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Navapadamaya Shrisiddchakradhan-vidhi Vigere Sangrah

Maharaj, Vijnemi Suri · 2009/11

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आ. थुक अमदावाद घीकांटा जेशंगभाइनी वाडीमा आवेला जन एडवोकेट प्रीन्टींग' प्रेसमां वाडीलाल बापुलाल शाहे छापी छापवा छपाचवा विगेरेनो सर्व हका प्रकाशके स्वाधिन राख्या छे.

卐 औ अहँ नमः ॥सर्वसाहितदायकाय नवपदमयश्रीसिद्धचक्रयन्त्राधिराजाय नमः। ॥ सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-सूरिचक्रचक्रवर्ति-शासनसम्राट्- तपागच्छाधिपति-जगद्गुरु-भट्टारकाचार्य श्रीमद्विजयनेमिसरिभगवद्भ्यो नमः ॥ EPQCDGCOGCO COCCOQOOOGOOCO COOCOOCOCCOBDOBO CASSOISSION नवपदमय श्रीसिद्धचकाराधन- विधि विगेरे संग्रह. SoscomcomCO@COACOWCOQCDGCORCOLOD0200CCOECDBCO ध्यात्वा श्रीस्तम्भतीर्थेशं, पार्श्व नवपदीं तथा ।। नेमिसूरिं गुरुं नुत्वा, वक्ष्ये विध्यादिसङ्ग्रहम् ॥११॥ अरिहं सिद्धायरिया, उज्झाया साहुणो य सम्मत्त। नाणं चरणं च तवो, इय पयनवगं परमतत्तं ॥१॥ श्री तीर्थंकरदेवप्रणीत वीतरागशासनमां श्री अरिहंत, सिद्ध आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यग्र्दशन, ज्ञान, चारित्र अने तप आ नवपदो परमतत्त्वरूप.छे १ (कारण) (२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। एएहिं नवपएहिं, रहियं अन्नं न होई परमत्थं । एएसुच्चिय जिणसा-सणस्स सव्वस्स अवयारो ॥२॥ एएसु नवपएसु, अवअरिअं सासणस्स सव्वस्स। ता एआइं पयाई, आराहह परमभत्तीए ॥३॥ जे किरसिद्धा सिझंति,जे अ,जे आवि सिल्झइस्संति। ते सद्दे विहु नवपय-झाणेणं चेव निभंतं ॥ ४ ॥ एयं च परमतत्तं, परमरहस्सं च परममंतं च । परमत्थं परमपयं, पन्नत्तं परमपुरिसेहिं ॥५॥ आ नवपदोथी रहित (शीवायर्नु) वीजु कोइ परमार्थ नथी, कारण आ नवपदोमांज समस्त श्रीजिनशासननो (अथवा शासनना सर्वस्वनो) समावेश छे. २. (उपदेश) आ नवपदोमां श्रीवीतरागशासनना सर्वस्वनो समावेश थयेलो छे तें माटे (हे भव्य जीवो!) उत्कृष्ट (बहुमानपूर्वक) भक्तिथी आ नवपदोनी आराधना करो. ३. (नवंपदाराधन प्रभाव). पूर्वकाले जेओ सिद्धिपद पाम्या, वर्तमानकाले जेओ सिद्धिपंद पामे छे (महाविदेहक्षेत्रादिमां), अने भविष्यकाले जेओ सिद्धिपद पामशे तेओसर्व पण निश्चयथी आ नवपद(वा नवपद पैकीनु एकादिपद) ना ध्याने करीने ज जाणवू ४. (नवपदमाहात्म्ब सार). श्री तीर्थकर सर्वज्ञ गणधर :पूर्वधर युगप्रधानादि महापुरुषोए नवपद माहात्म्य विचार ॥ (३) तत्तो तिजयपसिद्धं, अट्ठमहासिद्धिदायगं. सुद्धं । सिरिसिद्धचक्कमेयं, आराहह परमभत्तीए ॥६॥ आ श्रीसिद्धचक्रयंत्र परमतत्त्वरूप, परमरहस्यरूप, परम मंत्ररूप परमार्थस्वरूप अने परमपद स्वरूप वर्णव्यु छ (दशमा विद्याप्रवादपूर्व मांथी ऊद्धयु छे ). ५. ( नवपदाराधनना फलरूप माहात्म्य तथा उपदेशसार). ते माटे (विवेकि भव्य जीवो! ) 'त्रण जगत्मां प्रसिद्ध' आठ महासिद्धिओने आपनार विशुद्ध आ श्री सिद्धचक्रयंत्रनुं उत्कृष्ट (बहुमान युक्त) भक्तिथी 'आराधना करो!'६. अनुष्ठानमां विधिनुं माहात्म्य. आसन्नसिद्धियाणं, विहिपरिणामो य होइ सयकालं। विहिचाओ अविहिभत्ती, अभव्वजिअदूरभव्वाणं ॥१॥ अर्थ-थोडाकालमा मुक्तिगामि..जीवोने विधिनो परिणाम सदाकाल (हमेशां) होय छे, अभव्य अने दीर्घ संसार परिभ्रमणकरनार दूर भव्य जीवोने विधिनो त्याग अने अविधि प्रत्ये भक्ति रहे छे.१. भन्नाणं विहिजोगो, विहिपक्खाराहगा.सया धन्ना । विहिबहुमाणी धन्ना, विहिपक्ख अदूसगा धन्ना ॥२॥ .

4. ... (४) 'नवपद विधि विगेरे संग्रह.- विधिनो योग (आराधननी प्राप्ति) धन्यपुरुषोने होय छे. विधिपक्षनुं आराधन करनार सदाकाल धन्य पुरुषो छे. विधिनुं बहुमान करनार धन्यपुरुषो छे अने विधिपक्षनुं दूषण नहि देनार पण धन्य छे. २. विधिसहित उत्तमयोगनी आराधन सामग्री म- ळवा पूर्वक ते सफळ करवा आराधनामां उद्यमवंत थर्बु ते अपूर्व भाग्योदयथी पुण्यवान् जीवोनेज होय छे; आ आराधना मोक्षप्राप्तिना साधनरूप आलंबनना अवलंबनथीज थाय छे. अविच्छिन्न प्रभावशालि त्रि- कालाबाधित श्री वीतरागशासनमा शाश्वत अव्या बाध मुक्ति सुखने आपनार आराधना करवा लायक असंख्य योगो पैकी श्रीसिद्धचक्र महाराज जेवो परम योग. एक पण नथी, कयुं छे के- आलंबणांणि जइंवि हु, बहुप्पयाराणिं संति सत्थेसु । तहवि हु नवपयज्झाणं,सुपहाणं बिति जगगुरुणो॥१॥ अर्थ-जोके शास्त्रोमां घणा प्रकारना आलंबनो (मो. क्ष साधनो) छे. तो पण निश्चयथी जगद्गुरु श्री तीर्थकर

.
अनुष्ठानमां विधिनुं माहात्म्यः ।।
भगवंतों श्री नवपद ध्यानने सर्वथी मुख्य ( आलंबन )
फरमावे छे.
श्री सिद्धचक्र भगवान्नी आराधनामां तत्पर
थयेल भव्यजीवोने जेम जेम ते आराधननो दिवस
'नजीक आवतो जाय छे तेम तेम उल्लास परिणाम
तीव्र थतो जाय छे, भाग्यवान् जीवना हृदयमा एज
विचार उद्भवे छे के चीकणा कर्म खपाववाना परम
साधनरूप अनन्त पुण्योदये आ श्री सिद्धचक्र महा-
राजनी आराधना प्राप्त थई छे, जगत्मां तेवू कोई
ध्येय ध्यान करवा लायक] बाकी नथी के जे आश्री
सिद्धचक्रजी भगवान्ना ध्यानमां न आवतुं होय,
अथात् सर्वध्ययनो आना ध्यानमा समावेश थयेल
छे, कारण आ श्रीसिद्धचक्रभगवंतनी आराधनामां
धर्मप्रासादना मुख्य अंगरूप पायो, भीतो, पाटडा-
तुल्य आराध्य त्रणे तत्वोनो समावेश थाय छे.
"तन्नास्ति जगति ध्येय-मन्तर्भवति नात्र यत्।
सिद्धचक्रे सन्निविष्टं यस्मात्तत्वत्रयं परम् ॥१॥"

(६) नवपद विधि.विगेरे संग्रह ॥ सर्व क्रियाओमां तेनी सफलता माटे राखq जोईतुं सावधानपणुं? सद्गुरुंना उपदेशमां [ आज्ञानुसार ] वर्तनार, विधि प्रत्ये बहुमान राखनार, जे क्रिया चालती होय ते क्रियामांचित्तनी एकाग्रताकरनार,लघुहिलाकर्मी भव्य जीवनी समजणपूर्वक नियाणा रहित थती शुभक्रिया- ओ अवश्य फल आपनार होय छे, अने साचे साचुं मुक्तिनुं कारण पण तेज छे दरेक क्रिया करतां अनुष्ठानोनुं स्वरूप जाणवा लायक छे, तेमांथी हेय त्याज्य] अनुष्ठानो त्याग करवा, अने उपादेय (आदरणीय) अनुष्ठानो आदर करवा खास प्रयत्न करवो. रोगग्रस्त अने आरोग्यवान् जीवना भेदथी जेम भोजनादि क्रियाना फलमा भेद पडे छे. एकने जे भोजन रोग वृद्धि करनार होय छे ज्यारे बीजाने तेज भोजन बल पोषण करनार होय छे, तेम क्रिया कर- नारनी परिणतिना भेदथी अनुष्ठानो पण विभिन्न फल आपनार थाय छे.

- , क्रियाओमां.राखq जोइतुं सावधानपणुं । (७) १ धार्मिक क्रिया(अनुष्ठान)करतांआ भव संबंधी द्रव्य, स्त्री, पुत्र, वैभव, भोग, यश, कीर्ति आदिनी अभि- लाषा करवाथी विषानुष्ठान कहेवाय छे, के जे स्थावर जंगम झेरनी जेम शुभ अन्तःकरणने तत्काल मार- नार थाय छे. २ आ भवनी अपेक्षा न होय पण परभव संबंधी देव । ऋद्धि चक्रवर्ति आदि वैभव विगेरे अभिलाषा कर- वाथी गरानुष्ठान थाय छे, के जे संयोग ज झेर का- लान्तरे झेरविकारना परिणामनी जेम भवान्तरमा पुण्यक्षय करनार थाय छे. ३ कोईपण जातना फलनी अपेक्षा न होय' परन्तु : सन्निपातमां मुझायेल अगर संमूछिम जीवनी प्रवृत्तिनी जेम शून्यचित्ते क्रिया करवाथी अननुष्ठान थाय छे. आ अनुष्ठानमा कायक्लेशादि हेतुथी अकाम- निर्जरा थायछे पण मुक्तिनुं विशिष्ट साधन सकाम- • निर्जरा तो उपयोगप्रवृत्तिना अभाव थती नथी. ४ उत्तम अनुष्ठानना रागथी क्रिया करवाथी तहेतु 'अनुष्ठान थाय छे.

(6) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।
५.श्री. वीतरागदेव जिनेश्वर भगवंते बतावेल मार्ग
प्रत्ये उल्लास पामती तीव्रश्रमाथी असंख्य प्रदेश
वीर्य स्फूर्ति साथे उछळता आनन्दथी शुद्धविधि
साचववाथी अमृतानुष्ठान थाय छे.
अमृतानुष्ठान [अमृतक्रिया] ना लक्षणो-जे
क्रिया करता होय तेमांज शुद्ध एकाग्र उपयोग होय,
आडी अवळी दृष्टिन होय, तथा मननी व्यग्रतारूप
क्षेप दोष न होय ते 'तद्गतचित्त. १.जे क्रियानोशा-
स्त्रमांजेकाल कह्योहोय ते समयेज करवा योग्य शुभ
क्रिया करताहोयते 'समयविधान'२.चित्तनो उल्लास
अने परिणामधारानी पुष्टि होय ते 'भाववृद्धि' ३.
जेम नारकी जीव नरकथी त्रास पामतो होय, केदी
केदथी भयवाळो होय छे तेम संसारनुं जन्म-जरा-
मरणादिदुःख स्वरूप जाणी संसारथी भयवाळो होय
ते 'भवभय' ४. जे क्रिया करतो होय ते क्रिया मु-
क्तिनुं परम साधन छ पूर्वे कोई वखत मळेली
नथी तेम विचारतो आश्चर्यवन्त थाय ते 'विस्मय'

क्रियाओमां राखवू जोइतुं सावधानपणुं ॥ (९) ५.आq मुक्तिनुं परम कारण म्हने प्राप्त थयुं तेम हर्ष थवाथी वे संवा उंचाथाय ते अथवा आ क्रिया करता संसारथी त्रासेल होवाथीभयथी रुवाटा उंचा थाय ते 'पुलक', ६. अपूर्वमुक्तिदाता क्रिया प्राप्त थयेल होवाथी जन्मान्धपुरुषने पुण्योदये नेत्रप्राप्तिथी अ- थवा सुभटने रणसंग्राममा शत्रु जीतवाथी जे आ- नन्द थाय तेनाथी पण अधिक तात्त्विक आत्मसुख उत्पन्न थाय ते 'प्रमोद' ७.आ सर्व अमृत क्रिया- नां मुख्य लक्षणो छे. आ लक्षणोथी अमृतक्रियानो अनुभव थाय छे. आअमृतक्रिया आभव अने पर- भवमा अवश्य फल आपे छे. अमृतनो बिन्दु मळ्यो होय त्यां आरोग्यता माटे बीजा औषधनी जरुर होई शके नहि तेम अमृतक्रिया एकवार पण मळी होय तोवीजा कारणो शिवाय पण मुक्ति पामवामां कोई वाधक आवतुं नथी. "अमृतनो लेश लह्यो इकवार, बीजुरे औषध करवू नहि पडेजी ।

- (१०) नवपद विधि विगेरे संग्रह . अमृतक्रिया तिम लहि एकवार, • बीजारे साधन विण शिव नवी अडेजी ॥१॥ टुंकाणमां सारी रीते शास्त्रार्थनु चिन्तवन, क्रियाने विषे मननी एकाग्रता, तथा कालादि साधनोमां अवि- परीतपणुं ते अमृतानुष्ठान, लक्षण छे. अमृतानुष्ठा- ननो आनन्द भव्यजीवनना हृदयमा समातो नथी. क्रियानो अंगीकार, क्रिया करवामां प्रीति, धर्मने विषे व्याघाताभाव, झानादि संपत्तिनी प्राप्ति, वास्त- विक स्वरूपनी जिज्ञासा, वस्तु धर्मना जाणकार गी- तार्थोनी उपासना, ए सदनुष्ठानना लक्षणो छे. आ पांचे अनुष्ठानोमा प्रथमना त्रण अनुष्ठानो त्याज्य छे कारण तेमां क्रिया दूषित थाय छे, अने छेवटना बे अनुष्ठानो आदरणीय छे. वळी क्रियाना दग्ध १ शून्य २ अविधि ३ अतिप्रवृत्ति ४ दोषो पण वर्जवा. क्रिया साथे भावनी खास प्रधानता राखवी, कारण एकली क्रियाथी थएल कर्मक्षय देडकाना चूर्ण तुल्य कह्यो छे, अने भावपूर्वक क्रियाथी थएल कर्म- क्रियाओमा राखq जोइतुं सावधानपणुं । (११) क्षय देडकानी भस्म तुल्य कह्यो छे, देडकाना चूर्णने पाणीनो संयोग मळता जेटला चूर्णना कणीया छे तेटला नवा देडका उत्पन्न थाय छे, तेम अज्ञानताने योगे निमित्त मळता पाछो क्लिष्ट कर्मबन्ध थाय छे. अने देडकानी राख थइ होय तो ते राखमांथी गमे ते संयोगे पण पुनः देडकानी उत्पत्ति थती नथी, तेम पुनः कर्मबन्ध पडतो नथी. क्रिया कूवो खोदवा तुल्य अने भाव शिरा (सेर) पाणी तुल्य छ, कूवो खोया शिवाय शिरा (सर) प्रकटती नथी अने सेर शिवाय अखुट पाणी रहेतुं नथी.माटे वेडनी खास आवश्यकता छे. अज्ञानी जीव वर्ष कोटिओमां जेटलुं कर्म ख- पावे तेटढुं कर्म ज्ञानी श्वासोच्छ्वासमां खपावे छे, तेमां पण भावपूर्वक क्रियानी मुख्यता बतावी छे, आ दिवसोमांजेम बने तेम आश्रव-कषायनो त्याग विशेष करवो, आरंभोनो त्याग करवो कराववो, बनी शके तेटली अमारि प्रवर्त्ताववी. देवपूजनना कार्य .

(१२) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
शिवाय वापरवाना कार्यमा सचित्त पाणीनो पण त्याग
जा राखवो.
आ दिवसोमां विशेषे करी जुतुं बोल नहि.
कोइने कठोर वचन कहेवू नहि, भाषा उपर काबु
राखवो, हितकारी प्रिय लागे तेवू सत्य अने प्रमाणो-
पेत ज बोलवू.
पहेला अने पाछळना दिवसो साथे खास शुद्ध
ब्रह्मचर्य पाळवं, पोताने वापरवाना वस्त्रो अने दागीना
विगेरेनुं प्रमाण करवू.
आ दिवसोमाटे खास अमुक प्रमाण दिशानो
नियम करीलेवो.
जता आवता ईर्यासमितिनो खास उपयोग
राखवो.
उपाश्रय देहरासरमा प्रवेश करतां 'नीसीही त्रण
बोलवां, पण ते मात्र बोलवा पुरतुं नहि पण तेनो
अर्थ विचारी खास उपयोगमा रहे.
कोइ पण चीज लेता मुकता कटासणुं-संथा-
रीयुं पाथरता विगेरेमां खास जयणा करवी पुंजवा
प्रमार्जवानो उपयोग राखवो..

क्रियाओमा राखq जोइतुं सावधानपणुं । (१३) धुंक--बळखो विगेरे जेम तेम नांखी न देवा. जग्या जोइ परठववा, तेना उपर धूळ या रक्षा नांखवी. मात्रु, स्थंडिल विगेरेमां पण लीलफूल, कीडीना न- गरा, वनस्पति विगेरे तमाम जोइने जयणाथी वर्तवं. आर्त रौद्र ध्यान, अशुभलेश्या, उपाधि संकल्प- विकल्पो वर्जवां. कोइनी साथे कलह, क्रोध विगेरे करवो नही तेमज तेनी उदीरणा पण करवी नहि. प्रतिक्रमण, पडिलेहण, देववन्दन, प्रभुपूजन, विगेरे क्रिया करतां तथा गुणणुं गणवू, आहार वाप- रखो, मागें जता आवता, स्थंडिल मा करवा जतां विगेरे प्रसंगे बोलवू नहि. आयंबिल करती वखते नवकार गणी आहार स्वादिष्ट के विरस होय तो पण आहारनी वस्तु उपर के आहार बनावनार विगेरे उपर राग द्वेष करवो नहि, वापरतां 'सुरसुर' 'चबचब' शब्द थाय नहि. तेम बहु उतावळ के बहु धीमुं नहि, दांणो छांटो पडे नहि , (१४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ तेवी रीते उपयोग पूर्वक आहार करवो, तेमां द्रव्योनी गणतरी राखवी, बनी शके तो चौद नियमो धारवा उपयोग राखवो. दरेक सूत्रोनुं उच्चारण करतां तेमा रहेला लघु, गुरु, संयुक्त, असंयुक्त वर्णोतुं लक्ष्य राखवू पद, सं- पदा (अर्थाधिकार युक्त विश्रामस्थानो) नो उपयोग राखवो, अर्थ जपर खास ध्यान राखवू. न्यूनाधिक अ- क्षरो न करवा, कानो मात्रा अनुस्वार विगेरेनो बील- कुल फेरफार थाय नहि. वर्ण, अर्थ, अने आलंबन प्रतिमाजी, गुरु, स्थापना विगेरेनुं अवलंबन करी उपयोगमा वर्तवू. दरेक क्रियामा जे जे आलंबन होय तेनाथी बाकीनी ऊर्ध्वदिशा (ऊंचे) अधोदिशा (नीचे) तिर्य- ग्दिशा (अडखे पडखे)ए त्रणे दिशाओं तरफ जोवानो त्याग करवो, एकज सन्मुखभावे क्रिया करवी.. दरेक क्रियामा रुघु अने महोर छापना दृष्टान्ते बहुमान अने भक्तिनी चउभंगीनुं स्वरूप खास समजी आराधक दशाना भांगांनो आदर करवो.

क्रियाओमा.राखg जोइतुं सावधानपणुं ॥ (१५) वळी प्रीति, भक्ति वचन अने असंग ए चार अनुष्टानोना स्वरूप पण अवश्य जाणवा लायक तथा उपादेय ते आदरवालायक छे. देवपूजा, गुरुभक्ति प्रतिक्रमण, देववन्दन, प्र- तिलेखनादि दरेक शुभक्रियाओ करतां खेदादि चित्त- अन्तःकरणना दोषोनो अवश्य त्याग करवो. खेद-क्रिया करता कंटाळो आववो, त्यां विचा- खं के हे चेतन ? बीजाओनी द्रव्यादि लालसाए गुलामगीरी करता, आरंभादि कामोमां रहने कंटाळो आवतो नथी के जे केवळ संसारवृद्धिन कारण छे. अने आ क्रिया रहने मुक्तिनुं निदान प्राप्त थइ छे माटे आमां कंटाळो लावीश नहि. उद्वेग-क्रिया उपर अरुचिभाव, हे चेतन ! अहितकारिणी क्रियाओ करी करी भव बगाडयो त्यां अरुचि न आवी आ क्रिया एकान्त हितकारिणी छे आमा अरुचि लावीश नहि. क्षेप-एक पण आरंभेली क्रिया प्रत्ये चित्तनी

(१६) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
स्थिरता नथी अन्योन्य क्रियाओ प्रत्येनी चंचळता,
हे चेतन ! अशुभ प्रवृत्तिओमां, व्यापारमां; लेवड
देवडमां, हीसाबो तपासवामां रहने अस्थिरता नडती
नथी तो एकान्त शुभ प्रवृत्तिरूपी क्रियामां तुं अस्थि-
रता. करीश नहि इत्यादि क्रियाना फलने विनाशका-
रक महान् दोषोनो अवश्य त्याग करवो.
क्रियानो बाह्यशरीरोपयोग.
१ प्रतिक्रमण, प्रतिलेखन, देववंदन, खमासमण, का-
उसग्ग विगेरे तमाम क्रिया करवाना पवित्र उचित
स्थानके चंद्रवा बांधला होवा जोइये.
२ आयंबिलनीरसोइ,भोजन करवू पाणी ठार विगेरे
स्थले पण चंद्रवा बांधेला होवा जोइए.
३ यतना साचववा माटे स्थंडिल मा परठववानी
जग्यानो खास उपयोग राखवो.
४ थाळी, वाडका, पाटला, पवाला, कळशा, पहेरवाना
धोतीयां, खेस, कामळ विगेरे, तमाम वापरवानी

-
क्रिया माटे राखंवो जोइतो बाह्य-उपयोग॥ (१७:)
चीजो नाम (अक्षरों) विनाना होवा जोइए तथा
धोतीया-विगेरे वस्त्रो खेळ विनाना धोयेला राखवा,
फाटेला तथासांधेला राखवा नहि, पाटलाओ डगता
होवा न जोइए.
४ पाणी पधिा पछी तुरतज ते प्यालो खास ल्होइ
नांखवो, कारण तेमां अनुपयोग थवाथी भीनो रही
जाय तो बे घडी पछी संमूर्छिम जीवोनी उत्पत्ति
थाय छे तेथी ते माटे खास स्वच्छ लुगडाना कटका
अगर रुमाल राखवा..
५ पूजा माटेना उपकरणोनी शुद्धिनो खास उपयोग
राखवो.
६. पूजा भणावतां भावशुद्धि विशेष थवाना साधनो
अवश्य राखवा.
७ पूजा करती वखते पूजाना उपकरणो जेवा के
कलश, धूपधाएं, केशर चंदननी वाटकी, नैवेद्य,
फलनो थाळ विगेरें नाभिनी उपर अने
मुख
तथा
नासिकानो श्वास नलागे तेवी रीते हाथमा राखवा.
.
--
'.

(१८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। ८ नवकारवाली तथा पुस्तक विगेरे पवित्र उंचे स्थानके मुकवानो उपयोग राखवो, चरवळे भरावी देवानी तथा कटासणा उपर के जेमतेम मुकी देवानी घणी- खरी प्रथा देखाय छे पण तेम करवाथी आशातना थाय छे माटे तेम न करवं. ९ पुरुषोए चरवळा गोळ दांडीवाळा अने स्त्रीओए चोरस दांडीवाळा राखवा. १० सामायिक, प्रतिक्रमण करतां पहेलां मात्रु-स्थं- डिलनी बाधानो उपयोग करी लेवो, कदाच सा- मायिकमा प्रतिक्रमणमां बाधा थाय तो ते माटे माथे ओढवानी कामळी तथा पुंजवाना दंडास- णनो तथा अचित्त पाणीनो खास उपयोग राखवो, घणे ठेकाणे कामळीना अभावे कटासणुं माथे नांखी जता देखाय छे पण तेम करवाथी विराधना थाय छे माटे ते संबंधी खास उपयोग राखवो पडिलेह- णादि वखते काजो उद्धरवा काजा उद्धरणी (पुंजणी) सुपडीनो उपयोग राखवो.

पुस्तक वाचता राखवोजोइतो उपयोग। (१९) पुस्तक वाचता राखवो जोइतो उपयोग. १ अविनय आशातना न थाय माटे बहुमान सहित . पवित्र उंचे आसने पुस्तकने राखg. २ वांचती वखते तेना वर्णों उपर खास लक्ष्य राखवू पद क्यां पुरुं थाय छे, संपदा क्यां अटके छे, इस्व, दीर्घ, लघु, गुरु, संयुक्त, असंयुक्त,अनुस्वार,कानो, मात्रा विगेरेमा फेरफार न थइ जाय माटे खास उपयोग राखवो. ३ अर्थविचारणा करवी तथा ते आत्मामां घटाववा काळजी राखवी. ४ नाभिथी उपर पुस्तक रहे तेवी रीते सांपडा या बा- जोठ विगेरे उपर राखी हाथनो परसेवोन लागे, डाघ विगेरे न पडे तेनो उपयोग राखवो. हालमां केट- लाक अज्ञानताथी या संकोचवृत्तिथी या सगवड- तानी खातर सांपडाओ तदन न्हाना राखे छे माटे ते संबंधी काळजी राखवी, min (२०) नवपद विधि विगेरे संग्रह। ५ पुस्तकने थुक लगाडवं नहि, पार्नु फेरवतां केट- लाको धुंकवाळी आंगळी करे छे ते मोटामां मोटी भुल छे, पुस्तक पासे छते वाछूट करवी नहि; पग लगाडवो नहि, पुस्तक पासे छते झाडो, पेशाव, करवा नहि, पुस्तक उपर बेसबुं के सुवु नहि, पुस्तक पांसे राखी भोजन करवू नहि, अक्षर थुकथी भू- सवो नहि, पुस्तकने जेमतेम उंचेथी पटकवू नहि, पुस्तकनो अग्नि के पाणीथी नाश करवो नहि, पुस्तकने फाडवू के वीजी कोइरीते नाश करवो नहि. ॥ आवश्यक (प्रतिक्रमण) विगेरे क्रियामां राखवो जोइतो उपयोग तथा साचववानो विधि । वांदणानुं नाम द्वादशावर्त्तवन्दन अथवा गुरूं महाराजनुं उत्कृष्टवन्दन कहेवाय छे, वांदणा देता २५ १ आ सूत्र वोलतां वार आवों साचववाना होवाथी द्वादशा- वर्तवन्दन सूत्र कहेवाय छे. २ गुरु महाराजनी वन्दना पूर्वक सुखशाता (कुशल) पृच्छा आवश्यक (पतिक्रमण) विगेरे क्रियामा राखवो जोइतो उपयोग।।(२१) आवश्यक साचववाना छे, शिष्ये हमेशां पोताना श्वा- सोच्छ्वास, अधोवात विगेरेथी गुरुनी आशातना टा- ळवा माटे गुरुना अवग्रहथी बहार रहे जोइये. त्यां रह्यो छतो उभा उभा "इच्छामि खमासमणो वं- दिउं जावणिजाए नीसीहीआए अणुजाणह मे मिउ गह आटर्बु बोली अवग्रहमा पेसवानी आज्ञा मांगवा मस्तक नमावq. खमासमण विधिमां बतावेल नव संडासा प्रमार्जी 'नीसीही वोलता अवग्रहमा प्रवेश करखो. उभडक पगे वेसीने खमासमण विधिमां क- हेला १० थी १४ सुधीना पांच संडासा प्रमार्जी चरवळा उपर मुहपत्ती मुकवी (गुरु चरण स्थाने स्थापवी ) वेउ हाथ बे ढींचणनी अंदर राखी दस साथे तमाम प्रकारनी अविनय आशातनाओ वर्जवानो अर्थ होवाथी गुरुवन्दन सूत्र कहेवाय छ, आ सूत्रथी कोनी कोनी वन्दना करवी विगेरे विचार खास समजवा योग्य छे.

(२२) नवपद विधि विगेरे संग्रहः॥ आंगळीओ भेगी करी जेम भीत उपर थापो मारता होय तेवी रीते गुरुचरण स्थानापन्न चरवला उपर मुकेली मुहपत्ती (साधु साध्वीए मुहपत्ती ढींचण उपर राखवानी होवाथी ओघानी दशीओ) उपर उंधा हाथे दश आंगळीयोथी हळवे स्पर्श करतां 'अ' अक्षर बोलवो, तेवीज रीते चत्ता हाथे कपालने स्पर्श करता 'हो' अक्षर बोलवो. पूर्वनी माफक उंधे हाथे मुहपत्तीने स्पर्श करतां 'का' अक्षर बोलवो, कपाले स्पर्शता 'यं' अक्षर बोलवो, वळी मुहपत्तीने स्पर्शता 'का' अक्षर बोलवो अने क- पाले स्पर्शता 'य' अक्षर बोलवो, बन्ने हाथो मुहपत्ती उपर चत्ता मुकी तेमां मस्तक अडाडता 'संफासं' पद बोलवु' खमणिज्जो मे किलामो'ए पदोबोलता बे हाथ अंजलि जोडेला मस्तके लगाडवा पूर्वनी माफक बेउ हाथेमुहपत्तीने स्पर्शता 'ज' अक्षर बोलवो, वच्चे हाथ राखता . त्ता' अक्षर बोलवो, ललाटे (कपाले) स्पर्शता 'भे' अक्षर बोलवो. एज प्रमाणे आवश्यक (पतिक्रमण) विगेरे क्रियामां राखवो जोइतो उपयोग।।(२३) पूर्वनी माफक 'ज' 'व' 'णि' ए त्रण अक्षरो बोलवा, वळी तेज प्रमाणे 'ज्जं' 'च' 'भे' ए त्रण अक्षरो उच्चारवा, वळी मस्तक अडाडता 'खामसि खमास- मणो' ए पदो बोलवा, 'देवसिअं वइकम बोली छेल्ला त्रण संडासा प्रमार्जता 'आवसिआए' ए पद बोली अवग्रह वहार नीकळवु,आज प्रमाणे वीजे वांदणे पण करवू. मात्र बीजे वांदणे अवग्रहथी वहार नीकळवानुं न होवाथी 'आवस्सियाये' पद वोलवू नहि. एटले ते आवश्यक ओछं समजवू, मन, वचन, कायानी एका- ग्रता राखवी, 'अहो' विगेरे बवे अक्षरोमां पहेलो अक्षर उदात्त, ( उंचे स्वरे) वोलवो, बीजो अनुदात्त (नीचे स्वरे बोलवो, ' जत्तामे' विगेरे त्रणमां पहेलो उदात्त, वीजो स्वरित (मध्यमस्वरे)अनेत्रीजो अनुदात्त बोलवो, [आ विधिनो खास उपयोग राखवो कारण विधिनी अज्ञानताए प्रमादवशे क्रियानुं यथार्थ फल पामी शकातुं नथी] आज प्रमाणे मुहपत्ती पडिलेहवी, काउ- स्संग करवा विगेरे विधिओमां पण उपयोग राखवो,

(२४) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
प्रतिक्रमण (श्रावकोने वंदित्तु) सूत्र वोलता के
'वीरासन' करवं, देववन्दनमां मुद्राओ केवी करवी,
सूत्रो वोलतां केवी विधि साचववी विगेरे विधिना
जाणकार पासेथी समजी यथार्थ रीते वर्तवू(आमानो
केटलोक विधि आगळ पण कहेवाशे.

ॐ ॥ आराधनाना दिवसोनो विचार-काल रहस्य.।। आराधनानी शरुआत-कर्मना क्षय, क्षयोपशम, उपशम विगेरे करवामां द्रव्यक्षेत्रादिनी माफक काल पण एक विशिष्ट कारण छे. आम्रना परिपाकमां तथा खेती विगेरे करवामां जेम अमुक काल आवश्यक छ, तेम धर्मना परिपाकमां, तथा तपः क्रिया ध्यान विगेरे साधनोथी राग, द्वेष, काम, क्रोध, विषयवासना आदि कांटाओ दूर करी आत्मभूमिमां धर्मबीज आरोपण करवामां कालनी पण खास अगत्यता छे. विद्या-मंत्रा- दिनी साधना करवामां पण काल तथा जाप विगेरे साधनोनी पण जरुरीयात होय छे. आवा अनेक हेतु ओने लइने प्राचीन महापुरुषोए श्री सिद्धचक्रजी भगवानना आराधन माटे आश्विन अने चैत्र मासना नव नव दिवसो वताव्या छे, आ दिवसोने १ तीर्थ- (२६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। यात्रा २ रथयात्रा ३ अष्टाह्निकायात्रा एत्रण यात्राओ [महोत्सवो] पैकी अष्टाहिकायात्राना भेदोमां शाश्वत- यात्रा (महोत्सव) तरीके गणाव्या छे, तेमां पण प्रथम शरुआत परम निवृत्तिमय काल होवाथी आश्विन मासमां करवामां आवे छे, अने ते क्रमथी पूर्णाहुति पण आश्विन मासमांज थाय छे. वळी आ शरद् अने वसन्त ऋतुना लगभग मध्य दिवसोमां आयविलनी तपस्या शारीरिक आरोग्यताने अंगे वैद्यकीय(डाक्टरी) सिद्धान्त प्रमाणे पण केटली लाभप्रद छे ते कालविचारस्वरूपज्ञ पुरुषो पासे समजवा लायक छे. हालनी प्रवृत्तिए शुदि ७ थी १५ सुधीना नव दिवसोनुं आराधन छे. वचमां तिथिनी वृद्धि होय तो आठमथी, अने तिथिनी हानि होय तो छठथी शरु- आत थाय छे. सातम बेहोय तो वीजी सातमथी अने आसो बे होय तो बीजा आसोमां शरुआत थाय छे. एज प्रमाणे बे चैत्र होय तो बीजा चैत्रमा आराधना कराय छे. amta (२७) आराधक भव्य जीवोनुं प्रारंभ कृत्य ।। mmmm आराधक भव्य जीवोनुं प्रारंभ कृत्य. शरुआतमां दीन अनाथादि जीवोने मनमां सं- तोष उपजाववाने दान आप, छ री पाळवी, एटले के १ शुद्ध ब्रह्मचर्य धारी.२ भूमि संस्तारी. ३ एकाहारकारी. ४ उभटक प्रतिक्रमणकारी ५ सचित्त त्यागकारी. ६ पादचारी (जोडा विगेरेनो त्याग करी ऊघाडा पगे नियमित भूमिमां चालनार ) थर्बु अमारी प्रवृत्ति कराववी, जेटली बनी शके तेटली द्रव्यादि आपीने पण जीवदया प्रवर्त्ताववी, घाणी भट्ठी विगेरे तमाम आरंभो बंध कराववा, चैत्योमा आंगी पूजाओ रचाववी विगेरे पूर्व सेवाकृत्यो करवा. आराधक जीवोनुं अधिकारिपj. आराधक जीव शान्त होवो जोइए. अल्प आ- हारवान्, अस्प निद्रा करनार, कामना (अभिलाषा) रहित, कषायरहित, धैर्यतावान्, परनिन्दा नहि कर-

(२८) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
नार, गुरु उपासनामां प्रीतिवान्, कर्मक्षयनो अर्थी,
रागडेषनी मन्दतावाळो, दयाल विनयनी अपेक्षा
राखनार, आलोक परलोकना फलनी स्पृहा नहि
करनार, इत्यादि गुणवान् जीव तपनो अधिकारी छे.
अल्प गुणवाने यथाशक्ति गुणो मेळववा उद्यम करवो.

(२९) प्रथम दिवसनो कर्तव्य विधि.॥ प्रथम दिवसनो कर्त्तव्यविधि. , रात्रिनो चार घडी काल शेष रहे त्यारे जागृत थाय, परमेष्ठिमंत्र- स्मरण करे, पोताना स्वरूपनो विचार करे–हुं कोण छु,' 'क्यांथी आव्यो छु, 'क्यां जवानो छु,' 'मारुं कुल कयुं, 'मारो धर्म कयो 'मारा देव कोण, 'मारा गुरुकोण, "मारा धर्मने मारा कुलने उचित कर्त्तव्य शुं छे, में उत्तम कर्तव्यो शा शा कर्यां अने शाशा बाकी छे' इत्यादि विचारणा करवी, अन- न्त पुण्योदये आराधननो काल प्राप्त थयेल होवाथी अपूर्व उत्साह अने वीयोल्लास साथे स्वस्थ थइ श्री अरिहंत महाराजनाआराधनानो पवित्र दिवस होवाथी श्रीतीर्थंकर भगवानना द्रव्यगुण पयायोनी चिन्तवना करी तेमनाध्यानमां आपणा आत्माने लीन करीसामा- यिक अंगीकार करे. कुसुमिण दुसुमिणनो काउस्सग्ग (कर्म परिणामनी विचित्रताथी जीवघात-मैथुनादि संबंधी रौद्रस्वप्न आव्युंहोय तो सागरवरगंभीरा सुधी (३०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। ४ लोगस्स अने सामान्य विचारथी 'चंदेसु निम्मलयरा' सुधी ४ लोगस्स) करी अप्रमत्तपणे वीर्य न छुपावता विधिसहित उपयोग पूर्वक प्रतिक्रमण करवं. सूर्योदय लगभगमां तमाम पडिलेहणा संपूर्ण थाय ते प्रमाणे क्रियामां वापरवाना तथा रात्रे संथा- राना उपयोगी सर्वउपकरणोनी पडिलेहणा करी संपूर्ण पडिलेहण कर्या बाद आठ स्तुति अने पांच शकस्तवे देववंदन करे ‘मन्हजिणाणं' (श्रावककर्तव्य सूचक) सज्झाय करे, पवित्र उंचे स्थानके श्री सिद्धचक्र भग- वाननुं यंत्र पूर्व दिवसे प्रतिष्ठावी स्थापन कर्यु होय तो ठीक, नहि तो ते दिवसे स्थापन करावे, वासक्षेपथी पूजन करे त्रण खमासमण देवा. १ दरेक पूज्य वस्तुओ तथा पूज्यनी पूजामा उपयोगी चीजो उपकरणो विगेरे नाभिप्रदेशथी उंचे स्थानके राखवा.

गुणोनुं स्मरण करवा साथे प्रदक्षिणापूर्वक खमासण ॥ (३१) ॥ गुणो प्रत्येनुं बहुमान तेज गुणिनुं बहुमान होवाथी गुणोनुं स्मरण करखा साथे प्रदक्षिणापूर्वक समास- मण (पंचांग प्रणिपात) देवां ॥ श्री केवलज्ञान उत्पन्न थये श्री तीर्थकर प्रभुनी श्री तीर्थकर नामकर्म उदयथी प्रातिहार्य तथा अनेक अतिशयो गर्भित चार मूलातिशय स्वरूप अतिशयोथी थयेली विशिष्टता ध्यानमा लाववा माटेना बार गुणो- अशोकाख्यं वृक्षं सुरविरचितं पुष्पनिकरं । ध्वनि दिव्यं श्रव्यं रुचिरचमरावासनवरम् ॥ वपुर्भासंभारं सुमधुररवं दुन्दुभिमथ । प्रभोः प्रेक्ष्यच्छत्रत्रयमधिमनः कस्य न मुदः॥१॥ अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टि-दिव्यध्वनिश्चामरमासनश्च । भामण्डलं दुन्दुभिरातपत्रं सत्प्रातिहार्याणि जिनेश्व- राणाम् ॥२॥ १ प्रायः दरेक क्रियामां इरियावहिनी प्रधानता (प्रथम करवा पणू) होवाथी कोइस्थळे खमासमण देतां पहेला इरियावही करवानुं पण बतावे छे.

, (३२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। अपायापगमो ज्ञानं, पूजा वचनमेव च। श्रीमत्तीर्थकृतां नित्यं, सर्वेभ्योऽप्यतिशेरते ॥३॥ प्रातिहारज आठ छे, मूल अतिशय चार । बार गुण अरिहंतदेव, नमो नमो बहु वार ॥४॥ अर्हत्पदनमस्कार अर्हत्स्वरूपमा लीनता करनारनुं खरूपसूचक दुहाओ. परम पंच परमेष्ठिमां, परमेश्वर नगवान । चारनिक्षेपे ध्याइये, नमो नमो जिनभाण ॥१॥ अरिहंतपद ध्यातो थको, दव्वह गुण पज्जायरे । भेद छेद करी आतमा, अरिहंत रूपी थायरे ॥१॥ वीर जिनेश्वर उपदिशे, तुमे सांभळजो चित्त लावीरे। आतम ध्याने आतमा, ऋद्धि मळे सवी आवीरे ॥२॥ आ प्रमाणे दूहा बोली जयणा पूर्वक प्रदक्षिणा दइ १ खस्तिक करी यथाशक्ति फल, नैवेद्य, नाएं विगेरे मूकी १७संडासा प्रमार्जवापूर्वक खमासमण देवू..

खमासमणा पंचांग (मणिपात) देवानो विधि ॥ (३३) ॥खमासमणा (पंचांग प्रणिपातोदेवानो विधि.॥ 'इच्छामि खमासमणों वंदिरं जावणिजाए, नी- सीहिआए' एटला पदो उभा उभा बोली चरवलाथी जमणा पगनो पाछलनोभाग केडथी हानीसुधीप्रमा- जवो १ बे पगनो मध्यभाग २ तथा डाबो पग ३. एज प्रमाणे आगळना पंजा सुधीना त्रण भाग ६. ढींचणो स्थापवानी आगळनी जमीन त्रणवार ९ प्रमार्जी दींचणभर बेसी जमणा हाथमां मुहपत्ती लइ मुहप- पत्तीथी कपालनी जमणी बाजुथी आखो डाबो हाथ पाछळ कोणी सुधी १० तेज प्रमाणे डावा हाथमा मुहपत्ती लइ डाबा कपालथी जमणो आखो हाथ चरवलीनी दांडी मुहपत्तीथी प्रमार्जी ११ ज्यां बेः हाथ साथे माथु स्थापq छे ते चरवलानी दशीओना भौगनी आगळ मुहपत्तीथी त्रणवार १४ प्रमार्जी 'म- स्थएण वंदामि' ए पद बोलतां बे हाथ जोडी माथु नीचे नमावq (जमीन उपर लगाडवू) एटले के आ सुत्र बोलतां बे ढींचण बे हाथ अने मस्तक ए पांचे 3

(३४) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
mm
अंगो जमीन उपर लगाडवाना होवाथी पंचांग प्रणि-
पात दंडक कहेवाय छे..
उपरनी चौद संडासा ( संदंशक ) प्रमार्जनामां
ऊठती वखत हानीओ स्थापवानी पाछळनी जमीन
त्रणवार पुंजवी, आप्रमाणे सत्तर १७ संडासा जाणवा,
आ प्रमाणे विधि साचववा साथे दूहा वोली प्रदक्षिणा
दइ स्वस्तिक करवा पूर्वक खमासमण देवा. एकेक खमा-
समण दई एकेक गुण संभारवा पूर्वक नमस्कार
पद बोल.
॥ बार गुणगर्मित नमस्कार पदो.
१ श्री अशोकवृक्षप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदहते नमः॥
आप्रमाणे गुणसूचक नमस्कारपद बोलवू. वळी
पूर्वनी माफक दूहा बोली प्रदक्षिणा दई स्वस्तिक
करी खमासमण देवू. ए प्रमाणे दरेक गुणे समजवं.
२ श्रीपुष्पवृष्टिप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदहते नमः॥
३ श्रीदिव्यध्वनिप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदहते नमः।

वार गुण गर्भित नमस्कार- पदो । (३५) ४ श्रीचामरयुगलप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदर्हते नमः॥ ५श्रीस्वर्णसिंहासनप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदर्हते नमः ६ श्रीभामण्डलप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदर्हते नमः। ७ श्रीदुन्दुभिप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदर्हते नमः ॥ ८ श्रीछत्रत्रयप्रातिहार्यविभूषिताय श्रीमदर्हते नमः॥ ९ श्रीलोकालोकप्रकाशककेवलज्ञानस्वरूपज्ञानातिशय- विभूषिताय श्रीमदर्हते नमः॥ १० श्रीसुरासुरनरगणनायककृतसमवसरणप्रातिहार्यादि- विशिष्टपूजातिशयविभूषिताय श्रीमदहते नमः॥ ११ श्रीसर्वभाषानुगामिसकलसंशयोच्छेदकपंचत्रिंशद्गु- णालंकृतवचनातिशयविभूषिताय श्रीमदर्हते नमः ॥ १२ श्रीस्वपरापायनिवारकापायापगमातिशयविभूषिताय श्रीमदहते नमः॥ छेवटे एक खमासमण दइ अविधि आशातना मिच्छामि दुक्कडं कहे.

(३६),
नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
॥आ बार गुणोनी हृदयमां भावना रहेवा माटे
तेनी अर्थविचारणा.॥
श्री तीर्थंकर प्रभुना बाह्य ऐश्वर्य सूचवनार
प्रतिहार भक्त (सेवक देवो)ना भक्ति कर्तव्य आठ
प्रातिहार्यो तथा आन्तर ऐश्वर्य अने अनेक अतिशयना
बीजक रूप चार मूलातिशयो ए बार गुणोए श्री
अरिहंत प्रभुने ध्यान करवा.
१ प्रभु ज्या ज्यां स्थिरता करे त्या त्या सर्व शोकादि
दूर करनार प्रभुना बार गुणो अशोकवृक्ष देवता-
ओ रचे छ, वायुथी फरकती तथा चमकती अनेक
ध्वजाओ अने घूघराओथी सुशोभित अशोक वृक्ष
रूप प्रातिहार्य.
२ एक योजन प्रमाण क्षेत्रमा अधोमुखवाळा ढींचण
प्रमाण पांचवर्ण पुष्पवृष्टिरूप प्रातिहार्य,
३ मालव कौशिक रागे थती भगवंतनी वाणीने
अनुसरता दिव्य ध्वनिरूप प्रातिहार्य,

गुणोनी हृदयमां भावना रहेवा माटे तेनी अर्थविचारणा ॥ (३७)
'४ भगवंतनी बेबाजु वींजाता उत्तम चामररूपप्रातिहार्य,
५ भगवंतने बेसवा माटे उत्तम कान्तिवाळा रत्नजडित
सिंहासनरूप प्रातिहार्य.
६ भगवंतनीपीठेरहेलदेदीप्यमानभामंडलरूपनातिहार्य,
७ भगवंतना विहारादि अवसरे आकाशमां अदृश्य
दुंदुभिरूप प्रातिहार्य.
८ अर्जुन सुवर्णनी सळीओवाळा मोतीओना गुच्छा
समेत अनेक सफेद पुष्पमालाओथी वीटायेल श्वेत
दिव्य वस्त्रमय छत्रत्रयरूप प्रातिहार्य ए आठ
प्रातिहार्यों तथा.
९ लोकालोकप्रकाशकरनार श्रीकेवलज्ञानरूपज्ञानातिशय
१० सुर असुर मनुष्यादिए करेलीसमवसरण प्रातिहाया-
दि स्वरूप विशिष्ट पूजातिशय,
११ देव, मनुष्य, तिथंच सर्वनी भाषाने अनुसरती सकल
संशयने उच्छेद करनार, पांत्रीश गुणोए शणगारायेल
वाणीरूप वचनातिशय.
१२ पोताना घातीकोरूप कष्टनिवारण थया तथा
.

(३८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
परनाअपायना निवारण करवा स्वरूप अपायापगमा-
तिशय ए चार मूलातिशय,आ बार गुणोथी विभूषित
श्री अरिहंत भगवंतने मारो नमस्कार थाओ,
शक्तिवंतधनाढ्य पुरूषोए स्वस्तिक उपर वार हीरा
मुकवा, बीजा पण फल नैवेद्य विगेरे मूकवा, सोना-रूपा
नाणु विगेरे यथाशक्ति मूक.
सिद्धचक्रने दिवसे आठ माणेक मुकवा.
आचार्यपदने दिवसे ३६ गोमेदक रत्न अगर
३६ सुवर्ण फूल मुकवा.
उपाध्यायपदने दिवसे २५ मरकत मणि मुकवा.
साधुपदने दिवसे २७ श्याममणि मुकवा.
दर्शनपदने दिवसे ६७ उज्ज्वल मोती स्वच्छ
मोटा
मुकवा.
ज्ञानपदने दिवसे ५१ उज्ज्वल मोती स्वच्छ मोटा
मुकवा.
चारित्रपदने दिवसे ७० उज्ज्वल भोती स्वच्छ
मोटा मुकवा.

काउसग्ग विधि ॥ (३९) तपपदने दिवसे ५० उज्ज्वल मोती स्वच्छ मोटा मुकवा. वळी श्रीफल,द्राक्ष,नारंगी,बीजोरा,दाडम, केळां, बदाम विगेरे फळो, ला, पेंडा विगेरे नैवेद्य छती शक्तिए दररोज जुदीजुदी जातनुं मुकबु, जो दरेक दिवसे करवा शक्ति न होय तो दरेक ओळी दीठ एक एक दिवस .करवू, छेवटे बनी शके तो एक ओळी तो संपूर्ण विधिसमेत आराधवी. ॥ काउस्सग्ग विधि.॥ पूर्वोक्त विधिए खमासमण दइ उभा थइ पगना वचगाळाने त्रणवार पुंजतो जिनमुद्राए पग राखी योगमुद्राए हाथ राखी गुरु आदेश पूर्वक प्रथम 'इर्यावहिया प्रतिक्रमी (पडिकमी) खमाण इच्छा १ इरियावहिया ए कांइ सामान्य क्रिया नथी शुद्ध उपयोग पू. र्वक इरियावही पडिकमनार कठिन कर्मोनी निर्जरा करे छ, अब- विज्ञान अने केवलज्ञान जेवी विशिष्ट स्थितिए पहोंचे छे. आ इरि- यावहिनो अर्थ विचारवामां आवे तो आमां एकेन्द्रियथी मांडी यावत् M Ann...ANAK (४०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ दुवालसगुणविभूसियसिरिअरिहंतपयाराहणत्थं (द्वाद- शगुणविभूषितश्रीअर्हत्पदाराधनार्थ) काउस्सग्गंकरेमि- पंचेन्द्रिय सुधीना जीवोनी विराधनाना मिच्छामिदुक्कडं आवे छे जेनी संख्या १८२४१२० थायछे, 'जे मे जीवा विराहिया एगिंदिया बेइंदिया तेइंदिया चउशिंदेया पंचिंदिया' जे मे जीवो विराध्या एकेन्द्रिय थी यावत् पंचेन्द्रिय सुधी,अहीं एकेन्द्रियथी पंचेन्द्रिय सुधीना ५६३ जीवभेद लेवा, एकेन्द्रिय २२. पृथ्वीकाय (४) सूक्ष्म अपर्याप्त, सूक्ष्म पर्याप्त, वादर अप०,वा०प०. एवं अप्काय' (४) तेउकाय(४). वायुकाय (४). साधारण वनस्पतिकाय (४). आगळना तमाम जीवो बादर ज होय छे जेथी प्रत्येकवन०.अप० (१) प्रत्येक वन० ५० (२).दीन्द्रिय २.अप० द्वी०.१.प०द्वी २.त्रीन्द्रिय २.चतुरि०२. पंचेन्द्रियतिथंच २०. जलचर (४) सम्मू० अप०, सं०प०, गर्भज अप०, गर्भज पर्याप्ता. चतुष्पद (४). उरस्परिसर्प (४). भुजपरि० (४). खेचर (४). नारक १४. सात अप०, सात प०. मनुष्य ३०३ पांच भरत, पांच औरवत, पांच महाविदेह, ए १५ कर्मभूमि, पांच हिमवंत, पांच हिरण्यवंत, पांच हरिवर्ष, पांच रम्यक, पांच देवकुरु, पांच उत्तरकुरु, ए ३० अकर्मभूमि, छप्पन अंतद्वीप, कुल १०१. सम्मू० मनु० अपर्याप्ताज होय माटे ते १०१, अनेगर्भज अप०१०१ पर्याप्ता १०१(३०३).देवता १९८,दश भुवन- पति, पंदर परमाधामी, ८ व्यंतर, ८वाणव्यंतर, १० तिर्यग् जुंभक, ५ चरज्योतिष, ५ स्थिर ज्यो०, ३ किरिवषिक; वार देवलोक, ९ . . m . काउसग्ग विधि ॥ (४१) ( जो गुरुनी जोगवाइ होय तो गुरु आदेश आपे ' करेह । इच्छं, दुवालसगुणविभूसियसिरि लोकान्तिक, ९ ग्रैवेयक, ५ अनुत्तर, (१०, १५, ८, ८, १०, ५, ५,३,१२,९,९,५,कुल ९९). अप० ९९, पर्या० ९९ (१९०) सर्व भळी जीवभेद (२२, २, २, २, २०,१४,३०३, १९८) ५६३ विराधनाना ' अभिहिया' सामा आवता हण्या १, 'वत्तिया धृळे ढांकया २, 'लेसिया' जमीन साथे घस्यां ३, 'संघा- इया' शरीरे शरीर एकठा कर्या. ४. संघट्टिया' स्पर्शथी दृहव्या ५, 'परियाविया' परिताप्या ६, 'किलामियां' मृतप्राय कर्या ७,'उद्दविया'त्रास पमाडया ८, ठाणाओ ठाणं संकामिया' एकस्थानथी वीजे स्थाने मूक्या ९, 'जीवियाओ वव- रोविया' माणथी जुदा कर्या (मार्यो) १०, ए दश भेदे गुणतां ५६३०, रागद्वेषथी विराधना थाय छे माटे राग अने द्वेष वेथी गुणतां .११२६०, मन वचन कायाए विराधना कराय छे जेथी ए त्रणे गुणतां ३३७८०,करवू करावq अने अनुमोद, ए त्रण विराधनाना भेदो होवाथी त्रणे गुणतां १०१३४०, वर्तमान अतीत अने अना- गत ए त्रण काले गुणतां ३०४०२०, ते विराधनाने अरिहंत सिद्ध साधु देव गुरु आत्मा ए ६ साक्षिए मिच्छामि दुक्कडं होवाथी ६ ए गुणतां १८२४१२० भेद थाय छे. विचारसित्तरीमा उपयोग अने अनुपयोगे विराधना थती होवाथी ते वे भेदे गुणतां ३६४८- २४० भेद पण वताच्या छः (४२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। अरिहंतपयाराहणत्थं करेमि काउस्सग्गं वंदणवत्तिक अन्नत्थ० वार लोगस्स'चंदेसु निम्मलयरा' सुधी काउ- सग्ग करवो. यथाशक्ति उभा उभा काउसग्ग करवा उपयोग राखवो अने तेमां 'जिनमुद्राए' उभा रहेवू एटले बेउ पगना आगळना पंजाना भागमा [चार आगळy ] अंतर राख. अने पाछल प्हानीना भागमा किंचिन्न्यून चार आंगळy' अंतर राख. डावा हाथमां चरवळो अने जमणा हाथमां मुहपत्ती राखवी, काउसग्ग माटे तेना आगारो तथा दोषो तरफ खास उपयोग राखवो, काउसग्गमा आगार शिवाय अंग बीलकुल चलावq नहि, केटलाक संख्या गणवा माटे आंगलीना वेढा गणवा, होठ फफडाववा विगेरे करे छे, परन्तु तेम करवाथी दोष लागे छे वास्तविक री- तिए अंदर जीभ पण हालवी जोईये नही.दांते दांतनो स्पर्श करवो नही, इत्यादि खास उपयोग राखवानी आवश्यकता छे. काउसग्ग पारी प्रकट लोगस्स कही खमान्दइ अविधिआशातना मिच्छा मि दुक्कडं कहे, नव चैत्यवंदन विधि ॥ ॥ नव चैत्यवन्दन विधि.॥ ऋद्धिमंत भाग्यवान् जीवे दरेक मन्दिरे तेना उपयोगी पूजोपकरण कलश. धूपधाणुं, पूजानीवाटकी, फूलछाबडी, केसर, सुखड, वाळाकुंची, बरास, वरख विगेरे तमाम यथासंपत्तिए लइ जवा तभुनी स्तुत नैवेद्यसोनानाj,रूपानाणुं विगेडे, वाशक्ति करी चैत्यवन्दन त्सवसहित दीन, अनाणमुद्रानो विधि साचववो, योग- जइ विधि साचतमुद्रा, जिनमुद्रा, योगमुद्रा'एटले बेउ करवू. सर्व म्आंगलीओ मांहेमांहे अन्तरित करी कम- एक मन्डि आकारे बेड हाथ पेट उपर कूणीओ रहे स्वस्शिखवा, आ मुद्राथी प्रभु प्रत्ये आपणी नम्रता अछे, प्रभु गुणनी अधिकतानो भास थाय छे, अने यथार्थ एकतानवृत्ति थाय छे, 'मुक्ताशुक्तिमुद्रो' एटले मोती उत्पन्न थवानी छीपना जोडानाआकारे बेउ हाथ सरखा गर्भित राखी ललाट (कपाल)ना मध्यभागे लगाडवा, बीजा आचार्य मध्यभाग आगल राखवा (४४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। संबंधी तमाम चिन्तानो त्याग करी हुं प्रवेश करूंछु. त्यारबाद दहेरासर संबंधी संभाळवार्नु कार्य (आशातना विगेरे दूर करवू इत्यादि) संभाळी बीजी नीसीही कही ते संबंधी चिन्तानो हवे आगळ गभारा पांसे आवता त्याग कयों अने चैत्यवन्दन करवा बेसता भावस्त- आंगळy] अतीत करवा त्रीजी नीसीही बोलवी, किंचिन्न्यून चार आंगळ अभष्टिमां आवे के तुरत हाथमां चरवळो अने जमणा हाथरणाम करवो, त्रण काउसग्ग माटे तेना आगारो तथा दापरणमांप्रभुना उपयोग राखवो, काउसग्गमा आगार विचार तरफ बीलकुल चलावq नहि, केटलाक संख्या गणरी. आंगलीना वेढा गणवा, होठ फफडाववा विगेरे छे, परन्तु तेम करवाथी दोष लागे छ वास्तविक अह तिए अंदर जीभ पण हालवी जोईये नही. दांते दांतनो स्पर्श करवो नही, इत्यादि खास उपयोग राखवानी, आवश्यकता छे. काउसग्ग पारी प्रकट लोगस्स कही खमा०दइ अविधि आशातना मिच्छा मि दुक्कडं कहे. , नव चैत्यवंदन विधि । (४५) सेवq नहि, 'आशातना' एटले के आय-सम्यग्दर्शनादि निज गुणोनो लाभ, तेनी शातना-खंडना एटले विनाश थवो, आ आशातनानो सामान्य अर्थपण जोतां तेमां आत्माने हानि थाय छे माटे ते स्थान सेवq नही, प्रभुनी सन्मुख गभाराद्वारे उभा रही प्रभुनास्वरूपर्नु चिन्तवन करी असाधारण गुणसूचक प्रभुनी स्तुति करवी, पछी स्वस्तिकादि यथाशक्ति करी चैत्यवन्दन करवू, चैत्यवन्दनमा त्रणमुद्रानो विधि साचववो, योग- मुद्रा, मुक्ताशुक्तिमुद्रा, जिनमुद्रा, योगमुद्रा एटले बेउ हाथनी दशे आंगलीओ मांहेमांहे अन्तरित करी कम- ळना डोडा आकारे बेउ हाथ पेट उपर कूणीओ रहे तेम राखवा, आ मुद्राथी प्रभु प्रत्ये आपणी नम्रता थाय छे, प्रभु गुणनी अधिकतानो भास थाय छे, अने यथार्थ एकतानवृत्ति थाय छे, 'मुक्ताशुक्तिमुद्रो' एटले मोती उत्पन्न थवानी छीपना जोडानाआकारे बेउ हाथ सरखा गर्भित राखी ललाट (कपाल)ना मध्यभागे लगाडवा, बीजा आचार्य मध्यभाग आगल राखवा

(४६)
नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।
पण लगाडवा नहि तेम कहे छे. स्त्रीओए हाथ उंचा
करता स्तनादि अवयवो देखाय तेम थq न जोईथे,
जिनमुद्रा एटले बेउपग आगलनी आंगलीओना भाग
(पहोंचा)नुं अंतर चार आंगल थाय अने पाछलनी
प्हानीओनुं अंतर किंचिन्न्यून थाय तेवी रीते राखी
उभा रहे.
मुद्राओनो उपयोग.
स्तुति स्तोत्र, खमासमण, चैत्यवन्दन,शकस्तव
(नमुत्थुणं) स्तवन विगेरे सूत्रो योगमुद्रा साचवी
बोलवाना छ
चैत्योनी वन्दनानुं सूत्र
"जावंति
चेइआइं” मुनिवन्दन सूत्र जावंत केवि साहू
अने प्रार्थना सूत्र “जयवीयराय-आभवमखंडा” सुधी
ए सूत्रो मुक्ताशुक्तिमुद्रा साचवी बोलवाना छे.
वांदणादेवा,अरिहंत चेईयाणं विगेरे कार्योंत्सर्गना
सूत्रो बोलवा, काउस्सग्ग करवो विगेरेमां जिनमुद्रा
साचववानी छे.
,
प्रणिधानसूत्र

गुरुवंदन व्याख्यानश्रवण प्रत्याख्यान ग्रहणविधि (४७)
चैत्यवन्दन करता बनता सुधी जे प्रभु सन्मुख
चैत्यवन्दन करता होईए तेमनुंज चैत्यवन्दन, स्तवन,
स्तुति बोलवी.
चैत्यवन्दन करता वर्ण-अर्थ अने आलबंननो
अवश्य उपयोग राखवो जेनुं स्वरूप प्रथम का छे..
स्वस्तिकादि तथा चैत्यवन्दनादि प्रभुभक्तिमा
लीन थता आत्माओने ते समये धर्मना चारे अंग
दान, शील, तप अने भावनी समकाले आराधना
थाय छे. आश्रव कषायादि कर्मवन्धना साधनोनो
त्याग थाय छे, तथा किंचिदंशे भव्यजीवोने बारे
व्रतोनी पण आराधना थाय छे. तथा सम्यक्त्वशुद्धि,
दृढता तथा वृधिनुं तो मुख्य साधन छे.
गुरुवन्दन व्याख्यानश्रवण प्रत्याख्यान ग्रहणविधि,
प्रभु दर्शन-पूजन जेटवू अगत्यर्नु छे तेटर्बुज
गुरुवन्दन पणं खास अगयत्यनुं छे माटे गुरुना
स्थानमा आवी विधिपूर्वक गुरुवन्दन करवू, स्वस्तिक

(४८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ करवा पूर्वक गुरुमुख कमलथी श्रवण विधिपूर्वक श्री- सिद्धचक्र महाराजनामाहात्म्यनु,संसारनी असारतार्नु, पोतानी सामाचारी, विगेरे मुक्तिमार्गने देखाडनालं. व्याख्यान श्रवण करवं, विधिसहित प्रत्याख्यान ग्रहण, करवं, प्रत्याख्यान ग्रहण करतां दायक-ग्राहकनी जाणग--अजाणगनी चउभंगी खास ध्यानमा राखी आराधक भांगो लेवो, प्रत्याख्यानमां म्हारे केवी रीते वर्त्तवं, शो त्याग कयों आवा शा शा आगारो छे विगेरे तमाम समजवा उपयोग राखवो, प्रभातमा प्रतिक्रमण वखते, दहेरासरे चैत्यवंद- न कर्या पछी प्रभुसमद पञ्चक्खाण ग्रहण कयु छे तो पण गुरुसमक्ष लेवानी खास जरुर छे, मनमां दृढ- नियम कयों होय तो पण शास्त्रोक्त सूत्रोच्चार सहित गुरु समक्ष लेवाथी सील मारवामां आवे छे. स्वस्थाने आवी पूजा सामग्री तैयार करी स्नान करवू, स्नाननुं पाणी कोइ वासणमां झीली लेवू के विधिए स्नान करे, हम्मेंशा स्नान परनालवाला , राखवा, श्री सिद्धचक्रना यंत्रनी पुनः धूपादियी पूजा करवी. (४९) जमीनथी उंचा बाजोठ. उपर स्नान करे, जेथी तेनो रेलो जवाथी, कीडी, कुंथुआ, लीलफुल आदि कोइ जीवनी विराधना न थाय अने ते पाणी निर्जीव शुद्ध स्थंडिल भूमि जोइ छुटुं छुटुं परिठवके जेथी तुरतमा सुकाइ जवाथी संमूर्छिम जीवोत्पत्ति तथा लीलफूल विगेरे थवानो संभव न रहे, शरीर लोही नाखी निर्जल थये बीजुं वस्त्र फेरवी शुद्ध सफेद बी जाए नहि वापरेल पवित्र वस्त्रो पूजा माटे पूजामां रेशमी दुकूल-वस्त्रो बीजा उत्तम वर्णना होय तो पण चाले छे. स्त्री अने पुरुषोना वस्त्रोमांबीलकुल फेर- फार करवो नहि, फाटेला सांधेला मेला वापरवा नहि वस्त्र शुद्धि राखवी. अंग वसन मन भूमिका, पूजोपकरण सार। न्यायद्रव्य विधिशुद्धिता, शुद्धि सात प्रकार ॥१॥ ए सात शुद्धिनो बनतो उपयोग राखवो, अंग, अग्र, भाव विगेरे अनेक पूजा भेदोनुं स्वरूप समजी जेम विशिष्ट पूजन थाय तेम वर्तवू, जेजे पदाराधननो दिवस होय ते ते दिवसे ते ते पदनी विशिष्ट पूजा करवी विगेरे,संपूर्णविधि साचववासाथेपूजाअष्टप्रकारी आदि विस्तारथी करवीश्री अरिहंतपदनी विशेष पूजा करवी.

नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। " ॥ श्री सिद्धचक्र यंत्रनी पुनः धूपादिथी पूजा करवी.॥ मध्याह्नकाले पुनः देववंदन आठ थोइए करवं. देववंदनमा श्री तीर्थकर देवना चारे निक्षेपानीआरा- धना तथा ज्ञानादि गुणोनी, तीर्थादिनी आराधनाओ थाय छे. देववंदनना बार अधिकारोनो घणो विचार समजवा लायक छे. उही नमो अरिहंताणं” ए मंत्र जाप पदनो बे हजार [ वीश नवकारवाळी ] जाप करवो, पच्चक्खाणनो टाइम थये पच्चक्खाण पारवं. ॥ पच्चक्खाण पारखानो विधि. ॥ खमा० इरियावही पडिक्कसी खमा० इलाकारण संदिसह भगवन् चैत्यवंदन करूं ? इथं, जगचिन्ता- सणिथी यावत् जयवीयराय सुधी चैत्यवन्दन कर, खमा० इबा० सझायं करूं, इडं नवकार गणी "सह- जिणाणं आणं” ए पांच गाथानी सज्झाय (आ सज्झायमां श्रावकनी उत्तम करणीनुं स्वरूप बतावेवं -

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पचख्खाण पारवानो विधि ।।.
(५१)
छे ते खास विचारवा लायक छे तेमांनी आपणी
शक्ति अनुसार केटली करणी करी अने हवे केटली
बाकी छे ते खास स्मरणमा राखी यथोचित अवसर
मळ्ये ते ते करणीओ करवा प्रयत्न करवो) करवी.
खमा० इच्छा० मुहपत्ती पडिलेहुं, इच्छं, कही
मुहपत्ती पडिलेहबी, स्त्रमा० इच्छा० पच्चक्खाण पारं
'यथाशक्ति' खमा० इच्छा० पच्चक्वाण पायु, 'तहत्ति
कही, मुट्ठि सहित जमणो हाथ चरवळा उपर स्थापी
एक नवकार गणी "उग्गए सूरे नमुक्कारसहियं पोरिसी
साढपोरिसी सुरे उग्गए पुरिम सुट्टिसहियं पच्च-.,
क्खाण कर्यु चोबीहार आयंबिल एकासखं पच्चखाण
कर्यु तिविहार पच्चखाण फासियं पालियंसोहियं
१ 'फासियं' लीधेलु पच्चक्खाण तेना काल मुघी सारी
रीते स्पर्म्यु (आराध्यु.)
२ 'पालियं पच्चक्खाणनोकाळ पूरोन याय यांमुधी वारंवार
संभारी साचव्यु.
३ 'सोहियं ' गुर्वा दिने निमंत्रण करी व्होरावी वापरवाथी
शोभाव्यु.

(५२) नवपद विधि विगेरे संग्रह । तीरियं रकिट्टियं श्आराहियं जं च नआराहियं तस्स " मिच्छामि दुक्कडं " आप्रमाणे पाठ बोली पच्चक्खाण पार. एक नवकार गणवो, आयंबिलना पच्चक्खाणनी साथे काल संबंधी पोरिसी, सालपोरिसी, पुरिमह, अवह विगेरे पोतानी शक्ति प्रमाणे-पच्चक्खाण छे, एकवार भोजन- एका- सण पच्चक्खाण छे, प्रासुक पाणीनुं पाणस्सनु. पच्च- क्खाण छे, ते साथे मुट्ठिसहियं, पोते धारेलं गंठसहि- यादि पच्चक्खाण छे. । १ 'तीरियं' काल पूर्ण थया पछी तेनी शुद्धि माटे थोडा अधिक काल सुधी सवुर राखीने पारवाथी पार उतायु २ "किहियं वापरती वखते आज म्हारु अमुक पच्चख्खाण हतुं ते में संपूर्ण आराध्यु, हवे हुं वापरुं छु तेम पच्चक्खाणनी स्तवना (स्मरण) करवाथी वखाण्यु. ३ 'आराहियं ' आ म्हारं पच्चक्खाण : उपर प्रकारनी सव- शुद्धि सहित श्री जिनाज्ञा पाळवा पूर्वक फलाशंसा रहितपणे केवळ कर्मक्षयनी अभिलाषाथी कर्यु छे. - पञ्चक्खाण पारवानो विधि ॥ (५३) पछी आहार (आयंबिल) करवाना स्थानके आवी श्रीसिद्धचक्र भगवान्नुं ध्यान धरतो छतो ब- नता सुधी 'उत्कृष्ट आयंबिलनाप्रकारवालु तथा श्री अरिहंतप्रभुनुं ध्यान तथा सात्त्विक वृत्ति रहेवा माटे उज्ज्वलवणे चोखानुं आयंबिल करे, आयंबिल करता आहार करता जे विधि प्रथम बताव्यो छे ते उपर खास लक्ष्य राखq. आयंबिल कर्या बाद स्वच्छ म्हों (मुखशुद्धि) करी ठाम चउविहार बनी शके तो ते, नहि तो ति- विहारनुं पच्चक्खाण करे, साथे उपयोगनी तीव्रता माटे मुंठिसहियादि पच्चक्खाण करवं, त्यारबाद पाणी पीयूँ होय तो चैत्यवन्दन करी, जो मुठिसहियादि पच्चख्खाण होय तो ते नवकार गणी पारी पाणी यीवं, पुनः मुठिसहियादि पच्चक्खाण करी लेवू, आ १ आयंविलना प्रकारो गीतार्थ गुरुमहाराज पासे समजी यथाशक्ति उत्कृष्ट थाय तेवो उपयोग राखवो, उत्कृष्ट न थइ शुके. जो पण यथाशक्ति आराधना अवश्य करवी.. 4.

"
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(५४)
नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
प्रमाणे करवाथी उपयोगनी तीव्रता साथे विशेष ला-
भर्नु कारण विरतिपणुं आत्माने रहे छे.
॥शेषकालनुं कर्तव्य.॥
आ दिवसोमांजेम बने तेम प्रमाद सेववो नहि,
विकथा करवी नहि.कषायने अवकाश आपवो नहि अने
श्री सिद्धचक्र भगवान्नुं अपूर्व माहात्म्य हृदयमां स्फु-
रायमानथाय, तेमनाध्यानमांआत्मानी विशेष लीनता
थाय तेमाटे तेमनुं आराधन करनारश्रीपालमहाराजना
चरित्रगर्भित श्री श्रीपालमहाराजनो रास वाचवो
अगर सांभळवो, तेनी अर्थविचारणा करवी. सांजवें
यडिलेहण करवू, देववन्दन कर,
देववन्दन कर्या बाद पाणी पीवातुंनथी, सन्ध्या
कालनी आरती, धूप, दीप विगेरे पूजा करवी, श्री
सिद्धचक्र यंत्रनी पण संध्याकाले धूपादि यथोचित
पूजा करवी, सांझे दैवसिक प्रतिक्रमण करवं, प्रति-
क्रमण कया बाद गुरुमहाराजश्रीनी जोगवाई होय

पचक्खाण पारवानो विधि ।
(५५)
तो गुरुशुश्रूषा करवी, श्री अरिहंत प्रभुतुं ध्यानादि
स्वरूप विगेरे धर्मकथा करवी,
प्रहर रात्रिलगभगथये संथारा पोरिसीसांभळवी
संथाराविधि उपर लक्ष्य राखी ते प्रमाणे वर्तवू, पो-
ताना आराधन करेला दिवसनी सफलता मानतो,
श्री पंचपरमेष्ठि मंत्रनोजाप करतो संथारो पाथरवानी
जग्या चरवलाथी प्रमार्जी संथारीयु, उत्तरपट्टो पाथरी
श्री अरिहंत प्रभुनुं शुक्लवणे ध्यान करतो तेमनागुणोने
हृदयमां भावतो अल्प निद्रा करे,
॥ इति प्रथम दिवस कर्तव्य विधि।

॥श्री सिद्ध पदाराधन बीजा दिवसनु कर्तव्य.॥ उपर प्रमाणेज जागृत थयाथी तमाम कृत्य समजवु, मात्र आज सिक परमात्मानुं ध्यान करवानुं छे, अ- विनाशि स्वभावनो बोध आपवारूप भव्यजीवो उपर असाधारण उपकार करनार सिद्ध परमात्मा सकल कर्मरहित थइ केवी शुद्ध अवगाहनामां त्यां बीराजमान छे, तेमना आत्मानी साथे पोताना आ- मानो भेदाभेद चिन्तववो, तेमना ज्योति स्वरूप रूपातीत अवस्थाना. शुद्ध ध्यानमा आत्माने तन्मय बनाववो, .

श्री सिद्ध भगवंतना गुणोनो विचार ॥ (५७) ॥ श्री सिद्ध भगवंतना गुणोनो विचार. जो के कर्मक्षयना योगे सिक परमात्माना अ- नन्त गुणो प्रकाशित थयेला छे, तो पण महापुरुषोए ध्यान करवाने माटे एकत्रीश गुणोनो अथवा पंदर भेदे सिद्ध थता होवाथी पंदर भेदोना जाप विगेरे विधि अन्य तप विगेरेमां आवे छे, तो पण अहीं आठ कर्ममलथी लेपायेल आत्मा ते कर्मना क्षयथी कया कया गुणने प्राप्त करे छे तथा आत्मानुं निलित दशा- नुं स्वरूप के होय ते विगेरे ध्यान करवा तथा आ- स्माने ते ध्यानमां लीन करवा आठ कर्मक्षयथी ऊप- जेल आठ गुणोनुं ग्रहण कराय छे. गे ॥ सिद्धपदना ८ गुणो॥ एक एक कर्मना क्षय थकी, नीपन्यो गुण एक एक। आठ गुणे इम प्रणमीये, सिह प्रभु सुविवेक ॥१॥ - . (५८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। अनन्तं केवलज्ञान, ज्ञानावरणसंक्षयात् । अनन्तं दर्शनं चापि, दर्शनावरणक्षयात् ॥ १॥ क्षायिके शुद्धसम्यक्त्व-चारित्रे मोहनिग्रहात् । अनन्ते सुखवीय च, वेद्यविनक्षयात्क्रमात् ॥२॥ आयुषः क्षीणभावत्वात्, सिद्धानामक्षया स्थितिः। नामगोत्रक्षयादेवाऽ-मूर्तानन्तावगाहना ॥३॥ आ प्राचीन श्लोकोथी सिद्ध परमात्माना आठ गुणो बताव्या छे, जो के उपरोक्त श्लोकोमांमोहनीय क्षयथी सम्यक्त्व १ अने क्षायिकचारित्र २ ए बे गुणो. बताव्याछे, अने नाम तथा गोत्र ए बेउ कर्मनाक्षयथी 'अमूर्त अनन्त अवगाहना' नामनो एक गुण बता- व्यो छे, संख्यामां गुण ८ छे, परन्तु बीजा अनेक स्थ- लोए मोहक्षयथी उत्पन्न थयेल बेउराणने एकजलीधा छे,अने नाम कर्मक्षयथी अरूपी गुण अगोत्रक्षयथी अगुरुलघुस्वभाव गुण एम जुदा जुदा बे गणाव्या छे.. अने तेज प्रमाणे अहीं पण खमासमण देवामा ते मुजब गुणो गणाव्या छे.

सिद्धना ८ गुण-गर्भित नमस्को पदोना अर्थ॥ (६१), ॥ सिद्धपद नमस्कारपूर्वक सिद्ध स्वरूपमा करवानुं लीनता स्वरूप सूचक, खमासमणना दूहाओ रे. गुण अनन्त निर्मल थया, सहज स्वरूप ऊजास । अष्ट कर्म मल क्षय करी, भये सिद्ध नमो तास॥१॥ रूपातीत स्वभाव जे, केवल दंसण नाणीरे । ते ध्याता निज आत्मा, होय सिद्ध गुण खाणीरे॥२॥ वीर जिनेश्वर उपदिशे० ॥ सिद्धना ८ गुणगर्भित नमस्कार पदो, १॥ज्ञानावरणीयकर्मक्षयोद्भूतानन्तज्ञानगुणविभूषिते-- भ्यः श्रीसिद्धेभ्यो नमः॥ २॥दर्शनावरणीयकर्मक्षयोद्भूतानन्तदर्शनगुणाविभूषि- तेभ्यः श्रीसिद्धेभ्यो नमः॥ ३॥वेदनीयकर्मक्षयोभूताव्यावाधसुखगुणविभूषितेभ्यः श्रीसिद्धेभ्यो नमः॥

(५८) 'नवपद विधि विगेरे संग्रह। अनन्तं कर्मक्षयोद्भूतानन्तसम्यक्त्वचारित्रगुणवि- अषतेभ्यः श्रीसिद्धेन्यो नमः॥ ५॥ आयुष्कर्मक्षयोद्भूतादयस्थितिगुणविभूषितेभ्यः श्रीसिद्धेभ्यो नमः॥ ६॥ नामकर्मक्षयोद्भतारूपित्वादिगुणविभूषितेभ्यः श्रीसिद्धेभ्यो नमः॥ ७ ॥ गोत्रकर्मक्षयोद्भूतागुरुलघुगुणविभूषितेभ्यः श्री- सिद्धेभ्यो नमः ॥ ८॥अन्तरायकर्मक्षयोद्भूतानन्ताकरणवीर्यगुणविभूषि- तेभ्यः श्रीसिद्धेभ्यो नमः॥ काउस्सग्ग वखते — अडगुणविभूसियसिरिसिद्ध- पयाराहणत्थं काउस्सग्गं करेमि' (अष्टगुणविभूषित- श्रीसिद्धपदाराधनार्थ) आ प्रमाणे बोल जापमा 'ओ ही नमो सिद्धाणं' जप, सिद्धपदनुं विशेष पूजन करवू, बाकी तमाम विधि पूर्वनी माफक जाणवो, सिद्धगुणोनी भावना रहेवा माटे नमस्कार पदोना अर्थ। (६१) मात्र श्री सिद्ध परमात्मानुं रक्तवर्णे ध्यान करवानुं. होवाथी आयंविलमां पण रक्तवर्ण घउंनुं द्रव्य लेवु. श्री सिद्धगुणोनी हृदयमां भावना रहेवा माटे नमस्कार पदोना अर्थ १ ज्ञानावरणीय कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल, अनन्त ज्ञान (केवलज्ञान) गुण. २ दर्शनावरणीय कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल अनन्त केवल दर्शन गुण, ३ वेदनीय कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल अव्यावाध सुख गुण. ४ मोहनीय कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल क्षायिक सम्यक्त्व अने अनन्त चारित्रगुण, ५ आयुष्य कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल अक्षय स्थिति (फरी पार्छ आवतुं न होवाथी) गुण, ६ नाम कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल अनन्त अवगाह- ना सहित अमूर्त गुण, . (६२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। ७ गोत्र कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल अनन्त अवगा- हना सहित अगुरुलघु गुण. ८ अन्तराय कर्मना क्षयथी प्रकट थयेल अनन्त अ- करण [आत्मिक] वीर्य प्रभृति गुण. आ आठ गुणोथी विभूषित श्री सिद्धभगवानने नमस्कार थाओ.

ॐ आचार्यपदाराधन त्रोजा दिवसर्नु कत्तव्य. श्रीआचार्यपद माहात्म्य तथा तेमना गुणोनो विचार, पांच आचारना शुद्ध स्वरूपने आराधन करी बताववा रूप उपकारथी ध्यान करवा योग्य श्री आ- चार्यभगवंतना अनेक गुणो पैकी छत्रीश छत्रीशीओ मुख्य छे, संबोधप्रकरणमां श्री हरिभद्रसूरि भगवंते तेथी पण वधारे छत्रीशीओ गणावी श्री आचार्यभग- वंतना गुणोगाया छे. तेमनुं ध्यान करवा मुख्य छत्रीशी (३६ गुणो) ए जाप करवामां आवे छे. ॥श्री आचार्य पदना ३६ गुणो॥ पडिरूवाइ. चउद्दस, खंतिनाइय दसविहो धम्मो । वारस य भावणाओ, सूरिगुणा हुँति छत्तीसं ॥१॥ पडिरूवादिक चौदगुण, क्षान्त्यादिक दश धर्म । भावना बार छत्रीश/ए, सूरिगुणतुं मर्म, ॥१॥ १ (६४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। श्री आचार्यपद नमस्कार पूर्वक तन्मयतासूचक खमासमणना दूहा ॥ छत्रीश छत्रीशी गुणे, युग प्रधान मुणींद । निजमत परमत जाणता, नमो तेह सूरींद ॥१॥ ध्यातां आचारज भला, महामंत्र शुभ ध्यानीरे। पंचप्रस्थाने आतसा, आचारज होय प्राणीरे ॥१॥ ॥ वीर० ॥२॥ प्रदक्षिणा दइ स्वस्तिक करी खमा० देइ बोलवाना आचार्यपदना ३६ गुणगर्भित नमस्कार पदो. १ श्रीप्रतिरूपगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः २ श्रीतेजखितागुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः ३ श्रीयुगप्रधानागमगुणविभूषिताय श्रीआचार्यायनमः ४ श्रीमधुरवाक्यगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः ५ श्रीगाम्भीर्यगुणविभूषिताय श्रीआचायाय नमः ६ श्रधैिर्यसुबुद्धिगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः

आचार्य पदना गुण गर्मित नमस्कार पदो।
७ श्री उपदेशतत्परतागुणविभूषिताय श्रीआचार्याय
८ श्रीअपरिश्राविगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
९ श्रीसौम्यप्रकृतिगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१० श्रीसंग्रहशीलतागुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
११ श्रीअभिग्रहगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१२ श्रीअविकत्थकगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१३ श्रीअचपलतागुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१४ श्रीप्रशान्तहृदयगुणविभूषिताय श्रीआचार्यायनमः
१५ श्रीक्षमाधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१६ श्रीमार्दवधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१७ श्रीआर्जवधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
१८ श्रीमुक्तिधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचायाय नमः
१ए श्रीतपोधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचायाय नमः ..
२० श्रीसंयमधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः
२१ श्रीसत्यधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचाथाय नमः।
२२ श्रीशौचधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचार्याय नमः

'नवपद विधि विगरे संग्रह ।। २३श्रीआकिंचन्यधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचायायनमः २४ श्रीब्रह्मचर्यधर्मगुणविभूषिताय श्रीआचायाय नमः २५ श्रीअनित्यभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्री- आचार्याय नमः २६ श्रीअशरणभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआ- चार्याय नमः २७ श्रीसंसारभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआ- चार्याय नमः २८ श्रीएकत्वभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआ- चार्याय नमः २९ श्रीअन्यत्वभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्री- आचार्याय नमः ३० श्रीअशुचित्वभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्री- आचायाय नमः ३१ श्रीआश्रवभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआ- चायाय नमः ३२ श्रीसंवरभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआ- चार्याय नमः प्राचार्य पदना गुंणगर्भित नमस्कार.पदो॥. (६७) ३३ श्रीनिर्जराभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआ- चार्याय नमः ܕ ३४ श्रीलोकस्वभावभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्री आचार्याय नमः ३५ श्रीबोधिदुर्लभत्वभावनाभावितत्वगुणविभूषिताय श्रीआचायाय नमः ३६ श्रीधर्मकथकार्हन्त एव इति भावनाभाषितत्वगुण- विभूषिताय श्रीआचार्याय नमः श्रीआचार्य भगवंतना ३६ गुणोनी हृदयमां भावना रहेवा नमस्कारपदोनो अर्थ. १ जेमना देखतां पूर्वमहापुरुषो श्री गौतमस्वामी आदि स्मृतिमां आवे तेवा स्वरूपवन्त होय ते प्रतिरूप गुण. २ सुर्य समान तेजस्वी प्रतापवंत ते तेजस्विता गुण, ३ युगप्रधान भगवंत समान ज्ञानवंत० ते युगप्रधा- नागम गुण.

(६८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। गुण. ४ अमृतसरखामधुरवचनवान् ते मधुर वाक्य गुण. ५ समुद्र सरखा गंभीरता गुणवान्० ० ते गाम्भीर्य ६ उत्तमबुद्धिनिधान धैर्यतावान्० ते धैर्य सुबुद्धि गुण. ७ उपदेश देवामांहमेशां परायण० ते उपदेश तत्परता गुण. ८ जेमने निवेदन करेली गुह्य वात होठ बहार जाय नहि ते अपरिश्रावि गुण. ९ चन्द्र समान सौम्य शीतल स्वभाववंत० ते सौम्य- प्रकृति गुण. १० गच्च हितने माटे जोइतो संग्रह करवाने स्वभाव- वंत० ते संग्रहशीलता गुण. ११ द्रव्य देोत्र काल भावथी विविध अभिग्रहधारी होय ते अभिग्रह गुण. १२ आत्मश्लाघा नहि करनार ते अविकत्थक गुण, १३ पर्वत सरखा चलायमान थाय नहि ते अचल स्थि- रता गुण.

आचार्य पदना गुणगर्भित नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (६९)
१४ वैराग्यरंजित हृदयवंत होय ते प्रशांत गुण,
१५क्षमाधर्मथी विभूषित० ते क्षमा गुण,
१६ कोमळता धर्मथी विभूषित० ते मार्दव गुण,
१७ सरळता धर्मथी विभूषित० ते आर्जव गुणं.
१८ बाह्यान्यन्तर परिग्रहथी मुक्त मुक्तिधर्मथी विभूषित०
ते मुक्ति गुण.
१९ बाह्याभ्यंतर बारभेदे तपधर्मथी विभूषित. ते
तपो गुण.
२० सत्तरप्रकारे संयमधर्मथी विभूषित० ते संयम गुण,
२१ सत्यता धर्मथी विभूषित० ते सत्य गुण,
२२ शुचिगुणपवित्रता संयममां निरतिचारपणारूप
धर्मथी विभूषित० ते शौच गुण.
२३ शरीर धर्मोपकरणादि विषेपण निर्ममत्व धर्मथी
विभूषित० ते आकिंचन्य गुण.
२४ नववाड सहित शुद्ध ब्रह्मचर्य धर्मथी विभूषित.
ते ब्रह्मचर्य गुण.

(७०) . नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। २५ शरीरादि सर्व अनित्य ते अनित्यत्व भाव- नाभावितत्व गुण. २६ मात पिता विगेरे. कोइy पण शरण नथी ते अश- रणत्वभावनाभावितत्व गुण. -२७ चतुर्गति संसार केवल दुःखनी खाण छे विगेरे संसारभावनाभावितत्व गुण, २८ जीव एकलो आव्यो छे एकलो जाय छे एकलो कर्म बांधे छे, भोगवे छे विगेरे एकत्वभावना० गुण. २९ शरीरांदि बाह्य वस्तुथी आत्मा भिन्न छे तेवी अन्यत्व भावना० गुण. ३० मलमूत्रनी खाण शरीर अशुचिनो भंडार बे तेवी अशुचित्व भावना० गुण. ३१ मिथ्यात्व अविरति कषाय अने योग विगेरे कर्म आववाना मार्ग छे ते आश्रव भावना० गुण. २२ समिति गुप्ति आदि कर्म अटकाववाना मार्ग २ ते संवर भावना० गुण. - आचार्य पदोनी भावना माटे नमस्कारपदोनो अर्थ ॥ (७१) ad ३३ बाह्य अन्यन्तर तप कर्म खपाववाना मार्ग छे ते निर्जरा भावना० गुण. ३४ चौदराज लोकनुं षड्द्रव्यादिनुं स्वरूप चिन्तववा रूप लोकस्वभाव भावना० गुण, ३५ सर्व वस्तु सुलभ पण केवली प्रणीत धर्मनी श्रद्धारूप बोधि दुर्लभ डे ते बोधि भावना० गुण ३६ धर्मना कहेनार श्री तीर्थंकर प्रभुज डे ते धर्म- कथक दुर्लभत्वभावना० गुण. आ ३६ गुणे विभूषित श्री आचार्य भगवंतने म्हारो नमस्कार थाओ श्री आचार्य पदाराधननो काउस्सग्ग पूर्वनी माफक जाणवो, मात्र “छत्तीसगुणविभूसिय सिरिआयरियपयाराहणत्थं काउस्सग्गं करोमि” (षट्- त्रिंशद्गुणविभूषितश्रीआचार्यपदाराधनाथ) आ प्रमाणे बोल, ३६ लोगस्सनो काउस्सग्ग करवो जा- पपद ओ ही नमो आयरियाणं" जपवू आ दिवसे श्री आचार्य पदमां जेम विशेष लीनता थाय तेम आचार्य गुणोनुं ध्यान स्मरण विशेष करवू.

(७२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। शेष तमाम विधि पूर्वनी माफक [ प्रथम दिव- सनी जेम ] जाणवो, मात्र शासनस्तंभ गच्छधोरी आचार्य भगवंतनुं ध्यान पीतवर्णे करवानुं होवाथी चणानी दाळना द्रव्यर्नु आयंविल कर उचित छे.

ॐ
श्री उपाध्यायपदाराधन
चतुर्थ दिवसनुं कर्त्तव्य.
श्री उपाध्याय माहात्म्य तथा तेमना गुणोनो विचार,
शास्त्रप्रतिपादित यथार्थ विधिसहित सकल
शास्त्राध्ययन पूर्वक शुद्ध चारित्राराधनमां लीन रही
केवल उपकारक दृष्टिथी साधुसमुदायने अनेक प्रकारे
संयम सेवनामां, मुक्तिमार्गमा साहाय्यता आपी पत्थर
समान जडबुद्धि शिष्योने पण शास्त्रप्रवीण बनावे,
उत्तम आचारमा सुविनीत नापजावे,तेवा आचार्य पदनी
योग्यतावान् सकल श्री संघना साहाय्यक श्री उपा-
ध्याय भगवंतना अनेक गुणो पैकी अगीयार अंग

..ivi (७४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। तथा चौद पूर्वना पाठकता रूप तेमना असाधारण पचीश गुणोनुं ध्यान तथा जाप विगेरे करी आत्माने तन्मय बनाववा आ दिवसनी आराधना छे.जो के श्री उपाध्यायजी भगवान्ना पचीश गुणोनी अनेक पचीशीओ शास्त्रमा वर्णवेली छे तो पण मुख्य उपरोक्त पचीशीर्नु अथवा अन्यत्र आराधनामां ११ अगीयार अंग १२ बार उपांग, १ धरणसित्तरी, १ करणसित्तरी [अथवा १ द्वादशांगी सूत्रपाठकता अने १ द्वादशां- ग्यर्थपाठकता,) रूप पचीशीनी आराधना कराय . .. श्री उपाध्याय पदना २५ गुणो. . . इक्कारस अंगाई, चउदस पुत्वाइं जो अहिजेइ । अज्झावेइ परेसिं, पणवीसगुणो उवज्झाओ ॥१॥ अंगं अग्यार भणे तथा, चउदं पूर्व वळी जेह । परने भणावे प्रेमथी, उपाध्याय गुण एह ॥१॥ , , उणावेभू- श्री उपाध्यायपदना नमस्कारपूर्वक खमासमणना दुहा ॥ (७५) :. श्रीउपाध्यायपद नमस्कारपूर्वक तन्मयतासूचक खमासणना दूहा. बोध सूक्ष्म विणु जीवने, न होय तत्त्व प्रतीत । भणे भणावे सूत्रने, जयजय पाठक गीत ॥२॥ . तप सज्झाये रत सदा, द्वादश अंगनो ध्यातारे। उपाध्याय ते आतमा जगबंधव जगभ्राता रे॥१॥वीर० ॥ श्री उपाध्याय भगवंतना २५ गुण नमस्कार पदो. ठनतत्परतागुणविभू- १ श्रीआचारांगसूत्रपठनपाठन तेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नम ठिनतत्परतागुणविभू- २ श्रीसूत्रकृतांगसूत्रपठनपाठन पः॥ भ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः॥ तत्परतागुणविभूषि- ३श्रीस्थानांगसूत्रपठनपाठनतत्परत श्रीउपाध्यायेज्यों नमः ॥ नतत्परतागुण- ४ श्रीसमवायांगसूत्र पठनपाठनतत्परतागु भ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः नमः ॥

४७६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
५ श्रीभगवत्यंगसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभूषिते-
भ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः
६ श्रीज्ञाताधर्मकथांगसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणवि-
भूतेन्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः ॥
७ श्रीउपासकदशांगसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू-
षितेभ्यः श्रीउपाध्यायेन्यो नमः ॥
अ. oी अन्तकृद्दशांगसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू-
[अथवा र धापीउपाध्यायेभ्यो नमः ॥ .
ग्यर्थपाठकता,) रू.
तिकदशांगसूत्रपठनपाठनतत्परता-
श्री उपाध्यायेभ्यो नमः
'गांगसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणवि-
उपाध्यायेभ्यो नमः
अज्झावेइ परे सूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभूषिते-
अंगं अग्यार"
पाध्यायेभ्यो नमः
परने भादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभूषिते-
.: श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः
श्री उपा
इक्कारस अंगाई.
--

श्री उपाध्यायपदना नमस्कारपदो ॥ (७७) १३ श्रीअग्रायणीयपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू- षितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः १४ श्रीवीर्यप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू- षितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः १५ श्रीअस्तिनास्तिप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परता- गुणविभूषितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः १६ श्रीज्ञानप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू- तेज्याश्री उपाध्यायेभ्यो नमः॥ ; १७ श्रीसत्यप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू- षितेभ्यः श्री उपाध्यायेभ्यो नमः॥ १८ श्रीआत्मप्रवादपूवसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू षितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः॥ १९ श्रीकर्मप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभूषि- तेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः॥ , २० श्रीप्रत्याख्यानप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुण- विभूषितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः ॥

नवपद विधि विगेरे संग्रह। २१ श्रीविद्याप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू- षितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः॥ २२ श्रीकल्याणप्रवादपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुण- विभूषितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः ॥ २३ श्रीप्राणावायपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणविभू- षितेभ्यः श्रीउपाध्यायेभ्यो नमः ।। २४ श्रीक्रियाविशालपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुणवि- भूषितेभ्यः उपाध्यायेभ्यो नमः ॥ २५ श्रीलोकबिन्दुसारपूर्वसूत्रपठनपाठनतत्परतागुण- विभूषितेभ्यः श्री उपाध्यायेभ्यो नमः ॥ ॥ श्रीउपाध्याय भगवंतना २५गुणोनी हृदयमां भावना रहेवा नमस्कार पदोना अर्थ ॥ १ श्रीआचाराग सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर. २ श्री सुयगडांग सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर; ३ श्रीठाणांग सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर, उपाध्यायपदना नमस्कार पदोना अर्थ ।। (७९.) ४ श्री समवायांग सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर, '५ श्री भगवतीअंग सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर. ६ श्रीज्ञाताधर्मकथांग सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर. ७ श्री उपाशकदशांग सूत्र भणवाभणाववामां तत्पर. ८ श्री अंतगडदशांग सूत्रमणवाभणाववामां तत्पर. ९ श्री अणुत्तरोववाइय सूत्रमणवा भणाववामांतत्पर, १० श्री प्रश्नव्याकरण सूत्र भणवा भणाववामां तत्पर, ११ श्री वियाकअंग सूत्र भषवा भणालवामां तत्पर. १२ एक क्रोड पदप्रमाण द्रव्यना उत्पाद, व्यय अने ध्रौव्यपणानुं स्वरूप बतावनार पहेलु उत्पाद- पूर्व भणवा भणाववामां तत्पर, २३ ९६ लाख पदप्रमाण, सर्व प्रकारना बीजनी कुल संख्या बतावनार बीलुं अग्रायणीय पूर्व भणवाभ- णाववामां तत्पर, १४ ७० लाख पदप्रमाण, वीर्य जे बळ-प्रयत्न तेनो अर्थ वीर्यवन्तनुं स्वरूप कहेनार त्रीनुं वीर्यप्रवाद भणवा भणाववामा तत्पर.

. ३ .. (८०) 'नवपद विधि-विगेरे संग्रह ।। १५.६० लाख, पदप्रमाण कुल अस्तिनास्तिस्वभाव- रूप सप्तभंगीने स्याद्वादनुं स्वरूप बतावनार चोथु अस्तिनास्तिप्रवाद पूर्व भणवा भणाववामां तत्पर. १६ एक उणा कोड पद प्रमाणमति विगेरे पांचे ज्ञानन ' 'स्वरूप बतावनार पांचमुं ज्ञान प्रवाद पूर्व भणवा भणाववामां तत्परः १७.एक क्रोडने छ पद प्रमाण सत्यादि भाषानुं स्वरूप अने भाष्यभाषक तेमज वाच्यवाचकनुं स्वरूप कहेनार छटुं सत्यप्रवाद पूर्व भणवा भणाववामा तत्पर. १८ छवीशकोड पदप्रमाण आत्मअव्यर्नु कर्तृत्व,भोक्तृत्व व्यापकत्व नित्य,अनित्यादि स्वरूप.कहेनार सातk ...आत्मप्रवाद पूर्व भणवा भणाववामां तत्पर. १९ एक क्रोडने एंशीलाख पद प्रमाण आठे. कोना बंध, उदय, उदीरणा विरोरेनुं स्वरूप कहेनार आ- ठमुं कर्मप्रवाद पूर्व भणवा भणाववामां तत्पर. २० ८४ लाख पद प्रमाण सर्व प्रकारना पच्चरकाणर्नु " श्री उपाध्यायनपदोनी भावना मोटे नमस्कार :पदोना अर्थ।। (८१) स्वरूप अव्य, भाव, निश्चय; व्यवहारथी उपादेय प्रमुख सर्व शैली वतावनार नवमुं पञ्चरकाणप्र- वाद पूर्व भणवा भणाववामी तत्पर. २१ एक क्रोडने दश लाख पद प्रमाण गुरु लघु अंगुष्ट सेना प्रश्नादि सातसें विद्याआनुं तेमज रोहिणी प्रमुख ५०० महाविद्याओगें स्वरूप वतावनार दशमुं विद्याप्रवाद पूर्व भणवा भणाववामा तत्पर. २२ छवीश क्रोड पदप्रमाण, सर्व ज्योतिष शास्त्रनुं स्वरूप, शठशलांका पुरुषोनुंस्वरूप,चार प्रकारना देवोनुं स्वरूप अने.पुण्यना फलनुं स्वरूप बताव- नार अग्यारमा कल्याणप्रवाद पूर्व भणवा भणा- ववामा तत्पर, २३ तेर क्रोड पदप्रमाण आयुर्वेदादि आठ प्रकारनी 'चिकित्सा, प्राण, अंपान उदानादि वायुनु स्वरूप तथा पंचमहाभूतनुं स्वरूप अने प्राणायामादि यो- गर्नु स्वरूप बत्तविनार बारमा प्राणावायपूर्व भ- णवा भणाववामां तत्पर. १ (८२) नवपद .विधि विगेरे संग्रह ॥ २४ नव क्रोड पदप्रमाण छंदःशास्त्र, शन्दशास्त्र, व्या- . '. करण, सर्वशिल्प, सर्वजातनी कला, सर्व गुण ज तात्विक उपाधिरूप छे तेनुं स्वरूप बतावनार तेरसुं क्रियाविशाल पूर्व भणवाभणाववामां तत्पर, २५ बार क्रोडने पचास लाख पदप्रमाण, अथवा कर्म- ग्रंथ अभिप्राये साडाबार लाख पदप्रमाण. [तत्व केवलिगम्य] छ आरा विगेरे काळनुं स्वरूप व्य- वहार विधि, सर्व वस्तुना परिकर्म अने निःशेष श्रुतसंपदाथी भरपूर चौदमुं 'लोकविन्दुसार पूर्व भणवा भणाववामां तत्पर. आ अगीयार अंग तथा चौद पूर्व भणवा भ- गाववामां तत्परता रूप २५ गुणोथी विभूषित श्री उ- पाध्याय भगवंतने हारो नमस्कार थाओ. श्री उपाध्याय पदाराधननो काउस्लग्ग पूर्वनी माफक जाणवो,मात्र "पणवीसइगुणविभूसियसिरि उव- ज्झायपयाराहणत्थं काउस्लग्गं करेमि (पञ्चविंशतिगुण- विभूषित श्रीउपाध्यायपदाराधनार्थ) आंप्रमाणे बोलवं.

उपाध्यायन पदोनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ।। (८३)
२५ लोगस्सनो काउस्लग्ग करतो, जापपद ओ ही नमो
उवज्झायाणं " जपवु आ दिवसे श्री उपाध्याय पदमा
जेम विशेष लीनता थाय तेम श्री उपाध्यायना गुणोनुं
ध्यान स्मरण विशेष करवं.
शेष तमाम विधि पूर्वनी माफक जाणवो. मात्र
भव्य जीवोना · महान् उपकारक श्री उपाध्यायजी
भगवाननुं नीलवणे ध्यान करवानुं होवाथी मगनी
दालना द्रव्यर्नु आयंबिल कर उचित छे,
-

ॐ श्री साधुपदाराधन पंचम दिवसन कर्त्तव्य श्री साधुपद माहात्म्य तथा तेमना गुणोनी विचार ।। - आत्माने तत्वज्ञानथी वासित करी, सांसारिक सुखोनी असारता,जाणी,जन्म मरणनाअनन्त दुःखोना बन्धनथी त्रास पामी, संसारभ्रमण टाळवा तथा शा- श्वत सुखोमां उत्तरोत्तर स्थिर थवा आत्मशक्ति प्रकाश करनार, सांसारिक बन्धनो तोडी अनन्तभवे दुर्लभ, शाश्वत आनन्दमय मुक्तिपदप्रापक, उज्वल रत्नत्र- यौन आराधन करवा तेना पालक सद्गुरु चरणतुं अवलंबन लई अप्रमत्तपणे केवल आत्मामां ज लक्ष्य राखी आवता कर्मने रोकनार, शुद्ध संयमर्नु प्रतिपा- लन करनार अने आत्मार्थी जनोने जिनशासन रूप प्रासादमा प्रवेश करवाने द्वारसमान, प्रवेश करेलाओने यथाशक्ति सत्य मार्ग बतावी साहाय्य आपनार, भव्य पञ्चक्खाण पारवालो विधि ॥ (८५) जीवोना महान् उपकार करनार, रमणीय गुणोना भंडार साधु भगवंतोना अनेक गुणो पैकी २७ गु- णोनुं ध्यान तथा जापादि करी आत्माने तद्रूप बना- चवा आ दिवसनी आराधना छे. जो के साधु भगवं- तोना गुणोनी सत्तावीशीओ अनेक प्रकारे शास्त्रोमां वर्णवी छे छतां मुख्यताए आ. आगळ बतावेल.२७ गुणोए ध्यान तथा जाप कराय छे. ॥ श्री साधुपदना २७ गुणो॥ छव्वय ६ छकायरक्खा १२, पंचिंदिय १७ लोहनि- गहो १८ खंती १९ ।। भावविसुद्धी २० पडिले-हणाइकरणे विसुद्धी २१यः ॥१॥ संजमजोगेजुत्तो २२,अकुसलमंणवयणकायंसरोहो २५॥ सीयाइपीडसहणं २६, मरणंतुवसग्गसहणं २७ च ॥२॥ सत्तावीस गुणेहिं, अन्नेहिं जो विभूसिओ साहू । जिणपासायपवेसे, दुयारसमो रम्मगुणनिवहो ॥३॥ अत छ काय रक्षण तथा, इन्द्रिय लोभनिरोध । क्षमाभाव शुद्धि वळी, पडिलेहणादि विशोध ॥

(८६) नवपद विधि विगेरे-संग्रह। संयमयोगे युक्तता, अशुभ मन वच काया शान्त । शीतादि परीषह तथा, मरणोपसर्ग सहंत ॥ २॥ इस सगवीस गुणावलि, मौक्तिकमाल धरंत । मुक्तिमार्गसाधक मुनि, रमणीय गुण सोहंत ॥ ३ ॥ श्रीसाधुपदना नमस्कारपूर्वक तन्मयतासूचक ॥खमासमणना दुहाओ॥ स्याद्वाद' गुण परिणम्यो, रमता समतासंग ॥ साधे शुद्धानन्दता, नमो साधु शुभरंग ॥१॥ अप्रमत्त जे नित्य रहे, नवी हरखे नवि शोचेरे । साधुसुधा ते आतमा, शुं मुंडे शुं लोचेरे ॥वीर०॥ ॥ श्रीसाधुपदना.२७ गुणगर्भित नमस्कार पदो.॥ १ सर्वतः .. प्राणातिपातविरमणवतगुणविभूषितेन्यः श्रीसाधुन्यो नमः २ सर्वतोमृषावादविरमणवतगुणविभूषितेभ्यः श्रीसा- : धुभ्यो नमः

साधुपदना नमस्कार पदो॥ (८७)
३ सर्वतोऽदत्तादानविरमणव्रतगुणविभूषितेभ्यः श्री-
साधुभ्यो नमः
४ सर्वतो मैथुनविरमणव्रतगुणविभूषितेन्यः श्री-
साधुभ्यो नमः
५ सर्वतः परिग्रहविरमणबतगुणविभूषितेभ्यः श्री-
साधुभ्यो नमः
६ सर्वतोरात्रिभोजनविरमणवतगुणविभूषितेभ्यःश्री.
साधुभ्यो नमः
७ सर्वतः पृथ्वीकायरक्षणगुणविभूषितेभ्यः श्रीसाधु-
ज्यो नमः
८ सर्वतोऽप्कायरक्षणगुणविभूषितेभ्यः श्रीसाधुभ्यो
नमः
९ सर्वतः तेजस्कायरक्षणगुणविभूषितेन्यः श्रीसाधु-
भ्यो नमः
१० सर्वतो वायुकायरक्षणगुणविभूषितेभ्यः श्रीसाधु-
भ्यो नमः
११ सर्वतो वनस्पतिकायरक्षणगुणविभूषितेभ्यः श्री-
साधुभ्यो नमः

(८८) 'नवंपद विधि विगेरे संग्रह।
२२ सर्वतो द्वीन्द्रियादित्रसकायरक्षणगुणविभूषितेभ्यः
श्रीसाधुभ्यो नमः
१३ सर्वतः स्पर्शनेन्द्रियविषयनिग्रहगुणविभूषितेभ्य:श्री
साधुभ्यो नमः
१४ सर्वतो रसनेन्द्रियविषयनिग्रहगुणविभूषितेभ्यः श्री
साधुन्यो नमः
१५ सर्वतो घ्राणेन्द्रियविषयनिग्रहगुणविभूषितेभ्यः श्री
साधुभ्यो नमः
१६ सर्वतश्चक्षुरिन्द्रियविषयनिग्रहगुणविभूषितेभ्यः श्री
साधुभ्यो नमः॥
९७ सर्वतः श्रोत्रेन्द्रियविषयनिग्रहगुणविभूषितेभ्यः श्री
साधुभ्यो नमः॥
१८ सर्वतो लोभनिग्रहगुणविभूषितेभ्यः. श्री साधुभ्यो
१९ सर्वतः क्षमागुणविभूषितेभ्यः श्री साधुभ्यो नमः॥
२० सर्वतोभावविशुद्धिगुणविभूषितेभ्यःसाधुभ्यो नमः ।।
२१:सर्वतः प्रतिलेखनादिक्रियाविशुद्धिगुणविभूषितेभ्यः
श्री साधुभ्यो नमः॥
Ap

साधुपदनां नमस्कार दो. :
(८९)
२२ सर्वतः संयमयोगयुक्ततागुणविभूषितेभ्यःश्री साधु-
भ्यो नमः ॥
२३ सर्वतोऽकुशलमनोयोगनिरोधगुणविभूषितेन्यः श्री
साधुभ्यो नमः॥
२४ सर्वतोऽकुशलवचनयोगनिरोधगुणविभूषितेभ्यः श्री
साधुभ्यो नमः॥
२५ सर्वतोऽकुशलकाययोगनिरोधगुणविभूषितेभ्यः श्री
साधुभ्यो नमः॥
२६ सर्वतःशीतादिपरिषहसहनशीलतागुणविभूषितेभ्यः
श्री साधुभ्यो नमः ॥
२७ सर्वतो मारणान्तिकोपसर्गसहिष्णुतागुणविभूषिते-
भ्यः श्रीसाधुभ्यो नमः॥
साधुना सत्तावीस गुणोनी हृदयमां भावना रहेवा
माटे नमस्कार पदोना अर्थ॥
१ सर्वथा जीवहिंसाथी विरमवा रूप पहेलु महावत:
२ सर्वथा असत्य वचनथी विरमवारूप बीजुं महानते

.
minum
(९०) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
.३ सर्वथा नहीं दीधेनुं लेवाथी विरमवारूप त्रीजुंमहाव्रत
४ सर्वथा मैथुन सेववाथी विरमवारूप.चोथु महाव्रत.
५ सर्वथा परिग्रहमूर्छाथी विरमवारूप पांचमुं महाबत.
६ सर्वथा रात्रिभोजनथी विरमवारूप छ8 महाव्रत.
७ सर्वथा पृथ्वीकायजीवोना रक्षणरूप साधुधर्म.
८ सर्वथा अप्काय जीवोना रक्षणरूप साधुधर्म,
९ सर्वथा तेउकाय जीवोना रक्षणरूप साधुधर्म.
१० सर्वथा वायुकाय जीवोना रक्षणरूप साधुधर्म..
११ सर्वथा वनस्पतिकाय जीवोना रक्षणरूप साधुधर्म.
२२सर्वथा वेइंद्रियादित्रसकायजीवोना रक्षणरूप साधुधर्म.
१३ सर्वथा स्पर्शेन्द्रियनो विषयनिग्रह करवारूप साधुधर्म,
१४ सर्वथा रसनेन्द्रियनो विषयनिग्रह करवारूप साधुधर्म,
१५ सर्वथाघ्राणेन्द्रियनो विषय निग्रह करवास्प साधुधर्म,
१६ सर्वथा चक्षुरिन्द्रियनो विषयनिग्रह करवारूप साधुधर्म
१७ सर्वथाश्रोत्रेन्द्रियनो विषयनिग्रह करवारूप साधुधर्म.
१८ सर्वथा लोभकषायने निग्रह करवास्प साधुधर्म
१९ सर्वथा क्रोधने उपशम करवारूपक्षमाधर्मरूपसाधुधर्म
,

साधुपदोनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (९१) २० सर्वथा भावविशुद्धिरूप साधुधर्म २१ सर्वथा पडिलेहणादिक क्रियामां शुद्धि राखवा स्व- रूप साधुधर्म, २२ सर्वथा संयम व्यापारमा उपयोग राखवा स्वरूप साधुधर्म. २३ सर्वथा अशुभमनोयोगने रूंधवा स्वरूप साधुधर्म. २४ सर्वथा अशुभ वचनयोगने रूंधवा स्वरूप साधुधर्म. २५ सर्वथा अशुभ काययोगने रूंधवा स्वरूप साधुधर्म. २६ सर्वथा शीतादिपरिषहोने सहनशीलता स्वरूप साधुधर्म २७ सर्वथा मारणान्तिक उपसर्गाने पण सहन करवा स्वरूप साधुधर्म. आ २७ गुणोथी विभूषित श्री साधु भगवंतोने म्हारो नमस्कार थाओ.श्रीसाधु पदाराधननो काउस्सग्ग पूर्वनी माफक जाणवो.मात्र "सगवीसइगुणविभूसियसिरिसाहु- पयाराहणत्थं काउस्सगं करोमि” (सप्तविंशतिगुणविभू- षित श्रीसाधुपदाराधनाथ) आ प्रमाणे बोलवु२७लोग- स्सनो काउस्सग्ग करवो, जाप पद "ओ ही नमो लोए

(१९२०) नवएद विधि विगरे संग्रह ॥
सवसाहणं जप, आ दिवसे श्रीसाधुपद स्वरूपमा
आत्मानी विशेष लीनता थाय तेम साधु भगवंतना
गुणोनुं ध्यान स्मरण करवं.
शेष तमाम विधि पूर्वनी माफक जाणवो, मात्र
मुक्तिमार्गना साधनभूत श्री साधुभगवंतोर्नु .श्यामवर्णे
ध्यान करवानुं होवाथी अडदनी दाळना द्रव्यर्नु
आयंबिल कर उचित छे.
,

श्री सम्यग्दर्शनपदाराधन छठा दिवसर्नु कर्त्तव्य. श्री सम्यग्दर्शन माहात्म्य तथा गुणविचार. श्री सर्वज्ञ भगवते प्रतिपादन करेला जीव, अंजीव, पुण्य पाप, आश्रव, संवर, बंध, निर्जरा, मोक्ष ए नवे तत्त्वो, षद्रव्यो, चीर निक्षेपा, सप्तनय प्रमाण सप्तभंगी,द्रव्य क्षेत्र काल भाव आदि तमाम पदार्थोनी श्रद्धामय अनन्तानुबन्धी ४ तथा मिथ्यात्वमोहनी- यादि क्ष्य क्षयोपशम उपशमथींज प्रगट थयेल निर्मल आत्मपरिणाम स्वरूप, ज्ञान चारित्रादि सकल आ- स्मगुणोनो पायोश्री सम्यग्दर्शन रूप आत्मधर्म अनेक स्वरूपो पैकी ६७ स्वरूपीए जीवोना सात्त्विक आनन्द रूप उपकार गुणे ध्यान-जाप करवा योग्य छे. एक बाजु लौकिक लोकोत्तर सर्वधमों एकत्रित करो अने एक बाँजु ऐकलं सम्यग्दर्शन मुको. पण सम्यग्दर्शन- (९४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। नी तुलनामा कोइ आवी. शके तेम नथी, आवा अनेक परमगुणमय सम्यग्दर्शनना प्रतापेज देवर्नु देवत्व अने गुरुनुं गुरुत्व, पूजा, वन्दन, भक्ति, वहुमा- नादिने योग्य छे ते ध्यान करवा योग्य सम्यक्त्वनुं ६७ भेद स्वरूप आ छे. श्रीतीर्थकर प्रतिपादित आ. राधित श्री सम्यग्दर्शनादि चारे गुणोनुं उज्वल श्वे- तवणे ध्यान करवानुं होवाथी उज्वल चोखाना द्रव्यर्नु आयंविल कर, उचित छे. श्री सम्यग्दर्शनना ६७ भेद स्वरूप चउसदहण ४ तिलिंगं.. ७, : दसविणय १९ तिः. सुद्धि २० पंचगयदोसं:। २५ अट्ठपभावण ३३ भूसण ३८ लक्खण ४३ पंचविहसंजुत्तं ॥१॥ छबिहज़यणां४९गार५५ छन्भावणभावियं ६१ चछट्ठाणं ६७॥ इयसत्तसट्टिलक्खण भेयविसुद्धं च सम्मत्तं ॥२॥ चउसदहणा तिलिंग ७ छ, दशविध विनय १७ विचारोरे ॥

शम संवेगादिक गुश्री ना, क्षय उपशमे जे आवरे। पञ्चक्खाण परिवानोविधिः। त्रणशुद्धिा २० पण दूषण २५ आठ प्रभावक धा ३३ ॥१॥ प्रभावक अडपंच भूषण ३८ पंचलक्षण ४३ जाणीये, षट् जयणा ४९ षट् आगार ५५ भावना छबिहा.३१ मन. आणीये॥ षट्ठाण समकित तणा, सडसठ, भेद एह उदार ए। एहनो तत्व विचार करता लहीजे भवपार ए ॥२॥ श्रीसम्यग्दर्शनना नमस्कारपूर्वक तन्मयतासूचक खमासमणना दूहाओ. लोकालोकना भाव जे, सत्य करी अवधारतो, नमो नमो दर्शन तेह ॥१॥ मा शुं होय नाम धरावेरे ॥१ दर्शन तेहीज आत० श्री. १. वीर जिने . विलिभाषित जेह ।... .

(९६)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
॥ दर्शनपद ६७ भेदगर्भित नमस्कार पदों ।
,
१ परमार्थ संस्तवश्रद्धांनस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२ परमार्थज्ञातृ सेवनस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
३ व्यापन्नदर्शनवर्जनस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
४ कुदर्शनवर्जनस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
५ शुश्रूषालिङ्गस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
६ धर्मरागलिंगस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
७ वैयावृत्त्यलिंगस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
८ अर्हद्विनयस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
९. सिद्धविनयस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
१० चैत्यविनयस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
११ श्रुतविनय स्वरूपश्रीसंघरदर्शनाय नमः
१२ दामादिधर्मविनयस्वरूपश्रीसंपग्दर्शनाय नमः
१३ साधुवर्गविनयस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
१४ आचार्यविनयस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
१५. उपाध्यायविनयस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः

दर्शनपदना ६७-गुणोगर्भित नमस्कार पद ॥ (९७)
१६ प्रवचनरूपसंघविनयस्व० श्री सम्यग्दर्शनाय नमः
१७ दर्शनविनयस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
१८ मनः शुद्धि.स्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
१९ वचनश्रुद्धिस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२० कायश्रुद्धिस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२१ शंकादूषणत्यागस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२२ कांक्षादूषणत्यागस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२३ विचिकित्सादूषणत्यागस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२४ मिथ्यादृष्टिप्रशंसादूषणत्यागस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय
नमः
२५ मिथ्यादृष्टिसंसर्गदूषणत्यागस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय
.
२६ प्रवचनप्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२७ धर्मकथिकप्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२८ वादिप्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
२९ नैमित्तिकप्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः
३० तपखिप्रभावकख. श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः .
७

mi (१८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। ३१ विद्याभृत्प्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३२ सिद्धप्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३३ कविप्रभावकस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३४ जिनशासनक्रियाकौशलभूषणस्व. श्रीसम्यग्दर्श- नाय नमः ३५ प्रभावनाभूषणस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३६ तीर्थसेवाभूषणस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३७ स्थैर्यभूषणस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३८जिनशासनभक्तिभूषणस्वरूप श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ३९ उपशमलक्षणस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ४० संवेगलक्षणस्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ४१ निर्वेदलक्षणस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ४२ अनुकम्पालक्षणस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ४३ आस्तिक्यलक्षणस्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ४४ परतीर्थिकदेवपरतीर्थिकगृहीतजिनप्रतिमावन्दन- त्यागरूपयतनास्वरूपश्रीसम्यग्दर्शनाय नमः . .. ॥

दर्शनपदना ६७ गुणोगर्भित नमस्कार पद ॥ (९९) ४५ परतार्थिकदेवपरतीर्थंकगृहीतजिनप्रतिमानमन- त्याग० यतनास्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ४६ मिथ्यादृष्टिसहालापवर्जन यतनास्व० श्रीसम्यग्द- शनाय नमः ४७ मिथ्यादृष्टि सहसंलापवर्जन यतनास्व०श्रीसम्यग्- दर्शनाय नमः ४८ मिथ्याष्टिअन्नपानदानवर्जन यतनास्व० श्रीस- म्यग्दर्शनाय नमः ४९ मिथ्यादृष्टिवारंवारान्नपानदानवर्जन यतनास्व० श्रीसम्यग्दर्शनाय नमः ५० राजाभियोगाकारयुक्ततास्व० श्रीसम्यगदर्शनाय० ५१ गणाभियोगाकार श्रीसम्यग्दर्शनाय० ५२ बलाभियोगाकार श्रीसम्यग्दर्शनाय० ५३ देवाभियोगाकार श्रीसम्यग्दर्शनायः ५४ गुरुनिग्रहाकारयुक्तस्व० श्री ५५ श्रीवृत्तिकान्ताराकारयुक्ततास्वरूप श्रीसम्यक ५६ श्रीधर्मवृक्षमूलमिति भावनास्व० श्रीसम्यक " " "

"
"
(१००) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।
५७ श्रीधर्मपुरद्वारमिति भावनास्व० श्रीसम्यक
५८श्रीधर्मप्रासादप्रतिष्ठानमिति भावनास्वरूपश्रीसम्यक
५९ श्रीधर्माधार इति भावनास्व० श्रीसम्यग् ,
६० श्रीधर्मभाजनमिति भावनास्व० श्रीसम्यग्०
६१ श्रीधर्मनिधानमिति भावनास्व० श्रीसम्यग्०
६२ श्रीअस्ति जीव इति श्रकास्थानस्वरूपश्रीसम्यग्०
६३ श्रीनित्यानित्यो जीव इति श्रद्धास्थानस्वरूप श्री,
३४ श्रीकर्मणः कर्ता जीव इति श्रकास्थानस्व० श्री
६५ श्रीकर्मणोभोक्ता जीव इति श्रद्धास्थानस्व० श्री ,
६६ श्रीजीवस्य मोक्षोऽस्तीति श्रद्धास्थानस्व० श्रीसम्यग्
६७ श्रीमोक्षोपायोऽस्तीति श्रद्धास्थानस्व० श्रीसम्यग०
सम्यग्दर्शनना ६७ भेदोनी हृदयमां भावना राखवा
माटे नमस्कार पदोनो अर्थविचार
१ प्रवचनप्रतिपादित जीवादिक नवतत्त्वोनी अर्थ--
विचारणा करी श्रद्धा राखवी ते परमार्थसंस्तव.

दर्शनपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१०१)
२ परमार्थना जाणनार मुनिओनी आराधना करवी
ते परमार्थज्ञातृसेवन.
२ समकितथी भ्रष्ट थयेला निन्हवो, पासत्था, कुशीली-
या, वेषविडंबको तेओथी अलग रहेवा रूप व्या-
पन्नदर्शनवर्जन.
मिथ्यात्ववासित जीवोना संसर्गने त्याग करवो ते
कुदर्शनवर्जन,
५धर्मश्रवण करवानी तीन अभिलाषा ते
शुश्रूषा.
६ धर्मउपर गाढरुचि ते धर्मराग,
७ देवगुर्वादिकर्नु अप्रमत्तपणे वैयावच्च कर ते वै-
यावृत्य.
८ अरिहंत परमात्मानी भक्ति आदि जे विनय ते
अर्हद्विनय,
२ कर्मरहित सिद्धभगवंतोनी भक्ति आदि विनय ते
सिद्धविनय.
१० जिनेश्वर देवली प्रतिमानो तथा चैत्योनी भक्ति
आदि विनय ते चैत्यविनय,

.
(१०२) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
११ आचारांग विगेरे अंग उपांग विगेरे सिद्धान्तोनो
भक्ति आदि विनय ते श्रुतविनय.
१२ क्षमा आदिक दशधर्म प्रत्ये वहुमानादिक भक्ति
आदि विनय ते क्षमादिधर्मविनय.
१३ क्षमादि धर्मना पालणहार साधु भगवंतोनो वि-
नय ते साधुविनय.
१४ पांच आचारना पालक आचार्य भगवंतोनोभक्ति
आदि विनय ते आचार्यविनय.
१५ सूत्र सिकान्तना भणावनार उपाध्याय भगवंतों-
नो भक्ति आदि विनय ते उपाध्यायविनय,
१६ तीर्थंकर देवोए स्थापन करलां चतुर्विध संघनो
भक्ति आदि विनय ते प्रवचनविनय,
१७ क्षायिकादि सम्यक्त्वना भेदोनो भक्ति आदि
- विनय ते दर्शनविनय,
१८ श्री जिनेश्वर तथा जिनेश्वरप्रतिपादित तत्वो ते
शिवाय तमाम जुतुं छे एवी जे दृढ अंतःकरणनीं
विचारणा ते मनःश्रुद्धि,

दर्शनपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१०३) १९ जिनेश्वरनी भक्तिथी जे सिद्ध न थाय ते बीजा- थी होइ शकेज नहीएवी जे दृढता तेवचनश्रुकि, २० छेदन भेदनादि अनेक प्रकारे सहन करता पण जिनेश्वर शिवाय बीजा देवने नमे नही ते का- यशुद्धि, २१ जिनेश्वरदेवना वचनमां सर्वथी के देशथी शंकान करवी ते शंकादूषणत्याग, २२ अन्यमतनी सर्वथी के देशथी अभिलाषा न करवी ते कांक्षादूषणत्याग, २३ धर्मना फळना संदेहादि न करवां तथा साधुना मंळादिकनी जुगुप्सा न करवी ते विचिकित्सा- दूषणत्याग, २४ मिथ्याष्टिना मिथ्यात्ववृद्धिकारक गुणोनी स्त- वना न करवी ते मिथ्याष्टिप्रशंसादूषणत्याग. २५ मिथ्याष्टि जीवोनी संगति न करवी ते मिथ्या- दृष्टिसंसर्गदूषणत्याग, २६ वर्तमानश्रुतना सूत्र अर्थना पारगामी ते प्राव- चनिकप्रभावक, - (१०४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। २७ उपदेशादिकथी अनेक जीवोने रंजित करी प्रति- बोध करे ते धर्मकथिकप्रभावक, २८ निपुणतर्कशास्त्रना जाणकार राजमंदिरमा पण जीतने भेळवनार ते वादिप्रभावक, २९ परमतने जीतवा माटे अविरुद्धपणे निमित्ता- : दिकने कहेनारा ते नैमित्तिकप्रभावक, ३० निर्निदानपणे शुद्धज्ञानपूर्वक तीन तपस्याने करनारा तपस्वीप्रभावक, ३१ विद्यामन्त्रादिके करीने वज्रस्वामि भगवाननी पेठे शासनोन्नति करनार ते विद्याभृत्प्रभावक, ३२ अंजनचूर्णादिकना योगथी कालिकाचार्य भगवं- तनी माफक शासन उन्नति करनारा ते सिद्ध- प्रभावक, ३३ मधुर अर्थथी भरपूर अलंकारयुक्त धर्महेतुथी उत्तम काव्यो बनावी सिद्धसेनदिवाकरजीनी पेठे -राजाने प्रतिबोध करनारने कविप्रभावक, ३४ प्रवचनप्रतिपादित क्रिया अनुष्ठानने विषे दक्ष- पणुं ते जिनशासनक्रियाकौशलभूषण, . दर्शनपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (. १०५) ३५.जेम जिनशासननी घणा जीवो अनुमोदना करे : तेवा उत्तम प्रभावनाना कृत्यो करवां ते प्रभावना भूषण, ३६ संसार समुद्रथी तारनार स्थावर अने जंगम ती- थोंनी आराधना करवी ते तीर्थसेवाभूषण. ३७ सम्यक्त्वधर्मथी कोइनाथी पण चलायमान थाय नही ते स्थैर्यभूषण, ३८ देवगुर्वादिकनी भक्ति करवी ते जिनशासन- भक्तिभूषण. ३९ अपराधी जीवो उपर पण कोइजातनुं प्रतिकूल चिंतवतुं नहीं ते उपशमलक्षण, ४० देव मनुष्यना सुखोने पण दुःखरूपे मानी केवल मुक्ति सुखनी अभिलाषा करवी ते संवेगलक्षण, "४१ केदीने केदमांथी, नारकीने नरकमांथी जेम नी- कळवानी इच्छा, तेम संसारथी नीकळवानी इबा, ते निर्वेदलक्षण, ४२ दुःखी जीवो प्रत्ये द्रव्यथी अने धर्महीन प्रत्ये

(१०६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।
भावथी जे अनुकम्पा करवी ते अनुकम्पालक्षण,
४३ जे जिनेश्वर देवे फरमाव्यु ते अन्यथा होइ शके
नही, एवी जे दृढता ते आस्तिक्यलक्षण,
४४ परतीर्थी देवो तथा परतर्थीिओओ ग्रहण करेली
अर्हत्प्रतिमाओ तेप्रत्येहाथ जोडवा विगेरेनो त्याग
करवो ते वन्दनत्यागयतना कहेवाय:
४५ तेमना प्रत्ये मस्तक नमाववानो त्याग करवारूप
बीजी नमनत्यागयतना,
४६ मिथ्यादृष्टिओए नहि बोलाये छते पहेलवहेलु एक
वखत बोलावतुं ते आलाप, तेनो त्याग करवो ते
आलापत्यागयतना,
१७ वारंवार बोलाववानो त्याग ते संलापत्यागयतना,
४८ मिथ्यादृष्टिओने गौरवभक्तिसहित इच्छित अन्ना-
दिआपवानो त्याग ते दानत्यागयतना,
४९ वारंवार ते प्रमाणे त्याग ते अनुप्रदानत्यागयतना,
५० नगरस्वामी राजा विगेरेनी आज्ञाथी जेकरपडे
ते राजाभियोग आगार,.१,

दर्शनपदनी भावना माटे. नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१०७) ५१ लोकसमुदायने आधीन थइ करवु पडे ते गणा- भियोग आगार, २ ५२ चौरादिकना जोरथी जे करवू पडे ते बलाभियोग आगार,३ ५३ क्षेत्रपाल विगेरे देवोना आधीनपणाथी करवु पडे ते देवाभियोग आगार, ४ . ५४ पिता माता विगेरे वडीलोना हुकमी कर, पडे ते गुरुनिग्रह आगार, ५ ५५ ज्यां आजीविकानी दुर्लभता होय तथा महामारी आदिना उपद्रवथी जे कांई करवू पडे ते वृत्तिका- न्तार आगार, ५६ धर्मरूप कल्पवृक्षतुं मूल सम्यग्दर्शन छे तेवी चिन्तवना करवी ते धर्ममूलभावना, ५७ धर्मरूप नगरमा प्रवेशकरवानो दरवाजो सम्यग्द- . र्शन छे तेवी जे भावना ते धर्मद्वारभावना, ५८ धर्मप्रासादना मजबूत पायारूप सम्यग्दर्शन छे तेवी. जे भावना भाववी ते धर्मप्रतिष्ठानभावना, ६ nnr (१०८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ५९ शम दम विगेरे धर्मना गुणोनो. आधार सम्यग्द- र्शन छे ते जे भावq ते धर्माधारभावना, ६० शान्ति संवरादि वरूप अमृतरसने जीलवाने-भा- जन सर सम्यग्दर्शन छे तेवु जे मानवं ते धर्म- भाजनभावना. ६१ श्रुतज्ञान, शील विगेरे रत्नोनो भंडार सम्यग्दर्शन छे एवं जे चिन्तवq ते धर्मनिधानभावना. ६२ चैतन्यलक्षणथी जीवनामनो पदार्थ छे एवी जे श्रद्धा ते पहेलं स्थान. ६३ पयाये करीने जीव अनित्य छतां स्वस्वरूपे नित्य छ तेवी जे नित्यानित्यत्वविचारणा ते बीजुस्थानक. ६४ कर्मनो कर्त्ता चेतन छे तेवूभाव ते त्रीजुंस्थानक, ६५ कर्मना फलनो भोक्ता पण पोतेजछे तेवू जेभाचवू ते चोथु स्थानक, ६६ सकल कर्मनो क्षय थवाथी जीवनो मोक्ष थाय छे तेवू जे भाव ते पांचमुं स्थानक. ६७ सम्यग्ज्ञानक्रियास्वरूप मुक्ति पामवाना उपायो छे दर्शनपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१०९) ते, जे चिन्तवतुं ते स्थानक, उपर कहेली ४ सद्दहणा ३ लिंग, १० विनय,३ शुद्धि, ५ दूषणत्याग, ८ प्रभावक, ५ भूषण, ५ लक्षण, ६ यतना ६ आगार, ६ भावना, ६ स्थान ए प्रमाणेना ६७ भेदे विभूषित श्रीसम्यग्दर्शनपदने मारो नमस्कार थाओ. सम्यग्दर्शनपदाराधननो काउसग्ग पूर्वनी मा- फक जाणवो, मात्र सगसठिगुणविभूसियसिरिद- सणपयाराहणत्थं काउसग्गं करेमि (ससषष्टिगुणविभू- पितश्रीदर्शनपदाराधनार्थ) आप्रमाणे बोलवू. ६७लो- गस्सनो काउसग्ग करवो, जाप पद ही नमो दंसण स्स जप, आ दिवसे श्रीसम्यग्दर्शन स्वरूपमा जेम विशेष लीनता थाय तेम सम्यग्दर्शनना स्वरूपनुं ध्यान स्मरण विशेष कर. बाकींनो तमाम विधि पूर्वनी माफक, मात्र सम्य- गदर्शन पदनुं शुक्लवणे ध्यान करवानुं होवाथी चो- खाना द्रव्यनुं आयंबिल कर उचित छे. F ।

. श्री ज्ञानपदाराधन सप्तम दिवसनो विधि. श्रीज्ञानपदमाहात्म्य तथा तेना भेद विचार जीवतुं शुद्ध चैतन्य स्वरूप, जड़ चेतननो वि- भाग, गुणदोष, भक्ष्याभक्ष्य, पेयापेय, हिताहित, कर्त्त- व्याकर्तव्य, हेयोपादेय प्रमुख विवेकने जणावनार निविड कमानी निर्जरानु परम साधन, मोह हाथीना मदने उतारवामां केसरी सिंह समान, श्रीसम्यग्द- निनी निर्मलता तथा वृद्धिलु कारण, इन्द्रियादि आ श्रवस्थानोने काबुमा राखी कर्मवन्धने अटकावनार, राग द्वेषनी भन्दता करी शान्तिपद परमस्थान देनार, जड वस्तुथी आत्मानो भेद समजवानुं मुख्य लिङ्ग, आत्माना मुख्य गुणरूप ज्ञानपदनुं आराधन करवा जो के अन्यत्र मुख्यभेदनी अपेक्षाये पाच श्री ज्ञानपदना ५१ भेदस्वरूप ॥ (१११) भेदोथी आराधन करवानुं जणावाय छे, तोपण आ स्थळे तेना. ५१ भेदोथी ध्यान, नमस्कार विगेरे कराय छे. NE श्री ज्ञानपदना ५१ भेद स्वरूप. अष्टाविंशति भेदाढ्या, मतिः पूर्वमितं श्रुतम् ॥२॥ षोढा चाप्यवधिद्वेधा, मनःपर्यवमीरितम् ॥१॥ एकं केवलमाख्यात-मेकपञ्चाशदित्यमी। ज्ञानभेदा जिनरुक्ता भव्याम्भोजविकासकाः ॥२॥ मति अठावीस भेद छे, श्रुतना चौद प्रकार । षड्विध ओही वर्णव्यो, दुगधार ॥ १ केवल एक वखाणीये, इम एकावन मान । -ज्ञानभेद जिनवर कह्या, वंदु धरी बहुमान ॥ .. श्री ज्ञानपद नमस्कारपूर्वक तन्मयतासूचक खमासमणना दूहाओ. अध्यातम ज्ञाने करी, विघटे भवभ्रम भीति । सत्यधर्म ते ज्ञान छे, नमो नमो ज्ञाननी रीति ॥१॥ मनःपर्यव

(.११२)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
ज्ञानावरणीय जे. कर्म छे, क्षय उपशम तस थायरे ।
तो हूए एहीज आतमा, ज्ञान अबोधता जायरे ॥
वीर०॥
+
श्री ज्ञानपदना.५१ भेद गर्भित नमस्कार पदो.
१ स्पर्शनेन्द्रियव्यञ्जनावग्रहस्वरूप श्रीमतिज्ञानाय नमः
२ रसनेद्रियव्यञ्जनावग्रहस्व०श्रीमतिज्ञानाय नमः
३ घ्राणेन्द्रियव्यञ्जनावग्रहस्व०श्रीमतिज्ञानाय नमः
४ श्रोत्रेन्द्रियव्यञ्जनावग्रहस्व०श्रीमतिज्ञानाय नमः
५ स्पर्शनेन्द्रियार्थावग्रहस्व०श्रीमतिज्ञानाय नमः
६ रसनेन्द्रियार्थावग्रहस्वरूपश्रीमतिज्ञानाय नमः
७ घ्राणेन्द्रियार्थावग्रहस्व० मतिज्ञानाय नमः
८ चक्षुरिन्द्रियार्थावग्रह
मतिज्ञानाय नमः
९ श्रोत्रेन्द्रियार्थावग्रहस्व० मतिज्ञानाय नमः
१० मनोऽथावग्रहव० मतिज्ञानाय नमः
११ स्पर्शनेन्द्रियेहास्व० मतिज्ञानाय नमः
१२ रसनेन्द्रियेहास्व० मतिज्ञानाय नमः
"

"
श्री ज्ञानपदना ५१:भेदंगर्भित नमस्कार पदो॥ (११३)
१३ घ्राणेन्द्रियेहास्वरूप , श्रीमतिज्ञानाय नमः
१४ चक्षुरिन्द्रियेहा स्व०
मतिज्ञानाय नमः .
.१५ श्रोत्रेन्द्रियेहास्व०
मतिज्ञानाय नमः
१६ मनईहास्व०
श्री मतिज्ञानाय नमः
१७ स्पर्शनेन्द्रियापायस्व० श्रीमतिज्ञानाय नमः
१८ रसनेन्द्रियापायस्वरूप०,, मतिज्ञानाय नमः
१९ घ्राणेन्द्रियापायस्व० मतिज्ञानाय नमः
२० चक्षुरिन्द्रियापायस्व०
मतिज्ञानाय नमः
२१ श्रोत्रेन्द्रियापायस्व०
मतिझानाय नमः
२२ मनोऽपायस्व०
मतिज्ञानाय नमः
२३ स्पर्शनेन्द्रियधारणास्व०,, मतिज्ञानाय नमः
२४ रसनेन्द्रियधारणास्व० ,, मतिज्ञानाय नमः
२५ घ्राणेन्द्रियधारणास्व० मातिज्ञानाय नमः
२६ चक्षुरिन्द्रियधारणास्व० ,, मतिज्ञानाय नमः
२७ श्रोत्रेन्द्रियधारणास्व० मतिज्ञानाय नमः
२८ मनोधारणास्व० मतिज्ञानाय नमः
२९ अक्षरस्व० श्री श्रुतज्ञानाय नमः
"
"
-

(११४)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
३० अनक्षरस्वरूप श्री श्रुतज्ञानाय नमः
३१ संझिश्रुतज्ञानाय नमः
३२ असंज्ञि श्रुतज्ञानाय नमः
३३ सम्यकश्रुतानाय नमः
३४ मिथ्याश्रुतज्ञानाय नमः
३५ सादिश्रुतझानाय नमः
३६ अनादिश्रुतज्ञानाय नमः
३७ सपर्यवसितश्रुतज्ञानाय नमः
३८ अपर्यवसितश्रुतज्ञानाय नमः
३९ गमिकश्रुतज्ञानाय नमः
४० अगमिक्श्रुतज्ञानाय नमः
४१ अंगप्रविष्टश्रुतज्ञानाय नमः
४२ अनंगप्रविष्ट श्रुतज्ञानाय नमः
४३ आनुगामिकाऽवधिज्ञानाय नमः
४४ अनानुगामिकाऽवधिज्ञानाय नमः
४५ वर्धमानावधिज्ञानाय नमः
४६ हीयमानावधिज्ञानाय नमः
।
-

श्री ज्ञानपदना ५१ भेदगर्भित नमस्कार पदो॥ (११५)
४७ प्रतिपात्यवधिज्ञानाय नमः
४८ अप्रतिपात्यवधिज्ञानाय नमः
४ए ऋजुमतिमनःपर्यवज्ञानाय नमः
५० विपुलमतिमनःपर्यवज्ञानाय नमः
५१ लोकालोकप्रकाशनश्रीकेवलज्ञानाय नमः
ज्ञानपदना ५१ भेदोनी हृदयमा भावना राखवा :
नमस्कारपदोनो अर्थविचार
२८ मतिज्ञानना भेदो-
४ चक्कु अने मन ए बे वस्तुनी साथे संबंध पाम्या
शिवाय ज्ञान करनार बाकीनी चार स्पर्शेनन्द्रिय,
रसना (जीभ ) प्राण (नाक) श्रोत्र (कान) ए चार
इन्द्रियोथी थता चार व्यंजनावग्रह (अव्यक्तज्ञान)
६ पांच इन्द्रिय अने मनथी थता छ अर्थावग्रह (कां-
इक छे तेवू ज्ञान,)
६ पांच इन्द्रिय अने मनथी थती. छ ईहा (घणुं करी
आम हो जोइए,)

(११६) : ..'नवपद विधि विगेरे संग्रह ..
६ पांच इन्द्रिय अने मनथी थता छ अपाय [ अमुक
ज छे तेवो निश्चय
६ पांच इन्द्रिय अने मनथी थती ब धारणा [घणा
काळ सुधी ते ज्ञानने धारण करी राखq ]
ए अगवीश मति ज्ञान.
२४ श्रुत ज्ञानना भेदो.-
१ संज्ञा (लीपी) व्यंजन (उच्चार) स्वरूप अक्षरथी
थतुं अने लब्धि (उपयोग) अक्षर स्वरूप जे श्रु-
तज्ञान ते "अक्षरश्रुत
२ खोखारा, छींक, ऊधरस विगेरे अव्यक्त ध्वनिथी
थतुं श्रुत ते अनक्षरशृंत..
३ दीर्घकालिकी संज्ञावाळा. मनसहित जीवने थतुं
श्रुत ते संज्ञिश्रुत,
४ मनरहित असंज्ञिजीवोने थतुं श्रुत ते असंज्ञिश्रुत.
५ सम्यगदृष्टि जीवोनुं ज्ञान ते 'सम्यकुश्रुत'
ke

श्री ज्ञानपदनी भावना. माटे नमस्कार पदोना अर्थ।। (११७) ६ मिथ्यात्विओनुं ज्ञान ते 'मिथ्याश्रुत.' ७ भरत औरवतनी अपेक्षाये तीर्थप्रवृत्तिनीशरुआतथी प्रवत्यु ते 'सादिश्रुत' ८ महाविदेहनी अपेकाये अनादिकालथी चाल्यु आ- वतुं ते ' अनादिश्रुत' भरत अरवतनी अपेक्षाये तीर्थव्यवच्छेद थता ते 'सपर्यवसितश्रुत' १० महाविदेहनी अपेक्षाये तीर्थनो व्यवच्छेद न हो- वाथी ते ' अपर्यवसितश्रुत (आ सादि अनादि विगेरे चारे पदोनो द्रव्यादि अपेक्षाये पण विचार समजवो.) ११ सरखा पाठ आलवावाळु सूत्र होय ते दृष्टिवाद विगेरे 'गमिकश्रुत' १२ सरखा पाठ आलावा रहित सूत्र होय ते आचा- रांगादि 'अगमिक श्रुत' १३ बार अंगस्वरूप सूत्र होय ते 'अंगप्रविष्टश्रुत १४ अंगथी बहारर्नु आवश्यक उपांगादि स्वरूपं ते 'अनंगप्रविष्ट' , १ (११८) नवपदं विधि विगेरे संग्रह। . , ६ अवधिज्ञान- १ चढुनी जेम अवधिज्ञानीनी साथे जनार ते आनु- गामिक अवधि २ सांकळे बांधेल फाणसनी जेम साथे न आवनार अर्थात् जे क्षेत्रे उत्पन्न थयुं तेथी वीजा क्षेत्रमा न आवे ते ' अनानुगामिक अवधि' ३ क्रमे क्रमे वधतुं वधतुं केवलज्ञानदशाए आत्माने लइ जाय ते 'वर्धमान अवधि, ४ क्रमेक्रमे घटतुं घटतुं नाश पाभी जाय ते 'ही- यमान अवधि ५ एकदम पडी जाय अगाशीथी भूसकानी जेम, ते 'प्रतिपाति अवधि ६ आव्युं पाछु जाय नहि ते 'अप्रतिपाति अवधि २ मनः पर्यवज्ञान.- १ अढीद्वीपना संज्ञिजीवना मनोगत भावने सामान्य- स्वरूपे जाणनारने 'ऋजुमति मनःपर्यवं' .. " श्री ज्ञानपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (११९.) २. विशेषे करी स्वच्छ अने विस्तीण पर्यायो जणावनार ने 'विपुलमति मनःपर्यव' १ केवलज्ञान- १ लोकालोकना त्रिकालवर्ति रूपि अरूपि आदि सम- अद्रव्य,क्षेत्र,काल,भावने प्रकाश करनार 'केवलज्ञान.' ५१ भेदोए विभूषित श्री ज्ञानपदने म्हारो नम- स्कार थाओ, श्री ज्ञानपदाराधननो काउसग्ग पूर्वनी माफक जाणवो, मात्र एगावन्नभेयविभूसियसि- रिनाणपयाराहणत्थं काउसग्गं करोमि (एकपञ्चाशद्भे- दविभूषितश्रीज्ञानपदाराधनार्थ) आ प्रमाणे ५१ लोगस्सनो काउसग्ग करवो, जापपद नाणस्स” जप, आ दिवसे ज्ञानस्वरूपमा जेम विशेष लीनता थाय तेम ज्ञान स्वरूपनुं ध्यानस्मरण विशेष करवू शेष तमाम विधि पूर्वनी माफक, मात्र ज्ञान- पंदनुं ध्यान शुक्लवणे करवानु होवाथी चोखाना द्रव्यर्नु आंबिल करवं. . ही “नमो - .

, ॐ श्री चारित्रपदाराधन अष्टमदिवसनो विधि.॥ श्री चारित्रमाहात्म्य तथा तेना गुण विचार प्रवाहथी चाल्या आवता आठे कमोना निबीड बन्धनथी आत्माने छूटो पाडी शुद्ध स्फटिकरत्न तुल्य निर्मल कषायरहित शुद्ध आत्मस्वरूपने पमा- डनार, परमानन्दमय आत्मसाम्राज्यनुं परम साधन, इन्द्रादि देवो पण जे स्वरूप माटे मनुष्य भवनी जंखणा करे छे, जेना सुखने चक्रवति पण पहोंचवा समर्थ नथी जेना प्रभावी ज मनुष्यगतिनी दुर्लभ- ता-उत्तमता वर्णवी छे, जेमां बार कषायोनो अभाव छे, आरंभ परिग्रहनो त्याग छे, अशुन क्रियाओथी निवृत्ति अने शुभ क्रियाओमा प्रवृत्ति होय छे. आवता चारित्रपदना.७० भेद ।। (१२१) कर्मोंने अटकाववा ( नवो कर्मबंध न थवा देवो) ते तेनुं वास्तविक फल छे, छेवटे सर्व संवरचारित्र (शै- लेशीकरण) ना प्रतापे.ज जीव मुक्तिपद' पामे छे, आवा अनेक स्वरूपथी ध्यान करवा योग्य चारित्रपद- ना मूल गुणरूप तथा सदा आराध्य चरणसित्तरी भेदोए ध्यान कराय छे. श्री चारित्रपदना ७० भेद। वय ५ समणधम्म १५ संजम ३२ वेयावच्चं ४२ च बंभ- गुत्तीओ ५१ ॥ नाणाइतियं ५४ तव ६६ कोह-निग्गहाइ ७० चरण- मेयं ॥१॥ 'व्रत पांच ने दश श्रमणधर्म ज, संयम सत्तर जाणाये। दशं भेद वेयावच नवविध, बंभ गुत्ती वखाणाये ॥२॥ ज्ञानादि त्रण तप बार भेदे, कषाय चार निरोधीये आराधीने इम चरणसित्तरी, निजचरण संशोधीये ॥१॥ -:० नवपद विधि विगेरे संग्रह। श्री चारित्रपद नमस्कारपूर्वक तन्मयतासूचक खमासमणना दूहाओ. रत्नत्रयी विणु साधना, निष्फल करी सदीव । भावरयणर्नु निधान छे, नमो नमो संयम जीव ॥ ॥ वीर०॥१॥ जाण चारित्र ते आतमा, निज स्वभावमा रमतोरे। लेश्या शुद्ध अलंकयों, मोहवने नवि भमतो रे ॥ वीर०॥२॥ ॥ चारित्रपदना ७० भेदगर्भित नमस्कार पदो। १ सर्वतःप्राणातिपातविरमणव्रतस्वरूप श्रीचारित्राय नमः २ सर्वतः मृषावादविरमणव्रतस्व० ,चारित्राय नम: ३ सर्वतोऽअदत्तादानविरमणव्रतस्व० , चारित्राय नमः ४ सर्वतो मैथुनविरमणवतस्व० चारित्राय नमः ५ सर्वतः परिग्रहविरमणव्रतस्व० ,चारित्राय नमः " ९ " " " चारित्रपदना ७०, भेदगर्भित नमस्कार पदो ॥ (१२३) ६ सम्यक्षमाधर्मस्वरूप श्रीचारित्राय नमः मार्दवधर्मस्व० चारित्राय नमः आर्जवधर्मस्व० चारित्राय नमः मुक्तिधर्मस्व० चारित्राय नमः तपोधर्मस्व० चारित्राय नमः संयमधर्मस्व० चारित्राय नमः १२ सत्यधर्मस्व० चारित्राय नमः ,चारित्राय नमः आकिचन्यधर्मस्व० श्रीचारित्राय नमः १५ ब्रह्मचर्यधर्मस्व० चारित्राय नमः १६ पृथ्वीकायजीवरक्षासंयमस्व० श्रीचारित्राय नमः १७ अपकायजीवरक्षासंयमस्व० चारित्राय नमः १८ तेजस्कायजीवरक्षासंयमस्व० १९ वायुकायजीवरक्षासंयमस्व० श्रीचारित्राय २० वनस्पतिजीवरक्षासंयमस्व० २१ छीन्द्रियजीवरक्षासंयमस्व० २२ त्रीन्द्रियजीवरक्षासंयमस्व० ., शौचधर्मस्व० " १ " " १ " " , " " .(१२४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। २३ चतुरिन्द्रियजीवरक्षासंयमस्वरूप २४ पञ्चेन्द्रियजीवरक्षासंयमस्व० २५ अजीवसंयमस्व० श्रीचारित्राय नमः २६ प्रेक्षासंयमस्व० श्रीचारित्राय नमः २७ उपेक्षासंयमस्व० चारित्राय नमः २८ प्रमार्जन संयमस्वरूप चारित्राय नमः २९ परिष्ठापन संयमस्व० चारित्राय नमः ३० मनः संयमस्व० चारित्राय नमः ३१ वचनसंयमस्व० चारित्राय नमः ३२ कायसंयमस्व० चारित्राय नमः ३३ आचार्यवैयावृत्त्यस्व० चारित्राय नमः ३४ उपाध्यायवैयावृत्त्यस्व० श्रीचारित्राय नमः ३५ तपस्विवैयावृत्त्यस्व० चारित्राय नमः ३६ लघुशिष्यवैयावृत्त्यस्व० श्रीचारित्राय नमः ३७ ग्लानसाधुवैयावृत्त्यस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ३८ स्थविरवैयावृत्त्यस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ३९ समनोज्ञसामाचारीकारकवैयावृत्त्यस्वरूपश्रीचारि- त्राय नमः " " 1 चारित्रपदना ७० भेदगर्भित नमस्कार पदो॥ (१२५), ४० श्रमणसंघयावृत्त्यस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ४१ चन्द्रादिकुलवैयावृत्त्यस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ४२ कौटिकादिगणवैयावृत्त्यस्वरूप श्रीचारित्राय नमः ४३ स्त्रीपशुपंडकरहितवसतिवासशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूपश्री चारित्राय नमः ४४ स्त्रीसहसरागवार्तालापवर्जनशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूपश्री चारित्राय नमः ४५ स्त्रीआसनवर्जनशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ४६ स्त्रीसरागांगोपांगनिरीक्षणवर्जनशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूप श्रीचारित्राय नमः ४७ कुडयान्तरितस्त्रीपुरुषक्रीडास्थानवर्जनशुब्रह्मगु- प्तिस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ४८ पूर्वभुक्तस्त्रीसंगक्रीडाविलासस्मरणवर्जनशुद्धब्रह्म- गुप्तिस्वरूपश्रीचारित्राय नमः ४९ सरसाहारवर्जनशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूपश्रीचारित्राय नमः -

(१२६) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
५० अतिमात्राहारवर्जनशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूपश्रीचारि-
त्राय नमः
५१ विभूषादिशरीरशोभावर्जनशुद्धब्रह्मगुप्तिस्वरूप
श्रीचारित्राय नमः
५२ श्रीसम्यग्ज्ञानस्वरूप ,
नमः
५३ श्रीसम्यग्दर्शनस्व०
नमः
५४ श्रीसम्यक्चारित्रस्व०
५५ श्रीअनशनतपःस्व०
५६ औनोदर्यतपःस्वरूप
५७ वृत्तिसंक्षेपतपःस्व०
नमः
५८ रसत्यागतपः
नमः
५९ लोचादिकायक्लेशसहनतपःस्वरूप श्रीचारित्राय
"
नमः
"
नमः
"
नमः
"
"
६० संलीनतातपःस्वरूपश्रीचारित्राय नमः
६१ प्रायश्चित्तग्रहणरूपाभ्यन्तरतपःस्वरूपश्रीचारित्रा-
य नमः
६२ विनयकरणाभ्यन्तरतपःस्वरूपश्रीचारित्राय नमः
.

चारित्रपदनी भावना माटे ७० भेदगर्मित नमस्कार पदो।(१२७)
६३ वैयावृत्त्यकरणरूपाभ्यन्तरतपःस्वरूपश्रीचारित्राय
नमः
६४ स्वाध्यायकरणरूपाभ्यन्तरतपःस्व०॥ नमः
६५ शुभध्यानकरणरूपाभ्यन्तरतपःस्व०, नमः
६६ उत्सर्गकरणाभ्यन्तरतपः स्व०
नमः
६७ क्रोधनिग्रहस्वरूप
नमः
६८ माननिग्रहस्वरूप
नमः
६९ मायानिग्रहस्वरूप
नमः
७० लोभनिग्रहस्वरूप
नमः
R
R
चारित्रपदना ७० भेदोनी (गुणोनी) हृदयमां भावना
रहेवा माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥
१ सर्वथा प्राणातिपात (जीवहिंसा) विरमण (त्याग)
रूप महावतस्वरूप चारित्र,
२ सर्वथा मृषावाद (जुटुंबोलवाना) विरमण (त्याग)
रूप महाव्रतस्वरूप चारित्र.
३ सर्वथा अदत्तादान | नही दीधेल वस्तुग्रहण]
विरमण (त्यागरूप) महाव्रतस्वरूप चारित्र,

'नवपद विधि विगेरे संग्रह। - ४ सर्वथा मैथुन (कामविकार) विरमण (त्याग) रूप महाव्रतस्वरूप चारित्र, ५ सर्वथा परिग्रह [धन धान्यादि संबंध तथा मूछ। विरमण [त्यागरूप] महाव्रतखरूप चारित्र, ६ सम्यकप्रकारे क्षमा (क्रोध न करवारूप ) धर्म- स्वरूप चारित्र, ७ सम्यकप्रकारे मृदुता [ कोमलता माननाअभाव- रूप ] धर्मस्वरूप चारित्र, ८ सम्यकप्रकारे ऋजुता (सरलता मायाना अभाव- रूप) धर्मस्वरूप चारित्र. ९ सम्यकप्रकारे मुक्ति (लोभना अभावरूप) धर्मस्व- रूप चारित्र, १० सम्यकप्रकारे बाह्य अभ्यन्तर बार भेदे तप धर्म- स्वरूप चारित्र, ११ सम्यकप्रकारे सत्तरप्रकारना संयम धर्मस्वरूप चारित्र १२ सम्यकप्रकारे सत्य बोलवारूप धर्मस्वरूप चारित्र, चारित्रपदनी भावना. माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१२९) १३ सम्यकप्रकारे शौच (संयमप्रत्ये निरतिचारपणे व- तवारूप) धर्मस्वरूप चरित्र १४ सम्यकप्रकारे आकिंचन्य [निर्ममत्वभाव]धर्मस्वरूप चारित्र, १५ सम्यकप्रकारे ब्रह्मचर्य धर्मस्वरूप चारित्र, १६ सम्यकप्रकारे पृथ्वीकायजीवोना रक्षणरूप संयम- स्वरूप चारित्र, १७ सम्यकप्रकारे अप्कायजीवोना रक्षणरूप संयम स्वरूप चारित्र. १८ सम्यकप्रकारे तेजकायजीवोना रक्षणरूप संयम स्वरूप चारित्र. १९ सम्यकप्रकारे वायुकायजीवोना रक्षणरूप संयम स्वरूप चारित्र. २० सम्यकप्रकारे वनस्पतिकायजीवोना रक्षणरूप संयम स्वरूप चारित्र. २१ सम्यकप्रकारे बेइन्द्रियजीवोना रक्षणरूप संयम स्वरूपचारित्र,

.
-
( १३०)
: नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
२२ सम्यकप्रकारे तेइन्द्रियजीवोनां रक्षणरूप. संयम
स्वरूप चारित्र
२३ सम्यकप्रकारे चउरिन्द्रियजीवोना रक्षणरूप संयम
स्वरूप चारित्र.
२४ सम्यकप्रकारे पंचेन्द्रियजीवोना रक्षणरूप संयम
स्वरूप चारित्र,
२५ सम्यकप्रकारे अजीवपदार्थों [ पुस्तकादि] यतना
पूर्वक धारण करवारूप संयम स्वरूप चारित्र
२६ सम्यकप्रकारे पडिलेहण करीसम्यग् बेसवा उठवा
विगेरे क्रिया स्वरूप अथवा संयसमां सीदतासाधु-
ओने संयसमा जोडवारूप संयम स्वरूप चारित्र
२७ सम्यकप्रकारे चढुए सम्यग जोवारूप संयम स्वरूप
चारित्र
२८ सम्यकप्रकारे पापव्यापार करता गृहस्थादि प्रत्ये
अथवा पासत्था विगेरे प्रत्ये उदासीनभावे
सम्यग्वर्त्तवारूप संयमस्वरूप चारित्र
२९ सम्यक्प्रकारे जोया छतां पण, रजोहरणादिके
.

( चारित्रपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१३१) पुंजवा विगेरे यतना क्रियामां वर्तवारूप संयम स्वरूप चारित्र, ३० सम्यकप्रकारे परठववा विगेरेसां वर्गवारूप संयम स्वरूप चारित्र, ३१ सम्यकप्रकारे अशुभ संकल्प वर्जवा, संयम . स्वरूप चारित्र . ३२ सम्यकप्रकारे अशुभवचन वर्जवा शुभ वचन प्रव- विवा रूप वचनव्यापार संयम स्वरूपचारित्र : ३३ प्रकारे आचार्यवैयावच्चस्वरूप चारित्र ३५ प्रकारे उपाध्यायवैयावच्च स्वरूप चारित्र ३५ प्रकारे तपस्विवैयावच्चस्वरूप चारित्र ३६ लघुशिष्य [ नवदीक्षित ] वैयावच्चस्वरूप चारित्र ३७ ग्लानसाधुवेयावच्चस्वरूप चारित्र प्रकारे स्थविरमुनि वैयावच्चस्वरूप चारित्र ३९ प्रकारे उत्तम. सामाचारीवाळा मुनिवैया- वच्चस्वरूपचारित्र : ३

.
ते
४२
"
(१३२१).
नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
प्रकारे चतुर्विध संघवैयावच्च स्वरूप चारित्र
४१ सम्यकप्रकारे चान्द्रादिकुल ( अनेकगच्छोनो समूह
कूल ) वैयावच्चख० चारित्र
, कौटिकादिगण (अनेक कूलोनो समूह ते
गण) वैयावच्चस्व०
४३ स्त्रीपशु नपुंसकरहित वसतिमा रहेवाथी शुद्ध
ब्रह्मचर्यनी गुप्ति [वाड] स्व० चारित्र
स्त्रीओनी साथे रागवाली कथा [आलाप
संलाप] वर्जवाथी शुद्धब्रह्मचर्यनी गुप्ति स्व०
चारित्र
"४५
स्त्रीओना आसन उपर नहि बेसवाथी [पुरु--
षना आसन उपर स्त्रीए, पुरूष उठी गया
पछी पण त्रण पहोर सुधी बेसवु नहि,अने
स्त्रीना आसन उपर, स्त्री उठी गया पछी
पण बे घड़ी सुधी बेसबुं नहीं] शुद्धब्रह्मचर्य
नीगुप्ति स्व० चारित्र,
४६ रागसहित स्त्रीओना अंगोपांग नहि जोवा-
४४
"

"
चारित्रपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१३३.)
थी शुद्धब्रह्मचर्यनी गुप्तिस्वरूप चारित्र
४७ भीतने आंतरे रहेला स्त्री पुरूषोनी क्रीडाना
शब्दो सांभळवा विगेरे त्यागकरवाथी शुद्ध
ब्रह्मचर्यनी गुप्ति स्व० चारित्र.
पूर्व भोगवेला स्त्रीसंबंध क्रीडा विगेरे नहि
संभारवाथी शुद्ध ब्रह्मचर्यनी गुप्तिस्व०चारित्र
४९ सम्यकप्रकारे सरस मिष्टान्न आहारनो त्याग
करवाथी शुद्ध ब्रह्मचर्यनी गुप्ति स्वरूप चारित्र,
५० सम्यकप्रकारे कंठपूर घणा प्रमाणथी आहारादि
नहि खावाथी शुद्ध ब्रह्मचर्यनी गुप्ति स्व० चारित्र,
५१ सम्यकप्रकारे शणगार सजवो विगेरे शरीरशोना
त्याग करवाथी शुद्ध ब्रह्मचर्यनी गुप्तिस्व० चारित्र,
- ५२ सम्यकप्रकारे सम्यग् ज्ञानपरिणति स्व. चारित्र.
५३ सम्यकप्रकारे सम्यग्दर्शनपरिणति स्व० चारित्र.
५४ सम्यकप्रकारे सम्यक् चारित्र परिणतिस्व० चारित्र
५५ सम्यकप्रकारे अनशन (चारे आहारना त्याग रूप).
बाह्यतप स्व० चारित्र,

4 H - " (१३४), नवपद विधि विगेरे संग्रह। ५६ सम्यकप्रकारे उणोदरी ( उणुं रहेवारूप ) बाह्यतप स्वरूप चारित्र ५७ द्रव्यादिवृत्तिना संकोचरूप बाह्यतप- स्वरूप चारित्र दूध दही घी विगेरे रसत्यागरूप वा- यतपस्वख्य चारित्र, ५९ लोच, आतापना विगेरे कायलेशरूप बाह्यतपस्वरूप चारित्र. ६० इन्द्रिय कषाययोगने काबुमा राखवा- रूप बाह्यतपस्वरूप चारित्र. ६१ सम्यकप्रकारे प्रायश्चित्त लेवा (रूप) अभ्यन्तर तप स्वरूप श्री चारित्र, ૨ विनय करवा रूप अभ्यन्तरतपस्वरूप चारित्र. ६३ प्रकारे वेयावच्च करवा रूप अभ्यन्तरतप स्वरूप चारित्र ६४ सज्झाय करवा रूप अभ्यन्तर तप स्वरूप चारित्र R 4 " चारित्रपदनी भावना माटे नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१३५) ६५ " ६६ ६ प्रकारे शुभध्यान आदरवा रूप अन्यन्तर तपस्वरूप चारित्र शरीरकषाय विगेरे त्यागकरवारूप अभ्यन्तर तपस्वरूपचारित्र क्रोधने काबुमा राखवा स्वरूप चारित्रं.. प्रकारे मानने काबुमा राखवा स्वरूप चारित्र प्रकारे मायाने काबुमा राखवा स्वरूप चारित्र लोभने काबुमा राखवा स्वरूप चारित्र ६७ ६८ ७० आ सीचेर गुण करी विभूषित श्री चारित्रपदने मारो नमस्कार थाओ, श्री चारित्रपदाराधननो काउ- संग्ग पूर्वनी माफक जाणवो, मात्र सत्तरीगुणविभू- सियसिरिचारित्रपयाराहणत्थं काउस्सग्गं करेमि ( सप्ततिगुणविभूषितश्रीचारित्रपदाराधनार्थ ) आ प्रमाणे बोलवू, सीत्तेर लोगस्सनो काउसग्ग करवो, जाप पद " ओ ही नमो चारित्तस्स' जप आ दि- (१३६) नवपद विधि विगेरे संग्रह। वसे श्री चारित्रपदमा जेम विशेष लीनता थाय तेम चारित्र गुणोनुं ध्यान, स्मरण विशेष करवू, शेष त- माम विधि पूर्वनी माफक, मात्र चारित्रपदनुं ध्यान उज्वल वणे करवानुं होवाथी चोखाना द्रव्यर्नु आंबील करवं.

ॐ
श्री तपः पदाराधन नवम दिवसनो विधि.
श्री तपसाहात्म्य तथा तेना भेदगुणोनो विचार .
समता सहित करवामां आवतुं तप यावत् नि-
कांचित कर्मोने पण क्षय करवामा समर्थ छे, चारज्ञान
युक्त श्री तीर्थकर देवो के जेमना चरणनी उपासनामां
इन्द्रो पण तल्लीन रहे छे. पोतानी तेज भवमा मुक्ति
छे तेम जाणी रह्या छे छतां पण तेओ कर्मनिर्जराना
साधनभूत तपनी आराधनामां उद्युक्त रहे छ, तपथी
देवताओ पण वश थाय छे, तपथी अनेक व्याधिओ
पण मटे छे, ग्रह पीडा विगेरे पण निवृत्ति पामे छे,
उपसर्ग अने विघ्नोनो नाश थाय छे. सर्वमंगल भेदो-
मां महान् मंगल छे. इन्द्रियो, दमन थाय छे. : अने
इष्ट कार्यों सिद्ध थाय.छे,. आयंबिल, तपना प्रभाव
.

(१३८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। ज द्वैपायन ऋषिथी थतो द्वारिकानो दाह अटक्योहतो. नागकेतु महाराज विगेरे महापुरुषोना तपना प्रभाव- थीज देवकृत उपद्रवो पण नाश पांच्या हता. विगेरे अनेक गुणोधी तप आराधन सहान् लाभदायक छे. जोके आ तपना मुख्यताए वार भेदोथी अन्यत्र आ- राधन थाय छे तोपण अहीं तेना अवान्तरभेदो गणी ५० भेदोथी ध्यान नमस्कार विगेरे कराय छे. श्री तपः पदना ५० भेदस्वरूप, द्विविधं स्यादनशन, २-मौनोदर्य तथा द्विधा । चतुधा वृत्तिसंक्षेपः, ८ कायक्लेश (रसत्याग) स्तथैकधा ९ ॥१॥ एकधा रससंत्यागः (कायसंक्लेशः) १० संलीनत्वं तथा द्विधा १२ ॥ एवं वाह्यतपोभेदा द्वादश श्रीजिनोदिताः ॥शा शधा प्रायश्चित्तं १० स्यात्सप्तधा विनयस्तथा । १७ वैयो यं दशविधं २७ स्वाध्यायः पंचधा ३२ मतः॥३॥ .

, " तपः पदना ५० भेद स्वरुप ॥ ((१३९) चतुर्विधं तथा ध्यान ३६-मुत्सगों द्विविध३८ स्तथा। अष्टात्रिंशदिमे भेदा, स्तपसोऽभ्यन्तरस्य वै ॥४॥ अन्यथाप्यथवा भेदा-स्तपसः परिकीर्तिताः । पञ्चाशत्संख्यया ध्येयाः, निर्जरार्थिमनीषिभिः ॥ अनशनना बे भेद छ, ऊणोदरी वे भेद । वृत्तिसंक्षेपना चार भेद, कायक्लेश [रसत्याग]छे एक। रसत्याग (कायक्लेश) छे एकविध, संलीनता दुगविध, बाह्य तपना ए कह्या, बारस भेद प्रसिद्ध ॥२॥ प्रायश्चित्त दश भाखीया, सगविह विनय उदार दशविध वेयावच्च छे, सज्झाय पंच प्रकार ॥३॥ ध्यान चतुर्विध जाणीये, उत्सर्गना दोय भेद । अडत्रीश अन्यन्तर मळी, तप पचास सुभेद ॥४॥ श्री तपः पदना नमस्कारपूर्वक तन्मयतासूचक खमासमणना दुहा. कर्म तपावे चीकणा, भावमगंल तप जाण । पचास लब्धि उपजे, जय जय तप गुण खाण ॥ 1 ,

(१४०)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
इच्छारोधे संवरी, परिणति समता योगेरे।
तप ते एहीज आतमा, वा निजगुण भोगेरे।।वीर०॥
प्रदक्षिणा दइ स्वस्तिक करवा पूर्वक खमा० दइ
श्री तपपदना ५० भेदगर्भित नमस्कार पदो.
।
२
१ श्री यावत्कथिकानशनस्वरूपतपसे नमः
ईत्वरिकानशनखरूपतपसे नमः
३ ,, बाह्यौनौदर्यखरूपतपसे नमः
४, आभ्यंतरौनौदर्यस्वरूपतपसे नमः
.५, द्रव्यतो वृत्तिसंक्षेपस्वरूपतपसे नमः
६, क्षेत्रतो वृत्तिसंक्षेपस्वरूपतपसे नमः
कालतो वृतिसंक्षेपस्वरूपतपसे नमः
-,, भावतो वृत्तिसंक्षेपस्वरूपतपसे नमः
९ ,, लोचादि कायक्लेश(रसत्याग)स्वरूपतपसेनमः
रसत्यागस्वरूपतपसे नमः
११., इंद्रियकषाययोगसंलीनतास्वरूपतपसे नमः
१०

तपः पदना ५० भेद गर्भित नमस्कार पदो. (१४१). स्त्रीपशुपंडकादिवर्जितवसत्यवस्थानस्वरूपत- १२. पसे नमः " श्रीतपसे नमः श्रीतपसे नमः श्रीतपसे नमः श्रीतपसे नमः " " श्रीतपसे नमः १३ आलोचनाप्रायश्चित्त स्वरूपश्रीतपसे नमः १४ प्रतिक्रमणप्रायश्चित्त १५ मिश्रप्रायश्चित्त १६ विवेकप्रायश्चित्त १७ उत्सर्गप्रायश्चित्त १८ तपःप्रायश्चित्त श्रीतपसे नमः १९ छेदप्रायश्चित्त श्रीतपसे नमः २१ अनवस्थाप्यप्रायश्चित्त २२ पारांचिकप्रायश्चित्त श्रीतपसे नमः २३ ज्ञानविनय स्वरूपश्रीतपसे नमः २४ दर्शनविनय श्रीतपसे नमः २५ चारित्रविनय २६ शुभमनः प्रवृत्तिविनय २७ शुभवचनप्रवृत्तिविनय २० मूलप्रायश्चित्त श्रीतपसे नमः " . तपसे नमः तपसे नमः तपसे नमः """ (१४२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। तपसे नमः तपसे नमः तपसे नमः " १ "" २८ शुभकायप्रवृत्तिविनय स्वरूपश्रीतपसे नमः २९ औपचारिकविनय ३० आचार्यवैयाकृत्य ३१ उपाध्यायवैयावृत्य ३२ स्थविरसाधुवैयावृत्य , तपसे नमः ३३ तपस्विसाधुवैयावृत्य ३४ लघुशिष्यादिवैयावृत्य ३५ ग्लानसाधुवैयावृत्य ३६ समनोज्ञसामाचारीकारकवैयावृत्य ३७ श्रमणसंघवैयावृत्य स्वरूपश्रीतपसे नमः ३८ चान्द्रादिकुलवैयावृत्य ३९ कौटिकादिगणवयावृत्य ४० वाचनास्वाध्याय ४१ पृच्छनास्वाध्याय ४२ परावर्तनास्वाध्याय. ४३ अनुप्रेक्षास्वाध्याय ४४ धर्मकथास्वाध्याय तपसे नमः तपसे नसा तपसे नमः तपसे नमः "" "" तपले नमः तपसे नमः तपसे नमः तपसे नमः तपसे नमः तपसे नमः . तपसे नमः . "" - ""

तपः पदना ५० भेद गर्भित नमस्कार पदो. (१४३)
४५ आध्याननिवृत्तिध्यानस्वरूपश्रीतपसे नमः
४६ रौद्रध्याननिवृत्तिध्यान
४७ धर्मध्यानप्रवृत्तिध्यान
४८ शुक्लध्यानप्रवृत्तिध्यान
४९ बायोत्सर्ग
५० आन्यन्तरोत्सर्ग
तपसे नमः
तपसे नमः
तपले नमः
तपले नमः
तपसे नमः
""
""
तपपदना पचास भेदानी हदयमां भावना राखवा
नमस्कार पदोना अर्थ.
१ जावज्जीवनुं अनशन (चार आहारना त्याग
स्वरूप बाह्यतप.
२ अमुक मुदतर्नु ( नवकारशीथी मांडी उत्कृष्ट -
षभदेवप्रभुना कालमां वर्षप्रमाणर्नु, बावीश
तीर्थकर प्रभुना कालमां आठमहिना सुधीजें, अने
महावीर प्रभुना शासनमा उत्कृष्ट छ महिना सुधीर्नु
अनशन ( चारे आहारना त्याग ) स्वरूप बायतप.

(१४४) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
३ बाह्य ऊनोदरी ( एक दाणाथी मांडी बनी शके
त्यांसुधीनुं ) बाह्यतप.
४ आभ्यन्तर ऊनोदरी ( लोलुपता मटाडवा स्वरूप
ऊणोदरी ) बाह्यतप.
५ द्रव्यथी वृत्तिसंक्षप ( वस्त्र विगेरे निर्वाहना द्रव्योनो
संकोच) रूप बाह्यतप.
६ क्षेत्रथी वृत्तिसंक्षेप ( चेष्टा फरवा हरवाना क्षेत्रनो
संकोच ) रूप बाह्यतप.
७ कालथी वृत्तिसंक्षेप (अमुककालने माटेनो संकोच)
रूप बाह्यतप,
८ भावथी वृत्तिसंक्षेप ( महावीर प्रभुना अभिग्रहनी
जेम भावथी संकोच) रूप बाह्यतय,
९ लोच विगेरे कायकष्ट रूप बाह्यतप.
१० रसत्याग ( दुध दही, घी, गोळ विगेरे विकृतिनो
त्याग करवो) रूप बाह्यतप.
११ पांचइन्द्रिय, चारकषाय, त्रणयोगनी संलीनता
(इद्रियकषाययोगनी अशुभप्रवृत्तिनो संकोच) रूप
बाह्यतप.

तपपदना पचास भेदोना नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१४५)
१२:स्त्री पशु नपुंसकादिरहित वसतिमा रहेवा रूप सं-
लीनता स्वरूप बाह्यतप.
१३ आलोयणप्रायश्चित्त (गुर्वादि समक्ष करेला पा-
पर्नु आलोवबुं) स्वरूप अन्यन्तर तप,
१४ प्रतिक्रमणप्रायश्चित्त (ईर्यावहि पडिकमवी मि-
च्छामि दुकडं देवाथी पापर्नु प्रतिक्रमण) स्वरूप
अभ्यन्तर तप,
१५ उभयप्रायश्चित्त ( आलोयण तथा प्रतिक्रमण
करवा.) स्वरूप अभ्यन्तर तप,
१६ विवेकप्रायश्चित.(अकल्प्य अन्नपानादि परठववा
ते) स्वरूप अभ्यन्तर तप,
१७ कायोत्सर्ग प्रायश्चित्त (काउस्सगमा रही अमुक
लोगस्स विगेरे गणवा) स्वरूप अभ्यन्तर तप,
१८ तप करवारूप प्रायश्चित्त ( नीवी पुरिमढ आदि
तप करवो) स्वरूप अभ्यन्तर तप,
१९ छेद करवारूप प्रायश्चित्त (अमुक दीक्षापर्याय
घटाडवो) स्वरूप अभ्यन्तरतप,
बे
१०

(१४६) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
२० मूलनामनाप्रायिश्चित्त (फरीथीव्रतारोपण करवा
स्वरूप अभ्यन्तरतप,
२१ अनवस्थाप्यप्रायश्चित्त (अमुक तप विगेरे दंड
कराव्या शिवाय पुनव्रतारोपण)स्वरूपअभ्यन्तरतप,
२२ पारांचिकप्रायश्चित (महान् शासनप्रभावना कर्या
शिवाय महाव्रत उच्चरावी गबमा लेवाय नहि) स्व.
रूप अभ्यन्तर तप.
२३ ज्ञानविनय (ज्ञान- बहुमान भक्ति कालविनयादि
आचार साचववो) स्वरूप अभ्यन्तर तप,
२४. दर्शनविनय (सम्यक्त्वना लक्षणो तथा आचारो
साचववा) स्व० अभ्यन्तर तप,
२५ चारित्रविनय (चारित्रनी श्रद्धाआराधना आचारो
साचववा) स्व० अभ्यन्तर तप,
२६ मनोविनय ( रत्नत्रयवान जीवो उपर बहुमानादि
११ शुभमन राख,) स्व० अभ्यन्तर तप,
(इद्रिविनय (रत्नत्रयवान् जीवोनी वचनथी स्तुति
बाह्यतंप करवा ) स्व० अभ्यन्तर तप,
-

, तपपदना पचास भेदोना नमस्कार पदोंना अर्थ ॥ (१४७) २८ कायविनय ( रत्नत्रयवान् जीवोनी प्रत्ये शुभका- यिकभक्ति आदि करवा) स्व० अन्यन्तर तप, २९ उपचारविनय ( रत्नत्रयवान् जीवोनी भक्ति ब- हुमानादि करवा ) स्व० अभ्यन्तर तप, ३० आचार्यवैयावच्च (आचार्यभगवंतनी भक्ति बहु- मान, गुणस्तुति, आशातनापरिहार, अवर्णवाद- गोपनरूप अभ्यन्तर तथा वस्त्र, अन्न, पान,. औ- षधादि बाह्यभक्ति आदि करवा,) स्वरूप अभ्य- न्तर तप, ३१ उपाध्यायवैयावच्च ( उपाध्याय भगवंतनी भक्ति बहुमान०) स्व० अभ्यन्तर तप. ३२ स्थविरसाधुवैयावच्च (२० वर्षनी दीक्षापयायवाळा व्रतस्थविर १, समवायांगादि श्रुतना जाणकार · श्रुतस्थविर २, ६० वा ७० वर्षनी उमरवाळा वय- स्थविर, ३, ते सर्वनी भक्ति बहुमान०) स्व० अ- भ्यन्तर तप. ३३ तपस्विवैयावच्च (उग्रतपस्यावाळा महापुरुषोनी (१४८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ . बाह्य भक्ति आदि करवां ) स्व० अभ्यन्तरतप. ३४ लघुशिष्यादिवैयावच्च ( नवदीक्षित साधु आचार- मां स्थिर थाय ते माटे भक्ति बहुमान० स्व० अ: ज्यन्तर तप. ३५ ग्लानमुनिवैयावच्च ( रोगादिथी शिथील शरीर- : वाळानी भक्ति बहुमान० ) स्व० अन्यन्तर तप, ३६ समनोज्ञसामाचारीवाळानुं वैयावच्च ( उत्तम सा- माचारी पाळनार महापुरुषोनी भक्ति बहुमान०) स्व० अभ्यन्तर तप, ३७ श्रमणसंघवैयावच्च ( साधु, साध्वी, श्रावक, श्रा- विकारूप चतुर्विधसंघनी भक्ति अभ्यन्तर तप, ३८ चान्द्रादिकुलनी वैयावच्च (एकाचार्य समुदाय कुल कहेवाय, तेनी भक्ति बहुमान०) स्व० अ- भ्यन्तर तप, ३९ कोटिकादिगणनी वैयावच्च (त्रण आचार्यना कुलनो समुदाय गण तेनी भक्ति बहुमान०) स्व० अभ्यन्तर तप, बहुमान० ) स्व० .

अर्थनोपाठ तपपदना पचास भेदोना नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१४९) ४० वाचनास्वाध्याय ( योग्य जीवने सूत्र - भणाववो तथा पोते भणवो) स्व० अभ्यन्तर तप, ४१ पृच्छनास्वाध्याय (प्रश्नो पुछी संदेहादि टाळवा) स्व० अभ्यन्तर तप, ४२ परिवर्तनास्वाध्याय (प्रथमर्नु भणेलं संभार ) स्व० अभ्यन्तर तप, ४३ अनुप्रेक्षास्वाध्याय ( भणेला सूत्रार्थनो विचार करवो) स्व. अभ्यन्तर तप, ४४ धर्मकथास्वाध्याय (धर्मदेशना उपदेशादि आ- पवा) स्व. अभ्यन्तर तप, ४५ आर्तध्याननिवृत्ति, (इष्ट वस्तुना वियोगथी थती चिन्ता, शोक, विलाप विगेरे थाय ते इष्टवियो- गार्तध्यान १, अनिष्ट संयोगथी थता चिन्ता विगेरे अनिष्टसंयोगार्स २, रोगादि थवाथी थता चिन्ता विगेरे रोंगचिन्तार्त ३, भविष्य सुखनी चिन्तादि अग्रशौच्यात ४ ए चारेनो त्याग ) स्वरूप अभ्य- न्तर तप. .

(१५०) नवपद विधेि विगेरे संग्रह। ४६ रौद्रध्याननिवृत्ति. (द्वेषथी प्राणीने बांधवा मारवा विगेरे चिन्ता ते हिंसानुबंधिरौद्रध्यान १,छल प्रपंच करवाना विचार असत्यने सत्य स्थापवानी चिन्ता ते मृषानुबन्धि २, क्रोधादि कषायथी परतुं द्रव्य हरवानी चिन्ता ते स्तेयानुबंधि ३, विषय साधन धनादि रक्षण करवानी चिन्ता ते संरक्षणानुबंधि ४, ए चारे रौद्रध्याननो त्याग करवा स्व. अभ्य- न्तर तप, ४७ धर्मध्यानप्रवृत्ति. श्री (जिनेश्वरवचन सत्य छे ते विचारखं ते आज्ञाविचय १, रागद्वेषादि दुःखरूप विचारवं ते अपायविचय २, सुखदुःख पूर्वकृत कर्म नुं फल छे ते चिन्तव, ते विपाकविचय ३, लोका- कृति द्रव्यादिनुं चिन्तवतुं ते संस्थानविचय४,आचारे धर्मध्यानमा प्रवृत्ति राखवी स्व० अन्यन्तर तप, ४८ शुकलध्यानप्रवृत्ति. (पृथक्त्ववितर्कसविचार १, एक- त्ववितर्कअविचार २, सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति ३, व्युपरतक्रिया अनिवृत्ति ४, ए चारे केवलज्ञान तथा . तपपदना पचास भेदोना नमस्कार पदोना अर्थ ॥ (१५१) मुक्तिना साधनध्यानमा प्रवृत्ति राखवा स्व०अभ्य- न्तरतप, ४९ बाह्य उत्सर्ग (द्रव्य शरीर वस्त्रादिना त्याग) स्वरूप अभ्यन्तर तप. ५० अभ्यन्तर उत्सर्ग (मिथ्यात्व, कषाय,विगेरे कर्मबन्ध हेतुओना त्याग) स्वरूप अभ्यन्तर तप. आ प्रमाणे बाह्य तपना बार, तथा अभ्यन्तर तपना अडत्रीश कुल पचास भेदथी विभूषित तपपदने म्हारो नमस्कार थाओ. श्री तपः पदाराधननो काउस्सग्ग पूर्वनी माफक जाणवो, मात्र पचासगुणविभूसियसिरितवपया. राहणत्थं काउस्सग्गं करेमि [पञ्चाशद्गुणविभूषित- श्रीतपःपदाराधनार्थ ] आ प्रमाणे बोलवू, पचास लोगस्सनो काउस्सग्ग करवो, जापपद " ओ ही नमो तवस्स जपवु” आ दिवसे श्री तपपदमा जेम विशेष लीनता थाय तेम तपपदना गुणोनुंध्यान स्मरण विशेष करवू. शेष तमाम विधि पूर्वमाफक जाणवी, मात्र (१५२) "नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ तपपदनुं ध्यान उज्वल वणे करवानुं 'होवाथी चोखा- ना द्रव्यनुं आयंबिल करवं. आ अन्तिम [छेल्लो] दिवस होवाथी तमाम विधि अप्रमत्तपणे करवी, विशेष पूजा करवी, यथा- शक्ति आयंबिलमां पण द्रव्यादि अभिग्रहो राखवा, आज विशेष महोत्सव सहित सत्तर भेदी पूजा भणा- ववी. विशेष आंगी पूजा, रात्रिजागरण, भावना,प्रभा- वना विगेरे करवी. "बेल्ले आंबिल मोटोतप कीजे, सत्तरभेदी जिनपूजा रचीजे, मानवभव लाहो लीजे" पारणाना दिवसनो विधि. दरेक विधिओमां, विद्यासाधनामां पूर्वसेवा उ- त्तरलेवाओ होय छे, तेम आ दिवसे परंपराथी श्री सिद्धचक्र महाराजनुं समुदित आराधन कराय छे. पडिलेहण, देववंदन सुधीनो विधि संपूर्ण पू- र्वनी माफक करी,- सिद्धचक्र नमस्कार तथा खमासमणना दुहाओ ॥ (१५३) श्री सिद्धचक्र माहात्म्यगर्भित तेनो नमस्कार तथा तन्मयतासूचक खमासमणना दूहाओ. दशमा पूर्वथी उद्धर्यो, सिद्धचक्र शुभयंत्र । एहनी तुलनामां नहि, मंत्र तंत्र कोइ यंत्र ॥१॥. परमतत्व जिनधर्ममां, शासननुं सर्वस्व । मुक्तिपददायक भविक, नमो नमो चित्त एकत्व ॥२॥ योग असंख्य छे जिन कह्या, नवपद मुख्यते जाणोरे । एह तणे अवलंबने, आत्मध्यान प्रमाणो ॥३॥रे वीर०॥ आप्रमाणे दूहाओबोली प्रदक्षिणा दइ स्वस्तिक करी द्रव्यफल नैवेद्यादि मूकी एक एक खमासमण देवू. ॥ नमस्कार पद ॥ "श्रीविमलेश्वर चक्रेश्वरीपूजिताय जिनशासन- परमतत्वाय श्री सिद्धचक्राय नमो नमः,” एज. प्रमाणे नव खमासमण देवां, पद तेनुं तेज बोलवू. ईर्यावही करी काउसग्गश्री विमलेश्वरचक्रेश्वरी पूजितश्रीसिझचकाराधनार्थ काउसग्गं करेमि, इच्छं, श्री वि० करोमि काउ० अन्नत्थ० नवलोगस्स० प्रकट लोगस्स खमा० अविधि आशातना मिच्छामि दु०. .

क (१५४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ५ औं ह्रीं श्री विमलेश्वरचक्रेश्वरीपूजिताय श्री सिद्धचक्राय नमो नमः" एपदनी वीश नवकारवाली गणवी, गुरुवदन करी ओछामा ओछं बेसणानुं पच्च- खाण करवू, नवी ओळीनी आराधना प्राप्त थाय त्यां सुधीने माटे यथाशक्ति अभिग्रहादि लेवा, प्रभुदेवनी श्री सिद्धचक्रमहाराजनी विस्तारथी पूजा करी पछी पच्चक्खाण पारवं. अष्टान्हिकामहोत्सव पूर्ण थयेल होवाथी मुख्य- विधिए “ यात्रोत्सवो हि संपूर्णो भवति रथयात्रया ए शास्त्रवचनथी रथयात्रामहोत्सव बनती शक्तिए. अवश्य करवो जोइए. ते रथयात्रामहोत्सवमा श्री आर्यसुहस्ति भगवानना समये अवन्ती [उज्जयिनी] ना.श्रावकोनी, श्रीहेमचंद्रसूरि महाराजना समये पर- माहत महाराज कुमारपालनी रथयात्रानो विधि अव- श्य विचारवो, आ रथयात्रामहोत्सव पण, श्रावकना वार्षिक कृत्यो पैकीनुंएक छे. तेमज आज महान् उत्सव दिवस होवाथी. साधर्मिक वात्सल्य करवू. ...

minin श्री सिद्धचक्रपदोनो क्रमिकविचार ।। (१५५) श्री सिद्धचक्रपदोनो क्रमिकविचार, तेनुं रहस्य, संख्यामहिमाविचार. आ श्रीसिद्धचक्रना नवपदोमां पांच धर्मी (गुणी) छे अने चार धर्म (गुण) छे “गुणाणमासओ दवं " गुणोनो आश्रय द्रव्य छे एटले के निराधार गुणो होइ शकता नथी, जो के गुणोने लइनेज गुणीनी पूज्यता छे, छतां पण ते गुणोनो आविर्भाव, गुणोनी विशिष्ट- ता गुणि आत्माज करी शके छे. तेमज पूर्वोक्त वच- नथी जणाय छे के-निराधार गुणो न रही शकवा विगेरे अनेक कारणोथी पहेला पंचपरमेष्ठिरूप गुणीनुं ग्रहण कर्यु छे, आ ज पंचपरमेष्ठि (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) ना नमस्कारमयज सकल श्रुतस्कन्धना नवनीततुल्य अभ्यन्तर वर्तनार पंच- मंगल महाश्रुतस्कन्ध छे, श्रीभगवतीजीनुं आदिमंगल पण तेज छे, प्रणवाक्षर 'औ' पदे करी योगिओ- महात्माओ तेमनुज ध्यान करे छे, ए पांचना प्रथम , (१५६) नवपद 'विधि विगेरे संग्रह ॥ प्रथम अक्षरो लइ 'असिआउसा' ए पदे महापुरुषो तेमनोज जाप करे छे, इत्यादि अनेक स्वरूपमय आ पंचपरमष्ठिमां जो के सिद्धभगवान् सकल कर्मथी मुक्त थयेला अने सर्वकृतार्थ छे, तथा वर्तमानमां अर्ह- स्वरूपने पण जणावनार श्री आचार्य भगवंत विगेरे महान् उपकारक होवा छतां पण सर्व प्रथम मुक्ति- मार्गने देखाडनार, सिद्ध आदिना स्वरूपने पण ओ- ळखावनार, चतुर्विधसंघ तथा प्रवचनस्वरूप तीर्थना प्रवर्त्तावनार निरपेक्षपणे धर्म बतावनार जेमणे उपदे- शेल अर्थ स्वरूप त्रिपदीने पामी श्रीगणधर भगवं- तोए गुंथेला सूत्र तथा तेना आलंबनथी महापुरुषोए रचेला ग्रन्थोनी अपेक्षा राखी श्री आचार्यादि वीजा- ओने उपदेश विगेरे आपे छे विगेरे अनेक कारणोथी प्रथम श्री अरिहंत पद ग्रहण कयु छे, पछी सर्वकृतार्थ होवाथी श्रीसिद्धभगवंतने बीजे स्थाने ग्रहण कर्या छे, श्री अरिहंत प्रभु आदिना अभावमा मुक्तिमार्ग आदिना देखाडनार श्री आचार्य भगवंतज छे, इत्यादि हेतुओथी शासनना स्तंभ आचार्य भगवंतत्रीजे स्थाने गुणानु रहस्य अने क्रमविचार ॥ (१५७) ग्रहण कर्या छ, आचार्यपदना अधिकारी, शिष्योने सूत्रादि भणावी महान् उपकार करनार विगेरे अनेक हेतुओथी गच्छचिन्तक श्री उपाध्यायभगवंत चोथे स्थाने ग्रहण कर्या, मोक्षमार्गमा सहायदाता मोक्ष- मार्गना साधनार साधुभगवंतो पांचमे स्थानके लीधा, आ प्रमाणे पंचपरमेष्टिरूप गुणीनो क्रमविचार बतावी. हवे चार गुणो संबंधी विचारीये. ॥ गुणोनुं रहस्य अने क्रमविचार ।। - पवित्र आत्माना प्रकट थयेला अनन्त गुणो प्रशस्त होवा छतां आचार गुणोनीज मोक्ष प्रत्ये का- रणता तथा आ चार मार्गना अवलम्बनीज जीवोने सद्गति प्राप्त थाय छे, इत्यादि कारणोथी श्रीसिद्धचक्र यंत्रमा आ चारने ग्रहण काँ छे. का छे के- नाणं च दसणं चेव, चरितं च तवो तहा ।। एस मग्गुत्ति पन्नत्तो, जिणेहिं वरदंसीहिं ॥१॥ ज्ञान दर्शन, चारित्र अने तप ए चारज श्रेष्ट- - (१५८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। दर्शि केवलिभगवंतोए आ (ज्ञानादि ४) मार्ग मोक्षनो रस्तो) प्ररूप्यो छे ॥१॥ नाणं च दंसणं चेव, चरितं च तवों तहा ।। एय मग्गमणुप्पत्ता, जीवा गच्छति सुग्गई ॥२॥ ज्ञान, दर्शन, चारित्र अने तप ए चार स्वरूप मुक्तिमार्गने अनुसरेला जीवों सद्गति (मोक्ष गति) ने पामे छे. (आ चार हेतुथी मुक्तिमार्ग प्रत्ये थती अनुकूलता). नाणेणं जाणई भावे, दंसंणेणं यं संदहे ॥ चरित्तेण निगिण्हाइ, तवेण परिसुज्झई ॥१॥ ज्ञानी पदार्थोंने जाणे छे, दर्शने करी पदार्थोनी अंझा करे छे. चारित्रेकरी आश्रवस्थानो [कर्मबन्धन- कारणो] ने रुंधे छे, तपे करी प्राचीन कर्ममलनी (निर्जरा थवाथी) सर्वथा शुद्ध थाय छे ॥ १ ॥ इत्यादि अनेक वचनोथी तथा युक्तिविचारोंथी चारेमा मुक्तिसाधनता सिद्ध थाय छे. तेमां सम्यग्- दर्शन विना व्हाय तेटर्बु (नवपूर्व सुधीनुं ज्ञान पण - अज्ञान रूप छे. अखंडधाराये पळातुं चारित्र पणं अ- गुणोनुं रहस्य अने क्रमविचार ।। (१५९). भव्यादिनी जेम मुक्तिनुं कारण नथी तेम तप पण अज्ञान कष्टस्वरूप होवाथी सम्यग्दर्शन पद् चारे पदोमा पहेलु ग्रहण कयुं छे. सम्यग्दर्शनथी शुद्ध थयेला ज्ञानथी हेयोपादेय पदार्थों जाण्यां शिवाय वैराग्यपरिणति थती नथी, अने ते विनानुं चारित्र 'मार्जारविरतिकल्प' छे. तप पण शुद्ध थतुं नथी तेथी ज्ञानपद बीजुं कर्तुं डे, गढनाळाथी आवतो कचरो रोकाया शिवाय तळावनी अंदरनो कचरो साफ करी शकातो नथी तेम आश्रवस्थानो रूप कर्म आववाना साधनोथी आवतो कर्म कचरो रोकाया शिवाय आ- स्मशुद्धि (कर्म रहितपणुं) थइ शकतीनथी,जेथी आवता कर्म कचराने रुंधवा समान चारित्र पद त्रीजुं ग्रहण कर्यु, त्यार बाद बंधायेला कमों यावत् निकाचित अवस्था सुधीना होय तेने पण दय करवानुं परम साधन, सर्व मंगलभेदोमा प्रथम मंगल स्वरूप अ- वधिज्ञानथी तेज भवमा मुक्ति पामवानुं जाणता पण श्रीमत्तीर्थंकरदेवोए आचरेलु तपपद मुक्तिनुं महत् साधन होवाथी तप पद चोथु ग्रहण कर्यु छे.

(१६०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ॥ संख्याविशिष्टता-महिमा ॥ पांच धर्मि (गुणि) पदो अने चार धर्म पदो मळी नवना आंकमां ए विशिष्टता छ के-वधी आंक संख्याने गुणाकार करता ते आंकनो भंग थाय. छे. पण नवना आंकने च्हाय तेटला गुणा करो तो पण नवनो अंक अभंगज रहे छे,नवने वमणा करवाथी १८ थाय, तेमा एक अने आठ वेउ मळी ९ थाय छे. त्रमणा करवाथी २७ थाय, तेमां पण वे अने सात ९, एज प्रमाणे आगळ आगळ जेटली संख्या गुणा करो तेमां नवनो आंक आवी उभोज रहे छे. श्री जिनेश्वर देवप्रतिपादित अबाधिततत्त्वो पण नव छे, शाश्वत निधिओ पण नव छे. इत्यादि अनेक विचारोथी नव- पदमय श्रीसिद्धभगवंतनीविशिष्टता समजवालायकछे.

ॐ ॥ श्री सिद्धचक्रगुणोनुं स्तोत्र ॥ १२ अर्हद्गुणाः- अशोकाख्यं वृक्षं सुरविरचितं पुष्पनिकर, ध्वनि दिव्यं श्रव्यं रुचिरचमरावासनवरम् । वपुर्भासंभारं मधुररवं दुन्दुभिमथ, प्रभोः प्रेक्ष्यच्छत्रत्रयमधिमनः कस्य न मुदः॥१॥ अशोकवृक्षः सुरपुष्पवृष्टि- दिव्यध्वनिश्चामरमासनं च। भामण्डलं दुन्दुभिरातपत्रं, सत्प्रातिहार्याणि जिनेश्वराणाम् ॥२॥ अपायापगमो ज्ञानं, पूजा वचनमेव च । श्रीमतीर्थकृतां नित्यं, सर्वेभ्योऽप्यतिशेरते ॥३॥ ८ सिद्धगुणाः- अनन्तं केवलज्ञानं, ज्ञानांवरणसंक्षयात् । . ૧૧ www.. (१६२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। अनन्तं दर्शनं चापि, दर्शनावरणक्षयात् ॥४॥ दायिके शुद्धसम्यक्त्व-चारित्रे मोहनिग्रहात् । अनन्ते सुखवीर्ये च, वेद्यविनक्षयात्क्रमात् ॥५॥ आयुषः क्षीणभावत्वात्, सिद्धानामक्षया स्थितिः। नामगोत्रक्षयादेवाऽ-मूर्त्तानन्तावगाहना ॥६॥ ३६ आचार्यगुणाः- प्रतिरूपाद्याश्चतुर्दश, क्षान्त्यादिर्दशविधः श्रमणधर्मः । द्वादश भावना इति, सूरिगुणा भवन्ति षट्त्रिंशत्।।७ २५ उपाध्यायगुणाः- अङ्गान्येकादश वै, पूर्वाणि चतुर्दशापि योऽधीते । अध्यापयति परेभ्यः, पञ्चविंशतिगुण उपाध्यायः॥ वा २७ साधुगुणाः- व्रतषट्कं कायरक्षाः, पञ्चेन्द्रियलोभनिग्रहः क्षान्तिः। भावविशुद्धिः प्रतिलेखनादिकरणे विशुद्धिश्च ॥९॥ संयमयोगसुयोगोऽ, कुशलमनोवचःकायसंरोधाः। . शीतायाधिविषहनं, मरणाद्युपसर्गसहनं च ॥१०॥ सप्ताविंशतिसुगुणै-रेभिरन्यैश्च यो विभूषितः साधुः। .

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श्री सिद्धचक्रगुणोनु स्तोत्र ॥ (१६३)
जिनशासनप्रवेशे, द्वारसमो रम्यगुणनिवहः ॥११॥
६७ सम्यग्दर्शनभेदाः-
श्रद्धा ४ लिङ्गं ३ विनयाः १०,
'शुद्धि ३ दोषाः ५ प्रभावना ८ भणिताः।
भूषण ५ लक्षण ५ यतना ६,
आकारा ६ भावना ६ ध्येयाः॥१२॥
स्थाना ६न्येतै दै-रलङ्कृतं दर्शनमतिविशुद्धम् ।
ज्ञानक्रिययोर्मूलं, शिवसाधनमात्मसौख्यमिदम् ॥१३॥
५१ ज्ञानभेदाः-
अष्टाविंशतिभेदाढ्या, मतिः पूर्वमितं श्रुतम् ।
षोढा चाप्यवधिद्वैधा, मनःपर्यवमीरितम् ॥१४॥
एकं केवलमाख्यात-मेकपञ्चाशदित्यमी।
ज्ञानभेदा जिनरुक्ता, भव्याम्भोजविकासकाः ॥१५॥
७० चारित्रभेदाः-
व्रत ५ धर्म १० संयमा १७ स्त्विह,
वैयावृत्यानि १० गुप्तयो नव ९ वै।
ज्ञानादित्रिक ३ मिह तपः १२,
क्रोधादिनिरोधनं ४ च चारित्रम् ॥१६॥

(१६४)
नवपद विधि विगेरे.संग्रह।
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-
५० तपोभेदाः-
द्विविधं स्यादनशन--मौनोदर्य तथा द्विधा ।
चतुर्धा वृत्तिसंक्षेपः,कायक्लेश (रसत्याग) स्तथैकथा ॥१७
एकधारससंत्यागः (कायसंक्लेशः),संलीनत्वं तथा द्विधा।
एवं बाह्यतपोभेदाः, द्वादश श्रीजिनोदिताः ॥१८॥
दशधा प्रायश्चित्तं स्यात्, सप्तधा विनयस्तथा ।
वैयावृत्त्यं दशविधं, स्वाध्यायः पञ्चधा सतः ॥ १९ ॥
चतुर्विधं तथा ध्यान-मुत्सगों द्विविधस्तथा।
अष्टात्रिंशदिमे भेदा-स्तपसोऽभ्यन्तरस्य वै ॥ २० ॥
पञ्चाशत्संख्यया ध्येयाः, निर्जरार्थिमनीषिभिः ।
अन्यथाऽप्यथवा भेदाः, पदानां परिकीर्तिताः ॥२१॥
॥ इति श्रीसिद्धचक्रगुणाः ॥
+
॥ श्रीसिद्धचक्र गुणविचार ॥
(१२ अरिहंत गुण)
प्रातिहारज आठ छे, सूल अतिशय चार
बार गुण अरिहंतदेव, नमो नमो बहुवार ॥१॥

- श्रीसिद्धचक्र गुणविचार ॥ (१६५) (८ सिद्धगुण) एक एक कर्मना क्षय थकी, नीपन्यो गुण एक एक । आठ गुणे इम ध्याइए, सिद्धप्रभु सुविवेक ॥२॥ ( ३६ आचार्यगुण) पडिरूवादिक चौद गुण, क्षान्त्यादिक दशधर्म। भावना बार छत्रीश ए, सूरिगुणतुं मर्म ॥३॥ ( २५ उपाध्यायगुण) अंग अग्यार भणे तथा, चउद पूर्व वली जेह । परने भणावे नेहथी, उपाध्यायगुण एह ॥४॥ (२७ साधुगुण) व्रत छकायरक्षण तथा, इन्द्रिय लोभनिरोध । क्षमा भावशुद्धि वळी, पडिलेहणादि विशोध ॥ ५॥ संयमयोगे युक्तता, मनवचकाया शान्त । शीतादि परिषह तथा, मरणोपसर्ग सहंत ॥६॥ इम सगवीस गुणावलि, मौक्तिकमाल धरंत । मुक्तिमार्ग साधक मुनि, रमणीय गुण सोहंत ॥७॥ ( ६७ दर्शनभेद) चउसदहण तिलिंग छे, दशविध विनय विचारोरे।

नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ त्रणशुद्धि पण दूषण, आठप्रभावक धारोरे ॥ ८॥ प्रभावक अड पंचभूषण, पंच लक्षण जाणीए, षट् जयणाषट् आगारभावना, छव्विहा मन आणीये। षट्ठाण समकिततणा, सडसठ भेद एह उदार ए, एहनो तत्व विचार करतां, लहाजे भवपार ए ॥९॥ ( ५१ ज्ञानभेद ) मति अट्ठावीश भेद छे, श्रुतना चौद प्रकार । षविध ओही वर्णव्यो, मनःपर्यव दुगधार ॥ १० ॥ केवल एक वखाणीये, इम एकावन मान । ज्ञानभेद जिनवर कह्या, वंदुं धरी बहुमान ॥ ११ ॥ [७० चारित्रभेद ] व्रत पांचने दश श्रमणधर्म ज, संयम सत्तर जाणीये, दशभेद वैयावच नवविध, ब्रह्मगुप्ति वखाणीये। ज्ञानादित्रण तप बार भेदे, कषाय चार निरोधीये, आराधीनेइम चरणसित्तरी, निजचरणने संशोधीये १२ [५. तपोभेद] अनशनना बे भेद छ, ऊपोदरी बे भेद, .

, श्रीसिद्ध चक्र गुणविचार ॥ (१६७ वृत्तिसंक्षेपना चारभेद, कायक्लेश (रसत्याग) छे एक १३ रसत्याग (कायक्लेश) छे एकविध, संलीनता दुगविधः । बाह्यतपना ए कह्या, बारभेद प्रसिद्ध ॥ १४ ॥ प्रायश्चित्त दश जाणीये, सगविह विनय उदार । दशविध वैयावच्च छे, सज्झाय पंचप्रकार ॥१५॥ ध्यान चतुर्विध जाणीये, उत्सर्गना दोय भेद । अडत्रीश अभ्यन्तर मळी, तप पचाश सुभेद ॥१६॥ ॥ कोइक स्थळे १३०००जाप बतावे छे तेनो विचार ।। १०८ पंचपरमेष्ठिना गुणो. १२ श्री अरिहंतप्रभुना, ८ श्री सिद्धप्रभुना, ३६ श्री आचार्य भगवंतना, २५ श्री उपाध्याय भगवंतना, २७ श्री साधुभगवंतना, ५ दर्शनना भेदो. ५ज्ञानना भेदो.

।
(१६८) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
.१० श्रमणधर्मचारित्रना भेदो,
२ तपना भेदो.
कुल १३० भेद थया, ते प्रत्येकना सोसो जाप
एटले ( एक एक नवकारवाली) गणवाथी १३० ने
सोए गुणतां १३००० संख्या थाय छे.
अर्थात्-
१२०० श्री अरिहंतपदनो जाप,
८०० श्री सिद्धपदनो जाप,
३६०० श्री आचार्यपदनो जाप,
२५०० श्री उपाध्यायपदनो जाप,
२७०० श्री साधुपदनो जाप,
५०० श्री दर्शनपदनो जाप,
५०० श्री ज्ञानपदनो जाप,
१००० श्री चारित्रपदनो जाप,
१ वीजे स्थळे चारित्रना तथा तपना ६.-६-भेद वताव्या छे.
२ चारित्रना ६ भेदनी अपेक्षाये जाप संख्या ६०० तेज.
प्रमाणे तपना पण ६ भेदनी अपेक्षाये जाप संख्या ६०० जाणवी.
वेउ मली १२०० जाप थाय.

१३००० जाप विचार। (१६९) २०० श्री तपःपदनो जाप, १३००० कुल जाप ॥ श्री सिद्धचक्र महाराजना ०३४६ गुण भेदविचार ॥ १०८ गुणि वा धर्मि आश्रयी गुणो २३८ गुग वा (धर्म) आश्रयो भेदो . .. . ॥ अरिहन्तना १५ गुण ॥ (८) प्रातिहार्य- १अशोकवृक्ष, २देवकुसुमवृष्टि,३दिव्यध्वनि, ४ चामर, ५ सिंहासन, ६ भामंडल, ७ देवदुन्दुभि, ८ छत्रत्रय. (४ मूलातिशय) १ अपायापगम, २ ज्ञान, ३ पूजा, ४वचनातिशय. *कोइक स्थळे पंचपरमेष्ठिना १०८, दर्शन पदना ६७, ज्ञा- नपदना ५१, चारित्रपदना ५, तपपदना १२, सर्व मळी २४३ गुण- भेदो पण देखाडया छे. तेमां चारित्रपदना सामायिक १, छेदोपस्था- पनीय २, परिहारविशुद्धि ३, सूक्ष्मसंपराय ४, यथाख्यात ५. ए पांच भेद तथा तपपदनां ६ वाह्य अने ६ अभ्यन्तर मळी १२ भेद जाणवा.

(१७० नवपद-विधि विगेरे संग्रह। २४ तीर्थंकरभेदे २४ खमा० काज० विगेरे पण अन्यत्र आराधनामां आवे छे, । , ॥ सिद्धना ८ गुण, ॥ १ अनन्तज्ञान, २ अनन्तदर्शन, ३ अव्यावाध- सुख, ४ अनन्तसम्यक्त्वचारित्र, ५ अक्षयस्थिति, ६ अमूर्तअनन्तावगाहना, ७ अगुरुलघु, ८.अनन्तवीर्य, सिद्धभगवंतना१५ भेद होबाथी १५ खमा०काउ० विगेरे पण अन्यत्र आराधवामां आवे छे, १ जिनसिद्ध, २ अजिनसिद्ध, ३ तार्थसि०, ४ अतीर्थसि०,५ गृहिलिंग सि०, ६ अन्यलिं, स्वलिक, ८ स्त्रीसिद्ध, ९ पुरुषसिद्ध, १० नपुंसकलि०,११प्रत्येक- बुद्धसिद्ध,१२ स्वयंबुद्ध०, १३ बुद्धबोधित०,१४ एकसिद्ध, १५ अनेक सिद्ध, प्रकारान्तरे ३१ गुणोनी अपेक्षाए लीधा छे. ५ ज्ञानावरणीयाभाव, ९ दर्शनावरणीयाभाव, २ वेद- नीयाभाव, २ मोहनीयाभाव, ४' आयुष्कमाभाव, आचार्यना ३६ गुण॥ (१७१) रनामकमाभाव,२ गोत्रकर्माभाव,५अन्तरायकमाभाव, तेमज वर्णाभावादिनी अपेक्षाये पण ३१ भेदोथायछे. ॥ आचार्यना ३६ गुण.॥ १४ प्रतिरूपादि- १ प्रतिरूप, २ तेजस्विता, ३ युगप्रधानागम, ४ मधुरवाक्य, ५ गांभीर्य, ६ धैर्य,७ उपदेशतत्परता, ८ अपरिश्रावि, ९ सौम्यप्रकृति, १० संग्रहशीलता, ११ अभिग्रह, १२ अविकत्थकता, (अनात्मशंसिता), १३ अचपलता, २४ प्रशान्तहृदय, १० क्षमादिधर्म- १ क्षमा, २ मृदुता, ३ आर्जव, ४ मुक्ति, ५ तप,. ६ संयम, ७ सत्य, ८ शैचा, ९ आकिंचन्य,१० ब्रह्मचर्य. १२ भावना- १ अनित्यत्व, २ अशरण, ३ संसार, ४ एकत्व, ५ अन्यत्व, ६ अशुचित्व, ७ आश्रव, ८ संवर, ९ निर्जरा,१० लोकस्वभाव; ११ बोधिदुर्लभता,१२ धर्म- कथकार्हदुर्लभता. , (१७२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। बीजी पण अनेक रीतोथी छत्रीशीओ थायछे जे आगळ देखाडवामां आवशे. ॥ उपाध्यायना २५ गुण. ॥ ११ अंगपठनपाठनतत्परता,- १ आचारांग, २ सूत्रकृतांग, ३ स्थानांग, ४ सम- वायांग, ५ भगवत्यंग, ७ ज्ञाताधर्मकथांग, ७ उपासक दशांग, ८ अंतकृदंशांग, ९ अनुत्तरोपपातिकदशांग, १० प्रश्नव्याकरणांग, ११ विपाकांग. १४ पूर्वपठनपाठनतत्परता- १ उत्पाद, २ अग्रायणीय, ३ वीर्यप्रवाद, ४ अ- स्तिनास्ति प्र०, ५ ज्ञानप्र०, ६ सत्यप्र०, ८कर्मप्रवाद,९प्रत्याख्यानप्र०,१०विद्याप्र०,११कल्याणप्र- वाद,१२प्राणावाय,१३ क्रियाविशाल,१४ लोकबिन्दुसार, बीजी पण अनेक रीतियोए पचीशीओ थाय छे जे आगळ बताववामां आवशे,वळी मुख्यताए अन्यत्र ७ आत्मप्र - साधुना २७ गुण ॥ minian (१७३) ११ अंग १२ उपांग पठनपाठन तत्परता,१चरणसित्तरी, १ करणसित्तरी ए प्रमाणे २५ गुणो पण लीधा छे, ॥ साधुना २७ गुण.॥ छ व्रतो- १ प्राणातिपातविरमण २ मृषावादविर०३ अदत्तादान-- विर०४ मैथुनविरम०५परिग्रहविरम०६रात्रिभोजनविर० ६ कायरक्षा- १ पृथ्वीकायरक्षण, २ अप्कायरक्षण, ३ तैजस- कायरक्षण, ४ वायुकायरक्षण, ५ वनस्पतिकायरक्षण, ६त्रसकायरक्षा. ५ इंद्रियनिग्रह- १ स्पर्शेन्द्रियनिग्रह, २ रसनेन्द्रियनिग्रह, ३ घा- पेन्द्रिय निग्रह, ४ चक्षुरिन्द्रियनिग्रह, ५ श्रोत्रेन्द्रियनिक १ लोभ निग्रह, १ क्षान्ति, १ भावविशुद्धि, १ प्रतिलेखनादिक्रियाशुद्धि, १ संयमयोगयुक्तता, ३ अकुशलयोगनिरोध, [१ अकुशलमनोयोग, २ अकु- (१७४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ wwwimmmmmia शल वचन योग, ३ अकुशल काययोग] १ शीतादि परिसह सहनता, १ मारणान्तिकोपसर्गसहनता. बीजी पण अनेक रीतिए २७ गुणोनी सत्तावी- शीओ थाय छे, जे आगळ बतावाशे. ॥ सम्यग्दर्शनना ६७ भेदो.॥ , -४ सद्दहणा- १ परमार्थसंस्तव, २ परमार्थज्ञातृसेवना, ३ व्या- पन्नदर्शनवर्जन, ४ कुदर्शनवर्जन. ३ लिङ्ग- १ शुश्रुषा, २ धर्मराग, ३ वैयावृत्त्य. १० विनय- १ अर्हदिनय,२ सिद्धवि०, ३ चैत्यवि०, ४ श्रुत- विनय, ५ धर्मवि०,६ साधुवि०७ आचार्यवि०, ८ उ- पाध्यायविनय, ९ प्रवचनसंघवि० १०, दर्शनविनय, ३ शुद्धि- १ मनः शुद्धि, २ वचन शुद्धि, ३ कायशुद्धि.

सम्पग्दर्शनना ६७ भेदो॥ (१७५) ५ दूषणत्याग- १ शंका, २ आकांक्षा, ३ विचिकित्सा, ४ मिथ्या- दृष्टिप्रशंसा, ५ मिथ्याष्टिसंसर्ग. ८प्रभावक- १ प्रावचनी,२ धर्मकथि, ३ वादि, ४ नैमित्तिक, ५ तपस्वी, ६ विद्याभृत्, ७ सिद्ध, ८ कवि, ५ भूषण- १ जिनशासनक्रियाकुशलता, २ प्रभावना, ३ तीर्थसेवा, ४ स्थैर्य, ५ जिनशासनभक्ति. ५ लक्षण- १ उपशम,२ संवेग,३ निर्वेद,४ अनुकंपा,५आस्तिक्य. ६ यतना (त्याग)- १ परतीर्थिवंदन, २ परतीर्थिनमन, ३ परतीर्थि- सहालाप, ४ परतीथिसहसंलाप, ५ परतीर्थिअन्नपान- दान, ६ परतीर्थिवारंवारदान, ६ आगार- १ राजाभियोग, गणाभियोग, ३ बलाभियोग, ~ १७६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ , ४ देवाभियोग, ५ गुरुनिग्रह, ७ वृत्तिकान्तार, ६ भावना- १ धर्मवृक्षमूल,२ धर्मपुरद्वार, ३ धर्मप्रासादपीठ, ४ धर्माधार, ५ धर्मभाजन, ६ धर्मनिधान, ६ स्थान- १ अस्ति जीवः,२ नित्यानित्यो जीवः,३ कर्मणः कता,४ कर्मणोभोक्ता,५ जीवस्य मोक्षोऽस्ति, ७ मोतो पायोऽस्ति. ? ॥ज्ञानना ५१ भेद,॥ २८ मतिज्ञान,- ४ व्यंजनावग्रह- १ स्पर्शन, २ रसन, ३ घाण, ४ श्रोत्र, ६ अर्थावग्रह, १ स्पर्शन, २ रसन,३ घ्राण, ४ चक्षु, ५.श्रोत्र, ६मनः ६ ईहा, ६ अपाय, ६ धारणा, ४ ज्ञानना ५१ भेद ॥ (१७७) १४ श्रुतज्ञान- १ अक्षरश्रुत, २ अनवरश्रु०, ३ संझिश्रु०, ४ असंज्ञिश्रु०,५ सम्यंक्श्रु०, ६ मिथ्याश्रु०, ७ सादिश्रु०, ८ अनादिश्रु०,९ सान्तश्रु, १० अनन्तश्रु०, ११ गमिक श्रुत,१२ अगमिकश्रुत, १३ अंगप्रविष्ट, १४ अनंगप्रविष्ट, ६ अवधिज्ञान १ आनुगामिक, २ अनानुगामिक, ३ वर्धमान, ४ हीयमान, ५ प्रतिपाति, ६ अप्रतिपाति. २ मनःपर्यवज्ञान १ ऋजुमति, विपुलमति. १ लोकालोकप्रकाशक केवलज्ञान. to ॥ चारित्रना ७० भेदो.॥ ५ व्रतो.- १ प्राणातिपातविरमण, २ मृषावादविर०, ३ अदत्ता० वि०, ४ मैथुन वि०, ५ परिग्रहविरमण, १० श्रमणधर्म, , (१७८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ १ क्षमा, २ मार्दव, ३ आर्जव, ४ मुक्ति, ५ तप, ६ संयम, ७ सत्य, ८ शौच,९ आकिंचन्य,१० ब्रह्मचर्य, १७ संयम, १ पृथ्वीकायरक्षा, २ अप० २०,३ तेज० रक्षा, ४ वायु० रक्षा, ५ वन रक्षा, ६ द्वीन्द्रियर०, ७ त्रीन्द्रिय- रक्षा, ८ चतुरि० रक्षा, ए पंचे० रक्षा, १० अजीवसयम ११प्रेतासंयम, १२ उपेक्षासं०,१३ प्रमार्जनासं०,१४ परि- ष्ठापनसं०, १५ मनःसं०, १६ वचःसं०, १७ कायसंयम. १० वैयावृत्य,- १ आचार्यवैयावृत्य,२ उपाध्याय वै०,४ तपस्वि वै० ४ लघुशिष्य वै०, ५ ग्लानसाधु वै०, ६ स्थविर वै०, 3 समनोज्ञसमाचारीकारक वै०, ८ श्रमणसंघ वै०, ९ चान्द्रादिकुलवै०, १० कोटिकादिगुण वैयावृत्त्य, ९ ब्रह्मगुप्ति,- १ वसति, २ कथा, ३ निषद्या, (स्त्रीआसन), ४ इन्द्रिय०, ६ कुड्यन्तर०, पूर्वक्रीडित,७ प्रणीताहार, ८ अतिमात्राहार, ९ शरीरविभूषा. ,

चारित्रना ७० भेद॥
(१७९)
.
,
३ ज्ञानादि,-
१ ज्ञान, दर्शन, ३ चारित्र,
१२ तपोभेद,
६ वाह्यतप,
१ अनशन, २ ऊणोदरी, ३ वृत्तिसंक्षेप,४ रसत्याग,
५ कायक्लेश, ६ संलीनता,
६ अभ्यन्तर तप,--
१प्रायश्चित्त, २ विनय, ३ वैयावृत्त्य, ४ स्वा-
ध्याय, ५ ध्यान, ६ उत्सर्ग,
४ कषायनिग्रह,
१ क्रोधनिग्रह,२माननिग्रह,३मायानिग्रह,४लोभनिग्रह,
आ चरणसित्तरी कहेवाय छे तेवीज करणसि-
तरी पण क्रिया अनुष्ठान संबंधी छे,
॥ तपना ५० भेद, ॥
१२ वाह्यतप,
२ अनशन (१ यावत्कथिक, २ ईत्वरिक) २ ऊनोदर

नवर्षद विधि विगेरे संग्रह। (१ बाह्य, २ अभ्यन्तर) ४ वृत्तिसंक्षेप [१ द्रव्यथीरक्षे- थी, ३ कालथी ४ भावथी, ] १ कायक्लेश, १ रसत्याग, २ संलीनता १ (इन्द्रिय कषायादि सं०,२वसतिसं०) ३८ अन्यन्तर तप- १० प्रायश्चित्त (१ आलोचना, २ प्रतिक्रमण, ३ मिश्र, ४ विवेक, ५ उत्सर्ग, ६ तप,७ छेद, ८ मूल, ९ अनवस्थाप्य, १० पारांचिक.) ७ विनय (१ ज्ञानविनय, २ दर्शन वि०, ३चा- रित्रवि०, ४ शुभमनोवि०, ५ शुभवचनवि०, ६ शुभ- कायविनय, ७ औपचारिकवि०) १० वैयावृत्य [१ आचार्यवै०,२ उपाध्याय०,३ स्थ- विर०, ४ तपस्वि०, ५ लघुशिष्यादि०, ६ ग्लानसाधु, ७ समनोज्ञसामाचारीकारक०, ८ संघ०, ए कुल०, १० गणव०] ५ स्वाध्याय (१ वाचना, २ पृचना, ३ परिवर्तन, तपना ५० भेद ॥ (१८१) ४ अनुप्रेता, ५धर्मकथा.) ४ ध्यान (१ आर्त, २ रौद्र,३ धर्म्य, ४शुक्लध्यान) २ उत्सर्ग (१ बाह्य अभ्यन्तर) अन्यत्र तपथी प्रकट थती लब्धिभेदोए पण तपना ५० भेद वर्णव्या , बीजी रीते पण तपना ५० भेद थाय छे. २ बाह्यतप.- (४) अनशन- १ इत्वरिकानशन. २ इंगितमरणयावत्कथि- कानशन. ३ पादपोपगमनयावत्कथिकानशन, ४ भक्तपरिज्ञायावत्कथिकानशन, (१) ऊनोदरिका (१) वृत्तिसंक्षेप (१) रसत्याग (१) कायक्वेश (१) संलीनता. १ अभ्यन्तरतप.- (१०) प्रायश्चित. १ आलोचना, २ प्रतिक्रमण, ३ आलोचनाप्र- तिक्रमणोभय, विवेक,५व्युत्सर्ग,६ तप,७छेद (१८२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। 1 ८ मूळ, ९ अनवस्थाप्य, १० पारांचित. [७] विनय. १ ज्ञानविनय, २ दर्शनवि०, ३ चारित्रवि०, ४ मनोवि०,५वचनवि०,६कायवि०,७औपचारिकवि० (१) वैयावृत्त्य. (५) स्वाध्याय, १ वाचना, २ पृच्छना, ३ परावर्तना, ४ अनुप्रे- क्षा, ५ धर्मकथा. (१६) ध्यान- ४ आर्तध्यान, १ इष्टवियोगात, २ अनिष्टसंयोगात ३ रोगचिन्तार्त०, ४ अग्रशोचार्त०. ४ रौद्रध्यान. १ हिंसानुबंधिरौद्र,रमृषानुवंधि ३चौर्यानुबंधि, ४ परिग्रहानुबन्धिरौद्र. ४ धर्यध्यान. १ आज्ञाविचयधर्म०, २ अपायवि०, ३ विपा- कवि०, ४ संस्थानवि०, तपना ५० भेद ॥ (१८३) ४ शुक्लध्यान. १ पृथक् वितर्कसविचार, २ एकत्ववितर्कअ- विचार, ३ सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति,४ समुच्छि- न्नक्रियाऽनिवर्ति. (२) उत्सर्ग, १ बाह्य-उत्सर्ग २ अभ्यन्तर-उत्सर्ग. - - ॥ श्री सिद्धचकाराधनमाहात्म्य ॥ श्री सिद्धचक्र महाराजना नवपदोनी समुदित आराधना करनार महाराज श्री श्रीपालकुमार आभ- वमा अनेकभोग ऋद्धि वैभव पामी शासनप्रभावना करी माता तथा नव राणीओ सहित नवमे देवलोके उत्पन्न थया, यावत् नवमे भवे मुक्तिपद पामशे, ॥ नवपदोनुं पृथक् माहात्म्य ॥ गणधरभगवंत श्री गौतमस्वामिजी महाराज श्रेणिक महाराजाए पूछेला प्रश्नना जवाबमां नीचे प्रमाणे फरमावे छे. ॥श्री अरिहंतपद माहात्म्य.॥ तो भणइ गणी नरवर पतं अरिहंतपयप्पसाएणं । देवपालेण रजं, सकतं कत्तिएणावि ॥१॥ त्यारपछी गणधरभगवान् श्री गौतमस्वामीजी .

सिद्धचक्राराधन भाहात्मय ॥ (१८५) कहे छे हे राजन् ? (श्रेणिक) श्री अरिहंत पदना आ- राधनना प्रसादथी देवपाल नामनाशेठना नोकरे राज्य मेळव्युं, अने कार्तिकशेठे शक्रइन्द्रपणुं प्राप्त कर्यु. ॥श्री सिद्धपद माहात्म्य. ॥ सिद्धपयं झायंता, के के सिवसंपयं न संपत्ता । सिरिपुंडरीयपंडव-पउममुणिंदाइणो लोए ॥२॥ श्री सिद्धभगवंतनुं ध्यान करता मुनिओमां अग्रेसर श्री पुंडरीक गणधर भगवान् पांचे पांडवो तथा पद्म मुनि विगेरे कोण कोण मुक्तिसंपत्ति पाम्या नथी ? अर्थात् अनेक जीवो सिद्धिपद पाम्या छे. २ ॥ श्री आचार्यपद माहात्म्य. ॥ नाहियवायसमजिय--पावभरो विहुपएसिनरनाहो। जं पावइ सुररिद्धिं, आयरियप्पयप्पसाओ सो ॥३॥ (प्रथम) नास्तिक मतथी घणोज एकठो कयों (१८६.) 'नवपद् विधि विगेरे संग्रह। छे पाप समूह जेणे एवो छतां पण प्रदेशिराजाजे देव ऋद्धिने पामे छे ते केवल आचार्यभगवंतनाचरणनोज प्रसाद जाणवो, ३ ॥ श्री उपाध्यायपद माहात्म्य.॥ लहुयं पि गुरूवइ8, आराहंतेहिं वयरमज्झायं । पत्तो सुसाहुवाओ, सीसेहिं सीहगिरीगुरुणो ॥४॥ गुरु महाराजाए फरमावेल 'वयीं न्हाना पण वज्रस्वामिजी उपाध्याय वाचनाचार्य' ने आराधन करनार आचार्य श्री सिंहगिरिजी महाराजना शिष्योए उत्तम साधुवाद (आ उत्तम विनीत शिष्यो छे तेवी 'स्तुति') प्राप्त कयों, ४ . ॥ श्री साधुपद माहात्म्य ॥ साहुपविराहणया, आराहणया य दुकसुख्खाई। सप्पिणी रोहिणीजीवहि, किं नहु पत्ताइंगुरूयाई॥५॥ श्री साधुपदनी विराधना तथा आराधनाथी

दर्शनपद माहात्म्य ॥ (१८७),
अनुक्रमे रूपिणी तथा रोहिणीना जीवोए भारे दुःख अने
सुखो शुंप्राप्त कर्या नथी ? अर्थात् रूपिणीना जीवे साधु
पदनी विराधनाथी भारे दुःख मेळव्युं, अने रोहिणीना
जीवे साधुपदनी आराधनाथी अतिशय सुख मेळव्युंछे.५
॥ श्री दर्शनपद माहात्म्य ॥
दसणपयं विसुद्धं, परिपालंतीइ निच्चलमणाए।
नारीइ वि सुलसाए, जिणराओ कुणइ सुपसंसं ॥६॥
विशुद्ध श्रीसम्यग्दर्शन पदनी सर्व रीते आराधना.
करनार निश्चळ मनवाळी नागसारथीनी स्त्री सुलसा
श्राविका अवळा जातिनी पण तीर्थंकर देव भगवान्
श्रीमहावीर स्वामी सारी रीते प्रशंसा करे छे, (श्रावक
अंबडपरिव्राजकद्वारा कुशल समाचार तथा धर्मलाभ
कहेवराव्यो.) ६
॥ श्री ज्ञानपद माहात्म्य ॥
नाणपयस्स विराहण--फलंमि नाओ हवेइ मासतुसो ।
आराहणाफलंमी, आहरणं होइ सीलमई ॥७॥

(१८८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। श्री ज्ञानपदनी विराधनाना फल संबंधमां दृष्टान्त तरीके श्रीमाषतुष मुनि छे अने आराधनाना फल संबंधमा उदाहरण तरीके श्री शीलमती छे, ७ . :: ॥श्री चारित्रपद माहात्म्य ॥ चारित्तपयं तहभा--वओ वि आराहियं सिवभवंमि । जेणं जंबुकुमारो, जाओ कयजणचमुक्कारो ॥८॥ श्री शिवकुमारना भवमा तेवा प्रकारे भावथी श्री चारित्रपदनी आराधना करी के जेनाप्रतापे कयों छे लोकोमा चमत्कार जेमणे एवाश्रीजंबूस्वामी चरमकेवलि उत्पन्न थया. ॥ श्री तपः पद माहात्म्य ॥ वीरमईए तह कहवि, तवपयमाराहियं सुरतरुव । जह दमयंतीइ भवे, फलियं तं तारिसफलेहिं ॥१॥ कल्पवृक्ष समान श्रीतपापदनी राजपत्नी वीरमतीए तेवा कोइ पण 'उत्तम स्वरूपे आराधना करीके जेम -- उपदेशसार ॥ नलराजानी पटराणी श्री दमयंतीना भवमा तेवा 'उत्कृष्ट' फलोए ते तपः फलीभूत थेयुं॥ ॥छेवटे श्री गौतमस्वामी भगवान् साक्षात् दृष्टान्त देखाडे छे॥ किं बहुणा मगहेसर ? एयाण पयाण भत्तिभावेणं। तं आगमेसि होहिसि. तित्थयरो नस्थि संदेहो ॥१०॥ हेमगधदेशनायक श्रेणिक? घणुं शुकहीये, आ पदो प्रत्येना भक्ति परिणामे करी भविष्यकालमा तुं तीर्थ- कर [पद्मनाभ नामे आवती चोवीशीमां प्हेला] थइश, . आ बाबतमां संदेह नथी. १० उपदेशसार. तम्हा एयाई पयाई, चेव, जिणसासणस्स सबस्सं। नाऊणं भो भविया ! आराहह सुद्धभावेणं ॥ ११ ॥ हे श्रेणिक? ते माटे आ [नव] पदोज श्री जि- (१९०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। नशासनतुं सर्वस्व छे (आलुं जिनशासन आ नवप- दोमां समायेलूंछे) तेम जाणीने हे भव्यप्राणीओ ? शुद्धभावथी श्री सिद्धचक्र भगवान्नी आराधना करो.? ? ११, माहात्म्य (फल) निस्यन्द, एयाइं च पयाई, आराहताण भवसत्ताणं। हुंतु सया वि हुमंगल-कल्लाणसमिद्धिविद्धीओ ॥१२॥ निश्चयथी आ पदोनी आराधना करनार नव्य प्राणीओने मंगल [विपत्ति विनोनी शान्ति], कल्याण (संपत्तिनी उत्कृष्टता) समृद्धि (सर्व प्रकारे वैभवनी पूर्णता ) अने वृद्धि (च्हडती-अभ्युदय-आबादी) पण सदाने साटे थाओ १२. S

॥ श्री सिद्धचक्र तप उद्यापन विधि।.
។
भक्तिमान् भव्य श्रावके पोतानी शक्तिवै-
भवने अनुसारे उजमणुं करवाथी तपनी सफलता,
लक्ष्मीनो सद्व्यय, शुभ ध्याननी वृद्धि, सुलभबोधि
भव्यजीवोने सम्यक्त्वनी प्राप्ति, श्री तीर्थंकरदेवनी
अपूर्व भक्ति, श्री जिनशासननी प्रभावना-शोभा-
उन्नति अने तेनाथी सम्यक्त्वनी उत्तरोत्तर वृद्धि
-दृढता, क्षायिक सम्यक्त्व, तीर्थंकर नाम कर्मबन्ध
विगेरे अनेक महान् लाभो थाय छे, तप पूर्ण थये
उजमणुं करवं ते जिनेश्वर चैत्यनी उपर कलश
च्हडाववा तुल्य छे,
॥ उजम' करतां राखत्री जोइसी सावधानता ।।
तपर्नु उजमणुं करतां अपूर्व आत्मवीर्यनो
उल्लास राखवो, वीर्यउदास. विनानी दरेक क्रियाओ
यथार्थ फलदायक थती नथी, वीर्यउल्लास साथे

(१९२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। करांती शुभं क्रियाओज मुक्तिनुं कारण थाय छे, जेम औषधि अनुपान साथे तथा पथ्यसेवनथी विशेष लाभ आपे छे तेम उजमणुं करवाथी तप पण विशेष फलदायक थाय छे, असार अने चपल लक्ष्मी अनेक भवमा अरे एक भवमा पण अनेक वखत आवी अने गइ, मोहित प्राणिओने दुर्गतिओमां खेंची गइ अने खेंची जशे, . आ लक्ष्मीनो ल्हावो लेवानो तेनाथी सद्गति उपा- जवानो अपूर्व अवसर आव्यो मळ्यो जाणी पूर्ण उ- दारभावथी यथार्थ विधिसहित उजमणुं करवू, श्रीमद् उपाध्यायजी वर्णवे छे के- "धन म्होटे छोटुं करे,धर्म उजमणुं तेह, मेरे लाल । फल पूलं पामे नहि,मम करजो तिहां संदेह, मेरेलाल॥ मननो मोटो मोजमां ॥१॥" उजमणुं करतां विस्तीर्णमंडपमांश्री सिद्धचक्रमंडल (यंत्रनी) त्रण पीठिका विगेरे करवा पूर्वक स्थापना करी महोत्सव करवो, श्रीसिद्धचक्र यंत्रनी गोठवण तपना उधापन अंग करवाना कर्तव्य ॥ (१९३) वलयादिनी रचना विगेरे स्वरूप गीतार्थ गुरु महाराज पासे समजवू, ॥ तपना उद्यापन अंगे करवाना कर्तव्य ॥ जेटला तप दिवसो होय तेटली संख्या दरेकनी उत्कृष्टताथी लेवी, न बनी शके तो वर्तमान आच- रणाए ओळीनी अगर पदोनी संख्या लेवाय बे, मवीन चैत्यो बंधाववा, जीणोंझार कराववा, जिन विम्बो भराववा (परिकर समेत तथा परिकरविनाना श्री सिद्धचक्र भराववा, श्री सिद्धचक्र यंत्रो कराववा, श्री सिद्धचक यंत्रो चीतराववा, गणधर भगवंत आ- दिनी गुरु मूर्तिओ, पौषधालय, धर्मशाला, उपाश्रय बंधाववा. प्रभुजीना तमाम आभूषणो-मुकुट, कुंडल, तिलक, हंस, बाजु, कही, कडा आंगी, भामंडल, पाखरो, श्री- वत्स, बीवीओ, चाल्ला, विगेरे,त्रिगडा बाजोठो, सिंहा- सन, चंद्रुवा, मुठीया, रुमाल, पाठा, तोरण, स्थापना- १3 (१९४) नवपद विधि, विगेरे संग्रह। चार्य, नवकारवाळीओ, अष्टमांगलिक, कटोरी; सोना रूपाना वरख अगरबत्ती, दशांगधूप, अगर, केशरना पडीका, बरासना पडीका; चंदनना पुंठीया, ओरशीया, धूपधाणा, कळश, थाळ, बाबडीओ, चंगेरीओ, र- काबी, वाटकीओ, आचमनी, वाटका, मोरपीबीओ, वाळाकुंचीओ, देगडा, टबुडीओ, प्याला,. दंडासण, पुंजणी, सुपडी, फाणस, कोडीया, दीवीओ, हांडी,झ- म्मर, सरपोस, आरती, मंगळदीवा, घंट, घंटडीओ, त्रांबाकुंडी, हांडा, तांबडी, वाजोठ, पाटला, बाजो- ठीओ, नवग्रह-दिकपाल--अष्टमंगलना पाटला, चा- मर बत्रत्रय, अंगलुहणा, पाटलुहणा, कामलीओ, धो- तीया, उत्तरासंग; ध्वजा, वाटवा, झोळीओ, दाबडीओ विगेरे, ठवणीओ, सांपडा, दाबडा, चावखी, कंवली, खडीया, कलम, पेनसीलो, चाकु, कातर, आनुपूर्वीनी चोपडीओ, मोरपीडीओ, कांबी, रुमाल, पाटी, पाठा दरेक आगमनी तथा ग्रन्थोनी नवनव प्रतो,लखाववी जेटलं मली शके तेटलं पुस्तक संग्रह, ओधाना पाटा दशीओ, ओघारीया, नीशीथीआ, मुहपत्तीओ, ख. - त - तपना उद्यापन अंगे करवाना कर्तव्य ॥ (१९६) भानी कामळी, कामलीओ, चोलपट्टा कपडाना ताका, संथारीया, दांडा ओघानी दांडीओ, पातरा, तरपणी, पाणी लाववाना लोट, झोळी, पल्लां, पुंजणीओ, दंगा- सण ऊनना तथा पीबाना, सुपडी, पुंजणी, कंदोरा ओघाना दोरानी. दोरीओ, तरपणीना दोरा, चरवळा, : कटासणा, मुहपत्तीओ, संथारीया, दंडासण, कांब- -लीओ, घडीओ विगेरे ज्ञानदर्शन चारित्रना उपकरणो एक्याशी एक्याशी अथवा नवनव संख्याए मूकवा,' . : (अरिहंतपद)८ कर्केतनरत्न ३४ हीरा सिद्ध ८ माणेक ३१ परवाला : आचार्य , : ५ पीलामणि ३६ गोमेदक उपाध्याय,,, २५ नीलमणि साधुः..., ..२७ श्याममाण ५.राज्यपटमणि. दर्शनादिचार २३८. मोटा उत्तम. मोती.. . .. आ उपरांत श्री सिद्ध चक्रयंत्र पूजनमा जोइता तमाम साधन विगेरे श्री गीतार्थ. गुरुमहाराज पासेथी समजवाद .... , " -- -- नवपद विधि विगेरे.संग्रह। min min ॥श्री सिद्धचक्राराधक भव्यजीवनां कर्तव्यो!!! १ श्री अरिहंतपदाराधन-प्रतिमाजीभराववा,जीर्णोद्धारो कराववां, अंजनशलाका,प्रतिष्ठाओ कराववी, आंगी.. पूजा, महोत्सव करवा विगेरे श्री अरिहंत भक्ति. २ श्री सिद्धपदाराधन--सिद्ध प्रतिमाओ भराववी, तेमनी 'अंजनशलाका, प्रतिष्ठा, आंगी, पूजा, महोत्सव क- रवा. विगेरे श्री सिद्धभक्ति. ३ श्री आचार्यपदाराधन-श्री आचार्थभगवंतनी भक्ति विनय, वेयावच्च करवं, द्वादशावत 'वन्दन करवं, अशन पान खादिम स्वादिम वस्त्र पात्र वसतिः आदि पडिलाभवा, आचार्यपदप्रतिष्ठा कराववी. आचार्यना सामैया विगेरे सन्मान करवो. विगेरे, . ४ श्री उपाध्यायपदाराधन-श्री उपाध्यायजी भगवंतनी भक्ति विनय वेयावच्च करवा भणवा.भणाववाने त- माम अनुकूलता करी आपवी, उपाध्यायपंद प्रतिष्ठा, सामैयु आदि सन्मान कर विगेरे, '; ५ श्रीसाधुपदाराधन-श्रीपंचमहाव्रतधारी मोक्षमार्ग सा-.

श्री सिद्धचक्राराधक भव्यजीवनां कर्तव्यो । (१९७) धक साधु भगवंतोने वन्दन, नमन, आदर सन्मा- नादि करवा.वसति, अन्न, पान. औषध,भैषज्यादि आपवा. दीक्षा महोत्सवादि करवा; साधुनुं सामैयुं विगेरे करवा. ६ श्री दर्शनपदाराधन-श्री तीर्थ भक्ति करवी, श्री तीर्थ- रक्षणकार्यमा उत्साहपूर्वक बनती साहाय्य आपत्री, यात्रा संघो काढवा, साधर्मिक वात्सल्यो करवा, रथयात्रादि महोत्सवोकरवा,शासनोन्नतिना कार्यमां प्रयत्न करवो विगेरे.. ७ श्री ज्ञानपदाराधन-सिद्धान्तो लखाववा, भणनारने सहाय आपवी, पुस्तक संरक्षणना साधनो योजना, पुस्तक विगेरे ज्ञानसाधनोनीप्रभावना करवी, ज्ञान- दान कर विगेरे. ८ श्री चारित्रपदाराधन-व्रत नियमादि पाळता विरति वंत जीवोनी भक्ति करवी, चारित्रना उपकरणो विगेरे साधनोथी साहाय्य करवी विगेरे. ९ श्री तपःपदाराधन-तपस्विओनी भक्ति वैयावच्चादि करवा तपस्विओने प्रभावनाओ करवी, तप करतां उत्साह वधे तेवी अनुकूलता.जोडी आपवी. विगेरे. -

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॥ ओलीमा उपयोगी पञ्चकखाणो.॥
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आयंबिलनु पच्चकखाण
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उगए सूरे नमुक्कारसहियं पोरिसी. ,साढपोरिसी
सूरे उग्गए पुरिमढ़ अवसुट्टिसहियं पञ्चक्खाइ
उगए सूरे चउदिवहंपि आहारं असणं पाणं खाइमं
साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारेणं पच्छन्नकालेणं
दिसामोहेणं साहुवयणेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहि-
त्तियागारेणं आयंबिलं पच्चक्खाइं अन्नत्थणाभोगेणं
सहसागारेणं लेवालेवेणं गिहत्थसंसट्टेणं उविखनवि-
वेगेणं पारिठावणियागारेणं महत्तसगारेणं संव्वसमाहि-
वत्तियागारेणं एगासणं पच्चक्खाइ 'तिविहंपि आहारं
असणं खाइम साइमं अन्नत्थाभोगेणं सहसाग़ारेणं
सागारियागारेणं आउंटणपसारेणं गुरुअब्भुट्ठाणेणं
‘पारिट्ठावाणियागारेण महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तिया-
..', '१ ठाम चौविहार करको होय तो एकल्लठाणं पच्चख्खाइ
चउन्विपि.आहार असणं पाणं खाइमं साइम" ए प्रमाणे बोलवू.

पच्चक्खापा.
(१९९)
गारेणं पाणस्स लेवेश वा अलेवेण वा अच्छेण वा बहुलेवे-
ण वा ससिस्थेण वा असित्थेण वा वोसिरइ ॥
आयंबिल करी मुखशुद्धि कर्या पछी उठता
तिविहारतुं पच्चक्खाण.
:दिवसचरिमं पच्चक्खाइ तिविहंपि आहारं असणं
खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारेणं महत्तरा-
गारेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं वोसिरह ॥
मुठिसहियंनु पच्चक्खाण.
मुट्ठिसहियं पच्चक्खाइ अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारेणं
महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं वोसिर ॥
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,१ साथे देसावगासिय पच्चक्खाण लेवू होय तो " देसावगा-
सियं उवभोगपरिभोगं पञ्चक्खाइ, अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारणं
महत्तरागारणं सबसमाहिवत्तियागारेणं वोसिरइ " ए पच्चख्खाण
पण साथै वोल.
२ गंठसी, वेढसी आदि पच्चख्खाण करचुं होय तो ते पाठ
बालवो.

.(-२००) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। पाणहारनु पच्चक्खाण. पाणहार दिवसचरिमं पच्चक्खाइ अन्नत्थणाभोगेणं सहसागरेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं वोसिरह ॥ पारणाना दिवसतुं एकासणां बेसणानुं पच्चक्खाण. उग्गए सूरे नमुक्कारसहियं पोरिसि साढपोरिसी मुट्ठिसहियं पच्चख्खाइ उग्गए सूरे चउन्विहंपि आ- हारं असणं पाणं खाइमं साइमं अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारेणं पच्छन्नकालेणं दिसामोहेणं साहुवय- णेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं विग- इओ पच्चक्खाइ अन्नत्थणाभोगेणं सहसागारेणं लेवालेवेणं गिहत्थसंसटेणं उक्खित्तविवेगेणं पमुच्च- मक्खियेणं पारिद्वावणियागारेणं महत्तरागारेणं सव्व- समाहिवत्तियागारेणं 'एगासणं बियासणं पच्चक्खाइ ... १ जो वेसणुंज करवू हाय ता '.एगासणं बोलवू नहि अने एकास' कर होय तो 'वियासणं' बोलवू नहि. .

पच्चक्खाण. (२०१) अन्नत्थणाभोगेणं • सहसागारेणं सागारियागारेणं आउंटणपसारेणं गुरु अब्भुट्ठाणेणं पारिद्वावणिया- गारेणं महत्तरागारेणं सव्वसमाहिवत्तियागारेणं पाण- स्स लेवेण वा अलेवेण वा अच्छेण वा बहुलेवेण वा 'ससित्थेणवा असित्थेण वा वोसिरइ, ॥ अथ श्री स्नान पूजानो विधिः प्रथम त्रण गढने बदलें त्रण बाजोठ मूकीने उपला बाजोठने मध्यभागे केशर (कुंकुम)नो साथीओ करवो, अने तेनाआगळ केशर (कुंकुम)ना साथीआ चार करीने उपर अक्षत नांखंवा तथा फळ मूकवां वचला साथीआ उपर रुपानाणुं मूकवू, अने चारे साथीआ उपर कलश स्थापवा, तेमां पंचामृत करी जल भरवू. तथा वचला साथीआ उपर थाळ मूकी केशरनो साथीओ करी अक्षत नांखी फळ मूकी नवकार त्रण गणी प्रभुने पधराववा, पछी बे सनाथीआओने ऊभा राखीने त्रण नवकार गणाववा. पछी प्रभुना जमणा पगना अंगुठे कळशमाथी जल रेडवू, अने. अंगलूहणां त्रण करवां पछी केशरथी पूजा करी हाथ धूपीने सना आना जमणा हाथमा केशरनो चांल्लो करवो. पछी कुसुमां- जलि (फूल) होय ते हाथमां आपवी, पछी नीचे प्र- माणे, कहेवू, दीपक एक-प्रभुनी जमणी बाजुए करवो स्नात्र पूजानो विधि ॥ (२०३) ॥ पंडितश्रीविरविजयजी कृत स्नात्रपूजा ॥ ॥ काव्यं॥ ॥द्रुतविलंबितवृत्तम् ॥ सरसशान्तिसुधारससागरं, शुचितरं गुणरत्नमहाकरम् ॥ भविकपंकजबोधदिवाकर प्रतिदिनं प्रणमामि जिनेश्वरम् ॥ १ ॥ ॥दोहा॥ कुसुमाभरण उतारीने, पंडिमा धरिय विवेक ॥ मज्जन पीठे थापीने, करीये जल अभिषेक ॥२॥ ॥ गाथा ॥ आर्या गीति ॥ जिणजम्मसमय मेरु-सिहरंमि रयणकणयकलसेहिं । देवासुरेहि ण्हविज, ते धन्ना जेहिं दिट्ठोसि ॥.३ ॥ ॥ कुसुमांजलि । ढाळ ॥ निर्मलजल कलशे न्हवरावे, वस्त्र अमूलक अंग धरावे ॥ कुसुमांजलि म्हलो आदि जिणंदा ॥ सिद्ध- स्वरूपी अंग पखाली, आतम निर्मळ हुइ सुकुमाळी - (२०४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ॥ गाथा ॥ आर्यागीति ॥ मचकुंदचंपमालइ-कमलाई पुप्फपंचवण्णाई ॥ जगनाहन्हवणसमये, देवा कुसुमांजली दिति. ॥५॥ ॥ नमोऽर्हत्सिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुन्यः ॥ :, । कुसुमांजलि ॥ ढाळ ।। रयण सिंहासन जिन थापीजे, कुसुमांजलि प्रभु चरणे दीजे ॥ कुसुमांजलि मेलो शान्ति जिणंदा॥६॥ ॥दोहा॥ जिण तिहुँ कालय सिद्धनी, पडिमा गुणं भंडार ।। तसुचरणे कुसुमांजलि, भविक दुरित हरनार ॥७॥ ॥ नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः ॥ । कुसुमांजलि ॥ ढाळ ॥.. कृष्णागरु वर धूप. धरीजे, सुगंधः कर कुसुमांजलि दीजे. ॥ कुसुमांजलि म्हेलो नेमि जिणंदा ॥८॥ ॥ गाथा ॥आर्या गीति ॥ जसु परिमलबल दहदिसि, महुकरझंकारसहसंगीया॥ जिणचलणोवरि मुक्का, सुरनरकुसुमांजलि सिंधी-आई॥ ...

स्नात्र पूजानो विधि ॥ (२०५) ॥ नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः ॥ ।। कुमुमांजलि ॥ ढाळ ।। पास जिणेसरजग जयकारी,जल थल फुल उदक करधारी कुसुमांजलि म्हेलो पार्श्वजिणंदा ॥१०॥ ॥ दोहा॥ मूके कुसुमांजलि सुरा, वीरचरण सुकुमाल॥ ते कुसुमांजलि भविकनां, पाप हरे त्रण काळ ॥ ११॥ ॥ नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः । ॥ कुसुमांजाल ।। ढाळ ॥ विविध कुसुम वर जाति गहेवी, जिनचरणे पण-- मंत ठवेवी ॥ कुसुमांजलि म्हेलो.वीर जिणंदा ॥१२॥ ॥ वस्तु छंद ।। न्हवणकाले. न्हवणकाले, देवदाणवसुमुच्चिय ॥ कुसुमांजलि तहिं संठविय, पसरंत दिसि परिमल सुगंधियः॥ जिणपयकमले निवडेइं, विग्घहर जस नाम मंतो ॥ अनंत चउवीस जिन, वासव मलिय असेसा॥ सा कुसुमांजलि सुहकरो, चउविह संघ विसेस ॥ कुसुमांजलि मेलो चउवीस जिणंदा ॥१३॥ .

नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ॥ नमोऽहत्सिद्धाचार्योध्यायसंर्वसाधुन्यः ।। ।। कुमुमांजलि ॥ हाळं ॥ अनंत चउबीसी जिनजी जुहारु, वर्तमानचवीसी संभारु ॥ कुसुमांजलि मेलो चोवीशजिणंदा ॥ १४॥ ॥दोहा।। महाविदेहे संप्रति, विहरमान जिन वीश.॥ भक्तिभरे ते पूजिया, करो संघ सुजगीश ॥ १५ ॥ ॥नमोऽर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः ।। कुसुमांजलि हाला अपछरमंडलि गीत उच्चारा, श्री शुभवीरविजय जयकारा ॥ कुसुमांजलि मेलो सर्व जिणंदा ॥६॥ ॥ इति श्री कुसुमांजलयः॥ पछी स्नात्रीया त्रण समासमण देइ जगचिंता- मणि चैत्यवंदन करी “नमुथ्थुणं" कही जयवीयराय पर्यंत कहे. पछी हाथकलश धूपी मुखकोश वांधी कलश लेइ उभो रहीने कलश कहे, ते ढाळ ॥ अथ कलश !! दोहा॥ सयल जिणेसर पाय नमि, कल्याणकविधि तास ।। .

. स्नात्र पूनानो विधिः (२०७ वर्णवतां सुणतां थकां, संघनी पूगे आश ॥ २ ॥ ॥ ढाळ।। एक दिन अचिरा हुलरावती.-ए देशी॥ समकितगुणठाणे परिणम्या, वळी व्रतधर संय- मसुख रम्या ॥ वीशस्थानकविधिये तप करी, इसीभा- वदया दिलमां धरी ॥१॥ जो हो। मुज शक्ति इसी, सवि जीव करुशासन रसी॥शुचिरस ढलते [त) तिहां बांधतां, तीर्थंकर नाम निकांचता ॥२॥ सरागथी संयम आचरी, वचमा एक देवनो भव करी ॥ व्यवी पन्नरक्षेत्रे अवतरे,मध्यखंडे पणराजवी कुले ॥३॥ पटराणी कूखे गुणनीलो, जेम मानसरोवर हंसलों ॥ सुखशय्याये रजनी शेषे, उतरतां चउद सुपन देखे ॥४॥ ॥ ढाळ खननी॥ पहेले गजवर १. दीठो, बीजे वृषभ २ पइट्ठो त्रीजे केशरी सिंह ३, चोथे लक्ष्मी ४ अबीह ॥१॥ पांचमे फूलनी माळा, ५.छटे चंद्र. ६ विशाळां ॥ रवि रातो ७ ध्वज़ मोहोटो "८, पूरण कळंश ९ नहीं छोटो ॥२॥ दशमें पद्म सरोवर १०, अगियार में (२०८). नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ; रत्नाकर ११ ॥.भवन विमान १२ रत्नगंजी, १३, अग्नि- शिखा धूमवर्जी १४ ॥३॥ स्वप्न लही जइ रायने भाषे, राजा अर्थ प्रकाशे ॥ पुत्र तीर्थंकर त्रिभुवन नमशे, सकल मनोरथ फळशे ॥४॥ ॥ वस्तु छंद ॥ अवधि नाणे अवधि नाणे, उपनां जिनराज ॥ जगत जस परमाणुआ, विस्तर्या विश्वजंतु सुखकार ॥ मिथ्यात्व तारा निर्वला,धर्मउदय परभात सुंदर ॥मा-: ता पण आणंदियां, जागती धर्म विधान ॥ जाणंती जगतिलक समो, होशे पुत्र प्रधान ॥१॥ ॥ दोहा॥ शुभंलग्ने जिन जनमिया, नारकीमां सुख ज्योत ॥ . सुख पाम्या त्रिभुवन जना, हुओ जगत उद्योत ॥१॥ पढाळा कडखानी देशी॥ सांभळो कळश जन्म, महोत्सवनो इहां॥छप्पन कुमरी दिशि, विदिशि आवे:तिहां । माय सुत नमिय आणंद अधिको धरे ॥ अष्ट संवर्त, वायुथी कचरो हरे ॥१॥ वृष्टि गंधोदके, अष्ट कुमरी करे.॥ अष्टं कलशा.

. स्नान पूजानो विधि । (२०९) भरे, अष्ट दर्पण धरें । अष्ट चामर धरे, अष्ट पंखा लही ॥चार रक्षा करी, चार दीपक ग्रही ॥२॥ घर करी केळनां, माय सुत लावती ॥ करण शुचिकर्म, जळ, कलशे न्हवरावती ॥ कुसुम पूजी अलंकार पहेरावती। राखडी बांधी जइ, शयन पधरावती ॥३॥ नमिय कहे माय तुज, वाल लीलावती॥ मेरु रवि चंद्र लगे, जी- वजो जगपति ॥ स्वामिगुण गावती; निज घर जावती ॥ तिण समे इंद्र,सिं-हासन कंपती ॥४॥ ॥ ढाळ ॥ एकवीशानी देशी॥ जिन जन्म्याजी जिण वेला जननी घरे ॥ तिण वेलाजी इंद्रसिंहासन थरहरे ॥ दाहिणोत्तरजी, जेता जिन जनमे यदा ॥ दिशिनायकजी, सोहम ईशान बेहु तदा ॥१॥ । त्रुटक॥ तदा चिंते इंद्र मनमां, कोण अवसर ए वन्यो। जिनजन्म अवधिनाणे जाणी, हर्ष आनंद . ऊपन्यो. ॥१॥ सुघोष आदे घंटनादे, घोषणा सुरमें करे। सवि देवि देवा जन्ममहोत्सवे, आवजो सुरगिरिवरे ॥३॥..

.. . (२१०) नवपद विधि, विगेरे संग्रह। -ढाला। पूर्वली ॥ एम सांभलीजी, सुरवर कोडि. आंवी मले । जन्ममहोत्सवजी, करवा मेरु उपर चले ॥ सोहमप- तिजी, बहुपरिवारे आवीया ॥ माय जिननेजी, वांदी प्रभुने वधावीया ॥३॥ ॥ त्रुटक ॥ वधावी बोले हे रत्नकुक्षि-धारिणि ? तुज सुततणों॥ हुं शक सोहम नास करशुं, जन्म उत्सव अति घणों ॥ एम कही जिन प्रतिबिंब थापी, पंच रूपे प्रभु ग्रही । देव देवी नाचे हर्ष साथे, सुरगिरि आव्या वही ॥४॥ ॥ढाळा पूर्वली मेरु,ऊपरजी, पांडुकवनमें चिहुं दिशे॥शिला उपरजी सिंहासन मन उबसे॥ तिहा बेसीजी, शके जिन खोळे धर्या ॥ हार त्रेशठजी, बीजा तिहां आवी:मळ्या:॥५॥ ॥ त्रुटक॥ :: मळ्या चोसठ सुरपति तिहां, करे कलश अड जाति- ना॥ मागधादि जल तीर्थऔषधि,धूप वली बहुभातिना। अच्युतपतिएं हुकम कीनो, सांभलो देवा सवे॥ खीरज- लधिः गंगानीर लावो, झटिति जनममहोत्सवे॥६॥ .

१ ....... स्नात्र पूजानो विवि ॥ . (२११) ॥ढाळ ॥ विवाहलानी॥ सुर सांभलीने संचरीया, मागध वरदामे चलीया ॥ पन्नद्रह गंगा आवे, निर्मल जल कलश भरावे ॥१॥ तीरथ फल औषधि लेता, वली खीरसमुद्रे जाता ॥ जल कलशा वहुल भरावे, फूल चंगेरी थाल लावे ॥२॥ सिंहासन-चामर धारी,धूपधाणा रकेवी सारी ॥ सिद्धांत भाख्यांजेह,उपकरण मिलावे तेह॥शाते देवा सुरगिरि आवे,प्रभु देखी आनंद पावे ॥ कलशादिक सहु तिहां ठावे, भक्ते प्रभुना गुण गावे ॥४॥ ॥ डाळ ।। राग धन्याश्री ।। आतम भक्ति मळ्या केइ देवा, केता मित्तनु- जाइ ॥ नारी प्रेर्या वळी निज कुलवट; धर्मी धर्म स- खाइ ॥ जोइस व्यंतर भुवनपतिना, वैमानिक सुर आवे ॥ अच्युतपति हुकमे धरी कळशा, अरिहाने न्हवरावे ॥ आ०॥१॥ अडजाति कळशाप्रत्येके, आठ आठःसहस प्रमाणो॥ चउस? सहस हुआ अभिषेके, अढीसें गुणा करी जाणो॥ साठ लाख उपर एक कोडि, कळशानो अधिकार ॥ बासठ इंद्रतणा तिहा बासठ, ॥

(२.१२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।.. लोकपालना चार ॥ आ०॥२॥ चंद्रनी पंक्ति छा- सठ छासठ, रवि श्रेणि नरलोको ॥ गुरुस्थानक सुर केरो एकज, सामानिकनो एको । सोहमपति ईशान- पतिनी इंसाणीना सोल ॥ असुरनी दश इंद्राणी ना- गनी, बार करे कल्लोल ॥ आ० ॥३॥ज्योतिष व्यं- तर इंद्रनी चउ चउ, पर्षदा त्रणनोएको॥ कटकपति अंगरक्षक केरो, एक एक सुविवेको ॥ परचूरण सुरनो एक छेल्लो, ए अढीसें आभिषेको ॥ ईशानइंद्र कहे मुझ आपो, प्रभुने क्षण अतिरेको ॥ आ०॥४॥ तब तस खोळे ठवी अरिहाने, सोहमपति मनरंगे ॥ वृष- भरूप करी शृंग जळे भरी, न्हवण करे प्रभु पुष्पादिक पूजीने छांटे, करी केसर रंगरोले ॥ मंग- ब्दीवो आरति करतां, सुरवर जय जय बोले ॥ आ० ॥५॥ मेरी मूंगळ ताल बजावत, वळिया जिन कर धारी ॥ जननीघर माताने सोंपी, एणिपरे वचन उ-- च्चारी॥ पुत्र तुमारो स्वामि हमारो, अम सेवक आ- धार ॥ पंच धाव्य रंभादिक थापी, प्रभु खेलावण अंगे॥

स्नात्र पूजानो विधि.॥ '(२१३)) हार ॥ आ०॥ ६॥ बत्रीश कोडिः कनक मणि मा- णिक, वस्त्रनी वृष्टि करावे ॥ पूरण हर्ष करेवा कारण, छीप नंदीसर जावे ॥ करीय अट्ठाइ उत्सव देवा, निज निज कल्प सधावे ॥ दीक्षा केवलने अभिलाषे; नित नित जिन गुण गावे ॥ आ० ॥ ७॥ तपगढ़ ईसर सिंह सूरीसर, केरा शिष्य वडेरा ॥ सत्यविजय पन्या- सतणे पद, कपूविजय गंभीरा ॥ खिमाविजय तस सुजसविजयना, श्री शुभविजय सवाया ॥ पंडित वी- रविजय शिष्ये जिन, जन्म महोत्सव गाया।आ०॥८॥ उत्कृष्टा एकशोने सित्तर, संप्रति विचरे वीश॥ अतीत अनागत काळे अनंता, तीर्थकर जगदीश ॥ साधारण ए कळश जे गावे, श्री शुभवीरसवाइ ॥ मंगळलीला सुखभर पावे, घर घर हर्ष वधाइ ॥ आतम० ॥ ९ ॥ ॥ इति पंडितश्रीविरविजयजी कृत स्नान पूजाः समास ॥ अहीं कळशाभिषेक करीये. पछी दुध, दहि, घृत, जळ . अने शर्करा ए पंचामृतनो पखाल करीने पछी पूजा करीये ने फूल चढा; वीये. पछी लूण उतारी आरती उतारवी. पछी प्रतिमाजीने आडो पहुंदो राखी स्नात्रीआंओए पोताना नव अंगे कंकु, (केशर)ना चाल्ला करवा. पछी पडदो काढी नांखी मंगळदीवो उतारवो...

॥ (:२१४)) नवपदः विधि विगेर संग्रह ।। ....... ॥ अथ लूण उतारणं ।। खूण उतारो जिनवर अंगे, निर्मळ जळधारा मन रंगे ॥ खूण ॥१॥ जिम जिम तडतड गुणज फूटे, 'तिम तिम अशुभ कर्मबंध त्रूटे ॥ लूण०॥२॥ नयण सलूणां श्री जिनजीनां,अनुपम रूप दयारस भीनां ॥ लूणः ॥३॥ रूप सलूणुं जिनजी, दीसे, लाज्यु लूण ते जळमा पेसे ॥ लूण० ॥ ४ ॥त्रण प्रदक्षिणा देइ जलधारा, जलण खेपवीये लूण उदार ॥ लूण० ॥५॥ जे जिन उपर दुमणो प्राणी, ते एम थाजो लूण ज्यु. पाणी ॥ लूण०॥६॥ अगर कृष्णागरु कुंदरु सुगंधे, धूप करीजे विविध प्रबंधे ॥ खूण. ॥७॥ इति ।। ॥ अथ. आरति॥ विविध रत्नमणि जडित रचावो, थाल विशाल अनोपम लावो ॥ आरति ऊतारो प्रभुजीनी आगे, भावना भावी शिवसुख मागे| आ० ॥१॥ सात चौद ने एकवीश भेवा, त्रण त्रणवार प्रदक्षिणा देवा आ० ॥ २॥ जिमजिम जलधारा देइ जपे, तिम तिम क स्नान पूजानो विधि ॥ (२१५) दोहग थरहर कंपे ॥ ७० ॥३॥ बहु भव संचित पाप पणासे, अव्यपूजाथी भाव उल्लासे ॥ आ० ॥४॥ चौद भुवनमा जिनजीने तोले, कोई नहीं आरति इम बोले ॥आरति०॥ ५॥ इति ।। ॥ अथ मंगळदीवो ॥ दीवो रे दीवों मंगलिक दीवो, जुवन प्रकाशक जिन चिरंजीवो ॥ दी० ॥ १॥ चंद्र सूरज प्रभु तुम मुख केरा, लूंछण करता दे नित्य फेरा ॥ दी० ॥२॥ जिन तुज आगल सुरंनी अमरी, मंगलदीप करी दिये जमरी ॥ दी० ॥३॥ जिम जिम धूपघटी प्रगटावे, तिम-तिम भवनां दुरित दुझावे ॥दी० ॥ ४॥ नीर अक्षत कुसुमांजलि चंदन, धूप दीप फल नैवेद्य वं- दन ॥ दी०॥ ५॥ एणीपरे ‘अष्टप्रकारी कीजे, पूजा मात्र महोत्सवं पभाणजे ॥ दीवों रे०॥ ६॥ .

ॐ สรร ॥ अथ, श्री नवपद पूजा विधि ॥ - आ पूजामा जे जे चीजो अवश्य जोइये, तेमांनी केटलीएक चीजोनां नाम लखीए छीए:-- दुध, दधि, घृत, शर्करा, शुद्धजळ, ए पंचामृत तथा केशर, सुगंधी, चंदन, कपूर, कस्तुरी, अमर, रोली, मौली, छुटां फुल, फूलोनी माळा, फुलोना चंद्रुवा, धूप, तंदुल प्रमुख नव जातिनां धान्य, नव प्रकारनां नैवेद्य, नव प्रकारनां फळ, नव प्रकारनी पक्व वस्तु, मिश्री, पतासां, ओला प्रमुख, तथा अंगलूहणांने वास्ते स- फेद-वस्त्र, अने पहेराववाने वास्ते उत्तम रेशमी वस्त्र, वासक्षेप, गुला- वजळ, अत्तर, इत्यादिक वीजा पण नव नव नालीना कळश, नव रकेवी, परात (त्रास), तसला, आरती, मंगलदीपक, भगवाननी आंगी, समवसरण, इत्यादिक सर्व वस्तु प्रथमथीं ठीक करीने रा- खवी ए थकी पूजामां विघ्न न होय. ए संक्षेप विधि कह्यो. विशेष विधि गुरुंथकी जाणवो.. ॥कलश विधि. चैत्र तथा आश्विन मासमा: ए पूजाओ भणावे, तेवारे नव स्नात्रिया करिये, महोटी कळश-प्रमुखमां पंचामृत भरिये, स्थाप- नामां श्रीफळ तथा रोकड, नाणुं धरिये, केशरथी तिलक करे, . .

श्री नवपद पूजा विधि.॥ (२१७) कंकणदोरो हाथे बांधे, डावा हाथमा स्वस्तिक करीने विधिसंयुक्त स्नात्र भणावे. प्रथम श्री अरिहंतपद श्वेतवर्णे छे माटे तांदुल, (चोखा), धूप, दीप, नैवेद्य प्रमुख अष्ट द्रव्य, वासक्षेप, नागरवेल प्रमुखनां पान, रकेवीमां धरीने ते रकेवी हाथमा राखे. नव कळ- शने मौलीसूत्र वांधी, कुंकुमना स्वस्तिक करी, पंचामृतथी भरीने ते कळशो हाथमां लेइ, प्रथम श्री अरिहंतपदनी पूजा भणे ते संपूर्ण भणी रह्या पछी महोटी परातमां (थालमां) प्रतिमाजीने पधरावे. पछी "औं ही नमो अरिहंताणं " ए प्रमाणे कहेतो थको, श्री अरिहंतपदनी पूजा करे. अष्टद्रव्य अनुक्रमे चढावे. इति प्रथमपद पूजा विधि. २ वीजुं सिद्धपद रक्तवर्णे छे, माटे घउ रकेवीमां धरी श्रीफळ तथा अष्ट द्रव्य लइने नव कळश पंचामृतथी भरीने वीजी पूजा भणे ते संपूर्ण थवार्थी "औं ही नमो सिद्धस्स" एमकही कळश ढोळे, अष्टद्रव्य चढावे. इति द्वितीयपदपूजा विधि. ३ त्रीजु आचार्यपद् पीळे वर्णे छे, मांटे चणानी दाळ, अष्ट द्रव्य श्रीफळ प्रमुख लइ, नव कळश पंचामृतथी भरीने त्रीजी पूजानो पाठ भणे. ते संपूर्ण थयाथी "ओ ही नमो आयरियाणं" एम कही कळश ढोळे, अष्ट द्रव्य चढावे. इति तृतीयपदपूजा विधि, ४ चोथु उपाध्यायपद नील वर्णे छे, माटे मग प्रमुख तथा अष्ट द्रव्य लइने पूर्वोक्त विधिये पूजा भणी संपूर्ण थवाथी (२१८) नवपदं विधिः विगेरे संग्रह। "औं ही नमो उवज्झायाण" एम कहीं कळश ढोळे, अष्ट द्रव्य चढावे इति चतुर्थपदपूजा विधि. ५ पांच€ श्री साधुपद श्यामवर्णे. छे, माटे अडद प्रमुख लेइ वीजो सर्व पूर्वोक्त विधि · करी पूजा भणे ते संपूर्ण थयाथी " ओ ही नमो लोए सव्वसाहूणं " कहे इति पंचमपद पूजा विधि ६ तेमज छठे दर्शनपद श्वेतवर्णे छे, माटे तंदुल प्रमुख लेइ "ओं ही नमो दसणस्स" कहेवू, वीजो सर्व पूर्वोक्त विधि करवो. इति षष्ठपदपूजा विधि, ७ सातमुं ज्ञानपद् श्वेतवर्ण छ, माटे चावल प्रमुख लेइ ओ ही नमो नाणस्स" कहे. वीजो. सर्व पूर्वोक्त विधि करवो.. इति सप्तमपदपूजा विधि, ८ आठमुं चारित्रपद पण श्वेतवर्णे छे, माटे चोखा .. प्रमुख. "ओ ही नमो चारित्तस्स" कहे. वीजो. सर्व पूर्वोक्तं विधि करवो. इति अष्टमंपदपूजा विधि ९ नवमु तपपद श्वेतवर्णे छे, माटे चोखा प्रमुख लई. पूर्वोक्त विधि करीने " औं ही नमो तवस्स" कही कळश ढाळे अष्ट- दैव्या च्यात्ने, पछी अष्टपकारी पूजा करें, आरति करे, इतिश्री नवर्मपदपूजा विधि ॥ इति नवपदपूजा विधि समाप्त।

, श्रीतार्किकचक्रचक्रवति-न्यायविशारद-न्यायाचार्य महामहोपाध्याय- ॥ श्रीयशोविजयजीगणिजीविरचित्त श्रीनवपदजीनी पूजा ॥ ॥ प्रथम श्री अरिहंतपदपूजा प्रारंभः ॥ काव्यं-उप्पन्नसन्नाणमहोमयाणं, सप्पाडिहेरासणसंठियाणं ॥. सदेसणाणंदियसज्जणाणं, नमो नमो होउ सया जिणाणं ॥१॥ श्रीज्ञानविमलसूरिकृत स्तवना ।। ॥ भुजंगप्रयातवृत्तम् ॥ नमोऽनंतसंतप्रमोदप्रदान-प्रधानाय भव्यात्मने भास्वताय ॥ थया जेहना ध्यानथी सौख्यभाजा, सदा सिद्धचक्राय श्रीपालराजा ॥२॥ करयां कर्म दुर्मर्म बीजी प्रतनो वधारो- १. परम मंत्र प्रणमी करी तास धरी उर ध्यान । अरिहंत पद पूजा करो निज निज शक्ति प्रमाण ॥ (बाकी सरखं)...

(२२०) नवपद विधि विगेर संग्रह ॥
चकचुर जेणे, भला भव्य नवपद ध्यानेन तेणे॥ करी
पूजना भव्य भावे त्रिकाळे, सदा वासियो आतमा
तेणे काळे ॥३॥ जिके तीर्थकर कर्म उदये करीने,
दिये देशना भव्यने हित धरीने ॥ सदा आठ महा-
पाडिहारे समेता, सुरेशे नरेशे स्तव्या ब्रह्मपुत्ता ॥४॥
काँ घातियां कर्मचारे अलग्गां, भवोपग्रही चार
जे छे विलग्गा ॥ जगत् पंच कल्याणके सौख्य पामे,
नमो तेह तीर्थकरा मोक्षकामे ॥५॥
श्रीदेवचन्द्रजीकृत स्तवना ॥
॥ ढाळ ॥ उलालानी देशी ॥
तीर्थपति अरिहा.नमुं, धर्म धुरंधर धीरोजी ॥
देशना अमृत वरसता, निजवीरज वडवीरोजी ॥१॥
(उलालो) वर अखय, निर्मल ज्ञानभासन, सर्वभाव
प्रकाशता ॥ निज शुद्ध श्रद्धा आत्मभावे, चरणथिर-
ता वासता.॥ जिन नामकर्म प्रभाव अतिशय, प्राति-
हारज शोभता ॥ जगजंतु करुणावंत भगवंत, भविक-
जननें क्षोभता ॥२॥

। hone ६ ॥ श्री नवपदजीनी पूजा ।। (२२१) ॥ पूजा ।। ढाळ ।। श्रीपाळना रासनी॥ त्रीजे भव वरस्थानक तप करी, जेणे बांध्यु जिन नाम ॥ चोसठ इंद्रे पूजित जे जिन, कीजे तास प्रणाम रे ॥ भविका ॥ सिद्धचक्रपद वंदो, जेम चिर- काळे नंदो रे ॥ भविका सि०॥१॥ ए आंकणी ॥ जेहने होय कल्याणक दिवसे, नरके पण अजवाळु । सकळ अधिक गुण अतिशय धारी, ते जिन नमी अघ टाळु रे ॥ भविका ॥ सि० ॥२॥ जे तिहुं नाण समग्ग उप्पन्ना, भोगकरमक्षीण जाणी ॥ लइ दीक्षा शिक्षा दिये जनने, ते नमिये जिननाणीरे।। जविका ॥ सि० ॥३॥ महागोप महामाहण कहिये, नियामक स- स्थवाह ॥ उपमा एहवी जेहने छाजे, ते जिन नमिये उत्साहरे ॥ भविका ॥ सि०॥४॥आठ प्रातिहारज जस छाजे, पांत्रीस गुणयुत वाणी ॥ जे प्रतिबोध करे, जगजनने, ते जिन नमिये प्राणी रे ॥ भविका ॥ सि- द्धचक्र०॥५॥ ॥ ढाळ ॥ श्रीपालना रासनी ॥ अरिहंतपद ध्यातो थको, दवह गुण पज्जाय रे। 1 (२.२२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। भेद छेद करी आतमा, अरिहंतरूपी थाय रे ॥१॥ वीर जिनेश्वर उपदिशे, सांभळजो चित्त लाइ रे॥ आतमध्याने आतभा ऋद्धि मळे सवि आइरे॥वीर०॥२॥ विमलकेवलभासनभास्कर, जगति जन्तुम- होदयकारणम् ॥ जिनवरं बहुमानजलौघत; शुचि- मनाः स्नपयामि जिनेश्वरम् ॥१॥ स्नात्र करतां जगद्गुरु शरीरे सकलदेवे विमल- कलशनीरे । आपणा कर्ममल दूर कीयां, तिणे ते वि- बुध ग्रन्थप्रसिद्धा ॥१॥ हर्ष धरी अप्सराबंद आवे, स्नात्र करी एम आशीष भावे ॥ जिहां लगे सुरगिरि . जंबूद्दीवो, अम तणा नाथ देवाधिदेवो (अम तणा नाथ जीवानुजीवो)॥२॥ ओं ही श्री परमपुरुषाय, परमात्मने परमेश्वराय, जन्मजरामृत्युनिवारणाय,श्रीमते सिकच- क्राय श्रीअर्हत्पदाय जलं चन्दनं पुष्पं धूपं दीपं अक्षतं नैवेद्यं फलं यजामहे स्वाहा॥ ओ ही नमो अरिहंताणं। कही अनुक्रमे श्री अरिहंत पदनी अष्ट प्रकारी श्री नवपदजीनी पूजाः॥ ( २२३) 'पूजा करे (आ प्रमाणे दरेक पूजा दीठ जाणवं, मात्र पदनुं नाम फेरव). ॥ इति प्रथम श्रीअरिहंतपदपूजा समाप्ता ॥ ॥ अथ द्वितीय श्री सिद्धपदपूजा प्रारंभ ॥ - ॥ काव्यं ॥ सिद्धाणमाणंदरमालयाणं ।। नमो नमोऽणंतचउकयाणं ॥ करीआठकर्मक्षये पार पाम्या, जराजन्ममरणादि भय जेणे वाम्या।। निरावरण जे आत्मरूपे प्रसिद्धा,थया १ वीजी प्रतनो वधारो- १ सिद्धा० समग्गकम्मक्खयकारगाणं, जम्मं जरादुक्खनिवारगाणं। २ वीजी पूजा सिद्धनी कीजे दील खुशीयाल अशुभ कर्म दूरे टळे, फले मनोरथमाळ ॥१॥ (वाकी सर) १ सकल कर्मना क्लेशथी, मूकाणा महाभाग । चिदानन्दमय शाश्वता, लागे कोइ न. डाग ॥१॥ लोक अग्रक्षेत्रे रह्या, लही अनन्ती ऋद्धि । भस्म कीया'वाळी 'कर्म, परम आतमा सिद्ध ॥ २॥ .. " - (२२४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। पार पामी सदा सिद्धबुद्धा ॥६॥ त्रिभागोनदेहावगाहा- त्मदेशा, रह्या ज्ञानमय जातवर्णादि लेशा ॥ सदानंद करवु स्मरण ध्यान तमु, प्रतिमा वन्दन तास । नाम जाप पूजन न्हवण करीये धरी उल्लास ॥३॥ अवर्णवाद आशातना, वरजी नर मुविवेक । सदा भक्ति करवी भली, धरी मनमांही टेक ॥४॥ अरिहंत पण जेहने नमे, आठ कर्म कृतनाश । पनर भेद छे सिद्धना, कुण समरे नहि तास ॥५॥ मुकाये भवसहस (भ्रम्रण) थी, सिद्ध भणी नमस्कार । भावे जेह करे भविक, बोधि लाभ विस्तार ॥ ६॥ सुरतरु असुरादिक तणा, सुख सघळा ए मेला । तेह थकी शिव सुख तणी, अनन्ती-गुणी छे केली ॥७॥ :.,जिणे अमृत रस चाखीयो, बीजे रस न मुहाय । तिम शिवमुख जाण्यो. जिणे, वीजांना वेदाय ॥८॥ जीहां एक सिद्धातमा विहां अनंता, होय । . पण, अमूर्तपणा थकी, वाधा न लहे कोय ॥९॥ सिद्ध तणी अवगाहना, त्रिणसया तेतीस । धनुष त्रिभागे, अधिक, कही उत्कृष्टी इश ॥१०॥ उणा हाथ त्रिभागथी, च्यार हाथ.गणी लेयः। सिद्धातणी अवगाहना मध्यम भाखी एह ॥११॥ ; 7 . ।

in . ॥ श्री नवपदजीनी पूजा ॥ (२२५) सौख्याश्रिता ज्योतिरूपा, अनाबाध अपुनर्भवादिस्व- रूपा ॥७॥1..: :: ॥ढाळा उलालानी देशी ।। सकल करममल क्षय करी, पूरण शुद्ध स्वरूपो- जी ॥ अव्याबाध प्रभुतामयी, आतम संपत्तिभूपोजी ॥ उलालो] जेह भूप आतम सहजसंपत्ति,शक्ति व्य- क्तिपणे करी।स्वद्रव्य क्षेत्र स्वकाल भावे, गुण अनंता आदरी ॥ स्वस्वभाव गुणपर्याय परिणति, सि- द्धसाधन परभणी॥मुनिराज मानसहंस समवड, नमो सिद्ध महागुणी॥४॥ ॥ पूजा ढाळ ॥ .: समयपएसंतर अणफरसी, चरम तिभाग विशेष ॥ अवगाहन लही जे शिव पहोता, सिद्ध नमो ते जघन्य सिद्ध अवगाहना, अष्टांगुल एक हाथ । कूर्मा पुत्रादिक तणा, इम करी श्री जगनाथ ॥१२॥ सिद्ध ध्यानथी जीवना, जाये दुष्कृत कोटि .. जीम अमृतना विन्दुथी, जाय तीव्र विषचोटि ॥१३॥ प्रतिविवित निज़ आत्मस्यु, सिद्ध निहाळे जेह । त्रिजग पूज्यपद संपदा, ततखिण पामे तेहे ॥ .. '.. ૧૫

(२२६) नवपद् विधिः विगेरे संग्रह ।।
अशेष रे ॥ भविका॥ सि०॥६॥ पूर्व प्रयोगने गति प-
रिणामे, बंधन छेद असंग ॥ समय एक ऊर्ध्वगति में
हनी, ते सिद्ध प्रणमों रंगरे ॥भविका सि०॥७॥ नि-
मल सिद्धाशलानी उपरे, जोयण एक लोगंत ।।
सादि अनंत तिहां स्थिति जेहनी, ते सिक प्रणमों
संतरें। भविका ॥ सिं० ॥८॥ जाणे पण न शके
कही परगुण, प्राकृत तेम गुण जास ॥ उपमा विण
नाणी भवमाहे, ते सिद्ध दीयो उल्लास रे ॥ भविका ।
सि० ॥ ९॥ ज्योतिशुं ज्योति मळी जस अनुपम,
विरमी सकल उपाधि ॥ आतमराम रमापति समरो,
ते सिद्ध सहज समाधि रे॥भविका।। सिद्धचक्र०॥१०॥
॥ ढाळ ॥
रूपातीत स्वभाव जे, केवल दंसंणनाणी रे ॥ ते
ध्याता निज आतमा,होये सिद्ध गुणखाणी रे॥वीर०॥३॥
जिनेश्वर० काव्यं ॥ विमल ॥ ओ ही०॥
.....
॥ इति द्वितीय सिद्धपदपूजा समाप्त ॥ २ ॥

श्री नवपदजीनी पूजा ॥ (२२७) . ॥ अथ तृतीय श्री आचार्यपदपूजा प्रारंभ ॥ ॥ काव्यं ॥ . .॥ सूरीण दुरीकयकुग्गहाणं ॥ नमो नमोसूरसमप्पहाणं ॥२॥ : नमुं सूरिराजा सदा तत्त्वताजा, जिनेंद्रागमे प्रौढ- साम्राज्यभाजा ॥ षट्वर्ग वर्गित गुणे शोभमाना, पं- चाचारने पालवे सावधाना ॥ ८॥ भविप्राणाने देशना देश काळे, सदा अप्रमत्ता यथा सूत्र आले ॥ जिके शासनाधार दिग्दति कल्पा, जगे ते चिरं जीवजो शुद्ध जल्पा ॥ ९ ॥ २ वीजी प्रतनो वधारो. १ सूरी० सद्देसणादिसुसमायराणं, अखंडछत्तीसगुणायराणं? २ हवे आंचारजपद तणी, पूजा करो सविशेषः । मोह तिमिर दूरे,हरे, सूझे भाव अशेष ॥२॥ (वाकी सरखं) निरखद्य विद्याए पवित्र, मंत्र सिद्धनो वीज । गुरुनी भक्ति विवेकीये, करवी नति एहीज ॥१॥ जिनवरनी भक्त करी, पूर्व खपावे कर्म । । नमस्करेआचार्यजी, सिद्ध मंत्रादिक धर्म ॥ -- . d - . . . .. . 11 min -- - (२२८) नवपद विधि विगेरें संग्रह। ॥ ढाळ ॥ उलालांनी देशी ॥3, आचारज मुनिपति गणि, गुणछत्रीशी धामोजी । चिदानंद रस स्वादता, परभावे नि:कामोजी ॥ ५॥ [उलालो] निःकाम. निर्मळ शुद्धचिद्घन, साध्यनिज निरधारथी॥ निज ज्ञान दर्शन चरण वीरज, साधना : व्यापारथी॥ भविजीव बोधक तत्त्वशोधक, सयलगुण संपत्तिधरा ॥ संवरसमाधि गतउपाधि, दुविध तपगुण आगरा ॥६॥ ॥ पूजा ढाळ ॥ पंच आचार जे शुद्धा पाळे, मारंग भाखे साची॥ ते आचारज नमिये नेहशु,प्रेम करीने जाचोरे भाविका ॥ सि० ॥ ११ ॥ वर छत्रीश गुणें करी सोहैं, युगप्रधान जन मोहे ॥ जग बोहे न रहे खिणं कोहे, सूरि नमुं ते जोहे रे ॥ भविका॥ सि० ॥ १२ ॥ नित्य अप्रमत्त धर्म उवएसे, नहीं विकथा न कषाय ॥ जेहने ते आ- चारज नमिये, अकलुष अमल अमायरे ॥ भविका ।। सि० ॥ १३ ॥ जे दिये सारण वारण चोयण, पडि- चोयण वळी जननें। पट्टधारी गच्छ थंभ आचारज, .

(२३१) ॥ श्री नवपद्जीनी पूजा mima ते मान्या मुनिमनने रे ॥ भविका अत्यमिये ज़िन सूरज केवल, चंदे वन पदारथ प्रकटन पटु ते, आच | भविका.॥ सिद्धचक्र०॥ १५ ॥ - ॥ ढाळ ॥ ध्याता आचारज भला, महामंत्र शुभ ध्यानीरे॥ पंच प्रस्थाने आतमा, आचारज होय प्राणी रे ॥वीर०॥४॥ ॥ इति तृतीय आचार्य पद पूजा समाप्त ॥३॥ ॥ अथ चतुर्थ श्रीउपाध्यायपद पूजा प्रारंभः ॥ - ॥ काव्यं ॥ । सुतत्थवित्थारणतप्पराणं॥ नमो नमो वायगकुंजराणं ॥ वीजी प्रतनो वधारो- १ मुत्त गणस्स संधारणसायराणं, सव्वप्पणावज्जियमच्छराणं ॥१॥ गुण अनेक जग. जेहना, सुंदर शोभित, गात्र । उपाध्याय पद अरचीये, अनुभव रंसना . पात्र ॥ (बाकी सर) - .

(२२८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। . हाँ सूरि पण सूरिगणने सहाया, 'नमुं वाचका रक्त मदमोहमाया ॥वलि द्वादशांगादि सूत्रार्थदाने, जिके सावधाना निरुद्धासिमाने ॥१०॥ धरे पंचने वर्ग वर्गित गुणौधा, प्रवादि द्विपोबेदने तुल्यसिंघा ॥ गणी विधिशुं वात्सल्य कीजीए, तिहां श्रुतना वे भेद । वद्धावद्ध वखाणीया, चित्त धरो तजी खेद ॥१॥ श्रुत दुवालस अंग जे, वद्ध कहीजे तेह महानिशीथ निशीथ वळी, भेद अवद्ध लहेह ॥२॥ ते श्रुत गुरु पांसें भला, विधुश्युं योग वह । उद्देश समुदेशानुज्ञा, पूर्वक विनय कहेह ॥३॥ कालिक उत्कालिकं वळी, बहु सूत्रार्थक भेद । अंग अनंग प्रविष्ट मुख, कह्या अनेक मुभेद ॥४॥ ते सूत्रार्थ अधीत: जे; बहुश्रुत -ते सुविवेक । द्वादशांग दश पूर्वधर, आदिक भेद अनेक ॥५॥ तेहनी भक्ति करो भली, वस्त्र पात्र अन्नपान, यथा उचित दाने करी पोषे देइ मान ॥ ६॥ नमो उवझायाणं तथा, नमो चउद्दसंपुढीणं । ए पदनो गुणणों करे, दोय सहस प्रवीण|| विधि बन्दन, विश्रामणां आपे बहु सन्मान । नाम कर्मोदय तीर्थंकर, थाये उदय प्रधान । तीर्थकर, . . . श्री नवपदजीनी पूजा ॥ (२१) गुणी 'गच्छसंधारणे स्थंभभूता, उपाध्याय ते वंदिये चितूंप्रभुता ॥११॥ ॥ ढाळ ॥ उलालानी देशी॥ खंतिजुआ मुत्तिजुआ, अज्जव मद्दव जुत्ताजी: ॥ सच्चं सोय अकिंचणा, तव संजम गुणरत्ताजी ॥७॥ (उलालो) जे रम्या ब्रह्मसुगुत्ति गुत्ता,समिति समिता श्रुतधरा ॥ स्याद्वादवादे तत्ववादक, आत्मपरविभज- नकरा ॥ भवभीरु साधन धीरशासन, वहन धोरी मु- निवरा ॥.सिद्धांत वायण दान समरथ, नमो पाठक पधरा ॥८॥ ' ॥.पूजा ढाळ ॥ छादश अंग सज्झाय करे जे, पारग धारग तास ॥ सूत्र अर्थ विस्तार रसिक ते,नमो उवज्झाय उल्लासरे॥ भविका ॥ सि० ॥ १६ ॥ अर्थ सूत्रने दान विनागे, आचारज उवज्झाय.॥भव:त्रीजे.जे.लहे . शिवसंपद, नमिये ते सुपसाय रे ॥ भविका ।। सि॥१७॥मूरख शिष्य निपाई जे प्रभु, पाहाणने. पल्लव आणे ॥ ते उवज्झायं सकल जैन पूजित, सूत्र' अर्थ. संवि जाणे रे .

(२३२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। भविका ॥ सिः ॥१८॥ राजकुमर सरिखा गणधि- तक, आचारज पद योग ॥ जे उवज्झाय सदा तेन- मतां, नावे भवभयः सोग रे ॥ भविका ॥ सि० ॥१९॥ बावना चंदन रस सम वयणे, अहितताप सवि' टाळे ते उवज्झाय नर्माजे जे वळी, जिनशासन अजुवाळे २॥ भविका॥ सिझचक्र पद वंदो ॥२०॥ || ढाळ ॥ तपसज्झाये रत सदा, द्वादश अंगनो ध्याता रे उपाध्याय ते आतमा,जगबंधव जगभ्रातारे॥५॥ वीर०॥ ॥ इति चतुर्थ उपाध्यायपदपूजा समाप्ता ॥ ४॥ ॥ अथ पंचम श्री साधुपदपूजा प्रारंभ ॥ ॥ काव्यं ।।. साहूण संसाहिअ संजमाण ॥ नमो नमोसुद्धदयादमाणं ॥३॥ अन्य मतनो वषारो- १ साहूण तिगुत्तिगुत्ताण समाहियाणं, मुणीणमाणंदपयद्वियाणं १ . - श्री नवपदंजीनी पूजा ।। at करे सेवनाः सूरिवायगं गणिनी, करुं वर्णना ते हनी शी मुणिनीः॥ समेता सदा पंचसमिति त्रिगुप्ता, २.मोक्षमारग साधन भणी, सावधान थया जेह. ते मुनिवर पद वंदता, निर्मल थाये देह ॥ १॥ (वाकी सरखं) शान्तदान्त अन्तर्वहि, निर्विकार परिणाम: क्रियावंत संयम गुणे; चरण करणः अभिरामः ॥ १.॥' : दयावंत पट् कायना, मैत्री पवित्रित काय; अप्रतिबंध वायु परे, करे विहार अमाय ॥ २॥ ध्यान करे त्रिकरणपणे, ते देखी मुनिराय; परम प्रमोदे प्रणमीये, पूज्य तणां त्यां पाय ॥३॥ जननी पुत्र शुभ करे, तिम ए.परयण माय, चारित्र. गुणगणवर्धिनी, निर्मल शिव सुखदाय ॥ ४ भाव अयोगी करण रुचि, मुनिवर गुप्ति वरंत; जो गुप्ते न रही शके, तो समिति विचरंत ॥५॥ गुप्ति एक संवरमयी, औत्सर्गिक परिणम . संवर निर्जर समितिथी; अपवादे गुणधाम ॥ ६॥ : द्रव्ये द्रव्य चरणताः, भावे भावचरित्र भावदृष्टि द्रव्य क्रिया, करता; शिवसंपत्त ॥ ७ ॥ आत्मगुण रागभावशी, जे साधक परिणाम र समिति गुप्ति ते जिन कहे, आत्मसिद्धिः शिवठाम ॥ ८ : . .

7.
(२३४.) नवपदा विधिविगेरे संग्रह।
त्रिगुप्ते नहीं कामभोगेषुः लिप्ता ॥ १२गावळी बाह्य
अभ्यंतर ग्रंथि टाळी, होये मुक्तिंने योग्य चारित्रपाळी॥
शुभाष्टांग योगे रमे चित्त वाळी, नमुःसाधुनेशतिह
निज पाप टाळी ॥रा ji MEAST
॥ ढाळ ॥ उलालानी देशी ॥
सकल विषय विष वारीने निकामीणनिम्स
गीजी ॥ भवदवताप शमावती, तिमसाधन रंगीजी
॥९॥ [उलालो] जे रम्या शुद्ध स्वरूप रमणे, देह नि-
मम निर्मदा ॥ काउस्साग, मुद्रा धीर आसन ध्यान
अन्यासी सदानातप तेज दीपे कर्म जीप, नैव छीपे
परभणी मुनिराज करुणासिंधु त्रिभुवन बंधु प्रणमुं
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हित भणी ॥१॥ THE
THERE
निश्चय चरण रुचि थई, समिति गुप्तिधर साधु,
परम अहिंसक मावथी, आराधे निरुपाधि भी हो
परम महोदय साधा, जेह'थयो उजमीळगा
श्रमण भिर्दू माईणया, गाँउ तरुं गुणमाळमा बाग्माण
जे चारित्रे निर्मला ते पंचायण सिंह PTETTE
विषय काय ते गजीया ते वदुःनिशदीन रिश

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श्री नवपदजींनी पूजा ॥
(२३५)
॥ पूजा ढाळ,॥
'...,
जेम तरुफूले भमरो बेसे, पीडा तस न उपावे
लेइ रस आतम संतोषे, तेम मुनि गोचरी जावे रे ॥
भविका ॥ सि० ॥ २१॥ पंच इंद्रियने जे नित्य जीपे
षटकायक प्रतिपाल ॥ संयम सत्तर प्रकारे आराधे,
वंदु तेह दयाल रे ॥ भविका ॥ सि० ॥ २२ ॥ अढार
सहस्स शीलांगना धोरी, अचल आचार चरित्र ॥
मुनिमहंत जयणायुत वंदी, कीजे जन्म पवित्र रे ॥
भविका ॥ सि० ॥ २३ ॥ नवविध ब्रह्मगुप्ति जे पाळे,
वारसविह तप शूरा ॥ एहवा मुनि नमीये जो प्रगटे,
प्रवपुण्य अंकूरा रे ॥ भविका ॥ सि० ॥२४॥ सोना-
तणी परे परीक्षा दीसे, दिन दिन चढते वाने ॥ संज-
मखप करता मुनि नमिये, देश काल अनुमाने रे ॥
भविका ॥ सि० ॥ २५ ॥
॥ ढाळ॥
अप्रमत्त जे नित्य रहे, नवि हरखे नविशोचेरे ॥
साधु सुधा ते आतमा,शुं मूंडे झुलोचे रे॥६॥ वीर०॥
॥ इति पंचम साधुपदपूजा समाप्ता ॥ ५॥

(२३६), नवपद विधि विगेरे संग्रहः॥ ॥ अथ षष्ठ श्री सम्यग्दर्शनपदपूजा प्रारंभः ॥ : । ॥ काव्यं ॥ जिणुत्ततत्ते रुइलख्खणस ॥ नमो नमो निम्मलदंसणस्सः॥ विपर्यास हठवासनारूप मिथ्या, टळे जे अनादि अच्छे जेम पथ्या पथ्या ॥ जिनोक्ते होये सहजथी १“वीजी प्रतनो वधारो- १ जिणुत्त० "मिच्छत्तनासाइसमुग्गमस्स । मूलस्स सद्धम्ममहादु- मस्स.॥१ २ जिनवर भाषित शुद्ध नय, तत्त्वतणी परतीत । ते सम्यग्दर्शन सदा, आदरीये शुभ रीत ॥ २॥ (वाकी सरखं). जेहना जेहवा गुण हुवे, जाणे तास स्वरूप, देव धर्मगुरुने विषे, सम्यक् श्रद्वारूप ॥१॥ अरिहंत देवं सुसाधुगुरु, केवलिभाषित धर्म, तीन-तत्त्वं ए सद्दहे, ते सम्यक्त्व अकर्म ॥२॥ ते सम्यकत्व अनेकधा, होय परिणाम वशेण,. इंगदुतिविहा चविहाँ, पंचविह. दशविधश्रेणि ॥ ३ ॥ . ।

AAPAAM श्री नवपदजीनी पूजा ॥ (२३७) श्रद्दधानं, कहिये दर्शनं तेह परमं निधानं ॥१॥ विना जेहथी ज्ञान अज्ञान रूपं, चरित्रं विचित्रं भवारण्यकूपं । प्रकृति सातने उपशमे क्षय ते होवे, तिहां आपरूपे सदा आप जावे ॥१५॥ ॥ ढाळ ॥ उलालानी देशी ॥ सम्यग्दर्शन गुण नमो, तत्त्व प्रतीत स्वरूपोजी॥ जसु निरधार स्वभाव छे, चेतनगुण जे अरूपोजी॥२१॥ (उलालो) जे अनुप श्रद्धा धर्म प्रगटे, सयल पर- ईहा टळे॥ निजशुद्धसत्ता प्रगट अनुभव,करणरुचिता उच्छले ॥ बहु मान परिणति वस्तुतत्त्वे, अहव तसु कारणपणे ॥ निज साध्यदृष्टे सर्वकरणी, तत्त्वता संप- त्ति गणे॥१२॥ ॥ पूजा ढाळ ॥ शुद्धदेव गुरुधर्म परीक्षा, सद्दहणा परिणामः ॥ धर्मतत्व रुचि एक विधि, दुविह निसर्ग उपदेश, क्षायिक क्षायोपशमिक वळी, औपशामिक तृतीय विशेष॥ ४॥ कीजे सास्वादन सहित, थाये.चार ते वार; . वेदक समकित युक्तश्यु, थाय पंच प्रकार ॥५॥ १ -

(२३८) नवपदः विधि विगेरे संग्रह।
जेह पामीजे तेह नमीजे, सम्यग्दर्शन नाम रे ॥ भ-
विका ॥ सि० ॥ २६ ॥मलउपशम क्षय उपशमक्षय-
थी, जे होय त्रिविध अभंग ॥सम्यग्दर्शन तेह नमीजे
जिनधर्म दृढरंग रे ॥ भविका ॥ सि० ॥ २७॥ पंच
वार उपशमिय लहीजे, क्षयउपशमिय असंख ॥ एक-
वार क्षायिक ते समकित, दर्शन नमिये असंख रे ॥
भविका ॥ सि०॥२८॥ जे विण नाण, प्रमाण न
होवे, चारित्र तरु नवि फळियो।सुख निवाण नजे विण
लहीये, समकितदर्शन बलियो रे ॥ भविका, ॥ सि०॥
२९ ॥ सडसह बोले जे अलंकरियु; ज्ञानचारित्रनुं
-सूल ॥ समकितदर्शन ते नित्य प्रणमुं, शिवपंथन अ-
नुकूल रे ॥ भविका ॥ सिद्धचक्र० ॥३०॥
॥ ढाळ॥
शम संवेगादिक गुणा, क्षयउपशम जे आवे रे। दर्शन
तेहिज आतमा, शुं होय नाम धरावेरे ॥ ७ ॥ वीर० ॥
.
॥ इति षष्ठ सम्यग्दर्शनपदपूजा समाप्त ॥ ६ ॥

श्री नवपदंजीनी पूजाः॥ ANV ... - ॥ अथ सप्तम श्री सम्यगज्ञानपदपूजा प्रारंभ ॥ ॥ काव्यं ।। अन्नाणसंमोहतमोहरस्स॥ '; 'नमो नमो नाणदिवायरस्स। होये जेहथी ज्ञान शुद्ध प्रबोधे, यथावर्ण नासे विचित्रावबोधे ॥ तेणे जाणिये वस्तु षड् द्रव्यभावा, न हुये वितत्था. निजेच्छा स्वभावा. ॥ १६ ॥ होय पंच सत्यादि सुज्ञानभेदे, गुरूपास्तिथी योग्यता तेह वेदे ॥ वळी ज्ञेय हेयं उपादेय रूपे, लहें चित्तमा जेम ध्वांतप्रदीपे ॥१७॥ २ वीजी प्रतनो वधारो- १ अन्नाण पचप्पयारंस्मुवंगारस्स, सत्ताण सव्वत्थंपगासगरस ।। २ सप्तम पदश्रीज्ञान छे, सिद्धचक्र तपमाय आराधी जे शुभ मने, दिन दिन अधिक उच्छाह ॥ २ ॥ (वाकी सरखु) सदनुष्ठान संपूर्ण फल, तास प्रदायक एह तेह निरन्तर भावशु, ज्ञान उपयोग करेह ॥ १ ॥ वर्ष कोडि बहु नारकी, कर्म खपावे जेही ज्ञानी श्वासोश्वासमां, तिन गुप्तिःशुं तेह ॥२॥....' -- .

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+
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
मा ढाळ मा उलालामी देशी ।।.
भव्य नमो गुणज्ञानने, स्वपरप्रकाशक भावेजी
छट्ट अट्टम दश दोयलसे, करे अज्ञानी शोधि;
वहु गुणे जोय एहथी, ज्ञाने युक्ति विशोधि ॥३॥
अंतर-तत्त्व- विचारणा, सम्यग् ज्ञान संयोगः
दुर्जय कर्म तणो सही, तत्क्षण होय वियोग ॥ ४ ॥
जिनवर उक्तक्रिया विपे. ज्ञान तणों उपयोग
महानिर्जरा कारणे, कहे विशुद्ध वियोग ॥ ६ ॥
अंग अनंग भेदे करी, श्रुतना दोय प्रकार :
अंग आचारांगादि तिहां, अनंग बळी अवधार ॥६॥
आवश्यक उत्तराध्ययन, कल्पाध्ययनादीनु :
उपांग कहे सहु ग्रहे, सूत्रार्थ तल्लीन ॥७॥
ज्ञान अपूर्व ग्रह्या थकां, कर्मनिजरा होय;
तत्त्वांतत्त्वं प्रवोधथी, समकित निर्मल जोय ॥८॥
ज्ञानवध कारण विना, ज्ञान महातमसूर
भव समुद्र तारण भणी, ज्ञाननाव भरपूर ॥ ९ ॥
सूक्ष्म वादर लोकमां, जाणे सघळा भाव,
ज्ञान शिखलो. ते भणी, जे होवे. चतुराजीव ॥ १० ॥
ज्ञान परम गुण जीवनो ज्ञान भवणः प्रद्योत
मिथ्यामति तम भेदवा, ज्ञान महा उद्योत.॥११॥

श्री नवपदजीनी पूजा। (२४१) पर्यय धर्म अनंतता, भेदाभेद स्वभावेजी॥ १३ ॥ उलालो ॥ जे मुख्यपरिणति सकलज्ञायक, बोध भा- वविलच्छना ॥ मति आदि पंच प्रकार. निर्मळ, सिद्ध साधन लच्छना ॥ स्याद्वादसंगी तत्वरंगी, प्रथम भे- दाभेदता ॥ सविकल्प ने अविकल्प वस्तु, सकल संशय छेदता ॥ १४॥ । पूजा ढाळ ॥ भक्ष्याभक्ष्य न जे विण लहिये,पेय अपेय विचार ॥ कृत्य अकृत्य न जे विण लहिये, ज्ञान तें सकल आ- धार रे ॥ भविका ॥ सि० ॥ ३१ ॥ प्रथम ज्ञान ने पछी अहिंसा,श्री सिद्धांते भाख्युं॥ ज्ञानने वंदो ज्ञान म निंदो, ज्ञानीये शिवसुख चाख्युं रे ॥ भविका॥सि० ॥३२॥ सकल क्रियानुं मूळ जे श्रद्धा; तेहर्नु मूळ जे कहिये ॥ तेह ज्ञान नित नित वंदीजे, ते विण कहो केम रहिये रे ॥ भविका ॥ सि०॥३३॥ पंच ज्ञान- मांहि जेह सदागम, स्वपर प्रकाशक जेह ॥ दीपक परे त्रिभुवन उपकारी, वळी जेम रवि शशि मेह रे॥

(२४२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ भविका ॥ सि० ॥ ३४॥ लोक ऊर्ध्व अधो तिर्यग्ज्यो- तिष्, वैमानिक ने सिद्ध ॥ लोकालोक प्रगट सवि जेहथी, तेह ज्ञान मुज शुद्ध रे ॥ भविका ॥ सिद्ध- चक्र० ॥३५॥ ॥ ढाळ ॥ ज्ञानावरणी जे कर्म छे, क्षयउपशम तस थाय रे ॥ तो हुए एहिज आतमा,ज्ञान अबोधता जायरेवावीर०॥ ॥ इति सप्तम सम्यग्ज्ञानपदपूजा समाता ॥७॥ ॥अथ अष्टम श्री चारित्रपदपूजा प्रारंभ ॥ ॥ काव्यं ॥ आराहिअखंडिअसकिअस्स॥ नमो नमो संजसवीरिअस्स ॥ बीजी प्रतनो वधारो- १ आरा० सम्भावणासंगविवड्डियस्स निव्वाणदाणाइसमु- ज्जयस्स। (वाकी सरखं)

-
श्री नवमदजीनी पूजा (२४३)
वळी ज्ञानफल चरणं धरीये सुरंगे, निराशंसता
द्धाररोध प्रसंगे ॥ भवांभोधिसंतारणे यानतुल्यं, धरूं
तेह चारित्र अप्राप्तमूल्यं ॥ १८ ॥ होये जास महिमा-
थकी रंक राजा, वळी द्वादशांगी भणी होय ताजा ॥
चळी पापरूपोऽपि निःपाप थाय, थइ सिद्ध.ते कर्मने
पार जाय ॥१९॥
-
॥ ढाळ ॥ उलालानी देशी॥
चारित्रगुण वळी वळी नमो,तत्त्वरमण जसु मूलोजी
२ अष्टमपद चारित्रने पूजो धरी उमेद ।
पूजत अनुभव रस मिले, पातक होय उच्छेद ।
एहवा विण बहुपापने, उद्धरवा देहत्य ।
प्रव्रज्या जिनराजनी, छे एक शुद्धि अवत्थ ॥१॥
ते दुःखवल्ली वनदहन, ते शिवतरु सुखकंदा
ते कुलधर गुणगणतणुं, ते टाळे भवफंद ॥२॥
ते आकर्षण सिद्धिनु, भवनिष्कर्पण तेह;
ते कषायगिरि भेदपवि, तो कषाय उच्छेद ॥ ३ ॥
दशविध मुनिवर धर्म जे, ते कहीये चांरित्र,
द्रव्य भावथी आचर्या, तेहना जन्म पवित्र ॥ ४॥

. - . . (२४४.) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ॥ पररमणीयपणुं टळे, सकलसिद्ध अनुकूलोजी ॥१५॥ (उलालो) प्रतिकूळ आश्रव त्याग संयम, तत्त्वस्थिरता दममयी ॥ शुचि परम खंति मुत्ति दश पद, पंच संवर उपचयी ॥ सामायिकादिक भेद धर्मे, यथाख्याते पूर्ण- ता॥ अकषाय अकलुष अमल. उज्ज्वल, कामकरमल चूर्णता ॥२॥ ॥ पूजा ढाळ ॥ देश विरतिने सर्वविरति जे, गृहि यतिने अ- भिराम ॥ ते चारित्र जगत जयवंतु, कीजे ताल प्र- णामरे ।। भविका ॥ सि०॥ ३६ ॥ तृणपरे जे षट्खंड सुख छंडी, चक्रवर्ती पण वंरियो ॥ ते चारित्र अक्ष- यसुख कारण, ते में मनमोहे धरियो रे ॥ भविका ॥ सि० ॥ ३७ ॥ हुआ रांक पण जे आदरी, पूजित इंद नरिंदे ॥ अशरण शरण चरण ते बंदू, पूयं ज्ञान आ- नंदे रे ॥ भविका ॥ सि० ॥ ३८ ॥ बार माल पयाये जेहने, अनुत्तर सुख अतिक्रमिये ॥ शुक्ल शुक्ल अ- भिजात्य ते उपरे, ते चारित्रने नलिये रे ॥ भविका ॥

श्री नवपदंजीनी पूजा ॥ (२४५) सि० ॥३९ ॥ चय ते आठ करमनो संचय, रिक्त करे जे तेह ॥ चारित्र नाम निरुत्ते भांख्युं, ते वंदु गुणगेह रे ॥ भविका ॥ सिद्धचक्र० ॥ ४० ॥ ॥ ॥ ढाळ ॥ T जाण चारित्र ते आतमा, निज स्वभावमा रमतो २॥ लेश्या शुद्ध अलंकों, मोहवने नवि' भमतो रे॥९॥ वीर जिनेश्वर० ॥ , - . ॥ इति अष्टम चारित्रपदपूजा समाप्ता ॥ ८॥ . . ॥ अथ नवम श्री तपःपदपूजा प्रारंभः ।। . ॥ काव्यं ॥ कम्मदुमो मूलणकुंजरस्स ॥ नमो नमो तिव्वतवोमरस्त ॥५॥ . बीजी प्रतनो वधारों- कम्म० अणेगलद्धीणनिबंधणस्स दुस्सज्झअत्याण य साहनस्स (२४६.) नवपद विधि विगेरे संग्रह। ॥ मालिनीवृत्तम् ॥ इयनवपयसिहं, लद्धिविज्जासमिद्धं ॥ पयडियसरवग्गं, हाँतिरेहासमग्गं ॥ दिसिवइसुरसारं, खोणिपीढावयारं ॥ तिजयविजयचकं, सिद्धचकं नमामि ॥६॥ त्रिकालिकपणे कर्म कषाय टाळे, निकाचितपणे . बांधियां तेह बाळे ॥ कयुं तेह तप बाह्य अंतर दुभेदे, क्षमायुक्त निहेतु दुर्ध्यान छेदे ॥२०॥होये जास महि- माथकी लब्धि सिद्धि,अवांछकपणे कर्म आवरणशुद्धि । तपो तेह तप जे महानंद हेते, होय सिद्धि सीमंतिनी जिम संकेते ॥२१॥ इम नवपद ध्यानने जेह.ध्यावे, २ कर्मकाष्ठ प्रतिजालवा परतक्ष अनि समान । ते तप पद पूजो सदा, निर्मल धरीये ध्यान ॥ (वाकी सर निलोभी इच्छातणो; रोध होय अविकार; कर्मतपावन तप कह्यो तेहना. धार प्रकार ॥१॥ जेह कषायने शोषवे; प्रतिसमय टाळे पाप; ते तप करीये निर्मळो वीजो ननु संताप ॥२॥ . - श्री नवपदजीनी पूजा (१४७) सदानंद चिद्रूपता तेह पावे ॥ वळी ज्ञानविमलादि गुणरत्नधामा, नमुं ते सदा सिद्धचक्र प्रधाना. ॥२२॥ ॥ मालिनीवृत्तम् ॥ इम नवपद् ध्यावे, परम आनंद पावे ॥नवमे नव शिव जावे, देव नरभव पावे ॥ ज्ञानविमल गुण गावे, सिझचक्र प्रभावे ॥ सवि दुरित शमावे, विश्व जयकार ॥ पावे ॥२३॥ ॥ इति श्रीज्ञानविमलसूरिकृत श्रीसिद्धचक्ररतवना समाप्ता॥ . ॥ ढाळ ॥ उलालानी देशी॥ इच्छारोधन तप नमो, बाह्य अभ्यंतर भेदेजी ॥ आतम सत्ता एकता, परपरिणति उच्छेदेजी ॥ १७ ॥ (उलालो) उच्छेद कर्म अनादि संतति, जेह सिद्ध- पणुं वरे ॥ योग संगे आहार टाळी, भाव अक्रियता करे ॥ अंतर मुहुरत तत्त्व साधे, सर्व संवरता करी ॥ निज आत्मसत्ता प्रगट भावे,,करो तप गुण आदरी ॥१८॥ ॥ढाळ॥ इम नवपद गुण मंडलं, चउ निक्षेप प्रमाणे जी . (२४८) नवपदः विधि विगेरे संग्रह ॥ सात नये जे आदरे, सम्यग्ज्ञान ते जाणेजी ॥१९॥ [उलालो] निर्धारसेती गुणी गुणनो, करे जे बहुमान ए॥ तसु करण ईहा तत्त्व रमणे, थाय निर्मळ ध्यान ए॥ एम शुद्धसत्ता मळ्यों चेतन, सकल सिद्धि अनुसरे॥ अक्षय अनंत महंत चिद्घन, परम आनंदता वरे॥२०॥ , । ॥ अथ कळशः॥ ॥ इथ लयल सुखकर गुणपुरंदर, सिद्धचक्र. पदा- वलि॥ संवि लद्धि विद्या लिधिमंदर भविक पूजो सनरुली ॥ उवझायवर श्री राजसागर, ज्ञानधर्म सुरा- जता ॥ गुरु, दीपचंद सुचरण सेवक, देवचंद सुशो- अता ॥ २१ ॥ ॥ इतिश्री देवचन्द्रजीकृत स्तवना समाप्ता ।। पूजा ढाळ ॥ जाणता तिहुं ज्ञाने संयुत, ते.भव मुक्ति जिणंद ॥जेह आदरे कर्म खपेवा, ते तप शिवतरू कंद रेः॥भ- विका ॥ सि०॥४१॥ कर्म.निकाचित पण क्षय जाये क्षमा सहित जे करता। ते तप नमिये जेह दीपावे, • . . 4 i . श्री नवपदजीनी पूजा॥ (२४९) । जिनशासन उजमंतां रे॥भविका ॥ ति०॥४२॥ आ- मोसही पमुहा बहु लद्धि, होवे जास प्रभावे ॥ अष्ट महालिद्धि नवनिधि प्रगटे, नमिये ते तप सावे रे॥ भविका ॥लि. ॥ ४३ ॥ फळ शिव सुख महोटुं सुर नरवर, संपत्ति जेहनुं फूल ॥ ते तप सुरतरु सरिखं बंदूं, शम मकरंद अमूल रे ॥ भविका ॥ सि० ॥४४॥ सर्व मंगलमां पहेलं मंगळ, वरणवीये जे ग्रंथे ॥ ते तपपद त्रिहुं काळ नमीजे, वर सहाय शिवपंथे रे । भविका ॥ सि०॥ ४५ ॥ एम नवपद शुणतो तिहां लीनो, हुओ तन्मय श्रीपाळ॥ सुजसविलासे चोथे खंडे, एह अग्यारमी ढाळ रे भविका ॥ सिद्धचक्र ॥ ४६॥ ॥ ढाळ॥ इच्छारोधे संवरी, परिणति समता योगे रे ॥ तप ते एहिज आतमा, वर्ते निजगुण भोगेरे ॥१०॥ वीर० ॥ आगम नोआगमतणो, भाव ते जाणो साचो रे॥ आतम भावे थिर होजो, परभावे मत राचोरे ॥ ॥११॥ वीर०॥ अष्टक सकल सवृद्धिनी, घटमांहे ऋद्धि १ (२९०..) नवपद विधि विगेरे संग्रह। दाखी रे ॥ तेम नवपद ऋद्धि जाणजो, आतमराम छे साखी रे॥ १२॥ वीर०॥ योग असंख्य छे जिन कह्या, नवपद मुख्य ते जाणो रे ॥ एहतणे अवलं- बने, आतम ध्यान प्रमाणो रे ॥ १३॥ वीर० ॥ ढाळ बारमी एहवी, चोथे खंडे पूरी रे ॥ वाणी वाचकजस- तणी, कोइ नये न अधूरी रे ॥ १४ ॥ वीर० ।। ॥ इति नवम तपःपदपूजा समाप्ता ॥९॥ ॥ अथ काव्यं ॥ विमलकेवलभासनभास्कर, जगति जंतुमहोदय- कारणम् ॥ जिनवरं बहुमानजलौघतः,शुचिमनाः स्नप- यामि विशुद्धये ॥१॥ स्नात्र करतां जगद्गुरु शरीरे, सकलदेवे विमल कळश नीरे ॥ आपणां कर्ममल दूर कीधा, तेणे ते विबुध ग्रंथे प्रसिद्धा ॥ २ ॥ हर्ष धरीअप्सरावृद आवे, स्नात्रं करी एम आशिष पावें ॥ जिहां लंगे सुर- गिरि जंबुदीवो, अमंतणा नाथ देवाधिदेवो ॥३॥ (अमतणानाथ जीवानुजीवो ॥३॥ ओ ही श्री परम- , M श्री नवपदजीनी पूजा ॥ (२५१) पुरुषाय परमात्मने परमेश्वराय जन्मजरामृत्युनिवा- रणाय श्रीमते सिद्धचक्राय श्री तपःपदाय जलं च- न्दनं पुष्पं धूपं दीपं अक्षतं नैवेद्यं फलं यजामहे स्वाहा ओ ही नमो तवस्स कही तपःपदनी पूजा करवी. ॥ इतिश्रीमहामहोपाध्यायन्यायविशारदन्यायाचार्य श्रीयशोविजयजीगणिकृतश्रीसिद्धचक्रपूजा समाप्ता। ॥ इति श्रीमदशोविजयजिउपाध्यायकृत ॥ ॥ नवपद पूजा समाप्ता॥

(२५२)
नवपय विधि विगेरे संग्रह ।।
श्री सिद्धचक्रजीनी आरती.
सिद्धचक्र पद सेवता, ए सहजानंद स्वरूप
अमृतमय कल्याणनिधि, प्रगटे चैतन्यभूप
भविजन मंगळ आरती करीए,
जन्म जन्मकी आरति हरीये
आरती प्रथम जिनेश्वरजीकी,
दारुण विघ्न निवारणनीकी
दुजे पद श्री सिद्ध मुणिंदा,आरती करतमिटतभवफंदा
त्रीजेपद श्री सूरिमहंता, मारग शुद्ध प्रकाश करता
चौथे पदपाठक गुणवंता, आरती करत हरत भवचीता
पांचमी आरती साधु केरी,
कुगति निवारण शुभगति सेरी
शिवसुखकारण श्रीजिनवाणी,
छही आरती तास वखाणी,
सातमी आरती आनंदकारी,
समाकित नत गृह प्रतिमा धारी

आरतिओ॥
( २५३)
यहविधि मंगळ आरती गावे,
शुद्ध क्षमा कल्याण ते पावे
श्री सिद्धचक्र भगवाननी आरति
श्री नवपद०१
श्री नवपद०
श्री नवपद प्राणी नित्य ध्यावो, पंचमगति सासय
सुखपाचो ॥श्री० ए आंकणी ॥
धुरथी अरिहंत पद ध्याइजे स्थिरताए
श्रीसिद्ध थुणीजे ॥
आचारज त्रीजे आराधो
शुद्ध मने निजकारज साधो
उपाध्याय पंचम अणगारा
प्रणमंता पामे भवपारा
श्री नवपद०३
दसण नाण चरण भला दीपे
तप तपतां कर्म अरिने जीपे
श्री नवपद०४
ए नवपद प्राणी नित्य शुणतां
गिरुवा नरभव सफल गणंता
श्री नवपद.५.

Inmaan- (२५४) नवपद विधि विगेरं संग्रह ॥ wm श्री सिद्धचक्रनी कीजे सेवा मन वांछित लहीये नित्य मेवा अजर अमर सुखदायक साचो रुडा मनथीं नित्य नित्य रांचो श्री नवपद ६ श्री नवपद ७ नवपदजीनी लावणी. ॥ * , । जगतमें नवपद जयकारी, पूजंता रोग टले भारी । प्रथम पद तीर्थपति राजे, दोष अष्टादश कुं त्यागे॥ आठ प्रतिहारज छाजे, जगत प्रभु गुण वारे राजे । अष्टकरम दल जीतके, सकलसिद्ध थया सिद्ध अनंत | भजो पदबीजे, एक समय शिव. जाय । प्रकट भयो निजस्वरूप भारी ॥१॥ जगतमां॥ सूरिपदमां गौतम केशी, उपमाचंद्र सूरज जेसी। ऊगार्यों राजा परदेसी, एक भवमाहे शिवलेशी। चोथेपदे पाठक नमुं, श्रुतधारी उवज्झाय, सव्वसाहु पंचम पदमाही, धन्य धन्नो मुनिराय, वखाण्यो वीर प्रभु.भारी ॥ २॥ जगतमां ॥

आरतिओ॥॥
द्रव्यषट्को श्रद्धा आवे, शम संवेगादिक पावे ।
विनाए ज्ञान नहि किरिया, जैनदर्शनसे सब तरीया ॥
ज्ञान पदारथ पद सातमे, पदमें आतमराय ।
रमतां राम अध्यातमाहे, निजपद साधे काम,
देखंता वस्तु जगत सारी ॥३॥ जगतमां
जोगकी महिमा बहु जाणी, चक्रधर छोडी सब राणी,
यति दशधर्मे करी सोहे, मुनिश्रावक सब मन मोहे ॥
कर्म निकाचित कापवा, तप कुठार करधार.
नवमुं पद जो धरे क्षमासु, कर्म मूल कट जाय
भजो नवपद जय सुखकारी ॥४॥ जगतमा ।
श्रीसिद्धचक्र भजो भाइ, आचाम्ल तपनो विधि थाइ
पाप त्रिहुं जोगे परिहरज्यो, भाव श्रीपालपरे धरज्यो।
संवत ओगणीश सत्तरा, समे जे पोशीणा श्रीपास
चैत्र धवल पूनमने दिवस, सकल फली मुज आश
बाल कहे नवपद छवी थारी,जगतमें नवपद जयकारी ५
इति लावणी संपूर्ण ॥

(२५६)
नवपद 'विधि विगेरे संग्रह।
1
॥ अथ चैत्यवंदनो॥
॥२॥
नवपद्नु चैत्यवंदन.
जैनेन्द्रमिन्द्रमाहितं गतसर्वदोषं,
ज्ञानाद्यनंतगुणरत्नविशालकोशम् ।
कर्मक्षयं शिवमयं परिनिष्ठितार्थ,
सिद्धं च बुद्धमविरुद्धमहं च वंदे.
गच्छाधिप गुणगणं गणिनं सुसौम्यं,
बंदामि वाचकवरं श्रुतदानदक्षम् ।
क्षान्त्यादिधर्मकलितं मुनिमालिकांच,
निर्वाणसाधनपरं नरलोकमध्ये
सद्दशनं शिवमयं च जिनोक्तसत्य,
तत्त्वप्रकाशकुशलं सुखदं सुबोधम् ।
छिन्नाश्रवं समितिगुप्तिमयं चरित्रं,
कर्माष्टकाठदहनं सुतपः श्रयामि
पापौधनाशनकरं वरसंगलं च
त्रैलोक्यसारमुपकारपरं गुरुं च ।
भावातिशुद्धिवरकारणमुत्तमानां,
श्रीमोक्षसौख्यकरणं हरणं भवानाम्.
भव्याजबोधनरवि भवसिंधुनावं,
चिंतामणेः सुरतरोरधिकं सुभावम् ।
तत्त्वत्रिपादनवकं नवकाररूप,
श्रीसिद्धचक्रमुखदं प्रणमामि नित्यम्
॥४॥
॥५॥

अथ चैत्यवंदनो॥ (२५७:) ॥ अथ अरिहंतपद चैत्यवंदन ॥ जय जय श्री अरिहंत भानु, भाव कमलविकाशी ।। लोकालोक अस्पी रूपी, समस्त वस्तु प्रकाशी ॥२॥ समु- द्घात शुभ केवले, क्षय कृत मल राशि ॥ शुक्ल चमर शुचि पादसे, भयो वर अविनाशी ॥२॥ अंतरंग रिपुगण हणाए, हुय अप्पा अरिहंत ॥ तसु पदपंकजमें रही, हीर धरम नित संत ॥३॥ इति अरिहंतपदचैत्यवंदनम् ॥ अथ श्री सिद्धपद चैत्यवंदन ॥ श्री शैलेशी पूर्वप्रांत, तनु हीन त्रिभागी ॥ पुचपओ- गपसंगसे, ऊरध गत जागी ॥१॥ समय एकमें लोकप्रांत गये निगण निरागी ॥ चेतन भूपे आत्मरूप, सुदिशा लही सागी ॥२॥ केवल दसण नाणथी ए, रूपातीत स्वभाव ॥ सिद्ध भये तसुहीर धर्म, वंदे धरी शुभ भाव ॥३॥ इति सिद्धपदचैत्यवंदनम् ॥ ॥ अथ तृतीय श्रीआचार्यपद चैत्यवंदन ॥ ॥ जिनपदकुल मुखरस अनिल, मितरस गुण:धारी॥ प्रबल सवल घन मोहकी, जिणते चमुहारी ॥१॥ ऋ- १७ (२५८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। mimi numin ज्वादिक जिनराज गीत, नयतन विस्तारी॥ भव कूपे पाप पडत, जगजन निस्तारी॥२॥पंचाचारी जीवके, आचा- रजपद् सार॥ तिनकुं बंदे हीरं धर्म, अष्टोत्तरसो वार ॥ ॥ इति आचार्यपदचैत्यवंदनम् ॥३॥ - ॥ अथ चतुर्थ श्रीउपाध्यायपद चैत्यवंदन ॥ ॥ धन धन श्री उवझाय राय, शठता घन भंजन ||.. जिनवर दिसत दुवालंसंग, कर कृत जनरंजन ॥ १॥ गुण- वण भंजण मण गयंद, सुय शणि किय गंजण ॥ कुणालंध लोय लोयणे, जत्थ य सुय मंजण ॥२॥ महा प्राणमें जिन लह्यो ए, आगमसे पद तुर्य ॥ तिनपे अहनिश हीर धर्म, बंदे पाठकवर्य ॥३॥ इति उपाध्यायपद्चैत्यवंदनम् ॥४॥ ॥ अथ पंचम श्रीसाधुपद चैत्यवंदन ॥ ॥दसण नाण चरित्त करी,वर शिवपद गामी ॥ धर्म शुक्ल शुचि चक्रसे, आदिम खय कामी ॥१॥ गुण पमत्त अपमत्तते, भये अंतरजामी॥मानस इंदिय दमनभूत, शम दम अभिरामी ॥२॥ चारु तिघन गुण गणं भर्यों ए, पंचम पद मुनिराज ॥ तत्पदपंकज नमत है, हीरधर्मके काज ॥३॥ इति साधुपदचैत्यवंदनम् ॥ ५ ॥.. । 11 अथ चैत्यवंदनो॥ (२५९) ॥ अथ षष्ठ श्रीदर्शनपद चैत्यवंदन ॥ . ॥हुय पुग्गल परियह, अट्ठ परमित संसार ॥ गंठि भेद तब करी लहे, सब गुणनो आधार ॥१॥क्षायक वे- दक शशी असंख, उपशम पण वार विना जेण चारित्र नाण, नहीं हुवे शिव दातार ॥२॥ श्री सुदेव गुरु धर्मनी ए, रुचि लच्छन अभिराम ॥ दशनकुं गणि हीर धर्म, अहनिश करत प्रणाम ॥॥ इतिदर्शनपदचैत्यवंदनम् ॥६॥ ॥ अथ सप्तम श्रीज्ञानपद चैत्यवंदन ॥ . ॥ क्षिप्रादिक रस राम वहि, मित आदिम नाण ॥ भाव मिलापसे जिन जनित, सुय ब्रीश प्रमाण ॥१॥ भवगुण पजव ओहि दोय, मण लोचन नाण ॥ लोकालोक सरूप जाण, इक केवल भाण ॥२॥नाणावरणी नाशा ए, चेतन नाण प्रकाश ॥ सप्तम पदमें हीर धर्म, नित चा- हत अवकाश ॥५॥ इति ज्ञानपदचैत्यवंदनम् ॥७॥ ॥अथ अष्टम श्री चारित्र पद चैत्यवंदन ॥ ॥ जस्स पसाये साहु पाय, जुग जुग समितेंद् । नमन करे शुभ भाव लाय, फुण नरपति वृन्द ॥१॥ जपे

(२६०) नवपद विधि विगेरे संग्रहः ॥
धरी अरिहंत राय, करी कर्मःनिकंद ॥ सुमति पंच तीन
गुप्ति युत, दे सुख अमंद ॥२॥ इषु कृति मान कषायथी
ए; रहित लेशः शुचिवंत ॥ जीव चरित्तकुंहीर धर्म, नमन
करत: नित,संत ॥३॥ इति चारित्रपदचैत्यवंदनम् ॥४॥
.
•-
॥ अथ नवम श्री तपपद चैत्यवंदनः ॥
॥ श्री ऋषभादिक तीर्थनाथ, तद्भव शिव जाण ॥
बिहि अंतैरपि बाह्य मध्य, द्वादश परिमाणः ॥२॥ बसु कर
मित आमोसही, आदिक-लब्धि निदान ॥ भेदे समता
युत खिणे, इंग्घन कर्म विमान ॥२॥ नवमो श्री तपपद
भलो ए, इच्छारोधःसरूप ॥ वंदनसें नित हीरः धर्म, दूर
भवंतु भवकूप ॥३॥ इति तपपदचैत्यवंदनम् ॥४॥
,
॥ अथ श्रीसिद्धचक्रचैत्यवन्दनम् ॥
॥ श्री अर्हत्पदकाव्यम् ॥ इंद्रवज्रावृत्तम् ।।
जियंतरंगारिजणें सुनाणे, संप्पाडिहराइसयप्पहाणे ।'
संदेहसंदोहरयं हरंते,झाएह निच्चपि जिणेऽरिहते ॥१॥

अथ चैत्यवंदनो। ((२६) . ॥ श्री सिद्धपदकाव्यम् ॥ दुट्टकम्मावरणप्पमुक्के. अनंतनाणाइसिरीचउक्के ॥ . समग्गलोगग्गंपयप्प(स्थ )सिद्धे, झाएह निच्चंपि मणमि सिद्धे ॥२॥ ॥ श्रीउपाध्यायपदकाव्यम् ।। न तं सुहं देइ पिया न माया, जं दंति जीवाणिह सूरिपाया ॥ तम्हा हु ते चेव सया महेह, जं मुक्ख- सुक्खाई लहुं लहेह ॥३॥ ॥ श्रीआचार्यपदकाव्यम् ॥ सुत्तत्थसंवेगमयस्सुएणं, संनीरखीरामयविस्सुएणं ॥ पीणंति जे ते उवज्झायराए, झाएह निच्चंपि 'कयप्पसाए ॥४॥ ॥ श्रीसाधुपदकाव्यम् ॥ खते अ दंते असुगुत्तिगुत्ते, मुत्ते पसंते गुणजोगजुत्ते गयप्पमाए हयमोहमाए,झाएह निच्चं मुणिरायपाए।।५।। 1 4 (२६२)) नवपद विधि विगेरें संग्रह। ॥ श्रीसम्यग्दर्शनपदकाव्यम् ॥ जं. दव्वछक्काइसुसदहाणं, तं दसणं सव्वगुणप्पहाणं। कुग्गाहवाहीउवयंतिजेणं,जहा विसुद्धेण रसायणेणं ॥६॥ ॥ श्रीसम्यग्ज्ञानपदंकाव्यम् ॥ नाणं पहाणं, नयचवकसिद्धं, तत्ताववोहिक्कमयप्पसिद्धं । धरह चित्तावसहे फुरतं, माणिक्कदीवुव्व तमोहरंत॥७॥ ॥ श्रीचारित्रपदकाव्यम् ॥ सुसंवरं मोहनिरोधसारं, पंचप्पयारं विगयाइयारं ॥ मूलोत्तराणेगगुणं पवित्तं,पालेह निच्चंपिहु सञ्चरित्तं ॥८॥ ॥ श्री तपःपद काव्यम् ॥ बझं तहभितरभेअमेअं, कयाटुब्भेअकुकम्मभे। दुक्खवखयत्थे कयपावनासं,तवंतवेहांगमिअंनिरास॥९॥ ॥ इति नवपदकाव्यानि संपूर्णानि ॥

नवपदनुं चैत्यवंदन.
नवपद जयकरं
२
सकळ मंगळ परम कमळा, केलि मंजुल मंदिरं
भावकोटिसंचित पापनाशन, नमो
अरिहंत सिद्ध सूरीश वाचक, साधुदर्शन सुखकर;
चर ज्ञानपद चारित्र तप ए, नमो नवपद जयकरं.
श्रीपाळ राजा शरीर साजा, सेवतां नवपद् वरं;
जगमांहि गाजा कीर्ति भाजा, नमो नवपद जयकरं.
'श्री सिद्धचक्र पसाय संकट, आपदा नासे सवे
वळी विस्तरे सुख मनोवांछित, नमो नवपद् जयकरं. ४
आंबिल नव दिन देववंदन, व्रण टंक निरंतर
बेवार पडिकमणां पलेवण, नमो नवपद जयकरं.
त्रण काळ भावे पूजीए, भवतारकं तीर्थंकर
तिम गुणणुं दोय हजार गीए, नमो नवपद् जयकरं. ६
विधि सहित मन वचन काया, वश करी आराधीए;
तप वर्ष साडाचार नवपद, शुद्ध साधन साधीए.
गद कष्ट चूरे शर्म पूरे, यक्ष विमलेश्वरवर;
श्री सिद्धचक्र प्रताप जाणी, विजय विलसे सुखभरं. ८

मन
.
,
(२६४)
नवपद विधि विगरे संग्रह
नवपदन
चैत्यवदन.
श्री सिद्धचक्र आराधीए, आसो चैतर मास;
नवदिन नव आंबिल करी, कीजे ओळी खास
केसर चंदन घसी घणां, कस्तुरी बरास,
जुगते जिनवर पूज़िया मयणा ने श्रीपाळ.
::
पूजा अष्ट प्रकारनी, देववंदन त्रण काळ
मंत्र जपो त्रण काळ ने, गुणगुंतेर हजार
कष्ट टळ्युं उबर तणु, जपतां नवपद् ध्यान
श्री श्रीपाळ नरिंद थया, वाध्यो बमणो वान.
सातसो कोंढी सुख लह्यो, पाम्या निज आवास
पुण्ये मुक्तिवंधु वर्या, पाम्या लोलविलास.
नवपदनु चैत्यवन्दन:
बार गुण अरिहंतना, तेम सिद्धा.आठ;
छन्त्रीश गुण आचार्यना, ज्ञानतणा भंडार
पचीश गुण उपाध्यायनी, साधु सत्तावीश;
श्यामवर्ण तनु शोभता, जिनशासननी इश.
१ पांच परमेष्टिना १०८ अने ज्ञानना (द), दर्शनना (चारि-
त्रना (१०) ने तंपना (२) एम कुल १३० भेदनी, एकक नवकारवाळी
गणती (तेना १०० गणाता होवाथी.). १३०० गुणणु थाय
,
1.71

m अथ चैत्यवंदनो॥ (२६५) झान नमुं एकावने, दूर्शनना सडसठ; सीत्तेर गुण चारित्रना, सपना बार ते जिंट्ठ. एम नवपद् युक्ते करी, 'त्रण शत अष्ट (३०८) गुण थाय; पूजे जे भवी भावशु, तेहना पातक जाय. पूज्या मयणासुंदरी, तेम नरपति श्रोपाळ; पुण्ये मुक्तिसुख लह्या वरत्या मंगळमाळ. ४ .. नवपदनु चैत्यवन्दन (५ मुं.) श्री सिद्धचक्र महा मंत्रराज, पूजा परसिद्ध 'जांसनमनथी संपंजे, संपूरण रिद्ध. ऑरहतादिक नवपंद, नित्य नवनिधिदाता: 'ए संसार अंसार सार, होये पार विख्याता. २ अमराचल पद संपजे, पूरे मनना कोड; 'मोहन कहे विधियुत करो, जिम होय भवनो छोड. ३ ॥ नवपद चैत्यवंदन॥ ॥ जो धुरि सिरिअरिहंतमूलढपीढपइडिओ, सिद्ध सूरि उवज्झाय साहु चिहुँ 'साहगरिडिओ॥ दुसर्गनाण चरित्ततवहि पडिसाह ‘सुन्दरु, तत्तक्खरसरवग्गलद्धि- गुरुपयदल 'दुबरु । दिसिवालजक्खजक्खिणीपमुह सुर- (२६६))... नवपद विधि विगेरे संग्रहः॥ Aafrek-.. ... h कुसुमेहिं अलंकियओ, सौ सिद्धचक गुरु कप्पतरु अम वंछिय फल दिओ॥क्षा: ॥ पुनः नव पद चैत्यवंदन ॥ श्रीअरिहंत उदार कांति, अतिसुन्दर रूप ॥ सेवो सिद्ध अनन्त शांत, आतमगुण भूपं ॥शा आचारज उवझाय साधु, समतारस धाम ॥ जिनभाषितसिद्धांत- शुद्ध, अनुभव अभिराम ॥ २ ॥बोधिबीजगुणसंपदाए, नाणचरणतव शुद्ध ॥ ध्यावो परमानन्दपद, :ए नव पद अविरुद्ध ॥३॥ इह परभव आनन्दकंद, जग माहि प्रसिद्धा ॥चिंतामाण सम जास जाग, बहुपुण्ये लद्धा ॥४॥:तिह अणसार अपार एह, महिमा मन धारो ॥ परिहर पर जंजालजाल, नित एह.संभारो॥६॥ सिद्धचक्रपद सेवता, सहजानन्द स्वरूप ।। अमृतमय कल्याणनिधि, प्रगटे चेतन भूप ॥६॥ इति श्रीसिद्धचक्रचैत्यवंदन संपूर्णम् ॥ ॥ चैत्यवंदनम् ॥ १. ॥ श्री सिरि सिद्धचक नवपय महल्ल. पढ़मिल्ल प्रय मय जिणंद असुरिंदै चिय पयपंकय नाह, तुझ नमो ॥१॥ सिरि रिसहेसर सासिय फलदाण कापतरु कंप्प कंदप्पा . . minim अथ चैत्यवंदनो॥ (२६७), जण भवभंजण देव तुझ नमो ॥२॥ सिरि नाभि नाम कु- लगर कुलकमलुल्लास परमहंस समअसम तमतम तमो भरहरणिकपईच तुझ नमो ॥ ३ ॥ सिरि मरुदेवासामिणि उदरदरी दरियकेसरिकिसोर घोरभुयदंड खंडियपयंड मोहस्स तुझ नमो ॥४॥ इख्खागुवंसभूसण गयदुसण दुरिय- मयगलमइद चंदसम वयणवियसिय नीलुप्पल नयण तुझ नमो ॥५॥ कल्लाणकारणुं सम तत्तकणयकलसस- रिस संठाण कंठठिय कलकुंतल नीलुप्पलकालेय तुझ नमो ॥ ६ ॥ आईसर जोईसर लयगयमणलख्ख लक्खिय सरुव भवकूव पडिय जंतुतारण जिणनाह तुझ नमो ॥७॥ सिरि सिद्धसेलमंडण दुहखंडण खयरराय नयपाय. सयल- मह सिद्धिदाय जिणनायग होउ तुझ नमो ॥८॥ तुझ नमो तुझ नमो तुझ नमो देव तुझ चेव नमो ॥ पणयसुररयण- सेहर रुइरंजिय पाय तुझ नमो ॥९॥इति।। ॥ नवपद चैत्यवंदनम् ॥ ।। उप्पन्नसन्नाणमहोमयाणं, सप्पाडिहेरासणसंठियाणं ॥ सदसणाणदियसज्जणाणं, नमो नमोहोउसया जिणाणं ॥१॥ सिद्धाणमाणदरमालयाणं, नमो नमोऽणतचउकयाणं सूरीण दूरीकयकुग्गहाणं, नमो नमो सूरसमप्पहाणं ॥२॥ मुत्तत्थवित्थारणतप्पराणं, नमो नमो वायगकुंजराणं ॥ .

(२६८.) नवपद विधि विगेरे संग्रह । साहूण संसोहिअसेंजमाणं, नमो नमो ‘सुद्धदयादमाण ॥३॥ जिगुत्ततते ऋइलख्खगस्स, नमो नमो निम्मलदस- णस्सः ॥ अन्नाणसंमोहतमोहरस्स,नमो नमो नाणदिवायरस ॥४॥ आराहियाखंडीयसक्किअस्स, नमो नमो संजयवीरि- अस्स ॥ कम्मदुमोम्मूलंगकुंजरस्स, नमो नमो तिव्वतवो- भरस्स ॥५॥ इयनवपयसिद्धं दिविजासमिद्धं ॥ पयडिय- सुरवग्गं, हाँतिरेहासमग्गं ॥ दिसवइसुरसारं, 'खोणि- पीढ़ावयारंतिजयविजयचक, सिद्धचक्कं नमामि॥६॥इति।। ॥ नवपदनुं चैत्यवंदन. , पहेले दिन अरिहंतन, नित्य कीजे ध्यान; बीजे पद वळो सिद्धन, कीजे गुणगान. आचारज त्रीजे पदे, जपता जयजयकार चोथे पदे उपाध्यायना, गुंण गाओ उदार. सकल साधु वंदो सही, अढीद्वीपमा जेह; पंचम पद आदर करी, जपजोधरी ससनेहः छठे पदे दर्शन नमो, दरिसण अजुआलो; “नमो नाण पद सातमें जिम पाप पखालो. आठमे पदं आदर करी चारित्र सुचंग पद नवमे बहुः तपतंणो, फळ लीजे अभंग

अथ चैत्यवंदनोः॥
(२६९),
एणीपरे नवः पद् भावशुंए, जपतां नव नव कोड;
पंडित शांतिविजय तणो,.शिष्य कहे करजोड. ६.
नवपद, चैत्यवंदनः
सुललित नवपद् ध्यानी परमानंद, लहीए:
ध्यान अग्निथी कर्मना, इंधन पुण दहीए.
इति भीति ने रोग शोक, साव दूर पणासे;
भोग संजोग सुबुद्धिता, प्रास सुविलासे.
सिद्धचक्र तप कीजतां ए, उत्तम प्रभुता संग;
मोहन नाण प्रसिद्धता, गंगारंग तरंग.
२.
३
.
श्री सिद्धभगवाननु चैत्यवंदन.
1
सिद्ध सकळ समरूं सदा, अविचळ अविनाशी;
थाशे ने वळी थाय छे, थया अडकर्म विनाशी.
लोकालोक प्रकाश भासं, कहेवा कोण शरो;
सिद्ध बुद्ध पारंगत, गुणंथी नहीं अधूरो.
अनंत सिद्ध एणीपरे नमुंए, वळी अनंत अरिहंत
ज्ञानविमळ गुण संपदा, पाम्या. ते भगवंत..
२

. (२७०) नवपद विधि. विगेरे संग्रह। ॥ सिद्धचक्रजीनु चैत्यवंदन ॥ , ॥ श्री सिद्धचक्र आराधतां, सुख संपत्ति लहीए । सुरतरु सुररमणी थकी, अधिकज, महिमा कहीए ॥१॥ अष्ट कर्म हाणी करी, शिवमंदिर रहीए ॥ विधिशुं नव पद्ध्यानथी, पातिक सवि दमीए ॥ २ ॥ सिद्धचक्र जे से- वशे, एकमना नर नार ॥ मनवांछित फल पामशे, ते सवि 'त्रिभुवन मोजार ॥ ३॥ अंग देश चंपापुरी, तस केरो भू- 'पाल ॥ मयणा साथे तप तपे, ते.कुंवर श्रीपाल ॥.४ सिद्ध- चक्रजीना नमन थकी, जस नाठा. रोगः ॥ तत्क्षण त्यांथी ते लहे, शिवसुख संजोग ॥५॥ सातसे कोढी होता, हुवा निरोगी जेह । सोवन वाने झलहले, जेहनी निरुपम देह ॥ ६॥ तेणे कारण तमे भविजनो, प्रह. उठी भक्ते ॥ आसो मास चैत्र थकी, आराधो जुगते ॥७॥ सिद्धचक्र त्रण कालना, वंदो वली देव ॥ पडिकमगुंकरी उभय काल जिनवर मुनि.सेव . ॥ ८॥ नवपद् ध्यान . हृदे धरों, प्रति- पालो भवि शोल ॥ नव पद् आंबिल तैप तपो, जेम होय लीलम लील ॥ ९॥ पहेलो पद अरिहंतनो, नित्य कीजे ध्यान ॥ बजिो पद वली सिद्धनो, करीए गुणग्राम ॥ १०॥ आचारजं ब्रीजे पंदे, जपता जयजयकार | चोथों पद उ- 'वंझायनो, गुण गाउं उदार ॥ ११ ॥ सरव साधु वंदुःसही, अढीद्वीपमा जेह ॥ पंचम पदमां ते सही, धरजो धरी स-

अथ चैत्यवंदना ॥
((२७१)
.
नेह ॥ १२ ॥ छठे पद दरसण नमु, दरशन अजवालं.॥
ज्ञान पद नमुं सातमे, तेम पाप पखालुं ॥१३॥ आठमे
पद रुडे जपुं, चारित्र सुसंग ॥ नवमे पद् बहु तप तपो
जिम फल लहो अभंग ॥१४॥ एही नवपद ध्यानथी,
जपतां नाठे कोड ॥ पंडित धीरविमलतणो, नय वंदे कर
जोड ॥१५॥ इति ॥
रं वंछित
। जिन पूज्यानुं चैत्यवंदन. हरजोड६॥
।। प्रणमी श्री गुरुराज आज, जिनमः"
भणी करशुं सफल, जिनवचन भलेरो गनिस्पकं ॥ ध्यान
करे, चोथ तणुं फल पावे ।। जिन जुह १॥ गगन मंडल
पोते आवे ।। जइशुं जिनवर भणी एन ज्योति अनंत राजे
बादश तणुं पुन्य, भक्ति मालंता ॥ वेदन, दलित मोह
ए, पंदरे उपवास ॥ दीठो स्वामी ।। नमो० ॥ ३ ॥ विकट
मास ॥ जिनवर पासे आवतां सर्जनं ॥राग द्वेष वि-
आव्या जिनवर वारणे, वर्षी तप्वेमल केवल ज्ञान.लोचन,
उपवास पुन्य, प्रदक्षिणा देतां । मिति गम्यरूपं ॥ नमो० ॥
जे नजरे जोतां ॥ फल घणोरी पल्यंकासनं ॥ योगि-
ठवतां ।। पार न आवे गीत ना जगत जनके दास दासी,
शिर पूजी पूजा करो ए, सूर धामिति गम्यरूपं ॥ नमो० ॥
से अक्षय, सुख दीप तनुरूप निकी, सोय योगी अयोगि-
,

(२७२.) नवपद विधि विगरे संग्रह। स्थुणतां इंद्र जगीश ॥ नाटक भावना भावतां,,पामे पदवी जगीश ॥ जिनवरभक्ति वली ए,, मेमे प्रकाशी-॥ सुणी श्रीगुरु वयण सार, पूर्व ऋषि,भाखी॥ अष्ट कर्मने टालवा, जिनमंदिर जइशुं ॥ भेटी चरण भगवंतना, हवे निर्मल थइशं॥ कीर्तिविजय उवझायनो, विनय कहे कर जोड ।। सफल होजों मुज विनति, जिन सेवान कोड ॥ इति । ॥ चैत्यवंदन॥ पहेले दिर अरिहंतनुं, नित्य कीजे ध्यान । बीजे दि- न वली सिद्धन, कीजे गुणगान ॥१॥ आचारज बीजे पदे, जपतां जयजयका। चोथे पदे उवज्झायना, गुण गावो उदार ॥२॥ सकल माधु वंदो सही, अढी द्वीपमा जेहः । पंचम पद आदर करी, जपजो धरी सनेह ॥३॥ छढे पदे दर्शन नमो, दरिसण अजुआळो । नमो नाणपद् सातमे, जिम.पाप पखालोमा आठमे पद आदर करी, चारित्र सुचंग । नवमे पद बहु तोप तणो, फल लीजे अभंग ॥५॥ एणी परे नवपद् भावसुंर, जगतां नव नव कोड । पंडित 'शांतिविजय' तणो, शिर्षय कहे कर जोड ॥६॥ . ॥ चैदन॥ पहिले पद अरिहंतना॥ण गाउं नित्ये । बीजे सिद्ध तणा घणा, समरो एक चिोदते ॥१॥ आचारज बीजे. पदे, अथ चत्यवंदनो॥ (२७३) प्रणमो बिहु करे जोडी । नमिए श्रीउवज्झायने, चोथे पद मोडी ॥२॥ पंचम पद सर्व साधुन, नमतां न आणो लाज। ए परमेष्ठी पंचने, ध्याने अविचल राज ॥३॥दसण शंका- दिक रहित, पद छठे धारो। सर्व नाण पद सातमे, क्षण एक न विसारो ॥ ४ ॥ चारित्र चोखं चित्तथी, पद अष्टम जपिए । सकल भेद बिच दानमूल, तप नवमे तापिए ॥५॥ ए सिद्धचक्र आराधतां, पूरे वंछित कोड, सुमतिविजय कविराजनो, 'राम' कहे करजोड॥६॥ सिद्ध भगवाननु चैत्यवंदन. जगत भूषण विगत दूषण, प्रणव प्राणनिरूपकं ॥ ध्यान रूप अनुपमोपम, नमो सिद्ध निरंजनं ॥ १॥ गगन मंडल मुक्ति पद्म, सर्व ऊर्ध्व निवासनं ॥ ज्ञान ज्योति अनंत राजे ॥ नमो० ॥२॥ अज्ञान निद्रा विगत वेदन, दलित मोह निरायुषं ॥ नामगोत्र निरंतराय, ॥ नमो० ॥३॥ विकट क्रोधा मान योधा, माया लोभविसर्जनं ॥राग देष वि- मर्दित अंकुरे, ।। नमो० ।। ४ ।। विमल केवल ज्ञान लोचन, ध्यान शुक्ल समीरितं ॥ योगिनामिति गम्यरूपं ॥ नमो०॥ ॥५॥ योगमुद्रा सम समुद्रा, करी पल्यंकासनं ॥ योगि- नामिति गम्यरूपं, ॥ नमो० ॥६॥ जगत जनके दास दासी, तास आश निरासनं ॥ योगिनामिति गम्यरूपं ॥ नमो० ॥ ॥७॥ समय समकित दृष्टिं जनकी, सोय योगी अयोगि- ૧૮ (२७४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ कं ॥ देखि तामें लीन होवे, ॥ नमो० ॥८॥' तीर्थसिद्ध अतीर्थसिद्धा, भेद पंच दशादिकं ॥ सर्व कर्म विमुक्ति चेतन, ॥ नमो० ॥९॥ चंद्र सूर्य दीप मणिकी, ज्योति तेने ओलंगिकं ॥ तज्यो तिथि कोई अपर ज्योति,॥ नमो ॥१०॥ एक गाहे अनेक राजे, नेक मांहि एककं ॥ एक नेकी नाहि संख्या, ॥ नमो० ॥ ११ ॥ अजर अमर अलख अनंत, निराकार निरंजनं ॥ ब्रह्म ज्ञान अनंत दर्शन, ॥ नमो० ॥ १२ ॥ अचल सुखकी लहेरमां, प्रभु लीन रहे निरंतरं ॥ धर्म ध्यानथी सिद्ध दर्शन, ॥ नमो० ॥ ॥१३॥ ध्याने धूप मने पुष्प, पंच इंद्र हुताशनं ॥ क्षमा जाप संतोष पूजा, पूजो देव निरंजन ॥ १४॥ नमो सिद्ध निरं- जनं ॥ इति ।। ॥ चैत्यवंदन ॥ सिद्धचक्र महामंत्र राज, पूजाफल प्रसिद्धि । जास न्ह- वणवी संपजे, संपूर्ण माद्धि ॥ अरिहंतादि नवपदो, नित्य नवनिधि दाता॥ ए संसार असार पंथ होये पार विख्याता ॥ अबलाचलपद संपजे ए, पहोचे मननो कोड । मोह न कहे नवपद भणी, चंदु घेकर जोड ॥२॥ ॥चैत्यवंदन॥ आसो चैत्र उद्योतपक्ष, नव दिवस निरंतर । आंबिल तप बेउ टंकना प्रतिक्रमण सुहकर ॥त्रण काल अतिभा- ।

स्तवनो। (२७५.) वसु, चैत्यवंन्दन कीजे । चैत्यप्रवाडी वीतराग, पूजा फल लीजे ॥ स्वामिवत्सल कीजीये थे, नवओली वृत्तांत । ऊं- जमणुं सिद्धचक्रतुं, मोहन महिमावंत ॥३॥इति॥ : अथ स्तवनो. ॥श्रीअरिहंतपद स्तवनम् ॥ ॥त्रीजे भव विधिसहितथी, वीश स्थानक तप करीने से ॥ गोत्र तीर्थकर यांधीयु, समकित शुद्ध मन धरीने रे ॥ ॥१॥ अरिहंतपद् नित वंदीए, करम काठन जिम छंडीए रे॥ ए आंकणी ॥ जनम कल्याणकने दिने, नारकी सुखी- था थावे रे। मति श्रुत अवधि विराजता, जसु ओपन कोड नावे रे ॥१०॥ २॥ दीक्षा लोधी शुभ मने, सनापर्यव आदरीयु रे ॥ तप करी कर्म खपाइने, ततखिण केवल । वरीयु रे ॥०॥३॥ चउत्तीश अतिशय शोभता, वाणी गुण पंतोशो रे ॥ अब्दश,दोष रहित थइ, पूरे संघ जगी- शो रे अ०॥४॥ तन मन क्यण लगाइने, अरिहंतपद आ- राधे रे॥ते नर निश्चयथी सही, अरिहंतपदवी साधे रे ॥ अरिहंतपद नित चंदीए ॥६॥इति। ॥ श्री सिद्धपद स्तवनम् ॥ ॥ सकल करमनो क्षय करी, सिद्ध अवस्था पाई रे ।। -- (२७६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। minen गुण इगतसि विराजता, ओपम जस नहीं कांइ रे ॥ मन शुद्ध सिद्धपद वंदीए ॥१॥ ए आंकणी ॥ जनम मरण दुःख निर्गम्यां, शुद्धातम चिद्रूपी रे ॥ अनंत चतुष्टय धारता, अव्याबाध अरूपी रे॥ मन० ॥२॥ जास ध्यान जोगीसंरु, करे अजपा जापे रे ॥ भव भव संच्या जीवडे, कठिण करम ते कापे रे मन०॥३॥ ध्यान धरंतां सिद्धनु, पूजतां मनरागे रे ॥ अविचल पदवी पाइए, कडुं जिनवर वड भागे रे ॥ मन० ॥४॥इति।। ॥श्री आचार्यपद स्तवनम् ॥ ॥गुण छत्तीशे दीपता, पाले पंच आंचारो रे ॥ जिन- मारग माचो कहे, युगप्रधान जयकारो रे ॥ आचारजपद बंदीए ॥१॥ ए आंकणी ॥ सारण वारण चोयणा, पडिचो- यण चौ शिक्षा रे। भव्यजीव समझायवा, देवाने ते दक्षा रे ॥ आ०॥२॥ जिनवर सूरज आथम्या, परतिख दीपक जेहा रे। सकल भाव परगट करे, ज्ञानमयी जसु देहा रे ॥३॥ विधिशुं पूजा साचवे, ज्यावे निज हित जाणी रे पावे लघुतर कालमां, आचारजपद प्राणी रे ॥४॥इति। ॥श्री उपाध्यायपद स्तवनम्॥ द्वादशांगी वाणी वदे, सूत्र अर्थ विस्तारे रे ॥ पंच वरग गुण जेहना, सुमति गुप्ति नित धारे रे ॥१॥ श्री उव झाया वंदीए॥ ए आंकणी ॥ दायक आगम वाचना, .

स्तवनो॥ . womane (२७७) mfunn भेद भाव युत सारी रे ॥ मूरखकुं पंडित करे, जगतजन्तु हितकारी रे॥२॥ श्री० ॥ शीतल चंद किरणसमी, वाणी जेहनी कहीए रे ॥ते उवझाया पूजता, अविचल सुखडां लहीए रे ॥३॥ ॥ श्री साधुपद स्तवनम् ॥ ।। सकल विषय विष वारीने, आतमध्याने रातारे।। उपशम रसमां झीलता, निज गुण ज्ञाने माता रे ॥१॥ हित धरी मुनिपद वंदीए ॥ ए आंकणी ॥ रत्नत्रयी आ- राधतां, षटकाया प्रतिपाले रे ॥ पंचिंद्री जीपे सदा, जिन- मारग अजुवाले रे ॥ हित० ॥२॥ गुण सत्तावीश अलं- कर्या, पंच महाव्रत धारी रे ॥ बादशविध तप आदरे, चि- दानंद सुखकारी रे ॥ हित० ॥३॥ नवविध ब्रह्मचारिज 'घरे, करम महा भट जीत्या रे ॥ एहवा मुनि ध्यावेसदा, ते नर जगत विदिता रे ॥ हित०॥४॥ इति ॥ ॥श्री दर्शनपद स्तवनम् ।। ॥सुगुरु सुदेव सुधर्मनी, सहहणा चित्त धरीए रे ।। सात प्रकृतिनो क्षय करी, क्षायिक समकित वरीए रे ॥१॥ दसणपद् नित वंदीए ।.ए आंकणी ॥ इण विण ज्ञान निःफल कह्यु, चारित्र निःफल जाये रे ॥ शिवसुख ए विण ना मीले, बहु संसारी थाय रे ॥ ० ॥२॥ सड- सही भेदे शोभतुं, अजरामर फल दाता रे । जे नर पूजे भावणं, ते पामे सुख शाता रे ॥ दरशणपद० ॥ इति ॥ 1 (२७८) नवपद विधि विगैरे संग्रह। ॥ श्री ज्ञानपद स्तवनम् ॥ भक्ष्य अभक्ष: विचारणा, पेय अपेय निर्धारो रे ।। कृत्य अकृत्यने जाणीए, ज्ञान महा जयकारोरे॥१॥ ज्ञान निरंतर वंदीए ॥ ए आंकणी ॥ ज्ञान विना ज- यणा नहीं, जयणा विण नहीं धर्मो रे ॥ धर्म विना शिवसुख नहीं, ते विण न मिटे भमों रे ॥ज्ञान॥२॥ यांच प्रकार छे जेहना, भेद इकावन तासो रे ॥ जा- गीने पूंजे सदा, ते लहे केवल खासो रे झान० ॥३॥ इति। श्री चारित्रपद स्तवनम् ॥ सर्व विरति देशविरतिथी, अणंगार सागारी रे ॥ जयवंतो थावो सदा, ते चारित्र, गुणधारी रे ॥१॥ चारित्रपद नित बंदीए ॥ ए आंकणी ॥ षटू. खंड सुख तजी आदरे,संयम शिवसुखदायी रे ॥ सत्तर भेदे जिन कह्यो, ते आदरीए भाइरे चा०॥२ तत्त्वरमण ससु मूल छे, सकल आश्रवनो त्यागी रे ॥ विधि सेती पूजन करे, भाव धरी. वड:भागी रे॥.चा०॥३॥इति ।।

॥ स्तवनो॥ (२७९) mm ॥ श्री तपपद स्तवनम् ॥ निज इच्छा अवरोधीएं, तेहीज तप जिन भाख्यु रे॥ बाह्य अत्यंतर भेदथी, द्वादश भेदे दाख्यु रे ॥शा अनुपम तपपद वंदीए ॥ ए आंकणी ॥ तद्भव मोक्ष- गामीपणं, जाणे पण जिनराया रे ॥ तप कीधा अति आकरां, कुरिसत करम खपायां रे। अ० ॥२॥ करम निकाचित क्षय हुवे, ते तपने परमावे रे ॥ लब्धि अ- व्यावीश उपजे, अष्ट महासिद्धि पावे रे ॥अ०॥३॥ एह तपपद ध्यावंतां, पूजंतां चित्त चाहे रे ॥अक्षय गति निर्मल लहे, सहु योगींद सराहें रे॥अ०४ इति।। सिद्धचक्रतुं स्तवन, नवपद धरजो ध्यान,भक्जिन नवपद धरजो ध्यान;ए नपदनुं ध्यान करतां, पामे जीव विश्राम, भवि जन ।। ॥१॥ अरिहंत सिद्ध आचारज. पाठक, साधु सकळ गुण- खाण, भवी० ॥२॥ दर्शन ज्ञान चारित्र ए उत्तम, तप तपो करी बहु मान, भवी० ॥३॥ आशो चैत्रनी शुदि सातमथी, पूनम लगी प्रमाण, भवी० ॥ ४॥ एम एकाशी आंबिल कीजे, वरस साडा चारनुं मान, भवी० ॥५॥ पडियमणां दोय टंकना कीजे, पडिलेहण के वार. भवी

rumimmm
,
(२८०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।
।। देववंदन व्रण टंकना कीजे देव पूजो त्रिकाळ.भवी
॥७॥बार आठ छत्रीश पचवीशनों, सत्तावीश सड़सठ
सार, भवी० ॥८॥ एकावन सीत्तेर पचासनो काउस्सरण
करो सावधान. भवी० ॥१॥ एक एक.पदन गुण, गणीए
दोय हजार, भवी० ॥१०॥ एणे विधि जे ए तप आराधे
ते पामे भव पार, भवी० ॥ ११ ॥ कर जोडी सेवक गुण
गावे, मोहन गुण मणिमाळ, भवी ॥१२॥ तास दि
मुनि हेम कहे छे, जन्म मरण दुःख दाळ. भवी०
सिद्धचक्रनुं स्तवन.
सिद्धचक्रने भजीए रे, के भवियण भाव धरी
मद मानने तजीए.रे, के कुमति दूर करी;
पहेले पदें राजे रे, के अरिहंत श्वेततनु,
बीजे पदे छाजे रे, के सिद्ध प्रगट भj.
त्रीजे पदे पीळां रे; के आचार्य कहीए,
चोथे पदे पाठक रे, के नील वर्ण लहीए. सिद्ध
पांचमे पदे साधु रे, के तप संयम शरा
श्याम वर्णे सोहे रे, के दर्शन गुण पूराः : सिद्ध
दर्शनज्ञान. चारित्र रे, के तप संयम शुद्ध वरोः ।
भवियंण चित्तआणी रे के हृदयमा ध्यान धरो. सिद्ध ।
सिद्धचक्रने ध्याने रे, के संकट वर्ण टळे
कहे गौतम वाणीर के अमृत पद पावे
सिद्ध०.५
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स्तवनो। (२८१) सिद्धचक्रनुं स्तवन. सिद्धचक्र सेवो रे प्राणी, भवोदधिमांहे तारक जाणी विधिपूर्वक आराधीजे, जिम' भवसंचित पातक छीजे. सिद्ध० ॥१॥ प्रथम पदे अरिहंत, बीजे पदे वळी सिद्ध भगवंत; त्रीजे पदे आचार्य जाणु, चोथे पद उपाध्याय वखाणुं । सिद्ध० ॥२॥ पांचमे पदे सकल मुनींद्र, छठे दर्शन शिवसुख कंद; सातमे पदे ज्ञान विवुध, आठसे चारित्र धार विशुद्ध ॥ सिद्ध० ॥३॥ नवमे पद तप सार, एक एक पद जपो दोय हजार;नव आंबिल ओळी कीजे, व्रण काळ जिनने पूजीजे ॥ सिद्ध० ॥४॥ देववंदन व्रण वार, पडिक- मणुं पडिलेहंणं धार; रत्नं कहे एमआराधो श्रीपाळ मयणा जिम सुख साधो. सिद्ध० ॥५॥ सिद्धचक्रतुं स्तवन. (सांभळ रे तुं सजनी मोरी, रजनी क्यां रंमी आवीजी रे ए देशी) सिद्धचक्र वर सेवा कीजे, नर भव लाहो लीजे जी रे विधि पूर्वक आराधन करतां, भव भव पातक छीजे. ॥१॥ भविजन भजीये जी रे, अवर अनादिनी चाल, नित्य नित्य तजीए जी रे. ॥ए टेक॥ देवनो देव दयाकर ठाकर, चाकर सुर नर इंदा जी रे निगडे त्रिभुवन नायक बेठा, , , (२८२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। प्रणमो श्री जिन चंदा. भवि० ॥ २॥ अज अविनाशी अकळ अजरामर, · केवल ..दसण नाणीजी.., अ. व्यावाध अनंतु वीरज, सिद्ध प्रणमो भवी प्राणी.. भवि० ॥३॥ विद्या सौभाग्य लक्ष्मी पीठ, मंत्र योगराज पीठजी रेसुमेरु पीठ पंच प्रस्थाने, नमु आचारज हीट. भवि० ।। ॥४॥ अंग उपांग नंदी अनुयोगा, छ छेद ने मूळ चारजी रे, दस पयन्ना एम.पणयालीस, पाठक तहना, धार. भवि० ॥५॥ वेद ऋण ने हास्यादिक पट, मिथ्यात्व चार कषा- यजी रे चौद अभ्यंतर नवविध बाह्यनी, ग्रंथि तजे मुनि- रायः भवि०॥६॥ उपशम क्षय उपशम ने मायक, दर्शन त्रण प्रकारजी रे श्रद्धा परिणति आत्मा केरी, नसीए बार- वार. भवि० ॥७॥ अहावीश.चौद ने पट दुग इम, मत्या- दिकना जाणोजी रे; एम एकावन भेदे प्रणलो, सातमे पद वर नाण. भवि० ॥ ८॥ निवृत्ति ने प्रवृत्ति भेदे. चारित्र छे व्यवहारजी रे निजगुण स्थिरताचरण ते प्रणमो, निश्चय शुद्ध प्रकार: भवि० ॥९॥ बाह्य संभ्यंतर तप ते संवर, समता निर्जरा हेतु जी रे ते तप नभीए भाव धरीने, भव- सायरमा सेतु. भवि० ॥ १०॥ ए नवपदमा पण (५) छे धर्मा, धर्म ते करते चारजी रे; देवं गुरु ने धर्म ते एहमा, दोय त्रण चार प्रकार: भवि० ॥ ११ ॥ मार्गदेशक अवि- नाशीपणु, आचार विनय संकेते जी रे; सहायपणुं धरता साधु जी, प्रणमों एह ज हेते. भवि०॥ १२ ॥ विमळेश्वर + स्तवनो॥ . (२८३) सांनिध्य करे तेहनी, उत्तम जे आराधेजीरे पद्मविजय कहे ते भवी प्राणी, निज आतमहित साधे. भवि० ॥१३॥ श्री सिद्धनुं स्तवन. सिद्ध जगत शिर शोभता, रमता आतल राम, लक्ष्मी लीलानी लहेरमां, सुखीआ छे शिव ठाम. सि० ॥१॥ महानंद अमृत पद नमो, सिद्धि केवळ नाम; अपुनर्भव ब्रह्मपद वळी, अक्षय सुख विशराम. सि० ॥२॥ संश्रय निश्रय अक्षरा, दुःख समरतनी हाण; निवृत्ति अपवर्गता, मोक्ष मुक्ति निर्वाण. सि० ॥३॥ अचळ महोदय.पद् लघु, जोतां जगतना ठाठ; निज निज रूपे रे जुजुआ, वीत्या कर्म ते आठ. सि०॥४॥ अगुहलघु अवगाहना, नाम चिकसे वदन; श्री शुभ वीरने वंदता रहीए सुखमां म- गन. सि०॥५॥ श्री सिद्धचक्रतुं स्तवन. ( राग-नींदरी चरण हुइ रही-ए देशी ) श्री सिद्धचक्र आराधीए, जिम पामो हो भवि कोडि कल्याण के श्री० श्रीपाळतणी परे, सुख पामो होलही निर्मळ नाण के. श्री सि० ॥१॥ नवपद ध्यान धरो सदा, चोखे चित्ते हो आणी बहु भाव के विधि आराधन साचवो जिम जगमा हो होय जसनो जमाव के. श्री सि० ॥२॥ केशर चंदन कुलुपशु, पूजीजे हो उखेवी धूप के; कुंदरूं.

(२८४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। अगर ने अरगजा, तपदिन तां हो कीजे घृतदीप के. श्री सि० ॥३॥ आशो चैत्र शुक्ल पक्षे नव दिवसे हो तप कीजे एह के; सहज सोभागी सुसंपदा - सोवनसम हो झबके तस देह के. श्री सि० ॥ ४॥ जावजीच शक्ते करो, जिम पामो हो नित्य नवला भोग के चार. वरस साडा तथा, जिनशासन हो ए मोटो योग के. श्री सिवाना विमळदेव सांनिध्य करे, चक्रेश्वरी हो कर तास सहाय के श्री जिनशासन सोहीए, एह करतां हो अविचळ सुख थाय के. श्री सि०॥६॥ मंत्र तंत्र मणि औषधि वश करवा हो शिवरमणी काज के त्रिभुवन,तिलकसमावड़ी होय ते नर हो कहे नय कविराज के, श्री सिं०॥७॥ श्री नवपदनुं स्तवन. नरनारीरे भमतां भव भरदरीए, नवपद ध्यान सदा धरीए, सुखकारीरे, तो शिवसुंदरी वरीए, नवपदन ध्यान सदा धरीए.॥१॥ पहेले पद् श्री अरिहंत रे, करी अष्ट रिपुनो अंत रे, थया शिवरमणीना कंतरे पद बीजे से सिद्ध भजी दुःख हरीए रे नवपदनुं ध्यान सदा-धरीए; सुखकारी से० ॥२॥ आचार्य नमुं पद त्रीजे. रे चौथे पद पाठक लीजे. रे प्रीतेथी पाय प्रणमीजे रे पद पांच में मुनि महाराज उच्चरीए रे, नव॥ ३॥ छठे पद दर्शन 'जाणुं रे, ज्ञान गुण मुख्य वखाणं रे आ-जगमों .

स्तवनो॥. (२८५) नव० ॥४॥ नाणुं रे, बहु खरचो रे तोए न खुट जरीए रे, चारित्र पद नमुं आठे रे, नवमे तप करो बहु ठाठे रे, दुःख दारिद्रय जेहथी नाठेरे, जिनवरनी रे प्यारथी पूजा करीए रे, नव० ॥५॥ नव दिन शियळ व्रत पाळो रे, पडिकमण करी दुःख टाळो रे, जेम चंपापति श्रीपाळी रे, मनमाही रे शंका न राखो जरीए, नव०॥६॥ ओगणीश अठ्ठावन वर्षे रे; पोष मास पुनम तिथि फरसे रे, भावे गावे ते भव नवि फरसे रे, निभर्यथी रे धर्म कहे भव तरीए रे, नव० नव० ॥७॥ श्री सिद्धचक्रनुं स्तवन, (जगजीवन जग वाल हो. ए राग.) श्री सिद्धचक्र आराधीए, शिवसुख फळ सहकार लाल रे; ज्ञानादिक त्रण रत्ननु, तेज चढावणहार लाल रे. श्री सि० ॥१॥ गौतमे पूछता कह्यो, वीर जिणंद विचार लाल रे; नवपद मंत्र आराधतां, फळ लहे भविक अपार लाल रे. श्री सि०॥२॥ धर्म रथना चार चक्र छे, उपशम ने सुविवेक लाल रे संवर चीजें जाणीए, चोथु सिद्धचक्र छेक लाल रे, श्री सि०॥३॥ चक्री चक्र ने रथ बळे, साधे सयल छ खंड लाल रे; तिम सिद्धचक्रप्रभावथी, तेज प्रताप अखंड लाल रे, श्री सि० ॥४॥ मयणा ने श्रीपाळजी, - (२८८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। चोथे बंदाजी, म० साधु पांचमे देखी आणंदोजी म०॥४॥ छठे दरिसणं जाणोजी, म०, श्री ज्ञानने मातमे वखाणोजी म० चारित्र पद आटमे सोहेज़ी, म० वळी नक्मे तप मन मोहेजी, म०॥५॥ रसत्यागे आंबिल कीजेजी, म० तो मुक्तितणां फळ लीजे जी, म० संवत्सर युग (४). षट (६) मासे जी, म० ते तप कीजे उल्लास जी, म0.15॥ ए तो समयणा ने श्रीपाळजी, म० तप कीघो थइ उजमाळ जी, म० तेनो कोह शरीरनो. टाळ्यो जी, म० जगमा जशवाद प्रग- टायोजी, म० ॥ ७ ॥ पंचम काळे तुमे जाणाजी, म० प्रगट परचो परमाणोजी, म० अनुं गुणणुं वे हजार जी, म० तमे धरो हृदय मोझार जी, म०टा नर नारी ए' पढ़ने घ्यावे जी, म० ते तो संपद सघळी पावे जी, म० मुनि रत्नसुंदर सुपसायजी, म० सेवक मोहन गुण गायजी, मनोहर मनगमतां ॥९॥ श्री नवपदीनुं स्तवन, गोयम नाणी होंके, कहे सुणो प्राणी मारा लाल, जिनवर वाणी होके, हड्डे आणी मारा लाल; आसो मासे होके गुरुनी पासे मारा लाल, नवपद व्याशे होके, अंग उल्लासे मारा लाल... आंबिल कीजे होके, जिन. पूजीजे:मा०, जाप-जपीजे होके देव वांदीजे मा०) भावना-भावो होके, सिद्धचक्र ध्यावों मा०,

-
॥ स्तवनो॥
(२८९)
+
जिन गुण गांवो होके, शिवसुख पावो मा०.
श्री श्रीपाळ होके, मयणा बाळे मा०,
ध्यान रसाळे होके, रोगज टाळे मा;
सिद्धचक्र ध्यायो होक, रोग गमायो मा०,
मंत्र आराध्यो होके, नवपद पायो मा०,
भामिनी भाळी होके, पहेरी पटोळी मा०,
सहियर टोळी होके, कुंकुंम घोळी मा०;
थाळ कचोळी होके, जिनघर खाली मा०,
पूजी प्रणमी होके, कीजे ओळी मा०.
चैत्रे आसो होके. मनने उल्लासे मा०,
नवपद् ध्याशे होके, शिवसुख पाशे मा०;
उत्तमसागर होके, पंडित राया मा०,
सेवक कांते होके बहु सुख पाया मा०.
५
श्री नवपदजीनुं स्तवन.
नवंपद महिमा सार, सांभळजो नरनार, आछे
लाल, हेज धरी आराधीएजी तो पामो 'भव पार, पुत्र
कलत्र परिवार, आछे०, नव दिन मंत्र आराधीएजी.
॥१॥ ए आंकणी. आसो मास सुविचार, नव आंबिल
निरधार, आछे०, "विधिशुं जिनवर 'पूजीएजी; अरिहंत
सिद्ध पद सार, गय[तेर हजार, आछे०, नव पद महिमा
कीजीएजी. ॥२॥ मयणा सुंद्री श्रीपाळ, आराध्यो तं-
त्काळ, आछे० फळदायक तेहने थयोजी, कंचन वरणी

, (२९०) नवपद विधि विगेर संग्रह ।। काय. देहडी तेहनी थाय, आछे०, श्री सिद्धचक्र महिमा कह्यो जी. ॥ ३॥ सांभळी सहु नर नार, आराध्या नव- कार, आछे०, हेज धरी हैडे घणुंजी चैत्र मास वळी एह, नवपद शुं धरो नेह, आछे०, पूज्यो दे शिवसुख घj जी.॥४॥ एणी परे गौतम स्वाम, नव निधि जेहने नाम आछे०, नवपद महिमा वखाणीएजी; उत्तमसागर शिष्य, प्रणमे ते निशदीश, आछे०, नवपद महिमा जा- णीए जी.॥५॥ श्री नवपदजीनुं स्तवन. (कीसके चेले कीसके पुत. ए देशी.) सेवोरे भवि भावे नवकार, जपे श्री गौतम गणधार, भवि सांभळो, हारे संपद थाय भ०हारे संकट जाय भ०, आसो ने चैत्रे हरखं अपार, गणणु कीजे तेर. हजार. भ. ॥१॥ चार वर्ष ने वळी पंटू सास, ध्यानधरो भवी धरी विश्वास, भ०; ध्यायो रे मयणासुंदरी श्रीपाळ, लेहनो रोग गयो तत्काळ. भ० ॥ २॥ अष्ट कमल दल पूजा रसाल, करी न्हवणं, छोट्युं तत्काल, भ०; सातसो महीपति तेहने रें ध्यान, देहडी पाम्या कंचनवान., भ० ॥३॥ महिमा कहेतां नावे पार, समरो तिण कारण नवकार, भ, इह भव परभव दीए सुखवास, पामे लच्छी लीलविलास. .

1 mirin . . । ॥ स्तवनो.॥ (२९.१) भ०॥४॥ जाणी प्राणी लाभ अनंत, सेवा सुखदायक.ए मंत्र, भ०, उत्तमसागर पंडित शिष्य, सेवे कांतिसागर निशदीश. भ० ॥ ५॥ श्री सिद्धचक्रजी स्तवन. (कृपानिधि वींनती अवधारी, ए चाल.) सिद्धचक्र वंदो जयकारी। इंतो वारी जाउं वार हझारि, सिफाअरिहंत १ सिद्ध २ गुणधारी।आचारज उपगारी। उवजाय ४ सकल अणगारी ५। लि०॥१॥ वरदरशण ६ नाण ७ जीतारी । सुखकरण चरणहि- तकारी। शमरस युत तप ९ चित्तधारी सि०॥२॥ ए नवपद दुरित विदारी । वळि सहु जगजन मनहारी। तुमे सेवो नित निरधारी सि० ॥३॥ नवपद सहु सुर नर राया। वंदे नित चित,गुणलाया। एतोअशरणशरण ॥ नवपद भवजलधि जिहाझा। ए सकल भुवनमहाराजा। निताचितधरिये हितकाजासिक ॥५॥ अगणित जंग जीउ-उदास नवपद समरण उर धारा। भये मुगति रमाभरतारा । सि ॥६॥ नवपद सेवी सुखकंदा । भया ते सिरिपाल नरिंदा,नित लहीया कहाया, सि० 7 ॥ (२९२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। परम आणंदा ॥७॥ सि०॥ नवपदके महिमा उदारा कोइ पाम न शके पारा। कितने कहुं गुण विसतारा ॥८॥ पार्श्व प्रभु अंतरजामी । तसु चरण अनुग्रह पामी ॥ शिवचंद्र नमे शिरनामी, सि०॥९॥ श्रीसिद्धचक्रजी स्तवन (मातारे यशोदाजी म्हने चांदलीयो आपो,) ए देशी । पूजोरे सिद्धचक्रने भावे वाञ्छित आपे, नरभव पाभी लाहो लीजेभवदुःख काप॥१॥ ए आंकणी। पहीले पदे अरिहंत जपीजे, वीजे वली श्रीसिद्ध,त्रीजे आचार- ज तीस समरो, आप गुणे वृद्ध ॥ १॥ पूजोरे ॥ १ ॥ चोथे पदे उवज्झाय जपीजे पांचमे साधु, छठे दर्शन सातमे नाण भक्ते आराधु ॥२॥पू०॥ आठमे पद चारित्र नमीजे, नवमे तप तीम, ए नवपद भावे आ- राध्या श्रीपाले जीम ॥३॥ पूजोरे ॥ मन वच तनु त्रिहुं शुद्धि कीजे पडिक्कमणां दोय, देवत्रिकाले वंदो तीम वली, पूजा त्रिण होय ॥ ४॥ पूजोरे ॥ गु- गणुं तेर सहस उत्कृष्ट अथवा दोय सहस, भूमि सं-

1
॥ स्तवनो।
(२९३),
थारो शीलने पालो, जिनशासन- रहस्य ॥ ५॥ पू-
जोरे इम ओली नवकीजे, विधियु चढते उच्चाह्य,
द्रव्य भाव बेहुस्युं साढा चार वरस मांग ॥ ६॥ पू-
जोरे ॥ तप पूरे ऊजमणुं कीजे, तुरत यथाशक्ति दर्शन
जैन, जिम षटमां दीपे देखालीबिगते ॥७॥पूजोरे०
लघुकर्माने क्रिया फल दिये सफलो उवएस, सेर होय
तिहां कूवो खणीये ते विण संक्लेश ॥ ८॥पूजोरे ॥
सफल हूवो श्रीपालने, सवि जस अव्य भाव शुध्ध, इम
जो विधिस्युं आराधे, फल पामे बुद्ध ॥ ९॥पूजोरे ॥
एहथी राजऋद्धि बहु रमणी,सवि गुणनी वृद्धि, न्याय
सागर कहे एहने, सेवो जो व्हाली सिद्धि ॥ १० ॥
पूजोरे ॥ इति श्रीसिद्धचक्र स्तवन संपूर्णम् ॥
श्री सिद्धचक्र स्तवन ॥
श्री सिद्धचक्र सेवा करो, जस गाजे छे
सिध्ध साधन पुष्ट उपाय,
त्रिभुवन राजे छे
कारण शिव साधन तणां, जस गाजे छे
संख्यातीत कहेवाय
॥१॥

, ,,२ प्र . G ३ (२९४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। कारण सर्व शिरोमणि जस गाजे छे जोहां लहीये तत्त्वविचार त्रिभुवन राजे के धर्मा पांच लोहामणां तिहां लहीये तत्त्वविचार वर्जित दोष अढारथी अड प्रातिहार्य धार चोत्रीस अतिशय राजतो गुण पत्रिीश वाणी उदार गुण ठाणे तेरमे तथा चौदसे वरते जिनराज देवतत्व अरिहंतजी प्रणमो भवि आतमकाज आठ कर्मक्षयथी थया गुण अड एकत्रीश विशाल अव्याबाध सुखी घणा जस सादि अनंतह काल जाणे लोकालोकने पंण नवि हरखे नवि शोच " G । " "५ " में 7 " ७ " ॥ स्तवनो॥ (२९५) ते पण देव अनंत छ जस गाजे छे एक ठामे नवि संकोच त्रिभुवन राजे छे६ छत्रीस छत्रीशी गुणे गुरु तत्वमा मुख्य कहाय तीर्थकर सम तेह छे गौतम प्रमुख सूरि राय सूरि सम पाठक वळी पण वीस गुणवंत महंत सयल जीव उपगारीया प्रणमो गुरुपद विरतंत शिवमारग साधक मुनि करे अरस विरस आहार ते पण गुरु तत्त्वे नमो गुण सत्तावीश आधार ए समकीत सडसठ भेदी आराधो थइ उजमाल भेद एकावन नाणना समझो गुरुनिकट रसाल १ R " . १०

"
(२९६) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
सित्तेर भेद चरण तंणा : जस गाजे छे:
तिम तपना भेद पचास त्रिभुवन राजे छे
धर्मतत्त्व ए चारमा
वंदो आणी उल्लास
११
इण परे वहुविध अवतरे
साधन नवपदसा सार
गुण कुण कही शके एहना ,,
जो होय मुख जीभ हजार
विधिपूर्वक आराधतां
लहे जिम शिव श्रीपाळ
जिन उत्तम गुण गावतां
इम पद्मने मंगल माळ
१३
स्तवन वीजुं. मुजरो ल्योने जालीम जाटनी.ए. देशी.
तत्त्व ते त्रण्य छे जेहमां, देव गुरुनेरे धर्म,श्रीसिक
चक्रने जाउं भामणे, आंकणी ॥धमी. धर्म वली एहमां
जे जिनशासनमर्म ॥१॥चोत्रीश अतिशय राजतो, वाणी .
गुणरे पांत्रीश। अरिहादेव पहेले पदे,विवरे छे जेह वीस।।
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.
१
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३ , ॥ स्तवनो॥ (२९७) ॥ श्रीरूपातीत परमातमा,गुण वरीया एकत्रीश, वेदी ज लोकालोकना, प्रणमो तास गुणीश॥३॥ श्रीगुणछ त्रीश सूरि नमो,छत्रीस छत्रीशी जास । पाठक गुणपच- वीसथी,भणीये सूत्र जई पास ॥४॥श्रीगुण सत्तावीश धारजे, मुनिवर नमिये उल्लाल, सम्यग्दर्शन पद छठे, भवू सातमे नाणविलास ॥५॥श्री चारित्र आठमेजा- णीये नवमे तवगुण खाण, आराधो भवि एहने, जीम लहोक्रोड कल्याण ॥६॥श्री०शिवलहीये एह साधता, जीम जग कुंवर श्रीपाल, उत्तमविजय कृपाथकी, पद्मने मंगल माल ॥७॥ इति स्तवनम् ॥ ॥ अथ नवपद स्तवन । ॥ सुरमणीसम सहु मंत्रमा, नव पद अभिरामी रे लोय ॥ अहो नव०॥ करुणासागर गुणनिधि, जग अंतरजामी रे लोय ॥ अहो. जग०॥ १॥ त्रिभुवन जन पूजित सदा, लोकालोकप्रकाशी रे लोय॥ अहो लोका०॥ एहवा श्री अरिहंतजी, नमुं चित्त उल्लासी रे लोय ॥ अहो न० ॥२॥ अष्ट करमदल क्षय करी, - (२९८) नवपद विधि विगेरें संग्रह। थया सिक सरूपी रे लोय ॥ अहो न०॥ सिद्ध नमो भवि भावथी, जे अगल अरूपी रे लोय । अहो जे० ॥३॥ गुण छत्तीसे शोभता, सुंदर सुखकारी रे लोय ॥ अहो सुं०॥ आचारज तीजे पदे, वंदु अवि कारी रे लोय.॥ अहो वं० ॥ ४॥ आगमधारी उप- शमी, तप सुविध आराधी रे. लोय ॥ अहो त० ॥ चोथे पद पाठक नमो, संवेग समाधि रे लोय ॥ 'अहो सं० ॥५॥ पंचाचार पालणपरा, पंचाश्रव त्यागी रे लोय ॥ अहो पं० ॥ गुणरागी मुनि पांचमे, प्रणमुं वडभागी रे लोय ॥ अहो प्र०॥६॥ निज पर गुणने ओलखे, श्रुत श्रद्धा आवे रे लोय ॥ अहो श्रुतः ॥ छ8 गुण दरसण नमो, आतम शुभ भावे रे. लोय ॥ अहो आ० ॥ ७॥ ज्ञान नमो गुण सातमे, जे पंच प्रकारे रे लोय ॥ अहो जे०॥८॥ाठमे चारित्रपद 'नमो, परभाव निवारी रे लोयः॥ अहो प० ॥ खंत्या- दिक देश धर्मनो, जेह छे अधिकारी रे लोय ॥ अहो जे ॥..९ ॥ नवमे वली तपपद नमो, बाह्याभ्यंतर - - . ॥ स्तवनो॥ (२९९). भेदे रे लोय ॥ अहो बा०॥ बांध्यां काल अनंतनां;, जे कर्म उल्लेदे रे लोय ॥ अहो जे० ॥१०॥ए नव पद बहु मानथी, ध्यावे शुभ भावे रे लोय ॥ अहो ध्या०॥ नृप श्रीपाल तणी परे, मनवंछित पावे रे लोय ॥ अहो म० ॥ ११ ॥ आसो चैत्रक मासमां, नव आंविल करीएरे लोय ॥अहो न०॥ नंव ओली विधि युत करी, शिवकमला वरीए रे लोय ॥ अहो शि० ॥ १२ ॥ सिद्धचक्रनी बहु परे, वर महिमा कीजे रे लोय ॥ अहो व०॥ श्री जिनलाभ कहें सदा, अनुपम जस लीजे रे लोय ॥ अहो अ०॥१३॥ इति ॥ ॥ अथ नव पद स्तवन । ॥राग मारु ॥ तीरथनायक जिनवरूजी, अति- शय जास अनुप ॥ सिद्ध अनन्त महागुणीजी, पर- मानंद सरूप ॥ भविक मन धारजो रे ॥१॥ धारजो नवपद्ध्यान ॥ भ० ॥. श्री आचारज गणधरु रे, गुण छत्तीस निवास ॥ पाठक पद्धर मुनिवरुजी, श्रुत- दायक सुविलास ॥ भ० ॥२॥सुमति गुपतिधर शोभ- (३००) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ ताजी, साधु समतावंत ॥ सम्यग्दर्शन सुंदरुजी, ज्ञानप्रकाश अतन्त ॥ भ०॥ ३ ॥ संवर साधना चरण छे रे तप उत्तम विधि होय ॥ ए नवपदना ध्या नथी रे, निरुपाधिक सुख होय ।।भ० ॥४॥ अमृतसम जिनधर्मनो रे, सूल ए नवपद जाण ॥ अविचल अनु- भव कारणेजी, नित प्रति नमत कल्याण ॥ भ० ॥५॥ इति नवपदस्तवनम् ॥ ॥ अथ सिद्धचक्र स्तवन ॥ ॥राग प्रभाती ॥ नवपद ध्यान धरो रे ॥ भ- विका न० ॥ सन वच काया कर एकंते, विकथा दुर हरो रे॥ न० न०॥१॥ मंत्र जमी अरु तंत्र घणेरा, इन सबकुं विसरो रे ॥ अरिहंतादिक नवपद जपने, पुण्य भंडार भरो रे ॥ भ० न०॥२॥ अड सिद्ध नव- निध संगलमाला, संपत्ति सहज वरो रे ॥ लालचंद याकी बलिहारी, शिवतरु बीज खरो रे॥भ० न०॥३॥ इति श्रीसिद्धचक्रस्तवनम् ॥

. ॥ स्तवनो॥ (३०१ ॥ अथ पंचम स्तवनम् ॥ ॥ भवियां श्री सिद्धचक्र आराधो, तुमे मुक्तिमा-- रगने साधो, इह नरनव दुर्लभ लाधो हो लाल ॥ नव पद जाप जपीजे ॥१॥ त्रण टंक देव वांदीजे, त्रिहुं काले जिन पूजीजे, आंबिल तप नव दिन कीजे हो लाल ॥ न॥२॥ सुदि आसो चैत्रज मासे, तप सातमथी अभ्यासे; पद सेव्यां पातक नासे हो लाल ॥ न०॥३॥ मयणा ने नृप श्रीपाले, आराध्या मंत्र उजमाले, एह दुःख दोहगने टाले हो लाल ॥न. ॥४॥ एहनी जे सेवा सारे, तस मयगल गाजे बारे, इति भीति अनीति निवारे हो लाल ॥ न०॥५॥ मिथ्यात्व विकार अनिष्ट, जय जाये दोषी दुष्ट, इण सेव्या समकित पुष्ठ हो लाल ॥ न० ॥ ६॥ जशवंत जिनेंद्र सुसाखे, भावसिद्धचक्रना गुण भाखे, ते ज्ञान- विनोद रस चाखे हो लाल ॥न०॥७॥इति ॥ ॥ अथ सप्तम स्तवनम् ॥ ॥ चिंतामणि स्वामी सच्चा साहेब मेरा ए ॥ देशी। आराहो प्राणी साची नवपद सेवा ॥ ए आंक- .

(३०१) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ गी। नवनिधि आपें नव पद सेवे, इम भाखे श्री जिनदेवा ॥ आ०॥ १॥ श्रीसिद्धचक्र धरो नित्य दिल में, जैले गजमन रेवा । आ० ॥ २ ॥ अरिहंतादिक एक पद जपतां, हारे लहीए सुख सदैवा ॥ आ० ॥३॥ समुदित जपतां किम करी न करे, सुरसुख- द्रुसफल लेवा ॥ आ०॥४॥ जिनेंद्र कहे इम ज्ञानवि: नोदे, हर्षित द्यो.नित मेवा ॥ आ० ॥ ५॥ इति ॥ ॥ अथ अष्टम रतवनम् ॥ ॥ रांग सारंग ॥ ॥ गौतम पूछत श्री जिन भाखत, वचन सुधा- रस पानकी । बलिहारी नवपद ध्यानकी ॥ १॥ नव पद लेवे नक्से स्वर्ग, पावत ऋद्धि विमानकी ॥ व०॥२॥ याकी. महिसा. बल्लम हमकुं, जसे जसोदा कानकी । ब० ॥ ३ ॥ पावे रूप सरूप मदनसो, देही कंचन वानकी ॥ व०॥ ४॥याकी ध्यान हृदय जब आवत, उपजत लहेरी: ज्ञानकी ।। ब० ॥५॥ समाकित ज्योति होवे दिल भीतर, जेसे लोकनमें भानकी ॥ब० ॥६॥ '.

.
:'.. ॥ स्तवनो।
जिनेंद्र ज्ञानविनोद प्रसंगे, भक्ति करो भगवानकी ॥
॥ बलिहारी नवपद ध्यानकी ॥ ७ ॥ इति
॥ अथ नवम स्तवनम् ॥
॥ पूज्य पधारो अरु देशे ए देशी ॥
नवपद महिमा सांभली, वीर साखे हो सुंणो
'पर्षदा बार के ॥ए सरिखो जग को कहीं, आराध्यो
हो शिवपद दातार के ॥ न० ॥१॥ नव ओली आं-
बिल तणी, भवि कएि हो भनने उल्लास के ॥ भूमि-
शयन ब्रह्मवत धरो, नित सुपीए हो श्रीपालनो रास
के ॥ न० ॥२॥ नव विधिपूर्वक तप करी, उजमणुं हो
कीजे विस्तार के ॥ साहामी 'सामिणी पोषीए, जेस
लहीए हो भवनो निस्तार के ॥ न० ॥३॥नरसुखसुर
सुख पामीए, वली पामे हो भवभव जिनधर्म के ॥
अनुक्रमे शिवपद पण लहे, जिहां मोटा हो अदय सुख
शर्म के ॥ न०॥४॥ सांभली भावियण दिल धरो,
सुखदायी हो. नवपद अधिकार के ॥ वचनविनोद
जिनेंद्रनो, मुज होजो हो भवभव आधार के॥ नवपद
महिमा साभलो ॥ ५॥ इति ॥
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(३०४) नवपद विधि विगेरें संग्रह। ॥ अथ श्री सिद्धचक्रानुं स्तवन ॥ ॥ आठ लालनी देशी॥ समरी शारदा माय, प्रणमी निज गुरु पाय ॥ आछे लाल ॥ सिद्धचक्र गुण गायशुं जी ॥ ए सिद्ध- चक्र आधार, भवि ऊतरे भवपार ॥आ० ॥ ते भणी नवपद ध्यायशुं जी ॥१॥सिद्धचक्र गुणगहे, जसगुण अनंत अछेहे । आ०॥ समर्या संकट उपशमे जी ॥ लहीए वंछित भोग, पामी संवि संजोग ॥ आ०॥सुर नर आवी बहु नमे जी॥२॥ कष्ट निवारे एह, रोग रहित करे देह ॥ आ०॥ मयणासुंदरी श्रीपालने जी। ए सिद्धचक्र पसाय, आपदा दूरे जाय ॥ आ०॥आपे संगलमालने जी ॥३॥ए समः अवर न कोय, सेवे ते सुखीओ होय ॥ आ० ॥ मन वचं काया वश करी जी ॥ नव आंबिल तप सार, पडिकमणुं दोय . वार ॥ आ० देववंदन त्रण टंकनां जी ॥४॥ देव पूजो त्रण वार, गणणुं ते दोय हजार ॥ आ०॥ स्नान करी निर्मल जले.जी ॥ आराधे सिद्धचक्र, सानिध्य करे तेनी ॥ स्तवनो॥ (३०५) शक ॥ आ० जिनवर जन आगे भणे जी ॥५॥ए सेवो निशिदिश, कहीए वीशबावीश ॥ आ० ॥ आल, जंजाल सवि परिहरो जी ॥ ए चिंतामणि रत्ने, एहनां कांजे जत्न ॥ आ०॥ मंत्र नहीं एह ऊपरे जी ॥६॥ श्री विमलेसर जक्ष, होजो मुज परतक्ष ॥ आ०॥ हूं किंकर छु ताहरो जी ॥ पाम्यो तुंहीज देव, निरंतर करूं-हवे सेव ॥ आ०॥ दिवस चल्यो हवे माहरो जी ॥७॥ विनति करूं छु एह, धरजो मुजशु नेह ॥ आ०॥ तमने शुं कहीए वली वली जी॥श्री लब्धिविजय गुरुराय, शिष्य केसर गुण गाय ॥आ०॥ तुज लली लली जी ॥ ८॥इति ॥ ॥ अथ सिद्धचक्र स्तवन। अवसर पामीने रे, कीजे नव आंबिलनी ओली॥ ओली करतां आपद् जाये, ऋद्धि सिद्धि लहीए बहुली ॥ आ० ॥१॥ आसो ने चैत्रे आदरशु, सातमथी संभाली रे ॥ आलस महेली आंबिल करशे, तस.घर नित्य दिवाली ॥ आ०॥२॥ पूनमने दिन पूरी थाते, अमर नमे mom (३०६) नवपद विधि विगेरे संग्रह। प्रेमेशु पखाली रे ॥ सिद्धचक्रने शुद्ध आराधी, जाप जपे जपमाली ॥ आ०॥३॥ देहरे जइने देव जुहारो, आदीश्वर अरिहंत रे ॥ चोवीशे चाहीने पूजो, भावेशुं भगवंत ॥ आ० ॥ ४ ॥ बे टंके पडिक्कमणुं बोल्युं, देववंदनत्रण काल रे॥श्री श्रीपालं तणी परे समजी, चित्तमां राखो चाल.॥ अ०॥ ५॥ समकित पामी अंतरजामी आराधो एकांत रे ॥ स्याहादपंथे संच- रतां, आवे भवनो अंत ॥ अ०॥६॥ सत्तर चोराणुं सुदि चैत्रीए, बारशे बनावी रे ॥ सिद्धचक्र गातां सुख संपत्ति, चालीने घेर आवी ॥ आ०॥७॥ उदयरतन वाचक उपदेशे, जे नर नारी चाले रे॥ भवनी भावठ ते भांजीने, मुक्तिपुरीमां महाले ॥ अ०॥८॥ इति ॥ ॥ सिद्धचक्रजीतुं स्तवन ॥ ॥ जीहो कुंवर वेठा गोखड ॥ ए देशी ॥ ॥जीहो प्रणसुं दिन प्रत्ये जिनपति ॥ लाला ॥ शिव सुखकारी अशेष ॥॥ जीहो आसोइ चैत्री तणी ॥ लाला ॥ अट्ठाइ विशेष भविकजन ॥ जिनवर

॥ स्तवनों॥
(३०७)
जग जयकार ॥ १ ॥ जीहो जिहां नवपद आधार
॥ भ०॥ ए आंकणी॥ जीहो तेह दिवस आराधवा
॥ लाला ॥ नंदीश्वर- सुर जाय ॥ जोहो जीवाभिगम
मांहे कडं ॥ ला० ॥ करे अड दिन महिमाय ॥ ज०
॥ २॥ जीहो नवपद केरा यंत्रनी ॥ ला० ॥ पूजा
कीजे रे जाप ॥ जीहो रोग शोक सवि आपदा ला०॥
नासे पापनो व्याप ।। स० ॥३॥ जीहो अरिहंत सिक
आचारज ला०॥उवझाय साधु ए पंच ॥जीहो दसण
नाण चारित्त तवोला०॥ ए चउ गुणनो प्रपंच ॥
॥ भ० ॥४॥ जीहो नवपद आराधतां ॥ ला० ॥
चंपापति विख्यात ।। जीहो नृपश्रीपाल सुखीओथयो
बाला०॥ ते सुणजो अवदात ॥ भ०॥ ५॥ इति ॥
॥ ढाल वीजी॥
॥ कोइलो पर्वत धूंधलो रे लो॥ ए देशी ॥
॥ मालव धुर उज्जेणीए रेलो. राज्य करे प्रजापाल
रे ॥ सुगुणी नर ॥ सुरसुंदरी भयणासुंदरी रे लो० बे
पुत्री तस बाल रे ॥सु०॥ श्री सिद्धचक्र आराधीए रे

(३०८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ लो॥१॥ जेम होय सुखनी माल रे ॥ सु०॥श्री। ए आंकणी॥ पहेली मिथ्याश्रुत भणी रे लो, बीजी जिन- सिद्धांत रे ॥ सु०॥ बुद्धिपरीक्षा अवसरे रे लो० पूछो. समस्या तुरंत रे ॥ सु० ॥श्री० ॥ २॥ तूठो नृप वर आपवा रे लो, पहेली करे ते प्रमाण रे ॥ सु० ॥बीजी कर्म प्रमाणथी रे लो० कोप्यो ते तव नृपभाण रे॥सु० ॥ श्री० ॥३॥ कुष्ठी वर परणावीयो रे लो० मयणा वरे धरी नेह रे ॥ सु० ॥ रामा हजीय विचारीए रे लोक सुंदरी विणसे तुंज देह रे ॥सु०॥श्री०॥४॥ सिद्धचक्र प्रभावी रे लो० निरोगीथयो जेह रे॥ सु०॥पुण्य- पसाये कमला लही रे लो० वाध्यो घणो ससनेह रे ॥सु॥ श्री० ॥५॥ माउले वात ते जब लही रे लोक वांदवा आव्यो गुरु पास रे ॥ सु०॥ निज घर तेडी आवीयो रे लो आपे निज आवास रे ॥सु०॥श्री०॥६॥ श्रीपाल कहे कामिनी सुणो रे लो० हुँ जाउं परदेश रे ॥सु०॥ माल मता बहुलावशुं रेलो० पूरशुं तुम तणी खांत रे ॥सु०॥ श्री० ॥ ७॥ अवधि करी एक वर- ॥ स्तवनो॥ बनी रे लो० चाल्यो तृप परदेश रे ॥सु०॥ शेठ धवल साथे चट्यो रेलोजलपंथे सुविशेष रे ॥सु॥श्रीका॥ ॥ ढाल त्रीजी॥ ॥ इडर आंवा आंबली रे ॥ ए देशी ॥ ॥ परणी बब्बरपति सुता रे, धवल मूकाव्यो ज्यांह। जिनवर वार उघाडते रे; कनकेतु बीजी त्यांह ॥१॥ चतुर नर; श्रीश्रीपालचरित्र ॥ ए आंकणी ॥ परणी वस्तुपालनी रे, समुप्रतटे आवंत ॥ मकरकेतु नृपनी सुता रे; वीणावादे रीझंत ॥ च०॥२॥ पांचमी त्रैलोक्यसुंदरी रे; परणी कुब्जारूपा ही समस्या पूरती रे, पंच सखीशुं अनुप ॥०॥३॥ राधा वेधी सातमी रे आठमी विष उतार ॥ परणी आव्यो निज घरे रे; साथे बहु परिवार ॥ च० ॥४॥ प्रजापाले सांभली रे; परदल केरी वात ॥ खंधे कुहाडो ले करी रेम- यणा हुइ विख्यात ॥ च०॥ चंपा राज्य लेइ करी रे; भोगवी कामित भोग ॥ धर्म आराधी अवतयों रे, यहोतो नवमे सुरलोक । चतुर नर ॥६॥ श्रीश्रीपा॥

। (३१०) नवपद विधि विगेरे संग्रह.॥ ॥ ढाल चोथी॥ ॥ कंत तमाकु परिहरो॥ ए देशी ।। ॥ ए महिमा सिद्धचक्रनो, सुणी आराधे सुवि- वैक ॥ मोरे लाल ॥ श्रीसिद्धचक्र आराधीए ॥१॥ए आंकणी ॥ अडदल कमलनी थापना, मध्ये अरिहंत उदार ॥ मो० ॥ चिहुं दिशे सिद्धादिक चउ, वक्र दिशे तुं गुणधार ॥ मो० ॥ श्री०॥ २॥ पडिक्कमणां जंत्रनी, पूजा देववंदन त्रिकाल ॥मो० ॥ नवमे दिन सविशेषथी, पंचामृत कीजे पखाल ॥ मो० ॥श्री०॥३॥ भूमिशयन ब्रह्मविध धारणा, रंधी राखो त्रण जोग ॥ मो०॥ गुरु वैय्यावच्च कीजीए, धरो सद्दहणा भोग ॥ मो० ॥श्री० ॥ ४ ॥ गुरु पडिलाभी पारीए, साहम्मि वच्छल पण होय ॥ मो ॥ उजमणां पण नव नवां, कल धान्य रयणादिक ढोय ॥.मो० ॥ श्री ॥५॥ इह भव सवि सुखसंपदा, परभवे सवि सुख थाय ॥ मो०॥ पडित शान्तिविजय तणो, कहे मानविजय उवझाय ॥ मोरे लाल॥श्री० ॥ इति ॥

॥ स्तवनो॥ (३११) ॥ नवपदजीनुं स्तवन ॥ ॥ नव पद ध्यान सदा जयकारी॥ए आंकणी॥ अरिहंत सिद्ध आचारज पाठक, साधु देखो गुणरूप उदारी । नव पद० ॥१॥ दरशन झान चारित्र हे उत्तम, तप दोय भेदे हृदय विचारी || नव० ॥२॥ मंत्र जडी और तंत्र घणेरा,उन सबकुं हम दूर विसारी ॥ नव० ॥३॥ बहोत जीव अवजलसे तारे, गुण गावत बहु नर नारी ॥ नव०॥४॥श्री जिनभक्त मोहन मुनि वंदन, दिन दिन चडते हरख अपारी॥नव०॥५॥ ॥श्री नवपदजीतुं स्तवन ॥ ॥ नव पद धरजो ध्यान, भवितुमे नव पद धरजो ध्यान ॥ ए नवपदनु ध्यान करंतां, पाले जीव विस- राम ॥ भवि०॥१॥ अरिहंत सिद्ध आचारज पाठक साधु सकल गुणवान ॥ भवि० ॥२॥ दशन ज्ञान चारित्र ए उत्तम, तप तपो करी बहुमान ॥ भवि० ॥३॥ आसो चैत्रनी सुद सातमथी, पूनम लगे पर- मान ॥ भवि० ॥४॥ एम एकाशी आंबिल कीजे, (३१२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ वरष साडाचारनुं मान ॥ भवि०॥५॥ पडिकमणां दोय टंकनां कीजे, पडिलेहण बे वार ॥ भवि०॥६॥ श्री अरिहंत पद स्तवन अरिहंत पद आराधीये, आणी उलट भाव, भविक जीव, अघहर' मदमोचन धणी,ज्यों कंचन शुद्ध ताव । भ- विक जीव ॥ अरि०॥१॥ त्रीजेरे भवे वर ध्यानथी, समकीत बीज अंकूररे, भविक जीव,अरिहंत पशुद्ध अ- नुग्रहे, सबल करम चकचूररे॥भविक जीव ॥अरि॥२॥ अलख निरंजन आतमा,घटघट भाव प्रकाशरे,भविकजीव, भरमतिमिर धन संहरे ज्यों रविकिरण उजासरे।भविक जीव ॥ अरि० ॥३॥ मोर पयोधर ऋतुसमे,हरखे चित्त उदाररे,भविक जीव। जिनवाणी हियडे धरी; उपजे अनु- भव साररे, भविकजीव ॥ अरि०॥४॥ जलनिधि जल कोण भर शके, कोण तोले नगराजरे,भविक जीव । कहे जिनपद्म मुनीश्वर, त्रिभुवन जग शिरताजरे, भविक जीव ॥ अरि०॥५॥ इति ॥ श्री सिद्धपद स्तवन भविजन वंदोजी,सिद्ध शुद्ध आतमारे आणी समता अंग । सिद्ध समरंतारे सुगतिपणो वरेरे, लोहा पारससंग ॥ भवि० ॥१॥ पंचदश भेदे सिद्धपणुं वरीरे,मेटी सकल ॥ स्तवनो॥ (३१३) उपाधि । निजगुण ध्याने उज्वल आतमारे अध्यातम पद साध ॥ भवि० ॥२॥ सबल करमरे संगे विलुधीयोरे, चे- तन चिहुंगति संग। सघन करममल मेटी ज्ञानथीरे,पामी 'मुक्ति उत्तंग ॥ भवि० ॥३॥ इम शुद्ध भावेरे भवि तुमे वांदजोरे; सिद्ध सकल शुचिज्ञान। ए पद ध्यातां चेत जिन हुएरे, इयल ज्यु भमरी ध्यान ॥ भवि० ॥ ४॥ शुचि सं- वेगीरे समता आगरुरे, परमातम सुखकंद । अद्भूत ज्यो- तीरूप माहे सदारे पभणे पद्म सुरींद भवि० ॥५॥ इति श्री आचार्य पद स्तवन सूरि सकल भवि वांदीये, पद त्रीजे हो मद मच्छर साल के । प्रकटे आत्मप्रबोधता, तस विकसे होजगजीवन 'धारके ॥ सूरि० ॥१॥ पंच आचारपणुंग्रही, व्रतपाले हो शुचि तीक्ष्ण धाररे। कुमति कंदर्प कुकर्मने,जिम ज्वाले हो वन पवन तुषारके ॥ सूरि ॥२॥ अप्रमत्त भावे देशना टाली विषता हो वली विषय कषायके भव्य सुणी मोही रह्या, जीम मधुकर हो नित्य कमल लोभायके ॥ सूरि ॥३॥ सारण वारण चोयणा, पडिचोयणा हो इम चार विचारके । युग प्रधानपणुं बरी, भयटाले हो आणी उप- कारके ॥ सूरि०॥४॥ गुण छत्रीश शुं शोभता, पदधारी होजगदीपक आपके । कहे जिनपद्म मुनीश्वरू, तस स्मरणे हो मीटे तनु तापके ॥ सूरि ॥५॥ इति , (३१४). नवपद विधि विगेरे संग्रह। - श्री उपाध्याय पद स्तवन चोथे पद् उवज्झाय जपीजे,नित्य समकित दृढ चित्त : कीजेरे। समता रस आणी ॥जडपणु तज चेतन शुद्धधारे, भविक आत्मकाज सुधारेरे । समता रस आणी ॥१॥ अंग उपांग बहु सूत्र जाणे, निज आतम तत्व पिछाणे रे। समता रस आणी ॥ शुद्ध पचीस गुणे विकसंता, शुचि निरूपम धर्म दीपंतारे | समता रस आणी ॥ २॥ पांच समिति त्रण गुप्ति बीराजे, वाणी मेघतणी परे गाजेरे। समता रस आणी॥ उलट आणी भविजन धारो,निजकर्म उपाधि विदारोरे, समता रस आणी ॥३॥ अनुभव धर तीक्ष्ण व्रतपाले,नित्य जिनशासन अजवाले.रे। समता रस आणी॥ सिद्धामान महातम मोडी, वंदे पद्मसूरि कर- जोडी रे, समता रस आणी ॥४॥ श्री साधुपद स्तवनः मुनि पंचम पद.वांदिये । समता रसना धोरीरे । शान्त सुधारस क्यणसुं, आशापूरो मोरीरे मुनिः॥१॥ चारित्र रत्ल चूडामणि, समिति पंच प्रकारोरे। दशविध धर्म मुनितणो, पाले शुद्ध आचारोरे मुनि०॥२॥ अढार सहस' शीलांगना, गुणधारे निजअंगेरे। ' षटकायक प्रतिपालना, विचरे वसुधा उछरंगेरे ॥मुनिः॥३॥ फुलेजी तरु ऋतुराजरे । बेठे भमर अपारोरे।

॥ स्तवनो॥ (३१५) तसु पीडा व्यापे नहिः इणविधल्ये मुनि आहारोरे ॥ मुनि०॥४॥ गुणनिधि करुणा आग; समता रसना दरीयारे। वंदे पद्य मुनिश्वर इणविध; भवोदधि तरीयारे॥ मुनि०॥ ॥५॥ इति ॥ ॥ श्री दर्शनपद स्तवन.॥ . सम्यक्त्व नासे हो दर्शनपद नमुरे; आगी सुमति उदार । सडसठ बोले हो जिनवर वर्णव्युं रे। सूत्रसि- द्धांत मझार ॥ सम्य० ॥१॥ पंच प्रकार हो उपशम आ- दिथीरे; ज्ञानादिक गुण जोय । उज्वल ध्याने हो दर्शन सेवियेरे, रागादिकमल खोय ॥ सम्य० ॥२॥ दर्शन सम्यग हो शुध्ध प्रकटया विनारे; चारित्र ज्ञाननो भंग। जलधर धारा हो जगव्यापे नहिरे;तो विणसे लोक उमंग ॥ सम्य० ॥३॥ तत्व त्रिभेदे हो जिनवर निज कवारे। तपजप ध्यान आचार । ए सहु फले हो सम्यग्दर्शने रे । विकसे ज्युं वन जलधार ॥ सम्यः ॥ ४॥ सुमति संवे- गी हो शुध्ध स्वरूपनारे। दर्शनज्ञान दिणंद । भविजन धारो हो दर्शन नेहरयुरे; पभणे पद्मसूरींद् ॥ सम्य० ॥ ॥५॥ इति ॥

३१६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ श्री ज्ञानपद स्तवन ज्ञानपद् हितधार, भवि ए तो ज्ञानपद हितधार, भ- रम तिमिर विदार ।। भवि० ॥ सर्व रात्रिमा इन्दुभंजन दिवस रवि निरधार जगतजन्तु मोहमद्धर तास भंजन- कार ॥ भवि०॥ १॥ विकट वनमें प्रभा सुरतरु, विनय शुचि गुणसार, वसुधा माहे शोभत मेरु; शिवपंथ ज्ञान उदार ॥ भवि० ॥२॥ परम पंच प्रकार अनुपम मति श्रुत अवधि विचार, जननी उदरे धर्या छे जिनवर; संयमे चोथो सार ॥ भवि०॥३॥ सघनचाती कर्मवनदल प- वन तास तुषार; जगत जिनवर नामधर शुचि; उद्धों आगम अपार भ० ॥ ४ ॥ सुमतिधर भवि ज्ञानतज मद; मेटी विषय विकार । पद्मसूरि भणे निजहेते ज्ञानथी होय निस्तार । भवि०॥६॥ इति ॥ श्री चारित्रपद स्तवन वदो भवि चारित्र गुणधामिः अष्टमपद अभिरामीरे। समता रस अंगे पूरण पामी; विपत विदारण कामीरे ॥ चंदो० ॥१॥ अंब प्रभावे अंबुज प्रकटे; परिमल पवन प्र- काशेरे, धर्मनिपुणता ज्ञान विकासे; चारित्र तास उजा- सेरे ॥ ५० ॥२॥ सामायिक छेदोपस्थापनीय वळी परि- हारविशुद्धीरे सूक्ष्मसंपराय दशमे गुणठाणे; अंतर्मुहुत प्रसिद्धोरे ॥ ५० ॥३॥ यथाख्यात चारित्र प्रधान केवल ॥ स्तवनो॥ (३१७) निकट विभासेरे; वरते क्षीणमोह गुणठाणे; कर्म कठोर विनासेरे ॥ वंदो० ॥४॥ रंकपण जेह हृदय धरंता; ध्यावे इन्द्र आणंदेरे। वंदे पद्म सूरि निजहेते अष्टम पदसुख कंदोरे ॥ वंदो० ॥५॥ श्री तपः पद स्तवन नवमे पद प्रणमुं मुदारे; तप आतम शुद्धि हेतु । समल अथिर पद परिहरीरे; कर्मभंजन धूमकेतु ॥ भविक जीव- धारो तप शिवहेत; ज्वाले कर्मनुं खेत्र ॥ भविकजीव० ॥१॥ विकटसघन वन संहरेरे; दावानल असराल ।ज्वाले कम कषायनेरे; क्षमासहित तपपाल | भवि०॥२॥ द्वा- दशविधतपस्या तणारे;आगळ अंग मझार। बाह्य अभ्यंतर भेद श्युरे; षट्पट् भेद् विचार ॥ भवि० ॥ ३ ॥ अरिहंत जाणे ज्ञानथीरे; इणभव मोक्ष पहोंचंत । क्षमासहित तप आदरेरे; धारे शुचि मन खंत ॥ भवि०॥ ४॥ आमोसही आदे करीरे; अष्ट महासिद्ध जाम । उपजे गणधर वृन्दनेरे सारे संघना काम || भवि० ॥५॥ वनतस्वृन्द विकस्या सहोरे; वाजेवाय.कुवाय। नविफूले नविफली शकेरे तीम क्षमारहित तप जाय ॥ भवि० ॥६॥ तपपद् शुचि आ- राधतारे; त्रुटे कर्मनी कोड । पद्मसूरि भणे नेहस्यु रे; मान महातम मोड । भविक० ॥७॥ इति.

(३१८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। कलश नवपद ध्यान प्रभावथी;शिवशुचि पदपावे। भरमति भिरघन संहरे; समता रस आवे ॥ नव०॥१॥ करम कलंक पंके करी:भ्रम चेतन पावे । चिहं दिशि भ्रमत फीरे सदा; भृगनिंद न पावे ॥ नव०॥२॥ सद्गुरु संगपणो वरी; जडपद मीट जावे। उपल अनल प्रभावथी कलधौत कहावे ॥ लव० ॥३॥ शुद्ध संवेगपणु वरी; ममता तजी ध्यावे । भवोदधि भ्रमणपणु मटे चेतन जिन थावे ॥ नव० ॥४॥ शुद्ध स्वरूपपणे करीनिजकर्म खपावे । कहे जिनपद्म मुनी- श्वर ज्योतिरूप कहावे ॥ नव०॥५॥ ॥ इति श्री नवपद स्तवन संपूर्णम् ॥ नवपद स्तवन. अहो भविप्राणी रे सेवो। सिद्धचक्र ध्यान समो नहीं मेवो ॥ अहो० ॥ जे कोइ सिद्धचक्रने आराधे, तेहनो जगमांहि जश वाधे ॥ अहो॥१॥ पहेले पदे रे अरिहंत । बीजे सिद्ध बुद्ध ध्यान महंत ॥ त्रीजे पदे रे सूरीश । चोथे उवज्झाय ने पांचमे मुनीश ॥ अ० ॥२॥ छठे दसण रे कीजे । सातसे ज्ञानथी शिवसुख लीजे । आठसे चारित्र पालो । नवमे तपथी मुक्ति भालो ॥ अ. ॥ ३ ॥ आंबिल ओलो रे कीजे । नोकारवाली वीश ग- ॥ स्तवनो॥ (३१९) णीजे ॥त्रणे टंकना रे देवो। पडिलेहण पडिकम' सेवो ॥ अ०॥४॥ गुरुमुख किरिया रे कीजे । देवगुरुभक्ति चित्तमां धरीजे ॥ एस कहे रामना रे शिशो ओली.उज- वीए जगीशो ॥ अ० ॥ ५॥ इति ।। सिध्धचक्रजीनुं स्तवन. श्री सिध्धचक्र आराधो । मनवांछित कारज साधों रे ॥ भवियां ।। श्री० ॥ ए आंकणी॥ पद पहेले अरिहंत भावो । जेम अरिहंतपदवी पावो रे ॥ भवियां ॥ श्री०॥ 'पद दूजे सिद्ध मनावो । ज्यम सिद्ध सरूपी होइ जावो रे ॥ भ० ॥ श्री० ॥सूरि त्रीजे गुणवंता। जशना एक जग जयवंता रे ॥ भ०॥ श्री०॥चौथे पदे उवझाया। जेणे मारग आण बताव्या रे ॥ भ० ॥ श्री० ॥ साधु सकल गुणधारी; पद पंचमे जग हितकारी रे ॥ भ० ॥ श्री० ॥ दुरसण पद छठे वंदो; जेल कीति होय शीर नंदो रे ॥ भ० ॥ श्री० ॥ ज्ञानपद सातमे दाखो। चारित्रपद आठमे भाख्यो रे ॥ भ० ॥ श्री० ॥ तप नवमे पद शा. ख्यो; जेम वीरजीने वचने राख्यो रे ॥ भ० ॥ श्री० ॥ श्रीपालने मयणा लीधो नवमे भव कारज सिध्यो रे ॥ भ०॥ श्री० ॥ नवपद महिमा आणी. जिनचंद्रहोए मन आणी रे ॥ भ० ॥ श्री ॥ इति ॥ ॥ अथ श्री विनयविजयजी कृत ॥

(३२०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। श्री सिद्धचक्र स्तवन. ॥ ढाळ पहेली ॥ चेतन चेतोरे आतमा ॥ ए देशी ॥ सरस्वतीने चरणे नमी,प्रणमी सद्गुरू पायरे । सिद्ध- चक्र गुण गाइस्युं, मुझ मन हर्ष उछायरे । धन्य धन्य श्री सिद्धचक्रने ए आंकणी॥१॥ तेह दिवसे सुरपति मली, जाइ नंदीश्वर द्वीपेरे । उत्सव महोत्सव सुर करी, कर्म कटकने जीपेरे ॥ धन्य० ॥२॥ अट्ठाइ महोत्सव करे, जीवाभिगमनी साखेरे । श्रेणिकराये पूछीयु, इन्द्रभूति इम दाखेरे ॥ धन्य० ॥३॥ श्री श्रीपालमयणापरे, जाप- जपो भव्यप्राणीरे । रोगशोकने आपदा जीम शमे ते उकाय प्राणीरे ॥ धन्य ॥ ४ ॥ आसो शुदि सातम थकी पूनम लगे ओलीए करे। एक्यासी नव ओळीए, आंबील तप सुविवेकरे ॥ धन्य० ॥५॥ साढाचार संवत्सरे, तप- नो एह परिणामरे । गणणु पद एकएकनु, सहस्रदोय सुविज्ञाने रे ॥ धन्य० ॥६॥ ॥ ढाळ वीजी ॥ आदिजिनेश्वर विनति हमारी ॥ ए देशी ॥ बारगुणे अरिहंतघ्याउ, सिहभजो गुण आठेरे छन्नीश गुणे आचार्य सोहे, पचवीश ओपद पाठेरे ॥१॥ गुण सतावीश साधु वंदु, दर्शन सडसठ भेदेरे । ज्ञान एकावन गुणे संपूरो, चारित्र सीत्तेर ऊमेदेरे ।। गु० ॥२॥ पचास भेदे तपने जपीये, गुणणुं ए वर्तमानरे। तेर सह-

॥ स्तवनो॥
(३२१)
सवली बीजे मेदे, विद्याप्रवाद पुराणरे । गुण० ॥३॥ अ-
रिहंत आदे पंचपद केरा, गुण छे एकसो आठ रे। दर्शन
ज्ञानना दश वली जाणो, चारित्रषट् बहुपाठरे ॥ गुण
॥४॥ तपना षट्गुण सर्व मलीने, एकसोन्त्रीसज थाय
रे । नोकारवाली एह प्रमाणे समय भवदुःख जायरे ॥
गु० ॥ ५॥ हवे उजमण विधिस्यु बोलु, सांभळज्यो चि.
त्तलाय रे । ऊजमणाथी फल बहु वाधे; जीम जलपंकज
न्याय रे॥ गु०॥६॥
॥ ढाल त्रीजी ॥ श्रेणिक मन अचरिज हूओ ।। ए देशी।।
तपजप करीये शक्तिथी, तेहतणो छे भेद रे। शक्ति
प्रमाणे ऊजवो,भवभवना दुःख छेद रे । वीरवचनथी जा-
णज्यो. ॥ ए आंकणी ॥ १॥ ऊजमणा विण फल कहुं,
जीम अलुणों धान्य रे । शक्ति घणी छे जेहनी, पण
उजवे नहिं मनमान्योरे ॥ वीर० ॥२॥ तेहने फल केतो
कह्यो, सांभळ श्रेणिकरायरे । कुकश आपे वर्तिने, पुण्य
ते जे तो थायरे ॥ वीर०॥३॥ आत्मज्ञाने धारीये, धरीये
धरीये शीयल जगीशरे । गुरुपडिलाभीने पारीये, स्वामि
वत्सले फल ले सीरे । वीर० ॥ ४ ॥ पालणपुरमा प्रेमस्युं,.
श्री सिद्धचक्र गुणगायारे । चतुर चोमासु. तिहां रही,
ऊजमणे मन भायारे ॥ वीर०॥५॥

(३२२) नवपद विधि विगेरं संग्रह। (कलश) इम सयल सुहकर सयल पुरंदर संस्तव्यो रिसहेश्वर । तपगच्छ राजेवड दीवाजे विजय जिनेन्द्रसूरीश्वर ।। तासपसाए स्तवन पमण्यो शिष्यरूप विजयतणो । अढार एकासी आसोपूनम रंगविजय ऊलट घणो॥१॥ इतिश्री सिद्धचक्र नवपद् वर्णन ऊजमणा फलदायक स्तवनम् ॥ अथ स्तुतिओ (थोयो.) ॥ अथ श्रीअरिहंतपद स्तुति ॥ सकल द्रव्य पर्याय प्ररूपक, लोकालोक सरू- पोजी ॥ केवलज्ञानकी ज्योति प्रकाशक, अनंत गुणे करी पूोजी ॥ तीजे भव थानक आराधी, गोत्र ती- र्थकर नूरोजी ॥ बार गुणाकर एहवा अरिहंत, आ- राधो गुण भूरोजी ॥ इति अरिहंतपदस्तुतिः ॥१॥ ॥ अथ श्रीसिद्धपद स्तुति ॥ अष्ट करमकुं धमन करीने, गमन कियो शिव- वासीजी। अव्याबाध सादि अनादि, चिदानंद चिद्- ॥ थोयो । (३२३) राशिजी । शरमातम पद पूरण विलासी, अघधन दाघ विनाशीजी ॥ अनंत चतुष्टय शिवपद् ध्यावो, केवलज्ञानी भाषीजी ॥ इति सिद्धपदस्तुतिः ॥२॥ ॥ अथ श्रीआचार्यपद स्तुति ॥ पंचाचार पाले उजवाले,दोष रहित गुणधारीजी। गुण छत्तीसे आगमधारी, द्वादश अंग विचारीजी। प्रबल सवल घनमोह हरणकुं, अनिल समो गुण वा- णीजी । क्षमा सहित जे संयम पाले, आचारज गुण- ध्यानीजी ॥ इति आचार्यपदस्तुतिः ॥३॥ ॥ अथ श्रीउपाध्यायपद स्तुति ॥ अंग इग्यारे चउदे प्रव, गुण पचवीसना धा- रीजी। सूत्र अरथधर पाठक कहीए, जोग समाधि विचारीजी ॥ तप गुणशूरा आगम पूरा, नय निक्षेपे तारीजी । मुनि गुणधारी बुध विस्तारी, पाठक पूजो अविकारीजी ॥ इति उपाध्यायपदस्तुतिः॥४॥ ॥ अथ श्रीसाधुपद स्तुति ॥ सुमति गुपति कर संजम पाले, दोष बयाली- (३२४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। श टालेजी ॥ षटकाया गोकुल रखवाले, नवविध ब्रह्मवत पालेजी ॥ पंच महाबत सूधां पाले, धर्म शुक्ल उजवालेजी ॥ क्षपकश्रेणि करी कम खपावे, दमपद गुण उपजावेजी ॥ इति साधुपदस्तुतिः ॥५॥ ॥ अथ श्रीदर्शनपद स्तुति ॥ जिनपन्नत्त तन्त सुधा सरधे, समकित गुण उ- जवालेजी ॥ भेद छेद करी आतम निरखी, पशु टाली सुर पावेजी ॥ प्रत्याख्याने सम तुल्य भाख्यो, गणधर आरिहंत शूराजी ॥ ए दरशनपद नित नित वंदो, भवसागरको तीराजी ॥ इति दशनपदस्तुतिः ॥६॥ ॥ अथ श्रीज्ञानपद स्तुति ॥ मति श्रुत इंद्रिय जनित कहीए, लहीए गुण गंभीरोजी ॥ आतमधारी गणधर विचारी, द्वादश अंग विस्तारोजी॥ अवधि मनःपर्यव केवल वली, प्र- त्यक्ष रूप अवधारोजी ॥ ए पंच ज्ञानकुं वंदो पूजो, भविजनने सुखकारोजी ॥ इति ज्ञानपदस्तुतिः॥णा ॥ थोयो। (३२५) ॥ अथ श्रीचारित्रपद स्तुति ॥ कर्म अपचय दुर खपावे, आतमध्यान लगावे- जी ॥ बारे भावना सूधी भावे, सागरपार उतारेजी। षट् खंड राजकुं दूर तजीने, चक्री संजम धारेजी ॥ एहवो चारित्रपद नित वंदो, आतमगुण हितकारजी इति चारित्रपदस्तुतिः ॥८॥ ॥ अथ श्रीतपपद स्तुति ॥ इच्छारोधन तप ते भाख्यो, आगम तेहनो सा- खीजी ॥ द्रव्य भावसे द्वादश दाखी, जोगसमाधि राखीजी ।। चेतन निज गुण परणति पेखी, तेहीज तप गुण दाखीजी ॥ लब्धि सकलनो कारण देखी, ईश्वर सेमुस जाखीजी ॥ इति तपपदस्तुतिः ॥९॥ ॥ सिद्धचक्र स्तुति ॥ वीर जिनेश्वर अति अलवेसर, गौतम गुणना दरीआ जी॥ एक दिन आणा वीरनी लेइने, राजगृही संचरीआ जी ॥ श्रेणिक राजा वंदन आव्या, उलट मनमा आणी जी॥ पर्षदा आगल बार बिराजे, हवे (३२६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ सुणो भविप्राणी जी ॥१॥ मानवभव तुमे पुण्ये पाम्या, श्रीसिद्धचक्र आराधो जी ॥ अरिहंत सिद्ध सूरि उवझाया, साधु. देखी गुण वाधे जी ॥ दरशण लाण चारित्र तप कीजे, नव पद ध्यान धरीजे जी॥धुर आसोथी करवां आंबिल,सुख संपदा पामीजे जी ॥२॥ श्रेणिकराय गौतमने पूछे, स्वामी ए तप केणे कीधोजी ॥ नव आंबिल तप विधिशुं करतां, वंछित सुस्व केणे लीधो जी ॥ मधुरी ध्वनि बोल्या श्री गौतम, सांभलो श्रेणिकराय वयणांजी। रोग गयो ने संपदा पाम्या, श्रीश्रीपाल ने मयणाजी ॥३॥ रुमझुम करती पाये नेउर, दीले देवी रूपाली जी ॥नाम चकेसरी ने सिद्धार, आदि जिनवर' रखवाली जी ॥ विघन कोड हरे सहु संघनां, जे सेवे एना पाय जी ॥ भाणविजय कवि सेवक नय कहे, सानिध्य करजो साय जी ॥४॥ ॥ सिद्धचक्र स्तुति ॥ ॥ श्री सिद्धचक्र सेवोसुविचार, आणी हैडे हरख अपार, जिम लहो सुख श्रीकार ॥ मन शुद्ध ओली ॥ थोयो।। (३२७) तप कीजे, अहोनिश नव पद ध्यान धरीजे, जिनवर पूजा कीजे ॥ पडिक्कमणां दोय टंकना कीजे, आठे थुइए देव वांदीजे, भूमि संथारो कीजे ॥ मृषा तणो कीजे परिहार, अंगे शीयल धरीजे सार, दीजे दान. अपार ॥१॥ अरिहंत सिद्ध आचार्य नमीजे, वाचक सर्वे साधु वंदीजे, दंसण नाण सुणीजे ॥ चारित्र तपर्नु ध्यान धरीजे, अहोनिश नव पद गणणुं गणीजे, नव आंविल पण कीजे ॥निश्चल राखी मन हो निश्चे, जपीए पद एक एक ईश, नोकारवाली वीश ॥ छेल्ले आंबिल मोटो तप कीजे, सत्तरभेदी जिनपूजा रचीजे, मानवभव लाहो लीजे ॥२॥ सातसे कुष्ठीयाना रोग, नाठा यंत्र नमण संजोग, दूर हुआ कर्मना भोग॥अ- ढारे कुछ दूरे जाये, दुःख दोहग दूर पलाये, मनवंछित सुख थाये ॥ निरधनीयाने दे बहु धन्न, अपुत्रीयाने थे पुत्ररतन्न, जे सेवेशुद्ध मन्न॥ नवकार समो नहीं कोई मंत्र, सिद्धचक्र समो नहीं कोइ जंत्र, सेवो भवि हरखंत ॥३॥ जिम सेव्या मयणा श्रीपाल, उंबर रोग गयो सुख रसाल पाम्या मंगलमाल ॥श्रीपाल तणी पेरेजे

(३२८)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
आराधे, दिन दिन दोलत तस घर वाधे,अति शिवसुख
साधे॥ विमलेश्वर यक्ष सेवा सारे, आपदा कष्टने दूर
निवारे, दोलत लक्ष्मी वधारे ॥ मेघविजय कवियणना
शिष्य,आणी हैडे भाव जगदीश,विनय वंदे निशादेश ४
- ॥ अथ श्री सिद्धचक्र स्तुति ॥
॥ जिनशासन वंछित, पूरण देव रसाल ॥ भावे
भवि भणीए. सिद्धचक्र गुणमाल ।। त्रिहुं काले एहनी,
पूजा करे उजमाल ॥ ते अमर अमरपद, सुख
पामे सुविशाल ॥१॥ अरिहंत सिद्ध वंदो, आचारज
उवझाय ॥ मुनि दरिसण नाण, चरण तप ए समु-
दाय ॥ ए नव पद समुदित, सिद्धचक्र सुखदाय ॥ ए
ध्याने भविनां, भव कोटि दुःख जाय ॥२॥ आसो
चैतरमां, सुदि सातमथी सार ॥ पूनम लगे कीजे, नव
आंबिल निरधार ॥ दोय सहस गणे, पद सम
साडाचार ॥ एकाशी आंबिल तप, आगमने अनुसार
॥ ३ ॥ सिद्धचक्रनो सेवक, श्री विमलेसर देव ॥
श्रीपाल तणी परे, सुख पूरे स्वयमेव ॥ दुःख दोहग

॥ थोयो॥ (३२९) नावे, जे करे एहनी सेव ॥ श्री सुमति सुगुरुनो, राम कहे नित्यमेव ॥४॥ इति ॥ ॥ अथ सिद्धचक्रनी स्तुति ॥ अरिहंत नमो वली सिद्ध नमो, आचारज वाचक साहु नमो॥ दर्शन ज्ञान चारित्र नमो, तप ए सिद्धचक्र सदा प्रणमो ॥१॥अरिहंत अनंत थया थाशे, वली भावनिक्षेपे गुण गाशे ॥ पमिकमणां देववंदन विधिशु, आंबिल तप गणणुं गणो विधिशुं ।। २ ।। छरि पाली जे तप करशे,श्रीपाल तणी परे भव तरशे। सिद्धचक्रने कुण आवे तोले, एहवा जिनआगम गुण बोले ॥ ३॥ साडाचारे वरषे तप पूरुं, ए कर्म विदा- रण तप शुरूं ॥ सिद्धचक्रने मनमंदिर थापो, नय विम- -लेश्वर वर आपो॥४॥ इति ॥ ॥ सिद्धचक्र स्तुति ॥ अंगदेश चंपापुरी वासी, मयणाने श्रीपाळ सु- 'खाशी। समाकितसुं मनवासी, आदि जिनेश्वरनी उ- ल्लासी, भावपूजा कीधी मन आशी। भाव धरी वि. , (३३०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ , श्वासी। गलित कोढ गयो तेणे नाशी, सुविधिसु सिद्ध- चक्र उपासी, थया स्वर्गना वासी। आशो चैत्र तणी पौर्णमासी, प्रेम पूजो भक्ति विकाशी, आदि पुरुष अवि- नाशी ॥१॥ केशर चंदन मृगमद घोळी, हरखसुं भरी हेम कचोली, शुद्ध जळे अंघोळी। नव आंबिलनी कीजे ओळी, आसो सुदि सातमथी खोळी, पूजो श्रीजिन- टोळी । चउगतिमाहे आपदा चोळी. दुर्गतिना दुःख दूरे ढोळी, कर्म निकाचित रोळी । कर्म कषाय तणा मद रोळी, जिम शिव रमणीभमर भोळी, पाम्यासुख- नी ओळी, ॥२॥ आसो शुदि सातमश्यु विचारी, चैत्री पण चित्तसु निरधारी, नव आंबिलनी सारी । ओली कीजे आलसवारी, प्रतिक्रमण बे कीजे धारी, सिद्ध- चक्र पूजो सुखकारी । श्रीजिनभाषित पर उपकारी, नवपद जाप जपो नरनारी, जिम लहो मोक्षनी बारी नवपद महिमा अति मनोहारी, जिन आगम भाखे चमत्कारी, जाउं तेहनी बलिहारी ॥३॥ श्याम भमर सम वीणा काली, अति सोहे सुंदर सुकुमाळी, जाणे ॥ थोयो (३३१) राजमराली । जलहल चक्र धरे रूपाली, श्रीजनशास- ननी रखवाळी, चक्रेश्वरी म्हें भाळी । जे ए ओली करे उजमाळी, तेनां विघ्न हरे सहु बाळी, सेवक जन संभाळी। 'उदयरतन' कहे आलस टाळी, जे जिन नाम जपे जपमाळी, ते घर नित्य दीवाळी ॥४॥ ॥ श्रीसिद्धचक्र स्तुति ॥ जं भात्तजुत्ताजिणसिद्धसूरिउवझायसाहूण कमे नमंति । सुदंसणनाण तवो चरितं, पुअंतु पावेह सुह अणंतं ॥१॥नामाइभेएण जिणिंदचंदा, निचं नया जेसि सुरिंदविंदा' ते सिद्धचकरस तवे रथाणं, कुणंतु भवाण पसत्थनाणं ॥२॥ जो अस्थओ वीरजिणेण पुचि, पच्छा गणिंदेहि सुभासिओ अ। एयरस आराहणतप्पराणं सो आगमो सिद्धिसुहं कुणेउ ॥३॥ सवत्थ सवे विस- लप्पहाई, देवा तहा सासणदेवयाओ। जे सिद्धचक्रमि सयावि भत्ता, पूरितु भवाण मणोरहंते ॥ ४ ॥ ॥ सिद्धचक्र स्तुति ॥ भत्तिजुत्ताण सत्ताण मणकामणा-पूरणे कप्पत-

(३३२)
नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
रुकामधेणूवमं। दुक्खदोहग्गदारिदनिन्नासयं,सिद्धचक्कं
सया संयुणे सासयं ॥१॥ तिजगजणसंथुणिअपाय
केरूहा, हेमरूपंजणासोगनीलप्पहा । सिद्धचकं
थुणंताण कयनिव्वुई, सव्वतित्थंकरा दिंतु नाणुन्नई
॥२॥ जत्थ जिणसिद्धसूरिवायगजइ दसणं नाणचरणं
तवं नवपइ । सिद्धचक्कस्स वणिजए तंसया, नमह
सिरिवीरसिद्धंतमाणंदिआ ॥३॥ जक्खिणीजक्खवरि-
दिसिवालया जयविजयजंभिणीपमुहवरदेवया । दिंतु
सत्ताण खुद्दाण निन्नासगं, सिद्धचक्कं भयंताण कल्ला-
णगं ॥४॥
॥ नवपद स्तुति ॥॥
॥ श्री शत्रुजय तीरथ सार ॥ ए चाल ॥
श्रीसिद्धचक्रमा छे त्रण तत्व । देवगुरु धर्म तणुं
एकत्व । आराधो धरी सत्व॥बे पद देवतत्त्वमा सारां।
गुरुतत्वे त्रण पद छे प्यारां । धर्ममां चार उदारां ॥
विद्याप्रवाद पूर्वथी सार। सिद्धचक्रनो कयों उद्धार ।
पूर्वधरे धरी प्यार॥ विमलेश्वर सुर पूरे आश । जे करे
। नवपद तप उल्लास । 'हंस' लहे शिववास ॥१॥

॥ थोयो॥ (३३३) ॥ श्री सिद्धचक्र स्तुति ॥ ज्ञात्वा प्रश्नं तदर्थ गणधरमनसं प्रागवीरदेवः,, अर्हत्सिद्धार्यसाधुप्रभृतिनवपदान् सिद्ध चक्रस्वरूपान् । ये भुव्याश्रित्य धिष्णं प्रतिदिनमधिकं संजपन्ते स्वभ- क्त्या, ते स्युः श्रीपालवच्च क्षितिवरपतयः सिद्धचक्रप्र- सादात् ॥ १॥ दुस्तीणं निस्तरीतुं अवजलनिधिक पाणियुग्मे गृहीत्वा, यानेकान् कोटिकुम्भान् कनकम- णिमयान् षष्टिलक्षाभियुक्तान् । गंगासिन्धुहदानां ज- लनिधितटतस्तीर्थतोयेन भृत्वा, सत्सार्वाधीश्वराणां सुरपतिनिकरा जन्मकृत्यं प्रचक्रुः ॥२॥ कुर्युर्देवास्त्रिवत्रं रजतमणिमयं स्वर्णकान्त्याऽभिरामे, स्थित्वा स्थाने सुवाक्यं जिनवरपतयः प्रावदन् यां च नित्यम् । तां वाचां कर्णकूपे सुनिपुणमतयः श्रद्धया ये पिबन्ति, ते भव्याः शैवमागागमविधिकुशला मोक्षमासादयन्ति ॥३॥ देवी चक्रेश्वरी स्नग्धति च हृदये पत्तने देवका- ख्ये कामे मोदाभिकीर्णे विमलपदयुजि सिद्धचक्रस्य वीजे। श्रीमद्वार्षादियुक्तैर्विजयप्रभवरैर्यरूपैर्मुनीन्द्रः, स्तुत्या , , (३३४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। नित्यं सुलक्ष्मीविजयपदवृतैः प्रेमपूर्णैः प्रसन्ना ॥ ४ ॥ इति श्रीसिद्धचक्रस्तुतयः। ॥सिद्धचक्रनी स्तुति ॥ प्रह उठीवंदु, सिद्धचक्र सदाय; जपीये नवपदनो, जाप सदा सुखदाय, विधिपूर्वक ए तप, जे करे थइ उजमाल; ते सवि सुख पामे, जेम मयणा श्रीपाल ॥१॥ मालवपति पुत्री, मयणा अति गुणवंत । तस कर्मसंयोगे, कोढी मळीयो कंत । गुरु वयणे तेणे,आ- राध्यु तप एह । सुख संपद वरीया, तरीया भवजल तेह ॥२॥ विलने उपवास, छठ वली अठम । दस अहाइ पंदर, मासी छमासी विशेष ॥ इत्यादिक तप बहु, सहुमांहि शिरदार ॥ जे भवियण करश, ते तरशे संसार ॥३॥ तप सांनिध्य करशे, श्री विमलेश्वर यक्ष, सहु संघना संकट, चूरे थइ प्रत्यक्ष। पुंडरीक गणधर, कनक विजय बुद्ध शिष्य । बुद्ध दर्शनविजय कहे, पहोंचे स- यल जगीश ॥४॥ ॥श्रीसिद्धचक्रस्तुतिः॥ विपुलकुशलमाला केलिगेहं विशाला, समविभव- . ॥थोयो॥ (३३५) निधानं शुद्धसंत्रप्रधानं ॥ सुरनरपतिसेव्यं दिव्य- माहात्म्यभव्यं, निहतदुरितचक्र, संस्तुवे सिद्धचक्रम् ॥१॥ दमितकरणवाह-भावतो यः कृताहं, कृतिनिकृति- विनाशं पूरितांगिव्रजांशम् ॥ नमितजिनसमाज-सिद्ध- चक्रादिबीजं, भजति स गुणराजीः सोऽनिशं सौख्य- राजीः ॥२॥ विविधसुकृतशाखो भंगपत्रौघशाली, नयकुसुममनोज्ञः प्रौढसंपत्फलाढयं ॥ हरतु विनुवर्ता श्री-सिद्धचक्रं जनानां, तरुरिव अवतापा-नागमःश्री- जिनानाम् ॥३॥ जिनपति पदसेवां सावधाना धुनाना, दुरितरिपुकदंब-कांत(त) कांतिं दधाना॥ ददतु तपसि पुसां सिद्धचक्रस्य नव्य-प्रमदमिह रतानां रोहिणीमुख्य- देव्यः॥४॥ ॥श्रीसिद्धचक्र स्तुति ॥ . पहीले पद जपीये अरिहंत, वीजे सिद्ध जपो जयवंत, त्रीजे आचारज संत । चोथे नमो उवज्झाय- हसंत, नमो लोए सव्वसाहु महंत, पांचमे पद विल- संता, ॥ देसण छटुं नमो मतिमंत, सातमे पद नमो नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। man नाण अनंत, आठमे चारित्र हुंत । नमो तवस्स नवमे सोहंत,श्रीसिद्धचक्रतुं ध्यान धरत, पातिकनो होय अंत ११॥ केशर चंदनं अगर घसीजे, मांहे कस्तुरी भलीजे घन घनसार ठवीजे, । गंगोदकस्युं न्हवण करीजे श्री- सिद्धचक्रनी पूजा कीजे, सुरभि कुसुम चरचीजे ॥कंदरू अगरूनो धूप डहीजे कामधेनुधृत दीप भराजे, निर्मल भाव वहीजे । अनुपम नवपद ध्यान धरीजे, रोगादिक दुःख दूर हरीजे, मुक्तिवहु परणीजे ॥ २ ॥ आसो ने वली चैत्र रसाल, उज्वल पक्ष ओली सुविशाल, नव आंबिल चासाला रोग शोषनो मे तपकाल,साढा चार वरस तस चाल; वली जीवे त्यां भाल ॥जे सेवे भावि थई उजमाल, ते लहे भोग सदा असराल, जीम मयणा श्रीपाल । छंडी अलगो आल पंपाल, नित्य आराधे त्रण काल, श्रीसिद्धचक्र गुणमाल ॥३॥ गज- गामिनी चंपकदलकाय,चाले पग ने उर ठमकाय,हीयडे हार सोहाय । कुंकुम चंद तिलक रचाय; पहिरे पीत पटोली बनाय, लीलाये लहकाय॥वाली भोळी चक्के- सरी माय; जेनर सेवे सिद्धचक्रराय,ये तेहने सुसहाय । M ॥ थोयो ।। (३३७), श्रीविजयप्रभसूरि तपगच्छराय; प्रेमविजय सेवी पाय%; कांतिविजय गुण गाय ॥४॥ ॥ श्रीसिद्धचक्रजीनी स्तुति ॥ श्रीजिनशासन भविक विमासन, कुमतिकुशासन वारेजी।जे शुभ भावे भवियणध्यावे,नावे कष्ट किंवारेजी, राजग्रही गुरु गौतम आव्या, वीरतणे आदेशेजी श्रेणीक आगले नवपद महीमा, श्रीमुखथी उपदेशेजी ॥१॥ श्रीअरीहापद मध्ये ठवीये; पूरवादिसि सिद्ध जाणोजी आचारज उवझाय मुनीसर, अनुक्रम अह वखाणोजी; अग्निखुणे दर्शनपद जाणो, ज्ञानचरण तप सूत्रोजी) ओ ही बीजाक्षरधुरीः गुणीओ, गुरुगमथी एमंत्रोजीर आसो चैत्रसुदि सातमथी; नवदिन आंबेल कीजेजी; आठ थोय कही देव वांदीने, देवत्रिकाल पूजीजेजी; एक एक पदनीनवकारवाळी, वीस गुणो शुभभावोजी; आवश्यक दोय टंक करीने,श्रीसिद्धचक्र गुणगावोजी। नव दिन जिनवर चैत्य प्रवाडी, वांद्या जेम श्रीपाळजी

(३३८)
नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
साडाचार वर्षे होळी; नव करी तप उजवालेजी,
मुनि भीमराज चकेसरी देवी; विमलेसर सुखकारोजी
श्रीसंघ सहु दिनदिन अति दीपे; पामीजे भवपारोजी
॥ श्री सिद्धचक्र स्तुति (थोय)॥
त्रिगडे बेठा त्रिभुवननायक, वीर वदे एम वा-
णीजी, श्री श्रीपालतणी परे सेबो, सिद्धचक्र गुण
खाणीजी ॥ अरिहंत आदि सिद्ध आचारज, उवज्झाय
उलट आणीजी।साहूदसण नाण चारित्र तप, इति नव
पद जाणीजेजी ॥१॥आसो चैत्र शुदि सातमथी, नव
आयंबिल पच्चख्खीजेजी। पडिक्कमणा दोय त्रिकाल
पूजा, देववन्दन त्रण कीजेजी ॥ पद एकहुं प्रतिदिन
मन शुद्धे, तेर हजार गुणीजेजी, चोवीश जिननी सेवा
करीने, नरभव लाहो लीजेजी ॥२॥ नव दिननी नव
ओली करतां, आयंबिल एक्याशीथायजी, साढाच्यार
वरसे उजमणुं करीने,तेहने सवी सुख दाइजी । सिरि
सिद्धचक्रना न्हवणजलथी, कुष्ठ अढार पलायजी, सकल

॥ थोयो। (३३९) शास्त्र शिर मुकुट नगीनो, अंगे सुणो चित्त लाइजी ॥ ॥३॥ मातंग यश प्रभु पद सेवे, उलट आणी अंगेजी, सिरि सिद्धचक्रनी ओली करता, विन हरे मन रंगेजी।। हंसविजय गुरु पंडित पुंगव, चरण सरोरुह भंगजी, धीरविजय वुध मंगलमाला सुख संपत्ति लहे चंगजी ॥ ४ ॥ इति ॥ श्री स्तुति. आदीश्वरने पूजो आणी मन उल्लास; सिद्धचक्र -आराधो जिम व्होंचे मन आश || आसो चैत्र सात- सथी ओलीकोजे सार आंबीलस्युं करता लहीये जय जयकार ॥ १ ॥ अरिहंत सिद्धादिक आचार्य वलीजेह, उवज्झाय सर्व साधु दर्शन ज्ञानश्यु नेह ॥चारित्रतप 'धारो नवपद गुणभंडार; पंचवर्णा जिनवर सेवंता सुख- कार ॥२॥ श्रीपालनरेशर मयणा सुंदरी तपसार, उप- देशे श्रीवीरजी परखद वारमझार ॥श्रेणीकनृप आदे सांभले हरख अपार। आराधो भवि ऋद्धिवृद्धि उदार (३४०) नवपद विधि विगेर संग्रह ॥ ॥३॥ रमझमके नेउरी चीर चुनडी नथी सामु गोमुख चक्केसरी श्री ऋषभशासन हितकार॥ वंछित फल दे. ज्यो सुख संपत्तिदातार; गुरु कुंवरविजयनो रवि लहे जयकार ॥४॥ नवपदनी सज्झाय. (नणदलनी ए देशी.) वारी जाउं श्री अरिहंतनी, जेहना गुण छे वारा मोहन० ॥ प्रातिहारज आठ छे, मूल अतिशय चार मोहन०॥ १॥ वारि० ॥ वृक्ष अशोक कुसुमनी वृष्टि,. दीव्य ध्वनि वाण ॥ मोहन० ॥ चामर, सिंहासन, ढुं- दुभि, भामंडल छत्र वखाण ॥ मो० ॥ वारि० ॥ २॥ पूजा अतिशय छे भलो, त्रिभुवन जनने मान ॥ मो. वचनातिशय योजनगामी, समजे भविअसमान ॥ ॥मो०॥वा०॥३॥ ज्ञानातिशय अनुत्तरतणा, सं-- शय छेदणहार ॥ मो०॥ लोकालोक प्रकाशता, केवल ज्ञानभंडार ॥ मो० ॥ वारि० ॥४॥ रागादिक अन्त- ररिपु, तेहनो कधिो अन्त.। मो०॥जिहां विचरे जग-- . ॥ सज्झायो॥ (३४१) दीश्वरु तिहां साते ईति संमत ॥ मो० ॥ वा०. ५॥ एहवा अपायापगमनो, अतिशय अति अद्भूत. ॥ मो० ॥ अहर्निश सेवा सारता, कोडिगमे सुर हुंत ॥ मो० ॥ वा०॥६॥ मार्ग श्री अरिहन्तनो, आद- रीये गुणगेह । मो० चारनिक्षेपे वांदीये, ज्ञानविमल गुण गेह ॥ मो० ॥ वा ॥७॥ ॥इति अरिहंत प्रथम पद सज्झाय संपूर्ण ॥ ॥ सिद्धपदनी सज्झाय ॥ अलवे जो होली हलखेडेरे।। ए देशी ।। नमो सिद्धाणं वीजे पदेरे लाल, जेहना गुण छे आठ रे, हुं वारी लाल, शुक्लध्यान अनले करीरे लाल, वाळ्या कर्म कुठाररे ॥ १॥ हुं वारी लोल ॥ ज्ञानावरणीक्षये लह्यारे लाल; केवलज्ञान अनंतरे ॥ हुं० ॥ दर्शनावरणी क्षयथी थयारे लाल, केवलदर्शन करंतरे ॥ हुँ० न० ॥२॥ अक्षय अनन्त सुख सह- जथीरे लाल, वेदनी कर्मनो नाशरे ॥ ९ ॥ मोहनीय क्षये निर्मलंरे लाल, क्षायक समकित वासरे, हुं. ४ chhvvv......... (३४२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। न० ॥३॥ अक्षय स्थिति गुण उपन्योरे लाल, आयु कर्म अभावरे ॥ हुं० ॥ नाम कर्म क्षये नीपन्योरें लाल, रूपादिक गतिभावरे । ९० न० ॥४॥ अगुरुलघु. गुण उपन्योरे लाल, नरहया कोइ विभावरे ॥ ९० गोत्र. कर्मना नाशथीरे लाल, निज प्रकव्या जस भावरे ॥ हुं० न०॥ ५॥ अनन्त वीर्य आतमतणुं रे लाल, प्रगट्यो अंतराय नाशरे ॥ हुं० आठे कर्म नाशीगयारे लाल, अनन्त अक्षयगुण वासरे ॥ ९० न० ॥ ६ ॥ भेद पन्नर उपचारथी लाल, अनन्त परम्पर भेदरे ।। हुं० निश्चयथी वीतरागनारे लाल, किरण कर्म उच्छे- दरे ॥ ९० न० ॥ ७ ॥ ज्ञानविमलनी ज्योतिमारे लाल, भासित लोकालोकरे ।।हुं०॥ तेहना ध्यानथकी यशेरे लाल, सुखीया सघला लोकरे ॥ ९० न॥९॥ ।। इति सिद्धपद सज्झाय ॥ ॥ त्रीजा आचार्य पदनी सज्झाय ॥ आचारी आचार्यनो जी, त्रीजे पदधरो ध्यान; शुभ उपदेश प्ररूपताजी, कह्या अरिहंत समान ॥सूरीश्वर

॥ सज्झायो॥
(३४३))
नमतां शिव सुख थाय, भव भवना पातिक जाय ॥
सू० ॥ १॥ पंचाचार पलावताजी आपण पेपालंत ॥
छत्रीशी छत्रीश गुणेजी, अलंकृत तनु विलसन्त ।।
सूरीश्वर ॥ नम० ॥२॥ दर्शन ज्ञान चारित्रनाजी,
एकेक आठ आचार ॥ वारहतप आचारनाजी इम
छत्रीश उदार ॥ सूरी० ॥ नम० ॥३॥ पडिरूपादिक
चउदे अछेजी, वली दशविध यतिधर्म ॥ बारह भा-
वना भावतांजी, ए छत्रीशी मर्म ॥ सूरी० ॥ नम०
॥४॥ पंचेन्द्रिय दमे विषयथीजी, धारे नवविध ब्रह्म
॥ पंच महाव्रत पोषताजी, पंचाचारसमर्थ ॥ सूरी०
॥ नम० ॥ ५॥ सुमति गुति शुद्धि धरेजी, टाले
चार कषाय ॥ ए छत्रीशी आदरेजी, धन्य धन्य ते-
हनी माय ॥ सूरी० ॥ नमः ॥ ६ ॥ अप्रमत्ते अर्थ
भांखताजी, गणि संपद जे आठ ॥ छत्रीश चउ वि-
नयादिकेजी, इस छत्रीशी पाठ ॥ सूरी० ॥ नम०॥
॥७॥ गणधर उपमा दीजीएजी, युगप्रधान कहाय
॥ भावचारित्री तेहबाजी, तिहां जिनमार्ग ठराय ॥

onninn (३४४) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ सूरी० ॥ नम०॥ ८॥ ज्ञानविमल गुण राजताजी। गाजे शासन मांहे, ते वांदि निर्मल करोजी ॥ वोधि बीज उच्चाह ॥९॥ न०॥ इति नवपद अधिकार तृतीय पद सझाय ॥ ॥ चतुर्थ पद सज्झाय ॥ ॥ पांडव पांचेवा ॥ चोथे पद उवझायनु, गुणवंतनुं धरो ध्यानरे, युवराजा समते कह्या, पद सूरिने समानरे ॥१ चो० ॥ जे सूरि समान व्याख्यान करे, पण न धरे अभि- मान रे, वळी सूत्र अर्थनो पाठ दीये, भविजीवने सावधान रे॥ चो० ॥२॥ अंग इग्यार चउद पूर्व जे वळी भणे भणावे जेहरे ॥ गुण पचवीश अलंकर्या, दृष्टिवादे अर्थना गेह रे ॥ चो० ॥३॥ बहु नेहे अर्थ अन्याले सदा, मन धरता धर्मध्यान रे ॥करे गच्छ निश्चित प्रवर्तक, दिये स्थविरने बहु मान रे ॥ चो० ॥ ४ ॥ अथवा अंग इग्यार जे वळी, तेहना बार उ- यांग रे ॥ चरण करणनी सित्तरी, जे धारे आपणे ॥ सज्झायो । (३४५) अंग रे ॥ चो० ॥५॥ वळी धारे आपणे अंग, पंचा- गीसम-ते शुद्धवाणी रे ॥ नयगमभंग प्रमाण वि- चारने, दाखता जिन आणरे ॥ चो० ॥ ६॥ संघ सकल हित कारीया, रत्नाधिक मुनिहितकार रे। पण व्यवहार प्ररूपता, कहे दस समाचारी आचार रे ॥ ॥७॥ इन्दिय पंचथी विषय विकारनें, वारता गुण- गेहरे ॥ श्रीजिनशासन धर्मधुरा, निरवाहता शुचि- देहरे ॥ ८ ॥ पचविशि पचविस गुणतणी, जे भाखी प्रवचन मांहे रे ॥ मुक्ताफल सुक्तापरे, दीपे जस अंग उछाहरे ॥ ९ ॥ जस दीपे अति उच्छाहे, अ- धिक गुणे जीवथी एकतानरे ॥ एहवा वाचकनुं उप- मान कहुं किम; तेहथी शुभ ध्यान रे ॥१०॥ इति चतुर्थ पद सझाय संपूर्ण ॥ ॥ पञ्चमपद सज्झाय ॥ ॥ राग धनाश्री॥ ॥ मगधदेश राज गृही नगरी ॥ ए देशी ते मुनिने करुं वन्दन भावे, जे षट्काय व्रत राखेरे ॥ इन्द्रिय पण दमे विषय घणाथी, वलि शा- t (३४६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ न्ति सुधारस चाखेरे ॥१॥ ते मुनिने करुं वन्दन- भावे ॥ ए टेक ॥ लोभ तणा निग्रहने करता; वली पडिलेहणादिक किरियारे ॥ निराशंसयतनाए बहु पदी; वळी करणशुद्धि गुणदरियारे ॥ ते मुनि० ॥ ॥ २ ॥ अहनिश संजल योगशुं युक्ता; दुर्धर परिसह सहतारे ॥ मन वच काय कुशळता जोगे, वरतावे गुण अनुसरतारे ॥ ते मुनि० ॥३॥ छंडे निज तनु धरमने कामे, उपसर्गादिक आवे रे ॥ सत्तावीश गुणे करी सोहे. सूत्राचारने भावेरे ॥ ते सुनि० ॥ ४ ॥ ज्ञान दर्शन चारित्र तणा जे, त्रिकरण जोग आचार रे॥ अंगे धरे निःस्पृहता शुकि, ए सत्तावीश गुण साररे ॥ ते मुनि० ॥ ५॥ अरिहंतभक्ति सदा उप- दिशे; वायगसूरीना सहाइरे ॥ मुनि वीण रू क्रिया नवी सूजे; तीर्थ सकल सुखदाइरे ॥ ते मुनि० ॥६॥ पद पांचमे इणि परे ध्यावो, पंचमी गति ने साधोरे॥ सुखी करजो शासननायक, ज्ञानविसल गुण वा- धोरे ॥ ते सुनि० ॥७॥ इति नवपद विष पंचम - सुनिपदनी लज्झाय संपूर्ण.

। ॥ सज्झायो॥ (३४७) . सज्झाय. देशी भमरगीतानी गुरु नमतां गुण उपजे, वोले आगम वाण श्री श्रीपालने भयणासुंदरी, सबहे गुणखाण श्री मुनीचंद मुनीसर बोले अवसर जाण ॥१॥ आंबिलनो तप वरणण्यो, नवपद नवरे निधान कष्ट टळे आशा फळे, वाधे वसुधा वान ॥ श्री०॥२॥ रोग जाए रोगी तणा, जाए सोग संताप वाहलाई भेळा मले, पुन्य वधे घटे पाप ॥श्री०॥३॥ उज्वल आसो सातम, तप मांडे तनुहेत पुरण विध पुनिमलगे कामिनी कंत समेत ॥श्री॥ चैत्र सुद माहे तीम, नव आंबील नीरमाय इम एकाशी आबिले, ए तप पुरो थाय ॥ श्री० ॥५॥ राज नीकंटक पाळतां नवशत वरस क्लीन देशविरतिपणुं आदरी, दीपाव्यो जगजैन ॥श्री० ॥६॥ गजरथ सहस ते न बहुआ नवलख तेजी तोखार नवकोडी हयदल भलु नवनदन वननाड्य ॥ श्री. ७॥ ॥

(३४८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ 'तपजप उद्यापन थकी, लाधो नवमो सग्ग सुरनरना सुख भोगवी, नवमे भव अपवग्ग॥श्री०८॥ हंसविजय कविरायना जी मजलउपर नाव आप तरे पर तारवे मोहन सुहस्वभाव ॥ श्री० ९ ॥ अथ नोकारवालीनी सज्झाय. ॥ बार जपुं अरिहंतना, भगवंतना रे गुण निशदीस ॥ सिद्ध आठ गुण जाणिये वखाणीये रे गुण सूरि छत्रीश ॥ नोकारवाली वंदीये ॥ १ ॥ चिर नंदिये रे उठी गणीये सवेर ॥ सूत्रतणा गुण गुंथिया, मणिआ मोहन रे मह मोटो मेर ॥ नोका० ॥२॥ पंचवीश उवझायना, सत्तावीश रे गुण श्री अणगार॥ एकशो आठ गुणे करी, इम जपीय रे भवियण नवकार ॥ नोका० ॥३॥ मोक्ष जाप अंगुठडे, वै जूठडे रे तर्जनी अंगुली जोय ॥ बहु सुखदायक मध्यमा, अनामिका रे वश्यारथ होय ॥नोका० ॥४॥ आकर्षण टची अंगुली, वली सुणजो रे ए गणवानी रीति ॥ मेरु उल्लंधन मम करो, मम करजो रे नख ॥ सज्ज्ञायो॥ (३४९). अग्रे प्रीति ॥ नोका० ॥ ५॥ निश्चल. चित्तें जे गणे, जे गणे संख्यादिकथी एकांत ॥ तेहने फल होए अ.. तिघj, इम वोले रे जिनवर सिद्धांत ॥ नोक० ॥६॥ शंख प्रवाल स्फटिक मणि, पन्ना जीव रतांजली मोती सार ॥ रूप सोवन रयण तणी, चंदन अवर अगरने घनसार ॥ नोका०॥ ७॥ सुंदर फल रुद्राक्षनी जप-- मालिका रे रेशमनी अपार ॥ पंचवरण सम सत्रनी, वली वस्तुविशेष तणी उदार ॥ नोका० ॥ ८॥ गौ- तम पुंछते कहो, महावीरे रे ए संयल विचार ॥ ल-- धि कहे भवियण सुणो, गणजो भणजो रे नित्य सझायो नवकार ॥ नोका० ९ ॥ इति । ॥ श्री सिद्धनी सज्झाय ॥ आठ कर्म चूरण करीरे लाल, आठ गुण परसिद्ध ।। मेरे प्यारे ॥ क्षायिक समकितना धणीरे लाल ॥ वंदु वंदु एहवा सिद्ध ॥ मेरे प्यारे ॥आ०॥१॥ अनंत नाण. दरसण धरारे लाल, चोथु वर्यि अनंत ॥ मे०॥ अगुरु- लघु सूक्ष्म कह्यारे लाल, अव्याबाध महंत ॥ मे०॥ .

। - ( ३५०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। आ० ॥ २॥ जेहनी काया जेहवीरे लाल, उणी बीजे भागे ॥ मे० ॥ सिद्धशिलाथी जोयणेरे लाल, अब गाहना वीतरागे ॥ मे० आ०. ॥३॥ सादिअनंता तिहां घणारे लाल, समय समय तेह जाय ॥ मे० ॥ मंदिर माहे दिपालीकारे लाल, सघलो तेज समाय ।। मेरे० ॥ ४॥ सानवभवथी पामीयेरे लाल, सिद्ध तणा सुख संग ।। मेरे० ॥ एहनुं ध्यान सदा धीरे लाल, एम वोले भगवर अंग ॥ मेरे० अ० ॥५॥ श्री विजयदेव पटोधरे लाल. श्री विजयसेनसूरीश से०॥ सिद्धतणा गुण ए कह्यारे लाल, देव दीए आ- शीष ॥ मे० ॥ आ०॥ ६॥ इति श्री लज्झाय संपूर्णः ॥ नवपद महिमानी सज्झायः ॥ ॥ सरसती माता मया करो, आपो वचन विला- सोरे ।। मयणासुंदरी सती गायशुं, आणी हीयडे भा--. वोरे॥१॥ नवपद महिमा सांभळो, मनमां धरी उ- लासोरे ॥ मयणासुंदरी श्रीपालने, फलीयो धर्म उदा- रोरे ॥ न० ॥२॥ मालव देशमाही वली, उज्जेणी ॥ ॥ सज्झायो ।। (३५१.) नयरी जासोरे । राज्य करे तीहां राजीओ, पुहवीपाल नरिंदोरे ॥ न० ॥३॥ रायतणी मनमोहनी, धरणी अनोपम दोयरे ॥ तासु कुंखे सुता अवतरी, सुरसुंदरी मयणा जोडरे । न० ॥ ४ ॥ सुरसुंदरी पंडित कने, शास्त्र भणी मिथ्यातोरे ॥ सयणासुंदरी सिद्धांतनो, अर्थ लीयो सुविचारोरे ॥ न० ॥ ५ ॥ राय कहे पुत्री प्रत्ये, हुं तुठो तुम जेहोरे ॥ वंछीत वर मागो तदा, 'आपुं अनोपम जेहोरे ॥ २०॥ ६ ॥ सुरसुंदरीए वर मागीओ, परणावी शुभ ठामोरे ॥ मयणासुंदरी व- यणां कहे, कर्म करे ते होयरे । न० ॥७॥ करमे तु- मारे आवीयो, वर वरो बेटी जेहोरे ॥तात आदेशे कर ग्रह्यो, वरीयो कुष्टी तेहोरे ॥ न० ॥ ८ ॥ आंविलनो तप आदरी, कोढ अढारनो कालोरे । सद्गुरु आज्ञा शिरधरी, हुओ राय श्रीपालोरे ॥न॥ .॥ ९ ।। तप प्रसादे सुख संपदा, प्रत्यक्ष खगें पहुंतोरे ॥ उपसर्ग सवी दूरे टळ्या, पाम्यो सुख अनंतोरे ॥ ॥ न०॥ १० ॥ देश देशांतर भसी करी, आव्यो ते वरसंतोरे ॥ नव राणी पाम्या भली, राज्य पाम्यो म- , wwe (३५२) नवपद विधि विगेरे संग्रह। नरंगोरे॥न०॥ ११ ॥ तपगच्छ दिनकर उगीयो,श्री विजयसेन सूरिंदोरे, तास शिष्य विमल एम विनवे, सतीय नामे आणंदोरे ॥ १२ ॥ ॥ साधुजीनी सज्झाय ॥ ॥ पंचमहानत दशविध यतिधर्म, सत्तर, संजम भेद पालेजी ॥ वैयावच्च दस नवविधब्रह्मचर्य, वाड भली अजुआलोजी ॥१॥ ज्ञानादित्रय बारे भेदे, तप करे जे अनिदानजी क्रोधादिक चारेनो निग्रह, ए चरणसीत्तेरी मानजी ॥ २॥ चउविध पिंड वसती. वस्त्र पात्र. निर्दूषण ए लेवेजी, सुमति पांच वली.प- डिमा वारह, भावना बारह सेवेजी ॥३॥ पचविश. पडीलेहण पंचइंद्रिया ॥ विषयविकारथी वारेजी, त्रिण गुप्तिने च्यार अभिग्रह, द्रव्यादिक संभारेजी ॥ ४ ॥ करणसीत्तेरि एहवी सेवे, गुण अनेक वली वाधेजी ॥ संजमी साधु तेहने कहीये, बीजा सवी नाम धरावेजी ॥ ५॥ ए गुण विण प्रवज्या वोली, आजीविकाने तोलेजी; ते खटकाय असंजमी जाणो, धर्मदास गणी . ."

।। सज्झायो॥ (३५३) -NAMAVAN बोलेजी ॥ ज्ञानविमल गुरुं आणा धरीने, संजर्म शुद्ध आराधोजी । जिम अनुपम शिवसुख साधो, जगमा कीर्ति वाधेजी ॥७॥ श्री सिद्धपदनी सझाय श्री मुनिचंद्र मुनीश्वर बंदीए, गुणवंता गणधार, सुज्ञा- नी; देशना सरस सुधारस वरसता, जिम पुष्करजळधार, सु० श्री ॥१॥ अतिशय ज्ञानी. परउपकारीआ, संयम शुद्ध आचार, सु०॥ श्रीश्रीपाळ भणी जाप आपीओ, करी सिद्धचक्र उद्धार, सु० श्री० ॥२॥ आंबिलतप विधि शीखी आराधीयो, पडिक्कमणां दोय वार, सु० अरिहंता- दिक पद एक एकनो, गणणुं दोयं हजार, सु० श्री० ॥३॥ पडिलेहण दोय टंकनी आदरे, जिनपूजा त्रण काळ, सु०, ब्रह्मचारी वळी भोंय संथारे, वचन न आळ पंपाळ, मु०, श्री० ॥४॥ मन एकाग्र करी आंबिल करे, आसो चैतर मास, सु० शुदि सातमथी नव दिन कीजीए, पूनमे ओ.. च्छच खास, सु०, श्री ॥५॥ एम नव ओळी एकाशी आंविले, पूरी पूरण हर्ष, सु० उजमणुं पण उद्यमथी करे, साडा चारे रे वर्ष, सु० श्री० ॥ ६॥ ए आराधनथी सुख- संपदा, जगंमां कीर्ति रे थाय, मुं० रोग उपद्रव नासे एह- थी, आपदा दूरे पलाय, सु० श्री ॥७॥संपदा वाधे अति १.५४) नवपद् विधि विगेरे संग्रह ॥ . सोहामणी, आणा होय अखंड, सुरुमंत्र जंत्र तंत्र सोह- तो, महिमा जास प्रचंड, सु० श्री०॥ ८॥चक्रेश्वरीजेहनी सवा करे, विमलेश्वर वळी देव, सु० मन अभिलाष पूरे सवि तेहना, जे करे नवपद सेव, सु० श्री० ॥९॥ श्री- पाळे तेणी परे आराधीओ.दूर गयोतास रोग, सु० राज- ऋद्धि दिन दिन प्रत्ये वाधतो, मनवंछित लह्यो भोगः सु० श्री० ॥१०॥ अनुक्रमे नवमे भव सिद्धि वर्याः सिद्धचक्र सुपसाय; सु० एणी परे जे नित्य नित्य आराधशे; तस जस वाद गवाय: सु० श्री० ॥ ११॥ सांसारिक सुख वि- ळसी अनुक्रमे; करीए कर्मनो अंत,सु०, घाती अघाती क्षय करी भोगवो, शाश्वत सुख अनंत, सु० श्री ॥ १२॥ एम उत्तम गुरु वयण सुंणी करी, पावन हुवा बहु जीव, सु० पद्मविजय कहे ए सुरतरु समो, आपे सुख सदैव, सु० श्री०॥ १३ ॥ चरणसित्तरी करणसित्तरीनी सझाय, पंच महाव्रत दशविध यति धर्म, सत्तर संजम भेद पाळे जी: वैयावृत्त्य दश नवविध ब्रह्मचर्य, वाड भली अ- जवाळे जी.॥१॥ ज्ञानादिक त्रण बारे भेदे, तप करी जेह निदान जी क्रोधादिक चारनो निग्रहं, ए चरण सि- तरी मानजी. ॥२॥ चउविध पिंड वसति. वस्त्र पात्र, निर्दूषण ए लेवे जी;समिति पांच वळी.पडिमा बारे, भा: . -

॥ संज्झायो॥
(३५५)
वना बारे सेवेजी.॥शापच्चीश पडिलेहणा पण इंद्रिय, विषय-
'विकारने वारो जीत्रण गुप्ति वळी चार अभिग्रह, द्रव्या;
दिकथी संभाळो जी.॥४॥ करणसित्तरी इणविध सेवे, गुण
अनेक वळी धारेजी, संजमी साधु तेहने कहीए, बीजा सचि
नामधारी जी.॥५॥ ए गुणविण प्रव्रज्या बोली,आजीविकाने
ताले जीते षट काय असंजमी जाणो, धर्मदास गणी बोले
जी॥६॥ ज्ञानविमळ गुरु आणा धरीने, संजम शुद्ध आरा-
धेजी; जिम अनुपम शिव सुख साधे, जगमा सुजस ते
वाधे जी.॥७॥
॥ श्री अजितसेन मुनिए श्रीश्रीपाळ महाराजाने
आपेल उपदेश॥
हस्तिनागपुर वर भलो-ए देशी.
प्राणी वाणी जिनतणी, तुम्हें धारो चित्त मझाररे;
मोहे मुंज्या मत फिरो, मोह मूके सुख निरधाररे;
मोह मुके सुख निरधार, संवेग गुणपाली पुण्यवंतरे,
पुण्यवंत अनंत विज्ञान, वदे इम केवली भगवंतरे. १
दश दृष्टातें दोहिलो, मानवभव ते पण लद्धरे;
आर्यक्षेत्रे जन्म जे, ते दुर्लभ सुकृत संबंधरे।
ते दुर्लभ सुकृत संबंधरे ॥ संवे० ॥२॥

(३५६) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
आर्यक्षेत्रे जनम हुओ, पण उत्तमकुल ते दुर्लभरे ।
व्याधादिककुले उपनो,शुं आर्यक्षेत्र अचंभरे,शुं.संवे०३॥
कुल पामे पण दुल्लहो, रूप आरोग आउं समाजरे ।
रोगी रूपरहित घणा, हीण आउ दीसे छे आजरे ॥
हीण आउ दीसे छे आजरे. संवे० ॥४॥
ते सवि पामे पण सही, दुलहो छ सुगुरु संयोगरे ।
सघळे खेत्रे नहिं सदा, मुनि पामीजें शुभ योगरे ।
मुनि पामीजे शुभ योगरे, संवे० ॥५॥
महोटे पुण्ये पामीयें, सद्गुरु
संग सुरंगरे।
तेर काठीया तो करे, गुरु दर्शन उत्सव भंगरे.गु.संवे॥६॥
दर्शन पामे गुरुतणुं, धूतें व्युदग्राहित चित्तरे ।
सेवा करी जन नवि शके, होय खोटोभाव अमित्तरे॥
होय खोटो भाव अमित्तरे. संवे०॥७॥
गुरुसेवा पुण्ये लही, पासें पणु बेठा नित्तरे ।
धर्मश्रवण तोहे दोहिलं, निद्रादिक दिये जो भित्तरे ॥
निद्रादिक दियेजो भित्तरे
पामी श्रुत पण दुल्लही, तत्त्वबुद्धि ते नरने न होयरे ।
जो
संवे०॥८॥

संवे०॥१०॥ श्रीपाळ महाराजाने आपेल उपदेश । (३५७) शृंगारादिक कथारसे, श्रोता पण निज गुण खोयरे. श्रो० संवे०॥९॥ तत्त्व लहे पण दुल्लही, सद्दहणा जाणो संतरे । कोइ निज मति आगल करे, कोइ डामाडोल फिरंतरे॥ कोइ डामाडोल फिरंतरे आप विचारे पामिये, कहो तत्त्वतणो किम अंतरे । आलसुआ गुरु शिष्यनो. शहां जाबियो मन वृत्तांतरे ॥ इहां भावियो मन वृत्तांतरे. संवे०॥ ११ ॥ वठरछात्र गज आवतां, जिम प्राप्त अप्राप्त विचाररे । करेनतेंहथी ऊगरे,तेम आपमतिनिरधाररे;ते० संवे॥१२॥ आगम ने अनुमानथी, वली ध्यानरसें गुणगेहरे। करे जे तत्त्वगवेषणा,ते पामे नहि संदेहरे ते संवे॥१३॥ तत्ववोध ते स्पर्श छे, संवेदन अन्यस्वरूपरे। संवेदन बंध्येहुइ, जेस्पर्श ते प्राप्तिरूपरे जे०संवे०॥१४॥ तत्त्व ते दशविध धर्म छे, खंत्यादिक श्रमणनो शुद्धरे। धर्म-सूल दयाकही, ते खंतिगुणें आविरुद्धरेते०संवे०१५ विनयने वश छे गुण सवे, ते तो मार्दवने आयत्तरे।'

minnan, . (३५८) :: : नवपद.विधि विगेरे. संग्रह। जेहने मार्दव मन वस्यु, तेणें सवि गुणगण संपत्तरें। तेणे सवि गुणगणं. संपत्तरे. संवे०॥१६॥ आर्जव विण नवि शुद्ध छे, नवि धर्म आराधे अशुकरे। धर्म विना नवि मोक्ष छे, तेणें ऋजुभावी होय बुद्धरे। तेणें ऋजुभावी होय बुध्धरे. संवे० ॥१७॥ द्रव्योपकरण देहनां. वलि भक्त पान शुचिभावरे । भावशौच जिम नवि चले, तिम कीजें तास बनावरे॥ तिम कीर्जे तास बनावरे. संवे० ॥१८॥ पंचाश्रवथी विरमीयें, इंद्रिय निग्रहीजें पंचरे। चार कषाय त्रण दंड जे, तजीये ते संजम संचरे ॥: तंजीये ते संजम संचरे, संवे०॥१९॥ बांधव धन इंद्रियसुख तणो,वलि भय विग्रहनो त्यागरे।। अहंकार समकारनो, जे करशेते महाभागरे जे०संवे०२० अविसंवाद नजोग जे, वळि तन मन वचन अमायरे।. सत्य चतुर्विध जिन कह्यो, बीजे दर्शन न कहायरे ॥ बीजे दर्शन न कहायरे. संवे ॥२१॥ पविध वाहिर तप कह्यु अभ्यंतर षविध होयरे ॥

mona संवे०॥ २२ ॥ संवे० ॥२३॥ श्रीपाळ महाराजाने आपेल उपदेश । (३५९) कर्म तपावे ते सही, पडिसोअ वृति पण जोयरे, पडिसोअ वृत्ति पण जोयरे दिव्य औदारिक काम जे, कृत कारित अनुमति भेदरे। योग त्रिक तस वर्ज, ते ब्रह्म हरे सवि खेदरे । तें ब्रह्म हरे सवि खेद रे. अध्यात्मवेदी कहे मूर्छा ते परिग्रह भावरे ॥ धर्म अकिंचनने भएयो, ते कारण भवजल नावरे॥ ते कारण भवजल नावरे ॥ संवे० ०॥ २४ ॥ पांच भेद छे खंतिना, उवयारवयार विवागरे । वचन धर्म तिहां तीनछे,लौकिक दोइ अधिक सोभागरे। लौकिक दोइ अधिक सोभागरे, संवे० ॥ २५ ॥ अनुष्ठान ते चार छे, प्रीति भक्ति ने वचन अंसगरे । त्रण क्षमा छे दोयमां, अग्रिम दोयमा दोय चंगरे । आग्रिम दोयमा दोय चंगरे. संवे० ॥ २६ ॥ वल्लभ स्त्री जननी तथा, तेहना कृत्यमा जुओ जुओ रागरे। पडिक्कमणादिक कृत्यमां, एम प्रीति भक्तिनो लागरे।

(३६०) नवपद् विधि-विगेरे संग्रह ॥ एम प्रीति भक्तिनो लागरे. 'संवे० ० ॥ २७॥ वचन ते आगम आसरी. सहेजें थायें असंगरे । चक्रभ्रमण जिम दंडथी, उत्तर तभावे चंगरे। उत्तर तदभावे चंगरे, संवे०॥ २८ ॥ विष गरल अनुष्ठान छे, तद्धेतु अमृत वलि होयरे । त्रिक तजवा दोय सेववा, ए पांच भेद पण जोयरे । ए पांच भेद पण जोयरे. संवे०॥ २९ ॥ विषकिरिया ते जाणीयें, जे अशनादिक उद्देशरे। विष ततखिण मारे यथा, तेम एहज भव फल लेशरे। तेम एहज भव फल लेशरे. संवे०॥३०॥ परभवें इन्द्रादिक ऋद्धिनी, इच्छा करतां गरल थायरे। ते कालांतर फळ दीए, मारे जीम हडकियो वायरे । मारे जीम हडकियो वायरे. संवे०॥३१॥ लोक करे तिम जे करे, उठे बेसे समूमि प्रायरे । विधि विवेक जाणे नहीं, ते अन्यानुष्ठान कहायरे। . अन्यानुष्ठान कहायरे ॥ संवे०॥ ३२॥ तद्हेतु ते शुद्धरागथी, विधिशुद्ध अमृत ते होयरे । ते

.
श्रीपाळ महाराजाने आपेल उपदेश ॥ (३६१)
सकल विधान जे आचरे, ते दीसे विरला कोयरे ।
ते दीसे विरला कोयरे ॥
संवे०॥३३॥
करण प्रीति आदर घणो, जिज्ञासा जाणनो संगरे..
शुभ आगम निर्विघ्नता, ए शुद्ध क्रियानां लिंगरे॥.
ए शुद्ध क्रियानां लिंगरे॥
संवे०॥३४॥
द्रव्यलिंग अनंतां धर्या, करी किरिया फळ नविलद्धरे
शुद्धक्रिया तो संपजे, पुद्गल आवर्तने अद्धरे ॥
पुद्गल आवर्तने अद्धरे॥
संवे०॥ ३५॥
मारग अनुगति भाव जे, अपुनर्बधता लद्धरे ॥
किरिया नवि उपसंपजे, पुद्गळ आवर्त में अद्धरे ॥
पुद्गल आवर्तने अद्धरे।
संवे०॥३६॥
अरिहंत सिद्ध तथा भला, आचारिज ने उवज्झायरे
साधु नाण दसण चरित्त, तव नवपद मुगति उपायरे।
तव नवपद मुगति उपायरे ॥
संवे० ॥३७॥
ए नवपद ध्यातां थकां, प्रगटे निज आतमरूपरे ।
आतम दरिसण जेणे कयु, तेणे मूंद्यो भवभयकूपरे ।
तेणे मूंद्यो भवभयकूपरे ॥
संवे०॥३८॥

ते
(.३६२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
क्षण अद्धे जे अघ टले; ते न टले भवनी कोडीरे ।
तपस्या करतां अति घणी, नहि ज्ञानतणी छ जोडीरे
नहि ज्ञानतणी छे जोडीरे ॥
संवे० ॥ ३९ ॥
आतमज्ञाने मगन जे, ते सवि पुद्गलनो खेलरे.
इन्द्रजाल करी लेखवे, न मिले तिहां देइ मनमेल।।
न मिले तिहां देई मनमेलरे ॥ संव०॥४०॥
जाण्यो ध्यायो आतमा, आवरणरहित होय सिद्धरे ।
आतमज्ञान दुःख हरे, एहिज शिवहेतु प्रसिद्धरे ।।
एहिज शिवहेतु प्रसिद्धरे
संवे०॥४१॥
चोथे खंडे सातमी, ढाल पूरण थई ते खासरे;
नवपद महिमा जे सुणे, ते पामे सुजस विलासरे ।।
ते पामे
सुजस
विलासरे ॥
संवे०॥४२॥
॥ श्री श्रीपालमहाराजे करेली श्री सिद्धचक्र
भगवंतनी आराधना ॥
हवे नरपति श्रीपाल ते,निज परिवार संयुत्त मेरे लालं;
आराधे सिद्धचक्रने, विधिसहित ग्रही सुमुहुत्त मेरे
लाल. मननो महोटो मोजमां ॥१॥

. सिद्धचक्र भगवंतनी आराधना मयणसुंदरी त्यारे भणे, पूर्वे पूज्यु सिद्धचक्र । मेरे ला० धन त्यारें थोडं हतुं, हमणा तुं ऋद्धे शक्र, मे० म०॥रा धन मोटे छोटुं करे, धर्म उजमणुं तेह; मेरे लाल। (पाठांतर) जे करणी धर्मनुं तेह; मे। फळ पूलं पामे नहीं, मम करजो तिहां संदेह-मे० म.३ विस्तारे नवपदतणी, तिण पूजा करो सुविवेक; मे० धननो लाहो लीजीयें, राखी महोटी टेक, मं०म०॥४॥ मयणा बयणां मन धरी, गुरुभक्ति शक्ति अनुसार मे. अरिहंतादिक नवपद भलां, आराधे ते सार. मे०स०॥५॥ नव जिनघर नव पडिमा भली,नव जीर्णोद्धार कराव.मे, नानाविध पूजा करी,जिन आराधन शुभभाव:मे. म.६ एम सिद्धतणी प्रतिमातणुं, पूजन त्रिहुं काल प्रणास, मेरेलाल. तन्मय ध्याने सिद्धनु,करे आराधन अभिराम। मे.म.७ श्रादर भगति ने वंदना, वेयावच्चादिक लग्ग० मे० ভা विधि साचवी,आराधे सूरि समग्ग. मे, म.॥८॥ अध्यापक भणतां प्रति, वसनाशन ठाण बनाय. मे० (३६४) नवपद् विधि विपर संग्रह ।।" द्विविध भक्ति करतो श्रको, आराधे नृप उवज्झाय. |मे० म०॥ ९॥ नमन वंदन अभिगमनथी,वसही अशनादिकदान,मे, करतो वेयावच्च घj, आराधे मुनिपद ठाण मे० म० ॥१०॥ तीर्थयात्रा करी अति घणी, संघपूजा ने रहजत्त. मे० आराधे दर्शनपद भवं, शासन उन्नति दृढचित्त.. ॥ मे०म० ॥१॥ सिद्धांत लिखावी तेहने, पालन अदिक हेत, मे० नाण पदाराधन करे, सज्झाय उचित मन देत.म० म० ॥ १२ ॥ बत नियमादिक पालतो, विरतिनी भक्ति करत, मे. आराधे चारित्र धर्मने, रागी यतिधर्म एकंत । मे. १३ तजी इच्छा इह परलोकनी, हुइ सघळे अप्रतिबद्ध; मे षट बाह्य अन्यन्तर षट् करी; आराधे तवपद शुध्ध मे, म. ॥ १४ ॥ उत्तम नवपदं द्रव्यभावथी,शुभ भक्ति करीश्रीपालामे० आराधे सिद्धचक्रने, नित पामे मंगळ माळ मे०म०१५ श्री सिद्धचक्राराधननो विवि ॥ (३६५) इम सिद्धचक्रनी सेवना; करे साडाचार ते वर्ष मे० हवे उजमणा विधितणो, पूरे तप उपनो हर्ष।मे,म१६ चोथे खंडे पूरी थई, ढाल नवमी चढते रंग ॥ मे. ॥ विनय सुजस सुख ते लहे, सिद्धचक्र थुणे जे चंग. मे०॥ १७॥ श्री मुनिचन्द्रसूरीश्वरजीए श्रीपाल महाराजा तथा मय- णासुन्दरीने बतावेल श्री सिद्धचक्राराधननो विधि ।। - श्री मुनिचंद गुरे तिहां, आगमग्रंथ विलोइरे ॥ माखणनी पेरे उद्धरयो, सिद्धचक्रयंत्र जोइ रे ॥ चेतन चेतोरे चेतना, आणी चित्त मोझार रे ॥ १३ ॥ अरिहंतादिक नव पदे, ओ ही पद संयुक्त रे ॥ अवर मंत्राक्षर अभिनवा, लहीए गुरुगम तत्त रे ॥ चेतन ॥ १४ ॥ सिद्धादिक पद चिहुं दिशे, मध्ये अरिहंत देव रे॥ दरिसण नाण चरित्तते, तप चिहुं विदिशे सेव रे ॥ चेतन० ॥१५॥ अष्ट कमलदल इंणी परे, यंत्र स- , •(३६६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। कल शिरताज रे ॥ निर्मल तन मन सेवतां, सारे वां, छित काज रे॥ चेतन० ॥ १६ ॥ आशो सुदि माहे मांडीए, सातमथी तप एह रे ॥ नव आंबिल करी निर्मला, आराधो गुणगेह रे ॥ चेतन० ॥१७॥ विधि- पूर्वक करी.धोतीयां, जिन पूजो त्रण काल रे ॥ पूजा आठ प्रकारनी, कीजे थइ उजमाल रे॥चेतन०॥१८॥ निर्मल भूमि संथारीए, धरीए शील जगीश रे ॥ज- पीए पद एकेकनी, नोकारवाली वीश रे ॥ चेतन ॥ १९ ॥ आठे थोइए वांदीए, देव सदा त्रण वार रे॥ पडिक्कमणां दोय कीजीए, गुरु वेयावच्च सार रे ॥ चेतन०॥ २०॥ काया वश करी राखीए, वचन वि- चारी बोल रे ॥ ध्यान धर्मनुं धारीए, मनसा कीजे अडोल रे ॥ चेतनः ॥ २१॥ पंचामृत करी एकठां, परिगल कीजे पखाल रे ॥ नवमे दिन सिद्धचक्रनी, कीजे भक्ति विशाल रे ॥ चेतन० ॥ २२ ॥ सुदि सा- तमथी इणी परे, चैत्री पूनम सीमरे ॥ ओली एह आराधीए, नव आंबिलनी नीम रे ॥ चेतन० ॥२३॥ एम एकाशी आंबिले, ओली नव निरमाय रे ॥ साढे श्री सिद्धचक्राराधननो विधि ॥ (:३६७) चार संवत्सरे, ए तप पूरण थाय रे ॥ चेतन० ॥२४॥ उजमणुं पण कीजीए, शक्ति तणे अनुसार रे ॥ इह भव परभव सुख घणां, पामीजे भवपार रे ॥ चेतन० ॥२५॥ आराधन फल एहना, इह भवे आण अखंड रे ॥ रोग दोहग दुःख उपशमे, जिम घन पवन प्र- चंड रे॥ चेतन०॥ २६ ॥ नमणजले सिद्धचक्रने, कुष्ठ अढारे जाय रे ॥वाय चोराशी उपशमे, रुझे गुंबड घाय रे ॥ चेतन०॥ २७॥ भीम भगंदर भय टले, जाय जलोदर दूर रे ॥ व्याधि विविध विषवेदना, ज्वर थाये चकचूर रे ॥ चेतन० ॥ २८ ॥ खास खयन खस चकुना, रोग मिटे सन्निपात रे ॥ चोर चरड डर डाकिणी, कोइ न करे उपघात रे ॥ चेतन० ॥ २९ ॥ हीक हरस ने हेमकी, नारां ने नासूर रे ॥ पाठांपीडा पेटनी, टले दुःख दंतना सूररे । चेतन० ॥३०॥ निर्धनिया धन संपजे, अपुत्र पुत्रीया होय रे ॥ विण केवली सिद्धयंत्रना, गुण न शके कही कोयरे॥चेतन०३१ (३६८) नवेपद विधि विगेरे संग्रह ॥ श्रीमती मयणासुंदरीए अनुभवथी बतावेलं श्री नव पदजी आराधननुं फल. नव पद ध्यानरे पाप पलाय, दुरित न चारो ने ग्रह वक्रनो जी॥४॥ अरि करि सागर हरि ने व्याल ज्वलन जलोदर बंधन भय सवे जी॥ जाय रे जपतां नव पद जाप, लहे रे संपत्ति इह भवे परभवे जी ॥५॥ बीजा रे खोजे कोण प्रमाण, अनभव जाग्यो मुज ए वातनो जी ॥ हुओ रे पूजानो अनुपम भाव, आज रे संध्याए जगतातनो जी॥६॥ तदगतचित्त समयवि- धान, भावनी वृद्धि भवभय अति घणो जी ॥ वि- स्मय पुलक प्रलोद प्रधान, लक्षण ए छे अमृतकिया तणो जी ॥ ७॥ अकृतनो लेश लह्यो इक वार, बीजें रे औषध करवू नवि पडे जी ॥ अमृतकिया तिम लही एक वार, बीजा रे साधन विण शिव नवि अडे जी ॥ ॥ ८॥ एहवो रे पूजामां मुज भाव, आव्यो रे भाव्यो ध्यान सोहामणो जी ॥ हजीअ न माये मन आणंद, श्रीपाळ महाराजे करेली स्तवना।। (३६९) खिण खिण होये पुलक निकारणो जी ॥ ९ ॥ फुरके रे वाम नयन उरोज, आज मिले छे वालिम माहरो जी ॥ बीजुं रे अमृतकिया सिद्धिरूप, तुरत फले छे तिहां नहीं आंतरोजी ॥१०॥ श्री अजितसेन मुनिनी श्रीश्रीपाळ महाराजे करेली स्तवना. हुओ चारित्तजुत्तो समितिने गुत्तो, विश्वनो तारूजी. श्रीपाल ते देखी सुगुण गवेषी मोहियो। वारूजी, प्रणमे परिवारे भक्ति उदारे, विश्वनो तारूजी. कहे तुझ गुण थुणिये पातक हणीये आपणांवा०॥१. उपशम असिधारें क्रोधने मारे ॥ विश्वनो तारूजी.. तुं मदववजे मदगिरि भज्जे मोटका, वारूजी. मायाविषवेली मूल उखेडी ॥ विश्वनो तारूजी. तें अजव कीलें सहज सलीलें सामटी ॥ वारूजी. २. मूर्छाजल भरियो गहन गुहरियो । विश्वनो तारूजी. तें तरियों दरियो मुत्ति. तरीशु लोभनो ॥ वारूजी. २४ (३७०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। -- हु ए चार कषाया भवतरु पाया ॥ विश्वनो तारूजी. भेदे खेदे सहित निकंदी तुं जयो ॥ वारूजी. ३. कंदपै दप्पै संवि सुर जीत्या, विश्वनो तारुजी. ते तें इक धक्के विक्रम पक्के मोडीयो, वारूजी. हरिनादें भाजे गज नवि गाजे, विश्वनो तारूजी. अष्टापद आगल ते पण छागल सारिखो, वारूजी. ४ रति अरति निवारी भय पण भारी, विश्वनो तारूजी. तें.मन नवि धरिया तेहज डरिया तुजथी, वारुजी. तें तजीय दुगंछा शी तुज वंछा, विश्वनो तारूजी. पुग्गल अप्पा विहुँ पख्खें थप्पा लक्षणे, वारूजी.५. परिसहनी फोजें तुं निज मोजे; विश्वनो तारुजी. नवि भागो लागो रण जिम नागो एकलो; वारुजी ॥ उपसंगने वर्ग तुं अपवगै; विश्वनो तारुजी। चालतां नडियो तुं नवि पडियो पाशमां, वा०॥ ६ ॥ दोय चोर उठंता विषम व्रजंता; विश्वनो तारुजी। धीरज पविदंडे तेज प्रचंडे ताडियो; वारुजी। नइधारण तरतां पार उतरतां: विश्वनो तारुजी। नवि मारग लेखा विगत विशेषा देखिये, वागाणा .

श्रीपाळ महाराजे करेली स्तवना ।। (३७१) 'तिहां जोगनालिका समता नामे, विश्वनो तारुजी। तें जोवा मांडि उतपथ छांडि उद्यमें; वारूजी ॥ तिहां दीठी दूरे आनंदपूरे, विश्वनो तारूजी। उदासीनता शेरी नहि भव फेरी वक्र छे. वा०॥८॥ ते तुं नवि के जोग न चूके, विश्वनो तारूजी। बाहिर न अंतर तुंज निरंतर सत्य के वारूजी ।। नय छे बहुरंगा तिहां न एकंगा, विश्वनो तारूजी। तुमें नय पक्षकारी छो अधिकारी मुक्तिना वा० ॥९॥ तुमें अनुभव जोगी निजगुण भोगी, विश्वनो तारूजी। तुमें धर्मसंन्यासी शुद्ध प्रकाशी तत्त्वना; वारूजी ॥ तुमें आतमदरसी उपशम वरसी, विश्वनो तारूजी। साँचो गुण वाडी थाये जाडी पुण्यशं. वारूजी ॥१०॥ अप्रमत्त प्रमत न द्विविध कहीजें, विश्वनो तारूजी। जाणंग गुणठाणंग एकज भाव ते ते ग्रह्यो; वारूंजी। तुमें अगम अगोचर निश्चय संवर, विश्वनो तारूजी। फरस्युं नवि तरस्युं चित्त तुमकेरुं स्वप्नमां. वा० ॥११॥ तुज मुद्रा सुंदर सुगुण पुरंदर विश्वनो तारूजी। . , (३७२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥ सूचे अति अनुपम उपशम लीला चित्तनी; वारूजी।। जो दहन गहन होय अंतरचारी, विश्वनो तारूजी। तो किम नवपल्लव तरुअर दीसे सोहतो. वा० ॥१२॥ वैरागी त्यागी तुं सोभागी, विश्वनो तारूजी। तुज शुभमति जागी भावठ भागी मूलथी; वारूजी॥ जग पूज्य तुं मारो पूज्य बे प्यारो, विश्वनो तारूजी। पहेलो पण नमियो हवे उपशमियो आदयों. वा०॥१३॥ एम चोथे खंडे राग अखंडे संथुण्यो, विश्वनो तारूजी। जे मुनि श्रीपाले पंचमी ढाले ते कह्यो वारूजी । जे नवपदमहिमामहिमायें मुनि गावशे, विश्वनो ता.॥ ते विनय सुजस गुण कमला विमला पावशे. वा०॥१४॥. श्रीपाल महाराजाने श्री सिद्धचक्र भगवान्ना आरा- धनथी मळेल साक्षात् फल. सिद्धचक्र मुज एह, मनोरथ पूरशे हो लाल, मनोरथ० एहिज मुफ आधार, विधन सवि चूरशे हो लाल, वि०. थिर करीमन वच काय,रह्यो इक ध्यानशुं होलाल रह्यो.. तन्मय तत्पर चित्त थयुं तस ज्ञान\ होलाल, थयुं०८

श्री सिद्धचक्र तप उद्यापननी ढाल ॥ (३७३)
तताखण सोहमवासि, देव ते आवियो हो लाल, देव०
विमळेसर मणिहार मनोहर लावियो हो लाल, मनो०
थइ घणो सुप्रसन्न कुंअर कंठे ठवे, होलाल, कुंअर०
तेह तणो करजोडी,महीमा वरणवे होलाल, महीमा०९
जेहबुं वंछे रूप ते थायें ततखिणें हो लाल, ते थाये।
ततखिण वांछित ठाम जाये गयणांगणे होलाल जाये०
आवे विण अन्यास,कळा जे मन धरे होलाल, कळा०
विषना विषम विकार ते सघळा संहरे हो लाल, ते०१०
सिद्धचक्रनो सेवक, हुंछं देवता होलाल, के हुंछु
केइ उद्धरिया धीर,में एहने सेवता होलाल, से०एहने०
सिद्धचक्रनी भक्ति घणी मन धारजो होलाल, घणी०
मुजने कोइक काम पडे संभारजो हो लाल, पडये.११
श्री सिद्धचक तप उद्यापननी ढाल
हवे राजा निज राजनी, लच्छितणे अनुसार,
उजमणुं तेह तपतपुं, मांडे अतिहि उदार.
विस्तीरण जिनभुवन विरचीये, पुण्य त्रिवेदिक पीठ,
चंद्र चंद्रिकारे धवल भुवनतळे, नवरंग चित्र विसीट्ठ.१
.
१

२
th
(३७४) नवपद विधि विगेरे संग्रह।
तप उजमणुं रे इणिपरें कीजीये, जिम विरचेरे श्रीपाल.
तप फळ वाधेरे ऊजमणे करी, जेम जळ पंकजनाल.
तप उजमणुरे इणिपरे कीजीये.
पंचवरणनारे शालि प्रमुख भला,मंत्र पवित्र करी धान्य,
सिद्धचक्रनीरे रचना तिहां करे, संपूरण शुभध्यान.
तप उजमणुरे इणिपरें कीजीये.
अरिहंतादिक नवपदने विषे, श्रीफळगोळ उवंत,
सामान्य घृत खंड सहित सवे,नृप मन अधिकीरे खंत.
तप उजमणुं रे इणिपरे कीजीयें,
जिनपद धवव॒रे गोलक ठवे, शुचि कर्केतन अट्ट;
चोत्रीश हीरेरे सहित विराजतुं, गिरुओ सुगुण गरिठ्ठ.
तप उजमणुं रे इणिपरे कीजीये.
सिद्धपदे अड माणिक रातडां, बळि इगतीस प्रवाळ;
घुसृण विलपितगोलक तसठवे,मूरति रागविशाळ त.६
यण मणि पीत छत्रीश गोमेदकें, सूरिपदें ठवे गोळ;
नीलरयण पचवीस पाठकपर्दे,ठवे विपुल रंगरोलत.त.७
रिष्टरतन सगवीस ते मुनिपदें पंच रायपट अंक;

श्री सिद्धचक्र तप उद्यापननी ढाल ।। (३७५)
सगसहि इगवन्न सित्तरी पंचास ते मुगता शेष निःशंक.
तप उजमणुं रे इणिपरें कीजीयें,
ते ते वरणेरे चीरादिक ठवे, नव पदतणेरे उद्देश
बीजी पण सामग्री मोटकी, मांडे तेह नरेश, त० ९
बीजोरां खारेक दाडिम भला, कोहोलां सरस नारंग,
पूगीफळ वळी कलश कंचतनणा, रतनपुंज अति चंग.
तप उजमणुरे इणिपरे कीजीये.
१०
जे जे ठामेरे जे ठवq घटे, ते ते हवेरे नरिंद,
ग्रह दिक्पालपदें फल फूलडां,धरे सवरण आनंद. त०११
गुरुविस्तारेरे उजमणुं करी, न्हवण उत्सव करे राय,
आठ प्रकारीरे जिन पूजा करे,मंगल अवसर थाय, त०१२
संघ तिवारेरे तिलक मालातj, मंगल नृपने करेइः
श्रीजिन मानेरे संघे जे कयु,मंगल ते शिव देइ.त०१३
तप उजमणेरे वीर्य उल्लास जे, तेहज मुक्तिनिदान,
सर्व अभव्येरे तप पूर्ण कयां, पण नाव्युं प्रणिधान,
तप उजमणुरे इणिपरे कीजीयें,
लघुकर्मानेरे किरिया फल दीये, सकल सुगुरु उवएस;

, तप. ७ (३७६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। सर होये तिहां कूपखनन घटे, नहिं तो होइ किलेश; तप उजमगुंरे इणिपरे कीजीये. १५ सफल हुवो सवि नृप श्रीपालने, द्रव्य भाव जस शुद्ध, मत कोइ राचोरे काचो मत लेइ, साचो विहुं नयबुद्ध. तप उजमगुंरे शणिपरे कीजीये. १६ चोथे खंडेरे दशमी ढाळ ए, प्रण हुश् सुप्रमाण, श्रीजिन विनय सुजस भगति करी, पग पग होय कल्याण, ॥ कळश। तपगच्छनंदन सुरतरु प्रगट्या, हीरविजय गुरु- रायाजी। अकबरशाहेजस उपदेशे,पडह अमारि वजाया जी ॥ १ हेम सूरि जिनशासनमुद्राए, हेम समान क- हाया जी ॥ जाचो हीरो जे प्रभु होतां, शासन सोह चढाया जी ॥ २ ॥ तास पटे पूर्वाचल उदयो, दिनकर तुल्य प्रतापी जी ॥ गंगाजल निर्मल जस कीरति, सघले जगमांहि व्यापी जी ॥३॥ शाह सभा माहे वाद करीने, जिनमत थिरता थापी जी ॥ बहु आदर कळश (३७७) जस शाहे दीधो, बिरुद सवाइ आपी जी॥ ४॥ श्री विजयदेव सरि तस पटधर, उदया बहु गुणवंता जी॥ जास नाम दश दिशि छे चावं, जे महिमाए महंता जी ॥५॥श्रीविजयप्रभ तस पटधारी, सूरि प्रतापेछाजे जी ॥ एह रासनी रचना कीधी, सुंदर तेहने राजे जी ॥ ६ ॥ सूरि हीरगुरुनी बहु कीरति, कीर्तिविजय उवझायाजी। सीस तास श्रीविनयविजय वर, वाचक सुगुण सोहाया जी॥७॥ विद्या विनय विवेक विचक्षण, लक्षण लदित देहा जी ॥ सोभागी गीतारथ सारथ संगत सखर सनेहा जी ॥ ८॥ संवत् सत्तर अडत्रीसा वरसे, रही रानेर चोमासे जी ।। संघ तणा आग्रहथी मांड्यो, रास अधिक उलाले जी ॥९॥ सार्द्ध सप्त शत गाथा विरची, पहोता ते सुरलोके जी ॥ तेहना गुण गावे छे गोरी, मिली मिली थोके थोके जी ॥१०॥ तास विश्वासभाजन तस पूरण, प्रेम पवित्र कहाया जी ॥ श्रीनयविजयविबुधपयसेवक, सुजशविजय उव- झाया जी ॥ ११ ॥ भाग थाकतो पूरण कीधो, तास बचन संकेते जी ॥ तिणे वळी समकितदृष्टि जे नर, (३७८) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। तेह तणे हित हेते जी ॥ १२ ॥ जे भावे ए भणशे गुणशे, तस घर मंगलमाला जी ॥बंधुर सिंधुर सुंदर मंदिर, मणिमय झाकझमाला जी ॥ १३ ॥ देह सवल ससनेह परिच्छद, रंग अभंग रसाला जी ॥ अनुक्रमे तेह महोदय पदवी, लहेशे ज्ञान विशाला जी ॥१४॥ "संबोधप्रकरण"मां बतावेली श्री आचार्य गुणनी ४७ छत्रीशीओ. १ली छत्रीशी १४ प्रतिरूपादि,१० यतिधर्म,१२ भावना २जी ५ इन्द्रियसंवर; ९ ब्रह्मगुप्ति; ४ कषायत्याग; ५ महावत; ५ आचार, ५ समिति;३ गुप्ति. ३जी , विधिप्रतिपन्नचारित्र; गीतार्थवत्सल, सुशील; सेवितगुरुकुल अनुयत्तिपरदेश, कुल--जाति--रूपवान्, संघयणी-धृति--अना- शंसी-अविकत्य, अमायी, स्थिर, परिपाटी- गृहीतवान् जीतपरिषद्, जीतनिद्र, मध्यस्थ, देशज्ञ कालज्ञ भावज्ञ; आसन्नलब्धप्रतिभा बहुदेशभाषज्ञ, पंचाचारयुक्त, सूत्रविधिज्ञ . , श्री आचार्य गुणनी ४७ छत्रीशीओ॥ (३७९) अर्थविधिज्ञ, सूत्रार्थविधिज्ञ, उदाहरणज्ञ; हे.. तुज्ञ; उपनय, नयज्ञ, ग्राहणाकुशल, स्वपर समयज्ञ गंभीरदीतिमान् शिव-सौम्य-गुण- शतकलित प्रवचनोपदर्शक, ८ गणिसंपदा,. ४ आचारादिएकेक, ४ विनयप्रवृत्ति, ४थी ८ ज्ञान; ८ सम्य०, ८ चारित्र; १२ तप ५मी , ८ आचारादि; १० स्थितिकल्प, १२ तप; ६ आवश्यक १८ पापस्थानत्याग; १२ प्रतिमाधर, ६ व्रत- रक्षण ७मी २२ परिषह; १४ जीवभेद रक्षा; ८मी ४ सारणादिशिक्षा; ४ दानादि; १६ ध्यान,. १२ भावना ५ चारित्र; ५ व्रत; ५ समिति, ५ आचार; ५ सम्य० ५ सझाय; ५ व्यवहार; १ संवेग १०मी , ५ इन्द्रिय,५ विषय. ५प्रमाद, ५आश्रव, ५ निद्रा, ५ भावना, ६ काययतना, 450 ९मी " (३८०) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।। १३ सी ११ मी ,, ६ लेश्या, ६ आवश्यक, ६ द्रव्य; ६ वचन; ६ दोष, ६ भाषा. १२ मी ,, ७ पिडषणा, ७ पानेषणा, ७ भय, ७ सुख- सत्त्व, ८ मद. ८ दर्शनाचार, ज्ञानाचार, ८ चारित्राचार, ८ गुरुगुण, ४ शुद्धि. २४ मी ,, ८ योगांग, ८ सिद्धि, ८ दृष्टि, ८ कर्मविज्ञान, ४ द्रव्यादि अनुयोग. १५मी, ९ निदान, ९ ब्रह्मचर्य,९कल्पविहार,९ तत्व, १६ मी ,, १० उववाय, १० असंवर, १० संक्लेश, ६ हास्यादि. १७ मी, १० सामाचारी १० समाधिस्थान १६ क- षायत्याग. १८मी ,, १६ समाधिभेद १० अशनशुद्धि १० प्रति- सेवात्याग. १९ मी छत्रीशी १० मुनिधर्म,१० विनय, १० वैयावच्च, ६ अकल्प त्याग. ,

श्री आचार्य गुणनी ४७ छत्रीशीओ। (३८१),
२० मी ,, १० रुचि, २ शिक्षा, १२ अंग, १२ उपांग,
२१मी .. ११ गृहिप्रतिमा, १२ व्रत, १३ क्रियास्थान.
२२मी ,, १० प्रायश्चित, १२ उपयोग, १४ उपकरण,
२३ मी ,, १२ भावना, १२ तप, १२ मुनिप्रतिमा.
२४ मी ,, ८ अंडजादिजीव,१४ गुणस्थान, १४ प्रतिरूप..
२५ मी,, ३ गारव, ३ शल्य, १५ संज्ञा, १५ योग.
२६ मी ,, १६ उमदोष,१६ उत्पादनदोष,४ द्रव्यभिग्रह..
२७ मी,, १६ वचन, १७ संयम, ३ विराधना,
२८ मी,, १८ दीक्षा अयोग्यने दीक्षा न आपे,१८पा-
पवर्जन,
२९ मी ,, १८ ब्रह्मचर्य शीलांग १८ वसग्ग
३० मी , १९ काउस्सगदोष, १७ मरण.
३१ मी, १ मिथ्या, २० असमाधि, ५ मंडलिदोष, १०.
एषणादोष.
३२ मी ,, २१ शबल, १५ शिक्षास्थान,
३३ मी, १ मिथ्या०.३ वेद,६ हास्यादि,४ कषाय,
अभ्यंतर ग्रंथि, २२ परिषह,
३४ मी,, २७ मुनिगुण ९ कोटिविशुध्धि

(३८२) नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥
३५मी ,, २५ पडिलेहण ६ कायविराधनात्याग ५ वे-
दिकाशुध्धि.
३६ मी ,, ३२ योगसंग्रह ४ भावे (आचरणा-भाषणा
वासना-परावर्त्तना)
३७मी ,, २८ लब्धि, ८ प्रभावक,
३८ मी ,, २ए पापश्रुतवर्जन, ७ विशोधिगुण.
३९ मी ,, ६ अभ्यन्तरारि; ३० मोहस्थान
४० मी ,, ३१ सिद्धगुण; ५ ज्ञान.
४१ मी , दिव्यादि ४ उपसर्ग; ३२ जीवभेद,
४२मी, ४ विकथा; ३२ वंदनदोष.
४३ मी ,, ३३ आशातना; ३ वीर्याचार.
४४ मी ,, २५ व्रतभावना ११ अंगधारी
४५ मी ,, १२ अंग; १० पयन्ना;६ छेद;४ मूळ;१ नंदी;
१ अनुयोग. २ अरागद्वेष
४६ मी ,,१५ त्रिकरणपूर्वक पंचाचार,१० सामाचारी, ५
समिति, ५ स्वाध्याय, १ अप्रमत्त.
४७मी
८ प्रव० माता; ८ सुखदुःखशय्या; ३ सत्य;
६ भाषा; ५ ध्यान; ७ विभंग; ५ धर्म;
,
..

श्री आचार्य गुणनी ३६ छत्रीशीओ ॥
(३८३)
१॥ श्रीआचार्यगुणनी ३६ छत्रीशीओ॥
३ त्रीजी
१ प्रथम छत्रीशी ४ देशना; ४ कथा; ४ धर्म: ४ भा-
वना; ४ सारणा; १६ चार ध्यानना
प्रत्येकना चार चार भेद.
२ बीजी छत्रीशी ५ सम्यक्त्व ५ चारित्र; ५ व्रत; ५
व्यवहार; ५ आचारः ५ समिति,
५ स्वाध्याय; १ संवेग,
५ इन्द्रिय; ५ विषय, ५ प्रमाद; ५
निद्रा; ५ आश्रव; ५ कुभावनात्याग;
६ कायजयणा.
६ वचनदोष; ६ लेश्या; ६ आवश्यक
६ द्रव्य; ६ तर्क; ६ भाषा.
५ मी छत्रीशी७ भय; ७ पिंडेषणा, ७ पानैषणा, ७
सुख, ८ मद.
६ ठी ८ ज्ञानाचार, ८ दर्शनाचार, ८ चारि-
त्राचार; ८ वादिगुण, ४ बुद्धि
४ थी

(३८४) नवपद विधि विगेरे संग्रह। मी ७. मी , ८ कर्म ८ योग, ८ सिकि, ८ योगदृष्टि, ४ अनुयोग. R, तत्त्व, ९ ब्रह्मगुप्ति. ९ निदान, ९ नर्बकल्पविहार १० असंवर,१०संक्लेश,१०उपघात,हास्यादि. १०मी १० सामाचारी,१० चित्तसमाधिस्थान, १६ कषायत्याग " १२ मी " १० प्रतिसेवा, १० शोधिदोष, ४ विन- यसमाधि, ४ श्रुतसमाधि, ४ तपसमाधि, ४ आचारसमाधि १०वैयावच्च,१० विनय, १०धर्म ६अकल्प, १०. रुचि, १२ अंग; १२ उपांग; २ शिक्षा १४ मी , ११ श्रावकप्रतिमा;१२व्रत; १३ क्रियास्थान १२उपयोग;१०प्रायश्चित्तदान, १४उपकरण १२ तपभेद; १२ भिक्षुप्रतिमा, १२भावना. १७ मी ,, .१५ गुणस्थान; १४ प्रतिरूपादिगुण, सूक्ष्मजीवरक्षा १५ मी १६ मी " श्री आचार्य गुणनी ३६ छत्रीशीओ ॥ (३८५) १८ मी १९ मी २० मी २१ मी., २२ मी २४ मी १५योग;१५संज्ञा; ३ गारव; ३ शल्य १६ उद्गमदोष; १६ उत्पाददोष; ४ अभिग्रह १६ वचनविधि; १७ संयमः ज्ञानादि विराधना १८दीक्षाअयोग्य पुरुष भेद,१८पापस्थान. शीलांगसहस्र, १८ ब्रह्मचर्यभेद. २३ मी १९ कायोत्सर्गदोष १७ मरणभेद २० असमाधिस्थान, १० एषणादोष; ५ ग्रासैषणादोष, १ मिथ्यात्व २५ मी,, २१ शवलदोष; १५ शिक्षास्थान २६ मी, २२ परिषह, १४ अभ्यन्तरग्रन्थि ५ वेदिकाशुद्धि, ६ दोष,२५ प्रतिलेखना २८ मी, २७ साधुगुण, ९ कोटिविशुद्धग्राहक ! २९ मी., २८ लब्धि ८ प्रभावकगुण २९ पापश्रुतत्याग, ७ शोधिगुण ३० महामोहस्थान ६ अंतरंग शत्रु .३१. सिद्धगुण ५ ज्ञान. २७ मी " " ३० भी ३१ मी ३२ मी " " . " 4

(३८६) नवपद विधि विगेरे संग्रह ।।
३३ मी ३२ जीवरक्षा, ४ उपसर्ग
३४ मी,
३२ दोषरहितवंदना, ४ विकथारहित
३५ मी., ३३ आशातना ३ वीर्याचार
३६ मी,
४ आचारसंपद् ४ श्रुतसं०४ शरीरसं०४
वचनसं०४ वाचनासं०४ मतिसं०४प्रयो-
गमतिसं०४ संग्रह परिज्ञासंपद् ४ विनय
आचार; श्रुत विक्षेप, तदोषप्रतिघात
आ छत्रीशीओमां अप्रशस्त भावथी निवृत्ति
अने प्रशस्त भावमा प्रवृतिरूप गुणो समजवा.
॥ श्री उपाध्याय गुणनी २५ पच्चीशीओ ॥
१ पचीशी ११ अंग, १४ पूर्व,
११ अंग, १२ उपांग १ चरणसि०, १ करणसिक
१४ ज्ञानाशातना वर्जन, ११ सुवर्णगुणाख्यान,
१३ क्रियास्थानवर्जन, ६ द्रव्य, ६ काय.
* १४ गुणस्थान, ११ श्रावकप्रतिमा.
२
३
४
"

श्री उपाध्याय गुणनी २५ पच्चीशीओ ॥ . :( ३८७) '७ १० . ११ १२ २५ भावना [५ महाव्रतनी] भावे २५ अशुभ भावनावर्जन. ८ प्रकारी पूजा; १७ प्रकारीपूजानी प्ररूपणा; २३ इन्द्रियविषयवर्जन १ शुभ; १ अशुभ अग्रहण. २१ मिथ्या भेदप्ररूपण ४ प्रकारनासंघमांकरे, १४ जीवसेद; ८ भांगा; [ज्ञान-ग्रहण-पालन- ना] ३ अंगादिपूजा प्ररूपण ८ अनंत; ८ पु० पुरावत; ९ निदान ९ तत्व; ९ क्षेत्र, ७ नय ४ निक्षेप,४ अनुयोग;४ धर्मकथा; ४ विकथा; ४ दानादि, ५ कारण; ५ शान;५ व्यवहार; ५ सम्य०,५ प्रवचनांग, ५प्रसाद, १२ व्रत, १० रुचि, ३ विधिवाद, ३ हिंसा, ३ अहिंसा, १९ काउसग्गदोष, ८ आत्मा,८ प्रव० माता, ८ मद, १श्रका R '१५ " १९

.
२०
"
2
(३८८)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
२१ श्रावकगुण, ४ वृत्तिप्रवत्तना
३ अतत्त्व, ३ तत्व,३ गारव,३ शल्य,६ लेश्या,
३ दंड, ४ कारण,
२२ ,, २० स्थानक (जीनपदार्जव ) ५ आचार,
२३ १२ अरि० गुण ८ सिध्धगुण ५भक्तिनी एकता.
२४ १५ सिध्यभेद १० त्रिक
२५ १६ आगार ९ संसारी जीव
आ गुणोनी पच्चीशीओमा अप्रशस्त भावथी
निवृत्ति अने प्रशस्त भावमा प्रवृत्ति समजवी.
८
.
"
॥ श्री साधु गुणनी २७ सत्तावीशीओ ॥
- -
सत्तावीशी-
१ ली, ६ व्रत, ६ कायरक्षा,५ इन्द्रिय, १ लोभनिग्रह,
क्षमा, १ भावशुद्धि, १ पडिलेहणशुद्धि,१ संयम,
३ अकुशलयोगरोध,१ शीतादिसहन,१ मरणांत
उपसर्गसहन.
१

4
,
.
श्री साधु गुणनी २७ सत्तावीशीओ। (३८९)
२ जी उरग-गिरि-आग्नि-सागर-गगन-तरु-भ्रमर-मृग-. :
धरणि-कमळ-सूर्य-पवन-विष-तिनिश-वायु---
जुल-कर्णिकार-उत्पल-भ्रमर-उंदर-नट विगेरे.
३ जी २५ महावतभावना, २ द्रव्य भाव भेदथी
४ थी २५ अशुभ भावना, २ राग द्वेष वडे
५ मी १० श्रमणधर्म, ९ ब्रह्मगुप्ति, ८ प्रव० माता
६ ठी ८ वे शुभध्यानना भेद, ३ ज्ञानादि, १६ मै-
त्र्यादि भाव० ( दरेकना ४--४) भेद :
७ मी ८बे अशुभ ध्यान भेद, १६ कषाय, ३ ज्ञा-
नादिविराधनत्याग
८ मी ७ पिंडेषणा, ७ पानैषणा, ७ सप्तसप्तिका,
६ अशुभभाषा
९ मी १० सत्यवचन, १७ संयम,
१० मी १२ तप, १४ काम, १ असंयमनिग्रह
११ मी १० एषणादोष, १६ उत्पादनदोष,अद्धिभाव
२२ मी १६ उद्गमादिदोष, ५ आश्रव, ५ मंडलिदोष,
१ मनसहित
.
.
--

;
(३९०)
नवपदा विधि विगेरे संग्रह।
१३ मी १५ शिक्षास्थान, १२ भिकुप्रतिमा
१४ मी ८ वसतिदोष, ८ प्रमाद, ८ मद, ३ गारव
१५ मी १० विनय, ५ वरण, असत्यमृषा १२
१६ मी ११ अंग, १२ उपांग, ४ अभिग्रह
१७ मी १० सामाचारी, आवश्यकादि १०, २ शिदा,
५ स्वाध्याय,
१८ मी १८ हजारशीलांग, ९ निदान
१९ मी ३ अशुभ लेश्या, १८ ब्रह्मचर्यभेद, ३ शल्य,
३ दंड.
२० मी ८ पडिलेहणा, ८ गोचरी, दृष्टि, ३ शुभलेश्या
२१ मी १५ भावना, ४ शय्या (शुभ), ७ भयत्याग,
४ दुखशय्यात्याग
२२ मी १० प्रत्याख्यान, ११ विगय, ६ आवश्यक
२३ मी ४ दिव्यादि ( उपसर्ग), २२ परिषह, ए २
मां धीरता
२४ मी १ जिनकल्प, १ स्थ-कल्प, १० अचेलादि-
कल्प, ५ चारित्र, १० प्रायश्चित्त

मन्हजिणाणं सज्झाय ॥ (३९१)
२५ मी २० असमाधि, ७ विभंगस्थान
२६ मी २१ शबळ, ते करण-मतिथी २ ४ असंवर
२७ मी ५स्थावर,१श्वान,रासभ,१कुर्कट-१कर-१दीपक-
सुवर्ण-मुक्ता १हंस,अंबुज,पोत,श्रीफळ,श्वंस,
शंख,तुंवक, चंदन,१अगुरु,१मेघ, चंद्र, वृषभ,
गजेन्द्र, मृगन्द्र. १सूर्य सरखा.
आ गुणोमां अप्रशस्तभावथी निवृत्ति अने प्रश-
स्तभावमा प्रवृत्ति स्वरूप गुणो समजवा.
मन्हजिणाणं सज्झाय.
मन्हजिणाणं आणं, मिच्छं परिहरह धरह सम्मत्तं ॥
छविह-आवस्सयंमि, उज्जुत्तो होश पइदिवसं ॥१॥
भावार्थ-हे भव्य श्रावक ? श्रीजिनेश्वर भगवाननी आज्ञा
मान्य, मिथ्यावनो त्याग करय, सम्यक्त्व धारण करय, छ प्रका-
रना आवश्यकमां प्रति दिवस उद्यमवंत था.१
पव्वेसु पोसहवयं, दाणं सीलं तवो अ भावो अ॥ .
सज्झायनमुक्कारो, परोवयारो अ जयणा अ॥२॥

(३९२) नवपद विधि विगेरे संग्रह । भावार्थ-पर्व दिवसने विषे पोसह व्रत करय, दान, शील, तप अने भावना, स्वाध्याय, नमस्कार अने परोपकार करय, तथा जयणा राख्य. २. जिणपूआ जिणथुणणं, गुरुथुअ साहम्मिआण वच्छवं॥ ववहारस्स य सुद्धा, रहजत्ता तित्थजत्ताय ॥३॥ भावार्थ-जिनेश्वर भगवान्नी पूजा, जिनेश्वर भगवाननी स्तुति, गुरुनी स्तुति, अने साधीने विषे वात्सल्य, व्यवहारनी शुद्धि, रथयात्रा अने तीर्थयात्रा. ३. उक्सम विवेगसंवर, भासासमिइ छजीवकरुणा य॥ धम्मिअजणसंसग्गो, करणदमो चरणपरिणामो ॥४॥ भावार्थ-उपशम, विवेक संवर, भापासमिति अने छकाय जीवनी दया, धार्मिक माणसनो सत्संग, इंद्रियोनुं दमन अने चारि- जना परिणाम राखवा (आ सर्व क्रियाओ करवी.) ४. संघोवरि बहुमाणो, पुत्थयलिहणं पभावणा तित्थे । सहाण किच्चमेअं, निच्चं सुगुरुवएसेणं ॥५॥ भावार्थ-श्री संघ उपर बहुमान राखg, पुस्तक लखाववां अने तीर्थनी प्रभावना करवी. श्रावकनां आ कृत्यो छे, ते निरंतर सद्गुरुना उपदेशथी जाणवां. ५ इति. इति श्रावक दिनकृत्य सज्झाय.

संथारा पोरिसी विधि सूत्र
(३९३)
॥ अथ संथारा (पोरिसी) विधिसूत्र ।।
निसीहि निसीहि निसीहि, नमो खमासमणाणं
गोयमाइणं महामुणीणं ।।
अर्थ-पाप व्यापारनो त्याग करीने वार त्रण] म्होटा मुनि-
गो एवा गौतमस्वामी विगेरे क्षमाश्रमणोने नमस्कार थाओ.
अणुजाणह जिहि (8) ज्जा ! अणुजाणह पर-
मगुरु ! गुरुगुणरयणेहिं मंडियसरीरा ! बहुपडिपुन्ना
पोरिसि, राइयसंथारए ठामि ॥१॥
अर्थ-हे वृद्ध वडिल] साधुओ ! आज्ञा आपो, म्होटा गुण-
रूप रत्नोवडे मुशोभित छे शरीर जेनां एवा हे श्रेष्ट गुरुओ ! आज्ञा
आपो ! पोरिसि लगभग संपूर्ण थइ छे. हुं रात्रि संबंधी संथारो
करु छु. १.
अणुजाणह संथारं, बाहुवहाणेणं वामपासेणं ॥
कुक्कुडिपायपसारण, अतरंत पमज्जए भूमि ॥२॥

(३९४)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
संकोइए संडासा, उव्वदृते अ कायपडिलेहा ॥
दव्वाइउवओगं, उसासनिरंभणालोए ॥३॥
अर्थ-संथारानी आज्ञा आपो ! [गुरु महाराज आज्ञा आपे
एटले] हाथने ओशीकुं करीने डावा पडखे, कुकडीनी पेठे आका-
शमां पग प्रसारवाने असमर्थ छतो जमीनने पुंजे [ पुंजीने त्यां पग
राखे छे ] अने ढींचणो संकोचीने मूवे अने पासुं फेरवतां शररिनु
पडिलेहण करे. वळी [जागवू होय त्यारे] द्रव्यादिनी उपयोग
करे [तेम छतां निद्रा उडे नहि तो] श्वासोश्वास रुंधीने [निद्रा दूर
करवाने जता आवता लोकोने] जुए छे. २-३
जइ मे हुज्ज पमाओ, इमस्स देहस्सिमाइरयणीए।
आहारमुवहिदेह, सव्वं तिविहेण वोसिरिअं॥४॥
अर्थ-जो आ रात्रिने विषे मारा आ शरीरचं मरण थाय तो
आहार, उपकरण अने शरीर वगेरे सर्व त्रिविधे करीने सघळु [मन,
वचन अने कायावडे ] वोसराव्युं छे. ४
चत्तारि मंगलं-अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू
मंगलं, केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगलं ॥५॥

पोरिसी विधि सूत्र ॥
(३९५)
अर्थ-चार मने मंगळरूप छे-अरिहंतो मांगलिक छे, सिद्धो
मांगलिक छे, साधुओ मांगलिक छे अने केवळीए प्ररूपेल धर्म
[श्रुत अने चारित्ररूप] मांगलिक छे. ५
चत्तारि लोगुत्तमा-अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लो--
गुत्तमा,साहू लोगुत्तमा, केवलिपन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमो।
अर्थ-चार लोकने विषे उत्तम छे-अरिहंतो लोकमां उत्तम.
छे, सिद्धो लोकोमा उत्तम छे. साधुओ लोकमां उत्तम छे अने के-
वलिए प्ररुपेल धर्म लोकमां उत्तम छे. ६
चत्तारि सरणं पवज्जामि-अरिहंते सरणं पव--
ज्जामि, सिके सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पवज्जामि,
केवलिपण्णत्तं धम्म सरणं पवज्जामि ॥७॥
"
अर्थ-हुं चारने शरण तरीके अंगीकार करूं छु-अरिहंतोने
शरण अंगीकार करुं छु, सिद्धोने शरण अंगीकार करुं छु. साधु-
ओने शरण अंगीकार करुं छु अने केवलिए प्ररूपेल धर्मने शरण.
अंगीकार करुं छु. ७.
पाणाइवायमलिअं, चोरिक्कं मेहूणं दविणमुखं ।
कोहं माणं मायं, लोभं पिज्जं तहा-दोसं॥८॥

(३९६) नवपद विधि विगेर संग्रह। - कलहं अभक्खाणं, पेसुन्नं रइअरइसमाउन्तं । परपरिवायं माया--मोसं मिच्छत्तसलं च ॥ ९ ॥ अर्थ-प्राणातिपात [हिंसा], मृपावाद, चोरी, मैथुन [ सी सेवन], द्रव्य [धन-धान्यादि पौद्गलिक वस्तु नी मूछी, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग तेमज द्वेप, क्लेश, अभ्याख्यान [परने आळ देवू], चाडी अने रति अरविवडे युक्त, परपरिवाद. मायामृ- पावाद अने मिथ्यात्वशल्य. ८-९ वोसिरिसु इमाई मुक्खमग्गसंसग्गविग्धभूआई। दुग्गइनिबंधणाइं अट्ठारस पावठाणाई॥१०॥ अर्थ-मोक्षमार्गना गमनने विपे अंतराय करनारा अने माठी गतिना कारणभूत एवा ए पूर्वोक्त अढार पापस्थानोने [हे आत्मा!] तुं बोसराव [त्याग कर]. १० एगोहं नरिथ मे कोइ, नाहमन्नस्स कस्स। एवं अदीणमणसो, अप्पाणमणुसासइ ॥११॥ अर्थ-हुं एकलो छ, म्हारं कोई नथी, हु अन्य कोइनो नयी; 'ए प्रकारे अग्लान चित्तवाळो [ सावधान चित्तवाळा] आत्माने ॥ आपे. ११

पोरिसी विघि सूत्र ॥
(३९७)
एगो मे सासओ अप्पा, नाणदंसणसंजुओ
सेसा मे वाहिरा भावा, सव्वे संजोगलख्खणा ॥१२॥
अर्थ-शाश्वतो [सदा काळ-नित्य रहेनारो] अने ज्ञान दर्शन
युक्त, एक मारो आत्मा छे, वाकीना संयोग लक्षणवाळा सर्व भावो
माराथी बाह्य अर्थात् माराथी जूदा छे. १२
संजोगमूला जीवेण, पत्ता दुक्खपरंपरा ।
तम्हा संजोगसंबंध, सवं तिविहेण वोसिरिअं॥१३॥
अर्थ-संयोग (धन कुटुंवादिक) छे मूळ कारण जेनुं एवी
दुःखनी श्रेणी जीवे प्राप्त करी छे ते माटे संयोग संबंध में त्रिविधे
(मन, वचन, कायाए ) वोसिराव्यो छे. १३
अरिहंतो मह देवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो।
जिणपण्णत्तं तत्तं,इअ सम्मत्तं मए गहिअं॥१४॥
अर्थ-यावज्जीव सुधी अरिहंत म्हारा देव छे, साधुओ म्हारा
गुरु छे, वीतराग देव प्ररुपेल तत्त्व (धर्म) मने मान्य छे, ए प्रकारे
सम्यक्त्वने में ग्रहण कर्यु छे. १४
खमिअ खमाविअ,मइ खमिअ, सबह जीवनिकाय ।
सिद्धहसाख आलोयणह, सुज्झह वइरन भाव ॥१५॥

(३९८) नवपद विधि विगेरे संग्रह। अर्थ-सर्व जीव निकायोने खमावीने अने खमीने हुँ ( कई छु के) मारा सर्व अपराधो खमो. सिद्धनी साक्षीपूर्वक हुँ आलोचना करुं छं, मारे कोइनी साथे वैरभाव नथी. १५ सव्वे जीवा कम्मवस, चउदहराज भमंत । ते मे सव्व खमाविआ, मुज्झवि तेह खमंत ॥१६॥ अर्य-सर्व जीवो कर्मवशथी चौद. राजलोकने विषे भमे छे ते सर्वने में खमाच्या छे. मने पण तेओ खमे. १६ -- जं जं भणेण बद्धं, जं जं वाएण भासिय पावं। जं जं काएण कयं, मिबामि दुक्कडं तस्स ॥ १७ ॥ अर्थ--जे जे पाप मनवडे बंधायु, जे जे पाप वचन वडे बोलायु अने जे जे पाप कायावडे. करायुं छे ते मारुं ( सर्व ) पाप फोगट थाओ अर्थात् ते पापनो मिच्छामि दुक्कडं दउं . १७ ॥ देव वांदवानी विधि. ॥ प्रथम खमासमण दइ, इरियावही पडिक्कमी ‘लोगस्स कही, उत्तरासण नांखीने खमा० इच्छा० चै- .: देव वांदवानी विधि ॥. (३९९) 'त्यवंदन करूं ? इथं कही चैत्यवंदन करी नमुत्युणं अने जयवीयराय [आभवमखंडा सुधी] कही, खमा० दइ चैत्यवंदन करी, नमुत्थुणं कही ऊभा थइ अरि- हंत चे० अन्नत्थ० १ नवकार काउ० पारी नमोऽर्ह० पहेली थोय कहेवी, लोगस्स० सव्वलोये० १ नवका- रकाउ० बीजी थोय. पुख्खरवरदी० सुअस्स० १ नव- कारकाउ० त्रीजी थोय. सिद्धाणं बुद्धाणं. वेयावच्च० १ नवकारकाउ० पारी नमोऽर्हत् चोथी थोय कही बेसीने नमुत्थुणं कहीने बीजी वार पूर्वनी माफक चार थोइओ कहेवी; पछी नमुत्थुणंजावंतिचे खमा० जावंतकेवि० नमोऽहत्० कही स्तवन (उवसग्गहरं अथवा बीजुं) कहे, अने जयवीयराय अरधा (आ भवमखंडा सुधी) कहेवा. पछी खमा० दइ चैत्यवंदन करी, नमुत्युणं कहीने जयवीयराय संपूर्ण कहेवा. त्यारपछी विधि करतां अविधि थइ होय तेनो मि- च्छामि दुक्कडं दइने. प्रभातना देववंदनमां छेवटे -सज्झाय कहेवी [ बपोरे तथा सांजे न कवी ] ते स-

(४००)
नवपद विधि विगेरे संग्रह।
ज्झायने माटे एक खमा० दइ इच्छा० सज्झाय करूं
इहं कही नवकार गणी उभडक पगे वेसी एक जण
मन्हजिणाणंनी सज्झाय कहे. (त्यारपछी नवकार
न गणवो)
A
॥ इति नवपद विधि विगेरे संग्रह ॥

Navapadamaya Shrisiddchakradhan-vidhi Vigere Sangrah

Author
Maharaj, Vijnemi Suri
Title
Navapadamaya Shrisiddchakradhan-vidhi Vigere Sangrah
File name
Navapadamaya Shrisiddchakradhan-vidhi Vigere Sangrah
Text
OCR done
Published
2009/11
Publisher
Ahemadabad, Maneklal Bhai Mansukh Bhai
Language
Sanskrit
Pages
399
Library
Sanmati Library
Classification
Jain sahitya
DLI number
344404
Barcode
99999990234269.00
Scanning centre
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