Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sahitya Sushama
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सत्साहित्यग्रन्थमाला-ग्रन्थ । साहित्य-सुषमा। अर्थात [ हिन्दी पद्य-साहित्य का एक अपूर्व ग्रन्थ ] सग्रहकर्ता पं. रामदहिन मिश्र काव्यतीर्थ । प्रकाशक- ग्रन्थमाला-कार्यालय धांकीपुर नृतीय संस्करण १९२० [मूल्य पाठ आर पं० देवीदयालं वाजपेयी द्वारा- "पञ्चानन मेंस" सप्तसागर बनारस में मुद्रित ।
सूचीपत्र ।
विषय
इष्ठ
...
.
१
चन्दवरदाई
विद्यापति ठाकुर
कधीर साहेब
मीराबाई
गुरूनानक
सूरदास
मलिक मुहम्मद जायसी
Vतुलसीदास
दादू दयाल
है
१३३
रहीम
३४
रसपान
केशवदास
सुन्दरदास
बिहारीलाल
पण
मतिराम
देव
४१
४२
५०
५२
। २)
विषप.
पृष्ट.
नागरी दाम
...
८०
.
.
दिनपत्यापन
সিসি
पमाफर
ग्याल
/भारतेन्दु
धीधर पाठक
अयोध्या निद उपयाय
लाला भगवान दीन
रामचरित उपाध्याय
मैथिलीशरण गुप्त
श्रीयुत 'सनेही
रूपनारायण पाएदेय
कामता प्रसाद गुरु
लोचन प्रमाद पाण्डेय
रामददिन मिश्र
१०४
१०५
.
वक्तव्य । हमारे हिन्दी साहित्य में कैसे अनमोल रत्न भरे पड़े हैं, इसके शान और लाम हमारे नवयुवक विद्यार्थियों को बहुत कम होते हैं। इसको कारण यह है कि वे हमारे साहित्य से बहुत दूर रहते हैं। माध्यमिक कक्षा तक के साहित्य में उन्हें कुछ पद्य गद्य के साथ पढने को मिल जाते हैं, पर उच्च कक्षा में पहुंचते ही पहुँचते पद्यों से उनका पिएड एक प्रकार छूट ही जाता है। जहाँ कहीं पद्य पाठ की कुछ चर्चा है पर वह नाम मात्र की और वे सिलसिलेवार । उसमें भी व्यक्ति-विशेष की ही कुछ कविताओं के पढाने की प्राय. व्यवस्था दीप पड़ती है न कि कविवर्ग की सकलि कविताओं की। यदि हम दूसरी भाषाओं की ओर दृष्टि उठाने हें तो इस प्रकार की प्राचीन कवियों की सकलित कविताओं के अनेक ग्रन्थ दीख पडते हैं। पर हमारे साहित्य में इसकाएक दम अभाव है। इससे जो उद्देश्य लेकर विश्वविद्यालयों के प्रवेशिका- परीक्षार्थी विद्यार्थियों के लिये 'साहित्यसुधाकर' नामक हिन्दी गद्य साहित्य की पुस्तक निकाली गयी है उसी उद्देश्य से यह भी पुस्तक निकाली जाती है।
आदि प्राचीन तथा मिश्र-बन्धु-विनोद, कविता कौमुदी आदि
नवीन सग्रह पुस्तकों तथा सरस्वती आदि पत्र पत्रिकाओं से
चुनी हैं। इनका क्रम और परिचय प्रायः मिश्र-बन्धु विनोद
के अनुसार ही, यद्यपि उसमें कहीं २ व्यतिक्रम है, रक्सा है।
अतएव में इस साहाय्य-प्राप्ति के लिये उन सवों का कृतश हूँ।
जिन लोगों ने अपनी २ कविताओं को उद्धृत करने की अनु-
मति देकर मुझे अनुगृहीत किया है उनको भो हार्दिक धन्य
वाद देता हूँ।
।
ग्रन्थमाला मालाकार
T
रामदहिन मिश्र।
AM - - : साहित्य-सुषमा। - 1 - हिन्दी के प्रादि महाकवि चन्द वरदाई कृतः ।। मगलाचरण । 1 " नमो देव देवाधि. नमो नाभाय कमल वर । नमो माल पंकजन नमो वर, कनल कमल कर ।। नमो, नन घर कमल नमो चित्तह अधिकारिय । नमो विकट भजनन नमो संसार सुधारिय ॥ नमो चन्द नन्दन नवल नंद ग्रेह ब्रह्मएड गुर। दिप्पहिं सुदेव देवाधि तुहि मुगति समप्पन तिनहिं उर॥१॥ महाकवि मैथिल-कोकिल विद्यापति ठाकुर कृत। - विनय के पद। माधव बहुत मिनति करि तोय । टेर तुलसि तिल देहे समपिनु दया जनि छोडवें मोय । गनइत दोस गुन लेस न पायचि जर तुएं फरिरिरिचार। तु जगत जगनाथ कहायलि जादारिन इ कार किय मार्नुप पनु पाखी जे जनमिय प्रथया कीट पत। फरम विपास गतागत पुर "न मति ए तुम परसङ्ग ,
.
साहित्य-सुपसी
।।
हार्ड बडा हरि भजन कर, द्रव्य बडा कछु देय।
। अकल बडी उपकाराकर,जीवन का फल येह ॥४॥
देह धरे का गुन यही, देह : कछु देहुँ ।'
। बहुरि न देही पाइये, अवकी देहु सो देहु ।
सत ही में सत बाँई, रोटी में ते
माइक ।
1 यह कवीर ता दास को, कबहुं न श्रावैचूक ॥ ६॥
।
T
-
। सन्तोष।
"
चाह गई चिन्ता मिटी, मनुवां वे परवाह ।
जिनको कळू न चाहिये, सोई साहंसाह ॥१॥
सागन गये लो मरि रहे, मरे सो मांगन-जाहिं।
तिनसे पहिले वे मरे, होत करत,जो, नाहिं ॥२॥
गोधन गजधन वाजिधन, और रत्नधन खान ।
। जय श्रावे संतोप धन, सब धन धूरि समान ॥३॥
मरि, जाऊँ माँ यूँ नहीं, अपने
परमारथ के फारने, मोहि न आवै। लाज ॥४॥
तन, के
काज ।
.
।
धैय्या
+
-
धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींच सौ घडा, ऋतु आये फल होय ॥१॥
कविरा धीरज , के धरै,, हाथी मन-भर खाय।
टफ एक के कारने, श्वान घरै, घर जाय ॥२॥
कविरा भघर में पैठि के, मौचफ धना न जोय।
1 इपन का भय छाडिये, करता कर सो होय ॥३॥
में मेरी सब जायगी, तब श्रावंगी और।।
1 अप यह निश्चल होयगा, तब पावेगा ठोर ॥४॥
कबीर साहब की खाखियों और भजन । ५ -- उपदेश के दोहे। - - . - १ । को 1 काल करै सो अाज कर, श्राज कर सो अध्य। पल में परलै होयगी, बहुरि करंगो कम्य ।। या दुनिया में श्रायके, छाडि देइ तूं ऐंठ। लेना होय सो लेइ ले. उठी जात है पैठ ॥२॥ कवीर श्रापं ठगाइये, और न ठगिये कोय ।। श्राप ठगे सुखं ऊपजे, और ठगे दुख होय ॥ ३ ॥ जो तोको काँटा वुचे, ताहि योय तू फूल । तोहि फूल फूल है, वाको है तिरसूल ॥४॥ दुल को न सताइये,'जाकी मोटी हाय । विना जीव की खास से, लोह भसम हो जाय ॥ ५ ॥ ऐसी यानी चोलिये, मन का श्रापा सोय।" औरन को शीतल करै, आपहुँ शीतल होय ॥६॥ योलत ही पहचानिये, साहु चोर को घाट । अतर की फरनी सबै, निकसे मुह की याट ॥७॥ कथनी मीठी खांड सी, करती विपकी लोय । कथनी तज करनी करै, तो विप से अमृत होय ॥८॥ ।' साँच वरावर तप नहीं, झूठ बरावर पापः ।। जाके हिरदे साँच ताके हिरदे श्राप ॥६॥ { 'घुरा जो देपन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल योजौं श्रापना, मुझ सा बुरा न होय ॥१०॥ । दाया" दिल में राखिये, तू क्यों निरदय होय । साई के सब जीव हें, कोडी फुजर सोय ॥११॥ ।। परनारी पैनी छुरी, मत कोई लागे भिंग । । रावन के दस सिर गये, परनारी के सग ॥१२॥ । T 2 साहित्य-सुषमा | E निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय । विन पानी सावुन यिना, निर्मल करे सुभाय ॥१३॥ तिनका कबहुँ न निन्दिये, जो पावन तर होय । कबहू उडि आँखिन परै, पीर घनेरी होय ॥१४॥ रूखा सूखा साइ' के, ठंडा पानी पीव । देखि विरानी चूपडी, मतं ललचायो जीव ॥१५॥ कवीर गर्व न कीजिये, एक न हँसिये कोय । अजहूँ नाव समुद्र में, क्या जाने क्या होय ॥१६॥ मांगन मरन समान है, मति कोइ मांगो भीख । मांगन ते मरना भला, यह सत गुरु की सीख ॥१७॥ आपातजोऔरहरिभजो,नख सिखतजोविकार। सब जिउते निरवैर रहु, साधु मता है सार ॥१८॥ गारी ही सो ऊपजे, कलह कष्ट औ मीच ।। हारि चले सो साधु है, लागि मरै सो नीच १en कमंगति। -- - ग - करम गति टारे नाहिं टरी। मुनि बसिष्ठ से परिडत हानी सोध के लगन धरी। सीता हरन मरन दशरथ को यन में विपत परी। कह वह फद कहाँ पर पारधि कह वह मिरग चरी ॥ सीता को हरि लै गो रावन सुधरन लंक जरी। नीच हाथ हरिचन्द बिकाने शलि पाताल , धरी । कोदि गाय नित पुग्न करत नृग गिरगिट जोनि परी । पाडव जिनके पापु सारथी तिन पर पिपती परी॥ दुर्बोधन को गरए घटायो अदुशल मास , की।
७ - - T कवीर साहब की साखियाँ और भजन । राहु केतु श्री भानु चंद्रमा विधि सजोग परी । कहत कबीर सुनो भाई साधो होनी होके रही ॥१॥ चलत का टेढे टेढे टेढे। दसो द्वार नरकै मैं वूडे दुरगन्धों के वेढे ।। फूटे नैन हृदय नहिं सूझै मति एकौ नहिं जानी। काम क्रोधतृष्णा के मारेडिमुये विन पानी॥ जारे देह भसम ह जाई गाडे माटी साइ। सूकर खान काग के भोजन तन की है बडाई॥ चेति न देखु मुगुध नर वौरे तोते काल न दूरी। कोटिन जतन फर बहुतेरे तन की अवस्थाधूरी।। बालू के.घरवा में बैठे चेतत नाहिं श्रयाना । कह कबीर यक राम भजे दिन वूडे बहुत सयाना ॥२॥ मन लागो,है मेरो फकीरी में जो सुख पायो नाम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में भला बुरा सवफी सुन लीजे, कर गुजरान गरीबी,में। प्रेम नगर में रहनि हमारी, भलि पनि आई सबूरी में । हाय में कूडी बगल में सोंटा, चारो दिसि जागौरी में । आखिर यह तन खाक मिलेंगे, कहत फिरत मगरूरी में । कहै कबीर सुनो भाई साधो, साहिब मिल सबूरी में ॥३॥ रहना नहिं देश विराना है। यह ससार कागद की पुडिया यूद पडे धुल जाना है। यह संसार कांट फी वाडी उलझ पुलझमरि जाना है। यह संसार माड श्री झापर नाग लगे घरि जाना है। कहत कबीर सुनो भाई साधो सतगुर नाम ठिकाना है | भजु मन जीयन नाम मयेरा। सुन्दर देह देस जिन भूलो झपट लेत जस पाज वटेरा। - -y + साहित्यासुपमा। या देही को गरव न कीजै उड पछी जस लेताबसेरा या नगरी में रहन न पैहो कोइ रहि जाय न दूरा घनेरा। कहै कबीर सुनो भाइ साधो मानुख जनम न पैहो फेरा ॥५॥ श्रीमती मीराबाई के भजन । । 1 घसो मेरे नैनन में नन्दलाल। मोहिनी मूरति साँवरि सूरति 'नैना'चने विशाल । अंधर सुधारस मुरली 'राजित उर वैजन्ती माल । छुद्र घटिका कीट तक सोभित नूपुर शब्द रसाल । मीरा प्रभु सन्तन सुखदाई, भक्तपछल, गोपाल ॥१॥ पायोजी मेंने राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु भवसागर तर पायो । जनम जनम की पूंजी पाई जग में सभी खोवायों। सरचे निहिं कोइ चोर न लेवे दिन दिन चढत सवायो॥ सत की नाव खेवैया सतगुरु भवसागर तर प्रायो। | "मीरा के प्रमु गिरिधर नागर हरख हरख जसं गायो ॥२॥ रामनाम रस पीजे मनुश्री राम नाम रस पीजे । तर्ज फुसंग सतसग बैठ नित हरि चरचा गुण लीजे ॥ काम क्रोध मद लोभ मोह दूं चित से बहायसु दीजे । मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ताहि के रंग में भीजे ॥३॥ मजि मन चरण कमल अविनासी। जेताई दीस धरनि गगन विच तेताई उठि सव जासी। कहा भयो तीरथ प्रत कीने कहा लिए करवत कासी ॥ इस देही का गरव न करना, माटी में मिलि जासी । यो ससार चहर की बाजी सांझ पड़यां उठ जासी । . 4 PM - श्री गुरु नानक जी के पद। फहा भयो है भगवा पहना घर तजाभए सन्यासी। जोगी होय.जुगति नहिं जानी उलट जनम फिर मामी ॥ अरज करौं अवला कर जोर स्याम तुम्हारी दासी। । मीरा के प्रभु गिरिधर नागर फाटो जम की फाँसीता ४॥ 1 - श्री गुरु नानक जी के पद:| साधो मन का माने तिश्रागऊ। काम क्रोध संगति दुर्जन को तातें अंहनिशि भागऊँ ॥ सुख दुख दोनों सम फर जाने आउर मान अपमाना। हरप शोक ते रहैं अतीता तिन 'जग' तत्त्व 'पछाना (अ) स्तुति निन्दा दोउ तिश्रागे सो पद निर्वाना। जन नानक यह सेल कठिन है किनह गुरु मुग्व जाना ॥१॥ साधी रचना राम बनाई। इक यिनसे इक अस्थिर माने अचरज लस्यो न जाई। काम क्रोध मोह बस -प्राणी हरि मूरति, विसराई ॥ १, झूठा तन सांचा कर मानेउ जिउ सुपना' रैनाई। जा दीसै सो सकल विनासे जिउ - यादर,की छाई 17 1 ,जन नानक जग जानिी-मिथ्या रहियो राम सरनाई ॥२॥ नर अचेत पापत डर रे। ' दीन दयाल संकल, भय भजन सरन ताहि तुम पकरे। घेद पुरान जासु गुन गावत, ताको नाम हिये,मो धरु-रे। पावन नाम जगतम हरि को सिमिर, सिमिर कलिमल सयहरु रे मानुस देह - बहुरि नहिं, पावै फछुक उपाय मुक्ति का फरुरे नानफ कहत, गाय फरुनामय भवसागर से पार उतर रे॥३॥ काहे रे घन खोजन जाई । .सर्व निवासी सदा, अलेपा, तोही सग , समाई ॥ ॥ 4 - ६ . . २ साहित्य-सुपमा। लटकन लटकत ललित भाल.पर, काजर बिंदु भुव ऊपर रो यह शोभा नैननि भरि देखें, नहिं उपमा कहुँ भूपर, रो करहुँक दोरि घुटरु बन लटकत, गिरत परत फ़िरिधा चतरी इत ते नंद लाइ लेत हैं उतते जननि बुलावति री। दपति होड करत श्रापुस में, श्याम खिलौना कीनो रो। सूरदास प्रभु ब्रह्म सनातन, सुत हित करि दोउ लीनो री ॥ ६ ॥ कृष्ण की क्यनी। मैया कयहिं चढ़ेगी चोटी। फिती बार मोहि दूध पियत भई यह अजह है छोटी ॥ तू जो 'कहति वल की बेनी ज्यों है है लांबी मोटी। काढत गुहत नहावत श्रोछत 'नागिन' सी हूँ लोटी । काचो दूध पियावत पचिपचि देत न माखन रोटी। सूर श्याम चिरंजीवो दोऊ भैया हरि हलधर की जोटी ॥१॥ सेलन श्रव मेरी वलैया जवहि मोहिं देखत लरिकन - सग तयहि खिजत वलभैया । मोसों कहत तात वसुदेव को, देवकी तेरी मैया। मोल लियो कछु दे वसुदेव को करि- करि यतन बटैया ॥ अय बाबा कहि कहत,नद को यशुमति को कहै मैया। ऐसेहि कहि सव मोहिं खिजावत तव उठि चलो खिसैया । पाडे नद सुनत हैं ठाढे हसत हसत उर लेया। सूर नद बलिरामहि धिरयो मुनि मन हरख कन्हैया ॥२॥ खिझायो मोमो पहत, मोल को लीन्हों तोहि जशुमति कब जायो । 11कहा कहाँ यहि रिस के मारे खेान होनहिं जात ॥ । पाने पुनि कहत कौन है माता को है तुम्हरो तात । जात ܚܙ - मातु मोहिं दाऊ बहुत - श्रीसूरदास पदाचली। गोरे नंद यशोदा गोरी तुम फत श्याम शरीर । चुटकी दै दै हसत पाल सब सिखे देत घलवीर ॥ तू मोहि को मारन सीसी दाउहि कचहुँ न सीझै। मोहन कोमुरा रिस समेत लसियशोमति अंतिमनरी ॥ सुनहु कान्ह वलभद्र चवाई जनमत हो को धूत । सूर श्याम मो गोधन की सौ हौ माता-तू पूते ॥३॥ । ऊधो कांसदेश कथन । फवहिं सुधि करत गोपाल हमारी । पूंछत नद पिता ऊधो सौ अस यसुदा महतारी॥ बहुतै चूक परी अनजानत कहा अब के पछिताने। बासुदेन घर भीतर श्राये में अहीर के जाने ॥ पहिले गर्ग कह्यो हुतों हम सी.सग देत गयो भूली । सूरदास स्वामी के विछुरे रात दिवस "भै शूली ॥ १ ॥ • ( कह्यो कान्ह सुनु यशुमति मैया ।' श्रावहिंगे दिन चार पाच में हम हलधर दोउ भैयो। मुरली वेत विपाण देखिये ऋगी 'चेर सबेरो। ले जिनि जाइ चुराइ राधिका फ्छुक खिलौनों मेरो॥ जा दिन ते तुमसे विछुरे हम कोऊ न कहत कन्हेया । भोरहि नाहिं कलेऊ कीनो साँझ न पय पीयो ना येयाध, श्रय हिमसों, वसुदेव देवकी कहत आपुनो- जायो॥ कहिये कहा नन्द, वावा सों बहुत निठुर मन-कीनो सूर हलहिं पहुँचाइ मधुपुरी बहुरो सोध न लीनो ॥२॥ ।
। साहित्य-सुपमा ।
मातृ-वत्सलता।
यशोदा चार बार यो भाषै।
है कोई व्रज -हितू हमारो चलत गोपालहिं राखै ।
कहा काज़ मेरे छगन मगन को नृप मधुपुरी वुलायो ।
सुफलक सुत मेरे प्राण हतन को काल रूप है पायो
बरु ये गोधन हरो कस संव मोहि बदि ले मेलो।
इतने ही सुख कमल नयन मेरी अखियन आगे खेलो।
यासर बदन पिलोकत जीवो निस निज अंक मेलानों
सेहि बिछुरत जोजीवों कर्मवश तो हंसिकाहि बुलानी ।।
कमल नयन गुण टेरत टेरत अधर बदन कुम्हिलानो ।
सूर कहा लगि प्रगट,जनाऊँ दुखित नद जू की रानी
संदेसो देवकी सो कहियो । जा-
हो तो धाय तिहारे सुत की मया करत नित रहियो ।
यद्यपि देव तुम जानत, उनकी तऊ मोहि कहि आवै।
मातहि उठत तुम्हारे कान्हहि माखन रोटी भावे ।।
तेल उपटनो अरु ताते जल ताहि देख भगि जाते।
जोर जोई मागत सोइ सोईदेतीमत्रम फरिकरि न्हाते।
सूर पथिक सुनि मोहिं रौनि दिन बढो रहत उर सोच ।
मेरो अलक लई तो मोहन है है करत सकोच ॥ २
-
.
बजवाला विनय ।
ऊधो अंखिया अति अनुरागी।
एक टक मग जोवति अरु रोपति भूलेहु पलक नलागी
चिन पायम पावस ऋतु आई देखत हैं विदमाना।
orat same निर्गन ज्ञान।
-IN
श्रीसूरदास पदावली। १५ T . सुनि प्रिय सखा श्यामसुदर के जानन सकल सुमार। जैसे मिले के स्वामी तैसी करहु उपाइ ॥१॥ हमको हरि की कथा सुनाउ । ये श्राग्नी ज्ञान गाथा अलि मथुरा ही लै जाउ। घे नर नारिन के समुझहिंगी तेरो बचन बनाउ । पा लागो ऐसी इन बातनि उनही जाइ रिझाउ॥ जा शुचि सखा श्यामसुदर को अरु जिय अति सतिभाउ तो यारक पातुर इन नैनन वह मुखानि दिखाउ। जो कोउ कोटि करै कैसेहविधि विद्याव्यवसाउ ॥ तो सुन सूर मीन को जल विननाहिन और उपाउ । ग्रंज विरह निवेदन। कहा ली कहिये ब्रज की यात । सुनहु श्याम तुम बिन उन लोगन जैसे दिवस विहात ॥ गोपी गार ग्वाल गो सुत वै मलिन बदन कृश गात । परम दीन जनु शिशिर हिमात अंबुज गत दिन पात ॥ जा कहु भारत देखि दूरते सब पूछति फुशलात । चलन न देत प्रेम आतुर उर कर धरनन लपटात॥ पिक चातक धन यसन न पावहिं वायस घलिहि न सा सूर श्याम संदेशन के डर पथिक न उहि मग जात : विनय के पद। प्रभु मैं सय पतित्न फो टीकी । और पतित सय द्योस चार के मैं तो जन्मत ही को। यधिक अजामिल गनिका तारी और पूतना ही को मोहि छाडि तुम और उधारे मिट भूल कैसे जीको ।
- । N M - साप्त । साहित्य-मुरमा गोस्वामी श्रीतुलसीदास कृत 'रामायण' से। "मामीणो का अलौलिक प्रेम जे पुर ग्राम बसहि' मगुमाहीं। तिनहिं नागसुरनगर सिंहाहीं । केहि सुकृती केहि घरी बसाए। धन्य, पुन्यमय परम मुहाए । जह तहं रामचरण चलि जाहीं। तेहि समान अमरावति नाहीं । पुण्य पुज मगु निकट निवासी । तिनहि सराहहिंसुरपुरवासी । जे भरिनयन यिलोकहिं गमहि । जेहि सरसरित रामअवगाहहिं । तिनहिं देवसुर सरितसराहहि ॥ जेहि तख्तर प्रभु बैहि जाई ,करहिं कल्पतरू तासु बडाई परसि रामपदपा पगगा । मानति भूरिभूरि निज भागा। -~छाँह करहिं धन विधुधगण, वरपहिं सुमन सिहाहि । देखत गिरि चन विहंग न्ग, राम चले मगु जाहि । सीता लपण संहित रघुराई । गाव निकट जब निकसहिं जा। सुनि सव बाल वृद्ध नग्नारी । चलहिं तुरितगृहकाज बिसारी? रामलपन सिय रूप निहारी । पाइ नयन फल होहिं सुखारी, सजल नयनयति पुलकिशरीरा । सयभयमगन देखि दोउ वीरा ॥ धरणि न जाई दशा तिन केरी । लही रंक जनु सुरमनि देरी । एकहि एक बोलि सिख देहीं । लोचन लोह लेहु क्षण रही । रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जात संग लागे । एक नयन मंगुछवि उरानी। होहिं शिथिल तनुमानस पानी ! दो०--एक देखि घट छाह भलि, डारि मृदुल तृण पात ॥ 'कहहिं गवाँइय क्षणिक श्रम, गवनब अहिं कि प्रात एक कलश भरि आनहिं पानी। अंचइय नाथ सुनि प्रिय वचन प्रोति प्रति देखी। गम कृपातु मुशील विशेषी जानी सीय श्रमित मनमाहीं । धरिक रिलय कीन्ह परछाही . दा घ । r , प्रामीणों का अलौकिक प्रेम । मुदित नारि नर देखाह शोभा । रूप अनूप नयन मन लोभा ॥ एकटक सबजोहहिं चहुँ ओरा। रामचन्द्र मुख चन्द्र चकोरा॥ तरण तमाल चरण तनु सोहा । देखत काम, कोटि मन मोहा॥ दामिनि वरण, लपण सुन नीके। नम्वशिख सुमग भावते जीके ॥ मुनिपट कटिन्ह कसे तूणीरा । सोहत -करकमलन धनुतीरा ॥ दो०- जटा मुकुट शीसनि सुभग, उर भुज नयन घिशाल । सरद परव भा विधु बदन, लसत स्वेदकण जाल ॥ घरणिनि जाई मनोहर जोरी। शोमा अमित मोर मति थोरी॥ राम लपण मिय सुन्दरताई सबचितवहि मतिमन चितलाई।। थके नारि नर प्रेम पियासे । मनहुँ मृगी मृग देखि दियासे । सीय ,समीप मान निय जाही। पूछत अति सनेह सकुचाहीं ॥ यार चार सव भागर्हि पाए ! कहहि बचन मृदु सरल सुहाए। राज कुमारि विनय हम करहीं। हिय सुमाव कछु पूछत रहीं। स्वामिनि श्रचिनय उमय हमारी। विलगु न मानन जानि गंवारी।। राज कुगर दोउ सहज सलाने । इनर लाहि दुति मरकत सोने ।। दो-श्यामल गौर किशोर घर, सुन्दर सुग्यमा ऐन । शरद शर्वरी नाथ मुख, शग्द सरोरुह नैन कोटि मनोज 'लजावनिहारे।सुमुखिकरहु को अहहिं तुम्हारे। मुनि सनेह मय मजुल वानी । मकुविसीय मनमहं मुसुकानीn तिनहिं विलोकि धितोकेउ धरणी। दुहुसफोच सफुचति यावरणी। सकुचि स्प्रेम बाल मृगनयनी । चोली मधुर वचन पिकं धयनी ।। सहज सुभान सुभग तने गोरे। नाम लपण रघु देनर मोरे ॥ श्यामवर्ण पायत भुज नैना । अति सुन्दरः योतत मृदु पैना । पहुरि बटन निधु अंचल ढाँकी । पियतन चित मौर फरियांकी। संजन मनु तिरी नयनानिजपनिकहेउतिनहिंसियसयननि॥ मई मुक्ति मर ग्राम बसूटी । रंक्रन्द रतन राशि जनु लूटी। - ॥
4 २० साहित्य सुपमा ।। दो-अति सप्रेम सिय पाय धरि, बहु विधि देहि अशीत । सदा सोहागिनि रहनु तुम, जब लगि महि अहि शीस पारवती सम पति प्रिय होह। देवि न हम पर छोडव छोह ॥ पुनि विनय करहिं करजोरी । जोइहि मारगः फिरियवहोरी। 'दरशन देव जानि निज दासी'। लसी सीर्य सव मम पियासी । मधुर वचन कहि कहि परितोपी । जनु कुमुदिनी कौमुदी पोपी । तवहिं लखरण रघुवर रुपजानी। पूरे मगु , लोगनि मृदुवानी ॥ । सुनन नारि निर भए दुवारी । पुलकित अग विलोचन यारी॥ मिटा मोह, मन भए, मलीने। विधि निधि दीन्ह रोत जनु छीने ॥ समुझि कर्मगतिधीरजकीन्हा । शोयिसुगममगुतिन्हकहंदीन्हा। दोoलपण जानकी सहित, तय, गमन कीन्ह रघुनाथ ! फेरे सव प्रिय वचन कहि, लिप लाय मन साथ ॥" "फिरत नारि नर अति पछताहीं। देवहिं दोप देहि मन माहीं । सहित निपाद परस्पर ,कहहीं विधिकरतब सब उलटे अहहीं। निपट निरफुश निलुर निशंकू जेहिशशिफीन्ह सरजसकल सख कल्पतरु सागर । तारा। तेहिं पठये वन राजकुमारा' जा पे. इनहिं दीन्ह बनवासू । यह यादि ये विचरहिं मगु दिनु पदनाना । रचे दादि विधि वाहन नाना ये महि परहिडासि कुश पाना । सुभग सेजकत कीन्ह विधाता रस्तरयास इनाह विधि दीन्हा । धवल धाम रचिकत श्रम कीन्ई दो, जो ये मुनिपर धर जटिल, सुदर सुठि सुकुमार। विविध भांति भूषण वसन, वादि किये करतार ॥ जो ये कन्दमूल फल साहीं।'धादि सुधादि अशन जगमाई एक कहाँ यह सहज सुहाये । श्रीपु प्रकट भे विधि न ना जर लगिवेदबहाद घिधिकरणी। श्रवण नयनमन गोचर बरर न दशचारी | कह अस पुरुपकहा असिना 4 विलास .
ग्रामीणों का अलौफिक प्रेम । 14 9 M प इनहिं टेसि रिधि मन अनुरागा। पटतर योग धनानन , लागा ॥ कीन्ह बहुत श्रम एक न आये। तेहि इर्षा यन प्रानि दुराय ॥ एक कहहिं हम बहुत न जानहिं । श्रापुहि परमधन्यकरिमानहिं॥ ते पुनि- पुण्य-पुञ्ज हम लेसे । जे देसहिं देखिहैं जिन देसे॥ दो-इरि-विधि काहि फहि पचन मिय, मेहि नयन भरि नीर। किमि चलिहें मारग अंगम, सुठि सुकुमार शरीर ॥ नारि सनेह विफल सब होहीं। चकई साझ समय जिमि सोही ॥ मृदु पद कमल कठिन मग जानी । गहचरिहृदय कहहिंमृदुवानी ॥ परसत मृदुल चरण अरुणारे।सकुचितमहि जिमिहृदय हमारे। जो जगदीश, इनहि बन दीन्हा । कसन सुमनमय मारग कीन्हा ।। जो मांगे पाइय विधि पाहीरासिंयसखिइनाखिन माहीं।। जे नर नारि न अवसर श्रीयेते सिय राम न देसन पाये ॥ सुनि स्वरूप पूछर्हि अवुलाई । अब लगि गये कहा लगि भाई ।। समरथ धाइ रिलोकहिं जाई । प्रमुदित फिरहिं जन्म फल पाई ॥ दो श्रवला बातक वृद्धजन, कर मीजहिं पछिताहि । IT होहि प्रेमश लोग इमि, राम जहाँ जहँ जाहि ।। गाँव गांर अस होहि अनन्दा देखि भानुकुल कैरव चन्दा ॥ जे फर्नु समाचार मुंनि पावहिं । ते नृप गानाह दाप लगायाह ।। कहहि एक अनि भल नरनाह । दीन्ह हमहि जिन लोचन लाह' कहहिं परस्पर लोग लुगाई । याते सरला सनेह सुहाई॥ ते पितु मातु धन्य जिन जायें। धन्य सो नगैर जहा ते बाये॥ धन्य सौं शैत देवधन गाऊँ जह जह जाहिं धन्य सो टाऊँ। सुग्य पायोरिचि रचितेही ये जेहिके संव भांति सनेही राम लपण सिय कथा सुहाईरही सकल मग कानन छाई ॥ दो०-इहि गिधि रघुकुल कमल रति,मा लोगन सुख देत । जाहिं चले देखतः विपिन, सिय, सौमिति समेत् ॥ WH .
, M . -- 1 साहित्य सुपमा आंगे राम लपणे 'पुनि पाछे तापस वेप विराजत पाछे । उभयं मध्य सिय शोभति कैसी । ब्रह्म जीव विचमाया जैसी ॥ बहुरि कहाँ छवि जसमन वसईनुमधुमदन मध्य रति लसई ॥ उपमा बहुरि कहों जिय जोही जनुबुध विधु बिचरोहिणी सोही॥' प्रभुपद देख वीच विच सीता। धरहि चरणमगचलतसभीता। सीय रामपद अङ्क धराये । लपण चलहिं मगुदाहिन थांये।' राम लपण सि प्रीति सुहाई | चर्चने अंगोचर किमि कहि जाई। खग मृग मगन देसिछवि होही । लिये चोरिचित राम बटोहीं। दो-जिन्ह जिन्ह देखे पथिकप्रिय, सीय सहित दोउ भाइ। भव मग 'नगम अनन्द ते, विन श्रम रहे सिराइ । भरत की प्रातृभक्ति । दो०-राम शपथ सुनि मुनि जनक, सकुचे-सभा समेत। सफल विलोकहि भरत मुख, वनै ना उत्तर देत ॥ समा सकुचयश भरत निहारी । रामवन्धु धरि धीरज भारी - कुसमय देख सनेह सभारावढ़त विन्ध्यजिमि घटजनिबारा शोक कनक लोचन मति क्षोनी) हरी विमल गुणगण जगजोनी॥ भरत विवेक वराह विशाला । अनायास-उघरे तेहि काला । फरि प्रणाम सब कह करजोरी । राम राउ गुर.साधु निहोरी॥ क्षापबाजु अति अनुचितमोरा । कह₹ वचन मृदुवचन कठोरा ।। हिय, सुमिरी-शारखा सुहाई ।,मानसते , मुख पकज श्राई । विमल विवेक धर्मानय साली भरत - भारती मजु, मराली ।। दो०-निरखि विवेक विमोचनहि, शिथिल सेनेह समाज ! करि प्रणामा वोले भरत, सुमिरि सीय रघुराज ।। प्रभु पितु मातु सुहद गुरु सामी। पूज्य परमरित अन्तर्गामी ।" सखा सुसाहिब शील निधाना। प्रणत: पाल सश मुजाना । ..
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मरत की.मातृभक्ति।
समरथः शरणागत हितकारी गुणं ग्राहक अवगुण अंघहारी।।
खामि गुसाइहिं सदश गुसाई ।माहि समान में सामि दोहाई ॥
पभु पितुचचन मोर चश पेली । प्रायः इहां समाज सकेली ॥
जिगभल पोंच ऊंच अरु नीचू । अमी' अमर पद माहुर मीचू ।।
राम रजाई मेटिं मन माहीं देखीं सुना कतहुं कोउ नाहीं।
सो मैं सबै विधि कीन्ह दिठाई । पु मानी सनेह सेवकाई ।।
दोहा-कपा मलाई प्रापनी, नाथ कीन्ह भल मोरा
दूपण भे भूपण सरिस, सुयश चार चहुँ ओर ।।
राउर रीति सुवाणि बडाई जगत विदितं निगमागम गाई ।
फूर 'कुटिल खल कुमति कल की 1 नीच निशीथ निरीशनिशी ।।
तेउ सुनि शरण सामुहे श्राये । सुकृत पूनाम किये अपनाये ।
देखि दोप कबहु न उर श्राने । सुनि गुण साधु समाज पसाने ।
को साटेव सेवकाहि नेगाजी । आपु समान साज सव साजी ।।
'निज करतूति न समुझियसपने । सेवक संकुच शोच उर अपने ॥
सो गुसाई नहि "दूसर फोपी । भुजा उठाई फद्दों पूर्ण रोपी ॥
पशु नाचत शुक पाठ पूर्वीना । गुणगति नट पाठक आधीना ॥
दोहा-सो सुधारि सन्मानि जन, किये साधु शिर मोर।
को कपालु चिनु' पालिहें, विरदीचलि घर जोर ॥
शोक सनेह कि चाल स्वभाये। प्रायसु लाइ रजायसु पाये ॥
तवहुँ कृपालु हरि निज श्रोरी । संघहि भाति भल मानेहुँ मोरा ॥
देपेउ पाइ सुमंगल "मूला। जाने उस्वामिसहज अनुकूला !
घडे सिमाज विलोके भागू। वडी चूक साहिव अनुरागू।
छपा अनुग्रह अंधु घाई कीन्हळपानिधिसव अधिकाई।
राखा मोर दुलार' गुसाई । अंपने शील खमाष भलाई।
नाथ निपट में कीन्ह दिठाई । स्वामि समाज सकोच बिहाई ।
अविनय विनय यथारचियानी क्षमिय देवश्रति श्रारति जानी ॥
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-- २४ " । साहित्य-सुपमा; दोहा-सुहद सुजान सुसाहिवाह, बहुत कहब यडि खोरि।। श्रायसु देइय देव अव, सबइ सुधारिय मोरि ." प्रभु पद- पदुम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सीव सुहाई॥ सो करि फहउ हिये अपने की । रुचि जागत सोवत सपने, की । सहज सनेह स्वामि सेवकाई । स्वारथ छलफल चारि विहाई । आशा सम न सुसाहिब,सेवा, सो, प्रसाद जना, पावइ देवा ॥ अस कहिप्रेम-विवश भय भारी। पुलक शरीर विलोचन वारी ।। प्रभु पर्द कमल गहे अकुलाई । समयं सनेह न सो कहि जाई। कृपासिन्धु सनमानि-सुवानी। बैठाये समीप.. गहि पानी ॥ भरत विनयंसुनि देखिसभाऊ सिथिल सनेह सभा, रघुराऊ। -रघुराउ सिथिन सनेह साधु समाज मुनि मिथिलाधनी। मनमहं सराहन भरत भायप भगति की महिमा, धनी । • भरतहि प्रसंसत विबुध वरणत सुमन मानस मलिन से। तुलसी विफलं सब लोग सुनि सकुचें निशागम नलिन से। सो देख दुलारी दीन, दुईं,समाज नर नारि सब !, मघवा, महा मलीन, मुये मारि म-गल-चहत ॥ वर्षा और शरद वर्णन :- दोहा- लछिमन देखहु मोर गण, नाचत गारिट पेखि । गृती विरति रत हर्प जस, विष्णु भक्त कह देखि ॥ घन मंडेल, नभ गर्जतं घोरा प्रियाहीन डरपत मन मोरा। दामिनि दमकि रही धन माहीं। खल फै प्रीति-न्यथा थिर नाहाँ । बरसहिं-जलद भूमि नियराये। यथा नहिं बुध बिद्या पाये। खुद श्रधात सहै, गिरि- कैसे। पल के वचन सत सह जेमे। क्षदा नदी भरि चली इतराई । जसः -थोरहि, धन खल घोराईन भूमि परत भा दावर पानी-1 जिमि जीवहि माया-लपटानी । सिमिट सिमिटजल भरहितलाना। जिमि सद्गुण सज्जन पह;आवा 1 - . -
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वर्षा और शरद वर्णन!
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सरिताजल जलनिधिमह जाई । होहिंश्रचल जिमि जन हरिपाई।
दोटा-ररित भूमि तृण सॉलित, समुझ पर, नहिं पथ ,....!
जिमि पाखड़ विवादते, • गुप्त होहि-एग्रथ ॥
दादुर धुनि चहुँ दिशा सोहाई । वेद पढ़े. जनु बटु समुदाई ॥
नव पल्लर भये, विटप.अनेक साधकमन जस मिले विवेका ॥
अर्क जवास पान. विनु भयऊ । जससुराज खलं उद्यम गयऊ।।
खोजत कतहुँ मिल नहिं धरी । पर क्रोध जिमि धर्महिं दूरी।
ससि सम्पन्न सोह.महि.कैसी । उपफारी.के. सम्पति जैसी ॥
निशि तमधन खद्योत विराजा जनुदम्भिनकर मिला समाजा।
महावृष्टि चलिफ़टि कियारी जिमि स्वतन्त्र होइ विगरहि नारी
कृषी निरावहिं चतुर किसाना जिमि बुधतजहि मोहमदमाना ।।
देखियत चकवाक सग नाहीं । कलिहि पाइ जिमि धर्मपराही
ऊसर बरसै तृण नहिं जामा ! जिमि हरिजनउर उपजनकामा
विविध जन्तु संकुल महि भ्राजा! प्रजा घाट जिमि पाई सुराजा।
जह तह रहे पथिक थर्फ नाना । जिमि इन्द्रिय गण उपजे ज्ञाना ।
दोहा-क्यतुं प्रयल चल मारत, जहं तह मेघ विलाहिं।
जिमि फक्त फुल ऊपजै, 'सम्पति धर्म नशाहि ।
LY करहु दिवम मह निरिड' तम, क्य?क मंगट पतंग ।
1- 1 उपजे चिनसर शान जिमि; 'पाय कुसग सुसंग ॥
वर्षा विगत सरदं मनाई लछिमन देराह परम मुहाई।।
फूले कास सफल मंद्दि छाई जनु यो त प्रगट पढाई ।
उठित अगम्त पध' जल शोधा।जिमि लोहि शोपे सन्तोष
सरिता सर निर्मल जल सोहासित हृदय जस गत मदमोहा।।
रसग्म सूख मरित मर पानी । ममता त्याापरहि जिमिझानी
सानि गरद-मतु जन आये । पाइसमय जमिसुधनसुहाये ॥
पंकन रेनु सोहा स धरनी । नीति निपुरानपक्षीजसकरनी।
r L - ૨ साहित्य सुषमा | जल संकोच विकल भये मीना । अबुध कुटुम्बी जनुधन हीना विनु धन निर्मल सोह प्रकाशा हरिजन ईव परिहरिसंबंधाशा कहुँ २'वृष्टि शारदी योरी । कोउपक पाव भक्तिजिमिमोरी ॥ दोहा-चले हर्प तिजि नगर नृपं, तापस वणिक भिखारि।' 'जिमि हरि भक्ति पाइ श्रम, तजहि प्राथमी चारि। सुग्वी मीन जह. नीर अगाधा । जिमिहरिशरणनएको वाधा। फूले कमल सोह' सर कैसे । निर्गुण ब्रह्म सगुण भये जैसे। गुजत मधुकर मुसर अनूपा । सुन्दर 'सगरव नाना पा॥ चकवाक मन दुख निशि पेखी । जिमि दुर्जन परसम्पति देखी। चातक रस्त सृपा अति प्रोही । जिमि सुप लहहिन शंकर द्रोही। शदात निशि शशि अपहरेई | संत दरश जिमि पातक टरई ।। देखि' इन्दु चकोर समुंदाई चितवहि जिमि हरिजनहरिपाई। मशक दंश वीन हिम भासा । जिमिद्विज मोह किये कुलनासा॥ दोहा-भूमि जीव 'सकुल रहे, गये शरद ऋतु पाय ।' 'सद्गुरुमीले जाहि जिमि, संशय भ्रम समुदाय । . संत असंत लक्षण । सत असन्ता भेद - विलगाई। प्रणतपाल मोहिं कहहु धुझाई । सन्तन: के लक्षण-सुनु माता ।अगणितश्रुतिपुराण विख्याता सन्त असन्तन के अस फरनी। जिमि कुठार-चंदन आचरणी काटे परशु- मनय, सुनु भाई निज गुण देय सुगध यसाई ।। पोहा-ताने सुर शीशन्ह चढत, जग घल्लभ श्रीनड। ii. r“अनल दाहि पीटत घनहिं परशु बदन यह दंड ॥ - 7, विषय अलम्पट शील गुण कारि। परदुग दुखसखसुदेखेपर, सन अभून रिपु धिमद विरागी। लोमाम हर्ष भय चोगी। कोमल चित दीनने पर दावामन यचंक्रममम भक्वि अमायो। + - - 4, " maa , सत असत-लक्षण। १ M - , १ सबहिं मानप्रद श्रापु श्रमानी । भरत प्राण सम मन ते प्रानी ॥" विगत काममम नाम परायण शाति विरति गिनतीमुदितायन। शीतलता सरलता मत्री । द्विज पद प्रीति धर्म जनयित्री ये सब लक्षण वसहिं जामुउर। जानहु तात संत सतत फुर । समदमनियमनीतिनहिंडालहिं । परुपवचन कवह नहिं बोलहिं ।। दोहा--निन्दो प्रस्तुति उभय सम, ममता मम पद केज। ते सजन मम प्राण प्रिय, गुण मदिर सुख पुज। असतनं केर सुभाऊ । भूलेहु सगति करिय न काऊ । तिन्ह कर सग सदा दुखदाई । जिमि कंपिलहिं घाले हरहाई ॥ खलन्ह हदय अतितापनिशे वीजरहिं सदा पर सम्पति देखी। फह जहुँ निन्दा सुनहिं पराई । हपहिं मनहु परी निधि पाई ॥ काम फ्राध मद लोम परायन । निर्दय फपटी कुटिल मलायन ।। धेर अकारण सब काहू सौ । जो कर हितग्रनहित ताडू सोंग झूठा लेना भूउड देना । उइ भोजन झूठ चवेना ॥ घालहि वचन मधुरजिमि मोरा साहिँ महा अहि हदय फठोरा॥ दोहां--पर द्रोही पर दार रत, पेरधन पर अपनाद । ते नर पार पाप भय देह घरे मैनुयाद ।। लोभइ आढन लोभा डासन । शिश्नोर पर यमपुर भासन । फाह के जो सुनहि घडाई । श्वास लेहिं जनु जूडी थाइ॥ जर काहू के देखहि निपनी । सुखी भये मानहुँ जग नृपति।। सारय रन परिवार विरोधी । लंपट फाम लोम श्री क्रोधी। मातु पिना गुरु निम न मानहिं । आपुगय अस्धालहिं भानहि फरहिं माह. यश द्रोह परावा! सत सग हरि कथा न भावां। अवगुणसिंधुमद अति-कामी । वेद निदूपक , परधन स्वामी ॥ विप्र द्रोह सुरयिमु विरोरा । दमाकपद जिय घरे सुवेपा॥ 14
२८
साहित्य-सुपमा 1--
दोहा--ऐसे अधम,मनुज खल रुत युग त्रेता नाहिं ।'
द्वापर कछुक वृन्दबह होइहैं कलियुग माहि॥-7
परहित सरिस धर्म नहि माई । परपीडा सम नहिं अधमाई।
निणय सकल पुराण वेद कर...कहे तातजानहिं कोविद् नर ।
नह, शरीर धरि जे पर पीरा । करहिं तेसहहि महाभव भीरा॥
करहिं मोहवश नरअघनाना । स्वारय घश परलोक नसाना ।
काल रूप तिन्ह फह में नाता।शम अरु प्रशुभकर्मफल दाता।।
अस विचारि जे परम सयाने । मजहि मोहिं ससृति दुख जाने।।
त्यागहि कर्म शुभाशुभ दायका भजहिं मोहिं सुर नर मुनि नायक
सत असतन के -गुण- भावे । ते न परमिभव जिन्हलरा राखे ।
Hear
-
गोस्वामी श्री तुलसीदास कृत ग्रन्थावली ।
कवितावली रामायण' से
श्रवधेश के द्वारे सकारे गई, सुत गोद कै भूपति लै निकसे।
अवलोकिहीं सोच-विमोचनको,उगि सी रहीजे न ठगेधिकसे ॥
तुलसी मना रजन-रजित अजन, नैन सुखंजन जातक से।
सजनी ससि में सम सील,उभै;नव नील सरोरुह से,विकसे ॥
पग नूपुर की पहुँची कर कञ्जनी, मन्जु यनी मणिमाल हिये।
नव नील फलेबर पीत झगा, झलकै. पलकै नृप गोद लिये ...
अरबिन्द सौं अानन रूप मरन्द, अनन्दित लोचन भृङ्ग पिये।
मन में न वस्यो अस वालक जो, तुलसी जग में फल कौन जिये।।
तन की दुति स्याम सरोरुह लोचन, केज की मजुलताई हरै।
अंति सुन्दर सोहत धुरि भुरे, छवि भूरि अनंग की दूर धर ॥
दमक दंतियों दुति दामिन ज्या, किलक कल बाल विनोद करें।
अवधेश के वालक चारिसदा, तुलसी मन मन्दिर में बिहरै ।।
विनय पत्रिका। - Ja - । १ - फवहं शशि मागत पारि कर, करहू प्रतिविम्ब निहारि डरें। कवर करतोल बजाइ के नाचत, मातु सबै मन मोद भएँ । फरह रिसिप्राइक हठिकै पुनि लेत सोई जेहि लागि अरें। अमधेश के बालक चारि दशा, तुलसी मन मन्दिर में विहरे ॥ बरदत की पगति कुद फली, अधराधर पल्लव खोलन की। चपला चमकै छन धीच जुगे, छवि मोतिन माल अमोलन की। घुघुरारि 'लटें लटके' मुस ऊपर, कुडल लाल कपोलन की। नेवछावर प्राण ऊ” तुलसी, वलि जाऊं लला ईन चोलन की ॥ पदकन्जनि मन्जु बनी पनहीं, धनुहीं सर पकज पाणि लिये। लरिका सग खेलत डोलत हैं, सरयूतट चौट हाट हिये ॥ तुलसी अस यालक सो नहि नेह, कहा जप योग समाधि किये। नर ने पर शूकर श्वान समान, कहो जग में फल - कौन जिये.॥ 'विनय पत्रिका' से। ऐसे राम दीन हितकारी। । अनि कोमल का निधान नुि कारन पर' उपकारी सोधन हीन दीन निजे अंग्रेस शिला भई मुनि नारी। गृहे ते गगनि परसि पद पावन घोर साप ते टारी : हिंसाग्न निषाद तामन वपु पशु समान बन चारी। । भेट्यो हृदय लगाइ प्रेम बस नहि कुल जातं विचारी॥" । यद्यपि द्रोह कियो मुरपनि सुत कहिं न जाइ यनि भारी।" । सफल लोक अग्लोकि सोंक हत सरन गये भय टोरी। 'निहंग योनि श्रामिपं अंहार पर जीव क्षौन व्रतधारी | जना समान क्रिया नाकी निकर सर्व भाति सारी॥ "धर्म जाति सबरी सापित जड लोक वेद ते न्यारी। ॥ जानि प्रीति दै दरंस इंपानिधि सोउँ रघुनाथ उधारी । 17 . tog 17 . - M - ।
, Barre । 4 - nwer साहित्य-सुपमा। परसुख सम्पति देखि सुखं, जरहिं जे जविन श्रागि तुलसी तिनके भागते, चलै भलाई - मागि ६॥ कौरव पाण्डव (जानिये, कोध क्षमा के सीम। पाँचहि मारि न सौ सके, संवो संहारे भीम ॥ ७ ॥ रोप न रसना खोलिये बरु खोलिय तरवारि। सुनत मधुर परिणाम हित, बोलिय बचन विचारिः ॥ ८ ॥ 1. तुलसी सतफई से : तुलसी सन्तन ते सुने, सन्तन इ. विचार। तन धन चंचल अचला जंग; युग युग परे उपकार ॥१॥ । उरंग उरंग नारी नृपति, नर नीर्चा हथियार । तुलसी परत रहवी नित, इनहि ने पलटत वार ॥२॥ नीच निचाई : नहिं तजे, जो पावत : सतसङ्ग। 'तुलसी चन्दना विटप बसि, चिन सिप भय न भुजंग ॥३॥ दुरजन दरपण सम, सदा, फरि देखो हिय दौर । सन्मुख की गति और है, विमुस भये कुछ और ॥ ४ ॥ मित्र अवगुण मित्र को,, पर प्रहं भापत नाहि । कूप छाई जिमि प्रापनी, राखत श्रिापहि माहि ॥५॥ तुलसी सा समरथ सुमति, सुनी, साधु सुजान। जो विचारित्र्यवहरत जग, सरच लामा अनुमान ॥ ६॥ तुलसी खल वाणी विमल, लुनि समुच हिय हरि । "राम राज चाधक भई, मन्द मन्थरा चेरि॥७॥ तुलसी साथी विपति"के, विद्या विनय विवेक। " ' साहना सुका मन्य व्रत, राम भरोमो एक ॥ ८॥ १ । " . 11 - ।
श्री दादूदयाल के भजन और साखियां। श्री दादूदयाल के भजन और साखियाँ। मन रे राम बिना तन छीजइ । जब यह जरि मिलजाइ माटी में तव कहु कइसहि कीजइ । पारस परस कंचन कर लीजइ सहज सुरत सुसदाई ॥ माया चेलि विप फल लागे तापर भूल न भाई ॥ जव लगि प्राण पिण्ड है नीका तब लगि त जिनि भूलइ । यह ससार सेमर के सुस ज्या तापर तू जनि फलइ ॥ पोरउ यही जानि जग जीवन समझ देसि सच पारद । अंग अनेक प्रान मति भूलइ दादू जिनि डहंकायइ ॥ ३ ॥ पेमा राम हमारे पावे। वार पार कोइ त न पावे ॥ हलका भारी कहा न जाइ । मोल भाव नहिं रह्यो समाइ ॥ कीमति लेसा नहिं परिमाणा । सब पचि हारे साधु सुजाणा ॥ आगो पीछी परिमित नाहीं । फेते पारिय श्रावहिं जाहीं ॥ श्रादि श्रत मधि लखे न कोई। दादू देखे अचिरज होइ॥ दोहे । बहु रूपी मन तर लगे, जर लग माया रग । जब मन लाग्या राम सू , तब दादू के अग ॥१॥ ध्यान धरे फ्या होत हे, जो मन मेल न जाय । ध्यान धारि वर मीन जिम, पशू विचारे खाय ॥०॥ जे पहले सदगुरु कहा, नेनहु देख्या श्राइ । अरस परस उस एक सू, दादू रहा समाइ ॥३॥ दादू दीया हे भला, दिया करो सब कोय । घर में घसा न पाइये, जो कर दिया न हाय ॥ ४॥ सुग्न का माथी जगत सब, दुख का नाहीं कोई। दुख का माथी साइयां, दादू सतगुरु होह ॥ ५ ॥ ३ I - 7 । - - ३३ साहित्य-सुपमा परसुख सम्पति देखि सुर्स, जरहिं जे जड विनु श्रागि। तुलसी तिनंभोगते, चलै भलाई भौगि ॥ ६ ॥ कौरव पाण्डव जानिये,, फोध क्षमा के सीम । पांचहि मारिन सौ सके, सवो संहारे भीम ॥७॥ रोपन रसना खोलिये, "वरु:खोलिया तरवारि। सुनत मधुर परिणाम हित, चोलिय यन विचारि॥ ८॥ तुलसी सतफई.से... 'तुलसी' 'सन्तन ते “सुने, सन्तन 7 इहै : विचार । तन धन चल अचल जंग, युग युग पर उपकारंग॥ १॥ 1.उरंग उरंग"नारी नपति, नर नीची हथियार तुलसी परसत रहवीं नित, इनहिं न पलटत, वार ॥२॥ नीचा निचाई नहिं । तर्स, जो" पावत: सतसङ्ग। *" तुलसी चन्दन विटपसि,विन विष मय न मुजङ्ग ॥३॥ दुरजन दरपण सम सदा, फरि देखो हिय दौर । सन्मुख की गति और है, विमुख भये कुछ और ॥४॥ मित्र अवगुण मित्र को,' पर पहं भापत नाहि कूप छांह जिमि प्रापनी, रासत 'आपहि माहि॥ ५॥ तुलसी सा समय सुमति, सुझती साधु सुजान । जो बिचारि व्यवहरत जग, सरच लाभ,अनुमान ॥ ६॥ तुलसी सल वाणी विमल, सुनि समुझय हिय हेरि। राम राजवाधक भई, मन्द, चिरि॥७॥ तुलसी साधी : विपति, के, विद्या विनय विवेका साहिल सुजल सत्य व्रत, राम भरोसो एक ॥८॥ + . . , .
सुजान रससानि के सवैये।
जा दिन तें वह नन्द को छोहरो या वन धेनु चराह गयो है।
मीठि ही ताननि गोधन गावत चेन बजाइ रिझाइ गयो है ।।
वा दिन सों घुछ टोना सों के रसनानि हिये में ममाइगयो है
काउ न काहू की कानि करै सिगरोव्रजवीर विकाइगयो है ॥
मकराकृत कुण्डल गुज की माल वे लाल लसैं पग पावरियां
पछरानि चरावन के मिस भावतो दे गयो भावती भावरिया।
रसम्बानि पिलोकत ही सिगरो भई वावरियां व्रज डावरियां।
सजनि इहिं गोकुल मै विप सों जगरायो हैनन्द केसांवरियांका
मान वही तु रहें रिझि वापर रूप वही जिहि वाहि रिझायो
सीस वही जिन वे परसे पद अक यही जिन चा परसायो॥
दूध वही जुदुहायो री वाहि दही सु सही जो वही ढरकायो।
और कहालौं कहाँ रससानि रो भाव वहीजुवही मन भायो ॥६॥
कश्चन मन्दिर ऊंचे बनाइ के मानिक लाइ सदा झलकैयत ।
प्रात ही ते सगरी नगरी गजमोतिन ही की तुलानि तुलैयत ।
यद्यपि दीन प्रजान प्रजा तिन की प्रभुता मधमा ललचैयत ।
ऐसे भये तो कहारसखानिजो सौनरेग्नाल मो नेहन लेयत ॥१०॥
द्रौपदी कौगनिका गजगीध अजामिल सो कियोसोन निहारो।
गौतम-गेहिनी कैसी तरी प्रहाद को कैसे हखो दुस भारो ।
काहै को सोंच करै रमखानि कहा करि हैं रविनन्द विचारो।
ताबन जाखन रासियेमासनचाखन हारोसो राखनहारो ॥११॥
रेस विदेस के देसे नरेसन रीमि की कोउ न बूझ करैगो ।
नातो तिन्हें तजि जान गिरयो गुन सो गुनौगुन गांठि परैगो ।
चांसुरीवारो वडो रिझार है स्याम जो नैकु सुढार ढरैगो ।
लाडला छैल वही तो अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगो ॥१२॥
३६ साहित्य-सुपमा। - सुजान रसखानि के सवैये। मानुस हो तो वही रसखानि वसौं व्रज गोकुल गाँव के ग्वारन । जो पशु हों तो कहा यसु मरो चरोनित नन्द की धेनु मझारन । पाहन हों तो वही गिरि को जो भयो ब्रज छत्र पुरन्दर कारन । जोसग होतावसेरोकरौं उन कालिन्दो कूल कदम्ब केडारन ॥१॥ या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिह पुर को तजि झारौं । आठौं सिद्धि नवौ निधि को सुख नन्द की गाइचराय विसाएँ । कोटि करौं कलधौत के घाम करील के कुञ्जन ऊपर वारों। रसखानि कहै इन प्राचिन सो व्रज केयन वागतडाग निहारौं ॥२॥ गाचे गुनी गनिका गन्धर्व और सारद सेस सबै गुन गावत। नाम अनन्त गनत गनेस ज्यों ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत ॥ जोगी जती तपसी अरु सिद्ध निरन्तर जाहि समाधि लगावत । ताहि अहीर की छोकरिया छछिया भरिछाछ पैनाच नचावत ॥३॥ सेस गनेस महेस दिनेस सुरेस हजाहि निरन्तर गावै । जाहि अनादि अनन्त अखण्ड अछेद अभेद सुवेद वताः । नारद से सुक ब्यास रहैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पा । ताहि अहीर को छोहरिया छछियाभरिछाछ पैनाच नचावें ॥४॥ बेन वही उनको गुन गाइ औ कान वही उन चेन सो सानी । हाथ वही उन जात सरै, अरु पाइ वही जो वही अनुजानी । जान वही उन प्रान के सग श्री मान वही जो कर मनमानी । त्योरसखानि वही रससानिज है रससानिमोहै रसखानी ॥ दोउ कानन कुण्डल मारपखा सिर सोहै दुकूल नयो चटको । मनि हार गरे सुकुमार धरे नट भेस अरे पिय को टटको। सुम काछनी बेजनी पैजनी पामन श्रामन में न लगे झटको। यह सुदर को रसपान अली नु गलीन मैं श्राइ अवै ग्रेटको क्षा तृप्पा का अग। गई भूमि फिर मिले, चेलि फिर जमे जरेते, . फल फूलन ते फले, फल फूलंत झरे ते, केशव विद्या निकट, विकट विमरी फिरावे, बहुरि होय धन धर्म, गई सपति फिर पाये, होई जो शील सुशील मति, जगत हेतु इस गाइये, प्रान गयो फिर मिलत पे, पतन गई फिर पाइये ॥ ६ -०- महात्मा सुन्दरदास कृत । तृप्या का अग। इन्दव छद। नैननि की पलही पल में क्षण अाध घरी घटिका जु गई है। जाम गयो जुग जाम गयौ पुनि साझ गइ तव राति भई है ॥ आज गई अरु कारिह गई परसों तरसौं कछु और ठई है। सुंदर ऐसै हिं आयु गई तृसना दिन ही दिन होत नई है ॥१॥ डुमिला छद कनहीं कन को विललात फिरे सठ जाचत है जन ही जन की। तनही तन को अति सोच करे नर खात रहै अन ही अग की। मनही मन की तृष्णा न मिटी पुनि गारत हे धन हीधन की छिन ही छिन सुन्दर श्रायु पटी करहन गयौवन ही वन को॥२॥ इदव छन् । लाख करोरि अरब्य अरबनि नीलि पदम्म तहा लग घाटी । जोरिहि जोरि भडार भरे सर पोर रही सु जिमी तर दाटी । तोहु न तोहि सताप भयो सठ मुदुर ते तृष्णा नहिं काटी। एझत नाहिंन काल सदासिर मारि कथापमिलाई है माटी ॥
પર साहित्य-सुपमा। मूष नचावत रकहि राजहि भूप नचाइ के विश्व विगीई । भूब नचायत इन्द्र सुरासुर और अनेक जहा लग जोई । भूष नचावन है अध ऊरध तीनो लोक गने कहा कोई। सुंदर जाइ तहा दुम ही दुख ज्ञान बिना न कह सुख होई ॥४॥ हे तृमना कहि के तुहि थाक्लो त कर कान धरी नहिं एकहु बोलत बोलत पेटहि पायो । हस कोड वात बनाइ कह जब ते सव पीसत हो सब फाल्यो । फेक द्योग भये परमोधत ते अव श्रागहि कौं रथ हाँक्यो। सुदर सीप गई सव ही चलि तृसना कहि के तुहि थाफ्नो ४५१ . विहारी लाल । दोहे। मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि मोर्य। जा तनु की झाई परे, श्याम हरित द्युति होय ॥१॥ श्रधर धरत हरि के परत, श्रोठ दीठ पट ज्योति । हरित बाँसकी वासुरी, इन्द्र धनुप रंग होति ॥२॥ जो चाहै चटकन घटे, मैलो होय न भित्त । रज राजस न छुवाइये, नेह चीफने चित्त ३n चटकन छाडत घटत ह, सज्जन नेह गभीर । फीको परैन बरु घर, सयौ चोल रग चीर ॥ नीच हिये हुलसे रहें, गहें गंद के पोते । ज्यों ज्यों माये मारिये, त्यौं त्यौं ऊंचे होतं ॥५॥ कोदि यतन कोऊ करै, परै, न प्रकृतिहिंधीच । नलवल जल ऊंचो चढे, अन्त नीच को नीच ॥
विहारी लाल के दोहे।
४३
कैमे छोटे नरन ते सरत घडनि के काम।
मढो दमामो जात है, कहिं चूहे के चाम ॥ ७ ॥
मीत न नीति गलीत द्वै, जो धरिये धन जोरि।
स्याये खरचे जो चै तो जोरिये करोरि ॥८॥
घर घर डोलत दीन है, जन जन याचत जाय ।
दिये लोभ चसमा चसनि, लघु पुनि बडो लपाय ॥ ६ ॥
बसै चुगाई जासु मन, ताही सन्मान ।
भलो भलो कहि छांडिये, खोटे ग्रह जपटान ॥ १० ॥
धुगे बुराई जो तजै, तो मन सरो सफात ।
ज्यो निकलक मयक लगि, गर्ने लोग उतपात ॥
पढत यढत संपति सलिल, मन सरोज यदि जाइ ।
घटत घटत पुनि ना घटै, यरु समूल फुम्हिताइ ॥ १२ ॥
सगति सुमति न पावही, परे कुमति के धध।
रागो मेलि कपूर में, हींग न होय सुगध ॥ १३ ॥
नर की अरु नल नीर की, एके गति फरि जोय ।
जेतो नीचो है चले, तेतो कंचो
जिन दिन देसे वे कुसुम, गई सो बीति बहार ।
श्रर अलि रही गुलाव में, अपत कटीली डार ॥ १५ ॥
हि अाशा अटम्पो रहै, अलि गुलाब के मूल ।
हुइहैं यहरि वसन्त ऋतु, इन डारन चे फूल ॥ १६ ॥
पट पाएँ भख कांकरे, सदा परेई सग ।
सुपी परेमा जगत में, एकै तुही विहग ॥ १७ ॥
मरत प्यास पिंजरा परमा, सुओ समय के फेर ।
श्रादर। दै दै बोलियतु, नायस पलि की बेर ॥ १८ ॥
फरले संधि सराहि के, रहै सवे गहि मौन ।
गधी गध गुलाब को, गंवई गाहक कौन || १६ n
होय ॥१४॥
साहित्य-सुपमा । ......... करि फुलेल को आचमन, मीठो कहत सराहि । चुपकरि रे गधी चनुर, अतर दिखावत काहि ॥ २० ॥ भूषण कवितावली। श्रीनसाल विपयक कवित्त । निकसत म्यान ते मयूखै प्रलय भानु कैसी, फाएँ तम तोम से गयन्दन के जाल को। लागत लपटि कंठ वैरनि के नागिनी सी, रुद्राहि रिझावै दै दै मुडन के माल को। लाल छिति पाल छत्रमाल महा वाहुबली, कहा लो बखान करौं तेरी करवाल को। प्रति भट कटक कटील केते काटि काटि, कालिका सी किलकी कलेऊ देत काल को १॥ भुज भुजगेस की चै मगिनी मुजगिनी सी, खेदि खेदि स्वाती दीह दारुन दलन के। खतर पारिन वीच धसि जाति मीन, परि पार जात परवाह ज्यों जलन के । रेया गय चम्पति को छत्रसाल महाराज, भूपन सकत को बखानि तो बलन के। पच्छी पर छीने ऐसे परे पर चीने धीर, तेरी बरछी ने बर छीने हैं पलन के ॥२॥ रैया राय चम्पत्ति को चढी छत्रसाल सिंह, भूपन भनत समसेर जोम जमकै । भार्टी की घरा मी उठी गरदै गगन धेरै, सेलें समस₹ फेरें, दामिनि सी दमकै भूपण कवितावली। खान उमरावन के आन राजा रावन के, सुनि सुनि उर लागे धन कैमी घमके। घेहर यगारन की अरि के अगारन की, नांघती पगारन नगारन की धमकै ॥३॥ हे वर हरट्ट साजि, गैवर गर सम.. पैदर के ठट्ट फौज जुरी, तुरकाने की। भूपन भनत राय चम्पति को छत्रसाल, रोप्योरन ख्यान हे कै ढाल हिन्दुबाने की । फै यक हजार एक बार चेरी मार डारे, रजक दगनि माना अगिनि रिसाने की। सैद अफगान सन सगर सुतन लागी, कपिल सराप लौ तराप तोपसाने की॥४॥ चाक चक चमके अचाक चक चहूं शोर, चाकमी फिरत वाफ चम्पति के लाल की। भूपन भनत पातसाही मम जर कीन्हीं, काहू उमराव ना करेरी करवाल की ।। मुनि सुनि रीति विरदैत के बडप्पन की, थप्पन उथप्पन की बानी छत्रसाल की। जग जीति लेगा पे वै हुक दाम देवा भूप, सेवा लागे करन महेवा महिपाल की। ५॥ श्रीशिवाजी विषयक कवित्त । इद्र जिमि जम पर वाडव सुश्रम पर, रावन मु दम पर रघुकुल राज हैं, पौन पारिवाह पर शभु रतिनाह पर, स्यों सहस्रवाह पर गम द्विजराज हैं, ४६ साहित्य मुपमा । दाना दुमदुड पर चित्ता मृग झुड पर, भूषन वितुंड पर जैसे मृगराज है। तेज तम अश पर कान्ह जिमि कंस पर, त्यों विपच्छ वश पर शेर शिवराज हैं ॥१॥ गरुड को दावा जैसे नाग के समूह पर, दावा नाग यूथ पर सिंह-शिरताज को, दावा पुरहूत को पहारन के पूर पर, दावा सब पंछिन के गन पर वाज को, भूयन अखंड नवखंड मही मंडल मैं, तम पर दावा रवि किरन समाज को, पूरव पछांह देस उत्तरते दरिछन लो, जहाँ पातशाही तहाँ दावा शिवराज को ॥२॥ प्रेतनी पिशाच अरु निशाचर निशाचरी या, मिलि मिलि प्रापस में गावत वधाई हैं, भेगें भूत भूरि भिरि ममत भयकर से, जूय जूथ जोगिनि जमात जुरि आई हैं, किलकि किलकि काली करत कुलाहल सो, डौंरू गहि वामकर शकर बजाई हैं। शिवा पूछे शिवसों समाज कहि काज चल्यो, श्राज शिवराज मोह काह पे चढाई हैं ॥३॥ छूटत कवान वान गोली श्री गिलोलन के, नाही ठहरात मुरचानह की ओट में, कोनो शिराज वीर ताहि घेर हल्लाहद्द, बाध्यो परहल्ला प्रतिपच्छी भट जोट में भूबन भनत तेरी हिम्मन सराहो हद, , नाही को चहान वीच तेरेसम चोट में, भूषण कविताचली। ४७ ताव दे दे मूछन कगूरन पाय दे दे, शत्रु शिर घाव दे दे कूदे परे कोट में nen दुग्ग पर दुग्ग जीते शिरजा शिवाजी गाजी, झुड रिपु मुडन के उग्र हार फरके, भूगन भनत वाजे जीत के नगारे न्यारे, सारे करनाटी भूप सिंहललो सरके, नारे लगे शोणित के वहन पनारे लगे, भारे लगे धमके सतारे गढ धरके, बीजापुर चीरन के गोलकुडा धीरन के, दिल्ही उर मीरन के दाडिमसे दरके ॥५॥ काहु न सुधारी काहु बदरते पाय धारी, पड़व पसारी रतवारी रजवट की, बढी भुजदड चड चचल अकाश खेली, लागी पर लाग लेन काहुन अटकी। खेल दिल्ही वीच पोर गोलकुडा बीजापुर, खेलत निहारी मरजाद सिंधु तट फी, भूसन भनत महाराज शिवराज वीर, तेरी तलवार धो नाची नार नट की ॥६A इन्द्र करि यल नित हिरत गजेंद्र ह को, हेत उपेंद्र फामनेनु प्रिय निश को, भूलन भनत विधि हेरे राजहंस निज, हेरत चकोर चहु अोर रजनीश की, मिह शिवराज कृत सघर पराक्रम को, हेरे भो अचमो सुर फोटी नियतीस को, हेरे ना लहत तुव जश मं हिराने प्रय, हेरत गिरीश गौरी गिरिजा गिरीश को 198 साहित्य सुषमा। । माते मदवारे जाके द्विग्द निहारे भारे, चचल तुरङ्ग सेन शूर रनजीत हैं मुखन मनत बान छूटे नाग पुज मम, देखत डराने रिपु भागे भयभीत है, कर कुरापाती अरु सजन तमाम मिलि, गहत विवेक नेक न्याय धर्म रीत है, कपट अनीत द्वेश काह में न रह्यो लेश, नीकी शिवराज राजे, ऐसी राजनीत हे ॥ ८॥ रायगढ-वर्णन। , मनिमय महल शिवराज के इमि रायगढ़ में राजहीं। लखि यच्छ किन्नर सुर असुर गधळ हाँसनि साजहीं। उत्तंग मरकत मन्दिरन मधि बहु मृदग जु वाजहीं। धन समैं माना धुमरि करि धन धन पटल गल गाजहीं। (२) मुस्तान की मालरिन मिलि मथि माल छजा छाजहीं। सन्ध्या समै मानहुँ नपत गन लाल जह तहाँ ऊर) उठे हीरा किरन वन समुदाय है। मानो गगन तम्बू तन्यो ताके सपेत तनाय हैं। श्रम्बर गतही। भूपन भनत जहं परसि के मनि पुदपरागन की प्रमा। प्रभु पीत पट की प्रगट पात सिंधु में धन की समा। मुष नागरिन के राजही कई फटिक महलन सग में। पिकसग कोमल कमल मानद अमल गग तरग में !
। रायगढ-वर्णन।
४६
(४)
श्रानन्द सो सुन्दरिन के कहुं वदन इन्दु उदोत हैं।
नमसरित के प्रफुलित कुमुद मुकुलित कमल कुल होत हैं।
फहुँ वाचरी सर कूप राजत बद्ध मनि सोपान हैं
जहं हंस सारस चक्रवाक विहार करत सनान हैं।
कित विसाल प्रवाल जालन जटित अगन भूमि है।
जहँ ललितवागनि दुमलता मिलिरहैझिलमिलभूमि है।
चम्पा चमेली चारु चन्दन चारिह दिसि देखिये
लवली लवग इलानि केरे लाखहाँ लगि लेखिए ।
फहुँ केतकी कदली फरीदा कुद अरु कर वीर हैं ।
कहुँ दाख दाडिम से कटहल तूत अरु जम्भीर हैं।
कितहूं कदम्ब कदम्ब कहुँ हिंताल ताल तमाल हैं
पीयूष ते मीठे फले फितह रसाल रसाल हैं।
पुन्नाग कहुँ कहुँ नाग फेसरि कतहुँ यकुल असोक हैं
कहुँ ललित अगर गुलार पाटल पटत वेला थोक है।
कितह निगारी माधवी मिंगारहार फह लसें
जहं भाति भातिन रंग रंग निहग श्रानंद सो रसैं॥
लसत विहंगम यहु लरनित या भांति चाग मई।
कोकिल कीर फपोत फेलि फ्लक्ल परत नह ।
मजुल महरि मयूर चटुरा चातफ चकोर गन ।
पियत मधुर मकरन्द करत झकार भृङ्ग धन ॥
साहित्य सुपमा । भूपन सुवास फल फूल युत छहुऋतुवसतवसंतजह । इमि राजदुग्गराजतरुचिरसुखदायक सिवराज कह ॥ मतिरामकृत 'बूंदी' वर्णन । । दोहा। जगत-विदित वूदी नगर, सुख सम्पत्ति को धाम । कलियुगह मैं सत्यजुग, तहाँ करत विश्राम ॥१॥ पढत सुनत मन दै निगम, आगम समृत पुरान। गीत कवित्त कलान के, जहँ सब लोग सुजान ॥२॥ सरद धारिधर से लसत, अमल धौर हर धौल। चित्रति चित्रित सिसर जह, इन्द्र धनुप से नौल ॥३॥ महलनि ऊपर जह बने, कञ्चन कलस अनूप । निज प्रभानि सौ करत हैं, गगन पीत अनुरूप ॥ ४॥ जह विमान वनितान के, श्रम जैल हरत अनूप । सौध पातकनि के चसन, होइ विजन अनुरूप ॥५॥ बीना चेनु निनाद मृग, मोहि अचल करि चन्द । सोध सिर ऊपर जहाँ, दम्पति करत अनन्द ॥६॥ जहाँ छहाँ ऋतु में मधुर, सुनि मृदङ्ग मृदु सोर। सग ललित ललनानि के, नृत्य करत गृह मोर ॥७॥ मरकत लाल प्रवाल मनि, मुकुट हीर अपदान । ललित राज पथ में जहाँ, जरकस वसन विकात ॥ ८॥ मटजल घरपत भूमि के, जलधर सम मातङ्ग। विना परनि के खग जहाँ, सुन्दर तरल तुरङ्ग ॥६॥ सदा प्रफुल्लित फलित जह, द्रुम बेलिन के बाग । थति कोकिल कल निसनतालहतशत अनराग||
देव कवितावली।
कमल कुमुद कुवलयन के, परिमल मधुर पराग ।
सुरभि सलिल पूरे जहाँ वापी कूप तडाग ॥ ११ ॥
शुक चकार चातक चुहिल, कोक मत्त फलहस ।
जह तरवर सरवरन के, लसत ललित अवतस ॥१२॥
अक्षवट वालक उदय, ज्यौं ससार
सफल जगत पानिप रह्यो, बूंदी में ठहराय ॥१३
तामें प्रतिविम्वित मनी, सम्पत्ति जुत सुर लोक ।
अर घर नर नारी लसैं, दिव्य रूर के भोक ॥१४॥
समाय।
देव-कवितावली।
गोपियों का सौहाद।
को हमको तुमसे तपसी विन जोग सिसावन श्राइ है ऊधो।
पेपर एही कहौ उनको पिछली सुधि श्रावत है कबहू धो॥
एक भली भई भूप भये जिन्हें भूलि गया दधि माखन दूधो ।
कूवरी सी अतिसूधी वधू वरु पायोभलोघनश्याम सोसूधो ॥३॥
राबरो रूप रह्यो भरि नेननि बैननि के रस सो ध्रुति सानो।
गात मैं देखत गात तुम्हारेई यात तुम्हारिये वान चखानो।
ऊधो हहा हरि सों कहिये तुम हो न इहाँ यह तो नहिं मानो।
या तनते बिछुरे तो कहा मनते अनते जु यसो तर जानो ॥२॥
माहन माई भई मथुरापति देव महामट सो मन मात्यो।
कोर परे श्रव कूलरी के हरि या ते कियो हम सौ हित हात्यो
गोकुत गांव के लोग गरीय हे यानु बराबरी ही को यहाँ त्यो।
बैठि रह्यो सपनेह सुन्यो फहूँ राजन सा परजान सोनात्यो ॥३॥
साहित्य सुषमा - पूतना के पय पान फरो तन पूत नाते पिसाव वगारत । वेव कहा कहीं मातु पिता हित बंधुन सो हितु नीके निचाहत। कारे ही कान्ह निकारे हो कीलिरहेगुन लीलिपैश्रीगुन थाहत। पनग कीमनि फीने तुम्हें तुम पन्नग की फिचुनीकियोचाहत ४॥ फस रिपु अस अवतारी यदुवस कोई फान्ह सो परमहंस कहै तो कहा सगे। हम तो निहार ते निहारे बजवासिन में देव मुनि जाको पचिहारे निसि चासरी॥ भ्रम न हमारे जप सजम न करें कछु यहि गयो जोग जमुना जल विलासरो। गोकुल गोसाइनि। परम सुसदाइनि श्रीराधा ठॉगइनि के पायनि कोआसरो॥५॥ बाहिर ही बैठो मनि पैठो ब्रज कुज ऊधी वातनि विरूधो जनि सूधी ब्रजलोग पर। देव कौन देसै देसे गोपी के दुसह दमा विरह विलाको रापी प्रेम के प्रयोग पर कैसे कहि श्रावत कुटिल हठ बात साठ यात न सुहात कुपिजा के सुख भोग पर। सजोग विहारे ते अजोग ही निहारे जोग काटिक तिहारे हम चारे या नियाग पर ॥६॥ गोपियों की प्रेम भक्ति । न्यारी भई गोपी सो गुपाल की गुपित प्यारी पुदुमी उज्यारी में पदुम पश्न्यास ही। देव देवता सी देखि पूलै हरि देख्यो कहूँ देख्यो जो न सनकन नारद न व्यास ही॥
देव कविताली। पच्छिम पयोधि के पुलिन श्रायो इदु एऊ '. फालिंदी पुलिन अाई प्रानन उज्यास ही लीला लगी करन जु पूतनादि कीन्ही श्याम कोई पनी कान्ह काई गोपी अनध्यास ही॥१॥ फेरि फेरि टेरि टेरि हेरि हेरि हारी काहूँ मिल्यो' न विहारी विहरेया ब्रजनन को। यमुना पुलिन खुलि खुलिन नयन गुर्न गन गाय राय रोय राच्या मोह मन को। वंशी कर लीने वंशीवट के निकट देर प्रगट्यो हसत अनुरंजन जो जन को दौरि दौरि हंसि हसि रूसि रूसि लियो हरि हियो भरि भेट्यौ सय मेट्यो ताप तन को २ ॥ जानतिन बाद विधि घेद मरजाद तुम, प्रेम के प्रमाद हूं प्रमानन पनति हो। प्रेम को महातम महातम न माने, पर, मातम प्रधान यहि श्रानम की गति है। देर । अनुकूल आप सरन चरन मूल, हरिये हिये के सूल सुन्दर सुमति हो। ऊपर तिहारे पति रति म हारे न निहारे तनु प्रानिन हमारे प्रानपति हौ ३॥ पूतना को वैरी यह पूतना जसोमति को, छोटे ही छपाचर की छाती चढो छोहरो। लोटि जात्रासकट पछालावच्छ फारयो या, कोलिय निकारया प्रान अघासुर को हरयो। मुख मैं दिपायो जगु विधि को भुलायो मनु, खाल्यो मवया को उर पाल्यो व्रज गोइरो।
साहित्य-सुपमा
श्रायिन को तारो है हमारो भयो आँसि श्रोट,
टेत दुख हाँसी को देखावै श्रव सो हरो॥ ४ ॥
वृन्द के नीतिमय दोहे।
मधुर वचन तेजात मिट, उत्तम जन अभिमान ।
ननक सीत जलसों मिटे, जैसे दूध उफान ॥ १ ॥
कछु बसाय नहिं सवल सों, करे निवल सों जोर।'
चले न अचल उखार तरु, डारत पवन झकोर ॥२॥
पर घर कबहु न जाइये, गये घटत है जोति ।
रवि मडल में जात शशि, छीन कला छवि होति ॥ ३॥-
निकट अवुध समुझे कहा,बुधजन वचन विलास।
कवहू भेक न जानही, श्रमल कमल की घास ॥४॥
दोपहि सौ उमहे गहै, गुण न गहै खल लोक ।
पिये रधिर पय ना पिये, लगी पयोधर जोक ॥५॥
क्यों कीजे ऐसोजतन, जाते काज न होय ।
पर्वत में सोदे कुत्रा, कैसे निकले तोय ॥ ६ ॥
धन पाढे मन वढ गयो, नाहि न मन घट होय ।
ज्यो जल सँग वाढ जलज,जल घट घटे न सोय ॥७॥
सर ते लघु हे मागचो, या फेर न फार ।
वलि पै जाचत ही भये, बामन तन करतार ॥ ८॥
योर पराक्रम ना करे, तामों डरत न कोय ।
चालक ह के चित्र को, वाघ खिलौना होय ॥६॥
भली करत लागे विलम्ब,विलम्ब न बुरे विचार ।
मरन बनावत दिन लगे, दाहत लगै न वार ॥ १० ॥
वृन्द के नीतिमय दोहे। । सुस सजन के मिलन को, दुर्जन मिले जनाय । जाने ऊप मिठास को, जब मुसनिय चवाय ॥११॥ जाहि मिले सुख होत है, तिहि विछुरे दुख होय । सूर उदै फले कमल, ता दिन सकुचै सोय ॥ १२॥ कछु कहि नीच न छेडिये, भलो न वाको सग। पथ्थर डारे कीच में, उछरि विगारे अग ॥ १३ ॥ सजन वचावत कटते, रहे निरतर साथ । नैन सहाई ज्यों पलक, देह सहाई हाथ ॥ १४ ॥ बुद्धिवान गभोर कों, सगत लागै नाहिं। ज्याचदन ढिग अहिरहत विपनहोयतिहि माहि ॥१५॥ बचन पारखी होहु तूं, पहले श्राप न भास । अनपूछे नहिं भाखिये, यही सीख जिय राख ॥ १६ ॥ नैन श्रवण मुस नासिका, सवही कहवी सुनवौ देसी, चतुरन को कछु और ॥ १७ ॥ भाव माघ की सिद्धि है, भाव भाव में भेव । जो माने तो देन है, नहीं भीत को लेव ॥१८॥ जैतो गुण दीनो उई, तेसो रूप निवध । ये दोऊ कहाँ पाइये, सोनो और सुगध ॥ १६ ॥ श्रमही सॉसय मिलत हे,विन श्रममिलन काहि । सीधी अगुरि घी जम्यो, पनों हू निफरे नाहिं ॥ २०॥ जा जाको गुन जानही, सो तिहिं श्रादर देत । फोफिल श्रयहि लेत है, काग निचोरी हेन ।॥ २१ ॥ जाही ते क पाइये, फरिये ताकी श्रास । रोते मरवर पै गये, कैसे उझत पियाम ॥ २२ ॥ गुनही नऊ मंगाइये, जो जीरन सुप भौन । श्राग जरारत नगर तऊ, प्राग न पानत कौन ॥ २३ ॥ इक ठौर। - साहित्य सुषमा। रस अनरस समझे न कछु, पढे प्रेम की गाथ। बीबू मन्त्र न जानहीं, साँप पिटारे हाथ ॥ २४ ॥ कैसे निवहै निवल जन, कर सबलन मों गैर । जैसे बस सागर विपे, करत मगर सौ वैर।॥ २५ ॥ दीयो अवसर को भलो, जासों सुधरै काम । खेती सूखे वरमयो, धन को कौने काम ॥२॥ अपनी पहुँच विचार के, करतव करिये दौर । नेते पांव पसारिये, जेती लांची सौर ॥ २७ ॥ द्या धन उद्यम विना, कही जु पावै कौन । बिना डुलाये ना मिले, ज्यों पसा की पौन ॥ २८॥ बुरे लगत सिस के वचन, हिये विचारो श्राप । करुपो भेषज विन पिये, मिट न तन की ताप ॥२६॥ रहे समीप बडेन के, होत वडो हित नेल । सवही जानत चढत है, वृक्ष वरावर बेल ॥ ३०॥ फेरन हे है काट सों, जो कीजे व्यौपार । जैसे हाँडी काठ की, चढ़े न दूजी। बार ॥ ३१ ॥ करिये सुजाको होत दुख, यह कहौ कौन सयान । वा सोने को जारिये, जासो दृढे कान ॥ ३२॥ नयना देत वताय मय, हिय को हेन आहेत। जेप्ते निर्मल भारसी, भली धुरी कहि देत ॥ ३३ ॥ अति परचै ने होत है, अरुचि अनादर भाय । मलयागिरि की भीलनी, चन्दन देत जराय ॥३४॥ भले बुरे सब एक सौ जौं लौ बोलत नाहि । जानि परतु हैं काक पिक,ऋतु वसन्त के माहिं ॥ ३५॥ हितह की कहिय न तिहिं, जो नर होय अवोध । ज्यों नकदै को पारसी, होता दिखाये क्रोध ॥ ३६ ॥ - वृन्द के नीतिमय दोहे। 1 सबै सहायक सवल के,कोऊ ननिल सहाय । पवन जगात श्राग को, दीपहिं देते बुझाय ॥ ३७॥ रोप मिटे कैसे कहत, रिम उपजायन ' बात । ईधन डारे श्राग मो, कैसे आग बुझात ॥ ३८ ॥ जो जेहि भावेसो भलौ,गुन को फछु न पिचार । तज गज मुरुता भीलनी, पहिरति गुजा हार ॥ ३६॥ दुष्ट न छाडे दुष्टता, कैसे ह सुख देत। धाये है सौ घेर के, काजर होय न सेत ॥४०॥ जाको जैसी उचित तिहिं, करिये सोइ विचारि। गीदर कैसे ल्याइ है, गज मुक्ता गज मारि ॥ ४१ ॥ जैसे बधन प्रेम को, तैसो बध न और । काठहि भेदे कमल को, छेद न निकरै भौर ॥ ४२ ॥ जे चेतन ते क्यों तजे, जाको जासो मोह । चुवक के पीछे लग्यो, फिरत अचेतन लोह ॥४३॥ जो पावै अति उच्चपद, ताको पतन निदान । ज्यों तपि तपि मध्याह लों श्रस्त होतु है मान ॥ ४४ मूरख गुन समझे नहीं, तौ न गुनी में चुक कहा भयो दिन को विभौ, देखै जो न उलूक ॥ ४५ ॥ फरै बुराई सुख चहै, कैसे पाये कोइ । रोपे विरवा पाक को, श्राम कहाँ ते होई ॥४६॥ यहुत निवल मिल चल करें, करें जु चाहँ सोय । तिनकन की रसरी करी, करी निवन्धन होय ॥४७॥ साँच झूठ निणय कर, नीति निपुण जो होय । राजहस दिन को करे, क्षीर नीर को दोय ॥४८॥ कारज धीरे होतु हे, काहे होत अधीर । समय पाय तरुवर फलै, केतक सींचो नीर ॥ A ।
-- । 7 - साहित्य सुपमा । धुरी करें तेई बुरे, नाहिं चुरो कोउ और । बनिज करै सो पानियो, चोरी करै सो चोर ॥ ५० ॥ कछु कहि नीच न छेडियै, भलो न बाको सग। पाथर डारे कीच में, उछरि विगारै अङ्ग ॥५१॥ ऊपर दरसै सुमिल सी नतर अनमिल श्रॉक । कपटी जन की प्रीति है, सीरा की सी फाँक ॥ ५२ ॥ सवां आगे होय के कबहुँ न करिये चात। सुधरे काज समाज फल, विगरे गार्ग खात ।। ५३ ॥ बुरौ तऊ लागत भलौ, भली ठौर पर लीन । तिय नैननि नीको लगे, काजर जदपि मलीन ॥ ५४॥ क्षमा खड्ग लीने रहै, खलको फहा बसाय । अगिन परी तृनरहित थान, श्रापहिते वुझिजाय ।। ५५॥ श्रोछे नर के पेट में, रहे न मोटी बात । श्राध सेर के पात्र में, कैसे मेर समात || ५६ ॥ जूना खेले • होतु है, सुख सपति को नास। राज काज नलते छुट्यो, पाडव किय बनवास.।। ५७॥ सरस्वति के भडार की, वडी- अपरय बात। ज्यों सरवै त्यौं त्यों बढे, बिनसरचैघटि जात ॥५८॥ मित्र मित्र के काम को, देत विभव करि हेत। जैसे चद प्रकाश करि, रवि मडल से लेत.॥५६॥ लोकन के अपवाद को, डर करिये दिन रैन । रघुपति सीता परिहरी, सुनत रजक के वैन ॥ ६ ॥ - . ।
चैताल के नीतिमय छप्पय ।
बैताल के नीतिमय छप्पय ।
अरुण तेज अति रूप, वरन उनको है न्यारो।
तिमिर नाश परकाश, जगत को सिरजन हारो॥
देव आदि नर भूप, ध्यान उन्हीं को धारो।
प्रलय पवन जल नाश, भये इनहीं ते सारो ॥
वैताल कहे विक्रम सुनो, सफल लोक जिनते तरत ।
भानु प्रतापी नित जान कर, नमस्कार सवहीं करत ॥ १ ॥
वचन छल्यो बलिराज, वचन कौरव व्रत खडो।
घचन करन लगे कोश, वचन फौरव वन मडो॥
बचन लान हरिचन्द्र, नीच घर नारि समयो ।
वचन लाग जगदेव, शीश ककालिहि श्रो॥ ।
याचा याच वैताल भनत, तो कर गहि जिहा काटिये।
जर जाय लक्ष विक्रम तनय, सोचोलि वचन मत पलटिये॥ २ ॥
पहिर झींग ले पटा, पाग शिर टेढी वाधे ।
घर में तेल न लोन, पीति चेरी सो साधे ॥
घातन में गढ लेय, युद्ध श्रामिन नहिं देखें।
। अवस्ट घट में जान त्रिया सो मागे लेरो॥
जानत है सो जानन सथै, दुख सुख साथी कर्म के।
घेताल कहें विक्रम सुनौ, ये लक्षण नामर्द के ॥३॥
मर्द शीश पर नो, मर्द योली पहिचाने ।
मर्द पेलावै खाय, मर्द चिन्ता नहिं माने।
मद देय श्री लेय, मर्द को मर्दु बचावै ।।
गहिरे सकरे काम, मर्द के मर्दे श्रावै॥
पुन मर्द उन्हीं को जानिये,जो दुपसुम साथी कर्म के।
पताल कहै विक्रम सुनो, ये सब लक्षण मद के ॥ ४ ॥
। साहित्य-सुपमा। - बुध विन करे बेशर, दृष्टि विन नाव चलावे। सुर विन गावे गीत अयं विन नाच नचावे ॥ गुनविन जाय निदेश, अफल चिनुचतुर कहाचे । बल विन वाधे युद्ध, होस विन हेत जनावे । अन इच्छा इच्छा करे, अन दीठी बातों कहे। पैताल कहे विकुम सुनो, ए मूरख की जात है ॥ पाउ विन कटे न पंय, बाहु विन हटे न दुरिजन । तर विन मिले न राज,भाग्य विन मिलेन सजन ॥ गुरुविन मिले न ज्ञान,द्रव्य विन मिले न श्रादर। विना पुरुष सिंगार, मेघ विन कैस दादुर ॥ बैताल कहे चिकुम सुनो, बोल बोल बोली हटे। धिक धिक ए पुरुष को, मन मिलाइ अन्तर कटे ॥६॥ जीभ जाग अरु भोग, जीभि बहु रोग बढावै । जीभि करे उद्योग, जीभि ले कैद करावै ॥ जीभि स्वर्ग ले जाय, जामि सब नरक दिसावै । जीभि मिलावै राम, जीभि सब देह धरावै ॥ निज जीभि आठ एका करि, बाँट सहारे तोलिये। बैताल कहे विक्रम सुनो, जीमि समारे बोलिये जा टका करै कुल हुल, टका मिरदन वजावै । टका चढे सुपगाल, टका सिर छत्र धरावै ॥ टका माय अरु वाप, टका भैयन को भैया। टका सास अरु असुर, टका सिर लाड लडेया । अब एक टके विनु टकटका, रहत लगाये रातदिन । बैताल कहे विक्रम सुनो,धिक जीवन एक टके दिन 12R मरे बेल गरियार, मरै वह अडियल टइट। मरे करमसा नारि, मरे वह ससम निखट्ट।
२ महात्मा श्रीनागरीदास जी के पद । वामन सो मरिजाय, हाय लै मदिरा प्यावै । पृत वही मरि जाय, जू कुल में दाग लगावे।। अरु चे नियाव राजा मर, तवे नींद भार सोइय ॥ बैताल कहे विक्रम सुना, एते मरे न राइये ॥ER दया चट्ट ह गई, धरम धंसि गयो धरन म । पुन्य गयो पाताल, पाप भो वरन वरन में । राजा करे न न्याय, प्रजा की होत खुबारी । घर घर में वेपीर, दुचित भ सब नर नारी ।। श्रय उलटिदान गजपति मगे,सील संतोष कितै गयो। पैताल कहै विक्रम सुना, यह कलयुग परगट भयो ॥१०॥ ससि विन सूनी रैन, ज्ञान विन हिरदै सूनो । कुल सूनो विन पुत्र, पत्र दिनु तरचर सूना ॥ गज सूनो इदंत, ललित विन मायर सूना । विप्र सून विन वेद, और विन पुहुप बिहूना ।। हरि नाम भजन विनु सत श्ररु, घटासून गिन दामिनी । वैताल कहै विक्रम सुनो, पति विन सूनी कामिनी महात्मा श्री नागरीदास जी के पद । उजल पछ की रैन चैन उज्जल रस देनी । उदित भयो उडराज अरुन दुति मन हरि लैनी।। महा कुपित है काम बह्म अस्त्रहि छोड्यो मनु । प्राची दिसि ते पजुलित आवत अगिनिउठी जनु । दहन मानपुर भये मिलन को मन हुलसावत । छावत छपा अमद चन्द ज्यो त्यो नभ श्रावत ॥
साहित्य-सुपमा। जगमगाति बन जोति सोत अमृत धारा से । नव द्रुम किसलय दलनि चाह चमकत तारा से ॥ सेत रजत की रैन चैन चित मैन उमहनी । तैसी मन्द सुगन्ध कौन दिन मनि दुख दहनी ॥ मधि नायक गिरिराज पदिक घृन्दावन भूपन । फटिक सिला मनि भृङ्ग जगमगति दुति निदूपन । सिला सिला प्रतिचद चमकि किरननि छवि छाई । बिच विच अम्ब कदम्ब झम्ब झुकि पायनि आई ॥ ठोर ठौर चहुँ फेर ढेर फूलन के साहत । करत सुगन्धित पवन सहज मन मोहत जोहत ॥ विमल नीर निरझरत कहू झरना सुख करना । महा सुगन्धित सहज बास कुम कुम मद हरना। कहुँ कहुँ हीरन खचित रचित मण्डल सुरास के। अटित नगन कहुँ जुगुल खभ झूलनी विलास के ॥ ठोर ठौर लसि ठौर रहत मनमथ सो भारी । विहरत विविध विहार तहाँ गिरि पर गिरिधारी ॥१॥ किते दिन विन वृन्दावन सोये। योही वृथा गयेते अवलों राजस रग समोये ॥ छाडि पुलिन फूलन की सजा सूल सरन पर सोये। भीने रसिक अनन्य न दर से विमुखन के मुप गोये ॥ हरि बिहार की ठौर रहे नहिं अति प्रभाग्य चल बोये । कलह मराय यसाय भिटारी माया रांड विगोये ।। इक सर धो के सुस तजि के हां कबहुँ हंसे कह रोये। पियो न अपने दाज पराय भार सीस पर ढोये ॥ पायों नहीं आनन्द लेस में मौ नागरि दान से कुंजनि में स्वामी हित वृन्दावन दास जी के पद । । हम व्रज सुखी ब्रज के जीव । प्रान तन मन नैन सरवसु राधिका को पीव ।। फहाँ अानन्द मुक्ति में यह कहाँ मृदु मुसकान । कहाँ ललित निकुज लीला मुरलिका कल गान ।। पहा पूरन सरद रजनी जोन्ह जगमग जोत । कहाँ नू पुर वीन धुनि मिलि रासमण्डल होत ॥ कहा पांति कदम्ब की झुकि रही जमुना वीच । कहाँ रग बिहार फागुन मचति केसर चोच ॥ कहाँ श्रवनन की रतन जगमगनि दसधा रग । कठ गद गद रोम हरसन प्रेम पुलफित अग ॥ दास नागर चहत नहिं सुख मुक्ति आदि अपार । सुनहु बजवसि श्रवन में व्रज वासनन की गार ॥३॥ Referrern स्वामी हित वृन्दावन दास जी के पद। यह छवि वाढी री रजनी पेलत रास रसिक मनि माई । कानन वर सौरभ की महकनि तैसिय सरद जुन्हाई ।। पुलिन प्रकाश मध्य मनि मण्डल तहँ राजत हरि राधा । प्रतिचित तन दुरनि मुरनि में तय छवि बढत अगाधा। गौर श्याम छवि सदन वदन पर फबि रहे श्रमकन ऐसे । नील कनक अम्बुज अतर धरे श्रोपि जलज मनि जैसे ।। झलकत हार चलत कल कुटल मुस भयक ज्यों सोहैं । चारौं सरद निसा ससि फेतिक मन कटाच्छनि मोहें ।। थइ इ वचन बदत प्रिय प्यारी प्रगटत नृत्य नई गति । वृद नवद हिततान गान रस अलिहित रूप कुशल अति ॥१॥ -
६४
माहित्य-सुपमा।
।
हौं चलि जाऊँ मुख सुसरास ।
जहाँ त्रिभुवन रूप. सोभा रीझि कियो निवास ॥
प्रतिविम्ब तरल कपोल क्मनी युग तरौना कान ।
सुधा सागर। मध्य चैठे मनौ रचिगुग न्हान ।।
छवि भरै नव
कज दल से नह पूरित नैन ।
पूतरी मनि मधुर छौना बैठि भूलै गैन ।
कुटिल भृकुटी नमित सोभा कहा कहों विशेख ।
मनहुँ ससि पर श्याम बदरी युगुल किंचित रेख ।।
हरत माल विशाल ऊपर तिलक नगनि जराय।
मनहुँ चढे विमान ग्रह गण ससिह भेटत जाय ॥
मद मुसुफनि दसन दमकनि दामिनी दुति हरी।
वृन्दावन हित रूप स्वामिनी कौन विधि रचिकरी ॥२॥
सोमा केहि विधि वरनि सुनाऊँ ।
यक रसना सोउ लाचन हीनी कहौ पार क्यों पाऊँ ।।
अग अग लावन्य माधुरी बुधि पल किती बताऊँ।
अतुलित सुमति कहि गये क्या गपलरजि धरिजुउचाऊं।
नर वैसंधि दुहुनि नित उलहत जय देखो तब ओरे ।
यहि कौतुक मेरो सुनि सजनी चित न रहतयक ठोरे ।
लोक न सुनी द्वगन नहीं देखी ऐसी रूप निकाई ।
मेरी तेरी कहाँ चली मग मृग मति प्रेम,धिकाई ।।
कवह गौर श्याम तन काहूँ लोचन प्यासे धावें ।
कह घटि जात सिंधु को पछी जो चोंचन भरि लावै ॥
सुन्दरना की हद मुग्लीपर बेहद छचि श्री राधा।
गाथै थपु अनन्त परि मारद नऊन पूजे साधा ।।
न्याइ काम करपट निकसत पिय अरु कप गुमानी।
वृन्दावन हित रूप कियो वस लो कानन कीरानी ॥३॥
गिरिधर की कुंडलियाँ।
।
-
ऐसे ॥१॥
नगरी॥
गिरिधर की कुण्डलियाँ।
पुत्र प्राण ते अधिक है, चारित युग परिमान ।
सो दशरथ नृप परिहरे, पचन न दीन्हों जान ।।
पचनान दीन्हों जान, बडन की चूझि बड़ाई।
चात रहे सो -काज, और वरु, सरपस जाई॥
कहै गिरधर कविराय, भये नृप, दशरथ ऐसे
पुत्र प्राण
परिहरे, बचन परिहरे न
साई चेटा
चाप के, विगरे। भयो अकाज ।
हरणाकश्यप कंस को, गयो दुहुन को राज॥
गयो दुहुन को राज, बाप-बेटा में विगरी।
दुश्मन : दावागीर, हंसे बहु मडल
कहै गिरधर कविराय, युगन याही चलि आई।
पिता पुत्र के बैर, लाभ ,पको नहिं
साई पुर ज्वाला उठो, - श्रासमान ते धाय ।
अधहि पंगुहि “छोडिके, पुरजन चले पराय ॥
पुरजन चले पराय, अन्ध- यक मन्त्र विचारो।
पगुहि , लीन्हे कध, द्रुष्ट वाकी पगु धारो॥
कहे गिरधर; कपिराय, सुमति ऐसी चलिभाई।
बिना सुमति को राज, गयो रावण - को साई ॥३॥
दौलत ' पाइ - न पाइये, सपने में अभिमान ।
चचल है दिन चार को, ठाउ,न-रहत निदान ।।
ठाउ न रहत निदान, जियत जग में यश लीजै ।
मीठे वचन सुनाय, विनय सवही सो कीजे ॥
कहै गिरधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत ।
पाहुन निशिदिन चारि, रहत सवहि के दौलत ॥४॥
साई ॥२॥
चुद्धि सारधी जान, देह रथ रथी पातम ॥१७॥ । साहित्य-सुपमा। कहै गिरधर कविराय, सबै यामें सुधि, आई। शीतल जल फल फूल, समय जनि चूको साई ॥१३॥ पानी बाढो नाव में, घर में बाढो दाम । दोऊ हाथ, उलीचिये, यही सयानो काम ॥ यही सयानो काम, राम को मुमिरण कीजे । पर खारथ के काज, शीश श्रागे धरि दीजै ।। कहे गिरिधर कविराय, बडन की याही बानी। चलिये चाल सुचाल, राखिये अपनो पानी ॥१४॥ राजा के दरबार में, जैसे समया पाय साई तहाँ न चैठिये, जहाँ कोउ देय उठाय ॥ जहाँ,फोउ देय उठाय, घोल अन बोले रहिये। हसिये नाहिं हसाय, यात पूँछे ते कहिये । कहै गिरधर कविगय, समय सो कीजै काजा । अति आतुर महिं होय, बहुरि अनखैहै राजा ॥ कृतधन फयाहुन मानही, कोटि करे जो कोय। -सर्वस धागे राखिये, तऊ न अपनो होय । तऊ म अपनों होय, भले की भली न माने। काम कादि चुप रहै, फेरि तिहि नहिं पहिचाने । कहै गिरिधर कविराय,रहत नितही निर्भय मन । मित्र शत्रु ना एक, दाम के लालच कृतधन ।। १६४ - आतम रथी शरीर रथ, घुद्धि सारथी जान ।, मन डोरी इन्द्रीय हय, मारग विपय पिछान । मारग विपय पिछान, देह इन्द्रिय मन योगा । दुख सुख भोग भोग, तत्त्ववित कहै प्रयोगा। कहै गिरधर कविराय, है पही परमातम । + NamamarS Ay-- Thana - AM - - पद्माकर के कवित्त। मया मोह मद राग पुनि, ममता दम्भ सकान । यह 'जामें नहि पाइये, सो परमेश्वर राम ॥ सो परमेश्वर राम, सर्वका' 'जाननहारा। और सबै अध्यस्त,' श्राप धिष्ठान अपारा । कहै गिरधर कविराय, ध्यान धर सुनरे भाया । आश्रय पाशा तजि, आरोपित जिसमें माया ॥१८॥ मेरी तेरी छोड कै, पक्षापक्षहिं नारा। राग द्वेष को दूर कर, निजानन्द रस चाख ॥ निजानन्द रस चाख, और रस लागै फीके एक जान के भये, दु:ख मिट जांच जी के॥ कहै गिरधर कविराय, रङ्ग' जो पेरै गैरी। तव यह होवै सफल, तजे जब मेरी तेरी ॥१६॥ काल काम करना जोऊ, सो तो कीजे आज । मूल अविद्या नीदि ते, शीघ्रहि तू अब जाग । शीहि तूं अय जाग, अपना सब करले कारज । ऐसो मामय देई, फेर कर मिलही श्रारज ॥ कहै गिरधर कविराय, काट कर भ्रम के जाल । लखो श्रापको ब्रह्म, कालजो 'जो है फाल HRel पद्माकर के कवित्त स्कुर कवित। आयो मन हाथ तब श्रायवो रह्यो न कहु, भयो गुरु ज्ञाने फेर माययो कहाँ हो। को बनाफर सुगन्ध को तरङ्ग जैसे, पायो सतसई फेर पाययो कहा हो।
। साहित्य-सुपमा! - गगा को चरित्र लखि भाखें यमराज ऐसे, परे चित्रगुप्त मेरे हुकुम में कान दै। कहै पद्माकर ये • नरकन मूद कर, मूंद दरवाजन को छोड यह थान देख यह देव-नदी किये पश देव मनि, दूतन वुलाइ के बिदा के येऊ पान है। फार डार फरद मिटेर रोजनामे डाय, • खातो खत जान दे बही को बहि जान दे। ममपुर द्वारे के किवारे लगे तारे कोऊ, है न रसवारे ऐसे बन के 'उजारे हैं। कहै पद्माकर तिहारे प्रण घाटे जेते, करि घमारे सुरलोक को सिधारे हैं। सुजन सुसारे करें पुरान उजियारे श्रति, 'पतित कनारे भवसिन्धु ते उतारे हैं। काह नैन तारे तिन्हें गंगा तुम तारे आज, जेते तुम तारे तेते नभ में न तारे हैं ॥ ६ ॥ वसन्त-वर्षा शरद ऋतु वर्णन। कूलन में फेलि में कछारन में कुजन में मारिन में कर्लिन कलीन किलकत हैं। 'कहै, पनाकर परागन में पान ह में, पानन में पीक में पलासनं पतग है। "हार में दिसान में दुनी में इस देसन मै, देखो दीप दीपन में दीपत दिगत है। बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में, यनन में चागन में बगरो असत हे ॥१॥ - - ॥ ! - । वसन्त वर्षा शरद ऋतु-वर्णन। और 'भाति कुजन में गुजरत भौर भीर, और डोर झारन में चौरन के है गये। कहै पद्माकर सु औरे भाति गलियान, छलिया छबीले छैल और छवि च्वे गये ॥ और भाति विहग समाज में अवाज होत, ऐसो ऋतुराज के न आज दिन ह गये। और रस और रीति और रोग औरै रग, । और तन और मन और बन गये ॥२॥ पात दिन कीन्हें ऐसी भाति गन येलिन के, परत 'न चीन्हें जे ये लरजत लुज हैं। 'कह पानाकर बिसासी या वसंत के सु, • ऐसे उतपात गात गोपिन के भुज हैं। कंधी यह सूचीसोसदेशो कहि दीजो भले, "हरिसों हमारे 'शा न फूले चन कुज हें । किसुके गुलाय कचनार श्री अनारन की, डारन पै डोलत अगारन पुज है ॥३॥ 'मल्लिकन मंजुल मलिंद मतवारे मिले, मद मद मारुत मुहीम मनसा की है। कहै पद्माकर त्यों निदन नदीन नित, नागर नवैलिन की नजर नसाकी है। दौरत दरेरी देत दादुर सुदंदै दोह, दामिनि दमकत दिसानि मै दसा की है। पहलनि बुंदनि पितोक घगुलान घाग, घगलान पेलिन यहार घरपा की है ॥४॥ चंचला चमक यह औरतते चाह भरी, चरज गई थी फेर चरजन लागीरी। - ७६ 1 साहित्य-सुषमा कीधों महारुद्र जू के तीसरे बिलोचन की, खुलन लगी है कई "कोर तेज तरकी 'ग्वाल कवि कहत सुदर्शन कोम्यान किधों, उघरयो कहते हुटि सीवन है सरकी । हाय विरहीन की कि लाय विरहागिन की, देत है जराय, जेठी धूप-दूपहर की ॥३॥ कातिकादिचायेंमास तखत बिछायबैथ्यो, यद्दल सजल जव छत्र छबि छाई है। जव तव मेह धार चौर चार दोरियत, सूर दूर पौन की वजीरी सरसाई हैं। ग्वाल कवि बरफ विछावत कुहर दल , झिरनी -प्रबलनीकी नौवत बजाई है। शीत बादशाह सो न और कोऊ दरसाय, 'पाय बादशाही चाटे सवको रजाई है ॥४॥ विविध चनात किनखापकी कनात तामें, 'दीरध दुचोवे हैं सिचोये हक्क हद्दी में। चादनी चौवन पै पर दरीचन में, 'दुहरे दुलचे हैं गलीचे गोल गद्दी में। ग्वाल कविभातिमांतिभोजन हैं भामिनी हैं, दीप हैं दुशाले हैं मशोले मैन मद्दी में । चापि के चुहहीसांज सोज पै बिहद्दी बेश, 'करयो शोत रद्दी तब इज्यो जाय नदी में ॥ ५ ॥ रैनि घटि घटि के बढन लाग्यो दिन मोन, लागी गरमान भानु दुति घट संग की। सीरी सीरी पवन हितान लागी हिरया में, धोरी धीरी: श्रावत सुगंध रङ्ग रङ्ग की । - गंगा वणन !" . ग्वाल कवि कहै ठढ साझ ते सवारे लग, उठत तरग तामे मदन उमग की। सीत में शिशिर की लगी है होन डगमग, मग मग होन लागी जगमग रङ्ग की ॥ ६ ॥ . भारतेन्दु वाबू हरिश्चन्द्र रचिंता । गगा वर्णन - भवसहन नव उज्वल जलधार हार हीरक सी सोहति । विच बीच छहरतिवूद मध्य मुक्ता मनि पोहति ॥ लोल लहर लहि पवन एक पै 'इक इमि श्रावत । जिमि नर-गन मन विविध मनोहर करत मिटावत ॥१॥ सुभग-स्वर्ग-सोपान सरिस सय के मन भावत । दरशन मजन पान त्रिविध भय दूर मिटावत ॥ श्रीहरिपद-नत्र चन्द्रकान्त मनि द्रवित . सुधारस । ब्रह्म-कमडल मडन सुरसरबस ३२॥ शिव सिर-मालतिमाल, -भगीरथ नृपति पुन्य फल । ऐरावत-गज गिरि-पवि हिम-नग कंठहार सगर-सुग्न सठ सहम परस जल मात्र उधारण । अगिनित धारा रूप धारि सागर सचारण ॥३॥ कासी कह प्रिय जानि ललकि भेट्यों जग धाई। सपने नहिं तजी, रही कम लपटाई॥ नवघाट उच्च गिरिवर-सम सोहत । कहुं छतरी कहुँ मढी बढी मन मोरत जोहत ॥ ४॥ धवल धाम चहुं ओर फरहरत धुजा पनाका । घहरत घंटा धुनि घमकत घौसा करि साका कल॥
०८ साहित्य सुपमा। 1 । -- मधुरी नौबत वजत कहू नारी नर गावत।' वेद पढत कहु द्विज कहुं जोगी ध्यान लगावत ॥५॥ कहु सुन्दरी नहात नीर' कर-जुगलं उछारत । जुग अवुज मिलि मुक्त गुच्छ मनुसुच्छनिकारत। घाश्रत सुन्दरि बदन करन अति ही छबि पावत । यारिधि नाते ससिंकलक मनु कमलमिटावंत ॥६॥ सुन्दर-ससि मुख नीर मध्य इमि सुदर सोहत । कमल बेलि लहलही नवल कुसुमन मन मोहत ।।. दीठि जही जहं जात रहत तिनही ठहराई। गगा-छबि हरिचन्द कळू वरनी' नहिं जाई ॥ ७ ॥ - . - यमुना वर्णन । . तरनि तनूजा-तंट 'तमाल तरुवर बहु छायें । झुके कूल' सों जल-परसन हित मनहुँ सुहाये॥ किंधा मुकुर मैं लसत उझफिसव निज निजसोमा। कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोमा ॥ मर्नु अातप चारन तीर को सिमिटि सवैछाये रहत। कै हरिसेवा हित नैरहे निरखिनैनमन सुख लहत ॥ १ ॥ कहूँ तीर पार कमले 'अमल सोभित बहु भातिन । कहुँ सेवालन मध्य कुमुदिनी लगि रहि पातिन ।। मनु गधारि अनेक जमुन निरसत ब्रज सोभा। कै उमगे प्रिय प्रिया प्रेम के अनगिन गोमा । कै करिकै कर बहु पीय फों टेरत निज ढिंगसोहई । के पूजनको उपचार ले चलति मिलन मन मोहई ॥२॥ फै पिय पद उपमान जानि एहि निज उरधारत । कैमुन करिया भूगन मिम श्रस्तुति उच्चारत ।। . - " यमुना-वन'। के प्रज तिय गना बदन कमल की झलफत माई। के मज हरिपद परस हेत कमला बहु श्राई । के सात्विक अरु अनुराग दोउ प्रजमएडलवगरे फिरत। कै जानि लक्ष्मी मौन पहि करि सतधानिजल धरत ॥३॥ तिन पै जेहि छिन चन्द जोति राका निसि प्रावति। जल में मिलि के नभ अवनी लौ तान तनावति । होत मुकुर मय सवै तवै । उज्जल'इफ श्रोभा। तन मन नैन जुडारत देखि सुन्दर सो सोमा । सो को कवि जो छवि कहि सकैताछनजमुनानीरकी। मिलिश्रवनिनौर श्रम्पररहत छवि इसकी नमतीर की ॥४॥ परत चन्द्र प्रति विम्ब कई जल मधि चमकायो।। लोल लहर लहि नचत कबहुँ सोई मन भायो । मनु हरि दरसन हेता चन्द जल वसत सुहायो। के तरंग कर' मुकुर लिये सोभित छचि छायो ।। के रास रमन मैं हरि मुकुट भाभाजल दियरात है । के जल उर हरि मूरति यसति ताप्रतिबिंध लपात है ॥५॥ कपटु होत सतचन्द कबहुँ प्रगटत दुरि भाजत । परन गगन यस विम्ब रूप जल मैं बहु साजत । मनु ससि भरि अनुराग जमुन जल लोटत डोले। के तरग की डोर हिंडोरन फरत फलाले॥ चाल गुडी नभ में उडी सोहत इत उत धावती । कै श्रनगाहत डोलत फोऊ ब्रज रमनी जल पावती ॥६॥ मनु जुग पच्छ-पतच्छ होत मिटिजात जनुम जल । फै तारागन ठगनः लुकत प्रगटत ससि अविकाने ।। कै कालिन्दी, नीर तरग जितो उपजायत । तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों घावत ।। - -- क , , - ८० साहित्य-सुपमा के बहुत रजत चकई चलउ कै फुहार जल उच्छरत । कै निसिपतिमल्ल अनेक विधिउठिबैठत कसरत करत॥७॥ कूजत ,कहु कलहस-, कह ,मजत पारावत ।" कहु कारडव उठत कर जल कुक्कुट, धावते ।। चक्रवाक, कहु वसत, फिर धक ध्यान लगावत । सुक,पिक जल कहु पियत कडू, भ्रमरावलि गावत ॥ कहुं तट पर नाचत मोर बहू रोर विविध पच्छी करत! जलपानन्हान करिसुख भरे तट सोमासब जिय,धरत ॥८॥ कडू वालुका विमल सकल कोमल बहु छाई ।। । उजल झलकत रजत सिढी मनु सरस सुहाई ।। पिय: - के आगम हेत पांवडे. मनहुँ विछाये । रन्न रासि करि चूर कूल में मनु बगराये ॥ मनु मुक्त मांग सोभित भरी, श्याम नीर चिकुरन परसि। सत गुन छायो के तीर में, चननिवासलखि हिय हरसि॥॥ १ 'पण्डित श्रीधर पाठक रचित । हिमालय। उत्तर दिशि "नगराज' अटल छवि सहित विराजत । लसत श्वेत सिर मुकुट झलक हिम शोभा भ्राजत ॥ वदेन देश सनिशेष कनक प्राभा आभासत । श्रधर भाग की श्याम बरन छवि हृदय हुलासत ।। श्वेत पीत सँग श्याम धार अनुगत सम अन्तर। सोहत त्रिगुन त्रिदेव त्रिजग प्रतिभास निरतर । ' विलसत सो तिहुँकाल त्रिविध सुठि रेख अनूपम । भारतवर्ष विशाल भाग भूपित त्रिपुण्ड सम ॥
,
हिमालय।
८P
उज्जल ऊँचे सिपर दूर देशन लो चमकत ।
परत मानु नव किरन प्रात सुधरन सम दमकत ॥
लता पुहुप धन राजि सदा ऋतुराज सुहावत ।
ही भरी डहडही वृक्षमाला मन भापत ॥
कोकिल पीर कदम्ब अम्य चढि गान सुनावत ।
स्यामा चारु सुगीत मधुर सुर पुनि पुनि गाधत ॥
कहुँ हारीत फपोत कहूं मैना लखि परियत ।
कहुँ कहुँ मेचरवर चकोर के दरसन फरियत ॥
देवदार की डार कार लगूर हिलायत
फहुँ मर्कट को फटक वेग सौ तर तर धावत ।
विकमित नित नव कुमुम तरुन तरु मुकुलित यौरत।
अलवेले अलि वृन्द कलिन के ढिग ढिग झोरत ॥
झरना जहँ तह झरत करत कल छर छर जल रब ।
पियत जीव सो अम्बु अमृत उपमा हिम सम्भर ॥
पवन सीत अति सुपत घुझावत बहु निधि तापा।
चादर दरमत, परसत, परमत, आपहि श्रापा ॥
गंगा गौमुग्व ,नवत कहे को सोभा ताकी ।
चरने जन्मस्थली, वकि अथवा जमुना की ।
सतलज व्यास चिनाच प्रभृति पजाब पचजल ।
सरयू नादि। अनेकन नदियन को निसरन थल ॥
पृष्ठ भाग रमनीक, रचिर राजत रावण हद ।
ग्रहन करत निज देह, सिन्धु अरु ब्रह्मपुत्र नद ॥
हरिद्वार केदार बदरिकाशम भी शोभा ।
लखि ऐसो को मनुज जासु मा कनहुँ न लोभा ॥
पुनि देखिय कसमीर देस नेपाल तराई ।
सिकम और भूदान राज्य प्रासाम लगाई॥
।
साहित्य-सुषमा।
दन्छिनभुज अफगान राज मस्तक सौ भटत !
याम वाहु से घरमा के कच भार समेटत ।
ज्यों समर्थ बलवान सुभावहिं सो, उदार मन ।
देत अभय, वरदान, मानयुते निज आश्रित गन है
आर्यावर्त पुनीत ललकि हिय भरि प्रालिंगत ।
गगा जमुना अथु प्रेम प्रगटत हृदयंगत ।।
अगनित पर्वत खंड चहूँ दिशि देत दिखाई।
सिर परसत आकाश चरन पाताल छुभाई ।
सोहत सुन्दर खेत पांति तर ऊपर छाई ।
मानहु विधि' पट हरित स्वर्ग सोपान बिछाई
गहरे गहरे गर्त बडू - दीरघ गहराई ।
शब्द करत 'ही घोर प्रतिध्वनि देइ सुनाई।
तहाँ निपट निःशंक वन्य पशु सुख सो विचरत ।
करत फेलि कल्लोल मुदित श्रानन्दित विहरत ।
कहुँ इधन की ढेर सिद्ध श्रावास जनावत ।
कहूँ समाधिस्थित जोगी की गुहा सुहावत ।
विविध विलन्छन दृश्य सृष्टि सुखमा सुख मडल..'
नन्दनवन अनुरूप भूमि अभिनय · रगस्थल ।
प्रकृति परम चातुर्य अनूपम अचरज श्रालय ।
'श्रीधर दूग छकिरहत श्रटल छविनिरखि हिमालय
काश्मीर वर्णन।
धनि धनि श्री काश्मीर-धरनि मनहरनि सुहावनी ।
धनि कश्यप-जस धुजा, विश्वमोहिनि मनभावनि ।
धन्य भार्य-कुल-धर्म-पर्म-प्राचीन-पाठ-बल !
धन्य सारदा-सपनि श्रवनि, त्रैलोक्य-पुन्य फल ।'
काश्मीर वर्णन
धन्य पुरातन, प्रथित धाम, अभिराम अतुल-छवि ।
स्वर्ग-सहोदरि धरनि, घरनि हारे कोविद कवि ॥
*
*
मकृति यहाँ एकान्त पैठि निज रूप सधारति ।
पल पल पलटति भेस छनिक छवि छिन छिन धारति
विमल अम्बु सर मुकुरन महं मुख विम्ब निहारति ।
अपनी छवि पै मोहि श्रापही तन मन धारति ॥
सजति, सजावति, सरसति, हरसति, दरसति प्यारी।
यहुरि सराहति भाग पाय सुठि चित्तरसारी ।
विहरति विविध पिलास-भरी जोवन के मदसनि ।
ललकति,किलकति,पुलकति, निरखति थिरकतिवनिठनि।
मधुर मजु छवि पुज छटा छिरकति धन कुजन ।
सितवति, रिझवति,इसति,डसति,मुसिफ्याति,हरतिमन॥
यह मुरूप सिंगार रूप धरि धरि बहु भांतिन ।
सर, सरिता, गिरि, शिसर,गगन,गह्वर, तश्वर, तृन ॥
पूरन करिवे काज थाहना अपने मन की ।
किंकरता -करि रह्यो प्रकृति-पंकज-चरनन की ।
*
चहुँदिसि हिमगिरि-सियर,हीर-मनिमौलि अवलि मनु।
सरत सरित सित-धार, द्रचत सोइ चन्द्रहार जनु ॥
फल फूलन छवि छटा छई जो धन उपवन की।
उदित भई मनु अवनि-उरसों निधि रतनन की ।
तुहिन सिसर,सरिता,सर,निपिनन की मिलि सोछथि।
छई मडलाकार, रही चारहुँ दिसि यो फवि ॥
। मानहु मनिमय मौलि माल प्रारुति अलबेली ।
साहित्य-सुषमा।
यांधि विधि अनमोल गोल भारत सिर सेली।।
*
सुरपुर अरु कश्मीर दोउन में को है सुन्दर ।
को सोभा को, भौन रूप की कौन समुन्दर
काको उपमा उचित दैन "दोउन में काकी ।
याको सुर पुर की अथवा सुरपुर की याकी, ?
याको उपमा थाही की मोहि देत सुहावै ।
या सम दूजी ठौर, सृष्टि, में दृष्टि न श्रावै ॥
यही स्वर्ग सुरलोक, यही सुरकानन सुन्दर ।
यहिं अमरन को प्रोक, यहीं कहुँ बसत पुरन्दर ।
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सो श्रीधर-दूग बसी प्रेम-अम्बुद-रस देनी ।
पुन्य अवनि सुख सवनि, अलौकिक सोसासनी ।।
पैसु यथारथ महिमा नहिं मोहि शक्ति घसानन ।
सहसा नहिं कही सकहि एकहिं सहसन सहसानन ॥
कचिगन की कल्पना-कल्पतरु
मुनियन ,कौं तपधाम, ब्रह्म प्रानन्द ऐनु सी ॥
सिकन फौं रसथान, प्रान, सर्वस, जीवन, धन ।
प्रकृति प्रेमिनी कौं' सुकेलि क्रीडा-कलोल-वन ।
( काश्मीर-सुपमा से) पद्मकोट, प्रयाग।
काम धेनु । सी।
कर्मबीर । । पं. अयोध्या सिंह उपाध्याय रचित । कर्मवीर । ('पद्य प्रमोद से) (पर्टी पद 1) देखफर जो विघ्न-बाधाओं को धवराते नहीं। भाग पर रह फरके जो पीछे हैं पछताते नहीं। फाम कितना ही कठिन हो पर जो उकताते नहीं भीड पडने पर भी जो चंचल हैं दिखलाते नहीं॥ होते हैं यक श्रान में उनके बुरे दिन भी भले । सब जगह सब काल में रहते हैं वे फुले फले ॥१॥ श्राज जो करना है कर देते हैं उसको नाज ही। सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही। मानते जी की हैं सुनते हैं सदा सवफी कही। । जो मदद करते हैं अपनी इस जगह में श्राप ही। भूल कर वे दूसरे को मुँह कमी तफते नहीं। कौन पेसा काम है चेकर जिसे सकते नहीं ॥२॥ जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं। 'काम करने की जगह घात बनाते हैं नहीं। आज फल करते हुए' जो दिन गंवाते हैं नहीं। यस्न फरने में फभी जो जी चुराते हैं नहीं। यात है यह कौन जो होती नहीं उनके किये। वे नमूना श्राप बन जाते हैं औरों के लिये ॥३॥ गगन को छूते हुए दुर्गम पहाडॉ फे शिखर । चे घने जगल जहाँ रहता है तम आठो पहर । गर्जते जल गसि की उठती हुई ची लहर। माग फी भयदायिनी फैली दिशाओं में लवर -- साहित्य-सुषमा । ये पा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं। भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ॥४॥ चिलचिलाती धूप को जो चांदनी देवें बना। काम पड़ने पर करें जो शेर का भी सामना । हँसते हँसते जो चया लेते हैं लोहे का चना । "है कठिनकुछ भीनहीं जिनके है जी में यह ठना कोस कितने चले पर चेकमी थकते नहीं। कौन सी हैगांठ जिसको खोल चे सकते नहीं ॥५॥ जीकरी को वे बना देते हैं सोने की डली।। रेग को करके दिखा देते हैं वे सुन्दर खत्री । के बवूलों में लगा देते हैं चपे की कली। काक को भी वे सिखा देते हैं कोकिल-काकली ! कसरों में हैं खिला देते अनूठे वे कमल । । वे लगा देते हैं उकठे काठ में भी फल फल ॥ ६ ॥ 'झाम को प्रारभ करके यो नहीं जो छोडते । सामना करके नहीं जो भूल कर मुंह मोड़ते । 'गगन के फूल वातो से वृथा नहीं तोडते । सपदा मन से करोडो की नहीं जो जोड़ते। न गया हीरा उन्हीं के हाथ से है कारवन । काँच को करके दिखा देते हैं वे उज्वल रतन ॥७॥ वितों को काटकर सडक बना देते हैं वे। सैकडो मरुभूमि में नदियाँ - यहा देते हैं वे । रगम जल निधि-गर्म में बेडा चला देते हैं । जगलों में भी महा-भगल रचा देते हैं । द नम तल का उन्होंने है बहुत बतला दिया।' है उन्होंने ही निकालीतार की सारी किया। + .
भोर का उठता। - --- कार्य-चल को घे कभी नहिं पूछते"यह है कहाँगा कर दिखाते हैं असभव को यही सभर यहाँ। उलझने श्राकर उन्हें पडती हैं जितनी ही जहाँ । वे दिखाते हैं नया उत्साह उतना ही वहाँ । डाल देते हैं - विरोधो सैकडों ही अडचले। वे जगह से काम अपना ठीक करके ही टलें ॥६॥ जो रुकावट डाल कर होवे कोई पर्वत खडा ।. तो उसे देते हैं अपनी युक्तियों से वे उडा ॥ बीच में पडकर जलधि जो काम देवे गडबडा। तो यना देंगे उसे वे क्षुद्र पानी का घडा-॥ बन बँगालेंगे करेंगे व्योम में- बाजीगरी। कुछ अजय धुन काम के करने की उनमें है मरी॥१०॥ सब तरह से आज जितने देश हे फूल फले। -घुद्धि, विद्या, धन, विभव के हैं जहां डेरे डले ॥ वे बनाने से उन्हीं के बन गये इतने भले । वे सभी हैं- हाथ से ऐसे सपूतों क पले ॥ लोग जर ऐसे समय पाकर जनम लेंगे कभी। देश की श्री जाति की होगी भलाई भी तभी ॥ ११ ॥ मोर का उठना ।। ( पद ) भोर का उठना है उपकारी। जिीरन तरु जिससे पाता है हरियाली अति प्यारी। पा अनुपम पानिप तन धनता है यल-सचय-कारी । पुलकित,कुसुमित, सुरभित होजाती है जन-उर क्यारी, लालिमा ज्यो नम में छाती है। त्यो झी एक अनूठी धारा अवनी पर आती है। A
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'साहित्य-सुषमा।
परम-रुचिरता-सहित सुधा-बूंदों सी यरसाती है।
'रसमय,मुदमय,मधुर, खरों-मय सब दिशा-बनाती हैं।
तृण, वीरुध तरु, लता, वेलि को प्रतिपल पुलकाती है।
वन उपवन में रुचिर मनोहर कुसुम-वय खिलाती है ।
प्रान्तर-नगर प्राम-गृह-पुर में सजीवता लाती है।
उमग उरों तन पुलक जोति नव द्वग में उपजाती है ।
सदा भोर उठने वालों की यह प्यारी थाती है।
यह न्यारी निधि 'बड़े भाग वाली जनता पाती है ।
प्रात की किरने कोमल प्यारी।
जहाँतहीं फलती तरु तरु पर दिखलाती छबि न्यारी ।
जब भालोकित करती हैं अवनी कर प्रकृति संवारी।
तब युग नयन देख पाते हैं देव-कुसुम कल क्यारी:
जीवन लहर जगमगा जाती है पा दुति रुचकारी।
उर नव विभावान बनता है जैसे रजनि दिवारी ।
मात-पवन है परम निराली।
तन निरोग करने वाली औषध उसमें है डाली।
उसकी अति रुचिकर शीतलता चाल मृदुलता ढाली।
कुसुम कली लौं है जी की भी कली खिलाने वाली है
होती है जनता मलयानिल सौरभ से मतवाली।
किन्तु सामने यह रख देती है फूलों की डाली।
प्रात-पवन ही से मिलती है प्रीतिकरी मुखलाली।
'उसके सेवन से यढती है जीवन-तर हरियालो ।
। प्रात उठने में कभी न चूको ।
'अभिनव-किरण-जाल प्रारजित नित अवलोको भू को र
दूध फेन-सम सुफुसुम कोमल तल्प है परमं प्यारा।
किन्तु कहाँ उससे सुपकर या मालिक धारा
- श्रांख का प्राँस् । पात समय की सहज नोंद है बहु विनोदिनी 'मीठी । किन्तु पास है पात-पयन के अति पियता की चीठी ।। करो निछावर बालस को उस परकर पुलकित छाती। 'पात अटल से जो सजीवता है धमनी में पानी ॥ काम काज की विविध असुविधाजीवन की बहु बाधा। एक पात उठने ही से कम हो जाती है आधा ॥ वालक युवा सभी पाते हैं उससे सदा सफलता । सबके लिये पात का उठना है अमृत फल फलता । आंख का आंसू । [ चतुष्पद श्रांख का श्रासू ढलकता देख कर । जी तडप करके हमारा रह गया। क्या गयामोती किसी का है विखर। या हुश्रा पैदा रतन कोई नया ॥१॥ श्रोस फी यूदै कमल से हैं कीं। या उगलती यूद हैं दो मछलिया । या अनूठी गोलियां चादी मढी । खेलती हैं संजनों को लडकियां ॥ या जिगरपरजो फफोला था पड़ा। । फूट करके वह अचानक यह गया। हाय! था शरमान जो इतन घडा। आज वह कुछदयन कर रह गया ॥३॥ पूछते हो तो कहो मैं क्या कह । या किसी फा है निरालापन गया । दर्द से मेरे कलेजे का लह । देसता हूँ आज पानी बन गया ४ २ 6 - ॥ , ६० , साहित्य-सुपमा! - - प्यास थी इस आँखको जिसकी बनी। वह नहीं इसको सका कोई पिला। प्यास जिससे हो गई है सोगुनी । वाह ! क्या अच्छा इसे पानी मिला ॥ ५ ॥ ठीक कर लो जांच लोधोखा न हो। वह सकते हैं मकर करना इसे ॥ आंख के अांसू निकल करके कहो। चाहते हो प्यारे जतलाना किसे ॥६॥ प्राख के पास समझ लो बात यह । श्रान पर अपनी रहोतुम मत अडे । क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह। जव कि दिल में से निकल तुम योपडे। हो गया कैसा निराला यह सितम । भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया । यो किसी का हैं नहीं खोते भरम । पासुओं ! तुमने कहोयह क्या किया ॥ ८॥ झांकता फिरता है कोई क्यों कुत्रा। हैं फसे इस रोग छोटे बडे॥ है इसी दिल से तो वह पैदा हुआ। क्यों न आँसूका असर दिल पर पडे ॥ ६ ॥ रंग क्यो इतना निराला कर लिया। है नहीं अच्छा तुम्हारा ढग यह ॥ आसुओं जव छोड तुमने दिल दिया। किस लिये करते होफिर दिल में जगह॥१०॥ बात अपनी ही सुनाता है सभी। पर छिपाये भेद छिपता है कहीं। र , , 7 7 ।
आंख का श्रीसू।
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जव किसी की दिल पसीजेगा कमी।
आँख से आँसू कढेगा l नहीं ॥ ११ ॥
श्रांख के परदों से जो छनकर पहे।
मैल थोडा भी रहा जिसमें नहीं।
बूंद जिसको आँख टपकती रहे।
दिल जलों को चाहिये पानी वही ॥ १२ ॥
हम कहेंगे क्या 'कहेगा यह समी।
। आँख के प्रासू न ये होते अगर ॥
बावले हम हो गये होते कभी।
सैकडो टुकडे हुश्रा होता जिगर ॥ १३ ॥
है सगों पर रज का इतना असर ।
जव कडे सदमे कलेजे ने सहे ॥
सब तरह का भेद अपना भूल कर ।
आँख के भासू लह बन कर बहे ॥ १४ ॥
क्ता सुनायेंगे भला श्रप भी खरी ।
रो पडे हम पत तुम्हारी रह गई।
पैठ थी जी में यदुत दिन से भरी।।
श्राज यह इन -नांसुओं में यह गई ॥१५॥
धात चलते चल पडा आसू. थमा।
मुल पडे बडी सुनाई रो दिया ।
आज तक जो मैल था जी में जमा ।-
इन हमारे आसुत्रों ने धो दिया ॥१६॥
क्या हुभा अधेर ऐसा है कहीं।
सब गया कुछ भी नहीं अपरह गया।
टूडते हैं पर हमें मिलता नहीं।
श्राओं में दिल हमारा यह गया ॥ १७ ॥
। 1 साहित्य सुषमा लाल श्राख की, बहुत विगडे धने । फिर उठाई दौड कर अपनी छडी। बैसे ही अब भी रहे हम तो तने। श्राख से यह वूद कैसी ढल पडी । ३१ ॥ बूंद गिरते देख कर यो मत कहो। श्राप तेरी गड गई या लड गई ।। जो समझते हो नहीं तो चुप रहो। ९ फकरी इस प्राख में है पड गई ॥३२॥ है यहां कोई नहीं धुना किये । लग गई मिरचं न सरदी है हुई । इस तरह आँसू भर पाये किसलिये। आँख में उढी हवा क्या लग गई १॥३३॥ देख करके और का होते भला। आंख जोविन श्रागही यो जल मरे।। दूर से आंसू 'उमड कर तो चला। पर उसे कैसे भला उढा करे ॥३४॥ पाप करते हैं न उरते हैं कभी। चोट इस दिल ने अभी खाई नहीं । सोच कर अपनी बुरी करनी सभी। यह हमारी प्रास भर श्राई नहीं ॥ ३५॥ है हमारे औगुनों की भी न हद । हाय गरदनभी उधर फिरतीनहीं। देख करके दूसरों का दुख दरद । प्राख से दो यूद भी गिरती नहीं ॥ ३६॥ किस तरह का वह कलेजा है बना। जो फिसी के रंज से हिलता नहीं । - J ।
. प्रेम मंत्र। . आंख से श्रासू छना तो क्या छना। दर्द का जिसमें पता मिलता नहीं ॥ ३७ यह कलेजा हो कई टुकडे अभी। नाम सुनकर जो पिघल जाता नहीं। फूट जाये श्राख वह जिसमें कमी। "प्रेम का श्रासू उमड आता नहीं ॥ ३८॥ पाप में होता है सारा दिन बसर। सोच कर यह जी उमड़ पातानहीं है आज भी रोते नहीं हम फूट कर। आसुओं का तार लग जाता नहीं ॥३६॥ चू वनावर की तनक जिनमें न हो। चाह की छीटें नहीं जिन पर पडी। . प्रेम के उन श्रासुओं से हे प्रभो! यह हमारी श्राख तो भीगी नहीं ॥ ४०॥ लाला भगवानदीन रचित । (मम मंत्रा'मनोरंजन' से) चढ पहाट पर यही पुकारो, मैदानों में यही उचारी । "घृणा द्वेप सब दूर धरेंगे, सवसे मिल मिल प्रेम करेंगे।" प्रेम फौज का साज सजा कर, प्रेम दुदुभी मधुर बजाकर । सहमत हो सब काम करेंगे, भारत में श्रानन्द भरेंगे। दिन में निशि में सभी समय में, मस्तक में और मृदुल हदय में। यह विचार मित्रों के भरना, "पारस्परिक द्वेष परि हरहा " "पभाव में आग लगाकर, झूठ और अन्याय भगाकर ।। "सव पर प्रेम वारि ढारेंगे, भारत के सुकार्य सारेंगे, । " ६६ साहित्य-सुषमा। जल में थल में और पवन में, हिन्दूगण में और यवन मैं । फैला दो विचार शुभ ऐसा, "हम में तुम में अन्तर कैसा?" "भाई है घर एक हमारा, भाई बन कर करो गुजारा।" तब सबके सब काम करेंगे, भारत में सुख चैन भरेंगे। लोम क्रोध को मार भगाओ, वैर बाद ये आग लगाओ। प्रेम राज्य जग में फैलायो, प्रेम प्रेम की धूम मचानो । भारत का जो भला विचारो, यह सिद्धान्त हृदय में धारो॥ "प्रेम मन जिसने, मन धारा, उसने विजय किया जग सारा' प्रेम रज्जु सिंहां को बाधे, प्रेम मन्त्र सब कारज साधे। प्रेम आँच पत्थर पिघलावे, प्रेम वायु ब्रह्माड हिलावे । प्रेम-चोट हीरे को फोडे, प्रेम-गोद दृटे को जोडे ।। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, चखो परस्पर प्रेम मिठाई। - , पण्डित रामचरित उपाध्याय कृत । ' बन्धु विलाप ( 'रामचरित चिन्तामणि' से) लक्ष्मण गिरे धन-नाद की जब शक्ति पा उर में लगी, रोके रुकी रण में न तय भयभीत कपि-सेना भगी। अति-दीन मुख गत चेत लक्ष्मण को लखाजन राम ने, होकर विफल करने लगे रोदन सभी के साम्हने ।।३।। धोखा न दो भैया ! मुझे इस भाति श्राकर के यहा, । । मझधार में मुझको बहा कर तात ! जाते हो कहा। जाने न पाचागे, नहीं मारा गया अरि-दल अभी, तुमको न करना चाहिये है अग! मुझने छल कभी ॥२॥ मैया तुम्हीं यदि चलि बसोगे, मैं करूंगा क्या यहा? में भी चलूगा साथ में तुम तात | शायोगे जहाँ ।
शिवसिंहसरोज
एक सहस्र कवियों का जीवनचरित्र
PPA
দেন।
भ्व० ठाकुर शिवसिंहजी सेगर
काँधा, जिला उन्नाव
,
प्रकाशक
मालकिशोर-मेम: लग्वनऊ.
-
सन् १९२६६०
"
. साहित्य-सुषमा जल में थल में और पवन में, हिन्दूगण में और यवन में। फैला दो विचार शुभ ऐसा, "हम में तुम में अन्तर कैसा?" "भाई है घर एक हमारा, भाई बन कर करो गुजारा।" तब सबके सब काम करेंगे, भारत में सुख चैन भरेंगे। लोभ क्रोध को मार भगाश्रो, और बाद ये आग लगाओ ॥ प्रेम राज्य ,जग में फैलाश्रो, प्रेम प्रेम की धूम मचाओ । भारत का जो भला विचारो, यह सिद्धान्त हृदय में धारो॥ "प्रेम मन जिसने मन धारा, उसने विजय किया जग सारा' प्रेम रज्जु सिंहां को, वाघ, प्रेम मन्त्र सब कारज साधे ।। प्रेम पाँच पत्थर पिघलावे, प्रेम वायु ब्रह्माड हिलावे। प्रेम-चोट हीरे को फोडे, प्रेम-गोंद टूटे को जोडे । हिन्दू, मुसलमान, · ईसाई, चखो परस्पर प्रेम मिठाई । . . . पण्डित रामचरित उपाध्याय कृत । . वन्धु विलाप ( 'रामचरित चिन्तामणि' से) लक्ष्मण गिरे घन नाद की जय-शक्ति श्रा उरम लगी, रोके रुकी रण में न तब भयभीत कपि सेना भगी। अति-दीन मुख गत-चेत लक्ष्मण को लखाजन राम ने, होकर विकल करने लगे रोदन सभी के साम्हने ॥२॥ धोखा न दो भेया! मुझे इस भाति श्राकर के यहा। 1 मझधार में मुझको बहा कर तात ! जाते हो कहाँ। जाने न पापागे, नहीं मारा गया अरि दल अभी, तुमको न करना चाहिये हे अग! मुझसे छल कभी ॥२॥ तुम्हीं यदि चलि घसोगे, मैं करूंगा क्या यहा? चलूगा साथ में तुम तात! सानोगे जहा । - १७ । बन्धु-विलाप। अव जानकी की जान भी वचन न पावेगी कभी, श्रर हा! अयोध्या दराने में भी न प्रावगी कभी ॥ ३ ॥ यदि जानकी सी नायिका मिल जाय तो अचरज नहीं, साकेत' से कुछ कम न है अमरावती की भी मही । पर हाय ! अनुगामी अनुज तुमसा मिलेगा अब कहाँ, सोना सुगन्धित सोजने पर भी मिलेगा कव कहाँ ? ॥ ४॥ सौमित्र ! तुम सब काम में मुझमे सदा पीछे रहे, मेरे लिये क्या क्या न तुमने हद्विदारक दुख सहे ? । पर अग्रगामी श्राज क्यों चनने लगे हा चोल दो, देयो तनिफ मेरी दशा को शीघ्र अखि खोल दो ॥ ५ ॥ जिस रीति से पाए जगत में बस उसी क्रम से चला, शोकान्धि में में गिरा, मत इस समय मुझकोछला । कुछ काल तक ठहरो अभी आगे चलूगा में वहां, मुझको यहां पर छोड तुम हो चाहते जाना जहाँ ॥ ६॥ तुम हाथ मेरा छोडते हो साथ देगा कौन अन ? क्या रुष्ट हो मुझसे ? कहो कैसे हुए मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण कैसे हो सकेगी अब यहा, तुम भी रहोगे जो नहीं, में क्या कहा तर यहा ॥ ७॥ निज कम को प्रिय धर्म को भी छोड दूंगा मैं अभी, परिवार से ससार से मुख मोड दूंगा में अभी। । पर स्वप्न में भी एक पल तुमको न छोडूंगा कभी, 'तुमसे रहित हो शत्रुओं से कर न जोडूंगा कभी ॥ ८॥ मेरे करों से क्षीर पी कर, तिल विमिथित नीर क्या- हा वन्धु ! पीना चाहते हो ? हो गये वेपीर त्यो पहले चिता में मैं गिरूंगा गोद में ले कर तुम्हें ॥ जानित रहूंगा हाय ! कैसे काल को देकर तुम्हें ॥६॥ मोन पर। . A
१
साहित्य सुषमा।
अन्तिम क्रिया मैंने पिता की की नहीं, की गिद्ध की,
उपकार के सत्कार में उसको मिली गति सिद्ध की।
इस हेतु क्या विधि रुष्टाहोकर मारने तुमको चला
चलने न पावेगी अनुज पर एक भी उसकी कला ४१
तुमको मिटाने के प्रथम विधि, श्राप ही मिट जायगा,
यमराज भी निज राज से बस आज ही हट जायगा।
कैसे तुम्हारा लय प्रलय श्राए बिना हो जायगा,
खोना पडेगा तव तुम्हें ससार जव-खो जायगा ॥११-
सीता गई तुम भी चले, मैं भी न जीऊंगा कभी,
सुग्रीव को भी साथ ले घर जायंगे बन्दर सभी।
पर हाय! भैया यह विभीषण -भक्त जावेगा कहां?
मेरे लिये हो कर अकिंचन ठौर पावेगा कहा ? ॥१२॥
सीता-हरण मेरा भरण सुन कैकयी होवे सुखी,
+ पर शेप मातायें भला कैसे न हॉवेगी दुखी।
किस दुर्दशा को प्राप्त होगी वे, कहो कुछ ध्यान है ?
क्यों बोलते कुछ हो नहीं, मैं कौन है. कुछ ज्ञान
मैं सब अनर्थों का जनक माता हृदय, का शूल हूँ।
रघुवंश का अगार हूँ सर विग्रहों का मूल है।
मानो मही पर हो गया मेरा अपरिमित भार है,
मुझसे अभागे का सदा शिकार है धिकार है ॥१४॥
बन में तुम्हें खो कर अयोध्या में न जाऊंगा कभी,
जा कर वहा केसे किसी को मुख दिखाऊँगा कमी।
स्वर में पिता से क्या हंगा, यदि चलूगा में वहा,
मैं क्या फल से मलं, वालो अनुज जाऊँ कहां 2011
धनहीन हो, जनहरीन हा स्त्रीहीन हो जीता रहा,
वह कौन ऐसा दु.स है मुझ पर न जो चीता रहा ।
?
॥१३॥
सबने। - । केवल तुम्हारा पल रहा विधि ने उसे भी ले लिया, निज कुल, विनाशक हो श्रनुजक्या पापथा मैंने किया ॥१६॥ मेरे सहायक वन अनुज ! मन में स्वयं आए रहे, मेरे लिए ही हा वृथा तुमने अनेको दुख सहे। मुझको अकेला छोड कर क्यों भागते हो श्रव कहो। मैंने तुम्हारा साथ छोडा था कहा पर कय कहो ॥१७॥ यदि मेंट होगी जानकी से या सुमित्रा से कहीं। तो क्या कहूंगा में तनिक उठ कर बताओ तो सही। यदि तुम नहीं तो कुछ नहीं मेरा रहा संसार में, सर्वख मेरा नए हो कर मिल गया अब छार में ॥१८॥ संजीवनी लाने गया हनुमान भी पाया नहीं, मारा गया यह, या उसे उसने अभी पाया नहीं। होते सवेरा -फूच डेरा आपका हो जायगा, सक्ष्मण! शमन तब केकयो केताप का हो जायगा ॥१६॥ इसी बीच में वायु के पुत्र प्राये, हुई युक्ति सौमित्र ने प्राण पाये। मिले वन्धु दोनों, टला शोक भारी विधे! वन्ध है लोक-लीला तुम्हारी ॥२०॥ जन । ( 'सूक्तिमुपावली से) ऊँच नीच दोनों में, सजन कुछ भी न भेद रसता है । फल सुगन्धित करता है देखो युग्म हाथों को ॥१॥ यद्यपि निष्फल तोभी,सजन खल कासहाय करता। क्या फल है ऊपर से, मेघ यहा मी यरसाता है ॥२॥ मइट में मी सजन, स्वभाव अपना कमी नहीं तज्ञता । मर्थ-प्रसित सुधाकर सुखफर होता कुमुद-पन को ॥३॥ ग है साहित्य सुपमा। १०० - सजन जो कहता है, चाहे कुछ हो न फिर पलटता है। ४ दात निकल करिवर के,भीतरक्याफिर कभीजाते हैं.११॥४॥ दुख सहकर भीसजन,पर-दुख को वह नदेख सकता है। श्रातप सहकर भी नरु, छाया देता पयिक-जन को॥५॥ अति दुख में भी सजन नहीं करेगा कभी बुरे कर्म । । छांछ नहीं छूता है, हस भले ही मरे भूखों ॥ ६ ॥ सजन ही पर क्या, अच्छी चीजें बहुत नहीं होती। मोती कहीं कहीं है, सीप सभी ठौर मिलता है ॥७॥ पारस-सम पारस है, कल्पद्रुम के समान कल्पद्रुम। । सुरभी सम सुरभी है, सजन ही तुल्य सजन के ॥ ८॥ चन्दन और सज्जन की समता। दीन साधु क्या दे सकता है ? पर निज गुण से खुश करता है। चन्दन नहो खिलाता फलं को, किन्तु चाह उसकी भूतल को ॥१॥ यद्यपि दुर्जन दुरा देता है, तो भी उसे साधु सेता है। चन्दन का विष देता विपधर, वह उसकारखता है उसपर ॥२॥ सजन पिस जाता है तो भी, पर-उपकार किया करता चन्दन घिस जाता है तो भी, निज श्रामोद दिया करता है॥३॥ नीच जाति भी हाकर सजन, निज गुण से गौरव पाता श्रहा काठ भी होकर चन्दन, ईश शीश पर चढ जाता है ॥४॥ पड़ जावे में मन्जन, तो भी उसमें गुण रहता है। श्रहि के संग राता है चन्दन, जन-सताप तदपि रहता मजन स्वार्थ नहीं रखता है, निज समान सबको कई म्पय सुगन्धित होकर चन्दन, अपने सम कर देता करता हुआ शत्रु सम्मानित, मुख स हा दुमा धूम पामोदिन-पायक का, चन्दन है # कुसङ्ग
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माता का पुत्र को उपदेश ।
अपने प्राणों को भी देकर, पर दुख को मजन हरता है
चन्दन भी ज्या कट जाने पर ततों को शीतल, करता है ॥ ८ ॥
माता का पुत्र को उपदेश ।
पुत्र ! साथ तेरे रहती है, तेरे हित में चित धरती है। ।
इस कारण जो कुछ करती है, सुनकर उसे हदय में धरना॥
रात नहीं हे श्रव उठ वेठो, श्रालस से निज देह न ऐठों ।
सत्य सुधार सिन्धु में पेठो, पुत्र चित्त में जरा न डरना ॥२॥
रहे नहीं चे पिता तुम्हारे, चेत करो नैनों के तारे।
दोगे जो तुम भी न सहारे, बेटा ! मेरा कठिन उबरना ॥३॥
सकट में भी कभी न रोना, धर्म कर्म से विमुख न होना ।
जग जाने पर कभी न साना, पुत्र प्रथम हरिनाम सुमिरना ॥४॥
पर से अपनादुम्ब न कहना,गुरुजन की बात तुम.सहना ।
समरिम वन करनित रहना, इधर उधरसुतोवृथान फिरना ॥५॥
साहस, शक्ति,धीरता, उद्यम,सीखो ये गुण करो पराक्रम ।
ईश सहायक होगा हरदम, बालस नद में भूल न गिरना ॥६॥
शिनि, दधीचि, कर्णादि कहानी, सुनकर सीखो नीतिपुरानी।
चनना कभीन सुत अभिमानी, परहित से तुम कभी नमुडना॥॥
जवतक तुम पयपान करोंगे, नित नीरोग-शरीर रहागे।
फूलोगे नित नये फलांगे, पुत्र ! कभी भदपान न करना ॥ ८॥
भीख मांगना एकदम छोडो, दोसवृत्ति से भी मुस मोडो।
सरके साथ, अपनपो जोडो, पढो पुत्र शुभ उद्यम करना ॥६॥
जो कुछ कहदो हाथ उठाकर उससे कमी हटोमत तिल भर ।
सभ्योरशिक्षितकहलाकर,उचित सदा प्रण-पालन करना ॥१०॥
पर दुख को अपना दुख मानो, देश-मान,को अपना जानो।
पुत्र! वृथा ही हठमत ठानो,सीखोतुम पर-दुख को हरना ॥११॥
- . १०२ साहित्य-सुषमा। निज पूर्वज लोगों ने कैसे, काम किये, रहते थे कैसे। उचित तुम्हारा रहनावैसे,अनुचित बेटा ! उससे डरना १२५ वारय को जो धर्म समझते, पर को दुख देकर हैं हंसते । ईश्वर से भी तनिकन डरते, समझो उन्हें शीघ्र है मरना ॥१३॥ जो धोखा देने वाला हो, मुंह मीठा दिल का काला हो । सागर हो या नद नाला हो, उसके साथ कभी मत तरना ॥१४॥ कपटी, कुटिल, कुमति, कुलधालक हैं पर बनते हैं जगपालक । जो ऐसे हो, हे प्रिय चालक ! उनकी हाँ में हां मत करना ॥१५१ जहाँ न्याय का नाम नहीं है; पक्षपात की धार वही है। मेरा यह उपदेश सही है,' पुत्र वहाँ तू नहीं ठहरना ॥१६॥ - - जग में। श्रीयुत मैथिली शरण गुप्त रचित । स्वर्गीय संगीत । ( 'सरस्वती' से) नर हो, न निराश करो मन को। कुछ काम करो कुछ काम करो, । रह के कुछ नाम करो। यह जन्म हुश्रा किस अर्थ अहो, समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो। कुछ तो उपयुक्त करो तन को, नर हो, न निराश करो मन को॥१॥ संमलो कि सुयोग न जाय चला, का व्यर्थ हुआ सदुपाय मला' समझो जग कौन निरा सपना, “पथ श्राप प्रशस्त करो अपना। 4 .
करो।
स्वर्गीय सङ्गीत।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को,
नर हो, न निराश करो मन को ॥२॥
अल तुल्य निरन्तर शुद्ध रहो,
मचलानल ज्यों अनिरुद्ध रहो।
परनोपम् सत्कृति सील हो,
अवनीतलवद् धृतिशील रहो ।
कर लो नभ सा शुचि जीवन को,
नर हो न निराश करो मन'को ॥३॥
जय हैं तुम में सब तस्व यहाँ,
फिर जा सकता यह सस्व कहाँ ?
तुम स्वत्व सुधारस पान करो,
उठके अमरत्व विधान
दब-रूप रहो भव कानन को,
नर हो, न निराश करो मन को॥४॥
निज गौरय का नित झान रहे,
"हम भी कुछ हैं। यह ध्यान रहे।
सय जाय श्री, पर मान रहे,
मरणोत्तर गुखित गान रहे ।
कुछ हो, न तजो निज साधन को,
नर दोन निराश करो मन को ॥५॥
प्रमु
ने तुमको कर दान किये,
सब चाञ्छित घस्तु विधान किये।
तुम प्राप्त करो उनको , अहो,
फिर है किसका यह दोप कहो?
समझो न अलभ्य किसी धनको,
नर हो, न निराश करो मन को॥६॥
१०४. साहित्य-सुपमा। t - किस गौरख के तुम योग्य नहीं ? कर कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं' जन हो तुम भी. जगदीश्वर के, (सव हैं जिसके अपने घर के ) फिर दुर्लभ क्या उसके जन को?, नर हो, 'न निराश करो मन को॥७॥ करके विधिवाद न रोद करो। निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो। वनता घस उद्यम ही विधि है, मिलता जिससे सुख का निधि है। समझो धिक निष्क्रय जीवन को, नर हो न निराश करो मन को॥८॥ - -- रचित । - . श्रीयुत "सनेही" धीर नर। ('सरस्वती' से) पडे विपद पर विपद किन्तु पद पौछे नहीं हटाते हैं; 'अपना रोना कभी न रोते सोहस नहीं घटाते हैं। वन पडता है जहाँ तलक दोनों का दुख घटाते है; निज पौरप से समर भूमि में अरि को धुल चटाते हैं। वही धीर नर धरा धाम में घपल कीति नित पाते हैं॥१॥ अत्याचारी की गर्दन को झट मोड चे देते हैं, अन्यायी का मुस थप्पड से सदा मोड वे देते हैं। कोटि विघ्न या पडें कार्य निज नहीं छाड वे देते हैं, लास विफलताओं पर भी दिल नहीं तोड चे देते है। A + - + । धन विहङ्गम। १०५ धीर धुरन्धर वही वीर वर विश्व विदित हो जाते हैं ॥ २ ॥ मनुज केसरी इस भर-वन में भय-गज मार भगाते हैं,- पडे लोह पिंजडे में तो भी घास कदापि न खाते हैं। । दम में दम जय तक रहता है अपनी धान निभाने हैं, भ्वान समान दशन दिसला कर वे दुम नहीं हिलाते हैं। उनकी सूरत देख भीरु भय भूरि भरे थर्राते हें ॥३॥ चाल चले उनमें कोई .पया नहीं काल से डरते हैं शूरों की संसार-समर में सन्तत करणी करते हैं मार मार कर दुष्ट दलों को भार भूमि का हरते हैं। हो जाते हैं अमर जगत में कभी नहीं के मरते हैं। कीर्ति-कौमुदी से अपनी चे विमल चन्द्र बन जाते हैं। अटल सदा निज प्रण पर रहते करतेसत्पथ त्याग नहीं । अत्याचारी अधम जनों से उनको है अनुराग नहीं । नहीं चाहते हलुआ पूडी असन मिले पर साग नहीं | पर सतन्त्रता पर वे अपनी लगने देते दाग नहीं।' धृति धारण कर ध्रुव से धनते धीर वही कहलाते हैं ॥५॥ ॥ " . - । श्रीयुत रूपनारायण पाण्डेय रचित । -- । वन विहगम । ('प्रभा' से ) - धन बीच बसे थे, फंसे थे ममत्व में, एक कपोत कपोती कहीं। दिन रात न एक को दूसरा छोडता, ऐसे हिले मिले दोनों वहा । लगा नित्य नया नया नेह, नई नई कामना होती रही। कहने का प्रयोजन है इतना, उनके सुख की रही सीमा नहीं । चढने साहित्य सुपमा। हता था कबूतर मुग्ध सदा, श्रगुराग के राग में मस्त हुश्रा । करती थी कपाती कभी यदि मान,मनाताथा पासजाव्यस्त हुना। कुछ चाहाँ कबूतरी ने, उतना वह वैसे समस्त हुआ। इस भाति परस्पर पक्षियों में भी प्रतीति से प्रेम प्रशस्त हा (३) सुविशाल वनों में उडे, फिरते अबलोकते प्राकृत चित्र-छटा। कहीं शस्य येश्यामलखेत खडे, जिन्हें देख घटा काभीमानघटा। कहीं कोसों उजाड में झाड पडे, कहीं भाड़ में कोई पहाड सटा । कही कुंज, लता के वितान तने, सब फूलों का सौरम थासिमटान (४) झरने, झरने की कहाँ झनकार, फुहार को हार विचित्र ही था। हरियाली निराली,नमाली लगा, फिरभीसच ढगपवित्रहीं था। ऋषियों का तपोवन था,सुरभीकाजहा पर सिंह भी मित्रही था। बस,जान लो,सात्विक सुन्दरता,सुखसयुतशान्तिकाचित्रहीया . कहीं झील किनारे बडे बड ग्राम, गृहस्थ निवास बने हुए खपरैलों में कहु, करैलों की,येल के, खूब तनाव तने हुए थे। जल शीतल, अन जहा पर पाकर, पक्षी घरों में घने हुए थे सब ओर स्वदेश-स्वजाति-समाज-भलाई के ठान ठने हुए थे। , इस भांति निहारने लोक की लीला, प्रसन्न वे पक्षी फिर घर को। उन्हें देखते दूर ही से, मुख साल के,चच्चे चलें चट बाहर को । दुलराने, मिलाने-पिलाने से था अवकाश उन्हें न घडीभरको। कुछ ध्यान ही था न कबूतर को, कही काल बढा रहा है शरको 'वन-विहङ्गम। (७) दिन एक यडा ही मनोहर था, छवि छाई वसन्त की कानन में। सब ओर प्रसन्नता देख पडी, जड -चेतन के तन में, मन में निकले थे कपोत-कपोती कहीं, पडे झुंड में घूम रहे वन में पहुँचा यहाँघोसले पास शिकारी, शिकार की ताक में निर्जन में । (८) उस निर्दय ने उसी पेड के पास, विछा दियाजाल को कौशल से। यहाँ देख के अन्न के दाने पडे, चले वच्चे,अमित जो थे छल से। नहीं जानते थे, कि यहीं पर है कहीं, दुष्टो भिडा पडाभूतल से। मंस, फाँस के वास के बन्धन में, कर देगा हलाल हमें बल से जब बच्चे फंसे उस जाल में जा, तब घे धयडा उठे बन्धन में। इतने में कबूतरी आई वहाँ, दशा देख के म्याकुल हो मने में कहने लगी, "हाय हुआ यह क्या ! सुत मेरे हलाल हुए धन में ! अव जाल में जाके मिलू इनसे, सुख ही क्यारहा इस जीवन में!" (१०) उस जाल में जाके पहेलिये फे, ममता से कबूतरी आप गिरी। इतन में कपोत भी पाया यहां, उसघोसले में भी विपत्ति निरी लखते ही अंधेरा सा श्रागे हुश्रा, घटना कीघटायाहघोर चिरी। भयनों से अचानक चूद गिरे, चेहरे पर शोक की स्याही फिरी॥ (११) तब दीन कपोत बहे दुख से कहने लगा-"हा!अति कष्ट हुना। निचलों ही कोदेव भी मारता है"ये प्रवाद यहां पर स्पष्टश्राम सवसूना किया, चली छोड प्रिया, सपही विधि जीवन नष्ट हुना। इस माति अमागा अतृप्त ही, में,सुख भोगफे स्वर्ग से महुआ साहित्य सुपमा। प्राय कल कृजन केलि-कलोल में लिप्त हो, बच्चे मुझे जो सुखी करते। जय देखते दूर से श्राता मुझे, किलकारियाँ मोन से जो भरते॥ समुहाय के, धाय के, के पास, उठाय के पख नहीं ठरते। वही हाय ! हुए असहाय, अहो ! इस नीच के हाथ से हैं मरते।। (१३) गृह-लक्ष्मी नहीं,जोजगाए रहा करती थी सदासुख-कल्पना को। शिशुभी तो नहीं, जो उन्ही के लिये सहता इसदारुण वेदना को॥ वह सामने ही परिवार पडा पडा भोग रहा यमयानना को । "अव में ही वृथा इस जीवन कोरस कैसे सहूंगा बिडम्वना को (१४) यहासोचताथायोकपोत,वहा चिडीमारने मारनिशाना लिया। गिर, लोट गया धरती पर पक्षी, बहेलिये ने मन माना किया। पल में,कुल का कुल काल कराल ने 'भूत-भविष्य में भेज दिया। क्षणभंगुर जीवन की गति का यह एक निदर्शन है यढिया ॥ . - - हर एक मनुष्य फंसा जो ममत्व में, तत्त्व महत्त्व को भूलता है। उसके शिर पैं खुलासह सदा, बंधाधागे में धार से झूलता है। वह जाने विना विधि की गति को, अपनी ही गढन्त में फूलता है। पर अन्त को ऐसे अचानक अंन्तक अस्त्र अवश्य ही हूलता है। (१६) पर जो जन भोग के साथ ही योग के काम पवित्र क्रिया करता। परिवार से प्यार भी पूर्ण रखे, पर-पीर परन्तु सदा हरता॥ निजभावनभूलि के, भाषा न भूल के विन्न व्यथा को नहीं डरता। कतकत्य हुआ हँसते हँसते, वह सोच सकोच विना मरता।
बेटी की विदा। H (१७) प्रिय पाठक ! आपतोविज्ञही ह फिरापको क्या उपदेश करें। शिर पैशर ताने बहेलिया फाल सड़ा हुआ है, यह ध्यानधर।। दशा'अन्त फोहोती कपोत की ऐसी, परंतुन आप जरा भी डर । निज धर्म के कर्म सदैव करें, कुछ चिन्ह यहा पर छोड मरं ॥ " . । श्रीयुत कामताप्रसाद गुरुलिखित । येटी की बिदा प्यारी वहिन ! सौंपती हूँ में अपना तुम्हें खजाना । है इस पर अधिकार तुम्हारे बेटे का मनमाना । रक्त मास श्रो हाड हमारा हे यह बेटी प्यारी। करो इसे स्वीकार हुई यह अब सव भौति तुम्हारी ॥१॥ ।' पूजे कई देयता हमने तब इसको है पाया। प्राण समान पाल कर इसको इतना बड़ा धनाया । यही पातमा अाज हमारी हम से बिछुड रही है। समझाती है जी को तो भी धरता धीर नहीं है।" घहिन ! ढिठाई माता की तुम मन म नेक न धरियो। इस कामल चिरचा की रक्षा चडे चान से करियो। है यह नम्र मेमन मे भी भीर मृगी से बढ कर। कडी बात या चितवन से यह फंप जाती हे थरथर ॥३॥ है गवार यह भोली भाली, नहीं शिष्टता जाने। तो भी यह गुरुजन की प्राशा पडे प्रेम से मान। a Kamia's Letter के एक धप्रेजी पद्य का अनुवाद । विवाह हो जाने पर लडकी की मां, रडके की मां को अपनी स्टको सौंप हो है। मूल अंग्रेजी कविता दक्षिण को है। यहां यह पार है।
साहित्य-सुषमा। AN सांचे में तुम इसे दालियो, फभी में यह तडकेगी। बहिन ! सिखाने से चतुराई, बेटी सीख सकेगी ॥४॥ यह गुडिया, यह लक्ष्मी अपनी जीवन-मूल दुलारी। हृदय थाम कर करती हूँ मैं अब आँसों से न्यारी॥ माता-नेह सोच तुम मन में दुख मेरा अनुमानी। छुप नहीं है प्रीति छुपाए, बहिन ! सत्य यह जानो ॥ ५॥ इसका रूप निहार दिव्य मैं पल पल सुख पाती थी। गान समान सुरीली वोली इसकी मन भाती थी। बहिन! तुम्हें भी ये सब बातें जान पडेंगी भागे। अपने नैन रखोगी इस पर जय तुम नित अनुरागे ॥६॥ इसकी मद हंसी से मेरा सुख अतिशय बढजाता था। कठिन धावामी उससे दुख का अच्छा होजाता था। इसे उदास देख अांखों में भर आता था पानी। छुपी नहीं है यहिन ! किसी से माता प्रेम कहानी ॥७॥ बडी लालसा भी निज मन की इसने नहीं बताई। कर सकोच कठिन पीडा भी अपनी सदा छुपाई ।। तो भी में सब लख लेती थी ,इसके बिना कहे ही। यों ही तुम इसकी सब बातें, लखियो वहिन सनेही ॥८॥ अपना मास पिण्ड देती हूँ मैं तन से कर न्यारा । है यह जीवन मेरे जी का आँखों का है तारा ॥ इस अनाथ बच्चे का पालन माता-सम तुम कीजो। मेरी इस बल हीन दशा में बहिन! बांह गह लीजो ॥ ६ ॥ करो बहिन! स्वीकार दया कर मेरी इतनी बिनती। यशों में अपने तुम करियो इस बेटी की गिनती ॥ दीजै घहिन ! भरोसा मुझको हाय हाथ में देकर बेटी-सम पालेंगी इसको हम माता सम , होकर ॥१०॥ -
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घेटी की विदा।
मेरी ये श्राप पीती थीं नित जो रूप मनोहर ।
क्या उसके दर्शन का मुझको फिरन मिलेगाघसर।।
जिस चोली से धीरे धीरे इसे बुलाती थी मैं
क्या वह भी अब मूक रहेगी रख जी की जी ही में ॥१॥
हा मेरी अनमोल लाडली! माणाधार! दुलारी !,
क्या तू मुझे नहीं समझेगी अब अपनी महतारी॥
तुझे नई माता मिलती है, मैं तुझको सोती हूँ।
यही सोच सुख में भी तेरे बेटी ! में रोती हूँ ॥१२॥
हाय ! आज से हुश्रा हमारा यह घर भरा अंधेरा।
होकर निपट निरास न क्यों श्रव हृदय फटेगा मेरा,
अय मेरे इस सूने घर को उजला कौन करेगी।
कौन मधुर वातों से मेरा रीता हृदय भरेगी ! ॥१३॥
कौन सुरीली बीन बजा कर, मधुर गीत गावेगी।
घर में कौन लडकिया छोटी न्योत न्योत लावेगी।
ससियों के सग फोन पायनी, खेलैगी, झूलैगी!
किसको सुन रामायण पढते यह छाती फुलेगी।
हा बेटी 1 हा गुडिया मेरी ! हा मेरी सुकुमारी!
तेरे विना हृदय यह मेरा पावेगा दुस भारी ॥
केवल देव दयामय जो दुस जान सके है जन का ।
वही धीर दे दूर करेगा सकट मेरे मन का ॥१५॥
जा कर घहाँ दूर हे बेटी ! मुझे भूल मत जाना।
कभी कमी इस दुखिया की भीसुधनिज मन में लाना ।।
रो मत, बेटी! जा अपने घर, सग नई माता के।
जीज वहिन । इसे अब मुझसे, देती हूँ सिर नाके ॥६॥
.
१
"११२
साहित्य-मुपमा।
पाण्डेय लोचन' प्रसाद रचित ।
पाल्यस्मृति ।
कौन ले गया लूट हाय ! मम बाल-काल का सुप भाण्डार!
कहाँ प्रवल उत्साह, कहाँ अंच गई हृदय की शान्ति समूल
कहाँ सखा सङ्गिनी आदि का वह नैसर्गिक प्रेम अपार !
प्रास-मिचौनी, सुपद धूल-गृह-पेल कहाँ शैशव सूख मूल !"
'चला गया वह समय हाय ! इस जीवन को करके नि सार ।
वही नयन, तनु वही, किन्तु है हश्य बाज जग के प्रतिकूल ।
मुझे, वाल-सङ्गिनी सखागण भी करते हैं हाहाकार ।
इस जीवन के भीषण रण में पड, निज निजसुख कर निमूल ॥
शान्ति-पूर्ण उस बाल-काल' के पाचन सुख की होते याद ।
शोक-अग्नि से 'तनु जलता है व्याकुल होतेहैं मन प्राण ॥
स्थायी मुझे ज्ञात होता' था पाचन शैशव का श्राहाद ।
था नहीं मेरे बाल हृदय को कुटिल काल' की गति का ज्ञान ॥
चिर वन्दी रोता है ज्यो नितं सोचं सोच निज गृह सुस-स्वाद।
त्यों में अव व्याकुल होता हूँ उस सुख का कर मन में ध्यान ॥
1
एक राजपूती झलक। रामदहिन मिश्र लिखित । एक राजपूती झलक ( सरस्वती से ) श्राई, उदय सिंह के शक्त सिंह था प्यारा ढोटा, प्रवल प्रतापी भट "प्रताप का भाई छोटा। था छोटा पर सभी काम थे उसके न्यारे, जिन्हें देखकर मौन साहसी होते सारे ॥१॥ कहता हूँ मैं एक कहानी उसको चोखी, छोटी है, पर है अतीव रसवनी अनोसी । जिससे होगा,व्यक्त अलौकिक साहस उसका, और लगेगा पता पूर्ण उसके मानस का ॥२॥ एक समय तलवार एक चन करके लगे देखने सभी वहाँ उसकी सुघराई । करने उसकी जाच लगे तव सूत कार कर, पर न हुआ सन्तोष "शक" को उससे रुचिकर ॥ ३॥ श्रासन अपना छोड "शक्त" उठ ग्वडा हुआ झट, वोला मृदु गम्भीर वचन वह सुन्दर शिशु भट । "जो अव से तलवार धीर फर में जाोगी, नर यूथों का मास अस्थियुत यह खावेगी ॥४॥ इस प्रकार क्या ठीक परीक्षा इसकी होगी, और आप की उचित कभी मर्यादा होगी। धार परीक्षा करनी हो तो यो करिये फिर, राजपूत की नाम कीति हो जिससे सुस्थिर । साहित्य सुपमा यो कह उसने छीन लिया वह खड्ग मनोहर, है। हाँ कह सव लगे रोकने उसे उठा कर। किन्तु रुका वह नहीं किसी के कुछ भी रोके, रुका कहीं है दृढ़ प्रतिज्ञ जन उद्यत हो के ॥६॥ उठा तुरत तलवार काट डाली निज उगुली, जिससे धर धर उपण रक्त धारा बह निकली। किन्तु न इससे शुओं चित्त उसका कुछ विचलित, और व्यथा के चिन्ह दिखाई पड़े न किश्चित. पाच वर्ष का शक्त सिंह वह बालक था जब, किया इस तरह कार्य कठिन दु साहस का तब। रानावंशी नित्य 'कार्य ऐसे करते थे, जिससे वे प्रक्रान्त वीर योधा होते थे।
कवियों का सक्षिप्त परिचय ।
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कवियों को संक्षिप्त परिचय ।
चंदबरदाई-ये जाति के वन्दीजन,दिल्लीपति पृथ्वीराज चौहन
फे राजकवि और सवा थे। इनके जन्म मरण का ममय मरत
१२०५-१२४८ माना गया है। इन्होंने पृथ्वीराज का चरित्र अपनी
श्राजस्विनी कविता में एक वृहत् ग्रन्थ में लिया है। उसका
नाम है 'पृथ्वीराज रासो'। इनकी रचना कवित्वपूर्ण पर बडी
जटिल है, इससे उदाहरण में एक ही पद्य दिया गया ।
विद्यापति-इनके जीवन काल का समय सवत् १४०० का
पूद्ध है। सस्कृत के अगाध पाण्डित्य रसने के कारण ये
महामहोपाध्याय थे । सस्टन में इन्होंने कई ग्रन्थ बनाय है। ये
जैसे संस्कृत के महाकवि थे, वैसे हिन्दी के भी। इनकी कनिना
म कुछ निथिला भाषा के शब्द हैं। इनकी मधुर पदावलियाँ
बहुत प्रसिद्ध हैं, और वे गृहीत भी हो चुकी हैं।
कबीर साहेव-इनके जीवन-काल का समय सवत् १४०० का
शेषाद्ध है । प्राय यही सच विद्वाना की राय है। इनका जन्म
हिन्दू के घर और पालन पोषण मुसलमान के यहाँ मना गया
है। इनके स्वामी रामानन्द के शिष्य होने की बात कही जाती
है। मुसलमान होने पर भी इनके विचार हिन्दूकैसे थे । इनकी
सासियों और भजनों के बड़े २ ग्रन्थ सगृहीत हुए हैं। इनकी
कविता मनोहर, शिक्षापूर्ण और गम्भीर है । इनका एक अलग
मत है जिसे 'कवीर पया कहते हैं।
मीरामाई-इनका जीवन काल सरत् १५.८ से १६३० के'
चीच में माना गया है। श्रादि अन्त में केवल पाँच सात वर्ष
का अन्तर है । ये जोधपुर धराने की कन्या थीं और उदयपुर
फे धराने में ज्याही गयी थीं। बालकपन से ही गिरिपर
,
,
ܐ ܝ । 1 - साहित्य-सुपमा। माना जाता है । ये कान्यकुञ्ज ब्राह्मण थे। ये वीररस के महा. करि थे। इनकी कविताओं के पढ़ने से जी फडक उठता है। इनका 'शिवराज भपण' सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ है और उसमें शिवाजी महाराज का वर्णन है । शिवाजी के दरवार में इनका वडा श्रादर था। मतिराम-भूपण कवि के ये सगे भाई थे। इनकाजन्म मरण २६७१-१७७३ के लगभग माना जाता है । येशृङ्गार रस कवि थे। इनके 'ललित ललामा चगैरह कई काव्य प्रसिद्ध है। देव-इनका जन्म १७३० और १८०२ के लगभग देहान्त हुआ। ये मनाढ्य बाह्मण थ । मिश्र बन्धुनों नेसूर और तुलसी के साथ इनकी गणना की है। इन्होंने पचासो अन्य वनार्य हे और सबके सब उत्तम हैं। १७४१ के लगभग हुए | १७६१ तक इनका रहना एक ग्रथ में लिया है। ये जाति के बन्दीजन और कृष्णगढ़ के महाराज के यहा रहते थे। इनका 'वृन्दविनोद सतसई. नामक एक सुन्दर नीतिमय ग्रन्थ है। यताल-इनका जन्म काल १७३४ संवत् माना जाता है । ये विक्रम शाह के दरबार में रहते थे। इनके नीतियम छप्पय ही बहुत प्रसिद्ध हैं। कोई अथ इनका अभी तक देखने में नहीं आया। नागरी दास जी-इनका जन्म १७५६ और मरण १८२१ में हुआ था। कृष्णगढ के राजा थे। इन्होंने ७५ अन्य रचं हें। कविता इनकी वडी मवोहर और मधुर होती थी। श्रीहित वृन्दावन दास, जी-इनका जन्म ७०० के लगभग माना जा सकता है। ये जाति के ब्राह्मण थे। १८ हजार अधिक छन्द इनके देखने में आये हैं। कहते हैं कि इन'महात्मा ने लाखो पद रचे हैं। इनकी कविता वडी उत्तम है । ।
- ही लिये और काव्य-नाटक इतिहास चतित्र श्रादि सव पकार के ग्रंथ लिखे और कई पत्र पत्रिकायें भी चलाया। हिन्दी गद्य को आपस बहुत सहायता मिली और श्राप ही के कारण उसकी पडी उन्नति हुई। आप को वर्तमान हिन्दी के जन्म दाता कहने में भी कोई अत्युक्ति नहीं होगी। मीस श्राप श्रीधर यठक-इनका जन्म १६१६ मे हुश्रा था ये महाशय पञ्चम हिन्दी साहित्य मम्मेलन फ सभापति हुए थे। ये प्रज भाषा और सडी बोली दोनों के पसिद्ध कवि है। अयोध्या मिह उपाध्याय-यापका जन्म स० एम. कवियों का साक्षप्त परिचय । गिरधर कविराय-इनका भी जन्म १७०० सवत् के ही लग. 'भग माना जाता है। इनकी कुण्डलियां बहुत पमिद्ध है जो विशेषत. लोकोक्तियों पर बनी हुई हैं। इसी कारण वे वडी ही लोकप्रिय हैं । इनका छोटा मोटा एक दो सग्रह भी छपा है। पदमाकर–इनका जन्म १७१० और स्वर्गवास १८९० म हुश्रा । ये तैलग ब्राह्मण थे। इनके जगद्विनोट, गगालहरी अथ बहुत पिसद्ध हैं। इनकी कविता बडी मधुर और शब्दालदार- 'पूर्ण हैं | अनुपास की तो खूब ही बहार है। पाल-ये १६ वीं शताब्दी के शेषाद्ध में थे। ये जाति के बन्दीजन थे। इनके छोटे वड वीसा ग्रन्थ हैं। ये भी पनाकर "ही के समान शब्दालङ्कार के प्रेमी थे और कविता में की बडी भरमार रखते ये भारतेन्दु हरिश्चन्द्र-अापका जन्म १९१७ में और शरीर- पात १६४१ में हुअा। आपने १७ वर्ष से ही कविता करनी पारम्भ कर दी थी । आपके सब ग्रन्थ छ भागों में सङ्गविलास प्रेस चाकीपुर से प्रकाशित हुए हैं। अापने पाय गद्य पद्य बराबर नागरी नागर भी कहलाते हैं । अनुप्रास 1 " । - १२० साहित्य-सुपमा। श्राप हिन्दी के अच्छे लेखक और कवि हैं। और गम्भीर से गम्भीर हिन्दी लिखते हैं और ग्रजभाषा और सड़ी बोली दोनों ही में करते हैं। पूवास, टेठ हिन्दी के ठाट आदि बहुत लाला भगवान दीन-इनका जन्म १९३८ में पद्य दोनों के सुयोग्य लेखक और कवि हैं। प्रशसनीय है। प० रामचरित उपाध्याय-ये खडी चोली के सुकवि हैं। श्रापका 'रामचरित चन्द्रिका' महाकाव्य आदि बहुत प्रसिद्ध है। था मैथलीशरण गुप्त-पडी बोली के लिए स यहा नाम है इनके 'भारत भारती 'जयद्रथ वध' बढे ही लोकपिय हो रहे हैं। १० गयादीन शुक्ल सनेही ये भी खडी बोली कवि हैं। यद्यपि खड़ी बोली में इनका कोई का निकला है तो भी सुदर कवितायें ही इन्हें : कह रही हैं रूपनरायन पाण्डेय ये भी पडी बोली के कादि हैं। हाल में इनका स्फुट कविताओं का तिकाला है। श्रीयुत कामता प्रसाद गुरु ----ये जैसे सुलेखक हैं भी हैं । इनकी बहुत सी स्फुट कविताये भिन्न पुस्तकों में पुकाशित हैं। पाण्डेय रोचन प्रमाद-ये मड़ी चोली के बडे, हैं। इनके खही वाली के कई काव्य प्रकाशित हो - . म
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