Adarsh Library, Jaipur

Ek Hi Hai Zindagi

Basu Samresh · 2011/03

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चिरन्तन काल से ही कोई न कोई नारी
व्यक्ति के जीवन, संसार या राष्ट्र में विनाश को
अनिवार्य बनाती आई है। इस मामले में सर्वनाश
के जितने भी अस्त्र हो सकते हैं, सब के सब नारी
के सौंदर्य में छिपे रहते हैं। पुरुष इस मामले में
प्रकृति के हाथ में खिलौना की भूमिका ही अदा
करता है।
महेन्द्र के साथ भी यही हुआ । जीवन भर
एक बंधी-बंधाई डगर पर चलता हुआ जब वह
लखपती हो गया तो उसे नष्ट करने को उसके
जीवन में ईरानी आ जुटी और उसने महेन्द्र का
सारा जीवनक्रम ही बदल डाला । और तव उत्थान
की जगह ह्रास शुरू हुआ।
जीवन निःसन्देह एक ही है, और आदमी को
एक ही जीवन में अपना सारा काम-काज निपटा
लेना पड़ता है। इसे भूल जाने की गलती की वही
सजा भुगतनी पड़ती है जो महेन्द्र को ईरानी के
कारण भुगतनी पड़ी।
एक साधारण जीवन की अत्यन्त असाधारण
कथा।

एक ही जिन्दगी सारेशा बसु.

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लगभग एक बीघा जमान म चहारदावारा स घिरा एक माजला मकान बाहर से जितना खूबसूरत दोखता है, अन्दर को शक्ल उतनी अच्छी नहीं है। दस साल के मकान को नया ही कहा जाएगा। पिछले साल नए सिरे से क्रोम रंग से पोताई करने के कारण बाहर से बदस्तूर चमचम करता रहता है। मकान की उम्र की तुलना में चारेक नारियल, दो आम, एक कटहल, एक देवदार और एक झाऊ के वृक्षों को उम्र देशक ज्यादा हो होगी । कुछेक अमरूद और बेल के वृक्षों की उम्र पांच साल से ज्यादा नहीं है । अन्दाज लगाया जा सकता है कि गृहस्वामी ने स्वयं अपने हाथों से इन वृक्षों को रोग है । पूरब-दक्खिन में भी बगीचा लगाने की जो कोशिश की गई थी, इसका भी अन्दाज लगाया जा सकता है, हालांकि साफ-साफ पता चल जाता है कि उसकी अब उपेक्षा की जा रही है । लाल कनेर, टगर और गंधराज को झाड़ियां शुरू में ही लह- लहा उठी थी, अब वे काफी फैल गई हैं और मजबूत हो गई हैं। मगर जूही और वेला की झाड़ियां मुरझा गई हैं, उनके पत्ते झड़ गए हैं और फूलने को कोई संभावना नजर नहीं आती है। उनके चारों तरफ बे- शुमार झाड़-झंखाड़ उग आए हैं । लेकिन लाल कनेर को टहनियों और पत्तों को फांक से फूल के गुच्छे झांक रहे हैं। मकान जमीन की उत्तर-पच्छिम सीमा से सटकर सामने की ओर खड़ा है । दमदम जैसे अंचल में घर के सामने इस प्रकार का चौड़ा रास्ता कि जिससे गाड़ी आ जा सके, किसी जमाने में संभवतः वीरान और सुनसान हो रहता था। लेकिन देश के बंटवारे के बाद कलकत्ते को आखिरी सरहद या वृहत्तर फलकत्ते में इसकी कल्पना करना मुश्किल १० एक ही जिन्दगी है । साइकिल रिक्शा, ठेलागाड़ी और मोटर गाड़ियां अनवरत चलती रहती हैं। लोगों के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं। फिर भी इस एक- मंजिले मकान के आसपास अब भी कुछ परती जमीन और बगीचे इधर- उधर विखरे हुए हैं। साथ ही साथ दो बड़ी-बड़ी झीलें और कुछेक तालाब हैं। उनके आसपास ही कुछ नए-पुराने मकान हैं। यही वजह है कि मकान के अन्दर निर्जनता मंडराती रहती है। हालांकि एक किलोमीटर आगे बढ़ा जाए तो विस्थापितों की कॉलोनी, घनी आबादी वाले मुहल्ले और तमाम मकान एक-दूसरे से सटे हुए मिलेंगे। वहाँ निर्जनता की कोई निशानी नहीं है। मकान के सामने एक बड़ा सा फाटक है। फाटक से जाते ही जमाने पहले का गाड़ी जाने लायक ईंट का बना रास्ता मिलता है, जो बाएं मुड़कर मकान के पिछवाड़े उत्तर दिशा की ओर चला गया है । वहाँ दो गाड़ियां रखने लायक एक बड़ा-सा गैरेज है । लेकिन गाड़ी नहीं है। गैरेज के बाहर, पेड़ के तले छाँह में तीन आस्ट्रेलियाई गाएं, जो देखने में सचमुच ही बहुत ही सुन्दर हैं, बँधी हैं । वे खड़ो-खड़ी पागुर कर रही हैं, कान हिला रही हैं और दुम हिला-हिलाकर मक्खियाँ भगा रही हैं । गृहस्वामी महेन्द्र सरकार स्वयं तीनों गायों के नजदीक खड़ा है और नीम की दातून से दाँत रगड़ रहा है । अभी सुबह के साढ़े छ: बजे हैं। एक अधेड़ विधवा खटाल यानी गैरेज साफ कर रही है। नारियल के एक दरख्त के नीचे महेन्द्र की पत्नी सुरवाला मिट्टी की नाँद में गायों की सानी तैयार कर रही है। महेन्द्र दाँत रगड़ते हुए चारों ओर निगरानी रख रहा है और बीच- बीच में पेशानी पर बल लिए, कान खड़ाकर सुन रहा है कि घर के अन्दर उसके दोनों लड़के किन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए आपस में झगड़ रहे हैं । वड़ा लड़का मतीश पच्चीस साल का है। उसके बाद है एक लड़को-नन्दिनी, (असल में लड़की का नाम था नन्दरानी। इस तरह का नाम चूंकि आजकल चालू नहीं है, इसलिए लड़की ने जैसे हो एक ही जिन्दगी ११ , ग्यारहवां दर्जा पास किया, अपना नाम बदलकर रख लिया नन्दिनी । महेन्द्र इन मामलों में बाहर से बिलकुल उदासीन रहता है, मन ही मन हंसता है और सिर हिलाकर हामी भरता है। बात तो सही है ! नन्दरानी से नन्दिनी सुनने में अच्छा लगता है । लेकिन यह जवान से कुछ नहीं कहता है ।) जो तेईस साल की है। पिछले साल उसकी शादी हुई है और उसी वजह से मकान में रंग-रोगन कराना पड़ा था। उसके वाद जो लड़का है उसकी उम्र है इक्कीस साल । नाम है सतीश । तीन संतानों के जन्म लेने के बाद ही सरकारी किरानी महेन्द्र जन्म-निरोध के लिए जी-जान से लग गया था। मगर वह मन ही मन हंसता है और एक गीत गुनगुनाता है-नहीं भुवन का भार तुम्हारे हाय । "हाथ में भार होता तो इस दुनिया में बहुत-सी बातें होती साथ ही साथ सतीश के जन्म के ग्यारह साल बाद, सुरवाला एक और बच्चे को पैदा ही नहीं करती। जन्म-निरोध के तमाम कायदे-कानून को अंगूठा दिखाकर, सुरबाला जब ग्यारह बरसों के बाद फिर गर्भवती हुई तो महेन्द्र के आश्चर्य की तुलना में सुरबाला को कहीं अधिक खीझ का अहसास हुआ पा। क्योंकि देह और मन से वह इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थी। इच्छा या आकांक्षा तो दूर की बात, नई सन्तान को गर्भ में धारण करने के प्रति उसमें तीन वैराग्य और वितृष्णा का भाव था। फिर भी जब सुरवाला को गर्भ रह गया तो उसने ऊब और खीझ के साथ महेन्द्र को असावधानी के लिए कोसा था और क्लिनिक जाकर झंझटों से मुक्त होना चाहा था। लेकिन ग्यारह साल के दरमियान महेन्द्र के जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आ गया था। कॉलोनी के पास डेढ़ कट्ठा जमीन पर डेढ़ अदद कमरे का उसका जो मकान था, उसके बदले अपने निवास के लिए, नया मकान बनवाने के लिए, उसने एक बीघा जमीन खरीद लो यो । तब वह चारेक जन-संकुल वस-रूटों को बसों का मालिक हो चुका था। दो प्रेस विठा लिए थे, उनमें से एक खासा अच्छा बड़ा था। कलकत्ते में कुछेक जो होसियारी फैक्टरियां हैं, १२ एक ही जिन्दगी उनमें से एक बड़ी होसियारी फैक्टरी का वह मालिक हो चुका था। इसके अलावा कागज के व्यवसाय का कारोवार भी उसने बहुत फैला लिया था। कैसे यह सब अनहोनी घटनाएं घटित हुई, यह बाद की बात है, क्योंकि तुम्हें यह अच्छी तरह मालूम है कि, 'नहीं भुवन का भार तुम्हारे हाथ ।' घटना घटित हुई थी, महेन्द्र ने उसे शुभ क्षण में कार्य के रूप में परिणत किया था। हालांकि गरमी के दिनों में उसके बदन से अधमैली शर्ट, आठ हाथवाली मोटी धोती, पैरों से सस्तो मोटे रबर की चप्पलें और हाथ से कपड़े का एक छोटा-सा थैला कोई हटा नहीं सका है। सरदियों के दिन में उसके बदन पर सूत और ऊन मिली एक चादर या फुटपाथ से खरीदा हुआ एक स्वेटर रहता है। पांवों में कैनविस के फोते-बंधे जूते । अब भी वह सब उसी तरह रह गया है । दफ्तर के सह- कर्मियों के साथ वह जिस बेचारगी और विनम्रता के साथ पहले पेश । था, उस व्यवहार में अब भी कोई परिवर्तन नहीं आया है। म.4 सेक्रेटरी या अफसरों के सामने अब भी वह हाथ जोड़कर, अत्यन्त व्यस्तता के साथ 'हाँ सर, कहिए सर' के अलावा दूसरी बातें नहीं करता। खटने के मामले में, इस पचपन साल की उम्र में भी, कोई उसका मुकाबला नहीं कर सकता। ऑफिस के कर्मचारी उससे संतुष्ट हैं । अपने ‘महेनदा' से वे सिर्फ दावत की मांग करते रहते हैं। ऊपरवाले साहव भी बीच-बीच में महेन्द्र के सामने अपने शौक और ख्वाहिश का ऐलान करते हैं । कुछ विशेष नहीं, एक-दो बोतल विलायती शराब, चन्दन नगर का पानी-भरा सन्देश, बागबाजार का रसगुल्ला । इसके अलावा तीज-त्योहार के मौके पर मेमसाहब के लिए बनारसी साड़ी। महेन्द्र किसी प्रकार की आनाकानी नहीं करता । कारण, उसके जीवन के परिवर्तन के साथ ही यह सब अनिवार्य और स्वाभाविक जैसा हो गया है। क्योंकि वही एक वात-'नहीं भुवन का भार तुम्हारे हाथ ।'

एक ही जिन्दगी १३ .."तमाम बातें एक-दूसरी से जुड़ी हुई हैं । अत: 'देगा और लेगा।' इस राइटर्स के महान कलकत्ता के तौर पर ।"दौलत पैदा करना कोई मामूली बात नही है। महेन्द्र जानता है, इसमें मिलावट विहीन सुख नही है । पीड़ा का भी कोई अन्त नही । तल्खी और अपमान भी वर- दाश्त करना पड़ता है। फिर भी 'हे मन ! करो समर्पण । उसे समझ कर अपना ।... इस मामले में महेन्द्र की कोई गलती न थी और न ही है । वह एह- सान फरामोश भी नहीं है। राइटर्स इमारत को वह मन्दिर समझता है, अपने अफसरों को देव-प्रतिमा । पूजा करने और मान-मनौती में वह गलती नहीं करता है । उसके डेढ़ कठे जमीन पर खड़े टाली के मकान को जिन्दगी में, कुछेक सौ रुपये तनख्वाह के हालात में, अविश्वसनीय परिवर्तन आ जाने के बावजूद, महेन्द्र सरकार बाहर से जैसा था, वैसा ही है। यहाँ तक कि सुरवाला में भी, ढेरों जेवरात, साड़ी और दौलत रहने के कारण, सजने-संवरने के मामले में थोड़ा-बहुत बदलाव आ गया है । कान के दोनों हीरे देखने लायक हैं । गले का हार फाफो वजनी है । अभी गाय को सानी लगाने के समय, उसको वजनी-निवालिस सोने की चूड़ियां कलाई के ऊपर चढ़ी हुई हैं। हालांकि यह सब मामूली बात है । लेकिन महेन्द्र ने अपनी पुरानी कलाई घड़ी को, जिसकी संख्या और सुइयां धुंधली पड़ गई हैं, अब तक नहीं त्यागा है । लड़के और सुरवाला कपड़े-लत्ते और साज-सज्जा के बारे में शिकायत करते हैं तो महेन्द्र हसता है और कहता है, "यह सब मेरा युनिफार्म है। लोग मुझे वैरागी कह सकते हैं। सो कहें, मैं किसी की आंख में चकाचौंध पैदा करना नहीं चाहता । मेरे मन में उन सब चीजों को स्वाहिश नहीं है, बल्कि शान्ति है । यह सब में छोड़ नहीं सकता।" इतना जरूर है कि बाल-बच्चे यह सब नहीं मानते । अखवार के हर रोज के नए-नए विज्ञापनों की तरह रफ्ता-रफ्ना उनके कपड़े-लत्ते में बदलाव आता गया है। मगर गाड़ी ? नहे, वह नहीं हो सकती १४ एक हो जिन्दगी फ्रिज, टेलीफोन? वह सब भी नहीं। वह सब रहेगा सरकार एण्ड सन्स ऑटोमोबाइल एण्ड अदर कन्सर्न के दफ्तर में । फिलहाल टेलीविजन की मांग की जा रही है । नहीं, महेन्द्र हामी नहीं भर रहा है। इससे तो अच्छा है कि टेलीविजन का एक शोरूम खोल दिया जाए। उसके लिए बल्कि कोशिश की जा सकती है। लेकिन घर में बैठकर सिनेमा देखना? नहीं, यह सब नहीं चलेगा। बाहर-बाहर सिनेमा-थियेटर क्या कुछ कम देख रहे हो? सुरबाला इन मामलों में आम तौर से पति का ही साथ देती है। वाल-बच्चों की निगाह में बाप मक्खीचूस और रुचिहीन है-रुपया- पैसा रहने के बावजूद भले आदमी की तरह जीवन जोना नहीं चाहता। महेन्द्र को यह बात मालूम है । वह हंसता है और मन ही मन कहता है, "जाओ, जो बकना है, बको। तुम लोगों की इच्छा से न तो कुछ हो रहा है और न होगा। मैं मर जाऊंगा तो फिर जो मर्जी हो, करना। मैं मरूंगा तो तुम लोगों को 'डेथटैक्स' भी नहीं देना होगा और इसका मैंने इन्तजाम कर लिया है । मर जाऊँगा तो बात तुम लोगों की समझ में आएगी। तब हाँ, अपने परिवार के लिए (पत्नी को वह मन ही मन 'परिवार' ही कहता है और जवान से 'सुरो' कहकर पुकारता है।) भी मैंने पुख्ता इन्तजाम कर दिया है। किसी के सामने उसे हाथ फैलाना नहीं होगा।" बहरहाल, सुरबाला की ऊब और क्लिनिक जाकर फारिग होने की बात पर लोटा जाए। उसकी इच्छा का पता चलने पर महेन्द्र ने कहा था, "सुरो, एक बार सोचकर देखो। हम अवश्य ही बर्थ कंट्रोल करते आये हैं, मगर जो पेट में आ गया था, उसे कभी नष्ट नहीं करना पड़ा था। ।" "सो होने दो," सुरबाला ने कहा था, "पहले कभी नष्ट नहीं करना पड़ा था, इसका मानी यह नहीं कि अभी नष्ट नहीं करूं। ग्यारह -- एक ही जिन्दगी AM बरसों के बाद, इस उम्र में मैं नये बाल-बच्चों । कर पाऊँगी। महेन्द्र अपनी निरोह भंगिमा में हंस पड़ा । उसने तुरन्त अपनी और सुरवाला की उम्न का हि उस समय उसका छियालीसवां चल रहा था । तुरवाला का चालीसवां । उसने कहा था, "सुरो, तुम्हारी कोई खास उम्र नहीं हुई है, मान चालीस की हो।" "चालीस साल की उम्र तुम्हें मान ही लगती है ?" सुरवाला ने खोश भरे स्वर में कहा था। उसके बाद तनिक वैराग्य और लज्जा भरे स्वर में कहा था, "ग्यारह वर्ष बाद अचानक बच्चा होने से लोग-बाग क्या कहेंगे?" महेन्द्र के चेहरे पर वही हंसी तिर आई थी। कहा था, "बच्चा होगा तुम्हें, इसके लिए मैं अन्यथा नहीं सोच रहा हूँ। फिर लोग-बाग अन्यथा सोचेंगे हो क्यों ? और अगर सोचें तो क्या बिगड़ता है ? तुम्हारी उम्र में तो कितनी ही औरतें बच्चा पैदा करती हैं। इसमें दूसरे को अन्यथा सोचने की कौन-सी बात है ?" "दूसरे की बात जाने दो।" सुरबाला ने हालांकि जरा झुंझलाहट के साथ कहा था मगर दूसरे ही क्षण विस्मयपूर्ण आँखों से ताकते हुए पूछा था, "तुम्हें एकाएक इस उम्र में याप बनने का शौक क्यों हुमा ? तुम्हारे इस रुझान को बात मेरे दिमाग में कमी आई ही नहीं थी।" महेन्द्र को निरीह हँसी जरा और चौड़ी हो गई थी। कहा था, “सुरो, मेरा तो कहना यही है कि नहीं भुवन का भार तुम्हारे हाय । मैं कहता हूँ, यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर का कहना है । एक व्यक्ति जब आ गया है तो उसे फेंक क्यों हूँ? इसके अलावा एक बार सोचकर देखो सुरो, हमारे सुदिन में आ रहा है और मेरा चेहरा देखना चाहता सुरवाला ने तुरन्त झुंझलाकर कुछ कहना चाहा था लेकिन १४ एक ही जिन्दगी ज फ्रिज,हर की ओर ताककर चुप हो गई थी। गर्भ-धारण के संस्कार ने उसके मन की दिशा बदल दी थी और उसके मन में एक नई संभावना का विचार भी उत्पन्न हुआ था । महेन्द्र के चेहरे की ओर देखकर उसने मानो उसके भावों को पढ़ लिया था-गर्भ के नए भ्रूण में सुदिन की नई संभावना सौभाग्य के रूप में आ रही है। सुरवाला के रुष्ट और ऊबभरे चेहरे पर आहिस्ता-आहिस्ता हंसी तिर आई थी, मखें भी खुशी से दमक उठी थों और क्षण-भर में ही चालीस वर्ष की, चतुर्थ बार गर्भिणी नारी ने सलज्ज हंसी हंसते हुए कहा था, "मन की बात साफ-साफ क्यों नहीं कहते ? मैंने क्या इतना कुछ सोचा था।" और उसने अपने मुंह में साड़ी की कोर थाम ली थी। महेन्द्र ने कहा था, "फिर भी हकीकत यही है कि मैंने असावधानी से काम नहीं लिया था, सुरो । इसका मतलब समझी ? सावधानी की कहीं न कहीं कोई काट है, अपने काम के सिलसिले में यह बात मैं तरह समझ रहा हूँ। इसीलिए तो कह रहा हूँ, इतनी सावधानी तने के बावजूद जब एक व्यक्ति आ रहा है तो इसमें निश्चय ही I. ..त का हाथ है।" "समझ गई, समझ गई।" सुरवाला पति को खामोशकर, उठकर खड़ी हो गई थी और होंठ काटकर हंसती हुई बोली थी, "पंजावियों की दुकान से चार किस्म का अचार लेते आना, मेरे मुंह में बड़ी ही अरुचि पैदा हो गई है।" यह कहकर वह सामने से चली गई थी। महेन्द्र हँस दिया था। इस नये मकान की नींव डालने के बाद जब दो कमरे करीब-करीब तैयार हो चुके थे तो इसी मकान के एक कमरे में नीतू अर्थात् नीतिश का जन्म हुआ था और महेन्द्र की बात सच साबित हुई थी। उसके किसी कारोबार में मन्दो नहीं आई थी बल्कि तेजी के तौर पर सरकार एण्ड सन्स ऑटमबाइल का नया कारोबार- तमाम भारत के परिवहन साधन-चार अदद लेलैण्ड हैवी ट्रक चालू हो गई थी। एक नया बुक-बाइडिंग कारखाना खुल गया था जिसमें कल- एक ही जिन्दगी १७ कत्ते को नामी-दामो पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशकों का काम होता है। सिर्फ वहीं से आजकल साल में कुल लाम अढ़ाई लाख रुपया होता है । कागज की फटिंग से वाइडिंग कारखाने के औरत मदं श्रमिक कर्म- चारियों के पूजा के तीन महीने का बोनस, घर का कपड़ा-लत्ता और लोक-लौकिकता का खर्चा निकल आता है। पिछले साल लड़की की शादी के समय सगे-संबंधियों को इस घर में टिकाकर आमिप-निरा- मिप हर तरह का खाना खिलाया था। इसके अलावा कलकत्ते के एक होटल में लगभग तीन सौ व्यक्तियों को साहवी खाना और पेय पदार्थ को दावत दी थी। उसके लिए अंग्रेजो में अलग से कार्ड छपवाये गये थे। शादी में कुल मिलाकर एक लाख तीस हजार रुपये खर्च हुए थे। आयकर विभाग को खर्च के मद में तीस हजार रुपया दिखाया गया था। अलबत्ता यह वैसा कोई चालाकी भरा आश्चर्यजनक काम नहीं था। लोग बेवकूफ नहीं हैं, वे सब कुछ समझते हैं। लेकिन महेन्द्र के तौर-तरीके, आचार-विचार या पोशाक में कोई फेर-बदल नही आया है। यहां तक कि होटल को दावत को रात, खाने-पीने की सामग्री और पेय पदार्थ परोसनेवाले लोगों को पोशाक महेन्द्र को पोशाक से साफ-सुथरी थी। जो लोग सम्मिलित हुए थे, उनकी बीवियों को विश्वास नहीं हुआ था। महेन्द्र के दोनों लड़के, सतीश-मतीश तथा कारोबार से जुड़े कुछ शुभचिन्तकों ने सबका स्वागत- सत्कार किया था । अंग्रेजी कार्ड में हालांकि छपा हुआ था--मिस्टर एण्ड मिसेज महेन्द्र सरकार कॉरडिअली इनवाइट यू', लेकिन सुरबाला वहां मौजूद नहीं थी । तव हां, लड़की और दामाद मौजूद थे। लड़की के बैठने के लिए एक खास आसन का इन्तजाम किया गया था। अभी साढ़े छः बजे महेन्द्र नीम की दातून से दांत रगड़ रहा है सुरबाला गायों के लिए सानी तैयार कर रही है । एक अधेड़ नो १८ एक ही जिन्दगी गैरेज यानी खटाल साफ कर रही है। महेन्द्र समीप ही खड़ा होकर यह सब देख रहा है और बीच-बीच में पेशानी पर बल लाकर घर के अन्दर से तिरकर आती मती और सतु को-यानी मतीश और सतीश को-जो झगड़ते हुए आपस में ऊंची आवाज में तर्क कर रहे हैं, बातें सुन रहा है। कुछ देर पहले महेन्द्र गायों की ओर से नजर हटाकर, पूरब के नारियल और झाऊ की फांक से झिलमिलाते रक्तिम सूरज और धूप की ओर ताक रहा था । लेकिन चैत की शुरुआत में सूर्य का रंग अधिक देर तक रक्तिम नहीं रहता । देखते ही देखते आग के भभकते सफेद गोले जैसा हो जाता है और पल-पल दिन चढ़ने लगता है। अभी सुबह के साढ़े छः से अधिक समय नहीं हुआ है । लेकिन लगता है, वेला काफी ढल चुकी है। महेन्द्र को यह समय बड़ा ही सुहाना लगता है। दिन-भर को तरह- तरह की चिन्ता और घबराहट, एक शब्द में जिन्हें तनाव कहा जाता है, और जिस तनाव को अपने साथ ले वह रात में सोने जाता है और उसे कभी गहरी नींद नहीं आती, उसकी सारी ग्लानि और वेचैनी सवेरे आंख खुलते ही दूर हो जाती है । बगीचे में क्या और बुलबुल की कोई कमी नहीं है । चैत की भोर में, अब भी कोयल की कूक सुनाई पड़ती है । इस समय हवा ठण्डी रहती है और फर्र-फर्र चलती रहती है । हवा में वैसा कोई पागलपन नहीं रहता। काली आँखों वाली विशालकाय रंगीन आस्ट्रेलियाई गायों की ओर ताकने पर मन की गहराई में एक प्रकार के सुख और व्यथा आस-पास खड़े होकर पेंग मारते रहते हैं । व्यथा क्यों है, महेन्द्र को यह मालूम नहीं । इतना ही समझ में आता है कि गायों की ओर ताकते ही उसे अपने बचपन की याद आ जाती है। हालांकि आस्ट्रेलियाई गायों की बात न तो वह उन दिनों सोच सकता था, न उनके चेहरे की कल्पना कर सकता था और न जानता था कि ये आश्चर्यकारक सुन्दर प्राणी उसके जीवन में कब ।

एक हो जिन्दगी १६ 1 मायेंगे । बल्कि इसके बदले उसको आँखों के सामने पूर्व बंग के उस गांव का दृश्य उमड़ आता था जहां उसकी मां छोटी-छोटी सफेद दो- तीन दुबली-पतली गायों का दूध अपने हाथ से दुहकर उन्हें खाना खिलाती और चरवाहे के हाथ सौंप देती । मास-पास के और कई घरों की गायों का झुण्ड ले, इकहरा, लंबे-लंबे रूखे बालों वाला चरवाहा नंगे बदन, हाथ में लाठी थामे उन्हें दलदल भूमि के किनारे के मैदान में चराने ले जाता । वाबूजी हाथ में नारियल का हुक्का थामे, आँखों पर ऐनक चढ़ाए, ओसारे पर बैठे-बैठे बन्दर हाट से लाये गए चार-पांच दिनों के बासी कलकत्ते के अखबार पढ़ते रहते थे । महेन्द्र और उसका भाई ओसारे के एक छोर पर बैठ सिर हिला-हिलाकर स्कूल का सबक पढ़ते रहते थे। उम्र से बड़ी बहन तब तालाब के किनारे होती थी। दादी बुड़बुड़ाकर दीदी को डांटती। क्योंकि दीदो अकेली नही होती थी, आस-पास को और भी बहू-बेटियों के साथ सुबह से तालाब के किनारे पानी के खेल को महफिल गुलजार करने लगती थी। उनकी हसी और बातचीत का कोई ओर-छोर नहीं था। जितनी ही पानी की कलकल आवाज होती उनकी खिलखिलाहट और धोंगामस्ती की मात्रा उतनी ही बढ़ने लगती थी। बाबूजी एक पाठशाला के शिक्षक थे। थोड़ी-बहुत जमीन थी, दो छोटे-छोटे तालाब, पुश्तैनी मकान । जायदाद के नाम पर और कोई चीज उनके पास न थी। फिर भी लगता है, बचपन बढ़िया खान-पान, पढ़ाई-लिखाई और खेल-कूद में बीता है । महेन्द्र से दो वर्ष बड़े भैया ने हाई स्कूल से बदस्तूर मैट्रिक पास किया था। महेन्द्र ने दो साल बाद । उसके बाद ही कलफत्ते को चिन्ता मा गई। इतना जरूर है कि कुछ दिनों तक राजनीति की ओर भी उसका रुझान था। और वह रुझान गुप्त सशस्त्र विद्रोह की ओर ही अधिक था । परन्तु पिताजी गांधी के पक्के भक्त थे। महेन्द्र को याद है, बाबूजी बीच-बीच में अंग्रेजी में कहा करते थे-हि इज फादर ऑफ द नेशन । बड़ा भाई नरेन्द्र कहता- २० हथियारों का मुकाबला हथियारों से करना होगा । महेन्द्र को भैया पा वात पर ही आस्था थी। अव महेन्द्र को मालूम है, राजनीति एक तरह का पेशा है। कच्ची उम्र में उसके लिए जो शौक था, जीवन जीने की आवश्यकता के कारण वह शोक कुछ ही दिनों में खत्म हो गया। कलकत्ते का रास्ता शुरू में बड़े भाई ने ही दिखाया था। उसके बाद महेन्द्र आया था। लड़ाई उस समय हालाँकि शुरू हो गई थी मगर देश विभाजन की बात वाकई सोची भी नहीं गई थी। भैया को बैंक में नौकरी मिल गई थी। महेन्द्र को शुरू में क्लाइव स्ट्रीट के एक विलायतो फर्म में नौकरी मिली। उसके बाद सरकारी नौकरी। कम्पनी की नौकरी का मूल्य पुराने चावल के मानिन्द था। बड़ा भाई नरेन्द्र अव भी बैंक में नौकरी करता है। यादवपुर में उसने मकान बनवाया है। शुरू में भाई की हालत महेन्द्र से कहीं अच्छी थी । पक्का मकान भी उसने महेन्द्र से पहले बनवा लिया था। उन दिनों बड़ा भाई महेन्द्र से स्नेह करता था, आने-जाने का सिल- सिला भी था। उसके बाद महेन्द्र ने जव तरक्की करना शुरू किया, बड़ा भाई धीरे-धीरे दूर हटता गया। अव सरोकार रखना तो दूर की बात, महेन्द्र की लकड़ी की शादी में बड़ा भाई, भाभी और उनके बाल- बच्चे शामिल नहीं हुए । भैया साफ-साफ कहता है, "मेहन तो चोर है। धोखाधड़ी से दौलत पैदा की है। उस दौलत को ज्यादा दिनों तक भोग नहीं सकेगा।" सुरबाला शुरू में गुस्से से उबल पड़ती थी। महेन्द्र उसे शान्त करता, "उफ्, बकने दो। सच्चाई तो यही है कि मैंने धोखाधड़ी नहीं की है। मौके से लाभ उठाया है। अब भैया अगर सोचते हैं, मैं फरेबी हूँ तो उनसे झगड़ा करना कोई मानी नहीं रखता।" लेकिन नन्दिनी की शादी में भैया-भाभी का न आना महेन्द्र के हृदय को भी व्यथित कर गया था। आदमी की ईर्ष्या और कटुता के अनुभवों में वह गुजर चुका है। फिर भी अपने सगे भाई और भामो का हृदय इतनी ईयां और द्वेष से भर जाएगा, इसका उसे अनुमान नहीं था। वह स्वयं सुरबाला के साथ गया था और उन्हें निमंत्रित कर माया था। उन लोगों के पूर्व बंग के रिवाज के अनुसार एक सप्ताह पहले से ही घर में आकर रहने को कह आया था। भैया-भाभो के चेहरे को मुसकराहट और सहमति से कुछ समझ में नहीं आया था। इसका तो मतलव यही निकलता है कि महेन्द्र के लिए अब भी इस दुनिया का बहुत कुछ सीखना बाको रह गया है। हालांकि उसके तमाम कारोबार, उसके दो लड़कों के अतिरिक्त एक अत्यन्त कुशल एकाउन्टेन्ट और मोटी तनख्वाह पाने- वाले कम से कम सात ऊंचे ओहदे के लोग चला रहे हैं, लेकिन फिर भी हर जगह उसकी सजग और सतर्क दृष्टि रहती है। किसी भी तरह उसकी आंखों को धोखा नहीं दिया जा सकता है । अफसर तुल्य कर्मचारी और निपुण एकाउन्टेन्ट में से हरेक की आंखों की भाषा और हो को वह अच्छी तरह पहचानता है। कौन क्या गड़बड़ी कर रहा है, सया कहाँ चलान हो रहा है, राइटर्स के मामूली किरानी फो आंखों को इन मामलों में धोखा नहीं दिया जा सकता है। थोड़ी-बहुत चोरी हर बादनी करता है । उसके लड़के भी करते हैं । जहाँ भी नकद रुपये का लेन-देन होता है, वहीं कुछ न कुछ इधर-उधर होता है। लेकिन उसकी भी एक सोमा है। बस उतना ही होना चाहिए कि अखरे नहीं। हिसाब में दो पैसे की गड़बड़ी की है, ले जाओ। लेकिन सोमा-अतिक्रमण करने की कोशिश करोगे तो रास्ता बन्द कर दिया जाएगा। उस दृष्टि से देखा जाए तो महेन्द्र लोगों का चरित्र अच्छी तरह समझता है । सरकार के उच्च पदाधिकारियों की राई-रत्तो वह जब कि समझ लेता है तो फिर अपने कर्मचारी का चरित्न समझना कौन-सी बड़ी बात है ? उसको निरीह सादगी के अन्तराल में एक कठिन शक्ति सक्रिय रहती है, यह बात उसके सभी कर्मचारियों को मालूम है । इसका मनु- लब यह नहीं कि महेन्द्र सबको हमेशा अविश्वास निगाह से देखता २२ एक ही जिन्दगी है । जीवन के अनुभवों से उसे यह अहसास हुआ है कि दुनिया में हर . कदम पर सब पर अविश्वास नहीं किया जा सकता है। ऐसा वह करता भी नहीं। उसके लड़कों के अलावा भी कई ऐसे व्यक्ति हैं जिन पर वह विश्वास करता है। उन लोगों को मालूम है कि कलकत्ते में उसके कई मकान हैं, बहुमंजिली इमारतों में कहां-कहां उन्होंने फ्लैट खरीदे हैं, , सुन्दरवन के किस इलाके में कितनी जमीन है । यहाँ तक कि दो नम्बर के नकद रुपये का हिसाव भी उन्हें मालूम है । उनकी आंखों में धूल नहीं झोंकी जा सकती बल्कि उनके सहयोग की आवश्यकता ही रहती है। लेकिन उन्हें यह मालूम नहीं कि महेन्द्र ने उन रुपयों को कहाँ रखा है। दोनों लड़कों को भी इसकी जानकारी नहीं है। महेन्द्र उन रुपयों को बैंक के वोल्ट या घर में नहीं रखता। इसकी जानकारी सिर्फ उसे ही है । सुरबाला को भी उसने इसकी मोटे तौर पर जानकारी दे दी है । महेन्द्र ने नीम की दातून से दाँत रगड़ते-रगड़ते भौंह सिकोड़कर एक बार घर की ओर ताका । उसकी दोर्घकालीन निरीह मुख-मुद्रा पर क्रोध की झलकजरा भी नहीं आती है, हालांकि उसके अन्दर क्रोध, घृणा इत्यादि का वास है। उसके पचपन साल के मुटापा बढ़े औसत लम्बे कद के शरीर में निरीह भाव है। सिर के बालों का रंग धूसर है और वे पतले हो गए हैं। काठी सख्त या मजबूत नहीं है, मगर दुर्बल या वीमार जैसी भी नहीं । जीवन जीने की छाप उसके जिस्म या चेहरे पर इस कदर है कि अपनी उम्र से अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा ही बूढ़ा दीखता है। खड़े होने की भंगिमा तनकर खड़े होने जैसी नहीं है, कंधा जरा ऊपर की ओर झुका रहता है। नाक-नक्श देखने से लगता है, किसी जमाने में देखने में अच्छा ही रहा होगा। आँखें अब भी बड़ी-बड़ी हैं और बीमारी की कहीं छाप नहीं है। नाक तीखी नहीं, मगर खड़ी है। सारे दांत अब भी मौजूद हैं, फिर भी जब-जब मौसम में परिवर्तन आते हैं तो कई बरसों से दांत की जड़ें सूज जाती हैं और तकलीफ देती हैं । साल में कम से कम दो बार दांत के डॉक्टर के पास जाना पड़ता है।

एक ही जिन्दगी माजकल बीच-बीच में रक्त-चार भी बढ़ जाता है। उसके लिए भी जांच करानी पड़ती है, दवाखानी पड़ती है। डॉक्टर एक ही बात की तारीफ करता है और वह यह कि महेन्द्र किसी प्रकार के नशे का सेवन नहों करता। कभी वह चार-पांव बरसों तक सिगरेट पीता रहा, उसके बाद एक साल तक सुंधनी और पान का सेवन करता रहा । अब कुछ भी इस्तेमाल नहीं करता। बड़े नशे का सवाल पैदा हो नहीं होता। फिर भी महेन्द्र के चलने-फिरने के तौर-तरीके में तीव्रता का भाव नहीं है। भले हो पाव घसीट कर चलने जैमा भाव नहीं है मगर भयरता और धीरता अवश्य रहती है। मानो उम्र के बोझ से योड़ा-बहुत शुक गया हो। हालांकि ऐसा होना नही चाहिए था। दरअसल यह सब जीवन जीने की लम्बे अरसे की विशेष मंगिमा और अभिव्यक्ति है। महेन्द्र ने आंख घुमाकर सुरवाला को ओर देखा। सुरवाला भूता, आटा, चना, रात के भात का मांड़ और मशीन से कटे पुआल के छोटे- छोटे टुकड़ों को आपस में मिलाकर तीनों नांदों में वरावर-बराबर रख रही है। तीनों गाएं उसी ओर ताक रही हैं। महेन्द्र की तुलना में सुरवाला नाटो है पर उसकी काठी अब भो मजबूत है । कान और ललाट के पास के कुछ बालों में सफेदी आ गई है। मगर ज्यादातर बाल काले ही हैं। चेहरे का लावण्य अभी बिलकुल मलिन नहीं हुआ है, आंधों के नीचे और ललाट पर कुछ सलवटें पड़ गई है। काले रंग की होने के बावजूद किसी जमाने में सुरवाला अनायास हो माखों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। कलकत्ते में नौकरी करने के दौरान, देश के बंटवारे के पूर्व, देस जाकर महेन्द्र ने विवाह- रानि में पहले-पहल मुरषाला को देखा था। लड़की की पसन्दगी उसके पिता ने को यो । उसके पिता का कहना था, दरअसल मां काली ही लक्ष्मी हैं । सरस्वती भी वे ही हैं । सुरबाला सचमुच ही लक्ष्मी है और इस सम्बन्ध में महेन्द्र को कोई सन्देह नहीं है । बड़े भाई नरेन्द्र की शादी महेन्द्र को शादी के चार साल पहले हुई थी। देश-विभाजन के पहले ही - २४ एक ही जिन्दगी मां का देहान्त हो चुका था । बाबूजी जिन्दा थे। कलकत्ता आने पर शुरू में वे बड़े भाई के घर में टिके थे। तव बड़े भाई का यादवपुर में पक्का मकान बन चुका था। महेन्द्र का दमदम रेल-लाइन के इस पार डेढ़ कठे जमीन पर मिट्टी की दीवार और टाली के छाजन का मकान था। एकाध वर्ष बाद जाने क्या हुआ कि बाबूजी महेन्द्र के पास चले आए। बाबूजी ने यद्यपि मुंह खोलकर कुछ नहीं बताया, फिर भी महेन्द्र का अनुमान था कि भाभी के बर्ताव से बाबूजी के मन में तकलीफ पहुँची है। वह स्वयं भी डरता था कि सुरबाला टाली के उस मकान में बाबूजी के साथ अमन-चैन से रह पाएगी या नहीं। महेन्द्र सुरबाला की ओर ताककर अनमनेपन में डूब गया था। उसने फिर सुरबाला की ओर गौर से देखा । सुरबाला अभी तीनों गायों के लिए अलग-अलग बनी नांदों में सानी रख रही है। खाना खाने के पहले गाएं सुरबाला के गाल और माथे को सूंघकर चाट रही हैं । सुर- बाला कह रही है, "लाड़ बाद में करना, पहले खाना खा लो।" विदेशी गाएँ सुरबाला की हर बात समझ जाती हैं। गाय पालने का शौक सुरवाला को ही था। लेकिन तब इन विदेशी गायों के बारे में सोचा भी नहीं था। महेन्द्र को उसके विभागीय सेक्रेटरी साहब ने इस बात की सलाह दी थी। यह सुनकर कि वह गाय खरीदना चाहता है, उन्होंने कहा था, "देखो महेन्द्र, गाय पालना है तो फिर आस्ट्रेलियाई गाएँ ही खरीदो। अच्छी तरह लालन-पालन करोगे तो ज्यादा दूध ही नहीं मिलेगा, घर की शोभा भी बढ़ेगी। बड़े-बड़े मारवाड़ी आजकल वही गाय पालते हैं । सो घर की शक्ल जितनी ही साहबीनुमा क्यों न हो मगर गाय का लालन-पालन करना वे ही जानते हैं । न्यू अलीपुर जैसी जगह के तमाम पैलेसों में आजकल उसी किस्म की गाएं पाली जाती हैं। लक्ष्मी की दया से तुम्हारे पास पैसे का अभाव नहीं है । अगर तुम कहो तो मैं खुद हरिणघाटा की डेयरी से बातचीत कर इसका इन्तजाम करा हूँ। हरेक की कीमत तकरीबन हजार रुपया लगेगी। हमें भी बीच-बीच । -- सिहोरिन्दनी 'में तुम्हारेपर कोरके दूक, रसन्देश चखने कोनिता।" महेन्द्र को बात नई पीपराकर सुरराला से कहा तोवर राजी हो गई। दुबसुरत, बड़े-बड़े हन के जोड़ों को देखकर खुशी हुई दी। नरमाने का जब दल द्वारपा तो उन्हें बेस- गांडया के एस नुसत्तमान के झगड़े में ले जाना पापा का एक- मात्र कारोबार पा न मिन-भिन्न नलों के बांडों गानों को परतो कराना । उसके वान्टेनियाई चाह को देखकर महेन्द्र का कलेजा कार उठा था। मटियाने वार काले रंग के मिला-जुला उतकारोरजितना विशाल पा, वर्षे मी तीतह निदाड़ जैसी तासन्मान यो। भर से गाएं भी बनीन पर नई यौ। उसके बाद सांड़ के मानिक उस मुसलमान ने बांड कामवान बनाकर गायों को खड़ी कर उसमें बांध दिया था। तब सांड़ ने बसना कान किया था। महेन्द्र ने सोचा था, कहीं गायों की मौत न हो जाए। अव सोचता है तो हंसने का मन करता है। गायों को मौत नहीं हुई थी, बल्कि उन्होंने बच्छी तरह हो गर्भ धारण किया था। उस समय सुरवाला ने गायों का भरपूर सेवा-यल किया या । वड़ा जनने के वक्त खुद ही धाय का काम किया था। उस समय सुरो का चेहरा देखने लायक था। घर में गाएँ न लाई जाती तो सुरो के उस चेहरे और परित्र का पता ही नहीं चलता । सुरो पर निगाह जाते ही उसे बचान के समय मां के द्वारा गो-सेवा की बात याद आ जातो है । सुरो मा की तरह ही अहलेस्सुवह जगकर दूध दुहतो है । इसके लिए एक गैर वंगालो वाले के साथ इन्तजाम किया गया है। वह भी उसी समय आता है 'लेकर चला जाता है । घर के लिए भो थोड़ा-बहुत रख लिया जाता है। महेन्द्र भी पो पटने के पहले ही सुरवाला के साय जग जाता है और दातून मे मुंह धोता है: मुग्बाला को काम प देख रहा है और : ‘रहा है, मुरबाला और ૨૬ एक ही जिन्दगी. के अन्दर एक गुण है और वह यह कि गृहस्थी के हर काम-काज में अपने आपको ढाल लेना । असुविधा भी होती है तो आसानी से इसका अहसास नहीं होने देती है। मसलन अभी देखकर कौन कहेगा कि इस स्त्री के पास कम से कम एक सौ रत्ती सोने के जड़ाऊ गहने हैं ? इसी तरह उसने बाबूजी की सेवा मृत्यु के आखिरी दिन तक डेढ़ कट्टे को माटी-टाली के मकान में की थी। बाबूजी शान्ति के साथ ही मरे थे । बशर्ते मृत्यु को यदि शान्ति कहा जाए। भले ही बीमारी की तकलीफ तो दूर नहीं की जा सकती है। महेन्द्र ने मुग्ध आंखों से सुरवाला की ओर ताका । संतानधारण की क्षमता अब उसकी पत्नी में न रही। महेन्द्र में भी अब कोई खास काम-वासना नहीं है। उसमें कभी भी काम-वासना की अधिकता न थी। अब उनका दांपत्य जीवन बहुत कुछ आस-पास बैठकर सुख-दुःख, हिसाब-किताब, हाट-बाजार, खान-पान, ज्वर-बुखार इत्यादि की चर्चा तक सीमित रह गया है । सुरवाला अब भी अपने हाथों से रसोई पति और बाल-बच्चों को खिलाती है। घर पर काम-धाम लिए दो से अधिक आदमी नहीं रखे हैं । अधेड़ विधवा सरला. का काम कर रही है और एक पन्द्रह-सोलह साल का लड़का र के अन्दर चूल्हा सुलगाकर दूध गरम कर रहा है। इसी बीच गैरज के पीछे बछड़ों ने रंभाना शुरू कर दिया है। सुरबाला ने जल्दी-जल्दी नादों में हाथ चलाते हुए तेज आवाज में कहा, "जाती हूँ भैया, तुम लोगों को छोड़ देतो हूँ।" और वह. सीधी खड़ी हो गई । कमर ऐंठ गई है। सीधी खड़ी हो वह कुछ लहमों तक खड़ी ही रही और फिर गैरेज के पिछवाड़े की ओर चली गई। देखते न देखते तीन रंग-बिरंगे बछड़े दौड़ते हुए आए, अपनी-अपनी मां के थनों में सिर मारकर चूचुक से दूध पीने लगे ।क्षण-भर के लिए सानी खाना भूलकर गायों ने गरदन घुमाई और माथा झुकाकर बछड़ों को चाटा। महेन्द्र ने देखा, सुरबाला गैरेज के पिछवाड़े से निकल सामने आई। , ." :

एक हो जिन्दगो तभी उसके कानों में नये सिरे से फिर मतो और सती के झगड़े के शन्द माए । उसको भौहों पर बल पड़ गए, लेकिन उसने सुरवाला से कहा, "तुम कमर के दर्द को बावत बता रहो पो। आज सरला हो सानी-पानी करती तो अच्छा रहता।" "उम्र ढल रही है, अब बहुत-कुछ होगा ।" सुरबाना बोली, "ऐमा हो तो भी काम पड़ा हुआ नहीं रहने दिया जा सकता है। केवल सानो- पानी की ही बात नहीं है, दुहेगा कौन ?" सुरयाला चेहरे पर मुसकराहट लिए नल की ओर चली गई। महेन्द्र भी उसके पीछे हो लिया और बोला, "जिस वाले का गोपाल या कुछ ऐसा ही नाम है, उसने कहा था कि वह दुह दिया करेगा।" ग्वाला यानी जो दूध ले जाता है। मुरबाला ने नल के छोटे से चबूतरे पर खड़ी हो जैसे ही उसकी टौंटी खोली, पानी बाहर निकल आया । बगीचे के काम के लिए ही किसी जमाने में नल लगाया गया पा-नल की टोंटी में पाईप लगाकर बगीचे को सींचने के लिए। वह मुंह-हाय धोते-धोते बोली, "गोपाल नहीं, महावीर । सो मैं दुहने में जब एकदम असमर्थ हो जाऊंगी तो महावीर दुह दिया करेगा।" सरला गैरेज की खटाल की सफाई करते-करते बोली, "थन में जो- सो आदमी हाथ लगाए तो गाय दूध देना नहीं चाहती। देती है तो भी उसकी तादाद कम हो जाती है । सभी क्या हर गाय को दुह सकता है ?" महेन्द्र का चेहरा सरला की ओर था। उसके बाद सुरबाला को ओर ताका । मुंह के कड़वे थूक को थूककर कहा, "हाँ, इस तरह की बात सुनने को मिली है । जाना-पहचाना ग्वाला न हो तो गाय पहले को तरह दूध देना नहीं चाहतो । लेकिन धन में दूध रहेगा तो गाय उमे अपनी इच्छा से कहां रखे रहेगी?" सुरवाला ने महेन्द्र की ओर ताका । उसको आँखों में एक रहस्यमरी आमा पेल गई, उसके बाद वह हँस पड़ी। महेन्द्र इस हसो और आँखों की दृष्टि से अपरिचित नहीं है । इससे सुरवाला का एक गरि- २८ एक ही जिन्दगी हास प्रमाणित होता है जो सबके सामने कहा नहीं जा सकता । महेन्द्र आगे बढ़कर सुरवाला के पास चला आया और बोला, "तुम कुछ कहना चाहती थी ?" सुरबाला ने सरला की ओर एकवार देखते हुए मद्धिम स्वर में कहा, "औरत क्या अपने आपको हर मर्द को सौंप देती है ? उसमें भी भावना की बात रहती है।" अविश्वसनीय धन उपार्जन करनेवाले निरीह महेन्द्र को झुकी आँखों में संशय और जिज्ञासा का भाव कौंध उठा । बोला, "भावना?" "हाँ; तुमने सुना नहीं है कि गाय-बछड़े में प्रेम रहे तो वह जंगल में जाकर भी दूध देती है।" सुरबाला ने कहा, "सारा दूध प्राप्त करना हो तो प्रेम की आवश्यकता पड़ती है वरना थन में भरा हुआ दूध रहने पर भी गाय उसे वाहर निकालना नहीं चाहती।" यह कहकर अपने कहने के अन्दाज में बदलाव लाकर बोली, "लो, मुंह धोलो, मैं जाकर रसोई का इन्तजाम करूं।" महेन्द्र के चेहरे से संशय का भाव पूरी तरह दूर नहीं हुआ, हालांकि भावना की वात का उसने बहुत-कुछ अनुमान लगा लिया। हर औरत को जिस तरह हर मर्द सुखी नहीं कर सकता, उसी तरह जो-सो व्यक्ति हर गाय को दुह नहीं सकता। उसके बाद उसने भौंहों को सिकोड़ कर कहा, "तुम्हारे दोनों लड़के रात बीतते न बीतते किसलिए झग- ड़ना शुरू कर देते हैं ?" "झगड़े की बात वे ही जानें । सुरवाला ने निर्विकार स्वर में कहा, "इसीलिए तो तुमसे कहती है कि इन लोगों को शादी करा दो।" सुरवाला यह बात बहुत बार कह चुकी है। घर की ओर जाती सुरबाला की ओर ताकते हुए महेन्द्र ने कहा, "शादी करा देने से ही उनका झगड़ा खत्म हो जायेगा ?" "झगड़ा खत्म नहीं होगा।" सुरवाला घर के पिछवाड़े के दरवाजे एक हो जिन्दगी २६ को मोर जाती हुई बोली, "तब शायद वे अपनी-अपनो पलियों से हो झगड़ा करेंगे।" बाप रे ! वह तो और भी भयंकर बात होगी । उस समय घर में टिकना भी मुश्किल हो जाएगा। लेकिन असली तथ्य क्या यही है ? महेन्द्र के मन की जटिलता और अधिक गहरी है । उसकी आँखों के सामने बड़े भाई नरेन्द्र का चेहरा तिर उठा । शादी के पहले जब दोनों व्यक्ति मेस में रहते थे उस समय भैया महेन्द्र से हर वक्त डाँट-फटकार के स्वर में बातचीत करता था। महेन्द्र को हालाकि मन ही मन ऊब का अहसास होता था मगर वह जबान से कुछ नहीं कहता । तभी से उसके चरित्र में खामोशी और निरीहता का भाव आ गया था। इसका मतलब यह नहीं कि वह अन्दर-अन्दर निर्विकार था। उसके बाद जब भैया की शादी हो गई तो महायुद्ध की समाप्ति के पहले ही वह अपने लिए अलग से किराये का मकान ले वहां चला गया । झगड़ा-टंटा नहीं हुआ था । एक अनिवार्य घटना की तरह ही भैया महेन्द्र को मेस में रखकर, किराये का मकान ले देश से भाभी को ले आया था। महेन्द्र ने सोचा था, भैया अब उसे घर पर बुला लेगा। भैया ने ऐसा कभी नहीं कहा । भाभी को ले आने के बाद, महीने में एक बार, रविवार को अपने घर पर खाना खिलाने बुलाता था। शुरू में महेन्द्र ने भैया के आचरण को, मनायास ही अलगाव के तौर पर स्वीकार नहीं किया था। मन ही मन उसे विस्मय हुआ था, अभिमान हुमा था और तक- लोफ का भी अहसास हुआ था। लेकिन यह सव बात कभी उसने किसी को नहीं बताई। निर्विकार भले ही न हो मगर निरीह भाव से गृहस्थी के स्वरूप को पहचानने की कोशिश की थी। घर के अन्दर मती और सतु को आवाज बन्द हो गई। महेन्द्र समक्ष गया, सुरबाला ने जाकर बीच-बचाव किया है। नल को टोंटो खोल उसने कुल्ला किया । मसूड़े के दौत से दातून को बीच से चोरकर काफी देर तक आवाज करते हुए जीभ छीलता रहा। उसके बाद मुंह एक ही जिन्दगी प्रमाणित होता है जो सबके सामने कहा नहीं जा सकता । महेन्द्र । बढ़कर सुरवाला के पास चला आया और बोला, 'तुम कुछ कहना हती थीं?" सुरवाला ने सरला की ओर एकबार देखते हुए मद्धिम स्वर में कहा, 'औरत क्या अपने आपको हर मर्द को सौंप देती है ? उसमें भी भावना की बात रहती है।" अविश्वसनीय धन उपार्जन करनेवाले निरीह महेन्द्र को झुकी आँखों में संशय और जिज्ञासा का भाव कौंध उठा । वोला, "भावना ?" "हाँ; तुमने सुना नहीं है कि गाय-बछड़े में प्रेम रहे तो वह जंगल में जाकर भी दूध ने देती है।" सुरवाला ने कहा, "सारा दूध प्राप्त करना हो तो प्रेम की आवश्यकता पड़ती है वरना थन में भरा हुआ दूध रहने पर भी गाय उसे बाहर निकालना नहीं चाहती।" यह कहकर अपने हने के अन्दाज में बदलाव लाकर बोली, "लो, मुंह धोलो, मैं जाकर सोई का इन्तजाम करूँ।" महेन्द्र के चेहरे से संशय का भाव पूरी तरह दूर नहीं हुआ, हालांकि भावना की बात का उसने बहुत-कुछ अनुमान लगा लिया। हर और कों जिस तरह हर मर्द सुखी नहीं कर सकता, उसी तरह जो-सो व्य हर गाय को दुह नहीं सकता। उसके बाद उसने भौंहों को सिक कर कहा, "तुम्हारे दोनों लड़के रात बीतते न बीतते किसलिए - ड़ना शुरू कर देते हैं ?" "झगड़े की बात वे ही जानें । सुरवाला ने निर्विकार स्वर में : "इसीलिए तो तुमसे कहती हूँ कि इन लोगों को शादी करा दो।' सुरवाला यह बात बहुत बार कह चुकी है। घर की ओर की ओर ताकते हुए महेन्द्र ने कहा, "शादी करा देने उनका झगड़ा खत्म हो जायेगा?" "झगड़ा खत्म नहीं होगा।" सुरवाला घर के पिछवाड़े के एक हो जिन्दगी को ओर जाती हुई वोलो, "तब शायद वे अपनी-अपनो पलियों से हो झगड़ा करेंगे।" वाप रे ! वह तो और भी भयंकर बात होगी। उस समय घर में टिकना भी मुश्किल हो जाएगा। लेकिन असलो तथ्य क्या यही है ? महेन्द्र के मन की जटिलता और अधिक गहरी है । उसकी आँखों के सामने बड़े भाई नरेन्द्र का चेहरा तिर उठा । शादी के पहले जब दोनों व्यक्ति मेस में रहते थे उस समय भैया महेन्द्र से हर वक्त डॉट-फटकार के स्वर में बातचीत करता था। महेन्द्र को हालाकि मन ही मन कब का अहसास होता था मगर वह जवान से कुछ नहीं कहता । तभी से उसके चरित्र में खामोशी और निरीहता का भाव आ गया था । इसका मतलब यह नहीं कि वह अन्दर-अन्दर निर्विकार था। उसके बाद जब भैया की शादी हो गई तो महायुद्ध की समाप्ति के पहले ही वह अपने लिए अलग से किराये का मकान ले वहाँ चला गया। क्षगड़ा-टंटा नहीं हुआ था । एक अनिवार्य घटना की तरह ही भैया महेन्द्र को मेस में रखकर, किराये का मकान ले देश से भाभी को ले आया था। महेन्द्र ने सोचा था, भैया अब उसे घर पर बुला लेगा। भैया ने ऐसा कभी नहीं कहा । भाभी को ले आने के बाद, महीने में एक बार, रविवार को अपने घर पर खाना खिलाने बुलाता था। शुरू में महेन्द्र ने भैया के आचरण को, अनायास ही अलगाव के तौर पर स्वीकार नहीं किया था। मन ही मन उसे विस्मय हुआ था, अभिमान हुआ था और तक- लोफ का भी अहसास हुआ था। लेकिन यह सब वात कभी उसने किसी को नहीं बताई । निविकार भले ही न हो मगर निरीह भाव से गृहस्थी के स्वरूप को पहचानने की कोशिश की थी। घर के अन्दर मती और सतु की आवाज बन्द हो गई। महेन्द्र समझ गया, सुरबाला ने जाकर बीच-बचाव किया है। नल को टोंटी खोल उसने कुल्ला किया। मसूड़े के दांत से दातून को बीच से चोरकर काफी देर तक आवाज करते हुए जीभ छीलता रहा। उसके बाद मुंह एक ते-धोते उसके अन्दर एक जिज्ञासा उठी, बाबूजी ने क्या कभी सोचा T कि भैया उससे अलग हो जायेगा ? महेन्द्र-नरेन्द्र की गृहस्थी अलग- लग हो जायेगी? महेन्द्र ने झुककर लुङ्गी से मुंह पोंछा और मन ही मन इसका उत्तर दिया, बाबूजी ने यद्यपि दोनों लड़कों के अलग होने की बात नहीं सोची होगी, पर इसे दुनिया की एक स्वाभाविक घटना के तौर पर ही स्वीकार लिया था। मां इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकी थी। क्योंकि बाबूजी ने महेन्द्र को पत्र लिखा था : नरेन्द्र ने अलग से किराये का मकान ले लिया है और बहू को अपने साथ ले गया है । मेस में अब तुम अकेले हो। इससे तुम्हारी माँ बहुत ही व्याकुल रहती है। तुम सब कुछ पर गौर करते हुए सावधानी से रहना । कलकत्ता शहर में हो, इसीलिए ऐसा कह रहा हूँ। इतने दिनों तक तुम दोनों भाई एक साथ थे, अब अलग-अलग हो जाने से तुम्हारे और नरू (नरेन्द्र) दोन के लिए विशेष सावधानी से रहने की आवश्यकता है। इत्यादि इत्यादि । बाबूजी ने माँ की बेकली के बारे में लिखा था, किसी तर का निजी मनोभाव प्रकट नहीं किया था, सिर्फ अकेले में सावधा बरतने की सलाह दी थी। इसका अर्थ यही है कि बाबूजी ने इस वि को दुनिया की अनिवार्य घटना के तौर पर मान लिया था। घर के अन्दर जाने के पहले महेन्द्र ने एकबार गायों की ओर से दरअसल वह गायों को नहीं देख रहा था, एक निष्ठुर संभावना में सोच रहा था। मती-सतु का यह झगड़ा असल में भविष्य में अलगाव का ही संकेत है । छोटा लड़का दस साल का नीतू अभ दर्जे में पढ़ता है। भविष्य में, हो सकता है वह भी अपने भ अलग हो जाए। या फिर बड़े भाई ही उसे अलग कर दें। छाती के श्वास में भारीपन आ गया। यह सब बात सोच उदास हो जाता है । मन भले ही उदास हो जाए मगर दुनिय तौर-तरीके पर ही चलेगी । जैसा कि उसके साथ हालात 0 .

. है नो वन एक हो । नल और समाज है । अग्ने अपने परफे से दुनिया में प्रतिष्किार बोकमाए लो मोलतों के हार में पुराने मोरलगता फि मरिष्य हम पोशाला me के लिए कह मापन में मारपीट और मुरमा इतना जरूर है कि महेन ने के भाव में होगी बोर रिसाद के परे सल्ले हो कर कर दिए । रोपमा वको सरंपचीकर महेन्द्र रिजाई के पास के आदा) घर काही हिला विकास र लो; उतना नहीं है। घर के सामने बाहेर है. आने के सनम, बीच के दरवाजे से देश का सोनी तरफ आमने-सामने तीन-तीन छोडे कमरे है। स बार think रसोई और भोजन का कमरा । दूसरी ओर मायम गलियाराम के पिध्वाहे के दरवाजे तक चला गया है। तमाम नगरों मेl हिस्से में प्लास्टिक इमलसन पेंट किया गया है, किसी ने लाल, किसी में नीला और किसी में क्रीम । फर्श और मोमें अभीब तरह रम- विरंगे मोजाइक किए गए हैं । देखते हो समहा में भामाता दे ५॥ योजना में रुचिहोनता को छाप है. पैसे की शाहलना है। अन्दर दीवारों के प्लास्टिक पेन्ट गये है, जगह-जगह हा हा और तरह-तरह की लकीरें खिंगी हुई है। हर मार लागीर विस्तर है मगर कोई साफ-सुपरा नहीं है। राम पुनित विध है। हालांकि अलमारी, लकड़ों को भरागनी, शैला, माराम, महेन्द्र बेशक यह सब पराम्द ही मारताना एक ही जिन्दगी ? पसन्द नहीं था कि बाहर के कमरे को सोफा सेट से सजाया जाए। सजाने से हुआ ही क्या ? तमाम असबाब गर्द-गुबार से भरे हैं । सुरवाला का सारा समय दोनों वक्त की रसोई पकाने और पति-बाल-बच्चों को खिलाने मे ही निकल जाता है। बाकी जो कुछ करने को होता है सरला और पद्रह-सोलह साल का मदन करते हैं । इतना बड़ा मकान, इतने सारे कमरे, इसलिए करीने से सजाकर रखना उनके द्वारा नहीं हो पाता है। ऐसा संभव होता यदि उस प्रकार कोई उनका निर्देशन करता । सुरवाला मे भले हो बहुत सारे गुण हैं लेकिन घर को सहेजकर रखने का उसमे रुचिबोध नहीं है। इतना जरूर है कि महेन्द्र के मन में इन बातों के संबंध में कभी कोई सवाल पैदा नहीं हुआ। भोजन-कक्ष में मेज है । लेकिन वह एक किनारे पीढ़ा बिछाकर कांसे के थाल में भात खाता है । गलियारे की दहलीज के आमने-सामने के कमरों में से दाहिने ओर के आखिरी कमरे में वह और सुरबाला रहते हैं। दोनों के पलंग विस्तर अलग-अलग हैं । सुरवाला के बड़े पलंग पर नीतू अब भी माँ के साथ सोता है। आमने- सामने के दो कमरों में मती और सतु रहते हैं । मदन रसोईघर के एक किनारे सोता है। सरला सवेरे आती है और शाम को घर वापस चली जाती है। दोमंजिले की सीढ़ी के पास वाले कमरे में लक्ष्मी, काली इत्यादि के पट रखे हुए हैं। उस कमरे को सुरवाला स्वयं ही साफ-सुथरा रखती है। पति और लड़के जव घर से बाहर निकल जाते हैं तो नहा-धोकर, देवता को जल अर्पित करती है । संध्यावेला में रोशनी जलाती है, धूप- दीप बालती है, शख बजाती है और प्रत्येक वृहस्पतिवार को लक्ष्मी की पूजा करती है, शनि, सत्यनारायण आदि के माहात्म्य की पोथी पढ़ती है। महेन्द्र ने पिछवाड़े के दरवाजे से घर के अन्दर घुसते हुए देखा, सुरबाला रसोई घर में जा चुकी है। उसने अपने कमरे के भीतर जाकर देखा, पूरब की खिड़कियां बन्द हैं । सुरवाला के पलंग पर अब तक एक हो जिन्दगी मच्छरदानी टंगी है। नीतू गहरी नींद में घोया है। महेन्द्र ने मच्छरदानी खोलते-खोलते आवाज दी, "नीतू, अरे नीतू, ठ, काफो वेला हो चुकी है । आँख-मुंह धोकर पढ़ने बैठ जा।" नीतू ने अंगड़ाई ले, बाबूजी की ओर देखा और उसके बाद उठकर खड़ा हो गया। महेन्द्र ने खुद ही मच्छरदानी को पलंग को पाटी पर रख दिया। नीतू कमरे मे बाहर निकल गया। महेन्द्र सवेरे नोंद से जगते हो अपनो मच्छरदानी सहेजकर रख देता है । कमरे में असवाव नाम भाव का ही है। स्ट्रोल को एक आलमारो। एक किनारे एक छोटो- सी गोल मेज और कुर्सी। दोनों खिड़कियों के बीच पुराने जमाने की एक ड्रेसिंग टेबुल । किसी तरह की सजावट नहीं। कई दराजवालो छोटे पाये की मेज पर एक आईना । सामने बैठने के लिए कोई तिपाई भी नहीं। महेन्द्र ने पहले खिड़कियां खोली । कमरे में रोशनी और हवा माने लगी। चालू पंखे का स्विच बन्दकर, ड्रेसिंग टेवुल को दराज खोल, लकड़ी का एक छोटा-सा बक्सा और एक अण्डाकार आईना बाहर निकाले । कमरे के दूसरे किनारे मेज पर आईना और बक्से को रखकर, बक्से से ऐलूमिनियम का एक कटोरा, दाढ़ो बनाने का साबुन, प्रश और सेपटी रेजर निकाले । पिछले दिन का ब्लेड घो-पोंछकर रखा हुआ है। ऐलूमिनियम के कटोरे को अपने साथ ले, कमरे के बाहर वाथरूम जाकर पानी ले आया और कुर्सी पर बैठ गया। ब्रश से चेहरे पर जैसे ही साबुन लगा रहा था कि अचानक मोटर साइकिल को परंपरहिट सुनाई पड़ी। समूचा मकान जैसे कांप उठा। कांपना स्वाभाविक है। दोनों मोटर साइकिलें बाथरूम के बगल वाले खाली कमरे में रखी रहती हैं। सुरवाला को बात पर दोनों लड़कों के लिए यह माफ़त की पुड़िया उसे खरीदनी पड़ी है। लड़के मोटर खरोदने की जिद कर रहे थे। महेन्द्र राजो नहीं हुआ। दोनों लड़कों के लिए दो मोटर साइकिलें उसे खरीद देनी पड़ी। कारण ? कारण यह ३४ 'एक हो जिन्दगी कि लड़कों को काम की वजह से बहुत-सी जगहों का चक्कर लगाना पड़ता है, वे व्यस्त रहते हैं और वक्त पर उन्हें आना-जाना पड़ता है। बस-ट्राम पर चढ़कर इतने बड़े कारोबार का हर जगह निगरानी करना मुमकिन नहीं है। इसलिए सुरबाला ने कहा था, "मोटर गाड़ी को जरूरत नहीं है, उन दोनों को तुम दो मोटर साइकिल खरीद दो । हर रोज तकाजा करते-करते मेरा दिमाग चाट रहे हैं।" महेन्द्र भी बेशक महसूस करता है, मती और सतु को काम के सिल- सिले में कलकत्ते की बहुत सारी जगहों का चक्कर लगाना पड़ता है- वैक से बैङ्कशाल कोर्ट तक टैक्सी से भी यह काम किया जा सकता है। लड़कों का तर्क था, उसमें खर्च अधिक पड़ता है। इसमें अविश्वास करने लायक कोई बात नहीं है । महेन्द्र टैक्सी पर भी नहीं चढ़ता है। उसके चलने-फिरने का तरीका अलग किस्म का है। लड़कों के लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं है। पिता की तरह समय की पाबन्दी का पालन करना और नपे-तुले कदमों से चलना उनके लिए संभव नहीं है । दो मोटर साइकिल खरीद देना यों कोई मुश्किल बात नहीं, मगर खर्च का सिलसिला एकवार बढ़ जाए तो फिर उस पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता । वह बढ़ता ही जाता है । इसके अलावा कलकत्ते की जो हालत है, कब क्या दुर्घटना हो जाए, यह भी सोचने की बात है। मोटर साइकिल की आवाज से खीझकर महेन्द्र ने चेहरे पर साबुन लगाया । हर रोज, लगभग इसी वक्त, मती और सतु दाढ़ी बनाने और स्नान करने के पूर्व, दो चक्केवाली दोनों गाड़ियों को. जांच-पड़ताल करते हैं । उनकी आवाज हालांकि बर्दाश्त के बाहर है, फिर भी बर्दाश्त करना पड़ता है और वह जल्दी-जल्दी दाढ़ी बनाने का काम खत्म कर लेता है । गुसलखाने में जाकर देह-हाथ-पैर सिर में तेल लगाता है, नल की टोंटी के पास बाल्टी रख, मग से पानी ढालते हुए जल्दी-जल्दी स्नान कर लेता है । अंगोछे से बदन पोंछ, पहनी हुई धोती को उतार, अंगोछा लपेटे ही कमरे के अन्दर चला आता है। अलगनी पर रखा अण्डरवियर एक हो जिन्दगी पहनता है, उस पर धोती । चुन्नट के अगले हिस्से को कमर में खोंस लेता है । अलगनी के सामने ही रैक पर से अधवाही कुरता उतारकर पहनता है । ड्रेसिंग टेबल के पास जा, एक तरह से घुटनों के बल बैठ- कर, बालों पर कंधो कर मांग निकालता है। उसके बाद कमरे से बाहर आ, बाथरूम के निकट से होते हुए दोमंजिले की सीढ़ियां चढ़ता है और पूजा-धर में जाता है । उसने न तो किसी को गुरु बनाया है और न ही गुरु मंत्र लिया है । संध्या आह्निक पूजा-पाठ का झमेला उसके साथ नहीं है। फिर भी वह नहाने के बाद एक बार पूजा घर में जाकर देवता के पटों के सामने खड़ा होता है, आंख मूंदकर, हाथ जोड़कर प्रणाम करता है और मन ही मन कहता है, "दुःख-विपत्ति से रक्षा करो, शत्रु का विनाश करो।" इस वक्त उसकी आंखों के सामने गणेशचन्द्र एवेन्यू के दफ्तर का कमरा तिर आता है। राइटसं के दफ्तर के कमरे, सेक्रेटरी और अफ- सरों के चेहरे, विभिन्न व्यावसायिक प्रतिष्ठान-जिनसे उसका लेन-देन का हिसाब चलता है साथ हो होसियारी फैक्टरी, प्रेस, वाइंडिंग कार- खाना वगैरह । उसके बाद वह नीचे उतरकर सोधे भोजन-कक्ष में जाता - सुरवाला भी तैयार रहती है। तब हां, दाल-भात-भुजिया पीढ़े के सामने परोसकर कहती है, "जरा धीरे-धीरे खाओ, अभी समय है। मछली का झोल अभी तुरन्त नीचे उतारना है।" महेन्द्र के सामने सब कुछ तसवीर की नाई तिर आता है । मोटर साइकिल की जांच-पड़ताल मतो कर रहा था। सतु इस बीच बाजार से सामान लेकर आ चुका है । अब गुसलखाने में पहले जाने के सन्दर्भ में दोनों में फिर चख-चुन होगा। यह रोजमर्रा की वारदात है । नीतू बाहर के कमरे में चिल्ला-चिल्लाकर पढ़ रहा है। सिर के ऊपर पंखा न चलता होता तो गरम खाना मुंह के अन्दर रखना मुश्किल था। फिर भी खाना खाकर उसने हाथ-मुंह धोया, स्टोल को आलमारी खोलकर एक ही जिन्दगी घड़ी देखी-आठ बजकर बीस मिनट । घड़ी में चाबी दे उसे बायें हाथ की कलाई में बांधा और कपड़े की एक छोटी थैली को खींचकर बाहर निकाला। हाथ में ले उसके अन्दर झांककर देखा उसके अन्दर अलग- अलग गुच्छे में तरह-तरह की माप को चाबियाँ हैं । इसके अलावा एक खाता, एक कलम, तीन चेक-बहियां । थैले को बाएं हाथ की मुट्ठी में डाल कुहनी से दवा लिया । अन्दर के एक ढक्कन को खोल, तीन-चार रुपये की रेजगारी सामने की जेब के अन्दर बनी जेब में डालते हुए, आलमारी बन्द कर उसमें ताला लगा दिया। अलगनी के पास से छाता ले, घर से बाहर आ, रसोईघर के दरवाजे पर खड़ा होकर बोला, "सुरो, लो चावी रख लो।" "सुरवाला उठकर आई और कमरे की आलमारी की चाबी ले ली। महेन्द्र बोला, "चलता हूँ।" "जाओ।" सुरबाला फिर चूल्हे की तरफ चली गई। महेन्द्र ने हर कमरे में झांककर देखा-मती और सतु दोनों ड्रेसिंग टेबुल के सामने खड़े हो, मूछों को ज्यों का त्यों रखते हुए, दाढ़ी बना रहे हैं । महेन्द्र ने दोनों से सिर्फ इतना ही कहा, "मैं चल रहा हूँ। सब काम ठीक से करना । तीसरे पहर फिर मुलाकात होगी।" " मती-सतु दोनों ने हामी भरी। महेन्द्र जैसे ही बाहर के कमरे में आया, नीतू पढ़ाई छोड़कर उछल पड़ा। महेन्द्र के चेहरे पर हलकी मुसकराहट तिर आई । सामने की अन्दरूनी जेब से एक रुपया निकाल नीतू के हाथ में थमाते हुए कहा, "फालतू चीज में खर्च मत करना।" "आप तो बस हर रोज एक ही बात दोहराते रहते हैं।" नीतू ने होंठ लटकाकर लाड़ भरे स्वर में कहा, "मेरे लिए साइकिल खरीद देने की बात थी, उसका क्या हुआ ?" महेन्द्र दरवाजे को ओर कदम बढ़ाते हुए बोला, "यह तो तुम्हारी माँ ने कहा है। हाथ-पैर से जरा लम्बे हो जाओ, फिर तुम्हारी मां ही खरीद देगी।" TRA एक ही जिन्दगी ३७ "हाय-पैर से जरा और सेवा हो जाऊँगा तो मोटर साइकिल हो चलाऊँगा।" नीतू ने कहा, "मेरे जैसे कितने ही लड़के साइकिल चलाते हैं। उन्हीं की साइकिल चलाकर मैंने सोखा है।" महेन्द्र दरवाजे को सिटकनी खोलते-खोलवे बोला, "हो जाएगा, इतनी जल्दीवाजी क्यों ? ले, दरवाजा वन्द कर दे।" वह देहरी को सीढ़ियां तयकर नीचे उतर गया। नीतू वाप के पीछे-पीछे उतरकर माया और बोला, "मोह बाबूजी, आपसे एक बात कहना भूल गया था। हम लोगों के स्कूल के पास एक कार्निवल हो रहा है, वहाँ बहुत ही अच्छी आइसक्रीम मिलती है। दो आइसक्रीम की कीमत कम से कम चार रुपया लगता है।" कानिवल क्या चीज है ?" महेन्द्र ने पूछा। नीतू ने कहा, "मेला।" "दो आइसक्रीम लेकर क्या होगा ?" "मेरा एक दोस्त और मैं खाएंगे।" "चार रुपया बहुत ही ज्यादा कीमत है ।" यह कहते हुए अन्दर को जेब से और तीन रुपये निकालकर देते हुए कहा, "इतनी कीमती चीज खाने की जरूरत ही क्या है ? दोस्त को खिलाने की जरूरत हो क्या "यह सब बात आपको समझ में नहीं आयेगी बाबूजो, क्योंकि आपके तो कोई दोस्त-मिन्न नहीं हैं।" नीतू मुड़कर घर के अन्दर चला गया। महेन्द्र फाटक के पल्लों को खोलते हुए नीतू की ही बात दोहराने लगा, "आपके तो दोस्त-मिन नहीं हैं।" फाटक के बाहर जाकर पल्लों को खोंचकर बन्द कर दिया, गलो. कूचों से जाते हुए उसे एक ही बात बार-बार याद आने लगी, "आपके तो दोस्त-मित्र नहीं हैं।" वह बहुत सारे चेहरे को यादकर सोचने की कोशिश करने लगा। सचमुच उसका कोई दोस्त-मित्र नहीं है। इस ३८ एक ही जिन्दगो वात पर उसने कभी विचार नहीं किया था। आज एकाएक नीतू की बात सुन, बहुत सोचने-विचारने पर भी याद नहीं कर सका कि दुनिया में उसका मित्र कौन है-वास्तव में मित्र कहने से जो बात समझ में आती है । मसलन मती-सतु के भी बहुत से दोस्त-मित्र हैं जिन्हें व्याव- सायिक स्थानों में देखने से महेन्द्र को खीझ होती है। यहाँ तक कि आस-पास के मुहल्लों के किसी-किसी घर की महिला भी सुरवाला से गपशप करने आती है, और सुरवाला कहती है, वे. लोग उसकी सहेली तुल्य हैं । लेकिन महेन्द्र के साथ यह बात नहीं है । आश्चर्य की बात है! क्यों नहीं है ? किस तरह दोस्ती की जाती है ? किससे की जाती है ? और दोस्ती करने से लाभ ही क्या है ? महेन्द्र के मस्तिष्क में यह बात चक्कर काटने लगी और वह गली- कूचों का चक्कर लगाता हुआ बड़ी सड़क पर चला आया। बड़ी सड़क पर इस बीच यान-वाहन और लोगों की भीड़ उमड़ आई है । वह एक वस-स्टैण्ड की भीड़ से दूर हटकर, खाली स्थान पर खड़ा हो गया। कलाई उठाकर घड़ी देखी, आठ बजकर चालीस मिनट । दिमाग में दोस्त की भावना चक्कर काट रही है। याद आया, क्लाइव स्ट्रोट के कम्पनी के दफ्तर में काम करने के समय, सुकुमार नामक एक युवक उसकी काफी घनिष्ठता हो गई थी। उसके साथ कई दिन टॉकी और थियेटर देखे थे। बड़ा भाई नरेन्द्र सुकुमार को जरा भी पसन्द न करता था। वह बड़ा ही खुशमिजाज और जिन्दा दिल था । वह भैया को भी साथी बनाना चाहता था मगर भैया रूखेपन के साथ जाहिर कर देता था कि उसे यह सब पसन्द नहीं । महेन्द्र को अलग से डांटता था कि वह सुकुमार से अधिक घनिष्ठता न बढ़ाये । इसका नतीजा यह हुआ कि सुकुमार से मिलने-जुलने के लिए उसे बड़े भाई को धोखा देना पड़ता था । कई महीने के बाद अलवत्ता महेन्द्र ने महसूस किया था कि सुकु- मार जिम्मेदारी से कतराने वाला खुशमिजाज किस्म का आदमी है । से

एक ही जिन्दगी
ययोंकि महेन्द्र को बगैर जताये जसे वह केरल
ले गया था।
महेन्द्र को सिर्फ बेचैनो का हो रहा होड में का
पा। फिर भी सुकुमार में एक बार टरका कीया। बताता
तो उसका जवाब दिये बगैर रहा नहीं किन महेन्द फिर
फभी उसके साथ वजित मुहल्ले में होस । बहुत अनुरोध करने पर
भी शराब नहीं पी । तब हां, यह मौका है जिसमा जान
था और वह दिल-दरिया रिसादने या । महतो ने मन
एक भी पैसे की मांग न की पौ।हेल नहीं मानता किनकी
नौकरी न मिली होती तो वह सागर के साथ बह गम का र
गया होता । अलहदा जगह नकिन्ने के काम की
से अलग हो गये थे।
महेन्द्र को यह भी याद कर लिबडे भाई की गई
अलग होने के दरमियान राइ के कुल देसम पन्टर
यो । लेकिन उसी समय मा म बात कर
आई और उसके अन्दर वही नाका
शादी के बाद सेक्रेटरी और बल न छोडार मि
धनिष्ठ रूप में हेलमेन नहीं पाया। हालांकि परिवारम
और हो तरह को पोजिशन्देन और आसी नहमति भर
थी। सहो मानो में वहन महाधिारियों के एल.
पर ही अलग-अलग नामों का और परमिट का इन्तानमा
पा और फिर धीरे-धीरे भन्ने दूसरे-दूसरे व्यवसायों को बढ़ा लिन
महेन्द्र के चेहरे पर हलो मुसकराहट तिर आई । नहीं, नोटा
कहना ठीक नहीं है। मामी दोस्त पा, आज भी है । और
मुरबाला । महेन्द्र नै भने कुमार नहीं रखा है। गोपन,
जो कुछ भी गोपनीय बात हो सस्तो है उन दोनों के बीच ती गी".'.
।
थी और मात्र मी है।

एक हो जिन्दगी मुसाफिरों से ठसाठस भरी एक गाड़ो बस-स्टैण्ड पर आकर खड़ी हुई । महेन्द्र ने चकित दृष्टि से एक बार वस के नम्बर और ड्राइवर को देखा। ड्राइवर ने वहां से अपने माथे पर हाथ रखकर प्रणाम किया। महेन्द्र ने अपने सिर को झटका । ठसाठस भरी रहने के बावजूद वह बस यात्रियों को लादे ही स्टैण्ड से महेन्द्र के सामने आकर खड़ी हुई । ड्राइवर ने झट से सामने वाली बाईं तरफ का दरवाजा खोल दिया। महेन्द्र भी अविलंब हाथ बढ़ाकर खिड़को की सलाख को थामे अन्दर घुस गया और दरवाजे को बन्द कर दिया। वह ड्राइवर की बगलवाली छोटी सीट पर बैठ गया। "यह सब क्या हो रहा है ? स्टैण्ड से बाहर आकर ड्राइवर की बगल में आदमी क्यों बैठाया जा रहा है ?" मुसाफिरों की जमात के कुछ लोग तल्खी भरी आवाज में चिल्ला उठे। "भाई साहब के लिए क्या महीने-भर के लिए यही बन्दोवस्त है ?" किसी-किसी ने टिटकारी दी और आवाज कसी । कन्डक्टर बगैर कुछ जवाब दिये, बैग झनकारते हुए पैसा लेकर टिकट देने लगा। महेन्द्र के प्रति उसी प्रकार टिटकारी, व्यंग्य, आक्रोश और बेइंसाफी के खिलाफ चिल्लाने का दौर चलता रहा। महेन्द्र खामोशी ओढ़े सामने की ओर ताकता रहा । बस जोरों से चल रही है । क्या कहा जाए । लोग-बाग उसे हर रोज इस तरह चढ़ते देखकर भी जब यह नहीं समझ पाते कि किसी खास वजह से ही उसे सामने की सीट पर बैठाया जाता है, तो वह क्या कह सकता है ! क्योंकि, चिल्लाकर उन्हें यह नहीं बताया जा सकता कि इस रूट की दो बसों का वही मालिक है और यह गाड़ी उसो की है। कहा जाए तो मुसाफिरों की जमात जनतांत्रिक अधिकार की चर्चा करने लगेगी, और इसके चलते निश्चित रूपेण झमेला बढ़ेगा। इससे तो अच्छा यही है कि टिटकारी और गाली-गलौज की परवाह ही न की जाये। इस समय महेन्द्र की तीन रूटों में छह बसें चलती हैं। सारी बसें एक हो जिन्दगी ४१ इलहौसी से अलग-अलग जगहों में आती-जाती हैं । अतः वह ठोक रामय पर, सिंडिकेट के नियम और समय के मुताबिक, अपनी बस के सामने की सीट पर बैठकर याना करता है। उसके लड़कों के लिए इस ऽयवस्था से तालमेल रखते हुए चलना नामुमकिन है । दस बजने में जब दस मिनट बाकी थे, महेन्द्र दफ्तर पहुँचा । दो- चार-सिक्युरिटी के आदमी, दो-चार प्यून और बेयरों के अलावा अय तक कोई नहीं आया है। महेन्द्र के दफ्तर के विभागीय बड़े बाबू की कुर्सी खाली है । हाजिरी-वही उसके डेस्क में बन्द है और वहां ताला लगा है । लेकिन उसका काम रुका नहीं रहता है । सेक्रेटरी साहव साढे दस तक ही आ धमकेंगे। शुरू में उन्हें कौन-कौन सी फाइलें देनी हैं, उन्हें वह सहेजना शुरू कर देता है। वह उनमें से हरेक फाइल को, जिन पर 'कॉन्फिडेन्शल' और 'टॉप सिक्रेट' का चिह्न दिया हुआ है, अपनी आलमारो का ताला खोलकर बाहर निकालता है और उनके अन्दर के कागजात देखता है । हस्ताक्षर करने के स्थान पर कलम से निशान लगा देता है । जो सब सन्देहजनक पन या नोटिस लगते हैं उन्हें अलग कर रख देता है और मन ही मन कैफियत का विवरण भी तय कर लेता है। एक बार महेन्द्र को दफ्तर के बड़े बाबू का पद देने की भी चर्चा चली थी। बड़े वाबू के काम से भी उसका काम अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका पता इसी से चल जाता है कि बड़े बाबू की मेज के अलावा सिर्फ उसी को मेज पर टेलीफोन है । इसके अलावा उसके लिए एक निश्री आलमारी भी है। दरअसल इस कमरे में उसे बहुत ही कम समय रहना पड़ता है । ज्यादा से ज्यादा वक्त उसे सेक्रेटरी के बगल वाले छोटे में कमरे में बिताना पड़ता है जिससे कि पुकार सुनते ही उपलब्ध हो गई। मंत्री भी किसी कारणवश बुला सकते हैं । महेन्द्र के बिना वे एकदा भी आगे नहीं बढ़ पाते हैं। बीच-बीच में सेक्रेटरी के साय में भी दो के कमरे में जाना पड़ता है।

४२ एक हो जिन्दगी - महेन्द्र के लिए काम ही सब कुछ है। वह दफ्तर को दलबन्दी में नहीं रहता। यह काम हालांकि बड़ा हो कठिन है, फिर भी वह ताल- मेल बिठाकर चलता है। जो जितने ही चन्दे की मांग करता है, दे देता है। किसी प्रकार के झगड़े-टंटे में नहीं रहता। सबके बीच रहकर भी वह जैसे सबसे अलग-थलग है । सेक्रेटरी और उनके सहयोगी अफसरों के अलावा उसका किसी के साथ कोई काम नहीं रहता। वह कैन्टिन में खाने नहीं जाता। टिफिन नहीं लेता है। खुद सेक्रेटरी साहब का ऑर्डर है, तबीयत ठीक न रहने के कारण सवेरे दस से दो बजे तक लगातार काम करने के बाद उसे छुट्टी मिल जाती है । महेन्द्र के सह- कर्मियों ने भी इस तथ्य को स्वीकार लिया है। क्योंकि उनकी भी निगाह में महेन्द्र निरीह, कमजोर और दुर्वल है, लेकिन काम से जी चुरानेवाला आदमी नहीं। बहुतेरे लोग उसे क्षमा-घृणा की दृष्टि से देखते हैं, लेकिन उसका व्यवसाय और रुपये पैसे की बात बहुतों को परीकथा जैसी लगती है। यही वजह है कि बहुत से लोग उसे सन्देह की नजर से देखते हैं और तरह-तरह की फरमाइश करते हैं। ऑफिस में उसके पैसे से मिठाई खाना तो लगा ही रहता है, इसके अलावा बहुत से लोग मुहल्ले की पूजा, उत्सव इत्यादि के लिए बारहों महीने कुछ न कुछ वसूलते ही रहते हैं। महेन्द्र दुर्वल मनुष्य की भंगिमा में हंसता है, असहाय की तरह दान करता है और कहता है, "आप लोग मेरे बारे में जैसा सोचते हैं, वैसा नहीं हूँ। यकीन कीजिये, मेरा अपना कुछ भी नहीं है, सब कुछ परिवार का है।" महेन्द्र के असली रक्षक सेक्रेटरी, मंत्री के पी० ए० तथा अन्यान्य अफसर हैं जो अचानक ही वीच-बीच में कुछ रुपये की मांग कर बैठते हैं या मुसकराते हुए पार्क स्ट्रीट का खालो और सजा-सजाया फ्लैट एक- दो दिन के लिये मांग लेते आज काम खत्म होने के बाद स्वयं सेक्रेटरी ने ही महेन्द्र से पार्क एक ही जिन्दगी ४३ स्ट्रीट के फ्लैट को चावी दो दिन के लिये मांग लो। आमतौर से छुट्टी के दिन के पहले फ्लैट को चाची को ज्यादा खोज-पड़ताल होती है । लेकिन इस सप्ताह को फार्यावधि में कोई छुट्टी नहीं है। फिर भी महेन्द्र ने व्यस्तता के साथ सेक्रेटरी के हाथ में चावो थमाते हुए कृतशता के साथ कहा, "लीजिये सर, पिछले सप्ताह चक्रवर्ती साहब ने चावी ली थी, मकान को हालत कैसी है, मालूम नहीं।" "आपको यह सब सोचना नहीं है, में सारा इन्तजाम कर लूगा।" सेक्रेटरी ने चावी जेब में डाल ली। दरअसल महेन्द्र को तमाम खबरें मालूम हैं । डुप्लिकेट चाबी ले वह बहुत बार फ्लैट के अन्दर जाकर देख चुका है। ड्राइंगरूम में शोशे फा गिलास टूटा पड़ा है। मेज पर शराब की बोतल । प्लेट में मनखाये खाद्य-पदार्थ का ढेर। सोने के कमरे में सिगरेट के टुकड़े इधर-उधर बिखरे हुए, गिलास में बची हुई शराव, छोड़ा गया लिपस्टिक तपा और भी बहुत सारी औरतों के द्वारा इस्तेमाल में लाई गई छोटी-मोटी वस्तुएँ । एक वार तो एक जड़ीदार नेकलेस भी बिस्तर पर पड़ा हुआ मिला था और एक बार एक कीमती साडी। इतना जरूर है कि सब कुछ उसने ठीक ठिकाने पर पहुंचा दिया था। घर की हालत देखकर उसे दुःख होता है। कोई-कोई फ्रिज खुला ही छोड़कर चल देता है। लगातार कई दिनों तक बत्ती जलती रहती है। डर लगता है, कहीं किसी दिन कोई पाइप गैस खुला रखकर न चल दे। महेन्द्र हर वक्त हुप्लिकेट चावी से फ्लैट खोलकर उसे मादमी से साफ-सुथरा कराता है। विस्तर को सहेज देता है। तरह-तरह की खुशबुओं का उसे पता चलता है, बहुतेरी रमणियों के विलामपूर्ण अंग-प्रमाधनों का सर्श फमरों में विखरा है। मगर वह इन सब बातों के संदर्भ में अधिक सोचता नहीं है । समय होते हो सेक्रेटरी साहव को नमस्कार कर बाहर निकल आया। यहाँ से गणेश एवेन्यू तक पैदल हो जाता है। वहाँ 'सरकार एण्ड सन्त अट एक ही जिन्दगी वाइल्स एण्ड ट्रांसपोर्ट एण्ड अदर कन्सर्न्स प्राइवेट लिमिटेड' है। वहां वह जैसे ही पहुँचता है उसके जैसे मामूली किरानी पर नजर पड़ते हो सभी घवरा उठते हैं । महेन्द्र में किसी तरह की घबराहट नहीं दीख पड़ती। उसके लिए अन्दर के कमरे के एक कोने में एक छोटी मेज और कुर्सी पड़ी रहती है । दो डिरेक्टर—मती और सतु-के अतिरिक्त और दो आदमी सामने वाले ऑफिस के कमरे में बैठते हैं । एकाउन्टेन्ट का कमरा अन्दर है। बस और लॉरी का व्यवसाय इसी ऑफिस से परिचालित होता है। किस-किस मार्ग में कौन-कौन-सी बसें कितने मुसाफिरों को लादकर गई हैं, कितनी कीमत के कितने टिकट बिके हैं, उसका हिसाव यहीं मिलता है । दूर-दराज जाने वाली भारी ट्रके कहाँ कौन-सा माल लेकर गई और कौन कहाँ से आई है और कितनी रकम मिली है, उसका भी हिसाब-किताव यहीं रहता है। इसके साथ ही सब कुछ का हिसाब-किताव है-मरम्मत, दुर्घटना, गैरकानूनी पार्किङ्ग " और तरह-तरह के हानि-नुकसान का । महेन्द्र का आदेश है, सब कुछ लिखित रूप में रखना है। जवानी तौर पर कोई हिसाब-किताब नहीं रह सकता है । शुरू के दिनों में वैसी ही व्यवस्था थी। महेन्द्र ने हरेक कागज और खाते को गौर से देखा । इस काम में पांच बज गये। इस बीच वह कुछेक टिप्पणियां कर चुका है । एक मार्ग में टिकट-विक्री का सिलसिला धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, हालांकि उस मार्ग में अव भी सरकारी बस नहीं चलती है। एक दूर-दराज जाने वाली ट्रक सिर्फ आधे माल को ही लदाई हुई है। इस तरह का ऑर्डर फिर कभी नहीं लिया जाये, इस बात को उसने हिदायत की। क्योंकि इतना रुपया देकर भारी ट्रक से कोई इतना कम माल चलान नहीं करता। यह सब संदेहजनक व्यवसाय है। कुछ खरीदे गये गाड़ी के पास की कीमत बाजार की कीमत से मिल नहीं रही है। उसके बाद ढेर सारे चेक आए । महेन्द्र ने तमाम चेकों को देखा और अपने थैले से खाता निकालकर प्रत्येक चेक की राशि और विवरण दर्ज कर लिए । कुछेक में एक हो जिन्दगी . कागजात पर हस्ताक्षर किये और एक गिलास पानी पीकर बाहर निकल आया। महेन्द्र गणेशचन्द्र एवेन्यू से पैदल चलता हुआ सेन्ट्रल एवेन्यू के मोड़ पर माया । आगे बढ़कर ट्रैफिक के बायें घड़ा हो गया। फलाई उठा- कर घड़ी की ओर देखा, पांच मिनट में ही मुसाफिरों से लदी एक प्राइवेट बस आई और सवेरे की तरह ही यह बस के आगे, ड्राइवर की बगल में, वैठ गया और फिर बाकायदा गाली-गलोज को शुरुआत हो गई। वह विवेकानन्द रोह के मोड़ पर उतरा। वहाँ से पैदल बहे प्रेस के अंदर आया । वहाँ भी पहले जैसा ही दृश्य है । सभी व्यस्त हो उठे। महेन्द्र ने अपनी जगह पर बैठ सारे कागज-पत्तर, ऑर्डर, चेक, प्रेस का हिसाव और काम को रफ्तार पर नजर दौड़ाई । यहाँ कुछेक दो नंबर के कारोबार हैं। तमाम कारोबार में दो नंबर का काम चलता है। प्रेस में एक घंटा विताकर, माणिकतल्ला के मोड़ पर आकर बड़ा हुआ । कलाई घड़ी पर नजर दौड़ाते ही मुसाफिरों से लदी एक प्राइवेट बस आकर खड़ी हुई। पहले की तरह हो वह अगली सीट पर बैठ गया और फिर व्यंग्य और गाली-गलौज का सिलसिला चल पड़ा। प्रधान शाजार मोड़ के अगले पड़ाव पर नीचे उतरा। वहां से पैदल चनता हा एक गली के अन्दर होसियारी फैटरी में आया। यहां मौ में न प्रतिशत महिलाएं कार्यरत हैं। फैक्टरी का नाम है होसियारी एम। 'एस' बड़े अदार में लिखा है। यहां सिर्फ हिसाब-किताब ही नहीं कर पड़ती है, बल्कि महिलाओं को तरह-तरह की शिकाय मी वर्ग पड़ती हैं । महेन्द्र एकमात्र मैनेजर हरिपद मुखर्जी से दाते कहा है। साफ-साफ कहता है, "जो सब सूअर की औलाद महिना सलूक करते हैं, उन्हें एक घंटे के नौटिम पर भगा दें।" वह यह मव महिलाओं और मुजरिमों को मुनाकर होगा। क्योंकि महिलाओं की ओर से यही अभियोग सदा है इतना जरूर है कि कारणाने की तमाम औरतें दूध को ४६ एक ही जिन्दगी यह बात भी महेन्द्र अच्छी तरह जानता है और महिलाओं को सुनाते हुए कहता है, कारखाना काम की जगह है न कि बदमाशी की जगह । यहाँ जो लोग गन्दी हरकत करें उन्हें उनका बकाया चुकाकर तत्क्षण विदा कर दें!" महेन्द्र ने महिलाओं के संदर्भ में यद्यपि किसी गन्दे शब्द का इस्ते- माल न किया परन्तु बदचलन मर्द कर्मचारियों के प्रति 'सूअर की औलाद' का उच्चारण उसके जैसे निरीह व्यक्ति के मुंह से बड़ा ही बेमानी जैसा लगा। स्वाभाविक तौर पर वह किसी तरह के गाली- गलौज करने का अभ्यस्त नहीं है और न ही उसके गाली-गलौज से किसी प्रकार का आक्रोश टपकता है। उसकी धारण है, इन स्थानों में इस तरह की थोड़ी-बहुत बातें की जा सकती हैं। लेकिन मन ही मन उसे बेचैनी का अहसास होता है। उसे मालूम है, हर जगह मेहनतकश लोगों के बीच भले-बुरे होते हैं और वह किसी के चरित्र में फेर-बदल नहीं ला सकता। फिर भी उसे कुछ न कुछ कहना पड़ता है, खासकर 'शिकायत सुनने पर। होसियारी फैक्टरी का मैनेजर हरिपद मुखर्जी मोटे तौर पर ईमान- दार है। इतना जरूर है कि ईमानदारी का पैमाना प्राप्य राशि पर निर्भर करता है। यहां आमतौर से बनियान, मोजा, औरतों का नसियर, उभय लिंग की पैंट्री और जंघिया होते हैं। उत्पादन के लिये जितनी तादाद में धागा मिलता है, उत्पादित सामग्री के हिसाब में गड़बड़ी करनी पड़ती है । और वह गड़बड़ी इस पर निर्भर करती है कि कितने माल पर 'एस' स्टैम्प दिया जाता है और कितने पर नहीं दिया जाता है। स्टैम्प दिये हुए माल का हिसाब सरकार को देना पड़ता है और बगैर स्टैम्प के माल के खरीददार अलहदा हैं। कारोबार के लिये दो नंबर का मामला यों भी अनिवार्य हुआ करता है और किसी व्यवसायी के लिये उसे अनदेखाकर चलना नामुमकिन है। इस दो नंबर में मैनेजर को थोड़ी-बहुत हिस्सेदारी मिलती है और उसकी ईमानदारी का एक हो जिन्दगी पैमाना यही है। यानी उस हिसाब से बाहर वह हाप नहीं लगाता होसियारी के लगभग डेढ घंटे के काम को निवटाने के बाद महेन्द्र अपने थैले को कुहनी से लटकाये बाहर निकल आया । अव उसके लिये पालाईघड़ी को ओर निगाह दौड़ाना जरूरी नहीं है। श्याम बाजार के पांचवें घुमाव के नुक्कड़ पर आकर वह दक्खिन की ओर जाने वाली दाम के पड़ाव पर खड़ा हो गया । इस वक्त उसे सावधान रहना पड़ता है। उसके थैले में प्रेस, होसियारी, अटमवाइल्स एण्ड अदर कन्सनं की मोटी रकम रहती है। जहां तक हो सके लोगों की भीड़ भाड़ में रहता है । वह चाहे तो टैक्सी में बैठ आराम से जिल्दसाजी के कारखाने में जा सकता है । लेकिन जाता नहीं। नकद पैसे जव थैली में रखता है तो हर जगह एक ऐमा व्यक्ति गवाह रहता है, जो अगर न बताये तो किसी दूसरे के लिए यह जानना मुमकिन नहीं है । ट्राम निश्चित समय पर आई। एसप्लेनेड जाने वाली ट्राम में इस वक्त कोई खास भोड़ नहीं रहती है । महेन्द्र दाम में बैठ दोबारा मिर्जा- पुर के मोड़ पर चला आया। नीचे उतर, पैदल चलता हुआ एक टेढ़ी- मेढ़ी गली से जिल्दसाजी के कारखाने में पहुंचा। यहाँ काम दो पाली चलता है-सवेरे छः बजे से रात दस बजे तक। पूजा के पहले तीन पालो भो काम चलाना पड़ता है । जिल्दसाजी के कारखाने में भी कुछ लड़कियां काम करती हैं। महेन्द्र के लिए यहाँ भी अलग से एक छोटा-सा कमरा है । नंगा मेज और कुरसी के अलावा इस कमरे में कुछ नही है, केवल कारखाने फी खास गंध को छोड़कर । मेज पर कुछेक कागज-पत्तर वगैरा । यहाँ जो मैनेजर है वह कभो वाइडिंग कारखाने के यूनियन का सिक्रेटरी था। पिसी जमाने में कुख्यात गुण्डे के रूप में भी उसका नाम था। महेन्द्र ने उसे पालतू बना लिया है और वही जिल्दसाजी कारखाने का मैनेजर है। नाम है सुधीरदत्त । तव हां, मधोनता स्वीकार करने के पीछे एक हो जिन्दगी शर्ते हैं। दोनों के लेन-देन में ये शर्ते अमल में लाई जाती हैं और दूसरों को इस बात की जानकारी नहीं है। इसके अलावा इस मुहल्ले में इस तरह का जमा-जमाया जिल्दसाजी का कारखाना सुधीर जैसे दादा किस्म के आदमी के अतिरिक्त दूसरे के लिए चलाना मुमकिन नहीं है। बाहर आसपास के बरामदे पर तरह-तरह के गिरहों के बरामदेवाज वैठे रहते हैं। प्रत्येक व्यवसायी से उन्हें तरह-तरह की प्राप्यराशि प्राप्त होती है और उस प्राप्यराशि का हिसाब-किताव और लेन-देन सुधीर ही करता है । कई बार महेन्द्र पर आक्रमण हुआ तो उसकी समझ में आ गया कि सुधीर के बिना उसका काम-धाम चल नहीं सकता। क्योंकि बरामदेबाज जेब में हाथ लगाना भी गुनाह नहीं मानते हैं। महेन्द्र ने जैसे ही छोटे कमरे में प्रवेश किया, उसके पीछे-पीछे सुधीर भी दाखिल हुआ। लगभग पैंतालीस मिनट तक प्राप्यराशि और काम का हिसाब-किताव चलता रहा । एकमात्र इसी कारोबार में सुरवाला का नाम है-सुरवाला बाइंडर्स प्राइवेट लिमिटेड । यहाँ बदस्तूर दो नंबर का काम चलता है । महेन्द्र ने खाता निकालकर हिसाब दर्ज कर लिया। चेकों को बैंक में जमा करने को रखा। नकद राशि थैले में रखी। उसके खाते में वेशक असली और दो नंबर दोनों तरह के कारो- वार का हिसाब रहता है और यही खाता उसके तमाम कारोबारों के लाखों रुपये का एक गोपनीय दर्पण भी है। एकमात्र इस खाते को खोलते ही उसकी आँखों के सामने तमाम आय-व्यय की तसवीर स्पष्ट हो उठती है। यहाँ से निकलने के बाद महेन्द्र ने पुनः कलाई घड़ी की ओर निगाह दौड़ाई । पड़ाव पर एक बस आकर रुकी। कुछ ही मिनटों के दर- मियान एक प्राइवेट बस आई, मुसाफिरों से लदी-फंदी और महेन्द्र बदस्तूर सामने की सीट पर आसीन हो गया। आवाज कसने और गाली-गलौज करने की रफ्तार पहले की तरह ही चली । बस माणिक- .

एक हो जिन्दगो तल्ला के नुक्कड़ से मुड़कर सी० आई०टी० रोड की ओर दौड़ने लगी। समय का विशेष ध्यान रखना ही पड़ता है। महेन्द्र इस समय मन ही मन जरा अधिक चंचल हो उठता है। बस सी० आई० टी० रोड के एक बगैर पड़ाववाले स्थान में खड़ी हुई । महेन्द्र नीचे उतर पड़ा। सामने ही एक बहुमंजिली इमारत है । किसी की नजर उस पर नहीं पड़ती है हालांकि दरवान उसे अच्छी तरह पहचानता है । वह लिफ्ट से आठवीं माला पहुंचता है, थैले से झटपट चावी निफाल एक दरवाजे को खोलता है। अन्दर जाकर अभ्यस्त हायों से बत्ती जलाता है। एक विशाल कोठरी, स्टील की एक माल- मारी, संलग्न गुसलखाना । एक वन्द खिड़की के पास एक चौकी, उस पर मामूली बिस्तर । कपर सिलिंग फैन । महेन्द्र ने दरवाजा बन्दकर दिया और गुसलखाने के दरवाजे को खोलकर देखा । उसके बाद दर- वाजे को बन्दकर आलमारी के पास लौट आया। स्टील की आलमारी को खोल, झुककर बैठ गया। जो चीज वन्द चेम्बर जैसी लगी, उसे दोनों हाथों से उठाकर फर्श पर रखा। नीचे का स्टील का ढक्कन बाहर निकल आया। उसके नीचे और कुछ हो सकता है, ऐसा संभव नहीं लगता । लेकिन महेन्द्र ने एक चावी आलमारी के नीचे घुमाकर अत्यन्त अभ्यस्त हापों से एक खास स्थान में चावी को जैसे ही घुमाया, स्टील फा ढक्कन एक किनारे जरा सा सरक गया। वहां केवल सौ-सौ रुपये की गड्डिया है । इसके बाद उसने कपड़े के थैले से एक सौ रुपये के बारह नोट उस चेम्बर के अन्दर डाल दिए। चाबी घुमाते ही स्टील फा ढक्फन पुनः बन्द हो गया । कही कोई फांक नही रही। फर्श पर रखे पावी लगे चेम्बर को उठाकर सिलसिलेवार विठा दिया और चाबी से दूसरा चेम्बर खोला । लगभग पांच-सात सौ रुपये के नोट वहां विखरे हैं । एकबार सरसरी निगाह से देखकर बन्द कर दिया। उसके बाद मालमारी के पल्ले को चाबी लगाकर बन्द कर दिया । यह सारा काम कुछ ही मिनटों में खत्म हो गया । महेन्द्र को पसोना ४८ एक ही जिन्दगी शत्तें हैं। दोनों के लेन-देन में ये शर्ते अमल में लाई जाती हैं और दूसरों को इस बात की जानकारी नहीं है । इसके अलावा इस मुहल्ले में इस तरह का जमा-जमाया जिल्दसाजी का कारखाना सुधीर जैसे दादा किस्म के आदमी के अतिरिक्त दूसरे के लिए चलाना मुमकिन नहीं है। बाहर आसपास के वरामदे पर तरह-तरह के गिरहों के बरामदेवाज बैठे रहते हैं। प्रत्येक व्यवसायी से उन्हें तरह-तरह की प्राप्यराशि प्राप्त होती है और उस प्राप्यराशि का हिसाब-किताव और लेन-देन सुधीर ही करता है । कई बार महेन्द्र पर आक्रमण हुआ तो उसकी समझ में आ गया कि सुधीर के बिना उसका काम-धाम चल नहीं सकता। क्योंकि वरामदेबाज जेब में हाथ लगाना भी गुनाह नहीं मानते हैं। महेन्द्र ने जैसे ही छोटे कमरे में प्रवेश किया, उसके पीछे-पीछे सुधीर भी दाखिल हुआ । लगभग पैंतालीस मिनट तक प्राप्यराशि और काम का हिसाब-किताव चलता रहा। एकमात्र इसी कारोबार में सुरबाला का नाम है-सुरवाला वाइंडर्स प्राइवेट लिमिटेड । यहाँ बदस्तूर दो नंबर का काम चलता है । महेन्द्र ने खाता निकालकर हिसाव दर्ज कर लिया। चेकों को बैंक में जमा करने को रखा। नकद राशि थैले में रखी। उसके खाते में वेशक असली और दो नंबर दोनों तरह के कारो-. वार का हिसाव रहता है और यही खाता उसके तमाम कारोबारों के लाखों रुपये का एक गोपनीय दर्पण भी है। एकमात्र इस खाते को खोलते ही उसकी आँखों के सामने तमाम आय-व्यय की तसवीर स्पष्ट हो उठती है। यहाँ से निकलने के बाद महेन्द्र ने पुनः कलाई घड़ी की ओर निगाह दौड़ाई । पड़ाव पर एक बस आकर रुकी। कुछ ही मिनटों के दर- मियान एक प्राइवेट बस आई, मुसाफिरों से लदी-फंदी और महेन्द्र बदस्तूर सामने की सीट पर आसीन हो गया। आवाज कसने और गाली-गलौज करने की रफ्तार पहले की तरह ही चली। बस माणिक- 7 एक हो जिन्दगी तल्ला के नुक्कड़ से मुड़कर सी० आई० टी० रोड को ओर दौड़ने लगी। समय का विशेष ध्यान रखना ही पड़ता है। महेन्द्र इस समय मन ही मन जरा अधिक चंचल हो उठता है। बस सी० आई० टी० रोड के एक वगैर पड़ाववाले स्थान में खड़ी हुई । महेन्द्र नीचे उतर पड़ा । सामने ही एक बहुमंजिली इमारत है । किसी फी नजर उस पर नहीं पड़ती है हालांकि दरवान उसे अच्छी तरह पहचानता है । वह लिफ्ट से आठवों माला पहुँचता है, थैले से झटपट चावी निकाल एक दरवाजे को खोलता है। अन्दर जाकर अभ्यस्त हाथों से बत्ती जलाता है। एक विशाल कोठरी, स्टील की एक आल- मारी, संलग्न गुसलखाना । एक वन्द खिड़की के पास एक चौकी, उस पर मामूली बिस्तर । कार सिलिंग फैन । महेन्द्र ने दरवाजा बन्दकर दिया और गुसलखाने के दरवाजे को खोलकर देखा। उसके बाद दर- वाजे को बन्दकर आलमारी के पास लौट आया। स्टील की आलमारी को खोल, झुफकर बैठ गया। जो चीज बन्द चेम्बर जैसी लगी, उसे दोनों हायों से उठाकर फर्श पर रखा। नीचे का स्टील का ढक्कन बाहर निकल आया। उसके नीचे और कुछ हो सकता है, ऐसा संभव नहीं लगता । लेकिन महेन्द्र ने एक चावी आलमारी के नीचे घुमाकर अत्यन्त अभ्यस्त हापों से एक खास स्थान में चावी को जैसे ही घुमाया, स्टील का ढक्कन एक किनारे जरा सा सरक गया। वहां केवल सौ-सौ रुपये की गड्डियां हैं। इसके बाद उसने कपड़े के थैले से एक सौ रुपये के बारह नोट उस चेम्बर के अन्दर डाल दिए। चावी घुमाते ही स्टील का ढक्फन पुनः बन्द हो गया । कहीं कोई फांक नहीं रही । फर्श पर रखे पावो लगे चेम्बर को उठाकर सिलसिलेवार विठा दिया और चाबी से दूसरा चेम्वर खोला । लगभग पांच-सात सौ रुपये के नोट वहां विखरे हैं। एकबार सरसरी निगाह से देखकर बन्द कर दिया। उसके बाद मालमारी के पल्ले को चावी लगाकर बन्द कर दिया। यह सारा काम कुछ ही मिनटों में खत्म हो गया । महेन्द्र को पसीना ५० एक ही जिन्दगी छूटने लगा। एक यही ऐसा वक्त है जब उसके जैसा निरीह आदमी भी वेचैन और उत्कंठित दीख पड़ता है। उसके चेहरे की अभिव्यक्ति में जैसे एक चौर्यवृत्ति का भाव स्पष्ट हो उठता है। लेकिन वह पंखे को चालू नहीं करता। जल्दी से वत्ती वुझाकर कोठरी के बाहर चला आया और दरवाजे को जैसे ही खोंचा कि इएल लॉक अपने आप बन्द हो गया। महेन्द्र लिफ्ट के पास जाकर खड़ा हुआ। बटन दबाया । थोड़ी ही देर में लिफ्ट चला आया । वह ऊपर गया। फिर नीचे उतरा। लिफ्ट में उसके साय और दो व्यक्ति थे। मगर उसे कोई पह- चानता नहीं था। महेन्द्र जैसे ही नीचे आया, दरबान ने उसे सलाम किया और सामने खड़ा हो गया । महेन्द्र ने कुरते की अन्दरूनी पॉकेट से दो रुपये का नोट निकालकर उसे दिया। दरवान ने सलाम बजाते हुए पूछा, "इस रविवार को मांजी को साथ लेकर आ रहे हैं न बाबूजी ?" महेन्द्र हर रविवार को दोपहर के भोजन के बाद सुरवाला के इस एक कमरे के फ्लैट में आता है और शाम तक का वक्त यहीं रता है । दरवान की यह दृढ़ धारणा है कि सुरबाला महेन्द्र की पत्नी नहीं है-छुट्टी के दिन कुछेक घण्टे गुजारने लिए उसकी वह संगिनी मात्र है और इसी मकसद से यहाँ एक कमरेवाला यह फ्लैट रखे हुए है । इतना जरूर है कि वह पत्नी का परिचय पत्नी कहकर ही देता है। तमाम इमारत की जो लोग देख-रेख करते हैं वे विश्वास करते हैं और न भी करते हैं। इसके लिए कोई माथापच्ची नहीं करता। क्योंकि किसी-किसी फ्लैट में व्यभिचार का भी कारोबार चलता है, लेकिन इसके बारे में भी कोई कुछ नहीं बोलता। इस तरह. के स्थानों में जिन्दगी जीने में यही सुविधा है। महेन्द्र ने फिर घड़ी पर नजर दौड़ाई और बस के पड़ाव पर आकर खड़ा हो गया। वह जिस नंबर की बस से आया था, वही फिर दमदम के चिड़िया मोड़, श्याम बाजार, माणिकतल्ला होती हुई लौटती है ।

एक हो जिन्दगी बंधा-बंधाया वक्त है । कुछ ही मिनटों में बस आ गई और ड्राइवर ने बदस्तूर सामने का दरवाजा खोल दिया। महेन्द्र जैसे ही सवार हुआ, बस चलने लगी। जब दमदम के चिड़िया मोड़ पर उतरा उस समय रात के साढ़े आठ बज रहे थे । गली से होते हुए जर घर लोटा, सुबह से अब तक बारह घण्टे बीत चुके पे उसे मालूम है, सतु और मति अब तफ नहीं लौटे होंगे। कभी दस के पहले लौटते भी नहीं हैं। महेन्द्र सरकार, राइटस के फिरानो का दिन-भर का जीवन इसी प्रकार व्यतीत होता है। यही हर रोज का सिलसिला है। फाटक से होते हुए अन्दर जाने पर महेन्द्र को कभी चौखट में लगी घण्टी नही बजानी पड़ती है। रोजमर्रा की तरह सुरवाला दरवाजा खोलकर खड़ी थी। महेन्द्र ने घर को रोशनी में एक बार सुरवाला को और देवा और फिर अन्दर की ओर कदम बढ़ाते हुए बोला, "नीतू पाहाँ है ?" "नीतू आज अन्दर के कमरे में पढ़ रहा है। 'सुरवाला ने दरवाजा बन्द करते हुए कहा। महेन्द्र को मालूम है कि बोच-बीच में नीतू बाहरी रुमरे के बजाय अन्दर के कमरे मे बैठकर पढ़ता है। खासकर उस गेज जब प्राइवेट ट्यूटर पढ़ाने नहीं आता। अकेले बाहरी कमरे में बैठकर पढना नातू को अच्छा नहीं लगता। यानी उसे डर लगता है। अभी महेन्द्र के थैले में लगभग पचीस-तीम रुपये थे। उसने गारा पैसा सुरवाला को दे दिया, अगले दिन के गृहस्थी का खन चलाने के लिए । पांच-सात रुपये वह अपने लिए रख लेता है। आलमारो खोल, कपड़े के थैले को अन्दर रखा। कुछ ही मिनटो के दरमिपान रप:- लत्ते उतार, सिर, पीठ और छाती के अलावा मारे अगो को पानी से घो, शरीर पोंछ, लुंगो पहन, भोजन के कमरे में गया। बाना खाने के पहले नीतू को पुकारा, "अभी खाना खाओगे ?"

५२ एक ही जिन्दगी "नहीं, मैं बाद में खाऊंगा।" नीतू ने किताब से नजर न हटाते हुए जवाब दिया। महेन्द्र ने भोजन-कक्ष में आकर देखा, सुरवाला ने पीढ़ा बिछाकर, गिलास रखकर थाली में भोजन परोस दिया है । महेन्द्र बिना कुछ बोले खाने बैठ गया। रात में वह भात नहीं खाता। चारेक रोटी, मछली, सब्जी और वताशा डाले हुए गरम दूध में और दो रोटी । जब वह रोटी, मछली, सब्जी खत्म कर दूध में रोटी-बताशे मिला रहा था, सुरवाला बोली, “सिलीगुड़ी से इरानी ने चिट्ठी भेजी है।" सिलीगुड़ी से इरानी ने ? महेन्द्र ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा, "वह कौन है ?" सुरवाला वोली, "भूल गए ? हम लोगों की नन्दु की शादी के बाद एक वार रविवार को एक वक्त के लिए आ चुकी है। मेरी चाची की वही लड़की जिसका अच्छा नाम है रत्ना।" महेन्द्र दूध में रोटी मिलाते हुए इरानी यानी रत्ना को याद करने कोशिश कर रहा था और वह याद भी आ गई। उसकी आँखों के सामने छब्बीस-सत्ताईस साल की एक लड़की तिर आई। गोरा-चिट्टा कहने से जो बात समझ में आती है, वैसी न रहने पर भी गोरी है। काली-काली आँखें, नाक खड़ी, मगर तीखी नहीं। चेहरा लंबोतरा और मिट्टी की मूरत जैसा दीप्त और आकर्षक । मिट्टी की मूरत से तुलना इसलिए की गई क्योंकि मूरत के शरीर के गढ़न में जिस प्रकार की दीप्ति और अल्हड़पन रहता है, इरानी भी वैसी ही है । वह हंसमुख है, थोड़ी-बहुत शोख भी । महेन्द्र को बहनोई के नाते 'जमाई बाबू' कहकर संबोधित नहीं करती, 'महेनदा' कहकर पुकारती है । नन्दिनी की शादी के मौके पर महेन्द्र ने उसे सिलीगुड़ी के रिश्तेदारों के साथ देखा था। और एक बार थोड़ी देर के लिए इसी मकान में मुलाकात हुई थी। एक दोपहर को खाना खाकर चलो गई थी। किसी जरूरी काम से कलकत्ता माई थी।

एक ही जिन्दगी "याद नहीं आ रहा ?" सुरवाला ने कहा, वही-" महेन्द्र ने टोका, "हां, याद आ गया। तुम्हारे दूर के रिश्ते के चाचा मृत्यु हो चुकी है। शायद नाम था अक्षय मित्तिर--तुम्हारी उसी विधवा चाची की लड़की है न?" "बाप रे ! तुम्हें तो खानदान तक का याद है ।" सुरवाला ने हंसते हुए कहा। महेन्द्र ने मुसकराते हुए दूध से भीगी रोटी मुंह में डाली और उसे यह भी याद आया कि इरानी पुकारू नामवाली उस लड़की को काली आंघों का कटाक्ष पुरुषों के हृदय में सहज ही बिजली की कौंध पैदा फर देती है । भोजन चबाते-चबाते बोला, "पानदान का भी याद आ गया । नन्दिनी की शादी के समय हो तो तुम्हारी उस चाची जी से जान-पहचान हुई । उसके पहले तो उन लोगों को देखा तक नहीं था।" "हां, रिश्ता तो बहुत दूर का है।" सुरवाला ने कहा, "मेरी अपनी चाची नहीं है, चाची की बहन लगती है । मौसी कहना ही अच्छा रहता, मगर हम चाची जी ही फहकर पुकारते आए हैं।" महेन्द्र खाना खाते-खाते बोला, "हां-हां, वह लड़को किसी बैंक में काम करती है न ?" "हां, और इसीलिए खत लिखा है।" महेन्द्र की पेशानी पर सलवटें उभर आई, आँखों में जिज्ञासा का भाव, "क्या ?" "इरानी का तबादला कलकत्ते के हेड ऑफिस में हो गया है।" सुरबाला ने कहा, "तुम खाकर उठोगे और खत देखोगे तो बात तुम्हारी समझ में आ जायेगी।" महेन्द्र का मन बेचैन हो उठा । क्षण-भर में ही उसके मन में एक अनुमान जग पड़ा और रत्ना यानी इरानी का चेहरा उसकी आंखो के सामने तिर आया । हो, इरानी नाम से बंगालियों को जैसे एक जगली, दुष्कर्म में प्रवृत्त, चेहरे की याद आ जाती है, यह इरानी भी बहुत कुछ एक ही जिन्दगी । वैसी ही है । खाते-खाते महेन्द्र को इरानी की हास-परिहास से भरपूर बातें और मुसकराहट याद आने लगी। बातचीत वह फरटि से करती है, शरमोली लड़को नहीं है। लेकिन यही उसके आकर्षण का कारण है। महेन्द्र ने बड़े कटोरे को उठाकर दूध पी लिया और उठकर खड़ा हो गया। गुसलखाना जाकर हाथ-मुंह धोया और अंगोछे से पोंछा। सुर- बाला ने एक लिफाफा उसकी ओर बढ़ा दिया। लिफाफा. हाथ में ले महेन्द्र ने पढ़ते हुए नीतू की ओर ताका और बाहर के कमरे की ओर चला गया। सुरवाला उसके पीछे-पीछे हो ली । महेन्द्र ने स्विच दवाकर वत्ती जलायी और लिफाफे से खत को बाहर निकाला। इस उम्र में भी वह वगैर चश्मे का लिखने-पढ़ने का थोड़ा-बहुत काम कर लेता है। तव हाँ, काम ज्यादा होता है तो ऐसा कर नहीं पाता। खत को बाहर निकाल, उसे आँखों से काफी कुछ दूरी पर रख, पढ़ने लगा, "सुरादी, प्रणाम । एक खास जरूरत की वजह से तुम्हारे पास यह खत भेज रही हूँ। मेरी जरूरत को तुम लोग किस रूप में लोगे, पता नहीं; फिर भी भाग्य की परीक्षा करने के निमित्त लिख रही हूँ। बहुत दिनों तक स्सिल में नौकरी कर चुकी । अब मेरा तबादला कलकत्ते के मुख्या- लय में हो रहा है । कहा जा सकता है कि तबादले की इच्छा मुझे भी थी। मां की जरा भी सहमति न थी। बड़े भैया या भाइयों की भी नहों। लेकिन जब नौकरी ही करनी है तो हमेशा के लिए यहां क्यों पड़ी रहूँ ? अब बात यह है कि कलकत्ता जाते ही कोई मकान या लड़- कियों के किसी होस्टल में सीट मिल जाए, यह बड़ी ही मुश्किल वात है। कम से कम तीन महीने के लिए तुम और महेनदा मुझे अपने घर में टिकने दो तो मैं निश्चिन्तता की साँस ले सकू । वरना मैं तवादले का आदेश नहीं ले पाऊंगी। अन्यथा मत मानना, तुम लोगों के पास टिकने पर मेरा खर्च तुम्हीं लोगों को वहन करना होगा। कलकत्ता के मुख्या- लय में जाने का मतलब है मेरी तरक्की । जब अलग रहूँगी तो अपना खर्च खुद चलाऊँगी। ७.

एफ हो जिन्दगी "अब इस मुद्दे पर तुम और महेनदा मातचीत कर जो सय करोगी, वही होगा। तब हो, तुम्हारी सहमति मिल जाने पर मुझे बेहद प्रसाता होगी, इतना जो जानती ही होगी।" इतनी दूर तक पढ़ने के बाद पाती कुशल-मंगल आदि की मामूली बातें पढ़ने की जरूरत महेन्द्र ने महारा नहीं की। खत को मोड़कर लिफाफे के अन्दर डाल दिया और मुरपाला की ओर कदम बढ़ाते हुए उसके चेहरे को ओर ताका । सुरवाला महेन्द्र के चेहरे पर आंखें टिकाए थी। यत अपने छाप में लेती हुई बोली, "कहो, क्या जवाब दिया जाए ?" महेन्द्र की आंखों के सामने इरानी का चेहरा तैर रहा था । उस मन में दो प्रकार की प्रतिक्रियाएं टकरा रही थीं। किसी नारी के बंध में दोनों प्रतिक्रियाएं उसके जीवन में पहली बार आई थीं। एक क्षम प्रसन्नता और भय के टकराव से उसका मन परथरा रहा था। इतना जरूर है कि उसके निरीह चेहरे पर किसी प्रकार की अभिव्यक्ति जाहिर नही हुई । उसके जीवन की एक विशेष भंगिमा है । वह एक विशेष नरें पर चलता है । किसी औरत के बारे में सोचने को उसे फुसंत नहीं है, सिर्फ होसियारी और जिल्दसाजी के कारखाने की औरतों को छोड़कर। उस सोच का प्रवाह भी भिन्न है, उसका प्रभाव उसके मन में कोई हल- चल नही जगाता । उसके जीवन में, इस लिहाज से, नारी के रूप में एकमात्र सुरवाला ही है। मगर इरानी में एक ऐसा कशिश है दुनिया के तमाम पुरुषों को भयभीत कर सकता है। महेन्द्र इस चीज को मह- सूस कर रहा है । लेकिन वह भयभीत नहीं हुआ था। आज इमाण भयभीत होने का कारण यही है कि इरानी इस मकान में टिकना चाहती है। उसने निरीह भाव से सुरबाला से कहा, "इस सम्बन्ध में मैं मया कहूँ, मुरो? जिस मुद्दे पर कभी सोचा नही, उमरे सम्बन्ध में ताकाप क्या कुछ कहा जा सकता है ?" "सो तो ठीक ही कह रहे हो !" सुरवाला ने कहा, "यमी तुरन्त एक ही जिन्दगी तुम्हें कुछ कहना नहीं है। दो-चार दिन सोच लो, फिर जो तय करने का होगा, करना।" महेन्द्र ने कहा, "तुम्हारी बहन की उम्र भी कुछ कम नहीं है । देखने में भी कोई बुरी नहीं है। घरवालों की ओर से शादी-ब्याह के बारे में सोचा क्यों नहीं जा रहा है ?" "सोचने से ही हो जाएगा ?" सुरवाला ने हंसते हुए कहा, "पढ़ी- लिखी लड़की है, नौकरी कर रही है। उधर गृहस्थी का भी भार संभा- लना पड़ता है । मुझे मालूम है, इरानी के घरवालों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। अभी घरवालों की ओर से ही शादी कराने का कोई आग्रह नहीं है, क्योंकि उन्हें मालूम है, शादी होते ही लड़की से मिलने- वाला पैसा वन्द हो जाएगा। इसके अलावा, नोकरी पेशा लड़की का शादी कराना चाहे भी तो क्या वह तैयार होगी ?" महेन्द्र ने सिर झटकते हुए कहा, "सो तो ठीक ही कह रही हो। तब हां, मेरे विचार में एक खास उम्र की दहलीज पर आते ही लड़- कियों की शादी कर देना अच्छा रहता है । लड़की का मतलब है माथे - का बहुत बड़ा बोझा।" "तुम्हें तो वह फिक्र करना ही नहीं है ।" सुरबाला मुसकराते हुई बोली, “एक ही थी और उसकी वक्त पर ही शादी करके निश्चिन्तता की सांस ले रहे हो।" महेन्द्र ने मुसकराते हुए कहा, "और तुम निश्चिन्तता की सांस नहीं ले रही हो? मैं अकेले ही ?" "ऐसा कैसे कहूँ, मैं भी निश्चिन्तता की सांस ले रही हूँ।" सुरवाला ने कहा, "लड़की की शादी की उम्र हो जाए तो माँ-बाप को चिन्ता होगी ही। तब हाँ, इरानी की बात अलग है । उम्र हो गई है, नौकरी कर रही है । उसके बारे में उन्हीं लोगों को चिन्ता करनी है । 'फलकत्ते में इस तरह की हजारों लड़कियां देखी हैं जो अपने पैरों पर खड़ी होकर उपार्जन करती है और मौज-मस्ती में रहती हैं।" .

एक ही जिन्दगी महेन्द्र सुरबाला के चेहरे की ओर देखकर मुराकराया योला, "यह तो मैं भी देख रहा हूँ। लेकिन वे लोग क्या सचमुच हो मौज-मस्ती में रहती हैं ?" "मैं तुम्हारे कारखाने की लड़कियों के बारे में बात नहीं कर रही हूँ।" सुरबाला नाक सिकोड़ कर बोलो, "वे लोग कितने मौज-मस्ती में हैं, ईश्वर ही जाने।" महेन्द्र के निरीह चेहरे पर उदास हंसो तिर आई; बोला, "बात सही है, सुरो। तुम्हारी बहन इरानी की तरह वे लोग शिक्षित नहीं हैं, बैंक या दफ्तर में काम नहीं करती। उनमें से कुछ अपना नाम भी नहीं लिख पाती हैं । अंगूठे को छाप देकर वेतन लेती हैं। जब कारखाने में आती हैं और वहां से बाहर जाती हैं तो उनका पहरावा दूसरी ही तरह का होता है । देखने से लगता है, लड़कियां खुशहाल हैं । इरानी जैसी लड़कियों को बात ही अलग है, लेकिन मौज-मस्ती में रहना किसे कहते हैं, सुरो?" सुरवाला तत्काल कोई उत्तर नही दे सकी। महेन्द्र की जिज्ञासा का सही-सही अर्थ समझने के लिए उसकी आँखों की ओर खोजी निगाहों से ताका । महेन्द्र के निरीह मुख और आंखों को पुतलियों में हलको हंसो तिर आई। सुरवाला बोली, "क्या कह रहे हो, समझ नहीं पाई, जरा खोलकर कहो।" महेन्द्र को आंखों की पुतलियों का मवूझ हास स्पष्ट हो उठा; बोला, "सीधी बात ही कह रहा हूँ। लड़कियां अगर पढ़-लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होती हैं तो यह बहुत ही अच्छी बात है। लेकिन इतना हो क्या सब कुछ है ? उसे क्या खुशहाल रहना कहा जाएगा? तुम्हीं लोगों का तो कहना है, शरीर और मन का भी कुछ धर्म हुआ करता है। इतना जरूर है कि यह सब बात मेरी समझ में नहीं आती। लेकिन उसका इन्तजाम कैसे किया जाए ?" सुरवाला की चिन्तित धुंधली आँखों में प्रकाश खेल गया। बोली एक ही जिन्दगो "मव तुम्हारी बात समझ में आई । मैंने इतना कुछ सोचकर मौज- मस्ती में रहने की बात नहीं कही थी। आजकल की नौकरी पेशा लड़- कियों को देखने से लगता है कि बिलकुल बेपरवाह हैं, रंगीन तितलियों की तरह उड़ती रहती हैं। मानो, बहुत ही सुखी हों, किसी तरह की फोई चिन्ता नहीं । तुम्हें क्या ऐसा नहीं लगता ?" महेन्द्र ने कहा, “वाहर से देखने से ऐसा ही लगता है। अन्दरूनी वात कौन जाहिर करती है ?" "इरानी के बारे में हमें इतनी माथापच्ची करने की जरूरत ही क्या है ?" सुरवाला ने कहा, "उसकी अन्दरूनी बातें जानने की हमें जरूरत ही क्या है ?" महेन्द्र ने कहा, "कोई जरूरत नहीं। अपना खाकर पराये की परे- शानी मोल लेने से फायदा ही क्या ? तव हाँ, मैं पुराने खयाल का आदमी हूँ, लड़कियों की शादी वक्त पर करना, गृहस्थी चलाना, यही सब बात साफ-साफ मेरी समझ में आती है। नौकरी पेशा लड़कियों की मानसिकता मेरी समझ में नहीं आती और न ही समझने की कोशिश करता हूँ।" "फिर क्या इरानी को तुमने नकार दिया ?" सुरबाला के चेहरे पर आश्चर्य और हताशा का भाव तिर आता है। महेन्द्र ने हँसकर कहा, "नकार क्यों हूँ ? मैं तो बस यही कहना चाहता था कि औरतों की मानसिकता मेरी समझ में नहीं आती। जवाव क्या देना है, तुम्हीं सोचकर तय कर लो।" "मेरे अकेले सोचने से नहीं होगा।" सुरवाला बोली, "तुम्ही असली आदमी हो, तुम जो तय करोगे, वही होगा।" महेन्द्र ने सिर हिलाकर कहा, "नहीं, यह बात ठीक नहीं सुरो। मैं चाहे लाख करूं, मगर गृहस्थी दरअसल तुम्हारी ही है और मैं यह जानता हूँ। मैं तो रात में खाने और सोने आता हूँ, रात बीतने पर फिर खा-पीकर बाहर निकल जाता हूँ । इरानी को क्या जवाब देना है, - एक हो चिन्दको इसकी जिम्मेदारी मुन्नसे बहार तुम्हारो हो है।" "तुमने मुझे चिन्ता में डाल दिया।" तुरबाला बोसों, "माहिर है कि मेरे बाल-बच्चे बड़े हो नुके हैं, उनको रार भी जानना जरूरी है।" महेन्द्र के चेहरे के भाव में कोई परिवर्तन नहीं माया बोला, "तुम्हारे सड़कों के आने में अब भी देर है। में जाकर सो रहता हूँ। भय तुम जाकर नीतू को पाना दे दो।" यह महकर अन्दर जाने के दरवाये को ओर बढ़ते हुए बोला, "तब हां, किसी के बारे में मैं नए सिरे से मापा- पच्ची नहीं कर सकता। मैं अपनी ही चिन्ता से परेशान हूँ।" सुरवाला के चेहरे पर निराशा का भाव तिर भागा। महेन्द्र के पीछे-पीछे जातो हुई बोली, "तुम्हारी राय के बगैर कुछ होना नामुमकिन महेन्द्र उस तरफ मुंह किए बगैर बोला, "तुम लोगों को जो करना हो, फरो; मेरी राय उचित समय पर मिल जाएगी।" सुरवाला के पेहरे पर निराशा के साथ पेगैनी की छामा जार आई। तीसरे दिन रात के समय पाना याकर उठने के बाद सुरवाला तनिक उत्कण्ठा के स्वर में पूछा, "क्यों, इरागी के बारे में मुछ सोचा. विचारा?" "तुमने कुछ सोचा है ?" महेन्द्र ने प्रश्न के बदले प्रश्न किया । सुरबाला बोली, "मैं मती और सतु से पातें फर गुकी है। ये लोग असहमत नहीं हैं।" "उन लोगों की बातें अहमियत नहीं रखती, भरालो मारा तुम्हारी ही होगी।" महेन्द्र ने कहा, "गृहस्थो को बारे में उन्हें जानकारी देही कितनी? या जिम्मेदारी का अहसास ही कितना है?" सुरवाला ने महेन्द्र के निस्पृह चेहरे को ओर एक यार ताका । हैं 10 एक ही जिन्दगी उसकी आँखों में दुविधा है लेकिन व्यग्रता भी । महेन्द्र की अनिच्छा का भाव साफ-साफ जाहिर नहीं हो रहा । इसी ने सुरबाला को चिन्ता में डाल दिया है। उसकी गृहस्थी में इस तरह की घटना का यह प्रथम सूत्रपात है। सुरवाला के मायके के किसी रिश्तेदार ने इस तरह का प्रस्ताव इसके पहले नहीं रखा है । महेन्द्र के रिश्तेदारों के बारे में यही कहा जा सकता है कि वे लोग इस घर से बहुत ही कम संपर्क रखे हुए हैं। सुरवाला हालांकि मन ही मन किसी निष्कर्ष पर पहुँच चुकी है लेकिन महेन्द्र के निस्पृह चेहरे को देखकर वह विना बोले नहीं रह सकी, "तुम्हारा हाव-भाव देखकर मुझे कुछ कहने का साहस नहीं हो रहा है।" "साहस न हो पाने का कारण क्या है ?" महेन्द्र अपने चेहरे पर स्वाभाविक हंसी लाकर बोला, "मैंने तो तुम्हीं पर सारी जिम्मेदारी सौंप दी है । तुम जो कहोगी, वही होगा।" सुरवाला के चेहरे पर गंभीरता उतर आई; बोली, "फिर यही कहो न, कि तुम नहीं चाहते। ऐसी हालत में मैं इरानी को आने के बारे में नहीं लिख सकती। मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं करूंगी।" महेन्द्र ने कहा, "किसने कहा कि मेरी इच्छा नहीं है ? मैं तुम्हारी राय मानकर ही चलना चाहता हूँ, असली बात यही है । इसमें तुम्हारे लिए चेहरा लटकाने की कौन-सी बात है ?" सुरबाला ने महेन्द्र की आंखों की ओर देखा। महेन्द्र भी उसी की ओर ताक रहा था। वह सुरबाला के गंभीर और अभिमान से आहत आँखों की ओर ताकते हुए हँसकर बोला, "गुस्से में क्यों आ रही हो , सुरो। अपने मन की बात साफ-साफ कहो न ।" सुरबाला जैसे थोड़ी-बहुत प्रसन्न हो गई; बोली, "मेरे मन की बार यही है कि जब वह हम लोगों का सहारा चाह रही है तो फिर देना है चाहिए। तीन महीने से ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। दो दिन सोचक देखा, कलकत्ते में सचमुच उन लोगों का कोई नहीं है। होता तो औ कुछ कह देती। मगर"" । -- एक ही जिन्दगी "समा गया।" महेन्द्र हाथ उठाकर सुरवाला की बात के बीच में ही बोल उठा, "लड़कों ने क्या कहा, यह कहने की जरूरत नही तुम्हारी इच्छा है तो इरानी को आने के बारे में लिख दो।" सुरवाला फिर भी महेन्द्र के चेहरे को ओर दुविधापूर्ण दृष्टि से ताकती रही। महेन्द्र ने कहा, "क्या हुआ? अब तो इसमें कोई दूसरो बात नहीं है।" "नही है, यह सही है, लेकिन फिर भी है।" सुरवाला बोलो, "मुझे तो तुम्हारी राय के बारे में लिखना है । फेवल अपनी राय जाहिर कर आने को लिखने से काम नही चलेगा। अपनी राम तुमने अब तक जाहिर नहीं की है।" महेन्द्र ने मुसकराते हुए कहा, "इसके बाद भी अलग से अपनी राय जाहिर गरूँ ? इसमें रखा ही क्या है ? तुम्हारी राय ही मेरी राय है मैं तो सहमति प्रकट कर ही रहा हूँ। जाओ, अव नीतू को खाना दे आओ और मेरी मच्छरदानी लगा दो, मैं लेटना चाहता हूँ।" मुरवाला बोली, "तुम्हें एक बारगी न पहचानती होऊ, ऐसी बात नहीं है। फिर भी तुमने स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं बताया।" "इसके बाद भी स्पष्ट कहने को क्या बाकी रह जाता है ?" महेन्द्र बोला, "तुम्हारी इच्छा है और मेरी भी असहमति नहीं है । इसके अलावा इससे मेरा सरोकार हो क्या है ?" सुरबाला ने मुसकराते हुए कहा, "मुझ पर तुम इतना भरोसा करते हो, पहले यह नहीं जानती थी।" "किसी-किसी चीज के बारे में तुम पर भरोसा करने के अलावा मेरे लिए ही क्या उपाय है ?" महेन्द्र बोला, "खासकर वैसे मामले में जहाँ मैं खुद कुछ नहीं कर सकता। अपनी राय देकर मैं निश्चिन्त हो गया, बाकी सारा कुछ तुम्हें देखना है।" बात और आगे न बढ़ाकर सुरवाला ने नीतू को खाना और फिर मच्छरदानी लगा दी । बत्ती बुक्षाफर महेन्द्र लेट एकाही जिन्दगी भर मेहनत करने के बाद विस्तर पर लेटते ही उसकी आँखों में नींद उतर आती हो, ऐसी बात नहीं। उसके मस्तिष्क को इस वक्त तरह- तरह की चिन्ताएं जकड़ लेती हैं। आज सुरवाला से बातें करने के बाद उसकी आँखों के सामने खास तौर से इरानी का ही चेहरा तिर आया। वह क्या इरानी को दो दिनों से बिलकुल भूल चुका था ? नहीं, भूला नहीं था। एक मामूली किरानी, जिसके जीवन के नेपथ्य में एक विशाल व्यावसायिक जगत की धारा प्रवाहित हो रही है और जिस धारा का हर मोड़ उसे जवानी याद है, वैसे आदमी को भी इरानी के संबंध में किसी सिद्धान्त पर पहुंचने में असुविधा हो रही है। असुविधा से भी अधिक बेचैनी । मौजूदा हालत में इस विषय में कोई जटिलता नहीं है। एक रिश्ते की लड़की आकर कुछ दिन ठहरेगी और इससे उसे बहुत ज्यादा असुविधा अगर न हो तो यह कोई मुश्किल बात नहीं है । बहुतेरे परिवारों में इस तरह की घटना घटित होती है। लेकिन महेन्द्र जानता है, उसके स्वयं के जीवन और परिवार से दसियों परिवार की तुलना नहीं की जा सकती। वह सिर्फ एक कार्य निवृत्ति के समीप पहुँचने वाला किरानी होता तो सारा मामला अत्यन्त सहज-सरल होता। बाहरी आदमियों के लिए भी सहज होता। रिश्तेदार भले ही उसके बारे में जो चाहें कहें, मगर तथ्य की जानकारी उन्हें नहीं के बरावर है । उस दृष्टि से महेन्द्र के जीवन में एक नेपथ्य है। इसके अलावा मुंह से वह चाहे लाख कहे कि इस गृहस्थी में वह केवल रानिवास करता है और फिर वाहर चला जाता है, लेकिन असलो तथ्य यही है कि उसका दिन के अन्त का आवर्तन-प्रत्यावर्तन यही होता है। अपने विशाल कारोवार और जायदाद के उथल-पुथल से अन्दर ही अन्दर वह हमेशा वेचैन और चिन्तित रहता है, स्नायुओं पर तनाव का भार रहता है । फिर भी यही उसके जीवन का नशा है और उससे छुटकारा पाने का रास्ता वह खुद भी नहीं जानता । छुटकारा मिल जाए, ऐसा उसने कभी सोचा भी नहीं एक हो जिन्दगी है। बल्कि सच कहा जाए तो एक तरह से अनायास ही अर्थ-संग्रह का रास्ता मिल जाने से उसने जिन्दगी के बाकी दिनों की तरफ आंख उठा- फर भी नहीं देखा है। फिर भी उसने अपने व्यवसाय-वाणिज्य और वित्त का एक मात्र स्वयं की प्राप्ति के तौर पर दावा नहीं किया है। लगता है, कहीं न कहीं कोई छिद्र या धोखाधड़ी रह गई है, मिसके कारण सोलही आने प्राप्ति के तौर पर उन वस्तुओं का दावा नहीं किया जा सकता । यदि ऐसा संभव होता तो उसका जीवन जीने का ढर्रा और ही तरह का होता। यही वजह है कि वह निरोह-निर्दोप है, नितान्त जीवन जीने को ग्लानि लेकर ही जिन्दा है। अपने पापड़े-लते और आचार-विचार से वह यही सावित करना चाहता है। और इन सब कारणों से अपनी एक सत्ता को ओर, जो उपेक्षित-सी पड़ी है, न उसने फभी ताका है और न ही उसे पहचानता है। महेन्द्र के मनोजगत के इन पहलुओं पर गौर करने पर उसे एक शब्द में घर-गृहस्थी में उलझे रहनेवाला प्राणी नही याहा जा सकता। बल्कि लुटेरा भी जिस तरह किसी खास वक्त निश्चिन्त आश्रय की तलाश करता है, गृहस्थी उसके लिए वैसी ही है। इस दृष्टि से इस गृहस्थी में एक बाहरी लड़की को आश्रय देने से उसको परिणित क्या हो सकती है, यह वात संकट का चेहरा ओढ़ उसके सामने खड़ा हो गया है। इसी वजह से अपना स्पष्ट विचार न जाहिर कर उसने इसकी जिम्मेदारी सुरवाला पर सौंप दी है। और, इसके साप ही उमके मन में सूक्ष्म रूप से आकर्षक इरानी के प्रति एक प्रसन्नता और भय का मिला-जुला भाय है । हालांकि यह सूक्ष्म भावबोध उसके लिए जरा भी संकट की बात नहीं है। , सात दिन के बाद, रात साढ़े आठ बजे महेन्द्र अपना रोजमर्रा का काम खत्म कर पर नोटा है । फाटक पूरे तौर पर खोलने को ६४ एक ही जिन्दगी नहीं पड़ी। एक आदमी आसानी से समा जाए ऐसा एक दरवाजा, गेट के ग्रिल के पास बना हुआ है। बाहर से उसकी छिटकनी खोली जा सकती है। दिन-भर में दो बार ही बड़े फाटक को खोलने की जरूरत पड़ती है, मती और सतु जब मोटरसाइकिल लिए निकलते हैं और लौटकर आते हैं। महेन्द्र ने अलग से बने दरवाजे के पल्ले को खोल जैसे ही अन्दर कदम रखा, उसने देखा, बाहर का दरवाजा खोले सुरबाला खड़ी नहीं है । खुली खिड़की से घर के भीतर रोशनी जलती दीख रही है । शायद नीतू पढ़ रहा है । सुरवाला रसोई घर के काम में व्यस्त है । बीच-बोच में ऐसा भी होता है। हालांकि अधिकांश दिन सुरवाला का रसोई का काम बहुत पहले ही खत्म हो चुका होता है । गृहस्थी में उसका सबसे बड़ा काम है, दोनों जून रसोई पकाना, गायों को सानी-पानी देना तथा दुहना। बाकी काम दाई-नौकर उसके हुक्म पर करते हैं । शाम हो जाती है तो सरला घर चली जाती है। मदन नामक पन्द्रह-सोलह साल के लड़के : को भी सुरवाला दोनों वक्त की रसोई बनाने के बाद छुट्टी दे देती है। महेन्द्र ने बाहरी कमरे के दरवाजे के पास पहुँचकर जैसे ही कॉलिंग वेल दवाना चाहा, दरवाजे के पल्ले अचानक खुल गए। देखा, उसकी आँखों के सामने एक मोहिनी नारी-मूत्ति खड़ी है, जिसके उग्र वक्षस्थल के लाल ब्लाउज के एक सिरे पर का आँचल उघड़ा हुआ है। पुष्ट, लेकिन मेदविहीन लंबे-लंबे दोनों हाथ दरवाजे पर टिके हैं। आँखों की कोर और होंठों पर मुसकराहट । जेवर-जेवरात का कहीं नामोनिशान नहीं। सिर के बाल पीछे की ओर संभले हैं लेकिन गरदन या पीठ पर विखरे हुए नहीं हैं। दीख नहीं रही है लेकिन हो सकता है पीछे की ओर चोटी झूल रही हो । महेन्द्र न केवल अवाक् और विह्वल है, एका- एक नारी-मूत्ति के सामने अपने को खड़ा पाकर उसके दिन-भर के थके-मांदे सीने में साँस भी अटक सी गई है । भूतग्रस्त व्यक्ति की तरह उसने टूटे स्वर में कहा, "कौन?"

एक हो जिन्दगी लहमे-भर में उस नारो-मूत्ति का क्षोण कटि प्रदेश तिरा हो गया, उगि आगे बढ़ आये और सुगढ़ निसंय अत्यन्त उसत पोय पहा खिलखिलाती हसी फी थरथराहट से पीन पयोधर कापापिन महेन्द्र को लगा, उस दृश्य और शब्द से उसका मिरगजोशी या तरह चूर-चूर हो गया। उसी स्थिति में हसी रो छपको गृदंगनी शब्द उसके कानों में आए, "ए सुरादी, देयो सो राही, गुण पाप पड़ते ही महेनदा ऐसे चिढ़क उठे जैरो भूत पर नजर नही हो।" इरानी की बात समाप्त होने के पहले ही महेन्द्र गे जो गहमान लिया था। इरानी के पीछे से गुरवाला और उसगे पोष्ठी दूरी पर नीतू की हंसी का रेला उसके चेहरे से आकर टमाराया। गुस्माता कहा, "चौंकाने के खयाल से ही तोसुम रोज कदमों से दरलामा सानो गई थीं। दिन-भर पटने के बाद अभी यह मिसाओं में पूया भा रहा । "सचमुच !" इरानी ने दरवाजे से यरटे माहा, "युग ती गई मान गए महेनदा ? आइए, घर के अन्दर आए।" उपमानामादिगा- हाप महेन्द्र की ओर चढ़ा दिया। महेन्द्र के हृदय में तय भी इगनी की हंगी की कार ही पो। इरानी के स्वाभाविक, कौतुक की भी गले पर्याप्त मात्रा में हृदयंगम कर लिया है, हालांकि रानी के प्रति पलाय और गौन फी व्यग्रता से यह स्वयं को पूरे तौर पर यमग नही मार.गका RifEr भी अपने चरित्र की विपता के कारण हीनी. धागा को विना पकड़े वाला, "जानना नहीं था कि मुम श्रागी, श्रीर .. वाजा मोनकर मुड़ा हो, मानिए, जा"। यायको भागीर एक बार इरानी की और बाय दौडाने पवाया, "पिन राना मग. भीत नहीं हा या हि तुम्हारा हाप याम यर के बन्दा बाट।" महेन्द्र के मोले-भाले बोर मान यापन किया विगेय में इस तरह की वा थोरी-पात मितीमा ६६ एक हो जिन्दगी अलग हटकर खड़ी हो गई, वह घर के भीतर आया। सुरबाला महेन्द्र से बोली, "तुम्हारे बाद मती और सतु घर से बाहर निकले हैं, उसके एकाध घण्टे बाद ही इरानी पहुँची है।" "आज पहुँचने के बारे में मैंने एक पत्र भेजा था। पत्र तुम लोगों को मिला नहीं।" इरानी ने कहा, "हालांकि मिलता भी तो लाभ ही क्या होता? मुझे स्यालदह से लाने के लिए कोई नहीं जाता।" महेन्द्र इरानी की ओर ताकता हुआ उसकी बातें सुन रहा था। सिर घुमाकर सुरवाला की ओर देखा और निश्छल हंसी हँसते हुए बोला, "पन मिलता तो हो सकता है मती या सतु कोई जाता। घर खोजने में परेशानी तो नहीं हुई ?" उसने फिर इरानी की ओर निहारा। "परेशानी का मतलब ?" इरानी अपनी काली आंखों की पुतलियों को नचाते हुई बोली, "दार्जलिंग मेल से आने पर आपके घर पर पहुँचने के लिए सबसे अच्छा स्टेशन है दमदम । लेकिन मुझे स्यालदह से टैक्सी किराये पर लेकर पुनः दमदम आना पड़ा।" महेन्द्र निश्छल हँसी हंसकर बोला, "टैक्सी क्यों, बस पर भी तो आ सकती थीं।" "रात भर ट्रेन में जगकर माल-असबास के साथ ?" इरानी बड़ी- बड़ी आँखों से सुरवाला की ओर निहारती हुई अचकचाकर बोली, "महेनदा का कहना सुन रही हो न सुरोदी। तुम लोग होते तो वैसे ही आते ?" सुरवाला मुसकाती हुई बोली, "खैर यह सब बातें बाद में होंगी। पहले उसे कपड़ा बदलकर हाथ-मुंह धो लेने दो। कितनी देर पहले निकला है और अब वापस आया है।" महेन्द्र की तरफ मुड़कर बोली, "जाओ, तुम तैयार हो लो। मैं तुम्हारा खाना परोसने जा रही हूँ।" महेन्द्र ने कमरे की ओर कदम बढ़ाते हुए इरानी की ओर मुड़कर देखा और कहा, "हम लोग गरीब आदमी हैं"।"

एक ही जिन्दगो . "देखिए महेनदा, "वैष्णवी विनय का प्रदर्शन नही कीजिए। इरानी ने भौंह नचाते हुए प्रताड़ना भरे स्वर में कहा, "मुझे क्या मालूम नहीं कि आप एक धनकुबेर हैं ?" महेन्द्र वगैर कुछ उतर दिए अपने कमरे की ओर चला गया। नीनू हँस दिया, "इरानी मौसी, वावूजी तुमसे डरते हैं।" महेन्द्र को इरानी का स्वर सुनाई पड़ा, "हां, तेरे बाबूजी तो मुझसे डरेंगे ही।" सुरवाला ने कहा, "इरानो, मैं चलती हूँ, उसके लिए खाना परो- सना है।" महेन्द्र ने कमरे में प्रवेश कर, कुहनी में लटके थैले से स्टील की मालमारी की चायी निकाली और थैले को अन्दर रख दिया। और. और दिन वह इस वक्त दूसरी दिन की गृहस्थी के खर्च का पैसा सुर- बाला को दे दिया करता था और अपने लिए थोड़ी-सी रकम रख लिया करता था। आज न केवल परिस्थिति दूसरी तरह की है, उसके साथ ही मन के अन्दर एक तरह को वैसी वेकली भी घुमड़ रही है, जिसको वह व्याख्या करने में असमर्थ है । कपड़ा बदलने लगा तो उसे एकाएक याद आया, दरवाजा खुला है । नन्दिनी के विवाह के कुछ दिनों के अतिरिक्त उसे यह पहली बार खयाल आया, कमरे में कपड़ा बदलना होगा तो दरवाजे को यों खुला छोड़ा नहीं जा सकता। हालांकि वह यह काम पत्नी और बाल-बच्चों को उपस्थिति में अनायास करता माया है। करने में कोई परेशानी भी नहीं थी। बात तो मामूली ही है, क्योंकि नंगा तो होना नहीं पड़ता। गरीव मध्यवर्ग या उससे भी निचले दर्जे के आदमी इसी तरह किया करते हैं। लेकिन हमेशा का यह काम महेन्द्र पो नागवार गुजरा। फिर भी सुरवाला को हैरत में डालना अच्छा नहीं लगा। वह लुंगी लिए गुसलखाने में चला गया और दरवाजा बन्द कर दिया। अंगोछा वहां रखा ही रहता है। उसने इत्मीनान के साथ कपड़े उतारे और लुंगी पहन ली । दीवार के रंग के --मर ६८ एक ही जिन्दगी एक किनारे कपड़ों को रख, नल की टोंटी खोल, हाथ-पांव, मुंह, गला, गरदन अच्छी तरह धो लिया। अंगोछे से पोंछने के वक्त वैसा काम किया जैसा कि वह आमतौर पर नहीं किया करता है। खिड़की के सामने दीवार पर टंगे शीशे के सामने जाकर खड़ा हो गया। शीशा नीचे ही एक छोटे-से शेल्फ में रखा हुआ है। मति और सतु के लिए दाढ़ी बनाने का सामान अलग है । सब कुछ अलग है और महेन्द्र के सामानों से ज्यादा कीमती है। ब्रश, ब्लेड, रेजर, क्रोम, आफटर शेव लोशन । महेन्द्र पच्चीस साल पहले जैसा करता था, अब भी वैसा ही करता है । इसके पहले ब्लेड और सेफ्टीरेजर के बदले उस्तरा उपयोग में लाता था। बस, इतना ही बदलाव आया है । महेन्द्र कभी सुबह या रात के वक्त इस शीशे के सामने खड़ा नहीं होता था। आज इस क्षण कोई अदृश्य चुंबक जैसे उसे शीशे के सामने खींचकर ले आया और उसने अपने चेहरे की ओर देखा। सिर पर पतले धूसर वाल, तेल से चिकने जिन्हें कहा जाए, वैसे ही। उसका , चेहरा या शरीर कभी मांसल नहीं था। उस दृष्टि से देखा जाए तो चेहरा दुबला-पतला ही कहा जाएगा। ललाट और आँखों के गिर्द थोड़ी सलवटें पड़ गई हैं। स्वयं से दृष्टि-विनिमय होते ही वह संकुचित और शर्मिन्दा होकर मुस्करा पड़ा और गरदन हिलाते हुए अलग हट गया। रैक से कपड़े लेकर गुसलखाने के दरवाजे को खोला और अपने कमरे के अन्दर चला आया। कपड़ों को अलगनी पर रख दिया। कल सवेरे वह कौन-सी धोती और कुरता पहन कर बाहर निकलेगा, सुरवाला ही इसका इन्तजाम करके रखेगी। उसने जैसे ही मेज के पास जाकर बालों पर कंघी करना शुरू किया, इरानी कमरे के अन्दर आई । स्विच दबाकर पंखा खोलकर बोली, "इस गरमी में पंखा भी चालू नहीं करते ? जोरों से भख लगी है ?" "जोरों से क्या, और-और दिन जैसी महसूस होती है, वैसी ही।' महेन्द्र ने बालों पर कंघी करते हुए कहा । । " एक ही जिन्दगी इरानी निकट मा, अपने इर्द-गिर्द सिर घुमाकर जैसे किसी पोज की तलाश करने लगी। महेन्द्र ने जरा हटकर पूछा, "किसी चीज को तलाश कर रही हो क्या ?" "हो । पाउडर का डब्बा कहाँ है ?" इरानो ने कहा, "सोचा था, आपके बदन में जरा पाउडर लगा दूं।" महेन्द्र ने आश्चर्य चकित आँखों से इरानो की ओर ताकते हुए कहा, "मैं वह सब नही लगाता।" "क्यों नहीं लगाते ?" इरानी कमर पर हाथ रख, जरा तिरछो होकर खड़ी हो गई, "पूरा दिन गुजार कर घर लौटने पर देह-हाय पानी से धोने से बाद, पाउडर लगाने से तो अच्छा ही लगता है।" महेन्द्र को आखें इरानी की काली आँखों से टकराने के बाद जैसे ही उसके जिस्म पर आकर टिकों, उसने आँखें हटा लों और सरल मुस्कराहट के साथ कहा, "नहीं; वह सब मैंने कभी इस्तेमाल नहीं किया है और अब तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।" उपने कंधो को मेज पर रख दिया। "इस जन्म में नहीं किया, अगले जन्म में देखा जाएगा।" "क्यों ? इस जन्म में आपको क्या हुआ ?" इरानी छोड़नेवाली पानी नहीं है। महेन्द्र को इरानो की देह से एक मोठी पुशवू भाती हुई महसूस हो रही है। बाहर के कमरे में हो महसूस हुई थी। शायद वालों के तेल को खुशबू है या पाउडर को या किसी और ही चीज की। उसने इरानी की ओर ताकना चाहा मगर ताका नहीं। बोला, "अब घया, अव तो बुढापा भा गया।" "आपको बूढ़ा किसने कहा ?" इरानी ने विरोध के स्वर में कहा । महेन्द्र ने पुनः इरानी की आँखों को ओर देखा। सोचा था, व्यंग्य को हंसी से उसकी आंखें तिरछी हो गई होंगी। लेकिन वह सहज स्वर में ही वोलो, "मापको देखने से पता चल जाता है कि अब भी मजबूत हैं । अगर शरीर मांसल हो जाता तो देखने मे आप चाहे जैसे लगते मगर ७० एक हो जिन्दगी बूढ़े हो जाते । आपके हमउम्र लोगों को तो देखती ही रहती हूँ। अपनी मर्जी से ही वे बूढ़े हो जाते हैं।" महेन्द्र मुसकराया और इरानी की आँखों ने उसकी दृष्टि को जैसे चुम्बक की तरह अपने जिस्म की ओर आकर्षित कर लिया। जाहिर है, उसकी काली आँखों की स्वाभाविक चमक में एक प्रकार की मादकता है। लेकिन सचमुच ही क्या वह बूढ़ा नहीं हुआ है ? इरानी जैसी एक लड़की के मुंह से यह सुनना व्यंग्य जैसा ही लगता है। लेकिन उसके चेहरे पर उस व्यंग्य की निशानी नहीं है। महेन्द्र ने अनजाने ही उसके सीने से अपनी आँखें हटाकर उसकी आँखों की ओर ताका । इरानी मुसकरा दी, सोने के आँचल को उसने क्यों खींच लिया, समझ में नहीं आया। क्योंकि उघाड़ने-ढकने में कोई अलगाव दिखाई नहीं पड़ा । हँसती हुई वोली, "आपको मेरी बातों पर यकीन नहीं हो रहा ?" "कौन-सी वात पर?" सुरवाला ने दरवाजे के निकट से पूछा। महेन्द्र क्या चिहुँक उठा ? लेकिन उसके पहले ही उसने सरल शब्दों में उत्तर दिया, “इरानी कह रही है, मैं बूढ़ा नहीं हुआ हूँ। इतना जरूर है कि वह इस तरह का मजाक कर सकती है। चलो, चलकर खाना दो।" उसने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया। सुरवाला ने हँसकर कहा, "इरानी की निगाह ही असली निगाह है, वह जब कि कह रही है तो फिर बूढ़े नहीं हुए हो।" "मजाक नहीं, सुरोदी", इरानी वोली, "मैं सीरिअसली कह रही हूँ। मेरी राय में उम्र कोई अहमियत नहीं रखती। असली चीज है मन । इसके अलावा महेनदा के शरीर में मुटापा नहीं आया है, एक भी दांत नहीं टूटा है । तुमसे ही पता चला था, महेनदा को ब्लड प्रेशर की वीमारी नहीं है, ब्लड शूगर भी नहीं है । अभी भी दिन में बारह घण्टे परिश्रम करते हैं। इससे अच्छा क्या कहा जा सकता है ?" यह कहते हुए उसने सुरवाला और महेन्द्र के पीछे-पीछे रसोईघर में प्रवेश किया।

एक हो जिन्दगी ७१ । महेन्द्र ने पीढा बिछाने के पहले एक बार सुरवाला को ओर देखा और उसके बाद कहा, "स्वास्थ्य ठीक रहना और बुढ़ापा आ जाना अलग-अलग बातें हैं।" "सेहत ठीक रहे तो फिर बुढ़ापा क्या ?" इरानी ने कहा, "आपसे कम उम्र के बहुत से लोगों को मैंने बूढ़ा होते देखा है। उनकी तुलना में आप कही ज्यादा जयान हैं।" महेन्द्र ने अचकचा कर एक बार इरानी की ओर नजर दौड़ाई और फिर सुरबाला की ओर । सुरबाला भो ताक रही थी। दोनों हंस पड़े। सुरवाला ने इरानी से कहा, "अच्छी बात है, तुम्हारे बहनोई तुम्हारे लिए अभी भी जवान है, हुआ न?" "महेनदा कितने बूढ़े हैं, यह बात बेशक तुम्हों अच्छी तरह जानती होंगी।" इरानी ने सुरबाला को ओर आँख नचाते हुए हैसकर कहा, "यह बात तुमसे अधिक कोई नही जानता।" महेन्द्र ने एक बार सुरवाला की ओर देखा । वह मन ही मन सोच रहा था, पति-पत्नी के जीवन के इस प्रकार के अनुभव का इरानी को कैसे पता चला ? उसकी तो अभी शादी भी नहीं हुई है । इसके अलावा कम उम्र में बहुतेरे लोगों को उसने बूढ़ा होते कैसे देखा? यह सब देखने से क्या समझ में आता है ? इरानी के वास्तविक अहसास का स्वरूप क्या है ? सुरवाला वोलो, "अव मेरे जानने का समय नही रहा । वह भले ही बूढ़ा न हुआ हो, परन्तु मैं तो बेशक बूढी हो गई हूँ । अब तुम जानना चाहो तो कोशिश कर सकती हो।" महेन्द्र के मेरुदण्ड में सिहरन दौड़ गई, उसने आंख उठाकर इरानी की ओर देखना चाहा लेकिन देख नहीं सका । निश्छल हमी हमते हुए कहा, "क्या कह रही हो यह सब !" "फोशिश कर सकती हूँ, कहिए, ठीक कहा न महेनदा?" इरानी पलकों को नचाते बोली, "आखिर में तुम्हीं सुरादी लाठी लिए मरे ७० एक ही जिन्दगी बूढ़े हो जाते । आपके हमउम्र लोगों को तो देखती ही रहती हूँ। अपनी मर्जी से ही वे बूढ़े हो जाते हैं।" महेन्द्र मुसकराया और इरानी की आँखों ने उसकी दृष्टि को जैसे चुम्बक की तरह अपने जिस्म की ओर आकर्षित कर लिया। जाहिर है, उसकी काली आँखों की स्वाभाविक चमक में एक प्रकार की मादकता है। लेकिन सचमुच ही क्या वह बूढ़ा नहीं हुआ है ? इरानी जैसी एक लड़की के मुंह से यह सुनना व्यंग्य जैसा ही लगता है। लेकिन उसके चेहरे पर उस व्यंग्य की निशानी नहीं है । महेन्द्र ने अनजाने ही उसके सीने से अपनी आँखें हटाकर उसकी आँखों की ओर ताका । इरानी मुसकरा दी, सोने के आँचल को उसने क्यों खींच लिया, समझ में नहीं आया। क्योंकि उघाड़ने-ढकने में कोई अलगाव दिखाई नहीं पड़ा । हँसती हुई बोली, "आपको मेरी बातों पर यकीन नहीं हो रहा?" है कि "कौन-सी बात पर ?" सुरबाला ने दरवाजे के निकट से पूछा। महेन्द्र क्या चिहुँक उठा ? लेकिन उसके पहले ही उसने सरल शब्दों में उत्तर दिया, "इरानी कह रही है, मैं बूढ़ा नहीं हुआ हूँ। इतना जरूर वह इस तरह का मजाक कर सकती है। चलो, चलकर खाना दो।" उसने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया। सुरवाला ने हँसकर कहा, "इरानी की निगाह ही असली निगाह है, वह जब कि कह रही है तो फिर बूढ़े नहीं हुए हो।" "मजाक नहीं, सुरोदी", इरानी बोली, "मैं सीरिअसली कह रही हूँ। मेरी राय में उम्र कोई अहमियत नहीं रखती। असली चीज मन । इसके अलावा महेनदा के शरीर में मुटापा नहीं आया है, एक भी दाँत नहीं टूटा है । तुमसे ही पता चला था, महेनदा को ब्लड प्रेशर की बीमारी नहीं है, ब्लड शूगर भी नहीं है । अभी भी दिन में बारह घण्टे परिश्रम करते हैं। इससे अच्छा क्या कहा जा सकता है ?" यह कहते हुए उसने सुरवाला और महेन्द्र के पीछे-पीछे रसोईघर में प्रवेश किया।

एक हो जिन्दगी
७१
महेन्द्र ने पीढ़ा विछाने के पहले एक यार गरयाणा की भरमा
और उसके बाद कहा, "स्वास्थ्य ठीक रहना भोर यामानामा
अलग-अलग पाते हैं।"
"सेहत ठीक रहे तो फिर बुढ़ापा क्या ?" इरानी ने कहा, "मा
कम उम्र के बहुत से लोगों को मैंने बूढ़ा होते देवा है। Pा
में आप कहीं ज्यादा जयान हैं।"
महेन्द्र ने अचकचा कर एक बार इरानी की ओरगद और
फिर सुरवाला को ओर । सुरबाला भो ताक रही थी ।
सुरबाला ने इरानो से कहा, "अच्छी बात है, गुभार मा ult
लिए अभी भी जवान है, हुआ न ?"
"महेनदा कितने बूढ़े हैं, यह वात वैगक तुम्ही मराठीammarke
होंगी।" इरानी ने सुरवाला की थोर आंख नाम,
"यह बात तुमसे अधिक कोई नहीं जानता।"
महेन्द्र ने एक बार मुरबाला की और पा । वामपना
रहा था, पति-पलो के जीवन के इस प्रकार है अनुमा
कैसे पता चला ? उसकी तो यमी शादी मी नही या
कम उम्र में बहुरे लोगों को उमने दवाइंट में या try
से क्या समझ में मादा है? इरानी के दादा Ram
क्या है ?
मुरवाला बोली, "द जाने का मन
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चाहो नो कोरिटकर मादी हो।"
महेन्द्र मनिहाट टीकमरेचा
की ओर देवदारामिट देय नहीं ng,
कहा, "वना दम हीद मद्र!"
"कोभिकरदार "?"
पलकों को दी, "कादिर।

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एक हो जिन्दगी . सुरवाला ने कहा, "बच्चे मेज पर खाते हैं। मैं भी उसी तरह पाती हूँ। वह अपनी पुरानी आदत को बकरार रखे हुए हैं।" इरानी ने महेन्द्र के चेहरे की ओर देखा । महेन्द्र ने भी अपनी आँखें उसकी तरफ की और फिर पलक झुका लों। इरानी बोली, "महेनदा फा हर काम निराला है।" महेन्द्र बगैर आंख उठाये बोला, “निराला क्यों ? जिसे जिस तरह अच्छा लगेगा, उसी तरह खाना खायेगा न । मेज पर बैठकर खाने से मुझे जड़ता घेर लेती है। मानो, इत्मीनान से खाना ही नहीं खा रहा होऊँ।" "यह सब आपके मन का भ्रम है।" महेन्द्र ने मुसकराकर सिर हिलाते हुए कहा, "मेज-कुरसी पर बैठ सिर्फ काम किया जा सकता है, भात नहीं खाया जा सकता।" इरानी खिलखिलाकर हंसती हुई बोली, "आपने अजीब बात पही महेनदा । जिस तरह कि मेरी मां कहती हैं, रोटी खाने से ऐसा लगता है जैसे बुखार आ गया हो । वगैर बुखार के कोई रोटो नहीं खाता।" महेन्द्र ने कहा, "किसी जमाने में मुझे भी ऐसा ही महसूस होता था। बुखार आये तो रोटी, नहीं तो भात । इतना जरूर है कि अब वैसा महसूस नहीं होता । रात में रोटी नही मिलती है तो लगता है, खाना ही नहीं खाया है।" "सब कुछ मन की बात है।" इरानी ने कहा, "और आदत की बात । आपका मेज पर खाना न खाना वैसी ही बात है । आप जय होटल-रेस्तरां में खाते हैं तो क्या करते हैं ?" महेन्द्र की आँखों में विस्मय खेल गया; बोला, "होटल-रेस्तरां में ? मैं कभी नहीं खाता।" इरानी पुनः खिलखिलाकर हंस पड़ी। वह हंसी महेन्द्र के कलेजे में शनाक से बज उठी और शीशे के बर्तन की तरह सब कुछ जैसे चूर- चूर हो गया। इरानी बोली, "सचमुच महेनदा, आप एक निराले ७४ एक ही जिन्दगी व्यक्ति हैं। किसी दिन होटल-रेस्तरां में आपने खाना नहीं खाया है ?" महेन्द्र बोला, "बहुत दिन पहले मेस में खाना खाता था, होटल में भी खाना खाया है मगर पत्तल बिछाकर ही। मेज-कुरसी पर बैठकर खाना नहीं खाया है।" उसने दूध में रोटी और बताशा मिलाना शुरू किया । फिर बोला, मैं जैसा था, वैसा ही हूँ।" "विलकुल नहीं।" इरानी ने गरदन झटकते हुए कहा, "यह सब आपकी निराली बातें हैं । आप अच्छी तरह जानते हैं कि आप जैसे थे, वैसे नहीं हैं । बदन पर धोती और कुरता चढ़ाये केवल पुराने जमाने के किरानी बने हुए हैं।' इस तरह की ठोस सच्चाई के जवाब में महेन्द्र कुछ उत्तर नहीं दे सका। खाना खाते-खाते सोचा, उसके व्यवसाय और कारोबार के संबंध में इरानी को कितनी बातें मालूम हैं ? इन सब बातों के संबंध में वह खोद-खोदकर कुछ जानना नहीं चाहती है । इतना जरूर है कि वह लुक-छिपकर व्यवसाय नहीं करता मगर ढिंढोरा भी नहीं पीटता है । फिर भी तरह-तरह के लोग उसके बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं । वह निस्पृह और निर्विकार रहता है। लेकिन सुरवाला से इरानी ने क्यों कहा, स्वयं को वह बूढ़ी कहती है, इसकी उसे जान- कारी है और यह गलत बात है। इस बात का तात्पर्य क्या है ? महेन्द्र ने दूध से भरे कटोरे को एक हाथ से उठाकर होंठों से लगाया । सुरवाला ने घबराकर कहा, "कटोरे को दोनों हाथ से पकड़ो वरना गिर जायेगा।" महेन्द्र स्वयं भी यह बात जानता है। लेकिन इरानी के सामने दोनों हाथों से कटोरे को थाम होंठों से लगाने में उसे झिझक महसूस हुई। विना कुछ उत्तर दिये एक ही हाथ से दूध भरे वजनदार कटोरे को थाम उसने दूध पी लिया और कटोरे को नीचे रख दिया। एक हलकी-सी डकार लेकर कहा, "मुझे इस बात का खयाल है।" "सुरबाला बोली, "किसी दिन इस तरह नहीं पिया था । कटोरे ।

एकही जिन्दगी ७५ का वजन भी कोई कम नहीं है।" महेन्द्र ने पानी का गिलाम उठाकर होंठों से लगाया। इरानी वोली, "इसका मतलब समझों सुरादो। महेनदा सब कुछ कर सकते हैं । जान-सुनकर ही शिथिल बने रहते हैं।" महेन्द्र ने मुमकराकर इरानो को और ताका । उसको काली आँखों से आय मिलते ही उसके कलेजे में एक लहर-सी जगी। वह आंख शुकाकर जल्दी-जल्दी उठकर खड़ा हो गया । इरानो के अधरों के कोने में क्या मुसप राहट खेल गई ? वह क्या महसूस कर रही है कि उसकी ओर देखते हो महेन्द्र के कलेजे में आंधी चलने लगती है ? ऐसा क्यों हो रहा है ? किसी भी पुरुष के लिए यह क्या अनिवार्य क्रिया है ? सुरवाला बोली, "इरानो, तुम नीन को खाना खाने बुला लो। तुम भी खाना खा लो। तीसरे पहर तुमने कुछ नही खाया है।" "मैं अभी खाना नहीं खाऊंगी।" इरानी ने कहा, "मैं तुम्हारे साप खाना खाने वैठेगी। नीतू को बुला देती हूँ।" सुरवाला ने कहा, "फिर तुम एक काम करो। वह लेट गया है, तुम उसकी मच्छरदानी लगायर खोंस दो।" महेन्द्र के कानों में गुसलखाने में हो यह सब बात पहुँच रही थी। इरानी ने पूछा, "महेनदा, आपको अभी सोना है ?" "दो-चार मिनट शायद बैठेगा, उसके बाद ही सो जायेगा।" सुर- बाला ने कहा, "फिर सुबह होते न होते उठ जाना है।" महेन्द्र ने गुमलखाने से कमरे के अन्दर जाते-जाते देखा, इरानी दोनों छोर की कोठरियों के बीच के रास्ते से बाहर के फमरे पो ओर जा रही है। उसकी पतली कमर, पीट और चौड़े नितंब में जैसे एक. लय है। साड़ी के बन्धन और ब्लाउज के बीच का पोड़ा-सा हिस्सा खुला हुआ है । गजगामिनी जिसे कहा जाता है, वह क्या वैसी ही है ? उसके चलने के तौर-तरीके में भी एक प्रकार की अल्हड़ता है। यह अल्हड़ता मन को व्यषित नहीं करती बल्कि एक प्रकार का आवेग ज़ार एक ही जिन्दगी । जाती है । इरानी ने बाहर के दरवाजे के पास खड़ी होकर पुकारा, "नीतू, खाना खाने आ जा, सुरादी बुला रही हैं।" महेन्द्र जल्दी-जल्दी कमरे के अन्दर चला गया। वह आज भी और- और दिनों की तरह ही थका-मादा है। फिर भी थकावट के बीच उसे कहीं कुछ असहज जैसा लग रहा है । उसका कारण अवश्य ही इरानी की उपस्थिति है। हर पग पर उसकी उपस्थिति का इस तरह अहसास हो रहा है जैसे उसकी दैनन्दिन स्वाभाविकता में एक ठहराव आ गया हो। या फिर यह महेन्द्र के मन का विकार है ? नन्दिनी की शादी के समय भी, बहुतों के बीच इरानी की उपस्थिति ने मन के अज्ञात में बार-बार उसे चौंका दिया था। लेकिन उस समय पूरा घर लोगों से भरा था । इस तरह के लगभग खाली मकान में इरानी की उपस्थिति ने जैसे एक बहुत विराट रूप धारण कर लिया है । आश्चर्य है ! महेन्द्र को वह जवान कहती है ! "क्या बात है, खड़े-खड़े क्या सोच रहे हैं ?" इरानी ने कमरे के ६. प्रवेश किया। महेन्द्र चिहुँक उठा, "एँ ?" उसके बाद हँसकर बोला, "तरह-तरह की बातें । सोच का कोई अन्त है ?" "ज्यादा सोचने से फायदा ही क्या है ? एक ही तो जिन्दगी मिली है।" इरानी महेन्द्र के सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी काली आँखों की पुतलियों और होंठों पर कौतुक की छाप है। महेन्द्र ने देखा, इरानी के जिस्म का तीव्र अल्हड़पन जैसे उसकी छाती पर बैठने के लिए आगे बढ़ रहा है। जल्दी से आँख हटाकर बोला, "इसका मतलव ? जिन्दगी कितनी होगी?" "इसका मतलब यह कि मैं कहना चाहती हूँ, जिन्दगी जव कि एक ही है तो फिर इतना सोचने से लाभ ही क्या है ? इरानी ने अपने दाहिनी ओर के आँचल को ढंकने के प्रयास में उधाड़ दिया और फिर एक बार ढंकने की कोशिश की, "जों कुछ करना है, बस इसी एक जिन्दगी में कर लेना - एक ही जिन्दगी है। अगले जन्म के लिए पोटली बोध कुछ नहीं ले जा सकिएगा। इमो- लिए माहती हैं, ज्यादा सोचिए नहीं।" महेन्द्र यद्यपि इस तरह की कोई बात नहीं सोच रहा था, फिर भी यह बात उसके कानों में खटयो । अगले जन्म की बात उसने कभी सोची नहीं है । जिन्दगी के बारे में ही सोचा है । इस जिन्दगी का मत- लब है, उसका काम-धंधा, कारोवार, रुपया-पैसा, जिन्दगी जीने का तौर-तरीका और मोटे तौर पर इस गृहस्थी को बात । इसके अलावा उसके सामने और किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है । सासकर एक ही जिन्दगी में और कुछ करने की बात उसके मन में पैदा ही नहीं हुई है, क्योंकि और कुछ के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है । इरानी को वात से उसके मन में संशय जगा, जिन्दगी में और कुछ करने को उसने क्या इच्छा को है ? इरानी की बातों में क्या कोई गूढ़ संकेत है ? महेन्द्र निरीह हसी हसते हुए हट गया और पंखे के स्विच को दबाते हुए बोला, "पोटली बांध ले जाने की बात मैंने नहीं सोची है । लेकिन फिर भी आदमी सोचता ही है।" "कोई लाभ नहीं," इरानी वोली, "इससे तो अच्छा यही है कि मन जो चाहे वही करते रहना चाहिए । दिन-भर तो बहुत कुछ सोचते रहे हैं और काम करते रहे हैं, फिर अभी इतना सोचने-विचारने की कौन-सी बात है ? आइये, सो रहिये, मैं मापको मन्छरदानी लगाकर खोंस देती हूँ।" महेन्द्र ने निरीह मुसकराहट के साप कहा, "तुमने कहा, एक हो जिन्दगी है और जो कुछ करना है, इसी जिन्दगी में कर लेना होगा। लेकिन ऐसा कहीं होता है ? आदमो चाहे तो भी एक ही जिन्दगी में सब कुछ फरके नहीं जा सकता है।" "जितना कुछ कर सके, उतना कर ले।" इरानो ने दोनों हापों को उठाकर जिस्म में लोच पैदा करते हुए कहा, "मेरा तो यही विश्वास है। जो भी इच्छाएँ हैं, पूरी कर लूंगी। तब हाँ, जितना करना ७८ एक ही जिन्दगी हो सकता है । अफसोस करते हुए दुनिया से विदा होने में लाभ ही क्या है ?" महेन्द्र पलंग पर बैठकर बोला, "सभी अपने बारे में ऐसा ही सोचते हैं । अरे हाँ, तुम उस वक्त सुरो से क्या कह रही थीं ? बात ठीक से समझ में नहीं आई ?" "कौन-सी बात ?" इरानी ने अपने हाथ पलंग के पाये पर रख दिये । महेन्द्र ने जैसे ही उसकी ओर देखा, पहली बार उसके ध्यान में आया कि इरानी के शरीर का ब्लाउज स्लीवलेस है। बगल में ढेर सारे काले रोओं का गुच्छा है और हाथ ऊपर की ओर उठाते ही उसका वक्षस्थल ज्वार की तरह ऊर्ध्वमुखी हो जाता है। महेन्द्र के कलेजे को धड़कन अकस्मात् तीव्र हो गई। जल्दी से आंख हटाते हुए वह बोला, "वही जो तुम कह रही थी कि अभी वह बूढ़ी नहीं हुई है और जो सोच रही है, वह गलत है।" इरानी पलंग का पाया थामे हंस पड़ी और पाये की लकड़ी चर- उठी । बोली, "देख रही हूँ, वह बात आपको याद है, हालांकि रादी ने जानना भी नहीं चाहा कि मैंने वैसा क्यों कहा था।" "इसीलिए तो मैं जानना चाहता हूँ।" महेन्द्र की निगाह एक वार ऊपर उठी और फिर नीचे गिर गई। इरानी अवको जरा संकुचित सी हो गई । बोली, "यह बिलकुल औरतों की बात है, सुनकर आपको कोई लाभ नहीं होगा।" इरानी की बातों से महेन्द्र की उत्सुकता हालांकि बढ़ गई लेकिन उसके द्वारा न कहने की इच्छा जाहिर करने पर उसे दुख हुआ। फिर भी निरीह मुसकान मुसकराते हुए अपने पैर पलंग पर रखकर बोला, "लाभ-हानि की बात नहीं है, न कहने की बात है तो मत कहो।" "न कहने लायक कोई बात नहीं है।" इरानी ने पलंग के पाये पर रखी मच्छरदानी को खींचा। लेकिन मच्छरदानी लगाने के बजाय आँखों में शरारत का भाव लाकर कहा, "सुरीदी की संभवतः यही एक हो जिन्दगी ७८ धारणा है कि बाल-बच्चे की पैदाइश चन्द होते हो औरतों के लिए मव कुछ पर वन्दिश लग जाती है। लेकिन विज्ञान आजकल बताता है कि ऐसी कोई बात नहीं, समझ रहे हैं न ? इसीलिए मैंने सुरादो से कहा था कि उसको धारणा गलत है।" महेन्द्र ने अचकचाई निगाहों से तापते हुए पूछा, "इसका मतलब क्या है ? उसके बाद भी बाल-बच्चे होते हैं ?" इरानी खिलखिलाकर हंस पड़ो और उसका सारा शरीर हो जैसे हंसी से कांप उठा। बोली, "आपको और सुरादो को अभी यह सब समझाना होगा? खास तौर से आप जैसे आदमी को बाल-बच्चों की पैदाइश की बात मैंने नहीं कही है, जनाब । उसके अतिरिक्त भी सब कुछ वर्करार रहता है । बाल-बच्चे की पैदाइश धन्द हो जाने से कोई धूठी नहीं हो जाती।" महेन्द्र को मन ही मन आश्चर्य लगा। उसके और सुरवाला दांपत्य जीवन मे दैहिक मिलन अब कभी-कदा भी क्रियान्वित नहीं होता। खुद उसमे हो कोई खास इच्छा नही जगती । सुरवाला भी कभी इस तरह की मांग या इच्छा जाहिर नहीं करती । महेन्द्र को धारणा है, उन दोनों के जीवन का वह अध्याय समाप्त हो चुका है । लेकिन इरानी के सामने अपने आश्चर्य होने के भाव को प्रकट न कर वह धीरे-धीरे लेट गया और बोला, "यह सब बात तुम्हें मालूम कैसे हुई ?" "कैसे मालूम हुई ?" इरानो ने मच्छरदानी को खोचकर माड़ा और पलंग के चारों तरफ उसे फैलाते हुए कहा, "जानते ही हैं कि सुरादी जितनी मेरी उम्न नहीं है। जानकारी किताब पढ़ने से हुई है। आप क्या नहीं जानते ?" महेन्द्र बोला, "सारी खवरों का पता हरेक व्यक्ति को नहीं रहता है । मैं किताव छापता हूँ, पढता नहीं हूँ।" इरानी ने हंसते हुए, मच्छरदानी के अन्दर अपना भाधा शरीर घुसेड़ दिया और महेन्द्र के शरीर के ऊपर से अपना ।'

एक हो जिन्दगी मच्छरदानी खोंसने लगी। महेन्द्र को इरानी के जिस्म की एक खास किस्म की गन्ध मिली, किसी सुगन्ध से मिली-जुली पसीने को गन्ध । और वह गन्ध उसके कलेजे में धंसती गई। अब पहली बार इस बात की ओर उसका ध्यान गया कि ईरानी के जिस्म पर लाल ब्लाउज के अतिरिक्त और कोई अन्तर्वास नहीं है । इरानी के द्वारा अधोमुखी होने के कारण उसके बेल जैसे पुष्ट उरोजों का अधिकांश हिस्सा साफ-साफ दिखाई पड़ा नीर उसकी साँस जैसे रुद्ध हो गई—यह सोचकर कि अभी इस क्षण, हो सकता है कि उरोज द्वय उसके शरीर का स्पर्श कर लें। सांस रुद्ध होने के बावजूद उसको छाती में रक्त की धारा तीनता से प्रवाहित होने लगी। उसे इरानी की साड़ी के बन्धन के ऊपर लाल ब्लाउज तक फैला उसकी देह का हिस्सा दीख पड़ा। सिर पर जोरों से पंखा चलने के बावजूद महेन्द्र पसीना-पसीना हो गया। इरानी ने सरककर मच्छरदानी से अपना शरीर बाहर निकाल लिया और मच्छरदानी खोंसकर बोलो, "हो गया न महेनदा ? सुरादी की तरह मैं मच्छरदानी लगा पाती हूँ न ?" महेन्द्र ने मच्छरदानी के बाहर इरानी की ओर ताकते हुए कहा, "लगा क्यों नहीं सकोगी ?" "कह नहीं सकती।" इरानी ने हंसकर कहा, "शायद आपको पसंद नहीं आया। सुरादी की तरह सब कुछ तो मैं नहीं कर पाऊंगो।" महेन्द्र का सम्पूर्ण शरीर और मन विजली के आपस में जुड़े नेगे- टिव और पोजेटिव तारों के मानिन्द भभक उठा। और उसके तमाम अहसासों को चकाचौंध से भर दिया। मन ही मन सोचा, इरानी का सुरादी की तरह सब कुछ न कर पाने की उक्ति का तात्पर्य क्या है ? सीधे न पूछकर उसने अत्यन्त निरीह भाव से पूछा, "यह कौन-सी चीज है ?" "यह बात आप मन ही मन समझ लें।" इरानी फिर से हँस दी और मच्छरदानी के बाहर से महेन्द्र की ओर ताकती हुई अपनी कालो एक हो जिन्दगी ८१ आँखों से बाण चलाया, "सुरादी और मैं आपके लिए एक जैसी नहीं हैं ।" यह कहकर वह दरवाजे की मोर चली गई और पूछा, "रोशनी पया जली रहेगी, महेनदा?" महेन्द्र की धड़कन इतनी तो हो गई है कि उसे कुछ कहने में तकलीफ हो रही है। एक तरह से रुद्ध जैसे स्वर में ही कहा, "नहीं, वुझा दो।" स्विच की एक हलकी-सी आवाज के साथ ही क्षण-भर में अंधेरा उतर माया । महेन्द्र को लगा, इरानी ने दरवाजे के पल्लों को खोंचकर बन्द कर दिया। बाहर से दरवाजों को खींचा? या फिर इरानी अभी भी कमरे के अन्दर है ? उसे अपनी छाती को धड़कन के अलावा और कुछ सुनाई नही पड़ रहा है। कुछेक मिनट बीत जाने के बाद उसने इत्मीनान की सांस ली-इरानी कमरे से बाहर चली गई है। महेन्द्र की सांसें आहिस्ता-आहिस्ता स्वाभाविक हो गई। मगर उसके सामने इरानी के द्वारा मच्छरदानी घोंसने की तसवीर तैरने लगी । सांस हालांकि सहज-स्वाभाविक स्थिति में आ गई परन्तु रक्त की तीव्रता में सहजता नहीं आई। अपनी इस बेकली और विकार के संबंध में मन में कोई सवाल पैदा न होने के बावजूद, एक प्रकार का विस्मय और छटपटाहट एक ही साथ उसके मन को कुरेदने लगी। रुपया-पैसा और जायदाद के अलावा और किसी वस्तु के प्रति उसमें आसक्ति हो सकती है, यह बात उसे मालूम नहीं थी । नन्दिनी के शादो के वक्त काफी भीड़-भाड़ रहने के बावजूद इरानी ने अपनी हंसी और वातों से उसके मन में एक प्रकार की चंचलता जगा दो थो । महेन्द्र ने तब देखा था, रिश्ते के तमाम पुरुप इरानी के इर्द-गिर्द मंडराने को बेचैन हैं । उसने किसी तरह को बेचैनो जाहिर नहीं की थी। उसी समय उसे महसूस हुआ था, इरानो अपने यौवन के आवेग, हास-परि- हास और याक् पटुता के कारण विश्व के तमाम पुरुषों को चिरकालीन अभिलषित रमणी है । संसार में कोई-कोई नारी योवन और सौदर्य के ५२ एक ही जिन्दगी - अतिरिक्त कुछ और लेकर पैदा होती है । शायद स्वर्ग में इसी प्रकार की रमणी को उर्वशी का नाम दिया गया था। महेन्द्र ने आँखें बन्द कर ली और इरानी के प्रबल आकर्षण से छुटकारा पाने के लिए स्वयं को बीते दिनों में वापस ले जाना चाहा- जिन दिनों वह सेक्रेटियेट के एक साधारण किरानी से मौजूदा स्थिति में आया था। उसने कभी किसी स्त्री की ओर आंख उठाकर नहीं देखा था। वह अपनी दुनिया और अपने प्रलोभनों के बीच रहना चाहता है । नहीं चाहता कि इस उम्र में एक नई आसक्ति का लोभ उसे जकड़ सवेरे पांच बजे से थोड़ी देर पहले ही महेन्द्र की नींद टूटी । नोंद तोड़ने के लिए उसे घड़ी में अलार्म नहीं देना पड़ता है या कोई जगाए, इसकी भी नौबत नहीं आती है । सवेरे पांच बजे के पहले उठना काफी दिनों का अभ्यास रहा है । अपने आप नींद टूट जाती है। चाय पीने की उसे आदत नहीं है। कमरे के अन्दर ही सुराही और पानी का गिलास रखा रहता है। उसने मच्छरदानी के अन्दर से देखा, बड़ी खाट पर सुरबाला नहीं है । नीतू अकेले ही सोया हुआ है । इसका अर्थ है सुरवाला गाय दुहने चली गई है। महेन्द्र उठकर बैठ गया। शरीर में जैसे एक प्रकार का अवसाद छाया है-वैसा अवसाद जिसका अहसास उसे कभी नींद से जगने के बाद नहीं हुआ था। उसे इरानी की याद आई और अन्दाज लगाया कि वह अब भी सोई हुई ही होगी। महेन्द्र मच्छरदानी के बाहर आया और सुराही के पास जाकर गिलास में पानी ढाला और लगातार दो गिलास पानी पी गया। कमरे के अन्दर दो-चार बार इधर-उधर चहल-कदमी करने के बाद शोचकर्म से निवृत्त होने के लिए गुसलखाने के अन्दर चला गया। वहां से निकलने के बाद मिट्टी के एक बर्तन में एक ही जिन्दगो पानी से भीगने के लिए रखो नीम की एक दातून को चबाते-चवाते पिछले दरवाजे से बगीचे की ओर चला गया। देखा, मुरवाला उस गैर बंगाली के बहुत बड़े टोन के पान में भापकर दूध ढाल रही है इसका अर्थ है दूध दुहाने का काम खत्म हो चुका है। इरानी को वहां पाकर महेन्द्र को आश्चर्य हुआ। उसने सोचा नहीं था कि इरानी इतनी जल्दी सोकर उठ जाएगी। पिछली रात के साड़ी- ब्लाउज उसके शरीर पर भव मुड़े हुए हालत में हैं, थोड़े-बहुत अस्त- व्यस्त भो । साड़ी के नीचे, पैर के पास लहंगे का कुछ हिस्सा बाहर निकला है । माथे का जूड़ा ढोला है और पेशानी के पास कुछ बाल विखरे हैं। फिर भी वह पिछली रात के वनिस्वत ताजा दीख रही है। और उसे देखते ही महेन्द्र के सीने का नगाड़ा बज उठा । इरानो ध्यान से सुरवाला का दूध मापना देख रही है । महेन्द्र पर उसकी दृष्टि नही गई है । जाती भी नहीं अगर वह गैर बंगाली ग्वाला की निगाह उस पर नहीं गई होती और उसने माथे पर हाथ रख सलाम नहीं किया होता। बाले को दृष्टि का अनुसरण करते हुए इरानी ने पीछे मुड़कर देखा और महेन्द्र पर आँख जाते ही मुसकराकर कहा, "सु प्रभात, महेनदा।" मुसकराते हुए महेन्द्र ने अपनी गरदन को झटक दिया और घोरे. धोरे आगे बढ़ आया । बोला, "इतने तड़के जग गई हो?" "मैं सवेरे ही सोकर उठती हूँ", इरानी ने यहा, "काफी दिन तक विस्तर पर पड़े रहना मुझे बिलकुल अच्छा हो लगना । . अलावा सुरादी का दूध दुहना देखने को तीव्र इच्छा थो। समान मुरादी इतनी एक्सपर्ट है कि लगा, निखालिस ग्वाले फी पीपी है। हंसकर बोली, "देखिये, यह मत सोचियेगा कि आपको ग्वाला प महेन्द्र बोला, "कहोगी तो इसमें दोष हो यया है ? Or Hin

८४
हमें ग्वाला ही कहा जा सकता है । दूध तो ग्वाले ही बेचते
महेन्द्र ने देखा, इरानी की पीठ की तरफ के ब्लाउज व
खुला है । इरानी ने महेन्द्र की दृष्टि का अनुभव करते
किया। निर्विकार भाव लाकर बोली, "मैं तो यही देख रह
तरह की तीन गायें रहें तो नौकरी या कारोबार करने की
रत नहीं। सुरादी से पता चला, घर के लिए रखने पर भी
वक्त अठारह से लेकर बीस किलो दूध बेच दिया जाता है।
महेन्द्र बोला, "हां, यह सही बात है। तब हाँ, इस तर
पालने में भी कम खर्च नहीं है।"
"दूध से भी कम आमदनी नहीं है।" इरानी ने गरदा
ताका, “खर्चे से आमदनी जरूर ही अधिक होती होगी।"
महेन्द्र ने मुसकराकर कहा, "ऐसा न हो तो इन गायों
से लाभ ही क्या ? पालना हो तो ऐसी ही गायें पालनी चाहि
खाती हैं और ज्यादा देती भी हैं।"
इरानी ने उसकी बात को किस रूप में लिया, पता नह
की पुतलियों को नचाती हुई बोली, "ऐसी बात है ! यह स
ठीक से समझते होंगे । एक बार गायों की ओर नजर ६
बोली, "तब हाँ, आपको विलायती गायें देखने में सचमुच
हैं । मगर उनका विशाल चेहरा देखकर मुझे उनके गाने के
लगता है।"
महेन्द्र ने कहा, "देखने में हालांकि बड़ी-बड़ी
सीधी-सादी । सींग नहीं मारती हैं।"

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एक ही जिन्दगी । देखी हैं ? देखी हैं । लेकिन महेन्द्र के जीवन से उनका कोई सरोकार नहीं है, जान-पहचान नहीं है, इसलिए उनकी ओर ध्यान देने की बात सोची ही नहीं थी । स्वयं आगे बढ़कर, जान-पहचान कर, किसी लड़की से हेल-मेल बढ़ाये, उसका चरित्र इस तरह का नहीं है। यों भी वह साव- धान रहता है । अपरिचितों के बारे में उसके मन में हमेशा संदेह और दुविधा रहती है । लेकिन उस रात, उसकी रिश्तेदार परिचिता इरानी, जो केवल निकट को ही नहीं है, एक ऐसी अग्रगामी भूमिका मदा कर रही थी जिसे नकारा नहीं जा सकता। बल्कि वह और भी निकट खींच लेती है। हालांकि यही इरानी यदि राइटर्स की मुलाजिम होती उससे हर रोज मुलाकात होती, महेन्द्र उसकी ओर आँख उठाकर देखता, तो भी वह निर्विकार बना रहता। उसके प्राणों में कौंध पैदा नहीं होती, उसकी आँखों की दृष्टि चकित नहीं होती। अपरिचय की दूरी उसके लिए बहुत कुछ अस्तित्वहीन जैसी है। जिससे जान-पहचान नहीं, उसका अस्तित्व महेन्द्र के लिए नगण्य है। इस दृष्टि से इरानी केवल निकट को ही नहीं है। उसकी बातचीत और हँसो में इस प्रकार की एक आयासहीन प्रगल्भता है, घुलने-मिलने का एक ऐसा भाव है, जैसे वह बीच में कोई अड़चन रहने देना चाहती ही नहीं । उसकी वही बात महेन्द्र को फिर याद हो आई । 'जिन्दगी जबकि एक ही है तो इसी जिन्दगी में सब कुछ कर लेना है।' दरअसल याद नहीं आई बल्कि 'जिन्दगी एक ही है' यह बात उसके दिमाग में विध गई है । वाहर से वह शान्त, विनीत और बुझा-बुझा जैसा दोखता है और लोगों की धारणा है, वह धर्मभीरु है। लेकिन धर्म के संदर्भ में वह मायापच्ची नहीं करता। अगले जन्म के बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं है । मौजूदा समय में उसने स्वयं को जमीन-जायदाद बढ़ाने के काम में ही समर्पित कर दिया है। मगर जिन्दगी जब कि एक ही है, मरने के वक्त पोटली बांधकर कुछ साथ लेकर नहीं जाया जा सकता--- एक हो जिन्दगी ८७ तो यह बात नए सिरे से उसके अन्तर्मन को वेध रही है । जीवन बढ़ी ही दुर्लभ वस्तु है, उसे वह इतने दिनों तक इमो रूप में सोचता रहा पा। इरानी की बात के बाद से दुर्लभ जीवन को तसपोर और ही तरह की हो गई है। महेन्द्र को जैसे एकाएक स्मरण हो आया हो, इस अन्दाज से उसने इरानी से पूछा, "बहुत-सी ऐसी चीजें हैं, जिनके बारे में तुमसे पूछ नहीं पाया हूँ। तुम लोगों के सिलीगुड़ी का हाल-चाल ठोक है न?" "बहुत जल्दी ही तुम्हें यह बात याद आ गई।" मुरवाला गायों की सानो तैयार करते-करते बोली, "तुम किस दुनिया में रहते हो?" इरानी मुसकराकर बोलो, "हम लोगों का हालचाल ! किसी तरह चल रहा है। मां को तबीयत फिलहाल ठीक नहीं है।" महेन्द्र ने पूछा, "ट्रेन में इतना लंबा सफर अकेले-अकेले किया, पर में किसी में रोक-थाम नही को ?" "ययों करेंगे?" काली आँखों को भौहों को नचाती हुई इरानी बोली, "एक ही रात का तो सफर है। घोटायर स्लीपर में मजे में चली आई।" महेन्द्र बोला, "फिर भी औरत होकर अकेली ही चली आई।" "इससे क्या आता-जाता है ?" इरानी खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली। एकाएक तेज हवा के झोंके से उसका आंचल उड़ गया। उसने आंचल को पकड़ा पर उसे तत्क्षण सोने पर रखे बगैर वोलो, "आजकल लड़कियां अकेली हो विलायत चली जाती हैं। और मैं सिलीगुड़ी से स्यालदह नहीं आ सकती हूँ ?" महेन्द्र इरानी के हाप में थमे आंचल और उसके सोने के लाल ब्लाउज की ओर ताक रहा था और उसे एक प्रकार की वेचैनी और विवशता मे मिले-जुले भाव का अहसास हो रहा था। इरानो महेन्द्र को आँखों में झांक रही थी। अचानक वह दाँतों से निवो होंठ को एक ही जिन्दगो काटकर एक अजीव ही तरह की ऐसो हंसी हंस दो कि महेन्द्र के पचास साल के खून में झट से आग की लपटें लहक उठीं। इरानी ने महेन्द्र की आँखों से अपनी दृष्टि हटाकर अपने वक्ष पर टिका दी और आंचल को धीरे-धीरे पोठ की ओर सरका दिया। उसके बाद सहज हो, शिकायत भरे लहजे में कहा, “महेनदा, इतना-इतना पैसा रहने के बावजूद अपने यहां इतनी बड़ी इमारत क्यों खड़ी की है ? सेन्ट्रल या वालीगंज में मकान क्यों नहीं बनवाया ?" इरानी की बात सुनकर महेन्द्र को होश आया और उसने जरा घबराकर हंसते हुए कहा, "मेरे पास अगाध संपत्ति है, तुमसे यह किसने कहा?" "कौन कहेगा ?" इरानी ने गरदन झटकते हुए कहा, "सबको मालूम है कि आप धनकुबेर हैं । कम से कम सेन्ट्रल कलकत्ता में मकान बनाने लायक आपसे पास पैसा है।" महेन्द्र मन ही मन हँस पड़ा। आंखों के सामने अपने एक-एक मकान और जयदाद की तसवीरें उभर आई। मध्य कलकत्ते में उसका एक फ्लैट पच्चीस सौ स्क्वायर फीट में है, जिसमें तीन बेडरूम, ड्राइंग रूम, डाइनिंग रूम, किचेन है और किराये के तौर पर तीन हजार रुपये मिलते हैं। अठारह सौ स्क्वायर फोट का एक सजा-सजाया फ्लैट खाली पड़ा है । दफ्तर के कुछ विशिष्ट पदाधिकारियों के अतिरिक्त उसके बारे में किसी को कुछ मालूम नहीं है। क्योंकि पदाधिकारीगण बीच- बोच में चावी मांगकर ले जाते हैं । बालीगंज सर्कुलर रोड में बगीचे से घिरा एक दोमंजिला मकान है जो एक विदेशी डिप्टी कंसुलेटर को किराये पर दिया हुआ है। फर्न रोड में एक तीनमंजिला मकान है जिसमें तीन किरायेदार हैं। इसके अलावा माणिकतल्ला सी० आई० टी० रोड में एक कमरे वाला एक छोटा-सा फ्लैट है । दमदम की रेल- लाइन के पास डेढ़कट्ठा जमीन पर जो टाली का मकान था, उसकी जगह अब वहाँ एक पोता दोमंजिला मकान है और वह भी किराये पर लगा हुआ है। उसने कहा, "जोड़-जाइकर किसी तरह साहबी मुहल्ले में शायद एक मकान बन जाए, लेकिन वहां रहेगा कौन? हम लोग वैसे मुहल्ले में कैसे रहेंगे? इसके अलावा इस अंचल में बहुत दिनों से रह रहा हूँ, यहाँ अच्छा लगता है।" "लेकिन यहां से ऑफिस जाने में कितनी असविधा होती होगी, पर सोचकर देखें।" इरानी ने कहा, "सेन्ट्रल मैं पर हो तो हर दृष्टि से सुविधा होती है। यहां से हर रोज नौकरी करने के लिए स्लाइव स्ट्रीट जाना बाकायदा एक तकलीफदेह बात है।" महेन्द्र ने कहा, "हां, जरा दूर हो जाता है। फिर भी यहाँ से बहुतेरे औरत-मदं नौकरी करने के लिए मऑफिस मुहल्ले जाते हैं । मैं भी यहाँ से हर रोज राइटसं जाता हूँ।" "आपके जाने की बात मुझे सुरादी से सुनने को मिली है।" इरानी ने होंठ विदकाकर कहा, "कैसे आते-जाते हैं, आप हो जाने।" महेन्द्र मुसकराया पूछा, "तुम्हें यहाँ कब ज्वाइन करना है ?" "अगले सप्ताह सोमवार को।" इरानी ने कहा, "सोचतो हूँ, आज ही एकबार दफ्तर जाकर मिल-जुल आऊं। लेकिन जाने की बात सोचते ही डर लगने लगता है । गाड़ी मापने क्यों नहीं खरीदी है ? ऐसा होता तो दो-तीन महीने गाड़ी पर सवार हो दफ्तर जाती।" महेन्द्र निरोह हँसो हँसते हुए बोला, "गाड़ी रहे, यह सुनने में अच्छा लगता है, देखने में भी अच्छा लगता है मगर चालू रखना ही मुश्किल की बात है।" "क्यों, आपके पास तो इतनो-इतनी बसें और लारिया है, ये सब पया चालू हालत में नहीं हैं ?" इरानो ने पूछा । महेन्द्र का मन अशान्त हो उठा । इरानो को इतनी सारी बातों का पता कैसे चला? उसने कहा, "हां, उन्हें चालू हालत में रखना ही पड़ता है, और उसी से महसूस किया है कि गाडी चालू रचना कितना कठिन काम है। बिना गाड़ी के भी तो यह जोवन"।" उसने बात पूरी ।

एक ही जिन्दगी नहीं की, इरानी की ओर आँखें टिका दी और चेहरे पर असमंजस का भाव लिए चुप हो गया। "क्या हुआ, विना गाड़ी के भी तो यह जीवन ..?" इरानी ने जिज्ञासा की भंगिमा में वाक्य को अधूरा ही छोड़ दिया। महेन्द्र ने कहा, "तुम्हीं तो कहती हो, जिन्दगी एक ही है, और इसी जिन्दगी में सारी साध पूरी कर लोगी।" वाक्य पूरा करने के बाद उसने चकित दृष्टि से एकवार सुरबाला की ओर देखा। "वह बात आपको याद ही है !" इरानी ने हंसते हुए सीने के आंचल को खींचा, "मेरा तो विचार यही है । मेहनत करके खाऊँगी और जीवन का जहाँ तक उपभोग किया जा सकता है, कर लूंगी। उसके बाद मर जाने पर मेरा सब कुछ चिता में जल जाएगा।" महेन्द्र ने पुनः सुरवाला की ओर देखा। सुरवाला वड़ी नांद में चना, भूसा, गुड़ वगैरह मिलाकर अभी हरेक गाय को अलग-अलग खाना दे रही है। उसका ध्यान इस ओर नहीं है । घर से सतु की आवाज आ रही है। वह कोई हिन्दी गीत गा रहा है । महेन्द्र को याद आया, पिछली रात उसने सुरवाला को रुपया नहीं दिया है । सुरवाला रात में ही सतु को पैसा दे देती है, वाजार से सामान खरीदने के लिए। उसने सुरवाला से कहा, "सुरो, मैं पिछली रात तुम्हें रुपया देना भूल गया था, सतु का बाजार जाने का समय हो गया है।" सुरवाला वगैर गरदन घुमाये बोली, "मैंने सतु को रुपया दे दिया है । जाने के पहले तुम मुझे रुपया देते जाना।" "मैंने तय किया है महेनदा, सेन्ट्रल कलकत्ते में ही कहीं रहूँगी।" इरानी ने कहा, "तब हाँ, किराये पर मकान लेकर नहीं रह पाऊँगी। मेरे पास उतना रुपया नहीं है। लड़कियों के किसी होस्टल में टिक जाऊँगी ।" महेन्द्र मानो भूल ही गया था कि इरानी ने तीन महीने तक उन लोगों के मकान में रहने की इच्छा प्रकट की है। इसी बीच वह अपने ।

एक ही जिन्दगी रहने का इन्तजाम कर लेगी। इरानो के द्वारा लिपी गई चिट्ठी उसकी आंखों के सामने तैरने लगी। तब इरानी का इस मकान में टिकने का अनुमोदन महेन्द्र नहीं कर सका था। उसके मन के किसी कोने में एक असमंजस का भाव या, हालांकि एक तरह को सूक्ष्म दुर्बलता भी पी । अभी इरानी से यह सुनकर कि वह चली जायेगो, उसे एक प्रकार के सूनेपन की उदासी ने जकड़ लिया। हालांकि इरानी के यहाँ आये अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं। घोर, स्थिर, शान्त और दूरदर्शी महेन्द्र जीवन के संबंध में एक ठोस योजना तैयार कर चुका था। लेकिन अब उसे महसूस होता है कि वह स्वयं को कितना कम पहचानता है । उसने देखा, सुरवाला गैरेज के पीछे को ओर जा रही है । बछड़ों को लाने के लिये । महेन्द्र नीम की दातून से तब लगातार दांतों को रगड़ रहा था। बोला, "नई जगह जाने के लिये इतनी जल्दीबाजी क्यों मचाये हुई हो । जो कुछ करना हो, सोच-समझकर ही करना चाहिये। तुम्हें कोई भगा तो नही रहा?" इगनी ने सोने के आंचल को और जोर से कस लिया, उसके उरोज मानो साड़ी-ब्लाउज के बंधन को तोड़कर बाहर निकलने को छट-पठा रहे हों। उसकी काली आँखों को दृष्टि में जैसे एक छह पसर गई। उदास हँसी हंसती हुई बोली, "नही, आप भगा क्यों दीजियेगा ? लेकिन जब जाना ही है तो जितनी जल्दी इन्तजाम हो सके, उतना ही अच्छा। कहिये, ठीक कह रही हूँ न ?" उसको निगाह महेन्द्र की आँखों पर टिक महेन्द्र को निगाह इरानो के सीने पर थी। आंख उठाकर उमने चेहरे की ओर देखा । दुनिया का यह एक बहुत बड़ा विस्मय कि महेन्द्र के चेहरे पर असमंजस का आवेग खेल गया। इरानी की आंघों की पलकें क्या पोड़ी मुंद गई ? उसकी आँखों की पुतलियों में भया एक विशेष चमक उतर आई? महेन्द्र बोला, "बात तो ठीक है, मगर मे कहना है, तुम्हें जल्दीबाजी नहीं करनी है । मैं हो इसका पता साँ गई।

६२ एक ही जिन्दगी - कि तुम्हारी सुविधा के लायक कोई जगह मिलती है या नहीं। अभी तुम्हारे साथ एक ही असुविधा है और वह है आने-जाने की तकलीफ।" "आप अगर कोई इंतजाम कर-करा दें तो फिर कहना ही क्या ?" क्षण भर में इरानी की काली आँखों में विजली खेल गई, "आप ठीक ही कह रहे हैं, यहाँ से ऑफिस आने-जाने में ही सबसे बड़ी असुविधा है । तव हाँ, मैंने सोचा है, मती या सतु की मोटरसाइकिल के पीछे वैठकर ऑफिस चली जाया करूंगी।" यह बात सुनते ही महेन्द्र को लगा, उसके कलेजे में तोर चुभ गया और लहमे भर में यह बात उसके मस्तिष्क के प्रत्येक कोष में गूंज उठी और प्रवल आक्रोश और विद्वेष से उसका कलेजा जैसे फटने लगा। वह अपने कारोबार के स्थानों में तीखी बातें बोलता है, गुस्से में आ जाता है लेकिन वह सव जैसे उसके मुखौटे हों। थोड़ी-बहुत चोरो, हाथ की सफाई या होसियारी अथवा जिल्दसाजी कारखानों की लड़कियों के प्रति कोई-कोई हाथ बढ़ाने की कोशिश करेगा, यह सब बात उसे मालूम है । लूम होने के बावजूद वह इसका विरोध करता है, गुस्सा करता है, ली-गलौज करता है लेकिन यह सब उसके कलेजे को बेधता नहीं है। मन ही मन इन बातों को उसने स्वीकार कर लिया है। फिर भी वहाँ उसकी कोई न कोई भूमिका होनी चाहिए और वह उसी भूमिका में रंग- मंच पर उतरता है। अभी इरानी की बातों से उसका निरीह मुखौटा खुल गया। उसने गंभीर स्वर में पूछा, "यह सब कब तय हुआ है ?" सुरवाला वछड़ों को गायों के पास खूटे में बांध, वगीचे के नल से हाथ धोने जा रही थी। महेन्द्र का वज्र जैसा गंभीर स्वर सुनकर उसकी पेशानी पर सलवटें पड़ गई और उसने खोजी निगाहों से महेन्द्र और इरानी की मोर देखा । इरानी महेन्द्र के स्वर से चौंक पड़ी और फटी- फटी आंखों से ताकती हुई वोली, "कल रात ही कहा था और मती-सतु राजी हो गये हैं । इतना जरूर है कि आपकी राय के बगैर कोई काम नहीं करनी है।"

एक हो जिन्दगो २३ महेन्द्र के तने चेहरे और आँखों में क्रोध का भाव सप्ट है । उसने दृढ़ता के साथ सिर हिलाते हुए पहा, "नहीं, लड़कों को मोटरसाइकिल फे पीछे बैठकर तुम कभी दफ्तर नहीं जा सकती। ऐसा मैं पसंद नहीं फरता।" इरानी की काली आँखों में भी क्या आक्रोश उभर आया ? एक क्षण के लिए उसके जबड़े फस गये। दूसरे ही क्षण सुरवाला को और ताक फर वह आहिस्ता-से हंसी। उसके बाद ठठाकर हराते हुए हाय जोड़कर महेन्द्र से बोली, "आपको पसंद न हो, वैसा काम में नहीं फरूगी। हाथ जोड़कर कह रही हूँ, अब हुआ न ?" महेन्द्र अपने दांतों को नीम की दातून से जल्दी-जल्दी रगड़ने लगा। अचानक कोई बात न कह सका । लेकिन उसके चेहरे का तनाव और क्रोध का आवेग बुझ गया। सुरवाला इरानी से बोली, "कल रातवाली बात न? मती और सतु की मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर तुम्हारे ऑफिस जानेवाली वात?" "हां, वह बात कहते हो तुम्हारे पतिदेव देखो कितने गुस्से में आ गये।" इरानी ने पूरी घटना को अपनी हंसी से तुच्छ बना देने की फोशिश की। सुरवाला ने एक बार महेन्द्र की ओर देखा। पति को यह अटल- अटूट दृढ़ता देखकर मन ही मन खुश हुई। हसकर बोली, "मैंने तो तुमसे पिछली रात हो कहा था, तुम्हारे बहनोई संभवतः सहमत नही होंगे।" "अपने पति को तुम जितना पहचानती हो, मैं क्या उतना पह- चानती हूँ ?" इरानी ने मुसकराकर सहज स्वर में कहा, "मैंने यों हो बातचीत के सिलसिले में कहा था। कान मलती हूँ, अब यह सब नहीं सोचूगी।" सुरवाला हसतो हुई नल की ओर चली गई। महेन्द्र का हृदय अशान्ति और बेचैनी से भर उठा। जहरीला सांप जिस त ४ एक ही जिन्दगी उगलने के बाद निस्तेज हो जाता है, उसकी हालत वैसी ही है। वह इतना स्पष्टवादी है और उत्तेतिज हो उठेगा, ऐसा उसने स्वयं भी नहीं सोचा था। उसके मन की अशान्ति और बेचैनी बहुत-कुछ अनुताप जैसी थी। शायद वह अपना मनोभाव दूसरी तरह भी इरानी के समक्ष प्रकट कर सकता था । परन्तु वह स्वयं को किसी प्रकार रोक नहीं सका और सच्चाई को छिपाकर रखने के खयाल से उसने इरानी से एक मिथ्या बात कही, "दरअसल मुहल्लेवालों के बारे में सोचकर ही मैंने वैसा कहा । तुम्हारी किसी प्रकार की बदनामी हो, ऐसा मैं नहीं चाहता।" "समझ गई जनाब ।" इरानी महेन्द्र की आंखों की ओर देखती हुई हँस कर बोली, और उसकी आवाज एकाएक धीमी हो गई, बहुत ही धीमी, "मैंने ऐसा नहीं चाहा था, मती ने ही मुझे यह बात सुझाई थी।" महेन्द्र हंसकर बोला, "वे लोग लड़के हैं । उम्र कम है, अभी दायित्व बोध नहीं है । वे लोग तो कहेंगे ही।" उसने देखा, हवा के आकस्मिक झोंके से इरानी के पूरे शरीर का कपड़ा अस्त-व्यस्त हो गया । , इरानी ने सोने के आँचल को संभालने की कोशिश में कमर के २ तरफ लहराती साड़ी को चट से जाँघों के बीच दवा लिया। सोने के आंचल को हाथ में थामे ही बोली, "चैत महीने की बयार कलकत्ते में और ही तरह को होती है।" आंचल को उसने जोर से खींचकर थाम लिया। किसी का ध्यान इस ओर नहीं है कि एक वासन्ती चिड़िया किसी पेड़ के झुरमुट में बैठकर चहक रही है। सुरबाला नल के चबूतरे से महेन्द्र को उद्देश्य करती हुई वोली, "तुम मुंह नहीं घोओगे, देर हो रही महेन्द्र ने अचकचा कर इरानी की तरफ से आँखें हटा ली और तेज कदमों से नल की ओर बढ़ गया। लेकिन एक नामालूम चिन्ता समस्या का रूप धारण कर उसके मन को कचोटने लगी।

कए हो जिन्दगी ८५ कुछ दिन बीतने के बाद रविवार आया। इन कई दिनों के दर. मियान बाहरी तौर पर महेन्द्र में कोई फेर बदल न दिखने के बावजूद उसके मन के भीतर लहर पर लहर जग रही है और किनारे को तोड़ने फो कोशिश कर रही है। या यों कहा जा सकता है कि सम्मोहित शिकार जिस तरह अनजाने ही अजगर के ग्रास को और बढ़ता जाता है, वह भी इरानी की ओर बढ़ता जा रहा है। उसका सचेतन मन बार-बार उसे पोछे की तरफ खींचकर ले जाना चाहता है लेकिन वह आहिस्ता-आहिस्ता अचेतन के गड्ढे को भोर बढ़ता जा रहा है । उसका अनमनापन विस्मयकारी है-यहाँ तक कि उसके जीवन में जो घटित नहीं हुआ है, उस काम में भी वह बीच-बीच में भूल-चूक कर जाता है । महेन्द्र समझ नहीं पाता है कि इरानी स्वयं कितनी सचेतन है। मच्छरदानी लगाकर झाड़ देना और खोंसना अब उसका दैनिक कार्य हो गया है और उस कार्य के दरमियान ही उसका सीना या हाय महेन्द्र के शरीर को छू जाता है । वह स्पर्श मानो तेज चाकू से भी ज्यादा धारदार हो-एकबारगी खून में जाकर बिंघ जाता है या फिर यातना को अनु- भूति से उसे रोमांचकारी सिहरन जैसी महसूस होती है। वह अपने विगत यौवन को प्रौढत्व के रूप में लेता था किन्तु अब उसे यह एक नया आविष्कार जैसा लगता है कि उसके शरीर में योवन के ज्वार जग रहे हैं । इरानी अब बातचीत करने के दरमियान आंखों को तरह- तरह से नचाती है और अपनी आवाज में घीमापन लाकर, एकान्त में पूछती है, "सुरादो को आप रात में किस तरह पोहा पहुंचाते हैं ?" महेन्द्र इन बातों का कोई उत्तर नहीं दे पाता है, विह्वल-चकित नेत्रों से सिर्फ ताकता रहता है और सीने में नगाड़े बजते रहते हैं । इरानो अनायास ही उसके शरीर का बनियान घोचते हुए कहती है, "आपको इतनी पुरानी गंजी फबती नहीं है। कारखाने से एकाध दर्जन ले माइए।" कभी-कभी सिर के बालों को कर कहती है, "लगता है, कोई पुआल का टुकड़ा पड़ गया है।" महेन्द्र को मालूम नहीं कि एक ही जिन्दगी मुच पुमाल का कोई टुकड़ा है या नहीं। लेकिन बार-बार का स्पर्श उसके खून में सिहरन जगा देता है। इरानी क्या जान-सुनकर स्वेच्छा से ऐसा आचरण करती है ? यदि ऐसी बात नहीं है तो फिर इस तरह का आचरण, और सो भी अकसर सुरवाला की अनुपस्थिति में, क्यों करती है ? महेन्द्र को इसके अलावा इस बात का भी अहसास होता है कि इरानी को न जाने कैसे मालूम हो गया है कि वह जितना निरीह और उम्र के बोझ से दबा-दवा जैसा दीखता है, उसका अधिकांश उसका हाव-भाव विशेष ही है। कहती है, "मुझे मालूम है, आप फुर्तीले और स्मार्ट हैं, मगर भाव ऐसा रहता है जैसे आप बिलकुल निरोह और ढीले-ढाले हों।" महेन्द्र के कपड़े के थैले को कसकर पकड़ लेती है और कहती है, "इसे लेकर बाहर क्यों निकलते हैं ? एक अटैची केस खरीद नहीं सकते ? और यह सब कैसी पोशाक है ? मुड़ी-तुड़ी धोती, चुन्नट-लाँग कमर में खुंसी हुई और उसके ऊपर शर्ट ! यह सब बावा आदम के जमाने की पोशाक क्यों पहनते हैं ? घोती ही पहननी हो तो आजकल मर्दो के लिए करघे की कितनी ही अच्छी-अच्छी घोतियां मिलती हैं। वही पहनिये और चुन्नटदार अद्धी का कुरता । सिल्क का कुरता भी पहन सकते हैं। इसके अलावा आज फल खादी के कितनी हा तरह के रंग-विरंगे कुरते मिलते हैं । आपसे ज्यादा उम्र के आदमी भी वह सव कुरता पहनते हैं । फिर पैरों में आप इस प्रकार के सैंडल क्यों डाले रहते हैं ? तलवे फट रहे हैं। अलवर्ट पहन सकते हैं या फिर स्ट्रैप दिये हुए कितने ही सुन्दर-सुन्दर काबुली सेंडल आजकल मिलते हैं, वह सब भी पहन सकते हैं।" पोशाक के संबंध में इरानो सबके सामने बोलती है। सिर्फ सुर- वाला नहीं, मती-सतु-नीतू सबके सामने बोलती है। वे लोग सुनकर हंस देते हैं । महेन्द्र भी निरीह चेहरा लिये हंस देता है। उसके मुंह से निकल पड़ता है, "यह जिन्दगी इसी तरह वीत गई।" "अगले जन्म के बारे में आपको कैसे पता चलता है ?" इरानी ६७ एक हो जिन्दगी अपनी राय जाहिर करती है, अगला जन्म होता है या नहीं, यह हलफ- नामा लेकर कौन कह सकता है ? जिन्दगी एक ही होती है। यदि आपसे न हो सके तो मैं आपके लिए कपड़ा-लता-जूता खरोदकर ले आ।" महेन्द्र मन ही मन खुश होता है लेकिन घबराहट के साथ कहता है, "नहीं-नही, पागलपन मत करो।" महेन्द्र की हालत देखकर लड़के भी हंसते हैं। मतो कहता है, "ठोक कहती हो तुम, इरानी मौसी । बाबूजी को तुम जरा साफ-सुयरा रहना सिखा दो।" महेन्द्र हंसते हुए ही लड़के को डांटता है, "जा, बड़प्पन मत दिखा।" सुरवाला भी बीच-बीच में टिप्पणी करती है, "तुम ठोक हो कह रही हो, इरानी । हमेशा से इसे एक ही तरह का देखती आ रही हूँ। किसी भी हालत में तौर-तरीका बदलने वाला आदमी नहीं है ।" "तुम भी यह बात कह रही हो?" महेन्द्र आश्चर्य भरी निगाहों से देखते हुए पूछता है। इरानी गरदन झटक, पुतलियों को नचाकर कहती है, फिर आप सोचकर देखिए । सुरादी भी चाहती हैं कि आप जरा स्मार्ट बर्ने । सो तो कीजियेगा नही, लवादा चढ़ाकर इस तरह चलते-फिरते हैं जैसे आपके जैसा दोन-हीन अस्वस्थ आदमो कोई दूसरा न हो । दरअसल आप वैसे कतई नहीं हैं।" नीतू एक दिन कह देता है, जानती हो इरानी मौसी, बड़ी सड़क पर दवा की जो बड़ी-सी दुकान है, वहां बैठकर एक आदमी हिसाब- किताब करता है । यावूजी ठोक वैसे ही दीखते हैं।" सुरबाला धमकाती है, “चुप रह, नीतू ।" इरानी कहती है, "नीतू, अपने पिताजो के संबंध में इस तरह को बात नहीं करनी चाहिए।" महेन्द्र को पता है, लड़के उसे किस निगाह से देखते हैं । इराने एक ही जिन्दगी कटाक्ष से लड़कों का मनोभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है । महेन्द्र गुस्से में नहीं आ पाता है । इरानी की बातों में व्यंग्य का पुट नहीं है, वह सचमुच ही महेन्द्र को और ही तरह का देखना चाहती है । गृहणी और लड़के भी उसे उसी रूप में देखना चाहते हैं । परन्तु बहुत दिनों की आदत एक बात में नहीं जा सकती। यह निरीह मुसकराहट के साथ इरानी से कहता है, "तुम्हारी एक ही बात सोचने लायक है- "जिन्दगी एक ही है।" मगर मेरी प्रकृति और ही तरह की है।" "अपनी प्रकृति को गोली मारिये।" इरानी तमक कर कहतो है, "मैं रातों-रात आपकी प्रकृति को बदल दे सकती हूँ।" महेन्द्र इरानी की आँखों की ओर ताककर चुप्पी साध लेता है, एकाएक कोई जवाब नहीं दे पाता है। लेकिन छिपे तौर पर इरानी की आँखों की भाषा, हँसने की भंगिमा और बातचीत में बदलाव आ जाता है । कहती है, “सचमुच मैं आपकी प्रकृति बदल दे सकती हूँ।" महेन्द्र के सीने में नगाड़ा बजने लगता है। चेहरे से वह अपना भाव नहीं करना चाहता। फिर भी कहता है, "इस काठी में क्या यह है ?" "संभव जरूर है।" इरानी काली आंखों को नचाकर अपनी देह में लोच पैदा करती हुई कहती है, “यह सब बात मुझसे मत कहिये । आपकी फाठी अभी काफी मजबूत और ताजा है।" इरानी की बातें महेन्द्र के मस्तिष्क में गहरी प्रतिक्रिया जगाती हैं। फिर भी वह अपने अन्दर के अनजाने प्राणी को खोजने के मकसद से पूछता है, "तुम्हें कैसे पता चला कि मेरी हड्डी की यह ठठरी अव भी मजबूत और ताजा है ?" "मुझे मालूम है, साहब । इरानी आँख नचाकर, गरदन झटकते हुए फुसफुसाकर कहती है, “यह हड्डी अब भी बाजीगरी का खेल दिखाती है और यह बात मुझे मालूम है।"

एक हो जिन्दगी सद महेन्द्र की सांस जैसे पम जाती है और वह पूछता है,"कैसे, यताओ तो।" इरानी आगे बढ़कर, महेन्द्र के कान से होंठ सटाकर कहती है, "आँखों की ओर ताकने पर।" महेन्द्र के पूरे जिस्म में विजली को तरंग दौड़ जाती है और वह विह्वल स्वर में पूछता है, "आंखों की ओर ताकने पर ? यह षया चीज "और क्या चीज होगी?" इरानो तिरछी निगाहों से ताफफर पाहती है, "आँख हो मन का आईना हुआ करती है, यह आप नहीं जानते ? आपकी आँखों की ओर ताकते ही पता चल जाता है कि आपके अन्दर इच्छा-अभिलापा शक्ति सब कुछ मौजूद है । मैंने क्या यों ही कहा कि अभी आप पूरे जवान हैं ?" महेन्द्र को आवाज लड़खड़ाने लगती है, "मगर मगर-मैं-में तो इसका अहसास नहीं कर पाता हूँ।" "मैं अहसास करा दे सकती हूँ।" इरानी उंगली से उसके सीने फो ओर इशारा करती है और दांत से निचला होंठ काटती है । पलकों को नचाकर कहती है, "लेकिन सुरादी को पता चल जायेगा तो यह मेरा झोंटा पकड़कर घर से निकाल बाहर फारेगी।" यह कहकर छन- कती हंसो से भरे मुख में आंचल दवा लेती है। महेन्द्र सब कुछ समझने के बाद संशय भरे स्वर में पूछता है, "क्यों ?" "इस पर आप ही सोचकर देखें।" इरानी झट से महेन्द्र के गाल फे करीब होंठ लाकर फुसफुसाते हुए फहती है और हंसकर भाग जाती है। महेन्द्र अवाक् और विह्वल हो इरानी को देह गंध और उसके चले जाने की दिशा की ओर ताकता रह जाता है। राइटसं बिल्डिंग के सेक्रेटियेट के उस निरीह किरानी, जो आज सुयोग की छोरी १०० एक हो जिन्दगी अपनी बुद्धि के जोर पर लगभग करोड़पति है, के मुखड़े का चमड़ा उत्तेजना से जैसे थरथराने लगता है। उसके मस्तिष्क से जैसे तीव्र चिनगारी निकलती है और वह कुण्डलिनी चक्र को झंकृत कर देती है, साथ ही एक व्याकुलता उसके सम्पूर्ण हृदय को उत्तेजित कर जाती लगभग एक सप्ताह की इस परिणिति और उसके परिणामस्वरूप जो घटना विशेष उल्लेखनीय बन गई है वह है रात में लेटने पर जब नींद नहीं आती तो उसे बाहरी कमरे में मती और सतु की खिलखिला- हट के साथ इरानी की खिलखिलाहट सुनाई पड़ती है और उसका मन विक्षुब्ध हो उठता है । दुनिया का एक यह विचित्र अनुभव है। महेन्द्र सचेतन मन से सोच सके, उसको उसमें क्षमता नहीं है। इरानी के कारण उसका मन ईर्ष्या के ऐसे स्तर पर पहुंच चुका है कि वह इरानी फा किसी से घुलना-मिलना बरदाश्त नहीं कर पाता यहाँ तक कि अपने वाल-बच्चों के साथ भी घुलना-मिलना उसे बरदाश्त नहीं होता • है । एक दिन वह विस्तर से ही चिल्ला उठता है, "सुरो, सुरो रात के वक्त घर में यह शोरगुल क्यों मचा है ? जरा शान्ति से भी सो नहीं पाऊँगा?" सुरवाला घवराकर दौड़ी हुई आती है और कहती है, "अच्छा- अच्छा, मैं उन लोगों से जाकर कहती हूँ, तुम सो रहो । मैं दरवाजा वन्द कर देती हूँ।" "नहीं, दरवाजा बन्द नहीं करना है।" महेन्द्र उसी लहजे में चिल्लाकर कहता है, क्योंकि उसने खुद ही इरानी को दरवाजा खुला रखने कहा है ताकि बाहरी कमरे की बातचीत उसके कानों में आती रहे। इस वाकया के बाद रात के समय बाहरी कमरे की अड्डेवाजी बंद हो जाती है । महेन्द्र के उस बिगड़े मूड और चिल्लाहट से उसको पत्नी मोर बच्चों को अचरज होता है। शान्त निरीह महेन्द्र के अन्दर एक एक हो जिन्दगी सख्त जिद्दीपन है और इसी वजह से इस घर में मोटर, मोज, टेनोगोन वगैरह नहीं आ सके हैं । लेकिन उसका विगड़ा हुआ मूड नौर चिला- हट कभी देखने-सुनने को नहीं मिलो पो। उसका चुपचाप हाय लोर सिर हिलाना ही काफी होता था। "उस रात को चिल्लाहट के बाद इरानो उसे दूसरे दिन एकान्त में पूछती है, "कल रात माप इतने तैश में क्यों आ गये थे?" "सो नहीं सका था, इसीलिए।" महेन्द्र निरोह स्वर में जवाब देता इरानो महेन्द्र के चेहरे की ओर देखती है और धीरे-धीरे उसको दृष्टि में एक अर्थ पूर्ण हसी खेल जाती है। महेन्द्र विह्वल और विमूढ़ जैसा रह जाता है और पूछता है, "क्या ?" इरानी सिर हिलाकर हंसती है और सामने से जाती हुई कहती है, "कुछ नहीं, अब आपको नींद में खलल नहीं डालूगी।" महेन्द्र और सुरयाला के लिए जो बात मनजानी रह गई है वह यह कि इरानी पहले दिन मतो को मोटरसाइकिल के पीछे बैठकर दफ्तर गई थी और मती दमदम के मोड़ तक इरानी मौसी फो पहुँचा आया था। पच्चीस वर्ष के मतो का मन अभी उदार और विकारहीन है। फिर भी वह इरानी को छिपे तौर पर उसके नारी सुलभ आचरण के कारण हो क्लाइव स्ट्रीट तक ले गया था-उस नारी सुलभ भाचरण के कारण जो पुरुष के उदार और स्वतंत्र प्राणों को चिरदिन अपनी अधीनता स्वीकार करने को बाध्य करता रहा है । उसमें पापयोध नहीं, प्रकृति की अपनी गति से बढ़ने की लीला है। यही नहीं, इरानी इस बीच मती और सतु के साथ चौरंगी मुहल्ले के वातानुकूलित सिनेमा घर में एक दिन मैटिशी शो भी देख आई है । इस दुराव-हिसाव में बहुत कुछ बचपने का हाथ था । योवन की प्रगल्मता, छिपकर मजा लूटने का भाव था। उस वीच ही लड़कों ने इरानी फो महेन्द्र के मंबर- में बताया था, "वावूजी मोस्ट बैकवर्ड माइन्डेड मैन हैं।" "इरानी १०२ एक हो जिन्दगी हँसते-हँसते कहा था, "मगर तुम लोगों के मोस्ट बैकवर्ड माइन्डेड मैन पिता ने ही तो विशाल कारोवार खड़ा किया है।" मती और सतु ने राय जाहिर की थी, "सचमुच बाबूजी को देख- कर सोचा ही नहीं जा सकता कि उन्होंने इतना बड़ा कारोबार खड़ा किया है । इन फैक्ट, हमें भी मालूम नहीं है कि बाबूजी ने क्या-क्या कारोवार खड़ा किया है और कितने रुपये कहाँ रखे हैं।" मती और सतु की बातें इरानी ने हँस-हंसकर सुनी थीं मगर हर बात को ध्यान से सुना था। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बारे में भी मती और सतु से ही उसे पता चला था। लेकिन वास्तविक संपत्ति को तफसील की उन्हें भी जानकारी नहीं है । इरानी की उत्सुकता सिर्फ बढ़ी ही नहीं थी बल्कि उसके रमणी मन ने महेन्द्र सरकार नामक व्यक्ति को मुकम्मल तौर पर ईजाद करने की एक सौगंध खा ली थी। पुरुष के रूप में उस आदमी के हृदय का अधिकांश उसके समक्ष कई दिन पहले उद्घाटित हो चुका है। अब उसी रास्ते से अन्दर धंसकर उस आदमी के तमाम रहस्यों का पता लगाना है। मगर इस खोज के पीछे क्या कोई कारण है ? खुद इरानी को भी इसका पता नहीं है । वह विचार अभी प्रकृति की खामखयाली की तरह हो रमणी के हृदय से खिलवाड़ कर रहा है। प्रायः एक सप्ताह के दौरान परिस्थिति जब इस सोपान तक पहुँच गई और इरानी महेन्द्र के संबंध का संकेत स्पष्ट हो गया तो इस बीच सप्ताहान्त का रविवार आया। छुट्टी का दिन । महेन्द्र का रविवार आधे काम का दिन होता है । सवेरे शौचादि और जलपान से निबटने के बाद वह अपने कपड़े के थैले में रखे खाते को लेकर बैठता है। अविश्वास की बात होने के बावजूद, इस एक ही खाते के हिसाव और छोटी-मोटी टिप्पणियों में उसके तमाम कारोबारों का हर पहलू स्पष्टतः प्रतिविम्बित हो उठता है। सरकार एण्ड सन्स एण्ड अदर कन्सर्न्स के प्रत्येक वस-रूट की बसों के बिके हुए टिकट, एक हो जिन्दगी १०३ कीमत को दर, आय-व्यय, हैवी ट्रकों के आवागमन को दूरी, मास बोझाई का परिमाण, उसका आय-व्यय, प्रेस, होसिमारी और मिल्द- साजी के कारखाने का मौजूदा उत्पादन, आय-व्यय तया प्रत्येक प्रति. प्ठान की आय का एक नम्बरो यानी चेक से भुगतान-देय और प्राप्य-तथा दो नम्बरी यानो नकद भुगतान का देय और प्राप्य-सच कुछ का ब्यौरा एक मोटे खाते में छोटे-छोटे हरफों में लिया रहता है। महेन्द्र के अतिरिक्त और किसी के लिए इस पाते में तमाम व्यय- सायों को आईने की तरह देखना नामुमकिन है। रविवार के सपेरे एक बार उसे इस खाते को खोलकर बैठना ही पड़ता है । सप्ताह के और-और दिनों में उसे खतियाने का वक्त नहीं मिलता है। रविवार के प्रातःकाल वह खाते को खोल सप्ताह भर के समस्त हिसावों की बारीकी से जांच-पड़ताल करता है और उसके परिणामस्वरूप कमी- कमी थोड़ो बहुत भूल-चूक निकल आती है। विस्मय से इरानी की पेशानी पर सलवटें पड़ गई और वह एक तरह से चिल्ला पड़ी, "यह क्या महेनदा, आज रविवार को भी माप यह क्या लेकर बैठ गये ? काम करने लगे?" "बस जरा-सा।" महेन्द्र ने हँसकर कहा, "दोपहर के पाने के समय तक करूँगा, उसके बाद मुझे फुसंत ही फुसंत है।" इरानी ने रूठने की मुद्रा में होंठ लटकाकर कहा, "नहीं-नहीं, आज आपको वैठने नहीं दूंगी। चलिये, बाहर के बगीचे में पेड़ के नीचे हवा में बैठकर गपशप करेंगे।" "पेड़ के नीचे हवा में बैठकर गपशप !" महेन्द्र ने मानो सपना देखने की मुद्रा में कहा और उसके कथन में भी मपने का शुमार हा गया, "क्या गपशप करोगी, इरानी?" इरानी बोली, "ढेर सारा गपशप करना है। अगल-बगल बैठेंगे तो बहुत सारी बातें अपने आप चली आयेंगी।" महेन्द्र ने व्यग्रता महसूस नहीं की हो, ऐसी बात नहीं। लेकिन १०४ एक ही जिन्दगी उसका मन खाते के पृष्ठ में उलझा हुआ था। हालांकि इरानी का आकर्षण भी उसे खींच रहा था। उसने कहा, "तुम्हारी बातें सुनने को तीव्र इच्छा हो रही है लेकिन मैंने कभी सवेरे पेड़ के तले हवा में बैठ- गपशप नहीं किया है।" "यही वजह है कि आप स्वयं को बूढ़ा महसूस करते हैं ।" इरानी की पलकें भिच-सी गई और उसने कृत्रिम अभिमान भरे स्वर में कहा, "जिन्दगी को क्या कुछेक खाता-पत्र में ही जिलाए रखिएगा ?" महेन्द्र मन ही मन सहमत भी हो गया था किन्तु सुरवाला और लड़कों के बारे में सोचकर जा नहीं सका। बोला, "तुम समझती नहीं कि जाने से मसुविधा का सामना करना होगा ?" इरानी कुछ क्षणों तक महेन्द्र की आंखों की ओर निहारती रही, उसके वाद सिर झुकाकर उसके मुंह के करोव अपना मुंह लाकर बोली, "आप डरपोक हैं ।" यह कहकर पुतलियों को नचाती और बलखाती हुई चली गई। महेन्द्र एक क्षण निर्वाक् बैठा रहा और उस आश्चर्यजनक तसवीर के वारे में सोचने लगा कि वह और इरानी बगीचे में पेड़ के तले हवा में वैठकर गपशप कर रहे हैं। कौन-सा गपशप? कौन-सी बात? महेन्द्र को मालूम नहीं। अगल-बगल वैठते ही बहुत सारी बातें अपने आप आ जाती हैं । उसके बाद भी महेन्द्र ने हिसाब-किताव में स्वयं को खोने की कोशिश की लेकिन और-और रविवारों की तरह खाते में उसका मन नहीं लगा। बीच-बीच में उसे इरानी का स्वर अनमना बनाते रहा । इस कमरे में भी इरानी कई बार चक्कर लगा चुकी है, हालांकि उसने महेन्द्र से कोई वातचीत नहीं को और न ही उसकी ओर ताका । महेन्द्र की माँखें चुम्बक की तरह खिंच गई थी। उसके बाद महेन्द्र जब स्टील की आलमारी में खाता रख कमरे से बाहर आया तो देखा, इरानी सुरवाला के साथ रसोई के काम में लगी हुई है। मती और । ।

एक ही जिन्दगी १.” सतु मोटरसाइकिल लेकर छुट्टी के अड्डे पर निकल चुके हैं। नीतू बगीचे में खेल रहा है, मुहल्ले के अपने दोस्तों के साथ। सुरबाला ने हंसकर यहा, "तुम्हारी साली आज मुठो रसोई पका- फर खिलाएगी?" समझ में न आने के कारण महेन्द्र ने पूछा, "मुठो रसोई क्या चीज है ?" "इस देस में रहते-रहते आप बिलकुल पछाह बंगालो हो गये हैं, इमलिए आपको पता कैसे चलेगा कि मुठो रसोई क्या चीज है।" इरानी ने रसोई पकाते हुए उत्तर दिया । सुरवाला बोली, "पछह बंगाली होने की बात नहीं है। दरअसल आजकल में इस तरह को झंझट वाली रसोई नही पकाती हूँ। तुम्हारे बहनोई भी आजकल मसालेदार भोजन खाना नहीं चाहते।" "इसमें कोई खास मसाला नहीं है, सुरादी।" इरानी ने कहा, "चितला मछली को पीठ के हिस्से को सोझाकर काटे घुन लिये जाते है, उसके बाद उसे तलकर आलू मिलाकर प्लेन डालना' तैयार किया जाता है । घी देने को जरूरत नहीं, योड़ा-सा पिसा हुआ जीरा और गरम मसाला देने से ही तैयार हो जाता है।" सुरवाला ने कहा, "मालूम है।" "तुम्हें मालूम न हो, ऐसा कहो हो सकता है, सुरोदी ?" इरानी ने यह बात महेन्द्र को ओर ताकते हुए कहा। उसके बाद सुरवाला की भोर ताकती हुई बोली, "तव हो, मेरे हाथ की रसोई महेनदा को पसंद आयेगी या नहीं, कह नहीं सकती।" इरानी को रसोईघर में रसोई पकाते देख महेन्द्र मन ही मन बड़ा पुश हमा । बोला, "मैंने सोचा था, तुम बैंक के डेबिट-क्रेडिट एकाउन्ट का ही काम कर सकती हो । रसोई भी पका सकतो हो, ऐसा नहीं सोचा पा।" १. व्यंजन-विशेष।

एक ही जिन्दगी "आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि सिलीगुड़ी में मैं पको-पकायी भात- सब्जी खाकर बैंक जाती थी ?" इरानी कालो आंखों को कोर से ताकती हुई बोली, "विलकुल नहीं। मैं रसोईघर में न जाती होती तो खाना ही नसीब न होता। यहों आप लोगों से मेरा अन्तर है।" महेन्द्र ने कहा, "यह वात माननी ही होगी।" "महेन्द्र सरकार का क्रेडिट और अधिक है।" इरानी होंठों की कोर से मुसकराती हुई बोली, "वे मुझे यदि अपनी रसोई बनाने की नौकरी पर रख लें तो मैं यह भी कर सकती हूँ।" महेन्द्र ने पूछा, "तनख्वाह क्या होगी ?" "बैंक में नौकरी करने से जितना मिलता है, उतना ही।" इरानी ने आंखों को नशीली बनाते हुए कहा, "आपको तो मालूम ही है कि मुझे घर रुपया भेजना होगा, साथ ही अपना खर्च भी चलाना होगा।" महेन्द्र ने निरीह दृष्टि से सुरवाला की ओर देखा और हंस दिया। सुरवाला ने इरानी से कहा, "तुम बेवकूफ की तरह बातचीत क्यों करती हो, इरानी ? इससे तो बेहतर यही है कि अपना सारा बोझ उठाने कहो।" वह महेन्द्र की ओर देखकर हँस दी। "कहिये, मेरा बोझ उठाइयेगा ?" इरानो ने चूल्हा के निकट से गरदन तिरछी कर महेन्द्र की ओर देखा। और दूसरे ही क्षण कृत्रिम भय के साथ कहा, "यह बात मत कहो सुरोदी, उसके बाद तो तुम गर- दन पर हाथ रखकर मुझे निकाल बाहर करोगी!" सुरवाला बोली, "मैं निकाल बाहर करने वाली कौन होती हूँ ? मैं तो कह रही हूँ कि कोशिश करके देखो, शायद इस आदमी में कुछ बद- लाव आ जाये । मैं तो वैसा कर नहीं सकी।" महेन्द्र विना कुछ बोले अपनी पूर्ववत् निरीह मुसकान चेहरे पर लिए, रसोईघर के दरवाजे के निकट से हट गया । परन्तु प्रसन्नता का स्वर उसके प्राणों में गूजता रहा । उसके बाद जव सुरवाला ने खाने फो पुकारा तो रसोईघर के अन्दर जाकर महेन्द्र ठिठककर खड़ा हो एकही जिन्दगी १०७ गया । देखा, उसके खाने के स्थान पर फर्श पर पोढ़ा विछा नहीं है और न ही भोजन को याली है। कोठरी के एक कोने में सुरबाला मुंह में आंचल दवाए खड़ी है। मेज के मामने इरानी है और वहां एक पाली में भात तथा कई फटोरे में व्यंजन रखे हुए हैं । इरानो के होंठों के कोने में दोहरो मुसकराहट है और उसकी निगाह मेत्र को ओर है। महेन्द्र ने सुरवाला की ओर देखते हुए विस्मय भरे स्वर में कहा, "मुझे अपने स्थान पर खाना नहीं दिया ?" "नहीं, आज मैंने आपको यहां खाना दिया है।" इरानो बगैर मुसकराए महेन्द्र को आँखों की ओर देखती हुई बोली। महेन्द्र भी इरानी की ओर देख रहा था और उसके चेहरे पर मुस- कराहट और बेचैनी दोनों उभर माई थी। वह बोला, "वहाँ क्यों, मुझे फर्श पर ही दे । दो बिना अभ्यास के चन्दन लगाने से सिर दुखने लगता "कुछ नहीं दुखेगा, आप आकर वैठिये तो सही।" इरानी के स्वर में आदेश का पुट है, "हम लोग आपको सब बात मानेगे और माप हमारी कोई बात नहीं मानिएगा? ऐसा नहीं हो सकता, महेनदा ।माज से आपको मेज पर बैठकर ही खाना होगा।" महेन्द्र ने सुरबाला की ओर देखा और समझ गया कि वह मुंह में आंचल दवाए तमाशा देख रही है । महेन्द्र ने कहा, "याना तो अपनी पसन्द की चीज है, वरना खाना खाकर सन्तोप ही नहीं होता।" "पहले आप आकर बैठ जाएं, फिर मैं देखती हूँ कि सन्तोष होता है या नहीं।" इरानी के स्वर में पोड़ा-बहुत जिद का भाव है लेकिन आंखें महेन्द्र को आंखों पर टिकी हैं। महेन्द्र ने आगे और पीछे की ओर दृष्टि घुमाकर पुनः सुरवालाको ओर देखा, उसके बाद हौले-हौले मेज की ओर कदम बढ़ाते हुए बोला, "लगता है, इरानी को साजिश में तुम्हारा भी हाप है।" सुरवाला बोली, "बिलकुल नहीं। सारी साजिश इरानो एक ही जिन्दगी । १०८ "पागलपन है !" महेन्द्र ने कहा, लेकिन वह मेज पर रखे भोजन के सामने कुर्सी पर बैठ गया। एक बार उसने इरानी की ओर ताका। इरानी उसी की ओर ताक रही थी। वोली, “लीजिए, शुरू कीजिए।" महेन्द्र ने हाथ लगाया । बाएं हाथ को लटकाए रखने में असुविधा हो रही थी। इरानी ने एक बार सुरवाला को आंखों से आँख मिला- फर, महेन्द्र के बाएं हाथ को पकड़कर मेज पर रख दिया और कहा, "लीजिए हाथ यहां रखिए, आराम से बैठकर खाना खाइए।" महेन्द्र ने हंसकर पुनः एक वार सुरवाला की ओर देखा, उसके बाद खाना शुरू किया। नीतू इस बीच एक वार रसोईघर के दरवाजे से झांक गया और इस तरह चिल्क उठा जैसे भूत पर उसकी नजर पड़ी हो । और दूसरे ही क्षण वह आँखों से ओझल हो गया। सुरवाला बोली, "खैर इरानी के द्वारा कुछ तो हुआ।" "इसमें होने-हवाने की कौन-सी बात है ?" इरानी सुरबाला की ओर ताकती हुई बोली, "बल्कि यही कहा जा सकता है कि इसके पहले फा काम अजीब तरह का था ! इतना बड़ा भोजन-कक्ष है, टेबुल-चेयर सब कुछ हैं । और-और लोग वहां खाना खाएंगे और घर के मालिक फर्श पर बैठकर ?" सुरवाला के चेहरे पर क्या एक छाया उतर आई ? वह बोली, "वैसा तो गृह-स्वामी की मर्जी से ही हुआ था।" "सो तो है ही।" इरानी बोली, "घर की मालिक की मर्जी हमेशा चल नहीं सकती। घर वालों को मर्जी का भी थोड़ा-बहुत खयाल रखना पड़ता है।" महेन्द्र ने सिर उठाकर इरानी को ओर देखा, उसके वाद सुरबाला की ओर । लेकिन वगैर कुछ बोले खाना खाने में मशगूल हो गया। इस वीच मती और सतु ने भी दरवाजे से झांककर इस अविश्वसनीय ।

एक हो जिन्दगी १.८ । घटना को देख लिया था और सुरवाला तथा इरानो को आंखों से आयें मिलाकर मुसकराते हुए वहाँ से चले गये थे। महेन्द्र रविवार को दोपहर के समय सोता नहीं है। जो आदमी नौकरी करता है और जिसके इतने फारोबार फैले हैं, उसका एक काम आश्चर्यजनक है और वह यह कि रविवार के अलावा सप्ताह के किसी दूसरे दिन यह अखवार नहीं पढ़ता है । महेन्द्र अपने बिस्तर पर बैठ अखबार पढ़ रहा था। सुरवाला खाना खाकर आई और बोली, "माज क्या करोगे ? निकलोगे या घर पर ही रहोगे ?" महेन्द्र ने सिर उठाकर सुरबाला की ओर देखा । रविवार को दोप- हर वह खाना खाकर सुरवाला के साथ माणिकतल्ला सी० आई० टी० रोड के फ्लैट में जाता है। सारा दिन गुजार फर शाम को वापस आ जाता है । महेन्द्र के लिए इसका एक जरूरी कारण है । वह है उस एक कमरे के फ्लैट में हर रोज एक बार जाना । क्योंकि उसका सारा नकद फाला पैसा वहीं जमा है। उसने कहा, "वहाँ तो एकबार जाना हो है । क्यों, तुम नहीं चलोगी?" "चलूगी क्यों नहीं ?" सुरवाला बोलो, "लड़कों को तो मालूम हो है कि हर रविवार घाना खाने के बाद मैं तुम्हारे साथ बाहर निकलती हूँ। मगर इरानी से क्या कहूँगी? वह तो जानना चाहेगी, हम लोग कहां जा रहे हैं।" महेन्द्र कुछ लहमों तक सोचता रहा, उसके बाद बोला, "इरानी चाहे तो हम लोगों के साथ चल सकती है।" सुरवाला के चेहरे पर माश्चर्य चल गया, "तुम्हें असुविधा नहीं होगो?" "असुविधा क्या होगो ?" महेन्द्र ने निरोह स्वर में कहा, "उसके सामने आलमारी खोलकर मैं कुछ देखने नहीं जा रहा हूँ। देखने को जरूरत होगी तो मैं उसका इंतजाम कर लूगा।" सुरवाला को महेन्द्र से ऐसो आशा नहीं पो । एक मात्र नोवू ११० एक हा जन्दगा वह एक दो वार ले गया है। इसके अलावा वह किसी को भी नहीं ले जाना चाहता है। नीतू को बेशक वहाँ अच्छा नहीं लगा था, एकमात्र ऊँची-ऊंची इमारतें, वी० आई० पी० रोड, सॉल्ट लेक और आप-पास के सरकारी फ्लैटों को छोड़कर । सुरवाला बोली, "फिर इरानी से जाकर कह आती हूँ।" वह कमरे से बाहर चली गई। महेन्द्र के सोच की धारा वेशक दूसरी ओर ही प्रवाहित हो रही है । इरानी को वह घर में छोड़कर जाना नहीं चाहता। छोड़कर जाने का मतलब है मती-सतु के साथ हँसी-मजाक करना और हुड़दंग मचाना । यह भी हो सकता है कि उन लोगों के साथ मोटरसाइकिल के पीछे बैठ कहीं निकल जाए। हालांकि कल से ही इरानी अपनी नौकरी ज्वाइन करने जा रही है और उसे अकेले ही जाना है। दमदम से क्लाइव रोड तक जाने की समस्या इस बीच महेन्द्र के मन को कुरेद रही है। अपने साथ ले जाए, ऐसा संभव नहीं है । इरानी के लिए उस तरह ड्राइ- वर की बगल भी बैठना में असम्भव है। इसके अलावा ड्राइवर और .७५८२ ही क्या सोचेंगे ? मुसाफिर यों भी तरह-तरह के व्यंग्य कसते हैं । इरानी जैसी लड़की के साथ उस तरह ड्राइवर की बगल में वैठते देखकर और भी अधिक आवाज कसने लगेंगे। इरानी के लिए यह सब बर्दाश्त न होना ही स्वाभाविक है। "मुझे और सुरादी को लेकर कहाँ जाइयेगा, महेनदा ?" इरानी ने कमरे के अंदर प्रवेश किया। उसकी आँखों में कौतूहल है। महेन्द्र ने मुस्कराकर कहा, "चलो, एक जगह से घूम आएं।" "सिनेमा-थियेटर जा रहे हैं ?" इरानी की आँखों में प्रत्याशा की छाप है। महेन्द्र सिर हिलाकर कहा, "क्यों, सिनेमा-थियेटर के अलावा कोई दूसरी जगह नहीं जाया जा सकता? "चलो, एक नए मकान से घूम-फिर आएं।" इरानी मती-सतु से पहले ही सुन चुकी थी कि दोपहर के भोजन के एक हो जिन्दगी 111 पाद महेन्द्र और सुरवाला बाहर निकल पड़ेंगे। उसने सोगापा, पद गती सतु के साथ कहीं घूमने निकाल जायेगी । गहेन्द्र मो मात गुगकर इरानो को लगा, इस घर के इतिहास में आज एक गई पटना पटी है- ने मेज पर बैठकर खाना पाया है । मतो-रातु के साप पूगने में निकाली के बजाय महेन्द्र को यात मानना अच्छा ही रहेगा। गोंकि इस पुष्प के चरित्र का भेद जानने के लिये उराफे रमणी-गिरा मे एक प्रकार का संकल्प लिया है । गरदन तिरछी कर आगों को गनाते हए योगी, "आप जो काहियेगा, यही फलंगी । आप यह रहे हैं तो पगा।" महेन्द्र ने कहा, "फिर तुम जाकर तैयार हो जामो, गुरोरी जी तैयार होने को कहो।" वह अपवार रयकर विस्तार रोगी गरा रविवार को महेन्द्र अपनी बस से माणितल्ला सी० आई०टी० फ्लैट नहीं जाता है। क्योंकि इस दिन प्रत्येक स्ट में गफी एकाएक बस ही चलती है, बाकी छुट्टी पर रहती हैं। हर रविवार को दो रहा को यथाक्रम व्यवस्था है। सुरवाला के साय का यग गे माणिमात्रा मोड़ जाता है। वहां से बस बदलकर सी० आई०टी० रो। मग होकर भी दूसरी बस से जाया जा सकता है । मगर महेन्द्र को पहर सीधा लगता है। आज इरानी और सुरवाला के साथ गहन पर निकली ही महिन्य को अपनी जिन्दगी में पहली बार महमूस हया निही दिन भी वी में बेहद भीड़ रहती है। हालागि वरा में देगी हुई मार देगी 31 मन प्रसन्न हो जाता है। उरागे घास तौर गे पर भी गहगहमा. यातायात वाहनों के जितने मुगाफिर हैं ये गय रानी की और ना दृष्टि से ताक रहे हैं । शायद यही स्यामाविक हो । राना गाकर साथ ही उसके पूरे जिस्म में लाल वेप-यूटेदार रेगमी गाड़ी में भाग मसाते यौवन की पताका फहरा दी है। शायद मोर, मोरागाँ पर, हलके हायों से काली पैन्सिल की मूना फेरी गई है । पहाटका भी लाल-लाल है। उस पर भी इसका प्रोप पड़ा है। पर, एक ही जिन्दगी ११२ । नहीं है, सिवाय कान में झलमलाते दो नीले पत्थरों के । दाहिने हाथ की कलाई में घड़ी है और लाल रंग के फोम का एक बैग । उसके जिस्म से एक मीठी खुशबू निकल रही है जो महेन्द्र के नथुने में समाकर एक सरूर पैदा कर रही है। इरानी की तुलना में सुरबाला नितान्त एक अठपहरू साड़ी पहने- वाली प्रौढ़ा जैसी लगतो है। हालांकि उस को नोले चौड़े किनारे की घानी साड़ी कोई कम कीमती नहीं है। कान और नाक में हीरे के पासे और कील हैं। हाथों में निखालिस सोने की छ:-छः चूड़ियां, सोने से मढ़ी शंख की चूड़ी और लोहा । लेकिन साड़ी वह अठपहरू गृहस्थ वधू की तरह पहने है। पांवों के सैण्डल कोई खास आकर्षक नहीं हैं। बाहर निकलने के समय गले का हार खोल कर रख लेती है क्योंकि बटमारी होने का डर बना रहता है। , "ओ महेनदा, धूप और भीड़ देखकर मेरा सिर चकरा रहा है।" नी महेन्द्र के शरीर से सटती हुई बोलो और दूसरे हाथ से उसने सुरवाला का हाथ थाम लिया। महेन्द्र ने हंसकर कहा, "कलकत्ते में नौकरी करोगी और धूप-भीड़ देखकर डरोगी तो काम कैसे चलेगा?" "सचमुच, कलकत्ता एक झमेला ही है।" इरानो बोली, "सिली- गुड़ी में रिक्शे पर बैठ मजे से जाती थी। लौटने के वक्त पैदल ही आती थी। घर से हम लोगों का वैङ्क आधा मील दूर है।" महेन्द्र बोला, "लेकिन कलकत्ते में तुम्हारे बैङ्क के इर्द-गिर्द आधे मील तक सिर्फ दफ्तरों की इमारतें हैं, आदमी के रहने की जगह नहीं "फिर भी आप जो कहें, महेनदा, मकान आपने बहुत दूर वनवाया है।" इरानी ने होंठ लटकाकर शिकायत भरे लहजे में कहा, "और ऐसा लगता है, इस ओर की बसों में भीड़ कुछ ज्यादा ही रहती है।" - एक हो जिन्दगी १११ महेन्द्र बोला, "यह गलत धारणा है । कलकत्ता और उसके आस- पास जहां कही भी जाओ, बस में भीड़ मिलेगी ही। तब हो, श्याम- बाजार का पुल पार करने के बाद ट्राम मिलती है।" महेन्द्र को वात खत्म होने के पहले ही एक चलती हुई बस में इरानो फो हमउम्र एक लड़की रॉड पकड़कर झूलती हुई दोख पड़ी। उसका आंचल सड़क को बुहार रहा था यानी बहुत कुछ पुल-सा गया था। एक मर्द उसे कसकर पकड़े या। इरानी बोली, "वाप रे ! इसी तरह जाना होगा?" "महेन्द्र बोला, "होगा नही ? लगता है, किसी सिनेमा के मेटिनी शो का टिकट कटाए हुई है।" "नहीं बाबा, मैं उस तरह नहीं जा पाऊँगी।" इरानी बोली, "आप सुरादी के साथ हर रविवार को कैसे जाते हैं ?" महेन्द्र ने एक बार सुरबाला की ओर देखा, फिर हंसकर बोला, "इसी तरह।" ऐसे में एक खालो टैक्सी इरानी वगैरह के सामने आकर रुकी और हॉर्न बजाया। इरानी ने तत्काल कहा, "लिए महेनदा, टैक्सी से ही चलें।" महेन्द्र ने घबराकर कहा, "टैक्सी से चलेंगे ?" इरानी अपने दोनों हाथों से महेन्द्र और सुरवाला को पामे टैक्सी की ओर बढ़ गई, "आइए। ऐसा हालत देख चुकी हूँ कि उस तरह जाया नहीं जा सकता।" टैक्सी ड्राइवर के बगल वाले आदमी ने झट पोछे के दरवाजे को खोल दिया। महेन्द्र ने शिशकते हुए विमूढ़ दृष्टि से सुरवाला की ओर देखा । सुरवाला भी विमूत-सी हंसने लगी। महेन्द्र बोला, "ठहरो, जरा और देख लू।" "नहो-नहीं, अब कुछ नहीं देखना है।" इरानी ने सूरगा टैक्सो की ओर ठेल दिया । "इस तरह इतने लोगों " ने खड़े होने में भी परेशानी मालूम होती है।" यह कहकर सुरबाला द स्वयं अन्दर जाकर महेन्द्र का हाथ खोंचने लगी। इरानी की ओर इतने लोगों का फटी-फटो निगाहों से ताकना महेन्द्र अच्छा नहीं लग रहा था। फिर भी वह झिझकते हुए टैक्सी के न्दर चला गया। "किराया मैं ही दूंगी। अभी कहाँ जाना है, यही बताइए।' इरानो ने कहा। महेन्द्र विवशता की हंसी हंसते हुए बोला, "तुम किराया क्यों दोगी? वैठ ही गए हैं तो यह काम मेरा है।" ड्राइवर की ओर देखते हुए बोला, "माणिकतल्ला, सी० आई० टी० रोड ।" ड्राइवर के साथी ने मीटर गिरा दिया। टैक्सी आगे बढ़ने लगी। सुरवाला और महेन्द्र के बीच इरानी है। वह क्या जान सुनकर नहेन्द्र के शरीर से सटकर बैठी है ? उसके बाएं हाथ का वैग एक तरह से महेन्द्र की गोद में ही है । बोली, “वाप रे, अब शान्ति मिली । सुरादी, तुम इस भीड़ में कैसे जाती थीं?" सुरवाला ने मुसकराकर कहा, "मैं अभ्यस्त हो गई हूँ।" "मेरे भाग्य में कल से क्या लिखा है, कौनजाने ! "इरानी ने कहा, "इस तरह चमगादड़ की तरह लटककर कैसे जाऊँगी, समझ में नहीं आ रहा है।" सुरवाला बोली, "तुमने तो कहा है, तीन महीने के अन्दर ऑफिस मुहल्ले के आस-पास कहीं रहने का इंतजाम कर लोगी। फिर चिन्त की कौन-सी बात है ?" महेन्द्र चिन्ता में पड़ गया। उसका पूरा शरीर इरानी के देह छुअन की उष्णता से पसीना-पसीना हो रहा है। टैक्सी में न बैठता इतने सघन स्पर्श का अनुभव न होता। इरानी का बायां हाथ, नाखूनों पर रंग का प्रलेप है, उसकी गोद की बगल में दवा हुआ तीच-बीच में गाड़ी का झटका लगता है तो उसकी छाती महे - एक हो जिन्दगी ११५ दाहिने हाथ से छू-छू जाती है और महेन्द्र को इन्द्रियां थरथराने लगती हैं । इरानी का ऑफिस आने-जाने और चले जाने की बात उसके मन को विचलित कर रही है। वह बिना कुछ सोचे ही बोल उठा, "कोई न कोई इन्तजाम हो जाएगा। कोई काम अटका नहीं रह जाएगा।" "आप लोग तो कहकर छुटकारा पा लोजिएगा।" इरानी बायों ओर मुड़कर बोली और फिर सोधी होकर बैठ गई, "अपनी समस्या के बारे में मुझे स्वयं ही सोचना होगा।" महेन्द्र बिना कुछ बोले गरदन को झटकारते हुए हंसा । सुरवाला बाहर की ओर ताक रही थी । इरानी ने एक बार तिरछी निगाहों से महेन्द्र की ओर देखा और अपना बायां हाप सीट के पीछे रख दिया। महेन्द्र उसके शरीर के तीन स्पर्श से अभिभूत, नशे में धुत आदमी जैसा बैठा रहा । वह रास्ते का कुछ भी नहीं देख रहा है। नशा उसे स्थिर नहीं रहने दे रहा है। अपने में जज्व कर रहा है और बेपरवाह बना रहा है। सुरवाला के सामने कुछ करना सभव नहीं है। सुरवाला न भी होती तो महेन्द्र बेपरवाह होकर कुछ नहीं कर पाता। प्रायः पच्चीस मिनट के बाद महेन्द्र ने एक बहुमंजिली इमारत के सामने टैक्सी रुकवा दो। मोटर का कागज देख, अन्दर को बुक पॉकेट से रुपया निकालकर दिया और दरवाजा खोलकर नीचे उतर गया। उसके उतरने के बाद इरानी और सुरवाला भो नीचे उतरे। सड़क की पटरी पारकर, गाड़ी-पाकिङ्ग को बायों तरफ लिफ्ट की ओर बढ़ते ही महेन्द्र ने देखा, दरबान हैरतमरी निगाहों से इरानी की ओर देख रहा है । सुरवाला को वह रविवार को इस वक्त आते देखता है और कुछ अनुमान कर लेता है । आज इरानी जैसी माधुनिका रूपसी युवती को देखकर बेचारे का दिमाग काम नहीं कर रहा है । लिफ्ट के निम्न- गामी तोर की नोक की रोशनी ने सकेत किया। इरानी ने फुसफुसाते हुए पूछा, "किसके घर जा रही हो, सुरादी?"

११६ एक ही जिन्दगी आए?" "देखो, तुम्हारे बहनोई कहाँ ले चलते हैं ।" सुरबाला के चेहरे पर रहस्य की मुसकराहट खेल गई। लिफ्ट तीन महिला और एक पुरुष को लिए नीचे उतरा। उन लोगों के निकलने के बाद महेन्द्र ने लिफ्ट के दरवाजे को कसकर पकड़ते हुए कहा, "तुम लोग भीतर चली जाओ।" सुरवाला के पीछे-पीछे इरानी आई। उसके बाद महेन्द्र ने दरवाजा वन्द कर दिया और आठ नंबर बटन दबाया । लिफ्ट ऊपर उठने लगा। इरानी अपनी उत्सुकता दबा कर रख नहीं सकी। पूछा, “महेनदा, आखिरकार आप मुझे अनपहचाने बड़े आदमी के घर "पहचाने भी तो हो सकते हैं।" महेन्द्र ने हंसकर कहा । इरानी आश्चर्य चकित और विमूढ़ है । मती-सतु ने उसे इस तरह के किसी मकान के बारे में नहीं बताया था। लिफ्ट आठ नंबर फ्लोर में आकर रुका । महेन्द्र ने दरवाज खोला। पहले सुरवाला और इरानी बाहर आई। महेन्द्र ने बाहर निकल दोनों दरवाजे बन्द कर दिये। इरानी बोली, "मैंने ठीक ही कहा था महेनदा, आप चाहें तो स्मार्ट हो सकते हैं। लिफ्ट मजे में चलाते ले आए।" "इस तरह की इमारतों में बच्चे भी लिफ्ट से चढ़ते-उतरते हैं। हालांकि बच्चों का अकेले लिफ्ट में चढ़ने का नियम नहीं है।" महेन्द्र ने यह कहकर जेब में हाथ डाला और तीन-चार चाबियों वाला एक रिंग बाहर निकाला। वायीं ओर एक बंद दरवाजा है । सामने सीढ़ी के पास ही एक और दरवाजा । महेन्द्र ने उसी घर के इएल लॉक में चाबी डालकर दरवाजा खोला । दरवाजे को ठेलकर पुकारा, "चली आओ।" . इरानी जैसी असाधारण बुद्धि की चालाक चुस्त लड़की को भी बात समझ में नहीं आ रही थी। वह सुरवाला के पीछे-पीछे कमरे के अन्दर गई । महेद्र ने शुरू में पंखे का स्विच दबाया, उसके बाद वहां से हट एकही जिन्दगी ११८ महेन्द्र पाल पीछे की ओर व ११८ + ९. उत्तर की तरफ की खिड़की खोलते मेरा यही वक्त दरवाजा खोल दो।" दोनों खिड़कियां खोलते ही चार रहे या प्रकाश से भर गया । वालकांनी क डिजाइन का मोजाइक का फर्श झिल एक कमरे के फ्लैट में असुविधा या उधर वाथरूम और मिनी किचेन की तब हो, सामने ही सड़क है। 'दूर वी० पी० आई० रोड का बहुत बड़ा हिस्सा दीख पड़ता है।" "सो तो समझी।" इरानो ने विस्मय भरे स्वर में कहा, "लेकिन यह घर है किसका ? कौन रहता है ? एक ही सिंगल बाट का विस्तर है, और एक ही आलमारी है।" महेन्द्र सुरबाला को ओर देखकर मुसकराया, उसके बाद इरानी से कहा, "यह सब सोचकर क्या होगा कि किसका मकान है, कौन रहता है ? मान लो, अभी हम लोग हैं और यह मकान हमों लोगों का है। सप्ताह में एक दिन एक वक्त के लिए आते हैं। ज्यादा फर्नीचर रघकर पया होगा?" इरानी ने हैरतभरी निगाहों से सुरवाला को मोर देखा, उसके बाद महेन्द्र की ओर निगाह दौड़ाते ही उसकी आँखों का परदा जैसे सरकः गया। बोली, "इसका मतलब यह घर आपका ही है ?" चावी से दरवाजा खोला और उस पर भी तुम समझ नहीं सकौं ?" सुरवाला ने हंसते हुए कहा। इरानी के चेहरे पर जैसे हगार पावर का बल्ब जल उठा । बोलो, "अहा, कितना सुन्दर है !" यह कहकर तेज कदमों से बालकोनो को ओर चली गई और मुग्ध नयनों से दूर, दोपहर के यो० आई० पो० रोह और सेल्ट लॉक देखने लगा। उसके बाद कहा, ।

लोगों एक ही जिन्दगी "देखो, तुम्हारे कांनी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया। इरानी ने हस्य की मुसन मुड़कर कहा, "यह टॉप फ्लोर है, यानी नवमीमाला। लिफ्ट इसे क्या किराये पर लिया है ?" "नहीं, खरीदा है।" महेन्द्र ने कहा। ह" "क्यों, दमदम में इतना बड़ा मकान रहने के बावजूद इसे क्यों खरीदा?" इरानी के कौतूहल का कोई अन्त नहीं है । महेन्द्र बोला, "हर रोज तो नौकरी और उस मकान का सिलसिला बना ही रहता है। रविवार को एक वक्त इस घर में सोकर या बैठकर विता जाता हूँ । सुरो भी आती है। सप्ताह में एक दिन वह एक वक्त गाय नहीं दुहती है, बछड़ों के पीने के लिए छोड़ देती है।" इरानी आश्चर्य में आकर एक वार कमरे के अन्दर झांक गई। देखा, सुरवाला नहीं है । पूछा, "सुरोदी कहाँ गई ?" "शायद बाथरूम।" इरानी महेन्द्र से सटकर खड़ी हो गई और पलकों को नचाती धीमे स्वर में बोली, "दरअसल बीवी के साथ यहाँ एकान्त में मिलना होता है। है न ?" महेन्द्र के गले और चिवुक को इरानी की सांसें छू रही थों और उसे महसूस हो रहा था, इरानी की सांसों में भी जैसे एक सुगंध है सीने के एक किनारे का आँचल सरका है, दोनों उन्नत वक्षों के बीच की गहराई जैसे वह प्रत्यक्ष देख रहा है। उसके शोणित की गति ती हो गई। देखा, इरानी के होंठों के बीच उसके सफेद-उजले दांत झिक मिला रहे हैं। "क्या हुआ, मेरी बात का उत्तर दीजिए।" इरानी ने महेन्द्र सीने को अपनी उंगली से कोंचा। स्पर्श से महेन्द्र जैसे सचेतन हो उठा । एक बार पीछे की ओर त कर झिझकते हुए कहा, "तुम क्या बोल रही हो! मेरे और सुरा के 77 दोनों चुपचाप इस बालकॉनी में या तो बैठे एकही जिन्दगी ११८ हैं या फिर लेटे । सप्ताह भर में आराम के तौर पर मेरा यही वक्त हुआ करता है।" "वह सब रहने दीजिए।" इरानो ने कहा, "सुरादी के दिन रहे या नहीं, पता नहीं; आपके दिन तो हैं हो।" महेन्द्र को आवाज लड़खड़ाने लगो, "मैं-मैं तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा हूँ।" "समझा हूँ।" इरानी अपना शरीर महेन्द्र के शरीर से टिकाकर गड़ी हो गई । महेन्द्र की सांस जैसे रुक गई। सुरवाला का कंठ स्वर मुनाई पड़ा, "साली और बहनोई में इतनी क्या चर्चा चल रही है ?" महेन्द्र जरा हटकर खड़ा हो गया। इरानी ने कमरे के अन्दर जाकर कहा, "तुम लोगों के गोपनीय करिश्मे के बारे में यह रही थी।" "वह क्या?" सुरवाला ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा इरानी बोली, "और क्या? यह पर अगल में तुम्हारा और महेनदा का वृन्दावन है, युगल मिलन का स्थान।" "धत्त मुंहजली !" सुरबाला ने हंसकर उसे ढकेल दिया और कहा, "उसने क्या यही कहा ?" इरानी ने भी हंसते हुए कहा, "वे स्वीकार क्यों करने लगे ?" "हां, उन का तिहाई हिस्सा बीत गया, अव चोया है। अब इस उम्र में वृन्दावन !" सुरवाला पंखे के नोचे मोजाइक के फर्श पर बैठ गई। महेन्द्र ने हलका सा ठहाका लगाया, उसके बाद पलंग पर जाकर बैठ गया । इरानी फोम के बैग को पलंग पर रखती हुई बोली, "महेन- दा, मुझे माप यही मकान दे दें। मेरे अकेले के लिए बहुत अच्छा रहेगा। आप और सुरादी भी बीच-बीच में आ सकेंगे।" महेन्द्र बोला, "इसमें तुम्हें कौन-सी सुविधा होगी? यहाँ से आमिर्म जाने में भी तुम परेशान हो जाओगी। इसके अलावा होस्टन .

। एक ही जिन्दगी "देखो, तुम्हारे कानी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया । इरानी ने रहस्य की मुस लिपट २ मुड़कर कहा, "यह टॉप फ्लोर है, यानी नवमीमाला। लोगों ! इसे क्या किराये पर लिया है ?" "नहीं, खरीदा है।" महेन्द्र ने कहा। हा "क्यों, दमदम में इतना बड़ा मकान रहने के बावजूद इसे क्यों खरीदा?" इरानी के कौतूहल का कोई अन्त नहीं है । महेन्द्र बोला, "हर रोज तो नौकरी और उस मकान का सिलसिला बना ही रहता है। रविवार को एक वक्त इस घर में सोकर या बैठकर बिता जाता हूँ। सुरो भो आती है। सप्ताह में एक दिन वह एक वक्त गाय नहीं दुहती है, वछड़ों के पीने के लिए छोड़ देती है।" इरानी आश्चर्य में आकर एक बार कमरे के अन्दर झांक गई। देखा, सुरवाला नहीं है । पूछा, "सुरोदी कहां गई ?" "शायद बाथरूम।" इरानी महेन्द्र से सटकर खड़ी हो गई और पलकों को नचाती धीमे स्वर में बोली, "दरअसल बीवी के साथ यहाँ एकान्त में मिलना होता है। है न ?" महेन्द्र के गले और चिबुक को इरानी की सांसें छू रही थी और उसे महसूस हो रहा था, इरानी की सांसों में भी जैसे एक सुगंध है । सीने के एक किनारे का आँचल सरका है, दोनों उन्नत वक्षों के बीच की गहराई जैसे वह प्रत्यक्ष देख रहा है। उसके शोणित की गति तीव्र हो गई । देखा, इरानी के होंठों के बीच उसके सफेद-उजले दांत झिल- मिला रहे हैं। "क्या हुआ, मेरी बात का उत्तर दीजिए।" इरानी ने महेन्द्र के सीने को अपनी उँगली से कोंचा। स्पर्श से महेन्द्र जैसे सचेतन हो उठा। एक बार पीछे की ओर ताक- कर झिझकते हुए कहा, "तुम क्या बोल रही हो! मेरे और सुरा के क्या अव वे दिन रहे ? हम दोनों चुपचाप इस बालकॉनी में या तो बैठे रहते एक ही जिन्दगी ११ हैं या फिर लेटे । सप्ताह भर में आराम के तौर पर मेरा यही वक्त हुआ करता है।" "वह सब रहने दीजिए।" इरानी ने कहा, "सुरादी के दिन रहे या नहीं, पता नहीं; आपके दिन तो हैं हो।" महेन्द्र की आवाज लड़खड़ाने लगी, "मैं-मैं तो कुछ भी नहीं समझ पा रहा हूँ।" "समझा दूं।" इरानी अपना शरीर महेन्द्र के शरीर से टिकाकर पड़ी हो गई । महेन्द्र को सांस जैसे रुक गई। सुरवाला का कंठ स्वर सुनाई पड़ा, "साली और बहनोई में इतनी क्या चर्चा चल रही है ?" महेन्द्र जरा हटकर खड़ा हो गया। इरानी ने कमरे के अन्दर जाकर कहा, "तुम लोगों के गोपनीय करिश्मे के बारे में कह रही थी।" "वह क्या ?" सुरबाला ने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा इरानी बोली, "और क्या? यह घर असल में तुम्हारा और महेनदा का वृन्दावन है, युगल मिलन का स्थान।" "धत्त मुंहजली !" सुरबाला ने हंसकर उसे ढकेल दिया और कहा, "उसने क्या यही कहा ?" इरानी ने भी हंसते हुए कहा, "वे स्वीकार क्यों करने लगे?" "हो, उम्र का तिहाई हिस्सा बीत गया, अब चौया है । बद इस उम्र में वृन्दावन !" सुरवाला पंखे के नीचे मोजाइक के फन पर - गई। महेन्द्र ने हलका सा ठहाका लगाया, उसके बाद पलंग दर ३.. बैठ गया । इरानो फोम के बैग को पलंग पर रखती हुई दाली, "चंट- दा, मुझे आप यही मकान दे दें। मेरे अकेले के लिए वन बन्छन्द: आप और सुरादी भी बीच-बीच में आ सकेंगे।" महेन्द्र बोला, "इसमें तुम्हें कौन-सी सुविधा होगी इन जाने में भी तुम परेशान हो जाओगी। इसके दनादा हंसगुन १२० एक अलग बात है। यहां अकेली कैसे रहोगी ?" "क्यों ? अगर मैं अकेले डेरा लेकर रहूँ तो फिर ऐसे ही रहना पड़ेगा।" इरानी ने कहा, "सुवह शाम के लिए एक दाई रख लूंगी। तव हां, यह कहकर ही क्या होगा? मैं इस तरह के फ्लैट का किराया कहाँ से दूँगी ?" महेन्द्र सुरवाला की ओर नजर दौड़ाते हुए निरीह हँसी हंस दिया। वोला, "घबराने की कौन-सी बात है ? तुम्हारा कोई न कोई इंतजाम हो जाएगा। मैं खुद भी तुम्हारे लिए कोशिश करूंगा।" "खैर, अभी यह सब वात रहे।" इरानी बालकॉनी की ओर चली गई, "मैंने इतनी ऊंचाई से कभी कलकत्ते को नहीं देखा है, इसलिए देख लूं।" महेन्द्र ने स्टील की आलमारी की ओर नजर दौड़ाई । एक वार बालकॉनी की ओर ताका । इरानी चारों तरफ का दृश्य देखने में मश- * गूल हो गई है । वह आहिस्ता-आहिस्ता आलमारी के पास गया और जेव से चावी निकाली। सुरवाला फर्श पर लेट गई। मनुष्य प्राकृतिक प्रकोप की ध्वंसलीला को अचानक धरती पर. उतरते देखकर ज्ञान शून्य हो जाता है और हाहाकार मचाते हुए मृत्यु का वरण करता है । लेकिन पृथिवी के परिमंडल में, अन्तरिक्ष या पाताल के गर्भ में, अनिवार्य ध्वंसलीला की तैयारियां पहले से ही चलती रहती हैं । मनुष्य को यदि समस्त प्राकृतिक ध्वंसलीला का अनुमान पहले से ही चल जाता तो हो सकता है वह आत्मरक्षा का उपाय खोज लेता। लेकिन मनुष्य अपनी लीला में मग्न रहता है और प्रकृति अपनी लीला में । मनुष्य के लिए प्राकृतिक ध्वंसलीला का पता पहले ही चल जाए, ऐसा संभव नहीं है। यहाँ तक कि विज्ञान के दर्प से मदमाती सभ्यता भी प्राकृतिक प्रकोप की ध्वंसलीला रोक नहीं सकती । मनुष्य का अनुभव इस बात का संकेत करता है। महेन्द्र का ग्रह भी प्रकृति को ध्वंसलीला की जो एक तैयारी कर १२१ एक हो जिन्दगा रहा है, अपने अनुभवी जीवन में उसे न तो इसका अहसास हुआ और न ही वह इसका अनुमान कर सका। किसी को हानि उठाते देखकर और-और लोग उमकी बेवकूफी पर टिप्पणी करते हैं। लेकिन मनुष्य कहाँ, कब और किस परिस्थिति में अपनी लाचारी से अनजाने हो ध्वंस को ओर कदम बढ़ाता है, इस पर कोई नहीं सोचता। यह मनुष्य के जीवन के एक गहरे तात्पर्य का विषय है। महेन्द्र ने सचिवालय के एक साधारण किरानी होकर भी इतनी विषय-संपत्ति अर्जित की है, इतने कारोवार खड़े किए हैं कि सब कुछ अविश्वसनीय जैसा लगता है। संपत्ति क्या चीज है, इसे वह जानता है। भोग के प्रति उसमें कोई आसक्ति हो, इस तथ्य से वह स्वयं अपरिचित था । वह भोगी नही था । जवानो में सुरवाला उसके जीवन में विवाहिता वधू के रूप में आई थी। विवाह के पहले उसे अपनी आंखों से देखा तक नहीं था। पिता की पसन्द पर ही शादो की पो और स्वयं पसन्द करे, यह वात उसके खयाल में भी नहीं आया था। क्योंकि विवाह को उसने जीवन के दसियों अनिवार्य विषय के तौर पर हो स्वीकार किया था। पत्नी को पत्नी के रूप में ग्रहण करना और देखना दाम्पत्य जीवन में जो कुछ करणीय है, उसे भी दुनिया की और- और बातों के रूप में ही ग्रहण करना सीखा था। उसी के अनिवार्य कारणवश सन्तान को जन्म दिया। पति-पत्नी के पारस्परिक सानिध्य से शारीरिक मिलन होना उसके लिए भोजन-वस्त्र की तरह ही एक साधारण वात पो । उसमें कोई अधिक सुख, आनन्द, उल्लास या उच्छ- वास का उसने अनुभव नहीं किया था। उसके बाद सचिवालय के तरह- तरह के गली-कूचे का फेरा लगाने के क्रम में वह जीवन के दूसरे नशे में गर्क हो गया था। मौजूदा पचपन वर्ष को प्रौढ़ता में पहुंचने के बहुत पहले ही दांपत्य जीवन के स्वाभाविक क्रियाकलाप उसके जीवन से विदा हो चुके थे । सुरवाला ने भी इसे स्वाभाविक समझकर ही स्वीकार कर लिया था। उसे कोई शिकवा-शिकायत नहीं थी। पति और पुत्रों के २ थ वह सुखी गृहस्थ जीवन बिता रही है और उसे सुखी स्त्री ही कहा एगा। इस दृष्टि से महेन्द्र भी सुखहीन नहीं था। वह अपनी नौकरी, जायदाद, कारोवार, वकील से परामर्श, टैक्स का हिसाब-किताब वगै- रह लेकर मगन था। इरानी उसके जीवन में एक प्रलयंकर आँधी की तरह आई। उस आंधी ने उसके शोणित में एक प्रवल आवेग पैदा कर दिया। लगभग एक साल पहले, नन्दिनी के विवाह के समय ही उसकी स्थिरता और मन को इरानी ने चंचल बना दिया था। उसके जैसे पुरुष ने भी यह महसूस किया था कि इरानी के रूप और यौवन में एक ऐसी रमणी की प्रकृति अपना पंख फैलाए हुए है जो कि सभी रूपसी युवतियों में नहीं हुआ करती है। उस फैले पंख पर प्रत्येक पुरुष को कूदने-फांदने की इच्छा होने लगती है। तव महेन्द्र की समझ में यह मुद्दा क्षणस्थायी था, कुछेक दिनों की वात । अवकी स्थानान्तरित होकर जब इरानो उसी के घर में आकर टिकी तो तत्क्षण उसका हृदय वाणविद्ध हो गया। और ऐसा उस अज्ञात में अवचेतन को गहराई में हुआ। हालांकि इरानी के समस अंगों में किसी भी पुरुष के प्राणों को वेधने का हथियार है और र बात उसके सचेतन मन से छिपी हुई नहीं है। यही वजह है कि इरानी के चलते अपने लड़के के बारे में भी निश्चिन्तता का अनु नहीं कर पाता है। बल्कि अवचेतन मन से ईर्ष्यालु हो उठा है। क्य वह सचेतन मन से अपने जगत की परिक्रमा करने की प्रक्रिया से कर इरानी की ओर मुखातिब होकर खड़ा हो गया है। या कह सकते हैं कि इरानी ने प्रवल चुम्बक की तरह उसे अपने खींच लिया है। जो घटनाएं सरसरी दृष्टि से अत्यन्त ही तुच्छ प्रतीत महेन्द्र का भोजन-कक्ष के फर्श से डाइनिंग टेबुल तक पहुँचना पर वैठ सी० आई० टी० रोड जाना-वे उसके जैसे व्यक्ति एकहो जिन्दगी १२० किसी भी हालत में तुच्छ नहीं हैं। प्राकृतिय, बमलीना की यह मय तैयारियां हैं और एक बार जव इमको शुरुवात हो गई है तो वंग के आवर्तन को अन्तिम गोमा में पहुंचे विना इमा अन्त होनेवाला नहीं है। तब उसे रोका भी नहीं जा सकता है। महेन्द्र घर लौटने के ममय बगोचर में ही वहत पुछ आगे रन आया । अब उसे सारे काम-धाम के बीच हमेगा अपने मोमिन में एस. पुकार सुनाई पड़ती है और यह पुकार उसे बेचैन कर देती है। इसका कारण यह है कि वह इरानी की और तीव्र गति से बढ़ रहा है। नतीग यह हुआ है कि राइटर्स से निकलने के बाद वह अपने व्यावसादिक प्रतिष्ठानों में स्वभावतया बहुत ही कम वक्त तक ६ पाता है। उसकी जो परिणिति होनी चाहिए, हो नुको है । अपनी तीक्ष्ण मजग दृष्टि वकरार रखना और सब कुछ को अपने मजबूत हाथों में ममेटे गगना, अब संभव नहीं हो पा रहा है। हालांकि इसके लिए वह हर जगह कैफियत यही देता है कि उसकी तबीयत ठीक नहीं रह रही है। पर पर भी उसने यही फैफियत दी है । फलस्वरूप सुरवाला उसके स्वाम्प्य फे लिए विन्तित हो उठी है। एकमान चिन्तित नहीं है तो रला मित्र-यानी इरानी दी सफलता का अहसास हर कदम पर हो रहा है । नुरवाला ने नहर विश्वास के कारण महेन्द्र को सेवा-शुश्रूपा को बहुत कुछ हिम्मेवारी उसी पर सौंप दी है। इरानी ने महेन्द्र को तिल-तिल पहचान लिया है। इरानी की प्रकृति उस पर अमोघ शक्ति का प्रभाव हो रही है। महेन्द्र ने यद्यपि मना किया है, फिर भी वह हर रोज मती पी मोटा. साइकिल के पीछे बैठफर पलाइव स्ट्रीट जाती है । मती और गनु दोनों ने इरानी के इस दाये को गंगूर मार लिया है और पर में यह बान किसी को जानने नही दा है। गोटगे में पता इरानी मिनी यमगही लौटकर आती है । मह और कही नहीं जाती भयोंकि उस मासूम है. महेन्द्र जल्दी ही पर लौट भाएगा।

स बीच इरानी ने और एक काम किया है। नये साल पर उसने को एक महीन करघे को धोती, अद्धी का एक कुरता, एक जोड़ा वर्ट जूते और एक अटैची केस उपहार स्वरूप दिये हैं । महेन्द्र ने को हाथ उठाकर न-न करते हुए घोर आपत्ति की थी। लेकिन इरानी अधर की तरंग और काली आंखों के अभिमान में सब बह गया था। हेन्द्र ने तमाम पोशाकों को पहना था, पांवों में अलबर्ट जूते भी डाले र । मौका देखकर सुरवाला ने हमेशा के लिए रखे मोती-जड़े सोने के बटन भी कुरते में डाल दिए थे। नये साल के दिन घर में बाकायदा त्योहार मन गया था। महेन्द्र ने हाथ जोड़कर कहा था, "लेकिन दुहाई है इरानी, यह सब पोशाक पहनकर मुझे जहाँ कहीं भी जाने कहो, मगर राइटर्स नहीं। अटैची केस के साथ भी नहीं।' इरानी ने कहा था, "ठीक है, कहीं दूसरी जगह जाइएगा तो अब से आपको इस तरह की पोशाक पहन, हाथ में अटैची केस थामे जाना होगा। इस तरह का मुड़ा-तुड़ा कपड़ा-लत्ता पहन और उस वदसूरत वाहियात वैग को धाम आप नहीं जा सकते।" महेन्द्र ने निरीह मुसकराहट के साथ कहा था, "यह सब पागलपन दरअसल मन-प्राणों से यदि कोई पागल हो चुका था तो वह महेन्द्र ही था। क्योंकि उसकी आत्म-विस्मृति हैरतअंगेज थी। पहला वैशाख का वह दिन केवल पोशाक में ही नहीं बीता था । इरानी की जिद प महेन्द्र सुरवाला, नीतू और उसे लेकर, टैक्सी पर सवार हो सिने देखने गया था। वह उत्सव टूटन की एक प्रक्रिया थी, यह किसी समझ में नहीं आया। हालांकि एक महीना बीत चुका है, लेकिन इरानी अपने स्थायी की बात भूल चुकी है । असल में भूली नहीं है, उसके डेरे की खोज भार महेन्द्र ने ले लिया है। महेन्द्र मन ही मन इस बात की चिन त था लेकिन वह किसी सिद्धान्त पर नहीं पहुंच पा रहा था । -- एक हो जिन्दगी तरह के विचार उसके मन में जगते पे मगर उन्ह काय काम परि- णत नहीं कर पाता था। इसी तरह की परिस्थिति में जेठ मारा के दूसरे पथवारे में महेन्द्र दो बजकर बीस मिनट में राइटस से बाहर निकल रहा था। यानी उस विशेष पोशाक के कारण महेन्द्र सरकार एक ही नजर में पहपान में आ जाता है । बाएं हाप को कुहनी में कपड़े का थैला, दाहिने हाथ में छाता। मुख्य प्रवेश-द्वार से बाहर निकलते ही महेन्द्र अचकचाकर खड़ा हो गया। उसे अपनी आंखों पर जैसे विश्वास ही नहीं हुआ-सचमुच उसने गेट के बाहर इरानो को देखा या यह उसका भ्रम है। इरानी के कंधे में वैग लटका है । वह मुंह में आंचल पामे मुसकरा दी। यौवन से छलकते अंग कांप उठे। महेन्द्र को एकाएक पाद आया, भासपास के बहुतेरे लोग इरानी की ओर ताक रहे हैं। वह इरानी के निकट आकर बोला, "तुम ?" "आपके लिए हो खड़ी हूँ । इरानो आँख मटकाकर धीमे स्वर में बोली, "मुझे मालूम है, आप दो बजे बाहर निकलते हैं। बहुत देर से खड़ी हैं। सोच रही पो, अन्दर जाकर पता लगाऊं या नहीं।" महेन्द्र ने पवराहट और बेचैनी के साथ आसपास पड़े लोगों पर निगाह दौड़ाई, "आफिस नहीं गई पों?" "गई पी, पौने दो बजे चलती बनो।' इरानी लाल-लाल होंठों के बोच सुफेद दांतों को चमकाती हुई बोली, "सोचा, हर रोज चार-पांच बजे तक काम करती हूँ, आज जरा आपके पास चलें।" महेन्द्र को दृष्टि फाटक के निकट पड़े सिक्युरिटी के सिपाही को और गई । उसको मोषों में विस्मयजनित कौतुहल है, क्योंकि उसने शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि इरानी जैसी एक युवती से महेन्द्र का कोई संपर्क हो सकता है । महेन्द्र को बेचैनी महसूस हुई। बोला, "बस.- - चलते बातचीत करेंगे।" "चलिए।" महेन्द्र की बगल में चलती हुई ईरानी ने सड़क पार ते हुए पूछा, "अभी कहां चलिएगा?" महेन्द्र के नथुने में इरानी के प्रसाधन किए अंगों की खुशबू समा है। अपनी देह में वह उत्ताप महसूस कर रहा है। बोला, "इस क्त तो मैं गणेशचन्द्र एवन्यू के दफ्तर जाता हूँ।" "उफ्, ऑफिस और ऑफिस !" इरानी ने होंठ लटकाकर कहा, 'और कुछ सोच ही नहीं पाते हैं आप ! मैं इस शिद्दत की धूा में तपती हुई आपके पास आई और मुझे छोड़कर आपको ऑफिस जाने की इच्छा हो रही है ? फिर जाइए।" उसने अपने गरदन को एक बार में झटक दिया। महेन्द्र ने हँसकर कहा, "ठीक है, तुम्हारी क्या इच्छा है, यही बताओ इस धूप में कहाँ चलोगी ?" "चलिए न, किसी एयर कन्डिशन्ड रेस्तरां में चलकर बैठे।"इरानी बोली, "आपको कुछ खिलाऊँगी, मैं भी खाऊँगी।" महेन्द्र ने मुसकराकर कहा, "मैं एक तरह से बाहर कुछ खाता ही नहीं । तुम्हें यदि भूख लगी हो तो..." "हां, लगी है।" इरानी ने महेन्द्र का एक हाथ थाम लिया, "खाऊँगी नहीं तो ठण्डे में जाकर बैठेगो । कितना आराम मिलेगा।" यह कहकर उसने लालदीघी के पेवमेंट के सामने इन्तजार में खड़ी टैक्सियों में एक को हाथ उठाकर पुकारा, "टैक्सी।" इस वक्त यहाँ टैक्सियां रहती हैं। महेन्द्र कुछ कहे इसके पहले एक टैक्सी उन लोगों के सामने आकर खड़ी हो गई। इरानी ने दरव खोलकर पहले महेन्द्र को अन्दर जाने दिया, उसके बाद स्वयं ज बैठ गई । ड्राइवर ने मीटर डाउन कर पीछे मुड़कर देखा । इरानी के "आपसे यह पूछकर कोई फायदा नहीं कि कहाँ किस रेस्त जाइएगा।"

एकहो जिन्दगी १२७ महेन्द्र के ललाट पर एक क्षण के लिये कुछ सलवटें पड़ गई। वोला, "रेस्तरां के बदले अगर कोई आरामदेह जगह हो तो काम चलेगा? ऐसा हो तो मैं तुम्हें एक जगह लेकर चल सकता हूँ।" "कहाँ ? गंगा के किनारे? दुहाई है आपकी।" इरानी ने महेन्द्र को जाप को दबा दिया। महेन्द्र का शोणित तोय गति से प्रवाहित होने लगा। बोला, "नहीं, इस दोपहर के वक्त तुम्हें लेकर मैं गगा के किनारे नहीं जाऊंगा।" उसने ड्राइवर से कहा, "लाउडन स्ट्रोट चलो।" टैक्सी चलने लगी । इरानी ने पूछा, "वहां क्या है ?" महेन्द्र ने कहा, "जाकर देखोगी हो । इतना घबरा क्यों रही हो?' उसने आँख झुकाकर अपनी जांघ पर इरानी के नघरगे हाथ को देखा। एकमात्र इरानी के साथ घर से बाहर निकलने का यह पहला मौका है। सोचा था, इरानी हाथ हटा लेगी, लेकिन हटाया नहीं। उसके तेज गति से प्रवाहित होते शोणित में उष्णता आ गई । स्पर्श की प्रतिक्रिया से उसके पूरे जिस्म में एक उत्ताप जगा और वह शिराओं में प्रवाहित होने लगा। "इस तरह बीच-बीच में ऑफिस से भागने में बड़ा मजा आता है।" इरानी महेन्द्र के फन्धे से अपने सिर को सटातो हुई बोली, "कॉलग से भागने की तरह । ऑफिस से भागने को आपको इच्छा नहीं होती ?" महेन्द्र का गला सूख रहा है लेकिन उसके अन्दर एक स्रोत प्रयाहिरा हो रहा है । हंसफर बोला, "ऑफिस से भागना किसे कहते हैं, मैं नहीं जानता।" "आप मोस्ट ओबोडियेन्ट सर्वेन्ट है।" इरानी महेन्द्र पो ठोड़ो पर बोली, "अव इतने ओवोडियेन्ट रहने की जरूरत हो पया है?" महेन्द्र वोला, "मोबोडियेन्ट रहने को यात में नहीं कह रहा हूँ। आखिर करूंगा क्या ? काम के अलावा मुझे मालूम हो पया है ?" महेन्द्र की बातों में दयनीय स्वर उभर आया । इरानी बोली, - कह सकते हैं। लेकिन करने लायक कोई काम मिल जाए तो र से गायब हो सकियेगा न ?" महेन्द्र ने इरानी की आँखों की ओर देखा । देखा, उसके होंठ और वों में एक अर्थपूर्ण कौंध खेल रही है । वह बोला, "क्या मिलेगा ?" मान लीजिये, आज की तरह मैं ही अगर बीच-बीच में धावा बोलना रू कर दूं।" इरानी ने गरदन टेढ़ी की। महेन्द्र ने देखा, हँस दिया और बुदबुदाया, "धावा !":"उसे महसूस हो रहा है कि उसके जिस्म और गोद से इरानी का जिस्म और मांसल जांघ टकरा रही है। उसने बाहर की ओर नजरें दौड़ाई । टैक्सी लाउ- डन स्ट्रीट के भीतर आ चुकी है । थोड़ी देर बाद ही उसने टैक्सी ड्राइवर से कहा, "सामने दाहिनी ओर खड़ा होना है।" इरानी ने झुककर देखा और बोली, "यह तो एक बहुत ही ऊँची इमारत है।" महेन्द्र बोला, "हाँ, बारह मंजिली इमारत ।" उसने अन्दर के बुक पॉकेट में हाथ डालकर रुपया निकाला। इरानी ने महेन्द्र के हाथ कसकर पकड़ते हुए कहा, "उहुँ, वैसा नहीं होगा। आप चाहें बिगड़ें या कुछ करें, टैक्सी का किराया आज मैं ही दूंगी।" उसने बैग खोलकर दस रुपये का एक नोट ड्राइवर की ओर बढ़ा दिया। महेन्द्र हँस पड़ा, "तुमसे पार पाना मुश्किल है।" वह दरवाज खोलकर नीचे उतरा। इरानी ने किराया चुकाने के बाद आसमान की ओर सिर उठाय उस बहुमंजिली इमारत की ऊंचाई देखी, "माणिकतल्ला सी० आ टी० रोड के मकान से यह ज्यादा उंची और देखने में सुन्दर इम है। यहाँ भी फ्लैट रखे हुए हैं ?" महेन्द्र ने कहा, "धीरे-धीरे मेरे साथ आओ, घबरा क्यों रही इरानी की आँखें फिर चौंधिया रही हैं । महेन्द्र सीढ़ी की ब १२६ एक हो जिन्दगी होता हुआ लिफ्ट के सामने पहुँचा । लिपट नोचे ही था और अन्दर के एक कोने में स्टूल पर लिफ्टमैन बैठा था। महेन्द्र ने इरानी को पुकारा, "आओ।" इरानी महेन्द्र के साथ लिफ्ट के अन्दर आ गई। महेन्द्र ने लिफ्टमैन से कहा, "नाइन्य फ्लोर।" लिफ्टमैन ने बैठे-बैठे ही दरवाजे को खीचकर बटन दबा दिया। लिफ्ट कपर जाने लगा। इरानी मन ही मन प्रत्येक माला की गिनती कर रही है, दूसरी माला, तीसरी, चौथी, पांच-छ:-सात-आठ-नौ । लिफ्ट रुका, दरवाजा खोल दिया। महेन्द्र ने पुकारा, "आओ।" दोनों लिफ्ट से बाहर निकले । महेन्द्र बाएं जाकर दीवार की मोट में चला गया। दाहिनी ओर एक बन्द दरवाजा है । दरवाजे में को- होल है । महेन्द्र ने कपड़े के थैले में हाथ डालकर टटोलना शुरू किया, उसके बाद चावी वाला एक रिंग निकाला । इएल लॉक में चाबी डाल दरवाजा खोला । अन्दर अंधेरा रेंग रहा है । इरानी को अन्दर का कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है । महेन्द्र ने बाएं हाथ को बढ़ाकर एक स्विच दवाया। दरवाजे के अन्दर सिर के पास बत्ती जलने लगी। इरानी को पुकारा, "अन्दर चली आओ।" इरानी अन्दर गई। महेन्द्र ने जैसे ही दरवाजे को ठेला वह अपने आप बन्द हो गया। प्रवेश-पय कोई कम चौड़ा नही है । महेन्द्र ने और भीतर जाकर दाहिना हाय बढ़ाकर स्विच दबाया और विशाल कमरे के बीचोबीच एक बहुत बड़ी बती जल उठी। आंखों को चौधियाने वालो रोशनी नहीं, कोमल और मधुर। परन्तु सब कुछ स्पष्ट दोख रहा है। शुरू में आंखें गलीचे के चारों तरफ रखे सोफे और दीवान पर गई । बीच मे सेंटर टेबुल, शीशा लगा हुआ। एक तरफ को दीवार पर मात्र एक तसवीर है । इरानी यह नहीं जानती कि यह तसवीर पिकासो के 'बुल फाइट' को प्रिंट है । एक कोने में तिकोने एक मेज पर । - कोन है, वगल में गद्दी मढ़ी एक कुर्सी महेन्द्र ने आगे बढ़कर पर्दा हटा दिया और पूरव तरफ के दरवाजे खोल दिया । खासी लंबी-चौड़ी वालकॉनी। जोरों से सिर्फ हवा ने श ही नहीं किया, आंधी को तरह सायं-सार्य आवाज भी हुई। इरानी छ बोल नहीं रही, केवल देख रही है। बालकॉनो की ओर जाने के हले ही उसकी निगाह बाईं ओर गई । पार्टिशन जैसा एक पर्दा है जो हटा हुआ है । पर्दे के उस पार एक बड़ी मेज है, दोनों ओर कुर्सियों को कतार । मेज पर शीशे के गिलास इस तरह सजे हैं, जैसे वैठने भर की देर हो । उसके बाद उसकी नजर पीछे की तरफ बाईं ओर के एक रेफ्रिजरेटर पर पड़ी। उसकी वगल से एक दूसरे कमरे में जाने का रास्ता है । इरानी औरताना कौतूहल वश उस ओर बढ़ गई। हत्या घुमाकर दरवाजा खोलते ही उसे रसोईघर दिखाई पड़ा। गैस की पाइप लाइन और चूल्हा । शीशे की आलमारी में झकमकाता डिनर सेट, चम्मच, कांटा-छुरी, कप-डिश तथा कीमती शीशे के तरह-तरह के गिलास । एक तरफ मीट सेफ । गैस के चूल्हे के पास एक वेसिन । "तुम यहाँ ?" महेन्द्र रसोईघर के दरवाजे पर आकर खड़ा हुआ। इरानी ने मुड़कर देखा और पूछा, "यह सब किसका है महेनदा ?' "फ्लैट तो देखा ही नहीं, इसके पहले ही मालिक की खोज-खब क्यों लेने लगी?" महेन्द्र ने इरानी के अवाक् चेहरे को देखकर हंस हुए कहा, "आओ, कमरों को चलकर देख लो।" इरानो दरवाजे के पास आई और बोली, "चलिए।" महेन्द्र ड्राइंगरूम के अन्दर जाकर दाहिनी तरफ के छोटे गलि से होता हुआ आगे बढ़ा । बाएँ और दाहिने सिरे के दोनों कम दरवाजे खोलते हुए बोला, "जाओ, अन्दर जाकर देख आओ।" कमरों की खिड़कियों को महेन्द्र ने पहले ही खोल दिया था। ने वाई ओर के दरवाजे के अन्दर जाकर देखा, कमरे के एक एक पलंग है और उस पर डनलप पिलो का गद्दा मढ़ा विस्त एक ही जिन्दगी तकिया । ड्रेसिंग टेबुल और वारड्रोब दूसरी ओर है। दूसरे छोर पर एक और पुला हुआ दरवाजा है । इरानी आहिस्ता-आहिस्ता दरवाजे के पास गई और झांककर देखा । एक बड़ा-सा गुसलखाना फव्वारा और गरम पानी का हिटर । बेसिन के सामने आईना। उसके पास रैक पर दामी तौलिया । सुगंधित सावुन । लौटते वक्त इरानी की नजर आईने के सामने रखे एक लिपस्टिक पर पड़ी। उसनी भौंहों पर बल पड़ गए । हाथ बढ़ाया मगर बिना छुए ही वापस चली आई। बाहर आ दाहिनी ओर के कमरे के अन्दर प्रवेश किया। तकरीवन एक ही जैसा इन्तजाम है । लेकिन इस कमरे के पलंग को देखते ही साफ-साफ समझ में आ जाता है कि तकिया, चादर वगैरह इस तरह बिखरे हैं जैसे कोई उस पर सो चुका है । ड्रेसिंग टेबुल के पास जाते ही आईने के सामने उसे एक जनाना रेशमी रूमाल पड़ा हुआ दिखाई पड़ा। इस कमरे में भी एक वारड्रोव है । गुसलखाना पहले जैसा ही है । खिड़की से सार्य-सायें हवा आ रही है। समूचे फ्लैट को हवा जैसे उड़ाकर ले जाना चाहती है। शायद बहुत ऊँचा होने के कारण ही दोपहर के वक्त भी हवा में गरमी नहीं है। इरानी के कोतूहल का कोई ओर अन्त नहीं । वह कमरे से बाहर निकल आई । देखा, ड्राइंगरूम में महेन्द्र टेलीफोन से किसी से कह रहा है, "ही एक दूसरे काम के कारण मुझे रुक जाना पड़ा है । कब जाऊँगा, कह नहीं सकता. अय ? हां, हर जगह सूचना भेज देनी है । रख रहा है।" उसने रिसीवर रख दिया। ''यह किसका फ्लैट है, महेनदा?" इरानी ने दोबारा तहकीकात की। महेन्द्र मुड़कर मुसकराने लगा। बोला, "अभी भी एक मकान देखना बाकी है। फ्लैट चाहे किसी का हो, मगर कैसा लगा, यही बताओ।" "वहुत ही सुन्दर । वेल फनिश्ड, फ्लैट की साज-सज्जा देखकर मांखें धया रही हैं।" इरानी ने कहा । अव महेन्द्र उत्तर की ओर गया। पर्दा हटाकर एक दरवाजे को कर खोला । इरानी पीछे-पीछे आई। पूरव तरफ की खिड़की खुली । यह शयन-कक्ष और भी बड़ा है। डब्ल बेड पलंग का यह बिस्तर और ज्यादा खूबसूरत है । बेडकवर संभवतःचिकने मखमल का है। इस कमरे में वारड्रॉव, ड्रेसिंग टेवुल के अतिरिक्त स्टील की एक आलमारी भी है। खिड़की से दूर-दराज को कई इमारतें दीख रही हैं । निकट न जाने से कलकत्ते का बाकी हिस्सा नजर नहीं आता है, सिर्फ आस- मान दिखाई पड़ता है। "आप ले आए, सव कुछ दिखाया लेकिन इतने करीने और सुन्दर ढंग से सजे फ्रिज-टेलीफोन वाला यह फ्लैट किसका है, यह तो बताया ही नहीं।" इरानी की आँखों में संदेहपूर्ण जिज्ञासा का भाव है। वह महेन्द्र के पास जाकर खड़ी हो गई। फिर बोली, "लेकिन बिलकुल खाली है और चावी है आपके पास।" महेन्द्र ने धीमे स्वर में कहा, "खाली रखना ही पड़ता है। मतलब है-बीच-बीच में दफ्तर के उच्च पदाधिकारी चावी मांग लेते हैं और यहाँ आकर जरा आराम और अय्याशी करते हैं।" "इसका मतलब हुआ यह फ्लैट आपका है।" इरानी की काली काली आँखें फैल गई। गले का स्वर थम सा गया और उसमें आश्च का भाव तिर आया, "और वो जो लिपस्टिक देखा, रूमाल देखा- सब किसके हैं ?" महेन्द्र ने कहा, "मुझे मालूम नहीं। आफिस के बड़े-बड़े अप आते हैं, उनके साथ जो औरतें आती हैं, शायद वे ही छोड़ गई है "उफ् महेनदा-महेनदा, आप धरती के कितने नंबर के है हैं, मेरी समझ में नहीं आ रहा है।" इरानी का समस्त विस्म कौतूहल अव उल्लास के रूप में उभर आया, "इतना बड़ा वेल पलेट आपका है ? उस हाथ के थैले को आप पलंग पर फेंक दें एक ही जिन्दगी महेन्द्र ने हंसकर कहा, "तुम्हारे यातानुकूलित रेस्तरां से यह जगह बुरो तो नहीं है न?" "दुरी का मतलव ? स्वर्ग है स्वर्ग!" इरानी ने अपने दोनों हापों से महेन्द्र के हाथ कसकर पकड़ लिए, "महेनदा, तुम्हे या पा, राग में नहीं भा रहा है। तुम्हें किसी चीज को पानी नहीं है. म राषगुप ही सुखी हो।" महेन्द्र के खून में आग की लपटें दहकने लगी और उसका पंटरवर दोवारा अवरुद्ध जैसा हो गया। वोला, "सचमुच ? हालाकि गेरी-गरी धारणा है मुझे कुछ भी हासिल नहीं हुआ है।" "तुम्हें क्या नहीं मिला है महेनदा, क्या नहीं मिला है ?" इरानी महेन्द्र के शरीर से सटकर खड़ी हो गई और अपना चेहरा महेन्द्र के, चेहरे के पास ले गई, "तुम्हें जो नहीं मिला यह पया मैं तुम्हें सकती हूँ ?" महेन्द्र ने इरानी के चेहरे को ओर देखा, लेकिन इतने निकट रहने के बावजूद उसका चेहरा साफ़-साफ दिखाई नहीं पड़ा। एक पमरता हुमा प्रकाश उसके सामने है, बस इतना ही। लेकिन इरानी की छाती और शरीर के बाकी हिस्से उसके शरीर से सटते गए । टमनं कराटे जैसे स्वर में कहा, "इरानी, वह बात मुंह योलकर वह, इसका माहन नहीं हो रहा है।" "मैं जानती हूँ, जानती हूँ कि तुम मुझे चाहते हो।" इरानी देन फुसाते हुए कहा, "तुम्हारी आँखों को ओर देखकर पहले दिन ही इसका पता चल गया था। तुमने कहा क्यों नहीं था?" महेन्द्र नशे से अभिभूत होकर बोला, "ऐसा कर नहीं पाया इन धयोंकि मैं मैं हो है। मगर आज विना कहे रह नही पा रहा है जिनें देखकर सब कुछ भूल जाता हूँ।" "तब लो महेनदा, मेरा सब कुछ तुम ले लो।" इरानी ने स्वर में होंठों को फंपाते हुए कहा, "तुम्हें जैसे भी मर्जी हो, मु.

एक आवेग, उच्छ्वास और उत्तेजना से थरथराता महेन्द्र दुविधाग्रस्त स्थति में खड़ा रहा। टूटे स्वर में बुदबुदाया, "ऐसा लग रहा है जैसे जिन्दगी का सब कुछ आज नया हो, बिलकुल ही नया।" "फिर मैं ही तुम्हें सब कुछ की तालीम देती हूँ।" इरानी महेन्द्र के गले को अपनी बाहों में भरकर उसे पलंग के पास ले गई। खींचकर विठाया और स्वयं भी बैठ गई। उसके बाद महेन्द्र के होंठों को बार- वार चूमना शुरू कर दिया। महेन्द्र के भीतर से आहिस्ता-आहिस्ता एक क्षुधात, आकांक्षा से उन पुरुष प्रकट हुआ-यह वही पुरुष है जिसकी उम्र अभी गौण है। इच्छित रमणी को लेकर उसके यौवन का जैसे पहले-पहल यह अभि- पेक हो रहा हो। वासना के प्रवल आवेग से वह इरानी को विस्तर पर लिटाकर मदित करने लगा। f इस तरह ध्वंस का प्रथम संकेत मिला। इसके बाद ध्वंस का सि सिला चलने लगा। शुरू में कुछ दिनों तक इसी प्रकार अनियमित पर काम चलता रहा। लेकिन इस अनियमित मिलन ने महेन और अधिक व्याकुल बना दिया। जिन्दगी एक ही बार के लिए है, इस विश्वास को सत्य मानकर उसने अनवरत भोग से अपने को परिपूर्ण बनाना चाहा । इससे व्यावसायिक केन्द्रों और घर तरह के सवाल पैदा होने लगे । सब जगह महेन्द्र एक ही उत्तर वह एक विशेष कार्य में व्यस्त है। इस बात को किसी ने अविश्वसनीय तौर पर नहीं लिय महेन्द्र के लिए वैसा कुछ असंभव नहीं है । शायद वह नए काम कर रहा है । सुरवाला को सिर्फ एक ही चिन्ता है- दिनों से तबीयत ठीक न रहने की शिकायत कर रहा है लांकि महेन्द्र में अस्वास्थ्य का कोई चिह एक ही जिन्दगी १३५ पड़ रहा है । बल्कि आजकल वह तरोताजा दीखता है। उसके चलने- फिरने में भी एक तरह का बदलाव आ गया है। कपड़े-लते को ओर भी उसने ध्यान देना शुरू कर दिया है। बीच-बीच में अटैनोकेस को भी वह उपयोग में लाता है। घर पर लड़के मां और इरानी मौसी से बाबूजो में आए बदलाव के संदर्भ में चर्चा करते हैं। बात को हंसी-मजाक में उड़ा देने के बाव- जूद, इरानी के अतिरिक्त सभी के मन में अशान्ति का भाव जमने लगा है। हर आदमी का हर तरह का बदलाव स्वीकार कर लिया जाए, यह संभव नहीं है । मती और सतु आपस में चर्चा करते हैं कि महेन्द्र की नियमित अनुपस्थिति के कारण कर्मचारीगण फायदा उठा रहे हैं और कोई मन लगाकर काम नहीं करता है । चोरी का भी प्रकोप बढ़ गया है। असली आदमी न रहे तो जो होता है, वही होने लगा है। महेन्द्र जव घर से निकल जाता है तो इरानी मती-सतु के साथ पूर्ववद् मोटरसाइकिल से बाहर निकलती है । लेकिन आजकल बोच. चीच में उसे लौटने में देर हो जाती है और कैफियत के तौर पर बताती है कि ऑफिस में काम का दबाव बढ़ गया है। बोर-चोच में उसका ध्यान इस ओर जाता है कि मुरवाला अकसर उसे लुक-छिपकर देखती है । इरानी महसूस करती है, एकमात्र सुरादी को आयों ने ही उसके परिवर्तन को पहचान लिया है। जिस बदलाव फो पर के बाल-बच्चे समझ नहीं सकते, एकमान नारी हो नारी के उस परिवर्तन को भाप मकती है। यही वजह है कि सुरवाला मोच-बीच में मुसकराकर हसी- मजाक के लहजे पूछती हैं, "अरो इरानो, आजकल तुम क्या प्रेम-वेम के पक्कर में फंसी हो?" "क्या कहती हो, सुरादी!" पुरानी बात को हंसो में उड़ा देना चाहती। सुरवाला फहती, "तुम दिन-ब-दिन और ही तरह को होती जा रही हो । एक तो यों ही खूबसूरत हो, उस पर ऐमा लगता है जैसे 111 एक ही जिन्दगी गुम्मारी गुबगुनी दिन-दिन और निकर रही है। बात क्या है ? देखना, अमाम लोगों में पाम हो । चाची को मुझे ही जैफियत देनी होगी।" "हुरने की कोई बात नहीं है नुरोबी, इतना याद रखो कि मैं नोकरी से अपनी जीविका चलाती हूँ।" इरानो हंसकर कहती। मुरबाला जग मंत्रोत्र के साथ पूछतो, "होस्टल का कुछ पता घता?" "होस्टल तो बहुत सारे हे सुरादी, लेकिन मन के लायक नहीं मिल रहा है।" इरानी मिय्या उत्तर देतो। महेन्द्र इरानी के नाय नियमित तौर पर लाउडन फ्लैट नहीं जा पाता है। अकमर दफ्तर के अफसरान चावी मांग लेते हैं। वैसे वह इरानी के साथ माणिकतला सी० आई० टी० रोड वाले फ्लैट में जाता है । उसे देखते ही पता चल जाता है कि वह सिर्फ नशे में धुत्त होकर नहीं चल रहा है। इस दुनिया में संभवतः महेन्द्र जैसे सभी धनी- मानी लोग सच्चरित्र नहीं हैं। लेकिन महेन्द्र का सारा काम अति को सीमा पर रहता है। जब वह व्यवसाय-वाणिज्य और संपदा के संचय में निमग्न था, उस समय वह शाहली किसे कहते हैं, विलकुल नहीं जानता था । बल्कि संपत्ति की तुलना में वह अत्यन्त दीन-दरिद्र की तरह जीवन जीता था। अब जब कि वह इरानी का आंचल थामे रास्ते के नये मोड़ पर लाया है, तो तमाम दिशाओं से मुंह मोड़कर दुनिया को केवल इरानीमय देख रहा है। इरानी उसका जप-तप ध्यान ही नहीं है, वह उसको रक्त धारा के लिए प्राण संचारिणी का कार्य कर रही है। चारों तरफ से अपनी रक्षा करते हुए, अपने पैरों पर खड़े व्यक्ति की हैसियत्त से, इरानी को अपने साथ लेकर चलने को उसे तालाम नहीं मिली है। उसे इरानी अपने प्रवाह में वहाकर लिए जा रही है। लिहाजा कि उसने इरानो के सम्मुख अपने आपको इस तरह सौंप दिया कि इरानी के लिए उसका कुछ गोपनीय नहीं रह गया। यहां एक हो जिन्दगी तक कि परी कथा की तरह जो खाता उसके प्राणों का भौंरा है, उसे भी इरानो के हायों में सौंप दिया । अपना पूरा हिसाब-किताब भी बता दिया। इरानी ने विस्मय में आकर, आंखों को फैलाकर खाते की एक जगह फो संख्या को ओर इंगित करते हुए पूछा था, "यह सत्तासी लाख रुपये की पूरी रफम क्या कालाधन है ?" जवाब में इरानो को प्यार करते हुए महेन्द्र हंस दिया था। इरानी ने अत्यन्त सावधानी, परन्तु इस प्रकार के भाव से जैसे उसकी जिज्ञासा कोई अहमियत न रखती हो, पूछा था, "यह रकम बेशक वोल्ट में रखी हुई होगी ?" "दिमाग खराब है ?" महेन्द्र ने कहा था, "वोल्ट में कहीं इतना नकद रुपया रखा जाता है ? किसी भी वक्त पकड़ लिया जा सकता है। तुम्हें दिखाऊँगा कि कहाँ रखा हुआ है।" प्रेम में सराबोर हो इरानी ने महेन्द्र की गोद में सिर रखकर कहा था, "नहीं-नहीं, में यह सब देखना नहीं चाहती। तुम्हारे पास है, इतना जानकर हो मैं सुखो हूँ।" महेन्द्र ने उसको वात अनसुनी कर दी थी। माणिकतल्ला सो० आई०टी० फ्लैट को आलमारो के निचले हिस्से में अत्यन्त गोपनीय ढंग से रखे सत्तासी लाख रुपये का भंडार, नीचे के चेंबर के ढक्कन को हटाकर, उसके निचले भाग में चावी धुमाकर एक दूसरे चेंबर को खोलते हुए 'मुल जा सिमसिम' जैसे चमत्कार के साथ दिखाया था। कहा था, "सुरो को दिखाया है और अब तुम्हें दिखा रहा हूँ। लेकिन सुरो को न तो यह चावी दिखाई है और न ही उसे वर खोलने का तरीका बताया है । यह सिर्फ तुम्हें दिखा रहा हूँ।" "पैर, जल्दी से बन्द कर दो।" इरानी ने कहा था और स्वयं चायी ले, नीचे के छिद्र को हाथ से टटोलकर, उसका ढक्कन बन्द कर दिया था, "दो, मैं ही बन्द कर देती हूँ।" महेन्द्र चावी की बात याद भी नहीं रखना चाहता था। उसने १४० एक ही जिन्दगी तो मान लीजिए कि कैफियत ही है।" महेन्द्र ने तीखे स्वर में कहा था, "नहीं, मैं कोई कैफियत देना नहीं चाहता। तुम लोग इतने दिनों से क्या कर रहे हो ? तुम लोग सारा कारोवार चला नहीं सकते ?" सुरवाला इस बकझक के बीच ही वहाँ पहुँच चुकी थी। दूर थी तो केवल इरानी । सुरवाला ने महेन्द्र से कहा था, "यह सब तुम क्या कह रहे हो ? तुमने क्या उन लोगों को उस तरह से चलने की कभी तालीम दो है ?" "चलने की तालीम क्या दूँगा ?" महेन्द्र ने उसी उत्तेजना के साथ कहा था, "अगर अचानक मेरा हार्टफेल हो जाए ? तव ? उस समय भी वे मेरे इन्तजार में बैठे रहेंगे ?" सुरवाला ने हाथ से अपना मुंह ढंक लिया था और आहत उद्वेगभरे स्वर में कहा था, "छिः छि, यह सब क्या बक रहे हो ? तुम्हारी जुबान से इस किस्म की बातें कभी सुनने को नहीं मिली थी। तुम्हें क्या हो गया है ?" सुरवाला को आँखों की कोर में आँसू छलछला आए थे, अगर तुम पर कोई मुसीवत आई हो तो हम लोगों से कह सकते हो। कभी तो जवान खोलकर तुमने कुछ कहा नहीं।" "क्या कहूँगा?" महेन्द्र ने ऊब के साथ कहा था, "मुझ पर कोई मुसीवत नहीं आई है।" मती ने कहा था, "आप पर कोई दूसरी मुसीवत आई हो, इसका पता हमें नहीं है । तब हाँ, यह जान लीजिए, इन दो महीनों के बीच एक रूट की हमारी दो बसों के वर्कर तीन सप्ताह से स्ट्राइक पर हैं। आपके अलावा और किसी को वे लोग अपनी माँग बताने को तैयार नहीं हैं । एक महीना से अधिक अरसा गुजर गया, एक ट्रक माल लेकर पंजाव गई थी, वह लौटकर नहीं आई है। पुलिस को सूचना दी है मगर पुलिसवाले कोई पता नहीं बता सके। होसियारी में स्टैम्प वाला एक चौथाई माल जमा हो गया है। प्रेस में हजारों फर्मे चोरी से छापे जाते ।

एकही जिन्दगी १४१ । हैं । एकमात्र सुधीर बाबू जिल्दसाजो का कारखाना ठीक से चला रहे हैं । इन सबों को आप मुसीवत पाहना नहीं चाहते हैं ?" "इतनी खबरों का पता रखते हो मगर कोई रास्ता नहीं निकाल सफते ?" महेन्द्र ने रूपे स्वर में कहा था। सतु का दिमाग जरा गरम रहता है। उसने झुंझला कर कहा था, "नहीं, रास्ता निकाल नहीं पाया और न निकाल पाऊँगा। इतने दिनों तक किसी काम में हमें हस्तक्षेप नहीं करने दिया। अगर किया भी तो आपने दूर हटा दिया। सारा कुछ आप अपने हाथ में रखे हुए हैं । आप अपनी छाती पर हाथ रखकर कह सकते हैं कि आपने हम पर विश्वास किया है ? नहीं, ऐसा नहीं किया है।" सुरवाला ने सतु के मुंह पर चांटा जड़ दिया, "सतु, चुप रहो। बाबूजी से इस तरह बातें मत करो।" "विश्वास नहीं किया है तो ठीक ही किया है ।" महेन्द्र ने गुस्से में आकर कहा था, "अब जो करना हो करो, वरना जहन्नुम में जाओ। मैं एक महीने की छुट्टी पर बाहर जाऊंगा।" मतो ने कहा था, "ठीक है, जाना है तो मा साथ लेते जाइए। आप ओले नहीं जा सकते हैं।" "तुम्हारे हुक्म से?" महेन्द्र बेहद गुस्से में आ गया था, "मैं किमको लेकर जाऊँ और किसको लेकर न जाऊं, यह बात तुमलोग बताओगे?" सतु ने कहा था, "हाँ, हमी बताएंगे। अन्यथा आप जानी सकते।" "एक ही चाटे में तेरा दिमाग चकराने लगेगा, हरामजादा। मई हाथ उठाकर गुस्से में सतु की ओर बढ़ा। सतु भी वैसा ही गवार है । उसने कहा, "मारिए. देख लीजिए।" सुरवाला बाप और लड़कों के बीच आकर रुनाई के स्वर में महेन्द्र से कहा था, "दुहाई है १४२ एक ही जिन्दगी । हूँ, अव झमेला मत बढ़ाओ । मैंने तुम्हारा यह रूप कभी नहीं देखा था। मालूम नहीं; ईश्वर हमें किस ओर घसीटकर ले जा रहे हैं। तुम्हें जहां भी मर्जी हों, जाओ। मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊँगी। मैंने आज तक तुम्हारे किसी काम में अड़चन नहीं डाला है। वस, सिर्फ अपनी सेहत का खयाल रखो।" सतु का हाथ पकड़ वह उसे हटाकर ले गई थी। नीतू घर के एक कोने में खड़ा था। पिता का तेवर देख वह भय से काठ हो गया था। आखिर में इरानी कमरे के अन्दर आई थी। मगर कुछ बोली नहीं । कृत्रिम करुणा की मूर्ति लिए खड़ी रही। महेन्द्र सबके सामने से हट गया था। . पर्वत का भूस्खलन शुरू हो जाता है तो प्रकृति की अन्तर्निहित ध्वंस- नीला अपनी गति से अग्रसर होने लगती है। प्रकृति का यही धर्म है। ‘स की तैयारियां जब चलने लगती हैं तो वह मनुष्य को कुछ जानने ही देती। उसके बाद जब उसकी लीला शुरू हो जाती है तो वह दुनि- वार और भयंकर हो जाती है। महेन्द्र के जीवन में इस प्रकृति की भूमिका इरानी ने ग्रहण की है। मुर्गी नामक चिड़िया जब अत्यन्त सावधानी और चौकसी के साथ सजग दृष्टि रखते हुए डग बढ़ाती है तो लगता है शिकारी के लिए उसे पकड़ना संभव नहीं है । महेन्द्र गोकि सदा से चौकसी के साथ कदम रखता आया था लेकिन अनिवार्यतः वह शिकारी के फंदे में फंस गया । शायद यह कोई नई घटना नहीं है । चिरन्तन काल से ही कोई न कोई नारी व्यक्ति के जीवन, संसार या राष्ट्र में विनाश को अनिवार्य बनाती आई है। इस मामले में सर्वनाश के जितने भी अस्त्र हो सकते हैं, सबके सब नारी के सौंदर्य में छिपे रहते हैं। पुरुष इस मामले में प्रकृति के हाथ में खिलौने की भूमिका अदा करता है और उसकी बुद्धि और चौकसी धीमी पड़ जाती है।

एक ही जिन्दगी महेन्द्र उसका श्रेष्ठ उदाहरण है। केवल अपने से मेमेटरी और अफसरों को ही उसने हैरत में नहीं डाला है। एट्टी पर घर से बाहर जाने के लिए कुछ न पुछ तैयारियां करनी पड़ती है, यह बात भी उसके दिमाग से उतर गयी है। ऑफिस के अफसरान के अतिरिक्त उसके और-और सहकर्मी भी हैरत में मा गए हैं, क्योंकि उन लोगों ने मामूली सर्दी-युखार में भी महेन्द्र को छुट्टी लेते नहीं देगा था। उमयो प्राप्य छुट्टी साल-दर-साल यदि होती रही थी। एकमात्र सुरवाला हो सचेत थी। उसने एक मूटकेस में महेन्द्र के कुछ कपड़े-लते रख दिए। लेकिन महेन्द्र को इसके लिए कोई फिक्र नहीं थी। सूटकेस लेकर वह राइटर्स गया और ययासमय सूटकेस ले टैक्सी पर बैठ गया और लाडन स्ट्रीट फ्लैट में चला आया। इरानी अपने समय पर आई । उसके बाद केवल उन्माद और लालसा की अग्नि में जलने के आनन्द का सिलसिला चलने लगा। लालसा की अग्नि मे दग्ध होने में एक प्रकार का सुप है, लेकिन वह सुख, लालसा और उच्छ्वास अधे होते है। प्रेम में जो सब कुछ घो देता है उसे भी एक प्रकार का आनन्द मिलता है, क्योंकि उसमें मुक्ति है। उस मुक्ति का नाम है-"सपी, मर जाऊँ तो बांध मुझे रयना तमाल की डाल में।" लेकिन एक प्रौढ़ व्यक्ति की तमाम जिन्दगी के अवचेतन को भूख शान्त करने की क्रिया से इसका कोई ताल-मेल नहीं मैनेजर को अपने गौंदर्य से रिक्षाकर, इरानी ने महेन्द्र के कपना. नुसार दो बजे के याद हो एक महीने तक ऑफिस से लौटने की अनुमति प्राप्त कर ली है। ऑफिस में भी इरानी के रूप पर मुग्ध पुरुषों को कोई कमी नहीं है । इरानी को काली आंखों की पुतलियों में केवल पुरुषों का चित चुराने को चमक नहीं है। फिलहाल उसको मारक आंखों में एक बारीक सोच और सावधानी की छाया मंडरातो रहती है। महेन्द्र को एक महीने की ष्ट्री के दौरान दूसरे सप्ताह ही, १४४ एसएगा में ने अपनी एक सहेली की सहायता से दक्षिण कलकत्ते के एक काम-काजी लड़कियों के होस्टल में रहने का इन्तजाम कर लिया है। पेशगी रकम देकर हस्ताक्षर वगैरह कर आई है। लेकिन दूसरी ओर दमदम के घर सुरवाला और उसके लड़के के सामने भी अहम् भूमिका अदा कर रही है । मती और सतु महेन्द्र के बारे में उससे खुलकर चर्चा करते हैं। उन्हीं लोगों से इरानी को पता चला है, महेन्द्र की संपत्ति के संबंध में उन्हें पूरी जानकारी नहीं है। लेकिन उन्हें अपने पिता के चरित्र पर किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है। उनकी धारणा है, महेन्द्र किसी बेकार आदमी के पल्ले पड़ गया है । स्वभावतया वे लोग अपने पिता के लिए चिन्तित हैं। इरानी मन ही मन हंसती है। तीसरे सप्ताह के दौरान उसने चौथे सप्ताह के लिये बैंक से छुट्टी लो। महेन्द्र तव अपने बुझे यौवन की लौ को प्रखरता से जलाने के लिये पागल जैसा हो गया था। चौथे सप्ताह के पहले दिन ही वह माणिकतल्ला सी० आई० टी० रोड फ्लैट की चाबी लेकर चंपत हो गई । सुरबाला को बताया, उसे अच्छा नहीं लग रहा है । एक हफ्ते के लिये सिलीगुड़ो जाना चाहती है। और यह भी सूचना देने से नहीं चूकी कि लड़कियों के एक होस्टल में उसने रहने का इन्त- जाम कर लिया है सुरवाला का अनुमान था, दमदम के मकान का परिवेश इरानी को मौजूदा हालत में अच्छा न लगना स्वाभाविक ही है । उसने सोचा, इसी वजह से इरानी एक बार सिलीगुड़ी से घूम-फिर कर आना चाहती है और होस्टल में रहने का इन्तजाम कर लिया है। उसने बस इतना ही कहा, "इरानी, तुम्हारे बहनोई को क्या हो गया है और वे कहाँ गये हैं, कुछ समझ में नहीं आता है। तुम्हारा मन उदास हो गया है, इसका मुझे पता है । लेकिन मेरा एक अनुरोध है, सिलगुड़ी के सगे- संबंधियों को यह सब वात नहीं बताना।" "तुम निश्चिन्त रहो, सुरोदो।" इरानी ने कहा, "यह सब चर्चा - एक ही जिन्दगी १५५ करने में रखा हो क्या है । तव हाँ, महेनदा के लिये चिन्तित जरूर हूँ।" सुरवाला पो आँखों में आंसू छलक आये ! बोली, "उन्हें जिन्दगी के प्रथम दिन से एक जैसा ही देखती आई हूँ लेकिन इस रूप में कमी नही देखा था। पता नहीं, क्या बात है !" इरानी अपना अमवाब लेकर ययासमय विदा हो गई। अमरी उसके असवार में एक नये चमड़े के मूटकेस को वृद्धि हुई है। विदा फे दिन दोपहर के वक्त वह लाउडन स्ट्रीट फ्लैट मे गई सेरिगट्टी या चले जाने की बात उसने महेन्द्र को नही बताई। बल्कि आने के पहले लाउडन स्ट्रीट के पते पर महेन्द्र को एक पत्र भेज चुकी थी। शाम छः बजे इरानी के विदा होने का समय है । प्रगाढ़ आलिंगन और चुम्यनों के क्षण में महेन्द्र को पता नहीं चला कि यह इरानी को बाधिरी विदाई महेन्द्र दूसरे दिन अपने लाउडन स्ट्रीट के फ्लैट में, ग्यारह बजे बार- चार, व्याकुल प्रत्याशा की आँखों में टेलीफोन को ओर ताकने लगा। षयोंकि ग्यारह बजे इरानी हर रोज बैंक से टेलीफोन करती है। महेन्द्र छटपटाने लगा और कई बार संदेह मे याकर टेलीफोन को कान से लगाया । डायल टोन वाकायदा सुनाई पड़ रहा है। टेलीफोन खराव नहीं हुआ है । कहीं बैंक का टेलीफोन घराव तो नहीं है ? मगर वहाँ मान एक हो टेलीफोन नहीं है। मुख्यालय में पी० पी० एक्म है। तोनेक डाइरेक्ट लाइन भी है। फिर भी महेन्द्र ने तय किया कि वह ढाई बजे तक इन्तजार करेगा। शायद किसो घास वजह मे रानी टेलीफोन नहीं कर पा रही है । इसी बीच बारह बजे दरवान आया। वही महेन्द्र के लिये याहर से धाना से आता है। एक टिफिन कैरियर भी यहाँ रखा है। कभी दर- बान और कमी लिपटमैन खाना ला देता है । महेन्द्र खुद हो बोतल । -- १४६ एक हो जिन्दगी पानी भरकर फ्रिज में रख देता है। उसने दरवान को रुपया दिया। सिर्फ अपने खाने के लिए नहीं। इरानी आने के बाद यहाँ नाश्ता करती है। उसके लिये पहले से ही नाश्ता मंगवाकर रख दिया जाता इरानी का फोन न पाने के कारण महेन्द्र दोपहर का खाना निश्चितता के साय नहीं खा सका। उसके बाद भी विश्राम नहीं कर सका । बार- बार बाहर की वालकॉनी में जाकर नीचे झाकता रहा। हालांकि इरानी के आने का तव वक्त नहीं हुआ था। जब ढाई बज गये तो महेन्द्र की वेचैनी बढ़ गई । इरानी के द्वारा दिये गये खास नंबर पर उसने टेली- फोन किया । टेलीफोन बहुत देर तक घनघनाता रहा, उसके बाद एक महिला का कंठस्वर तैरता हुआ आया, "हैलो।" "कोन इरानी ?" महेन्द्र ने कहा। टेलीफोन के दूसरे छोर से विस्मय भरा उत्तर आया, "कोन इरानी ? आप किससे मिलना चाहते हैं ?" क्षण भर में ही महेन्द्र समझ गया, गले की आवाज पहचानने में उससे गलती हुई है। तुरन्त बोला, “अन्यथा न लें, मैं रत्ना मिन्न से वातचीत करना चाहता था। वे हैं या बाहर निकल चुकी हैं ?" उस छोर से महिला-स्वर आया, "रत्ना मित्र ? वह परसों से छुट्टी पर है। आप कौन बोल रहे हैं ?" महेन्द्र को आवाज लड़खड़ाने लगी, "छुट्टी पर है ? मैं उसका बहनोई महेन्द्र सरकार बोल रहा हूँ। "ओह, आप महेन्द्र बाबू हैं ?" उस छोर के रमणो-स्वर में अपनापा तैर आया, आपके बारे में रत्ना से सुन चुकी हूँ। नमस्कार !" महेन्द्र देवकूफ की तरह वुड़बुड़ाया, "नमस्कार !" उस छोर से आवाज आई, "आपको क्या पता नहीं है कि वह परसों से छुट्टी पर है ? कल दाजिलिङ्ग मेल से सिलीगुड़ी रवाना हो गई है।" " एक हो जिन्दगी १५७ "सिलीगुड़ी ?" "हो आपको तो मालूम रहना चाहिये था । वह तो आपके घर पर ही थी।" उस छोर से आवाज आई। महेन्द्र या रिसीवर से थमा हुआ हाथ कांप रहा है। योना, "दर- असल में कुछ दिनों से घर में नहीं या। यह कर लौटकर आएगो ?" "वह एक हफ्ते की छुट्टी पर गई है।" उस छोर से थावाज आई, "लौट फर वह सीधे होस्टल में रहने चलो जायेगी।" "होस्टल ?" महेन्द्र को आवाज थरयराफर टूटने लगी। "जी हो, मैंने उसके लिए होस्टल में इन्तजाम कर दिया है। उन छोर से रमणी-स्वर माया, "मतलब यह कि मेरे गाय ही होस्टल में रहेगी।" महेन्द्र ने उसकी बातों के आखिरी हिस्से को नहीं गुना । भयभीत, थातंकपूर्ण आंखों से अपने हाथ के कांपते रिसोवर का ओर देखा । उस छोर से तब आवाज आ रही यो, "हैलो, हैलो।" महेन्द्र ने फुसफुसाकर कहा, "चली गई. मिलीगुड़ी "लौटकर होस्टल में।" उसके हाथ से रिसीवर गिर गया। वह पागल की तरह दौड़ता हुमा गया और अपने कपड़े के थैले पो ड्रेसिंग टेबुल से उठाकर उलट दिया और झाड़ने लगा। खाता, कुछ रुपये-पैसे और फुटेर चावी के गुच्छे फर्श पर बिखर गये । महेन्द्र ने फर्श पर बैठे-बैठे हो हरेक पानी गुच्छे को देखा और पजे से माणिकतल्ला सी० आई० टी० पट को चाबो को उठाकर देखा । देखकर एक बार उसे गाल से और दूसरों बार सोने से चिपका लिया। पर दूसरे ही क्षण महेन्द्र का संपूर्ण शरीर कॉप ठा, मोर्य सन्देह और भय से आतंकित हो उठो। वह तुरन्त पाता, रूपया-पैसा, पायो के गुच्छे आदि कपड़े के थैले में रख उठकर खड़ा हो गया । अपने कपड़े. लते को और देखे, इसका उसके पास अवकाश नहीं है। सिर के नार पंधा चल रहा है, इसका भी उसे खयाल नहीं है। आधी की १४८ एक हो जिन्दगो शयन-कक्ष से निकल ड्राइंगरूम को पार किया और बाहर के दरवाजे को खोल जोर से खींच दिया। ताला अपने आप वन्द हो गया। लिफ्ट के पास आ, बार-बार घण्टो दबाने लगा। हताश हो जब सोढ़ी की ओर पाँव बढ़ाने लगा तो लिफ्ट ऊपर आया। वह एक तरह से छलांग लगाकर ही लिफ्ट के अन्दर चला गया। लिफ्टमैन को आश्चर्य में डालते हुए कहा, "नीचे।" नीचे उतर महेन्द्र जल्दी-जल्दी लिफ्ट से बाहर निकला और सड़क पर आ पागल की तरह टैक्सी खोजने लगा। थोड़ी दूर पैदल जाने के वाद ही टैक्सी मिल गई। टैक्सी में बैठ, टूटे हुए स्वर में किसी तरह कहा, 'माणिकतल्ला सी० आई० टी० रोड।" टैक्सी चलने लगी। महेन्द्र पत्यर के मानिन्द वैठा रहा, हालांकि उसका अन्तर थरथरा रहा है । सी० आई० टी० रोड के फ्लैट के सामने पहुँचकर टैक्सी वाले को रोका, भाड़ा चुकाया और नीचे उतर तेज कदमों से चलने लगा। उसका ध्यान इस बात पर नहीं गया कि दरबान उसकी ओर हैरतमरी 'निगाह से ताक रहा है । लिफ्ट से आठवीं माला में आकर उसने पहले दरवाजा खोला। बत्ती जलाकर कमरे को बन्द कर दिया। थरथराते हाथ से आलमारी खोली। नीचे के असंलग्न चेम्बर को हटाकर रख दिया, उसके बाद नीचे चाबी डालकर, अन्दर के चेम्बर का ढक्कन खोला और एक ही क्षण में उस खाली चेम्बर पर मुंह के बल गिर कर आर्तस्वर में रोने लगा, "उफ्, आह, हाय-हाय।" उसका ध्यान इस बात पर गया ही नहीं कि चेम्बर के किनारे की धारदार जगह से उसके सिर में चोट आई है और उससे खून टपक रहा है। वह बच्चे की तरह बन्द कमरे में कब तक रोता रहा, इसका उसे पता नहीं चला। उसके बाद वह उठकर खड़ा हो गया। खुली आल- मारी की ओर देखा । शून्य चेम्बर की ओर निगाह दौड़ाई । उसका सारा शरीर पसीने से भीग गया है, गालों पर सूखे आंसू की लकीर है। सिर के कटे हुए हिस्से में खून जम गया है। आलमारी की तरफ से - एक ही जिन्दगी १४६ आंखें हटाकर उसने कमरे के चारों तरफ निगाह दौड़ाई । उसके बाद आहिस्ता-आहिस्ता बालकॉनी के दरवाजे की ओर बढ़ गया। सिटकानी खोल, जल्दी-जल्दो वालकॉनी की तरफ बढ़ गया। सड़क पर रोशनी जल रही है । दूर वी० आई० पो० रोड की रोशनी 'कतार बद्ध विन्दु जैसी दीख रही है। महेन्द्र ने नोचे सड़क की ओर देखा । आदमो और यातायात वाहन चल-फिर रहे हैं और सड़क जैसे उसे हाय के इशारे से बुला रही है। महेन्द्र ने फुसफुसाकर कहा, "जाऊँगा । अव तुम्हारे सिवा मेरे लिए कोई दूसरी जगह नहीं है ।" रेलिंग पकड़, जैसे ही उसने पांव आगे रखना चाहा, कमरे के अन्दर से सुरबाला की आवाज तैरती हुई आई, "सुनो, कहाँ जा रहे हो?" महेन्द्र ने तत्क्षण कमरे को ओर देखा । कमरा पालो है । फिर भी उसने कमरे के अन्दर प्रवेश किया, पलग की तरफ देखा, उसके बाद फर्श को। फुसफुसाकर बोला, "तुम कहाँ हो सुरो ? कहाँ हो ?" यह कहते हुए औंधे मुंह फर्श पर लेटकर मातृहीन शिशु की तरह पुकारने लगा, "मुरो-सुरो, तुम कहाँ हो ?" महेन्द्र सुरो को पुकारते-पुकारते, शिशु की तरह ही फर्श में मुंह छिपाकर सो गया। एकाएक चिहुँककर जग गया और वोला, "कौन ? इरानी?" निःशब्द कमरा । रोशनी जल रही है । महेन्द्र ने भूतग्रस्त मानिन्द कमरे के चारों ओर निहारा । उसकी आँखें खुलो आलमारो पर गई। पीछे मुड़कर देखा, बालकॉनो का दरवाजा खुला है। वहां पानी का दाग है, चौखट भीगी है। पता नहीं, कब पानी बरस चुका है। महेन्द्र सपना देख रहा था, इरानी पीछे से आई है और उसे अचानक बांहों में भर लिया है, जैसा कि वह अकसर किया करती थी। महेन्द्र उठकर खड़ा हो गया। बालकॉनी में गया। अव भो सड़क पर रोशनी जल रही है लेकिन पूर्व दिशा के क्षितिज में हलको लाली - रही है। कहीं टूटे हुए स्वर में दो-चार कौवे बोल उठे। नीचे की ताका । दो-चार आदमी चल-फिर रहे हैं। देखते ही बात समझ आ जाती है, सवेरे के मेहनतकश वाहर निकले हैं। महेन्द्र ने दूर के आसमान की ओर एक बार फिर निहारा, उसके द कमरे के अन्दर मा, बालकॉनो का दरवाजा बन्द कर दिया । गुसल- जाने में जाकर बत्ती जलाई। वेसिन के ऊपर रखे आईने में अपना वहरा देखा । सिर के कटे हिस्से को हाथ से छुआ। वेसिन के नल की टोंटी खोल हाय-मुंह गरदन-गला घो लिये । कपड़े के छोर से पोंछा। अव उसकी आँखों में बेचैनी, भय, आतंक, हताशा और रुलाई नहीं है। उसके चेहरे पर मार खाए व्यक्ति के द्वारा स्वयं को शान्त करने की चेष्टा का भाव तैर रहा है । अब वह बहुत कुछ सामान्य नहीं दीख रहा है। गुसलखाने की वत्ती बुझाकर वह कमरे के अन्दर वापस आया। आलमारी के तमाम चेम्वरों को पूर्ववत् बन्द कर दिया, पल्ले को चावी से बन्द कर दिया। कपड़े के थैले में खाता, रुपया-पैसा और चावियों के सारे गुच्छे भर लिये । कमरे के चारों तरफ एक बार नजर दौड़ाई और 'रोशनी बुझा दी। दरवाजा बन्दकर लिफ्ट के पास आने पर समझ में माया, इस इमारत का कोई आदमी अभी सोकर नहीं उठा है। वह सीढ़ियां उतरकर नीचे आया। देखा, दरवान सोया है और बाहर जाने के कलैप्सिवल गेट पर ताला जड़ा है। महेन्द्र ने दरवान को पुकारा । विना कुछ वोले पाँच रुपये का ए नोट निकालकर दिया। दरवान ने भी वगैर कुछ बोले गेट का ताव खोल दिया। वाहर आ महेन्द्र ने सड़क के दोनों किनारे की मोर अ दौड़ाई । वस की उम्मीद में न रुककर वह पैदल ही आगे बढ़ा और एक टैक्सी मिल गई। उस वक्त भी सड़क पर रोशनी जल रही मगर पूरव का आसमान साफ हो रहा था और लाली तेजी से फैल घो। टैक्सी जाने को राजी हो गई तो महेन्द्र ने बैठकर कहा, चिडिया मोड़।" D एक ही जिन्दगी टैक्सी जब महेन्द्र के गेट के सामने आकर सको तो उसके घर में झाक और देवदार के पेड़ों को फांक से रक्तिम धूप को 'प्रयम फिरण झांक रही थी। किराया चुकाकर, गेट के छोटे हिस्से से वह गिर चुका फर अन्दर घुसा । ग्वाला अगर न आया होता तो छोटा हिस्सा वन्द ही होता। ग्वाला आ गया है, इसलिए पुला है । इसका मतलब मुरवाला अमी गाय दुह रही है। महेन्द्र वगीचे की ओर गया। जैसा मोचा पा, सही निकला। सुरवाला गाय दुह रही है । गाएं वड़ों को चाट रही हैं । शुरू में ग्यासा की नजर उस पर गई और उसने माये पर हाथ रखकर कहा, "राम- राम बाबूजी।" सुरवाला ने तत्क्षण मुड़कर देखा और उसकी हालत ऐसी हो गई जैसे नीचे गिर पड़ेगी । बोली, "तुम ! तुम आ गए ?" सुरवाला को गाय के थन से हाथ हटाकर जमीन पर रखते देय, महेन्द्र तेज कदमों से उसके पास चला आया और बोला, "भा गया हूँ सुरो। घबराओ नहीं । तुम जो काम कर रही पी, परो । मैं बलि बाथरूम जाकर नीम की दातून ले आता हूँ और दांत रगह लेता है।" क्या कहे, सुरवाला तय नहीं कर पा रही है। महेन्द्र के सिर पर नजर जाते ही वह गाय के पास से उठ घड़ी हुई, "यह क्या, तुम्हारे सिर में चोट कैसे लगो ?" "चोट नहीं लगी है, सुरो, सिर फट गया है। महेन्द्र उदास है लेकिन सहज मुसकान के साय बोला, "तुम घबराओ नहीं । मैं कमरे में थैला रख, नीम को दातून ले माता हूँ।" सुरवाला की आँसूभरे नेत्रों में उद्वेग थी हार है । महेन्द्र ने हाप उठाकर उसे सांत्वना दी और घर के पिछवाड़े के दरवाजे की ओर चला गया । अपने कमरे के अन्दर जाकर देखा, नीतू मच्छरदानो के अन्दर सोया है । उसने बगैर कोई आवाज किए बैग से पानी निरामो.शेर आलमारी खोलो।लेको मन्दर रख उसे फिर पद, . ।

१५२ एक हो जिन्दगी का कुरता उतार अलगनी पर रख दिया। वाहर आ गुसलखाने को खिड़की पर देखा, कपड़े में भीगी हुई नोम की दातून पूर्ववत् रखी हुई है । यह सुरवाला का काम है। शायद उम्मीद में वह हर रोज नीम की दातून रखती आई है। महेन्द्र की छाती में सांस जैसे अटक रही थी, फिर भी वह एक दातून मुंह में रख पिछवाड़े के दरवाजे से निकल आया और देखा, सुरवाला अव भी गाय के पास खड़ी है । महेन्द्र ने कहा, "मैं तो आ ही गया सुरो । तुम गाय दुह लो।" सुरवाला की आँखों में धुंधलापन तिर रहा है, फिर भी उसके उद्वेग की छाया वहुत कुछ पतली हो जाती है। वह फिर जाँघों के बीच बाल्टी रख गाय दुहने लगी। महेन्द्र ने बगीचे के चारों तरफ आंख दौड़ाई । सरला गैरेज यानी खटाल साफ कर रही है । वह धीरे-धीरे पूरब की ओर बढ़ गया । नीम की दातून चवाते-चबाते बीच-बीच में अनमनेपन में डूब जाता है और फिर आसमान को ओर देखने लगता है। पिछली रात की बारिश में इ-पौधे भीग गए हैं और हरे-हरे पत्ते ऐसे दीख रहे हैं जैसे नए सिरे से साज-सिंगार किया हो । मैना और गौरैया उड़ रही हैं। कहों एक नीलकंठ वैठे-बैठे कलरव कर रहा है। महेन्द्र को खयाल ही न रहा कि कब सुरबाला गाय का दुहना खत्म कर चुकी है और ग्वाला दूध लेकर चला गया है । अचानक उसकी इन्द्रियां चौंक पड़ों। सुरवाला उसके निकट आकर खड़ी हो गई है। महेन्द्र चिहुँका नहीं, अपनी सहजात हंसो के साथ बोला, "आओ सुरो।" सुरवाला महेन्द्र के सामने आकर खड़ी हो गई । अव भी उसकी आंखें आद्र हैं, लेकिन उनमें जिज्ञासा का भाव है। महेन्द्र ने कहा, "सुरो, मुझसे कुछ मत पूछों । मैं शायद बहुत दूर चला गया था, मगर वापस आ गया।" .

एक ही जिन्दगी १५३ "यहो तो मेरा-हम लोगों का भाग्य है ।" सुरवाला ने कहा, "तुम न कहना चाहोगे तो मैं तुमसे कोई बात नहीं पूछूगो।" महेन्द्र ने कहा, "इसलिए सुरो, कि पूछने से कोई लाम नहीं होगा।" "इरानो चली गई है, जानते हो न?" सुरवाला बोली। महेन्द्र थूक निगलकर एक क्षण चुप रहा, उसके बाद बोला, "जानता हूँ।" "जानते हो? कैसे पता चला?" "तुम फिर पूछताछ कर रही हो ?" महेन्द्र मुसकराया। सुरवाला ने घबराकर कहा, "नहीं-नहीं, पूछताछ नही करूंगी।" महेन्द्र नीम की दातून का फसैला थूक फेंककर बोला, "सुरो, मैंने सोचा था, जोवन जवकि एक ही है तो उसके साथ अपनी मर्जी के अनु- सार खिलवाड़ करूं।" यह कहकर वह हंस दिया और सिर हिलाया, "लेकिन यह असली वात नहीं है । जोवन निःसन्देह एक ही है लेकिन आदमी को एक ही जीवन में अपना सारा काम-काज कर लेना पड़ता है । इसे बिसरा देने से गलती को सजा उसे इसी जीवन में भोगनी पड़ती है।" वह चुप हो गया। उसके गले को ठेलकर जैसे कोई चीज बाहर निकलना चाहती है। स्वयं को शान्त करने के खयाल से वह मुलायम धूप से झलमलाते चिकने पेड़-पौधों की ओर देखने लगा। नीलकंठ अब भी शोर मचा रहा है। उसके साथ एक वया और दो बुलबुलें भी स्वर मिला रही हैं। मैना और नीलकंठ चुप होकर किसी जगह बैठना नहीं जानते । महेन्द्र ने हलकी खांसी खांसते हुए कहा, "चलो सुरो, मुंह घोल । सिर की चोट के कारण एक बार डॉक्टर के पास जाना होगा।" "माज तुम ऑफिग जाओगे ?" मुरवाला ने घबराकर पूछा। महेन्द्र ने कहा, "राइटस नही जाऊँगा लेकिन काम-धंधे को दूसरी जगहों में जाना है । रसोई के बारे में सोच रही हो? आज में जरा देर १० १५४ एक हो जिन्दगी . ? से बाहर निकलंगा।" वह पीछे की तरफ मुड़ा । देखा, मती, सतु, नीतू तीनों बगीचे में । आकर उसकी ओर ताक रहे हैं। महेन्द्र ने मुड़कर सुरवाला की ओर देखा । सुरवाला ने भी देखा। उसकी आँखों में फिर आंसू भर आए हैं । महेन्द्र सुरवाला का हाथ थामे पानी के नल की ओर चला गया। नल के पास जाकर लड़कों की तरफ मुड़कर बोला, "तुम लोग मुंह वाए क्या देख रहे हो ? वाजार-दुकान जाओ । खा-पीकर हम लोग सभी एक ही साथ निकलेंगे।" मती और सतु ने एक-दूसरे की तरफ आश्चर्य भरी दृष्टि से देखा। उसके बाद महेन्द्र पर उनकी दृष्टि गई । मतो ने पूछा, "आप कब आए वावूजी ?" "सवेरे ।" महेन्द्र ने सुरवाला का हाथ छोड़ पानी की टोंटी खोल दी। सतु वोला, "वाबूजो, आपके सिर में क्या हुआ है ?" "कट गया है, दवा लगानी है।" अंजुरी में पानी भर कर उसने मुंह के अन्दर डाला। मती और सतु मां की ओर नजर दौड़ाकर अन्दर चले गए। नीतू अब भी प्रस्तर की तरह खड़ा है । सुरबाला ने देखा, महेन्द्र ने एक बार मुंह से पानी बाहर फेंका परन्तु दोबारा पानी लेना भूल गया है । खुले नल की टोंटी से पानी की अजस्रधारा बह रही है। महेन्द्र का हाथ पानी से भीग रहा है। सुरवाला आगे बढ़कर उसके निकट आई। महेन्द्र उसकी ओर मुखातिव नहीं हुआ। बोला, घर जाओ, सुरो। मैं आ रहा हूँ।" सुरवाला कुछ क्षणों तक चुपचाप खड़ी रही। उसके बाद आगे बढ़- फर उसने नीतू का हाथ थाम लिया और घर के भीतर चली गई। महेन्द्र अव भी खड़ा है और पानी की धारा बह रही है बहती जा रही

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Ek Hi Hai Zindagi

Author
Basu Samresh
Title
Ek Hi Hai Zindagi
File name
Ek Hi Hai Zindagi
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Delhi The Kashmiri Gate
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
552171
Barcode
4990010032891.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
IlNdCkZF1bn
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