'करोत्य स्यान्नियमानपेक्ष ।।१।। भग अतिचार क्यो? मृत्यु कइहातिचार।

प्रथम अणुव्रत ६8 । पहले व्रत मे श्रावक के सर्व हिसा (प्राणविच्छेद) का त्याग होता है, बंध आदि का नहीं। तथापि बन्ध, वध आदि सर्व हिंसा के उपाय है, अतः परमार्थ रूप से इनको भी त्यागरूप ही समझना चाहिये। इसके साथ २ यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि यदि संकल्पपूर्वक, व्रतो की अपेक्षा किये विना अतिचारो का सेवन किया जाय तो वह अनाचार सेवन ही है, तभङ्ग का कारण ही है। अतिचार से व्रत का सर्वदा भङ्ग नहीं होता, देश भड्न देश भग (आशिक भंग) होता है। व्रत का पालन दो तरह से होता है अन्तर्वृत्ति से और बहिर्वृत्ति से। व्रती गृहस्थ मारनेकी बुद्धि विना क्रोध मे तत्पर होकर प्राणीके प्राणो को परवाह न करता हुआ वन्धन आदि मे वर्तता है, उससे प्राणी की मृत्यु न हो तो भी वह व्रत को अपेक्षा रखे बिना निर्दय भावना से वर्तता है, अतः अन्त- कृत्ति से उसके व्रत का भङ्ग होता है। और उस प्राणी की मृत्यु नहीं होती है, अतः बहिर्वृत्ति से व्रत का पालन होता है। अतिचार संख्या में पांच है। यह गणना मुख्य रूप से है। अतिचार इयत्ता का निर्धारण लक्षण बताने के लिए होता है । इसके अनुसार अन्य भी स्वयं जान लेने चाहिये। जिन २ कार्यों से प्राणातिपात विरमण व्रत के भद्ध होने की सम्भावना हो, वह सब इस व्रत के अतिचार है। अतिचार का स्वरूप शेष सभी ब्रतों मे इसी के अनुसार जान लेना चाहिये। धर्म से समाज का क्या सम्बन्ध है ? इस पर विचार करने के परिशिष्ट मृत्योरभावन्तियमोस्ति तस्य, कोपाद् दयाहीनतयातु भग्न । देशस्य भङ्गादनुपालनाच्च, पूज्यो मतीचारमदाहरन्ति ॥२॥ सख्या

१००
श्रावक प्रतिक्रमण
लिए व्रतों का स्वरूप दिखलाना आवश्यक प्रतीत होता हैं । इसमें
यह दिखलाने का प्रयत्न किया जायगा कि व्रत परम्परा के आधार
पर आध्यात्मिक जोवन से मनुष्य अपने सामाजिक और राष्ट्रीय
जोवन को भी कितना उन्नत बना सक्ता है। पहला अणुबत
हमें अहिंसा का उपदेश करता है। अहिंसा की भीत्ति पर खड़े
रह कर हम विश्व को मित्र बना सकते हैं। सबके प्रति हम
विश्वास के पात्र बन सकते है, और हम सबका विश्वास प्राप्त
कर सकते हैं।
"आत्मन. प्रतिकूलानि परेपा न समाचरेत्"* के सिद्धान्त को
हम नहीं भूलें।
"सब्वेजीवापियाउया, सुहाउया, सुहसाया दुहडिकूला ।'
सव्वेजीवा वि इच्छन्ति, जीवउ न मरीज्जि" ||
इस प्रकार के विचारों की सरिता का प्रवाह हमारे हृदय को
सोंचता रहे तो हम निःसन्देह एक भादर्श जीवन बिता सकते
हैं। यह सही बात है कि धर्म का लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। धर्म का
मुख्य फल वही है पर आनुषंगिक फल के रूप में समाज और
देश का सुधार सहज ही हो जाता है। यह विषय बहुत लम्बा
है और इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। किन्तु इप्स
समय सिर्फ प्रतिक्रमण सम्बन्धी मुख्य-मुख्य विषयों पर प्रकाश
*--जो काम मात्मा के लिए प्रतिकूल है वे दूसरो के लिए भी
न करें।
नसब जीवों को जीवन प्रिय है, सब सुख के इच्छुक है, दुख के
प्रतिकूल है। सब जीव जीना चाहते है, मरना नहीं । अत.
घोर प्राणि बध को वर्जना चाहिए।-
-

प्रथम अणुव्रत डालना है। इसलिए यहां केवल संक्षिप्त उदाहरण के रूप में ही कई वातों को सामने रखना चाहूंगा। उसके अनुसार विज्ञ- पाठक स्वयं उसके महत्व को हृदयंगम कर लेंगे। अहिंसाव्रत निरपराध त्रस जीवों को न मारने का आदेश देता है। मारना, पीटना, अंगोंपाङ्गों को छेद देना आदि आदि पाशविक कार्यों से बचना सिखलाता है। मूक प्राणियों के प्रति निर्दयता से किये जाने वाले, अधिक भार ढोना, न चलने पर उन्हें बुरी तरह ताड़ना आदि-आदि अत्याचारों का निषेध करता है, जिसके लिए सरकार को कानून बनाना पड़ा है। लोभ के वश मुनीम गुमाश्तों से काम कराते ही रहना, चाहे उनका खाने पीने का समय कब ही क्यों न बीत चुका हो, ऐसे आचरणों का प्रतिबन्ध करता है। जबकि सरकार ने अव कहीं कहीं (भारत में ) कानून बना कर इसे रोका है। इस व्रत का काम हृदय की क्रूरता का नाश करना है, जो कि सव अवगुणों का कारण है।

दूसरा अणुव्रत सत्य मूल पाठ बीयं अणुव्वयं थूलाओ मुसावायाओ वेरमणं सेय मुसावाए पंचविहे पन्नत्त तंजहा-१ कन्ना- लोए २ गवालीए ३ भोमालीए ४ नासावहारे ५ कूड़सक्खिज्जे इच्चैवमाइस्स थूलमुसावायरस पच्चक्खाण जावज्जोवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एअस्स बीयस्स थूलग-मुसावाय-वेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्या तंजहा- १ सहसा भक्खाणे २ रहस्स भक्खाणे ३ सदार- मंतभेए ४ मोसोवएसे ५ कूडलेह करणे जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।

दूसरा अणुव्रत ११०३ छाया द्वितीयं अणुवतं स्थूलाद् मृषावादाद् विरमणं स च मृषावादः पञ्चविधः प्रज्ञप्तः तद्यथा १ कन्यालीकम् २ गवालीकम् ३ भूम्य- लीकम् ४ न्यासोपहारः ५ कूटसाक्ष्यम् इत्येवमादेः स्थूलमृषा- वादस्य प्रत्याख्यानं यावज्जीवं द्विविघं त्रिविधन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन एतस्य द्वितीयस्य स्थूलमृषावाद विरमणस्य श्रमणोपासकेन पञ्च अतिचाराः ज्ञातव्याः न समा- चरितन्याः तद्यथा १ सहसाऽभ्याख्यानं २ रहस्याऽभ्याख्यान ३ स्वदारमन्त्र भेदः ४ भूषोपदेशः ५ कूटलेखकरणं यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः वस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् । शब्दार्थ झूठ) चीयं-दूसरा अणुव्वयं-अणुव्रत थूलाओ-स्थूल मुसावायाओ-मृषावाद से वेरमणं-विरमण करना। सेय-वह गवालीए-गवालीक, ( गाय सम्बन्धी भोमालीए-भूम्यलोक ( भूमि सम्बम्धी झूठ) नासावहारे-ज्यासापहार (धरोहर सम्बन्धी झूठ) कूडसक्खिज्जे-झूठ साक्षी (झूठी गवाह) इच्वेवमाइस्स-इत्यादिक थूलमुसावायसं-स्थूल मृपावादका पच्चक्खाणं--प्रत्याख्यान । मुसावाए-मृपावाद पंचविहे-पाच प्रकार का पन्नत्त- कहा है। तंजहा-वह इस प्रकार है। कन्नालीए-कन्यालोक ( कन्या सम्बन्धी झूठ) - - श्रावक प्रतिक्रमण जावज्जीवाए-जीवन पर्यन्त समायरियव्वा-आदरणीय दुविहं-दो करण तंजहा-वे इस प्रकार है। तिविहेणं-तीन योग से सहसा भक्खाणे-यकायक विना न करेमि-न करूँ (न बोलू) सोचे-विचारे किसी पर नकारवेमि-न कराऊँ (न बोलाऊ) कलक लगाना मणसा-मम से रहस्य भक्ताने-रहस्य की वयसा-वचन से वाते करते देखकर कलक कायसा-काया से लगाना एअस्स- इस सदारमंतभेए-स्त्री के मर्म को बीयरस-द्वितीय प्रकट करना थूलग-स्थूल मोसोवएसे-मिथ्या उपदेश देना मुसावाय-मृषावाद कूडलेहकरणे-झूठे लेख लिखना वेरमणस्स-विरमणव्रत के जो मे-जो मैने समणोवासएणं-श्रमणोपासक देवसिओ-दिन सम्बन्धी के लिए अइयारो–अतिचार पंच-पांच को-किया हो तो तस्स-उसका जाणियव्वा-ज्ञातव्य है। मिच्छामि-निष्फल न-नही है। दुकडं-पाप अइयारा-अतिचार भावार्थ हे गुरुदेव ! मैं दूसरे अणुव्रत में स्थूल मृषावाद से निवृत्त होता हूं। मैं जीवन पर्यन्त कन्यालीक प्रमुख पाँच प्रकार का मठ बोलने का दो करण तीन योग से प्रत्याख्यान करता हूं। मैं

दूसरा अणवत
आज से इस प्रकार का असत्य वचन मनसा, वाचा, कर्मणा न
वोलूगा और न बोलाऊंगा।
विवेचन
"असद्भावोद्भावनमनृतम्"
विना किसी अपेक्षा के असद् भाव (जो जिस प्रकार नहीं मृषावाद
है) को सद्भाव के रूप में दिखाने का नाम असत्य है।
असत्य का सम्बन्ध मन, वचन और शरीर इन तीनों से है। मन
और शरीर की अपेक्षा वाणी मे भावों को प्रगट करने की क्षमता
अधिक है। अत: असत्य का नाम मुख्यरूप से मृषावाद
( असत्य-बोलना) रखा गया है। एक असत्य भाव का मन से
चिन्तन करना मानस असत्य है, वाणो से कहना वाचिक
असत्य है, शरीर की चेष्टाओं से व्यक्त करना शारीरिक
असत्य है।
असत्य सभी त्याज्य है, चाहे वह छोटा हो, चाहे वडा ।
स्थूल
असत्य को कोई भी उपादेय नहीं बतळा सकता। यह मुनि का मृपावाद
विरति
आचरण है। श्रावक का एक सिद्धान्त है। श्रावक के सिद्धान्त
और आचरण का संतुलन नहीं हो सकता। सम्यक् श्रद्धा और
सम्यक् आचरण एक नहीं दो है। श्रावक सम्यक ज्ञान से पदार्थों
को यथावत् जानता है और सम्यक् श्रद्धा से उन पर विश्वास
करता है। पर उनका आचरण अपनी शक्ति के अनुसार ही कर
सकता है ; उसके उपरान्त नहीं। इसीलिए श्रावक स्थूल असत्य
वचन का त्याग करता है।
स्थूल मृपावाद के प्रधानतया पांच प्रकार बतलाए हैं। जैसे- पाच प्रकार
कन्यालीक, गवालीक, भूम्यलीक, न्यासापहार, और फूटसाक्षी ।

प
१०६
थावक प्रतिक्रमण
ये सब लाक्षणिक हैं। इनके सहश स्थूल असत्य वचन इन्हीं के
अन्तर्गत हो जाते हैं।
१ कन्यालीक-कन्या के सम्बन्ध में झूठ बोलना। जैसे
काणी, खोड़ी, अपंग-अपाहिज, कन्या को रूपवती एवं गुणवती
कहना। इसी प्रकार सर्वाङ्ग सुन्दर कुलीन कन्या को कुरूपा एवं
निराश्रित कहना। इसी प्रकार वर के सम्बन्ध में भी विपर्यास
सहित वाणी बोलना। इसमें नौकर-नौकरानी, मुनीम-गुमाश्ता
आदि सब मनुष्य सम्बन्धी स्थूल झूठ का समावेश हो जाता है ।
२ गवालीक-गाय सम्बन्धी झूठ बोलना । जैसे-थोड़ा
दूध देनेवाली गाय को बहुत दूध देनेवाली कहना। बहुक्षीरा को
अल्पक्षीरा कहना। इसमें ऊँट, घोड़ा, हाथी प्रमुख सब चार
पैर वाले जीवों से सम्बन्धित असत्य का ग्रहण हो जाता है।
३ भूम्यलीक-पर की भूमि को निज की कहना। इसमें
मकान, देश, खेत, सीमा, पहाड़ आदि सब अपद-पैर रहित
द्रव्य समा जाते है।
४ न्यासापहार-धरोहर के सम्बन्ध में असत्य बोलना।
पर की वस्तु को रख लेना और वापिस मांगने पर बदल जाना,
इन्कार हो जाना।
५ कूटसाक्षी-असत्य गवाही देना। अपने लाभ के लिए,
दूसरे की हानि के लिए, वैर प्रतिशोध के लिए या अन्य किसी के
प्रभाव में आकर कोर्ट-कचहरी, पञ्चायत, संघ आदि में झठी
में
साक्षी देना। "क्लिष्टाशय समुत्थत्वात् स्थूलासत्यानि"
चित्त वृत्तियां बड़ी भारी कलुपित होती हैं। अत: यह सब स्थूल
असत्य है।
1

दूसरा अणुव्रत
१०७
कन्यालीक आदि पहले तीन प्रकार के असत्य सर्व लोक स्यूर असत्य
विरुद्ध अति निन्दनीय एवं भत्सेनीय है। इसलिए इनको वर्जना का निषध
चाहिए। न्यासापहार विश्वासघात है। झूठी साक्षी धर्म के
प्रतिकूल है। क्योंकि प्रतिपक्षी, साक्षो से धर्म की सौगन्द खाने
को कहता है "धर्म बयाना धर्ममिति" धर्मसे कहो। उस समय
वह अपने धर्म को भी ताक पर रख देता है। इसलिए यह श्रावक
के लिए निषिद्ध है।
'अहिंसा पयस पालि-भूतान्यन्यव्रतानि यत् ।
असत्यसे
सत्य भङ्गात् पालिभङ्गेऽनर्गल विप्लवेत तत्' ।।
हानि
अहिंसा व्रत एक बाध है। सत्यव्रत उसका सेतु है। ज्यों
पाल टूटने से बाध टूट जाता है त्यों ही सत्यन्नत के भङ्ग से
अहिंसा व्रत भी टूट जाता है । अतः असत्य महान् पाप है।
एकनासत्यज पाप,
पापनि शेषमन्यत ।
द्वयोस्तुलाविधृतयो, राद्यमेव तिरिच्यते ।।'
एक ओर असत्य का पाप और एक ओर सब पाप, इन दोनों
को एक तराजू के दो पलड़ों में तोलें तो असत्य के पाप का पलडा
ही मुका रहता है। असत्य वचन के कारण भी बड़े निन्दनीय
हैं। मनुष्य क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, कुतूहल, और भय
आदिसे असत्य बोलता है । "असत्यवादिन पुस. प्रतीकारो न विद्यते"
और-और सव अवगुणों का प्रतिकार है, असत्यवादी की कोई
प्रतिक्रिया नहीं। हिंसक है और वह सत्यवादी है नो हम उसकी
हिंसा को जान लेंगे और उसे समझा-बुझा कर छुडवा देगे।
परन्तु जो मनुष्य हिंसा भी करता है और उसे दवाने की चेष्टा
करता है, उसका कोई उपाय नहीं हो सकता। इसीलिए यह
,

१०८ श्रावक प्रतिक्रमण अतिचार कहना उचित है कि असत्य वचन अवगुण आने का द्वार है एवं सत्य वचन सब दोपों का प्रतिकार या चिकित्सा है। इसके पाँच अतिचार श्रावक को वर्जने चाहिए। १ सहसाभ्याख्यान-विना सोचे समझे किसी के सिर पर झूठा दोष नहीं मढ़ देना चाहिए। जैसे हर किसी को ही कह देना-तू चोर है, तू व्यभिचारी है, इत्यादि संकल्प पूर्वक मिथ्या आरोप लगाना अनाचार है। उससे त्रत भंग हो जाता है। २ रहस्याभ्याख्यान- एकान्त में सलाह करते हुए व्यक्तियों पर आरोप नहीं लगाना चाहिए- उन्हें दोषी नहीं ठहरा देना चाहिए अथवा रहस्य के छल से दो व्यक्तियों के मन को फांटने वाली मन कल्पित वातें नहीं करना चाहिए। जैसे कोई दो आदमी गुप्त मंत्रणा कर रहे है उनके प्रति यह आरोप लगा देना कि ये राज्य विरोधी मंत्रणा करते है या किसी के पिता को कह देना कि तुम्हारा प्रिय पुत्र तुम्हें मारने की चेष्टा करना है। इस अतिचार में प्रत्येक बात आशंका से कही जाती है अत: यह पहले अतिचार से भिन्न है। ३ स्वदार मन्त्र भेद-पतिको अपनी स्त्रीको मर्म भरी बात नहीं कहना चाहिए और स्त्री को अपने पति की। इसके अनुसार अपने मित्र आदि किसी का भी मर्म प्रकाशित नहीं करना चाहिए। मर्म प्रकाशक को यह नहीं समझना चाहिए कि मैं सत्य मंत्रणा को प्रकट कर रहा हूं, अतः यह अतिचार नहीं है। मर्म प्रकाशित करने से लज्जा आदि कारणवश अपघात तक के बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते है-अतः वस्तुतः वह असत्य वचन है। केवल आशंका से दोषी बनाना-रहस्याभ्याख्यान है और मर्म दूसरा अणुव्रत १०६ को जानते हुए उसे प्रकाशित करना स्वदारमंत्र भेद है। यही इन दोनोंका अन्तर है। इस अविचारका परमार्थ यही है कि विश्वस्त सूत्र को-विश्वास के आधार पर कहे हुए वार्तालाप ( बात) को प्रकाश में लाना, चाहे वह किसी के भी क्यों न हो । संसारमे स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध अधिक विश्वस्त माना जाता है। अतः इस अतिचार को "स्वदारमंत्र भेद" के नाम से स्थापित किया है। १ मिथ्या उपदेश-किसी प्रकारका झूठा उपदेश नहीं देना चाहिए। जैसे-मैंने अमुक काल में इस प्रकार मिथ्या भाषण कर उसे जीता था । इत्यादि कह कर दूसरों को असत्य वचन कहने मे प्रेरित करना अथवा पर पीडाकारी, हिंसाकारी वचन कहना आदि २ । प्रमादवश इस प्रकार का उपदेश देना, जैसे चोरो को मारना चाहिए इत्यादि, अथवा अयथार्थ उपदेश देना मिथ्या उपदेश है। लेख. भूठा खत नहीं लिखना चाहिए। नकली नोट छापना, जाली कागज लिखना, बिन्दियों को बढ़ा कर धन राशि का परिमाण बढ़ा देना आदि सव इसमें अन्तर्विष्ट हो जाते है । मैंने झूठ बोलने का त्याग किया था- यह तो झूठा लेख है, झूठ बोलना नहीं है। इस प्रकार व्रत की अपेक्षा रखते हुए, व्रत का पूरा आशय न समझ कर ऐसा करना अतिचार है और जान बूझकर कूट लेख लिखना अनाचार है। आलोचना-इनके आचरण से कोई पाप लगा तो वह लिए निष्फल हो। एक दिन सत्यवादिता के कारण भारत का सिर गौरव से परिशिष्ट उन्नत था। दुनिया के अञ्चल तक इसका यश परिमल फैल चुका ५ कूट ११० श्रावक प्रतिक्रमण था। विदेशागत यात्रियों ने बड़े गौरव के साथ इस बात का उल्लेख किया है कि भारत के लोग बड़े सत्यवादी हैं। सारे कारोवार मौखिक चलते थे। साक्षी तो दूर, लिखने की भी कोई आवश्यकता नहीं थी। एक दिन आज का है, जो अपने हाथों से लिखे हुए खत को इन्कार करने मे न केवल सङ्कोच ; अपितु गौरव समझते है। यह निश्चित है कि आज के विषाक्त वाता- बरण से मनुष्य सहज ही प्रभावित हो जाता है, तो भी श्रावक को इससे बचना चाहिए। इस व्रत के अनुसार श्रावक को स्थल असत्य नहीं वोलना चाहिए। सूक्ष्म असत्य से भी जहाँ तक हो सके बचना चाहिए । असत्यवादी से लोग घृणा करते हैं। उसकी नेकी पर किसी को भी विश्वास नहीं होता। अविश्वास से उसे बड़ा धक्का पहुंचता है। प्रतिष्ठा का लोप होता है। सत्यवती को निरन्तर सत्य का आदर करना चाहिए। झूठमूठ दोष का आरोप करना, किसीको व्यर्थ कलंकित करना, विश्वस्त मन्त्र को प्रकट करना, मिथ्या उपदेश देना, झूठा लेख लिखनाआदि महान् अवगुण हैं। इन्हीं के कारण आज द्वष का ज्वालामुखी फूट रहा है । युद्धाग्नि के स्फुलिंग गगन को धूमिल कर रहे है । न्याया- लय के विशाल भवनाकाश के आंगन को छू रहे हैं। न्याया- धीश और वकीलों की संख्या से भी जनसमूह का एक बड़ा भाग रुका हुआ है। घूसखोरी का बाजार गम हो रहा है। क्या यही समाज की उन्नत दशा है क्या यहीसभ्य समाज के चिह्न ? ऐसा सामाजिक निर्माण आज कहाँ है, जो सत्य के आधार पर प्रतिष्ठित हो, नेकनीयत की भीति पर जिसका जीवन टिका हो? श्रावक को इस सत्य व्रत का उदात्त चेष्टा से पालन करना

दूसरा अणुव्रत
चाहिए। जिससे उसका जीवन सत्यता पर आधारित हो सके,
अनुकरणीय बन सके और उच्च एवं पवित्र ध्येय वाले समाज
की नींव डाल सके। श्रावक को सत्यभाषिता के साथ साथ
कटुकर्कश वाणी का संवरण करना चाहिए। जिससे "सत्ये नास्ति
भय क्वचित्" यह वाक्य सत्य सिद्ध हो सके। जैसा कि वर्तमान
आचार्य श्री का उपदेश है-
"कटु कर्कश भापा मति बोलो,
बोलो तो क्यण रयण तोलो,
तो लोक उभय भय नही दोलो।"
वाणीका सत्य प्रयोग नम्रता एवं मृदुतासे भावित होकर सोने
मे सुगन्ध को कहावत को चरितार्थ करता है। एक महत्त्वपूर्ण
उल्लेख के साथ प्रस्तुत विषय को अब पूरा करना है।
"सत्यवादिता अत्याचारों को छोड़ने का एक सर्वश्रेष्ठ उपाय
है। सत्यवादी अवगुणों से बचा रहता है, वह कभी अत्याचार
नहीं कर सकता। सत्य के और अत्याचारों के बीच विरोध की
दीवार खड़ी रहती है।"

तीसरा अवत अस्तेय मूल पाठ तइयं अणुव्वयं-थूलाओ अदिण्णा-दाणाओ-बेर- मणं सेय अदिण्णादाणे पंचविहे पन्नत्ते तंजहा १ खत्तखणणं २ गंठिभेअणं ३ जंतुग्धाडणं ४ पडिय वत्थुहरणं ५ ससामिअ-वत्थुहरणं इच्चेवमाइरस थूलअदिण्णादाणस्स पच्चक्खाणं जावज्जीवाए दुविहं- तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एअस्स तइयरस थूलग-अदिण्णा- दाण- वेरमणरस समणोवासएणं पञ्च अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ तेनाहडे २ तक्करप्पओगे अस्तेय ११३ ३ विरुद्धरज्जाइक्कमे ४ कूडतुल्लकूडमाणे ५ तप्पडि- रूवगववहारे जो मे देवसिओ अइयारो की तरस मिच्छामि दुकडं। छाया तृतीयं अणुवतं-स्थूलाद् अदत्ताऽदानाद्-विरमणं तच्च अदत्ता- दानं पञ्चविधं प्रज्ञप्तं तद्यथा १ खात्र खननं २ प्रन्थिभेदनं ३ यन्त्रो- द्घाटनं ४ पतितवस्तु हरणं ५ सस्वामिक-वस्तु हरणं इत्येवमादेः स्थूलाऽदत्तादानस्य प्रत्याख्यानं यावज्जीवं द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन एतस्य तृतीयस्य स्थूलकाऽश्त्ता दान-विरमणस्य श्रमणोपासकेन पञ्च अतिचारा: ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ स्तेनाहृतम् २ तस्कर प्रयोगः ३ विरुद्ध- राज्यातिक्रमः ४ कूटतौल्य-कूटमानं ५ तत्-प्रतिरूपकव्यवहारः यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुप्फूतम्। शब्दार्थ तइयंतीसरे पन्नते-कहा है अणुव्वयं-अणुप्रत तंजहा-वह इस प्रकार है धूलाओ-स्थूल खत्तखणणं-खात सनना अदिण्णादाणाओ-प्रदत्तादानका गंठिभेअणं-गाठ खोलना रमण--विरमण जंतुग्धाडणं-ताला तोड़ना पडियवत्यहरणं-पड़ी हुई वस्तु अदिण्णादाणे-~अदत्तादान को लेना पथविहे--पाच प्रकार का ससामिअ-स्वामी सहित सेय-वह श्रावक प्रतिक्रमण ली हो क्युहरणं-वस्तु को लेना न-नही है इच्चेवमाइस्स-इत्यादिक समायरिव्वा-समाचरितव्य थूलअदिण्णादाणस्स-स्थूल तंजहा-वे इस प्रकार है अदत्तादान का तेनाहडे-चोर की चुराई वस्तु पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान जावजीवाए-जीवन पर्यन्त तकरप्पओगे-चोर की सहायता दुविहं-दो करण की हो तिविहेणं-तीन योग से विरुद्धरजाइक्कमे विरुद्ध राज्य में नन व्यापारादि निमित्त प्रवेश करेमि-करू किया हो कुडतुल्लकूडमाणे-कूट तोल कूट कारवेमि-कराऊँ माप किया हो सणसा-मन से तप्पडिरूवगववहारे-एक मूल्य वयसा-वचन से वान् वस्तुमे खराब वस्तु का कायसा-शरीर से सम्मिश्रण किया हो एअस्स-इस जो-जो तइयस्स-तृतीय मे-मैने थूलग स्थूल देवसिओ-दिन सम्बन्दी अदिण्णादाण--अदत्तादान अइयारो-अतिचार वेरमणस्स-विरमणव्रत के कओ-किया हो समणोवासएणं-श्रमणोपासक को तस्स-उसका पञ्च-पाच मिच्छामि-निष्फल हो. दुक्कडं-~-पाप जाणियवा-ज्ञातव्य है अइयारा- अतिचार अस्तेय ११५ भावार्थ हे गुरुदेव ! मैं तीसरे अणुव्रत में स्थूल अदत्तादान से निवृत्त होता हूं। मैं जीवन पर्यन्त किसी के मकान की भीत फोड कर, गाँठ खोल कर, ताला तोड़ कर, मार्ग में पड़ी बहुमूल्य मालकियत की वस्तु उठा कर, सस्वामीक वस्तु का अपहरण कर, लूट-खसोट कर, अदत्त वस्तु को लेने का और इस प्रकार की निन्दनीय चडी चोरी करने का, दो करण तीन योग से प्रत्याख्यान करता हूं। विवेचन अदत्त+आदान, अदत्त नहीं दी हुई वस्तु का आदान- अदत्तादान ग्रहण करना अदत्तादान है। अदचादान चोरी है। चोरी अनेक प्रकार की होती है। सजीव वस्तु की, अजीव वस्तु की, आदि-आदि। वास्तविकता को छिपाना चोरी है, चाहे वह किसी वस्तु सम्बन्धी हो। जैसे-तपस्या के बिना अपने आपको तपस्वी एवं सदाचार के बिना सदाचारी कहना आदि। दूसरे के अधिकारों को हड़पना आदि कार्य भी चोरी है। प्रश्नव्याकरण में यहा तक लिखा है कि अस्तेय-व्रतधारी को पर-परिवाद-निन्दा नहीं करना चाहिए, पर के दोष नहीं कहना चाहिए, चुगली नहीं करना चाहिए। ईर्ष्या-अदेखाई नहीं करना चाहिए। यह चोरीका सार्वभौम स्वरूप है। श्रावक स्थूल चोरी का त्याग करता है, सूक्ष्म का नहीं। जिस अदत्तादान से चोरी का अपराध लग सकता हो, वह स्थूल अदत्तादान है। दुष्ट अध्यवसाय से स्वामी की आज्ञा के विना साधारण वस्तु लेना भी स्थूल अदत्तादान है। -

११६
६
श्रावक प्रतिक्रमण
स्थूल अदत्ता-
दान विरति
बड़ी चोरी के पांच मुख्य प्रकार बतलाये हैं।
१-खानखनन-खात खनकर, भींत फोड़ कर, पर की
चीज चुराना।
२-ग्रन्थिभेदन-गाँठ खोल कर, सन्दूक-बक्स आदि खोल
कर कोई चीज चुराना।
३-यंत्रोद्घाटन-ताला तोड़ कर या चाबी से ताले को
खोल कर, जेव काट कर चोरी करना।
४--पतित
वस्तु हरण-चीज का मालिक आगे चल रहा है,
उसके पास से कोई चीज गिर गई, उसे उठा लेना, विस्मृत आदि
भी इसके अन्तर्गत है। विस्मृत-वस्तु का मालिक वस्तु को रख
कर भूल जाता है, उसे उठा लेना। आहित-जमीन में गड़ी हुई
धनराशि को खोद कर निकाल लेना।
५-सस्वामीक वस्तुहरण-स्वामीका पता होते हुए भी किसी
पडी वस्तु को ले लेना। डाका डालना, लूट-खसोट करना, यह
सव स्थूल चोरी है। यह राज्य से दन्डनीय है, जन साधारण
में निन्दनीय है, आत्म गुण की घातक तो है ही। अतः श्रावक
इस प्रकार की चोरी से विरक्त रहता है।
इसके पांच अतिचार श्रावक को वर्जने चाहिए।
१ स्तेनाहृत-लोभ आदिसे चोरी की वस्तुको अल्प मूल्य
में नहीं लेना चाहिए। (इसका यह अर्थ नहीं कि पूरे मूल्य में
खरीद लेना चाहिये। क्योंकि चोरी की चीज को जान-बूझ कर
पूरे दामों मे कौन लेता है, वह तो लाभ की दृष्टि से लालच से ली
जाती है इत्यादि)।
अतिचार

अस्तेय ११७ २ तस्कर प्रयोग-चोरको शस्त्र आदि की सहायता नहीं देनी चाहिए, आश्रय नहीं देना चाहिए। चोरों को चोरी के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए। जैसे-तुम्हारी चुराई हुई वस्तु को कोई बेचने वाला नहीं है तो मैं वेच दंगा इत्यादि। ६ विरुद्धराज्यातिकम-परस्पर विरोधी राजाओं के राज्य मे व्यापारादि के निमित्त प्रवेश कर राज्य व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। युद्ध के समय एक राज्य से दूसरे राज्य में आने-जाने का निषेध होता है। अथवा एक देश से दूसरे में नियम के विरुद्ध अन्न भेजना, शत्रु के देश में जाना, शत्रु को समाचार भेजना इत्यादि। जिन कारणोंसे अवहेलनापूर्वक चौर्य दण्ड दिया जा सके, ऐसे काम श्रावक को नहीं करना चाहिए। ४ कूटतौल्य-कूटमान-हीनाधिक तौल और मापसे क्रय विक्रय नहीं करना चाहिए। धान्य आदि को तराजू से वेचने के समय थोडा और लेने के समय अधिक नहीं तौलना चाहिए। वस्त्र आदि को गज आदि से वेचने के समय थोड़ा और लेने के समय अधिक नहीं मापना चाहिए। ५ तत्प्रतिरूपक व्यवहार- वहुमूल्य वस्तु में अल्पमूल्य वस्तु, जो उसीके सहश है, मिला कर वेचना, अच्छी चीज दिखा धुरी चीज देना, घी मे वेजीटेबल (Vegetable) मिला कर वेचना, शक्कर मे आटा मिला कर वेचना, असली सोने के बदले नकली सोना बना कर वेचना आदि कार्य श्रावक को नहीं करने चाहिए। आलोचना-इनके योग से पाप लगा हो तो वह मेरे लिये निष्फल हो। कर ११८ श्रावक प्रतिक्रमण क्यो? अत के दो कूटतौल, कूटमाप और प्रतिरूप क्रिया, ये दोनों वस्तुवृत्या अतिचारः अतिचार है। इनको अतिचार की संख्या में क्यों परिगणित किया गया है ? इन दोनों व्यवहारों में अल्प मूल्य की वस्तुओं के बदले अधिक मूल्य लिया जाता है, अतः यह अदत्तादान है। यह स्पष्ट रूपसे पर-धन का ग्रहण है। यह सत्य है, पर श्रावक अचौर्य व्रत की रक्षा को तत्पर रहता हुआ व्यापार व्यवस्था के अनुसार, या व्यापार कौशल की भावना से या असावधानी से ऐसा करे, उस परिस्थिति में यह सव अतिचार है। पहले तीनों के सम्बन्ध में भी इस प्रकार समझना चाहिए। अहिंसा व्रत पर-धन ग्रहण से न केवल अचौर्यत्रत ही भङ्ग होता है अपितु भङ्ग अहिंसा व्रत भी खंडित हो जाता है। धन-हरण मनुष्य के प्राण नाश की तरह दुःख का हेतु है। श्वास और आभ्यन्तर प्राणों की भांति सोने-चांदी पर भी मनुष्य का ममत्व होता है। धन का नाश मृत्यु से भी असह्य है। धनक्षय से मानव विह्वल हो उठता है। चेतना लुप्त हो जाती है वेदना की विराट अनुभूति होने लग जाती है। चोरी करना निःसंदेह हिंसा है, अहिसा प्रत का खंडन है। चोरी के चोरीहेतु सापेक्ष है। चोरी का सर्व साधारण हेतु असंतुष्टि । जैसा कि उत्तराध्ययन में लिखा है "अतुट्ठी दोसेणदुही परस्स, लोभाविले आययइ अदत्त" मनुष्य चोरी क्यों करता है? इसका यह समाधान है- "अतुष्टि दोप से दुःखी मनुष्य लोभमस्त होकर अदत्त का ग्रहण करता है।" संतोषी पुरुष ऐसा कभी नहीं करता। विशेष रूप से असंतोष को उभारनेवाले द्यूत प्रमुख दुर्व्यसन, अधिक व्यय, कारण - अस्तेय ११६ कुसंगति, अशिक्षा, यशलोलुपता, देखादेखी, ऐश-आराम, सामा- जिक अव्यवस्था आदि अनेक चोरी के निमित्त है। चोरी का त्याग परम पुरुषार्थ का साधन है। वे पुरुष धन्य है जो चोरी का त्याग करते है। पर संपत्ति को देख कर जिसका मन डांवा डोल नहीं होता, जो पुरुष पर-धन को धूल मानता है, पर-धनराशि के ग्रहण को अपनी पराजय समझता है, वही दुनिया मे सबसे बड़ा धनी और सुकृति है। तीसरा व्रत मनुष्य बनने का उपदेश देता है। सुखी वनना परिशिष्ट सिखाता है। सबसे बड़ा सुख अपने अधिकारों की सीमा में रमण करना है। परकीय वस्तुहरण की राक्षसी वृत्ति मनुष्य को अशान्त और व्याधिग्रस्त बनाती है। इसलिये सुख-समाधि मे रमण करने के लिये मनुष्य को स्वकीयता की मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। चोरी की आसुरी वृत्ति ने केवल कई व्यक्तियों को ही उपद्रत नहीं किया है, अपितु देश और समाज की दुर्दशा कर डाली। मनुष्य को मनुष्यत्व से च्युत कर दिया । हृदय आतंकपूर्ण बना दिये। इसके प्रताप से ताले-कुंजी और आलमारियों के बड़े २ कारखाने प्रतिस्पर्धा से अपना काम कर रहे है। केवल चोरी करने वाला ही चोर नहीं, कराने वाला, सहायता देने वाला भी चोर है। असद् व्यवहार चोरी करने का मुख्य साधन है। जितने अधिक असद् व्यवहार लोगों के सामने आ रहे हैं, उतना ही अधिक चोरी का साहस और चोरी के तरीके बढ़ रहे है। अयोग्य अधिकारी एवं अर्वांछनीय कानूनों को जबरन जनता पर और विशेष रूप से व्यापारियों के सिर पर थोपने वाली शासनव्यवस्था के कारण चौरवृत्ति को नव जीवन

१२०
श्रावक प्रतिक्रमण
,
प्राप्त होता है। मनोविज्ञान यह बतलाता है कि चोरी में राज्य
और प्रजा दोनों का हाथ रहता है। राजा (राज्य व्यवस्था)
और प्रजा की अनधिकार और अनुपयोगी चेष्टा ही मुख्यतया
चोरी का कारण बनती है। बड़े २ व्यापारियों का यह व्यापार
साधन है। परिस्थितियां जितनी जटिल हो सकती हैं, आज
उतनी ही जटिल हैं। समाज के समाज और देशके देश इस
चक्र में फंसे हुए हैं। इस वातावरणमें केवल आत्म-शुद्धि के
लक्ष्य से ही चोरी का प्रत्याख्यान किया जा सकता है। श्रावक
का लक्ष्य आत्म-शुद्धि होना चाहिए और उस लक्ष्य के अनुसार
श्रावक को अन्याय क्षेत्र की साकार रूप चोरीका प्रत्याख्यान
करना ही श्रेयस्कर है।

चौथा अयुवत ब्रह्मचर्यव्रत मूल पाठ चउत्थं अणुव्वयं थूलाओ मेहुणाओ वेरमण जावज्जीवाए दिव्वं दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा माणुस्सं तिरिक्ख. जोणियं एगविहं एगविहेणं न करेमि कायसा एअस्स चउत्थस्स थूलग मेहुण-वेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा:- १ इत्तरियपरिग्गहियागमणे २ अपरिग्गहियागमणे ३ अणंगकिड्डा ४ परविवाहकरणे ५ काम-भोग- तिव्वाभिलासे जो मे देवसिओ अइयारो को तस्स मिच्छामि दुक्कडं।

१२२ श्रावक प्रतिक्रमण छाया चतुर्थ अणुव्रतं स्थूलाद् मैथुनाद् विरमणं यावजीवं देवं द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन मानुपं तिर्यग्योनिक एकविधं एकविधेन न करोमि कायेन एतस्य चतुर्थस्य स्थूलक मैथुन विरमणस्य श्रमणोपासकेन पञ्चातिचारा: ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ इत्वरपरिगृहीतागमनम् २ अपरि- गृहीतागमनम् ३ अनङ्गक्रीड़ा ४ परविवाहकरणं ५ काम-भोग- तीवाभिलाप: यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या में दुष्कृतम्। शब्दार्थ चउत्थं-चौथा माणुस्सं-मनुष्य सम्बन्धी अणुव्वयं-अणुव्रत तिरिक्खजोणियं-तिर्यच थलाओ-स्थूल सम्बन्धी मेहुणाओ-मैथुन से एगविहं-एक करण वेरमणं-विरमण (विरत होना) एगविहेणं-एक योग से जावज्जीवाए-जीवनपर्यन्त न करेमि-न करूं दिव्यं-देवता सम्बन्धी कायसा-शरीर से दुविहं-दो करण एअस्स-इस तिविहेणं-तीन योग से चउत्थस्स-चतुर्थ न करेमि-न करू थूलग-थूल न कारवेमि-न कराऊ मेहुण-मथुन मणसा-मन से वेरमणस्स-विरमणव्रत के वयसा-वचन से समणोवासएणं-श्रमणोपासक कायसा-शरीर से को।

ब्रह्मचर्य व्रत १२३ पंच अइयारा-पाच अतिचार परविवाहकरणे--पर सतति जाणियधा-जानने चाहिये का विवाह करना। न-नही कामभोगतिव्वाभिलासे -काम- समायरियन्ना-पादरने चाहिए क्रीडा तीव्र अभिलाषा तजहा-वे इस प्रकार है (अति आसक्ति) से इत्तरियपरिग्गहियागमणे भाडा करना। देकर कुछ कालके लिये अपने जो-जो अधीन की हुई स्त्रीसे आलाप- मे मैने सलापरूप गमन करना देवसिओ-दिन सम्बन्धी अपरिग्गहियागमणे-विवाहित अइयारो-~-अतिचार पत्लीके सिवाय वेश्या आदि से कओ-किया हो तो आलाप-सलापरूपगमन करना तस्स उसका अणंगकिडा-अस्वाभाविक रीति मिच्छामि-निष्फल हो से कामक्रीडा करना दुक्कडं-पाप - भावार्थ हे गुरुदेव । मैं चतुर्थ अणुव्रत में स्थूल मैथुन अर्थात अपनी परिणिता स्त्री के सिवाय शेष सब स्त्रियोंके साथ मैथुन सेवन करने से निवृत्त होता हूं। मैं जीवन पर्यन्त देवता, देवाङ्गना सम्बन्धी मैथुन नहीं सेवूगा, नही सेवाऊंगा, मन, वाणी और काया से। पुरुष, स्त्री, तिथंच, तिर्यचिनी सम्बन्धी मैथुन शरीर से नहीं सेवूगा। स्व स्त्री सम्बन्धी मैथुन मर्यादा के उपरांव शरीर से नहीं सेवूगा।

१२४ श्रावक प्रतिक्रमण अब्रह्मचर्य । विवेचन "मथुनम्ब्रह्म"-मिथुन नाम जोड़े का है। जोड़ा स्त्री-पुरुष स्त्री-स्त्री एवं पुरुष-पुरुष का हो सकता है। ऐसे जोड़े की काम-राग के आवेश से उत्पन्न होने वाली मानसिक, वाचिक एवं कायिक प्रवृत्तियां मैथुन (अब्रह्म) कहलाती है। इसका असली अर्थ तो कामराग-जनित चेष्टा है। चाहे वह केवल पुरुष या केवल स्त्री की हो हो। मैथुन का विस्तृत अर्थ काम-रागोत्पन्न चेष्टा ही करना होगा। मेथुन शब्द तो सिर्फ लाक्षणिक है। यह अब्रह्माचरण है। जिसके आचरण से सद्गुणकी वृद्धि होसके उसका नाम ब्रह्म है। और जिसके आचरण से अवगुण बढ़ सके उसका नाम अब्रह्म है । अब्रह्मचर्य अवगुणों की खान है। मन इससे क्लांत एवं विकल हो जाता है। वाणी की सुधबुध चली जाती है। स्वास्थ्य गिर जाता है। जागृत चेतना भी सुषुप्ति की गोद में चली जाती है । और भी क्या २ दोष नहीं, जो इसमें नहीं फलते ? इसलिए यह त्यागने योग्य हैं। मेथुन दो प्रकार का है-सूक्ष्म और स्थूल । मन, इन्द्रिय और वाणी में जो अल्प विकार उपजता है, वह सूक्ष्म मैथुन है और जो औदारिक या वैक्रिय शरीरके साथ काम-चेष्टा की जाती है वह स्थूल मैथुन है। श्रावक स्थूल मैथुन का प्रत्याख्यान करता है, अत: यह व्रत स्थूल मैथुन-विरति कहलाता है। अथवा मैथुन का त्याग देशतः और सर्वथा, दोनों प्रकार से होता है। श्रावक मैथुन का त्याग आंशिक रूप से करता है। इसलिए यह स्थूल मथुन विरति है। इसका दूसरा नाम स्वदार-संतोष है। स्त्री के लिए स्वपति-संतोप है। कई ग्रन्थों में इसको परदारगमन विरति ,

ब्रह्मचर्य व्रत
१२५
भी कहा है। वह केवल नामान्तर है । भावार्थ सव का एक है।
इस व्रत के पाच अतिचार श्रावकको वर्जने चाहिए।
(१) इत्वरपरिगृहीता गमन-थोड़े समय के लिए वेतन आदि
साधनों से अपने अधीन को हुई या किसी दूसरे के अधीन
की हुई साधारण स्त्री के साथ आलाप-संलाप-रूप गमन नहीं
करना चाहिए।
२ अपरिगृहीता गमन–वेश्या या वैसी कोई दूसरी साधारण
अनाथ विधवा, कन्या, कुलवधू (जिसका पति विदेश गया
हो) आदि (अपनी विवाहिता पत्नी के सिवाय सव ) के
साथ आलाप-संलाप-रूप गमन नहीं करना चाहिए
शङ्का---पर स्त्री और वेश्या के साथ भोगरूप गमन करना
स्वदार-संतोप व्रत में अनाचार है तो फिर अतिचार की
संख्या में इनका ग्रहण क्यों ?
उत्तर-ये दोनों अतिक्रमण आदि की अपेक्षा से अति-
चार हैं। जैसे इत्वरपरिगृहीता और अपरिगृहीता स्त्री के
साथ काया से भोग करने का संकल्प करना अतिक्रम है,
भोग करनेको उद्यत हो जाना व्यतिक्रम है और भोग के
उपायभूत आलाप-संलाप आदि करना अतिचार है। ऐसा
करने से व्रत एक देश से खण्डित होता है। सुई-डोरा की
विधि से पर स्त्री आदि के साथ मैथुन सेवन करने से व्रत
सर्वथा खण्डित हो जाता है। अतः यह तो अनाचार है ही।
इसीलिए अतिचार के प्रकरण मे इनके साथ आलाप-रूप
गमन करने का निपेय किया है।

१२६ श्रावक प्रतिक्रमण ३ अनङ्गक्रीडा-जो काम सेवन के प्राकृतिक अङ्ग हैं, उनके विरुद्ध श्रावक को काम-क्रीड़ा नहीं करनी चाहिए। परस्त्री से मैथुन सेवन करने का त्याग तो श्रावक के होता ही है, किन्तु इस अतिचार का आशय यह है कि उनसे कामानुराग सहित आलिंगन आदि भी नहीं करना चाहिए। तथा हस्त- कर्मादि अति घृणित पाशविक कार्य नहीं करना चाहिए। ४ पर विवाह करना-स्व संतति के उपरान्त दूसरे को सन्तति- पुत्र-पुत्री आदि का विवाह नहीं कराना चाहिए। स्वदार संतोषी श्रावक के लिए दूसरों को विवाहित कर मैथुन मे प्रवृत्त करना अनुचित है। अपने घर का प्रबन्ध करने के लिए भी यदि वह विवश न हो तो स्व सन्तति के विवाह का त्याग करना भी श्रावक के लिए उचित है। ५ कामभोग तीव्राभिलाप-कामशास्त्र-कथित प्रयोगों द्वारा तथा कामोत्तेजक औपधियों से कामवाधा को बार-बार उद्दीप्त कर क्रीड़ा नहीं करना चाहिए। पांच इन्द्रिय के विकारों में अति आसक्त-मंध नहीं होना चाहिए। अति कामान्ध धर्म, कर्म, व्रत, अव्रत का कुछ खयाल नहीं करता। वह तो निरन्तर रति-क्रीड़ा को ही सुख मान लेता है, जिससे व्रत-भङ्ग की सम्भावना रहती है। अतः यह अतिचार है। आलोचना-इनके सेवन से कोई दोष लगा हो तो वह मेरे लिए निष्फल हो। ब्रह्मचर्य की महिमा अनन्त है। उसे कोई सीमाबद्ध नहीं कर परिशिष्ट सकता। बड़े-बड़े ऋषि-महर्षियोंने इसके यशोगान गाये, तथापि

-
ब्रह्मचर्य व्रत
१२७
इसका लक्षांश बतलानेमे भी उन्होंने अपने को असमर्थ पाया।
ब्रह्मचर्य का जितना अधिक महत्व है, उतना ही अधिक कठिन
उसका पालन है और जितना कठिन है, उतना ही आवश्यक है।
अब्रह्मचर्य पशु-क्रिया है। अजितेन्द्रिय पुरुष ही उसमे प्रवृत्त
होता है। मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना महान् पुरुषार्थ
है। अब्रह्म को शरीरधर्म या प्राकृतिक लालसा मानकर उसकी
पूर्ति को आवश्यक नहीं मानना चाहिए। यह तो इन्द्रिय और
मन की उच्छवलता है। इसका दमन करना महापुरुष का काम
है। कामी मनुष्य कदापि तृप्ति का अनुभव नहीं करता। काम
काम की लालसा शात नहीं होती। जैसे:-
घृत की आहुति से नहीं बुझती है आग,
नहीं बुझता है कही स्नेह से चिराग ।
मरु मरीचिका से नहीं मिटती है प्यास,
विपय रसास्वादनसे नहीं मिटती है विपयकी अभिलाष ।
भोग सेवन से भोगों की वृद्धि होती है।
'स्त्री सम्भोगेन य, काम-ज्वर प्रतिचिकीर्षति ।
स हुताश घृताहत्या, विव्यापयितुमिच्छति ।'
जो
स्त्री-संभोगसे काम-बाधा कोशात करना चाहता है,
वह घी की आहुति से अग्नि को शांत करना चाहता है। काम
को जीतने का साधन विरक्ति है, मानसिक शुद्धि है। शरीर का
अशुचित्व और अनित्यत्ता का चिंतन, इससे विरत होने के उपाय
है। अब्रह्मचर्य की उच्छहलता से धार्मिक पतन के साथ साथ
सामाजिक और राष्ट्रीय पतन का भी घनिष्ट सम्बन्ध है। इसलिए
स्वदारसंतोपत्रत श्रावक को ब्रह्मचर्य पालने का, आदेश करता है।

१२८ श्रावक प्रतिक्रमण समर्थ मनोवल के विना पूरा ब्रह्मचर्य नहीं पाला जाये तो यह जरूरी है कि अब्रह्मचर्य को सीमित करे। श्रावक इसके आदेशानुसार विश्व की समस्त अङ्गनाओं पर प्रवृत्त होनेवाली काम-चेष्टा को संकुचित कर उसे एक (स्व विवाहित) स्त्री पर सीमित कर देता है और उसको नियमित करता रहता है तथा आगे जाकर वह उसका बिलकुल त्याग कर देता है। काम एक भयानक विष है । उसको निःसत्व करने की यह समुचित प्रक्रिया है। यह विष-वैद्य की प्रणाली है। विष-चिकित्सक समूचे शरीर में व्याप्त जहर को बटोर कर पहले डंकके स्थल में ले आता है और फिर उसे निकाल बाहर फेंकता है। इस व्रत का क्रम भी ठीक ऐसा ही है। अपरि- गृहीता, परिगृहोता आदि के साथ सम्पर्क करने से समाज और जाति की कितनी दुर्दशा होती है, यह स्वयंज्ञात है। श्रावक को इस प्रकार के कार्यों से अपने धार्मिक गौरव एवं समाज और राष्ट्र को भी पतित नहीं करना चाहिये । ब्रह्मचर्य व्रत का पूरा-पूरा आदर करना श्रावक का परम कर्तव्य है। इसमें सब का कल्याण है। जैसे- चिरायुष. सुसस्थाना, दृढसहनना नरा । तेजस्विनो महावीर्या, भवेयुर्ब्रह्मचर्यत ॥ ब्रह्मचारी पुरुष दीर्घजीवी, सुडौल, मजबूत, तेजस्वी और महापराक्रमी होते हैं। आधुनिक सभ्यता के नाम पर अब्रह्मचर्य को पुष्ट करना अनार्यत्व का लक्षण है। मैथुन से कदापि सभ्यता पल्लवित नहीं हो सकती। वे पुरुष अनार्य हैं, जो काम-चेष्टा को प्रोत्साहित करने का प्रयास करते है। श्रावक को अपने लक्ष्य को दृष्टिगत रखते हुए ऐसा नहीं करना चाहिए।

पांचवा अणुनत अपरिग्रह व्रत मूल पाठ ३ पंचमं अणुव्वयं थूलाओं परिग्गहाओ वेरमणं १ खेत्तवत्थुणं जहापरिमाणं २ हिरण्ण-सुवष्णाणं जहापरिमाणं ३ धणधन्नाणं जहापरिमाणं ४ दुप्पय. चउप्पयाणं जहापरिमाणं ५ कुवियस्स जहापरिमाणं एवं मए जहापरिमाणं कयं तओ अइरित्तस्स परि- ग्गहस्स पच्चक्खाणं जावज्जीवाए एगविहं तिवि. हेणं न करेमि.मणसा वयसा कायसा एअरस पंच- मस्स थूलगपरिग्गह-परिमाणव्वयस्स समणोवासएणं पंचअइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ खेत्तवत्युप्पमाणाइकमे २ हिरण्ण-सुवण्णप्पमाणा- १३० श्रावक प्रतिक्रमण इक्कमे ३ धणधन्नप्पमाणाइक्कमे ४ दुप्पय-चउ- प्पयप्पमाणाइक्कमे ५ कुवियप्पमाणाइकमे जो मे देवसिओ अइयारो की तस्स मिच्छामि दुक्कडं । छाया पञ्चमं अणुव्रतं स्थूला परिग्रहाद् विरमणं १ क्षेत्रवास्तूनाम् यथापरिमाणं २ हिरण्य-सुवर्णानाम् यथापरिमाणं ३धनधान्यानाम यथापरिमाणं ४ द्विपदचतुष्पदानां यथापरिमाणं ५ कुप्यस्य यथा- परिमाणं एवं मया यथापरिमाणं कृतम् ततः अतिरिक्तस्य परि- ग्रहस्य प्रत्याख्यानं यावज्जो एकविधं त्रिविघन न करोमि मनसा वचसा कायेन एतस्य पञ्चमस्थ स्थूलक-परिग्रहपरिमाण-व्रतस्य श्रमणोपासकेन पञ्चातिचारा: ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ क्षेत्रवस्तुप्रमाणातिक्रमः २ हिरण्य-सुवर्ण-प्रमाणातिक्रमः३ धन- धान्यप्रमाणातिक्रमः ४ द्विपद-चतुष्पदप्रमाणातिक्रमः ५ कुष्य- प्रमाणातिक्रमः यो मया देवसिक: अतिचारः कृतः तस्य मिथ्यामे दुष्कृतम्। शब्दार्थ पंचम-पाचवा हिरण्ण-सुवण्णाणं-हिरण्य- अणुव्वयं-अणुव्रत सुवर्ण का थूलाओ-स्थूल जहापरिमाणं-यथापरिमाण परिग्गहाओ-परिग्रह से घणधन्नाणं-धन-धान्य का वेरमणं-विरमण (निवृत्त होता हूँ) जहापरिमाणं- यथापरिमाण खेत्तवत्थुणं-क्षेत्रवास्तु का जहापरिमाणं यथापरिमाण चउप्पयाणं-चतुष्पद का दुप्पय-द्विपद अपरिग्रह व्रत जहापरिमाणं यथापरिमाण पंचअइयारा-पाच अतिचार कुवियस्स-कुम्य तथा घर जाणियन्या-जानने चाहिए सामग्रीका न-नही जहापरिमाणं-ययापरिमाण समायरियन्या-आचरण करना एवं--इस प्रकार चाहिए मए मैने तंजहा-वे इस प्रकार है- जहापरिमाणं-जैसा परिमाण खेत्तवत्थुष्पमाणाइकमे-क्षेत्रवास्तु- कयं-किया प्रमाण का अतिक्रमण करना तओ-इसके हिरण्ण-सुवण्णप्पमाणाइको अईरित्तस्स-उपरात हिरण्य-सुवण प्रमाण का अतिक्रमण परिग्गहस्स-परिग्रह रखने का करना पचक्खाणं-प्रत्यारयान धणधन्नप्पमाणाइकमे-धनधान्य जावज्जोवाए-जीवनपर्यंत प्रमाण का अतिक्रमण करना एग-विहं-एक करण दुप्पय चउप्पयप्पमाणाइकसे तिविहेणं-तीनयोगसे (प्रमाणाधिक द्विपद चतुष्पद प्रमाण का परिग्रह का सचय) अतिक्रमण करना कुवियप्पमाणाइक्कमे-कुप्य परि- करेमिकलं माण का अतिक्रमण करना मणसा-मनसे जो-जो घयसा-वचनसे मे ---मैने कायसा-कर्मसे देवसिओ-दिवस सम्बन्धी एअस्स-इस अइयारो अतिचार पंचमस्स-पाचवें कओ-किया थूलगपरिग्रह-स्थूल परिग्रह तस्स-उनके सब पाप परिमाणव्वयस्स-परिमाणनत के मिच्छामि-निष्फल हो समणोवासएणं-श्रावक को दुकडं-पाप - - श्रावक प्रतिक्रमण भावार्थ हे गुरुदेव ! मैं पांचवें अणुव्रत में स्थूल परिग्रह से निवृत्त होता हूं। १-क्षेत्र-खेत आदि खुली जमीन । २-वास्तु-घर आदि ढंकी हुई जमीन तथा गांव-नगर आदि । ३-४-हिरण्य (चांदो) सुवर्ण (सोना ) तथा चादि-सोना के आभूषण, वर्तन आदि। ५-धन-रुपये, मोहरें सिक्के, जवाहरात, वस्त्र आदि । ६-धान्य-गेहूं, चना, जव, मक्का आदि । ७-द्विपद-दो पैरवाले, दास-दासी, नौकर-नौकरानी आदि। ८-चतुष्पद--चार पैर वाले, हाथी, ऊँट, गाय, भैंस आदि । 8-कुप्य-चांदी, सोना के सिवाय ताबा, लोहा, कासा, पोतल आदि धातु तथा इनके बने हुए वतन तथा बिछौना, पल्यंक, मोटर, साइकिल, वायुयान आदि घर की सामग्री। यह नवजाति का परिग्रह है। इसका मैंने जो परिमाण किया है, उसके उपरान्त परिग्रह रखने का जीवन पर्यन्त मैं एक करण- तीन योग से प्रत्याख्यान करता हूं। विवेचन- "मूर्छा परिग्रहः" जो मूर्छा है, वह परिग्रह है। मूर्छा का अर्थ ममत्व या आसक्ति है। धन-धान्य आदि पदार्थ मूर्छा के हेतु है। इसलिय वह परिग्रह है। जड़ या चेतन, छोटी या बड़ी कोई भी वस्तु हो उसमे आसक्ति रखना, उसमें आत्मा को बाँध देना परिग्रह है। इसका फलितार्थ यह है कि रागासक्त वृत्ति से वस्तुओं का ग्रहण करना परिग्रह है। ना यों समझ लीजिये कि . परिग्रह । - अपरिग्रह व्रत जो वस्तु प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हिंसा का साधन है, उस पर ममकार होना परिग्रह है। शरीर भी, जो हिंसा का साधन है, वह परिग्रह है और जो अहिंसा-साधन में लगा हुआ है, वह परिग्रह नहीं है । व्यवहार नय से बाह्य वस्तुओं को ही परिग्रह कहा जाता है किन्तु निश्चय नय से परिग्रह हिंसा के साधनभूत पदार्थों में होने वाला अनुराग है। परिग्रह दो प्रकार का है-बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य परिग्रह के परिग्रह के क्षेत्र, वास्तु आदि नव भेद वतलाये हैं। आभ्यन्तर दो भेद परिग्रह चवदह प्रकार का है जैसे १ राग २ द्वषे ३ क्रोध ४ मान ५ माया ६ लोभ ७ शोक ८ हास्य हरति १० अरवि ११ जुगुप्सा १२ भय १३ वेद अर्थात् विकार १४ मिथ्यात्व । वाह्य परिग्रह, आभ्यन्तर परिग्रह का उद्दीपन करने वाला है। पाचवें अणुव्रत मे श्रावक बाह्य परिग्रह का नियन्त्रण करता स्थूल परिग्रह है। संग्रह की लालसा को सीमित करता है-सर्वथा सब परि- विरति ग्रह को नहीं त्यागता, अतः यह स्थूल परिग्रहविरमणव्रत है । बाह्य पदार्थसम्बन्धी आशा को रोके बिना आभ्यन्तर परिग्रह का त्याग करना असम्भव है। बाह्य वस्तुओं की लालसा के त्याग से आभ्यन्तर परिग्रह मन्द होता है। उसकी मंदता से जीव अप- रिग्रहो वनकर साधन के पथ पर आरूढ हो सकता है। इसलिये परिग्रह का परिमाण करना श्रावक के लिये अत्यन्त उपयोगी है। इस व्रत का दूसरा नाम इच्छापरिमाण है। इच्छापरिमाण अर्थात इच्छा निरोध के तीन प्रकार हैं- ब्रत ग्रहण करने के समय अपने पास जितना अर्थ संग्रह है, उससे परिमाण न्यून कर परिग्रह का परिमाण करना या उसके उपरात परिग्रह इच्छा

१३४
श्रावक प्रतिक्रमण
सञ्चय करने का त्याग करना अथवा उससे अधिक खुलावट रख
कर परिग्रह की मर्यादा करना।
प्रश्न—जिसके पास एक लाख रुपये का धन है, वह दो
लाख से अधिक परिग्रह रखने का त्याग करता है। यह तो
इस व्रत के प्रतिकूल होना चाहिये। इस व्रत का उद्देश्य इच्छा
निरोध है, न कि इच्छा विस्तार। क्या ऐसा करना व्रत की
परिधि में है?
उत्तर-हीं, है । यथाशक्ति व्रत ग्रहण करनेवाला वह यदि
दो लाख से कम परिग्रह में अपनी आशा को सीमित नहीं कर
सकता, इसलिए वह एक लाख की असत् (पास में न होने वाली)
सम्पत्ति को सीमा के अन्तर्गत रख लेता है। पर इससे व्रत मे
कोई वाधा नहीं आती। ऐसा करने से लाभ क्या, यह एक
असत् कल्पना है, यों भी नहीं सोचना चाहिए ; क्योंकि उस
सीमा (दो लाख) के उपरान्त धनोपार्जन का अवसर आ जाय
तो भी वह धन सञ्चय नहीं कर सकता। क्या यह लोभ
का संवर नहीं ? यदि वह धन सञ्चय न करने पावे, तो भी
अनन्त इच्छा को दो लाख तक सीमित कर देता है, क्या
यह इच्छा निरोध नहीं ? अवश्य है। अतः इसकी उपयोगिता मे
कोई भी सन्देह नहीं हो सकता।
अतिचार
इस व्रत के पांच अतिचार श्रावक को वर्जने चाहिये।
१ क्षेत्रवास्तुप्रमाणातिक्रम-क्षेत्र और वास्तु (घर) की मर्यादा
का उल्लंघन नहीं करना चाहिये। अथवा व्रत की अपेक्षा
रखते हुए खेत और घर की मर्यादा से अधिक अपने खेत के
..

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अपरिग्रह व्रत
१३५
पाश्ववर्ती खेत या घरके पार्श्ववर्ती घर को मोल लेकर संख्या
वृद्धि के भय से उसकी बाड़ या भीत को हटा कर मर्यादित
खेत या घर मे मिला लेना अतिचार है।
२ हिरण्य-सुवर्ण-प्रमाणातिक्रम....चांदी-सोने के प्रमाण का
अतिक्रमण नहीं करना चाहिये। सोना-चादी परिमाण से
अधिक हो जाये तो व्रतभंग के डर से उन्हें नियत समय के
लिये, अवधि पूर्ण होने पर, वापिस लेने की भावना से दूसरे
के पास रखना उक्त अतिचार है।
३ धन-धान्यप्रमाणातिक्रम-धन-धान्य की मर्यादा का अति-
क्रमण नहीं करना चाहिए। धन-धान्य की प्राप्ति होने पर
उसे अस्वीकार कर देना परन्तु व्रत भंग के भय से धान्यादि
विक जाने पर ले लूगा, इस भावना से दूसरेके पास रहने देना
उक्त अतिचार है।
४ द्विपदचतुष्पदप्रमाणातिक्रम दो पैर वाले दास-दासी,
तोता, मैना आदि और चार पैर वाले गाय, भैंस आदि की
मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए । अनुपयोग एवं
अतिक्रम आदि की अपेक्षा से यह अतिचार है।
५ कुप्यप्रमाणातिक्रमः सोने-चांदी के सिवाय अन्य धातु या
उनके पात्र अथवा आसन, शयन, रथ आदि गृह-सामग्री की
मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए। नियमित कुप्य
से अधिक संख्या मे कुप्य मिलने पर व्रतभंग के भय से
नियमित संख्या को कायम रखने के लिये दो-दो मिलाकर
वस्तुओं को बड़ी कर देना उक्त अतिचार है। ये पांचों ही
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श्रावक प्रतिक्रमण परिशिष्ट अनाभोगादि (अनुपयोगादि) एवं अतिक्रमणादि की अपेक्षा से अतिचार है । जान-बूझ कर मर्यादा का उल्लंघन करना अनाचार है। आलोचना-इनके योग से कोई पाप लगा हो तो वह मेरे लिए निष्फल हो। "इच्छाहु आगाससमा अणतया' * इच्छा आकाश के समान अनन्त है। अनन्त, अपरिमित आशा को परिमित करना इस व्रत का उद्देश्य है। मनुष्य के हृदय मे क्रान्ति है, विप्लव है, सक्रियता है, सुख के लिए, ऐश्वर्य के लिए। पर आज तक किसी ने भी इच्छा की उच्छृङ्खलता मे सुख नहीं देखा । आशाके दासत्व में शांति को नहीं छुआ। अतृप्तिके साम्राज्य मे अपने को अभय नहीं पाया। कितने ही प्राणी आशाके पाश से बंध कर आत्म- स्वातंत्र्य को खो चुके। आशा पिशाचिनी है, सर्व स्वाहा है सर्व भक्षी दावानल है। वह सुख नहीं, उसके तन पर सुखाभास का चोला है। भोलेभाले आदमी उसे ही असली सुख मान बैठते है। फिर दुख का अनुभव करते है। यहो तो अविवेक है। असली सुख संतोष है । आत्म-शोधक महात्माओं ने इसकी शोध को है। दुनिया की भलाई के लिए उन्होंने इसका उपदेश दिया है। निःसंदेह यह सुख है, शाति है, परम समाधि है। सुखी बनने का एक मात्र उपाय है। "सतोपवता निर्वनेनापि इन्द्रस्य सुखमनुभूयते" संतोषी पुरुष धनहीन होता हुआ भी इन्द्र के सुख का अनु- भव करता है। असंतोषी को समूचे जग का साम्राज्य मिल * उत्तराध्ययन, अध्ययन १ वा अपरिग्रह व्रत १३७ है को अखण्ड मिल जाने पर भी उसे सुख-शाति की सांस नहीं आती। "असतोषवत सौख्य न शक्रस्य न चक्रिग असंतुष्टचेता देवताओं का स्वामी इन्द्र और षट् खण्ड भूमिका शासक चक्रवर्ती भो सुखी नहीं हो सकता। सर्वदर्शी भगवान महावीर को वाणी मे आशा दुष्पूर है "कसिण पि जो इम लोय, पडिपुन्न दलेन्ज एक्कम्स । तेणावि से न सत्सेज्जा, इह दुप्पूरए इमे आया ।" मनुष्य की लालसा कितनी प्रबल । एक मनुष्य विश्व का स्वामी बना दिया जाय तो भी वह तृप्ति का अनुभव नहीं करता। इच्छित पदार्थ की प्राप्त होने पर भी उसकी पूर्ति नहीं होती। “लाहा लोहो पवढ्इ” लाभ से लोभ बढ़ता है। एक भीखमंगा परिस्थिति के चक्र से राजा होजाय तो वह सम्राट होने की चेष्टा करेगा। सम्राट् होजाय तो सारी पृथ्वी को आपने पंजे मे लेने को धुन में लगेगा। हाय । यही तो दु.ख का बीज- मंत्र है। एक तृष्णा नहीं होती तो क्यों मनुष्य व्यर्थ संग्रह करता? क्यों उसकी रक्षा को सशक रहता ? क्यों विरोधके वृक्ष फलते फूलते १ क्यों रक्त की नदियां बहतीं ? क्यों मनुष्य मनुष्य के खून का प्यासा होता ? क्यों ईर्ष्या की आग भभकती १ सब अपने २ अधिकार मे संतुष्ट रहते। शाति से जीवन बिताते ! अपेक्षाकृत अधिक सुखी होते। केवल आवश्यकता की पूर्नि करते । धन-धान्य और भूमि यह आशा की पूर्ति के साधन नहीं, जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं के साधन है। भूख को शान्त करने के लिये अन्न है, अन्न को पैदा करने के लिये भूमि है। आवश्यक अन्न और भूमि को पाने के लिये धन है। यह धावक प्रतिक्रमण । धन-धान्य और भूमि का आवश्यक उपयोग है। ऐसा किये बिना जीवन निर्वाह नहीं हो सकता किन्तु अनावश्यक धन-धान्य को इकट्ठा करना, अनावश्यक भूभागको रोके रहना, आवश्यक सामग्री का दुरुपयोग है। यह केवल तृष्णा की विडम्बना है। इस प्रकार की चेष्टा से, अनावश्यक संग्रह से, आत्म-गुणों का लोप होता है। धार्मिक आचरण विकास नहीं पा सकते। हिंसा को प्रोत्साहन मिलता है। मैत्री का स्रोत सूख जाता है । हडपने को भावना प्रबल हो उठती है। व्यर्थ द्रव्य-संग्रह न केवल धार्मिक नियम के ही प्रतिकूल है अपितु देश और समाज की सद्व्यवस्था के भी। इसमें न केवल धार्मिक हानि होती है किन्तु देश और समाज की भी। यदि आवश्यकता के उपरांत अधिक अर्थ-संग्रह की भावना मनुष्यों में नहीं होती तो भूख से मरना, तन ढकने को कपड़ा नहीं मिलना, रहने के लिये घर नहीं मिलना, इत्यादि साधारण से साधारण संऋट सम्भवतः जीवन की घड़ियों में नहीं आते । आर्थिक कठिनाइयों की इतनी अनुभूति नहीं होती। त्राहि- त्राहि को करुण पुकार इस तरह कानों से नहीं टकरातीं। आज का वातावरण विचित्र है। अर्थसंग्रह को प्रोत्साहित किया जा रहा है। आर्थिक स्थिति जोवन का मापदण्ड है। देश और समाज के महत्व की भीति ही अर्थ-संचय है। यही कारण है कि आज की परिस्थिति वास्तविकता से दूर है, अशान्त है, भया- नक है और संघर्ष मूलक है। एक दूसरे का राज्य हड़पनेकी लगन में है। धन की स्पर्धा है। धन की उत्कण्ठा है। अति धन-संग्रह ही सभ्यता का मूल सूत्र है। पर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि इससे जगत् का भला नहीं हो सकता। अशांति का अपरिग्रह व्रत १३६ उच्छेद नहीं हो सकता। दुख का अन्त नहीं हो सकता। लाभ लोभ का जनयिता है । लोभ महारम्भ का जनयिता है । महारम्भ अनर्थ का जनक है। अनर्थ अशाति और उदग का उत्पादक है । अतएव यह निश्चित है कि धन-संग्रह की प्रवल भावना और प्रबल प्रयत्न को रोके बिना शाति नहीं हो सकती। सुख और शाति का एक मात्र उपाय संतोष है। इसीलिये भगवान महावीर का उपदेश है--“लोभ सतोसओ जिणे" लोभ की विजय संतोष से करो। संतोषी पुरुप अपने मे ही तृप्त रहता है। वह पिशाची तृष्णा के सिकंजे में नहीं फसता। अनर्थ से उसका हृदय कांपता है। पाशविक करता संतोपी को विचलित नहीं कर सकती। आशा का निरोध करने वाला पुरुष उस सुख को बिना प्रयत्न साध लेता है, जिसको लालची लाखों यत्नों से नहीं साध सकता। परिग्रह का मूल्य, महत्व और स्पर्धा तबतक ही है जबतक मनुष्य लोभ के इशारे पर नाचता है। फिन्तु लोभ की सीमा होते ही वह सब कंकड़ के समान प्रतीत होने लगता है। जीवन सीमित है। धन असीमित है। लालसा अनन्त है, अतः अमर्यादित लाल- साओं की पूर्ति असंभव है। इसीलिये प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक समाज, जाति और राष्ट्र को हित और सुख शांति की रक्षाके लिये अर्थ-संग्रह की सीमा करना आवश्यक कार्य समझना चाहिए । श्रावक को तो इस प्रत का महान् आदर करना चाहिए।

धम गुजानत छठा दिग्बत मूल पाठ छह दिसिव्वयं उबृदिसाए जहापरिमाणं अहो. दिसाए जहापरिमाणं तिरियदिसाए जहापरिमाणं एवंमए जहापरिमाणं कयं तओ सेच्छाए काएणं गंतूणं पंचासवासेवणस्स पच्चक्खाणं जावजीवाए एगविहं तिविहेणं न करेमि मणसा वयसा कायसा एअस्स दिसिव्वयस्स छहस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्या, न समायरियव्वा तंजहा- १ उड्ढदिसिप्पमणाइक्कमे २ अहोदिसिप्पमाणाइ- कमे ३ तिरियदिसिप्पमाणाइक्कमे ४ खेत्तवुड्डी ५ सइअंतरद्धा जो मे देवसिओअइयारो कओतस्स मिच्छामि दुकडं।

दिग्व्रत १४९ छाया षष्ठं दिगवतं ऊर्ध्वदिशो यथापरिमाणे अधो-दिशो यथापरि- माणं तिर्यग-दिशो यथापरिमाणं एवं मया यथापरिमाणं कृतम् मतः स्वेच्छया कायेन गत्वा पञ्चानवाऽसेवनस्य प्रत्याख्यानं याव- जीवं एकविधं त्रिविधेन न करोमि मनसा वचसा कायेन एतस्य दिग-व्रतस्य षष्ठस्य श्रमणोपासकेन पञ्चातिचाराः ज्ञातव्या:न समाचरितव्याः वद्यथा १ ऊर्ध्व-दिक्प्रमाणातिक्रमः २ अधो-दिक्- प्रमाणातिक्रमः ३ तिर्यदिक्-प्रमाणातिक्रमः ४ क्षेत्रवृद्धिः ५ स्मृत्यन्तर्दा यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्यामे दुष्कृतम्। शब्दार्थ छट्टे-छट्टा काएणं-शरीर के द्वारा दिसिव्वयं-दिग्वत गंतूणं-जाकर उड्ढदिसाए-वं दिशा का पंचासवासेवणस्स-पाच आश्रव जहापरिमाणं-यथापरिमाण सेवन करने का अहो-दिसाए-नीची दिशा का पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान (करता हू) जहापरिमाणं-यथापरिमाण जावजीवाए-जीवनपर्यत विरिय-दिशाए-तियंग्-दिशा का एगविहं-एककरण जहापरिमाणं- यथापरिमाण तिविहेणं-तीनयोग से (पाच एवंमए-इस प्रकार मैने आश्रव का सेवन) जहापरिमाणं-जो परिमाण न-न कयं-किया है करेमि-कहें तमो-उसके उपरान्त मणसा-मन से सेच्छाए-अपनी इच्छासे वयसा-वचन से श्रावक प्रतिक्रमण उल्लघन करना परिमाण बढाना कायसा-शरीर से तिरिय दिसिप्पमाणाइक्कमे- एअस्स-इस तिछी दिशा के परिमाण को दिसि-ब्बयस्स-दिग्-व्रत का छहस्स-छ8 व्रत के खेत्तवुड्ढी-एक दिशाका समणोवासएणं-श्रावक को परिमाण घटाकर दूसरी दिशा का पंच अइयारा-पाच अतिचार जाणियव्वा-जानने चाहिए सइअंतरद्धा-परिमाण की न-नहीं विस्मृति से सदेह होने पर भी समायरियब्वा-आचरण करना उससे आगे जाना चाहिए जो-जो तंजहा-वे इस प्रकार है । मे-मैने उड्ढदिसिप्पमाणाइकमे-ऊर्ध्व- देवसिओ-दिन सम्बन्धी दिशाके परिमाणको उल्लघन अइयारो-अतिचार करना कओ-किया हो तो अहोदिसिप्पमाणाइकमे-नीची तस्स-उसका दिशा के परिमाण को उल्लघन मिच्छामि-निष्फल हो करना दुक्कडं-पाप भावार्थ हे गुरुदेव ! मैं ऊँची, नीची, तिर्थी दिशा में जाने का परिमाण करता हूं। मैं खुद अपनी इच्छा से मर्यादित दिशा से आगे जाकर हिंसा, असत्य, चौर्य, अब्रह्मचर्य, परिग्रह-इन पांच आश्रवों का सेवन करने का त्याग करता हूं। मैं जीवन पर्यंत मनसा-वाचा-कर्मणा इस व्रत का पालन करूंगा।

दिग्वत
अतिचार
विवेचन
इस व्रत के पाच अतिचार श्रावक को वर्जने चाहिए।
१ उर्ध्वदिक्प्रमाणातिकम-ऊंची दिशा में जाने का जो परि-
माण किया हो, उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
२ अधोदिक्षमाणातिक्रम-नीची दिशा में जाने काजो प्रमाण
किया हो, उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
३ तिर्यदिप्रमाणातिक्रम-तिर्की दिशा में जाने का जो प्रमाण
किया हो, उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए।
असावधानी से ऊर्ध्व, अधः और तिर्यग दिशा के प्रमाण का
उल्लंघन करना अतिचार है और जान बूझकर उल्लंघन करना
अनाचार है।
४ क्षेत्रवृद्धि---एक दिशा का परिमाण घटा का दूसरी दिशा का
परिमाण नहीं बढ़ाना चाहिए। दोनों दिशाओं के परिमाण
का परिवर्तन करने वाला यह जान ले कि मैंने क्षेत्र की सीमा
का उल्लंघन तो किया नहीं, केवल एक के बदले मे दूसरी
दिशा का परिमाण बढ़ाया है, इस प्रकार व्रत की उपेक्षा होने
से यह अतिचार है
५ स्मृत्यन्तर्धान–(स्मृतिभ्रंश) ग्रहण किये हुए परिमाण का
स्मरण न रहने पर संदेह सहित आगे नहीं चलना चाहिए।
जैसे किसी ने पूर्व दिशा में १०० योजन से उपरांत जाने की
मर्यादा की है। पूर्व दिशा मे जाने के समय उसे मर्यादा का
स्मरण नहीं रहा। वह सोचने लगा कि मैने पूर्व दिशा में
५० योजन की मर्यादा की है या १०० योजन की। इस

१४४
धावक प्रतिक्रमण
गुणवत
-
प्रकार समृति न रहने पर संदेह सहित ५० योजन से भी
आगे जाना अतिचार है।
आलोचना-इन अतिचारों के आचरण से मुझे दोष लगा
हो तो वह मेरे लिये निष्फल हो ।
पाँच अणुव्रत के पश्चात् तीन गुण व्रत हैं। "गुणाय चोपका-
राय अणुव्रताना व्रत गुणव्रतम्" अणुव्रतों के गुणों को बढ़ाने वाला,
उनका उपकार-पुष्टि करने वाला व्रत गुणव्रत कहलाता है। ऐसे
गुण व्रत तीन है:-
(१) दिग्विरति
(२) भोगापभोगविरति
(३) अनर्थदण्डविरति
दिगविरति नामक व्रत, व्रत-संख्या के क्रम से छठा व्रत है
और गुणव्रत की अपेक्षा पहला गुणव्रत है।
प्रत्याख्यान-द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव से सम्बन्ध रखता
है। हम जिसका त्याग करते है, वही उस त्याग का द्रव्य है।
उसके स्थान का निश्चय करना त्याग का क्षेत्र है। कबतक'
काल की अवधि का विवेक करना त्याग का काल है। राग-द्वष
रहित और उपयोग सहित उसका पालन त्याग का भाव है।
श्रावक का त्याग अपूर्ण होता है। आगार ( छूट ) सहित होता
है अतः आवक के लिए द्रव्य की तरह क्षेत्र को भी मर्यादित करना
जरूरी है।
स्वामीजी ने बड़े मार्मिक शब्दों में इस व्रत की उपयोगिता
बतलाई है जैसे:-
प्रयोजन
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दिग्नत १४५ "पाच अणुव्रत धारता, मोटी वाघी पाल !* छोटारी अवत रही, ते पाप आवे दग चाल || तिण अवत ने मेटवा, पहिलो गुणवत देख । दिशि मर्यादा माड ने, टाले पाप विशेप॥" श्रावक अणुव्रतों को स्वीकार करने के समय सब क्षेत्रो मे संकल्पना आदि हिसा का प्रत्याख्यान करता है और आरम्भजा हिंसा आदि का आगार रखता है। वह आगार सब स्थानों के लिये खुला रहता है । उसकी कोई सीमा नहीं होती । उस छूट को सीमा- बद्ध करने के लिए इस व्रत का विधान किया गया है। इस व्रत के अनुसार श्रावक अमुक २ दिशा से इतनी दूर से आगे जाकर आरम्भजन्य हिसा आदि का प्रत्याख्यान कर लेता है। फिर वह उस सीमा का उल्लंघन कर आरम्भजा हिंसा आदि का आचरण नहीं कर सकता। यह प्रणाली पोचों व्रतों के लिये समान है। इसमे क्षेत्र संयम का प्रधान्य है। इस व्रत का उद्देश्य हिंसा आदि पांचों दोषों की निवृत्ति परिशिष्ट करना है। इन्द्रिय वासनाओं की तृप्ति के लिए, प्राणिवध के लिए, दूसरे के अधिकारो को कुचलने के लिए की जाने वाली भ्रमणशील प्रवृत्ति को रोकने के लिए यह अत्यन्त उपयोगी है। सारे संसार को आप्लावित करने वाले परिमहरूपी पानी का वेग रोकने के लिए यह वाध है। दिगगमन की मर्यादा करने वाला न केवल स्वयं जाने का ही त्याग करता है, अपितु उस सीमा से बाहर रहने वालों के साथ व्यापार का सम्बन्ध, लेन-देन का * भिक्षु स्वामी १४६ श्रावक प्रतिक्रमण सम्बन्ध, बाहर से भोग्य वस्तुएं मंगाने एवं प्रमाणित क्षेत्र में उन्हें भेजने आदि का भी परित्याग करता है। धार्मिक सूक्ष्मता में इस व्रत का बड़ा भारी महत्व है। इससे पाँच अणुव्रत बहुत पुष्ट होते हैं । संयम का परिमाण बढ़ता है। जिस शान्ति की स्थापना के लिए विश्व का कण-कण टटोला जा रहा है, उसका मूल बीज इसमें गर्मित है । सब के सब अपने आवश्यक निर्वाह के उपयुक्त सीमा का निश्चय करें और यदि दूर-दूर की परिस्थितियों के अवलोकन का लोभ संवृत्त न हो सकने पर सुदूर प्रदेशों में जायें तो भी किसी पर आक्रमण करने के लिए, किसी को सताने के लिए, धन का अपहरण करने के लिए, लूटने के लिए, कूटनीति का चक्र फैलाने के लिए, उन पर शासन करने के लिए, व्यापारिक अधिकारों को ध्वंस करने के लिए, घरेलू लडाइयों के बीज बोने के लिए, दूसरों के स्वत्व को छीन कर निज को अधिक ऐश्वर्य- शालो बनाने के लिए इत्यादि अपरिमित कलुपित भावनाओं को कार्यरूप देने के लिए नहीं जाएं तो अवश्य ही शाति के दर्शन सुलभ हो जायंगे। पारस्परिक अविश्वास का अन्त हो जाएगा। संभवतः एक देश का दूसरे देश के साथ प्रवेश-प्रतिरोध, प्रवेश- स्वीकृति के सम्बन्ध भी आज जैसे संदिग्ध और जटिल नहीं रहेंगे। सबके प्रति विश्वास की परम्परा उल्लास पाएगी । मानव समूह को एक कल्पित एवं स्वप्न-प्रतीत सुख की साक्षात अनुभूति होगी। यह एक सामूहिक लाभ है। समाज पर विशेष कर इसके अनुशीलन का क्या असर होता है, उस पर भी एक दृष्टि डालनी चाहिए। आज का युग आडम्बर का युग है। बाहरी दिखावे में लोक मंत्र-मुग्ध है। लालसाएं बढ़ी-चढ़ी हैं। ऐश- दिग्व्रत १४७ आराम एवं फैशन के लिए कुछ उठा नहीं रखते है। इससे आज अनेकों समाज दुर्दशा के केन्द्र बन चुके है। अनेकों काल-कव- लित से हो रहे है और अनेको कंकाल के रूप मे खडे है। इस व्रत की ओर उन्हें आंख उठाने का सौभाग्य प्राप्त हो जाये तो अब भी उनका भाग्य सितारा जाज्वल्यमान मणि की भाति चमक सकता है। कठिनाइयों की कडिया टूट सकती हैं। पुन- जीवन की अमिट रेखा उज्ज्वल हो सकती है। आत्म-संयमके साथ सामाजिक पुरुष और स्त्रिया १०० या २०० मील अथवा, प्रमाणित क्षेत्र से बाहर बनी हुई आडम्बर को वस्तुओं का उपयोग करना त्याग दें, उनसे जी न ललचायें, घरावरी की भावना का सत्कार न करें, विलासिताके साधनों को स्पर्धा न करें तो निश्चय ही समाज के संकट भरे दिनो की इतिश्रो होकर रहेगी। सुख, शाति, संतोष और मैत्री का पौधा पनपेगा। इसलिए इस व्रत का पालन करना प्रत्येक शुभेच्छु का कर्त्तव्य है। आत्म-शोधन के साथ-साथ राष्ट्र और समाज का भी इससे बड़ा हित होता है।

दूसरा गुणवत सातवा व्रत पञ्च- मूल पाठ सत्तमेवए उवभोगपरिभोगविहि क्खायमाणे १ उल्लणियाविहि २ दंतधिहि ३ फलविहि ४ अभंगणविहि ५ उब्वट्टविहि ६ मजणविहि ७ बत्थविहि ८ विलेवणविहि ९ पुष्फविहि १० आभरणविहि ११ धूवणविहि १२ पेज्जविहि १३ भक्खविहि १४ ओदविहि १५ सूवविहि १६ विगयविहि १७ सागविहि १८ महुरविहि १९ जेमविहि २० पाणीविहि २१ मुहवासविहि २२ वाहणविहि २३ सयणविहि २४ उवाहणविहि २५ सचित्तविहि २६ दव्वविहि उपभोगपरिभोगव्रत १४६ इच्चाइणं जहापरिमाणं कयं तओ अइरित्तस्स उव- भोगपरिभोग पञ्चक्खाणं जावजीवाए एगविहं तिविहेणं न करेमि मणसा वयसा कायसा सत्तमे उवभोगपरिभोगव्वए दुविहे पन्नत्ते तंजहा भोयणओ कम्मओय तत्थणं भोयणओ समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ सचित्ताहारे २ सचित्त-पडिबद्धाहारे ३ अप्पओ- लिओसहिभक्खणया ४ दुप्पओलिओसहिभक्खणया ५ तुच्छोसहिमक्खणया जो मे देवससिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं । छाया सप्तमे व्रते उपभोगपरिभोगविधि प्रत्यास्यायमान.१ आर्द्र- नयनिकाविधिः २ दन्तनविधिः ३ फलविधिः४ अभ्यङ्गनविधिः ५ उद्वर्तनविधि ६ मजनविधिः ७ वनविधिः ८ विलेपनविधिः ६ पुष्पविधिः १० आभरणविधिः ११ धूपनविधि. १२ पेयविधि. १३ भक्ष्यविधिः १४ ओदनविधिः १५ सूपविधिः १६ विकृत विधिः १७ शाकविधिः १८ मधुरविधिः १६ जेमनविधिः २० पानीयविधि. २१ मुखवासविधिः २२ वाहनविधिः २३ शयन विधिः २४ उपानविधिः २५ सचित्तविधिः २६ द्रव्यविधिः इत्या- दीनां यथापरिमाणं कृतम् ततः अतिरिक्तस्य उपभोगपरिभोगस्य

श्रावक प्रतिक्रमण
प्रत्याख्यानं यावजीवं एकविधं त्रिविधेन न करोमि मनसा वयसा
कायेन। सप्तमम् उपभोगपरिभोग व्रतं द्विविधं प्रज्ञातं तद्यथा
भोजनतः कमतश्च । तत्र भोजनतः श्रमणोपासकेन पञ्च अतिचाराः
ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ सचित्ताहारः २ सचित्त
प्रतिबद्धाहारः ३ अपक्कौषधि भक्षणता ४ दुष्पकौपधि भक्षणता
५ तुच्छौषधि भक्षणता यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य
मिथ्या मे दुष्कृतम्।
शब्दार्थ
सत्तमे-सातवे
धूवणविहि-धूपविधि
वए-व्रत में
पेन्जविहि-पेयविधि
उपभोगपरिभोगविहि-उपभोग भक्खविहि-भक्ष्यविधि
परिभोग विधि का
ओदणविहि-ओदनविधि
पञ्चक्खायमाणे प्रत्याख्यान (रधी हुई चीजे)
करता हुआ
सूवविहि-दालविधि
उल्लणियाविहि-रूमालविधि विगयविहि-विगयविधि
दंतणविहि -दतवनविधि शाकविहि-शाकविधि
फलविहि-फलविधि महुरविहि-मधुरफलविधि
अभंगणविहि-तैलमर्दनविधि जेमणविहि-भोजनविधि
उव्वट्टणविहि-पीठीविधि पाणीयविहि-पानीविधि
मज्जणविहि-स्नानविधि मुहवासविहि-मुखवासविधि
वस्थविहि-वस्त्रविधि वाहणविहि-वाहनविधि
विलेवणविहि-विलेपन विधि शयणविहि-शयनविधि
पुप्फविहि-पुष्पविधि उवाहणविहि-उपानद् (जूता)
आभरणविहि-आभूषणविधि
विधि

उपभोगपरिभोगत सचित्तविहि-सचित्तविधि दुव्वविहि-द्रव्यविधि इचाइणं-इत्यादि जहापरिमाणं-जो परिमाण कर्य-किया तमओउससे अइरित्तस्स-अधिक उपभोग परिभोग-उपभोग- परिभोग का पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान जावज्जीवाय-जीवन पर्यन्त एगविहं-एक करण तिविहेणं-तीन योग से न करेमि-नहीं कर मणसा-मन से कम्मओय-कर्म से तत्थर्ण-उसमें भोयणओ-भोजन सम्बन्धी समणोवासएण-श्रावक को पंच-पाच अइयारा-अतिचार जाणियवा-जानना चाहिए न-नहीं समायरियव्वा-याचरण करना चाहिए तंजहा-वे इस प्रकार है सचित्ताहारे-प्रत्याख्यानके उप- रान्त सचित्त वस्तुका आहार करना सचित्तपडिवद्धाहारे-सचित्त सयुक्त आहार करना अप्पओलिओसहिभक्खणया- अपक्व औषधि (धान्य ) का चयसा-वचन से कायसा-शरीर से भक्षण करना सत्तमे-सातवा उपभोग-उपभोग परिभोगव्वए-परिभोग व्रत -दो प्रकार का पन्नतेकहा है तंजहा~वह इस प्रकार है भोयणओ-भोजन से दुप्पओलिओसहिभक्खणया- अद्ध पक्व ओपधि आदि का दुविहे. भक्षण करना तुच्छोसहिमक्खणया~असार फलादि का भक्षण करनर श्रावक प्रतिक्रमण कओ-किया हो तो जो-जो मे–मैने देवसिओ-दिन सम्वन्धी अइयारो-अतिचार तस्स-उसका मिच्छामि-निष्फल हो दुक्कडं-पाप पगारख कम्बादाणाई पन्द्रह कर्मादान मूल पाठ कम्मओणं समणोवासएणं पणरस कम्मा- दाणाई जाणियव्वाईन समायरियव्वाई जहा- १ इंगालकम्मे २ वणकम्मे ३ साड़ीकम्मे ४ भाड़ोकम्मे ५ फोड़ीकम्मे ६ दंतवाणिज्जे ७ केसवाणिज्जे ८ रसवाणिज्जे ९ लक्खवाणिज्जे १० विसवाणिज्जे ११ जंतपीलणकम्मे १२ निल्लं- छणकम्मे १३ दग्गिदावणया १४ सरदहतड़ाग- परिसोसणया १५ असईजणपोसणया जो मे देवसिओ अइयारो की तस्स मिच्छामि दुक्कडं । छाया कर्मतः श्रमणोपासकेन पञ्चदश कर्नादानानि ज्ञातव्यानि न समाचरितव्यानि तद्यथा १ अङ्गारकर्म २ वनकर्म ३ शाकटकर्म उपभोगपरिभोगव्रत ११ यन्त्रपोलनकर्म ४ भाटककर्म ५ स्फोटकर्म ६ दन्तवाणिज्यं ७ देशवाणिज्यं ८ रस- वाणिज्यं : लाक्षावाणिज्य १० विपवाणिज्य १२ नि छनकर्म १३ दावाग्मिदापनता १४ सरोद्रह-तटापरि- शोषणता १५ असतीजनपोपणता यो मया देवसिकः अतिचार कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् । पन्द्रह कर्मादान कम्मओणं कम से समणोवासएणं-धावक को पणरस-पन्द्रह कम्मादाणाई-कर्मादान जाणियवाई-जानने चाहिए न-नही समायरियन्वाई-आचरण करना चाहिए तंजहा-वे इस प्रकार है इङ्गालकम्मे-प्रगारका वणकम्मे-बनकर्म साड़ीक्म्मे-शाकटकर्म भाडोकम्मे-भाटककर्म फोड़ीकम्मे -स्फोटकर्म दंतवाणिज्जे-दन्तवाणिज्य केसवाणिज्जे-केशवाणिज्य रसवाणिज्जे-रसवाणिज्य लक्खवाणिज्जे-लाक्षवाणिज्य विसवाणिज्जे-विपवाणिज्य जंतपीलणक्म्मे-पत्रपोलनकर्म निल्लंछणकम्मे-निर्लाञ्छनकर्म दवग्गिदावणया-दावानलकर्म सरदहतडागपरिसोसणया- सरोद्रह-तडाग शोपणता असईजणपोसणया-असतीजन पोषणता जो-जो मे-मैने देवसिओ-दिन सम्बन्धी अइयारो-अतिचार फओ-किया हो तो तस्स-उसका मिच्छामि-निष्फल हो दुकडं-पाप श्रावक प्रतिक्रमण उपभोग- परिभोग- परिमाण भावार्थ उपभोग-भोजन आदि एक बार भोग में आनेवाले पदार्थ । परिभोग-वस्त्र, शय्या आदि बार-बार भोग में आनेवाले पदार्थ । उपभोग-परिभोग-पदार्थों की मर्यादा के उपरांत सेवन करने का प्रत्याख्यान करना उपभोग-परिभोग-परिमाण-व्रत है। यह दो तरह से होता है, भोजन से और कर्म से। उपभोगपरिभोग- पदार्थों का परिमाण से अधिक सेवन करने का प्रत्याख्यान करना, भोजन से उपभोगपरिभोगपरिमाण व्रत है और उनकी प्राप्ति के साधनभूत धन का उपार्जन करने के लिए मर्यादा के उपरान्त व्यापार करने का त्याग करना कर्म से उपभोगपरिभोग- परिमाण व्रत है। हे गुरुदेव ! सातवें व्रत में 'उल्लणियाविहि' आदि छब्बीस वोल का जो मैंने परिमाण किया है, उसके उपरांत सव द्रव्यों का जीवनपर्यंत एक करण तीन योग से त्याग करता हूं। अतिचार विवेचन इस व्रत के भोजन सम्बन्धी पांच अतिचार श्रावक को वर्जने चाहिए। १ सचित्ताहार-त्याग के उपरांत सचित्त (जीव सहित) नमक, पानी, वनस्पति आदि का आहार नहीं करना चाहिए। २ सचित्तप्रतिवद्धाहार-सचित्त वृक्षादि से सम्बद्ध फल आदि नहीं खाने चाहिए। अचित्त खजूर आदि फल सचित्त गुठलो सहित खाना या बीज सहित पक्के फल को, यह

उपभोगपरिभोगवत
सोच कर कि इसके अचित्त अंश को खा लूगा और सचित्त
अंश को फेक दूंगा, खाना सचित्त संयुक्त अतिचार है।
३ अपक्व औषधिभक्षण–विना पके गेहूं, चावल आदि धान्य
का भक्षण नहीं करना चाहिए।
४ दुष्पक्व औपधिमक्षण-अधपके गेहूं, चावल आदि धान्य को
पका हुआ जान कर नहीं खाना चाहिए। (अपक्क एवं
दुष्पक धान्य अचित्त नहीं होता अत सचित्त-त्यागी को
इनका आहार नहीं करना चाहिए।
५ तुच्छोपाधभक्षण---तुच्छ -असार औपक्षिय, जैसे कच्ची मूगफली
वगैरह, जिन्हें खाने में बडी विराधना और अल्प वृत्ति
होती है, नहीं खाना चाहिए।
ये अनुपयोग तथा अतिक्रम आदि की अपेक्षा से अतिचार
हैं, जान-बूझ कर ऐसा करना अनाचार है ।
आलोचना-इसके सेवन से दोप लगा हो तो मेरे लिये
निष्फल हो।
अशुभ कर्मों के प्रवल कारणभूत कर्म या व्यापार का नाम
कर्मादान है। कर्मादान संख्या में पन्द्रह है। ये कर्म (कार्य या दान-अतिगर
च्यापार) की अपेक्षा इस व्रत के अतिचार हैं।
-अनारकर्म-कोयले बना कर उसके धन्धे से आजीविका
करना। सोना, चांदी, लोहा, तांबा आदि धातुओं को
गलाना, ईंट, चूना आदि बनाना इत्यादि। जिन कार्यों में
अग्निकाय का महारम्भ हो, वैसव अङ्गार कर्म है।
२-वनकर्म-जगल के वृक्षों को काट कर या ऐसे ही उन्हें
१५ फर्मा

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१५६
थावक प्रतिक्रमण
वेचना तथा पेड़-पत्ते, फल-फूल के आरम्भ से आजीविका
चलाना।
३-शाकटकर्म-गाड़ी, इका, मोटर, रथ आदि का व्यापार
करना।
४-भाटककर्म-गाड़ी, घोडा, ऊँट आदि वाहन एवं मकान
आदि से भाड़ा कमाने का व्यापार करना ।
५-स्फोटकर्म-कुदाल आदि से भूमि एवं पत्थर आदि को
फोड़ना तथा धान्यादि को दल कर आजीविका करना ।
६-दतवाणिज्य-हाथीदांत, मोती, सींग, चर्म, हाड़ इत्यादि
त्रस तीवके अवयवों का व्यापार करना।
हरताल आदि खनिज पदार्थ, गोंद आदि वृक्षज पदाथों का
व्यापार करना, लाक्षावाणिज्यके अन्तर्गत है।
८-रसवाणिज्य-धी, दूध, दही तथा मदिरा मांस आदि का
व्यापार करना।
8-विपवाणिज्य-कची धातु, अफोम, शखिया आदि विषैली
वस्तु तथा अस्त्र-शस्त्र आदि का व्यापार करना ।
१०-केशवाणिज्य-केशों के निमित्त, केशवाले प्राणी~गाय,
भैंस, घोड़ा, हाथी आदि का एवं ऊन, रेशम आदि का
व्यापार करना।
११-यंत्रपोलन --तिल, ईख आदि को घाणी या कोल्हू मै पेरना ।
घट्टी, जल-यंत्र, मिल, कल-कारखानों से व्यापार करना ।
१२- निन्छिनकर्म-बैल आदि को नपुंसक करने का कर्म
करना ।

उद्देश्य उपभोगपरिभोगव्रत १३-दावानलकर्म-खेत या भूमि को साफ करने के लिये जगलों में आग लगाना। १४-सरोद्रहतड़ागशोषणता-खेती आदि करने के लिये या जीवन को उपयोगी बनाने के लिये झील, नदी, तालाब आदि को सुखाना। १५-*असतीजनपोषणता-आजीविका के निमित्त दास, दासी, पशु, पक्षी आदि असंयति जीवों का पोषण करना । आलोचना-अनुपयोग आदि से मर्यादा के उपरांत पन्द्रह कर्मादान सम्बन्धी जो कोई अतिचार लगा हो तो वह मेरे लिये निष्फल हो। छठे व्रत एहवा पचखाण, माहि घणा द्रव्यादिक जान । तेहनी अव्रत टालण काज, सातवो व्रत कहयो जिनराज । (श्री भिक्षु स्वामी) छठे व्रत मे श्रावक मर्यादित दिशा से आगे जाकर पांच आश्रव सेवन का और भोग्य वस्तुओं के क्रय-विक्रय या आदान- प्रदान का संयम करता है। सीमा की अन्तर्वी सव वस्तुएं आवश्यक नहीं होती। निरर्थक ही उन पर आशा का चक्र घूमता है। असंयम प्रबल होता है। भोग्य सामग्री को प्रमा- णातिरेक पाने की आकाक्षा से मनुष्य में वित्तोपार्जन की चेष्टा बढती है, उससे प्रेरित मानव व्यापार का आश्रय लेता है और अधिक से अधिक लोलुपता से महारम्भवाला काम करता है। * सारिका-शुक-मार्जार-व-कुक्कुटकलापिनाम् । पोपो दास्याश्च वृत्तार्थमसती पोपण विदु॥ योगशास्त्र-हेमचन्द्राचार्य (सप्तम व्रत) १५८ थावक प्रतिक्रमण परिशिष्ट इसीलिये मर्यादित क्षेत्र के अन्दर मिलने वाले भोग्य पदार्थ और उनकी प्राप्ति के निमित्त किये जाने वाले व्यापार पर नियंत्रण करने के लिये इस व्रत का निर्माण किया गया निर्वाह और लालसा दो चीज है। खाद्य. पेय, परिधेय आदि पदार्थ निर्वाह के साधन है, इनसे जीवन-निर्वाह होता है, लाल- साओं की पूर्ति नहीं। अनियंत्रित लालसा सव तरह से मनुष्य को हानि पहुंचाती है । शारीरिक एवं मानसिक वृत्तिया उत्पीडित रहती है अतएव उनका परिमाण करना सर्वथा हितकर है। एक मनुष्य सब चीजों को व्यवहार में नहीं ला सकता,सवका उपभोग नहीं कर सकता- इस दशा मे क्यों वह अधिक आशा का भार अपने सिर पर ढोये और क्यों उनकी प्राप्ति के हेतु महारम्भकारी व्यावसायिक वृत्तियों को धुन में चक्कर लगाये १ किन्तु लालसा की अमिट रेखा ने मनुष्यों को यहां तक विह्वल बना रखा है कि वे मद्य और मांस जैसे उन्मादक व्यापार से भी अपने को विलग नहीं रख पाते ! क्या इसके बिना जीवन नहीं चल सकता ? अथवा वे उस धन राशि से प्राप्त भोग-सामग्री का सदा उपभोग करते रहेंगे? नहीं, तो यह क्यों ? यह निर्वाह का दोप नहीं, यह दोष लालसा का है। अतएव प्रस्तुत व्रत भोगोपभोग की अभिलापाओं को सीमित करने का उपदेश करता है। जैसे- मर्यादित क्षेत्र में उपभोग-परिभोग की विपुल सामग्री है, उसका अनावश्यक संग्रह मत करो, महा आरम्भ वाले व्यापार से वासनाओं को पूर्ण करने का ख्याल मत करो, ऐसा करना अपने सुख के लिये दूसरों को दुखी बनाना है, हिंसावृत्ति को प्रोत्साहन देना है। श्रावक को इस प्रकार की चेष्टा से विरत

उपभोगपरिभोगव्रत
१५६
रहना चाहिए। आत्म-संयम की अनन्त महिमा को दृष्टि से
ओमल नहीं करना चाहिए। आत्म-संयम एक महान सुख है।
उसकी उपासना से अनेक भौतिक सिद्धियां अपने आप मिलती
हैं। उनके लिये अलग आयास करने की कोई आवश्यकता
नहीं। इस व्रत के कई लाभ तो हमारे प्रत्यक्ष हैं, जैसे-आर्थिक
कठिनाइयां, मनमानी बुराइयां, धन का अपव्यय आदि परिस्थि-
तियों का चक्र इसके अनुशीलन से अपनेआप लुप्त हो जाता
है। इसके मूल में समष्टि का लाभ अन्तर्निहित है। तत्वज्ञ
थोड़े मे ही बहुत कुछ समझ सकेंगे।

तीसरा अणुन्नत आठवा व्रत मूल पाठ अट्ठमं अणट्ठदंड-वेरमणब्वयं सेय अणट्ठदडे चउविहे पन्नते तंजहां १ अवझाणाचरिए २ पमायाचरिए २ हिंसप्पयाणे ४ पावकम्मोवएसे इच्चेवमाइरस अणट्ठदंडासेवणस्स पच्चक्खाणं जाव- जीवाए दुविहं तविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एअस्स अट्ठमस्स अणट्ठदंड वेरमणस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ कंदप्पे २ कुक्कुइए ३ मोहरिए ४ संजुत्ताहिकरणे उवभोग-परिभोगा- तिरित्ते ५ जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं।

अनर्थदड-विरमणव्रत १६१ १ छाया 7 अष्टम अनर्थ-दण्डविरमणव्रतं सच अनर्थदंडः चतुर्विधः प्रज्ञप्तः तद्यथा १ अपध्यानाचरितं २ प्रमादाचरितं ३ हिस्रपदानम् ४ पापकर्मोपदेशः इत्येवमादेः अनर्थदंडाऽसेवनस्य प्रत्याख्यान यापजीव द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन एतस्य अष्टमस्य् अनर्थ-दंड-विरमणस्य श्रमणोपास- केन पञ्च अतिचाराः ज्ञातव्याः न समाचरितव्या वधथा १ कन्दर्पः २ कौत्कुच्यम् ३ मौखर्यम् ४ संयुक्ताधिकरणं ५ उपभोग-परिभोगा- तिरिक्त यो मया देवसिका अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या में दुष्कृतम्। शब्दार्थ अट्ठमं-आठवा का प्रयोग करना अणदंड-अनर्थदण्ड पावकम्मोवएसे-पाप कर्म का घेरमणव्वयं-विरमणव्रत सेय-वह इच्चेवमाएस्स-इत्यादि अणटुदंडे-अनर्थदण्ड अणट्ठदंडासेवणस्स-अनर्थदण्ड चउन्विहे-चार प्रकार का पन्नत्ते-कहा है पञ्चखाणं-प्रत्याख्यान तंजहा-वह इस प्रकार है जावज्जीवए-जीवनपर्यन्त अवज्झाणाचरिए-अपध्यान का दुविहं-दो करण तिविहेणं-तीन योग से पमायाचरिए-प्रमाद का (अनर्थदण्ड का सेवन) न करेमि नहीं करू हिंसप्पयाणे-हिसाकारी शस्त्रो न कारवेमिनही कराऊ उपदेश करना के सेवन का पाचरण करना आचरण करना १६२ श्रावक प्रतिक्रमण मणसा-मन से कुचेष्टा करना वयसो-वचन से मोहरिए -विना प्रयोजन :कायसा-शरीर से अधिक बोलना .एअस्स-इस संजुत्ताहिकरणे-अधिकरण अट्ठमस्स-आठवे शस्त्रो को एक साथ रखना अणट्ठदंडवेरमणस्स-अनर्थदण्ड उवभोगपरिभोगातिरिते-उप- ' विरमणवंत के भोगपरिभोग-वस्तुमओ को अधिक समणोवासएणं-श्रावक को रखना पंच-पांच जो-जो अइयारा-अतिचार जाणियन्वा-जानने चाहिये देवसिओ-दिन सम्बन्धी नसमायरियव्वा-नही आचरण अइयारो-अतिचार करने चाहिये कओ-किया होतो तंजहा-वह इस प्रकार है तस्स-उसका कंदप्पे-कामोद्दीपक कथा करना मिच्छामि-निष्फल हो कुक्कुइए-भाड की भाति दुक्कडं-पाप भावार्थ अनर्थदण्ड अपने शरीर, पुत्र, पुत्री, परिवार, नौकर, चाकर, समाज, देश, कृषि, व्यापार आदि के अर्थ-निमित्त कार्य करने में होने वाली हिंसा अर्थदण्ड है। इसके अतिरिक्त बिना किसी आव- श्यक प्रयोजन के प्रमादादिवशं प्राणियों का पूर्ण या अपूर्ण वध करना अनर्थदण्ड है अर्थात् अप्रायोजनिक हिंसा है।

अनर्थदड-विरमणव्रत . चार भेद . विवेचन १ अपध्यानाचरित-जिस चिंतन से-एकाग्रता से पाप अर्थात् अनर्थदण्ड के अशुभ कर्म का बन्ध होता है, वह अपध्यान है। अपध्यान के दो भेद है-आर्स और रौद्र । अप्रिय वस्तु का संयोग ही जाने पर, प्रिय वस्तु का वियोग हो जाने पर, अप्रिय के वियोग की और प्रिय के संयोग की सतत चिन्ता करना, वेदना-पीड़ा की निवृत्ति के लिए व्याकुल हो उठना, तथा निदानमै अमुक २ हो,जाऊं, ऐसा संकल्प करना आध्यान है। हिंसा, असत्य, चोरी, और प्राप्त विषय- भोग के संरक्षण के लिये चिन्तन करना रौद्र ध्यान है। प्रयोजन के सिवाय आ ओर रौद्र ध्यान में प्रवृत्त होना अपध्यानाचरित अनर्थदण्ड है। २ प्रमादाचरित-~मदोन्मत की तरह विना प्रयोजन अपशब्द वोलना, प्रहार करना या मार डालना, एवं साधारणतया घी, तेल, चासनी के पान को खुला रखना आदि प्रमादाच- रण है। ३ हिस्रप्रदान-निरर्थक हिंसा के स्थानों में हिंसाकारी अस्त्र- शस्त्र देना। ४ पापकर्मोपदेश-बिना मतलव पापकारी कार्यों का उपदेश देना, जैसे-चोरों को मार डालो, हिंस्र पशुओं को मारो, वृक्षों को काटो इत्यादि। मैं जीवनपर्यन्त दो करण तीन योग से अनर्थ- व्रत ग्रहण दण्ड सेवन करने का प्रत्याख्यान करता हूं। मैं स्वयं अनर्थ- विधि गुरुदेव!

श्रावक प्रतिक्रमण , अतिचार ८ दण्ड का आचरण नहीं करूंगा; मन से, वाणी से, शरीर से। नहीं कराऊंगा, मन से, वाणी से, शरीर से। इस व्रत के पांच अतिचार श्रावक को वर्जने चाहिए। १ कंदर्प-कामोद्दीपक कथा नहीं करनी चाहिए। मोह को जगाने वाली हास्य-मिश्रित मजाक नहीं करनी चाहिए। २ कौत्कुच्य-भांड की तरह भौहें, नेत्र, मुंह, हाथ-पैर आदि शरीर के अवयवों को विकृत बनाकर दूसरों को हंसाने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये! ३ मौखर्य-विठाई के साथ असभ्य, असम्बद्ध ( उटपटांग ) एवं निरर्थक वचन नहीं बोलने चाहिये। ४ संयुक्ताधिकरण-हिंसाकारी अस्त्र-शस्त्रों को सजा करके नहीं रखना चाहिये। जैसे बन्दूक को गोली भर कर रखना, धनुष को बाण चढ़ा कर रखना, ऊखल-मूसल को, शिला लोढे को, एक साथ रखना। इसका कारण यह है कि अस्त्र- शस्त्रादि को सजा कर रखने से तुरन्त आवेश में अनर्थ हिंसा हो सकती है। अन्य कोई भी उनका उपयोग कर सकता है। ५ उपभोगपरिभोगातिरेक-अशन, पान, खादिम, स्वादिम, वस्त्र आभूपण आदि उपभोग-परिभोग की वस्तुओं का निज और आत्मीय जनों की आवश्यकता के उपरान्त सञ्चय नहीं करना चाहिये। आलोचना- इनके आचरण से अतिचार-दोष लगा हो तो मेरे लिये निष्फल हो।

. अनर्थदड-विरमणव्रत १६५ कंदर्प, कौकुच्य एवं उपभोगपरिभोगातिरेक- ये तोनों प्रमा- दाचरित-विरति के अतिचार है। संयुक्ताधिकरण, हिंस्रप्रदान विरति का अतिचार है। मौखर्य, पापकर्मोपदेशविरति का अति- चार है। अतिचारों का असावधानी से चिन्तन करना अप- ध्यानविरति का अतिचार है। श्रावक अपनी सामर्थ्य के अनुसार हिंसा आदि का परित्याग अतिचार करने के लिए अहिंसा अणुव्रत से लेकर उपभोग-परिभोग व्रत तक के सात व्रतों को स्वीकार करता है। श्रावक जितना जितना त्याग करता है, वह धर्म है, जितना-जितना आगार रखता है, वह अधर्म है। आगार के दो पहलू है। एक तो उस (खुलावट) का प्रयोग प्रयोजन सहित करे और एक निरर्थक ही। प्रयोजन- सहित दण्ड को श्रावक सामर्थ्य की कमी के कारण छोड नहीं सकता। पर अनर्थदण्ड मे श्रावक को प्रवृत्त नहीं होना चाहिये। इसी उद्देश्य से श्रावक को अनर्थ हिंसा आदि दोपों से निवृत्त करने के लिये अनर्थदण्ड-विरमणव्रत का सृजन किया गया है। जीवन में संयोग-वियोग का एक महान् विप्लव है। संयोग परिशिष्ट के पोछे वियोग और वियोग के पीछे संयोग है। संयोग मे जो सुख मानता है, वह वियोग में आनंद करता है। संयोग-वियोग मे एक समान वृचि रखने वाला पुरुष न तो अति स्निग्ध कर्मावृत होता है और न अति आसक्त। इसलिये संयोग-वियोग के अवसर पर, वेदना का प्रादुर्भाव हो जाने पर, समभाव रहना, कष्ट को समचित्त से सहना इत्यादि उपदेश का स्रोत अपध्या- नाचरित के प्रथमांश त्याग का प्रवाह है। किसी को पोडित देखकर सुख मानना, वह मर जाये, इसका सत्यानाश हो जाये, श्रावक प्रतिक्रमण यह पराजित हो जाये, इस प्रकार का चिन्तन करना, असत् अर्थ के प्रकाशित करने की, सत् अर्थ का अपलाप करने की दिल को गहरी चोट पहुंचानेवाले वचन बोलने की, दिल को दुहलानेवाला मखौल करने की सोचते रहना आदि २ आसुरी वृत्तियों का अन्त करने के लिए अपध्यानाचरित का दूसरा अंश सजीव है। मार्ग में चलते पथिक को गाली देना, पर्व के नाम पर विभत्स चेष्टाएं करना, गंदी गालियां बोलना, जान-बूझकर चींटी आदि को कुचल डालना, मार्ग होते हुए भी वनस्पति को पैरों तले रौंदते चलना, विना मतलब वृक्षों की टहनिया, पत्ते, फल-फूल तोड़ना, तालाब आदि जलाशयों में गन्दी चीजें फेंकना, दारु, ईधन, धन आदि में शून्यचित्त से आग लगने वाली चीज फेंकना, विषय में अत्यासक्त होना, विकथा करना, गांव का मैल धोना आदि २ अनार्य आचरणों से बचने के लिये प्रमादाचरित को त्यागना नितान्त आवश्यक है। शस्त्रास्त्र हिंसा के प्रबल साधन है। उनका अविवेकपूर्ण व्यवहार या लेन-देन करना उत्कट अनर्थ का हेतु बन जाता है। सुरक्षा के मिष वह विकास को पाता है। आखिर एक दिन उसी यज्ञानुष्ठान मे मनुष्य को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ती है। तब मनुष्य का निर्माण मनुष्य का संहार करता है। मनुष्य का बौद्धिक विकास मनुष्यके सर्वस्व को लुटा देता है। तब उसको शान्त और करुण दृष्टि अपने कृतकार्यों का अवलोकन करती है। बौद्धिक विकास भी करवट बदलता है। शस्त्रास्त्रों के अल्पीकरण या निःशस्त्रीकरण की समस्याओं पर रहस्यभरी दृष्टि डालता है। पर अहिंसा की शान्त मूर्ति का साक्षात्कार किये बिना वह केवल प्रस्तावों अनर्थदड-विरमणव्रत १ के उलट-फेर में असफल रह जाता है या अस्त हो जाता है। किन्तु धर्मतत्ववेदी श्रावक को अहिंसा एवं संतोष को मद्दे नजर रखते हुए हिंसाकारी शस्त्रास्त्रों का निरर्थक आदान-प्रदान कर विश्व को उत्पीडित करने का हेतु नहीं बनना चाहिये। इसीलिए हिंस्रप्रदान का नियम जरूरी होने के साथ २ अत्यधिक सुख- कारक है। निरर्थक पाप कर्म का उपदेश करना आत्म-संयम के विपरीत ही है। यही अनर्थदण्डविरमणव्रत का परमार्थ है।

मधम शिक्षाबूत
नवमा सामायिक व्रत
मूल पाठ
नवमं सामाइयव्वयं सावज्ज-जोग-वेरमणरूवं
जावनियमं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि
न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एअस्स नवमस्स
सामाइयव्वयस्स समणोवासएणं पंच अइयारा
जाणियन्वा न समायरियव्वा तंजहा १ मणदुप्पणि-
हाणे २ वयदुप्पणिहाणे ३ कायदुप्पणिहाणे
४ सामाइयरस सइअकरणया ५ सामाइयरस
अणवट्टियरस करणया
छाया
नवमं सामायिक व्रतं सावध-योग-विरमणरूपं यावत् नियम
पर्युपासे द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा

१ पंच-पाच सामायिक्व्रत १६१ कायेन एतस्य नवमस्य सानायिकत्रतस्य श्रमणोपासकेन पञ्च अतिचाराः ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ मनोदुष्प्रणिधानं २ वाग्दुष्प्रणिधानं ३ कायदुष्प्रणिधानं ४ सामायिकस्य स्मृत्यऽ- करणता ५ सामायिकस्य अनवस्थितस्य करणता । शब्दार्थ नवम-नौवा समणोवासएणं-श्रावक को सामाइव्वयं-सामायिकवत सावज्ज जोग-सावध योग अइयारा-अतिचार वेरमणरुवं-विरमणवत जाणियव्वा-जानने चाहिये जावनियम-जबतक नियम न-नही नियम का समायरियन्बा-आचरण करने पन्जुवासामि-पालन करू चाहिये दुविहं-दो करण तंजहा- यह है तिविहेणं-तीन योग से मणदुप्पणिहाणे-मनकी सावध (सावध व्यापार) प्रवृत्ति की हो न करेमि-नही करू षयदुप्पणिहाणे-वचन की न कारवेमि-नही कराऊ सावध प्रवृत्ति की हो मणसा-मन से कायदुप्पणिहाणे-शरीर की वयसा-वाणी से सावध प्रवृत्ति की हो कायसा-शरीर से सामाइयस्स सइ अकरणया- एअस्स-इस सामायिक की स्मृति न रखी है। नवमस्स-नौवे सामाइयस्स अणवट्ठियस्स सामाइयन्वयस्स-सामायिक करणया-सामायिकको नियत 'समय से पहले पूरी की हो व्रत के

१६२
धावक प्रतिक्रमण
अतिचार
भावार्थ
भगवन् ! मैं सावध योग विरमणरूप सामायिकत्रत को
ग्रहण करता हूं। जवतक (एक मुहूर्त तक ) इस व्रत का पालन
करूं, तबतक मन, वचन और शरीर की सावद्य अर्थात् पाप
सहित प्रवृत्ति स्वयं नहीं करूंगा और दूसरों से नहीं कराऊंगा।
विवेचन
इस व्रत के पांच अतिचार श्रावक को जाननेचाहिए।
१ मनोदुप्पणिधान-मन को सावद्य प्रवृत्ति अर्थात् गृह-कार्य,
व्यापार, आरम्भ-समारम्भ, हिंसा आदि पांच आश्रव
सम्वन्धी चिन्तन नहीं करता चाहिए।
२ वाग्दुष्प्रणिधान-वाणी का सावध प्रयोग अर्थात असभ्य,
कटु, छेदन-भेदनकारी, आघात पहुंचानेवाला वचन नहीं
बोलने चाहिए। खुले मुंह नहीं बोलना चाहिए। गृहस्थ
को आओ, चले जाओ, बैठ जाओ, अमुक काम करो इत्यादि
सामायिक व्रत के प्रतिकूल आदेश नहीं देना चाहिए।
३ कायदुष्प्रणिधान-शरीर की सावध प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिए।
विना देखे, विना पूजे उठना, बैठना, चलना आदि नहीं करना
चाहिए। प्राणातिपात आदि आश्रवों में शरीर को नहीं
लगाना चाहिए।
४ सामायिक स्मृत्यऽकरणता-सामायिक की विस्मृति नहीं
करनी चाहिए। जसे-सामायिक व्रत को ग्रहण कर प्रमाद
वश उसे भूल जाना, व्रतसम्बन्धी नियमों की सार सम्भाल
न रखना।

सामायिकवत ५ अनवस्थित सामायिककरण-सामायिक का कालमान एक मुहूर्त है। उससे पहले सामायिक को पूरी नहीं करनी चाहिए। अस्थिरता से सामायिक को ज्यों-त्यों पूरी नहीं करनी चाहिए। ये सब अनुपयोग एवं अतिक्रमादि की अपेक्षा से अतिचार है। आलोचना-इनके सम्बन्ध से अतिचार लगा हो तो वह मेरे लिये निष्फल हो। विवेचन बार बार अभ्यास करने योग्य व्रतों का नाम शिक्षात्रत शिक्षा व्रत है। प्राकथित आठ व्रतों की तरह शिक्षाव्रत का ग्रहण याव- जीवन के लिये नहीं होता। इनका कालमान पृथक् २ है। शिक्षाव्रत चार है। (१) सामायिक व्रत (२) देशावकाशिक व्रत (३) पौषधोपवास व्रत (४) अतिथि संविभाग व्रत सामायिक व्रत पहला शिक्षाबत है एवं पूर्व संख्या के क्रम से नौवां व्रत है। आध्यात्मिक आराधना एवं सआचरणों का अभ्यास करने के लिये सामायिक व्रत का अनुशीलन महान् लाभप्रद है। इसका विशेष विवरण सामायिक प्रतिक्षा में देखना चाहिये।

दूसरा शिक्षाबत दशवा देशावकाशिकवत मूल पाठ दसमं देसावगासियव्वयं दिण-मज्झे पञ्चस कालाओ आरब्भ पुव्वादिसु छसु दिसासु जावइयं परिमाणं कयं तओ अइरित्तसेच्छाएकाएणं गंतूणं अन्नेवापहिऊण पंचासवासेवणस्स पच्चक्खाणं जाव अहोरत्तं दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा अहय छसु दिसासु जाव- इयं परिमाणं कयं तम्मञ्झेविजावइयाणं दवाणं परिमाणं कयं तओअइरित्तरस भोगो व भोगस्त पच्चक्खाणं जाव अहोरत्तं एगविहं तिविहेणं न करेमि मणसा वयसा कायसा एअरस दशमस्स देशावकाशिकवत १६५ देसावगासियव्वयस्स समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ आणवणप्प- ओगे २ पेसवणप्पओगे ३ सद्दाणुवाए ४ रूवाणु- वाए ५ बहियापुग्गलपक्खेवे जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं । छाया दशमं देशावकाशिकव्रतं दिनमध्ये प्रत्यूषकालाद् आरभ्य पूर्वादिषु षट्सु दिक्षु यावत्कं परिमाणं कृतं ततोऽतिरिक्तं स्वेच्छया कायेन गत्वा अन्यान् वा प्रेष्य पञ्चाश्रवाऽसेवनस्य प्रत्याख्यानं यावत अहोरात्रं द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन अथ च षट्सु दिक्षु यावत्कं परिमाणं कृतं तन्म- ध्येऽपि यावता द्रव्याणा परिमाणं कृतं ततोऽतिरिक्तस्य भोगोप- भोगस्य प्रत्याख्यानं यावत् अहोरात्रं एकविधं त्रिविधेन न करोमि मनसा वचसा कायेन एतस्य दशमस्य देशावकासिकवतस्य श्रम- णोपासकेन पञ्च अतिचारा. ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ आनयनप्रयोग: २ प्रेष्यवलप्रयोगः३ शब्दानुपात: ४ रूपानुपात: ५ वहि.पुद्गलप्रक्षेपः यो मया देवसिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम्। शब्दार्थ दसम-दशवा दिण-मज्मे-दिन में देसावगासियव्वयं-देशा पञ्चसकालाओ-प्रभात काल से बकाशिक प्रत आरम्भ-लेकर धावक प्रतिक्रमण गंतूणं- पुव्वादिसु-पूर्वादि अय-और छसु-छ छसु दिसासु-छ दिगाओ में दिसासु-दिशाओ में जावइयं-जितना जावइयं-जितना परिमाणं-परिमाण परिमाणं-भूमिका परिमाण कयं-किया कयं-किया तम्मज्झवि-उसमें तओ अइरित्त'-उससे उपरान्त जावइयाणं-जितने सेच्छाए -स्वेच्छापूर्वक दन्वाणं-द्रव्यो का काएणं-काया से परिमाणं कयं-प्रमाण किया -जाकर तओअइरिन्तरस-उसके उपरान्त अन्नेवापहिऊण-अथवा अन्य भोगोवभोगस्स-भोगोपभोग का को भेजकर पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान पंचासवासेवणस्स-पाच आश्रव जाव-यावत् द्वारा सेवन करना अहोरत्त-दिन रात पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान एगविहं-एक करण जाव-यावत् तिविहेणं-तीन योग से अहोरत-दिन रात न करेमि-न करूं दुविहं-दो करण मणसा-मन से तिविहेणं-तीन योग से पयसा-वचन से न करेमि-न करू कायसा-शरीर से न कारवेमि-न कराऊ एअस्स-इस मणसा-मन से देसावगासियव्वयस्स-देशाव- कायसा-शरीर से काशिक व्रत के दशमस्स-दशवें वयसा-वाणी से देशावकाशिकवत समणोवासएणं-श्रावक को मनोगत भावो का ज्ञान कराना पंच अइयारा-पाच अतिचार रूवाणुवाए-रूप दिखा कर मन जाणियव्या-जानने चाहिये का भाव प्रकट करना न समायरियव्वा-नही आचरण बहियापुग्गलपक्खेवे-ककर प्रादि करने चाहिये फेक कर भाव जताना तंजहा-वे इस प्रकार है जो मे-जो मैने आणवणप्पओगे-मर्यादित क्षेत्र देवसिओ-दिनसम्बन्धी से बाहर की वस्तु मगाना अइयारो-अतिचार पेसवणप्पओगे-मर्यादित क्षेत्र कओ--किया हो तो से वाहर वस्तु भेजना तस्स-उसका सदाणुवाए-शब्द के द्वारा मिच्छामि-निष्फल हो दुकडं-पाप विवेचन छठे व्रत मे जो दिशाओं का प्रमाण किया है, उसका व्रत स्वरूप तथा अन्य सब व्रतों का प्रतिदिन संकोच करना देशाव- काशिक व्रत है । यद्यपि मूल पाठ मे दिग्बत के आगार का संकोच करने को देशावकाशिक व्रत कहा है तथापि दिगवत के उपलक्षण से ( अनुसार) सब अणुव्रत एवं गुणव्रत के रखे हुए आगारों का परिमित काल के लिये संकोच करना देशावकाशिक व्रत है। अतएव उपभोग-परिभोग के २६ घोल, १५ फर्मादान, १४ नियम आदि का समय की अवधि से त्याग करना एवं नमस्कारसहिता (नवकारसी) पौरुपी, उपवास, वेला, तेला यावत् छ. मास तक की तपस्या करना, इत्यादि सब देशावकासिकवत के अन्तर्गत है।

- १६६ श्रावक प्रतिक्रमण व्रतग्रहण गुरुदेव ! मैंने दशवे देशावकाशिकवत में प्रतिदिन प्रभात विधि काल से पूर्व आदि छः दिशाओं में जितनी भूमिका प्रमाण किया है उसके उपरांत स्वेच्छापूर्वक अपने आप जाकर अथवा अन्य किसी को भेजकर दो करण तीन योग से (न करूं, न कराऊ मनसा, वाचा, कर्मणा ) पांच आश्रव सेवन करने का प्रत्याख्यान करता हूं और छः दिशाओं में भी जितने क्षेत्र का प्रमाण किया है, उसमें भी जितने द्रव्यों का प्रमाण किया है, उनसे अधिक उपभोग-परिभोग वस्तुओं को व्यवहार में लाने का एक करण तीन योग से प्रत्याख्यान करता हूं। अतिचार इस व्रत के पांच अतिचार श्रावक को जानने चाहिए। १ आगमनप्रयोग- मर्यादा किये हुए क्षेत्र से बाहर स्वयं न जा सकने के कारण, दूसरे को 'तुम यह चोज लेते आना' इस प्रकार संदेश देकर बाहर की वस्तुएं नहीं मंगानी चाहिए। २ प्रेष्यप्रयोग-मर्यादित क्षेत्र से बाहर आज्ञाकारी पुरुषों के द्वारा वस्तुएं नहीं भेजना चाहिए । ३ शब्दानुपात-मर्यादित क्षेत्र के बाहर काम कराने के लिये जम्हाई, खांसी आदि शब्दों के द्वारा भाव नहीं दिखाना चाहिये। ४ रूपानुपात-नियमित क्षेत्र के बाहर प्रयोजन होने पर कार्य कराने के लिये अपना रूप-आकृति के भाव या पदार्थ का रूप नहीं दिखाना चाहिये। ५ वहिःपुद्गलप्रक्षेप-नियमित क्षेत्र से बाहर प्रयोजन होने पर दूसरों को जताने के लिये तण, कंकड़ मिट्टी आदि नहीं फेंकना चाहिए।

देशावकाशिकवत पहले दो अतिचार अतिक्रम या अनुपयोग को अपेक्षा, से है और अन्तिम तीनों मे व्रत की अपेक्षा रहने के कारण कपट युक्त अतिचार है। आलोचना- इनके आचरण से दोष लगा हो तो वह मेरे लिये निष्फल हो। दिगनत एवं उपभोगपरिभोग परिमाणव्रत का अधिक कठोर व्रत विधान अनुशोलन करने के लिये देशावकाशिकवत का विधान किया गया है। दिगवत मे गमनागमन का प्रमाण और प्रमाणित क्षेत्र से बाहर हिंसा आदि के आचरण का त्याग यावज्जीवन के लिये किया जाता है। गमनागमन की सीमा के अन्तवत्ती वस्तुओ के व्यवहार का यावज्जीवन प्रमाण करने के लिये भोगोपभोग- परिमाणव्रत विहित है, तब विधान-नियम के अनुसार सावधिक प्रमाण की आवश्यकता का अनुभव होता है। एतदर्थ ही देशा- वकाशिनत का विधान अपेक्षित है। सरल शब्दो मे यों कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अणुव्रतों का क्षेत्र सीमित करने के लिये दिगनत है, उसी प्रकार उनका परिमित काल तक अधिक संकोच करने के लिये देशावकाशिकवत है। दिन दिन आव- श्यकताओं का अधिकतर संकोच करना इस व्रत का मुख्य फल है। क्योंकि यावज्जीवन के लिये किये जाने वाले हिंसा आदि के प्रमाण उतने संकुचित नहीं होते जितने एक मुहूर्त, एक दिन या सावधिक समय के लिये हो सकते हैं। यावज्जीवन १००० कोस के उपरान्त जाकर हिंसा आदि दोषाचरण को त्यागने वाला व्यक्ति परिमित काल-एक दो दिन के लिए १०-२० या ५० कोस के आगे उनका त्याग सहज ही कर सकता है। इस व्रत के

श्रावक प्रतिक्रमण
पालने से दिनचर्या को अधिक विशुद्धि के पथ पर लाया जा
सकता है। जीवन के कण कण को सफल बनाने के लिये यह
अमोघ मन्त्र है। इसका महत्व एवं उपयोगिता पूर्ववर्ती व्रतों की
महिमा से तुली हुई है। इसका सम्बन्ध केवल छठे सातवें व्रत
तक ही सीमित नहीं, पांच अणुव्रत एवं अनर्थदण्ड विरमणव्रत
में भी इसका संचार है। यह उन सबका पोषक बन कर स्वयं
महान् उपयोगिता का केन्द्र एवं सफलता की आधारशिला
बनता है।
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तीसरा शिक्षाबत ग्यारहवा पौपधोपवासव्रत मूल पाठ एकारसमं पोसहोववासव्वयं - असण-पाण- खाइम-साइम-पच्चक्खाणं, अवंभपञ्चक्खाणं, उम्मुक्क मणिसुवण्णाइ - पञ्चक्खाणं-माला-वण्णग-विलेवणाइ पञ्चक्खाणं, सत्थ-मूसलाई सावजजोग पञ्चक्खाणं, जाव अहोरत्तं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा एअस्स एकारसमस पोसहोववासरस समणोवासएणं पंच अइयारा ' जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ अप्पडिलेहिय दुप्पडिलेहिय सिज्जा संथारए २ अप्पमजिय दुप्पमज्जिय सिज्जासंथारए ३ अप्प- श्रावक प्रतिक्रमण १७२ डिलेहिय दुप्पडिलेहिय उच्चारपासवणभूमी ४ अप्प- मजिय दुप्पमज्जिय उच्चार-पासवणभूमी ५ पोस- होववासस्स सम्म अणणुपालणया जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुकडं । छाया एकादशं पौषधोपवासवतं-अशन-पान-खादिम - स्वादिम- प्रत्याख्यानं अब्रह्म-प्रत्याख्यान उन्मुक्त -मणि-सुवर्णादि-प्रत्याख्यानं माला-वर्णक-विलेपनादि-प्रत्याख्यानं शस्त्र-मुसलादि-सावद्य-योग- प्रत्याख्यानं यावत अहोरात्रं पर्युपासे द्विविधं त्रिविधेन न करोमि न कारयामि मनसा वचसा कायेन एतस्य एकादशस्य पौषधोप- वासस्य श्रमणोपासकेन पञ्चातिचाराः ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ अप्रतिलेखित-दुष्पतिलेखित-शय्यासंस्तारकारअप्रमार्जित- दुष्प्रमार्जित-शय्यासंस्तारकः ३ अप्रतिलेखित-दुष्पतिलेखित-उच्चार प्रस्रवण-भूमिः, ४ अप्रमार्जित-दुष्प्रमार्जित-उच्चारप्रस्रवण-भूमिः ५ पौषधोपवासस्य सम्यगऽननुपालनता यो मयाः देवसिकः अति- चारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् । शब्दार्थ एकारसम-इग्यारहवा पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान पोसहोववासव्वयं-पौषधोपवास अवंभपञ्चक्खाणं-मैथुन सेवन का प्रत्याख्यान असण-पाण-अशन-पानी उम्मुक्रमणि-उन्मुक्त रत्न खाइम-साइम-खादिम-स्वादिम के सुवण्णाइ-सोना आदि के श्रावक प्रतिक्रमण . - पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान पंचअइयारा-पाच अतिचार माला-वण्णग-माला रंग जाणियव्वा-जानने चाहिए विलेवणाइ-विलेपन आदि के न-नही पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान समायरियव्वा-याचरण करना सत्थ-मूसलाइ-शस्त्र-मूसल आदि चाहिए सावन-जोग-सावद्य व्यापार के तंजहा-वे इस प्रकार है पञ्चक्खाणं-प्रत्याख्यान अप्पडिलेहिय-दुप्पडिलेहिय- जाव-यावत् निरीक्षण न करना या असावधानी अहोरत-दिन रात से निरीक्षण करना पज्जुवासामि-पौपधन का सेवन सिजा-संथारए-शय्या-सस्तारक करता है। (सथारेको) दुविहं-दो करण अप्पमज्जिय- दुप्पमज्जिय-न तिविहेणं-तीन योग से (सावद्य पूजना या असावधानी से पूजना योग का आचरण) सिज्जा-संथारए-शय्या-सथारेको न करेमि-नही करू अप्पडिलेहिय-दुप्पडिलेहिय- न कारवेमि-नही कराऊ निरीक्षण न करना या असावधानी मणसा-मन से से निरीक्षण करना वयसा-वचन से उच्चारपासवणभूमी-उत्सर्गभूमिका कायसा-शरीर से अप्पमज्जिय-दुप्पमज्जिय-न एअस्स-इस पूजना या असावधानी से पूजना एकारसमस्स-ग्यारहवें उच्चार-पासवणभूमि-मलमूत्र की पोसहोववासस्स-पौषधोपवास पोसहोववासस्स-पौपघोपवास समणोववासएक-श्रावक को भूमि को व्रत के व्रत को आवक प्रतिक्रमण पालना व्रत स्वरूप सम्मंअणणुपालणया-विधिवत् न अइयारो-अतिचार कओ-किया है। तो जो मे-जो मैने तस्स-उसका देवसिओ-दिन सम्बन्धी मिच्छामि-निष्पल हो दुक्कडं-पाप विवेचन धर्म को पुष्ट करने वाले नियम विशेष का नाम पौषध है। एक दिन रात तक अनशन ( भोजन ) पान (पानी) खादिम (जिह्वा के स्वाद के लिये खाये जाने वाले पदार्थ जैसे–फल, मेवा आदि) स्वादिम (मुंह को सफाई के लिये मुह मे रखे जाने वाले पदार्थ जैसे-पान, सुपारी, लवंग आदि) का त्याग करना अथवा पानी के सिवाय तीन आहार का त्याग करना उपवास है। चतुर्विधाहार त्याग सहित उपवास करके उस नियम का पालन करना पौषधोपवासवत है। हे गुरुदेव ! मैं एक दिनरात के लिये पौषधोपवास व्रत में अशन आदि चार प्रकार के आहार का त्याग करता हूँ। अब्रह्म- चये सेवन का त्याग करता हूं। उन्मुक्त अर्थात् शरीर पर पहने हुए आभूषणों के सिवाय मणि-सुवर्ण आदि का त्याग करता हूं। फूलों की माला पहिनने का, रंग लगाने का, चंदन आदि का लेप करने का त्याग करता हूं तथा शस्त्र-मूसल आदि सावद्य प्र- त्तियों को अथवा पापकारी कार्यों को त्यागता हूं। जवतक एक अहोरात्र तक मैं इस व्रत का पालन करता रहूंगा तबतक मन, वाणी एवं शरीर से सावध प्रवृत्ति स्वयं नहीं करूंगा और दूसरों से नहीं कराऊंगा। व्रतग्रहण विधि पौषधोपवासव्रत अतिचार इस व्रत के पांच अतिचार श्रावक को जानने चाहिए। ? अप्रतिलखित-दुष्पति लेखित-शय्या-संस्तारक-शय्या-संथारे को-सोने-बैठने की जगह, ओढ़ने-पहनने के कपड़ों एवं विछौने विना देखे या असावधानी से देख कर काम में लाना। २ अप्रमार्जित-दुष्प्रमार्जित-शय्या-संस्तारक-शय्या - संथारे को रात के समय बिना पूंजे या असावधानी से पुंज कर काम मे लाना तथा बिना पूंजे हाथ-पग पसारना, पार्श्व बदलना (करवट बदलना) अन्य स्थान को प्रभाजित कर अन्य स्थान मे हाथ पैर आदि रखना इत्यादि । ३ अप्रतिलेखित-दुष्पतिलेखित-उच्चारप्रस्रवणभूमि-मल - मूत्र विसर्जन की भूमि को दिन मे न देखकर या असावधानी से देखकर काम मे लाना। ४ अप्रमार्जित-दुष्प्रमार्जितउच्चारप्रसवणभूमि-मल-मूत्रविसर्जन के योग्य भूमि को रात मे बिना प्रमार्जन किये मल- मूत्र का विसर्जन करना तथा रात के समय खुली भूमि मे शारीरिक-शंका निवृत्ति के लिये जाना पड़े तब भी सिर को ढके विना जाना। ५ पौषधोपवास का सम्यक् अपालन-पोषधोपवासनतका विधि- पूर्वक स्थिर चित्त होकर पालन न करना, आहार, अब्रह्मचर्य, सावध व्यापार आदि की अभिलापा करना। आलोचना-इनके सम्बन्ध से कोई दोप लगा हो तो वह मेरे लिये निष्फल हो।

१७५ श्रावक प्रतिक्रमण ज्ञातव्य व्रत विधान पहले चार अतिचार असावधानी की अपेक्षा से है और भावनांसे विरतिका बाधक होने के कारण पांचवां अतिचार है। चतुर्विध आहार के त्यागवाले उपवास में उक्त नियम का पालन करना पौषधोपवास व्रत है। उपवास में पानी पी कर किया जाने वाला पौषध देशावकाशिक व्रत की परिधिमें चला जाता है। पौषध नौवें व्रत का एक विशाल रूप है। नौवें व्रत का कालमान एक मुहूर्त का है और इसका कालमान एक दिन रात का है। प्रत्याख्यान दोनों के एक-से है। प्रश्न- यह प्रश्न सहज ही हो सकता है कि नौवें एवं ग्यारहवें व्रत को दशवे से पृथक करने की क्या आवश्यकता है ? क्योंकि नियमित समय के लिए होने वाले सब त्याग इसके अन्तर्गत हो सकते हैं। उत्तर- यह सच है, इसका समावेश दश में हो सकता था तथापि इन दोनों का पृथक् निर्वाचन करने का लक्ष्य विशेष विशुद्धि है। विशेष विशुद्धि की हेतुभूत नियमानुवर्तिता के कारण ही ये दोनों उससे ( दशवेवत से ) भिन्न है । दशत्रतमें नियम करनेका कालमान निर्धारित नहीं है। यह (दशवों व्रत) दस मिनट के लिये एवं दो मिनट के लिये भी हिसा आदि का पांचों का या पाचों में से किसी एक का त्याग करके इच्छानुकूल स्वीकार किया जा सकता है। किन्तु सामायिक व्रत एवं पोषधोपवास व्रत का पालन इच्छानुकूल नहीं, वह तो विधि पूर्वक ही किया जा सकता है। सामायिक में एक मुहूर्त तक एवं पौषध में एक दिन रात तक हिंसा आदि पांचों आश्रय सेवनका अनिवार्यतया त्याग करना पड़ता है। यहो इन दोनोंका देशावका- शिकसे अन्तर या विशेषत्व है। पौषध श्रावक का एक उत्कृष्ट नियम है।

चतुर्थ शिक्षाबत वारहवा अतिथिसविभागवत मूल पाठ बारसम अहा-संविभागध्वयं-समणे-निग्गंथे फासुएणं एसणिज्जेणं असणपाणखाइमसाइमेणं चस्थपडिग्गहकंबलपायपुंछणेणं पाडिहारिएणं पीढ- फलगसिज्जासंथारएणं ओसह-भेषजेणय पडि- लाभमाणे विहरामि एअरस बारसमरस अहा. संविभागवयस्स समेणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तंजहा १ सचित्त- निक्खेवणया २ सचित्तपिहणया ३ कालाइक्कमे ४ परववदेसे ५ मच्छस्थिा ७ जो मे देवसिओ अइ. यारों की तस्स मिच्छामि दुकडं।

धावक प्रतिक्रमण छाया द्वादशम् यथासंविभागवतं श्रमणान् निन्थान् प्रासुकेन एषणीयेन अशन-पान-खादिम-स्वादिमेन वस्त्रप्रतिग्रह-कम्बल- पाद-पोन्छनेन प्रातिहारिकेण पीठफलकशय्यासंस्तारकेण औषध-भैपज्येन प्रतिलाभयमानः विहामि एतस्य द्वादशस्य यथा-संविभाग-व्रतस्य श्रमणोपासकेन पञ्च अतिचारा: ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ सचित्तनिक्षेपणता २ सचित्तपिधा- नता ३ कालातिक्रमः ४ परव्यपदेशः ५ मत्सरिता ६ यो मया दैव- सिकः अतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम । वारसमं-बारहवा पोढ-पीढा अहा -संविभागव्वयं-यथा फलगसिज्जा-फलक, शय्या संविभाग संथारएणं-सथारा समणे-श्रमण ओसह-भेपज्जेणय-औषधि भेषज निग्गंथे-निर्ग्रन्थ को पडिलामेमाणे-प्रतिलाभता हुआ फासुएणं-अचित्त (देता हुमा) एसणिज्जेण-एपणीय विहरामि- रहू असणपाणखाइमसाइमेणं--अशन एअस्स-इस पान, खादिम स्वादिम वारसमस्स-बारहवे वत्थपडिग्गह-वस्त्र-प्रतिग्रह अहा-संविभागव्वयस्स-यथा कंबलपायपुंछणेणं-कम्बल, सविभागवन के पाद-पोछन समणोवासएणं-श्रावक को पाडिहारिएणं -प्रातिहारिक पंचअइयारा-पाच अतिचारा (जो पदार्थ गृहस्थको वापिस जाणियव्वा-जानने चाहिये लौटाये जा सकते है) न समायरियव्यानही आचरण करना चाहिए अतिथिसविभागवत १८७ . रखना ढकना तंजहा-वे इस प्रकार है मच्छरिया-मस्सर भाव से सचित्तनिक्खेवणया-एषणीय जो मे जो मैने वस्तुप्रो को सचित वस्तुओ के ऊपर देवसियो-दिन सम्बन्धी अइयारो-अतिचार सचित्तपिहणाया-सचित से कओ-किया हो तो तस्स-उसका कालाइकमे - काल का मिच्छामि-निष्फल हो अतिक्रमण करना दुकर्ड-पाप परववदेसे-अपनी वस्तुको पर की बतलाना विवेचन पांच महाव्रत को पालने वाले तथा ४२ दोष-वर्जित व्रतस्वरूप भिक्षा लेने वाले साधुओं को अपने घरके निमित्त बने हुए भोजन आदि चवदह प्रकार की वस्तुओंका आत्म-कल्याण की बुद्धि से यथाशक्ति विभाग देना, यथासंविभागवत है। इस व्रत का दूसरा नाम अतिथिसंविभागवत है। इसका अर्थ है अतिथि को अपने भोजन आदि का विभाग देना ! जिनका भिक्षा के लिये आना किसी तिथि या पर्वसे सम्बन्धित नहीं, अमुक दिन या अमुक पर्व में ही भिक्षा लेनेके लिये आये, ऐसा कोई निश्चय नहीं, वे अतिथि है। प्रस्तुत प्रकरण में अतिथि शब्द शास्त्र- सम्मत साधुओं का बोधक है; अभ्यागत एवं साधारण भिक्षुओ का नहीं। १ अशन-मुख्यरूप से भूख मिटाने के लिए खाये जाने १४ प्रकार वाले पदार्थ, जैसे-रोटी। २ पान-पीये जाने वाले पदार्थ, जैसे--पानी । दूध आदि का दान ६ पोट- श्रावक प्रतिक्रमण भी पेय हैं, पर बुभुक्षा शांति के हेतु होने से उनका समा- वेश अशन में हो जाता है। ३ खादिम-जीभ के स्वाद के निमित्त ग्वाये जाने वाले पदार्थ, जैसे --फल, मेवा आदि। ४ स्वादिम-मुंह की सफाई के लिए मुंह में रखे जाने वाले पदार्थ, जैसे-लौंग, सुपारी आदि । खादिम एवं स्वादिम का उपर्युक्त अर्थ लोक-व्यवहार की अपेक्षा से है। इनका वास्तविक अर्थ तो खाने के उद्देश्य पर निर्भर है। ५ वस्त्र ६ पात्र--काष्ठ या मिट्टी के बने हुए खाने, पीने के भाजन । ७ कम्बल ८ पादपोछन-यन्ना के निमित्त पूजने के कान मे आने वाला रजोहरण। १० फलक-बड़े पाट। ११ शय्या-ठहरने के लिए मकान आदि । १२ संस्तारक-बिछौने के लिए घास आदि। १३ औपध-एक चोज से बनी हुई दवा । १४ मेपज-अनेक चीजों के मिलाने से बनी हुई दवा। इनमें पहले आठ प्रकार के पदार्थ अप्रातिहारिक है अर्थात् साधु उन्हें लेने के बाद दाता को वापिस नहीं लौटा सकते और - अतिथिसविभागवत १८६ शेष छः द्रव्य प्रातिहारिक है अर्थात् साधु उन्हें काम मे लेकर दाताको वापिस लौटा सकते है। हे गुरुदेव । मैं शुद्ध साधुओं को संयमो जीवन-निर्वाह के व्रतग्रहणविधि उपयुक्त १४ प्रकार का दान देने के लिए यथासंविभागवत को ग्रहण करता हूं। मैं आत्म-कल्याण की भावना से वैसे साधुओं को मन वचन एवं काया की शुद्धि से प्रासुक वस्तुओं का दान देता रहूंगा। इस बव के पांच अतिचार श्रावक को जानने चाहिए। अतिचार १ सचित्तानक्षेप साधु को नहीं देने की बुद्धि से छलयुक्त अचित्त अन्न आदि को सचित्त पदार्थ पर रख देना। २ सचित्तपिधान-साधुओं को नहीं देने की बुद्धि से कपट पूर्वक अचित्त पदार्थ को सचित्त फल आदि से ढक देना । ३ कालातिक्रम- भिक्षा के उचित काल का अतिक्रमण कर भावना भाना, मानो साधु कुछ लेंगे भी नहीं और मुझे जानेंगे कि अमुक श्रापक दातार है। ४ परव्यपदेश–आहार आदि अपना होने पर भी न देने की बुद्धि से दूसरे का बता देना। ५ मत्सरिता-दूसरे की देखा-देखी से, ईर्ष्याभाव से दान देना । आलोचना-इनके योग से कोई दोष लगा हो, वह मेरे लिये निष्फल हो। अहिसक मुनि जीवन-निर्वाह के आवश्यक साधन-भोजन और पानी के लिये भी हिंसा नहीं कर सकते है । उनका जीवन- निर्वाह एक मात्र विशुद्ध भिक्षाचा पर आधारित रहता है। व्रत विधान १६० श्रावक प्रतिक्रमण उनके लिए कुछ बना कर भी नहीं दिया जा सकता। वे उन्हीं वस्तुओ को लेते है जिनको गृहस्थ अपने लिये बनाता है । अत- एव इस व्रत में दुगुना लाभ है। एक तो यह है कि साधु को दान देनेवाला श्रावक अहिंसक शरीर के निर्वाह का आलम्बन बनता है और वह दान देकर अपनी खान-पान सम्बन्धी इच्छाओं का संकोच करता है, नया आरम्भ नहीं करता, यह दुसरा लाभ है। संयमी-दान श्रावक के पवित्र धार्मिक कायां में से एक महान् पवित्र कार्य है। लोकभाषा मे संयमी-दान के स्थान में सुपात्रदान का प्रयोग किया जाता है। सुपात्र दान के महत्व का गान जैन एवं जैनेतर धार्मिक ग्रन्थों में प्रायः एक स्वर से गाया गया है।

संलेहणाझ्यारे सलेखनाविचार मूलपाठ आपच्छिममारणांतिय संलेहणा-झूसणाराहणाय- समणोवासएणं पंच अइयारा जाणियव्वा न समा- यरियव्वा तंजहा १ इहलोगासंसप्पओगेर परलोगा- संसप्पओगे ३ जीवियासंसप्पओगे ४ कामभोगा- संसप्पओगे ५ मरणासंसप्पओगे तरस मिच्छामि दुकडं। छाया अपश्चिममारणान्तिकसंलेखना-जोषणाSाराधनायाः श्रमणो- पासकेन पंच अतिचारा: ज्ञातव्याः न समाचरितव्याः तद्यथा १ इहलोकाडाशंसाप्रयोगः २ परलोकाशंसोप्रयोगः ३ जीविताs)- शंसा प्रयोग. ४ कामभोगाऽाशंसाप्रयोगः ५ मरणाडाशंसा प्रयोगः तस्य मिथ्यामे दुष्कृतम्।

१६२ श्रावक प्रतिक्रमण शब्दार्थ अपच्छिममारणांतिय-अपश्चिम परलोगासंसप्पओगे-परलोक मारणान्तिक के सुखो की वाछा संलेहणा-झूसणाराहणाय --सले- जीवियासंसप्पओगे-असयम खना-जोषणा अराधना के जीवितव्य की वाछा समणोवासएणं-श्रावक को कामभोगासंसप्पओगे-काम पंच अइयारा-पाच अतिचार भोग की वाछा जाणियव्वा-जानने योग्य है मरणासंसप्पओगे-वाल मरण न-नहीं है। की वाछा समायरिया-आचरण करने योग्य तस्स-उस सम्बन्धी संजहा-वे इस प्रकार है मिच्छामि-निष्फल हो इहलोगासंसापओगे-इस लोक दुक्कडं- के सुखो की वाछा भावार्थ श्रावक अन्तिम समय में मृत्यु को पार्श्ववर्ती जानकर, अथवा रागद्वष रहित भावना से सचमुच जीवन से विरक्त हो जाने पर (कर्मक्षय करने के लिये तपस्या की भावना प्रबल हो उठने पर ) अपने शरीर एवं कषाय को दुर्बल करने के लिये जो अनशनादि तप विशेष करता है, उसका नाम संलेखना है। यह संलेखना व्रत वर्तमान शरीर का अन्त हो, तब-तक लिया जाता है। अतः इसको मारणान्तिक संलेखना कहते है। सलेखना अतिचार सलेखना संलेखना न तो आत्महत्या है और न हिंसा। रागद्वष आत्महत्या प्रमाद आदि भावनाओं से चाहे अपने प्राणों का अन्त किया नही जाय, चाहे दूसरे का, वह हिसा हैं। अपने प्राणों का वियोग

।
सलेखना-विचार
१९३
करना आत्म-हत्या एवं अन्य प्राणी के प्राणों का वियोग करना
हिंसा कहलाती है। संलेखना मे प्राणनाश अवश्य है पर वह
हिंसा नहीं । यथार्थ हिंसा का स्वरूप रागादि की वृत्ति से बनता
है। संलेखना व्रत एक मात्र कर्मक्षयके लिये आत्माको तपस्या द्वारा
उज्ज्वल करनेके लिये ग्रहण किया जाता है। अतः वह रागद्वेष
एवं मोह रहित होने के कारण हिंसा की कोटिम नहीं आता।
प्रत्युत् निर्मोही साधना की भावना मे से उत्पन्न होनेके कारण
यह शुभ ध्यान की कोटि मे है । इसको ग्रहण करनेका लक्ष्य कोई
भौतिक आशा एवं भौतिक प्रलोभन नहीं-केवल आत्म-शोधन
है । अतएव संलेखना न तो आत्महत्या है और न हिंसा ही।
संलेखना के पांच अतिचार श्रावक को जानने चाहिये ।
१ इहलोकाशंसाप्रयोग इस लोक अर्थात् मनुष्यलोक
मनुष्यलोक अतिचार
सम्बन्धी सुखो की इच्छा करना। जैसे-जन्मान्तर मे मै
चक्रवती होऊ, सम्राट, राजा या राजमन्त्री होऊ इत्यादि ।
२ परलोकाशंसाप्रयोग-परलोक अर्थात् देवलोक सम्बन्धी
सुखों की अभिलाषा करना । जैसे-जन्मान्तर मे मै इन्द्र
इत्यादि।
३ जिविताशसाप्रयोग—असयंम अर्थात् त्याग-विरति रहित
जीवन की अभिलापा करना।
४ मरणाशंसाप्रयोग–बालमृत्यु अर्थात् अज्ञानी की तरह मृत्यु
की चाह करना।
५ कामभोगागंसाप्रयोग-सासारिक वासनाओं मे विलासिता
आदि प्रवृत्तियों की इच्छा करना।
था देव होऊ

१६४ श्रावक प्रतिक्रमण परिशिष्ठ आलोचना- इनके योग से कोई दोष लगा हो तो वह मेरे लिए निष्फल हो। संलेखनाके अतिचारों पर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट जाना जाता है कि पौद्गलिक सुखों की अभिलाषा रखना एवं उनके लिये धर्म करना असली लक्ष्यसे दूर है। धर्म करने का उद्देश्य एक मात्र आत्मशोधन एवं आत्म-विकास है और यही होना चाहिए। भौतिक सुखों का न तो लक्ष्य हो और न होना ही चाहिये। भौतिक सुखों की चाह करने की कोई जरूरत नहीं, वे तो धर्म के अनुगामी है, धर्म के गौण फल के रूप में अपने आप प्राप्त होने वाले है। यही निर्लेप भावना का बीजमंत्र है। इसकी भूमिका अनासक्ति से ऊंची है। अनासक्ति का व्यवहार तो धर्म से पूर्व की भूमिका अर्थात् कृपि वाणिज्य पशु पालन गृहकार्य आदि नैतिक कार्यावली में भी करना चाहिये। जिससे न तो अन्याय एवं निरीह शोषण की मात्रा बढ़े और न निकाचित कर्म यानी गाढ़तम कर्म भी बंधे। जो पुरुष पौद्गलिक सुखों की लालसा को त्याग देता है, वह न तो जीवन से खुश होता है और न मृत्यु से डरता है। उसकी दृष्टि में जीवन और मरण, वेश परिवर्तन या गृह परिवत्तेन सरीखा है। धर्म की असलियत को पहचानने का यही सार है।

तरसा छम्मान मूल पाठ तस्स धम्मस्स केवलीपन्नत्तस्स अब्भुट्टि- ओमि आराहणाए विरओमि विराहणाए सव्वं तिविहेणं पडिक्क्रतो बंदामि जिण चउव्वीसं । छाया तस्य धर्मस्य केवलिप्रज्ञप्तस्य अभ्युत्थितोस्मि आराधनाया विरतोस्मि विराधनायां सर्व निविधेन प्रतिक्रान्तो वन्दे जिन- चतुर्विंशतिम् । शब्दार्य तस्स धम्मस्स-उस धर्म की सव्वं-सवप्रकार से केवली पन्नत्तस्स-केवलीभापित तिविहेणं-मन, वचन और अन्मुट्ठिओमि-सावधान होता हू शरीर से आराहणाय--आराधना करने पडिक्कतो-निवृत्त होता हुआ के लिए वंदामि-वन्दन करता हू विरओमि-विरक्त होता हू जिणच उन्चीस-चौवीस विराहणाय-विराधना से तीर्थंकरो को भावार्थ श्रावक प्रतिक्रमए मैं केवली भगवान् कथित धर्म की आराधना करने के लिये सावधान होता हूं। उसकी विराधना की हो तो सब प्रकार से मन, वचन और काया से निवृत्त होता हुआ, उससे विरक्त होता हूं और भगवान् अदिनाथ से भगवान् महावीर तक जो चौवीस तीर्थकर हुए हैं, उनको नमस्कार करता हूँ। धर्म की आराधना करने को उद्यत होना, उसकी विराधना से दूर रहना परम हित का उपाय है। धर्म की विराधना से पृथक रहने का उपाय मन, वचन, और शरीर सम्बन्धी चेष्टाओं की निवृत्ति है। अतः इनसे निवृत्त होकर ही धर्म-आराधना करने का उपदेश दिया है। इस अवसर्पिणी काल में चौवीस तीर्थकरों ने प्राणीमात्र के हितार्थ त्याग-तपस्यारूप धर्म का मार्ग दिखलाया था। अतएव उन परम आत्माओं को नमस्कार करता हूं।

खामगा
मूल पाठ
खामेमि सव्वजीवे, सव्वेजीवा खमंतु मे ।
मित्ती मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ ॥
छाया
क्षमयामि सर्व जीवान्, सर्वे जीवाः क्षाम्यन्तु मे,
मैत्री मे सर्वभूतेपु, वैरं मम न केनचित् ।
शब्दार्थ
खामेमि-क्षमाता हूँ
सधभूएसु-सब प्राणियो
सव्वजीवे-सब जीवोको से--प्राणी मात्रसे
सन्वेजीवा-सव जीव वेरमज्मन-मेरी वैर-शत्रुता
खमंतुमे-मुझको क्षमा करें नहीं है
मितीमे-मित्रता है मेरी केणइ-किसीके माथ
"मैं सब जीवों को क्षमाता हूं-सब जीव मुझे क्षमा करें, भावार्य
प्राणीमात्र के साथ मेरी मित्रता है-किसी के भी साथ मेरी
शत्रुता नहीं है।" अहा। कितना सुन्दर उपदेश ।। क्या इससे
भी बढ़ कर कोई विश्व-शांति का साधन है। जगन्मैत्री की
सद्भावना के बिना विश्व-शान्ति का अंकुर पल्लवित नहीं हो
सकता, चाहे कितना ही अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण क्यों न किया
जाय, क्यों न कितना ही शान्ति-परिषदों का समारोह किया
जाय-| शान्ति, हृदय को सरल एवं स्वच्छ किये बिना नहीं हो
-

१६८ श्रावक प्रतिक्रमण सकती। हृदय-मालिन्य शांति-पथ में रोड़ा है। हृदय-मालिन्य के हेतु क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थ आदि अवगुण है। इनसे मनोवृत्ति कुटिल हो जाती है, जिससे विचारधारा का प्रवाह मैत्री की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। विचारों मे मैत्री-भावना का संचार हुए विन। विश्व-शाति के स्वप्न भी असम्भव है। वस्तुतः यदि हम विश्व-शाति का इच्छुक है तो हमें इस सुधातिरेक सदु- पदेश को हृदय से पालना चाहिए। इसमें कितनी सद्भावना, कितनी सच्चाई और कितना आर्जव है ! "मैं प्राणी मात्र से अपने अपराधों की क्षमा मांगता हूं और प्राणी मात्र को उनके अपराधों के लिये क्षमा करता हूं। इसप्रकार के शांताचरण से ही भावना मैत्री से गद्गद् हो उठती है। सबसे क्षमा मांगना और सबको क्षमा करना मैत्री का बीज है। लाख जीवरकोनि सात लाख पृथ्वीकाय, सात लाख अपकाय सात लाख तेजस्काय, सात लाख वायुकाय, दश लाख प्रत्येक वनस्पतिकाय, चौदह लाख साधारण वनस्पतिकाय, दो लाख द्वीन्द्रिय, दो लाख त्रीन्द्रिय, दो लाख चतुरिन्द्रिय, चार लाख नारकी, चार लाख देवता, चार लाख तिर्यंच पंचेद्रिय, चौदह लाख मनुष्यकी जाति-चार गति चौरासी लाख जीव- योनिपर राग-द्वष आया हो तो मिच्छामि दुक्कडं ।

सामायिक-कारण विधि नवमें सामायिक व्रतमें जो कोई अतिचार- दोष लगा हो तो उसकी मैं आलोचना करता हूं: १ मनयोग सावध प्रवर्ताया हो, २ वचनयोग सावद्य प्रवाया हो, ३ काययोग सावध प्रवर्ताया हो, ४ सामायिककी सार-संभाल न की हो, ५ सामायिकका काल-मान पूरा होनेके पहिले ही सामायिक पारी हो । सामायिकमें स्त्रीकथा, भत्त- कथा, देशकथा, राजकथा की हो, तस्स मिच्छामि दुकडं। सामायिकवत श्रावकके आदरणीय घारह व्रतोंमेसे नवमा व्रत है। सामायिकका काल-मान एक मुहूर्तका है। इस अवधि के वीचमे-सामायिक्त्रत पालनेके समय प्रमादवश, भूल से या जानबूझ कर जो कोई मामूली स्खलना हो जाती है उसका सामायिक पारणविधि प्रायश्चित्त है। सामायिककी पूर्ति इससे ,

२००
श्रावक प्रतिक्रमण
करना आवश्यक है। अथवा सामायिकका काल-मान पूरा हो
जानेके पश्चात् सामायिक पारणविधिका ध्यानपूर्वक उबारण
करना अत्यावश्यक है। इसके उपरान्त यदि सामायिक में अधिक
दोप लगा हो तो उसके लिये गुरुके समक्ष प्रायश्चित्त कर लेना
चाहिए।
देवसिय-फायसिद्धता
देवसिक-प्रायश्चित्त
मूल पाठ
देवसिथ-पायच्छित्त-विसोहण8 करेमि काउत्सग्गं ।
छाया
भावार्थ
देवसिक प्रायश्चित्त विशोधनार्थं करोमि कायोत्सर्गम्
शब्दार्थ
देवसिय-दिवस-सम्बन्धी
करेमि-करता हू
पायच्छित्त-प्रायश्चित्तकी काउत्सर्ग-कायोत्सर्ग।
विसोहणटुं-विशुद्धिके लिए
हे गुरुदेव ! दिनमें मन वचन और शरीरसे प्रायश्चित्त योग्य
कोई अतिचार सेवन किया हो तो उसकी शुद्धिके लिये कायोत्सर्ग
करता हूँ।
पाप की शुद्धि के लिये की जानेवाली क्रिया-अनुष्ठान
प्रायश्चित्त कहते हैं।
देवसिक ४, पाक्षिक १२, चातुर्मासिक २० सांवत्सरिक
प्रतिक्रमण में ४०, लोगस्सका ध्यान करना चाहिये।
प्रायश्चित्त

परिशिष्ट

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पंच पद इन्दना पहिले पदे श्री सीमंधर स्वामी आदि जघन्य घीस तीर्थकर देवाधिदेव उत्कृष्ट एक सौ साठ तीर्थकर देवाधिदेव पंच महा- विदेह क्षेत्र मे विचरते है-अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त चारित्र, अनन्त वल, अशोक वृक्ष, पुष्पवृष्टेि, दिव्यध्वनि, देवदु- न्दुभि, स्फटिक सिंहासन, भामण्डल, छत्र, चामर इन द्वादश गुणों के धारक, एक हजार आठ शुभ लक्षण युक्त शरीर, चौसठ इन्द्रो के पूजनीय, चौंतीस अतिशय, पैंतिस वचनातिशय, से सुशोभित इस प्रकार के श्री अरिहन्त देवों के प्रति हाथ जोड, मान मोड़ "तिक्खुतो आयाहिणं पयाहिणं वदामि नमसामि सकारेमि सम्मा- मि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण बंदामि।" * जघन्य-कम-से-कम । तोयंकर-इस समय महाविदेह नामक क्षेत्रमें विद्यमान है। अरिहतोके यह बारह गुण बतलाये है, उनमे पहले चार तो उनके मात्म गुण है और शेप ८ उनके अतिशय यानी विशेषतायें है। यह योगजन्य विभूतिया योगशक्तिके द्वारा योगियोको प्राप्त हुआ करती है । तीर्थकर परम योगिराज है । उनको यह विभू- तिया मिले, इसमें कोई पाश्चर्य नहीं। जैनाचार्योंने योगशक्तिका बडा भारी महत्त्व बतलाया है। महर्षि पतञ्जलिका योग विभूतिपाद भी २०४ श्रावक प्रतिक्रमण दूसरे* पदे अनन्त सिद्ध पन्द्रह प्रकार से अनन्त चौबीसी अष्ट कर्मों को क्षय करके मोक्ष पहुंचे-केवलज्ञान, केवलदर्शन, आत्मिक सुख, क्षायक सम्यक्त्व, अटल अवगाहना, अमूर्तित्व, अगुरुलघुत्व, अन्तराय रहित ये अष्ट गुण संयुक्त जन्म-मरण-जरा रोग-शोक दुख-दारिद्रय रहित सर्वदा शाश्वत सुखपूर्वक विराज- मान हे-ऐसे श्री सिद्ध भगवान् प्रति हाथ जोड़, मान मोड़ "तिक्वत्तो आयाहिणं पयाहिणं वंदामि नमसामि संकारेमि सम्मा- णेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पञ्जुवासामि मत्थएण वंदामि ।" इस विषयपर काफी अच्छा प्रकाश डालता है। १-तीर्थकर जहां होते है, वहा उनके शरीरसे ऊंचे एक अशोक वृक्ष बन जाता है। वह वृक्ष केवल पुद्गलोका बना हुआ होता है । २-देवता कृत्रिम फूल बर- साते है। ३-दिव्य ध्वनि होती है। ४-देवता दुन्दुभि वजाते है। ५-स्फटिकका सिंहासन बन जाता है । ६-सिरके पीछे प्रभाका मण्डल होता है । ७-स्वाभाविक तीन छत्र होते है। ८-स्वाभाविक चामर डुलते है। * इस अनादिकाल प्रवाहमे अनन्त जीव सिद्ध हो चुके है। उनमे ९ गुण होते है । वह गुए आठ कर्मोको क्षीण कर डालनेसे प्रकट होते है। १-ज्ञानावरणीय कर्मका क्षय हो जानेसे केवलज्ञान–अनन्त ज्ञान होता है। २-दर्शनावरणीय कर्मका क्षय हो जाने से केवलदर्शन- अनन्त दर्शन होता है। ३-मोहनीय कर्मका क्षय हो जानेसे क्षायक सम्यक्त्व होती है । ४.-आयुष्य कर्मको क्षय हो जाने से अटल अवगां- हन-न जन्मना और न मरना अथवा परावर्तन न होना होता है। ५--नाम कर्मका क्षय हो जाने से अमूर्तिकपन-अशरीरीपन होता है । ६-गोत्र कर्मका क्षय हो जानेसे अगुरुलघुपन-न छोटापन और न बडापन होता है। - पच पद वन्दना २०५ तीसरे पदे मेरे धर्माचार्य गुरु पूज्य महाराजाधिराज श्री १०८ श्री तुलसीरामजी स्वामी आदि-वे आचार्य भगवान् कैसे हैं- पञ्च महाव्रत के पालने वाले, चार कषाय के टालने वाले पंचा- चार के पालने वाले, पञ्च समिति और तीन गुप्ति से युक्त, पाँच इन्द्रियों को जीतने वाले, नववाड़ सहित ब्रह्मचर्य को पालनेवाले तथा छत्तीस गुणों के धारक, शासनशृङ्गार, गच्छाधार, धर्मधुर- न्धर, सयल-शुभकर, भुवन-भासक, मिथ्यात्वनाशक, तीर्थङ्कर देववत् धर्मोद्योतकारी---ऐसे महापुरुष आचार्यश्रीके प्रति हाथ जोड़, मान मोड, "तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं वदामि नमसामि सकारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मङ्गलं देवयं चेइयं पन्जुवासामि मत्थएण वंदामि।" * पांच महाव्रत-अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य एव अपरिग्रह । चार कपाय-क्रोध, मान, माया, लोभ । पाच आचार-ज्ञान-आचार, दर्शन-आचार, चरित्र-माचार, तप-प्राचार, वीर्य (सामर्थ्य) आचार । पाच समिति-ईर्या-देखकर चलना, भाषा-पापरहित बोलना, एपणा-दोषरहित आहर-पानी आदि ग्रहण करना, आदान निक्षेप- अपने वस्त्र-पात्रोको सावधानीसे लेना-रखना, उत्सर्ग-निर्जीव भूमि में मल-मूत्रका उत्सर्ग करना। तीन गुप्ति-मनका निग्रह करना, वचनका निग्रह करना, शरीरका निग्रह करना । पाच इन्द्रिय-स्पर्शन, रसन, प्राण, चक्षु और श्रोत्र। नव बाड-१-स्त्री, पशु तथा नपुंसक रहित स्थानमें रहना। २-शृङ्गार रसोत्पादक कथा न करना। ३-स्त्रियोके साथ एक आसनपर न बैठना। ४-स्त्रियोके अगोपागोका अवलोकन न करना । ५-स्त्रियोके कामक्रीडाके शब्द न सुनना। ६-गृहस्थपनमें भोगे हुए भोगोका स्मरण न करना ।

MIC
श्रावक प्रतिक्रमण
चौथे पदे उपाध्यायजी महाराज वे कैसे है-ग्यारह अङ्ग
और बारह उपाङ्गो का स्वयं अध्ययन करते और दूसरों को
अध्ययन करवाते हैं-ऐसे पच्चीस गुणोंके धारक श्री उपाध्यायजी
महाराज के प्रति हाथ जोड़, मान मोड़, "तिक्खुत्तो आयाहिणं पया-
हिणं वदामि नमसामि सकारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मङ्गलं देवय
चइयं पज्जुवासामि मत्थएण वदामि ।"
७-विपयोत्पादक स्निग्ध एव सचिक्कण आहार न करना। ८-
मर्यादासे अधिक भोजन न करना। ९-शरीरकी विभूषा न करना।
११ अग-१ आचाराग, २ सूत्रकृताग, ३ स्थानाग ४ समवायाग,
५ भगवती, ६ ज्ञाता-धर्मकथा, ७ उपासकदशा, ८ अन्तकृतदशा,
९ अनुत्तरोपपातिक्दशा, १० प्रश्नव्याकरण ११ विपाक।
१२ उपाग-१ औपपातिक, २ राजप्रश्नीय, ३ जीवाभिगम,
४ प्रज्ञापना, ५ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, ६ चन्द्रप्रज्ञप्ति, ७ सूर्यप्रज्ञप्ति
८ निरयावलिका, ९ कल्पवतसिका, १० पुप्पिका, ११ पुष्पचूलिका,
१२ वृष्णिदशा।
उपाध्याय को इन ११ अग और १२ उपागो का अध्ययन रहता
है अतः उनके ये २३ गुण माने गये है और दो गुण ये हो जाते है कि
वे इन २३ सूत्रो का १ स्वय अध्ययन-मनन करते रहते है और २
दूसरो को करवाते रहते है। यहा एक प्रश्न होता है कि भगवान्
महावीर के समय से लेकर जब तक १२ अग उपलब्ध थे, तब उपाध्याय
के गुणो की गणना कैसे की जाती थी। इसका समाधान करने के
लिए हम कल्पनाए कर सकते है-बारहवे अग-दृष्टिवाद की
१-एक अन्य परम्परा के अनुसार उपाध्यायके ११ अग, १२ उपाग,
चरणसत्तरी एव करणसत्तरी ये २५ गुण माने जाते है।

पच पद वन्दना २०७ पांचवें * पदे अघन्य (कम से कम) दो हजार कोड़ से अधिक साधु-साध्वी उत्कृष्ट ( अधिक से अधिक) नव हजार कोड़ साधु-साध्वी अढाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्रों में विहार करते है, वे महा मुनिराज कैसे है-पञ्च महाव्रत के पालनहार पांच इन्द्रियों के उपलब्धि तक की परम्परा में उपाध्याय के गुणो की सस्या क्या थी, इसकी आगम में कोई भी चर्चा हमें उपलब्ध नही होती है अत बल- पूर्वक यह नहीं कहा जा सकता कि उस समय भी उपाध्यायके गुण २५ ही मगृहीत थे। दूसरे-दृष्टिवाद को सम्मिलित कर लेने पर भी यदि अध्ययन एव अध्यापन एक गुण माना जाता हो तो भी गुण- सख्या २५ हो सकती है, अथवा अध्ययन-अध्यापन यदि पृथक पृथक् गुण माने जाते थे तो सम्भवत दृष्टिवाद का अधिकार उपाध्याय के अधिकार में न रह कर प्राचार्य के अधिकार में ही रहता है यद्यपि यह साधारणतया तो सभव नहीं। क्योकि अध्यापन कार्य प्रमुखरूपेण उपाध्यायके अधिकार में होता है । किन्तु दृष्टिवाद का क्वचित् अपवाद हो। खैर, जो कुछ हो आज आगम परम्परा में से हम निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कह सकते। मागम की उत्तरवर्ती परम्परा में जो सग्रह हुआ है, उसमें उपाध्याय के गुणोकी सस्या यो ही उपलब्ध होती है। * आचार्यके ३६ गुण एव साधुके २७ गुणोको गहराई से देखें तो इनमें कोई भी खास अन्तर नजरमें नही माता । आचार्य पदकी महत्ताके अनुसार उनकी विशेषतानोका दिग्दर्शन क्यो नही कराया गया ? आचार्यके जितने गुण बतलाये गये है, वे तो प्रत्येक साघुमें अवश्य उप- लब्ध होते है, जिसमें इन आवश्यक गुणोकी कमी हो, वह साधु भी नही हो सकता ?

२०८ श्रावक प्रतिक्रमण जीतनहार, चार कषाय के टालनहार, 'भाव सत्य, करण सत्य योग सत्य, क्षमावन्त, वैराग्यवन्त, 'मनसमाधारणता, 'वचन- समाधारणता, 'कायसमाधारणता, ज्ञान-सम्पन्न, दर्शन-सम्पन्न, चारित्र सम्पन्न, वेदना (कष्ट ) आने से उसे समभावपूर्वक सहन करनेवाले, मृत्यु को समभावपूर्वक सहन करनेवाले, इन सत्तावीस" गुणोके धारक, बावीस परिषहों को जीतने वाले, बयालीस दोष टाल कर आहार पानी लेने वाले, बावन अनाचारों को टालने हा, यह सच है कि ये ३६ गुण प्रत्येक साधुमें होते है परन्तु प्राचार्य की गुणावलीमें इनकी परिगणना एक तथ्यको लेकर हुई है। यो तो आचार्य अतिशयके अक्षयनिधि एव अरिहन्तके प्रतिनिधि होते है। तो भी उनकी खास विशेषता यह है कि वे स्वय आचार-कुशल होते है और दूसरोको आचार-कुशल रहनेकी प्रेरणा करते रहते है। आचार्यकी आचार-कुशलता प्रत्येक साधुके लिए आदर्श होती है । भगवान् महावीर ने उक्त ३६ गुणोकी उज्ज्वलतामें अनन्त गुण तर तम बतलाया है। उक्तगुण राकाके चन्द्रमाके समान निर्मल होते है और प्रदिपदाके चादके समान भी। इस उपमासे पाठक समझ सकेंगे कि गुणगणनाके समान होने पर भी उज्ज्वलतामें कितना अन्तर है ? कहा तो वह प्रतिपदाकी लम्बी सी लकीर और कहा वह पूर्ण ज्योत्स्नाको अधिनायक पूनमका चाद, राका शशि । आचार्यको गुणराशि अत्यधिक समुज्ज्वल एव देदीप्यमान होती है अत. आचार्यको अन्य विशेषताए न बतला कर उक्त मौलिक विशेषताए बतलाना कोई असगत बात नही, किन्तु आदर्शवाद है। १-भावोको सरल रखना २-योगविशुद्धि खना ३-वाणीकी समाधि रखना ४-क्रियाको विशुद्धि रखना ५-~मनकी समाधि रखना ६-शरीरकी समाधि रखना पच पद वन्दना २०४ वाले, निर्लोभी, निर्लाची, संसार से उदास, मोक्ष के अभिलापी संसार से विमुख, मोक्ष के सन्मुख, सचित्त के त्यागी, अचित्त के भोगी न्यौता देने से भोजन नहीं करने वाले, बुलाने से नहीं आनेवाले, वायुवत् अप्रतिवन्धविहारी--इस प्रकार के महाउत्तम मुनिराजप्रति हाथ जोड, मान मोड, तिक्खुत्तो आयाहिणं पया- हिणं वंदामि नमसामि सकारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मङ्गलं देवयं चंइयं पज्जुवासामि मत्थएण वदामि ।

- प्रतिक्रमण करने की विधि प्रथम मन, वचन, काया के योगों को स्थिर कर "तिक्खुता के पाठ से विधि सहित गुरुदेव को नमस्कार कर, हाथ जोड़ "चवीसत्थव" की आज्ञा लेकर "चउवीसत्थव" करे। "चवी- सत्थव" की विधिः - "ईयोपथिकी" सूत्र का पाठ पढ़े, "तस्सुत्तरी" के पाठ में "तावकार्य" तक प्रकट कह कर शरीर की हलन-चलन क्रिया को रोक कर ध्यान करे। ध्यान में "ठाणेणं मोणणं झाणेणं अप्पाणं, वासिरामि" कह कर “ईर्यापथिकी"* का पाठ पढ़े और एक नमस्कारमन्त्र का स्मरण कर ध्यान पूरा करे। पीछे "लोगस्स” का पाठ कह कर दायें घुटने को जमीन पर टेक कर बायें घुटने को जमीन से चार अंगुल ऊँचा रख कर “नमोत्थुणं" का पाठ कहे। पीछे गुरुदेव को वन्दन कर "देवसिक" प्रतिक- मण की आज्ञा ले। पीछे “मत्थएण वन्दामि" प्रथम आवश्यक की आज्ञा है - ऐसा कहे। सामायिक आवश्यक में खड़ा होकर "आवस्सही इच्छा कारेण", एक नमस्कार मन्त्र, सामायिक सूत्र, इच्छामि ठाइडं काउ * इसके विषयमे दो परम्परायें है। एक ईपधिक सूत्रका समर्थन करती है और दूसरी लोगस्सका। तेरापन्थम अवतक पहली परम्परा प्रधम सामायिक आवश्यक चालू है।

प्रतिक्रमण करने की विधि
२११
सग"तस्स उत्तरी के पाठ मे "तावकार्य तक प्रकट कह कर
ध्यान करे, ध्यान मे "ठाणेण, मोणेणं, भाणेणं, अप्पाणं, वोसि-
रामि" कह कर चौदह ज्ञान के अतिचार, पांच सम्यक्त्र के, साठ
व्रतों के तथा पन्द्रह कर्मादान (सातवें व्रत के अतिचार के संलग्न
कहना ), पांच संलेखना के ये निन्यानवें अतिचार, अठारह पाप
स्थान, मूल गुंण, पाच अणुव्रत आदि "इच्छामि आलोइ" और
एक नमस्कार मन्त्र कहकर ध्यान पारे। प्रथम आवश्यक
समाप्त, ऐसा कहे।
"मत्थएण वदामि द्वितीय आवश्यक की आज्ञा है- ऐसा द्वितीय
कह कर लोगस्स का पाठ एक बार पढ़े। द्वितीय आवश्यक चतुर्विंशति
समाप्त, ऐसा कहे।
।
स्तव
आवश्यक
आवश्यक
"मत्थएण बंदामि" तृतीय आवश्यक की आज्ञा है, ऐसा कहे। तृतीय वदना
तृतीय आवश्यक में खड़ा होकर "खमासमण" का पाठ कहे।
"खमासमण" में "निसीहियाए" (शब्द) आवे तब हाथ जोड़
कर खड़ा-खडा वन्दना करे, पीछे "अणुजाणह मे मिउग्गह। (शब्द)
आवे तव दूसरी वार वन्दना करके "निसीहि" कह कर दोनो
घुटनों को खड़े रख के गोदुग्धासन की तरह बैठ कर "दिवसो
वइक्कतो" (शब्द) आवे तब तीसरी बार वन्दना करे। "जत्ता भे"
(शब्द) आवे तवे चौथी बार वन्दना करे । "जावणिज्जच भे"
(शब्द) आवे सर्व पाचवीं वार वन्दना करे। "देवसिय घइक्कम"
(शब्द) आवे तवं छठी बार वन्दना करके आवस्सियाए"
पडिकमामि" आदि सर्व पाठ खडा होकर कहे । पीछे "खमासमण"
* प्रथम और द्वितीय आवश्यक खडे २ करें।

२१२
धावक अतिक्रमण
का एक पाठ दूसरी 'घार फिर उपर्युक्त रीति से करे, परन्तु
"निसीहि" कह कर बैठने के बाद उठे नहीं 1, शेष संव पहिले
"खमासमण" के अनुसार ही करे। तीसरा आवश्यक समाप्त,
ऐसा कहे।*
"मत्थएण वदामि" चौथे आवश्यक की आज्ञा है--ऐसा,कहे ।
फिर खड़ा होकर निन्नानवें अतिचार आदि का जोध्यान किया
था, वह प्रकट कहे। फिर बैठकर दायें घुटने को ऊँचा रख कर
दोनों हाथ जोडकर नीचे लिखे अनुसार ८ पाठ कहे। १ तस्स
सव्वस्स, २ नमस्कार मन्त्र, ३ सामायिक, ४ चत्तारि मंगलं, ५
इच्छामि पडिक्काम जो मे, ६ इच्छामि पडिक्कमि इरियावहि-
याए, ७ आगमे तिविहे" (मूल पाठ) ८ दंसणंसिरिसमत्त
(मूल पाठ) बारह व्रत अतिचार सहित (मूल पाठ) पांच संले-
खना का अतिचार ( मूल पाठ) अठारह पापस्थान, इच्छामि
पडिक्कमिडं जो मे, “तस्स धम्मस केवलोपन्नतस्स अब्भुट्टिमोमि"
कह कर खड़ा होवे पीछे "विरओमि विराहणाए" आदि शेष पाठ
"खमासमण" के पाठ में दिवस, रात्रि, पक्ष, चातुर्मास, सवत्सर
सम्बन्धी प्रतिक्रमण में अनुक्रम से निम्नलिखित पाठ कहे -
"दिवसो वइक्कतो, राई वइक्कतो, दिवसो पक्खो वइक्कतो,
दिवसो चउमासो पक्खो वइक्कतो, दिवसो संवच्छरो वइक्कतो,
देवसियं वइक्कम, राइयं वइकमं, देवसियं पक्खियं वइकम,
देवसियं चउमासियं पक्खियं वइकम, देवसियं संवच्छरियं वइकमं।
देवसियाए आसायणाए,..राइय आसायणाए, देवसिय पक्खिय
आसायणाए, देवसिय चउमासिय पक्खिय आसायणाए, देवसिय
संवच्छरिय आसायणाए", ऐसा कहे।
चतुर्थ
प्रतिक्रमण
आवश्यक

प्रतिक्रमण करने की विधि २१३ प्रावश्यक - कह कर "खमासमण" का पाठ दो वार विधिवत् कहे, पीछे घुटना नीचे जमीन पर रखकर पांच पदों की वन्दना देकर खड़ा होकर "खामेमि सम्वेजीवा", सात लाख पृथ्वीकाय का पाठ कहे। चौथा आवश्यक समाप्त, ऐसा कहे। "मथएण वदामि पांचवें आवश्यक की आज्ञा है, ऐसा कहे। पचम फिर खडा होकर "देवसिय पायच्छितं," नमस्कार मन्त्र, सामायिक, कायोत्सर्ग "इच्छामि ठाइउं," "तम्स उत्तरी" पाठ मे "ताव कार्य" तक प्रकट कह कर पीछे ध्यान करे। ध्यान में "ठाणेणं, मोणेणं, माणेणं, अप्पाणं, वोसिरामि" कहकर देवसिक तथा रात्रिक प्रतिक्रमण मे ४ "लोगस्स", पक्षो मे १२, "लोगस्स", चतुर्मासिक पक्षी में २० "लोगस्स", सम्वत्सरी मे ४० “लोगस्स" का ध्यान करे। एक नमस्कार मन्त्र कह कर ध्यान खोले। पीछे "लोगस्स" का पाठ एक वार और दो वार "खमासमण" का पाठ पूर्वोक्त विधि से कह कर, पांचवा आवश्यक समाप्त-ऐसा कहे। "मत्थएण वदामि" छठे आवश्यक की आज्ञा है--ऐसा कहे। । पीछे भूत काल का प्रतिक्रमण, वर्तमान काल की सामायिक तथा भविष्यत् काल का प्रत्याख्यान ऐसा कह कर यथाशक्ति देवसिक आवश्यक तथा रात्रिक मे एक दिन का, पाक्षिक मे एक पक्ष का, चातुर्मासिक मे चार मास का तथा सावत्सरिक प्रतिक्रमण मे एक वर्षका प्रत्या- ख्यान करे। पीछेसामयिकर, चौवीसत्थवर, वन्दना३, प्रतिक्रमण४, कायोत्सर्ग३, प्रत्याख्यान, ये छः आवश्यक समाप्त, ऐसा कहे । पीछे इन छओं आवश्यकों मे जान मे, अनजान मे, जो कोई अतिचार-दोष लगा हो तथा पाठ का उच्चारण करते समय मात्रा, षष्ठ प्रत्याख्यान २१४ श्रावक प्रतिक्रमण अनुस्वार, विन्दु, अक्षरहीन अधिक, ऊँचा, नीचा, आगे, पीछे कहा हो तो "तस्स मिच्छामि दुक्कड" ऐसा कहे । ऐसा कह कर पीछे पूर्वोक्त विधि से दो "नमोरथुणं" कहे जिसमें दूसरे "नमोत्थुणं" में "ठाणं सम्पत्ताणं" के स्थान में "हाणं संपाविउकामाण" ऐसा कहे। पहला "नमोत्थुणं" सिद्ध भगवंत को हो, दूसरा "नमोत्थुण" अरिहन्त भगवन्त को हो, तीसरा "नमोत्थुणं" मम धम्मायरियस्स धम्मउवदेसगस्स थवत्थुई मंगलं" मेरे धर्माचार्य गुरु पूज्य श्री श्री १००८ श्री श्री तुलसीरामजी स्वामी को हो, ऐसा कहने के बाद पाच नमस्कार मन्त्र कहे तथा रात्रिक प्रतिक्रमण मे पांच नमस्कार मंत्र प्रतिक्रमण की आदि में कहे।* * प्रतिक्रमण में देवसिक शब्द आवे वहा रात्रिक, पाक्षिक, चौमा- सिक, सावत्सरिक, प्रतिक्रमण में अनुक्रम से निम्नलिखित पाठ कहे.-"राइनो", "देवसिओ", "देवसिओ परिखमो" "देवसिओ चउमासिनो पक्खिओ", "देवसिओ सवच्छरिओ" ऐसा कहे ।

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श्रावक प्रतिक्रमण

Author
नथमल
Title
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File name
श्रावक प्रतिक्रमण
Text
OCR done
Citation
1111
Published
2009/09
Publisher
आदर्श साहित्य संघ, सरदार शहर
Language
Sanskrit
Pages
242
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnun
DLI number
322503
Barcode
99999990253054.00
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Banasthali University
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