Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Vaidic Chikitsa

Satwalikara,.s.d. · 2012/08

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वैदिक चिकित्सा - . वेदमें अनेक प्रकारकी. चिकित्सा पद्धतियां वर्णन की हैं। किसी चिकित्सा पद्धविका वर्णन विस्तारपूर्वक है और किसीका संक्षेपसे है। इन • सब चिकित्सापद्धतियों को एक स्थानपर संगृहीत करना, सनका विचार और ममन फरके अनुभव लेना और उनका सार्वत्रिक प्रचार करना, उत्तम ज्ञानी वैधकाही कार्य है। किसी स्थानपर चेदकी परिभाषा साधारण मनुष्य के समझ में नहीं माती, उसका प्रकाश ज्ञानी वैद्यके अंत.करणमें ही होना संभव है । इसलिये विचारी वैद्योको इस चैदिक चिकित्सा पद्धविका अवश्यही मनन करना चाहिए। घेदकी विविध चिकित्सा पद्धतियों का सूक्ष्म विचार करनेसे पता लगता है कि वेद इन चिकित्सा पद्धतियोंद्वारा मनुष्यको स्थूलसे सूक्ष्म तत्वतक ले जा रहा है। बच्चे धर्मका यही मुख्य भीष्ट है कि वह मनुष्यों को स्यूलकी अपेक्षा सूक्ष्म शक्तियोंके विषयमें अधिक मेम उत्पा करे । स्यूल पदार्थों और शक्तियों का ज्ञान मनुष्यको स्थूल राष्टिसे होता ही रहता है। क्योंकि वह प्रत्यक्ष है। साधारणतः मनुष्यकी प्रवृत्ति प्रत्यक्ष व्यक्त और एपमें रमती है, विशेष कारणके विना मनुष्य अप्रत्यक्ष, मायक और मायके पीछे नहीं दौडना चाहता । जो मनुष्य विचारकी मालसे परिका (४) ។ निरक्षिण महर्निश करते रहते हैं, उनको इस दृश्य स्थूल जगत्के परे एक मदृश्य सूक्ष्म तत्व दिखाई देता है। जब उनको उस तत्वका साक्षात्कार वैसाही प्रत्यक्ष होने लगता है कि जैसा साधारण मनुष्य मात्रको इस दृश्य जगत्का प्रत्यक्ष ज्ञान हो रहा है, तब उनकी भक्ति स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्मपर अधिक दृढ होती है, क्योंकि सूक्ष्मका सामर्थ्य स्थूलकी अपेक्षा कई गुणा अधिक है। यही बात विविध चिकित्सा पद्धतियोंमें भी है। प्रथम अवस्थामें मनुष्योंकी भक्ति औषधिवनस्पतियां, दवाइयां, गोलियां आदिपर विशेष रहती है। यह बिलपुर स्थूलकी भक्ति है। इस कारण जो वैद्य मनकी चिकित्सा करनेके विना ही शरीरमें दवाइयो ठोस देते हैं दे स्थूल दृष्टिके वैद्य होते हैं। मनके माधीन ही सब शरीर होता है। जबतक मन कमजोर न होगा तबतक कोई यीमारी मनुष्यको हो ही .नहीं सकती। इसलिये हरएक रोगीके मनकी चिकिरसा प्रथम होना मावश्यक है। यह बात कई सूक्ष्मदर्शी अमेरिकन तत्वान्वेपियोंके ध्यानमें भानुकी है, उनमेंसे एक कहता है कि-In the beroic days of the Veda-writers the physician of the lody was' s160 the physician of the mind ( Dr. Axil Ent Gitson's Healtli culture VOL III,VO, V, May 1920) " वेदके शौर्य-वीर्य युक्त भोजस्वी समयमें शरीरका जो वैद्य होता था, वह मनका भी चिकित्सक हुमा करता था।" यह म० गिब्सन महोदयका कथन बिलकुल सत्य है । इसमें आश्चर्य की बात इतनी दी है कि जो मात म. गिब्सनको विदित होगई, यह मदतक यहाँके हिंदी मेंधवा मायदेशीय वैद्यों भोर हकीमोंको विदित नहीं हुई !!! वेद यद्यपि भौषधि-चिबिरसा यता रहा है, तथापि उसका मय क्षाकर्षण सूक्ष्म मानस चिकित्सापर ही हो रहा है। जो मद पुरुष इन - वेदमंत्रोंको सूक्ष्म से देखेंगे वे उसी समय जान सकते हैं कि घेदका माकर्षण कितना प्रथल है। इस पावकोही इस लेसमें स्पष्ट करना ६, प्रथमत. घंधक विषयमें निम्न मंत्र देखनेयोग्य है- - (१) दिव्य वैद्य। यत्रौषधीः समग्मत राजानः समितामिव । विप्रः स उच्यते भिषग्र रक्षोहाऽमीवचातनः । (क्र. १०९७६) अर्थ-जिम प्रकार राजा लोग अथवा क्षत्रिय (समिता इव) सभामें एकरित होते हैं, उस प्रकार ( यत्र) जहां औषधिया (सं भग्मत) इकट्ठी होती है उस (विप्रः) विशेष ज्ञानी मनुष्यको ही (भिपक् ) वैध कहते हैं । वह दी (रक्षो-हा) राक्षसोंका हनन करनेवाला और (भमीव. धातनः) रोग दूर करनेवाला कहा जाता है। इस मंत्रमें वैधका लक्षण बताया है--(१) संपूर्ण भापधियां अपने पास ठीक प्रकार रखनेवाला, (२) विशेष प्रवुद्ध अर्याद अपने शास्त्रका सागोपांग जिसने अध्ययन किया है, (३) जो युक्ति और योजनासे (भिपज्यति ) रोग दूर कर सकता है, (४) जो राक्षसोंका नाश कर सकता है और (५) जो रोगोंको मूलसे अर्थात् जडसे (धातना) उखाद देता है । ये वैद्यके पांच लक्षण उक मंत्रमें कहे हैं । " राक्षसों" के विषयमें इतना ही यहां कहना है, कि 'रक्षः, राक्षस, भसुर' मादि पाद विशेष अर्थ में वैद्यशास्त्रमें प्रयुक्त होते हैं। ये सजीव प्राणधारी सूक्ष्म कीटजीव हैं कि जो मनुष्यके माखोंसे भी दिखाई नहीं देते। शतपयमें इनके विषयमें कहा है कि- तदयधुनोति । अवधूत रक्षः। अवधूता अरातयः इति; तनाप्दा एचैतदक्षांस्यतोऽपहन्ति । (शत. प्रा ११४) झटक देता है और कहता है कि राक्षसोंका नाश होगया, असुरोंका नाश हुमा । इस प्रकार विनाशक राक्षसों का संहार होता है।" " वह धर्मय - अर्थात् चर्म झटकनेसे उसपर चिपके हुए राक्षस नीचे गिरते हैं और उनका नाश होता है । राक्षस चमडेपर चिपक जाते हैं, ये मनुष्यके मांखस नहीं दिखाई देते, और झटकनेसे दूर होते हैं, इतने सूक्ष्म ये राक्षस हैं। सूर्य अस्त होनेपर इनको बल मावा है, अंधेरेमें ये प्रवल होते हैं और सूर्य- किरणोंसे इनका नाश होता है। ये नाना प्रकारके रोग उत्पन्न करते हैं और मनुष्यों तथा अन्य प्राणियोंको सताते है। यह राक्षसोंका स्वरूप यहां ध्यानमें धरना चाहिए । बडे शरीरवाले जो राक्षस हैं वे भिन्न हैं। स्वतंत्र निबंध द्वारा राक्षसोंके स्वरूपका वर्णन किसी अन्य समय किया जायगा। यहांके प्रकरणमें जो राक्षसोंका सूक्ष्म स्वरूप अभीष्ट है, उसका सारांशसे वर्णन ऊपर किया है, उसको पाठक स्मरण रखें। इस प्रकारके राक्षसोंका औपधि प्रयोग मादि उपायोंके द्वारा नाश करना वैद्यका कार्य है। अस्तु । इस प्रकार वैद्यका लक्षण वेदमें कहा है। अब इस मंत्रके साथ निम्न मंत्र देखिए- अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो देव्यो भिषक् । महीश्च सर्वान्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यो ऽघराचीः परा सुव । (वा. य. १६५) अर्थ-सव (म-हीन ) कम न होने अर्थात् पढनेवाले रोग पोजोंका ( जंभयन् ) नष्ट भ्रष्ट करनेवाला सय (यातु-धान्यः) राक्षसोंको (अधराची:) नीचेको भोरसे जो (परा सुब) निकालता है वह (अधिवक्ता) उपदेशक पहिला दिव्य वैद्य (अधि भवाचत) कहता है अथवा हम सवको बचाता हैं। इस मंत्रमें वैद्यके लक्षण कहे हैं- (१) रोग-बीजोंका नाश करनेवाला, (२) राक्षसोंका संहार करनेवाला, (३) योग्य मार्गका उपदेश करनेवाला और (४) पचानेवाला वैद्य होता है। इस मंत्रमें "म-दि" शन्द रोगपीजोंका पापक भाया है। (हि) कम (म) न होनेवाला ' " (७) रोगधीज होता है। प्रारंभमें छोटासा दिखाई देता है, परंतु उदासीन रहनेपर वह बढने लगता है, फैलता है और सब शरीरमर व्यापता है। यातु-धान्यः" शब्द द्वारा रोगोंका दूसरा लक्षण कहा है। जिसमें धन्यताके दूर होनेका माव है। यह नाम राक्षसोंके लिये वेदमें आता है। जब ये सूक्ष्म राक्षस शरीरमें प्रविष्ट होते हैं तब शरीरका उत्साह और भारोग्य अर्थात् धन्यपन नष्ट हो जाता है। इन राक्षसों और रोग, बीजाको नचिके मागसे दूर करनेका कार्य वैध करता है। अर्थात् वैध विरेचनादि द्वारा राक्षसोंको शरीरसे निकाल देता है। ये दो मंत्र वैद्यका लक्षण बता रहे हैं। इस मंत्रमें " देव्यः भिषक्" शब्द है । "दिव्य वैध' अर्थात् 'आत्मा' ही वैध है, वास्तवमें सच्चा वैद्य मात्मा ही है, ऐसा इस मंत्रद्वारा सूचित किया है । यह मंत्र रुद्र सूक्तमें है और यहां “दैन्य, भिषक् शब्द 'रुद' के लिये प्रयुक्त हुए हैं । रुद्रका अर्थ 'वैद्य, मामा, परमात्मा है। इसकी विस्तृत व्याख्या (१) रुद्र देवताका परिचय और (२) ऋग्वेद में रुद्रदेवता इन दो पुस्तकोंके द्वारा की है। जो पाठक विस्तारपूर्वक इस विष- यको देखना चाहें उन पुस्तकों में देख सकते हैं। वैद्य शब्दके नाम जीवात्मा और परमात्मवाचक उक्त मंत्रमें और सूक्त में दिये हैं, इससे सूचित होता है कि शरीरमें सच्चा वैद्य जीवात्मा है और जगत्में परमात्मा है । शरीरको नीरोगता संपादन करनेका कार्य जीवात्मा कर रहा है, यह सूचना वेद क्यों दे रहा है? इस बातकी भोर पाठकॉका चित्त भापित होना भावश्यक है। वैद्यक औषध रोगीका आत्मिक बल हट जाने के पश्चात् कोई सहायता नहीं करते, और जिसमें बारिमक पलकी तीव्रता होती है वह बिना भौषधीकी सहायताके, अपने मनाशचिद्वाराही रोगोंको हरा सकता है। स्थूलसे सूक्ष्मतक ले जानेकी वेदकी यही खूबी है; वैद्यका लक्षण कहते हुए वेद बता रहा है कि "मारमा " ही सच्चा वैध है । जगदके वैद्य - - .

(2) उसके सन्मुख कुछ भी नहीं है। अर्थात् वैदिक धर्मी मनुष्योंको उचित है कि वे योगसाधनादि द्वारा अपने मानसिक और मास्मिक क्षतिको बढायें और इसी सच्चे दिव्य वैबसे अपने तथा दूसरोंके रोग दूर करें। परावलंबिताही दुःख है। दूसरेपर विश्वास रखकर बैठना, दूसरेकी सहायतासे स्वसंरक्षण करनेका यरन करना, दुःखकारक ही है। यह सिद्धांत माप व्यक्ति, राष्ट्र और जगत्में सर्वत्र देख सकते हैं। स्वावलंबन ही सुख है। अपनी धारणाशक्ति से स्वयं स्थिर रहना सुखका. साधन है। जबतक वैद्यकी औषधियोंपरही रोगीका विश्वास रहता है, तब- तक रोगीको दुःख भोगना आवश्यकही है। परंतु जब उस रोगीको पता लग जायगा, कि मैं स्वयं भारमरूपसे दिव्य वैद्य हूं और सब भोपाधि- योंकी संपूर्ण शक्तियां मेरे मनमें सदाही सिद्ध हैं और मैं अपनी इच्छा. शक्तिके पलसे अपने तथा अन्योंक रोग हटा सकता हूं, तयही सुखके लिये वह अधिकारी होता है , वही स्वातंत्र्य और स्वाधीनता वेदको अभीष्ट है कि सय लोक इस शक्तिको अपने अंदर विकसित करें, इसलिये वेद अपने मंत्रों द्वारा स्थूल शक्तिका वर्णन करता हुमा एकदम सूक्ष्म शचियोतक पाठकोंको पहुंचा देता है। यह बात हमने वैद्यके लक्षणों में सूक्ष्मरूपसे पताई है। भय प्रकृत निबंधका विषय देखते हैं। (२) औपाध-चिकित्सा। औषधियोंके उपयोगसे रोग दूर करनेका नाम " औषधि-चिकित्सा" है। इस विषयके भनेक मंत्र घेदमें हैं। संपूर्ण मंत्र इस छोटेसे नियंधों दिये नहीं जा सकते । सारांशरूपसेही इस भीषधि-चिकित्साका यहां स्वरूप बताना है। प्रथम भौषधियोंकी उत्पत्तिके विषयमें घेद कहता है- या ओपी पूर्ण जाता देवेभ्यस्त्रियुग पुरा । मने नु यणामहं शतं धामानि सप्त च। (१९७१) . - - अर्थ-जो बोषधी वनस्पतियां देवोसे तीन युग पहिले संपन्न हो गई थीं, उन (बभ्रूणां ) भरण पोषण करनेवाली औषधियोंके सौ और सात ( धामानि ) स्थान अथवा जातियां हैं ऐसा मै मानता हूं। इस भूमंडलपर प्रथम श्रौषधियां उत्पन्न हो गई थी और वीन युग न्यतीत होनेके नंतर मनुष्योंकी उत्पत्ति हो गई। (१) वनस्पति युग, (२) जलजंतु-युग, (३) सर्प युग, (४) पशु युग और (५) मनुष्य युग यह सृष्टिकम है। इन भौषधियोंके एक सौ सात वर्ग हैं। कई- लोग ' सप्त शतं धामानि ' का अर्थ सात सौ धाम मथवा वर्ग समझते हैं और कई लोग ' शतं धामानि सप्त च ' ऐमा वाक्य मानकर ' सौ और सात धाम ' मानते हैं। इसको विचार चतुर वैद्योंको करना योग्य है। बस्तु । इन लौषधियोंके विषयमें वेद कहता है- ओपीरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ब्रुवे । (*० १०१९७१५) औषधियां सच्ची (मातरः) माताएं हैं और वे ( देवी ) देवियां हैं। मान्य करनेवाली भयवा हित करनेवाली माताएं होती है और देवकी शक्ति धारण करनेवाली देवियां होती है। " देवीः भोषधीः इस शब्द प्रयोगद्वारा सूचित किया जा रहा कि भाषधि वनस्पतियों में जो दोष दूर करनेकी शक्ति है वह देव की, अर्थात् ईश्वरकी किंवा परमात्माकी है। सर्वव्यापक शक्ति सब विश्वमें व्याप रही है। भनिमें प्रकाश, जलमें शीतता, पृथ्वीमें धारणाशकि भादि भनंत गुण हैं, वे परमात्मासे प्राप्त हो गये हैं, इसी प्रकार मौषधियोंका रोग दूर करनेका गुण परमारमाका है। पूर्व स्थलमें "दिव्य वैद्य "एकही परमात्मा है, यह पात स्पष्ट कर है, बर यहाँ मोषधिमां मी परमात्मा- के गुण धारण करनेसे गुणी बन गई हैं ऐसा प्यानित किया है। " मारमा पैर और दवा एकही होजागी है "पह बात पाठक स्वयं जानतेही " 1 " है (१०) - होंगे । इस विषयमें यहां अधिक लिखनेकी भावश्यकता नहीं है औषधियोंकी प्रतिज्ञा निम्न मंत्रमें कही है- ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राशा । यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि ॥ (ऋ० १०।११।२२) अर्थ-गोपधियां सोम राजाके साथ बोलती हैं कि, हे राजन् (यस्मै ) जिस रोगीके लिये (बाह्मणः) ब्रह्मका ज्ञान धारण करनेवाला वैद्य हमारी योजना करता है, (तं ) उस रोगीको रोगसे हम पार कर देते हैं। इस मंत्रमें वैद्यका एक मुख्य लक्षण बताया है, वह यह है कि " वैद्य सच्चा ब्राह्मण होना चाहिए, अर्थात् ब्राह्मका ज्ञान वैद्यको चाहिए। आत्मज्ञानी वद्य चाहिए । मारमा, धुद्धि, मन भादि सूक्ष्म तत्वोंके गुणधर्म जाननेवालाही वैद्य बने । अन्य धनार्थी लोग वैद्यका धंदा न करें। भात्मज्ञानी सात्विक वृत्तिवालाही वैद्य क्यों होना चाहिए, इस बातका अधिक वर्णन करनेकी जरूरत यहां नहीं है, क्योंकि आजकलके जमानेमें वैद्योंके जालसे क्वचित् कोई पुरुषही बच सकता है । पैद्यका धंधा वास्त. वमें देवी धंधा है, परंतु लालचके कारण अन्य धंधोंके समान यह धंधा भी राक्षसी बनाया गया है। भास्मज्ञानी वैद्य आजकल किसी पवित्र भूमिमें होगा तो होगा। इस मंग्रमें औषधियोंके सोम राजाका नाम मागया है। सोमका अर्थ सोमवलि, चंद्र और जीवारमा है। चंद्रकी सोलह कलाएं होती है, जीव पोश-कल है ही, इसीको "पोळशी इंद" वेदमें भी कहा है। सोम- घल्लीका भी शुक्लपक्ष और कृष्णपक्षमें क्रमशः वृद्धि और क्षय होता है ऐसा कहते हैं, इस विषयमें हमें कोई प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है, क्योंकि भाजका पसली सोमवाली कहीं भी उपलब्ध नहीं है। परंतु चंद्र के साथ सोमका संबंध लगाया गया है। इसलिये सोमवल्लिको मी १६ कलाएं । , . हाना आवश्यक है ऐसा तर्क होता है । संशोधक वैद्य इस विषयमें विचार करें। यहां इतनाही बताना है कि औषधिवाचक सोमशब्द मात्माका वाचक होनेसे स्थूल औषाधिक नामसे सूक्ष्म भात्मतत्व यहां सूचित किया है। पाठक यहां देख सकते हैं कि किस प्रकार वेद हरएक बातमें पाठकोंको सूक्ष्म तरवके पास खींच रहा है। अब वेदमें कही हुई भौषधियां देखिए- पिप्पली क्षिसभेषजी उतातिषिद्धभेषजी । तां देवाः समकल्पयन इयं जीवितया अलम् । (अथव० ६११०९९) अथ-पिप्पली नामक औषधी क्षिप्त और भतिविद्ध रोगांके लिये अत्यंत उपयोगी है। यह एकही औषधी (जीवितवै) जीवित रहने के लिये (मल) पर्याप्त है, ऐसी देवोंने कल्पना की है। जिप्स रोगमें मनुष्य पागल सा बन जाता है उसको क्षिस कहते हैं और रोगसे अत्यंत घेरे हुए बीमारका नाम है अतिविद्ध । इनके लिये पिप्पली औषधी उत्तम है, इतनाही नहीं परंतु प्राणिमात्रके जीवनके लिये अर्थात् संपूर्ण भारोग्य प्राप्त करनेके लिये यह एकही मोपधि पर्याप्त है । तथा- श्यामा सरूपंकरणी पृथिव्या अध्युद्भता। इदमू पुप्र साधय पुना रूपाणि कल्पय॥ (अथर्व० १॥२४५) मर्थ-श्यामा नामक वनस्पति जो पृथ्वी के उपर उगती है वह शरीरके रंगको ठीक करती है। इस घनस्पतिसे (पुन ) फिर शरीरके रूप ठीक बन जाते हैं। शरीरपर जो वेत कुष्टके पन्ने आत है, तया जो अन्य प्रकारके कुटसे शरीर विरूप हो जाता है, उस बीमारीस श्यामा भौषधि बनाती है और पुनः पूषवंत सुंदर.रूप बनाती है। इस प्रकार कई मौषधियोंका. वर्णन. चेदमें है। यहां केवल सूचना मात्र बताना है इसलिये इतनाही पर्याप्त है। सोपधियां न होनेपर बडेसे बढा वैद्य भी कुछ कर नहीं सकता, यह इस मार्गमें भापत्ति है। पराधीनतासे दुःख भौर स्वाधीनतासेही सुख होना है। मौषधियोंके भवलंघनरूप पराधीनता इस मार्गमें है, इसलिये वेदने जल चिकित्सा बता दी है।- (३) जल-चिकित्सा। जल-विद्या ' नामक लेखमें बताया गया है कि वेदमें जल चिकित्सा- का क्या प्रकार या । इसलिये उसका पुनः यहां विशेष वर्णन करनेकी भावश्यकता नहीं, तथापि एक दो मंत्र यहां नमूनके लिये दिये जाते है- अमु मे सोमो अवधीदन्तर्विश्वानि भेजा। अग्निं च विश्वशंभुवमापश्च विश्वभेपजी. ( 11२३।२०) अर्थ-सोमने मुझे कहा कि पानीके अंदर संपूर्ण औषधियां हैं । जलही सब भौषधी है और अग्नि सब भारोग्य करनेवाला है। इस मंत्र में केवल जलके प्रयोगसे सब रोगोंकी निवृत्ति सूचित की है। इस मंत्रमें 'अग्निचिकित्सा की सूचना भी मिलती है। परंतु इस विषयमें यहां लिखने के लिये हमारे पास स्थानही नहीं है। अग्निचिकित्साके विषयमें किसी अन्य समय विस्तारपूर्वक लिखूगा । क्योंकि इस एक चिकित्साके कई विभाग है। अप्स्वन्तरमृतं अप्सु भेषजम् । (R० ११२३१९) "पानीमें अमृत है, पानीमें भौषध है।" इस प्रकार उदकका वर्णन वेदमें भा रहा है और जळाचकित्साकी सूचना दे रहा है। आप इद्वा उभेपजीरापो मर्माव-चातनीः । आपः सर्वस्य मेपजीस्तास्ते कृण्वन्तु मेषजम् । (R० 101१२०१६ (१३) अर्थ-जलीनि सदेह औषधी है, जलानि सशय रोगोंको दूर करनेवाला है, जल सब रोगोंकी एकही दवा है, वह जल तुम्हारे लिये औषध करे। इस मत्र में स्पष्ट कहा है कि संपूर्ण रोग एक ही जलके प्रयोगसे दूर हो सकते हैं। जलफा अभिपिंचन, 'उपसिंचन 'दि विधि अथर्ववेदमें लिखे हैं । विविध प्रकारसे जलका उपयोग करनकी विधेयोंकी सूचना उन शब्दोंसे मिलती है। अब यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि एकही जल सब रोगोंका शमन करने के लिये पर्याप्त है । तो अन्य दवाइयोंकी क्या आवश्यकता है ? जल सब देश में सब कालमें मिल सकता है । औषधियां सब कालमें सब देशमें मिल नहीं सकती, इसलिये भौषधिचिकित्सकको अपेक्षा जलचिकित्सक मधिक स्वतंत्र है । औषधिया न मिलनेकी कठिनता जलचिकित्सासे हट गयी है, इसमें कोई सदेह नहीं । जलचिकिरसामें दवाइयोंकी कटवाइटसे मुख खराव होनेका भय नहीं है। भौषधिचिकित्सा स्थूल अर्थात् पार्थिव चिकिरता है, उससे सूक्ष्म जलतरपका आश्रय होनेसे जलचिकित्सासे मनुष्य एक सिढो ऊपर पहुचता है। क्योंकि जिनका विश्वास जलचिकित्सा होता है उनके मनमें सूक्ष्मतावकी गतिकी कल्पना जागृत होती है । भाजकल भी कई वैद्य हैं कि जो जलचिकित्साको मानतेहीनिहानि सदेद जलचिकिरपासे उतना पैसा रोगियोंके जेबसे सेंचा नहीं जा सकता, जैसा भौषधियोंकी चिकि साले खींचा जा सकता है 1परतु यह पैद्योंकी सुभीताकी बात है, रोगियोंकी सुभीता और जाति जलचिकित्सासे अधिक होनी है, इसका मूर हेतु इतनाही है कि इसमें सूक्ष्म तत्वका माश्रय होता है । जिस प्रमाणपे सूक्ष्म वरपका आश्रय होगा उस प्रमाणसे अधिक उमवि और अधिक सुख मनुष्यको प्राप्त होता है यह वैदिक धर्मका सिद्धांत है। (४) अग्नि-चिकित्सा। ' भनि च विश्व श-भुव ' ऐसा पूर्व स्थरमें कहाही है। (विश्व) ।

(१४) संपूर्ण (शं) शांति और मारोग्य (भुवं) देनेवाला ममि है। अथात् संपूर्ण दोष भनि दूर कर सकता है! राक्षसोंका नाश करना वैद्यका एक फर्तग्य है यह पात पूर्व स्थलमें ,पताई है । भमिका नाम भी 'रमो-हा' अर्थात् राक्षसोंका नाश करनेवाला इस मर्थका घोतक है। अनिद्वारा दूसरी चिकित्सा हवन चिकित्सा है। अग्निचिकित्साका वर्णन विस्तारपूर्वक अन्य निबंध करनाही है, इसलिये यहां इतनाही पर्याप्त है। (५) हवन-चिकिर। घेदमें हवनका वडा भारी शास्त्र है । यद्यपि इसका पूर्णतया माविष्कार नहीं हुमा है, तथापि जो बातें इस समय सन्मुख भा गई हैं, उससे इतना स्पष्ट होता है, कि हवनसे रोगोंका शमन किया जा सकता है। इस विषय- में इस लेखमें एकही मंत्र देखिए- मुश्वामि त्या दविपा जीवनाय फमशात-यक्ष्मादुत राजयक्ष्मात् ॥ ( भयर्व) "इवनके द्वारा भज्ञात रोगसे तथा क्षयरोगस भी तुमको दीर्घ जीवनके लिये छुडाता हूं"। हवनसे ज्ञात रोग तो दूर होही सकते हैं, परंतु भज्ञात रोग भी दूर हो सकते हैं। जिनका कारण, निदान और चिकित्साकी विधि स्पष्ट विदित होती है उन रोगोंका नाम 'शात-यक्ष्म ' है, और जिनका निदान और सपशमनका उपाय ज्ञात नहीं है, उनको "म-ज्ञात-यक्षम "कहा जाता है । राजयक्ष्मा यह होता है कि जिसको उपेदिक, क्षयरोग भादि नामसे पुकारते है यह सब बीमारियोंका राजा है, क्योंकि एक समय जहा मह पहुंचता है बीमारको ही जाता है । इस प्रकारके भयानक क्षयरोग की भी चिकित्सा हवनक द्वारा हावाह। र मन्य रोग हट जाते है एसा कहनेकी मी क्या भावश्यकता है।

- ऋषिकालमें यशोधमें बहुवही उति हो गई थी। यज्ञसे दृष्टि कराई जाती थी, धान्यमें विशेष सत्व खाया जाता था, मगरा भार गृहका मारोग्य संपादन किया जाता था । वायु शुद्धि और उसकी प्रसन्नता प्राप्त की जाती थी, सुपुत्र उत्पादन के लिये इष्टिया की जाती थी। यह तो देवी भावनाके यहाँका स्वरूप है। राक्षसी मारना भी यज्ञ प्रचलित हो गये थे। इन राक्षसी यज्ञद्वारा श के नगरों में बीमारियां रपट की जाती थीं, इनका प्रवर्तन राक्षसों के पास होता था। हारपर्य हयनसे एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है उसको उत्तिके कार्यमें सपा विनाशके कार्य भी चर्ता जा सकता है। वैदिक वामय में यशका सय उज्ज्वल स्वरूपही दिखाया है, क्योंकि यैदिक यादमयकी प्रवृत्तिही देवी है। पैशाच और आसुरी प्रयोंमें राजस और तामस घोर इयनोंके विधि लिखे हैं। जिनसे उक्त भयानक परिणाम होते हैं । इनके संपूर्ण विधि इस समय ज्ञात नहीं है, परंतु जो घोडे ज्ञात हुए हैं, उनका वर्णन भी यहां नहीं हो सकता । निसंदेह इसका वर्णन पहा मनोरंजक और उपयोगी है, इसलिये किसी अन्य लेखमें इसका शुम मशुम स्वरूप बताया जायेगा। जिस प्रकार भापधिका पोग्य उपयोग करनेसे भारोग्य मोर मयोग्य प्रकारस सेवन करनेसे मनारोग्य होता है, ठीक उसी प्रकार साविक भेष्ठ पोंके हवनसे भारोग्य बढ सकता है मौर अन्य घोर इटियोप प्याधियां भी फैल सकती है। श्रेष्ठ देवी पॉका वर्णन गोपय-प्राह्मण निम्न प्रकार करता है- भपज्य-यहा या पते । तस्मातुसंघिपु मपुज्यन्ते । तुसधिपुपे ध्याघिर्जायते। (गोपप. उ .१९) "ये मोरपियोंकेही पश है। इसलिये तुमॉकी संधियों में पश हिपे जाते है, स्पोरिकसंधि पारि होती है।" और - अस्तु । रोगनिवारण और भारोग्यसपादन यह सात्विक यज्ञका मुख्य मारा है इसमें कोई सदेह नहीं। इस प्रकार यचिकित्साका योडासा स्वरूप है। पार्थिव, जल और अग्निसे चिकित्सा इस प्रकार वेदमें भावी है। 'मा' शब्दसे जल तत्त्वका जैसा-बोध होता है उसी प्रकार म्यापक भारमतत्यका भी ज्ञान होता है। तया 'अप्ति' शब्दसे वैजस् तत्यका ज्ञान होता हुला भी परमात्माका बोध होताही है। इस प्रकार वेद न केवल उच्च तत्वों द्वारा चिकित्सा बता रहा है, परतु हरएक ताववाचक शब्द द्वारा उस पावके मारे गुप्त रूपले विद्यमान भारमतावका साक्षारकार करा रहा है, इस मातको कभी भूलना नहीं चाहिए । अग्निचिकित्सा, सूर्य भी अमितत्व होनेसे इस चिकित्साका भी इस प्रकरणमें विचार करना योग्य है- (६) सौर-चिकित्सा। सूर्यके किरणों द्वारा जो चिकित्सा की जाती है उसका नाम सौर- चिकित्सा है। सूर्यकिरणोंका पवित्रता उत्पन्न करनेका धर्म वेदमें "शोचिए कश" शब्द द्वारा कहा है। इसलिये वेद कहता है कि- न सूर्यस्य सदृशे मा युयोथा ॥ (प्र. २३) मर्थात् " सूप प्रकाशले हमारा कभी वियोग न होवे " क्योंकि सूर्य ही सब प्रकारके दोष दूर करके प्राणियोंकी पुष्टि करता है। यहातक वेद कहता है कि- सूर्य आत्मा जगतस्तथुपश्च ।। (१० ११५11) सूर्य स्थावर जगम जगत्का मारमा है।" प्राणरूपी सूर्य होनेसे पद सयका यात्माही है। वह नष्ट होनेसे सब माणिमात्र नष्ट हो सकते । यही बात प्रभापनिषदमें कही है- आदित्यो ह वै प्राण ॥ (प्रश्न. उ० ॥५) यत्सव प्रकाशयति तेन सर्यान् प्राणान् राश्मिपु सनिध। (प्रक्ष०3०१६ .

(१७) 1 "मादित्यही नियसे प्राण है। जब मादित्य प्रकाशमान होता है सर वह सब प्राणों को अपने किरणों में रखता है तात्पर्य सूर्यकिरणोंके द्वारा सब जगत्में प्राणतत्वका सचार होता है । जहा प्राण पहुंचता है घाँसे मृत्युका दूर होना स्परही है। इसलिये घरोंकी रचना ऐसी होनी चाहिए कि सूर्यकिरणोंके द्वारा प्राण सब घरकी शुद्धल करके और रहनेके घरोल मृत्युको दूर हकाल देवे । रोग उपादक कृमियोंका नाश सूर्यकिरणद्वारा होता है ऐसा भी वेदमें कहा है, यह सय यहा अनुस- धानसे देखनेयोग्य है। सौरचिकित्साद्वारा योगी लोग बडा लाभ उठाते हैं । प्राणायामद्वारा इस प्राणपूर्ण सत वायुको भदर लेते और कुमकद्वारा माणको अपने शरीरमें स्थिर करते हैं । अन्य प्रकार युक्तिप्रयुक्तिसे सूर्यकिरणोंके द्वारा भारोग्य सपादन करना सौरचिकित्सामें हो सकता है। विविध रगोंवाले गौवॉके दूध विविध इष्ट और अनिष्ट परिणाम सौरचिकिरसा किंधा वर्णचिकित्साके साथ मयध रखते हैं। इस विषयमें बहुत रिया जा सकता है, परत विस्तारभयके रिये यहा इनाही लिख कर भय क्रमप्राप्त वायुचिकि साका स्वरूप यताता हूँ। (७) वायु-चिकित्सा । यायुद्धी प्राण बनकर शरीरमें माकर रहा यह उपनिषदोंका कपन है। वायुमें " भगृतका खजाना "है ऐसा १० १०॥८६ सूक्तमें कहा है। जहां अमृत है यहा रोग नहीं हो सकते, इसलिये ममृतका खजाना लेकर जहाँ यात्रु पहुंचता है, वहां नीरोगता प्राप्त हो सकती है। यही यायुधिकिरसाका मूल घेदमें है । तथा- मा घात पाहि मेपज विधात धादियद्रप । स्य हि विश्यमेपजो देवानां दूत ईयसे । (२.१120) "हे वायो ! तुम्हारी दवाई से भाभो भोर यहाँसे सब दोष दूर करो, क्योंकि वही सव मोपधियों से पुक है।"

पृथिवी, भाप, तेजकी अपेक्षा घायु सूक्ष्म तत्त्व है। इसलिये इससे आरोग्य संपादन करना और रोग दूर करना अन्य प्रकारों से श्रेष्ठ है। जल भी प्राप्त करनेके कष्ट हैं। वायु सर्वत्र ही है इसलिये यदि उसको खराब न किया जावे, तो सदा यह ममृत देनेके लिये सिद्ध ही है। योगी लोग. प्राणायामद्वारा इसी प्राणवायुसे आरोग्य और दीर्घ भायुष्य संपादन करते हैं। वायुके योग्य उपयोगसे हरएक बीमारी दूर हो सकती है । उसके सेवनकी विधिसे परिचय होना चाहिए । दयालु परमेश्वरने अमृत- मय वायु सर्वत्र भरा रखा है, परंतु अज्ञानी मनुष्य फिर भी अनारोग्यम सहते ही हैं !!! यदि मनुष्य प्रतिदिन सौ पचास प्राणायाम विधिपूर्वक करता जायगा तो उसके पास रोग खडा भी नहीं होगा। विधि छोडकर कार्य करनेसेही मनुष्यकी अवनत्ति होती है। इस प्रकार स्थूल भूतोंके आश्रयसे चिकित्साओंके क्रमपूर्वक प्रकार देखें। वेद किस प्रकार स्थूलसे सूक्ष्म तत्त्वोंकी शक्तियोंके पास मनुष्योंको खेंच रहा है इसका ज्ञान इस विचारसे हो सकता है। अब इससे भी सूक्ष्म तत्वसे जो मानसचिकित्सा होती है, उसका विचार करना है। (८) मानस-चिकित्सा। यही सर्वोत्तम चिकित्सा है। वेदने इस चिकित्सापर जितना बल दिया है उतना मन्य चिकित्साओपर नहीं दिया। इसका कारण स्पष्ट है। इस चिकित्सा जैसी स्वाधीनता होती है वैसी किसी अन्य चिकित्सा नहीं हो सकती। पौषधिचिरितामें मोपधियोंका माश्रय करना होता है। जलचिकित्सा उत्तम जल प्राप्त होना चाहिए, हवन-चिकित्सा विविध हवन सामग्री इकट्ठी करना आवश्यक है, वायुचिकित्सा में शुद्ध घायुके विना कार्यभाग नहीं हो सकता, सूर्य के प्रकाशके विना सौरचिकित्सा सशक्य है, तात्पर्य बाह्य साधनोंसे जो चिक्रिमा करनी है उसमें परतन्त्रता अवश्यही है। वेद मनुष्योंको किसी प्रार परमन्त्र रखना नहीं चाहता। इसलिये इस चिकित्सा वेदमें मानस चिकित्सा प्रताई है। इसमें किसी बाह्य साधनोंपर निर्भर होनेकी आवश्यकताही नहीं है। यह चिकित्सा अपने आत्मिक बलसे और मनकी इच्छाशक्तिसे ही होती है। यदि किसी प्रकार रोगीमें भात्मिक बल उत्पस हुमा भयवा चिकित्सकने अपनी इच्छा शक्तिद्वारा उसमें चल उत्पन किया तो वहां ही स्वयं रोगका शमन होने लगता है । वेदमें मनको शक्ति इसी प्रकार वर्णन की है- यत्मज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु । यस्मान्न ऋते किं चन कर्म कियते तन्मे मन शिवसंकल्पमस्तु ॥ ३ ॥ येनेदं भूत भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम् ॥ येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्प- मस्तु ॥४॥ सुपरथिरश्वानिव यन्मनुष्याने. नीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ॥ हृत्प्रतिष्ठं यदजिर जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु ॥६॥ (वा. य. ३४) इन मंत्रोंमें मनके गुणोंका कथन है। हमको यहां सब गुणोंका विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है, अपने विषयकी सूचना जिन शब्दों द्वारा हो रही है, उनका ही यहां विचार करेंगें- (१) यत् प्रजासु मंतः ममृतं जो मन प्राणियोंके मदर अमृत रूप है। अमृतका सेवन करनेसे सब बीमारिया दूर होती हैं। यदि योगद्वारा इस मनकी शक्तिका विकास हो गया तो आरोग्यके लिये किसी अन्य पदार्थके मायकी आवश्यकता ही नही होगी। (२) यस्मान् ऋते किं चन कर्म न क्रियते - जिस मनके विना कोई भी कर्म किया ही नहीं जाता । यहा बाह्य कर्मकी अपेक्षा शरीरके अंतर्गत काँकी ओर ही पाठक ध्यान देवें । हाथ ऊपर नीचे करना, पेटमें पचनका फर्म भादि सब मनकी प्रेरणासे ही हो रहा है। जिस मनकी शकिद्वारा चार (२०) - " पांच सेर वजनका हाय जैसा चाहिए वैसा घुमाया जाता है, उस मनकी शक्तिसे रोगके थोडेसे बीज अपने स्थानसे हिलाये नहीं जायगे, ऐसा कोई भी नहीं कह सकेगा। अपने सय शरीरमें मनकीही शक्ति कार्य कर रही है, परंतु मनुष्य अपनी ही शक्तिसे अपरिचित होने के कारण अपने स्वास्थ्य- के लिये दूसरोंपर निर्भर हो रहा है। वास्तवमें दिव्य वैद्य आत्माही है और अमृतरूपी मन उसीके पास है। परंतु अमृतके महासागरमें हूब मरनेवाले मूढके समान यह भी अपने पासके अमृतको छोडकर याहेरके पदार्थ कष्टसे प्राप्त करनेमें मानद मानता है !! (३) येन सप्त-होता यक्षः वायते - जिस मनके द्वारा सप्तहोता यज्ञ" फैलाया जाता है। दो मांख, दो कान, दो नाक और एक 'मुख ये सात होतागण जिसमें बैठे हैं ऐसा यह पुरपरूपी यज्ञ मनके द्वाराही चलाया जाता है । इस यज्ञमें मन ही ब्रह्मा है और ब्रह्माका काम यदी है कि वह यज्ञके दोषोंको दूर करे । यद्द मनरूपी ब्रह्माका अधिकार ही है। तात्पर्य शरीरके सब दोप मनके द्वारा दूर किये जा सकते हैं। दोष दूर होनेपर कोई रोग रहेगा ही नहीं। जबतक दोष होंगे तबतक ही रोग होते हैं। (४) सुपारथिः भवान् इव - उत्तम सारथी जिस प्रकार घोडॉको चलता है उस प्रकार यह मन मनुष्योंको चलता है। यह इसकी महती शक्ति है। परंतु मनुष्य अज्ञानके कारण अपनी शक्तिसे ही अपरिचित होगये हैं !! अपने भापको निर्वळ माननेमें ही धन्यता मान रहे है !!! क्या यह सबसे यहा माश्चर्य नहीं? तारपर्य मनकी अजव शाकि है। इसलिये मानस-चिकित्सा ही सबसे श्रेष्ठ चिकित्सा । इससे अपने क्या दूसरोंके भी रोग दूर किये जा सकते हैं। इतस्पद्वारा रोग दूर करनेका विधान निम्न मंत्र है- हस्ताभ्यां दशशाधाम्यां जिता चाचः पुरोगवी ॥ अनामयित्नुभ्यां त्या ताभ्यांत्योप स्पृशामसि ॥(क्र.१०।१३००) दस शाखाएं जिसको हैं ऐसे मेरे दोनों हाथोंसे तुमको स्पर्श करता हूं। ये मेरे हाथ (भनामयित्नुभ्यां नीरोगता करनेवाले हैं। और साथ ही मैं (वाचः) अपनी वाणीको प्रेरित करता हूं।" दस अंगुलियां हाथोंकी दस शाखाएं हैं। इनके स्पर्शसे दूसरेके रोग दूर हो सकते हैं। वाणीसे मी साथ साथ रोगीको सूचना देनी चाहिए। मानस-चिकित्साका प्रकार इसमें लिखा है। इस विषयका वर्णन विस्तार- पूर्वक भागे आ जायगा। यहां वेदके विविध चिकित्साओंके प्रकारही केवल बताने थे, सो सारांश रूपसे बताये हैं। वेद किस प्रकार स्थूलसे सूक्ष्म तत्वोंतक ले जा रहा है इसका थोडासा वर्णन यहां किया गया है। "इस चैदिक मानस-चिकित्सा विषयमें कई लेख लिखने भावश्यक है, इसका विशेषतः योगका स्वरूप बतानेके पश्चात् ही इस चिकित्साका वर्णन किया जायगा। भाशा है कि पाठक भी इस दृष्टिसे विचार करेंगे और अपने अंदर मानसिक अमरपनकी शक्ति योगद्वारा बढानेका पुरुषार्थ योग साधनद्वारा करेंगे। ॐ व्यक्ति में शांति । राणमें शांति । जगत्में शांति ।

वेदमें वैद्यशास्त्र "वेद सर्व सत्यविद्यामोंका मूल पुस्तक है " " वेदमें सर्व विद्याएँ बीजरूपसे मिलती है " " वेदका पठनपाठन, श्रवणश्रावण करना बायाँका परम धर्म है " इत्यादि उपदेश इम ऋषि मुससे श्रवण करते मायें हैं और उस पासवाक्यके अनुसार हमारा विश्वास भी है, परन्तु कौन कौनसे शास्त्र किस किस प्रकारसे वेदमें उपलब्ध होते हैं, इसका निश्चित पता अभीतक लगा नहीं है, तथा इन शास्त्रों की खोजमें वैदिक विद्वानोंके परिधम भी जैसे होने चाहिये वैसे इस समयतक नहीं हुवे हैं यह बढी शोककी बात है। मेरा परिश्रम वेद विषयमें बहुतही भरूप है । परंतु जो कुछ परिश्रम वेद विषयमें मैंने किया है उससे मेरा निश्चित मत यह हुभा है, कि वेद विविध ज्ञानका एक भंडार है। इस घेदमें मुख्यतया अध्यात्म-शास्त्र उपलब्ध होता है, तथा इसके साधक कई अन्य शास्त्र प्रतीत होते हैं जिनमें समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र, वैद्यशास्त्र, दण्डनीतिशास्त्र, राजविद्याशास्त्र इ. प्रमुख हैं। वैद्यशास्त्रके मंत्रोंका अभ्यास करते करते इस शास्त्रकी एक निश्चित व्यवस्था है, ऐसा मेरे ध्यानमें आने लगा है। परंतु इसकी पूर्ण ध्यपस्था मैंने इस समयतक नहीं की है। इस शास्त्रके थोडेसे मंत्र भापके सन्मुस रखना चाहता हूं जिससे पापके मनमें वैदिक वैद्यशास्त्रका गौरव नि:संदेह आजायगा। मेरा विश्वास है कि जो मंन बेदमें वैधशासविषयक भाते हैं उन्दी मंत्रोंके माश्रयपर हमारा मार्य वैद्य-शास्त्र बना हुवा है। अर्थात् मायं .

वैद्यशासका बीज वेदमन्त्रों में अवश्य मिलता है। जिसकी मंशतः गवाही - सुश्रुतकार देते हैं:- " 1 इह खल्वायुर्वेदो नाम यदुपांगमथर्ववेदस्य अनुत्पाद्यैव प्रजाः ...... कृतवान् स्वयंभूः॥ ( सुधुव० सूत्र. ..) आयुर्वेद अथर्ववेदका उपांग है " यही उपवेद है। परंतु शोक है कि यह उपवेद इस समय नहीं मिलता है । वेदसे आयुर्वेद नामक उपवेद निर्माण हुवा । इस भायुर्बेदसे प्राचीन वैद्यशास्त्र जो चरक मुश्रुवादि नामसे प्रसिद्ध हैं, उत्पन्न हो गये अर्थात् वेदसे वैद्यशास्त्र निकल पाया। वेदमें जो वैद्यशास्त्रका बीज था वही वैद्य ग्रंथोंके रूपमें वृक्षाकार परिणत हो गया है । अस्तु । अब हम प्रस्तुत निबंधका विचार करते हैं। वैद्यशास्त्र- के बीजभूत मंत्रोंका विचार करनेके पहिले वैद्यके लक्षण वेदने कहे है यह देखने चाहिये। यत्रौपधीः समग्मत राजानः समितामिव । विमः स उच्यते भिपप्रक्षोहाऽमीवचातनः ।। (R० १०९७६) भावार्थ-"जिस प्रकार क्षत्रिय युद्ध में एकत्रित होते हैं उस प्रकार जिसके पास सर्व भौषधियां (सेगोंके साथ होनेवाले युद्ध में ) एकत्रित होती है । उस विद्वान्का नाम ( भिषग् ) वैद्य-होता है, और वही विद्वान् राक्षसों-रोगबीजों का हनन करनेहारा तथा रोगोंका दूर करने वाला होता है " इस मंत्रको देखनेसे वैद्यके निम्नलिखित लक्षण प्रतीत (१) विप्रः ( विशेषेण प्राज्ञः ) वैद्य, विद्वान्, ज्ञानसंपन्न, अयात् सांगोपांग वैद्यशाख जाननेवाला होना चाहिये। (२) औषधिसंग्राहकः तथा भौषधियोजक रोगनिवारक सम्पूर्ण (२४) भौषधियोंका संग्रह करनेवाला तया उन औषधियों को उत्तमतासे योजना करनेवाला। (३) रक्षो-हा-(रक्षसां हन्ता) रोगजन्तुओंकी यथोचित परीक्षा करके उनका हनन करनेवाला। (४) ममीव-चातनः-(अमीवाः रोगाः तान् चातयति दूरीकरोति) रोगोंको औपधियोजनाके द्वारा दूर करनेवाला । इन चार लक्षणोंसे जो युक्त होता है, यह वैद्य कहलाता है-(१) शास्त्रका अभ्यास, (२) औषधि संग्रह, (३) रोग-बीज-दूरीकरण समर्थता (५) तथा रोगविनाश समर्थता-यह चतुर्लक्षण युक्त वैद्य होता इन लक्षणोंका विचार करनेसे भाजकलके इश्तिहारी वैद्योंके व्यवहारका पथोचित खण्डन हो गया है ! भर्थात् पैद्यका धंदा हरएकको नहीं करना चाहिये, परतु जो उक्त लक्षण युक्त हो वह ही वैद्यक किया करे, अन्य नहीं। इस मंसे कितना उत्तम उपदेश मिलता है। यदि लोक इस उपदेश- की ओर ध्यान देंगे तो बहुत लाभ हो सकता है। अब शरीर विज्ञानके विपयमें एक मत्र देखिये- यास्ते शतं धमनयोऽड्गान्यनु विष्ठिताः। तासां ते सर्वासां वयं निर्विाणि द्वयामसि । (अथर्व पा९०२) भावार्थ-" मनुष्यके शरीरमें सैकडों नसें तथा नाडियां है । प्रति भषयवमें इनकी स्थिति है। इन सय धमनियोंसे विषको हम बाहिर निकालेंगे। इस मन्नमें दो पावें स्पष्ट कहीं है। (१) एक यह है कि शरीरके. - - प्रति भवयवमें भनेक नाडियां हैं। तथा (२) दूसरी बात यह है कि उन नाडियों में विष संचार होकर नाना व्याधियां होती हैं । इस कारण इन नाडियोंको सदा निर्षिप अर्थात् शुद्ध रखना चाहिये । नाडियोंकी निर्विपताके ऊपर मनुष्यका स्वास्थ्य अवलम्बित है, यह बात यहां स्पष्ट प्रतीत होती है। धमनियों के अन्दर विष संचारित होकर नाना व्याधियां होती हैं उनके कई नाम अगले मन्त्रमें दिये हैं-देखिये- अंगभेदो अंगज्वरो यश्च ते हृदयामयः । यक्ष्मः श्येन इव प्रापप्तत् वाचा साढः परस्तराम् ।। (अथर्व० ५।३०१९) भावार्थ-"मांग दूखना, (२) शरीरका ज्वर, (३ ) हृदयकी व्यथा (४) क्षयरोग यह सब व्याधियां एकदम नष्ट हो जायगी, जिस प्रकार श्येन झटपट मागता है। इस मन्त्रमें चार व्याधियोंका परिगणन किया है। व्याधियों की अन्य परिगणना भी अन्य मन्त्रों में भागई है। (१)क्षेत्रिय व्याधिः-जो व्याधि मातापिताके रजवीय के साथ संतान. में भाते हैं उनको क्षेत्रिय व्याधि बोलते हैं । यह क्षेत्रिय व्याधि बहे दुस्वर होते हैं। इनका भौषधोपचार भयर्ववेदमें बहुत स्थानपर माया है। (२) निति:- अनियमित वर्तन, पुरा व्यवहार, करनेसे जो व्याधियां उत्पन्न होती है उनको निति बोलते हैं। (३) भाग:-- -फैलनेवाली व्याधि । (४) दुरितम्-(दुः+इत) सदोष पदार्थ शरीरमें प्रविष्ट होनेसे जो रोग उत्पन्न होते हैं उन व्याधियों के पीजका नाम दुरित है, इसीको विप भी कहते हैं। (५) निपं-(वि+) जिससे शरीरकी समता नष्ट होती है उसको विष कहते हैं, शरीरके अंदर सप्त धानुभोंकी साम्यावस्था जिस समय होती (२६) है उस समय उसको मारोग्य कहते है, वया जिस समय प्रतिलोमी पदार्य भन्दर जाता है और सप्त-धातु के अन्दर विषमता उत्पन्न करता है उस समय व्याधि उत्पन्न होते हैं, यह विषमता जिससे होती है उसको विप कहा हुवा है। सूर्य किरणों के द्वारा यह विष दूर होता है ऐसा भागामी मंत्रों में कहा है- ये अंगानि मदयन्ति यक्ष्मासो रोपणास्तव । यक्ष्माणां सर्वेषां विषं निरवोचमहं त्वत् ॥ १९॥ पादाभ्यां ते जानुभ्यां थोणिभ्यां परि भंससः। अनूकादर्पणीरुणिहाभ्यः शीणों रोगमनीनशम् ॥२१॥ सं ते शीर्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः । उद्यन्नादित्य रश्मिभिः शीणो रोगमनीनशः ॥ २२ ॥ (अथर्व० ९६८) भावार्थ-" जिससे अवयवोंके अन्दर मद उत्पन्न होता है और नाना प्रकारके व्याधि होते है वह विप होता है । पांव, जानु, श्रोणी, पेट, कमर, मस्तक कपाल, हृदय तथा अन्य अवयव इनके अन्दर जो विष रहता है उसका नाश उदयको प्राप्त हुवा सूर्य अपने किरणोंसे करता है । अर्थात् प्रातःकालके सूर्यकिरणों से अनेक व्याधि नाश होते हैं। इस मन्त्रमें विपसे व्याधियोंका उत्पन्न होना तथा सूर्यकिरणों द्वारा विषका नाश होना स्पष्ट लिखा है । सूर्यकिरण विष दूर करके भारोग्य- का संवर्धन करने हारे हैं । इस कारण सूर्यका नाम शोचिष्+केश ऐसा वेदमें भाया है। जिससे किरणोंका शुद्धता करनेका धर्म स्पष्ट पाया जाता है। सूर्य के विषयमें और देखिये- अपचितः प्र पतत सुपर्णो यसतेरिव । सूर्य्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा घोऽपोच्छतु ॥ (अथर्ष ६।०३१) भावार्थ-" जिस प्रकार गरुह दौर जाता है उसी प्रकार स्फोटक " (२७) ग्याधि दूर चली जायगी, इसके लिये सूर्य औषध बनावे तथा चंद्रमा अपने प्रकाशसे उसका नाश करे।" इस मंत्र में सूर्य औषध बनाता है, ऐसा स्पष्ट कहा है। सूर्य इस विश्व प्राणरूप है और मपने किरणों के द्वारा सर्व विश्वका स्वास्थ्य उत्तम रखता है। परंतु मनुष्य ऐसे हैं कि वे स्वयं मंधेरै स्थानमें रहकर सूर्यकी प्राणशक्तिसे वंचित रहते हैं और अनारोग्यमें फंसते हैं। इस मंत्रसे पता लगता है कि मकान इस प्रकारके बनाने चाहिये कि जिनमें सूर्य-प्रकाश विपुल भावे तथा उनके द्वारा आयुरारोग्यकी वृद्धि भास होथे। सूर्यकिरणों द्वारा जो चिकित्सा होती है वह रश्मिस्नान नामसे प्रसिद्ध है। इस रश्मिस्नानसे अनेक व्याधियां दूर होती हैं। अब रश्मिचिकित्साको यहां छोडकर वायु-चिकित्साके विषयमें थोडासा देखेंगे- द्वाविमौ वाती यात आ सिन्धोरा परावतः। दक्षं ते अन्य मा वातु पराऽन्यो वातु यद्रपः ॥२॥ आ वात वाहि भेपज दि वात वाहि यद्रपः। त्वं हि विश्वभेपजो देवानां दूत ईयसे ॥३॥ (ऋ० १०११३७) भावार्थ-" दो वायु हैं। एक समुद्र के उपरसे भाता है और दूसरा जमीनके ऊपरसे चलता है। जो समुदके ऊपरसे जमीनपर भाता है वह बलको लाता है । तथा जो जमीनके ऊपरसे भाता है वह दोपोंको साथ ले जाता है। बलवान वायु औषधि ले मावे तया अन्य वायु दोषोंको दूर करे। वायु संपूर्ण भौषधियों का केन्द्र है इस कारण उनको देवदूत कहते हैं।" इस मंत्रमें वायुविकिरताका मूल है। समुद्र के ऊपरसे शुद्ध वायु भाता है, वह बल देता है, मारोग्य यदावा है, अर्थात् यह वायु संपूर्ण औपधियोंको अपने साथ लाता है । शुद्ध वायु ऐसाही उत्तम होता है । इसलिये शुद्ध वायुका सेवन करना चाहिये । शरीरोंकी सथा गृहोंकी रचना ऐसी होनी चाहिये कि उसमें ऐसा शुद्ध वायु सदैव भाता रहे। , (२८) मनुष्यों के स्थानों परसे जो वायु माता है वह नाना प्रकारके रोग पीजोंको साथ लाता है, इस कारण यह लाभदायक नहीं होता है। मनुष्यके शरीरमें भी पास तथा उच्छ्वास ऐसे दो घायु कार्य करते हैं । जो शुद्ध पायु पदर जाता है वह वळ उत्पन्न करता है। तथा जो अंदरसे मशुद्ध वायु पाहर निकलता है यह अशुद्धि ले भाता है। सब शरीरका स्वास्थ्य इन वायुओंपर अवलंबित है। योगशास्त्रान्तर्गत प्राणायामकी क्रिया तथा प्रक्रिया इसी घायुके साथ संबद्ध है। योग्य प्रकारसे प्राणायाम करनेसे अनेक व्याधियां दूर होती हैं। यह बात अंतःशुद्धिके विषयमें हुई। याह्य शरीरके अनेक रोग भी विवक्षित प्रकारके वायु सेवनादिसे ठीक होते हैं। शुद्ध वायु नित्य सेवन करनेवाले महोदयको प्राय रोग होतेही नहीं यह अनुभव है, वेद भी वही बात स्पष्टतासे बतलाता है। उक्त मयों में पायुके लिये "विश्वभेषज " यह शब्द भाया है यही शब्द सय वायुविद्याके प्रकाशका केंद्र है । इसी शब्दने वायुचिकित्साके विपयमें सब कुछ कहा है । वायु अर्थात् शुद्ध वायु संपूर्ण औषधियोंका तत्त्व है, संपूर्ण औषधि सेवनका फल शुद्ध वायुके सेवनसे प्राप्त होता है। अर्थात् पौपधियोंका कार्य केवल अकेला पायुही कर सकता है। किस म्याधिके लिये किस प्रकार घायु सेवन करना चाहिये, यह बात अन्य प्रकारसे विदित हो सकती है। भस्तु, इतना धायु चिकित्साके विषयमें कहना पर्याप्त है। व जलचिकित्साके विषय में पोटासा देखिये--- अपतु मे सोमो अवधीदन्तर्विश्वानि भेपजा। अग्निं च विश्वशंभुषमापश्च विश्वमेपजीः ॥ इदमापः प्र पहत पत्किं च दुरितं मयि । यद्वादमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ॥ (२० १२३।२०,२२) - मापो हि ष्ठा मयोभुवस्तान ऊजें दधातन । महे रणाय चक्षसे ।। यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः ॥ तस्मा भरंगमाम यो यस्य याय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः॥ (ऋ० १०९।१३) भावार्थ-- पानीके अंदर संपूर्ण औषधियों विद्यमान है, जिस प्रकार अग्नि सब प्रकारसे कल्याणकर्ता है उसी प्रकार जल भी संपूर्ण औषधिरूप है। मेरे अंदर रोगवीलरूपी विष, जो कुछ गया हो उसको यह जल बाहर से आवे जो कुछ अपथ्य मेरेसे होगया दो पद इस जलसे ठीक होवे । जल अत्यंत भारोग्यदायक है तया बळ देनेवाला है । जल अत्यंत कल्याणरूपी है, बद्द हमारा दित करनेवाला होवे । यह सारांशरूपसे उक्त मंत्रोंका माशय है । उफ मंत्रोंमें जलके लिये जो विशेष शब्द भाये हैं उनका मर्थ देखिये- (.) विश्व-भेषजी-( सर्व-भेपजी)-जिसमें संपूर्ण औषधियां मर्यात संपूर्ण औषधियों का सत्व रहता है, ऐसा पदार्थ जल है। अर्थात् जलके यथायोग्य उपयोगसे भाषधियोंके योग्य सेवनका फल प्राप्त हो सकता है। (२) दुरित प्रवाहक% (वि-चिरेचक ) शरीरमें गये हुये रोगो- स्पादक विष दूर करनेवाला जल है। मर्यात् जलके योग्य सेवनसे शरीर निर्विप होकर मनुष्य नीरोग होता है। (३) मयोभुवः भाप:-उदक कल्याण करनेवाला है तथा द्वितकारक, भारोग्यवर्धक, सुखदायक है। (१) शिव-तमा रसा-जल यह एक अत्यन्त मारोग्य उत्पन्न करने. हारा कल्याणमय मर्क है। उक्त मंत्रों में ये शब्द हैं, कि जो जलका प्रभाव वर्णन कर रहे है, जिनसे जलाधिकिरमा प्रकट होती है। इस चिकित्साके विषपमें अगले मंत्र देखिये--

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जालापीमिशित जालापेणोप सिात।
मालापमुप्रं भेप तेग नो मृड जीयसे.
(मय. ॥५११)
मापार्ष-"अभिपिजिन नो, मह उपसिंचन करो, जसदी
पहा भारी बोध, उमौके सेवन से जीपम गुरामय होता है।
रप गंग स्पष्टतया कहा है हिलो मभिपिन या उपमिपनसे
जीवित
मुपमप होता है, उस दो प्रकार जल उपपोग करनेके है,
उप्रकारसे उपयोग करनेसे मंपूर्ण रोग दूर हो महते है, कारण यह है
जलापं उप्र मेपर्य" जल अत्यंत सोय नापधि है, पानी पदी रोज
दया है। दिइस मंत्र का है उसमे मौर अधिक गलचिकित्सा
विपपमें क्या कहा जा सकता है।
मूहिरण चिकिरमा, यायुपिरिमा, जळपिकिरसा. इन तीन चिकित्सा.
भोंके विषयमें पोटामा दिदर्शन इस समयता किया है, निपंधका
विमार यदुत न हो इसलिये हरएक विश्यमें अत्यंत संक्षरसेही दिखाया
जाता है।
उक्त जलचिकित्सा मंत्रों में भाषिके लिये · विश्व-शं-मुवं' ऐसा
विशिष्ट शन्द पाया है।
मिमका मय- संपूर्ण कल्याणका उत्पादक " ऐसा है। मनि
मी मारोग्यसंपर्धक है ऐमा इस शब्दसे प्रतीत होता है। जिस कारण
पमिका उपयोग दयनमें होता है। "नुमंधिपु पाधिजायते । ऋतुसंधि
यज्ञाः क्रिपन्ते ।" इस प्रकार के प्राण पचन बताते है कि रोगीजों को
हटाने के अर्थ पक्षका उपयोग होता है। इसलिये भमिक विषयमें अधिक
लिपनेका प्रपोजन नहीं है। भय भोपाधिचिकित्सा विषयमें संशेपसे लिखना
।
प्रथम "भीपधि" शब्दका अर्थ देसनेकी अत्यन्त आवश्यकता है।
भोपधि शब्दमें दो शब्द है मीर उनका अर्थ नीचे दिपा है-

. (३१) भोप (बशेष )-दोष, मल, रोगपीज । भी-धोनेवाली, धोकर दूर करनेवाली। नयाँत दोषोंको धोनेवाली, दोषों को दूर करनेपाली जो चीज होती है उसको औषधि कहते हैं। इसी कारण सोपधि वनस्पतियों को प्रोपाधि कहते हैं। भोपाधियां अनंत प्रकारको हैं। चेदमें भी अनेक प्रकारके मोरधि- योका वर्णन है वन वर्णनों से कुछ आपधियों का वर्णन नीचे दिया है। प्रथमस सामान्य वर्णन मगले मंत्रों में दिया है- या ओपधीः पूर्वी जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा । मनै नु वधूणामदं शतं धामानि सप्त च ॥ यदिमा वाजयन्नहमोपधीहस्त आदधे । थामा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवभो यथा । (2010१९०१,१०) भावार्थ-" मनुष्यों के पहिले तीन युग औषधियां उत्पच हुवी थीं, और इन भोपाधियों के सात सौ किंवा एक सौ सात जातियां है। भोपनी. को बलवती करके सेवन करनेसे रोगका बीजमरा होता है।" इस मन्त्रों में तीन बातें कहाँ है (१) भौषधियोंका तीन युग प्रथम ' उत्पन्न होना, (२) भोपाधियों की सात और सौ जावियों का अस्तित,(३) औषधियों के सेवन रोगबीजों का नाश होगा, इस तीसरी भातसेही वैद्य शास्त्रको उत्पत्ति है । इन मन्त्रोम जो पात कही हे बहुतही विचारपूर्वक कही है, फेवल भौषधि सेवनसे ग्याधिका नाश नहीं होता है, प्रत्युत बौपधिको वीर्यवती धनार सेवन करने से व्याधियां दूर होती है, मोरधि- को वीर्यवती पनानेागो प्रकार होता है वही उसकी विधि है। इस लिये विधियुक्त मौषध पनाकर उसका यथायोग्य सेवन करना चाहिये यह सापय स्थानमें धरनेयोग्य है। मन वेदमें किस प्रकार औपाधियोंका वर्णन हे पद देखिये- पिप्पली औषधि। पीपली क्षिप्तमेपजी उतातिविद्धभेषजी । तां देवाः समकल्पयन्नियं जीवितवा अलम् ॥ पिप्पल्यः समवदन्तायतीर्जननादाधि । यं जीवमनवामहै न स रिष्याति पूरुपः ।। वार्ताकृतस्य भेपजीमथो क्षिप्तस्य भेपजीम् ॥ (१० ६१०९।१३) भावार्थ-पिप्पली नौपधी उन्माद व्याधिपर तथा अत्यन्त पुराणे रोगपर चलती है । पिप्पलीकी प्रतिज्ञा है कि " जो पुरुष हमारा सेवन करेगा उसका नाश नहीं होगा।"पिप्पली औषधि वात विकार तथा उन्माद विकारपर मच्छी औषधि है। कैसा स्पष्ट पाब्दोंमें औषधिका वर्णन भाया है कोई संदिग्ध पात नहीं। साधारणतपिप्पलीका उपयोग सर्व साधारण व्याधियोंपर किया जा सकता है । अर्थात् यही एक भापधि विविध व्याधियोंपर विविध प्रकार- से चलती है। यह इस मौषधिका सर्व साधारण उपयोग कहा है, इस सूचनाको ज्यानमें रखकर वैद्य पिप्पलीका उपयोग कर सकते हैं । इस औपधिका विशेष उपयोग भी स्पष्टताके साथ किया है । कि उन्माद तथा वातरोग तथा पुराणे रोगोंपर इनके सेवनसे लाभ हो सकता है। अस्तु । इस प्रकार कई वनस्पतियों का वर्णन मंत्रों में पाया है। उनमेसे योडासा नमूना मागे दिया हुमा है- श्यामा औषधि। किलासं च पलितं च निरितो नाशया पृषत् । आ त्या स्वो विशतां वर्णः परा शुफ्लानि पातय । (अय. २२) ।

. - । आसुरी चक्रे प्रथमेदं किलासभेपजामेदं किलासनाशनम् । अनीनशत् किलासं सरूपामकरत् त्वचम् ॥२॥ श्यामा सरूपंकरणी पृथिव्या अध्युगता। इदम् पुभ साधय पुना रूपाणि कल्पय ॥४॥ (मथर्व० १।२।४) भावार्थ-- रामा, कृष्णा, मसिनी, श्यामा यह मौषधियां हैं जिनके उपयोगसे किलास (श्वेत कुष्ठ ) तथा पलित (श्वेत बिन्दु) बिलकुल नाश होता है । स्वचाका रंग ठीक करनेवाली श्यामा वनस्पति है। जिसके सेवनसे चमडीका रंग पुनः पूर्ववत् होता है।" श्वेत कुष्ठ के ऊपर इन चार वनस्पतियों का उपयोग करके देखना चाहिये । अनुभव, विचार तथा संशोधन करनेसे निश्चित विधिका पता लग सकता है । वेदने सूचना दी है, अब आर्य वैद्योंका काम है कि घे इनको यथायोग्य रीतिसे उपयोगमें लाकर लोगोंको व्याधिसे दूर करें। अपामार्ग। क्षुधामार सृष्णामारं तथा अनपत्यताम् । अपामार्ग त्वया वयं सर्वे तदप मृज्महे ॥ अपामार्ग ओषधीनां सर्वासामेक इदशी। तेन ते मृम आस्थितमथ त्वमगदश्वर ॥ ( अय० ॥१७॥६-८ ) भावार्थ-"क्षुधा, तृष्णा तथा मनपत्यवा इनके ऊपर अपामार्ग औषधीका उपयोग होता है। संपूर्ण मौषधियों में अपामार्ग औषधीसही उक्त कार्य विशेष प्रकारसे होता है।" क्षुधा तथा सृष्णा संबंधी सर्व विकार तथा मनपत्यता संबंधी सर्व ग्याधि इस मौषधि सेवनसे ३(. चि.) दूर होते है।

(३४) केशवर्धन के उपायका वर्णन अधर्व-वेद ६।१३७में आया है; तया क्लीयत्वनाशन अथर्व-वेद ६६१३८में भाया है । इस विषयके मंत्र विस्तार- भयसे यहा उद्धृत नहीं किये है, भय एकही वनस्पतिका उल्लस करके इस विषयकी समाप्ति करनी है- सं ते मजा मता भवतु समु ते पहपा परः। सं ते मांसस्य वित्रस्तं समस्थ्यपि रोहतु ॥ ३॥ मज्जा मज्शा संधीयतां चर्मणा चर्म रोहतु । असून ते अस्थि रोहतु मांसं मांसन रोहतु ॥४॥ यदि कर्त पवित्वा संश) यदि वाऽश्मा प्रहृतो जघान । ऋभू रथस्येयाङ्गानि स दधत्परुपा परुः ॥ ७ ॥ (अथर्व० ४१२) भावार्थ-" रोहिणी नामक जो वनस्पति है उससे मांसादिकी शीघ्र वृद्धि होती है, इस कारण शस्त्रादिकोक आघातसे सो जायम होती है उसका व्रण इस घनस्पतिद्वारा शीघ्र ठीक होता है । मनासे मजा, मांससे मास, चर्मसे चर्म, अस्थिसे अस्थि इस वनस्पतिद्वारा बढ़ता है । यदि पारि शस्त्रके आघात तथा पत्थर लगनेसे व्रण हुवा हो तो इस वनस्पतिसे शीघ्र ठीक होता है, जैसा कि उत्तम तर्साम रथके मंगोंको शीघ्र ठीक करता है, उसी प्रकार रोहिणी वनस्पति शरीररूपी रथको शीघ्र ठीक करती है।" यह रोहिणी वनस्पतिका वर्णन बहुत स्पष्ट है । हरएक विद्वान् पर्यको उचित है, कि इन घनस्पतियोंकी ठीक विधि घटकर उनका उपयोग यथायोग्य करके व्याधियों को शीघ्र हटाने का यत्न किया करे। औषधियां तैयार करने के समय वैद्योंको ओपधियों की शक्ति बढानेका उपाय भी सोचना चाहिये । औपध शतवीर्य तथा सहनवीर्य धन सकता है ऐसा वेदमें अनेक घार वचन भाया है।

शतवीर्य-सौगुणा अधिक शक्तिवाला तथा सहसवीर्य -सहस गुणा अधिक शक्तिवाला भौषध । पलयान, पलवत्तर तथा बलवत्तम यह भी तीन प्रकार है, यह सब मंशोधक तथा संग्राहक बुद्धिसे देखना व्या विचारना चाहिये, इन बीयो. का संबंध भोपधियोंकी तेजस्विता बढानेमें होता है, छोटे पड़े वीर्यवान पध व्याधि न्यूनाधिक तीग्रतारे अनुसार व्याधिप्रस्तको भायुके मनुमार यथा रोगको भाय अनुसार न्यूनाधिक मेवन किया जा सस्ता है, मस्तु । यहा भाषधि विषय समाप्त करके वायु शुद्ध करनेगले वृक्षों के रिपय में वेद क्या कहता है यद संक्षेपसे देसते है-- यमाझ्यत्था न्यग्रोधा महावृक्षा: शिखण्डिनः। तत् परेता अप्सरसः प्रतियुद्धा अभूतन ॥ ४ ॥ यन यःप्रेसा हरिता अर्जुना उत यमाघाटाः कर्कर्यः संवदन्ति । तत्परता अप्सरसः प्रतिवुद्धा अभूतन ॥५॥ पयमगन्नोपधीनां धीरुधां चीर्यावती। अमटेग्यराटकी तोहणटंगी व्युपतु ॥६॥ (अपयं० ४३७) भाया-"जहां अधरय न्यग्रोध, ये महाक्ष अपने पत्रों के साथ प्रसातास रहते हैं, मजुन, भघाट, फरी, मजगी, मराटको..सोमयंगी प पृश सपा पनापतियों रहती हैं पहा (अप्सरः) पानी में घरने हारे विपत नहीं पड़ते हैं।" मए सर" पद पानी में संचार करनेहारे जो रोगनु होते हैं उनका शोधक है। इन पशों के कारण मलीयामा दूर होना भी संनय है पोंकि मलीपा रोगयोन भी पलाषिक होते है। बदा मलीया पर होता है पहाडन पुनको गार' भनुमय देखनेयोग्य है, इस मकार ५ पृशों रिपपमें रिसा है।

भस्तु, इस प्रकार वैद्यक विषयको कई विद्यामोंके विषयमें वेदमें उल्लेख माया है-जिसका दिग्दर्शन करना भी एक बडा भारी ग्रंथ लिखनेके समान बडे भायासका काम है। एक वर्ष हुवा मैंने वेदके वैद्यशास्त्रका अभ्यास प्रारंभ किया, यद्यपि पद्यशास्त्र मेरा विषय नहीं, तथा मेरी गति भी इस विषयमे बहुतसी नहीं, तथापि इस विषयको खोजमें एक वर्षसे मेरी रुचि हो गयी । और मैं इस विषयका विचार करता रहा इस समयतक मेरे पास माठसौंसे माधिक मंत्र उपस्थित है, कि जिनमें वैद्यशास्त्र विषयके अद्भुत सिद्धात लिखे हुवे प्रतीत होते है,अन्य भी सैकड़ों मंत्र होंगें जो मैंने न देखे हों अथवा मेरे समझमें न आये हों। यदि कोई विद्वान् वैद्य इन मत्रोंका निरीक्षण करेगा और विचारपूर्वक संगति लगायेगा, तो लोगों के ऊपर बढ़ा भारी उपकार हो सकता है, मैं यथामति इन मोंकी संगति लगा रहा है और इन मंत्रोंके सग्रहको लोगोंके सन्मुख रखनेकी मैं इच्छा कर रहा हू, परंतु कितने समयका यह काम है इसका निश्चय इस समयतक नहीं हुवा है। अस्तु अंतमें इस महान तथा गंभीर विषयकी ओर विद्वान् वैद्योंको अपनी दृष्टि डालनी चाहिये, ऐसी उनकी सविनय नम्र विनति करके मैं इस मल्प निबंधको समाप्त करता हूँ। व्यक्तिमें शाति, राष्ट्रमें शांति, जगत् में शांति ।

“पीपल और पुंसवन" (लेखक-श्री. पं. ध्वजायमजी, वैद्य, पटियाला.) - जिससे सन्तान पुलिंग पैदा हो गर्भका ऐसा संस्कार करना पुंसवन कहलाता है। इस संस्कारका समय गर्भके दूसरे अधिकसे अधिक तीसरे मासतक है। इसके पीछे इस संस्कारका कोई प्रभाव नहीं हो सकता। इसलिये तीसरे महीने के पश्चात् यह संस्कार अनावश्यक है। यह संस्कार केवल उसी गर्भका करना चाहिये जिससे सन्तान पुलिंग अर्थात् पुत्र उत्पन्न करना चाहते हों। जो लोग लडकी पैदा करना चाहते हों उनके लिये यह संस्कार नहीं है। आजकल इस संस्कारको अंधाधुंध बिना किसी विचारके किया जाता है, यह व्यर्थ है। कुछ लोगोंका यह विचार है कि यह संस्कार प्रन्येक अवस्था करना चाहिये चाहे गर्भमें लडका हो या लडकी। क्योंकि इनके विचारमें यह संस्कार एक रस्म है जिसका कि पूरा करना उन्होंने अपना कर्तव्य समझ रख्खा है, इससे अधिक कुछ नहीं । किन्तु "धु-सवन" शब्द ही प्रगट करता है कि इससे सन्तान पुलिंग उत्पन्न हो। इसको छोडकर भी यदि "सामवेद" के मंत्रोंको देखा जाये, तो पता चलता है कि यह संस्कार केवल पुलिंग सन्तानको उत्पन्न करने के लिये है। इन मंत्रोमेंसे एक मंत्रमें ये शब्द पड़े हुए हैं, पुमान् गर्भस्तदोदरे"। अर्थात् गर्भवती खोकी ओर संकेत है कि तेरे पेटमें पुमान् अर्थात् नर बच्चा या पुलिंग बच्चा है। दूसरे मंत्रमें लिखा है कि "पुमांसं पुत्रं विन्दस्य", अर्थात् टू पुलिंग सन्तानको प्राप्त हो । इससे भी यही पाया जाता है कि यह संस्कार केवल उस गर्भका होना चाहिये जिससे कि पुत्र या पुलिग संवान भाभिप्रेत हो। " (३८) - यदि लडकी अभिप्रेत हो तो फिर इन मंत्रोंके पढनेसे क्या लाभ, जिनमें कि पुत्रप्राप्तिकी कामना की गई है। प्रत्येक गर्भमें इन मंत्रोंका पढना अनावश्यक है। क्योंकि प्रत्येक गर्भसे लडकाही पैदा नहीं होता। यदि ये मत्र पढनेपर भी लडकी पैदा हो तो फिर ये मंत्र मनावश्यक ठहरते है। या यदि प्रत्येक गर्भसे लडकेके उत्पन्न होनेकी ही कामना की जाये तो यह सृष्टिनियमके विरद्ध है। क्योंकि संसारमें हडके और लडकियोंकी समान आवश्यकता है यदि संसारमें केवल लडकेही उत्पन हो और लडकिया पैदा न हो तो भी काम नहीं चलता। और यदि केवल लडक्यिा ही पैदा हों और लडके पैदा न हो तो भी संसार स्थिर नहीं रह सकता। जिन स्त्रियोंको केवल कन्याएँ ही पैदा होती हैं या जो लोग किसी थावश्यकताके लिये लड़का पैदा करना चाहते हों, इनके लिये जहां मायुर्वेदके निर्देशके अनुसार गर्भाधान संस्कार करना भरवश्यक है, यहां पुंसवन संस्कार भी इनकोही करना चाहिये । संभव है ऐसे भद्र पुरष जो इस संस्कारको धार्मिक रस्म समझकर प्रत्येक गर्भके लिये करना थानश्यक समझते हों, मेरे इस विचारसे सहमत न हों। परन्तु यतः यह विषय साम्प्रदायिक झगडोंसे पृथक् है मतः किसीके इसके अनुकूल होने या न होनेका इसपर कोई प्रभाव न होगा। पुंसवन संस्कार केवल इसी लिये नहीं कि इससे पूर्व गर्भाधान संस्कार पुत्र होने के नियमोंकी उपेक्षा करके दिया जाये। इसमें संदेह नहीं कि ऐसी अवस्थामै भी जबकि बिना किसी विशेष विचारके गर्भाधान संस्कार किया जा चुका हो, या वीर्यकी कमी तथा रजकी अधिकतासे समय, साथही इन तिथियों में जिनमें समागम करनेसे लडकी उत्पन्न होना लिखा गया है, गभाधान किया गया हो, इस संस्कारसे संतान पुलिंग उत्पन्न हो सकती है। परन्तु यह अधिक उत्तम है कि प्रारंमसेही पुलिंग संततिकी तैय्यारी करके आयुर्वेद के निर्देशकै अनुसार गर्भाधान संस्कार करके समय- पर ही इस संस्कारको किया जाये।

, यह आवश्यक है कि कुछ सजन यह भाक्षेप करें कि जब कि नींव ऐसी डाली गई हो जिससे कि लड़की उत्पन्न हो, उस अवस्थामें पुंसवन संस्कारसे लडकीके स्थानमें लडका से उत्पन्न हो सकता है। अर्थात् गर्भमें महीने या दो महीनेकी लड़की रडके भाकारमें किस प्रकार परिचार्तित की जा सकती है ? इस आक्षेपका इतना उत्तर तो यहां ही दिया जाता है कि यदि ऐसा हो भी कि, स्त्रीपुरुषने जान बूझकर आयुर्वेदके निर्देशके अनुसार लडकी उत्पन्न होनेके नियमोंको पालन करके गर्भाधान किया हो, पुंसवन संस्कारसे लडकीके स्थानमें लडका उत्पन हो सकता है अर्थात् तीन महीनेसे पहिले गर्भमें लडकीका लडका बनाया जा सकता है। किस तरह? इसका उत्तर भागे चलकर दूंगा। अभी यहाँ केवल इस वातपर विचार करना है कि लडके और लड़कीके उत्पन्न होनेमे मुरय नियम क्या है ? अर्थात् कौनसी ऐसी बात है, जो लटका पैदा होनेका कारण है, और कौनसी ऐसी बात है जिससे कि लडकी पैदा होती है। आयुर्वेदके ग्रंथ घतलाते हैं कि यदि गर्भाधानके समय धीर्य अधिक हो तो पुन, यदि रज अधिक हो तो कन्या, और यदि रज पीयं सम हो तो नपुंसक उत्पन्न होता है। भावप्रकाशमें लिया है- आधिपये रेतसः पुत्रः कन्या स्यादातयेऽधिके । नपुंसकं तयोः साम्ये, यथेच्छा परमेश्वरी ॥ (भा.प्र.) भान पीय अधिक होनेसे पुग्न, रज अधिक होनेसे कन्या, रज भार थीर्य समान होनेम नपुंसक, अर्थात् जो न स्त्री हो न पुरप हो। इतना लिपनेपर भी भावमिधने इस सोरके मन्तमें ये शब्द रस दिये ६ कि, "यथेच्छा परमेश्वरी" इसका मभिमाय यह है कि "जैसी परमेश्वरकी इच्छा!!" मार प्रकाशके टीकाकार राला शालिग्रामजी बेश्य इसका यह मर्थ करते हैं कि, "भागे परमेश्वरकीया"| यदि भारमियका यही भाव है जो टीकाकारने म्यक किया है तो इससे विदित होता है, कि 1 - (४०) " इस पर पानी ईश्वरकी इच्छा भावमिश्र यह मानते हुए भी कि "वायांधिक्यसे पुत्र और रजके आधिक्य- से कन्या तथा दोनोंके समान होनेसे नपुंसक होता है' फेर कर ईश्वरकी इच्छाको ही नियम मानते हैं। अर्थात् इनके विचारमें यदि ईश्वरकी इच्छा हो तो इस नियममें भी परिवर्तन हो सकता है। अर्थात् वीर्यके अधिक होनेपर भी कन्याका उत्पन्न हो जाना, रजके अधिक होनेपर भी पुत्रका उत्पन्न हो जाना और रज और वीर्य के समान होनेपर भी नपुंसक उत्पन्न न होकर पुत्र या कन्याका उत्पन्न हो जाना, भायमिश्र- के विचारमें संभव है। "ईश्वरही जैसी इच्छा" ऐसा कहने के स्थानमें भावमिश्र यदि यह बतला जाते कि वीर्य अधिक होनेसे लडकी, रज अधिक होने हुए भी पुत्र और रज और वीर्य समान होते हुए भी लडका या लडकी उत्पन्न होना किसी नियमपर माश्रित है, तो अधिक अच्छा होता । प्रायः देखा जाता है कि जो बात समझमें न माये उसके लिये कह दिया जाता है। भावामेनके ये शब्द भी ऐसेही प्रतीत होते हैं !! असल बात यह है कि रज अधिक होनेपर भी पुत्र, वीर्य अधिक होने पर भी कन्या और रज और वीर्य दोनों समान होनेपर भी पुत्र तथा कन्या उत्पन्न हो सकते हैं । वेद तथा भायुर्वेदका बतलाया हुभा पुंसवन संस्कार, गर्भाधानके समय रज अधिक होनेपर भी लडका पैदा होनेका कारण है। यहां यह प्रश्न उठना भावश्यक है कि यदि पुंसवन संस्कारसे पुन उत्पन्न हो सकता है तो कोई ऐसा भी संस्कार होना चाहिये, कि भायश्य- कता होनेपर जिससे दूसरे या तीसरे महीनेमें गर्भको, चाहे गर्भाधानके समय वीर्य भधिकही क्यों न हो, लडकेके भाकारमें परिवर्तित किया जा सके । इसका उत्तर "हो" में ही दिया जाता है, अर्थात् जहां घेदने पुंसवन संस्कारसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है यह पतलाया है यहां कन्या और नपुंसकको उत्पन्न करने के नियम मी पतला दिये हैं।

(४१) 1 मावमिश्रने उपरोक श्लोक लिखनेके पश्चात् एक प्रश्न उठाया है कि "स्त्रियोंका रज सर्वदा अधिक होता है और धीर्य कम होता है वो पुप्रकी उत्पत्ति किस प्रकार हो सकती है? ( सापही आयुर्वेद बतलाता है) कि स्त्रीका रज चार भाग होता है और पुरपका वीयं एक भाग | जय स्त्रीका रज पुरपके वीर्यसे सवंदा अधिक होता है तो फिर पुत्रकी उत्पत्ति संभव नहीं हो सकती।" प्रभ रचित ही है, परन्तु दुःख है कि भावमिश्रने इसका उत्तर पयोधित नहीं दिया। यदि यह कह दिया जाये कि भावमिश्रजी इस नियमको समझही नहीं सके तो अशुद्ध नहीं है। देखिये भावमिश्रजी इसका क्या उत्तर देते हैं। माप लिखते है कि- "निस्सीम प्रसन्नता होनेसे अथवा दूध भादि वीर्यवर्धक वस्तुभोंसे किसी किसी समय वीर्य बढकर गर्भाशयम मधिक गिरता है। और कभी दुःख भादिसे मन पिगडकर वीर्यको कमीसे चौर्य कम गिरता है। इसी प्रकार रज भी न्यून अधिक हो जाता है। इमीसे ही पुन भौर कन्याकी उत्पत्ति होती है।" मन बहुत दुःखी होता है जय यह ध्यान आता है कि भाव मिश्र जैसे प्रतिष्टित वैद्यने जिनके भागे भाज सहस्रों वैद्य झुकते हैं, और जोकि माजसे सैकड़ों वर्ष पहिले जो समय भायुर्वेदके भाजको अपेक्षा यहुत अधिक समीप था और भारत पर्षमें अच्छे अच्छे वैद्य जिनके समयमें उपस्थित थे, मनुष्यके शरीरकी धुनियाद रज और वीर्यकी कमी और भाधिक्य के सिमान्तको समझने में इनी भाती ठोकर खाई है, तथा च पूर्वपक्षमें स्वयं ही रज सपा वीर्यका चार और एक होना स्वीकार कर लिया है ।!! परंतु यथार्थ यह है कि- 'समानता कई प्रकारकी होती . यथा भारमें मोर भायतनमें । देवदारकी की भोर फौलाद। यदि मायतनमें समान होंगे मर्यात पार चार चषाले पर्ग टुको देवदारती सकदीका तपा फोरादका , (४२) आ यतनमें समान कहला सकते हैं परतु मारमें समान न होंगे और यदि भारमें समान होंगे, मान लीजिये चार चार तोला है, तो जायतन अर्थात् लवाई चौडाई और मोटाई में समान न होंगे। प्राय सृष्टिमें यह पाया जाता है कि एक वस्तु दूसरी वस्तुके यदि भारमें समान है तो आयतनमें भी समान नहीं होती।" भावप्रकाशसे उपरोक्त जिस भाक्षेपमें रज तथा वीर्यका चार और एक हिस्सा होना लिसा गया है। वहा मूर लेखमें चार और एक भजुली है । अर्थात् स्वीका रज चार भजुली और पुरपका वीर्य एक भजुली । यहाँ भारका मान नहीं है प्रत्युत केवल आयतनके विचारसे रज भोर वीर्य चार और एक बताये गये हैं। इसके अतिरित्त एक और प्रकारकी समानता हो सकती है, परपना कीजिए सेरभर आटेकी रोटी बनाने के योग्य गृधनेके लिये तीन छटाक पानीको भावश्यकता है। यद्यपि भाटा और पानी न तो भारमें समान है, न भायतनमें समान हैं और नाही मूत्यमें समान हैं परतु रोटी तैय्यार करने में निज निन भागानुसार समान हैं। यदि पानी कम होगा तो आटा गूधा न जा सकेगा। यदि कठिनतासे गृधा जाये तो रोटी कठिन बनेगी। और यदि इस मानासे अधिक जल डाला जाये तो आटा पता हो जायेगा भार रोटी न पक सकेगी। यदि आटा पतला होगा तो यह अवश्य कहा जायेगा कि इसमें पानी अधिक पद गया है । परनु इसका यह अभिप्राय नहीं है कि पानीकी माया आटेसे अधिक होगई है। प्रत्युत यह समझा जायेगा कि रोटी पकानेके लिये भारेमें जितनी पानीकी थावश्यक्ता थी इससे अधिक डाला गया। दालमें नमक बहुत कम होता है, परतु अपनी मातासे जय अधिक पड जाता है तो यह कहा जाता है कि दाल में नमक अधिक है। परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं होता कि दालमें नमक दारकी मात्रासे अधिक घड गया है। प्रत्युत यही समझा जाता है कि नमक जितना टारना चाहिये या इससे अधिक पढ गया या डाला गया। - - कल्पना कीजिये एक मन दूधको मीठे दही रूपान्तरमें करने के लिये एक तोला दहीकी भावश्यकता है। यदि हम एक तोलेके स्थानमें दो तोरा दही डाल दें तो तैयार होनेवाला दही राष्ट्रा हो जायगा | WE दहीको देखकर पंजाबमें कहा करते है कि इसमें जामन अधिक लग गया है। जामन इस योदेसे दीका नाम है जो दही बनाने के लिये दूध डाला जाता है। दही खा होनेपर यदि कोई यह कह दे कि इसमें जामुन या अम्ल अधिक डाला गया है तो क्या इसके यह अर्थ होंगे कि खटाई दूधक्री मात्रास अधिक डाली गई है ? कदापि नहीं । प्रत्युत प्रत्येक विचारवान यही समझेगा कि सटाई अपनी मावासे या जितनी आवश्यकता भी उससे अधिक शाली गई है। यद्यपि दही जो जामनके लिये दूधमें मीठा दही जमानेके लिये डाला जाता है, भार तथा मायतनादिमें समान नही दोवा। परन्तु जिस उद्देश्यके लिये डाला जाता है उस उद्देश्यको पूरा करने के लिये समान होता है। एक यह समानता है। असल विषयके लिये यह उदाहरण ठीक अनुकूल है। प्रश्नकर्ता भावमिश्रजीसे पूछता है कि जब कि धोका रन चार मंजुली और पुरषका वीर्य शरीरमें सदा एक अंजली होता है तो फिर यह क्योंकर हो सकता है कि कभी कोई लउका पैदा हो। इसलिये कि नियम यह है कि लडका मधिक वीर्यसे उत्पन्न होता है। इवना तो वीर्य चद नहीं सकता कि वीके रजसे अधिक हो जाये, परन्तु संसारमें लडके उत्पन्न होते हैं इसका कारण क्या है। परन्तु भारमिशजीने इस सिद्धान्तको छुआ तक नहीं, केवल यह कह दिया कि सुशीसे भयया पायवर्धक पस्तुगों के प्रयोगसे वीर्य बह जाता है और बड़ा हुआ वीर्य लडकेकी उत्पत्तिका कारण होता है। मसल थात यह है कि गर्भ उदर के लिये गर्भाधान के समय घीका रज यतनमें चार और पुरपका वीर्य नायतनमें एक हो तो यह समान कह (४४) । लाता है। अर्थात् इससे नपुंसक यच्चा पैदा होता है। यदि वीर्य एक हिस्सेसे भायतनमें कुछ बढ जाये और रज चार भाग हो या इससे कुछ कम हो जाये तो लडका और यदि रज मायतनमें चार हिसेसे कुछ यद जाये और वीर्य एकही हिस्सा हो या एक हिस्सेसे भी कुछ कम हो जाये तो लडकी पैदा होगी। परन्तु तीन मासतक अवस्थाएं अनुकूल रहें तो। यह इसलिये लिखा गया है कि दूसरे या तीसरे महीने तक संस्कारसे इसमें परिवर्तन किया जा सकता है । इसी प्रकरणमें भावमिश्रजी लिखते हैं कि “गर्भाशय" के मुखमें तीन नाडियां जिनके नाम " चांद्रमसी, समीरणा और गौरी" है। यदि गर्भाधान के समय वीयं समीरणाके मुँहपर गिरे तो गर्म नहीं रहता। यदि चांदमसीके मुंहपर गिरे तो कन्या होती है और यदि गौरीके मुखपर वीर्य गिरे तो पुग्न पैदा होता है । ( देखिये श्लोक १७, १८) यहां मिश्रजी पहिले सिद्धान्तको भूल गये । अर्थात् यदि वीर्य अधिक हो तो किसी भी माडीके मुँहपर गिरे लडका ही पैदा होना चाहिये । इसी प्रकार यदि रज अधिक हो तो चाहे किसी मार्गसे वीर्य जारे लटकी ही उत्पन्न होनी चाहिये। हां, मिश्रीने यह न बताया कि नपुंसक उत्पन्न होनेका कारण क्या है। अर्थात् वह कौनसी नाडी है जिसके मुंहपर धीर्य गिरनेसे सन्तान नपुंसक उत्पन्न होती है। क्योंकि " समीरणा" के मुंहपर वीर्य व्यर्थ जाता है यह तो उन्होंने बता दिया फिर नपुंसक उत्पन्न होनेके लिये भी कोई न कोई नाडी होनी चाहिये । मिश्रजीने बतलाया कि यह बात चंद्रमौली अर्थात् शिवजीने यतलाई है, भस्तु यह यात किसीको किसीने भी यतलाई हो माननेके योग्य नहीं है। मपि दयानंदने-संस्कार विधिके गांधान-सस्कारमें मनुके प्रमाणसे बतलाया है जो कि मायुर्वेदके ठीक अनुकूल है कि, "जिस दिन स्नीको ऋतु प्रारंभ हो उस दिनसे चार रातें छोटकर यारह रातोंमें ही गर्भाधान - संस्कार करना चाहिये । परंतु ग्यारहवीं और तेहरवीं रात भी गर्भाधान न करना चाहिये। इसके अतिरिक्त इन दिनों पूर्णमासी, अमावास्या, धतुर्दशी और भष्टमी में भी गर्भाधानको आज्ञा नहीं है क्योंकि ये पर्व है। इन दिनों के अतिरिक्त दोष रातोंमें यदि पुत्रकी अभिलापा हो तो अतु मारंम होनेसे छटी, भाठवीं, दसवीं, बारहवीं चौदहवीं और सोलहवीं रातमें, और यदि कन्या उत्पन, करनेकी अभिलाषा हो तो पांचवीं, सातवीं, नवी और पन्द्रहवीं रातमें गर्भाधान संस्कार करना चाहिये । सोलहवीं रातके पीछे गभाशयका मुंह बंद हो जाता है। इसलिये इसके पीछे गर्भाधान नहीं करना चाहिये। यद्यपि भायुर्वेदने बतलाया है कि सोलहवीं रातके पीछे गर्भाशयका मुंह बंद हो जाता है, परंतु यह अन्तिम नियम नहीं है। क्योंकि इस भवधिके पश्चात भी कारण यश गर्भ ठहर सकता है। किस तरह ? इस. पर विवाद करना यहां आवश्यक नहीं है। प्रथम चार सते, ग्यारहवीं भौर नेहरवीं रात इसी तरह पूर्णमासी, अमावास्या, चर्तुदशी, और अष्टमीकी रातको गर्भाधानकी माता क्यों नहीं है, इसपर भी कभी फिर लिया जायेगा। पहां केवल इतना ही यतला देना शायश्यक है कि ऋतु प्रारंभ होनेवाले दिनसे उपरोक्त, छठी मोर माटवी आदि रातोंमें जमपने परिमाण अयात् चार भागमे कम भार पांचों और सातयी भादि राताम अधिक होता है । अतएप पहिली रातमें गर्भाधानसे पुत्र और दूसरी रातोंमें गोधानसे पुनीका उत्पन होना कहा गया है। जिस प्रकार पक्षपर फल मानेका कोई ऋतु होता है इसी प्रकार सीके पात्यती होने के लिप, या गर्भधारण करनेके योग्य होनेके लिये ऋतु या समय निपत है । भात् ऋतु भारंभ होने पत्रात् इसमें भी कुछ राख पुत्र पैदा होने के लिये भौर कुछ सहकीके लिये भनु या ठीक समय कहलाती है, जिनका कि अपर पर्णन किया जा चुका है। .

(४६) । । जिस प्रकार कि कुछ वृक्ष सालमें एकवार, कुछ दूसरे साल और फितनेही सालमें दो वार फल लाते हैं। इसी प्रकार कुछ स्त्रियां प्रतिवर्ष, कुछ दूसरे वर्ष और कुछ तीसरे साल और छठे वर्ष गर्भवती होती है। फितनीही केवल एक लडका उत्पन्न करके फिर गर्भधारण नहीं करती, जिनको काम्पन्ध्या कहते हैं। कितनी ही सारी भायुमें केवल एक मडकी ही उत्पन करती हैं । अनेक स्त्रिये लडकेही पैदा करती हैं, कुछ लडकियां- ही पैदा करती है। कुछ स्त्रिये एक बार पुत्र फिर कन्या एक क्रम पत्र पंदा करती हैं। और कितनीही एक बार लडका और दो चार लडकियां और कितनी एक वार लडकी और दो बार लडके उत्पन्न करती है । कुछ प्रथम वार लडका फिर सब लडकियां और कुछ प्रथम वार लडकी फिर- सब लडकही पैदा करती है। ये सब अभ्यास नियमके रूपमें या तो जन्ममे शरीरके ढाचेही उत्पन्न हो जाते हैं या पीछेसे भाहार और व्यवहार के फारण शरीरमं घरकर जाते हैं ये स्वभाव जन्मकालसे हों अथवा पीछे मादार व्यवहारके कारण उत्पन्न होगये हों। उचित चिकित्सासे दूर होकर सर्वदाफै लिये अथवा आवश्यकता होनेपर किसी विशेप समयके लिये इच्छानुसार बनाये जा सकते है। चंद्रमाके २८ नक्षनॉका सीके रज और धार्यपर भिन्न भिन्न प्रभाव होता है। जिस प्रकार पूर्णमासीको पूरे चांदकी ज्योत्स्नासे समुद्र में ज्वार भाटा अर्थात् उतार और घढार और अमावास्या अर्थात् सर्वथा अंधेरी रातमें अपेक्षा कृत निस्तब्धता होती है। यद्यपि अमावास्याको भी समुद्र में नदियोंके गिरने और हजारों मिल लम्बी लहरोंके कारण उतार दान होता है परन्तु पूर्णमासीसे कम होता है। यद्यपि प्रत्यक्षमें समुदमें पूर्णमा को ही अधिक प्रभार प्रतीत होता है, परंतु प्रत्येक चंद्रमाकी तिथिको इस प्रभावका चढाव उतराव रहता है। इसी प्रकार स्वीके रज और वीर्यपर भी यही प्रभाव होता है।

खियोंके रजके अपने परिमाणसे न्यूनाधिक होनेकी तिथियोंको उपरोक्त छी मार पांचवीं भादि रातोंसे समझा जा सकता है। हा इतना संकेत यहां कर देना आवश्यक है कि चांदकी तिथियों का पुरुपके अण्डकोशापर सिडने और फैलनेके रूपमें प्रभार व्यक्त होता है । जिसके कि समझदार व्यक्ति यतलाने पर यह अनुभव कर सकता है कि इस समय शरीरमें यीयंका चढाप है या उतार । न्यूनता है या भाधिक्य । इस लेसमें इस समयता यह बतलाया जा चुका है कि- (१) गांधागके समय पायका अधिक छोना लडके, रजा अधिक होना लडकी और दोनोंगा समान होना नपुरकके उत्पन्न करनेका कारण है। (२) कुछ तिथियों में स्त्रियोंका रज बढा हुमा होता है और पुछमें (३) त्रियोंके शारीरमें रज यदि भायतनमें चार भाग है तो पुरपोंक शरीरमें पौर्य भायतनमें एक भाग होता है। (४) गर्भाधानके ममय यदि यह परिमाग ठीक दे तो पद्या नपुंसर उपरा होगा। इस मायासे रज यद जाये तो लड़की और यो अपने माग्रामे यह जाये तो लटका उत्परा होता है। (५) यह तय ही हो सकता है जय फि गमाधानमे लेकर तीसरे महीने तक किसी संस्कारसे इसमें परिवर्तन न किया जाये या स्वयमेव इसे परिवर्तित करनेका कोई कारण उत्पस न हो जाय । यहा यह भी पतला देना सायश्यक प्रतीत होता है कि नपुंसक वों में पेशा पिता पिके शापित होनेमे पुस मा समार और चिन्ह आदि पाप जाने भार माता सो पपेशा धन अधिक होनसे पैग भ्वभाव या चिन्ह पापे जाते हैं। पहाता कि बातमे पुरखों मुहर भार मूला विना नहीं होने गौर यहुनमी त्रियों के मुहमा (४८) । दाढी और मूळे होती हैं। बहुतसे पुरुषोंकी बोल चाल जनाना और बहुतसी स्त्रियोंकी चाल ढाल मर्दाना होती है। इसमें मातापिताके रज भौर वीर्यकी न्यूनता और आधिक्य ही कारण है। अब इस पातपर विचार करना चाहिये कि जानबूझके वा बेजाने किसी भी कारणसे गर्भाधान के समय यदि कन्याकी बुनियाद रखी गई हो, तो उसे पुंसवन संस्कारसे पुनके साकारमें किस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है। यह बतलाया जा चुका है कि पुंसवन संस्कार तीसरे महीने तक ही हो सकता है। इसके पश्चात् नहीं। यह क्यों ? इसलिये कि तीन मासतक गर्भ की ही भाकृतिमें होता है। अधिकसे अधिक सामान्य लोथडेका भाकार धारण कर सकता है। पुरुष, स्त्री या नपुंसकके भययय, रूपादि इसमें कुछ भी नहीं होते। चौथे मासके प्रारंभसे अंगोंकी बनावट प्रारंभ होती है और गर्भ पतला अर्थात् खूनके भाकारमें नहीं रहता। प्रत्युत कठिन हो जाता है। इसी लिये आयुर्वेदने चौथे सासके प्रारंभसे पहिले यदि गर्भ जाता रहे तो उसे गर्भस्राय (अर्थान् गर्भका बह जाना) कहा है और चौथे मासके आरंभके पश्चात् यदि गर्भ जाता रहे तो उसे गर्भपात (गर्भ गिरना) कहा है। गर्भस्रार या गर्भका बहना केवल यह शब्दही बतलाया है कि चौथा मास शुरू होनेसे पहिले गर्भ खूनकी भाकृतिमें होता है, क्योंकि सदा पतली वस्तुही यह सकती है, ठोस नहीं । जब गर्भमें घालक जम जाता है या दोस हो जाता है, तब वह भगर किसी कारणसे दूर हो जावे वह इस प्रकार गिरता है जिस प्रकार कि वृक्षपरसे फल टूटकर गिरता है। एक मण दूधमें एक तोला जामन (दूध जमानेके लिये खटाई ) डाला जा चुका है, जिससे कि जमनेपर मीठा दही तैय्यार होगा। मगर दही जमनेसे अधिक समय पूर्वही जब कि दूध अभी पतला ही हो अथवा (४९) , . - हम चाहें तो अधिक खटाई डालकर उसे सट्टा बना सकते हैं। मथवा यदि खटाई अधिक डाली गई हो जिसका परिणाम दहीका खहा तैय्यार होना हो तो खारी वस्तुओंके मिलापसे यदि जमनेसे पहिले पहिले उसे इस योग्य बना सकते हैं कि दही खट्टा न हो, प्रत्युत मीठा हो। कच्चा दूध, दही भादि खटाईके सयोगसे या अधिक गर्मी खाकर यदि फर गया हो परन्तु अभी भागपर न चढाया गया हो तो बेसन (चनेकी दालका माटा) या सरिज भादि स्वल्प मात्रामें मिलाकर खूब दिलाकर भागपर रक्खें तो दूध न फटेगा। कुम्हार परतन धनानेसे पहिले भट्टीको गूधता है जयतक कि मिट्टी भाई है और यह माइति बदल सकती है, तबतक वह एकवार नहीं बार बार इसकी भाकृतियें बदल सकता है। परन्तु जब मिट्टी एकबार ठोस हो जाये, शुष्क हो जाये तो इसकी आकृति परिवर्तन नहीं हो सकती। स्त्रीके गर्भाशयमें कोई सांचा तो होताही नहीं जिसमें कि बच्चा पुन, कन्या वा नपुसकका रूप स्वीकार करता है। प्रत्युत्त यह बात वीर्य व रजकी न्यूनता व अधिकता और पीछेके सस्कारों (प्रभावों) पर निर्भर है। पुत्र, कन्या, नपुसक अपनी इच्छा के अनुकूल उस समय तक तैय्यार किया जा सकता है जबतक कि गर्म जमकर ठोस नहीं हुआ,प्रत्युत पतली और बहनेवाली भाकृतिमें हो। तीसरे मास जबतक गर्भ पतरा तथा बहनेवाला होता है अतएव इसे यथेच्छ रीतिसे किसी विशेष भाकार स्वीकार करनेको बाधित किया जा सकता है। अर्थात् विशेष औषधियों या सस्कारोंसे रज या वीर्य में से किसी एकके प्रभावको कम करके किसी दूसरेके प्रभावको अधिक क्यिा जा सकता है। यह असभव नहीं है। जहांतक भी विचार करें यही बात साधारणतया पाई जाती है। जो बात मनुष्यकी समझमें नहीं आती उसे सृष्टिनियम विरुद्ध कहकर मनको शान्त दी जाती है। भयवा दूसरोंसे पीछा छुड़ाने के लिये यह बात (वै चि) (46) है - अमोघ शस्त्र के रूपमें प्रयुक्त की जाती है। परंतु खोज करते हुए यह कहना ही कठिन हो जाता है कि यह या वह यात सृष्टिनियमके विरुद्ध है। ग्रामोफोनको गाते देखकर एक जंगली भादमी जिसने अचानक प्रथम यारही यह दृश्य देखा हो यह नहीं मानता कि लकडी भी गा सकती है। वह यही विचार करता है कि इसके नीचे कोई भादमी गा रक्षा अन्त में वह इसे मान लेता है कि लकडी भी गा सकती है। यह बात प्रायः सर्वन और प्रत्येक अवस्थामें पाई जाती है। इसमें संदेह नहीं कि हरएक बात जो पर्याप्त खोजके पश्चात् भी संभव सिद्ध न हो असंभव कही जा सकती है। परन्तु सामान्यतः संसारमें यही हो रहा है, कि जो बात जिसकी समझमें नहीं आई वह इसे असंभव और नियमाविरुद्ध कह उठता है हालाँ कि सृष्टिनियम इतना विस्तृत और सीमारहित है कि इसका मनुष्यके मस्तिष्क या समझमें समाना, जो संकुचित और सीमावा. ला है, स्वयं असंभव बात है। तलाश करनेवाले पाते हैं और खोजने. वाले प्राप्त कर लेते हैं, या खोदनेवाले तहतक पहुंच जाते हैं। संसारमें सदा यही होता रहता विषय लंबा हो गया है, अभी पीपल पुंसवन के किस प्रकार काम मा सकता है इसपर कुछ लिखना अवशिष्ट है। परन्तु जितना लिखा गया है यह भावश्यक था। मैं यह लिख चुका हूं कि पुंसवन संस्कार करनेके केवल वही लोग अधिकारी हैं जो लडका उत्पन्न करना चाहते हो। संस्कारके अर्थ कतिपय मंत्रोंको पढकर स्त्रीके शरीरके किसी अंगपर हाथ रख देना या केवल इवन कर छोडना नहीं है। संस्कारके अर्थ "बनाना" या "किसी विशेष बनावट के लिये प्रभाव डालना" है। जो लोग यह पूछे कि क्या इस कृत्यका जो कि इस संस्कारमें किया जाता है कोई प्रभाव नहीं होता ? उनको यह उत्तर दूंगा कि हाँ होता है और भवश्य होता है। यह नहीं हो सकता कि किसी कर्मका कोई प्रभावही न - है ।

। हो। यदि मैं यहां बैठे हुए हायपर हाथ मारकर ताली बजाऊं तो इसका प्रभाव होगा। बिजुली या माझाशके द्वारा एक धार इस सारे मंडलतक पहुंच जायेगा। यहांतक कि संस्कारका एक पत्तातक भी इससे प्रभावित हुए निना न रहेगा। चाहे वह किसी सुदूरतम पर्वतकी गहरी गुफामें ही क्यों न हो। जैसा कर्म होगा उसका वैसाही प्रभाव अवश्य होगा। परन्तु इसके यह अर्थ नहीं कि साधारण कर्मसे असाधारण फल मिल जाये । किसी कामके लिये जबतक कोई तरीका या रास्ता प्रचलित रहता है तबतक इस कामके पूर्ण होनेमें कठिनता नहीं होती और प्रत्येक मनुष्य सुगमतया उसे पूर्ण कर सकता है। परन्तु जब वह तरीका मिट जाये अथवा रास्ता गुम हो जाये और उसे मिटे या गुम हुए शताब्दियां नहीं प्रत्युत सहस्रों वर्ष बीत जायें; इस समय वह काम पूरा होना कितना कठिन होता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। भाज यही अवस्था और बहुतसी बातोंकी तरह, पुंसवन संस्कारकी भी है। अथर्ववेद काण्ड ६, सूक्त ११ का प्रथम मंत्र यह है- शमीमश्वत्थ आरूढस्तन पुंसवनं कृतम् । तद्वै पुत्रस्य चेदनं स्त्रीवा भरामसि ।। ( अथव० ६।११।१ ) इसका भाषार्थ यह है कि "शमी अर्थात् जंडी (पंजाबी नाम है वृक्षका) पर चढा हुमा पीपल पुंसवनका कारण है। यह दो पुत्रको प्रगट या पैदा करनेवाला है, उसे स्त्रियोंमें भरना या प्रविष्ट करना चाहिये।" बहुतसे ऐसे वृक्ष होते हैं जिनपर कौवों या अन्य जीवधारियोंकी विष्टाके द्वारा अथवा किसी और प्रकार किसी दूसरे वृक्षके बीज गिरकर उग आते हैं। लोगोंने प्रायः ऐसे वृक्ष देखें होंगे जो पृथिवीपर नहीं प्रत्युत किसी दूसरे वृक्षपर उत्पन्न हो जाते हैं। प्रायः पीपल ही दूसरे वृक्षापर उगा हुमा पाया जाता है। कोई भी ऐसा वृक्ष हो जो किसी दूसरे वृक्षपर उत्पन्न हुमा हो बन्दा या वन्दा कहाता है। संस्कृत-मापाके अबतक इसके ३७ नाम मालूम हो (५२) सके हैं। इन नामोंमेंसे इसका एक नाम "पुनिणी"है जिसके अर्थ पुत्रवाला या पुत्र देनेवाला होते हैं। "पुत्रिणी" शब्दसे लोग धोखा न खायें। यह देखकर कि इसमें शब्द पुनी भाया है पुत्र नहीं। पुग्नीके अर्थ जहां पुत्री अर्थात् कन्याके होते हैं वहां पुत्रीके अर्थ पुत्रवाला भी होते हैं। जैसे धनवालेको धनी, गुणवालेको गुणी, मानपालेको भानी, अभिमान वालेको अभिमानी, कामपालेको कामी, क्रोधवालेको क्रोध, और लोभ- पालेको लोभी कहते है। इसी तरह पुत्रवालेको पुत्री कहते हैं। पुत्री और पुत्रिणी एक ही अभिप्राय रखते हैं । मायुर्वेदके वर्तमान जितने भी ग्रंथ मिलते हैं उनमें कहीं भी यह नहीं लिखा कि बन्दा या वन्दा पुत्रको देता है, सिवाय इस नामके यह नाम निष्पयोजन नहीं है। इतना संकेत काम करनेके लिये पर्याप्त है। वेद स्पष्ट कहता है और आयुर्वेदमें इसका संकेत उपस्थित है, मार्ग साफ है- अब मैं अपना अनुभूत किया हुमा परीक्षण जो अभीतक रहस्य रूपमें रहा है, प्रगट करता हू जिसके जी में आये वह बेखटके इससे लाभ उठाये। यदि किसीको जंगलमें या प्राम आदि के समीप किसी अंदी (शभी) के वृक्षपर-तनेपर या शाखापर पीपलका छोटा या बडा पौधा उगा हुआ मिल जाये, तो उसे उखाड काट कर ले आना चाहिये। उसे छाया शुष्क करके उसके छिलके पत्तों और यदि कुछ जड भी साथ हो तो जडके छिलकोंको महीन पीसकर कपडछानकर रक्खें। अच्छा तो यही है कि गर्भाधानले पूर्वही प्रात:-काल तथा सायंकाल तीन तीन माशा यदि खुश्की मालूम हो तो दो दो माशा गौके गर्भ दूधके साथ स्त्रीको खिलायें। यह न हो सके तो गर्भाधानके पश्चात् । यदि किसी तरह यह समय भी निकल जाये तो तीसरे मासके प्रारंभमेही सात दिन इसे अवश्य पिलायें, पुन पैदा होगा। यह सरण रहे कि गर्भका काल मालूम करने में भूल रहे। यदि तीन मास कुछ दिन मागे निकल गये होंगे तो इससे अभिप्राय सिद्ध न होगा न - हुए पीपलसे इसे एक और विधिसे भी प्रयुक्त किया जा सकता है। उपर्युक जंडी (शमी ) के वृक्षपर उगे हुए पीपलको काटकर छोटे छोटे टुकडे करलें । जितने ये टुकडे हो उनको गुणा (जैसे सेर टुकडोंको ८ सेर) पानी में भिगो दें। १८ घंटेके पीछे नरम मांचपर उबालें। जब तनि भाग पानी जल जाये तब उतार लें। ठंडा होनेपर कपडेमेसे छानकर दोबारा नरम मांचपर पका । जब शदहकी तरह गाना हो जाये वय उतारकर ठंडा होनेपर किसी चिकने या शीशेके पात्र में डालकर रख छोडे। एक एक रत्ति प्रातः सायं पूर्वोक्त विधिसे सेवन करावें। इसी उदेशके लिये भयर्ववेदमें एक और मंत्र भाया है, वह यह है- पुमान् पुंसः परिजातोऽश्वत्थः खदिरादधि।" (अथर्व० ३.६१) इसका यह अभिप्राय है कि खैर (खदिर) के वृक्षपर चढे पुल्लिंग बच्चा उत्पन्न होता है। खैर कोकरसे मिलता जुलता पेट, इससे करया बनाया जाता है । इसपर चढा हुआ या उगा हुमा यदि पीपलका पेट मिल जाये तो इसे लाकर उपरोक मात्रासही सेवन करमा चाहिए, पुंसवन होगा, अर्थात् सन्तान पुन होगी । यह मंत्र संस्कारविधिमें नहीं है, इससे पहिले मंत्र पाधोंके मुखोंसे कईबार सुना होगा। यदि इन मंत्रीको केवल तोतोंकी वरद कभी कभी पढ़ छोडनाही पर्याप्त न समझा जाकर इनके अभिप्रायको समझनेकी कोशिश की जाया करे तो संसारका कितना कल्याण हो सकता है और वेदोंका मान लोगोंके दिलमें कितना वढ सकता है, इस एक विषयसेही अनुमान लगाईये । जिन लोगों के दिलमें वेदोंके लिये कोई लगन हो उनको पग भागे पाना चाहिये । जवानी जमाखर्च काफी हो चुका, वेदोंकी स्तुतिमें काफी गीत गाये जा चुके । अब घेदोंके गौरवको स्थिर रखनेके लिये वेदोंसे कुछ प्राप्त करके, सांप्रदायिक झगडाकी पर्वाह न करके, तथा देश तथा जातिके संकुचित विचार छोटकर, लोगोंको लाभ पहुंचाना चाहिये।

(५६) - रक्तपित्त, है ! इसका यही उत्तर है कि, हो पहुवसे ऐसे रोग हैं, जिनसे खून पढता है । अपवा खुनका मावश्यकतासे अधिक होना भी एक रोग है, जिस प्रकार कि च का आवश्यकतासे अधिक होना रोग है इत्यादि । बहुवसे रोग हैं जो मनुष्य शरीरमेंसे खूनको पीते हैं, या खूनको गिराते हैं। संस्कृतमें "पायक" भग्निका नाम है, इसके भयं “पवित्र करनेवाला या पीनेवाला" होते हैं । पित्तमें भी अग्नि प्रधान है। आयुर्वेद में उन रोगोंका नाम "रक्तपित्त" है, जिनमें कि किसी प्रकार या किसी मार्गसे शरीरसे खून बाहर निकलता हो । नाक, कान, मांख, मुह, गला, फेफडे, मूत्र या गुदद्वारसे खूनका जाना या शरीरके रोम कूपोंसे रक्तका निकलना कहता है । इस मत्रमें " असन-पावानं " शब्द ठीक रक्तपित्तके अर्थ देता है । भय, यवासीर खूनी, खून के अतिसार, नकसीर जाना, स्त्रियोका रक्त प्रदर, मथवा मनुष्योंका मूत्रमार्गसे खून जाना, यह सब रक्तपितके अन्तर्गत है । येही रोग है, जो खूनको पीते हैं। यही रोग है , जिनमें कि खून पद नहीं सकता । यहाँ केवल संकेत मानसे इस मंत्रका भावार्थ यतला दिया जाता है, भाशा है कि गुणग्राही इस मनसे बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकेगें। यह मंत्र बतलाता है कि भसक्-पावानम् रक्तपित्त रोगको पृश्निपर्णी दूर करती है ! कैसे ? यह घेोका काम है, कि यह परीक्षण करके पता लगावें | मायुर्वेद के नये या पुराने धर्तमान ग्रंथों में एक बाधा छोसका जिन्होंने कि पृष्टपणीको केवल खूनके दस्तोंको ही या छठे महीमेके गर्भपातको दूर करनेवाली लिखा है और किसीने इस घेदमंत्रके भयको सिद्ध नहीं किया। यह भावश्यक भी नहीं है, जिन बातोंको वर्तमान बायुर्वेदिक ग्रंथों में न लिखा हो. वेदों में भी उनका वर्णन न हो; यदि हम यत्न करें और परिश्रम करें, तो इस समय भी वेदों. के सहारे वर्तमान-पायुर्वेदिक प्रेयोंसे अधिक पसा प तयार कर सकते हैं । परंतु यह किसी एक व्यक्ति के करनेका काम नहीं, बहुत बयों या पंडित-वैद्योंकी मिली हुई शकिसे हो सकता है। अब केवल वे योग लिखे " या (५) आते हैं मथवा पूभिपीके उपयोग की विधि लिखी जाती है जिससे कि "अमृक्-पावा" या स्फपित्त रोग दूर हो सकता है। (२) प्रभिपीको पानी में पीसकर लेपकर दीजिए और छ: मासे पृमिपर्णीको पानी में घोटकर सापप्रात पिलायें, नकसीरका जाना बंद हो जायगा, चाई कितनी ही देरसे हो। (२) अनुपानके कारण भीषधिको शकि प्राय पाया करती है और अनुपानसे भौषध शीघ्र प्रभावकारी हो जाया करती है। इसलिये यहा भिन्न भिन्न रोगों के लिये पृष्टपर्णीका अनुपान भो लिख दिया जाता है। छ माशे पृशिपर्णी, एक माशा काली मिरचके साथ प्रात:साय पानीमें पीसकर पिलाये, बवासीरका जावा हुभा खून रुक जायगा और कोई कष्ट न होगा, कुछ काल के पश्चात् षवासोर खूनी जइसे हो जावेगी। पह दवाई प्रत्येक में प्रयोग की जा सकती है, आवश्यक पथ्य अनिवार्य है। । (३) पृभिपी ६ माशा, घासाके पत्ते ६ माशा, पानीमें रगटकर प्रात और साय पिलाईये, गलेसे खून आना, यक्ष्मा, दूर हो जायेगा, खुनकी बमन माती हो, तो भी इससे लाभ होगा, सस्तसे सख्त बुखार, खासीमें यह दवाई रामवाणका काम करेगी। यक्ष्माके निराश रोगियों- को भी एक बार इस मौषधि प्रयोगसे लाभ उठाना चाहिये । (७) भिपणी माशा+वासापत्र मागा+काली मिाच रमाशा, मात: सायकाल पानी में रहकर पिलानेसे स्त्रियों का एक प्रदर, तथा अन्य रजोविकार दूर हो जाते हैं। (५) पुरुषों के प्रवासे जाता हुआ रक भी छ, माशे पृभिपणीको दिन में तीन बार पानी में पीसकर पिलानेसे दूर हो जाता है। (१) पृभिपणी ६ माशा + विलगिरी ३ माशा, प्रात. सायं पानी में रगाहकर पिलाये, यो खूनके दस और खूनी समहणी बंद हो जाण है।

() और भी किसी तरह शरीरसे खून जाता हो तो केवल पृष्टपर्णी-- को पानी में रगडकर पिलानेसे बंद हो जाता है। मत समझिये कि किसी दूसरी यस्तुके साथ मिलकर ही पृष्टपर्णी उपरोक या इसी प्रकारके अन्य रोगोंको लाम पहुंचाती है। प्रत्युत अकेली पृष्टपर्णी भी वही काम दे सकती है जैसा कि इस मंत्रमें लिखा है। इस वेदमंत्रमें लिखा है, कि पृष्टपर्णी इन रोगोंको भी दूर करती है जो कि मनुष्य शरीरको यढनेसे रोकते हों, यों तो ऐसा बहुतसे रोग है जो मनुष्य शरीर बढने नहीं देते ! परंतु यहां उन सबका वर्णन और उन सयका पृष्टीपीके द्वारा इलाज लिखना कठिन है, इसलिये साधारण रीतिपर इन रोगोंका वर्णन कर देनाही पर्याप्त मालूम होता है जिनसे कि मनुष्य शरीर बढनेसे रुक जाता है । वैद्यलोग इससेही बहुत कुछ लाम उठा सकेगें । बच्चोंका सूखना, बच्चा पैदा होनेके पश्चात् पहिला रोग है और बहा रोग है जो यच्चोंको बढने नहीं देता और कि मनगिनत बच्चों- को मृत्युके मुहमें ले जाता है । पृष्टीपर्णी बोंके इस रोगको दूर करती है । बच्चोंको और बच्चोंको दूध पिलानेवाली स्त्रीको पृष्टीपीका उचित मात्रामें प्रयोग करना चाहिए। तथा च- यदि किसीका अग्नि मंद होगया हो, भूख कम लगती हो, पा खाई हुई सामग्री पूरी न पचकर शरीरका भाग न बनती हो, या भोजनका रस न बनता हो, तो शरीर नहीं पढ सकता। ऐसे किसने रोग है, जिनमें मनुप्यकी पाचनशक्तिकी ऐसी दशा हो जाती है, इन सबको मालम करनेके पथात् उन सबमें ही पृटपर्णीका प्रयोग करा, अग्नि प्रवाल होगा, भूख खूब लगेगी, खाया हुमा भोजन पचन होकर शरीरका भाग बन जायेगा। या शरीर मोटा ताजा होता जायेगा । शरीरमें साये हुये भोजनमे रस खूप बन रहा है, परंतु रससे खून धनानेवाळे अवयव जिगर भार तिल्ली आदि खार हो, खून अच्छी तरह न बनता हो, तो शरीर भी बढन सकेगा। ऐसी दशा में भी पृष्टपर्णी लाभप्रद सिद्ध होगी। जिगर और विल्लीकी दुकता दूर कर देगी।

जिससे शरीरकी आवश्यकतानुसार खून पर्याप्त उत्पन्न होगा। सूनसे मांस न बनता हो, मांससे घरपी न बनती हो, चाबीसे हड्डी न बनती हो, हहीसे मजा न घनती हो और मनासे वीर्य न बनता हो, तब भी आप पृष्टपर्णी ही का सेवन कीजिए । पृष्टपण! इन सब कष्टोंको निवृत्त कर देगी। पृष्टपर्णी घीयको पढानेवाली पस्नु है। जो लोग वीर्यको किसी प्रकार भी नाश कर नपुंसक हो बैठे हों, उनको पृष्टपर्णीकी शरणमें माना चाहिये। पृष्टपणका अनवरत सेवन उनको वीर्यवान बनावंगा इसपर और भी बहुत कुछ लिया जा सकता है, परंतु इसे ही पर्याप्त समझना चाहिये। घेदमंत्र पतलाता है, जो रोग गर्भको खानेवाले हो, पृष्टपर्णी इनको सूर कर देती है। कितने ही कारण हैं, जिनसे गर्भ पाया जाता है या गर्भनाय या गर्भपात हो जाता है। यदि किसी समय गर्भस्राव या गर्भपातका भय हो और ऐसे लक्षण दिखाई देते हों, जिनसे कि गर्भका खमकी रूपमें यह जाना या गिर जाना पाया जाता हो, सव स्त्रीको पृष्ट पो पानीमें पीसकर थोडी थोडी देर पीछे पिलाईये । भौर पृष्टपर्णी. का पानी में पीसकर पेट भार मसानेपर लेप कीजिये । माई हुई माफत टक लायगी। यदि सदा किसी प्रीका गर्भ गिर जाता हो उसे उस समय जयकी गर्भ म ठहरा हो पृष्टपर्णीका लगातार प्रयोग कीजिये । इससे जब मी गर्भ ठहरेगा तब गर्म न गिरेगा। गर्भको अवस्थामें भी इसका उपयोग कराते रहना चाहिये। सी पनया हो, को भी उसे पृष्टपर्णीका सेषन काईये । कुछ काठमें गर्भको रोकनेवाली खराबी दूर हो जायगी। छरका होगापा की इसपर विवाद कानेकी मावश्यकता नहीं देषठ यह लिसमा पर्याप्त है कि पृष्टपणी पध्यापनको दूर करती है। वेदताता है कि जो रोग गर्भको पका रसता हो, प्रहण करता हो, इसे भी पृष्टपणी दूर करती है । वह कौनसा रोग जो गर्भको पकर रखता है। हम देखते है तिमी गर्भवती स्त्रियों को, कारण पार महीने दो महीने के पीछे न्यून माना-मारंम हो जाता है। टीक इसी प्रकार जिस तरह कि मासा, पपि इस गर्म गिरता नहीं, परंतु गर्भ धामी . - । (६०) महीं सकता। एक दो महिने यह रफ बंद हो जाता है। भोर गर्भका बालक कुछ चढता है। फिर रक्त बहना प्रारंभ होकर यच्चेकी गर्भमें उअति रुक जाती है । इसी प्रकार कभी रक्त प्रारंम होकर, कभी घद होफर दो दो धार चार घरसतक यच्चा गर्भ ही में रहता है, इसका नाम है गर्भका पकडा जाना । इस घेद मंत्रमें “ गर्माद " शब्द है । इसके अर्थ है गर्भको सावाला, या गर्भको गिरानेवाला और गर्भको पकडने या ग्रहण करनेवाला। यह वो लिखा जा चुका है कि पृश्निपणी गर्भको गिरनेसे रोकती है। जहां पृभिपर्णी गर्भ गिरनेसे रोकती है वहां पृश्निपर्णी पकड़े हुए गर्भको छुड़ा देती है। अर्थात् इसके उपयोगसे गर्भके दिनों में मासिक रकका जारी होना बंद होकर, समयपर या यदि समयके पीछे पृश्निपर्णीका प्रयोग किया जाये, तय भी पधा सर्वसंपूर्णाग उत्पन्न हो जाता है। बच्चा उत्पक्ष होने के समय स्त्रीको कष्ट अधिक हो और बच्चा पैदा न होता हो, उसे भी "गर्भाद रोग" कह सकते हैं, ऐसी अवस्थामें पृश्निपर्णीका प्रयोग करनेसे भर्थात् घाँके साथ खिलानेसे या गर्मपानी में उबालकर पिलानेसे पानी में पीसकर पेटपर लेप करने और पृभिपर्णीकी जोंको कमरमें बांधनेसे, या पृश्निपर्णीको जलाकर इसकी धूनी देनेसे बच्चा शोध और बिना कष्ट उत्पन हो जाता है। यदि बच्चा गर्भमें उलटकर याहिर निकलनेके अयोग्य हो गया हो, तम भी पृभिपाणके प्रयोगसे वरचा ठीक तरह उप्तन्न हो जायेगा । गर्भ में घरचा मर गया हो और मल लगानेपर भी पद्या पाहिर न माता हो तर भी पृभिपीके उपयोगसे पच्चा बाहिर आ जायगा। और स्त्रीको मृत बच्चे के कारण कोई कष्ट न होगा। यदि हम इस मंत्रपर कुछ देर और विचार करें, तो संभव है, इससे भी मधिक भलाम हो सके और यह मालम हो जाये, कि सिवाय इसके गर्माद और किन किन रोगोंका नाम हो सकता है। जिनको कि पृश्निपर्णी दर करती है । धातुक्षय हो या क्षयरोग हो, जो कि शारीरिक वृद्धि रोकने- में 'परताज रोग है, पृभिपीके सेवन करनेसे दूर हो जाता है। पृश्निपणकि प्रयोगले दुवळ पतले, भौर निवल शरीर मौर माविक बलवान हो जाते है। A इन्द्र और नमुचि (लेखक- पं. ध्वजारामजी आर्य, वैद्य-पटियाला) - " अपां फेनेन नमुः शिर इन्द्रोदवर्तयः । विश्वा यदजयः स्पृधः" ॥ ऋग् मंडल ८ सूक्त १४, मंन १३॥ यजु. अध्याय १९, मंत्र, .. सामवेद पूर्वार्षिक प्रपाठक ३, दशती २, मंत्र ८ (२१२१॥मययं. काण्ट२०, सून २९, मंत्र ३) इसका शब्दार्थ यह है कि- "हे इन्द्र । भपा फेनके साथ नमुचिका सिर स्थल दे। या मरोट दे, या सलग कर दे और निरोधको जीता "नमुचि" कौन है जिसका सिर कुचलने के लिये इन्द्रसे प्रार्थना या निवेदन किया गया है, या इन्द्रको कहा गया है। इन्द्र कौन है ? या क्या धोन? "अयां फेन" कौनसा हथियार है, जिसके साथ फि इन्द्र नमुचि- का सिर कुचल या काट सकता है। पद मंय मी जो कि उपर दिया गया है, भायुर्वेदसेही संबंध रखता है। परंतु समय फेरसे, दूसरे यहुतसे चंदमंत्रोंकी सरह, इसके गले में मी व्यर्थ कदानियों का मुर्दा साप पर गया। जबतक कि इस पयको इसके गलेसे निकाल कर परे नहीं फेंक दिया जाता, तपतक इस मंत्रकी उम्पल भार पपिन मूर्तिक मासात् दर्शन असंभव है। इसलिये पुछ कालके लिये कपा कहानियोंको मुहार भारदार्थसही मायायको जानने का पान करें। मगुधि" भी रोग या यीमारी है, जिनेन्द्र को दूर करता है। मारह मादित्यान पूर्पका एक नाम "र" है भार यही नाम पड़ा भी माना (६) - है। "हरि" इन्द्रका भी नाम है और सूर्यका भी । "दिवस्पति" इन्द्र-- का भी नाम है और सूर्यका भी है । देखिए शब्दकल्पद्रुम भादि संस्कृतके कोष । "शब्दस्तोम महानिधि" के पृष्ठ ६८० पर इन्द्र सूर्यका भी नाम है । निरक्त ( निघण्टु ) अध्याय ५, खण्ड ४ में सविता जो सूर्यको नाम है वही इन्द्रके लिये भाया है । अथर्ववेद काण्ड १३, सूक्त ३, मंन १३ मे । लिखा है कि- "स धरुण सायमग्निर्भवति । स मित्रो भवति प्रातरुद्यन् । स सविता भूत्वाऽन्तरिक्षेण याति। स इन्द्रो भूत्वा तपति मध्यतो दिवम्"॥ (अथर्व.१३।३।१३) मर्थात् वह करण सायकाल भाग्नि होता है और प्रात काल उदय होता हुआ मित्र होता है। वह भाकाशमें सविता बोकर चलता है और इन्द्र होकर धुलोकमें तपता है, या दिनके मध्य में या दोपहरके समय । यहा स्पष्टरीतिसे दोपहरके सूर्यका नाम "इन्द्र" लिखा है । जिस प्रकार एक मनुष्यको आयुकी दृष्टिसे बच्चा, जवान और चूढा कह सकते हैं और कहा जाता है, इसी प्रकार "सूर्य भी भित्र भिन्न समयों में अग्नि, मित्र, सविता और इन्द्र कहलाता है।" इन्द्र नाम सूर्यका भी है, इसके लिये अधिक प्रमाणों की आवश्यकता नहीं क्योंकि वेदके माननेवारोंमें वेदसे बढकर और क्या प्रमाण हो सकता । सूर्यके जहां और बहुतसे नाम हैं वहां "मर्क" भी सूर्यका एक नाम है। जहां मर्क' सूर्यका एक नाम है, यहां भाकको भी 'म' कहते है । माक पंजाबमें महशूर पौधा है। भाको संस्कृतभाषामें ये नाम भी है, अर्थात् 'अर्क' भास्कर, विवस्वान, अर्यमा, महपति, उष्णरश्मि, भानु, प्रभाकर, विभाकर, विमारसु, सप्ताश्व, सविता और रवि आदि। "ये सय नाम ही सूर्यके हैं।

आयुर्वेद में नाक और सूर्य एकही नाममें आये हैं । जो नाम सूर्यके हैं वे सब भाकके भी हैं । आरु और सूर्यमें मित्रता मी है। अर्यात-तेज गरमी- के दिनों में जबकी धूपमें धरती परनंगा पैर रखना कठिन होता है, धरती और आकाश गरमीकी शकल ( रूप ) धारण करते हैं, गरम और वन्दि- सदश रेतमें आके पौधे होभरे और दूध या रससे भरे हुए तथा सांग संपूर्ण होते हैं । फल, फूल, पत्ते, पासा, और जड ये सारे भंग रसदार होते हैं। चाके आरंभही भाऊ जलना, भुरझाना और शुष्क होना प्रारंभ हो जाता है । परसात के दिनों में आम बेजान (निष्माण) हो जाता है। किमी हिन्दीके कतिने कहा है कि थाक. जघांसा बकरा चोथा गाडीचान ज्यों ज्यों बरसे मेघला, त्या त्या त्यजे प्राण !!" अर्थात् 'भार, जांसा (धमास), करा, तथा यैलगाडीवाला इन चारोंकी यह विशेषता होती है कि, ज्यों ज्यों मेघ परसता है त्यों रयों भागको छोड़ते हैं।" जयामा भी प्रसिद्ध पौधा है, वह भी तेज गरमीमें फलता और फूलता है, बकरी तेज गरमी ही खुश रहती है और सूर्य दूध देती है। कहा जाता है कि ज्यों ज्यों बकरीके खूर तपते हैं, क्यों त्यों इसका दूध पढता है,वांके भातेही पारियोंका दूधमी शुक हो जाता है। आफ और सूर्यका संबंध है। गरमीसे भाक फलता और फूलता सांग संपूर्ण या रसदार होता है । सविता इन्दका नाम है, सविता सूर्यका नाम है भार सरिता का नाम है "माफ और इन्द्र एक ही अर्थ देने- पाले हैं।" उपरोक्त घेदमंत्रमें पाये हुए "इन्द्र" पदके अर्थ "या" करने के पक्षात् प६ मालम करना भी आवश्यक है कि "भपा फेन" क्या वस्तु जिसके साथ इन्द नमुचिका सिर काटता है। "मपां फेन" का अभिप्राय समझने के लिये अधिक सगरमें पहनेकी मापश्यकता नहीं, दमा प्रमिद नाम है "समुद्र-साग" स्पर्धशी कया - (६४) कहानियोंके भावरण उतारकर उपरोक्त वेदमनका यह भर्य किया जा सकता है। कि- माक समुद्रझागके साथ नमुचिका सिर कुचलता है या दूर करता - । नमुचि क्या पदार्थ है । भय केवल यह देखना अवशिष्ट है । संस्कृतके कोषोंमें नमुचि एक असुरका नाम लिखा हुआ मिलता है, जिसको इन्द्र नामी देवों के राजाने मारा था। इससे अधिक और कुछ पता नहीं चलता । नमुचिका शब्दार्थ क्या है, यह किसीने नहीं बताया। क्योंकि इस शब्दके सामने मातेही सबसे पहिले राक्षसकी ओर ध्यान जाता है। नमुचिके दो अर्थ होते हैं। (दो केवल इसी लिये कहा गया है कि, इस समयतक कोई तीसरा अर्थ विदित नहीं हो सका है। संभव है कि इसके और भी कई मर्थ हो सकते हो।)न-मुधि" इसके दो अर्थ एकही मभिप्रायके देनेवाले होते है। एक "न मुञ्चति" अर्थात् जो नहीं छोड़ता उसे “नमुचि" कहते हैं, दूसरे "न मुच्यते" जो छूटता नहीं वह भी "नमुचि"कहराता है । अर्थात् नमुचिका यह अर्थ हुमा “जो नहीं छोडता" और "जो नहीं छूटवा"। इन दोनों बातोंका एक ही अभिप्राय है कि जो दूर न हो सके, वह नमुचि है इस भर्थसे यह पता नहीं गता, कि वह कौनसी बीमारी है। जो दूर नहीं हो सकती। और कि जिसका नाम नमुचि है। वर्तमत्त भायुर्वेदिक ग्रंथों में किसी भी बीमारीका नाम नमुचि नहीं पाया जाता। हां ऐसे पहुससे रोग हैं, जो रोगीको नहीं छोडते, या रोगीसे नहीं छूटते, उन सबको नमुचि कह सकते हैं। अर्थात् मायुर्वेदके । वर्तमान प्रभों में जिन रोगोंको असाध्य कहा गया है, उन सबका नाम "नमुचि रखा जा सकता है। परतु इसपर एक अत्यन्त मुरय आक्षेप हो सकता है, वह यह कि यदि नमुचि उन रोगों का नाम है, जोमसाध्य है, तो पिर माक और समुहागसे भी क्य । कर दूर हो सकते हैं। यदि यह मा और समुद्रसागसे दूर हो जाये, तो फिर इनको नमुचि या असाध्य नहीं कहा जा सकता । यह आक्षेप न केवल इसी स्थानपर हो सकता है, प्रत्युत भायुर्वेदमें बतलाये हुए बहुतसे रोगोंकी चिकित्सापर भी हो सकता है। जहां एक ओर तो किसी रोगको असाध्य बताया है दूसरी ओर उसकी चिकित्सा भी लिख दी है। इसका यह अभिप्राय भी हो सकता है कि, संसारमें कोई रोग मसाध्य नहीं ! हा. बहुतमे रोग साधारणतया असाध्य कहलाते हैं । या सामान्यतया वास्तवमें वे असाध्य होते हैं । परंतु विशेष रूपसे उनकी भी चिकित्मा हो सकती है। जिस सीमातक उनकी चिकित्सा नहीं हो सकती उस सीमातक उनको असाध्य या "नमुचि" कह सकते हैं । दृष्टान्तके लिये “मधुमेह" का नाम लिया जा सकता है। एक ओर तो इसे असाध्य कहा गया है, दूसरी ओर इसकी चिकित्सा बताई गई है, यह कहकर कि दवाईसे यह रोग दूर हो जाता है। इन दोनों बातोंमें धरती और आकाश- का अन्तर है । बस इस आक्षेपका-जो न केवल इस मंत्रपर भी किया जा सकता है, प्रत्युत आयुर्वेदिक बहुत ग्रंथोंपर भी हो सकता है कि रोग असाध्य या नमुचि है तो इसका किसी भी दवाई और चिकित्सासे दूर होना संभव नहीं और कि यदि रोग दूर हो सकता है, तो उसको नमुचि न्या असाध्य नहीं कह सकते यही उत्तर हो सकता है, कि वायुर्वेद या वेद- की परिभाषा नमुचि या असाध्य उसी रोगको कहा जाता है जो कि सामान्यतया अधिकित्स्य हो, जो रोग सामान्यतया अचिकित्स्य होते हैं। "इन्द्र" अर्थात् माक समुद्रझागके साथ क्या इन सब रोगोंको दूर कर सकता है कि जिनको असाध्य कहा गया है, या सामान्यतया भचिकिरस्य कहा गया है। इसका उत्तर वेदपर विश्वास रखते हुए यह दिया जा सकता है, कि हां आक और समुद्रमार (समुद्रफेन) से वह सब रोग दूर हो जाते हैं जिनको कि सामान्यतया अपाध्य माना जा सकता है। यद्यपि अपनी अल्पशनि और निर्यलताके कारण यह न बतलाया जा सकता हो, ५ (पै. चि.) + (६६) या , कि किस किस रोग किस किस तरह इन दोनों वस्तुओका उपयोग करनेसे लाभ होता है। उपर यह बतलाया जा चुका है कि नमुचिके दो अर्थ होते हैं । उनसे एक यह बतलाया गया है कि, जो रोग नहीं छोडता या नहीं छूटता; दूर नहीं होता या सामान्यतया असाध्य या मचिकित्स्थ है उसे नमुचि कहते हैं। दूसरे नमुचि "नम्-उचि" के अर्थ हैं नीचा और उंचा। क्या नीचा और उंचा या नीचा या उंचा भी कोई एक बीमारी है ? मानव शरीरमे बहुतसे ऐसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं जो नीचे होते हैं और उंचे होते है और पेमे भी रोग होते हैं जो नीचे और उंचे दोना। प्रकार के होते हैं। शरीरके किसी भागमा क्षपनी वास्तविक दशासे नीचा या उंचा हो जाना भी नमुचि कहलाता है। रसौली शरीरकी वास्तविक तरहसे ऊची होती है पाक इसे दूर करता है । पवासीरके मस्से शरीरकी वास्तविक मासे ऊंचे होते है, भगंदरका फोडा शरीरसे ऊचा या उभरा हुझा होता है। इसकी गहराई होती है। गहरेपे गहरे वण भौर नाढी वण ( नासूर ) ऊंचेसे ऊंचे फोटे और मस्से. कण्ठमाला या गण्डमाला, कोठ, सूजन आदि गेग नमुचि होते है। उपरोक्त वेदमंत्रमे एक शबद 'उदयर्तयः" भी है, जिसका अर्ध कुचरना, मरोढना या भलग करना भी है। कोपमें इस सदर भर्थ बहुतसे हैं। तथा प्रकाश करना (फैलाना ), विभाग वरना, टुकडे करना, सोहना, फोडना भादि, प्रस्ट करना, ऊंचा करना, सींचना, यरवान करना. बाधना, रोकना, छोडना, आदि, इन सय भयाको सामने रखते हुए इस वेदमनका यह भभिप्राय हो सरला है कि- "भाक समुदफन (समुद्रझाग) के माय उपरोक नमुचि फहरानेवाले रोगोमो, यदि दवे हुए हाँ, दृश्य न हो तो प्रशशित करया है। यदि फैलानेकी भावश्यकता हो नो फगता है, फोहता है,यदि प्रण गहरे हो (६७) . तो मरता है या ऊंचा करता है, यदि पीप आदि अंदर हो तो बाहिरकी भोर खींचता है। यदि किसी भंगमें निर्मलता या मशक्ति हो, तो उसे दूर करता है। यदि रोग संसर्गजन्य अर्थात् एकसे दूसरेमें आनेवाला हो तो उसे भी रोकता है, भादि। "उद्वर्त्तयः" से मिलता जुलता शब्द "उद्वर्तन" है जिसका बिगडकर उबटन' बना है। इसके अर्थ भी मिलनेके हैं, इस शब्दका बिगडकर "बटना" बन गया है। इसका अभिप्राय मदोडना या बल देना भी होते हैं, किसी घास या छिलकेके रेशे (तन्तु ) को मदोडकर रस्सी बनानेको 'घटना' कहते हैं । हाथ या उगलियोंसे किसी दवाईको मदोडकर गोली बनाते हैं संस्कृतमें उसे 'बटी' या 'वटिका" कहते है। इसका भी मि प्राय यह है अर्थात जो यहकर या मदोदकर बनाई गई हो वह घटी घटीसे बडी बन गया । बडियां महशूर है। उदढकी दालसे पेठा आदि ढालकर प्रायः अपने घरों में बनाई जाती है । "उद्वत्तयः" का अभिप्राय इसीलिये मदोदना या कुचलना किया गया है। किसीके सरतले सख्त फोडा हो, बद हो, या गिल्टी हो, भगन्दर हो या बवासीरके मस्स हों, रसौली हो या कण्ठमाला हो, माक और समुद्रशागके लगानेसे फूट जाते हैं। या कुचले जाते हैं। यदि घाव या नासूर गहरे हों तो भर जाने हैं, समान हो जाते हैं। इन सब रोगोंमे जो नमुचि शब्दके अन्दर मा सकते हैं पाक और समुद्रझाराका आन्तरिक तथा बाह्य रीतिपर प्रयोग किया जा सकता है। इनके खानसे कुष्ठ, भगन्दर, गण्डमाला, मशं, बद, श्लोपद. फोडे, नासूर, सूजन, दाद, चम्बल मादि बहुतसे रोग दूर हो जाते हैं। विस्तारमें जानेकी भावश्यकता नहीं। चिकित्सकगण ! इस खुले संकेतको पाकर पर्याप्त लाभ उठा सकते है यदि समय मिला नो इस विषयपर इससे भी अधिक लिखा जा सकता - . ।

(सिमाः) सिध्मल रोगोंको (करुमाः) करनेवाले (ये)जो (गर्दभना- दिनः) गधे सरीखा शब्द करनेवाले (सायं ) सायंकाल के समय (शाला) गोशाला, भोजन शाला, पाक शाला, आदि शालाओं में (परिनृत्यन्ति) नाचा करते हैं, (तान् ) उन सघ । विपूचीनान् ) उढकर लगनेवाले, रोगोंको लानेवाले, सब दुष्ट जन्तुओंको (भोषधे ) हे ओषधे ! (त्वम्) ५ (गन्धेन ) अपने सुगंधसे (विनाशय) नष्ट कर ॥ वेदकी कैसी उत्तम शैली है, जिसे विचारशील देखते ही उसकी महत्ताको समझेंगे। कैसे स्पष्ट भौर सार्थक विशेषणोंसे उक्त मंत्री विषय- को स्पष्ट करनेकी कोशिस की गई है। अब देखना केवल यद है कि, उपरोक्त विशेषण युक्त उडनेवाले और रोगोंको करनेवाले कौन हैं। यदि सूक्ष्म वीक्षण यंत्र (खुर्दवान ) से देखा जाये तो रोगोत्पादक जन्तु - कोंमें कुछ ऐसे प्राणो हैं, जिनके पंजे पीछेको ओर (पाणी ) एंडी भागेको और पेट निकला हुआ, मुखं सामनेको परंतु न अत्यन्त स्थूल जो दृष्टिस गोचर हो सके, ऐसे होते हैं और यह भी निश्चित है और सय ही जानते हैं कि सूर्यास्तके समय सायंकाल के समय अत्यधिक संख्यामें भोजन शाला या गोशाला या अन्य ऐसे ही शालाओके मासपास कान लगाकर ध्यानसे सुना जावे, तो विचित्र शब्द करते हुए ये ही नाचते हैं। वेद इन छोटे परंतु भयंकर जन्तुओं से बचने के लिए औषधी बतलाते हुए उपदेश करते हैं कि, इन्हे लोबान, गुग्गुल आदि औषधियांकी गन्धमे नष्ट करो जिससे आप लोग सुखी हो सके। .

(७२) । हृदय-रोग तथा कामिला-रोगकी चिकित्सा। [ऋषि -ग्रझा । देवता-सूर्यः, हरिमा, हद्रोगः ] अनु सूर्यमुदयतां हृयोतो हारमा च ते गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मास ॥१॥ परि त्वा रोहितैर्वर्गदर्धायुत्वाय दध्मसि । यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत् ॥२॥ या रोहिणीदेचत्या३ गावो या उत रोहिणी। रूपंरूपं घयोवयस्ताभिष्ट्वा परि दध्मासि ॥ ३ ॥ शुकेपु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि । अथो हारिद्रयेपु ते हरिमाण नि दध्मसि ॥ ४ ॥ (अथर्व ॥२२॥१-४) अर्थ- (ते हृद् द्योतः च हरिमा) तेरा हृदयका जलन और पालापन (सूर्य भनु उदयताम् ) सूर्यके पीछे चला जाये । गोके अथवा सूर्यके (रोहितस्य तेन वर्णन ) उस लाल रंगसे ( स्वा परि दध्मसि ) तुझे सब प्रकारसे हृष्टपुष्ट करते हैं ॥ (रोहितैः वर्ण ) लाल रंगामे (त्वा ) तुझको (दीर्घायुस्याय परि दध्मसि ) दीर्घ आयुके लिये घेरते हैं । ( यथा) जिससे (अयं) यह (भरपा असत् ) नीरोग हो जाय और (भ-हरित्ता भुक्त) पीलक रोगसे मुक्त हो जाय ॥२॥ (थाः देवत्या रोहिणीः गावः) जो दिष्य लालरंगकी गोवें है (उत या रोहिणीः) और जो लाल रंगकी किरण है (ताभिः) उनसे (रूप-रूपं ) सुंदरता और (वय. ययः ) बालके अनुसार (स्या परि दध्मसि ) तुम्हें घेरते है ॥३॥ (से हरिमाणं) तेरे पालक रोगको (सुकेपु रोपणाकासु च ) तोते और पौधोंके रंगों में (दमसि) धारण करते है ।(भयो) भौर (हरिमाणं!) तेरा फीकापन इम (हारवेषु ) हरी वनस्पतियोंमें (निद ममि ) रख देते हैं ॥५॥ - (७१) भावार्थ- तेरा हृदयरोग और पीलक रोग स्यं किरणों के साथ संबंध करनेसे चला जायगा। लाल रंगको गौवें और सूर्यको लाल किरणें होती हैं, इनके द्वारा नारोगता हो सकती है ॥ १॥ लाल रंगके प्रयोगसे दीर्घ भायुष्य प्राप्त होता है, पीलक रोग दूर होता है और नीरोगता प्राप्त होती है।॥ २॥ लाल रंगकरी गौवें और लाल रंगकी स्य-किरणे दिव्य गुणोंसे युक्त होती हैं। रूप और बलके अनुसार उनके द्वारा रोगी घेरा जावे ॥३॥ इस लाल रंगकी चिकित्सा रोगीका पालापन तथा फीकापन दूर होगा और वद्द हरे पक्षी और हरी वनस्पतियों में जाकर निवास करेगा, अर्थात् रोगौके पास फिर नहीं भावेगा॥४॥ वर्णचिकित्सा। यह सूपत "वर्ण-चिकित्सा" के महत्वपूर्ण विषयका उपदेश दे रहा है मनुन्यको हृदयका रोग और कामिला नामका पौला रोग कष्ट देते हैं। अपचन, पेटके विकार, तमाखू, मद्यप्राशन भादि अनेक कारण है जिनके कारण हृदयके दोष उत्पल होते हैं। तरण अवस्थामें वीर्यदोप होने के कारण मी हृदयके विकार उत्पन्न होते हैं। कामिला रोग पित्तके दूषित होने के कारण उत्पन्न होता है। इन रागोंके कारण मनुष्य कृश, निस्तेज, फीका, दुर्यल भौर दीन होता है। इसलिये इन रोगोंको हटानेका उपाय इस सूक्तम वेद मता रहा है । सूर्यकिरणों द्वारा चिक्रिमा तथा लाल रंगवाली गौमोके द्वारा चिकित्सा करनेसे उक्त दोष दूर होते हैं और उत्तम स्वास्थ्य मिलता है। सूर्यकिरण -चिकित्सा। सूर्य किरणों में सात रंग होते हैं अपना रगवाली शीशोंकी सहायतामे इष्ट रंगके किरण प्राप्त किये जा सकते हैं। नंगे शरीरपा से भारोग्य प्राप्त होग है और रोग दूर होते हैं । यह रंगीन सूर्य किरणो. कालानही है। यह नंगे शरीरसे ही करना चाहिये । छनपर लाल रंगके । - 1 फिरणोंको रख..

- शीशे रसनेसे कमरेमें लालरंगकी किरणें प्राप्त हो सकती है, इसमें नग शरीरसे रहनसे यह चिकित्सा साध्य हो सकती है। जिस प्रकार उक्त रांगोंके लिये लालरंगकी किरणोंसे चिकित्सा होती है उसी प्रकार भन्यान्य रोगाके लिये अन्यान्य वर्णीके सूर्यकिरणोंसे चिकि- रसा होना संभवनीय है। इसलिये सुयोग्य वैद्य इसका अधिक विचार करें और सूर्यकिरण चिकित्सासे रोगियों के रोग दूर करके जनताके सुखको वृद्धि करे। परिधारण-विधि । सूर्यकिरण चिकित्सा " परिधारण विधिका महत्व " है। इस सूतम " परि दमसि " शब्द चार वार, " नि दध्मसि" शब्द एक वार और " दध्मसि" शब्द एक बार भाया है। " चारों ओरसे धारण करना यह भाव इन शब्दोंसे व्यक्त होता है। शरीरके चारों ओरसे संबंध करनका नाम " परिधारण" है । जिस प्रकार तालारके पानी में तैरनेसे शरीर साथ जलका परिधारण हो सकता है, उसी प्रकार लाल रंगके सूर्यकिरण कमोमें लेकर उसमें नंगे शरीर रहना और शरीरको उलट पुलट करके सय शरीरके साथ लालरगके सूर्य किरणाका संबंध करना परिधारण वियिता तात्पर्य है। १ रोहितः वणः परि दध्मास ( मंत्र .) २ दीर्घायुत्वाय परि दध्मास ( " ३ गारोहिनस्य वर्णेन त्या पारे दम्मसि (मं.१) ४ ताभिट्या परि दध्मास ॥ (मं.३) ये सय भाग रक्त धर्णके सूर्यकिरणोंका स्नान भर्यात् " परिधारण करनेका विधान कर रहे हैं। रोगीको नंगे शरीर पूर्वोक्त रक्त वर्णके बोशेवाळे कमरे में रखने भार उसके शरीरका संबंध रक वर्णके मूम. किरणों के साथ करनेसे यह परिधारण हो सकता है और इससे निोगता, - . । दीर्घ मायुष्यप्राप्ति तथा बलप्राप्ति भी हो सकती है। अन्यान्य रोगोंके निवारणके लिये अन्यान्य वर्णाक किरणोंके स्नानोंको योजना करना चतुर वैद्योंकी बुद्धिमत्तापर निर्भर है। रूप और बल। रूप और बलके अनुसार यह चिकित्सा, यह परिधारणविधि अथव किरण स्नान करना योग्य है यह सूचना तृतीय मंत्र उत्तरार्धम पाठक देख सकते है । रूपका अर्थ शारीरका सौंदर्य, शरीरका रंग और शरीरकी सुकुमारता है। यदि गोरा शरीर हो, यदि सुकुमार नाजुक शरीर हो तो उसके लिये कितना किरण स्नान देना चाहिये, उसके लिये सवेरका कोमल प्रकाश, या दोपहरका कठोर प्रकाश इतना चाहिये, इत्यादिका विचार करना चोंका कार्य है । जो काले शरीरवाले तथा सुदृढ़ या कठोर शरीरवाले होते हैं उनके लिये किरणस्नानका प्रमाण भी भिन्न होना योग्य है। तथा जो घरमे बैठनेवाले लोग होते हैं और जो धूपमें कार्य करनेवाले होते हैं उनके लिये भी उस प्रमाण न्यूनाधिक होना उचित है । इस विचारका नामही " रूप और बलके अनुसार विचार " करना है। (रूपं रूपं वयो वयः) यह प्रमाण दशनिवाला मंत्रमाग अत्यंत महत्वका है। रोगोकी कोमलता या कठोरता, रोगीका रंग, रोगीका रहना सहना। रोगीका पेशा, उसकी आयु तथा शारीरिक बल इन सबका विचार करके किरण स्नानकी योजना करना चाहिये । नहीं तो कोमल प्रकृतिवालेको आधिक स्नान देनेसे आरोग्यके स्थानपर अनारोग्य होगा ( अपवा कठोर प्रकृतिवालेको अल्प प्रमाणमें देनेसे उसपर कुछ भी परिणाम न होगा। इस दृष्टिसे तृतीय मनका उत्तरार्ध पहुत मनन करनेयोग्य है। रंगीन गौके दूधसे चिकित्सा । इसी सूपसे रंगीन गौके दूध रोगीकी चिकित्सा कानेकी विधि भी पता दी है। गौ सफेद, काल, लाल, मो, नमधारी, मादामी, तथा (७४) विविध रंगके धन्यावाली होती हैं। सूर्यकिरण गौके पीठपर गिरते हैं और उस कारण रंगके भेदके अनुसार दूधपर भिन परिणाम होता है। श्वेत गौके दूधका गुणधर्म भित्र हागा, काले रंगकी गौका दूध भिक गुणधर्मवाला होगा, लाल गोका दूध मिस गुणधर्मवाला होगा, उसी प्रकार अन्याय रंगवाले गौमोंके दूध गुणधर्म भिन्न होंगे। एक धार वर्णचिकित्साका तत्व माननेपर यह परिणाम माननाही पड़ता है। इसी लिये इस सूक्तके मंत्र ३ में “रोक्षिणीः गायः " अर्थात् लाल गांवोंके दूधका तथा अन्यान्य गोरसोंका उपयोग हृदय विकार और कामिला रोगको निवृत्तिके लिये करनेका विधान है। यह विधान मनन करने से यहा योधप्रद प्रतीत होता है और इसके मनन करनेसे अन्यान्य रोगोंके लिये अन्यान्य गौवोक गोरसोंका उपयोग करनेका उपदेश भी प्रास होगा। वर्णचिकिरसाकाही तत्त्व गोदुग्ध-चिकित्सा के लिये वर्ता जायगा। दोनों के बीच ताव एकही है। पथ्य। वर्ण-चिकित्साके साथ साथ गोरस सेवनका पध्य रखने से अत्यधिक लाभ होना सभवनीय है । अर्थात् लालरंगके किरणों के परिधारण करने के दिन लाल गौके दूधका सेवन करना, इत्यादि प्रकार यह पथ्य समझना उचित है। इस प्रकार हम सृस्तका विचार करके पाठक यहुत लाभ प्राप्त कर AAMA- ॐ वैदिक-प्राण-विद्या।

(७३) अकैतनिक महाकीरोंका स्वागत । - राष्ट्रीय सैन्यमें कई वीर वेतन लेकर युद्ध में जानेवाले होते हैं और कई भवैतनिक स्वयं-सेवक होते हैं ।। वेतन लेकर युद्ध करनेवाले वीरों की अपेक्षा " अवैतनिक राष्ट्रीय स्वयं सेवकोंका सम्मान" अधिक होता है । अपने शरीरमें भी उस प्रकार के दो धीर विद्यमान हैं । दोहात, दो पांध, गुदद्वार मूयद्वार और मुख ये सात कर्मवीर हैं , तथा, इनके साथ कार्य करनेवाले दो नाक, दो भाख, दो कान और त्वचा ये सात ज्ञानवीर है। ये दोनों प्रकारके वीरोंके चौदह गण हैं। ये चीर शरीरके संरक्षणके लिये बदा युद्ध करते हैं, परंतु इनको खानपान भादि रूपसे वेतन अवश्य देना चाहिए। यदि वेतन न दिया जायगा. तो इनसे कार्य नहीं हो सकता । इनकी अपेक्षा अवैतनिक राष्ट्रीय स्वयंसेवकका कार्य करनेवाले एकादश रुद प्राणहासे इस शहरमें विद्यमान हैं। पंच पंच प्राण उपप्राण और एक जारमा मिलकर ये ग्यारह महावीर होते हैं । बिना खानेपोनेके, तथा माराम, विधाम और निद्रा न लेते हुए, ये वीर शरीरका संरक्षण करने के लिये दैनिक महायुद्ध में सदाही तत्पर होते हैं। ये महावीर इतने प्रभावशाली होते हैं कि ये स्वय अपना युद्धरूपी फार्य अपनीही शक्ति से करते रहते है, माथ साथ पूर्वोक्त कर्मवीरों और ज्ञानवीरों को भी सहायता देते हैं । उE वीरों की जागनेकी तथा सोनेकी अवस्था में इनका एक जैसाही निःस्वार्थ कार्य होता रहता है । इसलिये अवैतनिक कार्य करनेवाले इन महावीरोंका शरीर की स्थिति के लिये अत्यंत उपयोग है। इनके निष्काम भावसे किये हुए कार्यसेही संपूर्ण शरीरकी सुस्थिति होती है । इसलिये सब शरीररूपी इस राष्ट्रमें इनका माहात्म्य अधिक है और इसी कारण इन महावीरोंकी सर्वत्र पूजा होती हैं। इनकी पूजा करनेका विचार इस पुस्तकमें है।

(७७)
वैदिक प्राणविद्या।
AGRAM..
.
मनुष्यों के लिये सर अन्य विद्याओंकी अपेक्षा माणविद्याकी अत्यंत
आवश्यकता है। मनुष्यके शरीर भौतिक और अभौतिक अनेक शक्तियां
है। उन मय शकियों में प्राणशक्तिका महत्व सर्वोपरि है । सब अन्य शाक्ति-
योका अन्त होनेपर भी इस शरीरमें प्रागशक्ति कार्य करती है, परंतु प्राणका
अस्त होनेपर कोई अन्य शक्ति कार्य करने के लिये समर्थ नहीं हो सकती।
इससे प्राणका महत्व स्वय स हो सकता है।
इस प्राणकी विद्या वेदमें हैं या नहीं ! और यदि है तो उसका स्वरूप
क्या है ? यह प्रश्न वारंवार पछा जाता है। इसका उत्तर निम्न मत्रही
स्वयं दे सकते हैं । वेदमें विद्या विस्तारपूर्वक उपदेश है। प्रायः
अनेक देवतामोंके सूक्तम साक्षात् अथवा परंपरा से प्राणविधाका उपदेश
लाता है। परंतु वेदकी प्रागविद्या संपूर्ण मंत्र शतक एकत्रित नहीं हुए
है, इस अवस्था में प्राणविद्याका रूपसे उपदेश करनेवाले थोडेसे मंत्र
इस लेखमें देनेका यत्न कर रहा हूँ ।
ईश्वर सबका प्राण है।
पाणाय नमो यस्य सर्वमिदं चशे।
यो
भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन्सर्व प्रतिष्ठितम् ।।
"जिसके आधीन ( इदं सर्व ) यह सम जगत है, उस प्राणो लिये
का नमस्कार है। वह प्राय सबका ईश्वर ( भूत, ) है और उसमे पर
जगत् । प्रतिष्ठित ) रहा है।
-
.

(७९) - अंतरिक्षस्थ प्राण । नमस्ते प्राण कंदाय नमस्ते स्तनायित्नये। नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वपते ॥ २ ॥ "माण ! गर्जना करनेवाले तुझको नमस्कार है । मेघों में नाद करनेवाले तुसको नमस्कार है । हे प्राण ! चमकनेवाले तुझको नमस्कार है और हे प्राण ! वृष्टि करनेवाले तुझको नमस्कार है।" फेशल गरजनेवाले मेघी का नाम ' _ ' है, बडो गर्जना और विद्युत्परत, जिनसे होता है उन मेघों का नाम ' स्तनयिनु है जिनसे विजुली बहुत चमकती है उनको विद्युत् ' कहते हैं और पृष्टि करनेवाले मेघोंका नाम है 'यपत् ।।ये सब मेघ संतरिक्षम प्राणको धारण करते हैं और वृष्टिद्वारा पहाण भूमदलपर माता है, भार वृक्षवनस्पतियों में संचारित होता है। इस प्रकार सतरिक्षस्थानमें प्राण धास्तव्यका मनुमय करना चाहिए। इस "प्राका कार्य देखिए- प्राणका कार्य। यत्वाण रतनयित्नुनाऽभिदत्योपधीः । प्रवीयन्ते गर्मान् दधनेऽथा पाहोर्षिजायन्ते ॥३॥ "हे प्राण ! जप तू मेघों के द्वारा नापधियों के मन्मुस यदी गर्जना करता ६, नप भापधिपा (प्रयीयन्ते } तजरी होती है, (गर्मान् दधते ) गर्भ धारण करती हैं और बहुत प्रकार विनाको प्राप्त होती हैं।" मंतरिक्षा रखाना प्राण पृरिद्वारा पधि यनस्पतियों में भार पनस्पतियों का विस्तार फरता की यह शनि प्रत्यक्ष देपनेयोग्य है। याप्राण प्राताचागलेऽभि मंदस्योषधीः। म सदा प्रमोदने वाकिग भूम्यामधि ॥४॥ प्राण ! (Rt भागते ) तु मानेही अगापियार उससे गा पाने rmal दे, तप जगा भानंदित होता है, जो पुच्दम . . . पृषीपर।"

(७८) - यहाँ " प्राण" शब्दसे पामेश्वरको विश्वव्यापक जीवनशक्ति कही है। इस परमात्माकी जीवनातिके माधान यह सब संसार है, इसीके माधारसे रहा है और इसीसे सब संपारका नियमन भी हो रहा है । समष्टिटिसे सर्व प्राणका राज्य है । ध्यष्टिटिसे प्रत्येक शीमें भी प्राणकाही माधि. पंत्य है । प्राणिमात्रके प्रत्येक शरीरमें जो जो इंद्रियादिक शक्तियां हैं, तथा विभिर अवयव और इंद्रिय है, सबही प्राणके वशमें हैं। प्राणके आधीनही सप शरीर है। शरीरमें प्राणही सय इंदियों घोर अवयवोंका ईश्वर है, क्योंकि उमौके माधारसे सर शरीर प्रतिष्ठाको प्राप्त हुआ है । माणके विना इस शरीरको स्थितिही नहीं हो सकती। अर्थात् प्राणके वश होनेसे सम भारीर सुदृढ पार नीरोग हो सकता है और प्राणके निर्मल होनेसे सब गरीर निबल हो सकता है । इसलिये प्राणको स्वाधीन करनेकी आवश्यकता है। अपने शरीरमें श्वास-उच्छ्गमस्य प्राण चल रहा है और जन्मसे भरण- पर्यत यह कार्य करता है । सब इंद्रिय और अवयव मर जानेके पश्चात् भी कुछ देरतक प्राण कार्य करता है. इसलिय सबमे प्राणी मुख्य हे मोर वह सपका भाधार है । अपने प्राणो केवल साधारण श्वासरूपही समझना नहीं चाहिये, परतु उसको श्रेष्ठ दिव्य शाकका भंश समझना उचित है। मनकी इच्छा शक्ति से प्रेरित प्राण सयही शरीरका आरोग्य संपादन करने में समर्थ होता है, इस दृष्टि प्राणमा महत्व सब शरीरमें अधिक है। इसके महत्वको समझना और पदा मामें धारण करना चाहिए।" अपने प्राण भाधीन मेरा सब शरीर है. प्राग कारण यह स्थिर रहा है और उसको सब हडचल प्राणको प्रेरणासे होती है, इस प्रकारके प्राणकी मैं सपासना करूगा और उसको अपने क्षाधीन करूगा प्राणायामसे उपको प्रसन्न करूंगा और वशीभूत माणसे अपनी इच्छानुरूप अपने शरीरमें कार्य करूंगा।" यह भावना मनमें धारण करके अपने प्राणकी शक्तिका चिंतन करना चाहिए। या प्राण जैसा शरीरमें है चमा बाहिर भी है। इस विषयमें निम्नलिखित मंन्न देखिए- ।

(७२) अंतरिक्षस्थ प्राण! नमस्ते प्राण कंदाय नमस्ते स्तनायित्नवे। नमस्ते प्राण विद्युते नमस्ते प्राण वर्पते ॥ २ ॥ "हे प्राण ! गर्जना करनेवाले तुझको नमस्कार है । मेघों में नाद करनेवाले तुझको नमस्कार है । हे प्राण ! चमकनेवाले तुझको ममस्कार है और हे प्राण ! वृष्टि यारनेवाले तुझको नमस्कार है। " बल गरजनेवाले मेघीका नाम 'कर' है, बडो गर्जना और विद्युत्पात, जिनसे होता है उन मेघोंका नाम ' स्तनयिनु ' हैं, जिनसे बिजुली बहुत चसकती है उनको विद्यत् ' कहते हैं और वृष्टि करनेवाले मेघोंका नाम है 'वर्षत् ।। ये सब मेघ अंतरिक्षमें प्राणको धारण करते हैं और वृद्विारा वह प्राण भूमडलपा क्षाता है, और वृक्षवनस्पनियों में संचारित होता है। इस प्रकार अतरिक्षस्थानमें प्राण वास्तव्यका अनुभव करना चाहिए । इसः प्राणका कार्य देखिए- माणका कार्य । यत्प्राण स्तनयित्नुनाऽभिक्रदत्योपधीः । प्रधीयन्ते गर्नान दधतेऽथा पतीर्विजायन्ते ॥३॥ "हे प्राजय तु मेघोंके द्वारा सापधियोके सन्मुख बढी गर्जना करता है, तब भोपाधिया (प्रवीयन्ते ) तअस्वी होती है, (गर्भान् दधते ) गर्भ धारण करती है और बहुत प्रकार विस्तारको पास होती हैं। " मंतरिक्षा स्थानका प्राण वृधिद्वारा औषधि वनस्पनियों में भार वनस्पतियों का विस्तार करता है। प्राणकी यह शक्ति प्रत्यक्ष देखनेयोग्य है। यन्माण ऋतावागतेऽभि कंदत्योपयोः। सर्वं तदा प्रमोदत्त यत्किं च भूम्यामधि ॥ ४ ॥ "हे प्राण ! (ती मागते ) वर्षा ऋतु आतेही अपन भापधियों उद्देश से गर्जना करने राता है, तब जगत् धानदित होता है, जो कुछ इस 1 पृथ्वीपर है" (८०) वृष्टिद्वारा प्राप्त होनेवाले प्रामसे न केवल वृश्नवनस्पतिया प्रफुलित होती है, परंतु अन्य जीवजतु भोर प्राणी भी वर्ड इर्षित होते है । मनुष्य भी इसका स्वयं अनुभव करते हैं। देखिए- यदा प्राणा अभ्यवर्पण प्रार्थवीं महीम् । पशवस्त-प्रमोदन्ते महो वै नो भविष्यति ॥ ५॥ " जय प्राण वृष्टिद्वारा इस घडो भूमिपर वर्षा करता है, अब पशु हर्पित होते हैं [ और समझते हैं कि ] निश्चयसे भर हम सबको (मह.) वृद्धि होगी।" भाभिवृष्टा औषधयःप्राणेन समवादिरन् । आयुधैं न. प्रातीतरः सर्वा नः सुरभारकः ॥ ६ ॥ " औषधियोंपर वृष्टि होनेके पश्चात् पोपधियां प्राणके साथ भाषण करती हैं कि हे प्राण ' तूने हमारी आयु बढा दी है और हम सपको (मु. रमी. । सुगधियुक्त (अक ) किया है।" अंतरिक्षस्थ प्राणका कार्य इस प्रकार पाठक देखें और जगत्में इस मागका महर कितना है, इसका अनुभव करें। पहिले मंत्री प्राणका -सामान्य स्वरूप वर्णा किया है उसकी भतरिक्षस्थानीय एक विभूति यहा यता दी है। अब इमीकी वैयक्तिक विभूति यतायी जाती है । वैयक्तिक प्राण । नमस्ते अस्वागत नमोऽस्तु परायते । नमस्त प्राण तिष्ठत आसीनायोन ते नमः ॥७॥ नमम्ने प्राण प्रपतनमा अस्यपानते। परानानाय ते नमः प्रतीचीनाय ने नमः ।। सास्मै त इदं नमः ॥८॥ A (८१) . . "मागमन करने वाले प्राणके लिये नमस्कार है, गमन करनेवाले प्राणके लिये नमस्कार है । हे प्राण ! स्थिर रहनेवाले और बैठनेवाले प्राणके लिये नमस्कार है । हे प्राण ! (प्राण ) जीवनका कार्य करनेवाले तुझे नमस्कार है । अपानका कार्य करनेवाले तेरे लिये नमस्कार है। मागे बढनेवाले और पीछे हटनेवाले प्राणके लिये नमस्कार है। (सर्वस्मै ) सब कार्य करनेवाले तेरे लिये यह मेरा नमस्कार है।" श्वासके माथ प्राणका अंदर गमन होता है और उच्छ्वास के साथ बाहिर आना होता है। प्राणायामके पूरक और रेचकका बोध "मायत,रायत्" इन दो शब्दों से होता है। स्थिर (विष्ट) रहनेवाले माणसे कुभकका बोध होता है । और याह्य कुमकका ज्ञान 'मासीन 'पदसे होता है। (१)परक, (२) कुंमक, (३) रेचा और ( ४ ) बाह्य कुंभक "ये प्राणायामके चार भाग है । ये चारों मिलकर परिपूर्ण प्राणायाम होता है । इनका वर्णन इस मन्त्र" (.)भायद(२) तिष्ठत्, (३)परायत, ()भासीन" इन चार शब्दोसे हुआ है। जो भदर मानेवाला प्राण होता है, उसको "मायत् प्राण कहा जाता है, यही पूरक प्रणायाम है। मानेजानेको गतिका निरोध करके प्राणको अंदर स्थिर दिया जाता है, उसको “तिष्टत् प्राण" कहते हैं। यही कुंभक अथवा अंत कुभक प्राणायाम होता है। जो मंदरसे बाहिर जाता है उसको " परापत् प्राण " कहते हैं । यही रेचक प्राणायाम है। मम प्राण रेचक द्वारा याहिर निकालनेके पशात् उसको माहिरही विठलाना "आसीन आय "द्वारा होता है। यही राह्य कुंभक है। प्राणायामके ये चार भाग हैं । इन चारोके अभ्याससे प्राण वश होता है। यदी इस प्राणदवनाको प्रसनता कानेका उपाय है, यही माण-उपास- नाकी विधि है। प्राण नाम उसका है कि जो नासिका द्वारा छातीमें पहुंचता है। पान उसका नाम है कि जो नामिके निम्न देश गुदाके द्वारतक कार्य करता है। ६(वै० चि०) -- इन्हीके दो अन्य नाम " प्राचीन और प्रतीचीन, प्राण हैं। प्राणके स्वाधीन रखनेका तात्पर्य प्राण भार अपानको स्वाधीन करना है। मपानकी स्पधीनतासे मलमूत्रोत्सर्ग उत्तम प्रकारसे होते हैं और प्राणको स्वाधीन- तासे रुधिरको शुद्धि होती है । इस प्रकार दोनों वशीभूत होनेसे शरीरकी नीरोगता सिद्ध होती है । इस प्रकारको प्राणकी स्वाधीनता होने से प्राणके माधीन सय शरीर है, इसका अनुभव होता है। इमी उद्देश से मंत्र कहता है कि " सर्वस्मै व इदं नमः " अर्थात तू सब कुछ है. इसलिये तेरा साकार करता हूं। शरीरका कोई माग तेरी शक्ति विना कार्य नहीं कर सकता, इमलिये सय अवयवों में एय प्रकारका कार्य करनेवाले प्राणका सदादी सरकार करना चाहिए । हरएक मनु-यको उचित है कि, वह अपने प्राणको इस शतिका ध्यान करे विश्वासपूर्वक इस शक्तिका स्मरण रसे, क्योंकि निश चारोग्यकी सिद्ध इमापर निर्भर है। इस प्राणशक्तिका इतना महत्व है कि इमकी विद्यमानतामेही मन्य औषधि कार्य कर सकते हैं, परंतु इस शक्ति कमजोर होनेपर कोई औधि कार्य नहीं कर सकता । प्राणी सय औषधि- योंकी भाषधि है । इस विषयमें निम्नलिखित मंत्र देखिये- प्राणका औषधिगुण । या ते प्राण प्रिया तनूर्यो ते प्राण प्रयमी। अथा यनेपज तव तस्य नो धहि जाधम ॥ ९ ॥ हे प्राण जो सेरा ( प्राणमय ) प्रिय नारीर है, भार जो तेरे (प्राणा- पानरूप ) प्रिय माग है, तथा वो मेरा आपध है, यह (जीसे ) दीघ- जीवन के लिये हमको दो।" मखमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय गार मानंदमय ये पांच कोन है इनको पामर भी वह सकते हैं। इन पांच सागरी मेमे । in का मन इस मंत्र में किया है। "पिया मनू ' यह प्राणमय शेशी है। मप्रभ करते है, मब चाहते है कि यह प्राणमय गरीर " । प्राणमद सदा रहे। प्राण और मपान ये इस शरीरके दो प्रेममय कार्य है। प्राणसे शक्तिका संवर्धन होता है और अपानसे विपको र करके स्वास्थ्यका मर- क्षण होता है। प्राणके अन्दर एक प्रकारका " मेषज" मर्यात् भोषध है। दोपोंको, दूर करनेकी शक्तिका नाम ( दोप-ध ) भोप-ध अथवा भेषज होता है । शरीरकै सथ दोष दूर करना मार वहां शरीरमै भारोग्यकी स्था- पना करना, यह पवित्र कार्य करना प्ररणकाही धर्म है। प्राणका दूसरा नाम रुद्र" है और रुद्र शब्दका अर्थ वैद्य भी होता है। [ इसका वर्णन "रुददेवताका परिचय " और "ऋग्वेदमें रुददेववा" इन दो पुस्तकोंमें विस्तारसे किया है। पाठक बहाही इस विषयको देखें। ] इस प्राणमें भौषध है, यह घेदका कथन है। इसपर अवश्य विश्वास रखना चाहिए क्योंकि यह विश्वास भवास्तविक नहीं । अपनी निज शाक्तपर विश्वास रखने समानही या वास्तावक विश्वास है । मानचिकित्साका यह मूल है । पाठक इस टिपे इम मत्रका विचार करें। अपना प्राणशकिसे सपनीही चिकिस्पा की जा सकती है • मैं अपनी प्राणशक्तिसमपने रोगोशनिवा- रण माश्य फरूंगा, यह भाव यही धारण करनसे यह लाम होता है। सर्वरक्षक प्राण । मरण प्रजा अनु वस्ते पिता पुषमिव प्रियम् । प्राणो सस्यश्यरो यच्च माणति यच्चन ॥ १०॥ "जिस प्रकार प्रिय पुत्र मा पिता रहता है, उस प्रकार सप मजा- मों के साथ प्राणहता है। जो माग धारण करते है और जो नहीं धारण करते, उन मा प्रागही ईश्वर है।" शिव पुयका रक्षण करने की इजा पिता करया है, उसी प्रकार प्राण मग रक्षा करना चाहता । प्रधामोरीसमें नमनारियों में जाकर, यो रहर सपनाका REग यह प्राग ratन केवल . 0 प्राण धारण करनेवाले प्राणियोंका परंतु जो प्राण धारण नहीं करते हैं, ऐसे स्थावर पदायाँका भी रक्षण प्राणही करता है । अर्थात् कोई यह न समझ कि श्वासोच्छ्वास करनेवाले प्राणियोंमेंही प्राण है, परंतु वृक्षवनस्पति, पत्थर सादि पदार्थों में भी प्राण है, भौर इन सय पदार्थों में रहकर प्राण सयका संरक्षण करता है। प्राणको पिता के समान पूज्य समझाना चाहिए और उसको सब पदार्थों में व्यापक समझना चाहिए । प्राणकी उपासना। प्राणो मृत्युः प्राणस्तक्मा प्राणं देवा उपासते । प्राणो ह सत्यवादिनमुनमे लोक आ दधत् ॥ ११ ।। "माणही मृत्यु है और प्राणही जीवनी शनि है । इमलिये सब देय प्राणकी उपासना करते हैं। क्योंकि सत्यवादीको प्राणही उसम लोकमें पहुंचाता है।" शरीरसे प्राण चले जानेमे मृत्यु होता है. और सतक शमें प्राण कार्य करता है, तबतकही शरीर में सामर्थ्य पयवा महनशान रहती।इम प्रकार एकही प्राण जीवन और मृत्युका का होता है। दय' शब्दसे इस मंत्र में इंद्रियों का प्रण होता है । सब इंद्रियां प्राणकोही उपासना करती है, अर्थात् प्राण माय रहकर अपने अंदर चल माप्त करती हैं। जो इंद्रिय माग के साथ रहकर बल पाठ करता है, यदीवार्यक्षम होता है, परंतु जो इंद्रिय प्राण से वियुफ होता है, यह मर जाता है। यही प्राणकी उपासना है और यही रदकी उपासना है सब देवोंमें महादेवको शनि कमी कार्य करती है, इसका यहां अनुभव हो सकता है। प्रागही महादेयपदमु आदि नामों मे योधित होता है। व्यनियर प्रागही उपकी पिभूमि है। पर जगत्में उपका रूप विश्वम्यापक यागनिदी है। हम ग्वारक भागशनिक माध्यसे भाग्न, वायु, इंद. सूर्य आदि देवता-TM an भौर पना कार्य करते हैं । यष्टिमें मार माटमें ही नियम कार्य कर .

रहा है। यष्टिमें प्राणके साथ इंद्रियां रहती हैं और समष्टिमें व्यापक प्राण- शकिके साय मानि मादि देव रहते हैं। दोनों स्थानों में दोनों प्रकारके देव प्राणकी उपासनासेही अपनी शक्ति प्राप्त करते हैं। तीसरे देव समाज और राष्ट्रमें विद्वान् शूर आदि प्रकारके हैं। ये सत्यवादी, सत्यनिष्ठ, सत्यपरायण और सत्याग्रही बनकर प्राणायामद्वारा प्राणकी उपासना करते हैं। प्राणही इनको उत्तम लोकमें पहुंचाता है अर्थात् इनको श्रेष्ठ बनाता है । अर्थात् प्राणकी उपासनासे सबही श्रेष्ट बनते हैं। सत्यसे बलप्राप्ति । कई लोग यहां पूठेंगे कि सत्यवादिताका प्राणकी उपासनाके साथ क्या संबंध हे ? उत्तरमें निवेदन है कि सत्यसे मन पवित्र होता है और उसकी शक्ति बढती है। प्राणको शक्ति के साथ मानसिक शक्तिका विकास होनेसे बडा लाम होता है। प्राणायामसे प्राणकी शक्ति बटती है और सत्यनिष्ठासे मनकी शक्ति विकसित होती है। इस प्रकार दोनों शक्तियोंका विकास होनेसे मनुष्यकी योग्यता असाधारण हो जाती है। तथा- सूर्यचन्द्रमें प्राण । प्राणो विराट् प्राणो देष्ट्री प्राणं सर्व उपासते। प्राणी हसूर्यश्चन्द्रमाः माणमाहुः प्रजापतिम् ॥ १२ ।। " प्राण (वि-राज ) विशेष तेजस्वी है, और प्राणही (देष्ट्री) सबका प्रेरक है । इसलिये प्राणकोही सय उपासना करते हैं। सूर्य, चंद्रमा और प्रजापति भी प्राणही है।" प्राण विशेष पेजस्वी है । जबतक शरीरमें प्राण रहता है, तबतकही शरीरमें तेज होता है। प्राणके चले जानेसे शरीरका तेज नष्ट होता है। मद शरीरमें भाणसेही प्रेरणा होती है । बोलना, हिलना, चलना धादिमय प्राणकी प्रेरणासेही होता है, अर्थात् शरीरमें वेज और प्रेरणा प्राणसे होती है। इसलिये सब प्राणिमात्र प्राणकीही उपासना करते हैं किंवा यो समझिए कि - । । जबतक ये प्राणके साथ रहते हैं, तबतकही उनकी स्थिति होती है । जब वे प्राणका साहचर्य छोड़ देते हैं तब उनकी मृत्युही होती है । इच्छा म होने पर भी सव प्राणी प्राणकोही उपासना कर रहे हैं। यदि मानसिक इच्छाके साथ प्राणोपासना की जायगी, तो निःसंदह यदा लाभ हो सकता है। क्योंकि इस जीवनका जो वैभव है, वह प्राण पेही प्राप्त हुभा है। इसलिये अधिक धैभव प्राप्त करना है,तो प्रयत्नसे उसकीही उपासना करनी चाहिए। प्राणायामका यही फल है। इस जगत्में सूर्य चंद्र पे प्राणही है। सूर्य. किरणों के द्वारा यायुमें प्राण रखता है और चंद्र अपने किरणों से चौपधियों में प्राण रपता है । मेघ विद्युत् भादि अपने अपने कार्य द्वारा जगतको प्राग दे ही रहे हैं। अंत में प्राणीया प्राण जो प्रजापति परमामा , याही वरचा प्राण है, क्योंकि जीवनकी सय प्राणशासका यह एक मान मापा । यही कारण है कि वेदमें प्रजापति परमारमाका नाम प्राणदी है। अन्य पदार्थों में भी प्राण है, दम्बिए- धान्यमें प्राण । प्राणापानौ ग्राहिययायनदयान प्राण उच्यते । यवे प्राण याहितांनो मीदिरप्यते ॥ १३ ॥ प्राण और अपानही पावस और ली है। (मनवान् ) सदी मुख्य प्राण है। जीमें प्राण पार पावल भपानको का" मुख्य प्राण एकही है. उम बल गरमें प्रागभीरपान कार्यकारी है। इमी प्रकार सेती में पेलको शानिः मुग्य है, उसकी शानिमेडी पर और जी मादि पान्य रत्न होता है दो "अनदयान्" पर सवार है। ममनोनितो रोमें यह प्रारीचेलही गठी पाता और पदाका किमान जीवामा र क्षेत्र है,प्राणनीवारमा प्रय, और जीवनयापती पहा मी बदमें बनवान् भएका माग भयं है, यह म ममानेके कारण इयोंने पहा मननय डिपा, (८७) । देखिए- अनड्वान दाघार पृथियोमुत थाम् ॥ ( भव । ११) प्राणका पृथिवी और धुलोकको को आधार है," यह वास्तविक अयं न लेकर, बेलका पृथिवी और द्युलोकको आधार है ऐमा भाव कहयोंने ममझा है । यदि पाटक इस अनड्वान् सूकका अर्थ इस प्राणभूतके अर्थके साथ देखेंगे, तो उनको स्पष्ट पता लग जाया कि वह मनवान्का अर्थ केवल बलही नहीं है, प्रत्युत माण भी है। इसी कारण इस सूकमें प्राणका नाम मनवान् कहा है। यव प्राण है और चावल अपान है, यह कथन भालंका. रिक है। धान्यमें प्राण और अपान अर्थात् माणकी संपूर्ण शक्तियां व्यास हैं । धान्यका योग्य सेवन करनेसे अपने शरीरमें राणादिक भाते हैं और अपने शरीर के अवयव बनकर कार्य करते हैं। प्राणसे पुनर्जन्म। अपानति प्राणति पुरुपो गर्भ अन्तरा। यदा त्वं प्राण जिन्यस्यथ सजायते पुनः ॥ १४ ॥ (पुरुषः) जीव गर्भक अंदर प्राण और अपानके ध्यार करता है। हे प्राण ! जय जिन्वसि) प्रेरणा करता है, तब वह जीव पुन: उत्पन्न होता है।" गर्भके अंदर रहनेवाला जीव भी यहांही गर्भ में प्राण और भपानके व्यापार करना है। भार इसीलिये वहां उसका जीवन होता है। जय जन्मके समय प्राण जन्म होने योग्य प्रेरणा करता है, तब उसको जन्म भास होता है। अर्थात् जन्मके अनुकूल प्रेरणा करना प्राणकेही आधीन है। इस मंत्रमें "स: पुनः जायते " यह धाक्य पुनर्जन्मको कल्पनामा मूल वेदमें बता रहा है। जीवारमा पुनः पुनः जन्म धारण करता है, वह सब प्राणकी प्रेरणासे होता है, यह भाव इस मंत्रमें स्पष्ट है।

(८८) भविष्य प्राणमाहुर्मातरिश्वान वातो ह प्राण उच्यते । प्राणे ह भूतं भव्यं च प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ "प्राणको मातरिश्मा कहते हैं, और वायुका नामही प्राण है। भूत, भविष्य और सब कुछ वर्तमान कालमें जो है, यह सब प्राणमें ही रहता है।" "मातरि श्वा" शब्दका अर्थ माताके अंदर रहनेवाला, माताके गर्भ में रहने- वाला' है।माताके गर्भ में प्राणरूप अवस्थामें जीव रहता है, इसलिये जोवका' नाम मातरिश्वा' है। गर्भ में इसकी स्थिति प्राणरूप होनेसे इसका नामदी प्राण होता है। इस कारण प्राण और मातरिश्वा शब्द समान अर्थ बताते हैं। 'मातरिश्वा का दूसरा अर्थ वायु है । घायु, वात भादि शब्द भी प्राणवाचकही हैं। क्योंकि वायुरूप प्राणही हम अंदर लेवे है और प्राणधारण कर रहे हैं । प्राणका विचार करनेसे ऐसा पता लगता है कि उसके माधारसे 'भूत, और वर्तमानका सपही जगत् रहता है। प्राणके माधारसेहो सप रहता है। प्राणके विना जगत्में किसीकी भी स्थिति नहीं हो सकती । पूर्वजन्म, यह जन्म और पुनर्जन्म ये सय प्राणके कारण होते हैं । अधात् भूत, भविष्य, वर्तमान काल में जो कम संस्कार प्राणमें संचित होते हैं, उनके पारण यथायोग्य रीतिसे पुनर्जन्मादि होते हैं। अथर्व-चिकित्सा। आथर्वणीगंगिरसीवामनुष्यजा उत । ओषधयः प्रजायन्ते यदा त्वं प्राण जिन्यसि ॥ १६ ॥ "हे गण ! (यदा) जबतक तू ( जिन्यसि ) प्रेरणा करता है, सब- तकही भाथर्वणी, मांगरसी, देवी और मनुष्यकृत भौषधिया (प्रजायते ) फल देवों है।" औषधियों का उपयोग धयठकही होता है कि जबतक प्राणी मावि शरीरमें है। जब प्राणको शक्तिशारीरसे अलग होने लगती भापधिका कोई उपयोग नहीं होता । इमी सूक मंत्र ९ में “ मागही तय किसी । . औषधि है कि जो जीवनकी हेतु है " ऐसा कहा है, उसका अनुसंधान इस मंत्र के साथ करना उचित है। इस मंत्रमें "(१) पाथर्वणीः, (२) भोगिरसोः, (३) देवीः, और ( ४ ) मनुष्यजाः " ये चार नाम चार प्रकारको चिकित्साओं के बोधक हैं। इसका विचार निम्न प्रकार है- (१) मनुष्यजाः ओषधयः - मनुष्योंकी बनाई नापधियां, अर्थात् पाय, चूर्ण, अवलेह, भस्म, कल्प आदि प्रकार जो वैद्यों, डाक्टरों और इकोमोंके बनाये होते हैं, उनका समावेश इसमें होता है। ये मानवी औषधियों के प्रकार है। इससे श्रेष्ठ देवी विधि है । (२) देवीः औषधयः = आप, तेज, वायु, भादि देवोंके द्वारा जो चिकित्सा की जाती है, वह देवो चिकित्सा है। जलचिकित्सा,सौर- चिकिरमा, वायुचिकित्सा, विद्युचिकित्सा वर्णचिकित्सा आदि सब दैवी प्रकार हैं। सूर्य चंद्र वायु आदि देवताओं के साक्षात्संबंधसे यह चिकित्सा होती है और पाश्चर्यकारक गुण प्राप्त होता है, इसलिये इसकी योग्यताबदी है। इसके अतिरिक्त देवयज्ञ अर्थात् हवन आदि द्वारा जो चिकित्सा होती है उसका भी समावेश इसमें होता है । देवयज्ञ द्वारा देवताओं की प्रसन्नता करके, उन देवनाओंके जो जो अंश अपने शरीरमें हैं, उनका भारोग्य संपादन करना कोई अस्वाभाविक प्रकार नहीं है। यह बात युक्तियुक्त और तर्कगम्य भी है। (३)आंगिरसी औषधयः - अंगों, अवयवों और इंद्रियों में एक प्रकार- का रस रहता है। जिसके कारण हमारे अथवा प्राणियों के शरीरकी स्थिति होती है । उस रसके द्वारा जो चिकिरपा होती है वहांगिरस-चिकित्सा कहलाती है । मानसिक इच्छाशक्तिकी प्रबल प्रेरणासे इस रसका भंगप्रत्यगों में संचार करनेसे रोगोंकी निवृत्ति होती है । मानसिक चित्तंकारन्यका इसमें विशेष संबंध है। रूण अवयवको संबोधित करके निरोगताके भावकी सूचना देना, तथा रोगीको अपनी निज अंगासशक्तिकी प्रेरणा करने के लिये उत्तेजित करना इस विधिमें मुरय है। निज भारोग्यके लिये वाहा साधनोंकी निरपेक्षता इसमें होनेसे इसको गिरसी चिकित्सा अर्थात् अपने निज ।

(९०)
'अंगोंके रसद्वारा होनेवाली चिकित्सा कहते है। (१) आयर्वणीः औषधयः
= 'भ-या ' नाम है योगीका । मनकी विविध वृत्तियों का निरोध
करनेवाला, चित्तवृत्तियोंको स्वाधीन रखनेवाला योगी पयवा कहलाता है ।
इस शब्दका अर्थ (-या) निश्चल, स्तब्ध स्थिर, गतिहीन ऐसा है।
स्थितप्रज्ञ, स्थिरबुद्धि, स्थिवमति आदि शब्द इसका भाव बताते है । योगी
लोग तंग्रप्रयोगसे जो चिकित्सा करते हैं उसका नाम माथर्वणी चिकित्सा
होता है । हृदयके प्रेमसे, परमेश्वरभक्तिसे मानसशकिसे और धात्मविश्वाससे
मंत्रसिद्धि होती है । यह माधणी चिकित्सा सपस श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें
जो कार्य होता है वह मास्माकी शक्तिसे होता है, इसलिये अन्य चिकित्सा-
कोंकी अपेक्षा इसकी श्रेष्टता है, इसमें कोई संदेहही नहीं है । ये सब
चिकित्सा प्रकार तबतक कार्य करसे हैं कि जबतक प्राण शरीरमें रहना
चाहता है । जब प्राण घले जाता है, तब कोई चिकित्सा फलदायक नहीं
हो सकती। इस प्रकार प्राणका महत्व विशेष है
प्राणकी वृष्टि ।
यदा प्राणो अभ्यवपद् वर्षेण पृथियों महीम् ।
ओपधयः प्रजायन्ते याः काश्च वीरुधः॥१७॥
"(यदा) जय (प्राण:) प्राण इस बढी (पृथिवीं महीम्)पृथ्वीपर (अभ्यवर्षीद)
वृष्टि करता है, सय मापधियां बार धनस्पतियां पट जाती हैं।"
इस मंनका पूर्व अर्ध मंत्र पांच में भाया है, इसलिये इस मंत्रका संबंध
पांचवे मंत्रके माय देखना उचित है। अंतरिक्षस्य प्राण दृष्टिद्वारा वृक्षवन.
पतियों को प्राप्त होता है, यह इस मंत्रका तारपर्य है।
प्राणको स्वाधीन करनेवालेकी योग्यता।
यस्ते प्राणेदं वेद यस्मिश्चासि प्रतिष्टितः ।
सर्वे तस्मै वलिं हरानमुस्मिलोक उत्तमे॥१८॥
यथाप्राण यलिहतस्तुभ्यं सर्वा. प्रजा इमाः।
एवा तस्मै यालि हरान यस्वा प्रणयत्सुध्रय ॥ १९ ॥

N "हे प्राण! जो मनुष्य तेरी इस शकिको जानता है और ( यस्मिन् ) जिस मनुष्य में तू प्रतिष्ठित होता है, ( तस्म) उस मनुष्य के लिये उस उत्तम लोकमें सबही (बलिं) सरकारका समर्पण काते हैं ॥ हे प्राण! (यथा) जिस प्रकार ये सब प्रजाजन तेरा साकार करते हैं कि (य) जो (सु श्रवाः ) उत्तम यशस्वी है और (वा) तेरा सामर्थ्य (शुणवन् ) सुनता है" जो मनुष्य प्राणको शक्तिका वर्णन श्रद्धासे सुनता है, प्राणके बलको विश्वाससे जानता है, प्राणका बल प्राप्त करने में यशस्वी होता हे और जिस मनुय्यमें प्रापा उत्तम रीतिसे प्रतियित और स्थिर रहता है, उसका ही सब सरकार करते हैं, उसकी स्थिति उत्तम लोकमें होती है और उसी का यश सर्वत्र फैलता है। प्राणायाम द्वारा जो अपने प्राणको प्रसन और स्वाधान करता है, उसका यश सब प्रकारसे बढ़ता है। इस मंत्रमें बिलि" शब्दका अर्थ सरकार पूजा, अपंण, शकिमदान मादि प्रकारका है। मच अन्य देव प्राणको हो पूजते हैं, इस बातका अनुभव अपने शरीरमें भी मा सकता है। नेत्र कर्ण नासिका बादि सब अन्य देव प्राणको ही पूजा करते हैं, प्राणकी उपापनासे ही प्राशक) शक्ति उनमें प्रकट होती है। इसी "प्रकार प्राणायामकी साधना करनेवाले योगीका सरकार अन्य सजन करते हैं, और उसके उपदेशसे प्राणोपासनाका मार्ग जानकर अयं पलवान् वन सकते हैं । यही कारण है कि प्राणायाम करनेवाले योगीकी सर्वत्र प्रशंसा पिता-पुत्र--संबंध। अन्तर्गमश्चरति देवतास्वाभुतो भूतः स उजायते पुनः । स भूतो भव्यं भविष्यत् पिता पुत्र प्रवियेशा शचीमि. ॥२०॥ "(देवतासु भाभूतः) इंद्रियादिकों में जो व्यापक प्राण है प ही (अंतगर्भः घरति) गर्भके अंदर चलता है। जो (भूषः ) पहिले हुया था (सः उ) वह ही (पुनः जायते) फिर उत्पन्न होता है। जो (मूतः) पहिले हुआ था (म:) वह हो (भव्यं भविष्यत् ) अय होता है और मागे भी होगा। पिता (शचीभिः) अपनी सब शक्तियोंके साथ (पुत्रं प्रविवेश) पुत्रमें प्रविष्ट होता है।" सूर्य चंद्र वायु आदि देवताओं के अंश मनुष्यादि प्राणियों के शरीरमें रहते हैं। वही आंख नाक आदि अवयव किंवा इंद्रियों के स्थानमें रहते हैं। इन देवतामोंमें प्रागको शक्ति व्यास है। यही व्यापक प्राण पूर्व देहको छोडकर दूसरे गर्भ में प्रविष्ट होता है । अर्थात् एकबार जन्म लेनेके पश्चात् पुनः जन्म लेता है। आत्माकी शक्तियोंका नाम शची है। इंद्रकी धर्मपत्नीका नाम शची होता है। धर्मपत्नीका भाव यहां निजशक्ति ही है। इंद्र जीवामा है, और उसकी क्तियां शची नामसे प्रसिद्ध है। पिताका भंश अपनी स शानियों के साथ पुत्र में प्रविष्ट होता है। पिता के अंगों, भयमों और इंद्रियों के समानदी पुनके कई अंग, भवयर और इंद्रिय होते हैं । स्वभाव तथा गुणधर्म मी कई अंशमें मिलते हैं। उप पातको देखने से पता लग सकता है, कि पिता अपनी शक्तियों के माय पुनमें किप प्रकार प्रविष्ट होता है। गृहस्थी लोगों को इस बात का विशेष विचार करना चाहिए, क्योंकि प्रजा निर्माण करना उनका ही विषय है। माता पिता अच्छे और बुरे गुणदोप संतानमें पाते हैं, इसलिये मातापिताको म्ययं निदोष होकर ही संतान इत्पन्न करने का विचार करना चाहिए। अर्थात दोषी मातापिताको संतान टरपस करनेका अधिकार नहीं है। हंस । एक पाद नात्पिादति सलिलावंस उच्चरन् । यदन स तमुत्खिदग्नवाप न श्वः स्थाप्न रात्री नाहः भ्यान व्युच्छेत्कदाचन ॥२१॥ "जलसे इस उपर उठता हुमा एक पविको उठाता नहीं। (अंग) - प्रिय ! यदि वह उस पाँवको उठावेगा तो भाज, कल, रात्रि, दिन, प्रकाश और अंधेरा कुछ भी नहीं होगा।" इंस"नाम प्राणका है । श्वास मदर जाने के समय "स" का चनि होता है और उच्छ्वास हेर मानेके समय "ह" का ध्वनि होता है। "ह भार स" मिलकर "स" शब्द प्राणवाचक बनता है। उसीके अन्य रूप "अहंसा, सोऽहं" भादि उपासनाके लिये बनाये गये हैं। इनमें 'हंस' शब्द ही मुख्य है । उलटा शब्द बनानेसे इसोका "सोऽहं" बन जाता है, अथवा ईस' के साथ 'नों मिलानेसे 'सोऽई बन जाता है। स-ह ह--स ओ-म् म्-~ओ (अ) सोऽहं. पाठक यहां दोनों प्रकार के रूप देख सकते हैं। मांप्रदायिक झगडोंसे दूर रहकर मूल वैदिक कल्पनाको यदि पाठक देखेंगे तो उनको पसा पाश्चर्य प्रनीत होगा । भो' शब्द भारमा वाचक है और इस' शब्द माणका वाचक है। मामाका प्राण के साथ इस प्रकार का सबध है। मामा प्रमाका याचक है और ग्रह्मका यादन ईस है, इस पौराणिक रूपकमें मामाका प्राणके सायका भखड सबधही वर्णन किया है। यह इस मानस सरोवरमें कोडा करता है। यही प्राण भी हृदयरूपी अन्त करणस्थानीय मालस- सरोवरमें क्रीडा कर रहा है। हृदयकमलमे जोवारमाझा निवास सुप्रसिद्ध है। अर्थात् कमलासन ब्रह्मदेव और उसका वाहन हंस, इसकी मूल वैदिक कल्पना यह स्पष्ट होती है। ग्रझा, ग्रादेव मारमा, जीवारमा, यह हम-वादन प्राण-वाहन कमल-मापन हदय-कमल मानस सरोवर प्रेरक कर्तादेव मंत करण (हृदय) प्रेरक मामा "यह - वेदमें हंसका वर्णन भनेक मंत्रों में भागया है, उसका मूल नाशप इस प्रकार देखना उचित है। वेदमें 'असौ अहं" (यजु० ४०११७) कहा है । "असु अर्थात् प्राणशक्तिके अंदर रहने वाला मैं मारमा भाव उक्त मंत्रका है। वही भाव उक्त रूपमें है। प्राणके साथ मामाका अवस्थान है। यह प्राण ही "स" है, यह (सलिलं) हृदयके मानस सरोवरमें क्रीडा करता है । श्वास लेनेके समय यह प्राण उस सरोवरमें गोता लगाता है और उच्छ्वास लेनेके समय उपर उढता है। यहां प्रश्न उत्पन्न होता है, कि जय उच्छ्वासके समय प्राण याहिर लाता है सय प्राणी मरता क्यों नहीं ? पूर्ण उच्छ्वास लेकर श्वासको पूर्ण पाहिर निकालनेपर भी मनुष्य मरता नहीं। इसका कारण इस मंत्र यसाया है। जिस प्रकार हंस पक्षी एक पर पानी में ही रसकर दूसरा पाय उपर उठाता है, उसी प्रकार प्राण ऊपर उठते समय अपना एक पावश्यक रमाशयमें जमाकर रखता है और दूसरे पतिकोही पाहिर उठाता है, भी दूसरे पांव को हिलाना नहीं। तात्पर्य प्राण अपनी एक शक्तिको शर्गममें स्थिर रखता हुमा दूसरी शनिमे वारि मार कार्य करता है । इसलिये मनुष्य मरता नहीं। यदि यह अपने दूसरे पायका भी बाहिर निकालेगा नो माम काल, दिन रात, प्रकाश धेश भादि कुछ भी नहीं होगा अचान का प्राणा जीवित नहीं रह सगा। जायन पश्चात् ही कालका सान होता है। इस प्रकारका यह प्राणका मध है। प्रत्येक मनुष्यको उमम विधार करके इस सपथका मान ठाक प्रकाराम पास करना चाहिए । 'य' वादके साय प्राणी उपासनाका प्रकार भी इस मसे प्यार होता है। धारक माय 'स' कारका श्रवण मोर उच्छामर माय 'कारका प्रण पानसे प्राण उपासना होता है । इसम चित्तकी एकामना पीनदी माध्य होती है। यही "सो" माण वम साथ श्रीवा प्रवण टग्याम के माय करनेसे हसवादी र बन जाता है। यह प्राग पासनाका प्रकार है । सांप्रदायिक तोगनि इनपर विलक्षण मार मिमि मा. - - रची हैं, परंतु मूलकी ओर ध्यान देकर झगडोंसे दूर रहनाही हमको उचित है । अब इसका और वर्णन देखिये- अपाचक्रं वर्तत एकनोमि सहनाक्षरं प्र पुरो नि पश्वा । अर्धन विश्व भुवनं जजान यदस्या कतमः स केतुः ॥ २२ ॥ भाट चक्रोंसे युक्त, सहस्र अक्षरोंसे व्यक्त मौर एकही केंद्र जिसका है ऐसा यह प्राणचक्र भागे और पीछे चलता है । आधे भागसे सब भुवनोंको उत्पन्न करने जो इसका भाधा भाग शेप रहा है वह किसका चिह्न है?" इस शरीरमें आठ चक्र है जिनमें प्राण जाता है और विलक्षण कार्य करता है । मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, सूर्य, अमाहत, विशुद्धि, भाज्ञा और सहस्रार ये आठ चक्र है । क्रमशः गुदासे लेकर सिर के ऊपर ले मागतक NIT स्थानों में ये क्षार चक है । पाठ मेरुदंड में इनकी स्थिति है। इस प्रत्येक चकमें प्राण जाता है और अपने अपने नियत कार्य करता है। जो मजन प्राणायामका अभ्यास करते हैं, उनको अपना प्राण इस चक्रमें पहुंचा है इस बानका अनुभव होता है, और वहाको स्थितिका मी पता लगता है। ऊपर मस्तिष्क में मइसाक्षर चक्रका स्थान है। यही मस्तिक- का मध्य भार मुख्य भाग है। प्राणका एक केंद्र हृदयमें है। इस प्रकार एक केंद्र माय माठ चकों मे सहस्र भारोंके द्वारा भागे और पीछे चलनेवाला यह प्राण धक है। बाम उच्छनाम तथा पान द्वारा प्राणचक्रकी मागे और पोल गति है। पाठकों को उचित है कि वे इन थानों को जानने और अनुभव करने का यरन करें। प्राणका एक भाग सरीरको शानियों के साथ संपध रखता है और दूपरा माग मानाकी शक्ति माथ मबंध ग्यता है। शारीरिक पाक्ति माय संबंध सिनेवाले प्रभाव मागका ज्ञान प्राप्त करना बडा सुगम है, परंतु मामिक शनि पाप ध खनेवाले माण भागका शान प्रात करना बहा कठिन है । आधे भागा माय म भुइनको बनाना है.जो इसका दू-रा अध है वह किमका चिह्न है अर्थात् उमा जान किससे हो सकता है ? भारमारे ज्ञान के साथ ही उसका ज्ञान हो सकता है। - नमन और प्रार्थना। यो अस्य विश्वजन्मन ईशे विश्वस्य चेष्टतः । अन्येपु क्षिप्रधन्वने तस्मै प्राण नमोऽस्तु ते ॥ २३ यो अस्य सर्वजन्मन ईशे सर्वस्य चेष्टतः । अतन्द्रो ब्रह्मणा धीरःप्राणो माऽनु विष्ठत ॥ २४ ॥ "हे प्राण (विश्व-जन्मनः) सयको जन्म देनेवाले मोर इस स (चेष्टतः हलचल करनेवाले जगदका जो ईश है, सब हान्यों में ( क्षिप्र- धन्वने ) शीघ्र गतिमाले मेरे लिये नमन है। सय जन्म धारण करनेवाले और हलचल करनेवाळे सबका जो स्वामी है, वह धैर्यमय प्राण भालस्य- रक्षित होकर (अहह्मणा ) बामशक्तिसे युक्त होता हुआ (मा) मेरे पास (पनु नितु) सदा रहे।" प्राण सबकाही ईश है, इस विषयमें पहिले ही मंत्रमें कहा है। सयमें गतिमा गौर सबमें मुख्य यह प्राण है। ब्रह्म अर्थात् आत्मशरिके साथ रहनेवाला यह प्राण मालस्यरहित होकर और धैर्यके साथ कार्य करनेमें समर्थ बनकर मेरे शारीरमें अनुकूलता के साथ रहे। यह REPा उपासकको मनमें धारण करना चाहिए। अन्य इंदियोमें पास्य होता है, प्राणमें भारस्य कभी नहीं होता। इसलिये माणका विशेषण भतन्द' अर्थात् मालपाहित ऐसा रखा है। यही भाव निम्न मंन्नमें कहा है। ऊर्ध्वः सुप्तेषु जागार ननु तिर्यङ् नि पद्यते । न सुतमस्य सुतेप्यनु शुधाय कश्चन ॥ २५ ॥ " (मुलेषु ) सम्र सो जानेपर भी यह प्राण (अ)सा रहकर जागता है। कभी तिरमा गिरता नहीं सबके सो जानेपर इसका सोना किसीने भी मुना नहीं है।" ।

P सर्व इवियों माराम लेता है; मलिसी बनता है; सो आता है और कोई गिर जाती है। पातु प्राणही रातदिन खडा रहकर जागता है, अथवा भार इस मंदिरकी सरक्षण करने के लिये खेदी रहकर पहारा करता है किमी सोता नहीं, की ममि नहीं करती और अपने कार्यों की पीछे नहीं इटता। सब इंद्रियां सोती हैं परंतु इस प्रानिकी सौंना कभी किसीने सुना दी नहीं । भयात् विश्राम न लेता हुआ यह प्राग रातदिन शरीरमें कार्य करता है। इसीलिये प्राण उपासना निरंतर हो सकर्ती हैं। देखिए, किसी मलिकन- पर रष्टि रखकर ध्यान करना हो तो दृष्टि पक जाती है। दृष्टिं कर्नेपर उसकी उपासना नेत्रों द्वारा नहीं हो सकती। इसी प्रकार अन्य इंद्रियों थकती हैं और विश्राम चाहती हैं, इसलिये अन्य इंद्रियोंके साथ पोसना निरंतर नहीं हो सकती। परंतु यह प्राण कभी थकता नहीं और कमी विश्राम नहीं चाहता। इसलिये इसके साथ जो प्राग उपासना की जाती है वह निरंतर हो सकती है । विना रुकावट प्राणोपासना हो सकती है, इस- लिये इसका मयत महत्व है । ता और देखिए- प्राण मा मत् पर्यावृतो न मदन्यो भविष्यसि । अपां गर्भमिव जीवसे प्राण वध्नामि त्वा मयि ॥२६॥ "हे प्राण ! मेरेसे पृथक् न होओं। मेरेसे दूर न होमो पानी के गर्भ समान, हे प्राण ! जीवन के लिये मेरे अंदर तुझको यांधता हूँ। "हे माण ! मेरेसे दूर न हो जाओ, दीर्घ कालतक मेरे अंदर रहो, मैं दीर्घ जीवन व्यतीत करूंगा, मैं दीर्घ माधुसे युक्त होकर सौ वर्षसे भी अधिक जीवन व्यतीत करूंगी । इसलिये मेरेसे पृथर न होनी ! यह भावना उपासकको मनमें धारण करना चाहिये। अबमय मन मोर भापोमय ग्राण है। इसलिये प्राणको पानीको गर्भ कही। उपासक मनमें यह भावना स्थिर रहनी चाहिए, कि मैंने शणायामादि द्वारा अपने शगरम प्राणको बांधकर रख दिया है। इसलिये यह प्राणे कभी वियुक्त होकर दूर ७ (पै.चि.) - . . " ।

नहीं होगा। प्राणायामादि साधनोंपर हद विश्वास रखकर, उन सापोंके द्वारा मेरे शरीरमें प्राण स्थिर हुभा है, ऐसा दृढ भाव चाहिए और कभी अकालमृत्युका विघातक मनमें नहीं माना चाहिए। मामापर विश्वास रखनेसे उक्त भावना रद हो जाती है । इस प्राणसूक्तमें निम्न भाव है . प्राणसूक्तका सारांश । (१) प्राणके आधीन ही सब कुछ है, पाणही सबका मुखिया है। (२)माण पृथ्वीपर है, अन्तरिक्ष में हैं और घुलोकमें है। (३) धुलोकका प्राण सूर्यकिरणों द्वारा पृथ्वीपर माता है. अंतरिक्षमा प्राण वृष्टिद्वारा पृथ्वीपर पहुंचता है, और पृथ्वीपरका प्राण यहां सदाही यायुरूपसे रहता है। (४)मंतरिक्षस्य और पुलोकस्य प्राणले ही सपका जीवन है। इस पाणकी प्रातिसे सयको भानंद होता है। (५)एक ही प्राण व्यक्ति के शरीर में प्राण, अपान आदि रूप में परिणत होता है । शरीरके अंग, अवयव और इद्रियों में भर्यात् सर्वत्र प्राण ही कार्य करवा (६) प्राणही सम औषधियों की मौषधि है। प्राणो कारण ही सय शरीरके दोष दूर होते हैं। प्राणकी अनुकूलता म होनेपर कोई मौषध कार्य नहीं कर सकता, और प्राणकी अनुकूलता होनेपर विना औपच मारोग्य रद्द सकता है। (७)माणही दीर्घमायु देनेवाला है। (८)माण हो सका पिता और पालक है और सर्वत्र व्यापक भी है। (२) , रोग और यल ये सब प्राणके कारण ही होते हैं। सर इंदिया प्राणके माय रहनेपर यल प्राप्त करती हैं। श्रेष्ठ प्राणको वश में काके बल प्रा पा सकते हैं। सन्यनिष्ट पुरुष प्राणको प्रतासे डसम योग्यता प्राप्त करते हैं। - - (१०) प्रामके साथ ही सब देवताएं हैं। सबको प्रेरणा करनेवाला । । (1) धान्यमें प्राण रहता है। वह भोजनके द्वारा शरीरमें जाकर परीरका बल बढाता है (१२) गर्भ में भी प्राण कार्य करता है। प्राणकी प्रेरणाले ही गर्भ बाहिर पाता है मौर बढता है। (१३) माणके द्वाराही पिताके सब गुणकर्म स्वभाव और शक्तियां पुनमें भाती है (१४) प्राण ही हंस है और यह हृदयके मानस सरोवरमें कीटा करता है। जब यह घले जाता है, तब कुछ भी ज्ञान नहीं होता। (१५) शरीरके माठ चक्रोंमें, मस्तिष्कमें तथा हृदयके केंद्र में मिल रूपसे प्राण रहता है। यह स्थूल शकिम सब शरीरका धारण करता है और शुभम शकिसे मारमाके साथ गुप्त संबंध रखता है। (१६) प्राणमें भालस्य और पकावट नहीं होती है। मीति और संकोच नहीं होता। क्योंकि इसका प्रा भयवा मारमाके साथ संबंध है। (१०) यह शरीरमं रहता हुमा सडा पहारा करता है। अन्य दियो यकनी, दमती और सोती है,परंतु यह कभी थकता नहीं और कमी विधाम नहीं लेता। इसके विश्राम होनेपर मृत्यु ही होता है। (१८) इसलिये सबको प्राणकी स्वाधीनता प्राप्त करना चाहिए और उसकी शक्ति बलवान होना चाहिए। इस प्रकार इस सूक्तका भार देखने के पश्चात् वेदोंमें मन्यन प्राणविषयक जो जो उपदेश है उनका विचार करते हैं। ऋग्वेदमें प्राणविषयक उपदेश। अदमें प्राणविषयक निम्न मंत्र है, उनको देखनेसे ऋग्वेदका इस विषय में उपदेश ज्ञात हो सकता है।- (१००) प्राणाद्वायुरमापत॥ "परमेश्वरीय प्राणशक्तिसे इस वायुकी उत्पत्ति हो गई है । "पागाई हमारा पृथ्वीस्थानीय प्राण है । पायुके विना क्षणमात्र मी जीवन रहना कठिन है । सपही प्राणी इम घायुको चाहते है। परंतु कोई पहम समले कि यह घायुही वास्तविक प्राण ,क्याकि परमेश्वरकी प्राणशक्तिसे इसकी उत्पत्ति है। यह घायु हमारे फेंफडॉके अंदर जब जाता है, तब उसके माय परमेरकी प्राणशक्ति हमारे अंदर जाती है, और उसमे हमारा जीवन होता है। यह माव है कि जो प्राणायामके समय मनमें धारण करना चाहिए । माणही मायु है, इस विषपमें निम्न मंत्र देखिए- मायुनं प्राणः ॥ (1) "प्राणही भायु है।" जबतक प्राण रहता है, सवतक ही जीवन रहता है। इसलिये जो दीर्घायु चाहते हैं उनको उचित है, कि ये अपने प्राणको तया माणके स्थानको मरमान पनाये ।प्राणका स्थान फेंफॉमें पळयान् करनेसे प्राणमें पल पा जाता है और उसके द्वारा दीर्घ भायु प्राप्त हो सकती है। असु-नीति । राजनीति, समाजनीति, गृहनीति इन शब्दोंके समान "असुनीति शब्द है। राज्य चलानेका प्रकार राजनीतिसे म्यक होग है, इसी प्रकार "म" अर्थात् प्राणोंगा व्यवहार काही वि "ममुनीति" शब्दसे प्यक होती है | Guide to life, way to life अर्थात् "जीवनका मार्ग" इस भाषको" भमुनीति शम्द पर रा है, मा प्रो. मोक्षमुछा, प्रो. गॅप मादिका कयन मत्य है । दलिए- असुनीते पुनरस्मासु रक्षः पुनः प्राणामह नो धेहि भोगम् । ज्यो पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया न स्वस्ति । (2.1.५९) * 2 - " सुनीते! यहां हमारे अंदर पुनः चक्षु, प्राण और भोग धारण को। सूर्यका उदय हम बहुत देरत देख सकें। अनुमते हम भरको स्वास्थ्यसे युक्त रखो।" "मसुकी नीति" यर्थात् "प्राण धारण करनेकी रीति" अब ज्ञात होती है तब चक्षुकी शक्ति हीन होनेपर भी पुनः सत्तम टि प्राप्त की जा सकती प्राण जानेको संभावना होनेपर भी पुनः प्राणकी सिरता की जा सकती है, भोग भोगनेकी मशक्यता होनेपर भी भोग भोगमेकी शक्यता हो पती है । मृत्यु पास मानेके कारण सूप दर्शन शक्य होनेपर भी दीर्ष बाकी प्राप्ति होने के पक्षात् पुनः सूर्यकी उपारना हो सकती है। भाणनीति के मनुफूल मति रखने में यह सब कुछ हो सकता है, इसमें कोई दशहानहीं. समा- मसुनीते मनो अस्मासु धारय जोयातये प्रतिरान आयुः। रारंधि नः सूर्यस्य संशितन त्व तन्वं वर्धयस्य । "भमुनीते ! हमारे अंदर मनजी धारणा करो और हमारी आयु वरी की को। सूर्यका दर्शन हम करें। घीसे शरीर पढायो।" मायुप्प बहानेकी गति इस मंत्र में वर्णन की है। पहिली र मनकी भारत की है। मनही धारणा ऐमीर और पक्की कानी चाहिये कि, योग साधनादि द्वारा मवश्यही दीर्घमायु प्राप्त करूगा, या किमी काम भी मेरी मायुधाण नहीं होगी। इस प्रकार मनकी परळी धारणा भनी शाहिये। मनको सशक्तिपर ही मार मनके पामर दी रित होती है। सूर्यप्रका दीर्घमायुके साथ संबंध वेदमें सुपिडा। प्राणायाम माहिदा सो मनुष्य प्रागका बल बाना राहते हैं, उनमें भी बहुत बार अपना शरीर पुष्ट रखना चार। शापामगुरु पर चीन स्थानमे शरीर का होता है। इसलिए मालाधाम पनाओं को अपने मोउनमें भी (१०२) , इस प्रकार यह प्राणनीतिका शास्त्र है। पाठक इन मंत्रोंका विचार करे दीर्घ आयु प्राप्त करनेके पायोका साधन प्राणापामादि द्वारा करें। यजुर्वेद में प्राणविषयक उपदेश। प्राणकी वृद्धि। प्राणस्त आप्पायताम् ॥ (या य०६५) "रा प्राग संवर्धन करे।" माणकी शक्ति पानेशी घीही भाव- श्यकता है, क्योंकि प्रागी शक्ति के साथही मप भयगों की शहि संकल रखती है। इसकी सूचना निम्न मंत्र दे रहा है- ऐन्द्रमाणो अंगे अंगे निदाध्यदेन्द्र उदानो अंगे अंगे निधीतः । (पा०५०६२) "(पेंदः प्राण:)मामाकी शकिसे प्रेरित प्राण प्रत्येक अंगमें पहुंचा ६. मामाली शादि प्रेरित उदान प्रत्येक मंगमें एसा है।" इस प्रकार मातरिक शनिका पणन वेदने किया है। प्रत्ये पंगमें प्राण र पांत पहा मामाही प्रेरणामे कार्य करता। इस मंत्रसे पर पता मिलती है, कि जिम भंग, अवयव भपया इंद्रियमें माणको गति म्यू होगी, यहाँ मामारी प्रबल पारित द्वारा प्रागको शक्ति पास सकती है। यही पूर्व सोम मागि-रस Eि" है। अपने किस अंगों मागीन्यूनता है, यह जानना और यहां मनी माPिRE THIS द्वारा पागको पहुंगाना गरिए! यही माना मारोग्य बहानेका राष है। पंदमें जो भागिर विधा", पापही भाग कामे विपपमें निम्न मंत्र देखिए- प्रापं में पारापान मे पादिव्यानं मे पादि। या.. " "मो जाम, परान शाम मात्र हो। हम मानत्र का हीये भाग सा का संगमापा- - (९०३) . . • प्राणं ते शुन्धामि । ( वा० २०६९) प्राण मेतर्पयत ।। (वा० २०६३१) "प्राणकी पवित्रता करता हूं। प्राणको तृति कीजिए।" सृप्ति और पवित्रतासे ही प्राणका संरक्षण होता है। अतृप्त इंद्रिय होनेसे मनुष्य मोगोंको मोर जाता है, और पविठ होग है। इस प्रकार भोगों में फंसे हुए मनुष्य अपनी प्राणको शकिय स्त्रो बैठठे है। इसलिये प्राणका संवर्धन कानेवाले मनुष्यों को उचित है कि वे अपना जीवन पवित्रतासे और नित्यतृप्त पृत्तिम व्यतीत करें। अपवित्रता और मसंतुष्टता य दो दोप माणकी साक घटानेवाले हैं । शक्ति घटाने- वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि-- प्राणन वीर्य नसि (या. य० २२१४९) "नाकमें प्राणशक्ति और बीय यदामो।"प्राणशक्ति नासिकाके साय संबंध रखती है, और जयं यह प्राणशक्ति बलवान होती है, सप घोपं भी बनता है और स्सिा होता है। पोप और प्राण ये दोनों शरियां साप साप रहती है। शरीर धार्य रहने से प्राण रहता है, और प्राण साप षीय भी रहता है। एक दूपरेके आश्रयसे रहनेवाली ये शक्तियां है। जो मनुष्य प्रसाधयं की रक्षा करके अपीता बनने है, उनका भाग भी बलवान हो जाता है, और उनको आसानीमे प्राणायामकी सिदि होती - या जो प्रारंमसे प्राणायाममा मभ्याम नियमपूर्वक करत है, उनम पी स्थिर से जाता है। यपि किसीका सिमी कारण प्रपम भायुमें प्राधर्ष न रहाणे. तो भी या नियमपूर्वक मनुधानसे उमर मायुमें माणसापनसे अपने शरीर में पागमस्तिका साधन मार पीपंरक्षण का 'सकता है। जिसका समय मादि प्राममेही मिद होता है, उससे गीx भोर सहन सिदि होगी है परंतु विसको मारमसे सिदि नहीं होती, - , उसको वह वात प्रयत्नसे सिद्ध होती है। प्राशशक्तिके संवर्धन उपायों में गायन भी एक उपाय है- गायन और प्राणाशात । साम प्राणं प्रपद्य । (दा. य३१) मागको लेकर मामकी शरण लेता है। सामवेद गायन और उपासनाक। वेद है। ईश उपासना और ईशगुणों के गायनसे प्राणका पल पड़ता है। प्रेवल गानवियामे भी मनकी एकाग्रता और शाति प्राप्त होती है। इस- लिये गायनसे दीर्घ भायु और भाग्य प्राप्त हो सकता है। गायक सरोक यदि दुर्यसनोंमें न करेंगे तो ये मन्यों की अपेक्षा अधिक दीर्घ भायु मोर भाग्य प्राप्त कर सकते हैं । गायनका बारोग्यके माय मस्यंत सबध है। उपासनाळे साप भी गायनका मस्त मध है। मन गायनमे उपामग्रामें मृत्यत साधीन होता है और यही नलीनद्रा प्राणपिका प्रबल पारनेवारी यह बात और है कि गायनका प्रधा करमयाले मामालके सीपुरमा धापने भाषण की गिरा दिये हैं। पातु या दोष गायमका नहीं है, यह उन मनुष्योहा दोष है। तारपय यह है कि जो पाठक अपने प्राराको मूलयान करना चाहते है, ये सामान मगर मी, अथवा साधारण गायन सीसकर उसका उपासनामें पयोग करके मनकी छडीनता प्राप्त मपि प्राणापानी।। पा..." 'मोपदा प्राग मोर मपान पनयान हें।' पहरा हरएक मनुष्य सभापत. धारण करता ही है। परंतु कमी कमी प्यार उपयामे विसह करता है। जानके मनुमार सदार डोभापमा र कमी प्रकारका विष हो नहो या न माग प्रकरण चला है। इमाम सादिक वायुहे माय भोर पदर सय मामिका मादि स्थानके साथ है इसलिये कहा है।

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जातं प्राणेन मानेन नासिके ।। (वा. प० २५४२)
माणसे वायुको प्रसबता और मपानसे नामिकाकी पूर्तता करना शाहिए।
बाम झुधि और प्रसन्न पायुके साथ प्राण हमारे शरीरोंमें जाता है. मौर
मालिका ही उसका प्रबश द्वार है। मह घायुको प्रसन्नतामार नामिकाकी
अदि अवश्य करना चाहिए । नाकको मलिनता भार अपवित्रताके कारण
पाणको गतिमें रुकावट होती है। प्राण प्रतिष्ठाके लिए ही हमारे सम
प्रवरन होने चाहिए, इसकी सूचना निम्न मंत्रोंमे मिलती-
प्राणकी प्रतिष्ठा
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाथादानाय प्रतिष्ठाये चरित्राय।
. या०प० २३:१९, १४॥१२.१५६४)
विश्वस्मै भाणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्यानियच्छ ।
(घा० ५० १३१२१, ११.४ १५/५८)
प्राणाय स्वाहाऽपानाय स्वाहा व्यानाय स्वाहा।
। पा० ५० २२२२१२८)
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अर्थात् इंदियों के मोग भोगनेके लिये जो शक्ति खर्च हो रही है, उसका बहुतसा हिस्सा प्राणकी शक्ति बढानेके लिये सर्च होना चाहिररामनुष्यों के सामान्य व्यवहारमें देखा जायगा तो प्रतीत होगा कि इंद्वियभोग भोगने में यदि शक्तिके १०० मेंसे ९९ मागका स्वचं हो रहा है तो प्राण संबधनमें एक भाग भी खर्च नहीं होता है । मुख्य प्राणके लिये कुछ भी शक्ति नहीं खर्च होती परंतु गोण इंद्रियभोगके लिये ही सब शक्तिका म्यय हो रहा है !! क्या यह आश्वयं नहीं है। वास्तवमें मुख्यके लिये अधिक और गौण के लिये फम व्यय होना चाहिए यही वेदमें कहा है कि प्राणसवर्धनके लिये अपनी शक्तिका स्वाहा करो । अपना समय, अपना प्रयान, अपना पल और अपने अन्य साधन प्राणपंवर्धन के लिये कितने खर्च किये जाते हैं और भोगोंके लिये किसने खर्च किये जाते हैं, इसका विधार कीजिए । मनुष्योंका उल्टा व्यवहार हो रहा है, इसलिये इस विषयमें सावधानत । रखना चाहिए । प्रतिदिनका ऐसा विभाग करना चाहिये कि जिसमें पहुसस । हिस्सा प्राणवर्धन कार्यके लिये समर्पित हो सके। देखिए- राजा में प्राणः॥ (पा. य.२०१२) "मेरा प्राण राजा है" सब शरीरका विचार कीजिए तो भापको पता लग जायगा कि सरका राजा प्राण है। माप समझ लीजिए कि अपना प्राण यह सचमुच गजा है।जय मापके घामें राजा ही अतिथि माठा है, उस समय आप राजामा ही आदरातिथ्य करते हैं, और उनके नौकरों तरफ ध्यान अवश्य देते हैं. परंतु जितना राजाकी ओर ध्यान दिया जाता ६ उतना भन्यों के विषय में नहीं दिया जाता। यही न्याय यहां है। इस शरीर में प्राण नामक राजा अतिथि पाया है और उसके अनुचर अन्य दि. यगण हैं । इसस्पिं प्राणकी सेवा शुक्ष्म अधिक करना चाहिए, क्योंकि यह ठीक रहा, तो मन्य अनुपा रीक रह सकते हैं परंतु यदि गमन भासंतुष्ट होकर चले गया वो एक भी मनुचा भापकी महायता नहीं कर 1 सकेगा।

(१०७) भाभकल इंद्रियोंके भोग बढानमें सब लोक को है। प्राणसी शक्ति बढानेका कोई ख्याल नहीं करता !!! इसलिये प्राण प्रसन्न होकर शीघ्रही इस शरीरको छोड़ देता है। जब प्राण छोड़ने लगता है, तब अन्य इंद्रिय- अवितयां भी उसके साथ इस शरीरको छोड़ देती हैं। यही अल्पायुवाका कारण है। परतु इसका विचार बहुतही थोडे लोग प्रारंमसे करते हैं। वास्पर्य इंद्रिप भोग भोगने के लिये शक्ति कम खर्च करनी चाहिए, इसका संयमही करना चाहिए; और जो पल होगा उसको अर्पण करके प्राणकी शवित पढाने में पराकाष्ठा करनी चाहिए । अपने प्राणको चुरे कार्यों में समर्पित करनेसे यही ही हानि होती है। कितने दुर्व्यसन और कितने कुकर्म हैं कि जिनमें लोक अपने प्राण अर्पण करने के लिये भानसे प्रवृत्त होते हैं !! वास्तव में सरकीके साथही अपने प्राणोंको जोडना चाहिए। देखिए वेद कहता है- सत्कर्म और प्राण । आयुर्यज्ञेन कल्पतां प्राणो यझेन फल्पताम् । (वा य०९।२१ १८२९, १२०३३) प्राणश्च मेऽपानश्च मे ध्यानश्च मे अमुध मे ...यजन कल्पन्नाम्॥ (था. य. १८९) प्राणाश्च मे योन कल्पताम् । (वा० २० १८१२३) "मेरी भायु यज्ञसे बढे, मेग पाण यससे समर्थ हो । मेरा प्राण. मगन, न्यान और साधारण माण याद्वारा परवान बने । मेरा प्राण यशके लिये समर्पित हो।" यज्ञका अर्थ सरकम है। जिस कर्मके साप यहा सत्कार होता है, समें विशेष इटर एकतासी पृद्धि होती है और परस्पर उपकार होता है पद पर हुमा करता है। पक्ष मनेक प्रकारके ,पांतु पुत्र रूपसे मर यहीका वार उस प्रकारकाती है। इसलिये यशके साप प्रागा संप ... - (१०८) . मानेरो प्राणमें बल बहने लाता है। वार्य तथा खुदगीक कोंमें लगे रहनसे प्राणशक्तिका संकोच होता है, और जनता के हितके व्यापक कर्म करनेमें प्रवृत्त होनसे प्राणकी शक्ति विकसित होती है। आशा है कि पाठक इस प्रकारके शुभ कमि अपने भापको समर्पित करके अपने प्राणको विशाल करेंगे। वेदमें अग्नि आदि देवतामोंका जहा यणन माया है वह उनका प्राणरक्षक गुण भी वर्णन किया है। क्योंकि जो देवता माणरक्षक होगी उसकी ही उपासना करनी चाहिए । देखिए- प्राणदाता आग्नेि। प्राणदा अपानदा व्यानदा वादा वरिवोदाः ।। (था. 2001१५) प्राणपा मे अपानपाश्चक्षुप्पाः श्रीपाश्च मे चाची म विश्वभपजा मनसोऽसि विलायकः॥ (या. य० २०३४) व प्राण, अपान ध्यान, तेज और स्वातंत्र्य देनवाला है प्राण, अपान, चक्षु, श्रीन आदिका संरक्षक है, मेरे पाणी दोष दूर करने. पाला तथा मनको शुद्ध और पवित्र करनेवाला है। " प्राणका साकममें प्रदान करना, प्राणका संरक्षण करना, इंद्रियों का संयम करना, वाचाके दोष दूर करने और मनकी पवित्रता करना, यह कार्य सूक्ष्म रूपसे उक्त मग्रम कहा है। इसना करने में ही मनुष्यका वा पार हो सकता है। मन और वाणाको शुद्धता न होने से जगमें कितने मन हो रहे हैं, इनकी कोई गिनती नहीं हो सकती ।मन, पाणी, इदियों और प्रागइनकी स्वाधीनता प्राप्त करने के लिये ही सब धर्म भार कम हो । इमलिये मानी उनति चाहनेवालोंकी हम कन्यकी भोर मरना एयाय सदा रखना चाहिए । भव प्राणी विधि बतानेवाला बमला मंत्र, देखिए- । मेरे - - (१०) भये पुरो भुवः । तस्य प्राणो भौवायनो वसन्तः प्राणायना (पा. २०३५) "या मागे मुक्लॉक है, उसमें रहता है इसलिये प्राणको भौकायन कहते हैं। बसन्त प्राणायन है।" भूलोक पृथ्वी है, और अंतरिक्ष छोक भुवलोक है । यह प्राणका स्थान ३, इस आकाशमें प्राण व्यापक है, वायुका और प्राणका एकही स्थान है। क्षिमें ही दोनों रहते है। संत प्राणका ऋतु है। क्योंकि इस ऋतुमें सब जगत्में प्राणशक्तिका संचार होकर सब वृक्षोंको नवजीवन प्राप्त होता है। यह माणका अवतार हरएकको देखना चाहिए। प्रण मंचारसे जगद- में कितना परिवर्तन होता है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव यहां दिखाई देता है। इस तुमें सर वृक्ष आदि नूतन पल्लवोंसे सुशोभित होते हैं, फलोंसे पुक्त होनेके कारण पूर्णताको प्राप्त होते हैं। फल फूल और पल्लव ही सब . टिक नवजीवनकी साक्षी देते है। इसी प्रकार जिनको प्राण प्रसोका २ उनको भी सफलता प्राप्त होती है। जिस प्रकार सप सृष्टि माणकी प्रसमासे पुष्पपी मोर पसी होती है, उसी प्रकार मनुष्य मी प्राणको वश करनेसे अपने ममीटमें सफलता प्राप्त कर सकता है। प्राणके साथ इंद्रियोंका विकास । मोनेके समय मपने इंदिप कैसे डीन होते है और फिर जागृतिक समर से व्यक होते हैं, इसका विधार प्रत्येकको करना चाहिए। इससे पनामामार प्राणशक्तिके महत्वका पता भगता है। इसका प्रसार । - पुनमनः पुनरायुमं भागन्युनः प्राणा पुनरात्मा म आगन् पुनः पुनः आ म आगन् । वैश्वानरो अदग्धस्तनपा माग्निनः पातु दुरिमादयधात् । "मेरा मन, माप, माण, मारमा, पशु, थोत्र मादि पुनः मुझे मra (११०) हुए हैं। शरीरका रक्षक, स जनोंका हितकारी मारमा पापोंसे हम्म सबको बचाये।" सोनेके समय मन आदि सब इंद्रियां लीन हो गई यी, यद्यपि प्राम खागता था तथापि उसके कार्यका भी पता हमको नहीं था। वह सप फल के समान भाज पुनः प्राप्त हुभाहे । यह भारमाफी शक्तिका कितना पायकारक प्रभाव है ? यह मारमशक्तिहमको पापोंसे बचाये । प्राणत. फिके साथ इन शक्तियों का लीन होना और पुन: प्राप्त होना, प्रतिदिन हो रहा है। इसका विचार करनेसे पुनर्जन्मका ज्ञान होता है। क्योंकि जो पात निद्राके समय होती है यह ही सीही मृत्युक समय होती है। और उसी प्रकार महापलय समयमें भी होती है। नियम सर्वत्र एकही है । प्राणके साथ अन्य इंद्रियां कैसी रहती है, प्राण सा anा है और अन्य इंद्रियां कैमी यफ कर लीन होती है, इसका विधार करनेसे अपनी बामशक्तिका ज्ञान होता है, मार पर ज्ञान अपनी शक्तिका विकास करनेके लिग सहायक होता है। अपने प्राणा विश्वव्यापक माणके साथ संबंध देखना चाहिए, इसकी सूचना निम्न मंत्र देन है- विश्वव्यापक प्राण । संप्राणः प्राणन गप्छनाम् । (वा० २०६८) सं ते प्राणो वातेन गच्छताम् ॥ (पाय ६९.) "अपना प्राण विश्वमा मागके साथ संगत हो।ग प्राण वायुके साप सगत हो. ." ताप अपना प्राण अलग नहीं है। सार्वभौमिक प्रागका एक हिस्सा है। इस रहिसे अपने प्राणको जानना चरिए। सब अंतरिक्ष में प्राणका समुद्र भरा है, उसमेंसे थोडासा माग मोमंदर माकर भेरीरको जीवन सा है भास यास द्वारा पहही सार्वभौमिक प्रदर जा रहा है, इत्यादि मायना मनमें पारण करना चाहिए । वात्पर्य यह सार्वमामिक रसा धारण करनी चाहिए। सबकी नदिमें एककी 1 . पाति है, समष्टिकी रातिमें व्यष्टिकी मलाई है यह वैदिक सिद्धांत है। इसलिये समरिकी ग्यापक tre प्रत्येक उपासकके अंदर उत्पन्न होनी चाहिए । वह उक्त प्रकारसे हो सकती है । इस प्राणकी और बातें निम्न मंत्र में देखिए- लडनेवाला प्राण । अविन मेषो नसि घोर्याय, प्राणस्य पंथा अमृतो ग्रहाभ्याम् । सरस्वत्युपयाकान नस्यानि वहिर्वदरैज्ञान । (पा० २० १९९०) "(मेषःग) मेंढे समान लढनेवाला (पविः) संरक्षक प्राणवायु पीमके लिये (मपि) नाकमें रखा है ।(महाभ्यां) भास उपल्यास रूप दोनों प्राणों से प्राणका अमृतमय मार्ग बना है। (यदी उपवाक) सिर स्तुतियों के द्वारा (सरस्वती ) मुषुम्ना नादी (या सर्व गैर व्यापक स्थान प्राणको सपा (नस्यानि) नामिका साय संमंध रखनेवाः भन्य प्राणोंको (म जजान ) प्रकट करती है।" पर्षा करनेवाला, घायुके माय युद्ध काके उसका पराजय करने वाला मेंता होता है। यही पाणका कार्य अपने शरीरमें है। सय म्याधियों भार भीर समसयुभोंके साप सबका पारीरका भारोग्य नित्य स्थिर रखने काय करनेवाला महापौर अपने सारमें मुख्य प्राण ही है। यह मेंडके समान लाता है। इसका नाम "aft" क्योंकि यह भवन पनि मर मरीका क्षण करता है भयन भन्य मर्ष मो पा एखने योग्य है- गति, काति, जाति, प्ति, ज्ञान प्रवेश प्रवर्ग स्वामित्र, प्रार्थना, कर्म, दया, म, प्राप्ति, मालिंगन, दिवा, पान, मापार वृद्धि इसने भए पातुमय है। ये सब अयं प्राणवाचक "षि" सदमें है। प्राण कदिन समास पक्क होते हैं। पास इन प्रयास कर अपने प्राग अमीर की जाननेपालको। रक्षण, - इतने कार्य करनेघाला संरक्षक प्राण हमारी मासिकामें रहा है। मासिका स्थानीय एकही प्राण हमारे शरीरमें उक्त कार्य करता है। यही इसका महत्व । यह प्राणका माग "म-मृत" मन है । अर्थात् इस मार्गरे मरण नहीं है। इस मार्गका रक्षण करनेवाले दो मह है। वास और उच्छ्वास "ये दो ग्रह इस मार्गका संरक्षण कर रहे हैं। सबको स्वाधीन रखनेवाले, सयका ग्रहण करनेवाले ग्रह होते हैं। श्वास और उच्छ्नामोंसे सब शरीरका उत्सम ग्रहण हो रहा है, इसलिये ये ग्रह हैं। इन दो प्रहारे कार्यसे प्राणका मार्ग मृत्युरहित हुमा है, जपतक वास और उच्छास चलते है. तयतक मृत्यु होताही नहीं, इसलिये श्वासोच्छ्ासके मास्तरव- वक शरीरमें 'अमृत" ही रहता है । परंतु जब ये दो मई दूर हो जाते हैं, म मरण भाता है। "इडा पिंगला और सुपुम्ना" ये सीन नाटिया शरीरमें हैं। इन्दीले क्रमसे "गंगा यमुना और सरस्वती" कहा जाता है। भयात् सरस्वती सुपुम्ना है। इसमें प्राणकी प्रेरक शक्ति है। स्थिरचितसे जो उपासना करते हैं, अर्थात् र विश्वाससे जो परमात्माकी भक्ति करते है, उनके दर सुपुम्ना द्वारा यह प्राण विशेष प्रभाव बनाता है । तात्पर्य उपासनांक सायही प्राणका यळ बढता है। ज्यान प्राणे यह है कि जो सब शरीरमे व्यापक है, और अन्य मस्य अर्थात् नासिकाके माय संबंध रखनें. चाळे प्राण है । इन सब प्राणों की प्रेरणा ठेक्स सुपुम्ना करती है। परमधरे भक्तिरायल इस सुपुम्नामें पढता है और इसके द्वारा प्राणों का सामय भी प्रकट होता है। सरस्वतीम प्राण इस मत्रमें प्राणायाम साधनकी पहुवौं गुम नावे सरल शब्दोद्वारा लिखा है, इसरिये पाटकोंको हम मंग्रदा विशेष विचार करना चाहिए। इस मंत्रमें जिस सरस्वतीका वन माया उसीका वर्णन निम्न मंत्र पेखिए- - अश्विना तेजसा चक्षःप्राणेन सरस्वती धीर्यम् । वाचन्द्रोपलेनेन्द्राय दधुरिन्द्रियम् । (२. २०१८) "मधिदेव तेजके साय चक्षु देते हैं, सास्ववी प्राणशक्तिके साप वीर्य देती है, इंद्र (इंद्राय) जीवारमा लिये वाणी और पलके साप हंदिय- शकि मर्पण करता है।" इसमें सरस्वती जीवनशकिके साय पीयं देवी है ऐसा कहा है। अधिनौ धान्दा भी पूणेक सपुम्ना नादीका पाचक है। अधिनी शब्द धन और भण शकियों का याचक है। इस मंत्र में दो इंद्र शब्द है पदिला परमामाका बाधक भार दूसरा जीवारमाका वाधक है । इंद्रिय शब्द मामाकी शक्तिका याचक है। कई लोग सरस्वती का नदी मादि अर्थ लेकर विलापप्प अयं करते हैं, उनको यह बात मरण रखनी चाहिए कि वैदिक माध्यामिक शक्तियों के पाना मुख्यतः है, पशात अन्य पदायोंके वाचक है। मरतु मम प्राणविषयमें भऔर दो मंत्र देखिए- भोजन और प्राण। धान्यमसि धिनुहि देयान माणाय त्योदानाय स्था व्यानाय त्या दोघांमनु प्रसितिमानुषे धाव (प. २२.) प्राणाय मे पोंदा पर्चसे पवस्व व्यानाय मे पदा यस पयस्योदानाय मे घोंदा पर्चसे पयस्य ॥ (य .२०) "धाम्प है। देवों को पन्य को प्राग, ग्दान गौर पाने के लिये । स्पी कासाई मायुष्य के लिये मांदा धारण कावा मेरे प्राण, म्पान धीर दाम के तेजी वृद्धि दिये गुद बनो।" भरि पायापार नियारिक देशको सुद, पवित्र भी प्रपा परमार भोमनसे प्रागसब पाता हे मार भाउन्य खता शामे मामी मानि रिमित होती है, इत्यादि बहुव उत्तम भाव ८ (३.10.) + १ (११४) - - इसमयका उक मंत्रोंमें पाठक देख सकते हैं । क्या और एक मंत्र देखिये-- सहस्राक्ष अग्नि। अग्ने सहस्राक्ष शतमुधंछतं ते प्राणाः पहवं व्यानाः । त्यरसाहस्रस्य रायशिप तस्मै ते विधेम वाजाय स्वाहा। (घा.य. १७.७१) "हे महन नेग्रवाले भग्ने ? तेरे सैकडों प्राण, मैकरों उदान मार सहज ध्यान हैं। सहनों धनोपर मेरा प्रभुत्व है। इसालय शक्ति के लिये हमरी मासा करते हैं।" सहसान अनि" भारमा ही है। शतक्रतु, इंद, सहयाक्ष बादिशब्द मारमावाचक ही है। सहनतेजोका धारण करनेवाला भारमाही सहवास है। प्राण दान म्यान मादि सब प्रामकड़ों प्रकार के हैं। प्रत्येक प्राणका स्थान शरीरम निशित है । दृदय में प्राण है, गुदा के प्रावमें मपान है। नाभिस्थान में समान इ. कंडमें दान और सर्व शरमें ध्यान है। प्रत्येक स्थानमें छोटे मोटे भनेक अवयव है, और प्रत्येक भययको सूक्ष्म भेद सहयों है। प्रत्येक स्थानों और सूक्ष्ममे मुहमभेद में उस उस प्रागको स्थिति है, तात्पर्य या सेक भार सहयों भेद हो सकसे है। हम प्रकार यह प्रागमकिडा सिम्तार हजारों रूपोंपिमा परी मर सूक्ष्म म्हम मशमें हुमा है। यही कारण है कि प्राणशनि यस होने के कारण सब मग प्रत्यंग अपने माधीन हो जाते हैमर प्राणानिक पश होनेसे सब शरीरकी निरोगसा भी दि हो सकती है। इस प्रकार यजुर्वेदया विषयक उपदेश । जुदवा उपदेश किया प्रधान होता है। हमारये पाठक इस उपदेशकी भोर मनुटानकी रष्टिय देखें और इस उपदेशको अपने मान दानापान । सामवेद उपामनामक होने से प्राग माय टमका पनिष्ट संबंध

(११५)
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ई उसको उक्त कारणसे "प्राण वेद" भी समझते है। उपासनाद्वारा जो
प्राणका बल बढाना है उतनीही सहायता सामवेदसे इस विषयमें होती है।
अन्य बातोंका उपदेश करना मन्य वेदोंका ही कार्य है। इसलिय यहाँ
प्रवनाही लिखते हैं कि जो परमारमोपासनाका विषय है, उसको प्राणशक्ति-
का विकास करनेके लिय पाठक अत्यंत मावश्यक समझे और मनुष्टाना
करने के समय उसको किया को भा भयवेदका प्राणविषयक उपदेश
देखते है-
अथर्ववेदका प्राणविषयक उपदेश।
प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा ॥ (मयवं० २०१६)
ममं प्राणो हासीमो अपानः।
(अधर्व२२२८३)
"प्राण मपान मुझे मृत्युसे बचा। प्राण भपान इसको न छोड़ें।" इन
मंत्रों में प्राणकी शक्तिका स्वरूप पाया है। प्राण सहायतामें गृस्युसे
संरक्षण होता है। प्राण घशमें भा जाया तो मृत्युका भय नहीं रहता।
एमका भय हटानेके लिये प्राणी प्रमा करनी चाहिए । देखिए-
प्राण पाणं यम्यामो समये मृड ।
निन्याना पाशेभ्यो मुश्च ॥४॥
(मयवं. ११४५)
" I हमारे प्राणका रक्षण फो। सीवन ! हमारे जीवनको
सुखगण करो।मनियम ! मनियम पाशोसे हमें बचायो।"
अपनी माणशक्तिका संरक्षण करना चाहिए, अपने जीवनको मंगलमय
बनाना चाहिये ।नितिक पालोमे दधाना चाहिए । शनि"का मर्य-
"प्रगति, उपति, सामार्ग, उत्कर्ष, अभ्युदय, पोग्यता, माय, मीचा मार्ग,
संरक्षण, परियता " इतना भात नितिका भयं मयनति, फुमांग,
मपर, पोयति.मसम्मार्ग, तेवीपाल, पातपाही , अपविग्रवा
बद होता है। नितिक साप मानेवाला निसंदेह अधोगातको पटे बाता
घाताप्राणः॥५॥

है। इसलिये इस ते? मार्गके प्रमजालसे बचनेकी सूचना उक्त मंत्री दी है। हरएक मनुष्य, जो उन्नति चाहता है, सावधान रहता हुमा अपने आपको इस अधोगतिके मार्गसे पचाये। निऋतिके जाल प्रारंभमें परे सुंदर दिखाई देते हैं। परतु जो उनमें एडवार फंसता है, उनको उठाना पहा मुबिउ प्रतीत होता है। सब प्रकारके दुयसन, भ्रम, बालस्य, छल कपट भादि सबही इस निमंतिके जालके रूप है जो लोग इस जाल में फंसते उनको उठाना मुकिल हो जाता है। इसलिये उमति चाहनेवाले सजनोंको उचित है कि इमे बुरे राखसे अपने भापको बचायें। योग-साधन करनेवालोंको यह उपदेश अमूल्य है। योग यम नियम इसी 'उपदेशकै भनुमार बने हैं । अपने विषयमे किस प्रशारकी भावना करनी चाहिए इसका उपदेश निम्न मंत्र में किया है- मैं विजयी हूँ। सूर्यो मे चक्षुर्वानः प्राणो अन्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम् । भस्तृतो नामाहमयमस्मि स भारमानं निदधे घायाधि- घाभ्यां गोपीधाय॥ (अय. १९०) सूर्य मेरा नेत्र है, वायु मेरा प्राग है, मनरिक्षस्य वय मेरा भारमा है.. पृथिवी मेरा रथूल शरीर है । इस प्रकारका में अपगमित हूँ। अपने भापको मोर पृथिवी लाक के अतर्गत जो कुछ है उस सबके संरक्षण लिये अर्पण करता है।" भारमाविका विकाप करनेके रिये समरिकी मसाई के लिये अपने पापको समर्पित करना चाहिए । मौर बने भारतक शासियार साप पारदेवतामोंका संघ देखना चाहिए इतना ही नहीं प्रायुतगाव देवता. भोंके अंश सपने शरीरमें रहे हैं और बाय देयनामों के गम मा ममा हुमा में एक छोरापा पुरगई. एपी भावना धारण करके अपने मारो देशलामाका बाप, नया पोरीको देवमामाहा संप पपपा मंदिर समाना चाहिए। योगमापनमें यही भावना मुग्यो। पपने भारको निकृष्ट मार हीन दीन समझना नहीं चाहिए, परंतु (बई मस्तृतः मस्मि I am invincible ) मैं अपराजित हूं. मै शक्तिशाली हूं, इस प्रकारकी भावना धारण करनी चाहिए । दखिए येदका कैसा उपदेश है, और साधा- रण लोग क्या समझ रहे हैं। जैसे जिसके विचार होंगे पैसोही उसकी अवस्था नेगी। इसलिये अपने विषयमें कदाप तुच्छ बुदि धारण करना रचित नहीं है। प्राणायाम करनेवाले सज्जनको तो अत्यंत भावश्यक है कि अपने शरीरको देवताओंका मदिर, ऋषियोंका आश्रम समझे और अपने पापको उसका मधिष्ठाता तथा परमात्माका सहचारी समझ । अपनी भावना जैसी पद होगी पैसाही भनुमय मा सकता है। येदमें- पंचमुखी महादेव । प्राणापानौ व्यानोदानी । (अथर्व० १९१८२६) माण, मपान, म्यान, उदान मादि माम मागय हैं। उप प्रागों के नाम बदमें दिखाई नहीं दिये। सिमी मन्य रूपसे होंगे तो पता नहीं। यदि किमी विमान को इस विषय में ज्ञान हो सो उसको प्रकाशित करना चाहिए। पंच मागी पंचमुखी हारे, रुदके जितने नाम ये सब प्राणयापही है।महादेव, मु मादि सब रदके माम प्राणवाधक है। महादेयके पांच जो पुरागों में है उनका इस प्रा मूल विचार है। महादेय मृत्युंजय पाइसमा यहा निर्णय होता है। सतपयमें एकादरा बाँका वर्णन - " फतमे सदा तिदिशेमे पुरुपे प्राणा यामैकादशः। (त-मा. १४५) कौनसे हर है। पुरुषमें दस माग मौर ग्यारही भारमा है। ये स्याब"भपात ही एक है, मार इसरिपे भव, जय पशुपति बारिता सरसून अपने भनेक मामें प्राणपाक एक भयं मी महकाये । पशुपति मागवा माननेपर पशु धन्दा मर्य (११८) - . इंदिय ऐसाही होगा । इंद्रियोंका घोडे, गौवें, पशु आदि अनेक प्रकारसे वर्णन कियाही है। इस रीतिसे घेदमें अनक स्थानमें प्राणकी उपासना दिखाई देगी। भाशा है कि पाठक इस प्रकार घेदका विचार करेंगे। इस खेसमें रुद्रवाचक सम सूतोंका प्राणवाचक भाव बताने के लिये स्थान नहीं है, इसलिये इस स्थानपर केवल दिग्दर्शनही किया है। ममि शन्द भी विशेष प्रसंगमें प्राणवाधक है। पंच प्राण, पंच ममि, प्राणानिहाय मावि पारदाद्वारा प्राणकी ममिरूपता सिद्ध है। इस भावको देखनेसे पता लगता है कि, भनिदेवता मंग्रामें भी प्रणा वर्णन गौण वृत्तिामध्यस्थानीय देवताभोंमें पायु मार इंद्र ये दो देवताएं प्रमुख हैं । पायु देवताकी प्राण- रूपता सुपिन्द्रही है। स्थान सानिध्यसे इंदमें भी प्राणरूपत्व मा सकता रष्टिसे इंद्रदेवताके मंत्रोंसे भी वेदमें प्राणका पणन मिल सकता है। इस प्रकार अनेक देवतामा द्वारा बेदमें प्राणशनिका वर्णन है। किसी स्थानपर प्याटिरटिम है और किसी स्थानपर सटिएमे है। यह सब प्राणका वर्णन एकत्र करनेपे ग्रंपविस्तार हुन हो सकता है, इमलिग पहा केवल उतनाही लेख लिया जाता है कि जिन मंग्रामें स्पष्ट रूपये प्राणका पर्णन भागया है । म प्राणकी सत्ता कितनी व्यापक है, उसका वर्णन निम्न मंत्रों में देखिये- प्राणका मीठा चायुक। महत्पयो विश्वरूपमस्याः समुद्रस्य वोन रेत माहुः। यत पनि मयुकशा रगणा तरमाणस्तामृतं नियिम् ॥ २॥ मानादित्यानां दुहिना पसूनां प्राणः प्रजानाममृतसर नाभि हिरण्यवर्णा मधुकशा घृताची मदागर्मधरनि मयंपु ॥४॥ (अध.. "(मस्याः) म प्रविधी और समुदही पारी (ताatt मासा कहते हैं । वहाँले चमकता हुमा मोटा धापुर घटता है पर . - प्राण और वह हममृत है । श्रादियोंकी माता वसुझोंकी दुहिता, प्रजा- बॉका प्राण और ममृतंकी नामि यह मीठा भावुक है। यह तेजस्वी, तेज अपत करनेवाली मार (मस्येषु गर्मः ) मत्याक अंदर संचार करनेवाली. - इस मंत्रमें "मधु कशा" शब्द है। "मधु" का भर्ष मीठा स्वादु है। और "कशा" का अर्थ चाबुक है । पावुक घोहा गाडी चलानेवाले के पास होता है। चाड मारनेसे गाडी घोडे चलते हैं। उनकमत्रोम मधु कशा" अयाद मीठा चाबुकका वर्णन है। यह मीठा-गबुक मधिनी देवोंका है। मिनी देव प्राणरूपसे नासिका स्थानमें रहते हैं प्राण भपान, पाल, उच्छ्वास, दांये और बांये नाकका स यह अश्विनीदेवॉका प्राणमयप बारी में है। इस शरीर भश्विनीरूप •णोंका मीठा चावुक' कार्य कर रहा है और शरीररूपीज्यके इंद्रियरूप घोडॉको चला रहा है । इस चाबुकका अह स्वरूप देखने वेदके इस अद्वितीय और विलक्षण अलंकारकी कपना पाठी मनमें स्थिर हो सकती है। यह गणोंका मीठा घाबु म पयको प्रेरणा कर रहा है। हमकी प्रेरणा गिना इस शरी में कोई कार्य होता नहीं है। इतनाही नहीं परंतु सब जगत्में यह 'मोठा चावुही सरको मति दे रहा है। सय जगत में यह प्राणका कार्य देखनेयोग्य है। मंत्र कहता है कि "इस मीठे..चायुस्में पृथ्वी और जलकी सय शान्ति रहती है। जहा यह मीठा चायुक चलाया जाता है यहां की प्राण और ममत रहता है।" प्राण मारममृत एकही रहता है. क्योंकि जबतक शरीरम प्राण रहता है, तहत माणकी मोति नहीं होती।भार मय ही जानते है हिमानों के शरीरॉमें प्रागही सरका प्रेरक है, हमीलिये उसके चाचा की कल्पना उक्त मत्रमें कही है। कांकि शरीरपोरयघोटे चलानेका कार यह ही चाबुल कर रहा है। दूसरे मंत्रमें कहा है कि "यह चावुक शरोरा यमु श्रादि देवतामोंका सहायक है, यह प्रजाका प्राय ही है, अमृतका मध्य यह ही है। यह माण मत्योम वेज और चेतना उत्पन करता .

(१२०) है, और सब प्राणियोंके बीच यह चलता है यह वर्णन इत्तम मलंकार- से युक्त है, परंतु स्पष्ट होने के कारण हरएक इसका उपदेश जान सकता १ (म० १९५१) अपनी स्वतंत्रता और पूर्णता । नसोप्राणा॥ (भ.१९६६०) थोत्रं चक्षुःप्राणोऽच्छिन्नो नो अस्त्वच्छिन्ना ययमायुपो पचम ॥१॥ (4. १९५८) अयुतोऽहमयुतो म आत्माऽयुत मे चक्षुरयुत मे थोत्र. मयुतो मे प्राणाऽयुतो मेऽपानाऽयतों में व्यानोऽयतो ऽह सर्यः ॥१॥ "मेरे माछमें भाग स्थिरतामे रहे । मेरा कान, मेन और प्राण छिभिव म होता हुआ मेरे शरीरमें कार्य करे । मेरी घायु और रोज मयिष्टिक भपात दीघ दोर । मैं अपना मारमा, पशु, श्रोग, प्राण, अपान, म्यान पादि सप मेरी शक्तियो पूर्ण स्वतम और उनत होकर मेरे शरीर में रहें।" घायु और प्राय विस्छिन रूपसे अपने शरीरमें रहनेकी प्रथर का उक मंत्र है सदियां सपा मव भन्य रातियां अपि या पूर्ण उषत रूपसे सपने में प्रकट होनेकी प्यवस्थाहरएकको करनी चाहिये। 'उफ मंत्रमें कई शब्द मस्यंत महत्वपूर्ण हैं- पदं ययुतः। यसयः अयुतः। "म संपूर्ण रूपले स्वतंत्र, दूसो किवीकी सहायताकी मामा म कान- योग्य समय, किसी से सिसलिम मचने योग्य । माना पदि मममें मा जायगी तो मनुप्यकी हालिदिनी सकती है माविका पारस मी मरते हैं। मीदियां, मेरे प्रण व्या मेरे - " 7 मन्य अवयव ऐसे हद और बलवान होने चाहिए कि मुझे उनके कारण कमीक्लेश न हो सके, तथ. किसी दूसरी शक्तिको अपेक्षा न करता हुमा, मैं पूर्ण स्वतंत्रता साप आनंदसे अपने महान् महान् पुरुषार्य कर सकू। कोई यह न समझे कि यह केवल ख्यालही है। परंतु मैं यहां कह सकता कि यदि मनुष्य निश्चय करेंगे. तो निःसन्देह वे अपने आपको इस प्रकार पूर्ण स्वतंत्र धना सकते हैं और उक्त शक्तियांका पूर्ण विकाप धे अपने अंदर कर सकते हैं। तया- प्राणकी मित्रता। इय प्राणः सख्ये नो अस्तु तं त्या परमेछिन् । पर्यहमायुवा वर्चसा दधामि । (म. १३०१०) "यहां ही प्राण हमाग मित्र बने । हे परमेष्टिन् । अपने आयुष्य और वेजके साथ आपकी ही मैं पारणा करता हूं।"प्राणके साथ मिग्रताका वारपर्य इतनाही है कि अपने शरीर में प्राण बलिष्ठ होकर रहे । कभी मल्ल भायुमें प्राण दूर न हो। अपने मायुप्य में परमेष्ठी परमारमाझी ही सेवा और उरामना करनी चाहिए। परमात्मा सर्वश्रेष्ठ गुणोंका केंद्र होनेसे पामा- मतिमा सप ही श्रेय सद्गुणोंका पान होता है और मनुष्य जिसका सका ध्यान कावा है, उसके समान बन जाना है, इस नियमके अनुगर परमेगाके गुणों के विनरे मनुष्य भी थे। धनता है। यह उपासनाका गौर मानवी उमतिका संबंध है। इस प्रकार जो सरपुर अपनी प्रागश- पितको पता है, उसकी प्राणशक्ति कितनी विस्तृत होती है, इसकी कस्पना निम्न मंत्रोंसे हो सकती है। देखिए- तस्य मात्यस्य सप्त माणासापाना: सतव्यानाः॥ योऽस्य प्रथमः प्राण ऊध्यों नामायं सो मग्निः ॥ योऽस्य द्वितीयः प्राणः पोहो नायासोस आदित्यः ।। योऽस्य एतोयः प्राणोऽभ्यूदो नामाली स चन्दमाः । - .

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योऽस्य चनुधाप्राणो विभनामायं स पवमानः।
योऽस्य पंचमः प्राणो योनि म ता इमा अपः॥
योऽस्य पठः प्राणः प्रियो नाम त म पशवः॥
योऽस्य सप्तमः प्राणोऽपरिमितो नाम तामा प्रजाः॥
(मप० १५1५11-९)
"उस (मात्यस्य ) संन्यासी सत्पुरुपके सात प्राण, सात अपान, सात
भ्यान है । उसके सातों प्राणों के क्रमशः नाम जप, द. अभ्यूट, विम्,
पोनि, प्रिय भार अपर्शिमत है। मोर उनके सात स्वरूप प्रम: अमि,
मादित्य, धद्रमा, पवमान, मापः, पशु भार प्रजा है। "इसी प्रकार इसके
पान को ध्यानका यर्णन उक्त स्थानमे ही वेदने रिया है। यहां ही
उसको पाटक देखें । विस्तार होनेक भयस उससपको यहां नहीं लिय।
है मनुष्य अपनी शक्तिको इस प्रकार यहा सकता है। जो मनुम्य अपने
गतो प्राणोंको अपरिमित रूपमें बढ़ा सकता है. यहही अपने मारको
सप प्रजाजनों के हित कायमें अर्पण करता है जो अपने प्राणको अब
बार उच्च करण है. यह अतिके समान तेजस्वी होता है। पारि
प्रकार उपर क्यनका भार समझना चाहिए । तथा--
समयी अनुकूलता।
काले मनःकाले प्राणः काल नाम समादितम् ।
कालन सर्या नदन्यागंतन प्रजा इमाः son
(4. )
"कारको अनुपूरवासे मन, और माम रहता है। कालकी .
मूलवासे मय प्रनामों को मानद होता है।"
फालका नियम पालन करना चाहिए। पुरुग माय काली मनुस्-
स्ता होनेसे उत्सम फर प्राप्त होता है। कार EिET मरी जाना
चाहिए । जो मनुकूलता प्राप्त होठी उमका दपपाग अवश्य करना
.

चाहिए। प्राणायामादि साधन करनेबारेको सचित है कि वह योग्य कालमें नियमपूर्वक अपना भल्यास किया करे, तथा जिस समय जो काना योग्य. हे उसको अवश्य ही सस समय करना चाहिर । अब प्राणके संरक्षक षयोंका वर्णन निम्न मंत्रमें देखिये- प्राणरक्षक ऋयि। ऋषी बोधप्रतीयोधावस्थप्नो यध जागृतिः। सौ ते प्राणस्य गीतारौ दिवागतच जागृताम् । (अथर्व० ५३०५०) "बोध और प्रतिबोध अर्थात स्फूर्ति और जागृति ये दो ऋषि हैं। ये दोनों तेरे प्राणकी रक्षा करते हुए दिनरात जागते रहें। प्रत्येक मनुष्यमें ये दो ऋषि हैं । ' स्फूर्ति और जागृति" ये दो फपि है। एक ठरसाहकी प्रेरणा करता है और दूसरा सावधान रहनेकी चेना. देता है उत्साह और सावधानता ये दो सद्गण जिम मनप्य में जितने होंगे, उतनी पायता उप मनुष्य की हो सकती हैं। ये दो भीर प्राण के संरक्षण का कार्य करते हैं, और यदि ये दिनरात जागते रहेंगे तो मनुष्यको मृत्युकी बाधा नहीं हो सकती । जबतक मनुष्यका मन उसासे परिपूर्ण रहेगा और जयतक मावधानताके साथ वह अपना व्यवहार होगा, सवतक उसको मरणको माति नहीं होगा, या साधारण नियम समझिये। जो रोग सावधानताके - अपना दैनिक व्यवहार करते हैं, क्या जो सदा दीन दान मार दुर्बलताके ही विचार मनमें धारण करते है, उनको इस मंत्रका भाव ज्यानमें घाना उचित है। घेद कहा है कि मनमें उरसाहा विचार धारण करो और प्रतिक्षण सावधान रहो । जो मनुप्प अपने आपको येदिक धर्मा समझता है, उसको उचित है कि यह अपने मनमें वेदके ही मनुकूल भाव धारण करे । वैदिक धर्मी मनुष्यको उचित नहीं किया वेदक विरद्ध हीन भोर दानताके विचार अपने मनमें धारा , . .

(१२४) करके मृत्युके वशमें होघे । वैदिक धर्मका विशेष उद्देश सर्वसाधारण जनता की भायुज्यवृद्धि बार भारोग्यवृद्धि करना है, इसीलिये स्थान स्थानके वैरिक सूक्तोंमें दीर्घायुरखके अनेक उपदेश आते हैं। पाठक इन पातोंको ठीक प्रकार अपने मन में धारण करें। वृद्धताका धन। प्रविशतं प्राणापानावनड्वाहाधिय प्रजम् । सय जरिम्णः शेवधिररिए इह वर्धताम || आ ते प्राणं सुयामसि परा यमं सुधामि ते । आयनों विश्वतो दधदयमग्निवरेण्यः ॥६॥ (अथवं०७५५) "जिस प्रकार बैक माने स्यानर पपिस जाते हैं. उस प्रकार प्राण और भपान अपने स्थानपर आ जावें । पृद्धावस्थामा जो खजाना है. यह • यहाँ कम न होता हुमा बढता रहे। तेरे अंदर प्राणको प्रेरित करता हूँ और सीमारोको दूर फेंकता हूं। यह श्रेष्ठ भान हम सबको सय प्रकारक दीर्घ मायु दे। .. बैल शाम के समय येगसे अपने स्थानपर मा जाते है । सस प्रकार पल्युक्त चंगसे प्राण मौर अपान अपने अपने स्थानमें रहें। जब प्राण भार अपान यलवान बनकर अपना अपना कार्य करेंगे, तब मृत्युका भय नहीं हो सकता और मनुष्य दीर्घायुप्यरूपी धन FIR कर सकता है। पनों में मायुष्यरूपी धन ही सयमे भ्रष्ट है, क्योंकि सप अन्य धनौका सपपोग इसके छानपर ही हो सकता है। उपतमंत्रमें अरिरिणःशेयधिः यह यचंताम् ॥ (पर्य० ॥५३॥५) ये शन्द मनन करने योग्य है।'पृद्ध भायुका समाना यहां बटवा रहे।"भयांत् इस लोकमे भायुती रहे। ये वाद स्पष्टताले पठा रहे है कि भायु निक्षित नहीं, प्रत्युत पढनेगरी सो 'मनुप्प भरनी प्रायु पटाना चाहेगा वह उस मकारके मायुज्यवर्धक मुनियमों का पालन करके भायु बढ़ा सकता है। इस प्रकार वेदका उपदेश अत्यंत स्पष्ट है। ‘परंतु कई वैदिक धर्मा समझते ही हैं कि वायु निश्चित है और घर पर नहीं सकती जिन बातों में वेदका कथन स्पष्ट है उन पातों में कमसे कम भित्र विचार वैदिक धर्मियों को धारण काना उचित नहीं है। चोध और प्रतिबोध । पूर्व स्थानमें बोध और प्रतिरोध ये दो अपि हैं, ऐसा कहाँ ही है। वही माव थोटेसे फरकसे निम्न मंत्र भाया है, देखिये- योधश्च त्वा प्रतिरोधश्च रक्षतामस्वप्नश्च त्वाऽनवद्राणश्च रक्षताम् । गोपायंश्च त्या जागृविश्व रक्षताम् ॥ (म. ८३) "उत्साह और सावधानता वेग रक्षण करें। स्फूर्षि मौर जागृति वेरा संरक्षण को । रक्षक और जागृत ते पालन करें।" इस मंत्रमें संरक्षक गुर्गाका पर्णन है। उत्साह, सावधानवा, स्फूर्ति, बागृति, रक्षण और खबरदारी ये गुण संरक्षण करनेवाले हैं। इनके विरुद्ध गुण घातक हैं। सालये अपनी भभिवृद्धि की इच्छा करनेवालेको उचित.' है कि यह उक्त गुणों की वृद्धि अपनमें को। इस मंत्र के साथ पूर्व मंत्र, जिसमें दो प्राधियोंका वर्णन है. तुलना करके देखें । भवनिम्न मंत्र देखिये- उन्नति ही तेरा मार्ग है। उपान ने पुकर नाययानं जीवातं ते दक्षताति रुणोमि । आहिरोहमममृतं सुखं रयमय जिविक्दियमा यदासि ॥ -(M. 4118) 'हे मनुष्य ! तेरी गति ( उत् यानं ) उमतिकी ओर ही होनी चाहिये। कभी भी (गव यानं म) मयनातेकी मोर होनी नहीं चाहिये। वेरे दी T थायुप्यके लिये में बैल का विस्तार करता हूँ। इस सुखमय शारीररूपी अमृतमय स्थपर ( भारोह ) पढो । और जब तुम दीर्घ भायुसे युक्त हो जाओगे तय (विदयं ) समानों में । भावदासि ) संभाषण करांगे।" अपना अभ्युदय करने का यत्न करना चाहिए. कभी ऐसा कर्म करना , नहीं चाहिए कि जिपसे भवनति होने की संभावना हो सके । जीवन के लिये प्राणका बल फंलामा पारिए । प्राणहान पानेसे दीर्घ आयुष्य प्राप्त हो सकता है । यह शरीररूपी उत्तम ग्य है जिपको इंद्रियरूपी दम घोर जाते हैं । इस रथमें प्राणरूपी अमृत है. इमलिये इसको सुखमय रय कहा जाता है। इस सर्वोत्तम रथपर भास्ट हो जामो बार अपनी प्रतिके मार्गमें मागे पढी। जब तुम बल और दीघ भायु त कोगे तब तुमको पटी वटी सभाओं में भायही संभाषण कामा हागा, क्योंकि दूओंका सुधार करने के लिये मुमचा प्रयत्न कराना चाहिए । जीवनार्य युद्ध में सा जनताको उत्तम मार्ग बताने का कार्य तुम्हागही है। सुमको स्वार्थी बनना मही पाहिए, प्रत्युत जनताकी उमति में अपनी उप्रति समानी चाहिए। इस मंत्रसे पता लगता है कि प्राणायामाद सापनों द्वारा दीप मायु. उत्तम मारोग्य, अद्वितीय बल, सूक्ष्म पुदि मौर विशाल मन प्राप्त करने पश्चात् मनुष्य को अपना जीवन सार्वजनिक हिनका माधन करने में लगाना घाए । समाजसे अलग होकर अपनी ही शतकानेमात्र से मनुष काय नहीं हो पकता, परंतु जब एक "नर" अपने पापको उपत करने पश्चात् "धा-नर" के लिय नामसमर्पण करमा, राम भस्था प्राप्त कर सकता है। यही मयं मेघ यज्ञ है। सम्मम प्रकार उक्त मत्रने योगी मनुपके सम्मुम्ब निम TEL भाद रख दिया है। आशा है कि म अष्ठ मनुष्य इस किमाडो अपने मुख कर अपना जीवन अनुगर दामका यात गं । म मा यामाहा पार या करना है। योजनाधिकार कहता पहुँचता है, इसका पमा निम्न मंत्रोंसे सुगमता है- (१२७) यमके दूत। . - कुणोमि ते प्राणापानौ जगं मृत्यु दीर्घमायुः स्वस्ति। वैवस्वतन पाहतान यमदूनांश्चरतापमेवामि मनि ॥११॥ मारादति निति पगे ग्रादि कन्यादः पिशागन् । रक्षा यत्सर्वं दुर्भूत ततम इवाप हन्मसि ॥१२॥ अग्नेले प्राणममुनादायुष्मनो बन्वे जातवेदमः। यथा न रिष्या अमृनः सजरसस्तत् ते कृणामि तदुने समृध्यताम् ॥१३॥ (अ0८९) "मैं तेरे अंदर प्राण और अपामका बल, दीर्घ आयु. (स्वस्ति) स्वास्थ्य खादि पव पच्छे भाव, वृद्धावस्थाके पश्च तु योग्य समयमें मृत्यु पादि स्थापन करता हूं। वैवस्वत यमके द्वारा भेजे हुए यमदूतोंको मेर ढूंद कर दूर करता हूँ॥(राति ) भदान, (निति नियमविरुद्ध व्यव- हार, ( प्रादि ) देरसे चलने गरे रोग (याद. ) मांसको क्षाण काने. वाली पामारी. (पिशाचान् ) रक्तको निर्भर करनेवाले रसके कृमि, (R: = RRB ) सब क्षयक कारण, (सर्व दुर्भूनं ) सय पुरा व्यवहार बादि जो कुछ विनाश हे उप यत्रको अंधकार के समान से दूर करता ई॥ तेरे लिये में तेजस्था, अमर और भायुष्मान् जातादसे प्राण प्राप्त करता । जिस प्रकार से अकालमृत्यु न होगा, भमर अर्थात् दार्घजीवी बनोगे, ( मजून ) मित्रभावसे संतुष्ट होगे और तुम्हें कष्ट न होगा, उस प्रकारको समृद्धितरे लिय में अर्पण करता हूं।" इन मंत्रों में प्राण माधन करके जो गिलक्षण सिद्धि प्राप्त होता है उसका उत्तम वर्णन है । प्राणका पल प्राप्त करनेसे सब प्रकारका स्वास्थ्य, दीर्घ मायु, यल तथा योग्य काल में मृत्यु हो सकता है। पतु माणा पल न होने की अवम्यामें नाना प्रकार के रोग, मर मायु, अशक्तना भोर मकाल मृत्यु होते हैं । इसमे प्राणायामादि द्वारा प्राणकी शकि. पदानेकी बापश्य- . फता स्पष्ट सिद्ध होती है। जो विद्वान् भायुको परिमित और निश्रित मानते हैं वे कहते हैं कि, यमके दूत सब अगत्में संचार करते है, के मायुकी समाप्ति के समय मनुष्य के प्राणोंका हरण करते हैं। इसलिये भाय पढ नहीं सकती।इस मवैदिक मतका खंडन करते हुए घेद कहता है कि जो यमदूत इस जगत्में संचार करते होंग, उनको भी प्राण के अनु. छानसे किया जा सकता है । इसमें मनुष्य पराधीन नहीं है। मनुष्यामकी रीतिसे प्राणका बल बढाइए, तो उसी क्षण यमदूत आपसे दूर हो सकठे हैं। प्राणोपासना करनेवालोंके ऊपर यमदूत अपना प्रभाव नहीं डाल सकते। इस प्रकारका अभयदान वेद रहा है, इसकी भोर हरएक वैदिक धर्माका ज्यान अवश्य जाना चाहिए। इस विचारको धारण करके निर्भय बनकर प्राणायामद्वारा अपनी भायु हरएक्को दीर्घ यनानी चाहिए तथा अन्य प्रका- रका स्वास्थ्य भी प्राप्त करना चाहिए । प्राणायामक अनुष्ठानसे मनुप्प इतना बल प्राप्त कर सकता है कि जिससे वह यमदतोंको भी दूर भगा हना सामर्थ प्राप्त होता है इसलिये ही सर्वश्रा पुरुष प्राणायामका महत्व वर्णन करते हैं। प्राणायामसे सब ही प्रकार के पारि, दोष मौर रोगोंके मूल कारण दूर 'हो सकते हैं । दुष्ट भाव,बुरा आचार, विधिनियमों के विरुद व्यवहार पादि सप दोष इस अभ्याससे दूर होते हैं। सब प्रकार के रोगों के बीज शरीरसे हट जाते है । जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों द्वारा अंधकारका निर्मूलन करता है, उस प्रकार योगी मपनी माणधिक प्रमावसे सब गयीमोंको दूर कर सकता है। जो सर बने हुए पदार्योको यावत् जानता है, यह मारमा "जानवर अग्नि" है यह मामा ममृतरूप क्या मायुष्मान् है । इसलिये यह ही सपको भमर बार आयुष्मान कर सकता है।जो उसके साथ मपने मामाको योगसाधनद्वारा संयुक्त कर सकते हैं, वे अपने भापको दीर्घायुसे गुण सका । और अमरवसे पूर्ण बना सकते हैं। इस प्रकारके साधन संपर योगी चार मृत्युसे मरते नहीं, अमर बनते हैं, सदा संतुष्ट और प्रेमपूर्ण बनते हैं, इसलिये सब प्रकारको समृदिसे युक्त होते हैं। यही सच्ची समृद्धि है। मनुष्यका अधिकार है कि यह इस समृद्धिको प्राप्त करे। अथर्वाका सिर । चित्तवृत्तियों का निरोध करना और मनकी सरवृत्तियों को स्वाधीन रखकर उनको मच्छेदी कर्ममें लगाना योग कहलाता है। इस प्रकारका पुरुशाय जो करता है उसको योगी कहते हैं। योगीके अंदर चंचलता नहीं रहती और स्थिरता मनोत्तियों में गोमा बढाने लगती है। इस प्रकााके योगीका माम "-" होता है। 'म-चंच' यह मपर्वा शन्दका भाव है । एकाप्राकी सिदि उसको प्राप्त होती है । इस अपर्वाका जो घेद है वह अपविर है।मोद सर्व सामान्य मनुष्यों के लिये नहीं है । योगमा- पनका इसमें मुख्य भाग होनेसे तया सिद्ध अवस्थाको बातें इसमें होनेसे यह भयद योगियों का वेद है। इसमें इसी कारण प्राणायामविषयक उपदेश सय अन्य पदों की मपेक्षा मधिक है। इस वेदमें अथर्वा सिरका वर्णन निम्न प्रकार किया- मूर्षानमस्य संसोव्यायर्ग हदयं च यत् ॥ मस्तिष्कार्य प्रेरयापरमानोऽधि शीर्षतः ॥२६॥ तनामथर्वणः शिरो देयको समुस्जितः ॥ तत्प्राणो अभिरक्षति गिरो यममयो मनः ॥२७n, यो तां ग्रामका घेदामृतेनावृतां पुरम् । तसे माघ मालाध चनःप्राण प्रजां ददुः ॥२९॥ नयेतं चार्जदाति न प्राणो जरसः पुरा पुरं यो प्रसपो येद यस्याः पुरष उच्यते ९ (३.लि.) . . ३०॥

. (१०) अपचका नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वगा ज्योतिगवृता ३१०. तसिन् हिरण्मय कोशेयरे विप्रतिष्ठित तस्मिन् यघंशमात्मन्यत् तद् ब्रह्मविदो विदुः ॥३२०. प्रभ्राजमानां हरिणी पशमा सं परिवृताम् ।। पुरं हिरण्मयों ग्रहामविवेशापनिताम् ॥३३i . (भ.00) " (अ-प) स्थिरचित योगी भपने (मर्थान) मस्तिष्क के साथ हपको सीन है, और सिरके मस्तिष्क कर अपने ( पपमानः ) प्रो. भेज देवा है।वह दी अपर्वाका सिा है कि जिसको देशका कोश का भाता है । उसका रक्षा प्राण, भय और मन करता है ॥ अमृतसे परिपूर्ण, इस महाकी नगरीको जो जानना है. उपको प्रम मोर कर देश चतु प्राग और प्रमा देते हैं । वृद्धावस्था पूर्व पशु और प्राण उपको छोरते महो।। इस प्रमपुरीको जानता है, और जिसमें रहने के कारण मामाको पुर, कहते है । भाउ एक और ना द्वारों से युक यह योडीयोध्या नगरी है, इसमें तंजस्वी को वह ही देदीप्यमान स्वर्ग है। तीन मासे युक्त और सीन स्थानोपर हुए उस मस्व! कामें मो पुस मामा है, उसको मज्ञानी रोक जानते है। इस देदीप्यमान मनाहर यशस्वी भार बपरा. जित मगरी में प्रदा प्रवेश करता है।" योगसाधन कर पाओंके लिये यह उपदेश अल्प है। इसमें सबसे पहिली बात यह कही है कि इसका धर्म भरि और मसिप विधा है। मति और विधा मिोप नही होना चाहिये। दोनों एक ही कार्य में मम अधिकारी प्रवृत होने चाहिये । म दोनों विमान है उपमें दोष उत्पप होते हैं। धर्ममें विपन: मशिदी एना भार पड़ी भाको समान स्थान मिलना चाहिए जिम धर्ममें इनको समान स्थान नहीं आता, टस धर्ममें बहन विभाग. में भीमविकायका मम विकास दोने योग्य विधामा चाहिए। -- । समिक्षामें केवल मसिडी सर्कशकिपरसीस मिक्षावालीसे पाखिवा उपप होती है और जिससे केवल, मावि परती है, उस प्रमा से अंधविश्वास बढ़ता है। इसलिये तक और भक्तिका समविकास होनेसे दोनों दोष दूर होते है और सब प्रकारको उति होती है। योगसाधन : करनेवालेको उचित है कि वह अपने में मस्तिष्कको तर्कशक्ति और हरयी भक्ति समप्रमाणमें विकसित करे।यही माव' मूवी और दियको सीने" केत उपदेशामें है। दोनोंडी सोकर एक करना चाहिए और दोनों को मिलाकर बारमोवि कार्य में समर्पित करना चाहिए। ब्रह्मलोककी प्राप्ति। "मस्तिष्कके उपरके स्थानमें प्राणको प्रेरित करना " यह दूसरा उपदेश उप मंत्रों में मातको महतार चक्र है और इसके नाचे पृष्ठ साप कई पक्र है । प्राणायामद्वारा नाचेसे एक एक चक्रमें प्राण भनेकी किया साध्य होती है। और सबसे मसमें इस मखिक सहबार घरमें प्राण भेजा जाता है, इस अवस्थासे पूर्व पृष्ठवंशके नाडियों में प्राणका उत्तम संचार होता है। तापश्चात् मस्तिष्कके सहधार चक्रमें प्राण पहुचता है और पहातक प्राणको गति होती है। यह प्राणको सर्वोत्तम गति है। यही मालाक होनेसे सथा इस स्थान में प्राण साय मारमाकी गति होनेसे, उस अवस्था मुमुक्षु प्रहालोकप्राप्ति होती है। इसलिए इस अवस्थाको सबसे अवस्या कहते है । यह सबसे श्रेष्ठ भवस्था प्राणायामक नियमपूर्वक सम्पायसे प्राप्त होती है, इस कारण यह पोगियों को प्राप्त निवासी अवस्था है। देवोंका कोश। म-पया भयाद योगीका रू प्रकारका सिर सचमुच देवोंका सबाना है। इस प्रकारक अपरिसिसमें सब दिग्य भावनाएं रहती है। स विग्य अष्टदेवी शकियोंका निवास उसके शरीरमें होता है, इसलिये उसका देह (१९४) - अयोध्याका राम। इस नारी में जो पूजनीय देव है वह ही बारमाराम है उसको ब्रह्मज्ञानी लोक ही जानते हैं, अन्योंको उसका पता नहीं लग सकता । इस यशस्वी नगरी में विजयी महा प्रवेश करता है, जीवारमा जब बासुरी भावनामोंपर विजय प्राप्त करता है, पर वह अपनी राजधानी में विसयोरसय कामा हुमा प्रवेश करता है। यह राजधानी भयोध्या नगी पशसे परिपूर्ण है. दुःखों का हरण करने वाली है और जिसे प्रकाशित है। इसका परामय बासुरी भावनाओं के द्वारा कमी हो ही नहीं सका। इसलिये इसका नाम ही " अपगमित भयोध्या" हैं। अपने हदपकी इस शाकिको जानना चाहिए। मैं अपराजित: दुष्ट मावोंसे में कभी पराजित नहीं हो सकता । मैं सदा विजयी ही रहूंगा। मेरा मामही “विजय" है।' इत्यादि भाष उपासकको अपने अंदर धारण करने पाहिए । मैं हीन दीन दुख और मधम हूँ .इस प्रकारके भाष कदापि मनमें धारण नहीं करने चाहिए। ये भकि भाव है। इस मंत्र में मारमाका विजयी स्वरूप पताया है। भाशा है कि वैदिक धी समन इस भावको पारण करेंगे। अपने मारमाादी यह वर्णन है। भारमा डिप REर मावसे पराजित रोता है और किस भावना धारण करनेसे विजयी होता है, इसका परम वर्णन इसमें दिया है। हमारी प्रहा है। यह दृदयकमरमें निवास करता है, समर्थात् प्राण उसए वाहन है. यही देवकी पुरी भगवी दे, यही सब कुछ है । पाट परन कार अपने मंदर इस शक्तिका अनुमप परमार सपना विजय संपादन करें। बाधा अनेक मंत्रोमोजो उपदेश पर दिया। उसासारांशमी देवाह, मिपको पढने शोकस SRI मार दिपमे प्रकाशिहोसगा- 1 . (१)आंतरिक प्राणामार वायु साप नित्य सबंध है। (२) जितना प्राण होता है उतनी ही मायु होती है। इसलिये भाग- शक्तिकी वृद्धि करनेसे भायुध्यकी वृद्धि हो सकती है। (३) प्राणरक्षण के नियमों के अनुकून भाचरण कानेसे न केवल प्राणका "बल बढ़ता है. प्रत्युन चक्षु भादि सपही इदयों, भवपत्रों और भगोंकी भक्ति बढती है, उत्तम मारोग्य प्राप्त हो सकता है। (प्राणायामके साथ मनमें शुभ विचारों की धारणा करनेसे बड़ा हाम होता है। (५) सूर्यप्रकाशका सेवन तथा भोजनमें धोका सेवन करनेसे प्राणायाम- की शीघ्र सिद्धि होती है। (१) प्राणशान्तिका विकास करना हरएकका कर्तव्य है। क्योंकि मात्माकी शक्ति के साथ प्ररित प्राण शरीरक भगमें जाकर पदोंके स्वास्थ्यकी रक्षा और बलकी वृद्धि करता है। (6)एकही प्राणके प्राण 'अपान ग्यान, उदान और समान ये भेद हैं, "चपा भन्य उपप्राण भी उलीक प्रभेद हैं। (6) सतोषति और पवित्रतासे का सामर्थ्य बढ़ता है। (९) प्राणका घीयके साथ सबध है। धीयरक्षणसे प्राणाक्तिकी पृद्धि होती है और प्राणायामसे कार्यको स्थिरता होती है, इस प्रकार इनका परस्परसमध। (१०) परमेश्वरकी उपासना मौर समीठका अभ्यास इन दोनोंसे प्राणका बड बट जाता है। (11) प्राणशक्तिकी रक्षा और अभिवृद्धि के रिये सब भन्य इदियोंके सुखों को त्यागना चाहिए, अर्थात् अन्य हदियों के मुख प्राप्त करने के लिये आणकी हानि करना नहीं चाहिए। (१२) सा शक्तियों में प्राणशक्तिही मुख्य और प्रमुख शक्ति है।

(१३) सत्कर्मके साथ प्राणका पोषण करना चाहिए। (14) वाचा, मन और कर्ममें शुद्धता और पवित्रता रखना चाहिए इससे बल पदताई। (१५) सोनेके समय भपनी सर इंद्रियशक्तियां किस प्रकार मारमा लीन होती है, और उठने के समय पुनः किस प्रकार व्यक्त रूपमें कार्य करने लगती हैं, इसका विचार करना और इसमें प्राणके कार्यका अनुभव लेना चाहिए । इस अभ्याससे भारमाही विलक्षण शक्ति जानी जाती है (१६) संपूर्ण रोगयोजों और शारीरिक दोषों को प्राण ही दूर करता है बषयक प्राण है, वयतक पारमें ममृत है। (१७) भोजन के साथ प्राणशक्ति, भायुग, आरोग्य आदिका संबंध है इसलिये ऐमा उत्तम साविक भोजन करना चाहिए कि जो मायुष्य थारोग्य छादिकी वृद्धि कर सके। (१८) सहयों सूक्ष्म रूपोंसे शरीर में प्राण कार्य करता है। (१९) प्राणसंवर्धन के नियमों के विरुद्ध व्यवहार करनेसे सब शक्ति क्षीण होकर मकालमृत्यु भाता है। इसलिये इस प्रकारको नियमविद पापरण करनेकी प्रवृत्तिको रोकना चाहिये। (२०) अग्नि,मायु, रवि भादि वाद्य देवताएं अपने शरीर याचा, प्राण, चक्षु भादि रूपसे रही हैं। इस प्रकार अपना शरीर देवतामोका मंदिर है और मैं उन सय देवताओं का अधिष्ठाता है । यह भावना मनमें स्थिर करना चाहिये और मपने पापको उक मानारूप समझना चाहिये। (२१) अपने पापको अपराजित, विजयी और शक्तिका केंद्र मानन उचित है। (२२) प्राण ही रद है किदवाघ मब शाद माणवाचक है। (२३) प्राणके माधारसे दो सब विमल रहा है। प्राणियों के अंदर सहरी विक्षम प्रदि।

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१२४) मैं पुस्लायसे अवश्यही अपनी सब शक्तियों का विकास करूगा,
ऐसात निश्चय करना योग्य है।
(२५) अपने भापको कभी हीन दीन दुर्वल नहीं समझना, परंतु अपने
प्रमावरी गौरव ही सदा देखना चाहिए।
(१६) जगत्म ऐपो कोई शक्ति नहीं है कि जो मुझे कष्ट दे सकेगी।
मैं सब कोंको दूर करनेका सामर्थ्य रखता हूं । यह माव मनमें रखमा
पाहिए।
(२०) सर्वशक्तिमान् परमेश्वर मेरा मित्र है, इस पातपर पूर्ण विगत
रखना, सपा को माना रिता, माता, भाई मादि समाना। उसमें गौर
मेरेमें स्थान काल आदिका भेद नहीं है।
(२८) योग्य फारमें योग्य कार्य करना । कालकी अनुकूलता माछ
होने पर उसको दूर नहीं करना। भाजका कम्य कल के लिये नही रखना।
(२९) स्फूर्ति धीर जागृति धारण करनेसे सपति होती है।
(३.) दीर्य भायु ही बना धन है, उसको और भी मढाना चाहिए।
नियॉप बनने से उस धनकी दिदीहै।
(१) साह, सावधानता, स्फूते, जागृति, स्वसंरक्षणकी भावना
पर योगनासे सपतिका साधन किया जा सकता है।
(३२) सदा कर उठने के लिये प्रयान होना चाहिए। ऐसा कोई
कार्य करना नहीं चाहिए कि जिपसे नी गिरने की संभावना हो सके।
(२५)स भमयमय शरीरमें मार टिकी पति और सर
'बनताही अपति करने के लिये प्रयान करना चाहिए। जीवनका यही
हरया
(१५) संपूर्ण भनिष्टोंटे साप पुद करके अपना विजय संगइन करना
चाहिए।
(५) की मति मार मस्तिपादन दोनों बलियोको
'
.

(८) car एक ही सत्कार्य में लगाना चाहिए, 'या इन दोनोंका सम विकास करना चाहिए। (३५)योगीका सिर सचमुच देवोंका वसतिस्थान है। (३७) अपने ही हृदयमें ग्रानगरी है, वह ही स्वर्ग और यह हो अमरावती है। यही देवोंकी मयोध्या है। महाज्ञानी इसको ठीक प्रकार "जानते हैं। (३८) जो मारमशक्तिका विकास करता है, यह दी स्वकीय गौरवक साथ इस अपनी राजधानी में प्रवेश करता है। (३९) को अपने स्वाधीन करके मस्तिष्कके ऊपर भेजना चाहिए। जही विचारोंकी गति नहीं है, यही पहुंचना चाहिए । पद ही भारमाका स्थान है। (५०) निश्चयके साथ पुरुषार्थ-प्रपरनसे उसतिक पथपर चलनेवाला योगी अपनी सब प्रकारसे पति कर सकता है। इस प्रकार वेदमंत्रोंका भाशय है। पाठक इसका पारंवार विचार करें और चपनी विके लिये उपयोगी बोध ! तथा प्राप्त बोधक भनुमार मारण करके अपने और जनताले मभ्युदय और निधेयस् प्राप्तिके साधनमें सदा वरपर रहें। इस लेखमें थोडेसे वेदमंत्र दिये हैं जिनमें प्राणविषयक उपदेश विशेष रीतिसे सष्ट है । परंतु इसके अतिरिक्त अन्य देवताओं के स्कों में गुप्त शीतिसे जो प्राणविधाका वर्णन है उमकी भी सोम होनी चाहिए। मामा है कि पाठक स्वयं प्राणविद्याका अभ्यास करके उक्त खोज करने के पवित्र कार्य में अपने मापको समर्पित कोंगे स्थय मनुभव लेनेके विना उक प्रकारको खोजनही हो सकती इरिए प्रथम प्राणायामका साधन स्वयं करना चाहिए। जो समन प्राणापामका सावन स्वयं करेंगे और भूमिकामों में जाकर वहाँका प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे, उनको ही वैदिक संकेतों का उत्सम ज्ञान होना समय है। इसलिये पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे प्रथम अनुष्ठानद्वारा स्यं अनुभव लेनेका यत्न करें, और पसात् वैदिक प्राणविद्याकी खोज करके पीछेसे पानेवाले सज्जनों का मार्ग सुगम करें। हरएक के योडे थोडे प्रयत्नसे महान कार्य सिद हो सकता है । आशा है कि पाठक उरसाइके साथ पूर्व प्रयत्न करेंगे। उपनिपदों में प्राण-विद्या। पदमंत्रों में जो अध्यात्मविद्या है, वह हो उपनिषदों में बतलाई है। “अध्यात्मविद्या भनेक अंगों में प्राणविद्या नामक एक मुख्य अग है। यह घसा घेदके मंत्रों में वैसा उपनिपदोके मंत्रों में भी है। इससे पूर्व येदमंत्रों की प्राणाविद्या सारशि रूपसे बताई है, भय उपनिषदोंकी प्राणविधा देखना है। प्राणकी श्रेष्ठता। प्राण सब शकियों में सबसे श्रेष्ठ शक है, इस विषयमें निम्न वचन देखिये- प्राणो ब्रह्मति व्यजानात् । पाणाद्धयेव खधिमानि भूतानि जायन्ते ।प्राणन जातानि जीवन्ति । प्राण प्रयन्त्यभि संविशन्तीति। (ते. ३० ३३) "प्राणही प्रक्ष है, क्योंकि प्राणसे ये सब भूत उत्पश्च होते है, माणसे जीवित रहते हैं मोर अंतमें प्राणमें हो जाफर मिल जाते हैं। यह प्राणशक्तिका मास्व है। प्राण सबसे बड़ी शक्ति है, सब अन्य प्रक्रिया प्राणपर ही अवलंबित रहती हैं। जयतक प्राण रहता है, सबक अन्य शकियो रहती है। प्राग जाने गा, तो भन्यशक्तियो प्रथम पली जाती हैं, मोर पसार भाग निकल खाता है। ऐवल प्रागियोंकोही प्राग - ((१४०) .. माधार है, परंतु बापधि वनस्पति तथा अन्य स्थिरघर पदार्य इन सबको मी प्राणशक्तिका ही आधार है। प्राणशक्ति सर्वग्न व्यापक है और सबके अंदर रहती हुई सपका धारण पोषण कर रही है। प्रजापति परमारमाने सबसे प्रथम जो दो पदार्थ उत्पन्न किये उनमेंसे एक प्राण है.और दूसरी रपि हैं। इस विषयमें देखिये- स मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्राणं च ॥४॥ आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्या । एतत्सर्वे यन्मूत चामूर्त च तस्मान्मूर्तिरेव रथिः॥५॥ प्राण "परमेश्वरने सबसे प्रथम स्त्री-पुरुषका एक जोसा उप किया। उसमें एक प्राण है और दूसरी गयि है । जगत्में मादित्यही प्राण है, मार चंद्रमा तथा मूर्तिमान् जगत् य और पश्य पदार्थ मात्र है, रयि है।" বি দু রাকান্দি খাঁ ৰী বিদ্বান বই সমম বসে ছু इसका भाव निम्न कोष्टकसे ज्ञात होगा, देखिये- रयि मादित्य चंद्रमा पुरुष खी, प्रकृति L'ositive Negatire जगत्के ये मातापिता है, इनसे सृष्टिी उत्पत्ति हुई है। संपूर्ण जगत्में इनका कार्य है । सूर्यमालामें सूर्य प्राग है, अन्य चंद्र आदि रयि है। शारीरमें मुख्प-प्राण प्राण है मार धन्य स्थूस पर रवि है,देदमें सीधी गल प्राण है और बाई बगल रयि है। इस प्रकार एक दूसरे के अंदर बपि और प्राणशक्तियां ग्यापक है, किसी स्थानपर ये दोनों शक्तियां नहीं है, ऐसा नहीं है। सवंत्र रहकर व घरमें इनका कार्य हो रहा इसमें देखनेसे माणकी सर्वम्यापकताका पता ग सकता है। इस प्रकार सर वोंका देव प्राण है, इसलिए कहा है कि-

(११)"
-
।
-
.
कतम एको देव इति प्राण इति । (वृ. ३२९९)
एक देव कौनसा है ! प्राण है।" अर्थात् सब देवों में मुख्य एक देव
कौनसा है। उत्तरमें निवेदन है कि प्राणही सबसे मुख्य और श्रेष्ठ देव है।
बौर देखिये-
प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । (wi० ५।१।१शु० ६।११)
"प्राणही सबसे मुख्य और श्रेष्ठ है। "सब अन्य देव इसके माधारसे
रहते हैं। तथा-
(१)माणो वै यलं तत्प्राणे प्रतिष्ठितम् । (पृ. ५।१४)
(२) प्राणो या अमृतम् ॥
(व. २०६३).
(३) प्राणो वै सत्यम् ।
(० २।२०)
(४) प्राणो चै यशो बलम् ।
(धू. १।२।६)
"(1) प्राणही बल है, वह बल प्राणमें रहता है। (२) प्रागही अमृत
है। (३) प्राणही सत्य है। (१) प्राणही यश और पल है।" इस प्रकार
प्राणका महत्व है । प्राणको श्रेष्ठता इतनी है कि उसका वर्णन शब्दोंसे नहीं
हो सकता।
प्राण कहाँसे आता है?
परमारमाने प्राणकी उत्पत्ति की है, इसका वर्णन पूर्व स्वसमें हो चुका
है।पातु इस माशतिकी प्राप्ति प्राणियों को कैसी होती है, इस विषय में
निम्न मत्र देसने योग्य है-
आदित्य उदयन् यत्प्राची दिशं प्रविशति तेन प्राच्या
प्राणान् रामपु सनिघते । यहाक्षणां यत्प्रतीची यदुदीची
यदयो यदूध यदन्तरा दिशो यत्सर्व प्रकाशयति तेन
सर्वान् प्राणान् रश्मियु संनिघते ॥६॥ स एप वैश्वानरो
विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । वदेतदृचाम्युकम् ॥७॥

(१४२) विश्वरूपं हरिण जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपतम् ॥ सहस्राश्मिः शतधा धर्तमानः प्राणा प्रजानामुदयत्यंषः सूर्य ॥ (प्रभ उ• १६-८.) "मयंका चम उदय होता है, वव सयही दिशामों में सूर्यकिरणों के द्वारा। शाण रखा जाता है । इस प्रकार सर्वत्र सूर्यकिरणों के द्वाराही प्राण पहुचता है • यह सूर्यही प्राणरूप वैश्वानर अग्नि है । यह सूर्य ( विश्व-रूपं ) सब पका प्रकाश, (हारणं ) अंधकारका हरण करनेवाला, (जात-पेस ) धनों का उत्पादक एक, श्रेष्ठ जसे युन, सैकड़ों प्रकारों से सहस्रों किरणों के साय प्रकाशनेवाला यह प्रजामोंहा प्राण उदयको प्राप्त होता है।" या सूर्यका वर्णन बता रहा है कि सूर्यका प्राण के साथ क्या संबंध है। सूर्यकिरणोंक विना प्राणकी प्राप्ति नहीं हो सकती। इस सूर्यमालिकाका मूल प्राण यह सूर्य देही है। इसी कारण वेदमंत्रों में पायु. भारोग्य, पळ मादिके साथ मौका सबध वर्णन किया है। सूर्यप्रकाशका हमारे आरोग्यके साथ कितना घनिष्ठ समय है इसका यह पता लग सकता है। जो लोग सदा धेरै स्थान में रहते हैं, सूर्यप्रकाशमें प्रादा नहीं करते, सूर्यक प्रकाश से अपना भाग्य नहीं संपादन करते हैं और अपने भारोग्य लिये वैयों, हकीमों और दाक्टरोंक घर मरते रहते हैं, विषरूप दवाइया पाते हैं, उनकी मज्ञाननाकी सीमा कहां है? परमारमाने अगर दयासे सूर्य और मायु उपस किया है और उनसे पूर्ण मारोग्य मंपादन हो सकता है। योग्य रीनिसे प्राणायामद्वाग उनका सेवन किया जायगा, तो स्वमावत. ही भारोग्य मिल सकता है। इसना होनेपर भी मनुष्य ऐसी अवस्थात मा पहुच है कि मत संपत्तिका व्यय करनेपर मी उनको मारोग्य नहीं प्राप्त होता। पाठको | देखिये कि पदके उपदेशोंसे जनता कितनी दूर गयी है। अस्तु । विश्वव्यापक प्राण प्रात होनेका माग इस प्रकार पर प्राण सूर्य दिन हुआ है, वहांसे सूर्य- किरणोंग वायुमें माता है और घायु साप हमारे खूपमें जाम हमारा जीवन बढाता है जो प्राणायाम करना चाहते हैं, उनको इस बातका टीक सीक पणा होना चाहिये । इसी प्रानका और वर्णन देखिये-- सस्ता बारोग्य

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देवोंका घमंड।
एक समय ऐसा हुआ किवा सष्टिमें पृथिवी, भाप, म, दापु
देव, ज्या शरीर के अंदर पाचा, मन, सक्षु और श्रोत्र ये देव समझने मगे
महोइम जगत्को भाण करते हैं और हमारेसे कोई श्रेष्ठ शक्ति
नहीं है। इन देवोका यह गर्व देखकर प्राण कहने लगा कि, डे, देवो!
ऐसा घमंटन कीजिए, महीपने भापको पांच विभागों में विभक्त करके।
सी धारणा कर रहा हूं। पांतु इस कथनको उन देवाने माना नहीं,
सस समय मुख्य प्राण वहांसे हटने लगा, तब सब देव कांपने लगे। फिर
अब प्राण भागया तप देव मल हुए। इससे दोको पठा सगा कि यह
सामाणकी शक्ति है जिसके कारण हमार्य , कर रहे हैं। हमारी ही
केवल शक्तिसे हम इस कार्यको चलानेमें सर्वधा मसमर्थ हैं।
प्रकार अब देवोंने प्राणकी महिमा विदित की, तद ये प्राणकी स्तुति करने
को यह स्तुविनिम्न मंत्रों में है-
प्राण-स्तुति ।
एगेऽग्नित्तपत्र सूर्य एप पर्जन्यो मचानेप घायुरेष पृथि
घो रयिदे । सदसञ्चामृतं च यत् ॥५॥ पराइच रथनामी
प्राणे सर्व प्रतिष्ठतम् । चा यजाप सामानि यमाक्षर ग्रह्म
च॥ प्रजापतिश्परासि गमें न्यभेय प्रतिज्ञायसे । तुम्
प्राणा प्रतास्थिमा यलि हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥
देशानामांस यदिनमः पितृणां प्रथमा स्था। अपीगो चरितं
सत्यमागिरसाममि दस्थ प्राणनेजसा रक्षाऽसि
परिरक्षिता पम्नरिक्ष परसि मूर्य ज्यांनियां पति.
पास्यमियपस्यमाः प्राणते प्रजाः मारपास्तिष्ठति
कामायानं भविष्यती प्रात्यम्य प्रापिपिता विश्व
स्प सापतिः। पपमापस्य दाता पिताप मातरिश्चना
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(१४४) । . या ते तनूवाचि प्रतिष्ठिता या थोत्रे या व चक्षुपि। या च मनसि संतताशिवां तां कुरु मोममोः ॥१२॥ प्राणस्येदं वशे सबै त्रिदिवे यत्प्रतिष्ठितम् । मानेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रशां च विधेहि इति ॥१३॥ (प्रभ. उ. २). "यह प्राण भग्नि, घायु, सूर्य, पर्जन्य, इंद्र, पृथिवी, रयि मादि सर है। जिस प्रकार रचनाभिमें मारे जुड़े होते हैं, उसी प्रकार प्राणमें सब जुदा हुमा है। ऋचा, यजु, साम, यज्ञ, क्षत्र और शान सयही प्राणके माधारसे हैं । हे प्राण ! तू मजापति है और गर्भमें ही जाता है । सप प्रजायें तेरे लिये ही यली अपण करती हैं । सू देवोंका श्रेष्ठ संचालक मौर पितरों की स्वकीय धारणशक्ति है। मथर्वा आंगिरस ऋषियोंका सत्य सपाचरण भी तेरा ही प्रभाव है। इंद्र, रुद्र, है। वही वेपसे तेजस्वी हो रहा है । जप तू वृष्टि करता है, तब सय प्रजायें मानंदित होती हैं, क्योंकि उनको यहुत अन इस वृष्टिसे प्राप्त होता है । तूही वारय एक ऋषि और सब विश्वका स्वामी है, हम दाता हैं और तू हम सपका पिता है। जो मेरा शरीर, वाचा, चक्षु, श्रोत्र और मनमें है, उसको कल्याणरूप को और हमारेसे दूर न हो । जो कुछ त्रिलोकीमें है यह सब प्राणके घश में है। माता के समान हमारा संरक्षण करो और शोमा प्रथा प्रशा हमें देखो"। यह देवोंका बनाया माणसूक्त देखनेसे प्राणका महत्व ध्यानमें जा सकता है। यह सूक्त कई रष्टियोंसे विचार कानेयोग्य है। पहिली बात जो इसमें कही है वह यह है कि चक्षु प्रोग्र भादि इदियो शरीरमें व्या सूर्य चंद्र पायु मादि अगत्में देव हैं और ये सब प्राणके वश में हैं। प्राणकी शक्ति इनके अंदर आयी है और इनके द्वारा कार्य करती है। जिस प्रकार प्राणको शक्ति पारमें जाका पांसको देखने के कार्य करने के लिये समर्थ बनाती है, उसी प्रकार सूप अंदर विशम्यापक प्रागस्ति रहकर प्रचार कर रही है। , इसलिये अखिकी दृष्टि और सूर्यको प्रकाशशक्ति न मांस और सूर्यको है प्रत्युत प्रागकी है। इसी प्रकार अन्य इंद्रियों और देवताओंके विषयमें जानना उचित है। देव'शब्द'जैसा गरीरमें इंदियवाचक है, उसी प्रकार जगत्में हानि वायु भादि देवतानीका भी पाचक है । पाठक इस दृष्टिको धारण करके भनि मादि देवता के सूत्रों का विचार करें। उक्त सून में दूसरी बात यह है कि, अति मर्य, इंद्र, वायु, धिवी, रद्र भादि शब्द भगवाचक होनेसे इन देवतामोंके मूनों में भी प्राणविद्या प्रकाशित हुई है। इमलिये जो मजन अति आदि सूनोंका विचार करते है, ये टफसूकॉमें विद्यमान प्रावधाका भी विचार करें। अर्थात् अग्नि सूर्य आदि देवताओंके नामोंका 'ग' अर्थ ममाकर उन मनोंका मर्य करें। जो सात सामान्य अर्थवाले होंगे उनके अर्थ इस प्रकार हो सकये है। देखिये- प्राणरूप अछि। .

(१४६) प्राणाविद्याका महत्व उसमे वर्णन किया है। इसका थोडासा स्पष्टीकरण देखिये- (१) देवानां वदितम मसि । = प्राण "इदियोंको" चलानेवाला है। 'सूर्यादिकोंको' चलाता है, प्राणायामद्वारा विद्वान्" उबात प्राप्त करते हैं। (२) पितृमा प्रयमा स्वधा असि । - सपूर्ण पालक शक्तियों में सबसे श्रेष्ठ और (प्रथमा) अव्वल दर्जे की पालकशक्ति प्राण है और वह ही (स्वधा ) आत्मत्वको धारणा करती है। (३) ऋपीणा सत्य चरित मसि 1= सप्त ऋपियोंका सत्य (चरित) चालचलन अथवा आचरण प्राण ही करता है । दो लाख, दो कान, दो नाक भार एक मुख ये सप्त ऋपी हैं, ऐमा वेद और उपनिषदों में कहा है। ( ४ ) अथर्वागिरसा चरित असि | = (अथर्वा भगिरपी ) स्थिर मंगोंक रसोंका (चरित) चलन अथवा भ्रमण प्राण ही करता है । प्राणके कारण पोषक रस सब भगोंमें भ्रमण करता है और सर्वन पहुचकर सर्वत्र पुष्टि करता है। इस प्रकारका भाव उक्त सूक्तके याक्यों में गुप्त रीतिसे है। प्रत्येक शब्दका भाशय देखनेसे इसका पता ला सकता है। साधारण सूचना देनेक जिये यहां उपयोगी होनेवाले पदार्थ नीचे देता ह - (१) मानि = गति देनवाला, उष्णता और तेज उपत करनेवाला, (२) सूर्य = प्ररणा करनेवाला, प्रकाश देनेवाना, (३) पर्ज य ( पर पन्य ) पूर्णता करनेगला, (४) मघवान् = महत्वमे युक्त (५) वायु = हिलानेवार। और भनि टको दूर करनेगला (६) सृषिधी विस्तृय, माधार देने वाली, (0) रपि = तेज, पपत्ति, शरीरसपत्ति मादिः (6) देव =कौडा, विजिगपा, व्यवहार, तज, मानद, हर्ष, निदा, उत्साह, स्फूर्ति मादि देनेवाला, दिव्य, (१) अमृत - अमरत्वमे युक्त,(.) प्रजा पनि स्पधु भादिया प्रजाओंका पालक, प्रजा उत्पस करनेवाला, (B) पद्विवम अत्यठ ।

(१४७) - प्रेरक (१२) इंदः ऐश्वर्यवान्, भेदन करनेवाला (१३) रुद्रः ( स्त्- पः) बाब्दका प्रेरक; (रप-र:) दुःखको दूर करके भारोग्य देनेवाला (१४) प्रात्यः = ( व्रत ) नियमके अनुसार आचरण करनेवाला । इस प्रकार शब्दोंके अर्थ देखनेसे पता लगेगा, कि उक्त शब्दोंद्वारा प्राणकी किस शक्तिका कैसा उत्तम वर्णन किया गया है। वैदिक शब्दोंके गूढ माशय देखने मेही वेदकी गंभीरता व्यक्त होती है। भाशा है कि पाठक उक्त प्रकार उक्त सूक्तका विचार करेंगे। इस प्रकार प्राणकी मुख्यता और श्रेष्ठता है और वह प्राण सूर्यकिरणों के द्वारा प्राणियोंतक पहुंचता है। प्राण सूर्यकिरणोंसे वायुमें माता है, वायु श्वाससे अंदर जाता है, उस समय यह मनुष्यके शरीरमें पहुंचता है। प्राणायामके समय इस प्रकार इस प्राणका महत्व ध्यानमें धरना चाहिए। प्राणका प्रेरक । केन उपनिषदमें प्राणके प्रेरकावका विचार किया है । प्राणके माधीन संपूर्ण जगत् है, तथापि प्राणको प्रेरणा देनवाला कौन है ? जिस प्रकार दीवानके आधीन सय राज्य होता है, उसी प्रकार प्राणके आधीन सय इंद्रियादिकों का राज्य है। परंतु राजाशी प्रेरणासे दीवान कार्य करता है, उम प्रकार यह प्राणका प्रेरक कौन है। यह प्रश्नका सात्पर्य है। केन प्राणः प्रथमः प्रति युक्तः ।। केन द. १ "किसपे नियुक्त होता हुआ प्राण चलता है ? " अर्थात् प्राणकी प्रेरक शक्ति कौनसी है। इसके उत्तर में उपनिषद् कहता है कि-- स उप्रापणस्य प्राणः॥ (फेन ३०२) "वह भान्मा प्राणका प्राण है "अर्थात् प्राणका प्रेरक आरमा है। इसका और वर्णन देखिये--

(१४८)
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्राणीयत।
तंदव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते !
(केन उ.)
"जिसका जीवन गणसे नहीं होता, परंतु जिससे भाणका जीवन होता
है, वह (ब्रह्म ) आत्मा है, ऐसा तुम समझ लो। यह नहीं कि जिसकी
उपासना की जाती है।
अर्थात् भास्माकी शक्तिसे पण अपना सब कारोबार चला रहा है, इस.
लिये भाण की प्रेरक शक्ति आत्मा ही है । इस विषयमें ईशोपनिषद् का मंत्र
देखने योग्य है-
योऽमावमा पुरुषा मोऽहमास्मि ।
। ईश. १६)
योऽसाचादित्य पुरुषः सोऽमावहम् ॥ (वा० यजु० १७)
"जो यह ( पसा) असु अर्थात् प्राणके अंदर रहनेवाला पुरुष है, पह
मैं भात्मा हूं, मेरे गरों ओर प्राण विद्यमान है और मैं उसका प्रेरक
हूं। मेरी प्रेरणासे प्राण चल रहा है और सय इंद्रियोंकी शक्तियाँको
उत्तजित कर रहा है। इस प्रकार विणास रखना चाहिए और अपने प्रमा.
घका गौरव देखना चाहिए। इस विषयमें ऐतरेय उपनिषद्का वरन
देखिये-
नासिके निरभिद्यतां नासिकाभ्यां प्राणः प्राणाहायुः।
(ऐ० ८० ॥१॥४)
यायुः प्राणो भूत्या नामिक प्राविशत् ॥
(३० उ० ११२४)
"मासिका स्थानमें इंद्रिय हो गये, नामिकामे प्राण और प्राणी
यार हो गया। "मर्थान् प्राणसे घायु हो गया। मामाकी प्रबल इच्छा

. - शक्ति थी कि मैं सुगंधका आस्वाद ले लें। इस इच्छागक्तिसे नासिकाके स्थानमें दो वेद बन गये, ये ही नासिकाके दो छंद हैं । इस प्रकार नाक धनते ही प्राण हुदा और प्राणसे वायु बना है । आत्माकी इच्छाशक्ति कितनी प्रयल है इसकी कल्पना यहां स्पष्ट हो सकती है। इस प्रकार शरीरमें छेद करनेवाली शक्ति जो शरीरके अंदर रहती है वह ही आत्मा है। इमको इंद्र कहते हैं क्योंकि यह आत्मा (इदं द्र । इस शरीरमें सुराख करनेकी शक्ति रखता है। इसकी प्रबल इच्छाशक्तिसे विलक्षण घटनायें यहां सिद्ध हो रही हैं. इसका अनुभव अपने शरीरमें ही देखा जा संकता है। जो ऐसा समर्थ जीवरमा है, वह ही प्राणका प्रेरक है। इसका सेवक प्राण है, यह प्राण वायुका पुत्र है, क्योंकि ऊपर, दिये मनमें कहा है कि "वायु प्राण बनकर नामिकामें प्रविष्ट हुमा है।," इसलिये यह मात्र चायुका पुत्र है । यही 'मारुती" है, मारुतीका अर्थ 'मारुत्' अर्थात् वायुका पुत्र । विमें च्यापनेवाला पवन वायु है, उसका एक अंश शरीरमें मयतार, लेता है, इसलिये इसको 'पवनात्मज' कहते हैं । यही हनुमान, मारुाते, राम-सखा है। अवतारकी मूल कल्पना यदा व्यक्त हो सकती है। विश्व- च्यापक शनियां अवताररूपसे कर्मभूमिमें अर्थात् हम देहमें भाकर कार्य करती हैं । पायुके पुनोंकी जो कल्पना पौराणिक वाङ्मयमें है पह यदी है । इसको चिरंजीव कहा है, इसका कारण इम लखमें पूर्व स्पलमें यताया ही है । प्राणके अमरत्व के साथ इसका चिरजीयत्व सिद्ध होना है। इस प्रकार यह हनुमानजीका रूपक है । इसका संपूर्ण वर्णन किमी अन्य स्थानमें किया जाय । यहां संक्षेपमे सूचना माग्न लिसा है। अर्थात् हनुमानजीकी उपासना मूलमें प्राणोपासना ही है । यह "दशरथके राम" का सहायक है. दश इंद्रियोंके रथमें जो भानंदरूप भारमा है, उसका यह प्राण नित्य सहायक ही है । तथा “दशमुमकी लंका को जलानेवाला है। दश इंद्रियोंसे मुग्यतया भोगमें जो प्रवृत्तियां होती है, उसका प्राणायामके अभ्याससे दहन होता है । इत्यादि विचारसे पूर्वोक्त कल्पना अधिक सष्ट - , (१५०) होगी। पाठक इसका विचार करें । पूर्वोक उपनिषझै "प्राणकाप्रेरक भारमा" कहा है, और उक्त इतिहासमें "वायुपुत्रका प्रेरक दाशरथी राम* कदा है, दोनोंका तात्पर्य एकही है। सूज्ञ वाचक विचारके द्वारा इसके मूल भावको जान सकते हैं। पूर्वोक्त ईशोपनिषद्के वचनमें "असौ मई" शब्द आये हैं । "प्राणके जंदर रहनेवाला मैं भात्मा" यही भाव वृहदारण्यकके निम्न पचनमें दै-- याप्राणे तिष्ठन्प्राणादन्तरो यं प्राणोन वेद यस्य प्राणा शरीरं यः प्राणमंतरो यमयति, एप त आत्मा अंतर्याम्यमृतः। (पृ. १७१६) "जो प्राणके मदर रहता है, प्राणके अंदर रहनेपर भी जिसको (प्राणः न घेद) प्राण जानता नहीं, जिसका शरीर प्राण है, जो अंदरसे (प्राण यमयति ) प्राणका नियमन करता है, (एषः ) यह तेरा भंतांमी अमर मात्मा है।" प्राणके अंदर रहनेवाला और प्राणका नियमन करनेवाला यह भात्मा है। इस कथनके अनुसार गारमाका प्राण माय नित्यसंबंध है, यह यात स्पष्ट होती है । 'मैं भारमा हूं' प्राण मेरा धनुचर है और प्राणके माधीन संपूर्ण इंद्रियां और शरीर है। यह मेरा वैभव और साम्राज्य है। इसका मैं सया सम्राट बन्गा भौर विजयी तथा यशस्वी भगा,' यह वैदिक धर्मकी आदर्श कल्पना है । इस प्राणका वर्णन अन्य धनों में हुमा है- प्राणो वैरं प्राण दीमानि भूतानि रमन्ते (पृ. ५.२) प्राणो या उक्यं प्राणे हीदं सर्वमुत्थापयति ॥१॥ प्राणो वै यजुः प्राणे होमानि सर्वाणि भूनानि युज्यन्ते ॥२॥ प्राणो व सामाणे होमानि सर्वाणि भूतानि सम्यचि ॥३॥ प्राणो वै क्षत्रं प्राणो हि प्रायते | (पृ. उ. ५/१६) 'प्राण'र' है, क्योंकि सब भूत प्रागमें रमत है। पाण 'उपथ' है क्योंकि प्राण सबको उठाता है। प्राग 'यजु' है, क्योंकि प्राण में सब भूत संयुक्त होते हैं। प्राण 'साम' है, क्योंकि सब भूत प्राणमें सम्यक् रीतिसे रहते हैं। प्राणं 'क्षत्र' है, क्योंकि प्राणही क्षतों अर्थात् कष्टोसे बचाता . . इसका प्रत्येक मुख्य शब्द प्राणको शक्तिका वर्णन कर रहा है । 'साम, य' मादि शब्द अन्यत्र वेदवाचक होते हुए भी यहां केवल गुणवाचक हैं। इस शब्दप्रयोगसे स्पष्ट पता लग जाता है कि वैदिक समपमें शब्दॉका विशेष रीतिसे भी उपयोग होता था और सामान्य रीतिसे भी होता था । यहा सामान्य रीतिका प्रयोग है। जहां सामान्य रीतिप्ते प्रयोग होगा, यहां उसकायौगिक भर्थ करना चाहिये और जहां विशेष रीतिसे प्रयोग होगा, यहाँ योग रूढिका अर्थ समझना चाहिए। इस प्रकार एकही शब्दके दोनों भर्य होनेपर भी अर्थविषयक ठीक व्यवस्था लगाई जा सकती है। माशा है कि पाठक इस व्यवस्थाको वेदमंत्रों में देखेंगे । यह बात वेदका अर्थ करने के समय विशेष महत्वकी है, इसलिये यहां लिपी है। अंगोंका रस। शरीरके अंगोंमें एक प्रकारका जीवनका माधाररूप रस है। इसका वर्णन निम्न मंत्र है- आंगिरसोऽगानां हि रसः, प्राणो या अंगाना रसः तस्माद्यस्माकस्माच्चांगात् प्राण उत्सामति, तदेव तच्छुप्यति । (वृ० १३१९) "माग ही अंगोंका रस है, इसलिये जिस अंगसे प्राण चला जाता है , यह अंग सूख जाता है।" वृक्षॉमें भी यही यात दिखाई देती है। यह अंगरसका महत्व है। जीवाग्माकी रहासे प्राणके द्वारा यह रस सर शरीरमें घुमाया जाता है और प्रत्येक अंगमें क्षारोग्य और पल बढाया जाता है । प्रपल इच्छाशक्तिद्वारा ...

। - आरोग्य संपादन करने का उपाय इससे विदित होता है । इच्छाशक्ति और प्राण इनका बल बढानेमे उक्त मिद्धि होती है। मामाकी प्रेरणा प्राणमें होती है, माणसे मन संलग्न रहता है, मनरे इच्छाशक्तिका नियमन होता है, इच्छासे रुभिरमें परिणाम होकर इसके द्वारा संपूर्ण शरीरमें इष्ट कार्य होता ह । देखिये-- पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि संपद्यते. मनःप्राण, प्राणम्तेजलि, तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ( उ०६६) "पुरपकी वाणी मनमें, मन प्राणमें, प्राग तेजमें सार तेज परदेवतामें संलम होता है।" यही परपरा है । परदेवताका तात्पर्य यहां मामा है माणविद्याकी परम सिदि इस प्रकारसे सिद्ध होती है। प्राण और अन्य शक्तियां । प्राणके माधीन अनेक शक्तियां है, उनका प्राणके साथ संबंध देसनके लिये निम्न मंत्र देखिये- प्राणो वाय संवर्गः । स यदा स्वपिति, प्राणमेव वागप्येति, प्राणं चश्नः, प्राणं श्रोत्र, प्राणं मनः, प्राणो होवैतान संवृटतं ॥३॥ (छt० ४।३३) "जब यह मोता है तब वाय, पशु, श्रोग्र, मन भादि सप प्रागही लीन होती है, क्योंकि प्राणही इनका मंदारक है।" जिस प्रकार सूर्य उगने के समय उसरी किरण पं.दी और धनके समय फिर अंदर लीन होती है, इसी प्रकार प्राणम्पी मूर्यका जागृनिके भारंभमें उदय होता है, उम ममय उपकी किरणें इंद्रियादियों में फैलती है और निदा समय फिर उसी में लीन होती है। इस प्रकार प्रानका सूर्य होना सिद्ध होता है। इसका माय एक अंगमें है यह बात भूलना नही चाहिये । सूर्यके समान प्राणका भी कभी मन नहीं होता, परंतु मन भीर .

उदय ये शब्द हमारी अपेक्षासे उसमें प्रयुक्त हो रहे है। इस विषयमें निम्न वचन और देखिये- पतंग। स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रयद्धो, दिशं दिशं पतित्वा, अन्य बायतनमलव्धवा, बंधनमेवोपश्रयन, एवमेव खलु, सोम्य, तन्मनो दिशं दिशं पतित्वा अन्यत्रायतनमलब्ध्वा प्राणमेयोप- श्रयते, प्राणबंधन हि साम्य मनः ॥ (छां० उ० ६बार "जिस प्रकार पलंग, डोरीमे बंधा हुमा, भनेक दिशाओमें घूमकर, दूसरे स्थानपर आधार न मिलने के कारण, अपने मूल स्थानपरही भाजाता है। इसी प्रकार निश्चयसे, हे प्रिय शिव्या वह मन अनेक दिशा में घूम घाम कर, पूसरे स्थान पर धाश्रय न मिलने के कारण, प्राणकाही माश्रय करता है, क्योंकि, हे मिय शिष्य ! मन प्रागके साथही बंधा है।" इस प्रकार प्राणका मनके साथ संबंध है । यही कारण है कि प्राणायाम से प्राण यलवान होनेपर मन भी बलिष्ट होता है, प्राणका निरोध होनेसे मनमा संयम होता है। प्राणको चंचरतापे मन चंचल होता है और प्राणकी स्थिरताम्मे मन भी स्थिर होता है। इससे प्राणायामका महत्व और उसका मनवे संयमके साथ संबंध विदित हो सकता है। प्राणसे मन का संयम होने के कारण अन्य इंदिया भी प्राशके निरोधसे म्याधीन होती है, यह स्पष्ट की है, क्योंकि प्राणमे मनका संयम मार मनके यश होनेसे अन्य इंद्रियांका या होना स्वामाविक ही है। इस प्रकार प्राणायामसे संपूर्ण शक्तियो वशीभूत होती हैं । यही भार निम्न वचनों एस रीनिसे (१५४) - वसु-रुद्र-आदित्य। प्राणा वाव वसव एते होदं सर्व वासयन्ति ॥१॥ प्राणा वाव रुद्रा पते हीद सर्व रोदन्ति ॥२॥ प्राणा वावादित्याः एते हीदं सर्वमाददते ॥५॥ (छां० उ० ३१६) "प्राण वसु हैं क्योंकि ये सबको घसाते हैं। प्राण रुद्र हैं, क्योंकि इनके चले जानेसे सब रोते हैं। प्राण मादित्य हैं, क्योंकि ये सबको स्वीका- रते हैं।" इस स्थानपर "प्राणा'च रुद्राः हीदं सर्व रोदनं दावयन्ति" अर्थात् "प्राण रुद्र हैं, क्योंकि ये इस सब दुःसको दूर करते हैं । " ऐसा माक्य होता तो प्राणका दुःसनिवारक कार्य व्यक्त हो सकता था। परंतु उपनिषद्- “एते हीदं सर्व रोदयन्ति । " अयात् ये प्राण जब चले जाते है, सब वे सयको रुलाते हैं. इतना प्राणोंपर प्राणियोंकर प्रेम है. ऐसा लिखा है। शतपथादिमें भी रुद्रका रोदनधर्मही वर्णन किया है, परंतु दुःख. निवारक धर्म भी उनमें उससे अधिक प्रयल है। इसका पाठक विचार करें। इस प्रकार प्राणका महत्व होनेसे ही कहा ई- प्राणो हपिता, प्राणो माता, प्राणो भ्राता. प्राणः खसा, प्राण भाचार्यः, प्राणो ब्राह्मणः (सां. उ.७१५1) "प्राण ही माता, पिता, माई, बहन, भाचार्य, ब्राह्मण मादि हैं।" ये शब्द प्राणका महत्व बता रहे हैं-(१) माता-मान्य हित करनेवाली; (२) पिता-पाती, पालक, संरक्षक; (३) ग्राम-भरण पोषण करनेवाला; (४) स्वसा(मु असा) उत्तम प्रकार रखनेवाला (५) थाचाय-मामिल गुरु है, क्योंकि प्राणके मायामसे आग्माका साक्षात्कार होता है इसलिये; (६) माझणः- यह ब्रह्म के पास जानवाला है। ।

- ये शब्दोंके मूलमाव यहां प्राणके गुण यता रहें है। यह प्राणवर्णन है। इतना प्राणका महत्व है, इसलिये अपने प्राणके विषय में कोई भी उदासीन नरहे । सब लोग स्वर्ग प्राप्त करने की इच्छा करते हैं, वह स्व प्राणही है। देखिये- तीन लोक। यागेवायं लोफो मनो अंतरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः॥ (पृ.१०५४) "याणी यह पृथ्वीलोक है, मन अंतरिक्षलोक है और प्राण ही स्वर्गलोक इसलिये प्राणायामके अभ्याससे स्वगंधामको प्राहि होती है देखिये प्रागकी कितनी पता है !! इस प्रकार उपनिषदों में प्रागविद्या है। .मय विस्तार करनेकी कोई जरूरत नहीं है। संक्षेपसे मावश्यक पानीका उठेग्य यहो रियादै । इससे उपनिषदों की माल विद्याकी कल्पना हो सकती है। जो पाठक इसकी मोर मधिक गहराई देखना चाहते हैं, ये स्वयं उपनिपमिदी इसको देख सकते हैं नाशा है कि पाठक इस प्रकार इस पिपासा अभ्यास करेंगे। प्राणायामसे बहुत प्रसारकी सगियां प्रास होती हैं, ऐसा माणके रिधानों में रिसा है। प्राणायामका अभ्यास करनेमे पाकियोंकी प्राति रोना संभव है। अभ्यास • पिना टाति की प्राप्ति सर्वपाही पराभव है। प्राणापामका भन्यास करने के लिये प्रागरी शक्शिी कल्पना मयम दोनेकी मापाता है। यह कार्य मिद होने के लिये इस पुस्तका उपयोग होगरता है। इस पुस्पको भी प्रकार पढ़ने के पधार मनन- अपनी मागणमिका मारसन करना चाहिए। अपने प्राग यद सार, सायद महारभार हाकी उपासनामे इस प्रकार साम हो सकता है, इत्यादि विषयकी उत्तम करपना इस पुस्तकके अभ्यास से होगी। इतनी कल्पना इस होनेके पश्चात् प्राणायामका अभ्यास करने से बहुत लाभ हो सकता है। इस प्राणायामके भनुष्ठानका प्रकार विस्तारपूर्वक उत्तरार्धमे लिखा है । इसके अभ्यापके पश्चात् पाठक उस पुस्तकको अवश्य पढ़ें और उस प्रकार मनुबान करके अपनी उन्नतिका साधन करें। व्यक्तिमें शांति, जनतामें शांति और जगत्में शांति समाप्त

वैदिक चिकित्सा
विषय-सूची
पृष्ठा
३
५
विषय
यदिक चिकित्सा ।
(१)दिप वैचा
(२) मारपिणिमिता
१३) जम चिम्मिा
(५) प्रतिनिcिom
(५) इमरिग
(Ot.ivfernा
(पापुपिया
(CORRR विमा
येदा येशान
Thanपि
१२
२३
Ramniy
HTRIA
पीपल और गयन
เหระ
नमुनि
गोयामि
गया फामिदा-गोगी निम्मिा

" ७३ i (१५८ वर्णचिकित्सा सूर्य किरण चिकित्सा परिधारण विधि रूप और बल रंगीन गौके दूधसे चिकित्सा पथ्य वैदिक-प्राण-विद्या अवैतनिक महावीरोंका स्वागत वैदिक प्राणविद्या इंश्वर सबका प्राण है अन्तरिक्षस्थ प्राण ७५ ७७ " ७९ प्राणका कार्य ८. ८२ ८४ ८५ वैयक्तिक प्राण प्राणका औषधि गुण सर्वरक्षक प्राण प्राणकी उपासना सत्यसे बलप्राप्ति सूर्यचन्द्र में प्राण धान्यमें प्राण माणसे पुनर्जन्म अथर्व चिकित्सा प्राणकी वृष्टि ८७ ८८ पिता-पुत्र संबंध ९१ नमन और प्रार्थना

१०२
JU
भागतासाम
ऋग्वेदमें प्राणविषयक उपदेश
पा-नीति
यजुर्वेदमें प्राणविषयक उपदेश
मागडी पषि
गापन मोर प्रारित
प्रागीटा
Param
मानानामपि
मारमापनि रिसा
रियामा
बाग
राती प्राग
भीमान
गानि
भREETT
मेxिit
det

यमके दूत १२९ १३१ " अथर्वाफा सिर ब्रह्मरोककी प्राप्ति देवोंका कोश ब्रह्मकी नगरी अयोध्या मगरी अयोध्याका राम उपनिपदों में प्राण विद्या प्राणका श्रष्ठता प्राण कहास आता है। देवोंका घमड प्राण स्तुति प्राणरूप अग्नि प्राणा प्रेरक १३२ १३३ १३४ १३९ १४३ " १३५ १४७ अगोका रम १५२ १५३ प्राण भार अन्य शक्तियाँ पतग वसु रद भादित्य तीन लाक १५५

Vaidic Chikitsa

Author
Satwalikara,.s.d.
Title
Vaidic Chikitsa
File name
Vaidic Chikitsa
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2012/08
Publisher
Surat,.bharat Mudralye Anadsharam
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312365
Barcode
99999990321160.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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VMLT id
Ivg5L3XOAH8
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