Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sri Yajnavalkyasmriti
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श्रीः। अथ याज्ञवल्क्यमिताक्षराप्रकाशस्थविषयानुक्रमणिका । सं. विषय. पृष्ठ. १२ २० मार्जन .... .... " .... " .... .... .... विषय. पृष्ठ. प्रथमोऽध्यायः अध उपोदात प्रकरण || १॥ १ टीकाकारका मंगलाचरण १ २ मुनियोंका प्रश्न. २ छःप्रकारका धर्म २ ४ धर्मके चौदह स्थान.. ३ ५धर्मशास्त्रके प्रयोजक ऋषियों " .... .... .... " .... .... १३ " के नाम .... .... " " २१ प्राणायाम. २२ सूर्योपस्थान - २३ प्राणायामका लक्षण. २४ गायत्रीजपविधान २५ संध्या. २६ अग्निहोत्र २७ गुरुवृद्धादिकोंको नमस्कार, २८ स्वाध्यायका अध्ययन २९ अध्याप्योंका लक्षण.... ३० दंडादिकोंका धारण.... ३१ भैक्षचर्या ३२ भोजन विधि ३३ मधुमांसादि वर्जन ३४ गुरुतथा आचार्योका लक्षण ३५उपाध्याय तथा ऋत्विक .... ६ धर्मके लक्षण.... ७ धर्मके हेतु ८ मुख्यधर्म ९ कारक हेतुमें अथवा ज्ञापक .... .... .... ..." " .... .... .... १५ .... .... " इन्होंका लक्षण ७ .... " .... .... 11 देतुमें संशय होयती तहां निर्णय.. इति सपोद्धात प्रकरण ॥१॥ अथ ब्रह्मचारि प्रकरण ॥२॥ १० चारों वर्ण १११ गर्भाधानादिसंस्कार... १२ संस्कार करने में फल.... '१३ ब्राह्मणादिकोंके उपनयनका काल १४ गुरुके धर्म १५ शौचाचार । १६ तीर्थ 1 १७ आचमनविधि १८ स्थानविशेषपरत्वसे शुद्धि १९ स्नान. १२ " ... .... . ३६ वेदग्रहणके अर्थ ब्रह्मचर्यको अवधि ३७ उपनयन कालकी परमावधि ३८ नात्य लक्षण. ३९ द्विजत्वका हेतु १८ ४० वेदका ग्रहण और अध्ययन- का फल ४१ काम्य ब्रह्मयज्ञके अध्ययनका .. .... ..." .... .... or 11 " .... .... .... .... .... .... " ० .... .... ४२ स्वाध्यायसे पृथ्वीदानका फल २० '४३ नेष्टिक ब्रह्मचारीका लक्षण " ....
(२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितकी सं० सं० .... .... ३७. -" ... ... .... .... .... " .... .... " .... .... .... .... .... " .... .... " " " .... .... . विषय. पृष्ठ ४४ ब्रह्मचर्या श्रमका फल इति ब्रह्मचारिप्रकरण ॥३॥ अथ विवाहप्रकरण ॥ ३ ॥ १५ गुरुदक्षिणा ४६ समावर्तन ४७ विवाहयोग्य स्त्री ४. विवाहमें असापिंडयादिकसे परीक्षित स्त्री.... २२ ४९ विवाह योग्य पुरुषकी परीक्षा. २४ ५.शुद्रस्त्रीसें विवाहका निषेध.... २५ ५१ विवाहका क्रम २६ ५२ ब्राह्म विवाहका लक्षण ५३ देवविवाहका लक्षण ५४ आप विवाहका लक्षण ५५ प्राजापत्य विवाहका लक्षण २७ ५६ आसुर, गांधर्व, राक्षस, और पैशाच विवाहका लक्षण ५७ सवर्णादिकोंके विवाहमें विशेष ५८ कन्या दाताओंका क्रम ५९ कन्याहरणमें दंड ६० अन्यपूर्वाका लक्षण २९ ६१ नियोगविधि ६२ व्यभिचारिणीकी व्यवस्था ६३ द्वितीयविवाहके हेतु ३० । ६४ धामणी विधवाकी प्रशंसा ६५ अधिवेदनका कारण नहीं होवती अधिवेत्ताको कर्तव्य.... -/६६ स्त्रीधर्म ६७ शास्त्रीयदारसंग्रहका फल ६८ पुत्रोत्सत्त्यर्थ स्त्रियोंकी सेवा.... ६९ स्त्रीगमनमें वध । ७. स्त्रियोंका सत्कार ७१ स्त्रियोंका कर्तव्य विषय. पृष्ठ. ५२ प्रोषितभईकाके नियम ७३ स्त्रियोंकी अस्वतंत्रता ७४ अनेक भार्यावान्को कर्तव्य.... ४० ७५ मृतभार्य पुरुषको कर्तव्य इति विशह प्रकरण ॥ ३ ॥ अथ वर्णजाति विवेकमकरण ॥४॥ ७६ सजाति ७७ अनुलोमज ७८ प्रतिलोमज '७९ संकीर्णसंकरसे जात्यंतर ८० वर्णप्राप्तिमें अन्यकारण ८१ उत्तरोत्तरहीन वृत्तिसंजीवन... शीत वर्णजातिविवेकप्रकरण ॥ ४ ॥ अथ गृहस्थधर्मप्रकरण ॥ ५॥ ८२ कोनसे अग्निमें क्याकरनाइनका कथन.... -/८३ गृहस्थोंके धर्म ८४ दंतधावन ८५ निर्वाहकेवास्ते राजादिकोंका आअय ८६ वेदादिकोंका जप ८७ पंचमहायज्ञ ८८ भूतबलि ४९ ८९ पितर और मनुष्योंक अर्थ अन्नादान ९० भायर्या और पतिने सबको देकर शेष अन्नका भोजन करना ९१ अतिथियोंका भोजन ९२ भिक्षुसंन्यासी आदिकोको भिक्षादान .९३ श्रोत्रियका सत्कार ९४ स्नातकादिकों को प्रतिवर्ष में अध्यदान ५२ " .... .... 1 " " .... .... .... 21 " .... .... .... .... ५० .... " .... .... .... " .... .... mm- " .... ....
विषयानुक्रमणिका। New " .... .... " " .... " .... .... .... ... .... .... सं. विषय पृष्ठ. सं० विषय. पृ. परपाकर रुचिका निषेध પુર १२० क्रव्याद पक्ष्यादिकांका वजन.... ७७ सीयसंध्यादि शयनपर्यंत कृत्य ५३ १२१ पलांड आदिकोंका वर्जन ९७ ब्राह्ममुहूर्तमें अपने हितका ११२२ पंचनखादिकोंके मांसका चिंतन.... भक्षणकरनेका विधि ४९८ मानदेने योग्य पुरुष ५४ /२२३ वृथा मांसभक्षणकी निंदा ९९ वृद्धादिकोंको मार्ग देना १२४ मांसवर्जन विधि १०० द्विजातियोंक कर्म इति भक्ष्याभक्ष्यप्रकरण ॥ ॥ १०१ क्षत्रिय वैश्योंके कर्म १०२ शूद्रका कर्म . ५६ द्रव्य शुद्धिकरण ॥ ८॥ १०३ साधारण धर्म.... १२५ सौवर्णादि पात्रोंकी शुद्धि १०४ श्रीतकम ५७ १२६ यज्ञ पात्रादिकोंको शुद्धि १०५ नित्य श्रोतकर्म १२७ सहलेप पदार्थोकी शुद्धि ८३ १०६ यज्ञके अर्थ होनोंसें भिक्षा १२८ भूमिशुद्धि लेनेका निषेध १२९ गोमाता अन्नादिकोंकी शुद्धि.... ८६ १०७ धान्यादिकोंके संचयका उपाय ५९ १३० लाखशीशाआदिकोंकी शुद्धि ८७ इति स्वधर्मप्रकरण ॥५॥ १३१ अमेध्यसे दूषित पदायोंकीशुद्धि अय सातकधर्मप्रकरण ॥ ६ ॥ २३२ उदक मांसादिकोंको शुद्धि १३३ अग्नि आदिकोंकी शुद्धि १०८ स्नातकोंक व्रत १३४ स्नान पानके अनन्तर शुदि.... ९. १०९ राजादिकांसे धनका अग्रण.... ६६ । १३५ मार्गस्थ जलकी शुद्धि ११० उपाकर्म करनेका काल दयदि प्रमाण ॥८॥ १११ उत्सर्जन काल.... दान प्रकरण ॥ ९ ॥ ११२ अनध्याय ११३ स्नातकोंको निपिद्ध और विधेय १३६ दानपानवामगप्रशंसा ९२ १३७ सत्तामा गफालक्षग ११४ अभीज्योंके यहां भोजननिषेध '७२ १८ ससानको गोआदिकादान ११५ दासादिकाँका अन्न भोज्यद १३१ प्रतिमहका निध.... ऐसा कथन ... १४० दानमें विशेष पनि पानफारम प्रमाण ॥६॥ १४१ गोदान में विशेष १४२ गोदानका पद मय भश्यामभ्यमकरण || ॥ १४३ उभयतामुखी गांक दानका ११६ वर्य अन्न ११७ पर्युषितालामा प्रतिमसव १४४ उभयतो मुखीका समग.... ११८ वयं दुग्ध १४५ सामान्य गोदानका फल.... ११९ हवि आदिका का वर्णन १४६ गोदानके समान... " ... " .... .... ... " .... .... .... ५ ... .... " " .... " ७३ ....
(४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहितकी पृष्ठ. " ..... .... १२२ ... " . .... १२७ " .... १२८ " " " .... सं० विषय. पृष्ठ. सं० "विषय. १४७ भूमी आदिकोंके दानका फल ९५ १७५ भोज्यं विशेषसें फल विशेष.... १४९ गृहादिकोंके दानका फल.... १७६ गयाश्राद्धका फल ..: १४९ वेददानका फल १७७ तिथि विशेषसें फल विशेष १५० प्रतिग्रहन करनेसें दानका फल १७८ नक्षत्र विशेषसें फल विशेष. १५१ प्रतिग्रहके निषेधका अपवाद इति श्राद्धप्रकरण ॥१०॥ १५२, प्रत्याख्यान अयोग्य.... १५३ प्रतिग्रह निवृत्तिका अपवाद.... अय गणपतिकल्पप्रकरण ॥ ११ ॥ इति दान प्रकरण ॥ ९ ॥ १७९ विनकारक हेतु १२६ १८० विघ्नज्ञापक स्वमादि हेतु अथ श्राद्धमकरण ॥ १०॥ १८१ विघ्नज्ञापक प्रत्यक्ष हेतु १५४ श्राद्ध शब्दका अर्थ और १८२ विनशांत्यर्थ कर्म श्राद्ध काल .... ९८/१८३ स्नान.. १५५ पार्वणतथा एकोद्दिष्ट श्राद्धका १८४ उपस्थानमंत्र.... लक्षण.... १८५ बलिप्रदान १२९ १८६ अंबिकोपस्थान १५६ तीन प्रकारका आद्ध १८७ ब्राह्मण भोजन १५७ श्राद्ध में ब्राह्मण संपत्ति ९९ १८८ ग्रहपूजा १५८ श्राद्धमें वयं ब्राह्मण..... १५९ पार्वण आद्धका प्रयोग इति गणपतिकल्पप्रकरण ॥१॥ १६० अनी करण अथ ग्रहशांतिप्रकरण ॥ १२ ॥ १६१ अन्ननिवेदन १०८ १८९ ग्रहयज्ञविधान १३२ १६२ विकिरदान १०९ १९० नवग्रहोंके नाम १६३ पिण्डदान ११० १९१ नवग्रह मूर्तियोंके द्रव्य १६४ अक्षय्योदकदान १९२ नवग्रहकि ध्यान १६५ स्वधावाचन १९३ नवग्रहोंके मंत्र १३३ १६६ आशी प्रार्थन १९४ नवग्रहोंके समिधा १६७ ब्राह्मणविसर्जन १९५ नवग्रहोंके होमार्थ आहुतियों ( १६८ वृद्धिश्राद्ध की संख्या १६९ एकोद्दिष्ट आद्ध १९६ नवग्रहेकि पात्र १७० नवश्राद्ध १९७ नवग्रहोंकी दक्षिणा और १७१ सपिण्डीकरण.... भोजन १७२ उदकुंभाद्ध १९८ दुष्टग्रहोंकी पूजा १७३ एकोद्दिष्टश्राद्धके काल इति प्रशांति प्रकरण ॥ १२॥ .१७४ नित्यमाद्धके विना सर्व प्रा. अय राजधर्मप्रकरण ॥ १३ ॥ द्धोंमें पिंड प्रक्षेपका स्थल १९९ अभिषिक्त राजाके धर्म .... .... १३१ .... " २०१ .... .... .... .... " " " .... " " .... .... .... .... .... .... " १२३ " .... .... ....
विषयानुक्रमणिका। विषय.' पृष्ठ. .... १४७ .... .... 4. " .... .... ... .... .... .... .... " .... " .... .... .... .... " .... .... .... " .... .... " " .... .... पृष्ठ. विषय. राजाकै अठारह व्यसन २२८ सामादिक उपाय २०१वाजाके मंत्री २२९.संधी आदिकोंके गुण १४८ २०२ शनाकेपुरोहित २३० शत्रुपर चढाई करनेका समय २०३ यज्ञादिकोंमें ऋत्विक १३० २३१ देव और पराक्रम इन्होंका २०४ ब्राह्मणोंको धन देनेमें विशेष विचार २३२ देव और पराक्रममें मतांतर १४९ २०५ धनरक्षणका प्रकार २३३ लाभके प्रकार २०६ लेख्यकरण २३४ राज्यके अंग.... १५० २०७ लेख्यकरणका प्रकार २३५ दुर्वृत्तोंको दंड करना २०८ राजाके रहनेकी जगह २३६ भन्यायदंडका निध २०९ राजाके अधिकारी १४. २३७ दंडयोग्यको दंडसें फल १५१ २१० पराक्रमसें संपादित द्रव्यके २३८ प्रसरेणु आदिक परिमाण १५२ दानका फल २३९ रजतमान २११ युद्ध में मरणसे स्वर्गफल १४१ २४० ताम्रमान २१२ शरणागतका रक्षण... २४१ दण्डमें स्वशास्त्रीय परिभाषा १५४ २१३ लाभ और खर्चका देखना .... १४२ २४२ दंडके भेद २१४ सुवर्णको खजानामें नमा २४३ दंडव्यवस्थाके निमित्त करना.... इति राजधर्मप्रकरण ॥१३॥ २१५ तीन प्रकारके दूत इति आचाराध्याय ॥१॥ २१६ स्वच्छंद विहार और सेनाको देखना अय व्यवहाराध्याय ॥२॥ २१७ चारोंका गुप्त भाषण सुनना २४४ व्यवहारका लक्षण २१८ राजाके सोनेका प्रकार २४५ सभासदोंका लक्षण.... २१९ प्रजापालनका फल .... १५४ २४६ सभासदोंकी संख्या २२० ठग और चोरोसें मजाका रक्षण २४७ व्यवहारके देखनमें अनुकल्प १५८ २२१ प्रजाका रक्षण न करनेसे दुष्ट २४८ सभासदोंको दंड १५९ १४५ २४९ व्यवहार लक्षण २२२ राष्ट्राधिकारीकी चेष्टा जानना २५० अठारह व्यवहारपद १६० २२३ रिसवतलेनेवालोंको दंड १२५१ वादीके भागे लेख्यादिक क- २२४ अन्यायसे प्रजाके पास कर रना .... लेनका दोष २५२ श्रुत भयंका उचर लिखना १६४ २२५ देशाचारादिकाका रक्षण २५३ उत्तरके चार भेद २२६ मंधका क्षण २५४ चार प्रकारका मिप्पा टचर १६५ २१७ शल्याका चिंतन २५५ साधनके निर्देशकाविचार " .... " .... " ... .... १५६ " .... .... " .... " ... .... .... " ... " .... " " " ...
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितकी .... " .... .... " " " .... .... .... .... सं० विषय, पृष्ठ. २५६ व्यवहारके चारपाद इति साधारण व्यवहारमालका प्रकरण ॥१॥ अथ असाधारण व्यवहारमातृका प्रकरण ॥ २॥ २५७ प्रत्यभियोग २५८ अर्थिक विषयमें विचार २५९ एक अभियोगमें अनेक द्रव्यों के निवेशका निषेध.... २६० तहां उदाहरण २६१ अभियोगके निर्णय विना प्रत्य- भियोगका निषेध २७० २६२ प्रतिभू (वकील). २६३ प्रतिभूके अभावमें निर्णय २६४ निह्नवमें प्रतिभूका कर्त्तव्य.... १७१ २६५ मिथ्या अभियोगमें दंड २६६ कालविलंबका अपवाद २६७ दुष्ट अभियोगी और साक्षीका लक्षणं १७२ २६८ अनाहूतके भाषण में दंड २६९ धर्माधिकारीके पास दोनोके एकहीवारआने में किसकी क्रि- 'याकरना इसका निर्णय २७. सरतके व्यवहारमें निर्णय २७१ छलनिरसनका प्रकार २.२ छलानुसारी व्यवहारका लक्षण १७६१ २७३ व्यवहारके एकदेशके निन्हव " " .... .... सं. 'विषय. पृष्ठ २७८ धर्मशास्त्रअर्थशास्त्रका उदाह- रण .... १७७ २७९ आततायोके वधविषयमें निर्णय २८० द्विजातियोंके शस्त्रग्रहणमें नि- र्णय २८१ माततायी २८२ अन्य उदाहरण २८३ अन्यथा करने में प्रायाश्चित्त.... २८४ चारप्रमाण २८५ उन्होंके भेद. '२८६ मनुप्योको दिव्यप्रमाण लेने में निर्णय २८७ तहांउदाहरण २८८ दिव्यप्रमाण लेने में निषेध २८९ उसका अपवाद .२९लेख्यादिकोंकाभी कहांकहां नियम.... २९१ प्रमाणों के बलअवलमें विचार १७२ २९२ ऑधिआदिकोंमें पूर्वा उत्तरा क्रियाका निर्णय २९३ दसवीसवर्षीक उपभोगमें नि- र्णय २९४ अनागमके उपभोगमें दंड १८१ २९५ अस्वत्वके दानमें दंड २९६ दसवीस वर्षके उपभोगमें हा- निहोय तो वहां अपवाद २९७ उपनिक्षेपका लक्षण.... २९८ आध्यादिकोंके हर्ताको दंड.... २९९ दंडका परिमाण ३०० दंडके प्रकार.... ३०१ धनदेनकी अशक्तिमें दंडका प्रकार.... ३०२ उत्तम साहसदंडका स्वरूप ३०३ ब्राह्मणको वधदंडका निषेध " .... " " १७४ " .... जाननेका प्रकार .... .... " " " .... " " .... २७४ न्याय जानने में तर्क.... २७५ अनेक अर्थाके अभियोगमें निर्णय २७६ दोस्मृतियोंके विरोधमें निर्णय २७७ अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रोंके- विप्रतिपत्तिमें निर्णय.... " .... " .... " " विषयानुक्रमणिका ।। विषय. 1 " .... .... .... " .... " 1 " .... .... ११ " " " " " .... - ... .... .... .... .... .... पृष्ठ. सं. विषय. पृष्ठ. शिरोमुंडनादिदंड १८४ ३२७ निधिके प्राप्तिमें निर्णय अंकनमें व्यवस्था ३२८ ब्राह्मणकी निधिविषयमें नियम ३०६ चक्षुनिरोधशब्दका अर्थ ३२९ ब्राह्मणेतरके निधिप्राप्तिमें नि- ३०७ कैसा भोग प्रमाण है सोकथन १८५ र्णय ३०८ आगमनिरपेक्ष भोगका प्रामाण्य ३३० अनिवेदित निधिक विषयमें ३०९ अनागमके उपभोगमें दड निर्णय ३१० आगम सापेक्षक उपभोगमें दंड १८७ ३३१ निधिका स्वामी आनमें निर्णय १९३ ३११ तीनप्रकारका स्वीकार ३३२ वहां राजाका भाग ३१२ पुरुषकी व्यवस्थासें और ३३३ चौरहत द्रव्यके विषयमें निर्णय प्रामाण्य व्यवस्थासें आगम ३३४ चौरहत द्रव्यके अपहारमें विषयमें दंडकी व्यवस्था राजाको दोष ३१३ स्वीकारमें नियम २८८ ३३५ चौरहत द्रव्यकी उपेक्षामें ३१४ अभियुक्त मरने में निर्णय निर्णय ३१५ व्यवहारकी सिद्धिके वास्ते ३३६ चौरहत द्रव्यका दानकरने में व्यवहार देखनेवाली का बला निर्णय बल इति असाधारणदयाहारमा टकामकारण १२ ॥ ३१६ प्रबल हटव्यवहारके विषयमें निर्णय अय ऋणादानप्रकरण ॥ ३॥ १८९ ३१७ मत्तउन्मत्तादिकाने निीत ३३७ सातप्रकारकाऋणादान १९४ व्यवहारके विषयमें निर्णय ३३८ अधमर्णक विषयमें पांच प्रकार ३१८ गुरुशिष्य पिट पुन आदिकों ३३९ उत्तमर्णके विषयमें दोन प्रकार के व्यवहारके विषयमें निर्णय १९० ३४० मासमासमें वृद्धि (व्याण) ३१९ स्त्रीभोके व्यवहार विषयमें निर्णय ३४१ पणेक क्रमसें वृद्धिका निर्णय.... ३२२० स्वामिदासके व्यवहार विषयमें ३४२ चक्रवृद्धिकायिकादि वृद्धिका निर्णय.... प्रकार ३२१ अनादेयवादमें निर्णय ३४३ ग्रहीताके विशेपसे प्रकारांतर ३२२ गोपशांडिकादिको स्त्रियोंक २९५ व्यवहारमै निर्णय ३४४ कारित वृद्धि ३२३ लोटके द्रव्य देने का निर्णय.... ३४५ अकृतवृद्धि ३२४ तहां कालकी अवधि.... ३४६ याचितक विषयमें निर्णय ३२५ तहां राजाका भाग ३४७ याचितकके अदान में निर्णय.... ३२६ द्रव्यस्वामीके नहीं आनमें ३४८ अनाकारित वृद्धिका अपवाद निर्णय.... १९२ ३४९ द्रव्यविशेषसें वृद्धिका विशेष .... " " ... " का निर्णय .... } " " .... " ..." .... .... .... .... सें वृद्धि .... .... .. " .... ...
(८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहितकी 31 .... .... " .... " . १" .... " .... '' सं० विषय. पृष्ठ. ३६९ पुत्र पोनौने ऋणदेनेका निर्णय २०० ३७० प्राप्त व्यवहारके विषयमें निर्णय ३७१ प्राप्त व्यवहारमेंभी ऋणदानका 'निषेध.... २०१ ३७२ अर्जी और बुलानेका विषेध.... " ३७३ अरुणसें पिताको छोडने में निर्णय ३७४ श्राद्धमें बालककाभी अधिकार ३७५ विभक्तविषयमें निर्णय ३७६ अविभक्तके विषय में निर्णय.... ३७७ पुत्रके विषयमें ऋणदानका विशेष.... .... ३७८ पौत्रके विषयमें ऋणदानका विशेष.... ३७२ भणदिलाने में ऋणी उसका पुत्र और पोत्र इनके समवा- यकाक्रम ३८० परपूर्वादि स्त्रिपोंके स्वरूप ३८१ पुनर्मू और स्वेरिणी स्त्रियोंके लक्षण ३८२ योपिमाह ऋणदेने का अधि- " - .... .... - .... .... सं. विषय. पृष्ठ. ३५० दियेहुए द्रव्यका बहोत दिन रहने किस द्रव्यको कितनी वृद्धि यह कथन ३५१ रसादिकोंकी वृद्धि ३५२ वस्त्र धान्यादिकोंकी वृद्धि ३५३ पुरुषांतरमें संक्रामित किये द्रव्यके प्रयोगके विषयमें निर्णय १९७ ३५४ एकवार प्रयोगके विषयमें निर्णय.... ३५५ दिया आधन लेनका प्रकार.... ३५६ तहांधर्मादिक उपाय.... ३५७ राजानें अधमर्णसे कर्जा दिलानेका प्रकार ३५८ एकहीवार बहोत उत्तमर्ण आनसे किसको पहले दिलाना यह कथन ३५९ दुर्वल उत्तमणको न्यायके वास्तै द्रव्य दिलाना ३६० निर्धन अधणिकके विषयमें निर्णय.... • १९८ ३६१ दियेहुए द्रव्यका नहीं लेने में निर्णय.... ३६२ कुटुंयके वास्ते किये हुए ऋणक विषयमें निर्णय २६३ नहीं देने योग्य ऋण.. ३६४ पुषपात्रानभी नहीं देने योग्य मण ३६५ पतिनें कितनक. खियोंका ऋण देना ३६६ भापदिकों को अपनत्व वर्णन ३६७ फिरभी जोग देना जिसने देना यद वर्णन ३६८ फाल विशेषमें ऋगदानका निर्णय । .... २०२ " .... १ .... .... कारी .... .... .... " . .... " .... .३८३ ऋण स्त्रियोंने नदिया होता पु- घोंसें दिलाना ३८४ प्रातिभाव्य (इकट्टेमें किये हुए) ऋण और साक्ष्यका अविभ- क्ततामें निर्णय ३८५ स्त्रीपति इन्होंके अविभक्ततामें ऋगके विषय, निर्णय ३०६ पूर्तकौमें स्त्री पतिओंकापृथ- भधिकार.... २०५ ३८७ प्रातिमान्यका निरूपण ३८८ तीन प्रकारका मातिमान्य ३८९ दर्शन, प्रत्यप, भोर प्रति- मुफे विषयमें निर्भय .... .... " .... .... १ .... .... .... ... २०६ विषयानुक्रमीणका । विषय. M .... ... " .... 4 .... .... .... .... " .... " .... .... " .... " .... .... " . " .... .... .... सं० विषय. पृष्ठ. ३९० दान और प्रतिभूके विषयमें निर्णय.... ३९१ दर्शन और प्रतिभूके विषयमें निर्णय.... ३९२ दान और प्रतिभूके पौत्र वि- पयमें निर्णय .. ३९३ प्रातिभाव्यसें अतिरिक्त पिता- महके ऋणदेनेमें पौत्रका अ- धिकार ३९४ वृद्धि देने में निषेध ३९५ सबंधक प्रतिभूके विषयमें ऋणदेनेका प्रकार ३९६ प्रतिभूजामीन अनेक होनेमे ऋणदानका प्रकार ३९७ ऋणिकोंसे प्रतिभूको दुगुना द्रव्य दिलाना २०७ ३९८ प्रीतिसें दियेहुएको वृद्धिका निषेध.... २०७ ३९९ प्रहिभूदत्तके द्वैगुण्यमें अपवाद २०८ ४०० स्त्रीपशु आदिकोंके वृद्धि विषययें निर्णय ४०१ धान्य वृद्धिमे निर्णय ४४०२ वस्त्ररसविषयमें निर्णय । ४०३ प्रतिभूविशेषका निषेध ४०४ आधिका विधिवर्णन.... ४०५ आधिका लक्षण ४०६ दोपकारका आधि ४०७ चारप्रकारके आधिका विशेष ४०८ गोप्य आधिक भोगमे वृद्धि का निषेध ४०९ आधिके नाशमें निर्णय २११ ४१० तहां अपवाद.... ४११ आधिकीसिद्धि ४१२ द्विगुणधनमें आधि नष्ट होताह इसका अपवाद सं० पृष्ठ. ४१३ आधिछोडनेका प्रकार २१२ ४१४ प्रयोक्ता संनिहित न होने में निर्णय.... ४१५ अधमर्ण संनिहित न होने में निर्णय.... ४१६ भोग्याधिमें विशेष ४१७ फलभोग्याधिक विषयमें निर्णय.... इति ऋणादान प्रकरण ॥ ३॥ अथ उपनिधेि प्रकरण ॥ ४॥ ४१८ उपनिधिधरोर द्रव्यका लक्षण २१५ ४१९ उपनिधिके दानमें अपवाद ४२० उपनिधिक उपभोक्ताको दंड.... ४२१ पनिधि धर्मोका याचितका- दिकों में अतिदेश इति उपनिधि प्रकरण ॥४॥ अथ साक्षिप्रकरण ॥ ५॥ ४२२ साक्षिस्वरूपका वर्णन ४२३ साक्षिके भेद ४२४ कृतसाक्षी ४२५ अकृत साक्षी.... ४२६ लिखितादि साक्षियोंके भेदं ४२७ साक्षियोंके लक्षण और संख्या २१८ ४२८ दोषसे असाक्षी ४२९ भेदः असाक्षियोंका स्वरूप.... ४३० स्वयं आकर बोलने का स्वरूप ४३१ असाक्षी ४३२ एकसाक्षीके विषयमें निर्णय...." ४३३ चोर्यादिको वयं साक्षीको भी लेना ४३४ साशीका सुनाना ४३५ ब्राह्मणादिकोंमें सुनानेका नियम. ४३६ उसका अपवाद २२१ .... " .... ... .... " " " .... .... " .... " .... 1 " .... " .... .... ... .... ... " .... .... .... .... .... " .... . :11 ....
(१०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितकी .... " ... " " .... .... .... .... .... " .... ... " .... .... .... .... " .... .... .सं. विषय. पृष्ठ. सं० विषय.. पृष्ठ. ४३७ साक्षीको दूपण देनेका स्थल ३२१ ४६१ लेख्यकी समाप्तीमें अधमर्णकी ४३८ साक्षी सुनानेका प्रकार संमति ४३९ साक्षीको त्रास देनेमें निर्णय.... ४६२ लेख्यमें साक्षियोंका विशेष.... २३१. ४४० साक्षी नहीं कहे वहां कर्तव्य.... २२२ ४६३ लेखककी संमति .. ४४१ साक्ष्यके अनंगीकारमें निर्णय ४६४ स्वकृतलेख्यमें विशेष ४४२ कूटसाक्षियोंको दंड... ४६५ लेख्यमे आरूढ ऋणके ४४३ दोप्रकारके साक्षी हों तहां विषयमें विशेष निर्णय ४६६ बलात्कारकृत लेख्यमें विशेष २३२ ४४४ जयपराजय जाननेके विषयमें ४६७ उसका अपवाद निणर्य ४६८ जीर्णादिपत्रोंमें निर्णय ४४५ साक्षियोंका स्वभावोक्त वचन ४६९ देशांतरस्थ पत्र लानेकाकाला लेनेमे निर्णय.... वधि ४४६ साक्षीके वचनकी परीक्षा २२४ ४७० राजकीय पत्रके विषय में ४४७ क्रियाका बलाबल होनेक निर्णय विषयमें निर्णय ४७१ राजकीयजयपत्रके विषयमे ४४८ साक्षीके दोप जानने में निर्णय २२५ निर्णय ४४९ कूट मत विषय ४७२ सभासदोंके पत्रविषयमे ४५. साक्षियोंको दंड निर्णय ४५१ ब्राह्मणकूटसाक्षिके विषयमें ४७३ पांचप्रकारके हीन . पत्रके निर्णय २२७ विषयमें निर्णय ४५२ लोभादिकारणविशेपमें दंड ४७४ लेख्यसंदेहमे निर्णायक उपाय '१५३ ब्राह्मणको शारीरदंडका निषेध ४७५ लेख्यके पीछे लिखनेका प्रकार ४५४ साक्ष्यको छिपाने में दंड २२८/४७६ संपूर्ण ऋण देनमें कर्तव्यका ४५५ जाननेवालेको साक्ष्यके अनं- निर्णय २३५ गीकारमें निर्णय ४७७ ससाक्षिक सर्व ऋण देनमें ४५६ वर्णियोंके वध असत्यसाक्षि कर्तव्यका निर्णय की आज्ञा .... इति लेख्य प्रकरण ॥६॥ ४५७ असत्य भाषणमें प्रायश्चित्त.... अय दिव्य प्रकरण ॥ ७॥ इति साक्षि प्रकरण ॥५॥ अथ लेख्यमकरण ॥ ६॥ ४७१ शपथके प्रकार २३७ ४५८ दोप्रकारका लेख्य १८० दिव्यमें साधारण विधि ४५९ अन्यकृत लेख्यमें विशेष ४८१ दिव्यमें पूर्वाण्डादिक काल.... ४६० लेस्यमें संवत्सरादिकोंका ४८२ धट दिव्यका विधि निवेश ४८३ अग्मि दिव्यका विधि ... .... .... " .... " .. .... " " " .... .... " .... " ४७८ दिव्य मातृका .... .... .... " २३९ *...
विषयानुक्रमणिका । (११) पृष्ठ.. .... 1" .... .... .... .... " " .... ... " .... " .... .... " .... .... .... " " .... सं० विषय. पृष्ठ. विषय. ४८४ उदक दिव्यका विधि २५१ ५१० विषम विभागका निषे- ४८५ विष दिव्य विधि .. धकाविचार. २६९ ४८६ कोश दिव्य विधि २५७ ५११ उद्धार विभागका निषेध , ४८७ तंदुल दिव्य विधि २५० ५१२ मातृ धनमें कन्याका अधि- ४८८ तप्तमाष विधि कार ४८९ धर्माधर्माख्य विधि २५९ ५१३ कन्याके अभावमें मातृधनके ४९० तहां पक्षांतर ऊपर पुत्रका अधिकार .... २७० ४९१ शपथ २६० ५१४ अविभाज्य धन ४९२ शुद्धिकी विभावना ५१५ पिताके वस्त्रादिकोंके विभागमें इति दिव्य प्रकरण ॥७॥ निर्णय २७२ अथ दाय विभाग प्रकरण ॥ ८ ५१६ स्त्रियोंके अलंकारके विभागमें निर्णय ४९३ दाय शब्दका अर्थ. ५१७ योग क्षेम शब्दका अर्थ २७२ ४९४ दो प्रकारका दाय ४९५ अप्रतिबंध दायका लक्षण ५१८ अनेक भ्राताओंके पुत्रों के वि- भागमें निर्णय ४९६ सप्रतिबंध दायका लक्षण •२७३ ५१९ पितामहके संपादित धनमें ४९७ विभागका लक्षण पिता और पुत्रकी सत्तामैं नि- ४९८ स्वत्वका निरूपण २७४ -४९९ स्तेनका अतिदेश ५२० विभागके पश्चात उत्पन्न हुये ५०० लोकिक सत्ताके विषयमें पुत्रके विभागमे निर्णय विचार २६२ ५२१ पितृदत्त धनमे निर्णय ५०१ स्वत्वका 'प्रतिपादन ५२२ पिताके पश्चात् माताको समां- ५०२ पिताके इच्छासें विभागका शित्व वर्णन प्रकार ५२३ असंस्कृत भ्राताके संस्कार ५०३ ज्येष्ठ विभागमें विशेष करने में निर्णय २७७ ५०४ विभागका काल ५२४ असंस्कृत भगिनीके संस्कार ५०५ सम विभाममें पनियाका करने में निर्णय विशेष २६७ ५२५ भगिनी ओंके विभाग ५.६ पुत्रको दाय लेनेकी अनि ५२६ भिन्नजातीय पुत्रोंका विभाग २७८ च्छाम विशेष.... ५२७ भ्राता आदिकोंको फसा- ५०७ विषम विभागका निषेध यके रखे हुए समुदाय द्रव्यका ५०८ पिट मरणके पश्चात् सम. विभाग विभाग २६८ ५२८ समुदायदव्यके अपहारमें दोष २५२ ५.९ ज्येष्ठ पुत्रको विशोद्धार '५२९ इवामुख्यायण पुत्रका लक्षण २८० " .... .... णय .... .... .... .... .... " .... " .... .... .... " " .... .... " .... .... " (१९) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहितकी विषय. सं. विषय. पृष्ठ. ५६. यामुप्यायणके अधिकारमें निर्णय २८१ .... .... ५३१ नियोग .... .... .... .... " .... .... .... " . .... .... " .... .... .... " .... .... " .... " " .... सं० पृष्ठ. ५५८ पूर्व पूर्वके अभाव में 'सवको पितृ धनमें अधिकार २८६ ५५१ भाईके पुत्रको छोड़ अन्यका पुनलेनेका निषेध ५६० शूद्रापुत्रके विषय में विचार.... ५६१ शूद्रधनके विभागमें विशेष ५६२ विभक्त हुए अपुत्रीकेधनमें अ- धिकार वर्णन २८७ ५६३ पत्नीको धनभागित्व वर्णन २८८ ५६४ कन्याको धनभागिल वर्णन २९३ ५६५ दोहित्रको धनभागित्व वर्णन २९४ ५६६ मातापिताकोधनभागित्ववर्णन ५६७ भ्राताको धनमामित्व वर्णन २९५ ५६८ भ्राताके पुत्रको धनभागित्ववर्णन " ५६९ गोत्रनोंको धनभागित्व वर्णन २९६ ५७० पंधुओंको धनमागित्व वर्णन ५१ आचार्यको धनभागित्व वर्णन २९७ ५७२ शिष्यको धनभागित्व वर्णन ५७३ सहपाठीको धनाधिकारित्व वर्णन ५७४ श्रोत्रियकों अधिकारित्व वर्णन ५७५ राजाको अधिकारित्व वर्णन.... ५७६ जीमूतवाहन दायभागकी टी. कामें दिखाया क्रम.... ५७७ वानप्रस्यादिकोंकि धनमें म. धिकारी ५७८ संसृष्टिधनके विषयमें निर्णय ३०० ५९ सादरकेसंमृष्टिधनमें अधिकारि" ५०० सौदरअसोदरेक संसर्ग निर्णय३०१ ५.१ संगृष्टिक धनके विभागमें निर्णय ५.२टद्धतभागका विनियोग ५.३ भागहीनोंका वर्णन ५.४ टन्होका पापग ५.५ मनकि पुमाविरुप निमा- गया वगन ५३२ नियोगकी निन्दा -५३३ विधवा संयम ५३४ धर्यनियोग ૧૨ ५३५ गोण मुख्य पुत्रोंका स्वरूप ५३६ औरसपुत्रका लक्षण.... ५३७ पुनिका पुत्र लक्षण ५३८ क्षेत्रन पुत्र लक्षण ५३९ गूढ पुत्र लक्षण ५४० कानीन पुत्र लक्षण ५४१ पान व पुत्र लक्षण ५४२.दत्तक पुत्र लक्षण ५४३ कृत्रिम और क्रोत पुत्र लक्षण ५४४ सहोटग पुत्र लक्षण.... ५४५ अपविद्ध पुत्र लक्षण.... ५४६ एक पुत्रके देनेंका निषेध २८४ ५४७ अंक पुत्र होय ती ज्येष्ठ पु- नके देनेका निषेध ५४८ पुत्र प्रतिग्रहका प्रकार ५४९ स्वयंदत्त पुत्रका लक्षण ५५. पुत्रों का दायलेने में क्रम ५५१ भारसपानिकयके समूहमें निर्णय... २८५ ५५२ पूर्वपूर्वयोनमेंटरटतरीको पाशित ५५३ दशमफे अनंतर औरस हो. में निर्णय ५५४ मसगर्ग पुषक विपप निर्णय ५५५ क्षेगका शेष ५५ दारद पुमि नापादयम. दापार ५५.दपकको जनस तिरेपन और गोषी निधि .... " .... " " " .... .... .... .... .... " ....
विषयानुक्रमणिका । .... " " .... .... " .... " .... .... " " " .... सं० विषय. पृष्ठ. सं० विषय. -५८६ नपुंसकादिकोंके कन्याभोंका ६०९ धनचारीका लक्षण विशेष ६१० सीमाके वृक्ष.... ... ५८७ क्लीवादिकोंके स्त्रियोंका विशेष ६११ सीमाके चिन्द ५८८ स्त्रीधनका वर्णन ६१२ सीमानिर्णयका उपाय ५८९ स्त्रीधनके स्वरूपका वर्णन.... ६१३ सीमानिर्णयमें साक्षी.... ५९० स्त्रीधनके भेद ६१४ निर्णयकिये सीमाका पत्र ले- ५९१ अध्यग्नि आदिक स्त्रीधनका खनका प्रकार ६१५ साक्षियोंके असत्यभाषणमें दण्ड३१३ ५९२ स्त्रीधनके विभागका वर्णन ६१६ ज्ञाता और चिन्होके अभावमें ५९३ विवाह के भेदसे स्त्रीधनमें राजाने सीमाकरना. अधिकारियोंका भेद.... ३०५ ६१७ सीमानिर्णयका आरामादिको ५९४ संतानवालीके धनमें कन्या- में अतिदेश... ३१५ दिकोंका अधिकार ६१८ सोमानिणर्यके प्रसंगसे मर्यादा ५९५ ऊढा अनूढाके समूहमें भेदादिकोंमें दंड अधिकारीका निर्णय.... ६१९ अपनी भ्रांतिसें मर्यादा हरने में ५९६ प्रतिष्ठिता अप्रतिष्ठिताके समूहमे अधिकार निर्णय ६२० उत्तम साहस दंडका लक्षण ५९७ वाग्दत्ताके विषयमें निर्णय ६२१ सेतु कूपादिककरने के निषेधमें ५९८ वाग्दत्ताकन्याक मरणमें निणय दंड ५९९ दुर्भिक्षादि संकटमें स्त्रीधनके ६२२ अल्प उपकारमैं निषेध ऊपर भर्ताको अधिकार ६२३ सेलुके दो प्रकार .... ६०० आधिवेदनिकाख्य स्त्रीधनके ६२४ सेतुके प्रवर्तयिताके विषयमें लक्षण विचार ६०१ विभाग संदेहमें हेतु.... ६२५ जोतेहुए खेतके विषयमे इते दायविभाग प्रकरण ॥ ८ ॥ निर्णय.... अथ सीमा विवाद प्रकरण ॥९॥ इति सीमाविवाद प्रकरण ॥९॥ ६०२ सीमाविवादका निर्णय अथ स्वामिपालविवाद प्रकरण ॥ १० ॥ ६०३ सीमाविवादमें उसके निर्णयके ६२६ गौमादिकोंने दूसरेका अन्न साधन भक्षण करने में दंड ६०४ सीमाके चार भेद ६२७ मापका प्रमाण ६०५ ग्राम सामंतादिकोंका वर्णन ३१० ६२८ अतिशय अपराधमें द्विगुणि- ६०६ वृद्धादिकोंका लक्षण तदंड.... ६०७ मोलका लक्षण ६२९ क्षेत्रांतरमें और पश्चतरमें म. ६०८ उदृतका लक्षण तिदेश " .... " .... " .tta .... 44.0 .... .... " .... " ... .. " " .... " ... " " ..
(१४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितकी .... .... " .... .... " " .... .... .... 1 .... " " " " .... " .... .... 17 .... .... " " .... .... .... सं० विषय. पृष्ठ. विषय. पृष्ठ. ६३० क्षेत्रके स्वामीको फल दिलाने में ६५३ राजपुरुषने लायेके विषय में नि०३२४ निर्णय ६५४ नष्टद्रव्य राजाके पास लायाहो- ६३१ क्षेत्र विशेषमें अपवाद यती राजाने रक्षण करना ६३२ बाड करनेका प्रकार ६५५ रक्षणके निमित्त राजाकाभाग ३२५ ६३३ पशु विशेषमें दंडका अभाव ६५६ परस्वामिक नष्ट पशुओंकी ए- ६३४ अदंडय पशु कदिनका वेतन.... ६३५ गोपके विषयमें निर्णय ३२० इति अस्वामिविक्रयप्रकरण ॥१५॥ ६३६ गोपके नोकपैकी कल्पना अथ दत्तामदानिकप्रकरण || १२ ॥ ६३७ प्रमादसे नाश होने में निर्णय.... ६५७ दत्ताप्रदानिकका स्वरूप ६३८ पशुओंके कर्ण आदिका चिन्ह ६५८ दत्तानपाकर्मका स्वरूप दिखाने में निर्णय ६५९ उसके चारभेद ६३९ पालके दोषसे पशुका नाशमें ६६० कुटुंबके अविरोधसें दे- पालको दंड नेयोग्यके विषयमें निर्णय ६४० गोचारका निर्णय ३२१ ६६१ भर्तव्यगणका वर्णन ६४१ गोआदिकोंके प्रचारार्थ क्षेत्रका ६६२ आठप्रकारका अदेय.... परिमाण ६६३ सर्वस्वदानमें निषेध.... इति स्वामिपालविवाद प्रकरण ।। ११ ॥ ६६४ सोना आदिक दूसरेको कहिके अप अस्वामिविक्रय भकरण ||११॥ दूसरेको नहीं देना. ३२७ ६४२ अस्वामिविक्रयका लक्षण ...:३२२ ६६५ देयधनको प्रकाश देना ६४३ एकांतमें थोडेसे बेचनेका नि- ६६६ देनेंको कहा होय तो भी अध- पेध र्मि ऑको देना नहीं ६४४ स्वामी कारके अभियुक्तताकी ६६७ अदत्तका प्रकार कर्तव्यता ६६८ दतादत्तका स्वरूप ६४५ फ्रेता पकडे पोछे कर्तव्य ३२३ पति दत्ताप्रदानिक प्रकरण ॥१२॥ ६४६ देशांतरम केता गया होय तो 1 • अथ क्रीत्तानुशय प्रकरण ॥ १३ ॥ योजनकी संख्यासे कालावधि ६६९ क्रीतानुशयका स्वरूप ३२९ ६४७ मोल लाने में निर्णय.... ६७० पाछे लोटा देनेका निर्णय ३२९ ६४८ अज्ञात देशके विषयमें निर्णय ६२ दूसरे आदिक दिनोंमे पोछे लो- ६४९ साक्ष्यादिकोने प्रयका शोधन टादेनका निर्णय करने में दंड. ६७२ वीजादिकोंके विक्रयमें परीक्षा ६५. नष्ट वस्तुके निश्चयके उपाय ३२४ का काल ६५१ नटवस्तुके अभाव करने में दैट ३२४ ६७३ सुवादिकोकी परीक्षा ६५२ तस्करको हिसानवाले के विष ६७४ कंचलादिकोंमें वृद्धि.. यो निर्णय.... ६७५ द्रव्यांतर विशेष .... .... " .... " .... " .... . .... .... " .... .... .... " .... .... " .... .... .... 1 11 ....
विषयानुक्रमणिका । (१५) पृष्ठ. .... " .... .... " " .... " .... .... .... .... " . " .... .... .... .... J " " " सं० विषय. पृष्ठ. सं० विषय. ६७६ हास वृद्धिके ज्ञानका उपाय ३३० अय वेतनादान प्रकरण ॥ १६ ॥ इति जीतानुशय प्रकरण ॥ १३ ॥ ६९६ वेतनादानका स्वरूप अथ अभ्युपेत्य अशुश्रूषा प्रकरण ॥१४॥ ६९७ लियेहुए वेतनके विषयमें ६७७ स्वीकार करके सेवान करनेका निर्णय स्वरुप ६९८ भूति नहीं तोडक काम ६७८ पांच प्रकारके शुश्रूषक करावने वालेको दंड ६७९ चारप्रकारके कर्मकर ६९९ आज्ञाके विना काम करने वाले ६८० दोप्रकारके कर्मः के विषयमें निर्णय ६८१ तीनप्रकारके मृतक ५०० वेतन देनेका प्रकार ६०२ दासके पंद्रह भेद ७.१ आयुधोंका भार लेजाने वाले ६८३ बलसें दास कियेके विषयमें के विषयमे निर्णय . निर्णय ३३४ ७०२ काम करके छोडने वालेके ६८४ दासके छोडनेक विषयमें विषयमें निर्णय ३४१ निर्णय ७०३ अपगतव्याधिक विषयमें निर्णय ६८५ संन्यास भ्रष्टक विषयमें निर्णय इति वेतनादान प्रकरण ॥१६॥ ६८६ वर्णकी अपेक्षासें दास्यकी अथ द्यूतसामानयमकरण ॥१७॥ व्यवस्था "" ६८७ अंतेवासीके धर्म ३३५ ७०४ धूतसमाह्वयका स्वरूप કર इति अभ्युपेत्य अशुश्रूषा प्रकरण ॥१४॥ ७०५.द्यूतसभाके अधिकारिओंकी वृत्ति मथ संविद्वयतिक्रम प्रकरण॥१५॥ ७७६ चूतसमाधिकारिका कर्तव्य.... ६८८ संविद्वयतिक्रमका लक्षण.... ३३६ ७०७ सभिकने नहीं दिया होय तो ६८९ धर्मरक्षणके वास्ते ब्राह्मणोंकी राजानें दिलाना स्थापना ७.८ जयपराजयमें निर्णयका उपाय ६९. नियुक्तका कर्तव्य कर्म ७०९ धूतका निषेध करनेके वास्ते ६९१ उसके अतिक्रमादिको दंड दंड ६९२ गुणीऑमें राजाके वर्तनका १० कपटके फासेसे द्यूत करने प्रकार वालेको निकाल देना.... ६९३ समूइने दियेहुएको हरने वाले ११ समाह्वयमें द्यूतधर्मका मतिदेश को दंड ६९४ कार्य चिंतकका लक्षण इति पतसमाजय प्रकरणं ॥१७॥ ६९५ विद्य धर्मका श्रेणी आदिकों अथ वाक्पारुप मकरण ॥ १८॥ में अतिदेश.. १२ वाक्सारुण्यका लक्षण ३४५ इति सविपतिकम प्रकरण ॥१५॥ ७१३ तीनप्रकारका बास्पारुष्य .... .... .... 11 .... .... " .... .... .... .... " .... " ..." .... T (१६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहितकी पयमें दंड .... . .... .... .... " " A . .... .... .... " . सं० विषय. पृष्ठ. सं. "विषय. पृष्ठ. ७१४ निठुर आक्रोशमें सवर्णके वि- ७४० दुःख उत्पन्न करने वाले पदा- ३४५ र्थ फेंकनेमें दंड .७१५ अश्लीलआक्षेपमें दंड.... ३४६,७४१. पशुके मारनेमें दंड ७१६ विषमगुणमें दंड ७४२ लिंगके छेदने में दंड.... ७१७ परस्सरका आक्षेपमें दंड ७४३ महापशुके विषयमें दंड .... ७१८ प्रतिलोम अनुलोमके आक्षेपमें दंड" ७४४ स्थावरके विषयमें दंड ...... ७१९ निदुरआक्षेपमें दंड ३४७ ७४५ वृक्षविशेषके छेदनेमें दंड ७२० अशक्तके विषयमें निर्णय ३४९ ७४६ गुल्मादिकोंके छेदनेमें दंड... ३५५ ७२१ तीव्र आक्रोशमें दंढ.... इति दंडपारण्य प्रकरण ॥ १९ ॥' : ७२२ विद्यादिकोंकआक्रोशमें दंड अय साहस प्रकरण ॥ २० ॥ इति यायपारध्य प्रकरण ॥१८॥ 'अय दण्डपारुप्य प्रकरण ॥ १९ ॥ ७४७ साहसका लक्षणे .... ७४८ प्रथमादिभेदसें तीन प्रकारक- ७२३ दंडपारुष्यका स्वरूप ३४९ साहस ७२४ दंडपारुप्यके तीन भेद "४९ परद्रव्यका अपहरणमें दंड.... ७२५ दंडपारुप्यमें पांच विधि ७५० साहसके करावनेवालेको दंड ३५७ ७२६ दंडपारुप्यमें उसका संदेह ७५१ साहसिकविशेषको दंड निवारणार्थ निर्णय ४५२'भाईके स्त्रीको ताडनेंमें दंड.... ". ७२७ साधनविशेषकरिकै दंडका विशेष । ७५३ प्रातिज्ञा करकेनदेनवालको दंडं ". ७२८ विष्ठाभादिकोंकेस्पर्शमें दडं,... ७५४ समुद्र और गृहोंके भेदकरनेवा- ७२९ प्रातिलोम्यके अपराध दंड.... लेको दंड ७३० सजातीयक विषय हाथ पांव ७५५ स्वच्छन्दविधवागामीआदिको- उठानेमें दंड ... को दंड ७३१ केशादिक लोग्नमें दंड ३५२ ७५६ अयोग्य शपथ करनेमें दंड ७३२ काष्ठादिको ताडनेमें दंढ.... ७५७ पशुओंके पुरुषत्व नष्ट करनेमे ७३३ लोहू दीखने में दंड दंड ७३४ हाय पांव तोडनेमें दंड ७५८ दासीका गर्भ नाश करने में ७३५ चष्टा आदिफ रोकने में दंड दंड, . ७३६ मीया आदिकोंके मोडनेमें दंड ७५९ पिता पुनादिकोकों परस्पर ७३७ याहोंने एकके भंगभंग करने में छोटेनमें दंड.... ३५३ ७६० धोबी आदिकों को दंड १८ मगभरने के वास्ते औपच! ५६१'पितापुत्रकि विरोधमें साक्षीको भार पप्यकुं स दिलाना दंड ७.९.माहरफ भंगोंका नाश होने में ७१२ तोस नागाभादिकामे कपट करने वालेको दंट.. .... .... .... ३५० " ......... " .... .... .... " 1 .... " .... .... " " .... .... .... .... .... " ... ... " ....
विषयानुक्रमणिका । विपय.. पृष्ट. ८६७ दूसरेकी आंखआदि फोडनें में दंड ८६८ ब्राह्मणका वेष धारण करने में .... .... .... .... .... .... .... सं विषय. पृष्ठ. ७६१ प्रायश्चित्त न करें तो निकास देना ७६ ते त्रीसंग्रह प्रकरण ॥ २४ ॥ प्रकीर्णक प्रकरण ॥ २५॥ ७६६ श्री पुंयोग व्यवहार..... '७६७ उसका लक्षण त्रिीपुरुषोंको स्वमार्गमें रखना कीर्णकका लक्षण.. १७९९ अपराध विशेपमें दंड -८५२ अभक्ष्य पदार्थ से द्विजोंको दूषित करने में दंड ८५३ बनावटके सोनेके व्यवहारमें दंड ८५४ विषयविशेषमें दंड ८५५ काष्ठ लोष्ठ आदिकोंके फेंकने " " " .... .... " में दंड 1 " ८६९.सग़लोभाविकांसें अन्यरीतिसें व्यवाहर देखाजायतो वहां दंड ८७० साक्षीके दोपसे व्यवहारमें वि- रुद्ध होय तो साक्षीको दंड ८७१ राजाके अनुमोदनसे व्यवहार विरुद्ध होय तो दंड ८७२ निर्णय किये हुए व्यवहारको उलटनेमें दंड.... ८७३ तारित आदिक स्थलों में निर्णय ३९७ ८७४ न्याय विरुद्धके पुनः न्यायमें विशेष.... ८७५ अन्यायसें दंडलेनेवालेके ग- तिमें निर्णय .... इति प्रकीर्णक प्रकरण ॥ २५ ॥ इति व्यवहाराध्याय ॥ २॥ अथ प्रायश्चित्ताध्याय ॥ ३ ॥ अथ आशौच प्रकरण ॥१॥ ८७६ आशौचशब्दका अर्थ ३९९ ८७७ मृतक विषयमें खनन और दाहादिकाका निर्णय ८७८ प्रेतके पीछे गमनकरना ८७९ चांडालादिकोंके अग्निका निषेध४०० ८८० उदकदान में निर्णय ८८१ अग्निहोत्रीके मरने में विशेष १०१ ८८२ शूदने लाये हुए अग्नि और काष्ठके विषय में निर्णय ८८३ प्रेतस्तान ८८४ प्रेतको उठालैजाने में विशेष.... ८८५ प्रेतको लैजान में द्वारका निर्णय .. ८५६ चैलकी नाथ टूटनेंपर गाडीसें चोटलगेतो गाडीवालेको दंड ३९४ ८५७ उपेक्षा करने में स्वामीको दंड ८५८ अप्रवीण सारथीकोप्रेरणासे प्रा णीके प्रहारलगनेंमें निर्णय.... ८५९ प्राणीविशेषसे दंडविशेष ८६० जारको चोर कहनेवालेको दंड ३९५ ८६१ राजाके विरुद्ध कहनेवालको दंड ८६२ राजाके खजाना चोरने वालेको " " " .... " .... ..." " .... " .... .... .... 17 ... . .... ८६३ उपजीविकाके साधन चोरने वालेको दंड .. ८६१ ब्राह्मणों शरीरदंडका निषेध ८६५ प्रेतवस्तुका बेचना और गुरुको मारने वालेको दंड. १८६६ राजाके आसनपर चढने में दंड " T (२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितकी सं. .... 11 .... .... .... .... .... " .... .... " .... " " विषय. पृष्ठ. ८८६ पर्णशरके दाहमें निर्णय ८८७ आग्नि संस्कारके पश्चात कर्तव्य ४०२ ८०८ उदकदानमें गुणविधि ८८९ सपिडाक बीचम कितनंकको उदकदान निपध ८९० पाखंडीआदिकांक मरनेमें मा- शौचादिकों का निर्णय ....४०४ ८९१ मृत्यु विशेषादिका आशोचा- दिकोका निषेध ....४०४ ८९२ पतितादिकोंके दाद और अनुपातका निषेध ४०५ ६९३ आत्महत्याके विषय में निर्णय ४०६ ८९४ नारायण चलिका प्रयोग ८९५ नागबलीका विधि ८९६ विष्णुपुराणोक्त नारायण बलि ८२७ उदकदानके पक्षात् कर्तव्य १०८ ८१८ शोकनियतार्थ इतिहासका स्वरपकथन ८९१ रोदनका निषेध ४०९ ९०० प्रवेशनादिरोंका अतिदेश.... ४१० ९०१ धर्मार्थ प्रेत उठानेका फल .... ९०२ ब्राह्मचारीक विषयमें निर्णय.... १०३ माशीचवालकि नियम ९०४ प्रेतपिंडदानके विषय में निर्णय ९.५किया कांक नियम ९.०५ द्रव्यका नियम ४१२ ९.७ पिस्दानक अधिकारी ९.८ रिकी संख्या और कालादि- काका निर्णय १.९पियादिगं गदान ९१.८दीपनाकाट.... ९११ गरन निर ९१२ मनितोपिय निगर.... ४१४ १११ मतको सपोपासनका नि. प सं० विषयः पृष्ठ. ९१४ स्मार्तकर्मके विषयमें निर्णय ४१५ ९१५ सूतकीके अन्नभोजनका निषेध ९१६ आशौचके निमित्त और काल- के नियम ४१६ ९१७ सपिंडादिकोंका आशीच ९१८ याल आदिकोंके आशीचका निर्णय.... ४१७ ९१९ जननाशीचका निर्णय ४१८ ९२० प्रसूतिका शौचका निर्णय ९२१ पुत्रजन्मके दिन दानादिकोंको अधिकार .... ९२२ पष्ठीपूजनका निर्णय ११९ ९२३ आशांचके मध्यमें आशौचां- तर संपातका निर्णय.... ९२४ जननमरणके आशौच संपा- तमें निर्णय ९२५ मातापितामोके आशीच संपा- तमें निर्णय .... ४२०. ९२६ गर्भनावमें आशौचका निर्णय ९२७ सप्तमआदिकमासों में गर्भस्रा- वका निर्णय. ४२१ ९२८ जात मृत अथवा मृतमं जा- तक आशीचका निर्णय ४२२ ९२९ तदां व्ययस्था २३. रजस्वलाको शुद्धिक विषयम নিধি ,९३१ रजस्वला अवस्था नियम.... ९३२ ज्वादिपीडित रगलाके शुद्धिका निर्णय ९३३ रगस्टला और गतिकांकम- रने निर्गय.... •४२५ ९३४ भारिताकि मरनमि विशर १२५ ९२५ मृत्यु विशेषसे भाशाचा भावाद .९३६ पुद मरने में निर्गप " .... .... .... .... " "" .... " .... .... " .... ४२३ .... .... .... .... .... .... ..."
विषयानुक्रमणिका। (२१) * .... .... " " .... " .... .... .... .... ....४४८ .... - सं. विषय. पृष्ठ. सं. विषय. पृष्ठ. ९३७ विदेशस्थ जनन आशौचमें ९५८ कुत्ताआदिकोंके स्पर्श विषयमें विशेप निर्णय ९३८ विदेशस्थ मृता शौचमें विशेष ९५९ श्वपाकके विषय में निर्णय ४४१ ९३९ दश दिनके पश्चात् जानने में ९६० पक्षीके स्पर्शमें निर्णय ४४२ निर्णय ९६१ शुद्धिहेतूका कथन .... ४४४ ९४० बापकी स्त्रीके विषयमें विशेष ४२७ ९६२ अकार्यकारी औरनद्यादिकोंके ९४१ देशांतरका लक्षण शुद्धिका निर्णय •४६५ ९४२.वर्णविशेषसे आशौच दिनकी इति आशौच प्रकरण ॥१॥ संख्या ૪૨૮ अथ आपद्धर्म प्रकरण ॥ २॥ ९४३ उमरकी अवस्थानुसार दशा- हादि आशोचमें अपवाद -९६३ आपत्कालमें दूसरेकी वृत्तीसें- ४२९ ९४४ उमरकी अवस्थानुसार स्त्रियों उपजीविकाका निर्णय ४४७ को आशीच. ९६४ वेश्यवृत्तीसें उपजीविका करने ९४५ गुरुमामाआदिकोंके मरने में वाले ब्राह्मणको नहीवेचनेला- आशीच यकपदार्थीका निर्णय ९४६ मातापिताओंके मरने व्याही- ९६५ निषिद्धवस्तुओंमेंप्रतिप्रसव.... ४४९ ९६६ निषिद्धके अतिक्रममें दोष.... १५० हुई कन्याको आशीच ९६७ आपत्कालमें असत्प्रतिग्रहका- ९४७ श्वशुरादिकोंके मरने में आशीच " दोषनहीं यह कथन ९४८ औरसभिन्नपुत्रादिकोंका आ- २६८ आपत्कालमें उपजीविकासाधन ४५१ शीच .... • ४३४ ९४९ अन्याश्रितभार्याके मरनेमें आ- ९६९ कृषीआदिकोंके असनवमें जी- विकानिर्णय शाच .... ९७० ब्राह्मणोंको पजाने जीविकादेना ४५२ ९५० प्रेतके पीछेजानेंमें आशौचका इति आपद्धर्म प्रकरण ॥ २॥ निर्णय अथ वानप्रस्यधर्म मकरण ॥ ३ ॥ ९५१ राजाआदिकोंको सपिंडाशी- चका अपवाद ९७१ वानप्रस्थके धर्म ९७२ अग्निपरिचर्या में असमर्थक वि ९५२ दासआदिकोके आशौचविषयमें निर्णय पयमें निर्णय.... ४५४ ९७३ भिक्षा चरण .... ९५३ ऋत्विज आदिकोंका विशेष.... ४३७ ९७४ संपूर्ण अनुष्ठानमें समर्थ के कि- ९५४ ब्रह्मचारी संन्यासीके विषयमें पय कर्तव्योंका निर्णय ४५६ निर्णय शीयानमस्थधर्म प्रकरण ॥ ३॥ ९५५ आशौचके अंतमें स्नान अथ यतिधर्म मकरण ॥४॥ १९५६ रजस्वलादिकांके स्पर्शमेनिर्णय ४४० १५७ दुःस्वमादिके विषयमें निर्णय ४४५ ९७५ यतिधोका निरूपण " .... .... " .... .... ... , .... .... । .... " .... .... +-..
विषयानुक्रमणिका। (२३) सं " .... 1 .... . .... विषय.. पृष्ठ. सं० विषयः पृष्ठ.. १०२७ क्षेत्रज्ञके स्वरूपका कथन.... ५०१ १०५३ गुरुतल्पका अतिदेश .... ५२४ १०२८ बुद्धि आदिकांकी उत्पति .... २०५४ गुरुतत्पपापमें प्रायश्चित्त .... १०२९ गुणोंका स्वरूप १०५५.उपपातक वर्णन ५२५ १०३० स्वर्गियोंके भागका कथन .... ५०२ १ १०५६ जातिभ्रंश कारक १०३१-मप्रवर्तक ऋषियोंका कथन ५०३ / १०५७ संकरी करण.... १०३२ वेदादिकोंको अनादित्वकथन १०५८ अपात्री करण १०३३ आत्मदर्शनकी आवश्यकता ५०४ १ २०५९ मलिनी करण • १०३४ अचिरादि मार्गीका कथन.. -" १०६० ब्रह्मवध प्रायश्चिन २०३५ पितृयानका कथन ५०५/१०६१ अनुग्राहकादिकीको प्रायश्चित्त ५३३ १०३६ उपसनाके प्रकारका निरूपण १०६२ ब्रह्मवध विशेष १०३७ धारणात्मकयोगसमाधिका प्र १०६३ प्रोत्साहकादिकोंको दंडादिसे योजन और लक्षण.... ५०६ प्रायश्चित्त .... ५३४ १०३८ यज्ञदानादिकके असंभवमें १०६४ बाल वृद्धादिकीके साक्षात्क- चिचशुद्धिको उपायांतर .... ५०७ के विषयमं अर्ध प्रायश्चित्त इति यतिधर्म अध्यात्म मकरण ॥ ४ ॥ १०६५ ब्रह्मदत्यादि प्रायश्चित्तके नैमि- अथ प्रायश्चित्त भकरण ॥५॥ तिककी समाप्तिकी अवधि ५३४ २०६६ अन्य प्रायश्चित्त १०३९ कर्मविपाकका निरूपण ..... ५३६ १०६७ ब्रह्महत्याप्रायश्चित्तके अति- १०४० पूर्व कर्मके अनुरोधसे जन्म देश १०४१ पापके अनुरोधसें रोगियोंव्हा १०६८ आत्रेयी हत्याका प्रायश्चित्त ५४४ होना.... १०६९ आत्रेयीका लक्षण ५४५ १०४२ कर्मविपाकको दिखानकै वास्ते १०७० सुरापानका प्रायश्चित्त ५४६ कितनेक उदाहरण .. ५११. १०७१ सुराके विषयमें विचार १०७३ तहां शंखस्मृतिकारका दि- १०७२ ग्यारहमच खाया हुआ विशेष १०७३ अन्य प्रायश्चित्त ५५० १०४४ प्रायश्चित्ताधिकारीका निरू- १०७४ सुरासें मिश्रित शुष्करस अ- नके भक्षणमें प्रायश्चित्त १०४५ प्रायश्चित्तके नहीं करने में दोष ५१५/ १० सूखे हुए सुगभांडमें पानी १९४६ तामिस्र आदिक नरक पीनेमें प्रायश्चित १०४६ प्रायश्चित्तका फल .५१६ १०७६ मद्यपानमें प्रायश्चित्त १०४८ महापातकी ५१८ । १०७७ द्विजातियोंको स्त्रीको सुरापा- V१:४९ ब्रह्महत्याके समान पाप ५२१ नम प्रायश्चित्त १९५० सुरापानके समान पाप ५२२११०७८ सुवर्णकीचौरकामायश्चित्त... ym १०५१ सुवर्ण चौर्यके समान पाप ५२३ । १०७२ वहां शंख ऋपिका विशेष रस १०५२ गुरुतल्पके समान पाप १०८० सुवर्ण शब्दका अर्थ... .... .... .... .... .... .... ... " .... .... पण ... .... .... .... ...4 .... " ...
पाज्ञवल्क्पस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहितकी पृष्ठ. श्चित्त .... ६०८ .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... " " .... सं० विषय. पृष्ठ.. सं० विषय. २००१ सुवर्णकी चोरीमें अन्य प्राय ११०३ ब्रह्मचारीने स्त्रीगमनकियाहोय ५५० तहां प्रायश्चित्त १०८२ गुरुतल्पगमनमें प्रायश्चित्त. ५६१ १२०४ स्वममें वीर्यपात होने में प्राय- १०८३ गुरुशब्दका अर्थ 'श्चित्त.... १०८४ गुरुतल्पगमनमें अन्यप्रायश्चित्त ५६५, १९०५ गृहस्थाश्रमनलेकर सन्नामाश्र- '१०८५ ब्रह्महादि महापातकियोंक मसें भ्रष्टहोने में प्रायश्चित्त संसगीको प्रायश्चित्त ५६९ | ११०६ अन्य अनुपातकका प्रायश्चित्त ६१२ १०८६ पतितसंसर्गके निषेधसे योन १२०७ ब्रह्माचारीके प्रायश्चित्तप्रसंगसें संबंधका कहां प्रतिप्रसव गुरुको प्रायश्चित्त ६१३ ११०८ सर्वहिंसाप्रायश्चित्तोंका अप- १०८७ निषिद्ध संसर्गसें प्रतिलोमव- धर्म प्रायश्चित्त वाद ६१४ ११.९ झूठगवाही देनेमें प्रायश्चित्त ६१५ १०८८ शूद्रादिकोंके विषयमें प्रायश्चित्त १११० अभिशस्तको प्रायश्चित्त ६१६ १०८९ गोवधका प्रायश्चित्त.... ५७५ १०९० गोके ऊमरको विशेष प्राय- ११११ भ्रातृभार्यागमनमें प्रायश्चित्त १११२ रजस्वलाभार्यागमनमें प्राय- श्चित्त विशेप श्चित्त.... २०९१ रक्षानहीकरके उपेक्षा करने में १११३ रजस्वलाको रजस्वलास्पर्शमें प्रायश्चित्त प्रायश्चित्त ६१७ १०९२ स्त्रियों के प्रायश्चित्तमें विशेष .... ५८४ | १११४ अयाज्ययाजनमें प्रायश्चित्त.... ६१९ १०९३ पुरुपोंके प्रायश्चित्तमें विशेष १११५ वेदको अनध्यायमें पाठ शुद्रश्र- १०९४ उपपातकोंका प्रायश्चित्त १०९५ स्त्रीशूद्रवैश्य क्षत्रियोंके वधर्म वणादिमें प्रायश्चित्त .... प्रायश्चित्त १११६ स्वाध्यायत्यागमें प्रायश्चित्त ६२० १११७ अग्निहोत्रके त्यागमें प्रायश्चित्त ६२३ १०९६ स्त्रीवधर्म प्रायश्चित्त :५९९ | १११८ अनाश्रम बासमें प्रायश्चित्त-६२५ २०१७ किंचित् व्यभिचरिणी ब्राह्मणी १११९ असत्प्रतिग्रहमें प्रायश्चित्त आदिके वध विशेष ११२० पलांदु आदिकोंके भक्षणमें १०९८ अनुपपातक प्राणियोंके वधर्म प्रायश्चित्त मायश्चित्त १०९९ मा गदिकोंकेवधर्म प्रायश्चित्त २१२१ जातिदुष्ट संधिनी आदिओके २१०० वृक्षलतागुल्मलतादिकांक दूधपोनेंमें प्रायश्चित्त.... छेदने प्रायश्चित्ता ११२२ स्वभावदुष्टमांसादि भक्षणदिमें ६.४ प्रायश्चित्त १२०१ घुमलीवानरादिवध प्रायश्चित्त ११२३ अपवित्र स्पर्श किये अन्नभ- प्रसंगसे उसकेदश निमित्त प्रा- क्षण करने में प्रायश्चित्त यभित ६.५ ११२४ अशुद्ध द्रव्य संस्पृष्ट अन्नभक्ष- १९०२ रेतःस्खलनमें प्रायश्रित णमें प्रायश्चित्त .... .... .... .... " " ५९६ .... .... " .... .... .... ... .... ....
• (२६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितकी .... .... " .... .... सं० विषय. पृष्ठ. सं० विषय. पृष्ठ. ११७४ अन्य चांदायण ६७६ / ११८१ पातकोंके अभ्यासमें प्रायश्चित्त ११७५ कृच्छ चांदायणव्रत ६७८ की आवृत्ति . २१७६ प्रायश्चित्तमें वपनका निर्णय.... ६७२ | १९८२ व्रतमें अशक्तको ब्राह्मण भोजन " ११७७ अनादिष्ट पापमें प्रायश्चित्त ६८१ ११७८ व्रताशक्तिमें गोदानादि अनु- ११८३ कृच्छू चांद्रायणादिकोका फल ६८४ कल्प.... ६८२ | ११८४ याज्ञवल्क्य धर्म शास्त्रके अध्य ११७९ महापातकादिकोंमें गोआदिकों यनका फल ૬૬ की संख्या ११८५ ग्रंथकी समाप्ति १९८० चांद्रायणादिकोंमें गाओंकी संख्या ६८४ इति प्रायश्चित्त प्रकरण ॥ ६ ॥ .... .... .... " इति याज्ञवल्क्यमिताक्षरास्थविषयानुक्रमणिका सवेरग्राम संपूर्णतामयासीत् । वास्तव्य परशु- राम भट्टात्मज गोविंद.शास्त्री विरचिता।
आचाराध्याय उपोदातमकरण १
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ध्यात्वा यस्मिन् देशे कृष्णः मृगः तस्मिन् तात्पर्यार्थ यद्यपि आचार्य ब्रह्मचारीको
धर्मान् नियोधत इति मुनीन् अब्रवीत्।।२।। धर्मशास्त्र पढावे यह विधि रहो परंतु शिष्य
तात्पर्याय-पूर्वोक्त प्रकारसे पूछा है जिस- धर्मशास्त्रको पढे इसमें क्या कारण है इस
को ऐसा मिथिला नाम नगरीम स्थित वह शंकांक दूरकरनेके लिये यह तीसरे श्लोकहै
याज्ञवल्क्य योगीश्वर क्षणभर ध्यान करिके ब्राह्मआदि-पुराण-तर्कविद्यारूप न्याय-मी-
अर्थात कुछ कालतक इस लिये अपने म- मांसा अर्थात् वेदवाक्यका विचार-धर्मशास्त्र
नका समाधान करिके कि सुननेके अधिका- (मनुस्मृतिआदि) वेदके छःओ अंग अर्थात्
रीय मुनि नम्र होकर पूछते हैं इस लिये इनके | शिक्षा? कल्प २ व्याकरण ३ निरुक्त ४
प्रति धर्मका वर्णन करना युक्त है-यह बोले | ज्योतिष५ छंद ६ इन दसोंसमेत चारों वेद ये
कि भो मुनिश्वरो जिस देशमें काला मृग चौदह विद्या अर्थात् धर्म अर्थ काम मोक्षके
होय उस देशके धर्मोको तुम सुनो अर्थात् हेतुरूप ज्ञानोंके और धर्मक स्थान (कारण)
जिस देशमें कृष्णसार मृग यथेच्छ विचरता है- अर्थात् विद्या और धर्मका ज्ञान इन चौ-
होय उसी देशमें वे धर्म करने योग्य है और दहसेही होताहै और ये सब तीनों द्विजाति-
अन्य देशमें नहीं जिन धर्मोका वर्णन में आ- योंके पढने योग्य है इनके अंतरभूत (बीच-
पको सन्मुख करूंगा इस वचनसे आचार्य में ) होनेसे धर्मशास्त्रभी पढने योग्य है और
ब्रह्मचारीको धर्मशास्त्र पटावे कि-शोच-आ- इन सबको ब्राह्मण विद्यामाप्ति और धर्म
चरणोंकी शिक्षा आचार्य दे-शौच और आ- करनेके लिये पदे, क्षत्री और वैश्य धर्म करने
चरणोंका ज्ञान धर्म शास्त्रके विना नही हो के लिये पढ़ें- क्योंकि शंख ऋषिने विद्या-
स्थानोंके प्रारंभके समयमें इस वेचनसें यह
'भावार्थ-मिथिला नगरी में टिके हुये और कहा है कि इन विद्याके स्थानोंका ब्राह्मण
योगीजनोंके स्वामी वे याज्ञवल्क्य मुनि क्षण | अधिकारी है और वही अन्यवों के बावको
भर ध्यान करके मुनियों को यह बोले कि जि | धर्मशास्त्रके अनुसार दिखावे अर्थात् इतर
स देशमें काला मृग यथेच्छ विचरता होय | वर्णीको धर्मोका उपदेश करे और मनुनेभी
उस देशके धर्मोको तुम सुनो ॥२॥
इस वेचनसे धर्म शास्त्रके पढने और
वर्णन करनेमे ब्राह्मणकोही अधिकार कहा
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रांगमिश्रिताः। कि गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यंत निस-
वेदाःस्थानानिविद्यानांधर्मस्यचचतु के संपूर्ण विधिविधान वेदोक्त मंत्रोंसे कहे
होय उसी द्विजातिका इस धर्म शास्त्रमें अ-
धिकार है अन्य किसी वर्णका नहीं-विद्वान
पद-पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रानमिश्रि-
ता:१ वेदाः१ स्थानानि विद्यानां ६
१ एतानि ब्राह्मणोधिकुरुते सचा वृत्ति दर्शयती
धर्मस्य च चतुर्दशर- ॥३॥
तरेषामिति ।
योजना-पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रांगाम
श्रिताः वेदाः एते चतुर्दश विद्यानां च पुनः तस्य शोऽधिकारोस्मिन् ज्ञेयो नान्यस्य कस्यचित् ।।
२ निपेकादिमिशानातो मस्योंदितो विधिः ।
धर्मस्य स्थानानि भवति ॥ ३ ॥
विदुषा माह्मणेनेदं ध्येतव्य च प्रयत्नतः । शिप्येभ्यश्च
१ शौचाचापश्च शिक्षयेत् ।
प्रवत्तव्यं मम्यडू नान्येन केनचित् ॥
सकता ॥२॥
दश ॥ ३॥
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ब्राह्मणही इस धर्म शास्त्रको बडेयत्नसे पद (गिनती) नही है कि इतनेही धर्मशास्त्रके और अपने शिष्योंको भली प्रकार उपदेश बनानेवाले हैं इतर नही किन्तु प्रदर्शन (दि-- कर (पढावे) और कोई वर्ण उपदेश न करै- | खाना )के लिये है-इससे बौधायन आदिके इसस शिष्यको धर्म शास्त्रका पढना रचेकोभी धर्मशास्त्र मानने में कोई विरोधनहीं आवश्यकहै ॥ ३॥ है-यद्यपि इनसंपूर्ण ऋषियोंके रचे हुये ग्रंथों- भावार्थ-ये चौदह विद्या (ज्ञान) और को प्रमाणता है तथापि जिन २ स्मृतियोंमें धर्मक स्थान है कि पुराण-न्याय-मीमांसा | साकांक्षता है अर्थात् कोई धर्म वर्णन न धर्मशास्त्र और शिक्षाआदि वेदके छः कियाहो अथवा सूक्ष्म कियाहो उसको अंग और चारों वेद ॥ ३॥ दूसरी स्मृतिसे पूर्ण करना और जहां दो मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोंगिरा। स्मृतियोंका परस्पर विरोधहो वहां विकल्प समझना अर्थात् दोनों ऋषियोंका कथन प्रा- यमापस्तंबसंवर्ता:कात्यायनवृहस्पती॥४॥ माणिक मानना चाह जिसके कथनको मानै पद-मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनः१- यह करनेवालेको इच्छाहे दूसरेके कथन अंगियः१ यमापस्तंवसंवर्ताः१ कात्यायन- के न माननमें दोष नहीं है॥४॥५॥ बृहस्पती १ ॥४॥ भावार्थ-ये वीस ऋपि धर्मशास्त्रके रचने- पराशरव्यासशंखलिखितादक्षगौतमौ । वाले है कि मनु-आत्रि-विष्णु-दारीत-याज- ल्क्य-उशना-आगराः-यम-आपस्तंच-सं- शातातपोवसिष्ठश्वधर्मशास्त्रमयोजकाः५ वर्त-कात्यायन-वृहस्पति-पराशर-व्यास- पद-पराशरव्यासशंखलिखिताः२-दक्षगो | शंख-लिखित – दक्ष - गौतम -शातातप- तमा शातातपः१ वसिष्ठः१ चा-धर्मशा- | और वासिष्ठ ॥ ४ ॥५॥ स्वप्रयोगकाः१॥५॥ देशेकालटपायेनद्रव्यं श्रद्धासमन्वितम्। योजना-एते मन्वादयः विंशतिः धर्मशा- पात्रप्रदीयतेयत्तत्सकलंधर्मलक्षणम्॥६॥ समयोजकाः संति ॥ ४ ॥५॥ तात्पर्याय-यह वात रही कि शिप्यको धर्म पद-देशेकाले ७ उपायेन द्रव्यं १ श्र- शाखपटना फिरभी यह कैसे आया कि याज्ञ- दासमन्वितम् २ पात्र प्रदीयते क्रि-यत वल्क्यका रचा यह शाखभी पटना-इसशंका तत् १ सकलं १ धर्मलक्षणम् १ ॥६॥ की निवृत्ति के लिये इन दोरशोकास धर्म- योजनायद्रव्यं देशेकाले उपायेन श्रद्धा- शासक रचनेवालोंको कहते हैं कि मनु-अघि समन्वितं पाने प्रदीयते तत्सकलं धर्मलक्षणं विशु-दारीत-याज्ञवलय-उशना:-अंगिराः भवति ।। यम-आपस्तंय-संवतं-कात्यापन-वृहस्पति पराशर-व्यास-शंख-लिखित-दक्षा-गौतम- तात्पयार्य-पूर्वोक्त देश (गिसमें काला मृ- शाताता-सिष्ट-प२नांसपिधर्मशास्त्रक ग स्वच्छंद विचर )में संक्रांतिआदिकालमें प्रयोगक (रचननाल) है-इससे याज्ञवल्ल्प उपाय (शाप्रोक्तदानको विधिका समह)से का रचातुमा पद धर्मशासभी शियको जो प्रतिग्रह आदिसे मिल्लाहुआ गा मादि पटना चाहिये-पहभी इन कॉम परिसंस्य ! द्रव्य श्रद्धा (मास्तिक्यबुद्धिा टस मुशारकी आचाराध्याय उपोद्घातप्रकरण १ (५) भलीप्रकार दियाजाय जिसका लक्षण इस ( धर्मशास्त्र ) क्योंकि इस मनुके वचना- वैचनसे आगे दानप्रकारणमें कहेंगे कि नुसार श्रुतिको वेद स्मृतिको धर्मशास्त्र कहते है केवल विद्या और तपसे पात्र नहीं होता किंतु सदाचार ( शिष्टयका आचरण ) अर्थात् जिसमें विद्याऔरतपदोनों हाय वही पात्र कहा जिनको कर्मके फलकी प्राप्तिमें संदेह न है- और वह इसप्रकार दिया जाय कि । होय उन शिष्टोंका कर्त्तव्य और जो अपने को फिर लोटे नहीं और उसमें दूसरेके स्वत्त्वकी अच्छा प्रतीत होय वह-इप्समें यह शंका नही उत्पत्ति होजाय-एसे त्यागको धर्मका उत्पा- करनी कि किसीको मदिरापान आदि अनिष्ट- दक(पैदाकरनेवाला) कहतेहै कुछ इतनाही | कर्म प्रिय होयतो वहभी धर्मका मूल क्यों धर्मका लक्षण नहीं किंतु सकल अर्थात् इसकी | न होय-क्योंकि अपनेको प्रिय वही कर्म ध- जो और कला(भाग) शास्त्रोक्तगतिके अनुसार मका ज्ञापकहोताहै जिसको शास्त्र में विकल्प याग और होमादिहै उनसहित दानको धर्म- 1 ( दोप्रकार ) से कहाहोय-जैसेकि इस का कारक कहतेहै-इससे धर्मक कारक ये | बैचनसे ब्राह्मणका यज्ञोपवीत गर्भसे चारहै कि जाति-गुण-द्रव्यक्रियाभाव-अर्थ वाजन्मसे आठवे वर्षमें कर इनदोनोनमें क- (धन) ये संपूर्ण अथवा पृथक् शास्त्रोक्तके | रनेवालेकी इच्छाही नियामकहै चाहे गर्भसे अनुसार धर्मके हेतु जानने और श्रद्धाका हो | आठवे वाजन्मसे आठवे वर्ष में करें और अ- 'ना सबमें आवश्यकहै-इस श्लोकसें धर्मके च्छेसंकल्पसे पैदाहुआ शास्त्रके अनुकूल काम कारक हेतुओंका वर्णन किया जैसेकि कोई यह पण करिलेकि में भोजनके भावार्थ-गो दव्य उत्तमदेश और श्रेष्ठ- विना जलपान न करूंगा अर्थात् भोजन स- कालमें शास्त्रोक्तरीति और श्रद्धासे पात्रको | मयमें ही जलपीऊंगा ये सब पांचो धर्मक मूल भलीप्रकार दिया जाय वह संपूर्ण धर्मका (प्रमाण) ऋपियोंने कहे है-जहांकहीं इनका लक्षण होताहै ११६॥ परस्पर विरोध प्रतीत होय यहां पहिला २क- श्रुतिःस्मृतिःसदाचारःस्वस्यचप्रिय मसे बलवान् समझना मात्मनः । सम्यक्संकल्पजाकामोधर्म भावार्थ-वेद,धर्मशास्त्र, शिष्टीका आचरण अपने आत्माको प्रिय-अच्छे संकल्पसे पैदा मूलमिदंस्मृतम् ॥ ७ ॥ हुई कामना ये सवधर्ममें प्रमाण ऋषियोंने पद-श्रुतिः१ स्मृतिः१ सदाचारः१स्वस्य | कहेहैं ॥७॥ ६ चऽ- प्रियं१ आत्मनः६ सम्यक्संकल्पना इज्याचारदमाहिसादानस्वाध्यायकर्म कामः१ धर्ममूलं १ इदं १ स्मृतं १ ॥ ७॥ योजना-श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः च पुनः णाम् । अयंतुपरमोधर्मोयोगेनात्म स्वस्य आत्मनःप्रियं सम्यक्सकल्पनः कामः दर्शनम् ॥ ८॥ इदं (सर्व) मुनिभिः धर्ममूलं स्मृत ॥ ७ ॥ पद-इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायक- तात्पर्याय-अब धर्मके ज्ञापक (जताने- मणाम् ६ अयं तु:-परमार धर्मः यवर वाले) हेतुओंको कहतेहैं श्रुति (वेद)स्मृति , योगेन ३ आत्मदर्शनं १ ॥ ८॥ नरिचया केवलया तपसा वापि पात्रता यत्र १ श्रुतिनु वेदो वियो धर्मशानं तु वैस्मृतिः दृत्तमिमे चोभे सदि पात्रं प्रकीर्तितम् । २ गारमेष्टी यादे वामगोपनापनम् ।
(६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना-इज्याचारदमाहिसादानस्वाध्या- साबूतेयंसधर्मःस्यादेकोवाध्यात्मवित्तमः यकर्मणां परमः धर्मः अयं (अस्ति) यत् योगेन आत्मदर्शन( आत्मज्ञानं) भवेत्॥८॥ पद-चत्वारः१वेदधर्मज्ञाः १ पर्षत् १ त्रै- विद्य एवर-वा-साश्ते कि-यंरसः१धर्मः तात्पर्यार्थ- -अथ पूर्वोक्त देश आदि कारक । स्यात् क्रि-एकःश्वा-अध्यात्मवित्तमः॥९॥ हेतुओंका अपवाद कहतेहकि इच्या (य योजना-वेदधर्मज्ञाः चत्वारः वा विद्यु ज्ञकरना) आचार-दम ( इंद्रियोंकादमन ) पर्षत (सभा)भवति सा वा अध्यात्मवित्तमः१ अहिंसा-दान-स्वाध्याय ( वेदपाठ) इन एकः यं ब्रूते सः धर्मः स्यात् ॥ ९ ॥ काँका यही परमधर्म (फल) है कि तात्पर्यार्थ जहां धर्मके कारक वा ज्ञापक योगसे अर्थात् बाह्यविषयोंसे चित्तवृत्तिको हेतुओंमें संदेहहोय वहां निर्णयके हेतुको रोकनेसे अपने आत्माके यथार्थस्वरूपको कहतेहै कि वेद और धर्मशास्त्रके ज्ञातावार जानना अर्थात् योगसे आत्माके ज्ञानमें दे ब्राह्मण जिसमें होय अथवा आन्वीक्षिकी शकाल आदिका कुछनियम नहीहै क्योंकि आदि तीन विद्याओंके और धर्मशास्त्रके इस योगसूत्रमें यह लिखाहै कि जहां-ज्ञाता की सभा पण्डित जिसमें होय उसे पर्षत् मनकी एकाग्रताहै वहां देश आदिकी कोई (सभा)कहतेह-वह पूर्वोक्तसभा जिसको क- विशेषता नहीं- है अथवा अध्यात्म ज्ञानियों में निपुण और वेद भावार्थ-यज्ञकरना-आचरण-इंद्रियोंका और धर्मशास्त्रका ज्ञाता एकभी जिसको दमन-आईसा-दान-वेदपाठ-इनसब कर्मोंका । कहै वही धर्म जानना ॥९॥ यही परम धर्म है कि विषयोंसे चित्तवृतिको भावार्थ-वेद और धर्मशास्त्रके ज्ञाता- रोककर आत्माको जानना ॥८॥ चार अथवा तीनों विद्याआके ज्ञाताओंका चत्वारोवेदधर्मज्ञाःपर्षविद्यमेववा । समूहरूपसभा, और ब्रह्मज्ञानीऑमें उत्तम वेदधर्मशास्त्रका ज्ञाता एकभी जिसको कहै. १ यत्रैकाप्रता तत्राविशेषात् । वह धर्म होताहे ॥१॥ इति मिताक्षराप्रकाशसहितायां याज्ञवल्क्यस्मृतौ उपोदात- प्रकरणं समातम् ॥
आचाराध्याय ब्रह्मचारिभकरण २ अथ ब्रह्मचारिप्रकरणम् २ निष्क्रमः | पटेनमाशनं मासि ब्रह्मक्षत्रियविदशूद्रा वर्णास्त्वाद्यानयो चूडाकार्यायथाकुलम् ॥ १२ ॥ द्विजानिकाद्याश्मशानातास्तेषां पद-अहनि ७ एकादशे ७ नाम १ च- वैमंत्रतःक्रियाः ॥ १० ॥ तुर्थे ७ मासि ७ निष्क्रमः १ पठे ७ अन्न- पद-ब्रह्मक्षत्रियविदशूद्राः १ वर्णाः १ तुः कुलम् ॥ १२ ॥ प्राशनं १ मासि ७ चूडा १ कार्या १ यथा- आद्याः १ त्रयः १ द्विजाः १-निपेका- योजना-ऋता गर्भाधान- स्यन्दनात्पुरा द्याः १श्मशानान्ताः १ तेषाम् :-मंत्रतः पुंसः सवनम्-षष्ठे वा अष्टमे मासि सी- क्रियाः १ ॥ १० ॥ | मंतः-च पुनः एते (गर्भात कुमारे बहि- योजना-ब्रह्मक्षत्रियविशूद्राः वर्णाः तु गते) जातकर्म-एकादशे अहनि (दिने) पुनः आद्याः त्रयः द्विजाः भवति- तेषां नाम (नामकरणं ) चतुर्थे मासि नि- वे ( एव ) निपेकाद्याः श्मशानांताः क्रियाः / क्रमः (गृहादहिर्गत्वा बालस्य सूर्यद- मंत्रतः भवति ॥ १० ॥ र्शनं)-पष्ठे मासि अन्नप्राशनं ( अन्नभक्षणं) तात्पर्यार्थ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद ये चूडा ययाकुलं कार्या-कुलाचारानुसार कार्यति चारवर्ण हैं जिनके पृथक् २ लक्षण आगे क्रिया प्रत्येकं योज्या ॥ १ ॥ १२ ॥ वर्णन करेंगे उनमें आदिके तीन ब्राह्मण तात्पर्यार्थ-अब उन क्रियाओंको क्रमसे क्षत्रिय वैश्य द्विज इसलिये कहाते हैं कि । कहते हैं कि गर्भाधान यह अन्वर्थ (जिसका ये तीनों दोवार पैदा होते हैं एकवार मातासे अर्थ कर्ममें मिल ) कर्मका नामहे अर्थात् और दूसरी बार आचार्यके द्वारा उपदेशके | गर्भका स्थापन-यह कर्म सब कामें प्रथम समय गायत्रीसे-उन द्विजोंके ही गर्भाधा- | है और उस प्रथम ऋतु समय ( रजो नसे लेकर श्मशानके अंततक (अंत्येष्टि) दर्शनसे १६ रात्रियोंके भीतर ) किसी शुभ- संपूर्ण कर्म मंत्रोंसे होते हैं अर्थात् इन तीनों- | दिनमें होताहे जिसका लक्षण आगे कहेंगे- केही पूर्वोक्त कोंमें वेदोक्तमंत्रोंका उच्चा- पुंसवन कर्म गर्भमें बालकके हलने चलनेसे रण होताहै और शूद्र आदिकमें नहीं।।१०॥ पूर्व, इसका प्रयोजन यहहै कि जिसके करनेसे भावार्थ-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रये चारों पुरुषही पैदाहो कन्या नहो-छठे वा आठमें वर्ण और इनमें पहिले तीन द्विज होते हैं। मासमें सीमंतोन्नयन कर्म करना-ये दोनों और उन द्विजोंके ही गर्भाधान आदि मरण कर्म (पुंसवन सीमंत) क्षेत्र (गर्भ) के संस्कार पर्यत कर्म वेदोक्त मंत्रोंसे होते हैं ॥२०॥ (शोधक ) होनेसे प्रथम गर्भमें करने प्रति- गर्भ में नहीं क्योंकि देवलऋपिने इस वैचनसे गर्भाधानमृतौसासवनस्पंदनापुरा । यह कहाहै कि जिसस्त्रीका एक गर्भ संस्कार पष्टेष्टमेशासीमतोमास्येतेजातकर्म च११ होगयाहो वह प्रत्येक गर्भमें संस्कारवाली पद-गर्भाधानं १ ऋतो ७ पुंसः ६ स्य- होतीहै और जव गर्भसे बालक बाहिर आजाय न्दनात् ५ पुरा:-पष्ठे ७अष्टमे ७ वाई-सी- उससमय जातकर्म करना जन्मसे ग्यारहवें मन्तः १ मासि७ एते १जातकर्म १ च ॥११॥ दिन नामकर्म करना और वह नाम ऐसा अहन्येकादशेनामचतुर्यमास १ सकत्सुसस्कृता नारी सर्वगर्भेषु सस्कता।
यनं कुर्यात् एके (आचार्याः ) यथा यह (८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ! रखना जो पितामह वा मातामह आदिमें क्रिया:१- स्त्रीणां६- विवाहः१ तुः-सम-2 मिले अथवा कुलदेवतास मिलताहो क्योंकि वकः ॥ १३ ॥ शंख ऋषिने इस वेचनसे यह कहाहै कि योजना-एवं बीजगर्भसमुद्भवं एनः पिता कुलदेवसे मिलाहुआ नाम पुत्रका (पापं ) शमं याति-स्त्रीणां एताः (जातफ- रक्खे और चौथे मासमें निष्क्रम नामका | मादिकाः )क्रियाः तूष्णी (मंत्रं विना) कर्म कर अर्थात् बालकको घरसे बाहिर कार्या:- विवादस्तु समंत्रकः कार्यः ॥१३॥ निकासकर सूर्यका दर्शन करावे-और छठे तात्पर्यार्थ यद्यपि ये कर्म नित्य हैं मासमें अन्नप्राशनकर्म करै- अर्थात् तथापि इनका यह फलभी है कि इस प्रका- बालकको प्रथम अन्नका भक्षण करावे- | रसे किये गर्भाधान आदि कर्मोसे बीज और और चूडाकर्म ( मुंडन ) अपनी कुलरी- गर्भसे उत्पन्न हुआ पाप अर्थात् माता तिके अनुसार कर-मनुनेभी इस श्लोकसे पिताके गात्रकी व्याधिसे शुक्र शोणित यह कहाहै कि पहिले वा तीसरे वर्षों द्वारा जो पाप गर्भमें आताह वही पाप शांति श्रुतिकी आज्ञा और धर्मके अनुसार सब) ( नष्टता) को प्राप्त हो जाता है और द्विजातियोंका मुंडन करावे- इन दोनों जो पाप पतितसे उत्पन्न होनेसे होताहे वह श्लोकोंमें कार्या (करना) इस क्रियाका | शांत नहीं होता- स्त्रियों के लिये यह विशे- प्रत्येक कर्ममें संबंध होताहै ॥ ११॥ १२ ॥ । पहे कि ये पूर्वोक्त जातकर्म आदि कर्म भावार्थ-ऋतुसमयमें गर्भाधान- गर्भके । स्त्रियोंके मंत्रों के विनाही शास्त्रोक्त समयपर चलने हिलनेसे पहिले पुंसवन- छठे वा करने और विवाह तो स्त्रियोंकाभी मंत्रोसे आठवें महीने में सीमंत-गर्भसे बाहिर बाल- ही होताहै ॥ १३ ॥ कक आनेपर जातकर्म-गयारहवें दिन नाम भावार्थ-इस प्रकार बीज और गर्भसे कर्म- चौथे महीनमें निष्क्रम ( बाहिर पैदा हुआ पाप नष्ट होताहै और स्त्रियोंके निकास कर मूर्यको दिखाना ) और छठे | जातकर्म आदि कर्म मंत्रोंके विना और महीने में अन्नप्राशन (अन्नका प्रथम भक्षण) विवाह वेदोक्त मंत्रोंसे होताहै ॥ १३ ॥ औ कुलकी गतिके अनुसार चूडाकर्म गर्भाष्टमेष्टमेवान्दै ब्राह्मणस्योपनायनारांज्ञा (मुंडन ) कराना ॥११॥ १२॥ मेकादशे सैके विशामेके ययाकुलम्॥१४॥ एवमेनःशर्मयातिबीजगर्भसमुद्भवम्। पद-गर्भाटमे७ अष्टमे-वा-अब्दे ब्राह्म- तूष्णीमेताःक्रियाःस्त्रीणांविवाहस्तुसमं णस्य ६ उपनायनं २ राज्ञां ६ एकादशे ७ त्रका ॥ १३॥ सेके ७ विशां ६ एके ९ यथाकुलंड ॥ १९ ॥ योजना-ब्राह्मणस्य उपनायनं (यज्ञो- पद-एवं- एनः१ शम२ याति क्रि. पर्वातं) गर्भाष्टमे वाऽष्टमेऽन्दे राज्ञां एकाद बीजग समुद्भवम्१ तूष्णी एताः१ ) विशां सके एकादशे( द्वादशे )न्दे: १ कुलदेवतासम्बद्ध पिता नाम कुर्यात् । २ धूदाकर्म द्विजातीनां सर्वेशमेव धर्मतः । (कुलरीत्या ) उपनयनं इच्छति । प्रथमेन्दे वतीये का कर्तव्यं श्रुतिचोदनात्-म० अ०२ तात्पर्यार्थ-यज्ञोपवीतके समयको मर्श ही श्लो कहते हैं ब्राह्मणका यज्ञोपवीत गर्भा उप चमनके आचाराध्याय ब्रह्मचारिप्रकरण २ (९) वा जन्मसे आठवें वर्षमें इन दोनोंमें व्याहृतिपूर्वकर वेदं २ अध्यापयेत् क्रि- एनर कत्तांकी इच्छासे विकल्प समझना चाहे जब शौचाचारान् २ च-शिक्षयेत् क्रि.॥ करे, क्षत्रियोंका यज्ञोपवीत ग्यारहवें और योजना- गुरुः शिष्यं उपनीय महा- वैश्योंका बारहमें वर्षमें यज्ञोपवीत करै- | व्याहृतिपूर्वकं वेदं एन अध्यापयेत् च पुनः और क्षत्री और वैश्योंके यज्ञोपवीतमें गर्भसे | शौचाचारान् शिक्षयेत् ॥ वर्षोंकी गिनती जाननी क्योंकि इस तात्पर्य-गुरूके धर्मोको कहते हैं स्मृतिके वचनसे गर्भसेही ग्यारवें बारहमें | कि अपने गृह्य सूत्रमें उक्तविधिके अनुसार क्षत्री और वेश्यका यज्ञोपवीत कहाहे-यह यज्ञोपवीत देकर गुरु शिष्यको प्रथम बात गर्भाष्टमें इस समस्त (मिलेहुये ) पद- महाव्याहृति पश्चात् वेदको पढावे वे महा- मेंसें गर्भ शब्दको बुद्धिसे पृथक् करिके व्याहृतिये भू आदिसात वा गोतम ऋषिके और यहां एकादशे और सके इनके संग वचनानुसार पाच होती हैं और यज्ञोपवी- मिलानेसे समझनी- अन्यथा पूर्वोक्त स्मृति तके अनंतर निम्न लिखित शौच ओर और इस याज्ञवल्क्यके वचनका परस्पर आचरणोंके शिक्षादे- इससे यह प्रकट है विरोध होजाता कदाचित् काई यह कहै कि यज्ञोपवीतसे प्रथम शौच और आचा- कि समस्त पदमेंसे पृथक् हो कर दूसरेके रणके अन्यथा करने में बालकोंको काम- संग मिलनहीं सकता सो ठीक नहीं क्योंकि चार है अत एव अन्यथा करने में कोई भाग्यकार पतंजलिने इस वचनमसे प्रायश्चित्त नहीं और वर्णाके धर्मीको छोड- 'षष्ठयंत शब्दानां इस शब्दका पृथक्लौकिक कर स्त्रियोंकोभी विवाहसे पहिले काम और वैदिक शब्दोंके संग अन्वय कियाहे- चारहै- क्योंकि नियोंके विवाहकोही उपन- इस श्लोकभी पूर्वोक्त कार्यकी अनवृत्ति यनके स्थानमें कहा है- करनी कोई एक आचार्य कुलरोतिके अनु भावार्थ-गुरु अपने शिष्यको यज्ञोपवीत सार यज्ञोपवीतकी इच्छा करते है ॥ १४ ॥ देकर व्याहृतिपूर्वक शिप्यको वेद पढावे भावार्थ-गर्भसे वा जन्मसे आठवें वर्षमे और शौच आचरणोंकी शिक्षादे॥१५॥ दव, पणका और गर्भसे ग्यारहवें वर्षमें क्षत्रीका दिवासंध्यासुकर्णस्थब्रह्मसूत्रउदङ्मुखः । गर्भसे बारहमें वर्ष वैश्यका यज्ञोपवीत कुर्यान्सूत्रपुरीपेचरात्रीचेद्दक्षिणामुखः १६ नोंको-कोई एक पि कुलरीतिके अनुसार पद-दिवासंध्यासु७ कर्णस्थब्रह्मसूत्रः १ प्रजापीत करना कहते हैं-॥१४ ॥ उन्मुखः१ फुर्यात क्रि-मूत्रपुरीपे२ च.. यि गुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकं । रात्री ७ चेतर-दक्षिणामुखः१ ॥ १६ ॥ सन्यापयेदेनं शौचाचारांश्चशिक्षयेत् ।। योजना-कर्णस्थब्रह्मसूत्रः ब्रह्मचारी दि- वासंध्यासु उदखः रात्री चेत् (तु) दक्षि- भि-उपनीयऽ गुरुः१ शिष्यं२ महा- | गामुखः (सन् ) मूत्रपुरीपे कुर्यात्।। १६ ॥ तात्पर्याय-अव शौचाचारको कहते हैं कि पददिकादशे राज्ञो गर्भाद्धि द्वादशे विशः । कानपर ब्रह्मसूत्र (जनेऊ)को रखकर दिन खानिर शन्दानुशासन केषा शन्दानां लौकि तुमकृाकामा । भभुः सः महः जनः तमः सत्यम् ।
आचाराध्याय ब्रह्मचारिमकरण २ (११) 1 लिखाहै और याज्ञवल्क्य भी आगे यही योजना-द्विजः अपः त्रिः ( त्रिवार) कहेंगे॥१८॥ प्राश्य-द्विः (द्विवार) उन्मूज्य प्रकृतिस्थाभिः भावार्थ हाथोको गोटोके भीतर करिके फेनबुबुदैः हीनाभिः अद्भिः (जलः) खानि शुद्धदेशमें उत्तर वा पूर्वको मुखकिये हुये | (छिद्राणि ) समुपस्पृशेत् ॥ २० ॥ बैठा द्विज सदैव ब्राह्मतीर्थसे आचमन तात्पर्यार्थ-तीनवार जलको पीकर और करें ।। १८॥ अंगूठेके मूलसे दोवार मुखका मार्जन करके-जिनमें और द्रव्य न मिला हो और कनिष्ठादेशिन्यंगुष्ठमूलान्यग्रंकरस्य च । फेन (झाग) और बुलबुलेभी जिनमें न ही प्रजापतिपितृब्रह्मदेवतीर्यान्यनुक्रमातू१९ / ऐसे मलास नासिका आदि ऊपरके रिट्रीका पद-कनिष्टादेशिन्यंगुष्ठमूलानि अगं १ भली प्रकार स्पर्श करें एकवार अद्भिः इस करस्य ६ - प्रजापतिपिब्रह्मदेवती- पदसे जलोको कहकर फिर दुवारा उसी प- नि१ अनुक्रमात् ५॥११॥ दसे जलोंके कहनेका यह तात्पर्य है कि प्र- त्येक छिदमें स्पर्श करे-और वे जल प्रकृति योजना-कनिष्ठादेशिन्यंगुष्ठमूलानि च पुनः । (स्वभाव )में स्थितहों अर्थात् जिनके गंध- करस्य अयं एतानि अनुक्रमात् प्रजापति- रुप रस स्पर्श न बिगडे हों और इस श्लो- पितृह्मदेवतीर्थानि (ज्ञातव्यानि )॥ कमें तु शब्दके पढनेसे वर्षा और शूद्रके तात्पर्यार्थ-अब तीर्थीका वर्णन करते हैं- लाये जलसे स्पर्श (आचमन) करनेका नि- कनिष्ठा तर्जनी अगूंठा इन तीनोंकी मूल | पेध है ॥ २० ॥ और हाथका अग्रभाग ये चारो प्रजापतितीर्थ भावार्थ-तीन वार जलको पीकर और पितृतीर्थ-ब्राह्मतीर्थ-देवतीर्थ क्रमसे जानने दोवार सुखका मार्जन करके स्वच्छ और अर्थात् कनिष्ठाके मूलमें प्रजापतितीर्थ झाग और बुलबुले जिनमें नहों ऐसे निर्मल तर्जनीके मूलमें पितृतीर्थ- और अंगूठेके जलोंसे नासिका आदि परके छिद्रोंका मूलमें ब्राह्मतीर्थ और कर के अग्रभागमें स्पर्श करे अथीत् उक्त जलसे नासिका आ- देवतीर्थ होता है ॥ १९॥ दिको शुद्ध करे ॥२०॥ भावार्य-कनिष्ठा-तर्जनी-अंगूठा-इनती हत्कंठतालुगाभिस्तुययासंख्यंदिजा- नोंके मूल और करके अग्रभागमें क्रमसे तयः। शुध्येरन्त्रीचशूद्रश्वसकृत्स्पृष्टा- प्रजापति-पिट-ब्रह्म-देव-तीर्थजानन॥१९॥ भिरंततः॥ २१॥ विमाश्यापोद्विरुन्मृज्यसान्यद्रिः पद-हृत्कंठतालगाभिः३ :- पपास- समुपस्पृशेत् । अद्भिस्तु प्रकृतिस्था ख्यं-द्विजातयः शुध्येरन् कि- स्त्री १ चदः१-सकृदा- स्पृष्टाभिः- मिहीनाभिः फैनबुद्रुदैः ॥ २० ॥ ततः-॥३॥ दनत्रः-प्राश्या-अपःद्विः:-उन्मृज्या योजना-द्विजातयः (माझगक्षत्रियविशः) खानिर आद्भः समुपस्पृशेत् क्रि-अद्भिः। यथासंख्यं ( क्रमेण ) हत्कटतालगाभिः तु प्रकृतिस्याभिः३हीनाभिः३फेनबुबुदः३ | अद्भिः शधरन च(पुनः)बी-च(पुनः) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ताम् ॥ शूद्रः अंततः ( तालना ) स्पृष्टाभिः शुद्धये- | से मार्जन-प्राणायाम-- सूर्यको स्तुति-और प्रतिदिन गायत्रीका जप-इनको द्विज प्रति- तात्पर्यार्थ -हृदय कंठ तालमें प्राप्तहुये दिन करें ॥ २२ ॥ आचमनके जलसे तीनो द्विजाति अर्थात् गायत्रींशिरसासार्द्धजपेयाहतिपू- ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य क्रमसे शुद्ध होतेहे- विकाम् । प्रतिप्रणवसंयुक्तांत्रिरयं और स्त्री और शूद्र और चशब्दसे जिसका प्राणसंयमः ॥ २३ ॥ यज्ञोपवीत न हुआ हो वह ये सब तालुसे एकवारही जलके स्पर्श मात्रसे शुद्ध होत पद-गायत्रौं २ शिरसा३ सार्द्धम् - जपेत् है ॥२१॥ क्रि०-व्याहतिपूर्विका २ प्रतिप्रणवसंयुक्तार भावार्थ- विः-अयं १ प्राणसंयमः॥२३॥ 4-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य ये तीनों द्विज कमसे हृदय कंठ तालु इनमें पहुंचे हुये ज- योजना-प्रतिप्रणवसंयुक्तां-व्याहृतिपूर्वि- लसे और स्त्री और शूद ये दोनों तालुसे कां गायत्री शिरसा सार्द्ध त्रिः (त्रिवार) एकवार जलकें स्पर्शसे ही शुद्ध होते हैं २१- जपेत्-अयं (पूर्वोक्तस्य विर्जपः) प्राणसंयमः सानमन्दैवतेमंत्रमार्जनं माणसंयमः। (प्राणायामः) ज्ञेयः ॥ २३ ॥ सूर्यस्यचाप्युपस्थानंगायत्र्याःप्रत्यह तात्पर्यार्थ-आपोज्योति इत्यादि जो शिरः- संज्ञक मंत्र उससे संयुक्त और उक्त ७व्याहृति जपः ॥ २२॥ हैं पूर्व जिसके और प्रतिव्याहति (भूः भुवः पद-स्नानं१ अन्दैवतेः३ मंत्रेः३मार्जनं १ स्वः महः जनः तपः सत्यम्)हैं ओंकार पूर्व प्राणसंयमः१ सूर्यस्य६ च:- अपि- उप- जिसमें उसका तीनवार मुख नासिकामें स्थानं ९ गायन्याः ६ प्रत्यहं- जपः॥२२॥ | संचारी (रहनेवाली) वायुको मनसे रोककर योजना-स्नान-अन्दैवतैः मैत्रः मार्जनं- जोजप उसको प्राणायाम कहते हैं-इस प्राणा- प्राणसंयमः च (पुनः) सूर्यस्य अपि उप- यामसे ही योगीजन अनेक सिद्धियोंको प्राप्त- स्थानं (स्तुतिः) प्रत्यहं (प्रतिदिनं ) गा-होते हैं ॥ २३ ॥ यत्र्याः जपः कार्य:-अब कार्यशब्दः तत्तल्लिं भावार्थ-सात व्याहात हैं पूर्व जिसके ऐसी गानुसारण प्रत्येकं योज्यः ॥ २२ ॥ जो ओंकार सहित और शिरः मंत्र सहित तात्पर्यार्थ-शास्त्रोक्तरीतिसे प्रातःकाल मायत्री उप्तका जो प्राणोंको रोककर तीन- स्नान और जल है देवता जिनका एसे आपो- वार जप उसे प्राणायाम कहते हैं ॥ २३ ॥ हिष्ठा--आदि मंत्रास मार्जन (देहको शुद्धि) माणानायम्पसंमोक्ष्यतृचैनाब्दैवते और प्राणायाम (जिसका स्वरूप आगे वर्ण नतु । जपन्नासीतसावित्रीप्रत्यगा न करेंगे) और सूर्यकोह स्तुति जिनमें तारकोदयात् ॥ २४ ॥ ऐसे उदयंत आदि मंत्रोंसे सूर्यका उपस्थान १ आपोर्योतीरसौमृतं ब्रह्म भूर्भुवःस्वः। (स्तुति ) और गायत्री (तत्सवितुः) आ- दिका प्रतिदिन जप- इन पूर्वोक्त कर्माको सत्य-तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि धियो २: भुवः स्वःमः जनः तपः तीनो द्विजाति करें ॥२२॥ योनः प्रचोदयात् ॐ आपोज्योती रसोमृतं ब्रह्म भावार्थ-प्रातःकाल स्नान वरुणके मंत्रों-] भभुवः स्वगेम्-अयं प्राणायामः ।
आचाराध्याय ब्रह्मचारिप्रकरण २ (१३) पद-प्राणान् २आयम्य:-संप्रोक्ष्या-तृचेन मुखः गायत्रों जपेदित्यर्थः-ततः उभयोः अपि ३ अब्देवतेन३ तु: जपन् आसीत कि-सा- संध्ययोः अग्निकार्य (अग्निहोमादि )कुर्यात्- वित्रीम् २ प्रत्यक् आऽ- तारकोदयात् ॥२४॥ तात्पर्यार्थ-इस प्रकार पूर्वोक्तविधिको योजना-प्राणान् आयम्य तुपुनः अन्दै- | करता हुआ द्विज प्रातःकालके समयमें वतेन तृचेन (देहं )संप्रोक्ष्य सावित्री जपन् पूर्वाभिमुख स्थित होकर सूर्योदय पर्यत गाय- सन् आ तारकोदयात् प्रत्यक्संध्यां आसीत-त्रीका जप कर फिर संध्योपासनाके अनंतर सायं प्रत्यङ्मुखो गायत्री जपेदित्यर्थः ॥ अपने गृह्यसूत्रके अनुसार अग्निमें समित् तात्पर्यार्थ पूर्वोक्त प्राणायामको करके (काष्ठ ) प्रक्षेप आदि कार्यको करै ॥२५॥ और जल है देवता जिनका एसी आपो- ततोभियादयेदृद्धानसावमितिब्रुवन्। गुरु- हिष्टा आदि तीन ऋचाओंसे अपने देहका भलीप्रकार प्रोक्षण (छिडकना) करके चैवाप्युपासीतस्वाध्यायार्थसमाहितः।।२६ गायत्री जपता हुआ द्विज प्रत्यमुख (पश्चि पद-ततः:-अभिवादयेत् क्रि-वृद्धान् माभिमुख) होकर प्रत्यक् संध्या (सायंका- अौरअहं १इतिऽ अवन् १ गुरुं रचा-एव:- लके संध्योपासन)को करें और वह सायं- अपिऽ-उपासीत क्रि०-स्वाध्यायार्थ २ समा- कालकी संध्या और जप तारकाओंके उदय | हितः १॥ २६ ॥ पर्यत करना दिन रात्रिकी संधिमें जो कर्म योजना-ततः असौ अहं इति ब्रुवन् सन् किया जाय उसे संध्या कहते हैं-और संपूर्ण वृद्धान् अभिवादयेत् च पुनः गुरुं अपि एवं सूर्य मंडलके दर्शन योग्य जो काल उसे (निश्चयेन) समाहितः सन् स्वाध्यायार्थ उपा- दिन और उससे विपरीत समयको रात्रिसीत (सेवेत) ॥ कहते है और जिस कालमें सूर्य मंडल खंड तात्पर्यार्थ-फिर संध्योपासना और (अपूर्ण) प्रतीत हो उसको संधि कहते हैं | अग्निहोत्रके अनंतर यह मैं हूं इस और यह समय सूर्यके उदय और अस्त होनेके | प्रकार अपने नामको कहता हुआ गुरु समयमें ही होता हैं ॥ २४ ॥ पिता आदि जो अपने बड़े हैं उनको नम- भावार्थ-प्राणायाम और जल है देवता | स्कार करै-और तिसी प्रकार गुरु (जिसका जिनका ऐसी तीन ऋचाओसे अंगका भली | स्वरूप आगे कहेंगे )की स्वाध्याय (वेद प्रकार प्रोक्षणकरके सायंकालकी संध्याके , आदिका पठन )के लिये चित्तको सावधान समय गायत्रीको जपताहुआ द्विज नक्षत्रोंके करके उपासनाकर अर्थात गुरुके समीप उदयपर्यन्त पश्चिमको मुखकिये बैठारहै २४ जाय कर इस प्रकार अध्ययन करोक।२६॥ संध्यांप्राक्प्रातरेवहितिष्ठेदासूर्यदर्शनात् । भावार्थ-फिर यह मैहूं यह कढ़ता हुआ अनिकार्यतताकुर्यात्संध्ययोरुभयोरपि२५ गुरु आदि वृद्धोंको नमस्कारकर और पढ- नेके अर्थ सावधानीसे गुरुकोभी इसी प्रकार पद-संध्यांरप्राक्प्रातः-एवं-हि-तिष्ठत् उपासना(सेवा) करे कि ॥ २६ ॥ कि-आ-सूर्यदर्शनात् ५अग्निकार्य २ ततः:- आहुतश्चाप्यधीयीतलब्धतस्मैनिवेदयेत्। कुर्यात् क्रि-संध्ययोः ७उभयोः७ अपिड-॥ योजना-एवं(पूर्वोक्त विधि आचरन्)प्राक् १ असो देवदत्ताह भी गुरो वा पितः वामभि. संध्यां प्रातः आ सूर्यदर्शनात् तिष्ठेत्-प्राङ्- वाइये ( नमस्करोमि )।
(१४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कर्मभिः३॥ हितंतस्याचरेन्नित्यं मनोवाकायकर्मभिः२७ । तात्पर्यार्थ-कृतज्ञ जो हुये उपकारको विस्मर- पद-आहूतः १ चा- अपिऽ- अधीयोत | जनकरेनिभूल)भद्रोही जिसके हृदयमें दयाहो. क्रि लब्धं तस्मै निवेदपेन फ्रि-हित २ पटाये हुये को धारणकरसके-शुचिः जिसका मेधावी जिसकी ऐसी सामर्थ्य हो की गुरुके तस्य६ आचरेत क्रि-नित्यं२ मनोवाकाय-- बाह्य शुद्धिसे देह और अंतःशुद्धिसे अंत:- करण ये दोनों शुद्धहो-कल्प जिसको आधि योजना-आहूतः सन् अपि (एव )अधी- (मनकी पीडा ) और व्याधि (देहकी पीडा) यीत-लब्ध ( अन्नादि ) तस्मै निवेदयेत् । नहीं जो अनसूयक हो अर्थात् गुरुके मनोवाकायकर्मभिः तस्य हितं नित्यं आच- । दोषोंको प्रकट नकरे और गुणोंको प्रकट रेत् (कुर्वीत)॥ कर-और साधु जिसका आचरण श्रेष्ठहो.. तात्पर्याय-अब गुरुके यहां पढ़नेफे जोशक्तदोअर्थात् गुरुकी सेवा करनेमें समर्थ प्रकार कहते हैं कि गुरुके आह्वान हो और जो आप्तहो अपना दंधु हो औरजो (बुलाना) करने पर अध्ययन करे और ज्ञानद हो अर्थात् किसी अन्य विद्याको दे- पढनेके लिये गुरुको स्वयं प्रेरणा न करे- जो वित्तद जो अर्पण पूर्वक धनको दे-ये और जो कुछ द्रव्यआदि याचना आदि द्वारा पूर्वोक्त गुण जिनमें संपूर्ण हों अथवा न्यूना कहाँसे मिलगाय वह गुरुको ही निवेदन धिकहों वे शिष्य धर्मसे अर्थात् शास्त्र के अनु- करदे और मन वाणी देह-और कर्मसे गुरुके | सार पदावे ॥ २८ ॥ हितकाही आचरण कर कदाचित् भीगुरुके भावार्थ -कृतज्ञ-अद्रोही-बुद्धिमान्-शुद्ध- प्रतिकूल आचरण नकर और गुरुके दर्शन नीरोग अनिंदक-साधु-शक्त--आप्त-और- होनेपर कंठ आदि अपने अंगका प्रावरण, ज्ञान और धनके दाता-इनको धर्मसे (खोलना) नरें अर्थात् निःशंक पढावे ॥ २८ ॥ होकर न बोले ।। दंडाजिनोपवीतानिमेखलांचैवधारयेत्। भावार्थ-गुरुके बुलाने पर ही पढे और ब्राह्मणेपुचरेद्रेक्ष्यमनियेप्वात्मवृत्तयै२९ जो कुछ मिल वह सब गुरुको निवेदन करे और मन वाणी देह कर्मसे गुरुके हित- एक-धारयेत् कि-ब्राह्मणेषु ७ चरेत् क्रि- पद-दंडाजिनोपवीतानि रमेखला २ च काही नित्य आचरण करे ।। २७ ।। भक्ष्यं २ अनियेषु ७ आत्मवृत्तये ॥२॥ कृतज्ञाद्रोहिमेधाविशुचिकल्पानसूयकाः। योजना-दंडाजिनोपवीतानि च पुनः अध्याप्याधर्मतःसाधुशक्ताप्तज्ञानवित्तदाः । मेखला एव(आप) धारयेत् अनियेषु ब्राह्मणेषु पद-कृतज्ञादोहिमेधाविशुचिकल्पानसूय- आत्मवृत्तये भक्ष्यं चरेत् (कुर्यात्॥२८॥ काः१ अध्यायाःधर्मतः:- साधुशक्ता- और अनिन (कृष्ण मृगचर्म ) और कपास तात्पर्यार्थ-पालाश ( टाक) आदिके दंड तज्ञानवित्तदाः १॥ आदिके यज्ञोपवीत-और मुंज आदिको योजना-कृतज्ञादोहिमेधाविशुचिकल्पान-मेखला (कोदनी) आदिको धारण कर यहां साधुशताप्तज्ञानवित्तदाः धर्मतः आदि शब्दसे कमंडलु आदि ब्रह्मचारीके अध्याप्या भवति। उपकरण समझने इसप्रकार दंड आदिसे आचाराध्याय ब्रह्मचारिमकरण २ (१५) युक्त ब्रह्मचारी पतित और शाप आदि दोषोंसे तात्पर्याय-भावार्थ-ब्राह्मण क्षत्री वैश्य रहित जो अपने धर्ममे तत्सर ब्राह्मन उनके | इन तीनोंको आदि मध्य अंतमे जिसके 'घरामसे अपने जीवनके अर्थ भिक्षाका आच- भवति शब्दहोय एसे वाक्योंको क्रमसे कह- रण करे अर्थात् किसी अन्यके लिये भिक्षान | कर मिक्षा मांगनी अर्थात ब्राह्मण भवति मांगे उस भिक्षाको गुरुको निवेदन करके भिक्षा देहि -क्षत्री भिक्षां भवति देहि- और गुरु न होय तो उनके पुत्र स्त्री आदिको वैश्य भिक्षां देहि भवति-शब्दको कहै।।३०॥ अर्पण करके उनकी आज्ञासे भोजन कर इस श्लोकमें जो ब्राह्मणका ग्रहण इस नियमके - कृतानिकार्यो जीतवाग्यतोगुर्वनुज्ञया। लिये नहीं है कि ब्राह्मणों के यहांहीसे मांगे अपोशनक्रियापूर्वसत्कृत्यानमकुत्स- किन्तु संभव होयतो ब्राह्मणोंसे नमिले तो यन् ॥ ३१॥ तीनों द्विजातियोंसे भी भिक्षाटनमें दोष नही- जो किसीने इस वैचनस्ते चारों वर्षों में पंद-कृताऽग्निकार्यःमुंजीत क्रि-वाग्यतः१ भिक्षा मांगनी लिखी है वहभी तीनों वर्णोंमें अन्नं २ अकुत्सयन् १ ॥ ३१ ॥ गुर्वनुज्ञया ३आपोशनक्रियापूर्व२ सत्कृत्यः- ही समझनी क्योंकि यज्ञोपवीतका अधिकार तीनोंकोही शूद्रको नहीं अत एव उसका योजना-कृताग्निकार्यः वाग्यतः ब्रह्मचारी अन्नभी वर्जित लिखा है और जो इस | अन्नं सत्कृत्य अकुत्सयन् (सन् ) गुर्वनुज्ञया वैचनसे वारों वर्णोको भिक्षाटन लिखा है । अपोशनक्रियापूर्व मुंजीत ॥ वह भी आपत्ति के समयमें होसमझना॥२९॥ तात्पर्यार्थ-पूर्वोक्तविधिसे मिलि मिक्षाको भावार्थ-दंडभृगचर्म-जनेऊ और मेखला- | गुरुको निवेदनकरिके अग्निहोत्रकरनेके अन- को धारण करे औरनिंदाके अयोग्य ब्राह्मणोंमें तर मानहोकर अन्नका सत्कार करिके और अपने जीवनके लिये भिक्षा मांग॥२९॥ अन्नकी निंदाको त्यागकर भोजनसे पूर्व अपो- आदिमध्यावसानेपुभवच्छब्दोपलक्षिता। शन क्रियाको करिके अर्थात्-अमृतोपस्तर- णमसि-इस वचनसे आचमनकरके गुरुकी ब्राह्मणक्षत्रियविशांभेक्ष्यचर्याययाक्रम आज्ञासे भोजनकोकरे यद्यपि प्रथम पच्चीस २५ के श्लोकमें ब्रह्मचारीकोअग्निहोत्र करना- पद-आदिमध्यावसानेषु ७ भवच्छन्दो | लिखआयेहै इससे पुनः अग्निहोत्रका करना पलक्षिता १ ब्राह्मणक्षत्रियविशां ६ भक्ष्य- इसलिये नहीहै कि भोजनके समयमभी ती- चर्या१-यथाक्रमम् ॥ ३० ॥ सरीवार अग्निहोत्र कियाजाय-किंतु इसलियेहै योजना-ब्राह्मणक्षत्रियविशा आदिम-कि दैववससे संध्याके समयमें अग्निहोत्र न- ध्यावसानभु यथाक्रम भवच्छन्दोपल- कियाहोयतो भोजनके समय करले ॥३१॥ क्षिता भैक्षचर्या -कर्तव्येति शेषः-भवति भावार्थ-अग्निहोत्र-और अन्नका सत्कार भिक्षादेहि-भिक्षा भवति देहि- भिक्षां देहि करके-गुरुको आज्ञासे अन्नकी निंदाको भवति ॥ ३० ॥ त्यागकर मौनहोकर और अपोशन (आचमन) करिके भोजनकर ॥ ३१ ॥ सावर्णिक भैश्याचरणम् । २ चातुर्वणिक चौद्देश्यम् । ब्रह्मचस्थितीनकमन्नमद्यादनापदि ।
(१६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . ब्राह्मण काममनीयाच्यावितमपीड वर्जदे कि मधु (सहत) यहां मधु शब्दसे यन् ॥ ३२ ॥ मदिराका ग्रहणनही क्योंकि इस वेचनसे पद ब्रह्मचर्ये स्थितः १न:-एकंर अन्नर ब्राह्मणको मदियका सदैव निषेधहै मांस अंजन अद्यात् क्रि-अनापदि ब्राह्मणः काम २ -अर्थात् धृत आदिको देहमें और कजल आदिको नेत्रमें लगाना-गुरुका उच्छिष्ट अशीयात् क्रि- श्राद्ध व्रतं७ अपीडयन्॥ शुक्त (कठोरखचन ) यहां शुक्तपदसे अन्नरस योजना-ब्रह्मचर्ये स्थितः ब्राह्मणः अना- इसलिये नहीं लिया कि उसका अभक्ष्य पदि एक अन्नं न अद्यात् श्राद्धे व्रतं अपीड- प्रकरणमें निषेध कहेंगे- स्त्रीका संग-प्राणि- यन् (सन् )कामं अश्नीयात् ।। योंका हिंसन- उदय और अस्तके समय तात्पर्यार्थ ब्रह्मचर्यमें स्थित ब्राह्मण सूर्यका दर्शन अश्लील (झूठयोलना ) परिवाद आपत्तिकेविना एकके अन्नको न खाय अर्थात् (सच्चे और झूठे पराये दोषोंको कहना) शरीरमें कोई व्याधि आदि होयतो दोपनही- और आदिशब्दसे अन्य स्मृतियों में कहेहुये और श्राद्धके विषय कोई निमंत्रण देतो ऐसे गंध और माल्य आदिकोभीवर्जदे ॥ ३३ ॥ भोजनको यथेच्छ करिले जिससे अपने व्रतका भंग न होय अर्थात् मधु मांस आदि- भावार्थ- सहत-मांस- अंजन-गुरुका का भक्षण श्राद्धमेंभी न करें इस श्लोक में उच्छिष्ट-कठोरवचन- स्त्रोसंग- प्राणियों ब्राह्मणका लेख इसलिये है कि क्षत्री, वैश्यको की हिंसा उदय अस्तके समय सूर्यको देखना श्राद्धके भोजनका इस वेचनसे निषेध हैं और झूठ बोलना और गंध माल्यकोधारना कि क्षत्री वैश्यका यह काम नहींहै कि इनसबको ब्रह्मचारी वर्जिदे ॥ ३३ ॥ श्राद्धका भोजन करें ॥ ३२ ॥ सगुरुर्य किया कृत्वांवेदमस्मैप्रयच्छ- भावार्थ-ब्रह्मचारी विना आपत्तिके एकके ति । उपनीयददद्वेदमाचार्यःसरदा अन्नको नखाय और ब्राह्मण आपने व्रतकी रक्षापूर्वक श्राद्धमें यथेच्छ भोजन कर।। ३२ हृतः ॥ ३४॥ मधुमांसांजनोच्छिष्टशक्तस्त्रीमाणिहिंस पद-सः १ गुरुः१ यः१ क्रियाः२ कृत्वाऽ: वेदंर अस्मैट प्रयच्छति-कि. उपनीयऽ ददत् नीभास्करालोकनालीलपरिवादादिव श्वेदंर आचार्यः१ सः१ उदाहृतः१ ॥ र्जयेत् ॥ ३३ ॥ योजना-यः क्रियाः कृत्वा अस्मै वेदं पद-मधुमांसांजनोच्छिष्टशुक्तस्त्रीप्राणि प्रयच्छति स गुरुः यः उपनीय वेदं ददत् हिंसनं २ भास्करालोकनाश्लीलपारवादादि २ (भवति ) स आचार्यः उदाहतः वर्जयेत् क्रि-॥ ता. भा०-जो गर्भाधान आदि उपनयन योजना-मधुमांसांजनोच्छिष्टशुक्तस्त्रीप्रा- पर्यंत क्रियाओंको विधिसे कराकर ब्रह्मचारी णिहिंसनं भास्करालोकनालीलपरिवादादि को वेद पढावे उसे गुरु और जो यज्ञोपवीतही (ब्रह्मचारी वर्जयेत् ॥ को कराकर वेद पढावे उसे आचार्य कह- तात्पर्यार्थ-ब्रह्मचारी इनसववस्तु ओंको तेहै ॥ ३४ ॥ १ राजन्यवैश्ययोश्चव नेतकर्म प्रचक्षते। नित्यं ब्राह्मणो मय वर्जयेत् । 7 आचाराध्याय ब्रह्मचारिप्रकरण २ (१७) एकदेशमुपाध्यायऋत्विग्यज्ञकृदुच्यते । सोलहमें वर्ष में ब्राह्मणका करना- यह बात एतेमान्यायथापूर्वमेभ्योमातागरीयसी ३५ अभी है जर बारह वर्षका ब्रह्मचर्य होय- पांचवर्षके ब्रह्मचर्य मेंतो सोलह वर्षसे पद- एकदेशेर उपाध्यायः१ ऋत्विका यज्ञकृत उच्यते क्रि-एते? मान्याः१ यथा- वेश्यकोतो जनेऊके समान वाईस २२ या पहिलेभी केशांत कर्म करले- क्षत्री और पूर्व:-एभ्यः५ मातार गरीयसी१ ॥ चोवीस २४ वर्ष में केशांत कर्म करना । 'योजना-'यः एकदेश अध्यापयति सः भावार्थ- प्रत्येक वेदके पढनेमें १२ बारह उपाध्यायः-यज्ञकृत् ऋत्विक् उच्यते-एते गुर्वीचार्योपाध्यायविजः यथापूर्व मान्याः या पांचवर्षतक ब्रह्मचर्य वाजबतक वेद आव (भवंति ) एभ्यः (सर्वेभ्यः) माता गरीयसी । तबतक ब्रह्मचर्य करना और केशांत कर्म सोलहमें वर्षमें करना ॥ ३६॥ (पूज्यतमा)। तात्पर्यार्थभावार्थ-जो वेदके एकदेश मंत्र आपोडशादाद्वाविंशाचतुविशाचवत्सरात् । वा ब्राह्मण अथवा ६ अंग इनको पदावे ब्रह्मक्षत्रविशांकालऔपनायनिकः परः ३७ वह उपाध्याय और जो वरण किया हुआ पद-आ-षोडशात् ५आर-द्वाविंशात् ५ पाकयज्ञ आदि करे उसके ऋत्विज ये चारो चतुर्विशात् ५ च:- वत्सरात् ५ ब्रह्मक्षन- (गुरु-आचार्य-उपाध्याय-ऋत्विम् ) कमसे विशां ६ कालः१ औपनायनिकः १ परः१ ।। पूजा करनेके योग्यहै और इन सबसे अधिक योजना आषोडशातं आद्वाविंशात चपुनः पूजने योग्य माता होतीहै ।। ३५ ।। चतुर्विशात् वत्सरात् ब्रह्मक्षत्रविशां औपनाय- प्रतिवेदंब्रह्मचर्यद्वादशान्दानिपंचवा । निकः परः कालः ( स्मृतः)॥ ग्रहणांतिकमित्येकेकेशांतश्चैवपोडशे ३६ वर्षतक क्षत्रीके चोवीस वर्पतक वेश्यक ता भा०-सोलह वर्षतक ब्राह्मणके वाईम पद-प्रतिवेदं ब्रह्मचर्य १द्वादशान्दानिर यज्ञोपवीतका समय उत्तम कहा है इससे पंच१ वाऽ -ग्रहणांतिकं २ इति:- एकेर के परे उपनयनका समय नहीं रहता ॥ ३७ ।। शांतः१ चा -एव:- षोडशे ७॥ अतऊयपतत्येतेसर्वधर्मवहिप्कृताः । योजना- ब्राह्मणेन प्रतिवेदं द्वादश सावित्रीपतितावात्यावात्यस्तोमातेकतीः वापंच अब्दानि ब्रह्मचर्य कार्य एके आचार्याः ग्रहणांतिकं वदंति च पुनः केशांतः षोडशे द-अतउर्वर पतंति क्रि-एते १ सर्व- वर्षे कार्यः॥ धर्मवार कृताः १ सावित्रीपतिताः१ नात्याः१ व्रात्यस्तोमात्र ऋते:-क्रतोः५॥ तात्पर्यार्थ-जब विवाह न हुआहोय इस मनुके वचनानुसार चार वा २ दो वा एक एते पतंति वात्यस्तोमात् क्रतोःऋतेसावित्री योजना- अतऊर्च सर्वधर्मबहिस्कृताः वेद पढनेका ब्राह्मणको अधिकारहै तब एकर वेदके पटनमें बारह १२ वर्ष अथवा पांचवर्ष | पतिताः संतः नात्याः भवंति ।। ब्रह्मचर्य करें और कोई वैदके ग्रहण आनेतक तात्पर्यार्थ- पूर्वोक्तकालसे परे संपूर्ण ब्रह्मचर्यको कहते है और केशांत गर्भसे१६ धोके अनधिकारी ये तीनो पतित होते हैं और प्रात्यस्तोम यज्ञ किये विना सावित्रीसे १ वेदानधीत्य वेदी वा वेद वेति प्रवर्तते । पतित्त होजातेहै अर्थात् गायत्रीके उपदेश .
(१८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योग्य नही रहते यदि ये प्रात्यस्तोम यज्ञ कहनसे वेदही द्विजातियोंके परम निःश्रेयस करले तो यज्ञोपवीतके अधिकारी पूर्वोक्त (मोक्ष)का कर्ता है अन्य नही और एव गोणकालके अनंतरभी होते हैं ॥ ३८ ॥ शब्दसे वेदमूल स्मृतिभी मोक्षफलके देने- भावार्थ- इससे आगे ये तीनों संपूर्ण धर्मके वाली होती हैं ।। ४० ॥ अनधिकारी पतित होजाते हैं- और नात्य- मधुनापयसाचैवसदेवांस्तर्पयेद्विजः । स्तोम यज्ञ किये बिना ब्रात्यहोनेसे गाय- त्रीके अधिकारी नही रहते ॥ ३८ ॥ पितृन्मधुघृताभ्यांचऋचोधीतेचयोन्व हम् ॥ ४॥ मातुर्यदग्रेजायंतेद्वितीयमौजिबंधनात् ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादेतेद्विजाः पद-मधुना३ पयसा ३ चा-एव:-सः१ देवान् तर्पयेत् क्रि-द्विजः १ पितृन् २ मधु- स्मृताः ॥ ३९ ॥ धृताभ्यां३-च- ऋचःअधीते क्रि-च- पद-मातुः५ यत:- अने ७ जायंते क्रि- यः१ अन्वहम् ॥ द्वितीयं १ मौजिबंधनात् ५ ब्राह्मणक्षत्रिय विशः१ तस्मात्५ एते१ द्विजाः १ स्मृताः॥ अधीते सः देवान् मधुना चपुनः पयसा योजना-यः अन्वहं ऋचः (ऋग्वेदं) योजना-यस्मात् अग्रे एते मातुः सका-चपुनः पितॄन् मधुघृताभ्यां तर्पयेत् ।। शात् जायते एषां द्वितीयं जन्म मौजिबंधनात् ता० भा० जो द्विज प्रतिदिन ऋग्वेदको भवति तस्मात् एते ब्राह्मणक्षत्रियविशः पढताहे वह मधु (सहत वा मिष्ट) और दूधसे द्विजाः स्मृताः॥ ता०भा०- १०-जिससे ये तीनों प्रथम माताके | को तृप्त करता है ॥ ४ ॥ देवताओंको और मधु और घृतसे पितरों सकाशसे और दुवारा मौजिबंधन (यज्ञोपवीत) के समय पैदा होते हैं तिससे ये ब्राह्मण क्षत्रिय यजूंपिशक्तितोधीतेयोन्वहंसघृतामृतैः । वैश्य द्विजाति कहलाते हैं॥३०॥ मीणातिदेवानाज्येनमधुनाचपितुं यज्ञानांतपसांचवशुभानांचैवकर्मणाम् | स्तया ॥ ४२ ॥ वेदएवद्विजातीनांनिःश्रेयसकरःपरः॥४०॥ पद-यपि २ शक्तितः अधीते क्रि-यः१ पद-यज्ञाना६ तपसांच-एव:-शुभानां६ अन्वहऽ सः१ धृतामृतेः ३ प्रीणाति क्रि- च- एव कर्मणां ६ वेदः १ एव-द्विजातीनां देवान् २ आज्येन ३ मधुना ३ च:- -पितृन २ ६ निःश्रेयसकरः १ परः १ ॥ योजना-द्विजातीनां पज्ञानां चपुनः त योजना-यः शक्तितः अन्वहं . यषि पसां वपुनः शुभानां कर्मणां निःश्रेयसकरः अधीते सः घृतामृतैः देवान्-तथा आज्येन परः वेद एव-नात्य इति यावत् ॥ चपुनः मधुना पितृन् प्रीणाति (तर्पयति )॥ ता. भा० श्रुति और स्मृतिमें प्रतिपाद्य ता. भा० जो द्विज अपनी शक्तिके अनु- ' ( कहीहुयो ) यज्ञॉके- और कायसंताप सार प्रतिदिन यजुर्वेदको पढता है वह घृत आदि तपोंके और चांदायण आदि शुभ- और अमृतसे देवताओंको ओर घृत और कार्य और यज्ञोपवीतआदि संस्कारोंका बोध | मधुसे पितरोंको-तृप्त करता है ।। ४२॥ तथा-॥
आचाराध्याय ब्रह्मचारिप्रकरण २ सतुसोमघृतैर्देवांस्तर्पयेद्योन्वहंपठेत् । शत्या.३ अधीते क्रि-हि:-यः२ अन्वहम् ।। सामानितृप्तिकुर्याचापतृणांमधुसर्पिपाध३ योजना-यः द्विजः वाकोवाक्यं चपुनः पुराणं चपुनः नाराशंसीः गाधिकाः तथा इति- पद-स:१तु-सोमघृतैः ३ देवान् २तप- हासान-विद्याः शक्त्या अन्वहं अधीते येत् क्रि- यः१ अन्वहम् - पठेत् क्रि-(पठति ॥ सामानि तिर कुर्यात् क्रि-च-पितृणांव ता० भा० जो द्विज वाकोवाक्य.(प्रश्नो- मधु सर्पिषा ३॥ त्तररूप वेदके वाक्य ) ब्राह्म आदि पुराण योजना-यः अन्वहं सामानि पठेत् सःसोम- और चकारपढनेसे मानवआदि धर्मशास्त्र घृतेः देवान् तर्पयेत्- चपुनः मधुसर्पिणा और नाराशेती ( रुद्र है देवतां जिनका पितॄणां साप्तं कुर्यात्॥ ऐसे मंत्र) और गाथा (इंद्गाथाआदि ताः भा० जो द्विज प्रतिदिन सामवेदको यज्ञगाथा)-महाभारतआदिइतिहास-वारुणि पढता है वह सोम (अमृतलता) और आदि विद्या-इन सबको अपनी शक्तिके धृतेसे देवताओंको तृप्त करताहै- और अनुसार पठता है ॥ ४५ ॥ मधु और पीसे पितरोंकी तृप्तिको करता मांसीरीदनमधूतर्पणसदिवौकसाम् । करोतितृप्तिकुञ्चपितॄणामधुसर्पिप४ि६ ॥ मेदसातर्पयेद्देवानयवागिरस पठन् । पितुंश्चमधुसर्पियामन्वशक्तितो पद-मांसक्षीरोदनमधुतर्पणं , २ सः १ दिवौकसाम्६ करोति कि- तृप्तिं २ कुर्यात द्विजः ।। ४४ ॥ क्रि-च-पितृणांमधुसर्पिषा३ ॥ पद-भेदसा३-तर्पयेत् क्रि- देवान अथ- योजना-सः द्विजः दिवाकसां मांसधारी गिरतार पठन्१ पितृन् २ च- मधुसार्प- दनमधुतर्पणं करोति-चपुनः पितॄणां तृप्ति भ्याम्३ अन्वहं- शक्तितः:-द्विजः१ ॥ मधुप्तर्पिपा कुर्यात्।। याजना-द्विजः शक्तितः अथर्वागिरसः 'पठन सन् अन्वहं मेदसा देवान्-चपुनः मधु- ता भा• वह द्विज-मांस-दूध-ओदून ( भात)- मधु-इनसे देवताओंको और -सर्पियो पितृन तर्पयेत्॥ मधु और घीसे पितरोंको तृप्त करता ता. भा० जो द्विज अपनी शक्ति के अनु- है।॥ ४६॥ सार अथर्वागिरस (अथर्वणवेद)को प्रति दिन पढता है वह मेद (मजा से देवता सेतृप्तास्तर्पयंत्ये सर्वकामफलैःशुभैः । ये ओंको मधु और घीसे पितरोंको तृप्त करता यंक्रतुमधीतैसीतस्यतस्याप्नुयात्फलम् ।। है।॥ ४॥ पद-ते १ तृप्ताः १ तर्पयंति कि-एनं २ याकोवाक्यं पुराणंचनाराशंसीश्च सर्वकामफलैः ३ शुभः ३ यं यं २ ऋतुं २ गायिकाः । इतिहासांस्तथाविद्याः अधीते क्रि- असो १ तस्य ६ तस्य ६ शत्याधीतेहियोऽन्वहम् ॥ १५॥ आमयात् क्रि- फलम्॥ पद-वाकोवाक्यंरपुराणंरच-नाराशंसीः२ योजना-तृप्ताः सन्तःते (देवाः पितरः) उ-गायिकाःर इतिहासान तथाऽ-विद्याः२ | एनं शुभैः सर्वकामफले तर्पयंति-असो +4 (२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कांतहो अर्थात् वरके मन और नेत्रोंको आ- बाधक है कि विवाही हुयो कन्याओंका अ- नंद दे क्योंकि आपस्तंव ऋषिने इसे वचनसे | शौच केही माने जिनके विवाही हो-इससे यह कहा है कि जिसमे मन और चक्षु ये | जिन सपिंडोंमें विशेष वचन नहो तहांही पूर्वो- दोनो निरंतर लगे रहै उस कन्याके विवाह । क्त वचन दशदिनके अशोचका चोधक सम नेसे ऋद्धि होती है परन्तु न्यून वाअधिक बाह्य झना-इसीसे एक शरीरके अवयवोंके अन्व- अंगोंके दोष न होनेपरही यह समजनी यदि. यसे सपिंडता अवश्य कहनी क्योंकि इन वेदोष होयतो पूर्वोक्त कांताकोभी न विवाहे | श्रुतियों में भी यही कहा है कि आत्माहि -और जो असपिंडा हो अर्थात जिप्तका देह HD) अपने देहके संग एक नहो क्योकिं सपिंडता तभी होती है जब शरीरके अवयव एक हो- यह कहा वही पिता आदि पंदा ही सोई दिखाते है कि पुत्रका पिताके संग इससे कर प्रत्यक्षसे दीखता है तिसी प्रकार ग8 सापिन्य है कि पिताके शरीरके अवयवोंका | पनिषदमें लिखा है कि इस शरीरमें छः संबंध वीर्यद्वारा पुत्रमें है इसी प्रकार पिताके | कोस (वस्तु)है तीन पितासे और तीन मा- द्वारा पितामह आदिके संगभी सपिंडता सम | तासे अस्थि स्नाय मज्जा पितासे-त्वचा मांस झनी-इसी प्रकार माताके शरीरके सम्बंधसे | रुधिर मातासे होते है-इस प्रकार तहां २ माताके संग और माताके द्वारा मातामहआ शास्त्रोंमें अन्वयका प्रतिपादन किया है-यदि दिके संग समझनी इसी प्रकार परंपरासै एक साक्षात् पिताके ही संबंधसे सपिंडता मानोगे शरीरका संबंध होनेसे मौसी और मातुल- | तो माताकी संतान और भ्राताके पुत्रोंमें और चाचा पिताकी स्वसाके संग समझना- सपिंडता न होगी क्योंकि समुदायशक्तिसे इसी प्रकार पतिके संग पत्नीकी सपिंडता है रूढि मानोगे तो जहां तहां मानी हुयी अव- उसके संग अगकी एकता होनेवाली है-इसी यवशक्ति त्यागनी पडेगी-और परंपरासे एक प्रकार भ्राताकी स्त्रियोंके संग अपनी सपिंडता शरीरके अवयवसंबंधसे सपिंडता माननमें है क्योंकि भ्राताऑकि संग अपने शरीरकी दोपका अभाव आगे कहेंगे-और जो कन्या एकता है और उनके देहोंके संग उनकी अपनेसे यवीयसी हों अर्थात् अवस्था और स्त्रियोंके देहांकी-इस प्रकार जहांर सपिंड देहके प्रमाणसे न्यून होय उसको अपनी गृ- शब्द हो वहां २ साक्षात् वा परंपरा संबंधसे ह्यसूत्रमें कही हुई विधिसे विवाह ।। ५२ ॥ शरीरके अवयवोंका एकही संबंध जानना भावार्थ-नही नष्ट हुआ है व्रत जिसका इसमें यह शंका होती है कि जो मातामह | ऐसा ब्रह्मचारी श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त-और- आदिभी सपिंड है तो इस वैचनके स्त्री-जिसका पर पुरुषके संग संबंध न होय अनुसार उनको दशदिनकाही सूतक मर और जो मनोहर हो और अपने सपिंडोंमे नेका होना चाहिये सो शंका ठीक नही है क्योंकि उसका यह "विशेष वचन १ आत्माहि जज्ञे आत्मनः-प्रजामनुप्रजायसे । २ सएवाय विष्टः प्रत्यक्षेणोपलभ्यते । १ यस्या मनचक्षुषोनिवधस्तस्यामृद्धिः । ३ एतत् पाकौशिक शरीर त्रीणि पिटतः २ दशाहं शावमाझौच सापडेगु विधीयते । त्रीणि मावतः अस्थिस्नायुमजानः पित्तः खड्मास ३ प्रत्तानामितरे कुर्यः। रुधिराणि मावतइति ।
आचाराध्याय विवाहप्रकरण ३ (२३) न होय और जो अवस्था वा देह प्रमाणसे कोभी होय पर जिसका प्रवर एक होय-और न्यून होय ऐसी कन्याको विवाहे ।। ५२ ॥ असपिंडा इस पदसे सपिंड कन्याका विवाह अरोगिणींभ्रातृमतीमसमानार्पगोत्रनाम् । चारों वर्णोको निषिद्ध है क्योकि सपिंडता पंचमात्सप्तमादूर्ध्वमातापितृतस्तथा ५३ सबमें होसकती है और एक गोत्र और एक प्रवरको कन्याका जो निषेध है वह द्विजाती- पद-अरोगिणों २भ्रातमती २ असमाना-योंके ही लिये है-यद्यपि क्षत्री और वेश्योंका पंगोत्रजां २ पंचमात् ५ सप्तमात् ७ उर्ध्वम्२ कोई प्रातिस्विक ( भिन्न २) गोत्रके न हो- मातृतः पितः तथा 5-॥ योजना-अरोगिणीं भ्रातृमती असमानार्ष- गोत्र और प्रवरोंको वर्जदे- क्योंकि आश्व- नेसे प्रवर नही हो सकता तथापि, पुरोहितके गोत्रज्ञां कन्यां (उद्वहेत ) मातृतः पंचमात् लायन ऋपिने इस वेचनसे यह कद्दा पितृतः सप्तमात् उर्ध्व सापिंड्यं निवर्तते है कि यजमानके प्रवरांका विभाग करो यह इति शेषः॥ कहकर क्षत्री और वैश्यको पुरोहितकहो प्र- तात्पर्यार्थ-जो कन्या ऐसे रोगवाली न } वरोंका विभाग होता है सिद्धांत यह है कि होय जिसकी चिकित्सा नहो सके और जि- | सपिंडा-समानगोत्रा-समानप्रवरा में तीनों सका नाता विद्यमान होय और अपने प्रवर | भाया ही नही होसकती और गंगवाली गोत्रकी न होय क्योंकि गौतम ऋषिने । और जिसका नाता न होय ये दोनों भार्या हो उनका विवाह नही लिखा कि जिनका सकती है परंतु लौकिक विगंध हे अर्थात् प्रवर एक होय-और मर्नुजीनेभी माता रोगिणा में संतानके न होनेकी- जिसके भाई और पिताके सपिंडकी कन्याके संग विवाह न होय उसमें पत्रिका करनेकी शंका नहि लिखा-और माताक गोत्रकाभी कन्याका | बनी रहती है और मातांक वंशमें माताते विवाह कोई नहीं चाहते क्योंकि इस पांचवी पोदीसे और पितार्क वंशमें सातवी वैचनसे उक्त कन्याके विवाहमें प्रायश्चित्त पोटीस ऊपर सपिंडता नहीं रहती है-इससे लिखा है-कि मामाको पुत्री माताके गोत्रकी | यद्यपि यह सपिंड शब्द अवयव शक्ति (अ. और अपने प्रवरकी कन्याको विवाह लेतो के अनुसारसे) सयका बोधक होनेपर मथ- उसे त्यागकर चांद्रायण प्रायश्चित्त कर-कर पंकज आदि शब्दकै समान इनही परि पिछले श्लोकके असपिंडा पदस पिता और मितोंका बोधक है कि पिता आदि छः ६ वा माताकी वहिनको पुत्रीयोंका निषेध हैं और पुत्र आदि छः ६ और सातवा आत्मा (आ- यहां असगोत्रा पदप्से उसका निषेध है जो 4) और संतानके भेदमेंभी जिससे संतान भिन्नकुलमें पैदाहुई असपिड तो होय पर | भेद होय उससे सातवी पीढीतक गिनले ति- गोत्र एक होय-असमानप्रवरां इससे उसका सस मातासे लेकर माताके पिता और पिता- निषध है जो असपिंड और असमानगोत्र- महकी गिनती में जो पांचवी पीढी होय उसे मावत:पांचमी कहते है इसी प्रकार पितासे १ असमानमवविवाहः। लेकर पितामह आदिकी गिनतीमें जो सात- २ असापेंडा च या मातुरसपिंडा च या पितुः । ३ मामुलस्य सुनामूवा मातगोत्रा तथैवच । १ यजमारस्यायान् प्रवगीत इत्युक्त्वा पौरोहि- समानप्रवरा चैव सक्ला चांदायण घरदे । त्यान् राजविशान् प्रणाते।
(२४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित। वी पीढी हो वह पित्तः सप्तमी कहाती है- महाकुलात् ५ स्फीतात् ५ अपित- न:-. परंपरा संबंधसे भगिनी-भ्राता-भ्राताकी पुत्री संचारिरोगदोषसमन्वितात् ५॥ और पितृव्य (चाचा) इनके विवाहमें भिन्न २ योजना-श्रोत्रियाणां दशपूरुपविख्यातात कुलसे उत्पन्न होनेसे शाखाका भेद गिना महाकुलात् ( कन्या) आहर्तव्या संचारि जाताहे-वशिष्ठजीने जो यह कहा है कि रोगदोषसमन्वितात् स्फीतादपि न आह- माता पांचवी पितासे सातवी और पै- व्या॥ ठीनसीने मातात तीन और पित्तासे पांच तात्पर्याय-वेदपाठीयोंका मातासे और पीटीमें न होय उसे विवाह यह भी उ-पितासे पांच २ पुरुषोंतक विख्यात. जो ससे इधरकी कन्याको निषेधके लिये है । महान् कुल अर्थात् पुत्र पौत्र पशु दासी कुछ प्राप्तिके लिये नही-इससे सव स्मृति- ग्राम आदिसे प्रसिद्ध उससे कन्याको योंका भविरोध है यह बातभी सजातीयोंमें विवाह कर लावे और जिसमें कुष्ठ अपस्मार जाननी विजातियोंमे तो शंखऋपिने यह । (मृगी) आदि संचारी रोग और माता कहा है कि ब्राह्मण आदि एक जातिसे पिताके शुक्रशोणितद्वारा संतानमें प्रवेश भिन्न २. जातिकी स्त्रियोंमे पैदा हुये जन करनेवाले दोष होय वो चाहै महाकुलभी पृथक् २ होते हैं और जो सजातीय होय तो उसकी कन्याको न विवाहे-क्योंकि भिन्न २ स्त्रियों में पैदा हुये वे सपिंड मनुजीने इस टोकसे ये दशकुल होते हैं इन सबका शौच (शुद्धि) पृथक् २ विवाहमें वर्जित किये हैं-कि क्रियाहीन- होता है जिसको भशाच प्रकरणमें कहेंगे और सांपडतो तीन पुरुष पर्यंतही होते पुरुषहीन वेदरहित-रोमश-( जिस कुलके है-पद्यपि इन श्लोकोंसें माताके गोत्रकी क- मनुप्योंके देहपर अधिक रोमहीं) अर्श न्याके संग विवाह कहा है तथापि यह किसी (बवासीर ) की व्याधिसे युक्त-क्षयो-मंदा- २ दक्षिण भादि देशोंमें ही प्रचलित हैं स- नि-अपस्मारी-भित्री ( संपेद दाद ) बैन नहीं ॥ ५३॥ कुष्ठी ।। ५४ ॥ भावार्थ-जिस कन्याकै रोग न होय और भावार्य-दशपुरुषांतक विख्यात वेदपा- माता होय और जो अपने गोत्र और प्रवर ठियोंके महान् कुलकी कन्याको विवाद की न होय उसे विवाह और मातासे पांचवी और संचारी रोग और दोपसे युक्त बडे और पितास सातवी पीटीतक सपिडता | कुलकीभी कन्पाको न विवाहे ॥ ५ ॥ रहती है ।। ५३॥ एतैरेवगुणयुक्त सवर्णाश्रोत्रियीवरः । दशपूरुपविख्याताच्ट्रोत्रियाणांमहाकुलात् । यत्नात्परीक्षितःपुंस्त्वेयुवाधीमानजनप्रियः स्फीतादपिनसंचारिरोगदोपसमन्वितात् ।। पद-एतः ३ एव:- गुणेः ३ युक्तः १ पद-दशपुरुषविख्यातात् ५ श्रोत्रियाणांइतर पुंस्त्वे ७ युवर १ धीमान् १ गन- सवर्णः१ ओत्रियः१ वरः१ यत्नात्र परी- पचनी मतमी मारतः रिक्तस्नया। २ग्रीनारामतः पनातीय पवितः। प्रियः ।। ३ का सार क्षेत्रापजनाः । निशि निपुर्ण नियोगशामन् । पासपोयारिस्ताव दिए । सप्पामचररमारी चित्रिशुलिन ।
आचाराध्याय विवाहमकरण ३ (२५) योजना-एतैः एव गुणेः युक्तः सवर्णः / संग्रहः उच्यते एतत् मम मतं न (अस्ति) ओत्रियः यत्नात् पुंस्त्वे परीक्षितः युवा धी- युक्तः यस्मात् अयं ( द्विजातिः) तत्र मान् जनप्रियः वरः (द्रष्टव्य इति शेषः)। स्वयं जायते ॥ तात्पर्यार्थ-अब कन्याके ग्रहणमें नियमों तात्पर्याय-विवाहके तीन भेद हैं १ रतिके को कहकर कन्याके दानमें वरके नियमोंको लिये २ पुत्रके लिये ३ धर्मके लिय-उन कहते हैं कि इन पूर्वोक्त गुणोसे ही युक्त | तीनोंमें पुत्रार्थ विवाहके दो भेद हैं-एक नित्य और दोषोंसे जो वर्जित होय और जो अप- दूसरा काम्य नित्यमें प्रजाके लिये सवर्ण वेद- से उत्कृष्ट वा समान वर्णका होय हीन पाठी वरदेखना इससे सवर्णा कन्या ही मुख्य वर्णका न होय और जो स्वयं वेदपाठी | दिखाई अब काम्यमें नित्य संयोग होनेसे होय और जिसके पुंस्त्वकी यत्नसे इस | अनुकल्प (गौण )ताको कहते हैं कि जो नारदोक्त वचनके अनुसार परीक्षा करिली काम्य विवाहमें मनुजीने ब्राह्मणको इस होय कि जिसका वीर्य्य जलमें तरे और प्रकरणमें लिखा है कि कामनासे प्रवृत्त जिसका मूत्र सुखसे ऐसा निकसे कि पृथ्वी हुये-द्विजातियोंकी क्रमसे ये स्त्री श्रेष्ठ पर गिरनेके समय झाग उठे इन लक्षणोंसे होती हैं कि ब्राह्मणकी चारों वर्णकी जो युक्त वह पुरुष और विपरीत लक्षणों क्षत्रीको तीन वर्णको वैश्यको दो वर्णको युक्त वह नपुंसक होता है-और जो युवा | शूद्रको एक वर्णकी भार्या होती है यह जो होय वृद्ध न होय और जो लौकिक और द्विजातियोंको शूद्राका विवाह है यह मुझे वेदोक्त व्यवहारोंमें निपुण होय और जो ( याज्ञवल्क्यको ) संमत नहीं- क्योंकि यह हास्यपूर्वक कोमल भाषण आदिसे सबको द्विजाति भार्यासें स्वयं पैदा होता है और प्यारा प्रतीत होय ऐसा वर देखना | इस श्रुतिमेंभी यह लिखा है कि वही चाहिये ॥ ५५॥ जाया होती है जिसमें यह पुत्ररूपसे पुनः भावार्थ-जो इन पूर्वोक्त गुणोंसे युक्त, पैदा होय-इस श्लोकसे जो आवश्यक सवर्ण, वेदपाठी यत्नसे को हुई परीक्षामें पुरुष | पुत्रोत्पादन में प्रवृत्त हुये द्विजातीको शूद्राके युवा-व्यवहामि निपुण जनोंको प्रिय होय | विवाहका निषेध किया उससे यह प्रकट वही वर देखना ॥ ५५॥ आज्ञा प्रतीत हुई कि आवश्यक पुनोत्पत्ति के लिये काम्य विवाहमें ब्राह्मगको क्षत्रिया यदुच्यतेदिजातीनांशूद्राद्दारोपसंग्रहः । वेश्याके,क्षत्रोको वैश्याके विवादमें दोष नही, नेतन्मममतंयस्मात्तबायजायतेस्वयम् ॥ क्योंकि वेभी द्विजाति हैं परंतु यहभी पद-यत् १ उच्यते कि- द्विजातीनां ६ विवाह भर प्रचलित नहीं है किंतु समान शूद्रात् ५ दारोपसंग्रहः६ ना एतत् १ मम६ वर्णकी कन्याका विवाइद्दी इत्तम समझा मतं १ यस्मात् ५ता- अयं १ जायते क्रि-जाता है ।। ५६ ॥ स्वयं १॥ योजना यत् द्विनातीनां शूद्राद दारोप- फामतस्तु तानानिमायुः श्मनो वा। भूर मार्गदस्य सार पशिस्मृतः । देव १ पान खेत वीजहादिमूर्व म फेनिल । पुमान् वा यर या माचामनामनः । स्माक्षरतारपतिस्तु पमशः। २ मा माया मावि पदम्या आपने पुनः। T (२६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । भावार्थ-जो मनु आदिकोंने द्विजाति- द्विजातियोंकी क्रमसे तीन ३ दो २ एक? योंकोभी शूद्रसे स्त्रीका विवाह करना लिखा और शूद्रकी शूद्राही एक भार्या होती है वह मेरा मत नही अर्थात् याज्ञवल्क्यको है ॥ ५ ॥ संमत नहीं क्योंकि यह द्विजाति जायामें ब्राह्मीविवाहाहूयदीयतेशत्यलंकृता। स्वयं पैदा होता है ।। ५६ ॥ तज्जःपुनात्युभयतापुरुषानेकविंशतिम्॥ तिलोवर्णानुपूय॑णद्वेतर्थकायथाक्रम । पद-ब्राह्मः १ विवाहः१आहुय:-दीय- ब्राह्मणक्षत्रियविशांभार्यास्वाशुद्जन्मनः ॥ ते क्रि-शक्त्यलंकृता १ तज्जः १ पुनाति पद-तिस्रः१वणानपूर्येण ३ द्वे २ तथाऽ- | क्रि-उभयतः- पुरुपान् १ एकविंशति॥२॥ एका १ यथाक्रम:-ब्राह्मणक्षत्रियविशां ६ योजना-यस्मिन् आहूय शक्त्यलंकृता भार्या १ स्वर १ शुद्रजन्मनः६ ॥ कन्या दीयते सः ब्राह्मः विवाहः तज्जः पुत्रः योजना-ब्राह्मणक्षत्रियविशां वर्णानपूर्येण | उभयतः एकविंशतिं पुरुषान् पुनाति ।। तिसः द्वे तथा एका यथाक्रमं भार्याः भ ता. भा०-अव आठ प्रकायेंके विवाहमें वांत शूदजन्मनः स्वा-(शूदा एव)॥ प्रथम ब्राह्म विवाहका लक्षण कहते है कि तात्पयार्य-अब उस मनुष्यके विवाहका जिस विवाहमें पूर्वोक्त वरको बुलाकर शक्ति से अलंकृत की हुई कन्या संकल्प करके क्रम कहते हैं जिसको रतिकी कामना होय और पुत्रवान् होय और भार्या नष्ट दी जाय उस विवाहको ब्राह्म विवाह कहते है उस कन्यामें पैदा हुआ पुत्र यहि सुपात्र होगई होय और जो अन्य आश्रमका अधि- कारी न होय और जिसको गृहस्थाश्रममें होय तो दोनो तरफ इक्कीस २१ कुलोको टिकनेकाही आकांक्षा होय कि वर्णक कम अर्थात दस पिता आदि और दस पुत्र आदि तीनों द्विजातियोंमें ब्राह्मणकी तीन ३ क्षत्रीको इक्कीसवां अपना आत्मा पवित्र करता हेपर दो २ वैश्यकी एक १ शुदकीभी एकही। यज्ञस्थऋत्विजेदेवआदायार्पस्तुगोयं । भार्या होती है- और सवर्णा तो सबको मु चतुर्दशप्रयमजःपुनात्युत्तरजश्चपट् ५९ ख्यह- और पूर्व पूर्व वर्णकी कन्याके पद-यज्ञस्थे ७ ऋत्विजे ४ देवः १ आदा- अभावमें उत्तर २ वर्णकी भायी होसकती है ! य-आपः१तु:-गोद्वयं १ चतुर्दश १ प्रथम- और यही क्रम नित्य विवाहकै समान जः पुनाति क्रि-उत्तरजः१च- षट् ॥१॥ पुनोत्पत्ति के लिये कियहुये काम्य विवादमें योजना यस्मिन् यज्ञस्य ऋत्विजे कन्या दी- भी समझना । अतएव शूद्रापुनका पुत्रोंके , यते स देवःतपुनःयस्मिन् वरात गोद्वयं आ- मध्यमें गिनना और उसके विभागको दाय कन्या दीयते सः आपः प्रथमजः च- कहनाभी उसकाही है जो तिकी कामनासे | तुर्दश उत्तरजः पद् पुनाति ।। गृहस्थाश्रमवालेकी आकांक्षासे उत्पन्न होय ता. भा०-जिस विवाहमें यज्ञ कराते और जो अकस्मात् शुद्रामें पैदा होय वह हुये ऋत्विजको कन्यादीजाय वह देव और नपुत्र है और न उसको धनका विभाग जिस विवाहमैं वरसे भावश्यक और विवा- मिलता है ।। ५७ ॥ हमें करने योग्य धर्मके लिये दो बल लेकर भावार्य- माझग क्षत्री वश्य इन तीनों ! कन्यादी जाय वह आर्ष विवाह होता है आचाराध्याय विवाहमकरण ३ (२७) . क्योंकि मनुजीनें इसे वचनसे धर्मके लिये ता. भा० वरसे द्रव्यको लेकर कन्या- ही १ मोमिथुन वा २ गोमिथुन लेने कहे है- का जो दान वह आसुर-परस्सर कन्या और देव विवाहसे पैदा हुआ चौदह कुलोंको ५ वरकी प्रीतिसे जो विवाह वह गांधर्व-और पहिले-७ पिछले और आप विशहसे पैदा । युद्धसे कन्याकोहरनेसे जो विवाह सो राक्षस- हुआ छः कुलोंको अर्थात् तीन पिछले तीन और छलसे स्वापआदिके समय जो कन्याका अगलोंको पवित्र करताहै ॥ ५९ ॥ ग्रहण वह पेशाच विवाह कहाता है ॥ ३१ ॥ इत्युक्त्वाचरतांधर्मसहयादीयतेर्थिने । पाणिग्राह्यःसवर्णासुगृह्णीयात्क्षत्रियाशरम् । सकायापावयेशनःपट्पदंश्यान्सदात्मना।। वैश्यप्रतोदमादद्याद्वेदनत्यग्रजन्मनः ६२ पद-इति:- उक्त्वा:- चरतां कि-धर्म पद-पाणिः१ ग्राह्यः१ सवर्णासु ७ गृण्डी २सहा-या १ दीयते कि-अर्थिने ४ सः१ यात् क्रि-क्षत्रिया ? शरम् २ वेश्या १ प्रतोदर कायः १ पावयेत् क्रि-तनः १ षट् २ षट् आदद्यात् क्रि-चेदने ५ तु:- अमजन्मनः६॥ वंश्यान २ सहा- आत्मना ३ ॥ योजना-अग्रजन्मनः (ब्राह्मणस्य वेदने योजना-सह धर्म चरतां इति उक्त्वा । सवर्णासु पाणिग्राह्यः क्षत्रिया शरं गृहीयात या कन्या अधिने दीयते सः विवाहः कायः वैश्या प्रतोद आदद्यात् ॥ (प्राजापत्यः) तजः पुत्रः आत्मना सह पद ता. भा० सवर्णा स्त्रियोंके विवाहमें अपने पटू वंश्यान् पावयेत् ॥ गृह्यमें उक्तविधिसे पाणि ( हाथ ) कोही और ता. भा० तुम दोनो मिलकर अपने २ अपनेसे उत्कष्ट (उत्तम) वरके विवाहमें धौंका आचरण करो यह कहकर जोयाच- क्षत्रियकी कन्या बाणको-और वेश्या प्रतोद नाकरनेवाले वरको कन्या दोजाय वह विवाह (कोरडा को-और इस मनुवचनक अनुसार प्राजापत्य होताहै उससे पैदाहुआ पुत्र छः शूद्रा वस्त्रकी दशाको ग्रहण करे ॥ ६२ ॥ पिछले और छः अगले और एक अपनी । पितापितामहोभ्रातासकुल्योजननीतथा । आत्मा इसप्रकार तेरह १३को पवित्र करता कन्याप्रदःपूर्वनाशेप्रकृतिस्थापरःपरः ॥ पद-पिता पितामहःभ्राता १ सकुल्यः१ आसुरोद्रविणादानादांधर्वः समपानिमयः । जननी १ तथा:- कन्याप्रदः १ पूर्वनाशे ७ राक्षप्तोयुद्धहरणास्पैशाचाकन्यकाछलात् ॥ प्रकृतिस्थः१ परः परः १॥ योजना-पिता पितामहः भ्राता सकुल्यः पद-आसुरः१ दविणादानात् ५ गांधर्वः१ | तथा जननी-एषां मध्ये पूर्वनाशे सति प्रकृ. समयात् ५ मिधः5- राक्षप्तः १ यद्भहरणात्य तिस्थापरः परः कन्याप्रदः भवति । पैशाच:१ कन्यकालात् ५ ॥ ता-भा-पिता-बाबा-भाई-कुलमें उ- योजना-द्रविणादानात् आसुरः-मिथःसम-त्पन्न-और माता-इन सबमें यदि पूर्व २ न यात् गांधर्वः युद्धहरणात् राक्षसः- कन्यका होय तो पर २ (अग्रिम ) कन्याका दान करें छलात्-पैशाचः विवाह स्मृतः-चुधैगित शेषः। ( परन्तु यदि वह प्रकृतिस्थ हो अर्थात् उन्माद आदि दोषसे रहित हो ॥ ६३ ॥ 1 एकं गोमिधुन वै वा वरादादाय धर्मत कन्या- प्रदान विधिवदायी धर्मः स उच्यते । १ वसनस्य दशा प्रामा द्योत्कृष्टवेदने ।
(२८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अप्रयच्छन्समामोतिभ्रूणहत्यामृतावृतौ । विषयमें समझना-क्योंकि इस मनुवचनके गम्यंत्त्वभावेदातृणांकन्याकुर्यात्स्वयंवरम् ॥ अनुसार सप्तपदी होनेपरही विवाहको समाप्ति होती है ।। ६५॥ पद-अप्रयच्छन् १समाप्नोति क्रि-भ्रूण- इत्या २ ऋता ७ऋतौ ७ गम्यं २ तु:- अनाख्यायददद्दीपदंडटत्तमसाहसम् । अंभावे ७ दातृणां ६ कन्या १ कुर्यात् कि- अदुष्टांतुत्यजन्दब्योदूपयंस्तुमृपाशतम्६६ स्वयं १ वरम् २ ॥ पद-अनाख्यायऽ ददतर दोर दंडः १ योजना-यस्यदानाधिकारःसः कन्यांअ- उत्तमसाहसम् २ अदुष्टां २ तु:- त्यजन् १ प्रयच्छन् सन् ऋतो ऋतौ भ्रूणहत्यां अवा-दंडयः१ दूषयन् १ तुर-भूषा:- शतम् ।। मोति दातृणां अभावे तु कन्या स्वयं गम्यं योजना- यः (कन्यायाः) दोष अना- वरे कुर्यात् ।। ख्याय ददत् सत् भवति सः पिता उत्तम-. ता० भा० इन पूर्वोक्त पिता आदिदाताओं साहस दंडयः अदुष्टां कन्यां त्यजन् तुपुनः में जो ऋतुसमयमें कन्याकादान न कर वह | मृषा दूपयन् वरः शतम् दंड्यः ।। एक रऋतुमें भ्रूण (पाल) हत्याको प्राप्त होता तात्पर्यार्थ- जो पिता कन्याके ऐसे है-और इनसबके अभावमें कन्या गमन दोषको न कहकर दान करता है जो नेत्रोंसे के योग्य वरके संगस्वयं विवाह करले॥६॥ दीखसके उसको और जोवर निर्दोष कन्याको सकृत्प्रदीयते कन्याहरस्तांचोरदंडभाव! प्रतिग्रह लेकर त्योगदे उसको उत्तम साइ- सका यह दंड राजादे उत्तम साहसका दत्तामपिहरेत्पूर्वाच्छेयांश्चैदरआवजेत् ॥ दंड कमसे कम सहस्रपणलेना- यासर्वस्व पद-सकृतः- प्रदीयते क्रि- कन्या १ हरना-अथवा देहमें दाग देकर पुरसे नि- हरन १ तां २ चोरदंडभाक् १ दत्तां २ कालना अथवा उसके अंगको छेदन करना अपि-हरेत् क्रि-पूर्वात् ५ श्रेयान् १ चेत् --होता है और इसको उत्तम साहस कहते वरः १ आग्रनेत क्रि-॥ है- कि विप-या शस्त्रसे मारना-परदाराका योजना-कन्या सकृत् प्रदीयते-तां हरन् । संग- और जिससे प्राणों का नाश होनेकी सन् चोरदंडभाक् भवति- चेत् (यदि) संभावना होय वह- और जो विवाहसे पहि- पूर्वात श्रेयान् वरःमायगेत् तईि दत्तां अपिलेही द्वेष आदिसे कन्याको झूठे दोष लगावे हरेत् ॥ उसको राजा साँपण दंडदे ॥ ६६ ॥ ता. भा. शास्त्रका नियम यह है कि क- भावार्थ-कन्याके दोपको न कहकर दान न्याका दान एक वारही होताहे इससे दिये देनेवालेको और निदपि कन्याफे त्यागनेवाले पीछे रसको जो हर वह चौरदंटका भागी वरको उत्तम साहस दंडदे- और ना होताह-यदि प्रथम वरको अपक्षा विद्या अ- से निष्टातु विझया विद्धिःसप्तमे पदे । भिजन (फुल)भादिसे उत्तम वर आजाय २ उत्तमे साहसे दरः सागर प्यते । पपः ॐ..प्रथम पर पातकी और दुराचारी होय । सरस्वहाण पुगभिर्यासनांयते । तदंगदायुसो दर तो दीयो कन्याकोभी हरले यही सप्तप- ( उत्तमसाहस । व्यापारी विपत्रायः पादाराभिमश्न दीसे मपम वा वाग्दानसे दीडुपी कन्याके | भागोरीचि यथान्यदुधमुत्तममादयम् । 7.
आचाराध्याय विवाहप्रकरण ३ (२९) कन्याको झूठा दोष लंगावे उसको सौपण गोत्रः पुत्रकाम्यया घृताभ्यक्तः (सन् ) दंडदे ॥ ६६ ॥ ऋतो अपुत्राम् इयात्-गच्छन् (सन् ) आ- अक्षताचक्षताचैवपुनर्भूःसंस्कृतापुनः गर्भसंभवात् गच्छेत् अन्यथा तु पतितः भवेत् स्वैरिणीयापतिहित्वासवर्णकामतःश्रयेत् अनेन विधिना जातः पुत्रः अस्य (पूर्ववोदुः) क्षेत्रजः पुत्रो भवेत् ॥ ६८ ॥६९ ॥ पद-अक्षता १ चह-क्षता १ चा-एव:- पुनर्भूः१ संस्कृता १ पुनः- स्वरिणी १ या१ ता० भा० जिस स्त्रीके पुत्र न हुआ होय पति २ हित्वाऽ- सवर्ण २ कामतः- अयेत् | उस स्त्रीके संग पिता आदिको आज्ञासे कि-॥ पुत्रकी कामनाके लिये घृतसे अपने अंगको योजना- अक्षता चपुनः क्षता या पुनः लपेट कर ऋतुके समयमें देवर वा सपिंड संस्कृता भवेत् सापुन ः या पति हित्वा वा सगोत्र गमनकरे और तबतक गमनकर • कामतः सवर्ण श्रयेत् सा स्वैरिणी ॥ जबतक गर्भ न रहै- गर्भके अनंतर पुत्र होनेपर जो गमनकर वह पतित होता है ता. भा० प्रथम ५२ श्लोकमें वह कन्या विवाहनी लिखी है जो अन्यपूर्वा न होय इस विधि से पैदा हुआ जो पुत्र है वह प्रथम पतिका क्षेत्रज पुत्र होता है- आचार्य तो अब उस अन्यपूर्वाके दो भेद कहते है ? पहिली पुनर्भूः दूसरीर स्वैरिणी- और यह कहते हैं कि यह वचन उसी कन्याके पुन भी दो प्रकारकी होती है विवाहसे विषयमें है जो वाग्दत्वा होय क्योंकि मनुजीने पहिले पुरुष संबंधसे जो दूषित वह क्षता इस श्लोकसे यह कहा है कि जिस क- और पुनः संस्कारसे जो दूषित वह अक्षता न्याका वाग्दान किये पीछे पति मरजाय और जो कोमार अवस्थाहीमें अपने तिसको इस विधिसे अपना निनका देवर पतिको त्यागकर अन्य सवर्ण किसी पुरुषका विवाह ले- परंतु इस मनुजीके श्लोकमें आश्रयलेले वह स्वैरिणी कहाती है ॥६७ ॥ | अपुत्रा पदसे वागदानके अनंतर विवाहसे प्रथम पुत्र न होनेका निश्चय यद्यपि दुर्घट है अपुत्रांगुर्वनुज्ञातोदेवरःपुत्रकाम्यया। सपिं- तथापि वरमें जो ऐसे दोष प्रथमही प्रतीत डोवासगोत्रोवाघृताभ्यक्तऋतावियात् ६८ हो जाय कि जिनसे पुत्र न होयतो उस पद- अपुत्रां २ गुर्वनुज्ञातः १ देवरः १ | वाग्दत्ता कन्याको देवर विवाइलेगा६८॥६९॥ पुत्रकाम्यया ३ सपिंडः१ वा-सगोत्रः१ वाई हताधिकारांमीलनां पिंडमात्रीपजीवि- घृताभ्यक्तः१ ऋतौ ७ इयात् क्रि-1 ६८ ॥ नीम् । परिभूतामधः शय्यांवास येद्यभि- आगर्भसंभवादच्छेत्पतितस्त्वन्यथा भवेत् चारिणी ॥ ७० ॥ अनेन विधिनाजातःक्षेत्रजोस्यभवेत्सुतः।। पद-हताधिकाराम् २ मलिनां २ डिमा- पद-आ-गर्भसंभवात् गच्छेत क्रि-प्रोपजीविनी २ परिभूतां २ अधःशयां र पतितः१ तु:- अन्यथाऽ- भवेत् क्रि-अनेन ३ | वासयेत् क्रि.- व्यभिचारिणी २ ।। विधिना ३ जातः १ क्षेत्रजः १ अस्य ६ भवेत् क्रि-सुतः१ ॥ ६९॥ यानित कन्यागः बाग मन्यते । योजना-गुईनुज्ञातः देवरः सपिंटः वा स हामनेन धानेन निजी शिन्देव देवरः ।
याज्ञवल्क्यस्मृति. मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना व्यभिचारिणी (स्त्रियं) हृताधि- | विधीयते गर्ने चपुनः गर्भभवधादो तथा काराम मलिनाम् पिंडमात्रोपजीविनी परि- महति पातके त्यागः विधीयते ॥ भूतां- अधःशय्यां (स्वगृहे एव ) वासयेत् ॥ तात्पर्यार्थ-यदि स्त्रीअपने मनमें पुरुषांतर- ता०भा० जो स्त्री व्यभिचारिणी होय उसको केसंग भोगका ऐसा संकल्प करें कि जिसका इस प्रकार अपने घरमेंही बसावे कि प्रकाश न होय-उससे जो पाप उसकी शुद्धि भृत्योंके भरण, पोषणका, अधिकार, उससे रजोदर्शनके अनंतर होजातीहै और यदि छीनले, और देहके निर्वाहमात्र भोजन दे- शुद्र आदिक संगसें गर्भ रहजाय अथवागर्भ धिक्कार आदिसे उसका तिरस्कार करे और भर्ताको नष्ट करदे याकोई महापातक और भूतलपर शयन करावे यह सब वैराग्य | कर तो उसस्त्रीको उपभोग और धर्म कार्य केही लिये हैं क्योंकि इस वैचनसे यह कहा | इनसे त्यागदे अर्थात् ये इससे न करावे कुछ है कि उसका वही प्रायश्चित्त है जो पुरुषको घरसे न निकासदे क्योंकि इस वैचनसे एक- परस्त्रीगमनमें करना पडता है ॥ ७० ॥ घरमें उसका रोकना लिखाहै और इस सोमःशौचंददावाप्सांगंधर्वश्चशुभांगिरम् । वैचनसे द्विजातीयोंकी भार्याओंका शके संग पावकः सर्वमेध्यत्वमेध्यायोपितोह्यतः।। भौगहोनेपर उनकाही प्रायश्चित्त लिखाहै जिनके संतान न हुई होये और ये चार स्त्रीभी पद- सोमार शॉचं ददौ क्रि-आसां६ | इस वैचनसे त्यागने योग्य लिखीहैं कि शिप्यके गंधर्वः१ पा- शुभा २ गिरम् २ पावकंः१ और गुरूकेसंग जो गमनकरे और पतिकेमा- सर्वमेध्यत्वं२ मेध्याः १ :-योपितः१ हि-रनेवाली-और जो चर्मकार आदिका संगकरे सिद्धांत यह है कि मनके व्यभिचारसे योजना-आसां(स्त्रीणां) सोमः शोचं ग- शुद्धि है शरीरकेसे नही ॥ ७२ ।। धर्वः शुभां गिरम् पावकः सर्वमेध्यत्वं यतः भावार्थ-मनके व्यभिचारमें ऋतुसे गर्भकी ददी अतः योषितः मेध्याः वै (एव)॥ स्थिति गर्भ और भत्तांका नाश और ब्रह्महत्या ता. भावार्य-जिससे इन स्त्रियोंको वि- आदि करनेसे स्त्रीका त्याग करदे ॥ ७२ ॥ वाहसे पहिले भोगनेके अनंतर चंद्रमाने सुरापीव्याधिताधूर्तावध्यार्यम्यप्रियंवदा। शुद्धि गंधाने मधुर वचन अग्नि ने संपूर्ण अंगोंकी पवित्रता दी है इससे स्त्री पवित्रही स्त्रीप्रसूश्चाधिवेत्तव्या पुरुपद्वपिणी तथा।। होती है-यह वचन अर्थवादरूप है।। ७१ ।। पद-सुरापी र व्याधिता १ धूत्तर वंध्यार व्यभिचारांहतोशुद्धिर्मेत्यागोविधीयते। अर्थनी १ अप्रियंवदार स्त्रीप्रसूः१ चा-अधि- वेत्तव्या १ पुरुपद्धषिणी १ तथाऽ-॥ गर्भभर्तृवधादीचतयामहतिपातके॥७२॥ योजना-सुरापी-व्याधिता- धूर्ता-वंध्या पद-व्यभिचागत्५ ताशुद्धिः १ अर्थनी-अप्रियंवदा- स्त्रीप्रसूः तथा पुरुष- गर्भ ७ स्यागः १ विधीयते क्रि- गभभ निरंध्यादेफोरमनि । वधादौर च तयाऽ-महति ७ पातके ७॥ २ प्रामपक्षविणोशो मायाः प्रदेश संगताः । योजना-व्यभिचायत नियाः ऋताशुद्धिः | भजाता निगुभ्यति प्रारथितेन नेतगः ३ परास्नु परित्याग्या: शिपमा गुरुगा गया १ परमः परताप तमंनो गारपोवम् । पतिमी पनि हुग्तिोपगता प या । अतः-11 आचाराध्याय विवाहप्रकरण ३ द्वेषिणी-एवं अष्टमकारा स्त्री अधिवेत्तव्या | कीर्ति २ अवानोति कि- मोदते क्रि-च- तस्याः सत्वेपि अन्या स्त्री परिणेया ॥ उमया ३सह -॥ ता. भावार्थ-इन आठ प्रकारकी स्त्रियों के योजना-पत्यो मृते वा जीवति सति या होने परभी मनुष्य अन्य स्त्रीको विवाहले | स्त्री अन्यं न उपगच्छति सा इह (लोके) जो मदिराको पावै वा शूद्राहो क्योंकि इस कीर्ति अवाप्नोति चपुनः उमया सह मोदते॥ वैचनप्ते उस मनुष्यका आधा शरीर पतित ता. भा. पतिके जोते हुये वा मरने पर होजाता है जिसकी भार्या मदिराको पावै- जो स्त्री अन्यपुरुषका संग नहीं करती वह सामान्यसे सबका निषेध है इससे सुरापी इस लोकमें कीर्तिको प्राप्त होतीहै और शब्दसे शूद्रा लेनी दीर्घरोगसे ग्रस्त-धूर्ता | पुण्यके प्रतापसे पार्वतीसंग क्रीडा करतीहैं (कपटित) वंध्या-(निष्फळ ) धनको जो अर्थात् आनंद भोगतीहे ॥ ५ ॥ अष्टकर-कठोर वचन - जिसके लडकीही आज्ञासंपादिनींदक्षांवीरसंप्रियवादिनीम् । होतीहों-जो पुरुषका हित न करे-अर्थात् ये त्यजन्दाप्यस्कृतीयांशमद्रव्योभरणस्त्रियाः आठस्त्री अधिवेदन करने योग्य होतीहैं-अन्य पद-आज्ञासंपादिनी २ दक्षा २ वोरतूं २ भायीक स्वीकारको अधिवेदन कहते हैं७३॥ प्रियवादिनीम् २ त्यजन् १दाप्यः १ तृतीयां- अधिविन्नातुभर्तव्यामहदेनोन्यथाभवेत् । शंर अद्रव्यः १ भरणं २ स्त्रियाः ६॥ यत्रानुकूल्पदंपत्त्योत्रिवर्गस्तत्रवर्धते ७४ योजना-आज्ञासंपादिनी दक्षां वीरतूं प्रि- यवादिनी त्यजन (पुरुषः)तृतीयांश-अद्व्यः पद-अधिविन्ना १तु-भर्तव्या १ महत् १ | स्त्रियाः भरणं दाप्यः (दंड्यः) राज्ञेति शेषः।। एनः१अन्यथा- भवेत् क्रि-यन्त्र - आनुकू ता. भा० जो पुरुष आज्ञाकारिणी दक्ष ल्यं १ दंपत्योः ६ त्रिवर्गः१ तत्र-वर्धते क्रि- (चतुर) पुत्रवती मधुरभापिणी स्त्रीको त्याग- योजना-अधिविन्ना (स्त्री) पत्या भर्तव्या | ताहे अर्थात् उसके होते हुये द्वितीय विवाह अन्यथा ( अपालने ) महत् एनः भवेत् दंप- 1 करताहे उसको राजा धनका तीसरा भागका त्योः यत्र आनुकूल्यं तत्र त्रिवर्गः वर्धते॥ और निर्धन होय तो पहिली स्त्रोके भरण पो- ता. भा०-अधिविन्ना (जिसके होते विवा- षणका दंडदे ॥ ६ ॥ ह कीया जाय ) स्त्रीको पालना दानमानस- स्वीभिर्भर्तृवाकार्यपधर्मःपराखियाः। स्कारसे अवश्य करनी जो न करे तो महान् आशुद्धःसंमतीक्ष्योहिमहापातकदूपितः।। पाप दंडके योग्य होताहै क्यों कि जिस घरमें पद-स्त्रीभिः ३भृतवचः १कार्य १ एषः १ स्त्रीपुरुषका एकचित्त होताहे वहां धर्म धर्मःरपः १ स्त्रियाः ६ आशुद्धः५संप्रती- अर्थ काम तीनो बढते हैं ।। ७४ ॥ क्ष्यः १ हि महापातकदापितः १ ॥ मृतेजीवतिवापत्यौयानान्यमुपगच्छति ।। योजना- स्त्रीभिः भतवचः कार्य यतः सेहकीर्तिमवाप्नोतिमोदतेचोमयासह ५ । स्त्रियाः एष धर्मः परः अस्ति महापातक- पद-मृते ७ जीवति ७वाऽ- पत्यो यार दूषितः हि (अपि) आशुद्धः संप्रतीक्ष्यः ॥ ना- अन्यं २ उपगच्छति क्रि-सा १६६- मानना क्योंकि स्त्रीका परम धर्म यही है- ता. भा. स्त्रियोंको अपने पतिका वचन १ पतत्पर्दू शिरस्य यस्य भार्या सुप पिवेत् । यदि पति महापातक (ब्रह्महत्या) आदिसे याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । दूषित होजाय तो तबतक उसकी प्रतीक्षा | पोडशर्तुनिशाःस्त्रीणांतस्मिन्युग्मासुसंविशे कर जवतक महापातकसे शास्त्रोक्तरीतिक । ब्रह्मचार्येवपर्वाण्याद्याश्चतस्त्रश्चवर्जयेत् अनुसार जिसकी शुद्धि न हुई होय-शुद्धिके अनंतर उसी प्रकार पतिके परतंत्र हो जाती पद- पोडश १ ऋतुनिशाः १ स्त्रीणां ६ है-निदान महापातकके समय वचन न तस्मिन् युग्मासु ७संविशेत् क्रि-ब्रह्मचारीर एवs- पर्वाणि २ आद्याः २ चतस्रः २ च:- माने तो दोष नहीं ।। ७७॥ वर्जयेत् क्रि-1 लोकानंत्यंदिवःप्राप्तिःपुत्रपौत्रमपौत्रकैः । यस्मात्तस्मास्त्रियःसेव्याकर्तव्याश्चसुर- भवति तस्मिन् युग्मासु संविशेत् यः पणि योजना- स्त्रीणां ऋतुनिशाः पोडश क्षिताः ॥ ७८ ॥ चपुनःआद्याः चतस्रः वर्जयेत् सः ब्रह्मचारी पद-लोकानंत्यं १ दिवः ६ प्राप्तिः १. एव (अस्ति)॥ पुत्रपौत्रप्रपौत्रकः ३ यस्मात् ५ तस्मात् ५ तात्पर्यार्थ- गर्भ धारणके योग्य समयको स्त्रियः ६ सेव्याः १ कर्तव्याः १ च - ऋतु कहते हैं वह रजोदर्शनके दिनसे सुरक्षिताः १॥ पोडश १६ अहोरात्र होता है- उस ऋतु में योजना- यस्मात् पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः लो- जो रात्री युग्म (सम) ६।८।१०। आदि कानत्यं दिवःप्राप्तिर्भवति तस्मात् त्रियः हों उनमें ही पुत्रोत्पत्तिके लिये स्त्रीका संग सेव्याः चपुनः सुरक्षिताः कर्तव्याः॥ कर इस श्लोकमें युग्मातु यह बहुवचन तात्पयार्थ-अव शास्त्रीयदायके संग्रहका समुच्चयके लिये है। इस लियेही नहीं कि फल कहते है जिससे स्त्रियोंकेही प्रतापसे तीन गत्रियोंमें गमनकर दिनमें न करें पुत्र-पौत्र-प्रपात्रोंसे लोकानंत्यः (वंशकी | इससे एक ऋतुमें यदि संपूर्ण युग्म रात्री स्थिरता) और अग्निहोत्र आदि करनेसे अनिषिद्ध (शुद्ध) मिलजाय तो सबमें स्वर्गकी प्राप्ति होती है तिससे मनाके लिये गमनकर इस प्रकार गमन करताहुआ ग्र- स्त्रियोंके संग उपभोग करना और धर्मके हस्थ ब्रह्मचारी होता है- अतएव जहां लिये स्त्रियोंकी भली प्रकार रक्षा करनी श्राद्ध आदिमें गृहस्थीको ब्रह्मचर्य से रहना क्योंकि आपस्तंब ऋपिने इस वचनसे लिखा है वहांभी स्त्रीके संगस ब्रह्मचर्य दारसंग्रह (विवाह )का प्रयोजन धर्म और नष्ट नहीं होता। और आमावस्या आदि प्रजाका होनाही कहा है- कि यदि धर्म- पर्व और प्रथमको चारि पत्री इनको व- शील- और पुत्रवती भार्या विद्यमान रहते जिंद द- इस श्लोकमें पर्वाणि इस बहु वचनसे दूसरी स्त्रीको नविवाहै- रतिका फल तो अष्टमी और चतुर्दशीभी समझनी क्योंकि केवल लौकिक है। मनुजीने इस श्लोकसे अमावस्या-अष्टमी- भावार्य- जिससे पुत्र-पौत्र- प्रपात्रोंसे चतुर्दशी- पार्णमासो- इनकामी ऋतु सम- वंशका विस्तार और स्वर्गकी प्राप्ती यमें गृहस्थी द्विजको त्याग लिखकर ब्रह्म- स्त्रियोंसेही होती है तिससे स्त्रियोंको भोगना चारी कहा है निदान पुत्रोत्पत्तिके लिये स्त्रि- और भली प्रकार रक्षा करनी ॥ ७ ॥ योको इस नियमसदी भोगे॥ , आमाभ्यामटनाच पोर्गमारी च । धर्मजासंपनेषु दरारेणु नान्यों कुर्वति । प्रमचारी मोमिसमप्यती मातको द्विजः ।
आचाराध्याय विवाहमकरण ३ (३३) भावार्थ- स्त्रियोंकी ऋतु रजोदर्शनसे | करना आवश्यक है। मघा भूल इन दों सोलह १६ रात्रि होती है उनमें सम | नक्षत्रोंको वर्जिदे और चंद्रमा एकादश गनियोंमें गमनकरें और आदिकी चार रा- आदि शुभस्थानों में स्थित होय चकारसे त्रियोंको जो वर्जदे यह ब्रह्मचारीही होता पुनक्षत्रयोग लग्नभी शुद्ध होय तो एकही रात्रिमें पुमान् जिसके पुरुषपनमें कुछ वाधान एवंगच्छत्रियंक्षामांमघांमूलंचवर्जयेत् । होय शोभन लक्षणोंसे युक्त पुत्रको पैदा करता है। सुस्यइंदौसकसुत्रलक्षण्यंजनयेपुमान् ।। भावार्थ-इसप्रकार निर्वल स्त्रीके संग । पद-एवं- गच्छन् १ स्त्रियं २ क्षामा २ ) गमन करे मया और मूल इन दो नक्षत्रोंको मघां २ मूल २ च-वर्जयेत् क्रि- सुस्थे ७ | वर्जदे और चंद्रमा शुभस्थान ( ११ आदि) इंदौ ७ सकृत - पुत्रं २ लक्षण्यं २ जनयेत् | में स्थित होय तो पुरुष उत्तम लक्षणवाले क्रि-पुमान् १ पुत्रको पैदा करताहे ॥ ८॥ योजना- एवं क्षामां स्त्रियं गच्छन् पुमान् । ययाकामीभवेद्वापिस्त्रीणांवरमनुस्मरन् । इंदा मुस्थे ( सति) सकृत् (एकरात्री) स्वदारनिरतश्चैवस्त्रियोरक्ष्यायतःस्मृताः लक्षण्यं पुत्रं जनयेत् चपुनः मघां मूलं च वर्जयेत् ॥ पद-यथाकामी १ भवेत् क्रि-चा-अपि:- तात्पर्याय- इस पूर्वोक्त प्रकारसे स्त्रीका स्त्रीणां ६ बरं २ अनुस्मरन् १ स्वदारनिर संग करता हुआ पुरुष क्षामा (निर्बल) तः१ च- एवऽ- स्त्रियः १ रक्ष्याः १ यतः:- स्त्रीकाही संग करे यद्यपि उस समय निर्बलता स्मृताः १ ॥ रजोदर्शनके व्रतसेही स्त्रियोंको हो जाती है योजना-वा स्त्रीणां वरं अनुस्मरन स्वदा- यदि न होय तो अल्प भोजन वा स्निग्ध रनिरतः पुरुषः यथाकामी भवेत् यतः स्त्रियः भोगनसे पुत्रोत्पत्तिके लिये स्त्रीको निर्वल | रक्ष्याः स्मृताः- मन्व दिभिरितिशेपः॥ करनी चाहिये क्योंकि इस वैचनमें यह तात्पर्यार्थ-यथा कामी उसको कहतेहै जो लिखा है पुरुषका वीर्य अधिक होय तो पु- भायांकी इच्छाके अनुसार भोगमें प्रवृत्त रुष और स्त्रीका अधिक होय तो स्त्री होती । हो इंद्रने जो स्त्रियोंको वर दिया है उसका है- जिस समय युग्म रात्रिमेंभी स्त्रीका स्मरण करता हुआ पुरुष यथाकामी हो- शोणित अधिक होता है तब स्त्री होती है वह वर यह है कि जो तुह्मारी काम- परंतु उसका आकार पुरुषके समान होता नाको न करेगा वह पातकी होगाचे स्त्री है और विषम रात्रिमेंभी जब पुरुषका वीर्य | बोली कि हम वरको स्वीकार करतीहै और अधिक होता है उस समय पुरुष होता है ऋतुसे हमारे प्रजाहो और प्रजाके होनेतक परंतु उसका आकार स्त्रीके समान होता है 'क्योंकि काल तो निमित्तमात्र है गर्भके १ भवतीनां कामविहता पातकी स्यात् इति उपादान कारण होनेसे शुक्रशोणित ही यथा ता अनुवन् वरं वृणीमहे ऋत्वियात्मजां विंदा- प्रबल है तिससे ऋतुके समय स्त्रीको निर्यल। महै काममाविञनिनो सभवामेति तत्मात् ऋत्वियात् स्रियः प्रजा विदति काममाविजनिनोः सभवति दर १ पुमान पुंसोधिके गुके स्त्री भवत्यधिके स्त्रियः वृत्ततासामिति । , ३ याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कामको चेष्टा रहे तिससेही स्त्री ऋतुसही है जसे इन वाक्योंसे समदेशमें यज्ञ प्रनाको प्राप्तहोतीहैं और संतान होनेतक | करै-दर्श और पोर्णमास यज्ञ करे-यज्ञका कामचेष्टा रहताहै यही स्त्रियोंका वर है-और करना कहाहे वह देश विना नहीं होसकता अपनी ही स्त्रीमें मनुष्य रत रहै (मन रक्खे) इससे अर्थात देशपाया-वहदेशदोप्रकारका है और प्रायश्चित्तके भयसे अन्यत्रीका संग न- एक सम और दूसरा विषम-यदि यजमान फरे-इन दोनोंके लोकिक प्रयोजन को कहते समदेशमें ही यज्ञकरा चाहे तो (समे यजेत) है कि जिससे धर्मशास्त्रमें स्त्री रक्षाकरने यहवचन उदासीन होताहै क्योंकि इसके योग्य कही है-तिससे सुरक्षिता करनी और अर्थका त्याग होगया-जय यजमान विषमदे- उनकी भली प्रकार रक्षा तभी होसकहतीहै | शमें यज्ञ करा चाहे तब (समे यजेत) यह पर मनुष्य अन्य स्त्रोके संगको त्याग और वचन स्वार्थको करता है क्योंकि यससमय अपनी स्त्रीमें यथाकामी रहै इसीसे पूर्वकइ । समदेशमें यज्ञ प्राप्त नथा-और विषम देशकी आये है कि (तस्मिन् युग्मासु संविशेत् ) ति- निवृत्ति तो अर्थात् होजायगी श्रुतिमें कहे सऋतु युग्म रात्रियोंमें ही स्त्रीका संग करे- समदेशसेही यज्ञ होजायगा-यदि अशास्त्रोक्त क्या ऋतुमें गमन करे यह वाक्य विधि है (विषम ) देशका स्वीकार यजमान करेगा वा नियमहे अथवा परिसंख्याह-विधि वहां हो- तो शास्त्रोक्ततिके अनुसार यज्ञका अनु- तोह जहां सर्वथा प्राप्ति नहो-और नियम ठान ( करना ) नहोगा इसीप्रकार यह यहां होताहे जहां कही पावे कहीं नहीं और स्मृतिकोभी नियम विधिमे समझना कि परिसंख्या वहां होती है जहां तिसमेंभी पावे पूर्वाभिमुख होकर अन्नोंका भोजन कर-महां और अन्यत्रभी पावे क्योंकि इस वेचनसे यही एक ही विधेय अनेक जगह प्राप्तहो उसकी कहा-यह विधि तो नहीं है क्योंकि स्त्रीका | एकसे निवृत्तिकरके पुनः एकमें जो विधान गमन रागसे प्राप्त है- परिसंख्याभी नही है। वह परिसंख्या विधि होती है जैसे इस मंत्र से क्योंकि परिसंख्पाके मानने में तीन दोप मा- अभाभिधानी और गर्दभाभिधानी रसनाका चंगे कि प्राप्तका याध-पयर्थ कल्पना-स्वार्थका | ग्रहण प्राप्त है पुनः (अश्वाभिधानी आदत्त) त्याग-इसस न्यायंक ज्ञाता नियमको मानते इसमंत्रसे अवाभिधानीका ग्रहण होताहै है-डुन तीनों पूर्वोक्त विधियाम भेद (फरक) गर्दभाभिधानीको निवृत्ति होती है अर्थात. स्पाई इनका भेद पद है कि जहां विषपेकी । अश्वकीजिहाफामण और गर्दनकी निहाकी सर्वधा प्राप्ति नहो यहां विधि होती है जेते इन निवृति होती तिसीप्रकारपंचपंचनखाभक्ष्याः वायोंसे अमिहोत्र कर अष्टका श्राद्ध कर- यहांभी यदृच्छा (स्वेच्छा)श्वा भादि और शश आमिहोत्र और अष्टकाद्धका करना आदिका भक्षण गगते प्राप्तथा शश आदिकों किसी अन्य वचनसे प्राप्त नया-और जिस- कामंत्रम श्रवण इससे श्वाआदिक भतणकी जंग प्राप्तही टससे अन्य ऐसे पक्षम प्राप्तिको | निवृत्ति होती है-फिर यहां नियमविधि योधन करें जहां प्राप्ति नही वह निपम होता आचाराध्याय विवाहप्रकरण ३ (३५) माननीकी परिसंख्याविधि कोई कहताहै कि युक्त है क्योंकि पक्षमें अपने अर्थका उसमें परिसंख्या क्योंकि कियाहै विवाह जिसनें एसे | विधान है और इस स्मृतिसे ऋतुमें पुरुषको अपनी इच्छासे ऋतुमें गमन प्राप्तह | गमन न करनेमें दोषभी है कि जो ऋतु इससे विधिका यह विषय नही और इस स्नानवाली भार्या के समीप न जाय तो उसको गृह्यस्मृतिके विरोधसे नियमविधिभी नही | घोर भ्रूणहत्या लगती है कदाचित् कहो कहसकते क्योंकि विवाहके अनंतर तीनपत्र | कि नियममें विधिके अनुवादका विरोध है द्वादशरान वा संवत्सर ब्रह्मचारी रहै यदि | सो टोक नहीं यह अनुवाद नहीं है किंतु द्वादशरात्र वा संवत्सरसे पूर्वही ऋतु होजाय | यह वचन विध्यर्थही है क्योंकि विधिक तो ऋतुमें गमन कोही इस नियमसे ब्रह्मचर्य अनुवादका विरोध वहांही होता है जहां खंडित होजायगा और जिसवचनका भावार्थ | विधेय पर्यंत उसीको उतनाही फिर दुवारा प्राप्त होजाय वह विशेषण पर होजाताहै | कहा जाय और अन्यके उद्देशसे अप्राप्त- यहांभी ऋतु भार्यागमन इच्छासे प्राप्त है का विधान किया जाय जैसे वाजपेयाधि- इससे यह अर्थ करना पडेगा कि गमन कर करण पूर्वपक्षमें इस वाक्यमें कि स्वाराज्य तो ऋतुहीमें करे और पुत्रोत्पत्तिविधि निय- (चक्रवर्ती )की कामनावाला पुरुष वाजपेय मित है उसी सो ऋतुगमन नित्य प्राप्तही है | यज्ञ कर वाजपेयरूप गुणके विधान पर्यंत तो जो ऋतुमें गमन कर ही यह नियम निरर्थ- यागका अनुवाद है फिर स्वाराज्यके फलके क होजायगा । और नियममें अदृष्ट (एव) लिये उसका विधान है-इससे ऋतो भायी की कल्पना करनी पडेगी क्योंकि इस उपेयात् इस वाक्यमें अनुवादका कोई काम नहीं और यह कहोगे कि नियममें अष्टकी वाक्यमें एवपद नहीं है-किंच ऋतुमें गमन करे ही यह नियम स्वीकार करोगे तो कल्पना करनी होयगी वह परिसंख्यामेंभी जो पति परदेशमें है वाव्याधि आदिसे अस- वालेको दोषको कल्पना करनी होयगी-जो समान है और ऋतुभिन्नमें गमन करने- मर्थ है वा भोगका अनभिलाषी है उसको कोई यह कहै कि नियमसे पुनोत्पत्तिकी जो ऐसे अर्थका उपदेश होजायगा जो वह न कर विधि उसके आक्षेपसेही नित्य गमन प्राप्त सके और नियम मानोगे तो नियममें विधिका है इससे नियम नहीं सो ठीक नहीं क्योंकि अनुवादरूप विरोधभी होगा क्योंकि एक वही यह नियमसे पुत्रोत्पत्तिकी विधि वार पढा हुआ शब्द एकपक्षमें उसी | मानोगे कि इस प्रकार दुर्बल स्त्रोका संग अर्यका अनुवाद करेगा और एकपक्षमें करताहुआ पुरुष सुलक्षण पुत्रको पैदा उसीका विधान तिससे ऋतुहीमें- गमन करता है पुत्रके उत्पादनकी विधि स्त्रोके करे अन्यत्र न करे यह परिसंख्याही | गमनसे भिन्न है सो ठीक नहीं क्योंकि युक्त है यहां भारुचि विश्वरूप आदि परि- गमन है करण जिसमें ऐसा पुरुषका संख्याको नहीं मानते इससे नियमविधिही १ ऋतुमातां तु यो मार्श संनिधी नोपगच्छति घोरायां भ्रूणहत्यायो युज्यत नात्र संशयः । दारसं महानता विरात्र द्वादशरानं सरसरं २ वाजपेयेन स्वाराज्यकामो यजेत । चा प्राचारी स्यात् । ३१ गछन् नियं क्षार्मा लक्ष्यण्य पुत्रं जनयेत।
(३६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । व्यापारही पुत्रोत्पत्तिका कर्म उक्त वचनमें होनेका प्रसंग होगा इससे प्रायश्चित्त दीखता है जैसे अग्निहोत्रको करताहु स्मृतिके विरोधसे परिसंख्याही मानी है-इसी आ स्वर्गको प्राप्त होता है-कदाचित् वह | प्रकार यहांभी नियम विधिही है कि पूर्वोक्त दोप होगा कि दूर परस्थित और सायंकाल और प्रातःकालके समय में भोजन' असमर्थ पतिको अशक्य स्त्रीभोगकी विधि- द्विजातियोंको स्मृतिमें कहा है यदि परि- का उपदेश शास्त्र करेगा वह दोषभी नही संख्या मानोगे तो वीचमे भोजन न करें यह क्योंकि समीपवर्ती और समर्थ पतिके लिये पुनः उक्त दोष आवेगा- इससे नियम ही शास्त्रका उपदेश है क्योंकि इन वच- होनेपर ऋतुरमें गमन करें यह वीप्सा नोंमें विशेषकर यह कहा है कि समीपमें ( द्विवचन )भी लब्ध होती है निमित्त वर्तमान जो पति स्त्रीक ऋतुस्नान किये | ऋतुको आवृत्ति (पुनः पठन) होगी तो पीछे गमन नहीं करता-जो स्वस्थ पुरुष नैमित्तिक ( स्त्रीगमन )कोभी आवृत्ति हो. ऋतुस्नानके अनंतर अपनी स्त्रीके समीप जायगी-इसी प्रकार-यथाकामी भवेत्-यह नहीं जाता वह हत्याका भागी होता है- भी नियमही है कि अनृतु (ऋतुके विना) इच्छाके अभावकी निवृत्तिभी नियमके मेंभी स्त्रीको कामना होय तो स्त्रीके संग वलसे होजायगी-जब नियम है तो इच्छाके रमण कर ही-ऋतु, गमन करेही वा अभावमभी गमन करना पेडगा-और इस निषिद्धको छोडकर सर्वत्र गमन करेही विधिको पूर्वोक्त विशेषणपरताभी नही कह इन गोतमके दोनों सूत्रोंमेंभी नियमही सकते क्योंकि पक्षमें भावार्थ विधिही यह है-इससे ऋतौ उपेयात् तस्मिन् युग्मासु हो सकती है-पूर्वोक्त गृह्यस्मृतिकाभी विरोध / संविशेत् यहां नियम है परिसंख्या नही-इस नही क्योंकि वर्षदिनसे पूर्वही ऋतुके समय प्रकार अत्यंत विस्तारसे अलं (समाप्ति), होनेपर गमन करनेवालको श्राद्ध आदिमेंभी है-अर्थात् इतनाही बहुत है ।। ८१ ॥ ब्रह्मचर्यहानिका दोष नहीं तिससे अपने भावार्थ-अथवा स्त्रियोंके वरको स्मरण अर्थकी हानि- अन्य अर्थकी कल्पना- करताहुआ पुरुष स्त्रियोंकी इच्छाके अनु- प्राप्तका बाध-इन तीन दोषवाली परिसंख्या सार गमन करे और जिससे स्त्री रक्षा विधि युक्त नहीं यद्यपि पंच पंचनखा भक्ष्याः | करनेयोग्य कही हैं इससे अपनी स्त्रियों में यहां शश आदिका भक्षण प्राप्त है इससे | रत रहे ॥ ८१ ॥ पक्षमें नियम और शशआदि और श्वाआदि। भर्तृभ्रातृपिज्ञातिश्वश्रूश्वशुरदेवरैः । बंधु दोनोंका भक्षण प्राप्त है इससे पक्षमें परि- संख्या इसप्रकार नियम-परिसंख्या दोनोंका | भिश्चखियःपूज्याभूपणाच्छादनाशन:८२ संभव है-तथापि नियम पक्षमें शश आदिका पद-भरीभ्रातृपितृजातिभशूश्वशुरदेवरः३ भक्षण न करोगे तो दोषका प्रसंग होगा-बंधुभिः ३ चा-स्त्रियः पूज्याः१ भूपणाच्छा और भाआदिका भक्षण न कसेंगे तो दोप दनाशनः३ ॥ १ अपिदोनं जपात् स्वगंगानः। २मगुस्वाना तु योमा सन्निधी भोपगन्धाति । यसकारातुनातान् सरयः समापगच्छति । मारंपवादमातीनामशन स्मृतिनदिस । २ नन्तरा भोजन कुर्यात् । ३ मतो रगत् सम्रा प्रतिरिट्याज्य ।
आचाराध्याय विवाहप्रकरण ३ योजना- भर्तृभ्रातृपितृज्ञातिश्वश्रूश्वशुर पद-क्रीडां २ शरीरसंस्कार समाजोत्स- देवरः च पुनः बंधुभिः स्त्रियः भूपणाच्छाद- वदर्शन २ हास्य २ परगृहे ७ यानं २ त्यजेत् नाशनः पूज्याः ॥ क्रि- प्रेषितभर्तृका १॥ ता भा० पति भाई पिता ज्ञातिके मनुष्य योजना-प्रोषितभरीका (स्त्री) क्रीडा सासु और श्वशुर और देवर और बंधु ये शरीरसंस्कार समागोत्सवदर्शनं हास्यं पर सब साधवी स्त्रियांका पूंजन अपनीर शक्तिके गृहे यानं त्यजेत् ॥ अनुसार भूषण वस्त्र पुष्प आदिसे करे ता. भा०-जिस स्त्रीका पति परदेशमें क्योंकि पूजितकी हुई स्त्री धर्म अर्थ कामको होय वह गंद आदिसे कोडा और उबटने बढाती हैं ॥ २॥ आदिसे शरीरका संस्कार जनोंका समूह संयतोपस्करादक्षाहाव्ययपराङ्मुखी। और विवाह आदि उत्सवोंका दर्शन हंसी और पराये घरमें गमन इन सयको त्यागर्द।। ८॥ कुर्याच्छ शुरयोःपादवंदनभर्तृतत्परा ।। रक्षेत्कन्यांपिताविनापतिःपुत्रास्तुवार्धके । पद-संयतोपस्कर १ दक्षा १ हृष्टा १ अभावेज्ञातयस्तेपांनस्वातंत्र्यंकचिस्त्रियाः। व्ययपरामुखी १ कुर्यात् क्रि- श्वशुरयोः६ पादवंदनं २ भर्तृतत्परा १॥ पद-रक्षेत् कि-कन्यारपिताश्विन्नांरपतिः १ पुत्राः १ तु वार्धक अभावे ७ ज्ञातयः योजना-संयतोपस्करा दक्षा हृष्टा व्यय | १ तेषांदन:-स्वातंम्य १ धचित्त स्त्रियाः६॥ पराङ्मुखी भर्तृतसरा स्त्री श्वशुरयोः पाद- योजना-पिता कन्यां पतिः विनां रक्षेद बंदनं कुर्यात् ॥ तुपुनः वाईके पुत्राः तेषां अभावे ज्ञातयः र- तात्पर्यार्थ-रक्खे हैं जहां तहां उपस्कर | क्षेयुः स्त्रियाः कचित् अपि स्वातंत्र्यं नास्ति। (गृहसामग्री ) जिसने जैसा ऊखल मूसल ता० भा-विवाहसे पहिले कन्याको नि और सूप ये कंडनके स्थानमें और चको दित कमासे पिता विवाहकै अनंतर पति और हाथा ये पीसनेक स्थानमें-और गृहके और पतिके अभाबमें पुत्र रक्षा करें और यदि व्यापारमें कुशल और सदैव प्रसन्न और | वृद्ध अवस्थामें ये न होय तो ज्ञातिके मनुष्य व्यय ( खर्च )में परमुख और अपने | और ज्ञातिके मनुष्यभी नहोय तो रामा रस 'पतिके वशमें रहती हुई सास और श्रारके करें क्योंकि इस पंचनसे पितृफुल चरणोंको प्रतिदिन नमस्कार कर जिस और पतिकुलके अभावमें राजाकोहि प्रभु -स्त्रीको परका व्यापार सोपा जाय यह इस ओर रक्षक लिखा है इससे स्त्रियाँका किसी प्रकारही है। अवस्थामें स्वतंत्रता नही ।। ८५॥ भावार्थ-सावधानीते गृहको सामग्री खते पिदमारमुतभ्रातृधश्वशुरमातुलैः । ही और चतुर प्रसन्नमुख और कम खर्च करे नानस्यादिनाभागहंपीयान्यपाभवेत् ॥ और पतिके वशमें रहकर सास और श्वशु पद-पितृमातृसुतभ्रातृप्रभारमानुसार के चरणोंको नमस्कार कर ॥ ३॥ हीना १ ना-स्यात् क्रि-विना:- भनी ३ मीडांशरीरसंस्वारं समानोत्सषदर्शनं । । गई:या १ अन्यथा:- भत् शि:-॥ हास्पंपरगृहेपानंत्यप्रेमौषितभईका ८५ मायाम तु सगममा यिन। + याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । गागमा-गर्मा विना पितृमातृसुतभ्रातृश्वश्रू | पकडनेवाला विलमेंसे सांपको निकालता है मामाले स्त्री दीना न स्यात् अन्यथा | इस प्रकार वहभी अपने पतिका नरकसे उ- गांगा भगा॥ द्धार करके पतिके संग आनंद भोगती है- तात्पा-गदि पति समीपमें न होय तो ऐसे और पतिमें तत्पर हुई अप्सराओंके गण एमाग गरदै गदा पिता, माता, पुत्र, भ्राता | स्तुति करते है जिसकी ऐसी वह स्त्री अपने सार, मोरगागा न होय इनके विनारहै पतिके संग तावत् कालपर्यंत क्रीडा करती ती मनिगोग्ग होती है-यह कथन उसी है इतने चोदह १४ इंद्र राज्य भोगें जो स्त्री TA जा रत्री पति मरणानंतर ब्रह्मचा | विधवा होनेसे प्रथम पतिके मरतेही अभिमें (रणी से पीलित विष्णुस्मृति में विधवाव पतिके संग मरती हैं । चाहै वह पति ब्रह्म समाग मार्ग और सती होना लिखा हत्यारा वा मित्रका हत्यारा होय वा कृतनी कर व्यासगीन कपोतिनीके इति | हाय उसकोभी पवित्र करती है । पतिके मरे Emनगनौरो महान् पुण्य दि- | पीछे जो स्त्री सती होती है वह अरुंधतीके मामा पोतिनी पतिव्रता जलती | समान स्वर्ग लोकमें पूजता है। इतने स्त्री. चिताको अभिम प्रविष्ट होगई वहां चित्रां पतिक मरे पीछे देहको अग्निमें दग्ध न करे गार पतिको प्राप्त हुई फिर वह पक्षी | इतने वह स्त्रीके शरीरसे नही छुटती हारीत भागा मिलार गर्ग में गया और बढी पू- ऋपिनेभी-यह लिखा है कि जो सो नास भागी रादित रगता भया और तिसी सती होती है वह मता पिता और प- Terrar भोर अंगिरा प्रपिनभी यह | तिकै कुलको पवित्रकरती है जो स्त्री दुःखित TREE Sो रत्री पति के संग सती होती पतिके संग दुखी प्रसन्नके समय प्रसन्न पर कालराय स्वर्गमें बसती है देश जानेके समय मलीन और कृश होती गगुष्य शरीरमें रोम हे जसे सर्पका है और पतिके मरतेही मरती है वही खी पतिग्रता जाननी यह धर्म चांडाल पर्यंत उन भतार प्रमाणे सदन्यारोहणं वा । स्त्रियांका है जो गर्भवती न होय और जिन REATE Tusttt प्रविवेश हुताशनातन चिया की संतान बालक न होय-क्योंकि सब वच गरnt wait run रातः स्वर्गगतः पक्षी नामें यही सामान्यसे लिखा है कि भतीक HINI TERATH: । गर्मणा पूजितस्तत्र रेमेव सह | संग जो सती होती है जो ब्राह्मणीको सती भागांत होनेके यह निषेध है वे दूसरी चितामें जल- स: गोगोईपोटी प यानि टोभान मानु। नेके ही निषेध कहै कि ब्राह्मणीको मृत Hai भारि गानुगच्छती व्यालपाही | पतिके संग होना नही है और तीनो वाम पाल पलापुरते पिलान । पदमृत्ससा सती होना परम तप है यही वेदकी आज्ञा MAR मोर ॥ तसा भर्तपरमा स्तूयमाना है। जीती हुई पतिक हितको करे पतिक सरोगः । मोडते पसिना सार्थ यादिन्दाधतुरंश । मनो गाय मि इतनो गा मोर पतिः । पुनात्य मरे पीछे भात्मपात करे। जो बानगी मरे मारी तमाय मृतातगा। मते मातरि पाना | हुये पतिके साथ सती होती है वह आत्म- समानुसाशन malसमापारा लोके मही 1 मानक एक भारियन क्षेत्र प्रदान्ते । कुटपा मते । पामो पा की नारमाने प्रवाहवेत् । सास गुपो afrainingचन । पुनालेश मटार मानुगादि ।
- आचाराध्याय विवाहमकरण ३ (३९) . इत्यासे पति और अपने आत्माको स्वर्ग ( श्येनको परके मरणानुकूल व्यापार होनेसे में नहीं पहुंचाति इत्यादि वचन जो बा- | हिंसा कह सकते है क्योंकि कामनाके अ- ह्मणीको सती होनेके निषेधके है वे सब धिकारमें करणमें रागसे प्रवृत्ति हो सकती है पृथक् चितामेंही सती होनेके (निषेध कहै | इससे विधिको प्रवर्तकता नहीं है रागके द्वा- क्योंकि) इस वैचनसे पृथक् चितामेंही ) रा हिंसारूप होनेसे श्येनयाग निषिद्ध (बुरी) निषेध है कि पृथक् चितामें ब्राह्मणी सती न है इससे उसका रूपही अनर्थ है-उनके मत हो इससे यहभी स्पष्ट है कि क्षत्रिय आदि मेंभी सती होनेके शास्त्रनें मरणकोही स्वर्गका कोंकी स्त्रियोंको पृथक् चितामेभी दोष नहीं साधन कहा है यद्यपि मरणमें गगसे प्रवृत्ति -कोई यह जो कहते है कि पुरुषोंके स-है तथापि अग्निमें प्रवेशरूप मरणके पैदा मान स्त्रियोंकोभी आत्महत्या निषिद्ध है इ. | करनेवाले व्यापारमें विधिसेही प्रवृत्ति है इससे ससे श्येनयागके समान यह उपदेश उसी भूतोंकी हिंसा न करे इस निषेधकाअवकाश स्त्रीको है जिसको बडी भारी स्वर्गको नहीं है जैसे भूति( धन )की कामनावाला इच्छा है और जो निषेध शास्त्रको नहीं मान । पुरुष वायव्य श्वेत पशुकी हिंसा करै तिससे ती-स्पेनका उपदेश (शके मारनेका अ- यह बात स्पष्ट है कि सती होना श्ये भिलाषी पुरुष श्येनयन करे )भी उसी पु नके समान नहीं है जो कोई यह कहते है रुषको है जिसके अंतःकरणमै तीव्र क्रोध | कि स्वर्गकी कामनासे अपनी अवस्थाके होऔर हिंसाके निषेधको न मान-यह उनका प्रथम न मरे इस अतिके विरोधसे सती कहना ठीक नहीं है क्योंकि जो मनुष्य श्ये- होना मने है सो ठीकनहीं है क्योंकि उक्त न है करण जिसमें ऐसी जो भावना (क- श्रुतिका यह तात्पर्य है कि स्वर्गकी कामना रना) जिसमें प्राणीको हिंसा होनेवाली से अपनी अवस्थाके पूर्व वही मनुष्य उसमें विधिका तो स्पर्श नहो और निषेधका | न मेरै जिसको मोक्षकी अभिलाषा हो क्यों- स्पर्श होनेसे शयनको अनर्थता (बुरा) (कि अवस्थाके शेष रहनेपर नित्य और नै- इससे कहतेहै कि उसका फल बुग है उन मित्तिक कर्मोके करनेसे अंतःकरणका मल के मतमें स्त्रीका सती होना शास्त्रसे विहित | जब नष्ट होजायगा तो श्रवण मनन-निदिध्या है इससे हिंसाही स्वर्गके अर्थ है । क्योंकि सनकी प्राप्तिक द्वारा नित्य निरतिशय (स- अमीषोमके पशुषत् निषेधका सर्श नही पौत्तम ) ब्रह्मकी प्राप्तिरूप मोक्ष होनके संभ है इससे सतीका होना श्येनके समान वह-तिससे वह अनित्य अल्पसुखरूप स्व नही है जो कोई यह मानते है कि मारनेके | गके लिये अपनी अवस्थाका व्यय (नाश) न पैदा करनेवाले व्यापारको हिसा कहतेहै | करे इससे जो स्त्री मोक्षको नहीं चाहती और मृतानुगमन नास्ति ब्राह्मण्या ब्रह्मशासनात् । अनित्य अल्प सुखरूप स्वर्गकोही चाहती है इतोमुतु वगैषु तपः परभमुच्यते । जीवता तादतकर्या | उसको अन्य काम्यकर्मोके समान सती होना मरणादात्मघातिनी । या स्त्री म्हणजातीया मृत युक्त है-इससे संपूर्ण निर्दोष है। पतिमनुमनेन् सास्वर्गमात्मपातेन नात्मान न पति १ नास्यात्सर्वाभूतानि । २ पृषकश्चिात समायस्य न विद्या गंतुमर्हति । २ वायथै श्वेतमालभेत भूतिकामः । ३ नेनाभिचरन्यजेत। ३ तस्मादुहन पुरायुषः स्वः कामी प्रेयात । नयेत् ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भावार्थ-स्त्री पतिके मरनेपर पिता माता वाली- दुष्टस्वभाव- इनके संगन बैठे क्यों- पुत्र भाई सास भशुर मामा इनसे हीन (इन कि संसर्गसेभी दुष्टचरित्र हो जाता है और के विना) न रहे जो रहती है वह निंदाको | श्रीन- और वाक आदि इंद्रियोंको जीते- प्राप्त होती है।॥ ८८॥ ऐसी स्त्री इस लोकमें कीर्ति और परलोकमें पतिप्रियहितेयुक्तास्वाचाराविजितेंद्रिया. उत्तम गतिको प्राप्त होती है- यह संपूर्ण सेहकीर्तिमवाप्नोतिप्रेत्यचानुत्तमांगतिम् ।। स्त्रीका धर्म विवाहसे पीछे समझना क्योंकि इस वैचनसे विवाहसे पूर्व स्त्रियोंको य- पद-पतिप्रियहिते ७ युक्ता १ स्वाचाग १ | थेच्छ आचरण कहा है और विवाहकी विजितेंद्रिया १ सा इहा-कीत्ति २ अवा- | विधिही स्त्रियोंका यज्ञोपवीत कहा है ॥ मोति क्रि-प्रेत्या- च- अनुत्तमा २ ग- भावार्थ-पतिके प्रिय और हितमें लगी तिम् २॥ रहे- शुद्ध आचरण करे- इंद्रियोंको जीते योजना-या स्त्री पतिप्रियहिते युक्ता स्वा ऐसी स्त्री इस लोकमें कीर्ति और परलोकमें चारा विजितेंद्रिया भवति सा इह कीर्ति च- उत्तम गतिको प्राप्त होतीहै ।। ८७॥ पुनः प्रेत्य अनुत्तमां (सर्वोत्तमां) गति अवा सत्यामन्यांसवायां धर्मकार्यनकारयेत् । मोति- तात्पर्यार्थ-जो स्त्री पतिके प्रिय ( निर्दोष सवर्णासुविधौधर्म्यज्येष्ठयानविनेतरा ॥ मनके अनुकूल आचरण )में और हित पद- सत्यां ७ अन्यां२ सवर्णायां धर्म ( परलोकमें हितकारी )में युक्त होताह कार्य २ न:- कारयेत् कि- सवर्णासु ७ और जिसका आचरण शोभन है- शंख ऋ विधी ७ धम्य ७ ज्येष्ठया ३ न - विना:- पिने इस वेचनसे शोभन आचरण यह कहा इतरा १॥ है कि विना कहे घरसे बाहिर न जाय योजना-सवर्णायां सत्यां अन्यां धर्म- विना दुपट्टा ओढे न जाय-शीघ्र न चल-पर | कार्य न कारयेत्- सवर्णासु वढीषु मध्ये धुरुपके संग न बोले-और व्यापारी वैद्य सं ज्येष्ठया विना धय विधी इतरा न न्यासी वृद्ध इनसे बोलने में दोष नही है- नियोज्या ॥ नाभिको न दिखावे-टकनों तक वस्त्रको प भावार्थ- सवर्णा (सजातीय) स्त्रीके दिने-स्तनीको न खोले- न इसे न नमहो विद्यमान होनेपर अन्य वर्णकी स्त्रीसे धर्म पति और पतिके बंधोंकि संग पैर न कर संबंधी कार्य न कराये और बहुतसी सवर्णा गणिका धूर्त कुटिनी-संन्यासिनी-प्रेक्षणिक स्त्रियोंके होनेपर ज्येष्ठा पत्नीक विना अन्य -(पदातद्वा फिौ)- मायासे कपट करने खीको धर्मकार्यमें नियुक्त नकरे ॥ ८८॥ 7 मानुवादानित नानुत्तीया न रित दादयित्याग्रिहोत्रेणनियंवृत्तवतीपतिः । मत । नगपुरुए भाषेतान्यत्र पणिनीमत | भाईरेविधिवदाराननश्चिवाविलंययन् ८९॥ झाम नाभि देत भागुरुपादासः परिदध्यान् न स्वनी पिता पर्याय नहमेगाला मनोरं तर पद-दाहयित्वा-अमिहोघेण ३ खियं२ पूना न दिसाय ननिकाभिसमिति वृत्तवती २ पतिःर आहोत क्रि-विधिवतः- मक्षा मागमताकिमोनादिभिः सहेक प्रागुपनग्नारामचारपामवादशामभक्षाः वा- अतिरेक गगनीद पार गुप्तासि । किपिभिनीतामीरलायनिष: 'गृतः ।
आचाराध्याय विवाहप्रकरण ३
(४१)
दारन् २ अग्नीन् २ च-एव:- अविलं इन बचेनासे यह कहा है कि जो मनुष्य
बयन् ॥
पहिली भार्याके जीवते हुये दूसरी भा:
योजना- पतिः वृत्तवती स्त्रियं अग्नि | योको वैतानिक (वैदिक) अग्निसे दग्ध
होत्रेण विधिवत् दाहयित्वा चपुनः अवि- | करता है वह दग्धकरना मदिरापानके
लंययन् सन् दागन् चपुनः अग्नीन विधिवत् समान है- जो मनुष्य दूसरी स्त्रीके मरनेपर
आहरेत् (स्वीकुर्यात् ॥
ओर जो अपनी इच्छासे अग्निहोत्रको
तात्पर्यार्थ- पूर्वोक्त आचरणवाली स्त्री | त्यागता है इन दोनोंको ब्रह्महत्यारे जाने-
यदि मरजाय तो उसको अग्निहोत्रकी यह निषेध उसही दूसरीस्त्रीके लिये है
अग्निसे- वह अग्नि न मिले तो स्मात जिसको पतिके संग अग्निके आधान कर-
(लौकिक) अग्निसे भस्म करके- यदि | मेका अधिकार न हो- अर्थात् जो भिन्न-
पुत्र उत्पन्न न हुआ हो और कोई यज्ञभी | वर्णकी हो ॥
न कियाहो और- अन्य कोई स्त्रीभी न होय भावार्थ- श्रेष्ठ आचरणवाली स्त्रीको पति
तो पुनः स्त्री और अग्निहोत्रको शीघ्रही | अग्निहोत्रसे भस्म करके- शीग्रही विधिसे
विधिसे स्वीकारकरें क्योंकि दक्षऋषिने अग्निहोत्र और दारा (स्त्री )ओंको स्वीकार
इस वेचनसे यह कहा है कि द्विज | करे अर्थात् विवाह कर॥ ८९ ॥
एकदिनभी विना आश्रम न रहै यह धर्म
उसही स्त्रीका है जिसको अग्निके आधानका
१ द्वितीयां चैत्र योभार्या दहेद्वैतानिकानिमिः ।
जीवत्यां प्रथमायो तु मुरापानसमंहि तत् । मृतायातु
सहअधिकारहो अन्यका नहीं और जो | द्वितीयायां यौग्निहोत्र समुत्यजेत् । बम्हनव विजानी-
१ अनाश्रमी न तिष्ठेत दिनमेकमपि द्विजः । यात् यश्च कामात्समुत्सजेन ।
इति विवाहप्रकरणम् ॥३॥
(४२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथ वर्णजातिविवेकप्रकरणम् ४ / निषेध क्यों कहा क्योंकि प्राप्ति होनेपर निषेध सवणेभ्यासवर्णासुजायंतेहिसजातयः ॥ होता है और इस न्यायका विरोध है कि. जो जिस जातिके मनुष्यसे जिस . जातिकी. अनियेपुविवाहेपुपुत्राःसंतानवर्धनाः ९०॥ स्त्रीमें पैदा होता है वह इस प्रकार उसही पद- सवर्णेभ्यः ५सवर्णासु ७ जायन्ते जातिवाला होता है जैसे गोसे गौमें पैदा क्रि-हि:- सजातयः १ अनिंद्येपु विवादेषु | हुयोगी-और अश्वसे, घोडीमें पैदा हुआ पुत्राः १ संतानवर्द्धनाः १॥ अश्वदी होता है तिससे ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें योजना- सवर्णासु स्त्रीपु सवर्णेभ्यः पैदा हुआ ब्राह्मण यह विरुद्ध नहीं है और पतिभ्यः अनियेषु विवाहेषु संतानवर्द्धनाः | कानीन पोनर्भव आदि पुत्रोंक प्रकरण सजातयः पुत्राः जायते ॥ जो यह वचन कहा है कि यह विधिमें तात्पर्याय-ब्राह्मण आदि सवर्ण पतियोंसे सजातीय पुत्रोंमें कही है-उस वचनकाभी ब्राह्मणी आदि विवाही हुयो सवर्णा स्त्रियोंमें विरोध होगा--यह शंका उनकी अच्छी नही जो पुत्र पैदा होते हैं व मातापिताके सजा- है क्योंकि श्राद्ध में निषेध इस भ्रमकी "तीय होते हैं क्योंकि इस वचन से निवृत्ति के लिये है कि ब्राह्मणसे ब्राह्मणीमें विवाहित स्त्रियोंमेंही पूर्वोक्त विधि मानी पैदा हुआ ब्राह्मणही होता है जैसे अत्यंत और उक्तवचनमें विनापद संबंधिशब्द है | अप्राप्तभी पतितका श्राद्धमें निषेध है-और इससे अपने दूसरे शब्दकी अपेक्षा करनेसे न्यायकाभी विरोध नही है क्योंकि वहांही सवर्ण पतिके संग जिसका विवाह हुआ हो न्याय विरोध होता है जहां जाति प्रत्यक्ष उस सवो स्त्रीकोही जनावेगा इससे इस / जानी जाय-ब्राह्मण आदि जाति तो शोक में एक सवर्ण पद स्पष्टार्य है इससे यह स्मृतियोंसे जानी जाती है जैसे ब्राह्मणत्वक अर्थ सिद्ध हुआकि उक्त विधिसे विवाह समान होनेपरभी कुंठिनका वशिष्ठ और हुयी सवर्णीम सवर्ण विवाहनेवाले वरस अत्रिका गौत्तम गोत्र इस स्मृतिसे होता गो उत्पन्न हुयेहों वे समानजातीय होते हैं- (हे तैसे मनुप्यके समान होनपरभी ब्राह्मण इससे कुंड- गोलक- कानीन- सहोटज | आदि जाति स्मृतिसेही जानी जाती है आदि सवर्ण नहीं हो सकते और सवर्ण | और माता पिताकीभी जातिका लक्षण अनुलोमन प्रतिलोमजोंसे भिन्न उनका यही है कदाचित् कहो अनवस्था होगी सो अहिंसा आदि साधारण धामें अधिकार है नही संसारके अनादि होनेसे शब्द और क्योंकि इस वचनसे यह कहा है कि अर्थका व्यवहार है-सजातीय पुत्रोंको यह भो अपध्वंस (व्यभिचार )से पैदा हुपे विधि में कही इस उक्त वचनका व्याख्यान है वे सप शुद्धोफे समान धर्मवाले कई भी उक्तके अनुवादरूपसे करेंगे क्षेत्रग अर्थात् दिनोंकी सेवा आदिही वे कर- पुत्रता नियोगको शास्त्रोक्त होने से और कदाचित् कोई यह शंका कर कि मुट। शिष्टाचारसे माताका सनातीय होता है और गोलकको ग्रामग न मानोगे तो पाद जैस धृतराष्ट्र पांद विदुर क्षेत्रग माताके मिासोरपिः स्मृतः। १ ममानविपये प्रोसस्तन मया शिपिः। २ मा मनांना सलमाः मृताः। रिना शिष्टात्रिीतमः।
आचाराध्याय वर्णजातिविवेकप्रकरण । सजातीय हुये-और शुद्ध विवाहों (ब्राह्म- | आदि जातिही नहीं होती इससे इन मुर्दा आदि )में संतानके बढानेवाले-रोगहीन भिषिक्त आदिकोंको यज्ञोपवीत बनही दंड- दीर्घायु-धर्म प्रजासे संयक्त-पुत्र होते है | चर्म-यज्ञोपवीत आदिसे होता है जो क्ष-- भावार्थ-सजातीय पुरुषोंसे सजातीय स्त्रि त्रिय आदिकोंको कहे है और इनकोभी क्ष- याँमें शुद्ध विवाहासे संतानके बढानेवाले सत्रिय आदिकोंके समान यज्ञोपवीतसे पहिले जातीयही पुत्र पैदा होते है ॥९० ॥ यथेच्छ आचरण करना कुछ विशेष शुद्धिकी अपेक्षा नहीं है। विप्रान्मावसितोहिक्षत्रियायांविशः भावार्थ-ब्राह्मणस विवाही हुयो क्षत्रियामें स्त्रियाम् । अंबष्ठःशूद्यानिपादोजातः मुर्दावसिक्त और विवाही हुयी वेश्य कन्या पारशवोपिदा ॥ ११ ॥ में अंबष्ठ-और विवाही हुयो शूद्रुकन्याम नि- पद-विप्रात् ५ मुद्धावसिक्तः १ हि- पाद या पारसव पुत्र पैदा होता है ॥ ९१ ॥ क्षत्रियायां ७ विशः ६ स्त्रियाम् ७ अंबष्ठः १) वैश्याशयोस्तुराजन्यान्माहियोगीसुती- शुद्यां ७ निषादः १ जातः १ पारशवः अपि:- वाई- स्मृतौ । वैश्यातुकरणःशूम्यांविन्नास्वेप- योजना-विमात् क्षत्रियायां मूर्द्धावसिक्तः विधिः स्मृतः ॥ १२॥ विशः स्त्रियाम् अंबष्ठः शयां जातः निपादः पद-वैश्याशूद्योः ७ तु:- राजन्यात ५ वा पारशवः अपि स्मृतः॥ माहियोगौ १ सुतौ १ स्मृती १ वैश्यात् . ५. तात्पर्या-ब्राह्मणसे विवाही हुयी क्षत्रि-तु:- करण १ शूद्या ७ विनासु ७ एषः १ यामें जो पुत्र पैदा होता है वह मूविसिक्त । विधिः १ स्मृतः॥१॥ होता है और विवाही हुयी वैश्यकन्यामें जो योजना-गजन्यात् वैश्याशयोः माहियो पुत्र पेदा होता है वह अंबष्ठ होता है और प्रो सुतौ स्मृती-वैश्यात् शूद्या करणः सुतः विवाही हुई शूद्रामें निषाद नाम पुत्र होता है | स्मृतः एषः पूर्वोक्तः विधिः विन्नासु (विवाहि -यह वह निषाद नही जो मत्स्याको मारता ( तासु ) स्मृतः ( संमतः ) ऋपिभिरितिशेषः। है और प्रतिलोमसे पैदा होता है किंतु यह तात्पर्यार्थ-विवाही हुयी वैश्य और शूद्र- निषाद नामके भेदसे वह है जिसको पारशव की कन्याओमें क्षत्रियके सकाशसे माहिप्य कहते हैं जो शंख ऋषिन इस वेचनसे और उग्र नामके दो पुत्र क्रमसे पैदा होते है यह कहा है कि ब्राह्मणसे क्षत्रियामें पैदा और वैश्य से विवाही हुयी शूद्रामें करण नामका हुआ क्षत्रियही होता है और क्षत्रिइसे वैश्या पुत्र पैदा होता है यह संपूर्ण मूविसिक्त मैं पैदा हुआ वैश्य और वैश्यसे शुद्रामें पैदा आदि संज्ञाओंका विधान विवाही हुयी खि- हुआ शूद्र-वह शंखका कथन इस लिये है | योमही जानना और मूविसिक्त-अवष्ठ- कि उनको क्षत्रियके करने योग्य कर्म करने | निषाद-माहिप्य-उग्र-करण ये छः पुत्र अनु- कुछ इस लिये नहीं हैं कि मूविसिक्त | लोमज जानने अर्थात् वेचे वर्णके पुरुषसे नीच वर्णकी कन्यामें पैदा होते हैं । ब्राह्मणेन क्षत्रियासमुत्पादितः क्षत्रिय एव भवति क्षत्रियेण वैश्यायामुत्पादितो वैश्य एव भवति भावार्थ-विवाही हुयी वैश्य और शूद्रकी वैश्येन शुदायामुत्यादित एव भवति । कन्यामें क्षत्रिय मादिप्य और वा दो पुत्र
(४६)
याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
हुआ पांचवी पीटीमें वैश्यको पैदा करता है-णसे पैदा हये पुत्र-और माहिन्य और
ऐसेही वैश्यभी शूद्रवृत्तिले जीवता होय उपकी कन्याओंमें ब्राह्मण और क्षत्रियते.
और उसको न त्यागे तो पांचवी पीढीमें पैदा हुये पुत्र और करणीमें ब्राह्मण क्षत्रिय :
शूद्रको पैदा करता है और अधर और और वैश्यसे पैदा हुये पुत्र उत्तर अनुलोमज
उत्तर जो वर्णसंकरोंसे पैदा होते हैं वे पूर्वके होते हैं इसी प्रकार अन्यभी समझने ये
'समानही समझने अर्थात् अधर असत् और अधर प्रतिलोमज और उत्तर अनुलोमन
उत्तर सत् होते हैं इससे पहिले अनुलोमज असत् और सत् जानने अर्थात् अधर निकृष्ट
और प्रतिलोमन वर्ण संकर दिखाये और और उत्तर उत्तम होते हैं ।
रथकार आदि संकीर्ण संकरोंसे पैदा हुये
दिखाये अब इस अधरोत्तर पदसे वर्णसंक भावार्थ-पूर्वोक्त मूर्दावसिक्त आदि जाति-
रोसे पैदा हुये दिखाते हैं कि जैसे क्षत्रिय योको पांचवी वा छठी वा सांतवी पीढीमें
वैश्य शूद्रोसे मूर्द्धावसिक्ता कन्यामें पैदा हुये | जातिकी उत्तमता जाननी-यदि कर्मोंकी विप-
पुत्र-और अंबष्ठामें वैश्य शूद्रोंसे पैदा हुये | रीतता होयतो जातिको साम्यता (वहकी
पुत्र-और निषादीमें शूद्रसे पैदा हुये पुत्र । वह ) होती है और अधर प्रतिलोमन और
अधर प्रतिलोमन होते हैं तिसी प्रकार उचर अनुलोमजभी पूर्वके समानही असत्
मावसिक्ता अंबष्टा और निषादीमें ब्राह्म- और सत् जानने ॥ ९६ ॥
इतिवर्णजातिविवेकप्रकरणम् ॥४॥
भाचाराध्याय गृहस्यधर्ममकरण ५ (४७) अथ गृहस्थधर्मप्रकरणम् योजना-कृतशाचविधिः द्विनः शरीर चिन्तां निवर्त्य दन्तधावनपूर्वकं प्रातःसं- कर्मस्मातविवाहामौकुर्वीतप्रत्यहंगृही ॥ ध्यां टपासीत ।। दायकालाहतेवापिश्रीतवैतानिकानिपु९७ तात्पर्याय-अब गृहस्थके धर्म कहतेहैं। पद-कर्म २ स्मात २ विवाहामी ७ कु- आवश्यक इस शरीरको चिन्ताको (दिन वति क्रि- प्रत्यहं २ गृही १ दायकालाहते और संध्यामें यज्ञोपवीत कानपर रख और ७ वा अपि- ओतंर- वैतानिकाग्निषु ॥ (उत्तराभिमुख होकर मूत्र और मलका त्या- योजना-गृही स्मात कर्म विवाहाना वा ग कर इत्यादि विधिसे कहीं )- निवृत्त क- दायकालाहते अग्नी प्रत्यई कुर्वीत- श्रोतं रके- गंध और लेपके क्षय करनेवाले शोच-, कर्म वैतानिकानिष कुर्वात ।। को करे इत्यादि वचनसे कही विधिसे कोहै। तात्पर्यार्थ-वेद और स्मृतिमें कहे हुये शोचको विधि जिसने ऐसा द्विज दंतधा- कर्म अमिसे होते हैं यह दिखानेके लिये क- वनपूर्वक प्रातःकाल संध्याकी विधिको हतेहैं किस अग्निमें कोनकर्म करना-स्मृतिमें करे- दन्तधावनको विधि यह हैकि कांटे उक्त वैश्वदेव आदि कर्म और प्रतिदिन- और दूधवाले वृक्षकोहो और बारह अंगुल- के पाक आदि लौकिक कर्म इनको गृहस्थी की हो- और जो कनिष्ठा अंगुलीके अग्रभा- विवाहमें संस्कारकीहुई अग्निमें वा विभाग- | गके समान मोटीहो और जिसका कूर्च के समय में लाई हुई अग्निमें करें क्योंकि (डूंची ) आधेपर्व (अंगुल )काहो ऐसी वैश्य कुलसे अग्मिको लाकर विवाहरूप | दतोन और जिव्हाको उल्लेखिनी कहाई- संस्कार करें यहभी शास्त्रमें कहा और अ- इस वचनमें वृक्षको कहनेसे तृण डेला - पिशब्दसे जब गृहका स्वामी मरजाय तय | गुली आदिका और ढाक और पापल आ- लाकरजो अग्नि संस्कृत की हो उसमें पूर्वोक्त | दिकाभी निषेध अन्य स्मृतियोंमें कहाहु कर्म करे फिरभी तीनों कालॉका अतिक्रम आ जानना- दंतधावनका मंत्र यहहै कि होजाय तो द्विज प्रायश्चित्तके योग्य होताहै- अवस्था-वल-यश-तेज-प्रजा-पशु-धन- और श्रुतिमें कहे हुये अग्निहोत्र आदिकर्म | वेद पढनेकी बुद्धि और बुद्धि इनको है वैतानिक (अहावनीय आदि) अग्नियोंमें करे॥ वनस्पते (वृक्ष) तू हमेंदे-ब्रह्मचारी प्रकर- भावार्थ-स्मृतिमें कई कर्म विवाहको वा | णमें कहेभी संध्यावंदनका पुनः वचन दंत दाय (वांटा) कालमें लाई अग्निमें और धावन पूर्वक करनेके लियेहे-क्योंकि ब्रह्म- वेदोक्त कर्म आहवनीय आदि अग्निमें-- चारी दतोन नृत्य गीत आदिको वर्णदे इस हस्थी प्रतिदिन करे ॥ ९७ ॥ वचनसे ब्रह्मवारीको दतीनका निषेधहै- शरीरचिंतांनिर्वयकृतशोचविधिर्द्विजः ॥ भावार्य-मलमूत्र त्यागनेके अनंतर वि. धिसे शौचको करके द्विज दतोन करके भात संध्याभुपासीतदंतधावनपूर्वकम्९८ प्रातःकालकी संध्याको करे || ९८॥ पद- शरीरचिंता २ निर्वयं- कृतशोच- विधिः १ द्विजार प्रातः-संध्या २ चपासात हुत्वामीन्सूर्यदेवत्याञ्जपेन्मंत्रान्समाहितः। क्रि-दन्तधावनपूर्वकम् २॥ वेदार्थानाधिगच्छेचशास्त्राणिविविधानिच ।।
(४६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । हुआ पाँचवी पीढीमें वेश्यको पैदा करता है- से पैदा हये पुत्र और माहिष्य और , ऐसेही वैश्यभी शूद्भवृत्तिसे जीवता होय उग्रको कन्याओंमें ब्राह्मण और क्षत्रियसे और उसको न त्यागे तो पांचवी पीढ़ीमें पैदा हुये पुत्र-और करणीमें ब्राह्मण क्षत्रिय शूद्रको पैदा करता है-और अधर और और वैश्यसे पैदा हुये पुत्र उत्तर अनुलोमन उत्तर जो वर्णसंकरोंसे पैदा होते हैं वे पूर्वके होते हैं इसी प्रकार अन्यभी समझने ये समानही समझने अर्थात् अधर असत् और अधर प्रतिलोमन और उत्तर अनुलोमन उत्तर सत् होते हैं इससे पहिले अनुलोमन असत् और सतू जानने अर्थात् अधर निकृष्ट और प्रतिलोमज वर्ण संकर दिखाये और और उत्तर उत्तम होते हैं । रथकार आदि संकीर्ण संकरोंसे पैदा हुये दिखाये अब इस अधयेत्तर पदसे वर्णसंक भावार्थ-पूर्वोक्त मूर्द्धावसिक्त आदि जाति- रोसे पैदा हुये दिखाते हैं कि जैसे क्षत्रिय योको पांचवी वा छठी वा सांतवी पीढीमें वैश्य शूद्रोंसे मूविसिक्ता कन्यामें पैदा हुये जातिकी उत्तमता जाननी-यदि कर्मोको विप- पुत्र और अंबष्ठामें वैश्य शूद्रोंसे पैदा हुये रीतता होयतो जातिकी साम्यता (वहकी पुत्र-और निषादीमें शूद्रसे मैंदा हुये पुत्र । वह ) होती है और अधर प्रतिलोमन और अधर प्रतिलोमज होते हैं तिसी प्रकार | उत्तर अनुलोमनभी पूर्वके समानही असत् मुर्दावसिक्ता अंबष्ठा और निषादीमें ब्राह्म- और सत् जानने ॥ ९६ ॥ इति वर्णजातिविवेकप्रकरणम् ॥ ४ ॥ , (४८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद-हुत्वाऽ- अग्नीन् २ सूर्यदेवत्यान् २/ कहताहै क्योंकि वेतनको ग्रहण करके आ- जपेत् क्रि-मंत्रान् २ समाहितः १. वेदा- ज्ञा करनेको सेवाकहते हैं वह श्वा (कुत्ता) थान २ अधिगच्छेत् क्रि-क-शास्त्राणि २ की वृत्ति होनेसे निषिद्धह- फिर मध्याह्नमें विविधानि२चा-॥ शास्त्रोक्त विधिसे नदी आदिमें स्नान करके योजना- अग्नीन हुत्वा समाहितः सन् | देवता (जो अपने गृह्यसूत्रमें कहेहों) पि- सूर्यदेवत्यान् मंत्रान जपेत्-वेदार्थान् चपुनः तर आरै चकारसे ऋषि इनका देव आदि विविधानि शास्त्राणि अधिगच्छेत् ॥ तीर्थसे तर्पण करे-फिर गंध पुष्प अक्षतोंसे तात्पर्यार्थ-प्रातःकाल संध्यावंदनके अ- हरिहब्रह्मा आदि देवोंमें किसी एकका अ- नंतर आहवनीय आदि अग्नियों का ऑपा- पनी वासनाके अनुसार ऋग्वेद यजुर्वेद सा-- सन अग्निमें शास्त्रोक्त विधिसे हॉम करके मवेदके मंत्रोंसे वा पूजाके प्रकाशक चतुर्थी सूर्य है देवता जिनका ऐसे- उदुत्यंजातवे- विभक्ति और नमःपद जिनके अन्तमें ऐसे दसं० इत्यादि मंत्रोंको चित्तको सावधान ! नामांसे (हरये नमः आदि )शास्त्रोक्त विधिसे करके जपे फिर निरुक्त और व्याकरण आ-आराधन ( पूजन ) करे । दिके श्रवणसे बदके अर्थको पढे और च भावार्थ- योगक्षेम (निर्वाह के लिये कारसे पट हुयेका अभ्यास (विचार) करें- राजा वा धनीके समीप जाय और स्नान क- फिर धर्म अर्थ आरोग्य आदिके योधक रके देवता पितर ऋषि इनका तर्पण और मीमांसा आदि अनेक शास्त्रोंको जाने । पूजन करै ।। १००॥ भावार्थ- अग्निहोत्र करके सूर्यदेवताके मंत्रीका जपे और वेदका अर्थ और अनेक वेदायर्वपुराणानिसेतिहासानिशक्तितः । शास्त्रोंको जाने ।। ९९ ॥ जपयज्ञप्रसिद्ध्यर्थविद्यांचाध्यात्मिकोंजपेत् स्पेयादीश्वरंचैवयोगक्षेमार्थसिद्धये ॥ पद-वेदायर्वपुराणानि २ सेतिहासानि २ सात्वादेवान्पिढश्चैवतर्पयेदयेत्तथा १०० शक्तितः:- जपयज्ञप्रसिद्धयर्थ:- विद्यां २ पद-उपेयात् क्रि-ईश्वरं २ चा-एव:-यो-च- आध्यात्मिकी २ जपेत् कि-॥ गक्षेमार्थसिद्धये ४ स्नात्वाऽ देवान २ पितॄन् २ योजना- सेतिहासानि वेदायर्वपुराणानि च एव:-तर्पयेत कि अर्चयेत् क्रि-तथा- बपुनःआध्यात्मिको विद्यां जपयज्ञप्रसिद्धयर्थ योजना-चपुनः योगक्षमार्यसिद्धये ई- शक्तितः जपेत् ।। वर उपेयात-मात्वा देवान् चपुनः पितृन् ता. भा०- फिर वेद अथर्वण इतिहास अर्चयत् तथा तर्पयेत् ॥ पुराण व्यस्त (एकदो) वा समस्त (सब) तात्पर्यार्थ- तितके अनन्तर अभिषेक | इनको और आध्यात्मिकी (ब्रह्म) विद्याको (गनतिलक) आदिगुणास युक्त राजाके वाजपयज्ञको सिद्धिक लिये जप अर्थात् अन्य श्रीमान्के- अनिंदित (शुद्ध) योग | विचार करें ।। १०२॥ क्षेम (अलभ्य वस्तुके लाभको योग और ल- बलिकर्मस्वधाहोमस्वाध्यायातियिसति ब्ध वस्तु के पालनको क्षेम कहतेहैं ) कलिये याभूतपित्रमरब्रह्ममनुष्याणांमहामसाः धनकी सिद्धिके अर्थ-समीप जाय-समीप जाय यह कहनेसे सेवाके निषेधको आचार्य पद-पलिकमस्वधाहोमस्वाध्याया तिथि याचाराध्याय गृहस्यधर्मप्रकरण ५ (४९) सत्कियाः १ भूतपित्रमखममनुष्याणां ६ शक्तिके अनुसार- श्वा- चांडाल- काकोंके .महामखाः१॥ लिये और चशब्दसे कीट पापरोगी पतितकि योजना- बलिकर्मस्वधाहोमस्वाध्यायाति- लिये भूमिमें अन्न गेरदे-सोई मनने इस धिसक्रियाः भूतपित्रमब्रह्ममनुष्याणां क्रमेण वेचनसे कहा है कि कुत्ते पतित चांडाल महामखाः भवन्तीति शेषः ॥ पाप रोगी काक कृमि (कीदे) इनको अन्न तात्पर्याय- पलि वैश्वदेवकर्म भूतयज्ञ- कर्म सायंकाल और प्रातःकाल करना-क्यों शनैः २ (विनामंत्र ) भूमिपर गेरदे- यह और स्वधा (तर्पणश्राद्ध) पिठ्यज्ञ- होमं कि आश्वलायनका वचन है कि सायंकाल देवयज्ञ- स्वाध्याय (वेदपाठ) ब्रह्मयज्ञ- और प्रातःकाल स्नेहुये हविन्य अन्नमें से और अतिथिका सत्कार मनुष्ययज्ञ- पांच महायज्ञ प्रतिदिन करने ल्याक ये होमकर यहां कोई आचार्य वैश्वदेव कर्मको सपकर्म नित्य हैं काम्य नहीं है- जो कही पुरुषार्थ और भन्नका संस्कारक कहते हैं क्योंकि सायंकाल और प्रातःकाल सिद्ध इनके फलका श्रवण है वह इनकी पवित्रता हविष्य अन्नमेंसे होमकर इससे तो संस्कार गोधनके लिये है कुछ काम्य बोधनके लिये कर्म प्रतीत होता है- इसके मनंतर पांच नही है-नित्यकर्म वह होता है जिसके न करनेमें पापही और करनमें कुछ फल नहो- महायज्ञ कहते हैं इसप्रकरणमें उनको ही और काम्य कर्म यह होता है जिसके कर- इससे पुरुषार्थभी जानाजाताई सो टीक नही प्रतिदिन करें इस पचनसे नित्य कहाँहै नेका कुछ फल हो । क्योंकि पुरुषार्थ कहांग तो अन्नसंस्कार • भावार्थ- चलि-येश्भदेव-स्वधा- हम-कर्म नहीं हो सकता-जसे द्रव्यसंस्कार वेदपाठ- अतिथिका सत्कार ये पांचों पक्षमें वैश्रदेव कमको भन्नार्थता है और क्रमसे भूत पितर अमर (देव) ब्रह्म- पुरुषार्थ पक्षमें वैश्वदेव कार्य द्रव्य होगा मनुष्य- इनके महायज्ञ होते है ।। १०२ ॥ इस परसर विरोधसे पुरुषार्थ ही मानना देवेभ्यश्वहुतादनाच्छेपाभूतपलिहरेत् ।। युक्त है क्योंकि मनुफी स्मृति है कि महा- मन्नभूमोश्चचांडालवायसेभ्यश्चनिक्षिपेत् ॥ यज्ञ और यज्ञोंसे ब्राह्मणका शरीर बनाया जाताहे तसेही वैश्भदेव किये पीछे यदि पद- देवेभ्यः ४ का- हुतात् ५ अन्य अतिथि भाजाय तो उसकोभी यथा भग्नात् ५ शेषात् ५ भूतपलिं २ - हरेत् कि शक्ति अन्नद पुनः पलि बमदेव न करें अन्नं२ भूमा ७भचांटालवापसेभ्यः ४ चा- पुरुषार्य होनस मंदव कर्मका प्रति पारमें निक्षिपेत् कि- करना योग्य नहीं है-तिससे पूर्वोक्त सार्प- योजना-देवेभ्यः हुतात् शेषात् भन्नात् ! कास और प्रातःकाल कर इत्यादि बननसे मतपलिं होत्- चपुनः पचाण्डाल-उत्सति और प्रयोग दिखाये-तिन इन पजों की वापसभ्यः भूमी अरं निक्षिपेत् ॥ प्रतिदिन कर यह अधिकारका विधान हंन्दससे तात्पर्याय - अपने गृह्यमें कही विधिसे सब निदापि है ॥ वैभदेव होमको परफे उससे शेष नो भरर रोप पिताना एयरपो जारी उसमसे भूतोंको पहिद- भन्न पदका tathी। कहनाभपापक निशेधार्य-तिसके अनंतर यावल्क्यस्मृति मिवारामकाठमाहित । সমান্নাঙ্গ ইন হ লন্ত दा:मावाय-बालक-स्वशातिनी वृद्ध-गान- मृताको वलिंद-मार कुन चांडाय काकद-पी-मानुर (गी) और कन्या कोर लविय नको भी मृमि भन्न बालंद ॥ १३॥ भार मृत्य-इन सपको भोजन कराकर-शेष अपितृमनुष्यम्पादयमप्यन्वइंजलम् ॥ माजनको बी और पुरुष कर-जो विवाही स्वाध्यायंचान्वईकुयाग्निपचेदनमान्मने ।। हुया कन्या मिताक पर रह वह स्ववासिनो कहाती है।। १-५॥ पद-मनं १ पितृमनुध्यभ्यः १ देयम 2-अपिअन्यई २ बलम् :-स्वाध्यायं २ नापोशनेनोपरिष्टादधस्तादनावया । चमवई २ श्यांत कि-न- पचन क्रि- अननममृतंचवकार्यमन्त्रंद्विजन्मना १०६ अन्नात्मने ॥ पढ़-आपोशननद-उपरिष्यकामघस्ताव:- योजना-पितृमनुष्यभ्यः अपि अन्वहं म- मनता ३ तथा मनग्नं १ अमृतं १चा- गर्म देयम्- चपुनः अन्वदं स्वाध्यायंक- एका कार्य १ अन्नं १ द्विजन्मना ३ ॥ यात-आरमने अन्नं न पचेत् ॥ योजना-अत्रता द्विजन्मना आपोशनेन तात्पर्याय-पितर और मनुस्यांको अपनी उपरिष्टात् चपुनः अपस्तात्-अननं चपुनः शक्तिक अनुसार प्रतिदिन अन्नंद अन्नन | अमृतं-अन्नं कार्यम् । होय तो कंद मूल फल आदि दे-बदभी न ता० भाग-भोजन करता हुआ ब्राह्मण दोय तो गद-और अपिशब्दस अविस्मरण आपोशन भाजनसे पूर्व आचमन कर्मसे पीछे (न भूलना क लिंय निरंतर स्वाध्याय और पहिले अन्नको अनग्न (टका) औरम- (यदपाठ ) कर और कयल अपने निमित्त । मृत रूप करना-यहां द्विजन्मा पदके ग्रह- मनको न पयाये किन्तुदेवताकि निमित्त । णसे टपनयन आदि सव आश्रमोंका यह सा- ही पकाय-यहां अन्न पदका ग्रहण संपूर्ण भ धारण धर्म है ।। १०६॥ क्षणय योग्य द्रव्योंके दिखाने ( जताने ) के | अतियित्वेनवर्णानांदेयंशक्त्यानुपूर्वशः । लिप॥ अप्रणोद्योतियिःसायमपियारभूतृणोदकैः ।। भागार्य-पितर और मनुष्योंको प्रतिदिन पद-अतिथित्वेन ३ वर्णानां ६ देयम् भर जलदे-और प्रतिदिन पदको पद और अपने लिये अन्न न पकाये ॥ १० ॥ १ शक्त्या ३अनुपूर्वशः:-अप्रणोधार अति- थिः १ सायं-अपि वाग्भूतृणोदकः ।। पाठरपवासिनीवृद्धगर्भिण्यातुरकन्यकाः । योजना वर्णानांअथियित्वेन शक्त्याअनु- संभोग्यातिषिभृत्यांश्चदंपत्योः शेषभोज- पूर्वशः देयम्-सायं अपि अतिथिः वाग्भूतृणो दकः भप्रशोधः॥ पद-पाटस्तगासिनीवृद्धगर्भिग्यातुरकन्य- तात्पर्याय-वैश्वदेवके अनंतर ब्राह्मण RE-संभोग्य:- अतिथिभृत्यान् २ च आदि वर्ण युगपत् (इकडे) अतिथि पागोः ६ शपभोगनम् २ ॥ आगांपतो ब्राह्मण आदि क्रमसे सामर्थ्यके गोगना-पालवासिनी गृद्धगर्भिण्यातुर अनुसार अन्नदे और सायंकालके समयभी. पाः पुनः अतिषिभूपान् संभोग्य यदि अतिथि अजायतो वहभी अपणोध (नाहीके भयोग्य ) हे सोई मनुने इस गम् ।। १०५॥ देपामा शंभीगनात्यामेति शेषः ।
(५२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । बल वा बडा बकरा अर्पणकर और पीछे है- और पूर्वकह आये हैं लक्षण जिनका चठे और स्वादु भोजनदे और मीठे वचनसे ऐसे ऋत्विज तो वर्षसे पहिलेभी यज्ञरमें बोले ॥ १०९॥ मधुपर्कसे पूजने योग्य हैं। प्रतिसंवत्सरंवा स्नातकाचार्यपार्थिवाः । भावार्थ-स्नातक- आचार्य- राजा-प्रिय मियोविवाह्यश्चतयायइंप्रत्यूविजः पुनः॥ और ऋत्विजतो यज्ञ २ में वर्षसे पहिलेभी जामाता ये घर आये प्रतिवर्ष मधुपर्कसे. पद- प्रतिसंवत्सरंऽ- तु- अर्ध्याः १ पूजने योग हैं- ॥ ११ ॥ स्नातकाचार्यपार्थिवाः १ प्रियः १ विवाह्यः १ अध्वनीनोतिथिज्ञेयः श्रोत्रियोवेदपारगः। च-तथा-यज्ञ२ प्रति-ऋत्विजःपुनः5-॥ मान्यावेतीगृहस्थस्यब्रह्मलोकमभीप्सतः । योजना- स्नातकाचार्यपार्थिवाः प्रियः चपुनः विवाहाः एते प्रतिसंवत्सरं-ऋत्विजः पद-अध्वनीनः अतिथिःश्ज्ञेयःश्रोत्रियः पुनः यज्ञ प्रति अाः (पूजनयोग्याः) वेदपारगः १मान्यो? एतौ १गृहस्थस्य६ ब्रह्म- भवन्तीति शेषः ॥ लोक २ अभीप्सतः ६॥ तात्पर्यार्थ-स्नातक तीन होते हैं-१ योजना-अध्वनीनः अतिथि:- वेदपारगः विद्यानातक -२ व्रतनातक-३ विद्याव्रत-श्रोत्रियः ज्ञेयः- एतो ब्रह्मलोकं अभीप्सतः स्नातक- वेदको समाप्त करके और व्रतको | गृहस्थस्य मान्यों स्त इतिशेषः ॥ समाप्त न करके जो समावर्तन (गृहस्थ) तात्पर्यार्थ-मार्गमें जो वर्तमान (फिरता ) कर अर्थात् गृहस्थमें आवे वह विद्यास्नातक- वह अतिथि और वेदका पारगामी श्रोत्रिय और जो प्रतको समाप्त करके और वेदको | जानना-मार्गमें वर्तमान ये पूर्वोक्त दोनों समाप्त न करके समावर्तन कर वह व्रत- ब्रह्मलोककी आकांक्षा करनेवाले गृहस्थी स्नातक- और दोनोंको समाप्त करके जो को मान्य हैं अर्थात् अतिथिरूपसे सत्कारके समावर्तन करें वह विद्यावतघातक योग्य है-यद्यपि केवल अध्ययनसेभी श्रोत्रिय कहता है- आचार्य वह जिसका लक्षण कह | होता है तथापि यहां श्रुत और पढनसे आये हैं- और पार्थिव (गना) वह जिसका संपन्न श्रोत्रियं जानना-और एक शाखाके लक्षण आगे कहेंगे- प्रिय (मित्र) विवाह्य अध्ययनमें जो समर्थ वह वेदपारण जानना। (जामाता ) चकारसे अशुर- चाचा मातुल भावार्थ-मार्गमें वर्तमान द्विज और वेदका आदिलेने-क्योंकि आभलायनका वचन है | पारगामी वेदपाठी अतिथि जानने में दोनों कि वरणके अनंतर ऋत्विोंको औरना- ब्रह्मलोकके अभिलापी गृहस्थाको मानने तकको औरभाये हुये राजाको और आचार्य योग्य है ॥ १११ ॥ अपुर पिदव्य मावल इनको मधुपर्क दे- परपाकरुचिर्नस्यादनिंद्यामंत्रणाहते ॥ ये सातक आदि सप अपने पर आये हुये। पाक्पाणिपादचापल्यवर्जयेयातिभोजनम् प्रतिवर्ष मधुपर्क से पूनने योग्य हैं यहां अर्प शन्द मधुपरका टपलक्षण (पौधक) पद-परपाकरुचिः १ न: स्यात् कि- अनिंद्यामंत्रगात् ५ शत-पाक्पाणिपादचा- १ प्रतिशोगामधुरामाहरेत् घातपायोस्पिता- पल्यं २ यर्नपत कि-चा-भतिभाजनम् २॥ या पापाय पराप्यमातुहानाय । योजना अनिघामंत्रणातू ऋते परपाफ- आचाराध्याय गृहस्थधर्मप्रकरण (५३) रुचिः नस्यात्- वाक्पाणिपादचापल्यं चपुनः भावार्थ-वृतहुये अतिथि और श्रोत्रियके अतिभोजन वर्जयेत् ॥ पीछे सीमापर्यंत जाय और शेषदिनमें शिष्ट- तात्पर्यार्थ-अनिंद्यके आमंत्रण (नोता)को | इष्ट- और बंधुभकि संग बैठे ॥ ११३ ॥ छोडकर परपाकमै रुचे न करे क्योंकि उपास्यपश्चिमांसंध्यांहुवानीस्तानुपास्यचा यह स्मृति है कि अनिद्यर्क निमन्त्रणको स्वी कार करके नहटै-वाणी,हाथ, पाद इन तीनों भृत्यैः परिवृतोभुक्तानातितृप्यायसंविशेत्॥ का चापल्य वर्जदे-असभ्य (अयोग्य ) और पद- उपास्या- पश्चिमा २ संध्यां २ अनृत (झूठ) बोलनेको वारुचापल्य कहते हैं । हुत्या-- अग्नीन् २ तान २ उपास्या-च- -हाथोंके बजानेको पाणिचापल्य कहते हैं | भृत्यैः३ परिवृतः१ भुक्त्वाऽ- न- अतित- और लंघने कूदनेको पादचापल्य कहते हैं प्या- अय:- संविशेत कि-॥ --चकार पढनसे नेत्रांका चापल्य लेते है योजना- पश्चिमां संध्या उपास्य अग्नीन् क्योंकि गोतमका वचन है कि-लिंग उदर हुत्वा चपुनः तान् उपास्य भृत्यः सह हाथ नेत्र पाणी इनका चापल्य न करे और भक्त्वा- न अतितृप्य- अथ (अनंतर) रोगका हेतु होनेसे अतिभोजनकोभी वर्जदे॥ संविशेत् (स्वप्यात् ) ॥ भावार्थ (शुद्ध निमंत्रणके विना अन्यके व- तात्पर्यार्थ- फिर पूर्वोक्त विधिसे सायं- नाये पाकमें रुचिन करे-और वाणी हाथ पैर कालकी संध्याके अनंतर अग्निहोत्र करके इनकी चपलता और अतिभोजन इनको और उन अमियोंकी पूजाकरके और वर्ज दे ॥ ११२॥ पूर्वोक्त भृत्य और स्ववासिनी भादि सहित अतिथिश्रोत्रियंतृप्तमासीमांतमनुव्रजेत् । भोजनकरके और चकारसे परके आय व्यय अहःशेषसमासीतशिष्टैरिष्टैश्वबंधुभिः११३ (लाभ खर्च )की चिंतासे निवृत्त होकर पद- अतिथिं २ श्रोत्रियं २ तृप्तं २ आसी- शयन करे। मांत २ अनुव्रजेत् कि- अहःशष २ समा भावार्य-सायंकालकी संध्या अग्निहोत्र सीत क्रि-शिष्टेः ३ इष्टैः३च-बंधुभिः ३॥ और अप्तियोंकी पूजा और भृत्योसहित योजना तृप्तं अतिधि श्रोत्रियं आसीमांत भोजनके अनंतर अत्यंत तृप्त न होकर अनुवजेत्-अहाशेष शिष्टंः चपुनः इष्टः शयनकरें ॥ ११४ ॥ बंधुभिः समासीत ॥ ब्रा मुहूर्तेवोत्यायचिंतयेदात्मनोहितम् ॥ तात्पर्यार्थ- पूर्वोक्त श्रोत्रिय अतिथि और धर्मार्थकामान्स्वेकालेयपाशक्तिनहापयेत् ।। वेदके पारगामी अतिथिको भोजन आदिसे तृप्तकरके सीमाके अंततकरसके पोछे जाय पद-माझे ७ मुहूत ७ चा टत्यापर- फिर इतिहास पुराणके ज्ञाता शिष्ट-और का• चिंतयेत् क्रि- आत्मनः ६ हितम् २ ध- व्योंकि कथा कहने में चतुर इष्ट- और मायकामान् २से काले ७ यथाशक्तिर- अनुयूल बोलने में फुशल यंधु इनके संग ना. हापयेत् कि-॥ शेष दिनमें चठे- योजना-चानः पाने मुहते उत्थाय आ- भनिनामपिठो नाकामेत् । स्मनःहित चितपत्-हे का धांधका- २ मागेदरपानिपाचवांडपापलानि पुर्णत् । । मान् यथाशक्ति न हारयेत् [न पत] !
(५४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । तात्पयार्थ-फिर ब्राह्म मुहूर्त ( पिछला आ युक्त ये चाहे समस्त हो वा एक दो हो-शू- थाप्रहर )में उठकर किये और करने योग्य द्रभी वृद्ध [ अस्सी वर्षसे अधिक ] मानके अपने हितकी और वेदके अर्थमें संदेहोंकी योग्य है क्योंकि गौतमका वचन है कि चिंता करें क्योंकि उस समय चित्तको अ- अस्सी वर्षका शूद्रभी श्रेष्ठ है। व्याकुल होनेसे तत्त्वके समझनकी योग्यता भावार्य- विद्या कर्म अवस्था . वांधव होती है-फिर अपने उचित समयमें धर्म धुनसे युक्त मनुष्य क्रमसे मानने योग्य होते अर्थ कामाको यथाशक्ति न त्याग-किंतु य-हुँ- और अधिक विद्या आदिसे युक्तः थासंभव (जैसे होसके) पुरुषार्थ होनेसे होयतो शूद्रभी वृद्ध अवस्थामें मानके योग्य. सवकर-सोई गौतमने कहा है कि प- होता है ॥ ११६ ॥ वाहू-मध्यदिन-अपराह-इनको वृथा न करै वृद्धभारिनृपसातस्त्रीरोगीवरचक्रिणाम् । और धर्म अर्थ कामामेभी धर्मको मुख्य सम- पंयादेयोनृपस्तेपांमान्यासातश्चभूपतेः ॥ झे-यहां यद्यपि सामान्यसे करना कहा है तथापि काम और अर्थको धर्मके अनुकूल पद- वृद्धभारिनृपस्नातस्त्रीरोगीवरचकि- कर वे दोनो धर्म मूल है-इसी प्रकार प्रति- णाम् ६ पंथाः १ देयः १ नृपः १ तेषां ६ दिन करे॥ मान्यः १ स्नातः १ च - भूपतेः ६॥ भावार्थ-ब्राह्म मुहूर्तमें उठकर अपने हि योजना वृद्धभारिनृपस्नातस्वीरोगी तकी चिंता करें और धर्म अर्थ कामोंको | वरचक्रिणां पन्थाः देयः तेषां वृद्धादीनां अपने २ समयमें शक्तिके अनुसार न | नृपः मान्यः चपुनः सातः भूपतः मान्यः त्यांग ॥११५॥ भवतीति शेषः॥ विद्याकर्मवयोधुवित्तैमर्मान्यायथाक्रमम् । तात्पर्य-जिसका पका शरीरहो वह एतैःप्रभूतैः शूद्रोपिवार्धकेमानमर्हति ११६ ! घुछ क्षत्रिय मात्र नही. विद्या-- और प्रत वृद्ध भार( वोहा )वान्- नृप (राजा) पद-विद्याकर्मवयोयधुवित्तः ३ मान्याः १ देनासे स्नातक- स्त्री- रोगी-वर (विवाहके यथाक्रममा- एतैः ३ प्रभूतः ३ शूद्रः १ लिपे उद्यत) चक्री (गादीवान ) चकारसे अपि-वार्धक ७मानं २ अर्हति कि-॥ मत्त और उन्मत लेने- क्योंकि शंखकी योजना-विद्याकर्मवयोपंधुवित्तः युक्ताः यह स्मृति है कि यालक-वृद्ध-मत- ययानमम् मान्याः भवति-प्रभूतः एतः युक्तः उन्मत- पीडासंयक्त- भारसे आकांत- शूद्रः अपि वाईके मानं अईति॥ स्त्री-स्नातक- संन्यासी इनको मार्ग डोहदे तात्पपार्य-पुक्ति विद्या-चद और धर्म- अर्थात ये सन्मुख आते होयतो एकतरफको शायोक्तः कर्म अपनसे वा सत्तर वर्षसे अ- इंटगाप- इन सपको मार्गदे- यदि वृद्ध धिक अवस्या-अपने स्वगन बांधवोंकी सं-आदिकाक संग राजाका समवाय (मेल) पदा-माम रत्न आदि धन-इनस युक्त पुरुप हो जायतो राजाको मार्गयोटद-गजाकोभी प्रमसे मान्य [पूगर्न योग्य होते हैं और यातक (प्रदाचारी) मानने योग्य है- यहां . अत्यंत अधिक विद्या कम क्यो बंधु धनस यधिोकमा ও নানামুঘল २ पालादमोनमापक मामामार सात् ।
आचाराध्याय गृहस्यधर्मप्रकरण ५ (५५) स्नातकसे सब स्नातकलेने कुछ ब्राह्मणही क्षत्रिय और वैश्यका पटना धर्मतो ब्राह्मणको नही क्योंकि स्नातक सदेव गुरु (वडा) है- आज्ञासे होताहै अपनी इच्छा नही क्यों सोई शंखने कहा है कि ब्राह्मणको कि गौतमका वचनह आपत्तिके समय आगे मार्गदे और कोई कहते है कि ब्राह्मण भिन्नसेभी ब्राह्मण विद्या पदै विद्याकी राजाको मार्गदे- सो ठीकनहीं क्योंकि गुरु | समाप्ति होनेपर ब्राह्मणही गुरु होजाताई ये और ज्येष्ठ ब्राह्मण राजासे अधिक है इससे छः कर्म ब्राह्मणके अनापत्तिम है तिनमें यज्ञ उनको मार्गदे- यदि वृद्ध आदिकोंका आदि तीन धर्मार्थ हैं और प्रतिग्रह आदि मार्गमें परस्पर समागम होजायतो अत्यंत तीन जोविकार्य हैं क्योंकि मनुका पंचन वृद्धको अपेक्षासे वा विद्या आदिको अपेक्षासे है कि ब्राह्मणके छः कमामे-यज्ञ कराना विशेषको देखले अर्थात जो विद्या आदिस पटाना और शुद्ध जातिका प्रतिग्रह ये तीन अधिकहो उसको मार्ग छोडदें। कर्म जीविकाह-इससे यज्ञ आदि अवश्य भावार्थ- वृद्ध- भारवाला- रामा- करने और प्रतिग्रह आदि आवश्यकतासे न स्नातक- स्त्री- रोगी-वर- गाडीशन्-करने-क्योंकि गौतमका वचन है कि इनको मार्गदेदे- और वृद्ध आदि राजाको द्विजातियोंके पढना यज्ञ दान ये तीन कर्म है और राजा स्नातकको मार्ग छोडदै ॥ ११७ ॥ | और ब्राह्मणक ये तीन अधिकई कि पदाना इज्याध्ययनदानानिवैश्यस्यक्षत्रियस्यच । यज्ञ करना और प्रतिमह इन छामें पदि- प्रतिग्रहोधिकोपिमेयाजनाध्यापनेतया ॥ ले तीनाम नियमई॥ भावार्य-यज्ञ पढना दान ये तीन कर्म पद- इन्याध्ययनदानानि १ वैश्यस्य ६ वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मणके हैं और बार- क्षत्रियस्य ६ चा - प्रतिग्रहः १ अधिकः १ अंक ये तीन अधिकहें कि प्रतिग्रह यज्ञ करा- विप्रे७ याजनाध्यापने १ तथा:- ॥ ना और पदाना ॥ १८ ॥ योजना- वैश्यस्य चपुनः क्षत्रियस्य इन्याध्ययनदानानि कर्माणि सन्ति विगै मपानझात्रियकर्मप्रजानांपरिपालनम् । प्रतिग्रहः अधिकः अस्ति- तथा याजना- कुसीदकृषिवाणिज्यपामुपाल्पविशःस्मृतम् ध्यापने अधिक स्तः इतिशेषः ।। पद-प्रधानं क्षत्रिय कर्म १ प्रगानाम्प तात्पर्य-वश्य क्षत्रिय चकारसे ब्राह्मण परिपालनम् १ फुसीदकृषिवाणिज्यपानुरा- और अनुलोमन-और प्रतिटोमग इनके यज्ञ ल्यम् १ विशः ६ स्मृतम् १ ॥ अध्ययन दान साधारण कर्म है-और ग्राम योजना-शानिये प्रधानं कर्म प्रमानों परि- के प्रतिग्रह यज्ञ कपना और पदाना अधिक । पालनम्-विशः प्रधान कर्म कुसादकृषिया- ६-तथा इसके कहनेसे अन्यस्मृतियों में कही भीविका लेनी- सोई गौतमने कहा है कि अपने आप किये खेती और। व्यापार और व्याज ये वैश्पक धर्म है और याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कर ॥ १२४ ॥ धनही वह न करें क्योंकि इस वचनसे यह और आरायण यज्ञ अन्नको उत्पत्ति होने दोष सुना जाता है कि अल्प द्रव्य होनेपर वर्षश्में करना और चातुर्मास्य यज्ञ प्रतिवर्ष जो द्विज सोमपान करता है वह सोमपीने करना ।। परभी सोमपानके फलको प्राप्त नहीं होता भावार्थ- सोमयज्ञ वर्षमें और पशुयज्ञ यहभी काम्य कर्मके अभिप्रायसे है- नित्य अयनमें वा प्रतिवर्ष करना- आग्रयण कर्मको अवश्य कर्तव्य होनसे उसमें नियम | यज्ञ और चातुर्मास्य यज्ञ वर्षश्में नही है और जिसके घरमें एक वर्षके जीव | करने ॥ १२५ ॥ ने योग्य अन्नहो वह सोम यज्ञसे पहिले क- रने योग्य कर्माको ( अग्निहोत्र दर्शपूर्ण- एपामसंभवेकुर्यादिष्टिवैश्वानरीद्विजः । भास पशु चातुर्मास्य) करे क्योंकि ये सब हीनकल्पनकुर्वीतसतिद्रव्येफलप्रदम् १२६ सोमयज्ञके विकार ( अंग) हैं । पद- एषां ६ असंभवे कुर्यात् कि- भावार्थ-जिसके तीन वर्षके जीवनसे अ- | इष्टिं २ वैश्वानरी द्विजः १ हीनकल्पं.२ अधिक अन्नदो वही द्विज सोम पान करें- न:- कुर्वात क्रि- सति ७ द्रव्ये ७. और जिसके यहां एक वर्षका अन्नहो वह | फलप्रदम् २ ॥ सोमयज्ञसे प्रथम करने योग्य कमाको योजना- एषां असंभवे द्विजः वैश्वानरों इष्टिं कुर्यात्- द्रव्ये सति हीनकल्प न प्रतिसंवत्सरंसोमःपशुःप्रत्ययनंतथा । कुर्वीत फलप्रदं कर्मापि हीनकल्पं न कुर्वीत ।। कर्तव्याग्रयणेप्टिश्चचातुर्मास्यानिचैवहि ॥ तात्पर्याय- पूर्वोक्त इन सोम आदि यज्ञांका किसी प्रकारसे असंभव होयतो पद-प्रतिसंवत्सरं २ सोमः १ पशुः १, उस समय द्विज वैश्वानरी (अमिहोत्रआदि) प्रत्ययन २ तथा:-कर्तव्या १ आग्रायणाष्टिः यज्ञ करें- और जो यह हीनकुल्प कहा है चा-चातुर्मास्यानि १ चा-एव:-हि-॥. उसको द्रव्य होय तो न करें- और जो योजना-सोमः प्रतिसंवत्सरं कार्यः पशुः फलका दाता काम्यकर्म है उसकोभी प्रत्ययन तथा ( प्रतिसंवत्सरं) कार्पः-च होनकल्प (न्यूनप्रकारस) न करे । पुनः आग्रायणेष्टिः कर्तव्या चपुनः प्रतिसं- भावार्थ- यदि किसी प्रकार ये सोमयज्ञ यत्सरं चातुर्मास्यानि कर्तव्यानि ।। आदि न होसके तो द्विज वैश्वानरी यज्ञकरे तात्पर्याय-इस प्रकार वेदोक्त काव्य क- और द्रव्यके होते इस हीनकल्प (प्रकार ) मोको कहकर वेदोक्त नित्य कर्मोको कहते हैं । को न करे- और फलके दाता कर्मकोभी सोमयज्ञ यर्प में करना और पशुयज्ञ दोनप्रकारसे न करे ॥ १२६ ॥ दक्षिणायन और उत्तरायणमें या प्रतिवर्षमें चांडालोनायतेयाकरणाच्छूद्रभिक्षितात् । करना- क्योंकि यह स्मृति है कि पशुपज्ञ प्रतिवर्ष वा छ: मासमें करें- यमायलन्धमदददासःकाकोपिवाभवत् ।। १ मत सीमाम दले यामि पिपति दिनः। पद- चाण्टाटः १ जायते कि- यज्ञ- मतमोजोनि मह are: फरणात् ५ अभिक्षितात् ५ यज्ञार्थ:- मानामो समरे पापमुगुना द्रव्यं २ भददत् १ भासः १ काफः १ मामा। अपित-वा- मवेद मि.-1 भाचाराध्याय गृहस्थधर्मप्रकरण ५ (५९) योजना- शूद्रभिक्षितात् यज्ञकरणात चां- योग्य जिसके धान्यहो उसे श्याहिक धान्य डालः जायते- यज्ञार्थ लब्धं धनं अददत् कहते हैं जिसके अग्रिमदिनके भक्षण भासः वा काकः अपि भवेत् ॥ योग्य अन्न नही उसे अश्वस्तन कहते है- तात्पर्याय- यज्ञके लिये शूद्रसे धनकी इन कुशूल धान्य आदिके संचयका उपाय याचना करके जो यज्ञ कर वह अन्य- कहते है कि कुशूल धान्य आदि चार- जन्ममें चांडाल होता है जो यज्ञके अर्थ प्रकारका गृहस्थी शिल वा उञ्छसे जीव मांगेहुये संपूर्ण धनको नही लगाता वह नीहि आदिकी पडीहुई और खेतके भास (शकुंत) वा काक सौवर्षतक होता है | स्वामीकी त्यागीहुई वालोंके संचयको शिल क्योंकि मनुने यह कहा है कि यज़के और त्यागेहुए एकर दानेक ग्रहणको उन्छ लिये धनको मांगकर सबको जो नहीं देता ) कहते है- इन दोवृत्तियोंसे गृहस्थी कुल है वह ब्राह्मण सावर्षतक भाप्त वा काक होता | धान्य आदि रहे- इन चारी ब्राह्मणोंके मध्यमें परला २ अत्यंत श्रेष्ठ है- यह द्विजका भावार्थ- शूद्रसे भिक्षा मांगकर यज्ञ प्रकरण होनेसेभी ब्राह्मणकेही लिये समझना. करनेसे चांडाल होता है- यज्ञके लिये क्योंकि विद्या और शांतिका योग ब्राह्मणकोही मांगेहुये संपूर्ण धनको जो नही लगाता है । है- सोई मनुने कहा है कि भूतोंके द्रो- वह सौवर्षतक भास वा काक होता हका त्याग वा अल्पद्रोहसे जो जारिका है ॥ १२७॥ उसको करके ब्राह्मण आपत्तिके विना जीवे कुशूलकुंभीधान्यावाच्याहिकोइवस्तनोपिता इस वचनसे ब्राह्मणके प्रकरणमेही मनुनें जीवेद्वापिशिलोंछेनश्रेयानेपापरःपरः १२८ रहे यहभी अत्यंत संपन्न और संयमी जो कहा है कि कुशूलधान्यक वा कुंभीधान्यक पद- कुशूलकुंभीधान्यः १ वाऽ-व्याहिकः | यायावर उसके प्रति कहा हे ब्राह्मणमात्रके १ अश्वस्तनः१ अपि-वाऽ- जीवत् क्रि-अभिमायसे नही ब्राह्मणमानके प्रति मानो- वा:-अपि - शिलोञ्छेन ३ श्रेयान १ एषां गतो इस वचनके संग विरोध होगाकी तीन ६परः१ परः १ ॥ वर्षसे अधिक जिसके अन्नही वह द्विज सो- योजना- कुशूलकुंभीधान्यः वा अश्व-मपान कर-सही दोपकारके गृहस्थी तहार स्तनः अपि स्यात्- वा शिलोन्छेन जीवेत् । कई है सोई देवलने कहा है कि यायावर एषां मध्ये परः परः श्रेयान् भवति । और शालीन इन दोप्रकारका गृहस्थी है- तात्पर्याय- कोठीभर वा एंटनीभर दोनोंमें यागन अध्यापन प्रतिग्रह धनसंचय अन्नको रक्लै अपने कुटुंबके द्वादश १२ | इनके त्यागसे यायावर श्रेष्ठ है-छ: कमौका दिनतक भोगनके योग्य जिसके अन्नदो उसे कुसूल धान्य कहते हैं और छः६ दिनके खाने योग्य जिसके धान्यहो उसे कुंभी धान्य कहते हैं- और तीन दिनके भक्षण १ यहाथमोपक्षिला यः सर्व प्रशासति । म याति भासतो वि काकतो वा ग्वसमाः।
(६२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - . लक्षण मनुने यह कहाहै कि धर्मध्वजो सदा | होयतो न पहरे और भार्याके आगे देखतेहुए लोभी कपटी दंभी हिंसक सर्वाभिसंधि | वीर्यसे हीन संतानको उत्पत्तिके भयसे भोजन (झूठासयको धोखादे ) शठ(सचते टेढा)- न कर सोई श्रुति हेकि जायोके समीप इनके संग संसर्गके निषेधसे आप ऐसानहो ॥ भोजन नकर क्योंकि करे तो वीर्यसे हीन भावार्य-राजा-अंतेवासी-यज्ञकराने योग्य | संतान होताहै इससे भायांके संग भोजन इनसे धनकी इच्छा क्षुधासे दुखी होनेपर तो सर्वथा निषिद्धहै और एकवस्त्र धारण कर-दंभी देतुक पाखंडी और वकवृत्ति- | किये और खडा होकर भोजन करें ।। योंको वर्ज दे-अर्थात् उनसेधन नले॥१३०॥ भावार्य-शुक्लवस्त्रोको धारे नख केश श्मशु शुशांवरधरोनीचकेशश्मश्रुनखःशुचिः। इनको कटाये रक्खै शुद्ध रहै और भार्याके देखते हुए और एकवस्त्र धारण किये और नभार्यादर्शनेनीयानकवासानसंस्थितः ॥ खडा होकर भोजन न करे ॥ १३१ ।। पद-शुक्लाम्बरधरः १ नीचकेशश्मन- नसंशयंप्रपद्येतनाकस्मादप्रियंवदेत् । खः १ शुचिः १ ना-भार्यादर्शने ७ अश्री- नाहितनावृतंचैवनस्तेन स्यानवा(पी१३२ यात् कि-न-एकवासाश्ना-सांस्थतः२॥ पद-न-संशयं २प्रपद्येत क्रि-न:-अक- योजना- शुक्लाम्बरधरः नाचकेशश्मश्रु- नखः शुचिः स्यात्-भार्यादर्शने एकवासाः | न:-अनृतं २ च- एव:- न:- स्तेनः १ स्मात्:-अप्रियं २ वदेत् कि-न:-अहितं २ संस्थितः न अश्रीयात् ॥ स्यात् क्रि-न:- वार्धषी १ ॥ तात्पर्य-शुश (घुलेहुए)वस्त्रोंको धारण योजना-संशयं न प्रपद्येत-अकस्माद अ- करें और केश श्मश्रु ( टाटी) नख इनको प्रियं अदितं अनृतं नवदेव-स्तेनः वार्धपी कटाए रखे-पाहिर और भीतरसे शुद्ध रहै न स्यात् ।। और स्नान चंदन धूप माला आदिसे तात्पर्यार्य-गिसमें प्राणोंको विपचिका सुगंधित रहै- सोई गौतमने फद्दाहे- संशय हो उस कमेको कदाचित् नकर जैसे स्नातक नित्य शुद्ध-सुगंधिमान् और स्नान सिंह चौर आदि गिस देशम हो यहां गमन में शीलवान् रद-सुगंधिरहनेकी विधिसेही और कारणके विना अत्यंत कठोर और गंधस हीन मालाका निषेधदै सोई गोभि- उद्धेग करनेवाले अप्रिय यचनको कदाचित् ने कहाकि सुवर्ण और रत्नको । भीनकद और अहित अनृत असभ्य भयान- माताको छोटकर गंधसे हीन मालाको न क प्रियवचनकोभी नकह-यहभी हांसीके धार-स्नातकको संदव इस प्रकार रहनाभी विना समझना क्योंकि यह स्मृति कि धनहोनेपर समझना क्योंकि यह स्मृति-सुटिलताको छोडकर गुरुके सायभी हास्य साचनकिनी और मप्लेयरोंको धन करना और चौर नही अर्यात् विना दिये पराई पस्तुको प्रदान करे-और यामी नहो भाव निषिद्धवृद्धि (प्यागस गीविका -- मकर ॥
आचाराध्याय नातकधर्मप्रकरण ६ (६३) भावार्थ-जिसमें प्राणोंका संदेहहो उस | णभागमें करके गमन करे इसी प्रकार चैतु- कर्मको नकर और प्रिय अहित अनृतप्पथकोभी समझना-क्योंकि मनुका वचन बचनको विना विचार न कहै चोरी और है कि- मिट्टी-गो-देवता-बाह्मण-- घृत- वृद्धि (सूद से आजीविका नकरे ॥१३२॥ मधु- चतुप्पथ (चौराहा) और प्रसिद्ध २ दाक्षयणीब्रह्मसूत्रीयेशुमान्सकमंडलुः । वनस्पति (वृक्ष) इनको प्रदक्षिण भागमें कुर्यात्प्रदक्षिणंदेवमृद्गोविप्रवनस्पतीन् १३३ करके गमन करे। पद-दाक्षायणी-ब्रह्मसूत्रीर- वेणुमान् १ भावार्थ- सुवर्ण- जनेऊ- बाँसकी यष्टि- सकमण्डलुः१ कुर्यात् क्रि- प्रदक्षिणंर देव | कमंडलु- इनको धारणकरै- और देव- मृद्गोविप्रवनस्पतीन् २॥ मिट्टी- गौ- ब्राह्मण- वनस्पति- इनको योजना-दाक्षायणी ब्रह्मसूत्री वेणुमान दक्षिणभागमें करके गमन करे ॥ १३३ ॥ सकमण्डलुः स्यात्-देवमृगोविप्रवनस्पतीन् नतुमेहेनदीछायावर्मगोष्ठांबुभस्मसु । प्रदक्षिणीकुर्यात् ॥ नप्रत्यग्यर्कगोसोमसंध्याधुस्त्रीद्विजन्मनः ॥ तात्पर्यार्थ-दाक्षायण ( सुवर्ण )को जोधा- रण करे उस दाक्षायणी कहतेहै और ब्रह्म पद-ना-तु:- मेहेत क्रि- नदीछाया- सूत्र ( यज्ञोपवीत ) जो धारे उसे ब्रह्मसूत्री | वर्मगोष्ठाम्युभस्मसु ना - प्रत्यग्यर्क- कहतेहैं अर्थात् स्नातक सुवर्ण और यज्ञोपवी | गोसोमसंध्याम्बुस्त्रीद्विजन्मनः२॥ तको धारण कर-और देणव (वांसकी) योजना-नदीछायावमगोष्ठांबुभस्मसु अ- यष्टि ( लाठी) और कमंडलु इनको धारण | ग्न्यर्कगोसोमसंध्याम्वुस्त्रीद्विजन्मनः प्रति नतु कर- यहां ब्रह्मचारि प्रकरणमें कहे हुये यज्ञो | मेहेत-(मूत्र पुरीपे न कुर्यात् ) पवीतका पुनः कहना दूसरे यज्ञोपवीतकी प्राप्ति के लियेहै सोई वसिष्ठने कहा कि स्ना- गोशाला-जल-भस्म- इनमें मूत्र और तात्पर्यार्थ- नदी- वृक्षकी छाया- मार्ग- तकोंके अंतर्वस्त्र और उत्तर वस्त्र दो वस्त्र- मलका त्याग न कर- इसीप्रकार श्मशान और दो यज्ञोपवीत यष्टि और जलसहित आदिमभी न करें सोई शंखने कहा हैकि- कलंडलु होतेहैं-यद्यपि यहां दाक्षायणी पदसे गोमय- जुता और वोया खेत- घास- सामान्य रीतिसे सुर्वणका धारण कहा है त-चिता- श्मशान-मार्ग- खलियान-पर्वत- थपि कुंडलका धारणही करना क्योंकि म-नदीका तट-इनमें मूत्र पुगेपन करे- क्योंकि नुकी स्मृति है कि वांसकी यष्टि जलसहित ये सब भूतोंके जीवन के आधार हैं-और तैसेही कमंडलु-यज्ञोपवीत-वेद-और सुंदरसुवर्णके अग्नि-सूर्य-गौ-चंद्रमा-संध्या-जल-स्त्री- कुंडल-इनको स्नातक धारण कर-और दे- ब्राह्मण-इनके सन्मुख और इनको देखताहुआ बताकी पूजा-तीर्थकी मिट्टी-गो-ब्राह्मण- मूत्र और पुरीष नकर- सोई गौतमने और पीपल आदि वनस्पति इनको दक्षि- १ स्नातकानां द्वितीय स्यादन्तर्गसस्तयोत्तरम् । य- १ मृदं गां देवतां विप्रवृत मधु धनुष्पथम्-प्रद- यज्ञोपवीते द्वे यष्टिः सौदकश्च कमंडलुः । क्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन् । २ वैगवी धारयेष्टिं सोदकं च कम डलुम्न्यज्ञो २ न गोमयक्रप्टोपसालारतिस्मशानवर्मनल पवीतं वेदं च शुभै रोम्मे च कुण्डले । पर्वतपुलिनेषु मेहेत् भूताधारलात् ।
.(६४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा है कि- वायु- अग्नि-ब्राह्मण- सूर्य- और मध्यान्हके समयही . सूर्यका दर्शन जल-देवता- गौ- इनके सन्मुख और निषिद्ध है सर्वदा नही- और इस आ- देखता हुआ मूत्र- मल- और अपवित्र श्वलायनके वैचनसे भोगको छोडकर वस्तु न गैर और देवताके सन्मुख चरण न नग्नस्त्रीको न देखें- और भोगके अंतमें फैलाव-इन पूर्वोक्त देशांको छोडकर और अनग्नभी स्त्रीको और चकारसे भोजन भूमिको यज्ञके अयोग्यतृणोते ढककर मूत्र करतीहुयीको न देखे- सोई मनुने पुरीष कर-सोई वसिष्ठने कहा है कि शिरके कहा है कि भार्याकेसंग भोजन न करें ऊपर वस्त्र लपेटकर और यज्ञके अयोग्य | और न भोजन करतीहुयी भार्याको देखें तृणोंसे भूमिको ढककरमूत्र पुरीपकरै । और छींकती- जंभाई लेती-सुखसे बैठीहुई- भावार्थ- नदी- छाया- मार्ग- गोष्ठ- नेत्रोंमें अंजन लगाती-उवटना करती-नंगी- जल- भस्म- इनमें और अग्नि-सूर्य- गो- और बालक जनतीहुई स्त्रीको कल्याणका चंद्रमा-- संध्या-- जल-स्त्री- ब्राह्मण- इनके अभिलापी द्विजोंमें उत्तम न देखें- और संमुख- और इनको देखता हुआ मलमूत्र- मूत्र और मलको और अशुद्धिक समय का त्याग न करें ।। १३४ ॥ राहु और तारागणोंको न देखे- और नेक्षेताननग्रांतीनचसंसृष्टमेथुनाम् । चकारसे इस वैचनके अनुसार जलमें अपने प्रतिविम्बको न देखे ॥ नचमूत्रपुरीपंवानाशुचीराहुतारकाः १३५॥ भावार्थ- सूर्य नमस्त्री-मेथुनके अनंतर पद-न:- ईक्षेत क्रि- अर्क २ न-स्त्री-मूत्र मल- इनको और अशुद्धिके नमा २ स्त्री २ न:- चा -- संसृष्टमथुनाम् २ समय गहु और तारागणोंको न देख।।१३५॥ नः- चा - मूत्रपुरीपं २ वार न:- अशुचिः १ - राहुतारकाः२॥ अयमेवनइत्येवंतमंत्रमुदीरयेत् । योजना- अर्क- नग्नां संदृष्टमैथुनां स्त्री वर्पत्यप्रावृतोगच्छेत्स्वपेत्सत्यशिरानच ॥ चपुनः मूत्रं का पुरीपं अशुचिः सन् राहु पद- अयमेवज्रः १ इति एवं तारकाः न ईक्षेत (पश्येत् ॥ सर्व २ मंत्रं २ उदीरयेत् क्रि- वर्षति तात्पर्याय- यद्यपि सूर्यको न देखे यह ७ अप्रावृतः १ गच्छेत् क्रि-स्वपेत् कि- सामान्यसे सूर्यके दर्शनका निषेध कहा है | प्रत्यकशिराः १ न:- तथापि इस मनुके वचनानुसार उदय योजना- वर्षति सति अयमेवन इत्येवं मोर अस्त राहुग्रहण- जलमें प्रतिबिंच सर्व मंत्रं उदीरयेत्- अप्रावृतः गच्छेत्- नमामिविमादित्यापोईवतागाच प्रतिपश्यन्या | चपुनःप्रत्यकशिराः न स्वपत् ।। मूबपुरीयामध्यान्युदस्यन्नदेवताः प्रतिपादरी प्रसारयेत एसोशतिरेफेल भमिमतियस्तुणांन्तपांग मत्रपुरी १ अन्यत्र मैनात। पुर्यात् । २ नाभीगाहार्यया साई ननामीक्षेत चामतीम् । २ परिवेष्टितशिरा भूमिमापिरम्परन्तर्याय ब- सुवी मुंभमानां च नचासीनां यधामुख । नांजती पुरारी पूरा स्तके नये नयाभ्यतामनावृताम् । न पश्येत्यसती ३ नेक्षेतोदतमादित्य नास्त यांत पसायन-नोए. य भेरशामो द्विजोत्तमः। राष्ट्र न पारिर न मध्यं नमसा गतम् । ३२ घोरके निरीक्षेत स्वरूपमिति धारणा । - आचाराध्याय नातकधर्मप्रकरण ६ (६५) तात्पर्यार्थ-वर्षतेहुये अयमेवनः यह मनुने लिखा है कि मुखसे अ- वन मेरे पापको नष्टकरो इस सर्व-निको न धर्म नग्नस्त्रीको न देखें अग्निमें मंत्रको पढ़ और वस्त्रोंके बिना पहिन अपवित्रवस्तु न फेंकै न चरण तपाव गमन करे- क्योंकि यह निषेधं है अग्निको अपने नीचे न रखे न लघु-और कि वर्षतेहुये गमन न करें- और पश्चिमको न परेके नीचे रक्खै और ऐसा कर्म करे शिरकिये न साव- ओर चकारसे नग्न जिसमें प्राणान्त कष्टहो । और एकाकी शून्यघरमें न सोवै क्योंकि भावार्थ- थूक रुधिर मल मूत्र वीर्य मनुका यह निषेध है कि नंगा और इनको जलमें न फैक- और अग्निमें चरण शून्यपरमें अकेला न सोवै ।। न तपावे और नलंघे ।। १३७ ॥ भावार्थ-वर्षतेहुये अयमेवभ्र इसमंत्रको जलंपियनांजलिनानशयानमयोधयेत् । पटे और वस्त्रोंको न पहिन कर गमन करें नाक्षःक्रीडेनधर्मनधितर्वानसँविशेत् ।। और पश्चिमको शिरकिये न सोवे ॥ १३६ ॥ पद-जलं २ पिचेत् कि-ना-अंजलिना ठीवनामृक्शकृन्मूत्ररेतांस्यप्सुननिक्षिपेत् । ३ना- शयान २ प्रबोधयेत् क्रि-न- पादोपतापयेन्नागौन चैनमभिलंघयेत् १३७ अक्षः क्रीडेत् क्रि-न-धभन्नः ३ व्याधितः३ पद- ठीवनासक्शकृन्मूत्ररेतांसि २) वाऽ- न5-संविशेष क्रि- ॥ अप्सु ७ न- निक्षिपेत् क्रि- पादौ २ योजना- अंजालना जलं न पिवत्- प्रतापयेत् क्रि-न-अग्नौ १ नऽ- च:- एन२ शयानं न प्रबोधयेत् अक्षः धर्मग्नेः न अभिलंघयत् क्रि-॥ क्रीडेत् व्याधितः सह न संविशेव- योजना-अप्सुष्ठीवनामृक्शकृन्मूत्ररेतांसि (नशयीत ) ॥ न निक्षिपेत्- अग्नी पादो न प्रतापयेत् चपुनः तात्पर्यार्थ-मिलेहुये हाथोंसे जल न पावै- एनं न अभिलंधयेत् ॥ और विद्या आदिसे जो अपनेसे अधिकहो तात्पयार्य- ठीवन ( थूक वा वमन ) - उसे सोतसे न उठावै क्योंकि यह विशेष रुधिर- मल-मूत्र-वीर्य इनको और इस वैचन है कि अपनेसे श्रेष्ठको न जगाव-अक्ष शंखवचैनसे तुप आदिको जलमें न ( फांसे ) और धर्मके नाशक पशुलंभन फेंकै कि तप... मल भस्म हाड धूक आदिसे क्रोडा न करै- और ज्वर आदिसे नख लोम इनको जलमें न फेंकै- और युक्त रोगियोंके संग एकशय्यापर न सोवे ।। चरण और हाथसे जलको न ताडे- और भावार्थ- अंजलिसे जल न पावे सौतेसे अग्निमें चरण न तपावें और न अग्मिको न जगावं फांसोंसे और धर्मके नाशकोंके लंघे ओर चकार थूक आदिको अग्निमें न संग न खेले और रोगियोंके संग न फेंक और न मुखसे अग्निको धर्म- सोई । सोवै ॥ १३८ ॥ १ अयमेवन. पाप्मानमपहन्तु । १ नानि मुखेनोपयमेवनानक्षेतचनियम् । नामेध्यं २न प्रधावेच वर्षति । प्रक्षिपेदप्ती न च पादीप्रतापयेत् । अधस्तान्नोपदध्याध ३ नच नमः शयीत नेकः स्वप्याच्छन्यरहे। न चैनमभिलययेत्-ननं पादतः कुर्यान्न प्राणा ४ तुपकेसापुरीषमस्मास्थिश्लेष्मनखलोमान्यप्मु न वधिमाचरेत् । निक्षिपेत् पादेन पाणिना वा जलं नाभिहन्यात् । २ श्रेयांसं न प्रवोधयेत् ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । विरुद्धवर्जयेत्कर्मप्रेतधूमनदीतरम् । ता. भा० - सूनि (प्राणिहिंसक) चक्री केशभस्मतुपांगारकपालेपुचसस्थितिम् ॥ (तेली) ध्वजी (मदिरावेचनेवाला) वेश्या (रंडी) और राजा ये पाचों क्रमसे पूर्वरसे प्रेतधूम २ नदीतरं २ केशभस्मतुपांगार- दशगुणे प्रतिगृहमें दुष्ट हैं अर्थात् पूर्वर से परला २ दुष्ट है ॥ १४१ ॥ कपालेषु ७ चा- संस्थिति २ ॥ योजना- विरुद्ध कर्म प्रेतधूम चपुनः अध्यायानामुपाकर्मश्रावण्यांश्रवणेनवा । केशभस्मतुपांगारकपालेषु संस्थितिं वर्जयेत् ॥ हस्तेनीपधिभावेवापंचम्पांश्रावणस्यतु । ता० भा०-देश ग्राम कुल आचारके पद- अध्यायानां ६ उपाकर्म १ श्राव- विरुद्ध कर्म प्रेतका धूम भुजाओंसे नदीको | ण्यां७ श्रवणेन ३ वाऽ-हस्तेन ३ ओपधि- तरना और केश भस्म तुप अंगार कपाल | भावे ७ वा:- पंचम्यां ७ श्रावणस्य ६ तु:-॥ और चकारसे अस्थि कपाल और अपवित्र- योजना-श्रावण्यां वा श्रवणेन युक्ते दिने स्थान इनमें स्थिति इनको वर्जदे ॥ १३९॥ हस्तेन युक्तायां वा श्रावणस्य पंचम्यां वाओ- नाचक्षीतपयंतीगांनाद्वारेणविशेक्वचित् । पधिभावे अध्यायानां उपाकर्म कर्तव्यम् ॥ नराज्ञःमतिगृह्णीयालन्धस्योच्छात्रवर्तिनः ता- अब अध्ययनके धर्मोको कहते पद-ना- आचक्षीत क्रि- धयंती २ हैं-जो पढेजांय उने अध्याय (वेद) कहते हैं नऽ- अद्वारेण ३ विशेत् क्रि- क्वचिन्ह- उनका उपाकर्म- उपक्रम (प्रारंभ) औषधि- न:- राज्ञः ६ प्रतिगृह्नीयात् क्रि-लुब्धस्य ६ योंके जमनेपर श्रावणमासकी पूर्णिमाको उद्यास्त्रवर्तिनः६॥ वा श्रवणनक्षत्रयुक्त दिनमें वा हस्त योजना- परस्मै धयंती गां न आचक्षीत- | नक्षत्र युक्त पंचमीको अपने गृह्यसूत्रमें अद्वारेण कचित् न विशेत् लुब्धस्य राज्ञः कही विधि से करे और जिसवर्ष श्रावण- उच्छास्त्रवर्तिनः न प्रतिगृण्हीयात् ॥ मासमें औपधियोंकी उत्पत्ति न हो तय ता. भा० - परके दूध आदि पोवती | भाद्रपदमासमें श्रवण नक्षत्रमें करे- फिर गोको परको न कहै- किसीभी नगर ग्राम | साटेचारमासतक वेदोंको पटे- सोई मनु वा मंदिर में विनाद्वार न पुसै- और कृपण ने लिखा है कि श्रावणी श्रावण वा भाद्रपदको और शानको मर्यादाकै अवलंघन करने पूर्णिमाको ब्राह्मण विधिस उपाकर्म करके वाले राजासे प्रतिप्रद नले ॥ १४०॥ सावधानीसे साडेपांचमासतक वेदोंको पट ।। प्रतिमहेमूनिक्रिध्वजिवेश्यानराधिपाः । भावार्य- श्रावणमासको पूर्णिमा वा दुष्टादशगुणपूर्वारपूर्वा देतेपयाक्रमम् १५१ श्रवण नक्षत्र युक्तः दिनमें वा हस्तनक्षत्र युक्त पंचमीको आपधियोंके जमनेपर पद- प्रतिप्रई ७ मनिचक्रिवनिवेश्या- पाकर्म करें ॥ १४२ ॥ नगधिपाः १ दुष्टाः १ दशगुणं २ पूर्वात् ५ पूर्वात् ५ एते १ यथाक्रम:-॥ पोपमासस्परोदिप्यामष्टकायामयापिया। योजना- सानिमानिध्वनिवेश्यानराधिपाः जांतेष्टंदसांकुर्यादुत्सर्गविधिवद्धादिः१५३ एते पूर्वात वात् यधाममं प्रतिमंद दरागुगं यायो मोटरया या उपाययपाविधि । युगादिसपीर मामागिदापमान । दुधा मांति॥
आचाराध्याय सातकधर्मप्रकरण ६ (६७) पद-पोषमासस्य ६ रोहिप्यां ७ अष्ट- | पाविंगुरुबंधुषु ७ उपाकर्मणि ७ च-उ- कायां ७ अथ:-अपि:- वा:- जलाते ७त्सर्गे ७ स्वशाखाश्रोत्रिये ७ तथा:-॥ छदसां ६कुर्यात् क्रि- उत्सर्ग २ विधिवतः योजना- शिविग्गुरुबंधषु प्रेतेषु-तु- बहिः- पाकणि-चपुनः उत्सर्गे-तथा-स्वशाखाश्रो- योजना--पोषमासस्य रोहिण्या अथवा | त्रिये मृते सति व्यहं अनध्यायः कर्तव्यः ।। अष्टकायां जलांते छदसां उत्सर्ग ग्रामा- तात्पर्यार्थ- अब अनध्यायोंको कहतेहैं- दहिः विधिवत् कुर्यात् ॥ उक्त प्रकारसे वेदपाठियोंके शिष्य ऋत्विम् तात्पर्यार्थ-अव उत्सर्ग संस्कारके सम- | गुरु और बंधु इनके मरनेपर और उपाकर्म यको कहतेहैं-पोषमासकी रोहिणी वा अ- और उत्सर्ग कर्म करनेके अनंतर और एकाको ग्रामसे बाहिर जलके समीप अपने अपनी शाखा पढनेवाले वेदपाठीके मरनेपर गृह्यसूत्रमें कही विधिसे वेदोंका उत्सर्ग करे तीन दिन अनध्याय करना और उत्सर्ग- और जब भाद्रपद मासमें उपाकर्म हो तब में मनुनें जो पक्षिणी-और अहोरात्र अन- माघशुक्लके प्रथम दिनमें उत्सर्ग करे सोई ध्याय कहाहै उसके संग इसका विकल्पहै।। मनुने कहाकि पौषमासमें वा माघमासमें भावार्थ-शिप्य-ऋत्विग्-गुरु-यंधु अपनी शुक्लपक्षके प्रथमदिनके पूर्वाह्नमें ग्रामसे बा- शाखाका वेदपाठी इनके मरने और उपाकर्म हिर वेदोंका उत्सर्ग कर उसके अनंतर प- | उत्सर्गमें तीन दिन अनध्याय करना॥१४४॥ क्षिणी (दो दिन एक रात्रि ) वा अहोरान संध्यागजिंतनिर्यातभूकल्पोल्कानिपातने । अनध्याय करके शुक्लपक्षमें वेद और कृष्ण- समाप्यवेदानिशमारण्यकमधीत्यच १४५ पक्षमें वेदाङ्गोंको पटे-सोई मनुने कहा है कि पद-संध्यागजितनिर्मातभूकंपोल्कानिशत शास्त्रके अनुसार ग्रामसे बाहिर वेदोंका उत्सर्ग करके परिक्षणी वा अहोरान अन- ने ७ समाप्या- वेदं २ युनिशंऽ- आर- ध्याय कर-इसके अनंत शुक्लपक्षम वेद और ण्यकं २ अधीत्या चा-॥ कृष्णपक्षमें सब वेदांगोंको पढे ॥ योजना-संध्यागजितनिर्यातभूकंपोल्कानि भावार्थ-पोपमासको गहिणी वा अष्टका पातने वेदं समाप्य चपुनः आरण्यकं अधी- को जलके समीप ग्रामसे बाहिर वेदोंका | त्य झुनिशं अनध्यायो भवति । उत्सर्ग करे ॥ १४३ ॥ ता. भा०-संध्याके समय मेघ गर्जने- में आकाशमै उत्पात शब्द भूमिका चलना- यहफ्रेतेप्वनध्यायःशिष्यदिग्गुरुबंधुपु । उल्काका पतन मंत्र वा ब्राह्मणकी समाप्ति और उपाकर्मणिचोत्सर्गेस्वशाखाश्रोत्रियेतया ॥ आरण्यकका अध्ययन इनमें अहोरात्र अन- पद-त्र्यहं २ प्रेतेषु ७ अनध्यायः १ शि- | ध्याय होताहै ॥ १४५॥ 1 पीपे तु छन्दसा कुर्याइहिष्क्सर्जन युधः । माघ- | पंचदश्यांचतुर्दश्यामष्टम्याराहुसूतके । शुरस वा प्राप्ते पूर्वात प्रथमेहनि । ऋतुसंधिपुभुक्त्वावाश्रादिकंप्रतिगृह्यच ॥ २ यथाशास्त्र तु कृतवमुत्सर्ग उदमां बहिः। विरमे स्पक्षिणी रानि यद्वाप्येकमहनिशा अतउर्व तु छदासि पद-पंचदश्यां चतुर्दश्यां ७ अष्टम्यां७ शुलेप नियतः पठेत् । वेदांगानि च सर्वाणि कृष्णपक्षेषु पहुस्तके ७ ऋतुसंधिषु ७ भक्त्वा:-वार- श्राद्धिकर- प्रतिगृह्या-चा-॥ संपठेत् ।
(६८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना-पंचदश्यां चतुर्दश्यां अष्टम्यां | उतारनेके दिन अहोरात्र अनध्याय होताहै राहुसूतके शुनिशं अनध्यायो भवति ऋतु- यद्यपि शुनिशं इस पदसे अहोरात्रका प्रक- संधिधु श्राद्धिकं भुक्त्वा वा प्रतिगृह्य धुनिशं रण था फिर अहोरात्रपदका ग्रहण इस अनध्यायो भवति॥ लिये है कि संध्याका गर्जन भूकम्प उ- तात्पर्यार्थ- अनध्याय है -आमावास्या पूर्णिमा चतुर्दशो | ल्काका पात इनमें जो अष्टमी और चंद्रसूर्यका ग्रहण इनमें अहो- वह अकालिकहै- यही इस गौतम पत्र अनध्याय होताहे जो यह वचन / वैचनमें लिखा कि अनध्यायके निमित्त. है कि राजा और गहुस्तकमें तीन दिन वेद- कालसे परले दिन इतने वही काल आवे को नपढे वह प्रस्तास्तके विषयमें जानना- उस अकाल कहतेहैं और उसका अन- और ऋतुकी संधिकी प्रतिपदाको और श्रा- ध्याय अकालिक कहाताह यहभी प्रा- के भोजन और प्रतिग्रहमें अहोरात्र अ- तःकालकी संध्याके गर्जनेमें समझना नध्याय होताहे-यहभी एकोद्दिष्ट श्राद्धसे भि- रात्रिकी संध्याके गर्जने में तो रात्रिकाही अ- नमें समझना-क्योंकि यह स्मृति हैं कि | नध्याय होताहै क्योंकि हारीत का वचने बुद्धिमान् मनुष्य एकोद्दिष्टके निमंत्रणको | कि सायंकालकी संध्यांके गर्जनमें रात्रि ग्रहण करके तीन दिन वेद न पढ़ें। और प्रातःकालकी संध्याके गर्जनमें अहो-. रात्र अनध्याय होताहै और जो गौत- भावार्थ- अमावास्या, पूर्णिमा, चतुर्दशी | मने यह कहांहै कि श्वान-नौला-सर्प-. अष्टमी, ग्रहण, ऋतुकी संधि, श्राद्धका मेंडक-मार्जार-इनके बीचको निकसनेमें भोजन और प्रतिग्रह लेकर अहोरात्र तीन दिन उपवास, परदेशमें गमन करे वह भोजन करें ॥१४६॥ प्रथम पटने में समझना ॥ पशुभंडूकनकुलश्याहिमारिमूपकैः। /भावार्थ-पशु-मेंडक -नौला-कुत्ता-सर्प- कृतेंतरेत्वहोरात्रंशकपतितथीच्छ्ये १४७॥ माजार-मूसा-ये चीचकोनिकसनांय-और इंद्रकी ध्वजाके बांधने- और उतारनमें पद-पशुमण्डूकनकुलश्वाहिमाारमूषकः अहोरात्र अनध्याय होताहै ॥ १४७ ॥ ३ कृते ७ अंतरे ७ तुः- अहोरात्रं २ शक्र- श्वकोष्टुगर्दभोलूकसामबाणार्तनिःस्वने । वाते-तथा- - उच्छ्ये ७॥ अमेध्यशवशूद्रांत्यश्मशानपतितांतिके । योजना-पशुमण्डूकनकुलश्वाहिमाजरिमू- पक: अंतरे कृते सति शक्रपात तथा उच्छ्ये पद-श्वकोष्टगर्दभोलूकसामबाणानिःस्व-- अहोरात्रं अनध्यायः भवति-॥ ने अमेध्यशक्शूद्रांत्यश्मशानपतितांतिका तात्पर्यार्थ यादि पदनेवालोंके बीच में पशु निःस्वने अमेध्यशवशूद्रांत्यश्मशानपतितां- योजना- श्वक्रोष्टगर्दभालूकसामवाणात- मैंडक नकुल कुत्ता सर्प विलाव मूसा निक- तिक-तत्काल अनध्यायः भवाति ॥ लजाय और इंद्रकी ध्वजाके चांधने और , आकालिकनिर्घातभूकपराहुदर्शनोल्काः । १ न्यई न कीर्तया राज्ञो राहाथ सूतके । २ सायं स्तमिते रात्रिः प्रातः स्तनितेऽहोरात्र । २ प्रतिगृह्य द्विजो विद्वान्नकोदिष्टस्य केतनं त्र्य ३ श्वनकुलसर्पमण्ड्कमानीराणा त्र्यहमुपवासो वि- इसकीया। प्रवासथ।
(७०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद-देवलिंगस्नातकाचार्य राज्ञांद छायांर लक्ष्मीकी इच्छा करै- और किसीक मर्म परस्त्रियाः ६ ना- आक्रामेत् क्रि-रक्त- और दुष्टचरित्रका प्रकाश न कर ॥ १५३ ॥ विण्मूत्रष्ठोवनोद्वर्तनादि २ चा-॥ दूरादुच्छिष्टविण्मूत्रपादांनोसिसमुत्सृजेत् । योजना-देवत्विग्स्नातकाचार्यराज्ञां पर- स्त्रियाः छायां चपुनः रक्तविण्मूत्रष्ठीवनो- श्रुतिस्मृत्युदितंसम्पनित्यमाचारमाचरेत् द्वर्तनादि न आक्रामत् ।। पद-दूरात-उच्छिष्टविण्मूत्रपादाभासिर तात्पर्यार्थ इसप्रकार अनध्यायोंको कहकर समुत्सृजेत् क्रि- श्रुतिस्मृत्युदितं २ पूर्वोक्त स्नातकके वृतोंको फेर कहते हैं-देवता सम्यक् - नित्यं आचार २आचरेत् कि । ऋत्विज स्नातक आचार्य राजा और परा- सीजना उच्छिष्टविण्मूत्रपादाम्भासि ईस्त्री इनकी छायाको जानकर न लंघे और दूराव समुत्सृजेत् श्रुतिस्मृत्युदितं आचार न बै?- सोई मनुने कहाहे कि देवता । सम्यक् नित्यं आचरेत् ॥ गुरु स्नातक राजा आचार्य और नकुलके । ता० भा० - उच्छिष्ट मल मूत्र चरणोंका- समानहे वर्ण जिसका ऐसा गो अश्व आदि जल इनको घरसे दूरडाले- वेद और पशु इनकी छायाको जानकर न लंघे और धर्मशास्त्रमें कहेहुए आचारको भलीप्रकार रुधिर मल मूत्र थूक मल स्नान वमन इन- नित्य करे ।। १५४ ॥ कोभी न लंघे ॥ गोब्राह्मणानलानानिनोच्छिष्टोनपदा भावार्थ-देवता ऋत्विज स्नातक आचार्य स्पृशेत् । ननिंदाताडनेकुर्यात्पुत्रंशिष्य राजा पराई स्त्री रुधिर मल मूत्र इनकी छाया- को न लंधै ॥ १५२॥ बताडयेत् ॥ १५५ ॥ विप्राहिक्षत्रियात्मानोनावज्ञेया:कदाचन । पद- गोब्राह्मणानलान्नानि २ आमृत्योः श्रियमाकांक्षेन्नकंचिन्मर्मणिस्पृ- उच्छिष्टः१ नऽ-पदा ३ स्पृशेत् क्रि-न:- शेत् ॥ १५३ ॥ निन्दाताडने २ कुर्यात् क्रि-पुत्रं २ शिष्यं २ ताडयेत् क्रि-1 पद-विप्रादिक्षत्रियात्मानः १ न:- अवशे- योजना- उच्छिष्टः सन् गोब्राह्मणा- याः १ कदाचन:- आमृत्योःऽ श्रियं २ नलान्नानि न स्पृशेत् च पदा न स्पृशेत्- आकांक्षेत् क्रि- ना- कंचित- मर्मणि निंदाताडने न कुर्यात् चपुनः पुत्रं शिप्यं स्पृशेत् क्रि-॥ ताडयत् ॥ योजना-विप्राहिक्षत्रियात्मानः न कदा- तात्पर्यार्थ- गो ब्राह्मण अग्नि और चित् अवज्ञेयाः आमृत्योः श्रियं आकक्षित् | भोजनका अन्न और विशेषकर पक्वान्न कंचित् मर्मणि न स्पृशेत् ॥ इनको अशुद्धहुआ स्पर्श न करें- और ता. भा०- बहुश्रुत ब्राह्मण सर्प राजा और बिना उच्छिष्टभी चरणसें स्पर्श न करें- अपना आत्मा इनका तिरस्कार कदाचि- यदि प्रमादसे इनका स्पर्श करे तो आच- भी न करें और जबतक जीवै तबतक | मनके पीछे मनुके कहेहुए इस प्रायश्चित्तको १ देवतानां गुगे राज्ञः सातकाचार्ययोरपि । ना. १ स्पष्टुतानशुचिनियमद्भिः प्राणानुपस्यशेत- कामेव कामतछायां पभ्रुणो दीक्षितस्य च । गात्राणि चैव सर्वाणि नाम पाणितलेन तु । ना- आचाराध्याय नातकधर्मप्रकरण : कर- कि अशुद्ध मनुष्य इनका स्पर्श योजना- कर्मणा मनसा वाचा - यत्नात करके जलोंसे प्राणायाम और गात्रोंका | धर्म समाचरेत्-तुपुनः लोकविद्विष्टं अस्वयं स्पर्श करके इस्ततलसे नाभिका स्पर्श करै-धर्म अपि कर्म न आचरेत् ।। इसीप्रकार इस्ततलसे प्राणोंकाभी स्पर्श करें और किसीकीभी निंदा और ताडना | करे और उसकाही मनसे ध्यान और ता. भा०- देहसे यथाशक्ति धर्मको न कर यहभी उसके लिये है जिसने अपराध वाणीसे कथन करें और शास्त्रोक्तभी लोकमें न कियाहो- क्योंकि यह वैचन है कि निंद्य (मधुपर्कमें गोवधआदि) कर्मको न युद्धको न करतेहुए ब्राह्मणके आज्ञानसें करें क्योंकि उससे अग्निष्टोमके समान . रुधिर निकासकर मनुष्य मरनेके अनंतर महान् दुःखको प्राप्त होता है पुत्र और स्वर्ग नहीं होता ॥ १५६ ॥ शिष्य और चकारसे दास इनकी तो शिक्षा मावपिप्रतिषिभ्रातृजामिसंबंधिमातुलैः। लिये ताडना करे- और ताडनाभी रज्जु | वृद्धवालातुराचार्यवैद्यसंश्रितबांधवैः १५७ अदिसे उत्तम अंगको छोडकर करनी- पद- मादीपतिथिभ्रातृजामिसंबंधिमा- क्योंकि यह गौतमका वैचन है कि तुले: ३ वृद्धवालातुराचार्यवेद्यसंश्रित- शिष्यकी शिक्षा उसप्रकार करे जिससे बांधवैः ३ ।। मरण नहो और जो शिष्य पीडाको न सह सके उसकी ताडना रजु वांस विदल (व- ऋत्विक्पुरोहितापत्यभार्यादाससनामिभिः। कलआदि ) कोमलोंसे करै-अंन्यसे कर विवादंवयित्वातुसन्लिोकान्जयेट्टही ॥ तो राजा उसे दंडदे- और यहभी वचन है कि शरीरकी पीठपर ताडै और मुख नाभिभिः ३ विवादं २ वर्जयित्वाऽ - तु:- पद- ऋत्विक्पुरोहितापत्यभायर्यादासस- आदि उत्तम अगोंमें कदाचित् न ताई ॥ सर्वान र लोकान् २ जयेत् क्रि-गृही १ ॥ भावार्थ- गो ब्राह्मण अग्नि भोजनका अन्न उच्छिष्ट हुआ और चरणसे इनका योजना-मातृपिनअतिथिभ्रातृमामिसंबंधि- स्पर्श न करे- किसीकी निंदा और ताडना | मातुल: वृद्धवालातुराचायवैद्यसभितपांधवः।। न करे पुत्र और शिप्यकी ताडना करै१५५॥ अतिक्पुरोहितापत्यभार्यादाससनामिभिः सह कर्मणामनसावाचायनाधर्मसमाचरेत् । विवादं वर्जपित्वा गृही सर्वान् लोकान् अस्वय॑लोकविद्विष्टधर्म्यमप्याचरेनतु ॥ जयेत् ॥ पद-कर्मणा ३ मनसा ३वाचा ३यलात्५ ता. भा०- माता पिता अतिथि भिन्नो- धर्म २ समाचरेत् क्रि-अवर्य २ लोकवि- दरभाई सुदागिनस्वी संबंधि मातुल वृद्ध द्विष्टं २ धर्म्य २ अपि:- आचरेत् कि- (सत्तर वर्षसे अधिक) बाल (सोलह- वर्षसे न्यून) वंद्य (विद्यावान् वा भिषक) न:-तु:-॥ 7 अयुध्यमानस्योत्पाय प्रामास्वाम्ग तत । दुरा संश्रित (सेवक ) पिता और माताके पक्षक सुमदसामोति भेयाऽभारतानरः। चांधव- मातुलका पृथक् पटना आदरके शिष्यशिटिरवधेन शाधनाशक्ती रद- लिये है ऋत्विज- पुरोहित- संतान- टाभ्यां तनुभ्यामन्येन मन् राजा सास्यते । भायां- दास- सहोदरभाई- और भगिनी ३ पृष्तस्तु शरीरस्य नौतमामे कवचन । इनके संग वाणीके कलहको छोडकर (७२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । अना- ता०भा०- गृहस्थी प्राजापत्य आदि सब लोकोंमें प्राप्त | देवखात हद और प्रस्त्रवणोंमें पांच पिंडोंके होता है ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ निकासे बिनाभी स्नान करें-॥ १५९ ।' पंचपिडाननुद्धृत्यनस्रायात्परवारिषु । परशय्यासनोद्यानगृहयानानिवर्जयेत् । नायानदीदेवखातहदप्रस्रवणेपुच १५९॥ अदत्तान्यमिहीनस्थनान्नमयादनापदि ॥ पद- पंच २ पिण्डान् २ अनुद्धृत्य:- पद- परशय्यासनोद्यानगृहयानानि २ ना-स्नायात् क्रि- परवारिपु ७ मायात् वर्जयेत् क्रि- अदत्तानि २ अग्निहीनस्य ६ कि- नदीदेवखातहदप्रस्त्रवणेषु ७ च ॥ न:- अन्नं २ अद्यात् क्रि-अनापदि ७॥ योजना- परवारिषु पंच पिंडान् अनुमृत्य योजना- अदत्तानि परशय्यासनोद्यान- न स्नायात् चपुनः नदीदेवखातहदपत्र- गृहयानानि वर्जयेत् अग्निहीनस्य वणेषु स्त्रायात् ।। पदि न अद्यात् ॥ तात्पर्यार्थ- पराये उन जलोंमें जो विनादिये पराई शय्या सब जीवोंके निमित्त, न त्यागे होंय पांच आसन, उद्यान (बगीचा ), गृह- यान-- पिंडोंके बिना निकासें स्नान करे- इससे अग्निका जिसे अधिकार नही उस शूद्रका इनको वर्जदे-- और श्रीत और स्मार्त अपने और सब भूतोंके निमित्त त्यागेहुए और अग्निहोत्रके अधिकारी अग्निसे रहित तडाग आदिकोंमें पिण्डोंके विना उद्धार प्रतिलोमनका आपत्तिके बिना भोजन न करे कियेभी स्नान करै- यह अनुज्ञात हुआ और और प्रतिग्रह नले- तिससे गौतमेके वचना- जो साक्षात् वा परंपरासे समुद्रमें जातीहो उन नदीयोंमें और देवताओंके बनाये | नुसार अपने कर्मसे शुद्ध श्रेष्ठ जातियोंका पुष्कर आदि देवखातोंमें और जलप्रवाहक ब्राह्मण भोजन करे और प्रतिग्रहले॥ १६० ॥ जोरसे हुम जलसहित बड़े गहरे हृदों कदर्यवद्धचौराणांक्लीवरंगावतारिणाम् । (कुण्ड )में और पर्वत आदि उंचे देशसे वैणाभिशस्तवा(प्यगणिकागणदीक्षिणाम्।। निकसे प्रस्रवण (झरनाक जलोंमें पांच पिण्डोंके बिना निकासेभी स्नान करले- पद- कदर्यबद्धचौराणां ६ क्लीवरंगा वतारिणां ६ वैणाभिशस्तवाऽप्यगणिका- यहभी संभव होयतो नित्य स्नानक विषयमें गणदीक्षिणां ॥६॥ समझना- क्योंकि इस वचनमें नित्यपदका योजना- कदर्यबद्धचौराणां- क्लोवरंगा- ग्रहण है कि नदी देवखात तडाग सर गर्त वतारिणां- वैणाभिशस्तवार्धप्यगणिकागण- प्रस्रवण इनमें नित्य स्नान करें- और शोच दीक्षिणां अन्नं न अद्यात् ।। आदिके लियेतो यथासंभव पराये जलोंके वर्तावमें पांच पिण्डोंके निकास विनाभी दोष वचनमें कहा है कि आत्मा धर्मकार्य पुत्र तात्पर्यार्थ- कदर्य- (लब्ध) जो इस- नही है ।। स्त्री माता पिता भृत्य इनको जो लोभसे भावार्थ- पराये जलोंमें पांच पिंडोंके निकासे चिना स्नान न करें- और नदी १ तस्मात्प्रशस्तानां स्वकर्मणा शुद्धजातीनां नाह्मणो भुंजीत प्रतिग्रहीयाच । १ नदीषु देवनाता तडागेषु सरस च यानं २ आत्मान धर्मकरयंचपुत्रदाराच पीडयेव ।लो. समाचारेनित्यं गर्तप्रसवणादियु । मायः पितरी भृत्यान्स कदर्य इति स्मृतः।
आचाराध्याय स्नातकधर्मप्रकरण ६ . दुखी रक्खें उस कदर्य कहते हैं वेडी और भावार्थ-वैद्य-ोगी-क्रोधी वेश्या- मत्त वाणीसें जो रोकहो उसे बद्ध- ब्राह्मणके शव-क्रूर-उग्र-पतित व्रात्य दभी-उच्छिष्ट- सुवर्णसे भिन्न जो अन्यके धनको चुरावे | भोजी इनके अन्नको न खाय ॥ १६२ ॥ वह चोर कहते है और नपुंसक रंगावतारी अवीरास्त्रीस्वर्णकारस्त्रीजितग्रामयाजिनाम्। (नट चारण मल्लआदि ) वैण (वासोको शस्त्रविक्रयकारतंतुवायश्ववृत्तिनाम् १६३ काटकर जो जीवे) अभिशस्त (जिसको पातककर्म लगाहो) वार्धष्य (निषिद्ध सूदलेने पद- अवीरास्त्रीस्वर्णकारधीजितमाम वाला) गणिका (वेश्या)गगदीक्षी ( जो बहु- याजिनां ६ शस्त्रविक्रयकमारतंतुवायश्व- तोंको यज्ञ करावे ) इनके अत्रको न खाय।। ) वृत्तिनां ६ ॥ भावार्थ-कदर्य-बद्ध-चौर- नपुंसक-नर योजना- अवीरास्त्रीस्वर्णकारस्त्रीजित- चारण-मल्ल-वांसवेचनेवाले-पतित-निषिद्ध- | ग्रामयाजिनां शस्त्रविक्रयकमारतंतुवायश्व- व्याज लेनेवाले- वेश्या- बहुयाजक- इनके | वृत्तिनां अन्नं न अद्यात् ।। अन्नको भक्षण न करे ॥ १६१ ॥ तात्पर्यार्थ-व्यभिचारके विनाभी पतिपुत्रसे चिकित्सकातुरपुंश्चलीमत्तविद्विपाम् । रहित स्वतंत्र स्त्री-सुनार-खीका वशीभूत रोगपतितयात्यदांभिकोच्छिष्टभोजिनाम् स्त्रीजित-ग्रामयाजी-ग्रामको शांति आदिका कर्ता वा बहुतोंको यज्ञोपवीत देनेवाला) पद- चिकित्सकातुरक्रद्धपुंश्चलीमत्त- शस्त्र बेचनेवाला-कार- सुहार वा तक्षा विद्विपां ६ क्रूरोप्रपतितवात्यदांभिकोच्छि- आदि ) तंतुवाय-भवृत्ति ( जो कुत्तोंसे आ- टभोजिनां ६॥ जीविका कर ) इनके अन्नको न खाय ।। योजना चिकित्सकातुरक्रद्धपुंश्चली भावार्थ-अवीरा स्त्री-सुनार-स्त्रोके वशीभूत भत्तविद्विषां करोगपतितवात्यदांभिकोच्छिष्ट ग्रामयाजी-शस्त्रविक्रेता-लुहार-तंतुवाय-श भोजिनां, अन्नं न अद्यात् ॥ तात्पर्याय-वैद्यवृत्तिस जीनेवाला चिकि- | वृत्ति-इनके अन्नको न खाय ॥ १६२ ॥ त्सक- और इस वैचनमें कहै महा- नृशंसराजरजककृतनवधजीविनाम् । रोगोंसे युक्त अतुरकि-बातव्याधि-पथरी- चैलधावसुराजीवतहोपपतिवेश्मनाम् १६४ कुष्ठ-प्रमेह-महोदर-भगंदर-अर्श-गृहणी-ये पद-नृशंसराजरजककृतनवधर्जीविनां ६ आठ महारोग कहे हैं- क्रोधी व्यभिचारिणी चेलधातसुराजविसहोपपतिवैश्मनां ६ ॥ स्त्री विद्या आदिसे मत्त-विद्विद् (शव) क्रूर (जिसके भीतर अत्यंत काप हो) वाणी पिशुनातिनोश्चैवतयाचा क्रिकदिनाम् । और कायाके व्यापारस दूसरेको कपानवाला एपामन्नंनभोक्तव्यं सोमविक्रायणस्तथा ॥ उम्र ब्रह्मा आदि पतित-प्रात्य-(जिसका पद-पिशुनानृतिनाः ६ च एव तया:- उचित कालमें संस्कार न हुआ हो) चाक्रिकचंदिनां ६ एषां ६ अन्नं १ ना- दांभिक (वंचक) उच्छिष्टभाजी इनके भोक्तव्यं १ सोमविक्रयिणः६ तथा- ॥ अन्नको भक्षण न करें। योजना नृशंसराजरजककृतनवध- , वानन्याध्यमरीष्टमहोदरमगदराः ॥ अशां- जीविनां, चलवावमुरानीवसहोपपतिवेश्मनां सि प्रहपी पध मदागंगाः प्रशीर्तिताः। चपुनः पिशुनानृतिनीः, तथा चाक्रिक-
(७४)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
बँदिनां-तथा सोमविक्रयिणः एपां अन्नं न शूद्रपुदासगोपालकुलमित्रार्धसीरिणः !
भोक्तव्यम् ॥
भोज्यान्नानापितश्चैवयश्चात्माननिवेदयेत्।।
तात्पर्याय-नृशंस (निर्दयी ) राजा और
उसका पुरोहित- क्योंकि शंखने इस सौरिणाभोज्यान्नाः १ नापितः१ च-एव:-
पद-शूद्वेषु ७ दासगोपालकुलमित्रार्द्ध-
वचनसे पुरोहितका अन्नभी वर्जित लिखा
यः१-चा-आत्मानं२-निवेदयेत् क्रि-॥
है-कि भयभीत-निंदित-रोनेवाला-आक्र-
दित ( वद्ध) अवघुष्ट (शापित ) क्षुधित-
योजना-दासगोपालकुलमित्रार्द्धसीरिणः
(यद्वातद्वाभोक्ता ) विस्मित-उन्मत्त-अव- | चपुनः नापितः चपुनः यः आत्मानं निवेद-
धूत-गजा और पुरोहित इनके अन्नको वर्ज येत् एते शूद्रेषु भोज्यान्नाः भवंति ॥
दे-वस्त्रआदिको नीलआदि रंगसे रंगनेवाला तात्पर्यार्थ-आपत्तिके विना अग्निहीनके
रजक-कृतन ( उपकारको जो न माने)| अन्नको न खाय इस वचनसे शूद्रको
प्राणियांकी हिंसासे जीनेवाला वधजीवी- अभोज्यान कहा है-अब उसका प्रतिप्रसव
चैलधाव (धोबी ) सुराजीव (मदिरा वेचकर ( निषेधका निषेध ) कहते हैं दास (गर्भ-
जो जीव ) जिसके घरमें जार रहता हो- दासआदि ) गोपाल (जो गोओंकी पालनासे
पिशुन (चुगलखोर) अनृती (मिथ्यावादि) | जीवे-) पितापितामह आदिक्रमसे चला
चाक्रिक (तेली वा गाढीवान् ) क्योंकि इस | आया कुलका मित्र-अर्द्धसीरी ( जो कृषिके
वचनमें अभिशस्तको पतित और चाकि आधे अन्न आदिको ले और उघाई नले)
कको तेली कहा है-बंदीजन (जो वंशआ-|-नापित ( घरके व्यापार करनेवाला
दिकी स्तुति करतेहों) सोमलताके वेचने- | वा नाई) और जो में तेरहूं यह कहकर
वाला-इनके अन्नका भोजन न करे-ये सब- वाणी मन कायाको निवेदन करै ओर
कदर्य और कायरता आदि दोषोंसे दुष्ट चकारसे कुंभकार-शद्रोंमें इनका अन्न भोजन
द्विजही लेने-क्योंकि इतर जातिकी प्राप्ति करने योग्य है क्योंकि इस वेचनमें कुंभकार
नही है और निषेध प्राप्तिपूर्वकही होताहै। | भी भोज्यानोंमें पढा है-कि गोप नापित
भावार्थ-निर्दयी राजा रंगरेज कृतघ्नी
कुंभकार कुलमित्र अर्द्धसोरी निवेदितात्मा
हिंसक धोबी कलार जिसके घरमें जार हो- शूद्रोंमें इनका अन्न भोजन करने योग्य है ।
चुगल मिथ्यावादी तेली बंदीजन तथा सोम-
भावार्थ-दास गोपाल कुलमित्र अर्द्धसीरी
विक्रयी इनके अन्नको न खाय१६॥१६५॥ | कुंभकार शूद्रोंमें इनका अन्न भोजनके
योग्य है-
१ भौतावर्गातरुदिताकदितावघुटक्षुधितपारभुत्त-
विस्मितोन्मत्तावधूतराजपुरोहितान्नानि वर्जयेत् । १ गोपनापितकुभकारकुलमित्रादिकनिवेदितात्मानो
२ अभिशस्तः पतितश्चामिकस्तलकः।
मोज्यानाः।
इति स्नातकधर्मप्रकरणम् ॥६॥
आचाराध्याय भक्ष्याभक्ष्यप्रकरण ७ (७५) अथ भक्ष्याभक्ष्यप्रकरणम् ७ स्वला )का छुआ-उदक्या पदसे यहां चां- डाल आदि लेने- क्योंकि यह शंखका वे- मनचितवृथामांसंकेशकीटसमन्वितम् । चनहैकि अपवित्र-पतित-चाण्डाल-पुल्कस- शुरूंपर्युपितोच्छिष्टंश्यस्पृष्टंपतितेक्षितम् ॥ रजस्वला-कुनखी-कुष्ठी-इनकेशुभे अन्नको पद-अनचितं २ वृथामांसं २ केशकीट- |-और संघुष्ट अन्न कोई भोजन कर है.यह समन्वितं २ शुक्तं २ पर्युषितोच्छिष्टर श्वस्पृ. | शब्द कहकर जो दियाजाय उसे संघष्टान्न टं २ पतितेक्षितं २ कहतेई-पर्यायान्न जो अन्यका अन्न अ- उदक्यास्पृष्टसंपुष्टंपर्यायानंचवर्जयेत् । न्यके नामसे दियाजाय उसे पर्यायान्न क- गोधातंशकुनोच्छिष्टंपदास्पृष्टंचकामतः ॥ हते हैं जैसे कि इस वैचनमें लिखाहै कि ब्राह्मणान्नको देता हुआ शूद्र और शूद्रान्नको पद-उदक्या स्पृष्टसंधुष्टंर पर्यायान्नेर च- देताहुआ ब्राह्मण उन दोनोंका अन्न भक्षण वर्जयेत् क्रि-गोवातं२ शकुनोच्छिष्टर पदा ३ / योग्य नही और भक्षण करे तो चान्द्रायण स्पष्टर चा- कामतः5-॥ करे पर्याचांत यह पाठ होय तो फुल्ला करनेके योजना- अनचितं वृथामांसं केशकी- अनंतर भोजन न करे-अर्थात् गण्डूप (कु- समन्वितं शुक्तं पर्यपितोच्छिष्टं श्वस्पृष्टंप- | रला )सेपाछै और आचमनसे पहिले भोजन तितेक्षितं उदस्या स्पृष्टं संघुष्टं पर्यायान्नं गो- करना अयोग्यहै और जब पावाचान्त पा- प्रातं च पुनः कामातः पदा स्पृष्टं अन्नं ठहै तब यह अर्थहै कि एक पंक्ति में छठे वर्जयेत् ॥ हुओंमें पासका आचमन जब करले और तात्पर्यार्थ-ब्राह्मणके स्नातक प्रताको भस्म आदिकी मर्यादा न होता भोजन न कहकर अब द्विजातीयोंके धर्मोको कहतेहैं करेगोका सूंपा और शकुनोच्छिष्ट ( काक- कि तिरस्कारपूर्वक दिया हुआ पदार्थ-- | आदि पक्षीयोंका झूठ-) और जानकर पै- थामांस (जो वक्ष्यमाण प्राणान्त कष्टके रोसे छुआ इतने अन्नोंको वर्जदे । विना देवपूजनसे शिष्ट न हो) किंतु अपने भावार्य-तिरस्कारसे दिया अन्न-वृयामांस लिये ही बनायाहो केश और कीट आदिसे केशकीटसे युक्त अन्न-शुक्त- पर्युषित-उ- युक्त वस्तु-शुक्त जो अम्ल नहीं अधिकका- च्छिष्ट कुत्तेका छुआ और पतितका देखा ल वा अन्यद्रव्यके मिलनसे अम्ल (खट्टा) अन्न-रजस्वलाका हुआ-संघष्ट और पर्या- होजाय वहभी दधि आदिको छोडकर सम- झना क्योंकि यह शंखका वचनहे कि पापा-यान-नौका सूपा-पक्षीयोंका झूठा-और जा- का अन्न-द्विपक-शुक्त-पर्युषित इनको न वदे ॥ १६७ ॥ १६८ ॥ नकर पैसे छुआ भन्न-इतने भन्नीको खाप और राग-खांह-नुक्र दद्दी-गुह-गहूं जों-इनके विकारकै खानेका दीप नही-प- अन्नपर्युषितंभोज्योहातचिरसंस्थितं । युषित-(यासी ) उच्छिष्ट-( भोजनका शेष) भन्नेहाअपिगोधूमपयगोरसविक्रिया:१६९ सुतेका छुआ-पतितका देखा-उदक्या (रज १ अमेयापतितांगमाजसलाकुनामा- न पापीयसोऽनमनीयान दिपक न त न प- सिंघसन्न वर्जदे । दुषितं अन्यवरागसापचुकदधिगुटगोधरवपिर. २ मामान पदयादा मात्र मागो । रिकारेभ्यः । उमाशावमीग्गामा भाला चांदावन पौर।
(७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . पद- अन्नं १ पर्युषितं १ भोज्यं १ स्नेहा- कहते हैं-और जो एक समयको छोडकर १ चिरसंस्थितअन्नेहाः१ अपि-गोधूम- दूसरे समय दूध देना बछडे मिनाही दूधदे घवगोरसविक्रियाः१॥ उसभी संधिनी कहतेहैं-अनिर्दिशा (जिसके योजना- स्नेहाक्तं चिरसंस्थितं पर्युपि-प्रसवको दशदिन न वीते हों) अवत्सा- 'तमप्यन्नं भोज्यं भवति- गोधूमयवगोरस | ( जिसका वत्स मरगया हो) इन तीन विक्रियाः अस्नेहा अपि भोज्या भवन्ति ।। प्रकारकी गाओंका दूध वर्जद-यहां संधि- तात्पर्यार्थ- अब पर्युषितका प्रतिप्रसव नी पदसे स्यदिनी और यमलसूभी लेनी- कहतेहैं कि घृतआदि स्नेहसे युक्त चिरकाल-सोई गौतमैनें कहाहे कि स्यंदिनी यमलसू का संस्थितभी पर्युषित अन्न भोजन करने संधिनीका दूध वर्जितहै जिसका सदेव दूध योग्य होताह-और गोधूम जो गोरस इनके निकसतारहै उसे स्यंदिनी और जिसके विकार चिरकालकेभी स्थित मंडक सत्तू दो वत्स पैदाहो उसे यमलसू कहतेहैं इसी किलाट कूर्चिका आदि भोजन करने योग्य हैं | प्रकार बकरी और भैसका दूध दशदिन यदि वे विकारको प्राप्त न हुए हों क्योंकि यह तक वर्जितहै क्योंकि वसिष्ठको यह स्मृति वसिष्ठकी स्मृतिहै कि अपूप धान करंभ है कि बकरो और भैंस और गोका दूध सत्तू पाचक तेल पायस शाक ये शुक्त दशदिनतक वर्जितहै-दूधके ग्रहणसे उ- (खट्टे) होगये होतो वर्जदे ॥ सके विकार दही आदिकाभी निषेधहै- भावार्थ-स्नेहसे युक्त चिरकालकाभी वासी जैसे मांसके निषेधमें उसके विकारकाभी अन्न भोजन करने योग्य है और स्नेहस | निषेधहै-और जहां विकारका निषेध है रहितभी गेहूं जो गोरसके विकार भोजन निषेधसे गोवर और मूत्रका निषेध नहीं- वहां प्रकृतिका निषेध नहीं और दूधके करने योग्यहैं ॥ १६९ ॥ संधिन्यनिर्दशावत्सागोपयःपरिवर्जयेत् । और ऊंटनी और घोडी आदिका दूध स्त्री- औष्ट्रमैकशर्फत्रणमारण्यकमथायिकम् ॥ का दूध-स्त्रीक ग्रहणसे अजासे भिन्न सब द्विस्तनीयोंका निषेधहे-क्योंकि शंखेने यह पद-संधिन्यनिर्दशावत्सागोपयः २ परि- | कहा कि बकरीको छोडकर सर्व द्विस्त- वर्जयेत् क्रि- ऑष्टुं २ ऐकशर्फ २ स्त्रैणं२ नीयोंका दूध अभोज्यह-भैसको छोडकर आरण्यकर अथ-आविक २॥ और उनके पशुओंका दूध-क्योंकि यह योजना-सधिन्यनिर्दशावत्सागोपयः अथ वचनहै कि महिषीको छोडकर वनके सच ऑष्ट्र एकशर्फ स्त्रैणं आरण्यक आविकं पयः पशुओंका दूध वर्जितंह और आविक ये परिवर्जयेत् ॥ सब दूध वर्जितहे औष्ट्रं इस पदमें तात्पयार्थ- संधिनी (जो गौ दूध देतीहुई | विकारमै अण् प्रत्यय होनेसे उंटनीक वि- 'धनचढ़े ) क्योंकि यह त्रिकांडी स्मृतिहै कि | कार दूध मूत्र आदिका सर्वदा निषेधहे वशाको वंध्या और वृपाक्रांताको संधिनी १ स्यंदिनीयमलसूसंधिनीनां च । १ अपूपधानाकरमसनुयाचलपायमशाकानि २ गोमहिप्यजानामनिर्देशानां । 'शतानि वर्जयेत् । ३ सर्वप्तां द्विस्तनीनां क्षीरमभोग्यमजावये । २ वां वध्यां विमानीयादशाक्रांतां च संधिनों। ४ आरण्यानां च सर्वया मृगाणां माहिषं विना।
याचाराध्याय भल्याभक्ष्यप्रकरण ७ (७७) क्योंकि गौतमका वचन है कि भेड उंटनी पद-क्रव्यादपक्षिदात्यूहशुकप्रतुदटिट्टि- एक खुरके जीव इनके दूध आदिविकार भान् २ सारसंकशफान २ हंसान स- वर्जितह ॥ वन्२ि -ग्रामवासिनः २ ॥ भावार्थ-संधिनी-अनिर्दशा और अवत्सा योजना-क्रव्यादपक्षिदात्यूहशुकप्रतुदटि- गोका दूध-और उंटनी-एक खुरखाली घोडी | द्विभान्- सारसकशफान्-हंसान चपुनः आदिका दूध-बी-उनके पशु-भेड-इनका | सर्वान् ग्रामवासिनः वर्जयेत् ॥ दूध वर्जितह ॥ १७ ॥ ता- भा०-क्रव्याद ( कच्चे मांसके देवतार्यहविःशिमुलोहितान्त्रश्चनांस्तथा । | भक्षक जीव ) गीध आदिपक्षी-दान्यूह (चा- अनुपाकृतमांसानिविड्जानिकषकानिच ॥ तक) शुक (तोता ) प्रतुद (जो चोंचसें पद-देवतार्थर हविः२ शिर लोहितान तोडकर खाते हैं वे श्येन आदि ) टिभि व्रश्चनान २ तथा:-अनुपाकृतमांसानि२ वि. स-और-ग्राममें बसनेवाले कबूतर आदि (टटीरी ) सारस-एक शफ (अश्वआदि) जानि २ कवकानि २ चा-॥ संपूर्ण जीव ये सब वर्जितहैं || १७२ ।। योजनान्देवतार्थ हविः शिघु-तथा लोहि- तान् व्रश्चनान् चपुनः अनुपाकृतमांसानि | कोयष्टिप्लवचक्राहकलाकावकविकिरान् । विड्जानि कवकानि वर्जयेत् ॥ वृयाकृसरसंयावपायसापूपशकुलीः १७३ तात्पर्यार्थ-देवताकी बलि देनेके लिये पद-कोयष्टिप्लवचक्राबलाकारकावष्कि- बनाई हुई जो हवि वह होमस पाहिले अभ- रान्वृथाकृसरसंयावपायसापूपशकुलीः २ क्ष्यह शिग्र ( सोइजना) और वृक्षका लाल योजना-कोयटिप्लरचक्राहयलाकायकवि- गूंद-और वृक्षके छेदनसे पैदा हुए सब प्र- किरान्-वृथा कृसर संयावपायसापूप शकु- कारके गूद-सोई मर्नुनै कहाहै कि वृक्षके लीः वर्जयेत् ॥ लाल गूंद और छेदनसे पैदा हुए गूंद वजि- तात्पर्याय-कोयष्टि ( क्रींच) प्लव (जल- तहैं-लोहितके ग्रहणसे हीग और कपूर आ- दिका दोष नही-अनुपाकृतमांस ( यज्ञमें न मुरगा) चक्राह (चकवा) बलाका (वग- होमें पशुका) विड्ज-(मनुप्यक भक्षित | ला ) विकिर (जो नखोस फाडकर भक्षण बीजसे पैदा हुए तण्डल आदि) और कव करतेहैं वे चकोर आदि ) लेने क्योंकि क (स्त्राक) ये सब वाजतह ॥ लावक मयूर आदि भक्ष्यहैं और प्रामके भावार्थ-देवताक लिये हवि सोइजना- कुक्कुटका प्रामवासी होनेसे निषेधह-इन को- निमित्त विनायनाय कृशर संयाव पायस अयूप यज्ञमें न होमे पशुका मांस विष्ठामें पदा हुए शकुलिभी वनितई-तिल और मूंगमिल अन्न और वाक इन सबको वर्जदे॥११॥ औदनको कृशर कहतेह-क्षीर गुट घृत मा. कन्यादपशिदात्यहशुकमतुरिट्टिभान् । दिमें पकाये नूगको संयाव ( माइनरोग) सारसकशफान्हंसान्सश्चिन्नामयासिनः ।। कहतेहै- दूधमें पकाये मोदनको पायस नियमाविरमपेग्मोमेकच । (खीर ) कहतेह-अप (पृढे ) शकुली ३ रोहितान् समनिर्यासान् मथनाभस्तदा। (पूर्व) ये दोनों पीआदि नेहमें पके गोधून- लाल और वृक्षके च्छेदनसे पैदा हुए गूद और यष्टिआदि जीवोंको वर्भद और देवताओंक (७८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । का विकार है-ये सब भक्षणमें वर्जित है | सौनं २वल्लूरं.२ एव:- च-मत्स्यान् श्च:- यद्यपि अपने लिये अन्नको न पकावे इसे कामतः5- जग्ध्वा:- सोपवासः १ व्यहं २ वचनसे कृशर आदिकोंका निषेध सिद्धथा वसेत् क्रि-॥ पुनः कहना अधिक प्रायश्चितके लियेहै ।। योजना- चापान् च पुनः रक्तपादान च भावार्थ- क्रौंच- जलकुछट-चक्रवाक | पुनः सोनं च पुनः वल्लूरं च पुनः मत्स्यान् वलाका-गला-चकोर आदि-इनको वर्जदे कामतः जग्ध्वा व्यहं सोपवासः वसेत् ॥ और देवताके निमित्तविना, बनाये कृशर तात्पर्यार्थ- चाप (पपीहा) रक्तपाद संयाव पायस अपूप शकुलि इनकोभी वर्जदे ॥ १७३॥ (कादंब) सौन(घातस्थान)का मांस-वल्लूर (सूकामांस) मत्स्य- इन चाप आदिको कलविकंसकाकोलंकुररंरज्जुदालकम् । वर्जद, चकारसे नाली सण कुसुंभ आदि- जालपादान्खंजरीटानज्ञातांश्चमृगद्विजान् | भी वर्जित है क्योंकि ये वैचनहे कि नाली पद-कलविकं २ सकाकोलं २ कुररं २ | संण छत्राक कुसुंभ अलाम्बू विष्ठामें उत्पन्न रज्जुदालकं २ जालपादान २ खंजरीटान २ | कुंभी (तज ) कंदुक वेगन-कोविदार- अज्ञातान् २ च - मृगद्विजान् २॥ इनको वर्जदे-तैसेही अकालमें पैदा हुये योजना- सकाकोलं-कलविकं-कुररं र- फल और पुष्प-और विकार करनेवालोंको ज्जुदालक-जालपादान्-खंजरीटान्-चपुनः प्रयत्नसे वर्जदे-तैसेही वट, पिलखन, पीपल, अज्ञातान् मृगद्विजान् वर्जयेत् ॥ कदंब, कैत, मातुलिंग-इनके फलोंको व- तात्पर्यार्थ- कलविंक (ग्रामका चिडा) नंदे-इन पूर्वोक्त संधिनी आदिके दूध आ- यद्यपि ग्रामवासी होनसे निषेध सिद्धथा त-दिको जानकर भक्षण करतो तीन-रात्र उप- थापि पुनः वचन सब चटकोंके निषेधार्थ है | वास करे-ओर अज्ञानसे भक्षण करे तो अहो- काकोल (द्रोणकाक) कुरर ( उत्क्रोश) पत्र उपवास करें- क्योंकि शेषोंमें अहोरात्र रज्जुदालक (वृक्षकुट्टक) जालपाद ( जि- व्रत करै यह मनुका वचनहे-और जो शंखने नके पैर जालके समानहों) हंसोंके विना यह कहा है कि वक, बलाका, हंस, प्लव जालभी परहोतेहैं इससै पुनर्वचनहै-खंजरीट चक्रवाक-कारंडव-गृहचटक ( चिडा ) (खंजन ) और जिन मृगपक्षीयोंकी जाति कपोत, कबूतर, पाण्डु, शुक, सारिका, का ज्ञान न होवे-इन सबको वर्जदे ॥ , नालिकाशणवाककुसुभालायुविभवान् । कुं- भावार्थ-ग्रामका चिडा-द्रोणकाक, कु- भीकंदुकवृन्कातकोविदारांश्च वर्जयेत् । तथा काल. र वृक्षकुट्टक जालपाद खंजन और अज्ञात | प्ररूढानि पुष्पाणि च फलानि च । विकारवध मृग और पक्षी इनको वर्जदे ।। १७४ ॥ यरिकचित् प्रयत्रेन विवर्जयेत् । वरक्षाश्चत्यकपित्य मीपमातुलिंगफलानि वर्जयेत् । चापांश्चरक्तपादश्चिसौनवल्लूरमेवच । २ शेषेपपवसेदहः। मत्स्यांश्चकामतोजग्ध्यासोपवासस्यहवसेत् ३ कपलाकाद्दसप्लवचक्रवाफकारण्डवगृहचटकक पद-चापान २ चा रक्तपादान् २चा- पोतपारावतपांगुकसारिकासारसटिहिमोलकरंकरक्त पादचापमासगयसकोकिलशाइलिफुरदारीतमक्षणे- १ नपचेदनमात्मने । द्वादशरात्रमनाहारः पिरेन्द्रोमप्रयावक ।
आचाराध्याय भक्ष्याभक्ष्यप्रकरण ७ (७९) -मत्स्येषु ७ सारस, टिभि, उटूक, कंक, रक्तपाद, प्रायश्चित करें कि अज्ञानसे इन को चाक, भास, वायस, कोकिल, शालि, | खाकर सांतपन कृच्छ वा यतिचांद्रायण करे कुक्कुट, हार्यत-इनके भक्षणमें द्वादश रात्र --चा इसके कहे प्रायश्चित्तको करें कि तक भोजनको छोडकर गोमूत्र और जो- | लसुन पलांडु-मेजन-विड्वगह-प्रामकु- को पीवे-यह शंखका प्रायश्चित्त बहुत कुट-कुंभीक इनके भक्षणमें द्वादश पत्रतक कालके अभ्याप्तमें वा जानकर सबके दुग्धपान करे- भक्षणमें जानना ॥ भावार्थ-पलांडु-सलगेम-विट्वगह-7- भावार्थ-चाक रक्तपाद कसाईका और ) त्राक-ग्रामकुक्कट-लहसन और गाजर सूका मांस और मत्स्य इनको ज्ञानसे इनको खाकर चांद्रायण करै ।। १७६ ॥ खाकर तीन दिन उपवास करै ।। १७५ भक्ष्या:पंचनखासेधागोधाकच्छपशल्लकाः पलांडुबिडुराहंचछत्राकंग्रामकुकुटम् । शशश्चमत्स्येप्वपिहिसिंहतुंडकरोहिताः ।। उशुनगंज चैवजग्ध्याचांद्रायणंचरेत् १७६ पद-भक्ष्याः१पंचनखाः १ सेधागोधा- पद-पलाई२ विड्वराहंश्च-छत्राकं २ | कछपशल्लकाः १ शशः१ चा- ग्रामकुक्कुटर लशुनं २ गूजनं २ च:- एव:- | अपिऽ-हि:-सिंहतुण्डकगेहिताः १ ॥ जग्ध्वाऽ- चांद्रायणं २ चरेत् क्रि-॥ तयापाठीनराजीवसशल्काश्चद्विजातिभिः । योजना-पलांडु-चपुनः विड्वराई-छत्रा- अतःशृणुध्यमांसस्यविधिभक्षणवर्जने १७८ कं ग्रामकुक्कुटं लशुनं चपुनः गुंजन जग्ध्वा चांद्रायणं चरेत् ॥ पद-तथा-पाठीनराजीवसशल्काः रची- तात्पर्यार्थ पलांडु ( लसुनके समान | द्विजातिभिः ३ अतः- शृणुध्वं क्रि- मां- स्थूल कंद आदि ) विड्वरह (ग्रामसूकर)| सस्य ६ विधि २ भक्षणवर्जने ७॥ छनाक (सर्पछन ) ग्रामकुक्कुट (मुर्गा) योजना-सेधागोधाकच्छपशल्लकाः चपुनः लसुन (लहसन ) गूंजन (गाजर) इन शशः एते पंचनखाः मत्स्येषु अपि सिंहतु- छको एकबार ज्ञानसे खाकर चांद्रायण , ण्डकरोहिताः तथा पाठीनराजीव सशल्काः कर-यद्यपि ग्रामकुक्कुट और छत्राकका | द्विजातिभिः भक्ष्याः भवेति-अतः अनंतरं पहिले निषेध कर आये हैं फिर यहां कहना | हेमुनयःमांसस्यभक्षणवर्जने विधिं यूयंशृणुध्वं ।। पलांड आदिके समान प्रायश्चित्तके लिये तात्पर्यार्थ सेधा (सेह भाविध ) गोधा है-जानकर चिरकालतक भक्षण किये होय ( गोह) कच्छप-शल्लक-( शल्लकी ) और तो यह मनुका कद्दा प्रायश्चित्त है-कि शश ये पांच नखवाले पांचों और कुत्ता छनाक विड्वग्रह लसुन ग्रामकुक्कुट पलांडे मार्जार वानर आदि और चकारसे गेंडा ये गूजन इनको ज्ञानसे खाकर द्विज पतित पांच नखवालोंमें भक्षण करने योग्य है- होता है-अज्ञानसे इनके भक्षणका अभ्यास सोई गौतमने कहा है कि शशा शल्लक सेह किया होतो इसे वचनमें कहाहुभा १ छत्राक विदाह न लशुन प्रामरुकुट । पार्छ , लशुनपलांडगृजनपिटतानाम फाटभीक- एंजना मन्या भगवा परिजः । भक्षरे द्वारा पयः चित् । २ अमत्येतानि पदमरवा कुसान्तपेन चौत । २पंचनसाः गावाविहोपासाकच्यापाः ।
(८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । , गोह खड्ग-कच्छप ये पंचनखोंमें छः भक्ष्य मुनिओ इसके अनंतर तुम मांसभक्षण और हैं-मनुनेभी कहा है कि सेह शल्लक गोह निषेधकी विधिको सुनो ॥ १७७ ॥ १७८ ॥ गेंडा कछवा शशा पंचनखोम ये और प्राणात्ययेतथाश्राद्धेमोक्षितंद्विजकाम्य- टको छोडकर एक दांतवाले भक्षणके या। देवान्पितॄन्समभ्यर्च्यखादन्मांसन- योग्य हैं-जो वशिष्ठन इस वचनसे खड्गको अभक्ष्य कहा है कि खड्गके भक्ष्य माननेमें | दोपभाक् ॥ १७ ॥ विवाद करते हैं वह श्राद्धसे अन्यत्र पद-प्राणात्यय तथाऽ-श्राद्ध-प्रोक्षितं२. समझना क्योंकि श्राद्ध में खड्गके मांसका | द्विजकाम्यया३ देवान् २ पितृन २ सम- यह फल लिखा है कि पितृकर्ममें खड्गका | भ्यर्च्य -खादन् १ मांसं २ नदोपभाक् ॥ मांस देनेसे अक्षय होता है-तैसेही मत्स्योंके योजना-प्राणात्यये तथा श्राद्धे प्रोक्षितं मध्यमें सिंहतुंड-( सिंहमुख ) रोहित- द्विजकाम्यया देवान् पितृन् समभ्यर्य मांस (रक्तवर्ण) पाठीन ( चंद्रक ) राजीव खादन् दोपभाक् न भवति । ( पद्मवर्ण ) सशल्क-जिसके शरीरपर तात्पयार्थ-अन्नका अभाव हो वा व्याधि सीपक समान आकारहों-ये सब नियुक्तही हो और मांसके भक्षणक विना प्राणोंको -अर्थात् श्राद्धआदिके लिये बनायेही भक्ष्य | वाधा होय तो मांसका भक्षण नियमसे करे- हैं आत्मार्थ नहीं क्योंकि मर्नेका यह वचन | क्योंकि यह आत्माके रक्षाकी विधि है कि- है कि पाटीन रोहित सिंहतुण्ड राजीव सबसे देहकी रक्षाकरें- और इसेवचनसे सशल्क ये सब हव्यकव्यमें नियुक्त हैं-ये | मरणका निषेध है कि स्वर्गकी इच्छासेभी सब द्विजातियोंको भक्षण करने योग्य हैं- अवस्थासे पहिले न मरे- तैसेही श्राद्धमें इस वचनमें द्विजातिका ग्रहण शूद्रको | निमंत्रित ब्राह्मण नियमसे मांसका भक्षण भक्षणका दोष न हैं इस लिये है-अब द्विजा- करै क्योंकि भक्षण न करने में मनुने यह तियोंके धौंको कहकर चार वर्णोके धर्मको दोष कहा है कि जो श्राद्ध में नियुक्त ब्राह्मण कहते हैं-कि इसके अनंतर प्रोक्षित मांसके मांस नही खाता वह मरकर इक्कीस जन्मतक भक्षणमें और उससे भिन्न निषिद्ध मांसके पशु होता है- और जिस पशुका अग्नि- वर्जनमें हे मुनिओ-तुम विधिको सुनो ॥ सोम- आदि यज्ञके लिये वेदोक्त प्रोक्षण भावार्थ-संह, गोह, कछवा, शल्लक, और | संस्कार हुआ है होमसे बचे उस पशुके कच्छ ये पंचनख, और मत्स्योंमें सिंहतुण्ड- बिना यज्ञकी सिद्धि नहीं होसकती- और प्रोक्षित मांसका भक्षणकरें क्योंकि भक्षणके रोहित, तथा पाटीन, राजीव, सशल्क, ये द्विजातिओंको भक्षण करने योग्य हैं-हे | जो बनायाहो उसके भोजन और पूजाके ब्राह्मणभोजनार्थ वा देव पितरोंके अर्थ १ श्वाविधं शतकं गोघां सहमंशशास्तथा । शेष मांसभक्षणसे दोषभागी नही होता- भल्या पंचनखेवाहरनुष्याचस्तोदतः । इसीप्रकार भृत्योंके भरण पोषणके शेपमेंभी. २खतु विवदते। १ सर्वत एवात्मनो गोपायेत् । ३ खगमासमवेदत्तमक्षम्य पिटकर्मणि । २ तस्मादिह न पुरायुषः स्वकामी प्रेयात् । ४ पार्टनरोहितावाची नियुक्ती हव्यकव्ययोः। ३ यथाविधि नियुक्तस्तु यो मांस नाति मानवः । रानीवाः सिंहलुंहाच सल्शकाचैव सर्वशः। सप्रेदर पंशुतां याति संभवानेकावेंशति ।
आचाराध्याय भक्ष्यामत्यप्रकरण ७ (८१) . दोष नही- क्योंकि यह मनुका वचने है सर्वान्कामानवोनौतिहयमधफलंतया । गृहे कि ब्राह्मण यज्ञके लिये और भृत्योंके पिनिवसन्दिप्रोमुनिर्मासविवर्जनात् १८१॥ जीवनके लिये प्रशस्त मृग और पक्षीयोंको पद- सर्वान् कार्मान २ अवामोति कि- हते क्योंकि अगस्त्यने तेसही आचरण हयमेधफलंर तथा-गृहे अपि-निवसन किया है-पूर्वोक्त मांसके भक्षणमें दोपभागी विप्रः १ मुनिः १ मांसविवर्जनात् ५ ॥ नहीं होता यह कहनेसे अतिथिके पूजनसे योजना- विप्रः मांसविवर्जनात् सर्वान् शेषमांसकोभी आज्ञामान है कुछ प्रोक्षितके- कामान् तथा यमेधफलं अवाप्नोति- गृहेपि समान नियम नही- न खायतो कुछ दोप- निवप्तन् सन् मुनिः भवति । नही- इसीप्रकार जिनका निषेध नहीं तात्पयार्थ-जो मनुम्य प्रोक्षित मांसको वे शश आदिभी प्राणवाधाकेविना अभक्ष्य छोडकर में मांसभक्षण नहीं करूंगा यह हैं- इप्सर्स शद्रकोभी मांसको संपूर्ण विधि- सत्यसंकल्प करता है वह जिस कार्यको निषधका अधिकार है यह सिद्ध भया ।। सिद्धिमें प्रवृत्त होगा वह शुद्धांन्तःकरण भावार्थ- प्राणोंको बाधा और श्राद्धमें होनेसें उसको अवश्य प्राप्त होगा- सोई और प्रोक्षित और ब्राह्मणको इच्छासे और मेनने लिखा है कि जो मनुष्य किसीकी देवता और पितरोंको पूजकर मांसभक्षण हिंसा नहीं करता वह जो ध्यान करता है करनेवाला दोपभागी नही होता ॥१७॥ जिसको करता है जिसमें प्राति करता है वसेत्सनरकेयोरेदिनानिपशुरोमभिः । समि- उसके फलको निर्विन प्राप्त होता है- यह तानिदुराचारीयोहत्पविधिनापशून् ॥१८० कि वह अश्वमेधक फलको प्राप्त होता है- फल प्रासंगिकद मुख्य फल को कहते है पद- वसेत् क्रि-सः १ नरके ७ पार यह फलभी एकवाके संकल्पका है क्योंकि दिनानि २ पशुरोमभिः३ संमितानि २ मनुका वचन है कि जो सोवपतक अश्व- दुगचारः १ यः १ हन्ति कि - अविधिना ३ मेधयज्ञ करें और जो मांस न खाय उस दोनोंका पुण्यफल समान है-तसंही घरभी योजना- यः दुराचारः अविधिना पशून् हंति सः पशुरोमभिः संमितानि दिनानि घार बसताहुआ बाह्मण आदि वर्ण मांसके नरके वसेत् ॥ त्यागस मानने योग्य मुनि होता है- यहभी ननिषिद्धमांसके विषय में इन प्रीक्षितमांसक विषयमें है किंतु परिशंपस अतिथिपूजनसे शेषमांसके विषयमें समझना ।। भावार्थ- ब्राह्मग मांसद त्यागसे, सय कामनाओको अभमेध यज्ञक फलको है यहां आटप्रकारके पातक मनूनं कहे हुये प्राप्त झता है और घरमें वसता भाभी लेन-अनुमतिका दाता–कहनेवाला-माग्ने- मुनि होता है ॥ ११ ॥ याला-लेन और पंचनेवाले- पकानेवाला- पायन पादते गत पाति पत्र पति- और लानेवाला-और भक्षणका कत्ता १८०॥ वायोत्सर यो हिनस्तिनरियन । सा मामी मृगपक्षिण । २ वरना उशांममाः मनन भनाना मनसो बगरसगा। गनपदेशसा भास रपत्र । २ अनुमना सिमा मिांग पतास. इति भक्ष्याभक्ष्यप्रकरणम् ॥७॥ सकता योगदतां प सारवयी पातमाः । पशून् २॥ . -- .. .
(८४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . सुवर्ण आदिको पात्र स्मार्त और लौकिक इससे सुकाने और प्रोक्षणसे शुद्ध होजाते हैं कर्मके शोच करनेसेही अंग होसक्तेहैं-और यह कहकर फिर देवलनें कहाहै कि यदि- यज्ञके अंगपात्रोंका यह मार्जन शुद्ध करने- | वेही वस्त्र अपवित्रतासे युक्तहों तो अपनी के अनंतर संस्कारके लियेहै ॥ शुद्धि करनेवाले पदार्थ-और अन्नकी खल भावार्थ-काठ सोंग-अस्थियोंको पात्रकी | और फलके रस और खार इनसें धोवै- छीलनेसे और फलके पात्रोंकी गोवालोंसे और क्षोमके समानही शणके वस्त्रोंकी शुद्धि मार्जन करनेसे- और यज्ञके पात्रोंकी हाथसे | होतीहै हे-ऊन आदिका ग्रहण उनके और मार्जन करनेसे यज्ञकर्ममें शुद्धि होतीहै१८५।। रुईके वस्त्रोंके लियेहै-यादि उसमें अपवित्र सौखैरुदकगोमूत्रैःशुद्धयत्याविककौशिकम् | वस्तु न लगी हो और अल्प अशुद्धि होयतो सश्रीफलेरंशुपट्टसरिटैकुतपंतया १८६॥ जलसे पूर्वोक्त प्रकारसे धोवै क्योकि देवल- ने यह कहाहै कि-रुई-पहरनेका वस्त्र पद-सोखैः३ उदकगोमूत्रः३ शुद्धयति और पुष्प-रक्तवस्त्र-इनको धूपमें कुछ क्रि-आविककोशिकं१ सश्रीफलः ३ अंशु- सुकाकर हाथोंसे मार्जन करें और फिर ज- पट्ट१ सारिष्टैः३ कुतपं१ तथा:- ॥ लसे छिडककर यज्ञ कर्ममेले-और वे अ- योजना- आविककौशिकं सोखैः उद- | त्यंत मलीन होय तो यथावत् शुद्धिकरै-कुंकु- कगोमूत्रः अंशुपट्टे सश्रीफलैः तथा कुतपं म और कुसुमसे रंगे वस्त्रको पुप्परक्त कह सारिष्टः शुद्धयति ।। तेहै-पुप्परक्तके ग्रहणसे हरिद्रा आदिसे रंगां तात्पयार्थ-ऊंन और कोशसें पैदाहुए कंवल | वह वस्त्र लेना जो धोनेको न सहसके- और टसरी पट्ट आदि-उखरकी मट्टीसहित | क्योंकि शंखने कहाहै कि रंगेहुए द्रव्य प्रोक्ष- गोमूत्र और जलसें शुद्ध होतेहैं-उदकगो- | णसे शुद्ध होते हैं । मूत्रः यह बहुवचन इस लिये है कि मट्टी भावार्थ-भेडकी उनका-और तसारपट्ट लगाकर पछि जल और गोमूत्रसे धोवे और आदिकौशिक वस्त्र-उखरकी मट्टी सहित वकलके तंतुओंस बना अंशुपट्ट वेलके जल और गोमूत्रसे वकालके वस्त्र वेल और फल सहित जलोसे और पर्वतकी पकरीके | जल गोमूत्रसे पर्वतको छागका कंवल रीठे रोमांसे बना कुतपनामका कंवल रीठेके फ- | सहित जल गोमूत्रसे शुद्ध होतेहैं ॥ १८६ ॥ लोसहित जल और गोमूत्रसें शुद्ध होताहे- सगौरसर्पपैःसोमंपुनःपाकान्महीमयम् । यहभी उच्छिष्ट और स्नेह आदिके लगनेपर जानना-और अल्प अशुद्धि होयतो-प्रोक्षण- कारुहस्तःशुचिःपा :पण्यंभक्ष्ययोपिन्मुसंतया॥ ही करना क्योंकि धानको ये पूर्वोक्त वस्त्र पद-सगारसंपपः३ क्षामं२ पुनः:- पाका- नही सहसक्त क्योंकि सर्वत्र वही शुद्धि इष्ट . सान्येवामध्ययुक्तानि क्षालयेच्छोधनःस्वकः । है जिसमें द्रव्यका नाश नहा-सोई देवलन धारककैस्तु फलनः रसेः क्षारानुगरपि । कहा कि रन कौशय पुतप प क्षाम २ तूटियानुपधान च पुष्परतापरं तथा। शोषधि- दुफूल इन वन्न अल्पशुद्धिवाले होत है वानपे किंचिरको समायेन्मुहुः । पधारा वारणा मोर पिनिगुजीत फर्मगि । सान्पतिमलिट्रानि १ मांगावलपरासीमानाः । अन्नसो-यपासासोपत्र । मा भागमोक्षणादिभिः । ३ रागनागिनीक्षितानि सुपीनि ।
आचाराध्याय द्रव्यशुद्धिप्रकरण ८ (८५) त् ५महीमयमूर कारुहस्तः१ शुचिः१ पण्यं द्ध मार्गके गमनसे अशुद्ध नहीं होता और २ भक्ष्य? योषिन्मुखं तथा:- संभोग( रति के समय स्त्रीका मुख शुद्धहै- योजना- क्षामं सगौरसर्पपैः उदकगोमूत्रैः ( सोई इस स्मृतिमें कहा कि रतिके संगममें महीमयं पुनः पाकात् शुद्धचति-कारुहस्तः स्त्री शुद्धहै ॥ शुचिः भवति तथा पण्यं भेक्ष्यं योपिन्मुखं भावार्थ-क्षीमका वस्त्र, गौरसरसी और शुद्धं भवति ॥ जल गोमूत्रसे और मट्टीका पात्र फिर पका- तात्पर्यार्थ-क्षौम-(अतितीके सूतका ) नेसे शुद्ध होताहे-कारीगरका हाथ बेचने वस्त्र गौरसर्षपसहित जल और गोमूत्रसे ! योग्य द्रव्य भिक्षाका अन्न और रतिक सम- शुद्ध होताहे-और मिट्टीके घटआदि दुवारा य स्त्रीका मुख शुद्ध होते हैं ॥ १८७ ॥ पकानेसे शुद्ध होतेहै-यहभी तब जानना भशुद्धिमार्जनाहाहाकालागोक्रमणात्तथा । जब उच्छिष्ट स्नेह आदि लगेहो क्योंकि यह सेकादुल्लेखमालेपागृहमार्जनलेपनात्१८८ स्मृतिहै कि मदिरा भून मल कफ राध आं- शु रुधिर इनसे स्पर्श किया मट्टीका पात्र फिर पद- भूशुद्धि १ मार्जनात् ५ दाहात् ५ शुद्ध नही होता यदि चांडाल आदि छूले लेखनात्य ले नात्य गृहर मार्जनलेपनात् ।। कालावधु गोक्रमणात्५तथाऽ-सेकात५ उ- तो त्यागने योग्य होताहै-सोई पराशरने कहाहै कि चाण्डाल आदिका छुआ अन्न योजना- मार्जनात्-दाहाल- कालात् ओर वस्त्र जल छिडकनेसे शुद्ध होताई- तथा गोक्रमणात् सेकात उल्लेखनात लेपनात और मट्टीका पात्र त्यागने योग्यहे रजक भूशुद्धिर्भवति गृहं मार्जनलेपनात् शुद्धयति॥ और धोबी, सूपकार आदि कारुओंका हाथ तात्पर्यार्थ- मार्जन-अर्थात्-मार्जनी (बु- सदैव शुद्धहै और शुद्धभी सूतक आदि हो- हारी)से धूल और तृण आदिके दूर करने नेपर वस्त्रके धोवन आदिकोंमें उनके करने से ओर तृण और काष्ठ आदिसे दाह योग्यकर्ममेही समझना सोईअन्य स्मृतिमें | करनेसे, और जितने कालमें अशुद्ध लप भी लिखाहे कि कारु, शिल्पी, दासी, दास. | आदिका नाशहो उतने कालसे, और गोके राजा, राजाके भृत्य-इनकी शुद्धि उसी स-क्रमण-( फिरना )से और दूध गोमूत्र जल मय होतीह- पण्य (वेचने योग्य जो ब्रीहि गोमयसे वा वर्षासे, उल्लेखन ( खुरचना वा- आदि) लेनेवाले अनेक मनुष्योके | खोदना से और गोमय आदिके लीपनेसे हायसे छूने और व्यापारियोके सूतक आदि- इन संपूर्ण वा एकदोंसें अपवित्र और म- से अशुद्ध नहीं होता और ब्रह्मचारी आदि- लिन भूमि शुद्ध होतीहै-सोई देवलंने कहा के हाथमें आया भिक्षाका अन्न आचमन कि जहां नारीके प्रसवहो मरे-वा दाह कि- करनेसे पहिले स्त्री आदिके देनेसे वा अशु-याजाय, जहां चांडाल बसें हों वा विष्ठाआ- १ मद्यमत्रपुरीपैश्च श्लेष्मपूयाश्रुशोणित । मस्पृष्ट दिका संसर्ग हो, उस भूमिको अमेध्य कह- नैवशुध्येत पुनः पाकेन मृन्मयं । वियश्च तिसंसर्गे। २ चाण्डालौद्यस्तु सस्पृष्ट धान्य वस्त्रमथापि वा । २ यत्र प्रसूयते नारीप्रियते दद्यतेऽपिवारचाण्डाला- मक्षालनेन भक्ष्येत परित्यागान्महीमय । ध्युपित पत्र यत्र विटादिसगतिः। एवं कश्मलभरि- ३ फारवः शिल्पिनो वैयाः दासीदासास्तथैव च । शाभूरमध्या प्रकीर्तिता । श्वमकरखरोष्ट्रासंस्पृष्टा - राजानो राजाभृत्याच सद्यःशीचाः प्रकीर्तिताः। ष्टता नजेच भिगारतुपकेशस्थिमस्माधर्मलिना मवेद।
(८६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । तेहैं-और कुत्ता सूकर गधा ऊंठ आदिका कोटदूषिते ७ सलिलं १ भस्म १ मृत् १ जहां स्पर्शहों बह भूमि दुष्ट होतीहै अंगार वा अपि:-प्रक्षेप्तव्यं १ विशुद्धये ॥ तुष केश अस्थि भस्म आदिका जहां स्पर्श योजना-गोमाते तथा केशमक्षिकाकीट- हो वह भूमि मलिन होतीहै इस प्रकार अमेध्य दूषिते अन्ने सलिलं भस्म वा मृत् विशुद्धये. दुष्ट मलिन तीन प्रकारकी शुद्धि योग्य भूमिको प्रक्षेप्तव्यं ।। कहकर यह शुद्धिका विभाग देवलेने दिखायाहै कि पांच वा चार प्रकारसे अमेध्यभूमि, तीन ता०भा०-- गोके सूधैं और केशमक्षिका वा दो प्रकारसे दुष्टभूमि, और एक प्रकारसे कीट ( पिपीलिकाआदि ) से दूषित अन्नमें मलिन भूमि, शुद्ध होती है अर्थात् जहां जलं भस्म वा मिट्टीको शुद्धिके लिये यथा' है कि केशकी- मनुष्य भूखे जाय चाण्डाल वसंहों उनदो | संभव फैंके जो गौतमने भूमियोंका दाहकाल, गोमाका गमन, सेक, टसे युक्त अन्न भोजन करने योग्य नही वह और छीलना, इन पांच प्रकारसे और जहां वहां समझना जहां अन्न केशकीटोंके संग मनुष्य पेदाहों, वा मरें, और जहां अत्यंत मल पकायाहो ॥ १८९॥ मूत्रका संगहो, बभूमि दाइको छोडकर असीसकताम्राणांक्षाराम्लोदकवारिभिः । पूर्वोक्त चार प्रकारसे और कुत्ता सूकर खर ये | भस्मादिकांस्यलोहानांशुद्धिः प्लावोद्रव- जहां बहुत दिनतक वसेहों वह गौओंके गमन छिडकना और टोलना इन तीन प्रकारसे, स्यतु ॥ १९० ॥ और जहां उंठ ग्रामके मुर्गाआदि चिरकाल पद-पुसीसकताम्राणां ६ क्षाराम्ला- तक वसही वह छिडकनाऔर छीलना इनदो दकवारिभिः ३ भस्माद्भिः ३ कांस्यलोहानां प्रकारसे, अंगार और तुप आदि जहां बहुत ६ शुद्धिः १ लावः१ द्रवस्य ६ तु:-॥ दिनतकरहे हो वह छीना इस एक योजना-पुसीसकताम्राणां क्षाराम्लो- प्रकारसे, शुद्ध होताहै मार्जन और लीपनातो | दकवारिभिः कांस्यलोहानां भस्माद्भिः तुपु- सब शुद्धियों में समझना इसी प्रकार मार्जन नः द्रव्यस्य प्लावः शुद्धिर्भवति । और लीपनेसे गृह शुद्ध होताहै गृहका पृथक् | तात्पर्याय-लाख शोशातामा इनकी शुद्धि पटना इसलिये है कि उसका मार्जन लेपन खारे वा अम्लजलसे वा केवल जलसे-उप- प्रतिदिन शुद्धिके अर्थ करना ॥ घात (अशुद्धि )की अपेक्षा सव वा एकर भावार्य-मार्जन-दाह-काल-गौओंकाग- से शुद्धि होती है-कांसी-और लोहकी शुद्धि मन-छिडकना-धीलना-लीपना इनसे भूमि- | भस्म और जलसे होती है- यहां ताम्रके. की, और मान-लेपन इनसे गृहको शुद्धि | ग्रहणसे रांग और पित्तलभी लेने क्योंकि ये होती है ॥ १८८॥ सब एकसेही उत्पन्नहै- यह ताम्न आदिकों- गोमातेनेतथाकेशमक्षिकाकीटदूपिते । | की शुद्धिका अम्लोदक आदिसे कहना सलिलंभस्ममृद्रापिमोतव्यं विशुद्धये १८९- नियमके लिये नहीं है क्योंकि इस वचनसे. पद-गोमाते भन्ने तयार केशमक्षिका १ निगमभोग्य पै.सरदारपमं । ११ वा भतुल गारमेयापि गुध्यति । दृष्ट २ मटीगर्न तयनापदन्यो यद्यो- टानिया शिपायो मलिना। धनं प्रो. सामान्य नदिपन ।
आचाराध्याय द्रव्यशुद्धिप्रकरण ८ (८७) यह शुद्धि अभिषेकसे कहींहै कि जिस द्रव्य- (छानना ) कहीहै अन्यथा कीट आदि नही के मलका संयोग जिप्स द्रव्यप्ते दूरहोय वही निकस सकते-शूद्रके पात्रमें स्थित मधु उसकी शुद्धि सामान्य रीतिसे सब द्रव्य- | और उदक आदिकी शुद्धि दूसरे पात्र में शुद्धियोंमें कही है- इससे यदि तामा आदिका लानेसे होती है क्योंकि बौधायनको वचन है उच्छिष्ट अलका लेप अन्यसे ननासकेतो कि मधु जल-दूध-और उनके विकार एक नियमसे अम्लोदकसेही शुद्धि करनी इसीसे पानसे दूसरे पात्रमें लानेसे शुद्ध होते हैं- मैनुने यह सामान्यसे कहा कि तामा लोहा ) यदि मधु और घृतादि नीचवर्णके हायसे कांसी रांग लाख शीशा इनका शौच यथा- मिले होय तो दूसरे पान में रखकर फिर त- योग्य खारे वा खट्टे वा केवल जलसे करना । पावे यही शंखने कहाहै- कि भोजन करने और जो यह वचनहे कि भस्मसें कांशी और योग्य घृतके पदार्थीको फिर पकावे इसी अग्ल तामा शुद्ध होताहै वह अत्यंत प्रकार स्नेह और रसोंको समझना ।। शुद्धिके लियेहै कुछ अन्य शुद्धिके निषेधा- थं नहीहै और जब उपघात अधिक होय भावार्थ-लाख-शांशा-तांबा-खोरखट्टेल तव अम्लोदक आदिकोसे वारंवार शुद्धिकरै वा शुद्ध जलोसे कांशी- लोहा-भस्म-और क्योंकि यह स्मृति है कि गौके सूर्य कांसीके | जलोंसे घृत आदि द्रव द्रव्य-प्लाव(चाहाना) पात्र और शूदके उच्छिष्ट और कुत्ता और से शुद्ध होते हैं । १९० ॥ काक छु पात्रदशवार खार लगानेसे शुद्ध अमेध्याक्तस्यमृत्तोयैःशुद्धिगंधादिकर्षणात् होते हैं और द्रवद्रव्य (धृत आदि ) प्रस्थ वाक्शस्तमंबुनिर्णिक्तमज्ञातंचसदाशुचिः ॥ परिमापसे अधिक हो और उसे काक आदि ठूलै वा अपवित्र वस्तुका स्पर्श होजाय प्लावं पद-अमेध्याक्तस्य ६ मृत्तायैः ३ शुद्धिः१ (वहाना) शुद्धि है अर्थात् सजातीय द्रव्यसे | गंधादिकर्षणातू ५वाक्शस्तं १ अंबुनिणिक्तं १ पात्रको भरे जब उसमेसे वहने लगैतब शुद्ध । अज्ञातं १ चा-सदाऽ-शुचिः १ ॥ हो जाताहै उससे अल्प होयतो त्याग कहा है योजना-अमेध्याक्तस्य मृत्तीयः गंधादिक- बहुत और अल्पतो देश वा कालकी अपेक्षा | पंणात् शुद्धिः भवति वाक्शस्तं-अंबुनिर्गिक्तं जानने सोई बोधार्यनने कद्दाहै कि देशकाल चपुनः अज्ञातं सदा शुचिर्भवति- अपना आत्मा-द्रव्य द्रव्यका प्रयोजन-उप- पत्ति और अवस्था इनको जानकर शौचक- तात्पर्यार्थ- सुवर्ण और चांदीके सब रे-कीट आदि छलें तो छानले क्योंकि मनुने पात्रोंकी शुद्धिकों कहकर अब अमेध्यप्त कहा कि संपूर्ण द्रवदन्यांकी शुद्धि उत्पान ) उच्छिष्ट लिये उनकीही शुद्धिको कहते हैं अमेध्य (शरीरसे पैदाहुये वसा शुक्र आदि- १ ताम्रायः कास्यरेत्याना अपुणः सीसकस्य च । मल) उनसे लिप्त पदार्थकी शुद्धि मिट्टी शौच यथाई कर्तव्य क्षाराम्लोदकवामिः। और जलसे करनी वे मल मनु और २ भस्मना शुध्यते कास्यं नाम्रमम्लेन शुध्यति । ३ गवाघ्रातानि कास्यानि शूद्रोच्छिष्टानि यानि च। शुध्यति दशभिः क्षारः थकासहतानि च । १ मधूदके पयत्तविकारा पात्रात्पातिरानयने ४ देशकाल तथाल्मान द्रव्यं द्रव्यप्रयोजनम् । उप- पत्तिमास्यां च ज्ञात्वा शौच प्रकल्पयेत् । २ अभ्यवहागि धृतेनाभिधारिताना पुनः पवन ५ वाणां चैव सर्वेषां शुद्धिरुपयन स्मृतम् । एवं जेहानां सहबद्रशानाम् ।
(८८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । देवले आदिन ये कहे हैं कि वसा शुक्र रुधिर कहा है कि दूसरेके अस्थि-वसा-विष्ठा- मज्जा मूत्र विष्ठा कर्णविष्ठा नख-थूक-अश्रू-ढोढ रज-मूत्र-वीर्य-मज्जा-रुधिरको स्पर्श करके पसीना-यें चारह मनुष्योंके मलहै और मनु- स्नान कर-और अपनोंका पर्श करके धाने प्यका अस्थि-शव-विष्ठा-वीर्य-मूत्र-स्त्रीका | और आचमनसे शुद्ध होता है-और-नाभिसे रज-चसा-पसीना-अश्रू दीड-कफ-मद्य-ये | ऊपर हाथोंकों छोडकर जिस अंगमें उपघात अमेध्य कहाते हैं और शुद्धि गंधके कर्षण होय तो स्नानसे और नीचेके अंगमें उपघात (दूरकरना)से होती है और आदिपदसे लेप- होय तो प्रक्षालन और आचमनसे शुद्ध भालेना सोई गौतमने कहा कि अमेध्यलिप्त- | होता है-शास्त्रोक्त शौच करनेपरभी जहां की शुद्धि गंधके दूरकरनेसे होती है-सव शु- | मनके असंतोपसे शुद्धिका संदेह होय वह द्वियोंमें पहिलेतो मिट्टी और जलसे लेप और वाक्शस्त कहनेसे अर्थात् यह शुद्ध है इस गंधको दूर करना और उनसे नहोसकेतो अ- ब्राह्मण वचनसे शुद्ध होता है-और जहां न्यसे करना साई गीतमकी स्मृति है कि मट्टी कोई शुद्धि नही कही वहां अंबुनिर्णिक्त और जलसे प्रथम शुद्धि होती है वसा | (जलमें धोना) होनेसे शुद्धि होती है और आदिका ग्रहण सबको अमेध्य बतानेके जो द्रव्य जलमें धोना न सहे उसकी छिडक- लिये है कुछ समान उपघातके लिये नहीं | नेसे शुद्धि होती है जो पदार्थ अज्ञात हो क्योंकि उपपातमें विशेष यह कहा है कि अर्थात् काक आदिका छुवा प्रतीत नहो तत्कालके मूत्रं पुरीप श्लेष्म पूय-शोणित- वह शुद्ध है उसके खानेमें अदृष्ट दोष नही अश्व-इनसे स्पर्श किया हुआ मिट्टीका | और उसमें कुछ विरोध नहीं क्योंकि पात्र पुनः पाकसे शुद्ध नही होता- अपवि- जिसका दोप न देखाहो उसका यहे अभी ये देहसे पृथक होनेसे होते है क्योंकि । प्रायश्चित्त कहा है कि अज्ञात भोजनकी यह वचन है कि देहसे पृथक हुए मल | शुद्धि और विशेषकर ज्ञातकी शुद्धिके लिये अमेध्य होते हैं-हाथोंको छोडकर पुरुषकी | ब्राह्मण एक कृच्छ्र करे यह ठोक नहीं नाभिके ऊपरके अंगोंमें यदि अमेध्यका | क्योंकि प्रायश्चित भोजनके विषयमें है और स्पर्श हो जाय तो नान कर-सोई देवलने । दोषका अभाव अन्यके उपयोगमें है ।। भावार्थ-अमेध्यसे युक्त पदार्थकी शुद्धि वसागुमगद्मनाभूयविटकविण्नस्याः।लेष्मा- | मट्टी और जलसे गंध आदिके दूर करनेसे पिकास्येदो दार्शते नृणां मला:मानुप्यास्यि शर होती है वाणीसे श्रेष्ठ कहा, और जलसे धुला, विधा तो मानो बसा। दोश्रपिका श्लेष्ममय : और अज्ञात, सदैव शुद्ध होता है ।।१९१ ।। पामेश्यमुच्यते। २ौषममध्यटिसस सेवगधापकांगः । शुचिगोप्तिकृत्तोयंप्रकृतिस्थमहीगतम् । तक मृत्य। तयामांसंश्वचांडालकच्यादादिनिपातितम् माधि शमगा शोषित: मट मेगदपर पुनः पान मृन्मय । पद-शुचि १ गोप्तिकृत् १ तायं १ ५ अमेट मे देहा महायुताः । प्रकृतिस्यं १ महीगत १ तथाr-मांसं १ ६मानुमरियासमा मनरेगी। मशान भचारालकव्यादादिनिपातितम् १॥ कोनि रटा पार पातमानीया सावरमानिस. मागरमरि परमिजोरामात- परक्षा पम्यता मतदप तय रितः। -- (९०) याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षरामकाशसहित । ताभा-बकरी और अश्वका मुख त्यागके संग विकल्प है और निगरन्नेव पवित्र है और गो और देहके वसा आदि यह एवपद इसे विष्णुके वचनमें कहे आच- मल पवित्र नहीं हैं-और चांडाल आदिके मनके निषेधार्थ है कि पानके चर्वणको स्पर्श कियेभी मार्ग रात्रि में चंद्रमाकी किरण छोडकर चर्वणमें नित्य आचमन करे और और पवनसे-और दिनमें सूर्यको किरण ओष्ठोंको उलटे करके और वस्त्रोंको पहन- और पवनसे शुद्ध हो जाते हैं ॥ १९४ ॥ करभी आचमनकर- तांबूलका ग्रहण फल मुखजाविमुपामेध्यास्तथाचमनबिदवः । आदिके उपलक्षणार्थ है सोई शातातर्पने श्मश्रुचास्यगतंदंतसत्यक्त्वाततःशुचिः॥ कहा कि तांबूल- फल इनका और नेहसे शेषको भोजनमें और दांतोंमें लग्नके स्पर्शमें पद-मुखजाः १ विपुषः १ मेध्याः १ द्विज उच्छिष्ट नहीं होता। तथा- आचमनरिंदवः१ श्मश्वर च-आ- स्यगतं १ दंतसक्तं १ त्यक्त्वाऽ- ततः:- भावार्थ-मुखकी बूंद-और आचमनकी- शुचिः १॥ बंद और मुखमेंगई श्मश्रुशुद्ध हैं और दांतोमें योजना-मुखजाः विप्रषः तथा आचमन- लगेको त्यागकर मनुष्य शुद्ध होता है।।१९५॥ बिंदवः मेध्याः भवंति चपुनः आस्यगतं सालापीत्वाक्षुतेसुप्तभुक्त्वारथ्योपसर्पणे श्मनु मेध्यं भवति-दन्तसक्तं त्यक्त्वा ततः | आचांतःपुनराचामेद्वासोविपरिधायच ॥ शुचिः भवति ॥ पद- स्नात्वाऽ--पीत्वाऽ-क्षुते ७ सुप्ते ७ तात्पर्यार्थ-मुखमें पैदा हुये कफकी बूंद | भुक्त्वाऽ- रथ्योपसर्पणे ७ आचान्तः पुनःs- पवित्र हैं अर्थात् उच्छिष्ट नहीं करती यदि वे आचामेत् क्रि-वासः२ विपरिधाय:- च-॥ अंगमें न पड़ें क्योंकि गौतमका वचने योजना- स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्त्वा है मुखकी बंद अंगमें न पड़ें तो उच्छिष्ट ! रथ्योपसर्पणे चपुनःवासः विपरिधाय आचांतः "नहीं करती तोभी जो आचमनके जलकी पुनः आचामेत् ॥ बंद हैं वे चरणोंका स्पर्श.करलें तो पवित्र तात्पर्यार्थ- स्नान- जलपान क्षुत (छक) हैं और मुखपर लगीहुयी इमनु मुखमें सोना-भोजन-गलीमें गमन-वस्त्रोंका धारण प्रविष्ट होजायतो उच्छिष्ट नहीकरती- इनको करके आचमनके अनंतरभी आच- दांतोंमें लगे उस अन्नको जो स्वयं गिर- मनकर अर्थात् दोवार आचमनकरे और. जाय-त्यागकर शुद्ध होजाता है और जो चकारसे रोना पढनेका प्रारंभ और अल्प- अन्न न गिरे वह दांतोंके समान है सोई | झूट- इनमेंभी कर सोई वसिष्ठंने कहा है- गौतमने कहा है कि दंतामें लगा अन्ननिहाके सोना- भोजन- छीकना-स्नान- पान- स्पर्शसे गिरनेसे पहिले शुद्ध है जब गिर- | रोना- इनमें आचमनकरके आचमनकरे जायतो जलक स्रावके समान समझे उसके 1 चर्वणे ताचमेन्नित्यम्मुरत्वा ताम्बूलचर्वणम् । निगलनेसे शुद्ध होता है- और निगं | ओठ विलोमको स्पृष्ट्वावोसाविपरिधायच । लनेकाभी इसीश्लोकमें याज्ञवल्क्यने कहे २ ताम्बले च फले चैव भुक्तनेहावशिष्टके। दंतल- समुखविभूषउच्छिर कुर्वति नवेदंगेनिपतति । प्रस्य संस्मश नोछिटो मवति द्विजः। समें 'तुदंतवदन्यत्र जिल्हामिमशंनात्याक्- ३ मुत्वा भुस्ता शुत्वा साला पात्रा सदिता पारांतः पुनराचामेत् ।
आचाराध्याय द्रव्यशुद्धिप्रकरण ८ (९१) मनभी कहा है कि सोना- टीकना- रध्याकर्दमतीयानिस्पृष्टान्यत्यश्ववायसः । भोजन-धूकना-झूठ वचन कहना जलपीना- | मारुतेनैवशुद्धचतिपकाकांचतानिच११७ पढना इनमें सावधानभी मनुष्य आचमन- करे- भोजनमें तो आदिमेभी दो आचमन- अंत्यश्चवायसः३ मारुतेन ३ एव:- शुद्धंयति' पद- रथ्याकर्दमतीयानि १ स्पृष्टानि १ करें क्योंकि आपस्तंकी स्मृति है कि कि- पोष्टकचितानि १ च ॥ भोजनकरनेवाला सावधानीसे प्रथम दो योजना- अंत्यश्ववायसेः स्पृष्टानि रय्या- आचमनकर-नान और जलपानमें पहिले कर्दमतोयानि पुनः पोष्टकचितानि गृहाणि एकवार- पढनेके प्रारंभमें दोवार- और मारुतेनैव शुद्धयति ॥ शेषों में अंतमंदी दीवार आचमनकरे ।। भावार्थ-नान-जलपान-क- सोना- ता. भा--(सवमार्ग)क कदम (पंक) भोजन- गलीमें गमन इनको करक और तोय (जल)को चांडाल, कुत्ता, काक, पर्श करलेंतो पवनस- और पोइंटोस चिनेस- वस्त्रोंको पहिनकर आचमनके अनंतरभी पेदघर (महल)भी चाहाल आदिके स्पर्श- फिर आचमनकर ॥ १९६ ॥ करनेसे पपनसेही शुद्ध होते है यहभी संहतों 1 गुस्वा भुता घ भुका पटविलोक्तानृतं (इक? )का प्रोक्षणकर, इस पूर्वोक्त मोक्षणक वचः पालारोऽष्यमाणय भाचाभेरपयतोपि सन् । निषेधार्थ है तृणफाष्ट आदिक परतो प्रोक्षण, २ भोक्ष्यमाणरतुमयतापिदिापामेष । सही शुद्ध होते है। १९७ ॥ ॥ इति द्रव्यशुद्धिप्रकरणम् ॥
(९२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथ दानप्रकरणम् ९ चा-उभेश्तत् हि-पात्रं १ प्रकीर्तितं १॥ योजना- केवलया विद्यया वा केवलेन तपस्तत्त्वासृजद्ब्रह्माबाह्मणान्वेदगुप्तये । तपप्ता अपि पात्रता नभवति यत्र वृत्तं च- वृत्यीपतृदेवानांधर्मसंरक्षणायव १९८॥ पुनः इमे उभे (विद्यातपसी) स्तः हि निश्च- पद- तपः२ तत्वाऽ- असृजत् कि- येन तत् पात्रं प्रकीर्तितं ।। ब्रह्मा १ ब्राह्मणान् २ वेदगुप्तये ४ तृप्त्यर्थ: तात्पर्यार्थ -अब जाति विद्यानुष्ठान तप पितृदेवानां ६ धर्मसंरक्षणाय ४ च- ॥ इनमें एकर को प्रशंसासे पात्रताको कहकर योजना- ब्रह्मा तपः तत्त्वा वेदगुप्तये | सबसे पूर्ण पात्रताको कहते है केवल विद्या पितृदेवानां तृप्त्यर्थ चपुनः धर्मसंरक्षणाय (वेदाध्ययन) और केवल तप (शम दम ब्राह्मणान् असृजत् ॥ आदि) और आदि पदसे केवल कर्मका ता भा०- कल्पको आदिमें ब्रह्मान | अनुष्ठान और केवलजातिसें पूर्णपात्रता नही सपकरके वेदकी रक्षा और पितर और | होती किंतु जिसपुरुषमें वृत्त (कर्मका अनु- देवताओंकी तृप्ति और धर्म की रक्षाके लिये | ठान) और दोनों विद्या और तप और चश- सबसे पहिले ब्राह्मणोंको रचा इससे ब्राह्मणों-ब्दसे ब्राह्मणजाति हो वही मन्वादिकोंने य- को दियेका अक्षयफल होता है ॥ १९८ ॥ थार्थ पात्र कहा है-हि (निश्चय ) है कि उ- ससे परे पात्र नही है-औरजाति विद्या अनु- सर्वस्पप्रभवोविप्राः श्रुताध्ययनशीलिनः । प्ठान तपसे ये उत्तरोत्तर श्रेष्ठहै उसीके अनु- तेभ्यःक्रियापराः श्रेष्ठास्तेभ्योप्यध्यात्मवि- सार दानका फलभी होता है- त्तमाः ॥ १९८ ॥ भावार्य-केवल विद्या और तपसे पात्र नही पद- सर्वस्य ६ प्रभवः १ विप्राः १ श्रुता- होता जिसमें कर्मका अनुष्ठान और विद्या ध्ययनशीलिनाश्तेभ्यःक्रियापराः १श्रेष्ठाः१ तप ये दोनों हों वही पात्र मनुआदिकोंने तेभ्यः २ अपि:- अध्यात्मवित्तमाः १ ॥ कदा है ॥२०॥ योजना- श्रुताध्ययनशीलिनः विप्राः-स- वस्य प्रभवः संति तेभ्यः क्रियापराः श्रेष्ठाः गोभूतिलहिरण्यादिपात्रेदातव्यमाचतम् । तेभ्यः अध्यात्मवित्तमाः श्रेष्ठाः भवंति ॥ नापात्रेविदुषाकिंचिदात्मनःश्रेयइच्छता ।। ता० भाब्राह्मण, सय क्षत्रिय आदिव पद-गोभूतिलहिरण्यादि १ पाने ७ दा- णास जाति और कर्मसे श्रेष्ठ है-ब्राह्मणों- | तन्यं १ आर्चतं १ नर-अपात्र ७ विदुषा ३ मेंभी वेदपाठी- और वेदपाठीयोम वेदोतक-! किंचिता- आत्मनः ६ श्रेयः २ इच्छता३ ॥ मैक कत्ता, और उनमेंभी शमदुम आदियो योगना-आत्मनः श्रेयः इच्छता विदुपा गसें आत्मतत्त्वके ज्ञाता- श्रेष्ठ है ॥ १९१॥ पुरुपेण गोभूतिलहिरण्यादि पात्रे अचित दा- नविद्ययायलयातपसावापिपात्रता। तव्य भपनि किंचित् नदातव्यम् ।। पत्तमिमेपोभेतद्धिपाप्रकीर्तितम् ।। तात्पर्याय-पूर्वोक्त पानको और पानवि- पद-ना-विद्यया ३ वलया ३ तपसा३शरके फलविशेषको जानता हुआ और अ- वा:- अपि- पामतापम:-पृत्तं १ मे १ ! पने संपूर्ण फलका अभिलापी पुरुष, गौ - आचाराध्याय दानप्रकरण ९ (१३) थिवी तिल सुवर्ण आदिको शास्त्रोक्त संक- | दातव्यंप्रत्यहंपात्रेनिमित्तेतुविशेषतः । ल्पआदि विधिपूर्वक पूजासे दे और अपात्र याचितेनापिदातव्यं श्रद्धापूर्ततुशक्तितः ॥ क्षत्री आदि और पतित ब्राह्मणको अल्पभी नदे यहां कल्याणका अभिलाषी कहनेसे यह पद-दातव्यं१ प्रत्यहं - पान निमित्त सूचित कियाकि अपात्रके दानमेंभी तमो-/ तु-विशेषतः - याचितेन३ अपि-दातव्यं गुणी फलहै सोई व्यासने कहा है कि देश- श्रद्धापूतं १ तु- शक्तितः ।। कालके अभावमें वाअपात्रको और असत्कार योजना-पाने प्रत्यहं तु पुनः निमित्त वि- तिरस्कारपूर्वक जो दियाजाता है वह दान | शेषतः दातव्यं-याचितेनापि तुपुनः श्रद्धापूर्त तमोगुणी कहा है और अपात्रको नदेय वह शक्तितः दातव्यं ॥ कहनसे यहभी सूचितकिया कि देशकाल और ता. भा०-पात्रको शक्तिके अनुसार दव्य उत्तमही और पूर्वोक्त पात्र समीप नहो तो शास्त्रोक्त विधिसे कुटुंबकी अनुकूलतासे उसपात्रके निमित्त द्रव्यका त्याग वा प्रतिज्ञा प्रतिदिन दे और चंद्रग्रहण आदि निमित्तोम करके समर्पण करदे अपात्रको कदाचिनदे तो विशेषकरदे और याचनासेंभी श्रद्धासे और प्रतिज्ञा कियेहुए व्यकोभी पीछेसे पवित्र द्रव्यको शक्तिसेदे-याचितेन-इसपदसे पातक आदि लगनेपर नदे- क्योंकि यह यह सूचित है कि यथार्थ पात्रके समीप जा- निषध है कि प्रतिज्ञाकरकभी अधर्मीको नदे॥ कर वा बुलाकर जो दान वह महाफल होता भवार्थ-गौ पृथिवी तिल सुवर्ण ये चार | है- सोई स्मृतिमे कहा है कि जाकर सत्पात्रकोसत्कारसे दे और अपने कल्याण- जोदान दियाजाता है उसका अनंत फल है का अभिलाषी मनुष्य अपात्रको कदाचित् } पात्रको बुलाकर जो दियाजाता है वह सह- न दे ॥ २०१॥ स्रगुणा और मांगनेपर पाचसो ५०० गुणा विद्यातपोभ्यांहीनेननतुग्राह्य प्रतिग्रहः । । होता है । २०३ ।। गृह्णन्प्रदातारमधोनयत्यात्मानमेवच २०२ हेमशंगीसुरैरीप्यैःसुशीलापनसंयुता । पद-विद्यातपोभ्यां ३ हीनन ३ ना-तु:- सकांस्यपानादातव्यासीरिणीगौसदक्षिणा ग्राह्यः १ प्रतिग्रहः १ गृहन् १ प्रदातारं २ पद-हेमशृंगीर खुरः३ रोप्यैः३ सुशीला १ अधः-नयति क्रि-आत्मान२एवा-चा-॥ वस्त्रसंयुता१सकांस्यपात्रा दातव्यारक्षारिणीर योजना-विद्यातपोभ्यांहीनेन प्रतिग्रहःम-गोरसदक्षिणार ।। तु ग्राह्यः गृहन् सन् आत्मानं चपुनः योजना-हेमशृंगी गप्यः खरः। युक्ता, प्रदातारं अधः नयति।। ता० भा०- विद्या और तपस हीन | सुशीला, वनसंयुता, सकांस्यपाना, क्षारिणी, सदक्षिणा गोः दातव्या॥ मनुष्य सुवर्ण आदिका प्रतिग्रह नले-क्योंकि विद्या तपसे हीन मनुष्य नसे दाताको और ता. भाः-गोदानमें विशेष कहते हैं कि सुवर्णके जिसके सींगहों रूपे (चांदी) १ भदेशलाले यहारमानेभ्यध दीयते । असहत. मासात तत्तामसमुदाहतं । १ गदाधीयते दानं तदनताल स्मृत । सहरागु- २ प्रतिश्रुयापमंसयुक्तार न दद्यात् । पमायाचितनुताई।
(९४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कांशीके पात्र और दक्षिणासहित ऐसी पृथिवी १ ज्ञेया १ यावत् - गर्भ २ ना- दूधदेती गोको दे॥ २०४ ॥ मुंचति क्रि-॥ दातास्याःस्वर्गमानोतिवत्सरानोमसं .योजना-यावत् वत्सस्य द्वौ पादौ चपुनः मितान् । कपिलाचेत्तारयतिभ्यश्चास- | मुखं योन्या दृश्यते यावत् गर्भ नमुंचति समंकुलम् ।। २०५॥ तावत् गौः पृथिवी ज्ञेया॥ ता०भा०- उभयतोमुखीका लक्षण और पद-दातार अस्याः ६ स्वर्ग २ आप्नोति | उसके दानका फल कहतेहैं- कि जब कि- वत्सगन् २ रोमसंमितान् २ कपिला गर्भसे निकलते हुए वत्सके दो पाद और रेत् - तारयति क्रि.- भूयःऽ-च- आसप्तम-मुख योनिमें दीखतेहों तबतक गो उभय- कुलं २॥ तोमुखी होतीहै और इतने वह गर्भको योजना-अस्याः दाता गेमसंमितान् वत्स नहीं छोडती तबतक पृथिवीके समान जान- गन् स्वर्ग आमोति कपिला चेत् आसप्तमं | नी-इससे उसके दानका अधिक फलइ२०७॥ कुलं भूयः (अपि) तारयति॥ यथाकथंचिहत्त्वागांधे याधेनुमेयवा । ता. भा०-इस गोकी गेमोंके तुल्य वर्षों- तक गोका दाता स्वर्गमें जाता है यदि वह अरोगामपरिक्लिष्टांदातास्वर्गेमहीयते २०० कपिला होयतो पिताआदि ६ सातमी अपनी पद- यथाकथंचित-दत्वाऽ-गांर धेनुर आत्मा इन ७ कुलोंको तारती है-इसश्लो- वा अधेनुं२ एवऽ-वा-अरोगांर अपरिकि- कमें भूयः पद अपिके अर्थमें है ।। २०५॥ | टांर दाता१ स्वर्ग महीयते क्रि-॥ सवत्सारीमतुल्यानियुगान्युभयतोमुखीम् । योजना-धेनुं वाअधेनुं अरोगांअपरिक्लिष्टां दातास्याःस्वर्गमाप्नोतिपूर्वणविधिनाददत् । गां यथाकथंचित् दत्वा दाता स्वर्ग महीयते। पद-सवत्सागेमतुल्यानि २ युगानि .२ ता० भाग- धेनुं (दूधदेती) वा अधेनु उभयतोमुखीर दातारअस्याः६ स्वर्गर भानो और रोगरहित और अत्यंत दुर्वलतासे होन तिक्रि-पूर्वेण ३ विधिना ३ ददत् १ ॥ गोको यथाकथंचित् देकर-अर्थात् सुवर्ण- योजना-उभयतोमुखी पूर्वण विधिना | आदि शृंगके अभावमेंभी पूर्वोक्त विधिसे ददत् सवत्सारोयतुल्यानि युगानि अस्याः गोका दाता स्वर्गमें पूजताई ॥ २० ॥ दाता स्वर्ग आमोति ॥ श्रांतसंवाह रोगिपरिचर्यामुरार्चनम् । तामा-दभवतोमुखी गौको पूर्वोक्तवि- पादशौचंद्विजोच्छिष्टमार्जनंगोप्रदानवत् ।। पिसे देता हुआ इस गोका दाता वत्स और गोक रामोंके तुल्य युगांतक स्वगंमें प्राप्त पद-आंतसंवादनं गेगिपरिचर्या सुग- होता है।॥ २०६॥ चंर पादशोचं १ द्विमोच्छिष्टमार्जनं गांप्र- दानवता॥ यापद्वत्सस्यपादादौमुरांयोन्पांचट्यते । योजना-आंतसंयाइन-गगिपरिचया-सु- तावनी:पृथिवीशयायायगर्भन मुंचति २०७गर्चनं-द्विजानां पादशीचंद्विनौच्छिटमार्जन- पद-पायदा वत्सस्प६ पादौरद्वार मुखर गोमदानवत् संयं । पान्यां ७ चा-श्पते क्रि-तापत-गौः १ ता. भा०- प्रांत (थका) का शय्या आचाराध्याय दानप्रकरण ९ (९५). आसन आदि दानसे श्रमका अपनयन (दू- कि सात हाथके दंडसें तीस दंडमॉप-ऐसे रकरना) और यथाशक्ति औषधी आदि दश गोचर्म होतेहैं-उसको देकर स्वर्गमें दानसे रोगियोंकी परिचया-विष्णु आदि दे- पूजताहै ॥ बका गंधमाल्यसे पूजन, द्विजोंके चरणोंका भावार्थ- भूमि दीपक अन्न वन्न जल धोना-और उनकेही उच्छिष्टका मार्जन तिल घी धर्मशाला विवाहके अर्थ कन्या ये सब पूर्वोक्त गोदानके तुल्य जानने॥२०९॥ | सुवर्ण धो बैल इनको देकर स्वर्गमें भूदीपांश्चान्नवस्त्रांभस्तिलसपिःप्रतिश्रयान्। पूजताहे ॥ २१० ॥ मेवेशिकस्वर्णधुर्यदत्वास्थगेंमहीयते २१०॥ गृहधान्याभयोपानच्छत्रमाल्यानुलेपनम् । पद- भूद्वीपान २ ऽच-अन्नवस्त्रांभस्ति- लसर्पिःप्रतिश्रयान्२ नवशिकर स्वर्णधुर्यर यानंवृक्षप्रियंशय्यांदत्वात्यंतसुखीभवेत् ।। दत्वाऽ- स्वर्ग७ महीयते कि-॥ पद- गृहधान्याभयोपानच्छत्रमाल्यानुले- योजना- भूद्वीपान् चपुनः अन्नवस्त्रांभः । पनं२ यानंर वृक्षर प्रियंर शय्यार दत्वा:- स्तिलसपि प्रतिश्रयान नैवेशिकं स्वर्णधुर्य | अत्यन्त:- सुखी भवेत् क्रि-|| दत्वा दाता स्वर्गे महीयते ॥ तात्पर्याय-फल देनेवाली भूमि-देवमंदिर नुलेपनं-यानं वृक्षं प्रियं शय्यां दत्वा नरः योजना- गृहधान्याभयोपानच्छत्रमाल्या- आदिमें दीपक-अन्न वस्त्र जल तिल धी पर- अत्यन्तं सुखी भवेत् ॥ देशियोंका आश्रय (धर्मशाला ) और गृह- स्थके लिये कन्या-सुवर्ण और धोरी घेल तात्पर्याय- गृह-धान्य (शाली शाठी- इनको देकर दाता स्वर्ग लोकमें पूजताई- चावल ) गोधूम आदि अन्न-अभय (भय- यहां भूमिदान आदिका स्वर्गफल अन्य भौतको रक्षा)उपानहछन-माल्लका (चमेली) फलोंकी निवृत्ति के लिये समझना क्योंकि आदिक पुष्पोको माला कुकुम चंदन आदि- इन वचेनासे अन्यभी फल कहा कि जान- | अनुलेपन रथआदि यान (सवारी आम्रआदि) कर वा अज्ञानसे जो पाप करताहै-गोचर्म- उपकारी वृक्ष धर्म आदिप्रिय और शय्या मात्र पृथिवीके दानसे उसपापसे छुटताहे- इनको देकर मनुष्य अत्यंत सुखी होताहै- जलका दाता तृप्तिको अन्नका दाता अक्षय यहां कोई यह शंका कर कि धर्म आदिको सुखको-तिलका दाता इष्ट प्रजाको-दोप- | सुवर्ण आदिकः समान हाथमें नही कका दाता उत्तम नेत्रोंको और वस्त्रका देसकते इससे इनका दान असंभव है तो दाता चंद्रलोकको और अश्वका दाता अ- ठीक नहीं, क्योंकि भूमिदान आदिको भी श्विनी कुमारके लोकको प्राप्त होताहै । ऐसाहीहै-और अन्य स्मृति भी धर्मदान गोचर्मका लक्षण हम्पतिने यह कहाहै सुनाई कि-देवता गुरु माता पिता इनको । यत्किचित्कुरुते पाप मानतोऽमानतोऽपिकाभ- प्रयत्नसे पुण्यको दे और अपुण्यका दान गिोचर्ममात्रेग मामिदानेन शुद्धपतिः। पारिदस्तृतिमानोति । कहीं नही लिखा-लोभ आदिस लेनेवाले गुखमश्यय्यमन्त्रदः । निलप्रद प्रजामिष्टा दीनदयपुर- | और दाताको पापके देनमें पापदी बढताहे समायामोरबन्दसालोक्यमश्चिमाटोमयमश्वरः। २ सरहसन निविदरनिवानि दश तान्येव गो. १ देवता मुरुमां च मातापितास्तथैव च । पुन्यं गर्म दत्तारवर्गेमहीपते। देयं पावन नातुर्य चोदितं वचित्र (९६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । क्योंकि यह स्मृति है कि जो दुति पापको दानहै क्योंकि अपने स्वत्वकी निवृत्ति करने निर्वल जानकर लेताहे उसको निंदित आ- को अशक्यह ॥ चरणसे उसके समान पाप लगताह-और भावार्थ- सव धमाको बोधक वेदकादान दाताओंको दूना, सहस्रगुणा, अनंत पाए सब दानास अधिकहै इससे उसका दाता होताह-यहां सब जगह देश काल पात्र-देने- | संदेवकेलिये ब्रह्म लोकको प्राप्त होताह २१२ योग्य वस्तु और दाता इनके विशेषसे दान- प्रतिग्रहसमर्थोपिनादत्तेयःप्रतिग्रहम् । में फल मनें कहा, हिंसामेभी इसी प्रकार पाप समझना-इससे प्रतिगृहीताको वृत्तिके येलोकादानशीलानांसतानाप्नौतिपुष्कलान् विशपसे दाता और प्रतिगृहीताको न्यून, पद-प्रतिग्रहसमर्थः १ अपि-न-आदत्ते अधिक फल जानना ॥ क्रि-यः १ प्रतिग्रहम् २ ये? लोकाः१ दान- भावार्थ-गृह धान्य अभय उपानह छत्र शीलानां ६ सः १ तान् २ आमाति क्रि- माला अनुलेपन सवारी वृक्ष प्रिय (धर्म- | पुष्कलान् २ ॥ आदि) और शय्या इनको देकर दाता योजना-यः प्रतिग्रहसमर्थः अपि सन् अत्यंत सुखी होताहे ॥ २११ ॥ प्रतिग्रहं न आदत्ते स दानशीलानां ये लोकाः सर्वधर्ममयंब्रह्मप्रदानेभ्योधिकंयतः । तान् पुष्कलान् आमोति ॥ तद्ददत्समवानोतिब्रह्मलोकमषिच्युतम् ॥ ताः भाः दानके विनाभी दान फलकी पद- सर्वधर्ममय ब्रह्मर प्रदानभ्यः ५ प्राप्तिको कहते है कि जो मनुष्य प्रतिग्रहमें अधिकं १ यतः:-तत् २ ददत् र समवाप्नो- | समर्थ ( पात्र ) होकरभी प्रतिग्रह नहीं लेता तिकि-नालोकर अविच्यतं२ ।। अयांत सुवर्ण आदिका स्वीकार नहीं कर- पोजना- यतः सर्वधर्ममयं ब्रह्म प्रदाने- ता- वह दानियोंके जो स्वर्गआदि लोकहैं भ्यः भधिकं आम्त तत् ददत् सन् अवि- उन सबको प्राप्त होताहे ॥ २१३ ॥ च्यतं ब्रह्मलोकं समवाप्नोति ॥ कुशाःशापयौमत्स्यागंधाःपुप्पंदधिक्षितिः तात्पर्याय-दानका फल कद्द आये अव मांसंशय्यासनंधानाःमत्याख्येयंनवारिच ।। दानके विनाभी दानके फल की प्राप्ति में कार- णको कहते है कि जिससे ये वेदधमाका पद-गुशाः १ शाकं १ पयः१ मत्स्याः १ भवयोधक ( तापक) होनेसे सर्व धर्ममय | गंधाः १ पुपं १ दधि १ क्षितिः १ मांसं १ (धमंझप) है इसम इसका दान सय दा- शय्या ? आसनं १ धानाः १ प्रत्याख्येयं र नसि श्रेष्ट इतसे अध्यापनद्वारा इस ना वारि १ चा-॥ यंदको देताहुआ मनुन्य मिसंस कभी नहीं योजना-गुमाः शाकं पयः मत्स्याःगंधाः गिर पो मनोमयो प्राप्त होताई अर्थात पुनं दधि क्षितिः मांसं शय्या आसनं धानाः प्रलय पर्पत ग्रामदोरम टिकताई इस प्राय नपुनः वारिन प्रत्याश्ययम् ॥ दानमें अन्य स्वत्वको पंदा करना मात्र तात्पर्य-गुसा शाक दूध मत्स्य गंध Anारिताप पुन दही भूमि मांस शय्या आसन धान PTETTमगिरमान (भनगा) और चकार गृह आदि मयं प्राप्त यसप भारणल इनकी प्रदा
आचाराध्याय दानप्रकरण ९
(९७.)
करनेकी नाही न करें क्योंकि मनुका वचनह अन्यत्र दुप्कृतकर्मणः अपि अयाचिताहतं
कि शय्या पर कुशा गंध जल पुष्प मणि दही ग्राह्यं भवति ॥
मत्स्य धान दूध मांस शाक इनको नाही
ता०भा०-कुलटा ( व्यभिचारिणी) नपुं-
न कर-और तसेही वचनहै कि गंध जल सक पतित शन्नु इनको छोड़कर विना
मूल फल अन्न मधु धी अभय दक्षिणा प्राप्त मांगनेके मिले पूर्वोक्त कुशा आदिको कुक-
हुये इनको सबसे लेले ॥
मीसेभी ग्रहण करलेतो दोष नहीं ॥ २१५॥
भावार्थ-कुशा शाक दूध मत्स्य गंध पुष्प देवातिथ्यचनकृतेगुरुभृत्त्यार्थमेवच ।
दही भूमि मांस शय्या आसन धान और सर्वतःप्रतिगृण्हीयादात्मवृत्त्यर्यमेवच २१६
जल इनको सबसे ग्रहण करले ॥ २१४ ॥
अयाचिताहृतंग्राह्यमपिदुष्कृतकर्मणः
पद-देवातिथ्यर्चनकृते ४ गुत्रभृत्यार्थ २
एवा-च-सर्वतः:-प्रतिगृह्णीयात् क्रि-आत्म-
अन्यत्रकुलटापंढपतितेभ्यस्तथाद्विपः ।।
वृत्त्यर्थ- एव च ॥
पद-अयाचिताहृतं १ ग्राह्य १ अपि: योजना-देवातिथ्यर्चनकृते च पुनः गुरु-
दुष्कृतकर्मणः ६ अन्यत्र कुलटापंढपति- भृत्यार्थ चपुनः आत्मवृत्त्यर्थ सर्वतः प्रति-
तेभ्यः ५ तथा: द्विषः ५॥
गृहीयात् ॥
योजना कुलटापंढपतितेभ्यः तथा द्विषः दाभा-आवश्यक जो देवता और
१ शय्यां गृहान्कुशान्गंधानापः पुष्पं मणीन्दधि । अतिथिका पूजन- उसके और गुरु और
मत्स्यान धानाः पयो मांस शाकं चैव न निर्णदत् । भृत्य और अपने जीवनके लिये पतित
२ गंधोदकं मूलफलमनमभ्युद्यत च यत् । सर्वतः । और अत्यंत निंदितोंको छोडकर सबसे
प्रतिटन्हीयान्मध्वाज्याभयदक्षिणाम् ।
प्रतिग्रहको ले ॥ २१६॥
इति दानधर्मप्रकरणम्॥९॥
(९८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथ श्राद्धप्रकरणम् १० सपिंडीकरण-उनमें नित्य श्राद्ध इस वच- नसे कह आये कि पितर और मनुष्योंको अमावास्याष्टकावृद्धिाकृष्णपक्षोयनद्वयम् । प्रतिदिन अन्नदे-सोई मने कहा कि अन्न द्रव्यं ब्राह्मणसंपत्तिर्विपुवत्सूर्यसंक्रमः २१७ | आदिसे वा जलसे वा दूध और मूलफलोंसे पद-अमावास्या १ अष्टका ? वृद्धिः १ कर अब पार्वण और वृद्धि श्राद्धके कालोंको आद्ध पितरोंकी अक्षय प्रीतिका अभिलाषी कृष्णपक्षः १ अयनद्वयम् १ द्रव्यं १ ब्राह्मण- संपत्तिः १ विषुवत् १ सूर्यसक्रमः ॥ १॥ कहते हैं-जिस दिन चंद्रमा नदीखे उसे अमा- वास्या कहते हैं यदि वह दोनों दिन होयतो व्यतीपातोगजच्छायाग्रहणचंद्रसूर्ययोः । पितरोंको देनेका समय अपराह्न होताहे इस श्राद्धमतिरुचिश्चैवश्राद्धकालाप्रकीर्तिताः। वचनसे अपराह्वव्यापिनी लेनी-और पांच पद-व्यतीपातः१ गजच्छाया १ अहम १ प्रकारसे विभाग किये दिनके चौथे भागको चंद्रसूर्ययोः ६ श्राद्धं २ प्रति:-रुचिः १च- चा मासोंमें कृष्ण पक्षकी चार अष्टमी आश्व- अपराह्न कहते हैं-और हेमंत शिशिरके एव:- श्राद्धकालाः १ प्रकीर्तिताः १॥ लायनने अष्टका कही हैं-और वृद्धि (पुत्र जन्म योजना-अमावास्या अष्टका वृद्धिः कृष्ण- | आदि ) कृष्णपक्ष- दक्षिणायन- उत्तरायण- पक्षःअपनद्वयं द्रव्यं ब्राह्मणसंपत्तिः विषुवत् द्रव्य (कृष्णसार मृगका मांस आदि) सूर्यसंक्रमः व्यतीपातः गजच्छाया चंद्रसू- उत्तम २ ब्राह्मणोंकी संपत्ति (मिलना) ययोः ग्रहणं चपुनः श्राद्धं प्रति रुचिः एते दोनों विषुवत् (मेषतुलकी संक्रांति) युधैः श्राद्धकालाः प्रकीर्तिताः॥ सूर्यको संक्रांति- अर्थात् एकराशीसे तात्पीर्थ-अव श्राद्धप्रकरणका प्रारंभ दूसरी गशीपर सूर्यका गमन- यद्यपि मेप करते हैं-भोजन करने योग्य वा उसके | और तुलसी संक्रांतिसे आजाते तथापि स्थानीय (प्रतिनिधि द्रव्यका प्रेतके निमित्त । उनका पृथक् कहना अधिक फलकेलिये जो त्याग उसे श्राद्ध कहते हैं वह दो प्रकार है- व्यतीपात योग- गजच्छाया इस- काहे पार्वण और एकोद्दिष्ट, तीन पुरुषोंके वचनमें कही है कि जब चंद्रमा मघापरहो निमित जो किया जाय वह पार्वण और एक और सूर्य हस्तपरहो और दशमीतिथिही पुरुषके निमित्त जो किया जाय वह एको- वह गजच्याया कही है- जो कोई हाथोकी- हिट कहाताई फिर श्राद्ध तीन प्रकारकाई छापा कहते हैं वह यहां कालके प्रकरणसे नित्य नमितिक काम्य- जिसके करनेके नहीलेनी- चंद्रमा और सूर्यका ग्रहण- और समयका नियमहो उस प्रति दिनके और जप कर्ताकी श्राद्धकरनेमें रुचिदो बह- अमावस्या अष्टका श्राद्धको नित्य- जिसके समयका नियम नही उस पुन जन्म भादिक भादको नमितिक-को फलकी कामनासे किया जाप रस स्वर्गकी कामनासे करने योग्य पतिका नक्षमा श्राद्धको काम्य फरते है-फिर वह पांचमकारकाई किनित्य प्राद-पांच-दिमाद- एकोदिष्ट-मार - आचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १० (९९) और चशब्दते युगादि आदितिषि- ये ये ब्राह्मण श्राद्धकी संपदा (सिद्ध करने सबश्राद्धके काल बुद्धिमानोंने कहे हैं- वाले ) हैं। यद्यपि चंद्रमा और सूर्यके ग्रहणमें भोजन भावार्थ-सब वेदोंमें मुख्य- वेदपाठी- न करे इसवचनसे ग्रहण में भोजनका निषेध ब्रह्मज्ञानी- युवा- वेदार्थका ज्ञाता-ज्येष्ठ- है तथापि भोजनकरनेवालेको निषेधका दोष सामकापाठी-त्रिमधु और त्रिसुपर्णिक-ये हेदाताको पुण्यवृद्धिद। ब्राह्मण श्राद्धके साधक हैं ।। २१९ ॥ भावार्य- अमावास्या- अष्टका- वृद्धि- स्वतीयऋत्विम्जामाच्याज्यश्वशुरमातुलाः कृष्णपक्ष- उत्तरायण-दक्षिणायण-द्रव्य- ब्राह्मणोंकी संपत्ति- मेषतुलकी और सूर्यको त्रिणाचिकेतदौहित्रशिप्यसंबंधिवांधवाः ॥ संक्रांति-व्यतीपात- गजच्छाया- चंद्रमा पद- स्वस्त्रीयऋत्विग्जामाध्यान्यश्वशुर- और सूर्यका महण और श्राद्धकरनेमें रुचि-ये मातुलाः १ त्रिगाचिकेतौहित्रशियसंबंधि- सब श्राद्धके काल कहे हैं ॥२१॥२१८॥ बांधवाः ॥१॥ अश्या:सर्येपुवेदेपुरोत्रियोमह्मविद्युवा । योजना- स्वस्त्रीयऋत्विग्जामायाज्यक्ष- वेदार्थविज्येष्ठसामात्रिमधुविसुपर्णिकः ॥ शुरमातुलाः त्रिणाचिकेतदौहित्रशियसंबंधि- पांधवाः ब्राह्मणाः श्राद्धसंपदो भवति। पद- अग्र्याः १ सर्वेषु ७ वेदेषु ७ श्री- तात्पर्यार्थ- स्वस्त्रीय (भानजा) ऋविग- प्रियः १ ब्रह्मविद युवा १ वेदार्थवित् १ज्ये-जामाता-याज्य-(यज्ञकरानेयोग्य ) श्वशुर उसामा १ त्रिमधः १ त्रिसुपर्णिकः १॥ मातुल- त्रिणाचिकेत अर्थात् यगुर्वेदक योजना-सर्वेषु वेदेषु अन्याः-श्रोत्रियः । एकदेशको उसके व्रतको करके जो पदै- -ब्रह्मवित्- युवा- वेदार्थवित्- ज्येष्ठसामा- दोहित्र शिव्य संबंधि यांधव ये सब पूर्वोक्त त्रिमधुः-त्रिसुपर्गिकः एते ब्राह्मणाः श्राद्धसं- आन्य और श्रोत्रिय आदिके आभाव में जानने- क्योंकि मनेने इसवचनसे स्वस्रीय तात्पर्याय- संपूर्ण ऋग्वेद आदिवेदाम आदिको गाण कहा ई- कि हन्यकव्यके अनन्यमन होकर एकरस पढने में जो समर्थवे देनमें यह प्रथम कल्पमें कहा और यह अग्न्य- और वेदके पदनेमें समर्थ श्रोत्रिय- स्वस्रीय आदिकोंका अनुकल्प (गोग) और ब्रह्मज्ञानी- युवा जिसको मध्यम अव• सत्पुरुषोंमें यहभी निन्दित नही॥ स्थाहो- युवापद सबका विशेषण है- मंत्र भावार्य- भानजा ऋत्विज मामाता याज्य और ब्राझगरूप वेदके अर्थको जो जाने पर मामा विगाचिकेत दाहिन शिन्य संघ- वह वेदार्थवित्- ज्येष्ठसामवेदके पदनेके धियांधव ब्राह्मण ये सब आद्रको संपदा है। ग्रतको करके जो ज्येष्ठसामकोटै वह ज्येष्ठ- सामा- त्रिमधु (ऋग्वेदकाभाग) उसके फर्मनिष्टास्तपोनिष्ठापंचाग्रिग्रह्मचारिणः । प्रतको करके उसे जो पी- विमुपर्ग पिटमारपराधेपब्राह्मणाःबादसंपदः ॥ (ऋग्वेद और यगुर्वेदकाभाग) उसके पठनमें पद-कर्मनिष्ठाः-तपोनिष्ठाः-पंचाग्निः मतको करके जो उसे पर्दै वह त्रिमुनिक- १९ प्रपमा कन्यादाने लायसोनभनुक- १ पम्मदे नापार। सरस्वकासमा सहिरणतः। पदः संति ॥
(१००) याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षराप्रकाशसहित । - ता०भा०- 4 ब्रह्मचारिणः १ पितृमातृपराः १ चा-एक- पैदा होता है- कुनखी (जिसके नख संकु- ब्राह्मणाः१ श्राद्धसंपदः१ ॥ चितहों) श्यावदंतक ( जिसके दांतस्वभावसे योजना- कर्मनिष्ठाः तपोनिष्ठाः । कालेहों) ये ब्राह्मण श्राद्धमें निंदित हैं । पंचाग्निः ब्रह्मचारिणः चपुनः पितृमातृपराः भावार्थ-महारोगी-हीन वा अधिक जिसका ब्राह्मणाः श्राद्धसंपदः संति ॥ अंगहो-काणा-पुनर्भुकापुत्र-अवकीर्णी-कुंड -शास्त्रोक्त कर्मकरनेमें तत्पर गोलक-कुनखी और श्यावदंत ये ब्राह्मण. तपस्वी- ओर पंचाग्नि अर्थात् सभ्य आव- श्राद्ध में निंदित ॥ २२२ ॥ सथ्य और त्रेता ये पांच अग्नि जिसमेंहो भृतकाध्यापकाक्लीवः कन्यादूप्यभिशस्तकः अथवा पंचाग्नि विद्या पढताही- ब्रह्मचारी मित्रपिशुनासोमविक्रयीपरिविंदकः ।। (उपकुर्वाण वा नैष्ठिक) पितामाताके भक्त पद-भृतकाध्यायकार क्लीवः १ कन्यादू-- और चकारसे ज्ञाननिष्ठ आदि- ये ब्राह्मण पी१ अभिशस्तकः१ मित्रभुकू १ पिशुनः १ श्राद्धकी संपदा हैं अर्थात् श्राद्धमें अक्षय- | सोमविक्रयीर परिविंदकः १ ॥ फलके दाता हैं ॥ २२१ ॥ योजना-भृतकाध्यापक:-कीयः कन्या-- रोगीहीनातिरिक्तांगकाण:पौनर्भवस्तथा। दूषी अभिशस्तकः मित्रधृक् पिशुनः सोम- अवकीणीकुंडगोलौकुनतीश्यावदंतकः ।। विक्रया परिविंदकः एते ब्राह्मणाः श्राद्धे नि- दिताः भवंति ॥ पद- रोगीर हीनातिरिक्तांगः १ काणः १ तात्पयार्थ- वेतनको लेकर जो पढावे पोनर्भवः १ तथाऽ-अवकीर्णीः १ कुंडगोली१ वह मृतकाध्यापक और वेतन देकर जी कुनखी१ श्यावदंतकः१॥ पढे वह भृतकाध्यापित-कीय (नपुंसक) योजना- रोगी- हीनातिरिक्तांगः काणः | असत् वा सत् दोषोंसे जो कन्याको दूषित पोनर्भवः तथा अवकीर्णीः कुंडगोली कुनखी करे वह कन्यादृषी ब्रह्महत्यादिसे जो युक्त श्यावदंतकः एते ब्राह्मणाः श्राद्धे निंदिताः | वह अभिशस्त-मित्रधक्-मित्रद्रोही-पराये भवति॥ दोषोंको कहनेवाला पिशुन (चुगल) सोम- तात्पर्याय- रोगी (महारोगसेयुक्त) विक्रयो यज्ञमें सोम वेचनेवाला-परिविंदक- हीन वा अधिक जिसका अंगहो- एक ( परिवेत्ता ) जो ज्यठेभाईसे पहिले अग्नि नेत्रसे जो देखे वह काणा इसीसे अंध ( होत्रले वा विवाह करे वह परिवेत्ता और बधिर वृद्ध प्रजनन खंज दुश्चर्म आदिभी ज्येठा परिवित्ति होताहै सोई मनेने कहाहे निदित हैं और पोनर्भव अर्थात् पूर्वोक्त कि जो छोटाभाई बडेभाईके रहते उससे पुनर्भूकापुत्र अवकीणि (ब्रह्मचर्यअवस्थामें पहिले अग्निहोत्रका प्रहण और विवाह जिसका ब्रह्मचर्य नष्ट होगयाहो) कुंडगोलक करताहे उस परियेत्ता और ज्येष्ठको परिवि- जिनके लक्षण- इसेवचनमें ये कहे हैं कि | ति जानना-इसीप्रकार दाता और याजकभी पराई स्त्रीमें कुंडगोलक ये दोपुत्र पैदा होते निंदितहैं क्योंकि यह वचनहे की परिवित्ति और है-पतिके जीवते कुंड और मरेपीछे गोलक १ दाराप्निहोत्रसयोगं यः करोत्यग्रजे स्थितापरिवेत्ता स विज्ञेयः परिवित्तिस्तु पूर्वजः । परदारेए जायते द्वौ सुती कुडगोलको । पत्या. २ परिवित्तिः परिवेत्ता या च परिविद्यतेोमवे ते जीवति कैडस्तु मृते भर्तरि गोलकः । नरक यांति दात्यानपंचमाः।
आचाराध्याय याप्रकरण १० 11379 .(१०१) परिवत्ता और जिस कन्या विवाह हुआ हो निषेध इस लियेहै कि पूर्वोक्त योग्य ब्राह्मण वह विवाही कन्या दाता और याजक ये न मिलसके तो निषिद्धसे भिन्न ब्राह्मणोंको पांचों सबके सब नरकमें जाते हैं। श्राद्र में भोजन करादे ॥ भावार्थ- भृतकाध्यापक क्लीब-कन्या-. भावार्थ-पिता माता गुरु इनका त्यागी दूषी अभिशस्त मित्रधक् पिशुन सोमविक्रयी | कुंडके अन्नको भोक्ता वृषलका पुत्र-पुनर्भूका ये ब्राह्मण श्राद्धमें निंदित हैं ॥ २२३ ॥ पति चौर और कर्मसे दुष्ट ये श्राद्धमें नि- मातापितगुरुत्यागीकुंडाशीवृपलात्मजः। न्दित ॥ २२४ ॥ परपूर्वापतिःस्तेनःकर्मदुष्टाश्चनिंदिन्ताः ॥ निमंत्रयेतपूर्वेयुाह्मणानात्मवान्शुचिः । तश्चापिसंयतै व्यंमनीवाकायकर्मभिः ।। पद- मातापितगुरुत्यागी १ कुंडाशी १ वृषलात्मजः१ परपूर्वापतिः१ स्तनः१ कर्म पद-निमंत्रयेत क्रि-पूर्वेद्यःऽ-ब्राह्मणान् २ दुष्टाः१ च- निंदिताः१॥ आत्मवान् शुचिः १ ते ३ च-अपि:- योजना- मातापितगुरुत्यागी कुंडाशी | संयतैः ३ भाव्यं १ मनोवाकायकर्मभिः ३ ॥ वृषलात्मजः परपूर्वापतिः स्तेनः चपुनः कर्म योजना-आत्मवान् शुचिः सन् पूर्वाः दुष्टाः एते श्राद्धे निंदिताः भवंति ॥ ब्राह्मणान् निमंत्रयेत च पुनः तैः अपि मनो- तात्पर्यार्थ-विना कारण जो माता पिता | बाकायकर्मभिः संयतेः भाव्यं ।। गुरुओंको त्यागे, इसी प्रकार भार्या पुत्रों तात्पर्यार्थ अब पार्वणश्राद्धके प्रयोग- को त्यागीभी समझने क्योंकि मनुने इस व. को कहते हैं शोक और उन्मादसे हित चनसे इनको समान दिखायाहे-कि वृद्धमाता अथवा जितेन्द्रियरूप आत्मवान् और शुद्ध पिता और साध्वी भाया और बालक पुत्र होकर, पूर्वोक्त ब्राह्मणको पूर्व दिनमें वा उ- इनकी सौ अकार्य करकेभी पालना करै सीदिन श्राद्ध के लिये निमंत्रण दे-कि श्राद्ध यह मनुने कहाई-कुंडके अन्नको भोजन में भोजनके लिये अबसर रखियो क्योंकि जो करै वह कुण्डाशी-इसी प्रकार गोल- मने इस वचनसे यह कहा कि श्राद्धक- कका अन्नभक्षकभी समझना-क्योंकि यह मैक आनेपर पूर्वदिन वा सीदिन कमसे कम वचन है कि कुंडगोलकके अन्नको जो खाय तीन पूर्वोक्त ब्राह्मणोंको निमंत्रणदे-और वे उस कुंडाशी कंइतेहैं-वृषल ( विधर्मों का निमंत्रित ब्राह्मणभी मन वाणी काया कर्मसे जो पुत्र परपूर्वा (पुनर्भू )का पति-चोर क- नियतरहे । मदुष्ट अर्थात् शास्त्रविरुद्ध कर्मके कर्ता भावार्य-आत्मवान् शुद्धहोकर पहिले और चकारसे कितब देवलक आदिलने दिन ब्राह्मणोंको निमंत्रणदे और वे ये श्राद्धमें निषिद्ध ब्राह्मणहैं-यद्यपि अय्याः ब्राह्मणभी मन वाणो काया कर्मसें नियत सर्वेषु वेदेषु इत्यादि पूर्वोक्त वचनोंसे श्राद्ध- शुद्ध रहे ॥ २२५ ॥ योग्य ब्राह्मणोंके कहनेसेही उनसे भिन्न अपराह्नेसमभ्यय॑स्वागतेनागतांस्तुतान् । अयोग्य सिद्धये फिरभी रोगी आदिकोंका पवित्रपाणिराचांतानासनेपूपवेशयेत् २२६ वृद्धीचमातापितरो साध्वीमायां सुतः शिशुः । अध्यकार्यशत कृत्वा भर्तच्या मतुरबवीत् । 1 पूर्वेारपरेशुर्वा श्रादकर्मयवस्थिते निमंत्ररेत- २ यस्तयोरेग्नमध्नाति स मुहाशीप्रकीर्तितः । यवरान सम्यग् विपान योदितान् । 11140 (१०२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . पद-अपराह्ने ७ समभ्यर्य:- स्वागतेन३ भावार्थ-अपराह्न आयहुए ब्राह्मणका 'आगतान २ तु:- तान् २ पवित्रपाणिः १ स्वागतसे सत्कार पूर्वक पूजन और हाथोंको आचांतान २ आसने ७ उपवेशयेत् कि-॥ पवित्र करके ब्राह्मणोंको आचमन कराकर 'योजना-आगतान तान अपराह्नेस्वागतेन आसनोंपर बिठावै ॥ २२६ ।। समभ्यर्च्य पवित्रपाणिः सन् आचांतान् आ- युग्मान्दैवेयथाशक्तिपित्र्ययुग्मांस्तथैवच । सनेषु उपवेशयेत् ॥ परिस्कृतेशुचौदेशेदक्षिणाप्रवणेतथा २२७॥ तात्पर्यार्थ-उन निमंत्रित ब्राह्मणोंको अ- पराङ्गके समय स्वागत पचनसे पूजकर अयुग्मान् २तथाऽ-एव: च-परिस्तुते ७ पद-युग्मान् रदेवे यथाशक्ति:-मिन्ये और उनके पैर धोकर और आचमन कराकर शुचौ ७ देशे दक्षिणाप्रवणे ७ तथा:- ॥ विछाये हुए आसनोंपर हाथोंको पवित्र क- रके बैठादे-यद्यपि यहां सामान्यसे अपराह्न योजना दैवे युग्मान् तथा पित्र्ये अयुग्मान् कहाहै तथापि कुतुपमें प्रारंभ करकै कुतुप क्षिणाप्रवणे देशे उपवेशयेत् ॥ ब्राह्मणान् यथाशक्ति परिस्तृते शुचौ तथा द. आदि पांच मुहूर्ती श्राद्धको समाप्तिसे क- ल्याण होताहै क्योंकि यह वचनहै कि दिनके तात्पर्यार्थ-देव (आभ्युदयिक) श्राद्धमें पंद्रह मुहूर्त सदेव होतेहै उनमें आठमें मुहू- युग्म (सम) ब्राह्मणोंको यथाशक्ति बैठगवे तको कुतुप कहते हैं-जिससे मध्याह्नसमें यहां वैश्वदेवमें दोदो और माताआदि ती- सूर्य सदैव मंद होताहै इससे मध्याह्नमें नोंमें एक एकके दोदो वा तीनोंके दोदो इस आरंभ अनंत फलका दाताहै -कुतुप मुहूर्तसे प्रकार पिताआदि तीनोंमें एक एकके दोदो पीछेके चार मुहूर्त और एक कुतुप ये पां- वा तीनोंके दोदो इसीप्रकार मातामइआदि- चमुहूर्त स्वधा भवन कहे हैं तिसी प्रकार | मेंभी समझना-अथवा तीनोंमें वैश्वदेवश्राद्ध- अन्यभी श्राद्धके उपयोगी कुतुप इन वच- तन्त्रसे ( एक ) करे- पिथ्य (पार्वण ) नोंमें कहेहैं कि मध्याह्न गैंडेका पान नेपाल श्राद्धमें अयुग्म (विषम) ब्राह्मणों को बैठावै कंबल चांदी कुशा तिल गो और आठवा और इस आद्धको चारों तरफ वस्त्र आदिसें दौहित्र कहाई-पापको कुत्सित कहते हैं जि- ढक और गोमय आदिसे लिप और दक्षिण- ससे ये आठ उसपापके संताप करनेवाले हैं। को नीचे शुद्धदेशमेंकरें ॥. तिससे कुतुप नामसे विख्यातहे ॥ भावार्थ-आभ्युदयिक आद्धमें सम और पार्वण श्राद्धमें विषम ब्राह्मणोंको यथाशक्ति १ अहो मुहूर्ता विख्याताः दशपंच च सर्वदा । बेठावे-और स्त्र आदिसे टके और शुद्ध तत्राष्टमी मुहूतायः स कालः कुतुप स्मृतः॥ मध्यान्हे दक्षिणदिशाको नीचे देशमें आद्धकर-२२७ सर्वदा यस्मात् मंदीभवतिमास्करः । तस्मादनंतफलद- द्रौदेवेमात्रयःपित्र्येउद्गेकैकमेववा । स्तत्रारंभी विशेष्यते ॥ उर्ध्वमुर्तात्तुतुपाद्यन्मुहूर्त- मातामहानामप्येवंतंत्रवादैश्वदेविकम् ॥ चतुष्टयं । मुहूर्तपंचक ह्येतत् स्वधाभवनमिप्यते । २ मध्याहःखङ्गपात्रच तथा नेपालकबल रोप्य पद-दौ १ देवे ७ प्राक् १त्रयः १ दर्मास्तथा गावो दौहिपश्चाटमः स्मृतः। पाकुत्सित , पित्र्ये ७ उदक १ एकैकं १ एका-वा- मित्याहुस्तस संतापकारिणः अयदेतेयतस्तस्माकपा मातामहानां ६ अपि - एवं-तंत्रं वा- इति विश्रुताः। वैश्वदेविकं १॥
आचाराध्याय श्रादप्रकरण १० (१०३) योजना-देवे द्वौ प्रामुखो पिये त्रयः पद-पाणिप्रक्षालनं २ दत्वाऽ-विष्टरार्थ:- उमुखाः उपवेश्याः वा उभयत्र एकैकं | कुशान् अपि:-आवाहयेत् क्रि-अनुज्ञातः। उपवेशयेत् मातामहानामपि श्राद्धे एवं विश्वेदेवासइत्यूचा ३ ॥ कर्त्तव्यं वा वैश्वदेविक तंत्रं कर्त्तव्यम् ॥ योजना-पाणिप्रक्षालनं विष्टरार्थ कुशान् तात्पर्यार्थ-वेश्वदेवमें दो ब्राह्मण पूर्वाभि- अपि दत्त्वा ब्राह्मणेः अनुज्ञातः सन् विश्वेदे- मुख बैठाव और पिताआदिके स्थानमें तीन वासइत्यूचा विश्वेदेवान् आवाहयेत् ।। ब्राह्मण उत्तराभिमुख बैठावे अथवा विश्वेदेवा तात्पयार्थ-उसके अनंतर विश्वादेवाओंके और पितरोंके श्राद्ध में एक एकही ब्राह्मण लिये ब्राह्मणों के हाथमें जल और आसन वैठावे यहां संभवसे विकल्प समझना माता- | केलिये युग्म कुशाओंको देकर और विश्वेदेवा महोंके श्राद्ध में इसीप्रकार निमंत्रणसे लेकर ओंका आवाहनकरताहूं ऐसे ब्राह्मणोंसें ब्राह्मणोंकी संख्या और बैठनाका प्रकार सम- पूछकर आवाहन कर इस ब्राह्मणोंको आज्ञासें झना-अर्थात् पितृश्राद्ध के समान सब कर्मको विश्वेदेवास इस ऋचासे वा आगच्छंतु महा करना अथवा पितृश्राद्ध और मातामह | भागाः इस स्मार्त मंत्रसे विश्वेदेवा ओंका श्राद्धमे विश्वेदेवाओंका श्राद्ध एकतंत्रसें | आवाहन करें-यह विश्वेदेवा ओंका आवाहन करना अर्थात् एकही विश्वेदेवाओंके स्था- | यज्ञोपवीती और सव्यहोकर प्रदक्षिण नमें दो ब्राह्मण बैठावे-और जब दोही ब्राह्मण कमसे करना क्योंकि पितृश्राद्धमें यह मिले तो विश्वेदेवाओंके श्राद्धमे पात्रर- विशेष वचर्ने है कि फिर अपसव्यहोकर खकर पितृपक्ष और मातृपक्षमें एकएक ब्रा- पितयेका श्राद्ध और आवाहन अप्रदक्षिण झण बैठादे सोई वशिष्ठने कहा है कि कमसे करै ।। यदि श्राद्ध में एक ब्राह्मणको जिमावे तो वहां भावार्थ-ब्राह्मणको हाथमें जल और आस- देवश्राद्ध कैसेहो बनाये हुये संपूर्ण अन्नको नके लिये कुशादेकर ब्राह्मणोंकी आज्ञाके पात्र में विश्वेदेवाओंके आगे रखकर फिरा- अनंतर विश्वेदेवास इसमंत्रसें विश्वेदेवा द्धको करे और उसविश्वेदेवाओंके अन्नको | ओंका आवाहन करै ॥ २२९ ॥ अग्निमें होमदे- अथवा ब्रह्मचारीको दे॥ भावार्थ-देवश्राद्ध में दो ब्राह्मण पूर्वाभि- यदैरन्ववकीर्यावभाजनेसपवित्रके। मुख और पितृश्राद्ध में तीन ब्राह्मण उत्तरा- शन्नोदेव्यापयाक्षित्वायवोसीतियवांस्तया। भिमुख वा दोनों जगे एक एक बैठा और | यादिव्याइतिमंत्रणहस्तेप्वयविनिक्षिपेत् । इसीप्रकार मातामहाँका श्राद्ध करे अथवा पद-यवैः३अन्ववकार्य -अथ -भाजने पितृ और मातृ श्राद्ध में तंत्रसे विश्वेदेवा- | सपवित्रकेशन्नोदेव्याः ३ पयः२-क्षिप्त्वा:-' ओंका श्राद्ध करे ॥ २२८ ॥ विश्वान्देवानहमावाइयिये । पाणिप्रक्षालनंदत्वाविष्टरार्थंकुशानपि । २ विश्वदेवा सागतशृणुताम इम-इवं एपहि- अवाहयेदनुज्ञासीविश्वेदेवासइत्यूचा२२९॥ निषीदत। १ यद्येक भोजयच्छादै दैव तत्र कयंभवताअन्न पात्रे ३आगच्छतु महाभागा विश्वेदेवा महापटाये यत्र समुन्य सर्वस्य प्रकृतस्य च । देवतायतनकृला ततः योजिताः आरे सावधानाः भवतु ते । श्राद्धपवर्तयेत् । प्रास्येदप्रतदमौतु दद्याद्वानाचारिणे ॥ ४ अपसव्य ततः कृता पितृणामप्रदक्षिण।
(१०४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . यवोसीतिऽन्यवान् तथा यादिव्या इतिऽ-मं- | दानं तथा आच्छादनदान चपुनः करशी- त्रेण३ हस्तेषु ७अयं रविनिक्षिपेत् क्रि-॥ चाथै अंबु, दत्वा ततः अपसव्यं कृत्वा योजना-अथ यवैः अन्ववकीर्य सपवित्रके पितॄणां कर्म अप्रदक्षिणं कुर्यात् ॥ भाजने शन्नोदेव्याः पयः यवोसीतिमंत्रेण य- तात्पर्यार्थ-फिर हाथोंकी शुद्धिके लिये चान् क्षिप्त्वा तथा यादिव्याइति मंत्रेण | जल देकर क्रमसे गंध पुप्प धूप दीप तथा हस्तेषु अर्घ्य विनिक्षिपेत् ॥ आच्छादन वस्त्र इनकोदे-गंध आदिमे अन्य तात्पर्यार्थ-फिर विश्वेदेवाओंके लिये ब्राह्मणने कहा है कि चंदन कुंकुम कपूर अगुरु स्मृतियोंमें कहाहुआ यह विशेष समझना-वि- णके समीप भूमिमें प्रदक्षिण क्रमणसे जौं वखेरकर फिर चांदी आदिके और दो कुशा- पुष्पभी इस वचनमें कहे हुये लेने कि श्राद्ध पद्मक (कमल ) येउपलेपनके लियेदे- भोंकी पवित्रीसे ढके पात्रमें शन्नोदेवी इस- मंत्रसे जल और यवोसि इसमंत्रसे यव डाल पदाहुये पुष्प और चमेलीये श्रेष्ठहैं और इस जाती मल्लिका श्वेतयूथिका ( जुही) जलमें कर अर्घ्यपात्र और पवित्रीसे ढके ब्राह्मणों वचनमें कहे पुष्पवर्जित जानने-कि जिनमें के हाथमे या दिव्या इस मंत्रसे हे विश्वेदेवाओ अधिक गंधही वा गंध नहो जो चैत्य ( चवू- यह अर्घ्य आपके लिये है यह कहकर तरा) वृक्षकेहों, वा रक्तवर्णहों, कांटेवाले अर्यका जल छोडदे ॥ वृक्षका नहो, और अकंटकवृक्षका शुक्ल और' भावार्य-भूमिपर यवोंको वखेर पवित्री सुगंधिहो, वहदे-और रक्तनहो और रक्तभी सहित अर्घ्यपात्रमें शन्नादेवी इस मंत्रसे कुंकुम और जलजकोदे और धूपमे यह जल और यवोप्तिइप्तमंत्रसे जी डालकर विशेष विष्णुने कहा कि संपूर्ण प्राणियोंके फिर उसअर्घ्यको यादिव्या इसमंबसे ब्राह्म- अंगकी धूपनदे घृत मधु संयुक्त गुग्गुल चंदन गोके हाथपर छोडे ॥ २३० ॥ अगर देवदारु सरल आदिकी धूपदे दीपकमें दत्त्वोदकंगंधमाल्यंधूपदानंसदीपकम् २३१ यह विशेष शंखने कहाहै घृत वा तिलोंके बयाच्छादनदानंचकरशीचार्थमंबुच । तेलका दीपकदे और वसा ( चर्वी ) और अपसव्यंततःकृत्वापितॄणामप्रदक्षिणम् ॥ मेटके दीपकको वर्जदे और आच्छादनका वस्त्र शुक्ल और नवाहो और जो जीर्ण नहो पद-दत्वा -उदकं २ गंधमाल्यं २ ऐसा दशा (छोर ) सहितदे-यह संपूर्ण वेश्व धूपदानं २ सदीपकं २ तथा:- आछादन- देव श्राद्धका कर्म उत्तराभिमुख होकर करे- दानं २ च-करशीचार्थ २ अम्बु २ च- अपसव्यं ततः:- कृत्वा - पितृणां ६ अ- , चंदनकुंकुमकर्पूरागुरुपद्मकान्युपलेपनार्थ । २ या जात्यः प्रशस्तास्युमल्लिकाश्तयूधिकााज- प्रदक्षिणं १॥ लोभवानि सर्वाणि फुपुमानि च पुष्पकं । योजना-उदकं गंधमाल्यं सदीपकं धूप- ३ प्रगंधीन्यगंधानित्यवृक्षोभवानि च पुष्पाणि १शनोदेवीरभिष्टय आपोभवतु पीतये । शंथ्योरमि- वजनीयानि रक्तवर्णानि यानि च । सवंतनः । ४ प्राण्यंग सर्व धूपाय न दद्यात् घृतमधुसंयुक्त गुग्गु- २ यवोसियवयास्मद्वेषो यवयारातीः । लुश्रीखडागरुदेवदारसरलादि। ३ यादिव्याापः पयसासंपभूवुर्याभंतरिक्षा उतपा ५ धृतेनदीपणे दातव्यस्तिलीलेनवा पुनः। वसामे- पिवीर्याः हिरण्यवर्णास्तानआपःशिवासश्स्योनाः । दोद्वंदीप प्रयबेनविवर्जयेताआच्छादनंच शुधनवमहत सुहवा मतु। सदशंदद्यात् ।
आचाराध्याय याप्रकरण १० (१०५) --- और पिट श्राद्धका कर्म दक्षिणाभिमुख न्तस्त्वानिधीमहि इसे प्रचासें करके आय- होकरकर-ऐसही वृद्ध शातातपने फैहा है न्तुनःपितरः इस मंत्रसे स्तुतिकरे । कि देवताओंको उत्तराभिमुख होकर और भावार्य-द्विगुणी भुग्न मुशाओंका देकर पितरोंको दक्षिणाभिमुख होकर पार्वण श्राद्धमें फिर प्रादागों की आज्ञासे टशन्त इत्यादि विधिस देवगनपूर्वक संपूर्णदे ॥ ऋचासे पितका आवाहन करके आपन्तुनः भावार्य -जल गंध माला धूप दीप आच्छा- इत्यादि मंत्रको जप ॥ २३ ॥ दन पत्र और इस्तप्रक्षालनके लिये जल अपहताइतितिान्विकीर्यचसमंततः 11 देकर फिर अपसव्य होकर पितरोंका श्राद्ध यवार्यास्तुतिल कार्याःकुदियादिपूर्वदत् अप्रदक्षिण करै ॥ २३१ ॥ २३२ ।। द्विगुणांस्तुशान्दलाहाशंतस्त्वत्यूचा- पद- अपदताइति:-तिलान् विकॉपी- पितृन । आवाह्यतदनुज्ञातोजपेदायतुन-कुर्याद कि-अयदि र पूर्ववतः ।। चा-समंततः:-पवाया:श्त-तिलः कायां: स्ततः ।। २३३ ॥ दत्वाप्यसंसपास्तेपांपाकलाविधानतः । पद-द्विगुगान २ तुर- फुशान्र दत्वाः- हि-दशन्तस्त्वेत्यचा ३ पितृन २ आवाहा:- पितृभ्यःस्थानमसीतिन्युनंपाकरोत्ययः तंदनजातःगत्-क्रि-आयन्तुनः२ तता: पद-दत्त्वा-अर्घ्य १ संखपान २ तेषां ६ योजना-द्विगुणान् सुशान् दत्वा ततः पात्र मृता-रिधानत:-पितम्यस्यानम- तदनुज्ञातःसन् पितृन् आवाहा आपन्तुनः । साति-युग्गंसाकरोति कि-अप-11 . इतिमंनं जपेद ॥ योजना-चपुनःअपहता इति मंग सम- तात्पर्याय-अंदर फर्मक अनंतर अप-ततः तिष्टान् विकार्य पवायर्याः तिः कार्याः सय हुपे यज्ञोपर्वतको सव्य फरक-पहां उपुनः अादि संवत् गुयांद-भर्णदत्या ततः यह कदनसे देव काइका अनुसमय तेषां (माणा) संस्खवान् विधानतःदि. (उत्तरकाल सूचन किया-पिता आदि ती- पात्र निधाय पितृभ्याम्पानमसीति मग पानं नोको द्विगुण मुमहों ऐसी विषम पुःशा भारी अधः न्युज पुर्याव- ।। वाम भागमें गहदानरांक आसनोपरदेय तापपाप-जास जो सिददी र अर. फिर गद यांकि आभायपन की स्मृति किरण ( वरना )भादिया तिमी मान है कि गल देकर हिगुन भुत नशा और तिर भयंानी भासनसे होकर मा. गरद-पद आचतम राहदान पैदर दनपर्यन समंसी पूर्वत को गिसमें पर और विश्थादमे पाय २ . सायना किनिक महता भागात पा, सुनना करने के लिये समाता-पिता इत्यादि से प्रा. गं माल भर रितामह प्रतिनामददनमा आइन करना Nare .. पद मागास पर भाजदन पर इस TImericnil मानगोंगी मनका भाहना Tagrat fotirast दर minironi PrimTTrai oret mamkirl 1 (१०४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । यवोसीति: -यवानर तथाऽ यादिव्या इति:-मं- दानं तथा आच्छादनदानं चपुनः करशौ- त्रेण३ हस्तेषु ७अर्घ्य रविनिक्षिपेत् क्रि:- ॥ चार्थ अंबु दत्वा ततः अपसव्यं कृत्वा योजना-अथ यवेः अन्ववकीर्य सपवित्रके | पितृणां कर्म अप्रदक्षिणं कुर्यात् ।। भाजने शन्नोदेव्याः पयः यवोसीतिमंत्रेण य. तात्पर्या-फिर हाथोंकी शुद्धिके लिये वान्ऽ क्षिप्त्वा तथा यादिव्याइति मंत्रेण जल देकर क्रमसे गंध पुष्प धूप दीप तथा हस्तेषु अर्घ्य विनिक्षिपेत् ॥ आच्छादन वस्त्र इनकोदे-गंध आदिमे अन्य तात्पर्यार्थ-फिर विश्वेदेवाओं के लिये ब्राह्म- स्मृतियों में कहाहुआयह विशेष समझना-वि- पके समीप भूमिमें प्रदक्षिणक्रमणसे जो ष्णुने कहा है कि चंदन कुंकुम कपूर अशुरु वखेरकर फिर चांदी आदिके और दो कुशा- पुष्पभी इस वैचनमें कहे हुये लेने कि श्राद्धमें पद्मक (कमल ) येउपलेपनके लियेदे- ओंकी पवित्रीसे ढके पात्रमें शन्नीदेवी ईस-जाती मल्लिका श्वेतयूथिका (जुद्दी ) जलमें मंत्रसे जल और यवोसि इसमंत्रसे यव डाल पैदाहुये पुष्प और चमेली ये श्रेष्ठहैं और इस कर अयंपात्र और पवित्रीसे ढके ब्राह्मणों वचनमें कहे पुष्पवर्जित जानने-कि जिनमें के हाथमें या दिव्या इस मंत्रसे हे विश्वेदेवाओ अधिक गंधहो वा गंध नहीं जो चैत्य ( चबू- यह अर्घ्य आपके लिये है यह कहकर तरा) वृक्षकेहों, वा रक्तवर्णहों, कांटेवाले. अर्घ्यका जल छोडदे॥ वृक्षका नहो, और अकंटकवृक्षका शुक्ल और भावार्य-भूमिपर यवांको वखेर पवित्री सुगंधिहो, वहदे और रक्तनहो और रक्तभी सहित अर्घ्यपात्रमें शन्नोदेवी इस मंत्रसे कुंकुम और जलजकोदे और धूपमे यह जल और यवोसिइसमंत्रसे जौ डालकर विशेष विष्णुने कहा कि संपूर्ण प्राणियोंके फिर उसअर्घ्यको यादिव्या इसमंत्रसे ब्राह्म- अंगकी धूपनदे घृत मधु संयुक्त गुग्गुल चंदन णोंके हाथपर छोडे ॥ २३० ॥ अगर देवदारु सरल आदिकी धूपदे दीपकमें दत्त्वोदकंगंधमाल्यंधूपदानंसदीपकम् २३१ यह विशेष शंखने कहाहै घृत वा तिलोंके वयाच्छादनदानंचकरशीचार्थमंबुच । तेलका दीपकदे और वसा ( चर्वी ) और अपसव्यंततःकृत्वापितॄणामप्रदक्षिणम् ॥ मेवेंके दीपकको वर्जदे और आच्छादनका वस्त्र शुक्ल और नवाहो और जो जीर्ण नहो पद-दुत्वाऽ -उदकं २ गंधमाल्यं २ ऐसा दशा (छोर ) सहितदे-यह संपूर्ण वेश्व धूपदानं २ सदीपकं २ तथा:- आछादन- देव श्राद्धका कर्म उत्तराभिमुख होकर करे- दानं २ चs- करशोचार्थ २ अम्बु २ च - अपसव्यं ततः:- कृत्वा-पितृणां ६ अ- १ चंदनकुंकुमकगगुरुपमकान्युपलेपनार्थ । २ श्राद्धेजात्यःप्रशस्ताःस्सुमल्लिकाश्वेतपूपिकााज- प्रदक्षिणं १॥ लोवानि सर्वाणि कुपुमानि च पुष्पकं । योजना-उदकं गंधमाल्यं सदीपकं धूप- ३ उप्रगंधीन्यगंधानित्यवृक्षोमवानि च ।पुष्पाणि १ शन्नोदेवीरभिष्टय आपोभवंतु पीतये । शय्योमि- | वर्जनीयानि रक्तवर्णानि यानि च । सवंदनः । ४ प्राण्यंग सर्व धूपार्थ न दद्याद घृतमधुसंयुक्तं गुग्गु- २यवासियवयास्मद्वेषो यदयारातीः । लुश्रीखंडागरदेवदारुसरलादि। ३ यादिव्याभाषः पयसासंवर्याअतरिक्षा उतपा ५ घृतनदीपो दातव्यस्तिलीलेनवा पुनः। वसामे- पिवीयां: हिरण्यवर्णास्तानआपःशिवाःसश्स्योनाः दोद्भवदीपं प्रयचेनविवर्जयेताआच्छादनंच शुधनवमहतं . सुहवा मवंतु। सदशंदद्यात् ।
(१०६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । , दक्षिण वखेरकर अयुग्म कुशाओंसे बनाई पद-अमौ ७ करिष्यन् १ आदाय - हुई कूचीसे ढके तीन चांदीके पात्रोंमें शन्नो- पृच्छति क्रि-अन्नं २ घृतभृतं २ कुरुष्व देवी० इस मंत्र से जल और तिलोसि सोम क्रि-इति:- अभ्यनुज्ञातः१ हुत्वाम् अग्नी देवत्य इस मंत्र तिल पुष्प गंध इनको पितृयज्ञव:- ॥ डालकर उन पात्रोंको स्वधार्ष्या इस मंत्रसे हुतशेपंप्रदद्याचभाजपुसमाहितः । ब्राह्मणोंके आगे स्थापन करे फिर यादिव्या यथालाभोपपत्रेपुरौप्येपुचविशेषतः२३७॥ इस मंत्रके अंतमें हेपितः यह अर्घ्य आपकी पद-हुतशेष २प्रदद्यात् क्रि-तु:-भाजनेषु- मिलो-हपितामह यह अर्घ्य आपको मिलो- हे प्रपितामह यह अर्घ्य आपको मिलो यह च-विशेषतः:- ॥ समाहितः २ यथालाभोरपन्नेषु ७ रौप्येषु ७ कहता हुआ उस अर्घ्यको ब्राह्मणोंके हाथ- योजना-अग्नौ करिष्यन् घृतप्लुतं अन्नं पर छोडदै दोनों स्थानोंमें एकरक्खै इस पक्षमेंभी तीन पात्र करने इस प्रकार अध्यको | आदाय पृच्छति कुरुष्व इति अभ्यनुज्ञातः देकर उन अयॊके संस्रवा (ब्राह्मणोंके हाथसें हितः सन यथालाभोपपन्नेषु चपुनः विशेषतः सन् पितृयज्ञवत् अमोहुत्वा हुतशेष समा- गिराहुआजोmaa जिसका ए दद्यात् ।। (कूची) अर्थ-फिर अग्नीकरण करनेकी इ- मिले अन्नको लेकर ब्राह्मणोंको यह | AAJALAns कि मैं अग्नीकरणकर्ताहूं-यहां घृतका ग्रहण पात्र और -Appratyusultkarसूपशाक आदिको निवृत्ति के लिये है जव त्रा- पुष्प धूप •KIPHAYARISHAD ह्मण करो यह आज्ञादे दें तय प्राचीनावीती हेपितः यह तःयह (सव्य होकर अग्निका स्थापन करके और पुप्पआपद EHYDRA हुआदे॥ मेक्षणसें घीको लेकर अवदानके समान इन भावार्थ -re से ब्राह्मणोंके मंत्रोंसे होम करे कि सोमायपितृमतेस्वधा चारॊतरफ नमः-अग्नयेकव्यवाहनाय स्वधानमः- पिंड- और यव (जौं )के पितृयज्ञके प्रकारसे यह अग्निहोत्र करके स्थानमें दि भार अर्घ्य आदिको और मेक्षणको अग्निके समीप रखकर पूर्ववत् कर र और उनके संस्रवको होमसें शेष अन्नको मिट्टिके पात्रोंको छोडकर पंगत्रमें करके पितृभ्यःस्थानमसि इस यथाशक्ति मिलेहुये पात्रोंमें और विशेषकर अपर उस पात्रको न्युज ( अधो मुख) चांदीके पिता आदिके पात्रों में परसदे विश्वे- योजना- देवाओंके पात्रमे नपरसे और परसताहुआ शन्नोदेवारमा बादायपृच्छत्यनंघृतप्लुतम् । समाहित रहै अर्थात् अन्यत्र मनको न लगा सवंतुनः । "तोहुत्वाग्रौपिठयज्ञवत् ॥ वै-यहां यद्यपि अग्नी यह अविशेषसे कहाहै २ यौसियवयास्मद्वेपो तथापि जिसने अग्निहोत्र लेरक्खा है उसको ३ यादिव्याआपः पयसासमवे देवनिर्मितः प्रल सर्वाधानपक्षमें औपासन अग्निका अभावह थिवीयाः हिरण्यवर्णास्तानआप.पूणीहि नः स्वाहा। इससे पिण्डपितृयज्ञके अंतर्भावि पार्वण श्राद्धमे सुहवा भवंतु। शास्त्रोक्त दक्षिणाग्निसमीपहै इससे दक्षिणाग्निमे ऊपर पित पानकोन्यु प्रदक्षिण २३५॥ ।
आचाराध्याय श्राद्धमकरण १० (१०७) होमकरै क्योंकि स्मार्त कर्म विवाह अग्निमें पूर्वोक्त चार ४ अष्टकाओंमें अष्टका श्राद्ध करे इसका यह अपवाद है सोई मार्कण्डेय और एकोद्दिष्ट यहां एकोद्दिष्ट शब्दसे सर्पि- ने कहा, आहिताग्नि मनुष्य सावधानीसे डी लेतेहैं-उसमेभी एकका उद्देश्यह केवल दक्षिणाग्निमें अनोकरण होम करे अना- | पार्वणका ग्रहण नहीं क्योंकि साक्षात हिताग्नितो औपसद अग्निमें औपंसद | एकोद्दिष्टमें अनोकरणका अभावहै-अ- नहोयतो ब्राह्मणका मुख वा जलमें करे और थवा गृह्यभाप्यकारके मतसे साक्षात् एको- जब अर्धाधानपक्षहे तव आपासन अग्निभी | दिष्टमेंभी पाणिहोम होताई- इससे एको- होसकतीहै तब आहिताग्नि और अनाहितानि | दिष्टसे साक्षातही एकोद्दिष्ट लेना. इन आगे दोनोंका होम औपासनअमिमें होताहै-इसी | में पहिले चार श्राद्ध में सामिकका अग्निमें प्रकार अन्वष्टका आदि तोनामें पिंडपितृ- | होम और पिछले चारों निरग्नि वा साग्निक यज्ञकाही प्रकार माना और काम्य आदिचार पितृ ब्राह्मणके हाथमे होम होताहे- जिसका श्राद्ध में ब्राह्मणके हाथमेंही अग्नीकरण होम | पिता मरगयाहो उसको पार्वण सदेव करना होताहे-सोई गृह्यकारोंने कहाकि अन्वष्टका | इससे वढ्भी ब्राह्मणके हाथमें होमकरे क्यों- 'आद्ध पूर्वदिन (सप्तमी) में होताहे-और कि यह वचनकि मरगया है पिता जिस्का पार्वण मास २ में होताहे-काम्य अभ्युदयमें ऐसा जो द्विज वह मास २की प्रति- और एकोद्दिष्ट आठमां होताहै-पहिले चारो पदाको जो पार्वण नही देता वह प्रायश्चि- श्राद्धोंमें सामियोंका होम वह्निमें होताहै | तकाभागी होताहे इसी प्रकार काम्य अभ्यु- और पिछले चारोंमें ब्राह्मणों के हाथमें होताहै दय अप्टका एकोद्दिष्ट इनमेंभी हायमें होम इसका अर्थ स्पष्ट यहहै कि हेमंतशिशिर- | होताह-क्योंकि यह मनुका वचनहै कि अ- के चारों मासोंमे कृष्णपक्षकी अष्टमी चारों ग्निनहो तो ब्राह्मणके हाथमें अन्नदेदे परंतु अष्टका होताहे-नौमीमें जो श्राद्ध किया | ब्राह्मणके हाथमें दिये अन्नका पृथक् ग्रास- जाय वह आन्वष्टक्य कहताहे-सप्तमीमें जो का निषेध कहतेहैं-अर्यात् उस अन्नको सव किया जाय वह पूर्वेद्य कहाताह-मास २ के अन्नमें मिलाकर खाय सोई गृहकारने कृष्णपक्षकी पंचमी आदि जिस किसी तिथि कहा कि हायमें दिये अन्नको निर्बुद्धि में अन्वष्टकाश्राद्धके अतिदेशसे जो किया खातेहैं उससे पितर तृप्त नही और शेष जाय वह, और अमावास्याके पिंड पितृयज्ञके अन्न पितरांको नहीं मिलता जो हाथमे दिया अनंतर जो किया जाय वहपार्वण स्वर्ग अन्नदे और जो परसाहुआ अन्नद उसे मिला आदिकी इच्छासे कृतिका भादिमें जो किया कर खाय पृथक् भावनकरे ।। जाय वह काम्य पुत्रकी उत्पत्ति तहाग आदि की प्रतिष्ठामें जो कियाजाय वह अभ्युदय म निवपति यः श्राद्ध प्रमीतपिटको दिशः ९. आहितामिस्त जुहुयात दक्षिणामा समाहितः क्षये मासि माति प्रायश्चित्ती मवेतु सः। अनाहितामिहत्वीपसद अम्पावद्विजेमुवा । २ अन्यमावेतु विनय पाणावेवोपपादयेत् । २ अन्नटश्यच पूर्वार्मासिमास्यय पार्वण 1 काम्य ३ अन्न पाणितले दत्तं पृयगश्नत्ययुद्धयः । पितरस्ते. मभ्युदयेटम्यामेकोदिष्टमयाटमै । चतुर्वाधेषु सानी. न तृप्यति शेषानं न टमंतिते । यप पाणितले दत्तं नां वो दोमो रिधीयते । पिश्यामगहस्ते साटुतरेणु यच्चान्यदुपरित । एकीमावेन भोक्तव्यं परमातो न विद्यते। अनुपि।
(१०८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भावार्थ- अग्नीकरण करता हुआ मनुष्य | वाच्यं ते ब्राह्मणाः अपि वाग्यताः (मौनिनः) घोसें मिलें अन्नको लेकर ब्राह्मणोंसें अग्नीकरण | भुंजीरन् ॥ की पूछे जब करनेकी आज्ञा देदे तब पितृ तात्पर्याय- उसके अनंतर परसाहुआ यज्ञके समान अग्निमें होमकरै- होमसें और परसने योग्य यह अन्न तृप्तिपर्यंत शेष अन्नको जैसे मिले वा विशेषकर चांदिके विश्वेदेवाओंको प्राप्तहो यह कहकर जौं पात्रामे सावधानीसे परसे ॥ २३६ ॥२३७॥ और जलसे देव श्राद्ध में निवेदनकरके और दत्यानपृथिवीपात्रमितिपात्राभिमंत्रणम् । तैसेही पिता पितामह प्रपितामहोंको अमुक- कृत्वेदविष्णुरित्पन्नेद्विजांगुष्ठनिवेशयेत् ॥ गोत्र अमुकशर्माको परसाहुआ और परसने- योग्य यह अन्न तृप्तिपर्यंत प्राप्तहो यह कह- पद-दत्वाऽ अन्न २ पृथिवीपात्रंइति : कर तिल और जलदानसे निवेदनकरके पात्राभिमंत्रणं २ कृत्वाऽ- इदंविष्णुरिति:- आपोशानदेकर और पूर्वोक्त व्याहृतियोंसहित अन्ने ७ अंगुष्ठर-निवेशयेत् क्रि-॥ गायत्री और मधुवाता इन तीन ऋचाओंको योजना-अन्नं दत्वा पृथिवीपात्रं इति मंत्रे- जपकर और तीनवार मधु कहकर सुखसे ण पात्राभिमंत्रणं कृत्वा इदंविष्णुः इति म- भोजनकरो यह कहै और वे ब्राह्मणभी त्रेण अन्न अंगुष्ठं निवेशयेत् ॥ मौन होकर भोजनकरै- पारस्करको यह तात्पर्यार्थ-भा०-ओदन सूप पायस आदि वचन है कि पितर और देवताओंके निमित्त अन्नको पात्र में देकर पृथिवीतेपात्रं इस मंत्र- अन्नका संकल्प करके सावित्री और मधुवाता से पात्रोंका अभिमंत्रण करके इदविष्णुः ऋचाओंको जप- फिर श्राद्धका निवेदन इस मनसे अन्नके उपर ब्राह्मणके अंगुष्ठका आपोशान- यथा सुख भोजन करो कहना- स्पर्श करावे-और विभेदेवा भाके आगे भोजन- तीन वा एकवार व्याहृतिसहित सव्य होकर हव्यको रक्षाकरो और पितरोंके | गायत्रीका और मधुवाता इन तीन ऋचा- आगे अपसन्य होकर हे विष्णो कन्यकी | ओंका जप और तीनवार मधु३ जपकर ।। रक्षा करो यह कहे ऐसेही मनुने कहाह२३८ भावार्य- भू आदि व्याहतियोसहित सन्याहृतिकांगायत्रींमधुवाताइतिवचम् । गायत्री और मधुवाता इन तीन ऋचाओंका जप करके कह कि सुखसे भोजन करो वे जात्याययामुखंयाच्य/जीरंस्तपिवाग्यता: ब्राह्मणभी मोनहोकर भोजनकरें ॥२३॥ पद-सव्यादतिकां २ गायत्री २ मधु- अन्नमिष्टइविष्यंचदद्यादकोधनोत्वरः । वाताइति:-तृचं जप्त्वा-यथासुखं वाच्य मातृत्तेस्तुपवित्राणिजात्यापूर्वजपंतया २४० मुंजीरन् कि-ते १ अपित-वाग्यताः१॥ पद-अन्नं २-इष्टं २६विष्यं श्च दद्यात् योजना- सव्याहृतिकां गायत्री- मधु- कि-अक्रोधनः १ अत्वरः १आऽ-तृप्तः ५ वाता इति तृचंजप्त्वा यथासुखं गुपवं इति-तु-पवित्राणि २ जप्त्वाचा-एव:-अनुमा- पिते पाय पियाने प्रागा मुनेमृत १ साल्पापितयिभ्य: सावित्री मशुमारपः श्रादं गृत जुहोनि स्वाहा। निरोपशान अपशोच मोजनम् । गायत्री निगम २t froगको नया निधे पर सदापि मोबाइविपूर्षिका माता इनिए मलि. मसारमो। सरिता भाचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १० (१०९) योजना-अक्रोधनः अत्वरः सन् इष्टं अन्नं जपकर और तृप्त ब्राह्मणोंको जानकर व्याह- चपुनः हविप्यं दद्यात् तुपुनः आतृप्तेः पवि-तियों सहित पूर्वोक्त गायत्रीको जपे ॥ त्राणि जप्त्वा तथा पूर्वजपं जपेत् ॥ भावार्थ-क्रोध और शीघ्रतासे रहित इष्ट तात्पर्याय-भक्ष्य भोज्यलेह्य चोप्य पेयरूप और हविष्य अन्नको तृप्तिपर्यंत देकर पवि- पांचप्रकारके और ब्रह्मण प्रेत वा यजमानको अमंत्रोंको जपकर पूर्वोक्त प्रकारसें गायत्रीको इष्ट (रोचक ), इविष्य (श्राद्धहविके योग्य) अपै ॥ २४० ॥ जो इस अन्यस्मृतिमें प्रसिद्ध है कि ब्रीहि अनमादायहप्तास्थशेपंचैवानुमान्यच । शाली यव गेहूं मूंग उडद मुनियोंका अन्न तदनविकिरेझूमौदद्याचापःसकृवसकृत् ॥ कालकेशाक-महाशल्क-इलायची-झूठ-मिर- च-हींग-गुड-शर्करा-कपूर-सैंधव-सांभर- शेषं रचा-एवऽ अनुमान्या चा-तत् २अनं पद-अन्नं २ आदायऽ-तृप्ताः१ स्थ कि- पनस-नारीयल-कदली-वेर-गव्य-दूध-दही | विकिरेत् क्रि-भूमौ ७ दद्यात् क्रि-च-अपः घृत-पायस-मधुमांस आदि-इन सबकोदे २ सकृत-सकृतह-॥ और हविष्यके कहनेसे इस अन्य स्मृतिमें योजना-अन्नं आदाय तृप्ताः स्थ इति कहे अयोग्य अन्नोंकी निवृत्ति समझनी कि पृच्छेत्-चपुनः शेष अन्नं अनुमान्य तत् कोदूं- मसूर-चणा-कुलथी-पुलाक-निप्पाव | अन्नं भूमौ विकिरेत् चपुनः सकृत् सकृत राजमाप (लोविया) कूष्मांड-गन-दोनों अपः दद्यात् ॥ कटेहली-उपोदकी चांसके अंकुर-पीपल-वच- तात्पर्यार्थ-फिर सब अन्नको लेकर सौंफ-ऊपरलवण-माहिष (भैंस) चमरी- ब्राह्मणोंको तृप्तहुये ऐसेपूछे जब वे तृप्तहुये गोका दूध-घी पायस आदि श्राद्धमें निषि- ऐसे कहदें तब यह पूछे कि शेषभी कुछ हैं और उक्त अन्नको क्रोध और शीघ्र- अन्नहे उसे क्याकरें-इष्टमित्रों सहित भोजन ताको छोडकर तृप्तिपर्यंत दे-और तु शब्दसे को इस उनकी आज्ञासे उस अन्नको पितृ जो कुछ उच्छिष्टहो वहदे क्योंकि वह दासों- ब्राह्मणके आगे उच्छिष्टके समीप ऐसी का भागहोताहै क्योंकि मनुका वचनहै कि भूमिमें तिलजल पूर्वक इस मंत्रसे दे कि नो भूमिमें पडा, उच्छिष्ट कपट और शठतासे हीन दक्षिणामकुशाओंसे ढकी हो-कि मेरे कुलमें दास और उसके पिताका भाग कहाताहे- जिनको अग्निका दाह मिलाहै वानहीं तेसेही तृप्तिपर्यंत पुरुषसूक्त आदि पवित्रोंको | मिलावे भूमिमें दिय अन्नसे तृप्त होकर पर- मगतिको प्राप्तहो और ब्राह्मणोंके हाथमें एकर १ बीहिशालियरगोधममुगमाषमुन्यन्नकालशाकम- वा कुल्लेके लिये जल दे॥ हाशल्कैलासुंठीमरीचहिंगुगुदशर्कराकपूरसैंधवसाभरप. भावार्य-अन्नको लेकर ब्राह्मणोंसें तृप्तहुये नसनालिकेरकदलीबदरगन्यपयोदपिघृतपायसमधु- यह पूछे जबवे तृप्तहुये यह कहदे तब उनकी मांसप्रभृति । २ कोद्रवमसूरवणककुलित्यपुलाकनिष्पावराजमा- | आज्ञासे उस अन्नको कुशारखकर भूमिपर पकूरमांदवार्ताकवृहतीद्वयोपोदकीवंशांकुरपिप्पलीवचा विकिरदे-फिरकुल्लेके लिये एक २ वार ब्राह्म- शतपुष्पोपराविडालवणमाईिषचामरक्षरिदधिघृतपाय ।। णोंको जलदे ॥ २४१ ॥ ३ उच्छेपणभूमिगतमनिमस्याशटस्यच । दासब १ अग्निदग्धाश्च ये जीवाः येप्यदग्धाः कुले मम। गस्य तरिपने भागधेयंप्रचक्षते । भूमौ दत्तेन तोयेन तृप्ता यांतु कुले मम ।
(११०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । सर्वमन्नमुपादायसलिलंदक्षिणामुखः । पद-दत्वा:-तु:-दक्षिणां२ शक्त्या ३स्व- उच्छिष्टसन्निधौपिंडान्दद्याद्वैपितृयज्ञषत् ॥ धाकार उदाहरेत् क्रि-वाच्यतां क्रि- इति:- पद- सर्वर अन्नं २ उपादाय:-सतिलं२ । अनुज्ञातः१प्रकृतेभ्यः४स्वधा उच्यतां क्रि-॥. दाक्षणामुखः १ उच्छिष्टसन्निधो पिण्डान् योजना-तुपुनः शक्त्या दक्षिणां दत्वा २ दद्यात् कि- वै:-पितृयज्ञवा-॥ स्वधाकारं उदारहेत्-वाच्यतांइतिअनुज्ञातः सन् प्रकृतेभ्यः स्वधाउच्यतांइति उदाहरेत।। योजना-सतिलं सर्व अन्नं उपादाय दक्षि- णामुखः सन् उच्छिष्टसन्निधौ पितृयज्ञवत् दक्षिणादेकर स्वधाको कहा बताहूं यह कहै ता. भा० फिर यथाशक्ति सुवर्ण आदि पिण्डान् दद्यात् ॥ तात्पर्यार्थ भावार्थ-पिंडपिठ्यज्ञके समान जब ब्राह्मण स्वधावाचन कराओ यह कहदें तब ब्राह्मणोंको यह कहे कि पिता- चरु पकाया होय तो अमोफरणसे आदि और मातामह आदिको दिया बचा जो चरु उसको और सब अन्नको स्वधा ( पहुचे) होय ॥ २१४ ॥ मिलाकर अमिके समीप पिण्डदे चरु नप- काया होयतो ब्राह्मणके भोजनार्थ बनाए सब | ब्युरस्तुस्वधेत्युक्तेभूमौसिंचेत्ततोजलम् । अन्नको लेकर उच्छिष्टके समीप तिलस- | विश्वेदेवाश्चमीयंतांविगैश्चोक्तमिदंजपेत् ।। हित पिण्डोंको दक्षिणको मुख करके पित- पद-त्युःक्रि-अस्तु क्रि-स्वधा:-इति:- यज्ञके समान पिण्डोंको दे ॥ २४२ ॥ उक्त ७ भूमो सिंचेत् कि- ततःऽ-जलं २ मातामहानामप्येवंदद्यादाचमनंततः । विश्वेदेवाः १ च-प्रीयंतां क्रि-विप्रेः३ चा- स्वस्तिवाच्यंततःकुर्यादक्षय्योदकमेवच ॥ | उक्तं इति: जपेत् क्रि-॥ पद-मातामहानां ६ अपिड एवं दद्यात् योजना-ते ब्राह्मणा अस्तु स्वधा इति कि- आचमनं २ ततः-स्वस्तिऽ वाच्यं १ युः तैः उक्ते सति ततः भूमो जलं सिंचेत् तसा-कुर्यात् कि-अक्षय्योदकंर एव च। च पुनः विश्वेदेवाः प्रीयंतां इति विप्रेः योजना-मातामहानां अपि एवं कुर्याद उक्तं जपेत् ।। ततः आचमनं दद्यात्-ततःस्वस्तिवाच्यं च ता. भा०-चे ब्राह्मण स्वधाही जब ऐसे पुनः अक्षम्योदकं फुर्यात् ।। कहदें तप कमण्डलुसे भूमिमें जल सौच-फिर विश्वेदेवा प्रसन्नही ऐसे कई जव ब्राह्मणभी ता० भा०- मातामहोंका आवाइनसे पिंडदानपर्यंत कर्म सही कर-फिर प्रसन्नहों ऐसे कहदें तब इसको जकिर ब्राह्मणोंको आचमनदे-फिर ब्राह्मणोंको दातारोनोभिवर्धतांवेदाःसंततिरेयच । स्वस्तिकहो ऐस कह फिर वे स्वस्ति | श्रदायनोमान्यगमद्वहुदैयंचनोस्तु २४६॥ फहदें फिर अक्षय्य हो यह कहकर ब्राह्म- गोंको हायपर जलदान कर ब्राह्मणभी अ-वेदाः १ संततिः १ एवा-चा-श्रद्धा १ च पद-दातारः १ नः ६ अभियर्द्धतां क्रि. क्षय हो यह कहदे ।। २४३ ॥ नः ६ मा व्यगमत् क्रि-यह १ देयं १ च दत्यातुदक्षिणांशक्त्यास्थयाकारमुदाहरेत् । नः ६ अस्तु-क्रि ।। पाच्यतामित्यनुज्ञातःप्रकृतेभ्यःस्पयोच्यतां योजना-नः (अस्माकं ) दातारः वेदाः आचाराध्याय श्राद्धमकरण १० संततिः अभिवर्द्धन्तां च पुनः श्रद्धामाव्य पद-यस्मिन् ७ ते १ संस्रवाः १ पूर्व २ गमत् च पुनःमः(अस्माकं) बहुदेयं अस्तु। अयंपाने ७ निवेशिताः १ पितृपानंर तत्र ता० भा-हमारे कुलमें दाताओंकी वृ- | उत्तानंरकृत्वाऽ-विमान २ विसर्जयेत् क्रि- द्धिहो पठन पाठन आदिसे वेदको पुत्र पोत्र आदिसे संतानकी वृद्धिहो और पितृकर्म योजना-यस्मिन् अर्घ्यपात्रे ते संबवाः मेसे हमारी श्रद्धा मत जाओ और हमें पूर्व निवेशिताः तत् पितृपात्रं उत्तानं कृत्वा बहुत देनेको सुवर्ण आदिमिले इस तरह विप्रान् विसर्जयेत् ॥ ब्राह्मणोंसें प्रार्थनाकरे ॥ २४६ ॥ ता भा०-जिस अर्घ्य पात्रमे पहिले अर्थ इत्युक्तोवाप्रियावाच:प्रणिपत्यविसर्जयेत्। दानके पीछे ब्राह्मणकै हाथसें गिराहुआअर्घ्य- वाजेवाजइतिप्रीतःपिपूर्वविसर्जनम् २४७ का जल रक्खा था उस ओंधेहुए पितृपा- त्रको सूधा रखकर ब्राह्मणोंका विसर्जन करे- पद-इत्युक्तः१ उक्त्वाऽ-प्रियाः२ वाचः२ यह विसर्जन आशीर्वादके मंत्रसे पीछे बाजे २ प्रणिपत्य:-विसर्जयेत् क्रि-वाजेवाजेइति:- इस मंत्रके उच्चारणसे पूर्व समझना-क्योंकि प्रीतः १ पितृपूर्व १ विसर्जनं ॥ १॥ कृत्वा विसर्जयेत् यहां पूर्वकालबोधक क्त्वा- योजना इत्युक्तः सन् प्रियाः वाचः । प्रत्ययका श्रवणहें ॥ २४८ ।। उक्त्वा प्रणिपत्य विसर्जयेत् कथं विसर्जये- प्रदक्षिणमनुव्रज्यभुञ्जीतपितृसेवितम् । दित्याह वाजे वाजे इति मंत्रेण प्रीतः सन् पितृपूर्व विसर्जनं कुर्यात् ॥ ब्रह्मचारीभवेत्तांतुरजनींब्राह्मणैः सह२४९॥ तात्पर्यार्थ-इस पूर्वोक्त मंत्रको जपकर पद- प्रदक्षिणं२ अनुव्रज्या-मुंजीत कि- और आपके दोनों चरणोंकी रजसे गृह जि- पितृसेवितं २ ब्रह्मचारी १ भवेत् क्रि-तां २ नके पवित्र हुए और शाक आदिके भोज-तु-जनी २ ब्राह्मणेः ३ सहा- || नके दुःखको नमान करजो आपने अनु- योजना-प्रदक्षिणं अनुव्रज्य पितृसे- गृहीत किये हैं ऐसे हमको धन्य इस तरह | वितं भुजीत-तुपुनः तारजनी ब्राह्मणैः सह मधुर वाणीयोंको कहकर परिक्रमापूर्वक ब्रह्मचारी भवेत् ॥ नमस्कार करके विसर्जन इस प्रकारकरे कि वाजेवाजे इसे ऋचासें पितृपूर्वक प्रपितामह तात्पर्यार्थ-इसके अनंतर सीमापर्यत और विश्वेदेवापर्यतोंका विसर्जन, प्रसन्न ब्राह्मणोंके पीछे जाय फिर आप जाओ हुआहे पितर तुम उठो यह कहता हुआ करें॥ | बैंठो इस उन ब्राह्मणोंकी आज्ञासे लौटकर भावार्थ-इस कहनेके अनंतर मधुर वाणी- पितृ सेवित आद्धके शेष अन्नको इष्ट मि- योंको ब्राह्मणों के प्रति कहकर वाजेवाजे इस नोंके साथ भोजनकरे- यह नियम है परिसं- ऋचासे पिताआदिका विसर्जन करे॥२४७॥ ख्या नही मांसमें तो यथा रुचि हो वह-द्विज यस्मिस्तेसंस्रवाःपूर्वमयपात्रेनिवेशिताः । काम्यया यहां कह आये जिस दिन श्राद्ध पितृपात्रंतदुत्तानंकृत्वाविभान्विसर्जयेत् ॥ किया उस रात्रिको भोक्ता ( भोजन करने १ वाजे बाजे वतवाजिनोनोधनेषुविधा अमृता वाले) ब्राह्मणोंसहित ब्रह्मचारी (विषय ऋतज्ञाः । अस्य मध्वः पिबतमादयध्वत्प्तायात पयि | आदिसे सहित ) रहे-रे तुशब्दसे यह मिर्देवयानैः। समझना कि पुनर्भोजन आदिकोभी न करें- (११२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । क्योंकि यह वचने है कि दंतधानन-तांबूल- करने यहां ब्राह्मणोंकी संख्या-देवश्राद्धमें स्निग्ध स्नान (तेलाभ्यंग )पुन जन-रमण- | युग्म ब्राह्मण यथाशक्ति करे यह पूर्व औषध पपया अन्न इनको श्राद्धका कर्ता कह आये यहां प्रदक्षिणक्रम आदिके गि- वर्न दे- पुनर्भोजन अध्वा भार (बोझा) ननेसे अन्य स्मृतियोंमें कहै औरभी विशेष अध्ययन मैथुन दान प्रतिमह होम इन | धर्म लेने सोई आश्वलायननें कहहै कि आठको श्राद्धका भोक्ता वर्जदे ॥ आभ्युदायिक श्राद्धमें युग्म ब्राह्मण, मूल भावार्थ-ब्राह्मणोंके पीछे चलकर पितरों- रहित कुशा, पूर्वाभिमुख, सव्य प्रदक्षिण के भोगे श्राद्धके अन्नको खावे और ब्राह्म- होकर क्रम, तिलोंके स्थानमें जौ-गंध आदि णों सहित उस पत्रिमें ब्रह्मचारी रहें।।२४९॥ और आसनमें दोर ऋजु कुशादे यवोसि इस एवंप्रदक्षिणावृत्कोवृद्धौनांदीमुखान्पितन् । मंत्रप्सें जो दे हे विश्वेदेवा' यह आपको अ- यजेतदधिककै मिश्रान्पिडान्यवैःक्रियाः॥ य॑ है हे नांदीमुख पितरो यह आपको अ- य॑है ऐसे अर्घ्यदे- कव्यवाहन अग्निको पद- एवंड-प्रदक्षिणावृत्कः १ वृद्धौ ७ नांदीमुखान् पितृन्श्यजेत् क्रि-दधिकर्क- स्वाहाहै पिठमान् अग्निको स्वाहाहै इन दो मंत्रोंसे ब्राह्मणोंके हाथपर होमकरै-मधुवा- धुमिश्रान पिंडान्२ यवैः३ क्रियाः १ ॥ ता इन तीन ऋचाओंके स्थानमें-उपास्मे योजना- एवं प्रदक्षिणावृत्कः सन् वृद्धौ | गायत ये पांच मधुमती और अक्षन्नमीमदंत नांदीमुखान् पितृन् दधिकर्कन्धुमिश्रान् यह छठी ऋचा सुनावै-जब ब्राह्मणभोज- पिंडान् दत्वा यजेत क्रियाः यवैः कर्तव्याः॥ नके अंतमें आचमन करलें तब गोवरसे तात्पर्याय-- अब वृद्धिश्राद्धको कहतेहैं | लीपकर और पूर्वाग्र कुशाको बिछाकर पुत्र जन्म आदि निमित्तों में जो किया जाताहै | वहां वेर और घी मिले भोजनके शेष अन्नसे उस वृद्धिश्राद्धमें इस पूर्वोक्त प्रकारसे एकरको दोर पिण्ड दे-यद्यपि यहां पित- पितरोंका पूजन करे-तिसमें विशेष कहतेहैं रोंकी पूजा कर यह सामान्यसे कहाहे तथा- कि यह कर्म प्रदक्षिणावृत्कहै अर्थात् इस पि तीन श्राद्धकर उसका क्रम अन्यस्मृति- कर्मको अनुष्ठानका मार्ग प्रदक्षिणाक्रमसे | योंसे जानना-सोई शातातेपनें कहा कि है-यहां नांदीमुखान् यह पितॄन् इस पदका | पहिले माताका श्राद्ध फिर पिताओंका फिर विशेषणहे इससे आवाहन आदिमें नांदीमुख मातामहोंका ये तीन श्राद्धवृद्धिमें कहें हैं । पितरोंका आवाहन करताहूं नांदीमुख पि- १ अथाभ्युदयिके अमूला दर्भाः प्राइमुखी यशो- तामहोंका आवाहन करताहूं इत्यादि वचन कहने-किस प्रकार पूजनकर इस अपेक्षासे पर्वातीसात्मदक्षिणमुपचारोयवैस्तिलाथों गंधादिदानम्। २ यवोसि सोमदेवत्यो गोसवो देवनिर्मितः प्रव• कहतेहैं कि दधिकर्कन्धुमिश्र अर्थात् वेर मद्भिः संपृक्तः पुष्टया दानं द्विादः ऋजुदर्भान् आसने और दधिसे मिश्रित पिण्डोंको देकर पूजन नान्दीमुखान् पितॄन् लोकान् प्राणयाहिनः दद्यात कर और तिलसें जितने कर्महै वे सब जोंसें | स्वाहा। दतधावनतापूलं स्निग्धस्नानमभोजन । रत्यौप ३ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा-सोमाय पितमते घपरान्नानि श्राद्वकृत् सप्तवर्जयेत् । पुन जनमध्वानं | स्वाहा । भाराध्ययनमैथुनम् । दान प्रतिप्रहं होमं श्राद्भुफ्त्वष्ट ४ मातुः श्रादं तु पूर्व स्यात्पितृणां तदनंतर । ततो वर्जयेत् । माहामहानां च युद्धौ पादत्रयं स्मृतं ।
आवाराध्याय श्राद्धप्रकरण.१०, (११३) भावार्थ- इस प्रकार वृद्धि में नांदीमुख मान समझना-यह मध्याह्नमें करना सोई पितरीको प्रदक्षिण क्रमसे दहीवर मिले देवलने कहाहै कि देयकर्म पूर्वाह्नमें पितृकर्म पिण्डोंसे पूजे और तिलोंके कर्मको जोंसें अपराह्नमें एकोद्दिष्ट मध्याह्नमें वृद्धिश्राद्ध प्रा- करें ।। २५० ॥ तःकालमें कर-पितरोंके शेषको भोजन करें एकोद्दिष्टंदेवहीनमेकार्यकपवित्रकम् । इस शेषभोजनका किसी एकोद्दिष्टमें निपे- मावाहनानीकरणरहितंापसव्यवत् २५१॥ धभी देखते हैं कि नवश्राद्धका शेष-और गृहका वासा अन्न और स्त्रीपुरुपके भुक्तका पद- एकोदिष्टं देवहीनं १ एकार्येक शेष इनको भोजन न करे-नवश्राद्ध तो यह पवित्रकं १ आवाहनाग्नीकरणरहितं १ हि:- | है कि प्रथम तृतीय पंचम सप्तम नवम और अपसव्यवत:॥ एकादशदिनोंके श्राद्धको नवश्राद्ध कहते हैं। योजना- देवहीनं- एकार्यकपवित्रकं भावार्य- अक्षय्यक स्थानमें उपतिष्ठतां आवाहनानीकरणरहितं अपसव्यवत् एको- और ब्राह्मणोंके विसर्जनमें अभिरम्यतां कह द्दिष्टं भवति ॥ वे ब्राह्मण्यभी अभिरत हुये (जातेहैं ) ऐसे ता. भा- एकोद्दिष्ट श्राद्धको कहते हैं कहैं ॥ १५२ ॥ एकका उद्देश जिसमें हो उसे एकोद्दिष्ट कहतेहैं शेष कर्मको पूर्वके समान करे इससे गंधोदकतिलयुक्तं कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् । पार्वणके सब धर्म पाय एकोहिष्टके विशेषको अथिपिलपात्रेपुप्रेतपात्रं सिंचयेत् २५३ कहते है कि देवसे रहित और एक अर्घ्य पद- गंधोदकतिलः ३ युक्तं १ कुर्यात् एक पात्र एक कुशाकी पवित्री-आवाहम- | क्रि- पात्रचतुष्टयम् अार्थर पिनृपात्रे- अग्नीकरण होमसे रहित और अपसव्यसे पुछ प्रेतपा–२ प्रसिंचयेत् क्रि-1 एकोद्दिष्ट होताहै ।। २५१॥ येसमानाइतिद्वाभ्यांशेपंपूर्ववदाचरेत् ।। उपतिष्ठतामक्षय्यस्थानेविप्रविसर्जने । एतत्सपिंडीकरणमेकोद्दिष्टस्त्रियाअपि२५३ अभिरम्यतामितिवदेद्युस्तेभिरताःस्मह पद- येसमानाइति:-द्वाभ्याम् ३ शेष२ पद-उपातिष्ठतां क्रि-अक्षय्यस्थाने विप्र- पूर्ववत: आचरव क्रि-एतदर सपिंडीकरण विसर्जने अभिरम्यतां कि-इतिऽ-वदेत कि- एकोद्दिष्ट१ स्त्रियाः६ अपि:- ।। योजना- गंधोदकतिलः युक्त पात्रचतु- युः क्रि-ते१ अभिरताः स्मः क्रि-हा-॥ टयं अार्थ कुर्यात्-प्रेतपानं पितृपानेषु ये योजना- अक्षय्यस्थाने उपतिष्ठता-विप्र- विसर्जने अभिरम्यतां इति वदेत ते (ब्राह्म- आचरेत् एतत्सपिडीकरणं एकोद्दिष्टं स्त्रियाः समानाइतिद्वाभ्यां प्रसिंचयेद-शेष पूर्ववत् णाः) अपि अभिरताःस्मः इति यः॥ अपिन्भवति । तात्पर्यार्थ- जो यह कहा कि स्वस्ति- वाचनके अनंतर अक्षय्योदकदे वहां भक्ष- दिष्टं तु मध्याहे प्रातदिनिमित्तकम् । पूर्वाह्न दैविक फर्म अपराहे तु पैनकं । एको. य्यक स्थानमे उपतिष्ठतां (प्राप्तहो) कह और वार मंत्र प्राह्मणों के विसर्जनमें अ- भुक्तशिष्टंन नभुजीत कदाचन । २ नवयादेपछि गहे पर्युषितं च यत् । दंपत्यो. भिरम्यतां (रमण कये) है वे ब्राह्मणभी ३पमेडि उतीदि पचमे सप्तमे तया। नवमेशा रमण करते हैं ऐसे कह-शेष कर्म पूर्वके स- दशे चैव वनयभावमुच्यते । .
(११४) याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मित्तारामकाशसहित । । तात्पर्याय- अब सपिंडी करण श्राद्धको कि सपिंडीकरण आद्ध देवपूर्वक करे कहते हैं-गंध जल तिलोंसे युक्त चार और उसमें पितरोंको जिमावे फिर प्रेतश- पात्र अर्घ्य देनेके लिये पूर्वोक्त प्रका-ब्दका उच्चारण न कर-सपिंडी किये पीछे रसे करे चार पात्रोंके कहनेसे पितृवर्गमें | प्रेतको श्राद्ध आदिका निषेध देखते हैं वह चार ब्राह्मण दिखाये-- दो विश्वेदेवाओंके | अनंतर(तत्काल)मरेका नहीं हो सकता क्यों थे ही यहां किंचित् शेष प्रेतपात्रके कि अमावस्या आदिमें उसका श्राद्ध कहाहे जलको तीन प्रकारसे विभाग करके पि- | और सातवें पुरुषमें सपिंडता निवृत्त होजा- तके पात्रोंमे ये समाना इन दो मंत्रोंसे सीं- तीहै यह वचनेभी तभी घट सकताहै जब चे और शेष विश्वेदेवाओंके आवाहन आदि चौथेका तीनमें अंतर्भाव मानो कि चौथा विसर्जन पर्यंत कर्मको पार्वणके समान कर तीन पिंडोंमें पांचवां दोपिंडोंमें छठा एक और प्रेतके अर्घ्यपात्रके शेपजलको प्रेत- पिंडमे अधिकारीहै और सांतवेमें पिंडकी ब्राह्मणके हायमें देकर शेषकर्मको एकोदि- निवृत्ति होजातीहै पितृपात्रों में सींचे यह पूर्वोक्त एके समान समाप्तकरे और तीनों पितरोंके वचनभी इसी पक्षमे पिताको मुख्यहोनेसे घट अघाम पार्वणके समान कर्मको करो-यह सकताह और प्रपितामह आदिहोनेसे अन्यथा सपिंडीकरण और पूर्वोक्त एकोद्दिष्ट स्त्री (माता )काभी करना- यह कहनेसे यह पात्रको सींचे-यह सब कोईका कहना ठीक- नही घटसकता तिससे पितृपात्रोंमें उस प्रेत- जानागयाकी पार्वणमें माताका आद्ध पृथक नहीं क्योंकि यहां पिंड मिलानेका यह नकर-यहां प्रेतशब्दको पिताके प्रपितामहका प्रयोजन नहींहै कि पिताके प्रपितामहके बोधक कोई कहते हैं क्योंकी वह तीनके पिंडकी निवृत्तिहो किंतु पिताको प्रेतत्त्वकी मध्यमें है और इसीसे सपिंडीके पीछे उसके निवृत्ति और पितृत्त्वको प्राप्ति है प्रेतत्व यह पिंडदानकीभी निवृत्ति हो सकती हैं जो क्रम- पूर्वक मरा हो उसके पिडजलदानका अंत- है कि क्षुधा तृषा आदि अत्यंत दुःख भोग- र्भाव यक्तनहीं इसीसे यमने कहाहै कि जो नेकी अवस्था-सोई मार्कडेय ने कहा कि सपिंडी किये प्रेतको पृथक् पिंडमें मिलाता है हे भृगुनंदन प्रेतलोकमें मनुष्य एक वर्ष विधिका नाशक वह पितरोंका नष्ट करने- | वसतेहैं वहां प्रतिदिन क्षुधा वृषा होतीहै- वाला होताह-प्रकर्षसे (भली प्रकार ) जो और वसु आदि श्राद्ध देवताओंके संब- इत (गया) हो उसे प्रेत कहतेहैं इससे धको पितृत्व प्राप्ति कहतेहैं-पूर्वोक्त एकोद्दिष्ट चौथेमभी प्रेतशब्द हो सकताहै और यहभी सहित सपिंडी करनेसे जब प्रेतत्वको निवृ- लिखाह कि पितरोंकोहीदे-और इस वचनसे | त्ति होगई तब पितृत्वको प्राप्तहो जाताहै १ ये समाना समनसो जीवाजीवेषु मामकाः तेषार यह ज्ञातभया-क्योंकि ये वैचन है कि श्रीमयि कल्पतामस्मिलोके शत समाः ॥ ये १ सपिंडता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते । समानाः समनसो पितरो यमराज्ये तेषां लोकः २ प्रेतलोके तु वसतिनृणां वर्ष प्रकीर्तिता स्वधानमः यज्ञी देवेषु कल्पताम् । क्षुत्तृष्णे प्रत्यह तत्र भवेता भृगुनंदन । २ यः सपिकृतं प्रेत पृथपिडे नियोजयेत् । ३ यस्यैतानि न दत्तानि प्रेतश्राद्धानिषोडश प्रेतत्वं विधिनस्तेन भवति पितहा चोपजायते ॥ सुस्थिरं तत्य दत्तः श्राद्धशतैरपि।चतुरोनिपेपिण्डान् ३ सपिटीकरणं श्राद्ध देवपूर्व नियोजयेत् । पितृने । पूर्वतेपु समापयेत् । ततःप्रभृति वै मतः पितृसामान्य- वायत्तत्र पुनः प्रेतं न निशेत । मश्नुते।
आचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १० (-२१५), ये सोलह प्रेत श्राद्ध जिसको नही दिये जाते | पितामह आदि तीनोंक मरनेपर जानना उसका सौ श्राद्धदेने परभी प्रेतल स्थिर पिता मरगया हो और पितामह वा प्रपिता रहताहै प्रथम चार पिंड दे पहिला पिंड | मह जीवता हो तो सपिण्डीकरण नदी तीनमें मिलादे उससे आदि लेकर प्रत होता क्योंकि यह वचन है कि जो क्रमप्स पितरोंके समान होजाता है और जो सपिंडी | नमरे हों उनकी सपिण्डी न कर-जो यह किये प्रेतको इस पूर्वोक्तः वचनसे भी यह मर्नुका वचन है कि जिसका पिता मर- जाना गया कि पृथक् एकोद्दिष्टका निषेध है | गया हो और पितामह जोता हो वह पि- और पार्वणकी विधि है तिससे पितरोंके संग ताक नामको लेकर पितामहके नामको ले पिंडदान होता है-यहभी वार्षिक और वही पितृशब्दके उच्चारणके लिये निय- पाक्षिक एकोद्दिष्ट विधिक लिये कहते हैं- मार्थ है दो पिण्ड देने के लिये नहीं क्योंकि और जो यह वचन है कि फिर प्रेत शब्दका यह वचन है कि पिता जीता होय तो वा पिता निर्देश न करे वह प्रेतशब्दका उच्चारण न मरगया हो और पितामह जीता हो वह भी करे किंतु पितृशब्दका उच्चारण करे इस उनको पिण्ड दे जो पूर्व मरहों दोनों पक्षों लिये है-और जिसका प्रकर्ष गमन हो उसमें प्रेतशब्द नहीं जिससे अधिक दुःखक भी कसे दे इस शंकामें यही कहा है कि अनुभवको अवस्थाका प्रत शब्द मदिसे | पिताका नाम लेकर प्रपितामहका नामले- कहता है यह कह आय-और जो सब मरों इस आदि और अंतक ग्रहण (उच्चारण)से सब जगह पिताको पितामहको प्रपिताम- ये प्रेत शन्दका प्रयोग है वहभी भूतपूर्वग- तिसे है-अर्थात् वेभी कभी प्रेतथे सातमें | इको यह पिण्ड है यही कहै-और कदा- पुरुपमें सापण्डता निवृत्त होती है इसका चित्भी पितामह और प्रपितामह आदि यह अभिप्राय है कि पहिला पिंड चौतक नहीं हो सकते और वृद्ध प्रपितामह वा दूसरा पांच तक तीसय छठे तक व्याप्त उप्तका पिता अन्त नही हो सकते-इससे होताहै-और सातवमें निवृत्त होजाता है | पिता आदि शब्द संबंधके योधक है- अर्थात् जिन पिण्डोंको देता है वे सपिण्डीमें इससे पिता जीता होय तो पिताके तक ही मिले ई-और यहभी बात है | पिता पितामह प्रपितामहको और पि- कि दियेहुये पिंडोंके संबंधसे सापिण्डय तामह जीता होयतो वह पितामहके पिता नही-चयोंकि वहां व्यापकता नहीं अपितु | पितामह प्रपितामहको यह पिन्द्रह ऐसे प्रयोग एक शरीरके जो अवयव उनके अन्यपसे है | करें इससे पिपितृयज्ञमें शुधन्तां पितर यह पहिले कद आए और पितृशदभी इत्यादि मंत्रामें उह नही होता-अयोत् पित- भेतत्वकी निवृत्तिस आद्ध देवता जो होगपे रके स्थानमें पितामह यह यदलना नहीं (११६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । पडता जो विष्णुका यह वचन है कि जिसका और जलदान पतिके गोत्रसे करने-इससे पिता मरगयाहो वह पितृपिण्डको देकरपिता- भताका गोत्र और पिताके गोत्रको छोडकर महसे परले दोको पिण्डदे-इस वचनका यह भतीके गोत्रसे न करें क्योंकि जन्म और मर- अर्थ है कि पितामह जोताहो और पिता मर णमें स्त्रीको पिताका गोत्रहै-इस प्रकारके. गयाहो वह पिताके एक पिण्डको एकोद्दिष्ट | विवादमें आसुर आदि विवाहोंमें और पुत्रि- विधिसे मिलाकर पिताक पितामहको और काके करने में पिताका गोनही रहताहै क्योंकि उसके परले दोकोदे क्योंकि अपना प्रपिता ! तहां २ विशेष वचन है और इन पूर्वोक्त मह जो पिताका पितामह वह संप्रदानरूप | विवाहोंमें दानकोभी निवृत्ति नहीं हुयी और विद्यमानहे-इससे प्रपितामह और उससे ब्राह्म आदि विवाहोंमें ब्रीहि यवके और बृह-. परले दोकोदे शब्दोंके उच्चारणका नियमतो थंतर सामके समान विकल्पहै अर्थात् दोनों पूर्वोक्तहीहै- इसी प्रकार गो ब्राह्मणसे हतेकी गोत्रोंमे कोईसामानो-उनमेंभी इसे वचनके भी सपिण्डिका अभाव जानना-सोई कात्या- अनुसार वंशपरंपराके आचरणसे व्यवस्था यनने कहा कि ब्राह्मण आदिसे पिता | जाननी कि जिसमार्गसे इसके पिता पिताम- मराहो पतित वा सन्यासी हो वा क्रमसे न | हके चलेहों सत् पुरुषोंक मार्गसे चलता हुआ मगहो तो पुत्रभी उनकोही श्राद्धदे जिनको उसी मार्गको चल- इस प्रकारके विना इस पिता देताथा इस वचनसे पिताको सपिण्डीके वचनका अन्य विषय नही है-और जहां संभवमें पिताको लंघकर-पितामह आदिको | शास्त्र वाआचारसे व्यवस्था नहो वहां आत्म- पार्वणकी विधि सिद्धहुई-इससे पिताकी | नस्तुष्टिरेवच, इस वचनसे अपने संतोषसेही सपिण्डीका अभाव जानागया-अन्य स्मृतिमेंभी व्यवस्था जाननी जैसे गर्भसे वा जन्मसे आठवें लिखाहे कि जो नर संततिसें हीनहैं उनकी वर्षमें यज्ञोपवीतका करना-माताकी सपिंडी. सपिण्डी नहीं होती और उनके संग सो- करनेमें विरुद्धरवचन दीखते हैं-वहां पिता- लह१६एकोद्दिष्ट नहीं करने माताके पिण्ड- मही आदिके संग सपिंडीकरण कहाहै तेसे दान आदिमें गोत्रका विवादहै-कि पतिके | भर्ताके संग और अपनी माता आदिके संग गोत्रसे वाउसके पिताके गोत्रसे-दोनों प्रका- | सपिंडीकरण पैठीनसिने कहा कि अपुत्र स्त्री रके वचन दीखते हैं कि विवाहको सप्तपदीमें मरजायतो पति सास आदिके संग सपिंडी- नारी अपने गोत्रमें नहीं रहती उसके पिण्ड | करण होताहे-पतिके संग सपिंडी यमैने १ यस्य पिता प्रेतः स्यात् स पित्तपिंड निधाय पिता- | करै क्योंकि मरीभी वह मंत्र आहुति व्रतोंसे कहीहै कि स्त्रीको सपिंडी एक पतिके संग महारपराभ्यां द्वाभ्यां दद्यात् । २ ब्राह्मणादिहते ताते पतिते सगजिते व्युत्क्र- पतिके संग एकताको प्राप्त हुई है-उशनाने माच मृते देयं येभ्य एव ददायसी॥ ये नराः संततिच्छिन्नाः नास्ति तेषां सपिंडता। १ येनास्यपितरो याता येन याताः पितामहाः। नच तैः सह कर्तव्यान्येकोद्दिष्टानि पोडश ॥ तेन यायात्सतां मार्गतेन गच्छन्न टुष्यति ॥ ४ स्वगोत्रातस्यते नारी विवाहात्सप्तमे पदे । स्वामि २ अपुत्रायां मृतायांतु पतिः कुर्यारसहितां । व- गोत्रेण कर्तव्यातस्याः पिंडोदकक्रियापितगोत्रं समु-यादिभिः सहैवास्याः सपिडीकरणं भवेत् । सृजप न कुर्याद्भगोत्रतः ॥ जन्मन्येव विपत्ताच ३ पत्या चैकैन कर्त्तव्य सपिंडीकरणं त्रियाः । भारीणां पैतकं कुलम् । सामृतापि हि तेनैक्य गता मंत्रातिप्रतः । .
आचाराध्याय श्राद्धमकरण १० “(११७) तो मातामहके संग सपिण्डी कही है कि सपिण्डी किये पीछे पत्नी पति और पिताके जैसे पूर्ण वर्ष होनेसे पिताकी पितामहमें | संग एकताको प्राप्तहो जातीहे तिससे उनके सपिंडी होती है इसी प्रकार माताकी माता- | अंशका भागिनी होतीहै-जब ऐस है तो महमें करनी-लेसेही वचने है कि पुत्र पूरे माताकी सपिण्डी जय मातामहके संगहे तब वर्ष दिनमें पिताको जसे पितामहमें मिलाते है मातामहका श्राद्ध पितृश्राद्धके समान नित्य तैसेही माताको मातामहमें मिलाद-यह (अवश्य करने योग्य ) है जब पति वा भगवान् शिवनें कहाहै-इस प्रकार अनेक पितामहीके संग सपिंडी हो तब मातामहका वचनोंके होत सन्ते पुत्रहीन भार्या मरजायतो श्राद्ध नित्य नही अर्थात् करे तो पुण्य है पति अपनी माताके संग सपिण्डी करे- और न करे तो कुछ दोष नहीं ।। अन्वारोहण ( सतीहोना ) मे तो पुत्र अपने भावार्थ-गंध जल तिलांसहित अय॑के पिताके संगही सपिण्डी करे-आसुर आदि लिये चार पात्रकर-प्रेत पात्रका येसमाना विवाहोंसे उत्पन्न हुआ पुत्र और पुत्रिकाका- इन दो ऋचासि पितरोंके पात्रोम पुत्र मातामहके संग करें-बाह्म आदिवि- सींचे-शेष कर्मको पूर्वकी समान करे-यह वाह से पैदा हुआ पुत्र पिता वा मातामह | सपिंडीकरण और एकोद्दिष्ट माताकाभी या पितामही इनके संग विकल्पसे करे अर्थात् करना ॥ २५३ ॥ ॥ २५४ ॥ इनमेंसें किसी एकके साथ करदे-इसमेंभी जो अक्सिपिंडीकरणयस्यसंवत्सराद्भवेत् । वंशका समाचार नियतहो उसी आचरणसे करे और जो नियत नहो तो अपनी प्रसन्नता | तस्याप्यन्नंसोदकुंभंदद्यात्संवत्सरंद्विजे ॥ अनुसार रुचिसे कर-उसमेंभी चाह जिस पद-अर्वाक् १ सपिंडीकरणं १ यस्य ६ किसीके संग माताको सपिण्डीहो जिन अन्व- | संवत्सरात् ५ भवेत् क्रि- तस्य ६ अपि:- प्टका आदिमै माताका श्राद्ध पृथक् इस वच- अन्नं २ सोदकुंभ २ दद्यात् क्रि-संवत्सरं २ नसे कहाहै वहां पितामही आदिके संगही | द्विजे ७॥ -पार्वण श्राद्ध करै-कि अन्वष्टका वृद्धि क्षयी योजना-यस्य सपिंडीकरणं संवत्सराद- इनमें माताका श्राद्ध पृथक् कर अन्यत्र वाकू भवेत् तस्य अपि सौदकुंभ अन्नं द्विगे पतिके संग कर-क्योंकि पति के संग सपिण्डी सवत्सरं दद्यात् ।। होनेसेंही उसे उसका अंश मिलताहै-और तात्पर्यार्थ-वर्षदिनसे पहिले जिसकी मातामहके अंशभागिनी होनेसे मातामहके सपिंडी की हो उसके निमित्त वर्षदिनतक संग कर-सोई शातातपैने कहाँहै कि | वा प्रतिदिन वा प्रतिमाप्त जलघट सहित १ पितुः पितामहे यद्वत्पूर्ण संवत्सरे सुतः। मातु- | कहने से यह बात दिखाई कि पूरे वर्षदिनमें अन्न ब्राह्मणको दे-वर्षदिनसे पहिले सपिण्डी. -मीतामहे तद्वदेषा कार्यासपिरहता । २ पिता पितामहे योज्य: पूणे संवत्सरे सुतैः। वा पहिले करे सोई आश्वलायननें कहा है माता मातामहे तद्वदित्याइ भगवान् शिवः । कि इसके अनंतर सपिण्डी वर्षदिनके अं- ३ अन्वष्टकासु वृद्धौ च गयाया च क्षयेहनि। मातु. तमे वा द्वादशदिनमें कर कात्यायनेने श्राद्ध पृथक कुर्यादन्यत्र पतिना सह । अय सपिहीकरण संवत्सराते द्वादशाहे वा। ४ एकत्तित्वमायाति सपिण्डीफरणे कृतै । २ ततः सपत्तरे पूर्णे सपिंडीकरणं भवेत् । त्रिप. “पत्नीपतिपितॄणां च तस्मादशेन मागिनी । क्षेवा यदा चार्वा वृद्धिापद्यते तदा ।।
(११८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा है कि तिसके अनंतर पूर्ण वर्षके होने आपत्तिका पक्ष है जब इस आपत्तिके पक्ष पर वा विपक्षमें अथवा पहिले जबवृद्धि (उ- को मानकर सपिण्डीसे पहिले प्रेत श्राद्धोंको त्सव) आनपडै तव सपिण्डी होती है- करे तव एकोद्दिष्ट विधिसे करे-और जब सपिण्डीमें ये चार पक्ष दिखाये कि द्वादश- | पूर्वोक्त मुख्य पक्षको मानकर अपने कालमें दिन-त्रिपक्ष-वृद्धिकी प्राप्ति और वर्षकी हो कर तब जो मनुप्य वार्षिक आद्धको पूर्ति-उन चारोमे बारवे दिन पिताकी सपिण्डी | पार्वण वा एकोद्दिष्ट जसे करता हो उसी- अग्निहोत्री करें-क्योंकि सपिण्डीके विना प्रकार मासिकको करें-क्योंकि यह स्मृति पिण्डपितृयज्ञ नहीं होसकेगा-क्यों कि है कि सपिंडीसे पहिले पोडश आद्ध- 'यह वचन है कि जब कर्ता वा प्रेत अग्नि | करें तो सबको एकोद्दिष्टविधिसे करे- होत्री हों तब बारमेदिन पिताकी सपिण्डी सपिण्डीसें पीछे करे तो प्रतिवर्ष क्षयी श्राद्ध करे-और निरग्नि तो त्रिपक्षवा वृद्धिके को जैसे करता हो तोही षोडशश्राद्धोंको प्राप्तिमें करै जब संवत्सरसे पहिले सपिण्डी | करे-यह प्रेत श्राद्ध सहित सपिण्डीकरण करें. तब षोडश श्राद्ध करकै सपिण्डी जिनाने धन वाटलियाहो ऐसे भाइयोंके होते करे अथवा सपिण्डी करके अपने २ कालमें | भी एक २के करनेसे ही सब पूर्ण होता है षोडशश्राद्धकरै यह सन्देह होता है और इसको सब पृथक्र-नकरै क्योंकि यह वचन दोनों प्रकारके वचन देखते हैं षोडे | है कि नवश्राद्ध सपिण्डी और पोडशश्राद्ध शश्राद्ध दिये विना सपिण्डी न करे-किंतु भाईयोंके पृथक् २ होनेपरभी एककोही पोडशश्राद्ध देकर करे पोडशश्राद्ध | करने और प्रेत श्राद्ध सहित यह सपिण्डी- यह है कि द्वादशदिन-त्रिपक्ष-पण्मास- करण संन्यासीसें भिन्न पिताओंका पुत्र निय- मासिक और वार्षिक ये षोडश आद्ध मसेंकर-क्योंकि यह प्रेतकी मुक्तिके लिये विद्वानोंने कहे है-तैसेही वैचन है कि है और संन्यासीयोंका न करे सोई उशनाने वर्षदिनसे पहिले जिसको सपिण्डीहो उस- कहा है कि संन्यासीयोंका एकोद्दिष्ट न करे कोभी वर्षदिनतक मासिकश्राद्ध और जलका | किंतु एकादशाहके दिन पार्वण श्राद्ध करें- घटदे-उसमें मुख्य पक्ष यह है कि सपिण्डी | पुत्र आदि सन्यासीयोंको सपिण्डी न करे करके अपने २ कालमें षोडश श्राद्ध करे | त्रिदण्डके ग्रहणसे ही वे प्रेत नहीं होते- क्योंकि कालके न आनेसे पहिले अधिकार | पुत्र आदिके सपीप न होनेपर जिस सगोत्री नही जो यह पक्ष है कि पोडश श्राद्ध करके वर्षदिनसे पहिलेभी सपिण्डी करें १ सपिंडीकरणादवाक् कुर्वाद्धानि पोदश । वह एकोद्दिष्टविधानेन कुर्यात्सर्वाणि तानि तु ॥ सपि- साकस्तु यदा कर्ता प्रेतो वाप्यग्निमान् भवेत्। | ण्डीकरणाय यदा कुर्यात्तदापुनः-प्रत्यब्द यो यथा द्वादशाहे तदा कार्य सर्पिडीकरण पितुः ॥ कुर्यात्तथा कुत्सि तान्यपि ॥ २ श्राद्धानि पोडशादत्वा नैव कुर्यात्सपिण्डतां । २ नवश्राद्ध सपिण्डल श्राद्धान्यपि च पोडश। एक- श्राद्धानि पोडशापाय विदधीत सपिण्डता । नैवतु कार्याणि सविमक्तधनेष्वपि । ३ द्वादशाहे विपक्षेच पश्मासे मासि चाणिके। ३ एकोद्दिष्टं च कर्तव्यं यतीनां चैव सर्वदा। श्राद्धनि पोर्शतानि संस्मृतानि मनीषिभिः । अहन्येकादशे प्राप्ते पाणं तु विधीयते । सपिण्डॉक- ४ यस्यापि वासराद िसपिडीकरण भवेत् । रण तेषां न कर्तव्य मुतादिभिः । त्रिदंडग्रहणादेव मासिकं चोदकुभं च देयं तस्यापि वत्सरम् । 'प्रतत्व. नैव जायते ।
आचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १० (१२९) आदिने दाइकर्म कियाहो वही दशदिन- याहो क्योंकि यह स्मृति है कि परदेशमें तक प्रेत कर्म कर-क्योंकि यह स्मृति | जानेके दिन वा उस मासकी अमावास्या- है कि असगोत्र हो वा सगोत्रहो स्त्रीहो को पिंडदे और मरनेके दिनकाभी विशेष वापुरुषहो जो पहिले दिन पिण्डदे वही दश- जातुकर्ण्य ने कहा है कि विपक्षसे पोछेका -दिनतकके कर्मको समाप्त करै-शूद्रोंकी जो श्राद्धहै वह मरणदिनमें और त्रिपक्षसे भी यह सपिण्डी विना मंत्र वारवें दिन करनी पहिलेका श्राद्ध दाहके दिनसे अग्निहोत्री क्योंकि यही विष्णुको स्मृतिमें लिखा है स- ब्राह्मणका होताहै तात्पर्य यहहै कि त्रिपक्षसे पिंडीके पीछे वार्षिक और पार्वण आदि पुत्र | पहिले प्रेतकर्म दाहके दिनसे और त्रिपक्षसे नियमसे कर और अन्य कर चाहे न करे । पीछेका श्राद्ध मरण दिनमें करे-और जो भावार्थ-जिसकी सपिण्डी वर्ष दिनसे | अग्निहोत्री नहो उसके सब श्राद्ध मरण पहिले होजाय उसकोभी वर्षांदनतक ब्राह्म- | दिनमेंही होते हैं और आद्य श्राद्ध ग्यारवें णको अन्न और जलका घटदे ॥ २५५- ॥ | दिन होताहै यह अशीचका उपलक्षणहे मृतेहनितुकर्तव्यंप्रतिमासंतुवत्सरम् । यह कोई कहते हैं-शुद्ध होकर कर्मको कर यह वचन शुद्धिका अंगहै और अशैचिके प्रतिसंवत्सरंचैवमाद्यमेकादशेहनि॥२५६॥ जानेपर इसका प्रारंभ करके सामान्यसे सब पद-मृते ७ अहान ७ तु:-कर्त्तव्यं १ | वर्णोको एकोद्दिष्ट करना विष्णुने कहाहै-यह प्रतिमास २ तुः-वत्सरं २ प्रतिसंवत्सरम् २ ठीक नही क्योंकि येठीनसिकी यह स्मृति चा-एवंड-आद्यं १ एकादशे ७ अहनि ७ ॥ है कि एकादशैका जो आद्धहे वह चारों- योजना-वत्सरं मृते अहनि प्रतिमासं, | वर्णीका सामान्य कहाहे और सूतक पृथकर चपुनः प्रतिसंवत्सरं एकोद्दिष्टं एकादशे अ- होताहै और इस शंख वचनेकाभी विरो- हनि आद्यं, कर्त्तव्यं ॥ धहै कि अशुद्धभी मनुष्य एकादशाहको तात्पर्थि- अबएकोद्दिष्टक कालको क- आद्य श्राद्धकर श्राद्धके समयतक कर्ता हते हैं-मरनेके दिन वर्षादिनतक प्रतिमास शुद्धहै और फिर वह अशुद्धहीहै और सा- मान्यके प्रकरणका विष्णुवचन दश दिनके में एकोद्दिष्टकरे और सपिण्डीके पीछे प्रति- अशौचमेभी घट सकताह और प्रतिवर्ष ऐसे वर्ष मरनेके दिन एकोद्दिष्टकर और सब हो मरण दिन में एकोद्दिष्ट करना याज्ञवल्क्यने एकोद्दिष्टोके मूल आद्य श्राद्धको मरने इसी वचनमें कहाहै-सोई अन्यस्मृतिमें सें ग्यारवेंदिन करे- यदि मरनेके दिनका ज्ञान नहीं तो जिसदिन मरनेकी सुने उस- १ प्रवासदिवसे देय तन्मासन्दुक्षयपि वा । दिन वा अमावास्याको एकोद्दिष्ट करै-यह २ उर्द्धत्रिपक्षायच्मादं मृतेहन्येव तव भवेता अघ- स्तु काम्यहााहितामजन्मनः। स्मृतिमे लिखा है और अमावास्याभी उस- ३ अयाशीचापगमे। मासकी लेनी जिस मासमे परदेशमें ग- ४ एकादशेसि यच्छ्राद्धं तत्सामान्यमुदाहृतं चतुर्णा १ असगोत्रः सगोत्रोत्रा स्त्री दयायदि वा पुमान् मपि वर्णानो मतकच पृथक् पृथक् ।। प्रथमेहनि यो दद्यात् स दशाह समापयेत् । ५ आद्यश्राद्ध मशुद्धोपि कृताचैकादशहनि कर्तु- २ एव सपिण्डीकरण मंत्रवज्र्य द्राणां द्वादशाह | स्तारकालिकी शुद्धिशुद्धः पुनरेव सः । ३ अज्ञाते मृतेहनि अमावास्याया श्रवण ६ वर्षे वर्षे तु कर्तव्या मातापित्रौस्तु सक्रिया दिवसेवा। भवं भोजयेच्छाद पिंडमेकं तु निर्वपेद ।
-- (१२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । कहा है कि वर्ष २ में माता पिताकी पराशरका वचनहै कि मरेहुये पिताका सक्रिया करै विश्वेदेवाओंसे रहित श्राद्ध देवत्व औरसको तीन पुरुषतक और कर और एकपिंडदे-येमने भी कहा कि अनेकगोत्रपुत्रीका देवता एकही मरण सापिंडीके पीछे प्रतिवर्ष पुत्र मातापिताके दिनमें होताहे वहभी व्यवस्थाका बोधक निमित्त मरण दिनमे एकोद्दिष्ट करै-व्यास- नही जिससे उसका यह अर्थहै कि देवत्व- नेतो पार्वणका निषेध कहाहैकि जो मनुष्य को प्राप्त हुये ( सपिंडकिये) पिताका सदैव एकोद्दिष्टको छोडकर पार्वण करताहै वह औरसपुत्र तीन पुरुषतक पार्वण करे और भिन्न विना किया जानना और वह पितृघातक गोत्र (मातुलआदि)का जो श्राद्ध वह एककेहि होताहे-जमदग्निने तो पार्वण कहा कि निमित्त और एकोद्दिष्ट ही होताह और सपिंडी औरसपुत्र विधिसे सपिंडी करके मातापि- किये पीछे औरसभी एकोद्दिष्टही करे यह तांक मरण दिन में अमावस्याके समान पैठी सिने कहाहै कि औरस मरनेके दिनमें पार्वणश्राद्ध कर-शातातपनेभी कहींहै कि एकोद्दिष्ट करें और सपिंडी किये पोछे पार्वण सपिंडी करके सदैव पार्वण प्रतिवर्ष करे यह न करे-और उदीच्य इस प्रकार व्यवस्था विधि छागलेयने कहीहै-इस पूर्वोक्त प्रका- कहते हैंकि अमावास्या और भाद्रपदके रसे जब वचनोंका विवादुई इसमें दक्षिणी कृष्णपक्षमें मरणदिन होय तो पार्वण और ऐसे व्यवस्था कहतेहैं औरस और क्षेत्रज | अन्यत्र होयतो एकोद्दिष्ट होताहै-यही स्म- पुत्र मातापिताके क्षयाहमें पार्वणही करें और तिमें लिखाहै कि अमावास्या और प्रेतप- दत्तक आदि एकोद्दिष्टको जातूकर्ण्यके वच-क्षमें जिसका मरण होयतो पार्वण करै ए- नसे करें कि क्षेत्रज और सपुत्र प्रतिवर्ष कोद्दिष्ट कदाचित् नकर-इस व्यवस्थाकाभी पार्वण विधिसे और इतर दशपुत्र एको- वृद्ध आदर नहीं करते क्योंकि जिसके द्दिष्ट करैं सो ठीक नहीं क्योंकि इसमें क्षया | मूलका निश्चय नही ऐसे इस वचन से जिन- ह वचन नहीं किंतु प्रत्यन्द वचनहै और के मूलका निश्चयहै ऐसे अनेक और क्षयाह क्षयाहको छोडकर प्रतिवर्षके श्राद्ध अक्षय मात्रमें पार्वणके बोधक वचनोंका अमावस्या तृतीया-माघपूर्णिमा वैशाखी आदिहे इससे प्रेतपक्ष- मृताहविषयक मानकर संकोच यह वचन क्षयाहमें पार्वण और एकोद्दिष्टको अयुक्तहै और सामान्यवचनभी अनर्थक व्यवस्था करनेको समर्थ नही-और जो हो जायगें वहांही सामान्यवचनसे विशेष वचनका उपसंहार होताहे जहां सामान्य १ सपिंढीकरणार्द्ध प्रतिसवत्सरं सुतः । माता- और विशेषके संबंध ज्ञानसे दोनों वचन पित्रोः पृथक्वर्यादेकोद्दिष्ट मतेहनि । २ एकोद्दिष्टं परित्यज्य पार्वण करते नरः । अकृत अर्थवाले हो-जैसे सत्रह सामधेनीयोंको तद्विजानीयाद्भवेच्च पितृघातकः। १ पितुर्गतस्य देवत्वमौरसस्य त्रिपारुषं। सर्वत्रानेक- ३ आपाय च सपिंडत्वमौरसो विधिपत्सुतः। कुर्वीत | गोत्राणामेकस्यैव मृतेहनि । दर्शवच्चाई मातापित्रोः क्षयेहनि । २ एकोद्दिष्टोहि कर्तव्यमौरसेन मृतेहनि । सपिंडी- ४ सपिंडीकरणं कृत्वा कुर्यात्रार्वणवत्सदा ।। करणालै मातापित्रोर्न पार्वण । प्रतिसंवत्सरं विद्वांच्छागलेयोदितो विधिः। ३ अमारस्यायो यस्य प्रेतपक्षेऽथवा पुनः। पार्व. ५ प्रत्यब्दं पार्वणेनैव विधिना क्षेत्रजौरसौ। कुर्या-तत्र कर्तव्यं नैकोदिष्टं कदाचन । तामिवरे कर्युरकोटिं सुता दश । ४ सप्तरशसामधेनमिन घ्यात् ।
आचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १० (१२१) पीछेसे कहे प्रारंभ किये विना पढे और वि- एकोद्दिष्ट करैं पार्वण नही वहां यह निर्णय है कृतिमात्र विषयक सप्तदश १७ वाक्यका कि संन्यासीयोंका क्षयाहमें पुत्र पार्वण ही सामधेनीलक्षणद्वारा संबंधसे जो अर्थ उ-] करें क्योंकि यह प्रचेताका वचनहै कि निदं- सके वश मित्रविंदाआदिप्रकरणमें पढे स- डके ग्रहणसे संन्यासीयोंकि सपिण्टीका सदश वाक्यसे मित्रविंदा अधिकारसे पूर्वर अभाव है इससे एकोद्दिष्ट नहीं होता सदैव संबंधके बोधसे सार्थकताई और मित्रविदा- पार्वण होता है-अमावस्या या प्रेतपक्षों आदि प्रकरणमें उपसंहार (समाप्ति ) है अ- | क्षयाह हो तो पूर्वोक्त वचनको नियम बोधक र्थात् मित्रावेदाप्रकरणसे पहिले २ सप्तदश होनेसे पार्वण ही होताह अन्यत्र क्षयाहमें सामधेनीयोंका पठनहै यहां तो दोनों वचन | पार्वण और एकोद्दिष्टका मीहि और यक्के मृताहके विषय होनेसे अर्थवान् नही होस- समान विकल्पह और वंशंक आचारसे कते इससे यहां पाक्षिक एकोद्दिष्टको निवृत्ति- व्यवस्था होय तो विकल्पकी व्यवस्थाई के लिये पार्वणके नियमका विधान युक्तहै | अन्यथा अपनी इच्छा है अतिप्रसंगके और एकोद्दिष्टक वचनोंको मातापिताके कहनेको समाप्त करते हैं-॥ क्षयाइविषयक और पार्वणके वचनोंको भावार्थ:-एकवर्षतक प्रतिमासके और मातापितासे अन्यके क्षयाइविश्यक मान-प्रतिवर्षसे मरण दिनमें एकोद्दिष्ट कर और नेसे व्यवस्था युक्त नही क्योंकि दोनों जगे एकादशाहको आद्यश्राद्ध कर ॥ २५६ ॥ माता पिता सुत पदका ग्रहण विद्यमान है कि ये वचने ईकि सपिण्डीके पोछे पुत्र माता-पिंडांस्तुगोजविग्रेभ्योदयादग्रौजलेपिया । पिताके मरण दिनमें पृथक् २ एकोद्दिष्ट कर प्रक्षिपेत्सत्सुविभेपुद्धिजीच्छिष्टनमार्जयेत् ।। और औरसपुत्र विधिसे सपिण्डी करकै मा- तापिताके भरण दिनमें अमावास्याके समान कि-अग्नो ७ जले ७ अपि- वाई-प्रक्षिपेत् पद-पिण्डान्तु:-गोजविप्रेभ्यः दद्यात् (पार्वण ) श्राद्धकर-और जो कोई यह कि-सत्सु ७ विप्रेषु ७ द्विजोच्छिष्टं २ न:- कहते है कि इस सुमंतुके वचनसे मातापि- ताके मरणदिनमें अग्निहोत्री पार्वण और मायेत् क्रि- ॥ निरग्नि एकोद्दिष्ट कर-वहभी सत्प्रतिपक्ष योजना-तुपुनः पिण्डान गोजविप्रेभ्यः (विरुद्ध ) होने से त्यागने योग्य है क्योंकि दद्यात् अग्नी वा गले अपि प्रक्षिपेत् विमेषु यह स्मृति है कि जो ब्राह्मण अनेक आन- सत्सु द्विजोच्छिष्ट न माजयेत् ।। वाले वा एक अग्निवाले हैं वेसपिण्डीके पीछे ता: भा-पिण्डोको गो, बकरी, ग्राम- णको दे अथवा अग्नि वा जलमें फेंक दे १ सपिण्टीफरप्पाट प्रतिसवत्सर मते. । माता- और ब्राह्मण भोजनके स्थान में पठे होय तो पित्रोः पृथक कार्यमेकोदिष्टं मृतेहति ॥ आपाय सह । टनके उच्छिष्टका मार्जन न करें ॥ २५७ ॥ पिण्डवमौरसा विधिवत्सुत. ! गीत दर्शाच मातापित्रोः क्षोहनि । हरिप्यानेनवमासंपायसेनतुषरसरम् । २ वर्षे वर्षे मुत. कुर्या-पार्वण योनिमान् दिजः । । मात्स्पहारिणकौरभ्रशाकुनच्छागपापतेः ।। गियोरनाप्रमान्योः एकोदिष्ट मृतहनि ।। ३ सापपस्तु ये विश येसार एक्च । देश १ एकोदिष्टं पनास्ति चिदमदनादिद । सरि- सपिण्डनाइमेकोरिष्ट न पानी पडीकरणामा तस्सदा । ।
(१२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . पद-हविष्यान्नेन ३ वै:-मासं २ पायसेन३ एण रुरु वाराह शशा इनके मांसके देनेसे तु:- वत्सरं २ मात्स्यहारिणकौरभ्रशाकुन एक २ मासकी वृद्धितक पितर यथाक्रम च्छागपार्वतः ॥३॥ तृप्तिको प्राप्त होतेहैं ॥ २५८ ॥ २५९ ॥ ऐणरौरवयाराहशाशैमासर्यथाक्रमम् । खड्गामिपमहाशल्कंमधुमुन्यन्नमेवच । मासवृद्धयाभिवृप्यंतिदत्तरिहपितामहाः ॥ लोहामिपमहाशाकमांसंवा(णसस्यच ।। पद-एणरोरखवागहशाशेःश्मासः ३यथा- पद-खड्गामिषं २ महाशल्कं २ मधु २ क्रमऽ-मासवृद्धया ३ अभितृप्यति ३ दत्तैः३ मुन्यन्नं २ एवs चा लोहामिषं २ महाशाकर इहा-पितामहाः १॥ मांसं २ वाणसस्य ६ च- ।। योजना-हविप्यान्नेन मासं तुपुनः पायसे- यद्ददातिगयास्थश्वसर्वमानंत्यमश्रुते । नं वत्सरं मात्स्यहारिणकारभ्रच्छागपपितः । तथावर्षात्रयोदश्यांमघासुचविशेषतः २६१ ऐणरौरववाराहशाशेः दत्तैः मांसः पितामहाः यथाक्रम-मासवृद्धया अभिवृप्यंति ॥ पद-यत् २ ददाति क्रि-गयास्थः१ च - सर्व २ आनन्त्यं २ अश्रुते क्रि-तथा-वर्षात्र- तात्पर्यार्थ-दविके योग्य तिल व्रीहि योदश्यां ७ मघासु ७ च विशेषतः:- ॥ आदि हविष्यसे पितर एक मासतक तृप्तहो तेहैं-सोई मनुने कहा कि तिल व्रीहि मैं योजना-खड्गामिष महाशल्कं मधु चपुनः उडद जल मूल फल विधिपूर्वक इनके देनेसो | मुन्यन्नं लोहामिषं-महाशाकं-च पुनः वार्धी- मनुष्योंके पितर एकमासतक हप्तहोतेहैं- णसस्य मांसं च पुनः गयास्था तथा वर्षात्र- और गोके दूधसे बनाये पायस (खीर )से योदश्यां च पुनः विशेषतः मघासु यत् ददा- इस वचन अनुसार एक वर्षतक तृप्त ति तत्सर्व अनन्त्यं अश्रुते ॥ होतेहैं और पाठीन आदि भक्षणके योग्य तात्पर्यार्थ-खड्ग (गेंडा )का मांस-महा- मत्स्य हरिण (ताम्रमृग) क्योंकि एण शल्क रूप मत्स्यका मांस-मधु ( सहत) कालामृग और हरिण ताम्रमृग आयुर्वेद में | नीवार आदि मुनियोंके अन्न-लोह ( लाल- कहाहै उरभ्र ( भेड ) शकुन ( पक्षी ) छाग | बकरी)का मांस महाशाक वाणिसका (बकरी) पृषत (चित्रमृग) एण रुरु संबर | मांस (जो यज्ञके कर्ताओं में इस वचनके वराह ( वनका शूकर) शशा (खरगोस )) अनुसार प्रसिद्धहै) कि जो जल तीनसें पोवे पितरोंके निमित्त दिये इनके मांससे पितर अर्थात्-जिसकी जिव्हा और कान जल पीते क्रमसे एक २ मासकी वृद्धितक पितर | हुए जलसे स्पर्श करें-ऐसे निर्बल इंद्रियवाले, तृप्त होतेहैं॥ श्वेत, वृद्ध, बकरीयोंके पति, बकरेको भावार्थ-दविप्यान्नसे मासतक पायससे यज्ञकै कर्ता श्राद्धकर्म, वार्धाणसकहतेहैं. वर्षतक मत्स्य ताम्रमृग भेड वकरी चित्रमृग और चकारसे हरिद्वारआदिमें जो देताहे- और गयामें जाकर जो शाकआदि देताह तिलैवाहियपिद्भिर्मूलफलेनवा । दत्तेन मां- | वह सब अनंत फलका दाता होताहै क्योंकि से प्रपिन्तो विधिवत् पितरो नृणां । २ संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन वा । १ विपिलिदियक्षीणं श्वेत वृद्धमजापतिम् । ३ एणः कृष्णमृगो ज्ञेयस्ताम्रो हरिण उच्यते। वाधीनसंतुतं प्राहुर्याज्ञिका यज्ञकर्मणि ।
आचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १० (१२३) .. यह वचन है कि गंगाद्वार प्रयाग नमिष | ब्रह्मवर्चस्विनःपुत्रान्स्वर्णरौप्येसकुप्यके । पुष्कर अर्बुद सन्निहित-गया-इनमें दिया- जातिश्रेष्टयं सर्वकामानाप्नोतिश्राद्धदः सदा श्राद्ध अक्षय होताह-तैसेही वर्षात्र- योदशी अर्थात् भाद्रपद वदी १३ रोप्ये २ सकुप्यक २ जातिश्रेष्ठयं २ सर्व- पद- ब्रह्मवर्चस्विनः १ पुत्रान् २ स्वर्ण- और विशेषकर मधानक्षत्रयुक्त त्रयो- दशीको जो कुछ दिया जाता है यह सब | कामान् २ आमोति क्रि- श्राद्धदः १ अनंतफलदायी होता है- यद्यपि यहां सदाऽ-॥ मुनियोंके अन्न मांस मधु आदि सब | प्रतिपत्मभृतिप्वेकावर्जयित्वाचतुर्दशीम् । वोंके लिये सामान्यसे श्राद्धयोग दिखाये शख्नेणतुहतायवैतेभ्यस्तत्रप्रदीयते २६४ ॥ हैं तोभी इस वचनेसे पुलस्त्यकी कहीहुई व्यवस्था- आदर करने योग्य है- कि चतुर्दशी २ शस्त्रेण ३तुर-हताः १ ये१वैs- पद-प्रतिपत्प्रभृतिषु एकांरवर्जयित्वाऽ- नीवार आदि-मुनियोंका अन्न जो श्राद्ध योग्य | तेभ्यः ४ तन- प्रदीयते क्रि-॥ कहा वह ब्राह्मणके लिये प्रधान और समग्र फलका दाता है, और जो मांस कहा है यते तो एका चतुर्दशी वर्जयित्वा प्रतिपद- योजना-ये शस्त्रेण हताः तत्र तेभ्यः प्रदी- वह क्षत्रिय वैश्यके लिये प्रधान है और जो मधु (सहत) कहा है वह शूदके लिये प्रभृतिषु श्राद्धदः सदा कन्यां कन्यावेदिनः प्रधान है अब इन तीनोंको छोड़कर जो | पशुन् चपुनः सत्सुतान्- धृतं कृषि चपुनः शास्त्र निषिद्धनही वह और शास्त्रोक्त वास्तुक पुत्रान् सकुप्यके स्वर्णराप्ये जातिश्रेष्ठथं सर्व- वाणिज्यं द्विशफैकशर्फ तथा ब्रह्मवर्चस्विनः आदि वह सब वर्णोको समग्र फलका दाताहे॥ कामान् क्रमेण अवाप्नोति ॥ भावार्थ-गैडेका मांस और महाशल्कका मांस और मधुमुनियोकाअन्न लालबकरीका तात्पर्यार्थ-रूपलक्षणशीलवाली कन्या- मांस समयका शाक वाणिसका मांस रूपलक्षणसे युक्त कन्याके वेदी (जमाई) गयाका श्राद्ध यह सब और भादपदवदी और अजाआदि क्षुद्रपशु सन्मार्गमें और मानक्षत्रयुक्त प्रयोदशीका श्राद्ध यह | वाणिज्य (व्यापार )में लाभ- द्विशफ वर्तनेवाले पुत्र द्यूतकाविजय कृषिकाफल सब अनंत फलका दाता है ॥२६० ॥२६१ ।। (गो आदि) और एक शफ (अश्वआदि) कन्यांकन्यावेदिनश्चपशून्वसत्सुतानपि । पशु वेदके पठन और वेदोक्तकमके कर- द्यूतकृपिंचवाणिज्यविशफकशर्फतथा ॥ | नेसे पैदाहुआ जो ब्रह्मतेज- सुवर्ण चांदी- पद-कन्यां २ कन्यावेदिनः६ च और त्रिपु सीस आदि) कुप्प जातिमें पशून २ वड- सत्सुतान् र अपि- द्यूत २ श्रेष्ठता और स्वर्ग पुत्र पशु आदि संपूर्ण कृषि र चा-- वाणिज्यं २ द्विशकशफं २ कामना- इन कन्या आदि संपूर्णफलोको कृष्ण प्रतिपदासे आमावास्यापर्यन्त चतु- 1 गंगाद्वारे प्रयागे च नैमिषे पुष्कोर्बुदे । सब्रिहि देशीसे वर्जित चौदह 'तिथियोंमें श्राद्धका सोम गगायां श्राद्धमक्षम्यतां यजेत् ॥ दाता क्रमसे प्राप्त होता है क्योंकि चतु- २ मुन्यानं माझगस्योक्त मांसं क्षत्रियवैश्ययोः दशीको जो कोई शस्त्रसे मरहो उनकोही मधु मधानं सदस्य सवा याविरोधि यत् ॥ श्राद्धदं यदि वे ब्राह्मणसे न मरहों क्योंकि तथा॥ 1 (१२४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । यह स्मृति है कि सपिण्डी कियेभी शस्त्रसे- धनवेदान्भिपकसिद्धिंकुप्यं गा अप्यजी- मेरे पिताका एकोद्दिष्ट महालयमें चतुर्दशीको विकम्। अश्वानायुश्च विधिवद्यः श्राद्धं सं पुत्र करें- यहां यह नियम है कि भाद्रपद- प्रयच्छति ॥ २६७ ॥ वदि१४ चतुर्दशीको शस्त्रहतकाही श्राद्ध- करे अन्यको न करें और यह नियमनही पद- धनंर वेदान्२ भिषसिद्धिं २ शस्त्रहतका श्राद्धहो तो चतुर्दशीकोहीहो, कुप्य२ गाः २ अपि- अजाविकंर अमान् तिससे क्षयाह आदिमें शस्त्रहतकाभी श्राद्ध आयु: २ चा विधिवत् - यः १ आदर अद्धाके अनुसार करें भाद्रपदवदी चतुर्दशीको संप्रयच्छति क्रि- करे यह विधि नहीं- यह बात मानने योग्य | कृतिकादिभरण्यंतंसकामानाप्नुयादिमान् ।। है- क्योंकि शौनकको यह स्मृति है कि आस्तिका श्रद्दधानश्वव्यपेतमदमत्सरः ॥ भाद्रपदके कृष्णपक्षमें और माप्तमें २ शस्त्रके इतका श्राद्धकरे ॥ पद- कृत्तिकादिभरण्यन्तं २सः१ कामान् भावार्थ- कन्या जमाई पशु श्रेष्ठपुत्र २ आमुयात् कि-इमान् २ आस्तिकः १ जूआ खेती व्यापारमें लाभ गो अश्व आदि | अद्दधानः १ चा- व्यपेतमदमत्सरः १ ॥ पशु ब्रह्मतेजवाले पुत्र-सुवर्ण चांदी त्रपु योजना-चपुनःआस्तिकःश्रद्धधानःयः (शीश) जातिमें श्रेष्ठता और संपूर्ण कामना कृत्तिकादिभरण्यन्तं विधिवत् श्राद्धं प्रयच्छ- इन चौदह फलोंको चतुर्दशीको छोडकर तिसः इमान् कामान् अवामुयात्-स्वर्ग अ- प्रतिपदा आदि चौदह तिथियों में मनुष्य पत्य- चपुनः- ओजः शौर्य- क्षेत्रं-तथा- प्राप्त होता है- क्योंकि चतुर्दशीको जो | वलं-- पुत्रं- ससौभाग्यं- श्रेष्ठय- समृद्धिं- शस्त्रसेमरे उनकोही श्राद्ध दियाजाता। मुख्यता-शुभं-चपुनःप्रवृत्तचक्रतां वाणिज्य- है ॥ २६२ ॥ २६३ ॥ २६४ ॥ प्रभृतीन् अरोगित्वं- यशः- चीतशोकतां स्वर्गह्यपत्यमोजश्चशौर्यक्षेत्रवलंतथा । परमां गति- धनं- वेदान्- भिषसिद्धि- कुप्यं-गा:- अजाविकं- अश्वान्- आयुः।। पुत्रंश्रेष्ठससौभाग्यंसमृद्धिमुख्यतांशुभं । पद-स्वर्ग २ हि:- अपत्यं २ ओजः २ और श्रद्धावान् और गर्व और ईप्यासे रहित ता० भा०- जो आस्तिक (विश्वासी) चा शार्य २ क्षेत्र २ वलं २ तथा:- पुत्र-जो कृत्तिकासे- भरणीतक श्राद्ध देता है श्रेष्ठयं २ ससौभाग्यं २ समृद्धिं २ मुख्यतार वह कमसे स्वर्ग (अधिक सुख) संतान- शुभं २॥ ओज-(अधिकशक्ति) शौर्य (निर्भयता) प्रवृत्तचक्रतांचैववाणिज्यमभृत्तीनपि । फलवालाक्षेत्र-शरीरमें बल गुणीपुत्र जातिमें- मरोगित्वंयशोवीतशोकतांपरमांगतिम् ।। श्रेष्ठता सोभाग्य (जनोंकाप्यार) धनआदिको पद-प्रवृत्तचक्रतां२ च:- एव:-वाणि- | वृद्धि मुख्यता शुभ-प्रवृत्तचकता (आज्ञाका- ज्यप्रभृतीन् २ अपि:- अरोगित्वं २ यशः२ प्रचार) कृषि कुसीद गोरक्षा आदिवाणिज्य रो- वीतशोकतार परमार गति२ ॥ गका अभाव-यश-शोकका नाश-(अर्थात् इष्ट १ समत्वमागतस्यापि पितुः शन्नहतस्यवे । एको वियोगआदि दुःखकानाश) परमगति (ब्रह्म भदिष्ट पितुः कार्य चतुर्दश्यां महालये। लोककी प्राप्ति ) सुवर्ण आदिधन- ऋग्वेद २ प्रोटरयामपरपक्षे मासि मासि चैवम् । आदिवेद-भिपसिद्धि (औषधके फलकी
आचाराध्याय श्राद्धप्रकरण १०
(१२५)
१
प्राप्ति ) कुप्य (सुवर्णरजतसे भिन्न ताम्रआदि किंतु पिट पितामह प्रपितामहके अधिष्ठाता
धन ) गौअजा (बकरी) अवि (भेड)अश्व वसुरुद्र आदित्य सहितहीका बोध होताहे-
अवस्था (अधिक जीना) क्रमसे इन फलों- जसे देवदत्त आदि शब्दोंसे शरीरमान वा
को प्राप्त होताहे॥२६५।२६६॥२६॥२६८॥ | आत्ममात्रका बोधनहीं होता किंतु शरीर-
वसुरुद्रादितिसुताः पितरः श्राद्धदेवताः
विशिष्ट आत्माका बोध होताहै- इसी
पीणयंतिमनुप्याणांपितृश्राइनतर्पिताः ॥
प्रकार अधिष्ठात् देवताओं सहित देव-
दत्त आदि पितृ आदिशब्दोंसे कहे जाते
पद-वसुरुद्रादितिसुताः पितरः१श्राद्ध- हैं इससे वसुआदि अधिष्ठाता देवता पुन
देवताः१-प्रीणयंतिक्रि-मनुष्याणां ६ पितॄन् | आदिके दिये अन्नपान आदिसे तृप्त हुए
श्राद्धेन३ तर्पिताः १॥
उन देवदत्त आदिको तृप्तकरतेहे जसे माता
आयुः प्रजांधनविद्यास्वर्गमोक्षंसुखानिच । गर्भपोषणके लिये अन्यके दिये दोहद अन्न
प्रयच्छंतितयाराज्यंप्रीतानृणांपितामहाः ॥ पान आदिसे स्वयं भोजन करके तृप्त हुई
अपने उदरमे स्थित बालककोभी तृप्तकरती
पद-आयुः २ प्रजां२ धनं २ विद्यां
स्वर्गर मोक्ष२ सुखानिर चा-प्रयच्छति क्रि-
है और दोहदअन्नके देनेवालोंकोभी प्र-
तथाऽ राज्यं प्रीताः १नृणापितामहाः १॥ त्युपकारका फलदेताहे- तिसीप्रकार वसु
रुद आदित्यही वे पितर पिता पितामह
योजना-आद्धेन तर्पिताः श्राद्धदेवताः । प्रपितामह शब्दसे कहे जातेहैं केवल देवदत्त
वसुरुद्रादितिसुताः पितरः मनुष्याणां पितॄन ही श्राद्धकर्मके संप्रदानरूपनहीं वे स्वयंभोज-
प्रीणयन्ति- तथा प्रीताः नृणां पितामहाः । न किये श्राद्धसे तृप्तहुए मनुष्योंक पितरोंको
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षं तथा राज्यं ज्ञानशक्ति देकर तृप्त करतेहैं-और केवल
प्रयच्छन्ति ॥
पितरोंकोही तृप्त नहीं करते किंतु श्राद्ध
तात्पर्यार्थ-यहांदिये हुये श्राद्धआदिसे मास | करनेवाले मनुष्योंको अवस्था प्रजाधन विद्या
वृद्धिसे पितामह तृप्त होतेहैं इस पूर्वोक्त , स्वर्ग मोक्ष और राज्य इनको प्रसन्न होकर
प्रकारसे पितरोंको तृप्तकही सो ठीक नहीं | मनुष्योंके पितामह देतेहैं और चकारसे
क्योंकी जो अपने २ कर्मवश स्वर्ग नरक शास्त्रमें तहां तहां कहै अन्यफलोंकोंभी देतेहैं।
आदिमें गतहैं उनके पुत्र आदिके दिये
अन्नसे तृप्तिका असंभवह और संभवभी हो-
भावार्य-आद्धप्से तृप्तहुए वसु रुद्र आदि
तोभी स्वयं असमर्थ वे कैसे स्वर्ग आदि फ- श्राद्ध देवता मनुष्योंके पितरोंको तृमकर-
लको देते है इससे यह समाधानहै कि यहां | तेहै और तैसेही प्रसन्न हुए पितामह जनोंको
पित आदि शब्दोंसे श्राद्धकर्ममें संप्रदानरूप आयु- प्रजा-धन-विद्या-स्वर्ग-मोक्ष और
(दानके पात्र) देवदत्त आदि नही समझने राज्य इनको देतेहैं ॥ २६९ ॥ २७० ॥
इति श्राद्धप्रकरणम् ॥१०॥
(१२६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । १ . . अथ गणपतिकल्पप्रकरणम् ११ पद-कापायवाससः२चा-एव:-क्रव्या- दान २ चा-अधिरोहति क्रि-अंत्यजे ३ ग- विनायकः कर्मविघ्नसिद्धयर्यविनियोजितः भैः३ उष्ट्रय सह एकत्र:-अवतिष्ठते क्रि-।। गणानामाधिपत्येचरुद्रेणब्रह्मणातथा २७१ व्रजन्नपितथात्मानंमन्यतेनुमतंपरैः । पद-विनायकः १ कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थ:-वि- विमनाविफलारंभासमीदत्यनिमित्ततः ॥ नियोजितः १ गणानां ६-आधिपत्ये ७च:- पद-व्रजन् १ अपि:-तथा-आत्मानं २ रुद्रेण ३ ब्रह्मणा ३ तथाऽ- ॥ मन्यते क्रि-अनुमतं २ परेः३ विमनाः१विफ- योजना-रुद्रेण तथा ब्रह्मणा कर्मविन लारंभः १ संसीदति क्रि-अनिमित्ततः १॥ सिद्धयर्थ चपुनःगणानां आधिपत्ये विनायकः योजना-यः तेन ( विनायकन) उपसृष्टः विनियोजितः ॥ तस्य लक्षणानि यूयं निबोधत स्वप्न अत्य- ता० भा०-दृष्ट और अदृष्टफलके साधन थे नलं अवगाहतेच पुनः मुण्डान् चपुनः कहे और कहेंगे उनका करना और फ- काषायवाससः पश्यति- चपुनःक्रव्यादान् लकी सिद्धि आविघ्नसे होती है-इससे अवि- अधिरोहति अंत्यजःगर्दभैः उष्ट्रः सह एकत्र के लिये कर्म करनेकी इच्छासे विनके अवितिष्ठते तथा व्रजन् अपि आत्मानं पेरे- कारक हेतु ओंको कहते हैं विनायक इत्यादि लोकसे दोनों प्रकारके हेतुओंका ज्ञान है अनिमित्ततः संसोदति ॥ अनुमतं मन्यते-विमनाः विफलारंभः सन् इससे विनके प्राक् होनेकी पालना और हुए विघ्नके नाशके लिये जानकर करनेवाले ता०भा०-इसप्रकार विनके कर्ता हेतु- प्रवृत्त होते है और रोगही दोनों प्रकारके ओंको कहकर ज्ञापकहेतुओंको कहते हैं-उस विनोंका हेतुहे-विनायक (गणेश) पुरुषा- विनायकसे ग्रहण किये मनुष्यके लक्षणोंको हे थके साधन काँकी विनसिद्धिक लिये मुनियों जाना-फिर मुनियोंका संवोधनशांति अर्थात् विनोंके स्वरूप और फलसाधनके | प्रकरणके प्रारंभार्थजानो-स्वप्नमें अत्यंतजल, नाशार्थ रुद्र ब्रह्मा और चकारसे विष्णुने का अवगाहन ( डूबनातिरना) करताहे और पुष्पदंत आदि गणका अधिपति नियुक्त और मांस भक्षक गीध आदि पक्षी और सिरमुंडे गेरुसे रंगे वस्त्रवालोंको देखताहै- किया ॥२७१ ॥ मृगपर चढताहै-चाण्डालादि गर्दभ ऊंट तेनोपसृष्टीयस्तस्यलक्षणानिनिबोधत । इनके बीचमें बैठताह-और चलताहुआ- स्वप्नवगाहतेत्ययजलंमुंडांश्चपश्यति २७२ भी पीछे दोडते हुए शत्रुओंसे अपनेको तिर- स्कार प्राप्त हुआ देखताहै-और विक्षि- पद-तेन-३-उपसृष्टः श्यतस्तस्य ६ल- सचित्त निष्फल आरंभ हुआ किसीभी क्षणानि २ नियोधत क्रि-स्वप्ने ७ अवगाहते फलको प्राप्त नहीं होता-इससे विनानिमि: कि- अत्यर्थ २ जलं २ मुण्डान् २ चा-प त्त दुखी होताहे अर्थात् कारणके विना दी- श्यति कि- नमन हो जाताहै ॥२७२ ॥२७३ ॥२७४ ॥ कापायवाससश्चैवक्रव्यादांश्चाधिरोहति । तेनोपसृष्टोलभतेनराज्यराजनंदनः । अंत्यजेगर्दभैरुष्ट्रःसहैकत्रावतिष्ठते॥२७३६ कुमारीचनभर्तारमपत्यंगर्भमंगना||२७४ ।
आचाराध्याय गणपतिकल्पमकरण ११ (.१२७) , पद-तेन ३ उपसृष्टः १ लभते कि पद-सर्वोपधैः ३ सर्वगंधैः ३ विलिप्तशि- ना-राज्य २ राजनंदनः १ कुमारी १ चा- रसः ६ तथा भद्रासनोपविष्टस्य ६ स्वस्ति- न भतार २ अपत्यं २ गर्भ २ अंगना ॥ वाच्याः १ द्विजाः२ शुभाः१॥ आचार्यत्वंश्रोत्रियश्चनशिष्योध्ययनंतथा । योजना-तस्य पुण्येन्दि विधिपूर्वकं स्न- वणिग्लाभनचाप्नोतिकृञ्चिापिकृपीवलः ॥ ! पर्न कर्त्तव्यं-साज्येन गौरसर्पपकल्केन पद-आचार्यत्वं २ श्रोत्रियः १ चा-ना- उत्सादितस्य- च पुनः सर्वोषधः सर्वगंधेः 'शिष्यः १ अध्ययनं २ तथाऽ-वणिक् १ विलिप्तशिरसः तथा भद्रासनोपविष्टस्य शुभाः लाभं २ ना-बा-आप्नोति-क्रि-कृषिर चs- द्विजाः स्वस्तिवाच्याः कर्तव्याः ॥ अपि-कृपीवल: १॥ ता० भा०-इस प्रकार कारक और ज्ञा- योजना-तेन उपसृष्टः राजनंदनः राज्यं पक हेतुओंको कहकर विभशान्तिका कर्म न लभते-कुमारी भर्तारं अंगना अपत्यं गर्भ, कहते हैं- उस विनायकसे उपसृष्टको अ- श्रोत्रियःआचार्यत्वं च पुनः शिष्यः अध्यय- थवा विनायक उपसर्गकी निवृत्तिके अभि- नं-तथा-वणिक् लाभं च पुनः कृषीवल: लापी मनुष्यको अनुकूल नक्षत्र आदि दि- कृर्षि न आप्नोति ॥ नमें विधिसे स्नान करना वह विधि यह है ता० भा-विनायकसे युक्त-राजनंदन कि गौर सरसोंके चूनमें घी मिलाकर उ- (राजपुन ) राज्यको प्राप्त नही होता चाहै | वटना कर और प्रियंगु नागकेशर आदि वह विद्या शूरवीरता धैर्य आदि गुणांसे युः । सर्वोषधि और चंदन अगर आदि सर्व .ग- क्तहो, रूप लक्षण आदिसे युक्तभी कुमारी | धोंसे शिरको लीपकर-और भद्रासन (जो पतिको, और गर्भिणी स्त्री संतानको, और आगे कहेंगे )पर बैठाकर वेदाध्ययनसे ऋतुमती स्त्री गर्भको, और पठन और अ- युक्त सुंदर चार ब्राह्मण स्वस्तिवाचन करें- र्थका ज्ञाताभी वेदपाठी आचार्यत्वको, और उसी समय गृह्योक्त मंत्रसे पुण्याह- और विनय और आचारसे युक्तभी शिप्य वाचन करें ।। २७७ ॥ २७८ ॥ पढनेको-और वणिक् (वैश्य ) लाभ (नफे) अश्वस्थानाद्गजस्थानादल्मीकासंगमाह- को, और किशान कृषिके फलको प्राप्त नहीं होता-इसी प्रकार जो मनुष्य जिस वृत्तिस दात् ।मृत्तिकारोचनांगंधान्गुग्गुलुंचाप्सुनि जीता हो वह विघ्नेश्वरसे युक्त होने से उसके क्षिपेत् ॥ २७९ ॥ आरंभमें निष्फल समझना ॥२७५॥२७६॥ सपनंतस्यकर्तव्यं पुण्यतिविधिपूर्वकम् । पद-अश्वस्थानात् ५ गजस्थानात् ५व- ल्मीकात् ५ संगमात् ५हदात् ५मृचिकार गौरसर्पपकल्केनसाज्येनोत्सादितस्यच ॥ पेचनां २ गंधान २ गुग्गुलु २ च-अप्सु पद-नपनं १ तस्य ६ कर्तव्य १ पुण्ये- निक्षिपेत् क्रि-॥ हि ७ विधिपूर्वकं २ गौरसर्वपकल्केन ३ साज्येन ३ उत्सादितस्य ६ चा-॥ यामाहृता कवर्णश्चतुर्भिःकलशहदांत । सर्वोपधैः सर्वगंधदिलिप्तशिरसस्तया । चर्मण्यानडुहेरक्तस्याप्यंभद्रासनंतत:२८० भद्रासनोपविष्टस्यस्वस्तिवाच्याद्विजाः पद-याः १ आहृताः १ एकवर्गः ३च- शुभाः ॥ २७८ ॥ तुभिः ३ कलशः३हदात् ५ चणि७ आ- (१२८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । नड्डहे ७ रक्ते ७ स्थाप्यं १ भद्रासनं १ हागिन रूप, सुवेषवाली स्त्रियोंके मंगल ततः-॥ करनेके अनंतर पूर्व दिशाके कलशको ले- योजना-अश्वस्थानात् गजस्थानात् व- कर गुरु इस मंत्रसे अभिषेक कर कि सह ल्मीकात् संगमात् तथा हृदात् मृत्तिकां साक्ष अनेक शक्तिवाला-शतधार ( अनेक आनीय रोचनां च पुनः गुग्गुलं गंधान् प्रवाहवाला) जो जल ऋषियोंने पवित्र कि- तासु अप्सु निक्षिपेत्-याः आपः एकवणैः च-याहै-उस जलसे विनायकके उपसर्ग तुर्भिः कलशैः हृदात् आहृताःततः आनडहे शांत्यर्थ-तेरा भाभिषेक करताहूं-ये पवित्र रक्त चर्मणि भद्रासनं स्थाप्यं ॥ जल तुझे पवित्र करो-फिर दक्षिण दिशामें ता०भा०-अश्व हाथी वमि नदीयोंका से रखे दूसरे कलशको लेकर इस मं- गम इनसे लाई पांच प्रकारकी मट्टी गोरोचन से साँच-कि ॥ २८१ ।। गुग्गुलु गंध इनको उन जलोंमें डाल जो भगतेवरुणोराजाभगंसूर्योवृहस्पतिः । एक वर्णके चार कलशोंमें द्वद (कुण्ड )से | भगमिंद्रश्चवायुश्चभगंसप्तर्षयोददुः २८२ भरकै लाये हों-फिर चलके लाल उस चर्म- पर जिसकी उत्तर दिशाम लोम-और पूर्व- पद-भगं २ ते ४ वरुणः १ गजा भगर को ग्रीवाहो मनोरम श्रीपीसे बनाए आसन- | सूर्यः १ बृहस्पतिः १ भगं २ इंद्रः १ चा- का स्थापन करे फिर पूर्वोक्त मृत्तिका | वायुः१ च- भगं २ सप्तर्षयः१ददुः क्रि- ॥ आदि सहित आमके पत्ते अनेक प्रकारकी योजना-वरुणः राजा ते तुभ्यं भगं-सूर्यो माला चंदन नवीन वस्त्रसे शोभित रन बृहस्पतिः ते भगं इद्रः च पुनः वायुः सप्त- घटोको पूर्वआदि चार दिशाओंमे स्थापन | पयः ते तुभ्यं भगं ददुः ॥ करके शुद्ध और लिप स्थंटिलमें रचे पां ताः भा०-राजा वरुण सूर्य बृहस्पति इंद्र च वर्ण स्वस्तिक पर लाल बलको चर्म- | वायु और सप्तर्षि तुझे कल्याण दो फिर ती- को पूर्वोक्त प्रकारसे पिटाकर उसके ऊपर- सरे कलशको लेकर इस मंत्रसे साँचे कि । श्वेत वस्त्रसे के आसनको स्थापन कर यत्तेकेशेपुदौर्भाग्यसीमंतेयञ्चमूर्धनि। लला- इसकोही भद्रासन कहते हैं इसपर पेठ यजमा- नको ब्राह्मण स्वस्तिवाचन कर।।२७२॥२८॥ टेकर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्नंतुसर्वदा ॥२८३॥ सहस्रारंशतधारमृपिभिः पावनंकृतम् । पद- यत् १ ते ६केशेषु दोभाग्यश्सी- मंते यत्र च-मुनि ललाट कर्णयोः तेनत्वामभिपिचामिपावमान्यः पुनंतुते ॥ अक्ष्णो: आपः१ तदनंतु क्रि-सर्वदा।। पद-सहस्राक्षं १ शतधारं १ प्रपिभिः ३ योजना- ते केशेषु-सीमंते यत् दोभाग्य पावनं १ कृतं १ तेन ३ त्वां २ अभिषि- अस्ति यत् सामंतेच पुनः मूनि ललाटे चामि फि-पारमान्यः १ पुनंतु फ्रि-ते ६॥ कर्णयोः अक्षणीः अस्ति तत् आपः स- योजना- सहस्ताक्ष- शतधारं ऋषिभिः धंदा मंतु ॥ पावनं गृतं यजलं तेन त्वां अमिर्पिचामि -तरे कशाम भोर सीमंत पारमान्यः कः ते (त्वां) पुनंतु ।। मस्तक ललाटमार्ण भार नेत्रमि गो दोभाग्य ता. भाल-स्वस्तिवाचनक अनंतर सु-(भरल्याग) रस समको ये जल शांत ताभाऊ- आचाराध्याय गणपतिकल्पप्रकरण ११ (१२१) करो फिर चाये कलशको लेकर पूर्वोक्त पुप्पंचित्रंसुगंधंचसुरांचत्रिविधामपि । तीनों मंत्री अभिषेक करै क्योंकि इसे मूलकंपूरिकापूर्वतयैवोडेरकस्रजः॥२८॥ मंत्रमें यही लिखा कि सब मंत्रोंको पढकर चौथे घटसे अभिषेक करें ।। ३८३ ।। पद-पुप्पर चित्र२ सुगंध२ चा सुरांर च-त्रिविधांर अपिठ-मूलकर परिकापूपर सातस्यसातलं वेणोद्वरेणतु । तथाऽ-एवा-उण्डेरकस्रजः२॥ जुहुयान्मूर्धनिकुशान्सव्पेनपरिगृह्यतु २८५ दध्यनंपायसंचैवगुडपिष्टंसमोदकम् । पद- नातस्य सार्पपर तेलंर सुवेण ३ एतान्सर्वान्समाहत्यभूमौकृत्वाततःशिरः ।। औदुम्बरेण तु: जुहुयात कि-मूर्धनि ७ कु- शान् २ सव्यन३ परिगृह्या-तु:- ॥ पद-दध्यन्नरपायसंरच-एव:-गुडपिष्टं २ योजना- नातस्य मूनि सव्येन कु- समोदकरतानरसर्वानर समाहृत्य -भूमो शानू परिगृह्य औदुम्बरेण सुवेण साप तैलं कृत्वाऽ-ततः:-शिरः २ ॥ तुपुनः सव्येन कुशान् परिगृह्य जुहुयात् ॥ विनायकस्पजननीमुपतिष्ठत्तताबिकाम् । ता० भा०- उक्त प्रकारसे कियाहे अ- दुर्वासर्पपपुप्पाणांदत्यायपूर्णमंजलिम् ॥ भिषेक जिसका ऐसे यजमानके उस मस्त पद- विनायकस्य ६ जननौर उपतिष्ठेतू कपर जो सव्य (वाम ) हाथसें पकडी कु- | कि- ततः- अविकार दूर्वासर्पपपुष्पाणार शाओंसे ढकाहो मूलरके स्रुवेसे सरसोंके | दत्वाऽ- अयर पूर्ण२ अंजलिं२॥ तेलको वक्ष्यमाण मंत्रोंसे डाले ॥ २८४॥ योजना-- अन्ते स्वाहासमन्वितैः मितः मितश्चसमितश्चैवतथाशालकटकटौ । | समितः तथा शालकटंकटो कूश्मांडः राज- कुश्मांडोराजपुत्रश्चेत्यंतेस्वाहासमन्वितैः॥ | पुत्रः इति विनायकस्य नामभिः जुहुयात् पद- मितः१ च संमितः१ च एव:- बलिमः ( बलिमंत्ररूपः) दशलोकपालेभ्यः चपुनः हुतशेष नमस्कारसमन्वितः नामाभिः तथाऽ-शालकटकटीर फूश्मांडः१ राजपुत्रः दद्यात्ततः शिरः भूमौ कृत्वा कृताकृतान् तं- १चा- इति:- अन्ते स्वाहासमन्वितैः ३॥ दुलान् पललौदनं पक्वान् तथाआमान् मत्स्या- नामभिलिमंत्रेश्चनमस्कारसमन्वितैः । न् तुपुनः एतावदेवमांसं-सुगंधचित्रं पुष्प-चपु- दद्याचतुप्पयेशूपेंकुशानास्तीर्यसर्वतः२८६ नत्रिविधांअपिसुरा-मूलक-पूरिकापूपत्तथाउ- पद- नामभिः ३ बलिमंत्रैः३ चा- नम- ण्हेरकस्रजः दध्यन्न-चपुनः पायसं समोदकं स्कारसमन्वितेः ३ दद्यात् क्रि-चतुप्पथे ७ | गुडपिष्टं एतान् सर्वान समाहत्य सर्वतः शू कुशान् आस्तीर्य चतुष्पथे दद्यात् ततः शूर्प ७ कुशान २ आस्तीर्य:-सर्वतः-॥ दुर्वासर्पपपुप्पाणां पूर्ण अंगलिं दत्वा विनाय- कुत्ताकृतास्तदुलांश्चपललौदनमेवच । कस्य जननी अम्बिका उपतिष्ठेत् ॥ मत्स्यान्पकांस्तथैवामान्मांसमेतावदेवतु ॥ तात्पर्याय- स्वाहा शब्द जिनके अंतमें पद- कृताकृतान् तन्दुलान् च-पल- | और कार भादिमें हो ऐसे विनायकके लौदनर एव-च-मत्स्यानरपक्वान्तथा:- | मित संमित आदि नामोंसे होमकर-स्वाहा एव:-आमानरमांसर एतावत एव:- च-1 | शब्दके योगमें चतुर्थी होतीहै इससे मि- याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । तायस्वाहा इत्यादिछः मंत्र सिद्ध होतेहैं-इस- | पाप-शत्रु मेरै नहों और तृप्तहुए भूतप्रेत के अनंतर.लौकिक अग्निमें स्थालोपाककी आदि सब सुखदायी ओर सौम्यहो- विधिसे चरुको पकाकर इन पूर्वोक्त छः ६ एकवार छडे हुए तन्दुलोंको कृताकृत मंत्रोंसेही तिसी अनिमें होमकरे फिर उस | कहतेहैं-- पलल (तिलकी पिट्ठी )से मिले होमके शेष अन्नकी नमःशब्दसे अन्वित ओदनको पललोदन कहतेहैं पके और (युक्त) चतुर्थी विभक्ति जिनके अंतमें हो ऐस | विनापके मत्स्य-और विनापका मांस बलिके मंत्ररूप इंद्र-अमि-यम-निति-वरुण- | रक्त पीत आदि नाना प्रकारके पुप्प और वायुसोम-ईशान-ब्रह्मा-अनंत- इनके ना- चंदन आदि सुंगधिवाला द्रव्य-ओर गौडी- माँसे इन पूर्वोक्त देवताओंको बलिदे-इसके माध्वी-पेष्टी तीन प्रकारकी मदिरा मूलक अनंतर क्या करे इस अपेक्षासे कहतेहैं कि (मूली) पूरीपूए उण्डेरक माला अर्थात् कृताकृत तंदुल आदि बलिक समूहको पिरोहीहुई पिट्टीकी माला-दही मिला अन्न विनायक और उसकी माताको देकर और पायस (खीर) गुढपिष्ट अर्थात् गुडमिली भूमिपर शिरको रखकर इन दो मंत्रोंको पढ- शाली आदिकी पिट्टी मोदक (लड्डू) इन कर विनायक और अंविकाको नमस्कार सबको देकर विनायककी जननी अंबिकाको करे फिर बलिसे शेष बचे अन्नको पिाई | दुर्वा पुष्प सर्पपकी पूर्ण अंजलिसे जल देकर हुइ कुशाओंपर रखके सूपमें रखकर चौ- इन मंत्रोंसे स्तुति करे । राहेमेंदे-और कहकि ये देवता बलिको ग्रहण भावार्थ-अंतमें स्वाहासे युक्त मित करो कि आदित्य- वसु- मरुत्- अश्विनीकु- समित शाल कटकट कूश्मांड राजपुत्र मार-रुद्र- सुपर्ण- पन्नग-ग्रह-असुर-या- इन नामोंसे और नमस्कारसे युक्त ब- तुधान-पिशाच-उरग-मातर-शाकिनी-यक्ष- वैताल-योगिनी-पूतना-शिवा-मुंभक-सिद्ध में सूपके ऊपर कुशा रखकर पके और लिके मंत्रोंसे होमकरे फिर चतुःपथ- गंधर्व-माया-विद्याधर-नर-दिक्पाल-लोकपा- ल-विघ्नविनायक-और जगत्की शान्तिक विनापक तंडुल-पललोदन-पके और विना कर्ता ब्रह्मा आदि महर्षि-तृप्त हो और विन पके मरस्य और मांस अनेक रंगके पुप्प सुगंध और तीनप्रकारको मदिरा मूली पूरी १मतायस्वाहा-समिता ॐशालाय. अपूप-सूतमें पुयेही मिट्टीको माला-दही कटफटा० कूश्मांदा० राजपुत्रायस्वाहा । २ तत्पुरुषाय विप्रहे वक्रतुंडाय धीमहि । तन्नोदंती | मिला अन्न-पायस (खीर ) गुड मिली पिट्टी प्रचोदयात्-सुभगाये विद्महे सुमालिन्यै धीमहि तन्नोगौरी । मोदक इन सबको पूर्वोक्त सूपमें रखकर और भूमिमें शिरको टेककर और दूसरसों ३ बलिं गृहीत्वमे देवा आदित्या वसवस्तया । पुष्पोंसे भरी अंजलिसे अर्घ्य देकर विनाय- मरुतधाश्विनी कदाः सुपीः पन्नगा प्रहाःअसुरा धातु- ककी माता अंबिकाकी इन मंत्रोंसे स्तुति धानाथ पिशाचोरगमातरः । शाकिन्यो यक्षवेतालाः | करेकि॥२०५।२८६।२८१२८८।२८९।२९० योगिन्यः पतनाः शिवाःाजुम्भकाः सिद्धगधर्वो माया रूपंदेहियशोदेहिभगंभवतिदेहिमे । विद्याधरा नराः । दिक्पाला लोकपालाश्च पेच विन्न विनायकाः ॥ जगतां शांतिकारो प्रमाद्याश्च मह- पुत्रान्देहिधनंदेहिसर्वकामांश्चदेहिमे २९१ श्रयः। माविमाचरेत्तापं मा सन्तु परिपथिनः ।। पद-रूपं २ देहि क्रियशः२ देहि कि- मोम्या भवंतु सप्ताव भूतप्रेताः सुखावहाः । भगं २ भवति १ देहि कि-मे ४ पुत्रान् २ प्रचोदयात् ।
आचाराध्याय गणपतिकल्पमकरण ११ (११) देहि क्रि- धनं २ देहि क्रि- सर्वकामान् २ स्तुतिकर-और आचार्य बलिके शेषको भू- 'चा देहि क्रि-मे ४॥ मिमें रखकर और शिरको भूमिमे झुकाकर ततः शुक्लांबरधरः शुफमाल्यानुलेपनः । चौराहेमें रखदे फिर यजमान गुरुको दक्षिणा ब्राह्मणाम्भोजयेद्दद्यादत्रयुग्मंगुरोरपि ॥ और दोवस्त्र दे और ब्राह्मणभोजन करावे- भावार्य-हे भगवति मुझे रूप यश ऐश्वर्य पद्-ततः- शुक्लांबरधरः १ शुक्लमा- पुत्र धन और संपूर्ण कामनादे फिर शुङ्गा- ल्यानुलेपनः १ ब्राह्मणान् २ भोजयेत् क्रि- वस्त्र धारण किये और शुक्माला और चंदन दद्यात् क्रि-वस्त्रयुग्मं २ गुणेः ६ अपि:-॥ योजना हे भवति रूपंदेहि मे (मा) गुरुको दो वस्त्रदे ॥ २९१ । २९२ ॥ लगाकर ब्राह्मणोंको भोजन करावे ओर यशः देहि-भगंदोह- पुनान्दहि-धनं देहि- इति विनायकसान विधिः चपुनः सर्वान् कामान् मेदेहि-ततः शुक्लायर- एवंविनायकंपूज्यग्रहांश्चैवविधानतः । धरः शुक्लमाल्यानुलेपनः यजमानः ब्राह्मणान् कर्मणांफलमानोतिश्रियंचामोत्यनुत्तमाम् भोजयेत् गुरोः अपि वस्त्रयुग्मं दद्यात् ।। तात्पर्याय-हे भवति (पूजने योग्य) मुझे पद-एवं-विनायकं २ पूज्य - महान् २ रूप यश ऐश्वर्य पुत्र संपूर्ण कामना धन दे-पोति क्रिश्रियं २ चा-एवं-अनुत्तमा २ ॥ चा-एव:-विधानतः कर्मणां ६ फलं२ आ- यह स्तुतिका मंत्र है-विनायककी स्तुतिमें है भवतिको जगे हे भगवन् कई-फिर अभिषे- योजना-एवं विनायकं चपुनःमहान संपूज्य कके अनंतर यजमान शुषलवस्त्र और शुक्ल- कर्मणां फलं चपुनः अनुत्तमाश्रियं आमोति।। ताभार- इस उक्त कारसे विनायक और विधिसे ग्रहोंकी पूजा करके कमाके फल और सर्वोत्तम लक्ष्मीको प्राप्त होता है यहां ग्रहपूजा इस लिये कही है कि महपी- दोवस्त्रदे और अपिशब्दसे ब्राह्मणोंकीभी य. थाशक्ति भोजनको दक्षिणादे-इसके प्रयोगका डाओंको शान्ति और लक्ष्मीकी कामना लिये ग्रहपीडाको आगे कहगे २९३ ।। यह क्रम है कि मंत्रका ज्ञाता और उक्तलक्षण गुरु चार ब्राह्मणों सहित भद्रासनकी रचनाके आदित्यस्यसदापूनांतिलकंस्वामिनस्तया अनंतर भद्रासनके समीप विनायक और महागणपतेश्चैवकुर्वन्सिद्धिमवाप्नुयात् २९४ इसकी मातांका उक्त मंत्रोंसे पूजन करके पद-मादित्यस्य ६ सदाऽ- पूजां २ और चरुको पकाकर ओर भद्रासनपर बैठे तिलकं २ स्वामिनः६ तपा-महागणपतेः७ यजमानका पुण्याहवाचन और चार कल- । चा-एवा-फुर्वन् सिद्धि मावामुयात् कि-॥ शोसे अभिषेक करके और उसके शिरपर। योजना-आदित्यस्य सदा पूजां चपुनः शिरसांके तेलको डालकर और चरुको तिलक तथा स्वामिनःपूजां चपुनः मागण होमकर-अभिषेक शालाकी चारों दिशाओमें पतेः पूनां कुर्वन् सिद्धि भवाप्नुयात् ।। इंदादिदेवताओंको बलिदे- यजमान तो। ताम्भाः-सूर्यकारक्तचंदन कुंकुम आदिसे खानके अनंतर शुलमाला और पस्रोंको पूजा आर स्कंदकी और महागणपतिको धारणकर गुरु सहित विनायक और अंपि- नित्य पूजा मार इन सबका तिलक करता फाको भेटदेकर और भूमिमे शिरको लगा- मनुष्य आत्मज्ञानद्वारा सिद्धि (मोक्ष) 1 को प्राप्त होता है ।। २९४ ।। कर पुसमलसे अर्घ्य और वसिरसोंकी अनलि देकर विनायक और भषिकाको इति महागणपतिकल्पः॥११॥ - - (१३२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथ ग्रहशान्तिप्रकरणम् १२ स्ववर्ण पटेलेख्यागधैर्मडलकेपुवा । ययावर्णपदेयानिवासांसिकुसुमानिय२९८ श्रीकामः शांतिकामोवाग्रहयज्ञसमाचरेत् । पद-स्ववर्गः३वाऽ-पटे लेख्या:गंधैः३ वृष्टयायुःपुष्टिकामोवातथैवाभिचरन्नपि । मंडलकेषु ७ वाऽ- यथावर्ण:- प्रदेयानि १ पद-श्रीकामः १ शांतिकामः १ वा-ग्रह- | वासांसि १ कुसुमानि १ च-|| यज्ञं २ समाचरेत् क्रि-वृष्टयायुःपुष्टिकामः गंधश्चवलयश्चैवधूपोदेयश्चगुग्गुलुः । १ वा-तथा-एवं-अभिचरन् १ अपि:- ॥ | कर्तव्यामंत्रवंतश्वचरवामतिदेवतम् २९९॥ योजना-श्रीकामः वा शांतिकामः वृष्टया पद-गंधः १ च वलयः १ चा-एव:- यु:पुष्टिकामः तथा अभिचरन् अपि ग्रह- धूपः १ देयः १ च:-गुग्गुलुः १ कर्तव्याः १ यज्ञं समाचरेत् ॥ मंत्रवन्तः १च:- चरवः १ प्रतिदैवतम् २॥ ता० भा०-अब ग्रहपूजाके अन्यभी फ- योजना-ताम्रकात् स्फाटिकात् रक्तचंद- ल कहते हैं लक्ष्मी दुःखकी शांति और नात् स्वर्णकात् उभी राजतात्-अयसः सी- सस्यकी वृद्धिके लिये वृष्टि अवस्था निरोग | सात् कांस्यात् ग्रहाः कमात् कार्याः-स्वव- शरीर इन सबकी कामना करनेवाला और वासांसि चपुनः कुसुमानि प्रदेयानि-गंधः चपु- ः वागंधैः पटे वा मंडलकेषु लेख्याः यथावर्ण अभिचार ( परपीडा )का अभिलाषी मनुष्य | नः वलयः चपुनः गुग्गुलुः धूपः देयः चपुनः ग्रहयज्ञको करे ॥ २९५॥ | प्रतिदैवतं मंत्रवन्तः चरवः कर्तव्याः ॥ सूर्यः सोमोमहीपुत्रः सोमपुत्रीबृहस्पतिः । तात्पर्यार्थ-सूर्य आदिनव ग्रहोंकी मूर्ति- शुक्रः शनैश्चरोराहुः केतुश्चेतिग्रहाः स्मृताः तांबा स्फटिक रक्तचंदन सुवर्ण सुवर्ण चांदी लोहा सीसा कांसी इनकी क्रमसे बनावावे-ये पद-सूर्यः१ सोमः१ महीपुत्रः१सोमपुत्रः१ न मिलेंतो अपने.२ वर्णसे वस्त्रके ऊपर-वा बृहस्पतिः १ शुक्रः १ शनेश्वरः १ राहुः १ रक्तचंदन आदि गंधासे मंडलम लिखने और केतुः १ चा-इति:- ग्रहाः १ स्मृताः१॥ | इनके दोभुजा आदि विशेष मत्स्यपुराणमें योजना-सूर्यः सोमः महीपुनः सोम १ पद्मासनः पद्मकरः पद्मगर्भसमद्यतिः । सप्ताश्वर- पुत्रः बृहस्पतिः शुक्रः शनेश्वरः राहुः | घसंस्थश्च द्विभुजः स्यात्सदा रविः ॥ श्वेतः श्वेतांवरधरी केतुः इति नवग्रहाः स्मृताः॥ दशाश्वः श्वेतभूषणः।गदापाणिविाहुश्च कर्तव्यो वरदः ता०भा०-सूर्य सोम मंगल बुध बृहस्पति। शशी ॥ रक्तमाल्यांबरधरः शक्तिशूलगदाधरः । चतुर्भु- शुक्र शनैश्चर राहु केतु ये नवग्रह कहे हैं । जो मेषगमः वरदः स्याद्धरासुतः ॥ पीतमाल्यांवरधरः कर्णिकारसमद्युतिः । सडचर्मगदापाणिः सिंहस्यो ताम्रकात्स्फाटिकाद्रक्तचंदनात्स्वर्णकादुभौ वरदो धादेिवदैत्यगुरू तद्वपीतश्वेती चतुर्भुजी। दंडि- राजतादयसः सीसात्कांस्यात्कार्यामहाः नौ वरदी कार्यों साक्षसूत्रकमंडलू ॥ इदनीलद्युतिः कमात्॥ २९७॥ शूली वरदो एप्रवाहनः । वाणयाणासनधरः कर्त- व्योर्फमुतः सदा॥ करालवदनः खड्नचर्मशूली परमदः । पद-ताम्रकात् ५ स्फाटिकात् ५ रक्तचं- नीलः सिंहासनस्यश्व राहुरत्र प्रशस्यते॥ धूमा द्विपाइवः दनात् ५ स्वर्णकात् ५ उभो १ राजतात् ५ सर्वे गदिनो विकताननाः। प्रभासनगता नित्य केतवः अयसः ५ सीसात् ५ कांस्यात् ५ कार्याः १ स्युर्वरप्रदाः ॥ सर्वे किरीटिनः कार्या प्रहा लोकहिता- ग्रहाः १क्रमात् ५॥ वहाः । स्वांगुलेनौच्छूिताः सर्वे शतमोत्तरं सदा ।
आचाराध्याय ग्रहशान्तिप्रकरण १२ (१३३) कहे जानने कि सूर्यका पद्मके समान आसन और देवता २ के प्रति चारर मुष्टि चरुइस और हाथहें और पद्मके गर्भको तुल्य कांतिहै | मंत्रसे देनी और अग्निस्थापन अन्वाधान सात अश्ववाले रथसे युक्त है और दोभुजा- पूर्वक चरु बनावनाकर भली प्रकार प्रज्व- और चंद्रमा श्वेतवस्त्रधारी दश अश्व- लित अग्निमें इध्मका आधान आदि आधा- वाला-श्वेतभूषण-गदा हाथमें जिसके ऐसा | संत कर्म करके आदित्य आदिके निमित्त बनाना-और मंगल रक्तपुष्प और रक्तवस्त्र- क्रमसे वक्ष्यमाण मंत्र औरवक्ष्यमाण प्रकारले धारी-शक्तिशूलगदाधारी चतुर्भुजी मेषवाह- होमकर चरुओंका होमकर ॥ न-वरका दाता होताहै-और बुध पीतमाला भावार्थ-तांबा-स्फटिक रक्तचंदन-सुवर्ण- और पीतवस्त्रका धारी-कनेरके समान कां- सुवर्ण-चांदी-लोहा-सीसा-कांती इनके क्रमसे ति-खड्गचर्म गदा जिसके हाथमें-सिंहवाहन- ग्रह बनावे-अथवा अपने २ वर्णके या गंधसे वरका दाता है-देवता-और दैत्योंके गुरु वस्त्र और मंडल में लिखने और वर्णके अनु- वृहस्पति और शुक्र पीत श्वेत चतुर्भुजी- | सारही वस्त्र और देने-गंध-वली-गुग्गुलुका दंडधारी और अक्षसूत्र कमंडलुके धारी क्रमसे धूप देना और देवता के प्रतिमंबासे चरु बनाने और शनैश्चर इंद्रनील मणिके समान बनाने ॥ २९७ ॥ २९८ ॥ २९९ ।। कांति-शूलधारी-वरका दाता-गीधवाहन बाण आकृष्णेनइमंदेवामनिर्पादिवाककुन् । और धनुषधारी-सदैव करना-और पहु करालमुख-खड्गचर्म शूलधारी-वरका दाता- उद्बुध्यस्वेतिचऋचोयथासंख्यप्रकीर्तिताः।। नीलरंग-सिंहासनपर स्थित करना कहाई पद-आकृष्णेन ३ इमंदेवा १ अग्निद्धी- और केतु-धूम्नरंग-दोमुजा-गदाधारी-वि-- दिवःककुत् १ उद्बुद्धयस्त्र इति:-च-नाचा कृतमुख-गीधवाहनपर स्थित वरके दाता १ यथासंख्य:- प्रकीर्तिताः १ ॥ कईई-और जगत्के हितकारी सब ग्रहोंके बृहस्पतेअतियदर्यस्तयवान्नात्परिघुतः । मुकुट बनाने और अपने अंगुलसे ऊंचें अष्ट शनोदेवीस्तयाकांडारकेतुंग्वनिमांस्तया उत्तर सो बनाने और इनके स्थापनका देश- भी वहांही कहा कि मध्यमें सूर्य-दक्षिणमें पद-वृहस्पतेअतियदर्यः १ तथा:-एव:- मंगल-उत्तर, पृहस्पति- पूर्वोत्तरमें बुध- अन्नात्परिमृतः १ शन्नोदेवीः १ तथा कां- पूर्वमें शुक्र-दक्षिणपूर्वमें चंद्रमा पनिममें डात् ५ केतुकृण्वन् १ इमान २ तथा:- ॥ शनैश्वर-पश्चिमदक्षिणमें राहु-पश्चिमउत्तरमें योजना-आकृष्णेन-इमंदेवाः-अनिर्मदा- केतुका-श्वेत चावलोंसे स्थापन करे-अव उद्बुद्ध्यस्व इतिऋचः पृहस्पते अतियदर्यः- पूजाकी विधिको कहते हैं-जिस प्रहका जो तथैव अन्नात्सरिसुतः तथा शन्नोदेवीः काण्डा- रगहै उसी वर्णके गध वस्त्र पुम देने और त्-केतुं कृण्वन् तथा इमान् मंत्रान् महागां बली देनी और धूप सबको गुग्गुलुकी देनी- | यथासंख्यं विदुः ।। ताभा०- आकृगेनरजसावर्तमान इ. १ मध्ये तु भारफा विशमोहित दक्षिणे नतु ।उत्त- त्यादि वेदोक्त नौ मंत्र सूर्य आदि ग्रहोंक रेण गुरुं विवादा तोतरेण तु । पूर्वेग मा विश- ! क्रमसे जानने ॥ ३०० ॥ ३०१ ॥ रसो दक्षिण पश्चिमेन शनि विवादा पशिम १ धनुरयतरो मुद्यः निगम वा ! राहतारिनोतरतः पेतु साया तह निर्वामि।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अर्क पलाशाखदिरअपामागीयपिप्पलः। पद-दद्यात् कि-महकमात् ५ एव:- औदुंबरःशमीदूकुशाश्चसमिधःक्रमात् ॥ द्विजेभ्यः भोजनं २ द्विजः १ शक्तितः:- वाऽ-यथालाभं-सत्कृत्या-विधिपूर्वकं- पद-अर्कः १ पलाशः १ खदिरः१अपा- मार्गः १ अथ - पिप्पलः १ औदुम्बरः १ योजना-द्विजः ग्रहकमात् गुर्डीदनं चपुनः शमी १ दूर्वा १ कुशाः १ च समिधः १ पूर्ण मांसं चपुनः चित्रान्नं एतानि शक्तितः पायसं हविष्यं क्षीरषाष्टिकं दध्योदनं इवि-- क्रमात् ॥ ५॥ -योजना-अर्कःपलाशःखदिरः अपामार्गः यथालाभं विधिपूर्वकं सत्कृत्य द्विजेभ्यःभोजनं दद्यात् ॥ अथ पिप्पल औदुम्बरःशमी दूर्वा चपुनःकुशाः ता०भा०-गुडसे मिश्रित ओदन (भात) समिधःएताःक्रमात् ग्रहाणां समिधो भवंति॥ पायस हविष्य (मुनियोंका अन्न) दुग्धसे ता०भा०-आक ढाक खैर ओंगा पीपल मिश्रित साठी चावलोंका ओदन-दध्योदन गूलर शमी (छोंकर) दूव और कुशा ये क्रमसे (दहीसे मिला भात) हविः (घृतमिश्रित सूर्य आदि ग्रहोंकी समिध होतीहै और वे भात ) चूर्ण ( तिलोंके चूर्णसे मिश्रित गीली विनाटूटी और त्वचा सहित प्रादेश- ओदन) मांस अर्थात् भक्षण करने योग्य मात्र लेनी ॥ ३०२॥ मांससे मिलाहुआ ओदन-चित्रोदन (अने- एकैकस्य त्वष्टशतमष्टाविंशतिरेव च । क वर्णका भात ) ये गुडौदन आदि संपूर्ण होतव्यामधुसर्पिभ्यदिनाक्षीरेणवायुत्ताः ॥ क्रमसे सूर्य आदि ग्रहोंके उद्देशसे ब्राह्म- णोंको भोजनके लिये दे-ब्राह्मणोंकी संख्या पद-एकैकस्य ६ तु:-अष्टशतं १ अष्टा- अपनी शक्तिके आनुसार समझनी-गुडौदन विंशतिः १ एव:-चा-होतव्याः १ मधुसर्पि- | आदि नमिले तो प्राप्तिके अनुसार ओदन भ्या ३ दधा ३ क्षीरेण ३ वा-युताः १॥ योजना- एकैकस्य तु मधुसर्पियो द- विधिपूर्वक सत्कारसे दे ।। ३०४ ॥ ३०५ !! आदिको ब्राह्मणोंको पादोंके प्रक्षालन आदि ना वा क्षीरेण यताः अष्टशतं अष्टाविंशतिः आहुतयः होतव्याः॥ धेनुः शंखस्तथानड्वान्हेमवासोहयाक्रमात् । ताभा०-सूर्य आदि ग्रहोंमें एक एककी | कृष्णागौरायसंछागएतावैदक्षिणाः स्मृताः एकसो आठ १०८ वा अठाईस २८ लेकर पद-धेनुः १ शंखः १ तथा:-अनहान मधु-धी- दूध वा दधिसे युक्त समिध हेम १ वासः १ हयः १ क्रमात् ५ कृष्णा १ होमनी ॥ ३०३ ॥ गौः १ आयसं १ छागः १ एताः १ - गुडौद पायसंचहविप्पंक्षीरपाष्टिकं । दक्षिणाः १स्मृताः १॥ दध्योदनंहविश्चूर्णमांसंचित्रानमेवच ३०४ योजना-धेनुः शंखः तथा अनवान् हेम वासाहयः कृष्णा गौः आयसं छागः एताः पद-गुडोदनं २ पायसं २ च-हविष्यं २ क्षीरपाप्टिक २ दध्योदनं २ हविभूर्ण र मांसर क्रमात् पाहणां दक्षिणाः मुनिभिः स्मृताः ॥ ता० भाग-दूध देतीहुई गो भार लेजा- चित्रान्नं २ एवा-चा- नेमें समर्थ हो ऐसा चलवान् अनडान् दद्यादहक्रमादेवद्विजेभ्योभोजनंद्विजः । (बल) हेम (सुवर्ण ) वासः ( वस्त्रपीला ) शक्तितोवायथालाभंसत्कृत्यविधिपूर्वकम् ॥ हय (सफेद लाल वर्णका अश्व ) कालीगो आचाराध्याय ग्रहशान्तिप्रकरण १२ (१३५). आयस ( लोहेका शस्त्र ) छाग ( वकी) भी ग्रहपूज्य होते हैं यह प्रतीत हुआं-उभयत्र ये धेनु आदि दक्षिणा सूर्य आदिके उद्देशसे (ऐश्वर्य-और पडना ) कारणोंको कहतेहैं- मनु आदिकोंने ब्राह्मणोंको कही- यह | कि प्राणिऑकी ऐश्वर्यकी वृद्धि और विनि- सब देनेकी शक्ति हो तो समझना-न मिल-पात (ऐश्वर्यसे गिरना) ग्रहोंके अधीन सके तो लाभके अनुसार शक्तिसे और होतेहैं इससे इनके अधिकारियोंको ये ग्रह ही कुछ देना ॥ ३०६॥ पूजने योग्यहैं और स्थावर जंगमरूप इस यस्ययास्यायदादास्यासतंयत्नेनपूजयेत्। जगत्के भावाभाव (उत्पत्ति मरण)भी यहाँके ब्रह्मणेषांवरोदत्तः पूजिताः पूजयिप्यय ॥ अपने समयानुसार उत्पत्ति और निरोध होते अधीनहै तिस समयमें यदि ये पूजे जायतो पद-यस्य ६ यः १ स्यात् क्रि- यदा- हैं अन्यथा नही-तिससे तिस जगत्के योग दुःस्था सः१ ते २ यत्नेन ३ पूजयेत् क्रि-क्षेम करनेवाले राजाओंको जगत्के ईश्वर ब्रह्मणा ३ एषां ६ वरः ६ दत्तः ६ पूजिताः१ होनेसे वे ग्रह पूजने योग्यहैं इससे शांति पूजयिप्यथ क्रि-॥ आदि कामें विशेषकर अधिकार राजाओंको योजना-यस्य (पुरुषस्य)यः यदादुःस्थः | है-सोई गौतमने इस प्रकार शांतिक आदि स्यात् सः तं महं यत्नेन पूजयेत्-एपा(ग्रहाणां) | दिखायहें कि राजा ब्राह्मणसे अतिरिक्त संपू- ब्रह्मणा वरः दत्तः पूनिताः यूपं पूजपिप्यथा गोका ईश्वर है यहां राजाका अधिकार करके ता०भा-जो अह जिस पुरुषके दुष्ट | वर्ण और आश्रमांकी न्यायसे रक्षाकर और (अष्टम आदि)स्थानमें जब स्थित हो वह इन सबको अपने २ धर्यमें नियुक्त रक्खे मनुष्य तब उस ग्रहका यत्नसे पूजन करे- | और इत्यादि गुजाके धर्मोको कहकर फिर क्योंकि जिससे इन ग्रहोंको पूर्व ब्रह्मानें यह कहा कि जो देव उत्सातके विचार करने वर दियाहे की पूजा किये हुये तुम पूजन | वाले (ज्योतिर्विद् ) कहैं उनको माने और करनेवालोंको इष्ट वस्तुके देने और अनिष्ट कोई यह मानतेहैं कि योगक्षेम उनके ही वस्तुके नाश करनेसे प्रसन्न कये ॥ ३०॥ अधीनहै-अब शांतिक पौष्टिक आदि अनु- छानके हेतुओंको कहकर-शान्तिक पु- ग्रहाधीनानरेंद्राणामुच्छायाः पतनानिच । ण्याहवाचन स्वस्त्ययन-आयुन्य मंगल इनके भावाभावाचजगतस्तस्मात्पूज्यतमामहाः। और शत्रुके स्तन (निषेध) अभिचार पद-प्रहाधीना१ नरेन्द्राणां६ उच्छायाः१ | और शत्रुओंको वृद्धि इनसे युक्त जो अन्य पतनानि १ चा -भावाभावो १ च जगतः६ आभ्युदयिक कर्मई उनको शालामिकरें। तस्मात् ५ पूज्यतमाः १ प्रहाः १॥ इति ग्रहशान्तिप्रकरणम् ॥१२॥ योजना-नरेन्द्राणां उच्छायाः चपुनः पत राजासर्वस्वष्टं माम्हणवामिति रानानमपित्य नानि चपुनः जगतः भावाभावो ग्रहाधीनाः वर्णानाश्रर्माध न्यायतीभिरेक्षच तत तान्लपमें संति तस्मात् पूज्यतमाः महाः संति ॥ स्थापयेदित्यादीकाचिदानुश्ता यानि च देवो. तात्पर्यार्य- शान्तिक पोष्टिक आदि पातचिंतकाः प्रभ्युस्तान्याद्रियेव साधीनमपि हो कमाका अधिकार अविशेषसे द्विजोंको कह योगक्षेममाभिजानते इति शान्तिकौटियाउनुष्वान- कर तिसमें अभिषेकसे युक्त राजाको विशे: | हेतुमभिधाय शांतिकपुण्याहस्वस्त्ययनायुष्णमगठस- पसे अधिकार कहते हैं-नरेन्द्र ( जिनका युनान्याभ्युदधिकानि विद्वनिगः स्तमनाभिचार- अभिषेक हुआ हो ऐसे क्षत्रिय के मह द्विषष्टिकानि च शालामी कुर्यादिति गतिका- अतिशय पूग्य (श्रेष्ठ होतई-इसमें अन्योंके- दनि दर्शितानि । 반 (१३६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । १ अथ राजधर्मप्रकरणम् १३ नसे पूर्वक धर्म लेतेहैं-सत्त्वसंपन्न अर्थात् संपत्ति और आपत्तिमें सुख दुखःसे रहितहो महोत्साहःस्थूललक्षः कृतज्ञोवृद्धसेवकः। और कुलीन अर्थात् माता और पितासे विनीतःसत्त्वसंपन्नःकुलीनःसत्यवाक्शुचि॥ | जिसका अभिजन हो- सत्यवाक-अर्थात् पद-महोत्साहः१स्थूललक्षः१ कृतज्ञः१ सत्य वचन कहनेवाला हो-शुचि अर्थात वृद्धसेवकः १ विनीतः १ सत्वसंपन्नः बाह्य और भीतरको शुद्धियुक्तहो-अदीर्घ कुलीनः १ सत्यवाक् १ शुचिः १॥ सूत्र-अर्थात् अवश्य करने योग्य काँके प्रारंभमें और प्रारंभ किये कर्मीको समा- अदीर्घसूत्रः स्मृतिमानक्षुद्रोपरुपस्तथा । प्तिमें जो विलम्ब ( देर ) न करताहो धार्मिकोव्यसनश्चैवप्राज्ञःशूरोरहस्यवित् ॥ और जानेहुए अर्थको जो न भूले ऐसा पद-अदीर्घसूत्रः १ स्मृतिमान्१ अक्षुद्रः स्मृतिवालाहो- अक्षुद्र अर्थात् जो असत् अपरुषः १ तथा:-धार्मिकः १ अव्यसनः १ (खोटे) गुणोंकी निंदा करताहो अपरुष- च:-एव-प्राज्ञः १ शूरः १ रहस्यवित् १॥ अर्थात् पराए दोपको जो न कहताहो- स्वरंध्रगोतान्वीक्षिक्यांदंडनीत्यांतथैवच । धार्मिक (वर्णाश्रमके धर्मोंसे युक्त) हो- विनीतरस्त्वयवार्तायांत्रय्यांचैवनराधिपः॥ रहितहो- व्यतन ये अठारह१८ प्रकारके और अव्यसन अर्थात् जो व्यसनोंसे 'पद-स्वरंध्रगोप्ता १ आन्वीक्षिक्यांदंड- | मनुने कहें हैं कि मृगया (सिकार) १ अक्षों नीत्यां७ तथा:- एव: च-विनीतः १तु:- (फांसों से खेलना- २ दिनमें सोना-३ अथ:- वार्तायां ७ त्रय्यां ७चा-एवा-नरा- निंदा करनी ४ दिनमें स्त्रीसेवन- ५ मदिरा धिपः १॥ आदिसे मद (नसा) करना-६ तौर्यत्रिक योजना-नराधिपः महोत्साहायुक्तल-(नाचना गाना बजाना९) वृथा घात-१० क्षणकः स्यात् तथा अन्वीक्षिक्यां दंड- ये दश व्यसन कामसे उत्पन्न होते हैं- नीत्यां चपुनः वार्तायां तथा त्रय्यां विनीतः पेशुन्य- साहस-द्रोह- ईया- (कपटसे- स्यात् ॥ मारना) असूया (दूसरेके गुणोंकी निंदा) तात्पर्यार्थ-बहुत जिसे उत्साह अर्थात् दूषण- वाणी और दण्डसे उत्पन्नहुई कठो- पुरुषार्थसे जो सिद्ध कर्म उसके प्रारंभ कर- रता अर्थात्- आक्रोश आदि- और- नेका निश्चय हो-और स्थूल लक्ष-बहु देय ताडनादि ये आठ व्यसन क्रोधसे उत्पन्न अर्थका दर्शीहो और कृतज्ञ अर्थात् दूसरे- होते हैं-तिन अठारहमें ये सात कष्टसाध्य के किये उपकार और अपकार (तिरस्कार)- कहे है कि मदिरा आदिका पान- फासोंसे को जो न भूलताहो-और तप और ज्ञानसे मृगयाक्षा दिवास्वप्नः परिवादः ब्रियो मदतीय- जो वृद्ध ( अधिक ज्ञान और तपवाले ) विकं वृयाघातः कामजो दशकोगणः । पैशुन्यं साह- है उनका सेवक हो-विनीत अर्थात् विनय सं द्रोहः ईासयाय दूषणं । वाग्दंडनं च पारप्पं फोघ जोपि गणोऽटकः। (नम्रता )से युक्तहो-यहां विनय शब्दसे शा- २ पानमक्षाः त्रियश्चैव मृगया चयाकमाएतत्काट- स्त्रसे अविरुद्ध पूर्व कहे हुए स्नातकके तमं विद्याचतुष्कं कामले गणे । दण्डस्य पातनं चैव -संशयको न प्राप्तहो और अकस्मात् कि- वापारघ्यार्थदृषणं क्रोधजेपि गणे विद्यारकाप्टमे- सीको कठोर वचन न कहे इत्यादि वच- तनिक भवेत् ।
आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३ (१३५) खेलना- स्त्रीसेवन और मृगया ये चार | स्वरंध्रगोता- और आत्मविद्या- दंडनीति क्रमसे कामसे पैदाहुए व्यसनगणमें कष्ट- | और वेदनयी इनमें विनीत ऐसे लक्षणवाला तम समझने- दण्डका पातन- वाक्पारुप्य राजाही ३०९॥ ३१ ॥ ३११ ॥ (कठोरवचन ) अर्थमें दोष देना ये तीन समंत्रिणःप्रकुर्वीतमानान्मौलानस्थिराञ्छु- क्रोधसे उत्पन्न व्यसनगणमें कष्ट (कष्टसाध्य) चीन् तिःसाईपितयेद्राज्यविमेणायततापरं समझने- प्राज्ञ-अर्याद जो गंभीर (फूट अर्थक जानने में समर्थहो- जो शूर (निर्भय) मोलान्य स्थिरान्२ शुचीनर तैः ३ सार्द्ध:- पद-साश्मंत्रिणःरमति कि-प्राज्ञानर हो रहस्यवित्-अर्थात् गोपनीय(छिपानेयोग्य) अर्थके गुप्त रखने में चतुरहो- जो स्वर- चिंतयेत् क्रि- राज्यं विप्रेण३ अs- ततः -परं२॥ गोता अर्थात् अपनेसातों अंगोंमें जो योजना- सः प्राज्ञान-- मौलान्- स्थि- दूसरेके प्रवेश होनेके द्वारकी शिथिलता गन्-शुचीन्- मंत्रिणः प्रवीत- चपुनः (आलस्य ) उस स्वरंध कहते हैं उसका तः सार्द्ध राज्यं चिंतयेत् अथ ततः परं जो प्रच्छादन (छिपाना) करले- अर्थात् विप्रेण साई राज्यं चिंतयेत् ॥ जैसे अपने सातों अगोंमें प्रवेश होनेका द्वार तात्पर्याय-वह महोत्साह आदि गुणों से दूसरेको न मिले- और आन्वीक्षिकी जो युक्त राजा जो हित और अहितके विवेकमें (आत्मविद्या) और दंडनीति जो अर्थ और कुशल हो उन प्राज्ञोंको, जो वंशपरम्परासे योगक्षेम, उपकार करनेवाली है उसमे चले आएदों टन मालाको और जो बडेभी और धनकी वृद्धि में कारण जो कृषि-आनन्द और दुःखके स्थानमें विकार रहित वाणिज्य- पशुपालनरूपवार्ता और ऋक्- हो उन स्थिरोंको, और जो धर्म अर्थ काम यमुः - साम- ये वेदत्रयी इनमें जो विनीत भयसे शुद्धहो उन शुद्धोको मंत्री करें और अर्थात् इन दंडनीति आदि विद्याओंके वेभी इस मनुके वचनानुसार सात वाआठ क- जाननेवालोंने जो इनमें चतुरकररक्खाहो- ने कि मोल शास्त्र के ज्ञाता शुरवीर लक्ष्यके जैसे मनुने कहा है कि विद्या (वेदत्रयीके ज्ञाता कुलीन मलीप्रकार परीक्षा करके ज्ञाता)से वेदत्रयी और नीतिके जानने 'सातवा आठमंत्री करे-इस प्रकार मंत्रीयोंको वालोंस नीति आत्मविद्याके ज्ञाता भत्मविद्या रखकर टन सबके वा एकदो संग संधि और लोकसे वार्ताओंको भाने- ऐसारान्या- ' विग्रह आदि गन्यको चिंता कर-टनके भिषेक निसको हुआदो ऐसा नराधिपहा- अभिप्रायको जानकर संपूर्ण शास्त्रांक विचार- भावार्थ- पहा उत्साही- स्थललक्ष में फुशल ब्राह्मण (पुरोहित ) संग (अतिज्ञानी) कृतज्ञ और युद्धोंका सेवक कार्यको विचार कर फिर अपनी पदिरो बिनपयुक्त- सत्वसपन्न- गुलीन- सत्य- 'विचारकर काम करे ॥ वादी-शुद्ध-अदीपसून (जो कार्यमें देर न भारार्य -बद गना युद्धिमान् माल और कर) स्मृतिमान्- अशुद्र- (खोटगुगौंका स्थिर शुद्ध मंत्रीयांको करें टनकै संग फिर देपी) भारुष (जो कटोरनही) धार्मिक- ब्रह्मगो संग राज्यको निता फार ।। ३१२॥ व्यसनरहित-माज-शूरवीर- रहस्यविद् मोटन रान टपर पुलो- पिपरदा पिलर तदिदः । मागन् । मदिान मस पाती वाद - माती भाइयो बारको रसः ।
(१३८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पुरोहितप्रकुर्वीतदेवज्ञमुदितोदितम् । योजना-विप्रेभ्यः भोगान् दत्वा चपुनः दंडनीत्यांचकुशलमयौगिरसेतथा ॥३१३ विविधानि वसूनि दद्यात् चपुनः यत् विप्रेषु उपपादितं अयं राज्ञां निधिः अक्षयः भवति।। पद-पुरोहितं २ प्रकुर्वीत क्रि-दैवज्ञं २ उदितोदितं २ दंडनीत्यां ७चा-कुशलं २ ता० भा० ब्राह्मणोंको भोग ( सुख) अथवा गिरसे ७ तथा:-॥ और सुवर्ण चांदी आदि अनेक धनोंको दे योजना-देव-उदितोदितं चपुनः दंड- क्योंकि यहाजाऑकि अक्षय निधि (खजान) नीत्यां तथा अथर्वागिरसे कुशलं पुरोहितं | है कि जो ब्राह्मणोंको देना ॥३१५ ॥ कुर्वांत ॥ अस्कन्नमव्ययंचैवप्रायश्चित्तरदृपितम् । ता० भा० ग्रहोंके उत्पात और शांतिके अग्रेसकाशादिमागौहुतंश्रेष्ठमिहोच्यते ।। ज्ञाता-और विद्या अभिजन अनुष्ठान आदि पद-अस्कन्नं २ अव्ययं १ चा- एव:- शास्त्रोक्त लक्षणोंसे युक्त और दंडनीति शां- | प्रायश्चित्तैः ३ अदूषितं १ अग्नेः ५ सका- ति आदि कर्म में जो कुशल ऐसे पुरोहित- शात् ५ विप्राप्नो ७ हुतं १ श्रेष्ठं १ इहा- को करे अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट कर्ममें उच्यते क्रि-॥ दान मान सत्कारोंसे अपने संग मिलकर जो योजना-अग्नेः सकाशात् विप्राग्नी हुतं आगेसे आगे हित कर ॥ ३१३ ॥ अस्कन्नं अव्ययं चपुनः प्रायश्चित्तेः अदूषित श्रौतस्मातक्रियादेतोवृणुयादेवचलिजः । इह श्रेष्ठ उच्यते ॥ यज्ञांश्चैवमकुवातविधिवदरिदक्षिणान् ॥ ता. भा०-बाह्मणरूप अग्निमें किया है होम (भोजन) जिससे क्षरण (शोपण) पद-श्रोतस्मातक्रियाहेतोः ५ वृणुयात् और नाशरहित और पशुहिंसाहीन होनेसे क्रि-एव:- च- ऋत्विजः २ यज्ञान २ प्रायश्चित्त योग्यं इससे आनिमें करने योग्य च:-एव:-प्रकुर्वीत क्रि-विधिवत्-भूरिदाक्ष- राजसूय आदि काँसे श्रेष्ठ कहा है ॥३१६॥ योजना- चपुनः ओतस्मार्तक्रियाहेतोः अलन्धमीहेद्धर्मेणलब्धंयवनपालयेत् । ऋत्विजः वृणुयात् चपुनः भूरिदक्षिणान् पालितंवईयेन्नीत्यायुद्धपात्रेनिक्षिपेत् ।। यज्ञान् कुयात् ॥ पद- अलन्धर ईहे कि-धर्मण३ लब्धं ता० भा०- अग्निहोत्र आदि ओत कर्म | २ यलेन ३ पालयेत् क्रि- पालितंर वर्द्धयेद और उपासन आदि स्मातं कर्मके लिये कि-नीत्या३ वृद्ध२ पापुनिक्षिपेत् कि- ऋत्विजोंका वरण करें और अधिक दक्षि- योजना- अलब्धं धनं धर्मेण ईहेत लब्ध पासे युक्त राजसूय आदि यज्ञोंको कर ३१४॥ धनं यत्लेन पालयेत् पालितं धनं नीत्या वर्द्ध- येत् वृद्धं धनं पात्रेषु निक्षिपेत् ॥ भोगांश्चदत्वाविप्रेभ्योपसूनिविविधानिच । ता. भा० अलन्धधन मादिका धर्मशा- महायोपनिधीराजांयदिभेषूपपादितम् ॥सके अनुसार यल कर लन्धधनकी यनते पद-भोगान्चा-दत्वाऽ- विप्रेभ्यः ५व- पालना (रक्षा) करे और रक्षा कियेधनको सुनि २ विविधानि २ चा अक्षयः १अयं । व्यापार भादि नीतिसे यदावे और पटेहुपे निभिः १ गज्ञां ६ यत् १ विप्रेषु ७ उप- धनको धर्मअर्थकामरूप तीन प्रकारक पादितं २॥ पानाको दे॥ ३१७॥ णान् २॥
आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३ (१३९) दत्त्वाभूमिनिबंधवाकृत्वालेख्यंतुकारयेत् । पूर्वक लिखकर और चशब्दसे प्रतिग्रह लेनेवा- आगामिभद्रपतिपरिज्ञानाय पार्थिवः३१८ लेको लिखकर और प्रतिग्रहका परिमाण और पद-दत्वाऽ-भूमिर निबंध२ वा-कृत्वा-बंधका प्रमाणऔर देने योग्य क्षेत्र आदिका- दानछेदका उपवर्णन-अर्थात् रूपक आदिनि- लख्यं तुः-कारयेत् क्रि-आगामिभद्रनुप-छेद (निवर्तन ) उसके नदी और आवाटसे तिपरिज्ञानाय ४ पार्थिवः १॥ प्रमाण उसका वर्णन इस प्रकार लिखेकि योजना- भूमि दत्त्वा वा निबंधं कृत्वा पा- | अमुक नदीसे दक्षिण वा वाम यह क्षेत्रहे र्थिवः आगामिभद्रनृपतिपरिज्ञानाय लेख्यं और अमुक ग्रामके पूर्व इतना निवर्तनहै- कारयेत् ॥ और नदी नगर मार्ग आदि आवाटकी भू- ता. भा०- शास्त्रोक्त विधिसे भूमिका मिका न्यूनाधिक भाव होसकताहे उसकी दान देकर और निबंधको करके अर्थात् निवृत्ति के लिये-अपने हस्तसे यह लिखदे कि एकभाण्ड भारके इतने रुपये और एकपर्ण | जो इस पत्रके ऊपर लिखाहे वह मुझे संमतहै भारके इतने पर्ण यह प्रबंध करके राजा और युक्त है और वह लेख शक संवत्सररूप आगे होनेवाले श्रेष्ठ राजाओंके ज्ञानार्थ लेख्य | दो प्रकारके कालसे और चंद्रसूर्यके ग्रहणसे करादे इससे यह बात सूचितहै कि भूमिके युक्त हो और गरुड वाराह आदि अपनी दान और निबंधमें राजाका अधिकारहे राजमुद्रासे अंकितहो ऐसे स्थिर (दृढ) भोगनेवालेका नही ।। ३१८ ॥ शासन (शिक्षा)को इस लिये करे कि पटेवाताम्रपट्टेवास्वमुद्रोपरिचिह्नितम् | आगे होनेवाले राजा जानजाय और महीप- अभिलेख्यात्मनोवंश्यानात्मानंचमहीपतिः ति कहनसे यह सूचित कियाकि भोगनेवाले का अधिकार नहीं, और यह लेखभी संधि- पद- पटे७ वा-ताम्रपट्टे७ वाऽ-स्वमुद्रो- विग्रह करनेवाले किसी अपने मुख्य अधि- परिचिह्नितंर अभिलेख्या-आत्मनः६वंश्यानर कारीसे करावे क्योंकि यह स्मृति कि आत्मानंर च-महीपतिः १॥ संधि विग्रह करनेवाला उसका लेखक होतो प्रतिग्रहपरीमाणंदानच्छेदोपवर्णनम् । राजाके शासनको लिखे ॥ स्वहस्तकालसंपनशासनंकारयेत्स्यिरः॥ भावार्थ-वस्त्र वा तामेंके पत्रपर अपने वंशके पुरुष और अपनी आत्माको और पद-प्रतिग्रहपरीमाणंरदानच्छेदोपवर्णनंर प्रतिमहके परिमाण और दानछेदके उपव- स्वहस्तकालसंपनर शासन२ कारयेत् क्रि- नको लिखकर अपनी राजमुद्रासे ऊपर स्थिरं २॥ अंकित और अपने हाथ और कालसे युक्त योजना- पटे वा ताम्रपट्टे आत्मनः वेश्या- दृट शासनको पजा करवावे ॥३१९॥३२०॥ न चपुनः आत्मानं स्वमुद्रोपरिचिह्नितं-प्रति- प्रहरीमाणं-दानछेदोपवर्णनं स्वइस्तकाल- रम्पंपशव्यमाजीव्यंजांगलंदेशमाषपेत् । संपन्नं स्थिरं शासन महीपतिः कारयेत् ।। तत्रदुर्गाणिकुर्वीतजनकोशात्मगुप्तये३२१ तात्पर्यार्थ-वस्त्रया ताबके पट्टे पर अपने पद-रम्यं २ पशपरआजीव्यं जांगलं २ वंशके पितामह प्रपितामह आदिकोंको वीर्य संधिविमहकारीतु भवेयस्तस्य लेखकः। स्वयं और विद्या आदि गुणोंके वर्णन और प्रतिष्ठा- | राज्ञा समादियः समाजशामना ।
(१४०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । देशं २ आवसेत् क्रि-तत्रऽ-दुर्गाणिर कुर्वीत | ध्यक्षान् कुशलान् शुचीन प्रकुर्यात् क्रि- कि-जनकोशात्मगुप्तये ४॥ आयकर्मातव्ययकर्मसु७ चा- उद्यतान् २॥ योजना- राजा रम्यं पशव्यं आजीव्यं योजना- तत्रतत्र च निष्णातान् कुशलान् जांगलं देशं आवसेत्-तत्र जनकोशात्म- शुचीन च पुनः आयकर्मातव्ययकर्मसु उद्य- गुप्तये दुर्गाणि कुर्वीत ॥ तान् अध्यक्षान कुर्यात् ॥ तात्पर्यार्थ- अशोक चंपक आदिसे रम तात्पर्यार्थ- तहां तहां धर्म अर्थ काम णीक और पशुओंकी वृद्धि करनेसे पशु- आदिमें योग्य अधिकारीयोंको नियुक्त करे आको हित-और कंद मूल फल पुष्प क्योंकि यह कहाँहै कि धर्मकार्योंमें धर्मके आदिसे मनुष्योंको हित जांगल देशों से ज्ञाता और अर्थके कार्योंमें पण्डित यद्यपि अल्पजल तरु और पर्वत जिसमें हो स्त्रीयोंमें नपुंसक निन्दित कामें नीचोंको ऐसे देशको जांगल कहते हैं तथापि यहां नियुक्त कर- जो निष्णातहो अर्थात् जल तरु जिसमें हों ऐसा देशही लेना-उस जिनको अन्यव्यापार नहो-और जो सय देशमें जन और सुवर्ण आदिका कोश इन-व्यापारों में कुशल (चतुर)हों और जो चार- की रक्षाके लिये दुर्ग बनावै वह किला छः प्रकारको उपधासें शुद्धहो और जो सुव- प्रकारका इस मनुवचनैमें कहाहे कि धन्वदुर्ग- आदिके उत्पतिके स्थानरूप आय क- महीदुर्ग-जलदुर्ग-वृक्षदुर्ग-नृदुर्ग-गिरिदुर्ग इन माम सुवर्ण आदि दानस्थान रूप व्ययक- छःप्रकारके किलोंसे पुरको ढककर वस-जल- मा उद्यत और चकारसे प्राज्ञ हो सोई कहा रहित पांच योजनका देश जितके चारोंतरफ कि विद्वान् उपधा( छल )से शुद्ध-अप्रमाद हो वहधन्वदुर्ग-जो पत्थर और ईटोंसे युक्त, अभियुक्त (प्रतिष्ठा)ता-कामि व्यसनका अ. बारह हाथ ऊंचा और बहुत विस्तृत युद्धके भाव स्वामीकी भक्ति इनसे योग्यता होती ।। लिये ऊपर फिरने योग्य और साधारण झरोके भावार्य-तहां २ कुशल-शुद्ध-चतुर आ- आदिसे युक्त, और चातरफ परकोटे और दखाजोंसे युक्तहो, ऐसा महीदुर्ग-निसके यफर्म और व्ययकामें उद्यत अध्यक्षोंको चारोतरफ अगाध जल हो यह जलदुर्ग | नियतकरे ।। ३२२ ॥ और वृक्षसि युक्त घृक्षदुर्ग-चतुरंगिणी सेना नावापरतरोधनृिपाणांयद्रणार्जितम् । नृदुर्ग-पर्वतसे युक्त गिरिदुर्ग कहाताई ॥ विग्रेभ्योदीयतेद्रव्यंप्रजाभ्यश्चाभयंसदा ।। भावार्य- रमणीक-पशुओंको हित-ऐसे पद-ना-अतः-परतरः १ धर्मः १ नृ- जांगल देशमै बस और वहां जन और पाणां ६ यत् १ रणार्जितम् १ विप्रेभ्यः । कोश और आरमाको रक्षाफे लिये किले दीयते क्रि-द्रव्यं १ प्रमाभ्यः ४ चा-अभ- पनावाच ॥ ३२१ ॥ यं सदा:- ॥ तत्रतत्रनिष्णातानभ्यपान्कुशलारटुचीन् योजना यत् रणार्जितं द्रव्यं विप्रेभ्यः च अकुर्यादापकमांतव्ययकर्मसुचौद्यताम् ॥ पुनः सदा प्रगाभ्यः भभयं दीयते मतः पर- पद-तमा-तमाना-निष्णातान २ अ- तर धर्मः नृपाणां नास्ति ।। पन्न मागंपग यामतपरि १ प प धमलका शिान् । दुर्ग समाहार योपुर। श्री डीवान निीत मीयान निपु फर्मम् ।
आचाराध्याय राजधर्ममकरण १३ (१४१) ता भा०-इससे अधिक राजाओंका पद-तव ६ अहं १ वादिनं २ की २. अन्य कोई धर्म नहीं कि जो रण ( युद्ध )से | निहति २ परसंगतं २ नऽ-हेन्यात् क्रि-वि- संचित किया धन बाह्मणोंको और प्रजा- | निवृत्तंश्च युद्धप्रेक्षणकादिकम् २॥ ओंको अभय सदैव देना ॥ ३२३ ॥ योजना-अहं तव अस्मि इति वादिनं यभाषेपुवध्यंतेभम्यर्थमपराङ्मुखाः। सीवं निर्हति परसंगतम् च पुनः विनिवृत्तं अकूटैरायुधारितेस्वर्गयोगिनोयथा ३२४, युद्धप्रेक्षणकादिकं न इन्यात् ।। पद-ये आहवेषु वध्यते क्रि-भूम्यर्थर तात्पर्यार्थ-जो मैं तेगहूं ऐसे कई-नपुं- अपराङ्मुखाः १ अकूटः ३ आयुधैः ३ यांति सक-आयुथसे रहितहो-अन्यके संग युद्ध क्रि-ते १ स्वर्ग २ योगिनः १ यथा:- ॥ करता हो युद्ध करके बैठ रहाहो और जो योजना ये भूम्यर्थं अपरामुखाः संतः । युद्धको देख रहाहो इतने शत्रुओंको न मारे अकूट: आयुधे आहवेषु वध्यंत ते यथा सु- आदि पदके ग्रहणसे अश्न और सारथि कृतिनः तथा स्वर्ग यांति ॥ आदिका महण है सोई गौतमने कहा है कि तामा०-जो भूमि आदिके अर्थ प्रवृत्त कि अवसायि-अनायुध- ( शस्त्रहित) संग्राममें हिंसाका दोष इनको छोड करहै- हुये अपरामुख (संमुख ) होकर मारे जातेहैं वे योगियोंके समान स्वर्गम ( कृतांजलि केशोंको फेलाएहुए- परामुख- जातेहैं यदि वे कूट (विपलगे) आयुधोंसे बैठाहुआ-स्थल और वृक्षपर चदाहुआ- युद्ध न करे ॥ ३२४ ॥ दूत-गो-ब्राह्मण-वादी (कहे ) शंखनेभी कहाँहै कि राजासे अतिरिक्त पुरुष-पानी- पदानिक्रतुतुल्यानिभग्रेप्पप्यनिवर्तिनाम् । / पीता हुआ-भोजन करताहुआ क्षत्रियसे अ- राजासुकृतमादत्तेहतानांविपलायिनाम् ॥ | तिरिक्त-जूतोंको छोडता हुआ (छोडकर पद-पदानि १ ऋतुतुल्यानि १ भन्नेषु ७ भागता हुआ) स्त्री हथनी अश्व-सापथ अपि - अनिवर्तिनाम् ६ राजा १ सुकृतं २ दूत-ब्राह्मण और राजा इनको नमारे ।। आदत्ते कि इतानां ६ विपलायिनाम् ॥ ६॥ भावार्थ-तेराहूं ऐसे कहता हुआ नपुंसक- योजना-भग्नेषु अपि अनिवर्तिनां पदानि निगयुध- दूसरेसे युद्धकरताहुआ- युद्धसे क्रतुतुल्यानि भवति- विपलायिनां हतानां निवृत्तहुआ-युद्धके देखनेवाला और आदि- सुकृतं राजा आदत्ते ॥ शब्दसे अश्व साथ इनको नमारे ।।३२६।। ता० भा० अपने हाथी अश्व रथ आ- कृतरक्षासमुत्यायपश्यदायव्ययीस्वयम् । दिके भग्न ( टूट )होने परभी जो अनिवर्ती व्यवहारांस्ततोदृष्ट्वानात्वा जीतकामतः ।। (न हटते) है अर्थात् पराई सेनाके सन्मुख चलते हैं उनके पद अश्वमेध पज्ञके तुल्य १न दोषोहिसायामाहो ऽन्यत्रा वसारप्यनाणुध. हैं-और जो पलायन करते हैं अर्थात् कृतांजलिप्रकीर्णकेशपराइमुखोपविष्टस्यलाझादूत- पराङ्मुख हो जाते हैं मरे हुये उनके पु- गोब्राह्मणवादिभ्यः । ज्यको राजा लो लेताहै ॥ ३२५ ॥ २न पानीयं पिपन्त न मुंजानं नाबर्माण मोपानही तवाइंवादिनीवनिइतिपरसंगतम् । मुंबत न सवर्मा न स्त्रियं न करे न वाजिनं न साय, और नहन्यादिनिवृत्तंचयुद्धप्रेक्षणकादिकम् ॥ न दूत न ब्रामण न राजानमरामा इन्याव । न म आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३ (१४३) पतिसहित तिसकी देशकालमें उचित रक्षा नहो इस लिये यथाशक्ति स्वाध्याय आदिका विचार करे ॥ (वेदको) पटे॥ का 'भावार्थ-फिर-अकेला वा मंत्रीयोंसे सहित भावार्य-फिर संध्योपासन करे चारपुरु- अन्तःपुरमें विहारकरे फिरसेनाओंको देख- पोके गुप्त भाषणको सुने-फिर मृत्यगीत कर सेनापति सहित' उसको रक्षा आदिकी आदिसे मन प्रसन्न करके भोजनको फिर चिता करे ॥ ३२९॥ घेदको पढे ॥ ३३० ॥. संध्यामुपास्यशृणुयाचाराणांगूढभाषितम् । संविशेत्तुर्यपोपेणप्रतियुध्येत्तथैवच । गीतनृत्यैश्च जीतपठेत्स्वाध्यायमेवच ॥ शास्त्राणिचिंतयेदासर्वकर्तव्यतास्तथा ।। पद-संध्यां २ उपास्या- शृणुयात् क्रि- पद-विशेत कि-तूर्यपोषण ३ प्रतियुध्येत् चायणां ६ गूदभाषित २ गीतनृत्यैः ३ च-1 | क्रि-तथा:-एव:- च-शाखाणि २ चिन्तयेत मुंजीत क्रि-पठेत् कि-खाध्यायंर एवाच:- क्रि-बद्धा- सर्वकर्तव्यताः २ तथा:-॥ योजना-संध्या उपास्य चाराणां गूदभाषि-अपयेचततश्चारान्स्वैप्चन्येपुचसादरान् । तं शृणुयात् चपुनः गीतनृत्यः क्रीडित्वा ऋत्विपुरोहिताचाराशीभिरभिनंदितः।। मुंजीत च पुनः स्वाध्यायं पठेत् ।। पद-प्रेपयेत् क्रि-घर-ततः:- चारान् २ ता भाफिरसायंकालके समय संध्यो- पासन करे-संध्योपासन सामान्यसेही प्राप्त हिताचार्यः ३ माशीभिः ३ अभिनंदितः । स्वेषु अन्येपु च सादगन २ऋवियपुरो- था फिर लिखना इस लिये है कि बहुतसे कार्योंमें व्याकुल होनेसे विस्मरण नहीं- दृष्ट्याज्योतिर्विदविद्यान्दद्यादांकांचनमदी । फिर जो पूर्व (प्रातःकाल ) देखकर किसी नैवेशिकानिचततः श्रोत्रियेभ्योगृहाणिय । स्थानमें जो बैठा रक्खये उन चार पुरुषोंके पद-दृमा ज्योतिर्विदः२ वैद्यान २ दद्यात गुप्तभाषणको किसी मकानके भीतर शस्त्रको किर-गां २ कांचनं २ मही २ नवेशिकानिर धारण किये हुये सुने- वही इस वचनमें च-ततः-ऑप्रियभ्यः ४ गृहाणि च--॥ कहा कि शस्त्रधारी रागा संध्योपासन क- योजना-तूयंघोषिश संविशेद चपुनः तयेव रके गुप्तभाषी चारोंके चेष्टितको गृहके प्रतिबुध्येत्-तया शास्त्राणि सर्वकर्तव्यताः भीतर सुने-फिर नृत्य गीत आदिसे कुछ- चितयत च पुनः स्वेष भन्येषुव चारान प्रे- काल खेलकर अन्यगृहमें प्रविष्ट होकर भो-पयेत् ततः ऋत्विरपुरादिताचार्यः माशीभिः जन करे- क्योंकि यह वचन हकि टस भनिनादतः सन् ज्योतिर्विदः वैद्यान् वा (रणवासके ) मनुष्यको अनुज्ञा देकर अन्य । मोत्रियेभ्यः गांकांच्नं मही नशिकानि गृहमें जाकर भोजनके लिये स्त्रीओं सहित गृहागि दद्यात् ।। अंतःपुरमे प्रवेशकर फिर से विस्मरण
आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३
(१४५)
देभिः चपुनः विशेषतः कायस्थः पीड्यमानाः उत्कोचजीविनीद्रव्यहीनान्कृत्वा
प्रजाः राजा रक्षेत् ॥
विवासयेत् । सदानमानसत्कारा-
तात्पर्यार्थ -चाट जो विश्वास देकरधनको
च्छोत्रियान्वासयेत्सदा ।। ३३९ ॥
हरते हैं वे ठग-और छिपकर जो धनको हरे
वे तस्कर (चौर) और दुर्वृत्त-(इंद्रजालिक पद-उत्कोचजीविनः २ द्रव्यहीनान् २
और कितव आदि ) और वलसे धन कृत्वा विवासयेत् क्रि-सदानमानसत्का-
हरनेवाले महासाहसिक-आदि शब्दसे गन् २ श्रोत्रियान् २ वासयेत् क्रि-सदा:-॥
मौल कुहकवृत्ति लैने इनसे पीडित और योजना-ये राष्ट्राधिकृताः तेषां विचेष्टितं
विशेषकर कायस्थ- अर्थात् गणक और चारैः ज्ञात्वा साधून संमानयेत् विपरीतान्
लेखक उनसे पीडित प्रजाको रक्षाकरे क्योंकि घातयेत् उत्कोचजीविनःद्रव्यहीनान् कृत्वा
वे राजाके प्यारे और बड़े मायावी होते हैं विवासयेत् सदानमानसत्कारान् श्रोत्रियान्
उनसे बचना कठिन है ॥
सदा वासयेत् ॥
भावार्थ-ठग-चौर-इंद्रजाली- महासाह ता भा०-जो अपने राज्यके अधिकारों में
सिक-और विशेषकर कायस्थ इनसे पीडित | नियुक्तहैं-उनके आचरणोंको पूर्वोक्त चासे
प्रजाकी राजा रक्षा करें ।। ३३६ ॥
जानकर उनमें जिनका श्रेष्ठ आचरणहो उनकी
अरक्ष्यमाणा कुतियत्किचित्किल्विपंप्रजा दानमान सत्कापसे पूगा और जिनका दुष्ट
तस्मात्तुनृपतेरधयस्माद्गतात्पसौकरान् ॥
आचरणहो उनकी हनन राजा अपरा-
धके अनुसार करावे और जो रत्कोच (रीस-
पद-अरक्ष्यमाणाः र कुति क्रि- यत्र वत से जीतेहों उनके द्रव्यको छीनकर अ-
किंचित् - किल्विषं २ प्रभाः १ तस्मात् ५ पने राष्ट्र देश से निकासदे और वेद-
तु-नृपतेः ६ अर्द्ध १ यस्मात् ५ गृङ्गाति । पाठीयोंको दान मान सत्कारकर सदैव
कि- असौ १ करान् २॥
वसावै ॥ ३३८ ॥ ३३९ ॥
योजना-यस्मात् असौ राजा कपन गृ- | अन्यायेननृपोराष्ट्रात्स्वकोशंयोभिवर्धयेत् ।
पहाति तस्मात् अरक्ष्यमाणाः प्रजाः यत् किं-
चित् किल्विषं कुर्वन्ति-तस्मात् नृपतेः अई सोचिराद्विगतश्रीकोनाशमैतिसवांधवः ॥
'भवति॥
पद-अन्यायेन ३ नृपःश्राष्ट्रातपस्वकोशेर
ताभा--जिससे राजा प्रजाओंसे कर ले- यः १ अभिवर्द्धयेत् कि-सः १ अचिपक:-
ताहै तिससे नही रक्षाकी हुई प्रजा जो पाप | विगतश्रीकःनाशं २एति क्रि-सबांधवः१ ॥
करती है उससे आधाराजाको मिलताई ३३७ योजना-योनृपः अन्यायन राष्ट्रात स्वकोश
येराष्ट्राधिकृतास्तेपांचारात्वाविचेष्टितम् ।
अभिवर्द्धयेत् सःअचिग विगतश्रीकः सन्
सांधवः नाशं एति ॥
साधूसंमानयेद्राजाविपरीताश्चपातयेत् ॥
ता-भा-जो राजाअपने कोशको अन्या-
पद-ये १ राष्ट्राधिकृताः१ तेषां ६ चारः३ यसे राज्यमसे बढताहे यह योटेही का
ज्ञात्वा:-विचेष्टितंर साधून संमानयेत् कि- लक्ष्मीसे हीन होकर बांधवों सहित मनं
पजा १ विपरीतान २ चा-घातयेत् क्रि- प्राप्त होताहे ॥ ३४ ॥
(१४६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रजापीडनसंतापात्समुद्भूतोहुताशनः । स्थितिः यथा आसीत् तथा असौ परि- राज्ञः कुलंश्रियंप्राणांश्चादग्ध्वाननिवर्तते ॥ | पाल्यः राज्ञेतिशेषः ॥ पद-प्रजापीडनसंतापात् ५ समुद्भूतः १ तात्पर्याय-अब पराये देश अपने देशमें हुताशनः राज्ञः ६ कुलं २ श्रियं २ प्राणान्२ संग उसके आचारका संकर (मेल होजाय तब अपने देशके आचार आदिके च-अदग्ध्वाऽ-न-निवर्तते कि-॥ योजना-प्रजापीडनसंतापात् समुद्भूतः करै-अर्थात् जिस देशमें जो आचार फुलकी स्थिति(मर्यादा)और व्यवहार जिस प्रकार- हुताशनः राज्ञःफुलं-श्रियं-प्राणान् अदग्ध्वा ह पूर्वहो तिसी प्रकार उस धर्मकी रक्षा करे- न निवर्तते ॥ तात्पयार्य भा०-तस्कर आदिके किए यदि वह शास्त्रविरुद्ध नहोतो-( यदावशं उपागतः) इसके लिखनेसे यह दिखायाकि प्रनाओंके संतापसे पैदाहुई जो भनि अर्थात् वश-होनेसे पूर्व इस पूर्वोक्तका अनियम है- पापकी राशिहे वह राजाका कुल लक्ष्मी प्राण इनके विनादग्ध किये नही शान्त होती और इसके देशको परिपीडित करे और तैसेही वचने है कि-शत्रुको दायकर बैठे अर्थात् सपको दग्ध करदेती है ॥ ३४१ ॥ इसके यव अन्न जल इंधन इनको दूषित यएवनृपतेर्धमःस्वराष्ट्रपरिपालने । करदे ॥ तमेवकृत्स्नमामोतिपरराष्ट्रवनियन्३४२॥ भावार्थ-जिस देशमें जो अचार व्यवहार पदः यः एव नृपतेः ६धर्मः १स्वराष्ट्र- | कुलकी मर्यादाहो उस देशके वशहोनेपर परिपालने ७ ते २ एव:- कृत्स्नं २ आमोति | उसका उसी प्रचार करना ॥ ३४३ ॥ क्रि-परराष्ट्र २ वर्श २ नयन् ॥ १॥ मंत्रमूलंयतीराज्यंतस्मान्मंसुरक्षितम् । योजना-स्वराष्ट्रपरिपालने यः धर्मः मृपतेः कुर्याद्यथास्यनविदुःकर्मणामा फलोदयातू अस्ति-परराष्ट्र वशं नयन् सन् त एव (धर्म) पद- मंत्रमूलं१ यतः:- राज्यं १ त- कृतने आप्नोति ॥ स्मात मंत्र२ सुरक्षित२ फुर्यात् क्रि- ता०भा० न्यायसे अपने देशकी रक्षामें जो | यथा- भस्य६ ना- विदुः क्रि-कर्मणां६ राजाका धर्महे वक्ष्यमाण न्यायसे दूसरेके | आर-फलोदयात् ॥ देशको अपने अधीन करता हुभायजा उसी योजना- यतः राज्य मंत्रमूलं अस्ति , सकल धर्मको प्राप्त होताहै ॥ ३४२॥ तस्मात् यथा अस्य मंत्र कर्मणां आफलो. यस्मिन्देशेयमाचारोव्पयहारःकुलस्थितिः । दात जनाः न विदुः तया सुरक्षितं मंत्रं तषपरिपाल्पोसीयदावशमुपागतः३४३॥ कुर्यात् ॥ पद-पस्मिन् देशे ५ यःराचारः चिन्ताकर- यह पूर्वोक्त मंत्र राज्यका मूल ताभा--जिससे मंत्रीभोकेसंगराज्यकी- व्यवहारः १ फुलस्थितिः १ हएषा परिपाल्यः१ असो १ यदा- यर्शन फर जैसे इस यशाः संधि विग्रह आदि जना-यदायादेशःपर्श टपागतः तदा १ रिमाल राष्ट्र पाएयापार पो. पारण सत यामानादोन्पम् । १ रातो या भाचारः स्यवहारः गुट- सोधपुर तथा- ३२ गतः१॥
आचाराध्याय राजवर्मभकरण १३ (१४७) कोको फलकी सिद्धिके लिये कोई अन्य- मंत्र और सेनासे जो हीन वह पीडनीय होता पुरुष न जाने ॥ ३४॥ है-जिसके मित्र और सेना बलवानहो वह आरमित्रमुदासीनोनंतरस्तत्परः परः कर्शनीय है सोई नीतिको वचन है कि क्रमशोमंडलंचिंत्यसामादिभिरुपक्रमः ॥ निर्मूलकरनेसे समुच्छेद-और बल (सेना) के निग्रहको पीडन- कोश और दण्डके पद-अरिः १ मित्रं१ उदासीनः अनं- छीननेको कर्शन कहते हैं- मित्रकेभी दो- तरः१ तत्परः१ परः१क्रमशः:- मंडलं १ भेद है एक बृहणीय और कर्शनीय- कोश चिन्त्यं१ सामादिभिः ३ उपक्रमैः ३॥ और सेनासे जो हीन वह धृहणीय (बढाने योजना- अरिः मित्रं उदासीनः अनं- | योग्य) और कोश सेनासे जो अधिक यह -तरः तत्परः परः एतन्मण्डलं क्रमशः सामा- | कर्शनीय (क्लेशकरनेयोग्य ) अब प्राकृत दिभिः उपक्रमः चिन्न्यं ॥ मित्र भरि और उदासीनोंको कहते हैं- -- तात्पर्याय- अरि (शत्र) मित्र और कि. अनंतर जिसका देश समीपदो-वह दोनों लक्षणों ( शत्रुता- मित्रता )से हीन | प्राकृत अरि- उससे परला प्राकृतमिन और. उदासीन ये तीनों तीन२ प्रकारके हैं कि | उससे परला प्राकृत उदासीन- शेष भेद सहज- कृत्रिम- प्राकृत- उनमें सहज- | प्रसिद्ध होनेसे नहीं कहे यह गंजमण्डल पूर्व शत्रुवह होता है कि जो सापत्न -(मौसीका- आदि क्रमसें जाननेयोग्य है अर्थात् उनके पुत्र) पितृव्य और उसके पुत्र आदि | आचरणको जानकर साम दान आदि पक्ष्य- कृत्रिम शत्रु जिसका अपकार कियाहो माण उपायोंकी चिंताकरे- इसप्रकार आगे वा जिसने अपना अपकार कियाहो- प्राकृत पीछे दोनों पावों में तीनर ओर एक आप शत्रु- समीपके देशका राजा होता है और इन त्रयोदश राजरूप यह राजमंडल पद्मके सहन मित्र भानजा फूफी और मौसीका पुत्र आकार होता है और पाणिग्राह आक्रं. और कृत्रिम मित्र जिसको उपकार कियाहो दासार आदि तो अरि मित्र उदासीनोंके वा जिसने अपना उपकार कियाहो और प्राकृत | बीचमें आजाते हैं उनका नाममात्रसेही भेद मित्र उस देशका राजा जिसके देशमें एक- | है- अन्य ग्रंथों में वे भेद दिखाये हैं इससे देशका अन्तरहो और सहज और कृत्रिम | याज्ञवल्क्यने भेद पृथक् नही कहे ।। मित्रवा शत्रुके लक्षण जिसमें नहीं वह सहज भावार्थ- आरे मित्र उदासीन प्राकृतशत्रु कृत्रिमोदासीन- और जिसके देश और प्राकृतमित्र प्राकृत उदासीन- इस राज- अपने देशके बीचमें दो देश पढें वह प्राकृत | मण्डलका साम आदि उपायोंसे विचार उदासीन- इससें ये नौ भेद हुये- शत्रुभी करे ३४५॥ चार प्रकारका होता है- यातव्य-उच्छेत्तव्य- उपायाःसामदानंचभेदोदंडस्तथै- पीडनीय-और कर्शनीय- उनमें यातव्य- वच । सम्यक्प्रयुक्ताःसिध्येयुदै- (चढनेयोग्य) समीपका राजा होता है- इस्त्वगतिकागतिः ॥ ३४६ ॥ उच्छेत्तव्य यह है कि व्यसनी सेनासें हीन मजा जिसके वशमें नहीं दुर्ग नहो- मित्रसे पद- उपायाः १ साम १ दानं . हीनहो और दुर्बलहो- बद्द उखाडने योग्य हे अर्थात् उसके सिंहासनको छीनले और 4 (१४६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रजापीडनसंतापात्समुद्भूतोहुताशनः । स्थितिः यथा आसीत् तथा असौ. परि- राज्ञः कुलंश्रियंप्राणांश्चादग्भ्याननिवर्तते । पाल्यः राजेतिशेषः ॥ पद-प्रनापीडनसंतापात् ५ समुद्भूतः १ तात्पर्याय-जब पराये देश अपने देशमें हुताशनः राज्ञः ६ कुलं २ श्रियं २ प्राणान्२ संग उसके आचारका संकर (मेल ) होजाय तब अपने देशके आचार आदिके चर-अदग्ध्वा-ना-निवर्तते कि- योजना-प्रजापीडनसंतापात् समुद्भूतः स्थिति(मर्यादा )और व्यवहार जिस प्रकार: करे-अर्थात् जिस देशमें जो आचार कुलकी हुताशनः राज्ञःकुलं--श्रियं-प्राणान् अदग्ध्वा न निवर्तते ॥ ह पूर्वहो तिसी प्रकार उस धर्मकी रक्षा करें- यदि वह शास्त्रविरुद्ध नहोतो- ( यदावशं तात्पयार्थ भा०-तस्कर आदिके किए प्रजाओंके संतापसे पैदाहुई जो अग्नि अर्थात् वश होने से पूर्व इस पूर्वोक्तका अनियम है- उपागतः) इसके लिखनेसे यह दिखायाकि पापकी राशिहे वह राजाका कुल लक्ष्मी प्राण तसेही वचने है कि-शत्रुको दावकर बैठे इनके विनादग्ध किये नही शान्त होती और इसके देशको परिपीडित करे ओर अर्थात् सबको दग्ध करदेती है ॥ ३४१ ॥ इसके यव अन्न जल इंधन इनको दूषित यएषनृपतेर्धमःस्वराष्ट्रपरिपालने । करदे ।। तमेवकृत्स्नमामोतिपरराष्ट्रवर्शनयन्३५२॥ भावार्य-जिस देशमें जो अचार व्यवहार पदः-यः१ एव-नृपतेः ६धर्मः१स्वराष्ट्र-कुलकी मर्यादाहो उस देशके वशहोनेपर परिपालने ७ तं २ एव:- कृत्स्नं २ आमति | उसका उसी प्रचार करना ॥ ३४३ ॥ क्रि- परराष्ट्र २ वर्श २ नयन् ॥१॥ मंत्रमूलंयतोराज्यंतस्मान्मत्रंसुरक्षितम् । योजना-स्वराष्ट्रपरिपालने यः धर्मः मृपतेः । कुर्याद्यथास्यनविदुः कर्मणामा फलोदयात् अस्ति-परराष्ट्र पर्श नपन सन्तं एव (धर्म) पद-मंत्रमूलं१ यतः:- राज्यं १ त- कृत्स्नं मानोति ॥ स्मात? मंत्र२ सुरक्षितं२ कुर्यात् कि- तामा० न्यायसे अपने देशकी रक्षा में जो यथा-मस्य६ न- विदुः कि- कर्मणां६ राजाका धर्महे वक्ष्यमाण न्यायसे दूसरेके आर- फलोदयात्- ॥ देशको अपने अधीन करता हुआराजा उसी योजना- पतः राज्य मंत्रमूलं भस्ति . सकल धर्मको प्राप्त होताहै ।। ३४२ ॥ तस्मात् यथा अस्य मंचं कर्मणां आफलो. यस्मिन्देशेयआचारोव्यवहार कुलस्थितिः । दयात् जनाः न विदुः तथा सुरक्षित मंत्रं तयैवपरिपाल्योसोयदावशमुपागतः३४३॥ पुर्यात् ॥ पद-पस्मिन् देशे ७ यः१भाचारः चिन्ताकरें- यह पूर्वोक्त मंत्र राज्यका मूल ताभा--जिससे मंत्रीओंके संगराज्यकी- व्यवहारः १ पुलस्थितिः १ इएप: परिपाल्यः१ असा १ यदा: वर्श करे नसे इस गगाके संधि विग्रह आदि है-तिससे मंकी उस भटे मकारसे रक्षा- जना पदापादेशःपर्श उपागतः तदा , परध्यारिभालिगगावातीपे. १ एततो या भाचारः व्यवहारः सुख पास्य मदत परमानापन। . तथा:- ३२ गतः१॥
आचाराध्याय राजधर्मभकरण १३ (१४७) कर्मोको फलकी सिद्धिके लिये कोई अन्य- मंत्र और सेनासे जो द्दीन वह पीडनीय होता पुरुष न जाने ॥ ३४॥ हे-जिसके मित्र ओर सेना बलवानहो वह कर्शनीय है सोई नीतिको वचन है कि अरिमित्रमुदासीनीनंतरस्तत्परः परः निर्मूलकरनेसे समुच्छेद- और बल (सेना) क्रमशोमंडलंचिंत्यसामादिभिरुपक्रमः ॥ के निग्रहको पीडन- कोश 'ओर दण्डके पद- अरिः१ मित्रं१ उदासीनः अनं- छीननेको कर्शन कहते हैं- मित्रकेभी दो- तरः१ तत्परः१ परः १ क्रमशः - मंडलं १ | भेद है एक बृहणीय और कर्शनीय- कोश चिन्त्यं१ सामादिभिः ३ उपक्रमैः३॥ और सेनासे जो हीन वह बृहणीय (वढाने- योजना- अरिः मित्रं उदासीनः अनं- | योग्य) और कोश सेनासे जो अधिक वह तरः तत्परः परः एतन्मण्डलं क्रमशः सामा- | कर्शनीय (क्लेशकरनेयोग्य ) अव प्राकृत दिभिः उपक्रमः चिन्त्यं ॥ मित्र अरि और उदासीनोंको कहते हैं- तात्पर्यार्थ- अरि (शत्र) मित्र और कि अनंतर जिसका देश समीपहो वह दोनों लक्षणों ( शत्रुता- मित्रता )से हीन | प्राकृत अरि-उससे परला प्राकृतमित्र और उदासीन ये तीनों तीनर प्रकारके हैं कि | उससे परला प्राकृत उदासीन- शेष भेद सहज- कृत्रिम- प्राकृत- उनमें सहज- | प्रसिद्ध होनेसे नही कहै यह गजमण्डल पूर्व शत्रु वह होता है कि जो सापत्न-(मौसीका- आदि क्रमसें जाननेयोग्य है अर्थात् उनके पुत्र) पितृव्य और उसके पुत्र आदि | आचरणको जानकर साम दान आदि वक्ष्य- कृत्रिम शत्रु जिसका अपकार कियाहो माण उपायोंकी चिंताकरै- इसप्रकार आगे वा जिसने अपना अपकार कियाहो- प्राकृत | पीछे दोनों पाचों में तीनर और एक आप शत्रु-समीपके देशका राजा होता है और इन त्रयोदश पजरूप यह राजमंडल पत्रके, सहन मित्र भानजा फूफी और मौसीका पुत्र | आकार होता है और पाणिग्राह आर्क- और कृत्रिम मिन जिसको उपकार कियाहो दासार आदि तो अरि मित्र उदासीनोंके वा जिसने अपना उपकार कियाहो औरमाकृत | बीचमें आजाते हैं उनका नाममात्रसेही भेद मित्र उस देशका राजा जिसके देशमें एक- | है- अन्य ग्रंथामें वे भेद दिखाये हैं इससे देशका अन्तरहो और सद्दन और कृत्रिम याज्ञवल्क्यने भेद पृथक् नही कई ॥ -मित्र वा शत्रुके लक्षण जिसमें नहीं वह सहज भावार्थ- आरे मित्र उदासीन प्राकृतशत्रु. कृत्रिमोदासीन- और जिसके देश और प्राकृतमित्र प्राकृत उदासीन- इस राज- अपने देशके वीचमें दो देश पडें वह प्राकृत मण्डलका साम आदि उपायोसे विचार उदासीन- इससे ये नौ भेद हुये- शत्रुभी | करे ३४५ ॥ चार प्रकारका होता है-यातव्य-उच्छेत्तव्य- उपाया:सामदानंचभेदोदंडस्तयै- पीडनीय और कर्शनीय- उनमें यातव्य- वच । सम्यमयुक्ताःसिध्येयुर्द- (चढनेयोग्य) समीपका राजा होता है- डस्त्वगतिकागतिः ॥ ३४६ ॥ अच्छेत्तव्य वह है कि व्यसनी सेनासें हीन भगा जिसके वशमें नहीं दुर्ग नहो- मित्रसे पद-उपायाः १ साम १ दानं १ होनहो और दुर्बलहो- वह उखाडने योग्य निर्मलनात्समुच्छेदं पोडन पलनिग्रहं है अर्थात् उसके सिंहासनको छीनले और ! तु पुनः प्राहुः कौशदंडापकर्षणात् । - .
आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३ पर (शत्र )के देश आदि वश होजायगे के विनाही और कोई कालसे और कोई और यदि देव नहीं है तो पुरुषार्थ करने- पुरुषार्थसे मानते हैं-अपने मतको कहते परभी वश न होंगे इससे यह यात्राआदिका कि कुशलबुद्धिवाले मनुआदि यह मानते प्रसंग व्यर्थ है इस शंकासे कहते हैं कि कि देव आदिके समुच्चय (इकट्ठा.) इष्ट-(अपनेको वांछित) और अनिष्टरूंप होनेपर कलकी प्राप्ति होती है ॥ ३५० ॥ जो कर्म की सिद्धि अर्थात् फलकी प्राप्ति है ययान्होकेनचक्रेणरयस्यनगतिर्भवेत् । 'वह केवल देवके अधीन नहीं किन्तु पुरु- यकार ( पुरुषार्थ )कभी अधीन है क्योंकि एवंपुरुपकारेणविनादेवनसिद्धयति ॥ संसारमें तिसी प्रकार ( पुरुषार्थसे सिद्ध) पद-यथाऽ-हि-एकेन ३ चक्रेण३ रथस्यद देखा जाता है और यदि ऐसाही मानोगतो न:-गतिः१ भवेत् क्रि-एवं-पुरुषकारेण ३ चिकित्सक आदिकोंके शास्त्र (चरक - विना-देवं २ न:- सिद्धयति कि- ॥ श्रुत आदि भी व्यर्थ हो जायगे और योजना-यथाहि रथस्य गतिः ( गमनं.) पुरुषार्थक विना देवही सिद्ध नही, सोई | एकेन चक्रेण न भवति एवं पुरुषकारेण 'कहते हैं कि क्योंकी देव उसेही कहते विना देवं न सिद्धयति ॥ हैं जो पूर्व देइसे अर्जित (इकठ्ठा) किया ताभा०-अकेलेसे फल सिद्ध नहीं होता पुरुषार्थ हैं और वह थोडे पुरुषार्थके इसमें दृष्टांत कहते हैं कि जैसे एक चक्र करनेसे महाफलको जो प्राप्ति है उससे (पईयां )से रथ नही चलता इसी प्रकार प्रतीत हुआ पोरुष पौर्वदेहिक कर्म हे-तिससे विनापुरुषार्थ देव नही.सिद्ध होता ।। ३५१ ॥ पुरुषार्थक विना दैव नहीं हो सक्ता इससे हिरण्यभूमिलाभेभ्योमित्रलब्धिर्वरायतः । उस पुरुषार्थमें यल करना- अतीयतेततत्मात्त्यरक्षेत्सत्यसमाहितः ॥ भावार्थ- कर्मकी सिद्धि देव और पुरु- षकार (पुरुषार्थ )में व्यवस्थित है तिसमें पद-हिरण्यभूमिलाभेभ्यः५ मित्रलब्धिः १ देव पूर्व देहसे इकट्ठा किया पुरुषार्थ प्रतीत | वरा १ यतः-अत:-यतेत क्रि-तत्प्राप्ये होताहै ॥ ३४९ ॥ ४ रक्षेत् क्रि-सत्य २ समाहितः१॥ कैचिद्देवात्स्वभावाद्वाकालात्पुरुपकारतः । योजना-यतः हिरण्यभूमिलाभेभ्यः मित्र- संयोगेकोचिदिच्छतिफलंकुशलबुद्धयः । लब्धिः वरा अस्ति-अतः समाहितः सन् तत्प्राप्त्यै सत्यं यतेत (च) रक्षेत् ॥ पद केचित दैवात् ५ स्वभावात् वाऽ ता. भा०-लाभके लिये परराष्ट्र पर चढ़े कालात ५ पुरुषकारतःऽ-संयोगे ७ के- यह पूर्व कहा यहां लाभ तीन प्रकारकाहे चित्-इच्छति कि- फलं २ कुशलवुद्धयः१ | कि हिरण्यका लाभ भूमिका लाभ और योजना-फलं केचित्-देवात् केचित् स्व- | मित्रका लाभ इनमें मित्रका लाभ सबसे कालात्-केचित् पुरुष- | श्रेष्ठहे तिससे इसकी. प्राप्तिके लिये पल कारतः इच्छंति केचित् कुशलबुद्धयः करना वह प्राप्तिका यत्न सत्य वचन है सोई संयोगे इच्छंति ॥ कहते हैं कि जिससे हिरण्य ओर भूमिके ता भा०-कोई इष्ट अनिष्ट फलकी मा- | लाभसे मिन्त्रका लाभ श्रेष्ठ है तिससे कि प्तिको देवसे कोई स्वभाव अर्थात् कारण ! प्राप्तिमें यल और सावधान हुआ भावात्-केचित् (१५०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । आदि उपायोंसे सत्यकी रक्षा करें क्योंकि कि दमन करनेसे दंड कहते हैं तिससे दुम- मित्रकी प्राप्तिमें सत्यही मूल (मुख्य नके जो योग्य उनका दमन करे ॥ ३५४ ॥ उपाय ) है ॥ ३५२ ॥ सनेतुंन्यायतोशक्योलुब्धेनाकृतबुद्धिना। स्वाम्यमात्याजनोदुर्गकोशोदंडस्तयैवच । सत्यसंधेनशुचिनासुसहायेनधीमता ।। मित्राण्येताःप्रकृतपौराज्यंसप्तांगमुच्यते ॥ पद-सः १ नेतुं न्यायतः:-अशक्यः १ पद-स्वामी १ अमात्याः १ जनः१ दुर्ग? लुब्धेन ३ अकृतबुद्धिना ३ सत्यसंधेन ३ कोशः दण्डः १ तथा:-एव वा-मित्राणि १ } शुचिना ३ सुसहायेन ३ धीमता ३ ॥. एता:१मकृतयःश्यज्यंसप्तांगंश्उच्यते क्रि योजना-लुब्धेन अकृतबुद्धिना राज्ञा स योजना- स्वामी अमात्याः जनः दुर्ग | दंडः नेतुं अशक्यः सत्यसंधेन, शुचिना कोशः दण्डः मित्राणि एताः प्रकृतयः भवंति सुसहायेन, धीमतासः न्यायतः नेतुं शक्यः।। एवं-राज्यं सप्तांगं उच्यते ॥ ताभा०- वह पूर्वोक्त दंड लोभी और ता भा०-महोत्साह आदि जिसके लक्षण | चंचल बुद्धि राजा न्यायसे नहींदे सकता- पूर्व कहें ऐसा महीपति स्वामी-मंत्री पुरोहित और जो सत्यसंघ (निष्कपट) और शुद्ध- आदि अमात्य-ब्राह्मण आदिप्रजाके जन-धन्व और पूर्वोक्त सहायोसहित और नय और दुर्ग आदि-सुवर्ण आदिधनकी गशि कोश | धीमान अर्थात् न्याय और अन्यायमें कुशल (खजाना) दण्ड अर्थात् हस्ती अश्व रथ है ऐसा राजा उस दण्डको न्यायसे देस- पत्ति (पैदल मनुष्य )रूप चतुरंगसेना- कताई ।। ३५५ ।। सहा कृत्रिम प्राकृतादि मित्र-ये स्वामी आदि राज्यको प्रकृति अर्थात् मूल कारण - यथाशास्त्रप्रयुक्तः सन्सदेवासुरमानवम् । इस प्रकार राज्यको सप्तांग कहते हैं॥३५३॥ जगदानंदयेत्सर्वमन्ययातत्सकोपयेत् ॥ तपाप्यनृपादंदुयत्तेपुनिपातयेत् । पद-यथाशास्त्रं प्रयुक्तः १ सन् १ सदे- धर्मोहिदंडरूपेणब्रह्मणानिर्मितः पुरा॥ वासुरमानवं १ जगत् २ आनंदयेत् कि- सर्व २ अन्यथा:-तत् २ प्रकोपयेत् कि- ॥ पद- तत् २ अवाप्या-नृपः १ दंडं २ योजना-दंडं यथाशास्त्रं प्रयुक्तः सन्- दुईत्तेषु ७ निपातयेत् फ्रि- धर्मः १ दिन- संदेवासुगमानवं सर्व जगत् मानन्दधेट दण्डरूपेण ३ ब्रह्मणा३ निर्मितः १ पुरा भन्यथा तत् प्रकोपयत् ।। योजना-तत् (राज्य) अवाप्य नृपः : . दण्डं निपातयेत्-हियतः धर्मः पुरा दंड देवता असुर और संपूर्ण मनुष्योसहित ता. भा०-शास्त्रोक्त मयार्दास दिया वह दण्डरपेण निर्मितः ॥ १॥ ता. भा-उस राज्यको इस प्रकार प्राप्त सब जगतको आनंद करताहे और शास्रके होकर गगा वचक शठ आदि दुराचारि- अवलंघनसे दिया बद दंड सर जगत्को याम उस दंडको दे क्योंकि धर्मकोही फुपित करताहै ॥ ३५६ ॥ दंडास प्रहाने पूर्व समयमें रचाई दंट यह अधर्मदंडनंस्वर्गकीतिटोकांश्चनाशयेत् ।। नाम योगिकई क्योंकि गौतमने यह कहा, सम्यतुदंडनराज्ञः स्वर्गकीर्तिजयापहं ।। सोमनादिरया: तेनादातान्दमयेव । पद-अधर्मदण्डनं १ स्वर्ग २ कीति र .
आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३
(१५१)
।
लोकान् २ चा-नाशयेत् कि सम्यक् १ भावार्थ अपने धर्मसे चलायमान भ्राता
तु-दण्डनं १ राज्ञः ६ स्वर्गकीर्तिजयावह पुत्र अर्घ्य (आचार्य आदि ) श्वशुर मातुल
योजना-अधर्मदण्डनं राजां स्वर्ग कीर्ति येभी राजाको दंड देने योग्यहैं ।। ३५८ ॥
चपुनः लोकान् नाशयेत् पुनः सम्यकूद- योदड्यान्दंडयेद्राजासम्यग्वध्यांश्वघातयेत्
ण्डन राजः स्वर्गकीर्तिजयावहं भवति ।
इष्टस्याक्रतुभिस्तेनसमाजवरदक्षिणः ॥
ताभा-अधर्म (शास्त्रका अवलंघन )
से दिया हुआ दंड राजाके स्वर्ग कीर्ति और
पद-यः १ दण्ड्यान २ दण्डयेत् कि-
लोकोंको पापका हेतु होनेसे नष्ट करताहै राजा १ सम्यक् वध्यान २ च - घातयेत्
और. शास्त्रोक्त प्रकारसे भली प्रकार दिया। क्रि-इष्टं १ स्यात् क्रि-ऋतुभिः ३ तेन.३
दंड राजाको स्वर्ग कीर्ति और जयका
समाप्तवादक्षिणः ॥
दाताह ।। ३५७ ॥
योजना-या राजा दण्ड्यान सम्यदंड-
येत् चपुनः वध्यान् घातयेत्तेन राजा समाप्त-
अपिभ्रातासुतीयोवाश्वशुरोमातुलोपिका
वादक्षिणः क्रतुभिः इष्टं स्यात् ॥
नादब्यौनामराज्ञीस्तिधर्माद्विचालितःस्वका-
तात्पर्यार्थ-जो राजा अपने धर्मसे डिगने
त्.॥ ३५७ ॥
| आदि कुकर्मोसे दण्डंक योग्योंको भली
पद-अपि -भाता १ सुतः१अर्घ्यः १ वा- प्रकार शास्त्रोक्त मार्गसे-अर्थात् घिग्धन
श्वशुरः१मातुला १ अपि-वार-न:- अदं- दंड आदिसे दण्ड देता है और मारनेके
डयः १ नाम १ राज्ञः६अस्ति कि- धर्मात् / योग्योंको मारताहै-उस रजानें भली प्रकार
विचलितः १ स्वकात् ५॥
| दीहै दक्षिणा जिनमें ऐसे यज्ञासे मानो यज-
योजना-स्वकात धर्मात विचलितःभ्राता नकिया-अर्थात् उसे पूर्वोक्त यज्ञोका फल
अपिसुतः अर्ध्यः चपुनः श्वशुरः मातुलः राज्ञः मिलताहै कदाचित् कोई शंका करें कि इस
अदंख्यः नाम न आस्ति।
फलके सुननेसे दण्डका देना काम्यह सो
तात्पर्याय-भ्राता पुत्र अर्घ्य देनेके योग्य ठीक नहीं-क्योंकि दण्डके न करनेमें इस
आचार्य आदि-और मातुल येभी अपने वशिष्ठकी स्मृति में प्रायश्चित्त लिखाहै इससे
धर्मसे चलायमान होतो राजाको दंड देने यह नित्य कर्महै कि दंड देने योग्यके
योग्यई-क्योंकि अपने धर्मसे चलायमान छोडनेमें गजा एक रात्र और पुरोहित तीन
कोईभी राजाको अदंड्य नही-यहभी माता- रात्र उपवास करे और दंड देने अयोग्यको,
पिता आदिको छोडकर समझना क्योंकि दंड देने में पुरोहित कुछ और राजा तीन
स्मृति में लिखाहै कि माता पिता घातक | रात्र उपवास को ।।
संन्यासी पुरोहित वानप्रस्थ ये अदण्ड्य हैं भावार्थ-जो राजा दंडके योग्योंको दंड
कि विद्या शील शौच आचारवाले ये धर्मके देताहै और मारने. योग्योंकी मारताहै वह
अधिकारीह॥
अधिक दक्षिणावाले यज्ञासे पूजन कर
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ताहै ॥ ३५९ ॥
(२५२) . . याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । इतिसंचित्यनृपतिः ऋतुतुल्यफलंपृयक् । और अर्थदंड भेदसे दंड दो प्रकारका व्यवहारान्स्वयंपश्येत्सभ्यः परिवृतोन्वहम् ताडनसे . लेकर मारनेपर्यंत शरीरदण्ड और काकिणीसे लेकर संपूर्णधन छीनने पद-इति:-संचित्या-नृपतिः १ ऋतुत- पर्यंत अर्थदण्डहै और दो प्रकारभी यह ल्यफलं २ पृथक-व्यवहारात २ स्वयं:- अपराधके अनुसार अनेक प्रकारका होताहै पश्येत् क्रि-सभ्यः परिवृतः १ अन्वई: ॥ योजना नृपतिः इति ऋतुतुल्यफलं २ और अर्थदण्ड कई प्रकारका होताहै ॥ सोई कहाहे कि शारीरदंड दशप्रकारका संचिंत्य सभ्यः परिवृतः सन् पृथक् व्यवहा- रान् स्वयं अन्वहं पश्येत् ।। भावार्य-कुल-जाति-श्रोणी-और जान- ता० भा०-इस पूर्वोक्त यज्ञके 'तुल्य पद-आपने धर्मसे चलायमान हुए इनको फलको देखकर वक्ष्यमाण सभासदोंसे अपनेर धर्ममें दण्डदेकर स्थापनकर।।३६१।। युक्त राजा पृथक् २ वर्गों के वक्ष्यमाण व्यव- | जालसूर्यमरीचिस्यंत्रसरेणूरजःस्मृतम् । हारोंको स्वयं देखे क्योंकि विना स्वयं देखें | तेष्टोलिक्षातुतास्तिस्रोराजसर्पपउच्यते ॥ दुष्ट और अदुष्टका ज्ञान नही हो पद- जालसूर्यमरीचिस्थ? ऋतरेणुः१ सकता ॥ ३६०॥ कुलानिजातीःश्रेणीश्चगणानुजानपदानपि। रजः१ स्मृतं१ ते१ अष्टोर लिक्षाः१ तुर- ताः तिस्रः१ राजसर्पपः१ उच्यते कि-॥ स्वधर्माच्चलितानराजाविनीयस्थापयेत्पथि। गौरस्तुतेत्रयापट्तेयवोमध्यस्तुतेत्रयः । पद-कुलानि २ जातीः २ श्रेणीः २ च:- गणान् २ जानपदान २ अपि-स्वधर्मात् ५ कृष्णलापंचतेमापस्तेसुवर्णस्तुपोडश । चलितान २ राजा । विनीय:- स्थापयेत् पलंसुवर्णाश्चत्वारःपंचवापिप्रकीर्तितम् ॥ क्रि-पथि ७॥ पद-गौरः१ तु:-ते१ त्रयः१ पट्१ ते१ योजना- राजा स्वधर्माद चलितानि | यवः१ मध्यः१ तु-ते१ प्रयः२ कृष्णला? मुलानि जातीः चपुनः श्रेणीः चपुनः जान-(पंचर ते१ मापः१ ते१ सुवर्णः१ तुः-पोड- पदान् गणान् विनीय पथि स्थापयेत् ।। शर पलं१ सुवर्णाः१ चत्वारः१ पंच१ या तात्पर्य-ब्राह्मण आदिकुल, और मू- | अपि:-प्रकीर्तित २ ॥ भिषिक्त आदिजाति औरताम्बलिक आदि योजना- जालसूर्यमरीचिस्य रजः स- श्रेणी और हेलानुक आदिगण, और फारुक रेणुः स्मृतः ते अष्ट लिक्षाः, तास्तितः राज- आदि जनपद (देश) ये सब अपने धर्म | सर्पपः उच्यते, ते त्रयः गौरः (सर्पपः ),ते सें चलायमान होतो गना अपराधके अनु-पट् मध्यः यवः, ते त्रयः कृष्णलः, ते पंच- सार दण्डदेकर अपनेर धर्ममें स्थापन कर मापः,ते पोडश सुवर्णः, चत्वारः वा पंच- दुराचारीयोंको दण्ड देयह जो पूर्वकह आपई । सुवर्णाः पलं प्रकीर्तितं ॥ इदंड शरीरदण्ड और धनदण्डके भेदसे तात्पर्याय- जाल (झरोखा )के मध्यमें इंटर नारदेके वचनानुसार है कि शरीरदंड प्रविष्ट हुए सूर्यको किरणोंमें स्थित गो रग नाम परिवर्षदस्य इंडस्तु विधिः स्मृतः । | उसे योगीश्वर प्रसरेणु कहतेहैं आठ प्रस- उदिरतु मरणांत प्रकासितः। काफिया. शरीरो समायोजस्तावसरेया। स्तविप।
आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३ (१५३) रेणुकी एक लिक्षा (लीख) और तीन लिक्षा- | इसी प्रकार पांच सुवर्णको पल कहतेहैं इस ऑकी एकाई और तीन राईकी एक गौर सर्पप | पक्षमें बीस निष्कका नाम पलह-इसी प्रकार (सरसो) होताहै-और छःसरसोका एक मध्य- अन्यभी निष्कका चालीसमा भाग कृष्णल. यव होताहे अर्थात् स्थूलनमूक्ष्म-इससे | दो निष्कका सुवर्ण और आठ निष्कका पल गोरसर्षप और रागसपिभी मध्यम जानने | इत्यादि लोक व्यवहारके अनुसार इसी और यहां मध्यम शन्दके लिखनेसे सर्पप वचनसे जानने ॥ आदि शब्दक बल तोलके वाची नही किंतु भावार्थ- जाल में स्थित सूर्यके किरणांकी इनसे तुले द्रव्यके वाचीहैं जैसे प्रस्थसे तुले | रजको सरेण कहतेहै-आठ असरेणुको एक द्रव्यको प्रस्थ कहते हैं-इसी प्रकार सर्पप लिक्षा-तीन लिक्षाओंकी एक राई कहातीहै आदिसे तुले द्रव्यको सर्षप कहतेहैं यदि तीन राईका एक सरसों-छ: सरसोका सर्पप आदि शब्दको केवल तोलका वाची- मध्यपव-और तीन मध्ययवोंका एक कृष्णल मानेंगे तो सरेणु इकटे करके तुल नही | और पांच कृष्णलोंका एक माप-और सौल- सकेंगे उसके द्वारा कृष्णल आदि व्यवहार ह माषोंका एक सुवर्ण-और चार वा पांच न होगा उनमेंभी स्थूल-स्थूलतर-स्थूलतम मापोंका एक सुवर्ण कद्दाहे ॥ ३६२-३६३॥ , सूक्ष्म-मूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम-मध्यसर्षप आदि देकृष्णलेरूप्यमापोधरणंपोडशेवते । उन्मानके भेदसे देश में जब व्यवहारका भेद शतमानंतुदशभिर्धरणैः पलमेव तु ॥ है तम दंडक व्यवहारमें मध्य लेना यह नियम इस वचनसे किया वे तीन मध्ययवोंका पद-द्वेष कृष्णले १ रुप्यमापः१ धरण १ कृष्यल होताई पाच कृष्णलोंका एक षोडश एवा-तेर शतमानं तु देशाभिः भाषा षोडश मापोंका एक सुवर्ण चार धरणेः३ पलं? एक:-तु:- ।। वा पांच सुवर्णोका एक पल नारद आदि योजना-द्वे कृष्णले रुप्यमापो भवति ऋषियोंने कहाह यदि स्थूल तीन यहाँसे ते पोडश धरणं दशभिः धरणेः शतमानं तु कृष्णल मानोंगे तो व्यावहारिक निष्कका | पुनः पलं एव भवति ॥ मोडशवां भाग कृष्णल होताहै उन पांच ता. भा०- पूर्वोक्त दो फुगलोंका कृष्णलोंका माप और सोलह माषोंका एक चांदीका मासा होताह और सीलद रुप्प- सुवर्ण होताहे और वह व्यावहारिक पांच मासोंका एक धरण कहाता पुगणभी इसी- निष्कोंका एक सुवर्ण होताहै और चार सुव- को कहते क्योंकि सोलह मापोंका एक गोका एक पल होताहै क्योंकि वो सनि- धरण वा पुगण म¥ने कहाह-और दश घर- कोको पल कहतेहैं और गव सूक्ष्मतीन गोका शतमान और पल कहा और पूर्वोत्तर यवॉसे कृष्णलको मानोगे तो व्यावहारिक चार सुवर्णाशा एक चांदीका मापा हो- निष्कका बत्तीसमां भाग कृष्णल होताहै ताई ।। ६६४ ॥ बस पक्षमें ढाई निष्कोंका सुवर्ण और दश निकमुवर्णाश्चत्वारस्कार्पिकस्तानिकापणः निष्कोंका पल होतादे और जय मध्यम ययोंसे कृष्णल मानोगे तय नियका यो- पद-निक १ सुवर्णाः १ चत्वारः १का- समां भाग कृष्णल और चार कृष्णलका पिंक: १ तानिकः १ पणः १॥ सुवर्ण और पोदा सुवर्णका पल होताई ते पोल सादर पुगने पर राजन (१५४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना-चत्वारः सुवर्णाः निष्कं भवति । दाइसोंपणका दंड प्रथम साहस और ५०० कार्षिकः ताम्रिकः पणो भवति ॥ पांचसोका दंड मध्यम साइप्त और १००० ता भा०-पलका चौथा भाग- लोकमें | हजारका.दंड उत्तम साहस कहाहै वहभी कर्ष प्रसिद्धहै-उसकर्षभर तांबेको पणवाका- दूसरा पक्ष अज्ञानसे अपराधक विषयमे पिण कहतहैं क्योंकि मनुने कर्षभर तांबेको समझना । पण और कार्षापण कहा जय पांच सुवर्ण भावार्थ-अस्सी ऊपर हजार१०८०का दंड का पल मानते हैं तब वीस मासेका पण उत्तम साहस और उससे आधा मध्यम और होताहै तिससे यह व्यवहारभी सिद्ध होताहै उससे आधादंड अधमसाहस कहाहै।।३६६।। कि पणके वीसवे भागको मासा कहते हैं- धिग्दंडस्त्वपवाग्दंडोधनदंडो जय चार सुवर्णका पल मानते हैं तब सोलह वधस्तथा । योज्याव्यस्तासमस्ता मासेका पण होताहै इस पक्षमें सुवर्ण कार्या- पण पण इन शब्दोंका अर्थ एकभी है तोभी वाह्यपराधवशादिमे ॥ ३६७ ॥ पण और कार्यापण तांबेके लेन-इस प्रकार पद-धिग्दंडः१ तु:-अथ वाग्दण्डः १ सोना चांदी तामाआदिका प्रमाण दंड उपयो- धनदंडः १ वधः१तथाऽ-योज्याः१व्यस्ताः । गी होनेसे कहा इसी प्रकार लोक व्यवहारके | समस्ताःश्वाऽ-हि- अपराधवशात् ५ इमे १ अंग कांशी पीतलकामी प्रमाण जानना ॥ योजना-धिग्दंड अथ वाग्दंडः धनदंड: भावार्थ-चार सुवर्णीका एक निष्क और | तथा वधः इमे त्यस्ताः वा समस्ताः अपराध- कर्षभर तांबेका पण कदाताहै ॥ ३६५॥ वशात् योज्याः॥ साशीतिपणसाहस्रोदंडउत्तमसाहसः । तात्पर्य अव दंडके भेद कहते हैं कि धिर धिग्-यह वाणी कहकर . निंदाकरनी तदर्धेमध्यमः मोक्तस्तदर्धमधमः स्मृतः ॥ | धिग्दंड और कठोर वचन और शापदेना पद- साशीतिपणसाहस्रार दण्डः१ उत्तम- वाग्दंड-धनको हरना धनदंड-और रोकनेसे साहसः१ तदर्द्ध१ मध्यमः प्रोक्तःरतदर्द्ध १ मरण पर्यत शरीरका दण्ड वधदण्ड ये चार अधमः १ स्मृतः १॥ प्रकारके दंड एकएक वातीन चार अपराधके योजना-साशीतिपणसाइलादण्डः उत्तम- अनुसार राजाको देने पूर्वोक्त क्रमसे पहिलार साहसः मोक्तः तदर्द्ध मध्यमः प्रोक्तः तदर्घ असाध्य होयतो पिछलारदेना-क्योंकि मनुने अधमः स्मृतः ॥ १ ॥ यह कहा कि पहिले धिग्दंड फिर वाग्दंड तात्पर्यार्थ अस्सीअधिक सहस्रपणका फिर धनदंड और उससे पीछे वध दंडदेने। जो दंडहै वह उत्तम साहस और उससे भावार्य-धिग्दण्ड वाग्दंड धनदंड वधदंड आधा (५४०) दंड मध्यम और उससे इन एकरको वा सबको राजा अपराधके आधा ( २७०) दंड अधम साहस कहाई- वश ( अनुसार)दे ॥ ३६७ ॥ ' और जो मनुने यह कहा कि ( २५० ) ज्ञात्वापराधंदेशचकालंयलमयापिका । कार्यापगस्नु विजयस्तानिकः कार्पिक स्तथा । वयाकर्मचवित्तंचदंडदव्यपुपातयेत् ।। -१ पगाना देसाते सार्दै प्रथमः साहसः स्मृतः पद-ज्ञात्वा:-अपराधं २ देशं २ च- पंप विशेषः सहसं तेव पोत्तमः । कालं २ पलं २ अया-अपि-वा-वयः २ - आचाराध्याय राजधर्मप्रकरण १३ (१५५) कर्म २.चा-वित्तं २ चा-दण्ड २ दण्ड्येषु ७ धर्मका समूह क्षत्रियके समूहमें कहाहै तथापि मातयेत् कि । | देशमण्डल आदिकी पालनाके अधिकारी योजना-अपराध- चपुनः देश-कालं-- अन्यवर्णकाभी यह धर्म जानना क्योंकि राज- बलं अथ वयः चपुनः कर्म वितं ज्ञात्वा धर्मीको कहताहूं जैसे आचरणवाला नृपही दण्डं दंडयेषु पातमेत् ॥ इस वचनमें राजासे पृथक् नृपपदका ग्रहणहे. तात्पर्यार्थ-अपराध देश काल अवस्था और करका लेना रक्षाके लिये है और रक्षा कर्म धन इनको जानकर इनके अनुसारही दंड देनेके आधीनहै ॥ दंड देने योग्योंको दंडदे--इसी प्रकार जान- भावार्थ-अपराध देश काल अवस्था कम कर वा विना जाने एकवार वा वारंवार धन इनको जानकर दंड देने योग्योंको अपराधके अनुसार दंडदे-यद्यपि यह राज- दंड दे ॥ ३६८ ॥ इतिराजधर्मप्रकरणम् ॥ १३ ॥ इति श्रीमिश्रौपापंडितरामरक्षात्मजपंडितमिहिरचंदकृतमिताक्षरा प्रका- शभाषा विवृत्तिसहित याज्ञल्क्यस्मृता आचाराध्यायः संपूर्णः ॥
याज्ञवल्क्यस्मृतिः। मिताक्षराप्रकाशभापाटीकासमेता। व्यवहाराध्यायः॥ क जो व्यापार उसे अथवा बादी और साधारणव्यवहारमातृकाप्र०१ प्रतिवादी (मुद्दई मुद्दायले )योंका किया. व्यवहारानृपः पश्येद्विद्रिाह्मणैः सह । भोग साक्षी प्रमाण आदिसे परस्पर विरुद्ध धर्मशास्त्रानुसारेणक्रोधलोभविवर्जितः १॥ कोटि जिसको ऐसे व्यापारको व्यवहार कहा पद- व्यवहारानर नृपः१ पश्येत् क्रि- है संप्रतिपत्ति (दावेको मानना) उत्तरमें तो विद्वद्भिःश्वाह्मणेः ३सहधर्मशास्त्रानुसारेण३ व्यवहार पद गौणहै-उस व्यवहारके अनेक शोधलोभविवर्जितः १॥ प्रकार-व्यवहारान्-इस बहुवचनसे ही योजना-क्रोधलोभविवर्जितः नृपः धर्म- याज्ञवल्क्यने दिखाये हैं-क्रोध और लोभसे शास्त्रानुसारेण विद्वद्भिः ब्राह्मणैः सह व्यव- | विवर्जित ( रहित )नृप ( नरोंका पालक )नृप हारान् पश्येत् ॥ इस पदके देनेसे यहभी दिखाया कि केवल तात्पर्यार्थ-अभिषेक (गजतिलकके सम- क्षत्रियकाही यह धर्म नही किंतु प्रजाकी पालना करने में जो अधिकारीहैं उन सबका यका स्नान)आदि गुणांसे युक्त राजाका परम धर्म प्रजाका पालन है वह दुष्टोंको दण्ड दिये है- राजा व्यवहारोंकों-पश्येत (देखें) पूर्वोक्त विना नहीं होसकता और दुष्टका ज्ञान होना के लिये है वेद व्याकरण आदि धर्मशास्त्रके भी पश्येत् इसका अनुवाद धर्मविशेष णताने व्यवहारके विना देखे असंभवई इससे भाचा- राध्यायके राजधर्म प्रकरणमें इसे वचनसे कह को देख क्षत्रिय आदिको सहित नहीं यहां ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मणों सहित राजा व्यवहारों आए हैं कि सभासदों सहित राजा प्रतिदिन ब्राह्मणैः सह-सह शब्दके योगमें ब्राह्मणेः यह व्यवहारोंको स्वयं देखें परंतु यह नहीं कह प्रधानमें तृतीयाहै इससे व्यवहारके दे- आए कि वह व्यवहार कैसा और किस खनमें राजा प्रधान है और ब्राह्मण अप्र- प्रकारका और कैसे करना अर्थात् यह उस । की इतिकर्तव्यता ( करनेकी गति ) नहीं। इससे यदि राना व्यवहारको न देखें धान है-श्योंकि यह पाणिनीका सूत्र है कही उसकेही कहनेको इस दूसरे अध्या- यका प्रारंभ करते हैं अन्यके विरोधसे अपने को नही-सोई मनुने कहा कि दंड देनेके वा अन्यथा देखें तो राजाको दोपद ब्राह्मणों. आत्माकी वस्तुको कहना( यताना )व्यवहार भयोग्याको दंड देता और योग्योंको नही है जैसे कोई कहे कि यह क्षेत्र मेरा है इसी देता राजा अपयशको प्राप्त होताई और प्रकार दूसरा भी उसके विरोधसे कइकि नरफमें जाताहै भार व्यवहारभी धर्म शास्त्रके 'यह तेय नही मेरादे और मदनरलमें मयख- मनुसार देखे औशनस आदि अर्थ शत्रके पो यह कहा कि विवाद करते हुए सापुत्रोसपाने। मनुष्यको अज्ञात और अधर्मका योध- १ भान् पन् NRI दयश्चियायदर- रान् एवं पश्येमन्यः सितोन्नई। पन् । सो महामोदि मरकं पारिति । -२ समेत व्यवहाराध्याय साधारणव्यवहारमालकाप्रकरण १ (१५७) अनुसार नदेखै देश आदि संकेतका जो | ब्राह्मणही लेनै क्योंकि कात्यायनने यह सामयिक धर्म यदि धर्मशास्त्रका विरोधी नहीं कहा कि स्थिर बुद्धिमान् मौल (परम्प- वहभी धर्मशास्त्रका विषय है इससे पृथक् रासे चले आये ) धर्मशास्त्रके अर्थमें कुश- नहीं कहा-सोई कहेंगे कि अपने धर्मके अवि- ल और नीतिशास्त्रमें चतुर ऐसे सभासदों रोधसे जो धर्म सामयिकहै और जो राज- ( से युक्त राजा रहे और वेभी सभासदः-इस' कृत धर्म है वहभी यत्नसे रक्षाकरने योग्यहै- बहुवचनसे तीनही रखने और मनुनेभा धर्मशास्त्रक अनुसार यह कहनेसेदी क्रोध कहाँहै कि जिस देशमें वेदके ज्ञाता तीन लोभ विवर्जित 'आजाता फिर क्रोध लोभ | ब्राह्मणं टिकतेहैं और बृहस्पतिने इस वचन- विवर्जितका देनर आदरके लियेहै-नसहने से सात पांच५वा तीन ३सभासद कहेहैं कि को क्रोध और अधिक अभिलापाको लोभ / लोकवेद धर्मके ज्ञाता सात पांच वा कहतेहैं। तीन ब्राह्मण जहां बेठतेहैं वह सभा यज्ञके भावार्थ-क्रोध और लोभसे रहित राजा | समान है कदाचित कोई शंकाकरे कि पूर्व विद्वान् ब्राह्मणों सहित धर्मशास्त्र के अनुसार श्लोकमें कहै ब्राह्मणेः इस पदका श्वताध्य- व्यवहारोंको देखे ॥ १॥ यनसंपन्नाः यह विशेषणहै सो ठीक नही क्योंकि ब्राह्मणेः इस तृतीयांतका श्रुता- श्रुताध्ययनसंपन्नाधर्मज्ञाःसत्यवादिनः । ध्ययनसंपन्नाः यह विशेषण नहीं होस राज्ञासभासदः कार्यारिपौमित्रेचयेसमा१२ । कता और विद्वान हो- यहह अर्थ पद-श्रुताध्ययनसंपन्नाः १धर्मज्ञाः सत्य- जिस्का ऐसे विद्वद्भिः इस पदके संग पुन- वादिनः १ राज्ञा ३ सभासदः १ कार्याः१ रुक्ति दोषभी आवेगा-तैसेही कात्यायनने रिपी मित्रेचा-ये१ समाः२ ॥ ब्राह्मण और सभासदोंका भेद प्रकटतासे : योजना-श्रुताध्ययनसंपन्नाः धर्मज्ञाःसत्य- दिखाया है कि प्राडिवाक (वकील) अमात्य वादिनः चपुनःरिपी मित्रे ये समाः तेसभासदः (मंत्री) ब्राह्मण पुरोहित सभासद-इनसे युक्त राज्ञा कार्याः ॥ होकर व्यवहारोंको देखनेवाला राजा धर्मके अनुसार स्वर्गमें टिकता है उनमेंभी यह तात्पर्यार्थ-मीमांसाव्याकरण आदिके पटने भेद है कि ब्राह्मण अनियुक्त और सभासद और सुननेसे युक्त और वेदके पाठी धर्म-नियुक्त होते हैं इसीसे कहते है कि नियुक्त शास्त्रके ज्ञाता और सत्यवादी और शत्रु (नोकर) हो वा अनियुक्त हो धर्मका ज्ञाता और मित्रमें सम दृष्टि (रागद्वेषसे रहित ) सभामें जैसे बेठसके उसी प्रकार दान मान १ सतु सभ्यैः स्पिरैर्युक्तः प्रामोलैर्दिजोत्तमः। धर्म- सत्कार पूर्वक राजाको सभासद करने- शाचार्यकुशलरर्यशास्त्रविशारदः । यद्यपि श्रुताध्ययनसंपन्नाः इस पदसे मीमांसा २ यस्मिन् देशे निपीदन्ति विवादविनयः। आदिके श्रोता और पटनेवाले अविशेष ३ लोकवेदाधर्मशा सत पर योशिवा । यत्रो- से कहे हैं कछु ब्राह्मगद्दी नहीं. तथापि पविष्टा विभाः स्यु सायशासशी सभा । ४ स प्राडियाफः सामात्यः निजपाविरोधेन यस्तु सामयिको भवेत् । ससभ्यः प्रेक्षको राजा स्वर्ग विशति धर्मतः। सोपि पलेन संरक्ष्यो धाराजकृतथयः। ५ नियुक्ती वानियुको वा धर्मको । Hama (१६०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराभकाशसहित । . तिरस्कार जिस्का ऐसा पुरुष राजाको वा चौरी-साहस-स्त्रीसंग्रहण-स्त्रीपुरुषकाधर्म- प्राडिवाकको विज्ञापन करें (अर्जीदे) तो विभाग- घृत- आह्वय( संग्राम )- ये वह विज्ञापन उस व्यवहारका पद (विषय) है अष्टादश (१८) पद व्यवहारकी स्थितिमें जो व्यवहार प्रतिज्ञा- उत्तर- संशय- हेतु-होते हैं-और ये अगरहभी साध्यके भेदसे परामर्श-प्रमाण- निर्णय- प्रयोजनरूप है बहुत होजाते हैं- सोई नारदंने कहा है कि यही उसका सामान्य लक्षणं है उस व्यवहार- इनके औरभी अष्टोत्तरशत (१०८) भेद केभी दो भेद है शंकाभियोग और तत्त्वाभि- | होते हैं- और मनुष्योंकी क्रियाके भेदसे. योग- सोई नारंदने कहा है कि शंका और इनकी सेकडो शाखा होती हैं, और राजाको तत्वके अभियोगसे अभियोग दो प्रकारका विज्ञापन करे इस कहनेसे यह दिखायाकि. है असजनोंके संगसे शंका और चिह्नके स्वयं जाकर निवेदन करे और राजा वा. दर्शनसे तत्त्वका अभियोग (ज्ञान) होता है | राजाके पुरुषोंके कहनेसे निवेदन न करें- सोई. और तत्त्वका अभियोगभी दो प्रकारका है- मर्नुने कहा है कि राजा वा राजाका पुरुष प्रतिषेधरूप- और विधिरूप- जैसे मेरे स्वयं कार्य ( दावा )को पैदा न करें- और सुवर्ण आदि धनको लेकर नहीं देता वा मेरे अन्यके निवेदनकिये अर्थका मास (छिपाना) क्षेत्र आदिको यह हरता है सोई कात्यायनने कोसी प्रकार न करें-परेः इस पहुवचनसे यह कहा है कि जो स्वयं- उचितको न कर दिखायाकि एककेवा दोके वा बहुताके - संग या अन्यायको करै वह व्यवहारभी फिर एकका व्यवहार होसकता है- और जो इन मनुके (भ. ८ श्लो. ४-५-६-७) वैच- यह नारदका वचन है कि एकका बहुतोंके नासे अठारह प्रकारका हैऋणादान-निक्षेप-संग-त्रियोंका-सेवकोंका-विवाद धर्मके अस्वामिविक्रय (अन्यकी वस्तु वेचना) - ज्ञाताओंको स्वीकारके अयोग्य लिखा है- वह संभूयसमुत्थान ( साझेका व्यापार) दियेको भिन्नरसाप्यके विषयमें समझना-और राजा न देना- वेतनको न देना- प्रतिज्ञाकी- को विज्ञापन कर-इससेही यह यात अर्थात- हानि- ऋयविक्रयका अनुशय( त्याग) सिद्ध है कि राजाके पूछनेपर नम्रताका वेष धारे स्वामी और गोपालका विवाद सीमाका- निवेदन करें और अयांका निवेदन युक्त विवाद- कठोरदंड- और कठोरखाणी- होय तो राजा अपनी मुद्राका पत्र भेजकर , अभियोगस्तु विशेष संवामियोगतः शाह प्रत्यर्थीको बुलावे- और बुलानेके योग्य सातुसंसर्गातलं होगमिपर्शनात । नहो तो न पुलावे इससे सब यहां नदीकदा अन्यस्मृतियों में तो सष्टके लिये यह यहाहे २ न्याय स्वं नेच्छवे कर्तुमन्याय दाफरोति यः। ३ रोपामारालादाने निक्षेपोऽस्यामिविश्यः। संभू. १ एपामेव प्रभेदोन्यः शतमोत्तर भाकिया गप समुत्थान इसरानाकर्म पतनस्पैर धादानं । भान्मनुष्याणां पातशाम्रो निगयते । राशिय माविक्रमः । प्रायविस्पानुसो ति सा निगरयो । सीमाविवादधर्मय पारये इस्लामिका २ मोत्पादपरताय कार्य रामावाप्यस्य पूराम प्राषितमन्येन प्रमेतार्य कपंचन। सर्व य साम पर बीसमालमेर पसीधी लि. माग पूलनार एव पापानि पर. ३ पास मिः स स प्रेमनग। हारिया भमादेशी महापारि | व्यवहाराध्याय साधारणव्यवहारमारकाप्रकरण १ (१६१) कि समयपर आए और आगे कहते हुए आदिहै-उनकोभी इस प्रकार राजा बुलाव कार्यार्थीको पूछे कि क्या तेरा कार्यहै और जो कार्य भारी हो और उनको-क्रोधन आवे क्या दुःखहे भय मतकरै-हे मनुष्य कहो आसेधकी व्यवस्थाभी अर्थात् सिद्धहीहें वह किसने किस समय किस कारणसे तुझे नारदने केहीहै कि जो कहने योग्य अर्थपर दुःख दिया इस प्रकार सभामें आयेको पूछे | न टिकै और अपने वचनको उलट जाय इस प्रकार पूछाहुआ वह मनुष्य जो कहै | ऐसे मनुप्यका प्रत्यर्थीके आनेतक विवा- उसको सभासद और ब्राह्मणोंके संग विचार दार्थी राजा आसेघ (रोक ) करे और वह कर करे और उचित होय तो प्रत्यर्थीके आरोप स्थान-काल-प्रवास-कर्म-इनके बुलानेके लिए अपनी मुद्राके पत्रको अथवा | भेदसे चार प्रकारकाहै जो अपने पक्षको पुरुषको भेजदे-और इतने मनुष्योंको राजा | सिद्ध न कर सके वह आसेधको न लघे न बुलावे असमर्थ-चालक-वृद्ध-संकटमें आसेधके समयमें जो आसेधका भागी स्थित-कार्यमें व्याकुल-अन्य कार्यमें आस- | आसेधको नही मानता-अन्यथा करतेहुए व्यसनी- राजकार्यमें व्याकुल-मत्त- उ- | उस आसिद्धको दण्ड और शिक्षादे जो न्मत्त-प्रमत्त-दुःखी और भृत्य-हीनपक्षवाली आसिद्ध (कैदी) नदीका तरना वन दुष्ट- और कुलीन और प्रसूता स्त्री-सब वामें | देश और उपद्रव आदिमें आसेधका अव- उत्तम कन्या इनकोभी न बुलावे-क्योंकि लंघन करताहै वह अपराधी नहीं होता इनके प्रभु ज्ञातिके होतेहैं और जिनके अ- | सेवाका अभिलाषी-रोगसे आर्त-यज्ञ कर- धीन कुटंब हो वे-और व्यभिचारिणी वेश्या | नेवाला-व्यसनमें स्थित-अन्यके संग आभि- कुलसे हीन-पतित-जो है उनका बुलाना | युक्त ( लडता) राजकार्यमें उद्यत-गी कहाहे-काल-देश-और कार्योका बल अ- | चराते गोपाल और खेतवोते किशन, और बल देखकर असमर्थ आदिकोंकोभी शनैः२ | शिल्पी और संग्राममें योद्धा, ये सब आसेधका राजा यानासें बुलावे-और अभियोग (दावा) | अवलयन करतेहुए अपराधी नही होते- की दशाको जानकर जो वनमें संन्यासी यदि ये पूर्वोक्त असमर्थ-आदि, पुत्र आदि, वा १ काले कार्यार्थिनं पृच्छेद्गुणंतपुरतःस्थित । कि किसी अन्य मित्रको भेजदें तो वे परार्थवादी कार्य का चते पीडा माभैषीबीहे मानव॥केन कस्मिन् न समझने क्योंकि इस नारेदके वचनसे कदा कस्मात्पृच्छेदेवं सभागत। एव पृटः सयड्यात स १ वक्तव्ये ह्यतिष्ठन्तमुत्क्रामतं च तद्वचः । सभ्य ब्राह्मणैः सह॥विमृश्य कार्य न्याय्य चेदासानार्थ- | आसैधयेद्विवादार्थी घावशाकानदर्शनम् ॥ स्थानासेघः मतः पररामुद्रा वा निक्षिपेत्तस्मिन्पुरुष वा समादिशेत | कालकृतः प्रवासात्कर्मणस्तथा । चतुर्विधः स्यादासे- अकल्पवालस्थविरविषमस्यक्रियाकुलान् । कार्याति- | घो नासिद्धस्तं विलघयेत्॥भासेधकाल आसिद्ध आसेध पातिव्यसनिनृपकार्योत्सवाकुलान् । मत्तोन्मत्तप्रम- । पोतिवर्तते॥सविनेयोऽन्यथा कुर्वन् नासैद्धा दहभाग्म- त्तान्भृित्यानाहू नयेनृपः । न हीनपक्षां युवती कुले- वेवानदीसंतारकां तारदुर्देोपालवादिषु ॥ आसिर जाता प्रसूतिकां ॥ सर्ववर्णोत्तमां कन्यांता ज्ञाति- परासेधमुत्क्रामन्नापराभुयात् । निर्देष्टुकामो । प्रभुकाः स्मृताः ॥ तदधीनकुटुंदिन्यः स्वैरिण्यो गणि- | यियक्षुर्व्यसने स्थितः ॥ अभियुक्तस्तथान्येन काश्च याः। निष्कुला याश्च पतितास्तासामहानामिप्यते ॥ | कार्योद्यतस्तथा। गवां प्रचार गोपालाः सस्पाम काळं देशंच विज्ञाय कार्याणां च बलावले ! अकल्पादन वलाः ॥ शिल्पिनथापि तत्काळमायुधीया पिशननिराहानयेन्नृपः। ज्ञात्वा वियोगं येपि स्युर्वनेप्रत्र यो न भ्राता नच पिता न पुत्री छपी जितादयः । तानप्यासानयदोजा गुरुकार्येष्वकोपयन् ॥'परार्थवादी दंव्यः स्याद् व्यवहार व्यवहाराध्याय साधारणव्यवहारमालकामकरण १ "मेरेपेर सो रुपये नहीं चाहतेहैं यह मिथ्यो- | किया कि संदिग्ध-प्रकृतसे अन्य अत्यंत त्तरहे सोई कात्यायनने लिखा कि यदि अल्प-अत्यंत अधिक- पवैकदेशव्यापी- अभियुक्त (प्रत्यर्थी) अभियोग (दावा) व्यस्तपद-अव्यापी-निगूढार्थ-आकुल-व्याख्या का अपन्हव ( नाही) करे तो उस उत्तरको गम्य-असार-इतुने उत्तर-उत्तराभास होते हैं व्यवहारसे मिथ्या जाने वह मिय्या उत्तर | उनमें संदिग्ध यहहै कि इसने मेरेसो सुवर्ण लि- इस वचनमें चार प्रकारका कहाहै कि यह येहैं इस अभियोगमें सचलियेहैं परंतु यह ख- मूठह-मैं जानताभी नही मैं उस समय वहां पर नही कि सो सुवर्ण लिये वा सौ मासे-प्र- नहीं था-मैं उस समयतक पैदाभी नही हुआ | कृतसे अन्य यह है कि सौ सुवर्णके अभियो- था इस प्रकार मिथ्या उत्तर चार प्रकारकाई-गमें सौ पण मेरेपर चाहतेहैं-अत्यल्प यह है प्रत्यवस्कंदन उत्तर उसको कहतेहैं मैंने सो | कि-सो सुवर्णके अभियोगमें पांच सुवर्ण रुपे लियेथे परंतु-देदीये-अथवा प्रतिग्रहसे चाहतेहैं-अत्यंत अधिक वह है कि सो मिलेथे-सोई नारदेने कहा कि अर्थीने जो | स्वर्णके अभियोगमें दो सौ सुवर्ण चाहतेहैं- अर्थ लिखाहो उसे प्रत्यर्थी मानकर कोई । पर्खेकदेशव्यापी वह है कि सोना और कारण बतादै तो उस उत्तरको प्रत्यवस्कंद- | वस्त्र आदिके अभियोगमें सोना लियाहै न कहतेहैं-और पूर्वन्याय उत्तर वह होताहे अन्य नही-व्यस्तपद वह है कि-सो सुवर्ण- जहां प्रत्यर्थी यह कहै कि जिस अर्थकाइस- के अभियोगमें यह उत्तर देना कि उसने ने अभियोग कियाहै उसमें मैं च्यवहारके मुझे माराहै-अव्यापर यह है कि जिसके मार्गसे पराजय कर चुकाहूं-सोई कात्यायने देश स्थान आदि नमिले-जैसे मध्यदेश ने कहा कि जो आचरणसे अवसन्न काशीकी पूर्व दिशामें इसने मेरा क्षेत्र छीन (हाग) अर्थी अर्थको यदि फिर लिखे तो लिया-इस पूर्वपक्षमें यह उत्तर देना कि में पहिले जीता हुआ वह अर्थ होता है उससे क्षेत्र छीन लीया-निगूढार्थ वह होताहै-कि उसका उत्तर प्राङ्न्याय उत्तर कहाताई-जब सौ सुवर्णके अभियोगमें यह उत्तर देना कि ये उत्तरके लक्षणहैं-तो जिनमें उत्तरके लक्ष- क्या मेरे ही शिर इसके आतेहैं-ऐसे प्रत्य- ण नही उत्तरके समान दीखते वे अर्थात् | थीके कथनको प्राड़िवाक वा सभासद वा उत्तराभासहैं-सोई अन्य स्मृतिमें स्पष्ट अर्थी यह सुचन करे कि अन्यपर चाहतेहैं आकुल वह होताहै कि पूर्वापर जो १ अभियुक्तोभियोगस्य. यदि कुर्यादपहवम् । विरुद्धहो जैसे सुवर्ण शतके अभियोगमें- मिथ्या त विज्ञानीयादुत्तरं व्यवहारतः ॥ २ भियतनाभिजानामि तदा तत्र न सनिधिः । सच लियाथा-परंतु मेरेपर चाहते नही- अजातश्चास्मि तत्काल इति मिथ्या चतुर्विघम् । व्याख्यागम्य वह होताहै कि जिसमें कठिन ३ अर्थिना लिखितो योर्थः प्रत्यर्थी यदि तं तया । विभक्ति समास वा अन्य देशको भाषा कह- प्रपद्य कारणं वयात्मत्यवस्कदनं स्मृत । नेसे कठिनाईहो और उसका अर्थ खोलना ४ आचारेणावसन्नोपि पुनर्लेखरते यदि । सोभिधे- / पढे-जैसे कि सोसुवर्ण इसके पिताने लियेथे यो जितः पूर्वप्राइन्यायस्तु स उच्यते ॥ इस अभियोगमें यह उत्तर कि लेनेवालेके ५ सदिग्धमन्यत्प्रकृतादत्यल्पमतिभरि चापक. | सो वचनसे-सुवाको-पिताको नही. मान- देशव्याप्यन्यत्तथानेवोत्तरं भवेत् ॥ ययस्तपदमव्यापि ता-इसका यह अर्थ खोलना पडेगा कि निगूदार्थ तथाकुल । व्याख्यागम्यमसारं च नौत्तर लिये हैं सौ सुवर्णजिसने ऐसे पिताकेवचनसे स्वार्थसिद्धये । सो सुवर्ण पिताने लियेथे यईम नही जानता- (१६६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । असार वहहै जो न्यायसे विरुद्धहो जैसे सौ सौ रुपये मैं नहीं लिये और वस्त्र के विषयमें तो सुवर्ण इसने व्याजपर लियेथे वृद्धि ( व्यान') पहिले यह न्यायप्से पराजित हो चुकाहै-ऐसेही ही दोहे मूल नहीं दिया इस अभियोगमें चार उत्तयेंके संकरमें जानो-ये सव अनुत्तर सत्यहै वृद्धि दोहै मूल मैं लियाही नहीं-उत्तरं ) इकठ्ठहो सकते है क्योंकि वह अंश उसके इस एक वचनसे उत्तरोंके संकरका निरास | बिना सिद्ध नहींहो सकता-और क्रमसेतो भया-सोई कात्यायनने कहा कि जो पक्षके। ये सब उत्तरही हैं और क्रमभी अर्थी प्रत्यर्थी एक देशमें सत्य-एक देशमें कारण-एक और सभासदोंको इच्छासे होताहै-जहां दोका देशमें मिथ्याहो ऐसा उत्तर संकर होनेसे संकरहै वहां जो अधिक पदार्थ हो उसकी ठीक उत्तर नहीं-और अनुत्तरमें कारणभी क्रियाकै स्वीकारसे पहिले व्यवहार करे-और कात्यायनने कहा कि एक विवादमें दो पीछे अल्पविषयक उत्तरके उपादान(सुनना) वादियोंकी क्रिया और दोनों के अर्थकी सिद्धी से व्यवहार देखना-और जहां संप्रतिपत्ति नहीं होती और एकवार दो कार्यभी नहीं और अन्य उत्तरका संकरहै वहां अन्य उत्त- होते-मिथ्या और कारण उत्तरोंके संकरमें | रको सुनकर व्यवहार देखनाक्योंकि संपति- अर्थी और प्रत्यर्थी दोनोंको क्रिया पाती है। पत्ति उत्तरमें कोई क्रियाही नही होती इसीप्ते क्योंकि यह स्मृतिहै कि पूर्व वादमें मिथ्या हारीतने जहां मिथ्या और कारण उत्तर दो- क्रिया और कारणमें प्रतिवादिको क्रिया | नौ हों और अन्यके संग सत्यभीहो वहां होतीहै-चे दोनों एक व्यवहारमें विरुद्ध जसे | कोनसा उत्तर मानना यह कहकर कहाहै सुवर्णशत-और रूपकशत इसने लिय हैं इस कि जिसके धनका विषय बहुतहो वा जहां अभियोगमे सुवर्णशत में नहीं लिये सौ रुपये क्रियाका कुछ फलहो वहांही उत्तर असंकीर्ण लियेथे परंतु देदियेथे कारण और माइन्यायो- (साफ) जानना इससे अन्य संकीर्ण होता है तरमें तो प्रत्ययोंकीही क्रिया होती हैं सोई शेष उतरोंमें क्रम अपनी इच्छासे होताहै- इसे वचन में लिखाई जैसे सुवर्ण लियाथा उसमें प्रभूत अर्थ यहै कि इसने सुवर्ण-सौ देदिया-और रूपकमें यह व्यवहारके मार्गस | रुपये और वन लिये हैं इस अभियोगमें पराजयहो चुकाह यहां प्राङ्न्यायमें जीतके सच सुवर्ण लियाथा-सौ रुपये नही लिये- पसे वा प्रादन्याय देखनेवालोंसे निश्चयकर बवतो लियेथे परंतु देदियेथे यहां मिथ्या और कारणके कथनमें साक्षीके लेख आदिस क्रियाको लेकर पहिले व्यवहार करना- उत्तरका विषय अधिकहै इससे अर्थाकी निश्चय कर यही विरोधह-इसी प्रकार तीन उत्तक संकरमभी जानना-जैसे इसने सुवर्ण- फिर वस्त्रोंका व्यवहार करना इसी प्रकार सौ रुपये और वस्त्र लिये हैं इस अभियोगमें- मिथ्या और प्रान्यायके और कारण और सच सुवर्ण लियाथा परंतु देदियाथा-और मादन्यायक संकरमें समझना-सेही पू. वोक्त अभियोगमें सचहै सुवर्ण और सो १ पदेशे यासरयमेदो घ कारणन् ।मिप्याच रुपये लियेथे दोगा-वस्त्रता नही लिये २ नरिमनिका किया स्यातादिनी वा लियेथे परत देदियेये वा यस्क विषयमें नगारिदिएमपोनन कत्र किया। । मिष्योत्तरं कारण घ स्याता दुभोमर्च ३ मिया रिया शारे कारणे पतिवादिनि । पापि सहान्येन तत्र मा पिमुत्ताम् । ४ामायकारलाको तु मा निधि २ यत्समतातिपय या या सारिकयातरम् । मात्र दरमागमतोन्यया । वपदेोग सकरात्तनुताम् ।
व्यवहारध्याय साधारणव्यवहारमालकाप्रकरण १ (१६७), यह पराजितहो चुकाई- इस उत्तरमें यद्यपि उतरमें कारण उत्तर स्वीकार करने योग्य है संप्रतिपत्तिका विषय बहुतहै तथापि उसमें और जहां मिथ्या और प्राङ्न्याय उत्तर प- क्रियाका अभाव होनेसे मिथ्या आदि उत्त-क्षके व्यापक हैं जैसे कि इसपर सौ रुपये रॉकी क्रियासे व्यवहार करना-जहां मिथ्या | चाहते हैं इस अभियोगमें यह बात मिथ्या और कारण उत्तर सब पक्षक विषयमेंहों जसे | है और इसमें इसका पहिले पराजय हो सींग पकडकर कोई कहै कि यह गौ मेरीथी | चुकाह वहांभी प्रतिवादीकीही पहिले क्रिया और अमुक समयमें खोई गयीथी आज इसके | होती है क्योंकि यह वचन है कि प्राड्न्याय घरमें देखी है-दूसप यह कहताहै कि यह और करणोत्तरमें प्रत्यर्थी क्रियाको दिखा- झूटहै उससे पहिलेही मेरे घरमैथी वा पैदा | शुद्ध प्राङ्न्याय उत्तरका अभाव होनेसे वह हुईथी-यह पक्षके निराकरणमें समर्थ होनेसे | उत्तरही नही संप्रतिपत्तिभी सा- अनुत्तर नही और न मिय्याही है क्योंकि कार- ध्यत्वक निराकरणसेही उत्तर होसकता है- णसे युक्त है-एक देशके स्वीकारके अभावसे क्योंकि साध्यरूप पक्ष उसमें सिद्ध माना कारण उत्तरभी नहीहै तिससे यह कारण- जाताह-और जब कारण और प्राङ्न्यायका सहित मिय्या उत्तरह-इसमें कारणमें प्रति- | संकर है जैसेकि सौ रुपे इसने लियहें इस वादीकी क्रिया होतीहै इस वचनसे प्रथम | अभियोगमें सच लियेथे परंतु देदिये और प्रतिवादीको क्रिया राजा करें-कदाचित् कोई | इसमें पहिले न्यायसे यह पराजित हो चुकाहै शंका करे कि मिथ्या उत्तरमें पूर्ववादीकी | वहांभी प्रदिवादीकी रुचिके अनुसार निर्णय क्रिया होतीहै इस वर्चनसे पूर्ववादीकी क्रिया करें, कहींभी वादी प्रतिवादीयोंकी एक व्य- पूर्व क्यों नहीं होती सो ठीक नहीं वह वचन ) वहारमें दो क्रिया नहीं होती यह निर्णयहै इस मिथ्या उत्तरके विषयमें है-कदाचित् | प्रकार पत्रके लिखनेपर कार्यको सिद्धि का- कोई शंका करें कि कारण उत्तरमें प्रत्यर्थीकी रणके अधीन है उस कारणका निर्देशकोन क्रिया (सुनाई) पूर्वकरै यहभी शुद्धकारण- | करे इस अपेक्षासे कहतेहैं फिर उत्तर लेनके के विषयमें क्योंनही माना जाताई-सो ठीक अनंतरअर्थी उसी समय प्रतिज्ञात(साध्य)अ- नहीं-क्योंकि सब कारण उत्तरोंको मिथ्यो- के साधन (प्रमाण)को लिखवावे-यहां सद्यः त्तरकै सहचारी होनेसे शुद्ध कारणोत्तरका ही लिखवावे इस घातके कहने से यह जाना असंभवहे प्रसिद्ध कारणोत्तरमेंभी प्रतिज्ञात मया कि उत्तरके देने में कालका विलंरभी अर्थके एकदेशके स्वीकारसे एकदेशमें स्वीकार है-सोई आगे पृथक् २ दिखावें गे- मिथ्यात्व रहताहै जैसे कि सचहै कि में सो अर्थी प्रतिज्ञात अर्थक साधनको लिखवावे रुपे लियेथे पर अब मुझपर नही चाहते हैं यह कहनसे यहभी कहागया कि जिसका क्योंकि में उदीयेथे-प्रकृत (इस) उदाहरणमें साध्यहो वही प्रतिज्ञात अर्थके साधनको लि- तो प्रतिज्ञातअर्थके एक देशकाभी स्वीकार खवाव इससे प्राइन्याय उत्तर प्राङ्न्यायकोही नहीहै इतना विशेषई-यह वात हारीतने इस साध्य होनेसे प्रत्यर्थी ही अर्थी जानागया इससे वचनसे स्पष्ट कहीहै कि मिथ्या और कारण वहीसाधनको लिखवावे-कारणोत्तर भी कारण १कारण प्रतिवादिनि । ही साध्य है इससे कारणकावादी हो अर्थीहे २ मिथ्या क्रिया पूर्ववादे । इससे वही कारणको लिखवावे- मिथ्यो- ३ मिध्याकारणयोऽपि प्राध कारणमुत्तर । १ प्राइन्यायकारणोक्ती तु प्रत्यर्थी निदिशेत क्रियां (१६८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । त्तरमै तो पूर्ववादी ही अर्थी है वही साध- युक्त ऋणादान आदि विवादोंमें वर्णन नको लिखवावे-फिर अर्थी लिखवावे इस | किया है तिन चारोंमें प्रत्यर्थीके आगे लिखे कहनेसे यहभी कहा गया कि अर्थी ही लि- यह भाषावाद प्रथमई-और सुनेहुये अर्थका खवावै अन्य नही-इससे संप्रतिपत्ति उत्तरमें उत्तर लिखे यह उत्तर पाद दूसरा है-फिर साध्यके अभावसे भाषा और उत्तरके वादी अर्थी प्रतिज्ञात अर्थके साधनको लिखें दोनों ही अर्थी नही हो सकते और साधनका | यह क्रियापाद तीसरा- साधनकी सिद्धिमें दिखानाभी नही क्योंकि उतने (प्रत्यर्थीका- | सिद्धिको प्राप्त होताहै यह साध्य सिद्धिका स्वीकार)सेहीव्यवहार समाप्त हो जाता है यही पादं चौथाहे-सोई कहाहै कि मनुष्योंकी बात हायतेने स्पष्ट कहो की प्राङ्न्याय और स्वार्थ सिद्धिके परस्पर विवादोंमें वाक्यके कारण उत्तरोंमें प्रत्यर्थी क्रियाको दिखावे | न्यायसे व्यवस्थाको व्यवहार कहते हैं उसके और मिथ्या उत्तरमें पूर्ववादी क्रिया दिखावे क्रमसे ये चार अंश होते हैं कि भाषा उतर और संप्रतिपत्ति उत्तरमें क्रिया नहीं होती॥ | क्रिया साध्य सिद्धि इससे उसको चतुष्पाद् भावार्थ-पूर्ववादीके सामने सुने हुये अर्थका कहते हैं-संप्रतिपत्ति उत्तर तो साधनका उत्तर लिखना-फिर अर्थी अपने प्रतिज्ञात | दिखाना नहीं और भाषाके अर्थको- अर्थका साधन(कारण वा प्रमाण) लिखवावे॥ भी सिद्ध नहीं करना पडता इससे तसिद्धौसिद्धिमाप्नोतिविपरीतमतोन्यथा। साध्य सिद्धि रूप पादनही है वहां दो पादही चतुप्पायवहारोयंविवादेधूपदर्शितः॥९॥ व्यवहार होताहे उत्तर कहनेके अनंतर स- भासदोंका जो यह विचाररूप व्यवहार है पद-तत्सिद्धी ७ सिद्धिं २ आप्नोति क्रि- कि (अर्थी और प्रत्यर्थीके मध्यमें किसकी विपरीत १ अतः:- अन्यथाऽ- चतुष्पात् १ क्रिया पहिले हो वह याज्ञवल्क्यने पृथक व्यवहारः १ अयं १ विवादेषु७ उपदर्शितः१॥ नहीं कहा और व्यवहार करनेवालेका कोई योजना-तसिद्धो ( प्रमाणसिद्धो ) संबंधभी नहीं इससे व्यवहारमाद नहीं हो व्यवहारः सिद्धिं आमोति-अतः अन्यथा विपरीतं भवति-अयं चतुप्पात् व्यवहारः सकता यह स्थितभया ॥ विवादेषु उपदर्शितः॥ भावार्य-प्रमाणकी सिद्धि में साध्य (दावा.) तात्पर्यार्थ-यदि वह साधन (प्रमाण) सिद्धिको प्राप्त होताहे और अन्यका ( असि वक्ष्यमाण साक्षी आदिके लेखसे सिद्ध हो दिसे ) सिद्धिको प्राप्त नहीं होता-यह पूर्वी जाय तो साध्यरूप अपने अर्थकी जयरूप क्त चार पादवाला व्यवहार विवादोंमें दिखा सिद्धिको अर्थी प्राप्त होताह और इससे याहे-८ इति साधारणव्यवहारमावका अन्यया होय तो अर्थात् साधनकी सिद्धि न प्रकरणम् ॥ होप तो विपरीत होता है अर्थात् पराजय- रुप असिद्धिको प्राप्त होता है-राजा इति साधारणन्यवहारमारकामकरणम् १ व्यवहारको देखे यह पूर्व कहाहुआ व्यवहार १ परस्पर मनुष्याणां स्वाविमतिपत्तिा । वापर- चतुष्पाद अर्थात् चार अंश वा कलाओंसे न्यायाधरणानं व्याहार उपाहतः । भारोत्तानिया १ माइन्यायकारणोक्ती तु प्रत्यर्थी निदिशेन हि साध्यसिद्धिमिः प्रमत्तिमिः ।। भाक्षितपतुरंशस्तु याम् । मिण्यनी पूर्णगदी तु प्रतिरती न सामवेद ॥ पतुष्पादभिधीयते।
व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमालकामकरण २ (१७१) वे दोनों वेतन दें सोई कात्यायनने कहाँ है पत्ति उत्तरमें तो दंडका अभाव है यहभी यदि कार्यके योग्य वादीका प्रतिभू न होय तो ऋणादानके विषयों समझना- पदांतर रक्षा कियाहुआ तो वह वादी संध्याके समय विषयों में तहांर दंड कहा है और धनसे सेवकको वेतन (नौकरी) दे॥ भिन्न व्यवहारोंमें इसका असंभव है इससे भावार्थ- कलह और साहसमें प्रत्यभि- | यह वचन सब विषयमें नहीं है- राजा अध- योगकोभी करै- वादी और प्रतिवादी मर्णको दुंडदे यह वचने यद्यपि ऋणादानके दोनोंके ऐसे प्रतिभूको स्वीकार कर जो | विषयमें है तथापि इसका विशेष वहांही आर्यके निर्णयमें समर्थहो ॥ १० ॥ कहेंगे और यही वचन सब व्यवहारके विष- निन्दवेभावितोदद्याद्धनराज्ञचतत्समम् । यमेंभी लगाने योग्य है कैसैको जब अभि- मिथ्याभियोगीद्विगुणमभियोगाद्धनंवहेत् ॥ युक्त प्रत्यर्थी अभियोगका निद्भव कर और अमियोक्ता साक्षी (अर्थी) आदिसे स्वीकार पद-निह्नवे ७ भावितः १ दद्यात् क्रि- करदेतो अभियुक्त उसके समान धन धनं२ गजेष्ट च-तत्समम्२ मिथ्याभियोगी राजाकोदे यह बात तहां २ उक्त है- यहां द्विगुणं२ अभियोगात्५ धनं२ वहेद क्रि॥ चशब्दका निश्चय अर्थ है धनका दड राजा- योजना-भावितः प्रत्यर्थी निहये सति को दे यह अनुवाद है यदि अभियोगकरने- अर्थिने च पुनः तत्समम् धनं राज्ञे दद्यात्- | वाला अभियोगको न कहसके तो मिथ्या- मिथ्याभियोगी अर्थी अभियोगात् द्विगुणं धनं भियोगी वह प्रतिपदोक्त धनसे दूना धनदे राज्ञे वहेत (दद्यात्)॥ यह विधि है- यहांभी प्रान्याय और प्रत्य- तात्पर्यार्थ- यदि अर्थीके निवेदनकिये वस्कंदनमें पूर्वके समान समझना॥ अभियोगका प्रत्यर्थी निगव (नमानना) करै भावार्थ-यदि प्रत्यर्थी अर्थीके अभियोगको और अर्थी साक्षी आदिसे स्वीकार करादेतो न माने और अर्थी साक्षी आदिसे स्वीकार प्रत्यर्थी उस अभियोगकै धनको तो अर्थाका करदे तो अर्थीको ओर राजाको अभियोगके और उसके समानही झूटके दंडरूप धनको समान धन प्रत्यर्थीदे और यदि अर्थीकाही राजाकोदे- यदि अर्थी अंगीकार न योगसे दूना धन राजाकोदे ॥ ११ ॥ अभियोग (दावा) मिथ्याहो तो वही अभि- करासके तो वही मिथ्याभियोगी हुआ इससे अभियोगसे दना धन राजाकोर्दै- प्राड्न्याय विवादयेत्सद्यएवकालोन्यत्रेच्छयास्मृतः ॥ साहसस्तेयपारुप्यगोभिशापात्ययेत्रियाम्। और प्रत्यवस्कंदनमेंभी इसीप्रकार समझना वहांभी अपह्नववादी अर्थीको यदि प्रत्यर्थी पद-साइसस्तेयपारुप्यगोभिशापात्यये ७ अर्थका स्वीकार करादै तो रानाको प्रकृत- स्त्रियां विवादयेत् क्रि- सद्यः- एव:- धनके समान दंडदे और यदि प्रत्यया कालः १ अन्यत्र- इच्छया३ स्मृतः १ ॥ प्राइन्याय और कारणको स्वीकार न करा- योजना-साहसस्तेयपारुप्यगोभिशापात्यये सके तो मिथ्याभियोगी प्रत्यर्थीही राजाको स्त्रियां सद्यः विवादयेत् अन्यत्र इच्छया दूना धन और अर्थीको प्रकृत धन दे संप्रति- कालः स्मृतः ॥ ता. भा०- विषशस्त्रआदिसे प्राणीयोंकी १ अथ चत्प्रतिभूनास्ति कार्ययोग्यस्तु घादिनः । हिंसारूप साहस और स्तेय (चौरी) पारुष्य स रक्षितो दिनस्याते दद्यादृत्यायवेतनम् । १ राज्ञायमर्णको दाप्यः।
(१७२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । (कठोरवाणी और कठोरदण्ड) गो- पातक तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य मन वाणी और लगाना- प्राण और धनका नाश- और काया कति स्वभावके अनुसार ही विना कुलीनस्त्रीका चरित्र-और दासीका स्वत्व इतने भय आदिके विकारको प्राप्तहो वह अभि- विवादामें उत्तीसमय विवादको राजा प्रवृत | योग करने में और साक्षी देनेमें दुष्ट कहाहै कर अर्थात् प्रत्यर्थीसे उत्तर लेनेमें कालकी उन विकारोंको ही पृथक २ दिखातेहैं कि प्रतीक्षा न करे देर नकर और अन्य विवादोंमें देशसे देशांतरमें जाय कहीं टिक नही, और उत्तर देनेका समय अर्थी प्रत्यर्थी सभापति | जो सूक्कणी (होठोंका प्रांत )को अपने और सभासदोंकी इच्छासे कहा है। जिव्हाके अग्रसे स्पर्श करे यह क्रियाका विकार है और जिसके मस्तकपर स्वेद देशाद्देशांतरंयातिसृकिणीपरिलेढिच । ( पसीना ) आजाय और मुख विवर्ण ललाटस्विद्यतेचास्यमुखवैवर्ण्यमेतिच१३॥ (पीला वा काला) होजाय-यह कायाका पद- देशात् ५ देशांतर२ याति क्रि- विकार है और जो परिशुष्यत्स्खलद्वाक्य मृतिणी२ परिलेटि कि- च- ललाटं२ होकर अर्थात् गदगद और अस्तव्यस्त स्विद्यते क्रि-चर- अस्यद मुखर वैव वचनोंसे पूर्वापरके विरुद्ध (पुरखिलाप ) एति कि-च-॥ बहुत बोलै-यह वाणीका विकारहै और जो उत्तर देनेसे पराई वाणीकी, और देखनेसे पाशुप्यत्स्सलद्वाक्योविरुद्धंबहुभापते । नेत्रोंकी पूजा न करे अर्थात् यथार्थ न कह वाश्चक्षुः पूजयतिनोतयोष्ठौनि जत्यपि॥ सके नदेखसके-यह मनके विकारका लिंगहे पद- परिशुप्यत्स्खलद्वाक्यः १ विरुद्धं२ और जो अपने ओष्ठोंको टेढा' करें यहभी बहु-भापते क्रि- वाक्चक्षुः १ पूनयति वह दुष्ट कहाई-यहभी दोषकी संभावनाक कायाका विकार है-इतने चिन्ह जिसमें हो क्रि-नो-तथा-ओष्ठौर निर्मुजति क्रि- लिये कहाई कुछ दोपनिश्चयके लियेनही अपि-॥ क्योंकि स्वाभाविक ओर नैमित्तिक विका- स्वभावाद्विकृतिगच्छेन्मनोवाकायकर्मभिः। की विवेचना कठिनतासे जानी जाती है- अभियोगेचसास्येवादुष्टःसपरिकीर्तितः१५ यदि कोई निपुण बुद्धिविवेकसे जानभी जाय तोभी पराजयके निमित्त कार्य नही पद- स्वभावात विकृति२ गच्छेत् क्रि-! होता क्योंकि मरनेवालेका चिन्ह देखकर मनोवाकायकर्मभिः ३ अभियोगे चा- | मरनेका कार्य नहीं कियाजाता इसी प्रकार साक्ष्ये१ वा-दुष्टः१ सः १ परिकीर्तितः१॥ इसका पराजय होगा इस चिन्हसे ज्ञानके योजना-परं देशात् देशांतरं याति यः होनेपरभी पराजयक निमित्त कार्य नही रामिणी परिलेटिभस्यसलाटं स्विद्यतेच पु-होता ॥ नामुख वर्प एतियः परिशुव्यस्विटद्वाक्यः भावार्य-जो देशसे देशांतरको चलानाय याविरुद्ध भाषते यः याचक्षुः नौ मयति और सफणीको चाट-मस्तक पर पसीना न पुनः मोटा निमुंमति मनोगामायक-मानाय गुख विवर्ग दो गाय मभिः सभागात विकृति यः गच्छति सः गदवाणीस पात विरुद्ध को और जो अभियोगे मपुनः साध्ये दुष्टः परिकीर्तितः । यथार्थ टत्तर न दसक और न देखसक जी गद- -- व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण २ (१७३) स्मृतः॥ और जो दांतोंसे ओठोंको चवावे इस प्रकार साक्षिपूभयतः सत्सु साक्षिणः पूर्ववादिनः। जो मन वाणी काया और कर्म ( क्रिया) पूर्वपक्षेऽधरीभूतभवत्युत्तरवादिनः ॥१७॥ से विकारको प्राप्तहोताहै वह अभियोग और साक्षी देनमें दुष्ट कहाहे ॥१३॥ १४ ॥१५॥ पद-साक्षिषु ७ उभयतः-सत्सु ७ सा- संदिग्धार्थस्वतंत्रीयः साधयेद्यश्चनिष्पतेत्। रीभूते ७ भवंति क्रि-उत्तरवादिनः ६ ॥ क्षिणः १ पूर्ववादिनः ६ पूर्वपक्षे ७ अध- नचाहूतोवदेत्किंचिद्धीनोदंड्यश्वसस्मृतः ॥ योजना-उभयतः साक्षिषु सत्सु पूर्ववादिनः पद-संदिग्धार्थ २ स्वतन्नः २ यासाध- | साक्षिणः पूर्व प्रष्टव्याः पूर्वपक्षे अधरीभूते येत् कि-यः१च-निष्पतेत क्रि-न-चा-सति उत्तरवादिनः साक्षिणः भवंति ।। आहूतः १ वदेत् क्रि-किंचित्-हीनः १ तात्पर्याय-जहां दोनों भाषावादी एक दंड्यः १ च-सः १ स्मृतः १ ॥ वार धर्माधिकारीके समीप आवें उनमें योजना-यः स्वतंत्रः सन् संदिग्धार्थ । एकता प्रतिग्रहसे क्षेत्रको लेकर और कुछ साधयेत् च पुनः निष्पतेत् च पुनः आहूतः काल भोगकर कार्यवश कुटुंब सहित देशां- सन् किंचित् न वदेत् सः हीनःच पुनः दंड्यः | तरमें चलागया और दूसराभी उसी क्षेत्रको प्रतिमहसे लेकर कुछ काल भोगकर देशां- तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य अधमर्णके नही तरमें चलागया फिर दोनोंभी एक समय स्वीकार किए संदिग्ध अर्थको स्वतन्त्र आकर मेरा यह क्षेत्रहे- मेरा यह क्षेत्र ऐसे होकर अर्थात् साधनोंके विनाही आसेध | परस्पर विवादकरते हुये धर्माधिकारीके आदिसे सिद्ध करे-और जो स्वयं स्वीकार- पास आये हो वहां प्रथम किसकी क्रियाको किए वा साधनोंसे सिद्धकिए अर्थसे गिर- करे इस अपेक्षाले कहतेहैं कि दोनों वादि- जाय अर्थात् नदे और जो अभियोगी | योक साक्षियोंका संभव होयतो पूर्व वादीके राजाके बुलानेसे सभामें कुछ नकहै वह हीन | अर्थात् पूर्वकालमें मुझे मिलाथा और पहिले और दंड देने योग्य कहाहै अर्थात् वह हार | ही मैं भोगाथा ऐसे जो कहै उसके साक्षी जायगा और दंड देने योग्यभी होगा-अभि- पहिले होतेहैं कुछ पूर्व जो निवेदन करे योग और साक्षीमें वह दुष्ट कहाहे यह उसके नहीं और जब दूसरा ऐसे कहे कि प्रकरणथा इससे हीनकाही ग्रहण नहोजाय | सच इसनें पूर्व प्रतिग्रह लिया और भोगाथा तिससे दंध्यका ग्रहण किया और दंड्यभी | किंतु गजाने यही क्षेत्र इससे मोल लेकर शिक्षाके योग्य होताहे परंतु अर्थसे हीन नही मुझे देदिया था अथवा इसनेही प्रतिग्रहसे होता इससे अर्थसे अहोन नहीजाय तिससे लेकर मुझे देदिया था वहां पूर्वपक्ष असाध्य होनका ग्रहण किया। होनेसे जब अधर (न्यून) होजाय तन भावार्य-जो अर्थी स्वतंत्र होकर संदिग्ध | उत्तर कालमें मुझे मिला और मैंने भोगा अर्थको सिद्ध करे और जो प्रमाणसे सिद्ध | ऐसे कहनेवाले उत्तर वादीके साक्षी पूछने- किये अर्थसे गिरजाय अर्थात् मांगने पर यही अर्थ अत्यंत श्रेष्ठहै-और (अन्य) नदे और जो यनाका बुलाया सभामें कुछ व्याख्यान ठीक नहीं है कि मिथ्याउत्तरमें न कइसके वह अर्थ (दावे )से हीन और | पूर्ववादीके साक्षी होतेहैं- और प्रान्याय दंड देने योग्य कहाहै ॥ १६ ॥ और कारण उत्तरोंमें पूर्वपक्षके अधर होने, (१७४) , याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । N पर उत्तर वादीके साक्षी होतेहैं-क्योंकि यह / जहां एकतो क्रोधमें आकर यह कहै कि अर्थतो फिर अर्थी प्रतिज्ञात अर्थक साध- यदिमैं इस विवादमें पराजित होगाऊंगा तो नको उसी समय लिखवावे इसे वचनसे । सो पण दूंगा और दूसरा कुछ प्रतिज्ञा न कह आयेथे इससे पुनरुक्तिदोष आवेगा- करे-वहांभी व्यवहारकी प्रवृत्ति होती है उस और यही अर्थ. नारदने इन वचनों से स्पष्ट व्यवहारमें पणकी प्रतिज्ञाका वादी यदि हनि कियाहै कि पूर्व वादमें मिथ्याकी और प्रतिवा- | हो जाय तो उसको पणसहित दंड राजादे- दुर्मे कारणकी क्रिया होती है प्राङ्न्याय दूसरा पराजित हो जायतो उसे दंडदे पण और विधिकी सिद्धिमें जयका पत्रही क्रिया उससे नले क्योंकि वचनमें स्वपणं ( अपना होती है यह कहकर कहाहै कि दोनों पण यह विशेष कहाई-जहां एक सौ रुपयेका विवादोंके अर्थमंदोनोंके साक्षी होयतो जिसका और दूसरा पचासका पण करैं वहांभी परा- पक्ष पहिलाहो उसकेही साक्षी होते हैं- जयमें अपने किये पणकेही दंडभागी होते हैं- यह 'इस लिये पृथक् कहा कि यह सब यदि विवाद पण सहित हो यह कहनेते व्यवहारोंसे विलक्षण है। यहभी सूचित भया कि पण रहितभी विवाद भावार्थ-दोनोंके साक्षी होयतो पूर्ववादोके होताहै ॥ साक्षी पहिले होते हैं यदि पूर्व पक्ष किसी भावार्य-यदि विवाद पणसहित होयतो प्रकारन्यूनहो जायतो उत्तरवादीके होतेहैं१७ पणमें हीनको राजाको अपने किये पण और सपणश्चेद्विवादः स्यात्तत्रहीनंतुदापयेत् । | दंड-और अर्थीको धन-यह सब दंड दे१८ दंडचस्वपणचैवनिनेधनमेवच ॥ १८ ॥ छलनिरस्यभूतेमव्यवहारामयेनृपः । पद-सपणः १ चेता-विवादः १ स्यात् । भूतमन्यनुपन्यस्तंहीयतेव्यवहारतः॥२९॥ क्रि-तथा-हीनं २ तुः-दापयेत् कि- दण्डै २ पद-उलं २ निरस्य:-भूतेन ३ व्यवहा- च-स्वपणं २ च एव:-धनिने ४ धनं २ सन् २ नयेत् कि-नृपः १ भूतं २ अपि अनुपन्यस्तं १ हीयते क्रि-व्यवतः- ॥ योजना-चेत् (यदि )विवादासपणास्यात् को पोजना-नृपः छलं निरस्यभूतन व्यवहा- तत्र हीनं दंहं चपुनःस्वपणं चपुनः धनिने नयेत-भूतं भपि अनुपन्यस्तं व्यव- धनं राजा दापयेत् ॥ हारतः हीयते ॥ तात्पर्याय-यदि विवाद ( व्यवहार) पण तात्पर्याय-प्रमादसे कथनरूप छलको (सरत ) सहितहो और उस व्यवहारमें जो छोडकर भूत (वस्तुका तत्त्व )के अनुसार हीन (पपंजित) होजाय तो उसको राजा राजा व्यवहारोंको समाप्त करै-तिससे भूत पर्योक दंड और स्वकृत पण राजाको और (वस्तु )काभी उपन्यास (लेख) भाषाके धनी (अर्थी )को विनादका धन दिवाये- समय न किया होय तो व्यवहारसे हानिको सनोपरिपोरसमः प्रतिकातासंसाधनम् । प्राप्त होताहै तिससे भूतका अनुसरण राजा २ मिया मिरा पशिदे कारण प्रतिवादिति को और जैसे अपी प्रत्यर्थी सत्यही कदै धान्यापविशमिद्री तु जपान या मोत्य- वही यत्ल सभासदों सहित सभाका पति र सो सगु प साक्षिणा पो मोन्य सामआदि टपयोंसे करें क्योंकि ऐसे करनेसे मोसाय मारिणः साक्षी भादिके अभावमभी निर्णय हो सकता - व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमारकाप्रकरण २ (१७५) हे-यदि किसी प्रकारभी वस्तु तत्वके अनु- अर्थीने न लिखाई हो और उसको अर्थी यह सार व्यवहार न हो सके तो साक्षी आदिसे कहै कि मैं भूल गयाथा इस अोंके निवे- निर्णय करे यह अनुकल्पहै-सोई कहा कि दनको राजा न माने और प्रत्यर्थीसे अर्थको भूत और छलके अनुसार विगति( कुगति) दिवावे-और यह केवल वचनसेही नहीं कही है-तत्व अर्थसे युक्तको भूत और ! क्योंकि एकदेशमें प्रत्यर्थीको जब मिथ्या प्रमादसे कहनेको छल कहते हैं-उनमें भूतका वादित्वका निश्चय हो गया तो देशांतर,भी अनुसारी व्यवहार मुख्यहै और छलका मिथ्या वादित्वका संभव होगा और अर्थीको अनुसारी अनुकल्पहै- साक्षी और लेख जब एकदेशवस्तुमें सत्यत्वका निश्चय होगया आदिके अनुसार व्यवहारके निर्णयमें कदा- | तब देशांतर वस्तुमभी सत्यवादित्वका संभव चित् वस्तुका अनुसरण हो जाताहै और होगा-इस प्रकार तर्क है दूसरा नाम कदाचित् नहीभी होता- क्योंकि साक्षी | जिसका ऐसी संभावनाहै अनुकूल जिसके आदिके व्यभिचार ( अन्यथा कहना )कोभी ऐसे इसी योगीश्वरके वचनसे राजा संपूर्ण संभावना हो सकतीहै॥ धनको दिवावे यह निर्णय है-ऐसे तर्कके भावार्थ-छलको छोडकर राजा वस्तुके वाक्यानुसार निर्णय करनेपर वस्तु अन्यथाभी तत्वको जान कर व्यवहारोंको समाप्त कर हो जायतोभी व्यवहार देखने वालों को कुछ जिस वस्तुके तत्वको लेख भाषाके समय न | दोष नही सोई गौतमने कहाहे कि न्यायके हुआ हो वह वस्तु व्यवहारके मार्गसे हानिको स्वीकारमें तर्क उपायह उससे स्वीकार करके प्राप्त हो जाती है ॥ १९॥ वस्तुको स्थानके अनुसार पहुंवाद-यह कह- निबुतलिखितनैकमेकदेशेविभावितः । कर कहा कि राजा और आचार्य निंदाके अ- योग्यहे-और यहां इतनीहि बात नहीं जाननी दाप्यः सर्वनृपेणार्थनग्राह्यस्त्वनिवेदितः ॥ पद-निन्हुते क्रि-लिखितंर नेक २ एक- थकावचन माननेयोग्य नही क्योंकि यह वचन कि एकदेशका अंगीकार करनेवाले प्रत्य- देशे अविभावितः १ दाप्यः १ सर्वश्नृपेण ३ है (एकदेश विभावितो नृपेण सर्वदाप्यः) अर्थ २ न:- ग्राह्यः १ तु:-अनिवेदितः १॥ कि एक देशका जिसने स्वीकार किया हो योजना-अर्थिना लिखितं नैकं यःप्रत्यर्थी ऐसे प्रत्यर्थीसे राजा सब धन दिवावे-जो निन्हुते-एकदेशे विभावितःसानृपेण सर्व अर्थ कात्यायनने यह कहा कि अनेक अर्थके दाप्य:-अनिवेदित अर्थवज्ञा न ग्राह्यः॥ अभियोगमभी जितनेको धनी साक्षियोंसे तात्पर्याय-सुवर्ण चांदी वस्त्र आदि अनेक सिद्ध करा दे उतनेही धनको अर्थी प्राप्त वस्तु जो भाषाके समय अर्थाने लिखवादीही होताहै-यह वचन पुत्र आदिके ऋगके वि- यदि उन सबका प्रत्यर्थी निहव ( मुकरना) पयमें है क्योंकि वहां बहुत अोंका है करें और उनमें सुवर्ण आदि एकदेशका अभियोग जिसपर ऐसा पुत्रआदि में नहीं अर्थी साक्षी आदिसे अंगीकार कपदे तो न्यायाधिगमे तर्कीभ्युपायस्तैनाम्युपेत्य ग्यास्या- पहिले लिखे संपूर्ण अर्थको राजा प्रत्ययोंसे । न गमयेत् । अर्थीको दिवादे-औरजोवस्तुभापाके समय २ तस्मादाजाचार्यानिया। भूतच्चलानुसारित्वादिगति. समुदाहतः । भर्त. ३ अनेकार्याभियोगोपि पारत्मसम्बदनी । सा- तत्वार्थयुक्तं यत्प्रमादाभिहित इलम् । क्षिमिस्तादेवासी समने सांधितं धनम् ।।
१ १ कपादित गरेपु पिरमर नियतमा नीति शास्त्र यहां कहनेको इष्ट इ-इससे २सायापाशेपि गदिवे सानिभिः समलं मवेद विरोप होयतो अर्थशास्त्रसे धर्मशास्त्र बल- :(१७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशंसहित । जानता ऐसे कहता हुआ निन्हववादी नहीं कह दें तो उस संपूर्ण साध्यको सिद्धि होता इससे एक देशमें स्वीकार करायाभी होती है जो स्त्रीका संग साहस चौरीके वह कभीभी असत्यवादी नहीं होता इससे विषय हो । अनेक लेखोंको जो न माने यह वचन वहां भावार्थ-अनेक लिखाई हुई वस्तुओंको प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि न निन्हव वाद है प्रत्यर्थीन माने और साक्षी आदि एक देशका न अपेक्षित तर्क है-और अनेक अर्थ- स्वीकार करदें तो राजा सब धनको उससे के अभियोगमें भी यह पूर्वोक्त कात्यायन- दिवावे-और जो अर्थ भाषा (अर्जी)के समय का वचन सामान्य विषयमें है इससे विशेष निवेदन न किया हो उसको राजा अह- शास्त्रके विषय निन्दवके उत्तरको छोड कर न करे ॥२०॥ अज्ञानसे जो उत्तर उसमें जो प्रवृत्त होता है कदाचित् कोई शंका करें कि जब ऋण स्मृत्योविरोधेन्यायस्तुवलवान्व्यवहारतः । आदि व्यवहार प्रायःस्थिर हो जाय तो ऊन अर्थशास्त्रात्तुवलवद्धर्मशास्त्रमितिस्थितिः ।। वा अधिक कहने पर साध्यकी सिद्धि नहीं पद-स्मृत्योः ६ विरोधे ७ न्यायः १ तु:- होती यह कहते हुये कात्यायनेने अनेक अर्थके बलवान् १ व्यवहारतः:-अर्थशास्त्रात् ५ अभियोगमें साक्षियोंमें एक देशका स्वीकार वा तु बलवत् १ धर्मशास्त्रं१ इति स्थितिः१॥ अधिकका स्वीकार करादिया जाय तो संपूर्ण- योजना-स्मृत्योः विरोधे सति व्यवहार- को ही सिद्धि नही होती-यह कहाहै- न्यायः बलवान् भवति-तु पुनः अर्थ- तैसे होनेपर एक देशके स्वीकारमें शास्त्रात् धर्मशास्त्रं बलवद्भवति इति स्थितिः विना स्वीकार किये एक देशकी सिद्धि (मर्यादा) अस्ति । कहां-इस शंकाका समाधान कहते हैं कि तात्पर्यार्थ- जहां दो स्मृतियोंका परस्पर लिखे हुये सबंधनकी सिद्धिके लिये दिये हुये विरोध हो वहां विरोध दूर करनेके लिये साक्षियों के एक देशकेवा अधिकके कहनेपर विषयको व्यवस्था में उत्सर्ग और अपवाद संपूर्ण ही साध्य सिद्ध नही होता यह उस वचन आदि न्याय बलवान् होनेसे समर्थ है वह का अर्थ है-वहांभी निश्वयसे सिद्ध महीन्याय कहांसे जानना इस लिये कहते हैं होता इस वचनसे पूर्वके समान संशयही कि व्यवहारसे अर्थात् वृद्धोंके अन्वय व्यति- है इससे अन्य प्रमाणकाभी अवसुर है रेक व्यवहारके द्वारा वह व्यवहार जानना नियम है और साइसमें तो संपूर्ण साध्यको व्यवस्था युक्त है-इसी प्रकार अन्यत्रभी यदि सिद्ध करदें तो संपूर्ण साध्यको सिाद विषय व्यवस्था और विकल्प आदि यथा होती ही है क्योंकि उतनेसे ही साहस आदि- संभव जानने-धर्म शास्त्र के अनुसार व्यव- यदि साप्प अर्थक एक भागकोभी साक्षी | हो चुका था तोभी धर्म शास्त्रके अंतर्गतही अर्थशास्त्र और धर्मशासकी स्मृतियाँका वान् होताहै यह मर्यादा है यद्यपि दोनोंका टने वापिका मोल सायन सिदपति। सामग सारो गो पासाध्य परिजितम् ।
| वान् होताई यह मर्यादा है यद्यपि दोनोंका . यदि साच्य भयके एक भागकोभी साक्षी हो चुका था तोभी धर्म शाखके अंतर्गतही | नीति शास्त्र यहां कहनेको इष्ट ६-इससे २ सामाजिपि नादित साक्षिामा सपाट मां। विरोध होयतो अर्थशास्त्र धर्मशाख बल- .(१७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । जानता ऐसे कहता हुआ निन्हववादी नहीं कह दें तो उस संपूर्ण साध्यकी सिद्धि होता इससे एक देशमें स्वीकार करायाभी होती है जो स्त्रीका संग साहप्त चौरीके वह कभीभी असत्यवादी नहीं होता इससे विषयमहो॥ अनेक लेखोंको जो न माने यह वचन वहां भावार्थ-अनेक लिखाई हुई वस्तुओंको प्रवृत्त नहीं होता क्योंकि न निन्हव वाद है प्रत्यर्थीन माने और साक्षी आदि एक देशका न अपेक्षित तर्क है और अनेक अर्थ- स्वीकार करादें तो राजा सब धनको उससे के अभियोगमें भी यह पूर्वोक्त कात्यायन- दिवावे-और जो अर्थ भापा (अर्जी)के समय का वचन सामान्य विषयमें है इससे विशेष निवेदन न किया हो उसको राजा मई- शास्त्रके विषय निन्हवके उत्तरको छोड कर | णन करै ॥ २० ॥ अज्ञानसे जो उत्तर उसमें जो प्रवृत्त होता है कदाचित् काई शंका करें कि जब ऋण स्मृत्योविरोधेन्यापस्तुषलवान्व्यवहारतः । आदि व्यवहार प्रायःस्थिर हो जाय तो उन अर्थशास्त्रात्तुवलवद्धर्मशास्त्रमितिस्थितिः ।। वा आधिक कहने पर साध्यकी सिद्धि नही पद-स्मृत्योः ६ विरोधे ७ न्यायः १ तु:- होती यह कहते हुये कात्यायनेने अनेक अर्थक बलवान् १ व्यवहारतः-अर्थशास्त्रात् ५ अभियोगमें साक्षियोंमें एकदेशका स्वीकारवा तुः चलवत् १ धर्मशास्त्रं? इति स्थितिः १॥ अधिकका स्वीकार करादिया जाय तो संपूर्ण- की ही सिद्धि नही होती यह कहाहै-त यायः बलवान् भवति-तु पुनः अर्थ- योजना-स्मृत्योः विरोधे सति व्यवहार- तसे होनेपर एक देशके स्वीकारमें शास्त्रात् धर्मशास्त्रं बलवद्भवति इति स्थितिः विना स्वीकार किये एक देशको सिद्धि ( मर्यादा) अस्ति ॥ कहां-इस शंकाका समाधान कहते हैं कि तात्पर्यार्थ- जहां दो स्मृतियोंका परस्पर लिखे हुये सब धनकी सिद्धि के लिये दिये हुये विरोध हो वहां विरोध दूर करने के लिये साक्षियोंके एक देशकेवा अधिकके कहनेपर विषयको व्यवस्थामें उत्सर्ग और अपवाद संपूर्ण ही साध्य सिद्ध नही होता यह उस वचन आदि न्याय बलवान होनेसे समर्थ हे बह होता इस वचनसे पूर्वके समान संशयही व्यवहारसे अर्थात् वृद्धाके अन्वय व्यति- हैं इससे अन्य प्रमाणकाभी अवसुर है रेक व्यवहारके द्वारा वह व्यवहार जानना क्योंकि उलको छोटकर व्यवहार कर यह इस प्रकरणक उदाहरणमें भी विषयको सिद्धि के लिये दिये साक्षी एक देशकामा व्यवस्था युक्त है-इसी प्रकार अन्यत्रभी यदि सिद्ध कादं तो संपूर्ण साध्यको सिाद विषय व्यवस्था और विकल्प आदि यथा होती ही है क्योंकि उतनेसे ही साइस आद- संभव जानने-धर्म शास्त्र के अनुसार व्यव- सिद्ध है और कात्यायनका वचनमी - हारोंको करे इससेही अर्थशास्त्रका निरास अर्थशास्त्र और धर्मशासकी स्मृतियांका फगादिषु शिमगर पिरमाणु निश्चिवम् । दो वाणपिका से सायं न सिट्पति । भंगे मागे पांव पसाय परितिवम् । , व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमालकाप्रकरण २ (१८१) (निधिका मिलना ) और ब्राह्मणको-प्रति- वस्तुको ही आधि देना विक्रय होताहै-और ग्रहसे मिला क्षत्रियका जीता हुआ और आधिकिये और दिये और विक्रीत (वेचा) वैश्य और शूद्रका निविष्ट ( खेती गोरक्षा का स्वत्वनही जाता-यदि स्वत्व रहितको और सेवा वे इन आठोसे स्वामी होताई-कदा- | देतो दंट इसवचनसे कहाहै कि दुनके चित् कहो कि यही वचन वीस वर्षके भोगको अयोग्यको जो लेताहे-और जो देताहे वे स्वत्वका हेतु प्रतिपादन करताहै सो ठीक | दोनों चोरके समान शिक्षाके योग्य होनेसे नही-क्योंकि स्वत्व और स्वत्वके हेतु लोकमें | उत्तम साइस दंडके योग्यह-तैसही आधि प्रसिद्ध केवल शास्त्रसे नहीं जाने जाते- आदि तीनका अपवादभी यह वचन होगा यह विभागके प्रकरणमें भली प्रकार वर्णन | तो अगले श्लोक, आधि सीमा आदि अप- करेंगे-गौतमका वचनतो नियमके लिये है- | वाद न हो सकेंग-तिससे भूमि आदिकी और अनागम (अस्वत्व )भोगको स्वत्वका हानि सिद्धनही होसकती-और व्यवहारकी हेतु मानोगे तो यह वचनभी विरुद्ध हो जायगा | भी हानि नहीहै क्योकि नारदने इस वैच- कि बहुतसे सैंकडों वर्पतक जो अनागम नसे उपेक्षामें लिंगके अभावसे व्यवहार- (विना मिला)को भोगताहै टप्सको पृथिवीका की हानि कहाँहे वस्तुके अभावसे नहीं कि राजा चोरका दंडदे- और यह वातभी | उपेक्षा करनेवाले और तूष्णीं बैठे हुये इस कहनेको युक्त नहीं है कि अनागमको जो मनुष्यका पूर्वोक्त काल वीत जाय तो व्यव: भोगे यह वचन परोक्ष विषयमें है और देख- हार सिद्ध नही होता-तैसेही मनुनेभी व्यव- कर जो निषेधन करे यह वचन प्रत्यक्ष विष- | हारसे भंग दिखायाहे वस्तुसे नहीं कि यदि यमें है क्योंकि आगमके विना जो भोगे यह जड और पौगंडसे भिन्न जिसके विषयको अविशेषसे कथनह प्रत्यक्ष वा परोक्षका भोगें तो वह व्यवहार भन्न होताहै और नामभी नहींह-और यह कात्यायनका भी | भोगनवाला उस धनके योग्य होताई-और वचन है कि पशु स्त्री पुरुष आदिके हरने- व्यवहारका भंग ऐसे है कि भोक्ता कहताहे वाला वा उसका पुत्र उपभोगमें बल नकरें कि जड (मूर्ख वा अज्ञानि ) और पोगंडसे यह धर्मको व्यवस्थाहै-प्रत्यक्षके भोगमें ! भिन्न यह बालक है इसके समीप मैने निरं हानिके कारणका अभाव है इससे हानिका | तर वीस वर्षतक भोगाहै उसके बहुत असंभव है-और यहभी मानने योग्यनही साक्षीहैं-यदी इसके स्वत्वको मैं अन्यायसे कि आधि प्रतिग्रह क्रोम पहिली क्रियाकी | भोगा तो यह इतने कालतक उदासीन प्रबलताके अपवादरूप इस वचनसे भूमिके क्योरहा-इसमें यह बालक उत्तर नहीं दे- विषयमें वीसवर्षके और धनके विषयमें दश | सकता इसी प्रकार उत्तर न देनेवालेभी वर्षके उपभोगवाली उत्तर क्रियाकी प्रबलता | बालकका वास्तवमें व्यवहार होता ही है कहीहै क्योंकि आधि आदिकोंमें यथाथैसे १ अदेय यश्च गृह्णाति यश्चादेय प्रयच्छति । उभौ तौ उत्तर क्रियाही नही होसकती क्योंकि अपनी | चोरवच्छाश्या दाप्यो चौत्तम साइसम् । १ अनागर्म च यो भुक्ते बहून्यब्दशतान्यपि । चौर २ उपेक्षां कुर्वतस्तस्स तूष्णीभूतस्य तिष्ठतः । देडेन त पापं दडयेस्पृथिवीपतिः । कालविपन्ने पूर्वोक्त व्यवहारो न सिद्धयति । २ नोपभोगे वलं कार्यमाहर्ता तत्सुतेन वा ! पशु ३ अजहश्चेदपागडो विषये चास्यभुज्यते। भारत- स्त्रीपुरुषादीनामिति धर्मों व्यवस्थित.। द्वश्वहारेण भोक्ता तनमहति ।
लेकर फिर अन्यके यहां आधिकरके कुछ | हानि हो जाती है-कदाचित् कोई शंकाकरै ; रुपया लेले तो पूर्वकाही वह क्षेत्र होता है कि यह बात नही हो सकती है-क्योंकि (१८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . जायंतो उसके वादीका विजय होता है और आधि प्रतिग्रह-क्रीतमें-पूर्व कार्य बलवान् पूर्व कार्य सिद्धभी हो जाय उसके वादीका | होताहै ॥ २३ ॥ पराजय होता है वह ऐसे है कि कोई तो पश्यतोवतोभूमानिर्विशतिवार्षिकी । ग्रहण ( लेना से धारण (कर्ज)को सिद्ध परेणंभुज्यमानायाधनस्यदशवार्षिकी २४॥ करताहै और कोई प्रतिदान (लौटाना )से अधारणको सिद्ध करताहै-उनमें ग्रहण और पद-पश्यतः ६ अन्ववतःभूमे ६हानिः१ प्रतिदान प्रमाणोंसे सिद्धभी हो जाय तो विंशतिवार्षिकी १ परेण ३ भुज्यमानायाः ६ प्रतिदान बलवान है इससे प्रतिदान वा- धनस्य ६ दशवार्षिकी १ ।। दीका विजय होता है-तैसेही पहिले दोसो योजना-परेण भुज्यमानायाः भूमेः ता रुपये ग्रहण करके कालांतरमें तीन सौका पश्यतः अनुवतः पुंसः विंशतिवार्षिकी हानि स्वीकार जिसने कियाहो वहां दोनोंमें प्रमा- भवति-धनस्य दशापिकी हानिः भवति । भी हों तोभी तीन सौका ग्रहण बलवान् है तात्पर्यार्थ-यदि पर(अन्य )मनुष्य विना क्योंकि पूर्वका बाध पश्चात् होनेवालेसे हो संबंध (दावे) भूमि और धनको भोगता हो गया इससे पूर्वकी उत्पत्तिही नहीं होती सोई और स्वामी देखताहो और यह भूमि मेरी है कहाहे कि पूर्वके बाधे विनाउत्तरकी उत्पत्ति | तुझे भोगनी न चाहिये ऐसा निवारण न कर सिद्ध नही होती-और आधि ( गहने )प्रति- | ताहोय तो उस भूमिकी वीस वर्षमें हानि हो अह-क्रीत-इन तीनों में पहिला कार्य बलवान् | जाती है अर्थात् वह भोगनेवालेकी हो होता है वह ऐसेहै कि एकही क्षेत्रको एक मनु- जाती है यदि उसने निरंतर वीस वर्ष भोगी हो प्यके यहां आधिकरके और उससे कुछ रुपया और हस्ती अश्व आदि धनकी दश वर्षम . उत्तरका नदी-इसी प्रकार प्रतिग्रह और वेच- स्वामीके मने न करनेसे स्वस्त नही मा नेमें समझना-कदाचित् कोई शंकाकर कि सकता-दान और विक्रयके समान अनिषे- आधिरखे हुयेमें अपना स्वत्व ही नहीं रहा की स्वत्व निवृत्तिके हेतुओंमें प्रसिद्धि इससे पुनःआधीही नही हो सकती इसी प्रकार नहीं और न वीस वर्षके भोगसे स्वत्व उत्पन्न दिये हुयेका दान और क्रीत (खरीदा का होता क्योंकि उपभोग स्वत्वमें प्रमाण नहीं प्रय नही तिससे यह वचन अनर्थकहै- हो सकता और प्रमाण प्रमेयको पैदा नदी इसका समाधान यहहै कि स्वत्व नहीभी है कर सकता-और रिक्थ ( भाग )क्रय आदि तोभी कोई मोह वा लोभसे फिर आधि आदि- जो स्वत्वके कारण ( साधक) और हेतु है को को तो यहां पहिला बलवान होता इस उनमें उपभोग नही पटा-सोई दिखाते हैं न्यायमूषही यह यचनह इससे तर्कना करने कि ये आठही स्वत्वक हेतु गौतमने पेटे हैं योग्य नही॥ भोग नही पटा कि भाग-मय-संविभाग भागार्य-संपूर्ण ऋण भादि अयात विवा- ( प्रतिपंधयाला दाय ) प्रतिमह-अधिगम दाम पिछा कार्य पख्यान होताई-भार सामिरिषयमयसीयमागरमधिगमेनुमान पागापिसण क्षत्रिय मीना जन नोतिराणसी। यो।
व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमातकाप्रकरण २ (१०१) । (निधिका मिलना) और ब्राह्मणको-प्रति- | वस्तुको ही आधि देना विक्रय होताई-और महसे मिला क्षत्रियका जीता हुआ और आधिकिये और दिये और विक्रीत (वेचा) वैश्य और शूद्रका निविष्ट (खती गोरक्षा का स्वत्वनही जाता यदि स्वत्त्व रहितको और सेवा)व इन आठोंसे स्वामी होताहे कदा- | देतो दंड इसवचनसे कहाहै कि दुनके चित्कहो कि यही वचन वीस वर्षके भोगको अयोग्यको जो लेताह-और जो देताहै वे स्वत्वका हेतु प्रतिपादन करताहै सो ठीक दोनों चोरके समान शिक्षाके योग्य होनेसे नही क्योंकि स्वत्व ओर स्वत्वके हेतु लोकमें उत्तम साइस दंडके योग्यहैं-तसेही आधि प्रसिद्ध है केवल शास्त्रसे नहीं जाने जाते- आदि तीनका अपवादभी यह वचन होगा यह विभागके प्रकरणमें भली प्रकार वर्णन | तो अगले श्लोकमें आधि सीमा आदि अप- करेंगे-गोतमका वचनतो नियमके लिये है- याद न हो सकेंगे-तिससे भूमि आदिकी और अनागम ( अस्वत्व )भागको स्वत्वका | हानि सिद्धनही होसकती-और ध्यवहारकी हेतु मानोगे तो यह वचनभी विरुद्ध हो जायगा | भी हानि नहीहै क्योंकि नारदने इस वैच- कि बहुतसे संकडों वर्षतक जो अनागम नसे उपेक्षामें लिंगके अभावसे व्यवहार- (विना मिला)को भीगताहै उसको पृथिवीका की हानि कहींई वस्तुके अभावसे नहीं कि राजा चोरका दडदे- और यह वातभी | उपेक्षा करनेवाले और तूष्णीं बैठे हुये इस कहनेको युक्त नहीं है कि अनागमको जो मनुष्यका पूर्वोक्त काल बीत जाय तो व्यव- भोग यह वचन परोक्ष विषयमें है और देख- हार सिद्ध नही होता-तैसेही मनुनेभी व्यव- कर जो निषेधन करें यह वचन प्रत्यक्ष विष- हारसे भंग दिखायाह वस्तुसे नहीं कि यदि यमें है क्योंकि आगमके विनाजो भोगे यह जड और पोगंडसे भिन्न जिसके विषयको अविशेपसे कथनंहे प्रत्यक्ष वा परोक्षका ) भोगें तो वह व्यवहार भन्न होताहे और मामभी नहीहै-और यह कात्यायनका भी ! भोगनेवाला उस धनके योग्य होताह-और वचने है कि पशु स्त्री पुरुष आदिके हरने- | व्यवहारका भंग ऐसे है कि भोक्ता कहताहै वाला वा उसका पुत्र उपभोगमें बल नकर कि जड (मूर्ख वा अज्ञानि ) और पौगंडसे यह धर्मकी व्यवस्थाहै-प्रत्यक्षके भोगमें | भिन्न यह बालक है इसके समीप मैने निरं- हानिके कारणका अभावहै इससे हानिका | तर वीस वर्षतक भोगा, उसके बहुत असंभव है-और यहभी मानने योग्यनही | साक्षीहैं-यदी इसके स्वत्वको मैं अन्यायसे कि आधि प्रतिग्रह क्रया में पहिली क्रियाकी | भोगा तो यह इतने कालतक उदासीन प्रबलताके अपवादरूप इस वचनसे भूमिके क्यारहा-इसमें यह बालक उत्तर नही दे- विषयमें बीसवर्षके और धनके विषयमें दशा सकता इसी प्रकार उत्तर न देनेवालेभी वर्षके उपभोगवाली उसर क्रियाकी प्रबलता बालकका वास्तवमै व्यवहार होता ही है कहीहै क्योंकि आधि आदिकोंमें यथार्थसे १ अदेय यश्च गृह्णाति यश्चादेय प्रयच्छति । उभौ तो उत्तर क्रियाही नही होसकती क्योंकि अपनी | चौरवच्यास्या दाप्यौ चोत्तमसाहसम् । १ अनागमं च यो भुक्ते यहून्यदशतान्यपि । चौर २ उपेक्षां कुर्वतस्तस्य तूष्णीभूतस्य तिष्ठतः । देउन त पापं दयेथिवीपतिः । कालविपन्ने पूर्वोत्ते व्यवहारो न सिद्धयति । २ मोपभोगे नलं कार्यमाही तत्सुतेन वा । पशु ३ अजहश्चेदपीगो विषये चास्यभुज्यते । मनत. ब्रीपुरुषादीनामिति धर्मों व्यवस्थित.। यवहारेण भोक्ता तद्धनमहति ।.
(१८६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । सौ वर्षपर्यत है.क्योंकि इसे श्रुतिमें पुरुषको एक वर्षके मध्यमेंभी तीन पुरुष वीतसकते अवस्था सौ वर्षकी कही है-इससे सौ वर्षसे हैं दूसरेही वर्षमें आगमके विनाभी भोग अधिकका निरंतर और निषेधसे रहित- | प्रमाण होजायगा-वह होजायगा तो इस प्रत्यर्थीका प्रत्यक्ष-जो भोग-वह चाहै आग- पूर्वोक्त स्मृतिका विरोध होजायगा कि स्मरण मके अभावकाभी निश्चयही अव्यभिचारसे | योग्य कालमें भूमिकी क्रिया आगम सहित (आगमके विना भोग नही होता) आगमका | भोगहे-अन्यायेनापि यद्भुक्तं-इस वचनका आक्षेप ( अनुमान ) करके स्वत्वको जनाता| यह अर्थ करना कि अन्यायसे भोगेकोभी हे-और स्मरणके अयोग्य कालमेंभी परंप- | नही छीनसकते अन्यायके अनिश्चयमें रासे आगमके अभावकाही स्मरण होय तो | तो कैसे छीन सकते हैं क्योंकि वचनमें भोग प्रामाणिक नहीं हो सकता इससे यह अपि शब्द सुना जाताहै-और जो हारी- कह आये हैं कि आगमके विना जो बहुतसे तने कहीहै कि जो आगमके विना पूर्व- सैंकडौं वर्षतकभी भोगे भूमिका राजा उसे ले तीनपुरुषोंने अत्यन्त (निरंतर) भोगाहो चौरका दंडदे-कदाचित् कोई शंका करे कि | तीन पुरुषसे चले आये उसको छीन नही अनागमं तु योभुक्ते यहां एकवचनके निर्देश- | सकते-उसकाभी यह अर्थ करनाकी और बहून्यब्दशतान्यपि इस अपिशब्दके अत्यंत आगमके विना अर्थात् उपलभ्य- प्रयोगसे प्रथमपुरुष आगमके विना चिर- | मान (दीखता ) आगमके विना जो भोगा कालतक भोगे तोभी दंड होगा-सो ठीक हो कुछ आगमके स्वरूपके विना यह अर्थ नहीं क्योंकि दूसरे वा तीसरे पुरुष (पीटी)में नहीं क्योंकि आगमका स्वरूप नहोयतो मैं- आगमके विना भाग प्रमाण हो सकताई। कडों भोगोंसेभी स्वत्वनही होताहै-क्रमान्त्रि- और यह इष्ट नहीं है क्योंकि आदिमें कारण | पुरुषागतं-इसका वही अर्थहै जो कह दानहे और मध्यमें आगम सहित भोग यह आयेहैं कदाचित् कोई शंकाकरे कि स्मरण- नारदकी स्मृतिहे-तिससे सर्वत्र आगमके | योग्य कालमें आगमका सापेक्ष भोग प्रमाण विना भागमे ( अनागमं तु यो भुक्ते ) यह नहीं होसकता सोई दिखातेहैं कि यदि पूर्वोक्त चौरका दंड जानना और जो यह आगमका ज्ञान किसी अन्य प्रमाणसे हुभा वैच है कि अन्यायसे पिता और पहिले तीन | होय तो उसी प्रमाणसे स्वत्वका ज्ञान पुरुषाने जो क्रमसे तीन पुरुषसे चला आया होजायगातो भोग स्वत्व वा आगममें प्रमाण वह अपहरण (अनना) करनेको शक्य नही होसकता-यदि अन्य प्रमाणसे आगमन नही है-उस वचनमेंभी पिता सहित पहिले जाना हो तो आगमनसे युक्त भोग कैसे तीन पुरुषेनि भोगा हो-यही अन्वय करना प्रमाण हो सकताह-इस शंकाका समाधान और उस वचनमेंभी (कमास्मिपुरुपागतं) कहते हैं कि अन्य प्रमाणसे जाने हुये आग क्रमसे तीन पुरुषोंसे चली माई हो-यह मसे युक्त निरंतर भोग कालांतरमें स्वत्वको स्मरणके अयोग्य कालका उपलक्षण (चो-जना देता है और प्रमाणसे जानाभी आगम धफ) ई-तीन पुरुषकाही पोधक मानोगे तो भोगरहित होप तो कालांतरमें स्वत्वके सतायो पुतः। जाननेको समयं नहीं क्योंकि मध्यमें भी २ भन्नादनापत विधा तितभिः ।। दिनागमायने मुक्त एशिमोनाना- , যা মানুষ। पपमपातु मात्रिपुष्पागतम् ।
व्यवहारध्याय असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण २ दान विक्रय आदिसे स्वत्व आसकताहै इससे यदि पर्व अपर कालका ज्ञान होयतो विगु- सब निषिद आगम सापेक्ष भोगको प्रमाण भी पूर्व कालका आगमही बलवान होता ' कहा अब वह कहतेहैं कि भोगसे निरपेक्षही है अथवा लेख साक्षी भोग यह तीन प्रकारका आगम प्रमाणहै जिस आगममें अल्पभी प्रमाण कहाहे इन तीनोंके समुदायमें कहां भोग नहो उस आगममें बल नहींहे अर्थात् किसको प्रबलताहै इस लिये यह वचनहे कि वह पूर्ण नहीहै-यहां यह अभिसंधि (निर्णय) पूर्व क्रमसे चले आये भागको छोडकर भोगसे है कि अपने स्वत्वकी निवृत्ति और पराये आगम अधिकहै और जहां अल्पभी भोगनहो स्वत्वकी उत्पत्तिको दान कहते हैं- और वहां आगममभो बल नही होता यह तात्पर्य परका स्वत्व तभी पैदा हो सकता। यदि पर है कि पहिले पुरुषके समय साक्षियोंसे स्वी- स्वीकार करै अन्यथा नही- और स्वीकार | कार कराया आगम भोगसे अधिक बलवान्) तीन प्रकारका मानसिक-वाचिक-कायिक- है परंतु पूर्व क्रमसे चले आये भोगके विना- उनमें यह मेराहे यह मनस संकल्परूप | वह पूर्व क्रमसे चला आया भोग चौथे पुरु- .मानस है यह मेराहे इत्यादि वचन जिसमें पमें लेखसे स्वीकार किये आगमसे बलवान् कहा जाय वह विकल्प सहित प्रतीति रूप है मध्यम पुरुष तो भोग रहित आगमसे -वाचिक है और कायिक उपादान (ग्रहण) अल्प भोग सहितभी आगम बलवान होताहै- स्पर्श आदि रूपसे अनेक प्रकारकाहै उसमें यही वात नारदने स्पष्टकी है कि पहिला यह स्मेति नियमके लिये है कि कृष्णमृगच- कारण दानहे-मध्यमें आगम सहित भोग- र्मको और गोको पुच्छ पकडकर और हाथीको | और निरंतर और चिरकालका जो भोगहै सूंड-औरअश्वको केसर-और दासीकोशिर वही एक मुख्य कारणहे ॥ पकडकर दान करै-आश्वलायननेभी कहा भावार्य-पूर्व क्रमसे चले आये भोगको कि प्राणीका अनुमंत्रण (कथन) और अ| छोडकर आगम- भोगसे अधिकहे-और प्राणी और कन्याके स्वीकारमें स्पर्श करे- जहां अल्पभी भोग नहो वहां आगमर्मभी उसमेंभी सुवर्ण और वस्त्र आदिमें जल दानके | वल नहीं होता ॥ २७ ॥ अनंतरही उपादान ( लेना)का संभव हो- आगमस्तुकृतोयेनसोभियुक्तस्तमुद्धत् । सकताहै इससे तीन प्रकारकाभी स्वीकार हो सकताहे और क्षेत्र आदिमें तो फलके नतत्सुतस्तत्सुतोवाक्तिस्तत्रगरीयसी ।। उपभोग विना कायिक स्वीकारका असंभव पद-आगमः १ तु:-कृतः १ येन सः१ होनेसे अल्पभी उपभोग होना चाहिये अन्यथा अभियुक्तः १ तर उद्धरेत् क्रि-न-तत्सुतः १ दानक्रय आदिकी संपूर्णता नहोगी इससे तत्सुतः १ वाऽ- भुक्तिःपतन:-गरीयसी १॥ फलके उपभोगरूप कायिक स्वीकारसे योजनान्येन आगमः कृतःसाअभियुक्तः रहित आगम दुर्बल हो जाता क्योंकि स्वी- सन् तं उद्धरेत् तत्सुतःवा तत्सुतः(पौत्रः) कार सहित आगम नहीं है यहभी तय है जब न उद्धरेत-तत्र भुक्तिः एव गरीयसीभवति । दोनोंके पूर्व और अपर कालका ज्ञान न हो तात्पर्यार्थ-जिन पुरुपने भूमि आदिका १ दयात कृष्णाजिन पुच्छे गां पुच्छे करिण करे। आगम ( स्वीकार ) कियादो वह पाटी 'यसरेर तवाव दासी शिरसि दापयेत् । ! आदी तु पारणं दान मध्ये मुक्तिस्तु सागमा । २ अनुमंत्रयेदमायिभिमशेदमाणिकन्याञ्च । कारणं भुतिरेवैका संतता या चिरतनी।
(१८८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । परेतः १ तेरा क्षेत्र आदि कहां है ऐसा अभियोग योभियुक्तःपरेतः स्यात्तस्यरिक्थीतमुद्धरेत् करनेपर उस प्रतिग्रह आदि आगमको नतत्रकारणंयुक्तिरागमेनविनाकृता ॥ २९ लिखित आदिसे उद्धार (स्वीकार )करावे- इससे यह बात उक्तप्राय (कहीसी) है प्रथम पद- यः.१ अभियुक्तः१ पुरुष आगमका उद्धार न करे तो दंड | स्यात् क्रि- तस्य६ रिक्थी१ २२ उद्धरेत होताह- उसका पुत्र दूसरा अभियोग करने | क्रि-ना-तत्र:- कारण मुक्तिः १ आग- पर आगमका उद्धार न करे-किंतु निरंतर मेन३ विनाऽ कृतार ॥ और आक्रोश रहित प्रत्यक्ष भोगका उद्धार योजना-यः अभियुक्तः परतः स्यात- करावे-इससे यह बात कही गयी कि आग- तस्य रिक्थी तं उद्धरेत्-आगमेन विना मका उद्धार न करतेहुये दूसरे पुरुषको तो कृता मुक्तिः तत्र कारणं न भवति ॥ दंड नहीं होता और विशिष्टभोगका जो तात्पर्यार्थ- बिना पूर्वक्रमागतात-इस- उद्धार न करै उसको दंड होता है और वचनमें जिसके कालका स्मरण नहो ऐसे, उस पुत्रका पुत्र तीसरा पुरुष (पोता)न और आगमके ज्ञानसे निरपेक्ष उपभोगको आगमका न विशिष्टभोगका उद्धार करें- प्रामाण्य (मानने योग्य) कहा अब उसका किंतु क्रमसे चलेआये भोगकाही उद्धार अपवाद कहते हैं- जब आहरण आदिका कर- इससेभी यह बात कही गयी कि | करनेवाला व्यवहारके निर्णयसे पहिले मर- तीसरा पुरुष क्रमसे चलेआये भोगका उद्धार | जाय तो उसका रिक्थी (पुत्र आदि) उस न करे तो दंड है आगमका उद्धार न करे | आगमका उद्धार करे जिससे उस व्यवहारमें वा विशिष्टभोगका उद्धार न करें तो दंड | साक्षीआदिसे सिद्धकियाभी आगमरहित नहीं है- वहां उन दूसरे और तीसरेका | भोग प्रमाण नहीं है- क्योंकि पूर्वके अभि- भोगही अत्यंत गुरु है उनमेंभी दूसरेमें गुरु योगसे भोग अपवादसहित है-नारदनेभी तीसरेमें अत्यंत गुरु यह विवेक है- और कहाँ है नवीनहुआ है विवाद जिसका ऐसे तीनों भी आगमका उद्धार न होय तो अर्थ- परलोकमें गये (मरे) व्यवहारीका पुत्र उस की हानि समानही है और दंटमें तो विशेष अर्थका शोधन करे भोग उसको निवृत्त है यह तात्सर्यार्थ है- सोई हारीतने कही है नहीं करसकता ॥ कि जिसने आगम कियाहो वह यदि उसका भावार्थ-जो अभियुक्त मरजाय तो उसका उद्धार न कर तो दंडके योग्य है उसका पुत्र पुत्र उस अभियोगका उद्धार कर-आगमके या उसके पुत्रका पुत्र दंडके योग्य तो नहीं विना किया भोग उस व्यवहार में कारण परंतु भोगकी हानि उसकीभी होती है ॥ (प्रमाण) नही होसकता ॥२९॥ भावार्य-जिसने आगम कियाहो वह ! नृपेणाधिकृताः पृगाः श्रेणयोयकुलानिच । अभियोगकरनेपर उसका उद्धार न करावे और इसका पुत्र या पात्र उद्धार कार्य पूर्वपूर्वगुरु ज्ञेयं व्यवहारवियौनृणाम् । उनमें भोगही अत्यंत गुरु है।॥ २८ ॥ पद-नृपेण३ अधिकृताः १ पूगाः१ आमाछो येनगरपातमनुदानामत. मामीनारय प्रेतार यादारितः। दुग Tो वा मोपदामिनोग सोपः मंशोगो न भोगोनियतया ।
व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण २. (१८९) श्रेणयः १ अथर-कुलानि च पूर्व१ पूर्व१ / किया पूगमें पूगका निर्णय किया राजाकै- गुरुर ज्ञेयं१ व्यवहारविधौ नृणाम् ।। अधिकारियोंमें जासकता है नारदने तो योजना-नृपेण अधिकृताः पूगाः श्रेणयः राजाके अधिकारियोंने निर्णय किया व्यवहार अथ कुलानि संति तेषु नृणां व्यवहारविधी राजाके पास जाता है- यह कहां है कुल पूर्व पूर्व गुरु ज्ञेयम् ॥ श्रेणी पूग अधिकारी राजा- इनसे व्यव- तात्पर्यार्थ-व्यवहारके निर्णयसे पहिले हारोंकी स्थिति होती है और इनमें उत्तर व्यवहारी मरजाय तो व्यवहार निवृत्त नहीं श्रेष्ठ है- उसमेंभी जव व्यवहार राजाके होता यह स्थित भया-निर्णय किये व्यवहार- समीप जाय तब अपने उत्तर (नीचला) सभा- कीभी स्थितिमें वा व्यवहारीक रहते कही सदसहित राजाको पूर्वर सभ्योसहित पण- व्यवहार प्रवृत्त होता है कही नही-इस व्यव- सहित व्यवहारका निर्णय करना होय स्थाको सिद्धिकेलिये-व्यवहारके देखने और यह कुदृष्टवादी पराजित होजायतो पालोंका वल और अवल कहते हैं- नृप दंडदेने योग्य होता है और जो यह जयको (गजा )ने अधिकार दिया है व्यवहारदेखने- प्राप्त होजायतो सभासद दंडकेयोग्य होते हैं। केलिये जिनको ऐसे वे प्राइविवाक आदि भावार्थ- गजाके अधिकारी-पूग-श्रेणी- सभासद् जो राजा सभासदों कर इस वचनसे और कुल जो है उनमें मनुष्योंके व्यवहार- कहे है- पूग(समूह) भिन्नरजातिक करनेमें पूर्व पूर्व गुरु (श्रेष्ठ) जानना॥ ३०॥ और भिन्नर वृत्तिवाले एकस्थानके निवा- बलोपाधिविनिर्वृत्तीव्यवहारान्निवर्तयेत् । सियोंको पूग कहते हैं-जैसे ग्राम नगर आदि- खीनक्तमंतरागारवहिःशत्रुकृतांस्तथा ३१ श्रेणि नानाजातिके वा एकजातिके जो एक- जातिके कर्मोसे जीवे ऐसे समूहोंको श्रेणि निवर्तयेत् क्रि- स्वीनतमन्तरागारबहिःशत्रु- पद-बलोपाधिविनिर्वृत्तान् २व्यवहारान कहते हैं-जैसे हेडावुक आदि और तमोली सनुवंद चर्मकार आदि-कुल- ज्ञाति संबंधि कृतान्२ तथा:- ॥ भोंके समूह- राजाके नियतकिये इन योजना-बलोपाधिविनिवृत्तान् तथा स्त्री- नद आदिचाके मध्यमें पूर्वर जो इस नक्तमंतगगारबहिः शत्रुकृतान् व्यवहान् राजा पढा है बहर गुरु (श्रेष्ठ) मनुष्योंके निवर्तयेत् ॥ व्यवहारके देखने में- जानना- यह कहा ता. भा०-बलात्कार और उपाधि (भय गया कि- राजाके अधिकारी व्यवहारका | आदि )से-किये और स्त्री-पत्रिमें गृहके निर्णय करदें और पराजितको यदि कुदृष्ट भीतर- ग्रामसे यादिर-और अत्रुओंके किये बुद्धिसे संतोष न होयतो पूग आदिम पुनः व्यवहारोंको राजा निवृत्त कर दे अर्थात् व्यवहार नहीं होता- इसीप्रकार प्रगका बल आदिसे किये व्यवहारोंके जय पराज- निर्णय किया व्यवहार श्रेणी आदिपर नहीं यको राजा न माने ॥ ३१ ॥ जासकता- तैसेही श्रेणीका निर्णय किया मत्तोन्मतातव्यसनिवालभीतादियोजितः कुलम नही जासकता-कुलका निर्णय किया , असंबद्धकृतश्चैवव्यवहारोनसिद्धयति ३२. तो श्रेणी आदिमें जासकता है-श्रेणीका निर्ण- , कुलानि श्रेणयश्चैव पूपाश्चाधिछतानृपः। प्रति १ राज्ञा सभासदः कार्या रिपो मित्रे च ये समाः। व्यवहाराणां गुर्वेपामुत्तरोत्तरम् ।
(१९०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . च्याधि सभातरागन पद-मत्तोन्माग लेकर शेष धन स्वामी पद-इतरेण ३ निधौ ७ लब्धे .७ राजा २ जितः १ असंगजाके भागमेंसे चौथा भाग पष्ठांशं २ आहरेत् क्रि-अनिवेदितविज्ञातः१ वहारः १ न:-तिो धन मिला (पाया ) हो- दाप्यः १ त २ दण्डम् २ एव:-च-॥ योजना-मत्तोमाया होयतो संपूर्ण धनमेसे योजितः च पुनः वालेको देकर शेष धनको योजना-राजा निधि लब्ध्वा अर्ध द्विजेभ्यः न सिद्ध्यति ॥ सोई गौतमने कहींहै कि दद्यात्-विद्वान् द्विजः पुनः (तु ) अशेषं तात्पर्यार्थ-मदिधनको पाकर राजा वर्ष | आदद्यात्-यतः सःसर्वस्य प्रभुः भवति-इत- और वात पित्त रे-वर्षके पीछे-चौथा भाग रेण निधो लब्धे सति राजा पष्ठांशंदत्वा आ हुए उन्मादसे उन्म शेष राजाका होताह-इस हरेत्-अनिवेदितविज्ञातः पुरुषः तं (निधि) इप्टका वियोग और यह · एकवचन अवि- | चपुनः दंडं एवं (अपि ) दाप्यः ।। हुए दुःखसे युक्त जा तीन वर्पतक रखें। ता पिपर्यि-पूर्वोक्त निधिको राजा लेकर अयोग्य बालक और है, और वर्षमेत आशा दुर्भिक्ष धर्मकायको शेषको कोश आदि पदके ग्रहणले पुर और देशका विरोधी | इनमें ग्रहण किये स्त्रीधनको भर्ता अपनी लेना इनका किया हुआ व्यवहार सिद्ध नहीं इच्छाके विना देने योग्य नहीं है इस वच- होता अर्थात् माननेके अयोग्य है मनुकाभी | नसे यदि दुर्भिक्ष आदिके विना स्त्री धनका वचने है कि पुर और देशसे विरुद्ध और व्यय (खर्च) भर्ता करे और याचना राजाका त्यागाहुआ वाद धर्मके ज्ञाता ऑने करनेसेभी विद्यमान धनको न दे तब स्त्री- ग्रहण करने अयोग्य कहा है और असम्बंध | पुरुषकाभी व्यवहार होता है-तसेही भक्त- (जो राज्यमें नियुक्त न हों ) उनका किया- | दासका स्वामीके संग व्यवहार कहेंगे-और मी व्यवहार सिद्ध नही होता और जो यह गर्भदास आदिकाभी-इस नारदके वच- वचन है कि गुरु शिष्य पिता पुत्र स्त्री पुरुष | नसे कि 'जो इन गर्भदास आदिकोंमें स्वा- स्वामी भृत्य इनके परस्पर विरोधमेंभी व्य-मीको प्राणसंशयसे छुटावे वह दासभावसे वहार सिद्ध नही होता यह वचनभी गुरु | मुटता है और पुत्रके भागको प्राप्त होताहै- शिष्य आदिके व्यवहारके सर्वथा निषेधार्थ स्वामीके न छोडने और पुनभागके न दे- नही है क्योंकि उनकाभी व्यवहार किसी ने स्वामीके संग व्यवहारको-कोन निवारण प्रकार इष्ट है सोई दिखाते हैं कि शि- कर सकता है-तिससे गुरु आदिके संग प्यकी शिक्षा वधको छोडकर करे असमर्थ | व्यवहार-दृष्ट और अदृष्ट (दोनोलोक )में होय तो रस्सी वांस विदल जो कोमल है उ- | कल्याणकारी नही होता इससे प्रथम नसे करें अन्यसे मार तो राजा गुरुको दंड | सभासदों सहित राजा शिष्य आदिका दे-इस गौतमके और उत्तम अंगमें कदा- | निवारण कर-यही इस श्लोकका तात्पर्यार्थ ३ पुरराष्ट्रविरुद्धश्च यच राज्ञाविसर्जितः । अनादे है यदि अत्यंत हट करें तो शिप्य आदि- योमवेद्वादो धर्मविद्भिन्दाहृतः । १नोत्तमागे कथंचन । २ गुरोः शिष्ये पितुः पुत्रे दपत्योः स्वामिभृन्ययाः। २ टुभिक्षे धर्मकार्य च व्याधी संप्रतिरोधके । गृहीतं 'वरोधोपि मिथस्तेषां व्यवहागे न सिद्ध्यति । श्रीधनं मर्ता नाकामो दातुमइति । ३ शिप्याटिरवधेनाशनी रज्जुशुविदलाभ्यां ३ यथेषां स्वामिन कश्चिन्मोचयत्प्राणसंशयात् । सभामन्यन मन् राजा शास्या। दासत्तात्स रिमुच्येत पुत्रमागं लभेत च ।
व्यवहाराध्याय असाधारणव्यवहारमारकामकरण २ (१९१) . वां भाग स्वयं लेले-सोई मनुने कहा है जिसका वह धन हो उसको विभावयत्-तदि (अ. ८ शो ३५)जो मनुष्य सत्यसे यह कहै | देता हुआ राजा जिसका कि यह निधि मेरी है उसके छठे वा द्वा-द्रव्य था उसको और आदि द्रव्य यदि दश भागको राजा ग्रहण कर भागोंका यह | प्राप्त होता है सोई मनु) और स्थानके छठा दशवां आदि विकल्प तो देशकाल चोराके चराये हुये धनको र इनाने राजाको आदिकी अपेक्षासे जानना ॥ दे-क्योंकि उसको भोगता (धनको धनीको भावार्थ-राजा निधिको प्राप्त होकर आधा | पापको प्राप्त होता है यदि संख्या आदिसे द्रव्य ब्राह्मणोंको दे यदि विद्वान ब्राह्मणको | लेकर स्वयं भोगे तो चौरकादे-यदि वह निधि मिल जाय तो वह संपूर्णको लेले | होता है यदि चोरके चुराये हुयेकाना सके क्योंकि वह सब जगत् प्रभु (स्वामी )है- | उपेक्षा करें तब देशनिवासियोंके पापको यदि किसी अन्यको निधि मिल जाय तो प्राप्त होता है-यदि चोरोके चुग- राजा उसको छठा भाग देकर शेषको येका प्रतिआहरण ( निकासना )के लिये आप ले ले-यदि कोई मनुष्य निधिको पाकर यत्न करता हुआभी राजा प्रतिआहरण राजाको न बतावे और ज्ञात हो जाय तो उसको | न करसके तो उतना धन अपने कोश- निधिका और इतर दंड राजादे॥३४ ॥३५॥ मेंसे दे-सोई गोतमैने कहा है कि देयंचौरहतंद्रव्यंराज्ञाजानपदायतु । चोरके धुरायेको नीतकर यथास्थान अददद्धिसमानोतिकिल्वियस्यतस्यतत्॥ कृष्णद्वैपायनकोभी वचन हे-यदि चारोंक (स्वामीको ) पहुंचा दे वा कोशमसे देदे- पद-देयम् १ चौरहतं १ द्रव्यं १ राज्ञा ३ चुराये धनका प्रत्याहरण न करसके तो जानपदाय ४ तु अददत् १ हिऽ- समामोति | असमर्थ राजा अपने कोशमैसे देदे॥ क्रि-किल्बिष२ यस्य ६ तस्य ६ तत् १॥ भावार्थ-वीरोंके चुराये धनको राजा र २० योजना-चौरहतं द्रव्यं राज्ञा जानपदाय देशके निवासियोंको दे क्योंकि नहीं देता- सरदा भनेक - हि ( यतः) अददत् राजा यस्य हुआ राजा देशके वासियोंके पापको प्राप्त से मिल-तस्प किल्बिषं (पाप) समामोति ।। होताहे ॥ ३६॥ तात्पर्यार्थ-चोरोंने जो द्रव्य हरा हो उस १ दातन्य सर्ववर्णेभ्यो रामा धीरहवें धनम्। धनको चोरोंसे जीतकर अपने देशके राजातदुपमुंगानचीरस्यापोनि कित्विषम् । निवासी जो जानपद (देशके मनुप्य) में २ चौरहतमवजित्य यथास्थानं गमयेद कोश. हा वाद। ममायमिति यो भूयानिधि सत्येन मानवः । ३ प्रत्याहतुं न शक्तस्तु धन चौरहत यदि । स्वको तत्यादीत पड्भाग राजा द्वादशमेव का। शात्तीदे दये स्वादशक्तेन महाक्षिता । इति असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरणम् ।।२।।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । तात्पर्यार्थ- अब द्रव्यके विशेषसे वृद्धि- आदि दुगुनेसे अधिकभी पूर्वके समान बढते- को कहते हैं-पशु और स्त्रियोंकी वृद्धि संता- ही हैं-और एकवारके प्रयोगमेंभी-प्रतिदिन न होतीहै जो मनुष्य पशु और स्त्रीके पोष-प्रतिमास वा प्रतिवर्ष वृद्धिके लेनेमें अध- णमें असमर्थ होनेसे उनकी पुष्टि और सं- मणको जो देनाथा वह दूना हो सकता है तानकी कामनासे किसी अन्यको दे और इससे पूर्व लीहुई वृद्धिके संग मिलाकर दूनेसे ग्रहण करनेवाला दूध और सेवाके लिये अधिकभी बढताही है सोई मनुने केहाहै कि ग्रहण करले तो स्वामी उनकी संतानरूप | एकवार ठहराई हुयी कुसीद ( बढने के लिये वृद्धिका भागी होताह-अव यह कहतेहैं | दियाधन )की वृद्धि दूनेसे अधिक नहीं कि जो दियाहुआ द्रव्य वृद्धि लियविनाभी होती और अन्यपुरुषके द्वारा वा दूसरे चिरकालतक रहै उसमें किस द्रव्यको कि- प्रयोगसे ठहराई हुई तो दूनेसेभी अधिक हो तनी वृद्धि अधिकसे अधिक होतीहै-वृद्धि- जाती है यदि सकृदाहता-यह पाठ होयतो के ग्रहण कियेविना चिरकालतक टिके शनैः २ प्रतिदिन प्रतिमास वा प्रतिवर्ष तेल घृत आदिकी वृद्धि यदि अपनीकी हुई अधमर्णसे लेली होयतो दूनेसे अधिक नही वृद्धिसे वह बढगया होयतो अधिकसे अ- | होती-सोई गौतमनेभी कहाहै कि चिरकालमें धिक अष्टगुणा वृद्धि होतीहे अर्थात् आठगु- | प्रयोग (देना ) दूना हो जाताहै यहां प्रयो- ना बढताई आधिक नही-तैसेही वस्त्र अन्न गस्य-इस एक वचनसे दुसरा प्रयोग करनेमें सुवर्ण इनकी क्रमसे चौगुनी तिगुनी दुगुनी दूनेसे अधिकका होना इष्टहै और चिरस्थाने वृद्धि अधिकसे अधिक होतीहै-वसिष्ठनेतो | यह कहनेसे शनैः २ वृद्धिके ग्रहणमें दूनेका रसको तिगुनी कही है कि दुगुनासुवर्ण और | अवलंघन दिखायाहै । तिगुना अन्न रस पुष्प मूल फल-चढते हैं- भावार्थ-पशु और स्त्रियोंकी वृद्धि संतान तोले हुये रस आदि तीनों आठगुने होते हैं- होती है और रसकी वृद्धि अधिकसे अधिक मर्नुनेतो धान्य पुष्प मूल फल आदिकोंको | आठगुनी-और वस्त्र अन्न सुवर्ण इनकी वृद्धि पांच गुना कहाहे कि-धान्य शद (पुष्प- क्रमसे चोगुनी तिगुनी और दूनी अधिकसे मूल फल आदि क्षेत्रका फल ) लव( मेपकी | अधिक होती है ॥ ३९ ॥ ऊन चमरीगौके केश आदि ) वाह्य (पैल अश्व आदि) इनकी वृद्धि पांच गुनेसे मपनसाधयन्नर्थनवाच्योनृपतेर्भवेत् । अधिक नहीं होती-उसमेंभी अधमर्णकी | साध्यमानोनृपंगच्छन्दंडोदाप्यश्चतद्धनम् योग्यता-दुर्भिक्ष आदिका समयके अनु- सार व्यवस्था जाननी-यहभी एकवार देने पद-प्रपन्नं २साधयन्श्मरन-वाच्यः१ और लेनेमें समझना-अन्य पुरुषके नामसे नृपतेःभवेद क्रि-साध्यमानःश्नृपं २ गच्छ- वा अन्य प्रयोग (देना) करने वा उसी नदव्यःरदाप्यः १ च-तद्धनम् २॥ पुरुषको अनेकवार प्रयोग करनेमेंतो सुवर्ण योजना-अपनं अर्थ साधयन् उत्तमर्णः 1 द्विगुणं हिरण्यं त्रिगुण पान्यं धान्येनैव रसाः नृपतेः वाच्यः न भवेत् नृपं गच्छन् साध्य- व्याख्याताः पुष्पमटफलानि प-तुलाघृतं प्रितम मानः अधमर्णः दण्डयः चपुनः तद्धनं दाप्या-भवति॥ २ थान्ये शदे रवे वाये नातिकामति पंयताम् । तिसादाहिता(दाहता)। गुणन् ।
व्यवहाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ (१९७) तात्पर्यार्थ-अधमर्णने प्रपन्न (स्वीकृत) भिन्न मार्गसे दयाया हुआ राजाको निवेदन किये वा साक्षी आदिसे स्वीकार कराये धन-/ करें तो यह व्यवहारका पदहै-इसका मत्युदा- का धर्मआदि उपायोंसे प्रत्याहरण ( वसूल) हरण-जानना ।। करते हुये उत्तमर्णका राजा निवारण न करे भावार्य-अधमणसे स्वीकार किये अर्थको धर्म आदि उपाय मनुने दिखाये हैं कि प्रीतिके | जो सिद्ध (वसूल) करे उसका निवारण सत्यवचनरूप धर्मसे-साक्षी लेख आदि राजा न करें यदि अधमर्ण साधन करनेपर व्यवहारसे छल ( उत्सव आदिके वहानेसे राजाके समीप जायतो दंडके योग्य होता भूषण आदिका ग्रहण )से अचरित(भोजनका | और धनीके धनको उससे राजा दिवादे ४० अभाव )से और पांचवे निगड बंधन आदि बलसे-उपचय(बढाना)के अर्थ दिये द्रव्यको गृहीतानुक्रमादाप्योपनिमामधमर्णिकः । इन उपायों से अपने आधीन करे-अपनअर्थ- दत्वातुब्राह्मणायैवनृपतेस्तदनंतरम् ॥ को सिद्ध करते हुये उत्तमर्णको राजा मने पद-गृहीतानुक्रमात् ५ दाप्यावनिनां६ न करे-यह कहनेसे यह दिखाया कि अप्रति- अधर्णिकः१ दत्वा-तु:-माहह्मणाय एव:- पत्रको सिद्ध करते हुयेको गुजा निवारण | नृपतेः ६ तदनन्तरम् २॥ करे-यही बात कात्यायनने स्पेप्टकी है कि योजना-धनिनां गृहीतानुक्रमात् अधम- जो धनी न्यायवादी ऋणवालेको पीडा दे-णिकः राज्ञा दाप्या-तुपुनः ब्राह्मणाय देवा वह उस धनकी हानिको प्राप्त होता है और तदन्तरं नृपतेः दाप्यः ।। उस धनीके धनके समान दंडको पाता है ता. भाक-यदिधनी समान जातीके एक- और धर्म आदि उपयोंसे याचना करनेपर वार राजाके समीप आवतो जिस क्रमसे स्वीकार करनेवाला राजाके समीप जाकर धन लियाहो उसी क्रमसे अधमर्गसे दिवाव साधन करनेवालेपर अभियोग (दावा) यदि वे उत्तमणे भिन्न २ जातिके होयतो करे तो वह शक्तिके अनुसार दंडका भागी प्रथम ब्राह्मणके और फिर क्षत्रियके धनको होता है और राजा उससे धनीको धन दिवा- दिवावै ॥४१॥ दे-राजाके धन दिवाने के प्रकार दिखाये है राज्ञाघमणिकोदाप्यः सापिताशकंशतम् कि रामा स्वामीको ब्राह्मणसे शांतिके द्वाय पंचकंचशर्तदायमाप्तायोंयुत्तमर्णिकः ४३ और अन्यसि देशके आचरणसे-और दुष्टोंसे दुख देरकर धनको दिवाद-और जो धनी पद-राजा ३ अधमणिकः १ दाप्यः १ सुहद् ( मित्र) होयतो छलसेभी धनको दि- साधितात् ५ दशकं २ शतम् २ पंधकं २ वादे साध्यमानो नृपं गच्छेत्-यह वचन (जो च-शतं २ दाप्यः १ प्राप्तायः १ हि- मांगनेपर राजाके पास जाय) स्मृति आचारसे उत्तमर्थिकः १॥ योजना-राजा अधर्णिकः साधितात् धर्मेन शवहारेण एरेनाचीरतेन से । प्रयुक! दशक शतं- दाप्यः- प्राशार्थः उत्तमर्गिकः सापद पंचमेन बलेन । २ पीटयेद्यो धनी कधिनियावादिन। तस्मा-पंचकं शतं दाप्यः ॥ पास हीयेत तरसमे पानुयारमम। ता. भार-पदि दुबल उत्तमर्ग स्वीकार धर्मेण व्यवहारेण नागरिक छ । म्युन किये अर्थको धर्म आदि उपायोंसे सिद्ध न साधरेदर्य पंयमेन पसेन च । करसक और राना सिद्ध करले-तो राज] (१९८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अधमर्णसे साधित अर्थमेसे प्रतिशतमेंसे धनीके सम (तुल्य ) करै अर्थात् आपसमें दशरुपये दंडके ले अर्थात् राजा दशवां उत्तमर्ण अधमर्णनामको दूरकर-और होन भाग दंडरूप ग्रहण करें-और मिलगयाहै जाति अधमर्ण होयतो उस धनको दे-और धन जिसको ऐसे उत्तमर्णसे प्रति शत से श्रेष्ठजाति तो शनैः २ ऋणको दे ॥ पांचरूपये भृतिरूप राजाले अर्थात् वीसवें भावार्थ-निधन होनजाति अधमर्णसे ऋण भागको राजा ग्रहण कर यदि अस्वीकार दूरकरनेके लिये कामको करावे- ब्राह्मण किये अर्थको राजा सिद्ध करादेतो वहां निर्धन अधमर्ण होयतो उससे यथासंभव दंडका विभाग-निन्दवे भावितो दद्यात्-इस ऋणको राजा दिवादे ॥ ४३ ॥ श्लोकमें दिखाय आये ॥ ४२ ॥ दीयमानंनगृह्णातिपयुक्तयः स्वकंधनम् । हीनजातिंपरिक्षीणमृणायकर्मकारयेत् । मध्यस्थस्थापितंचत्स्यावर्द्धतेनततः परम् ॥ ब्राह्मणस्तुपरिक्षीणः शनैर्दाप्योययोदयम्॥ पद-दीयमानं २ मा-गृह्णाति क्रि-प्रयुक्तं पद-दीनजाति २ परिक्षीणं २ ऋणार्थ२ यः १ स्वकं २ धनम् २ मध्यस्थस्था- कर्म २ कारयेत् झि-ब्राह्मणः १ तुः-परि-पितं चेत् स्यात् क्रि-वर्धते क्रि-न-ततः- क्षीणः १ शन::- दाप्यः १ यथोदयम् -॥ परम् २ ॥ योजना-परिक्षीणं हीनजाति ऋणार्थ कर्म योजना-या उत्तमर्णः प्रयुक्तं स्वकंधनं कारयेत्-तुपुनः परिक्षीणः ब्राह्मणः शनैः दीयमानं नगृहाति चेत् यदि तत् मध्यस्थ-. यथोदयं दाप्यः॥ स्थापितं स्यात् तदा ततः परं न पड़ते ।। तात्पर्य-धनवान् अधमर्णके प्रति कहा ता भा०-चदानके लिये दिये धनको अप निर्धन अधमणके प्रति कहतेई कि यदि उत्तमर्ण अधमर्णके देनेपर घृद्धिक प्रामाण आदि उत्तमर्ण-परिक्षाण (निर्धन) लोभसे ग्रहण नकर-और यदि अधमर्ण उसे क्षत्रिय आदि हीन जातिसे ऋणकी निवृत्तिके मध्यस्थके हायमें स्थापित करदे (रखदे) तो लिये अपना कर्म उनकी जातिके अनुरूप वह धन स्थापनसे आगे नहीं घटता यदि कराये उसमेंभी उनके युटुंपका विरोध न स्थापितकोभी याचना करनेपरनदे तो पूर्वके करे यदि ब्राह्मण परिक्षीण (निर्धन ) होयतो समान बढताही है ॥ १४ ॥ गगा उससे शनैः २ ययोदय (जैसे होसक) अविभक्त कुटुंवार्ययणंतुस्कृतभवेत् । ऋणको गगा दिवाये-पहां दीनमाति समा- न जातिकाभी उपलक्षणई-इससे निर्धन दास्तद्रिक्यिनः प्रेतेमोपितेवाकुटुंपिनि ॥ सजातीयते यथोचित कर्म कराये और पद-अविभक्त कुटुंयार्थ पत्रमाणं १ प्रानफा प्रणभी श्रेष्ठ जातिका उपलक्षण तुम्-कृतभवेत् कि-दःक्रि-तत्र पिस्थि- ६ इससे निधन क्षत्रिय भादिभी वैश्य आ-नाप्रेते ७ प्रोपिते ७ वा-युद्धपिनि ७॥ दिका निः२ यथोचित कर्म फरे यही मनेने योजना-अविभः पुढेयाय गुते पर स्पष्ट कियाई ( अ.टो.१७६) कि सगाति ऋणं भवेत्-कुटुंपिनि प्रेते या प्रोषित तद अधम अपने आत्माको फर्म फरफेभी ऋणं चिरयनः ददाः ।। पगरि एम बुद्रनियतापमाः मो. ता. मा०-अविभत्तः (इ) पतीने पEnामोर सपन जो ऋण पृया २ किया दो दसको पुर्वपी व्यवहाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ दे और कुटुंची मरजाय वा पर देशमें चला शठ चाट चारण चौर इनको दिया निष्फल जाय तो सब रिक्थी (हिसेदार दे॥४५॥ होताहै यह दंड शुल्कके शेषको नदे यह नयोपित्पति पुन्नाभ्यांनपुत्रेणकृतपिता । कहनेसे यह नहीं समझना कि दंड आदि दद्यादृतेकुटुंबार्थान्त्रपतिः स्वीकृतंतथा ४६ कि दंड या दंडका शेष शुल्क वा शुल्कका संपूर्णको दे क्योंकि उशनाकी यह स्मृति है पद-न:-योषित १ पतिपुत्राभ्यां ३ न:- शेप और जो व्यवहारका नहो वह इनको पुत्रेण कृतम् २ पिता१ दद्यात् क्रि-ऋते:- पुत्र न दे गौतमनेभी कहा है कि मदिरा शुल्क कुटुंयार्थात् ५न:-पतिः१ स्वीकृतर तथाऽ-॥ द्यूत काम दंड इनको पुत्रनम्र अर्थात् ये ऋण योजना-पतिपुत्राभ्यां कृतं ऋणं योषित- पुत्रोंके ऊपर नही होते इस बचनसें देनेके पुत्रेण कृतं पिता-तथा स्त्रीकृत पतिः कुटुं- | अयोग्य ऋण कहा। वार्थात् ते न दद्यात् ॥ ता. भा.-पतिक कियेहुये ऋणको किया और दंड वा शुल्कका शेष और भावार्थ-मदिरा विषयभोग धूत इनमें भार्या और पुत्रके किये ऋणको माता-और वृथादान पिताके किये इतने ऋणोंको पुत्र पुत्रके किये ऋणको पिता नदें यदि वह नदे॥४७॥ कुटुंबके पोषणार्थ किया होयतो चाहे जिसने गोपशोडिकशैलूपरजकव्याधियोपिताम् । कियाहो उसको सब कुटुंबीदें यदि कुटुंबीन होयतो उसके दायभागोदें ॥ ४६ ॥ ऋणंदद्यात्पतिस्तासांयस्मादृत्तिस्तदाश्रया सुराकामयूतकृतंदंडशुल्कावशिष्टकम् । पद -गोपशौंडिकशेलूपरजकव्याधयोषिता- म् ६ ऋणं२ दद्यात् क्रि-पतिः२ तासांप वृपादानंतथैवेहपुत्रोदद्यानपैवकम् ॥१७॥ यस्मात् ५ वृत्तिः १ तदाश्रया १ ॥ पद-सुराकामद्यूतकृतं २ दंडशुल्का योजना-गोपौंडिकशैलूपरजकव्याधपो- वशिष्टकम् २ वृथादान २ तथा:-एव:-इहा- पिता ऋणं तासां पतिः दद्यात् यस्मात् पुत्रः १ दद्यात् कि-ना-पैसकम् २॥ वृत्तिः तदाश्रया (स्त्यधीना) भवति । योजना-सुगकामातकृत-दंडशुल्काव- ता. भा०-गोपाल शौडिक (करार) शिष्टकम्-तथैव इह वृथादानं पैतृकं पुत्रः । शेरूष (नट ) रजक (रंगरेज )व्याध इनकी म दद्यात् ॥ त्रियोंने जो ऋण कियाहो उसको उनके तात्पर्यार्थ-मदिराका पीना कामदेव पतिदें क्योंकि उनकी जीविका स्त्रियोंके (स्त्रीका व्यसन) रातमें पराजय इनमें किया आधीन होताई- (यस्मादृत्तिस्तदाश्रया ) और दंड वा शुल्क (महसूल) इनका शेष | इस हेतुके कहनेसे यह बात जानीगयी कि जो पिताका किया ऋणहै और तैसेही धूर्त अन्यभी जिनका जीवन स्त्रियोंके आधीन है बंदीजन मल्ल आदिको जो वृथा दान, वेभी स्त्रीके किये ऋणको दें ॥४८॥ पिताके किये इतने ऋणोंको शौडिक(करार) प्रतिपन्नंखियादेयंपत्यावासह यकृतम् । आदिक ऋणको पुत्र नदे क्योंकि यह स्मृति स्वयंकृतवायदृर्णनान्यत्स्त्रीदातुमईति १९ कि धूर्त बंदीजन मल्ल खोटा वैद्य कपटी दड वा दडशेष वा गुरु तच्छरमेव वान धूर्ते पदिनिमलेच कुवैये कितवे शठे चाटचा. दातव्य तु पुत्रेण यच न व्यावहारिकम् । रणची दत्त भवति निष्फलम् । २ मशुल्कयूतकामदगन् पुत्रानध्यावहेयुः।
(२००) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद-प्रतिपन्नं १ स्त्रिया ३ देयम् १ पत्या३ भावार्थ-जो ऋण स्त्रीने स्वीकार कर वा-सहा- यत् १ कृतम् १ स्वयं-कृतं लियाहो और जो पत्तिके संग कियाहो और १ वा- यत् १ ऋणम् १ ना-अन्यत् १ स्त्री जो स्वयं कियाहो उस ऋणको स्त्री दे-और १ दातुमा अईति कि- अन्य ऋणके देने योग्य स्त्री नही होती ॥४९॥ योजना यत् ऋणम् स्त्रिया प्रतिपन्नं चा पितरिमोपितेमेतेन्यसनाभिप्लुतेपिवा । पत्या सह यत् कृतम् वा स्वयंकृतं तव पुत्रपौत्रैर्ऋणदेयंनिन्हवेसारिभावितम् ५० ऋणम् स्त्रिया देयम्-अन्यत् ऋणं दातुम् स्त्री पद-पितारे ७ प्रोषिते ७ प्रेत७ व्यस- न अर्हति ॥ तात्पर्याय-मरते वा परदेशमें जाते हुये नाभिप्लुते अपिध्या-पुत्रपौत्रैः ३ ऋणम् पतिके कहनेसे ऋणादानमें जो ऋण स्त्राने देवम् १ निवे७ साक्षिभावितम् ॥ योजना- प्रोषिते प्रेते वा व्यसनाभिप्लुते स्वीकार करलियाहो-और जो पतिक जीवन समयमें उसकी संमतिसे कियाहो और जो पितरि सति पुत्रपात्रः ऋणं देयम्-निवे स्वयं कियाहो वह ऋण पतिके अभाव में साक्षिभावितम् तैः एव देयम् ॥ स्त्रीद-कदाचित् कोई कहै कि स्वीकृत देकर मरगयाहो वा दूर देशमें चलागयाहो तात्पर्थि- पिता देने योग्य ऋणको न आदि इन तीन ऋणोंको स्त्रीदे यह वचन अथवा चिकित्साके अयोग्य व्याधि आदिसे न कहना चाहिये क्योंकि इनके देनेमें संयुक्त हो और पिताके किये ऋणको कोई देहका अभावहै-इस शंकाका समाधान यह है । वतावतो उसको पुत्र वा पौत्र पिताका कि भार्या पुत्र दास ये तीनों निर्धन कहेहैं ये धन नहो तोभी हैं क्योंकि वे उसके तीनों जो पैदा करें वह धन उसकाही पुत्र और पौत्र है-उप्तमें फ्रमभी यह है कि होताई जिसके ये तीनों हो इस पचन पिताके अभावमें पुत्र और पुत्रके अभावमें स्वीकृत आदिमें भी न देनेकी शंका निवृपात्रदे-यदि पुत्र या पात्र उस ऋणका निद- तिके लिये यह वचन कहा और यह पूर्वोक्त वचनभी स्त्री आदिको निधनकाी व करें ( मुकरें) और अर्थी साक्षी आदिसे वोधक नहीहै किन्तु पराधीनताका बोध- स्वीकार करदे तो पुत्र पौत्र ऋणको - इस वचनमें पिता परदेशमें चलागयाहो इत- कहे-यह वात विभागप्रकरणमें स्पष्टकरेंगे-नाही कहाह-काल विशेषतो नारदका कहा कदाचित् कहो कि अन्य धनको स्री देने जाननाकि पिता पितृव्य (चाचा) ज्येठाभाई योग्य नहीं है-यहभी न कहना चाहिये ये परदेशमें चलेगये होयतो वीस वर्षसे क्योंकि विधिसेही निषेध सिद्धहो जायगा पहिले पुत्र आदि इनके ऋणको नर्द-और अर्थात् स्वीकृत आदि तीनसे भिन्न ऋणको पिताके मरनेपरभी वह पुत्र नदे गिसको खानदे-इसका समाधान कहते हैं-पूर्वोक्त व्यवहारको समयका ज्ञान नहो-ऑर जिसैं स्वीकृत भादिके अपवादके लिये यह पच- ज्ञानहो यहदे-यह व्यवहारका समपभी नार- नहै अर्थात् अन्य भो सुराकाम आदिहें नहीं दिखाया कि आठ पतिक शिशु धे चाहिं स्वीकार किये ही चाहे पतिके संग नागसंघरसराशासित प्रोषित कर्ण । किये ही उनको स्त्री नदे। दारिपतये ना पेठे धातर्पयापिया। माधासच पाना: मृताः। २ गर्भधः सागः परमातरसराया। यो सममिति परवे तस्य सदनम् । पाल मा पौडयाद्वारयोगस्यति ।
11379 व्यवहाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ (२०१) (बालक) गर्भमें स्थितके समान जानना- गया-सोई नारदन कहाहै पिताके मेरे पीछे और सोलह वर्षपर्यंत बाल वा पौगंड कहा- | पुत्र विभक्त हों वा इकट्ठे हों पिताका ऋणदें ताहै इससे परे व्यवहारका ज्ञाता स्वतंत्र | अथवा जो उनमें भारवाही (मुख्य) हो पितरावृत ( पिताके समान व्यापारका कर्ता) वही दे-और यहां पुत्र पौत्र ऋण दें यह कहाताहै-यद्यपि पिताके मरणानंतर बाल- | अविशेषसे कहाँद्दे तथापि यह विशेष जानना भी स्वतंत्र होगया-तौभी ऋणका भागी | कि पुत्र तो वैसाहि ऋण दे जैसा पिता वृद्धि नही होता-सोई कहाहै कि यदि व्यवहारको | सहित देता था और पौत्र मूलके समानहीदे नजानता होय तो स्वतंत्र ऋणका भागी | वृद्धि न दे क्योंकि यह बृहस्पतिका वचन है नहीं होता क्योंकि स्वतंत्रता ज्येष्ठमें होतीहै कि पुत्र पिताके ऋणको अपनेके समान दे- और ज्येष्ठ गुण और अवस्थासे होता है और और पौत्र मूल मात्र दे और प्रपौत्र प्रपिता- तिसी प्रकार व्यवहारके अज्ञानीको आसेध | महके ऋणको न दे-और यहां विभावित (अर्जी )और आह्वान(बुलाना)काभी निषेध (स्वीकृत ) इस अविशेष कहनेसे-साक्षि- देखतेहैं कि व्यवहारका अज्ञानी-दूत दान | विभावित-इस पूर्वोक्त वचनमें साक्षिका ग्रहण देनेमें उद्यत-व्रती-और संकटमें स्थित ये | प्रमाणका उपलक्षणहै-सम दे इसका अर्थ आसेधके योग्य नहीं हैं और न राजा इनका | यहहै कि जितना लियाहो उतनाही दे वृद्धि आह्वान करै-तिससे इस वचनमें पुत्र पदका न दे-यह सब अगले श्लोकमें स्पष्ट करेंगे। व्यवहारका ज्ञाता-और जात पदका निप्पन्न भावार्थ-पिता पर देशमेंहो वा मर गयाहो (कुशल )अर्थ करना कि इससे व्यवहारका | वा दुःखसे युक्तहो पुत्र और पोत्र ऋणको दें ज्ञान होनेपर पुत्र अपने स्वार्थको छोडकर यदि वे निह्नव ( मुकरना) करें और साक्षि- बडे यत्नसे पिताको ऋणसे ऐसे छुटाव जैसे | योंसे स्वीकृत हो जायतोभी ऋणको व्॥५०॥ पिता नरकमें न जाय-श्राद्धमें तो पालक- | रिक्थमाहऋणदाप्योयोपिगाहस्तथैवच । काभी अधिकारहे-क्योंकि यह गौतमकी | पुत्रोनन्याश्रितद्रव्यापुत्रहीनस्यरिक्थिन। स्पॅतिहे कि श्राद्धको छोड़कर बालक वेदका पद-रिक्थमाइः १ ऋण २ दाप्पः १ उच्चारण न करें और पुत्रपौत्रैः इस बहुवच- | योषिद्ग्राहार तथाऽ एकाचा पुत्रः अनन्याश्रि- नके दिखानेसे यदि पुत्र पृथक् २ होगये तद्रव्यः १ पुत्रहीनस्य ६ रिक्थिनः १ ॥ होय तो अपने २ भागके अनुसार दें और योजना-रिक्थवादः तथैव योषिद्मादः इकट्ठे होय तो मिलकर धनको पैदा करके अनन्याश्रितद्व्यःपुत्रः ऋणं दाप्या-पुत्रही -यदि उनमें कोई गोण और कोई प्रधान | नस्य रिक्थिनःऋणं दाप्याः ॥ होयतो प्रधान पुत्रही ऋणको दे-यह जाना तात्पर्य-दूसरेका द्रव्य क्रय आदिके १ अप्राप्तव्यवहारश्चेत्स्वतत्रीपि हि नभाक्।स्वा- बिना जो अपना हो जाय उसे रिक्य कहते तंत्र्य हि स्मृत ज्येष्ठ ज्येष्टघ गुणवयःकृतम् । हैं-जो विभागके द्वारा रिक्थको ग्रहण करे २ अप्राप्तव्यवहारच दूतो दानोन्मुखो व्रती। विष- | (ले) उसे रिस्थमाह कहते हैं-उससे राजा मस्थाच नासध्या नर्चतानाइयेनृपः । १ अत उर्व पितुः पुत्रा कण दयुयारातः भ. ३ अतः पुत्रेण जातेन स्वार्थमुत्यज्य पलतः । विमता विभक्ता वा यस्तावहते धुरम् । ऋणात्पिता मोचनीयो यथा न नरके प्रजेत् । २ ऋगमात्मीयवतिय देयं पुर्विभावित पितामह ४ न ब्रह्माभिच्याहरेदत्यन स्तधानिनयनात् । समं देयमदेयं तमुत्तस्य तु। (1310 (२०२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ऋणको दिवावे यह बात इससे कही गयी अवश्यदें यह सिद्धही था-इन सब शंका- कि जो मनुष्य जिसके द्रव्यको रिक्थरूपसे ओंका समाधान कहतेहैं कि पुत्रके होतेभी अहण कर उसीसे उसका कियाऋण दिवावे- रिक्थका ग्राही अन्य हो सकताहै क्योंकि और योपित् (भार्या )को जो ग्रहण करै क्लीव अंधै बधिर ये पुत्रभीहैं परंतु रिक्थके उसे योषितग्राह कहते हैं उससेभी ऋणको माही नहीं हो सकते-सोई लीव आदिको- दिवाव अर्थात जो जिसकी भार्याको ग्रहण कर को क्रमसे पढकर यह कहेंगे कि अंशसे वही उसके किये ऋणको दे-योपित इस हीन इनका भरण ( पालन ) कर-तसेही लिये पृथक् लिखौहै कि वह वांटनेका द्रव्य | सवर्णाका पुत्रभी अन्याय वृत्तिहोय तो न होनेसे रिक्थ नही हो सकती-जिसके | अंशका भागी नही होता इस गौतमके मातापिताका द्रव्य अन्यके पास न पहुंचा वचनसे पुत्रभी रिक्थका ग्राही नहीं हो हो ऐसे पुत्रसेभी राजा ऋणको दिवावे और सकता-इससे नपुंसक आदि पुन्नोंके रहते जो पुत्रसे हीन हो उसका ऋण रिक्थिोंसे और सवर्णाके पुत्रके अन्यायवृत्ति होनेपर दिवावे-और इनका समवाय (ये सब ) पितृव्य और पित्यके पुत्र रिक्थमाही हो होय तो पटनेके क्रमसे दिवावे कि प्रथम सकतेहैं-यद्यपि शास्त्रके विरोधसे योपिशाह रिक्थग्राह- उसके अभाव, योपिद्माइ- नहीं होसकता तथापि जिसने शास्त्रके निषे. उसके आभावमें पुत्र-ऋणदे कदाचित् कोई धको न माना वह पूर्व पतिके किये ऋण शंकाकरें कि इनका समूहही नहीं होसकता दूरकरनेका अधिकार्य होदी सकताई और भाई और पितर पिताक रिक्यकै भागी नहीं | वह योषिद्ग्राह होताई जो चारस्वैरिणियों में होते किंतु पुत्रही होताह इसे वचनसे पुत्रके | पिछलीको और तीन पूनर्भूओंमें पहिलेको होते अन्य रिक्यका ग्रहणही नही कर ग्रहण करे-सोई नारदने कहा कि परपूर्वा सकता और योपितका महभी नहीं हो १ मतन्यास्तु निरंशकाः। सकता क्योंकि यह मनु (अ.पलो.१६२) २ सवर्णापुधोप्यन्यायात्तिनलभेतकंपाम् । का वचनंहै कि साध्वी स्त्रियोंका दूसरा भर्ता ३ पर पूर्वाः सियस्त्वन्याः सह प्रोक्ता यमाझमम् । कहीं नहीं कहा-और पुत्रसे पिताका ऋण पुनर्भग्निविधा तास स्तरिणी तु चतुर्विधा । कन्यैया दिवावे यहभी नहीं हो सकता-क्योंकि पुत्र क्षतयोनिर्या पाणिप्रहदूषिता । पुनः प्ररमा नाम पात्र ऋगको दें यह कह आयेहँ अनन्याश्रित पुनःसंस्कारकर्मणा ॥ देशधर्मानरेश श्री गुर द्रव्य (जिसके माता पिताका द्रव्य अन्यकी मिया प्रदीयते । उत्पन्नसाइसान्यस्मै सावितीया की- नमिला हो ) यह विशेषणभी ठीक नहींह, तिता । असत्सु देवरेए सीयार्या प्रदीपवे ॥सार अर्थात् अनर्थकह-पुत्रके होते द्रव्य सपिंडाय सा तृतीया प्रकीर्तिता ।वी ममताम्ममूतारा भन्यके आश्रयहोही नहीं सकता और पगावय तु जीपति समापदन्यं प्रथमा सरि. होयभीती नियमाही इससहि काम चल पातु सा ॥ फोगारंपतिमुरग्य या सत्यं पुरुष मिता सफ था-पुनहीनका ऋण रिक्सी (हिसेदार) मान देवरादीनगर या। उभरपारपरं । फामा- पुनः पत्युर्यदं यागारया द्वितीया प्रभाविता मृले मतं. दें पहभी नकहना चाहिये-पुण्य होतेभी सवय सनिता मासा देणादनासास्पिा. पम रिस्थमादी ऋणदे-पुत्रके न हनिपर तो सारा पयावामित्युगवा सा धतुरो rikant मधातो न विरस शारिवपदराः पितुः । प्रतिमा रिलो या प्रमाप पुनर्भगभ सपी: नविय Hit पिदायिते । पवित दापरताधिः। ।
(२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताहारामकाशसहित । संतानसे हीन स्त्रीका जो याही उससे ऋण भ्रातृणामथदंपत्योः पितुः पुत्रस्य चैवहि । दिवावे- यही नारदनें कहा है कि धन बीके प्रातिभाव्यसृणंसात्यमविभक्तेनतुस्मृतम् ॥ हरनेवाले और पुत्र इनमें वही ऋणका भागी होता है जो धनको ले-त्री और धनके हारी पितुः पुत्रस्य चा-एवा-हि-पातिभाव्यम् पद-भातृणाम् ६ अथ - दमत्योः ६ न हॉयतो पुन-और धनहारी और पुत्र न होयतो घोके हरनेवाला ऋणका भागी होता। ऋणम् १ साक्ष्यम् १ अविभक्ते ७ न:- है- और बीहारीके अभावमें पुत्र और पु. तु- स्मृतम् १॥ के अभावमें स्त्रीहारी ऋणका भागी होता योजना-भ्रातृणां दम्पत्योः चपुनः पितुः हे-इस विरोधका परिहार (हटाना) पूर्वकै स- पुत्रस्य अविभक्त द्रव्ये प्रातिभाव्यं ऋणं मान जानना- पुत्रहीनस्य रिक्थिन: इसका साक्ष्यं मन्वादिभिः नतु स्मृतम् ।। अन्यभी अर्थ है कि ये धनहारी स्त्रीहारी तात्पर्यार्थ- भ्राता-भार्या और पति-पिता पुत्र किसके ऋणको दें इस अपेक्षामें यह और पुत्र- इनका अविभक्त (इक? )धनमें कह सकते हैं कि उत्तमर्णके ऋणकोदें-उ- प्रातिभाव्य (जामनी ) ऋण और साक्ष्य त्तमर्णके अभावमें उसके पुत्र आदिके और | परस्पर-मनुआदिकोने नहीं कही हे प्रत्युत पुत्र आदिके अभावमें किसके ऋणको दें यह साधारण होनेसे निषेध किया है-प्रातिभाव्य जय अपेक्षा हुई तब यह वचन है कि पुत्र और साक्षी करनेसे तो पक्षमें द्रव्यके व्ययका होनस्प रिक्थिनः- पुत्र आदि वंशसे हीन अवसान ( अंत) है-और ऋण अवश्य उत्तम वर्णका जो धन ग्रहण करने के योग्य है देनेयोग्य होगा- यह बातभी परस्सरकी अनु- उसधनोके सपिंड आदि ऋणकोदें-सोई ना- मतिके अभावमें समझनी-परस्परको अनु- रदनें कहा है कि यदि ब्राह्मणके वंशमें देने मतिसे तो अविभक्तोंकेभी प्रातिभाव्य आदि योग्य कोई नहो अर्थात् धनका भागी नहो- होतेहाहै- और विभागके पीछे तो परस्परको तो वह धन अपने सकुल्योंको या अपने - अनुमति के बिनाभी प्रातिभाव्यआदि होतेहैं- धुओंको देदे-यदि सकुल्प-संबंधी यांध- कदाचित् कोई शंका करे कि भार्या और यभी न होयतो ब्राह्मणोंको देदे-ब्राह्मणभी न पतिको प्रातिभाव्य आदिका निषध विभागसे होयती राजा जलमें फेंकंद ।। पहिले ठीक नहीं है क्योंकि उनका विभाग भावार्थ-जो रिक्थका माही और योषित नहीं हो सकता इससे विशेषण (विभागसे (सी)का जो प्राही-और जिसके माता-। पहिले ) अनर्थ कहै उनके विभागका अभाव पिताका द्रव्य अन्यको न मिला हो वह पुत्र विभाग नहींह- यह सत्य है- वेद और ध- आपस्तवने दिखाया है कि स्त्री और पुरुषका ऋणकोई और पुत्रहीनके धनको रिफ्थी (शके भागीद- ॥ ५ ॥ मशास्रमें उक्त अमिसे सिद्ध होनेवाले क- माम मौरउन काँके फलाम विभागकाममा- परीक्षारिएकामागभानो पन हए ।पुत्रो यई फुछ संपूर्ण कर्म और द्रव्योंमें नहीं सोई सतीगनिनोबीहारी पापुषः। २ मारप तुप सामास्ति पेश निर्मः दिखाते हैं कि जापा और पतिका विभाग तसभ लामा नसालाः जागरगोन विभागो नियते। मुरंग संबंधिगया पाटिगतु नेपाल २ माशायोगविपन-शानिप्रमादि सरसं या पुनरेगा व्यवहाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ (२०५) । नहीं है क्यों नहीं है यह जब अपेक्षा हुई तो देनमें स्तेय (चोरी कहींभी मनुआदिकोंने यह हेतु कहा है कि विवाहसे स्त्री पुरुषका नहीं कही तिससे भार्याकोभी द्रव्यका स्वामित्व सहत्त्व ( एकता) कर्म और पुण्यके फलोंमें है अन्यथा चोरी हो जाती तिससे भाकी होताहे जिससे विवाहके प्रारंभसे कर्मोमें इच्छासे भार्याके द्रव्यकाभी विभाग होताहै सहत्व शास्त्रमें सुना जाता है जायापति अपनी इच्छासे नही सोई कहेंगे कि यदि अग्निका आधान करें तिससे आधानमें सह | समान अंश करें तो पत्नियोंकोभी समान (इकट्ठे )अधिकारसे आधीन की हुई अग्निमें | भाग करे ।। किये कामभी सह अधिकार है तैसेही भावार्थ-भाई-स्त्री और पति-पिता और स्मार्तकर्म विवाहके अग्निमें करें इत्यादि | पुत्र इनका परस्पर-अविभक्त द्रव्यमें प्राति- स्मृतिसे विवाहमें मिली अमिमें जो कम होते | भाव्य-ऋण-साक्षी होना-ये तीन नही हैं उनमेंभी सह अधिकार है इससे दोनोप- कहे हैं ।। ५२ ॥ कारकी अग्निके निरपेक्ष जो पूर्त ( वापी कूप | दर्शनेप्रत्ययेदानेमातिभाव्यविधीयते ।। तडाग आदि) हैं उनमें जाया पतिका पृथकर आयौतुवितयेदाप्यावितरस्यमुतामपि ५३ २ही अधिकार है- यह सिद्ध भया-तैसेही पुण्योंके फल स्वर्ग आदिमेंभी जायापतिका पद-दर्शने ७ प्रत्यये ७ दाने ७ माति- सहत्व श्रुतिम है कि स्वर्गमें अजर ज्योतिका | भाव्यं१ विधीयते क्रि-आद्यौरतु-वित्तथै७ आरंभ दोनों करो- यह जानने योग्य है कि दाप्या १ इतरस्य ६ सुताः १ अपि -- ।. जिन पुण्यकर्मोमें सह अधिकार है उनके योजना-दर्शने प्रत्यये दाने प्रातिभाव्य फलमेंभी सहत्व है कुछ भर्ताकी आज्ञासे विधीयते- वितथे आद्यो दाप्यो-इतरस्य किये हुये पूर्त वापी कूप आदि कमाके फ-सुता अपि दाप्याः ।। लोंमेंभी सहल है यह नही कदाचित कोई तात्पर्याय-प्रातिभाव्य उसको कहते हैं शंका करें कि द्रव्यके स्वामित्वमें भी सहत्त्व जो विश्वासके लिये दूसरे पुरुषके संग समय कहाँहे द्रव्यकै स्वीकारमें सहत्व है क्योंकि (इकरार ) करना वह विषयके भेदसे तीन भर्ता परदेशमें हो और नैमित्तिक दान करे प्रकारका होता है जैसे कि दर्शनमें इसको तो वह किसी शास्त्रकारनेभी चोरी नही कही में समयपर दिखा दूंगा-दूसरा मत्यय (वि- है- यह सच है परंतु इस वचननें पल्लीको श्वास )में जैसे मेरे विश्वाससे इसको धन द्रव्यकी स्वामिता दिखाई कुछ विभागका देदो यह तुमारे संग ठगाई न करेगा क्योंकि अभाव नहीं दिखाया- निससे द्रव्यपरिग्रहेषु यह उन (प्रतिष्ठित का पुत्र है इसकी भूमि च-पह कहकर उसमें कारण कहा कि सुंदर है इसके पास उत्तम माम है-तीसग भर्ता परदेशमें हो किसी निमित्तमें दान दानमें जसे यदि यह न देगा तो मैं दूंगा- अवश्य करना है या अतिथिभोजन भिक्षा इन पूर्वोक्त दर्शन आदिमें प्रतिभाव्य (जा- जायापती भामिमादधीयताम् । मिनी) कहा है- इनतीनोंमें वितथ (अ- २ कर्म स्माते विवाहानी। न्यभा होना) होनेपर अर्थात् नदिवासके ३ दिवि ज्योतिरजरमारभेताम् । और विश्वास न करे तो गना दर्शन और ४य्यपरिग्रहेषु च नदि भविश्वासे नैमित्तिके विश्वासके जो प्रतिमूहे उन उत्तमका जो वाले स्तरमुपदिति। धन हो वह दिवाव-और दानका जो प्रतिमू (२०६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । है उसके तो पुत्रोंसेभी दिवावे यदि अधमर्ण पुत्र और पौत्रके जो पुत्र (पौत्रप्रपौत्र) हैं वे अन्यथा करे शठता वा निर्धन होनेसे न दे। दोनों प्रातिभाव्यके और अप्रातिभाव्यके सके तो प्रतिभूके सही पुत्रभी दें-इतरस्य णको नदें यदि उन्होंने धन न पायाहो और सुताः यह कहनेसे पहिले दोनों प्रतिभुओंके जो यह स्मृतिहे कि खादक (अधमर्ण)ध. पुत्रोंसे न दिवाव-और सुता यह कहनेसे नसे हीन हो और लग्नक( प्रतिभू )यदि ध- पोनोंस न दिवावे-यह दिखाया है। नवान् होयतो वह मूलही दे वृद्धि नदे-इ- भावार्थ-दर्शन- विश्वास और देना इ-सकाभी यह अर्थ करना किलमक यदि वि. नमें प्रतिभू (जामिन) करना कहाहे वितथ त्तवान् (धनी )मरगया होय तो उसका पुत्र (झूट) होनेपर पहिले दोनोंसेही धनको मूलहोदे वृद्धि नदे और जहां दर्शनका प्र- राजा दिवाव-और इतरके तो पुत्रोंसेभी दि-तिभू वा प्रत्ययका प्रतिभू पूरा रबंधक (मा- वावे ॥५३॥ तिभाव्यका द्रव्य )अपने पास रखकर प्रतिभू दर्शनप्रतिभूर्यत्रभृतः प्रात्यायिकौपिवा । हुये हों वहां तो उनके पुत्रभी उसी बंधकमेसे प्रातिभाव्यके ऋणको अवश्यदें सोई कात्या- नतत्पुत्राऋणदार्दानायपः स्थितः ॥ यनने कहा कि जहां बंधकको लेकर पद-दर्शनप्रतिभूः १ यत्र-मृतः १ मा- अधमर्णके दर्शन में स्थितहो अर्थात् रुपया त्ययिकः १ अपि:-वा-ना-तत्पुत्राः १ऋण२ लेकर हाजिर जामिनीकर-पिताके मरने या दराः क्रि- दद्युः कि- दानाय ४ यः १ दूरदेशमें जानेपर पुत्रसेभी उती बंधकके ध- स्थितः २॥ नमेंसे ऋणको राजा दिवावे दर्शन विश्वासका योजना-पत्र दर्शनप्रतिभूः वा प्रात्य- उपलक्षण है ॥ यिकः अपि मृतः तत्पुत्राः ऋणं न दाः यः भावार्थ-दर्शन और प्रत्यय (विश्वास) दानाय स्थितः तस्य पुत्राः ऋणं दाः ।। तात्पर्याय-जय दर्शन और विश्वासके प्र. का प्रतिभू जहां मरगयाहो-उनके पुत्र ऋण तिमू स्वर्गमें चले गये हों उनके पुत्र प्राति-न-जो दानका प्रतिभू था उसके तोपुत्रभी ऋणको दें॥५४॥ भाव्यसे चले आपे धनको नद-और गोदा- नका प्रतिभू था वह यदि स्वर्गमें चला जाय यहवः स्युर्यदिवांशेर्दा:प्रतिभुवोधनम् । तो उसके पुत्रभी रक्तधनकोदें पौत्र नद-और एकच्छायाश्रितेवेषुपनिकस्यययारुचिपन पुषभी मूलहोः पृद्धिको नदें क्योंकि व्यास पद-बहवः स्यः क्रि- यदि:- स्वांश:३ का यह वचन है कि पितामहके ऋणको दः कि- प्रतिभुवः१ धनम् २ एकच्छा- पोनदं और प्रातिभाव्य (नामिनी से चले याश्रितेपु७ एपुष धनिकस्य ६ यथारुचि ॥ आये धनको पुत्र सम (मूलमात्र )दे भार योजना-यदि यहवः प्रतिभुवः स्यः ताई उनके पुम नदेअर्यात प्रातिभाव्यको छोटफर स्वांश: धनं दाः एषु एकच्छायाश्रितेषु पितामहनें जितना ऋण लिपाहो उतनाही सत्सु धनिकस्य ययाचि तया दयः ॥ दे वृद्धि नदे-तसेही पुप्रभी प्रातिमा पसे चले आपे पिताके ऋगको समदी दे उन पूर्वोक्त ई तस्स मोर न वृद्धि दातुमईति । १ मारयो शिवदीनः श्यारलको विशयादे। जामहपौधानिमापागलं गुतः। सम २ पहीला पक या रनिए nिa मोर । माणे नामानि निका पिना चिा धनागमाहाणा माता मुरः। 1 .
व्यवहाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ (२०७) तात्पर्याय-यदि एक प्रयोगमें दो या ब- प्रकाशं दापितः-ऋणिकः ( अधमर्गः ) हुत प्रतिभू हों तो वे सब ऋणको वांटकर तस्य तत् धनम् द्विगुणम् प्रतिदातव्यम् ।। अपने २ भागके अनुसार धनको दें-यदि ये तास्पयार्थ-प्रतिभूको ऋण देनेकी विधिको सब एकच्छायाम आश्रितहों अर्थात् अधम- कहकर अब प्रतिभूने जो दियाहो उसकी के समान पृथकू २ पूर्णधनके प्रतिभूहाँ प्रतिक्रिया ( लौटाना) कहतेई-जिस इ. जैसे अधमर्ण संपूर्ण धनको देता वैसेही वेभी | व्यको प्रतिभू वा उसका पुन उत्तमर्णकी संपूर्ण धनके दिवानेके लिये पृथक् प्रतिज्ञा-पोडा ( तकाजा ) से प्रकाश (सबके करें- इस प्रकार दर्शन और प्रत्ययमें एक- प्रत्यक्ष) उत्तमणको राजाको आज्ञासे और छायाश्रित होनेपर--धनिक (उत्तमर्ण )को फिर दूनके लोभसे दें ऋणिक ( अधमर्ण) रुचिके अनुसार-इसप्ते जो धनिक प्रतिभू उस प्रतिभूको उस धनसे दूना धनदे-सोई ओंके धनकी अपेक्षासे अपने द्रव्यको चाहै नारदने कहा है कि धनिकसे पीडित प्रतिभू तो उससेही सब धनको राजा दिवादे भागके लो धनदे-ऋणिक उस धनको दूना प्रति- अनुसार नही-उन एकच्छायाश्रितोंमेसे यदि भूको दे-बहभी कालविशेषकी अपेक्षाको कोई देशांतरमें चला गयाहो और उसका छोडकर शीग्रही दूना देना क्योंकि यह पुत्र समीपमें हो तोभी उत्तमर्णको इच्छाके वचन इसीलियेहै-ओर यहभी सुवर्णके विष- अनुसार सब धनदे-यदि कोई मरगया होय | यमें समझना-कदाचित् कोई शंका करें कि तो उसका पुत्र वृद्धिसहित अपने पिताका यह वचन दूनेको बोधक करताहे-इससे भागदे- सोई कात्यायनने कहा है कि पूर्वोक्त कालकी कला (सूद )के अयाधसे- एकच्छायामें जो प्रविष्टहैं उनमें वही धन दे भी लग सकताहै-जैसे जातेष्टिकी विधि जो देने योग्य दीखे-जो परदेशमें चला गया। शुचित्वके अबाधसे होतीहै-और जप यह हो उसका पुत्र संपूर्णधनको और जो मरग- पक्षहै कि उसी समय वृद्धि सहित दे तो याहो उसका पुत्र सम(मूलमात्र)धनको दे॥ पशु .स्त्री इनकी संतान सद्यः नही हो भावार्थ-बहुत प्रतिभू होयतो अपनें २ सकती इससे मूल्यका दानही पाताहे-सो भागके अनुसार उत्तमर्णको धनदें यदि वे शंका ठीकनहीं क्योंकी वन दान सुवर्ण पृथक २ संपूर्ण धन देनेके प्रतिभू होजांयतो इनकी क्रमसे चौगुनी, तिगुनी, दूनी अधि- उत्तमर्णकी इच्छाके अनुसार धनको दें।॥५५॥ कसे अधिक वृद्धि होतीहै इस पूर्वोक्त वचनसे- प्रतिभापितोपत्तुमकाधनिमोधनम् । ही कालकी कलाके क्रम दूने आदिकी सिद्धि होनेसे दूने मात्रकाही यह वचनभी द्विगुणंमतिदातव्यमृणिकैस्तस्यतद्भवेत् ।। विधान करेगा तो अनर्थक हो जायगा और पद-प्रतिभूः १ दापितः १ यत् २ तुर-- | पशु स्त्रीयांका तो कालक्रमक पक्षमभी प्रकाशं २ धनिनः धनम् २ द्विगुणं १ / संततिको अभाव होय तो स्वरूप ( वस्तु) प्रतिदातव्यम् १ अणिकैः ३ तस्य ६ तत्१ काही दान होताहै-जब प्रनिभूभी द्रव्यदे- भवेत् क्रि-॥ नेके अनंतर कुछ कालके पीछे अधमणसे योजना-धनिनः यत् धनम् प्रतिभूः 1य चार्य प्रनिभर्दवासनिरेनोपपीडितः ऋणि- १ एफच्छायाँ प्रवियना दाप्यो घस्तन हरपते। कस्त प्रतिधुने दिगुणं प्रउिदापयेत् । तत्सुतः सर्व पित्रश तु मृते समम् । ३ पन्नदानहिरयानां चतुनिद्रिगुणा पण । . - मोरित - (२०८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । मिलजाय तब संततिभी हो सकतीहै और भी पूर्वोक्त वृद्धि के अनुसार ही राणा दिवाये दी जातीहे-अथवा पहिली हुई संतान सहित यह श्लोक तो व्याख्यातही है अर्थात पशु स्त्रियोंको दे देगा यह पूर्वोक्त कथन सीधाह-स्त्री पशुओंकी संतानको-तिगुने ठीक नहीं और जो प्रातिभाव्यका ऋण अन्नको चौगुने वस्त्रको आठगुने रसको राना प्रतिभूने प्रीतिसे दियाहो उसकी मांगनसे अधमर्णसे प्रतिभूको दिवावे-जिस व्यकी पहिले वृद्धि नहीं सोई कहा कि जो धन | जितनी वृद्धि अधिकसे अधिक कहींहै प्रति- प्रीतिसे दियाहे वह मांगने के विना नहीं घटता । भूके दिये हुये उतने द्रव्यको खादक यदि मांगनेपर न दिया होय तो सौ रुपर- (अधमर्ण ) उस वृद्धिसहित कालविशे- पर पांच रुपये बढतेहैं-इससे नहीं मांगेभी पकी अपेक्षाको छोटकर शीघही देदे यह इस प्रीतिसे दिधे धनकी देनेके दिनते तामाथहै-जब दर्शनका प्रतिभू मातहुथे लेकर कालके कमसे तबतक बहतीहै जब- समयपर अधमर्गको नदिखा सकै तब तक दूना धनहो-यह पात इस वचनसे उसको अधमर्णके ढूंढनेके लिये तीन पक्षकी कही-सोभी ठीक नहीं क्योंकि यह अर्थ अवधिदे-तीनपक्षमें यदि उसे दिखादे तो इस बचनसे प्रतीत नही होता किंतु दूनादे प्रतिभू छोड़ने योग्यई मदिरखासके तो इतनाही प्रतीत होताहै-तिससे कालके उससे प्रस्तुत ( दावेका ) धन उत्तमर्णको क्रमको अपेक्षाको छोडकर इस वचनके राजा दिवावे-श्योंकि कात्यायनका यह मारंभसामर्थ्यसे दूना देना यह बहुत वचनहै कि नष्टके टूटनेके लिये अधिकसे ठीक कहा ॥ अधिक तीन पक्षदें उनमें यदि षह दिखादे भावार्थ-रागाने सब जनोंके प्रत्यक्षमें तो प्रतिभू छोड़ने योग्यहे-यदि प्रतिमू उसै जो धनीको प्रतिभूसे धन दिपायाहो उससे नदिखा सके और अवधिका काल वीतलाय. दूना धन प्रतिभूको अाणिक (अधमर्ण) तो उस निबंधको दे-पही विधि अधमर्णके दे॥५६॥ मरनेपरह-लमक ( प्रतिमू ) विशेषका संततिः स्त्रीपशुप्वेवधान्यंत्रिगुणमेवच । निषेधभी कात्यायननेही कहाई-कि स्वामी-शत्र वखंचतुर्गुणंमोक्तरसश्चाटगुणस्तथा ५७ ॥ स्वामीका अधिकारी निरुद्ध( कंदी)दंडित । पद-संततिः १ श्रीपशुपु ७ एव: धान्य में नियुक्त-संन्यासी-जो धनीका धन न दे दिग्ध रिक्थी-मित्र-नैष्ठिक-ब्रह्मचारी-राजका त्रिगुण १ एवा-का-वनं १ चतुर्गुणं १ मोटर रसः१/- अगुणः । तपा:-॥ १ नरस्यान्वेषणार्य तु दाप्य पदाअयं परम् । पचती योजना-स्त्रीपशुम संततिः पुनः पात्यं दर्शयतः मोक्तव्यः प्रतिमर्मवेय॥ काले व्यतीते प्रति- त्रिगुणं-वस्त्रं चतुर्गुण, प्रोक्तं तयारसः अ- सूर्यदि से नैव दर्शयेशानियधं दापयेतत्र प्रेते धेष विधिः गुणः प्रोक ताप-प्रतिमूने जो दिया वह सर्वन निदो दतिर्थव संदिग्पवैव न चित ! म रि- २न स्वामी नप ये शत्रुः स्वामिनाधिकृतस्तया। दूना पाया अब उसका अपवाद कहते हैं- वी न मिच नदासतवासिनः राजकार्यनियुक्त दुने सुवर्णके समान सी पशु आदिकोको चयन प्रनिता नरान शाको पनिने दातुं धन रोप प्रीतिका यह विचारते न स्यचितम समम् । जीवनमा पिता यशवेच्छापवर्तकः पाणमासमा यति पंचम् शतम् । नातितो माहीतयः प्रतिभूः स्वकियो मति ! स्मृतः। ।
आचाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ (२०९) सके- जो उसके समान राजाको दंड न दे आधिः प्रणश्यद्विगुणेधनेयदिनमोक्ष्यते। सके-जिसका पिता जीताहो-इच्छाहे जो कालेकालकृतोनश्येत्फलभोग्योननश्यति वर्ताव करे-अज्ञात-इतने प्रतिभू अपनी क्रिया नही लेने-शत प्रतिभूविधिः- पद-आधिः १ प्रणश्येत् क्रि-द्विगुणे धनके प्रयोगमें विश्वासके हेतु दो है-एक कृतः १ नश्येत् क्रि-फलभोग्यः १ न:- धनेण्यदि:-ना-मोक्ष्यते क्रि-काले काल- प्रतिभू और दूसरा आधि यह नारदने कहा नश्यति क्रि-॥ है उनमें प्रतिभूका निरूपण किया अब योजना-यदि न मोक्ष्यते तर्हि प्रयुक्ते आधिका निरूपण करते हैं-आधि (गिरवी धने द्विगुण सति आधिः प्रणश्येत्-कालकृ. वा रहन )वह है जो ग्रहण किये धनके ऊपर विश्वासके लिये अधमर्ण उत्तमर्णके यहांरखदे तः काले नश्यत्-फलभोग्यः न नश्यति-॥ तात्पर्यार्य-प्रयुक्त (दियाहुआ ) धन वह आधि दो प्रकारका है एक कृतकाल और दूसरा अकृतकाल अर्थात् अवधि जप आपनी फीहुई वृद्धिप्से दूना कालके सहित और निरवधिक-फिर प्रत्येक दोनों क्रम सूदसे होजाय और अधमर्श द्रव्यको दो दो प्रकारकी है गोप्य और भोग्य-सोई देकर आधिको न छुटावै तो आधि नष्ट हो- जातीहै-अधमर्णका धन देनेवाले (उत्तमर्ण) नारदने फहाहै कि अधिकृत जो की जाप मरखी जाय ) उसे आधि कहते हैं उस- लहे वह निश्चित किया काल • दूनेसे पहिले का स्व(धन) होताई-और जो कृतका- दो लक्षण जानने-कृतकाल छुटाने यो- दे और यावहेयोद्यत (जो ऋणके देनंत-निस क्षेत्र आराम आदिके फलको उत्त- पूरा होगाय तो-नष्ट होजाताहे-औ- के रहे ) वह फिर दो प्रकारका है गोप्य मण भोगे वह कदाचित्भी नष्टनही होती-कृ- और भोग्य-कृतकाल वह है जिसमें यह तकाल आधि गोप्य हो चाहै भाग्यहो उसका समय आधान ( रखना )के समयही हो कालके बीतनेपर नाश कहा है कि काल- लाय कि दीपमालिका आदि अमुक कालमें कृत आधि कालपर नष्ट हो जाती है और इस आधिको मैं छुटालूंगा अन्यथा आपको जो अकृतकाल है और भोग्यभी है उसके ही होजायगी-इस प्रकार कहे कालमें अपने नाशका अभाव-फल भोग्य आधि नष्ट नहीं अपने पास लौटाने (छुटाने ) योग्य है-दू होती-इस कहनसे कहा-अब परिशेषसे- /सरी इतने लिया हुआ धन न पहुंचे तबतक आधिः प्रणश्येत्-यह वचन अकृतकाल रहती है-इससे-यावद्देयाद्यत-कहाती है और गोप्य आधिक विषयमें रहा-दना धन पद गोप्य रक्षा करने योग्य होती है। होनेपर और निश्चित कालके पीतने परभी 1- भावार्थ-सी और पशुओंकी संतान- आधिके नाशमें इस पृईसतिके वचनसे तिगुना अन्न-चाँगुना वस्त्र और आठगुना ' चतुर्दश (१४)दिनकी प्रतीक्षा उत्तमर्ण करकि सि प्रतिभूको देना कहा है ५७ ॥ सुवर्ण आदि धन दूना होजाय और की हुई । अवधि पूरी होजाय तो धनका स्वामी बंधक सिभहेतू दादय प्रतिमूगघिरेव च । २ अधिक्रियत स्याधिः सवियो दिलक्षणः कृतः हिरव्ये दिगुणीभूते प्राते काले कतावः घर- कालोऽभनेरच यावद्देयोयतस्तयास पुनदिविषः प्रोको म्ग धनीलामी द्विसप्ताहं मंत्रीश्य चातदवराधनं दत्ता पोप्पो मोग्यस्तथैव च। ऋणी बंधामुयात् । वा पीछे - आचाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ गोप्य अधि नष्ट होगई होय तो पूर्वके रक्ष्यमाणः १ अपिठ-असारताम् २ यातः १ समान देनी और भोगी होय तो वृद्धि चेत:- अन्यः १ आधेयः १ धनभाक् १ (सूद )भी छोड देनी-यदि भोग्य आधि वाई-- धनी १ भवेत् क्रि-।। नष्ट होगयी होय तो पूर्वके समान करके योजना-स्वीकरणात् आधेः सिद्धिः भ- देनी उसमें वृद्धि होय तो वह छोड देनी- वति-रक्ष्यमाणः अपि असारतां यातः चेत् और जो आधि विनष्ट अत्यंत नाशको अन्यः आधेयः-वा धनी धनभाक् भवेत प्राप्त होगई हो वहभी मूल्य आदिकेद्वारा देनी उसके देनेपर उत्तमर्णको वृद्धि सहित धिको सिद्धि स्वीकार ( उपभोग )से होती है तात्पर्यार्थ-भोग्य और गोप्यरूप आ- मूल मिलताहै-यदि नदे तो मूलका नाश होता है क्योंकि यह नारदको वचन कि कुछ साक्षी और लेख्यमात्रसे नहीं और नाममात्रसेभी आधि नहीं होती- सोई देव और राजाके कियेको छोडकर आधिके नारेदने कहाहै कि आधि दो प्रकारकाहै विनाशमें मूलका नाश होता है-अग्नि जल जंगम और स्थावर इस दोनों प्रकारकी देशमे उपद्रव आदि देवके किये और आधिकी सिद्धि भोगसेहै अन्यथा नही- अपने अपराधको छोडकर राजाके किये विनाशको छोडकर विनष्ट आधिर्म मूलका पहिली क्रियाको जो अत्यंत बलवती कह इसका फल यहहै कि आधिप्रतिग्रह क्रीतमें नाश होताहै और देव राजाके किये आये है वहां स्वीकारसे हीन - पहिलीभी विनाशमें तो अधमर्ण वृद्धि सहित मूल्य बलवती नही होती यह आधि प्रयत्नसे दे वा अन्य आधि रखदे-सोई कहाँ है रक्षा करनेभी असारताको प्राप्त होजाय कि क्षेत्रको सात नष्ट कर दे वा गजा अर्थात् वृद्धि सहित मूल द्रव्यदेने योग्य हरले तो अन्य आधि करदेनी अथवा धनीको धन देदेना-इसमें स्रोतसे सब देवी धनीको धन देदेना-रक्षा करनेसेभी असा- न रहै तो अन्य अधिकार देनी अथवा रताको प्राप्त होजाय यह कहनेसे यह जनाया भावार्य-गोप्य आधिके भोगने और उप- कि धनी आधिकी प्रयत्नसे रक्षा करे । कार करनेवाली और हानिको प्राप्तहुई भावार्थ-स्वीकार करनेसे आधिकी सिद्धि आधिमें वृद्धि नहीं होती और नष्ट (विगडा) हुई आधि देने योग्यहै-और देव और होतीहै-यदि रक्षा की हुईभी आधि असा- राजाके किये विनाशको छोडकर विनष्ट रताको प्राप्त होजाय तो अन्य आधि रखनी वा धनीको धन देने ॥ ६०|| हुई आधिभी देने योग्य है ॥ ५९ ।। चरित्रबंधककृतंसवृद्धया दापयेद्धनम् । आधे:स्वीकरणारिसद्धीरक्ष्यमाणो- सत्यकारकृतंद्रव्यंद्विगुणप्रतिदापयेत् ६१॥ प्यसारताम् । यातश्चैदन्या- योधनभाग्वाधनीभवेत् ॥ ६० । पद-चरित्रबंधककृतम् २ सवृद्धया ३ दापयेत् कि- धनम् २ सत्यंकारकृतं -२ पद-आधेः ६ स्वीकरणात् ५ सिद्धिः १ द्रव्यम् २ द्विगुणं २ प्रतिदापयेत् क्रि-॥ १ विनटे मूलनाशः स्याद्देवराज तादृते । २ सोतसापहने क्षेत्रे राज्ञा चैवापहारिते । आधि- १ आधिस्तु द्विविधः प्रोक्तो जंगमः स्थावरस्तथा । पोय कर्तव्यो देय या धनिने धनम् । सिद्धिरस्योभयस्यापि भोगो यद्यस्ति नान्यथा ! उपद्रव लेने- (२१२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना-चरित्रबंधककृतं धनम् राजा भावार्थ-चरित्रसे बंधक किया द्रव्य वृद्धि सवृद्धया दापयेत्-सत्यकारकृतं द्रव्यं द्विगुणं सहित धनीको राजा दिवाव और सत्यकार प्रतिदापयेत ॥ किये द्रव्यका दूना प्रतिदान राजा तात्पर्यार्थ-जो द्रव्य चरित्र ( शोभना दिवावै ॥ ६१ ॥ चरण)से जो बंधक उससे जो धन उपस्थितस्यमोत्तव्यआधिःस्ते- अपने वा पराये आधीन करदियाहै-यह उ- नोऽन्यथाभवेत् । प्रयोजकेसतिध- तही समझना-जहां धनीका अतःकरण स्वच्छहै वहां बहुमूल्यभी द्रव्यको आधीन नंकुलेन्यस्याधिमाप्नुयात् ॥ ६३ ॥ . करके अधमर्णने अल्पही द्रव्य लियाहो वा पद-उपस्थितस्य ६ मोक्तव्यः१आधिः १ अधमर्णका अंतःकरण स्वच्छ होनेसे जहां स्तेनः १ अन्यथाऽ- भवेत् क्रि-प्रयोजके ७ अल्प मोलको आधि ग्रहण करके बहुतसा असति ७ धनं १ कुले ७ अन्यस्य ६ आधिर द्रव्य धनीने अधमर्णके आधीन करदिया आमुयात् कि- ॥ हो उस धनको राजा वृद्धि सहित दिवादे योजना-उपस्थितस्य आधिः मोक्तव्यः यह आशयहै कि एक रुपयाभी बंधक द्वि- अन्यथास्तेनः भवेत्-प्रयोजके असति अन्य- गुण द्रव्य होने परभी नष्ट नहीं होता किंतु स्य कुले धनं आधि आप्नुयात् ॥ द्रव्यही देना चाहिये-तैसेही सत्यंकार- ता०भा०-धनको लेकर जो आधिके कृत ( सत्यके करनेसे किया ) अर्थात् छुटानेको उपस्थित ( आया ) हो धनी बंधक देनेके समयमें ही यह कह दियाहो | उसकी आधिको छोडदे वृद्धिके लोभसे कि दूना द्रव्य होने परभी मैं दूना द्रव्यही अपने पास नरक्खे-अन्यथा (नछोडे तो) इंगा आधिका नाश न होगा-तब वह धन स्तेन ( चोर )के समान दंडके योग्य राजा' दूना दिवावे-अन्यभी इस श्लोकका होताई-यदि प्रयोक्ता (देनेवाला) समी- अर्थहै कि चरित्रही बंधक चरित्र शब्दसे | पमें नहोय तो वह धन, अन्यक कुलमै गंगास्नान अग्निहोत्र आदिसे पैदा हुआ अपूर्व | किसी आप्त(सज्जन)के हाथमें वृद्धि सहित (पुण्यका संस्कार ) लेतेहैं-जहां उस धर्म- रखकर अपने बंधकको ग्रहण करले ॥६२॥ रूप अपूर्वको आधि करके जो द्रव्य अपने आधीन कियाहो वहां वही द्विगुण द्रव्य देना तत्कालकृतमूल्योवातत्रतिष्ठेदवृद्धिकः । आधिका नाश नहीं होता-आधिके प्रसंगसे विनाधारणिकाद्वापिविक्रीणीतससाक्षिकं ॥ भन्यभी कुछ कहतेहैं- सत्यंकारकृतम् पद-तत्काल कृतमूल्यः १ वाइ-ता- क्रय विक्रय (लेना देना) आदिको व्यव- । तिष्ठत् क्रि-अवृद्धिकः १ विना-धारणिका- स्थाके निर्वाहार्थ जो अंगूठी आदि पराये त् ५ वा:-अपि - विक्रीणीत क्रि-ससाक्षि- हायमें देदीहो यदि उस व्यवस्थाका अवलं- , कम् २ ॥ पन करें तो द्विगुण देना चाहिये-उसमेंभी योजना-चा तत्काल कृतमूल्यः आधिः यदि अंगूठी अर्पण करनेवाला व्यवस्थाका अवृद्धिकः तत्र तिष्ठेत् वा धारणिकात् विना अवलंघन करें तो वह उस अंगूठीकोही ससाक्षिकं विक्रीणीत ॥ देद-यदि इतर व्यवस्थाको लंप तो उसही तात्पर्याय-पदि प्रयोक्ताभी समीपमें नहीं अंगूठीको दूनी करके दे। और उसके आप्तभी धनको नले अथवा आचाराध्याय ऋणादानप्रकरण ३ (२१३) प्रयोक्ता समीप नहो और अधमर्ण आधिको तात्पर्यार्थ-जब प्रयुक्त धन अपनी की वेचकर धन देना चाह-उस समय आधिका हुई वृद्धिसे दूना होजाय और आधिसे पैदा मूल्य करके उसी धनीके पास उस आधिको हुआ द्रव्य दूना धनीको मिलचुकाहो तब वृद्धिसे रहित छोडदे उससे आगे वह फिर नही धनी आधिको छोडदे-और जब आदिमें बहती-इतने धनी धनको लेकर उस आधिको इस विचारसे कि दूना धन होनेपर तुम छोडे चा इतने उसका मूल्य द्रव्य अधमर्णको आधिको छोडदेना, कालांतरसे या भोगके नदे-जब ऋण देनक समयमें ही यह निश्चय अभावसे आधिमें दूना ऋण होगया हो तब कर लियाहो कि दूना होनेपरभी धनको आधिसे पैदा हुआ धन भोगके लिये धनिके ही लेना आधिका नाश न होने पावे पास पहुंचगयाहो तो आधि छोडने योग्य वहां दुना होनेपर अधमर्ण समीपमें है अधिक धन भोगा होयतो वहभी दे-यह- न आवे तो उस अधमर्णके विनाभी- वचन उस आधिके विषयमें है जो वृद्धि साक्षी और आप्त (सज्जन ) मनुप्याँसमेत | सहित मूलके दूरकरनेके लिये भोगी जाती उस आधिको वेचकर धनी धनका ग्रहण : है- इस आधिको जगतमें क्षयाधि कहते करले-यहां वा शब्द विकल्पके लियेहै-जब हैं और यह निर्णय होगयाहो कि वृद्धिके ऋणके ग्रहण समयमें द्विगुण धन होनेपरभी लियेही आधिका उपभोग है वहां दूनेसे धनही लेना आधिका नाश न होगा यह न अधिकभी होनसे जबतक मूल धन न मिले विचाराहो तब आधि दूना धन होनेपर नष्ट तबतक आधिको भोगतेही हैं- यह सब होजातीहै इस पूर्वोक्त वचनसे आधिका वृहस्पतिने इसेवचनसे स्पष्ट किया है कि 'नाश होताहै--विचारा होय तो यह पक्षहै कि फल है भोग्य जिसका ऐसा बंधक (आधि) साक्षियोंक प्रत्यक्ष विक्रय करदे ।। दोप्रकारका है प्रथम वृद्धिसहित मूल जिसमें भावार्थ- -उस कालमें आधिका मोल मिले- दूसरा वृद्धिमात्र धन जिसमे मिले- करके वृद्धिके विनाही आधिको उत्तमर्णक उनमें वृद्धिसहित मूल मिलनेवाले बंधकका समीप रहने दे-वा अधमर्णके विनाभी काल (अवधि ) पूर्ण होजायतो उसको अध- साक्षियोंसहित आधिको वेचकर धनी अपने । मर्ण प्राप्त होता है अर्थात् फलकेद्वारा वृद्धि धनको ग्रहण करले ।। ६३ ॥ सहित मूल जब धनीको मिलगयाहो तब बधक अधमर्शको मिलजाता है और जोधक यदातुद्विगुणीभूतमृणमाधौतदाखलु । वृद्धिकेही दूर करनेके लिये है उसको सामक मोच्याधिस्तदुत्पन्ने प्रविष्टेद्विगुणेधने ६४ (मूलमात्र ) धनकोही देकर अधमर्ण प्राप्त होताहै- इसका यह अपवाद है कि यदि पद-यदा:-तु:-द्विगुणीभूतं १ ऋण १ उस बंधकका फल वृद्धिसभी अधिक होगया आधी ७ तदार-खला-मोच्यः १ आधिः १ होय तो धनी मूलमात्र धनकामी भागी नही तदुत्पन्ने ७ प्रविष्टे ७ द्विगुणे ७धने ७ ।। होता अर्थात् मूलकेभी बिना दिये अधमर्ण योजना-यदा तु आधी ऋणं द्विगुणीभूतं भवेत् तदा खलु तदुत्पन्ने द्विगुणेधने प्रविष्ट द्रव्यतुमामकम् । यदि प्रकाषितं तत् स्यात्तदाप्रधनमा- कीयधमवानुरात् । फलभोग्यं पूर्णकालं देवा सति आधिः मोच्यः॥ ग्छनी । ऋणी च न लभद्र, परस्परमतं विना। -
(२१४)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
बंधकको प्राप्त हो जाता है और जो वह बंधक दाता )भी बंधकको मूलमान धनके देने.
वृद्धिके लियेभी पूरा न होय तो मूलमात्र पर्यंतही धनी भोगता है और निकृष्ट (वृद्धिसे
देकर अधमर्णको बंधक नहीं मिलता- किं न्यून फलका दाता) बंधकको मूलमान
तु वृद्धिका जो शेष उसको देकरही मिलता | धनके देनसेही अधमर्ण प्राप्त होताहै ।।
है- फिर पूर्वोक्त दोनों बंधकोंमें अपवाद भावार्य -जब आधि ऋण दूना होगयाहो
कहते हैं कि उत्तमर्ण और अधमर्णकी पर- और आधिसे पैदा हुआ धन धनीको दूना
स्पर संमति न होय तो यह पूर्वोक्त समझना मिल चुकाही तय उत्तमर्ण आधिको छोडदे
परस्पर संमतिमें तो उत्कृष्ट(अधिक फलका | अर्थात् अधमर्णको देदे ।। ६४ ॥
इति ऋणादानप्रकरणम् ॥३॥
भाचाराध्याय उपनिधिप्रकरण ४ अथ उपनिधिप्रकरणम् । सति भ्रषः (नाशः )तहिं दाप्यः चपुनः त- त्सम दण्डं दाप्यः॥ वासनस्थमनाख्यायहस्तेन्यस्ययदर्यते ॥ तात्पर्याय-यदि वह उपनिधि राजा देव द्रव्यंतदोपनिधिकंपतिदेयंतथैवतत् ॥६५॥ (जलआदि ) चोर इनसे नष्ट हो जाय तो पद-वासनस्थं १ अनाख्याया-हस्ते अ- जिसके समीप रक्खी हो उससे राजा न न्यस्य ६ यत् १ अर्घ्यते क्रि-द्रव्यं १ तत् ? दिवावै क्योंकि धनीकाही वह द्रव्य नष्ट हुआ ओपनिधिकम् १ प्रतिदेयम् १ तथा:- है यदि उसमें कोई छलनी- साई नारदने कहा कि जो उपनिधि ग्रहण करनेवालेके एव:- तत् १॥ योजना-वासनस्थं यत् (द्रव्यं ) अना- धनसहित नष्ट हुआ हो तो धनके स्वामीकाही ख्याय अन्यस्य हस्ते अयते तत द्रव्यं औप- नष्ट होताहै और तैसेही देव और राजा निधिकं भवति- तत् तथव प्रतिदेयम् ॥ नष्ट हुआ कपटसे रहित होय तो रखनेवाले धनीकाही नाश समझना-इसकाभी अपवाद ता. भा०-निक्षेप (धरोर) जिसमें रक्खा कहते हैं कि यदि स्वामीने धनको ढूंढ लियो जाय ऐसे अन्य द्रव्य ( पिटारी आदि )को हो और मांगनेपर न दिया हो उसके अनंतर . वासन कहते हैं- उस वासनमें रखकर चाह राजाआदिसे भेष (नाश ) हो जाय रुपयेकी संख्याआदिको न कहकर और | तो उस व्यका मोल करके-धनीको धन अपनी मुद्रा (मोहर ) लगाकर रक्षाके लिये और राजाको उसके तुल्य दंड-धर्मका अधि- विश्वाससे जो अर्पण ( सोपना) किया जायकारी प्रदणकरनेवालेसे दिवावे ॥ उस्से ओपनिधिक कहतेहैं सोई नारदने भावार्य-गजा देव चोरसि नष्ट हुई उपनि- कहा है कि बिना संख्याकरके और विना धिको राजा न दिवावे-यदि ढूंढनेपरभी न जाने और मुद्रा लगाकर जो सौंपा जाय दोहो और फिर नष्ट हो गई होय तो उस उसे उपनिधि-और गिनकर जो रक्खा जाय उपनिधिको और उतनाही दंड राजाको वह उसे निक्षप कहते हैं- वह द्रव्य वैसाही ६ जिसके समीप रक्खीयो ।। ६६ ।। पहिली मुद्राके चिह्नसहित रखनेवालेको प्रति- देय (लौटानेयोग्य ) है ॥ ५ ॥ आजीवनखेन्छयादव्यौदाप्यस्त चापिसोदयम् । याचितावा- नदाप्योपहृतंतनुराजदैविकतस्करैः। हितन्यासनिक्षेपादिप्वयंविधिः ॥६॥ भ्रेपश्चेन्मागितेदत्तेदाप्योदंडेचतत्समम् ॥ पद-आजीवन् १ स्वेच्छया ३ दण्ड्यः १ पद नः- दाप्यः १ अपहत २ तं तुर-दाप्या १२ च अपि:- सोदयम् २ मा- राजदेविकतस्करः ३भेषः१ चेता-मागिते चितावाहितन्यासनिक्षेपादिषु ७ अयम् । अदत्ते ७ दाप्या पदंड चा-तत्समम् २ ॥ विधिः १ ॥ योजना-राजदेविकतस्करः अपहृतं तं योजना-स्वेच्छया आजीवन् दण्ड्यः राज्ञा न दाप्यः चेत ( यदि )अदत्त मागिते चपुनः सं अपि सोदयम् दाप्यः भवेत् १ असाध्यातमविहात समुदं निधीयते । तत्रानी. प्रातः सहयोन नग्य नष्टःम दागिनःविराम यानिधि निक्षपं गमित रितुः। छते उदहवेजितकारितम्
(२१६)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
अयम् विधिः याचितावाहितन्यासनिक्षे- रखदियाहो वह अन्वाहित- गृहके स्वामीको
पादिषु ज्ञेयः ॥
दिखाकर उसके परोक्ष. उसी घरके किसी
तात्पर्यार्थ-जो मनुप्य स्वामीकी आज्ञाके मनुष्यके हाथमें दियाजाय कि गृहके स्वामीको
विना उपनिधिक द्रव्यसे जीविका करता है तू देदीजियो वह न्यास- और घरके स्वा-
वा प्रयोग आदिसे लाभके लिये व्यवहारमें भीके प्रत्यक्षमें देना निक्षेप-इन याचित
लगाता है वह भोग वा लाभके अनुसार आदिकोंमें- और आदि शब्दरी-सुनार आ-
दंडके योग्य होताहै और उससेधनीको उप-दिके हाथमें कटक आदि बनानेके लिये
भोगमें वृद्धिसहित और व्यवहारमें लाभस- रक्खे हुये सुवर्ण आदिका- और प्रतिन्यास
हित उपनिधिको राजा दिवाव-वृद्धिका प्रमाण (लोटाना )का परस्पर प्रयोजनकी अपेक्षामें
कात्यायनने कहाहै कि निक्षेप-वृद्धिका शेष तुम इसकी रक्षा करियो और मैं तुमारे
क्रय विक्रय इनको मांगनेसे न देतो सोरुपये इसकी रक्षा करुंगा- ऐसी प्रतिज्ञासे दिये
पर पांचरुपये बढते हैं- यहभी भक्षितमें सम- हुयेका ग्रहण- लेना- सोई नारदेने कहा है
झना-उपेक्षा और अज्ञानसे नष्ट हुयेमें कि याचित और अन्वाहित आदिमें और
तो उसनेही विशेष दिखाया है कि शिल्पीके समीप उपनिधि न्यास और प्रति-
भक्षितमें सोदय ( लाभप्तहित ) और न्यासमें यही विधि जाननी- इन याचित
उपेक्षित मूलके समान और अज्ञानसे नष्ट आदिमें यही विधि है जो उपनिधिके प्रति-
हुये द्रव्यमें से कुछ न्यून (चौथाई न्यून )राजा दानकी है ।
ग्रहण करनेवालेसे दिवावै- विवाह आदि
भावार्थ-जो अपनी इच्छासे स्वामीकी
उत्सवों में जो वस्त्र अलंकार आदि मांगकर
लेजाय वह याचित-जो द्रव्य एकके यहां आज्ञाकेविना उपनिधिके द्रव्यको भोगता है
रक्खाहो और उसनेभी फिर अन्य के यहां यह दंड देने योग्य है और लाभसहित धन
निक्षेप वृद्धिशेष च क्रय विक्रयमेव च । याय-
धनीकोदे-यही विधि याचित अन्याहित
मानो नयाददते पंचकं पातम् ।
न्यात निक्षेप आदिमें समझना।। ६७ ॥
२ भक्षित सोदर्य दायः समं दाप्य उपेक्षितम् । १एप पर विधिरंटो याचितान्याहितादिपु । शिल्पि
किंचिन्यून प्रदाय: स्यात् द्रव्यमज्ञाननाशितम् । भूपनिधौ न्यासे प्रतिन्यासे तय च ।
-
इति उपनिधिप्रकरणम् ॥४॥
आचाराध्याय साशिमकरण ५ (२१) अथ साक्षिप्रकरणम् साक्षी बुद्धिमानाने शास्त्रमें देखाहै पांचप्रका- रका कृत और छःप्रकारका अकृत-उनका तपस्विनोदानशीला कुलीनाः भेदी नारदनेही दिखाया है कि लिखित सत्यवादिनः । धर्मप्रधानार स्मारित- यदृच्छाभिज्ञ- गूढ उत्सरसाक्षी यह जवापुत्रवतीधनान्विताः ॥ ६८ ॥ पांचप्रकारका साक्षी कहा है-लिखित आ- पद- तपस्विनः १ दानशीलाः १ कुली- जिसको अर्थी आप लाकर लेख (भी)में दिका स्वरूप तो कात्यायनंने कहा है कि नाः १ सत्यवादिनः १ धर्मप्रधानाः १ ऋज- नाम लिखवाद वह लिखत है और जो पनपर वः१ पुनवतः १ धनान्विताः ।। न लिखाहो वह स्मारित होता है-स्मारितः ग्यवराःसाक्षिणोदेयाःश्रौतस्मातक्रियापराः पत्रकाहते इसका अर्थ कात्यायननेहीं किया यथानातिययावर्णसर्वमवंपुवास्मृताः ६९ है कि जिसका अपने कार्यकी सिद्धिके लिये कार्यको देखकर वारंवार अर्थी स्मरण पद- यवराः १ साक्षिणः ५ ज्ञेयाः१ आतस्मार्तक्रियापयः १ यथाजाति:- यथा- करावे वह स्मारित कहाता है जो अकस्मात् वर्ण:- सबै१ सर्वेषु वा- स्मृताः ॥ (अचानक ) आया साक्षी कियाजाय वह यहच्छाभिज्ञ होता है-ये दोनों पत्रपर लिखे योजना-तपस्विनः दानशीलाः कुलीनाः नहीं होते-इनके भेद कात्यायननेही दिखाया सत्यवादिनः धर्मप्रधानाः ऋजवः पुत्रवतः है कि प्रयोजनसे जिसे लाव और प्रसंगसे धनान्विताः श्रीतस्मानियापराः ब्यवराः यथाजाति यथावर्ग साक्षिणः याः वा सबै जो चला आ विना लिखेभी ये दो साक्षी पूर्वपक्षके साधक होते हैं-तैसेही वचने है सर्वेप साक्षिणः स्मृताः॥ कि जिसको अर्थाने प्रत्यर्थीका वचन स्फुट तात्पर्यार्थ-शास्त्रमें लिखित भुक्ति साक्षी सुना दियाहो और गुप्त स्थित रहे वह गूढ प्रमाण कहे है, यह कहे आये उनमें भुक्तिका साक्षी कहाता है तसेही सीक्षियों केभी सा- निरूपण किया-अय साक्षीका स्वरूप निरु-क्ष्यको सुनने वा सुनानेसे ऊपर २ से कहै वह पण करते हैं और साक्षात् दर्शन और उत्तरसाक्षी कहा है-छःप्रकारके अकृतका सुननेस साक्षी होता है सोई मनु (अ.८ श्लो.५४ )ने कहा है कि समक्ष देखने अलिखितस्मारितश्चैव यहच्छाभिज्ञ एवच । गढवी और सुननेसे साक्षी सिद्ध होता है वह साक्षी तरसादी च साक्षी पचयिधः स्मृतः । दोप्रकारका हे कृत और अकृत- जिसको २ भार्थना स्वयमानीतो यो लेख्य सनिवेश्यते । साक्षी कह दियाहो वह कृत-जिसको न स साझी लिखितो नाम स्मारितः पत्रकाहते ॥ कह दियाहो वह अकृत होता है-उनमें ३ यस्तु कार्यप्रसिद्धयर्थं दृष्ट्वा कार्य पुन.पुनःस्मार्यते कृत पांचप्रकारका और अकृत छाप्रकारका | न्याविना साक्षी स स्मारित इहोच्यते । है ऐसे ग्यारह प्रकारका साक्षी कहा है ४ प्रयोजनार्यमानीत. प्रसगादागतश्च यादी साक्षि' सोई नारदैने कहा है कि ग्यारह प्रकारका | जो त्वलिखितौ पूर्वपक्षस्य साधको । ५ आर्थना स्वार्थसिद्धयर्थं प्रन्यर्थिवचन सुटम् । यः १ समक्षदर्शनास क्ष्यं श्रवणाचच सिध्यति । श्राषितः स्थितो गदो गूढसाक्षी स उच्यते । २ एकादशरिधः साक्षी शाक्षे दृष्टी मनीषिभिः । ६ साक्षिणामपि यः साक्ष्यमुपयु परिभाषते [भवणा- कृतः पंचविषो हेय. पहिषोऽमृत उच्यते । मावणादापि स साक्ष्युत्तरसंशितः ।
(२१८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भेद नारदेने दिखाया है कि ग्राम प्रावि- | ने पांच प्रकारके दिखाये हैं कि असाक्षी- वाक-राजा-कार्यका अधिकारी अर्थीकाभेजा- भी बुद्धिमानोंने शास्त्रमें पांच प्रकारका कुलके विवादाम कुलके मनुष्य-ये भी साक्षी | देखाहै कि वचनसे-दोषसे-भेदसे-स्वयं जानने-इस वचनमें प्राडिवाकका ग्रहण लेख- कहनेसे-मृतांतर वचनसे असाक्षी ये कहे क और सभ्योंकाभी उपलक्षण है क्योंकि यह है कि वेदपाठी-तपस्वी-वृद्ध और संन्यासी वचन है कि लेखक-प्रादिवाक-सभासद ये आदि ये वचन (शास्त्रका कथन )से ही सव राजाके कार्यको देखनेके समयमें साक्षी असाक्षी होतेहैं इसमें अन्य कोई कारण कहे हैं-अप यह कहते हैं कि चे साक्षी कैसे नहीं कहाहै तपस्वी पदसे वानप्रस्थ लेने और कितने होते हैं कि तपस्वी-दानमें तत्पर आदि पद्से वे लेने जो पिताके संग विवाद कुलीन-सत्यवादी-जो धर्मको मुख्य समझे कर सोई शंखने कहाहैकि पिताके संग . अर्थकामको नही-ऋजु (कोमल वा अकुटिल) विवादी गुरुकुलका वासी-संन्यासी-वान- पुत्रवान् धनवान-वेद और धर्मशास्त्रमें प्रस्थ-निग्रंथ (बंधन रहित) ये असाक्षी कही हुयी क्रियामै तत्पर-ऐसे पुरुष अवर होतेहैं-दोपसेभी असाक्षी दिखायेहैं-कि (कमसे कम तीन ) साक्षी होतेहैं अर्थात् चोर-साहसिक-चंड- ( क्रोधी )कितव . तीनसे कम नहीं होते-अधिक तो चाहे (जुवारी ) वंचक ये दुष्ट होनेसे असाक्षी जितने अपनी इच्छाके अनुसार होतेहैं और होतेहैं क्योंकि इनमें सत्य नही होता- वेभी यथाजाति अर्थात् ( मूवसिक्त, भेदसे जो असाक्षी उनका स्वरूपभी उस- आदि जाति और अनुलोमज प्रतिलोमज ) नहीं दिखायाहै कि साक्षी लिखित-निर्दिष्ट- होतेहैं उस जातिके कार्योंमें उसी जातिके वादी-इनमें एकभी अन्यथा कहैं तो वे साक्षी होतेहै और यथावर्ण होते हैं अर्थात् सब भेदसे साक्षी नहीं होते-तैसेही स्वय- : ब्राह्मण आदि वर्णाक ब्राह्मण आदि वर्णही मुक्तिका स्वरूपभी कहाहै कि विनाकहे साक्षी होतेहै-इसी प्रकार क्षत्रिय आदिमें- स्वयं आनकर जो कह उसको शास्त्रमें भी समझना-जैसे इस मनु(अ०८. वचनके अनसार स्त्रियोंकी साक्षी स्त्री करें- सूची कहतेई वह साक्षी देने योग्य नहींहै- मृतांतरकाभी लक्षण कहा है कि जिस यदि सजातीय और सवर्ण न मिले तो मूर्द्धवारिक्त और ब्राह्मण आदि सबमें श्रीत्रियास्तापसा वृक्षाये च मनजितादयः असा• यथासंभव (जो मिलसके) साक्षी होते हैं- क्षिणस्तै वचनामान हेतुरुदाहतः । पूक्ति स्वरूप साक्षियोंका असंभव होय २ पिनाविषदमानगुटकुलवासिपरियाजकवानप्रस्था तो निषेधसे रहित अन्यभी साक्षियोंकि कह निर्मपाश्चामाक्षिणः । नेके लिये असाक्षी कहने योग्य वे नारद ३ म्तेनाः साहसिफाबहाः कितया पंचकास्तगा। मामय प्रादिवाकर राजा प गवहारिणाम् । | असाक्षिणस्ते दुष्टत्वात्तेषु सत्यं न विद्यते । यापितो य: म्यादधिना प्रदितथ यः ॥ शुल्याः ४ साक्षिणा लिखिताना पनिटानां प वाहिनी। फुनावादाशियास्तपि साक्षिणः । सेगमेयोन्यपावादी भेदास न साक्षिपः। २ सेगमाः प्राटिसाफ सभ्यायवानुशारे ५ स्वपमुत्तिरनिर्दियः स्वयमेवैत्य यो यदेव । सूनी- पनि तत्काय माक्षिणः समुदाहताः। शुनः सशानेपु म स साक्षितमहंति । ३ ममापि हिमापु स्ट: पंचविषो बुधः। ए. ६ योधः श्रापयितन्यः स्यास्मिलसति पापिनि। ग नापतो भेगास्वयमुन मतान्तरः। पतातु साक्षिसमित्यसाक्षी मृतांतरः।
आचाराध्याय साक्षिप्रकरण ५ (२१९) अर्थी वा प्रत्ययाको जो पात सुनानी हो र साहसी १ दृष्टदोषः १ च:- निर्धताद्याः कि तुम इस यातके साक्षी हो उस अर्थि वा १ तुइ-असाक्षिणः १॥ प्रत्यर्थीक मरनेपर और अर्थभी उसने योजना-स्त्रीबालवृद्धकितवमत्तोन्मत्ताभि- निवेदन न किया हो और साक्षी एस शस्तकाः रंगावतारिपाखण्डिकूटकृतिकले- कि किस अर्थमें किसके लिये साक्षी है वह न्द्रियाः पतिताप्तार्थसंबंधिसहायरिपुतस्कराः मृतांतर साक्षी नहीं होता और जहां मान-साहप्ती च पुनः दृष्टदोषः तु पुनः निर्धू वाले स्वस्थ पिता आदिने अपने पुत्र ताद्याः असाक्षिणो भवति । आदिको यह सुना दिया हो कि इस अर्थमें तात्पर्यार्थ-स्त्री-जिसको व्यवहारका ज्ञान ये साक्षी है वहां मृतांतरभी साक्षी होताहै नहो वह बालक-वृद्ध (अस्सी ८० वर्षका) सोई मारंदने कहा कि मरनेवालेने यहां वृद्ध शब्दसे पूर्व वचनमें निषिद्ध अ- सुनायेको छोडकर अर्थीके मरनेपर मृतांतर न्यभी साक्षी आदि लेने-कितव (जुवारी) साक्षी नही होता तसेही वचन है कि जो मदिरापान आदिसे मत्त और ग्रहों (भूत अर्थ स्वस्थ अवस्था, धर्मपूर्वक सुना- आदि से युक्त उन्मत्त ब्रह्महत्या आदि दिया हो अर्थाके मरने परभी उसमे और पातक जितको लगायाहो वह अभिशस्त- छः हों अन्वाहित आदिमें मृतांतरभी रंगवावतारी (चारण ) पाखंडी ( निर्मथ साक्षी होताहै आदि) कूटकृत् (जो कपटका लेख भावार्थ-तपस्वी, छलीन, दानी, सत्य-लिखे ) विकलेन्द्रिय (वधिर आदि ) पतित वादी, जो धर्मको मुख्य समझे, कोमल- (ब्रह्महत्यारा आदि) सुहृत्-जिस अर्थमें हृद्य-पुत्रवान्-अत्यंतधनी, वेद और विवाद होय उसका सम्बधी-जिसका धर्ममें कहे कर्मों में तत्सर, अपनी जाति, वा! एकही कार्य होय वह-सहाय शत्रु ओर अपने वर्णके. कमसे कम तीन साक्षी चोर साहसी जो अपने बलका ग्रहण करें जानने-अथवा सव संपूर्णांके साक्षी कहहैं अर्थात् अन्यकी ॥ ६८॥६९ ॥ दे-दृष्टदोष-(जिसका मिथ्या वचन दे- खाहो) निर्धूत (जो बंधुओंने त्यागाहो) स्त्रीवालवृद्धकितधमत्तोन्मत्ताभिशस्तकाः और आद्य शब्दसे अन्य स्मृतिम कहे रंगावतारपासंडिकूरकृतिकलेंद्रियाः ७०॥ हुए दोष या भेदसे असाक्षी औका और पद- स्वीयालवृद्धकितवमत्तान्मत्ताभिश- स्वयमुक्ति और मृतांतरका ग्रहण करना-ये स्तकाः १ रंगावतारिपाखण्डिकूटकृतिकले- स्त्री वाल आदि सब साक्षी नहीं करने । न्द्रियाः १॥ भावार्थ-स्त्री बाल वृद्ध जुबारी मत्त उन्मत्त पतिताप्तार्थसंबंधिसहायरिपुतस्कराः । पातकी रंगावतारी (नट ) पाखाण्डि कपटसे लिखनेवाला- बधिर आदि-- ब्रह्महत्यारा- साहसीदृष्टदोपश्चनिधूताद्यास्त्वसाक्षिणः ॥ मित्र-अर्थसंबंधी सहायक शत्रु-तस्कर- पद-पतिताप्तार्थसम्बधिसहायरिपुतस्कराः साहसी-दृष्टदोष और निर्धूत आदि ये १ मृतांतधिनि प्रेते मुमधुधाविताहते । साक्षी नहीं करने ॥ ७० ॥ ७१ ॥ २ श्रावितो नातुरेगापि यस्त्वयों धर्मसयुतः । मृते- । उभयानुमतः साक्षी भवत्येकोपिधर्मवित् । : पितय साक्षात्स्यास्पट्सु चान्याहितादिषु । सर्वः साक्षीसंग्रहणेचौर्यपारुण्यसाहसे ७२ चलने (२२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । पद-उभयानुमतः १ साक्षी १ भवति कि- कि अपने बलसे सब मनुष्योंके सन्मुख एकः १ अपि-धर्मवित् १ सर्वः १ साक्षी १ / किये हुये वे साहस कहातेहैं और एकांतमें संग्रहणे ७ चौर्यपारुप्यसाहसे ७ ॥ किए हुए संग्रहण कहातेहैं ।। योजना एकः अपि धर्मवित् उभयानुमतः भावार्थ-एकभी धर्मका वेता दोनोंकी साक्षी भवति संग्रहणे चोर्यपारुप्यसाहसे | अनुमतिसे साक्षी होताई और चौर्य ( संग्र- सर्वः साक्षी भवति ॥ हण) पारुप्य, साहस, इनमें सब साक्षी तात्पर्यार्थ-ज्ञानपूर्वक नित्य नैमित्तिक | होतेहैं ।। ७२ ॥ कर्मको जो करे वह धर्मवित् होताहे वह साक्षिणः श्रावयेद्वापिप्रतिवादिसमीपगार एकभी अर्थी और प्रत्यर्थी दोनोंको सम्मत येपातककृतांलोकामहापातकिनांतया ॥ होय तो साक्षी होता है और अपिशन्दके चलसे धर्मके वेत्ता दोभी साक्षी होतेहैं- पद-साक्षिणः २ श्रावयेत क्रि-वादिप्र- यद्यपि उनत्तरके (६९) श्लोकमें वेद और तिवादिसमीपगान् २ ये १ पातककृतां ६ धर्मकी क्रिया तत्पर कमसे कम तीनी लोकाः १ महापातकिना ६ तथा:-॥ धर्मवेत्ता ओंका कहना समानहै तथापि वै अग्निदानांचयेलोकायचत्रीवालपातिनां । दोनोंकी अनुमतिके अभावमेंही साक्षी हो | सतासानवामोतियः साक्ष्यमनृतंवदेत् ॥ सकतेहैं-यहां एक वादोधर्मके वेत्ता दोनोंकी अनुमतिसेही साक्षी होते हैं इस वास्ते क- येर च- स्त्रीवाल घातिनां ६ सः १ तान् २ पद-अग्निदानां ६ च:-ये १ लोकाः १ मसे कम वहां तीनका ग्रहण है और यह वचन उसका अपवाद है- अब तपस्वी लोकान् अवाप्नोति क्रि-यः१ साक्षीपहि-अ- और दानशील इसका अपवाद कहतेहैं। नृतं २ वदेत् क्रि-॥ संग्रहण (मिनका लक्षण कहेंगे )में चार्य सुकृतंयत्वयाकिंचिजन्मांतरशतैः कृतं । पारुष्य ( कठोर वचन ) साहस इनमें सब तत्सर्वतस्यजानीहियंपराजयसेवृथा ७५ ॥ साक्षी हो सकतेहैं अर्थात् वचनोंमें निपिद्ध पद-सुकृतं १ यत् १ त्वया ३ किंचित् - और तप आदि गुणसे यक्तभी साक्षी हो जन्मान्तरशतैः ३ कृतं १ तत् २ सर्व २ जाते-और दोष और भेदसे जो असाक्षी और स्वयमुक्ति जो है वे संग्रहण आदिमेभी | तस्य ६ जानीहि क्रि-यं २ पराजयसे क्रि- वृथा-11 साक्षी नही होसते क्योंकि इनमेंभी वही साक्षी होताई जो सत्यवादीहो-यद्यपि मनु- ' श्रावयेत् ये पातंककृतांलोकाः तथा महापा: योजना-वादिप्रतिवादिसमीपमान साक्षिणः प्यका मारना, चोरी, पराई दाराका स्पर्श, ताकना ये लोकाः चपुनः ये अग्निदानां कठोर वचन, और कठोर दंड रूप पारुप्य : लोकाः चपुनः ये सौचालघातिना लोकाः यह चार प्रकारका साहस होताद इसे वच- नसे खी संग्रहण चार्य पारुष्यभी साहसह कान् अवाप्रति यत त्वया जन्मांतरशतः यः साक्षी मनृतं वदेत सः तान् सर्वान लो- तपापि ये साहसस पृथक् इस लिये पर्देई किंचित सुकृतं कृतं तत्सर्व तस्य जानीहि मनुमार गोप्य परताराभिमान । पापयत्वं यं वृथा पराजयसे । मुमा पनि साहसं थापताधर । तात्पर्याप-अयी और प्रत्यर्थीक सन्मुख -- आचाराध्याय साक्षिप्रकरण ५ (२२१) इकठे हुए साक्षी ओंको वक्ष्यमाण(जो कहेगे) आचरण कर इसमें ब्राह्मणका ग्रहण क्षत्रिय सुनाव क्योंकि गौतमका वचन है कि अस- और वेश्यकाभी उपलक्षणहे प्रतिवादी नव मवेत (पृथक) पूछनेसे साक्षी नकहै उस- साक्षीमें दूषण दे दे और प्रत्यक्षते दूषणके मभी कात्यायनने यह विशेष दिखाया कि योग्य बाल्यआदिमेंभी तसेही निर्णय है और सभाक मध्यमै अर्थी और प्रत्यर्थीके सन्मुख | अयोग्य दूषणोका तो उनके वचन आर इस विधिसे शान्त करता हुआ प्राडिवाक लोकसे निर्णय करे कुछ दूसरे साक्षियोंकी साक्षीऑको नियुक्तकर (सुन) देवता और अपेक्षा नहींहै इससे अवस्था दोप नहीं यदि ब्राह्मणों के समीप उत्तर वा पूर्वाभिमुख बैठे | साक्षीके दोषको प्रकट करके प्रतिवादी सिद्ध शुद्धब्राह्मणोंसे शुद्ध होकर सत्यरूपसे साक्ष्य- न कर सके तो दोपके अनुसार दंडके योग्य को पूछे-और शपथ ( कसम ) देकर जाना है-यदि सिद्ध कर दे तो वे साक्षी नही सम- है आचरण जिनका और जाना है अर्थ | झने-सोई केदाहे कि साक्षियोंके दूषणको जिनाने ऐसे संपूर्ण साक्षाओंको पृथक२ प्रकटरीतिसे सिद्ध न करे वह दडयोग्य है पूछे तैसेही ब्राह्मण आदिके सुनानेमें मनु सिद्धकर देतो साक्षांके धर्मस रहित धे (अ.८श्लो, ११३ )ने नियम दिखाया ब्राह्म-साक्षी वर्जित हैं-यदि दिये हुये साक्षी सब को सत्यकी-क्षत्रियको वाहन आयुधोंकी- दूषित हो जाय और अर्थीभी कोई दूसरी वैश्यको गौ बीज सुवर्णकी-शुद्रको सब पात- क्रिया न कर सके तो पराजित होताह-क्योंकि कोंकी शपथदे-अर्थात् ब्राह्मणको यह कहै कि यह स्मृति है कि शास्त्रोक्त मार्गसे जिसका अन्यथा कहनेसे तेरा सत्य नष्ट हो जायगा पराजय हुआ हो वह वादी साक्षियोंके सत्य- क्षत्रियको तेरे वाइन और आयुध निष्फल | पर टिका हो-और निराकांक्ष हो अर्थात् होजायगे-वैश्यको तेरे गो बीज सुवर्ण निष्फल अन्य क्रिया (दावा ) न करना चाहता हो हो जायगे और शूद्रको तुझें सब पातक वह नम्रतासे दंड देनेयोग्य है-और साकांक्ष लगगे इसका अपवादभी उसनेही दिखाया (चाहता) होयतो दूसरी क्रियाको करे- है कि (अ० ८ श्लो. १०२)गौओंके रक्षक पातक उपपातक महापातको कती-अग्नि व्यापारी-कारीगर-कुशौलव, (गानेवाले) लगानेवाले-स्त्री बालकोके घातक इनको प्रेष्य ( नोकर) वाषिक (सूद लेनेवाले) जो लोक होते हैं उन सबको वह प्राप्त होता जो ब्राह्मण हैं उनके संग शूद्रके समान है जो साक्षी मिथ्या बोलता है और तेसेही १ नासमवेताः पृष्टाः प्रत्रयुः । सैंकडों जन्मांतरोंमें जो सुकृत (पुग्य) २ समान्तःसाक्षिण सर्वामधिपत्यधिसन्निधौ । तुमने किया वह सब उसको मिलेगा जो प्राड्डियाको नियुजीत विधिनानेन सांस्ययन ॥ देवना- तेरे झूटसे पराजित होगा-यह सब-साक्षि- मणसानिध्ये साक्ष्य पृच्छेदृतं द्विजान् । उदइमुखान् योंको सुनावै-यहभी शूद्रके विषयमें है- प्राइमखान्या पूर्वाह्न वै शुचिःशुचीन् । आहूयसाक्षिणः क्योंकि शूद्रको सब पातक लगेंगे इस मनु पृच्छेनियम्यशपथैर्भूश । समस्ताविदिताचारान् विज्ञा- तार्थान पृथक पृथक् । वचनसे सब पातकोंका सुनाना कहाहे-और ३ सत्येन शापयेद्रिनं क्षत्रियं वाहनायुधै. ! गोची १ असाध्यन्दम दाप्यो दूषणं साक्षिणा सुदम् । जकांचनवयं सूई सवैस्तु पात कैः । भाविते साक्षिणो वाः साक्षिधर्मनिराकृताः। ४ गोरक्षकान् वाणिनिकान् दया काहशील २ नितः सचिनव दाप्यः शानदृष्टेन कर्मणा । यदि बान्। नेप्यान्वार्षिकांचव विमान् वदाचरेत् । । वादी निराकांक्षः साक्षिसन्ये व्यवस्थितः ।
(२२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । गोपालआदि द्विजातियोंके विषयमेंभी है और दशभागसे युक्त संपूर्ण ऋण दिवाव क्योंकि गोरक्षक आदि ब्राह्मणको शूद्रके इसमें दशवां भाग राजाका होताह राजा समान समझना उसी मनुवचनमें कह आये अधमणिकसे साधित धनमेंसे दशवां भाग है-अनेक जन्मोंके पुण्यांका मिलना और स्वयं ले यहभी छालीसवे दिनके आनेपर महापातक आदिके फलकी प्राप्तिं झूटमात्रसे जानना उससे पहिले साक्षी देदे तो दशम नहीं होसकती इससे यह साक्षियोंके दुःखके- भाग दंडके योग्य नहींहे-यहभी तब लिये कहा जाता है सोई नौरदने कहा कि जब व्याधि आदिका कोई उपद्रव नहो सोई पुराण धर्मके वचन-सत्यके महात्माका मनु ( अ० ८ श्लो० १०७) ने कहाहै कि कीर्तन-असत्यकी निंदा इनसें साक्षियोंको रोगरहित मनुष्य तीनपक्षके भीतर मग निरंतर बासदे (डरावे )॥ आदिमें साक्षी न दे तो उस सब ऋणको भावार्थ-वादी और प्रतिवादकि समीप और दशमांश राजदंडको प्राप्त होताहै चठेहुये साक्षियोंको यह सुनावे कि पातकी | यहां अगद (रोगरहित )पद राज. और और महापातकी अग्नि लगानेवाले-स्त्री बाल- | देव उपद्रवके अभावका उपलक्षण है ।। कोंके हत्यारे इनको जो नरक आदिलोक भावार्य-जो साक्षी तीन पक्षके भीतर होते हैं वह उन सबको प्राप्त होताहे जो साक्ष्यको नहीकहता है अर्थात् साक्षी साक्षी झूट बोलताहे-सैकडों जन्मांतरोंमें नही देता छालीसवें दिन उससे राजा जो पुण्य तुमने किया वह सब उसका जान वह सब ऋण और दशांश अपना भाग जिसका पराजय वृथा (झूटयोलक) तू ग्रहण करे ॥ ७६ ॥ कराता है ॥ ७३ ।। ७४ ॥ ७५ ॥ | नददातिहियः साक्ष्यजाननपिनराधमः। अनुपन्हिनरः साक्ष्यमृणंसदशबंधकम् । सकूटमाक्षिणांपांपैस्तुल्यो दंडेनचैवदि । राशासर्पप्रदाप्यः स्यात्पश्चत्वारिंशकहनि पद-ना-ददाति कि-हि-यः १ पद-अनुवन् १ हि:-नरः १ साक्ष्य २ | जानन् १ अपि - नराधमः १ सः १ फूट- ऋणम् २ सदशबंधकम् २ राज्ञा ३ सर्वम् २ साक्षिणाम् ६ पापैः ३ तुल्यः १ दण्डेन ३ प्रदाप्यः १ स्यात् क्रि-पट्चत्वारिंशके ७/चा-एव:-दि- अहनि ७ ॥ योजना-या नराधमः जानन् अदि योजना-हि (यतः )साक्ष्यं अनुवन् | साक्ष्यं न ददाति सः पापैः च पुनः दंडेन नरः सदशबंधकम् सर्वम् ऋणम् पट्चत्वा- कूटसाक्षिणा तुल्यः भवति तेषां पापं दंड रिशके अहनि पज्ञा प्रदाप्यः स्यात् ॥ चाप्नोतीत्यर्थः ।। तात्पपाध-जो मनुष्य साक्षी होनेको तात्पर्य-जो मनुष्यों में अधम विवादके अर्थको विशेष कर जानताहुआभी साक्षी मुनानेपर किसी प्रकार नही पोलता अर्थात् साक्षी नहीं देता रामा उससे वृद्धिसहित | नदीहोता-बह पाप और दंडसे फूट- साक्षियोंकि तुल्य है यूटसाक्षियोंक दंडको 1 पुगमाग गत्यमापनैः। भनृत विशारभूपन्मायणादिषु नरोगः तण- शमुनासोदिमान् । मानुगाम मांगा। स्वीकार करके शपथ (सुगंधदेना ) आदिकै हानका साकार नहीकरता अर्थात् साक्षी व्ययवहाराध्याय सालिकरण ५ ( २२३) - आगे कहेंगे और कूटसाक्षियोंको दंड देकर | वचनसे गुणकी अधिकता मुख्यहै कि पुनः व्यवहारको प्रवृत्त करना और व्यव- दोनोंको संमतधर्मका वेत्ता एकभी साक्षी हार समाप्तभी होगयाहो फूटसाक्षिके होताहै और जो यह कहाहै कि भेदसे ज्ञान दोनेपर निवृत्त करदेना सोई मनु असाक्षी होते है ( भेदादसाक्षिणः ) वह उस (अ०८ श्लो. ११७)ने कहाँहै' जिस २ | विषयमहै जो समरूपसे ग्रहण न कियहाँ ।। विवादमें कूटसाक्ष्य होगयाहो उस २ भावार्य-परस्परके विवादमें बहुतोंका- कार्यको निवृत्तकर कियाभी वह विना- और समानीमें गुणियोंका और गणियों में कियाही होताहै ॥ जो अत्यंत गुणवान् है उनका वचन ग्रहण । भावार्थ-जो मनुष्यों में अधम जानकर- करने योग्यहै ॥ ७ ॥ भी साक्षी नहीं देता-वह पाप और दंडसे यस्योचुः साक्षिणः सत्यांमति- कूटसाक्षियोंके तुल्य होताहै अर्थात उक्तसा- 'क्षियोंके पाप और दंडका भागी होताहै ज्ञांसजयीभवेत् । अन्यथावा- द्वैधेबहूनां वचनं समेपुगुणिनांतथा । दिनोयस्यभुवस्तस्यपराजयः।। ७९॥ गुणिद्वैधे तुवचनंग्राह्ययेगुणवत्तमाः ७८ ॥ पद-यस्य ६ ऊचुः क्रि-साक्षिणः १ स- पद-वैधेयहूनाम् ६ वचनं १ समेष | कि-अन्यथा-वादिनः १ यस्य ६ ध्रुवः १ त्याम् २ प्रतिज्ञा २ सः १ जयी १ भवेत गुणिनां ६ तथा:-गुणिद्वैधे तु:-वचनं १ तस्य ६ पराजयः १॥ ग्राह्यं १ ये गुणवत्तमाः १ योजना द्वैधे बहूनां वचन तथा समेषु प्रतिज्ञा ऊचुः सःजयी भवेत् यस्य साक्षिणः योजना-यस्य वादिनः साक्षिणः सत्यां गुणिनां वचनं गुणिकै ये गुणवत्तमाः तेषां वचनं ग्राह्यम्।। अन्यथा ऊचुः तस्य ध्रुवः पराजयो भवेत्।। तात्पर्यार्थ-साक्षियोंका जहां वैध (पर- तात्पर्यार्थ-जिस वादीकी द्रव्य जाति स्परविवाद ) होय तो बहुतोंका वचन | संख्या आदि विशिष्ट प्रतिज्ञाको सत्य कहैं मानने योग्यहै-यदि द्वधर्मभी समानही अर्थात् हुम जानते हैं यह कहैं उसका संख्या होय तो उनका वचन प्रमाणई जो जय होताहै और जिस वादीको प्रति- गुणी हों और जहां गुणियोंकीभी परस्पर ज्ञाको अन्यथा (विपरीत) अर्थात् .यह विप्रतिपत्ति (विवाद ) हो वहां जो गुण- मिथ्याहै यह कहैं उसका निश्चयसे पराजय वत्तम, अर्थात् जो बेदके पठन पाठन होताहै और जहां प्रतिज्ञा किये हुये अर्थके दोक्त कर्मका करना धन पुत्र आदि गुणोंसे होने और न होनेको विस्मरण आदिसे (संपन्न हैं उनका वचन ग्रहण करने योग्य है | साक्षी न कहसकै वहां अन्य प्रमाणसे राजा और जहां गुणी तो कतिपय (अल्प ) और | निर्णय कर वारंवार साक्षीओंको न पूछे निर्गुण बहुतहों वहांभी गुणियोंका वचनहीं किंतु अपने स्वभावसे कहाहुआही साक्षी! ग्रहण करने योग्यहै क्योंकि इस पूर्वोक्त आँका वचन ग्रहण करने योग्य है सो कहाहै कि स्वभावसे कहा साक्षीद : यस्मिन्यस्मिन्निवादतु कौटमाश्य कृत भवेत्। तत्तकार्य निवर्तेत कृत चाप्यकृत भवेत् । १ स्वभावोक्त वचस्तेषां प्राद्यं यद्दोपार्जित । रते. २ उभयानुमतः साक्षी भवत्येकोपि धर्मवित् । साक्षिणो रक्षा न प्रष्टव्याः पुन, पुन. ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - गोपालआदि द्विजातियोंके विषयमेंभी है और दशभागसे युक्त संपूर्ण ऋण दिवाये क्योंकि गोरक्षक आदि ब्राह्मणको शूद्रके इसमें दशवां भाग राजाका होताई राजा समान समझना उसी मनुवचनमें कह आये अधमणिकसे साधित धनमेंसे दशवां भाग हैं-अनेक जन्मोंके पुण्योंका मिलना और स्वयं ले-यहभी छालीसवे दिनके आनेपर महापातक आदिके फलकी प्राप्ति झूटमात्रसे | जानना उससे पहिले साक्षी देदे तो दशम नही होसकती इससे यह साक्षियोंके दुःखके- भाग दंडके योग्य नहींहै-यहभी तबहे लिये कहा जाता है सोई नोरदने कहाहै कि जब व्याधि आदिका कोई उपद्रव नहो सोई पुराण धर्मके वचन-सत्यके महात्माका | मनु ( अ० ८ श्लो० १०७) ने कहा कि कीर्तन-असत्यकी निंदा इनसे साक्षियोंको | रोगरहित मनुष्य तीनपक्षके भीतर ऋण . निरंतर त्रासदे (डरावे )। आदिमें साक्षी न दे तो उस सब ऋणको भावार्थ-वादी और प्रतिवादकेि समीप और दशमांश राजदंडको प्राप्त होताहै बेठेहुये साक्षियोंको यह सुनावे कि पातकी यहां अगद (रोगरहित )पद राज और और महापातकी अग्मिलगानेवाले-स्त्री वालं- | देव उपद्रवके अभावका उपलक्षण है । कोंके हत्यारे इनको जो नरक आदिलोक भावार्य-जो साक्षी तीन पक्षके भीतर होते हैं वह उन सबको प्राप्त होताहै जो साक्ष्यको नहीकहता है अर्थात् साक्षी साक्षी झूट बोलताहे-सैंकडों जन्मांतरोंमें नहीं देता छालीसवें दिन उससे राजा जो पुण्य तुमने कियाहै वह सब उसका जान | यह सब ऋण और दशांश अपना भाग जिसका पराजय वृथा (झूटबालक ) तू ग्रहण करै ।। ७६ ॥ कराता है ।। ७३ ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ नददातिहियः साक्ष्यंजानन्नपिनराधमः । अवन्हिनरः साक्ष्यमृणंसदशबंधकम् । सकूटसाक्षिणांपापस्तुल्यो दंडेनचैवहि ॥ राज्ञासर्मप्रदाप्यः स्पारपट्चत्वारिंशकहान पद-ना-ददाति कि-हि-य: १ साक्ष्यं २ पद-अनुवन् १ हि-नरः १ साक्ष्य २ | जानन् १ अपि:- नराधमः १ सः१ फूट- ऋणम् २ सदशबंधकम् २ राज्ञा ३ सर्वम् २ | साक्षिणाम् ६ पॉपः ३ तुल्यः १ दण्डेन ३ प्रदाप्यः १ स्यात् क्रि-पट्चत्वारिंशके ७ चा-एक-हि-॥ अहनि ७ ॥ योजना-या नराधमः जानन् अपि । योजना-हि (यतः )साक्ष्यं अनुवन् | साक्ष्यं न ददाति सः पापैः च पुनः दंडेन नरः सदशबंधकम् सर्वम् ऋणम् पट्चत्वा- | कूटसाक्षिणां तुल्यः भवति तेषां पापं दंड रिशके अदनि राजा प्रदाप्यः स्यात् ॥ चामोतीत्यर्थः ।। तात्पर्थि-जो मनुष्य साक्षी होनेको तात्पर्याप-जो मनुष्यों में अधम विवादके अर्थको विशेष कर जानताहुआभी साक्षी गुनानेपर किसी प्रकार नहीं बोलता अर्थात साक्षी नहीं देता राजा टससे वृद्धिसहित नहीहोता-वह पाप और दंडसे फूट- ताक्षियोंके तुल्य है फूटसाशियांक दंडको वचनः मत्यमाहात्म्पपीनैः। भनृत. त्रिपक्षावन्साश्यमृणादिषु नरोऽगदः। तहण- सपा भूशासदिमान् । म्मामुपासर्वे दापय च मशः। स्वीकार करके शपथ (सुगंधदेना) आदिके होने का स्वीकार नहीकरता अर्थात साक्षी
व्यवहाराध्याय साक्षिप्रकरण ५
(२२७)
कहा कि लोभसे सहस्र और मोहसे पूर्व बंध आदिको अपेक्षासे विवासन-नन-
साहस-भयसे मध्यम-और-मित्रतासे चो- करना-घरका भंग-देशसे निकासना-यह
गुना पर्वसाहसदंड होताहे-कामसे दशगुना ! व्यवस्था जाननी-लोभ आदि कारण विशे-
तात्पर्यार्थ-जहां शेरना-अज्ञानसे पूरे पका अज्ञान-अनभ्यास और अल्प विषयमें
ब्राह्मण इन चारों वर्णाके सत्याना )से सौ कूट साक्षी होय तो ब्राह्मणकोभी क्षत्रिय
नेसे वधको संभावना हो वहां सादेश आदि- आदिके समान अर्थकाही दंड होताहे-
बोले अर्थात् सत्य न कहे इस सत्य १०८ | बडे विषयमें तो देशसे निर्वासनही होताहे-
के निषेधसे पहिले. निषिद्ध किएभी
thest सभ्याममें सबकोही मनुका कड़ा
चनकी आज्ञाका २धनका दंड नहीं है
सत्य वचनकी और अवचन (न
क्योंकि साक्षियोंके असत्ये वचन
बोलना )की आज्ञा साक्षीको समझनी
ओर जहां शंका ओर अभियोग आदिम चनके निषिद्धका जो अवलंघन झका
तत्य वचन कहनेसे वर्णोंका वधहो और अधिक प्रायश्चित्तहै और साधारण मिथ्या
वचन और अवचनका अल्प पापहै इससे
असत्य वचन कहनेसे किसीका वध नहीं उनकी आज्ञाका वचन सार्थकई यद्यपि
हां साक्षी झूठ बोले-यह आज्ञा है, और
हां सत्य वचन कहनेसे अी और- बहुतसे पापको निवृत्तिसै प्रसंगसे हुये अल्प
पापकी निवृत्तिभी अन्यत्र देखौहै तथापि
अत्यर्थी दोनोंका वधहो और असत्य बोल-
यहां आज्ञाके वचनसे और प्रायश्चित्तके
नेसे एकका वधहो वहां तूष्णीं रहनेको विधानसे अधिक प्रायश्चित्तकी निवृतिसे
'ज्ञाहै यदि राजा स्वीकार करें, यदि अल्पभी प्रासंगिक पाप निवृत्त नहीं होता यह
ना किसीप्रकार विना कथन न माने ज्ञात होता है-यही घात अन्य प्रश्नामें
हां भेदसे साक्ष्य करना-यदि वहभी नहो वीके वधकी आशंका होय वहां पथिक
के तो सत्यही कहै क्योंकि असत्य वच- आदिकोंको अनृत वचन और अवचनकी
से वर्णी ( ब्राह्मण आदि के वधका दोष आज्ञा जाननी, और वहां अन्य निषेधक
सार झूठका दो दोपह-और सत्यवचनमें अभावसे प्रायश्चित्तकी निवृत्तिभी नही, किसी-
हे धोके वधका एकही दोपहै और उसका ' अन्य निमित्तसे कालांतरमें अर्थका तत्व
तरके अनुसार प्रायश्चित्त करना-प्रायश्चित्त प्रतीतभी होजाय तोभी साक्षी और भन्य
सहते हैं कि उस असत्य वचन और तूष्णी अधिकारीको इसी वचनसे दंडका अभाव
से पैदाहुये पापकी निवृत्तिके लिये द्विज समझना ॥
पृथंकर सरस्वती देवता जिसका ऐसा चरु भावार्य-जहां ब्राह्मण आदि वर्णीका वध
बना-जिसकी ऊष्मा( मांड ) न निचोडी हो वहां साक्षी मिय्या पोले और उसकी
म उस पके भोदनको चरु कहतेहैं-यहां शुद्धिके लिये ब्राह्मण सरस्वतीके निमित्त
पह सिद्धांतहे कि साक्षियोंको मिथ्या वचन चरु यनावें ॥ ८३ ॥
और अवचनका जो निषेधह उसकी यहां
१, नानृतं वोह-अनुवन विश्ववानि नरो भवति
आजाई-और जो मिथ्या न बोलें न कहने और किविता ।
इति साक्षिप्रकरणम् ॥५॥
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । नाही नहो कि शब्दही शब्द साधुहों और वचनसे पैदा हुई अपवादको शंका उसके प्रतिदेशको भाषासेभी लिखने योग्य है-सोई दूर करनेके लिये यह वचन रचा है-सोई नारदने कहा है कि देशाचारसे अविरुद्ध | दिखाते हैं कि पनके लक्षणको कहु- और आधिकी विधिका जिसमें लक्षण प्रकट कर कात्यायननें इस बेचनसे कहाहै हो जिप्समें अर्थ और क्रमसे अक्षरोंका लोप कि इसी प्रकार जिसका काल व्य- नहो और राजाकी आज्ञासे जो युक्तहो ऐसा ) तीत होगया हो वहीभी पितरोंका ऋण लेख प्रमाण करने योग्य होता है कुछ साधु | दिवाया जाताहे अर्थात् इस प्रकार पत्रपर २शन्दोंकाही इसमें नियम नही है लिखा हुआ पितरोंका ऋण कालके भीतने भावार्य-अधमर्णके हाथसे लिखा हुआ | परभी राजा दिवादे-यहां पितृणां इस जो लेख्य है वह साक्षियोंके विनाभी बला- बहुवचनसे कालमातक्रांतं-इस वचनसे त्कार और छल क्रोध आदि उपाधिसे चौथे आदि (प्रपौत्र )से न दिवावै तेसेही कियेको छोड़कर प्रमाण करने योग्य ह।।८९॥ हारीतनेभी कहाहै कि जिसके हाथमें ऋणलेख्पकृतंदेयं पुरुषैखिभिरेवतु | लेख्यहो उसको ऋणका लाभ होताहै इस सामान्य वचनसे चतुर्थ आदिसेभी ऋणका माधिस्तुभुज्यतेतावयावत्तन्नप्रदीयते ९० लाभ प्रतीत होताहै-इससे इसी आशंका- पद-ऋणं १ लेख्यकृतम् १ देयम् १ की निवृत्तिके लिये यह ववन-ये दोनों पुरुपैः ३ त्रिभिः ३ एव:-तु: आधिः१ तुर-वचन योगीश्वर (याज्ञवल्क्य )के वचनके भुभ्यते कि तावतः-यावत्-ततश्ना-प्रदी- अनुसार लगाने योग्यह-जो ऋणबंधक यते कि- (गिरवी) सहित पत्रपर आरुट (लिखा योजना-लेख्यकृतं ऋणं त्रिभिः (मिट हुआ है वहभी तीनही दें इस नियमसे पुत्रपौत्र) एव देयम्-तुपुनः आधिः यावत् ऋणके दूर करनेमें जप चतुर्थ आदिका तत् माणन प्रदीपतेतावत् सत्तमणेन भुज्यते॥ अधिकार नहीं तो आधिके अपहरण तात्पर्याय-जैसे साक्षी आदिसे सिद्ध ( छीनना वा छुटाना )मेंभी अधिकार न। किये ऋगको तीनही देने योग्य है इसी प्र-! होगा . इस लिये यह वचन्ह कि इतने फार लेख्यसे किये ऋणकोभी आहर्ता (0- चौथा वा पांचवां ऋणको न दे तबतक नेवाला) और पुत्र पात्र ये तीनही दे चतुर्य आधि भोगी नातीहै इस कहनेसे चौथेको आदि नदें यह नियम इस वचनसे किया ई- बंधक सहित ऋणके दूर करनमें अधिकार कदाचित् कोई शंका कपके पुत्र पौत्र ऋण- है-यह दिखाया-कदाचित् कहो कि यह कोर्दै पत्रपत्रिगंदेयं-इस पचनसे सा भी कहही आयेहैं कि फल भोग्य आधि नष्ट मान्य रीतिसे ऋणमामको तीनही दें यह नहीं होती-सत्यह-यदि यह भपवादका नियम पाही फिर यह कहनावृया है यह वचन न होता तो वहभी तीनही पुरुषांक शंका मानने योग्य है-इसी दसमें जो विषयमें होता इससे सम निदोपहै। पत्र में लिख के विषयमें अन्य स्मृतिके भावार्य-लेख्यपा किये हुये ऋणको पनि पदपना रिम् । १ एकरपियो fi राप्यत माना। समान मारेगमचिनुत कममाम् ॥ २च्यामोदात सामनस्य विनिशिव। -- मा 'व्यवहाराध्याय लेख्यमकरण ६. R1 (.२३३) तीन पुरुषही दें-और आधि तो इतने कोई देशांतरमें होयतो देशांतरसे मंगानेके लिये पंशका पुरुषमण न देतबतक भोगी जातीहै ।। कालकी अवधिदे कि इतने दिनमें मंगालो- देशांतरस्येदुर्लेख्यनष्टोन्मुऐहतेतया और विद्यमान न होय तो जो पहिले भिन्नेदग्धेयवाछिन्नेलेख्यमन्यत्तुकारयेत् ॥ साक्षी थे उनसेही व्यवहारको समाप्ति पद-देशांतरस्थे ७ दुर्लख्ये७ नष्टोन्मृष्टे निर्णय करें क्योंकि यह स्मृति है कि कर-जब साक्षीभी न होय तो दिव्यसे. हते तथाऽ-भिन्ने दग्धे अथवा-छिन्ने ७ जिसका लेख्य साक्षी नहो उस व्यवहा- लेख्यं २ अन्यत् २ तु:-कारयेत् कि । रमें देवी क्रियासे निर्णय करे-यह व्यवस्था- योजना-देशांतरस्थे-दुलेख्ये-नष्टोन्मृष्टे- तथा हते-भिन्ने दग्धे अथवा छिने (लेख्य- पत्र जानपद ( देशके मनुष्योंका ) है- राजकीय व्यवस्थापनभी ऐसाही होताहै- पने ) सति अन्यत् लेख्यं कारयेत् ।। तात्पर्याय-अब यह कहते हैं कि व्यवहा- लिखाहो और राजाको मुद्रा (मोहर)से इतना तो विशेषहे कि जो राजाके हाथसे रके अयोग्य पन हो जाय तो दूसरा पत्र लि- चिह्नितद्दो-और साक्षीसे युक्तहो वह, लेख्य खवाव-सोई दिखाते हैं कि यदि पत्र अत्यंत सब अमि राजकीय होताहे अन्यभा व्यवहित (दूर ) देशमें स्थितहो वा दुर्ल-राजकीय जयपत्र वृद्धवसिष्ठनें कहा कि ख्यहो जिसको लिपिके अक्षर वा पद संधि- जो निवेदन किये साध्य अर्थसे संयुक्तहो ग्धहो वा वंच न सके ऐसेहो-जो काल और उत्तरको किया सहित हो-और अव- पायकर नष्ट होगयाहो जो स्याहीकी दुर्वल- धारण ( निश्चय ) से सहितहो-वह जयपत्र तास उन्मृष्टहो अर्थात जिसकी लिपिके अक्षर मले गये हों-निसको चोर चुरा ले गये हों- इष्टहै-जिसपर प्राडियाकके हस्ताक्षरहों और जिसपर राजाकी मुद्राहो-अर्थ सिद्ध भिन्न होगयाहो (दलामला गयाहो ) दुग्धहो होनेपर जिसकी जीत हो उस वादीको जय- गपाहो-छिन्न (फटना हो गया हो-ऐसे सब पत्र दे-तैसेही सभासदभी मैं अमुकके प्रकारसे पत्रके नष्ट होनेपर दूसरा पत्र लिख- पुत्रका दिया यह कहकर अपने हाथसे दें वावे- यहभी वादी और प्रतिवादीकी परस्पर क्योंकि यह मर्नुनें कहा है कि गजाकी अनुमतिसे जानना--यदि संमति न होयतो सभामें जो स्मृति शास्त्रके ज्ञाता सभा- 'व्यवहारके समय देशांतरसे पन मंगानेके लिये कठिन मार्ग आदिकी अपेक्षासे समय हायसे जयपत्र दें-यदि सभासदोंकी पर- सदहैं वे लेख्यकी विधिके अनुसार अपने देना चाहिये-यदि पन दुर्गम देशमें हो वा नष्टहो गया होय तो साक्षियोंसेही व्यवहारका १ अलेख्यसाक्षिके देवी व्यवहारे विनिर्दिशेत् । निर्णयकर-सोई नारदेनें कहाहै कि लेख्य २ राज्ञःस्वहस्तसंयुक्त स्वमुदाचिहित तथा । राज. देशांतरमें स्थितहों-शीर्ण (जीर्ण) हो- कीय स्मृतलेख्य सर्वेष्वर्थेषु साक्षिमत् । दुष्ट लिखादो-चुराया गयाहो-यदि वह ३ ययोपन्यस्तसाध्यार्य संयुक्तं सोत्तरक्रियं । सा- विद्यमान होयतो कालकी अवधि कोन वधारणक चैव जयत्रकमिष्यते ॥ प्राष्ट्विाकादि. होय तो साक्षियोंसे निर्णय करें-अर्थात् वह इस्तांक मुद्रित गजमुद्दया । सय वादिने दयायिने जयरत्रकम् । १ लेख्ये देशांतरन्यस्ते शीणें दुटिखिते हृते ।सत. ४ सभासदश्चये सत्र स्मृतिशास्त्रविदः स्थिताः । तत्कालकरणमसतो द्रष्टदर्शनम् । यथालेख्यविषों तद्वत् स्वहस्तं दधुरेवते ।।
(२३४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । स्पर अनुमति न होय तो व्यवहार छिद्रसे तात्पथार्थ-शुद्ध है वा अशुद्ध ऐसे संदिग्ध रहित नहीं होता सोई. नारदेने कहा कि लेख्यकी शुद्धि अपने हाथसे लिखित आदिसे जिसको सम्पूर्ण सभासद साधु (अच्छा) होतीहै अर्थात् अपने लिख अक्षरोंकी सदृश मानें वही व्यवहार निश्शल्य होताहै और अक्षर मिलजाय तो शुद्ध अन्यथा अशुद्ध नहीं तो सशल्य (छिद सहित ) होताहे-होताहै-आदि शब्दसे साक्षी लेखक-अपने यहभी चतुप्पाद व्यवहारमें समझना क्योंकि लिखे अन्य लेखक संवाद (मेल )से शुद्धि यह स्मृति है कि जिससे साध्य अर्थ | होतीहै-और युक्तिसे प्राप्ति अर्थात् देश सिद्ध हो और जो चतुष्पाद हो ओ जिसपर काल पुरुष इनका द्रव्यके संग संबंध होना राजाकी मुद्रा (मुहर वह जयपत्र हो- कि इस काल और इस देशमें यह द्रव्य इस ताई और जिसमें हीनता होय वहां जयपत्र पुरुषका घट सकताहै-क्रिया साक्षियोंका नही दियाजाता किंतु हीनपत्र दिया जाता | देना-चिह्न (असाधारण श्री आदि ) संबंध है जैसे कि अन्यथावादी क्रियाका द्वेषी उप- अर्थात् पहिलेभी अर्थों और प्रत्यर्थीके पर- स्थातासे भिन्न ( जो न आवे ) जो उत्तर न | स्पर विश्वाससे लेने वा देनेका संबंध-आगम दे-बुलानेपर भाग जाय-यह पांच प्रकारका अर्थात् इतने अर्थकी प्राप्ति हो सकतीहै वादी हीन कहाई-और हीनपत्र कालांतरमें इतने हेतु, इनसे संदिग्ध लेख्यकी शुद्धि दण्डके लिये और जयपत्र प्राङ्न्यायकी होतीहै-और जब लेख्यके संदेहमें निर्णय न सिद्धिके लियेहै। होसके तव साक्षियोंसे निर्णय कर-सोई भावार्य-यदि पत्र देशांतरमें हो-यथार्थ | कात्यायनने केहाहे कि पत्र दूषित होजाय न लिखाहो नष्ट हो गया हो-जिसकी लिपिके | तो वादी पत्रपर लिखे साक्षियोंको दे-यह अक्षर बिगड गयेहों चौरीमें गयाहो-भिन्न वा वचनभी साक्षियोंके संभव है-साक्षियों के छिन्न होगया होयतो दूसरा लेख्य करावे ९१ | असंभवमें तो हारीतका वचनहें कि यह पत्र संदिग्धलेरूपशुद्धिःस्यात्स्वहस्तलि- मैं नही किया इसने कूट करा लियाहै-ऐसे पत्रको अधर करके अर्थात न्यून समझकर खितादिभिः ॥ युक्तिमाप्तिक्रिया- दिव्यसे अर्थका निर्णय करे ।। चिदसंबंधागमहेतुभिः ॥ ९ ॥ भावार्थ-अपने हाथके लेख आदि-और पद-संदिग्धलेख्यशुद्धिः १ स्यात् क्रि-युक्ति, प्राप्ति, क्रिया, चिह्न, संबंध, आगम- स्वहस्तलिखितादिभिः ३ युक्तिप्राप्तिक्रिया- | इतने हेतुओंसे संदिग्ध लेख्यकी शुद्धि -चिह्नसबंधागमहेतुभिः ३ ॥ होतीहै ॥ १२ ॥ में... स्वहस्तलिखितादिभिः- युक्तिमा- | लेख्यस्यपृष्ठेभिलिखेहत्त्वादत्त्वर्णिकोधनम्। . मि. संदिग्धलेख्य- धनीवोपगतंदद्यात्स्वहस्तपरिचितितम् ९३ पद-लेख्यस्य ६ पृष्ठे ७ अभिलिखेत् कि- यत्र सभ्यो जनः सर्वः साध्वैतरिति मन्यते । स! दत्त्वाऽ दत्त्वा:-ऋणिकः १ धनम् २ धनीर निकाल्यो निशदः स्थात्सल्यस्वन्ययामरेत् । १दूषिते पत्रके यादी तदारुदास्तु निहित । २ अन्यही कियाडेशी नोपस्याता निसरः। २ न मयतत् कृतं पत्रं षटमैतेन कारितम् । अपरी आइतप्रपलापी च हीनः पंचविषः स्मृतः। कृत्य तत्पत्रमर्षे दिव्येन निर्णयः । स्यात् ॥
व्यवहाराध्याय लेख्यप्रकरण ६
(२३५)
वा:-उपगतं २ दद्यात् क्रि-स्वहस्तपरीचि पद-दत्त्वा ऋणं २ पाटयेत कि-लेख्यं २
हितम् २॥
शुद्धय ४वा -अन्यत् १तु-कारपेत् कि-सा-
योजना-ऋणिकः धनं दत्त्वा दत्त्वा ले- क्षिम १ च भवेत् कि-यत् १ वाइ-तत् १
ख्यस्य पृष्ठे अभिलिखेत् वा धनी उपगतं | दातव्यं १ ससाक्षिकम् १॥
धनं स्वहस्तपरिचिह्नितम् ऋणिकाय-लेख्य-
पृष्ठे वा दयात्॥
योजना-ऋणं दवा लेख्यं पाटयेत वा
ताभावार्थ -अब अधमर्ण सब ऋणको शुद्ध्ये अन्यत् कारयेत्-चपुनः यत् लेख्य
नदेसके तो अपनी शक्तिके अनुसार दे २ साक्षिमत् भवेत् तत् ससाक्षिकम् दातव्यम्।
कर पूर्व लिखे हुये लेख्यकी पीठपर लिखदे
ता भावार्थ-क्रमसे वा एकवार संपूर्ण
कि इतना मैंने दिया-अथवा उत्तमर्ण उपगत ऋणको देकर पूर्व किये हुये लेख्यको फाडदे
( मिला) धनको उसी लेख्यकी पीठके ऊपर जय दूरदेश आदिमें पत्र स्थितहो वा लेख्य
लिखदे-कि इतना मुझे मिला-वहभी अपने नष्ट होगया हो तब शुद्धिक लिपे अधमर्ण
हायसे लिखे भक्षरासे चिहितहो-अथवा उत्तमर्णसे शुद्धि कराले अर्थात् पूर्वोक्तः
उपगत (प्रवेशपत्र रसीद ) अपने हाथसे कमसे उत्तमर्ण विशुद्धिका पत्र अधमर्णको
लिखकर उत्तमर्ण अधमर्णको देदे ॥ ९३ ॥ देर्द-यदि पूर्व किया लेख्य साक्षि सहित होय
दत्त्वर्णपाटयेल्लण्यशुद्धयवान्यत्तुकारयेत्॥ तो पहिले किये साक्षियोंके सामने ही
साक्षिमच्चभवेद्यद्वातदातव्यंससाक्षिकम् ॥ देना ॥ ९४ ॥
इति लेल्यप्रकरणम् ॥ ६॥
(२४०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योगोंमें स्त्री आदिकोंको तुलाही होती है- कुष्ठियोंको आमि-श्वासकासवालोंको जल- यह वचन इससेही सार्थक हो सकता है, पित्त और कफवालोंको विष-सदैव वर्जदे- सब दिव्योंमें साधारण जो मार्गशिर चैत्र | उनको अग्नि आदिके कालमेंभी साधारण वैशाख आदि मास हैं उनमें स्त्री आदिकोंको तुला आदिही दिव्य होता है-तैसेही जेल सब दिव्योंके होनेपरभी तुलाही देनी-कुछ अग्नि विषये बलधारी मनुष्योंको दे इसे वच- सब कालोंमें स्त्रियोंको तुलादे इससेही सा नसे दुर्बल मनुप्योंको सर्वथा विधि और नि- र्थक यह वचन नहीं समझना क्यों कि इस पेधसे ऋतुकालके अनुसार जाति अवस्था वचनसे विष जलको छोडकर तुला कोश | और देहके अनुसार दिव्य देने ॥ आमि आदिसे स्त्रियोंकी शुद्धि कही है कि भावार्थ-स्त्री- बालक-वृद्ध-अंधे- पंगुन स्त्रियोंको विष और जल नही कहे तुला ब्राह्मण-रोगी-इनको तुलाही दिव्यदे-और और कोश आदिसे उनके अंतःकरणको तपाया झाल और तपाया माषरूप अग्नि विचारै-इसी प्रकार पालक आदिमेंभी सम- क्षत्रियको-और वैश्यको केवल जल और झना-जैसे ब्राह्मण आदिकोंको सब कालोंमें शूद्रको सात विषके यव (जौं) शुद्धिके- तुला आदिका नियम नही है क्योंकि यह लिये दे- ॥९८ ॥ पितामहको वचन है कि सब वर्णोकी को- नासहस्राद्धरेत्कालंनविनतुलांतथा । शसे शुद्धि कही है और तुला आदि सब नृपार्थेप्वाभिशापेचपहेयुः शुचयःसदा १९ वोंकी ब्राह्मणको विष छोडकर होते है-तिससे साधारण कालमें बहुत दिव्योंके पद-ना-आसहस्रात्-हरेत् क्रि-फालं २ होनेपर तुला आदिके नियमके लियेही ना-विषं २ ना-तुला २ तथाऽ-नृपार्थेषु३७ यह वचन है-और अन्यकालमें तो सबको अभिशापेचा-वहेयुः क्रि:-शुचयः१सदा-1 तिस २ कालमें कहा हुआ दिव्य होता है- योजना-आसहस्रात् फाल-विषं तथा सोई दिखाते हैं कि वर्षा ऋतुमें अग्निही स- तुला नहरेत् ( नकारयेत् ) नृपार्थेषु च पुनः बको होता है-हेमंत ओर शिरशिरमें क्षत्रिय अभिशापे उपवासादिना शुचयः सदा बहेयुः आदि तीनोंको आग्नि और विषमें विकल्पहै (कुर्युः)- और ब्राह्मणको अग्निही दे कदाचित्भी विष तुला इन तीन दिव्योंको न करे-ओर तात्पर्यार्थ ई-सहस्र पणके दंडकेनीचे फाल विषनही क्योंकि ब्राह्मणको विपके विना दिव्यदे यह निषेध है-ग्रीम और शरदमें इनके मध्यमें पटे जलकोभी नकरे-सोई कही तो जलहीदे और जिनको विशेष व्याधि- है कि तुलासे विषपर्यंत गुरु अर्थोके विषयमें योंके कारण अग्नि आदिकोंका निषेधैं है कि कि यह स्मृति है कि अल्प अभियोगमें- दे- यह कोशका ग्रहण इस लिये नही किया १ स्त्रीणाच न विषं प्रोक्तं न चापिसलिलं स्मृतं । घट-) भी कोशरूप दिव्यकोदे-इन चायें दिव्योंको कोशादिमिस्तासामंतस्तत्वं विचारयेत् । ३ सर्वेषामेव वर्णानां फोशशुद्धिविधीयते । सर्वाम्ये कोई शंका करे कि पितामहर्ने सहस्रपणसे सहस्रपणसे ऊपरही दे नीचे नदे-कदाचित् तानि सर्वेषां माह्मणस्य विषविना । ३ ब्राह्मणस्य विपं विना। १ तोयमान विरं चैव दातयं पटिनो नृणाम् । : ४ कुष्टिना वर्जयेदाने सलिलं ग्यासकासिनाम् । 'पित्तोमवतां नित्यं विषं तुपरिवर्जयेत् । '२ तुलादीनि विषांगानि गुरुष्पर्धेषु पापयेत् । ३ कोशमल्पेपिदापयेत्।
व्यवहाराध्याय दिव्यमकरण ७- (२४१) + नोचेभी आग्नआदि दिखाये हैं कि सहस्र | विचारताहुआ राजा धर्म और अर्थसे हीन पणमें तुलाको-आधे सहस्रमें लोहेको-उससे नही होता-सुवर्णाकी संख्याको जानकर आधे जलको और उससे आधेपर विषको यहां सुवर्णपदसे पूर्वोक्त सोलह मासे सोना देना कहा है-वह शंका सत्य है-उसकी यह लेना और नाशशब्दसे अपह्नव लेना- व्यवस्था है कि जिस द्रव्यके हरनेसें पतित और सहस्रसे नीचे फाल नदे यहां तांबके होजाय उसमें तो पितामहका वचन और सहस्र पण, लैने-और राजाका द्रोह और इतर द्रव्यके विषय में योगीश्वरका वचन है- | महापातकके अभियोगमें द्रव्यकी संख्याको दोनों वचन चोरी और साइसके विषयमें झोडकर इन सब दिव्योंको उपवास आदिसे अपनव( झूट ) में विशेषतो कात्यायनने | शुद्धहुये मनुष्य सदैव करे-तैसेही देश- खाया है कि जहां दिये हुयेका अपह्नवहो | विशेष नारदर्ने केहाहै कि सभा-राज- प्रमाणकी कल्पना करे-चोरी और कुलका द्वार-देवमंदिर-चौगहा-इनमें धूप- समें दिव्यप्रमाणको अत्यंत अल्प अर्थ- माला-चंदन इनसे पूजा करके निश्चल तु- दे-संपूर्ण द्रव्यके प्रमाणको देखकर लाको स्थापना करे-व्यवस्थाभी कात्याय- सौनेकी कल्पना करें और सोनेका जितना ननें कहीहै कि पतित और महापातको प्रमाण हो उतनाही दिव्यदे-सोनेकी संख्या- मनुष्योंको इंद्र ( मंदिर के स्थानमें- को जान कर यदि सो सुवर्णका नाश हुआ होय | ओर राजाके द्रोहियाको राजद्वारमें- और तो विषको देना कहा है-अस्सीका नाश हुआ | प्रतिलोमसे ( ऊंचे वर्णकी कन्यामें नीचे होयतो अग्निका देना कहा है-साठके नाशमैज- वर्णसे ) पैदा हुयोंको चौगहेमें और इनसे ल-चालीसके नाशमें तुला-तीसके नाशमें को- जो अन्यहैं उनको सभाके मध्यमें बुद्धिमा- शिकापान कहाहे-पांचसे अधिककै नाशमें और नाने दिव्य देना कहाहै-और स्पर्शक अ- उसके आधेकेभी आधेके नाशमें तंदुलप्र- योग्य नीच और दासोको-म्लेच्छ और पापि- माण कहाहे-उससे आधेकेभी अर्धके ना- योंको और प्रतिलोमसे पैदाहुयोंको निश्चयसे शुमें पुत्रआदिके मस्तकका स्पर्श करे- गजाके संमुख दिव्यदे-और पूर्वोक्तोंमें संदेहे और उससे आधेकेभी आधेके नाशमें होय तो तिन में जो २ दिव्य प्रसिद्धहीं लोकिकक्रिया करनी कहीई-इस प्रकार | वे २ ही दे॥ १ सहस्सेतु घट दद्यात् सहस्रार्धे तयायसम् । अर्घ- भावार्थ-सहन तांबेके पणोंसे नीचे फाल, स्यार्धे तु सलिलं तस्यार्धेतु विषस्मृतम् । विष, तुला इन दिव्योंको न करें-और रा- २ दत्तस्यापदयो यत्र प्रमाण तत्र कस्पयेत् । स्तेय-जाका द्रोह और महापातकके अभियोग साहसयोर्दिव्य स्वल्पेयर्थं प्रदापयेत् ॥ सर्वद्रव्यप्रमाणं तु | ( दावा )में उपवास आदिसे शुद्ध होकर ज्ञात्वा हेम प्रकल्पयेत्॥ हेमप्रमाणयुक्तं तु तदा दिव्यंनि सभाराजकुलद्वारे देवायतनचत्वरेनिधेयो निश्चल: योजयेत्॥ज्ञात्वा संख्या सुवर्णानां शतमाशे विष स्मृतम्। | पूज्यो धूपमाल्यानुलेपनैः ।। अशीतैस्तु विनाशे वैदद्यादेवहुताशनम् ॥ षष्ठ्यानाशे २ इंद्रस्थानभिशस्तानां महापातकिनां नृणाम् । जलं देयं चत्वारिंशति वैधटम् ।। विशदशविनाशेतु कोश-नृपदोहे प्रवृत्तानां राजद्वारे प्रयोजयेत् ॥ प्रातिलोम्य. पान विधीयते।।पचाधिकस्य वा नाशे ततोर्धास्य- प्रसूतानां दिव्य देयं चतुष्पथे। अतोन्येषु सभामध्ये दिव्यं तंदुलाः। ततोर्षिविनाशे हिस्से पुत्रादिमस्तकान् ॥ | देय विदुर्घघा.॥अस्पृश्याधमदासानां म्लेच्छानां पाप ततोधीविनाशे तु लौकिक्यश्च क्रियाः स्मृताः। एव• कारिणाम् । प्रातिलोम्यप्रसूतानां निययो न तु राजाने।। विचारयन् राजा धर्मार्याभ्यां नहीयते । तत्मसिद्धानि दिव्यानि संशये तेषु निर्दिशेत । १६ (२४२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । सदेव दिव्यको करें-इति दिव्य मातृका।।९९॥ | प्रकार मंत्र पढकर अभिमंत्रण (प्रार्थना) तुलाधारणविद्वद्भिरभियुक्तस्तुलाश्रितः ॥ करे कि हे तुले तू सत्यका स्थानहै और प्रतिमानसमीभूतोरेखांकृत्वावतारितः१०० पहिले (आदि सृष्टिके समयमें ) हिरण्य- पद-तुलाधारणविद्वद्भिः ३ अभियुक्तः१ गर्भ (ब्रह्मा) भादि देवताओंने तू रची तुलाश्रितः १ प्रतिमानसमाभूतः र रेखा २ है तिससे तू सत्य कहिये अर्थात् संदिग्ध अर्थके स्वरूपको दिखाईये और हे कल्याणि कृत्वाऽ- अवतारितः ॥ वंतुलेसत्यघामासिपुरादेवैर्विनिर्मिता ॥ इस संशयसे मुझे छुटावो-यदि हेमातः मैं पापकर्मा हूं अर्थात् झूटाहूं तो तूं मुझे तत्सत्यंवदकल्याणिसंशयान्मांविमोचय ।। नीचे करियो-और यदि मैं शुद्ध ( सत्य- पद-त्वं १ तुले १ सत्यधामा १ असि-वादी) हूं तो मुझे तू ऊपरको पहुंचाइयो- क्रि-पुराऽ-देवः ३ विनिर्मिता १ त यह मंत्र दिव्यप्रमाण करनेवालेका हे ओरे सत्य- पद क्रि-कल्याणि १ संशयात् ५ प्राइवियाक गिसमंत्रसे तुलाका अभिमंत्रण "मां२ विमोचय क्रि-॥ करें यह मंत्र अन्य स्मृतियोंमें कहाई-जये यद्यस्मिपापकृन्मातस्ततीमांत्वमधोनय पराजयका स्वरूप तो इस पूर्वोक्त मंत्रसेही शुद्धश्चद्गमयोध्यमांतुलामित्यभिमंत्रयेत् ॥ जाना गया इससे पृथक् नहीं कहाहै तु पद-यदि:- आस्मि क्रि-पापकृत् १लाका पनाना और पुनः (दुवारा) तुला मातः १ ततः - मां २ त्वं १ अपाऽ-नय पर बेठना यह सम अर्थात् सिद्ध हे-ओप क्रि-शुद्धः १ चेता-गमय क्रि ऊर्ध्व- मार / वह इस प्रकार पितामह नारदआदिकोने तुलां २ इति:- अभिमंत्रयेत् क्रि-॥ रिसातु यज्ञियं वृक्षं यूपवन्मंत्रपूर्वकम् ॥ प्रण योजना तुलाधारणविद्वद्भिः तुला- सोकपालेभ्यस्तुला कार्या मनीपिमिः ॥ मंत्रः सौम्य श्रितः प्रतिमानसमीभूतः-रेखां कृत्वा यानस्पत्यपछेदने जप्य एय घाचतुरसा तुला कायर्यादा अपतारितः अभियुक्तः-हे तुले पुरा देवः | माया सवव । कटफानि प देयानि त्रिवस्थाने, विनिर्मिता त्वं सत्यधामा असि तत् चायवाचतुर्दस्ता तुला कायर्या पादौ घोपरितत्समो (तस्मात हे कल्याणि सत्यं वद मांसंशयात् । प्रांतरं तु तोहस्ती भषेदध्यमेश्वारा हस्तद्रयं निसे. विमोचय-हेमातः यदि पापकृत् अस्मि ततः पंतु पादपोयमयोरपि ॥ सोरणे च तथा कार्य पार्थयो- (लदि) म., अरः नए चैन (यदि मोरपिघातस्याता नित्य दामिरे शुद्धः तहि मां अर्व गमय-इति तुलां अभि- | भवलंबी च कर्तव्यो चोरणाभ्यामधोमुखी ॥ मृन्मयों मंध्येत् (प्रार्थयेत् ॥ मग्रमपदो परमस्तफगुम्पिनी । प्रारमुखी निघोरा पाप जलाके धारण ( तोल को | कार्यः शुषो से घटस्तपा । शिफ्यद्वयं ममा आदि जानते हों वे मिट्टी भा. मोहमयोरपि ॥ पथिमे चोलयेकानन्यस्मिन्गृत्तिको ज्यपापोरमयोरपि प्राइमुसाकल्पयेहान् शिष्य- (तोल )से अभियुक्त या | le+ पूर्यतरिमनिटकापायागुमिः ॥ भय करनेवालेको सम ( यययर ) मृतिका भाषामना किम्पः । परीक्षा नियो- और दिव्यका कार्य प्रतिमान करनेके समयानुलामानविदाः। यपिशोदेमपाराश्य यां- शंकेके नीचे नहीं भाभियुक्त टि-रकारान्याय फार्यः पाक्षिकानमाल- यहां पांदु आदिसे एक रेखा फर देस मममोपटः । गर्मी मात घटस्योगी प्रकार तोहा हुमा यद फिर तुम्नका इस ! पति परिमनपाने यो प्रतियः समो घटातो 10 व्यवहाराध्याय दिव्यप्रकरण ७ (२४३) - स्पष्ट किया कि यजके यूपके समान मंत्रको जपे-और चौकोर-दृट-और कोमल मंत्रोंको पढकर यज्ञके वृक्षको काट-और तुला करनी और उसके तीन स्थानों में कडे लोकपालोंको प्रणाम करके बुद्धिमान् म लगाने-बार हाथकी तुलाहो और ऊपरके नुष्य तुलाको धनवावे-और काटनेके सम-पापेभी चाही हाथके हो उन दोनोंका यमें वनस्पति है देवता जिसका ऐसे सौम्य अंतर ( फरक ) मध्यमें एक वा आधे यित्वानरं पूर्व पयाप्तमवतार्यतु । पर्ट तुफारयेन्नित्यं हाथकाहों और दोनों पादोंका निखेय पताकाध्वजशोभित। तत आवाइयेईवान् विधिनाने (गाडना ) दो हायकाही और दोनों पाश्चा में न पंत्ररित् ॥ वादितूर्यघोषैश्वगंधमाल्यानुलेपनः । । एक २ तारणहो वे दोनो-तुलासे दश में- प्रामुखः प्रांजलिर्भूत्वा प्राडिराफरततो वदेव ॥ एसोहि । गुल ऊँचे हों और तुलाके मस्तकपर नीचे- भगवन्धर्म शास्मिन्दिव्ये समाविशाराहिती लोकपालेश्च को है मुख जिनका और सूतसे जो बंधेहों वस्त्रादित्यमरगणैः ॥ आशयतु घटे धर्मे पश्चादंगानि | एसे दो अवलंयहों और तुलाका मुख विन्यसेत् । इदं पूर्वेनु संस्थाप्य प्रेतेशं दक्षिणे तयावरण पूर्वको हो और वह शुद्ध देशमें करनी श्चिम भाग युवरं चौतर तथा अभ्यादि लोकपा और निश्चल बनानी-दोनों पाश्चाम लांच कोणभागेषु विन्यसेत् । इंद्रः पीतो यमः श्यामो ( दोछींके बांधदे-और उन छौंकोंके ऊपर वरुणस्फटिकामः ॥ कुघरस्तु सुवर्णामोवहिथापि | पूर्वाभिमुख कुशाओंको रक्खे-पश्चिम मुवर्गमः । तथैव निर्मतिः यामी वायुर्धनः प्रश- कैछीकपरकर्ताओंकोतोल और पूर्वके छौंके- स्यते ।। ईशानस्तुभवेद एवंध्यायेक्रमादिमान् । पर श्रेष्ठमट्टोको तोले छकके पिटक इंद्रस्य दक्षिणे पार्श्वे वसूनाराषौदुधः ॥ धरौ ध्रुव- रतथा सोम आपश्चैयानिलोनलः । प्रत्यूषश्च मा. (पिटारी )को ईट पत्थर वा धूलिसे पूर्ण करदे तश्च वसवोटो प्रकीर्तिताः ॥ देवेशेशानयोर्मध्ये आदि यहाँ मही ईट पत्थर धूलि इनमें विकल्प 'त्यानां तथागणं । घातार्यमाच मित्रश्च करणोंगर्भगः समझना और तुलाके तोलनेमें चतुर परी- स्तथा। इद्रो विवस्वान् पाच पर्जन्यो दशमः स्मृतः क्षोंको नियुक्त कर वे वैश्य सुनार, वा ततरत्वा ततो विष्णुर जघन्यौजधन्यजः । इत्येते ( कांसीकर, होवे परीक्षक तुलाको अवलम्बमें द्वादशादित्या नामभिः परिकीर्तिताः। निः पश्चिमभागे | समान करें और तुलाके ऊपर जल डार जिस तु रुद्राणामपनं विदुःसवीरभद्रश्च शंभुश्व गिरिशच महा- तुलाका जल इधर उधरको न गिरे यह सम यशा अनेकपादहियुभ्यः पिनाकीचापराजितः ।। भुव- जाननी इसप्रकार मनुष्यका तोल करें और नाधीश्वरश्चैव पाली च विशाम्पतिः। स्पाणुर्भवच उतारकर तुलाको ध्वजा और पताकासे भगवान् रुदारवेकादश स्मृताः ॥ पेतेशरक्षौमध्ये सदेव शोभित कर फिर मंत्रका वेता इस- तु मास्थान प्रकल्पयेद भावी माहेश्वरी चैव कौ- विधिसे देवताओंका आवाहन करे कि फिर सारी वैष्णवी तर ॥ वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा । वादिन और तूर्यके शब्दोंसे गंध पुष्प चंद् गणसंयुता। गिते रुतो मागे गणेशपतन विदुः । नसे तुलाकी पूजा करके पूर्वाभिमुख और वरुणस्योतरे भागे मेहता स्थान मुच्यते ॥ गगनः स्पर्शनी वायुरनिलो मातस्तथा प्राणः प्राणेशजीवीच हाथ जोड़कर प्राडिवाक यह कहै हैं कि हे मरुतो टौ प्रकीर्तितामधटस्यौत्ताभागे तु दुर्गामाताहये भगवन धर्म तुम आओ लोकपाल वसु दुपः। एतासां दैवताना तु स्वनाम्ला पजन विदुःभिषा आदित्य और मरुद्गणों सहित इस दिव्यम वसानं धर्माय त्याचाध्यादिक कमात् । अर्यादिपश्चा- समावेश करो इसप्रकार तुलामें धर्मका दंगाना भूषांतमुपाल्पयेत् ॥ गंगादिका मेवेद्याता परि-आवाइन करके फिर अंगन्यास करे कि पश्चर्या प्रकल्पयेत् । । पर्वमें इंदका, दक्षिणमें यमका, पश्चिममें - (२४४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । वरुणका, उत्तरमें कुबेरका, और अग्नि आदि पाद्य आचमनीय और मधुपर्क' आचमनीय कोणों में अग्नि आदि लोकपालोका न्यास करें स्नान वस्त्र यज्ञोपवीत आचमनीय मुकुट उनमें इंद्र पौला, यम श्याम, वरुण स्फटिकक कटक आदि भूषण पर्यत देकर इंद्र आदि. समान, कुवर और अग्नि सुवर्णके समान और दुर्गा पर्यंत देवताओंका ओंकार जिनकी निति श्याम और वायु धूम्र और ईशान आदिमें चतुर्थों ओर नमः जिनके अंतमें रक्तरूप है इसप्रकार क्रमसे इनका ध्यान करे | एसे अपने २ नाम मंत्रोंसे (औदुर्गाय नमः और इंद्रके दक्षिण पार्श्वमें बुद्धिमान मनुष्य इत्यादि) अय॑से • भूषणपर्यत पदाथोंको वसुओंकी आराधना करे धर, ध्रुव, सोम, समय २ पर देकर और धर्मको गंध पुष्प धूप आप, पवन, अग्नि, प्रत्यूप, प्रभात, ये आठ | दीप नैवेद्य देकर इंद् आदिकोंकोभी पूर्वके वसु कहे हैं इंद्र और ईशानके मध्यमें आदि- समान गंध आदिदे और तुलाकी पूजामें गंध त्योंके गणको आराधना करै धाता, अर्यमा, पुष्परक्तलेने सोई नारदैने कहा है कि रक्त गंध मित्र, वरुण, अंशु, भग, इंद्र, विवस्वान्, पूषा, और पुष्प दधिपूए और अक्षत आदिसे पर्जन्य, त्वष्टा, और विष्णु, जो विष्णु छोटे | तुलाकी पूजा करके शिष्टोंका पूजन करें- बडे रूपसे दोप्रकारका है ये बारह आदित्य इंद्र आदिकी पूजामें विशेष नहीं कहा इस नामोंसे कहे हैं-और अग्निसे पश्चिमके भागमें जैसे मिल सके रक्त वा अन्य पुष्पोंसे पू, रुद्रीका स्थान कहते हैं वीरभद्र शंभु गिरीश | करै यह पूजाका क्रम है इस पूर्वोक्त सबक अजेकपात् अहिर्बुध्य पिनाकी अपराजित प्रादिवाकभी करे सोई कहा कि मि भुवनाधीश्वर कपाली स्थाशु भव ये ग्यारह वेदवेदांगका पारगामी वेद और आचरण रुद्र कहे हैं-यम और निऋतिके मध्यमें युक्त शांतचित्त मत्सरसे मुक्त सत्यवादी शुर मातृओंके स्थानकी कल्पना करे ब्राह्मी | चतुर सब प्राणीयोंका हितकारी और उप- माहेश्वरी कोमारी वैष्णवी वाराही माहेन्द्री वास शुद्धवस्त्रोंका धारण इनको कर चामुण्डा ये सात गणसे युक्त मातर हैं- प्राड्विाक ब्राह्मण सबदेवताओंकी पूज नितिसे उत्तर भागमें गणेशका और वरु-विधिसे करे तैसेही चार ऋत्विजोंसे तुलाकी णसे उत्तर भागमें मरुतोंका स्थान कहा है चार दिशाओंमें होम करे सोई कहाहै कि गगन स्पर्शन वायु अनिल मारुत प्राण | वेदके पारगामी ब्राह्मण घी हवि और होमके प्राणेश जीव ये आठ मरुत् कहे हैं तुलाके | साधन समिघोंसे स्वाहाहे अंतमें जिसके उत्तर भागमें बुद्धिमान मनुष्य दुर्गाका आवाहन कर इन सब देवताओंका अपने २ रक्तगंधैश्चमाल्यैश्च ध्यपूपाक्षतादिभिः। भर्चयेत्तु नामसे पूजन कहा है धर्मको भूषण और घटं पूर्वततः शिष्टांस्तु पूजयेत् । वस्त्र देकर क्रमसे अर्घ्य आदिदे-फिर अंगके २ प्राडिवाकस्ततो विप्रो वेदवेदांगपारगः। श्रुत- देवताओंको अय॑से भूषण पर्यंत देकर दृत्तोपसंपन्नः शांतचित्तो विमत्सरः ॥ सत्यसंधः शुचि- गंधसे नैवेद्य पर्यंत पूजा कर-और यहां पताका दक्षः सर्वप्राणिहिते रतः। उपोक्तिः सुदरसरः कृतद और ध्वजासे तुलाको शोभित करके और न्तानुधावनः ॥ सर्वासां देवान्तानां च पूजां कुर्याय थाविधि ॥ उस तुलामें एहि एहि इस पूर्वोक्त मंत्रसे ३ चतुर्दिक्ष तथा होमः कर्तव्यो वेदपारगः आज्ये- धर्मका आवाहन करके धर्मको अर्घ्य देताहूं न हविषा चैव समिद्भिहोमिसाधनैः।सावित्र्या प्रणवे- धर्मको नमस्कार है इत्यादि प्रयोगसे अर्घ्य नाथ स्वाहान्तेनैवहोमपेत् । .
व्यवहाराघ्याय दिव्यमकरण ७ (२४५ ऐसी ओंकारसहित गायत्रीसे होम करे तुझे दुरात्माओंकी परीक्षाके लिये ब्रह्माने अर्थात् ओंकार आदि गायत्रीको पढकर रचाहे-धकारसे तू धर्ममूर्ति है ओर टकारसे फिर स्वाहाहै अंतमें जिसके ऐसे ओंकारको कुटिल नरको धारणकरके विचारती है पढकर समिध घो चरु इनकी प्रत्येक अष्टो- | इससे धुझे घट कहते हैं तू सब "जन्तुओंके त्तरशत १०८ आहुतिदेइस प्रकार हवनपर्यंत पुण्य और पापको जानतीहै-दे देव जिसको देव पूजाकरनेके अनंतर वक्ष्यमाण मंत्रस- मनुष्य नहीं जानते उसको तू जानती है हित अभियुक्त अर्थ (दावेका धन ) को व्यवहारमें अभिशस्त हुआ मनुष्य शुद्धिको पत्रपर लिखकर उस पनको शोध्य (शुद्ध चाहता है तिससे धर्मके अनुसार संशयसे करनेयोग्य ) ममुप्यके शिरपर रक्खे-सोई इसकी रक्षा करनेयोग्य तू है शुद्धिकेयोग्य कहा कि जो यथार्थ अभियोग हो उसको मनुष्य तो त्वं तुले इत्यादि पूर्वोक्त मंत्रसे इस मंत्रसहित पत्रपर लिखकर शिरपर तुलाकी प्रार्थना करे फिर प्राविवाक शिर- रक्खे वह मंत्र यह है कि सूर्य चंद्रमा पवन | पर रक्खे हुये पत्रको शोधन करके और अग्नि यो (आकाश) भूमि जल हृदप अनुकूल स्थानमें रखकर तुलाके ऊपर यम दिन पनि दोनों संध्या और धर्म ये सव शोध्य मनुष्यको बैठावे-क्योंकि यह स्मृति मनुष्यकै वृत्तांतको जानते हैं- यह सच है कि कुछ काल टिककर और पत्रको रखकर धर्मके आवाहनसे लेकर शिरपर पत्र रखने फिर तुलाके ऊपर बैठावै-और बैगकर पर्यंत कर्मका समूह सव दिव्यों में साधारण पांच विनाडी इतने वीतें तबतक वैसेही है सोई कहा कि इस संपूर्ण मंत्राविधिको स्थापित रक्खे और उस कालकी परीक्षा सब दिव्योम करे तैसेही सब देवताओंका ज्योतिःशास्त्रका ज्ञाता ब्राह्मण करे क्योंकि 'आवाहनी करे फिर प्राडिचाक तुलाकी यह स्मृति है कि ज्योतिषी श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रार्थना करें क्योंकि यह स्मृति है कि शास्त्र- कालकी परीक्षा कर पांच विनाडी पंडितानें का ज्ञाता इस विधिसे तुलाकी प्रार्थना कर परीक्षाका काल कहांहे- दश गुरु अक्षरोंका उसके मंत्र ये दिखाये हैं कि हे घट (तुले) उच्चारण काल प्राण और छः प्राणोंकी १ यथार्थमभियुक्त स्यालिखिता तंतु पत्रके। मो- विनाडी होती है सोई कहाहै कि दश गुरु थानेन सहितं तत्कार्य तु शिरोगतम् । वर्णांका प्राण छः प्राणोंकी विनाडी और २ भादित्यचदावनिलोनलश्च द्योभूमिरापोहृदयं यमश्व । अश्व रात्रिश्च उभेच सध्ये धर्मश्च जानाति साठ विनाडियोंकी एक घटी और साठ घटीयोंका एक अहोरात्र और तीस अहो- ३इम मत्रविधि कृत्स्न सर्वदिव्येषु योजयेत्। आवा- / पत्रोंका एक मास होताहै- और उस परी- "हनं च देवाना तथैव परिकल्पयेत् ॥ क्षाके कालमें राजा शुद्धब्राह्मणोंको नियत ४ धटमामंत्रयचत्र विधिनानेन शास्त्रवित् । ५ त्वं धट ब्रह्मणा सृष्टः परीक्षार्थ दुरात्मनाधिकाराद्धर्म १ पुनरारोपयत्तस्मिन् स्थित्वावस्थितपत्रकम् । मूर्तिस्त्वं टकारारकुटिलं ना ॥ धृतो भावयसे यस्माद २ ज्योतिविद्राम्हणः श्रेष्ठः कुर्यात्कालपरीक्षणम् । टस्तेनाभिधीयते । त्व वैरिस सर्वजतूनां पापानि सुक्छ- विनाय, पंच विज्ञेयाः परीक्षाकालकोविदः । तानिच ॥ त्वमेव देव जानीष न विदुर्यानि मानवाः। ३ दशगुरुवर्णः माणः षट्माणाः स्थादिनाडिका व्यावहामि स्तोयंश मानुषः शुद्धिमिच्छति । तदेनं ( तासाम् । षष्टयाघटी घदीनां घटयाहोरात्र उक्तय मंशयास्मादर्मतस्त्रातुमईसि । खाग्निाभादनासः। .नरस्यवृत्तम्।
(२४६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित करे वे शुद्धि और अशुद्धिको राजाके प्रति रक्खा हुआ तुलाका आधार पंट्ट-जब किसी कई-सोई पितामहनें कहा कि साक्षियोंके | दीखते हुये कारणके वश इनका भंग होजा- मध्यमें जैसा देखें वैसेही अर्थको कहनेवाले | यतो तुलाको फिर रक्खे क्योंकि यह स्मृति शानी शुद्ध-लोभरहित ब्राह्मणोंको राजा- | कि छीके आदिका छेदन वा भंग होजायतो नियुक्त कर वे राजाको शुद्धि वा अशुद्धिको । मनुष्यको फिर ठावे-फिर ऋत्विज पुरोहित कहै-और शुद्धि और अशुद्धिक निर्णयका आचार्य इनको दक्षिणाओंसे प्रसन्न करे- कारणभी कहा कि यदि तोलमें बढ जायतो इस प्रकार करता हुआ राजा मनोरम भो- निःसंदेह शुद्ध है और सम (उतनाका गोंको भोगकर महती (बडी) कीर्तिको उतना) हो वा न्यून हो जाय तो | प्राप्तहोताहै और अंत समयमें मुक्तहोताई- वह मनुष्य शुद्ध नहीं होता- और जो यह । यदि राजा पूर्वोक्ततलाका उसी प्रकार, पितामहका वचन है कि जो अल्प दोष है | स्थापन रखना चाहे तो काक आदि उप वह सम जानना और बहुत दोषवाला हीन धातों ( नाशक के निवारणार्थ कपाट (कम ) हो जाताहै उसका यह अभिप्राय आदि सहित शालाको वनवावे-क्योंकि यह है कि यदि अभियोगका अर्थ अल्प है वा स्मृति है कि विशाल-उंची-शुक्ल-धटकी बहुतहै यह दिव्य प्रमाणसे निश्चय न हो- ऐसी शाला बनवावै-जिसमें स्थापनकी हुई सके तोभी एकवार विना जाने अल्प और तुलाको कुत्ते चांडाल काक नष्ट न करेन वारंवार और जानकर महत्व दंड वा प्राय- | और उसी शालाकी दिशाओंमें लोक श्चित्तमें निश्चय समझना-और जब नही दी- पालोंका स्थापन करै-और उनका गंध, पुष्प खते हुये दृष्ट कारणोंसेही कोख ( कुक्षि) चंदनसे त्रिकाल पूजन करै-और जो आदिका छेदन वा भंग होजाय तो. शाला कोवाड और जौं ब्रीही आदिके बीजों- भी अशुद्धिही समझनी- क्योंकि यह से युक्त और सेवकोंसे रक्षितही-और मिचे स्मृति है कि कक्षका छेदन- तुलाका भंग | जल अग्नि इनसे युक्तहो और शून्यभी ने धडा और कर्कटका भंग-रस्सीका छेदन | हो-ऐसी शालाको राजा बनवावे ॥ अक्षका भंग-हो जाय तो उसी प्रकार अ- शुद्धि कहनी कक्षनाम छोकेका तल-कर्कट भावार्थ-तुलाके धारणको जो जानतेही नाम तुलाके दोनों प्रांतके भागोंमें छींका ल- वे अभियुक्तपुरुष तुलापर रख और प्रति- टकानेक कुछ वक्र, लोहेके कीलक, कडीके मान (वाट )के समान करके उसको उता- तुल्य होतेहैं-अक्षनाम पादके स्तंभोंके ऊपर रले-फिर वह अभियुक्त वा अभियोक्ता साक्षिणों ब्राह्मणाः श्रेष्ठा यथा दृष्टार्थवादिनः। १ शिक्यादिच्छेदभगेषु पुनरारोपयनरम् । ज्ञानिनः शुचयोऽलुब्धा नियोक्तव्या नृपेण तु । शंसति २ एवं कारयिता राजा भुक्खाभोगान्मनोरमान् ।। साक्षिणः श्रेष्टाः सुद्धाशुद्धी नृपे तदा । महती कीर्तिमामोति प्रह्मभूयाय कल्पते । २. तुलितो यदि बत स शुद्धःस्यानसंशयः।समो ३ विशालामुन्नता शुभ्रां पयशाला तु कारयेत् । दा हीयमानो वा न स शुद्धो भवेन्नरः। यवस्था नोपइन्येत विभिचांडालवायसैः॥ तत्रैव लोक- ३ अल्पदोषः समो हेयः यहुदोरस्तु हीयते । पालादीन् सर्वानदिक्षु निवेशयेत् ॥ त्रिसंध्यं पूजयेचतान ४ कक्षभेदे तुलामगे घटकर्कटयोस्तथा ।जुच्छेद | गंधमाल्यानुलेपनैः कपाटवीजसंयुक्तां परिवारवराक्ष- क्षमंगे वा नवाशुद्धिमादिशेद । ताम् ॥मृत्पानीयामिसंयुक्ताम शून्यो कारयेमृएः ।
व्यवहाराध्याय द्विव्यप्रकरण ७ (२४७) तुलाकी इस प्रकार प्रार्थना करे कि हे तुले | नारदका वचन है कि सपेद सात सूतके तू सत्यका स्थानहे देवताओने तू पहि- तन्तुओंसे हाथको लपैटे-तैसेही सात शमी ले रचीहै तिससे हे कल्याणि सत्य कहिये और दुर्वाके पत्ते अक्षत और दही मिले' और संशयसे मुझे छुटाइये-हे मातः यदि मैं | अक्षत इन सबको पीपलके पत्तोंपर रखदे- पापकर्मा हूं तो मुझे नीचे करियों और जो क्योंकि यह स्मृतिहै कि सात पीपल के पत्ते मैं शुद्धहूं तो उपरको पहुंचाइयो अर्थात् मेरे | और शमीके पत्ते अक्षत और सात दूर्वाके पलडेको ऊंचा करियो।।१००१०१११०२॥ पत्ते और दही मिले अक्षत इन सबको इति घटविधिः। हाथके ऊपर रखदे-और पुप्पोकोभी रखदे- क्योंकि यह पितामहका वचनहै कि सात करौविमृदितव्रीहर्लक्षायित्वाततोन्यसेत् । पीपलके पत्ते-अक्षत पुष्प दधि इनको हाथ- सशाश्वत्यस्यपत्राणितावत्सूत्राणिवेष्टयेत् ॥ पर रखदे और सूतसे लपेटदे-और जो यह वचनहै कि अग्निसे तपाये लोहेको सात पद-करौ२ विमृदितीः६ लक्षायित्वा:- आखके पत्तोंसे ढककर हाथोंमें लेकर सात ततःऽ-न्यसेत् क्रि-सप्त २ अश्वस्थस्य ६ पद गमन करै यदि सातपदतक दग्ध मन्त्राणि २ तावत्-सूत्राणि २ वेष्टयेत् क्रि-॥ नहोयतो शुद्ध जानना-पह वचन पीपलके योजना-विमृदितबीहेः पुरुषस्य करौ | पत्तोंके अभावमें आखके पत्तोंके विषयमें 'लक्षायित्वा ( अंकयित्वा) ततः अश्वत्यस्य जानना क्योंकि पीपलके पतोंकीही पिताम- सप्त पत्राणि न्यसेतू-तावत सूत्राणि वेष्टयेता हके वचनमें प्रशंसा लिखीहै-इससे वेही | तात्पर्यार्थ-दिव्यमावकामें कहे हुये मुख्य-कि पीपलसे अग्नि पैदा होती साधारणधर्मोके होते-तुलाकी विधिमें कहे | पीपल वृक्षोंका गजाहे इससे बुद्धिमान धाम जो आवाहन-सिरपर पत्रके रखने के मनुष्य उसके पत्तोंको हाथोंके ऊपर रक्खै ।। अंतमें अग्निकी विधि भावार्य-हाथोंसे मलेह व्रीहि (धान) मलेहैं हाथोंसे व्रीहि जिसनें ऐसे पुरुषके | जिसनें ऐसे पुरुषके हाथोंमें काले तिल हाथोंको देखें और हाथोंमें जहां २ काला आदिके चिह्नोंको देखकर उनमें लाखके तिल-व्रणकिण (रेखा) आदि स्थानों में रंगसे हंसपद आदिके चिह्न करके सात लाखके रस आदिसे चिह्नको करदे-सोई | पीपलके पत्तोंको अंजलीमें रखदे और नारदेने कहा कि हाथके सब क्षतों (चिह्न) हाथ सहित पत्तोंको सात सपेद सूतक डोरोंसे में हंस पदोंको कर-फिर सात पीपलके | लपेटदे ॥ १०३ ॥ पत्तोंको अंजली किये हाथों में रखदे- क्योंकि यह स्मृति है कि पीपलके सात + वेटवीत सितईस्तं सप्तमिः सूत्रताभिः । पत्तोस अंजलोको पूर्ण कर-और हाथ २ सप्तापप्पलपत्राणि शमीपत्राण्यथाक्षवान् । दी- सहित उन पत्तोपर सातवारही सूतको याः सप्तपत्राणि दध्यक्तांश्चाशतान्यसेत् । ३ सप्त पिप्पलपत्राणि अक्षतान्सुमनी दधिहस्त- लपेटद-वे सात सूत शुक्ल होतेहें-क्योंकि योनिक्षिपेत्तत्र सूत्रेणावेटन तथा ॥ हस्तक्षतेपु सर्वेषु कुर्याद्वंसपदानि तु । ४ पिप्पलातायत वहि: रिप्पलो क्षराट् स्मृतः। २ पांजरिमापूर्प आश्वत्यैः सप्तभिः समः। भतस्तस्य तु पत्राणि हस्तयो विन्यसेदुधः । यह विशेषहै-कि (२४८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । १ १ त्वमग्नेसर्वभूतानांमंतश्चरसिपावक । इस वेचनमें यही लिखा है-होमके अनंतर साक्षिवत्पुण्यपापेभ्योबहिसत्यकवेमम ॥ उस अग्निमें लोहेके पिण्डको गेरकर ,और उसके तपते हुए धर्मके आवाइनसे हवन पद-त्वं १ अग्ने १ सर्वभूतानां ६ अन्तः पर्यंत पूर्वोक्तविधिको करके तीसरी बारके चरति क्रि-पावक १ साक्षिवतऽ-पुण्यपाप-तापमें उस लोह पिण्डकी अग्निकी इन मंत्रों- भ्यः ५ ब्रूहि क्रि-सत्यं २ कवे १ मम ६॥ से प्रार्थना करे-कि हे अग्ने तू चारों वेदरूप योजना-हे अग्ने त्वं सर्वभूतानां अन्तः चरसि-हे पावक है कवे पुण्यपापेभ्यः. और ब्रह्मवादिओंको मुख है जठर (पेट) है तू पजाम होमा जाता है तूही सब देवता (पुण्यपापं अवेक्ष्य ) साक्षिवत् सत्यं ब्रूहि ॥ में टिका हुआ तू प्राणीओंके शुभ और तात्पर्याय हे अग्ने तू जरायुज ( मनुष्य अशुभको जानता है और जिससे तू पापसे आदि ) अण्डज (पक्षी आदि) स्वेदन (कृमि) पवित्र करता है इससे पावक कहता और उद्भिज्ज (वृक्ष ) इन चार प्रकारकै भू- है-हे पावक पापीओंको . अपने स्वरूपको तोके शरीरके भीतर विचरता है अर्थात् उप- दिखाकर तेजस्वी हो और शुद्धि भावों में है योगी अन्नपान आदिके पाचकरूपसे रहता हुताशन शीतल हो हे अग्ने तू सब देवता है-हे पावक (शुद्धिके कारण) हे कवेतू सा- ओके भीतर साक्षी होकर विचरता है हे क्षीकी समान पुण्य और पापको देखकर देव जिनको मनुष्य नही जानते उनको तू सत्य कह-तीनदफे तपायेहुये अयःपिण्डको जानता है व्यवहारमें अभिशस्त .( फंसा सन्देश (संडाप्ती )से आगे लाकर प-हुआ ) यह मनुप्य शुद्धि चाहता है तिससे श्चिम मण्डलमें पूर्वाभिमुख बैठा हुआ क- इसकी इस संशपसे धर्मपूर्वक रक्षा करो। तो इस मंत्रसे अग्निकी प्रार्थना करे-सोई भावार्थ-हे अग्ने तू सब भूतोंके भीतर नारदने कहा कि अग्निके समान तपाएं हुए विचरता है हे पावक हे कवे मेरे पुण्य पापको। लोहके पिण्डको स्फुलिङ्ग (अग्निकण) देखकर सत्य कहियो अर्थात् दिखाईयो । सहित और भली प्रकार रंजित उसको ती- सरे तापमें सत्ययुक्त वचनसे प्रार्थना करे तस्येत्युक्तवतोलौहपंचाशत्पलिकंसमम् । अर्थात् लोहकी शुद्धिके लिये भली प्रकार | अनिवर्णन्यसैपिडहस्तयोरुभयोरपि १०॥ तपाएहुए लोहेकै पिण्डको जलमें गेरकर फिर तपाकर फिर गेरकर फिर तीसरी पंचाश पलिकर समं २ अग्निवर्णर न्यसेत पद-तस्य ६ इतिः उक्तवतः ६ लौह २. दके तपाएहुए उसको संडाशरसे पकडकर शोध्य मनुप्यके आगे लाकर सत्य शब्द घृतमष्टोत्तरं शतं । युक्त त्वमग्ने सर्वभूतानां इत्यादि मंत्रको २ त्वमग्ने वेदाश्चत्वारस्त्वं च यज्ञेषु हूयसे ।। त्वं मुलं कर्ता पढ़ प्राडिवाक तो मण्डल भूमिके दक्षिण सर्वदेवानां त्वं मुखं ब्रह्मवादिना ॥ जटरस्थो हिभूतानां . देशम लोकिक अग्निका स्थापन करके उस ततो देलिशुभाशुभं पापं ॥ पुनासि वै यस्मात्तस्मा- अग्निमें-अग्नये पावकाय स्वाहा इस मंत्रसे त्पावक उच्यसे ॥ पापेषु दर्शयात्मानमचिम्मान्भव थोकी अष्टोत्तरशत १०८ आहुति दे-क्योंकि । सर्वदेवानामन्तवासि साक्षियत् । त्वमेव देवजानी पावक॥अथवा शुंद्रभादेषु शीतो भव हुताशन ॥ समझे 1 अग्निवर्णमय-पिण्डं सस्यूलिंग सुरंजितम्। तापे । न विटुनि मानवाः ॥ व्यवहाराभिशस्तोयं मानुषः तृतीये संताप्य यात्सत्यपुरस्कृतम् ॥ शुद्धिमिच्छति । तदने संशयादस्माद्धर्मतनातुमर्हसि ।
व्यवहाराध्याय दिव्यप्रकरण ७ (२१९) नि-पिण्डं २ हस्तयोः ७ उभयोः ७ पैरको रक्ख मण्डलोंका अवलंघन न करे- अपि- सोई पितामहने कहा है कि मण्डलकाअवलं- योजना-इति उक्तवतः तस्य उभयोःअपि- घन न करें और न उससे पहिले पाद रक्खे इस्तयोः लाहं पंचाशत्पलिकं समं अग्निवर्ण और सोलह अंगुल प्रमाण जिस्का ऐसा पिण्डं न्यसेत् ॥ मण्डल जानना और एक मण्डलका दूसरे तात्पर्यार्थ-जब वह कर्ता त्वमाने सर्व- मण्डलसे अंतर ( फरक )भी सोलह अंगुल- भूतानां-इस पूर्वोक्त मंत्रसे अग्निकी प्रार्थना | काही जानना- षोडश अंगुलौके सात करचुकै तब उसके दोनों हाथोंपरजोपीपलके मण्डलोंमें गमन करे यह कहनेसे यह कहा पत्ते दधि दूर्वा आदिसे ढकेहो आग्निके गयाकि पहिला एक मण्डल अवस्थान समान है वर्ण जिस्का ऐसे पचास पलपर (बैठना )का और सात मण्डल गमन कर- सम और कोणोंसे रहित आठ अंगुलका नेके इस प्रकार आठ मण्डल सोलह अंगु- जिस्का विस्तारहो और जो चिकनाहो | लके होते हैं और वे उन सातौंके मध्य- ऐसे अयःपिण्डको प्राडियाक रखद क्यों / भागभी सोलह अंगुलके जानने-वेही बात कि पितामहका वैचन है कि आठ अंगुल | नारदने संख्या करके कही है कि मण्ड- अचास पलभर लोहेके पिण्डको बराबर और लसे दूसरे मण्डलकाअंतर बत्तीस अंगुलका कोणोंसे हीन करके अग्निमें तपावे ।। होता है इस प्रकार आठ मण्डलोंके दोसो भा०-इस पूर्वोक्त अग्निको स्तुतिकों करते चालसि २४०अंगुल भूमि अंगुलके प्रमा- हुए कर्ताके दोनों हाथोंपर जो पचास पल | णसे होती है-इसका यह तात्पर्य है कि भरहो अग्निकासा जिसका वर्ण हो ऐसे अवस्थानके षोडशांगुलं १६. मण्डलसे बराबर लोहेके पिण्डको प्राविवाक रखें- सोलह अंगुलके अंतरपर द्वितीय आदि सोलह २ अंगुलके सात मण्डल-बत्ती- सतमादायसत्तैवमंडलानिशनजेत्पीडशा स २ अंगुलके अंतर सहित होते हैं और गुलकंज्ञेयंमंडलंतावदंतरम् ॥ १०६ ॥ अवस्थानका मण्डल तो सोलह अंगुलकाही । पद-सः १ तं २ आदायऽ-सप्त २ एव:- | होताहै इस प्रकार अंतगल सहित आठों मण्डलानिर शनैःऽ-व्रजेत् क्रि-षोडशांगुलकंर | मण्डलोंका प्रमाण २४० दोसो चालीस जयं १ मण्डलं १ तावत् १ अन्तरम् ॥१॥ अंगुल भूमि होतीहै-इस पक्षमें अवस्थानके योजना-सः तं आदाय सप्त एवं मण्डलानि | मण्डलको सोलह अंगुलका बनाकर-- शनैः प्रजेत् मण्डलं षोडशांगुलकं ज्ञेयं । मध्यके भागों सहित बत्तीस अंगुलके सात अन्तरंच तावत् एव ज्ञेयम् ।। भूमिके भामोंके दो २ भाग करके अंतराल तात्पर्यार्थ-वह पुरुष तपाएहुए लोहपि- छोडकर मंडलके भूभाग जो सोलह अंगुल ( मध्य )के भूभागोंके सोलह अंगुल ण्डको अंजलिमें लेकर और सात मण्डलॊके प्रमाणकेहैं उनमें ऐसे सात मण्डल बनावै भीतरही चरणोंको रखकर शनैः शनैः गम- न करै-यहां एवपदके देनेसे मण्डलोंमें ही १ नमण्डलमतिकामैनाप्याक स्थापयेत्पदम् । २ त्रिसदगुलं प्राईमण्डलान्मण्डलांतर अष्टाभि- १ भनहीनं समं कला भष्टांगुलमयोमय। पिण्ड तु | मण्डलैरेव मण्डलानां शतद्वयं ॥ चत्वारिंशत्समधिक तापयेदमौ पचाशत्पलिकसमम । भूमेरंगुलमानतः ॥
(२५०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । जो गमन करनेवालेके पोंके समान(तुल्य) | और अंगुलका प्रमाण यह कहाहै कि हों-सोई तिसनेही कहा कि मण्डलका तिरछे जौंके आठ ८ उदर वा खडे हुये प्रमाण उसके चरणके समान बनावे और तीन प्रीहि अंगुलका प्रमाण कहाहै बारह जो पितामहनें यह कहा कि आठ मण्डल | अंगुलकी एक वितस्ति और दो वितस्ति- बनावे और पहिला एक नवम ९ मण्डल | योंका एक हाथ-चार हाथका एक दंड-दो बनावे-पहिला मंडल अग्निका-दूसरा वरु- सहस्र दंडका एक कोश-औरचार कोशका णका तीसरा वायुका-चौथा यमका-पांचवा | एक योजन होताहै ॥ इंद्रका-उठा कुबेरका-सातवां सीमका भावार्थ-वह कर्ता उस लौईके पिंडको आठवा सावित्रीका नौमा सब देवताओंका लेकर शनै: २ सात मंडलोंमें गमन करे होताहै यह दिव्यके ज्ञाता जानते हैं और और सोलह अंगुलका मंडल और सौ मंडलसे मंडलका अंतर बत्तीस अंगुलका लहही अंगुलीका मंडलोंका अंतर (मध्य होताहै इसप्रकार आठों मंडलोंक २५६ होताहै ॥ १०६ ॥ दोसो छप्पन्न अंगुल भूमिकी रचना हो और मुक्त्वात्रिंमृदितीहिरदग्धाशुद्धिमानुयात् । मंडलका प्रमाण कर्ताक पादुके प्रमाणसे अंतरापतितेपिंडेसंदेदेवापुनहरेत् ।।१०७॥ होताहे और मंडल में शास्त्रोक्त कुशा र. खनी-उस पचनमेंभी सबबै देवता जिसके पद-मुक्त्वाऽ-अग्निंस्मृदितव्रीहिः१अदाधः ऐसा जो नवम मंडल उसके अंगुलोंका | १शुद्धिं २ आनुयात क्रि-अंतराऽ-पतिते ७ प्रमाण नहीं होताई उसको छोडकर आठ | पिण्डे ७ सन्देहे ७ वा-पुनःऽ-हरेत् कि-॥ मंडल और आठ अंतरालोंका प्रमाण प्रत्येक योजना- अग्निं मुक्त्वा मृदितव्रीहिः सोलह २ अंगुलका होताहै इससे संपूर्ण । अदग्धः पुरुषः शुद्धिं आनुयात्-पिंडे अंतरा मंडलोंके दोसो छप्पन्न अंगुल सिद्ध होतेहैं | पतिते वा संदेहे पुनः पिंडं हरेत् ।। उसमभी गमन करनेके मंडल सातही तात्पर्याध-आठवें मंडलमें टिककर नवम होतेहैं इससे इस वचनकाभी विरोध नहीहै | मंडलमें अग्निसे तपाये लोहेके पिंडको कि पहिले मंडलमें लोहेके पिंडको लेकर त्यागकर और हाथोंसे प्रोहियोंको मलकर खडा होताहै और नोमें मंडलमें फेंकदेता है | यदि पुरुष दग्ध नही (नजले) तो शुद्धिको प्राप्त होताहै और जल जायतो अशुद्ध है १ मंडलस्य प्रमाण तु कुर्योत्तत्पदसंमितम् । २ कारयेन्मंडलान्यष्टी पुरस्तात्रवम तया । आमेयं । यह बात अर्थात् सिद्धहे-और जो संतास मंडळं चाद्य द्वितीय वारुणं स्मृतम् ॥ तृतीय वायुदेवत्व (दुःख )से गिरता हुआ मनुष्य हाथों चतुर्थ यमदैवतम् । पंचम विंददैवत्यं पाठ कौबेरमुच्यते।। | भिन्न शरीरमें जलजाय तोभी अशुद्ध नही सप्तमं सोमदेवत्र सावित्रं वष्टम तथा ( नवमं सर्व होता-सोई कात्यायनने कहा है कि यदि दवत्यमिति दिव्यविदो विदुः । द्वात्रिंशदगुलं प्राहुर्म १ तिर्यग्यवोदराण्यटायावा नीयमयः। प्रमाण- सलामंडलातरम् । अष्टाभिर्मडलरमण्डलानां शतद्- | मंगुलस्योक्तं वितस्तिदशांगुलः ॥ हस्ते वितस्तिद्वितयं यम् । पटपंचाशत्समधिकं भूमेस्तु परिकल्पना ।कर्तुः । दंदोहस्तचतुष्टयम् । तत्सहसइयं श्रोशो योजनं तच्च- पदसमं कार्य मंडलं तु प्रमागतः । मंडले मंडले देयाः | तुष्टयम् । कुशाः शासपचोदिताः ॥ १ प्रस्स्वलन्नभिशस्तश्चेत्स्थानादन्यत्र दह्यते ।' अ. ३ प्रथमे तिष्ठति नवमे क्षिपति । दग्धतं विदुदैवास्तस्य भूयोपि दापयेत् । .
व्यवहाराध्याय दिव्यप्रकरण ७ (२५१) गिरता हुआ अभिशस्त (अपराधी) स्थान पद-सत्येन ३ मा २ आभिरक्ष क्रि-त्वं (हाथों से अन्यत्र जल जाय तो उसकोभी वरुण १ इति:-अभिशाप्याकम् नाभिद- देवता अदग्ध कहते हैं वा उसके हाथमें | मोदकस्थस्य ६ गृहीत्वा-ऊरू २ जलं २ भूयः (फिर ) लोइके पिंडको दिवांव-यदि विशेत् क्रि-॥ गमन करते हुये मनुष्योंके हाथों से आठमें योजना-हे वरुण त्वं मा (मा) सत्येन अ- मंडलसे अर्वाक (पहिले ही पिंड गिरजाय भिरक्ष इति कं (जलं ) अभिशाप्य (अभि- तो और जलने न जलने में संदेह होय तो मध्य) नाभिदनोदकस्थस्य उरू. गृहीत्वा फिर उक्त पिंडको लेकर चलै-यहां यह शोध्यः जलं विशेत् ॥ अनुष्ठान (करना)का क्रम है कि पहिले तात्पर्यार्थ-हे वरुण तू मेरी सत्यसे रक्षा दिन भूतशुद्धिको करके और परले दिन कर इस मंत्रसे जलकीप्रार्थना करके नाभितक शास्त्रोक्तरीतिसे मंडलोंको रचकर और है प्रमाण जिसका ऐसे जलमें स्थित किसी तिस २ मंडलमें मंडलोंके देवताओंको अन्य पुरुषकी जंघाओंको पकडकर शोध्ये पूजकर और अग्निका स्थापन करके और- शांतिके होमसे निवृत्त होकर और उपवास वरुणकी पूजाके अनंतर करै-क्योंकि नारद- मनुष्य जलमें प्रवेश करे- (हू ) यहभी किया है जिसनें ऐसे-स्नान किये और आई | को स्मृति है कि गंध पुष्प चंदन मधु (गीले) वस्त्र धारण किये पुरुषको पश्चिमके मंडलमें स्थित करके ग्रीहियोंके मर्दन (म-वरुणकी पूजा करें और तसेही धर्मका दूध घृत आदिसे सावधान होकर प्रथम ।लना) आदि-हाथोंके संस्कारको करके- । और मंत्रोसहित प्रतिज्ञा ( दावा के आवाहन आदि संपूर्ण देवताओंको पूजा- पत्रको कर्ताके शिरपर बांधकर-तीसरे ता- होम और मंत्रोंसहित प्रतिज्ञा पत्रके शिर- पमें प्राड्विाक अग्निकी प्रार्थना करके पर रखने पर्यंत साधारण कर्मोको करके जलमें प्रवेश करे-और तसेही जब माड्- और तपाये हुये लोहेके पिंडको संदेश (सं- विवाक इस प्रकार जलकी प्रार्थना करले. डाशी)से पकडकर-कर्ता जन अग्निकी मा- कि हे जल तू प्राणियोंका प्राणसृष्टिकी र्थना करचुकै तब उसकी अंजली में लोहेके आदिमें रचाहे और द्रव्य और देहधारियोंकी पिंडको रखदे-वहभी सात मंडलोंने गमन शुद्धिका कारण कहाहै इससे शुभ और करके नवमें मंडल में दग्ध न होयतो शुद्ध होता है। अशुभकी परीक्षामें अपने स्वरूपको भावार्य-अग्निको छोडकर और हाथोंसे दिखाय-तब शोध्य मनुष्य हे वरुण तू मेरी घोहियोंको मलकर दग्ध न होय तो शुद्धिको सत्यसे रक्षाकर इस प्रकार जलकी प्रार्थना माप्त होता है यदि लोहका पिंड अष्टम मंह- करे-उदकके स्थान नारदने ये कहेहैं लसे पहिलेही गिरपडै और जलने वां न जल- 1 गंधमाल्यैः सुरभिभिर्मधुनीरघृतादिभिः । वर. भेमें संदेह होयतो लोहेके पिंडको लेकर गाय प्रकुर्वीत पूजामादी समाहितः ।। धुनः (दुवारा) गमन करे ॥१०॥ इत्यग्नि कारणं प्रोक्तं द्रव्यानां देहिनां तथा ॥ अतस्त्वं दर्शया- २ तोय व प्राणिना प्राणमुष्टेरायं तुनिर्मित मुद्धेश्व स्मानं शुभाशुभपरीक्षणे। सत्येनमाभिरक्षत्त्वंवरुणेत्यभिशाप्यकम् । ३ नदीपु तनुवेगासु सागरेषु वहेषु १ । हृदेषु नाभिदनोदकस्यस्यगृहीत्वोरूजलंविशेद देवखा तेषु तहागेषु सरस्सु च । विधिः॥
(२५२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । कि सूक्ष्म जिनका वेगहो ऐसी नदी सागर योजना-समकालं गते तस्मिन् जविनिए- वह हद (कुंड) देवखात (पुष्कर आदि) कस्मिन्पुरुषे सति अन्यः (शरपातस्थानस्थः) तडाग और सरोवर- तैसेही पितामहमें जवी नरः मुक्तं इथं आनीय चेत् (यदि ) भी कहेहैं कि स्थिर जलमें गोता लगावे निमनांगं पश्येत् तर्हि शुद्धिं आमुयात् ॥ और जिसमें ग्राहहो वा अल्पजल हो तात्पर्याय-निमज्जनके समान कालमें । उसमें न लगावे तृण और 'शिवालसे ( डूबतेही) एक पुरुष वेगसे जब वाणके -रहित जलौका ( जोंक ) और मत्स्यसे संगचले और जहां बाण गिर वहां स्थित वर्जित जलमें और देवखातके जलमें | अन्य वेगवाला मनुष्य पहिले छोडेहुये बा- शोधन कर-ओर जो जल आहार्य हो अ- णको लाकर जलमें डूबेहुये अपराधीको यदि र्थात् तडाग आदिमे लाकर तामेके कडाह देख तो अपराधी शुद्ध होताह-यहां यह, आदिमें रक्खाहो उसको ओर अधिकवेग- घातकही समझनी कि तीन बाणोंके छोडने-' वाली नदीओंको सदेव वर्जदे-और जिसमें | पर एक वेगवाला मनुष्य मध्यम शरके पार तरंग और कीच नहो ऐसे जलमें प्रवेश करे | तस्थानमें जाकर और शरको लिये वहाही और नाभितक जलमें टिका हुआभी यज्ञके खडा रहे और अन्य वेगवान् पुरुष वाणके वृक्षकी धर्मस्थूणा (थूनी )को पकडकर छोडनेके स्थानमें तोरणके नीचे स्थितरहै- पूर्वाभिमुख स्थित रहे क्योंकि यह स्मृति है | इस प्रकार ये दोनों जव स्थितहो जाय तब कि धर्मकी स्थूणाको ग्रहण करके जलमें तीसरी करतालीके बजानेपर शोध्य मनुष्य पूर्वको मुख किये खडारहे ॥ जलमें ढूंचे-उसी समय तोरणके मूलमें, भावार्थ हे वरुण तू मेरी सत्यसे रक्षा कर स्थित मनुष्य बढे वेगसे मध्यम बाण जहां इस प्रकार जलकी प्रार्थना करके और गिरहो वहां जाय और उसके वहां आतेही नाभिमात्र जलमें खडेहुये किसी अन्य शरमाही ( वाणवाला) दूसरा वेगवाला म- मनुष्यकी जंघाको पकडकर जलमें प्रवेश कर नुष्य बडे वेगसे तोरणके मूलमें आकर यदि (डूवै) ॥ १०८ ॥ अपराधीको जलमें अंतर्गत (डूबा) न देखें। समकालमिघुमुक्तमानीयान्योजवीनरः । तो अपराधी अशुद्ध होताहै-यही सब पिता महने स्पष्ट कियाहै कि जानेवालेका गमन गतेतस्मिन्निमग्नांगंपश्येच्वेच्छुद्धिमानुयात् । और कर्ताका जलमें मज्जन एककालमेंही पद-समकालं २ इयूं २ मुक्तं २ आनी- दोनों होतेहैं-वेगवाला मनुष्य तोरणके या अन्यः १ जवी १ नरः १ गते ७त- मूलसे लक्ष्य (निशाना )के स्थानमें जाय स्मिन् ७ निमग्नांगम् २ पश्येत् क्रि-चेत् उसके जातेही दूसराभी वेगसे- बाणको शुद्धिं २ आनुयात् कि- लेकर उसी-तोरणके भूलके समीप स्थिरताये निमजेत्तु नग्राहिणि न चाल्पके ॥ त. आवे जहांसे वह पुरुष. गयाथा-आयाहुआ शैवालरहिते जलौकामत्स्यवजिते ॥ देवखातेषु य. १ गंतुश्चापिच कर्तुश्च सम गमनमत्रनम् । गच्छे. तोयं तस्मिनकर्यादिशेधनम् । आहर्य दर्जयेन्नित्यं | तोरण मूलातु लक्ष्यस्थानं जवनिरः । तस्मिन्गते शीघ्रगामु नदीषु च ॥ आविशेसलिलं नित्यममिपंकवि | द्वितीयेपि वेगाादाय सायकम् । गच्छेद्योरणमलतु यतः सपूरुषोगतः । आगतस्तु शरमाही न पश्यति यदा २ उदफे प्रामुखस्तिष्टेद्धर्मस्थूणां प्रगृह्य छ । | जले। अंतर्जलगवं सम्यक्तदा शुद्धि विनिर्दिशेत् । जिते । न व्यवहराध्याय दिव्यमकरण (२५३). बाणका ग्राही यदि जलमें न देखें तो अशु- बाणभी वाशके हों और अग्रभागमें लोहा न द्धिको और जलमें देखे तो शुद्धिको कहै- लगाहो ऐसे बनवाने क्योंकि यह स्मृति और वेगवाले पुरुषोंका निर्धारण (निर्णय) है कि जिनके अग्रभागमें लोहा न लगाहो नारदेने कियाहै की पचास दौडनेवालोंमें जो ऐसे वाशके बाणोंको शुद्धिके अर्थ बनाये वेगसे अधिक दो? वे चाणके लानेके | और फेंकनेवाला दृढतासे फैक-और लिये नियुक्त करने और तोरणभी जलमें | फेंकनेवालाभी क्षत्रियहो वा क्षत्रियकी वृत्ति- डूबनेके स्थानसे समीपमें शोध्य मनुप्यके वाला ब्राह्मणहो और जिसने उपवास कियाहो कानकी बराबर बनवाना क्योंकि नारदकी | वह नियुक्त करना-सोई कहाँ है कि फेंक- स्मृति है कि उस जलके स्थानमें जाकर | नेवाला क्षत्रिय वा क्षत्रियवृत्ति ब्राह्मण- सम (इकसे) भूमिके भागमें कानको | जिसका हृदय दूर नहो-जो शांतहो-जिसने बराबर ऊंचा तोरण बनावे-और तीनों | उपवास कियाहो-वहीं बाणोंको फेंके-तीन बाणोंका और वशिके धनुषका मंगलके , बाणोंमें छोडनेपर मध्यम बाण ग्रहण करना- भेत गंध पुप्पोंसे पहिले पूजन करके अन्य | क्योंकि यह वचन है कि छोडेहुये शास्त्रोक्त कर्मको करे यह पितामहनें कहा है - उन बाणों में बलवान् मनुष्य मध्यम बाणको धनुषका प्रमाण और लक्ष्यका स्थान नॉर ग्रहण करे-वहभी पडनेके स्थानसे लाना ने कहा है कि सात अधिक सौ अंगुल | सर्पण (सरकना) स्थानसे नहीं क्योंकि सका प्रमाणहो वह क्रूर और छः अधिक | यह वचन है कि बाणके पडनेको ग्रहण करे सोतक मध्यम-और पांच अधिक सौतक सर्पणको वर्जदे-क्योंकि सर्पता २ वाण बहुत भंद होता है-यह धनुषकी विधि लाननी- दूर चला जाता है और पवनके चलते मध्यम धनुषसे तीन वाण फेंकने और और विषम आदि देशमें चाणको न छोड़े- देदसौ १५०हाथपर बुद्धिमान मनुष्य लक्ष्यको क्योंकि यह पितामहका वचनें हैं कि अत्यंत बनाकर न्यून वा अधिकपर बाणोंको जो पवनके चलते और ऊंची नीची भूमिमें फेंके उसको दोप होता है-अर्थात् सात और बहुत वृक्षोंके स्थान में जहां तृण गुल्म अधिकसी अंगुलके यारह अंगुल ऊपर लता वल्ली पंक वा पाषाण हों वहां बुद्धिमान चार हाथ होते हैं वही क्रूर धनुषका प्रमाण हे मध्यमका दश अंगुल ऊपर और मंदका | मनुष्य बागको न फेंके, शोध्यको आनकर नौ अंगुल ऊपर चार हाथ होता है-और शराथानायसामांस्तु प्रकुर्वीत विशुद्धये । वेगु १ पंचाशतो धावकामा यो स्यातामधिको जोती | काण्डमयांश्चैव क्षेप्ता तुमुदक्षिपेत् । च तत्र नियोक्ता न्यौ शरानयनकारणात् । २ क्षेप्तान क्षत्रियः प्रोक्तस्तवृत्तिामणोपिवा । भ २ गत्वातुतज्जलस्थानं तटे तोरणमुच्छितम् । फरहृदयः शांतः सोपवासस्ततः क्षिपेत् । कुर्वीतकर्णपात्र तु भूमिभागे समे शुचौ ॥ ३ तेषांच प्रेषितानां च शराणां शास्त्रचोदनात । ३ शरान्सपूजयेत्पूर्व वैणवं च धनुस्तथा। मंगलैधुप | मध्यमस्तु शरोपाह्याः पुरुषेणवलीयसा । पुष्पेश्च ततः कर्म समाचरेत् ॥ ४ शरस्य पतनं पाह्य सर्पगन्तु विवजयेत् । सर्पन् vt धनुः सतशत मध्यम पदात स्मृत्त । मदं सर्पन गरोयायादातरयतः॥ पंचशत शेयमेषज्ञेयो धनुविधिमाध्यमेन च चान प्रक्षित ५\न पक्षिद्विात्मायते चातिवायनि । विषमे पेत्तु शस्वयं हस्तानातुशते साढ़े लक्ष्य कृत्वा विचक्षणः। | भूमदेशेच वृक्षस्थानामामुले ॥ तृणगुल्मटतारली पे. न्यूनाधिकेतु दोषः स्यात् क्षिपतस्सायकांस्तथा । कपाषाणासंयुते । .
(२५४) याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षराप्रकाशसहित ! डूबाहुआ देखें तो शुद्धिको प्राप्त होता है | फटकारचुके तब एकवार गमन और यह कहने से यह दिखायाको शोध्य उन्म- जलमें डूचना और बाणका लाना होते हैं- जित अंग (जलसे बाहर) होयतो अशुद्ध भावार्य-डूबनेके समयमें जब वेगवान् होता है और अन्य स्थानके गमनमेंभी | एक पुरुप चलानाय तब दूसरा वेगवान नर पितामहने अशुद्धी कही है कि यदि एक छोडेहुये बाणको लाकर जलमें 'डूबेहुये अंगभी दीखजाय और जिस स्थानमें प्रथम | शोध्यको देखे तो वह शोध्य शुद्धिको प्राप्त प्रवेश कियाहो उससे अन्यत्र गमन करे तो होता है। १०९ । इत्युदकविधिः ॥ शुद्धि नहीं होती और एक अंगका दीख- नाभी कर्ण आदिका लेना क्योंकि यह विशेष खंविषब्रह्मणःपुत्रःसत्यधर्मव्यवस्थितः । वचने है कि जिसका जलके प्रवेशमें केवल प्रायस्वास्मादभीशापात्सत्यनभवमेमृतम् । शिर दोखे कान और नासिका न दीखें उस पद-त्त्व१ विप १ ब्रह्मणः ६ पुत्रः १ सत्य- कोभी शुद्ध कहै-यहां प्रयोगकी विधिका धर्म व्यवस्थितः १ त्रायस्व क्रि-अस्माद्- यह क्रम है कि पूर्वोक्त जलस्थानके समीप अभीशापातर सत्येन३ भव क्रि-में पूर्वोक्त तोरण बनाकर कहा है प्रमाण | अमृतम् १ ॥ जिसका ऐसे देशमें लक्ष्य (निशान )को एवमुक्त्वाविषशाईभक्षयेद्धिमशैलजम् । रखकर तोरणके समीप मागसहित धनुषकी यस्पवेगविनाजीयेच्छुद्धिं तस्यविनिर्दिशेत पूजा करके और जलस्थानमें वरुणका आवा- हन और पूजन करके और जलके तीर धर्म पद-एवं-उक्त्वाऽ-विष२ शाई२ भक्ष आदि देवताओंकी हवनपर्यंत पूजा करके येत क्रि-हिमशैलजर यस्य वेगैः ३ विना- और शोध्य मनुप्यके शिरपर प्रतिज्ञापत्रको जीर्येत क्रि-तस्यशुद्धिंर विनिर्दिशेत क्रि- बांधकर हे जल तू माणीओंका प्राण है योजना-हे विष त्वं ब्रह्मणः पुत्रः सत्य, इत्यादि पूर्वोक्त मंत्रसे प्राड्विाक जलकी | धर्मे व्यवस्थितः असि अस्मात् अभीशापान प्रार्थना करे-फिर शोध्य मनुष्य हे वरुण मांत्रायस्व सत्येन मेअमृतंभव एवमुक्त्वाशा, सत्यसे मेरी रक्षा को इस पूर्वोक्त मंत्रसे | ईहिमशैलनं विषं भक्षयेत् यस्य वेगविना जलकी प्रार्थना करके ग्रहणकी है स्थूणा | विषं जीर्येत् तस्य शुद्धिं विनिर्दिशेत् ॥ जिसने और नाभिमात्र जलमै स्थित बल तात्पर्यार्थ हे विष तु ब्रह्माका पुत्र है वान् पुरुषके पास जाय-अब तीन बाण छोड- और सत्यधर्ममें स्थित है इस अपराधसे दियहों और जहां मध्यम बाण पडाहो वहां मेरी रक्षा कर और मेरे सत्यसे अमृतरूप हो मध्यम बाणको लेकर एक वेगवान् पुरुष इस मंत्र से विषको प्रार्थना करके हिमाचल स्थितहो और दूसरा तोरणके मूलमें स्थि- आदिके शिखरोंमें पैदा हुए विपको शुद्धिका तहो जब प्राशिवाक तीन हाथकी ताली / कर्ता भक्षण करे वह भक्षण किया विष वेगोंके बिना जीर्ण हो जाय-अर्थात् पच १ अन्यथा न विशुद्धिः स्यादेकांगस्यापि दर्शनात । जायतो वह कर्ता शुद्ध होताहै यहां विष वेगसे सानादान्यत्र गमनायस्मिन्पूर्व निवेदितः ।। . २शिरोमात्रं तुदृश्येत न करें नापि नासिका। एक धातुसे दूसरी धातुमें प्राप्ति इस वचनसे अप्मु प्रवेशने यस्य शुद्धं तमपि निति । १ धातोर्यात्वंतरपासि विषवेग इति स्मृतः।
व्यवहाराध्याय दिव्यप्रकरण.७ (२५५) कहींहै और स्वचा रुधिर मांस मेदा | इसप्रकार विषकी प्रार्थना करके दक्षिणाभि- अस्थि मज्जा शुक्र ये सात ७ धातु होतीहै मुख बैठे शोध्यपुरुषको विषदे क्योंकि और सात ही विपके वेग होतेहैं उनके नारदका वचन है कि ब्राह्मणोंकी समीप पृथक् २ लक्षण विष तंत्रमें कहेहैं कि पहला दक्षिणाभिमुख बैठे हुए मनुष्यको उत्तर विषका वेग शरीर में रोमांच खडी करताहै | वा पूर्वाभिमुख बैठा प्राडिवाक विष दे-और दूसरा स्वेद और मुखको शुष्क करताहे | विषभी वत्सनाभ आदि लेना-क्योंकि पिता- तीसरा और चौथा शरीरके वर्णका भेद और मईका वचन है कि सींग वत्सनाभ वा कंपको पैदा करते हैं-पांचमां वेग विवश हिमका विष दे और वर्जितभी ये विष कहेहैं होना और कंठका भंग और हुचकी पैदा किं चारित-जीर्ण-कृत्रिम भूमिमें उत्पन्न-इन करताहे-छठां वेग श्वास और मुहको और | सब विषोंको वर्जदे नारदजेभी कहाहै कि सातमा वेग भक्षण करनेवालेकी मृत्युको मुना चारित-धूपित-मिश्रित-कालकूट-अ- पैदा करताहे-यहां महादेवकी पूजा करनी लायु-इन विषोंको यलसे वर्जदे-कालभी सोई नारदनें कहा है-कियाहै उपवास जिसने | नारदने कहाहै कि तोलकर उस विषको ऐसा प्राविवाक धूप-उपहार (भेट ) और | समयपर दे जिसको कर्ता चाहे ओर मंत्रोंसे महादेवकी पूजा करके ब्राह्मण और शीतकालमें दे-और अपराह्न-मध्याह्न-सं- देवताओंके समीप विषको दे-उपवास ओर ध्या इनमें धर्मका ज्ञाता विपको नदे-अन्य- महादेवकी पूजाके अनंतर प्राड़िवाक शोध्य | कालमें तो पूर्वोक्त प्रमाणसे अल्पविषको दे- मनुष्यके आगे विषको रखकर और हवनप- | क्योंकि यह स्मृति है कि वर्षामें चार जौं यत धर्म आदिकी पूजा करके शोध्य मनु- भर-भीममें पांच जी-हेमंतमें सात जौं-और प्यके शिरपर प्रतिज्ञापनको धरकर विषकी | शरदऋतु में उससे भी अल्पमात्रा (छः जी) प्रार्थना करे कि हे विष तू दुगत्माओंको | कहीहै- हेमंतके ग्रहणसे शिशिरकाभी ग्रहण परीक्षाके लिए ब्रह्माने रचाहै पापीओंकी है क्योंकि इस श्रुतिमें हेमंत और शिशिरको मारदे और शुद्धको अमृतरूप हो-हे मृत्यु- | समान (तुल्य) कहाई-वसंतऋतुको सब रूप विष तू ब्रह्माने रचाहे इस मनुष्यकी | दिव्योंमें साधारण होनेसे उसमें भी सात नौं पापसे रक्षा कर और सत्यसे अमृतरूप हो- को मात्रा देनी-और विषभी पी मिलाकर १ बेगोरोमांचमाद्यो रचयति विषजः स्वेदवकोप १द्विजाना सन्निधावेव दक्षिणाभिमुख स्थिते । शोषौ तस्योरतत्परी द्वौ वधुषि जनयतो वर्णभेदन | उदमुखः प्राइमुखो वा विषं दद्यात्समाहितः । वेपौ ॥ यो पेग पंचमोसौ नयति विवशता कंठमग २ श्रृंगिणो वत्सनाभस्य हिमजस्य विषस्य वा। च हिको पछौ निश्वासमोही वितरति च मृति ससमो ३ चारितानि म जीर्णानि कृत्रिमामि तवच । मक्षकस्य भूमिजानिच सर्वाणि विपागि परिवर्जयेत् ॥ २ दयाद्विष सोपवासो देवत्रामणसन्निधौ । धूप ४ भृष्टच चारितं चैव भूपितं मिश्रितं तपा। काल- पहारमंत्रैश्च पूजयित्वा महेश्वरम् । कूरमलावूच विष यलेन विर्जयेत् । :३वं विश प्रम्हणा मृष्टं परीक्षार्थ दुरात्मनां ॥ पापा ५ तोलयित्वेप्सितं कालेदेपतद्धि हिमागमैना परा- मां पर्शयात्मानं शुद्धानाममृत भर ॥ मृत्युपूत्त विष ह्वेन मध्याहून संध्यायां तु धर्मवित् । त्वं हि ब्रह्मणा परिनिर्मितं । प्रायस्वैनं नरं पापारसत्ये. ६ वर्षे चतुर्यवा मात्रामीप्मे पंचयवा स्मृता । हेम. नास्यामृतभर। न्त मा सप्तयवा शरद्यल्पा ततापिहि ।।
(२५६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । देना क्योंकि नारदका वचने है कि छः पल | क्योंकि नारदका वचन है कि श्रृंग और विषका जो वीसवां भाग आठवें भागसे हीन | हिमवान्का विष गंध वर्ण और विषसे युक्त (कम) उसको घी मिलाकर शुद्धिके लिये रस अकृत्रिम असंमूढ (जिससे मोह नहो) दे-अर्थात् चार सुवर्णका पल होताहै और और जो मंत्रसे उपहत,नहो वह विष श्रेष्ठ उसका छठा भाग दशमाष और दश यव होताहै तैसेही विष पीनेके अनंतर इतने पंच होतेहैं तीनजीका एक कृष्णल और पांच शत ( ५०० ) करतालिका दे तबतक कृष्णलोंका एक माष-अर्थात् पंद्रह १५ यव उसकी प्रतीक्षा कर उसके अनंतर चि- एक मापमें होतेहैं इस प्रकार दशमाषोंके | कित्सा करने योग्यहे-सोई नारर्दनें कहा सार्द्धशत (१५०)जों होतेहैं और दश जो वे जो कि पांचसो ५०० करतालीके कालतक पहिले पलके छठे भागमें दशमापोंके उपर शोध्य पुरुष निर्विकार होय तो शुद्ध होताहै कह आये हैं ऐसे षष्ट्यधिक शत (१६०)| उसके अनंतर उसकी चिकित्सा करै-पि. जौ पलके छठे भागमें होतेहैं और उसके | तीमहने तो दिनका अंत अवधि कहा वीसमें भागमें आठ जौं हुए उसका आठमां | वह अल्पमानाके विषयमें समझाकि भक्ष- भाग ऊन (कम) करनेसे सात जो रहे उतने | णके अतर मूर्ग और छर्दि (वमन): विपको घी मिलाकर शोध्यको दे-और | रहित दिनके अंततक रहैतो उसको विपसे तीसगुणा धी मिलाव-क्योंकि यह | शुद्ध कह-यहां यह क्रम समझा कि प्राडि कात्यायनका वचन है कि पूर्वारके समय वाक उपवास और महादेवको पूजा शोध्यदे: शीतलदेशमै देहधारियोंको विषदे और आगे विषका स्थापन करके धर्म आदि तीस गुने घृतमें पीसकर स्वच्छ विषको | कोंका पूजन और शोध्यके शिरपर प्रतिज्ञा मिला दे और शोध्य मनुप्यके कपटी पत्रको रखकर और विषकी प्रार्थना करक- आदिकोंसे रक्षा करें क्योंकि यह पितामहका दक्षिणाभिमुख बैठे शोध्यको विष दे-औरवह वचन है कि तीन वा पांचरात्रितक अपने शोध्यभी विषकी प्रार्थना करके भक्षणकरे। पुरुषोंसे युक्त दिव्यकरनेवालेकी कंपटी भावार्थ-हे विष तू ब्रह्माका पुत्र है और आदिकोंसे राजा रक्षा करें और औषधी सत्यधर्ममें स्थितहै और इस अपराधासे मंत्रके योग मणि जो विषको दूरकरनेवाले हैं | मेरी रक्षाकर और सत्यसे अमृतरूप हो इस उनकी और कर्ताके शरीरकी दशाकी गुप्त- | प्रकार विषकी प्रार्थना करके हिमाचलक तिसे रक्षा कर-तसेही विषकीभी रक्षा करे- | शिखरआदिसे पैदाहुए विपको भक्षण करें जिसका विष वेगोंके विना जीर्ण होजाय १ विषस्य पटपट् मागान् भागो विशतिमस्तु यः । अर्थात् पच जाय उसको शुद्ध कहै।।११०॥ तमरमागहीनन्तु शोध्ये दयाद् घृतयुतम् ।। ॥ १११ ॥ इति विषविधानम् ।। २ पूर्वाशीतले देशे विदेयं तु देहिनां घृते नि १ शाई हेमवतं शस्तं गवर्णरसान्वितं भकत्रिम- योजित शिक्षण पिष्टं त्रिंशद्गुणान्वितम् ॥ मसमूहममत्रोपहत च यत् ॥ ३ बिरा पररानं या पुरस्वरधिष्टितं । फुह २पंचतारिशत कालं निर्विकारो यदा भवेश । कादिमामामा रक्षदिल्यकारिण। धीमप्रयोगांथ तदा पवति सशुदः ततः पुचिकित्सितं ।। मजनिय गिरान् । फर्नुः शरीरसंस्थास्तु दो ३ भक्षितेतु यदा सस्यो माछीदेविजितः। पमाना। निर्विकारोदिनस्यांत गुदं तमपि निर्दिशेत् ॥
व्यवहाराध्याय दिव्यप्रकरण ७ (२५७) देवानुमान्समभ्यय॑तस्नानोदकमाहरेत् । ताओंकेभी आयुधोंको स्नान करावे-इति दे- संश्राव्यपाययेत्तस्माज्जलंतुमसृत्तित्रयम् ॥ वता नियमः-अब कार्यके नियमको कहते हैं कि विस्तंभ (विश्वास) सब प्रकारकी शंका- पद-देवान् २ उग्रान् २ समभ्यर्व्य- तत्स्नानोदकं २ आहरेत् क्रि-संश्राव्या-पा- सदेव कोशको दे- इति कार्यनियमः अन संधिका कार्य इनमें चित्तको विशुद्धिके लिये ययेत् नि-तस्मात् ५ जलं रतु-प्रमृतित्रयंक अधिकारियोंको कहते हैं कि उपासेको योजना-उमान् देवान् समभ्यर्च्य-तत्स्ना- पूर्वाद्ध में और स्नान किये आई वस्त्रधारी- नोंदक आहरेत् तु पुनः संश्राव्य तस्मात् । सशूक (आस्तिक )को व्यसनसे रहि- प्रसूतित्रयं जलं प्रादिवाकः पाययेत् ॥ तको कोशका पान कहाहै और मदिरा तात्पर्याय-दुर्गा आदित्य आदिकोंका पीनेवाला-स्त्रीव्यसनी-कितव (कपटी) नान और गंध पुष्प आदिकोंसे भली प्रकार | और जो नास्तिकहै इनको कोश न दे- पूजन करके उनके स्नानके जलको लेकर और महापगध ( महापातक ) निर्धर्म और हे जल तू प्राणियोंका प्राण है इस (वर्ण आश्रमसे रहित) कृतम नपुंसक- पूर्वोक्त मत्रसे प्रादिवाक उसकी प्रार्थना करे कुत्सित ( निंदित ) नास्तिक-नात्य और जय शोध्य उस जलको दूसरे पात्रमें ( जिनका समयपर जनेऊ न हुआहो ) करके हे वरुण तू मेरी सत्यसे रक्षा कर दाश ( धीवर ) इनको कोश न पिलावे-इति त मंत्रले प्रार्थना करले तव तीन प्रसूति अधिकारनियमः तैसे गोमयका मंडल (अंजाल ) जल पिलादे यहभी तब पिलावे रचकर और शोध्यको सूर्यके संमुख बैठा- जब ये सब साधारण कर्म करलिये हों कि कर पिलावे यह बात नारदके वचनसे जा धर्मका आवाहन सब देवताओका पूजन ननी सोई कहाहै कि उस अपराधीको दु- होम मंत्राँसाहत प्रतिज्ञापत्रका स्थापन- लाकर महामंडलमें आदित्यके संमुख यहां स्नान कराने योग्य देवताकार्य और | करके तीन प्रमृत्ति जलको पिलावे अधिकारी इन तीनों का नियम पितामह आदिकोनें कहाहै कि जो मनुष्य जिस देव- भावार्थ-देवताओंकी स्नान और पूजा ताका भक्तहो उसका ही जल उसको पि-करके उनके स्नानका जो जल उसको ले लावे यदि देवताओंमें समान भाव होयतो। और उस जलमंसे अभिमंत्रण ( प्रार्थना ) मूर्यका पिलावे-चौर और शस्त्रसे जो जीबैं १विप्नभेसर्पशंकामु सधिकार्य तथैव च । प्यु कोशः उनको दुर्गाका पिलावे-और सूर्यका जल प्रदातव्यो नित्य चित्तविशुद्धये ॥ ब्राह्मणको न पिलावे-दुर्गाके शुलको स्नान १ पूर्वाह्ने सोपवामस्य स्नातस्याई पम्य च ॥ सश- करावे और सूर्यके मंडलको और अन्य देव- कस्याव्यमनिनः कोशपान विधीयते ॥ मापनी- भक्तो यो यस्य देवस्य पाययत्तस्य तजल । सम- व्यसनिना कितवानां तथैव च । कोशः पाइने भावे तु देवानामादित्यस्य तु पापयेत् ।। दुर्गायाः | क्षतव्यो वे च नास्तिकवृत्तयः ।। महापराये निर्धर्म पाययेचौरान ये च शस्रोपजीविनः । भास्करस्य तु इतन्ने लीवकुत्सिते । नास्तिकवायदासपु कोशपानं यत्तीय ब्राह्मणं तन्न पायर्यतु ।। दुर्गायाः नापयेच्छल-विवर्जयेत् ॥ मादित्यस्य तु मण्डल। अन्येषामपि देवानां नापये ३ तमाहूयाभिशस्तं तु मंहलाभ्यंतरे स्थितम् । आदित्याभिमुख कृत्वा पाययेत्यमृतित्रयम् ॥ दायुधानि तु ॥ १७
(२६०)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
उनके पर पंचगव्य छिडककर शुक्ल पुप्पोंसे कि ब्राह्मणोंको सत्यको क्षत्रीको वाहन
धर्मकाऔर कृष्ण पुष्पोंसे अधर्मकाऔर चंद- और आयुधोंकी वेश्यको गौ वीज सुवर्णकी
नसे दोनोंका पूजन कर ऐसे करके उन दोनों और शूद्रको सब पातकोंकी सौगंद दे-
को गोमय वा मिट्टोके पिण्डपर स्थापन कर उन और यहां शुद्धिका निश्चयभी मनुनें कहाहै
दोनों पिण्डौंको मट्टीके नवीन पात्रमें इस कि जिसको राजा वा देवसे घोर दुःख न
प्रकार ढककर रख लिये हुए शुद्ध देशमें हो वह शपथमें शुद्ध जानना कालका नियम-
देवता और ब्राह्मणोंके समीप देवता और भी एक रात्रसे तीन रात्रतक और तीन
लोकपालोंका आवाहन करे-और धर्मका रात्रसे पांचरात्र न कहै यह एकरात्र आदि-
आवाहन करके प्रतिज्ञापत्रको लिखें फिर भी कार्यका लाघव और गौरव देखकर
अपराधी इस प्रकार प्रार्थना करे कि यदि में जानना इस प्रकार जब दिव्योंसे जय पराण-
पापसे मुक्त हूं तो मेरे हाथमें धर्मआओ और यका निश्चय हो जाय तब दंड विशेषाभी
अशुद्ध हूंतो पापआओ-पहेकर अभियुक्त कात्यायनने दिखाया है कि शुद्ध मनुष्य
मनुष्य उन पिंडों से शीघ्र एक पिंड ग्रहण करे | पैसे पचास दिलाव और अशुद्धको दंड
यदि वह धर्मको ग्रहण करले तो शुद्ध और वह दंड यह है कि विष जल अग्नि तुला
अधर्मको ले तो अशुद्ध होताहे इस प्रकार कोश तण्डुल तप्तमाय इन दिव्योमें सही
संक्षेप धर्म-अधर्मकी परीक्षा कही ।।
पट्शत- पंचशत- चार तीन दो ए
इति धर्माधर्मविधिः ॥ क्रमसे दंड होता है और अल्प अपराधों में
अन्यभी शपथ (कसम ) द्रव्यके अल्प
अल्प दंडकी कल्पना करै-निवमें साक्षि --
और महत्त्वमें और विशेषजातियों में मनुआ- योसे सिद्ध किए धनको राजा दियावे इस
दिकनि कईई-जैसे कि एक निक अभि- । उक्तदंडके संग इस दिव्यदंडका समुच्चय;
योग, सत्यवचन दो निष्कके अभियोगमें समझना।
चरणोंका स्पर्श तीन निष्कस पहिले पहिले
पुष्यका शपथ दे इससे पर कोशपान कराव कानाथ राष्ट्र सर्वस्तु पानकः ।
१ सत्येन शापपेदित क्षमियं वाहनायुधः । गोत्री
मनुने (म. ८ भी० ११३) कहाँद
२ नमातिमृति क्षिप्र स देयः शापये शुचिः ।।
१ अभिसापायक प्रदीताक्लिपितः । धमें ३ शताई दागदपादो देरमाग्भवेत् /
एते शुदा स्वादयतु महावा ॥ए समामत. मोन ४ विप तोये हुताशेप तुलायोसे पतले ॥ सप्त
पनपक्ष ।
मारकादियो न समार प्राप्त ॥ सहायं पर शतं
२णि मस्तपन दिनिक पादलभन । भा तथा पर तानिया पतरियाई च दीनं
विश पुत्र रालोशनमल पा ॥
का
.
इति दिव्यप्रकरणम् ॥७॥
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण.८, (२६१) . . . अथ दायविभागप्रकरणं.८ प्रकार और कोन-इनका निरुपणतो तहां २ श्लोकके व्याख्यानमेंही कहेंगे-यहां तो इतना मानुष और देवभेदसे दो प्रकारका प्रमाण विचारते हैं कि विभाग किसका होताहै क्या.. वर्णन किया अब योगमूर्ति याज्ञवल्क्य ऋषि | विभाग करनेसे धनमें स्वत्व पैदा होताहे वा दायके विभागका वर्णन न करतेहैं वहां स्वत्ववाले धन काही विभाग होताहै-अर्थात् दायशब्दसे वह धन कहा जाताहै जो धन पुत्र आदिका जन्मसे ही उस धनमें स्वत्वथा : स्वामीके संबंध निमित्तसेही अन्यका स्व | उसमें प्रथम स्वत्वकाही निरूपण करते हैं (धन) हो जाय, वह दाय दो प्रकारकाहे | क्या स्वत्व एक शास्त्रसेही जाना जाताहे एक-अप्रतिबंध-अर्थात् जिसको कोई रोक वा किसी प्रमाणांतरसेभी जाना. जाताह न सके दूसरा सप्रतिबंध अर्थात् जिसका उनदोनों में शास्त्रसेही जाना जाताहै . यही कोई प्रतिबंधक हो-उनमें पुत्र और पौत्रोंका युक्त है क्योंकि यह गौतमका वचन है कि पुर्वरूप और पीत्ररूपसे पिता और पिता- रिक्थ (हिस्सा) क्रय ( मोल लेना) महके धनमें स्वत्वहै वह अप्रतिबंध दाय | संविभाग (वॉटना ) परिग्रह (प्रतिग्रह) होताहै क्योंकि उसको कोई हटाय नहीं अधिगम ( गढाधन मिलना इनमें ) स्वामी सेकता और पितृव्य और भ्राता आदिकोंका | होताहे-और ब्राह्मणको प्रतिग्रहसे मिला पत्र और पिताके अभाव मेंही स्वत्व हो । क्षत्रियको विजयसे वैश्यको. व्यापार भकताहै इससे पुत्रका होना और स्वामीका | और सेवासे मिले हुएम स्वत्व होताहै- होना उसके स्वत्वमें प्रतिबंधक है इससे यदि स्वत्व ( अपना हो जाना ) प्रमाणा- पितृव्यरूपसे और भ्रातारूपसे जिसमें स्वत्व तरसे जाना जाता तो यह वचन अनर्थक हो वह सप्रतिबंध दाय होताहे इसी प्रकार | हो जाता तैसेही यदि स्वत्व लौकि- उनके पुत्र आदिमॆभी समझना विभाग क होता तो अर्थात् लोकसे जाना जाता तो इसका नाम है- कि अनेक हे स्वामी मर्नुने (अ.८-श्लो.१४०९) में यह जो दण्ड जिसमें ऐसे द्रव्यसमुदायके विषयोंमसे जो कहा है कि जो ब्राह्मण यज्ञ कराने वा पदाने- स्वामीयोंके एकदेशमें द्रव्यकी व्यवस्था सेभी उससे धन लेनेको इच्छा करे जो दाता विभाग कहाती है-इसी अभिप्रायसे नारदने और दायका भागी न होय वहभी चौरके स- कहाहे कि पिताके धनका विभाग जहां पुत्र और यदि स्वत्व लौकिक होता तो मेरा स्त्र मान है यह दंडका विधानभी संगत न होगा करै वह दायभाग नामका व्यवहार पद् इसने चुराया है यह कोई नहीं कहता क्यों बुद्धिमानोंने कहाहै-इस वचनमें पिनृपसे कि चुरानेवालेकेही हाथमें होने से उसकाही स्वत्वके संबंधी और पुत्रपदसे निकटके स्वत्व प्रतीत होता है अन्यथा स्व अपनाही वर्ती समझने-यहां यह निरूपण करनेयोग्यहे कि किसकालमें किसका किसप्रकार और १ स्वामी, रिक्ययसंविमागपरिपहाऽधिगमेषु कोन विभाग करें-उनमें किसकालमें किस ब्राह्मणस्याधिक लय क्षत्रियस्य विजितं निर्वि वैश्यशयोः ।। विभागोर्थस्य पित्र्यस्य तनपर्यन कल्प्यते । २ योऽदत्तादायिनो हस्तालिप्सेत ब्राह्मणो धन । दायभाग इति प्रोक्त व्यवहारपदं बुधः ॥ याजनाध्यापनाद्वापि यथा स्तेनः तथैव सः॥ .
(२६२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराम्रकाशसहित । इस चौरने चुराया है यह कहसक्तेथे इससे | प्रवृत्ति नहीं होगी-तिससे विरुद्ध कहनेवाले चुरानेवालेका धनमें स्वत्व नहीं होसकता। यह किसीने प्रलाप ( अनर्थ ) कहा कि क्यों कि शास्त्रमें नहीं कहा है और ऐसेहि व्यका अर्जन स्वत्वको पैदा नहीं करता- यहभी संशय सुवर्ण और रजत आदिके तैसेही सिद्धांतमेंभी स्वत्वको लोकिक मान- स्वरूपक समान नहीं होगा कि इसका स्व कर विचारका प्रयोजन कहा है इससे पुरु- है वा अन्यका है तिससे स्वत्व केवल शा- पको नियम अतिक्रम (अवलंघन ) है ऋतु स्त्रसेही जाना जाता है-इसमें हम यह कह- ( यज्ञ )का नही पूर्वोक्त गुरुवचने अर्थ ते हैं कि स्वत्व लौकिक है क्यों कि लौकि- इस प्रकार किया है की जय द्रव्यसंचय । क प्रयोजन और क्रियाओंका साधन है- | नियम ऋतुके लिये हैं तब नियंमसे संचितर शास्त्रसे जानने योग्य आहवनीय आदि द्रव्यसे ही क्रतुकी सिद्धि होती है औध- अग्निहोत्र लौकिक क्रियाके साधन नहीं | नियमके अवलंघनसे सांचित किए द्रव्यमी होते इससे वे लौकिक नही, कदाचित् | ऋतुकी सिद्धि नहीं होती पूर्वपक्षमें नियमक्य कोई शंका करै कि आहवनीय 'आदिभी , अवलंघनका दोप पुरुषको नहीं होता सिद्ध पाक आदिके साधन होनेसे लौकिक हैं सो- | द्धांतमें तो द्रव्यसंचयका नियम पुरुषको ठीक नही क्यों कि वे आहवनीयरूपसे लिये उसके अवलंघनसे संचित किया जो पाकके साधन नही किंतु प्रत्यक्ष देखने | धन उससेंभी ऋतुकी सिद्धि होती है केवला योग्य आग्ने आदिरूपसे है यहां तो सुवर्ण पुरुषको नियमके अवलंघनका दोष होता आदि धन सुवर्ण आदिरूपसे क्रयसाधन है नियमके अवलंघनसे संचित किए । नही किंतु स्वत्वसे है-क्यों कि जिसका जो व्यमेंभी स्वत्व माना है न मानोगे तो क्रतुकस स्व नहीं होता वह उसकी क्रय आदि अर्थ सिद्धि नहीं होगी कदाचित् कोई शंका करें) क्रियाको सिद्ध नही करसक्ता-और जिनाने कि चौरी आदिसे प्राप्त हुए धनमेंभी स्वत्व शास्त्रका व्यवहार नहीं देखा उन प्रत्यन्त- हो जायगा सो ठीक नही क्यों कि चौरी आ- वॉसी (ग्रामीण आदि )यामेभी क्रय विक्र- | दिसे प्राप्त हुए धनसे स्वत्व लोकमें प्रसिद्ध य (लेनदेन) आदिके देखनेसे स्वत्वका व्य- नहीं क्यों कि चारिमें व्यवहारका विसंवाद पहार देखते हैं और नियत है उपाय जिस- है इस प्रकार प्रतिग्रह आदि है उपाय जि का ऐसा स्वत्व लोकसिद्ध है यह न्यायके के एसा स्वत्व जब लौकिक है वहां अदृष्ट ज्ञाता मानते हैं-सोही दिखाते हैं लिप्सासूत्र- के लिये यह नियम है कि ब्राह्मणके प्रति- के तृतीय वर्णकमें द्रव्याजन (द्रव्यसंचय) मह आदि और क्षत्रियके विजित आदि के नियमोको क्रत्वर्थ मानोगेतो स्वत्वही न | और वेश्यके कृषि आदि और शूद्रके शुश्रुपा- होगा क्योंकि स्वत्व अलौकिक है-इस आदि उपाय है और पूर्वोक्त गौतमवचनमें पूर्वपक्षके असंभवकी आशंका करके गुरुनें कहे हुए-रिक्थ-क्रय-संविभाग-परिग्रह- यह पूर्वपक्ष समर्थित (पुष्ट ) किया है कि अधिगम-जो सबके लिये साधारण उपाय प्रतिप्रह आदिसे द्रव्यका जो अर्जन वुह है उनमें अप्रतिबंध दायको रिक्थ कहते हैं स्वत्वका साधन लोकमें प्रसिद्ध है और द्रव्यके अर्जनको क्रत्वर्थ (यज्ञार्य) मा १द्यार्जननियमानां कलर्थले स्वत्वमेव न स्या- नोगे तो स्वत्वहीन होगा इससे यज्ञकाभी | रस्वत्वस्यालौकिकत्वात् ॥
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२६३) क्रय ( मोल लेना) संविभाग (सप्रतिबंध होतेहैं इस वचनसे केवल शास्त्रसिद्धभी दाय ) नहीं है अन्य स्वामी पहिले जिस्का | स्वत्वहै तोभी निंदित असत्प्रतियह आदि ऐसे जल तृण काष्ठ आदिके स्वीकारको और व्यापार आदिसे जो मिलाहो उसमें परिग्रह कहते हैं-निधि आदिकी प्राप्तिको स्वत्वही नही होसकता इससे वह धन अधिगम कहते हैं-ये सब निमित्त होयतो पुत्रोंके विभाग करने योग्य ही नहीं और स्वामी जाना जाता है और प्रतिग्रह आ- जब स्वत्व लौकिकहै तब असत्प्रतिग्रह दिसे मिलेमें ब्राह्मणका और विजय और आदिसे मिले भी स्वत्व होनेसे उसके पुत्रोंको दंड आदिसे मिलेमें क्षत्रियका और कृषि वह विभाग करने योग्यहीहै-उसके त्यागते गोरक्षा आदिसे मिलेमें वैश्यका और द्विजों- शुद्ध होते हैं यह प्रायश्चित्त संचय करने- की सेवा आदिसे मिलेमें शूद्रका असा- | वालेकोही है-उसके पुत्रोंको ता वह दाय है 'धारण स्वत्व होता है इसी प्रकार अनु- | इससे ही स्वत्व होनेसे पुत्रोंको दोपका संबंध लोमज और प्रतिलोमजके जो जगत्में नहीहै-यह मनु (अ० १० श्लो० १५) काभी प्रसिद्ध स्वत्वके हेतु हैं उनमें जो २ असा- वचनहै कि धन आनेके सात उपाय धर्मसे धारण कहा है कि जैसे कि सूतोंको अश्व- हैं कि दाय-लाभ-क्रय-जय-प्रयोग-और का सारथ्य वह सब पूर्वोक्त गौतमके वचनमें कर्मयोग और श्रेष्ठ प्रतिग्रह-अब यह सं- कहे निर्दिष्ट शब्दसे लिया जाता है क्यों देह शेष रहा कि विभाग किये पीछे स्वत्व कि वह सब भृतिरूप है और विकाण्ड होताहै अथवा विद्यमानहे स्वत्व जिसमें कोशेमभी लिखा है कि भृति और भोगको ऐसे धनका विभाग होताहै उनमें विभागसे निर्वेश कहते हैं-वह सवपूर्वक्तिोंका असाधार- स्वत्त्व होता है यही युक्तहै क्योंकि जात (पैदा- ण स्वत्वका हेतु जानना और जो पुत्रहीन मनु- हुये ) पुत्रका आधान कहाहै यदि जन्मसेही प्यके पत्नी दुहिता आदि क्रमसे स्वामी होते स्वत्व होता तो पैदाहुये पुत्रकाभी वह हैं वहांभी स्वामीके संबंधीरूपसे बहुतसे साधारण धन है इससे धनसे साध्य आधान दायके विभागी प्राप्तथे लोकसे प्रसिद्धभी आदिमें पिताका अधिकार न होगा-तैसेही स्वत्व में व्यामोहनिवृत्तिके लिये यह वचनहै विभागसे पहिले पिताको प्रसन्नतासे जोधन की पत्नी दुहिता आदिही होते हैं अन्य नही- किसी पुत्रको मिलाहो उसके विभागका इससे सब निदोषहे-और स्वत्वको लौकिक निषेध है वहभी न होगा क्योंकि सबकी मानने में जो यह दोष दिया कि मेरा स्व अनुमतिसे दिया इससे विभागकी प्राप्तिही इसने हरलिया यह नहीं कह सकेंगे वह-नही-सोई कहाहै कि शूर वीरतासे मिला भी ऊक नही क्योंकि कत्लके हेतु जो और भार्याका धन और विद्याधन ये तीनों क्रय आदि उनके संदेहसे स्वत्वका संदेह विभाग करने योग्य नहीं हैं और पिताकी हो सकताहै-विचारका प्रयोजन तो यहहै १ यहिते नार्जयति कर्मणा ब्राह्मणा + धनम् । कि जो धन ब्राह्मणोंने निंदित कमसे संचित | तस्योत्सर्गेण शुद्धयति जप्येन तपसेव च ॥ कियाहै उसके त्यागसे जप और तपसे शुद्ध २ सप्तवित्तागमाधा दायो लाभःक्रयो जयप्रयोगः कर्मयोगश्च सत्पत्तिग्रह एव च ॥ ३ शौर्यभार्याधने चोमे यच विद्याधनं भवेत् । निर्वेशो भतिभोगयोः । त्रीण्येतान्यविभाज्यानि प्रसादो यश्च पैटकः ।।
(२६४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रसन्नतासे मिला जो धन वहभी विभागके द्रव्यमेंसे स्वत्व नष्ट हो चुका तो अन्यकोई योग्य नहीं होता-तैसेही इस वचनेसे प्री-ग्रहण करने लगे तो निवारण (मने ) नही तिका दानभी ठीक न होगा कि प्रसन्न कर सकेंगे-तैसेही जो पुन एकही है तो होकर भताने स्त्रीको जो धन दियाहै उसके | उसका स्वत्व पिताके मरनेसेही होजाताहै मरे परभी उस धनको यथेच्छ भोगे वा | इससे विभागकी अपेक्षा वहां नहींहै-इस स्थावरको छोडकर किसीको देदे-कदा विषयमें हम यह कहते हैं कि लोक प्रसिद्ध चित् कोई कहे है जन्मसेही स्वत्त्व मानने में ही स्वत्वहै यह कह आयेहैं और लोकमें यह संबंध युक्तहे कि ( स्थावराहते यत् । पुत्र आदिकोंका जन्मसेही जो स्वत्व अत्यंत दत्तं ) स्थावरके विना जो दियाहै उसकोही प्रसिद्धहै वह अपनवके योग्य नहीं अर्थात. यथेच्छ भोगे इससे स्थावरका प्रीतिसे दानही वह हटनहीं सकता और विभाग शब्दभी नही हो सकता सो ठीक नही क्योंको व्यव- | बहुत हैं स्वामी जिसके ऐसे धनके विषयमेंही हित (दूरकी) योजना ( अन्वय )का प्रसंग | लोकमें प्रसिद्धहै अन्यके धनमें वा मृतकके होजायगा और जो यह वचनह कि मणि धनमें नहीहै और गौतमकोभी वचनहै कि मोती प्रवाल (मूंगा ) इन सबका स्वामी उस अर्थके स्वामित्वको उत्पत्तिसेही प्राप्त हो- पिता है और संपूर्ण स्थावरको तो न पिता | ताहे यह आचार्य कहतेहैं और पूर्वोक्त मणि- स्वामी है और न पितामह है-और तैसेही मुक्ताप्रबालानां यह वचनभी जन्मसे स्वत्व वचनहै कि पिताकी प्रसन्नतासे वस्त्र और | माननेके पक्षमेही ठीक होसकताहै, और भूषण भोगे जाते हैं और स्थावर तो पिताकी | पितामहके पैदाकिये स्थावरके विषयमें है यह प्रसन्नता होनेपरभी नहीं भोगा जाता-इन युक्त नहीं क्योंकि यह वचन है कि पिता वचनोंसे जो स्थावर आदिको प्रसन्नतासे ! और पितामहस्थावरके स्वामी नहीं हैं-अपना देनेका निषेध है वह पितामहके पैदा | संचित कियाभी पितामहका स्थावर धन पुत्र किये स्थावरके विषयमें है पितामहके और पात्रोंके होते देनेयोग्य नहीं है. यह भरनेपरतो वह धन पिता और पुत्रका ) वचनभी जन्मसेही स्वत्वको जनाताह जैसे साधारणभी वह धनहै तोभी मणि मुक्ता अन्यके मतमें पितामहकेभी मणि मोती दि तो पिताकेही हैं और स्थावर तो वस्त्र भूषणों में पिताका ही स्वत्व वचनसे दोनोंका साधारणहै यह इसी वचनसे जाना है-इसी प्रकार हमारे मतमभी पिताके संचित जाताहै-तिससे जन्मसे स्वत्व नहीं होता कियेभी इनमें पिताको दानका अधिकार किंतुस्वामीके मरण वा विभागसे स्वत्त्व होता- बचनसे हैं इससे कोई विशेष नहींहै-और है इसीसे इस शंकाकाभी अवकाश नहीं कि जो यह विष्णुका वचनहै कि प्रसन्न होकर पिताके, मरनेपर और विभागसे पहिले जो भर्ताने दिया उसको यथेच्छ भोगै यह १ मत्री प्रीतेन यदत्तं निय तस्मिन्मृतेपि तत् । स्थावरकोप्रीतिसेदेनेका बोधन है उसकाअर्थ सा ययाकाममश्नीयाह्याद्वा स्थावराहते ॥ यह करना कि अपना संचितभी पुत्र आदि- २ मणिमुक्तामवालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः। की आज्ञासेही देना- क्योंकि पूर्वोक्त-मणि- स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः ॥ मुक्ता आदि वचनोंसे स्थावरसे भिन्नाकाही ३ पितृप्रसादराज्यंते वनाण्यामरणानिध । स्थावर तु न भुज्येत प्रसाद सति पैनके । १तं तोसत्यवार्थस्यामित्वं लभेतत्याचार्याः । .
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२६५) प्रीतिसे दानकी योग्यताका निश्चयहै-और और अवश्य करने योग्य पिताके श्राद्ध जो यह कहाहै कि धनसे साध्य वेदोक्त आदिमें एकभी समर्थ स्थावर धनका दान कर्मों में अधिकार नहोगा-वहां वेदोक्त कर्मकी आधि विक्रय करदे-जो यह वचन है कि विधिसेही अधिकार जानाजाताहै-तिससे अविभक्त वा विभक्त जो सपिंड है वे सब पिता और पितामहके द्रव्यमें जन्मसेही | स्थावर धनमें समानहैं उनमें एक दान स्वत्वहै-तथापि पिताको अवश्य करने योग्य | आधि विक्रय करनेमें समर्थ नहीं है वह धर्मके कार्योंमें और वचनोंसे प्राप्त प्रासाद वचनभी इस प्रकार व्याख्या करने योग्यदे ( पर ) दान-कुटुंगका पालन-आपत्तिकी कि अविभक्त भाईयाँका जो द्रव्यद वह निवृत्ति आदिमें स्थावरसे भिन्न द्रव्यके देनेमें मध्यमें स्थितहै उसका एक स्वामी नहीं हो पिताको स्वतंत्रता ( इकत्यार ) है यह सकता इससे सबकी संमति अवश्य लेनी- स्थितभया-अपने संचित और पिता आदिसे | विभक्त (जुदेर ) हुये पीछे तो विभक्त और मिले स्थावरमें तो पुत्र आदिको परतंत्रता- | अविभक्तका संदेह दूर होनेसे व्यवहारको हीहै अर्थात् पुत्र आदिकी संमत्तिके विना सुकरता (भलाई के लिये सपकी संपत्ति दानआदि पिता नहीकर सकता क्योंकि होतीहै कुछ एकके अनीश्वर (नहीमालिक) सा वचन कि स्वयं संचय कियेभी . होनेसे नही इससे विभक्तोंकी अनुमतिके पथावर और द्विपद (भृत्यआदि ) हैं उनका | विनापि व्यवहार सिद्ध होताहै-और जो यह रोष पुत्रोंकी संमतिके विना न दान न | पचन है कि अपना ग्राम-जाति-सामंत- विक्रयई-जो पुत्र पैदा हो चुकेहैं और जो | दायाद इनकी अनुमति और सुवर्ण और पैदा नही हुये गर्भही स्थित वेभी वृत्ति | जलके दान (संकल )से इन छःसे पृथ्वी (जीविका )को चाहतेहैं इससे उनके विना | दुसरेको हो जातीहै उसमेंभी ग्रामकी अनु- दान और विक्रय नहीं हो सकता-इसका मति इस लिये अपेक्षितह कि प्रतिमह प्रकाश भपवादभी वचन है कि आपत्तिके लिये कुटुं- करके होताई और स्थावरताको प्रकाश बके अर्थ और विशेष कर धर्मके लिये विशेष करके होताहै इस वचनसे व्यवहारका एकभी मनुष्य दान आधि और विक्रय प्रकाश होजाय कुछ ग्रामकी अनुमतिके करदे-इसका तात्पर्य यहहै कि जब पुत्र विना व्यवहारकी असिद्धि नहीं होती और और पात्रोंको तो व्यवहारका ज्ञान नहो और सामंतों ( समीपक जिमीदार )की अनुमति अनुज्ञा देनमेंभी असमर्थ हों और भ्राताभी तो सीमा विवाद दूर करनेक लिये है- अविभक्तहीं वा पुत्रोंके समानही हो और जाति और दायादाकि अनुमतिका प्रयोजन ऐसी आपत्ति हो कि जो सब कुटुंयमें आप्त | तो कह भाये-(हिरण्योदकदानेन) सुवर्ण (फैली ) हो उसमें और कुटुंबके पोषणमें मोर जलदानसे-इसका यह अर्थहै कि १ स्थावर दिपई चव यद्यपि स्वयमर्जितम्। भस. स्थावरका विक्रय नही होता किंतु सयकी भूय सुनान्सर्वान्न दान नच विक्रयः। ये ज्ञाता पेशा 1 अश्मिता विभना या सपिटास्य परे ममाः । जाताच ये घ गर्भ व्यवस्थिता । वृत्तिं च तेभिको क्षति एकोनीशः सन दानापमानाकये ॥ नदान न विक्रयः ॥ २ स्वप्रामहातिमामतावानुमतेन न । हिरभ्यो- २ एफोपि स्थावरे फुर्याहानाधमनस्कियम् । दकदानेन पदमिर्गानि मेदिनी । आपत्काले फुटपायें धर्मार्थे च विशेषतः ।। ३ प्रतिमहा प्रयाश: स्यावावरस्य विशेषतः॥
(२६६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अनुमतिसे आधि ( गिरवी ) करदे इस श्रेष्ठभागसे मध्यमको मध्यमभागसे-कनि- वचनसे स्थावरके 'विक्रयका निषेधहे और ठको कनिष्ठ भागसे विभक्त कर श्रेष्ठआदि इस वचनसे दानकी प्रशंसाभी देखते हैं कि विभाग मनुने (अ. ८ श्लो. ११२) कहाहै जो भूमिका प्रतिग्रह लेताहै और जो भूमि- | कि ज्येष्ठका वीसवां उद्धार वा द्रव्यमेंसे श्रेष्ठ को देताहे वे दोनों पुण्यकर्मा नियमसे स्वर्ग में वस्तु उससे आधा मध्यमका और छोटे जातेहैं-इससे विक्रयभी करना होयतो सुवर्ण भाईका उद्धार चौथाई होता है-इस वचनमें सहित जलदेकर दानकी रीतिसे स्थावरका ) वाशब्द वक्ष्यमाणपक्षकी अपेक्षासे है कि विक्रय करे-अर्थात् लोभसे नकर ॥ अथवा सबज्येष्ठ आदि भाई समान भागीही विभागंचेत्पिताकुर्यादिच्छयाविभजेत्सुतान् इसप्रकार पिता विभाग करे-और यह विषम ज्येष्ठेवाश्रेष्ठभागनसर्वेवास्युःसमाशिनः ॥ विभागभी अपने पैदा किये व्यके विषयमें है पद-विभाग २ चेता-पितार कुर्यात् कि- और जो द्रव्य पिता पितामहके क्रमसे चली आया है उसमें तो पिता और सब भाई.. इच्च्या ३ विभजेत् क्रि-सुतान् २ ज्येष्ठं २ .योंका समान स्वामित्व आगे कहेगें इससे वा-श्रेष्ठभागेन ३ सर्वे १ वा:- स्युः क्रि- पिताकी इच्छासे विषम विभाग युक्त नहीं, समांशिनः १ ॥ है-यदि पिता विभाग करे इस कथनसे ना योजना-चेत ( यदि ) पिता विभाग पिताकी विभाग करनेकि जो इच्छा वाई कुर्यात् तहि इच्छया सुतान् विभजेत्-चा ज्येष्ठं श्रेष्ठभागेन विभजेत-वा सर्वे समा- एक विभागका समय है- दूसरा समय यह है कि पिताके जीवतेभी जब पिताको शिनः स्युः ॥ तात्पर्यार्थ यद्यपि पिता और पितामहके द्रव्य संचयकी इच्छा नहीं-स्त्रीसंगसे निर्व धनमें जन्मसेही स्वत्वहै तथापि इसका होचुकाहो तो पिताकी इच्छाके न होनेपरभी तिहो और माताकाभी रजोधर्म निवृत्ते विशेष-भूर्या पितामहोपात्ता-इस वच कहेंगे-अब यह कहते है कि जिस कालमें पुत्रोंकी इच्छासेही विभाग होता है-सोई । जो जैसे विभाग कर-जब पिता विभाग नारदंने कहा है कि पिताके मरे पीछे पुत्र कियाचाहै तब पुत्रोंको अर्थात् एक दो तीन धनको सम (बराबर ) वाटले- इसप्रकार आदि पुत्रोंको अपने सकाशसे विभाग पिताके मरे पीछे विभागको कहकर यह करदे-इच्छामें कोई अंकुशनही होता इससे दिखाया है कि माताका रजोधर्म निवृत्तहो नियमके लिये पिछले आधे श्लोकसे इच्छासे चुकाहो और भगिनीयोंका विवाह होगयाहो विभागकाही विवरण कियाहे वे दोनों पक्षही और पिताकी स्त्रीसंग और धन संचयों इच्छामें मानोगे तो वाक्यभेद होजायगा वांछा न रही होय तो पुत्र धनको समान और यह अव्यवस्थाभी हो जायगी कि एकको लक्ष किसीको कपर्दिका और १ ज्येष्ठस्य विश उद्धारः सर्वव्याच यरं। ततोर्द्ध किसीको कुछभी न मिलेगा-अथवा ज्येष्ठको मध्यमस्य स्यात्तुर्राय तु यायसः । १ स्थावरे विक्रयो नास्ति कुर्यादाधिमनुज्ञया । १ अत उर्ध पितुः पुत्रा विभजेयुधनंसम । मातुनि. २ भूमि यः प्रतिगृह्णाति यश्च भूमि प्रयच्छति ।। वृत्ते रजसि प्रत्तासु भगिनी च ॥ निवृत्ते चापि रमणे उभी तो पुण्यकाणी नियतो स्वर्गगामिनी । पितर्युपरतस्पृहे।
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२६७) (इकसे) भागसे वाटले- गौतमनेभी पिताके पत्नीयोकोभी समानही भागदे जिन पलि मरेपीछे पुत्र धमको वांटलें यह कहकर- | योंको पति और श्वशुरने स्त्रीधन न दियाहो- माताका रजोधर्म तिवृत्त होनेपर दूसरा स्त्रीधनके देनेपर तो इसे वचनसे आधा भाग विभागका समय दिखाया है और जीवतेहुये | देना कहेंगे-जब पिता श्रेष्ठ भाग आदि पिताकी इच्छा तीसरा विभागका काल देकर ज्येष्ठ आदि पुत्रोंका विभाग कर तब दिखाया है-तैसेही माताको रजोधर्मभी पत्नियोंको श्रेष्ठ आदि भाग प्राप्त नही होता होताहो और पिताकी इच्छाभी नही और | किंतु निकासा है उद्धार जिसमेंसे ऐसे पिता अधर्ममें वर्तताही वा दीर्घ रोगसे ग्रस्त इकट्टे धनमेंसे समान भाग और अपने होय तो पुत्रोंकी इच्छासेभी विभाग होता है | उद्धारकोही पत्नी प्राप्त होती है-सोई आप- सोई शखने कहा है पिताके निष्काम और स्तंचनें कहां है कि परके परीभांड (पात्र) वृद्ध होनेपर धनका विभाग होता है और और अलंकार (गहना ) भार्याका होता है- जब पिताका चित विपरीत (अधर्म ) होजाय | कही तो पिताकी इच्छाके बिनाभी विभाग वा पिता रोगी होजाय तब विभाग होता है। बृहस्पतिने कहा है कि क्रम (परंपरा से भावार्थ-यदि पिता विभाग करतो अपनी | चलेआये गृह क्षेत्र आदि धनमें पिता और इच्छासे चाहे जब पुत्रोंको विभक्त (जुदे २) पुत्र समानभागी हैं इससे पिताकी इच्छाके करदे- अथवा जेठे पुत्रको श्रेष्ठ भागदेकर बिनाभी पैतृक विभागके अनुसार विभाग पृथक्कर-अथवा सबको समान (भरायर) करने योग्य हैं अर्थात् पितामह आदिके भाग देकर पृथक् २ करे ॥ ११४ ॥ संचय किये धनमें पिताकी इच्छाके न होने परभी अपना अंश वटवा सकते है- यदिकुर्यात्समानंशान्पल्याकार्याः भावार्थ-यदि पिता समान भाग कर तो समांशिकाः । नदत्तंत्रीधनंयासा उन पत्नियोंकोभी समान भागदे जिनको भावाश्वशुरेणवा ॥ ११५ ॥ भर्ता वा श्वशुरने स्त्रीधन न दियाहो॥११५॥ । पद-यदि:-कुर्यात् क्रि-समान २ अंशा शकस्पानीहमानस्पकिंचिद्दत्वा- न२ पल्यः १ कार्याः १ समांशिकाः १ न:- पृयक्रियान्यूनाधिकविभक्का- दत्तर स्त्रीधनं यासांद भनीवा श्वशुरेण३ नाधर्म्यःपिटकृतःस्मृतः॥११६॥ योजना-पदि समान् अंशान् कुर्यात् पद-शक्तस्य अनीदमानस्थ६ किंचिता- तर्हि यासा भर्ना वा श्वशुरेण स्रीधनं न दत्तं दत्वाऽ-पृथक्रिया १ न्यूनाधिकविभक्तानां६ ताः पल्यः समांशिकाः कार्याः ॥ धर्म्यः पितृकृतः१ स्मृतः१॥ तात्पर्य-जब पिता अपनी इच्छासे योजना-अनीहमानस्य शक्तस्य किंचित् .सय पुत्रोंको समान भागो कर तब उन दत्ता पृथक्रिया कर्तव्या-न्यूनाधिकविभ- १ वर्ग पितः पुत्रा ऋयथं विभनेरन् इत्युक्ता । दत्ते स्वई प्रशल्पयेत् । निवृत्ते चापि रजसि । जीवतिच्छति। २ परीभार च गृहेटफारो मायायाः । २ भकामे क्तिरे रिस्परिभागो दे विपरीत. ३ प्रमागते गृहक्षेत्र पिता पुत्राः समाशिनः। पैन. केन रिभागाः मुताः पितुरनिच्या ॥ वा-॥ । चेतासे रोगनि च ।
(२६८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । १०११२) क्तानां विभागः धर्म्यः (शास्त्रोक्तः) चेत् मातुः ६ दुहितरः १ शेष २ प्रणात् ५ताभ्यः पिकृतः स्मृतः मन्वादिभिरितिशेषः । ऋते-अन्वयः १॥ तात्पर्यार्थ-जो पुत्र स्वयं द्रव्यके संचय योजना-पित्रोः उर्ध्व सुताः रिक्थं ऋण करनेमें समर्थ होनेपर पिताके धनको समं विभजेरन कणात् शेषं मातुर्धनं दुहितरः इच्छा न करे उसको यत् किंचित् (बुरा विभजेरन् ताभ्यः ऋते अन्वयः गृहीयात् ॥ भला )धन देकर पिता अन्यपुत्रोंका इसलिये तात्पर्यार्थ -माता पिताके मरण पीछे पुत्र विभाग करदे कि उस समर्थ पुत्रके पुत्रोंकी किसी कालांतर में अंश लेने की इच्छा नहीं धन और ऋणको समान (पानर ) ही वाटले-यहां मातापिताके मरनेके समय न्यून वा अधिक भाग देकर विभक्त (जुदे ) और पुत्रविभागके कर्ता और समान यह किये पुत्रोंका जो विभागं पितानें कियाहै विभागके प्रकार क्रमसे दिखाये हैं कदाचित वह विभाग यदि धर्म्य (शास्त्रोक्त रीतिके कोई शंका करें कि मनुने मातापिताके मरण अनुसार ) हे तो पितृकृत है अर्थात् वह पाछे यह प्रारंभ करके (अ०९-शोः १०५) निवृत्त नहीं होसकता यह मनु आदिकोंने कहाहे शास्त्रोक्तरीतिके अनुसार न होय में कहा कि ज्येष्ठ पुत्रही पिताके सवधनको तो पिताका कियाभी न्यूनाधिक विभाग | ग्रहण करे और शेषपुत्र उसके आश्रयसे निवृत्त होसकताह सोई नारदने कहा कि इस प्रकार जीवे जैसे पिताके आश्रयसे रोगी-क्रोधी-विषयोंमें जिसका मन आसक्त जीतेथे यह कहकर (अ०९-श्लोक हो और जो शास्त्रोक्तरीतिके अनुसार विभाग में मनुनें कहाहे कि सब धनके समुदायमेंसे वीसवां भाग और सब द्रव्यों में श्रेष्ठ द्रव्य न कर ऐसा पिता विभागमें प्रभु (समर्थ) नहीहै अर्थात् उसका किया विभाग लौट ज्येष्ठको और उससे आधा चालीसमां भाग सकताहै ॥ और मध्यमद्रव्य मध्यमको और उससे चौथा अस्सीमां भाग और हीन (छोटासा) द्रव्य भावार्थ-जो समर्थ पुत्र पिताके धनको कनिष्ठको दे- यह उद्धार विभाग मातापिता- न चाहै उसको कुछ द्रव्य देकर पिता के मरनेके अनंतर मनुने दिखायाहे तैसेही " करदे और न्यून अधिक (कम | मनुनें (अ० ९श्लो०११६-११७ )में कहाहै । ५९) किया है विभाग जिनका ऐसे उद्धार न निकासा होय तो इस प्रकार पुत्रोंका विभाग शास्त्रोक्तरीतिसे हुआ होय | पुत्रांके अंशकी कल्पना करे कि ज्येष्ठ पुत्र तो पिताका कियाही वह विभाग समझना एक भाग अधिक ले उससे छोटा आधा । यह मनुआदिकोंने कहाहै ॥ ११६ ॥ भाग अधिक ले और उससे छोटे एक २ विभजेरन्सुताः पित्रोरुचरिक्यमृणंसमम्। मातुर्दुहितरः शेषमृणात्ताभ्यऋतेन्वयः ॥ १ ज्येष्ठ एव तु गृहीयात्पित्र्य धनमशेषतः। शेषा- स्तमुपजीवेयुर्यथैव पितर धनं । पद-विभनेरन् क्रि- सुताः १ पित्रोः २ ज्येष्टस्य विंश उद्धारः सर्वव्याच्च यद्वरं । ततो ६ अर्ध्वम् २ रिक्थं २ ऋणम् २ समम् २ मध्यमस्य स्यात्तुरीयं तु यीयसः । ३ उद्धारेऽनुद्धृते पामियं स्यादशकल्पना ।। एका- १ व्याधितः कुपितर विषयासक्तमानसन अन्य- | धिक हरेज्ज्यष्टः पुत्रोध्यर्द्ध ततोनुजः । अशमंश था शानकारी च न विभागे पिता प्रभुः ।। यदीयांस-इति · धर्मों व्यवस्थितः । - व्यवहाराध्याय दायविभागमकरण ८ (२६९) - भागको ग्रहण करें यह धर्मकी व्यवस्थाहै । यह कोई कहते हैं-इसे वचनसे एक ज्येष्ठ- अर्थात् ज्येठा दो भाग और उससे छोटा कोही सब धनका ग्रहण करना किसीके डेढ भाग और उससे छोटे एक २ भागको | मतसे लिखकर फिर देशविशेषसे सुवर्ण प्रहण कर-उद्धारके बिनाभी यह विषम कृष्णा गो कृष्ण (कंबल आदि ) भूमिका विभाग दिखाया है और स्वयंभी याज्ञवल्क्यने पदार्थ ज्येष्ठ पुत्रके, और रथ पिताका, और मातापिताके मरनेके अनंतर और उनके घरके परीभाण्ड और भूषण और ज्ञातिसे जीवन समयके विभागमें विषम विभाग इस मिला धन ये भार्याके, होते हैं यह कोई वचनसे (ज्येष्ठं वा श्रेष्ठभागेन) दिखायाहै | कहते हैं कि इस वचनसे किसीके मतसे इससे सब कालमें जब विपम विभागहे तो | उद्धार भागको दिखाकर वह शास्त्रम यह निमम कैसे करते हो कि बराबर विभाग | निषिद्ध है इस वचनसे निराकरण किया है करले- इस शंकाका समाधान कहते हैं वह शास्त्रका निषेध मर्नेने स्वयं दिखाया कि यह बात सत्य है कि यह विषम विभाग है कि पुत्रोंका दायविभाग कर यह बात शास्त्रमें देखाहे तथापि जगतमें निंदित अविशेष ( न्यूनाधिकाविना )ते शास्त्र में होनेसे करनेयोग्य नही क्योंकि यह निषेध है | सुनी है-तिससे शास्त्र में देखाभी विषम वि. कि स्वर्गको न देनेवाले जगतमें निंदित भाग लोक और वेदके विरोधसे करने यो- शास्त्रोक्त कर्मकोभी न करे जैसे बडा बैल | ग्य नहीं है इससे सम ( वरावर )ही वाटले वा बडा बकरा वेदपाठीके निमित्त दे यह | यह नियम किया है अब माताके धनमें विधिभी हैं तथापि जगतमें निंदित होनेसे इसे | इसका अपवाद कहते हैं कि ऋणसे शेष कोई नहीं करता और जैसे मित्रा- माताके धनको दुहिता ( पुत्री .) विभाग वरुणहैं देवता जिसके ऐसी बंध्यागोका | करले अर्थात माताके किए ऋणको दूरक- गलंभन ( हिंसा ) कर इस वैचनसे गया- रके शेष धनको पुत्री ग्रहण करै-यदि ऋण- उनका विधानभी है तथापि जगत्में | से न्यून या समानही माताका धन होयतो निदित होनेसे कोई नही करता सोई कहा | उस माताके धनका पुत्रही विभाग करलें- है कि जैसे शास्त्रोक्तभी वियोग धर्मका और ! यह बात समझनीकि माताके किए ऋणको अनुवंध्या गोके वधका अब प्रचार नही इसी | पुत्रही दूर कर दुहिता न करे ऋणसे बचे प्रकार उद्धार विभागभी आज कल प्रचलित | धनको तो दुहिता लेलें और यह युक्तभी है नहीं है-आपस्तंनेभी जीवता हुआ पिता | कि पुरुषका वीर्य अधिक होयतो पुरुष और पुत्रोंको समान रीतिसे दायका विभाग कर-स्त्रीका अधिक होयतो कन्या होती है इसे दे-इस वचनसे समता ( तुल्यभाग )को वचनले पुत्रियों में स्त्रियोंके अवयवोंकी अ- कहकर एक ज्येष्ठ पुत्रही दायका भागी है १ अस्वयं लोकविदिष्ट धर्म्यमप्याचरेन त। १ ज्यष्टो दायाद इत्येके। २ महोक्ष या महाज वा श्रोत्रियायोपकल्पयेत् ॥ २ सुवर्ण कृष्णा गावः कृष्ण भोमं ज्येष्ठस्य स्थ: ३ मैनावरुणा मा शामनु वध्यामालभेत । पितुःपरीमोड च एहेलकारोभार्यापा: ज्ञानिधन चेत्येक ४ यथा नियोगधर्मो नो नानुपध्यावधोपि वा । तथो ३ शास्त्रविप्रतिपिद्ध। द्वारविभागोपि नैव सप्रति वर्तते । ४ पुत्रेभ्यो दाय विभनेदियविशेषेण श्रूयते । ५जीयनपुत्रेभ्यो दाय विभत्समम् । ५ पुमान् पुसाधिके शुक्र स्त्रीभवत्यधिक निया।
(२७०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित। धिकता होनेसे स्त्रीका धन पुत्रियोंको और योजना-यत् अन्यत् पितृव्याविरोधरी पिताके अवयव पुत्रोंमें अधिक होते हैं इससे स्वयं अर्जितं चपुनः मैत्रं औद्वाहिकं यत् पिताका धन पुत्रोंको मिलता है उसमेंभी द्रव्यं तत् दायादानां न भवेत् क्रमात् अ. गौतमने यह विशेष दिखाया है कि विना | भ्यागतं हृतं अपि द्रव्यं यः उद्धरेत् तत् विवाही और अप्रतिष्ठित (निर्धन ) दुहि- चपुनः विद्यया लब्धं दायादेभ्यः न दद्यात्-'. ताओंको स्त्रीधन मिलता है इस वचनका तात्पर्यार्थ-माता पिताके द्रव्यका विना यह अर्थ है कि विवाही और विना विवाही व्यय किए स्वयं संचित किया जो धन है कन्याओंके समुदायमें उनकोही स्त्रीधन | वा मिनके सकाशमे मिला अथवा विवाहमे मिलता है जिनका विवाह न हुआहो-और मिला जो धन है वह दायके भागी. विवाही हुईयो भी प्रतिष्ठित और अप्रति- | भ्राताओंका नहीं होता-जो पिताके क्रमसे ठितके समुदायमें उनकोही स्त्रीधन मिलता चला आया कुछ द्रव्य किसी अन्यने हर है जो अप्रतिष्ठितहों-यदि दुहिता न होयतो (छीन ) रक्खाहो और असमर्थ आदिसे पुत्र आदि अन्वय (वंश )काही कोई अ- | पिता आदि उसका उद्धार ( वसूल) न धिकारी स्त्रीधनको ग्रहण करै-यह बात | करसके हों पुत्रोंके मध्यमें जो कोई पुत्र माता पिताके पीछे पुत्र धनका विभाग करें उस धनका दूसरे पुत्रोंकी आज्ञा लेकर इससेही सिद्धथी तथापि स्पष्टके अर्थ पुनः उद्धार करलें तो उस धनको भ्राता आदि कही है- दायादोंको नदे किंतु उद्धार करनेवालाई, भावार्थ-माता पिताके मरे पीछे पुत्र धन ग्रहण करले उसमेंभी क्षेत्र होय तो और ऋणको बराबर वाटलें और ऋणसे करनेवालेको चौथाई भाग मिलताहै औ.. बचे या ताके धनको पुत्री ग्रहण करें-पुत्री शेप सब क्षेत्र सबका समान होताहै-सोई न होयतो पुत्र आदिही ग्रहण करें ॥११॥ | शंखने कहाहै कि पहिले नष्ट हुई भूमिका पितृद्रव्याविरोधेनयदन्यत्स्वयमर्जितम् । जो एक उद्धार करे उसको चौथाई भर मैत्रमौदाहिकंचैवदायादानांनतद्भवेत्र १८ देकर सब भाई अपने २ भागके अनुसार प्राप्त होतेहैं तैसेही वेदका पढाना पढाना पद-पितृद्रव्याविरोधेन ३ यत् ३ अ और उसकी व्याख्या करनेसे मिला जोध १ स्वये:-अर्जितम्-मैत्रं १ औदहि- वहभी दायादोंको नदें किंतु संचय करन- कं १ च:- एव:-दायादानां ६ न:- तत् १ वालाही ग्रहण करै-यहां पिताके द्रव्यको, भवेत् क्रि- विना व्यय किएँ जो कुछ स्वयं संचय किया क्रमादभ्यागतंद्रव्यंहतमप्युद्धरेत्तुयः । यह सबका शेष समझना-इससे पिताके दायादेभ्योनतद्दद्याद्विद्ययालब्धमेवच११९ द्रव्यको व्यय न करके मित्रसे जो मि- पद-क्रमात ५ अभ्यागतं २ द्रव्यं २ लाहो वा पिताके द्रव्यको खर्च न करके हृतं २ अपिऽ-उद्धरेत् क्रि-तु-यः९ दाया- विवाहमें जो मिलाहे अथवा तैसेही क्रमसे देभ्यः ८ नऽ-तत् २ दद्यात् क्रि-विद्यया ३ चले आए द्रव्यको उद्धार कियाहो वा विद्यासे लब्ध २ एव:-चा-॥ १ पूर्व नष्टों तु यो भमिमेकश्चेदुद्धरेत क्रमात् । १ स्त्रीधनं दुहितॄणाममत्तानामप्रतिष्ठितानां च ॥ ययाभागं लभतेन्ये दत्त्वांशं तु तुरीयकं । .
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२७५) हैं-यद्यपि पिता और पितामहके धनमें योजना-विभक्तेषु पुत्रेषु सत्सु सवर्णायां जन्मसेही स्वाम्य पुत्रका है तथापि पिताके जातः सुतः विभागभार स्यात्-वा आय- धनमें पुत्र पिताके आधीन है और पिता व्ययविशोधितात दृश्यात् तद्विभागः स्यात्।। अपने संचय किये धनमें प्रधान है-पिता तात्पर्यार्थ-पुत्रोंको विभाग किए पीछेसमा- अपने संचित किये धनको दियाचाह तो नवर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न हुआ पुन माता पिताके पुत्रके संग संमति करले-पितामहके संचि- | विभाग (धन आदि )का भागी होता है तधनमें तो पिता पुत्र दोनोंका स्वामित्व अर्थात् माता पिताके मेरे पोछे अंश (हि. समान है इससे पुत्रको निषेधकाभी अधि-स्से को प्राप्त होता है-पदि कन्या होपतो कार है इतनाही विशेष है-मनुका (अ. ९ | माताके अंशको प्राप्त होती है क्यों कि यह श्री. २० भी वचन है कि पिता नही | कह आये है कि माताके शेष धनको कन्या मिल अपने पिताके जिस धनको प्राप्त हो । प्राप्त होती है और यदि असवर्णा (समान पसको और अपने संचित धनको अपनी वर्णकी जो नहीं से पैदा होयतो पिताके 'इच्छाके विना पुत्रोंके साथ विभाग न करे धन से अपने हिस्सेका और माताके सब वहां जो जिसका पितामहनें उद्धार ( व-धनका अधिकारी होता है यही मर्ने सूल) न किया हो ऐसे हरे ( छिनाए) हुए (अ. ९ श्ो. २१६ ) में कहा है कि पितामहके संचित ( इकटे ) किए हुए विभाग किए पीछे उत्पन्न हुआ पुत्र पिन्य धनका पिता उद्धार यदि करले तो वह धनको प्राप्त होता है-यहां माता पिताका जो पने संचय किए धनकी समान विना हो उसे पिन्य कहते हैं यह पित्र्य शब्दको व्या- अपनी इच्छा पुत्रोंको न बांट यह कहनसे ख्या करनी क्योंकि यह वचनहै कि विभक्त- यह दिखाया कि पितामहका संचय हुये माता पिताक विभागमें विभागसे पहिले किया धन यदि पिता न वांटना चाहै तोभी पैदा हुआ पुत्र समर्थ नहींहैं और विभागके पुत्रोंकी इच्छासे पुत्रोंके संग विभाग करे अनंतर पैदा हुआ भ्राताओंके विभागमें भावार्य-पितामहकी संचय करी हुई समर्थ नहीहै-तैसेही विभागके अनंतर जो भूमि निबन्ध सुवर्ण आदि द्रव्य इनमें पिता कुछ धन पिताने संचित कियाहो वह उस- और पुत्रका स्वाम्य ( स्वामित्व ) वरावर काहीहै जो विभागके अनंतर उत्पन्न हुआई होता है- ॥ १२१॥ क्योंकि यह स्मृति है कि पुत्रोंके संग विभतेपुमुतोजातीसवर्णापांविभा- विभाग करने पर जो धन पिताने स्वर्ण पदा गभार | दृश्यादातद्विभागः स्या- कियाहो यह सब विभागके पीछे पैदा हुये पुत्रकाई-ज्येठे भाई उसके स्वामी (मालिक) दायव्ययविशोधितात् ।। १२२ ॥' नहीं हो सकते-और जो विभत्ताहुये पुन पद-विभक्तेषु २ सुतः १ जातः १ सव- पिताके संग संमृष्ट (मिलना) झगपदों णांयां १ विभागमाफू १ दृश्यात् ५ वा- पिताके मरण पछि विभागके अनंतर पैदा तद्विभागः १ स्यात् कि- आयत्ययविशोधि- को दिमागमातस्तु यिमर हट्नम् । तात् ५॥ २ भनीशः पूर्वम; त्रिोत्रं तुभांगे मिनाया। पतु पिता इसमनदास याचार ३ : मह मिनेनानायरनमनितमविभ- मंजे सादमयमा सम्मनितम् । बनल तसतमाः पूजाः स्मृतः ।
व्यवहराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२७७) संस्काः ।। नके देनमें आधे अंशका भाग माताका चौथाई भाग उसको मिलना चाहिये-जसे कहेंगे। किसीके ब्राह्मणीही एक पत्नीहो और भावार्थ- माता पिताने जिसको जो धन ! एक पुत्र और एकही कन्या हो यह पिताके दे दियाहो वह उसकाही होताहे पिताके मरे संपूर्ण द्रव्यके दो भाग करके और उन दो पीछे विभाग करनेवाले भाताओंमें माताभी भागोमसे एक भागको चार भाग करके समान भागको ग्रहण करे ॥ १२३ ॥ उनमेंसे एक भाग कन्याको देकर शेष असंस्कृतास्तुसंस्कार्याधातृभिःपूर्वसंस्कृतः संपूर्ण धन-(७ भाग )को पुत्र महण क- भगिन्यश्चनिजादशाहत्यांशतुतुरीयकम् ॥ रले-जय दो पुत्र और एक कन्पाही तर पिताके संपूर्ण धनको तीन भाग करके और पद-असंस्कृताः १ तुा-संस्कार्याः १ एक भागके चारभाग करके उसका भ्रातृभिः ३ पूर्वसंस्कृतः ३ भागन्यः १ च-चौथाई कन्याको देकर शेष धनको दोनों निजात् ५ अंशात् ५ दत्वाऽ-अंशं १ तु:- पुत्र ग्रहण करले-यदि एक पुत्र और दो तुरीयकम् २॥ कन्या होयतो पिताके धनके तीन भाग योजना असंस्कृताः भ्रातरः पूर्वसंस्कृतः करके और एक भागके चारभाग कर प्राकृभिः संस्कायोः च पुनः निगात् - उनमसे दो भाग दोनों. कन्याओं को देकर शाद तुरीयकम् अंशं दत्वा भगिन्यः तः शेष संपूर्ण धनको पुत्र ग्रहण करें इसी प्रकार सजातीप सम और तात्पयार्य-पिताके जीवन समयमें जिन विषम भाई और भगिनीमि समझना भ्राताओंका संस्कार (विवाइ)न हुआहो जहां ग्रामगीका एक पुत्रहो और धार्मिपाकी पिताके मरणानंतर उनके संस्कार अधि- एक कन्याहो यहां पिताक धनक. सात कारियोंको कहतेहैं कि पिताक मरनेपर भाग करके और क्षत्रिया पुत्रके तीन भा- विभाग करतेहुये भ्राता समुदायके द्रव्यमस ' गोंक चारभाग करके चौथाई दन नाताओंका संस्कार करें गिनका सं- कन्याको देकर शेष धनकी बानगीका पुत्र स्वार न हुआदी-और संस्कारसे रहित ग्रहण करे जहां दो पानी के पुत्रहों भार भगिनीयाँका संस्कारभी यही भाई क्षरियाको एक कन्यादो वहां रिताफे सय अपने अंशमस चौथाई भाग देकर करे- धनरे ग्यारह ११ भाग फरफ क्षप्रिया इससे यह बात जानी गरी किरिताक खोक पुरक नीन भागकि चार भाग करके मरनेपर दुहिता ()भी अदामो प्राप्त टनम चौध भागको क्षधिया कन्याको होताहै-उसमें अपने २ अंशी बांयाई देकर दौर सय धनकी दोनों माना मागको प्रत्येक भाता निकाह कर भाग- पुमलिभाग फरफ पहरा कर-इसी प्रकार नीयांका संस्कार करें या अर्थ नदी करना भिन्न जाति के भाई और भगिनीकी संख्या किन्तु मिस गातिको यह कन्यादो टसी सम या विषम होप तो विभागकी प्रतिको जातिके पुरमा नो भागही उससे चौपाई समदाना-कदाचित् कोई शंका फर कि अपने भाग टसको देना-६ पात कही समाना अंशर्मस चोपाई भाग देकर यहां चौपाई कि यदि वह कन्या प्रादगी होयतो प्रा- भागको अविसमासे यह अपं करना गुरुहै पर पुधा मितना अंश होताद उससे किमि योग्य धन भगिनीको कर व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२७९) एक एकको तीन २ भाग और वैश्यासे | विषयमें है जो कुछ धन जीवते हुये पितानें उत्पन्न हुओंको दो२ भाग और शूदसे पैदा | शुद्राके पुत्रको दिया हो- यदि पितानें हुए पुत्रोंको एक २ भाग मिलता है क्षत्रि- प्रसन्नतासे कुछ न दिया होय तो एक यकी कन्या क्षत्रियसे पैदा हुए पुओंको अंशका भागी होताहै इसमें कुछ विरोध क्रमसे तीन दो एक भाग मिलते हैं अर्थात् नही है । क्षत्रिया पैदा हुएको तीन २ वैश्यामें पैदा भावार्थ-ब्राह्मणसे ब्राह्मणी आदिमें पैदा हुयेको दो २ और शूद्रामें पैदा हुयेको एक २ हुये पुत्र वर्णके क्रमसे चार तीन दो एक भाग मिलताई और वैश्यसे वैश्यामें पैदा | भागको और क्षत्रियसे क्षत्रियआदिमें पैदा हुयेको दो २ और शामें पैदा हुयेको एक हुये पुत्र तीन दो एफ भागको- और एक भाग मिलताह-शूद्रकी भार्या एकही वैश्यसे वैश्या आदिमें पैदा हुये पुत्र दो होतीहै शूद्रसे भिन्नजातिका कोई पुत्र नहीं एक भागको वर्णोके क्रमसे प्राप्त होतेहै१२५ होता इससे शूद्रके पुनीका पूर्वोक्तही विभाग अन्योन्यापहृतंद्रव्यं विभक्तेयत्तदृश्यते । होताहै- यद्यापि चार तीन दो एक भाग | तत्पुनस्तसमेशिविभजेरनितिस्थितिः ॥ सामान्य रीतिसे कहेहैं तथापि वे भाग प्रति- ग्रहसे मिली भूमिसे भिन्न विषयमें समझने क्योंकि यह स्मृति है कि क्षत्रियाके पुत्रको यत् १त:- दश्यते क्रि- तत् पुनःs तेर पद-अन्योन्यापहतं १ द्रव्यं १ विभक्त प्रतियहीं मिली हुई भूमिको न दे जो कुछ समः ३ अंशः ३ विभगेरन् कि- इति:- । पिता उक्तभूमि क्षत्रियाकै पुत्रको देदे तो स्थितिः१॥ पिताके मरनेपर ब्राह्मणीका पुन छीनले-- योजना-विभक्ते यत् द्रव्यं अन्योन्याप- प्रतिग्रहके कहनेसे मोल ली हुयी भूमिको हृतं दृश्यते तत द्रव्यं ते पुनः समः अंशः तो क्षत्रियाआदिके पुत्रोंकोभी देदे- और विभनेरन् इति स्थितिः ( मर्यादा ) अस्ती- शूद्राके पुत्रोंको यह विशेष निषेधैभी है कि ति शेषः।। द्विजातियोंसे शुदामें पैदा हुआ पुत्र भूमिके तात्पर्यार्थ -परस्पर हरा (चुराया) हुआ भाग योग्य नहीं है- यदि मोखली हुयी भूमि वा विभागके समयमें जाना हुआ जो समु- क्षत्रिया आदिके पुत्रोंको न मिलती तो दापका द्रव्य, पिताके धनके विभाग किये शुदा पुत्रको विशेष निषेध ठीक न होता- पीछे दीखेतो उस धनको सब भाई समान और जो यह मनु ( अ०९ लो० १५५) भाग करके वाटले यह शास्त्रको मर्यादा है वचन है कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यांसे पैदा। यहां समान भाग कहनसे उद्धारविभागका हुआ शुद्राका पुत्र--धनका भागी नही होता । निषध समझना और विभाग करलें इस किन्तु पिता जो कुछ इसको देदे वही कहनसे यह दिखाया है कि जिसको दीर इसका धन होताह वह बचनभी उस धनके बही नले- इससेही यह वचन सार्थक हैं १ नं प्रतिमहभूया निमाहिसुनाय वै ॥ ययणेषां । कुछ समुदायद्रव्यके चरानमें दोपके अभा- पिता दद्यान्मते विमासुतो होत् । । एका बोधक नहीं है-कदाचित् कोई शंका २ सूदपोदिजातिभिर्मातो न भूमैर्मागमईति । करें कि मनु (अ. ९ श्लो. २१३) ने ३ मामक्षत्रिविशा शूदापुत्रो न रिपपभाक् ॥ यो स्वेटो विनिमुवात लोमाद्धादन्यकीयसः । यदेवारय रिता दयार तदेवास घन मरेत् । । समेटः स्यादभागय नियतव्यश्च राजाभिः ।। - (२८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशमहित । ज्येष्ठकोही समुदायके द्रव्य चुरानेमें दोष वे उडद मुंगकी बुद्धिसे ग्रहण किये हैं यह दिखाया है छोटे भ्राताओंको नही कि जो जब शंकाकरनेवालेने कहा तहां मूंगके ज्येठा भाई लोभसे छोटे भाईयोंका तिर- अवयवोंके ग्रहण होनेमें वर्जनके अयोग्य स्कार करै अर्थात् उनके भागको नदे उस होनेसे उडदोंके अवयवोंकाभी ग्रहण हो- जेठेको भाग नही मिलता और राजदंडको होगा इससे निषेध अवश्य लगता है यह प्राप्त होता है-सो ठीक नही क्योंकि जब स्व- | सिद्धांतानें कहा है-तिससे वचन और तंत्रताको प्राप्त हुये-पिताके स्थानमें बैठे न्यायप्से साधारण द्रव्यके चुराने में दोष ज्येष्ठकोही मनुनें दोष कह दिया तो ज्ये- अवश्य है यह सिद्ध भया॥ ठके आधीन पुत्रके समान छोटे भाईयोंको भावार्थ-विभाग किये पोछे जो द्रव्य दंडापूपन्यायसे अवश्य दोष दिखायही भ्राताओंमें परस्पर चुराया हुआ दीखजाय, दिया-दंडापूपन्याय यह है कि जहां दंड उस द्रव्यको वे सब समान अंशोंसे फिर जायगा वहाँही उससे बंधे पूर्व जायगे-तैसे वाटले यह शास्त्रकी मर्यादा है- ॥ १२६ ही अविशेषतासे इस गीतमके वचनमें अपुत्रेणपरक्षेत्रेनियोगोत्पादितःसुतः दोष सुना जाता है कि जो मनुष्य जिस उभयोरप्यसौरिक्थीपिंडदाताचधर्मतः ॥ भागके योग्यका भागसे निराकरण करता है अर्थात् उसके भागको नही देता भागसे पद-अपुत्रेण ३ परक्षेत्र ७ नियोगो- रहित हुआ वह उस भागसे रहित करने- त्पादितः १ सुतः १ उभयोः ६ अपिs- वालेको नष्ट करता है अर्थात् दोपसे युक्त असौ १ रिक्थी १ पिंडदाता १ च:-धर्मतः5-1 करता है यदि उसको नष्टन करें तो उसके योजना-परक्षेत्रे अपुत्रेण नियोगोत्सा पुत्रको वा पात्रको नष्ट करता है-इस वच- दितः यः सुतः असो उभयोः रिक्थी च पुनः नमें ज्येष्ठ आदिके नामको नलेकरही धर्मतः उभयोः पिंडदाता भवति ।। अविशेषतासे साधारण द्रव्यके चुराने में तात्पर्याय-पुत्ररहित स्त्रीके संग गुरुकी दोष सुना जाता है-कदाचित् कोई कहै कि आज्ञासे पुत्रके लिये देवर वा सपिंडवा साधारण द्रव्यमें अपनाभी स्वत्व होता है सगोत्र मनुष्य घीको लपेटकर ऋतुके सम- ने अपनी है इस बुद्धिसे ग्रहण करनेमें य गमन करे और गर्भकी स्थिति पर्यंतही भु दोष न होगा-सो ठीक नही-क्योंकि | गमन करे अन्यथा करनेसे पतित होता है अपना है इस बुद्धिसे ग्रहण करनेमें दूसरे इस विधिसे पैदा हुआ इस पहिले पतिकाही भाईके वर्जने योग्य होनेसे पराया धनभी क्षेत्रज पुत्र होता है-इस पूर्वोक्त विधिसे ग्रहण कियागया इस प्रकार निषेधके प्रवे- पुत्ररहित देवर आदिके सकामसे. परायी शसे दोष (पाप)को अवश्य करेगा-जैसे स्त्रीमें गुरुकी आज्ञासे पैदा किया पुत्र बीज मुंगका चरु जहां नष्ट होजाय और तुल्य- | और क्षेत्रवाले दोनोंके रिक्थ (धन)को तासे उडदोंके ग्रहण करने उहद यज्ञके ग्रहण करनेवाला और धर्मसे दोनोंको पिंड- योग्य नही यह निषेध नही लगता है क्योंकि का दाता होता है-जहां यह गुरुकी आज्ञासे १ यो वै भागिन भागानुदते चयते एवैनं स यदि - नियुक्त देवर आदि स्वयंभी पुत्र रहितहो नं नवयतेय पुत्रमय पौत्र चयते । और पुत्ररहितकीही स्त्रीमें अपने और पराये २ अयशिया वे मापाः। पुत्र के लिये प्रवृत्त होकर जिस पुनको पैदा व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२८१) कर उस दो पितावालेको द्वयामुयायण विषय एक पुत्रको पैदाकर दूसरेको कदा- कहते हैं वह दोनोंके धनका भागी और चित न कर इस प्रकार नियोगको कह कर पिंडका दाता होता है और जहां नियुक्त- स्वयंही निषेध कियाहै ( अ० ९ श्लो०६४- देवर आदि पुत्रवान्हो केवल क्षेत्र (स्त्री)| ६५-६६-६७-६८ )कि द्विजाति अन्यके वाले केही पुनके लिये पल करे तो उससे संग विश्वास्त्रीका नियोग न करें क्योंकि पैदा हुआ पुत्र क्षेत्रबालेकाही होता है चीज- अन्य पुरुषके संग नियोग करनेवाले सना- वालेका नहीं-वह नियमसे न बीजवालेके तन धर्मको नष्ट करतेहैं-विवाहके मंत्रों में धनको लेसकता है न पिंड देसकता है- कहींभी नियोग नहीं कहा और न विवा- सोई मनु (अ. ९ श्लो. ८३ )में कहाँ है हकी विधिमें पुनः विधवाका विवाह कहाहै- कि इस स्त्रीम पैदा हुआ पुत्र-इम दोनोंका | यह पशुओंका धर्म (नियोग) बुद्धिमान होगा इस संवित् (प्रतिज्ञा )के स्वीकारसे द्विजाने निंदित कहाहै-और वेन राजाके क्षेत्रका स्वामी बीज बोनेके लिये जिस क्षेत्रको राज्यमें मनुष्यों में भी चलाथा-वह राजर्षि- बीजवालेकोदे उस क्षेत्रमें पैदा हुये पुत्रके पोज- योमें श्रेष्ठ वेन पूर्वसमयमें संपूर्ण पृथिवीको वाला आरक्षेत्रवाला दोनों स्वामी महर्षियोंने भौगताहुआ और कामदेवसे नष्टबुद्धि देने हैं-तैसेही मनुनें (अ०९ श्लो०५२) कहाहै होकर वर्णोका संकर करता भया-उसके कि इस स्त्रीम पैदा हुआ पुत्र दोनोंका पीछे जो मनुष्य संतानके लिये विधवा होगा इस प्रतिज्ञाको न कहकर पराये क्षे- स्त्रीका नियोग करताहै साधुजन उसकी में जो पुत्र पैदाहो वह क्षेत्रवालेकाही निंदा करते हैं कदाचित् कोई शंका करें कि पुत्र होताहै क्योंकि बीजसे योनिको प्रचल मनमें विधि और निषेध दोनों हैं इससे गो अश्व आदिमें देखा-यहां भी नियोग विकल्प होगा-सो ठीक नहीं क्योंकि नियोग वाग्दत्ता (जिसकी सगाई होचुकी हो)के करनेवालोंकी निंदाशास्त्र में सुनीहै-और स्त्रीके विपयमेंही समझना-क्योंकि अन्य स्त्रीमें धर्नामें व्यभिचार करनेमें बहुत दोष सुन- नियोग मनु (अ० ९ श्लो० ५९-६. नें | तेहैं और संयम( इंद्रियोंको रोकना की नेपिद्धं कियाहै कि भली प्रकार नियुक्त अत्यंत प्रशंसाहै-सोई मनुनेंही (अ०५ 'काहुयी स्त्री देवर वा सपिंडसे संतानके श्लो. १५७ )मे श्रेष्ठपुष्प मूल फलासे नाशको देखकर वांछित सतानको प्राप्त । चाहै देहको नष्ट करदे परंतु पतिके मरे होजाय-विधवामें नियुक्त मनुष्य धोको लपे- टकर और मानको धारण करके रात्रिके अन्यस्मिन्हि नियुजाना धर्म हन्यु सनातन॥ नोद्वाहिकेषु १ नान्यस्मिन्विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः। १ क्रिया-पुपगमारक्षेत्र चीनार्थ यत्मदीयते ॥ तस्येह , मत्रेषु नियोगः कीयते क्वचित् । न विवाहविधायुक्त भागिनी दृष्टा बाजी क्षेत्रिक एन च । विधवावेदन पुनः ॥ अय दिहि विद्वद्भिः पशुधर्मो विग- २ फल वनभिसधाय क्षेत्रिणा बीजिना तथा ! हितः ॥ मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्य प्रशासति । सम- प्रत्यक्ष क्षेत्रिणामों वीजादोनिलीयसी। हीमखिला भजन राजर्षिप्रवरः पुरा ।वर्णानां संकर चक्र ३देवराहा सपिडादानियासम्पनियुक्तया।प्रजेप्सि- ( कामोपहतचेतनः। ततःमति यो मोहातु ममीत पतिका ताधिगतच्या सतानस्य परिक्षये ॥ विधवाया नियुक्तस्तु निया नियोजयत्यपत्याथै गर्हन्ते त हि साधवः ॥ घृतातो वाग्यतो निशि । एकमुत्पादयोपुत्रं न द्वितीय २ काम तु क्षपये हम्पुष्पमूलफलैः शुभैःनितु नामापि रहीयात्पत्यो प्रेते परस्य तु । म । कथचन ॥
(२८२) याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षरामकाशसहित । पीछे पर पुरुषका नामभी न ले इस वचनसे | होनेपर्यत ऋतु ऋतुमें एकवार . संगकरै जीवन के लिये परपुरुषके आश्रयका निषेध क- जिसके संग वाग्दान हुआहो वह प्रतिग्रहके रके मैनुनें (अ०५ श्लो. १५८-१५९-१६०- विनाही उस कन्याका पतिहै यह बातभी १६१ ) कहाहै कि मरणपर्यंत पतिव्रताओंके इससेही जानीगई-यदि वह पति मरजाय सर्वोत्तम धर्मकी आकांक्षा करतीहुई विधवा- तो उसका छोटावा ज्येठा सोवर ( सगा ) स्त्रीकी और नियमसे ब्रह्मचारिणी रहे-अनेक | देवर उस कन्याको विवाह ले-यथाविधि सहस्र कुमार अवस्थाके ब्रह्मचारी कुलमें कहनेसे यह सूचित किया कि शास्त्रके अनु- संतानको पैदा किए विनाही स्वर्गमें गये | सार विवाह कर घीका अभ्यंग और मौन पतिके मरे पीछे साध्वी स्त्री पुत्रके विनाभी आदि नियमोंसे मन वाणी काया जिसके इस प्रकार स्वर्गमें पहुचेगी जैसे वे ब्रह्मचारी वशम हो ऐसी कन्याको गर्भ धारण पर्यंत गए जो स्त्री संतानके लोभसे अपने भर्ताका प्रत्येक ऋतुमें एक २ वार संग करे यहई अवलंघन करतीहै वह इस लोकमें नि- ( वचनसे सिद्ध विवाह, घोके अभ्यंग आदि दाको प्राप्त होतीहै और परलोकसे पतित | नियमवाले नियुक्त देवरका स्त्रीके साथ होताहै इन वचनोंसे पुत्रके लियेभी दूसरे | गमनका अंगहै उससे उस स्त्रीको देवरकी पुरुषका आश्रय मने कियाहै तिससे विधि भार्याका बोधक नहीं हो सक्ता इससे और निषेध दोनोंके होनेसे विकल्प मानना उस स्त्रीमें पैदाहुआ पुत्र क्षेत्रके स्वामी युक्त नही-इस प्रकार जिसका विवाह- (स्त्रीका पहिला पति )काही होता है देव- रूप संस्कार होगयाहो उसका नियोग जब रका नही-यदि दोनोंके होनेका नियम निषिद्धहै तो कोनसा धर्मका नियोगहै-इस (प्रतिज्ञा ) विवाहके समय होगया होय तो लिए मन ( अ०९ श्लो० ६९-७०)ने ) दोनोंका पुत्र होता है। 'धर्मका नियोग कहा कि जिस कन्याका भावार्थ-पुत्रहीन मनुष्यनें पराई स्त्री नियो- वाग्दान किए पर्छ पति मर जाय उस-] गसे पैदाकिया जो पुत्र है वह दोनों पिता- कन्याको इस विधिसे देवर विवाह ले और ओंके धनका भागी और दोनोंकोही धर्मसे शुक्ल वस्त्रोंको धारती और शुद्ध प्रतवाली | पिंडका दाता है ।। १२७ ॥ सिको विधिसे प्राप्त होकर परस्पर संतान औरसोधर्मपत्रीजातत्समापुत्रिकासुतः । १ आसीतामरणाक्षांतानियता ब्रह्मचारिणी।शे धर्म । क्षेत्रजःक्षेत्रजातस्तुसगोत्रेगेतरेणवा१२८॥ एकपरनीनां कांक्षती तमनुत्तमम्॥अनेकानि सहवाणि कौमारब्रह्मचारिणाम् । दिवगतानि विप्राणामकृला पद औरसः १ धर्मपत्नीजः १ तत्समार कुलसतिम् । मृत भटरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिः । पुत्रिकासुतः १ क्षेत्रजः १ क्षेत्रातः १ तु:- ता॥स्वर्गयच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः अपत्यलो- सगोत्रण३ इतरेण३ वा-॥ माया तुनी भरिमतिर्तते । सेह निदामवामीति पर- गृहेप्रच्छन्नउत्पन्नोगूढनस्तुसुतः स्मृतः । लोकाच दीयते । कानीनाकन्यकाजातोमातामहसुतोमतः ॥ २यस्याम्रियेत कन्यायावाचा सत्यकृते पत्तिा ताम- नेन विधानेन निजी विदेन देवरा ययाविध्यभिगम्यना पद-गृहे७ प्रच्छन्नः १ उत्पन्नः १ गूढ- शानो शचित्रतामा मियोमजेतामसवासहरसाद-जः१ तु:- सुतः१ स्मृतः १ कानीनः१ साना। कन्यकाजातः १ मातामहसुतः १ मतः१॥ १ व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२८३) अक्षतायांक्षतायांवाजातः पौनर्भवः सुतः । पुत्रोंके स्वरूप और विभागको कहते हैं धर्म- दद्यान्मातापितावायंसपुत्रोदत्तकोभवेत् ॥ विवाहसे विवाहीहुई सवर्णा पत्नीसे उत्पन्न पद-अक्षतायां क्षतायां वा-जातः १ हुआ पुत्र औरस होता है अपनी उर(छाती) के बलसे पैदा होनेसे यही सब पुत्रोंमें मुख्य पोनर्भवः १ सुतः १ दद्यात् क्रि-माता है और पुत्रिका सुतभी औरसके समान पितार वाई- येर सः १ पुत्रः १ दत्तकः १ (तुल्य ) होता है सोई वसिष्ठने कहा है कि भवेत् क्रि॥ भ्रातासे रहित इस अलंकारकीहुई कन्याको क्रीतश्ताभ्यांधिकीतः कृत्रिमः स्थास्वयं- तुझे देताहूं इसमें जो पुत्र होगा यह मेरा कृतः। दत्तात्मातुस्वयंदत्तोगभिन्न सहो- पुत्र होगा-अथवा पुत्रिकासुतपदका यह दजः ॥ १३१ ॥ अर्थ है कि पुत्रिकाही जो सुत वह पुत्रिका- पद-क्रीतः १ चऽ- ताभ्यां३ विकीतः १ क्योंकि उसमें पिताके अवयव अल्प सुत है वह पुत्रभी औरसके समान है कृत्रिमः १ स्यात् क्रि-स्वयकृतः १ दत्ता और माताके अवयव बहुत है-सोई वसिष्ठनें एमार तु:-स्वयंदत्तः १ गर्भ७ विन्नः १ सहोदजः १॥ कहाँ हैं कि दूसरा पुत्र पुत्रिकाही है-द्यामु- प्यायण तो औरस पुत्रसे कुछकम जनक .. उत्सृष्टोगृह्यतेयस्तुसोपविदोभवेत्सुतः । (पैदा करनेवाला)का पुत्र इस लिये होता पिंडदोशहरश्चैषांपूर्वाभावेपरःपरः।।१३२॥ है कि अन्यके क्षेत्रमें पैदा हुआ है कि । पद-उत्सृष्टः १ गृह्यते क्रि-यः १ तुः- सगोत्र वा इतर (असपिंड से वा देवरसे संः१ अपविद्धः १ भवेत् क्रि-सुतः १ पैदाहुआ पुत्र क्षेत्रज होता है-भर्ताके घरमें पिण्डदः १ अंशहरः१ चा- एषां ६ पूर्वाभाव, जो प्रच्छन्न (अप्रकट ) पैदाहो अर्थात् न्यून और अधिक जातिको छोडकर-पुरुष विशे- परः१परः१॥ पसे पैदाहोर्नका चाह निश्चय नहों परंतु सव- योजना-धर्मपत्नीजः औरसः तत्समः ! जसे पैदाहुयेका निश्चयही-ऐसा जो पुत्र वह पुत्रिकासुतः सगोत्रेण वा इतरेण क्षेत्रातः गूढज पुत्र होता है-पूर्वके समान सजाती- क्षत्रजः-गृहे प्रच्छन्नः उत्पन्नः सुतः गूढेजः । यस कन्याम पदाहुआ पुत्र कानीन होता स्मृतः-कन्यकाजातः कोनीनः मातामहसुतः वह मातामह ( नाना )का पुत्र होता है मतः-अक्षतायां वा क्षताया जातः सुतः । यदि वह कन्या विनाविवाहीहो और पिताके पानवैः-माता वा पिता यं दद्यात् स पुत्रः : घरमही रहतीहो यदि विवाहीहुयी होयतो दत्तकः भवेत् ताभ्यां विक्रीतः क्रीतः- विवाह करनेगलेकाही पुत्र होता है सोई स्वयंकृतः कृत्रिमः स्यात्-तुपुनः स्वयंदत्तः । मनु (अ.९श्लो १७२)ने कहा है कि जो कन्या दत्तात्मा-गर्भ विनः सहोदजः-तुपुनः यः पिताके घर एकांतमें जिप्स पुत्रको पैदाकरें उत्सृष्टः गृह्यते सः सुतः अपविद्धः भवेतू- एषां द्वादशानां मध्ये पूर्वाभाव परः परः १ अभ्रातुकां प्रदास्यामि तुभ्यकन्यामर कृताम्। अ- पिंडदः चपुनः अंशहरः-भवतीति शेषः ॥ स्था यो जायते पुनः स मे पुनो भवेरिति । २ द्वितीयः पुत्रिकेव। तात्पर्यार्थ-सजातीय और विजातीय ३ पितृवेदमनि कन्या तुयं पुत्र जनयद्रहःकालीन पुक विभागको कहकर मुख्य और गांण । वदनाना वौदुः कन्यासमुद्रवम् ।
(२८४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । उसे नामसे कानीन कहते हैं-अन्या मैदा- निषेधहै-इसी प्रकारको क्रीत स्वयंदत्त हुआ वह पुत्र बोढा (विवाहनेवाला )का कृत्रिम पुत्रों में भी समझना क्योंकि वेभी इस होता -क्षता (जिसको पतिका संग हो- केही समान, माता पिता दोनोने वा माताने चुकाहो ) वा अक्षता (जिसको पतिकासंग वा पितानें जो विक्रीत (वेचदिया ) कर न हुआहो) पुनः (दुवारा ) विवाही हुयीमें दियाहो वह क्रीत पुत्रहोताहै-इसमेंभी पूर्वके जो सजातीयसे पैदाहो वह पौनर्भव पुत्र समान ज्येठे और एक पुत्रको नवेचे और होता है-पतिक परदेशजानपर वा मरनेपर आपत्तिमें और सवर्णकोही वेचे-जो तो मनु भर्ताकी आज्ञासे माता-वा पिता वा दोनों (अ.९लो.१७४)में कहाहै कि संतानक जिस पुत्रको अपनें सजातीयको देदें वह लिये माता पिताके समीपसे जिसके मोलले पुत्र उस सवर्णका दत्तक पुत्र होता है सोई वह दृश हो वा अ दृश हो क्रीत पुत्रहो मनु (अ. ९ श्लो. १६८)ने कही है कि । ताहे उस मनुके वचनसे गुणोंम सदृश व माता वा पिता जिस अपने सजातीय असदृश यह अर्थ करना-जातिसे सहर पको आपत्तिके समय प्रीतिसे दे वह . पुत्र । असदृश यह अर्थ नहीं हो सकता क्योंकि दत्तक जानना- आपत्ति के कहनेसे आपत्ति | अंतमें याज्ञवल्क्यही यह कहेंगे कि यह न होयतो दाता कभी न दे-तैसेहो एक विधि-मैं-सजातीय पुत्रोंकी कहीहे-जिसके पुत्रकोभी न दे क्योंकि यह वसिष्ठैकी स्मृति । पुत्रक अभिलापी मनुप्यनें धन और क्षेत्र है कि एक पुत्रको न दे और न ले-तैसेही | आदिके लोभको दिखाकर स्वयं पुत्र कर अनेक पुत्र होयतो ज्येष्ठ पुत्रको न दे क्योंकि लियाहो वह कृत्रिम पुत्र होताहै-वहभी मात मनु (अ.९ली.१०६ ) कहाँ है ज्येष्ठके | पितासे रहितहो क्योंकि उनके जीवत हुये पैदा होतेही मनुष्य पुत्रवाला होता है इससे पुत्र उनके परतंत्र होताहै-जो माता पिता पुत्रके कार्य (श्राद्ध आदि)करनेमें वही मुख्य हीन हो वा उन दोनोंने त्याग दियाहो-में है-पुत्रके लेने का प्रकार यह वसिष्ठनें कों है । आपका पुत्र होताहूं ऐसे कह कर स्वयं- कि पुत्रको ग्रहण करना चाहे तो बंधुओंको दत्त भावको प्राप्तहोगया हो वह दत्तात्मा पुत्र बुलाकर और राजाके यहां निवेदन (अर्गी होताहै-जो गर्भवतीही विवाहीहो उसके देना ) करके और गृहक मध्यमें होम कर- संग गर्भमें स्थित बालकभी विवाहा गयाही अनंतर जो अपने बंधुओंमें समीपही वह सहोदज पुत्र विवाहने वालेका होता पुत्रको अपने बंधु ओंके मध्यमेही बेठ- बीजवालेका नही-माता पिताने जिसको कर ग्रहण करे बंधुओंमें समीपहो यह कह- छोड दियाहो और उसको जिसनें ग्रहण नेसे देश वा भाषासे विप्रकृष्ट (दूर )का करलिया हो वह अपविद्ध नामका पुत्र ग्रहण करनेवालेका होताहे-इन सब पुत्राम १ माता पिता वा दद्यातां यमद्भिःपुत्रमापदि। सशसवर्ण ( सजातीय) लेना अर्थात् सजातीय प्रीतिसयुक्तः स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः । होसकतेहैं अन्य नही होसकते-इस प्रकार २ नोवेक पुर्व दद्यारमतिराहीयावा । ३ ज्येप्टेन जातमात्रगे पुत्री भवति मानवः । मुख्य और अमुख्य पुत्रोंको क्रमसे कह कर ४पुत्र प्रतिगृहाप्यवधूनाहूय गजनि चाय निवेशन-, उनके दाय ग्रहण करने में क्रमको कहते हैं- मध्ये व्याहृतिभिर्दा अदाबांध यंघुमनिकट एव १ क्रीणीयायस्वपत्यार्थ मातापिनोर्यमंतिकात् ।स- प्रतिपक्षीपाद । गीतकः सुतस्तस्य सदृशोसहमपि वा। --- -- व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२८५) इन बारह प्रकारके पुत्रोंक मध्यमें पहिले २ कीभी पिताके सब धन ग्रहण करनेका के अभावमें परला २ पिटका दाता और अधिकार-(पूर्वाभावे परः परः)-पहिले २. अंशका भागी होताहै-औरसपुत्र और पुत्रके अभाव में परलार धनका भागी होताहै पुत्रिकाका पुत्र ये दोनों होयतो औरसको इस वचन से है-जो मनु (अ ९श्लो.१६३) ही धनका ग्रहण पाया इसमें मनु (अ.९ का वचनेहै कि एक औरस पुत्रही पिताके श्लो.१३४ ). निषेधे किया कि पुत्रिका सब धनका स्वामीहै ऋरता( निंदा ) होजाय करनेके अनंतर यदि पुत्रहो जाय तो वहां इस लिये शेष पुत्रोंको जीवनके उपयोगी विभाग तुल्य होताहे स्त्रीको ज्येष्ठता नही द्रव्यको दे- वहभी तब जब दत्तक आदि होती-अन्य पुत्रों भी तिसी प्रकार पहिले२ औरस पुत्रके प्रतिकूलहों वा निर्गुणहों-उन-. पून:- हाते पिछले२ पुत्रोंका चौथाई भाग मेंभी क्षेत्रनके लिये मनुने (अ.९श्लो.१६४') वशिष्ठनें कहा है कि यदि दत्तक पुत्रके में ही विशेष दिखायाहै कि दायका विभाग प्रदण किये पीछे औरस पुत्र पैदा होजाय तो करता हुआ औरस पिताके धनमसे छठा या चौथाई भाग दत्सकको मिलताहे-यहां दत- पांचवां भाग क्षेत्रनकोदे-उसमेंभी यह विवे- कका ग्रहण क्रीत और कृत्रिम आदि सब- कहे कि प्रतिकूल और निर्गुणको छठा भाग का भोधकहे-सबमें पुत्रीकरण ( अपुत्रको और एकही होयतो पांचवां भागदे-और जो पुत्र करना ) समानह-सोई कात्यायनने मनुने छः छः पुत्रोंको लिखकर पहिले छ- कहा कि औरस पुत्रके पैदा होनेपर सजा- को दायके भागी और पिछले छःको तीय अन्य पुत्र चतुर्थ अंशके भागी होतेहैं दायके अभागी कहाँहे ( अ. ९ श्लो. १५९ और विजातीयोंको तो भोजन वस्त्रही मिल- १६०) कि औरस-क्षेत्रज-दत्तक कृत्रिम- ताहै यहां सवर्ण पदसे इत्तक क्षेत्रन आदि गूढोत्पन्न-अपविद्ध-ये छः बांधव दायके और असवर्णपदसे कानीन गूढोत्पन्न सहोदन भागीहैं-और कानीन-सहोट-क्रीत-पौनर्भव- निर्भव आदि लेने इनमें सवर्णोको चौथाई स्वयंदत्त और शोद्र-ये छः बांधव दायके माग और असवर्णों को भोजन वस्त्रका अधि- भागी नहींहै-वहभी तबहे जब अपने पिताके कारहे-जो यह विष्णुका वचनहै कि अप्र- शस्त ( निंदाके योग्य ) जो कानोन गूटो- सपिंड और समानोदकोंमें समीपका कोई त्पन्न सहोटज पौनर्भवहै ये पिंडदेने और दायभागी नहोय तो पहिले छः दायभागी, धनके लेनेके भागी नहीहै-वह वचनभी। और पिछले छःनही-सगोत्री वा सपिंड होनेसे औरसके होते चौथाई भागका निषेध कर- जलदान आदि कार्य करने के लिये बांधव तो ताई यदि औरस न होयतो कानीन आदिको दोनों वर्गाको समानहै अर्थात् बारके यारह १ पुत्रिकाया कृताया तु यदि पुत्रानुजायते। समस्त १ एक एचौरसः पुत्रःपित्र्यस्य वस्तुनः प्रभुः। शेषा- में विभाग: स्याज्ज्येष्ठता नास्ति हि त्रियाः। णामानुशस्यार्थ प्रदद्यात्तु प्रजीवनम् । २ तस्मिश्चेत्प्रतिगृह्णीते औरस उत्पति चतुर्थभाग २ पट तु क्षेत्रजस्याशं प्रदद्यात्पचकाद्धनान् । औरसो भागी स्याइतक.। विभजन् दाय पिच्य पचममेव वा । ३ उत्पन्ने त्वौरसे पुत्र चतुर्थाशहराः सताः । सवर्णा ३ औरसः क्षेत्रजचा दत्तः कृत्रिम एस च । गो- असवर्णास्तु प्रासाच्छादनभाजनाः ॥ स्पन्नोऽाविद्धश्च दायादा चाधवाश्च षट् ॥ कानीनश्च ४ अप्रशस्तास्तु कानीनगदोत्पत्रसहोटजाः पौन-सहोदश्च नीतः पौन वस्तथा । स्वय दत्तश्च शौद्रश्न वच नैवैते पिडरिक्याशभागिनः । पडदायायाधयाः।
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२९१) सनातन धर्मको नष्ट करते हैं जो ! नोंको विरोध होगा कि अपनी शक्तिके पूर्वक्ति वसिष्ठका वचन है कि धनके अनुसार धर्म अर्थ कामको न त्यागे-धर्म लोभसे नियोग नहीं होता उत्त वचनका यह अर्थ कामके विना पूर्वाह्न मध्याह्न अपराह्न अर्थ करना कि अविभक्त ( इकट्टा )वा सं- इनको निष्फल न कर-विनासेवा इंदियोंका सृष्टी (साझी)भाई मर जायतो उसकी स्त्रीको संयम नही करसकते-और धनको यज्ञार्थ धनका संबंध नहींहै वह स्त्री अपने पुत्रको ! मानोगतो सुवर्णको धारण कर इस वचनमें धनसंबंधके लिये नियोग न करे- और सुवर्णके समान धनको जो पुरुषार्थ कहा है जो पूर्वोक्त नारदका वचन है कि जीवन- वहभी न होसकेगा और यज्ञशब्दको पर्यत अपुत्रकी स्त्रियोंकी पालना करें- वह धर्मका उपलक्षण माननेमें स्त्रियोंकीभी पूर्त भी संसृष्टोंका जो भाग है वह संसृष्टीको धर्मका अधिकार होनेसे धनका ग्रहण अत्यं- है। इष्ट है इस वचनमें संसृष्टोंका प्रकरण तयुक्त है जो ये परतंत्रताके बोधक वचन होनेसे उनकीही अपत्यरहित स्त्रियोंके भरण है कि स्त्री स्वतंत्रताके योग्य नहीं है वह मात्रका बोधकह-कदाचित् कोई शंका परतंत्रता रहो धनके स्वीकारमें क्या विरोध करें कि भ्राताओंमें जो प्रजाहीन मरजाय है-फिर यज्ञके लिये पैदाहुआ द्रव्य-इस इस पूर्वोक्त वचनको संसृष्टोंके विषयों वचनकी क्या गति होगी इसकी गतिको होनेसे संसृष्टोंके भागको संसृष्टले इसके संग ) कहते हैं कि यज्ञके लियेही संचितकिये पुनः उक्ति (दोवार कहना ) दोष है-सो द्रव्यको यज्ञमेही पुत्र आदि लगावें इसका ठीक नही--जिससे पूर्वोक्त विवरण (अर्थ) | बोधक वह वचन है क्योंकि यज्ञके लिये से स्त्रीधनको विभागकी अयोग्यता और | मिले द्रव्यको जो नही देता वह भास वा उसकी स्त्रियोंका पालन पोपणही विधान काक होता है यह दोषका सुनना पुत्र किया है जो यह पूर्वोक्त वचन है कि पुत्र आदिकोंमेंभी समान है-और जो यह कात्या- हीन इनकी स्त्रियोंकी पालना करे-वहभी यननें कहा है कि जो धन दायादोंसे रहित नपुंसक आदिकी स्त्रियोंके विषयों है यह है अर्थात् जिसका कोई भागी नहीं वह आगे कहेंगे-और जो यह कहा है कि | गजाका होता है परंतु स्त्रियोंके भोजन वस्त्री- द्विजातियोंका धन यज्ञके लिये है स्त्रीयोंकों पयोगी और धनीके श्राद्धोपयोगी द्रव्यको यज्ञका अधिकार नही इससे धनका ग्रहण छोडकर राजगामी होता है-इसकामी यह अयुक्त है-बहभी ठीक नहीं क्योंकि संपूर्ण अपवाद है कि श्रोत्रिय (वेदपाठी )का जो द्रव्यको यज्ञार्थ मानोगेतो दान होम आदि द्रव्य है वह श्रोत्रियको स्त्रीका मालन और न होसकेंगे-कदाचित् कहो कि यज्ञ शब्द धर्ममर्थं च कामं च यथाशक्ति न हापयेत्॥नपू: धर्ममात्रका बोधकहै दान होम आदिभी चह्निमध्यदिनापराह्वानफलान्कुयायथाशनिधर्मार्थका- धर्मार्थ है इससे यज्ञार्थ कहने में कुछ विरोध में य ॥ नतधेतानि शक्यते सनियतुममेवया । नही-ऐसे माननेमेभी धनसे सिद्ध होनेवाले २ हिरण्यधार्यम् । अर्थकामोंकी सिद्धि न होगी और ऐसे ३ न छी स्वातन्यामईति। मानने में इन याज्ञवल्क्य गौतम मनुके वच ४ यतार्थ लन्धमददगासः काकोपि वा भाव। ५अदायिक राजगामि योश्त्यिावेदहिकमाअपा. १ समानां तु यो भागः संसृष्टानां स इष्यते । स श्रोत्रियव्य श्रोत्रियेभ्यस्तदर्पयेत् ।
विषयमें है जो अवरुद्धको (रोक हा पुत्रके समान अंशको ग्रहण करती है-सोभी (२९२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । ओत्रियके आवदेहिक कर्मको छोडकर यगें कदाचित यह मानोकि बहुत धन होयतो श्रोत्रियोंकोदे गजान ले-यहभी उन स्त्रियोंके जीवन के उपयोगी और अल धन होयतो क्योंकि इस वचनमें योषित पदका ग्रहण है- ठीक नहीं क्योंकि विधिको विषमता होगा और नारदकाभी वचन है कि ब्राह्मणको | यगी-विषमताकोही दिखाते हैं कि पनि । छोडकर धर्ममें परायण राजा धनीको स्त्रियों- ! योंके समान अंशकर-माताभी समान अंशते को आजीवन (भोजन वस्त्र )दे यह दायकी | ये दोनों वचन बहुत धनमें जीवनके उप- विधि कही है- यह वचन अवरुद्धकी स्त्रीके योगीकोले इस दूसरे वाक्यकी अपेक्षासे विषयमें है क्योंकि इसमें स्त्रीशब्दका ग्रहण | जीवनमान धनको और अल्प धनमें पुनकि है-यहां तो पत्नीशन्दके ग्रहणसे विवाही समान अंशोंको प्रतिपादन (कहना ) करेंगे और जितेंद्रिय उसको धनके ग्रहणमें कोई तैसेही चातुर्मास्य यज्ञोंमें दोनोंका प्रणयन विरोध नहीं-तिससे विभक्त असंसृष्टी पुत्र | (प्राप्तकरना ) करते हैं इस वाक्यमें पूर्व रहित मनुप्यके मरनेपर सबसे प्रथम पत्नी | पक्षीनें सोमयज्ञके प्रणयनके अतिदेशम धनको ग्रहण करती है इसमें कोई विरोध | वैश्वदेवमें उत्तर वेदीपर उपकिरण (कुशार- नही-विभागको कह आये और संसृष्टि- खना) करते हैं गुनासीरीयमें नही यह उत्तर योको कड़ेंगे-इससे श्रीकर आदिकाने इस वेदीका प्रतिषेध हेतु दिखाया है फिरसिद्धा वचनको अल्पधनके विषयमें जो कहा है | तोके एकदेशीने यह कहा कि सोमयज्ञवें वह निरस्त (खंडित) समझना-तैसेही | प्रणयनके अतिदेशसे प्राप्तहुयी उत्तर वेदी औरस पुत्रोंके होतेभी पिताके जीवन वा | प्रथम उत्तम पर्वोका यह निषेध है-फिर पूर्व मरण समयके विभागमें पत्नियोंको पुत्रोंके पक्षीने यह विषमता दिखायी कि को समान अंश कह आये हैं-कि यदि पिता | हुये-(वपन करते हैं) इस प्रथम उत्तर सम अंश करे तो पलियोंकोभी समान पाके निषेधकी अपेक्षा एक पक्षको उत्तर अंशदे-पिताके मरनेपर पुत्र विभाग करें तो वेदीको प्राप्त करता है-और मध्यके दे. माताभी समान अंशले-तिससे स्वर्गमें गये | तो नित्यके समान-निरपेक्ष उत्तर अपुत्र मनुप्यके धनको पत्नी भोजन वस्त्रसे प्राप्त करता है-सिद्धांतमेंभी विधिको नि अधिक नहीं लेसकती यह व्यामोह (भ्रम ) ' मताके भयसे प्रथम उत्तर वेदीका प्रति मात्र है-कदाचित् यह कोई मान कि पत्नि- नित्यका अनुवाद है-दोनों में प्रणयन करते योंको समान अंशदे-माताभी समान अंशल- हैं इस अर्थवादकं पर्यालीचन (देखना इन पूर्वोक्त दोनों वचनों में जीवन के उपयोगी से कहा जो वर्पति ( वपन करते हैं मध्य धनकाही स्त्रीग्रहण करती है-सो ठीक नही- | वरुण प्रयाप्त शाकमेध पामेंदीउत्तर पेदी क्योंकि अंशशब्द और समशन्द व्यर्थ होना- कहता है-यह सिद्धांत दिखाया है जो कोई यह मानते हैं कि अपुत्रके धनको 1 अन्यत्र माझगाकेतु राजा धर्मगपणः। रानी- और वा भ्राता ग्रहण करते हैं-इसे मनु मां जीरनं दद्यादेष दायविधिः स्मृतः ॥ (अ० ९ श्लो. १८५)वचन और तसही २ यदि कुसिमानशत्पन्नाका: ममाशिफाः । चातुर्मास्य र दशः प्रगति शिवस्य विमजा माताप्यं सम हरेद। २ पिता होवस्य सिक्यं भातर एव या। । - व्यवहाराध्याय दायविभागमकरण ८ (२९३) अपुत्रके मरनेपर द्रव्य भ्राताको मिलता है। स्थाकी कर्कशा विधवा स्त्रीहो उसकोभी वह न होयतो माता पिताको वा ज्येठि पत्नी- अवस्था बितानेके लिये भोजनदे वह वचन- को मिलता है इसे शंखके वचनसे अपुत्रका | भी उस स्त्रीको संपूर्ण धनको निषेध करता धन भ्राताको प्राप्त होता है यह पाया और है जिसके व्यभिचार कर्मकी शंकाहो और जीवन पर्यंत अपुत्रकी स्त्रियोंकी पालना करें इसी हारीतकै वचनसे व्यभिचारको शंकासे इत्यादि वचनसे पालनके उपयोगीको पली रहित स्त्रीको संपूर्णधनका ग्रहण प्रतीत होता ग्रहण कर और शेष धनको भाई ग्रहण करें- है-यही जानकर शंखने-ज्येष्ठा वा पत्नी- और जव पत्नीकी पालनाके उपयोगीही धनहीं | यह कहा है अर्थात् व्यभिचारकी शंकासे वा उससे भी न्यूनहो तब पत्नीही ग्रहण करे रहित जो गुणोंसे ज्येठी है वह सर धनको वा भ्राताभी कुछ ग्रहण करें इस विरोधमें ग्रहण करके दूसरी कर्कशाकीभी माताके पूर्व वचनके बलवान् बतानेके लिये-पत्नी समान पालना करै-इससे सब पूर्वोक्त कथन दुहितरः-इस वचनका प्रारंभ किया है- | निर्दोष है-तिससे विभक्त ( जुदा ) असं- इस पूर्वोक्त किसीके माननेकोभी भगवान् सृष्टी पुत्र रहित मनुष्यके मरनेपर-जितें आचार्य नहीं सहते-जिससे पूर्वोक्त मनु द्रिय और विवाही हुयी स्त्री संपूर्णही धनको (अ० १ श्लो० १०५) वचनमें अपुनके । ग्रहण करती है यह स्थित (सिद्धांत हुआ धनको पिता ग्रहण करे वा भ्राता-इस । पत्नी न होयतो दुहिता ( पुत्री) लेती हैं- विकल्पके स्मरणसे यह वचन क्रमका बोध- दुहितर:-यह बहु वचन इस लिये है कि क नही किंतु धनके ग्रहण करनेमें अधि- । सजातीय और विजातीय पुत्रियोंको सम री दिखानेके लिये है-अधिकारियोंका विषम-अंश मिलता है-सोई कात्यायनेने एखाना तो पत्नी आदिका समुदाय | कहा है कि जो व्यभिचारिणी नहो वह न होयतोभी घट सकता है यह व्याख्या पत्नी पतिके धनको लेती है उसके अभावमें आचार्यनें की है- शंखका पूर्वोक्त वचन विना विवाही होयतो पुत्री लेती है-वृहस्पति- भी संसृष्ट भ्राता ओंके विषयमें है-और यह कोभी वचनहै कि भाके धनको पत्नी भी है कि अल्प धनके विषयमें पत्नी ले य- लेतीहै-उसके विनर दुहिता कही है-अर्थात हुवात इस वचन वा प्रकरणसे प्रतीत नहीं | पत्नी न होयतो दुहिता लेती है मनुष्यों के होती-उत्तर २ धनका भागी है यह वाक्य अंग अंगते पुत्रोंके समान दुहिता पैदा पत्नीदुहितरः-इन दोनों विषयों में वाक्यां- | होती है तिप्तसे अपुत्र पिताके धनको दुहि- तरकी अपेक्षासे अल्प धनके विषयमें-और । ताप्ते अन्य मनुष्य कैसे ग्रहण कर सकता पिता आदिमें संपूर्ण धनके विषयमें है-यह । है-उनमेंभी विवाही और विना विवाहियाके पूर्वोक्त विधिको विषमता तदवस्थ (ज्योंकी- समुदायमे विनाविवाही ही लेती हैं क्योंकि त्यों) है इससे वह पूर्वोक्त कथन तुच्छ है- पूर्वोक्त कात्यायनके वचनमें यह विशेष जो हारतका वचन है कि जो यौवन अव- कहा है कि विना विवाही होपत्तो पत्नीके १ स्वर्यातस्य पुनस्य घाटगामि द्रव्य तदभावे अपनी पत्युर्धनहरी यासाव्यभिचारिणी। तदमावे पितरो हरेयात ज्येष्ठा वा पत्नी । तु दुहिता ययनूढा भवेत्तदा । २ भरण चास्य कुलरिन् खाणामाजीवनक्षयात् । २ भर्तुर्धनहरी पत्नी तां विनाहिता स्मृता । भगा- ३ विधरा यौवनस्या चेन्नारी भवति कर्कशा। दगात्सभवति पुत्रबदुहिता नृणाम् ॥ तस्मापिरधन आयुषःक्षपणार्य तु दातन्य जीवनं तदा। वन्यः कथ गृहीत मानवः।
(२९६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । मरजाय तो उसके भ्राताओंको अविशेष- पितामह आदि धनके भागी होते हैं क्योंकि तास धनका संबंध हुआ और भ्राताके धन भिन्नगोत्री सपिंडोंका बंधु शब्दसे ग्रहण है विभागसे पहिलेही यदि कोई भ्राता मरगया उनमें पिताकी संतानके अभावमें पितामही होय तो उसके पुत्रोंकोभी पिताकद्वाराधनका पितामह-पितृव्य पितृव्योंके पुत्र-क्रमसे ध- अधिकार पाया वे भाईके पुत्र और भाई नके भागी होते हैं-पितामहकी संतानमें विभागसे धनको ग्रहण करें पिताके क्रमसे कोई न होय तो प्रपितामही प्रपितासह-ड़- भागकी कल्पना होतीहे इस पूर्वोक्त वचनके सके पुत्र और उनकेभी पुत्र धनके भागी अनुसार विभाग कर अर्थात् मरे हुये भ्राता होते है-इस प्रकार सात पीटीपर्यंत समान के पुत्रोंकोभी उनके पिताका भाग दें- गोत्री और सपिंडोंको धनका ग्रहण जानना- भ्राताके पुत्रोंके अभावमें गोत्रज धनके उनकेभी अभावमें समानोदकोंको धनका सं- भागी होते हैं अर्थात् पितामही सपिंड और बंध होता है-वे सपिंडासे उपरके सात जा- समानोदक भागी होते हैं उनमें पहिले पि-नने वा जन्म नामके ज्ञानतक-अर्थात् जहाँ- तामही धनकी भागिनी होती है क्योंकि तक अपने बडोंका नामस्मरण हो वहांतक माताके मरनेपर पिताकी माता धनको लेती जानने-सोई बृहत् मर्नु ने कहा है कि सांतवें है इस पूर्वोक्त मनु (अ०९ श्लो० २१७) पुरुषमें सपिंडता निवृत्त होती है चौदहवीं के वचनसे माताके अनंतर पितामहीको ध- पीटी पर्यत समानोदक भाव निवृत हो जाता नका ग्रहण पाया पितासे लेकर भ्राताओंके है और कोई जन्मनामके स्मरण पर्यंत पुत्र पर्यताका जो क्रमसे पढना उनके म- समानो दुक भाव कहते हैं-उससे परे गोत्र ध्यमें प्रवेशके अभावसे पिताकी माता धनको कहाता है:- ग्रहण करे इस वचनको धन ग्रहण करनेके गोत्रजोंक अभावमें बंधु धनके भागी हो- अधिकारकी प्राप्तिका बोधक होनेसे उत्कर्ष | धनके ग्रहण करनेमें प्रयोजक (हेतु ) नहीं (बडाई )में भ्राताके पुत्रोंके नंतर पिताम- कही-अर्थात् कहनी योग्य थी-यह मयूखमें ही ग्रहण करती है इसमें कोई विरोध नही लिखा है- है पितामहीके अभावमें समानगोत्र सपिडं. * मनुस्मृतिमें उसके अभाव में सकुल्य : * सपिंड न होय तो भगिनी धनभागिनी आचार्य वा शिष्य लें इस वैचनमें सकुल्य होती है क्योंकि मनुनें इस पूर्वोक्त सपिंडोंमें शब्दसे सगोत्र समानोदक मातुल आदिका अनंतर ( समीप )को धनका ग्रहण कहा है और तीनों बंधुओंका ग्रहण है योगीश्वरके (अ० ९ श्लो० १८७) बृहस्पतिकोभा व- वचनमेंभी वध पदसे मातुलका ग्रहण) चन है कि जहां बहुत ज्ञातिके सकल्य वा-हे अन्यथा मातुल आदिका ग्रहण ही न बांधवहीं उनमें जो समीपमें हो वही अनप- होगा इससे इसके पुत्रोंको उनका अधिकार त्यके धनको ले-इससे भगिनीभी भ्राताके है फिर समीपकोंका-उनको अधिकार न गोनमें पैदा हुयी है गोत्रजही है परसगोत्र नहीं है और वह भगिनी यहां (मिताक्षराम) १ सपिंडतात पुणे सप्तमे विनिवर्ततीसमानोदकः- भावस्तु निवर्तेताचतुर्दशात् ॥ जन्मनायोः स्मृतरेके 'पहरी ज्ञातयो यत्र सकुल्या बांधवास्तथा । य. तत्पर गोत्रमुच्यते । २ तदभाव सकुल्यः स्यादानाचार्य: शिप्यएव था। न सोनपत्यधन हो ।
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२९७ ) ८ तेह वे बंधु तीन प्रकारके होते हैं अपने बंधु | धुओंके अभावमें आचार्य और आचार्यक पिताके बंधु माताके बंधु सोई कहा है कि अभावमें शिष्य धनके भागी होते हैं क्योंकि अपनी फूफीक पुन-अपनी माताकी भगि- यह आपस्तंबका बैचन है कि पुत्रके अभा- नांक पुत्र-अपने मामाके पुत्र-ये तीन अपने वमें जो समीप हो वह सपिंड-उसके अभा- बंधु जानने-पिताकी पितृप्वप्सा ( फूफी )के वमें आचार्य-आचार्यके अभावमें शिष्य ध. पुत्र-पिताकी माताकी भागनीके पुत्र-पिताके नका भागी होता है-शिष्यके अभाव में सन- मामाके पुत्र-ये तीन पिताके बंधु होते हैं- ह्मचारी धनका भागी होता है-जिसके संग माताकी फूफौके पुत्र-माताकी भगिनीके पुत्र (सहपाठी आदि ) आचार्यसे यज्ञोपवीत- और माताके मामाके पुत्र-ये तीन माताके वेदका पठन-वेदके अर्थका ज्ञान प्राप्त हुये बंधु जानने-इन तीनोमें अंतरंग (समीप ) हो उसे सब्रह्मचारी कहते हैं-उसके अभा- होनेसे पहिले अपने बंधु उनके अभाव में पि- | वमें ब्राह्मणके द्रव्यको कोई न कोई वेद ताके बंधु उनके अभावमें माताके बंधु ध-पाठी ग्रहण करें क्योंकि गौतमका वचन है नके भागी होते है-यह क्रम जानना-ब-कि अनपत्य ब्राह्मणकं धनको श्रोत्रिय ग्रहण होगा तो यह बडा अनुचित होगा-यह- करै-उसके अभावमें सब ब्राह्मण ले-सोई वीर मित्रोदयमें लिखा है- मनु ( अ० ९ श्लोक १८८)ने कहा है कि *कदाचित कोई शंका कर पली आदिक | सबके अभावमें बीके ज्ञाता-शुद्ध-इंद्रि- सबको जो धनका भाग है वह मृत ( मरने- योंके दमन करनेवाले ब्राह्मण धनके भागी वाला )के संबंधसे है बांधवोंको भी धनका होते हैं ऐसा करनेसे धर्मको हानि नही भाग वैसाही क्यों नहो अर्थात् मरेक वधु- होती-ब्राह्मणके द्रव्यको राजा कदाचित् भी ऑकोही मिले-इससे पिता और माताके न ले-श्योकि यह पूर्वोक्त मनु (अ०१ श्लोक बंधुओंको धनका संबंध कैसे-पिताकी १८९ )का वचन हैं कि ब्राह्मणका द्रव्य रा- फूफीके पुत्र इत्यादि वचन तो संज्ञा और | जाके ग्रहण करने अयोग्य है नारदनभी- संज्ञावाले के संबंध जतानेके लिये हैं-कुछ कहा है कि ब्राह्मणके मरनेपर ब्राह्मणके ध- धन संबंधके लिये नही-इस शंकाका समा- नका कोई दायभागी न होय तो राजा प्रा- धान कहते हैं-कि इन वचनोंके विनाभी | ह्मणोंको ही दे दे-अन्यथा करै तो राजा अ- अपने पिता मातुल पितृव्य आदिमें जैसे पगधी होता है और क्षत्रिय आदिके धनको संबंधका ज्ञान होता है ऐसही पिताके तो सब्रह्मचारी पर्यंतोंके अभावमें राजा ग्रहण मंधुओंमेभी योगसेही उस शन्दकी शक्ति हो लेनेसेही वचन सफल हो सकता है-- आयगी तो संज्ञासंज्ञिसंबंधका पताना ओंके लिये शौचमं भी यही विधि है-इतिदिक्- अनर्थक हो जायगा-तिससे बंधुओंके लिये १ पुप्राभावे यः पन्यासनः मपिंडावरभाने भावार्य धन संबंधके कहने में पिता माताके बंधुओंके आचार्याभायतेगमी । . आत्मपितष्पमुः पुत्राः आत्ममावष्वमु मृताः। २ौप्रिया प्राणस्यानपयस्य पिय मजैरन् । आरममातुलपुनाथ विक्षरा यात्मक्यापितु.पितृपमुः ३ सपामध्यभाते तु प्रामणा सियभागिनः । पुत्राः पिटमारणमुः सुताः। पितुर्मातलाभाय विनेयाः प्रेषियाः मुनयो दातास्तमा धर्मो न होते। पिबांधवाः ॥ मातुः विष्वमुः पुरा मातुविषमुः ४ प्राशनाय तमाम दावादनेननथनमान- सताः। मातुमातुलपुत्राय लिया मात्रामाः। पत्र दातव्यमनस्ती स्यारोन्यथा ।
(२९८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । कर ब्राह्मण नले-सोई मनु (अ० ८ श्लोक वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणांरिक्थभागिनः । १८९)में कहा है कि इतर वर्गाके धनको क्रमेणाचार्यसच्छिप्यधर्मभ्रात्रेकर्थिनः ।। सबके आभावमें राजा ले-अर्थात् ब्राह्मणके धनमें राजा प्रभुनही है अन्यवोंमें है- पद-वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणां ६ रिक्थभा- गिनः १ क्रमेण ३ आचार्यसच्छिप्यधर्म- यहां सुगमताके लिये अपुत्रधनके दाय-भ्रात्रकतार्थिनः १॥ भागियोंके क्रमको कहते हैं-पत्नी-दुहिता- होनेकी संभावनाहो इन दोनोंको तुल्य दोहित्र-माता-पिता- भ्राता-भिन्नोदरभ्राता अधिकार है-बंध्या विधवा और पुत्रहीना- भ्राताके पुत्र-गोत्रज-पितामही- पितामह- को धनका अधिकार नहीं है-विवाही हुई समानोदक-बंधु-शिष्य-सवह्मचारी ये क्र- मसे धनके भागी मिताक्षराके मतसे होते हैं। पुत्री के अभावमें दौहित्र उसके अभावमें पिता उसके अभाव में माता उसके अभावमें भावार्थ-पत्नी-दुहिता-माता-पिता-भ्राता भ्राता लेते हैं-उनमेंभी पहिले सोदर उनके भ्राताके पुत्र-गोत्रन-बंधु-शिष्य-सब्रह्मचारी अभावमें मात्रेय ( भिन्नोदर) लेता है-यदि इनमें पूर्वर के आभावमें परला २ धनका मराहुआ भ्राता भ्राताओमें संमृष्ट ( साझी) भागी होता है-पुत्ररहित मनुप्यके मरनेपर होयता पहिले संसृष्ट सोदरही अधिकारी हैं सब व में यही दायके विभागकी विधि है वह नहोयतो असंसृष्ट सोदर लेता है-ए- ॥१३५॥ १३६॥ * सेही सब वैमात्रेयोंमें पहिले संसृष्ट वै- * जीमूतवाहन दायभागकी टीकामें मात्रेय उसके अनंतर असंसृष्ट वैमात्रेय लेता दिखाय क्रमको लिखते हैं- है-जहां वैमात्रेय तो संसृष्ट हो और सोदर मरे हुये पुरुपके धनके जो अधिकारी असंसृष्ट हो तब वे दोनों संग (इकसाथ) उनका यह क्रम है कि पहिले पुत्र उसके अधिकारी. हैं-भ्राताओंके अभावमें भ्राता- अभावमें पोत्र-उसके अभाव में प्रपौत्र धनका का पुत्र लेता है उनमेंभी पहिले सोदर भाई- भागी होता है क्योंकि जिसका पिता मरगया का पुत्र-वह न होयतो वैमात्रेय भ्राताका पुत्रले- हो ऐसे पौत्रका और जिसके पिता पिता- ता है-संसृष्टियों में तो सोदर भाईयोंके सब मह दोनों मरगयेहों ऐसें प्रपत्रिका पुत्रके , पुत्रोंमें पहिले संसृष्ट सोदर भाईका पुत्र वह न संग युगपत् ( इकसा ) अधिकार है-प्रपौत्र होयतो असंसृष्ट सोदर भाईका पुत्र लेना है पर्यंत कोई नहोयतो पत्नी लेती है वह भर्ता- वैमात्रेय भ्राताभोंके सब पुत्रोंमें पहिले सं- के दायको प्राप्तहोकर भर्ताके कुलके और । सृष्ट वैमात्रेय भ्राताका पुत्र वह न होयतो उसके अभावमें पिताके कुलके आश्रय असंसृष्ट वैमात्रेय भ्राताका पुत्र लेता है-जहां शकर शरीरकी रक्षाके लिये पतिके दायको सोदर भ्राताका पुत्र असंसृष्ट हो और वैमात्रय भोग-तसेही भर्ताके उपकारार्थ यथाकथं- भ्राताका पुत्र संसृष्टहो तब वे दोनों भ्राताके चित् दान आदिकोभी करे-स्त्रीधनके समान समान तुल्य (इकसे) अधिकारी है- "८ ( यथेच्छ )नु लगावे-पत्नीके अभा- | भ्राताके पुत्र न होयतो भ्राताके पात्रोंका अ- है दुहिता लेती है उनमें पहिले कुमारी धिकार है उनमेंभी भ्राताओंका सोदर नहोयतो वाग्दत्ता-वह न होयतो वि- असोदरका क्रम और संसृष्टि असंसृष्टिका पाही हुई-उनमें पुत्रवाली और जिसके पुत्र क्रम समझना-उनके अभावमें पिताका - व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (२९९) योजना वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणाम-का तात्पर्यार्थ-पुत्र पात्र और उनके अभावमें चार्यसच्छिप्यधर्मभ्रात्रेकतीथिन: क्रमेण पत्नी आदिदायके भागी कहे अब उन दोनोंका रिक्थभागिन:-भवतीति शेषः ।। अपवाद कहते हैं-वानप्रस्थ संन्यासी दाहिन लेता है वहभी सोदर भगिनीका पुत्र | ब्रह्मचारी इनके धनके भागी प्रतिलोम (उ- लेना-वह न होय तो वमात्रय भगिनीका लटा) क्रमसे आचार्य-श्रेष्ठ शिप्य धर्म- पुत्र लेता है-उसके अभावमें पिताका सहो- भ्राता एकतीर्थी होते हैं-यहां ब्रह्मचारीपदसे दर-उसके अभाव में पिताका वैमात्रेय-उसके नष्ठिक ब्रह्मचारी (जो जीवनपर्यत गुरुका से अभावमें पिताके सोदरोंके पुत्र-पिताके वै- | वकहो ) लेना उपकुर्वाण ब्रह्मचारीके धनको मात्रयोंके पुत्र-पितार्क सादरोंके पौत्र-पि- | तो माता आदिही लेतेहै नैष्ठिकके धनको तो पिताके वैमात्रेयोंके पौत्र-इनका क्रमसे अधि- उसका बाधकहोकर आचार्यही ग्रहण करता कार है-उसके अभाव में पितामहका दौहित्र- है यति (संन्यासी )केतो धनको श्रेष्ठ शिप्य उनमेंभी पिताकी सोदर भगिनीका धुन और लेता है-श्रेष्ठ शिप्य वह होता है जो वमात्रेय भगिनीका पुत्र लेते हैं-वक्ष्यमाण अध्यात्म शास्त्रके श्रवण- धारण-उसमें (जो कहेंगे ) प्रपितामहके दौहित्रके अधि- कहे कर्मोंके करनेमें समर्थ हो-दुराचारी कारमें भी ऐसेही समझना-उसके अभाव में आचार्य आदिभी भागक अयोग्य है-बान- पितामह वह न होय तो पितामही लेती है- प्रस्थके धनको धर्मभ्राता एकतीर्थालता है उसके अभावमें पितामहके सोदर भ्राता- धर्मभ्राता प्रतिपन्न (मानाहुआ ) भ्राताको चैमात्रेय भ्राता-उनके पुत्र और पात्र और कहते हैं-एकतीर्थी एकाश्रमवालेको कहते प्रपितामहके दौदिनोंका क्रमसे अधिकार है-धर्मभ्राता जो एकतीर्थी उसे धर्मभ्राने- है-धनीके भोग्य-पिंडके दाता ये पूर्वोक्त न कतीर्थी कहते हैं-इन आचार्य आदिकोंके होय तो-धनी जिनको पिंड दे उन ( नाना- अभावमें पुत्र आदिकोंके होनेपरभी एक- आदि )को पिंड देनेवाले मातुल आदि- तीर्थीही लेता है-कदाचित कोई शका रैकि कोंका अधिकार हे-उनके अभावमें-धनीकी अन्य आश्रमोंमें गये अंश (भाग )से हीन माताकी भगिनीके पुत्रका अधिकार है- उसके अभावमें मातुलके पुत्र पोत्रोंका एक ग्राममें स्थित सगोत्र और एकप्रवर- क्रमसे अधिकार है-उनक अभावमें नाचेके वालोंका क्रमसे अधिकार है-यहां तक धनी उन सकुल्या प्रतिप्रणप्ता आदि तीन पुरुषोंका | के संपूर्ण सबंधियोंमें कोई न होय तो ब्राह्म- अधिकार है जो धनीके भोगनेयोग्य लेप के धनको छोडकर राजा ग्रहण करले- भागके दाता हैं-उनके अभाव में फिर ऊप- ब्राह्मणके धनको तो विद्य आदि गुणोंस रके उन सकुल्योंका समीपताके क्रमसे युक्त ब्राह्मण करें-इसी प्रकार वानप्रस्थका अधिकार है जो धनी जिनको देताथा | धन-भ्राताके तुल्य माना हुआ-वा अन्य उनको लेपभागके दाता वृद्ध प्रपितामहकी वानप्रस्थ एक तीर्थका वासी ले तसेही संतानमें है-उनके अभावमें समानोदकांका- यतिके धनको सच्छिष्य-नैष्ठिक ब्रह्मचारीके उनके अभावमें आचार्यका-उसके अभावमें धनको आचार्य-दे-उपकुर्वाण ब्रह्मचारीके शिप्यका उसके अभावमें संगवेदकै पाठी | धनको तो पिता आदि ग्रहण करें-इति ब्रह्मचारीका अधिकार है-उसके अभावमें । संक्षेपः ॥
(३००) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । होतेहै इस वसिष्ठके वचनसे अन्य आश्रमों में हरेत क्रि-च:- अंश २ जातस्य ६ चा- गयोंको धनका सम्बन्धही नहीं होता तो | मृतस्य ६ च - ॥ उसका भाग कहांसे होगा- कदाचित् कहो योजना-जातस्य चपुनः मृतस्य संसृष्टिनः कि नैष्ठिकको अपने संचित धनका संबंधहै | अंशं संमृष्टी-सोदरस्य संसृष्टिनः जातस्य सोभी नही क्योंकि उसको प्रतिग्रहका निषेध | मृतस्य अंशं सोदरम्दद्यात् चपुनःअपहरेत् ॥ है- गौतमकाभी वचन है कि भिक्षु संचय न तात्पर्यार्थ-अब अपुत्रका धन पत्नी करे- इससे भिक्षुकोभी अपने संचित धनका | आदि ग्रहण कर इसका अपवाद कहते हैं संबंध नहीं हो सकता-उस शंकाका समा- | विभाग किये हुये धनके फिर मिलानेको धान कहते हैं कि वानप्रस्थको इस वैचनसे | संसृष्ट कहते हैं उसका जो स्वामी वह धनका संबंध है कि एक दिन-मास-छः । संसृष्टी कहाता है संसृष्टभी जिस किसकि मास-वा वर्ष भरके लिये धनका संचय करे संग नही हो सकता किंतु पिता भ्राता और संचित कियेको आश्विनमें त्यागदे- | पितृव्य इनके संग हो सकताहे सोई बृह- संन्यासीकोभी-कोपीन आच्छादनके लिये स्पतिनें कहाहै कि जो विभक्त हुआ पुत्र वह वस्त्रोंको धारे और योगकी सामग्रीयोंके भेद और खडाऊंको धारण करे इत्यादि * मयूखमें लिखाहै कि इस बृहस्पतिके वेचनसे वस्त्र और पुस्तकका संबंध है- वाक्यमें पिता भ्राता पितृव्यके संगही संसृष्ट नैष्ठिककोभी शरीरके निर्वाहार्थ वस्त्रआदिका | हो सकताहै अन्यके संग नहीं क्योंकि संबंध है ही इससे उनका विभाग कहना कहाई- युक्त तो यह है कि विभागके जो वचनमें अन्य नही पढे यह मिताक्षराआदिम युक्त है। भावार्थ-वानप्रस्थ संन्यासी ब्रह्मचारी- करनेवाले पिताआदि हैं उन सबके संग इनके धनके भागी प्रतिलोम क्रमसे आचार्य | संसर्ग हो सकताहे- वृहस्पतिके वचनमें श्रेष्ठ शिप्य-धर्मभ्राता एकतीर्थी होतेहैं अर्थात् पिता आदिपद विभागके कर्ताओंके बोधक ब्रह्मचारीके धनको आचार्य-संन्यासीके हैं जैसा आधा वेदीके भीतर मापता है धनको श्रेष्ठ शिष्य वानप्रस्थकेधनको धर्मका आधा वेदीके बाहिर यहां अन्यथा मानोगे भ्राता एकतीर्थी लेताहे ॥ १७ ॥ तो वाक्यभेद होगा-तिससे पत्नी पितामह भ्राता पोत्र पितृव्य पुत्रआदिके संगभी संसर्ग. संसृष्टिनस्तुसंसृष्टीसोदरस्यतुसोदरः होताहे विभक्त जो इकठ्ठा रहे वह संसृष्ट दद्यादपहरेच्चांशंजातस्यचमृतस्यच १३८॥ यह विभाग कर्ताके सामानाधिकरण्य ( जो पद-संसृष्टिनः १ तु:-संसृष्टी १ सोद- विभक्त हो सके वही संसृष्ट )से विभक्त रस्य ६ तु:-सोदरः १ दद्यात् क्रि-अप- दो भाईयोंका पुत्रआदिके संग संसर्ग नही १ अनंशास्त्वाश्रमांतरगताः । हो सकताहै विद्यमान वा होनेवाला धन २ अनिचयो भिक्षुः। हम दोनोंका पुनः विभाग पर्यंत साधारण ३ अडोमासस्थपण्णां वा तथा संवत्सरस्प वा । (साझे) रहा ऐसी बुद्धि वा इच्छाको संसर्ग अर्थस्य निचय कुर्यात्कृतमाश्वयुजे त्यजेत् । कहते हैं- यह वीरमित्रोदयमें लिखा है ।। ४ कोपीनाच्छादनार्य वा वासोपि त्रिभृयाश्च सः । १ विभक्तो यः पुनः पित्रा भ्रात्रा वैकत्रसंस्थितः। योगसभारभेदांश्च गद्रीयापादुके तया । पितृव्येणाथ वा प्रीत्या स तत्संदृष्ट उच्यते । ।
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ 1214(३०१) पिता भाता वा पितृव्य (चाचा) के संग संसृष्टः (सोदरः ) असंसृष्टी अपि वा धनं एकत्र स्थित हो जाय वह उनका संसृष्ट आदद्यात्- अन्यमानः न आदद्यात ॥ कहाताहै मरे हुये संसृष्टीक अंश ( विभाग) तात्पर्यार्थ -अब पुत्ररहित संसृष्टी मरजाय को उस ससृष्टीके पुत्रको देदे जो विभागके और भिन्नोदर तो संसृष्टी हो और सोदर समय जिसके गर्भका ज्ञान न हो ऐसी ; असंसृष्टी होय तो दोनों विभागले धनको संसृष्टीकी भार्या से पीछे पैदा हुआ हो-पुत्र ग्रहण कर- यह कहतहैं- अन्योदर्य ( साप- नहोय तो संसृष्टीही ग्रहण कर पूर्वोक्त पत्नी लभाई ) संसृष्टी होय तो धनको ग्रहण करे आदिग्रहण न करें- अब संसृष्टीके धनको और अन्योदर्य असंसृष्टी होय तो धनको संसृष्टी ग्रहण कर इसकाभी अपवादकईतहैं ग्रहण करे- इन दोनों वाक्योंसे भिन्नोदरके इसमें संसृष्टीके धनको संसृष्टी (संसृष्टिनस्तु धन ग्रहण करने में संसृष्टी होनाअन्वय और संसृष्टी ) इस पूर्ववाक्यकाभी संबंधह तिससे व्यतिरेक ( विधि निषेध )से कारण कहा सोदर संसृष्टी मर जाय तो उसके अंशको असंसृष्टी पदका आगेभी संबंध है कि सोदर संसृष्टी- संसर्गसे पीछे पैदा हुये असंसृष्टीभी संसृष्ट होय तो अर्थात एक संसृष्टीके पुत्रको दे पुत्र न होय तो संसृष्टी उदरमें संसृष्ट ( संबंधवाला ) सहोदर जो सोदर वही ग्रहण करै- इसी प्रकार होय तो संसृष्टीके धनको ग्रहण कर इस सोदर और भिन्नादरके संसर्ग में सोदर संस- वाक्यप्ते असंसृष्टीभी सोदरके धन ग्रहण टीके धनको सोदर संसृष्टीही ग्रहण करै करनेमें सोदर होना कारण कहा- संसृष्ट संसृष्टीभी भिन्नोदर होय तो ग्रहण न करे इस पदका उत्तरपदके संगभी संबंधहै और यह पूर्वोक्तका अपवाद है। वहां संसृष्ट पदका संसृष्टी अर्थ है नान्य- भावार्थ-संसृष्टीके धनको संसृष्टीके मर- मातृजः इसमें एवपदके( हो ) अध्याहारसे नेपर पीछे पैदा हुये पुनको संसृष्टी देदे वह अर्थ करना कि अन्यमातासे पैदा हुआही न होय तो संसृष्टी ग्रहण करे सोदर संस- संसृष्टाके धनको ग्रहण न कर- किंतु टीके धनको तो सोदर संसृष्टी पूर्वोक्त सौदरकोभी दे- इसी प्रकार असंसृष्ट्यपि संसृष्टीके पुत्रको दे वह न होय तो सोदर वा दद्यात्-इस अपि शन्दके सुननेसे और संसृष्टीही लै भिन्नोदर संसृष्टीभी होय संसृष्टो नान्यमातृज एव इस अवधारणक तो नले ॥ १३८ ॥ निषेधसे सोदर तो असंसृष्टी हो और भिन्नोदर संसृष्टी होय तो दोनों सम अन्यौदर्यस्तुसंसृष्टीनान्योदर्योधनहरेत् । विभागसे धनको ग्रहण कर क्योंकि दोनोंमें असंपृष्टयपिवादद्यात्संसृष्टोनान्यमातृजः) | सोदर होना और संसृष्टी होना एक एक पद-अन्योदयः १ तु- संसृष्टी १ न:- धन ग्रहण करनेका कारण है- यही मनु- अन्योदयः १ धनं २ हरेत् कि- असंसृष्टी ने स्पष्ट किया है (अ.९श्लो.२१० ) कि अपि - वाई- आदद्यात् क्रि- संसृष्टः १ विभक्तहुये भ्राता संग रहतेहुये यदि फिर विभाग करें-इसप्रकार संसृष्टीके विभागका ना-अन्यमातूजः १ प्रारंभ करके (अ०९श्लो० २११-२१२) योजना-तु पुनः अन्योदयः संसृष्टी धनं हरेत्- अन्योदयः असंसृष्टी धनं न होत् १ विभक्ताः सहजीवतो विभजेरन्पुनदि। 11...
(३०२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा है कि जिन संसृष्टि भ्राताओं के मध्यमें (नपुंसक ) ब्रह्महत्यारा आदि पतित-और ज्येष्ठ-कनिष्ठ-बा मध्यम भ्राता अपने भागके पतितसे उत्पन्न-पंगु (पेरीसे लंगडा) उन्मत्त लेनेसे भ्रष्ट होजाय अर्थात् अन्य आश्रममें अर्थात् जिसको वात पित्त कफ संनिपात- होजाय वा ब्रह्महत्यारा होजाय-वा मरजाय ग्रहोंका आवेश (भूतीका लिपटना ) आदिसे तो उसके भागका नाश नहीं होता-इससे | असावधानीहो-जड जिसका अंतःकरण उसको पृथक् रखदे संसृष्टीही ग्रहण न | ठीक न हो अर्थात् अपने हित अहितको करें-उसको सोदर असंसृष्टभी भाई इकटे न जान-अंधा जिसके नेत्र इंद्रिय न हो- होकर वाटले-और देशांतर (परदेश )में जिसकी चिकित्सा (इलाज)न होसक होय तोभी आकर इकट्ठे होकर मिलकर ऐप्ते राजयक्ष्मा आदि रोगसे ग्रस्त-आद्य- सम विभागसे विभाग करलें न्यून अधिकस शब्दके पढनेसे अन्य आश्रमोंमें गये-पिताके नही-जो भिन्नोदर भ्राता संसृष्टही वे और वरी-उपपातकी- बहिरे-गूंगे-- इंद्रियोंसेरहित सहोदर भगिनी होय तो सम विभाग करलें लेने-सोई वसिष्टनें कहां है कि अन्य आश्र- अर्थात् बराबर वांटकर ग्रहण करलें। मोमें गये अंशोंसे रहित होते हैं-नारदेन भी भावार्थ-भिन्नउदरमें पैदाहुआ भाई संसृष्टी। कहा कि पिताका वैरी पतित नपुंसक-और होयतो धनको ग्रहण करें और भिन्नोदर उपपातकी येसभी अंशको नही लेसकते क्षेत्रज असंसृष्टी होयतो धनको ग्रहण न कर-और तो कैसे लेसकता है-मनु(अ.९श्लो.२०१)का असंसृष्टीभी सोदर धनकोले-अन्यमातासे भी वचन है कि नपुंसक-पतित-जन्मांध- पैदाहुआ संसृष्टीही संसृष्टीके धनको ग्रहण न बधिर-उन्मत्त-जड-मूक और इंद्रियोंसे जो करे किंतु सहादरकोभी भागदे।। १३९ ॥ * स्यादोपपातिक के स्थानमें स्यादपया- कीबीयपतितस्तजापंगुरुन्मत्त वितः यहभी पाठ कही है अपयाचित वह कोजडः। अंधोचिकित्स्यरोगा- होता है राजके द्रोह आदि अपराधसे या भर्तव्या स्युनिरंशकाः ।। १४०॥ घटस्फोट आदि करके बंधुओंने जिसें जाति वाहिर कियाहो-यह मदन कहते हैं- पद-सीयः १ अथा- पतितः १ तज्जः१ व्यवसायके लिये नाव आदिमें बैठकर जो मंगुः १ उन्मत्तकः १ जड़ः१ अंधः १ अचि- द्वीपांतरमें जाय वह अपयावित होता है किरस्परोगामः १ भर्तयाः १ स्युः कि- यह युक्त है-क्योंकि कलियुगमें उसके निरंशकाः १॥ संसर्ग (मेल)का निर्धे है कि जो द्विज योजना-कोयः अथ पतितः तन्नः पंगुः समुद्र में नावमें जाय शुद्ध कियेभी उसका उन्मतकः जहः अंधः अचिकित्स्यरोगागः संग्रह न करे और रागद्रोह भादिम घटस्फोट निरंशकाः एते भर्तव्याः स्यः ।। जातिसे पाहिर करना नही कहे ॥ तात्पर्य-अप पुत्र पत्नी भादिक . १ अनशासायासरगताः। दाप ग्रहण करने में अपवाद कहते हैं-सीय २ पितरि पतितःपंटो यशस्यापपातिकार. मेटः कनिष्टो या हायनशिनदानतःवि. मा भपि बालभैरन् क्षेत्रमाः युतः । चायतरी पापि तरामागोमलप्पासोदर्ग विमनेय, ३ भनंशी दीपपतिती मान्यपयर्गिया। उन्म- तर गहिताः सममा आतरोपेश मगष्टा मनिला सम्मान फेविसिदिया। viरान्धी नीयातः शारितम्यायममः। . अगनामः।
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ रहित हैं-अर्थात् जिनकी रोगसे इंद्रिय नष्ट योजना-तुपुनः एषां निदेोपाः औरसाः होगई हों ये सब नपुसक आदि अंशके भागी क्षेत्रजाः पुत्राः भागहारिणः भवंति-चपुनः नहीं होते केवल भोजन वस्त्रके देनसे पालना एपां सुताः (पुन्यः ) यावद्भसात्कृताः और रक्षा करने योग्य होते है-पालना न तावत् भर्तव्याः (पालनीयाः)॥ करने में तो पतित होनेका दोष है कि मनु तात्पर्यार्थ-इन नपुंसक आदिकोंके (अ.९श्लो.२०२ ) बुद्धिमान मनुष्य शक्तिके | आरस और क्षेत्रन पुत्र निर्दोष है अर्थात् अनुसार जीवन पर्यंत भोजन व वस्त्रेदे न जिनमें अंश ग्रहण करनेका विरोधी नपुंस- देतो पतित होता है-इन सबको विभागसे कता आदि दोष नहीं है वे अंशंक ग्रहण पहिले दोष लगजाय तो भाग नहीं मिलता- करनेवाले होते हैं-उनमें नपुंसकका क्षेत्रन और विभागके अनंतर नपुंसकता आदि पुत्र हो सकता है और अन्योंके पुत्र और- दोप लगजांयतो उनके धनको कोई भाई सभी होसकते हैं-यह और औरस और आदि छीन नही सकता-और विभाग क्षेत्रका ग्रहण इतर पुत्रोंके निषेधके लिये किये पीछेभी औषध आदिके करनेसे दोप है और पतियोंके आधीनहोने (विवाह) दूर होजाय तो भाग मिलसकता है क्योंकि पर्यत इन नपुंसक आदिको पुत्रियोंकीभी यहभी इसके समानही बात है कि विभाग पालना कर और चशब्द पढने से उनका हुये पीछे सवर्णा स्त्रीमें पैदाहुआ जो पुत्र है । संस्कार करे ॥ वहभी विभागका भागी होता है-और पतितः आदिकोंमें पुल्लिंग (पतितः ) अविवक्षित है औरस और क्षेत्रज पुत्रोंको भाग मिलता भावार्थ-इन नपुंसक आदिक-निर्दोष अर्थात् पुरुषही-पूर्वोक्त-भाग रहित नहीं होते-किंतु पत्नी दुहिता माता आदिमेंभी है और विवाह होनेतक इनकी कन्याओंकी पालना और उनका विवाह करें।। १४१ ॥ उक्त दोष होयतो भागसे रहित भानना- भावार्थ-नपुंसक-पतित-पतितका पुत्र- अधुत्रायोपितश्चैपांभर्तव्याःसाधुवृत्तयः । पंगु- उन्मत्त-जड- अंध-जिनके रोगको निर्वास्याव्यभिचारिण्यः प्रतिकूलास्तथैवच चिकित्सा न होसके इत्यादि सब भागसे ही- पद-अपुत्राः १ योपितः १ च-एषां ६ न होते हैं किंतु पालनाके योग्य होत भर्तव्याः १ साधुवृत्तयः १ निवस्याः १ हैं।। १४० ॥ व्यभिचारिण्यः १ प्रतिकूलाः १ तथा:- औरसाक्षेत्रजास्त्वेषांनिदोपाभागहारिणः । एवऽ-च- ॥ सुताश्चैपांप्रभर्तव्यायावद्वेभसात्कृताः ॥ योजना-एषां अपुत्राः साधुवृत्तयः योपितः पद-औरसाः १ क्षेत्रमाः १ तुः-एप६ भर्तव्याः व्यभिचारिण्यः चपुनः तथैव प्रति- निर्दोषाः १ भागहारिणः १ सुताः १ च कूलाः निवास्याः भवंतीति शेषः- एषाद प्रभर्तव्याः १ यावत् -वै- भर्तृसा ता. भा०-इन नपुंसक आदिकोंकी जो स्कृताः१॥ पली साधुवृत्ति (सदाचार)हैं तो पालना १ सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातु शत्तयामनीषिणा।प्रासा- करने योग्य हैं और जो व्यभिचारिणी हैं वे छादनमत्यतपतितो ह्यददद्भवेत् ॥ और जो प्रतिकूल (विरुद्धाचरण) हैं वे निका- २ विभत्तेषु सुतो जात. सवर्णायां विमागमाक् । सने योग्य हैं-यदि वे व्यभिचारिणी न होयतो याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पालना करने योग्य हैं-यह नही कि प्रति- धन कहा है-वह न्यून संख्याके निषेधक कूल होनेसे उनका पालनभी न करें-॥१४२॥ लिये हे अधिक संख्या निषेधार्थ नही- पितृमापतिभ्रातृदत्तमध्यग्न्युपागतम् । अध्यग्नि आदिका स्वरूप कात्यायननें कहा है कि विवाहके समय अग्निके समीप आधिवेदनिकायंचस्त्रीधनंपरिकीर्तितम् ॥ को स्त्रियोंको दिया जाता है वह सत्पुरुषोनें पद-पितृमातृपतिभ्रातृदत्तम् १ अध्यग्यु- अध्यग्नि नामका स्त्री धन कहाह-और पि- पागतम् ९आधिवेदनिकाद्यम् १ च-स्त्रीधनं १ | ताके घरसे पतिके घर जानेके समय जो परिकीर्तितम् १ ॥ धन स्त्रीको मिलै वह अध्यावहनिक नामका योजना-पितृमातृपतिभ्रातृदत्तं अध्यग्यु- स्त्रीधन कहाहै-जो कुछ सास श्वशुरोनें पागतम् च पुनः आधिवेदनिकाद्यं स्त्रीधनं प्रीतिसे दियाहो वा चरणोंको नमस्कार क- बुधैः परिकीर्तितम् ॥ रनेसे मिलाहो वह प्रीतिदत्त नामका कर तात्पर्यार्थ-अब स्त्रीधनके विभागको धन कहाताहै-विवाही हुयी कन्याको पतिक इच्छासे प्रथम स्त्रीधनका स्वरूप कहते घरपर वा पिताके घरपर भ्रातांक सकाशसे हैं-पिता माता पति भ्राता इन्होंने जो दियाहो | वा मातापिताके सकाशसे जो मिल उसे और जो विवाहके समय अध्यग्नि ( आग्न- सौदायिक कहते हैं ।। होत्रके समीप ) मातुल आदिने दियाहो जो भावार्थ-पिता माता पति भ्राता इनाने आधिवेदनिक धनहो अर्थात् पतिने दूसरा जो दिया-अग्निके समीप जो आया-आधि- विवाह करनेके समय प्रसन्नताके अर्थ पहि- वेदनिक आदि-मनु-आदिकोनें स्त्रीधन ली स्त्रीको जो धन दियाहो वह इसे वचनसे कहा है ॥ १४३ ॥ कहेंगे कि जिस स्त्रीको स्त्रीधन नमिलाहो बंधुदत्तंतथाशुल्कमन्वाधेयकमेवच उसको दूसरे विवाहमें जितना द्रव्य लग उतना द्रव्यदे स्त्रीधन दियाहोयता आधा अतीतायामप्रजातिवांधवास्तवामुयुः१४६ धनदे-आद्य शब्दसे अंश-क्रय-विभाग पद-बन्धुदत्त१ तथा:-शुल्कं १ अन्वाधा- परिग्रह-अधिगमसे मिला लेना यह मनु यकं १ एव:-च-अतीतायां ७ अप्रजाति आदिकाने बीधन कहा है-स्त्रीधनशब्द वांधवाः १ तत् २ अवाप्नुयः क्रि-॥ योगिक है अर्थात् जिसमें स्त्रीका धन यह योजना-बंधुदत्तं तथा शुल्क चपुनः * अर्थ घटे वह पारिभाषिक (संज्ञा) नहीं वांधेयकं स्त्रीधनं परिकीर्तितम्-तत् पूर्वोक्तं क्योंकि योगकं संभवमें परिभाषा मानना स्त्रीधनं अप्रजसि अतीतायां सत्यां बांधवाः अयुक्त है-जो मनु ( अ० ९० १९४) । अवाप्नुयु:- में कहा है कि अध्यग्नि-अध्यावनिक और प्रीतिसे मंगल कार्योंमें दिया-भ्राता ध्याहत सादः श्रीधन परिकीर्तितम् ॥ यत्पुनर्लभते १ दिपाहकाले यात्रीभ्यो दीयते स्खनिसनिधीसद- माता पिता इनसे मिला यह छःप्रकार स्त्री-मानीयमाना पिहान्।अध्यावनिक नाम नीधनंत. भविविनिय दयादाधिसनिक समम् । दतं दुदाहतम्॥ीत्या दत्तं तु यन् फैिपिच्वारा शुरेण सीपनं गातो सत्य प्रकीर्तितम् । या पाहवंदानिक व प्रीतिदत्तं तदुच्यते । या २ भयाध्यापहनिक दतं घनीशियमगि। कन्यया वापिपरयुः पितृहरि या नातुः । समाशा- भातृमारशिग पनि श्रीधन स्मृतम् ।। पिनो सन्धं मौदायिक रमृतं ॥ - व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण तात्पर्यार्थ-कन्याकी माताके और पितांक पूर्वोक्त प्रनारहित-मरोहुयी स्त्रीका जो पूर्वो- बंधुओने जो दियाहो-और जो बरसे धन | क्त स्त्रीधन है वह सबसे पहिले भतीका लेकर कन्यादीजाय वह शुल्क-अन्वाधे-| होता है उसके अभावमें पतिके समीपके जो यक जो विवाहके पीछे दियाजाय-सोई | सपिंड हैं उनका होता है और आसुर गां- कात्यायननें कहा कि विवाहके पीछे जा | धर्व पक्षस पैशाचरूप शेष विवाहोंमें जो धन पतिके कुल से स्त्रीको मिलै वा पिताके | भार्या हुई हो उस प्रजाहीन स्त्रीका धन कुलसे मिले वह धन अन्वाधेय कहाता है- माता पिताको प्राप्त होता है यहां पिटगामि यहभी स्त्रीधन कहा है-इस पूर्वोक्त स्त्री | पदका यह अर्थ है ( माताच पिताच पितरो धनको-संतानसे हीन ( दुहिता दौहित्र पुत्र | पितरौ गच्छतीति पिढगामि ) अर्थात् माता पात्रसे रहित ) स्त्री मरजायतो वे भर्ता आदि पिताको जो प्राप्तहो एकशेषसे दिखाईभी बांधव ग्रहण करते हैं जिनको आगे कहेंगे॥ | माताको प्रथम ( पितासे पहिले ) धनका भावार्थ-बंधुओंका दिया-शुल्क ( मोल) | ग्रह पहिलेही कहआये हैं-उसके अभावमें अन्वाधेयकभी स्त्रीधन कहा है-संतानसे | उसके समीपके सपिंडोंको धनका ग्रहण रहित स्त्री मरजायतो-इस पूर्वोक्त स्त्रीधनको | जानना और संपूर्णभी विवाहोंमें प्रसूता पति आदि बांधव ग्रहण करते हैं-॥१४॥ ] ( संतानवाली ) होय तो वह धन दुहिता अमजस्त्रीधनभर्तुब्राह्मादिपुचतुर्वपि ॥ ओंका होता है-यहां दुहितापदसे दुहिता- दुहितणांमसूताचेच्छेपेपुपिगामितत्१४५ की दुहिता लेनी क्योंकि जो साक्षात् (अपनी) पद-अप्रजस्त्रीधनं १ भर्तुः ६ ब्राह्मा- | दुहिता है उनको धनका ग्रहण- ( ऋणसे दिषु ७ चर्तुएं ७ अपि:-दुहितृणां ६ प्रमूता१ ] शेष माताके धनको दुहिता ग्रहण ) कर इस चेह-शेषेषु ७ पितृगामि १ तत् १ ॥ वचनसे पहिले कह आये-इससे माताके योजना-ब्राह्मादिषु चतुर्बपि विवाहेषु । मरनेपर माताके धनको पहिले दुहिता अप्रजस्त्रीधनं भर्तुः भवति प्रसूताचेत् दुहित- | लेती हैं-उनमेंभी विवाही और विना विवाही- णां भवति-शेषेषु विवाहेषु तत् धनं पितृ के मध्यमें विना विवाही लेती है वह न होय- गामि भवति॥ तो विवाही लेती है-उनमेंभी प्रतिष्ठिता और तात्पर्थ-वाम देव आर्ष प्राजापत्य | अप्रतिष्ठिता के मध्यमें अप्रतिष्ठिता (निध- इन चार विवाहीम जो भार्या हुयी हो ऐसी न वा संतानरहित) लेती है उसके अभा- * अपि शब्दसे गांधर्व लेना अथवा ब्राह्म वमें प्रतिष्ठिता लेती है सोई गौतमनें कहो आदि है जिनमें इस अतद्गुणसविज्ञानवहु है कि विनाविवाही और अप्रतिष्ठिता दुहि- व्रीहिसे ब्राह्म विवाहसे भिन्न देव आर्ष प्राजा ॐ भाके अभावमें उसके समीपके स- पत्य गांधर्व चारलेने इनमें जी धन वह प्रजासे | पिंडोंका और पिताके अभावमें पिताके स- हीन स्त्रीके मरनेपर भर्ताका इष्ट है इस मीपके सपिंडोंका धन होता है उनमेंभा मनु पचनके संग विसंवाद (विरोध) होगा॥ | स्त्रोके समीपक फिर उनके समीपके उनके १ विवाहासरतो यच । लब्ध मर्टकुलानिया। द्वारा उनके कुलके समीपके समझने यह अन्वाधेय तु तव्य लन्ध पितृकुलात्तथा। व्याख्या करनी॥ २ ब्राह्मदेवार्षगाधर्वप्राजापत्येषु यद्धनम् । अप्रजा १ मातुर्दहितरः शेषमृणात्ताभ्य करतेन्वयः । यामतीताया भतुरेव तदिष्यते । २ स्त्रीधन दुद्दितृणामप्रत्तानामप्रतिष्टितानां च ।
(३०६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ताओंको स्त्रीधन मिलता है-इस गौतमके भगिनी धनको सम वांटले अर्थात् सहो- वचनमें चशब्दसे प्रतिष्ठिताओंकोभी सम- | दर भाई सम वांटले और भगिनी होयतो झना-यहभी शुल्कको छोडकर समझना- वेभी सम वाटले कुछ यह अर्थ नहीं कि क्योंकि वह इसे गौतमके वचनसे सोद- भाई और भगिनी इकट्ठे होकर समान वांट- रोका होता है कि माताके मरनेपर करलें क्योकि द्वंद्व और एक शेपके अभावसे भगिनीका शुल्क सोदर भाईयोंका होता | इतरेतर योग प्रतीत नहीं होता-विभाग है-सब प्रकारको दुहिताओंके अभावमें | कर्ताओंके अन्वयसेभी चशब्द चरितार्थहो 'दुहिताकी दुहिता ग्रहण करती है क्योंकि जायगा-जैसे देवदत्त खेती करता है चपुनः संतानवाली होयतो दुहिताको दुहिता ग्रहण | यज्ञदत्त-यहां-समपदका ग्रहण उद्धार करती है यह इसही वचनमें कहा है यदि वे | विभागके निषेधार्थ है-सोदरका ग्रहण भिन्नो- भिन्नोदर और विषम होयतो माताओंकी | दरोंकी निवृत्ति के लिये है संतानरहित हीन संख्याके अनुसार भागकी कल्पना करनी जातिकी स्त्रीके धनको तोभिन्नोदर भी उत्तम क्योंकि यह गौतमका वचन है किवा माता के | जातिको सपत्नीकी दुहिता ग्रहण करती है प्रति अपने वर्गसे भाग विशेष होता है दुहिता वह न होयतो उसकी संतान लेती है-सोई और दोहित्रीयोंके मध्यमें दौहित्रीयोंका अल्प- | मनु (अ० ९ श्लो. १९८ )ने कहा है कि ही देने योग्य है-सोई मनुनें कहां है (अ०९ पिताका दिया हुआ जो स्त्रीका कुछ धनहो श्लो० १९३) कि जो उन दुहिताओंकी दुहिता | वह ब्राह्मणी कन्या ग्रहण करे वा उसके हों उनकोभी मातामहीके धनौसे प्रसन्न अपत्य (संतान )का होता है इस वचनमें तासे देना-दाहिनीयोंके अभावमेंभी दाहिन ब्राह्मणी पदका ग्रहण-उत्तम जातिका बोधक धनके भागी होते हैं सोई नारदनें कहा है कि | है-इससे संतानरहित वैश्याके धनको क्ष- माताकी दुहिता न होय तो दुहिताओंके अन्वय | त्रियाकी कन्या ग्रहण करती है-पुत्रोंके अ- (वंश)को मिलता है तत्शन्द समीपको दु- | भावमें पात्र पितामहीके धनको लेते हैं- हिताओंके ग्रहणार्थ है-दोहिन न होयतो पुत्र | क्योंकि यह गौतमको वचन है कि जो लेते हैं क्योंकि दुहिता दौहित्र न होयतो धनके भागी व ऋणको दूरकर-पुत्र पौत्र ऋण- अन्वय लेता है यह कह आये है-मनुभी | को दे इस वचनसे पोत्रोंकोभी पितामहीके दुहिता और पुत्रोंको माताके धनका संबंध ऋण दूर करने में अधिकार है-पात्रोंकेभी' दिखाते हैं (अ०९ श्लो० १९२) जननी अभावमें पूर्वोक्त भर्ता आदि बांधव धनक मरजायतो सबसहोदर भाई और सब सहोदर ग्रहण करनेवाले होते हैं। भावार्थ-ब्राह्म देव आप प्राजापत्य इन १ भगिनीजुलंगोदर्याणामूर्खमानुः । चार विवाहोसे विवाही हुई-संतानहीन २ मतिमावतो या स्वगर्गेश मागविशेषः । स्त्रीका धन भताका होता है और संतान- ३ पारतासा पदिनारतासामपि माहतः । मा- | याली होयतो दुहिताओंका होता है और तामामा पनात किंचित प्रदेयं प्रीतिपूर्वकम् । ४ मानुभिारे दुरितां तदन्वयः । धियान्तु यद्यदितं पित्रा दरा कार्यरन । प्रामणी गरेकन्या उपन्यस्य या भाव । ५ अनन्या मस्मितार्श तुम सर्व महोदराम २लियभान फर्ण प्रतिकर्पः। सरन् माकरिश्थ मागिन्याय सनामयः ! ३ पुनमिंग देयम् ।
व्यवहाराध्याय दायविभागप्रकरण ८ (३०७) । शेप (आंसुर गाधर्व राक्षस पैशाच) विवा- कि मरीहुयी कन्याके धनको सहोदर ग्रहण होंमें वह धन पिताको पहुंचता है ।। १४५॥ कर उनके अभावमें माता और उसके अभा- दत्त्वाकन्याहरन्दंब्योव्ययंदद्याचसोदयम्॥ बमें पिता ग्रहण कर ॥ मृतायांदत्तमादद्यात्परिशोध्योभयव्ययम्। भावार्थ-कन्याको दकर जो हरै वह पद-दत्वाऽ कन्यां २ हरन् र दंड्यः १ (पिता आदि ) वृद्धि सहित व्यय वरको दे- 'व्ययं २ दद्यात् कि-च-सोदयम् २ मृता- आर कन्या मरजायतो अपने और कन्याके यां ७ दत्तं २ आदद्यात् क्रि-परिशोध्या- पिताके व्यय (खर्च)को शोध (गिन) उभयव्ययम् २॥ कर शेष धनको क्र ग्रहण करे ॥ १४६ ।। योजना-कन्यां दत्वा हरन् दंड्यः भवति । दुर्भिक्षेधर्मकार्येचव्याधीसंप्रतिरोधके । राति शेपः चपुनः सोदयं ( सवृद्धि ? गृहीतंत्रीधनभानस्त्रियदातुमर्हति१४७॥ व्ययं दद्यात्-कन्यायां मृतायां उभयव्ययं परिशोध्य आदद्यात (वरो गृहीयात् ) पद-दुर्भिक्षे ७ धर्मकार्य ७ चा व्याधी ७ तात्पयार्थ-अव वाग्दत्ताके विषयमें कुछ संप्रतिरोधके ७ गृहीतं २ स्त्रीधनं २ भर्ता १ कहतेहैं-वाणीसे कन्याको देकर ( सगाई | न-स्त्रियै ४ दातुम् -अर्हति क्रि-॥ करके ) जो हर अर्थात् सगाई छुटाले- वह योजना-दुर्भिक्षे चपुनः धर्मकार्ये व्याधी व्यसंबंधके अनुसार राजाको दंड देने योग्य | संप्रतिरोधके गृहीतं स्त्रीधनं भर्ता स्त्रिये है-यहभी तब जब हरने (छुटाने )में कोई दातुं न अर्हति ।। कारण नहो-पदि कारण होयतो वाणीसेही तात्पर्यार्थ-अब जीवती और प्रजावाली हुई कन्याकोभी दूसरा श्रेष्ठ वर आजाय तो स्त्रीके धनकोभी किसी समयमें भर्ता ले हरले यहे हरनेकी आज्ञा होनेसे दंड देने | सकताहे यह कहतेहैं-कुटुंबको पालनाके योग्य नहींहै-और जो वाग्दानके निमित्त लिये दुर्भिक्षमें अवश्य करने योग्य धर्मके वरनें अपने और कन्याके संबंधियोंके उप- श्राद्ध आदिकार्यमें-व्याधिमें और संप्रतिरोध चार (खातिर )में धनव्यय ( खर्च ) ( बंदीग्रह वा कैद में अन्य द्रव्यसे रहित कियाहो उस सबको वृद्धि (व्याज) सहित भतां स्त्रीधनको ग्रहण करले तो फिर स्त्रीको कन्याका दाता वरको दे-यदि वाग्दत्ता कन्या देने योग्य नहीहै-अन्य प्रकारसे ले तो देदे संस्कारसे पहिले मरजाय तो वरने जो अंगूठी | भर्ताके विना जीवती हुई स्त्रीके धनको कोई- आदि वा शुल्क कन्याको दियाहो उसको भी दायाद ( हिस्सेदार ) ग्रहण न करे-मनु .अपने ओर कन्याके दाताके व्ययको (अ.९ श्लो.२९)का वचनहै कि जीवती शोधकर ( काटकर ) शेष धनको वर हुई उन स्त्रियोंके धनको जो अपने बांधव ग्रहण करले और मातामह आदिने जो ग्रहण करे उनको धार्मिक पृथिवीका पति शिरके भूषण आदि कन्याको दियेहों वा * वाचस्पतिने तो संप्रतिरोधके यह क्रमसे मिला जो धनहो उसको सोदर भाई ग्रहण कर-क्योंकि बोधायनकी यह स्मृति व्याधौका विशेषण कहा है अर्थात् ऐसी व्याधि हो जिसमें मनुष्य काम न करसके- १ दत्तामपि होत कन्यों श्रेयांश्चेवर भावजेत् । २ रिक्यं मृतायाः कन्याया गृहीयुः सोदरास्तदमावे जीवंचीनां तुतासां ये तद्धरेयु: स्वाधवाः। ता- मातुस्तदभावे पितुः। उियाचारददेव धार्मिकः पथिवीपतिः।
(३०८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . चोरके दंडसे शिक्षादे-तैसेही मनु ( अ.९ | विभागनिह्नवेज्ञातिबंधुसाक्ष्यभिलेखितैः । श्लो.२००) का वचनहे कि पतिके जीवते विभागभावनाज्ञेयागृहक्षेत्रश्चयौतकैः १४९॥ हुये जिस अलंकारको स्त्रियोंने धारण कर लियाहो अर्थात् पति आदिने दियाहो भिलेखितः ३ विभागभावनार ज्ञेयार गृह- पद-विभागनिह्नवे ७ ज्ञातिबंधुसाक्ष्य-- और उसने धारलियाहो उसको दायाद न क्षेत्रः ३ चऽ-यौतकैः ३॥ वांट तो वे पतित होतेहैं यह दोष सुनाहै ॥ योजना-विभागनिह्नवे सति ज्ञातिबंधु-- भावार्थ-दुर्भिक्ष-धर्मका कार्य-व्याधि- साक्ष्यभिलेखितेः चपुनः यौतकैः गृहक्षेत्र संप्रतिरोध (कंद) इनमें ग्रहणकिये स्त्रीध- विभागभावना (निर्णयः ) ज्ञेया । नको भर्ता स्त्रीको देने योग्य नहीं है ॥१४७॥ तात्पर्यार्थ-अब विभागके संदेहमें आधिविन्नस्त्रियैदयादाधिवेदनिकंसमम् । निर्णय कहते हैं-विभागका निह्नव (अपना- नदत्तस्त्रीधनयस्यैदत्तत्वबैमकीर्तितम्१५८ | पवा मुकरना) होजाय तो ज्ञाति (सजातीय) पिता और माताके मातुल आदि बंधु और पद-अधिविन्नस्त्रिये४ दद्यात् क्रि-आधि- वेदनिकर समम्२ ना-दत्तर स्त्रीधन पूर्वोक्त है स्वरूप जिनका ऐसे साक्षी और . लेख्य- (विभागका पत्र ) इनसे विभागका यस्यैध दत्ते तु:-अर्द्ध प्रकीर्तितम् १॥ निर्णय जानना-और पृथक्२ कियेहुये घर योजना-यस्यै स्त्रीधनं न दत्तं तस्य और क्षेत्रांसभी विभागका निर्णय करना अधिविन्नस्त्रिय- समं आधिवेदनिकं दद्यात् अर्थात् पृथक् कृषि आदिकार्योको करना- alने दत्ते तु अर्द्ध प्रकीर्तितम्-मन्वादिभि- और पृथकही पंचमहायज्ञ आदि करने- रिति शेयः॥ तात्पर्याय-जिसके उपर दूसरा विवाह विभागका चिह्न नारदैने कहा है कि अविभक्त कियाजाय वह पहिली स्त्री अधिविन्ना कहाती (इक? ) भाईयोंका धर्म एकही प्रवृत्त होता है उस अधिविन्नस्त्रीको सम आधिवेदनिक है-विभाग हुयेपर वह उनका धर्मभी पृ- धनदे अर्थात् जितना द्रव्य दूसरे विवाहमें थक् २ हो जाता है तैसेही अन्यभी विभा- लगे उतनाही उस पहिलीस्त्रीको दे जिसको गके चिह्न नारदनेंही कहे हैं कि श्वशुर वा पतिर्ने स्त्रीधन न दियाहो-स्त्रीधन साक्षी प्रतिभू (जामिन ) दान, ग्रहण, दिया होयतो आधा देना कहा है-यहां अर्द्ध- इनको विभक्त (जूदे ) भाई करें अविभक्त शब्द समविभागका वाची नहीं है- इससे कभीभी न करें । पूर्व दियाहुया धन जितनेसे आधिवंदनिकके भावार्य-विभागके नव (अपलाप )में तुल्य होजाय उसका आधा देदे । विभागका निर्णय जाति बंधु साक्षी लेख भावार्थ-जिसको श्रशुर वा पतिने स्त्रीधन और पृथक् किये घर और क्षेत्रोंसे विभागका न दिया। उस अधिविनस्त्रीको आधिवेद- निर्णय जानना ॥ १४ ॥ निक (दूसरे विवादका खर्च के समान धन इति दायविभागप्रकरणम् ॥८॥ पतिद्धे-सीधन दिया होयतो आधिवेदनि- प्रातणामविमतानामेमो धर्मः प्रवर्तते । विभागे याका आधादे।। १४८ ॥ सति धर्मापि भवेतेशं पर यक। पानीति मासाभिएकारो तो मनोरन २ साक्षित्व प्रातिमान्यं च दान ग्रहणमेरया मि. सा भातरा मानांश्मिनाः कर्यपन । से ममाता मनमाना:पति ते॥
व्यवहाराध्याय सीमाविवादप्रकरण ९ (३०९) अथ सीमाविवादप्रकरणम् ९ ध्वजिनी-मत्स्यिनी नैधानी-भयवर्जिता-और राजशासननीता-यह पांच प्रकारकी सीमा सीनोविवादेक्षेत्रस्यसामंतास्यविरादयः । कहीहै. ध्वजिनी बह होतीहै जिसमें वृक्ष गोपाःसीमाकृपाणायेसर्वेचवनगोचराः ॥ | आदिका चिह्नहो क्योंकि वृक्षप्रकाश होनेसे ध्वजाके तुल्य,-मत्स्यिनीवह होतीहै जिसमें पद-सीम्रः ६ विवादे ७ क्षेत्रस्य ६ सा- मन्ताः १ स्थविरादयः १ गोपाः सीमाकृपा- जलका चिह्नदो क्योंकि मत्स्य शब्दसे उसका णाः १ ये १ सर्वे १ च-वनगोचराः १॥ आधार जल लेते हैं नैधानी यह होती है जिसमें तुष वा अंगार गडे हो उनको गडे हुये नयेयुरेतेसीमानस्थलांगारतुपद्रुमैः । होनेसे निधान (खजाना )को तुल्यता है- सेतुवल्मीकनिम्नास्थिचैत्याद्यैरुपलक्षिताम्। भयवर्जिता वह होतीहै जिसको वादी और पद-नयेयुः क्रि- एते १ सीमानं २ स्थ- प्रतिवादी दोनों स्वीकार करलें-राजशासन- लोगारतुषगुमैः ३ सेतुवल्मीकनिम्नास्थिचे- नीता वह होतीहै जिसके चिह्नोंका ज्ञान नहीं त्यायेः ३ उपलक्षिताम् २॥ और राजा अपनी इच्छासे सीमाका निर्णय योजना-क्षेत्रस्य सीनः विवाद स्थविरा- करदे- ऐसी सीमामेंभी छः प्रकारका विवाद दयः सामन्ताः गोपाः ये सीमाकृषाणाः च हो सकताहै सोई कात्यायननें कहा कि पुनः सर्वे वनगोचराः एते स्थलांगारतुपद्रुमः | अंशमें अधिकता और न्यूनता- अस्तिता सतुवल्मीकनिम्नास्थिचेत्यायेः उपलक्षिताम् (होना )और नास्तिता (नहोना ) भोगना और नभोगना और सीमा ये छः भूमिके सीमानं नययुः (निश्चिनुयुः ॥ विवादमें हेतुई-सोई दिखाते हैं कि यहां तात्पर्यार्थ-दोग्रामोंके क्षेत्रोंकी सीमाके मेरी पांच निवर्तना (मापका भेद से अधिक विवादमें तैसेही एकग्रामके खेतोकी मया- भमिहै यह कोई कहे तो पांच निवर्तनाहीहै दाके विवादमें सामंत (आसपासके ) वृद्ध- अधिक नहीं यह अधिकमें विवाद-पांच आदि और गोप ( ग्वालिये ) सीमाकृपाण निवर्तना नहीं उससे न्यून है यह न्यूनतामें (जो सीमाके आस पास जोतते हो) विवाद- पांच निवर्तना मेरा अंशहै इस और संपूर्ण वनके वासी ये सव स्थल-अंगार कहने में अंशही नही यह अस्तिता और तुप-वृक्ष-सेतु वल्मीक (वामी )- निम्न नास्तिताका विवाद- मेरी यह भूमि इसने (नीचाई ) अस्थि चैत्य (चबूतरा वा टोला) पहिले कभीभी न भोगीपी और भर यह इन लक्षणोंसे अर्थात् पूर्व किसी समयमें भोगताहै यह कहनेपर सदासेही मैं भोगी है किये हुये सीमाके चिह्नासे जानी हुई सीमाका यह अभांगमुक्तिका विवाद- यह मर्यादा है निश्चय करें-क्षेत्र आदिकी मर्यादाको सीमा कि यह है यह सीमा विवाद- यह छः कहते हैं वह चार प्रकारकी होतीइ जनपद प्रकारकाही विवाद हो सकताहै- : प्रका- (देश)को सीमा-मामको सीमा- की रकेभी भूमिके विवादमें श्रुति और अर्षसे सोमा-गृहकी सीमा-और उसके यथासभव सीमाकाभी निर्णय हो सकताई इससे सीमा- पांच लक्षण हैं सोई नारदन कहा कि निर्गपके प्रकरणमें तिसका अंतर्भाव (पटना) जिनी मस्विनी पेव नपानी भराजिता । १ भाधिापन्यूनता पशि भस्तिनास्वित्तमाघ। रामशासननीता च सीमा पर्याश्या स्मृता भभोगनिः सीमा प प गदस्यहेतः ।
(३१०). याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । है- सामंत वे होतेहैं जो संमततासे (चारों सीमाका फिर उद्धार करदे इससे उद्भूत तरफके) चारों दिशाओंमें समीपके ग्राम | कह है गोपपदसे गौओंके चरानेवाले आदि हैं वे सीमासीमापरस्थित हैं इससे | लेने-सीमाकृपाण वे होतेहैं जो सीमाके सामंत कहातेहैं- क्याकि कात्यायनका समीपके खेतको जोतते हो- और सब वनमें वचन है कि ग्रामका सामंत माम-क्षेत्रका | विचरनेवाले व्याधआदि- और वे मनुनें. क्षेत्र घरका सामंत घर इससे कहाहै कि कहे हैं कि (अ.८श्लो.१६०)व्याध-शाकुनिक वह समंतता (चारोंतरफ से परिरंभण (पक्षियोंके हतनेवाले) गोपाल-कैवर्त (भील (मिलना) करके रहता है यहां ग्रामआदि वा धीवर) मूल (जड)के खोदनेवाले- शन्दसे ग्राममें स्थित (रहनेवाले ) पुरुष साँके ग्रहण करनेवाले (सफेले ) उच्छ- जानने से ग्रामः पलायितः (ग्राम भान वृत्ती-अर्थात् कटेहुये खेतोमेसे एकरदानोंको गया) यहां-यहां सामंतका महणभी सामं- बीननेवाले और अन्यभी वनके वासी-स्थल तोंसे जो मिले हों उनके बोधनके लियेहैं- | (ऊंचा भूमिका भाग) अंगार (कोले ) तुप. सोई कात्यायननें कहा कि जो मिले हुये हों (धानकी त्वचा ) द्रुम (वट आदिवृक्ष ) सेतु वे सामंत और उनसे जो उत्तर वे सामंतसं- (जलके प्रवाहका बंधन) चैत्य(पत्थर आदिका सक्त (मिले ) और उन सामतोंकेभी संस- बंध वा चबूतरा) आदिशब्दसे वेणु और. तोंके जो संसक्त वे सामंतसंसक्त संसक्त | वाल (रेत ) आदिका ग्रहण है-ये सबभी. कहातेहैं और वे पद्मके आकारके समान प्रकाश और अप्रकाशके भेदसे दोप्रकारके होतेहैं- स्थविरपदसे वृद्ध लेने आदिपदसे हैं सोई मनुने केहे है (अ.८श्लो.२४६-४७-) मौल और उद्भूत लेने-वृद्धआदिका लक्षण- | १८) कि वट -पीपल-ढाक-सेंभल-शाल- भी कात्यायननेही कहाहै कि होता हुआ | ताड-और जिनमें दूध निकसे ऐसे गूलर कार्य उसी कार्यके करनेवाले जिहोंने देखा आदि वृक्ष-सीमापर निश्चयके लिये लगावे हो वे धृद्ध हो चाहै वृद्ध न हों वे | गुल्म ( गुच्छे ) वेणु (वांस ) शमी (छोंकर वृद्ध कहाते हैं-जो वहां पहिले सामंतवा जांड ) वल्ली (लता) और स्थल- शर. हो और पीछेसे परदेशमें चले गये हों | (सरकंडे ) कुंज इनके गुल्म ऐसे बनाये वही देश उनका मूल (जड ) है इससे जिनसे सीमा नष्ट न हो- तलाव-उंदपान वे ऋपियोंने मोल कहे है- सुनने और (चौवच्चे ) पावडी-प्रस्रवण ( झरने ) भोगने कार्यके कहनेका जिनमें चिह्नहो और | और देवताओंके मंदिर-इनको सीमाकी संधियों ( मेल )में करें-ये सब तो प्रकाश १ मामो ग्रामस्य सामतः क्षेत्र क्षेत्रस्य कीर्तितम् । गृहे गृहस्य निर्दिष्ट समतासरिरभ्य हि । (प्रकट )रूप-(अ. ८ श्लो. २४९-५० २ संसक्तकास्तु सामतास्तरसंसक्तास्तथोत्तराः । १ व्याधान् शाकुनिकान् गोपान कैवान्मूलखात- संसक्तसतससत्ताः पद्मापाराः प्रकीर्तिताः। कान् । व्यालमाहानुंछत्तीनन्यांच वनगोचरान् । ३ निष्पायमान यदृष्टं सत्कार्यं तद्गुणान्वितः। वृद्धा २ सीमाक्षास्तु फुति न्ययोधाश्चात्यकिशुकान् ।। पा यदि पाशदास्ते तु वृद्धाः प्रकीर्तिताः । ये तत्र पूर्व शाल्मलीशालतालांचीरिणचर पादपानागुल्मान्वणश्य - पधादातरगताः । तन्मूलतात्तु तेमीला क- विविधान् दामपिस्सिलानि च । शरान्मुंजकगुल्मांध 1. परिकीर्तिताः ॥ सपश्ररणसंमोगर्याश्यानी- यथा सीमान नश्यति मतदागान्युपानानि यायः प्रभव- पचिडितान उद्धरति पुनरमाङ्गतास्ते ततः स्मृताः। मानि च । सीमासवियु कार्याणि देवतायतनानि च ।
व्यवहाराध्याय सीमाविवादप्रकरण ९ (३११) ५१-५२) और सीमाके ज्ञानमें मनुष्योंका | पूर्व कहाई-स्वरूप जिनका ऐसे सामंत- प्रतिदिन विपर्यय ( कलह ) देखकर अन्यभी | वा चार आठ दश सम संख्याके ग्राम प्रच्छन्न (छिपे हुये) सीमाके चिह्नोंको अर्थात् समीपक ग्रामोंके वासी मनुष्य रक्त- करवावे- पत्थर- अस्थि-गौओंके वाल- | माला और रक्तही वस्त्रोंको धार कर- और तुष- भस्म- कपाल सूकागोवर- इंट अपने मस्तकपर भूमिका खंड (डेला) रख- अंगार ( कोले) शर्करा ( कंकर-) वाल | कर सीमाके निर्णयको करें ( दिखावे ) यहां इनको औरभी जो ऐसेहैं जिनको बहुत | सामंतवा इस विकल्पका कहना अन्य स्मृति- कालतक भूमि भक्षण न करै उन सबको यामें कहे साक्षियोंके अभिप्रायसे है-सोई मनु सीमाकी संधियोंमें अप्रकाश रूपसे करे | (अ० ८ श्लो० २५३)ने कहा कि सीमा- विवाद करते हुये मनुष्योंकी सीमाका निर्णय | विवादके निर्णयमें साक्षीकी ही प्रतीति इन प्रकाश और अप्रकाशरूप, सामंत होतीहै- उसमें साक्षियोंसे निर्णय करना आदिके दिखाये लिंगोंसे राजा करें ॥ मुख्यहै वे न होयतो सामतोंसे- सोई कहाहै भावार्थ-क्षेत्रकी सीमाके विवादमें वृद्ध- मन (अ०८ श्लो० २५८ ) की साक्षियोंके आदि सामंत-गोप-और सीमापर समी- अभाव में सीमाके समीप वसनेवाले चारग्राम पके जोतनेवाले और संपूर्ण वनके वासी- सावधान होकर गजाके समीप सीमाका स्थल अंगार- तुप- वृक्ष- सेतु- वामी- | निर्णय करें- उनके अभावमें उन मामोंसे नीचा स्थल- अस्थि- चैत्य-आदिसे जानी जो संसक्त ( मिले ) हे वे निर्णय कर-सोई हुई सीमाके निर्णयको करें ।। १५०॥१५१ ॥ कात्यायननें कहा किमी अर्थक गौरवसे सामंतावासमग्रामाश्चत्वारोप्टौदशापिवा । अपने प्रयोजनको दुष्टतासे सामंत न कर- रक्तस्रग्वसनाःसीमांनयेयुःक्षितिधारिणः ॥ सके तो उनके संसक्तोंसे सीमाका उद्धार (निर्णय ) करना इसमें संशय नहीं- यदि पद-सामंताःश्वाऽ-समनामा:१चत्वारः १ संसक्तभी किसी दोषसे युक्त हो जाय तो अष्टौ १ दश १ अपि-वाऽ- रक्तस्रग्वसनाः १ धर्मको जानता हुआ राजा उनकभी अ. सीमां२ नयेयः क्रि- क्षितिधारिणः १ ॥ योजना-सामन्ताः वा चत्वारः अष्टो वा सीमाके निर्णयमें नियत करे- दुष्टोंको न दुष्ट संसक्तों ( सामंतसंसक्तसंसक्त को दश समग्रामाः रक्तस्त्रग्वसनाः क्षिति- कर सामंत आदिके अभावमें मोल आदि धारिणः सन्तः सीमा नयेयुः ।। तात्पर्यार्थ- जहां चिन्ह नहीं और होभी ग्रहण करने- उनके अभावमें सामंताम तो ऐसेहों जिनका लिंग प्रतीत होनेसे वृद्ध मौलीमै वृद्ध उद्धृत आदि नियत क- सेंदिग्ध हो वहां सीमाके निर्णयको कहतेहैं- १ साक्षिपत्यय एव स्यात्सीमावादविनिर्णये । १ उपच्छन्नानि चान्यानि सीमालिंगानि कारयेत् । २ साक्ष्यभावे तु चत्वारोप्रामाः सीमांतवासिन.सी. सीमाज्ञाने नृणां वीक्ष्य नित्य लोकै विपर्यय॥अश्मनोस्थी- माविनिर्णय कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ । निगौवालास्तुपान्मस्मकपालिका. करीषमिष्टकांगार ३ स्वार्थसिद्धी प्रदुष्टेषु सामोवर्थगौखात् । तत्सस- शर्कवालुकास्तथा।।यानि चैदप्रकाराणि कालाभूमिर्न तैस्तु कर्तव्य उद्धारो नात्र संशयः।। ससक्ते सक्तदोपे तु मक्षयेत् । तानि साधन सीमायामप्रकाशानि कारयेत्॥ वत्ससकाः प्रकीर्तिताः । कर्तव्या न प्रदुष्टास्तु राज धर्म एतलिंग येत्सीमां राजा पिवदमानयोः। विजानता।
(३१२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । रने-क्योंकि कात्यायनकी यह स्मृति है कि कार किये धर्मजसे भिन्नके विषयमें है इससे छः प्रकारकेभी स्थावर धनके विवादमें कोई विरोध नही-स्थल आदिका चिह्न विचार न करना यह क्रम कहाहै-औरये होय- तोभी साक्षी और सामंत आदिकोंको सामंत आदि गुणोंकी अधिकतासे होतेहैं- सीमाके ज्ञानमें उपाय विशेष नारदेने कहाहे क्योंकि यह स्मृति है कि पहिला सीमाका | कि नदीयोंने नष्ट की और छोडी हुयी साधन सामंतहै उनमें जो गुणवान्हें वे निर्दी- और जिनका चिह्न नष्ट होगयाहै उन भूमियों में पहैं उनमें पिछले दूने समझने और उनसे- उसप्राचीन प्रदेश (स्थान)के अनुमान और भी अन्य तिगुने समझने और वे साक्षी और भोग (जोतना वोना )के दर्शन रूप.प्र सामंत अपनी शपथों ( कसम )से शापित माणसे-अर्थात् ग्रामसे सहस्र दंडके प्रमाण किये सीमाका निर्णय करै अर्थात् उनको श- | पर इसका क्षेत्र पश्चिम भागमें है एसे पथ देकर पूछ-क्योंकि मनु ( अ० ८ प्रमाणसे अथवा प्रतिवादीके प्रत्यक्ष(सामना) श्लो० २५६ )की स्मृतिहै कि वे शिरपर | विना विवादके ऐसा जो भोग जिसका पृथिवीको रखकर माला और रक्त वस्त्रोंको | स्मरण न हो उस भोगसे सीमाके निर्णयको धारकर और अपने २ पुण्योंकी शपथ लेकर पूर्वोक्त सामंत आदि करै-वृहस्पतिनें इसमें भली प्रकार सीमाका निर्णय करें-यहां नये- | विशेष दिखायाहै कि आगम-प्रमाण-भो- युः (निर्णय करें) यह बहुवचन दोके गका समय-नाम-भूमिके भागका लक्षण निषेधार्थ है एकके नही क्योंकि नारदने इनको जानें वे सीमाके निर्णयमें साक्षी इस वेचनसे एककी अज्ञादी है कि एक होतेहैं-इन साक्षी सामंत आदिकोंको कुल मनुप्य सीमाका निर्णय करे तो उपवास- आदिके समक्ष (सामने ) राजा पूछ सोई रक्तमाला और रक्त वस्त्रोंका धारण-और मनुनें (अ. ८ श्लो० २५४ ) कहाहै कि मस्तकपर भूमिको-रखना-इनको करके ग्रामके वासी और अच्छे कुलसे पैदा हुये जो यह एकका निषेधे है कि प्रतीति मनुप्योंके समक्ष और उन वादी विवादि- (विश्वास वालाभी एक मनुष्य सीमाका योके समक्ष सीमाके विषय जो सीमाके निर्णय न करें-क्योंकि इस कार्यको गुरु लिंग उनको साक्षियोंसे पूरे-पूछे हुये वे होनेसे यह सीमाका निर्णय करना बहुत मनु- साक्षी एक संमति करके संपूर्ण ( इकट्टे) प्योम स्थितह-वह दोनों वादी विवादियोंने स्वी- सीमाका निर्णय कहै-उनको निर्णय की हुयी ! और उनके दिखाये संपूर्ण चिह्नों से युक्त- । तैपामभारे सामतमौलवृद्धोद्धृतादयः । स्थावरे | और साक्षी आदिके नामसे युक्त सीमाका पट्प्रकारेपि फायर्या नात्र विचारणा । २ मामताः साधनं पूर्व निदोषाः स्युर्गुणान्विताः। वादे सोई मनु (अ. ८ श्लो० १६१ )में भविस्मरण (स्मरण )के लिये पत्रपर लिख- रिगुणास्तूतरा झेयास्ततोन्ये त्रिगुणा मताः। ३ शिरोमिस्ते एहीयोती सग्विणो रनवासप्तः। १ निम्नगापहतोत्सप्टनष्टचिहासु भूमि । तसरे- गुरतः शापिताः सामनयेयुस्तै समंजसम् । सानुमानाच प्रमाणानौगदर्शनात् । ४ एकोपपेरसीमां सोपवासः समुनयेव । रता २ आगमं च प्रमाणे च भोगकाले घनाम परा ममिमादाय मुद्धनि । भूमागलक्षणं चैव ये विदस्तेत्र साक्षिणः। ५नेर ममुनोत्सीमां नरः प्रत्ययानगिधगुरुत्सा- ३ प्रामेयकफुलानांतु समक्षं सीनि साक्षिणः । प्र. दस्य पारय विमारा स्थिता। टय्याः सीमलिंगानि तयोर विशदिनोः ।
व्यवहाराध्याय सीमाविवादप्रकरण ९ (३१३) कहा कि वे पूछेहुये सब जैसे सीमाके | कथन होय तो सप सामंतोंको प्रत्येक म- निर्णयको कह बसेही सीमाका निबंध ध्यम साहस (पांचसी चालीस पण ) दंड (पत्रपर) लेख करे और उन साक्षियोंकेभी राजादे-यह वचन सामंतोंके विषयमें है यह नाम पत्रपर लिखदे- इन साक्षी सामंत इससे प्रतीत होती कि साक्षी माल आदिके सीमामे भ्रमणके दिनसे तीन प-आदिकोंको अन्य स्मृतियों में दंड कहाह क्षके भीतर राणा वा देवसे कोई | सोई मेनु (अ. ८ श्लो० ५७)ने कहाहै आपति न आन पड़े तो उन सामंत आ- कि सीमाके निर्णयमें यथोक्त कहतेहुपे दिक कहनेसे सीमाका निर्णय समझना- वे सत्य साक्षी विपरीत ( अन्यथा ) निर्ण- यह राजा और देवकी आपत्तिकी अवधि | करें तो दोसो पण दंड दे- नारदनभी कात्यायननें कही है कि सीमामें भ्रमण- कहाहै कि सीमाके निर्णयमें सामंत झूठ कहें कोश- पादोंका स्पर्श-इनमें क्रमसे तीन तो सपको मध्यम साहसका दंड राजा पक्ष-पक्ष-सातदिनतक देव और राजाका पृथक् २ दे- इससे सामंतोंको मध्यम साह- व्यसन (दुःख) इष्टहै ॥ सका दंड कह कर-शेष जो भूमिके काममें भावार्थ-सामंत वा सम संख्यांक चार नियुक्त किये हैं (सामंतसंसक्त आदि-) आठ दश ग्राम रक्तमाला और रक्त वस्त्रांको वे नीच अन्त कहें तो पृथक् २ पूर्व धार और मस्तकपर भूमिको रखकर (प्रथम) साहस दंडदेने योग्य हैं इस प्र- सीमाके निर्णयको करें ॥ १५२ ।। कार सामंतोंसे मिले आदिकों में नारदने दंड मतेतुपृयग्दव्या राज्ञामध्यमसाइसम् । कहाहै-मार आदिकोंकोभी वही दंड अभावेज्ञाचिद्वानांराजासीम्नाप्रवर्तिता ॥ भी अनुतके कहनेपर कहा कि मोल वृद्ध आदि जो अन्यहें हैं- भी अनृतके कहनेपर दंडकी गतिसे पृ., पद-अनृत तुम्-पृथक्-देव्याःराज्ञा३ थक् २ प्रथम साहस दंड देने योग्यहै.' मध्यमसाइसम् २ अभावे ७ ज्ञातृचिह्नानां६ / आदि शब्दसे गोप- शाकुनिक-व्याध-वन- राजा १ सीम्नः ६ प्रवर्तिता वासियोंका ग्रहण, यद्यपि शाकुनिक आदि- योजना- अनृते तु सति राज्ञा यध्यम- | कोको पापमें तत्पर होनेसे चिह्नोंक दिखानेमें साहसम् पृथक् २ सामताः दंड्याः-शात- ही उनका उपयोगहे साक्षात सीमाके निर्णयमें चिह्नानां अभावे सीम्रः प्रवर्तिता राजा नहीं तथापि चिह्नके दिखाने ही मिथ्यावादी भवतीति शेपः॥ हो सकतेहैं इससे दंडका कहना ठीक है- तात्पर्याय-यदि तीन पक्षके भीतर सा- अनृतमें पृथक्र दंडदेने योग्य हैं यह दंडका क्षियोंको पेग आदिहो जाय अथवा प्रति- ৭ অথকর সম্বাদুদ দুষগয়ন্স ভিীষ। वादीसे अधिक संख्या वा गुण दूसरे साक्षि- | नयंतस्तु दाप्याः यदिशतं दमम् । २ अथ चैत घ्युः सामता: सीमनिर्णये । सर्व- यासे विरुद्ध दिखादे तोउन मिथ्यावादी पहिले पृयक् पृथक् दंड्या राज्ञा मध्यमसाहसम् । साक्षियोंको दंड कहतेहैं- अमृत मिथ्या ३ शेषाश्चेदनृतं घूयुनियुक्ता भूमिकर्मणि । प्रत्येक तु १ ते पृष्टास्तु यथा युः समस्ताः सीनि निर्णय । | जघन्यास्ते विनयाः पूर्वसाहसम् । निवनीयास्तथा सीमा सर्वोस्तांश्चैव नामतः । ४ मौलवृद्धादयस्त्वन्ये दंडगया पृथक् पृथक् । वि- २ सीमाचक्रमणे कोशे पादस्पर्शे तथैव च। त्रिप• नया. प्रयमेनैव साहसेनानृते स्थिताः । क्षपक्षसप्ताहं देवराजिकमिप्यते । ५ अनृततु पृथक्दयाः ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । कथन अज्ञानके विषयमें है क्योंकि कात्या- | अयोग्य हो तो धर्मका ज्ञाता राजा एककेही यनेने ज्ञानके विषयमें साक्षी आदिको यह | उपकारके लिये भूमिको देदे यह मर्यादा है। अन्य दंड कहा है कि यदि बहुतसे ग्रहण भावार्थ-सामंत आदि मिथ्याकहैं तो कियेहुये साक्षी भय वा लोमसे निर्णय न पृथक् २ मध्यम साहस दंड देने योग्य हैं- करें तो उत्तम साहस दंडदेनेके योग्य हैं- और यदि सीमा जाननेवालोंका और चि- तैसेही साक्षियोंकि वचनके भेदमेंभी यही न्होंका अभाव होयतो राजाही सीमाको प्रव- दंड कात्यायनने ही कहा है कि कहेहुयेमें भेद त करे- ॥ १५३ ॥ (फरफ) होयतो उत्तम साहस दंडदेने योग्य आरामायतनग्रामनिपानोद्यानवेश्मसु । होते हैं-इसप्रकार अज्ञान आदिसे साक्षि- | एपएपविधियोवर्षावुप्रवहादिपु.॥१५॥ योंको अमृत कहनेका दंडदेकर फिर सीमाके विचारको प्रवृत्त करे-यह कहकर पद-आरामायतनग्रामनिपानोद्यानवेश्मसु कायोयननेही निर्णयका प्रकार यह कहा ७ एषः १ एका-विधिः १ ज्ञेयः१-वायुप्रवहा- है कि दुष्ट सामंतोंको त्यागकर और माल दिषु ७ ॥ योजना- आरामायतनग्रामनिपानोद्यान- आदिकोंके संग अन्योंको मिलाकर सीमाको ठीक कर यह धर्मके ज्ञाता जानते हैं-जहां वेश्मनु-वर्षीप्रवहादिषु एष एव विधिः सामंत आदि ज्ञाता और चिन्ह न होय, वहां ज्ञेयः ।। सीमाके निर्णयका उपाय कहते हैं-सामंत तात्पर्यार्थ-आराम ( फूल फलकी वृद्धिक आदि सीमाके ज्ञाता और वृक्ष आदि चिन्ह लिये भूमिका भाग) आयतन (निवेशन) न होयतो राजाही सीमाको प्रवृत्त करा- अर्थात् पलाल आदि रखने के लिये भूमिका वाला होता है और दो ग्रामोंके मध्यको जित भाग (खलियान ) ग्राम-यहां ग्रामपद नगर भूमिमें विवादही उसका सम ( बराबर ) आदिकाभी उपलक्षण (बोधक )ह-निपान विभाग करके यह भूमि इसकी है और यह (जलका स्थान ) बावडी कूप आदि-उद्यान इसकी इस प्रकार दोनोंके अर्पण करके (क्रीडाका वन ) वेश्म (घर) इन पूर्वोक्त उस भूमिक मध्यमें सीमाके लिंग राजा करा आराम आदिकोंमें यही सामंत साक्षी आदि- दे-जप उस भूमिमें किसी एकके टपकारको से निर्णयकी विधि जाननी-तसेही वर्षासे अधिकता दिखे तो उस ग्रामके अपण सब हुपे जलके प्रवाहोंमें इन दो घरोंके मध्यमें भूमिको करदे-सोई मनुनें (अ० ८ श्लोजलका प्रवाह वहता है अथवा इन दो पके २६५)कहा है कि यदि किसीको भूमि सहनेके मध्यमें इस प्रकारके विवादमें और आदि- पदके ग्रहणसे प्रासादो (मंदिर मभी । पनां तु गृहीतानां न सर्वे निर्णय यदि । पुर्युर्म- | पूर्वोक्तही विधि जाननी सोई कात्यायनने पाना लोमादा दंयास्तसमसाहसम् । २ फोनित पद भेदः शाईयास्तूत्तमसाहमम् । कहा है कि क्षेत्र कूप तलाव केदार आराम २ भामागोतो दररित्या पुनः सोमो निारयेत् । घर प्रासाद आवसथ (हवेली ) गजा और गालादुटो सातानन्यान्मालादिमिः सह- देवताओंके मंदिर-इनमेंभी यही सीमाके निर्णयको विधि है ॥ ५ सीमापारि र राजा भगिय । प्र. दिशा भूमिपामुपगारादिति स्थितिः । १क्षेपपतडामानां फेदारारामपोररि । गृह- मामावास्यपदेपरदेशु च। •र मारपेणीमामे धर्मगियो विदुः ।
व्यवहाराध्याय सीमाविवादमकरण ९ भावार्थ -आराम (बाग) निवेश ग्राम- उसके अंगका छेदन करना यह उत्तम निपान-(जलस्थान ) उद्यान ( क्रीडाका | साहस दंड कहाँ है ॥ वन ) वेश्म (धर ) इनमें और वर्षासे हुये भावार्थ-मर्यादाका भेदन-सीमाका अव- जलके प्रवाहाम यही सीमाक निर्णयको | लंघन और क्षेत्रके हरणेमें क्रमसे अधम विधि ( सामंत आदि ) जाननी-अर्थात सा- उत्तम मध्यम साहस दंड होते हैं-॥ २५५ ।। मंत आदि जिसका कहै उसकेही आराम आदि होते हैं ॥ १५४ ॥ ननिषेध्योल्पवावस्तुसेतु कल्याणकारकः । मर्यादायामभेदेचसीमातिक्रमणेतया । परभूमिहरन्कूपःस्वल्पक्षेत्रीयहूदकः१५६॥ क्षेत्रस्यहरणेदंडाअधमोत्तममध्यमाः १५५ पद-सह-निध्यः१ अल्पयाधः १ तु:- सेतुः १ कल्याणकारकः १ परभृाम २ पद-मर्यादायाः ६ प्रभेदे च समिाति- हरन् १ कूपः १ स्वल्पक्षेत्रः १ बहूदकः १॥ कमणे ७ तथा:- क्षेत्रस्यद हरणे दंडाः १ योजना-परभूमि हरन् सेतुः अल्पवाधः अधमोत्तममध्यमाः १॥ न निषेध्यः स्वल्पक्षेत्रः बहूदकः क- योजना-मर्यादायाः प्रभेदे-तथा सिमाति- ल्याणकारक: कूपः न निषेध्यः॥ कमण-क्षेत्रस्य हरणे-अधमोत्तममध्यमाः तात्पयार्थ-जो पराये क्षेत्रमें प्रार्थना करके दंडाः क्रमेण भवंतीति शेषः ॥ तात्पर्यार्थ-अनेक क्षेत्रोंकी जो व्यवच्छे- | वा धन देकर सेतु वा कूपको स्वामीको आ-. दक ( भेद जतानेवाली ) भूमि से मयादा / ज्ञासे बनायाचाहै उसके निषेधसे क्षेत्रके कहते हैं उसका जो भली प्रकार ( जड़मू- करताभी सेतु(जलके प्रवाहका बंध)क्षेत्रस्वामी- स्वामीकोही दंड कहते हैं पराई भूमिको नष्ट लसे) भेदनमें और सीमाको लंधकर क्षेत्र- के जोतनेमें और भय आदिको दिखाकर पीडा और अधिक उपकारका कर्ता हो के निषेध करने योग्य नही यदि यह अल्प- क्षेत्रके हरणे ( छीनने )में कमसे अधम और जो कृप अल्प क्षेत्रमें बननेसे अल्प उत्तम मध्यम साहस दंड जानने यहां क्षेत्र- का ग्रहण गृह आराम आदिके उपलक्षणार्थ । बाधा करें और अधिक जलवान् होनेसे है और जब अपनेकी भ्रांतिसे क्षेत्र आदिको कल्याणका कर्ताहो इससे यहूदक वह कूप- भी निवारण करने योग्य नही यहां कूपका -हरता है तब दोसौ पणका दंड जानना- सोई मनु (अ० ८ श्लो० २६४ )ने कहा है ग्रहण बावडी और पुष्करिणीका उपलक्षण की घर तलाव आगम क्षेत्र इनको जो भय है जहां यह कूप संपूर्ण क्षेत्रमें होने से अधिक दिखाकर हरे उसको पांचसो पणका और बाधा कर पा नदी आदिके समीपके क्षेत्रमें अज्ञानसे हरैतो दोसौ पणका दंडदे और हरे करने योग्य है यह बात अर्थात् कही सम- होनेसे अल्प उपकार करै तब वह निषेध हुये क्षेत्र आदिको अधिकताको देखकर झनी दो प्रकारका सेतु नारदैने कहा है कि कदाचित् उत्तम साहस दंडभी देने योग्य है इसीसे कहा है कि-मारना-सर्वस्वका हरना १ वधः सर्वस्वहरणं पुसान्तसनांकने । तदंगच्छे- पुरसे निकासना-अंक करना (दागना) दइत्युको दंड तमसाहो। गृहं तवागमाराम क्षेत्र वा मीषया हरन् । शतानि २ सेतुश्च डिविधो या खेयो त्यस्तथैव चातीय- पंच दंडयः स्वादशानादिशतो दमः। प्रवर्तनात् वयः वंध्यः स्यात्तनिवर्तनात् ।
(३१६)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
प्रवृत्त करें।
खेम और बंध्य दो प्रकारका सेतु होता है तात्पन्भा०-क्षेत्रके स्वामीके प्रति कह-
जिससे जलकी प्रवृत्तिहो वह खेय-और | कर सेतु बनानेवालेको कहते हैं-क्षेत्रस्वा-
जिससे जलकी प्रवृत्ति न हो वह वंध्य होता | मोके विना पूछे और उसके अभावमें राजाके
है-जो अन्यके बनाये -भेदन (फूटना )आ- विना पूछे जो पयये क्षेत्रमें सेतुको बनाले
दिप्ते नष्ट हुये सेतुको संस्कार कर तो पहिले वह फलका भागी नही होता किंतु उससे
स्वामी उसके वंशके मनुष्य-वा राजाको पूछ- पैदा हुये फलकोही क्षेत्रका स्वामी भोग
करदी संस्कार कर-सोई नारदेनें कहा है | सकता है और स्वामी न होयतो राजाको
कि पहिले बने हुये और छोडे-सेतुको स्वा- | फल मिलता है तिससे प्रार्थना और धनदे-
मौके पूछे विना जो कोई प्रवृत्त ( जारी) कर क्षेत्रके स्वामी वा राजाको पूछकरही
करै वह उसके फलका भागी नहीं-स्वामी | पराये क्षेत्रमें सेतुको बांधै- ॥ १५७ ॥
मागया होय और उसके वंशका मनुष्यभी
कोई न होयतो राजासे पूछ करके सेतुको
फालाहतमपिक्षेत्रनकुर्याद्योनकारयेत् ।
सप्रदाप्यःकृष्टफलंक्षेत्रमन्येनकारयेत५५८
भावार्थ-अल्प पाडाका कर्ता और अधिक पद-फालाहतं २ अपि-क्षेत्र २ न:-
उपकारी पराई भूमिका नाशक कूप और कुर्यात् क्रि-यः १ ना- कारयेत् क्रि-स.१
अल्पस्थानमें जो बने और बहुत जलको | प्रदाप्यः १ कृष्टफलं २ क्षेत्रं १ अन्येन ३
जो दे वह कूप क्षेत्रके स्वामीके निषेध | कारयेत् क्रि-॥
करनेके अयोग्य है ॥ १५६ ॥
योजना-फालाहतं अपि क्षेत्रं यः न कुर्या-
स्वामिनेपोनिषेधवक्षेत्रेसेतुंप्रवर्तयेत् ।त्न कारयेत् सः कृष्टफलं प्रदाय:-क्षेत्रं
उत्पनेस्वामिनोभीगस्तदभाषेमहीपतेः ॥ अन्येन कारयेत्॥
पद-स्वामिने ४ यः १ अनिवेद्या-एव: तात्प भावार्थ-गो मनुष्य क्षेत्रस्वामीके
क्षेत्र ७ सेतुं २ प्रवर्तयेत् कि- उत्पन्ने ७ पास यह कहकर कि मैं इस खेतको जो
स्वामिनः ६ भोगः तदभावे ७ महीपतेः ६ नूंगा-सीछे छोडता हे और अन्यसे भी न
योजनान्यः स्वामिने अनिवेद्य एव क्षेत्रे जुतवाता है-फालसे कुछ जुताभी वह क्षेत्र
सेतुं प्रवर्तयेत् उत्पन्ने (फले ) भोगः स्वा- इलसे कुछ जुताहानेसे भली प्रकार वीज
मिनः भवति तदभावे महीपतेः भागः भवति। । वोने योग्य नहो तोभी उसके जोतने धोनेसे
पूर्वप्रवृत्तमुत्राष्टमपृष्ट्वा सामिनं तु यमसेतु माये- जितना अन्न सामंत (जिमिदार ) समझा-
रफाधिन म तत्कटमाग्भवेत्॥धृते तु स्वामिनि पुनः हो उतना दंड उस कर्षक (किसान)को
राये पापि मानोगजानमामभ्य ततः कुर्यात्सेतु- गजादे और उस क्षेत्रको पहिले किसानसे
छीनकर अन्यसे करवावे-॥ १५८ ॥
नम् ।
इति सीमाविवादप्रकरणम् ॥९॥
व्यवहाराध्याय स्वामपालविवादप्रकरण १० अथ स्वामिपालविवादप्रकरणम् महिषीके स्वामीको आठ मापका और गौके स्वामीको चार मापका और बकरी भेडके मापानष्टौतुमहिपीसस्यघातस्यकारिणी । स्वामीको दो माषका दंड दे-॥ १५९ ।। दंडनीयातदईतुगौस्तदईमजाविकम् ॥ भक्षयित्वोपविष्टानांयथोक्ताद्विगुणोदमः । पद-मापान २ अष्टो २ तु:- महिषी १ | सममेपाविदीतपिखरोष्ट्रमहिपीसमम् १६० सस्यघातस्य ६ कारिणी १ दंडनीया १ तदर्ध २ तु:-गौः १ तदर्ध २ अजाविकम् २ पद-भक्षयित्वाऽ-उपविष्टानां ६ यथो- योजना-सस्पघातस्य कारिणी महिषी विवीते ७ अपिड-खरोष्ट्र २ महिपीसमम् २॥ क्तात् ५ द्विगुणः १ दमः १ समं २ एषां ६ अष्टौ मापान्-गौः तदर्ध-अजाविक दंडनीया तदः॥ योजना- भक्षयित्वा उपविष्टानां यथो- तात्पर्यार्थ-पराये सस्यका नाश करने- तात् द्विगुणो दमः ज्ञेयः- एषां ( महिप्या वाली महिषी (भैंस)को आठ माधका और दीनां)विवीते (प्रचुरतणकाष्ठवति रक्षिते) गौको चार मापका-और अजा और मेषको अपि समं दंडो भवति- खरोष्ट्र महिषीसमं दो मापका दंड राजादे-यहां महिषी आदिक ज्ञेयम् ॥ पासतो धन नहीं होता इससे उनके स्वामी तात्पर्यार्थ-अपराधकी अधिकतासे कहाँर पुरुषोंको दंढ समझना- यहां माषपदसे ता- दूना दंड कहतेहैं-यदि पशु पराये क्षे- बेके पणका वीसवां भाग जानना क्योंकि को खाकर विनानिकासे क्षेत्रमेही सार हैं तब नारदका वचन है कि पणका वीसवां भाम | पूर्वोक्त दंडसे दूना दंड जानना-यदि अपने ब- माष कहा है-यह भी अज्ञान (विनाजाने)क | छडों सहित बैठ जायतो चोगुना दंड विषयमें है जान करतो अन्य स्मृतिम कहा | जानना- क्योंकि यह वचन है कि क्षेत्रमें यह दंड जानना कि पणके दो पाद गौको ) पशु वसैं तो दूना और बच्चों सहित उससे दूने (चारपाद ) महिषीको तैसेही वसे तो चौगुना दंड होताहै- प्रचुर (अ- अजा भेड बछडोको पणके एक पादका धिक है तृण काष्ठ जिसमें ऐसा रक्ष्यमाण दंड कहाहै और जो नारदनें यह कहाँ है ( राखाहुआ) जो देश उसे विवीत कहतेहै कि गोको एक माषका महिषीको दो माषका | उसके नष्ट करनेमेभी अन्य क्षेत्रके दंडके और अना भेड बछडोंको आधेः माषका तुल्यही दंड महिषी आदिकोंको है- और दंड होता है वह ऐसे भक्षणके विषयमें है | खर- उंट-ये सब महिपीके तुल्य है- अर्थात जिसकी जद वचरही हो और वठनेके जहां महिषीको जो दंड दिया जाताई वही योग्य हो ॥ दंड खर ऊंट इनकोभी प्रत्येक दे-खे- भावार्थ-पराये खेतका नाश करनेवाली तके नाश करनमें खर और ऊंट प्रत्येक महिषोके तुल्यहै और दूंड अपराधके अनु- मापो शितिमो भागः पणस्य परिकीर्तितः। २ पणस्य पादी द्वी गातु तद्विगुण महिपी तथा। सार होताहे इससे खरोष्टम् ( खर और तथाजाविकवत्मानां पादो दडः प्रकीर्तित.. ऊंट) यह समाहार ( समूह ) विवक्षित ३ मार गोदापयेद्दह दो मापौ महिषी तथा । तथा- जाविकवरसानां पडः स्यादर्धमाधिकः। १ यसतां द्विगुणः प्रोक्तः सवरसानां चतुर्गुणः । .
(३१८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । नही है- अर्थात् दोनोंको मिलकर एक | उसमें गोके स्वामियोंको दंड नहीं किंतु महिषीके समान दंड नहीं है- पालना करनेवाला उस दंडके योग्य हो- भावार्थ- भक्षण करके जो वहांही बैठ ताहे- यदि गौका स्वामीही अपने अपराधसे गये होय तो दूना दंड होताहै और अधिक सस्यको नष्ट करै तो पूर्वोक्त दंडके योग्य तृण काष्ठवाले देशमेंभी इन महिपी आदि- होताहे ताडनाके नहीं- फलके देनेका कोंको सम ( तुल्य) ही दंड है और खर | अधिकार सर्वत्र गोके स्वामीकोही है क्योंकि और ऊंट महिषीके तुल्य दंडके योग्य होतेहैं। उस क्षेत्रके फलसे पुष्ट महिषी आदिके दूधके यावत्सस्यविनश्येत्सुतावत्स्यात्क्षेत्रिणःफ- | भोग(पीना)के द्वारा गौका स्वामीही उस क्षे- लम् । गोपस्ताव्यस्तुगोमीतुपूर्वोक्तंदंडम-त्रके फलका भोगनेवालाह- और गो आ- ईति ॥ १६१ ॥ दिके भक्षणसे शेष( बचा ) पलाल आदिको पद- यावत्:- सस्य १ विनश्येत् कि- | तो गौका स्वामीही ग्रहण करले क्योंकि तु:- तावत्ऽ-स्यात् क्रि-क्षत्रिणः ६ फलम् १ | मध्यम मनुष्योंने कल्पित ( ठहराया ) मूल्य- गोपः १ ताड्यः१ तु:-गोमी १ तुः- पूर्वोक्तरे के देनेसे वह क्षेत्र उसका क्रोत (खरीदा) के समानहै इसीसे नारदंने कहा है कि गो- दंड २ अर्हति कि-॥ भोंके भक्षण किये सस्यको जो नर मांगे जो योजना- यावत् सस्पं विनश्येत् तावत् फल क्षेत्रिणः स्यात्- तु पुनः गोपः ताड्यः | अन्न उस क्षेत्रमें वोयाहो उसका दव्य वा गोमी तु पूर्वोक्तं दंडं अर्हति- उतना अन्न जो सामंत ठहरादे देदे- और तात्पर्याय-पराये सस्पके नाशमें गोके | उस खेतका पलाल गाके स्वामीको और स्वामीको दंड कहआये अवक्षेत्रके स्वामीको अन्न कर्षक (किसान)को देदे- फलभी दे यह कहतेहैं-यहां सस्यका ग्रहण भावार्थ- नितना क्षेत्र नष्ट हुआ हो क्षेमकी वृद्धिका उपलक्षण-जिस क्षेत्रमें जि- उतनाही फल क्षेत्रके स्वामीका होताहै और तना पलाल और धान्य आदि गो आदिकोंने गोप तो ताडनाके योग्य है और गौओंका नष्ट कियाहो उतना क्षेत्रका फल गोवाला स्वामी पूर्वोक्त दंडके योग्य होताहै ॥१६॥ क्षेत्रके स्वामीको दै- अर्थात् इतने क्षेत्रमें पथिग्रामविवीतांतेक्षेत्रेदीपोन विद्यते । इतना अन भूसा हुआ करताह इस प्रकार अकामत:कामचारेचौरसइंडमर्हति।१६२॥ सामंतोंके निश्चय किये अन्न आदिको देदे- और गोपको ताडनाही दे उससे फल न पद-पथि ग्रामविवीतान्ते क्षेत्रे दोपः१ दिवावे- यदि पाल (गोप)क दोपसे स-ना-विद्यते क्रि-अकामतः:- कामचारे ७ स्यका नाश हुआ होय तो गोपकोभी चौखता-दंडं २ अर्हति किं- ।. पूर्वोक्त धन दंटसाहितही तारना जाननी योजना-पथि ग्रामविवीतांते क्षेत्र अका- पयोंकि यह येचनहै कि जो नष्ट (विटडी) मतः नाशिते दोषः न विद्यते- कामचारे एपी गो पालक दोपसे सस्योंको नष्ट कर- चौखत् दंड भइति ।। २ या मा पाटोरेज गस्तु सरयानि नाराये। मदन नमिना पारदरमति। मोनिस्तु भक्षित सत्य यो नरः प्रसियायते । सामवानुमत देयं पाय पसत्र वास्तिम् ।
व्यवहाराध्याय स्वामिपालविवादप्रकरण १० (३१९) तात्पर्यार्थ-मार्ग ग्राम और विवीत (जिसमें तिकागंतुकादयः १ पालः १ येषां ६ न:- तृण वा काष्ठ रक्षाके लिये छोड रक्खेहों) ते १ मोच्याः १ देवराजपरिप्लुताः १ ॥ इनके समीपका जो क्षेत्रहै उसको रखवाले योजना- महोक्षा उत्सृष्टपशवः सूतिका- गोपके विनाजाने गौ भक्षण करलें तो गंतुकादयः- येषां पालः न अस्ति देवराज- गोप और गोका स्वामी इन दोनोंको परिप्लुताः ते मोच्याः स्युः ।। दोष ( अपराध ) नहीं-यहां दोषके अभा- तात्पर्यार्थ- महान् जो उक्षा उसे महोक्षा वका कहना दंडके अभावार्थ है और (सांड ) कहते हैं वह- और उत्सृष्ट पशु नष्ट हुये सस्यके मोल देनेके निषेधार्थहै- जो वृपोत्सर्ग आदिको विधिसे वा देवताके यदि · कामचार हो अर्थात् जानकर निमित्तसे छोटे हों- और दुशदिनके भीत- खेतमें गौ आदिको चुगावे तो जो देड चौर- रकी प्रसूता ( व्याई हुयो ) गौ आदि आगं- कोई होताहै वेसेही दंडके योग्य वहभी होताहै यहभी उस क्षेत्रके विषयमें है जो तुक (जो अपने यूथसे भ्रष्ट होकरदेशांतरसे आये हों) इतने पशु छोडने योग्य, अर्थात् अनावृत (विनावाड ) हो क्योंकि मनु ये पराये सस्यका भक्षण करने परभी दंडके (अ० ८ श्लो० २३८ )ने यह दंडका योग्य नहीहै और जिनका पाल नहीं हों वेभी अभाव अनावृत क्षेत्रके विषयमेंही कहाहे देवराजोपहत (सस्यके नाशक ) होय तो कि जहां विना वाडके खेतके धान्यको याद । दंडके योग्य नहीं होते-आदि पदके ग्रहणसे पशु नष्ट करदें वहां राजा पशुओंके रखवा- हस्ति अश्व आदि लेने वे उशनाने केहेहे लोंको दंड नदे- और आवृत ( वाडवाले) कि हाथी और अश्व दंडके योग्य नहीं हैं तो मार्ग आदिके क्षेत्रमेंभी दोषइ हो-वृति | क्योंकि ये प्रजाके पालक कहेहैं- काणे ( बाड )का करनाभी मनु ( अ और कुबड़े चिलवालेभी दंडके योग्य नहीं लो० २३९ )नही कहाहै कि क्षेत्रको ऐसी कही ऐसाभी पाठ है कि काणे और एक वाडकरै जिसके करनेसे ऊंट क्षेत्रको न सांगके और दाग दिये बैल दंडके अयोग्य देखसके और उसमें ऐसे छिद्रभी न रहने दे हैं- अकस्मात् (अचानक ) आई-सूतिका जिनमें कुत्ते और सूकरोंका मुख जासके। अभिसारिणी (जो अपने यूथसे भ्रष्ट हुई भावार्थ-मार्ग माम विवीतके समीपका जो फिर अपने यूथमें जाती हो) उत्सवकी क्षेत्र उसको विना जाने गौ आदि नष्ट और श्राद्धके समयमें आई इतनी गौ दंडके करदें तो कुछ दोष नहीहै-यदि जानकर चुरावे | अयोग्य हैं- यहो उत्सृष्ट (छोडे हुये ) पशु- तो चौरके समान दंडके योग्य होताहै ॥ ओंको दंडसे रहित होनेसे दृष्टांतके लिये महोशोत्सृष्टपशवःसूतिकागंतुकादयः । उनका ग्रहण है अर्थात् जसे उत्सृष्ट पशु पालोयेपांनतेमोच्यादैवराजपरिप्लुता:१६३ . दंडके भयोग्य ऐसेद्दी महोक्षा आदिभी दंडके अयोग्यहँ ॥ पद-महोक्षा १ उत्सृष्टपशवः १ सू- यनापरिवृतं धान्य विहिम्युः परावो यदिशन पत्र । १ अदया हस्तिनो वश्वा. प्रजापाला हि ते स्मृताः प्रणवेड नृपतिः पशुराक्षिणाम् । अदंच्या कापन्जा च ये शश्वरकृतलक्षणाः ॥ भदं- २ वृतिच तत्र कुर्वीत यामुटौ नावलोकये छिद उभागतीगौच सूतिका वाभिमारिणी । भदइयायो- निवारयेत्सर्व श्वकरमुखानुगम् । त्सरे गावः श्राद्धकोल तथैव च । %3D (३२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।. ។ भावार्थ-महोक्ष (सांड ) पुण्यार्थ छोडे | इतने प्रकारके पशुको पालही दे- और जो हुये पशु-मतिका- अचानक आये पशु ये | बलसे चारोंने चुराये होयतो पाल दंड देने- दंड देनेके अयोग्यहैं- और जिनका कोई योग्य नहीहै सोई मनु (अ०८ श्लो०२३३) पालक न हो देव और राजासे उपहत ने कहाहै कि पराक्रमसे वा' कहकर जो (अपराधी) वेभी छोडदेने योग्यहैं ॥१६३।। चोरोने चुराया हो उसको पाल देनेयोग्य यथापितान्पशून्गीपासायंमत्यर्पयेत्तथा । नहोदै-यदि देश और समयमें अपने स्वा- मीको कहदे-देव और राजासे जो मरे हाँ प्रमादमृतनांश्चमदाप्याकृतवेतनः १६४ उनके कान आदिको गोप दिखादे- क्योंकि पद-यथा:-अर्पितान २ पशून् २ गोपः १ | मनुकी (अ०८ श्लो० २३४ ) स्मृति है। सायंड-प्रत्यर्पयेत् कि- तथाऽ- प्रमादमृत- कि कान चाम केश बस्ति स्नायु-रोचना- नष्टान् २ चऽ- प्रदाप्यः १ कृतवेतनः १॥ पशुओंके इन सबको स्वामीको दे और योजना-गोपः यथापितान् पशून् तथा मरेपर पशुओंके अंगोंको दिखादे ॥ सायं प्रत्यर्पयेत् प्रमादमृतनष्टान् पशुन् भावार्य-गौओंके स्वामीने प्रातःकालके (ज्ञात्वा) कृतवेतनः गोपः प्रदाप्यः- समय जैसे पशु गोपके अर्पण ( आधीन) (दंडनीयः)-॥ किये हो उसी प्रकार गोपभी सायंकालको तात्पर्यार्थ- गौओंके स्वामीनें प्रातःकाल गौओंके स्वामीको सौंपदे ।। १६४ ॥ जिस प्रकार गिनकर पशुअर्पण किये हो पालदोपविनाशेतुपालेदंडोविधीयते वसेही सायंकाल के समय गिनकर गोप गौओंके स्वामीको प्रत्यर्पण कर ( सौंपदे) अर्द्धत्रयोदशपणःस्वामिनोद्रव्यमेवच१७० यदि अपने प्रमाद (अपराध) से पशु पद-पालदोपविनाशे तुरु-पाले दंडः १ मरगये हो वा नष्ट हो गये होय तो वह | विधीयते कि- अर्धत्रयोदशपणः १ गोप दंडकेयोग्यहै जिसका वेतन (नोकरी) स्वामिनः ६ द्रव्यं २ एव:-च:-॥ 'नियत हो-वेतनकी कल्पना नारदनें कहीहै योजना-तुपुनः पालदोपविनाशे सति. कि सा गौओंकी रक्षा करनेवाले गोपको पाले अर्धत्रयोदशपणः चपुनः स्वामिनः एक वत्सतरी (बछिया) और दोसौ गो द्रव्यं दंडः विधीयते ॥ ओंके रक्षकको एक धेनु-आठवे दिन दुहना तत भा०-यदि ग्वालियाके दोपसे पशु वर्षदिनमें भृति ( नोकरी) होतीहै-प्रमादसे नष्ट हो जाय तो साढे तेरहपण दंड पालको नाशभी मनुनं (भ. शी. २३२) स्पष्ट किया है कि नष्ट हुआ और कृमि (कीडे ) * कोई तो अर्द्ध त्रयोदश पणसे आधेसे यांका खाया कुत्ताका मारा-विषम (ऊंचसे रहित साढे चारह पण लेते हैं क्योंकि उत्तर- गिरता आदि )में मग- पुरुषार्थसे हीन- पदलोपी कर्मधारय समास है (अर्द्धरहित स्त्रयोदशपणः अर्द्धत्रयोदशपणः ) जो विज्ञा- tosसनीनुः म्यादिमाताभूतिः ।प्र शिप्रम्य तु हनं चाग्नं पालो दातुमर्हति । यदि गिसो गोरे दोहमारमेहाने । देसी म काले सम्पामिनः स्वस्य मति । २ नई जगप्रय मिभिः शतं सिमंती होने २ फागों चर्म च पाय परित सार्य परोपनी पुरुष पारस मामिनो दया रोप्वमानि रसद ।
व्यवहाराध्याय स्वामिपालविवादप्रकरण १० (३२१) 1 और मध्यस्थ ( सामंत के निश्चय परिगृहीत नही उसमें तो ब्राह्मणसे भिन्नका- किये नष्ट हुये पशुओंका मूल्य स्वामीको भी स्वत्व परिग्रहसेही सिद्ध है जैसे गौतम- ग्वालिया दे १६५॥ नही कहा कि अंश-क्रय-विभाग-परिग्रह- ग्रामेच्छयागोपचारोभूमीराजवशेनपा । अधिगम इनसे स्वामी होताई- और जो द्विजस्तृणैधःपुष्पाणिसर्वतःसर्वदाहरेत् ॥ यह कहाहे कि तृण वा काष्ठ-पुष्प वा फल इनको विना पूछे जो ग्रहण कर वह हाथ पद- प्रामेच्छया ३ गोप्रचारः १ भूमिः १ छेदनके योग्य होता है वह वचन द्विजोंसे भि- राजवशेन ३ वा- द्विजः १ तृणेधः- नोंके विषयमें है वा विना आपत्तिके विषय में पुष्पाणि २ सर्वतः:-सर्वदा:- आहोत कि-॥ है- अथवा गो आदिसे भिन्नके विषयों है। योजना-ग्रामेच्छया वा राजवशेन गो भावार्य-प्रामकी वा राजाको इच्छासे प्रचारः भूमिः ( कर्तव्यः) द्विजः तृणैधः- गौओंके चुगनेके लिये विना जुती भूमि पुष्पाणि सर्वतः सर्वदा आहरेत् (गृहीयात्)॥ | छोड़ देनी-प्राह्मण-तृण-काष्ठ-पुष्प-इनको तात्पर्यार्थ-ग्रामके मनुष्योंकी इच्छासे । सवस्थानोंसे सयकालमें अपनेकी . समान वा राजाके वश (इच्छा )से गोऑके प्रचार ग्रहण करे ॥ १६६ ॥ (चरने )की भूमि करनी अर्थात् ग्रामकी अल्प वा अधिक भूमिके अनुसार गोऑके धनुःशतपरीणाहोग्रामेक्षेत्रांतरंभवेत् चुगनेके लिये कुछ भूमिका भाग विना जुता देशतेखर्यटस्पस्यानगरस्पचतुःशतम् १६७ छोडदेना- और ब्राह्मण-तृण-काष्ठ-पुष्प पद-धनुःशतम् १ परीणाहः १ ग्रामे ७ इनको समकालमें सव स्थानोंसे ऐसे ग्रहण क्षेत्रांतरम् १ भवेद क्रि-द्वे १ शते १ खर्वट- करे जैसे अपनेको ग्रहण करतेहै- फलस्य ६ स्यात् कि नगरस्य ६ चतु शतम् १ तो वेही ग्रहण करे जो अपरिवृत (बिना योजना-ग्रामे क्षेत्रान्तरं धनुःशतम् परी- वाड ) हो क्योंकि गौतमका वचन है कि गाइः भवेत्-खर्वदस्य द्वेशते-नगरस्य चतुः- गों और आमिके लिये तृण और काष्ठ-लता शर्त परीणाहः स्यात् ॥ और वनस्पतियोंके पुष्प इनको तो अपनेके ताभावार्य-ग्राम और क्षेत्रका अंतर समान ग्रहण करै- और फल तो उनकेही (वीच) सौ धनुष परीणाह (प्रमाण) का ले जो वाड किये वृक्ष न हो- यहभी परिय- उत्तम चायें दिशा में करें-और खर्वट हीत (मिला )के विषयमें है क्योंकि जो । ( जिसमें बहुत कांटेहों ) प्रामका अतंर दो- नेश्वरने अर्द्ध अधिक त्रयोदशपणका दंड · सौ धनुष प्रमाणका होता है जिसमें बहुत कहाहै वह त्यागनेपोग्य साईद्विमात्र आदिम जन वसतद्दा ऐसे नगर ( सहर ) और क्षेत्र- अर्द्धत्रिमात्र आदिका प्रयोग महाभाष्यका- का अंतर चारसा धनुष प्रमागका करना-॥ रने किया है। स्वामी विथकरपिमागपग्निहाधिगमे । गौम्य तगमेधामि यीपइनस्पतीना पदुष्पाशि २ वर्ग वा यदि या कार पुष या यदि या फलम्। सग्दादीत फलानि चापरिवृत्तानाम् । इति स्वामिपालविवादप्रकरणम् ||१०|| ( ३२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथास्वामिविक्रयप्रकरणम् ११ कालमें अर्थात् रात्रि आदिमें क्रय करे (ख- रीदे ) तो क्रेता ( लेनेवाला ) तस्कर (चो- स्वलभेतान्यविक्रीतकेतुदोषीप्रकाशिते । र) होता है चोरके दंड योग्य होता है-सोई हीनाद्रदोहीनमूल्येवेलाहीनेचतस्करः १६८ कहाँ है कि विना स्वामीके विक्रय किये पद-स्वं २ लभेत कि -अन्यविक्रीतम्२ द्रव्यको जो प्राप्त हो (ले ) उस द्रव्यको स्वामी लेसकता है-सबको प्रकाश करके केतुः ६ दोषः । अप्रकाशिते ७ हीनात् ५ लेनेसे क्रेताको शुद्धि होती है और एकांतमें रहःऽ-हीनमूल्ये ७ वेलाहीने ७चा-तस्करः खरीदनेस चोरी होती है। योजना-अन्यविक्रीतं स्वं स्वामी लभेत भावार्थ-अन्यके विक्रय किये अपने अप्रकाशित केतुः दोषः भवति-हीनात् (द- द्रव्यको स्वामी ग्रहण करले-क्रेता उसका व्यागमरहितात ) रहः ( एकांते ) होनमूल्ये, | प्रकाश न करे तो क्रेताका अपराध है यदि चपुनः वलाहाने (कुसमये ) केता तस्करः । वह द्रव्य संचयके उपायप्ते हीन हो वा एका भवति ॥ तमें लियाहो अथवा हीन ( कम) मूल्यसे तात्पर्याय-अब अस्वामिविक्रय नाम लिया हो वा समयसे हीन (रात्रिआदि में प्रकरणका आरंभ कहते हैं उसका लक्षण लिया होयतो क्रेता ( मोल लेनेवाला)तस्कर नारदेन यह कहा है कि सौंपा हुआ पराया (चौर ) होता है ॥ १६८ ॥ द्रव्य-नष्ट हुआ मिला-वा चौपकिया-जो सयके प्रत्यक्ष वेचा जाय उसको अस्वामि- नष्टापहृतमासाद्यहरिग्राहयेन्नरम् देशकालातिपत्तीचगृहीत्वास्वयमर्पयेत् ॥ विक्रय कहते हैं-उसमें जो दंड होता है उसको कहते हैं-अपने द्रव्यको अन्य पुरु- पद-नष्टापहृतं २ आसाद्य हतारं २ ग्रा- पके हाथसे विक्रीत (वचा ) देख तो उस- हयेत् कि- नरम् २ देशकालातिपत्तो ७ को ग्रहण कर पकडले क्योंकि विनास्वामीके च- गृहीत्वा:- स्वयं-अर्पयेत् कि-॥ जो विक्रय किया हो वह स्वत्वका हेतु नहीं योजना-नष्टापहतं आसाद्य इतर नरं होता-यहां विक्रीत (वेचा )का ग्रहण,दिये ग्राहयेत्-चपुनः देशकालातिपत्ती स्वयं गृ- और साप हुयेकेभी उपलक्षणके लिये है- | हीत्वा अपयेत- क्योंकि वेभी अस्वामिविक्रांतके तुल्य हैं तात्पर्य-स्वामीनें किया है अभियोग इसीलिये कहा है कि विना स्वामी विक्रय- जिसपर ऐसा क्रेता यह कर कि नष्ट और दान-आधि ( गिरवी ) इनको लोटादे अ- | चुराये हुये अन्यके द्रव्यको मोल लेकर याद सत्य न समझ-यदि क्रेता (लेनेवाला) ता, विक्रेता ( बेचनेवाला ) मनुष्यको अपने कय्य (खपेदनाको ) प्रकाश न करे | चोरोंके पकडनेवालोंको पकटवादे-क्योंकि तो प्रेताका अपराध होता है-ततेही द्रव्यके | इससे अपनी शुद्धि और राजदंडका अभाव आगमसे हीनके फ्रयसे-और एकांतमें आरव-दामोहोंगे-यदि विक्रेता अज्ञात देशा अल्प मोलसे और बेलास हीन (कुसमय ) चला गयाहो या कालांतरमें मरगया हो निक्षिप्त या पाश्य नष्ट सवारपारि | मूल (जह )के लानेमें असामथ्र्यस से समझ पा राहायोगामिरिकपः । च्यमस्वामिविशति प्राप्य सागरी २ भामिविर्य दानमामि पशिनियतयेत् । प्रकाराश्यतः शुद्धिः फ्रेतुः स्नेयं रहना - रोचना व्यवहाराध्याय स्वामिविक्रयप्रकरण ११ (३२३) ताके विना दिखायही उस धनको स्वयंही कहै कि मैं यह नहीं चुराया किंतु अन्यके नाष्टिक (जिसका द्रव्य नष्ट हुआ हो) के | सकाशसे क्रीत किया (खरीदा) है वह अर्पण करदे-इतनेसेही यह शुद्ध होता है- यदि क्रेता विक्रय करनेवालेको दिखा दे तो यह पूर्वोक्त संपूर्ण श्रीशंकराचार्यका अर्थ ठीक उसकी शुद्धि होती है अर्थात् फिर वह अ- नहीं है क्योंकि विक्रेताके दिखानेसे क्रेता- भियोग करनेके योग्य नही है-किंतु उता- की शुद्धि होती है इस अग्रिम वचनके संग के दिखाये उस विक्रेताके संग नाष्टिकका पुनरुक्ति (दुबाराकहना )दोष आवेगा- विवाद है सोई बृहस्पति ने कहा है कि इससे इस वचनकी व्याख्या (अर्थ) अ- मूलके ला देनेपर कदाचित्तूभी अभि- न्यथा करते हैं-कि नाष्टिक, प्रत्यय, वा योग ( दावा ) न करे किंतु फिर किसीके उपदेशसे नष्ट और चुराये अपने नाष्टिकका विवाद भूलके संग होताहै यदि द्रत्यको क्रेताके हाथमें देखकर उस हरन | उस विवादमें विना स्वामीके बेचनेका (जय ) करने वालेको स्थानपाल ( चौकी निश्चय होनाय तो उस नष्ट वा चराये हुये दार) आदिको ग्रहण करादे ( पकड़वाय द्रव्यका जो विक्रेता है उसके सकाशसे दे) यदि देश वा कालका अतिपत्ति (अति- स्वामी ( नाष्टिक ) अपने द्रव्यको और क्रम वा बीतना ) होता जाने और स्थान- । राजा अपराधके अनुसार दंडके धनको पाल आदि सभीपमें न होयतो और उनके और क्रेता अपने मूल्यको- प्राप्त होताहै- विज्ञापन (जनाने )से पहिले उस क्रेताके | यदि देशांतर (परदेश )में गया होय तो पलायन (भागना )की शंका होयतो आ- | उसके लानेके लिये योजनोंको संख्यासे पही ग्रहण करके स्थानपाल आदिके अ- समय देदेना योग्यहे- क्योंकि यह स्मृति कि यातो प्रकाश करके क्रय करै (वेचे) भावार्थ-नष्ट और चुराये अपने द्रव्यको वा मूल (नड)को अर्पण करदे और देखकर क्रेता मनुष्यको स्थानपाल आदिको | मार्गकी संख्यासे वहां मूलके लानेका ग्रहण करादे यदि देश वा कालका अति- समय देने योग्यई- यदि विना जाना देश क्रम होयतो स्वयंही पकडकर अर्पण करदे॥ होनेसे मूलको न लासके तो क्रय विक्रेतुर्दर्शनाच्छुद्धिास्वामीद्रव्यंनृपोदमम् । ( खरीदना )को शोधन करकेही शुद्ध होता है क्योंकि यह वचनहै कि जिसका मूल क्रेतामूल्यमवाप्नोतितस्माद्यस्तस्यविक्रयी। न आसकै वहां क्रयकी ही शुद्धि करे पद-विक्रेतुः ६ दर्शनात् ५ शुद्धिः १ अर्थात् यह प्रकट करदे कि इनके सामने स्वामी १ द्रव्यं २ नृपः १ दमम् २ क्रेता मैं खरीदाहै- और जब साक्षी आदिसे वा मूल्यं २ अवाप्नोति कि-तस्मात् ५ यः १ दिव्यप्रमाणसे अपने क्रयको शुद्ध न करे तस्य ६ विक्रयी ॥ और मूलकोभी-न दिखावे तो वही दंडका । योजना-विक्रेतुः दर्शनात् केतुः शुद्धिः १ मूले समाहते क्रेता नाभियोग्यः कथंचन । मून भवति यः तस्य विक्रयी तस्मात् स्वामी | सह वादस्तु नाष्टिकस्य विधीयते ।। स्वरदायं-नृपः दुमं क्रेता मूल्यं अवाप्नोति ॥ २ प्रकाश वा ऋयं कुर्यान्मूलं वापि समर्पयेव । मूला- पर्याय-चौरके पकडवाय देनेपर यह नयनकारश्च दैयस्तत्रावसंख्यया ।। 'यदि वह पकडा हुआ फ्रेता यह ३ असमाहार्यमूलस्तु क्रयमेव विशोषयेत् । र्पण करदे । २ (३२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . । अथास्वामिविक्रयप्रकरणम् ११ कालमें अर्थात् रात्रि आदिमें क्रय करें (ख- रीदे) तो क्रेता ( लेनेवाला) तस्कर (चो- स्वलभेतान्यविक्रीतंतुदोंपोप्रकाशिते । र) होता है चोरके दंड योग्य होता है-सोई हीनाद्रहोहीनमूल्येवेलाहीनेचतस्करः १६८ | कहाँ है कि विना स्वामीके विक्रय किये द्रव्यको जो प्राप्त हो (ले ) उस द्रव्यको पद-स्वं २ लभेत क्रि-अन्यविक्रीतम्र स्वामी लेसकता है-सबको प्रकाश करके तुः ६ दोपः । अप्रकाशिते ७ हीनात् ५ लेनसे क्रेताकी शुद्धि होती है और एकांतमें रहा-हीनमूल्ये ७ वेलाहीने श्चा-तस्करः खरीदनेस चोरी होती है । योजना-अन्यविक्रीतं स्वं स्वामी लभेत भावार्थ-अन्यके विक्रय किये अपने अप्रकाशित केतुः दोषः भवति-हीनात् (द्र- द्रव्यको स्वामी ग्रहण करले-क्रेता उसका व्यागमरहितात् ) रहः (एकांते ) हीनमूल्ये, प्रकाश न करे तो क्रेताका अपराध है-यदि चपुनः वलाहीने (कुसमये ) ता तस्करः | वह द्रव्य संचयके उपायसे हीन हो वा एका- भवति ॥ तमें लियाहो अथवा हीन ( कम) मूल्यसे तात्पर्यार्थ -अव अस्वामिविक्रय नाम | लिया हो वा समयसे हीन (रात्रिआदि )में प्रकरणका आरंभ कहते हैं उसका लक्षण लिया होयतो क्रेता (मोल लेनेवाला )तस्कर नारदेन यह कहा है कि सौंपा हुआ पराया (चोर ) होता है ॥ १६८ ॥ द्रव्य-नष्ट हुआ मिला-चा चोगकिया-जो नष्टापहृतमासायहरंग्राहयेन्नरम् सबके प्रत्यक्ष वेचा जाय उसको अस्वामि- विक्रय कहते हैं-उसमें जो दंड होता है देशकालातिपत्तौचगृहीत्यास्वयमर्पयेत् ॥ उसको कहते हैं-अपने द्रव्यको अन्य पुरु- पद-नटापहृतं २ आसाद्य-हतारं २ मा- पके हाथसे विक्रीत (वचा) देखे तो उस- हयेत् कि- नरम् २ देशकालातिपत्ती ७ को ग्रहण कर पकडले क्योंकि विनास्वामीके | च:- गृहीत्वाऽ- स्वयं:- अर्पयेत् क्रि-॥ जो विक्रय किया हो वह स्वत्वका हेतु नहीं योजना नष्टापहृतं आसाद्य हारं नरं होता--यहां विक्रांत (वेचा )का ग्रहण,दिये ग्राहयेत्-चपुनः देशकालातिपत्तो स्वयं गृ- और साप हुयेकेभी उपलक्षणके लिये है- होत्वा अर्पयेत्- कि यम अस्यामिलिमीत्फ तुल्य हैं रात्रपाठ-स्त्यामलें किया है अभियोग इसीलिये कहा है कि बिना स्वामी विक्रय- जिसपर ऐसा क्रेता यह कर कि नष्ट और दान-आधि (गिरवी ) इनको लौटादे अ- चुराये हुये अन्यके द्रव्यको मोल लेकर यांत सत्य न समझे-यदि क्रेता ( लेनेवाला) क्रेता, विक्रेता ( वेचनेवाला ) मनुष्यको अपने फय्य (खरीदनाको ) प्रकाश न करे चोरोंके पकडनेवालोंको पकडवादे-क्योंकि तो फ्रेताका अपराध होता हे-तैसेही-द्रव्यके | इससे अपनी शुद्धि और गजदंडका अभा आगमसे हीनके फ्रयसे-और एकांतमं और व-दामोंहोंगे-यदि विक्रेता अज्ञात देश अल्प मोलसे और वेलासे होन (फुसमय) चला गयाहो या कालांतरमै मरगया होगा मिक्षिप्त या पदव्यं न सभापहम्य गारिणीय मूल (जह ) के लानमें असामर्थ्य ये समक्ष दीपोप्रशामिविक्रयः । रोपनी इव्यमस्यामिविनीत गाप्य यामी २ भामिकिपदानमाशिष गिनितिंदैन । प्रकारात आदिः केतुः रस्ते rmi व्यवहाराध्याय स्वामिविक्रयप्रकरण ११ (३२३) ताके विना दिखायेही उस धनको स्वयंही | कई कि मैं यह नही चुराया किंतु अन्यके नाष्टिक (जिसका द्रव्य नष्ट हुआ हो) के सकाशसे क्रोत किया (खरीदा) है वह अर्पण करदे-इतनेसेही यह शुद्ध होता है- यदि केता विक्रय करनेवालेको दिखा दे तो यह पूर्वोक्त संपूर्ण श्रीशंकराचार्यका अर्थ ठीक उसकी शुद्धि होती है अर्थात् फिर वह अ- नहीं है क्योंकि विक्रेताके दिखानसें क्रेता- भियोग करनेके योग्य नहीं है-किंतु केता- की शुद्धि होती है इस अग्रिम वचनके संग के दिखाये उस विक्रेताके संग नाष्टिकका पुनरुक्ति (दुवाराकहना )दोष आवेगा- विवाद है सोई वृहस्पति ने कहा है कि इससे इस वचनकी व्याख्या ( अर्थ ) अ- मूलके ला देनेपर कदाचित्भी अभि- न्यथा करते हैं-कि नाष्टिक, प्रत्यय, वा योग ( दावा ) न करै किंतु फिर किसीके उपदेशप्से नष्ट और चुराये अपने नाष्टिकका विवाद मूलके संग होताहै यदि द्रत्यको क्रेताके हाथमें देखकर उस हरन ! उस विवादमें विना स्वामीके बेचनेका ('क्रय ) करने वालेको स्थानपाल (चौकी निश्चय होगाय तो उस नष्ट वा चुराये हुये दार ) आदिको ग्रहण करादे ( पकडवाय द्रव्यका जो विक्रेता है उसके सकाशसे दे) यदि देश वा कालका अतिपत्ति (अति- | स्वामी ( नाष्टिक ) अपने द्रव्यको और क्रम वा वीतना ) होता जाने और स्थान- | राजा अपराधके अनुसार दंडके धनको- पाल आदि समीपमें न होंयतो और उनके और क्रेता अपने मूल्यको-प्राप्त होताहे- विज्ञापन ( जनाने )से पहिले उस क्रेताके यदि देशांतर (परदेश )में गया होय तो पलायन (भाजना )की शंका होयतो आ- | उसके लानेके लिये योजनोंकी संख्यासे पही ग्रहण करके स्थानपाल आदिके अ- समय देदेना योग्यहे- क्योंकि यह स्मृति कि याता प्रकाश करके क्रय करै (वेचे ) भावार्थ-नष्ट और चुराये अपने द्रव्यको वा मूल (जड)को अर्पण करदे और देखकर क्रेता मनुष्यको स्थानपाल आदिको मार्गकी संख्यासे वहां मूलके लानेका ग्रहण करादे यदि देशं वा कालका अति- समय देने योग्यहे- यदि विना जाना देश क्रम होयतो स्वयंही पकडकर अर्पण करदे होनेसे मूलको न लासके तो क्रय विक्रेतुर्दर्शनाच्छुद्धिास्वामीद्रव्यंनृपोदमम् । ( खरीदना )को शोधन करकेही शुद्ध क्रेतामूल्यमवाप्नोतितस्माद्यस्तस्यविक्रयी। होता है क्योंकि यह वचनहै कि जिसका मूल न आसके वहां क्रयको ही शुद्धि करे पद-विक्रेतुः ६ दर्शनात् ५ शुद्धिः १ अर्थात यह प्रकट करदे कि इनके सामने स्वामी १, द्रव्यं २ नमः १ दमम् २, क्रेता १ . मैं खादा है- और जब माक्षी आदिमे वा. मूल्यं २ अवाप्नोति क्रि-तस्मात् ५ यः १ दिव्यप्रमाणसे अपने क्रयको शुद्ध न करे तस्य ६ विक्रयो १॥ और मूलकोभी न दिखावे तो वही दंडका योजना-विक्रेतुः दर्शनात् केतुः शुद्धिः १ मूले समाहृते क्रेता नाभियोग्यः कथचन । मलेन भवति-यः तस्य विक्रयी तस्मात् स्वामी सह वादस्तु नाष्टिकस्य विधीयते ।। स्पाय-नृपः दम-क्रेता मूल्यं अवाप्नोति ॥ प्रकाश या क्रय कुर्यान्मूलं वापि समर्पयेत् । मूला- पर्यार्थ-चोरके पकडवाय देनेपर यह नपनकाउच देवस्तश्रावसंख्यया ।। यदि वह पकडा हुआ क्रेता यह ३ असमाहार्यमूलस्तु क्रयमेव विशोधपत् । पण करदे ॥
(३२४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - पणान् २॥ भागी होताहै क्योंकि यह मनुका वचनहै गसे नष्टको सिद्ध करै-यदि सिद्ध न कर- कि जो मूलको न लासके और न क्रयको सके तो गजाको उस धनका पांचवां भाग शुद्ध करे तो अभियोगके अनुसार धनीको दंड दे ॥ १७१ ॥ धन और राजाको दंड दे॥ हृतंप्रनष्टयोद्रव्यंपरहस्तादवामुयात् भावार्थ-विक्रेताके दिखानेसे क्रेताकी अनिवेद्यनृपेदव्यासतुपण्णवत्तिपणान् १७२ शुद्धि होती है और जो उस द्रव्यका विक्रय करनेवाला है उसीसे स्वामी अपने नष्ट द्रव्य- पद-हृतं २ प्रनष्टं २ यः १ द्रव्यं २ को और राजा दंडको क्रेता मोलको प्राप्त | परहस्तात् ५-अवामुयात् क्रि-अनिवेद्या- होते हैं ॥ १७० ॥ नृपे ७ दंड्यः १ सः १ तुऽ-पण्णवति २ आगमेनोपभोगेननष्टंभाव्यमतोन्यया योजना-यः हृतं प्रनष्टं द्रव्यं नृपे भोले- पंचबंधोदमस्तस्यराज्ञेतेनाविभाविते १७१ वेद्य परहस्तात् अवाप्नुयात् सः पण्णवर्ति पद-आगमन ३-उपभोगन ३ नष्टं १ पणान् दंड्यः ॥ भाव्यं १ अतः-अन्यथाऽ-पंचबंधः १ दमः१ ता. भा०-जो मनुष्य चुराये वा नष्ट हुये तस्य ६-राज्ञे ४ तेन ३ अविभाविते ७॥ अपने द्रव्यको इसने मेरा चुराया है यह: योजना-स्वामिना- आगमेन उपभोगेन राजाको निवेदन किये विना अभिमान आदिसे नष्टं भाव्यं (साध्यं ) अतः अन्यथा तेन अ- चौर आदिसे ग्रहण करता है वह छानो विभाविते सति तस्य (धनस्य) पंचबंधः (९६) पण दंड देनेके योग है क्योंकि दमः राज्ञे देयः नाष्टिकणति शेष:- यह चोरके छिपानेसे दुष्ट है ॥ १७२ ।। तात्पर्या-आगम (रिक्थक्रय आदि) शौल्किकै स्थानपालनिष्टापहतमाहृतं । से उपभोगसे अर्थात् मेरा यह द्रव्य है वह अक्सिंवत्सरात्स्वामीहरेतपरतोनृपः १७३ इस प्रकार नष्ट हुआ वा चुराया है इनको धनका स्वामी सिद्ध कर-इससे अन्यथा पद-शोल्किकः ३ स्थानपालैः ३ वाई- अर्थात् वह धनका स्वामी सिद्ध न करसके नष्टापहतं २ आहृतं २ अर्वाक् २ संवत्स- तो नष्ट हुये व्यका पांचवां भाग गजाको रात् ५ स्वामी १ हरेत क्रि-परतः: नृपः ॥ नाष्टिक दे-यहां यह क्रम समझना कि पहि- योजना-शौल्किकैः वा स्थानपालः आ- ला स्वामी नष्ट हुये द्रव्यको अपना सिद्ध हतं नष्टापहृतं धनं संवत्सरात् अर्वात कर-फिर क्रेता चोरीके दूर करनेके लिये स्वामी होत परतः नृपः हरेत ॥ और मोलके लाभार्थ विक्रेताको लावे-यदि तात्पर्यार्थ-अब राजपुरुषोंके लाये व्यके न लासके तो अपने दोषकी निवृत्तिके विषयमें कहते हैं-जय शुल्क ( महसूल) के लिये क्रय (खरीदना )को शुद्धकरके । अधिकारी वा स्थानके रखवाले नष्ट हुये उस द्रव्यको नाष्टिकके अर्पण करदे॥ वा चुराये द्रव्यको राजाके समीप लावें वे यदि भावार्थ-धनका स्वामी आगम वा उपभो- वर्षदिनसे पहिले लाये होयतो उस द्रव्यको नाष्टिक ही प्राप्त होता है वर्षसे पीछे मिला १ अनुपस्थापयन्मूल क्रय याप्यविशोषयन् । य- होय तो राजा ग्रहण करे-और अपने पुरुषोंके पामियोगं धनिने धन दाप्यो दर्म च सः । लाये द्रव्यको जनके समूहमें उद्घोषण (दें-
व्यवहाराध्याय स्वामिविक्रयप्रकरण ११
(३२५)
डोरेसे प्रसिद्धि )करके उस व्यका वर्षदिन भावार्थ-शुल्कवाले वा स्थानके पाल (चौ.
पर्यंत राजा रक्षा करै-सोई गौतमैने कहा है कीदार ) इनका लाया जो नष्ट और चुराया
कि नष्ट है स्वामी जिसका ऐसे धनको द्रव्य वर्ष दिनसे पहिले मिले उसको स्वामी
प्राप्तहोकर राजाको निवेदन करें और राजा । ग्रहण करे और वर्षदिनके पीछे राजा ग्रहण
वर्षदिनतक उसकी रक्षाकरे जो मनुनें यह करले ॥ १७३ ॥
दूसरी विधि कही है कि (अ.८ श्लोक ३०) पणानेकशफेदयाच्चतुरःपंचमानुपे
नष्ट (अज्ञात) है स्वामी जिसका ऐसे द्रव्य- महिपोष्ट्रगवांद्वौद्रौपादपादमजाविक १७४
को राजा तीन वर्षतक रक्खे तीनवर्षप्ते प.
हिले स्वामी आजाय तो वह ले और परै
पद-पणान २ एकशफे ७ दद्यात् कि-
राजा ग्रहण करे वह वेदुपाठी और सदा-द्वौ २ पादं २ पदं २ अजाविक ७ ॥
चतुरः २ पंचरमानुपे७ महिषोष्ट्रगवां ६ द्वौ २
चारी ब्राह्मणके धनमें है-और रक्षाके निमित्त
छठे भागका ग्रहण करनाभी मनुने ही कहा पंच-महिषोष्टगवां दो-दो अजाविके , पार्द
योजना-एकशफे चतुरः पातु मानुषे
है (अ. ८ श्लोक. ३३) कि नष्टहुआ मिला
जो द्रव्य है उसमें से सत्पुरुषोंके धर्मका पादं दद्यात् ॥
ताभावार्थ-अश्व आदि एक शफ
ज्ञाता राजा छठा दशवां वा बारहवां भाग - ( खुर )वाले नष्ट हुये मिले तो उनकी
हण करे-इन भोगोंका लेना राजाको क्रमसे
रक्षाके निमित्त राजाको चार पण दे-मनुष्य
तीसरे दूसरे पहिले वर्षमें समझना-इसको
जातिका द्रव्य होय तो पांच पण-अजा
.विस्तारसे पहिले कह आये ॥
और भेडके विषय प्रत्येक पणका पाद-
१ प्रणष्टस्वामिकमधिगम्य राज्ञे प्रत्यर्विव्याप्य (चौथाई भाग ) दे-महिष (भैसा) ऊंट
संवरसर राज्ञा रक्ष्यम् ।
गो होय तो प्रत्येक दो दो पण रक्षाके नि-
२ प्रणटस्वामिक द्रव्य गजा व्यब्दं निधापयेत् । मित्त राजाको दे-यद्यपि यहां अजाविक यह
'अर्वाच्यब्दाद्धरेत्स्वामी परतो मृपतिहरेत् । समासभी है तथापि पादं पादं इस वीप्सा
३ आददीताथ पमार्ग प्रणयाधिगतान्नृपः । दशम (दोवार पढना )से केवल प्रत्येकमें संबंध
द्वादर्श वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ।
जाना जाता है || १७४ ॥
.
इत्यस्वामिविक्रयप्रकरणम् ॥१३॥
(३२६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ! अथ दत्तापदानिकप्रकरणम् १२ रॉमें जानना उनमें देय वह है जो अनिषिद्ध दानक्रियाके योग्य हो-अदेय वह है जो स्वकुटुंबाविरोधेनदेयंदारसुताहते 1) अपना स्व (धन) न हो वा निषिद्ध होनसे मान्वयेसतिसर्वस्वंयच्चान्यस्मैप्रतिश्रुतम् ॥ दानके अयोग्य हो-जो सावधानीमें दिया लोटानेके अयोग्य हो वह दत्त कहाता है-- पद-स्वं १ कुटुंबाविरोधेन ३ देयम् १ अदत्त वह है जो लौटाने के योग्य हो इन दारसुतात् ५ ऋतेऽ-न-अन्वये ७ सति ७ सबका संक्षेपसे निरूपण करते हैं- सर्वस्वं १ यत् १ - अन्यस्मै ४ अपना स्व (धन) कुटुंबके अविरोधसे प्रतिश्रुतम् ॥ अर्थात् कुटुंबके पालनसे शेप जितना हो योजना-कुटुंबाविरोधेन दारसुतात् ऋते वह देय ( देनेयोग्य ) है सोई मनु ( अ५८ स्व देयम्-अन्वये सति सर्वस्वं चपुनः यत् श्लो० ३५)में कुटुंबका पालन आवश्यक अन्यस्मै प्रतिश्रुतम् तत् न देयम् ॥ कहाँ है कि वृद्ध माता पिता-साध्वी भार्या- 'तात्पर्यार्थ-अब शास्त्रोक्त मार्गद्वपवाले बालक पुत्र-इनका सोभी अकार्य करके दत्तानपाकर्म और दत्ताप्रदानिक नामके | पालन कर अर्थात् निंदित कर्मसेभी आ- दानरूप व्यवहारके पदको कहते हैं-उसका जीविका करके इनका पालन कर यह मनुनें स्वरूप नारदनें कहा कि जो कहा है कुटुम्बके विरोधको न करके इससे असम्यक (कुरीति )से द्रव्यको देकर फिर एक प्रकारका अदेय दिखाया और स्वं ग्रहण किया चाहे वह दत्ताप्रदानिक नाम दद्यात् (अपने द्रव्यको दे ) इससे जो व्यवहारका पद हे-अर्थात् शास्त्रोक्तसे अपने स्व नहीं ऐसे अन्वाहित याचित आधि भिन्न मार्गसे द्रव्यको देकर फिर ग्रहण साधारण निक्षेप इन पांचोंको व्यतिरेकसे करनेकी इच्छा जिस विवादके मध्यमें हो। अदेय दिखाया और जो नारदने आठ वह दिये हुयेकाहै आप्रदान (फिर लो- प्रकारका अदय कहा है कि अन्वाहित टाना) जिसमें दत्ताप्रदानिक व्यवहारका याचित आघि साधारण निक्षेप पुन स्त्री पद है और उसका प्रतिपक्षी वह दत्तानपा- सर्वस्व कठिनभी आपत्तिमें वर्तमान देहधा- कर्म व्यवहारका पद अर्थात् हुआ जो शा- रीको ये सात और आठमां वह जो दूसरेको स्त्रोक्त मार्गसे दिया हो-और दिये हुयेका देना कर रक्खा हो आन्वाोंने ये आठ पुनः आदान (ग्रहण )को इच्छा जिस अदेय कुहे हैं यह नारदका वचन सब अदे- विवादमें न हो-वह दत्तानपाकर्म कहाता यांकी गिनतीक अभिप्रायसे है कुछ स्वत्वा- है और वह देय (देनेयोग्य ) अदेय ( देने- भावके अभिप्रायसे नही क्योंकि पुत्र स्त्री अयोग्य ) आदि भेदसे चार प्रकारका है- सर्वस्व और प्रतिश्रुत इनमें स्वत्व है अन्वा- सोई नारदमें कहा है कि देय-अदेय-दत्त अदत्त-यह चार प्रकारका दानमार्ग व्यवहा- अप्यकार्यशतं कृत्वा भवव्या मनुरवीत् । १ वृद्धौ च मातापितरौ साध्वी भार्या सुतः शिशुः । १ दया द्रव्यमसम्यग्यः पुनरादातुमिच्छति । २ अन्वाहित याचितकमाधिः साधारण व यत् । दत्ताप्रदानिक नाम व्याहारपदं हि बत् ।। निक्षेपः पुत्रदारांश्च सर्वस्वं चान्वपे सति ॥आपस्वपिच २ अय देपमदे च दत्त वाईत्तमेवव । व्यवहारेषु | कटान वर्तमानेन देहिना । अदेपान्याहुरावार्य विश्यो दानमार्गशतुर्दिछ। यचान्परम प्रतिश्रुतं ।
व्यवहाराध्याय दत्ताप्रदानिकप्रकरण १२ (३२७) हित आदिका स्वरूप पहिलेही विस्तारसे | शसेही प्रतिग्रह ले क्योंकि अपने आए कह आये-स्वको दे इस पूर्वोक्त वचनसे स्थावर धनको सुवर्ण आदिके समान दि- स्त्री और पुत्रभी स्व हैं उनकाभी दान पाया | खाय नहीं सकता- और देनेयोग्य और उसका निषेध कहते हैं कि स्त्री और पुत्रके प्रतिश्रुत अर्थात् धर्मके अर्थ जो द्रव्य जि- विना स्वको दे स्त्री पुत्रको न दे-ततेही सको देना कहाहो वह उसको देय (देने- पुत्र पोत्र वंशमें होयतो सर्वस्व (सब धन) | योग्य )ही है यदि वह प्रतिग्रह लेनेवाला को नदे क्योंकि यह स्मृति है कि पुत्रोंकी अपने धर्ममें स्थित रहे-यदि धर्मसे डिग उत्पत्ति और विवाह करके उनकी जीवि- | जायतो फिर न दे क्योंकि गोतमकी यह काका प्रबंध करे तसेही अन्यको देनेकी स्मृति है कि प्रतिज्ञा करकेभी अधर्मसे यु- प्रतिज्ञा किए हुए सुवर्ण आदि द्रव्यको क्तको न दे-और न्यायके मार्गसे जो दिया अन्यको न दे॥ हो उस सात प्रकारकेभी दिये धनका अप- भावार्थ-अपने कुटुंबकी पालनासे बचा | हरण ( फिर लेना) न करे किंतु बेसाही धन स्त्री और पुत्रको छोडकर देने माने और जो अन्यायसे दिया हो उस सो- योग्य है अर्थात् स्त्री पुत्रको किसीको न दे लह प्रकारकेभी अदत्त धनको लौटा ले यह और धन देने योग्य है-और अपना वंश | अर्थात् कही गयी-नारंदने सात प्रकारके होयतो सर्वस्वका दान न करें और अन्यको दत्त और सोलह प्रकारके अदत्तको देनेकी प्रतिज्ञा किए धनको अन्यको कहकर दत्त और अदत्तका स्वरूप न दे ॥ १७५॥ नारदमुनिनेही विवेचनासे कहा है कि क्रीतका जो मोल दियाहो-जिसनें अपना प्रतिग्रह प्रकाशास्यात्स्थावरस्यविशेषतः । काम किया उसको भृति (नोकरी ) देना- देयंप्रतिश्रुतंचैवदत्वानापहरेत्पुनः॥१७६॥ तुष्टि (प्रसन्नता से बंदीजन चारण आदिको पद-प्रतिग्रहः १ प्रकाशः १ स्यात कि- जो दियाहो-स्नेहसे दुहिता पुत्र आदिको स्थावरस्य ६-विशेषतः- देयं २ प्रतिश्रुतं जो दियाहो-प्रत्युपकारसे अर्थात् अपने २ चऽ- एव:- दत्वा-ना-अपहरेत् क्रि- उपकारीको जो दियाहो-स्त्रीशुल्क अर्थाद विवाहके लिये कन्याकी ज्ञातिके मनुष्योंको योजना-सर्वस्य प्रतिग्रहः विशेषतः स्था- जो दियाहो-जो अनुग्रह (अदृष्ट )के लिये वरस्य प्रतिग्रहः प्रकाशः स्यात् देयं चपुनः दियाहो-तो यह सात प्रकारकाभी दत्त प्रतिश्रुतं दत्वा पुनः न अपहरेत॥ १ प्रतिश्रुत्याप्यधर्मसंगुक्ताय न दद्यात् । तात्पर्यार्थ-स्त्रीपुत्रसे भिन्न देयको कहकर २ दतं सप्तविध प्रोक्तमदत्तं पाहशामकम् । प्रसंगसे अब यह कहते हैं कि अदेय धन- ३ पण्यमूल्य भृतिस्तुट्या महात्प्रत्युपकारतः।छी- का ग्रहण प्रतिग्रह करनेवाला प्रकाश शुल्कानुग्रहार्य च दत्त दानविदो विदुः ॥ अदत्त तु मय- (सपके सामने) कर सब धनका प्रतिग्रह झोपशोकवेदरुगन्वितैः । तयोत्कोचारीहामव्यत्यास- विवादको निवृत्तिके लिये प्रकाश होकर चलयोगतः ॥ बालमूटस्वतवार्तमत्तोन्मत्तापवजितं । करे और स्थावर धनकातो विशेषकर मका- कर्मा मभेद फर्मेति प्रतिलाभेन च पत् । अपाचे पात्रमित्युने कार्य वा धर्मसंयुते । यद्दत्त स्यादविज्ञाना. पुत्रानुरपाय संस्कृत्य वृत्ति ची प्रकल्पयेत् । दत्तमिति तर स्मृतम् ॥ पुनः5-1 .
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
(दिया ) धन लौटानेके योग्य नही है- कात्यायनको स्मृति है कि स्वस्थ वा रोगीने
भयसे जो बंदिग्राह आदिको दियाहो- ( धर्मके लिये जिसकी प्रतिज्ञा करली हो
क्रोधसे जो पुत्र आदिकेसंग वैरकी निवृ- | उसको विनादिये मरजायतो उसके पुनसे
तिके लिये अन्यको दियाहो पुत्र वियोग राजा दिवावे इसमें संशय नहीं-तैसेही यह
आदि शोकके निमित्त जो दियाहो-उत्को- संक्षिप्त अर्थवाला वचैन सब विवादोंमें
चसे कार्यमें प्रतिबंध (रोक )की निवृत्तिके | साधारण है (मनु अवश्लो.१६५) कि योग
लिये जो राज्यके अधिकारियोंको दियाहो- | आधमन (गिरवी) विक्रीत (वेचा) योग
परिहास (हंसी )से जो दियाहो-एक अपने | दान प्रतिग्रह इनमें जिसकी उपाधि (सरंत)
द्रव्यको अन्यको दे और अन्यभी अपना देखें उस सबको निवृत्त करदे अर्थात् जिस
द्रव्य उसकादे इसप्रकार दानके व्यत्यास | उपाधिसे विक्रय दान प्रतिग्रह कियेहों उस
(बदला )से जो दियाहो छलके योगसे | उपाधिके वीतनेपर उन क्रय आदिको निवृ-
जैसे सौमुद्रिकाके दानकी प्रतिज्ञाकरके |त्त करदे (लोटादे ) जो मनुष्य सोलह
और उन सको सहस्र कहकरदे-चालक प्रकारकभी अदत्त धनको ग्रहण करता है।
(सोलहवर्ष से कम ) जो दियाहो-लोक- | और जो देता है उनको दंड नारदनें कह
वादक न जाननेवाले बालकनें जो दियाहो- है कि जो लोभसे अदत्तको ग्रहण करता
अस्वतंत्र (पुत्र दास आदि )कादिया-आत | है और जो अदेयको देता है वह अदेयका
(रोगी)का दिया-जो मत्तने दिया अर्थात् | दाता और प्रतिग्रह लेनेवाला दंडदेने
मदिरा आदि पदार्थ वा वातके उन्मादसे | योग्य है।
उन्मत्तनें जो दियाहो-और प्रतिलाभ(यह मेप भावार्य-प्रतिग्रहको और विशेषकर स्था-
काम करेगा)की इच्छासे जो दियाहोचतुर्वे-वरके प्रतिग्रहको प्रकाश (सबके सामने)
दी नही और अपनेको चतुर्वेदी कह उसको | रीतिसे ले-जो जिसको देना कियाहो वह
जो दियाहो-जो यज्ञ करूंगा यह कहकर उसको देना-और देकर फिर न हरे (नले)।।
धनको मांगकर गत आदिमें लगाये उसको
स्वस्येनासेन वा दत्तं यावितं धर्मकारणात भद.
जो दियाहो-यह सोलह प्रकारकाभी दत्त
अदत्त कहाता है क्योंकि यह सब प्रत्या-
त्वा तु मृते दाप्यस्तत्सुतो नात्र संशयः ।
२ योगाघमनविकीत योगदानप्रतिप्रद । यस्य चा-
हरण (लौटाना ) के योग्य है-रोगीके गुपपि पश्येत्तत्सर्वे विनिवर्तयेत् ।
दियेको जो भदत्त कहना है वह धर्म-
३ ग्रहास्पदत्तं यो लोभायवादेयं प्रयच्छति । भदे-
कायंसे भिन्न विषयों है क्योंकि यह । यदायको दध्यस्तया दत्तप्रतीच्छकः।
इति दत्ताप्रदानिक नाम प्रकरणम् ॥ १२॥
व्यवहाराध्याय कीतानुशयप्रकरण १३ (३२९) अथ क्रीतानुशयप्रकरणम् १३ वीहि आदि बीज-अय (लोहा ) वाहा दर्शकपंचसप्ताहमासव्यहार्द्धमासिकम् । (दासी दोहा ( महिषीआदि ) पुरुष इन (बैलआदि) रत्न ( मोतीमूंगाआदि ) स्त्री बीजायोवाहारत्नस्त्रीदोह्यपुंसापरीक्षणम् ॥ बोजआदिका क्रमसे दश दिन-एक दिन- पद-दशैकपंचसप्ताहमास व्यहार्द्धमासिक पांच दिन-सात दिन-मास-तीन दिन- १बीजायोवाह्यरत्नस्त्रीदोह्यापुंसां ६ परीक्षणं १॥ अर्द्धमास-(पक्ष) क्रमसे परीक्षाका काल जानना-यदि बीजआदिकी परीक्षा करनेसे योजना- बीजायोवाह्यरत्नस्त्रीदाह्यपुंसां- दशैकपंचसप्ताहमासव्यहार्द्धमासिक परी- दुष्टताका सदेह होयतो दशदिन आदिके विषयही क्रयकी निवृत्ति हो सकती है उस- क्षणं ज्ञेयम् ॥ से परे नही यही इस उपदेशताका प्रयोजन तात्पर्याय-इसके अनंतर कोतानुशयको है-जोतो मर्नु (अ०९ श्लो० २२२)का यह व- कहते हैं उसका स्वरूप नारंदने कहा है कि चन है कि मोल लेकर वा देकर जिसको क्रेता (लेनेवाला ) मोलसे पण्य ( विकती अनुशय (संदेह ) होय वह दशदिनके वस्तु)को मोल लेकर स्वीकार न करे | भीतर उस व्यको देदे और लेले यह म- (नले ) वह क्रीतानुशय नाम विवादका पद नुका वचन पूर्वोक्त लोहआदिसे भिन्न भोग- कदाता है उसमेंभी यह बात नारंदनेही कही नेयोग्य और नाशमान-घर खेत यान शय्या है जिस दिन जो पण्य मोल लियाहो वह आसन आदिके विषयमें है और यह पूर्वोक्त उसीदिन जीकात्यों फेरनेयोग्य है कि यदि | सब उसी वस्तुके विषय में है जो परीक्षा लेनेवाला मोलसे पण्यको खरीदकर उसको | करके न लीहो जो वस्तु परीक्षा करके फिर वह बुग क्रीतकरा माने तो उसीदिन वि- न लोटाऊंगा यह प्रतिज्ञा करके लाहो वह ऋप करनेवालेको जोकात्यों देदे-द्वितीय विक्रेताको फिर न लोटानी-सोई कहाँ है आदि दिनके विषे लोटानेमें विशेष नारंदनेही | कि पहिले क्रेता विकती हुई वस्तुकी गुण- कहा है-यदि-केता दूसरे दिन देयतो मूल- ( दोषसे परीक्षा स्वयं करे यदि परीक्षा करके का तीसमां भाग विक्रेताको दे-और तीसरे मोल ली होयतो फिर विक्रेताकी नहीं होती- दिन उससे दुनादे उससे परे वस्तु क्रेताकी भावार्थ-बीजकी पपेक्षाके दश-लोहेका होती है अर्थात नही लोटाई जाती अर्थात् एक-बैलआदिका पांच-और रत्नके सात तीसरे दिनसे पीछे अनुशयन करना, यहभी- दिन-दासीका एक मास-भैसके तीन दिन- बीजसे भिन्न उपभोगकी नाश होनेयोग्य व-दासका एक पक्ष-परीक्षाका काल क्रमसे स्तुके विषे समझना-बीज आदिके लेने में जानना ॥ १७७ ॥ दूसरीही लोटानेकी विधि कहते हैं-कि अग्नौसुवर्णमक्षीणरजतेद्विपलंशते । १ क्रीत्वा मूल्येन यत्पण्य क्रेता न बहुमन्यते । अष्टोत्रपुगिसीसेचतानेपंचदशायसि १८३ श्रीतानुशय इत्येतद्विवारपदमुच्यते ॥ २ क्रीत्वा मूल्येन यत्पण्य टुटफ्रीतं मन्यते क्रयो। १ मीत्वा वित्रीय वा किंचिद्यस्येहानुभयो भवेत विक्रेतुः प्रतिदेय तत्तस्मिन्नेवायविक्षत ॥ सौन्तर्दशाहातस्य दद्याचैवाददीतच । २. द्वितीयेदि ददरता मूल्यानिंशांशमाहेत् । २ केतापण्य परीक्षेत प्राक्स्वय गुणदोषतः । परी- दिगुणं तु हतीयेद्रि पातः फ्रेतुरेव तत् ॥ क्ष्याभिमत फ्रीत विऋतुर्न भवेयुनः ।
(३३२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथाभ्युपेत्याशुश्रूपाप्रकरणम् ॥ शिष्य-अंतेवासीभृतक-चोथा अधिकर्मकृत्ये बलाबासीकृत्तश्चौरीविक्रीतश्चापिमुच्यते । कहाते हैं- बुद्धिमानोंने इन सबको सामान्य कर्म कर जानने और गृहदाप्त जातआदि दास स्वामीप्राणप्रदभिक्तत्यागात्तानेकयादपि रीतिसे अस्वतंत्रता कहीहै- और जातिकर्म पद- बलात् ५ दासीकृतः १ चौरेः ३ | करना कहाहै और विशेषकर इनकी वृत्ति विक्रीतः १ च- अपि:- मुच्यते क्रि- कर्मप्सेही कहीहै- शुभ और अशुभ भेदसे स्वामी १ प्राणप्रदः १ भक्तत्यागात् ५) दो प्रकारका कर्म है दासका कर्म अशुभ है तन्निष्क्रयात् ५ अपि-॥ और कर्मकरोंका शुभ कहाहै गृहका द्वार योजना-बलात् दासीकृतः चपुनः चौरैः अशुद्धस्थान-स्थ्या-अवस्कर इनका शोधन विक्रीतः मुच्यते स्वामी प्राणप्रदः भक्तत्या- | गुप्तअंगका स्पर्श-उच्छिष्ट-विष्ठा-मूत्र इनका गात्- तत् निष्क्रयादपि मुच्यते ॥ तात्पर्यार्थ अब अभ्युपेत्य अशुश्रूषा ग्रहण और फेंकना और स्वामीकी इच्छानु- (स्वीकार करके सेवा न करना) नामका सार अंगोंकी मन लगाकर सेवा करनी यह विवादपद कहने का प्रारंभ करते हैं- उसका | सब अशुभ कर्म जानना- उनमें वेदविद्या स्वरूप नारद, कहाहै आज्ञा करनेको पढनेवालोंको शिष्य और शिल्प विद्या शुश्रूषा कहते हैं उसको स्वीकार करके | पटनेवालेको अन्तेवासी कहतेहैं- मोल लेकर पोछेसे जो संपादन नही करता वह अभ्यु- जो कर्म कर उसे भृतक-और कर्मकर- पेत्य अशुश्रूषा नामकविवाद पद कहाताद नेवालोंका जो अधिष्ठाता ( जमादार) उसे शुश्रूषा कर्नेवाला पांच प्रकारका होताहै अधिकर्मकृत् कहते हैं-उच्छिष्ट फेंकनेका उनमें पहिले चार कर्मकर कहातेहैं- और जो गठ्ठा उसे अशुचिस्थान-और गृहके वे शुभकर्मके करनेवाले होतेहैं-और गृह- मार्जन आदिको धूलि जहां फैंकी जाय उसे जात आदि दास १५ पदह प्रकारके होतेहैं अवस्कर कहते हैं त्यागको उजल कहते और वे गृहका द्वार अशुद्धस्थान रथ्या हैं-भृतक तीन प्रकारका होता हे-सोई क- (गली) अवस्कर ( मलमूत्र ) इनके शोध- । हा है कि आयुवको जो धारै उसे उत्तम न आदि अशुभ कर्म करनेवाले होते हैं- और खेतीका कर्ता मध्यम और भारले सो यह सब नारदर्ने स्पष्ट कहाहै- कि जानेवाला अधम ऐसे तीन प्रकारका भृत- १ अभ्युपेत्य तु शुश्रूषां यस्ता न प्रतिपद्यते। अशु-क होता है-और दास १५ पंद्रह प्रकारका श्रूपायुपत्येतद्विवादपदमुच्यते ॥ होता है-गृहनात-क्रीत-लब्ध-दायागत- २ नाथूपका पंचरिधः शान्ने दृष्टो मनीषिभिः।चतु. विधःकर्मफरस्तेषां दासाग्निपंचकाः । शिष्यान्तवासि अनाकालभृत्-आहित- ऋणमोक्षित-युद्ध तयाथर्पस्त्वधिफर्मयय। एते कर्मफरा शेया दासास्तु प्राप्त-पणमें जीता-मतेपहूं यह कह कर एहजातयः ॥ सामान्यमस्वतंत्रत्वमामाहुर्मनीषिणः ।। १ उत्तमस्त्वायुधी योत्र मध्यमातु कपीवलाय. जानिफर्मफरस्तूतो विशेषो वृत्तिरेव चाफर्मापिदिति- मो भारवाही स्थादिरपेव विविधो भृतः । पोपममं शुभमेवप। माम दासकमोक्तः शुभं कर्म २ हजात स्तथा फ्रीतो लग्यो दायादुपागतः अना- ता स्मृन । गरद्वाररागिरधानरप्यावरकरशोधन ॥ कालभृतस्तरदाहितः सामिना ययः॥ मोक्षितो महस. मारपानीभिशीमूत्रप्रहणोनन । इच्छतः वर्णाशुदप्राप्तः पर्गेजितः। तमित्युपगतः प्रत्रग्यार. गामिनयागेरपरपानमयतित: । भशुभ फर्म विज्ञये सितः छतः । भत्तदासय दिशेयस्तथैर परवाहतः विक्रेता पारमनः शाने दामाः पंचशा स्मृताः।। गुममन्याता पर।
व्यवहाराध्याय अभ्युपेत्याशुश्रूषामकरण १४ आया-प्रयन्यावसित-कृत-भक्तदास-बड- वेतनादान प्रकरणमें कहेंगे कि जो नि- वाहत-आत्मविक्रता-इनमें गृहकी दासीम | तना काम करे उतनाही उसको वेतन दे- जो पैदा होय उसे गृहजात-मोल लियेको बलके जोरसे जो दास किया हो और ची- फ्रीत-प्रतिरहसे मिलेको लब्ध-दायसे रोने चुराकर जो चाहो और अपिशब्दप्से मिले-अर्थात् पिता आदिके दासको दाया- आधि (गिरवी) किया और दत्त लेना इतने गत कहते हैं-दुर्भिक्षमें दास बनानकेलिये | दास-दासपनेसे छुट सकते हैं यदि स्वामी मासे जिसको रक्षाकी होवह अकालभृत् छोडे तो राजा छुडादे-सोई नारदने कहा स्वामीनें धन देकर जिसे आधिकर लिया है कि चोरोंने चुप करवचा और पलसे दास हो उसे आहित-ऋण देकर जो दासभाव- जो पनायाहो-उनको राजा छुडादे क्योंकि को प्राप्त किया हो वह ऋणदास संग्राममें उनमें दासभाव नहीं होता, चौर और व्या- जो जीतकर ग्रहण हो वह युद्धप्राप्त-यादि घोंने गेके स्वामीके प्राणोंकी जो रक्षा करे इस विवादमें जो में पराजित होगा तो तेग यहभी छुडाने योग्य हैं यह दासनिवृत्तिका दास बनजाऊंगा-इस प्रतिज्ञा करके जो कारण सय दासोंके लिये समान है क्योंकि आमें जीता हो वह पणेजित-और-में तेग नारदकी यह स्मृति है कि जो कोई इन दास रहूंगा यहकहकर जो आया हो वह दासोंमें स्वामीको प्राणसंशयसे छुटावे वह तवाह उपगत कहा है-संन्याससे जो पतित दो जाय उसे प्रव्रज्यावसित-इतने कालप- दासभावसे छुटता है और पुत्रके भागको प्राप्त होता है-भक्तदास आदिकोंका प्राति- त मेंदास रहूंगा यह स्वीकार करके जो रहाहो स्विक ( पृथकर भी मोक्षका कारण कहते वह कृत-सब काल भोजनके लिये जो दास हैं कि अकालमें पाला और भक्तदास ये हुआ हो वह भक्तदास-बडवा गृहदासीको दोनों भक्तके त्याग ( देना )से अर्थात् कहते हैं लोभसे उसको विवादकर जो दासभावसे लेकर जितना स्वामीका द्रव्य दास बनाही बद बडवाहत-जो अपनी आ- त्माको वेचदे वह आत्मविक्रेता-होता है- और ऋणदास ये उसके निष्क्रय (मोल ) खायाहो उतना देकर छुटते हैं और आहित इस प्रकार पंद्रह प्रकारके दास होते हैं जो देनसे अर्थात् जितना धन लेकर स्वामीनें मनुनें (अ०८ श्लो० १३०) सात प्रकार- आधि कियाहो और . उत्तमर्णको जितना को कहा है कि-ध्वजाहत-(युद्धमें जीता) द्रव्य लेकर ऋणसे छुटायाहो-वृद्धिसहित भक्तदास गृहनात फ्रीत दलिम-पत्रिक उतने व्यके देनेसे छुटते है-नारदने वि- दण्डदास ये सात दासयोनि कहाते हैं-वह यो यावत्कुरुते कर्म तावत्तस्य तु वेतनं । बचन साताको दास कहनके लिये है कुछ २ चीरापहृतविक्रीता येच दासीरता बलात।राज्ञा- गिनती के लिये नही-जन शिष्य अन्तवारी मौचयितव्यास्तै दास्य तेषु दि नेप्यते । भृतक अधिकर्मकर दासोक मध्यमें शिष्य- ३ यो वैषां स्वामिन कश्चिन्मोवयेरमाणसशयात् । की वृत्ति पहिलेही यह कही है कि गुरुके दासत्वात्स विमुच्येत पुत्रभाग लभेत च । बुलानेसे पर्दे और जो मिले वह गुरुके नि- ४ अनाकालभृतो दास्यान्मुच्यते गोयुग ददत वेदन करे-और अधिकर्म भृत्योंकी वृत्ति समक्षित यदुर्भिक्ष्ये न तच्छुध्येत कर्मणाभक्तस्योक्षेप वजाहतो भत्तदासटइनः फ्रीतदधिमौ। पत्रि- णात्सद्यो भक्तदासः प्रमुच्यते।माहितोपिधनं दत्त्वा स्वा- को दहदामश्च सहते दासयोनयः॥ मी यद्येनमुदोत् । ऋणं तु सौदय दत्वा ऋणी दास्यात्म २ आहूतश्चाप्यायीत लन्ध चास्मै निवेदयेत् । मुच्यते ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथसंविध्यतिक्रमप्रकरणम् १५ स्मृतिमें कहा वर्ण और आश्रमोंका जो धर्म उसका प्रचार करो। राजाकृत्वापुरेस्थानं ब्राह्मणान्यस्यतत्रतु । भावार्थ-राजा अपने दुर्ग (किला )में पियंवृत्तिमयात्स्वधर्मःपाल्यतामिति ॥ स्थान बनाकर उसमें तीन वेदोंके ज्ञाता और जीविकासे युक्त ब्राह्मणोंको रखकर पद-राजा २ कृत्वाऽ-पुरे ७ स्थानं २ उनको यह कहै कि आप अपने धर्मको ब्राह्मणान् २ न्यस्य-तत्र-तु:-विद्यं २ करें ॥ १८५॥ वृत्तिमत् १ ब्रूयात् क्रि-स्वधर्मः १ पा- निजधर्माविरोधेनयस्तुसामयिकोभवेत् । ल्यतां कि-इति:- सोपियत्नेनसंरक्ष्योधर्मोराजकृतश्चयः१८६ योजना-राजा पुरे स्थानं कृत्वा तुपुनः त ब्राह्मणान् न्यस्य-तद् ब्राह्मणवातं विद्यु पद-निजधर्माविरोधेन ३ यः १ तु:- वृत्तिमत् कृत्वा-स्वधर्मः पाल्यतां इति तान् | सामयिकः१ भवेत् क्रि-सः १ अपिऽ-यले- प्रति श्रूयात्-(प्राधयेत् ॥ न ३ संरक्ष्यः १ धर्मः १ राजकृतः १ चा- यः१॥ तात्पर्यार्थ -अब संवितके व्यतिक्रम योजना-तुपुनः यः निजधर्माविरोधेन (लंघन )को कहते हैं उसका लक्षण नार- | सामयिकः भवेत् चपुनः राजकृतः यः धर्मः दने निषधके द्वारा दिखाया है कि पाखंडी | अस्ति सः अपि यत्नेन संरक्ष्यः।। (वेदमार्गके विरोधी व्यापारके कती) नेगम तारप भावार्थ-इस प्रकार नियुक्त हुये (वेदके अनुकूल ) आदिपदसे वेदत्रयी- ब्राह्मणोंके कर्मको कहते हैं-वेद और स्मृ के ज्ञाता-इनकी जो अपने २ स्वरूपमें स्थि- | तिमें कहा धर्म जिससे नष्ट नहीं एसा समय- ति उसको समय कहते हैं समयका जोअन से पैदा हुआ जो गौओंका चारण जल देव- पाकर्म(दूरन करना वह विवादका पद कहाता मंदिरकी रक्षारूप धर्म-और राजाका कि- है इस प्रकार पारिभाषिक धर्मसे जो व्यव- या जो धर्म वहभी अपने धर्मके अविरोधसे स्था उसको समय कहते हैं उसके अनपा- अर्थात् पथिकको इतना भोजन ( सदावर्त) कर्म (नलंघना ) अर्थात समयकी पालना देना हमारे शत्रुओंके मंडलमें घोडे आदि न करना उससे जो डिगना वह विवादका पद भेजने इत्यादि जो राजाका कहा यलेसे, होता है- रक्षा करने योग्य है ॥ १८६॥ राजा अपने दुर्ग आदि पुरमें धवल गणद्रव्यहरेद्यस्तुसंविदंलंपयेच्चयः (सपेद ) घर आदि स्थानको बनाकर सर्वस्वहरणंकृत्वातंराष्ट्राद्विमवासयेत् १८७ और उस परमें ब्राह्मणों को नियत करके और टन ब्राह्मणीक समूहको विद्य (तीन- पद-गणद्रव्यं २ हरेत् किन्यः १ तु:- बदास युक्त ) और वृत्तिमत् ( बहुत से सुव- । संविदं २ लंघयेत् क्रि-चा-यः १ सर्वस्वह- गं आदिकी जीविकासे युक्त ) करके उनके रणं २ कृत्वाइ-तं २ राष्ट्रात् ५ विप्रवासये- प्रति यह प्रार्थना करें कि आप श्रुति और त् कि- योजना-यः गणव्यं हरेत् चपुनः यः नगमान स्थिति: समय उच्यते । समय- संविदं लंघयेत् तं सर्वस्वहरणं कृत्वा राष्ट्रात विप्रवासयेत् ।। - एसनपा स्मृतम् ।
व्यवहाराध्याय संविधतिक्रमप्रकरण १५ तात्पर्यार्थ-समयके धर्मकी पालनाको क- | कर्तव्यं-तत्र यः विपरीतः स्यात् सः प्रथम हकर उसके लंघने में दोषको कहते हैं- दर्म दाप्यः भवेत्॥ जो मनुष्य प्राम आदि समूहरूप गणके तात्प भावार्य-समूहवालोंके मध्यमें जो द्रव्यको चुगता है और जो सेवित अर्थात् समूहके हितको कहैं उनके वचनको सब समूहको वा राजाकी नियत ( थापी) की करें अर्थात् समूहके अन्तर्गत मनुष्य हुयी मर्यादाका लंधन ( नमानना )करता है उसकेही अनुसार चलें-जो समूहक हित- उसके सब धनको अपहरण ( छीनना) | कारियोंके वचनका प्रतिवध (निषेध) करे करके अपने राष्ट्र (देश) से निकासदे- राजा उसको प्रथम साहस दंड दे॥१८॥ यह दंड अनुबंध (दावा )की अधिकतामें समूहकार्यायातान्कृतकार्यान्विसर्जयेत् । जानना-अनुबंध अल्प होयतो मनु (अ०८ सदानमानसत्कारैःपूजयित्वामहीपतिः । श्लो० २१२-२२०)के कहेदंडोंमेंसे निकासना चार सुवर्ण-छः निष्क-शतमान इन चारोंमें पद-समूहकार्ये ७ आयातान् २ कृत- जाति और शक्तिकी अपेक्षासे दंडकी कल्प- कार्यान् २ विसर्जयेत् क्रि-सः १ दानमान- ना करलेनी कि जो मनुष्य माम और दे | सत्कारः ३ पूजयित्वाऽ- महीपतिः ।। शके संघांके संग सत्यसे संविदको करके ..योजना-सः महीपतिः समूहकार्ये आया- लोभसे विसंवाद झगडा करता है उसको | तान् कृतकार्यान् दानमानसत्कारैः पूज- देशसे निकासदे और इस समयके व्यभि- यित्वा विसर्जयेत् ॥ चारीको निग्रह (केद) करके चारसुवर्ण तात्प भावार्य- समूहकी कार्यसिद्धिके छः निष्क और चांदीके शतमान (सोरुपये) / लिये जो अपने समीप आयेहों और उन्होंने दंदद।। अपना कार्य लिया होयतो दान मानसत्का- भावार्थ-जो मनुष्य समुदायके द्रव्यको रसे उनका पूजन करके वह राजा विसर्जन चुराता है और संविदको लंपता है उसके सब धनको छीनकर अपने देशमसे निका- | समूहकार्यप्रहितोयल्लभेततदर्पयेत् । सदे॥१८॥ एकादशगुणंदाप्योपद्यस्मैनार्पयेत्स्वयम्॥ कर्मव्यवचनंसर्वःसमूहहितवादिनाम् पद-समूहकार्यमहितः १ यत् २ लभेत यस्तत्रविपरीतःस्यात्सदाप्यामथमंदमम्।। क्रि-तत् २ अर्पयेत् क्रि-एकादशगुणम् २ पद-कर्तव्यं १ वचनं १ सर्वैः ३ समूह- दाप्यः १ यदि:- अस्मे ४ न:-अपयेत् कि- हितवादिनाम् ६ यः १ तत्र-विपरीतः १ स्वयम्-॥ स्यात् क्रि-सः१ दाप्यः१ प्रथमरदमम् २॥ योजना-समूहकार्यप्रहितः यत् लभेत योजना-समूहहितवादिनां वचनं सर्वेः तत् अर्पयेत् यदि असौ स्वयं न अर्पयेत् ताई एकादशगुणं दाप्यः (दंडनीयः) रा- शेति शेषः॥ १ यो प्रामदेशसंघानां कृत्वा सत्येन सविद ॥ विस- वदेनरो लोभात्तं राष्ट्रादिप्रवासयेत् ॥ निगृह्य दापयन तात्प भावार्थ-राजाके पास समूहके का- समययभिचारिणम् । चतुःसुवर्ण पणिक शतमानं यार्थ महाजनोंके भेजे हुयेको नो सुवर्ण वस्त्र आदि राजासे मिले-वह विनाही याच- करे ॥ १८९॥ च राजतं।
(३३८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । नाके महाजनोंको स्वयं निवेदन करदे, पद-श्रेणिनगमपाखंडिगणानाम् ६अपि निवेदन नकर तो राजा एकादश ११ गुना अयम्१ विधिः १ भेदम्२ चा- एषांनृपः१ दंड उसकोदे ॥१९॥ रक्षेत क्रि-पूर्ववृत्तिर च-पालयेत क्रि-॥ धर्मज्ञाःशुचयोलुब्धाभवेयुःकार्यचिंतकाः । योजना-श्रेणिनेगमपाखंडिगणानां अपि. कर्तव्यंवचनंतेषांसमूहहितवादिनाम् ।१९१ अयं विधिः शेयः-चपुनः एर्षा भेद नृपः पद-धर्मज्ञाः १शुचयः १ अलुब्धाः १भ- रक्षेत् चपुनः पूर्ववृत्तिं पालयेत् ।। वेयुः कि-कार्यचिंतकाः१ कर्तव्यम् १ वच- ता०भा० -एक पण्य ( व्यापार )से जो नम् १ तेषाम् ६ समूहहितवादिनाम् ६ ॥ जोवें वे श्रेणी-और वेदको जो आप्त योजना कार्यचिंतकाः धर्मज्ञाः शुचयः अलुब्धाः भवेयुः समूहहितवादिनां तेषां ( यथार्थवादी )का बनाया होनेसे प्रमाण वचनं इतरेः कर्तव्यम् ॥ मानें वे पाशुपत आदि नेगम-जो वेदको तात्प भावार्य-वेद और स्मृतिमें कहे प्रमाण न मानें ऐसे नाम सोगत आदि धर्मके ज्ञाता-बाह्य और भीतरसे शुद्ध- पाखंडी और एक आयुधसे युद्ध आदि धनके निर्लोभी-जो हौवे कार्योंके विचार | एक कर्मसे जो जीवें वे गण-होते हैं उन- कर्ता करने समूहके हितवादी जो वे उन- | कीभी यह पूर्वोक्तही विधि है ओर इन श्रेणी का वचन आदरसे सचमनुप्य मार्ने ॥१९१॥ आदिके भेद च धर्मव्यवस्थाकी राजा श्रेणिनेगमपाखंडिगणानामप्यविधिः । रक्षा करे और पूर्वोक्त जीविकाको नियत भेदचैपांनृपोरक्षेत्पूर्ववृत्तिंचपालयेत्।। १९२ करे ॥ १९२ ॥ इति संविध्यतिकमप्रकरणम् ॥ १५ ॥ .
व्यवहाराध्याय वेतनादानप्रकरण १६ (३३१) कर्मर त्यजन्१ • अथ वेतनादानप्रकरणम् १६ यथाशक्ति रक्षा करें क्योंकि न करेंगतो कृषि आदि न होसकेंगे॥ गृहीतवेतमाकर्मत्यजनद्विगुणमावहेत् । भावार्थ-वेतनको लेकर जो कर्म न करे अगृहीतेसमंदाप्योभृत्यरक्ष्यउपस्करः१९३ वह दूनी भृति स्वामीको दे यदि वेतन न पद-गृहीतवेतनः१ लिया होयतो भृतिक समान' द्रव्यदे-और द्विगुण२ आवहेत कि अगृहीते समर खेती आदिका जो उपस्कर उसकी रक्षा दाप्यः १ भृत्यैः ३ रक्ष्यः १ उपस्करः १॥ भृत्य करें॥ १९३ ॥ योजना-गृहीतवेतनः कर्म त्यजन् सन् दाप्यस्तुदशमंभागंवाणिज्यपशुसस्यतः । द्विगुणं (वेतनं) आवहेत-वेतने अगृहीते अनिश्चित्यभृतियस्तुकारयेत्समहीक्षिता ।। सति समं दाप्यः भृत्येः उपस्करः रक्ष्यः ।। पद-दाप्यः १ तुः-दशमंरभागर वाणि- तात्पर्य-अव वेतनके अनपाकर्म व्यव-ज्यपशुसत्यतःऽ-अनिश्चित्या- भृतिर यः१ हारपदका प्रस्ताव करते हैं उसका स्वरूप तुकारयेत् कि- सः१ महीक्षिता३ ।। नारद कहो है कि भृत्योंके वेतनके देने योजना-तुपुनः यः भृति अनिश्वित्य और न देनीकी विधिका क्रम जिसमें हो- भृत्यं कर्म कारयेत् सः महीक्षिता वाणिज्य- यह वेतनका अनपाकर्म व्यवहारका पद | पशुसस्यतः दशमं भाग दाभ्यः॥ कहाता है उसका निर्णय कहते हैं जो भृत्य तात्पर्यार्थ-जो स्वामी व्यापारी या गोमी वेतनको ग्रहण करके अपने अंगीकार वा क्षेत्रिक वेतनका निश्चय न करके मृत्य किए कर्मको न करे यह दूना वेतन स्वामी- काम करावे उस स्वामीसे व्यापार पशु को दे और जो वेतनको न लेकर स्वीकार और खेतसे जो पैदाहुआहो उसका दशर्मा किए कर्मको त्यागदे वह उतनेही येतनकोदे जितना ठहग्रहो दूना नदी अथवा पलसे भाग भृत्यको राजा दिलावे यहभी भी परिश्रमके विषय समझना यदि बहुत परि- स्वीकारकीहुई भृति उसपर करावे क्योंकि श्रम होपतो इस बृहस्पतिके वचनानुसार नारदका पचने है कि स्वीकार करके जो कर्म न कर उससे भूति (नोकरी ) देकर पांचम भागको प्रहण फेर-भोजन या समझना-दलके जोतनेवाला तीसरे वा पलसे कर्म करावे भूतिभी नारदनही कही को नो प्रहण कर यह सीरके पांवमें है कि काम करनेवाला स्वामी भृत्यको भागकोले ओर जो भोजन वख नले यह आदि मध्य अंतमें यह कर्मका घेतन फ्रमसे पदाए भन्नके तीसरे भागको ले-भोगन दे जो भृत्य और स्वामीके पोचमें निभित और वस्त्रके पानेवाले मृत्य भन्न मोर होगयादो और वे मृत्य सब उपस्कर लागल बससे पोषण करने योग्य है। प्रग्रह (रस्से) योफ (आ) आदिकी। भावार्य-जो मृतिका निभय न करके मृ- भृयानो वेतनस्योनो दातानविषिक्रमः । वेतनस्यानगर्म तीवादप स्मृतम् । धिमार्ग पनमाणे वा रहीपाश्मीरसाहामना. २ फर्मान् पतियुन्य कार्यो पता भति महात् । स्मारपत्रामीण्णा एजीत पधर्म : मानवधिमा १ भृत्याय वेतन (पात कर्मस्वामी पपाकर्म ।प्रह्रींपात्यातः । मकााग्राममानेन भामरसाने वा कर्मणो पतिविधि ।
(३३८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । नाके महाजनोंको स्वयं निवेदन करदे, पद-श्रेणिनेगमपाखंडिगणानाम् ६ अपिड- निवेदन नकरै तो राजा एकादश ११ गुना ] अयम्१ विधिः १ भेदम् च - एषांनृपः१ दंड उसकोदे ॥१९॥ रक्षेत क्रि-पूर्ववृत्तिर च:- पालयेत् क्रि-॥ धर्मज्ञाःशुचयोलुब्धाभवेयुःकार्यचिंतकाः । योजना-श्रेणिनेगमपाखंडिगणानां अपि कर्तव्यवचनंतेषांसमूहहितवादिनाम् ।१९१ अयं विधिः ज्ञेयः-चपुनः एषां भेद भूपः पद-धर्मज्ञाः १शुचयः १ अलुब्धाः १ भ- रक्षेत् चपुनः पूर्ववृत्तिं पालयेत् ।। वेयुः कि-कार्यचिंतकाः१ कर्तव्यम् १ वच- ता. भा० -एक पण्य ( व्यापार )से जो नम् १ तेषाम् ६ समूहहितवादिनाम् ६ ॥ जीव वे श्रेणी-और वेदको जो आप्त योजना कार्यचिंतकाः धर्मज्ञाः शुचयः अलुब्धाः, भवेयुः समूहहितवादिनां तेषां ( यथार्थवादी )का बनाया होनेसे प्रमाण वचनं इतरैः कर्तव्यम् ॥ मानें वे पाशुपत आदि नेगम-जो वेदको तात्प भावार्थ-वेद और स्मृतिमें कहे प्रमाण न मानें ऐसे नम सौगत आदि धर्मके ज्ञाता-बाह्य और भीतरसे शुद्ध- एक आयुधसे युद्ध आदि धनके निलीभी-जो हवि कार्योंके विचार | एक कर्मसे जो जीवें वे गण-होते हैं उन- कर्ता करने समूहके हितवादी जो वे उन- कीभी यह पूर्वोक्तही विधि है और इन श्रेणी का वचन आदरसे सपमनुष्य मानें ॥१९१॥ | आदिके भेद व धर्मव्यवस्थाकी राजा श्रेणिनैगमपाखंडिगणानामप्यविधिः । रक्षा करे और पूर्वोक्त जीविकाको नियत भेदंचैषांनृपोरक्षेत्पूर्ववृत्तिंचपालयेत्।। १९२ / करे ॥ १९२ ॥ पाखंडी-और इति संविधतिकमप्रकरणम् ॥ १६ ।।
व्यवहाराध्याय वेतनादानकप्रकरण १६ (३.१) भाण्ड (वर्तन)को यदि वाइक अज्ञानसे | भृतिका चौथा भाग और जो आधे मार्गमें नष्ट करदे तो नाशके अनुसार उस भा- त्यागे वह संपूर्ण भृतिका दण्डदे और जो ण्डको दिवावे-सोई नारदेने कहा है कि य- त्याजक हो अर्थात् अंगीकर किए कर्मको दुि वाहकके दोषसे पात्र फूटजाय तो देव न त्यागते हुए मनुष्यसे कर्मका त्याग क- और राजाके पात्रको छोडकर वाहकसे दि- रावै उस स्वामीसेभी भृत्यको पूर्वोक्त प्रक्रांत चाव-और जो विवाह आदि मंगलके दिन आदि अवसरोंमें सातमा भाग आदि राजा- प्रस्थान करनेवालेके यात्राके उपयोगी कं- | दिवावे-यहभी उस विषयमें जानना जव मको पहिले अंगीकार करके उसी समय | भृत्यको कोई व्याधि आदि न हों-क्यों- -यह कहता है कि मैं नहीं करूंगा अर्थात् कि मनुका वचन है कि (अशो. प्रस्थानमें विघ्नकरता है उससे दूनी भृति | २५) जो भृत्य रोगी न होकर स्वामीके राजा दिवावे क्योंकि उसने अत्यंत बडाईके | कहे कर्मको न करे उसको आठ क्ष्णलका कर्नमें विन किया। दंडदे और वेतन दे-और जब व्याधि चली- भावार्थ-राजा और देवके पात्रको छोड़- जाय और व्याधिके दिनोंकी संख्या जितनी कर वाहकसे पात्र फूटजाय तो उसपात्रको हो उतने दिन कर्म करके स्वामीके का वाइकसे दिवावे और यात्रामें विन करने- | मको पूराकरदे तब तो भृत्य वेतनको प्राप्त वालेको दूनी भृतिका दंडदे ॥ १९७ होता है क्योंकि मन (अ०८ श्लो. २१६) प्रक्रांतेसप्तमभागंचतुर्थपथिसत्यजन् का वचन है कि रोगी मनुष्य स्वस्थ होकर स्वामीके कथनानुसार कर्मको करदे तो वह भृतिमर्दपथेसर्वांप्रदाप्यस्त्याजकोपिच ॥ अपने बहुतकालकेभी सब वेतनको प्राप्त पद-प्रक्रान्ते सप्तम २ भागेर चतुर्थ २ | होताई-और जो मनुष्य व्याधिक दूर होनेपर- पथिर संत्यजन् १ भृति २ अर्द्धपथे ७ सर्वार भी स्वस्थ हुआ आलस्यसे अपने आरंभकिये प्रदाप्यः १ त्याजकः१ अपि-चा-॥ किंचिन्यून कर्मको न स्वयं करता है और योजना-प्रक्रान्ते संत्यजन् सप्तमं भागं न दूसरेस कराता है उसको वेतन न दे- पथि संत्यजन् चतुर्थ अद्भपये संत्यजन् । सोई मनु (१०८ श्लोक. २१७) ने कहा है सर्वा भृति भृत्यः प्रदाप्यः ।। कि रोगी वा स्वस्थ मनुष्य जो यथोक्त कर्म- तात्पर्यार्थ प्रस्थानके प्रक्रांत (निश्चय) को नही करता है उसको किंचिन्न्यून क- समय में अपने अंगीकारकिएकर्मको जो त्यागें | मकाभी वेतन न दे ॥ उसमे सातमां भृतिका भाग स्वामीको राजा भावार्थ-प्रस्थानके प्रारंभमें त्यागे तो दिवावे-कदाचित् कोई शंका करे कि पहिले सातमां भाग-मार्गमें त्यागे तो चोथा भाग लोकमें प्रस्थानमें विन कर्ताको दूनी आधे मार्गमें त्यागे तो संपूर्ण भृति भृत्यसे भृतिका दंड कहा और वहां सातमां भाग | स्वामीको इसीप्रकर कर्मको न त्यागते हुये कहतेदो यह परस्पर विरोध है-उसका ममा- भृत्यमे कर्म न कराते हुए म्यामीमे भत्यको धान चाहते हैं कि जो भृत्य स्वामीको दूसरा राजा दिलावे ॥ १९८ ।। भृत्य मिलने की संभावना में अपने भंगीकार इति वेतनादानप्रकरणम् ॥१६॥ किए कर्मको त्यागे वह भृतिका सातमां भाग और प्रस्थान लमही जो स्यांग वह भृत्यो नातों न कुर्यायो दोस्पर्म ययोदित । स स्वामीको दुनो भृति दे इससे कुछ विरोधनहीं दण्या कपटान्यष्टो म देय तस्य वेतनम् । जो मार्गमें गमनके समय कर्मको त्यागे वह सदीर्घस्यापि कालय त भेटेर पेठनम् । २भातस्तु पुर्यास्तस्म: सन्यसामापिनमादितः। 1 भा हो व्यसनमागोयदि वाहकदोषतः।दाप्यो ३ यपोक्तमातसरयो वा यस्तरकर्म न कारयेत् । यात्र मस्येतु देवराजरतारते । नतस्य वेतन देयमापांनस्यापि पर्मनः।
(३४०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । त्यसे कर्म करावै उससे राजा व्यापार पशु | अपि:-असाध्यं १ चेत् - साध्ये ७ कुर्यात और सस्यसे पैदा हुये द्रव्यका दशमां भाग | क्रि-यथाश्रुतम् २ ॥ . दिलावै॥१९॥ योजना-यदा यत् कर्म उभयोः अपि अ- देशकालंचयोतीयाल्लाभकुर्याच्चयोन्यथा । साध्यं स्यात् तदा यः यावत् कुरुते तावद तत्रस्यात्स्वामिन छंदोधिकंदेयंकृतेधिके ।। तस्य वेतन देयं साध्येसति यथाश्रुतं कुर्यात्।। तात्यार्थ-जब वेतनका निश्चय करके पद-देशं २ कालं २ च यः ९ अ: जिस एकही कर्मको दो मनुष्य करें और तीयात क्रि-लाभं २ कुर्यात् क्रि-चा-यः १ अन्यथाऽ तबऽ स्यात् कि-स्वामिनः ६ छंदः वह कर्म व्याधि (रोग) आदिके कारणसे अधिकं १ देयं १ कृते ७ अधिक ७ ॥ उन दोनोंसे वा बहुतसे मनुष्योंसे समाप्त न योजना-पः देशं चपुनः कालं अती- होय तो स्वामी जो भृत्य जितना कर्म करे। उतनाही वेतन उनके किए कर्मके अनुसार यात चपुनः लाभं अन्यथा कुर्यात् तत्र जोमध्यस्थनें कहदिया होदे सम न दे और स्वामिनः छंदः स्यात् अधिके कृतेसति अधिकं देखें। यह न समझनाकि कर्मके अवयवोंका वेतन तात्पर्याय-जो भृत्य विक्रय आदिके पूर्व भृत्योंसे स्वामीनें नही नियत किया इससे न देना चाहिये और यदि उस कर्मको वेदो- उचित देश वा कालमें पण्य वस्तुका विक्रय नो सिद्धकरलेतो जितना पूर्व देना कह लि. आदि नहीं करता अर्थात् अभिमान आ- याहो उतनाही उन दोनोंको दे यह फिर न दिसे अवलंघन करता है और जो उसी करे कि प्रत्येकको संपूर्ण वेतनदेदे वा कर्मके देश कालमें अन्यथा लास करता है अ- र्थात् अधिक व्ययसे अल्प लाभ करता अनुसार विचार कर दे । बस सेवकको भृति देने में स्वामीका छंद भावार्थ-जो कर्म दो मनुष्योंसे भृति ठ- (इच्छा ) प्रमाण होता है अर्थात् जितनी | हराकर करवायादो वह कर्म यदि उन म- स्वामीकी इच्छाहो उतनी भृति दे अधिक नुष्योंसे सिद्ध न होय तो जिसनें जितना नदे-और जो मृत्य देशकालको नान- कर्म कियाहो उतनाही उस भत्यको दे कर अधिक लाभ करता है उस भृत्यको और सिद्ध हो जाय तो जितना ठहराहो - स्वामी नियतकी हुई भृतिसभी कुछ अ- तनादे ॥ १९६ ॥ धिकदे॥ मराजदेविकनष्टभांडंदाप्यस्तुवाहकः । भावार्य-जो भृत्य देश कालका भव- प्रस्थानविनकृवैवप्रदाप्योद्विगुणांभृतिम् ।। लंघन करे वा अन्यथा लाभ कर उस भृत्यको स्वामी इच्छाके अनुसार दें और पद-अराजदविक र नष्टं २ भारदाप्यः? गो मृत्य अधिक कर उसे अधिकदे॥१९५॥ वाहकः १ प्रस्थानविनकृत् १ चा एका योपावतुरुतेकर्मतावत्तस्यतुवतनम् प्रदाप्यः-१ द्विगुणां २ भृति २ ॥ उभयोरप्यसाध्यचेत्साध्यैकुर्याद्ययाश्रुतम्।। | दाप्यः चपुनः प्रस्थानविनकृत द्विगुणां भृति योजना-वाहकः भराजदेविक नष्ट मार्ड पद-यः १ यावत् १ कुरुते कि-कर्म२) प्रदाप्यः ।। तावत्-तस्य ६ तुः-वेतनं १ उभयोः ६ तारपाप-पगा और देवता ऑसे भिन्न - व्यवहाराध्याय वाक्पारुष्यप्रकरण १८. (३४५) अथ वाक्पारुष्यप्रकरणम् १८ तीन प्रकारका कहाहै और उसके गौरवसे दंडभी क्रमसे गुरु होताहे उनमें मूर्ख और सत्यासत्यान्पथास्तोत्र!नांगद्रिय जाल्मको धिक्कार है ये जो आक्षेप सहित रोगिणाम् । क्षेपंकरोतिचेहव्यः वचन वह निष्ठुर-भगिनी आदि गमनरूप पणानईत्रयोदशान् ॥ २०४ ॥ न्यंग (पाप) सहित जो आक्रोश उसको पद-सत्यासत्यान्यथास्तोत्रेः३ न्यूनांगेदि-तकोंका जो आक्रोश उसे तीव्र कहतेहैं । अश्लील-तू मदिरा पीताहै-इत्यादि महापा- यरोगिणाम् ६ क्षेपं २ करोति क्रि- चेत:- उन तीनोंमें सवोंके विषे निष्ठुर आक्रोश दंड्यः १ पणान २ अर्द्धत्रयोदशान २ ॥ का दंड कहतेहैं करचरण आदिसे जो विकल योजना-यः न्यूनांगेंद्रियरोगिणां सत्या- (रहित ) वे न्यूनांग-नेत्र श्रोत्र आदिसे सत्यान्यथास्तोत्रैः क्षेप चेत् करोति सः अ- जो रहित वे न्यूनेंद्रिय और जिनको देहकी त्रयोदशान पणान् दंड्यः राज्ञेति शेषः ॥ त्वचा दुष्टहोय वे रोगी इनको जो सत्य- तात्पर्यार्थ-अब वाक्पारुष्य प्रकरणका मिथ्या वा निंदापूर्वक स्तुतिसे-अर्थात् दोनों प्रस्ताव करतेहैं उसका लक्षण नारदर्ने नेत्रोंसे हीनको यह अंधा है यह सत्यवचन- कहा कि देश जाति कुल आदिका जो | और नेत्रवालोंको यह अंधा है यह असत्य- न्यंग ( दोष वा पाप ) सहित आक्रोश वचन-और विकृताकृतिको तू बडा दर्श- (उंचे स्वरसे कठोर वचन कद्दमा) और नीय है यह कहना अन्यथास्तोत्र इसप्रकार जो प्रतिकूल (उद्वेग ) ताको पैदा कर जो क्षेप (निर्भत्सन वा निंदा कर)उसको राजा उसको वाक्पारुष्य कहतेहैं- उनमें गाटोको साटेतेरह पण दंडदे-और जो यह मनु- कलह प्यारी होतीहै यह देशका आक्रोश (अ. ८-लो. २१४ का वचन है कि (निंदा) है- ब्राह्मण नितांत (निश्चय ) | काणे वा खंज (लंगडे ) वा ऐसेही अन्यको लोलुप (चचल) होतेहैं यह जातिका सत्यवचनसेभी काणा भादि कहे उसको आक्रोश है- विश्वामित्रोंका आचरण क्रूर | कमसे कम कार्षापणका दंडदे यह वचन होताहै यह कुलका आक्रोश है आदिपदके अत्यंत दुराचारी वर्णके विषय में है और ग्रहणसे अपनी शिल्प आदि विद्याकी निंदासे | जब पुत्र आदि माता आदिकोंका आक्रोश विद्वान और शिल्प आदि ग्रहण करने और करें तब सौका दंड मनु (म.ली.२१५) उस'माकोशके दंडतारतम्य (न्यून अधिक) नही कहा है कि माता पिता जाया भ्राता के लिये निष्ठुर आदि भेदसे तीन प्रकारका | गुरु इनका जो आक्रोश करे-और जो कहकर उसका लक्षण नारद ही कहा कि सन्मुख आते गुरुको मार्ग न दे उसको निष्टुर अश्लील तीन इन भेदोंसे आक्रोश सोपणका दंड यजा दे-यहभी तुप जानना जय माता आदिका अपराधहो और जायाका १देशजातिकुलादीनामाकोशन्यगसयुतम्। यायः प्रतिकूटा वारपारण्य तदुच्यते । अपराध नहो। २ निरालीलतावत्यातदपि विविध मत । गोर काणं वाप्यपना खजम वा प तथाविधवणे. वानुमामात्तस्य दंगपि स्थालमानुषः ॥ साक्षेप निठुर नापि ध्रुवन् दाप्यो र कापायगावरं । गमलील न्यगसंयुनं । पतनीरुपकोशस्तीनमाहुर्म २मात रित माया भ्रातरं बरं गुरु भासार- मीषिणः। यन् शतं दाप्या पंथानं पारदगुरोः ।
' (३४४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना तस्करज्ञानकरणात् शूतं एकमु- एकमुख ही द्यूतको राजा करावे- और खं कार्यम्-प्राणिते समाह्वये एपः एव प्राणियोंके चूतरूप समाह्वयमें यही पूर्वोक्त विधिः ज्ञेयः॥ विधि जाननी अर्थात् उसमेंभी सोरुपये तापर्यार्थ-पूर्वोक्त द्यूत एक है मुख (प्रधान) करे॥ पर पांचरुपये आदिको सभापति ग्रहण जिसमें ऐसा और अध्यक्षोंसे अधि- ठित (युक्त)-राजा करावे क्योंकि तस्करों- भावार्य-चोरोंके ज्ञानार्थ द्युतमें एकको का ज्ञान इसी प्रकार होताहै--पहुधा चोरी- प्रधान राजा रख्खै और यही पूर्वोक्त विधि से धनसंचय करनेवाले ही कितव होते हैं। प्राणियोंका धूत जो समाह्वय उसमेंभी इससे चोरोंके विज्ञान ( पहचान )के अर्थ जाननी ॥ २०३ ॥ - मि इति यूतसमाह्वयप्रकरणम् ।। १७ ॥
व्यवहाराध्याय वाक्पारुष्यप्रकरण १८ (३४५) अथ वाक्पारुष्यप्रकरणम्१८ तीन प्रकारका कहाहै और उसके गौरवसे दंडभी क्रमसे गुरु होताहै उनमें मूर्ख और सत्यासत्यान्यथास्तोत्रन्यूनांगेंद्रिय जाल्मको धिक्कार है ये जो आक्षेप सहित रोगिणाम् । क्षेपंकरोतिचेइंव्यः वचन वह निधुर-भगिनी आदि गमनरूप प्रणानत्रयोदशान् ॥ २० ॥ न्यंग (पाप)सहित जो कोश उसको अश्लील-तू मदिरा पीताहे-इत्यादि महापा- पद-सत्यासत्यान्यथास्तोत्रैः३न्यूनांगेंद्रि-तकोंका नो आक्रोश उसे तीव्र कहतेहैं ।। परोगिणाम् ६ क्षेपं २ करोति क्रि- चेत् - उन तीनामें सवर्णोके विषे निष्ठुर आक्रोश दंड्यः १ पणान २ अर्द्धनयोदशान २ ॥ का दंड कहतेहैं करचरण आदिसे जो विकल योजना-यः न्यूनांगेंद्रियरोगिणां सत्या- (रहित ) वे न्यूनांग-नेत्र श्रोत्र आदिसे सत्यान्यथास्तोत्रैः क्षेपं चेत् करोति सः अ. जो रहित वे न्यूनेंद्रिय और जिनको देहकी त्रयोदशान मणान् दंड्यः राज्ञेति शेषः ।। त्वचा दुष्टहोय वे रोगी-इनको जो सत्य- तात्पर्यार्थ-अब वाक्पारुप्य प्रकरणका | मिथ्या वा निंदापूर्वक स्तुतिसे-अर्थात् दोनों प्रस्ताव करतेहैं उसका लक्षण नारदने | नेत्रोंसे हीनको यह अंधा है यह सत्यवचन- कहाहै कि देश जाति कुल आदिका जो और नेत्रवालोंको यह अंधा है यह असत्य- म्यंग (दोष का पाप) सहित आक्रोश वचन-और विकृताकृतिको तू बडा दर्श- (उचे स्वरसे कठोर वचन कहना ) और नीय है यह कहना अन्यथा स्तोत्र इसप्रकार जो प्रतिकूल (उद्वेग ) ताको पैदा कर जो क्षेप (निर्भत्सन वा निंदा कर)उसको गजा उसको वाक्पारुप्य कहते हैं- उनमें गौडोंको साढतेरह पण दंडदे-और जो यह मनु- कलह प्यारी होतीहै यह देशका आक्रोश | (अ. ८-लो. २१४ )का वचने है कि (निंदा) है- ब्राह्मण नितांत (निश्चय ) काणे वा खंज (लंगडे) वा ऐसेही अन्यको लोलप (चंचल) होतेहैं यह जातिका | सत्यवचनसेभी काणा आदि कहै-उसको आक्रोश है- विश्वामित्रोंका आचरण दूर कमसे कम कार्षापणका दंडदे यह बचन होताहै यह कुलका आक्रोश है आदिपदके | अत्यंत दुराचारी वर्णके विषयमें है-और ग्रहणसे अपनी शिल्प आदि विद्याकी निंदासे जब पुत्र आदि माता आदिकोंका आक्रोश विद्वान और शिल्प आदि ग्रहण करने और करें तम सोका दंड मनु (अ.८शो.२१५) उर आक्रोशके दंडतारतम्य (न्यून अधिक) नही कहा है कि माता पिता जाया भ्राता के लिये निष्ठुर आदि भेदसे तीन प्रकारका गुरु इनका जो आक्रोश कर-और जो कहकर उसका लक्षण नारद ही कहा कि सन्मुख आते शुरुको मार्ग न दे उसको निष्टुर अश्लील तीन इन भेदोंसे आक्रोश सोपणका दंड गजा दे-यहभी तुम जानना जय माता आदिका अपराधहो और जायाका १देशजातिफुलादीनामाकोशन्यगमयुतम्। यदः प्रतिकूला वारपारुप्यं तदुच्यते । अपराध नहो। ३ निरालीलप्तीमत्वातदपि विविध मत गौर , काग वाध्यपका जमन्यं वापि तपाविधी तणे- वानुकमात्तस्य देगेपि शालामानुः ॥ साक्षेप निर नारि वन दाप्यो दर्द कार्यायणावरं । शेयमशील न्यंगसयुतं । पतनीरुपयशेतीवमाहुर्म- २ मातरं पितरं जायां प्रातरे श्वगुरु आझार- नीषिणः। यन् भव थाप्यः पंथानं चाररगुरोः ।
(३४८)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
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अशक्तस्तुवदन्नेवदंडनीयःपणान्दश योजना-पतनीयकृते क्षेपे मध्यमसाहसो
तथाशक्त प्रतिभुवंदाप्याक्षेमायतस्यतु ॥ दंडो भवति तुपुनः उपपातकयुक्तेक्षेपे प्रथम-
साहसं दंडं दाप्यः॥
पद-अशक्तः १ तु:-वदन् १एव:-दंड-
नीयः १पणान् २ दश २ तथा:-शक्तः १
ता भा०-पतितके कारण (तू ब्रह्मद-
प्रतिभुवं २ दाप्यः १ क्षेमाय ४ तस्य तुर-॥ त्यारा है )से वर्णोंका आक्रोश होयतो मध्य-
योजना-तुपुनः अशक्तः एवं वदन् दश मसाहस दंड होता है और उपपातक
पणान् दण्डनीयः तथा तुपुनः तस्य क्षेमाय (तू गोहत्यारा है )के योगमें प्रथमसाहस
दंड देनेयोग्य होता है ॥ २१ ॥
शक्तः प्रतिमुवं दाप्यः॥
ता भा०-जो मनुष्य ज्वर आदिसे अश- विद्यनृपदेवानांक्षेपउत्तमसाहसः।
क्त हुआ वाणीसे बाहु आदिके पूर्वोक्त विना- मध्यमोजातिपूगानांप्रथमोग्रामदेशयोः ।।
शको कहै उसको राजा दशपणका दंडदे-
पद-विद्यनृपदेवानां ६ क्षेपे ७
और जो शक्त ( समर्थ) मनुप्य अशक्तका साहसः १ मध्यमः १ जातिपूगानां ६'प्र-
उत्तम
पूर्वोक्त प्रकारसे आक्रोश करे तो उसको
थमः १ ग्रामदशयोः ६॥
पूर्व कहे हुए सोपण दंडके अनंतर अशक्त
योजना-त्रैविद्यनृपदेवानां क्षेपे उत्तम-
मनुष्यको रक्षाके लिये प्रतिभूका दंडदे
अर्थात् उसकी सेवाके लिये एक मनुष्य शयोः क्षेपे प्रथमः साहसो दंडो ज्ञेयः ।।
साहसः जातिपूगानां क्षेपे मध्यमः ग्रामदे-
उसके पास छुडवावे ॥ २०९ ॥
पतनीयकृतक्षेपेदंडीमध्यमसाहसः ।
ताभा०-तीन वेदोंके ज्ञाता विद्य राजा
और देवता इनके क्षेप (आक्रोश)में उत्तमः
उपपातकयुक्तेतुदाप्याप्रयमसाहसम्॥२१५
साहस दंड-ब्राह्मण और मूवसिक्त आदि
पद-पतनीयकृते ७ क्षेपे ७ दंडः १ | जातिओंका जो संघ उसकी निन्दामें मध्यम
मध्यमसाहसः १ उपपातकयुक्ते ७ तु:- साहस दण्ड-ग्राम और देशके प्रत्येक आ-
दाप्यः १ प्रथमसाहसं २॥
क्षेपमें प्रथम साइस दण्ड जानना ॥२११
इति वाक्पारुष्यदंडप्रकरणं ॥ १८॥
व्यवहाराध्याय दंडपारुष्यभकरण ११ (३४९) : अथ दंडपारुष्यप्रकरणम्१९ और हीन मध्यम उत्तम द्रव्योंके अवलंघ- नसे तीन प्रकारकेही साहस कहेहैं उन भसाक्षिकहतेचि युक्तिभिश्चागमेनच । साहसोमही कंटकों (अपराधी)का शोधन द्रष्टव्योव्यवहारस्तुकूटचिकृतोभयात् ॥ गजा करे ये साहससे किये तीन प्रकारके दंडपारुप्य होते हैं तैसेही वाक्पारुप्य और पद असाक्षिकहते ७ चिह्नः युक्तिभिः ३ दंडपारुष्य ये दोनों कलह जहां प्रवृत्तहों चा-आगमेन ३ च-द्रष्टव्यः १ व्यवहारः १ उनके मध्यमें जौ क्षमा करे उसको केवल तु-फूटचिह्नकृतः ६ भयात् ५॥ दंडका अभावही नहीं किंतु वह पूजाके यो- योजना असाक्षिकहते सति चिह्नः चपुनः ग्यभी है-तैसेही जो पहिले कलहमें प्रवृत्तहो युक्तिभिः चपुनः आगमेन कूरचिङ्गकृतः भ- | उसको दंडभी गुरु ( अधिक ) होता है- या व्यवहारः द्रष्टव्यः॥ और कलहमें वही दंडका भागी है जिसको तात्पर्याय-अपदंडपारुप्यका प्रस्ताव क- वैधे हुये वेरका अनुसंधान (स्मरण) रहै- रतेहै-उसका स्वरूप नारदनें कहा कि तेसे दोनों अपराध विशेषका ज्ञान न हो- पराये स्थावर जंगम द्रव्य गात्रोंमें हस्त-पाद यतो दोनोंको समान दंड होता है-ततेही यदि शस्त्र और ग्राव ( पत्थर ) आदिसे जो अभि- | श्वपच आदि आर्योका अपराध करदें तो दंड द्रोह ( हिंसा.) अर्थात् दुःखको पदाकरना | दिलानेके अधिकारी सज्जनही होते हैं और तैसेही भस्म-रज-कीच-पुरीप आदिरो | यदि घे दंड देनेको शक्य नहीं अर्थात श्व- स्पर्श करके पयए मनमें दुख पैदाकरना इस ) पोंको दंड न देसकै तो राजा श्वपचोंको दोनों प्रकारको दंडपारुष्य कहते हैं दंड- | मरवायही दे उनसे धनको महण न करे रुष्य शब्दका यह अर्थ है कि जिससे दंड इस प्रकार पांच प्रकारको विधिभी नारदने दिया जाय वह देहदंड कहाताहे उस ही कहा है कि इन दोनोंकी विधि पांच प्र. दंडसे जो जंगम आदि द्रव्यका विरुद्ध आच- कारकी कही है-कोचसे पारुष्य उत्पन्न हो रण उसको दंडपारु-य कहत है और उसकी ओर दोनों क्रोधियों के मध्यमें वही मानता भवगोरण आदि करणों के भेदसे तीन प्रका-है नो क्षमा करता है, जो लंघन करता है रको कहकर हीन मध्यम उत्तम द्रव्यरूप विधि: पंचविधस्तून एतयोरुभयोरपि । पारष्ये कर्मके तीन भेदोंते फिर तीन प्रकारका नार- सति संरभादुत्पन्ने क्रुद्धयोर्दयोः । स मन्यते यःक्ष- देने ही कहा कि हीन मध्यम उत्तमक । मते दहभाग्योतिवर्तते । पूर्वमाक्षारयेयस्तु नियत क्रमसे वह साहस तीन प्रकारका है अब | स्यात्स दोषभाकापश्चायः सोप्पसत्कारी पूर्वे तु विनयो- गोरण ( गाली देना ) निशंक होकर गुरु द्वारापश्याः स्तुत्यमनुवालियापुन: स तयोः प्रहार-क्षत (धाव )का करनेसे- देखा है मानोति पूर्वो वा यदि वेतरः । पारुप्पदोषावृतयोर्युग- परसंप्रवृत्तयो । विशेषग्वेन लक्ष्यत विनयः स्यास परगाढेष्वभिद्रोही हस्तपादायुधादिभिः । भरमा मस्तयोः श्वपाकषदचहालव्यगेषु वधवृत्तिषु ।। इस्ति: दिमिश्वोपघाती दंडपारुष्य उच्यते । पवाल्यदासेषु गुर्राचार्य नृपेषु च । मर्यादातिकमे सयो २ तस्योपदृष्ट त्रैविध्यं हीनमध्योत्तमक्रमात ॥ अव घात एवानुशासनम् ।। यमेव ह्यतिवर्तेरनेते सतं जनं गोरणनिःसगपातनक्षतदर्शनैः ॥ हीनमध्योत्तमानां तु | नृषु। स एव विनय कुर्यान्न तद्विनयभाहनृपः ॥ मल दव्याणो समतिकमात् । वीण्येव साहसान्याहुस्तब के घेते मनुष्याणां धनमेषां मलात्मकम् । अतस्तान्धा- टकशोधनम् । तयाजा नार्थदंड न दडयैव ।
(३५०)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
वह दंडका भागी होताहै जो प्रथम आक्षारण भस्मपंकरजस्पर्शेदंडोदशपणःस्मृतः ।
(अपराध) करे वह नियमसे दंडका भागी | अमेध्यपाणिनिष्ठचूतस्पर्शनेद्विगुणः स्मृतः
होताहै-जो पीछे करे वहभी असत्कारके यो-
पद-भस्मपंकरजःस्पर्श ७ दंडः १ दश-
ग्य है-परंतु पहलेको दंड गुरु होता है-यदि
दोनों तुल्य आपत्तिवालेहों उनमें जो फिर पणः १. स्मृतः १ अमेध्यपाणिनिष्ठयूत-
अनुवंश ( कलह वा दावा) करे वही उन स्पर्शने ७ द्विगुणः १ स्मृतः १ ॥....
दोनों में दंडको प्राप्त होता है वह पहिला हो- समेष्वेवंपरस्त्रीपुद्विगुणस्तृत्तमेपुच।
चाई पिछलाहो-यदि पारुष्यदोषवाले एक- हीनप्वर्धदमोमोहमदादिभिरदंडनम् २१९
समयमें कलहमें प्रवृत्तहो और कुछ विशेष
पद-समेयु ७ एवं:-परस्त्रीषु ७ द्विगुणः १
प्रतीत न होयतों दोनोंको समान दंड हो: तु:-उत्तमेषु ७ च-हीनेषु ७ अर्धदमः
ता है यदिश्वपाक नपुंसक-चांडाल-अंगसे मोहमदादिभिः ३ अदंडनम् १ ॥
होन-हस्तिप (पीलवान् ) वात्य-दास और
योजना-भस्मपंकरजःस्पर्शे दशपणः दंड:
हिंसासे जो जीवें ये सब गुरु-आचार्य
स्मृतः-अमेध्यपाणिनिष्ठयूतस्पर्शने द्विगुणः
राजा-इनके विषय मर्यादाका अवलंघन | दंडः स्मृतः-एवं दंडः समेषु ज्ञेयः पर-
करें तो इनकी शिक्षा मारनाही है और ये स्त्रीषु चंपुनः उत्तमेषु द्विगुणः दंडः बोध्यः
मनुष्याम जिस सजनका अवलंघन करें होनेषु अर्धदमः भवति-मोहमदादिभिः स्प-
वही उसको दंडदे राजा नदे-ये श्वपच आदि र्शने अंदंडनम् भवति ॥
मनुष्योंमें मलरूप हैं इनका धनभी मल-
तात्पर्यार्थ-भस्म (राख) पंक (कीच
रूप है इससे राजा इनको, मारदे धनका वा गारा) रन (रेणु.) इनसे जो अन्य।
दंड इनको न दे-
स्पर्श करेउसको दशपण दंडदे-और अमेर
इस प्रकार दंडदेना-दंडके पारुष्य निर्णयसे अर्थात् आंसू-कफ-और नख-केश-कान का
होता है उसके स्वरूपके संदेद निवारणार्थ मैल-दूषिका (नेत्रमल ) भोजनका उच्यिा
निर्णय कहते हैं- जब कोई मनुष्य राजाको पाणि (चरणका पिछला भाग-ऐडीन-
यह निवेदन करें कि मुझे एकांतमें इसने म्यूत (थक ) इनसे परेका स्पर्श करें। तो
ताडना दी है (माय है ) तहां साक्षी न होय पूर्वोक्त दशपणसे दून- पीसपण) दंड कहा
तो वर्ण और स्वरूप आदिके चिन्होंसे-युक्ति- है-और पुरीप (विष्ट मादिके स्पर्शमें को.
से अर्थात् कारण और प्रयोजनके देखनेकी त्यायनेने विशेष कहा है कि छर्द-मूत्र-विष्ठा
रोतिसे-आगम(जनोंका कथन) से भऔर च- आदिका जो स्पर्श दूसरे मनुष्यके करे चो-
शब्दके पटनेसे दिव्य प्रमाणसे इस लिये गुना वा छ: गुना दंढ कायाके मध्यमें सर्श
रागा परीक्षा करे कि इसमें फूट (मिप्या) करनेसे होता है और मस्तकपर सर्श
चिङ्ग करलेनेका भय होता है ।
भावार्य-यदि मारनेका कोई साक्षी न वसा शुक्र रुधिर मजा लेने-यह पूर्वोक्त दंड
करे तो ठगुना दंड कहा है-मादि शन्दसे
५ तो चिह्न यदि मनुष्योंका कथन-इनसे सव”के विषय में जानना-और सब जाति
.। व्यवहारको फूट चिटोंके करनेके भ मित्रपुरपारायः स गतुर्गणः । पाणः
फायमध्ये सान्मूलि सनः स्मृतः ।
यसे देखे ॥ २१२॥
व्यवहाराध्याय दंडपारुप्यमकरण १९ (३५१) योंकी पराई स्त्री और उत्तम अर्थात् अपनेसे | जिस किसी अंगसे निचला वर्ग उत्तमवर्णकी अधिक विद्या और आचरणवालोंके विष हिंसा करें तो वही २ इसका अंगछेदन पूर्वोक्तं दशपुण और वीसपणसे दूना दंड करना यह मनुको आज्ञा है. तीनों द्विना- जानना और जो अपनेसे विद्या और तियोंके अपराधमें शूद्रका अंग छेदन कह- आचरणमें न्यून हैं उनमें पूर्वोक्त से आधा नेसे वैश्यभी क्षत्रियका अपकार करें तो यही ( दश-चीसपण ) दंड होता है और मोह दंड तुल्यन्यायसे समझना-यदि उद्गुण (मा- (चित्तको बेकली ) मद ( मदिरा रनेकेलिये शस्त्र उठाना) करतो प्रथम साहस पीनसे उन्मत्तता ) आदि पदसे ग्रह (भूत) दंड जानना-और शूद्रको तो उद्गुणैमभी का प्रवेश-इनसे युक्त मनुष्य भस्म हस्तका छेदनही होता है क्योंकि मनु आदिका स्पर्श करें तो दंड न करना । (भावार्थ-भस्म और पंक रज इनके स्पर्श- (अ. लो. २०८) की स्मृति है कि हाथ में देशपण दंड कहा है और अपवित्र वस्तु- योग्य होता है और उद्गिरणके लिये शस्त्र वा हाथसे दंड उठाकर हाथके छेदन करने पाणि (एडी) थूक इनके स्पर्शमें दना दंड आदिका स्पर्श करे तो उससे आधा अर्थात कहा है-यह दंड सवों में है और पराई स्त्री और अपनेसे उत्तमोके स्पर्शमें दूना दंड प्रतिलोमके अपवाद (अपगधी )में क्षत्रिय प्रथम साहसका आधादंड जानना-और और अपनेसे हीन गुणवालोंमें पूर्वोक्त से और वैश्यको दूने औरतिगुने दंड-चाक्पारु- आधा दंड होता है-और मोह और भदवाला प्यके समान समझने शूद्रको तो उसमेंभी मनुष्य भस्म आदिका स्पर्श करे तो उसको दंडका अभाव होता है।।२१३॥ २१४॥ इस्तका छेदनही है क्योंकि मर्नुका वचन विमपीडाकरच्छेदमंगमब्राह्मणस्यतु TT अभिभार किमीके अपर निष्ठीव (यूके) है ( अ० ८-श्लोक. २८२ ) कि नों रंदणेप्रथमोदंडःसंस्पर्शतुतदार्दिकतना देव शतिर तत श्रेष्ठोका और मूत्र करे तो पद- विप्रपीडाबर १ टेमसे समझनी- अनाणस्य६ तु-उद्गुणे७ प्रक्षाक्पारुप्य प्रकार योजना वायु करे तो गुदाछेदन संसाशे ७ तु तदर्धिकः॥ भावार्थ-ब्राह्मणको पीडा करनेवाले क्षत्रि- योजना-विप्रपीडाकर अब्राह्मणस्य अंग यके अंगका छेदन करे-मारनेके लिये छेचं उद्गुणे प्रथमः दंड नुपुनः संसरों शस्त्र उठाने में प्रथम साहसका दंड-और मार- तदपिका दंडः ज्ञेयः ॥ नेके लिये शस्त्रके छूनेमें उससे भाषा दंड तात्पर्याय-ब्राह्मणोंको पीडा देनेवाला जो होता है। २१५ ॥ ब्राह्मणसे भिन्न (क्षत्रिय आदि का अंग है । दूर्णहस्तपादितुदशाशतिकीदमी । (कर चरण आदि) बह छेदन करने मो- परस्परंतुसर्वेषांशस्त्रेमध्यमसाहसः ॥२१६॥ ग्य हे-और क्षत्रिय वा धेश्यको पीडा करले- वाले शूद्रकाभी अंग छेदनके योग्यही है पद-उद्गुणे ७ इस्तपादे तु:- दश- क्योंकि मन (अ. ८ श्लोक. २७९ ) में १ पाणिमुयम्य दण्ड या पाणिरछेदनमइति । येन केन चिदंगेन हिंस्याच्ट्रेयांसमत्यजः । ३ भवनिष्ठीवतो हावोटो छेदयपः भव ऐसध्य तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् । बयतो मेमवार्थयतो गुदम् । अनाम (३५२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । + विंशतिकार दमौर परस्परं२ तु:-सर्वेषां६ ) बत्तीस ३२ पण दंड देने योग्य होता है और शस्त्रे७ मध्यमसाहसः१॥ भारी तादनासे रुधिर दीखजायतो द्विगुण योजना-हस्तपादे उद्गुणे सति दविंश- ( ६४) दंडदेने योग्य होता है और तिको दी वेदितव्या-तुपुनः परस्परं शस्त्रे त्वचा अस्थि मांसके भेदने में तो विशेष उद्ऎसति मंध्यमसाहसः दंडो दाप्यः ॥ मनुनें दिखाया है (अ.८श्लो.२८४) कि ता० भा०--ताडनाके लिए हाथ वापर त्वचाके भेदक और लोहितके दिखाने- उठावै तो क्रमसे दशपण-और वीसपण- वालेको सौपणका दंड और मांसके दिखाने- दंड जानना-यदि संपूर्ण वर्ण मारनेके लिए | वालेको छः निष्कका दंडदे और जो अस्थि परस्पर शस्त्र उठावें तो सबको मध्यम साहस (हाड ) को तोडे उसे देशसे निकास दंड होता है।।२१६॥ दे॥ २१८॥ पादकेशांशुककरोल्लंचनेपुपणान्दश । करपाददतोभंगेछेदनेकर्णनासयोः पीडाकशुकाटपादाभ्यासेशतंदमः२१७ मध्योदंडोजगदिदेमृतकल्पहत्ततथा॥१९ पद-पादकेशांशुककोल्लचेन ७ पणान्२ पद्-करपाददतः ६ भंगे७ छेदने कर्ण- दशर पीडाकर्षाशुकावेष्टपादाध्यासे७ शतं १ नासयोः ६ मध्यः १ दंडः १ ग्रंगोद्भदे मृतकल्पहते७ तथा-॥ दमः ॥१॥ योजना- करपाददतो भंगे-कर्णनासयोः योजना-पादकेशांशुककरोढुंचनेषु दशप- छेदने-व्रणोद्दे-तया मृतकल्पहते मध्यम- णान् दण्डयः पीडाकपाशुकापेष्टपादाध्यासे साहसो दंढो भवति ॥ शतं दमो भवति ॥ स्पर्श भा०- हाथ-पर-दांतका टूटना ता० भा०- चरण-कर्क पारुष्य नियन अर्थात् माताकके छेदनमें और ग (पाव) इनको पकडकर जो शीघ्र संदेह निवारपर्य मेल-दूषिका (इ-साना जिसे दूंढदेने योग्य होता है।ई. मना लपेटकर | पाणि ( तुल्य होजाय तो मध्यम और खींचकर जो कोई परको पिसे तो राजा दंड जानना यहांभी अपराहाके उसे सोपण दंडदे॥ २१७ ॥ अनुसार दंडकी कल्पना करनी ॥ २१९ ॥ शौणितेनविनादुःखंकुर्वन्काष्ठादिभिर्नरः । ष्याभोजनवारीधनेत्रादिप्रतिभेदने द्वात्रिंशतपणान्दव्योद्विगुणंदर्शनेसृजः२१८ | कंधरावाहुसक्नांचभंगेमध्यमसाइस:२२० पद-शोगितन३ विना:-दुःखं२ कुर्वन पद-चेष्टाभोजनवामोधे ७ नेत्रादिप्रति- काष्टादिभिः ३ नरः १ द्वात्रिंशतं २ पगान भेदने कन्धरापाहुसक्यां६ चा भंगे ७ दण्डयः१ द्विगुणं२ दर्शने सृजः६ ॥ मध्यमसाइस: १॥ योजना-शोगितन विना काष्ठादिभिः योजना- चेष्टाभोगनवामोधे-नेत्रादिप्रति- पुर्वन् नः द्वात्रिंशतं पणान् दंडयः- भेदने चपुनः कन्धरावाहुसक्या भंगे मध्यम : दर्शन द्विगुणं दण्डयः॥ साइसःदंडो भवति ॥ ता. भा-जो मनुष्य काष्ठ आदिसे स्वाभेदफा गत दो लोहितस्य व दर्शन दूसरेको दुःख कर भोर रुधिरन दौखतो मांसभेता व पग्निप्काकामवास्यस्त्वरिषभेदकः ।
ज्यवहाराध्याय दंडपारुष्यप्रकरण १९ (३५३) । . ता. भा०- और गमन- भोजन- भाषण दुःखमुत्सादयेद्यस्तुससमुत्थानजव्ययम् । इनके रोकने और नेत्र जिह्वाके भेदन दाप्योदंडंचयोयस्मिन्कलहेसमुदाहृतः ॥ करने और कन्धरा (ग्रीवा) बाहु सक्थि (जंघा) इन प्रत्येकके भंजनमें मध्यम पद-दुःखंर उत्सादयेत् क्रि- यः १ तु:- सः१ समुत्थानज२ व्ययंर दाप्यः१ दंडः२ साहस दंड जानना२२० ।। तु:-यः १ यस्मिन् कलहे समुदाहृतः ॥ - एकंन्नतांबहुनांचययोक्ताहिगुणोदमः योजना-तुपुनः यः यस्य दुःखं उत्पा- कलहापहृतदेयंदंडश्चद्विगुणस्ततः।।२२६॥ दयेत् सः समुत्थाननं व्ययं चयुनः यस्मिन् पद-एकर प्रतांद बहूनां ६ चा यथो- कलहे यः दंडः समुदाहृतः तंदडं दाप्यः- तात द्विगुणः १ दमः १ कलहापहृतं २ ता० भा०-जो मनुष्य ताडनासे जिसके देयंर दण्डः ५ च-द्विगुणः १ ततः5 दुःख (व्रण आदि )को पैदा कर वह मनुष्य योजना-एकं नतां बहूनां यथोक्तात् उसके घावके गेपण ( भरना) आदिके द्विगुणो दमो ज्ञेयः कलहापहृतं देयं ततः लिये जो औषधि और पथ्यभोजन उनका द्विगुणो दंडः देयः- व्यय (खर्च)दं और जिस कलहमें जो तात्पर्यार्थ-जहां बहुतसे मनुष्य मिलकर दंड कहा है उस दंडके देने योग्य है एकके अभंग आदिको करें वहां जिस २ केवल उनके व्यय मात्रही नही ।। २२२ ॥ अपग जोर दंड कहा है उससे''न्येकको अभिघालेतयाछेदेभेदेकुड्यावपातने मानना-क्योंकि वे अत्यंत क्रूर पणान्दाप्यापंचदशविंशतितद्ययंतथा २२३ गारोतलोम और अनुलोमके अपरा- धिोमभी सवर्णके विषयमें कद्देहुए इन पूर्वोक्त कुड्यावपातने पाणान् दाप्यः १ पंचदश २ पद- अभिघाते७ तथा: छेदे भेदे दंडोंकी हानि और वृद्धिको कल्पना दंड विंशतिर तत्र ययर तथा- ॥ पारुष्य प्रकरणमें कहेहुए क्रमसे समझनी- क्योंकि यह स्मृति है कि वाक्पारुप्य प्रक- योजना-अभिपाते तथा छेदे भेदे कु- रणमें जो दंड प्रतिलोम और अनुलोम ड्यावपातने यथाक्रमं पंचदश विंशति क्रमसे वर्णोको कहा है वही दंड दंडपारुप्य पणान् दाप्यः तथा तव्ययं दाप्यः ॥ प्रकरणमें राजा कमसेदे-जो मनुष्य कल ता०भा०- पराई भीतके मुद्गर आदिसे हके समय जिस द्रव्यको हरले उसको फाडने और विदारण (छेदन ) और भेदन लोटादे और उससे दूना दव्य चोरी करनेके करने में पांच दश वीस पणका दंड क्रमसे अपराधसे दे। जानना और भीतके गिराने में तो ये सब भावार्थ- बहुतसे मनुष्य एकको मार दंड मिलाकर समझने और स्वामीको भीत उनको पूर्वोक्त दंडसे दूना दंड होता है बनाने के लिये व्यय (धन) भी दे ॥२२३॥ कलहके समय जो द्रव्यको चुरावे वह उसको और उससे दूने दंडदे॥ २२१ ।। दुःखोत्पादिगृहेद्रव्यक्षिपन्प्राणहरंतया । पोडशायःपणान्दाप्योद्वितीयोमध्यमंदमम् १ वारपारुष्ये य एवोक्तः प्रातिलोम्यानुलोमत: स एव दडपाइये दाप्यो राज्ञा यथाक्रमम् । पद-दुःखोत्पादिरगृहे द्रव्यं २ क्षिपनर दा - २३ (३५४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्राणहरं २ तथाऽ-पोडश२आद्यः २ पणान २ पेक्षा सुनी हुई द्वित्व संख्याकेही अभ्यास दाप्यः १ द्वितीयः १ मध्यमं२ दमं२॥ ( वारंवार.) स्वीकार ( बढाने )हे दंडकी योजना-गृहे दुःखोत्पादि तथा प्राणहरं अधिकताका संपादन करना श्रेष्ठ हैं-इससे द्रव्यं क्षिपन् यो भवति तयोः मध्ये आद्यः | सब निर्दोष है ।। पोडश पणान् द्वितीयः मध्यमं दमं दाप्यः । भावार्थ-अजा आदि क्षुद्र पशुओंको ता भाल-दुःख पैदा करनेवाले कंटक दुःख देने रुधिर निकासने शौंग काटने आदि द्रव्यको पराये घरमें जो फैकै उसे और अंगके छेदनमें द्विपण आदि क्रमसे सोलह पणका और प्राण हरनेवाले विष सर्प दंड देने ॥ २२५ ॥ आदिको जो फेके उसे मध्यम साहसका लिंगस्थच्छेदनेमृत्योमध्यमोमूल्यमेवच | दंड गजादे॥ २२४ ॥ महापशूनामेतेपुस्थानेपुद्विगुणोदमः॥२२६ दुःखेचशोणितोत्पादेशाखांगच्छेदनेतथा । पद-लिंगस्य ६ छेदने ७ मृत्यौ ७ मा.) दंडक्षुद्रपशूनांतुद्विपणमभृतिःक्रमात्र२२५ मः ९ मूल्यं १ एवs- च:- महापशूना : ६ पद-दुःखे ७ च:-शोणितोत्पादे ७शाखां- एतेषु ७ स्थानेषु ७ द्विगुणः १ दमः १॥ गछेदने ७ तथा:- दंडः १ क्षुद्रपशूनां तु: योजना-तेषां लिंगस्य छेदने-मृत्यौ देम. द्विपणप्रभृतिः १ क्रमात् ५॥ ध्यमसाहसो दंडो भवति चपुनः तन्मूई न्य योजना-तुपुनः क्षुद्रपशूनां दुःखे शोणि- | दातव्यं-महापशूनां एतेषु स्थानेषु सता दिन तोत्पादे तथा शाखांगछेदने क्रमात् द्विपण- गुणो दमो दाप्यः । प्रभृतिः दंडी भवति ॥ ता भा०-और उन क्षुद्र पशु ओंके लिंग- तात्पर्यार्य-अना अवि मृग आदि क्षुद्र छेदन ओर मारनेमें मध्यम साहस दंड और पशुओंकी ताडनाके विषे दुःख करने रु- स्वामीको मोलका देना होता है यदि गौ हस्ति घिर निकालने शाखा अर्थात् जिनमें प्रा- अश्व आदिका ताडन-रुधिर निकासना णोंका संचार नहो ऐसे सींग आदि अंगोंके | आदि किये जांयतो पूर्वोक्त दंडसे दूना दंड छेदन करनेमें दोपण आदि दंड समझना- मानना।।२२६ ॥ अर्थात् जिस दंडमें दोपण हों उसे द्विपण मरोहिशाखिनाशाखास्कंघसर्व विदारणे । कहते हैं-वह जिस दंड समुदायकी आदि- मेंहो वह द्विपणप्रभृति कहाता है और वह उपजीव्यमाणांचविंशदिगुणोदमः२२७० दंडं समुदाय दोपण-चारपण-छःपण-आठ पद-प्ररोहिशाखिनां ६ शाखास्कंध- पण समझना और दोपण-तीनपण-चारपण सर्वविदारणे ७ उपजीव्यगुमाणां ६.चा- पाचपण आदि न समझना- कदाचित् कोई विंशतः ६ द्विगुणः १ दमः १ ॥ शंका करें कि यह क्यों न समझना और वही योजना-अरोदिशाखिना चपुनः उपगी- पयों समझना तो उसका समाधान कहते हैं । व्यगुमाणां शाखास्कंधसर्वविदारणे विंशतेः अपराधकी अधिकतासे पहिले दंडसे । द्विगुणः मः यथाक्रमं ज्ञेयः ।। तीन दंड भत्यंत अधिक जाने जा तात्पर्याय-जिन वृक्षोंकी शाखा प्रये तह-और उस दंढमें द्विपण शब्दमें विना (मंकुर ) वाली होती है अर्थात् काटकर सुनी त्रित्व३ आदि संख्याक स्वीकारकी अ-! लगानेसे जिनकी शाखा प्रतिकांड लगकर 1
व्यवहाराध्याय दंडपारुप्यप्रकरण १९
(३५५)
.
हरी रहती हैं और फल फूल देती हैं ऐसी सीमा-पुण्य (पवित्र) इनमें उत्पन्न हुये
शाखाबाले वृक्ष (वट आदि) प्ररोहि शा- | स्थान-देवमंदिर-और पीपल पलाश आदि
खो कहाते हैं-उनकी शाखाके छेदनमें-और प्रसिद्ध वृक्ष-इनकी शाखा आदिके छेदनमें
जिससे मूल शाखा निकसती हैं उस | पूर्वोक्त दंडसे दूना दंड जानना॥२२८ ॥ .
स्कंध ( गद्दा) के छेदन में और समूलवृक्ष- | गुल्मगुच्छापलताप्रतानीषधिवीरुधाम् ।।
के छेदनमें-और जिनसे जीविका होती है पूर्वस्मृतादर्द्धदंडास्याने पूक्तेपुकर्तने२२९॥
ऐसे आन आदि वृक्षोंकीभी शाखा आदिके
छेदनमें-क्रमसे वीस पणसे लेकर पूर्वरसे
पद-गुल्मगुच्छापलताप्रतानौपंधिवीरुधा
उत्तर २ दंड दूना जानना अर्थात् वीसपण- म् ६ पूर्वस्मृतात् ५ अर्थदंडः १ स्थानेषु
उक्तेषु ७ कर्तने ७ ॥
चालीसपण-अस्सीपण-दंड शाखा-स्कंध
योजना- गुल्मगुच्छापलतामंतानोपधि:
सब वृक्षके छेदनमें क्रमसे जानना-और
वीरुधाम् उक्तेषु स्थानेषु कर्तने सति पूर्व-
1 वृक्ष जीविकाके दाता नही है वा प्ररोहि
शाखीभी नही हैं उनमें दंडकी कल्पना अ-
स्मृतात् अर्धदंडः ज्ञेयः-
तात्पर्या-जिनकी बहुत लंबी और स-
पनी बुद्धिसे करनी ।।
घन लता न हो ऐसे मालती आदि गुल्म-
भावार्थ-जिनकी शाखा लगानेसे दूसरा और जो वल्लीरूप न हों ऐसे प्रायः सरल
वृक्ष होजाय-और जिनसे जीविका हो ऐसे नहोंने कुरंड आदि गुच्छ-और जो प्रायःस-
वृक्षांकी शाखा स्कंध और सब वृक्षके छेद्- | रलहों ऐसे करवीर आदि क्षुप-और दीर्घ
नमें वीस-चालीस-अस्सीपण दंड क्रमसे । (लंबी) चढनेवाली द्राक्षा आदिलता-
जानना।।२२७॥
और कांड प्ररोहसे रहित हों और सरल
चैत्यश्मशानसीमासुपुण्यस्थानेसुरालये । जांय वे सारिवा आदि प्रतान और फलके
सातदुर्माणांद्विगुणोदमोवृक्षेपुविश्रुते।२२८ पकनेतक जो रहे थे प्रीही आदि ओषधि-
पद चैत्यश्मशानसीमासु ७ पुण्यस्था- जमजाय वे गिलोह आदि वीरूध- कहाते हैं
और जो छेदन करनेसेभी अनेक प्रकारसे
ने ७ सुरालये ७ जातह्रमाणाम् ६ द्विगुणः१
इनका पूर्वोक्त शाखा आदि स्थानों में छेदन
दमः १ वृक्षे ७ अथ:-विश्रुते ७॥
करनेवाले मनुष्यको पूर्वोक्त दंडसे आधा दंड
योजना-चैत्यश्मशानसीमासु-पुण्यस्थाने-जानना ॥
सुरालये-जातद्माणां-अथ विश्रुते वृक्षे-
भावार्य-गुल्म-गुच्छ-शुप-लता-प्रतान-
द्विगुणः दमः ज्ञेयः-
औषधि-धीरुप इनकी शाखा आदिके छेदन
ता. भा०-चैत्य ( चबूतरा) मश्शान- | करनेमें पूर्वोक्त दंडसे आधा दंड जानना२२९
.
.
इति दंडपारुष्यप्रकरणम् ॥ १९॥
(३५६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अथ साहसप्रकरणम् २० उसका लक्षण नारदेनही स्पष्ट रीतिसे कहा है कि वह साहस फिर प्रथम मध्यम उत्तम सामान्यद्रव्यप्रसभहरणारसाहसंस्मृतम् । भेदसे तीन प्रकारका जानना उनका लक्षण तन्मूल्याद्विगुणोदंडोनिदेवतुचतुर्गुणः२३० | शास्त्रोंमें पृथक्र कहा है-फल मूल जल आदि और क्षेत्रकी सामग्री-इनके भंग पद-सामान्यद्रव्यप्रसभहरणात्५साहसं १ स्मृतम् १ तन्मूल्यावर द्विगुणः १ दंडः १ प्रथम साहस होता है और वस्त्र पशु अन्न आक्षेप उपमर्दन (मलदेना) आदि करने में निवे ७ तु:-चतुर्गुणः ॥ १॥ पान घरकी सामग्री इनके भंग आदि करने में योजना-सामान्यद्रव्यप्रसभहरणात् साहसं मध्यम साहस कहा है-और विष और स्मृतम् तन्मूल्यात् द्विगुणः दंडः भवाति- शस्त्र आदिसे मारना पराई स्त्रीका स्पर्श तुपुनः निहवे चतुर्गुणः भवति। (संग) और जो अन्य प्राणोंका उपरो)- तात्पार्यार्थ- -अब साहस नाम विवादपदके | (नाश) करनेवालाहो यह उत्तम साहस व्याख्यान करनेकी इच्छासे प्रथम साहसका होता है-उस साहसका दंड यह है- कि लक्षण कहतेहैं-सामान्य ( साधारण ) प्रथम साहसका दंड कमसे कम सौ पण- द्रव्येक वा इच्छाके अनुसार दानके अयोग्य और मध्यम साहसका पांच सोपण-और पराये द्रव्य के बलसे हरनेसे साइंस कह उत्तम साहसका दंड कमसे कम सहस्रपण जाता है यह बात कही समझो कि राजाका इष्ट है और वध (फांसी ) सर्वस्वका हरण- दंढ और जनोंकी निंदा इनको लंघकर- पुरसे निकासना-चिह्नका करना और अप- राजपुरुपसे भिन्न जनोंके सामने जो कुंछ । गधीके अंगका छेदन यह दंड उत्तम साह मारण-पराई स्त्रीका प्रधर्षण (प्रहण ) आदि समें कहा है-यहां वध आदि अपराधी जो कियाजाय वह सब साहस होता है यह | तारतम्य (न्यून अधिक )से उत्तम साहसमें साहसका सामान्य लक्षण है-इससे साधा- पृथक्र वा समस्त देने योग्य है-चुरायेहुये रणधन-परधन इनकेभी पलसे हरणको | द्रव्यके मोलसे दूनादंड-और जो मनुष्य करें तो साहस कहा जाता है-नारदनेभी | साहस करके निदव (छिपाना ) करें कि मैं साहसके स्वरूपका विवरण किया है कि साहस नही करा उसको मोलसे चोगुना दंड पलके अभिमानसे जो कुछ कर्म किया होता है-इसी विशेष दंडके कहनेसे प्रथम जाता है वह साइस कहा है क्योंकि साहस- पदमें सहका अर्थ वल कहा है-सो यह तत्पुनसिविध ज्ञेय प्रयम मध्यम तया। उरामं साइस चोरी-वाक्पारुष्य-दंडपारुष्य-स्त्री- चेति शास्त्रेषु तस्योक्त लक्षणं पृथक् । फलमूलोदका- संग्रहण-इनमेंभी है तोभी बलके अभिमान- दीना क्षेत्रोपकरणस्य च । भंगाक्षेपोपमधः प्रथम रुप उपापिसे भिन्न होता है इससे दंडकी साहसं स्मृतम् । यासः पश्चन्नपानानां गृटोपकरणस्य भधिकताके लिये पृथक् कहा है-उसके | पिया परदाराभिमर्शनम् । प्राणोपरोधि यथान्य प! एतेनैव प्रकारेण मध्यम साइस स्मृत व्यापादी दोंकी विचित्रता कहनेके लिये प्रथम दस मुत्तमसाहस । तस्यदण्डःक्रियाशेषः प्रथमस्य शता साहस आदि भेदसे तीन प्रकार कहकर | वासामध्यमस्य तुमानजट: पशवायर उत्तम सहसा रियो फर्म यतिथिन्मपितः। तन्मा रणः एहसास इप्यते । यधः सास्वहाण पुगनिर्ग समिति प्रो. रादो ममिहोच्यते । सनापने । सदंगोरे इत्युनो एंट एसमसाइने ।
व्यवहाराध्याय साहसमकरण २० (३५७) साहस आदिका जो दंड है वह चागते योजना-अाक्रोशातिक्रमकृत- भ्रात भिन्न विषयमें है यह जानागया ॥ भायांप्रहारदः-चपुनः संदिष्टस्य अमदाता- भावार्थ-साधारण द्रव्यके वलसे चुराने में समुद्रगृहभेदकृत्- सामंतकुलिकादीनां अप- साइस कहा है-उस चुराये द्रव्यके मोलसे कारस्य कारक:- यः अस्ति एषां दंड: दूनादंड स्वीकार करनेमें-और चुराकर पंचाशत्पणिकः भवति- इति विनिश्चयः ॥ छिपाने में अर्थात् न माननेमें मोलसे चौगुना ताभावार्थ-पूजनेयोग्य आचार्य आदिका दंड होता है।। २३० आक्रोश (निंदा) और आज्ञाका अवलंघन यःसाहसंकारयतिसदाप्योद्विगुणंदमम् । जो कर-और भ्राताकी स्त्रीको जो ताडना दे और देनेकी प्रतिज्ञाकिये धनको जो यश्चैवमुक्त्वाइंदाताकारयेत्सचतुर्गुणम् ॥ नदे-और जो मुद्रित (वंद) घरको खोले- ( पद-यः १ साहसं२ कारयति क्रि-सः १ और अपने घर खेत आदिसे मिलेहुये पर दाप्यः १ द्विगुणं२ दमम: १ चा-एक- | और क्षेत्रके स्वामीयोंका और अपने उक्त्वा अई१ दातार कारयेत् कि- सः १ / कुलके मनुष्योंका और आदिपदसे अपने चतुर्गुणम्॥ ग्राम और देशके मनुष्योंका जो तिरस्कार योजना-या साहसं कारयति-सः द्विगुणं | करै-इन सबको पचास पणका दंड होता दम-चपुनः यः अहं दास्यामि एवं उक्त्वा है-यह निर्णय है।। २३२॥ २३३ ।। कारयेत् सः चतुर्गुणं दाप्यः (दंडयः) स्वच्छंदंविधवागामीविकुष्टेनाभिधावकः । ता भावार्य-जो मनुष्य साहसकर ऐसे कारणेचविकोप्टाचंडालश्चोत्तमान्स्पृशेत्। .कहकर साहस कराता है वह साहससे दूना- दंडदेने योग्य होता है-और जो मैं तुझे पद- स्वच्छंदं २ विधयागामी १ विकष्टे धन दूंगा तू साहसकर ऐसे कहकर साहस ना-अभिधावकः १ अकारणे ७ चा-विक्रो- कराता है वह साहससे चौगुने दंडके योग्य | टा १ चंडालः१ चा उत्तमान स्पृशेत् क्रि- होता है क्योंकि उसका अपराध अधिक शूद्रप्रवनितानांचदेवेपित्र्येचभौजका ह॥ २३१॥ अयुक्तंशपथंकुर्वन्नयोग्योयोग्यकर्मकृत् ॥ अाक्रोशातिक्रमकदाभायामहारदः । पद-शद्रप्रप्रणितानां६चा-देवे पिये संदिष्टस्यामदाताचसमुद्रगृहभेदकृत् २३२ चा भोनकः १ अयुक्त २ शपर्य २ फुर्वन् । पद-अभ्यकिोशातिक्रमकृत् १ भ्रातृभार्या अयोग्यः १ योग्यकर्मकृत् १॥ प्रहारदः १ संदिष्टस्य६ अमदाता १ च वृपक्षुद्रपशुनांचपुंस्त्वस्पप्रतियातत् । समुद्रगृद्दभेदकृत् ॥ साधारणम्यापलापीदासीगर्भविनाशकृत् ॥ सामंतकुलिकादीनामपकारस्यकारकः । पद-वृषसुद्रपशूनां ६ च-पुंस्वस्य ६ पंचाशत्पणिकोदंडएपामितिविनिश्चयः ॥ प्रतिपातक १ साधारणस्प ६ अपलापीर दासीगर्भविनाशकृत् ॥१॥ पद-सामंतकुलिकादीनां ६ अपकारस्प ६ कारकः १ पंचाशत्पणिकः १ देहः १ ६ पितापुत्रस्वसभापदंपत्याचार्यशिष्यकाः । इति-विनिश्चयः १॥ एपामपतितान्योन्यत्यागीचशतदहमा ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
पद-पितापुत्रस्वसृभ्रातृदंपत्याचार्यशिष्य- ( झूटा ) आक्रोश करे-जो चांडाल-ब्राह्मण
काः १: एषां ६ अपतितान्योन्यत्यागी १ आदि उत्तम वाका स्पर्श कर-जो दिगंबर.
चई-शतदंडभाक् १॥
आदि शद्र. संन्यासियोंको देव और पित-
योजना-यः स्वच्छंदं विधवागामी-विकुष्टे रोके कर्ममें भोजन करावे-जो अयुक्त
सति न अभिधावकः चपुनः अकारणे | (मैं माताका गमन करूं इत्यादि ) शपथ
'विक्रोष्ट-चपुनः यः चंडालः उत्तमान् करें- और जो शूद्र आदि अयोग्य मनुष्य
स्पृशेत-चपुनः शूद्रप्रजितानां देवे चपुनः | वेदपठन आदि योग्य कर्मको करे और
पित्ये (कर्माण ) भोजक:-अयुक्तं शपथं | जो बैल क्षुद्रपशु ( अज आदि ), इनके
'कुर्वन्-यः अयोग्यः योग्यकर्मकृत्-चपुनः पुंस्त्व (संतान पैदा करनेकी शक्ति) का
वृपक्षुद्रपशूनां पुंस्त्वस्य प्रतिघातकृत्- | नाश करें-जहां वृक्षक्षुद्रपशूनां यह पाठ है
साधारणस्य अपलापी- दासीगर्भविनाश- वहां यह अर्थ करनाकि हिंगु आदि औपथके
कृत-चपुनः ये पितापुत्रस्वसभ्रातृदंपत्या- | प्रयोगसे जो वृक्षोंके फल फूल गिरावे-जी
'चार्यशिप्यकाः संति- एषां अपतितान्योन्य साधारण द्रव्यका अपलाप करे ( ठग)-
'त्यागी सः शतदंडभाक्-भवतीतिशेषः ॥ और जो दासीको गर्भका पात करावे-और
तो० भावार्थ-और नो स्वच्छंद होकर जो अपतितही पिता-पुत्र-भगिनी-भ्राता-
(नियोग विना अपनी इच्छासे ) विधवाके स्त्री-पुरुष-आचार्य-शिष्य-इनका परस्परका
'संग गमन कर और जो चोगक भयसे त्याग करें-ये सब एक २ के प्रति सौपण
कोई आक्रोश (खुलावे:) करे और समर्थ दंडके योग्य होते हैं।२३४॥२३५।।२३६।।
होकर उसके समीप न दो-और जो वृथा ! २३७॥
..
इतिसाहसप्रकरणम् ॥२०॥
व्यवहाराध्याप निर्थेजकादीनां दण्डकथनम् । (३५९) . निर्णेजकादीनां दण्डकथनम्। वस्त्रका मूल्यसे अठवा भाग हीन (कम ) वमानस्वीपणान्दव्योनेजकस्तुपरांशुकम् । होता है दीवार धोनेमें दोपाद-तीनवार धोने में तीन भाग-चारवार धोनमें आधा नष्ट विक्रयावक्रयाधानयाचितेपुपणान्दश २३८ हो जाता है- आधे नाशते पीछे एक २ वार पद-वसानः १ त्रीन् २ पणान् २ दंड्यः धानेमे क्रमसे एकरपाद कम हो जाता है जब नेजकः १ तुः-परांशुकम् २ विक्रयावक्र- | उसकी दशा (छोर) जर्णि होगई होय तो याधानयाचितेषु ७ पणान् २ दश २॥ वस्त्र जर्णि कहाता है-जीर्णके क्षयका नियम योजना-तुपुनः परांशुकं वसानः नेजकः | नहीं है-तात्पर्य यह है कि आठ पणसे मोल सौन् पणान्- विक्रयावक्रयाधानयाचितेषु- | लिया वस्त्र एक वार धोया जाय और उसको कृतेषु दश पूणान्-दंडयः भवतीति शेषः- | धोबी नष्ट करदे तो अष्टम भागसे हीन तात्पर्यार्थ-साहसके प्रसंगसे साहसके तुल्य अपराधोंमे निर्णेजक आदिको दंड कहते (सातपण) मूल्य धोवीदे-और दीवार धुला ह-नेजक (धोबी) यदि धोनके लिये अ- वस्त्र होयतो पादसे हीन-तीनवार धुला पण किये पगये वस्त्रोको स्वयं आच्छादन | होयतो तीन भागसे होन-चार वार धलेका कर (पहने ) तो वह तीन पण दंड देने | आधा भाग--अर्थात चारपण दंड धोवीदे- यो य होता है और जो नेजक उन वस्त्रोंका | तिससे परे प्रत्येक धुलाईमें शेष वस्रके मो- विक्रय को वा अवक्रय ( भाडेपर ) इस | लको एकर पाद घटार करदे-इतने वह वस्त्र गतिसे देकि इतने कालपर्यंत उपभागके लिये | जीर्ण नहो-और जीर्ण वस्त्रको नष्टकर देतो वस्त्राके देताहूं तू मुझे इतना धन दौजियो- वहां अपनी इच्छासे मोल देनेकी कल्पना अथवा जो मेजक वस्त्रोको आधि (गिरवी)। राजा करले ॥ रखदे और अपने मित्रोंको याचित (मांगे) भावार्थ-धोबी पराये वस्त्रोंको धारण करें देदे उस धोबीको प्रति अपराध दश पणोंका दंड राजादे और नेजक उन वस्त्रोको चिक- (पहने ) तो तीन पण दंड-और येचे-वा संभलके पट्टेपर धौव-पाषाण पर न धोवै- भाडेपर दे अथवा गिरवी रक्खे और मांग आर उनका व्यत्यास (बुदलना )भी न देतो दशपण दंड-देने योग्य होता है।२३८ करे-और न अपने घरपर रखै-इस पूर्वोक्त- पितापुत्रविरोधेतुसाक्षिणांत्रिपणोंदमः से अन्यथा कर तो दंड देने योग्य है क्योकि अंतरेचतयोर्यःस्यात्तस्याप्यष्टगुणोदमः ॥ मनु (अ.८श्लो. ३९६)का वचन है कि सेंभुलके चिकने पट्टे पर धोबी वस्त्रोको पद- पितापुत्रविरोधे ७ तु:- साक्षिणां धावे और दूसरेके वस्त्रोंम वस्त्रोकोन मिलावै त्रिपणः १ दमः१ अन्तरे७ च - तयोःक्ष्यः१ और न अपने घर में रखें- और जो धोबी | स्यात क्रि-तस्य६ अपि-अष्टगुणः१ दमः२ प्रमादसे वस्त्रोंको नष्ट करता है उसके नार- दैका कहा दंड जानना- कि एकवार धोये योजना- तुपुनः पितापुत्राविरोधे साक्षि- णां त्रिपणः दमः भवति-चपुनः यः तयोः १ शाल्मले फलके वक्ष्णे निज्याद्वासासि नेजकः । अन्तरे स्यात् तस्य अपि अष्टगुणः दमः न च वामामि वासोभिनिहरेन्न व नामयेत् । २ मूल्याष्टभागो हीयेत सादौतस्य वाससः द्विपा । ज्ञेयः ॥ दग्निस्तृतीयांशधतुतिर्धमेवच । अर्धक्षयानु परतः ता. भाः-पिता पुत्र के विरोधमें जो मनु- पादचापचयः क्रमात । यावक्षीणदशं जीणे जीर्णस्या । प्य साक्षी होना स्वीकार करता है और उनक कलहका निवारण नहीं करता वह नियमः क्षयः।
(३६.)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
तीन पण दंड-और जो उनके पण सहित पद-अकूटर कूटकर व्रते कि-फूटर यः१
विवादमें पण दिवानेका प्रतिभू (जामिन) च:-अपि अकूटकर सः १ नाणकपरीक्षी१
होता है और चकार पढनेसे जो उनके क- | तु:-दाप्यः १ उत्तमसाहसम्२॥
लहको वढाता है वह तीन पणसे आठगुना योजना-यः अकूट कूटकं ब्रूते चपुनः
(२४ पण ) दंड देने योग्य होता है-स्त्री | कूटं अपि अकूटकं ब्रूते-सः नागकपरीक्षी
पुरुष आदिके विरोधमेंभी यही दंड स- उत्तमसाहसं दाप्यः (दंडनीयः)-
मझना.॥ २३९ ॥
ता भावार्थ-जो नाणकको परीक्षा करने-
तुलाशासनमानानांकूटकृन्नाणकस्यच । वाला (जोहरी ) तांबामिले द्रुम्म आदि
एभिश्वव्यवहर्तायःसदाप्योदममुत्तमम् ॥ कूट नाणकको अकूट (श्रेष्ठ ) और श्रेष्ठको
पद-तुलाशासनमानानां ६ कूटकृत् १ फूट (मिलावट )का कहता है वह उत्तम
नाणकस्य६ च-एभिः ३ चः- व्यवहौ १ साहस दंडदेने योग्य होता है ॥ २४१ ।।
यः१सः १ दाप्पः १दम उत्तमम् ।। भिषड्मिथ्याचरन्दंव्यस्तिर्यक्षुमयमंदममा
योजना-यः 'तुलाशासनमानानां चपुनः मानुषेमध्यमराजपुरुषेपूत्तमंदमम्॥ २४॥
नाणकस्य फूटकृत्-चपुनः यः एभिः व्यव-
पद-भिषकी मिथ्याऽ-आचरन् १दंड्यः।
इतः अस्ति सः उत्तमं दमं दाप्यः।। तिर्यक्षु७ प्रथम२ दमम्२. मानुपे७ मध्यम
तात्पर्यार्थ-तुला (तोलनेका दंड ) और गजपुरुषेषु उत्तमर दमम् २ ॥
पूर्वोक्त शासन (शिक्षा) प्रस्थ द्रोण आदि योजना-तिर्यक्षु मिथ्या आचरन् भिषक
तोलनेकी वस्तु-और गज़मुद्रासे अंकित प्रथमं दम-मानुपे मध्यम-राजपुरुषेषु उत्तम
द्रम्म निष्क आदि नाणक इन सबको जो दम-दंडयः-भवतीति शेषः ॥
फूट करता है अर्थात देशमें प्रसिद्ध परि-! तात्पर्याय-जो वैद्य आयुर्वेदको न जान-
माणसे न्यून या अधिक रूपसे अन्यथा :
कर जीविकाकेलिये मैं चिकित्सा करना
करता है-अथवा द्रव्य आदिको ऐसी
मुद्राको करे जो व्यवहारमें प्रचलितनहो वा जानताई ऐसा समझकर तिर्पक (पशु)
दम्म भादिके गर्भमें तांया आदि करता मनुष्य और रानाके पुरुष इनकी चिकित्सा
है और जो मनुष्य जानकर फूट उन पूर्वा (इलाग) करता है वह कमसे प्रथम-मध्यम-
तोस व्यवहार करता है वे दोनों उत्तम मभी तिर्यक आदिमें मोलके विशेषसे-मनु-
उत्तम-साहस दंट देने योग्यहोता है-उस-
साइस इंटदेने योग्य होते है।
प्यों में वर्णके विशेषसे और राजपुरुषाम
भावार्य-तोल- राणाका शासन मान राजांक समीपकी विशेषतासे दंडकी न्यूनता
(पाट आदि) नाणक-इनको जो फूट भार अधिकता जाननी ।।
करता है और मो पटरप इनसे व्यवहार
रता है ये दोनों इतम साहस दंदने
भावार्य-पद्य तिरच्छी योनियों में और
पोप होत ६॥ २४०॥
मनुष्यामे- आर रागकि पुरुषमि-मिभ्या
मिकितसा (छूटी हिकमत ) कर तो क्रम
प्रथम साहस-मध्यम साहस-उत्तम साइस
देश देने योग्य होता ॥ २४२॥
व्यवहाराध्याय निणेजकादीनां दंडकथनम् । ममू॥ - अवध्ययश्चवनातिवद्धयंश्चममुंचति । पद- भेषजम्नेहलवणगंधधान्यगुडादिषु ७ अप्राप्तव्यवहारंचसदाप्योदममुत्तमम्२४३ पण्येषु ७ प्रक्षिपन् १. हीन २ पणान् २ दाप्यः १ तुर-षोडश॥ पद-अवध्यं यः १ चा-बधाति क्रि- बर्द्ध२ यः १ च - प्रमुंचति क्रि- अप्राप्त- गुडादिषु पश्येषु हीन प्रक्षिपन् वणिक योजना-तु पुनः भेषजस्नेहलवणगधधान्य- व्यवहारं२ च:- सः १ दाप्यः १ दमर उत्त-) पोडश पणान् दाप्यः (दंड्यः ) ॥ योजना-या अवध्यं बघ्राति-चपुनः यः ताभावार्थ-भेषज (औषध) घृत आदि बद्धं-चपुनः अप्राप्तव्यवहारं प्रभुंचति सः स्नेह-लवण-उशीर-चंदन आदि गंध द्रव्य उत्तमं दमम् दाप्यः (दंडयः)॥ अन्न-गुड-और आदि शब्दसे होंग मिरच ताभावार्थ-जो मनुष्य बंधनके अयो- आदि-इन पण्य द्रा में जो हीन (असार) ग्यको बांधता है और बंधेहुयेको और द्रव्य मिलाकर विक्रय करता है वह सोलह जिसका व्यवहार समाप्त न हुआहो उसको १६ पण दंडदेने योग्य होता है।। २४५ ॥ छोडता है वह उत्तम साहस दंडदेने योग्य मृचर्ममणिसूत्रायःकाष्ठवल्कलवाससाम् ॥ २४३ ॥ अजातजातिकरणेविकेयाष्ठगुणोदमः२४६ मानेनतुलयावापियोंशमष्टमकहरेत् । पद- मृच्चर्ममणिसूत्राय काष्ठवल्कलवास- दंडंसदाप्योद्विशतंवृद्धौहानीचकल्पितम् ।। | साम् ६ अजाती ७ जातिकरणे ७ विक्रे- याप्टगुणः १दमः१॥ पद-मानेन३ तुलया३ वा:-अपि:-यः१ अंशंर अष्टमकर हरेत् कि-दंड२ सः? योजना- मृचर्ममणिसूत्रायःकाटवल्कल दाप्यः १ द्विशतं २ वृद्धो ७ हानी ७ चा वाससाम् अजातो जातिकरणे विक्रेयाष्ट कल्पितम् २॥ गुणः दमः (दंडः ) ज्ञेयः॥ योजना-यः मानेन वा तुलया अपि अष्ट- तात्पर्यार्थ-जिसकी बहुत मोलकी जाति मक अंशं हरेत् सः द्विशतं दमं चपुनः नहो उस मिट्टी चर्म आदिको अजाति कहते वृद्धी हानो कल्पितं दम दाप्यः ।। हैं उस मिट्टी-चाम- मणि-सूत- लोहा- ताभावार्थ-जो व्यापारी नीहि और काठ-चक्कल-वस्त्रमें जातिको जो कर अर्थात् कपास आदि पण्य (विकने योग्य ) दव्य गंधवर्ण और अन्य रसके संचार (मिलावन) अष्टम अंशको कूटमान (काट आदि) वा से अधिक मोलकी जातिके सदृश करे- कूट तुलासे या किसी अन्य प्रकारसे हरता । जैसे चमेलीको सुगंधको मिलाकर मिट्टीम है अर्थात् कम देता है वह दोसो पण दंड । सुगंध आंवलावताना-बिलावके चममें उत्तम और चुराये द्रव्यकी वृद्धि वा हानिमें जो वर्ण बनाकर व्याघ्रका चर्म बताना स्फटिक दंड कल्पितहो वह दंड देने योग्य होता' मणिमें अन्यके रंगको मिलाकर पराग हे ।। २४४ ॥ । कहना-कपासके सूतमें गुणकी अधिकता बनाव पसूत (रेशम) बताना-काले भैषजस्नेहलवणगंधधान्यगुहादिपु । लोहेमें उत्तम वर्ण करके चांदी 'बताना-चे- पण्येधुप्रक्षिपन्हीनंपणान्दाप्यस्तुपोडश ॥ ! लके काठमें चंदनको सुगंध मिलाकर चंदन . . - (३६२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - बताना-ककोलको त्वचारूप लौंगवताना कृत्रिम ( बनी.) करके आधि रखता है वा कपासके वस्त्र में श्रेष्ठ गुणकारंग मिलाकर को- विक्रय करताहै उसके दंडकी कल्पना यह शेय (रेशम ) बताना इन सब अजातिके जाननी कि यदि कृत्रिम कस्तूरी आदिका जाति करनेमें विक्रय करने (वेचने योग्य | मोल पणसे न्यून होय तो उसके, विक्रय बनाये द्रव्यका आठगुना दंड जानना अर्थात् आदि करनमें पचासपणका दंड होता है उत्तमसे आठगुना समझना ॥ और यदि पणही मोल होयतो सो पण दंड- भावार्थ-मिट्टी-चाम-मणि-सूत-लोहा- दो पणमोल होय तो दोसौ पण दंड काठ- वक्कल-वस्त्र इन अजाति (अल्पमोल) होता है इस प्रकार मोलकी वृद्धिमें दंडकी- के को जो जाति (अधिकमोलके ) करे | भी वृद्धि जाननी॥ उसको विक्रयके योग्य द्रव्यके मोलसे भावार्थ-जो मनुष्य दकीहुयी पिटारीको आठगुना दंड होता है ॥ २४६ ॥ बदलकर देता है अर्थात अन्य दिखाकर समुद्रपरिवत चसारभाडंचकृत्रिमम् । अन्यको देता है और जो कस्तूरी आदि आधानविक्रयवापिनयतोदंडकल्पना२४७ | सारभांड (उत्तमद्रव्य )को कृत्रिम वनाव।। आधि वा विक्रय करता है उसका दंड २ पद-समुद्र परिवर्त १ च- सारभांड २ है कि कस्तूरी आदिका मोल पणसे * च- कृत्रिमं २ आधानं २ विक्रयं २ वाऽ- होय तो पचास पणका दंड- पण मोद अपि-नयतः ६ दंडकल्पना १॥ होयतो सौ पण दंड, दो पण मोल होय) भिन्नपणेतुपंचाशपणेतुशतमुच्यते तो दोसो पण दंड होता है- इसी प्रकार द्विपणोद्विशतेदंडोमूल्यवृद्धीचवृद्धिमान् ॥ | मोलकी वृद्धिमें दंडकी वृद्धि जाननी॥२४८॥ पद-भिन्न ७ पणे ७ तुः-पंचाशतर पणे संभूयकुर्वतामसवाधंकारुशिल्पिनाम् । तु:- शतं १ उच्यते कि-द्विपणे द्विशतं १ अर्घस्यहासंवृद्धिंवाजानतोदमउत्तमः२४९ दण्डः १ मूल्यवृद्धी ७ च वृद्धिमान् १॥ पद-संभूया- कुर्वतां ६ अर्थ २ सवारी योजना- समुद्रपरिषर्त चपुनः कृत्रिमं कारुशिल्पिनाम् ६ अर्घस्य ६ हासं २ वृद्धिार सारभांडं आधानं विक्रयं वा नयतः पुंसः वा-जानतां ६ दमः १ उत्तमः १ ॥ इयं दंडकल्पना ज्ञेया पणे भिन्ने (न्यूनपण- योजना-अर्षस्य हासं वा वृद्धि जानता मूल्ये ) सति पंचाशत्पणः पणे (पणमूल्ये) कारुशिल्पिना अर्घ संभूय सबाधं कुर्वतां शतं द्विपणे द्विशतं दंडः एवं मूल्यवृद्धा उत्तमः दमः ज्ञेयः॥ घृद्धिमान् दंडः ज्ञेयः ।। तात्पर्यार्थ- मुद्नाम पिधान (टकना) किय अर्थ (भाव )को न्यूनता और अधि- ता. भावार्थ-जो मनुष्य यजाके नियत- का मुद्से जा युक्तहो उसे समुद्र कहते हैं कताको जानते हुये व्यापारी मिलकर- उसके परिवर्तको जो कर अर्थात् टकेहुये (पिटारी को मोतियोंसे पूर्णको रजक आदि कारु- और चित्रकार आदि दिखाकर अपने हायके लाघव (चतुपई शिल्पी इनकी पीडा करनेवाले अन्य अर्पद से स्फटिकोंके भरेकरंडका समर्पण करताहै। अपने लाभक लोभसे करते हैं वे उत्तम और जो सारमांट ( कस्त्री आदि) को ! साहस दंड देने योग्य होते हैं ।। २४९ ॥
व्यवहाराध्याय निर्णेजकादीनां दंडकथनम् (३६३) स्थापन करे- संभूयवणिजांपण्यमनघेणोपरुंधताम् । को नही कहा है- मनुने (अ.८ श्लो.४०२) विक्रीणतांवा विहितीदंडउत्तमसाइस:२५० तो अर्थ करने में विशेष दिखाया है कि पांच- वेपांचवे दिन वा पक्ष वा मास '२ वीतनेपर पद-संभूय:- वणिजां ६ पण्यं ३ राजा व्यापारियोंके समक्ष (रूबरू) अर्घका अनर्पण ३ उपरुंधताम् ६ विक्रीणतां ६ पा:-विहितः १ दंडः १ उत्तमसाहसः१॥ भावार्थ-राजा जिस अर्घ (भाव)का योजना-अनर्पण पण्यं संभूय उपरुंधता- स्थापन करदे जप्सीसे प्रतिदिन विक्रय वा धामहार्पण विक्रोणतो वणिजां उत्तमसाहसः क्रय करे उससे जो निस्रव (बैट) वही धन दंडः विहितः (मन्वादिभिरितिशेषः) । व्यापारियोंका लाभकारी कहा है ॥ २५१ ।। ता० भा०-जो वैश्य वा व्यापारी मिल- स्वदेशपण्येतुशवणिकगृह्णीतपंचकम् । फिर देशांतरसे आये पण्य (विकनेयोग्य) दशकंपारदेश्येतुयःसद्यःक्रयविक्रयी २५२ ज्यको बाहते हुये अनर्घ (अल्पमोल) महकर विकनेसे रोकते है- अथवा महाऱ्या पद-स्वदेशपण्ये ७ तु:-शतं २ वणिक २ पमहंगा )से वेचते हैं उन सबको उत्तम गृहीत कि-पंचकम् २ दशकं २ पार- साहस दंड मनुआदिकोंने कहा है ॥२५०॥ | देश्ये ७ तु:- यः१ सद्यः- क्रयविक्रयी ॥ राजनिस्थाप्यतेयोपामत्यतन विक्रयः। योजना-यः वाणिक सद्यः क्रयविक्रमी योषानिस्रवस्तस्मादणिजांलाभकृरस्मृतः पारदेश्ये दशकं शतं गृहीत ।। अस्ति सः स्वदेशपण्ये पंचकं शतं-तुपुन: पद-राजनि ७ स्थाप्यते कि- यः १ तात्पर्यार्थ-जो व्यापारी अपने देशमें पैदा अर्घः १ प्रत्यहंा- तेन ३ विक्रयः १ क्रयः१ | हुये पण्य द्रव्यको मोल लेकर शीग्रही ( उ- शा- निस्रकः १ तस्मात् ५ वणिजां ६ / सीदिन ) विक्रय कर वह सोपण पर पांच भकृत् १ स्मृतः ॥ १॥ पण लाभको ग्रहण करै-और जो द्रव्य पर- योजना-गजनि सनिहिते सति यः तेन देशसे आया हो उसके शत पण मूल्यके भर्घः स्थाप्यते तेन प्रत्यहं विक्रयः वा जो व्यापारी कालांतरमें वेचे उसको का- हिसाबसे दश पण लाभको ग्रहण करे-और क्रयः कर्तव्यः तस्मात् निस्रवः वणिजां लकी अधिकताके अनुसार लाभकी अधि- लोभकृत स्मृतः ॥ कता करनी-इससे उस रीतिसे अपने दे- तात्पर्यार्थ-राजाकै समीप रहते जो अर्थ शके पण्यका अर्घ राजा नियत करें जैसे सो (भाव) राजा वा द्रव्यका स्वामी स्थापन पणपर पांच पणका लाभ व्यापारियोंको हो करदें उसी अर्घसे प्रतिदिन क्रय( खरीदना) सके । और विक्रय (वचना)करे और उस अर्थ भावार्थ-उस दिनके लिये पण्यको उसी (भाव से जो स्रव (बडना ) हो अर्थात् दिन विक्रय करनेवाला व्यापारी अपने देश- राजाके किये अबसे जो बढ़े वही व्यापारि- योंका लाभकारी होता है और अपनी १ पंचराने पचरात्रै पक्षे मासे तथा गते । कुर्वीत इच्छासनियत किये अर्घसे लाभ वैश्यों, चैषां प्रत्यक्षमघसस्थापन नृपः ।
(३६४) . याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । के पण्यमें सौपण पर पांचपण और पर दे योजना-पण्यसमुद्भवं व्ययं पण्यस्य शसे आये पण्यमें सौपणपर दशपण ला- उपरि संस्थाप्य केतुः चपुनः विक्रेतः अनु- भको ग्रहण करे ॥ २५२॥ ग्रहकृत् अर्घः राज्ञा कार्यः॥ ता. भावार्थ-देशांतरसे आये पण्यमें पण्यस्योपरिसंस्थाप्यव्ययंपण्यसमुद्भवम् । देशांतरके आने जाने और भांडोंका ग्रहण अोनुग्रहकृत्कार्यक्रेतुविक्रेतुरेवच ।।२५३ और शुल्क आदि स्थानोंमें जो धन व्यय हुआ हो उतने धनको पग्यके मोलमें मिला- पद-पण्यस्य ६ उपरिध-संस्थाप्या-व्ययंर कर जैसे सोपणमें दश पणका लाभ हो उस पण्यसमुद्भवम् २ अर्घः १ अनुग्रहकृत | प्रकार केता और विक्रेताके अनुग्रह करने कार्यः १ केतुः ६ विक्रेतुः ६ एव:-चा-॥। वाले अर्घका स्थाप राजा करे ।। २५३ इति निणेजकादि दंडकथनम् ॥
व्यवहाराध्याय विक्रीयासंप्रदानप्रकरण २१ (३६५) अथ विक्रीयासंप्रदानप्रकरणम् दिये जाते हैं-इस छः प्रकारकेभी पण्यको विक्रय करके जो नदे उसके दंडको कहते गृहीतमूल्यंयापण्यकेतुर्नैवप्रयच्छति । हैं कि ग्रहण किया है मोल जिसका ऐसे सोदयंतस्पदाप्योसौदिग्लाभवादिगागते ॥ | पण्यको विक्रय करनेवाला यादि प्रार्थना पद-गृहीतमूल्यं २ यः १ पण्य २ के-करतेहुये अपने देशके व्यापारी लेनेवाले- को अर्पण नहीं करता है और वह द्रव्य- तुः ६ नः एव:-प्रयच्छति क्रि-सोदयं २ तस्य ६ दाप्यः १ असो १ दिग्लाभं रवा:- क्रय (लेना )के समय बहुत मोलका हो | दिगागते ७॥ और कालांतरमें अल्पमूल्यसेही मिलसकै तो अर्धक हास (कमी )से किया जो उदय योजना-यः पुरुषः गृहातमूल्यं पुण्यं केशन प्रयच्छति असो तस्य सौदयं मूल्यं (वृद्धि) स्थावर जंगमरूप पण्यद्भव्यकी गागते पण्ये दिग्लाभदाप्यः राज्ञेति शेषः॥ | विक्रेताको गना दिवावे-और जहां मोलकी उस वृद्धिसहित पण्यद्रव्यको विक्रेता तात्पर्याय-अय प्रसंगसे आये साहसके न्यूनताका किया पण्यका उदय न हो और सदृश ( तुल्य) अपराधोंके दंडका निरू- क्रयके समयमें जितना मोल पण्यद्रव्यका पण करके विक्रीयासंप्रदानका प्रारंम करते निश्चित हुआहो- उतनेही उस पण्यद्रव्यको है उसका स्वरूप नारदने यह कहाहै कि लेकर उसी देशमें विक्रय करते (धेचते ) मोलसे पण्यको वेचकर क्रेताको जो न हुये मनुष्यको जो लाभ (नफा )उस सहित दियाजाय वह विक्रीयासंप्रदान नाम वि- वा पूर्वोक्त सौ रुपये पर दो तीन रुपये वृद्धि वादका पद कहाता है-उसमेंभी विक्रेय सहित मूल्यको क्रेताकी इच्छाके अनुसार (वेचने योग्य ) द्रव्यके चर अचर दोभेद वेचनेवालसे राजा दिवावे-सोई नारदने कर छः प्रकारका नारदनेही कहाहै कि कहाँहै कि अर्थहीन होजायतो उदय इस लोकमें जंगम और स्थावर रूप दो प्र- ( वृद्धि ) सहित पण्यको दे-यह नियम कारका पण्यद्रव्य होता है बुद्धिमानोंने एक स्थान वासियों में है जो देशों में विचरते उसके देने और लेनेकी विधि छः प्रकारकी हैं उनको देश विचरनेका लाभभी दे और कहीहै कि गणित-तुलित- मेय-क्रियासे-जब अर्घ (भाव) की अधिकता (तेजी)से पसे-लक्ष्मीसे-अर्थात् क्रमुकके फल | पण्यको न्यूनताहो तब उस गृह आदि पण्य आदि गिनतीसे-सुवर्ण कस्तूरी आदि तो- को विक्रेतासे केताको दिवावे-सोई नारद- लसे-शाली आदि परिमाणसे- वाहन दुइना ने कहाँहै कि जो मोलसे पण्यको वेचकर आदि रूप क्रियासे अश्व मेंस आदि-और क्रेताको नहीदेता वह स्थावर धनकी हानि रूपसे पण्य स्त्री ( वेश्या) आदि-लक्ष्मी और नंगम धनकी क्रियाके फलका दंड- कांति )से मरकत पद्म राग आदि-लिये देने योग्य है-विक्रय करने वालेके उपभो- 1 विक्रीय पण्यं मूल्येन तुर्यन्न प्रदीयते। विक्रीया- समदान तद्विवादपदमुच्यते । अर्घवेदवहीयेत सोदयं पण्यमावहेत् । स्थानिनामक २ लोकेस्मिन् द्विविधं पण्यं जगम स्थावर तथा। नियमो दिग्लाभ दिग्विचारिणाम् । पड्डिधस्तस्य तु बुधैर्दानादानविधिः स्मृतः । गणितं २ विक्रीय पण्यं मूल्येन यः केतुर्न प्रयच्छति। स्थाव- "तुलित मेयं क्रियया रूपतः श्रिया । रस्य क्षय दाप्यो जंगमस्य क्रियाफलम् ।
व्यवहाराध्याय विक्रीयासंप्रदानप्रकरण २१ कि-॥ दमः १ तत्र-मूल्यात्५ तुऽ-द्विगुणः१ भवेत् क्षयंवृद्धिंचवणिजापण्यानामविजानता ! क्रीत्वानानुशयःकार्य:कुर्वन्पदागदंडभार । योगना-यः अन्यहस्ते विक्रीतं वा दुष्टं पद-क्षयं २ वृद्धिं २ चा- वणिजा ३ अदुष्टवत् यदि विक्रीणीते-तत्र , मूल्यात् | पण्यानां अविजानता ३ क्रीत्वाऽ- न:-अनु- द्विगुणः दमः भवेत् ॥ शयः कार्यः१ कुर्वन १ षड्भागदंडभाक१ ॥ तात्मयार्थ-जो मनुष्य पश्चात्तापके विनाही योजना-पण्यानां क्षयं चपुनः वृद्धिं-अवि- एकके हाथ विक्रयकिये पण्यको फिर अन्यके | जानता वणिजा पण्यं क्रीत्वा अनुशयः न हाथ विक्रय करताहे-अथवा दोपवाले (बुरे) | कार्यः अनुशयं कुर्वन् वणिक् षड्भागदंड; पण्यको दोषोंको छिपाकर अदुष्टके समान भाक् भवतीतिशेषः ॥ वेचताहे तो वह मूल्यसे दूने दंडके योग्य तात्पयार्थ-परीक्षा करके क्रीत (खरीदे) वहे नारदनेभी यहां विशेष दिखायाहै कि पयोंका क्रय करनेके अनंतर ऋय कालके "यके हाथ वेचकर जो अन्यको देताहे वह परिमाणसे अर्घ( भाव )से कीहुई वृद्धिको से दूने दंडको और उतनेही पण्यको देने- जो न जानसके वह क्रेता अनुशय न करै- पण और जो निर्दोषको दिखाकर दोष | इसी प्रकार विक्रेताभी महार्य ( महंगा) साहतको देताहे वह मूल्यसे दूने दंडको और से हुये पग्यके क्षयको नजाने तो अनुशय न उतनेही पण्यका दंड देने योग्यहे-यह सब करें क्योंकि वृद्धि क्षयके ज्ञानसेही क्रेता विधि उक्त पण्यमें जाननी जिसका मूल्यदे और विक्रेताको अनुशय होताहे यह बात दयाहो और जिस पण्यका मूल्यन दियाहो | निषेधरूपसें कही समझनी-अनुशयके केवल वाणासही क्रयकिया (वेचा )हो वहां | कालको अवधि तो नारद कहींहै कि यदि क्रेता और विक्रेता निर्णय किये समयको क्रेता मूल्यसे पण्यको खरीदकर दुष्क्रीत छोडकर प्रवृत्ति वा निवृत्तिमें कोई दोष नहीहै (बुराखरीदा ) माने तो विक्रेताको उसी सोई नारदने कहाहै कि दिया है मोल | दिन अविक्षत (ज्योंका त्यों ) लौटादे-यदि जिसका ऐसे पण्यकी यह विधि कहींहै- क्रेता दूसरे दिन लोटा तो तीसवां भाग सोल न दियाहोय तो समयको छोडकर | विक्रेताको दे और तीसरे दिन उससे दूना विक्रेताका अविक्रय नहींहोता ॥ दे- इससे परे वह द्रव्य क्रेताकाही होता है भावार्थ-जो व्यापारी अन्यके हाथ वेचकर और परीक्षा किये बिना जो क्रय विक्रय हे अन्यको वेचताहे वा दुष्ट पदार्थको अदुष्टके वह पण्यके वैगुण्य ( दुष्टता )की अवधि- समान वेचताई वहां दंड मूल्यसे दूना दश, एक, पांच दिन सप्ताह-इत्यादि वच- होताहे ॥ २५७॥ नते दिखायही आयेई-तिससे इस वाणीको युक्तिके द्वारा वृद्धि और क्षयका परिज्ञान (. अन्यहस्ते च विकीय योन्यस्मै तत्प्रयच्छति य तद्रिगुणो दाप्यो विनयस्तावदेव तु । निदोष (जानना ) अनुशयका कारण नानागय, सुशेयित्वा तु सदोषं यः प्रयच्छति । स मूल्याद्विगुण १ कीत्वा मूल्यन यत्पण्य दुष्कीत मन्यते नयी विनय तावदेव तु! विक्रतुः प्रतिदेय तत्तस्मिन्नवासयविक्षतम् । द्वितीये- १२ दत्तमूल्यस्य पण्यस्य विधिरेष प्रकीर्तितः । अद- | ति ददत् क्रेता मूल्यानिशांशमावत्॥द्विगुण तु तृती- सेन्यत्र समयान्न विक्रेतुरविक्रयः । यति परतः केतुरे वतत् ।
व्यवहाराध्याय संभूयसमुत्थानप्रकरण २२ (३७१) घरहों वे प्रतिवेश कहाते हैं उनमें जो और ऋण देनमें समर्थ हो वही धनको ग्रहण वसे वे प्रातिवेश्य होते हैं- वेदपाठ और | करै-यदि किसी भी सामर्थ्यकी विशेषता न सदाचरणसे युक्त उन ब्राह्मणांका यदि धनी होय तो सब विभाग करके ग्रहण करलें भी होकर श्राद्ध आदिमें निमंत्रण न देतो यही न होय तो दशवर्ष पर्यत दायादोंकी प्रतीक्षा दशपणका दंड उसकोभी जानना ॥ (वाटदेख ) करके उनके न आनेपर राजा भावार्य-यदि नाववाला(मलाह)स्थलक ग्रहण करले सोई यह सब नारदने स्पष्ट शुल्कको ग्रहण करे तो दशपण दंड देने | किया है कि एक मरजाय तो उसका योग्य होता है और जो अपने आसपास | दायाद धनको प्राप्त होता है-दायाद न होय रहते श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको निमंत्रण न दे उस- | तो कोई अन्यही ले-औरसभी समर्थ होय कोभी यही दंड जानना ।। २६३ ॥ तो सवही ग्रहण करें-वेभी न होयतो राजा उस धनको दशवर्षतक गुप्त रखे-पदि दश- देशांतरगतेप्रेतेद्रपंदायादवांधवाः । वर्षतक स्थित किये धनका कोई दायाद जातयोवाहरेयुस्तदागतास्तविनानृपः ॥ और स्वामी न आवे तो राजा उस धनको अपने आधीन करले तो धर्ममें हानि नहीं पद-देशांतरगते ७ प्रेते ७ द्रव्यं २ दा-होती ॥ यादवांधवाः १ ज्ञातयः १ वार- हरेयुः कि- भावार्थ-अन्य देशमें जाकर कोई व्या- तआगताः १ ते ३ विना-नृपाः १॥ पारी मरजाय तो उसके द्रव्यको दायाद योजना-देशांतरगते प्रेते सति आगताः | बांधव वा ज्ञातिके मनुष्य आकर ग्रहण करें दायादयांधवाः वा ज्ञातयः तत् द्रव्यं हरेयुः वे न होयतो राजा ग्रहण करे ॥ २६ ॥ तेविना नृपः हरेत् ॥ तात्पर्यार्थ-जब संभूय ( इकट्ठे होकर ) जिह्मत्यजेयुनिभिमशक्तोन्येनकारयेत् । काम करनेवालोंके मध्यमें कोई मनुष्य अनेनविधिराख्यातऋत्विकर्पककर्मिणां ॥ देशांतरमें जाकर मरजाय तो उसके अं- पद-जिज्ञ२ त्यजेयः कि- निलाम २ शको दायाद (पुत्रआदिसंतान ) वा बांधव अशक्तः १ अन्येन ३ कारयेत कि-अनेन ३ ( मातृपक्षके मातुल आदि ) ज्ञाति | विधिःरआख्यातः १ ऋत्विकर्षककर्मिणाम् ६ (अपत्यवर्गसे भिन्न वासपिंड ) आनकर योजना-नि निलाभ त्यजेयुः-अशक्तः उस धनको ग्रहण करें अथवा देशांतरोंसे आये संभूयकारी लें और दायाद आदि न अन्येन कारयेत्-ऋत्विकर्षककर्मिणां विधिः होयतो राजा ग्रहण करै-इसी वचनमें पढे अनेन आख्यातः ( कथितः) । वाशन्दसे विकल्पसे अधिकारको दिखाते हैं तात्पर्यार्थ और जो व्यापारी वंचक (छ. पूर्वको नले इसका नियमतो पत्नीदुहितरः | लिया) है उसको निर्लाभ ( लाभको छीन- इस वचनसे अपुत्र धनके विभागमें जो कह १ एकस्य चेत्स्यान्मरण दायादोस्य तदानुयात् । आये हैं वही यहाँभी जानना-शिष्यसब्रह्म- भन्यो वाऽसति दायादे शक्ताश्वेत्सर्व एव तोतदमावे तु चारि ब्राह्मणका निषध और व्यापारि (साझी) | गुप्तं तत्कारयेद्दश वत्सरान्] अस्वामिकमदायादं दश- मोकोभी मिलना इस वचन बनानेका प्रयो- वर्षस्थित तत: 1 राजा तदात्मसाकुर्यादेवं धर्मों में मन है-व्यापारीयोंके मध्यमेंभी जो पिंड देने हीयते ।
(३७०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । उनको राजाके निवेदन किये बिना लाभके तात्पर्यार्थ और शुल्क दोप्रकारका जल लोभसे विक्रय करता है वह सब विना और स्थलके भेदसे होता है-उनमें स्थलका मूल्यके दियेही राजगामि होता है अर्थात् शुल्क- अघको नियत करनेसे वीसवें उन सब पण्योंको राजा ग्रहण करले और | भागको राजा लेले- इस वचनमें कह मोल नदे॥ आये जलका शुल्क मनु (अ.८ श्लो.४०४- भावार्थ-अर्घ (भाव )के नियत करनेसे ५-७-) ने कहा है कि नावमें यानसे वीसवां भाग कर राजा ग्रहण करले और एक पण मनुष्यसे आधापण- पशु और निषेध किये और राजाके योग्य पण्यको स्त्रीसे चौथाई पण और रिक्त (भाररहित) जो वेचता है वह सब राजाका होता मनुप्यते पणका आठवां भाग ले- और जो है।। २६१॥ यान (गाडी आदि) भांडोंसे भरे हों उनमें मिध्यावदन्परीमाणशुल्कस्थानादपासरन् । जैसे द्रव्यसे भरे हों उसके अनुसार लें और 'दाप्पस्त्वष्टगुणंयश्वसव्याजक्रयविक्रयी ॥ रिक्तभांड होय तो और पुरुषोंके पासभी कुछ सामग्री न होयतो उनसे यत्किंचित पद-मिथ्याऽ- वदन् १ परीमाणं२ शुल्क- द्रव्य ले ले- और दो मास आदिकी गर्भ- स्थानात ५ अपासरन् १ दाप्यः१ तुः- अष्ट- | वती स्त्री और संन्यासी मुनि और ब्रह्मचर्य गुणं २ यः १ च-सव्याजक्रयविक्रयी॥१॥ आदि लिंगवाले ब्राह्मण इतने मनुष्योसे योजना- परीमाणं मिथ्या वदन शुल्क- | नावकी उतराई न ले-और दोनों प्रकारके, स्थानात् अपासरन् चपुनः यः सव्याजक्रय- भी शुल्कोंमें यह औरभी विशेष कहाहे कि विक्रयी अस्ति सः अष्टगुणं दाप्यः ॥ भिन्न (बने) सुवर्णपर शुल्क नही होता-और ता भावार्थ-जो मनुष्य व्यापारी होकर शिल्पसे जो जीविका करे-चालक-दूत-और शुल्ककी वंचनाके लिये पण्यके परीमाण जो भिक्षासे मिले-और चौरीका शेषहो और (तोल )को मिथ्या कहता है वा शुल्कस्थान वेदपाठी-संन्यासी और यज्ञ-इनमें शुल्क (पोनटोटो )से छिपकर जाता है और जो | नही होता-जिससे तरजांय उस नाव आ- व्याज (बहाना )से अर्थात् यह इसका पण्य | दिको तरि कहते हैं उसके शुल्कका जो है वा इसका इसप्रकार विवादके योग्य अधिकारी वह तरिक कहाता है यदि वह पण्यको खरीदता है-वे सर पण्यसे आठगुने स्थलके शुल्कको ग्रहण करे तो दशपण दंड दंडदेने योग्य होते हैं।। २६२ ।। देने योग्य होता है-वेशनाम वेश्म (घर) तरिकास्पलजंशुल्कंगृह्णन्दाप्यःपणान्दश | काहै और वेशके संमुख वा समीपमें जो ब्राह्मणप्रतिवेश्यानामेतदेवानिमंत्रणे २६३ १ पर्ण यान तरे दाप्यः पुरुषोधपर्ण तरेः । पादपशु पद-तरिकः १ स्थलज २ शुल्कर गृह- तार्य दाप्यानि सारतः ॥ रिक्तभाडानि यकिंचित्पुमा- योपिद्य पादा) रिक्तकः पुमान् ।मांडपूर्णानि यानानि न् १ दाप्यः १ पणान् २ दशर ब्राह्मण- सचापरिच्छादाः । गभणीतु दिमासादिस्तया प्रय- प्रातिवेश्यानां६ एतत्१ एव:-अनिमंत्रणे७॥ योजना-स्थलज शुल्कं गृह्णन् तरिका जितो मुनिसमाभणालिंगिनश्चैव न दाप्यास्तारिक नराः २ नभिमकायपणमस्ति शुल्क न शिल्पसौन शिशौ दश .पणान् दाप्यः ब्राह्मणप्रातिवेश्यानां न दूतान भैझलन्ध न हतावशेषे न प्रोत्रिये न प्रमजि. अनिमंत्रणे एतत् एव दंडदानं ज्ञेयम् ॥ तेन यते।
व्यवहाराध्याय स्तेयप्रकरण २३ (३७५) मिथ्याकारण साधनके द्वारा अभावकोभी | जानना-जो यह वृद्धमनुका वचन है कि विषय करताही है जैसे इसको जव वस्तुका ये चोर अन्यायसे द्रव्यका संचय करते हैं नाश वा चोरी हुईथी तब मैं देशांतरमें था इससे इन का धन मलरूप है इससे राजा इस प्रकार प्रामाणिक मनुष्योंसे जब देशां- चोगेको मखादे धनका दंड न दे-वहभी तरमें स्थितिको सिद्ध करदिया तर चौ- महान् अपराधके विषयमें समझना और रीका अभाव अर्थात् सिद्ध हो गया इससे ब्राह्मण चोरको तो महान् अपराधर्मभी न अपराधसे शुद्धि हो सकती है । मरवावे किंतु मस्तकपर चिह्न करकर अपने भावार्थ-चौरीमें शंकासे पकडाहुआ मनुष्य देशसे निकासदे-और चिह्नभी श्वपदके आ- यदि अपने आत्माको शुद्ध न करें तो चो- कारका करना सोई मनु (अ०९ श्लो०२३५) रीमें गये द्रव्यको दिवाकर चौरका दंड में कहा है कि गुरकी स्त्रीक गमनमें भग राजा उसको दे ।। २६९ ॥ का चित-मदिराका पानमें सुराकी ध्वजाका- और चरिमें श्वपदका-और ब्रह्महत्यारेके चौरंमदाप्यापहृतपातयेदिविधैर्वधैः । विनाशिरके मनुप्यके चिह्नको फर-यहभी सचिबाह्मणंकृत्यास्वराष्ट्राद्विप्रवासयेत् ॥ उसको है जो दंडके पीछे प्रायश्चित न किया चाहे-सोई मनु (अ.९श्लो,२४० )ने पद-चौरं २ प्रदाप्या-अपहृतं २ घातयेत् कहा है कि यथोचित प्रायश्चित्तको करतेहुये क्रि-विविधैः ३ वधैः ३ सचिह्नं २ ब्राह्मणं २ सब वणों के मस्तकपर राजा चिह्न न करें कृत्वाऽ- स्वराष्ट्रात् ५ विप्रवासयेत् क्रि-॥ किंतु उत्तम साइसका दंडदे॥ योजना-चौरं अपहृतं प्रदाप्य विविधैः भावार्थ-चोरसे चुराया धन स्वामीको वधैः पातयेत्-ब्राह्मणं सचिनं कृत्वा स्वरा- दिवायकर अनेक प्रकारके वासे मरवाय ट्रात विप्रवासयेत् ॥ दे-और ब्राह्मण चोरको तो चिह्न करके अपने देशमसे निकास दे ॥ २७० ॥ तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य पूर्वोक्त परीक्षासे वा परीक्षाके विनाही चौर निश्चित होजाय घातितेपहतेदोपोग्रामभक्षुरनिर्गते उससे स्वामीको चराया धन वा उसका विवीतभर्तुस्तुपथिचारोद्धतुरवीतके २७६॥ माल दिवाकर नानाप्रकारके वधों ( हिंसा) पद-पातिते अपहृते दोपः १ ग्राम- से मरवायदे-यहभी उत्तम दंडकी प्राप्तिके भर्तुः ६अनिर्गते विवीतभर्तुः ६ तुः- पथि योग्य उत्तम द्रव्यके विषयमें समझना और चौरोद्धर्तुः ६ अवीतके ।। पुष्प वस्त्र आदि क्षुद्र, मध्यम, व्यको योजना-चौरपदे अनिर्गते सति घातिते चोरीके विषयमें नहीं है क्योकि इस नार- अपहृते ग्रामभर्तुः दोषः तृपुनः पथि विवीत- दके वचनसे वधरूप उत्तम साहसका दंड उचम द्रव्यके विषयमेंही कहा कि तीन १ अन्यायोपात्तवित्तत्ताद्धनमेपा मसात्मकम् । साहसमि जो दंड चुद्धिमानोंने कहा है वही अतस्तान्धातोद्राजा नार्थदडेन दडयेन् । दंड तीन प्रकारके द्रव्योंकी चोगमें क्रमसे २ गुरुतल्पे भगः फार्थ सापाने साध्वजास्तेय च पद कार्य प्रग्रहण्याशिराः पुमान् । १ साहसेषु य एवोन विषुदंडोमनीषिभिः । सए- ३ मायश्चित्त तु कुर्वाणाः सर्वे वर्णा यधोदिन । . व दडः स्तयेपि इश्येषु विष्वनुक्रमात् । नाक्या राज्ञा लाटे तु दाप्यास्तूत्तमसाइसम् ।
(३७४). याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - वसे कि मैं शूद्र नहीहूं- और नामका नि भावार्य-अन्यभी शंका जाति और ना- न्हव कि मैं लपित्य नहीहूं-आदि पदसे अपने मके छिपानेसे और द्यूत- स्त्री-मदिरापान- देश ग्राम फुल आदिके अपलाप (छिपांना)से इनमें आसक्त और जिनका मुख शुष्क हो युक्तभी पकडने योग्य समझने और धूत- और स्वर (वाणी )का भेद हो-और जो वेश्या मदिरापीना आदि व्यसनोंमें जो अत्यंत | पराये द्रव्य और गृहोंको पूठे और छिपहुये आसक्त हों और जिसकोचोरोंके पकडनेवाले रूपसे विचरै-और जो विना आयके अधिक ऐसे पूछे कि तू कहां रहता है यदि वह शुष्क- व्यय करें-और जो विनष्ट (निंदित वा फटे) मुख और भिन्नस्वर होजाय अर्थात् उसका द्रव्यका विक्रय करें (वेचें) ये सब पकड- मुख सूकनाय और गद्गद वाणीसे बोले- नेयोग्य होते हैं ।। २६७ ॥ २६८ ॥ तो वहभी पकडने योग्य है और शुष्कभिन्न मुखस्वगः-इस बहुवचनसे जिनके मस्त- गृहीतःशंकयाचायनात्मानंचेद्विशोधयेत् । कपर स्वेद आजाय उनकाभी ग्रहण है-तैसे | दापयित्वागतंद्रव्यंचौरदंडेनदंडयेत् २६९ जो मनुष्य विनाकारण इसके कितना धन हे वा इसका घर कोनसा है इस प्रकार आत्मानं २ चेतऽ-विशोधयेत क्रि-दापयि- पद-गृहीतः १ शंकया ३ चोर्ये ४ ना- पूं, और जो दूसरा वेष बदलकर अपने स्वरूपको छिपाकर विचरते हैं और जोआय त्वाइ-गतं २ द्रव्यं २ चौरदंडेन ३ दंड- (प्राप्ति )के अभावमेंभी बहुत व्यय (खर्च) येत् कि- ॥ करते हैं और जो विनष्टद्रव्य अर्थात् ऐसे योजना-शंकया चौर्ये गृहीतः पुरुषः चेत् जीर्णवस्त्र-फूटेपात्र आदिको वेचते हैं जिनके (यदि ) आत्मानं न विशाधयेत् तहिं गतं स्वामीकी प्रतीति नहो-ये पूर्वोक्त सब चोर- द्रव्यं दापयित्वा चौरदंडेन राजा दंडयेत् ॥ की संभावनासे पकडने योग्य हैं-इस प्रकार तात्पर्यार्थ-यादि शंकासे चोरीमें पकडा- नानाप्रकारके चिह्नोंसे पुरुषोंको पकडकर- हुआ मनुष्य उसके निस्तारके लिये अपने यह भलीप्रकार परीक्षा करे कि ये चोर है | आत्माको शुद्ध न करे तो आगे वर्णन किये वा साधु हैं-कुछ चिह्नके देखनेसही चौरका धन दिवाना वध आदि जो चोरके दंड हैं निर्णय न करले-क्योंकि चोरसे भिन्नकेभी उनका दंड उसको राजादे इससे चोर अप- लोष आदिका चिह्न होसकता है सोई नेको मानुष प्रमाण ( साक्षीआदि) और नारदेने कहा है कि अन्यके हाथसे गिरे वा वह न होयतो दिव्यसे शुद्ध करे कदाचित् विनाही इच्छाके भूमिपर पडे वा चोरके मेरे कोई शंका करे कि (नाहंचौरः) मैं चौर मही लोभकी परीक्षा राजा यत्नसे करे-तैसेही हूं इस मिथ्या उत्तरमें कैसे प्रमाण होसकता कहाँ है,कि असत्य सत्योंके समान और है क्योंकि वह अभावरूप है-इसका समा- सत्य असत्योंके समान अनेक प्रकारके धान कहते हैं,दिव्यप्रमाण भाव अभाव जीव होते हैं तिससे परीक्षा करनी कही है। रूपसे दो प्रकारका (रुच्या वान्यतरः कु- अन्यहस्तारपरिभ्रष्टमकामादुत्थित मुशिचौरेण वा र्यात् ) इस वचनमें कहआये हैं-और मा- परिक्षितं लोप्नयलापरीक्षयेत् । नुष प्रमाण यद्यपि शुद्ध मिथ्याउत्तरमें २ असत्याः सत्यसंकाशाः सत्याथासत्यसनिभाः। अभावरूप नही होसकता तथापि किसी विविधाभावस्तस्मादुक्त परीक्षण । कारणसे-मिला है भावरूप जिसमें ऐसे । .
व्यवहाराध्याय स्तेयप्रकरण २३ (३७७) र्णय कर क्योंकि वृद्ध मनुका वचन है कि तात्पर्यार्थ-और वस्त्र आदिका जो उत्क्षे- यदि दिवानेयोग्य उस धनके मोष (चोरी) | पण (चराना) कर वह उत्क्षेपक वस्त्र में संशय होयतो चौरसे शपथ ले अथवा आदिमें बंधे सुवर्ण आदिको खीचकर वा उसके बंधुओंसे चोरीको सिद्ध करावे ॥ कांटकर जो चुराव उसे ग्रंथिभेदक (गढकटा) भावार्थ-अपनी सीमामें चोरी होपतो कहते हैं-उन दोनोंको प्रथम अपराधर्में ग्राम दे वा जहां चौरका पद जाय वह ग्राम | हस्त और संदंश (संडसी ) के समान दे कोशसे बाहिर चोरी आदि होयतो पांच | तर्जनी और अंगूठासे हीन करे-अर्थात् ग्राम वा दशग्रामोंका समूह दे ॥ २२॥ उत्क्षेपकके हाथको और ग्रंथिभेदकके तर्जनी चंदिग्राहांस्तथावाजिकुंजराणांचहारिणः । और अंगूठेको क्रमसे छेदन कर-और प्रसह्यघातिनश्चैवशूलानारोपयेन्नरान् २७३ दूसरे अपराध, एककर और एकपादसे पद-बंदिग्राहानरतथा वाजिकुंजराणां ६ हीन करे अर्थात् दोनोंके एक २ हाथ-और च:- हारिणः २ प्रसह्य घातिनः २ च- एक २ पादको क्रमसे छेदन करे-यहभी उस एवऽ- शूलान् २ आरोपयेत् क्रि-नरान् ॥ व्यकी चारीमें समझना जो उत्तम साइस योजना-दिनाहान तथा वाजिकुंजराणां वचनं है कि उत्तम साहसमें दंड उसका दंडकी प्राप्तिके योग्य है क्योंकि नारदका हारिणः चपुनः प्रसह्य घातिनः नरान् राजा | अंगछेदन कहाई-तीसरे अपराधमें तो वधही शूलान् आरोपयेत्॥ तात्प भावार्थ-चंदिग्राह (जो कैदीको कहाँ है कि पहिले ग्रह ( पकडना )में . होता है सोई मनु (अ०८-श्लो०२७७-) में पकडे) और अश्व और हाथियोंके चोर और थिभंदाकी अंगूलियोंको और दूसरे महमें जो बलात्कारसे पाती (हिंसक ) हैं उनको हाथ और चरणको छेदन करे और तीसरे शूलीपर चढावै-यह वधके प्रकारका उपदेश ग्रहमें वधके योग्य होता है और जाति और इस मनु (अ०९० ३८०)के वचनके अनुसार है कि कोठार आयुधका घर देवम- दंडकी कल्पना करनी ॥ द्रव्यके परिमाण और मोलके अनुसार दिर इनके भेदकोंको और हाथी अश्व रथ इनके चुरानेवालोंको विना विचारेही मारदे॥ भावार्थ-वस्त्र आदिके चौर और ग्रंथिम- उत्क्षेपकथिभेदौकरसंदंशहीनको । दकके हाथको-और तर्जनी अंगूठेको क्रमसे कार्योंद्वितीयापराधेकरपादैकहीनको २७४ पहिले अपराधमें छेदन करें और दूसरे अप- पद-उत्क्षेपकग्रंथिभेदी १ करसंदंशहीन- करे ॥ २७४ ॥ राधमें एक पाद और एक चरणको छेदन को १ कार्यो १ द्वितीयापराधे ७ करपाद- कहीनको.१ ॥ क्षुद्रमध्यमहाद्रव्यहरणेसारतोदमः "-- देशकालवयशक्तीःसंचित्यदंडकर्मणि ॥ पद-क्षुद्रमध्यमहाद्रव्यहरणे सारता- रापय दाप्योःपधुभिर्वापि दापयेत् ॥ १ तगच्छेद इत्युक्तो दह उत्तममाहसे । २ कोष्टागायुधागारदेवतागारभेदकान् । हस्य २ अंगुलीधिभेदस्य छेदयेत्ययमे प्रहाद्वितीये हस्त- श्वस्यहर्तच इन्यादेवाविचारयन् ॥ चरणी तीये घधमइति ।
(३७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भर्तुः- अवीतके चौरोद्धर्तुः दोषः भवतीति होयतो तो मार्गपाल आदि चोरोंके बताने- शेषः॥ वालोंका दोष है।। २७१ ॥ तात्पर्यार्थ-यदि ग्रामके मध्यमें मनुष्य स्वसीनिंदद्यानामस्तुपदंवायत्रगच्छति । आदि प्राणीका वध-वा धनकी चोरी होजाय पंचग्रामीबहिाकोशाद्दशग्राम्यथवापुनः ॥ तो उस समयमें ग्रामके भर्ता (जिमिदार) को चोरकी उपेक्षाका दोष है यदि वह पद- स्वीम्नि७ दद्यात् क्रि-ग्रामः १ आमते निकसे चोरके पद (पैड)को मतु-पदंश्वाऽ-यत्र-गच्छति क्रि-पंचग्रामी१ अथवा:- दिखादे-और वह ग्रामका पति दोपके दूर बहिः- क्रोशात दशग्रामीर करनेके लिये चोरको पकडकर राजाके पुनः5-11 अर्पण करदे-अर्पण न करसके तो चोरीका योजना-तुपुनः स्वसीम्नि ग्रामः वा यन धन-धनके स्वामीको दे-यदि चौरके । पदं गच्छति 'सः दद्यात् क्रोशात् बहिः पदको ग्रामका भी दिखायदे तो जहां पंचग्रामी-अथवा पुनः दशनामी दद्यात् ।। पदका प्रवेशहो उसी देशका अधिपति चोर तात्पर्यार्थ और जव ग्रामसे बाहिर सी- और धनका अर्पण कर-सोई नारदेने कहा | मापर्यंतक क्षेत्रमें चोरी आदि होंय और सी- है कि-जितके विषय (देश )में धनका लोप मासे बाहिर चोरका पद न जाय तो ग्रामके (नाश )हो वही चोरको पकडे और धन दे- वासीही चौरीके धनको दे और ग्रामसे बा- यदि चोरका पद वहांसे न निकसाहो-और हिर निकसा चोरका पद जिस ग्राम आदिमें ग्रामसे निकसा पद यदि अन्यत्र न जाय जाय वही चोरका और धनका अर्पण करें- तो सामंत मार्गके पालक और दिशाओंके और जब ग्रामसे बाहिर अनेक ग्रामोंके । पालकोंसे दिवावे-विवीत (ग्रामके समीप मध्यमें क्रोशसे बाहिर देशमें घायल मनुष्य छुटी भूमि )में चोरी होयतो विवीतका जो वा चौरी मिले और चौरका पद मनुष्योंके स्वामी उसकाही अपराध है-और यदि संमर्द ( आना जाना ) आदिसे नष्ट होगया मार्ग वा विवीतको छोडकर अन्य किसी हो तब पांच ग्रामोंका समूह वा दशग्रामोंका क्षेत्रमें धनका नाश होयतो चोरोंका उद्धार समूह चोर आदिको दें यहां पांच वा दश (निकासना) करनेवाले मार्गपाल और ग्राम दें यह विकल्पका कथन तो इस लिये दिशाओंके पालोंका दोष होता है। है कि जैसा २ ग्रामोंका समीप हों वेसे २ ही भावार्थ-प्रामके मध्यमें प्राणीको हत्या धनको लौटावें जब राजा चुराये हुये धनको वा चोरी होजाय और चोरका पद ग्रामसे अन्यसे न दिवायसकै तो अपने कोशमसे बाहिर न जायतो ग्रामके स्वामीका दोष दे क्योंकि गौतमका वचन है कि चोरके ह-विवीतमें नष्ट होयतो विवीतके स्वामी- हरे द्रव्यको राजा जीतकर यथास्थान का-और विवीतसे भिन्नमें वा मार्गमें नष्ट (जहांका तहां ) पहुंचा दे अथवा अपने कोशमसे दे-यदि चुराये और विना चुरायेका, १ गोचरे यस्य लुप्येत तेन चोरः प्रयत्नतः । प्रायो- संदेह होयतो मानुष वा दिव्य प्रमाणसे नि- दाप्योऽथवा शेष पद यदि न निर्गतम् । निर्गते पुमरे- तस्मान दन्यत्र पातितं सामंतान्मार्गपालांश्चदिपा १ चौरहतमवजित्य यथास्थान गमयेत सोशा लांचव दापयेत् । --- है द्वादद्यावा व्यवहाराध्याय स्तेयप्रकरण २३ (३७९) अधिक अन्नकी चोरी कर तो वधका दुद कि काटके पात्र तृणं आदि और मिट्टीको और शेप चौरीयों में ग्यारह गुना दंड और वस्तु-वांस और वांसके पात्र और वायु स्वामींके धनकोदे-जिसमें वीस २० द्रोण (चरची ) अस्थि चर्म-शाक और आई। अन्न आवे उसे कुंभ कहते हैं और चुण्या मूली-फल और मूल-गोरस-ईखके विकार- द्रव्य और स्वामी इनके गुणकी अपेक्षासे | लवण-तेल-पक्वान्न और कृतान-मत्स्य- सुभिक्ष- दुर्भिक्ष- आदि कालकी अपेक्षासे मांस-इन सबकी चोरीमें मूल्यसे पांचगुना चौरको ताडना-अंगछेदन-वध-ये दण्ड दंड होता है और जो क्षुद्र द्रव्योमें कमसे देने योग्य हैं-तैसेही संख्याके विशेपसे दं- कम सोपण वा पचास पणतक प्रथम साहस डका विशेष रत्न आदिमें कहा है(अ०८- कहा है वह उसमें समझना जिसका माप श्लो०३३२ ) मनुनें कहाहे कि सुवर्ण चांदी वा माषसे अधिक मोलदो-और जो क्षुद्र उत्तम वस्त्र और सम्पूर्ण रत्न इनके सोसे द्रव्यके विषय मनुका वचन है कि मूल्यसे अधिक चुरानेमें वधके और पचास से अधि- दूना दंड होता है वह उन शराव आदिमें है कके चुरानेमें हाथका छेदन इष्ट है-और जितना प्रयोजन अल्प इ-तसेही अपरा. शेषकी चौरीमें मूल्यसे ग्यारह गुने दंडको दे धकी अधिकतासेभी दंटकी अधिकता -तैसेही द्रव्यके विशेषसेभी मनुनें (अ०८- होती है कि जो चोर रानिमें संधि (किवा- लो०३३३)दण्ड कहा कि कुलीन पुरुष और ड)को छेदन करके चोरी करते हैं उनके विशेषकर कुलीन स्त्री इनके चुसनेमें वधके | हाथोंका छेदन करके राजा तीक्ष्ण (पैनी) योग्य होताहे- अकुलीनोंके हरनमें तो यह | शूलीपर आरोप ( रखना) करै-इस प्रकार दंड हे कि पुरुषकी चार में उत्तम साहस दण्ड सब दंडके कारण अनंत हे द्रव्यरके प्रति कहाँह स्त्रीके अपराधके सर्वस्वका हरण / नहीं कहेजासकते इससे जाति परिमाण और कन्याके चौरीके अपराध वध कहाँह आदि कारणों से दंडके गुरु लघुभावकी क- और मापसे न्यून है मोल जिनका ऐसे जो मना करलेनी-पदि पथिकोंका अल्प अप- क्षुद्र द्रव्य हैं उनकी चोरीमें मूल्यसे पांच गुना दंड है क्योकि यह नारदको स्मृति है। यध होयतो दंड नहीं है-सोई मनु ( म०८ श्लो०३४१) ने कहा कि नहीं निर्विका जि. सुवर्णरजतादीनामुत्तमाना च वासमा । रत्लाना धेत सोग शतादभ्यधिके वधः ॥ पचाशतस्तभ्याधिक सकी ऐसा मार्गमें चलनेवाला हिन किसीके हस्तरोनमिष्यते । शेषेप्येकादागुण मन्यादर खेतमेसे दो इशु (गांडे ) दोमूली लेलेती परम्परत ॥ दंड देने योग्य नहीं होता तसेही चणे मोदी २ पुरुषागां कुलीनानां नारीणा वा विशेषतः । गोधूम जी मूंग उद-इनकी एक मुट्टीको रलाना चव सपा हाणे वधमहति। पुष हरतो दर तन्मयाद्विगुणोदमः। उक्त उत्तममाहत. साधे तु सर्वस्व कन्या तु हरती २ साप हिरवा तु ये चोर राम्रो पुति तरसरा तेरोहित्रा नृपो इस्ती तीक्षाले निवेशयेत् ।। ३ काटमांडतपादर्शना मृन्मयानां तथा च । वेणु ३ दिनोध्वगः क्षीनताविरुदेषमूल। भा- वैभडाना तथानाम्यस्थिवर्मणाम् । शाकानामा सानः पाक्षेत्रास सवाईति । चणकाहिंगोधर्म- मूलाना हरणे फरमटयोः । गोरसे विकाराणां तथा याना मुदमायो । भनिविदीतव्यो मोटोकः पपि लामालपोः॥पान्नानो तानानां मारपानामामिररियनः। तर, सप्तमे भनेः भक्तानि परममता ॥ स्वप। सगे मम्यभूतानां मून्याचगुणो दमः । अबस्तनरिमानने वन्य हनिकर्मणः॥ पधः॥
(३७८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । जाति दमः १ देशकालवयःशक्तीः १ संचिंत्यं १ सुवर्ण अन्न आदि इनमें न्यूनाधिक भाव दंडकर्मीण ७॥ है इससे अधिक और न्यून दंडकी योजना-शुद्रमध्यमहाद्रव्यहरणे सारतः आकांक्षामें मूल्यके अनुसारसे दंडकी दमः चिंत्यः देशकालवयाशक्तीः देडकर्मणि| कल्पना करनी और उस दंडकी कल्पनामें संचित्यं ।। दंडके कारण देशकाल अवस्था शक्तिकी तात्पर्थार्थ-अब प्रत्येक द्रव्यको नाति भली प्रकार कल्पना करनी और यह और परिमाणका ज्ञान और अवस्था शक्ति-द्रव्य परिमाण परिग्रह आदिकाभी उपलक्षण देशकालका ज्ञान आदि जो दंडकी अधि- है सोई दिखाते हैं कि शूद्रको चोरीका कता और न्यूनताके कारण हैं वे अनंत हैं दंड अष्टपाद ( अठगुना ) होता है .॥ इससे द्रव्य द्रव्यमें कहनेको शक्य नही-इस- अर्थात् जिस द्रव्यको चोरीमें जो दंड कहाँह लिये सामान्य से दंड देने का उपाय कहते हैं | यदि उस द्रव्यकी चोरी विद्वान् शुद्ध करें क्षुद्र मध्य और उत्तम व्योंके हरनेमें मूल्य | तो अठगुना दंडदेने योग्य है यहां किल्विष' आदिके अनुसार दंडको कल्पना करनी- | शब्दसे दंड लेते हैं और वश्य क्षत्रिय : क्षुद्र आदि द्रव्योंका स्वरूप नारदनें कहाहै | ब्राह्मण विद्वानोंको कुमसे उत्तरोत्तर दूना कि मिट्टिके पात्र आसन खटा अस्थि- | दंड होता है-अर्थात् वैश्यको सोलह गुना चर्म तृण आदि और श्यामाक अन्न और क्षत्रियको यत्तीस गुना और ब्राह्मणको पका अन्न ये क्षुद्र द्रव्य कहे हैं और रेशमसे चौसठ गुना दंड होता है क्योंकि वर्ण के भिन्न वस्त्र और गासे भिन्न पशु सुवर्णसे भिन्न प्रति विद्वानको धर्मके अवलंघनमें दंडको लोहा बीही और जो ये मध्यम द्रव्य कहेहै- अधिकता है जिससे विद्वान् शदको चौरीमें और सुवर्ण रत्न रेशमका वस्त्र स्त्री पुरुष गौ | दंडकी अधिकता है इसीप्त मनें यह हाथी अश्व देवता ब्राह्मण राजा इनका द्रव्य अर्थ दिखाया है कि (अ०.८- श्लो० ३३७ उत्तम द्रव्य कहाता है- तीन प्रकारकेभी | .:३३०-) शूद्रको चौरीका दंड अठगुना और इनद्रव्योंमें प्रथम मध्यम उत्तम साइसके दंड- वैश्यको सोलगुना और क्षत्रियको ३२वत्ती- का स्वाभाविक नियम नारदमें ही दिखाया सगुना और ब्राह्मणको चौसठ गुना वा सौगुना है कि बुद्धिमानोंने जो दंड तीनो साहसोंमें | वा एकसो अठाईस गुना होता है क्योंकि कहा है वही दंड क्षुद्र मध्यम उत्तम वह ब्राह्मण उस चौरपके दोष और गुणके द्रव्योंकी चोरीमें समझना- मिट्टीक पात्र अधिकता देखते हैं सोई मननें कहा जाननेवाला है-तसही परिमाणसेभी दंडकी माणि और मल्लिका आदि गो अश्वसे भिन्न है (अ०८ - श्लो० ३२०) दशकुंभसे महिप भेट आदि पशु और ब्राह्मणके १ अष्टपाद्यं स्तेयकिल्विषं शूद्रस्य द्विगुणोत्तराणी- १ मृदाण्डासनखवास्पिदारुचर्मणादियत् तरेषां प्रतिवणे विटुपोऽतिकमे दण्डभूयस्व । शमीधान्यं कृतात्र च क्षवं द्रव्यमुदाहृतायातः कौशेय २ अष्टपाद्यं तु शद्रस्य स्तेये भवति किल्विषी घोड. वयं च गोवर्य पशवस्तथा । हिरण्यदज्ये टोह च शैव तुपैश्यस्य द्वात्रिंशत् त्रियस्य तु माह्मणस्य चतुः- मध्यं मीहियका अपि । हिरण्यरत्नकौशेय स्त्रीपुगोगज-पाटः पूणे वापि शतं भवेत् । द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्त- वाजिनः देवब्राह्मणराश च द्रव्यं विज्ञेयमुत्तमं । होषगुणदिनः । २ साइसेपु य एवोक्तस्त्रिषु दंदी मनीषिभिः । सएव ३ धान्य दशभ्यः कुंभेभ्यो हरतोभ्यधिकं वधा। दंडः स्तथीप द्रव्येषु विष्वनुक्रमात । शेषवेकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धन ॥
व्यवहाराध्याय स्तैयप्रकरण २३ . (३८१). योजना-विप्रदुष्टां पुरुषनी चपुनः सेतुभे- सुतबांधवाः १ प्रष्टव्याः १ योपितः १ च दकरी-अगर्भिणी स्त्रियं शिलां रद्धा अप्सु अस्य६ परपुंसि७ रताः १ पृथक- ।। प्रवेशयेत् ॥ योजना-अविज्ञातहतस्य कलह सुत- तात्पभावार्थ-और विशेषकर प्रदुष्ट बांधवाः चपुनः अस्य परपुंसि रताः योषितः (भ्रूणहत्यारी वा स्वगर्भको पातिनी ) और पृथक् आशु (शीघ्रं ) प्रष्टव्याः ।। पुरुषकी हंत्री ( हत्यारी) और मर्यादाका ता भावार्थ- अज्ञात पुरुषनें जिसको भेदन करनेवाली ये स्त्री गर्भवती न हो- माराहो उसके संबंधी पुत्र और समीपके यतो गलेमें शिला बांधकर जलमें प्रवेश वांधव और उसके संबंधको प्यभिचारिणी करदे ॥ २७८ ॥ स्त्रियोंसे राजा पूठेकी इसके संग किसका विपांनिदापतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम् कलह (लडाई ) हुईथी ॥ २८० ॥ विकर्णकरनासौष्ठींकृत्वागोभिःप्रमापयेत् ॥ खीद्रव्यवृत्तिकामीवाकेनवायंगतःसद्द । पद-विषामिदा २ पतिगुरुनिजापत्य- मृत्युदेशसमासळपृच्छेदापिजनशनः२८१ प्रमापणीम् २ विकर्णकरनासौष्ठीम् २ कृत्वाऽ पद-स्त्रीद्रव्यवृत्तिकामः १ वा:- केन ३ गोभिः ३ प्रमापयेत् क्रि-॥ वाइ-अयं१ गतः१ सह-मृत्युदेशसमासन्नर योजना- विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यप्र- पृच्छेत् कि- वाई-अपि-जनं२ शन::-॥ मामणीम् स्त्री विकर्णकरनासाष्टां कृत्वागोभिः योजना-अयं स्त्रीद्रव्यवृत्तिकामः पा प्रमापयेत् ॥ केन सह गतः इति मृत्यदेशसमासनं जनं तात्पर्याय-इसवचनमें पिछले वचनसे अपि शनैः पृच्छेत्॥ अगर्भिणी पदको अनुवृत्ति होतीहै- जो तात्पर्यार्थ-क्या यह मनुष्य स्वीद्रव्य- खी अन्यके मारनेके लिये अन्न जल आदिमें | जीविका इनकी कामनासे और तसेही किस विषदे-और जो दाइके लिये ग्राम आदिमें | स्त्रीमें इसकी प्रीतिथी और कोनसे द्रव्यमें अग्नि को दे-और जो अपने पति गुरु अप- प्रीतिथी और किससे जीविकाकी काम- त्य इनको मारे-वह स्त्री गर्भिणी न होयतो नाथी-और किसके संग देशांतरमें गयाथा- उसके कान-दाथ-नाक-ओष्ठ-इनको काट- | इसराति और नाना प्रकारोंसे पूर्वोक्त व्यभि- कर नही दमनकिये बैलोंसे मरवाय ई-चारिणी स्त्रियोंको पृथकर पूछ-और तसेती चोरी प्रकरणमें जो यह साहप्तिकका दंड मरनेके देशके निकट रहनेयाले गोप और कहा है यह प्रसंग है-यह मानने योग्य है | धनके वासी आदि जन है उनकोभी विभास भावार्थ-विष और अमिदेनेपाली-पति देकर पूर्वोक्त प्रकारसे शनः १ पृटे-ऐसे गुरु संतानक मारनेवाली घी गर्भिणी न | अनेक प्रकास प्रश्नोंको करके ऑर मारने होयतो उसके कान हाथ नाक ओष्ठ काट-पालका निश्चय करके टसको रचित दंडदे- कर-लोले मरवाय दे॥२७८ ॥ भावार्य-श्री द्रव्य जोषिकाके लिये यह अविज्ञातहतस्याशुकडईसुतर्वाधवाः । किसके संग गयाधा-ऐसे मरनेके स्थानके मष्टव्यायोपितश्चास्यपरपुंसिरता:पृथक् ॥ समीप रहनेवाले मनुन्याको पद-अविज्ञातइतस्प ६ आशुर- कलहर पूल २८२ ॥ शनः २ (३८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । 'पार्थिक खेतमेंसे लेले जिनको कोई निषेध भावार्थ-जो मनुष्य जानकर चोर वा में करे-तैसेही सातवें भोजनके समयतक | हिंसकको भोजन-धर-अग्नि-जल-संमति- जिसको सातों भोजन न मिलेहों अर्थात् चौरीकी सामग्री और मार्गका व्यय (खर्च) तीन दिनका भूखा हो वह उसी समयके देता है उसको उत्तमसाहस दंड होता भोजनयोग्य हीनकर्मा (नीचजाति )सेभी है ॥ २७६ ॥ भोजनके लिये प्रतिग्रहको लेले परंतु शस्त्रावपातेगर्भस्पपातनेचोत्तमोदमः । अगले दिनके लिये नले ।। उत्तमोवाधमोवापिपुरुपस्त्रीप्रमापणे२७७॥ भावार्थ-क्षुद्र-मध्यम-उत्तम-द्रव्यके चु- राने में मोलके अनुसार दंड होता है-और पद- शस्त्रावपाते ७ गर्भस्य ६ पातने ७ दंडके कर्म (देने )में देश काल अवस्था | च- उत्तमः १ दमः १ उत्तमः १ वा:- शक्ति इनकी चिंता (विचार) करने यो- | अधमः१वा:-अपिऽ-पुरुषस्त्रीप्रमापणे ॥ ७ ॥ ग्य है ॥ २७५॥ योजना-शस्त्रावपाते चपुनः गर्भस्य पा- तने उत्तमः दमः-पुरुपस्त्रीप्रमापणे उत्तमः भक्तावकाशाग्न्युदकमंत्रोपकरणव्ययान् । वा अधमः दमः ज्ञेयः॥ दत्वाचौरस्यवाहतुर्जानतोदमउत्तमः२७६ तात्पार्थ-और पराये गात्रमें शत्रका पद- भक्तावकाशाग्न्युदकमंत्रोपकरणव्य अवपात (मारना ) और दासी और ब्राह्म- यान २ दत्वाऽ-चोरस्य ६ वा:- हंतुः ६ | णसे भिन्न गर्भके पातनमें उत्तम साहस दंड जानतः ६ दमः १ उत्तमः १ ॥ जानना-दासीके गर्भपातमें तो-दासीगर्भ- योजना-चोरस्य-वा हंतुः भक्तावकाशा- | विनाशकृत्- इत्यादि वचनसे सोपणका न्युदकमंत्रापकरणव्ययान्- दत्वा जानतः | दंड कह आये हैं और ब्राह्मणके गर्भमें पुरुषस्य उत्तमः दमः भवति । तो- हत्वा गर्भमविज्ञातं- इस वचनमें तात्पर्यार्थ -भक्त ( भोजन ) अवकाश | ब्रह्महत्याका अतिदेश (मानना) कहेंगे (निवासका स्थान ) और शीतके दूर क- पुरुष और स्त्रीके प्रमापण ( मारना )में रनेके लिये अग्नि-और तृषा दूर करनेके शील और आचरणकी अपेक्षासे उत्तम वा लिये जल-मंत्र ( चोरीका उपदेश )चोरीके | अधम दंड व्यवस्थासे जानना ॥ साधनरूप उपकरण- और व्यय अर्थात् भावार्थ-शस्त्रका मारना गर्भका गिराना परदेशमें जाते हुये चोरको मार्गका खर्च- | इनमें उत्तम साहसका दंड-और पुरुष इतनी वस्तुओंको जो चोर वा हंता (मारने- | और स्त्रीकी हिंसामें उत्तम वा अधम साइसका वाला )को देता है अर्थात् दुष्टताको जान- | दंड होता है ।। २७७ ॥ करभी देता है और जो चोरकी उपेक्षा (छोडना ) करता है उसको उत्तमसाहस | विप्रदुष्टांस्त्रियंचैवपुरुपनीमगर्भिणीम् । दंड होता है क्योंकि यह नारदका वचन है सेतुभेदकरींचाप्सुशिलांबद्धाप्रवेशयेत् ॥ कि जो समर्थ होकर चोरकी उपेक्षा करते हैं वेभी उसी दोपके भागी होते हैं । पद-विप्रदुष्टां २ स्त्रियंरच:-एव:-पुरुष- नीम् २ अगर्भिणीम् २ सेतुभेदकरीम् २ १शक्ताश्च य उपेक्षते तेपि तदोषमागिनः । च-अप्सुशिलां २ बाऽ-प्रवेशयेत् क्रि व्यवहाराध्याय स्तेयप्रकरण २३ (३८६) योजना-विप्रदुष्टां पुरुषनी चपुनः सेतुभे- सुतबांधवाः १ प्रष्टव्याः १ योषितः १ चा- दकरी-अगर्भिणी स्त्रियं शिलां बद्ध्वा अप्सु अस्य६ परपुंसि७ रताः १ पृथक- ।। प्रवेशयेत् ॥ योजना-अविज्ञातहतस्य कलहं सुत- तात्प भावार्थ-और विशेषकर प्रदुष्ट | बांधवाः चपुनः अस्य परपुंसि रताः योषितः (भ्रूणहत्यारी वा स्वगर्भकी पातिनी ) और पृथक् आशु (शीघ्रं ) प्रष्टव्याः ॥ पुरुषकी इंत्री (हत्यारी ) और मर्यादाका ता भावार्थ- अज्ञात पुरुपनं जिसको भेदन करनेवाली ये स्त्री गर्भवती न हो- माराही उसके संबंधी पुत्र और समीपके यतो गले में शिला बांधकर जलमें प्रवेश बांधव और उसके संबंधकी व्यभिचारिणी करदे ।। २७८ ॥ स्त्रियोंसे राजा पूठेकी इसके संग किसका विपांग्रिदापतिगुरुनिजापत्यप्रमापणीम् । कलह (लडाई ) हुईथी ॥ २८० ॥ विकर्णकरनासौष्ठींकृत्वागोभिःप्रमापयेत् ॥ स्वीद्रव्यवृत्तिकाभोवाकेनवार्यगतःसह । पद-विषाग्निदा २ पतिगुरुनिजापत्य- | मृत्युदेशसमासनपृच्छेद्वापिजनशनः२८१ प्रमापणीम् २ विकर्णकरमासौष्ठीम् २ कृत्वाड पद-स्त्रीव्यवृत्तिकामः१ वाह- केन ३ गोभिः ३ प्रमापयेत् क्रि-॥ वाऽ-अयं१ गतः१ सहा-मृत्युदेशसमासन्नर योजना- विषाग्निदां पतिगुरुनिजापत्यम- | पृच्छेत् क्रि-वा:- अपि - जनं२ शनः:-॥ मापणीम् स्त्री विकर्णकरनासाठी कृत्वा गोभिः योजना-अयं स्त्रीद्रव्यवृत्तिकामः वा प्रमापयेत् ॥ केन सह गतः इति मृत्युदेशसमासनं जनं तात्पर्यार्थ-इसवचनमें पिछले वचन अपि शनैः पृच्छेत्॥ अगर्भिणी पदको अनुवृत्ति होतीहै- जो तात्पर्यार्थ क्या यह मनुष्य स्त्रीद्रव्य- स्त्री अन्यके मारनेके लिये अन्न जल आदिमें जीविका इनकी कामनासे और तसेही किस विषदे-और जो दाहके लिये ग्राम आदिमें | स्त्रीमें इसकी प्रीतिथी और कोनसे द्रव्यमें अग्निको दे-और जो अपने पति गुरु अप- प्रीतिथी और किससे जीविकाकी काम- त्य इनको मारे-वह स्त्री गर्भिणी न होयतो | नाथी-और किसके संग देशांतर गयाथा- उसके कान-दाथ-नाक-ओष्ठ-इनकोकाट- इसरोति और नाना प्रकारोंसे पूर्वोक्त व्यभि- कर नही दमनकि ये लोंसे मरवाय दे-चारिणी स्त्रियोंको पृथकूर पूछ-और तसेही न्चोक प्रकरणमैं जो यह साहसिकका दंड मरनेके देशके निकट रहनेवाले गोप और कहा है यह प्रसंगसे है-यह मानने योग्य है | वनके वासी आदि जन हैं उनकोभी विश्वास भावार्थ-विष और अनिदनेशली-पति देकर पूर्वोक्त प्रकारसे शनैः२ पूछे-ऐसे गुरु संतानके मारनेवाली श्री गर्भिणी न | अनेक प्रकारसे प्रश्नोको करके और मारने होयतो उसके कान हाथ नाक ओष्ठ काट- | वालेका निश्रय करके उसको उचित दंढदे- फर-घेलासे मरवाय दे॥२७८ ।। भावार्थ-स्त्री द्रव्य जीविकाके लिये यह अविज्ञातहतस्याशुकलसुतबांधवाः । किसके संग गयाथा-ऐसे मरनेके स्थानके मष्टच्यायोपितश्चास्यपरपुंसिरता:पृथक् ॥ समीप रहनेवाले मनुष्योंको पद-अविज्ञातहतस्य ६ भाशुर- कलईर । पूर्छ।। २८१ ॥ शन:२
(३८२)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
क्षेत्रवेश्मवनग्रामविवीतखलदाइकाः ता भावार्थ-पकेफल और सस्यसेयुक्त
राजपत्न्यभिगामीचदग्धव्यास्तुकटामिना।। क्षेत्र वेश्म (घर) वन-ग्राम-और पूर्वोक्त
पद-क्षेत्रवेश्मवनग्रामविवीतखलदाहकाः१ विवीत-खलियान-इनका दाह करनेवाले
गजपत्न्यभिगामीर च- दग्धव्याः १तु- और राजपत्नीके संग गमनका कर्ता इन
कटामिना३॥
सवको कट (वीरण तृण )से लपेटकर दग्ध
योजना क्षेत्रवेश्मवनमामविवीतखलदाह- करदे-- इन क्षेत्र आदिक दग्धकरने वालोंके
काः चपुनः राजपल्यभिगामी कटामिना दंडका कथन- मारण दंडके प्रसंगसे
दग्धव्याः ॥
है।।२८२ ॥
इति स्तेय प्रकरणम् ॥ २३॥
व्यवहाराध्याय स्वीसंग्रहणप्रकरण २४ (३८३) २ अथ स्त्रीसंग्रहणप्रकरणम् २४ समान रूप (आकार )के दोनों पद ग्रहण पुमान्संग्रहणे ग्राह्यः केशाकेशि परस्त्रियाः करने और प्रहार करने अर्थमें और इस सद्योवा कामजैश्चिन्है प्रतिपत्तौद्धपोस्तथा। इन्कर्मव्यतिहारे- इस सूत्रस-केशाकश- युद्ध इस अर्थमें समासको प्राप्तहों-फिर-- पद-पुमान्१ संग्रहणे ७ ग्राह्यः १ केशा समासके अंतमें इच् प्रत्यय होनाता है- केशि-परस्त्रियाः ६सद्य:- वाई-कामजेः३और केशाकेशि शब्दको अव्यय होनसे चिह्नः ३ प्रतिपत्ता द्वयोः ६ तथा: तृतीया ( भिस् ) विभक्तिका लुरु होजाता- योजना-परस्त्रियाः संग्रहणे प्रवृत्तः पुमान् है-तिससे यह अर्थ होजाता है कि पराई केशाकशि आदिभिः वा कामजः चिन्दः । भार्याक संग केशाकशि क्रीडाकरके न- तथा द्वयोः संप्रतिपत्तौ सत्यां सद्यः ग्राह्यः॥ खोके नवीन हुये व्रणोंस और प्रीतिसे किये तात्पर्यार्थ -अब स्त्रीसंग्रहण नाम विवा- चिन्ह वा दोनों को परस्पर संमतिसे ग्रहणमें दके मदकी व्याख्या करते हैं- प्रथम सा- | प्रवृत्तहुआ मनुष्य पकडने योग्य है-यहां हस आदि दंडकी प्राप्तिके लिये उसको तीन । परस्त्रीकामहण- नियुक्त और अवरुद्धा प्रकारका स्वरूप व्याप्सने कहा कि वह आदि स्त्रियोंके निषेधार्थ है ॥ प्रथम मध्यम उत्तम भेदसे तीन प्रकारका भावार्थ- पराईस्त्रीकेसंगकेशाकशिसंग्रहण ६-भिन्न २ जो देश काल भाषा इनसे और करनेमे और तत्कालके गावमें नख आदिके निर्जन स्थानमें पपई स्त्रीके संग कटाक्षसे दे- छेद आदि चिहास और स्त्री और पुरुष खना-हंसना-प्रथम साहस-और गंध माला- दोनोंकी संमतिपत्ति ( सलाह )में-पकहने भेजना- धूप भूषण वस्त्र और अन्न पानका योग्य है ॥ २८३॥ लोभदना मध्यम साहस-और एकांतमें संग नीवीस्तनमावरणसक्थिकेशावमर्शनम् । बैठना परस्सरका आश्रय केशाकेशि प्रहण , अदेशकालसंभापंसहेकासनमेयच।।२८९॥ यहसम्यक् संग्रह कहा है स्त्री पुरुषके मैथुनको पद- नविस्तनप्रावरणसक्थिकेशावमर्श- संमद कहते हैं-संग्रहणमें प्रवृत्तहुआ पुरुष-नम् २ अदेशकालसंभाएं २ सहकासनं २ केशाकेशि आदि चिह्नोंसे जानकर ग्रहण एव:-चा-॥ करने योग्य है-परस्पर केशोंको पकडकर | योजना-नौविस्तनप्रावरणसपियशावमर्श- जो कीडा उसे केशाकशि कहते हैं- केशा- अदेशकालसभाष-पुनःसह एकासन केशिपदमें- तम्रतेनेदमितिसरूपे- इस फुर्वाणः पुरुषः ग्रामः ॥ सूमसे बहुमीहिसमाप्त होता है उस सूत्रका तात्पर्याय-गो मनुष्य पराई पीके परि- अर्थ यह है कि सप्तम्यंत और कृतीयांत । धानवस्त्र (लहंगा की अंपिक स्थानका- । निश्यि तत्समाग्यान ममम मध्यमोसममा भदेश- चपावरण ( चोली ) अंपा और शिरके- काठमापामिनिजेने च परनियाः । कराझारेक्षा केशीका स्पर्श अगिलासे कर-सही हा प्रथम साहस स्मृतम् ॥ प्रथमात्याना प. निर्जन देश और जनोंका समूह और संघ- भूपगासाम् । मलोमने पायामध्यम साइसं : कारसे युक्त देशमें पराई खोके संग संभा- स्या सहासन शी. परशरमुशधरः । पण कर-और पपई मापीक संग एक शय्या कैसारिमा और सम्पर संग्रहण एएनन् । आदिपर रमण करने की इच्छासे घटे-सी + (३८४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरांप्रकाशसहित | । . संग्रहणमें प्रवृत्त वहभी पुरुष ग्रहण करने- तयोः ६ दण्डः १ यथा-संग्रहणे ७ तथा:- योग्य है-यहभी उस पुरुपके विषयमें है योजना-निषेधे स्त्री शतं तुपुनः पुमान जिसमें दोपकी शंकाही अन्य पुरुषको तो द्विशतं दमंदद्यात् प्रतिषेधे तयोः दण्डः-यथा दोष नहीं है सोई मनु ( अ०८ श्लो०३५५)/ संग्रहणे तथा ज्ञेयः॥ ने कहा कि जो मनुष्य पहिला अप तात्पर्याय-जिस मनुप्यके संग संभाषण राधी नहीं और किसी कारणसें परस्त्रीके संग आदि करनेका पति पिता आदि निषेध वार्तालाप करें तो वह किंचित् भी दोषको | करदें उसके संग संभाषण करती हुई स्त्री प्राप्त नही होता क्योंकि उसका किंचित्भी | सौपण दंडदे-और इसी प्रकार निषेध करने- अपराध नहीं जो मनुष्य पराई स्त्री उसका | पर वार्तालाप आदि करता हुआ मनुष्य स्पर्श करें और यह क्षमा करले तो वहभी दोसोपण दंडदे-और यदि निषेध करनेपर पकडने योग्य है वहभी मनु (अ.८श्लो.३५८ । दोनों वार्तालाप आदिमें प्रवृत्त होयतो उनको नेही कहाँ है जो मनप्य गुप्त स्थानमे | वही दंड होता है जो वर्णोके अनुसार संग्र- स्त्रीका स्पर्श करै वा स्त्रीके स्पर्शको सह ले इण ( भोग )में कहेंगे-यहभी चारण आदिको यह सब परस्परकी सम्मतिमें संग्रहण कहाहै | भार्याको छोडकर समझना-क्योंकि यह मनु और जो मनुष्य अपनी बढाईके लिए सर्पके | (अ०८ श्लो० ३६२ ) की स्मृति है कि यह समान क्रूरजनोंके सामने यह कहै कि इस विधिचारणोंकी स्त्री- और जो अपने देहसे चतुरस्त्रीक संग मैने कईवार रमण किया है | जीते हैं उनकी ( मजूर ) स्त्री-इनमें नहीं है वहभी पकडने योग्य मनुनें कहां है क्योंकि वे अपनी स्त्रियोंको सजाते है और कि अभिमान वा मोह वा वडाईसे जो स्वयं छिपाकर परपुरुषोंके समीप भेजते हैं । यह कहै कि यह स्त्री मैने पहिले भोगी है भावार्थ-निषिद्ध की हुई जो स्त्री परपुरुषके यहभी संग्रहण कहाता है॥ संग और निषिद्धकिया हुआ पुरुष पराई भावार्थ-नीवी-चोली-जंघा-केश-इनका | स्त्रीके संग संभाषण आदि करतोस्त्री सोपण स्पर्श-और कुदेश और कुसमयमें वार्तालाप | दंड-और पुरुष दोसोपण दंडदे- यदि नि- और एकासनपर बैठना इनको जो पराई | षेध करनेपर दोनोंही वार्तालाप आदि करें। स्त्रीके संग करे वहभी पकडने योग्य है॥२८४॥ तो उनको वही दंड है जो पराई स्त्रीके भो- स्त्रीनिषेधेशतंदद्याविशतंतुदर्मपुमान् । गमें कहेंगे ॥२८५॥ प्रतिषेधेतयोर्दडोयथासंग्रहणे तथा।।२८५।। स्वजातावुत्तमोदंडआनुलोम्येतुमध्यमः ! पद-स्त्री १ निषेधे ७ शतं २ दद्याक्रि- प्रातिलोम्येवधःपुंसोनार्याःकर्णादिकर्तनं ।। द्विशतं २ तुः-दमं २ पुमान् १ प्रतिषेधे ७ पद-सजातो ७ उत्तमः१ दंडः १-आनु- । यस्तनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत कारणात् ।नदोष लोम्ये ७ तु:- मध्यमः १ प्रप्तिलोम्ये ७ प्राप्नुयाकिचिन हि तस्य व्यतिक्रमः॥ वधः१ पुंसः६ नार्याः ६ कर्णादिकर्तनम्१- २ स्त्रिय स्पृशेदशेयः स्पृष्टो वा मर्पयेत्तथा । पर. योजना-सजाती उत्तमः-तुपुनः आनुलो- स्परस्यानुमते सर्व संग्रहणं मत ॥ ३ दर्पाहा यदि वा मोहालाघया वा स्वय वदेत् । १ नैप चारणदारेषु विधिर्नात्मोपर्जाविधु । सनयति पूर्व मयेयं भुक्तेति तच सग्रहण स्मृतम् । हिते नारी निगुदाश्चारयति च। *- व्यवहाराध्याय स्त्रीसंग्रहणप्रकरण २४ (३८५) . म्ये- मध्यमः दंडः भवति-प्रातिलोम्ये पुंसः (कोईसी) स्त्रीके संग गमन जो कर वधः-नायाः कर्णादिकर्तनम्-दंडःज्ञेयः ॥ वह गुरुतल्पग कहता है उसका दंड तापयार्थ- यदि चागेवण- बलात्कारसे शिश्न ( लिंग के काटनेसे अन्य नही है- अपनी सजातीय और गुप्त ( पडदेदार) और प्रतिलोममें उत्तम वर्णकी स्त्रीके गमनमें पराई स्त्रीके संग गमन करे तो उत्तम दंड क्षत्रिय आदि वर्गों में पुरुपका वध होता है- (अस्सी ऊपरसहस्रपण ) होता है और जो यहभी गुप्त स्त्रीके विषयमें हैं अन्यके गमन में आनुलोम्यसे अर्थात् उत्तमवर्ण नीचवर्णकी तो धनका दंड होता है क्योंकि यह मनुकी स्त्रीके संग गमन कर तो मध्यम दंड जानना स्मृति है (अ० ८ श्लो० ३७७-३७८-) -और अपने वर्णकी-गुप्तसे भिन्न स्वीक- कि यदि वे दोनों क्षत्रिय वैश्य-गुप्ता ब्राह्म- और गुप्तभी नीचे वर्णको स्त्रीके संग गमन | णीक संग-धर्मसे पतित हुये गमन करे तो करै तो मनुनें विशेष कहा है (अ०८ शूद्रके समान दंड देनेयोग्य हैं वा कटाग्निसे श्लो०३७८-३८३) कि यदि ब्राह्मण अगुप्त दग्ध करने-यदि वैश्य और क्षत्रिय अगुप्ता ब्राह्मणीके संग बलसे गमन करे तो सहस्र- ब्राह्मणीक संग गमन करें तो वैश्यको पांच पण दंड-और चाहती हुई ब्राह्मणीके संग । सो पणका और क्षत्रियको सहल पणका गमन करे तो पांचसो पण दंड-दे-और यदि दंड दे-और शूद्र अगुप्ता उत्कृष्ट वर्णकी गुप्त उन पूर्वोक्तोंके संग गमन करे तो सह- स्त्रीके संग गमन कर तो लिंग छेदन और सपण दंडदे-और क्षत्रिय और वैश्यकोंभी । सर्वस्वका हरना-और गुप्ताक संग गमन शूद्राके गमनमें सहस्रपण दंड होता है- कर तो वध और सर्वस्वका अपहार होता यहभी गुरु और मित्रकी भायासे भिन्नके है-यह मर्नु नैही कहा है कि (अ० ८ श्लोक विषयमें समझना क्योंकि नारंदका वचन | ३५३ ) यदि शुद्र, गुप्ता वा अगुप्ता द्विजाति है कि माता माताको बहिन-सास-मातुल-स्त्रीकेसंग गमन करे तो अगुप्ताके गमनमें कीस्त्री-पिताको भगिनी-पितृव्य मित्र शिष्य | अंग और सर्वस्वसे हीन कर और गुप्ता इनको स्त्री-भगिनी-भगिनीकी सखी-पुत्रवधू- संग गमन करे तो सर्वस्वका हरण कर- पुत्री आचार्यकी स्त्री-सगोत्रा- शरणआई- यदि स्त्रीहीन वर्णके पुरुषके संग गमन करे यणी-- सन्यासिनी- धात्री ( धाय )- तो कर्ण और आदिपदसे नासिकाका छेदन साध्वी- उत्तमवर्णकी- इनमें अन्यतम करे और अनुलोमा में सजातीय पुरुषके संग १ सहस ब्राह्मणो दध्यो गुप्ता विप्रा बलाद्रजन् । गमन करनेवालीके दंडकी कल्पना अपनी शतानि पच दंश्यः स्यादिच्छत्या सह सगतः ॥ सहस्र बुद्धिसे करनी-और वध आदिका उपदेश प्रामणो दंड दाप्यो गुशे तु ते प्रजन् । भूदाया क्षत्रिय-राजाकेही करनेयोग्य है क्योंकि प्रजापालनका विशः सहस्र तु भवेद्दमः ।। २ माता मातृष्षसा श्वश्रूमातुलानी पितृष्वसा । १ उभावपि हितावर ब्राह्मण्या गुप्तयासह । विगुती पितृव्यसाखिशिष्यत्री भगिनी तत्सखी स्नुपा ॥ दुहि- शवया दग्धच्या या कटामिना-बामणी ययगुप्तां ताचार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता। राी प्ररजिता तु सेवेता वैश्यपानावश्य परशत कुर्यात् क्षत्रियंत धात्री साली वर्णोत्तमा च या ॥ आसामन्चतम सहारणम् । गरछन्गरतल्पग उच्यतेशिक्षयोत्कर्तवात्तव नान्यो २ शदी गुप्तमगुप्त वा वैज्ञात वर्णमावसन्-अगु- प्तमंग सर्वस्वगुप्तं सर्वेण हीयते । . । दो रिधीयते।
(३८६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । आधिकार राजाकोही है-द्विजातिमात्रको पद-अलंकृतां २ हरेत् क्रि-कन्यां २ नही है क्योंकि उसमें यह निषेधे है कि उत्तम २ हि:-अन्यथा:-अधर्म २ दण्डम् २ ब्राह्मण परीक्षाके लियेभी शस्त्रको ग्रहण न दद्यात् क्रि-सवर्णासु ७ प्रातिलोम्ये ७ वधः१ कर-और जहां राजाको निवेदन करनेमें स्मृतः १॥ कालका विलंबहो और कार्यके अतिपात योजना-यः अलंकृतां कन्यां हरेत् तस्य (विगाड )को शंका होयतो स्वयंही जार उत्तमं अन्यथा अधर्म दंड सवर्णासु दद्यात आदिको हतदे-(मनु अ० ८ श्लो० ३४८) प्रातिलोम्ये वधः स्मृतः ॥ का वचन है कि जहां धर्मका अवरोध (रोक वा नाश हो वहां. ब्राह्मणभी शस्त्रको तात्पा-भा०-विवाहके समय अलंकार की ग्रहण करें-मनु (अ० ८ श्लो० ३५१ )का हुई कन्याको हरै तो उत्तम साहस और वचन है कि आतताया (शस्त्रधारी के विना विवाहके समय हरे तो अधम साहस मारनेमें-मारनेवालेको कुछ दोष नही होता | दंड होता है और प्रतिलोम वर्णकी कन्याके है चाहे प्रकट वा अप्रकट मारे-क्योंकि हरनेवाले क्षत्रिय आदिका तो वध कहा है क्रोधही क्रोधको नष्ट करता है इस वचनसे यहां दंडके कहनेसे चुरानेवालेसे छीनकर शस्त्रग्रहण करने की आज्ञा ब्राह्मणकोभीहै- वह कन्या अन्यको विवाह देनी यह बात तेसे क्षत्रिय और वैश्य परस्परको स्त्रीके संग अर्थात् जानीगई ।। २८७ ॥ गमन कर तो क्रमसे सहस्रपण और सौपण सकामास्वनुलोमासुनदोपस्त्वन्यथाधमः। दंड जानने सोई मनु (अ० ८ श्लो० ३८२) दूषणेतुकरच्छेदउत्तमायांवधस्तथा॥२८८ में कहाँ है कि वैश्य गुप्ता क्षत्रियाके संग और क्षत्रिय वैश्याके संग गमन करें तो पद-सकामातु ७ अनुलोमासु ७ न:- वे दोनों उस दंडक योग्य होते हैं जो अगुप्ता दोषः १ तु-अन्यथाऽ दमः १ दूपणे ७ तु:- ब्राह्मणांके गमनमें होता है। करच्छेदः १ उत्तमायां ७ वधः १ तथा:-॥ भावार्थ-सजातीय स्त्रीक गमनमें उत्तम और अनुलोम स्त्रीके गमनमें मध्यम दंड दोषः न भवति अन्यथा दमः भवति तुपुनः योजना-सकामासु अनुलोमासु गमर्ने सब वर्णोको होता है-और प्रतिलोम स्त्रीके | दूषणे करछेदः तथा उत्तमायां वधो गमनमें पुरुषका वध और स्त्रीको कान भवति । आदिका काटना होता है ॥ २८६ ।। अलंकृतांदरेत्कन्यामुत्तमान्ययाधमम् । तात्पर्यार्थ-यदि अनुरागवाली हीनवण- की कन्याका अपहरण (चपना) कर तो दंडंदद्यात्सवासुप्रातिलोम्येवधास्मृतः॥ कुछ दोष नहीं और बिना इच्छावाली १ नाह्मणः परीक्षार्थमपि शत्र नाददीत । अपहरण कर तो प्रथम साहसका दंड होता २शन द्विजातिभिर्माद्यं धोयत्रो परध्यते । है और अनुलोम वर्णकी नहीं चाहती हुई ३ नाततायिनदोषो हतुर्भवति कश्चन । प्रकाश वा | कन्याको बलात्कारसे नखक्षत (घाव) प्रकाश वा मन्युस्त मन्युमृच्छति.. आदिसे. दूपित कर तो उसके हाथ छेदन ४ वैश्यश्चक्षत्रिय गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत् | करने योग्य हैं और जो उसी पूर्वोक्त क- यो भासण्यामगुप्तायांतानुमा दडमईतः । न्याको योनि अंगुलिके प्रक्षेपसे क्षत करके .
व्यवहाराध्याय स्त्रीसंग्रहणप्रकरण २४ (३८७) . - 'दूषण लगाता है तो उसको यह मनेका देदे यदि नहीं चाहती हुई सवर्णाके संग गमन (अ० ८ शो ३६७ ) कहा हुआ दंड जा- करे तो वधही कहा है-मनु ( अ०८ श्लोक नना-कि जो मनुष्य नही सहकर 'अभिमा- | ३६३-३६४) समान वर्णकी कन्याकासेवन नसे कन्याको दूपित करता है उसकी शीघ्र करता हुआ मनुष्य पिता चाहें तो शुल्कदै अंगुलि काटने योग्य है और वह छःसो ६०० और नहीं चाहती हुईके संग जो गमन के- पण दंड देने योग्य है और यदि चाहती हुई रता है वह वधक योग्य होता है और कन्याको पूर्वोक्त प्रकारसे दूषित करे तो चाहती हुई कन्याको दूषित करता हुआ मर्नुन (अ. ८ श्लो० ३६८) यह विशेष तुल्य वर्णका मनुष्य वधको प्राप्त होता है ।। कहा है कि यदि सजातीय वर्णकी चाहती भावार्थ-इच्छावाली अनुलोम कन्याका हुई कन्याको दूषित करे तो अंगुलि छेदनके गमन करता हुआ मनुष्य दोषभागी नही योग्य नहीं होता है और पुनः सगकी निवृत होता और न चाहती हुएके संग गमन करे तिके लिए दोसा पण दंड देने योग्य है तो दंड होता है और दूषित करनेमें हाथोंका और जब कन्याही, और वही स्त्री, कन्याको छेदन और उत्तम वर्णको कन्याको दूषित दूषित कर तो मर्नुर्नेही (अ० ८ श्लो० ३६९) करें तो वधके योग्य होता है ।। २८८ ।। यह कहा है कि जो कन्याही कन्याको दूषि- त करे तो दोसी पण दंड-और बड़ी स्त्री | शतंवीदूषणेदद्याहेतुमिथ्याभिशंसने कर तो शीघ्रही मूंडने योग्य और अंगुलि-! पन्गच्छन्शतंदाप्योहीनांस्त्रींगांचमध्यम योंके छेदन मौर खर (गधा) पर चढाने पद-शतं २ स्त्रीदूषणे ७ दद्यात् क्रि- योग्य है-यहां कन्याके दूषणसे योनिमें पाव । २ तु:-मिथ्याभिशंसने ७ पशून् २ लेना और जो उत्तम जातिकी चाहती वा गच्छन् १ शतं २ दाप्यः १ हीनां २ स्त्रीं २ विना चाहती हुई कन्या क्षत्रिय आदि गमन गां २ च-मध्यमं २ ॥ करता है उसका मारनाही दंड इस मनु (अ० ८ श्लो० ३६६ ) के वर्चेनते है कि द्वशते दद्यात् पशून् गच्छन् सन् शतं योजना-स्त्रीदूपणे शतं-मिथ्याभिशंसने उत्तम वर्णकी कन्याके संग गमन करता हुआ होन वर्ण वर्धके योग्य होता है-और दाप्यः चपुनः हीनां स्त्री चपुनः गां गच्छन् सन् मध्यमं दाप्य:- जो चाहती हुई सवर्णा कन्यासे गमन करता तात्पर्यार्थभा०-यहां स्त्री शब्दस प्रकरणके है या उस कन्याके पिताको दो गो शुल्क- वलस कन्या समझनी उस कन्याके विद्य- रूपसे देदे यदि वह पिता चाहे पिता शुल्क- मानही अपस्मार (मिर्गि ) राजयक्ष्मा रूपसे न चाहना होय तो वे दोनों गा गजको आदि बडे निंदित रोग और मथुन आदिको १ अविवाद्य तु य. कन्याकुर्यादर्पण मानवः । प्रकट करके जो मनुष्य उसको यह अकन्या तस्याशु का अगल्या दह चाहंति पट्शत । (मैथुनके अयोग्य ) है इस प्रकार दूषित २ सकामा दूषय स्तुल्यो नागलिच्छेदमर्हति द्विशत करता है वह सौपण दंड देने योग्य है और तु दम दाप्य. समविनिवृत्तये । ३ कन्यैव कन्यायां कुर्यात्तस्यास्तु द्विशतो १ शुल्क दद्यात्सेवमानः सममिच्छत्पिता यदि। • दमः यातु कन्या प्रफुयात् स्त्रीसा सोमण्डियमर्हति। योकामा दूषयेत्कन्यां स सयो वधमइति । सकामां. ४ उत्तमा संवमानस्तु जघन्यो यधमहति । दुषयस्तुल्यो न वध प्रामुयानरः ।
(३८८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । । जो कन्यामें नहीं विद्यमान दोषोंको प्रकट | रिणी-वेश्या दासी निष्कासिनी जो स्त्री हैं करता है वह दासोपण देने योग्य है और वे अनुलोम क्रमसे गमन करने योग्य हैं- जो गौसे भिन्न पशुका गमन कर वह | प्रतिलोमसे नही-यदि वे भुजिया होयतो सोपण दंड देने योग्य है और जो मनुष्य | पराई दाराके समान दोप है-गमन करने सकाम वा निष्काम चाण्डालकी स्त्री वा | योग्यभी उनमें गमन न करें क्योंकि वे पराई गौके साथ गमन करता वह मध्यम | परिग्रह (स्त्री) हैं-स्वामीकी नही रोकी साहस दंडके योग्य होता है ॥ २८९ ॥ जो दासी निष्कासिनी होती है-कदाचित अवरुद्धासुदासीपुभुजिप्यासुतथैवच कोई शंका करे कि स्वरिणी आदिको साधारण रूपसे गमन योग्य कहना अयोग्य गम्यास्वपिपुमान्दाप्य:पंचाशत्पणिकंदमम् है क्योंकि जाति वा शास्त्रसे कोईभी स्त्री पद-अवरुद्धासु ७ दासीषु ७ भुजिप्या- जगत्में साधारण नहीं मिल सकती-सोई सु ७ तथाऽ-एव:-च-गम्यासु ७ अपि:- | दिखाते हैं कि स्वरिणी और दासी वर्णकी पुमान् १ दाप्यः १ पंचाशत्पणिकं२ दमं २॥ | ही स्त्री होती हैं-क्योंकि मनुका वचन है योजना-अवरुद्धासु दासीषु चपुनः त- | किजो स्वैरिणी पतिको छोडकर अपने सवर्णके थैव भुजिप्यासु गम्यासु अपि आसु गच्छन् | पुरुषका कामनासे आश्रय लेती है ऐसे . पुमान् पंचाशत्पणिकं दमं दाप्यः॥ वोंके अनुलोमक्रमस दासभाव होताह प्रति- तात्पर्यार्थ-इस वचनमें पिछले वचनमेंसे | लोमसे नही-और अपने वर्णकी स्त्रीको गच्छन् पद आता है-पूर्वोक्त है लक्षण | पतिके जीवते वा मरेपर अन्य पुरुषके संग जिनका ऐसी अपने वर्णकी जो स्त्री वे दासी भोग करनाभी नही घटता क्योंकि यह मनु- कहाती हैं उनको यदि स्वामी अपनी शुश्रू- में (अ० ५ श्लो. १५४-१५७ ) निषेधका पामें हानि न पडनेके लिये अपने घरही | वचन है कि दुष्ट स्वभाव-यथेच्छाचारी- अन्य पुरुषोंके संग भोगनिवृत्तिके अर्थ रोक गुणोंसे हीनभी पतिकी, साध्वी स्त्री देव- कर रक्खे तो वे अवरुद्धा दासी कहाती हैं- ताके समान परिचर्या कर-चाहे पुष्प मूल और पुरुषकी स्त्री बन करजो रहै वे भुजिप्या फल इन श्रेष्ठोंसे देहको शुष्क करदे होती हैं-जो दासी अवरुद्धा और भुजिन्या परंतु पतिक मरने पर-अन्य पुरुषकानामभी 'होयतो उनमें और चशब्दसे वेश्या और स्वै- | नले-और कन्या अवस्था भी स्त्री साधा- रिणी साधारण स्त्री जो भुजिप्या है उन सब रण नहीं हो सकती क्योंकि उसी क- साधारण मनुष्योंके गमन करने योग्य त्रि- | न्याके दानका शास्त्रसे उपदेश है जिसकी योमें गमन करता हुआ मनुष्य पचास पण ' पिताने रक्षाकर रक्खी हो-और दाताके दंड देने योग्य है क्योंकि वे अन्यका परि-। अभावमें भी वसी हीको स्वयंवरका उपदेश अह होनेसे पराई स्त्रीके तुल्य हैं-यही नार- दने स्पष्ट कहा है कि ब्राह्मणीसे भिन्न स्वै- वर्णानामानुलोभ्येन दास्यं न प्रतिलोमतः ॥ १ स्वैरिणी या पात हित्वा सवर्ण कामतः श्रयेत् । . स्वरिण्यत्राह्मणी वेश्या दासी निष्कासिनी च याः २ दुशीलः कामवृत्ती वा गुणैर्वा परिवर्जितः। गम्या:स्पुरानुलोम्येन त्रियो न प्रतिलोमतः।भास्वेव तु | परिचर्यः स्त्रिया साध्व्या सतत देववसतिः । भजिप्यासु दोषः स्यात्परदास्यत् । गम्यास्वपि हि नोपे काम तु क्षपयेईई पुष्पमूलफलैः शुभैः । न तु यायत्ताः परपरिग्रहाः। नामारि गृहीवात्पत्यो प्रेते परस्य तु । - व्यवहाराध्याय स्त्रीसंग्रहणमकरण २४ (३८९) है-आर दासी होनेसे कुछ अपने धर्मसे | समान सो ठीक नहीं-वहां कुंडगोलक पतित नहीं होती क्योंकि परतंत्र हो जाना आदिमें होनेसे मनुष्यजात्याश्रयत्वात् यह दाप्तभाव है कुछ अपने धर्मका त्याग नहीं- हेतु अनेकांतिक है अर्थात् व्यभिचारी है वेश्याभी साधारणी नही है अनुलोम क्योंकि कुंडगोलकमें मनुष्यत्व है, और वर्णोको छोड़कर गमनके योग्य अन्य कोई वोंके अंतःपातित्व (मध्यमें ) उनमें नही जाति नहीं है और उनकेही मध्यमें मानोगे है-इससे यह मानना योग्य है कि वेश्या- तो पूर्वके समानही गमनके अयोग्यता नामकी कोई जाति अनादिसे है उसमें है और प्रतिलोमोंमें तो भली प्रकारही उत्तम जातिके वासमान जातिके पुरुषसे जो गमनके अयोग्य होंगी-इससे अन्य पुरुषके | कन्या पैदा है उसकी जीविकाभी पुरुषके संग भोगमें उनको निंदित कर्मक | संभोगसे है और वह जाति ब्राह्मणत्वके अभ्याससे पतित होना होता है और समान लोक प्रसिद्ध है और यह प्रसिद्धि पतितका संसर्ग निषिद्ध है इससे सब पुरु- कि पंचचूडानाम किसी अप्सराके सकाशसे निर्मूलभी नहीं क्योंकि स्कंद पुराणमें कहाहै पोंके भोगने योग्य नही हो सकती यह उसकी संतानमें पांचवी वेश्या जाति हुई- शंका सत्य है-किंतु यहां स्वैरिणी आदिके उपभोगमें पिता आदि रक्षक-और राज- इससे वे नियमसे पुरुषके संग विवाहकी दंड आदिका भय आदि दीखता हुआ दोष- जातिके पुरुषके संग गमनमें अदृष्ट दोष विधिसे शून्य हैं इससे समान और उत्कृष्ट का अभाव है इससे गमन करने योग्य कहना नहीं है और न दंड है-और उनमेंभी जो युक्त है और वह गमन-अवरुद्धा दासीयोंमें दंडका अभाव है इससे नियमसे जो पुरुषोंका पोको यद्यपि दंड नही है तथापि अदृष्ट अवरुद्ध है उनके संग गमन करनेवाले पुरु- परिग्रहरूप उपाधिसे दंडका कहना है उस उपाधिसे जो रहित हैं-उनमें अर्थात् जाना दोष (पाप) तो है ही क्योंकि यह नियम जाता है अर्थात् वेही गमनके योग्य है और है कि अपनी स्त्रीमही सदैव रत रहे और यह प्रायश्चित्तभी है कि पशु आर स्वरिणी आदिमें जो दंडका अभाव है वह ' वेश्याके गमनमें प्राजापत्य व्रत कहा है- दंडकी विधिकै अभावसे है और इस निष- इससे सब निर्दोष है !! धसभी जाना जाता है कि उत्कृष्ट वर्णकी भावार्थ-अवरुद्धा और भुजिप्या जोगमन कन्याको जो भजे ( सेवे ) उसको कुछ दंड | करने योग्यभी हैं उनके संग गमन करने- नदे-ओर अपने धर्मसे पतनका प्रायश्चित्त वाले पुरुषकोपचाप्त पणका दंड होताहर९०।। तो गमन करने योग्य स्त्री, और गमन करने- 'प्रसादास्यभिगमेदंडोदशपणास्मृतः । वाले पुरुष, इनको अविशेपसे होताही ई- बहूनांपयकामासाचतुर्विंशतिक पृथक् ॥ और जो वेश्याओंको भिन्न जातिके अभा- पद-प्रसाा-दास्यभिगमे ७ दंडः१दश- वसे वोंके अतःपातिनी (बीचमें) अनु- पणः स्मृतः१पहूनां ६ यदि-अकामा १ मानसे कहाँ है कि वश्या-वर्ण आर अनु- असो १ चतुर्विशतिकः१ पृथक् १॥ लोमोके मध्यमें है-मनुष्य होनेसे-जाह्मणोंक 'पचचहानामझायनाप्सरसस्तरसंततिः वेश्या- कन्या मनतीमुत्कृष्ट न किंचिदपि दापयेत् । ख्या पचमी जातिः। २ घेश्या वर्णानुलोमांत पातिन्यो मनुथ जा- २सदारनिरतः सदा । शववाभिगमने प्राजा- त्याश्रयतात् । प्रायम्यादिवत् । पत्य विधीयते। - (३९०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । -- योजना-प्रसह्य दास्यभिगमे सति दश तात्पर्यार्थ-जय शुल्कको लेकर स्वस्थभी पणः दंडः स्मृतः-पदि असा यहूनां अकामा वेश्या धनके स्वामीको न भजाचाहे तो. भवेत् तदा चतुर्विशतिकः पणः दंडःपृथक् २ दूना शुल्कदे और शुल्कदेकर पुरुषगमन न ज्ञेयः॥ किया चाहे तो शुल्क न मिलेगा क्योंकि नार- तात्पर्याय-पूर्व दासी स्वरिणी भुजिप्याके | देने कहा कि शुल्कको लेकर भोगको न गमनमें दंड करनेसे भुजियासे भिन्नोंमें दंड चाहती हुई स्त्री शुल्कको दूनादे और दिया नही यह अर्थात् कहा गया-अब उसकाभी है शुल्क जिसनें ऐसा पुरुष भोग न किया अपवाद कहते हैं-पुरुषके संग भोगही हैं। चाहे तो शुल्ककी हानिको प्राप्त होता है- जीविका जिनकी ऐसी दासी स्वैरिणी आदिके और शुल्क न ग्रहण किया होय तो ठहराने- संग शुल्क ( मोल ) दियेविना बलात्कारसे। पर वेश्या उतनाही शुल्क दे-तैसेही अन्यभी गमन कर उसको दशपणका दंड होताहै- विशेष उसनेही दिखाया है यदि पुरुष यदि बहुतसे मनुष्य-नही चाहती हुई एक स्त्रीको कहकर शुल्क नदे और दांत वेश्याके संग बलसे गमन करें तो प्रत्येक और नख आदिके द्वारा बलसे गमन कर मनुप्यको चौवीस २ पण दंड होताहै-और और योनिसे भिन्न स्थानमें गमन करै वा ब- जब वेश्याकी इच्छासे भाटि (भाडा ) देकर हुत पुरुषोंसे गमन कराव तो आठगुण शुल्क वेश्याके न चाहनेपरभी गमन करें तो उन वेश्याको और उतनाही दंड राजाकोदे जो पुरुषोंको दोष नहीं है जो उस वेश्याको | प्रधान वेश्या है और वेश्याके घरमैं रहने- व्याधि नहो-क्योंकि नारदको वचन है कि वाले कामी पुरुप हैं उनसेही निर्णय वेश्यासं- गिन-परिश्रमवाली-राजाके काममें लगी- | बन्धिकार्यों में होता है। वेश्या बुलाने पर न आवे तो दंड देने योग्य भावार्थ-वेतनको ग्रहण करके पुरुषका नहीं कही है। सम्बध वेश्या न चाहै तो दूना शुल्क दे भावार्थ-बलात्कारसे दासीके गमनमें | वेतन न लिया होय तो समान ही दे इसी दशपण दंड कहा है यदि नही चाहती हुई प्रकार पुरुषभी दे ॥ २९२ ।। स्त्रीके संग बहुतसे मनुप्य गमन करें तो अयोनौगच्छतोयोपांपुरुषवापिमेहतः पृथक् २ चौवीस २ पण दंड दें ॥ २९१ ॥ चतुर्विंशतिकोदंडस्तथाप्रवजितागमे ।२९३ . .. 'तीद्विगुणवहेत् । पद-अयोनगिच्छतःक्ष्योपांर पुरुषवाई- मगृहीतेसमंदाप्यापुमानप्येवमेवच२९२॥ अपि-मेहतः६ चतुर्विंशतिकः १ दण्डः१ तथाऽ-प्रबजितागमे ७ ॥ पद-गृहीतवेतना १ वेश्या १ न:-इच्छंती१ द्विगुणं २ वहेत क्रि- अगृहीते ७ समं २ १ शुल्क गृहीला पण्यस्त्री नेच्छती द्विगुण बहे- दाप्यः १ पुमान् अपि-एवं-एव:-च-॥ त् अनिच्छन्दत्तशुल्कोपि शुल्कहानिमवाप्नुयात् । योजना-भोगं न इच्छंती गृहीतवेतना २ अप्रयच्छस्तथा शुल्कमनुभुय पुमान् नियं वेश्या द्विगुणं अगृहीत वेतने समंवहेत्- वाम गच्छेद्यो बहुभिपि वासयेत् ॥ शुल्कम गुण आक्रमेण च सगच्छन् घातदतनखादिभिः ॥ अयोनी चपुनः पुमान् अपि एवमेव दाप्यः॥ दाप्यो विनय तारदेव तु ॥ वेश्याप्रधाना यास्तत्र का १ व्याधितास श्रमा म्यग्रा राजकर्मपरायणा । आ मुकास्तगृहोषिताः ॥ तत्समुत्येषु कार्येषु निर्णक मंत्रिता चेन्नागच्छेददच्या वड्या स्मृता। सशये विदुः। ८
२
व्यवहाराध्याय स्त्रीसंग्रहणमकरण २४
(३९१)
योजना-योषां अयोनो गच्छतः वा पुरुषं नमें यदि तीनों वर्णके मनुष्य प्रायश्चित्त न
प्रति मेहतः तथा प्रजितागमे पुरुषस्य करें तो इस मनुके वचनसे सौ पण देकर
चतुर्विशतिको दंडोभवति ॥
और निंदितबंधन ( भगाकार )का चिह्न क-
ता भा०-जो मनुष्य अपनी स्वीके मुख | रके अपने देशसे राजा उनको निकासदे
आदिमें गमन करता है वा पुरुषके सन्मुख | कि अन्त्यज वर्गों को स्वीके गमनमें सहस्र
मेहन (गमन ) वा संन्यासिनीके संग गमन पण दंड होता है और जो प्रायश्चित्त कर-
करता है वह चौवीस पण दंड देने योग्य है। नेको उद्यतहों उनको पूर्वोक्तही दंड होता
अत्याभिगमनेत्वंक्यःकुर्वधनप्रवासयेत् ।
है शुद्धती चाण्डालीके गमनसे चाण्डालही
शूद्रस्तांत्यएवस्थादत्यस्यार्यागमेवधः ॥
होता हैयदि चाण्डाल उत्तम जातिकी
स्त्रीके साथ गमन करे तो उसका वधही
पद-अन्त्याभिगमने ७ तु-अंक्यः १ दंड है ॥
कुबंधेन ३ प्रवासयेत् नि-शूद्रः १ तथा:-
भावार्थ-चाण्डालीके गमनमें भगाकार
अंत्यः १ एव:- स्यात् क्रि-अंत्यस्य ६आ- चिह्न करके अपने देशसे निकासदे और
योगमे ७ वधः १ ॥
शूद्र चाण्डालीके गमनमें चाण्डालही होता
योजना-तुपुनः अंत्याभिगमने कुबन्धन है चाण्डाल उत्तम वर्णकी स्त्रीके साथ गमन
अंक्यः शूद्रः अंत्याभिगमने अंत्य एव स्यात् कर तो बधको प्राप्त होता है ॥ २९४ ॥
अंत्यस्य. आभिगमने वधः एव स्यात् ॥
तात्पर्यार्थ-अंत्या ( चाण्डाली ) के गम १ सहस्रन्त्यन्त वीस्रयम् ।
इति स्त्रोसंग्रहप्रकरणम् ॥२४॥
(३९२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । - अथ प्रकीर्णकप्रकरणम् २५ अब प्रकीर्णक नामके व्यवहार पदका प्र.. स्ताव करते हैं-उसका लक्षण नारदनें कहा जनवाभ्यधिकंवापिलिखेद्योराजशासनं । है कि प्रकीर्णकमेंभी राजाके आश्रयके व्य- पारदारिकचौरंवाचतोदंडउत्तमः २९५॥ बहार जानने-नाकी आज्ञाको न मानना- वा न माननेका कर्म करना-पुरः (नगरी) पद-ऊनं २ वा-अभि-अधिकं २वा- अपिऽ-लिखेत् क्रि-यः १ राजशासनम् २ भदन-पाखंडी नैगम श्रेणीगण इनके धर्मका का दान-प्रकृति ( राजाके सेवक)योंका पारदारिकचौरं २ वार-मुञ्चतः ६ दण्डः १ विपर्यय-पितापुत्रका विवाद-प्रायश्चित्त न उत्तमः १ ॥ करना-प्रतिग्रहका नाश-आश्रमवालोंका योजना-उन वा अधिकं वा योराजशा- क्रोध-वर्णसंकरका दोष-उनकी जीवि- सनं लिखेत तस्य वा पारदारिकचौरं मुञ्च- काका नियम और जो पिछले प्रकरणोंमें न तः पुरुषस्य उत्तमो दण्डो भवति ॥ दोखै वह सब प्रकीर्णकमें होता है-प्रकीर्णक तात्पर्यार्थ-व्यवहार प्रकरणके मध्यमें स्त्री- | नामके विवादपदमें जो विवाद राजाका उ- पुंयोग नामका अन्यभी विवादका पद मनु । ल्लंघन-राजाकी आज्ञा करना के विषयमें हैं और नारदनें कहा है उसमें नारदका वचेन वे सब राजाके आधीन होते हैं-राजाही- है कि जिसमें स्त्री और पुरुषके विवाहकी | उनमें धर्मशास्त्र और सदाचारके विरुद्ध जो विधि कहीजाय वह स्त्रीपुंयोग नाम विवा: | वर्ताव करें उनका प्रतिकूल होकर व्यवहा- दका पद कहाता है मनुनेंभी कहा है ( अ० रोका निर्णय करे यह कहनेसे यह बात जा- श्लो०२) कि अपने कुलके मनुप्य स्त्रि- नीगयो कि राजाके आधीन जो व्यवहार वह योंको रातदिन अपने वशमें रक्खें और प्रकीर्णक कहाता है | विषयों में लगी हुई होयतो अपने वशमें रक्खे यद्यपि स्त्री और पुरुषका परस्पर अर्थी और राजानें भूमि वा निबंधका जो परिमाण प्रत्यर्थीरूपसे राजाके सामने व्यवहार नि- | दियाहो उससे न्यून वा अधिक जो प्रकाश पिद्ध है तथापि प्रत्यक्षसे वा कर्णपरम्परा करके लिखता है और पारदारिक (जार) (सुनकर )से उनका परस्पर अपचार (अ- वा चोरको पकडकर राजाक अर्पण किये पराध ) देखकर राजा स्त्री और पुरुष दोनों- विना जो छोडता है वे दोनों उत्तम साहस को अपने २ धर्ममार्गमें स्थापन करे न दंड देनेयोग्य होते हैं । कर तो राजा दोषका भागी होता है यह भावार्थ-जो मनुष्य न्यून वा अधिक रा- सब व्यवहारप्रकरणमेंही राजधर्मके मध्यमें | जाकी आज्ञाको लिखता है वा जार और स्त्री पुरुषका धर्मसमूह कहा है और विवाह प्रकरणमेंभी विस्तारपूर्वक कहा है इससे १ प्रकीर्णके पुन या व्यवहारा नृपाश्रयाः । राज्ञा माज्ञानीघातस्तत्कर्म करण । पुर.प्रदान यहां पुनः (फिर) योगीश्वरने नहीं कहा है- | सभेदः प्रकृतीनां तथैव च ॥ पाडिनैगमणिगण- विवाहादिविधिः स्त्रीणां यत्र पुसां चकीत्यते।वी धर्मविपर्ययाः । पितापुत्रविवादश्च प्रायश्चित्तव्यति- सयागेसज्ञ तद्विवाहपदमुच्यते । क्रमः । प्रतिग्रहविलोपश्व कोप आश्रमिणामपि २ अस्वतंत्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषैः स्वैर्दिवानिशा | वर्णसंकरदोषश्च तद्वृत्तिनियमस्तथा ॥ न दृष्टं यच्च विपयेषु च सजन्यः संस्थाप्या ह्यात्मनो वशे । पूर्वेषु सर्व तत्स्यात्प्रकीर्णक। तथा व्यवहाराध्याय प्रकीर्णकप्रकरण २५ (३९३) 7 चौरको छोडता है वह उत्तम साहस दंड | मांसका विक्रय करनेवाला जो शोनिक- देनयोग्य है ॥ २९५ ॥ (हिंसक ) आदि है उसको और च शब्दसे अभक्ष्येणद्विजेंदूप्यदंडउत्तमसाहसम् । कूट चांदीक व्यवहारीको नासिका कर्ण मध्यमक्षत्रियवैश्यंप्रयमंशूद्राद्धकम् २९६ ओर हाथसे हीन प्रत्येक २ को करे और उत्तम साहस दण्डदे जो मनुनें यह कहा पद-अभक्ष्येण ३ द्विन २ दूप्या-दंडः१ है (अ.९श्लो.२९२) कि सब कण्टकोमें उत्तमसाहसम् १ मध्यमं १ क्षत्रिय २ यहा पापी सुनार है यदि वह अन्यायमें वैश्यं २ प्रथम १ शूद्रं २ अधिकम् १ प्राप्त होयतो उसका देह तिल२पर छुरीसे योजना-द्विजं अभक्ष्येण दूष्य उत्तम | छेदन करे यह वचन देवता और ब्राह्मणके साहसं-क्षत्रियं दृष्य मध्यम-चेश्यं दूष्य प्र- | सुवर्णके विषयमें है- थम-शूद्रं दृष्य अधिक-दंड्यः भवति । भावार्य-कूट स्वर्णके व्यवहारी कुत्सित ता भावार्थ-मूत्रपुरीप आदि अभक्ष्य मांसके बेचने वालेका अंग छेदन करे पदार्थसे ब्राह्मणको दूषण लगाकर अर्थात् | और उत्तम साइस दंडदे ॥ २९७ ॥ अन्नपान आदिमें मिलाकर भक्षण कराकर चतुष्पादकृतोदोषोनापैहीतिप्रजल्पतः । उत्तम साहस दंडके और ऐसेही क्षत्रियको । काष्ठलोटेपुपापाणवाहुयुग्यकृतस्तथा२९८ दूषित करके मध्यम साहस दंडके और वेश्यको दूषित करके प्रथम साहस दंडके पद-चतुप्पादकृतः १ दोषः१, न:- और शूद्रको दूषित करके प्रथम साहसके अपहि क्रि-इति:-प्रजल्पतः ६ काष्ठलोटेपु७ आधे दंडके योग्य होते है-और लशुन पाषाणवाहुयुग्यकृतः १ तथा:- ॥ आदि अभक्ष्यसे दूषित करनेमें तो दोषके योजना-अपेहीति प्रजल्पतः स्वामिनः न्यून अधिक भावसे दंडको न्यूनाधिकता चतुष्पादकृतः तथा काष्टलांप्टेषु पाषाण- जाननी ॥ २९६ ॥ बाहुयुग्यकृतः दोषो न भवति॥ कूटस्वर्णव्यवहारीविमांसस्पचविक्रयी । तात्पर्यार्थ-अपसरणकरो (हटो ) इस अंगहीनस्तुकर्तव्यांदाप्यश्चोत्तमसाइसम् ॥ गोगन आदि चतुप्पादोंके किए अपराधका प्रकार ऊंचे स्वरसे कहतहुए स्वामीको पद-कूटस्वर्णव्यवहारी १ विमांसस्य६ दोष नही होता-तैसेही लकडी डेला बाण च-विक्रयी१ अंगहीनः १ तु:-कर्तव्यः । पत्थर इनके फेंकनसे भुजाका और युग दाप्यः १ चा-उत्तमसाहसं२॥ (जूआ )लेगाते हुए अश्व आदिका किया- योजना-कूटस्वर्णव्यवहारी चपुनः विमा- पूर्वोक्त अपराधका दोष उसको नहींहोता सस्य विक्रयी अंगहीनः कर्तव्यः चपुनः | जो काष्ठ आदिको फेंकताहो और अपने उत्तमसाहसं दाप्यः- मुखसे हठजाओ ऐसा कहताहो वहां काष्ठ तात्पर्यार्थ-संवध आदिसे किए है उत्तम आदिक फैकनेम दोषका अभाव कहना दंडके वर्ण जिनके ऐसे कूट (बनावटके ) सुवासे अभाव कहनेके लिए है अज्ञानसे किए व्यवहारकरने का स्वभाव जिनका ऐसे स्वर्ण १ सर्वकण्टकसापष्ट हेमकार तु पार्थिवः । प्रवत्त कारको और श्वा आदिसे मिले कुत्सित मानमन्याय छैदयेश्वशः रंगः । ।
(३९४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पापका प्रायश्चित तो करनाही पड़ता है भंगसे पीछेको गमन करतेहुए शकट यहां काष्ठ आदिका ग्रहण शक्ति और तो- आदिसे हिंसा होय तो कुछ स्वास्नीको दोष मरकाभी उपलक्षण हैं। नही॥ २९९ ॥ भावार्थ-हटो ऐसे कहतेहुए स्वामीको शक्तीप्यमोक्षयन्स्वामीदेष्टिणादागिणांतया। चोपाओंका किया दोष और काष्ठ लोष्ट प्रथमंसाहसंदयाद्विकुष्टेद्विगुणं. तथा ॥३०० फेंकतेहुए मनुष्यको पापाप भुजा और पद- शक्तः १ अपि:- अमोक्षपन् १ अश्व आदिका दोष नही लगता॥ २९८ ॥ स्वामीर दंष्ट्रिणां६ शृंगिणांद तथा:-प्रथमर छिन्ननस्पनयानेनतथाभग्नयुगादिना । साहसं२ दद्यात् क्रि-विटे द्विगुणंर पश्चाच्चैवापसरताहिंसनेस्वाम्यदोषभाक् ॥ तथा:-॥ पद-छिन्ननस्येन३ यानेन ३ तथाऽ-भग्न योजनादैष्ट्रिणां चपुनः शृंगिणा शक्ती युगादिना३ पश्चात्-च-एव अपसरता३ | अपि स्वामी अमोक्षयन् सन् प्रथमं साहस हिंसने स्वामी१ अदोपभाक् ।। तथा विक्रष्टे सति द्विगुणं दद्यात्।। योजना-छिन्ननस्येन यानेनतथा भग्नयुगा- तात्पर्यार्थ-यदि अप्रवीण (अनाडी) दिना चपुनः पश्चात् अपसरता हिंसने सति | प्राजक (सारथि )की प्रेरणासे हाथी आदि स्वामी अदोषभाक् भवति॥ दंष्ट्रावाले और गौ आदि सींगवाले पशु- तात्पर्यार्थ- नासिकाको रजको नस्य | ओंसे वधको प्राप्तहुए जीवको जो स्वामी कहते हैं-वह शकट आदिमें जुते जिस | नही छुटाता अर्थात् उपेक्षा करताहै तो बलीवर्दकी नष्ट होगईहो वा युग्यकाभंग उस स्वामीको इस लिये प्रथमप्ताहस दंड होगयाहो और वह अक्ष और चक्र आदिके होता है कि उसने अकुशल सारथी क्यों भंगसे पीछेको चलकर वा तिरछा चलकर रक्खा यदि मनुष्य ऐसे कहें कि मुझे मारता- वा आगेको चलकर किसी मनुष्य आदि- है फिरभी न छुटावे तो दुगुना दंड होता की हिंसा करदे तो स्वामी वा सारथी है-यदि कुशल सारथीको स्वामी और तो दोषके भागी नहींहोते सोई मनुनें (अ० ८ | सारथीकोही दंड होता है स्वामीको नही- श्लो.२९१- ९२-) कहाहै यदि यानके | सोईमर्नुनें (अ० ८ श्लो. २८४ ) कहा कि बलका नस्य (नाथ )का छेदन युगका | सारथी कुशल होय तो वही दंडयोग्य होताहै भंग-अक्ष और चक्रका भंग-यंत्रोंका छेदन- प्राणीके भेदसे भी दंडका भेद समझना रज्जका छेदन-आदि होजानेसे वह तिरछा | ऐसेही मर्नुनै कहा है (अ.८श्लो.२९६- और सन्मुख चलाजाय और स्वामी हटोर | ९७-९८-) कि मनुष्यके मरणमें शीघ्रही ऐसा कहता रहे तो कुछ दण्ड नही यह अपराधी होताहे और बडे२ प्राणधारी मनुनें कहा है। भावार्थ- चलोंकी नाथके छेदन-युग्यको १ प्राजकाचेगवेदाप्तः प्राजको दहमहति । २ मनुष्यमरणे क्षिप्र चारवत्किल्विषी भवेत्। प्राण- १ छिन्ननस्ये भमयुगे तिर्यक् प्रतिमुखागते । भृत्सुमहत्स्वधैं गोगजोष्ट्रह्मादिए । क्षुदाणां तु पशूना अक्षभंगे च यानस्य च क्रममढ़े तय च ॥ छेदने तु हिमायां द्विशतो दमः । पंचाशत्तु भरेद्दण्डः शुभेषु चैव यत्राणां योक्तादम्योत्तथैव च आनन्दे सत्याही- मगपक्षिय । गर्दभाजाविकानां तु दंडः स्थापंच ति न दंडं मनुरवीत् ॥ मारकः । मायकस्नु भयेद्दडः श्वशकरनिपातने ।
व्यवहाराध्याय प्रकीर्णकप्रकरण २५ (३९५) गौ गज अश्व ऊंट आदिकी रडी हिंसामें आक्रोशकारिणम्-चपुनः तन्मंत्रस्य भेत्तारं आधा दंड शूद्र पशु आदिकी हिंसामें दो जिह्वां छित्त्वा प्रवासयेत् ।। सौ२००पण दंड-शोभन मृग पक्षी आदिकी तात्पर्यार्थ-और राजाके अनिष्ट(शत्रुकी हिंसामें पचासपण दंड-गर्दभ-अजा-भेडकी स्तुति आदि) को जो वारंवार कहै और हिंसामें पाचमाष दंड होताई-और श्वा- सूकर-इनकी हिंसामें एकमाप दंड होता है- अपने राज्यको वृद्धि पराये राज्यकानाश राजाकीही जो निंदाकरें और राजाका जो भावार्थ-यदि समर्थ होकर स्वामी दंष्ट्रा इनके लिये मंत्र हो उसका जो भेदन करे और सींगवाले पशुसे न बचाव तो प्रथम- अर्थात् राजशत्रुओंके कानोंमें कहै उसकी साहस दंड और मनुष्यके मुझे मारता है जिव्हाका छेदन करके अपने राज्यमेंसे नि- ऐसे कहनेपर स्वामी न बचावै तो दूनादंड कासदे-ओर जो कोश आदिका अपहरण होता है।। ३००॥ (चोरी ) करे तो उसका तो वधही होता है जारचौरेत्यभिवदन्दाप्यापंचशतदमम् । क्यों कि मनुकीस्मृति है(अ०९श्लोक-२७५) कि राजाके कोशके चोरोंको और राजाकी उपजीव्यधनंमुचस्तदेवाटगुणीकृतम् ३०१ प्रतिकूलतामें स्थितों (टिके)को और राजशत्रु पद-जारचौर १ इति:-अभिवदन दाप्यः आके उपकारकर्ताओंको अनेक प्रकारके १पंचशतं २ दमम् २ उपजीव्य:- धनं २ दंडोसे मरवाय दे-अर्थात् सर्वस्वका हरण- मुंचन तत् २ एव:- अष्टगुणीकृतम् २॥ अंगछेदन-वध-आदिका दंड दे और सर्व- योजना-जार चौर इति अभिवदन् पु- स्वकें हरने में भी चोरके जीवनकी सामग्री हो रुषः पंचशतं दम दाप्यः धनं उपजीव्य मुंचन् बद न छीने किंतु चोरीकी ही सामग्री (कु- सत् अष्टगुणीकृ तंतदेव दम दाप्यः॥ हाल आदि )छीनले सोई नारदने कहा है ता. भावार्थ-अपने वंशमें कलंक लगनेके कि शस्त्रोंसे जीनेवालोंके शस्त्र और वाह्यास भयसे पराई स्त्रीमें गमन करनेवाले जारको जीने वालोंके वाहा( बैल आदि ) और वेश्या है चोरत निकस ऐसे जो कहता है वह पां- चसो पण दंड देने योग्य है जो मनुष्य जा- रके हाथसे धनको उत्कोच (कोड ) रूपसे उपकरण (सामग्री) हो भार जिसस कारुक अहण करके जारको छोडता है वह जितना (शिल्पी ) जीवतें हों-इन सपको सर्वस्वके धन ग्रहण किया होउससे आठगुना दंड देने . हरनेमें भी राजा हरनेके योग्य नहीं है और योग्य ह॥३०१॥ ब्राह्मणको शरीरका दंड नहीं है इस निषेधसे वधके स्थानमें शिरका मुंडन आदि करें राहोनिष्टप्रवक्तारंतस्यैवाकोशकारिणम् । तन्मंत्रस्यचभेत्तारंछित्त्वाजिव्हांमवासयेत् । १ राम: कोशापहश्च प्रतिकलेपु य स्थितान् घातयेटिविदेडररीणों चोपकारकान् । पद-राज्ञः ६-अनिष्टप्रवक्तारं २ तस्प६ २ आधाग्यापुधीयानो वाद्यादीनवाग्रजीविना । एव:-आनोशकारिणम् २ तन्मत्रस्य ६ वेशानीशामलं कारान्वायतीगाहे तद्रिदाय । यय चा-भत्तारर लित्वा:-जिह्वांरप्रवासयेत्-क्रि॥ यस्योपकार येन जीवति कादकाः । सर्वस्वहरणे- योजना-राज्ञः अनिष्टप्रवक्तारं-तस्य एव , प्तन्न राजाहर्तुमति । .
(३९६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । क्योंकि मनुकी स्मृति है कि ब्राह्मणका वध- तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य क्रोध आदिसे हूँ मुंडनाही है और मस्तकपर श्रेष्ठ अंक | सरेके दोनों नेत्रोंको भेदन करता है और (दाग) और गर्धभपर गमन (चढाना )है ।। | जो ज्योतिःशास्त्रको जाननेवाला हितकी भावार्थ-राजाके अनिष्टका वक्ता राजाका | इच्छाकरनेवाले गुरु आदिसे भिन्न राजाको निंदक-राजाके मंत्र ( सलाह ) का भेदक | जो अनिष्ट उपदेश करता है कि तेरा राज्य इनकी जिह्वा काटकर-देशमसे निकास इस वर्षके अन्तमें नष्ट हो जायगा और जो दे ॥३०॥ शूद्र भोजनके लिये यज्ञोपवीत आदि ब्राह्म- । णके चिन्होंको दिखाता है इन सबको आठ मृतांगलग्नविक्रेतुर्गरोस्ताडयितुस्तया । सोपण दंड देना- यहां स्मृत्यंतरमें कहा राजयानासनारोदुर्दडउत्तमसाहसः ३०३ हुआ यह समझनाकि जो शूद्र श्राद्धभी- पद-मृतांगलग्नविकेतुः ६ गुरोः ६ ता- | जनके लिये ब्राह्मणके वेषको धारण करे अपितुः ६ तथा: राजयानासनारोदुः ६ उसके शरीरमें तपाई हुई शलाकासे यज्ञो- पवीतके समान चिह्न करदे और जो वृत्ति दण्डः १ उत्तमसाहसः १॥ (जीवन ) के लिए यज्ञोपवीत आदि श्रा- योजना-मृतांगलग्नविक्रेतुः तथा गुरोः ह्मणके चिन्होंको धारण करे उसका वधही ताडयितुः राजयानासनारोदुः उत्तमसाहस । होता है क्योंकि यह वचन है कि द्विजके दंडो भवति ॥ चिनीको धारणकिएहुए शद्रोंको नष्ट करदे ता० भा०-मरेहुये शरीरके सबन्धी वस्त्र भावार्थ-दोनों नेत्रोंका भेदन करनेवाला पुष्प आदिके वेचनेवाला और पिता आ और राजाको अनिष्ट उपदेश करने वाला चार्य-आदि गुरुको ताडना करनेवाला | और ब्राह्मणके वेशको धारण करके जीवन और जो राजाको अनुमतिके विना रा- करनेवाला शूद्र इनको आठसौ पण दंड जाके अश्व गज आदि यान और सिंहासन देना-॥३०५ ॥ आदि आसनपर बैठता है इन सबको उत्तम साहस दंड होता है।३०३ ॥ दुर्दृष्टांस्तुपुनदृष्टवाव्यवहारानृपेणतु सभ्या:सजयिनोदंब्याविवादाद्विगुणंदमम्।। द्विनेत्रभेदिनोराजद्विष्टादेशकृतस्तथा विप्रत्वेनचशूद्रस्यजीवतोष्टशतोदमः।३०४ पद-दुर्दृष्टान् २ तु:- पुनः-दृष्ट्वाऽ--व्यव- हागन् २ नृपेण ३ तु:-सभ्याः १ सज- पद-द्विनेत्रभेदिनः६ राजद्विष्टादेशकृतः ६ यिनः १ दंड्याः १ विवादात् ५ द्विगुण २ तथाऽ-विप्रत्वेन ३ चा- शूद्रस्यजीवतः ६ दमम् २ ॥ अष्टशतः १दमः १ ॥ योजना-तुपुनः नृपेण दुर्दृष्टान् व्यवहा- योजना-द्विनेत्रभदिनः तथा राजद्विष्टा- देशकृतः चपुनः विप्रत्वेन जीवतः शूद्रस्य गुण दम दंडयाः- रान् दृष्टा सजयिनः सभ्याः विवादात द्वि- अष्टशतो दमो भवति॥ तात्पर्याय-धर्मशास्त्र और सदाचार १ राज्ञः कोशापहर्तश्च प्रतिकूलेषु च स्थितान् । धर्मके अवलंघनसे राग लोभके द्वारा भली घातयेद्विविधैर्दण्डारीणा चोपकारकं । ५ द्विजातिलिगिनः शदान् घातयेत् ।
1६111.. (३९७) प्रकार विना विचारे शंकासे युक्त व्यवहारों पद-यः १ मन्येत क्रि-अजितः १ अ- को राजा पुनः स्वयं भलीप्रकार विचार | स्मि क्रि-इति:न्यायेन ३ अपि:- पराजितः१ कर निश्चित है दोष जिनका ऐसे पहिले तर आयांतं २ पुनः:-जित्वाऽ-दापयेत् क्रि- निर्णय करनेवाले उन सभासदोंको और द्विगुणं २ दमम् २॥ जीत जिसकी हुई है उस जयीको विवादके योजना-न्यायेन पराजितः अपि यः अ- पदमें जो दंड पराजितको है उससे दूना | जितः अस्मि इति मन्यत-आयांतं तं पुनः दंढ प्रत्येकको दे-यह वचन उसको दंडका | जित्वा द्विगुणं दमं दापयेत्- विधान करता है जिस जयके अयोग्यको जय तात्पयार्थ-न्यायके मार्गसे पराजितभी हुआ हो इससे राग लोभसे धर्मशास्त्रके जो मनुष्य उद्धत पनेसे अपनेको यह माने विरुद्ध करने वालोंको पृथक् दंडदे इस कि मैं पराजित नही हुआ यह कहकर कूट पूर्वोक्त वचनसे पुनरुक्तिः दोष 'नही है- | लेख आदिके उपन्याससे धर्माधिकारीके और जहां साक्षियोंके दोषसे व्यवहारकी समीप फिर आवे तो उसका धर्मसे फिर दुष्टताहो वहां साक्षीही दंड देने योग्य है | पराजय करके दूना दंड दिवावे नारदनेभी कहा जयी और सभासद नही-और जव राजाकी है कि जो पराजय किया वा शिक्षित किया अनुमतिसे व्यवहारकी दुष्टता होयतो मनुष्य अधर्मसे पराजय आदिको माने उसको राजा सहित संपूर्ण सभासद आदि दंड दूना दंड देकर उसके कार्यका फिर उद्धार देने योग्य हैं क्योंकि यह वचने है कि पा- | करै-इस वचनमें तीरित वह है जिसका • पका एक पाद कर्ताको एक पाद साक्षीको साक्षी लेखहो चुकाहो और दंड जिसने म एक पाद सभासदोको और एक पाद | दियाहो और अनुशिष्ट उसको कहते हैं जिसने राजाको प्राप्त होता है-यह वचन प्रत्येक | दंड दियाहो अर्थात् दंडपर्यंत दे चुकाहो राजा आदिकोको दोषका बोधक है-एक २ | और जो मनुका यह वचन है (अ०९श्लोक को पापके अपूर्वके विभागार्थ नही है-सोई | २३३ ) कि जहां कहीं तीरित और अनु कहा है कि अपूर्व जो होता है वह कर्ताम | शिष्ट नहो उसको धर्मसे किया जाने, बुद्धि- समवाय संबंधसे रहनेवाले फलको पैदा मान् मनुष्य उसको निवृत्त न कर-वह वचन करता है-पाप और पुण्यका जो फलजनक इस लिये है कि अर्थी और प्रत्यर्थी इन संस्कार बह अपूर्व कहाता है- दोनोंमें किसी एकके वचनसे अधर्म पूर्वक भावार्थ-विशेष कर दुष्ट व्यवहारोंको । व्यवहार हो जानेकी शंका होनेपर फिर देखकर और राजा पुनः स्वयं विचार कर दूना दंडदे और प्रतिज्ञापूर्वक व्यवहारको सभासद और जीतनेवालेको विवादके । पुनः प्रवृत्त करे और धर्मप्से व्यवहार होनेके धनसे दूना दंडदे ॥ ३०५॥ निश्चय होनेमें गजा लोभआदिसे व्यवहारको योमन्येताजितोस्मीतिन्यायेनापिपराजितः । प्रवृत्त न कर-और जो व्यवहार किसी अन्य तमायांतंपुनर्जित्वादापयद्विगुणंदमम् ३०६ । तीरित चानुशिष्ट वा यो मन्येत विधर्मतः। द्वि- १पादो गच्छति कर्तार पादः साक्षिणमृच्छति। गुण दहमास्याय तत्कार्य पुनस्व । पादः सभासदः मर्वान् पादो राजानमृच्छति । २ तारित चानुशिष्टं च यत्र वचन विद्यते । कृतं २ कर्वसमवादिफ्टनननस्वभाववादपूर्वस्य । तर्मतो इय न तत्माज्ञो निवर्तयेत् ।
(३९८)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित |
राजाने न्यायसे हीन ( अन्यायसे ) कार्य भावार्थ-जो दंड राजाने अन्यायसे लि-
कियाहो उसको भी भलीप्रकार परीक्षा याहो उसको संकल्प कर वरुणके निवेदन
करक धर्म मार्ग में स्थापन कर-क्योंकि यह करके और तीस गुने उस धन को संकल्प
स्मृति है कि जो अन्य राजाने अज्ञानसे करके ब्राह्मणोंको राजा स्वयंदे- ॥ ३०७ १
किया हो अन्यायसे किये उसकोभी फिर
न्यायमें प्रवेश करे-
इति प्रकीर्णकप्रकरणं २५
भावार्थ-न्यायसे पराजितभी जो मनुष्य इतिश्री याज्ञवल्कीयधर्मशास्त्रविवृतेः श्रीपद्म-
अपनेको पराजित न माने-राज्यस्थानमें नाभभट्टात्मजश्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्य-
आये उसको फिर जीत कर दूना दंड विज्ञानेश्वरभट्टारककृतमिताक्षराया:मिताक्ष-
दिवावे ॥ ३०६॥
रार्थचोधिन्याः पं. रामरक्षात्मज पं.मिहिरचंद्र-
राज्ञाऽन्यायेनयोदंडोगृहीतोवरुणायतम् । कृतायां श्रीकृष्णदासात्मज खेमराजगुप्त का
निवेद्यदद्याविप्रेभ्यःस्वयंधिशद्गुणीकृतम् ॥ रितायां मिताक्षरप्रकाश प्रजभाषाविवृती
व्यवहाराध्यायः समाप्तः २॥
पद-राज्ञा ३ अन्यायेन ३ यः १ दंडः १ अव इस अध्यायकी अनुक्रमणिका कहते है
गृहीतः १ वरुणाय ४ तम् २ निवेद्या-दद्यात्
क्रि-विप्रेभ्यः ४ स्वयं:-त्रिंशद्गुणीकृतम् २॥
पहिला साधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण १
योजना-यः दंडः राज्ञा अन्यायेन गृहीतः
असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण२ ऋणादा-
स्वयं त्रिंशद्गणीकृतं तं वरुणाय निवद्य न ३ उपनिधिः ४ साक्षिप्रकरण५ लेख्यप्रक-,
रण ६ दिव्यप्रकरण ७ दायविभागतीमावि-
वादस्वामिपालविवाद र अस्वामिविक्रय११
तात्पर्याय-जो दंड राजाने लोभसे - दत्ताप्रदानिक १२क्रीतानुशय १३ अभ्युपेत्या-
हण कियाहो उसको तीस गुणा करके
और वरुणको संकल कर निवेदन करके शुश्रूषा १४संविद्यतिक्रम २५ वेतनादान १६
ब्राह्मणोंको स्वयं देदे क्योंकि अन्यायसे दंड साहस २० विक्रीयासंप्रदान २१ संभूस
द्यूत समाह्वय१७वाक्पारुप्य१८दंडपारुप्य१९
रूपसे जितना ग्रहण कियाहो उतना उस
कोही दे जिससे लियाहो अन्यथा चोरीका
समुत्थान २२ स्तेयप्रकरण २३ स्त्रीसंग्र-
दोष होगा-और भन्यायसे दंडके ग्रहण में प्रकरणानि उत्तम है उपपद जिसके और
हण २४ प्रकीर्णक २५ इति पंचविंशति
पहिले स्वामीके स्वत्वका नाशभी नही होता आत्माके शिष्य विज्ञानेश्वरयोगीकी कृति
१ न्यायाप्त यदन्येन राज्ञा ज्ञानकृत भवेत् । त- ( बनायी ) यह धर्मशास्त्रकी विवृति
दप्पन्यायविहित पुनन्याये निवेशयेत् ।
(व्याख्या ) है ।
विप्रेभ्यः दद्यात्-
इति मिताक्षराप्रकाशसहितः व्यवहाराध्यायद्वितीयः संपूर्णः॥२॥
याज्ञवल्क्यस्मृतिः मिताक्षरा प्रकाशसहिता। प्रायश्चित्ताध्यायः३ अथाशोचप्रकरणम् १ आदिके निषेधका निमित्त भूत पुरुषमें रहने वाला कोई एक धर्मविशेष कहा जाता है ऊनद्वियनिखनेन्नकुर्यादुदकंततः कुछ कर्मके अधिकारका अभाव हो नहीं आश्मशानादनुव्रज्यइतरोनातिभिर्मतः १ क्योंकि अशुद्धा बांधवाः सर्वे-इत्यादि वच- पद-उनद्विवर्ष २ निखनेकि नऽ-कुर्यात नमें अशुद्धिही कही है-यहां अशुद्ध शब्दका क्रि-उदकं २-ततः:-आ-श्मशानात् ५ व्यवहारमें अग्निहोत्रीस भिन्न दीक्षित आदिमें अनुव्रज्यः२ इतरः१ ज्ञातिभिः३ मृतः१ ॥ संपूर्ण अधिकारीयोंसे भिन्नमे प्रयोग नहीं है यममुक्तंतथागाथाजपदिलीकिकामिना और वृद्धाक व्यवहारकी व्युत्पत्तिसे भी यही सदग्धव्यउपेतश्चेदारिताग्न्यावृतार्ययत् २ वालीको ज्ञान आदिका निषेध देखते हैं शब्दार्थ प्रतीत होता है और जो अशीच- पद-यमसूक्तं २तथाऽ-गाथा १जपद्भिः ३ वहभी अयोग्यता रूप अशीच शब्दका अर्थ लोकिकाग्निना ३ सः १ दग्धव्यः१ उपेतः१ है और उसमें अनेकार्थ कल्पनाका दोष घेता-आहिताग्न्यावृता ३ अर्थवत् ॥ भी है इससे वह पक्ष त्यागने योग्य है । योजना-उमद्विवर्ष प्रेतं भूमो निखनेत् ! जो प्रेत दो वर्षको अवस्थासे कमही बसको तत रदकं न कुर्यात् इतरः मृतः ज्ञातिभिः | भूमिमें गठा खोदके गाडदे दाह न कर--एक आश्मशानात् अनुव्रज्यो भवति उपेतश्चेत् वार उदक (जल) सीचे इस आदि वचनोसें यमसूक्तं तथा गाथाः जपद्भिः आहिताग्न्या- विधान कियाजो प्रेतके निमित्त जलदान वृता अर्थवत् सः लौकिकाग्निना दग्धव्यः ॥ आदि आर्द्ध देहिक कर्म वह न करे-और तात्पर्यार्थ 4-इससे पहिले दोनों अध्यायोंमें इसकोभी गंध पुष्प चंदन आदिसे शोभित गृहस्थ और आश्रमवालोंके नित्य और नै- करके श्मशानसे भिन्न ऐसी शुद्ध भूमिमै मित्तिक धर्म कहे और अभिषेक भादि ग्रामसे बाहिर गाडै जिसमें अस्थि न पडेहो- गुणसे युक्त गृहस्थ विशेष (राजा) के गुण सोई मर्नुने कहा है कि ( अ०५ श्लो०६८) और धर्मदिखाय-अब उसके अधिकारके , सकृत्यमिचन्युदकम् । संकोच करनेवाले अशीचके कथनद्वारा २ उनदिवार्षिकोत निरभ्युर्वान्धवा बहः। अल- उनके निषेधका प्रतिपादन करते है अशीच वृदय शुची भूमावस्थिसचयनाइते । नास्य कार्योति शब्द करके स्नान आदिसे दूर करने योग्य सस्कारो नास्य कार्योदककिया । अरण्य कारपत्य- समय और पिण्ड जलदान विधि और पठन | क्या क्षिपेयुस्यहमेवतु ।
(३९८)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
राजाने न्यायसे हीन ( अन्यायसे ) कार्य भावार्थ-जो दंड राजाने अन्यायसे लि-
कियाहो उसको भी भलीप्रकार परीक्षा याहो उसको संकल्प कर वरुणके निवेदन
करके धर्म मार्गमें स्थापन कर-क्योंकि यह करके और तीस गुने उस धन को संकल्प
स्मृति है कि जो अन्य राजाने अज्ञानसे | करके ब्राह्मणोंको राजा स्वयंदे- ॥ ३०७ ।
किया हो अन्यायसे किये उसकोभी फिर
न्यायमें प्रवेश करे-
इति प्रकीर्णकप्रकरणं २५
भावार्य-न्यायसे पराजितभी जो मनुष्य इतिश्री याज्ञवल्कीयधर्मशास्त्रविवृतेः श्रीपद्म-
अपनेको पराजित न मान-राज्यस्थानमें नाभभट्टात्मजश्रीमत्परमहसपब्रिाजकाचार्य-
आये उसको फिर जीत कर दूना दंड | विज्ञानेश्वरभट्टारककृतमिताक्षरायाःमिताक्ष-
दिवावे ॥ ३८६॥
रार्थबोधिन्याः पं.रामरक्षात्मज पं.मिहिरचंद्र-
राज्ञाऽन्यायेनयोदंडोगृहीतोवरुणायतम् । कृतायां श्रीकृष्णदासात्मज खेमराजगुप्त का
निवेद्यदद्याद्विप्रेभ्यःस्वयंधिशद्गुणीकृतम् ।।
रितायां मिताक्षरप्रकाश प्रजभाषाविवृती
व्यवहाराध्यायः समाप्तः २॥
पद-राज्ञा ३ अन्यायेन ३ यः १ दंडः १ अब इस अध्यायकी अनुक्रमणिका कहतेहै
गृहीतः १ वरुणाय ४ तम् २निवेद्य दद्यात्
क्रि-विप्रेभ्यः ४ स्वयं-त्रिंशद्गुणीकृतम् २ ॥
पहिला साधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण १
योजना-यः दंडः राज्ञा अन्यायेन गृहीतः असाधारणव्यवहारमातृकाप्रकरण२ ऋणादा-
स्वयं त्रिंशद्गणीकृतं तं वरुणाय निवेद्य न ३ उपनिधिः ४ साक्षिप्रकरण ५ लेख्यप्रक-,
रण ६ दिव्यप्रकरण ७ दायविभागसीमावि-
तात्पर्याय-जो दंड गजाने लोभसे ग्र- दत्ताप्रदानिक१२क्रीतानुशय १३ अभ्युपेत्या-
वादस्वामिपालविवादर अस्वामिविक्रय११
हण कियाहो उसको तीस गुणा करके
और वरुणको संकल्प कर निवेदन करके द्यूत समाह्वय१७वाक्पारुष्य १८दंडपारुप्य१९
शुश्रूषा१४संविधतिक्रम १५ वेतनादान १६
ब्राह्मणोंको स्वयं देदे-क्योंकि अन्यायसे दंड साहस २० विक्रीयासंप्रदान २१ संभूम
रूपसे जितना ग्रहण कियाहो उतना उस
समुत्थान २२ स्तेयंप्रकरण २३ स्त्रीसंग्र-
कोही दे जिससे लियाहो अन्यथा चोरीका
दोष होगा-और भन्यायसे दंडके ग्रहणमें | प्रकरणानि उत्तम है उपपद जिप्तके और
हण २४ प्रकीर्णक २५ इति पंचविंशति
पहिले स्वामीके स्वत्वका नाशभी नहीं होता | आत्माके शिप्य विज्ञानेश्वरयोगीकी कृति
१ न्यायापेतं यदन्येन राज्ञा ज्ञानकृत भवेत् । त- ( बनायी ) यह धर्मशास्त्रकी विवृति
दप्पन्यायविहितं पुनन्याये निवेशयेत् ।
(व्याख्या ) है ।
विप्रेभ्यः दद्यात्-
इति मिताक्षराप्रकाशसहितः व्यवहाराध्यायद्वितीय संप्रणः ॥ २ ॥
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचप्रकरण १ (०१) . उसके अनुसार लौकिक अग्निसे अर्थवत् | शेषभी मर्नु ( अ० ५श्लोक १०४) ने दिखाया (प्रयोजनवत् ) दाह करने योग्य है-इसका है कि अपने कुलके मनुष्य होते हुए मरे हुए यह अर्थ है कि यदि इसका कोई कार्यरूप ब्राह्मणको शूद्रसे न लिवाजाय शूद्रके स्पर्श प्रयोजन है अर्थात् भूमिकासेवन और प्रो- से दूपित हुई यह आहुति स्वर्ग देनेवाली क्षण आदिरूप वह ग्रहण करने योग्य | नही होती यहां अपने कुलके होते हुए यह है-और जिस पान योजन आदिका प्रयोजन | अर्थ विवक्षित नही क्योंकी स्वर्गकी दाता नहीं नहो उसको निवृत्ति जाननी तैसेही लौकिक होती इसके श्रवणसे सर्वथा स्वर्गको दाता अग्निकी विधिसे यज्ञोपवीत हुए पीछे जो आग्न- नही होती मरेहुए शूद्रको पुरीके दक्षिणद्वारसे होत्री नहो उसकी दाहको विधि गृह्याग्निसे है | और ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य इनको पश्चिम उत्तर इससे प्रयोजन आदि न होनेसे आहवनीय पूर्वद्वाको क्रमसे लेजाय-तैसेही हारीत आदि अग्निकीभी निवृत्ति समजना-अन्य ! काभी वचन है कि ग्रामके सन्मुख प्रेतको न अग्निकी विधिभी वृद्ध याज्ञवल्क्येनें कही है ले जाय और जब परदेशमें मरे हुयेका शरीर कि जो अग्निहोत्री हो उसका शास्त्रोक्त न मिले तो अस्थियोंकि प्रतिकृति शतिसे तीन अग्नियोंसे दाह करै और जो (पुतला ) बनाकर और अस्थि न मिलेतो अग्निहोत्री नदो उसका एक अग्निसे करे और | पर्णशरोंसे शौनक आदिके गृह्यसूत्रकी अन्यमनुष्योंका दाह लौकिक अग्निसे करे- विधिसे प्रतिकृति बनाकर संस्कार करे और शूद्र श्मशानमें काष्ठ और अग्नि द्विजोक | और इसका अशाच दश दिन आदि लिये न लेजाय क्योंकि यम का यह वचन है होता है क्योंकि वसिष्ठकी यह स्मृति है कि जिस द्विजको लिये शूद्र अग्नि काष्ठ हवि | कि यदि आग्निहोत्री परदेशमें मरजायतो लेजाता है उसको सदा प्रेतत्व रहता है आर सबके समान अशीच होता है और अग्नि वह शूद्भभी अधर्मसे लिप्त होता है और तै- होवीन होयतो निरात्र अशीच होता है क्योंकि सेही दाहभी स्नानके अनंतर कराना-क्योंकि यह वचन है कि जलसे मिले चूनको लपेट यह स्मृति है कि सुगंधजलोंसे स्नान कर अग्निसे दाह-यह स्वर्गलोकके लिये कराकर और माला पहनाकर प्रेतका दाह स्वाहा है यह कहकर अन्धव करें इस करें-प्रचेतने भी कहा है कि पुत्रआदि प्रेत- प्रकार पर्णशरको दध करके तीनपत्र का स्नान और वस्त्र आदिसे पूजन करें और अशुद्ध होता है-तिससे यह सिद्धान्त हुआ नग्न देहका दाह न करें और सबके वस्त्रोंमसे श्मशानवासी भूतोके लिये एक वस्त्रत्या १ न विप्नं स्त्रेषु तिष्ठत्सु मृत शूद्रेण हारयेत् ।अं- गर्दै-और प्रेतको श्मशानमें ले जानेमें वि- स्पा ह्याहुतिः सा स्याच्न सकषिता । २ दक्षिणेन मृत गई पाद्वारेण निहरे । पश्चि. , आहितामियान्याय दग्धव्यलिभिगतिभिः । मोत्तरपूस्तु यथास्य विजातयः- ॥ न प्रामाभि- अनाहितामिरकन लौकिकेनापरो जनः । मुखं प्रेत होयः । २ यस्यानयात शूद्रोनिं तृण काष्ट हबीपि च । प्रेतत्व ३ाहितानिश्चेत्नवसन्प्रियेत पुनःसस्कारं शवदा- हि सदा तस्य स चाधर्मेण लिप्यते । ३ प्रेतं दहेच्छुभैगंधः नापितं साविभूषित। ४ सुपिष्टर्जलमांमिश्रेर्दग्धव्यश्च तथामिना । असो ४ घान प्रेतस्य पुप्रायैवतायः पूजन ततः । नन- लगाय लोकाय स्वाहेत्युवतास बाघवः ॥ एवं पर्णशर देह दहेन्नेव किंचिद्देयं परित्यजेत् । | दग्ध्वा निशानमगचिवे। शौचम् ।
(४०२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित। . कि नाम करणसे पहिले गाडनाही है जल | चार्यकोभी जलदान करें यह जलदान अयु- दान आदि नही-उससे पीछे तीन वर्षतक | ग्मतिथि योंमें करना क्योंकि यह स्मृति है अन्न जलदान विकल्पसे होते हैं अर्थात् | कि पहिली तीसरी पांचमी सातमी तिथिमें करे चाहे न करें उससे परे यज्ञोपवीत | जलदान करना यह जलदान स्नानके पीछे पर्यंत विनामंत्र अग्नि और जलदानका नि- | करना क्योंकि शातातपकी यह स्मृति है यम है-तीन वर्षसे पहिलेभी जिसका मुण्ड कि प्रेतके शरीरको अग्निमें दाह करके नहो चुकाहो और यज्ञोपवीतसे पीछे आहि | चिताको न देखते हुए जलके समीप जाय ताग्निकी प्रक्रियासे दाह करके सब और्छ । अर्थात् स्नान करके जलदान करें तैसेही देहिक कर्म करे इतना तो विशेष है कि | प्रचेतानेभी यहां यह विशेष दिखाया है कि जिसका यज्ञोपवीत हुआहो उसका लौकिक प्रेतके बांधव वृद्धोंके अनुसार जलमें प्रविष्ट अग्निसे दाह करे और जो अग्निहोत्रीनहो | होकर उदासीन हैं और जलके समीप वस्त्र उसका गृह्याग्निप्ते दाह करे और पात्र और यज्ञोपवीतको अपसव्य करके दक्षि- योजन आदिभी जितने मिले उतनोंका करे णाभिमुख हुए जलदान करें ब्राह्मण उत्तरको अर्थात गृह्याग्निके पात्र आदिभी चितामें रखदे | मुख किए क्षत्रिय और वैश्य पूर्वको मुख भावार्थ-दो वर्षसे कमके प्रेतको भूमिमें किए जलदान करें-अन्य स्मृतिमें तो गाडदे जलदान न करें उससे भिन्नमरे जितने अशीचके दिनहीं उनमें प्रतिदिन हुए प्रेतके संग ज्ञातिके मनुष्य श्मशान तक जलदान करना कहा है सोई विष्णुनें कहाहै गमन करें और यमसूक्त और यमकी गाथा- कि जितने दिन अशौचहो उतने दिन प्रेत- का गान करते हुए दाह कर-और चाल-को जल और पिण्डदानदे तेतेही प्रचेता- कका यज्ञोपवीत हो चुका होयता बालकको नेभी कहा है कि प्रेतके कारण दिन २ अग्निहोत्र प्रक्रियासे यथार्थ दाह करें ॥१२॥ जलकी भरी अंजलिदे इतने पिण्ड समाप्त हों तबतक अंजलियांकि वृद्धि करता जाय सप्तमाद्दशमाद्वापि ज्ञातयोऽभ्युपयंत्यपः । अर्थात् दशमें पिण्डतक अंजालयोंको बढावे अपनःशोशुचदघमनेन पितृदिङ्मुखाः ॥ यद्यपि इन दोनों गुरु और लघु कल्पोंमें पद-सप्तमात् ५ दशमात् ५ वा अपिऽ- | एक प्रकारके करनेसे शास्त्रका अर्थ सिद्धहै त- ज्ञातयः १ अभ्युपयन्ति क्रि-अपः २अपनः थापि बहुत क्लेश देनेवाले गुरुतर कल्पमें शोशुचदघमनेन ३ पिवृदिग्मुखाः १ ॥ किसीकी प्रवृत्ति नहीं होती परन्तु प्रेतका योजना-सप्तमात वा दशमात् पितृदि उपकार अधिक होता है यह कल्पना मुखाः ज्ञातयः अपनःशोशुचदघमनेन अपः प्रथमतीयपंचमसप्तमेपदकक्रिया । अभ्युपयन्ति- २ शरीरमग्नी संयोज्यानवेक्ष्यमाणा आपोभ्युपयन्ति तान्पपीर्थ-सात वा दश दिनसे पहि- ३ प्रेतस्य पांधवाः ययावृद्ध मुदकमवतीय नौद्धर्षये- ले सपिण्ड और समानोदक ज्ञातिके मनु- युरुदकान्ते प्रमियुरपसव्ययज्ञोपवीतवासमोदक्षिणाभि- प्य दक्षिणा दिशाको मुख करके जल हमारे मुखा बामणस्योदङ्मुखाःप्राइमुखाश्च राजन्याययोः । ४ यावदाशौचन्तावत्तस्योदकं पिण्ड च दद्युः पापको दूर करा इस मंत्रको पढ कर जल ५ दिनदिनेजलीन्पर्णान्प्रदद्यात्तमाणात् ।तावद दान कर इसी प्रकार मातामह और आ- वृद्धिः प्रकर्तव्या यावपिण्डः समाप्यते ।
प्रायश्चित्वाध्याय आशौचप्रकरण १ (४०३) करनी अर्थात अधिक कल्पसेही जलदान पद-सकृद३ प्रसिंचन्ति कि- उदकर आदि करने अन्यथा गुरुकल्पके बोधक नामगोत्रण३ वाग्यताः १ न:-ब्रह्मचारिणः १ अनर्थकता होगी वशिष्टनेभी विशेष दिखाया | कुर्युः क्रि-उदकर पतिताः १ तथाऽ- है कि अपसव्य हाथोंसे जलदान करें ।। योजना-वाग्यताः (सपिण्डाः) नाम- भावार्य-ज्ञातिके मनुष्य सातौ और गोत्रेण सकृत् उदकं प्रसिंचन्ति ब्रह्मचारिणः दशमें दिनसे पहिले दक्षिणाभिमुख होकर तथा पतिताः उदकं न कुर्युः ॥ जल हमारे पापको दूरकरों इस मंत्रको तात्पर्यार्थ-वह जलदान इसप्रकार करना पढतेहुए जलदान करें ॥३ कि सपिंड और समानौदक मौन हुये एवंमातामहाचार्यप्रेतानामुदकक्रिया ।। प्रेतके नामगोत्रका उच्चारण करके अर्थात् कामोदकंसखिमत्तास्वत्रीयश्वशुविजाम् अमुक गोत्र और अमुक नामका प्रेत तृप्तहो यह कहकर एकवारही जलदान करें पद-एवं- मातामहाचार्यप्रेतानां६ उद- । अथवा तीनवार करें क्योंकि प्रचेताकी यह कक्रिया १ कामोदकं१ सखिपत्तास्वस्त्रीय- | स्मृति है कि प्रेत तृप्तहो यह कहकर श्वशुरांत्वना ६ ॥ प्रत्येक मनुष्य तीनवार जलदान करें- योजना-मातामहाचार्यप्रेतानां उदकक्रि- प्रतिदिन अंजलियोंको वृद्धिको कहआये या एवं कर्तव्या सखोप्रत्तास्वत्रीयश्व- | है-तैसेही यह विशेषभी उसनेही कहा है शुरविजो कामोदकं कर्त्तव्यं । कि फिर नदीके तटपर जायकर और तात्पर्याय-नामगोत्रसे दियहुए जल- यथार्थ रीतिसे शुद्ध होकर प्रथम वस्त्रोंको दानका भिन्न गोत्र मातामह आदिकॉमेभी धोवै और फिर स्नानकर फिर सचेल स्नान- अतिदेश (करना) कहते हैं-जैसे सगोत्र | कर और पाषाणको लेकर उसके ऊपर सपिण्ड प्रेतोंको जलदान दियाजाता है ब्राह्मणको दश अंजलि क्षत्रियको वारद इसीप्रकार मातामह और आचार्य प्रेता- | वैश्यको पंद्रहशुद्रको तीसदे फिर घरमें कोभी नित्य जलदान करना और मित्र प्रवेश करे फिर स्नानकरे और घरकी लेप विवाहीहुई कन्या-भगिनी आदि औरभानजा आदिसे शुद्धिकरै-अब सपिडीको मध्यमें श्वशुर और ऋत्विन मरेहुए इनको कामो- किसीरको जलदानका निषेध कहते हैं कि दक करना अर्थात् प्रेतकी गतिकी कामना ज्ञातिका मनुष्य होनेपरभी समावर्तनपर्यंत होय तो जलदान करता न होयतो न करना ब्रह्मचारी और जिनको द्विजातियोंके कर्मका कुछ न करनेमें दोष नही- अधिकार न हो वे पतित जल और पिण्ड- भावार्थ-मातामह और आचार्य प्रेतों-दान न करें और जो ब्रह्मचर्यके समयमें कोभी इसीप्रकार जलदान करे मित्र विवादी त्रि. प्रत्येक कुर्यः प्रेतस्कृप्यतु । कन्या भानजा श्वशुर प्रतिज इनको जल २ नदीवर ततो गत्ला शौच कृता यावर । दान कर चाहै न करे ॥ ४॥ वन संशोधयदागततः मान समाचरेत् । सबैटस्तुततः सुकृत्मसिचंयुदकनामगोत्रणवान्यताः ।। स्नास्वा शचिः प्रयतमानमः। पाषाणं तत आदाय मब्रह्ममारिणः कुर्युरुदकंपतितास्तथा॥५॥ विप्रे दद्यानांजलीन् । द्वादश क्षत्रिये दद्यादी पंच- दश स्मृताः । विशद्राय दातव्या ततः सन.वैशेहं। १ स्योहराया सांगण्यामुदकत्रियां कुरिन् । ततः खान पुनः कार्य गझीच च कारयेत् ।
(४०४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । मरहों उनको जलदान और अशाच ब्रह्म योजना-पाखंडी अनाश्रिताः स्तनाः चर्यके अनंतर अवश्य करें सोई मनु भर्तृभ्यः कामगादिकाः सुराप्यः आत्मत्या- (अ.८-श्लो.८८)ने कहा है कि जिस ब्रह्म- | गिन्यः एते अशौचभागिनो न भवन्ति । चारीको ब्रह्मचारीके कर्मोंकी (अपोशान तात्पर्यार्थ-मनुष्यका शिर और कपाल दिनमें न सोना आदि )की आज्ञा है वह | आदि वेदसे बाह्य चिन्हको जो धारण करें वे आदिष्टी ब्रह्मचारी जबतक व्रतकी समाप्तिहो पाखंडी और अधिकार होनेपरभी जिनोंने तबतक जलदान न करें और व्रतकी ब्रह्मचर्य आदि आश्रमोंका ग्रहण न कियाहों समाप्ति होनेपर तो जलदेकर तीनरात्र अशु- वे अनाश्रित सुवर्ण आदि उत्तम दव्योंको द्ध होता है यहभी पिता आदिसे भिन्नके विष- जो चुरावें वे स्तेन-पतिकी हत्या करनेवाली य समझना यह आगे कहेगे-आचार्य पिता | और कुलटा अर्थात् जो विनाप्रयोजन कुलर में उपाध्याय इस वचनमें आचार्य यह मानते विचर वे कामग स्त्री, और आदि पदके ग्रह- हैं कि जिसने प्रायश्चित्त का प्रारंभ करर- णसे अपना गर्भ और ब्राह्मणके हत्यारी और क्खाहो वहही आदिष्टी कहाता है उसकोही | जिस जातिको जो मदिरा निपिद्धहो उसके यह जलदान आदिका निषेध है और प्राय- पीनेवाली सुरापी और जो विष अग्नि जल श्चित्त रूप व्रतकी समाप्तिके अनंतर जलदान और बंधनसे अपना घात करे वे आत्म- और अशौचकी विधिभी उसकोही है तेसेही | त्यागिनी ये पाखंडी आदि सब तीन सत्र वा नपुंसक आदिकोंको जलदान निषिद्ध है- | दशरात्र जो आशीच कहेंगे उसके और जल- क्योंकि वृद्धमनुका यह वचने है कि नपुंसक | दान आदि कोई देहिक कर्मके अधि- आदि पुत्र चौर जिनका समयपर यज्ञोपवीत | कारी नही होते अर्थात् सपिंड आदिको न हुआ हो वह व्रात्य-विधी गर्भ और इनके मरने में अशौच आदि नहीं होता इससे भर्तीका द्रोह करनेवाली और मदिरापीने सपिंडभी जलदान आदि न करें इसके वाली स्त्री ये सब जलदान न करें । लिये ये वचन है-यहां सुराप्य इत्यादिमें स्त्री- भावार्थ-मौन धारै एकवार नाम गोत्र | लिंग विवक्षित नही क्योंकि इस वचनमें लेकर जलदान करे ब्रह्मचारी और पतित | लिंगको न मानने योग्योमें पढा है कि लिंग ये जलदान न करें- ॥ ५॥ वचन-देश-कालकर्मका फल इन पांचोंको पाखंड्यनाश्रिताः स्तेनाभन्यः कामगा. मीमांसामें कुशलोंने मानने योग्य नही कहा दिकाः॥ सुराप्य आत्मत्यागिन्यो नाशौचो यहभी जानकर करनेमें समझना-सोई दकभाजनाः ॥६॥ गांतमेने कहा है कि प्रायः (महाप्रस्थान) पद-पाखण्डी १ अनाश्रिताः १ स्तेनाः १ अनशन ( भोजनका त्याग) शस्त्र अग्नि विष मध्यः २ कामगादिकाः १ सुराप्यः । जल इंधन गिरिकी शिखिरसे गिरना इनसे आत्मत्यागिन्यः १ न:- आशौचोदक | जो मरनाचा वे अशोचके भागी नही होते इस वचनमें इच्छतः यह कहनेसे दोप नहीं आदिटी नोदकं कुर्यादा प्रतस्य समापनात् । लिंग च वचन देश: कालोय कर्मणः फलं। समाते तरफ दत्ता विराप्रमशुचिर्भवेत् । मीमांसाकुशलाः माहुग्नुपादिगपंचकं । हीराया नौदक कुयुः स्ना बात्या विधर्मिणः । २ पायोऽनाशकरावामिविषादयोद्वन्धनप्रपतन- गर्भभद्रुश्चैव सुराप्यश्चैव योषितः । भागिनः१॥ च्छताम्।
मायश्चित्ताध्याय आशीचप्रकरण १ .(४०५) 2 यह जानना क्योंकि अंगिराकी स्मृति है कि करना क्योंकि यमराज की यह स्मृति है कि जो कोई मनुष्य प्रमादसे अग्नि और जलसे जो ब्राह्मणके दंडसे मरेहों उनका अशाच मरजाय उसका अशौच और जलदान करै जलदान रोदन दाह आदि अन्त्येष्टि कर्म तेसही विशेष मृत्युसेभी अशौच आदिका | और कट (पीजरी ) धारण न करे कदाचित् निषेध इस ववनसे है कि चाण्डाल-जल-सर्प कोई शंका करे कि अग्निहोत्रीको अग्नि ब्राह्मण-बिजली-डायाले-और पशु-इनसे और यज्ञपात्रोले दाह करे इस श्रुतिसे कहीं पापी मनुष्य भरते हैं उन पापियोंको जो जल अग्नि और यज्ञ पात्र आदिकी प्रतिपात्तेका और पिंड दिया जाता है वह उनको नहीं । लोप होगा इससे यह स्मृतिमें कहा हुआ मिलता कितु आकाशमेंही नष्ट हो जाता है दाह आदिका निषेध ब्राह्मण आदिसे इतकी अग्निके विषमें न होगा यह शंका ठीक यह भी तब है जब जानकर आत्महत्याकी | नहीं क्योंकि चाण्डाल आदिसे इते हुए हो क्योंकि गौतमके यचनमें जानकर जो आमहोत्रीके जो अग्निपात्र हैं उनकी दूसरी आत्महत्या की हो उसकोही अशीचका विधि अन्य स्मृतिमें कही है कि यदि अग्नि- निषेध कहा है इस वचनमेंभी चाण्डाल जल होत्री वृथा मराहो वैतान पात्रको जलमें फेकै और सर्प इनके साहचर्य देखनेसे जान कर आवसथ्यको चौराहेमें फैंके पात्रोको अग्निमें ही मरनेके विषयमें यह वचन है यह ही फूंक दे तैसेही इनके शरीरको भी दूसरी निश्चय है इससे अभिमान आदिसे जो | विधि कहीहे कि अपनी आत्माके त्यागे चाण्डाल आदिके मारनेको गयाहो और और पतित इनकी दाह आदि क्रिया करनी उनाने मार दियाहो उसको पिण्ड दानका उचित नही किंतु इनका गंगामें तिसी प्र- निषेध है क्योंकि उसने सबसे अपनी कारके संस्थापन (फेंकना) ही हित है- आत्माकी रक्षा करे इस शास्त्रकी विधिका तिससे विना विशेषके सबको दाह आदिका अवलंघन किया-इसी प्रकार दुष्ट सर्प निषेध हे इससे स्नेह आदिसे इस निषेधका आदिके पकडनेके लिये अभिमान आदिसे कोई अवलंघन करे तो प्रायश्चित्त करना सन्मुख गयाहो और मरजायतो उसको यह योग्यहै क्योंकि यह स्मृति है कि अग्निदाह पिण्डदान आदिका निषेध जानना यह आजलदान स्नान स्पर्श श्मशानमें ले जाना शौचका निपेधभी दशदिनकका है क्योंकि कथा रज्जुका छेदन रोदन इनको करके तप्त इसे वचन से इनकी शीघही शुन्दि कहेंगे कि कृच्छ्रसे शुद्ध होताहै यहभी चाण्डालआदि ब्राह्मण गो राजासे जो मरेहो और जिनाने प्रत्येकके लिये इनको जानकर करने में प्रत्यक्ष आत्महत्याको हो उनकी शुद्धि शीघही जानना अज्ञानसे करनेमें तो यह संवर्तका होती है तेसेही इनका दाह आदिभी न नाशौच नोदकं नाथुन दाहायन्त्यकर्म च ब्रह्म १ अपकश्चित्मभावेन नियेतान्यदकादिभिः तस्या- दहताना च न कुर्यास्कटधारणम् । चं विधातव्यं कर्तच्या चोदफकिया। २ आहितामिमानभिहन्ति यज्ञपात्रैश्च । २ चाहालादुइकात्साहाह्मणाद्रद्यतादपि । दष्ट्रि ३ वैताने प्रक्षिपदेप्सु आवसथ्यं चतुष्पथे। पात्राणि भ्यश्च पशुभ्यश्च मरणं पापकर्मणाम् । उदकं पिंडदान । तु दहेदनी यजमाने वृयामृते । च प्रेतेभ्यो पत्प्रदीयते । नोपतिठति तत्सर्वमंतरिक्ष ४ आरमनस्त्यागिना नास्ति पतितानां तथानिया विनश्यति। तेषामपि तथा गगातोये सस्थापन हितम् । ३ सर्वत एवात्मान गोपायेत् । ५ कृतानिमुदक स्नान स्पर्शन बहनं कयां । रज- ४ इतानर भूपगोविनरन्नक्षं चात्मघातिनाम् । छेदा पात च सप्तण गुध्यति ।
(४०६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा हुआ प्रायश्चित्त समझना- इनमेंसे और छागलेयने कहा कि लोकनिंदाके कोईसे प्रेतका जोले जाता है वादग्धकरता | भयसे मनुष्य उनके लिये नारायण बलि करै है और कट' और जलदान करता है वह | अन्यथा उनकी शुद्धि नही होती यह यमने सान्तपन कृच्छू कर और जो इस वचनसे कहा तिससे उनके निमित्त दक्षिणासहित उपवास कहाहै कि चाण्डालआदि शवका अन्नदान करे- व्यासने भी कहा है कि नाग- स्पर्श वा अशुभ बात करें और पूर्वोक्त | यणके निमित्त अथवा शिवके निमित्त जो दाह आदि न भी करें तो एकरान न करे | दिया जाताहै वह प्रेतकी शुद्धिकी लिये यह उपवास, और तो सुमंतुने इस वंचनसे कर्म है अन्यथा शुद्धि नहीं होती इस भिक्षाका भोजन कहाहे वह कि कृच्छ करनेमें प्रकार नारायण वाले प्रेतकी शुद्धि जो असमर्थ हो वा बंधन और छेदन करे करनेके द्वारा श्राद्ध आदिकी देनेकी वह एकमासतक त्रिकाल भिक्षाका भोजन योग्यताको पैदा करतीहै इससे संपूर्ण और्द्ध- करै ये दोनों वचन असमर्थक विषयमें हैं- | देहिकभी करना चाहिये इसीसेही यह त्रिंश- इसी प्रकार अन्यभी इस विषयके स्मृति- के मतसे भी औल देहिककी आज्ञा योके वचनोंकी व्यवस्था समझनी यह दाह देखते हैं कि गौ ब्राह्मणसे हते और पतित आदिका निषेधभी उस वानप्रस्थसे भिन्नके | इनका वर्षदिनके अनंतर संपूर्ण औy विषयमें है जो नित्यकर्मक अनुष्ठानमें अस- देहिक करै- इस प्रकार वर्षदिनसे मर्थ और जीर्ण हो क्योंक तिनकोभी शा- पीछे नारायणबलि करके और्ध्वदोहक स्त्रकी आज्ञा देखते हैं- क्योंकि यह स्मृति | करे- नारायणबलि इस प्रकार करनी है कि वृद्ध जो शोच और स्मरणसे रहित | चाहिये- किसी शुक्लपक्षकी एकादशीको हो और वैद्योंने जिसे त्याग दिया हो- यदि विष्णु वैवस्वत और यमका यथार्थ पूजन वह पर्वत आग्नि अनशन व्रत जल इनसे | करके और पिंडदान पर्यत कर्मको अपनी आत्माकी हत्या करे उसका त्रिरात्र करके पिण्डोंको जलमें फेंक दे पत्नी अशोचहोताहै दूसरे दिन अस्थिसंचय तीसरे आदिको न दे- फिर उसी रात्रिमें अयुग्म दिन जलदान और चौथेदिनश्राद्ध करें ।। ब्राह्मणोंको निमंत्रण देकर उपवास करे इसी प्रकार जिस जिस उपाधिसे आत्म- प्रातःकाल होनपर मध्याह्नके समय हत्या कहीहै उससे भिन्नमार्गसे जो आत्म-विष्णुका पूजन करके एकोद्दिष्ट विधिसे हत्या कर उनका श्राद्ध आदि और्ध्व देहिक ब्राह्मणोके पादोके प्रक्षालन (धोना) आदि कर्म निपिद्ध है तो उनके लिये क्या करना तृप्तिके प्रश्न पर्यत कर्मको करके पिण्डपित- चाहिये इस अपेक्षाके होनेमें वृद्ध याज्ञवल्क्य यज्ञकी विधिसे उल्लेखन आदि अवनेजनः : एषामन्यतम प्रेत यो बहेत दहेत वा। कटोदक- पर्यन्त कुर्मको तूप्णी (मौन) करके विष्णु कियां कला कडू सांतपन चरेत् । ब्रह्मा और परिवार सहित यमको पिण्डदे २ तच्छव फेवलं स्पृष्टमथुवा पातित यदि। पूर्वो- कर नाम गोत्र सहित प्रेतका स्मरण करके तानामकारी चैदेकरानमभोजनम् । १ नारायणवलिः कार्यों लोकगभियानः । तथा ३ पदः शौचामृत तः प्रत्याग्यातभित्रक्रियः । तेषां भवेच्छांचं नान्यथेन्यप्रवीयमः । तस्मात्तभ्योगि भारमानं घातयेद्यस्तु भृग्वायनशनाम्नुभिः । तस्य | दातव्यमत्रमेव सदक्षिणम् । विरात्रमाशीनं द्वितीये त्वस्थिसचयः । तीये तूदर्क २ नारायण समुद्दिश्य शिवं वा यत्प्रदीयते । तस्य एला चत बाइमाचरेत् । शुद्धिकर फर्म सद्भवेन्नेतदन्यया ।
प्रायश्चिचाध्याय याशोचप्रकरण १ (१०७) और विष्णुका नाम लेकर-पांचवां पिण्डदे- एकादशी आने पर विष्णु और यम वैवस्वत फिर आचमनके अनंतर ब्राह्मणोको दाक्ष- देवका पूजन करें और पीमिले हुए और णासे प्रसन्न करके उन ब्राह्मणणाके मध्यमें सहत और तिल मिलेहुए दश पिण्डोंको किसी श्रेष्ठ गुणवाले ब्राह्मणका प्रेतबुद्धि | दश कुशाओं परदे दक्षिणाभिमुख होकर- से स्मरण करता हुआ गो भूमि सुवर्ण आ-दे-विष्णुको बुद्धिमें रखकर नदीके जलमें दिसे भली प्रकार उसको प्रसन्न करके प- वित्र हे हाथ जिनके एसे ब्राह्मणोंसे प्रेतके पिण्डोंका स्थापन करे नाम गोत्रले पुप्पोस निमित्त तिल सहित जल दिवा कर अपने पूजन कर-भक्ष्य भोज्यदे-पांच ५ सात ७ जनों सहित आपभी भोजन करावे-सर्पसेह नो ९ ऐसे ब्राह्मणोंको निमंत्रणदे जो विद्या तैमें तो यह विशेष है कि वर्ष दिनतक पु- और तपसे वृद्धहों कुलीन और सावधानहों गणोक्त विधिसे पंचमीको नागपूजा करके पूरा वर्ष होनेपर नारायणबलि करके सोने- दूसरा दिन आने पर मध्याह्नके समय उप- का नाग और प्रत्यक्ष गौदे फिर संपूर्ण औ- | वास करके विष्णुका पूजन करके उन ब्रा- छ दोहक करें मारायण पालिका स्वरूप ! ह्मणोंको उत्तराभिमुख ज्येष्ठ २ पितगेका वणवने कहा है कि जैसे शुक्ल पक्षको । स्मरण करता हुआ बैठादे फिर विष्णुमें १ एकादशी समासाय शुक्लपक्षस्य वै तिथि । विष्णु | मनको लगा कर संपूर्ण देवताओंका आवा- समचौद्देव यम वैवस्वत तया । दशापिण्डान् घृताभ्यः हन आदि कर्म सावधान होकर करे-फिर तान्दर्भेषु मधुसयुतान् । तिलमियान्प्रदद्यादै सयतो ब्राह्मणोको तृप्त हुए जानकर-आप तृप्त हुये दक्षिणामुखः । विष्णु बुद्धी समासाद्य नयंभास ततः यह पूछे उसके अनंतर-हविष्य और तिल क्षिपेत् । नाममात्र ग्रह तत्र पुष्परभ्यर्चन तथा । धूप- इनके पांच पिण्डबनाकर देवताके रूपका दीपप्रदान थ भक्ष्य भोज्य तथा पर । निमत्रयेत विप्रा- स्मरण करता हुआ इन वक्ष्यमाण देवता न्यै पच सप्त नवापि वा । विद्यातपःसमुद्रान्व कुलो- ओंकोदे पहिला पिण्ड विष्णुको दूसरा शिव- पन्नान् समाहितान् । अपोइनि सप्राप्ते मध्याह्ने समु. को तीसरा ब्रह्माको और चौथा पिण्ड अनु- पोषितः । विष्णोरभ्यर्चन कृत्वा विप्रास्तानुपवासयेत् । चरों सहित यमकोदे फिर गोत्रोच्चारण पूर्वक उदइ मुखान्यथाग्येष्ठ पितृरूपमनुस्मरन् । मनोनिवेश्य विष्णो वे सबै कुर्यादतन्द्रित । आवाहनादि यो प्रेतका ध्यान और विष्णुका नाम लेकर देवपूर्व तदाचात् । तृशान् ज्ञात्वा ततो विप्रांस्तृप्ति पांचमा पिण्ड पूर्वको समान प्रेतके निमित्त पृथ्वा यथावधि । हविष्य व्यजनेनैव तिलादिसहितेनचा फेंकदे-फिर संपूर्ण ब्राह्मणोंकी दक्षिणासे पच पिण्डान्प्रदद्याच देवरूपमनुस्मरन् । प्रथम विष्णवे और एक, वृद्ध किसी उत्तम ब्राह्मणकी दयाहाणे च शिवाय च। यमाय सानुवराय | सुवर्ण गो वस्त्र भूमि इनसे उस प्रेतको मनमें चतुर्थे पिण्डमुत्सृजेत् ।मृत सकीर्त्य मनसा गोत्रपूर्वमतः स्मरण करता हुआ पूजा करें-फिर वे ब्रा- परं । विष्णोर्नाम गृहीत्य पंचम पर्ववक्षिपेत् । ह्मण हाथमें तिल जल कुशा लेकर उसके विमानाचम्य विधिवद्दक्षिणाभिः समर्चयेत् । एक वृद्वतम नामको बुद्धिमें विचारते हुए फेक और हवि विप्र हिरण्येन समर्चयेत् । गवावस्त्रेण भूम्या व गंध द्रव्य तिल जल इनको सावधान हो प्रेत त मनसा स्मरन् । तस्तिलाम्भो विप्रास्तु | करदें-फिर वह यजमान मौन होकर मित्र इस्तैर्दर्भसमन्वितैः । क्षिपेयुर्गोत्रपूर्व तु नाम बुद्धी निवेश्य छ । हविर्गन्धतिकाभस्तु तरमै दद्युः समा- भृत्य जनों सहित आप भोजन कर इस हितः । मित्रभृत्यजनैः सार्द्ध पश्चाइजीत वाग्यतः। प्रकार वष्णव मतमें स्थित होकर जो आ- एवं विष्णुमते स्थित्वा यो दद्यादात्मघातिने । समुत्मघातीके लिये देता है वह उसका शीघ्र द्धति त क्षिप्र नात्र कार्या विचारणा । ही उद्धार करताहै इसमें संशय नही
(१०८)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
सर्पसेडसे हुएके लिएतोसुमन्तुनें इस भविष्य-
पद- मानुष्ये ७ कदलस्तंभनिःसारे ७
त्पुराणके वचनेसे सुवर्ण प्रतिमाको सर्पका सारमार्गणम् २ करोति कि- यः १सः १
दान कहा है कि भार (परिमाणविशेष ) संमूढः १ जलवुद्धदसन्निभे ७ ॥
भर सुवर्णका सर्प और गौ इनका व्यासके योजना- कदलीस्तंभनिःसारे जलबुद्ध-
लिये विधिवत् दान करके पिताके ऋणसे
विमुक्त हो जाता है
दसंनिभे मानुष्ये यः सारमागंण करोति सः
संमूढः भवति ॥
भावार्थ-पाखंडी-अनाश्रमी-चोर-पतिको तामा०-यहां मनुष्य शब्दसे जरायुज अं-
मारनेवाली स्त्री-व्यभिचारिणी-मदिरापीने- | डन आदि चार प्रकारका भूतोंका समुदाय
वाली-जल आदिसे आत्महत्यारी-ये अ- लेते हैं ऐसे कदलीस्तंभके समान भीतर
शौच और जलकी भागिनी नही होती ॥६॥ साररहित और जलके बुद्बुद (वचूला ) के
कृतोदकान्समुत्तीर्णान्मृदुशादलसंस्थितान् समान शीघ्रही नष्ट होनेवाले संसारमें जो सार
स्नातानपवदेयुस्तानितिहासै:पुरातनैः॥ (स्थिरता)को ढूंढता है वह भलीप्रकार
मूढ है अर्थात् नष्टचित्त है-तिससे संसारके
पद-कृतोदकान् २-समुत्तर्णािन् २ मृदु- | ऐसे सारके जाननेवाले तुमको शोक न
शाद्वलसंस्थितान् २ स्नातान २ अपवदेयुः | करना चाहिये ॥ ८ ॥
क्रि-तान २ इतिहासैः ३ पुरातनैः ३ ॥
पंचधासंभृतःकायोयदिपंचत्वमागतः ॥
योजना-कृतोदकान् समुत्तीर्णान् मृदु-
शादलसंस्थितानु स्नातान् (पुत्रादीन् )
कर्मभिःस्वशरीरोत्यैस्तत्रकापरिदेवना ९॥
कुलवृद्धाः पुरातनेः इतिहासः अपवदेयुः ॥ पद-पंचधा:- संभृतः १ कायः १ यदि:-
ता० भा०-इस प्रकार अपवाद सहित | पंचत्वं २ आगतः १ कर्मभिः ३ स्वशरीरो-
उदकका दान कहकर इसके अनन्तर क्या । त्यैः ३ तनऽ- का १ परिदेवना १ ॥
करना चाहिये इस अपेक्षासे कहते हैं जि योजना-यदि पंचधा स्वशरीरोत्थैः संभृतः
नोने जल दिया है ऐसे कृतोदक और सात कायः पंचत्वं आगतः तत्र परिदेवना का न
और जो भली प्रकार जलसे निकले हों) कापि इत्यर्थः ॥
और जो नये कोमल तृणसे आवृत पृथ्वीपर तात्पर्यार्थ-जन्मांतरमें अपने शरीरसे
बैठेहों ऐसे पुत्र आदिकोंको कुलमें वृद्ध उत्पन्नहुए अपने कर्म बीजोंसे अपने फ-
मनुष्य वक्ष्यमाण पुरातन इतिहासो (पूर्व- लोंके भोगार्थ पृथिवी आदि पांचभूतसे पांच
कया )से शोकको दूर करावे-अर्थात् शो- प्रकार रची हुई काया यदि फलके भोगकी
कके दूर करनेवाले वचनोंसे उनको बोध निवृत्ति होनेपर पंचत्वको प्राप्त हो जाय
अर्थात् फिर पृथिवी आदि पांचभूतोंमें लीन
मानुष्येकदलोस्तंभनिःसारेसारमार्गणम् हो जाय उसमें आप लोगोंको शोककरना
करोतियः ससंमूढोजलघुद्धदसंनिभे ॥८॥ | व्यर्थ है- अर्थात् निष्प्रयोजन होनसे शोक
न करना चाहिये क्योंकि जिस वस्तुकी
१ मुवर्णभारनिरपा नागं कृता तक गां ।व्या- स्थितिको कोई अवलंघन नहीं कर सत्ता
सार पसा विधिवपितुरानृण्यमानुयात् । वह वस्तुकी स्थिति ऐसेहीहै ।
करे ॥७॥
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचमकरण १ (४०९) भावार्थ-पांचभूतोंसे अपने शरीरके किए | नहि रोदितव्यं किंतु स्वशक्तितः क्रियाः कासे पैदा हुआ देह यदि पांचभूतों में मिल | कार्याः ।। गया तो उसमें शोक करना वृथा है ॥ ८ ॥ ताभा-जिससे शोक करतेहुए बांधव गंत्रीवसुमतीनाशमुदधिदैवतानिन । मुख और नेत्रोंसे जो कफ और आंशु फैनप्रख्यः कर्यनाशमर्त्यलोकोनयास्यति १ निकासते हैं उनको इच्छाके न होनेपरभी प्रेत खाता है तिससे प्रेतके हिताभिलाषी पद-गन्त्री १ वसुमतीश्नाशं २ उदधिः १ / योंका रोना न चाहिये किन्तु अपनी देवतानि १ च:- फेनप्रख्यः १ कथं:- ( शक्तिके अनुसार श्राद्ध आदि क्रिया नाशं २ मर्त्यलोकः १ न:- यास्यति क्रि-॥ करें।। ११ ॥ योजना-वसुमती नाशं गंत्री उदधिः इतिसंश्रुत्यगच्छेयुईिवालपुरःसुराः ।। च पुनः देवतानि नाशं गताण फेनप्रख्यः विदश्यनिवपत्राणिनियताद्वारिवेश्मनः १२ मर्त्यलोकः पुनः नाशं कथं न यास्यति । तात्पर्यार्थ और यह मरण आश्चर्य नहीहै पद-इति:-संश्रुत्या-गच्छेयुः क्रि-गृहर क्योंकि पृथिवी आदि बडे बडे भूत भी बालपुर सगः २ विदश्य:-निम्बपत्राणि २ नष्ट होयगे और जरा और मरणसे रहित नियताः १ द्वारि७ वेश्मनः ६॥ समुद्र और देवताभी प्रलयके समय नाशको आचम्यान्यादिसलिलंगोमयंगौरसर्पपान्।। प्राप्त होयगे फनके समान यह मर्त्यलोक प्रविशेयु:समालभ्यकृत्वाश्मनिपदंशनैः ।। अस्थिर होनेसे केसे नाशको प्राप्त न होयगा अर्थात् अवश्य होयगा क्योंकि जिसका पद-आचम्य:-अग्न्यादि२ सलिलं२ गो- मरना धर्म है उसका जाना उचित है इससे | मयर गौरसर्षपान्२ प्रविशेयः क्रि-समा- शोकका करना उचित नहीं । लभ्या-कृत्वाऽ-अश्मनि पदं शनैः-- ॥ भावार्थ-पृथिवी समुद्र देवता येभी जय योजना-इति कुलवृद्धवचासि संश्रुत्य नाशको प्राप्त होयगे तब फेनके समान यह बालपुरसगः गृहं गच्छेयुः वेश्मनः हारि देह नाशको प्राप्त क्यों नही होगा अर्थात नियताः निम्बपत्राणि संदश्य आचम्य अवश्य होयगा ॥ १०॥ अग्न्यादिसलिलं गोमयं गौरसपान् समा- लभ्य अश्मनि शनैः पदं कृत्वा प्रविशेयु: श्वप्माश्रुवांधवैर्मुक्तप्रेतोभुक्तयतोवशः। गृहमिति शेषः॥ अतोनरोदितव्यहि क्रिया कार्या:स्वशक्तितः ताभावार्थ-इस प्रकार कुलवृद्धोके वच- पद-श्लप्माश्रु २ बांधवैः३मुक्तं २ प्रेतः१ नोंको सुनकर शोकको त्यागकर और मुंक्त कि- यतः:- अवशः १ अतः- बालकोंको आगे करके घरको जाय और वहां रोदितव्यं १ हि:- क्रियाः १ कार्याः १ रोककर नोमके पत्तोंको चावकर और जाकर घरके द्वारपर बैठकर और मनको स्वशक्तितः:- ॥ उन पत्तांका त्याग करके आग्नि जल गोमय योजना-यतः ( यस्मात् ) अवशः प्रेतः । सरसों इनका स्पर्श करके आदि पदके ग्र- बांधवैः मुक्तं श्लेष्माश्रु भुङ्क्त अतः युप्माभिः ! हणसे दूवके अंकुर और बेलका स्पर्शभी नर- (४१०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । लेना क्योंकि शंखनै इस वचनमें भी दो असपिण्ड द्विज प्रेतको 'ब्राह्मण अपने बंधु- पढे हैं फिर पत्थरके ऊपर पैर रक्खे और के समान और माताके श्रेष्ठ बांधवोंकोलेजा- शनः २ गृहमें प्रवेश करें ॥१२॥१३॥ कर तीन रानमें शुद्ध होता है यदि उनके प्रवेशनादिकंकर्मप्रेतसंस्पर्शिनामपि ॥ अन्नको भक्षण करे तो दश रानमें शुद्ध इच्छतांतत्क्षणाच्छुद्धिःपरंपांस्नानसंयमात् होता है-यदि उनके अन्न को न खाय और पद-प्रवेशनादिकं २ कर्म २ प्रेतसंस्प- उनके घरमें नवस तो एक रात्रमें शुद्ध होता शिनां ६ अपि- इच्छता ६ तत्क्षणात् ५। है-यहां यह व्यवस्था है कि जो स्नेहसे प्रेत- शुद्धिः १ परेषां ६ स्नानसंयमात् ५॥ को श्मशानमें लेजाकर उसके अन्नको खा- योजना-प्रवेशनादिकं कर्म प्रेतसंस्प- ता है और उसके घरमें वसता हे उसकी शिनां अपि भवति- इच्छतां तत्क्षणात् | दश गनमें शुद्धि होती है और जो उसके शुद्धिः भवति परेषां स्नानसंयमात् भवति ॥ घरमें वसता है और उसके अन्नको नही तात्पर्यार्थ-जो यह नीमके पत्ते चावने खाता उसकी त्रिरात्र में शुद्धि होती है और और गृहमें प्रवेश आदि कर्म है वह केवल | जो केवल प्रेतको लेजाता है न उसके अ- ज्ञातिके मनुष्योंको नही किन्तु धर्मके लिये नको खाता है न घरमें वसता है उसकी प्रेतका अलंकार और श्मशानमें लेजा- एकरात्रमें शुद्धि होती है-यह भी सजा- नेके लिये जो स्पर्श करते हैं उनके लि- | तीयके विषय में है विजातीयके विषयमें तो एभी है-यहां आदिशब्द मांगलिक होनेसे जिस जातिके प्रेत को लेजाता है उस जा- प्रतिलोम क्रमका बोधक है अनुलोम का तिकेही अशौचका भागी हो जाता है सोइ नही धर्मके लिये प्रतके लेजानेमें प्रवृत्तहुए | गौतमैने कहा है कि यदि छोटावर्ण पूर्वको वे यदि उसीक्षणमें शुद्धिचाहें तो सपिण्डोंस- वा पूर्ववर्ण छोटे वर्णको श्मशानमें लेजाय तो भिन्न उनकी स्नान और प्राणायामोंसे शुद्धि | उस शवका जो आशौच वही उसको कहा होती है सोई पराशरने कहा है कि जो है ब्राह्मण शूद्रको लेजाय तो एक मासका द्विजाति अनाथ ब्राह्मण प्रेतको लेजाते हैं वे और शूद्र ब्राह्मणको ले जायतो दश रात्रका पदरपर क्रमसे यज्ञके. फलको प्राप्त होते हैं अशीच होता है इस प्रकार शवके समान उन शुभकर्मवालांको किंचित्भी अशुभ आशीच करना। नही होता किंतु जलमें स्नान करनेसेही भावार्थ-प्रेतके स्पर्श करनेवालोंको उनकी शीघ्र शुद्धि होजाती है स्नेहसे प्रेत गृहमें प्रवेश आदि कर्म करना यदि वे चा- के लेजानेमें तो मन (अ० ५ श्लो० १०१- हैं तो उसी क्षणमें शुद्धि होती है और १०२-) को कहाहुआ विशेष जानना कि सपिण्डोंकी स्नान करनेसेही शुद्धि होती १ दूर्वाप्रवालमनिवृषभावा । है।॥ १४ ॥ २ अनाथ ब्राह्मण प्रेतं ये वहन्ति द्विजातयः पदे पदे यज्ञफलमनुपर्व लमन्ति ते । भाचार्यपिचपाध्यायानिहत्त्यापिवतीवती । ३ असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हय वधुववादि- | सकटानंचनानीयानचतैःसहसंवसेत् १५|| शुध्यति त्रिगण मातुराप्तांश्च यांधवान् । यद्यन्नमत्ति तेषां तु दशाइन विध्यति । अनदनन्नमढेर नचे 1 अवरचेद्रर्णः पूर्व वर्णमुपस्पृशेत पूर्वो वावरं तत्र तच्छवोतमाशाचम् । त्तस्मिन्गृहे वसेत् ।
प्रायश्चित्ताभ्याय आशौचप्रकरण १ (४११) पद-आचापित्रुपाध्यायान् २ निर्हत्य:- यह पूर्वोक्त भोजन न मिलती अर्थात् अन अपि-प्रती१ व्रती सकटान्नं २ चा-न:- शन व्रत करें इसीसे वशिष्टने कहा कि घरमें अनीयात् कि-न-च-तैः ३ सह-संव- जाकर भूमिके विस्तरपर तीन दिन तकविना- सत् कि-॥ भोजनकिए बैठे अथवा मोलके अन्नका भ- योजना-व्रती आचार्यपिचपाध्यायान् क्षण करै अशौचवालोंके सोने वा पैठनेके निहत्य अपि व्रती भवति सकटान्नं न लिए जो तृणोंका विस्तर उसे अधःप्रस्तर अभीयात् चपुनः तैः सह न संवसेत् ।। कहते हैं और वे सपिण्ड भूमिमेंही पृथक् २ तात्पर्यार्थ-आचार्य- माता-पिता-उपा- सोवे खट्दा आदिपर नही-मर्नु (अ०५ ध्याय-इनको श्मशानमें लेजाकर ब्रह्मचारी | श्लो० ७३ ) ने भी यहां विशेष दिखायाहै कि ब्रह्मचारीही रहताहै उसका व्रत नष्ट नहीं खारालवण जिसमे नहीं ऐसे अन्नको भक्षण होता यहां कट शब्दसे अशौच लेते है करतेहुए वे तीन दिनतक-नानकर और उसका जो अन्न उसै सकटान्न कहते है मांसका भक्षण न कर तेसेही गोतमनभी उसको न खाय न अशौच वालोके साथ विशेष कहा है कि शवके कर्म करनेवाले सोवे-यह कहनेसे यह बात अर्थात् कही भूमिपर सोवें और ब्रह्मचारी रहै और पिण्ड- गई कि आचार्य आदिसे भिन्नके लेजान में पितृयज्ञको प्रक्रियासे अर्थात् अपसव्य व्रत नष्ट होजाता है इप्तीसे वसिष्ठेनें कहा होकर प्रेतके लिए पिण्डरूप अन्न तीन है कि शवके कर्म करनेवाले ब्रह्मचारीकी व्रतसे निवृत्ति होती है माता और पिताक दिनतक मौनदोकर भूमिपर दें सोई मरी'- कर्मको करें तो व्रतसे निवृत्ति नहींहोती ॥ चिनें कहा है कि दर्भ और मंत्रसे वर्जित भावार्थ-आचार्य पिता उपाध्याय इनको प्रेतका पिण्डस्नान और सावधानीसे पूर्व श्मशानमे लेजाकर ब्रह्मचारीका व्रतभंग और उत्तर दिशामें चरु बनाकर ग्रामसे नहीं होता परंतु वह अशौचका अन्न न वाहिर दे यहां कुशा और मंत्रसे वर्जित खाय और न अशौच वालोंके संग वसे ॥१५॥ कहना उसकेलिए है जिसका यज्ञोपवीत क्रीतलन्धाशनाभूमीस्वपेयुस्तेपृथक्पृथक्॥ न हुआ हो क्योंकि प्रचेतोंकी यह स्मृति है पिंडयज्ञावृतादेयंप्रेतायानंदिनत्रयम्॥ १६॥ कि जिनका संस्कार न हुआ हो उनका पद-क्रीतलब्धाशनाः १ भूमौ ७ स्वपे- | पिण्ड भूमिमें और जिनका संस्कार हो- युः क्रि- ते? पृथक्-पृथक्- पिण्डयज्ञावृ- चुकाहो उनको कुशाओंपर दे-तैसेही ता ३ देयं १ प्रेताय ४ अन्नं १ दिनत्रयम् २।। गृहान् व्रजित्वाधःप्रस्तरे त्र्यहमनश्नन्तः भा- योजना-क्रीतल धाशनाः तेभूमी पृथक् २ स्वपेयः पिण्डयज्ञावृता प्रताय अन्न दिनत्रय सीरन् क्रीतोत्पन्न वत्तरेन् । २ अक्षारल्यणानाः स्युनिर्मजेयुश्च ते त्र्यहं ।मांसा- देयं ॥ शनं च नानीयु. सीरंश्च पृथक्षिती । तात्पर्यार्थ-वे अशाचवाले मोलका अया- ३ अध शय्याशयिनी ब्रह्मचारिणः शवकार्मिणः। चित वा अकस्मात् मिले भोजनको करें यदि ४ प्रेतपिंड बाहिदद्यार्भमत्रविवर्जित । प्रागुदीच्या ब्रह्मचारिणः शवकमिणो व्रतानिवृत्तिरन्यत्र | चा कृया सातः प्रयतमानसः । मातापियो। ५ असस्कृतानां भूमौ पिण्ड दद्यान्संस्कृतानां कुशेषु .
(११२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कर्ताका नियमभी गृह्यपरिशिष्टसे जानना पिण्ड-क्षत्रियके बारह पिण्ड अशौचके कि असगोत्रहो वा सगोत्रहो स्त्री हो वा दिनकी संख्यासे होते हैं जितना अशीच पुरुषहो पहिले दिन जो देवे सोही दश- उतना जल और पिण्ड दें-तैसेही अन्य- दिनतक कर्मकी समाप्ति करे तसेंही द्रव्य- | स्मृतिमें कहा है कि नो ९ दिनोंमें नो पिण्ड का विनिमय (देना) शुनःपुच्छेने दिखाया | सावधानीसे दे-दशमें पिंडको देकर एक है साठी सक्तु वा शाक इनसे पिण्ड दे और रात्रि में शुद्ध होता है यह शुद्ध होनेका व- पहिलेदिन जिस द्रव्यसे पिण्डदे उसी द्रव्यसे ! चन अगले दिन श्राद्ध करनेके लिए और दशदिनतक पिण्डदे-और सेचन-फूल- ब्राह्मणों के निमंत्रणके लिये है योगीश्वरनेतो धूप-दीप-इनको विना मंत्रदे-और पिण्डको तीन पिंडका दान कहा है उन दोनों गुरु पापाणपर दे माला पिण्ड जल इनको भूमिमें लघु कल्पोंकीभी वही व्यवस्था जाननी जो वा पत्थरपरदे यह शेखने कहाहे- कदाचित् जलदानके विषयमें कह आये है-यहां और दाः (दें) इस बहुवचनसे जलदानके भी विशेष शातातपनें कहा है कि आशौचके समान सब पिण्डदान करें यह शंका न | अल्प होनेपरभी दशही पिण्ड दे-जिनको करनी किं तु पुत्रही पिण्डदान करे-पुत्र न तीन रात्रका अशोष है उनको पारस्करने होयतो समीपके सपिण्डौमसे कोई करे वे विशेष दिखाया है कि पहले दिन सावधान भी न होयतों माताके सपिण्डों से कोई करे होकर तीन पिण्ड दे दूसरे दिन चार पिण्ड क्योंकि गौतमकी यह स्मृति है कि पुत्रके और अस्थिसंचयन कर तीसरे दिन चार अभावमें सपिण्ड, माताके सपिण्ड, शिप्य, पिण्ड दें और वस्त्रोंको धोवै- पिण्डदान करें ये न होयतो ऋत्विक और भावार्थ-मोल लिए भोजनको खाते हुए आचार्य पिण्डदान करें और बहुत पुत्रोंके वे भूमिमें सौवें और अपसव्य होकर तीन होनेपरभी ज्येठाही पिण्डदान करै क्योकि दिन तक प्रेतको पिण्ड दे ॥ १६ ॥ -मरीचिका वचन है कि सबकी अनुमतिसे जो जेठेने विभक्त द्रव्यसेभी किया वह सर- जलमेकाहमाकाशेस्थाप्यंक्षीरंचमृ- का किया होता है-पिण्डको संख्याका न्मये | वैतानोपासनाःकार्याःकि- नियम विष्णुनें कहा है कि ब्राह्मणके दश याश्च श्रुतिचोदनात् ॥ १७ ॥ १ असगोत्रः सगोत्रो वा यदि स्त्री यदि वा पुमान् । पद-जलं १ एकाहं २ आकाशे ७ स्था- अपमेहान यो दद्यारस दशाहं समापयेत् । प्य १ क्षीरं १ च - मृन्मये ७ वैतानी- २ शालिना सक्तभिर्वापि शाकैर्वाप्यय निर्वपेताप्रयमे पासनाः १ कार्याः १ क्रियाः १ च-श्रुति- हनि यद्दय्य तदेवस्थादशाझिकम् । चोदनात् ५॥ ३ तूणी प्रसेकं पुष्प च दीपं धूपं तथैव च । नवभिर्दिवतैर्दद्यान्नव पिण्डान्समाहितः । दशम ४ पुनाभावे सपिंडा मातृसपिण्डाः शिष्याश्च पिण्डमुत्सृज्य रात्रिशेषे शुचिर्भवेत् । २ आशौचस्य तु र सेपि पिण्डान्दद्याद्दश्व तु । ५ सबैरनुमान कृत्वा ज्येष्ठेनैव तु पस्कृत । द्रव्येण ३ प्रथमे दिवसे देयास्त्रयः पिण्डा समाहितः । द्वि- तीये चतुगे दद्यादस्थिसचयन तथा ॥ त्रीस्तु दद्या- तृतीयेहि ववादि क्षालपेत्तया । भूमा माल्य पिंडपानीयमूपले वा दद्युः । तदभारे ऋत्विाचायौं। वा विभनेन मोव कृत भवेत् । ६ यावदाशौच प्रेतस्योदकं पिण्डं च वादाः । 1 प्रायश्चित्ताध्याय माशीचमकरण १ (१३) योजना-जलं चपुनः क्षीरं मृन्मये पात्रे रना क्योंकि देवलेने यह कहा है कि दशमे एकाई आकाशे स्थाप्यं श्रुतिचोदनात् वैता- | दिनके आनेपर ग्रामसे बाहिर स्नान होता है नोपासनाः चपुनः क्रियाः कार्याः- उप्ती दिन वस्त्र-केश-श्मश्रु-और-नख- तात्पर्यार्थ-जल और क्षीर मट्टीके दो | ये त्यागने योग्य है-तेसेही अन्यस्मृति- पात्रोंमें शिक्य आदिमें रखकर प्रेतके निमित्त मभी लिखा है कि दूसरे-तीसर-पांचमें आकाशमें एक दिन दे यहां विशेष न सातमें दिन श्राद्ध देनसे पहिले मुण्डन क- कहनेपरभी एक दिन पहिला लेना है प्रेत राव सिद्धान्त यह है कि एकादशाहके श्राद्ध यहां स्नानकर इस वचनसे और इसका | देनेसे पहिले मुण्डनकरानेका नियम नहीं चाह पानकर इस वचनसे दूधका स्थापन कर जिस दिन करे मुण्डन कर इस आकां- तसेही अस्थिसंचयनभी प्रथम आदि दिनों | क्षामें आपस्तम्ब में कहा है कि अ- में करना सोई संवतने कहा है कि पहिले नुभावियोंका मुण्डन होता है इसका यह तीसरे सातमें नौम दिन सगोत्रीयोंको साथ अर्थ है कि शक्के दुःखको जोमाने उनको लेकर अस्थिसंचयन करें कहींतो दूसरे , अनुभावी ( सपिण्ड) कहते हैं-उन सपि- दिन अस्थिसंचयन कर यह कहां है विष्णु- ण्डोमें अविशेषसे सबका मुण्डन होता है पुण्णमें तो कहा है कि चौथे दिन अस्थि- अथवा छोटी अवस्था वालोंका इस अपेक्षामें संचयन करें और उनको गंगाजल में स्थापन भी येही वचन उपस्थित होता है कि तप कर दे-इससे इनमें से कोई से दिन अपनी यह अर्थ है कि अनु (पीछे ) उत्पन्न होय गृह्यसूत्रकी विधिसे अस्थिसंचयन करे- अं-उनें अनुभावी कहते हैं अर्थात् छोटी अ. गिरीने यहां यह विशेष दिखाया है कि भ- | वस्थावालीका मुण्डन होता है कोई पु!- स्थिसंचयनके दिन देवताओंका यज्ञ कहा | कोही अनुभावी जानते हैं क्योंकि यह नि- है जो मनुष्य शुद्ध होकर उस दिन देवता- यम देखते हैं कि गंगा भास्करक्षेत्र माता ओंका पूजन नही करता उसको देवता पिता गुरुका मरण आधान सोमपान इन शाप देते हैं यहां देवता श्मशानवासी लेने सातमें मुण्डन होता है । क्योंकि अंगिरानेही कहा है कि पहिले अशाच कि अशुद्धिमें संपूर्ण वेद आर दग्ध होनेवाले श्मशानमें वसनवाले सबके स्मृतियोंके कर्मको निवृत्ति पाई उनमें देवता कहे हैं इससे तत्काल मरे हुए प्रेतके किसी कर्मकी आज्ञाके लिए कहते हैं अग्नि निमित्त उन देवताओंका धूपदीप आदिसे योक विस्तारके वितान कहते हैं उसमें जो पूजन कर तसेही दशमं दिन मुण्डनभी होनेवाली क्रिया अर्थात् त्रेताग्निमें होने १ प्रयमेट्ति हतीये या सप्तमे नवमे तथा । अस्थि १ दशमेहनि संप्राप्त स्नानं प्रामावहिर्भवेत् । तत्र सचयन कार्य दिने सगोत्रजैः सह । त्याज्यानि वासांसि केशरमथुनखानि च । २ द्वितीये स्वास्थसचय। ३ द्वितीयेहनि कर्तव्य क्षुरकर्म प्रयत्नतः । तृतीये ३ अस्थिमचयने यागो देवानां परिकीर्तितः । पचमे वापि सप्तमे वा प्रदानतः। प्रेतीभूत तमुद्दिश्य यः शुचिर्न करोति चेत् । देवतानां ३ अनुभाविनां च परिवापनम् । तु यजन त शपन्त्यथ देवताः। ४ गंगायां भास्करे क्षेत्र मातापिनोगुरोर्मती ॥ ४ पूर्वदग्धाः स्मशानवासिनो देवाःशवानां परिकीर्तिताः । आधानकाले सोमे च वपन सप्तसु स्मृतम् । A (११४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । वाली अग्निहोत्र 'दर्शपूर्णमास आदि कि- और कोई शालाग्निमें कहते हैं इस वचनसे या को वैतान कहते हैं-प्रतिदिन जिसकी | गृह्याग्निमें होने वाले आवश्यकोंकाभी नि- उपासनाकी जाय उपगृह्य आग्निको उपा-षेध कहा है इससे उन पूर्वोक्त कर्मोके विष सन कहते हैं उसमें करने योग्य सायंकाल | अशौच नहीं है-काम्य कमीका तो शुद्धिके प्रातः कालकी क्रियाको औपासन कहते हैं | अभावसे न करनाही श्रेष्ठ है-मनेनेभी इसी टन तान औपासन नाम वेदोक्त कर्मोको अभिप्रायसे कहा है (अ० ५ श्लो० ८४)कि अशौचमेंभी करे-कदाचित् कोईकहै कि ये | अग्नियांके कर्मको न करे जो अग्नियों में नहीं वेदोक्त कैसे हैं इससे कहा है कि ( श्रुति- होते उन पंचमहायज्ञ आदिकोंकी निव- चो०) वेदमें कहनेसे-सोई दिखाते हैं कि | ति होती हैं इसीसे संवत ने कहा है कि- इतने जीवे अग्नि होत्र कर इत्यादि श्रुति | मरण और जन्मके अशोचमें शुष्क अन्न वा योसे अग्निहोत्र आदिका वेदमें कहना स्पष्ट । फलोसे होम करना और पंचमहायज्ञ न है तसेही इस श्रुति से औपासनहोमभी करने-वैश्वदेव कर्मको अग्निसे साध्यभी कहा है कि प्रतिदिन स्वाहा कर अन्नके होने पर वचनसे निवृत्ति होती है क्योंकि अभाव में काष्ठपर्यन्त किसीसे करै-यहां तिसकाही यह वचन है कि ब्राह्मण दर्श ओत (वेदोक्त ) विशेषणके देनेसे स्मृति- दिनतक बलि . वैश्वदेवसे रहितरहे- योंमें कही दान आदि क्रियाओंका न | यद्यपि सूतक संध्या आदि कर्मोंका त्याग करना जानागया-इसीसे वैयाघ्रपादने कहाँ | कहा है-इसे वचनसे संध्याकोभी नि- है कि राहुके सूतकसे अन्य सूतकमें स्मृ- वृत्ति शास्त्रमें सुनी जाती है तथापि तिमें कहेहुए कर्मोंका त्याग होता है और सूर्यके निमित्त अंजलिका प्रक्षेप करे वेदोक्त कर्मो में तो उसी कालमें स्नान कर- क्योंकि पैठीनती का वचन है कि सूतकोंमें गा- नेसे शुद्ध होता है-यहां वेदोक्तकोका यत्रीसे अंजलि देकर और सूर्यको प्रदक्षिणा क- करना जो कहा है वह नित्य और नैमित्ति- रके ध्यान करता हुआ नमस्कार कर यद्यपि कके अभिप्रायसे है सोई पैठानसीने कहाँ | वैतान उपासना क्रियाओंको करे यह है कि घेतान कर्मको छोडकर नित्य कर्मों | सामान्यसे कहाहै तथापि औरसे करादे- को निवृत्ति होती है और कोई शालाग्निके क्योंकि पठीनासिने यह कहाहे कि अन्य कर्मीको निवृत्ति कहते हैं-नित्य कर्म निवृत्त मनुष्य इनकोको करे- वृहस्पतिने भी होते हैं इस अविशेष कहनेते आवश्यक नित्य नैमित्तिक काँकी निवृत्ति पाई इससे १ प्रत्यूहेनाग्निपु क्रियाः। वैतान कर्मको छोडकर इस वचनसे तीन पचयज्ञविधानन्नु न कुर्यान्मृत्युजन्मनोः । २ होमं तत्र प्रकुर्वीत शुष्कानेन फलेन वा । अग्नि साध्य अवश्य कर्मोका निषेध कहा है ३ तिम्रो दशाहमासीत वैश्वदेवविवर्जितः । ४ सूतके कर्मणां सागः संध्यादीनां विधीयते । १ यावीरममिहोत्र जुहुयात् । ५ मतके सावित्र्या चान्जलि प्रक्षिप्य प्रदक्षिणं २ अहाहःस्वाहा कुर्यादन्नाभाव केन चिदाकाष्टात् कृत्वा सूर्य ध्यायन्नमहायात् । ३ स्मातकर्मपरित्यागो राहोरन्यन्न सूतके । ओठे ६ भन्ये एतानि कुयुः। कर्मणि तत्कालं नातः शुदिमवाप्नुयात् । ७ मत के मृतके थैव अशक्ती प्राधमोजने । प्र. ४ नित्यानि पिनियतरवतानयज्य शालामा चैक। वासादिनिमित्ता हारयन्न तु हापयेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय आशीचप्रकरण १ (४१५) कहहिं कि सूतक-मरण-असामयं श्राद्ध और एकको ज्ञान होय तो भोक्ताकोही भोजन-परदेशआदि निमित्तामें दूसरेसे होम | दोर होताहै- तैसेही विवाह आदिमें करादे और माग न कर तिसी प्रकार सूतक होनेसे पहिले ब्राह्मणांक लिये पृथक स्मृतिधर्मशास्त्रोक्त होनेपर भी पिण्डपित किया भन्न भोजन करने योग्य है- क्योंकि यज्ञ- श्रावणीका कर्म आश्वयुजी कर्म-वृहस्पतिका वचन है कि विवाह उत्सव आदि, नित्यहोम अवश्य करना- क्योंकि यज्ञ इनके बीचमें सूतक होजाय तो पूर्व आतुकार्यका वचन है कि सूतकके हानेपर संकल्प किए पदार्य दोष नही कहा तसे स्मातकर्मको किस प्रकार करना चाहिये । अन्यभी विशेष पत्रिंशत्के मतमें दिखाया ऐसी आकांक्षा यह विधि है कि पिण्डपिट | है कि विवाह उत्सव यज्ञ इनके मध्यमें यज्ञ-चरु-होम-ये अपने असगोत्रीसे करादे मरण और सूतक हो जाय तो भिन्न गोत्री यद्यपि अगसहित कर्ममें कर्ता नवा हो । मन्त्रको दें और ब्राह्मग भोजन करें-ब्राह्म- सकता तथापि अपने द्रव्यका दानरूप | णोंके भोजन करनेके समय मरण और प्रधानकर्म स्वयं करें क्योंकि उसको अन्य सूतक होजाय तो अन्य ग्रहके जलसे नही कर सकता- इसीसे पीछे कह आय आचमन करनेसे वे शुद्ध होनाते है- है कि वेदोक्त कर्ममें स्नान करनेसे शुद्ध तसेही अशौचके होनेपर भी किदो एक होताहै और जो यह होमका निषेधे है कि द्रव्योंमें दोषका अभाव है सोई मरीचिने दान प्रतिग्रह होम वेदपाठ ये सूतकमें निवृत्त कहा कि लवण-मधु-मांस-पुष्प-मूल- होते हैं वह निषेध काम्यकर्मक अभिप्राय फल-शाफ-काष्ठ-तृण-जल-दधि-धी-दूध- है ऐसी व्यवस्था जाननी तेही सतकके तिल-ओपध-मृगछाला मोदक आदि पक- अन्नकाभी भोजन न करे- क्योंकि यह और तण्डुल आदि अपक-आर वैचनेकी यमका वचन है कि जन्म और मरण दोनों सम्पूर्ण वस्तु-इनमें मरण और जन्मके सूतकोमें दशदिनतक कुलके अन्नको भोजन सूतकका दोष नही- किंतु स्वामीकी न करे- अर्थात् जिस कुलमें सूतक हो उस और अमक अन्न स्वामीकी आज्ञासे सत्रके आज्ञासे इनको स्वयंहि ग्रहण करले-पका- कुलके अन्नको असफुल्य नखांय और सङ्क- ल्योंको दीप नहीं क्योंकि यमनही कहा विषयमे लेना क्योंकि अंगिरीका वचन है कि सूतकमें कुलके अन्नका दोष नही १ विवाहोत्सवयज्ञेषु त्यन्तरामृतस्तकै । पूर्वसक- यह मर्नुन कहाँह यह निषेधभी तब जानना ल्पितार्थेषु न दोषः परिकीर्तितः । जय दाता और भोक्तामें कोईसेनें जन्म २ विवाहोत्सवयहंगु सन्तरामृतभूतके । पर ओर मरण जानलिया हो क्योंकि वह षट्- सतरा मृतस्तके । अन्यमहोदयाचाताः सर्वे ते पदातयं मोक्तव्यं च द्विजोत्तमैः । भुजानपुतु विप्रेषु त्रिंशत् के मतसे यह देखते है कि दोनोंको शुचयः स्मृताः। ज्ञान न होय तो सूतकका दोष नही ३ लवणे मधुमासे च पुष्पमूलफलेषु च । वा- १ सूत के तु ममुत्ग्न्ने स्मार्त कर्म कपभोत् । पि. कराठतृणप्वप्सु दधिसर्पि पयस्य च । तिलीपधाजिने- प्रहयज्ञ चर होममसगोत्रण कारयेत् । चैव पक्कापक्के स्स्य प्रदः । पण्येषु चैव सर्वेषु नाशौचं २ दान प्रतिग्रहो होमः स्वाध्यायश्च निवर्तते । मृतसूतके। ३ उमपत्र दशाहानि कुलस्यान न भुज्यते । ४ अन्नमत्रप्रवृत्तानामाममनमगार्हत । भवत्ता- ४ सूतके तु कुलस्यानमदोष मनुरब्रवीत् । पक्कानमतेषां विरानतु पयः पिरेत् ।
(४१६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ! कि सनके अन्नमें जो प्रवृत हैं उनका आम | शव है निमित्त जिसका उसे शाव कहते हैं (कन्चा) अन्न निन्दित नहीहै और इनके | जन्मकेवाची सूतक शब्दसे उसके निमित्त पक्वान्नको खाकर तीन राबतक दुग्धका आशीच लेते हैं-ऐसे कहते हुए आचार्यनें पान करे यहां पक्वान्न शब्दसे भक्ष्यसे भिन्न जन्म और मरणको आशौचका निमित्त ओदन आदि लेना-शवके संसर्गसे हुए कहा वह जन्म और मरण पैदा होनेपरभी अशाचमें तो अंगिरीने विशेष कहाहै कि जिस | जानकरही आशौचका निमित्त होता है गृहस्थीको संसर्गसे अशोच होय उसके । क्योंकि यह उसमें प्रमाण देखते हैं कि दश काँका लोप नही होता और उसके घरमें दिनके भीतर ज्ञातिका मरण और पुत्रका होनेवाले भार्या आदि और द्रव्योंको अशौच | जन्म सुनकर आशौच होता है-तसेही इस नही लगता किन्तु केवल उस गृहस्थकोही वाक्यके आरंभसेभी जन्म और मरणका अशाच होता है-अशाचके वीत परभी यही ज्ञानही निमित्त है उत्पत्ति नहीं कि परदेशी अर्थ अन्यस्मृतिमें दिखाया है कि दश दि- | टिके हुएका जो दशदिनके भीतर मरना नके वीत पीछे गृहस्थीको अशौचका ज्ञान सुन वह उतनेही कालतक अशुद्ध होता है होयतो उसका तीन रान अशॉच होता है | जो दशगत्रका शेष हो यदि उत्पत्तिकोही' उसके द्रव्यको कदाचित् नहीं होता। केवल अशाचका निमित्त मानोंगे तो दशदिन भावार्थ-एक दिन आकाशमें जल और आदि अशीचकालके नियम तिसरसही भव- दूध मट्टीके पात्रमें रक्खे और श्रुतिकी आ- सुननपर दशरात्रकाही अशाच अर्थात् सिद्ध श्य होयगे दशदिनके भीतर ज्ञाति मरणके ज्ञासे तान और औपासन कोको करे होयगा-फिर दशरात्रका जो शेष इस वच- अर्थात् बेताग्निमें करने योग्य अग्निहोत्र नके आरंभका क्या प्रयोजन था तिससे आदि और गृहा-ग्निमें करने योग्य सार्यकाल जाने हुए जन्म और मरणही अशीचके नि- प्रातःकालंक होम आदिको कर ॥ १७ ॥ मित्त हैं वे दोनों निमित्त है जिसके ऐसा विरानंदशरात्रवाशावमाशाचमिप्यते अशाच तीनपत्र और दशपत्रही मनु आ- ऊनद्वियर्पटभयोःसूतकंमातुरेवदि॥ १८ ॥ दिकोंने माना है-इस आशौच प्रकरणमें दिनका ग्रहण और गत्रिका ग्रहण अहोरा पद-गिराम २ दशरात्रं २ वार-शावं २ । वका योधक मनुआदिकोंने दशगत्र और आशौचं २इन्यतं कि-उनद्विवर्ष उभयोः ६ : तीनरात्र अशाच माना है यह वचनभी मनु सूतकं १ मातुः ६ एव:-- ॥ । आदिकोंने कह सपिण्ड और समानोदक योजना-उनद्विवर्षे शावं आशाचं टभयोः । रुप-विषयभेद दिखाने के लिये है सोई दि- विग वा दशपत्र इप्यते सूतकं मातुः एव | खाते हैं कि मरणका अशाच सपिण्टीम -- ति॥
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचमकरण १ (४१७) दशदिनतक कहा है-और जन्ममेंभी पूरी- सौई पेंग्येने कहाहै कि गर्भमें पालक मरनेसे शुद्धि चाहते हुएको इतनाही अशौच होता- माताको दशदिनतक और जन्मकर मरने में है-और जन्ममें समानादकोंकी शुद्धि तीन माता-पिता-दीनोंको दशदिनतक , और रात्रमें होती है शवका स्पर्शकरनेवाले और नाम रखनेके अनंतर मरनेपर सोदर भाई- समानोदक तीनरात्रमें शुद्ध होते हैं इत्यादि योंको दशदिनतक अशीच होताहै अथवा वचनांसे निगन और दशरात्रकी समानोदक | यह अर्थ है कि दोवर्षसे कमका चालक और सपिण्डके विषयसे व्यवस्था की है | मरनेपर स्पर्श न करनारूप अशौच माता- इससे सातपीढीतक सपिण्डोंको अविशेषसे पिताकोही होलाहै सपिंडोंको नहीं सोई दशरात्र और समानोदकोंको चिरान अशीच | अन्यस्मृतिमें लिखा है कि दो वर्षसे कमकै होता है और जो यह अन्यस्मृतिका वचन वालकके मरनेपर मातापिताओंकाही अशीच है कि चौथी पीढीतक दशरात्र और-पांच-(हे अन्योंको नही इस वचनमें भी स्पर्श न मीमें छःरान छठीमें चारदिन और सातमीमें करनाही लिया है किसी कर्मको न करना एक दिन में शुद्धि होती है-वह वचन नि-रूप जो अन्य आशीच है.वह, सपिण्डोंमें न्दित होनेसे आदर करनेयोग्य नही-यद्यपि दांत जमनेसे पहिले शीघ्र शुद्धि होतीहै शास्त्रका वचन होनेसे निन्दित नही तथापि | इत्यादि वचनोंसे कहाहै इसमे दृष्टान्त हे मधुपर्कमें गोहिंसाके समान जगत्में निंदित | कि जैसे जन्म है निमित्त जिसमें ऐसा होनेसे करनेयोग्य नही क्योंकि यह मनुका | स्पर्श न करनारूप अशौच माताकोही वचन है कि स्वर्गकै न देनेवाले जगत्में | होताहे ऐसेही दो वर्षसे कमके मरनेमें निदित धर्मकाभी आचरण न करे और माताको पिताको स्पर्श न करनारूप अशाच यह युक्त नही कि सातमी पीटीके | होताहे- दो वर्षसे कमके मरनेमें स्पर्शन समीप सपिण्डोको एक दिनका और करनेका निषेध कहते हुए आचार्यने दो विप्रकृष्ट (दूरके ) अष्टम पौदी आदिके वर्षसे आधिकके मरनेमें स्पर्श न करनेकी समानोदकाम तीन दिनका अशीच मानना आज्ञा अर्थात् दोहे- सोई देवलंने कहाहे इस प्रकार अविशेषसे सपिण्डोको आशाच कि अपने अशौचका जो समय उसके पाया कही एक नियमके लिए कहते हैं कि तीसरे भागमें ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्ध दोवर्षसे कमका बालक मर नाय तो माता इनको शास्त्र के अनुसार स्पर्श करना कहाँह और पिताकोही दशरात्रको अशोच होताहे यह भी उस बालकके अतिक्रान्त अशाच सब सापण्डोंको नहीं सपिण्डोंको तोइस वच- और त्रिगत्रमें है जिसका यज्ञोपवीत न नते दांत जमनेसे पहिले शीग्रही शुद्धि कहेगे हुआ हो और जिसका यज्ञोपवीत हो चुका १ चतुर्य दशरात्रं स्थानिशाः पुसि पवमे । षष्ठे चतुरदाच्छुद्धिः सप्तमे त्वहरेव तु। २ अस्वार्थ लोक विद्विष्ट धर्म्यमप्याचरन तु । २ उनीद्धा सस्थिते रथयोरेव मातापिनोदशपत्र- माशीच में सपा सपिण्डाना ४ तेषा तु वक्ष्यति आ इंतजननारसयः । १ गर्भस्थे प्रेसे माटुर्दशाह जात उभयोः कृते ना- नि सोदराणां । २ उनद्विवर्षे पेल्ने मातापित्रोरव नेतरे पां। ३ सपिण्डेष्वपि आ दन्त जन्मनः सद्यः । ४ स्वासश्चकालादिशेय स्पर्शन च श्रिमागतः । शूद्रविक्षत्रविप्राण यथाशास्त्रं प्रचोदितं ।
(४१८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । हो उसके मरनेमें तो देवलनेही यह कहाहे | कि यदि स्पर्श न करें तो पिताको अशौच कि दशदिनतक आदि तीन भागमें अस्थि- नहीं होता-जन्ममें रज अशुद्ध होता है वह संचयन किए हुए पीछे तत्त्वके देखनेवाले रज पुरुषमें नहीं होता पिताको अशौच ध्रुवनहीं वोंके अंगका स्पर्श चाहते हैं- तीन- | होता किन्तु स्नान करनेसेही स्पर्शको चार-पांच-दशदिनमें ब्राह्मण आदि चारों- | अभावनिवृत्त हो जाता है-सोई संवर्त ने वर्णक्रमसे स्पर्श करने योग्य है और ना- | कहा है कि पुत्रके होनेपर पिताको सचैल झणका अन्न दशदिनमें-क्षत्रियका बारह दि- स्नान कहा है कि माता दश दिनमें शुद्ध नमें और वेश्यका १३ दिनमें और शूद्रका | होती है और पिता स्नानसे शुद्ध होता दुका १५ पंद्रह दिनमें भोजन करने योग्य | है-माताकी दश दिनमें शुद्धिभी व्यवहार होता है ॥ की व्योग्यताकेही लिये है और धर्मार्थ का- भावार्थ-तीन वा दश पत्र दोवर्षसे कमके | यौके लियतो पेठी नसीने विशेष कहा है। शवका अशौच माता पिता दोनाको इष्ट है कि पुत्रवाली सूतिका पर दश दिनमें कार्य और मूतक तो दोनोंको होता है ॥ १८ ॥ | करावे और जिसके कन्या हुई हो उससे पित्रोस्तुस्तकमातुस्तदसग्दर्शनाद्भुवम् । पिण्डोंको स्पर्श करना कहा है भूतकमें एक मासमें कार्य करावे-अंगिरीने तो स- तदहर्नप्रदुप्येतपूर्वेषांजन्मकारणात् ॥१९॥ मूतिकाको छोडकर अन्य मनुप्यके स्पर्श पद-पित्रोः ६ तुः- सूतकं १ मातुः ६ लेतो स्नानही कहा है-जिस दिन बालकका करनेका निषेध नही-सतिकाका स्पर्श कर- तदसग्दर्शनात् ५ध्रुवं २ तत् १ अहः १ न:- प्रदुष्येत कि- पूर्वेषां ६ जन्मकारणात् ॥५॥ जन्म होय वह दिन दूषित नही होता अर्थात् उस दिनमें करने योग्य दान आदिका अधि- योजना-पित्रोः सूतकं भवति-तदमृग्द- कार बना रहता है क्योंकि उस दिन पिता र्शनात् मातुः ध्रुवं सूतकं भवति-पूर्वेषां जन्म- आदिही पुत्र रूपसे पैदा होते है सोई वृद्ध कारणात् तत् अहः न प्रदुध्येत ।। याज्ञवल्येने कहा है की बालकके जन्म तात्पर्याय-जन्म है निमित्त जिसका ऐसा दिनमें ब्राह्मण-सुवर्ण-भूमि-गौ-अश्व-वक- अस्पर्श करने रूप अशौच माता पिता दो- री-वस्त्र-शय्या-आसन आदिका प्रतिग्रह नोंको होता है सब सपिंडोंकी नही और / लें-इन सबका प्रतिग्रह तो ले परन्तु कि- वह स्पर्श न करना रूप माताको तो निश्च- यसे होता है क्योंकि मातांक शरीरमस रु- १ जाते पुने पितुः स्नान सचलं तु विधीयते । धिर निकलता है-इसीसे वशिष्ठने कहा है माता शुध्येशान नानात्तु स्पर्शनं पितुः । २ सूतिको पुत्रवतीं विंशतिरावेग फर्माणि कार- येत् । मासेन घीजननी। १ शादादिधिमागेन ते सपने कमात् । अग- ३ सूतो मूतिकारज्य मसी न निषिध्यतास- एशनमिच्छति वांनां तदर्शिनः । विगतुःपग-पदों मूतिकायास्तु मानमेय धीयते । नि: या नयाः नगनु । मोग्यारो दामिविप्रः ४ कुमारजन्मदिवसे मिः कार्यः प्रनिप्रदः । हिरण्यगावाजवामानण्यासनादिपु ॥ तर म मानो ने पुग' संग मेन गच्छति । प्रतिमा कृताय न तु मक्षपेत् भिक्षापारा सुत. जिसमा जिन वियते । मोहाद्विजनांदापण घरेत् । गतो.
प्रायश्चित्वाध्याय आशौचप्रकरण १ (४१९) एहुए अन्नका भक्षण न करें-जो द्विज मोहसे | उसके भीतर यदि उस आशचिके समान भक्षण करता है वह चांद्रायण कर-व्यासने-वा उससे न्यून (कम) कालवाले आशी- भी यहां विशेष कहा है कि सूतिकाके ग्रहम | चका निमित्त रूप जन्म वा मरण हो जाय तो है स्थान जिसका ऐसी जन्मदा नाम देवता | उस पहिले आशौचके शेष दिनोंसेही शुद्धि है उनकी पूजाके निमित्त जन्ममें शुद्धि कही हो जाती है अर्थात् फिर उस पीछे उत्पन्न है-पहिले-छठे-दशमदिन-पुत्रके जन्ममें | हुए बालककै जन्मका आशौच पृथक् (जु-. सूतक न करै-मार्कंडेयनेभी कहा है कि | दाजुदा) न करना और जो वर्तमान आ- सूतकमें छठीरात्रिकी विशेषसे रक्षा करे रा- शौच अल्प ( थोडे दिनका ) हो उसके भी- निमें जागरण करे और जन्मदानाम देवता | तर बहुत दिनका आशोच आन पड़े तो को बलिदे-पुरुष-हाथमें शस्त्र रक्खै-और पूर्व आशोचके शेष दिनोंसे शुद्धि नहीं होती स्त्री नृत्य और गीतसे रात्रि जागरण करें सोई उशनाने कहा है कि अल्प आशीचके और ये सब कर्म दशमी रात्रिमें दशमें दिन | मध्यमें जो दीर्घ आशौच आनपडे तोउसकी 'विशेषकर करें शुद्धि स्वकाल ( अपना नियतकाल )से हो- भावार्थ माता-पिताको सूतक होता है- तोहै पूर्वाशोचके शेष दिनोंसे नही-यमने भी और माताको तो उसके रुधिरके निकल कहा है कि दीर्घ कालिक आशौच' अपने नेसे अवश्यही सूतक होता है वह दिन | नियत दिनोंसेही निवृत्त होता है-यहां अ- दान आदिके ग्रहण करनेमें दूषित नहीं न्तरा जन्म मरणे यह वचन अविशेषसे क- क्योंकि उसमें पूर्व ( पिता ) आदिही पुत्र | हा है तथापि जन्म सूतकके भीतर मरे हुए- रूपसे उत्पन्न होते हैं ॥ १९॥ का आशौच पूर्व शेपसे शुद्ध नहीं होता- अंतराजन्ममरणेशैपाहोभिर्विशुध्यति । यही अंगिरांने कहा है कि सूतकमें मृत्यु हो गर्भवावेमामतुल्यानिशा शुद्धस्तुकारणम् जाय अथवा मृतकमें सूतक हो जायतो वहां पद-अन्तरा:-जन्ममरणे ७ शेषाहोभिः ३ मृतक आशौचके शेष दिनोंसे सूतक आशो विशुध्य क्रि-गर्भस्रावे ७ मासतुल्याः १ चकी शुद्धि होजातीहै सूतक आशेचसे मृतक निशाः १ शुद्धः ६ तु:- कारणम् १॥ आशौच नहीं-तैसेही षट्त्रिंशत्के मतसेभी योजना-अन्तरा जन्ममरणे सति शेषा होभिः विशुध्यति गर्भस्रावे मासतुल्याः जायतोशावसे सूतीकी शुद्धि होजातीहै सूति- कहा कि शाब आशौचके होनेपरसूतक हो 'निशाः शुद्धः कारणं भवन्ति- तात्पर्यार्थ-वर्ण और अवस्थाको अपेक्षासे से शावकी शुद्धि नहीं-तिससे सूतकके भीतर जिसका जितने दिनका आशौच लिखा है मरे हुए शाव आशोचकी शुद्धि पूर्वशेषसे १ मतिकावासनिलया जन्मदा नाम देवताः । तासां यानिमित्त तु शुचिर्जन्मनि कीर्तिता । प्रथमे १ स्वल्याशौचस्य मध्ये तु दीर्घाशीच भवेद्य- दिखने पठे दशमे चैव सर्वदा । त्रिप्तेषु न कुर्वीत | दि । न पूर्वेण विशुद्धिः स्यात्स्तकालेनैव शुध्यति । सूतक पुत्रजन्मनि । २ अहो वृद्धिपदाशीचं पश्चिमेन समापयेत् । २ रक्षणीया तथा पष्ठो निश्शा तत्र विशेषतः। ३ सूतके मृतकं चत्स्यान्मृत के त्वथ सतकातत्राधि- रात्री जागरण कार्य जन्मदानां तथा बलिः । पुरुषा. कृत्य मृतक शौचं कुर्यान मतक। मान्नहस्ताश्च नृत्यगीतैश्च योषितः । रात्री जागरणं ४ शावाशीचे समुत्पन्ने मूतक तु यदा भवेत्। शारे- कुर्युर्दशम्यां चैव सतके। न शुध्यते मूतिर्न मतिः शावशोधिनी ।
(४२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । नहीं होती-किन्तु शाव आशौचके मध्यमें | क्योंकि उसने ही कहा है कि जन्म होनेसे हुए सूतककोही होती है सजातीय शाव आ-| पीछे दश दिनके भीतर यदि मरण होजाय शौचके मध्यमें हुए शावकी पूर्व शेषसे शु-| तो प्रेतके निमित्त अपने बन्धु पिण्डदान द्धिका अपवाद अन्यस्मृतिमें दिखाया है | करै-प्रेत क्रियाके प्रारंभ होनेपर मध्यमें कि पहिले मरी हुई.माताके आशौचमें यदि जनन होजाय तोभी उसी प्रकार शेष पिता मरजाय तो उस आशौचकी शुद्धि पिता | पिण्डोंको करै-इसी प्रकार शाव आशौचके के.शेष आशौचसे होती हैं माताकी पक्षिणी | होनेपरभी प्रेत क्रिया करे तथा अन्य आशी- (दो दिन एक रात) करे-इसका यह अर्थ | चके होनेपर पुत्रजन्म निमित्तक जातकर्म है कि पूर्व मरी हुई मातासे उत्पन्न हुए आ-| आदि क्रियाकोभी करे-सोई प्रजापति ने शोचमें यदि पिताका मरण होजाय तो पूर्व- | कहा है कि आशौचके होनेपर पुत्रका जन्म शेषसे शुद्धि नहीं होती किन्तु उसको शुद्धि होय तो कर्मकाकी तात्कालिक शुद्धि हो पिताके मरण निमित्तक आशोचके शेष | जाती है क्योंकि वह पूर्वाशीचसे शुद्ध हो- दिनोंसे करनी और इसी प्रकार पिताके म-जाता है-प्रसव ( उत्पत्ति )का काल और रण आशौचके मध्यमें माताका स्वर्ग लोक | जानना शौचको कहकर अव असमय गर्भके (मरण ) होजाय तोभी पूर्व शेषसे शुद्धि | पतनका आशौच कहते है-यद्यपि लोकमें नही होती अर्थात् पिताके आशोचकों समाप्त स्रवति धातुका प्रयोग वहां दिया जाता है करके फिर माताकी पक्षिणी कर-आशीचके | जहां परिस्यन्द उस धातुकी क्रियाका कर्ता सन्निपात कालका विशेष अपवाद गौतमने द्रव (वहती) द्रव्य होता है तथापि यहां (ग- कहा है कि रात्रि शेष रहनेपर दो दिनमें भस्रावे ) स्त्रवति धातु-द्रव और अद्रवरूपः प्रातःकालके होनेपर तीन दिनमें शुद्धि साधारण द्रव्यके अधः पतन (नीचे गिरना होती है-इसका स्पष्ट अभिप्राय यह है कि में ) वर्तती है क्योंकि जो द्रवद्रव्यके अधः- पहिले आशौचमें रात्रिमात्र शेष हो तव कोई पतन ही मानोगेतो-मासतुल्याः निशाः यह अन्य आशौच आन पहे तो फिर उस भा- बहुवचन नबनेगा क्योंकि वह द्रवगर्भ में शौचकी समाप्ति हुए पीछे दी रात्रिमें शुद्धि द्रवत्व (पतला पन ) पहिलेही मासमें सं-. होती है-प्रभातमें अथवा उस गत्रिको अ-भव होता है तो गर्भस्राव पहिलेही महीने के न्तके प्रहरमें जो काई जन्म आदिका आ- गर्भके पतनका नाम होगा तो उसमें मास- शौच हो जाय तो वह, तीन रात्रमें शुद्धि है तुल्य निशा शुद्धिका हेतु है ऐसा कहनसे तच्छेप मात्रसे नही-शातातपर्नेभी कहा है। वह एक मासही लिया जायगा तो फिर यह कि रात्रिके शेपमें दो दिनमें प्रहरके शेषमें बहुवचन असंगत होगा-गर्भस्रावमें उतनी तीन दिन में शुद्धि हो जाती है पुनः सूतकके निशा आशाच मानना जितने महीन गर्भधा- हनिपरभी प्रत क्रिया निवृत्त नही होती- १ अन्तर्दशाहे जननात्पश्चात् स्यान्माण यदि । प्रतमुद्दिश फर्तव्य पिण्डदान सपन्धुभिः । पारधे मात प्रीतागमादी पिने पिता पितुः | मरिण्डे तु मध्ये चैत्रनन भवेत् । तवाशान- पुदि गामातुः कुर्यात्तु पक्षिणी । पिॉस्तु शेषान् दयावारिधि । २रानिय मति प्रभाले गति तिर्णमः। २ आशेचे तु ससुराने पुप्रजन्म यदा मोम् । ३ रात्रि पहाचादिः यामीपे मायगादार । । फर्तुस्तालालिको शुद्धिः सचिन शुध्यति ।
मायाश्चत्ताध्याय शोचप्रकरण.१ (४२१) . -रण किये हुए हो यह स्त्रीकोही समझना बालकके मरनेमें और गर्भके पतनमें सपि- क्योंक वशिष्टकी स्मृति है कि गर्भस्रावमें ण्डोंको तीनराच आशौच है वह वचन पांच स्त्रीकी मासतुल्य रात्रिसे शुद्धि और पुरु- | और छठे महीने में पडेहुए कठिन गर्भके “पकी स्नान मात्रसे होती है और जो गौतम | विषयमें समझना-क्योंकि मरीचिका वचन ने कहा है कि यह अर्थात् तीन रात्रमें | है कि चोथे महीनेकेको स्राव-पांचमें छठेको शुद्धि होती है वह तीन माससे पूर्व गर्भस्रा- पात -इससे अनंतरकेको प्रसूति कहते हैं वक विषयमें समझना-क्योंकि ऐसा मरीचिका | और दशदिनको सूतक कहते है-त्रावमें वचन है कि तीन माससे पूर्व गर्भस्राव माताको तीन रात्र आशौच सपिण्डोंको होय तो ब्राह्मणकी तीनरात्र-क्षत्रियको चार-नही-पातमें माताको मासके समान दिन- रात्र वैश्यको पांच और शूद्रको आठ | और पिता आदिको तीन दिन आशौच रात्रमें शुद्धि होती है- यह सब छः । होता है-सप्तम आदि मासमें मपहुआ पैदा महीनेंके भीतर गर्भस्रावके विषय हो वा पैदा होताही मरगया होय तो सपिण्डों- समझनी- सप्तम आदिमासमें प्रसव को जन्मनिमित्तक परिपूर्ण आशीच होता है- आशीच परिपूर्ण करना-क्योंकि सप्तम | क्योंकि हारीतका वचन है कि पैदा होताही- मासमें परिपूर्ण अंगवाले गर्भका जीवसहित | मरगया हो वा मराहुआही पैदा हुआ होय- निर्गम होता है-इससे उसे लोकमै प्रसव | तो सपिण्डोंको दशदिन आशौच होताहै- कहते हैं-इसमें यह स्मृतिभी प्रमाणे है कि पारस्करने भी कहा है कि जन्मसे सूतिका छः मासके भीतर जब गर्भका स्रावहो का उठना ( दशदिन तक सूतकके समान उतने महीनोंकी संख्यावाले दिनोंसे शुद्धि आशोच होता है सूतकवत् इसका यह होती है-इसके अनन्तर अपनी जातिमें अर्थ है कि शिशुके मरण निमितक जलदान कहा अशौच पूर्ण होता है और सपिण्डोंकी | आदिसे रहित रहे-बृहन्मनुकाभी वन है शुद्धि गर्भके पतनमें सद्यः (नानानन्तर) कि दशदिनका जो वालक मरगया होयतो होती है-यह सपिंडोंको सद्यःशाच द्रव | उसका शावाशौच नहीं होता किंतु मूत्या- गर्भक पडनेक विषयमें समझना-और जो शौच होता है-इसीप्रकार स्मृत्यन्तरमभी- यह वसिष्ठका वचन है कि दो वर्षसे कम लिखा है कि दशदिन के भीतर जो मरगया १ गर्भबाये मासतुल्या रात्रयः मीणा स्नान- होयता-सूतकके दिनसिही आशीच होता मात्रमेव पुरुषस्य । है-इत्यादि वचनोंके देखनसे सपिण्डोंको २ भ्यह च। ३ गर्भसावे यथामासमंचिो तूत्तमे त्रयः । गजन्ये १ आ चतुर्थाद्भवेत्सावः पातः पचमपट्योः । अत तु चतुरान वैशे पंचाहमेव तु । अष्टाहेन तु शद्रस्य | ऊ प्रमूर्तिः स्थादशाह सूतकं भवेत् । नावे मातुन्नि- शुद्धिरेशा प्रकीर्तिता। रात्र स्वात्सपिण्डाशीचवर्जन । पाते मातुर्यथामास ४ पण्मासाभ्यन्तरे यावदर्भस्रावो भवेद्यहा । तदा | पित्रादीनां दिनत्रयम् । माससमैस्तासा दिवसः शादिीिप्यते । अत उर्दू स्व २ जातमृते मृतजाते वासपिण्डानां दशाहम् । जायुक्त तासामाशोचमिप्यते । सद्यःशीच सपि. ३ भतः सूतके चेदोत्यानादाशीचं सूनकरत् । ण्डानां गर्भस्य पतनै सति । ४ इशाहाभ्यन्तरे पाले प्रमीते तस्य पांघावा- ५ उदिवार्षिक प्रेते गर्भस्य पतने च सपिण्डा- शौच न कर्तव्य सूत्वाशीच विघीयते । ५ अन्तर्दशाहोपरतस्य सूतकाहभिरेवासोचम् । नां विरायम् ।
(४२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । जन्म निमित्तक आशौच होता है यह वात | तन्निमित्तक आशौचभी नहीं करना किन्तु. प्रतीत होती है जो कि बृहद्विष्णुका वचन | पूर्वाशौचसेही शुद्धि होजाती है और जो है कि उत्पन्न होता मरजाय वा मराहुआही | कि यह बृहन्मनुका वचन है कि जीनाही उत्पन्न हुआहोतो कुलको सद्यःआशौच होता उत्पन्न हुआ हो फिर मरजाय तो माताको है उसको बालकमरणनिमित्तक आशौचकी पुरा आशौच होता हैं और पिता आदिको स्नानसे शुद्धि होती है इस बातके सूचनके तीन रातकाही होता है-और जो कि यह विषयमें समझना-कुछ प्रसव निमित्तके विष- बृहत्प्रचेताका वचन है कि एक मुहूर्तजी- यमें नहीं सोई पारस्करनें कहा है कि गर्भके कर बालक मरजाय तो माताकी दश दिनमें विषयमें यदि विपत्ति होजायतो दशदिन शुद्धि और सगोत्रियोंकी सद्यः शुद्धि सूतक होता है क्योंकि सपिंडोंको जन्मका होती है यहां अब यह व्यवस्था है कि आशौच विद्यमान है-इससे जीता हुआ उ- | जननसे पश्चात् और नाल छेदनसे पूर्व मर- त्पन्न होकर यदि मरजाय तो सद्यः (स्नानसे) जाय तो जनन निमित्तक आशौच तीन दिन शुद्धि होजाती है यह वचन प्रेत आशौचके पिताआदिकोंको होताह और सद्यःशोच अभिप्रायसे है-सोई शंखेने कहा है कि ना- | तो अग्निहोत्रके लिये कहाहै क्योंकि शं. मकरणसे पूर्वमरनेमें शीग्रही शुद्ध होजाता | खकी स्मृति है कि आग्निहोत्रके लिये है-और जोकि यह कात्यायनका वचन है स्नानके करनेसे तत्काल शुद्धि होतीहै- कि दशदिनके न व्यतीत होनेपर जो बालक नाल छेदनसे उत्तर कालमें शिशुके मरनेपर पंचत्व ( मरण)को प्राप्त होजाय तो सद्यः जनन निमित्तक समस्त आशोच सपिण्डोंको शुद्धि होती है उसे प्रेतके निमित्त उदक होताहै क्योंकि जैमिनीका वचन है कि जब- आदिका दान न करे- वहभी विष्णुके वचन तक नाल छेदन न हो तबतकही मृतक के समान है और जब कि (न प्रेतं नैव सू- नही होता नाल छेदनसे पीछे सब सपि- तक) ऐसा पाठ है तब सूतक शब्दका यह ण्डोंको सूतक होताहै-मनु (अश्लो०६६) अर्थ है कि पिता आदिको स्पर्श करनका भी यही अर्थ दिखाया है िगर्भस्रावके अभाव नहीं होता-अथवा यह अर्थ है कि होनेपर जितने महीने में गर्भस्राव हुआ हो दश दिनके भीतर जो वालक मरगया होय | उतनी रात्रिमें शुद्ध होतीहै- और रज- तो प्रेतआशीच नही होता यदि उसमें स्वला स्त्री रजः (स्त्रीका वीर्य ) के निवृत्त- किसी सपिंडके बालक उत्पन्न हो जाय तो हो जाने पीछे स्नानसे शुद्ध होतीह-इस व- चनके उत्तर भागका यह अर्थ है कि निक- १ जाते मृते मृतजाते कुलस्य सयाशीचं । २ गर्भे यदि पिपत्ति. स्थाद्दमाहं मतकं भवेत् । १ मुहूर्त जीवतो पालः पंचलं यदि गच्छति । जीवन् जातो यदि प्रेयात्मय एवं विशुद्ध्यति । मातुः शुद्धिर्दशाहेन सद्यः सुद्धास्तु गोत्रिणः । ३मानामकरणारसधा चम्। २ अमिहावार्थ नानोपस्पर्शनात्तकाल शौचं । ४ भनियो शाहे तु पचर्य यदि गच्छति । मय ३ यापन जियते नाल तापमानोति मूनक । छिन्ने एक दि म्याग्न प्रेत नोदशिया । नाले ततः पधात्मता तु विधीयते । ५ जीरजातो सदिसतो मृतः मृतक एलनु। ४ रात्रिभिर्मासतम्यामिर्गर्भपाते शिवपति । १० मतर्फ सफल मारियादीनां विराजतः। मस्युपरने साध्वी प्रानेन सी रजस्सला ।
प्रायश्चित्ताध्याय बाशीचप्रकरण १ (४२३) लनेसे जब रजकी निवृत्ति होजाय तब रज- | इष्ट है इससे विरोध नही- यह अशुचित्वका स्वला स्त्री साध्वी देव आदिकर्मके योग्य होती निषेध उसके विषयमें है कि जिस स्त्रीका है और स्पर्श आदिके योग्य तो चाहे रज | रजोधर्म प्रायः बीसदिनके पीछेही होता हो निवृत्त न हो तौभी चौथे दिन स्नानके | और जिसको चढतीहुई यौवनको अवस्था करनेसे शुद्ध होजातीहै- सोई वृद्ध मनुने हो उस स्त्रीका अठारह दिनसेही पूर्वही लिखाहै कि स्पर्श आदि व्यवहारकेलिये | बहुत रजका निकलना होताहै उसकी शुद्धि चोदिन स्त्री शुद्ध होजातीहे- तिसी तो तीनरामेंही होगी उस स्त्रीको तीनगत्र- प्रकार स्मृत्यन्तरमें भी कहा कि रजस्वला | तक स्नान आदिसे रहित होना चाहिये स्त्री पतिके लिये तो चौथे दिन स्नान करनेसे क्योंकि वसिष्ठकी स्मृति है रजस्वला तीन- शुद्ध होजातीहै और दैव पिन्यकर्मके कर- | रात्र अशुद्ध होतीहै वह न आंखों में अंजन नेके लिये तो पांचमें दिन शुद्ध होतीहै- लगाव- न शरीरसे उबटना करे - न पंचमेहनि यह वाक्य रजोनिवृत्ति कालका जलोमें स्नान करे- नीचे सोवे- दिनमें उपलक्षण है अर्थात् जब रजकी निवृत्ति हो न सोवे- न सूर्य आदि ग्रहोंको देखें- तबही शुद्ध होतीहै और जो रजोदर्शनसे | न अग्निका स्पर्श करै-न अत्यंत भोजन लेकर सतरह १७ दिन के भीतर फिर रजो | करै-न रस्सी बांट-न दन्तधावन कर- दर्शन हो जाय तो फिर अशुद्धि नही होती न हंस-न कोई काम करे-अखर्व ( वडा ) अठारह १८ में दिन रजो दर्शन होय तो पात्र- वा अंजली (पस) वा लोहेके एक दिन में शुद्धि उन्नीशमें दिन दोदिनमें | पात्रसे जलको पावै-अंगिराने भी विशेष फिर उससे पीछे तीनदिनमें शुद्धि होतीहै | दिखाया है-हाथमें वा मट्टीके पात्र में खीर सोई अप्रिनें कहा कि जो रजस्वला स्त्री खाय-पृथ्वीपर सौव-ऐसी उजस्वला चौथे स्नानकिए पीछे फिर रजस्वला अठारह दिन स्नानसे शुद्ध होतीहै-पार्गशरनेभी दिनसे पूर्व हो जाय तो अशुद्ध नहीं, विशेष कहा है कि यदि स्त्रीको नैमि- होती उन्नीशमें दिनसे पूर्व एक दिनमें | त्तिक स्नान करना होय और रजस्वला वीसमेंसे पूर्व दो दिनमें- फिर वीस दिनसे हो जायतो पात्रान्तरित जल से स्नान क- आगे होय तो तीनदिन अशुद्ध होताई रके व्रतकरे जलसे अपने गात्रका प्रोक्षण और किसी अन्य स्मृतिमें चौदहमें दिनसे रजस्वला त्रिगत्रमशुचिर्भवति सा च नाजीत नाभ्यं. पूर्व हो जाय तो अशुद्ध नहीं होती यह | जीत नाप्सु स्नानायादधः शयीत न दिवा स्वप्याव न लिखा है उसमें स्नानसे पीछे चौदहमा दिन | प्रहान्वीक्षेत नाग्निं स्पृशेनानी यान्न रज्जु मजेत न च दतान्धावयेत न हसेन च किंचिदाचीत असण १ चतुर्षेहनि संशुद्धिर्भवति व्यावहारिकी । पात्रेण पिवेदजलिना वा पात्रेण लो हेतायसेन २ शुद्धा भर्तुश्चतुति स्नानेन स्त्री रजस्वला। देवे | वेति विज्ञायते । कर्मणि पित्र्ये च पचमेनि शुध्यति । २ हस्तेनीयान्मृन्मये वा हविर्भुक् क्षितिश ३ रजस्वला यदि स्नात्वा पुनरेव रजस्वला । अष्टा- | यिनी । रजस्वला चतुर्थोति लावा शुद्धिमवाप्नुयात् । दशदिनादवांगशुचित्व न विद्यते । एकोनविंशा- ३ स्नाने नैमित्तिके प्राप्त नारी यदि रजस्वला । गेकाह स्यात्ततोयह । त्रिंशत्मभृत्युत्तरेषु त्रिरात्रम- पात्रान्तरिततोयेन स्नान कृत्वा द्रत चरेत् । सिता. गाना भवेदद्भिः सांगोशंगा कथंचन । न वनपीडन ४ चतुर्दशदिनाद गशचित्वं न विद्यते । कुर्यात्नान्यदासश्च धारयेत् । शुचिर्भवेत् ।
(४२४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । करके सांगोपांग न वस्त्रोंको निचोडै न अन्य | मरेन पर याज्ञिक इस प्रकार करे कि एक वस्त्रोंको धारण कर-उशनानेभी यहां घटमें जल और पंचगव्य लेकर उस जल विशेष दिखाया है कि जिस स्त्रीको ज्वर को पुण्याहवाचनकी ऋचासे अभिमंत्रित आता हो और रजस्वला हो जाय तो उसका | करके वाणीसे शुद्ध करे फिर उस जलसे शीच किस प्रकार होना चाहिये और उस- स्नान कराकर यथाविधि दाह कर और रज- का स्पर्श करके किस कर्मसे उसकी शुद्धि स्वला मरजायतो पंचगव्यसे स्नान कराकर होय इस अपेक्षासे कहते हैं कि जब चौथा और किसी अन्य वस्त्रमें लपेट कर यथा दिन हो तब कोई स्त्री सचैल जलमें स्नान | विधि दाह करैये रजोदर्शन और पुत्रका वारंवार करके पुनः स्पर्श करें और फिर जन्म आदि यदि सूर्योदयसे पश्चात् हुई दश वा द्वादशवार वारंवार आचमन करे- होयतो उसी दिनसे लेकर आशौचके दिन- उसके अनंतर उस वस्त्रोंको त्यागदे इससे | पत्र गिने-और जो रात्रिमें हुए होतो यह वह रजस्वला शुद्ध होती है फिर शक्तिके व्यवस्था है कि यदि अर्द्ध रात्रिसे पूर्व हुए अनुसार दान देकर पुण्याहवाचनसे शुद्ध होतो यद्यपि वह आशीच पूर्वदिनमेंभी है होती है-यह स्नानविधि आतुर मात्रके वि- तोभी पहिले दिनसेही आशौचके दिन गिने पय समझनी-क्योंकि पाराशरने कहा है ये पूर्वकल्प है-और कोई यह मानते है कि आतुरको जव अवश्य स्नान करना होय | और दूसरा यह कल्प हैं कि रात्रिके तर अनातुर दशवार वारंवार स्नान करके तीन भाग ( हिस्से ) करके पहिले दो स्पर्श करे-अर्थात् एवे फिर नन कर इस | भागोंमें जन्म आदि हुआ होयती पहिले तरह आतुर शुद्ध हो जाता है-जब रजस्व | दिनसे ओर सूर्योदयसे पूर्व हुआ होयतो ला वा सूतिका (जया) स्त्री भर जायतो दूसरा दिन-सोई कश्यपने कहा है कि वहां यह मानका प्रकार है कि सूतिकाके । सूर्यके उदय होने पर स्त्रियोंका रजोदर्शन होय वा जन्म आदि हो वा विपत्ति होयतो , जाभिभूता या नागे रजसा च परिप्लुता । उसके सूतकमें अर्द पत्रिपर्यंत वही दिन फर्य तस्यामाच्छी शुद्धिः स्याफेन कर्मणा । चतु” लिया जायगा जिसमे सूर्य उदय हुआहो- हनि मप्राप्त सगेदन्या तु ता प्रिय । सा सबैलागा- अथवा पत्रिके तीन भाग करके पहिले दो खापः साताम्म्रता पुनः स्पृशत् । दशद्वादशहत्वो भाग पूर्व दिनमें समझने पिछला तीसरा या आरमेय पुनः पुनः । भन्ते च वामप्सा स्यागः ततः भाग ऋतु सूतकमें दूसरे दिन में समझना- गुदा भोग सा । दयालया ततो दान पुण्याहेन वि. और रजस्वला स्त्रीके मरनेक विषयमें यह शुदपति । है कि रात्रिके होनेपर जबतक सूर्य उदय २ भातुरे ग्रान उसने दशहतो बनातुरः। माया नहीं तच पहिलाही दिन समझना-इन सप पाया म्पादन ततः शुद्रपेरस भानुरः । ३ मतिया तापान फर्य धुर्वति यतयाः ।। १ टोदते तु या सर्व नाणा रयते तः। जनन सस्टिमादाय परगन्य ता य । पुज्याभिरभि-या रित्तिर्ग परमादरवरण शरी। अपराबाद: मप्याप गागा गुदि सभेनतः। नित सारिता फालः सतयादी विधायने गधि कुर्या भागांतु द्वौ दाई Kaifiyaपानः प्रागीता तु गदः मागी पी एन । उसरास: प्रमान दुगत का- मेन रजागनमतगत पता दाहदिर-सतो. राम मारो मो रजासि बफे । पर्वमा दिन प्राय पानीपत रामः। । गा।
मायश्चित्ताध्याय आशौचमकरण १ (४२५) 'कल्पोंकि व्यवस्था देशाचारसे समझनी-त्मिघातिनां शुद्धिः अन्वतं भवति-प्रोपिते यह आशौच अग्निहोत्रोके मरनेमें तो दाह- | कालशेषः शुद्धिः हेतुर्भवति-पूर्णे उदकं दत्त्वा के दिनसे अनग्निहोत्रीके मरनेमें मरनेके | शुचिर्भवति- दिनसे होता है-और अस्थिसंचयन तो तात्पर्यार्थ-जिसका अभिषेक आदि कर्म दोनोंका दाहके दिनसेही होता है यह जा- हुआ हो ऐसा क्षत्रिय आदिनृप सींग और मना-सोई अंगिरानें कहां है कि अनग्नि | डाढवाले गोआदिपशु-यहां विप्रशब्द शू- होत्रीका आशौच मरण दिनसे और अग्नि-द्रका भी उपलक्षणहै विप्रआदि इनसे जो होत्रीका दाइके दिनसे गिना जाता है और | मरे हों और जो विष (जहर ) फासीसे अ- संचयन दोनोंका दाहके दिनसे लिया जाता | पने संबंधी सपिण्डोंको जो मारते है वे आ- है और श्राद्ध करनेके लिये मरनेका दिन ! त्मपाती-यहां आत्मघाती पद पाखण्ड्य ना- वही होता है निस तिथीको माहो-यहां | श्रिता इस श्लोकमें कहे हुए सव पतीतोंका साग्नेः संस्कारकर्मण इसके सुनने से यह उपलक्षणहै-उनके संबंधियोंको सद्यः शौच अनुसंधान करना यदि अग्निहोत्री पिता ! होता, दशदिन आदिनही-सोई गोत- देशान्तरमें मरगया होयतो उसके पुत्र आ- | मने कहाहै कि गौ ब्राह्मणसे मरे हुए राजा- दिको जबतक उसका दाह न हो तबतक के क्रोधसे मरे हो और युद्धके विनाही संध्या आदि कर्मका लोप नही होता-सोई प्रायः नष्ट न करनेवाले शस्त्र अग्नि विष पठीनसिने कहा है कि अनामिहोत्रीद्विजका | जल उन्धन (फासी) और प्रपतन आशौच द्विजोंको मरण दिनसे होता है और (ऊंचेस पडना ) इनसे मरनेको इच्छावाले परदेशमें मरे हुए अग्निहोत्रीका आशौच जो मनुष्य उनका सद्यः शौच होताहे- यहां क्रोधका ग्रहण जो प्रमादसे मारा हो भावार्थ-प्रथम आशौचके मध्य में जन्म वा सके निरास (निवृत्ति ) के लिय है और मरण हो जाय तो उस पहिले आशौचके शेष- अयुद्ध ग्रहण युद्ध में मरेका एकदिन आशोच दिनास शुद्धि होतीहै गर्भस्राव हो जायतो- होताहै इस बातके जताने के लिये है- मासतुल्य रात्रियोंसे शुद्धि होती है ॥ २०॥ क्योंकि यह स्मृति है कि जो ब्राह्मणके लिए मरे हो गौस जो मरे हो जो यद्धमें हतानांनृपगोविगैरन्वक्षंचात्मघातिनाम् । मारे गये हो उनका एकरात्र अशीच होताहै प्रोपितकालशेपास्यात्पूर्णेदत्त्वोदकंशुचिः ।। यह वचन- युद्धके समयके क्षत (घाव) पद-हतानां ६ नृपगोविः ३ अन्वक्षं:- | आदिसेही जो कालान्तरमें मरा हो उसके च:-आत्मघातिनां ६ प्रोषिते ७ कालशेषः१ लिये है- और संग्राममेही मारा गयाहो स्याक्रि-पूर्णे ७ दत्त्वा:-उदकं २ शुचिः१॥ । उसका तो सद्यःशौच होताई सोई मनु योजना-नृपगोविनैः हतानां चपुनः आ- | ( अ. ५ श्लो. ९८ ) ने कहा कि युद्धके १ अनग्निमत एकान्तेः सान्नः सस्कारकर्मणः । १ गोत्राह्मणहतानामन्वक्ष राजकोधाचायुद्धे प्रायो- शुद्धिः सचयनं दाहान्मृताहस्तु यथातिथि । नाशकरावाग्निविषादको₹धनमपतनश्वेच्छताम् । २ अननिमत उत्क्रान्ताच हि द्विजात्तिषु । २ उद्यतैराइवे शत्रैः क्षत्रधर्महतस्य च । सद्यः से- दाहादमिमतो विद्याद्रिदेशस्थे मृते सति । तिष्ठते यज्ञस्तथा शौचमिति स्थितिः । दाहसे होता है- (४२६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । विषे उठाये हुये शस्त्रोंसे जोक्षत्रधर्मसे मराहो | विधि है अन्यको नही सोई देवलने कहाहै वहां यज्ञकी प्राप्ति और आशौच सद्यःकाल | कि आशीचके दिनोंके वीतनेपर प्रसव होताहै- अब यह दिखाते हैं कि ज्ञात आशौच नही होता- तिससे यही मर्यादा (जाने हुये ) जन्म आदिही आशौचमें हेतु है कि विपत्तिके विषय मेंही अतिक्रान्ताशाच है इससे जन्म होनेसे पीछे जो जाना है होताहै जन्ममें नही- कोई इस (हतानां उसमें दशदिन आदि आशौचका अपवाद नृपेत्यादि) श्लोकको अन्यथा पढते हैं कि दिखाते है कि जिस देशान्तरमें स्थित हुए | प्रोपित मनुष्यके मरण आदिमें कालशेषसे सपिण्डके पुत्रआदिका जन्म घरके सपिण्डनें शुद्धि हैं और जो शेष न होय तो तीन पहिलेही दिनमें न जाना होय तो उस सपि- | दिनमें शुद्धि होती है-और जो वर्षादिनके ण्डको दशदिन आदिके आशौचके जितने व्यतीत होनेपर सुनाजाय तो प्रेतको जल दिनशेपहो उतनेही दिनमें शुद्धि होतीहै देकर शुद्धि होती है-इसका अन्यभी अर्थ और जो सब आशौच पूरा होनेपर सुना स्पष्टरीतिसे करते हैं कि देशान्तरमें, जो जाय तो प्रेतको जल देकर शुद्धि होती है- मरजाय तो सब ब्राह्मण क्षत्रिय आदि व- उदकका दान स्नान पूर्वक होता है इससे की शुद्धि अविशेषसे कालशेषसे होती स्नान और जल देकर शुद्ध होताहे- है और जो अशेष अर्थात् दश आदि दिन सोई मेनु (अ. ५ श्लो. ७७ ) में कहा । व्यतीत हो गये होय तो सब वर्णोकी तीन दशदिनके अनंतर जाति मरण वा पुत्र | दिनमें शुद्धि होती है और वर्ष दिनकें पूरे जन्म सुना जाय तो सचैल जलमें कूदकर | होनेपर परदेशीका मरण सुना जाय तो सब मनुन्य शुद्ध होताहै-वहां (पूर्ण दत्त्वोदकं ब्राह्मण आदिवर्ण स्नान और जल देकर शुचिः ) इस पदस यह जाना जात है कि शुद्ध होते हैं-सोई मनुनें कहा है कि (अ० प्रेतको उदकदान सहित आशौचकाल "-श्लो० ७६-) वर्ष दिन पुरा होजाय तो शुद्धिका कारण है इससे सपिण्डोको पुत्र जलकेही स्पर्शसे शुद्ध होता है वह तीन दि- जन्मका आशौच दशदिनके अनंतर सुननेसे नमें शुद्धि-दश दिनसे ऊपर और तीन म- नही होता- और पिताको तो दशदिनसे होनोंसे पूर्व २ सुना जायतो समझनी-पूर्वोक्त अनन्तर भी मान करना क्योंकि यह वचन सद्यः शोचतो नौ महीनोंसे ऊपर और वर्ष है कि पुत्रके जन्मको सुनकर मान कर- दिनसे पूर्व २ समझना और जो कि यह व- इस पदसे पुत्र शब्दका ग्रहण भी यही शिष्ठकों वचन है कि दश दिनमें पर सूचन करता है कि जन्ममें अतिक्रान्ता ' सुनकर एक रात्र अशाच होता है वह शोचसपिण्होंको नही होता- अन्यथा ' महीनासे पर नौमें महीनास पूर्वक ऐसाही कहना उचित था कि दशदिनके विषयमं जानना और जो गौतमका वचनें है अनंतर ज्ञातिमरण और जन्मको सुनकर । १ नादिः प्रसवासाने व्यतीते दिनादि। पूर्वोक्त कर- इससे पुत्रका ग्रहण इसी लिय २ प्रोपिते कालपः स्यादन्यह एव तु । सा ६ कि जिसका पुत्र हो उसीको ग्रानका पसर पूर्ण प्रेते रमोदकं शुषिः । निलिमरण पृष्ला प्राय जन्म घ । ३ मामा व्यतीत तु रवापी विध्यति । ससा समगदोमाति माना। दाजुला एमगन् । नियमान श्रुषा जन्म गनिशन् । ५ युत्या भारयापहले।
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचपकरण १. (४२७) कि दशमें दिनसे ऊपर पक्षिणी ( एक राम मरनेको सुनकर और गर्भस्रावमें सगोत्री दो दिन ) आशौच होता है वह तीन माससे मनुष्य स्नानसे शुद्ध होते है-देशांतरका उपर छठे महीनेसे पूर्व २ समझना-सोई | लक्षण बृहस्पतिने यह कहते है कि जिसमें धृद्ध वशिष्ठने कहा है कि तीन महीनेसे पूर्व | गंगाआदि महानदीका व्यवधानही और तीन रात्र-और छः महीनसे पूर्व २ पक्षिणी | जहां पर्वतका व्यवधान हो और जहां वा- .मौर नीमहीने से पूर्व २ एक दिन और इससे णीका भेद (बोलीमें फर्क) होजाय उसे ऊपर स्नान मात्रसेही शुद्ध होता है यह देशान्तर कहते है और कोई साठ योजनपर आशौच माता पितास भिन्नके विषयमे सम- देशान्तर कहतेहैं-कोई चालीस और कोई झना-क्योंकि यह पैठीनसीको स्मृति है | तीस योजनपर देशान्तर कहते है- कि माता पिता मरगये हों पुत्र परदेशमें यह अतिक्रान्ताशीच उपनीतंक मरनेके होय तो सुनकर दश दिन सूतकी होता है- | विषय समझना-अवस्था विशेष विषयके और सोई स्मृत्यन्तरमें भी लिखा है कि जो आशौच उनके विषयमें न समझना- महागुरु (पिता)के मरनेपरवर्ष दिन व्यतीत | सोई व्याघ्रपादने कहा है कि सब वर्गोको हो जाय तोभी-आर्द्र वस्त्र और व्रती होकर अवस्था निमित्तक आशीच और अति- विधिपूर्वक प्रेत क्रियाको करै-अर्थात् आ- कान्ताशीच समान होता है और वह आ- शौच- जलदानको कर-उसमें स्नान शाच उपनीतके विषयमें विषम होता है मानसे शुद्धि नही होती-मातासे भिन्न पि- और तिसीके विषयमें अतिक्रान्ताशौच ताको स्त्रीमें विशेष स्मृत्यंतरमें दिखाया है | होता है-इसका यह अर्थ है कि तीन कि मातासे भिन्न पिताकी स्त्रीक मरनेमें वर्ष । वर्ष आदि अवस्थाके विपे जो दांत जमनें व्यतीत होजाय तोभी ब्राह्मण तीन रात । पर्यत सद्यः शौच होता है इत्यादि वा- अशुद्ध होता है और जो कि सपिंड नदी- | क्योंसे आशौच कहा है वह सब ब्राह्मण आदिसे व्यवहित देशांतरमें मरा होय तो आदि वर्गीको समान है-और दश दिन सपिण्डोको दश दिनकं पीछे और तीन मा- आदिके व्यतीत होनेपर जो तीन दिन आ- ससे पूर्वभी सद्यः शोच होता है क्योंकि यह दिका आशौच कहा है वहभी सब वर्गों में वचन है कि देशान्तरमें जो हो-नपुंसक- समान है-परंतु उपनीत मस्नेसें-दश बारह वेखानस-(वानप्रस्थ ) और यति इनके पंद्रह और तीसदिन क्रमसे ब्राह्मण आदि- कोकों होता है इत्यादि वाक्यसे विषम आशौच १मासनये विरात्रि स्थात्पण्मासे पक्षिणी तथा । अदस्तु नवमादगिर्व स्नानेन शुध्यावे । ब्राह्मण आदि वर्णीको होता है-और अति- २ पितरी चेन्मृतौ स्यातां दूरस्थोपि हि पुत्रक.। क्रान्त आशौचभी इसी उपनीतके मरनेके श्रुत्वा तद्दिनमारभ्य दशाह सूतको भवेत् । विषयमें समझना-उस तीन वर्ष आदिके ३ महागुरुनिपाते तु आईवघोपवासिना । अती- । बालकके मरनेमें नहीसमझना। ब्दपि कर्तव्य प्रेतकार्य यथाविधि । १ महानद्यन्तर यत्र गिरि व्यवधायकवायो यत्र ४ पिपल्यामपंतावा मानवयं द्विजोत्तमः । विभियन्ते तद्देशातरमुच्यते । देशान्तर वदन्त्य के पष्टि- सवत्सरे व्यतीतेपि विरात्रमशुचिर्भवेत् । योजनमायत। चत्वारिंशद्वदन्त्यन्यै त्रिंशदन्ये तथैव च । ५ देशान्तरमृत श्रुत्वा क्लीवे वैखानसे यतौ। मृते २ तुल्य वयसि सर्वेषामतिकान्ते तथैव च । उप- सानेन शुद्धयन्ति गर्भसादे च गोत्रिणः । नीते तु विषमं तस्मिन्नेवातिकालने । 1.
(४२८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भावार्थ-राजा गो ब्राह्मण इनसे मरेहुए | होता है और वसिष्ठ तो यह कहते हैं कि और आत्मघाती इनका सद्यःशीच होता | पंद्रह रात्रि में क्षत्रिय और वीस रात्रिमें वैश्य है-और परदेशके मरनेमें-आशोचके शेष शुद्ध होता है-और अंगिरा यह कहता है दिनोंसे और पूर्ण होनेपर स्नानपूर्वक जल | कि शातातपने यह कहाहै कि सब वर्गों की दानसे शुद्धि होती है ।।२१॥ शुद्धि मृत सूतकके विषै दश दिनमें हो- जाती है-इस प्रकार अनेक थोडे और ब- क्षत्रस्यद्वादशाहानिविश:पंचदशैवतु ॥ हुत दिनोंके आशौच कल्प दिखाये है परन्तु त्रिंशद्दिनानिशूद्रस्यतदर्धन्यायवर्तिनः॥२॥ उनका आचार लोकमें न होनेसे बहुत व्य- पद-क्षत्रस्य ६ द्वादशाहानि १ विशः. ६ / वस्था दिखानी उपयोगी नहीं है इससे उन- पंचदश १ एव:- तु:-त्रिंशदिनानि १ की व्यवस्था अब नहीं दिखाते-जबकि ब्रा- शूद्रस्य ६ तदर्द्ध १ न्यायवर्तिनः ६॥ ह्मण आदिके क्षत्रिय आदि सपिण्ड होय तो योजना-क्षत्रस्य-द्वादशाहानि विशः पं- यह हारीत आदिका कहाहुआ आशौच चदश अहानि तुपुनः शूद्रस्य त्रिंशत् दि- समझना कि यदि ब्राह्मण सजातीय सपिण्ड नानि-न्यायवर्तिनः (शूद्रस्य राज्ञः ) तदर्द्ध के मरनेमें दश दिनमें शुद्धि और क्षत्रिय आशोचं भवति ॥ धा वैश्य अथवा शूद्र सपिण्ड होयतो :नके मरण और जन्ममें क्रमसे छः तीन और तात्पर्यार्थ-क्षत्रिय वैश्य शूद्र इनको सपिं- | एक रात्रमें शुद्धि होती है-विणु भी कहा डके मरने और पैदा होने में क्रमसे द्वादश १२ है कि क्षत्रियकी वैश्य शूद्र सपिंडके मरनेपर पंद्रह १५ और तीस ३० दिन आशौच क्रमसे छः गत और तीन रातमे, वेश्यकी होता है-और पाक यज्ञ द्विजकी शुश्रूषाके शूद्र सपिण्डके मरनेमें छः रातमें, हीन वर्णकी विषय जो तत्पर हो ऐसे न्यायवर्ती शूद्रको अपनेसे उत्कृष्ट सपिण्डके मरनेमें वा जन्ममें महीनेका अर्द्ध अर्थात् पंद्रह दिन आशौच जब आशाच निवृत्त होजाय तव शुद्धि होती होताह-इससे विरात्रंबा इत्यादि कहा दश है-चौधायनने अविशेषसे सबकी दश दिन- रानका आशीच परिशेषसे ब्राह्मणके विषयों में शुद्धि कही है कि जो क्षत्रिय वैश्य और समझना-अन्य स्मृतिओमेतो क्षत्रिय आ- शूद्रये ब्राह्मणक बांधव होयतो इनके आ- दिकोको दशदिन आदिकाभी आशौच दिखाया है-सोई पराशरने कहा है कि अ. १ पंचदशगण राजन्यो विशतिरात्रेण वैश्यः। पने कर्ममें तत्पर और शुद्ध क्षत्रिय दश २ सपामेव वर्णाना मृतक सतके तथा दशाहा- दिनमें और वैश्य बारह दिनमें शुद्धिको शुद्धिरेतेपामिति शातानपोऽधीत् । प्राप्त होता है-शातातपनेभी कहा कि ३ दशाहाच्यते विनो जन्महानी स्वयोनिए । प- " मरण मृतकके विषय क्षत्रिय ग्यारह दिन | भित्रिभिरकेन विविट्दयौनिए । वश्य पारद दिन औरशूद्र तीस रात्रि शुद्ध ४ क्षत्रियस्य दिनदेषु सपिण्टे पड़ात्रनिराया• न्या वैश्यस्य शरे स.पण्हे पहावेग आदिहानपणानां क्षरिपस्तु शाहन स्वर तिः शुचिः । तातोपु सरिटेगु जाने मृतेषु या तदाशनयम- द्वादन याः शादिमाग I गमे शुद्धिः। २पादनादादाजन्यः वेश्योद्वाभिम्तयागी ५क्षत्रविदादजातीया ये सारस्य पपिताः । विशारागदपत मतरतफे। तपानशा सिमस्य साहादिरप्यो ।
मायाश्चत्ताध्याय आशाचप्रकरण १ (४२९) शौचमें ब्राह्मण दश दिनमें शुद्ध होता है- | सद्यः शौच-ओर मुण्डनसे पूर्व मरे एका एक इनदोनों पक्षोंकी व्यवस्था आपत्ति और | रात्र दिन-यज्ञोपवीत होनेसे पूर्व-और अनापत्तिके विषयसे है-दासी आदिको मुंडनसे पीछे मेरेहुएका तीन रात आ- स्वामीके आशौचकी निवृत्ति होनेपरस्पर्श- शौच होता है-यद्यपि दन्त जमनेसे पूर्व सद्यः की योग्यता तो होनाती है-परन्तु मास- | शौच होता है यह वचन अविशेषसे कहा पर्यत कर्म करनेका अधिकार नही होता है तथापि यह आशीच अग्नि संस्कार (दाह) सोई अंगिरांने कहा है कि दासी वा दास न हुआ होय तो समझना-क्योंकि इस वि- जिस वर्णके हों उस वर्णको उनके मरनेमें ष्णुके वचनसे अग्निसंस्कारसे रहितकोही सद्यः शौच होता है और दासीको उस | सद्यः शौच कहा है कि जिसके दांत न नि- वर्णक मरनेमे एक मास सूतक रहता है- कलेहों ऐसे बालकके मरनेमें सद्यः शौच और प्रतिलोमा ओंका तो आशौच नहीं होता है और इसका अग्निमें दाह और जल होता है क्योंकि ये स्मृति है कि प्रतिलोम | दान आदि क्रिया न करनी-यदि अग्नि सं- धर्मसे हीन होते हैं उनके जन्म और मरणमें | स्कार होजाय तो चालक-और जिनका वा- केवल मूत्र और पुरीष (विष्ठा ) के शौचकी ग्दान (सगाई) न कियाहो ऐसी कन्या- समान उस मलके निवृत्त करनेके लिये | ओंका एक दिनका आशौच इस वक्ष्यमाण शोचही होता है। वचनसे होता है-सोई यमैने कहा है कि भावार्थ-क्षत्रियको बारह दिन वैश्यको | जिनके दांत न निकलेहों ऐसे बालकके पंद्रह दिन शुद्रको तीस दिन और धर्मात्मा | मरनेमें और गर्भस्रावमे सब सपिडौंको दि शुद्रको पंद्रह दिन आशोच होता है ॥२२॥ नगतका आशौच होता है-नामकरणसे- पूर्व तो नियमसे सद्यःशौचही होता है- आदतजन्मनासयआचूडान्नैशिकीस्मृता ॥ | क्योंकि ये शंखको स्मृति है कि-नाम क- त्रिरात्रमावतादेशाद्दशरात्रमतःपरम् २३॥ | रणसे पूर्व सद्यः शौच होता है-चूडाकर्म इस स्मृतिसे पहिले वा तीसर वर्ष में होता है-कि पद-आदन्तजन्मनः ५ सद्यः --आचू- डात् ५ नैशिकी १ स्मृता १ निरात्र १ । सव द्विजातीयोंको श्रुतिकी प्रेरणासे चूडा- कर्म पहिले वा तीसरे वर्षमें करना-तिससे आऽ-व्रतादेशात्पदशरात्रं १ अतः:- परं १ दांत जमनेके अनंतर प्रथम वार्षिक चूडा- योजना-आदन्तजन्मनः सद्यः शुद्धिः | कर्म पर्यंत एक दिनका आशोच है और आचूडात् नैशिकी शुद्धिः आवतोद्देशात् जो दंतजमजाय और चूडाकर्म न होय तोभी त्रिरात्रं अतः परं दशरानं शुद्धः कारणं भवति ।। १ भदन्तजाते बाले प्रेते सद्य एवं नास्याग्नि- तात्पर्यार्थ-आयुः और अवस्थाविशेष- सस्कारो नोदकक्रिया। सेभी दश दिन आदि आशाचका अपवाद २ अहस्तदत्तकन्यासु वालेषु च विशोधनं । कहते है कि जितने कालमें दांत उपजै ३ भदंतजाते तनये शिशी गर्भच्युते तथा । तिस कालमें मरेहुए बालकोंके सपिंडोंको | सपिंडानां तु सर्वेषामहोरात्रमशौचक ! ४ प्राङ्नामकरणात्सय.शौचं । दासी दाप्सश्च सर्वो वै यस्य वर्णस्ययो भवेत् । ५ चूडाकर्म विजानीनां सर्वेषामेव धर्मतः । प्रथ- तदर्णस्य भवेच्छाचं दास्यां मासस्तु सूतक । मेच्दै तृतीय वा कर्तव्य श्रुतिचोदनात् ।
(४३०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । तीन वर्षतक एक दिनकाही आशौच रहैगा | तीन वर्षसे ऊपर मुण्डन होय तो उसके वि- सोई विष्णुनें कहा है कि दांत जमआयेहों | पयमें समझना-क्योंकि उसनेही फिर यह और चूडाकर्म न हुआहोय तो अहोरात्रसे कहा है कि तीन वर्षसे कम ब्राह्मण मरजाय शुद्धि है-तिसके अनंतर उपनयनसे पूर्व | तो अहोरात्रमे शुद्धि होती है-कदाचित तीन दिनम शुद्धि होती है और जो कि यह कोई यहां यह शंका करें कि यह एक दि- मनु ( अ०५-श्लो०६७)का वचन है कि | नका आशीच जिसके दांत न निकले हो उ- जिनका मुंडन न हुआ हो उनकी शुद्धि | सके विपेंभी मानना पडेगा-सो ठीक नहीं अहोरात्रमें और जिन होगया हों उनकी | क्योंकि तीन वर्षसे कमके बालकके दांत न तीन रातमें शुद्धि होती है उसका तो यह निकले ऐसी बातही संभव नहींहोसक्ती- (पूर्वोक्त)ही विषय है परन्तु फिर जो दोवर्षसे और दांत निकल आएहो मुंडन न हुआ- कमके बालकके उद्देशसे मनु (अ० ५ श्लो० होय तो एक दिनका आशौच होता है इस ६९)ने कहाँ हैं कि वनमें काष्ठकी समान विष्णुके वचनके साथ जो विरोध है उसका गेरकर तीन दिन उसका अशौच करे-और भी परिहार न होसकेगा-इससे विरोध आ- जो यह वशिष्ठंने कहा है कि दो वर्षसे कम दिके होनेसे पूर्व कीहुई जो व्याख्या (कुलध- बालकके मरनेमें और गर्भके पडनेमें सपिं- | मकी अपेक्षा इत्यादि ) नही श्रेष्ठ है-जो कि डोंको तीन रात्र अशीच होता है सो यह यह कश्यपको वचन है कि जिनके दांत न कथन वर्षदिनमें चूडाकर्मके अभिप्रायस पैदा हुएहो उनका तीन रात आशीच हो- है-अर्थात् यह शंका है कि जब तीसरे वर्ष- ताहे वह माता पिताके विषयों समझना- तक चूडाकर्मकी मर्यादा है तो वर्षसे पूर्व क्योंकि इस वचनसे तीनपत्रके आशौचमें अकृतचूड होनेसे अहोरात्रका आशाच जन्यजनकमावसंवन्धरूप उपाधिदी निया- प्राप्तथा इससे फिर दो वर्षसे कमको तीन मकहै कि मनुष्य वीर्यको स्खलन (गरा) रात्रका आशौच जो दिखाया है वह मुंडन | करके जलके स्पर्शसे शुद्ध होता है और वे रहित प्रथम वर्षतक है-इस अभिप्रायसे है । जिक संबन्ध अर्थात् परपूर्वा स्त्रीके विषे स- इससे विरोध नहीं जो कि यह अंगिराको न्ततिको पैदा करके तीनरात अशुद्ध होता वचन है कि यद्यपि मुण्डन न हुआ हो और है-इससे यहां यह व्यवस्था समझनी कि दांत निकलनेसे अनंतर मरगयाहोय तो- ' नामकरणसे पूर्व मरे तो सद्यः शौच-उसके भी इसको अग्निमें दग्ध करके तीनरात आ- ' अनंतर दांत जमने से पूर्व मर और अमि शोच कर वहभी कुल धर्मको अपेक्षासे जे, ' संस्कारहो गया होय तो एक दिन आशाच अन्यथा सद्यः शौच होता है-दांत निकलनेके १ दन्तजातेप्यन्त ददोराण शुद्धिः । । अनंतर और प्रथम वार्षिक मुंढनसे पूर्व मरा २ नृणामतनानामदिनशिका स्मृता : होयता एक दिन-प्रथम वर्षसे पीछे तीन नियंतहकानां तु विरायाचद्धिरणने । १ अर फाटनमा क्षिपेपुष्पहमेव तु । 1 िन्यूनविण तु मृते शुदिनु नशिकी। ४ नाकाने गर्भपतने या सरिरदाना निराम्। २ पालानामदंतजानां गिानेग द्धिः । ५पपगारामटोय जातईतच महिला तथापि दागिनगमायोष यादमाग । ३ निएम सु दुर्भागुस्नुपम्प गति । मजिगाभिमभादरा व्याम् । -- - मायश्चित्ताध्याय आशीचमकरण १ (४३१) वर्षसे पूर्व मुंडन होगया होय तो तीन दिन | 'विवाह होने से पूर्व-पितृपक्ष (फुल) और पति आशौच-अन्यया एक दिनका आशीच होता : पक्षमें तीनगत्रका आशाच होता है-सोई है-तीन वर्षसे ऊपर जो मुंडन न हुआ होय मन (अ. ५ श्लो० ७२)ने कहा है कि तोभी तीन दिनका आशाच होता है-यज्ञो- जिनका संस्कार न हुआही ऐसी कन्याओं पवीतके अनंतर सय ब्राह्मण आदिकोंको के मरनेमें वान्धव (पतिपक्ष) तिनरामें दशरान आदिका आशाच होता है। और सनाभि (सपिण्ड) अर्थात् पिता भावार्य-दांतोके पैदा होनेतक सद्यः । पसके मनुष्य निवृत्तचूडकानां इत्यादि आशौच और मुण्डन पर्यंत अहोगन-आर शोकसे कहा जो तीन रात्रका आशौच यज्ञोपवीत पर्यंत तीनगन और इससे परे उससे शुद्ध होत है दशगनसे नहीं क्योंकि दशरात्रका आशाच होता है ।। २३ ।। विवाद होनेसे पूर्व उसकी प्राप्ति नही-इससे ही मरीचि ने कहा है कि वाग्दान की हुई अहस्त्वदत्तकन्यामुबाठेपुचविशोधनम् ॥ कन्याजी जल आदान ( संकल्प ) पूर्वक जो गुर्वतेयास्यनूचानमातुलश्रोत्रियेपुच॥२४॥ न दी हो वह असंस्कृत होती है उसका आशीच दोनोपक्षामें तीनरात्र होता है-विवा- पद-अ६ः१ तुः-अदत्तकन्यासुध्यालेयु७ हमे पीछे तो यह विष्णुंने विशेष दिखाया है च-विशोधनं १ गुर्वन्तेवास्यनूचानमातुल- कि विवाही हुई कन्याका आशौच-पितृ आत्रियेषु ७ चा-॥ पक्षमें नहीं होता-यदि उसके पुत्र आदिका योजना अदत्तकन्यात चपुनः पालेषु प्रसव अथवा मरण पिताके घर होयतो पिर चपुनः गुर्वन्तवास्यनूचानमातुलश्रोत्रियेषु पक्षने तीन रात वा एक रात्रआशोच होताहे अहोरात्रं विशोधनं भवति तिसमें भी प्रसवमें एकयत और मरणमें तात्पर्याय-जिनका विवाह न हुआ हो ऐसी तीनरात आशौच होता है यह व्यवस्था है कन्याओंका आशीच सपिण्डोंको मुण्डन | यह वयोवस्था आशीच-सय वर्णीको साधारण होनेके अनंतर और वाग्दानसे पूर्व अहोरात्र में क्योंकि तत्तद्वर्णका असाधारण आशौच होताह कन्याओंका सापिंड्य तीन पुरुष पर्यत | क्षत्रियको बारह दिनका आशाच होता है- इस वसिष्टकी स्मृतिसे होता है कि-अदत्त । इत्यादि वचनसे तिस तिस वर्णको पृथकर कन्याओंका सपिण्ड्य तीन पुरुष पर्यंत कह कह दिखाया है-इससे यह तीनरात शिष्टजन कहते हैं-जिनके दांत न निकलेही | आदिका आशौच अविशेषसे सर वर्णीको ऐसे बालकोंका आशीच अग्निसंस्कार होनेपर समान है- इसीसे मनुनेभी चारों वर्णीका अहोपन होता है- और जिनका मुण्डन न अधिकार (प्रकरणसे उत्तरोत्तर संबंध) हुआ हो ऐसी कन्याओंका सद्यःशौच होता है क्योंकि आपस्तम्बको वचन है कि जिनका १ स्त्रीणामसस्कृतानां तु त्यहाच्छुद्धयन्ति यां. चूडाकर्म न हुआहो ऐसी कन्याओंका सद्यः धवाः । यथोक्तेनैव कल्पेन शुद्वयन्ति तु मनामयः। शोच होता है-और वाग्दानके अनंतर २ वारिपूर्व प्रदत्ता तु या नैर प्रतिपादिता। अस- स्कृता तु सा ज्ञेया त्रिरात्रमभयोः स्मृत । १ अप्रत्ताना तु स्त्रीणां त्रिपुरुषी विज्ञायते । ३ सस्कृतामु नीषु नाशौच पितृपक्षे तामसव. २अकृतचूदाया तु कन्याया सयः शौच विधीयते | मरणे चेसिवटहे स्याता तदेकरात्र त्रिरात्र वा।
(१३२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । . होनेपरभी ( चतुर्णामपि वर्णानां यथावदन पक्षकों स्वीकार किया है और इन ऋष्य- पूर्वशः) इस अपने श्लोकमें चतुर्णा वर्णानां जो शृंग आदिके कहे हुए वचनोंका तिरस्कार लिखा है वह इसी बातके जतानेके लिये है कि | विगीत (निंदित) जानकर किया है और जिसमें वर्ण विशेषका उपादान नहीं किया जो वचन अविगित ( यथार्थ ) हैं व आर्त ऐसी आशौचकी विधि सब वाम साधारण (रोगी ) और अनात क्षत्रिय आदिके . है- सोई अंगिरोने कहा है कि संस्कार | विषयमें व्याख्येय (समझने) हैं ॥ जो से पूर्व अविशेपसे सव वर्गोको तीनरातमें । पढावै वह गुरु- अन्तवासी ( शिष्य ) शुद्धि और कन्याके मरनेमें एक दिन में शुद्धि । व्याकरण आदि वेदोंके अंगके कहनेवाला होती है- अवस्था निमित्तका आशौच सब | अनूचान और मातुल शब्दसे अपने बन्ध वर्णीको तुल्य होता है इत्यादि व्याघ्रपादका | माताके बन्धु और पिताके बन्धु योनिसं- वचनतो पूर्व दिखाय आए-जैसे पिण्ड- | बन्ध पत्नीदुहितर इत्यादि वचनमें कहे यज्ञा वृता देयं इत्यादि वचनसे कही | हुए समझने वे और एक शाखाका पढने हुई पिण्डदान और जलदानकी विधि वाला श्रोत्रिय-क्योंकि बौधायनकी स्मृति है और अंतरा जन्ममरणे इत्यादि सन्नि | कि एक शाखाको जो पढे वह श्रोत्रिय होता पाताशांचक विधि और गर्भन्नावेमाप्त- है इनके मरनेपर अहोरात्र आशौच होता है- तुल्यानिशा इत्यादि स्रावाशीचकी विधि | और जो कि मुख्य गुरु पिता है उसको और प्रोपिते कालशेषःस्यादशेषे व्यहमेवतु- दशदिनका आशीच होता है और जो पुत्र- इत्यादि विदेशस्थ, आशौचके विधि-और को पैदा करके संस्कार और वेदको पढावे जैसे-गुरु आदिके आशौचकी विधि-सव | और वेदके अर्थको बताकर वृत्ति (आ- वर्णोको साधारण है-तिसी प्रफार वयोवस्था जीवन ) कराता है वह महागुरु है उसके निमित्तक आशौचभी सब वर्णीको साधारण मरनेमें इस आश्वलायनका कहा हुआ होनाही उचित है-ईसीसे तिन वर्षसे ऊपर | आशाच समझना कि महागुरुके मरनेमें चूडाकर्मक होनेपर-क्षत्रियको छ:दिनका चारहरात्र दान और अध्ययनको वर्ज दे- आशीच-वैश्यकों नौ दिनका और शूद्रको आचार्यके भरनेमें तो तीन पत्रही आशाच बारह दिनका आशॉच होताहे तसेही जिसमें होता है-सोई मनु (अ०५-लो०८०)ने कहाँ ब्राह्मणोंको तीन रातका आशौच दिखाया है कि आचार्यके मरनेमें तीनगरका और है उसमें शूद्रको बारह दिनका और क्षत्रि- उसके पुत्र वा स्त्रीके भरनेमें अहोरात्रका यको छ.दिनका और शूद्रको नौ दिनका । आशौच होता है और जो शिन्य आचार्य, आशौचहाताद-इत्यादि-धारेश्नर-विश्वरूप- आदिका अन्त्यष्टि (प्रेतकर्म) कर्म करे तो और मेधातिथि आचार्याने इस साधारण दशराब आशाच होता है-क्योंकि मनु १ अविशेषेण वर्णनामांर सस्कारकर्मणः । दि. (अ०५ शो० ६५)नही कहा है कि मरे रामानु भोदिः कन्यादा विधीयते । १द्वादशारा वा दानाध्ययने वर्जयेत् । २क्षत्रे पभिः गृो चौले वैश्य नाभरच्यते । २ त्रिरात्रमादुरासयमाचार्य मरियत सति । सस्य विपांचाई सु द्वादशाहो विधीयते । पत्र विता-पुत्रे च पल्यां दियागमति स्थितिः । नमाजोन शिप प्रपते । तत्र शूरे द्वादशादः ३ गुरोः प्रेतस्य शितल तिमय समापरण। पन्नर पोपी। प्रवाहाः सम रात्र दशदिन विध्यति । . 1 ।
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचप्रकरण १ (४३३) हुये गुरुकी जो शिष्य प्रेतक्रिया करें तो नेमें विवाही कन्याओंको किसतरह आशाच प्रेतके लेजानेवालोंके समान-दशदिनमें शु- होता है इसमें यमनें कहा है कि तीनरात्रमें द्ध होता है-एक गाममें वसनेवाले ओत्रि- शुद्धि होती है और इसीप्रकार सास-श्वशु- यके मरनमें तो एकदिन आशीच इस आ र-भगिनी-भाई-मामा और मातापिताकी श्वलायनके वचनसे होता है कि-जिसनें बहन इनके मरनेमें पक्षिणी आशीच होता एक आचार्यसे उपनयन करायाहो वह सब है-और यहभी वचन है कि मामा श्वशुर- ब्रह्मचारी और श्रोत्रिय इनके मरनेमें एक मित्र-गुरु-गुरुकीस्त्री-और नानी इनके दिन आशौच होता है-यह दूर मरे होयतो मरनेमें पक्षिणी आशीच होता है-सोई गो- समझना और जो समीप मरे होयतो तीन-तमने कहा है कि जो सपिण्ड नहीं ऐसे रात्रकाही आशीच होता है-सोई मर्ने (अ. ५० ८१)ने कहा है कि श्रोत्रियके मर- योनिसंबंध और सहाध्यायी इनके मरनेमें नेमें तीनरान मामाके मरनेमें पक्षिणी पक्षिणी आशौच होता है-योनिसंबंध मामा- (दोदिन एकरात ) और शिप्य ऋत्विज मौसीका पुत्र और बुआका पुत्र ये होते और बांधव इनके मरनेमें पक्षिणी आशीच है-जाचोलिनेभी कहा है कि समानोदकोंका होता है-उपसंपन्न शब्दसे मैत्री-समीप रहना तीनदिन, सगोत्रीयोंका एकदिन, माताके भादि जिसकेसाथ संबन्धहो-और वा जो बन्धु-गुरु-मित्र-राजा-इनके मरनेमें एक शीलयुक्तहो-मातुलशब्दसे मौसी आदिभी दिन, आशीच होता है-विणुनेभी कहा है . समझनी-और बांधवशब्दसे अपने बंधु मा- | कि जो सपिण्ड अपने घरपर जायतो एक ताके बंधु और पिताके बंधु समझने-बृह- दिन माशीच होता है-तैसेही वृद्धवसिष्ठेने स्पतिने भी कहा है कि भ्राता आचार्य और कहा है कि विवाही हुई बहन-असंस्कृत श्रोत्रिय इनके मरनेमें तीनरान अशुद्ध होता भाई-मित्र-जामाता दौहित्र-भानजा-शाला- है-सोई प्रचेताने कहा है कि ऋत्विज और शालेकापुत्र-इनके मरनेमें मानमानसे सद्यः याज्य इनके मरनेमें तीनपतमें शुद्ध होता शुद्धि होती है और ग्रामका अधिपति-कु- है-वसिष्ठनेभी कहा है कि दोहित्र (धेवता) लकापति-श्रोत्रिय-तपस्वी-शिष्य-इनके म- और भानजेके मरनेमें पक्षिणी रात्रि और जो संस्कृत होयतो तीनरात्र आशीच होता है ये धर्मकी व्यवस्था है-मातापिताके मर १ मातुले श्वशुरे मित्र गुरी गुरंगनासु च ।आगीच पक्षिणी रात्रि मना मातामही यदि। १एकाह समाचारिणितमानमामिणेच श्रोत्रिये। २ पक्षिणीमसपिण्डे योनिसवधे सहाध्यापिनिय। २ भोत्रिये तुप पन्ने निरामशुचिर्भरत ।मातले पक्षिणी रात्रि शिविरबांधवेषु च । ३ एकोदकानां तु यहो गोत्रजानामहः स्मृतं । ३ यह मातामहाचार्य श्रोत्रियेवशुचिर्भवेत् । मात्यंधी गुरी मित्रे महलाधिपती तथा। ४ मृत चतिजि याच्य च त्रिरात्रेण विशद्वयति । ४ असपिण्दे स्ववेरमनि मृते एकरात्रं । ५ सस्थिते पक्षिणी रात्रि दौहित्रे भगिनीसुते । ५ मांगन्यां सस्कृतायां तु प्रातयपि च सस्कृते । संस्कृते तु त्रिरात्र स्यादिति धपों व्यवस्थितः । मित्र जामातरि प्रेते दौहित्रे भागनीसुते | स्यालके त- ६ पित्रोरुपरमै श्रीणामुदानां तु कय मवेत् । विग-न्सवे चैव सयः मानेन मुध्यति । प्रायो फुलपती ओणव शुद्धिः स्यादित्याह भगवान्यमः । श्वशुरयोर्भ श्रोत्रिये च तपस्विनि । शिये पंचतमापन्न नाचिर्न- गिन्या च मातुलान्यां च मातुले । पित्रोः स्वम- क्षत्रदर्शनात् । प्राममध्यगतो यावच्छवस्तिष्टांत कस्य- रि तदस्य पक्षिणी क्षयेनिशा। विद। मामत्य तावदाशीच निर्माते शुचितामियात् ।
-- (४३४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . रनेमें सायंकालको नक्षत्र (तारे ) के देख- का अभावही है-ये भार्या और पुत्रशन्द- नेसे शुद्धि होती है-ग्रामके बीचमें जबतक संबन्धी शब्द है इससे जिप्सकी अपेक्षासे शव (मुर्दा) रहे तबतक ग्रामको आशौच | जिन स्त्री और पुत्रोंमें भायीत्व-और-- है उसके निकलनेपर ग्राम शुद्ध होता है- पुत्रत्वहो अर्थात् जिसके स्त्री और पुत्रेही इत्यादि विशेष आशौचके प्रतिपादक स्मृति उसकोही आशीच है-अन्य सपिडाको ओंके वचन स्मृतिओंमें देखने ग्रन्थके बड-नहीं-इसीसे प्रजापीतनें कहाँहै कि जो नेके भयसे इसमें नही लिखते-इन वचनोंमें अन्यके आश्रय स्त्री और जो अन्यकी जो ऐसे वचन है कि एकके विषयमही गुरु | स्त्रीमें उत्पन्न हुए पुत्र हैं उनके मरनेमें (बडा) और लघु (छोटा) और शो- | और पैदा होने में सगोत्री स्नानसे और पिता चके प्रतिपादन करनेसे परस्पर जिनमें वि- तीन रातमें शुद्ध होता है और जो स्वैरिणी रोध आता, है उनकी व्यवस्था-समीप- (व्यभिचारिणी) आदि जिसके आश्रय हैं . और परदेशकी अपेक्षासे समझनी-अर्थात् | उसकोभी तीन रात्रका आशीच होता है- जो समीप होय तो गुरु आशौच और परद- सोई विष्णुंने कहा है कि अनौरस पुत्रोंके शमें होय तो लघु आशौच करना ॥ पैदा होने और मरनेमें और परपूर्वा स्वीक भावार्थ-जो कन्या न विवाही हों और वा- | सन्तति होने वा मरनेमें तीन रात्र आशौच लक इनके मरनमें एक दिन आशौच तथा होता है-डुन तीन रात और एक रात्रकी- गुरु अन्तेवासी-अनूचान-मामा श्रोत्रिय इ- समीप और पर देशकी अपेक्षासे व्यवस्था नके मरनेमें एक दिनरात आशौच होता है। है-जब पिताको तीन रातका आशेच होय अनौरसेपुपुत्रेपुभार्यास्वन्यगतासुच ॥ तो सपिण्डोको एक रातका आशीच होता. निवासराजनिप्रेतेतदहःशुद्धिकारणम् २५॥ है.सोई मरीचि ने कहा है कि परपूर्वा स्त्री- और उनके पुत्रोंके पैदा होने और मरनेमें ती- पद-अनौरसेषु ७ पुत्रेषु ७ भार्यासु ७ नंरात आशाच होता है जिसमें पिताको तीन अन्यगतासु ७ चा-निवासराजनि ७ प्रेते ७ रातका आशौच हो उसमे सपिण्डौंको एक तत् १ अहः १ शुद्धिकारणम् १ ॥ योजना-अनौरसेषु पुत्रेषु-चपुनः अन्य जिस दिन मर-वह दिन और रात शुद्धिमें दिनका होता हे-अपने देशका अधिपति गतासु-भायीसु-मृतासु निवासराजनि-प्रेते- कारण है-और रात्रि में मरा होयतो सतरं में सति- तत् ( यस्मिन्मृतः) अहः शुद्धि- कारणं भवति- सूतक निवृत्त हो जाता है-इसीसे मनु (अ० तात्पर्धि-क्षेत्रज-दत्तक आदि अनारस नमें सज्योतिः आशाच होता है अर्थात १५ श्लोक ८२)ने कहा है कि रोजाके मर- पुन-उनके उत्पन्न होने और मरनेमें और अपनी विवाही स्त्री प्रतिलोमसे भिन्नके आ- , अन्याश्रितेषु दारेषु परपत्नीसुतेगु च । गोत्रिणः अय जो होजाय उसके मरनेमें अहोरात्र सानमुद्राः स्तुस्लिरात्रेणेव तत्पिता । २ अनारसे पुत्रेषु जातेपु च मृतेषु च । परपूर्वामु दश रात्रका नहीं होता-और जो कि प्रति- सोमके आश्रय स्त्री हैं उनके मरनेमें तो हस्त सपिंडानां विराम यत्र वै पितुः । ३ मतके मृतके च विराध परपूर्वयोः। एका- पाखंड्यनाश्रिता इत्यादि शोकसे आशांच ४ प्रेते रामनि सज्योतिर्यस्य स्याद्विषये स्थितः। । आशौच होता है यद्यपि ये सर्पिड हैं तोभी भार्यामु प्रस्तासु मृतामु च ।
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचमकरण १ (४३५) - - 'दिनमें मग होयतो जवतक सूर्य दौख तब- शब्दसे माताके सपिण्ड लेने-अन्योंके संग तक रात्रिमें मरा हो तो जबतक तागगण गमनको शास्त्र विहित होनेसे दोष नही- दीखे तबतक आशीच होता है । अपनेसे निकृष्ट ( नीच) जातिके संग भावार्थ अनौरस पुत्र और अन्य पुरुषमें गमन करनेमें तो यह स्मृत्यंतरमें कहा आसक्त स्त्री और अपने देशका राजा इनके हुआ देखना तहां शूद्रके संग गमन करनेमें. मरनेमें अहोरात्रसे शुद्धि होती है ॥२५॥ तो यह पाराशरने कहा है कि जो ज्ञानसे ब्राह्मणेनानुगंतव्योनशूद्रोनाद्वजः दुर्वल ब्राह्मण मरेहुए शूदक संग गमन चित् ॥ अनुगम्यांभसिस्ना- करता है वह तीन रात्र शुद्ध होता है- त्वास्पृष्ट्वानिवृतभुग्शुचिः ॥ २६ ॥ जब तीन सत्र व्यतीत होजाय तब समुद्रमें; जिसका प्रवाह पडै ऐसी नदीपर जाकर पद-ब्राह्मणेन ३ अनुगन्तव्यः १ न:- 'शूद्रः१ न:- द्विजः १ क्वचित-अनुगम्य- ब्राह्मणको क्षत्रियके संग अनुगमन करनेमें, सौ प्राणायाम और घी खाकर शुद्ध होता है- अम्भसि ७ स्नात्वाऽ- स्पृश्वाऽ-अग्नि३ घृत-! यह वसिष्ठको कहा अहोरात्रका ' आशोच मुक ? शुचिः १॥ योजना-ब्राह्मणेन शूद्रः-वा द्विजः क्वचि- समझना कि मनुष्यकी स्निग्ध हड्डीको छू- कर तीनगत और मनुष्यकी अस्निग्ध (शकी) त् न अनुगंतव्यः-अनुगम्य पुनः अंभसि हड्डीको कर अहोरात्र और शव (मुर्देके) स्नात्वा अग्निं स्पृष्ट्वा तथा घृतभुक् सन् संग अनुगमन करनेसे एक गतदिन अशीच शुचिभवति॥ होताह-वैश्यकें संग जानेमें पक्षिणी अशीच तात्पर्यार्थ असपिण्ड ब्राह्मण-विप्र आ- ब्राह्मणको इस वचनसे होता है और क्षत्रि- दि द्विज और शूद्र इन प्रेतोंके संग अनु । यको अनंतर(अव्यवहित)वश्यके संग जानमें गमन न करे अर्थात् इन मरे हुएओंके साथन । अहोरात्र-एकान्तर अर्थात् एक वैश्य है जाय-यदि स्नेह आदिसे इनके संग चलाजा- मध्यमें जिसके ऐसे शूद्रके संग जानमें पक्षिणी यतो तडाग आदिके जलमें स्नान-अग्निका' अशीच और वैश्यको शूद्रके संग जानेमें स्पर्श और घृतका भोजन करके शुद्ध होता एक दिनका अशाच होताहै-यह बात विचार है-उस दिन भोजन करनेमें इस घृत प्राश- लेनी-तैसेही रोनेमेंभी पारस्करने यह कहाहै. नकाही विधान है अर्थात् धृतकोही खाय | कि बांधवासहित मरेहुए मनुष्यका रोदन और कुछ न खाय ऐसी कल्पनामें कोई प्र- और शोक आदिको कर उस दिनरात दान माण नही इससे भोजन करनेका प्रतिषेध और श्राद्ध आदि कर्मको वजेदे-तैसेही" नहीं-यह प्रायश्चित्त सामन और उत्कृष्ट जातिके विषयमें समझना-सोई मनु ( अ. प्रेतीभत तु यः शूद ब्राह्मणो ज्ञानदुर्वलः । - ५ श्लो० १०३ )ने लिखा है कि सजातीय नुगच्छनीयमान स त्रिरात्रेण शुध्यति। त्रिराने तु तत- वा विजातीय प्रेतके साथ इच्छासे गमन | चार्गे नदीं गत्वा समुद्रगा । माणायामशतं कृत्वा 'करके सचैल स्नान-अग्निका स्पर्श-घृत प्राश्य विशुद्धयति । और २ मानुपास्थि निग्धं स्पृष्टा त्रिरात्रमाशौचं अ- घृत खा कर शुद्ध होता है-ज्ञाति स्निग्ध स्वहोगात्रं शबानुगमने चैकं । १ अनुगम्येच्छया प्रेत ज्ञातिमझादिमेव च । सा ३ मुनस्य बांधवैः साः कृत्वा तु परिदेवन् । ता सचेलः स्पृधाग्निं घृत प्राश्य विशुवधाते । दर्जयेत्तदहोरात्र दानं श्राद्धादिकर्म च । - (४३६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । । प्रेतका अलङ्करण (शृंगार )भी न कर- कर्मअन्यसेनही होसक्ताजोआशोचकै अभा- क्योंकि करनेमें यह प्रायश्चित्त शैखने दि-वकी इच्छा करता हो उन मंत्रि पुरोहित खाया है कि असपिण्ड प्रेतके श्रृंगार कर- आदिको आशौच नही होता-यहां जो. नमें पादकृच्छव्रत करें और जो अज्ञानसे राजाके असाधारण (जिनको और कोई न किया होयतो उपवासकरे जो शक्ति न होयतो | करसके) प्रजापालन स्वकर्म हैं वह जिस स्नान करें। दान-मान-सत्कार और व्यवहारका दर्शन भावार्य-ब्राह्मण असपिण्ड द्विजक और आदि कर्मके विना न होसके उसी कर्मके शूद्रके संग कदाचित् गमन न करें जो करे | करनेमें राजाओंको आशोचका अभाव है- तो जलमें स्नान अयिका स्पर्श और घी खा- | कुछ पंचमहायज्ञ आदिके विषे नही-सोई कर शुद्ध होताहे ॥२६॥ मनु ( अ०५ श्लो० ९५) ने कहा कि महीपतीनांनाशाचंहतानांविद्युतातया ॥ राज्यपदके विषे वर्तमान राजाको सद्यः गोब्राह्मणायसंग्रामेयस्यवेच्छतिभूमिपः२७ शान्ति होम आदिसें जो प्रजाको रक्षाके- शौच होता है इस आशौचाभावमें अन्नदान पद-महीपतीनां ६ न:- आशाचं १ लिये राज्यासन पर पैठना वोही कारण है-गौ- हतानां ६ विद्युता ३ तथा:- गोब्राह्मणार्थे ७ / तमनभी कहा कि राजाओंको कार्यका संमामे७ यस्य च इच्छति क्रि-भूमिपः१॥ नाश न हो इस लिये आशोच नही होता योजना-महीपतीनां तथा विद्युता इतानां गजाके भृत्योकोभी आशोच नही होता- गोब्राह्मणार्थे हतानां यस्य आशौचाभावं भू- सोई-प्रचेताने कहा है कि कारु ( सूप- मिपः इच्छति तस्य चं आशाचं न कार्य ॥ कारादि ) चित्र बनानेवाले वस्त्रोके तारपयार्य-यद्यपि मही शब्द संपूर्ण भूगो- धानेवाले शिल्पी वैद्य-दासी-दास-राजा- लका याची है तथापि उसका एकदंशरूप और राजाके भृत्य इनको सद्यः शौच होता मण्डल लेते हैं क्योंकि संपूर्ण पृथ्वीका एक ई-यह आशौचाभाव किस कर्मके वि पति नहीं होसक्ता और एकपतिकोही मानो- इस अपेक्षामें यही बात बुद्धिमें आती है कि. तो महीपतीनां यह बहुवचन असंगत होगा- कर्म है निमित्त जिनमें ऐसे शिल्पी आदि. इससे इस बहुवचनके अनुरोधसे मण्डलही शन्दसे जो आशाचा भाव दिखाया है वह लते-उसके पालन करनेमें नियुक्त औरानि- उसी असाधारण कर्मके विषयमें है जिसको नका अभिषेक हुआ है-ऐसे क्षत्रिय आदिको निमित्त मानकर जो नाम है जैसे शिल्प कर्म- भाशौच नही अर्थात् सपिण्डके मरनेमें के करनेसे शिल्पी-इससे टसी कमके विप उनको आशंच नहीं करना और जो वि-, समझना-इसीसे विष्णुने राजकर्ममें राणा- जलीसे वा गौ ग्रामपके लिए मोद-उनके गतो माहानिके स्थाने मयः शौचविधीयते । सपिष्टोको तथा निन मंत्रि पुरोहित मादिको प्रजानां परिरक्षार्थमागन गाय कारण । येरागा इस अपने कार्यको सिद्धिक लियकि २ गत च पारियाताय। इनदिना मंत्र मामिहाव भार मभिचारमादि ३ पारस: सिपिनो नेवादासी दामास्नया । ! रातानी राजनाथ मयःfrare ! पीतारमभाग. ४ मगर उसमन प्रतिना प्रतेन सानो गयनो एमिनो। सत्र म काम्नी सारसमनि।
प्रायश्चित्ताध्याय माशाचप्रकरण १ (४३७) ऑको प्रतके वि प्रतिऑको यज्ञक विषं या पद-दाने .७ विवाहे ७ यज्ञे ५ चा-सं- ज्ञिकोंको कारु कर्ममें कारुको आशौच नही ग्रामे ७ देशविप्लवे ७ आपदि ७ अपिऽ-हि होता ऐसा कहने से जिसका जो नियत कर्म कष्टायां ७ सद्यः १ शौचं १ विधीयते कि- है उसीमें आशौचका अभाव दिखाया है योजना-ऋत्विजां-दीक्षितानां चपुनः य- शातातपकी स्मृति में भी कहा है कि मूल्प) ज्ञियं कर्म कुर्वता-सन्त्रिप्रतिब्रह्मचारिदाह- कर्म ( नोकरीके) करनेवाले शूद्र-दासी- ब्रह्मविदां-चपुनः दाने-विवाहे-यज्ञे-संग्रामे दास-पे खान-शरीर संस्कार-और गृहका देशविलंब (एषां विषये) हि- (निश्व- कर्म (लेपन आदि ) इनके करनेमें दूषित येन) कष्टायां आपदि सत्यां अपि सद्यः नही होते यह दास आदिकी शुद्धि जिसका शौचं विधीयते ॥ परिहार न होसके अर्थात् जिसको अन्य तात्पर्यार्थ-जिनका वरण होगयाहो ऐसे कोई न करसके ऐसे प्राप्त स्पर्शके विपमें है । यज्ञमें होम करनेवाले ऋत्विज जिनको यह बात समझनी इसीसे स्मृत्यंतरमें लि- यज्ञमें दीक्षादीहो ऐसे- दीक्षित यज्ञके कर्म खाह कि गर्भदास (जो अपनी दासीमें पैदा करनेवाले इनको सद्यः शौच होता है- य- हो) सद्यःस्पर्श करने योग्य और भक्त ' द्यपि यहां वैतानोपासनाः कार्याः इस वच- दास (जो अपना भोजन खाता हो ) तीन नसे दीक्षितको अधिकार सिद्धथा तथापि- दिनमें शुद्धिके योग्य होता है-तैसेही यह । पुनः दीक्षित शब्दका ग्रहण यज्ञ कराने- वचन है कि जो चिकित्सक (वैद्य) जिस | वालों में स्वयंकर्तृत्वका विधान( खुद करना) कर्मको करता है उसको अन्य नहीं कर और सद्यःस्तानकी अविधि (अभाव ) के सक्ता इससे चिकित्सक नित्यस्पर्श करनेके लिये है-सत्रि शब्दसे अन्न सत्रमें जो प्रवृत्त लिये शुद्ध होता है। भावार्थ-महीपति-विजलोसे वा गा ब्राह्मण उनका सन्ततानुष्ठान (निरंतर करना ) के के लिये जो मेरहे उनके सपिंडोंको , समान ग्रहण हे मुख्य सत्रियों को तो आ- शौचका अभाव दीक्षितके ग्रहणसेही सिद्ध, और जिसके अशोचाभावकी राजा इच्छा करे उन मंत्री आदिकोंको आशौच- है-यहां व्रती शब्दसे कृच्छ चांद्रायण बात नहीं होता ॥ २७ ॥ कव्रत आर प्रायश्चित्त तथा ब्रह्मचर्य व्रत ऋत्विजांदीक्षितानांचयज्ञियकर्मकुर्वताम् । इनके करनेवाले और श्राद्धके कर्ता और भोक्ता लिये जाते है-सोई स्मृत्यंतरमें लिखा सत्रिवतिब्रह्मचारीदाब्रह्मविदांतया २८॥ है कि नित्य अन्नके देनेवाला कृच्छ्चांद्रायण पद-ऋत्विजा - दीक्षितानां ६ च को करनेवाला-कृच्छ्र होम आदिमें प्रवृत्त- यज्ञियं २ कर्म २ कुर्वतां ६ सत्रिवातेब्रह्म- भोजनमें प्रवृत्त ब्राह्मण आदि ब्रह्मचर्य चारिदाब्रह्मविदां ६ तथा:- १ नित्यमनप्रदायापि कृच्छ्रचांद्रायणादिय निहते- दानेविवाहेयज्ञेयसंग्रामेदेशविप्लवे । आपपिहिकप्टायांसयःशौचविधीयते २९ नियमस्वापि तस्मादन्यस्य कस्यचितानिमत्रितेपु विग्रेट कृच्छ्होमादौ प्रामादिषु भोजने । क्षत १ मूल्यकर्मकराः शूमा दासी दासास्तथैव चालाने प्रारब्धे श्राद्धकर्मणि । निमंत्रितस्य विप्रस्थ शरीरसंस्कार पद्दकमण्यटूषिता । स्वाध्यायाद्विग्तस्य च । गेह पिटपु तिष्टत्सु २ चिकित्सको यत्कुरते तदन्येन न शक्यते। नाशौवं विद्यते क्वचित् । प्रायश्चित्तप्रवृत्तानां दाद- नामानिकिरसमा पर्षे शुद्धो भगति नित्यशः । । अझविदा तपा। . - १ (४३८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । आदि नियमवाला-निमंत्रित ब्राह्मण-श्राद्ध न्तरमें लिखा है कि जिसकी सामग्री इकट्टी कर्मका आरंभ जिसने किया हो और उसमें करली हो एसा यज्ञ और विवाह श्राद्धकर्म निमंत्रित ब्राह्मण-वेदके अध्ययनसे जो नि- इनमें सद्यः शौच होता है-विवाहका ग्रहण वृत्त हुआ हो-जिसके घर पितर बैठे हो- पूर्व प्रारंभ किए चूडा--यज्ञोपवीत-आदि प्रायश्चित्तके करनेवाले-आर दाता और संस्कारकाभी . उपलक्षण है-और यज्ञ श्रोत्रिय-इनको कदाचित् आशाच नही | ग्रहण-पूर्व प्रारंभ किए-कि देव प्रतिष्ठा आरा होता-सत्री-और व्रतीओंकी शुद्धि सब-म (बाग ) आदिका उत्सव इनका उपलक्षण और व्रतकेही विषयमें है कुछ अन्य स-है-क्योंकि यह विष्णुको स्मृति है कि ।। , मस्त कर्म वा व्यवहारके विषमें नहीं देवप्रतिष्ठा-उत्सर्ग-विवाह- देशकाउपद्रव- सोई विष्णुने कहा है कि व्रतीयोंको । अत्यन्तकष्टआपत्तिम आशौच नहींहोता-. व्रतमें और सत्रियोंको सनमें आशॉच नही । संग्रामके विर्षे आशीच नही होता अर्थात् होता ब्रह्मचारि-उपकुर्वाणक और नैष्ठिक संग्रामके विराजाकोसन्नद्ध कर इस आश्व- दोनों प्रकारके समझने और दाता शब्दस लायन आदिकी कही सन्नहन (तेयारी) विधि उसीका ग्रहण है कि जो नित्य दाताही हो के विष प्रस्थानके समय जो शान्तिहोम प्रतिग्रह न लेता हो ऐसा वैखानस (धानप्रस्थ) आदि किएजाते हैं उनमें सद्यःशुद्धि होती ब्रह्म (वेद ) के जानने वाला यति (सं-है-देशमें विस्फोर (शीतला )आदि उपसर्ग न्यासी ) इन तीनों आश्रमियोंकी सब वा राजाके भयसे जो उपद्रव हो उसकी कर्ममें शुद्धि हे विशेष कर्म के विषे कोई प्र- शान्तिके लिए जो शान्तिकर्म किए जाते हैं माण नही पूर्व जिसका संकल्प कर लिया | उनमेंभी शुद्धिसद्या होती है-विप्लवक अभा- हो ऐसे द्रव्य देनेमें आशोच नही होता- वर्मभी कहीं देश विशेपसे पटीनसि ने कहाँहे क्योंकि कतुकी स्मृति है कि पूर्व संकल्प कि विवाह यज्ञ किला यात्रा और तीर्थ इनमें किया द्रव्य दिया जाय तो दोय नहीं- सूतक नहीं होता इनमें यज्ञ आदि कर्मको स्मृत्यंतरमें तो यहां विशेष कहा है कि करें-व्याधि आदिक जोरसे जो मरनेकी विवाह-उत्सव-और वृपोत्सर्ग आदि यज्ञक अवस्था प्राप्त होगईही इसमें जो पापकी विष जो अन्तरा- भाजनके मध्य ) जो शान्तिके लिये दान किया जाय धन आदिसे मृत्यु वा सूतक होजाय तो टस शेष (बा- ' संकुचित वृत्ति ( कंजूस ) होनेसे जो माता सगोच्छिष्ट ) अन्नको अन्य मनुप्यास दिवाव । पिता आदि कुटुम्ब क्षुधास अत्यंत व्याकुल , . दाता (स्वामी) और भोजन करनेवालोंका होनांगतो उनके उदरपोपणक निमित्त जो स्पर्श न कर-विवाह और यज्ञ शब्दसे जि-प्रतिग्रह लियानाय इनमें सद्यःशाच होता सकी पूर्व भोजन आदि सामग्री इकट्टी कर है पद्द सद्यःशाच जिसको सद्यःशाचर्क लोदी वह विवाह और यज्ञ लेना-सोईस्मृत्य- विना क्षुधा आदि पीडाको शान्ति नहीं हो १ यो माममारे विगंद पाटुकामगि । प्रतिनो मते में सत्रिणो सप्रे । २६ वनिसर्गविवाहपु २ देशांचन २ सयांपत इन दीयमानं न टुप्पनि । नापति ग यसमा ३ विगाहोरमायादिषन्तरा मृतस्तक । शेर- ३ शिशरद गोधु पात्रायो सायरमाण । नय मन परेन दान मानधन स्पृशेत् । सासारफर्म या पारंगत।
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचप्रकरण १ (४३९) ऐसे अश्वस्तनिक (जो एक दिनके निर्वाह चाल ब्राह्मणको एकदिन आदिसे शुद्धि मात्र अन्नसंग्रह करें )के विषयमें है-जिसके कर्मसामान्यमें प्रतीत होती है इस कर्म एक दिनको उदर पूर्णाके लिए संचित सामान्यमें शुद्धि तुम इष्ट क्यों नहीं मानते धन होटसको एक दिनका-तीन दिन के लिए उसका यह समाधान करते हैं कि शाव होयतो तीन दिनका -वार दिनके लियेहो , आशौच सपिडोंको दशदिन होता है इस उसको चार दिनका और कुसूलधान्यको | वाक्यसे जो दशदिनका आशीच सामा- दश दिनका आशौच होता है-इस प्रकार न्यसे प्राप्तथा उसको बाध करता हुआ जिसके जितने काल क्षुधा आदि पीडाका | ब्राह्मण एक दिनमें शुद्ध होता है यह वाक्य अभाव रहै तिप्सको उतने कालतक आशौच विशेष आशौचका विधायक है-बाधक होने में रहता है-श्योंकि आशीचके संकोचमें अनुपपत्ति अर्थात् समस्त अपने विषयमें आपत्ति उपाधि (कारण) है-इसीसे मर्ने सामान्य वाक्यकी प्रवृत्ति होनेसे अपने विष- न (अ०४ श्लो० ७) कुसूलधान्यक और यमें चरितार्थ न होना कारण है इससे कुंभीधान्य वैदिक और अश्वस्तनिक गृह- जितने विषयमें बाध्यको विना बाधे अनुप- स्थीहो इस श्लोकसे गृहस्थीको चार प्रकारका पत्तिका क्षय नहीं उतने विषयमें बाध्य बाधा कहकर इसी अभिप्रायसे सपिण्डोंको दश जाता है इससे अब यह अपेक्षा हुई कि यह दिनका आशाच अथवा अस्थिसंचयतक | ( एकाहाब्राह्मणःशुध्येत् ) वाक्य कितने वा तीन दिनका वा एक दिनका आशीच विषयमें बाध्यको बाधकर चरितार्थ होगा तो होता है यह चार कल्प आशौच के इसी वाक्यमें अग्नि और वेदसे युक्त ब्राह्मण प्रतिपादन करे हैं और जो किसी स्मृ- दशदिनमे शुद्ध होता है इस विशेषके देख- तिमें समानोदकोंको यह तीन प्रकारका नेसे अग्निहोत्र कर्म और स्वाध्याय इन दोनों जो संकुचित आशौचका कल्प दिखाया है | विषयोंमेही बाध्यको बाधकर इसकी चरि- कि पक्षिणी (दो दिन एक रात ) एकदिन- । तार्थताको अवस्थिति प्रतीत होती है इससे वा सद्यःशाच समानोदकोंको है वहभी इसी यह वाक्य अग्निहोत्र और स्वाध्याय इन वृत्तिकै संकोचसे समझना-यह आशौचका विशेष कामेही एक दिनके आशौचका संकोच ( कमकरना ) जिस प्रतिग्रह आ- | विधायक है अन्य दान आदि कर्मके दिक विना आर्ति हो उसके विषय है अन्य । विषयमें नहीं-क्योंकि अपने विषयमें चरि- कर्ममें नही कदाचित् कोई शंका कर कि | तार्थहुए पीछे अचरितार्थतारूप जो अनुप- अध्याधान और वेद करके युक्त ब्राह्मण एक पत्तिथी उसका क्षय होगया तो फिर अन्य दिनमें और केवल वेदके पढनेवाला तीन । विषयमें वाध्यकी प्रवृत्तिको यह पचन दिनमें और इन दोनास रहित दशदिनमें नहीं हठासक्ता-इस बातके सिद्धहुए शुद्ध होता है इत्यादि अन्यस्मृतियांक देख- पाछे अग्निवेद समन्वित इस पदमें अग्नि नेसे वेदाध्ययन अग्न्याधान आदिके करने और वेद पदका एक दिन आशाचरूप जो २ कुसुलधान्यको वास्यात्कुभाधान्यक एवं वा । कार्य है उसमें अन्वय है अर्थात् अग्नि यहदिकोवापि भवेदश्वस्तनिक एव वा । दशाहशाव- आदि कर्ममें एक दिनका आशौच है यह माशीच मापण्डेषु विधीयते । अनि सचयनादस्मा अर्थसिद्ध हुआ-अन्यथा जिसने अग्निसाध्य ध्यइमेकाइमेत्र या । कर्म कियाहो उसकी एक दिनमें शुद्धि . ।
(४४.) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । होती है इस पुरुष विशेषका उपलक्षण आदिमें अन्वय होता है अथवा क्रियाको अमि और वेद होजाता-जो की विरोध कृतक्रिय अर्थात् आशीचकालतक उदक आदिके होनेसे त्याज्य है- जबकि अग्नि- आदि कर्मको करके पीछे ब्राह्मण आदि और वेदपद कार्यान्वयी हुए तो इस वाक्यकी जल आदिका स्पर्श करके शुद्ध होता इन मनुके वाक्योंसे एक वाक्यता सिद्ध हुई है यह स्पर्श आशौच कालके अनंतर जो कि अग्निामें होम आदि अनुष्ठानको करे स्नान होता है उसका प्रतिनिधि समझना- और वेदमें कही हुई वैतान अग्निकी उपासना भावार्थ-ऋत्विज-दीक्षित-यज्ञके कर्मके करे. तथा ब्राह्मणको स्वाध्यायकी निवृत्तिके करनेवाले-सत्री-प्रती-ब्रह्मचारी-दाता श्री- अर्थ सद्यःशीच होता है-और इन दश दिन त्रिय-इनको और दान-विवाह-यज्ञ-संग्राम- पर्यंत भोजन आदिके प्रतिषेध करतेहुए देशोपद्रव-और अत्यंतकष्ट-इनमें सद्यः, यम आदिके वचनोंके संग विरोधका परिहार | शौच होता है।।२८॥२९॥ भी सिद्ध हुआकी दोनों आशौचोंमें दशदिनत उदक्याशुचिभिःस्रायासस्पृष्टस्तै- क कुलके अन्नको नखाय-इससे यह आशो- रुपस्पृशेत् । अब्लिंगानिजपे- चके संकोचका विधान किसी कर्म विशेषमें चैवगायत्रीमन तासकृत् ॥ ३० ॥ हैसब व्यवहारोंके विषय में नहीं-अब हम इस पद-उदक्याशुचिभिः ३ वायात् क्रि- प्रपंचो समाप्त करते हैं यह सद्यःशौचका विधान बहुत वेदके पढनेवालेकी वेदके निरजपेत् क्रि-चा- संस्पृष्टः १ तः ३ उपस्पृशेत् क्रि-अदिलगा- -एवा-गायत्रारमनसा३ त्यागनेसे उत्पन्न हुई पीडाके विषयसमझना सकृत् ॥ अन्यको तो यह प्रतिषेधही है कि दान- योजना-उदक्याशचिभिः संस्पृष्टः सन् प्रतिग्रह होम और स्वाध्याय निवृत्त हो मायात् तैः ( संस्पृष्टैः) संस्पृष्टः सन् उप- जाते हैं-इसी प्रकार ब्राह्मण आदिके मध्यमें स्पृशेत चपुनः अलिगानि मंत्राणि तथा जिसको जितने कालका आशौच कहा है। मनता गायत्री सकृत् जपेत् ।। वह उस कालके अनंतर इन स्नान आदिसे तात्पयार्थ-उदक्या ( रजस्वला ) और शुद्ध होता है केवल कालकेही व्यतीत हो- | शव ( मुर्दा ) चाण्डाल ( भंगी ) पतित नेसे नहीं जैसे कि मनु ( अ०५ श्लो०९२) (कलंकीआदि) सूतको तथा शावाशीची ने कहा है कि प्रेत क्रियाक किएपीछे (मृतकसूतकी ) इनको छूकर स्नान करें स्नान करके हाथसे जलका स्पर्श करके और इन रजस्वला आदिके संग भिटहुएको शुद्ध होता है क्षत्रिय अपने वाहन ( घोडा छ्कर आचमन कर-आचमन किए पीछे दि) और अस्त्रोको कर वैश्य स्थकी र- आपोहिष्ठामयोभुवः इत्यादि तीन ऋचा- स्सी वा प्रतोद ( कोडा) को छुकर और आंको जप-तीनके बोध करनेसे बहुवचन शद्र यष्टिकाको छकर शुद्ध होता है-यह | चरितार्थ हो लिया इससे तीन ऋचाआका स्पृश्ता इस पदस स्पर्शही लेंत हैं नान और ग्रहण है-तथा मनसे एकवार गायत्रीको आचमन नही क्योंकि इसी पदका वाहन जपे-यहां कोई यह शंका करें कि उदक्या- .१दानं प्रतिपदो होमः स्वाध्याय निवर्तते । संस्पृष्टः स्नायात् यहां संस्पृष्टः जो यह एक २ वि: शुयलयः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुध । | आपोहिष्ठामयो भवः। तानउनें दधात नः। म- वश्यः प्रतोद रस्मीता याट शरः कृतत्रियः। देरणाय चक्षसे । म प्रायश्चित्ताभ्यायं आशौचमकरण १ (४४१). वचनसे वोधन किया है उसका (तैः तिनेभी कहा है कि-मेथुन-और कट इस बहु वचनसे परामर्श कैसा किया तो (चिता )के धूआंके लगनेमें सद्यः स्नान इसका यह उत्तर है कि जो रजस्वला आ- कर सो यह स्नानमात्रका विधान जो वस्त्र न दिसे स्पर्श किए गए हैं उनसे भिन्न जो पहिनेहो ऐसे मनुष्यसाथ स्पर्शके विषयों मानके योग्य हैं उन साँके साथ स्पर्श है-और सचैल चितिस्थ आदिके साथ स्पर्श करनेमेंभी आचमन करना इससे यह (तैः) होजान तो सचेलही स्नानका विधान है- बहुवचनका निर्देश है इससे विरोध नहीं- सोही च्यवनेने कहा है कि श्वान-चाण्डाल- वे स्नान के योग्य अन्य स्मृतियोंसे समझने-चिताका धूम्न ब्राह्मणादिक दानके लिए. - पागशेरने जैसे कहा है कि दृष्ट्र स्वप्न जो द्रव्य है उससे जोवे-ग्रामयाजी- के देखने में मेथुन-वमन विरेचन और क्षार कर्मके करानेमे तथा चिति-(चिता ) यूप सोमविक्रयो-यूपचिति ( प्रेतके स्तंभका (प्रेतकास्तंभ) और श्मशान इनमें स्थिर चबूतरा ) चिताका काष्ठ-मदिरा-मदिराका मनुष्यके साथ स्पर्श करनमें स्नान कर पात्र-स्नेहयुक्त मनुष्यका अस्थि-मुर्दे से भि- सोई मनु (अ०५ श्लो० १४४ )ने कहा यहुआ-रजस्वला-महापातकी- ( कलंकी है कि वमन और रेचन निसने किया हो आदि ) और शव (मुर्दा) इनको छूकर वह मनुष्य स्नान करके धीको खाय-और वस्त्रोंसहित जलमें गोता लगा फिर निक- अन्नको खाकर आचमन करे तथा जिसने लकर अग्निका स्पर्श करके आठवार गाय- मैथुन किया हो वह स्नान करें-मैथुन करने त्री जपे-धाको खाकर फिर स्नानको करकर वालेको स्नान ऋतुकालके विषयमें है क्योंकि तीनवार-आचमन करे-यह प्रायश्चित्त जान- यह बृहस्पतिकी स्मृतिहै कि ऋतुसे भिन्न- कर स्पर्शके विषयमें है-अज्ञानसेतो स्नान समयमें गमन करनेवालेको मूत्र विष्ठाके | मानसे शुद्धि होजाती है क्योंकि बृहस्पतिकी समान शौच करना-अनृतु (ऋतुसे भिन्न ) स्मृति है कि शवसे स्पर्श कियाहुआ मेंभी काल विशेषसे स्नान स्मृत्यन्तरमें कहा दिवाकीर्ति (दिनका आशीची ) चिति- है कि अष्टमी चतुर्दशी दिन और पर्व इनमें यूप-और रजस्वला-इनको विनाजाने छूकर मेथुन करके सचैल स्नान कर वारुणी ऋचा स्नानसे ब्राह्मण शुद्ध होता है-इसीप्रकार आसे माजन करेसोई यमने कहा किअजीर्ण- वक्ष्यमाण वचनोंमेंभी विषयोंकी समानता अभ्युदय-वमन-इनमें सूर्यके अस्त होनेक समय खोटे स्वप्रके देखने में-दुर्जनके साथ स्पर्शक- रनेमें स्नानमात्रको करै-तिसीप्रकार वृहस्प १ मथुने कटधूमे च सद्यमान विधीयते । 1 दुग्गी मथुने वान्ते विरित क्षरकर्मणि । २ श्वान श्वपाक मैतधूम्र दैवद्रव्योपजारिन प्राम- चितियूपश्मशानस्थस्पर्शने स्नानमाचरेत् । याजित सोपवित्रपिणं अपचिति चितिकाष्ठ मद्य । २ वान्ते विरिक्त स्नात्वा तु घृतमाशनमाचरेत् । मद्यभाण्ड सह मानुपास्थि शवस्पृष्टं रजस्वला महापा- आचामेदेव भुक्तान लान मैथुनिनः स्मृत। तकिन शव दृष्ट्वा सचेलमभावगायोत्तीर्यामिमुपस्पृ- ३ अन्तौ तु यदा गच्छेच्छौच मूत्रपुरीषवत् । ४ अभ्यां च चतुर्देरणा दिवा पर्वणि मधुनम् । दय गायत्रीमनार जपेत् घृतं पाश्य पुनः मावा छत्वा मलं स्नात्वा च वाणीमिश्च मार्जयेत् । त्रिरावामित्। ५ अजीणेऽभ्युदिते वान्त तथाप्यस्तमिते रखा। ३ शवसृष्ट दिवाशीति चितिं यूपं रजस्वला । दुःस्वप्ने हुनस्पद सातमात्र विधीयते ॥ स्पृशा वकामतो विप्रः स्नानं कृता विशुध्यति । । ३ (४४२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । समझनी-सोई कश्यपैने कहा है कि उदय चाण्डाल और पतित इनको दूरसेही वर्ष और सूर्यास्तके समय वीर्यस्स्वलन करके दे और गोके चवरके पवन लगनेसे पहिले अक्षिस्पंदन (आंख फेरना) कर्णाक्रोशन- वोसहित जलमें प्रवेश करे-अर्थात गाके (कानमें शब्द करना)चित्यारोहण (चितापर वालोंका स्पर्श होजायतो उनसेही शुद्धि हो चढना) और यूप (प्रेतका स्तंभ )के स्पर्श सकती है-यहभी अत्यंत संकटमें समझना करनेमें सचेलस्नानको करके-पुनर्माम अन्यत्रतो वृहस्पतिने कहा है कि चांडा- इत्यादि ऋचाको जपे फिर-महाव्याहति | ल-सूतिका-उदक्या-पतित-इनके स्पर्शमें , (ॐभूः स्वाहा इत्यादि )योंसे सात घीकी | एक-दो-तीन-चार-युगोंतक क्रमसे नरक आहुतियोंसे होम करे-सोई स्मृत्यन्तरमें | होता है-तिसीप्रकार पेठीनसिनेभी कहा है. लिखा है कि देवलकको छूकर वस्त्रांसहित कि काक और उल्लूके स्पर्श करनेमें सचेल जलमें कूद-देवलक वो होता है जो तीनवर्ष नान और जलकेविना मूत्र और पुरीषके धनके निमित्त देवताको पूजामें तत्पर रहै करनेमें सचैल स्नान और महाव्याहृतियोंसे वह सब देवकर्म और पिरकर्ममें निंदित होम करै-विनाजलके मूत्र आदि करना यह है-तैसेही ब्रह्माण्डपुराणमें लिखा है कि वचन जो मनुष्य चिर (बहुत )कालतक शेव-पाशुपत लोकायतिक-तथा नास्तिक- मूत्र वा दिशा जाकर आशौच न कर उसके विरुद्धकर्मके करनेवाले द्विज और शूद्र विषयमें है-अंगिरानेभी कहा है कि उल्लू- इनको छूकर सचैल जल में प्रवेश करे शूद्र- | काक-विलाव-गधा-ऊंट-कुत्ता और सू- के स्पर्शमें निषेधविधायक यहभी प्रमाण है कर-और अमेध्य द्रव्यको छूकर . सचेल कि शूद्रके स्पर्शसे दूपित हुई शवरूपी आ- जलके बीचमें प्रवेश करै मारिके स्पर्शका हुति स्वर्गदायक नहीं होती-तिसीप्रकार सान उच्छिष्टके समय-वा अनुष्ठानके सम- अंगिरानेभी कहा है कि-जो ब्राह्मण चाण्डा- यके विषयमें समझना-क्योंकि वह घरमें लकी छायामें बैठे तो स्नान और धृतप्राशनसे बेरोक फिरता रहता है-अन्यसमयके विष शुद्ध होता है-व्याघ्रपोदनेभी कहा है कि तो इस वचनसे स्नानका अभावही है कि. १ उदयारतमययो: स्कदयिता अक्षिपदने मार्जार कडछी और पवन ये सदाशुद्ध रहते कर्णाकोशने चिन्यारोहणे यूपस्पर्शने च सचैल है-कुत्ताके स्पर्शमें नाभि (टूंडी )से ऊपर स्नान पुनर्माम इति जपेत् महाव्याहृतिभिः सप्ताया- यदि स्पर्श होयतो सान समझना यदि हुतीर्नुहुयात् । स्पृष्ट्वा देवलक चैव मवासा जलमा- नाभिसे नीचे स्पर्श करलेतो जल छिकडनेसे, विशेन । देवार्चनपरो विप्रोवित्तार्थे वरसरत्र५ । असो दे- शुद्ध होजाता है क्योंकि उसीने कहा है वलको नाम हव्यकव्येषु गार्हतः । २ौगान् पाशुपतान् स्पृट्या लोकायतिकनास्ति- कि नाभिसे ऊपर यदि हाथोंसे अतिरिक्त कान् । विकर्मस्थान द्विजान् शूदग्न् सवासा जलम १ युगं च युिग चैव नियुग च चतुर्युगे । चा- पहालसूतिकदिक्यापतितानामधःकामात् । ३ अस्वगर्या बाहुतिः सा स्याटूसंपर्फपिता। २ काकोलूकस्पर्शने - सचैलं नानमनुदकमब- ४ यस्तु छायां वपाकस्य ब्राह्मणो त्यधिरोहति । पुरीपकरणे सर्चलं नान महाशाहतिहोमध । तत्र मान प्रकुर्वीत घृतं प्राश्य विशुद्धयति । ३ भासवायसमार्जारखरोष्ट्र च यशकरान् । अमे- ५ चाण्डाल पतितं चैव दतः परिवर्जयेत् । गो-! ध्यानि च सस्पृश्य सचैल जलमाविशेत् ।' वालव्यजनादाक सवामा जसमाविशेत् ॥ ४ मार्जारश्चैव दर्श च मारतश्च सदादादिः.. । विशेत् । ।
(४४४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । हड्डीके स्पर्शमें तो विष्णुने कहा है कि जो कि देवलको वचन है कि अशुद्धसे स्पर्श कि भक्ष्य नहीं है ऐसे पांच नखवाले मरे जीवको | येहुये तीसरे मनुष्यका स्पर्श करके मनुष्य वा उसकी नेहसहित इडीको छूकर जलसे हाथ पाओंको धोकर आचमनसे शुद्ध स्नान करें और पहिले वस्त्रोंको धोकर होता है-अशुद्धके साथ जो रजस्वला आदि पहरे-इसी प्रकार अन्यभीस्नानाईस्मृत्यन्त- स्पर्श करै तो उसमें विशेष देवलने कहा है रसे समझने-इस प्रकार स्नानाहोंके बहुत कि चाण्डाल-पतित-व्यंग (जिसका अंग- होनेसे उनके अभिप्रापसे जो (तैः) यह विगडगयाहो ) उन्मत्त-शवके लेजानेवाला- वचन श्लोकमे लिखा है उसमें विरोध नहीं सूतिका-जिसके सन्तति हुई हो वह सा- है-(उदक्याशुचिभिः स्नायात् ) यह वचन विका-रजस्वला-ग्रामके कुत्ता-मुर्गा-शंकर चाण्डाल आदि अचेतनव्यवधान (श- इनको छूकर मनुष्य वस्त्रोंसहित शिरतक वका साक्षात स्पर्श नहो )के स्पर्शमें सम-नान करनेसे उसी समय शुद्ध होजाता है- झना चेतन व्यवधानमें तो मनु (अ५ और स्वयं अपि अशुद्ध मनुष्य इन अशुद्धों श्लो० ८५)ने यह कहा है कि दिवाकीर्ति- का यदि स्पर्श करे तो उपवास वा कृव्रतसे रजस्वलापतित-मुर्दा-इनको वाउनके छूने- शुद्ध होता है यहां कृच्छ्वत श्वपाक आदिके वालेको छूकर म्नानते शुद्ध होता है तृतीय स्पर्शम है-और कुत्ता आदिसे स्पर्श करे तो (चाण्डालसे भिडेहुए मनुप्यका जो स्पर्श । उपवासही करना-यह व्यवस्था है ॥ कर उसको छूनेवाला )की आचमन मात्रसे भावार्थ-रजस्वला और अशुद्ध पतित ही शुद्धि होती है क्योंकि संवर्तका वचने है आदिसे स्पर्श करे तो स्नान और स्पर्श किए कि पतित आदिसे भिडेहुएकाही जो स्पर्श हुएको जो छूवे वह आचमन-आपोहिष्ठा कर उसकोही स्नान फिर आचमन-और इत्यादि ऋचा-और मनसे एकवार गायत्रीका द्रव्योंका प्रोक्षण (छिडकना) इनकी विधि जप करे ॥ ३० ॥ है-यह अज्ञान पूर्वक स्पर्शके विषयमें है और जो जानके छुवे तो स्नानही करना जैसे कि कालोमिकर्ममृद्वायुमनोज्ञानंतपोजलम् । गौतमनें कहा है कि पतित-चांडाल-सूतिका पश्चात्तापोनिराहारःसर्वेमीशुद्धिहेतवः ३१ रजस्वला-शव-इनके स्पर्श करनेवाला-और| पद-कालः १ अग्निः १ कर्म १ मृत् १ इनसे स्पृष्टका स्पर्श करनेवाला मनुष्य । वायुः १ मनः १ ज्ञानं १ तपः १ वलं १ सचेल जलमें स्नानसे शुद्ध होता है-और पश्चात्तापः १ निराहारः १ सबै १ अमी १ चौथे मनुप्यकी तो आचमनसे शुद्धि है-क्यों-.. शुद्धिहेतवः १॥ 1 दिवाकीतिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा। शत्रं । हस्तौ पादौ च तोयन प्रक्षाल्यावम्य शुध्यति । १ उपस्पृश्शशुचिस्पृष्टं तृतीयं वापि मानवः । तस्पटिन चैव स्पृष्टया स्नानेन शुद्धयति । २ तमेव तु स्पृशेयस्तु स्नान तस्य विधीयते । उर्व । साविकां नारी रजसा च परिप्रताम्। श्वकुकुटवराहांश्न २ श्वगाऊं पतितं व्यगमुन्मत्तं शवहारकं । मूतिका माचमन प्रोक्त द्रव्याणां प्रोक्षणं तया । प्रामान संस्पृश्य मानवः। सचैलः सशिरःखातातदानी ३ पतितचाण्डालमृतिकोदक्याशवस्पृष्टितस्पृश्युप- मेव शुध्यति । अशुद्धान् स्वयमप्येतानशुद्धस्तु यति पर्शने सलमुदकोपस्र्शनाच्छुद्धयेत् । स्पृशेत् । विशुद्धयत्युपवासन तथा कुद्रेण वा पुनः ।
प्रायश्चित्ताध्याय आशौचमकरण १ + न्मनां ६॥ : योजना-कालः अग्निः कर्ममृत वायुः भावार्थ-काल-अग्नि-कर्म-मट्टी-पवन- 'मनः ज्ञानं तपः वलं पश्चात्तापः निराहारः | मन-ज्ञान-तप-जल-पश्चात्ताप निराहार-ये अमी सर्वे शुद्धिहतवो भवंति ॥ सब शुद्धिमे कारण होते हैं ॥ ३१ ॥ तात्पर्यार्थ-जैसे ये सब अग्नि आदि | अकार्यकारिणांदानंवेगोनद्याश्वशुद्धिकृत् । अपने विषयमे शुद्धिके कारण हैं तिसी प्रकार शोध्यस्यमृचतोयंचसंन्यासोबैद्विजन्मनाम् दशरात्र आदि आशीचकालभी शुद्धिका हेतु. पद-अकार्यकारिणां ६ दानं १ वेगः १ है-शुद्धिको कारणताशास्त्रसे जानी जाती है इससे उसीको दिखाते हैं-अग्नि जिस प्रकार नद्याः ६ चा-शुद्धिकृत् १ शोध्यस्य ६ मृत् शुद्धिका हेतु है वह पुनः पाकान्महीमयं १ चा-तोयं १ चा-संन्यासः १ वै-द्विन- अर्थात मट्टीका पात्र फिर पकानेसे शुद्ध हो ताई इत्यादि पूर्व कहआए कर्म जैसे शुद्धिका | तपोवेदविदांक्षांतिर्विदुपावर्मणोजलम् । हेतु है वह अश्वमेधावभृतस्नानात् अर्थात् जपामच्छन्नपापानांमनसःसत्यमुच्यते ३३ अन्वमेधके यज्ञातस्त्रानसे शुद्ध होता है पद-तपः १ वेदविदां ६ क्षांतिः'१ इत्यादिसे कहेंगे मट्टीकोभी शुद्धिमें कारण | विदुषां ६ वर्मणः ६ जलं जपः १ प्रच्छन्न इत्यादि वचन दिखाय आये कि शुद्धि के लिए पापानां ६ मनसः ६ सत्यम्१ उच्यते क्रि-॥ भस्म और मट्टी इनसे मांजकर जलसे धौवे- वायु जैसे शुद्धिका हेतु हे वहभी मारुतेनैव | भूतात्मनस्तपोविद्येबुद्धेर्ज्ञानविंशोधनम् । 'शुध्यन्ति अर्थात् पवनसेही शुद्ध होते हैं | क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञानाद्विशुद्धिःपरमामता ३४॥ इत्यादि वचनसे पूर्व कह आए-मनभी पद-भूतात्मनः ६ तपोविये १ बुद्धः ६ वाणीको शुद्धि में जिस प्रकार हेतु है वहभी | ज्ञानं १ विशोधनं १ क्षेत्रज्ञस्य ६ ईश्वर- मनसा वा इपिता वाग्वदति इत्यादिसे कह ज्ञानात् ५ विशुद्धिः १ परमा १ मता १॥ आए-आध्यात्मिक ज्ञान जैसे बुद्धिकी शुद्धिमें योजना-अकार्यकारिणां-दान-नद्याः वे- आदिकारण है वह क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञान त् गः-चपुनः शोध्यस्य मृत्-तोयं वै इति इत्यादि वचनसे आगे कहें गे- कृच्छ्र आदि निश्चयेन द्विजन्मनां संन्यासः शुद्धिकृत- तप जैसे हेतु है वहभी प्राजापत्यं चरेत्कृच्छं तथा-वेदाविदांतपः-विदुषां शान्तिः वर्मणः समोवा गुरुतल्पग इत्यादि वचनसे आगे जलं- प्रच्छन्नपापानां जपः-मनसः सत्यं दिखावेंगे-जैसे जलभी शरीर आदिकी शुद्धिकृत उच्यते ॥ भूतात्मनः तपोविद्ये शुद्धिमें हेतु है वहभी वर्माणो जलं इत्यादिसे विशोधने स्तः-बुद्धानं विशाधनं भवति- दिखावेगे-पश्चात्ताप जैसे शुद्धिका हेतु है वह क्षेत्रज्ञस्य (जीवस्य) ईश्वरज्ञानात् परमा ख्यापनेनानुतापेन अर्थात् पापके प्रकट कर- | विशुद्धिःमता ॥ नेसे और पश्चातापसे शुद्ध होता है इत्या- दिसे कह आए-निराहार जैसे शुद्धिका तात्पर्याय-अकार्यकारी अर्थात् निषिद्धके कारण है वह आगे तीनरात्र उपवास करके सेवन करनेवाले मनुष्योंका दानही मुख्य जपकरे इत्यादिसे कहगे ॥ शुद्धिका हेतु है जैसे कि पात्रको पूर्ण धन देकर कहेंगे इत्यादिसे आगे प्रीम आदि १ सटिल भस्म मृद्वापि प्रक्षेप्तव्यं विभुये। ऋतु अल्प जलके होनेसे जिसके तीरपर .
(४४६)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
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अमेध्य वस्तुका संसर्ग होगयाहो ऐसी न-वस्थाओंमें आत्माकातो अन्वय-(होना)
दीका वेग अर्थात् फूलको तोडनेवाला जो ! और शरीर भादिका-व्यतिरक ( न होना)
जलका प्रबाह. है वह शुद्धिका हेतु है- वह कहते हैं जैसे तपसे ब्रह्मक जाननेकी
शोध्य द्रव्यका मट्टी और जल शुद्धि करने- इच्छाकर इसे पंचकोशसे भिन्न आत्माके
वाला हे जसे कि यह कहाँ है अमेध्यसे | बोधकवाक्यमें पूर्वोक्त,आत्माका अन्वय व्य-
संसृष्ट द्रव्यकी मट्टी और जलस जव उसकी : तिरेक, लेते हैं-विद्याशब्दसे त्वंपदार्थका
गंध निकलजाय तब शुद्धि होती है- 'निरूपण है विषय जिसका ऐसे उपनिषदके
संन्यास द्विजोंके मानसकर्मका शुद्धि कर | वाक्यसे उत्पन्न हुआ जो-युह मात्मा न
नेवाला है-तप अर्थात् वेदाभ्यास वेदक- स्थूल है न सूक्ष्म है-न ह्रस्व है न किसीसे
ज्ञाताओंका शुद्ध करनेवाला है-कृष्ठ आदि संबंध रखता है-इस प्रकारका ज्ञान वह
सवकी शुद्धि कारण है केवल वेदके जा- लेते हैं-इन दोनोंस इस शरीरकी शुद्धि
ननेवालोको नही-वेदके अर्थके जाननेवा- होती है शरीर आदिको व्यतिरेक बुद्धि जो
लोंकी क्षमा शोधकह-वर्म अर्थात् शरी- संशयविपर्ययरूप होनेसे अशुद्ध हुई उस
रका जलशोधक है-जिनोंने अपने पापको का प्रमाणरूप ज्ञान शुद्धिका कारण है-
प्रकट नहींकिया है ऐसे प्रच्छन्न पापोंका तप और विद्यासे शुद्ध हुआ त्वं इस पदका
अघमर्षण आदि सूक्तका जप शुद्धिका सा- अर्थरूप जो क्षेत्रज्ञ है उसकी तत्त्वमसि
धन है-सत् ( श्रेष्ठ ) असत ( दुष्ट ) इत्यादि वाक्यसे उत्पन्न हुआ समानाकार-
कर्मीका संकल्परूप जो मन है वह असत रूप ईश्वरका ज्ञान (जीवब्रह्मका अभेद ।
संकल्पके करनेसे अशुद्ध होजाता है उसका ज्ञान ) उससे मुक्तिरूप अत्युत्तम आत्माको
सत्य अर्थात् सत्य संकल्पही शुद्धिका हेतु शुद्धि होती है-भूतात्मा आदिकी शुद्धिका
है-भूत शब्दसें यहां उसके विकारदेह इंद्रि- अभिधान इसप्रशंसाके लिए किया है कि
योंका संबंध लेते हैं-उस देह और इंद्रियोंसे जैसे यह शुद्धि परमपुरुषार्थ रूप है इसी.
संबंध करके जो यह आत्मा इस अभिमा- प्रकार कालराद्धिभी अत्यंत युक्त है ।
नसे वर्तता है कि मैं स्थूलहूं-मैं कृशहूं भावार्थ-निषिद्धसेवियोंका दान-नदीका
मैं काणाहूं-मैं बधिरहूं-अर्थात् उन स्थूल वेग-शाध्यके मट्टी और जल-द्विजोंका
कुश आदि शरीर और इंद्रियोंके धर्मोको | संन्यास-वेदविदोंका तप-विद्वानोंकी क्षा-
अपने धर्म मानता है वह भूतात्मा (जीव)/न्ति-शरीरका जल-प्रच्छन्न पापोंका जप-
तप और विद्या (ज्ञान )से शुद्ध होता है- मनका सत्य-भूतात्माका तप-और विद्या-
यहां तपशब्दसे अनेक जन्मोंमें अथवा एक | बुद्धिका ज्ञान-और क्षेत्रज्ञका ईश्वरज्ञान-
जन्ममें जाग्रत्-स्वप्न-सुषप्ति-इन तीनों अ- परमशुद्धिका कारण हैं॥३२॥३३॥३४ ॥
। अमेध्याक्तस्य मृत्तोयैः शुद्धिगंधापकर्षणात् ।
१ तपसा ब्रह्म विजितवासस्त्र ।
इत्याशीचप्रकरणम् ॥ १॥
मायाश्चत्ताभ्याय आपदमप्रकरण २ (४४७). अंधापद्धर्मप्रकरणम् २ वृत्ति और वैश्य शूद्रवृत्तिको इन अपने . वर्णसे अनन्तर हीन वर्णकी वृत्तिकोही स्वी. क्षात्रेणकर्मणानीवेद्विशावाप्यापदिद्विजः । कार कर-क्योंकि वसिष्ठकी स्मृति है कि निस्तीर्यतामयारमानंपावयित्वान्यसेत्पथि॥ | अपने धर्मसे न जीतेहुए ब्राह्मण आदि अन- पद-मात्रेण ३ कर्मणा ३ जावेत् क्रि-न्तर होनवर्णकी वृत्तिसे जीवन करअपनसे विशां ६ वा-अपिs-आपदि ७ द्विजः १ | उत्तम जातिकी वृत्तिसे कदाचित् भी न जावे निस्तार्य:-तां २ अय:-आत्मानं २ पावयि- यहां ज्यायसी वृत्तिसे ब्राह्मणकी वृत्ति लेते त्वा:-न्यसत् कि- पथि ७ ॥ है-सोई स्मृत्यन्तरमें लिखा कि शूद्रको योजना-द्विजः आपदि अपि क्षात्रेण या उत्कृष्ट अर्थात् ब्राह्मण कर्मसे और ब्राह्मणक विशां कर्मणा जीवेत्-अथ तो निस्तीर्य आ- अपकृष्ट अर्थात् शुद्रके कर्मसे आजीवन स्मानं पावयित्वा पथि न्यसेत् ॥ न करना अन्य क्षत्रिय और वैश्यक कर्म आपत्ति कालमें सब वर्णोको तात्पर्यार्थ-मुख्य आशाचोंके कल्पोंका साधारण अनुष्टान न होसके तो आपत्तिकालमें शद आपत्ति कालमें वैश्यको वृत्ति-अथवा शिल्पकर्म ( कारीगरी )से जीवे-क्योंकि सद्यःशीच होता है इत्यादि वचनसे सद्यः शौच आदि कल्पको पूर्व दिखाया अब उस- यह पूर्व कह आये हैं शद्र द्विजोंकी शुश्रूषा के प्रसंगसे यह कहते हैं कि आपत्तिकालमें (सेवा ) करै यदि उससे न जौसके तो. द्विजातियोंके हितको करताहुआ वैश्य- प्रतिग्रहोऽधिकोविप्रे याजनाध्यापने तथा इत्या- कर्म वा अनेक प्रकारकी कारीगरीसे जीवे- दिवचनसे कहीहुई मुख्यवृत्ति न होसके मन (अ० १८ श्लो० १०. ) ने यहां कि- अन्यवृत्तिस आजीवन करे । शेष दिखाया है कि जिन किएहुए काँसे द्विज अर्थात् विप्र बहुत कुटुम्ब होनेसे अ- पनीवृत्तिसे जो आजीवन करनेको न समर्थ | द्विजातियोंकी शुश्रूषा होती है उन कार- कर्म और शिल्प कर्मोंको शूद्र कर-इसी होय तोक्षत्रिय संबंधी जो शस्त्र धारण आदि प्रकार अनुलोमोसे जो उत्पन्नभए हैं वेभी कर्म हैं उनसे आपत्तिकालमें जो-और उस कर्मसेभी जो जीवनेको न समर्थ होय तो अपनी जातिसे अनंतर वर्णकी वृत्तिसे जीव वैश्यक वाणिज्य भादि कर्मसे जोव-परंतु वर्णको वृत्तिसे आपत्तिको व्यतीत करके , यहभी समझना इस प्रकार अनन्तर हीन शूद्रको वृत्तिसे आजीवन न करे-सोई मने फिर प्रायश्चित्त करनेसे आत्माको पवित्र करें (अ० १० श्लो० ८२) ने कहा है कि यदि और पथि अर्थात् अपनीवृत्तिमें स्थापन करे- दोनों वृत्तियोंसे न जी सके तो कैसे करे इस अपेक्षासे कहा है कि कृषि वा गोरक्षा है कि निंदित वृत्तिसे इकठे किए धनको अथवा-पथि न्यसेत् इस वाक्यंका यह अर्थ रूपी कर्मको करके वेश्यकी वृत्तिसे जीव- अजीवन्तः स्वधर्मणानन्तरां पावसों वृत्तिमाति- तिसी प्रकार-आपत्तिकालमेंभी हीन वर्ण ठेरद् न कहाचिज्ज्यापसीम् । ब्राह्मणकी वृत्तिको कदाचित् स्वीकार न करे-किंतु ब्राह्मण क्षत्रियवृत्ति क्षत्रिय वैश्य मध्यमे कर्मणी हित्वा सर्वसाधारण हित । .उत्कृष्ट वापट या तः कम न विद्यते। उभाभ्यामप्यजीवस्तु कस्यादितिचेद्भवेत् । कृषि- गोरक्षमास्थाय जीवेश्यस्य जीविकाम् । ३ यः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूयन्ते निजाता। तानि कारककर्माणि शिपानि विविधानि च ।
(४४८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . त्यागदे-सोई मर्नु (अ० १० श्लो० १११) तात्पर्यार्थ-यहां फल शब्दसे बदर(धेर) ने कहा है कि याजन और अध्यापनसे और इंगुदके (गोंदी) फलोंको छोड कर किए पापको जप और होमसे और प्रति- अन्य कदलीफल ( केलाकी गैर ) आदि ग्रहसे किए पापको त्याग वा तपसे दूर करे॥ | लेते हैं-जैसेकी नारदेने कहा है कि अपने- भावार्थ-द्विज आपत्तिकालमें क्षत्रिय वा| आप वृक्षसे शीर्ण (झडे हुए पत्ते और वैश्यके कर्मसे जीव-फिर उप्त आपत्तिको फलोंमें वेर और इंगुद (गादी) रस्सी और . व्यतीत करके प्रायश्चित्तसे आत्मको पवित्र | जो विकृत न हुआ हो ऐसा कपासका सूत्र करे और अपने धर्म मार्गमें स्थापित करे३५॥ इनको बेचै-उपल शब्दसे माणिक्य (मुंगेर) फलोपलक्षीमसोममनुष्यापूपवीरुधः । आदि सब पत्थर लेते हैं-क्षोम-अर्थात् भे- डकी उनका वस्त्र क्षोम ग्रहण सब तांतव . तिलौदनरसक्षारान्द्धिक्षीरंघृतंजलम्३६॥ आदिका उपलक्षण है जैसे कि मर्ने (अ. पद-फलोपलक्षौमसोममनुप्यापूमवीरुधः२ १० श्लो० ८७) ने कहा है कि रंगेहुए सब तिलौदनरसक्षारान् २ दधि २ क्षीरं २ तांतव (वर) और शण क्षुमा (भेडको घृतं २ जलं २॥ ऊन) और पकरीकी ऊनके विनारंगे वस्त्र तथा मूल-फल-और ओषधि इनकोनवेचे- शस्त्रासवमधूच्छिएंमधुलाक्षांचवर्हिषः ॥ सोम-मनुप्य पदसे सामान्य स्त्री पुरुष नपुंसक मृचर्मपुप्पकुतुपकेशतकविषक्षितीः ॥३७॥ लेतेहैं-अपूप शब्दसे मण्डक (मांड) आदि सब भक्ष्य पदार्थ-वीरुध अर्थात् वेत अ- पद-शस्त्रासवमधूच्छिष्टं २ मधु २ मृतलता-तिल-ओदन शब्दसे संपूर्ण भोज्य लाक्षां २ च-बहिषः २ मृचर्मपुष्पकुतुप- पदार्थ समझने-गुड-ईषकारस-शर्करा केशतक्रविषक्षितीः २ ॥ आदि रसु-तैसेंही मर्नु (अ० १- ला०८८) कौशेयनीललवणमासकशफसीसकान् । ने लिखाहै कि क्षीर सहत-दही-धी-तेल- मधु-गुड-कुशा-इनको न वे-यवक्षार. शाकाद्रीपधिपिण्याकपशुगंधांस्तथैवच ३८ (जवाखार ) आदि क्षार-दधि क्षौरका प्र- पद-कौशेयनीललवणमासकशफसीस- हण-दही दूधके विकार जो मस्तु (मथा-- कान २ शाकाषधिपिण्याकपशुगंधान २ दही ) पिण्डकिलाट (नोनी ) और कू- चिका ( लपसी ) आदि है उन सबका उप- तथा:- एव:-च:- ।' योजना-फलोपलक्षौमसोममनुष्यापूपवी- लक्षण है-जैसे कि गौतम ने कहा है कि रुधः तिलौदनरसक्षागन् दधि क्षीरं घृतं शब्द तैल आदि सब स्नेहोंको उपलक्षण दूध और उसके विकागेको न वे-घृत-. नलं-शस्त्रासवमधूच्छिष्टं मधु लाक्षां चपुनः है-जल-खड़ आदि शस्त्र-आसव अर्थात् चर्हिषःमृचर्मपुष्पकुतुपकेशतक्रविषक्षितीःको- शेयनीललवणमासकशफसीसकान्शाका - १ स्वय शोर्णाने पानि फलाना घरगुदे । षधिपिण्याकपशुगंधान्-द्विजो न विक्रीणीत रज्जुः कापातिक सूत्र तचेदविकृतं भवेत् । २ सर्वे च तान्तर र साक्षीमापिकानिक अपि चैत्स्युराक्तानि फलम्ले तयारधीः । १ जप होमपैत्येनीयाजनाध्यापनैः कृतं प्रतिप्रह ३ क्षीरं क्षाद दधि घृतं तैलं मधु गुदं कुशान् । निमित्त तु लागेन तपसव तु । ४क्षीरं सविकारम् ।
प्रायश्चित्वाध्याय आपद्धर्मप्रकरण २ . (१४९) सब प्रकारकी मद्य-मधूच्छिष्ट ( मोम) मधु कुप्पा-माल-मठा-पृथ्वी-रेशमीयस्त्र-नील- (सहत ) लाक्षा (लाख) बर्हि (कुशा)- नोन-मांस-घोडा आदि एक खुर वाले- मट्टीचर्म (मृगचर्म ) पुष्प-बकरीकी लो- सीता-शाक-गीलिऔषधि-पिण्याक- पशू- मका कम्बल-कुप्या-चमरि गो आदिके और गन्ध-इनको ब्राह्मण न . पचे बाल-तक (मठा) विप (शंख भादि ) ॥ ३६ ॥ ३७॥ ३८ ॥ क्षिति शब्दसे भूमि लेते है-जैसे कि सुमंतु वैश्यवृत्यापिजिवन्नोविक्रीणोतकदाचन ॥ ने कहा कि भूमि-धान-जो-बकरी- , भेड-घोडा-चल-धेनु-और अनडान इन- धमार्थविक्रयनेयास्तिलाधान्येनतत्समाः ।। को न बैचे कोई ऐसे कहते है कि के शेय पद-वैश्यवृत्या३ अपि - जीवन १ नो:- (रेशमी वस्त्र) नील-लवण शब्दसे विड- विक्रीणीत कि- कदाचन:- धर्मार्थ २ वि- सौवर्चल-सैन्धव-सांमुद्र-सोमक और कृ-क्रयं २ नैयाः १ तिलाः १ धान्येन ३ त- त्रिम-ये सबतरहके नोन लेते है-मांस- समाः १॥ एक शफ ( घोडा आदि )-सीस शब्दसे योजना वैश्यवृत्त्या अपि जीवन् ब्राह्मणः सब प्रकारके लोहे समझने-सब शाक-औ- कदाचित् इमान नौ विक्रीणीत-धर्मार्थ तिलाः पधि नों फलके पकनेतक रहता है के गेहू धान्येन तत्समाः विक्रय नेयाः ।। जो आदि-इसमें आषधि इस विशेष तात्पर्यार्थ-यदि पाकपज्ञ आदि आवश्यक. के कहनेसे शुष्क औषधियोंमें दोष नही- कर्म- उसके साधनभूत ब्रीहि आदि धा- पिण्याक पशुशब्दसे वनके पशु लेते है न्यके विना न होसके तो-धान्यसे ति- क्योंकि म ( अ० १०-श्लो० ८१ ) कहा लोंकोसम (घराबर ) करके वेचे अर्थात् है कि वनके पशु-डाढवाले जीव-और द्रोणभर नाजसे द्रोणभर तिल दे-सोई मने- पक्षी-इनको न वेचै-चन्दन कस्तूरी आदि (अ० १० श्लो० ९० )में कहा है कि कि- गंध-इन सब पदार्थोको वृत्तिसे जीता- शानके कर्मको करता हुआ यथेच्छ खे- हुआ ब्राह्मण कदाचित्भी न वेचै-क्षत्रिय तीको पैदा करके शुद्ध और जो बहुत दि- आदिको तो इनके वैचनेंमें दोष नहीं-इसी नके नहों ऐसे तिलोको धर्मकी सिद्धि (पा- से नारदने इस वचनमें ब्राह्मण पदका प्रह- कयज्ञ ) के लिए वे यहां धर्म ग्रहण णकियाहे कि वैश्यवृत्तिमें ब्राह्मण दूध अन्य आवश्यक भेषज ( औषधि ) आदि- दहीको न वेचे ॥ काभी उपलक्षण है-इसीसे नारदमें कहा है कि-अशक्ति-भेषजके निमित्त-और य- भावार्थ-फल-पत्थर-कंचल -सोम-म- ज्ञके लिए यदि तिल अवश्यही बेचनेहीय नुष्य- अपूप-वीरुध-निल -भात-रस-यव- तो धान्यसे बरावर करके वेचदे-यदि अ- क्षार-दही-दूध-धी-जल-शस्त्र-मदि-मधू- | न्यथा ( अन्य कर्मके लिये) वैचे तो यह च्छिष्ट-सहत-लाख-कुशा-मरी-भृगचर्म-फूल-मनु (अ० १० श्लो० ९४ )का कहा दोप है काममुत्साय कृष्या तु सयमेव कृषीवलः । वि- निस भूभित्रीहिरवाजाव्यश्वर्षभधेन्वनाइश्चैके। प्रीति सिलान् शुद्धान्धमिचि स्थितान् । २ आरण्यांश्च पम्न् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च । २ अशी भएजस्याय यज्ञहेतोस्तपैवच पवश्य ३ वैश्यात्तावविक्रेय ब्राह्मणस्य पयो दधि । तु विक्रयास्तिला धान्येन तत्समाः ।
(४५०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । - कि भोजन-अभ्यञ्जन-और दान इनसे अ- वैश्यकी तुल्यताको प्राप्त होताहे-जैसे मर्नु न्यके लिए जो तिलोंको वेचता है वह उस ( अ०१० श्लो० ९२-९३ )ने कहा है पापसे पितरौंसहित कीडा होकर कुत्तेकी कि लाख-नोन-मांस इनके वेचनेसे शोपही विष्ठामें प्राप्त होता है-सजातीयके साथ तो ) पतित होता है और दूधके वेचनसे तीन विनिमय (अदलाबदला ) करनेमें दोप नही दिनमें विप्र शूद्र होजाताहै-अन्य अपण्य सोई मर्नु (अ०१० श्लो० ९४ )ने कहा है वस्तुओंको इच्छासे वेचनेसे सातरातमें वैश्य कि रसोंको रसोंके साथ बदलले परन्तु रसोंसे भावको प्राप्त हो जाता है । लवणको न बदले-पकान्नको पकानसे-और भावार्थ-लाखनोनके और मांसके वेच- घरावरकर करके तिलोंको धान्यसे बदलले नेसे पतित- दही-दूध-के बेचनेसे हीन जबकि कृतानं चाकृतान्नेन ऐसापाठ है तब | वर्णको ब्राह्मण प्राप्त होता है ॥४० ॥ यह अर्थ है कि पच अन्नको अपक्क तण्डुल | आपद्गतःसंप्रगृह्णन् जानोवायतस्ततः ॥ (चावल आदि ) आदिसे बदलले ॥ नलिप्यतेनसाविमोज्वलनासमोदिस:४१ भावार्थ-इन पूर्वोक्त फल आदिको घश्य- वृत्तिसे जीताहुआ ब्राह्मणन वेचै परन्तु धर्मके पद-आपद्गतः १ संप्रगृहन् १ मुंजानः१ निमित्त धान्य बराबरके तिलोंको वैचे तो वाई- यतः- ततः:- नऽ- लिप्येत क्रि- दोप नही ।। ३९॥ एनसा ३ विप्रः १ ज्वलनार्कसमः १ दिइ-सः १॥ लाक्षालवणमांसानिपतनीयानिविक्रये । योजना आपद्गतः विप्रः यतः ततःसं- पयोदधिचमाचहीनवर्णकराणितु ॥४०॥ प्रगृह्णन् वा तदन्नं भुजानः अपि एनसान लिप्येत-हि अतः सः ज्वलनार्कसमो भवति पद-लाक्षालवणमांसानि १ पतनीयानि? तात्पर्यार्थ-जो निर्धन अत्यंत कुटुम्बके विक्रये ७ पयः १ दधि १ च मद्य१ चा- होनेसे आपत्तिकोभी प्राप्तहोकर क्षत्रिय वा हीनवर्णकराणि १ तु:- ॥ वश्यकी वृत्तिमें प्रवेश नही करना चाहता है योजना लाक्षालवणमांसानि विक्रये और यतस्ततः दीनसे हीनपरसे प्रतिग्रह पतनीयानि स्युः तथा पयः दधि चपुनः मद्यं | लेताहुआ था उसके अन्नको खाताहुआ हीनवर्णकराणि स्युः ॥ पापसे लिप्त नही होता क्योंकि उस ब्राह्म तात्पर्यार्थ-लाख-नौन-और माप्त यदि लेने का अधिकार है इससे अग्नि और सूर्य- णको उस आपत्ति कालमें दूषितभी प्रतिग्रह इनको ब्राह्मण वेचे तो सद्यः ही सच द्विज- को समान है अर्थात् जैसे अग्नि दुषित काँसे पतित होजाता है और दुग्धआदिको वेचतो शूद्रको तुल्यताको प्राप्त होता है- वस्तुके संसर्गसे दूषित नहीं होती तिसी और इनसे भिन्न अविक्रेयवस्तुके वैचनेमें | प्रकार आपत्तिकालमें दूषित प्रतिग्रहके लेनसे ब्राह्मणभी दृषित नहीं-येही भग्निकी १ भोजनाभ्यंजनादानाघदन्यक्रुरुते तिलै समि १ सयः पतति मोसेन लाक्षयालवणेन च । ज्यहेज भूत्वा वरिष्टायां पितृभिः सह मनति । दादो मवति माणः क्षीरविक्रयात् । इतरेपामपण्यानां २ रसा रसनिमातव्या नदेव लवगरसः । ताप्नं विक्रयादिह कामतः । ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यमावं च कृतानन तिला धान्येन तत्समाः । निगच्छति।
'प्रायश्चित्ताध्याय आपद्धर्मप्रकरण २ (४५१) वन करें। समानता है-ऐसे कहनेसे यह बात सूचित अर्थात् व्याजके लिए द्रव्य देना-इनको (जाहिर) हुईको आपत्तिको प्राप्तहुए मनु- स्वयं करनेकी शास्त्रकी आज्ञा है-शकट- प्यको दूसरेके धर्म सेवनसे अपने धर्मका जोकि भाडेसे दूसरेकी द्रव्यको ले जाताई- अनुष्ठान दूषितभी मुख्य (अच्छा ) होताहै जिसको छकडा वा गाडी कहते हैं-गिरि- सोई मन (अ.१० श्लो० ९७ )ने कहाहै अर्थात उसके तृण वा इन्धनसे जो कि अपना विगुणभी धर्म कल्याणकारक जीवन-सेवा अर्थात् दूसरेके चित्तके अनु- होताहे और पराया अच्छाभी धर्म श्रेयस्कर | सार चलना-अनूप जिसमें बहुत तृण-वृक्ष नहीं होता क्योंकि दूसरेको धर्मके सेवनसे हो-और जहां थोडा जल हो ऐसा प्रदेश- विप्रजातिस पतित हो जाता है। तथा नृपसे याचनारूपभिक्षा-ये आपत्ति भावार्थ-आपत्तिको प्राप्तहुआ ब्राह्मण ही- | कालमें स्नातकके भी जीवन है-सोई मर्नु नजातिसे प्रतिग्रह और उसके अन्नको । (अ. १० श्लो. ११६ )ने कहा है कि खाकर पापसे लिस नहीं होता क्योंकि वह विद्या-शिल्प-भृति-सेवा -गोरक्षा-दुकान- अमि और सूर्यकी समान होता है ॥४१॥ खेती-पर्वतकी वस्तु-भिक्षा-व्याज-ये दश कृपिःशिल्पंभृतिपियाकुसीदंशकटगिरिः । जीवनके हेतु है अर्थात् इन दशसे आजी- सेवानूपंपोभेक्ष्यमापत्तीजीवनानितु ४२॥ भावार्थ-कृषि-कारीगरी-नोकरी-विद्या- पद-कृषिः १ शिल्पं १ भृतिः १ विद्या १ | व्याज-छकडा-पर्वत -शुश्रूषा-अनूप-राजा- कुसी, १ शकटं १ गिरिः १ सेवानूप १ नृ-भिक्षा-ये आपत्ति कालमें जीवनके हेतु हैं ।। पः१ भैयं १ आपत्ती जीवनानि १ तु:-॥ युभुक्षितख्यइंस्थित्याधान्यमब्राह्मणादरेव। योजना-एतानि आपत्तो जीवनानि भवति प्रतिगृह्यतदाख्येयमभियुक्तेनधर्मतः ४३॥ कृषिः शिल्पं भृतिः विद्या कुसीदं शकटं गिरिः सेवानूपं नृपः भेक्ष्यं ।। पद-बुभुक्षितः १ व्यहं २ स्थित्वाइ- तात्पर्यार्थ-आपत्तो जीवनानि इस विशे- धान्यम् २ अब्राह्मणात् ५ हरेत् कि-प्रति- पणसे यह वचन इस बातको जनाता है कि गृहऽ-तत्१ आख्येयं १अभियुक्तेनइधर्मतः- इन कृषि आदि वृत्तियोंमें जिस वृत्तिका योजना-बुभुक्षितः १ म्यहं स्थित्वा अ. जिसको अनापत् कालमें प्रतिषेध लिखा है ब्राह्मणात् धान्यं आहरेत् प्रतिगृह्य अभि- उस मनुष्यको आपत्तिकालमें उस प्रतिषिद्ध युक्तेन धर्मतः तत्तथा आख्येयम् ॥ वस्तुसे आजीवन करना-जैसे कि आपत्ति- तात्पर्याय-धान्यके अभावसे तीन रात काल में ब्राह्मण और क्षत्रियको वैश्य वृत्ति भूखा रहकर अब्राह्मण अर्थात् शुदसे उ- नो कृषि कर्म है उसकी स्वयं करनेकी | सके अभावमें वैश्यसे और उसकेभी अभा- आज्ञा है-इसी प्रकार वैश्यको शिल्पआदि-वमें क्षत्रियसे एकदिनतकके लिए धान्यको उपकरण आदि शिल्प-भृति (नोकरी)- लावे-जैसेकि मर्नु (अ० ६ १९७) विद्या अर्थात् नोकरहोकर पदाना उसीद १ विद्या शिल्प भृतिः संवा गोरक्षा विपणिः कृषिः। गिरिभक्ष्य कुसाद च दशजीवनहेतवः । पर स्वधर्मो विगुणो ने पारक्यः स्खनुष्ठितः। परधर्माश्रयादियः समः पतति जातितः। नविधानेन दर्तव्य हीनकर्मणः। . २ तथैव सप्तमे मते मतानि पहननता। अश्वस्त-
(४५२)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
.
कहा है कि छः भक्त भोजन न करता हुआ अध्ययनं २ तपः २ ज्ञात्वाऽ-राजा १ कुटुंवर
सप्तम भक्तमें अपनेसे हीनकर्म करनेवाले-धा २ वृत्ति २ प्रकल्पयेत् क्रि-१॥
से अश्वस्तन (जो कि दूसरे दिनको नर योजना-गजा तस्य वृत्तं कुलं शीलं श्रुतं
है ) विधि करके धान्यको लावै-जब लेनेके | अध्ययन-तपः ज्ञात्वा चपुनः कुटुं ज्ञात्वा
अनंतर यदि नाष्टिक (जिसका धन नष्ट हो- धा वृत्ति प्रकल्पयेत् ।।
ता है ) स्वामी ऐसा कहैकि क्या आप मेग तात्पर्याय-जो मनुष्य क्षुधासे व्याकुल
धान्य लेचलो हो तो जो लिया हो उसे ध-होकर दुखी हो उसके आचार और कुल
मसे वृत्तांत सहित यथावत् कहदे जैसे कि - आत्माका स्वभाव शास्त्रश्रवण अध्ययन
मनुने कहा है कि खल (पैर) वा खेत वा ) और कृच्छचोदायणादिव्रत इनकी परीक्षा
घरसे जितने धान्यकोले उसको याद उसका | करके राजा धर्मके अनुकूल उसकी वृत्तिकी
स्वामी पूछे तो उससे यथावत् कहदे ॥ कल्पना करे याद न करे तो राजाको दोष
भावार्थ-तीन दिन भूखा रहकर ब्राह्मणसे होता है जसे कि मनु (अ०७ श्लो० १३४).
अन्य वर्णसे धान्यको लावै यदि उसको कोई ने कहा है कि जिस राजाके देशमें वेद-
पूछे तो उसे यथावत् कहदे ॥ ४३ ॥
पाठी ब्राह्मण क्षुधासे व्याकुल रहता है उस
राजाका देश दुर्भिक्ष ( अकाल ) और व्या--
तस्यवृत्तंकुलंशीलं श्रुतमध्ययनंतपः । धि(विशाचिका आदि) सर्दय पीडित रहता है
ज्ञात्वाराजाकुटुंयंचधावृत्तिप्रकल्पयेत् ॥
भावार्थ-राजा वेदपाठी ब्राह्मणके आचार.
पद-तस्य ६ वृत्तं २ फुलं २शीलं श्रुतं२ कुल शील शास्त्र वेदाध्ययन और कुटुंबको
जानकर उसकी उत्तम वृत्तिसे पालना करे।
१ खलात क्षेत्रादगाराद्वा यतो वाप्युपलभ्यते । आ १ यस राज्ञस्तु विपये प्रोत्रियः संदिति क्षुधा।
ध्यातव्यं तु ततस्मै पृच्छते यदि पृच्छति । तस्य सीदति तद्राष्ट्रं दुझिव्याधिपीडितम् ॥
।'
इत्यापद्धर्मप्रकरणम् ॥२॥
मायश्चित्ताध्याय वानमस्यधर्मप्रकरण ३ (४५३) अथ वानप्रस्थधर्मप्रकरणम्३ ०२) ने कहा है कि गृहस्थी जब अपने वालोंको पलित (पीले ) देखे और पुनके सुतयिन्यस्तपत्नीकस्तयावानुगतोवनम् । पुत्रको देखले तब वनमें जाकर यस-यह पानप्रस्थाब्रह्मवारीसानिःसोपासनोवजेत्॥ पुत्रोंको स्त्रीका सोफना जिसकी स्त्री विद्य- पद-सुतविन्यस्तपत्नीकः १ तया ३ मान हो उसको है क्योंकि आपस्तम्प आदिन जिसकी स्त्री मरगई हो उसकोभी वा- अनुगतः १ व २ वानप्रस्थः१ ब्रह्म- चाये १ साप्तिः १ सोपासनः १ ग्रनेत कि- वनवास कहा है-इससे.( सुतविन्यस्तपल्ली- कः) इस पदसे यह संशय न करना कि योजना-सुतविन्यस्तपत्नीका अथवा तया अनुगतः ब्रह्मचारी सामिः सोपासनः वानप्र- मृतभार्यको नही-इससे अग्निहोत्र दाह जिसकी स्त्री विद्यमानही उसकोही अधिकार स्थःसन् वनं व्रजेत् ॥ करके पुनः अग्न्याधान करे इत्यादिसे जो तात्पर्याय-चनमें जो नियमसे टिके यह पुनः अग्न्याधानका विधान है वह जिसके वानप्रस्थ अर्थात् वक्ष्यमाण वृत्तिको महण कषायोंका परिपाक न हुआ होउसके विषय करके जो यनमें जाने की इच्छा कर यह है-और श्रीत और गृह्याग्निको साथ लेकर वानप्रस्थ अपनी स्त्रीको तू इसका यथावत् जाय यहां भी जो अाधान (श्रोत स्मात पोपण करियो इस प्रकार पुत्रको सॉफदे- अमिओंका पृथधारण) कियाहोय तो श्रोत यदि वह स्त्रीभी पतिकी परिचर्याको अभि- और गृह्य अग्निओको साथ लेकर जाय लापासे आपभी यनजानेकी इच्छा करतीहोय और सर्वाधान किया होय तो केवल श्रोत तोउसकोभी साधलेले-और ब्रह्मचार्य अर्थात् अग्निओकोही संगलकर गमन करे-यदि कि जीता होकरचतान अमि और उपासनाअ- सी प्रकार ज्येष्ठ भाईको अनाहितानि होनेसे निको लेकर यनको गमन करे-खोकोतो पुरको जो श्रोताग्निका भाधान न किया होय तो सोंफदै (सुतविन्यस्तपत्नीकः) इस पदसे उपासन भग्निकोही लेकर गमनको यह यह दिखायाकि गृहस्थाश्रमको जिसने बात समझनी-यह अमिका लेगाना उसमें भोग लियादो उसीको यानप्रस्थका वनवास करनेयोग्य अमिझोत्र आदि कर्मको सिद्धिक करनेका अधिकार है यह यात आश्रमांक लिये है-इसीसे मन (अ.६ला. ९) ने समुशपपक्षको स्वीकार करके कही अन्य | कहा कि वितान भीममें भमिदोगको यथा- पक्षमतो गिसका प्रापर्य प्रष्ट नहो यह विधि कर और अमावस्या पूर्णमासी और पर्व 'गिस आश्रमकी इच्छा कर उसमें यस इत्या- इनको शक्तिसे श्राद्धयरे-पहां कोई शंका करे दि वचनसे जो गृहस्थाश्रममें नदीभाया । किसीको साथ लेकर होम करे इस वचनसे यहभी वनवास करनेमें अधिकारी हे हो-यह स्त्रीको साय करदी होम करनेका अधि- यनमें प्रवेश जिसका जग अवस्थासे शरीर कार है तो फिर जिसने पुत्रको वी सापदी गगर होगयाही या जिसके पात्र रसन्न है वा श्रीस रहित हे टस वानप्रस्यको भाग्न- होगपाही उत्तको है-जैसे कि मन (भ६ होत्र भादि कर्मका अनुष्ठान किस तरह यन (४५४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । सकता है सोयह उस वादीकी शंका सत्यहै | ओढ-जिसमें हल चले उस क्षेत्रमें निवास "परन्तु यहां पुत्रपरस्त्रीको सोफनेकी जो विधि न करे-जो हलकर्मसे न उत्पन्नहुएहो उस है उससेही यह बात जानीजाती है कि पत्र और मूल फल इनको इकट्ठा कर-उर्द्ध- वानप्रस्थको स्त्रीकेविनाभी अग्निहोत्र करने- | रेता रह-पृथ्वीवर सोवे-दान दे प्रतिग्रह न का अधिकार है इसमें दृष्टांत है कि जैसे ले-पांचमहीनेसे पीछे श्रावणिक अग्निका रजस्वला स्त्रीके विर्षे इस अवरोधकी विधिके- | आधान करके आहिताग्नि हो उसके द्वारा बलसे उसकी अग्निहोत्र आदिमें अपेक्षा पितर और मनुष्य देवता इनको मूल फलदे नहीं कि जिस मनुप्यकी स्त्री व्रतके दिन वह अनन्त स्वर्गको प्राप्त होता है यहां श्राव- रजस्वला होजाय तो उसका अवरोध णिकका यह अर्थ है कि वैदिक मार्गसे (रोक) करके यज्ञकरे-तिसी प्रकार यहां भी | अग्न्याधान कर लौकिकसे नहीं । समझना-अथवा कुछ विरोध नही क्योंकि भावार्थ-वनमें प्रस्थानकी इच्छाकरने- वनको जातेहुये पतिको स्त्री अनुमती देती । वाला अपनी स्त्रीको पुत्रको सोंफकर अथवा है-कदाचित् कोई फिर शंका करे कि जैसे | उसकरके सहित औपासन और वैतानाग्निको ब्रह्मचारी और स्त्रीसे रहित वानप्रस्थको | साथ लेकर ब्रह्मचारी होकर वनम जाय४५॥ अग्निहोत्र आदि कर्मका अभाव है इसी- | अफालकृष्टनाग्नींश्चीपतृन्देवातिथीनपि । प्रकार जिसने स्त्रीको सोफदीहो उसको भृत्यांश्चतर्पयेत्श्मश्रुजटालोमभृदात्मवान् अग्निहोत्रका अभाव है सो ठीक नही क्यों- पद-अफालकृष्टेन १ अग्नीन् २ च कि ये अग्न्याधान अपाक्षिक रूप अर्थात् जो पुत्रको सोफजाय उसको और जो साथ / पितॄन् २ देवातिथीन २ अपिंड-भृत्यान् २ चऽ- तर्पयेत् क्रि-श्मश्रुजटालोमभृत् १ लेजाय उसकोभी अमिका लेजाना सामा- न्यसे पूर्व श्लोक ( सुत्तविन्यस्त इत्यादि )में आत्मवान् १॥ योजना-श्मश्रु भृत् तथा आ- सुनाजाता है इससे स्त्रीको छोड़कर जाने- वालेको अग्निहोत्रका अभाव नही-इसी त्मवान् सन् वानप्रस्थः अफालकृष्टेन अग्नीन प्रकार ब्रह्मचारी और विधर (स्त्री रहित)को भी | चपुनः पितॄन देवातिथीन् तथा भृत्यान् तर्पये। अग्निसाध्य अग्निहोत्र आदि कर्मके करने में तात्पर्याय-फालग्रहण कर्षण (पृथ्वीका- अधिकारका अभाव नहीं है क्योंकि पांच खनन के साधन समस्त हल आदिका उ- महीनसे पीछे जब श्रावणिक अग्निका आधा- पलक्षण है-जो कर्पण न कियाजाय ऐसे न किया जाता है उसमें उनदोनोकोभी क्षेत्रमें उत्पन्नहुए नीवार (समाके चावल) अग्निहोत्र कर्म करनेका अधिकार इससि- वेणु श्यामाक आदिसे अग्निसाध्यकर्म ठको स्मृति से देखा जाता है कि वानप्रस्थ (आग्नि होत्र आदि )च शब्दसे भिक्षादान जटाओंको धारण करे चीर और मृगचर्मको पितर-देवता-अतिथि और अपिशब्दसे भूत इनकी तृप्तिको करै-और चकारसे आश्रम १ पानप्रस्यो जटिलचीराजिनवामान फालकृष्ट-आएहुए भृत्योंकोभी तृप्त करे-सोई मनुने माधेतिष्ठेत् अकृष्ट मुलालं संचिन्वीत अर्द्धरेताः (अ०६ श्लो० ७)कहा है कि जो भक्ष्य नी- ६माशयो दद्यादवे न प्रतिगृह यादव पंचभ्यो मासेभ्यः श्रावणिकनामिमाभायाहितामिक्षमूलको दद्यादेव १ यद्भक्ष्यं स्यात्ततो दद्याद्वलि भिक्षां च शक्ति तः । पितमनुप्पेभ्यः स गच्छेत् स्वर्गमानंत्यम् । अम्मूलफलभिक्षाभिरर्चयेदाश्रमागतान् ।
मायश्चित्वाध्याय वानप्रस्थधर्ममकरण ३ (४५५) वार आदि हो उससेही बलि वैश्वदेव और अपने विषयमें बाधक सर्वथा चरितार्थ नहो शत्तयनुसार भिक्षादान करें और आश्रममें यहां अफालकृष्टसे अग्निमें होम स्मात अ- आएहुओका जल-मूल-फल-इनसे सत्कार निके विषयमें चरितार्थ है इससे साधकभी करे-इसीप्रकार पंचमहायज्ञोंको करके नही होसत्ता-वह शंका टीक है परन्तु ब्रीहि आपभी उससे शेष अन्नकोसाय-क्योंकि आदि अफालकृष्ट अर्थात् विनाजीत खे- मन ( अ०६लो. १२)ने कहा है कि तभी पैदा होतेहै इससे ग्रामके वीहि आ- वनमें उत्पन्नएहु मेध्य इविसे देवताओंका- दिके परित्यागमें श्रुति विरोध नहीं इसीसे होम (बलि वैश्वदेव ) करके शेष हविको मनु (अ० ६ श्लो० ११)ने कहा है कि व- आप खाय भोर स्वयंकृत लवणको खाय- | संत भार शरदऋतु में उत्पन्नहुए मेध्य मुनि यहां स्वयंकृत शब्दसे ऊखर ( रण )से उ- | अन्नोंको स्वयं लाकर उनके पुरोडाश और त्पन्नहुआ नोन लेते है-भोजन और याग चरु बनाकर पृथक २ होम कर-यहां नीवार आदिमें मुनिक अन्नके नियमसे ग्रामके आदि मुनि अन्न जो स्वयं उत्पन्नहुए उनको गोधूम आदिका परित्याग अर्थात् सिद्ध है- यद्यपि स्वतः मेध्यत्व सिद्धथा तथापि फिर इसीसे मर्नु ( म०६लो० ३ )ने कहा है मेध्यशब्दका लिखना यज्ञके योग्य प्रीहि कि मामके सब आदार और परिच्छद (ख-आदिकोभी प्राप्तिकलिए है क्योंकि मेध्य हा आसन आदिको ) छोडकर वनवास शब्दका यह अर्थ है कि मेध नाम यज्ञ उ. करे यहां कोई यह शंकाकर कि अमा- सके जो योग्य हो उसे मेध्यकहते हैं तिती- वस्या और पूर्णमासीक होम आदि तो प्रा प्रकार मच ( दादी मूछ ) जयरूप शिरके मके पौहि (धान) आदिसे सिद्ध होते है | माल और कक्ष (गल)के वालौंको धारण और उसके लिए ये उपयोगी है तो फिर इ- करके भीमशब्द नखोंकाभी उलपक्षण है नका परित्याग कसे कहते हो कदाचित् सोई मर्नुन कहा है कि जटाश्मशु-लोम- कोई यहां कहने लगे कि जिसमें हल न नख-इनको सदा धारण करें-तिसी प्रकार चले ऐसे क्षेत्रमें उत्पन्नहुए अन्नसे भग्निमें आत्माको उपासनामं तत्सररहे ।। होम को इस विशेष वनन (अफालकृष्टेना भावार्थ-विना जाते खेतमे पैदाहुए भ- मीस्तर्पयेत् )की सामर्थ्यसे वानप्रस्थको अ-से अग्नि पितर देवता अतिथि भृत्यं इनको निमें मोदि आदिसे होम करने का वाध तृप्त कर-और जटा (अभाव ) ई-सो टोक नही क्योंकि के-मको सदैव धारण करें और आत्माकी उ- इमच साहि विशेष फर्मका योध न करनेवाला स्मृ-पासनामें तत्पर रहै ।।१६।। तिका वचन हो उससे अति (वेद) वि. हित कर्मका पाथ अन्याय्य है अर्थात् उ.। आगोमासस्पपणांवातपावत्सरस्पवा । चित नहोह और वास्तवमें बाधभी नहीं: भयंस्पसंचयंकुर्यात्कृतमाश्वयुजेत्यर्जत ।। दो सत्ता क्योंकि याध तप होता है कि जय पद-अङ्गः ६ मासस्य ६ पणां ६ वार- तथा- संवत्सरस्प ६ था- अर्थस्य ६ १२ताना सदरा या पता हरि- मत्यानि जी सकपा एम् । २ भाग्य माममा मारिपाई। लोम नख इ- (४५६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । संचयं २ कुर्यात् कि- कृतं २ आश्व- या अश्मकुट्टकः सन् फलस्नेहः श्रीतं स्मात युजे ७ त्यजेत् क्रि-॥ कर्म तथा क्रियाः कुर्यात् ॥ योजना-अङ्गःमासस्य पणां वा मासानां तात्पर्यार्थ-वह वानप्रस्थ अपने दांतोंको तथा संवत्सरस्य उपयोगि- अर्थस्य संचयं ही उलूखल (जिसमें फूटनेसे अन्नका घुष दूर कुर्यात् कृतं आश्वयुजे त्यजेत् ॥ होजाता है वह ओखली) बनाव समयपर ता० भा -जिसमें एक दिनके भोजन | पकेहुए समाके चावल-वेणु श्यामाक आ- यज्ञआदि दृष्ट अदृष्ट कर्म होजाय उतने | दि अन्न और वेर इंगुद आदि फल इनके धनकां अथवा महीना वा छः महीने या खानेका स्वभाव रखे-श्लोक वा शब्द अ- वर्ष दिनके संवधि कर्म जितनेमे होजाय | निमे पकेहुएको अथवा समयपर पकेहुएको उतने धनका संचय करें और इस तरह क- खाय क्योंकि इस मनुके वाक्यमें जो अग्निमें रनेपरंभी यदि अधिक होजाय तो उस अ. पक अन्नका भोजन है वह उसके अभि- धिक धनको आश्विनके महीने त्यागदे४७ प्रायसे है-अथवा पत्थर से कूटकर खाय दांतत्रिपवणस्नायीनिवृत्तश्चप्रतिग्रहात् । तथा और श्रीतस्मातकर्म और जिनका- स्वाध्यायवान्दानशीलःसर्वसत्त्वहितेरतः॥ क्रिया इनको मधूक (महुआ )आदि मध्य फल प्रत्यक्ष देखा जाता है वे भोजन आदि पद-दान्तः २ त्रिषवणस्नायी १ निवृत्तः । वृक्षोंके फलसे उत्पन्नहुये स्नेह द्रव्योंसे करे च- प्रतिग्रहात् ५ स्वाध्यायवान् १ दान- घृतादिसे नही-सोई.मनु (अ०६ श्लो. शीलः १ सर्वसत्वहिते ७ रतः१ ॥ १३)ने लिखा है कि मेध्यवृक्ष.और फलों- योजना-दान्तः निषवणस्नायी तथा प्रति- | से उत्पन्नहुए स्नेहको खाय ॥ ग्रहात् निवृत्तः स्वाध्यायवान् दानशील: भावार्थ-दांतोंकोही जिसने ओखली सर्वसत्वहितेरतः स्यात् ।। बनाया है-समयपर पंकहुए द्रव्योंको खाने- ता०भा० वानप्रस्थ सदैव-अभिमानसे वाला वा पत्थरसे कुचलकर खानेवाला रहित प्रातःकाल मध्याह्न और सायंकाल | वानप्रस्थ फलोंके स्नेहसे श्रोत स्मात कर्म इन तीनों कालोंमें स्नानयुक्त प्रतिग्रह और और भोजन आदि क्रियाको करै ॥ १९ ॥ यामनसे परामुख-स्वाध्यायमें और वेदा-बांद्रायणैर्नयेकालंकृच्छविर्तयेत्सदा । भ्यासमें और फलमूलको भिक्षा आदिके पक्षेगतेवाप्यनीपान्मासेवाहनिवागते ५०॥ न करने में और सम्पूर्ण प्राणियांके हित नमें तत्पर रहै ॥४८॥ पद-चांद्रायणैः ३ नयेत् क्रि- कालं २ कृच्छः ३ वा-वर्तयेत् कि-सदा:- पक्षे ७ " . । गते वाऽ-अपि - अश्नीयात् क्रि- मासे । श्रौतस्मातैफलस्नेहै कर्मकुर्यात्तथाक्रियाः। वा:- अहान ७ वाई-गते ७ ॥ पद-दन्तोलूखलिकः १ कालपकाशी १ योजना-चांद्रायणैः कालं नयेत वा स- वाई-अगमकुट्टकः१ श्रोतं २ स्मातर फलने- दा कृच्छैः वर्तयेत्-पक्षे गते सति वा मासे है:३ कर्म२ कुर्यात् क्रि-तथा:-क्रियाः २ ।। , अमिपकाशनो वा स्शकालपकमुगेव वा। योजना-दन्तोलूखलिकः कालपक्काशी २ मध्यक्षोद्यानयात्नहांश्च फलसंभवान् ।
मायश्चित्ताध्याय वानप्रस्थधर्मप्रकरण ३ (४५७) गतेसात अथवा अहनि गते सति अनी- नही है क्योंकि दिनके सोनेका निषेध तो मात् ॥ पुरुषमात्रकेलिए कहनेसेही सिद्धथा इससे तापर्य-जो आगे कहे जायगे उन | यह वानप्रस्थको रात्रिमें बैठने और खडे चांद्रायण प्रतासे समयको व्यतीत कर अ- | होनेकी निवृत्तिकैलिए ई-और भूमिही यवा कृछ वा प्राजापत्य आदि व्रतोसे | सोवे अर्थात भूमिपर न कुछ चदाई आदि समयको विताव-अथवा पक्ष (१५ दिन ) विछाकर सोवे न पलंग विछाकर सौवे-और के बीतनेपर वा महीनाके व्यतीत होनेपर दिनको संप्रपद अर्थात् इधर उधर फिरकर अथवा दिनके व्यतीत होनेपर अर्थात् रा- अथवा स्थान आसनरूप बिहार कि कुछ विमें भोजन करे-अपिशब्दसे चतुर्थकाल थोडीदेर खडा रहना कुछदेर बैठना इससे आदिमें भोजन करै-जैसे कि मनु (अ०६ / व्यतीत करे-अथवा योगाभ्याससे व्यतीत श्लो० १९)ने कहा है कि रात्रि भोजन कर-सोई मनु (अ०६० २९ )ने कहा करे वा दिनके चौथकालमें अथवा अष्टम है कि ब्रह्मकी माप्तिके निमित्त नानामकारकी कालमें शक्तिके अनुसार भोजन करें-इन | उपनिषदको श्रुतियोंको पढे उनके अर्थका कालोंके नियमका अपनी शक्तिकी अपेक्षासे अभ्यास करे-तिसीप्रकार पृथ्वीपर लौटनेसे विकल्प है। व्यतीत करें क्योंकि मर्नु (अ. ६ श्लोक भावार्थ-चांदायण वा कृच्छ प्राजापत्य | २२)ने कहा है कि पृथ्वीपर लौटे वा खटा- आदि प्रतोंसे अपने कालको विताव पंद्रह | रहे अथवा पाओंके अग्रभागसे वैश रहे ॥ दिन वा महीना वा दिनके वीतनेपर भो भावार्य-विमें भूमिपर प्रयलसे सावे- जन करें ॥५०॥ दिनको भ्रमण खटारहने-वा बैठने-वा योगाभ्याप्तसे व्यतीत करे ।। ५१ ।। स्वप्यामौशुचीरात्रीदिवासमपदैर्नयेत् । ग्रीमेपंचाग्निमभ्यस्योपासुस्पंडिलेशयः। स्थानासनविहारवायोगाभ्यासनवातया ॥ आषासास्तुहेमंतेशत्तयाषापितपश्चरेत् । पद-स्वप्यात् कि- भूमी ७ शुचिः १ रानो ७ दिवा-संप्रपदैः ३ नयेत क्रि-स्था- पद-प्रोम्मे ७ पंचाग्निमध्यस्थः १ यासु नासनविदारेः ३ वा-योगाभ्यासेन ३ वा:- स्थंडिलेशयः १ भावासा: तुर-हेमन्ते ७ शत्तया ३ वा:-अपि-तपः २ चोद किं- योजना-शचिः सन् रानाभूमौ स्वप्यात्- योजना-ग्रीमे पंचाग्निमध्यस्पः वर्गातु स्थन्टिलेशयः हेमन्ते माईवासाः अथवा दिवा (दिवसं ) संप्रपदैः नयेत् अथवा शत्तया तपः चरेत् ॥ स्थानासनविहारः वा योगाभ्यासेन नयेत् ।। तात्पर्य-आहार और विहारके सम- तापाप-प्रीम और हेमन्त इनके देखने से तीन ऋतुओका वर्ष रोग होता है पको छोड़कर सावधानीसे रात्रिकेविष सो- वे न तो वैठ और न खदारद रात्रिम सो उनमें मोम ऋतुके जो चैत्र आदि चारमास यह बचन दिनके सोनेको निवृत्ति के लिए- है उनमें चार अग्नि चारोदिशा में पांचमा उपर मूर्य इस पांच अग्मियोंकि वीचमें डे- १ना वानं समायादिग वाल नियनपतु सिविपाशानदारात्मममिट्ये श्रुती। शादिलो पारामपालिरः २ ममी दिलितव तिला प्रपददिनन् । तथा:- (१५८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । और वर्षाऋतुके जो श्रावण आदि चारमास पद-अग्नीन् २ वा:-अपि:-आत्मसात- हैं उनमें स्थण्डिल अर्थात् जिसमें वर्षाकी) कृत्वाऽ- वृक्षावासः १ मिताशनः १ वान- धाराओंके रोकनेवाला कोई आवरण न हो ऐ-प्रस्थगृहेषु ७ एव:- यात्रार्थ २ भक्ष्यं २ आ- सीभूमिपर निवास करै-और हेमन्त ऋतुके | चरेत् क्रि-॥ जो मार्गशीर्ष आदि चारमास हैं उनमें गीले योजना-अथवा अनीन् अपि आत्मसात् वस्त्रोंको ओढे-यदि इस प्रकारके तपकर- कृत्वा वृक्षावासो मिताशनः सन् वानप्रस्थ- नेमें समर्थ न होय तो अपनी शक्तिके अनु- गृहेषु एव यात्रार्थ भैक्ष्यं आचरेत् ।। सार तपको करे-और जिस प्रकार यह श- तात्पर्यार्थ अब अमिकी परिचर्या करनेमें रोर सूखै उसीप्रकार यत्न करें क्योंकि जो असमर्थ हो उसकेप्रति कहते हैं अग्नि- मन (अ० ६ श्लो० २४) में लिखा है कि योंको आत्मामें समारोप करके वृक्षकोही अत्यंत उग्र तपको करताहुआअपने शरी- | कुटी बनावे और थोड़ा भोजन करै और रको सुखावे ॥ अपि शब्दसे फल मूल इनका भोजन करे भावार्थ-ग्रीष्मऋतुमें पंचालिके मध्यमें जैसेकि मेन ( अ० ६ श्लो० २५) ने कहा चठे वर्षा ऋतुमें स्थण्डिल पर सौवे हेमन्त-है कि वैतान अग्निओंका भस्मपान आदि ऋतुमें गीले वस्त्रोंको ओढे-अथवा अपनी से विधिपूर्वक आत्मामें समारोपण करके शक्तिके अनुसार तप करे ।। ५२॥ अग्नि और गृहसे रहित होकर मौन व्रतको याकंटकर्षितुदतिचंदनैर्यश्चलिपति । धारणकर मूलफलोंको खाय और मूल अनुद्धोपरितुष्टश्चसमस्तस्यचतस्यच५३॥ फलभी न मिलैं तो जितनेमें प्राणोंकी धारणा हो उतनी भिक्षाको वानप्रस्थोके गृहासे लावै।। पद-यः १ कण्टकैः ३ विदति कि- भावार्थ-अग्निओंका भस्मपान आदिसे, चंदनः ३ यः १ चऽ-लिंपति क्रि-अमृद्धः आत्मामें आरोप करके वृक्षोंके नीचे वसे थोडा अपरितुष्टः १ च:-समः २ तस्य ६च- आहार करे प्राणोंकी धारणाके लिए वान- तस्थ६च:-॥ प्रस्थोंके गृहोंसे भिक्षाको लावै ॥५४॥ योजनान्यः कण्टकः तुदति चपुनः यः चंदनैः लिम्पति-तस्य तस्य उपरि अद्धः ग्रामादाहृत्यवानासानष्टौ जीतवाग्यतः । अपरितुष्टःसन् समो भवेत् ॥ पायुभक्षामागुदीचीगच्छेदावर्मसंक्षयात् ॥ ताभा जो कांटे आदिसे अपने अंग- पद-मामात्५ आहत्या-वा-ग्रासान् २ को पीडादे उसके ऊपर क्रोध न कर और अष्टो २ भुंजीत क्रि-वाग्यतः १ वायुभक्षः १ जो अपने शरीरको चंदन आदिके लगा- प्रागुदीचौर गच्छेत् क्रि-वा-आऽवर्मसं- नेसे सुखदे उसके ऊपर प्रसन्न न होअर्थात् क्षयात् ५॥ उन दोनोंके पर सम ( उदासीन ) रहै ॥ योजना-अथवा ग्रामात आहत्य वाग्यतः अग्रीन्याप्यात्मसात्कृत्त्वावृक्षावासोमिताश / सन् अष्टो प्राप्तान मुंजीत वायुभक्षा सन् नः। यानप्रस्थगृहेप्वेवयात्रार्यभेक्ष्यमाचरेत् आवर्मसंक्षयात् प्रागुदीची दिशं गच्छेत्।। अमीनात्मनियेतानान्समारोप्य यथाविधि अन. १ तपश्चरंश्योप्रतर शोषयेद्देइमात्मनः। मिरनिकेतः स्यान्मानर्मूलफलाचनः ।
(४६०)
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित ।
तीन आश्रमीयोंको पुण्य लोककी प्राप्ति कही प्राप्त होता है इस वचने से जो गृहस्थीको
है-इस प्रकार आश्रमोंका स्वरूप और उन मोक्षका प्रतिपादन कियाहे वह जिसने अन्य
आश्रमीयोंको पुण्य लोककी प्राप्तिको कह-जन्ममें संन्यस्त धर्मको धारण किया हो उस
कर ब्रह्ममें है निष्ठा जिस्की ऐसा आश्रमी गृहस्थोक विषयमें समझना ।
मोक्षको प्राप्त होताहै इस वचन में परिशेपसे भावार्थ-ग्रामसे भिक्षाको लाकर मौनी
ब्रह्मसंस्थ पम्रिाजक (संन्यासी) को ही होकर आउग्रासोंको खाय अथवा वायुको
मुक्तिरूप अमृतत्वकी प्राप्ति कही है-सत्य- खाताहुआ भरणपर्यंत ईशान दिशाको गमन
वादी श्राद्धके करनेवाला गृहस्थी मोक्षको करें ॥५५॥
१ अप्रसंस्थोऽमृतात्मेति।
१ प्रादयत् सत्यगदी च गृहस्थोपि विमुच्यते।
इति वानप्रस्थधर्मप्रकरणम् ॥३॥
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४ (१६१) है अथ यतिधर्मप्रकरणम् ४ सोई जाववलकी श्रुति में देखा जाता है कि ब्रह्मचर्य आश्चमको समाप्त करके गृहस्थी बनाहादाकृत्येष्टिसार्ववेदसदक्षिणाम् । होय और गृहस्थको समाप्त करके वानप्रस्थ प्राजापत्यांतदंतेतागमीनारोप्यचात्मनि ॥ होय-और वानप्रस्थके अनंतर परिवाजक होय-अथवा-ब्रह्मचर्यसेही संन्यासी हो अ- पद-वनात्महात्यवा-कृत्वा-इष्टि२ थवा गृहस्थाश्रमके वीतनेपर हो अथवा वा- सार्ववेदसदक्षिणाम् २ प्राजापत्यां २ नप्रस्थके अनन्तर हो तिसी प्रकार गृहस्था- तदन्ते ७ तान २ अमीन भाषेप्य:- चा-१ श्रमके पीछे अन्य आश्रमका अभाव गीत- आत्मनि ॥ मैने दिखाया है कि अथवा एक गृहस्थही अधीतवेदोजपकृसुत्रवानन्नदोनिमान् । आश्रमको रबरवै क्योंकि गृहस्थकी विधि शत्याचयशकृन्मोझेमनाकुर्यातुनान्पथा। प्रत्यक्ष है-इन सब समुशय-विकल्प-और पाध पक्षोंका श्रुतिसिद्ध होनेसे अपनी इ- पद-अधीतवेदः १ जपकृत् १ पुत्रवान्१ च्छासे विकल्प है अर्थात् जो ब्रह्मचर्य के अ- अन्नदः १ अमिमान् १ शत्तया ३ च-नन्तर संन्यास लेनेकी इच्छा होय तो सं- यज्ञकृत् १ मोक्षे ७ मनः २कुर्यात कि-तु:- न्यास लेले न होय तो गृहस्थाश्रममे आ- न:- अन्यथा:- जाय-इत्यादि-इससे अपनेको पण्डित मा- ननेवाले में जो कहा है कि नैष्ठिकब्रह्मचर्य योजना-वनात् अथवा गृहात् अनंतर आदि स्मृति विदित है इससे उनका बेद- सार्ववेदसदक्षिणां प्राजापत्या इष्टिं कृत्वा तदन्ते अमीन भात्मनि समारोप्य अधीत- विहित गृहस्थाश्रमसे बाध है अर्थात जो वेदः जपकृत् अन्नदः अमिमान् चपुनः गृहस्थाश्रमके योग्य हो वह नैष्ठिक प्रह्मचर्य शत्तपा यज्ञकृत सन माझे मनः कुर्यात आदिको ग्रहण न करे अथवा नाहकमा चर्य आदि उनके विषय में है जो गृहस्था- अन्यथा न कुर्यात् ।। श्रमके अधिकारी नही है ऐसे अन्धे दुरी तात्सर्यार्थ-बडे तीक्ष्ण तपके करनेसे नपुंसक आदि जो है-सी इस उन पण्डित- जिसने अपने शरीरको सुखा दिया है ऐसे मन्योंके कथनमें वेदाध्यनकी शून्यता, कार- वानप्रस्थका जितने कालमें विषयोंका परि- : पहै-अर्थात् वे वेदको नहीं मानते इससे पाक होजाय और फिर मंदसे उत्पन्न हुई । उनका कथन सर्वथा त्यागनेयोग्य है जैसे भाशका ( भय ) न हो तबतक यन में वस- । कि श्रोत कर्म ( यज्ञ आदि के विप पंगु कर उसके पीछे मोक्षमें मनको लगाव-पही अंधे आदिका अधिकार इस लिये नदी वन और गृह शब्दसे उनके सम्बन्धी कि ये विष्णुको परिक्रमा और घृतका अवे- माश्रम ( वानप्रस्थ गृहस्थ ) लेते हैं और क्षण (देखना) आदि नही करसते तिती मोक्ष शन्दसे मोक्षदी है मुख्य फल जि- • प्रकार स्मात कर्म (नष्ठिक माह्मचर्य ) भा- सका ऐसाचतुर्थ आश्रमहते है-इस यचनक यहने से यह यात सूचन करीकि आश्रमांका, भोइनी मुत्य प्रजोत् यदि वगरया प्रय समुच्चयक्ष अर्थात् चारों भाश्रमोंको । सो शानद्वा। भोगना-जो पूर्व का है उसमें विकल्प है १ प्रनया परिसमाय गृही भनेही भूसा बनी - ৪বাধ যাতায়াবেয়াপলাগবে।
(४६२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - दिमेंभी वे जलसे भरे घडेको लाना-भिक्षाके और अपनेसे ज्येष्ठ भाईने अग्न्याधान न अर्थ जाना इत्यादि कर्मके करनेमें वे समर्थ किया होय तो आप आन्याधन न करे इस नहीं हैं तो फिर किस प्रकार नष्ठिक आ- प्रतिवन्धके न होनेपर अग्न्याधानको करके दिको उनपंगु आदिके विषय माननेसे चरि- उसमें नित्य-नैमित्तिक यज्ञको करके मो- तार्थ मानते हो-इस चतुर्थ आश्रमके विषे क्षमे मनको करें-अर्थात् चतुर्थ आश्रममें ब्राह्मणकोही अधिकार है-सोई मनु (अ० प्रविष्ट होय अन्यथा नहो-इस वचनसे ६ श्लो० २५)ने कहा है कि आत्मामें अ- | जिसने तीनों ऋण निवृत्त न किये हो निओंका आरोप करके ब्राह्मण संन्यासको उसको संन्यासका अधिकार नही यह ले-तैसेही मर्नु ( अ० ६ श्लो० ९७ )न | बात सूचन करी-जसे कि मनु ( अ६ कहा है कि-हे ऋषीश्वरो इस प्रकार ब्राह्म- श्लो० ३५ )ने कहा है कि तीन ऋणोंको णके चार प्रकारके धर्म तुमको बताए-इस | निवृत्त करके मनको मोक्षमें लगावे- प्रकार प्रारंभ और समाप्तिके वचनोंसे मनुनें और ऋगाको विना निवृत्तकिए जो संन्या- ब्राह्मणकोही अधिकार सूचन किया है-इससे सका सेवन करता है वह नरकमें पडता और ब्राह्मण परिव्राजहो इस श्रुतिसे ना है-जो कि ब्रह्मचर्य से पाछे संन्यासी होनाचा- ह्मणको ही अधिकार है द्विजाति मात्रको नही है उसको सन्तानकी उत्पत्ति करनेका और अन्यतो त्रैवर्णिकानां-इसको अधिका- | नियम नही क्योंकि पुत्रके उत्पादन आदिमें रसे और वेदाध्ययनपूर्वक चारों आश्रम जिसने दारपरिग्रह (विवाह ) न किया हो तीनों वर्णीको होते हैं उस सूत्रकारके वचने उसको अधिकार नहीं और विवाहमें राग से द्विजाती मात्रको संन्यासका अधिकार चित कोई शंका करे कि तीनों ऋणोंक निमित्त है इससे दार परिग्रह नित्य नहीं-कदा कहते है-जब गृहस्थ वा वानप्रस्थसे स. न्यास लेना चाहैं तब सम्पूर्ण वेदकी जिसमें होता है क्योंकि विवाहके किए विना ऋण दूर करनेकी विधिसेही दाराओंका आक्षेप दक्षिणा है प्रजापति जिसका देवता है ऐसे निवृत्त नहीं होतक्ता वह ऋणकी निवारण- यज्ञको करे-उससे पीछे वैतान अग्निओंको विधि दारपरिग्रहके नियम करने वाली है- वेदविहित विधिसे आत्मामें आरोपण करै- | सो ठीकनही क्योंकि विद्या और धनके अ- और च शब्दसे पूर्णमासीके दिन पूर्व पुरश्च- | र्जन (इकठ्ठा करना) के नियमके समान रण करके शरीरको शुद्ध कर आठ वाचारह यह ऋणनिवारक विधिभी स्त्रीके परिग्रह- श्राद्धोंको कर इस बौधायेनके कहे पुरश्च- | का आक्षेप नहीं करती क्योंकि वह विधि रणकोकरे नप करनेमें युक्त पुत्र जब हो- जिसने स्त्री का परिग्रह किया है उसके वि- जाय-और दीन अंधे कृपण इनको धनका | षय चरितार्थ है-कदाचित् कोई यह कहने अर्पण करके-यथा शक्ति भन्नको देकर- | लगेकी उत्पन्न (पैदा ) होतेही सम्पूर्ण बा- : आत्मन्यनीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रबजेट गृहाद । ह्मण तीन ऋणोंके साथ जन्म लेते हैं इससे २ एषवौमिहितो धर्मों प्राह्मणस्य चतुर्विधः। ब्रह्मचर्य आश्रमसे ऋषिओंके ऋणको और यज्ञसे देवता ओंके ऋणको और प्रजा ४त्रयाणां वर्णानो वेदमधीत्य चत्वार भाश्रमाः | (संतान ) से पितरोंक ऋणको निवृत्त करे ५ पौर्णमास्यां पुरश्चरणमादी कृत्वा शुद्रेन काये ऋणानि श्रीण्यपात्य मनो मोक्षे निवेशयेत् । नाटौनादानि निर्वपेद द्वादश था। भनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो मजत्यधः। ३ ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति ।
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्ममकरण ४ (४६३) इस वचनेसे ब्राह्मण मात्रको प्रजाका उत्पा | योंका हित करे. अर्थात् दर्षके देनेवालेसे दन आदि आवश्यक है यह दिखाया है- | अत्यंत हित और दुःखदेनेवाले उदासी- सो टोक नही क्योंकि इस वचनका यह अर्थ नता न करे-क्योंकि गोतमे की स्मृति है है कि जिसने दाग और अमिका परिग्रह कि हिंसा और अनुग्रहको न करे-वाहित न कियाहो उत्त ब्राह्मण मानको यज्ञ आदि और अन्तःकरणमें शान्त (राग द्वेष र- कर्ममें अधिकार नही इससे अधिकारीही हित ) रहै-तीन दण्ड वालेको निदंडी कहते जायमान ब्राह्मणआदियज्ञ आदि कर्मको करे | हैं-ये दंड वेणु (वांस )के समझने-उनको इससे जिसकायज्ञोपवीत होगयाहो उसको वे . ग्रहण करे-क्योंकि ऐसा स्मृत्यन्तरेमें लिखा दाध्यपन ही आवश्यक कर्म है अन्य नही और है कि प्राजापत्य यज्ञक अनंतर मस्तक जिसने स्त्री और अग्निको ग्रहण किया हो | तक जो लम्बेहो ऐसे तीन बांप्तके दण्डोंको प्रजाका उत्पादन भी आवश्यक कर्म है- दाहिने हाथ से धारण करे और वामहाथमें इससे सब निर्दोष है। जल सहित कमण्डलको धारण करे-अथवा भावार्थ-वानप्रस्थ वा गृहस्थाश्रमके अन- एक दण्डकोही धा•ण करें क्योंकि पोधा- न्ता सब वेदोंकी जिसमें दक्षिणा प्रजापति यनकी स्मृति है कि एक दंडवाला हो अ- जिसका देवता है ऐसे यज्ञको करके और थवा तीन दंडवाला मिदंडीहो और चतुविश- उसके पीछे वैतान अमिओंका आत्मामें तिके मतभी यह लिखाहै िसवसंगोंसे र. आरोप करे जिसने वेद पटलियादो-जप हित होकर एक दंड वा तीन दंडको धारण करने वालाहो-जिसके पुत्र उत्पन्न हो लिया करके ब्रह्मविद्यामें तत्पर ब्राह्मण चतुर्थ हो यह अन्नदान-और आधान कीहुई अ- आश्रममें प्राप्त होय-तिसी प्रकार शिखाका ग्निमें शक्ति के अनुसार यज्ञको करक मोक्षमें धारण करनाभी वैकल्पिक (धारण करना मनको लगाव-अर्थात् चतुर्थ आश्रममें प्र- नया करना) है क्योंकि गोतमको स्मृति धेश करे अन्यथा न करे॥५६॥५॥ है कि मुण्डन करादे अथवा शिखाको धा- रण करे-वशिष्टने भी कहा है कि मुण्डन सर्वभूतहिताशांतत्रिदंडीसकमंडलु । करादे-ममतासे रहित रहे-क्रोध और एकारामापरिमापभिवाग्राममाश्रयेत् ॥ परिग्रह इनकोभी त्यागदे यज्ञोपवीतके धा- पद-सर्वभूतहितः १ शान्तः१त्रिदण्डी १ रणर्मभी विकल्प है क्योंकि काठककी श्रुतिम सकमण्डलुः १ एकारामः १ परिग्रन्या भिक्षार्थी १ प्रामम् २ माश्रयेत् कि-॥ १हिमानुप्रयोरनारम्भी। योजना-परिमन्य ( संन्यासी भूत्वा ) २ प्राजापत्यैश्पनन्तर पान्देशान्दगन् मुर्ध. सर्वभूतहितः शान्तः विदण्डी सकमण्डलुः प्रमाणान्दक्षिणेन पाणिना धारयेत सव्येन शोदक एकारामः भवेत्-भिक्षार्थी सन्माम आश्रयेत पमडम् । ३ एकरदी विष्टीपा। तारपर्य-प्रिय (हर्ष ) करने वाले और vधनुर्पमा प्रम मोनापियापरायगः। एकरी अमिय (दुःख ) करने वाले सय प्राणि-विली या सर्वसंगविवर्जितः । १पुग्दा शिली वा। मारमातो ३ प्रामानिमिजान जाने प्रहरीयो पोरसम्यः प्रपा विभ्यः। ६ भुगोऽममोम्योचोमाः। ५ सामान्यनिकर रिमा पापवीतम् । meuru .
पायाश्चत्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४ (४६५) . मणकी न होयतो चार महीनापर्यतभी एक जिस समय धूआं न रहै-मुसलका शब्द न. 'स्थानपर स्थित रहे-वर्षाकालको छोडकर होताहो मनुष्य सब भोजन कर चुके हों-शगव एक स्थानपर बहुतकालतक न वसे-क्योंकि (सराई ) कोभी फेंकदीहो-उस समय यति देवलकी स्मृति है कि वर्षालक्षण इननेही सदा भिक्षा करे (मांगे) तसेही यहभी कहाई' कहा है श्रावणआदि चार महीना वर्षाकाल | कि एक समय भिक्षाको लावै भिक्षाके अत्यं- होता है कण्वपिनेभी कहा है कि ग्राम | तविस्तारमे आसक्तनहो क्योंकि बहुतसी एकरात्र औरनगरमै पांचरात्रओर वर्षाऋतुमें | भिक्षामें आसक्त हुआ यति विषयों में भी किसी स्थानपर चार महीना निवास कर ॥ भासक्त होजाता है-अनभिलक्षित रदै भावार्थ-सब कर्मीका परित्याग करके | अर्थात् ज्योतिष विद्या के प्रश्न-मुहूर्त-आदि- सब भूतोपरहित रक्खे शान्त रहे-तीनदण्ड का पताना-रूप चिह्नको नरखे सोई मर्नु और कमण्डलुको धारण करे-अकेला रहे- (अ०६ श्री. ५०) ने कहा है कि उ- मिक्षाके निमित्त प्राममें प्रवेश करें ॥ ५० ॥ त्पात-मुहूर्त आदिका बताना-क्षत्रियको विद्याका उपदेश-उत्तम शिक्षा और वादः अपमत्तश्चरेद्रेक्षसायाह्ननभिलक्षितः ॥ इन कारणोसे संन्यासी भिक्षाकी कदाचित् रहितेभिक्षुकैमियात्रामात्रमलोलुपः ५९॥ भी लेनेकी इच्छा न करें-जोकि फिर वसिष्ठ ने यह कहा है कि प्राह्मणके फुलमें जो पद-अप्रमत्तः १ चरेत् कि-भक्षं २ सायाझे ७ अनभिलक्षितः र रहित भ- | कुछ मिले उसकाही मांसकधिना सायंकाल और प्रातःकाल भोजन करे-सो यह वचन क्षुकैः ३ ग्रामे यात्रामानं २ भलोटुपः १॥ असमर्थके विषयमें है-भिक्षा मागनेका योजना-संन्यासी अप्रमत्तःअनभिलक्षितः जिनका स्वभाव है ऐसे पाखण्डी आदिसे या अलोलुपः सन् सायाह्ने भिक्षुकः रहिते | रहित ग्राममें भिक्षा करें-मन (भ०६ शो प्रामे यात्रामा भक्षं चरेत् ।। ५१) ने यहां यह विशेष दिखाया है कि तात्पर्याय-अप्रमत्त अर्थात् वाणी और जो गृह तपस्वी ब्राह्मण पक्षी कुत्ता और नेन आदिकी चपलतासे रहित होकर अन्य भिक्षुक इनसे आकीर्ण (व्याप्त नहो भिक्षाको मांगे-वसिष्ठने यहां विशेष दिखाया उसमें भिक्षा की याचना करे-जितने अन्नस है कि जो संकल्पित (मनमें विचारे) नहीं प्राणोंको याना हो उतनीही भिक्षा कर सोई ऐसे सात घर भिक्षामांगे-सायान शब्दसे संवत ने कहा है कि सन्याप्ती आठ सात दिनका पांचमांभाग समझना-तिसी प्रकार एकपाल घोमिक्षा सनतु तिरे । मने (अ० ६ शो०५६) ने कहा कि मैमनसको हि यतिषिपप्पपि मनति । नयोरगतनिधियों न नक्षमागविषया. नानु. १२ गिरामेल बसेदन्यत्र वर्षाकाला। नासनगदम्या भिक्षी टिमेत गहिन्ति । २यानायगारो मामा वर्षाशः। मानाले वा परमेव तदुजीन सामान- ३ एमरा बसेगमे नगरे गायक । वांम्पो- मामाम् । स्या पर्गमु मामात्सु गनुरो बसप । ४न सामाना गोभिरि का अभिः । ४ सागाराग्यसपन्निवानि पारम् । भाती मिग्मगारमा ५रिने सम्ममः पगारे भुन बने । इते ५ भोमिक्षाः ममामाप निः सप्त च पम । सगगते नियमिक्षा परिमोद । भद्धिः भाप दासगरिनटाउौपाय वाग्यतः ।
(४६८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । करे॥६५॥ जिस्का ऐसे इन ध्यान और योगोंसे-सूक्ष्म | का निराकरण-ज्ञानकी उत्पत्तिमें कारणरूप शरीर-और प्राण आदिसे पृथक् क्षेत्रज्ञ | अन्तःकरणकी शुद्धिके पैदा करनेमें राग जिसका नाम है और ब्रह्मके बीचमें अव-द्वेषका परित्याग अन्तरंग रूपसे प्रधान स्थित है इस प्रकार तत्व और पदार्थोकी (मुख्य कारण )है इस रागद्वेपकी प्रशं- एक्यताको भली प्रकार देख-इसीसे इस साके लिए है कुछ आश्रमके परित्यागके श्रुतिमें आत्मा देखने योग्य है इस वाक्यसे | लिए नहीं क्योंकि वह स्मृतिसे विहित है- आत्माको साक्षात्काररूप दर्शनको कहकर सोई मर्नु (अ० ६ श्लो० ६६ ) ने कहा है उसके साधनरूप-इस वाक्यसे अवण- | दूषितभी मनुष्य जिस किसी आश्रममें वसता मनन-और निदिध्यासनको कहा है। हुआ धर्मको करें- रै-सब प्राणीयोंके ऊपर सम भावार्थ-गर्भमेनिवास-कर्मसे पैदाहुई- रहे क्योंकि केवल लिङ्ग कमण्डलु आदि गति-आधि-व्याधि-फेश जरा रूपविपर्यय | धर्ममें कारण नहीं । अनेक जातियोंके विषे जन्म-प्रिय (इष्ट) भावार्थ-आश्रम धर्मके विर्षे कारण नहीं अप्रियका विपर्यय इनको विचारपूर्वक देखें क्योंकि वह करनेमें अत्यंत दुप्कर नही है- आत्मामें स्थित सूक्ष्म आत्मा है इस इससे जो आत्माके उद्वेग करनेवाले कठोर- प्रकार ध्यानयोगसे आत्माके स्वरूपको वचन आदि है उनको दूसरेके निमित्त न विचार ।। ६३ ।। ६३ ॥ नाश्रमाकारणंधमक्रियमाणोभवेद्विसः । सत्यमस्तेयमक्रोधोहीःशीचंधीधृतिर्दमः । अतीयदात्मनोपयंपरेपांनतदाचरेत्।६५। संयतेंद्रियताविद्याधर्मःसर्वउदाहतः । ६६ पद-न-आश्रमः १ कारणं १ धर्म ७ पद-सत्यं १ अस्तेयं१ अक्रोधः१ हीः१ क्रियमाणः१ भवेत् क्रि-हि- सः१ अतः:- शौचं १ धीः १ धृतिः १ दमः१ संयते- यत् १ आत्मनः ६ अपथ्यं १ परेषां ६ न:- |न्द्रियता विद्यारधर्मः१ सर्वः१ उदाहतः १ तत् १ आचरेत् कि-॥ योजना-सत्यं अस्तेयम् अक्रोधः ही: योजना-आश्रमः धर्मे कारणं नास्ति हि शोचं धीः धृतिः दमः संयतन्द्रियता विद्या यस्मात् सः क्रियमाणो भवेत् तस्मात् यत् एष सर्वः धर्मः उदात्तः॥ आत्मनः अपथ्यं तत् परेपांन आचरेत् ॥ तात्पर्याय-ययार्थ-और प्रियवचनका तात्पर्यार्थ-पूर्व शोकमें कहा जो भात्मा. उचारणरूप-और दूसरके द्रव्यको न को उपासनारूप धर्म है उसमें आश्रम नुराना-वह अस्तेय-और अपना जो तिर- अर्थाद दण्ट कमण्डलुआदिका धारण कारण | स्कार कर उसके उपरभी क्रोध नहीं करना नहीं है क्योंकि वह कियानाय तो अत्यंत | वह अक्रोध-सी (लना) आहार भादिको दुपर नही-तिससे गो मात्मामें उदग- शुद्धिरूपशाच हित और अहितको जो करनेवाले कटोर भाषण आदि हैं उनको विचारनारूप धी-इष्ट वस्तुके वियोग होनेपर पपए निमित्त न करे-दस वननस आश्रम- भार अनिष्ट (दुःख) पस्तुकी प्राप्ति होनेपर १ भागमा परेरचः। १ दृषि गोदमै पन तपाय बगर । एमः २ योगयो मन्नन्या मिनिमः। सच भूतेन रिंग पसारा ।
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण (४६९) जो चित्तमें हलचलता पैदाहो उस चित्तको विर्ष स्थित देखना-अथवा इसका यह दूस- जो पूर्वकी समान स्थिर करना वह धृति-) रा उत्थानिकापूर्वक अर्थ करते हैं कि जब मदका जो त्याग-वह दम जिनका-प्रतिषेध | सब क्षेत्रज्ञ सुषुप्ति और प्रलयकालके समय नहीं है ऐसे विषयोंपरभी चित्तका जो न ब्रह्ममें लीन (अन्तर्धान) होजाता है तब लगाना वह संयतेन्द्रियता-आत्माका जो आत्माकी उपासनाविधि किस क्षेत्रज्ञके ज्ञान वह विद्या-इन सब सत्य आदिके कर- विषय है-इससे यह निःसरन्तिआदि श्लोक नेसे सम्पूर्ण धर्मका अनुष्ठान यथावत् हो | से उत्तर कहते हैं कि यद्यपि प्रलयकालमें जाता है-इस श्लोकसे दण्ड कमण्डलु आदि । सूक्ष्मरूपसे सब क्षेत्रज्ञ लीन होजाते हैं जो बाह्यचिह्न हैं उनसे सत्य आदि आत्माके तथापि फिर उसी ब्रह्मके सकाशसे अविद्या गुणोंको अन्तरंगता(श्रेष्ठतावा आवश्यक रूप उपाधिके भेदसे भिन्नरूप जीवात्मा द्योतन की॥ उत्पन्न होते है और कर्मके वशसे स्थूल भावार्य-सत्य-चोरी न करना-क्रोधसेरहि- शरीरके अभिमानी ( कि मैं स्थूल हूं-कृशहूं) तहीना-लज्जा-शौच-बुद्धि-धैर्य-दम-इंद्रि- | होजाते है-तिससे आत्माकी उपासना वि- योंको जीतना और आत्मज्ञान ये सम्पूर्ण धिमें विरोध नहीं लोह पिण्डका दृष्टान्त इस धर्मका स्वरूप है ॥ ६६॥ समताको सूचन करनेको दिया है कि जसे लोहपिण्डकी अग्निसे उत्पन्नहुए अमिक निःसरतियथालोहपिंडात्तप्तारस्फुलिंगकाः। कण भिन्न प्रतीत होते हैं इसीप्रकार परमा- सकाशादात्मनस्तद्वदात्मानःप्रभवंतिहि ॥ | मासे उत्पन्न हुए जीव पृथर हैं-परमार्थतः पद-निःसरन्ति कि-यथाऽ-लोहपिण्डाव५ कुछ भेद नही ।। तप्तात् ५ स्फुलिंगकाः १ सकाशात् ५ भावार्थ-जैसे तपाएहुए लोहेके गोले से आत्मनः ६ तद्वतः-आत्मानः १ प्रभवति स्फुलिंग निकलते हैं इसीप्रकार आत्माके क्रि-हि-11 सकाशसे आत्मा (जीव ) उत्पन्न होते योजना-यथा तप्तात् लोहपिण्डात् स्फलिं- हैं ॥६७ ॥ गकाः निःसगन्ति तद्वत् आत्मनः सकाशात् तत्रात्मादिस्वयंकिंचित्ककिंचित्स्वभावतः आत्मानः प्रभवन्ति ॥ करोतिकिंचिदभ्यासाद्धर्माधर्मोभयात्मकं ।। तात्पर्य यद्यपि जीव और परमात्मामें पारमार्थिक कोई भेद नही है तथापि परमा-चित-कर्म २ किंचिता स्वभावतः करोति पद-तत्रा- आत्मा १ हि-स्वपा-कि- माके सकाशसे अविद्यारूप उपाधिभेदसे भिन्न जीवात्मा उत्पन्न होते हैं इससे जीव क्रि-किंचिता अभ्यासात् ५धर्माधभिया- और परमात्मामें भेदका व्यपदेश (व्यवद्दार) त्मकम् २॥ किया जाता है-असे अग्निमें तयारहुए योजना-हि (निश्चयेन ) तन आत्मा लोईके गोलेमते स्फुलिंग (अनिके कण) किंचित् धर्माधभियात्मकं कर्म स्वयं निकलते हैं और उनको जगत्, स्फुलिंग करोति किंचित् स्वभावतः किंचित् अभ्या- इस नामान्तरसे उच्चारण करते हैं-इससे ; सात् करोति ।। -टपपन्न (स्थित हुआ) आत्माको भारमाके । A तात्पर्य यद्यपि तिस प्रलयरूप अव- (७०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । स्थामै परिस्पन्द (हलन चलन )रूप क्रिया रूप कर्मको पूर्व जन्मके अभ्यासके बलसे नहीं होती तथापि धर्म और अधर्मका करताहै ।। ६८ ॥ अध्यवसायरूप मानसकर्म होता है और निमित्तमक्षरकर्ताबोद्धाब्रह्मगुणीवशी । उस कर्मकोही विशिष्ट (जरायुज) शरीर आदिके ग्रहणमें कारणता है क्योंकि मनु अनःशरीरग्रहणात्सजातइतिकीयते ।६९१ (अ० १२ श्लो० ९.)ने लिखा कि वाणीसे पद-निमित्तम् १ अक्षरः १ कर्ता १. किए कमाते पक्षी और मृगको योनिको | बोद्धा १ ब्रह्म १ गुणी १ वशी १ अजः १ और मनसे किए कमासे चाण्डालयोनिको शरीरग्रहणात् २ सः १ जातः १ इति:- प्राप्त होता है-इसप्रकार मानसकर्मसे शरी- कोत्यंत क्रि-॥ रको ग्रहण करके स्वयंही-अर्थात् इस योजना-निमित्त-अक्षरः कर्ता बोद्धा ब्रह्म अन्वयव्यतिरेककी अपेक्षाके विनाही | गुणी वशी अजः सः शरीर ग्रहणात् जातः स्तनसे उत्पन्न हुए दूधके पोनेपर तृप्ति होती | इति कीर्त्यते ।। है और उसके न पीनेपर तृप्ति नही होती तात्पर्यार्थ-वह सत्य आत्मा इस संपूर्ण और पूर्वजन्मके अनुभव (ज्ञान)का सं- जगत्के प्रपंचको प्रकट होनेपर अविद्याके स्कार जो है उसको किसी अदृष्टके केवल समावेशसे स्वयंही समवायी-असमवायी- से उदुद्ध (खलना ) होनेसे जिसको पूर्व और निमित्तरूप तीन प्रकारका कारणही : जन्ममें किएहुए हित अहित कार्योका | है-कार्य कोटिमें प्रविष्ट नहीं है क्योंकि वह स्मरण होजाता है वह किंचित् दुग्धपान | अक्षर अर्थात् नाशसे रहित है-कदाचित आदिकोको करता है और किसी प्रयो- कोई शंका करे कि इस कार्यरूप जगत्में जन आदिके विनाही पिपीलिका ( चेटी ) | सुख दुःख और मोहरुप सत्त्व आदि आदिके भक्षणरूप कर्मको यदृच्छासे करता | गुणके विकार देखे जाते, तो उस गुण- है-और किसी धर्म अधर्मरुप कर्मको जन्मा- वाली प्रकृतिकोही जगतका कर्ता मानना न्तरक अभ्यासके चलसे करता है सोई | उचित है उन गुणोंसे रहित ब्रह्मको नही- स्मृत्यन्तर में लिखा है कि जो जन्म जन्ममें | सो ठीक नहीं क्योंकि जीवोंको भोगने योग्य दानवाअध्ययन वा तप अभ्यास(अतिशयसे) जो सुख और दुःख हैं उनका कारणरूप किया है-उसी अभ्यासके बलसे फिरभी । जो अदृष्ट ( धर्म अधर्म) है उसका देखनें- उसी दान आदिका अभ्यास करता है-इस वाला ब्रह्मही है इससे आत्माही का है प्रकार यह वात युक्त हुईकि जीवोंको को- प्रकृति नही-आर यह प्रकृति अचेतन है की विचित्रतासे-जगुयुज आदि देहकी । इससे नाम और रूपांसे नाना प्रकारके जो विचित्रता प्राप्त होती है। भोक्ता ओक समूह हैं उनके भोगके अनु- भावार्य-ऐसी अवस्थामें यह आत्मा । फूल भोग्य( उत्तम पदार्थ ) और भोगायतन किसी कर्मको स्वयं करता है किसीको ( शरीर आदि ) जिसमें रचेजाते हैं स्वभावसे करता है और किसी धर्म और अधर्म से इस जगत् की रचनाभी उसके विषय १ पागो: बिगा मानमान्यज्ञातिनाम् । युक्त नहीं है-इससे यह धर्म और अधर्मका २ परिजन्म पदभ्यान दानमध्यानं तपः। नया साक्षी चेतन प्रानदी कारणह-और यही पान अांद इस जगदमा विस्तार करनेवाला - স্বামীর স্বামী খুন।
पायाश्चत्ताध्याय यातधर्मप्रकरण ४ (४७१) है-और यह ब्रह्म निर्गुणभी नहीं है क्योंकि तापर्य-सृष्टिके रचनेके समय जिस प्रकृति प्रधान है दूसरा नाम जिस्का | प्रकार परमात्मा-शब्द है एक गुण जिस्का ऐसी अविद्या रूप जो तीनों गुणोंको शक्ति ऐसे आकाशको और शब्द-स्पर्श ये दो हैं जिसमें विद्यमान है-इससे यद्यपि आप नि- गुण जिसमें ऐसी वायुको और शब्द-स्पर्श- गुणभी है तोभी उस अविद्यारूप शक्तिके | रूप-ये तीन हैं गुण जिसमें ऐसे तेजको- द्वारा सत्व आदि गुणोंका सम्बन्धी कहा और शब्द-सर्श-रूप-रस-ये चार गुण हैं जाता है-इस इतनी बातसेही प्रकृतिको जिसमें ऐसे जलको-और शब्द-स्पर्श- कारणता नहीं है क्योंकि वह आत्मा वशी रूप-रस-न्ध-ये पांच गुण है जिसमें ऐसी अर्थात् स्वतंत्र है और प्रकृति परतंत्र है- पृथ्वीको इस प्रकार पूर्वसे २ एक २ गुण है यदि आत्माक समान प्रकृतिहीको जगत् अधिक जिनमें ऐसे इनको रचता है-तिसी करने में स्वतत्र अन्य पदार्थ है ऐसा विचारो प्रकार आत्माभी जीव भावको प्राप्त होकर सोभी ठीक नहीं क्योंकि प्रकृतिको उस प्र- उत्पन्न हुआ अपने शरीरके आरंभक रूपसे कारकी मानने में कोई प्रमाण नही इससे उनको ग्रहण करता है- आत्माही जगतका तीन प्रकारका कारण है- भावार्य-सर्ग आदिमें जैसे परमात्मा एकर तथा अन अर्थात् उत्पत्तिसे रहित है इससे उसको साक्षात् उत्पत्ति नहींह तथापिशरीरक गुण जिनमें पूर्वसे अधिकहे ऐसे इन आका- श-वायु-तेज-जल-पृथ्वी-इनको रचता है ग्रहण करनेसे जात (उत्पन्न) ऐसा कहा जाता उसी प्रकार आपभी जीवन भावको प्राप्त होकर है-क्योंकी वह अन्य अवस्थाके संबन्धसे उत्पन्न होताहे-जैसे गृहस्थाश्रम सम्पन्धसे- उनको शरीर रूपसे ग्रहण करता है॥७॥ गृहस्थोयं जात ऐसा कहते हैं । आहुत्पाप्यायतेसूर्यःसूर्याष्टिस्तथीपधिः। भावार्थ-वह आत्मा कारण अविनाशी तदन्नरसरूपेणशुक्रत्वमधिगच्छति ॥७२॥ जगत्का कर्ता-बोद्धा-ब्रह्म सत्व आदि गुण- पद-आहुत्या ३ आप्यायते क्रि-सूर्यः १ वाला-वशी (स्वतंत्र ) अन अर्थात् उत्प- सूर्यात ५ वृष्टिः१ तथा-ओपधिः१ तदन्नं १ तिसे रहित है और वह केवल शरिके प्र. सरूपेण ३ शुक्रत्वम् अधिगच्छति क्रि- हण करनेसे जात ( पैदा हुआ ) कद्दा जाता है ।। ६९ ॥ योजना-आहुत्या सूर्यः आप्यायते-सू- यात् वृष्टिः-तथ वृष्टेः ओषधिः ओषध्या सर्गादीसययाकाशवायुज्योतिर्जलमहीम् । अन्नं जायते तत् अन्नं रसरूपेण शुक्रत्वम् सृजत्येकोत्तरगुणांस्तथादत्तेभवन्नपि ।७०1 अधिगच्छति-(प्रामाति) ॥ पद-सादी सः १ यया- आकाशं २ तात्पर्याय-यजमान जो पुरोटाश आदि वायु २ ज्योतिः २ जलम् २ महीं २ मृजति : आहुतिको अग्निमें गैरता है उसके रससे कि-एकोत्तरगुणान् २ तथा:- आदते क्रि-सूर्य वृद्धिको प्राप्त होता है और जिसमें का- भवन् १ अपि-॥ लके वस पृत आदि हविका रस परिपाकको योजना-सः सर्गादी यथा आकाशं वायु प्राप्त होगाता है ऐसे सूर्यसे वर्षा होती है ज्योतिः मही-एकांतरगुणान् सृजति तथा । और दस वर्षासे बौद्धि (धान) आदि आ- भवन् भपि आदते।। पधिरूप अन्न पैदा होता है और वह अन्न (१७२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भक्षण किया हुआरससे रुधिर इत्यादि क्रमसे जो यह वीर्य योनिमें जाकर स्त्रीके रजसे मि धार्य और शोणितरूपको प्राप्त होताहै ॥ लता है उस समय उसी क्षणमें-भूतात्मा भावार्य-आहुतिके देनेसे सूर्य वृद्धिको और सत्वगुण-रजोगुण-तमोगुण-इन तीन प्राप्त होता है और उस सूर्यसे वर्षा होती है | गुणों सहित वायु प्रेरणासे गर्भाशयमें स्थित और उस वर्षासे ओषधि रूप अन्न उत्पन्न होता है । होता है-वह अन्न रसरूपसे शुक्र शोणित भावार्थ-स्त्री और पुरुषके संयोग होनेपर रूपको प्राप्त होता है ।। ७१ ॥ दोपसे रहित शुक्र और शोणितमें स्थित स्त्रीपुंसयोस्तुसंयोगेविशुद्धेशुक्रशोणिते होकर वह भूतात्मा पृथिवी आदि पांच भूत पंचधातून्स्वयंपष्टआदत्तेयुगपत्प्रभुः ।७२॥ और छठा आप एक कालमेंही ग्रहण करता है ॥ ७२॥ पद-स्त्रीपुंसयोः ६ तु:-संयोगे ७ वि- शुद्धे ७ शुक्रशोणिते ७ पंचधातून २ स्वयं:- इंद्रियाणिमनःमाणोज्ञानमायुःसुसंधृतिः । षष्ठः १ आदत्ते क्रि-युगपत-प्रभुः ॥ १॥ धारणाप्रेरणंदुःखमिच्छाहंकारएवच ७३॥ योजना-स्त्रीपुंसयोः संयोगे सति वि- पद-इन्द्रियाणि १ मनः १ प्राणम् १ शुद्धे शुक्रशोणिते स्थित्वा पंचधातून्- | आयुः १ सुखम् १ धृतिः १ धारणा १ प्रेर- स्वयं षष्ठः प्रभुः युगपत् आदत्ते-(गृह्णाति) णं १ दुःखम् १ इच्छा १ अहंकारः १ तात्पर्याय-ऋतुकालके समय स्त्री और | एव:- च- ॥ पुरुषका संयोग होनेपर जो स्त्रीका और पु- प्रयत्नआकृतिवर्णःस्वरद्वेषौभवाभवौ रुपका वीर्य और शोणित, इस स्मृत्यंतरमें कहहुए दोषोंसे रहित अर्थात् वात पित्त तस्यैतदात्मजप्तर्वमनादेरादिमिच्छतः ७४ कफ दुष्टग्रंथि पूय क्षीणमूत्र पुरीप गंध पद-प्रयत्नः१ आकृतिः १ वर्णः १ स्वर- वीर्य-इन सप चीजोंसे हीन-परस्सर मिलते द्वेषो १ भवाभवौ १ तस्य ६ एतत् १ आ- रहै उसम स्थित होकर-पृथिवी आदि पंच | मनं १ सर्व १ अनादेः ६ आदिम् २ भृतरूप जो पांच धातु है उनको यह प्रभु | इच्छतः ६॥ अर्थात् शरीरके बनाने में अधर्मधर्मरूपी क- योजना-इन्द्रियाणि मनः प्राणः ज्ञानम् मके संपन्धसै समर्थ छठा भाप चेतन स्व- | आयुः सुखम् धृतिः धारणा प्रेरणं दुःखम्- रुप आत्मा एक कालमें ग्रहण करता है अ- यात् उसको भोगका आयतन ( जिसमें वर्णः स्वरद्वेषा भवाभवा एतत् सर्वम् आदि- इच्छा चपुनः अहंकारः प्रयत्नः आकृतिः 'भोग भोगा जाय ) बनाता है-साई शारिरक | मिन्छतः अनादेः तस्य आत्मनः आत्म- में लिखा है कि स्त्री-और पुरुषके मिलनेपर १ वानपित्तोष्पदुष्टप्रधिपक्षीणमनगिंधरा- तारपर्य-जो आगे कग वे ज्ञानेन्द्रिय- स्पोजानि। और कर्मेन्द्रिय-और मन-आश्रयके भे. सामगे: मोगे योनी रजसाभिसगट शुरः | दसे जो भिन्न कहेगाते है ऐसे प्राण-अ- रामनमा समतामना गुनय मसरतमाभिः । पान-न्यान-उदान-और समान ये शरीरकी सद माना मा गभगो विकात। वायु-रुप-प्राग-ज्ञान-शतवर्ष आदितक जम् आत्मजन्यम् ॥
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४ (४७३) 'जीवनरूप आय-सुख-धृति ( चित्तकी | अभिप्राय है कि गर्भाशयकी पवन-और स्थिरता) और प्रज्ञा और मेधारूप-धारण पेटको पाचनअग्नि इन दोनोंसे कुछ :२ और ज्ञानद्रिय-और कर्मेन्द्रियोंका अधिष्टा- | मूकता सूकता वह वीर्यके संबन्धसे पतला • तृत्वरूप-प्रेरण-दुःख-( चित्तका उद्वेग)- जो पृथिवी आदिका समूह हैं सो तीस दि- इच्छा-अहंकार-प्रयत्न (उद्यम ) आकार नमें जाकर करडापनको प्राप्त होताहै-सोई गौर-कृष्ण आदि वर्ण पड़गांधार-आदि सुश्रुते में लिखा है कि कुछ ठंडी और गरम स्वर वैर-पुत्र और पशु आदिका विभवरूप, वायु और जठराग्निसे परिपाकको प्राप्तहुआ भव और इनका न होना रूप अभव वे सब पृथिवी आदिका समूह करडा होजाता है- शरीरके ग्रहण करनेकी इच्छावाला जो अ- और वह तीसरे महीनेमें इंद्रियोंसे युक्त नादि नित्य ब्रह्म है-उससे उत्पन्न होते है | होता है ।। अर्थात वह आत्मा जो पूर्व जन्ममें कर्म क भावार्य-यह भूतात्मा पृथिवी आदिके रता है उसीके अनुकूल ये सब पैदा होते | साथ मिलाहुआ पहिले महीने में पतला हो- ता है और दूसरे महीने में कुछ २ मांसके भावार्थ-इन्द्रिय-मन- प्राण-ज्ञान-अ- लोदे कैसा आकार कट होजाता है और वस्था- सुख-धेर्य-- बुद्धि-प्रेरण-दुःख- तीसरे महिने में इंद्रियोंसे युक्त होता है।।७५।। इच्छा- अहंकार---प्रयत्न-आकार आकाशाल्लापवंसौदम्यंशब्दंश्रोत्रंबलादिकं वर्ण-स्वर--द्वेष-भव-अभव-ये सब वायोश्चस्पर्शनचेष्टांव्यूहनरीक्ष्यमेवच ७६॥ शरीरकी इच्छावाले नित्य (भूतात्मा ) से उत्पन्न होते है ॥७३॥४॥ शब्दं २ श्रोत्रं २ पलादिकम् २ वायोः ५ पद-आकाशात् ५ लाघवं ९ सोक्षम्यं ३ प्रथमेमासिसंश्लेदभूतोधातुविच्छितः । च: -स्पर्शनं २ चेष्टां २ व्यूहनं २रौक्ष्यम् २ मास्पदंद्वितीयेतुवृतीयेंगेंद्रियैर्युतः १७५// एव च ॥ पद-प्रथमे ७ मासि ७ संक्लेदभूतः १ पित्तात्तुदर्शनंपक्तिमौण्यरूपंप्रकाशितां । धातुविमूच्छितः १ मासि ७ अर्बुदं १ द्वि- | रसात्तुरसनशैत्यस्नेहक्लेदसमार्दवं ॥७७|| तीये ७ तु:- तृतीये ७ अंगेन्द्रियः ३ युतः१ पद-पित्तात् ५ तु-दर्शनम्२ पक्तिम् २ योजना-प्रथमे मासि धातुविभूछितः सं- | ओप्ण्यम् २ रूपम् २ प्रकाशिताम् २ रसात्५ केदभूतो भवति द्वितीयमासे अर्बुदरूपो तु:-रसनं २ शैत्यम् २ स्नेहम् २ क्लेदार भवति तुपुनः तृतीयेमासि अंगेन्द्रियैः युतो समार्दवम् २ ॥ भवति ॥ भूमर्गधंतथाघाणगौरवमूर्तिमेवच तात्पर्यार्थ-यह चेतन आत्मा पृथिवी आत्मागृह्णात्यजःसर्वतीयेस्पंदतेततः ७८ आदि धातुओंकें विर्षे जल और दूधके समान एक होकर प्रथम मासमें द्रव (पतला) पद-भूमेः ५ गन्धम् तथा:- प्राणम् २ रूप रहताहै करडा नहीं होता और दूसरे गौरवम् २ मूर्तिम् एवा-च:-आत्मारहा- महीने में कुछ २ करडा-मांसके पिण्ड १ द्वितीये शीतोष्णानिलरमिपच्यमानो भूतस- (लोदा) कैसा आकार होता है यहां यह | घातो घनो जायते । आत्मा (१७२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - भक्षण किया हुआ रससे रुधिर इत्यादिक्रमसे जो यह वीर्य योनिमें जाकर स्त्रीके रजसे मि वार्य और शोणितरूपको प्राप्त होताहै ।। लता है उस समय उसी क्षणमें-भूतात्मा भावार्य-आहुतिके देनेसे सूर्य वृद्धिको और सत्वगुण-रजोगुण-तमोगुण-इन तीन प्राप्त होता है और उस सूर्यसे वर्षा होती है । गुणों सहित वायु प्रेरणासे गर्भाशयमें स्थित और उस वर्षासे ओपधि रूप अन्न उत्पन्न होता है ॥ होता है-वह अन्न रसरूपसे शुक्र शोणित भावार्थ-स्त्री और पुरुषके संयोग होनेपर रूपको प्राप्त होता है ॥ ७१ ॥ दोषसे रहित शुक्र और शोणितमें स्थित स्त्रीपुंसयोस्तुसंयोगविशुद्धेशुक्रशोणिते होकर वह भूतात्मा पृथिवी आदि पांच भूत पंचधातून्स्वयंपठआदत्तेयुगपत्प्रभुः १७२। और छठा आप एक कालमेंही ग्रहण करता है ॥ ७२॥ पद-स्त्रीपुंसयोः ६ तु:- संयोगे ७ वि- शुद्ध ७ शुक्रशोणिते ७ पंचधातून २ स्वयं:- इंद्रियाणिमनःमाणोज्ञानमायुःसुखधृतिः । षष्ठः १ आदत्ते कि- युगपत्:-प्रभुः ॥ १॥ धारणाप्रेरणंदुःखमिच्छाहंकारएवच ७३॥ योजना-स्त्रीपुंसयोः संयोगे सति वि- पद-इन्द्रियाणि १ मनः १ प्राणम् १ शुद्धे शुक्रशोणिते स्थित्वा पंचधातून्- | आयुः १ सुखम् १ धृतिः १ धारणा १ प्रेर, स्वयं षष्ठः प्रभुः युगपत् आदत्ते-( गृह्णाति) णं १ दुःखम् १ इच्छा १ अहंकारः १ तात्पर्यार्थ-ऋतुकालके समय स्त्री और एवऽ- च-॥ पुरुषका संयोग होनेपर जो स्त्रीका और रुपका वीर्य-और शोणित, इस स्मृत्यंतरमें प्रयत्नआकृतिर्वर्णःस्वरद्वेषौभवाभवौ कहेहुए दोषोंसे रहित अर्थात् वात पित्त तस्यैतदात्मजसर्वमनादेरादिमिच्छतः ७४ कफ दुष्टग्रंथि पूय क्षीणमूत्र पुरीप गंध पद-प्रयत्नः१ आकृतिः १ वर्णः २ स्वर- वीर्य-इन सब चीजोंसे हीन-परस्पर मिलते द्वषो १ भवाभवौ १ तस्य ६ एतत् १ आ- रहे उसम स्थित होकर-पृथिवी आदि पंच मनं १ सर्व १ अनादेः ६ आदिम् २ भूतरूप जो पांच धातु है उनको यह प्रभु | इच्छतः ६ ॥ अर्थात् शरीरके बनानेमें अधर्मधर्मरूपी क- योजना-इन्द्रियाणि मनः प्राणः ज्ञानम् मके संबन्धसे समर्थ छठा आप चेतन स्व-भायुः सुखम् धृतिः धारणा प्रेरणं दुःखम्- रूप आत्मा एक कालमें ग्रहण करता है अ- इच्छा पुनः अहंकारः प्रयलः आकृतिः र्थात् टसको भोगका आयतन ( जिसमें वर्णः स्वरद्वेषो भवाभवा एतत् सर्वम् आदि- 'भोग भोगा जाय ) बनाता है-सोई शारीरक मिच्छतः अनादेः तस्य आत्मनः आत्म- में लिखा है कि स्त्री-और पुरुपके मिलनेपर वातपित्त नदुटप्रधिकृपक्षीगमत्रर्गपगधरता- तात्पर्यार्य-जो आगे कहेंगे ये ज्ञानेन्द्रिय- स्वाभानि। और कर्मेन्दिय-और मन-आश्रयके में- २ पुगणे: मोंगे योनी रजसाभिसमष्ट शु. दसे जो भिन्न कहेगाते है ऐसे प्राण-अ. समागमा सह मनारमना गुमेध मत्ताजस्ताँमः | पान-ध्यान-उदान-और समान ये शरीरकी सदाना मा गांगणे मिठा। वायु-रूप-प्राण-ज्ञान-शतवर्ष आदितक जम् आत्मजन्यम् ॥
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण १ (४७३) . जीवनरूप आयु-सुख-धृति (चित्तकी अभिप्राय है कि गर्भाशयकी .पवन-और स्थिरता ) और प्रज्ञा-और मेधारूप-धारण | पेटको पाचनअग्नि इन दोनोंसे कुछ २ और ज्ञानेंद्रिय-और कमीन्द्रयोंका अधिष्टा-कता सूकता वह वीर्यके संबन्धसे पतला तृत्वरूप-प्रेरण-दुःख-( चित्तका उद्वेग )- जो पृथिवी आदिका समूह हैं सो तीस दि- इच्छा-अहंकार-प्रयत्न (उद्यम ) आकार नमें जाकर करडापनको प्राप्त होताहै-सोई गोर-कृष्ण आदि वर्ण पडगांधार-आदि | सुश्रुत में लिखा है कि कुछ ठंडी और गरम स्वर-वैर-पुत्र और पशु आदिका विभवरूपा वायु और जठराग्निसे परिपाकको प्राप्तहुआ भव और इनका न होना रूप अभव वे सब | पृथिवी आदिका समूह करडा होजाता है- शरीरके ग्रहण करनेकी इच्छावाला जो अ- और वह तीसरे महीनेमें इंद्रियोंसे युक्त नादि नित्य ब्रह्म है-उससे उत्पन्न होते है | होता है ॥ अर्थात् वह आत्मा जो पूर्व जन्ममें कर्म क भावार्य-यह भूतात्मा पृथिवी आदिके रता है उसीके अनुकूल ये सम पैदा होते | साथ मिलाहुआ पहिले महीनेमें पतला हो- ता है और दूसरे महीनेमें कुछ २ मांसके भावार्य-इन्द्रिय-मन- प्राण- ज्ञान-अ-लौदे कैसा आकार कट होजाता है और वस्था- सुख-धेर्य- बुद्धि-प्रेरण--दुःख- तीसरे महिनेमें इंद्रियों से युक्त होता है।।५।। इच्छा-- अहंकार-- प्रयत्न- आकार आकाशाल्लाघवंसौरम्यंशब्दश्रोत्रंबलादिकं वर्ग--स्वर--द्वेष-भव-अभव-ये सब वायोस्पर्शनचेष्टांव्यूहनरौक्ष्यमेवच ७६।। शरीरकी इच्छावाले नित्य (भूतात्मा ) से उत्पन्न होते है ॥७३॥७४१ शब्द २ श्रोत्रं २ बलादिकम् २ वायोः ५ पद-आकाशात् ५ लाघवं ९ सोक्ष्म्यं ३ प्रथमेमासिसलेदभूतोधातुविमूच्छितः । च-स्पर्शनं २ चेष्टां २ व्यूहनं २ रोक्ष्यम् २ मास्पदद्वितीयेतुतृतीयेंगद्रियैर्युतः १७५] एवऽ-च ।। पद-प्रथमे ७ मासि ७ संक्लेदभूतः १ / पित्तात्तुदर्शनंपक्तिमौण्यरूपं प्रकाशितां । धातुविभूछितः १ मासि ७ अर्बुद १ द्वि- रसातुरसनशैत्यस्नेहलेदसमार्दवं ॥७॥ तीये ७ तुः-- तृतीये ७ अगेन्द्रियः ३ युतः१ पद-पित्तात् ५ तु:- दर्शनम्र पक्तिम् २ योजना-प्रथमे मासि धातुविछितः सं- आप्ण्यम् २ रूपम् २ प्रकाशिताम् २ रसात्५ क्केदभूतो भवति द्वितीयमासे अर्बुदरूपो | तुर-रसनं २ शैत्यम् २ स्नेहम् २ क्लेदार भवति तुपुनः तृतीयेमासि अंगन्द्रियैः युतो ! समार्दवम् २ ।। भवति ॥ भूमेगधंतयाघ्राणगौरवमूर्तिमेवच तात्पर्याय-यह चेतन आत्मा पृथिवी आदि धातुओंके विष जल और दूधके समान आरमागृहात्यजासर्वतृतीयेस्पंदतेततः ७८ एक होकर प्रथम मासमें द्रव (पतला) पद-भूमेः ५ गन्धम् तथा:- प्राणम् २ रूप रहताई करडा नहीं होता और दूसरे गौरवम् २ मूर्तिम् एव:- च-भात्माला- महीने में कुछ २ करडा-मासके पिण्ड १ द्वितीये शीतोष्णानिलरमिपच्यमानो भूतसं- (लोंदा) कसा आकार होता है यहां यह | पातो धनो जापते । आत्मा (१७४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । तिक्रि-अजः १ सर्व २ तृतीये ७ स्पन्दते | वीरता-असहन-तीक्ष्णता-अन्नका पचना-श- क्रि-ततः:-॥ रीरमें गरमाई-मुखपर तेजी (दमदमाट) योजना-आत्मा आकाशात् लघिमानं- संताप-वर्ण-और रूपके ग्रहणकरनेवाली सोक्षम्य शब्दं श्रोत्रम् बलादिकम् वायोःसका | इंद्रिय ये तेजसे पैदा होते है-इसी प्रकार शात् स्पर्शनम् चेष्टाव्यूहनं रोक्ष्यम् चपुनः जलसे-रसके ग्रहण करनेवाली जिह्वा-शरी-- पित्तात् ( तेजसः ) दर्शनम् पक्तिम् औ- रमें ठंडापन-चिकनाई-कोमलता- और प्ण्यम् रूपम् प्रकाशिताम् तुपुनः रसात् आर्द्रता (गीलापन ) और पृथिवीसे गंधके रसनम् शैत्यम् नेहम् समार्दवम् क्लेदं ग्रहण करनेवाली प्राण इंद्रिय-भारीपन-शरी- भूमेः सकाशात् गन्धम् तथा प्राणम् गौरवं रका आकार-इनको ग्रहण करता है-इस चपुनः मूर्तिम्-गृह्णाति ततः (तदनन्तरम् ) प्रकार यद्यपि आत्मा वास्तव में जन्मसे रहित सन्दते ।। है तथापि इन सबको तीसरे मासमें ग्रहण तात्पर्याय-यहां-आत्मा गृहाति इस करताहे-फिर चौथे मासमें इधर उधर चलने पदका सबके साथ संबन्ध होता है-वह लगता है सोई शारीरकमें लिखाहै कि भूतात्मा आकाशसे लंघनरूप क्रिया में उप-तिससे चलने आदिमें चौथे माप्तके विष योग करनेवाली लघुता-सोक्षम्य ( सूक्ष्मता) यत्न करता है ।। शब्द-श्रवणेंद्रिय-ऑरद्दढतारूपी बल-और आदिपदसे-छिद्र-औरमुख आदि अवकाश भावार्य-आत्मा-वास्तवमें उत्पत्तिसे रहित । इनको ग्रहण करता है क्योंकि गर्मोपनिष- | है तथापि गर्भमें स्थित होकर तीसरे मासमें दमे यह देखा जाता है कि आत्मा आका- आकाशते लघुता-सूक्ष्मता-शब्द-कर्ण ई- शसे-शन्द-ओत्र अवकाश- और सम्पूर्ण द्रिय-- वलआदि-और वायुसे-स्पर्श इंद्रिय- छिद इनको प्राप्त होताहे-और पवनस- चेष्टा-अंगोका फैलाना कर्कशता और ते- स्पर्शके ज्ञानवाली त्वचारुप इंद्रिय-गमन | जसे-देखना-पचना-गरमाई-रूप-तेजी- आगमन (जाना आना ) आदि चेष्टा हस्त । और जलसे-जिह्वा-ठंडापन-शरीरपर चिक- चरण आदि अंगोका अनेक प्रकारसे जो नाई-कोमलता-गीलापन-और पृथिवीसे गन्ध , फैलाना वह व्यूहन-कर्कशता (थकावट) के ग्रहण करनेवाली नासिका इंद्रिय-भारी और च शब्दसे स्पर्श-इनको प्राप्त होताहै- पन-और शरीरका आकार इनको ग्रहण और तेजसे-दर्शन (देखना) चक्षुरूप करता है फिर चोथे महीने में चलने इंद्रिय-खाये हुए अन्नका जो पंचनाना-वह लगता है ।। ७६ ॥ ७० ॥ ७८ ॥ पति-उष्ण स्पर्श-श्याम आदिरूप-प्रका- .ian ( मुख आदि अंगकी तेजी) और दौहृदस्यामदानेनगांदीपमवाप्नुयात् । सो प्रकार संताप (चित्तको तीक्ष्णता) वैष्प्यमरणवापितस्मात्कामियस्त्रियाः ॥ सहनशीलता इनको प्राप्त होता है- क्योंकि गोपनिषदमें लिखा है कि शुर- दोषं २ भवानुपात् क्रि-वरुप्यम्र मरणम् पद-दोहदस्य ६ अप्रदानेन ३ गर्भः १ : आई श्रीपं गतता सहित चा:-अपि तस्मात् ५ कार्यम् १ मिपं १ समूहमा सिपा.६॥ २ मामातीप्यमानिस हानिकता। तस्मानुष मास भटनालामागे मगति ।
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४ (४७५) योजना-गर्भो द्वौहृदस्य अप्रदानेन दोषं इन दोनोंकी गांठ बंधनी-और योनिका वैरुप्यम् अथवा मरणम् अपि अवाप्नुयात् त-स्फुरण ये होते है ।। स्मात् स्त्रियाः प्रियं कार्यम्- भावार्थ-दोदके न देनेसे गर्भ कुत्सित- तात्पर्यार्थ-एक गर्भका हृदय-और दूसरा रूप अथवा मरणको प्राप्त हो जाता है इसके गर्भिणी श्रीका हृदय इस प्रकार दो हृदय- स्त्रीको इष्ट वस्तुकी सिद्धि अवश्यही करनी वाली स्त्रोका जो मनोरथ होता है उसे दो- चाहिये ॥ ७९ ॥ हृद कहते हैं-उसके न देनेसे अर्थात् पू. स्थैर्यचतुर्थत्वंगानांपंचमेशोणितोदयः । रण न करनेसे-गर्भ कुत्सित रूप वा मरण पष्ठेवलस्यवर्णस्यनखरोम्णांवसंभवः॥८॥ रूप दोपको प्राप्त हो जाता है इससे उस दोषके परिहारके लिए गर्भिणी स्त्रीको जो पद-स्थैर्य १ ७ तु:- अंगानां ६ अच्छालगे उस मनोरथको अवश्यही सिद्ध पंचमे ७ शोणितोद्भवः १ षष्ठे ७ बलस्य ६ करना-सोई सुश्रुतमें लिखा है कि दोहृदय, वर्णस्य ६ नखरोम्णां ६ च- संभवः १ ॥ वाली स्त्रीको द्विहृदया कहते हैं उसके योजना-तुपुनः चतुर्थे मासि अंगानां मनोरथको सिद्ध किया जायतो वह अत्यंत | स्थैर्य भवति पंचमे मासि शोणितोद्भवः पराक्रमी और बहुत कालतक जीने वाले | पष्ठे मासि बलस्य वर्णस्य चपुनः नखरोम्णां पुनको पैदा करती है-वह स्त्री तिसी प्रकार | संभवो भवति ॥ गर्भ ग्रहणसे लेकर व्यायाम ( कसरतका तात्पर्यार्थ-भाग-तीसरे मासमें प्रकटहुए काम ) आदिकोभी छोडदे क्योंकि सुश्रुते | अंगोकी स्थिरता चौथे महीने में होती और मेही लिखाया है कि व्यायाम-या मैथुन-अ-पांचौमासमें रुधिरकी उत्पत्ति और छठे मही- ति भोजन-दिनमें सोना-रातमें जागना- नेमें बल और वर्ण और नख-और शरीरके शोक-डर-सवारीमे बैठना-भागकर चलना- रोमोंकी उत्पत्ति होती है ॥ ८॥ मुगेकी तरह बैठना-और रुधिरका छोडना- इनको गर्भिणी स्त्री वर्जद-इस मनश्चैतन्ययुक्तोसौनाढीस्नायुशिरायुतः । है यह बात श्रम आदि चिन्होंसे जाननी सप्तमेचाष्टमेचैवत्वङ्मांसस्मृतिमानपि ८१ . क्योंकि सुश्रुत में ही लिखा है कि-जिसने पद-मनश्चैतन्ययुक्तः १ असो १ नाडी- सद्यः ही गर्भका ग्रहण किया हो उस स्त्रीको स्नायशिरायतः १ सप्तमे ७ चा- अष्टमे ७ अम-जी मिचलाना-प्यासका लगना-सक्थि च-एवं-त्वमांसस्मृतिमान् १ अपि- ।। (गोडे ) औमें दर्द होना-चीर्य और शोणित योजना-असो गर्भः सप्तमे मासे मनश्चे- १ द्विहृदयां नारी दौहदिन माचक्षते तदभिलषितं अष्टमे मासे त्वांसस्मृतिमान् भवति ॥ तन्ययुक्त: नाडीस्नायुशिरायुतो भवति चपुनः दद्यादीर्थरन्त चिरायुषे पुत्र जनयति । २ ततःप्रभृत्ति व्यायामव्यवायतितर्पणदिवा ता. भाः-यह पूर्वोक्त गर्भ सातमें मही- स्वरात्रिजागरणशोकमययानारोहणवेगधारणकुटा- नेमें मन-चेतना-सब शरीरमें प्राणवायुको सनशोणितमोक्षणानि परिहरेत् । ले जानेवाली नाडी अस्थि (हड्डी )याको ३ सयौ गृहीतगाया अमोग्लानि पिपासा सक्थि- बांधनेवाली स्नायु-और चातपित्त-लेम सीदनम् । शुक्रशोणितयोरतवन्धः स्फुरणं च योनैः । इनको शरीरमें प्राप्त करनेवाली शिरा-इनसे (४७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित | । युक्त हो जाता है और आठमें महीनेमें त्वचा सूतिमारुतैः ३ निःसार्यते क्रि- वाणः १ मांस-और स्मृति इनसे युक्त होताहे ॥८१॥ | इव:- यन्त्रछिद्रेण ३ सज्वरः १॥ पुनर्धात्रीपुनर्गर्भमोजस्तस्यप्रधावति योजना-नवमे वा दशमे अपि मासे प्रबल:- अष्टमेमास्यतोगर्भोजातःप्राणैर्वियुज्यते ॥ सूतिमारुतैः गर्भः सज्वरः यंत्रच्छिद्रेण बाण इव निःसार्यते ॥ पद-पुनः- धात्री २ पुनः :- गर्भ २ तात्पर्यार्थ-जब गर्भ चक्षु आदि इंद्रिय ओजः १ तस्य ६ प्रधावति क्रि- अष्टमे ७ , और हस्त चरण आदि अंगोंसे परिपूर्णहो मासि ७ अतःऽ- गर्भः १ जातः १ प्राणः ३ | जाता है तब उत्पन्न करने में प्रवल कारण वियुज्यते कि-॥ जो वायु है वह उस गर्भको दशमें वा नौमें योजना-तस्य (अष्टममासिकस्य)गर्भस्य | महीने में और अपि शन्दसे सप्तम और ओजः धात्री गर्भ पुनः पुनः धावति अतः आठमें मासमें-स्नायु और हड्डी-चर्म आदिसे अष्टमे मासि जातो गर्भः प्राणः वियुज्यते बनायाहुआ जो यन्त्र है उसके छिद्रके द्वारा तात्पर्याय-उस आठ महीनेके गर्भका ओज | बडेभाग दुःखोंसे पीडित करती हुई इस प्रकार जिसका नाम है ऐसा कोई गुण तेजरूप | निकालती है जैसे धनुषधारी पुरुष धनुषके होताहै वह धात्री और गर्भकेप्रति वारं यन्त्रसे अत्यंत वेगसे बाणको निकाल देता वार अत्यंत चंचलतासे चलायमान रहताहै। है-निकलनेके अनंतर जब उसके शरीर इससे आठमें महीनेमें जो गर्भ पैदा | से बाहिरकी पवनका स्पर्श होताहे तय होताहै वह प्राणोंसे रहित हो जाता है | उसको उसी समय पूर्व जन्मका स्मरण इससे यह बात दिखाई कि उस ओजकी| सब नष्ट होजाताह क्योंकि निरुक्तके अठा- स्थितिही जीवनमें कारण है- ओजका । रहमें अध्यायमें यह लिखा है कि उत्पन्न रुप स्मृत्यन्तरे में यह दिखाया है कि जो होनेके समय जब उससे वायुका स्पर्श होता दयंक बीचमें निर्मल और कुछ गरम पि- है तब पूर्व जन्मके-जन्म मरण-शुभ और त्तकरके सहित स्थित रहता है उसको अशुभ कर्म इनका स्मरण जाता रहता है ।। शरीरमें आज कहते हैं-वह शरीर उस भावार्य-नामें वा दशमें महीनेमें उस ओजक नाश होनेपर नाशको प्राप्त होजाता है। गर्भको पवन योनिके छिद्रद्वारा इस प्रकार भावार्य-तिस आठ महीनेके गर्भका ओज शीघ्र निकालती है जैसे धनुपसे वाण निक-. कभी धात्री और कभी गर्भमें इस प्रकार यही लता है ॥ ८३ ॥ विचलतासे दोडता रहता है इससे आठमें तस्यपोटाशरीराणिपट्त्वनोधारयतिच । निम उत्पन्न हुआ गर्भ प्राणोंसे रहित हो पडंगानितयास्यांचसहपष्टयाशतत्रयम् ८४ है।। ८२॥ पद-तस्य ६ पोटा-शरीराणि १ षट् २ नयमेदशमेवापिम्पलेःसूतिमारुतैः । त्वचः २धारयन्ति क्रि-च-पट् २अंगानिर निःसार्यतेवाणइवयंत्राच्छद्रेणसज्वरः८३॥ तथा:- अस्मां ६ चा- सहा-पष्टया ३ पद-नवमदशमेवा:- अपि:-प्रक्ला३ शतत्रयम् २॥ दिer पदमीपटुष्ण सपतिक। भोज: १ जातः समायुना रपटो न स्मगत मन्म शारे सगाल समाजामति । मरण कर्म प शुभाशुमम् ।
मायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४, (१७७) योजना-तस्य पोढा शरीराणि पट् त्वचः श्लोकोंसे कहें गे वे ३६० तीनसो साठ हड्डी धारयन्ति चपुनः पटू अंगानि तथा अस्थां इनको ग्रहण करता है । षष्टयासह शतत्रयं धारयन्ति ॥ भावार्थ-उसका छः प्रकारका शरीर छ: तात्पर्यार्थ-उस आत्माके जो जरायुज-अ- | त्वचाओंको और छः अंगोंको और तीनसो- ण्डज रूप शरीर हैं वे रुधिर आदि छः साठ हड्डीयोंको ग्रहण करता है-॥ ८४ ॥ धातुओंके परिपाक करनेवाली जो छः अग्नि हैं उनके स्थानके संबन्धसे छः प्रकारके स्थालैःसहचतुःपष्टिदंतावविंशतिर्नखाः । होते हैं-सोई कहते हैं कि जब अन्नका रस पाणिपादशलाकाश्वतेषांस्थानचतुष्टयम् ॥ जठर (पेट )की अग्निसे परिपाकको प्राप्त पद-स्थालेः ३ सहा- चतुःषष्टिदन्ताः १ होताहै तब वह रुधिररूप होजाता है- वै- विंशतिः १ नखाः पाणिपादशलाकाः१ और जब वह रुधिर अपने कोश (स्थान) च-तेषां ६ स्थानचतुष्टयम् १॥ की अग्निसे पकता है तब मांस हो जाताह योजना-स्थालैः सह चतुःषष्टि (६४) वह मांस अपने कोशकी अग्निद्वारा | दन्ताः विंशतिः नखाः चपुनः पाणिपादश- पकनेसे मेदरूप होजाता है-वह मेद भी लाकाः भवन्ति तेषां स्थानचतुष्टयं विज्ञेयम्।। अपने कोशकी अग्निसे पचनेमें हड्डीरूप होता तात्पर्यार्थ-दांतोके मूलके यतीस अस्थि है-और वह अस्थि अपने कोशकी अग्निसे योंको स्थाल ( जड ) कहते हैं उन करके पकनेसै मज्जारूप हो जाता है और वह सहित चौसठ-दांत होते हैं-और नख और मज्जाभी अपने कोशकी अग्निसे चरम धातु- हाथ और चरणोंकी शलाका अर्थात् शलाईके रूप (वीर्य) से परिणाम (रूपान्तर )को आकारको हड्डी जो मणिबन्धके ऊपर अंगुले- प्राप्त होताहे वह चरम धातु-परिणामको नहीं | योक मूलमें रहती हैं-ये वीश होती है-इन प्राप्त होता-वह चरम धातुही आत्माका | वीस२ नख और शलाका ओंके स्थान चार प्रथम कोश है-इस प्रकार छः कोशकी | होते है अर्थात् दो चरण दो हाथ इस प्रकार अग्निके सम्बन्ध होनसे शरीर छः प्रकार- एक सो चार १०४ अस्थि होते हैं- के है-और अन्न रसरूपी जो प्रथम धातु है उसकी स्थितिका नियम न होनेसे उसकी भावार्थ-मूलके अस्थियों सहित चौसठ अपेक्षाको लेकर शरीरका छः प्रकारसे अन्य | दांत और वीस२ नख और हाथ पैरोंकी श- प्रकार नहीं है और वे शरीर छः त्वचाओको | लाका होती है जिनके दो हाथ दो पर ये धारण करते है-अर्थात्-रक्त-मांस-भेद- चार स्थान है ॥ ८५ ॥ अस्थि मज्जा-शुक्र-ये जिनके नाम हैं तैसी | पष्टयंगुलीनांद्वपाप्योर्मुल्फेपुचचतुष्टयं । ये छः धातु केलाके स्तम्बकी त्वचा (वक्कल) चत्वार्यरनिकास्थीनिजंघयोस्तापदेवतु ८६ के समान बाह्य और आभ्यन्तररूपमे स्थित हुए स्वचा (छाल)की समान आच्छादक पद-पष्टिः १ अंगुलीनाम् ६ द्वे १ पा- होनेसे छः त्वचाओंको धारण करते है-सो | योः ६ गुल्फेषु ७ तुः-चतुष्टयम् १ च- यह बात आयुर्वेदमें प्रसिद्ध है-तिसी प्रकार स्वारि १ अरनिकास्थीनि १ जंघयोः ६ ता- दो हाथ-दो चरण-एक मुख-और एकगात्र वत् १ एव- तु:-॥ इन छ: अंगोंको और जो आगेके छ: योजना-अंगुलीनां पष्टिः पायर्योः दे गु- (४७८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ल्फषु चतुष्टयम् तुपुनः अरनिकास्थीनि अक्ष-तालु-और श्रोणिका फलक-इनमें दोर चत्वारे तुपुनः जंघयोः तावत् अस्थिसमू-अस्थि होते हैं ॥ ८ ॥ हो भवति- भगास्थ्येकंतथापृष्ठे चत्वारिंशचपंचच । तात्पर्यार्थ और प्रत्येक वीस अंगुलियोंमें ग्रीवापंचदशास्थास्याजन्मेकैकंतथाहनुः ॥ तीन ३ अस्थि होनेसे साठ अस्थि होते हैं- और चरणोंके पश्चिम भागको पाणि(एडी) पद-भगास्थि १ एकम् १ तथाऽ-पृष्ठे ७ कहते हैं उनके दो २ अस्थि होते हैं-और चत्वारिंशत् १ चा- पंच१ चा-ग्रीवा १ पंच- एकरपादमें दो दो गुल्फ ( टकने ) होते हैं- दशास्थी १ स्यात् क्रि-जत्रु १ एकैकम २ और उनके चार अस्थि होते हैं-अरलि है | तथा:- हनुः१ ॥ प्रमाण जिनका ऐसे चार अस्थि भुजा ऑमें योजना-भगास्थि एकम् तथा पृष्ठे पंच और चार अस्थि जंघा ऑमें होते हैं-इस चपुनः चत्वारिंशत् अस्थीनि ४५ भवन्ति प्रकार चोहत्तर ७४ अस्थि होते हैं। ग्रीवा पंचदशास्थी स्यात् नत्रुणी एकेक अ- भावार्थ-अंगुलीयोंमें साठ और एडीमें | स्थि तथा हनुः एकास्थि भवति ॥ दो गुल्फोंमें चार और जंघाओंमें अरलि ता० भा०-भग (गुह्य )का अस्थि एक कितना जिनका प्रमाण है ऐसे चार अस्थि होता है और पृष्ठ (पश्चिम भाग) में ४५ होते हैं ॥८६॥ पैतालीस और ग्रीवा (कंधरा) में १५पंद्रह भस्थि होते हैं और जनु अर्थात् वक्षस्थल देद्वेजानुकपोलोरुफलकांससमुद्भवे । और कांधेकी सन्धि उन दोनोंमें एकर अस्थि अक्षतालूपकोणीफलकेचविनिर्दिशेत् ८७ | होता है और हनु ( ठोडी ) में एक अस्थि पद-वे १ढे १ जानुकपोलोरुफलकां- होता है-इस प्रकार६४चौंसठ अस्थि हुए८८ सप्तमुद्भवे ७ अक्षतालूपकोणिफलके ७ तन्मूलेटेललाटाक्षिगंडेनासाधनास्थिका । च:-विनिर्दिशेत् क्रि-|| पार्श्वका:स्पालकैसाईमवुदेश्चद्विसप्ततिः। योजना-जानुकपोलोरुफलकांससमुद्भवे पद-तन्मूले ७ढे १ ललाटाक्षिगण्डे ७ चपुनः अक्षिताटूपक श्रोणिफलकेद्वेव अस्मी नासा१ घनास्थिका १ पार्श्वकाः१स्थालकैः३ विनिर्दिशेत ॥ सार्द्ध:- अर्बुदः ३ चा-द्विसप्ततिः १॥ तात्पर्याय-जानु अर्थात् जंघाऔर उसकी योजना-तन्मूले ललाटाक्षिगण्डे द्वे अस्थि- संधि (गोडा) कपोल (गाल ) ऊरु (स- नी भवतः नासा घनास्थिका भवति स्था- विथ ) का फलक अंस ( कंधा) अर्थात् लकः चपुनः अनुदः सार्द्ध पार्श्वकाः द्विस- मुगाका शिर अक्ष अर्थात कर्ण और नेत्र-पतिः भवंति ॥ फे मध्यमें शंखका अधोभाग तालूपक (ता- तात्पर्य-उस हनूके मूलमें और एलाट ख्या या काकुद) श्रोणि ( ककुभवी ) नेत्र और गण्ट (कपोल मेमोका मध्यभाग) का फटक-इन सातों में प्रत्येक दोर अस्थि इनमें दो २ अस्थि होते हैं और नासिकामें होते है-इस प्रकार चौदह अस्थि हुए । घन नामका एक अस्थि होता है-और फ- भारार्थ-जानु-कपोश-उसका फल भंस क्षके नीचले प्रदेशमें जो भास्य टन पार्थ " प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४ (४७१) + कहते हैं-वे उनके आधार भूत स्थालक | विषयाः स्मृताः चपुनः नासिका लोचने और अर्बुद नामके अस्थियों सहित बहत्तर जिह्वा त्वक् श्रोत्रंच इंद्रियाणि भवेति ॥ ७२ पाचक होते हैं-पूर्वोक्त नो अस्थियोंके ता. भा०-गंधरूप रसस्पर्शशब्द ये मिलानेसे ये इकाप्ती अस्थि होते हैं। पुरुषकै बन्धनमें हेतु होनेसे विषय कहेहैं भावार्थ-इनुका मस्तक-नेत्र-गंडस्थल- क्योंकि विषय शब्द पिञ् बन्धने धातुका इनमें दो २ अस्थि होतेहैं नाप्तिकामें घन | रूप है- और गंध आदि पांचों विषयोंका नामका एक अस्थि होताहे और कक्षके | ज्ञान जिनसे होवे नासिका नेत्र-जिह्वा- अधःप्रदेशके अस्थि स्थालक और अर्बुदो- त्वचा-श्रोत्र रूप पांच ज्ञानेन्द्रिय होतीहै ९२ सहित बहतर होते हैं ।। ८९ ॥ हस्तीपायुरुपस्थंचनिहापादोचपंचव द्वौशंख कौकपालानियत्वारिशिरसस्तया । कर्मेंद्रियाणिजानीयान्मनश्चैवोभयात्मकम् उरःसप्तदशास्थीनिपुरुपस्यास्थिसंग्रहः ॥ पद-हस्ता १ पायुः १ उपस्थं १ च-- पद-द्वी १ शंखको १ कपालानि १ च- | जिह्वा १ पादौ १ च-पंच. १ वेऽ- कमदि- याणि २ जानीयात् क्रि-मनः२ चा- एव:- 'वारि १ शिरस: ६ तथाऽ- उरः १ सप्तद- उभयात्मकम् ॥ शास्थीनि १ पुरुषस्य ६ अस्थिसंभवः १॥ योजना-शंखको द्वो तथा चत्वारि कपा- योजना-हस्तो पायुः उपस्थं चपुनः जिह्वा लानि उरः सप्तदशास्थीनि भवन्ति अयं पादो एतानि पंचकद्रियाणि जानीयात पुरुषस्य अस्थिसंग्रहः उक्तः ॥ चपुनः मनः उभयात्मकं जानीयात् । ता. भा०-भृकुटी और कर्णके मध्यप्र- तात्पयार्थ-हस्त-पायु-(गुदा) उपस्थ देशके जो अस्थि उनै शख कहते हैं-वे (लिंग ) जिह्वा-पाद-ये हस्त आदि पांच दो होतेहैं और शिरके कपाल चार होते हैं- कर्मेन्द्रिय जाननी अर्थात इनसे ग्रहण उर ( छाती )के अस्थि सतरहहोते हैं इस मलका त्याग-विषयका आनन्द-बोलना- प्रकार २३ तेईस अस्थि होते है- पूर्वोक्त गमन-ये पांचकर्म होतेहैं- और एककालमें सब अस्थियोंके मिलानेसे ३६० तीनसो दो आदि ज्ञानके न होनेसे जाननेयोग्य जो साउ अस्थि हुए इस प्रकार पुरुषके अस्थि मन-वह ज्ञान और कर्मेन्द्रिय दोनोंका सह- यौंका वर्णन किया ॥ ९ ॥ कारी होनेसे उभयरूप जानना ॥ भावार्थ-हाथ-गुदा-लिंग-जिह्वा-पाद ये गंधरूपरसस्पर्शशब्दाश्चविषयाःस्मृताः । पांच कर्मेन्द्रिय जाननी और मन ज्ञानेंद्रिय नासिकालोचनजिद्वात्वश्रोत्रंचेंद्रियाणि च और कर्मेन्द्रिय उभयरूप जानना ॥ ९२ ।। पद-गंधरूपरसस्पर्शशन्दाः १ च:- नाभिरोजोगुदंशुक्रशोणितशंखकौतया । विषयाः १ स्मृताः १ नासिका १ लोचने ? | मौसकंठहृदयंप्राणस्यायतनानिच ९३ जिप १ त्वक् १ श्रोनं १ च:- इंद्रियाणि १ पद-नामिः १ ओजः १ गुदं १ शुक्रम् शोणितं १ शंखको १ तथाऽ- मूर्तीस- योजना-चपुनः गंधरूपरसस्पर्शशब्दाः । कंठहृदयं १ प्राणस्य ६ आयतनानि च ॥
(४८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । तथा:- - योजना-नाभिः ओजः गुदं शुक्र शोणितं यके समीपमें स्थितमांसके पिण्ड-पास्ति शंखको मूद्धीसकंठहृदयं प्राणस्य (मूत्रस्थान ) पुरीषाधान (मलाशय) आ- आयतनानि एतानि भवन्ति ।। माशय (अपक अन्नका स्थान )हदय स्थूल ता० भा० नाभि ओज (बल) गुदा | आंत-गुदा-उदर-और बाहिरके गुद वलयसे शुक्र शोणित दोनों शंख मस्तक कांधे भीतरके जो दो गुदाके वलय उने कोष्ठ कहते कण्ठ हृदय ये प्राणके दश स्थान होतहै- हैं वे नाभिके नीचले प्रदेशमें होतेहै- यह यद्यपि समान नामका पवन सम्पूर्ण अंगमें | प्राणके स्थानोंका विस्तार कहा- पहिले विचरता है तथापि नाभि आदि स्थान विशे- | श्लोकमें तो संक्षेप कहा था- इसीसे पोका कहना अधिकताके अभिप्रायसे है | पहिले श्लोकमें कहे हुओंके मध्यमें किसि अर्थात् अन्यस्थानोंकी अपेक्षा इनमें समान | किसीका यहां फिर पाठ पढा है ॥ वायु अधिक रहताहै ॥ ९३॥ भावार्थ-वपा-वसा-अवहनन-नाभि- वपावसावहन नाभिालोमायलिहा । लोमा यकृत्-प्लिहा-क्षुदान्त्र-वृक्कक- बस्ति- क्षुद्रांककौवस्तिःपुरीपाधानमेवच ९४ , मलाशय-आमाशय-हृदय-स्थूलान्य-गुदा- पद- वपा १ वसा १ अवहननम् ।। णोंके स्थानोंका विस्तार कहा है।।९॥१५॥ उदर-और गुदाके भीतरके दो कोष्ठ ये प्रा- नाभिः १ सोमा १ यकृत् १ लिहा १ क्षुद्रां- त्रम १ वृक्कको १ वस्तिः १ पुरीपाधानम् | कनीनिकेचाक्षिकूटेशप्कुलीकर्णपत्रको । कोशंखौभ्रुवोदंतवेष्टायोष्ठौककुंदरे ॥१६॥ भामाशयोथहृदयंस्थूलांगुदएवच पद-कनीनिके १ चऽ-अक्षिकूटी १श- उदरंचगुदीकोष्ठयौविस्तारोयमुदाहृतः९५ प्कुली १ कर्णपत्रको १ कर्णी १ शंखा १- पद-आमाशयः १ अथ - हृदयम् १ भुवौ १ दन्तवेष्टो १ ओष्ठौ १ ककुंदरे १ ॥ स्थलान्यम् गुदः१ एव:- च- उदरं१ चा क्षणीवपणौवृकौश्लेप्मसंघातजास्तनी । गुदा १ कोष्ठयो १ विस्तारःअयंरटदाहृतः॥ उपजिहास्फिजावाहूजंघोरुपुचपिंडिका ॥ योजना-चपा वसा-अवहननम् नाभिः पद-वंक्षणी १ वृषणी १ वृको १ श्लेष्म- लोमा यकृत् पिदा क्षुद्रान्त्रम वृद्धाको यस्तिः संघाती १ स्तनो १ उपजिहा १ स्फिजी १' पुरीपाधानम्-चपुनः आमाशयः हृदयम्- स्थूलान्त्रम् चपुनः गुदः उदरं गुदा कोष्ठयो- याहू १ जंघोरुपु ७ चा-पिण्टिका र अयं प्राणायतनस्य विस्तारः उदाहृतः ॥ तालूदरवस्तिशीपीचबुकेगलशुहिके तात्पर्याय-यपा वसा (मांसका नेह) अपटश्चैवमेतानिस्थानान्यत्रशरीरके ९८॥ नाभि-अपहनन-(फुफ्स )ोमा यकृत्- पिडा (तापतिट्टी )चदान्त्र (छोटीरमांत) पद-तारादरं १ चम्तिशीर्ष १ चिमुक । जो हदपमें रहती है- इनमें अबद्दनन-आर तानि र स्थानानि १ भऽ शरीरके ७ ॥ गलशुण्डिके १ भवटः १ चा-एवं- ए- सीदा-मांसपिन्टाकार धाम यक्षिमें होतई- और कालिकाको यकृत् भार मांसपिन्टीको | अशिवर्णचतुप्पंचपदस्तहदयानिच । लोमा कहते हैं- और पृथक-अर्थात् दद- नच्छिद्रापितान्यवमाणस्यायतनानितु ।। एक-च-॥ १ प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण : (४८१) पद-आक्षिवर्णचतुष्कं १ चा- पद्धस्त योजना-सप्तशतानि शिराः चपुनः हृदयानि १ च- नव १ छिद्राणि १ तानि १ स्नायुशतानि नव धमनीनां द्वे शते पेशी- एक:-प्राणस्य ६ आयतनानि १ तु: शतानि पंच भवन्ति ॥ योजना-कनानिके चपुनः अक्षिकृटे शप्कु- तात्पर्यार्थ-नाभिसे मिली वात पित्त श्ले- ली कर्णपत्रको कर्णो शखा भ्रुवो दंतवेष्टो ओष्ठौ प्मको वहनेवाली चालीश शिरा होती है स- ककुंदरे वंक्षणो वृषौ वृक्को श्लेष्मसंघातजो कल शरीर व्यापिनी वे नाना शाखावाली स्तनो-उपजिह्वा-स्फिी-चाहू-जंघोरुषु पि- सातसा होती है-तैसेंही अंग और प्रत्य- ण्डिका-तारादरं- बस्तिशीर्ष-चिबुके-गलशु- गकी संधियोंके बन्धन-स्नाय नासो होते ण्डिके चपुनः अवटः एतानि अत्र शपरके है-नाभिसे उत्पन्न हुई चोवीस धमनी-प्राण प्राणस्य स्थानानि भवन्ति-अक्षिवर्णच- | आदि वायुको प्रेरणेवाली शाखाके भेदसे २०० दोसी होती है और पेशी अर्थात् मां- तुकं चपुनः पद्धस्तहृदयानि तान्यव नव- छिद्राणि प्राणस्य आयतनानि भवन्ति ॥ सल है आकार जिनका और अरु पिण्डिका आदि अंग प्रत्यंगकी सन्धिरूप पेशी-पा- ता० भा-कनीनिका (नेत्रोंके तारे) चसौ होती है ।। अक्षिक्ट (नेत्र और नासिकाकी सन्धि भावार्थ-सातसौ शिरा नोसो स्नायु दोसी शकली (कर्णछिद्र) कर्णपत्र (कर्णपाली-)| धमनी पांचसो पेशी शरीरमें होती है।।१०।। कर्ण-दन्तवेष्ट ( दन्तवाली) ओष्ठ-ककुं- दर-( जघनके कूप ) वंक्षण ( जघन और एकोनविंशल्लक्षाणितथानवशतानिच उनकी संधि ) और पूर्वोक्त वृक-श्लेष्मके पट्पंचाशच्चजानीतशिराधमानिसंज्ञिताः ॥ संघातसे पैदाहुए स्तन-उपजिह्वा (घंटिका ) पद एकोनत्रिंशल्लक्षाणि १ तथा:-नवश- फिज (कटिकाप्रोथ ) बाहु-जंघा और ऊ- तानिश्च:-पट्पञ्चाशत् १ चऽ-जानीत क्रि- रकी पिण्डिका-अर्थात् मांसल प्रदेश-गल- शिराः १ धमनिसंज्ञिताः १ ॥ शुण्डिका-अर्थात् इनुका मूल और गलेकी योजना-शिराः धमनिसंज्ञिताः एकोन सन्धि-अवट (शरीरमें निम्नभाग ) ये इस शिल्लक्षाणि तथा नवशतानि चपुनः पल्प- शरीरमें प्राणके स्थान होते है और नेत्र क- ञ्चाशत् यूयं जानीत ॥ नीनिकाके समीपके चारवर्ण जो श्वेत होते ता. भा०-शिरा और धमनि ये दोनों है-चरण हाथ हृदय वेही पूर्वोक्त नव छिद्र मिलकर शाखाके भेदसे उनतीस लाख- अर्थात् दो नासिका-दो नेत्र-दो कान-मुख नोसो छप्पन ( २९००९५६ ) होती है है पायु-उपस्थ-ये प्राणके आयतन-( रहनेके सामश्रम आदि मुनियों यह तुम जानो १०१ स्थान ) होते है-॥ ९६॥२७॥९८॥१९॥ शिराःशतानिसप्तवनवस्नायुशतानिच । सप्तोत्तरमर्मशतंदेचसंधिशतेतथा.॥१०२॥ त्रयोलक्षास्तुविज्ञेया:श्मश्रुकेशाःशरीरिणां धमनीनांशतेद्वेतुपंचपेशीशतानिच॥१०॥ पद-त्रयः १ लक्षाः १ तु- विज्ञेयाः १ पद-शिराः १ शतानि १ सप्त १ एक- श्मश्रुकेशाः १ शरीरिणाम् ६ सप्तोत्तररमर्म- नव १ स्नायुशतानि १ च- धमनीनां ६ शतं १ १ चा-सन्धिशते १ तथाऽ-11 शते १२ १ तुः-पंचा-पेशीशतानि १ च-॥ योजना-शरीरिणां श्मश्रुकेशाः त्रयोलक्षाः ।
(४८२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । । विज्ञयाः सप्तोत्तरं मर्मशतं विजयं तथा द्वे एकही है अर्थात् प्रधान है-इससे तुमारे सन्धिशते विज्ञये ॥ मध्यमें इसको जो कोई जाने वहभी तुमारे ता० भा०-शरीरधारियोंके श्मश्रु और के- मध्यमें मुख्य है-इससे पुद्धिमान् मनुष्य श मिलकर तीन लाख होते हैं मरण और भावोंकी स्थितिको यलसे जाने। केश करनेवाले मर्मस्थान १०७ एकसा भावार्य-रोमोंके परमाणु स्वेदके बहने- सात होते है और अस्थिओंकी सन्धि दोसौ वाले वायुके परमाणुसे पृथक कियहुए होती है स्नायु और शिराओंकी सन्धि तो चम्मन किडोर साडेसहसत लाव होते हैं अनन्त हैं ॥ १०२॥ इन भावोंकी स्थितिको जो जानता वह रोम्णांकोटयस्तुएंचाशचत्तयःकोट्यएवच। मुख्य है।। १०३॥१०॥ सप्तपष्टिस्तथालक्षाःसार्कीस्वेदायन सह ।। रसस्यनवविज्ञेयाजलस्यांजलयोदश पद-रोम्णां६ कोट्यः १ तुः-पंचाशत् १ सप्तवतुपुरीपस्यरक्तस्याप्टौप्रकीर्तिताः ॥ चतस्रः १ कोट्यः१ एव:-चा-सप्तपष्टिः १ पद-रसस्प ६ नव१ विज्ञेयाः १ जलस्यद तथा:- लक्षाः१ सा ः १ स्वेदायनेः३सह-॥ अंजलयः १ दश.१ सप्त १ एव:- तुम्- वायवीयर्षिगण्यतेविभक्ताःपरमाणवः ॥ पुरीपस्य ६ रक्तस्य ६ अष्टो १ प्रकीर्तिताः यदप्येकोऽनुवेत्त्येपांभावनांचैवप्तस्थितिम्॥ पट्टेप्मापंचपित्तंचचत्वारोमूत्रमैवच । पद-वायवीयः३विगण्यन्ते क्रि-विभक्ता १ वसात्रयोदौतुमेदोमज्जेकोर्धतुमस्तके १०६ परमाणवः १ यदपि - एकः १ अनुवे पद-पटू १ श्लेष्मा १ पंच१ पित्तं९ चा- त्ति कि-एषां भावानां च - एव:- संस्थि- चत्वारः१ मूत्रम्१एव:-च- वसा १ त्रयः१ तिम् २॥ द्वार तु:-मेदः १ मज्जा १ एकः १ अर्द्ध १ योजना-रोम्णां परमाणवः वायवीयैः तु:- मस्तके ७ ॥ स्वेदायनेः सह विभक्ताः पंचाशत् कोश्यः श्लप्मीजसस्तावदेवरेतसस्तावदेवतु चपुनः चतस्रः कोट्यः तथा सार्दाः सप्त- यष्टिलक्षाः विगण्यन्ते हेनुनयः यदपि एषां इत्येतदस्थिरवर्मयस्यमोक्षायकत्यसौ ॥ भावानां संस्थितिम् यः अनुवेत्ति सः एकः पद-श्लेष्मौजसः६तावत एव:-रेतसाई मुल्य इति पावत् ॥ सावत् १ एय-तुः-इति:-एतत् १ अ. तात्पर्यार्थ पूक्तिशिरा और केशीसहित स्थिरम् १ वर्म १ यस्य ६ मोक्षाय ४ कृती? रोमोके परमाणु स्वेद झरनेके सुपिरोंसहित असौ १॥ सूक्ष्मसे अत्यंत सूक्ष्मभाग चम्मन किडोर योजना-रसस्य नव अंजलयः जलस्य साडे सडसत लाख पवनके परमाणुसे पृथक्- दश अंजलयः पुरीपस्य सप्त अंजलयः कर गिने जाते हैं यह बात शास्त्र दृष्टिसे ) रक्तस्य अष्टौ अंजलयः प्रकीर्तिताः श्लेप्मा कही है क्योंकि चक्षु आदि इंद्रियोके द्वारा | षट् पित्तं पंच-चपुनः मूत्रं चत्वारः वसाः यह विषय जाननेके अयोग्य है इस शिरा त्रयः मेदः द्वो मज्जा एकः मस्तके अर्द्ध आदि भावोंकी स्थितिके अत्यन्त कठिन- श्लेष्मोजसः तावत् (अर्द्ध) तुपुनः रेतसः अर्थको हे मुनियों जो कोई जानता है वह तावत् अंजलयः प्रकीर्तिताः यस्य एतत् प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण ४ (४८३) वर्म अस्थिरम् इति बुद्धिः असा मोक्षाय शरीर उसके निमित्तभी मूढ मनुष्य पापोंको कृती भवति-मोक्षाधिकार्यस्ति इत्यर्थः ॥ करते हैं जो इस देहका रूप-भीतर(रुधिर तात्पर्यार्थ-भली प्रकार परिणामको प्राप्त- आदि) है यदि वह बाहिर होजाय तो यह हुआ जो भोजन उसका जो सार उसे रस | लोक दण्डको लेकर कुत्ते और काकोंको कहते हैं-उसका प्रमाण शरीरमें नौ अंजलि निवारण करै-तिससे ऐसे निन्दित शरीरकी होता है-पृथ्वीके परमाणुका संयोग है नि- आत्यन्तिक (सर्वथा) निवृत्तिके लिये मित्त जिसमें ऐसे जलकी दश अंजलि | आत्माकी उपासना यत्न करे । जाननी और पुरीष ( मल) की सात जठरा- भावार्थ-रसकी नो अंजलि जलकी दश मिके परिपाकसे रक्त हुआ जो अन्नका रस | मलको सात रुधिरकी आठ कफकी छ: उस रक्त वा रुधिर कहते हैं उसकी आठ | पित्तका पांच मूत्रकी चार वसाकी तीन मे- अंजलि होती हैं कफकी छः पित्तकी पांच | दाकी दोअंजलि होती हैं-मज्जाकी एक मस्त- मूत्रकीचार वसा (मांसका स्नेह) की तीन | कमें आधी अंजलि कफ और वीर्यकी आधी भेदा ( मांसका रस ) की दो मज्जा अर्थात् अंजलि होती है यह शरीर अस्थिर है यह अस्थियों में रहनेवाला जो सुषिर उसमें जिसकी बुद्धि है वह मनुष्य मोक्षको समर्थ स्थित रसविशेष--उसकी एक अंजलि होती, होता है ।। १०५ ॥ १०६ ॥ १०७ ॥ है मस्तकमें आधी अंजली-कफ और दासप्ततिसहस्राणिहृदयादभिनि:- वीर्य के सारकीभी आधी अंजलि होती है मृताः।हिताहितानामनाड्यस्ताप्तां यह कथनभी उस अभिप्रायसे है जिसकी मध्येशशिप्रभम् ॥ १०८॥ संपूर्ण धातु समान भावसे रहती हों और जिसकी धातु विषम ही उसका नियम नही पद-द्वासप्ततिसहस्राणि १ हृदयात् ५ क्योंकि आयुर्वेदमें यह लिखा है कि शरी- अभिनि-मृताः १ हिताहिताः १ नाम:- रॉके अस्थायी और विलक्षणता होनेसे दोष नाडयः १ तासां ६ मध्ये ७ शशिप्रभम् ॥ धातु मल इनका कोई परिमाण नहीं है-इस मंडलंतस्यमध्यस्थआत्मादीपइवाचलः । प्रकार ऐसा अस्थि और स्नायु आदिसे रचा सज्ञेयस्तंविदित्वेहपुनराजायतेनतु १०९॥ हुआ यह देह अस्थिर है यह जिस पुरुषकी युद्धि है वह मनुष्य मोक्षके लिए कृती अ- पद-मण्डलं १ तस्य ६ मध्यस्थः १ र्थात् समर्थ है क्योंकि वैराग्य और नित्य आत्मा १ दीपः १ इवऽ-अचलः १ सः १ अनित्य वस्तुका विवेकही मोक्षका हेतु है- | ज्ञेयः १ ते २ विदित्वाऽ-३६ऽ-पुनः:-आजा- इसीसे व्यासेनें लिखा है कि सब प्रकार यते कि न:-तु:-॥ अशुद्धताका निधान कृतन-विनाशी-जो योजना-हृदयात् अभिनिःमृताःद्वासप्तति- । वैरक्षण्याउरीराणामस्थायित्वात्तरेव च ॥ दोष | तासांमध्ये शशिप्रभं मण्डलम्भवति तस्य सहस्राणि हिताहिता नाम नाडयः भवन्ति धातुमलानां च परिमाण न विद्यते । २ साशुचिनिधानस्य कृतमस्य विनाशिन. शरीर- मध्यस्थः यः दीपः इव अचलः सः आत्मा- कस्यापि कृते मूटा पापानि कुर्वते ।। ज्ञेयःतं विदित्वा इह संसारेपुनः नआजायते कायस्य यदन्तस्तदभिवेत् । दण्डमादाय लोकोयं तापर्याय-हदयके स्थानसे निकसीहुई शुनः काकांच वारयेत् । कदम्बके पुष्पकी केशरके समान चारों त- नामास्य प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण : (१८५) ब्रह्मको प्राप्त होता है अर्थात् सामवेदके ये चार गीतिका होतीहैं- यह अपरांतक शब्दमें लगी हे चितकी एकाग्र वृत्ति जिसकी आदि गीतोंका समूह माना है आत्मका भाव ऐसा पुरुष सामक गानमें कुशल हुआ शब्दा- | जिसमें ऐसा और मोक्षका हेतु होनेसे मोक्ष कार शून्यको उपासनासे परब्रह्मको प्राप्त संजित माननेयोग्य है अर्थात् इनके गानेसे हो जाता है-सोई कहा है कि जो शब्द मोक्ष होताहै क्योंकि इसका अभ्यास एका- ब्रह्ममें कुशल है वह परब्रह्मको प्राप्त होता प्रताका संपादक होनेसे आत्माके संग है यह शब्द ब्रह्मकी उपासना उसके लिये | जीवकी एकताका कारण है ॥११३॥११४॥ है जिसकी चित्तवृत्ति निराकारालंबन रूपसे वीणावादनतन्वतः श्रुतिजातिविशारदः । समाधिमें न लगै- तालज्ञश्चामयासेनमोक्षमार्गनियच्छति ॥ भावार्थ-विधिपूर्वक सावधानीसे सामवेद पद-वीणावादनतत्त्वज्ञः १ श्रुतिजाति- पढताहुआ मनुष्य उसके अभ्याससे पर ब्रह्मको माप्त होता है ॥ ११२ ।। विशारदः १ तालज्ञः १ च:- अप्रयासेन ३ मोक्षमार्ग २ नियच्छति क्रि-॥ अपरांतकमुल्लोप्यमद्कमकरीतथा योजना-वीणावादनतत्वज्ञः श्रुतिजातिवि- आवेणकंसरोपिंदुमुत्तरंगीतकानिच ११३॥ शारदः चपुनः तालज्ञः पुरुषः अप्रयासेन पद-अपरान्तकम् १ उल्लोप्यम् १ मद मोक्षमार्ग नियच्छति ( प्राप्नोति)॥ कम् १ मकरीम् १ तथा:- विणकम् १ तात्पर्यार्थ -भरत आदि मुनियोंकि कहेहुए -सरोपिन्दुम् १ उत्तरम् १ गीतकानि र च-" वीणावादनके तत्त्वका ज्ञाता और जो श्रव- ऋग्गाथापाणिकादक्षावहिताब्रह्मगीतिका । कीजाय यह अति जो सातास्वरोंमें या- गेयमेतत्तदभ्यासकरणान्मोलसंज्ञितम्११४ ईस २२ प्रकारकी होती हैं कि षड्न मध्यम पद-ऋग्गाथा १ पाणिका १ दक्षविहितार धैवत ये तीनों प्रत्येक चार २ अतिवाले ब्राह्मगीतिका १ गेयम् १ एतत् । तद होते हैं और ऋषभ और धैवतमें प्रत्येक भ्यासकरणात् ५ मोक्षसंज्ञितम् १ ॥ तीन २ श्रुति होती है गांधार निषादमें प्रत्येक योजना-अपरान्तकं उल्लोप्यं मद्रकं तथा दो २ श्रुति होतीहै- और स्वरोंकी जाति मकरी-औवणकं- सरोपिंदु-उत्तरं-एतानि- तो शुद्धरूप पन आदि मात और संकर गीतकानि-ऋग्गाथा पाणिका दक्षविहिता हैं उनमें प्रवीण और ताल (गीतका परिमाण) जाति ग्यारह इस प्रकार अठारह प्रकारकी ब्रह्मगीतिका-एतन्जेयं भवति तदभ्यासक- के स्वरूपका ज्ञाता पुरुष उन स्वगम अनु- रणात् मोक्षसंज्ञितम् भवतीति शेषः । ता. भा-अपरान्तक उल्लोप्य मद्रक परिश्रमसे मोक्षके मार्गको प्राप्त होताहै विद्ध ( व्याप्त ) ब्रह्मको टपासनासे थोडेहा मकरी आनणक साबिंदु रतर ये सातगीत , क्योंकि गाने में ताल आदिक भंगके भयसे होतई और चकारकै पटलेसे आसारित चित्तको वृत्ति आत्मामें अनायाससे हो बर्द्धमानक आदि महागीत लेने और जाती है गाथा पाणिका दक्षविहिता ब्रह्मगीतिका भावार्थ-वीणा बजानेके तत्वका ज्ञाता शादमाग निमार पर ममाधि गछति । श्रुतियोंकी जातिम चतुर और तालमा (४८६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ज्ञाता पुरुष विना परिश्रमही मोक्षमार्गको (जन्म) सर्ग आदिमें कहां है कि वह आत्मा प्राप्त हो जाता हैं ॥ ११५॥ आकाश आदिके अनुसार है ।। १२८ ॥ गीतज्ञोयदियोगेननामोतिपरमपदम् । कयमेतद्विमुह्यामासदेवासुरमानवम् ॥ रुद्रस्यानुचरोभृत्वातेनैवसहमोदते॥११६॥ जगदुद्भूतमात्माचकतस्मिन्वदस्वनः ॥ पद-गीतज्ञः १ यदि:- योगेन ३ ना पद-कथंड-एतत् १ विमुह्यामः क्रि-सदे- आमोति क्रि- परमं २ पदम् २ रुद्रस्य ६ वासुरमानवम् १ जगत् १ उद्भुतं १आत्मार अनुचरः १ भूत्वाऽ- तेन ३ एव:-सह- च-कथं-तस्मिन् ७ वदस्व कि- नः६॥ मोदते क्रि-1 योजना-सदेवासुरमानवम् एतत् जगत् योजना-यदि गीतज्ञः पुरुषः योगेन परमं कथं उद्भूतं चपुनः तस्मिन् आत्मा कथं उ- पदं न आमोति तर्हि रुद्रस्य अनुचरः भूत्वा भूतः एतस्मिन् वयं विमुह्यामः नः (अ- तेन एव सह मोदते ॥ स्माक) त्वं विस्तरेण बदस्व ॥ ता० भा०-चित्तके विक्षेप आदि विनसे ता०भा०-जो यह देवता असुर मनुष्य हतेहुयेकोभी अन्यफल कहते हैं कि यदि सहित संपूर्ण जगत् है वह आत्माके सका- गीतका ज्ञाता किसी प्रकारसे योगके द्वाय शसे कैसे उत्पन्न हुआ और उस जगत्में परम पदको प्राप्त न होय तो रुद्रका | आत्मा कैसे तिरछी योनि मनुष्य सर्प मंत्री आगले जन्ममे होकर रुद्रके संगही आदि शरीरधारी होता है-इस विषयमें हम क्रीडा करता है ॥ ११६॥ मोहको प्राप्त होतेहैं इससे मोह दूर करनेक अनादिरामाकथितस्तस्यादिस्तुशरीरकम् लिये हमारे प्रति विस्तारसे कहो ॥११८ ॥ आत्मनस्तुजगत्सर्वजगतश्चात्मसंभवः११७ मोहजालमपास्पेहपुरुपोदृश्यतेहियः ॥ सहस्रकरपनेत्रासूर्यवर्चा:सहस्रका ११९॥ पद-अनादिः १ आत्मा १ कथितः २ तस्य ५ आदिः १ तु:-शरीरकम् १ आ पद-मोहजालं२ अपास्य:- इह:- पुरुषः त्मनः ६ तु:- जगत् १ सर्वम् १ जगतः ५ दृश्यते क्रि-हि-यः१सहस्रकरपन्नेत्रःरसूर्य- बा-आत्मसंभवः १॥ वर्चाः १ सहस्रका २॥ योजना-आत्मा अनादिः कथितः तस्य | सआत्माचैवयज्ञश्चविश्वकपःप्रजापतिः । आदि शरीरकं भवति सर्व जगत् आत्मनः । विराजःसोनरुपेणयज्ञत्वमुपगच्छति १२० 1. भवति चपुनः जगतः आत्मसंभवः भपत शेषः॥ पद-सः१ आत्माश्चा- एव:-यज्ञः१च ताः भा०-पूर्वोक्त रीतिसे आत्मा (क्षेत्रज्ञ | विश्वरूपः १ प्रजापतिः १ विराजः १ सः १ वा जीव ) अनादि कहाहै और शरीरका अन्नरूपेण ३ यज्ञत्वं २ उपगच्छति क्रि-॥ ग्रहण करनाही उसकी आदि (जन्म) योजना-मोहजालं अपास्य इह यः कहाहै ऐसे सब जगत् आत्मासे होताई और उत्पन्नहुये उस पृथिवी आदि भूतीक पुरुषः सहस्रकरपन्नेत्रः सूर्यवर्चाः सह- समूहसे स्थूल शरीर रूपसे आत्माका संभव १ स यथाकाशम् ।
मायश्चित्वाध्याय यतिधर्मप्रकरण (१८७) । यः स्रका दृश्यते सआत्मा चपुनः यज्ञः विश्व- स्वमंडलादसौसूर्यःसृजत्यमृतमुत्तमम् । । रूपः प्रजापतिः विराजः अस्ति सः आत्मा यज्जन्मसर्वभूतानामशनानशनात्मनाम् ।। अन्नरूपेण यजत्वं उपगच्छति ( प्राप्नोति ) पद-स्वमण्डलात् ५ असौ १. सूर्यः १ तापर्थ-इस जगत्में जो यह सृजति क्रि-अमृतं२ उत्तम२ यत् १ जन्म? स्थूल शरीर आदि आत्मासे भिन्नमें आत्मा- सर्वभूतानां ६ अशनानशनात्मनां ६ ॥ का अभिमानरूप मोहजाल है उसको दूर करके और उससे भिन्न जो अनेक चरण ! तस्मादन्नात्पुनर्यज्ञःपुनरनपुनःक्रतुः हाथ नेत्रवाला और सूर्यके समान तेजधारी एवमेतदनार्यतंचक्रसंपरिवर्तते १२४ अनंत किरण और अनेक शिरवाला दीखता पद-तस्मात् ५ पुनः5- यज्ञः १ पुनः- है वह आत्मा है यह इससे कहा है कि तिस२ अन्नश्पुनः:- क्रतुः१ एवं - एतत्१ अनाद्य- पदार्थकी शक्तिका आधार वह आत्मा है न्तम् १ चक्र १ सम्परिवर्तते क्रि- ॥ क्योंकि उस आत्माको साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) योजना-द्रव्यदेवतात्यागसंभूतः आदिके संबंधका अभाव है और यज्ञ प्रजा- पति है क्योंकि वह विश्वरूप ( सर्वरूप ) है यजमान फलेन संयोज्य वायुना सोमं नीयते उत्तमः रसः सः रसः देवान् संतर्य चपुनः क्योंकि वह विराज है इससे पुरोडाश आदि ततः रश्मिभिः ऋग्यजुःसामविहितं सारं अन्न रूपसे यर्शक रूपको प्राप्त होता है और यज्ञसे वृष्टि आदिके द्वारा प्रजाको धाम उपनीयते असो सूर्यः स्वमण्डलात् तत् रचना होती है इस प्रकार आत्माविश्वरूपहै। मना सर्वभूतानां जन्म तस्मात् अन्नात. उत्तम अमृतं सृजति यत् अशनानशना- भावार्य मोहके जालको दूर करके जो पुरुष अनेक करचरण नेत्रधारी सूर्पक पुनः यज्ञः पुनः अन्नं पुनः क्रतुः भवति एवं समान तेजस्वी-और अनेक शिरधारी एतत् अनाद्यन्तं चक्रं संपरिवर्तते ॥ दीखता है वह आत्मा है और वही यज्ञ तात्पर्यार्थ चरु पुरोडाश आदि द्रव्यका प्रजापति विश्वरूप है क्योंकि वह विराजरूप जो देवताके निमित्त त्याग उससे जो अन्यरूपसे यज्ञरूपको प्राप्त होता है॥१२०॥ आत्माका परिणामान्तर अदृष्टरूप और योद्रव्यदेवतात्यागसंभूतोरसउत्तमः संपूर्ण जगत्का बीज होनेसे अत्यन्त उत्तम देवासंतर्यसरसोयजमानंफलेनच १११ जो रस पैदा होता है वह रस संप्रदान का- रकरूप देवताओंको भलीप्रकार तृप्त पद- यः १ द्रव्यदेवतात्यागसंभूतः १ करके और यजमानको वांछित फलसे करके रमः १ उत्तमः १ देवान संत-सरसः१ पवनकी प्रेरणासे चंद्रमण्डलके प्रति प्राप्त यजमानं २ फलेन ३ च-॥ किया जाता है फिर चंद्रमण्डलसे किरणों के संयोज्यवायुनासोमनीयतेरश्मिभिस्ततः । द्वारा ऋग्वेद- यजुर्वेद-सामवेदरूप सूर्य अग्पनुःसामविहितंसोरंधामोपनीयते १२२ अपने मण्डलसे टस वृष्टिरूप उत्तम रसको मण्डलक प्रति प्राप्त किया जाता है वह सूर्य पद-संयोन्या- वायुना ३ सोमम् २ नीय- रचता है जो घर भचर संपूर्ण भूतंकि नि- ते क्रि-विमभिः ३ ततः:- ऋग्यजुःसाम- | मित्त होता है वृष्टि से पैदाहुए और प्रनाकी विदित र सारं २ धाम २ उपनीयते कि- रत्पत्तिके हेतुरूप उस अन्नसे-फिर यज्ञ.
(४९०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित | - सहस्रों योनियोंमें चाण्डाल आदि अन्त्यज (फल ) प्रेत्य ( अन्यदेह ) में होताहे और और काक आदि पक्षी और वृक्ष आदि स्था- किसी २ कारीरी यज्ञ आदिकर्मका फल (. वर रूपको प्राप्त होता है-तिससे अविद्याके प्टिआदि) यहां ही होता है और किसी २ सम्बन्धसेही आत्माका जन्म है स्वरूपसे चित्र आदिका फल पशुआदि इसदेहमें वा नहीं॥ अन्य देहमें अनियमसे होताहै कुछ शास्त्रका भावार्थ-यह जीव मन वाणी काया क- यह तात्पर्य नहीं है कि कर्मके अनंतरही से किये हुए दोषोंसे अन्त्यज और पक्षी कर्मका फल हो जाय और यहां कर्मोंकी और स्थावर भावको प्राप्त होता है॥१३१॥ शुभ अशुभ फलकी जनकतामें सत्त्व आदि भावही प्रयोजकहै क्यों कि फलोंका तारत- अनंताश्चयथाभावाशरीरेपुशरीरिणाम् । म्य उसकेही आधीन है। रूपाण्यपितथैवेहसर्वयोनिपुदेहिनाम् १३२ भावार्थ-किसी कर्मका फल अन्य जन्म- पद-अनन्ताः १ चऽ- यथाऽ- भावाः १ | में और किसीका फल इस जन्ममें और कि- शरीरेषु ७ शरीरिणां ६ रूपाणि१ च-तथा- सीका. फल इस जन्ममें वा अन्य जन्ममें एवऽ-इह-सर्वयोनिषु ७ देहिनां ६ ॥ होता है उसमें प्रयोजक सत्त्व आदि भाव योजना-शरीरिणां शरीरेषु यथा भावाः | होता है ॥ १३३ ।। अनन्ता भवन्ति तथा देहिनां सर्वयोनिषु परद्रव्याण्यभिध्यायंस्तथानिष्टानिचितयन् रूपाणि भवन्ति । वितथाभिनिवेशीचजायतेंत्यासुयोनिषु ॥ ता. भा०-जैसे शरीरोंके विष जीवोंके भाव (अभिप्राय) सत्त्व आदि गुणोंकी अ- पद-परद्रव्याणि २ अभिध्यायन् १ धिकतांके तारतम्यसे अनन्त होते हैं तै- तथा:- अनिष्टानि २ चिंतयन् १ वितथाभि- सेही देहधारियोंके कुब्ज वामन आदि रूपभी निवेशी१ चऽजायते क्रि-अंत्यासुण्योनिषु७॥ अनन्त होते हैं ।। १३२ ॥ योजना-परद्रव्याणि अभिध्यायन तथा अनिष्टानि चिंतयन् च पुनः वितथाभिनिवे- विपाकाकर्मणांप्रेत्यकेपांचिदिहजायते । शी पुरुषः अंत्यासु योनिषु जायते-! इहवामुत्रथैकेषांभावस्तत्रप्रयोजनम् १३३ तात्पर्य भावार्थ-पराये द्रव्योंको कसे चु- पद-विपाकः १ कर्मणां ६ प्रेत्य:- केषां- राऊं यह अभिमुख होकर ध्यान करता हुआ चित्-इहा- जायते क्रि:- इहा- वाई-अमुत्र और हिंसा आदि अनिष्टोंकी चिंता करता वै-केषां ६ भावः १ तत्र:- प्रयोजनम् १ ॥ हुआ और झूटी वस्तुमें आग्रह करता हु- योजना कर्मणां विपाकः प्रेत्य केषांचित् आ मनुष्य चांडाल आदि अंत्य योनियों में उत्पन्न होताहे-॥ १३४ ॥ इह जायते केपांचित् इह वा अमुत्र जायते तत्र प्रयोजनं भावः अस्ति ॥ पुरुपोनृतवादीचपिशुनःपरुपस्तथा तात्पर्यार्थ-यदि कुब्ज आदिरूप काँसे अनिवद्धमलापीचमृगपक्षिपुजायते १३५॥ पैदा होते हैं तो कर्मके पीठही तत्काल पद-पुरुषः१अनृतवादी १ च-पिशुनः१ होने चाहिये इसलिये कहते हैं कि किनहीं२. परुषः १ तथाऽ-अनिवद्धप्रलापी १ च- काँका स्पोतिष्टोमअति- 1.विष "गपक्षिष ७ जायते क्रि-॥ . ।
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्ममकरण १ (४९१) योजना-अनृतवादी च पुनः पिशुनःतथा द्या धन अभिजन आदिके अभिमानसे रहि- परुषः च पुनः अनिषद्धप्रलापी पुरुषः मृग-त और बाह्य (देहका) और आभ्यंतरके पक्षिषु जायते ॥ शौचसे युक्त दांत अर्थात् शांतचित्त और तात्पर्यभावार्थ-झूट बोलनेवाला और पि- तपस्वी (कृच्छआदि तपसे युक्त) और इं- शुन (चुगलखोर) और परुष (कोर) द्रियोंकी विषयोंमें आसक्तिसे रहित और जिसकी वाणीसे दूसग डरै और अनिबद्ध नित्य नैमित्तिक कर्मोक करनेमें तत्पर और प्रलापी अर्थात् प्रकरणके असंगत अर्थका | वेदके अर्थका ज्ञाता जो सात्विक (सत्त्वगु- कहनेवाला पुरुष जानकर वा विनाजाने वृ. | णी ) मनुष्य सत्त्वगुणके तारतम्यसे उत्तम तिके तारतम्यसे हीन और उत्तम मृगपक्षि- और अत्यंत उत्तम देवयोनियोंमें उत्पन्न- योंमें अपनी वृत्तिके अनुसार पैदा होता है१३५ होता है ॥ १३७ ॥ अदत्तादाननिरतःपरदारोपसेवकः । असत्कार्यरतोधारमारंभीविषयी च यः । हिंसकश्चाविधानेनस्थावरेप्वभिजायते ॥ सराजसोमतुप्पेप्मृतीजन्माधिगच्छति ॥ पद-अदत्तादाननिरतः १ परदारोपसे पद-असत्कार्यरतः१ अधीरः १ आरंभीर वकः१ हिंसकः १ च- अविधानेन३ स्था- विषयो १ च- यः १ सः १ राजसः १ वरेषु ७ अभिजायते कि ॥ मनुष्येषु ७मृतः१ जन्म २अधिगच्छति क्रि।। योजना-अदत्तादाननिरतः परदारोप- योजना-असत्कार्यरतः अधीरः आरंभी सेवकः च पुनः अविधानेन हिंसकः पुरुषः च पुनः विषयो यः अस्ति सः राजसः पुरुषः स्थावरेषु अभिजायते ।। मृतः सन् मनुष्येषु जन्म अधिगच्छति (प्राप्नोति)॥ तात्पभावार्थ-विना दिये पदार्थके ग्रहण करनेमें तत्पर ( चोर) पराई स्त्रीमें आसक्त असत्कीमें रत और अधीर (व्यग्रचित्त) तात्प भावार्थ-सूर्य वादिन नृत्य आदि और शास्त्रोक्त विधिक विमा प्राणियोंका हिं- आरंभी अर्थात् सदेव कामेिं व्याकुल और सक मनुष्य दोपके गुरु लघु भावके अनुसार विषयों में अत्यंत आसक्त जो पुरुष है वह वृक्षलताप्रतान आदि स्थावमि उत्पन्न रजोगुणी मनुष्य मरकर रजोगुणके न्यून- होता है ॥ १३६ ॥ अधिकभावके अनुसार हीन और उत्तम मनुष्य आत्मज्ञःशौचवान्दांतस्तपस्वीविजितेंद्रियः । जातियोंमें जन्मको प्राप्त होताई ॥ १३८ । धर्मकृदविद्याविरसात्विकोदेवयोनिताम्।। ' निद्रालुरकुल्लुब्धानास्तिकोयाचकस्तथा। पद-आत्मज्ञः १ शोचवान् १ दांतः १ ममादवान्भिनवृत्तीभवेत्तिर्यक्षुतामसः ॥ तपस्वी १ विजितेंद्रियः १ धर्मकृत् १ वेद- पद-निद्रालुः १ फरकृत् १ लुब्धः १ विद्यावित् १ सात्विकः१ देवयोनिताम२॥ नास्तिकः १ याचकः१ तथा:-ममादवान् १ योजना-आत्मज्ञःशाचवान दांतः तपस्वी भिन्नवृत्तः१ भवेत् क्रि-तियक्षु तामसः१॥ दिजितेंद्रियः धर्मकृत वेदविद्यावित् १ सा योजना-निद्रालः क्रूरकृत टुन्धानास्ति- विकः पुरुषः देवयोनिताम् प्राप्नोति।। तया याचकः प्रमादवान् भिन्नवृत्तः तात्पर्यायभावार्थ-आत्मज्ञानी अर्थात वि- तामसः पुरुषः तिर्यक्ष योनिषु भवेत् ।।
(१९४). याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . -- ता० भा०-आत्माके रचनेका प्रकार क- (त्वचा ) इंद्रियसे कोन जानेगा कि जिसको हतेहैं जैसे कुलाल मिट्टी चक्र चीवर आदिके मैं देखा उसकाही मैं स्पर्श करताहूं१४९॥ संयोग (लेना )से घट करक शराव आदि वाचवाकोविजानातिपुनःसंश्रुत्यसंश्रुताम् ।। नाना प्रकारके कार्यसमूहको और गृह- अतीतार्थस्मृतिःकस्यकोवास्वमस्यकारका कारक (वर्द्धकिः ) अर्थात् गजण मिट्टी 'काष्ठ जो परस्पर सापेक्ष हैं उनसे एक गृह पद-वाचं २ वा-कः१ विजानाति क्रि- (घर) रूप कार्यको करता है-और जेसे पुनःऽ-संश्रुत्य-संश्रुताम् अतीतार्थस्मृतिः१ हेमकारक (सुनार ) केवल सुवर्णको लेकर कस्य ६ कः१ वाऽ- स्वप्नस्य ६ कारकः१॥ सुवर्णके अनुरूप कडे-मुकुट-कुंडल-आदि जातिरूपवयोवृत्तविद्यादिभिरहंकृतः कार्यको उत्पन्न करता है-और जैसे कोश- शन्दादिविपयोद्योगकर्मणामनसागिरा ॥ कारक (कीटविशेष अंजनहारी नामसे प्रसिद्ध ) अपनी लालके संयोगसे अपने पद-जातिरूपवयोवृत्तविद्यादिभिः ३ अहं- ३१ वैधनरुप कोशको रचता है तिसीप्रकार कृतः १ शब्दादिविषयोद्योगं २ कर्मणा आत्माभी पृथिवी आदि परस्पर सापेक्षका- | मनसा ३ गिरा ३ ॥ रणों (साधन ) को और श्रोत्र आदि कर- योजना-संश्त्य संभृतां वाचं पुनः कः गोंको ग्रहण करके इस संसारक विर्षे तिसर| वा विजानाति-अतीतार्थस्मृतिः कस्य भवेत् देव आदि योनियोंमें आपही अपने बंधन वा स्वमस्य कारकः कः भवेत-जातिरूप- रूप शरीरको रचता है।।१४६॥१४७॥१४८॥ ययोवृत्तविद्यादिभिः अहंकृतः कः भवेत- कर्मणा मनसा गिरा शब्दादिविषयोद्योग महाभूतानिसत्यानिययात्मापितथैपद्दि ॥ कः कुर्यात् ॥ कोन्ययेकेननेत्रेणष्टमन्येनपश्यत्ति १५९॥ तात्पर्याय-तैसेही किसी पुरुपकी वाणीको पद-महाभूतानि १ सत्यानि १ यथा:- पहिले सुनकर टस सुनीहया वाणाको यह आत्मा १ अपि-तथा-एव:-दि:- का १ 'उसकी वाणी है यह कोन जानेगा तिससे अन्यथा:- एकन ३ नेत्रेण ३ दृष्टं २ अन्ये- ज्ञानेंद्रियोंसे भिन्न आत्मा है यह सिद्ध हुआ और जो आत्मा नित्य न होता तो पहिले योजना-यथा महाभूतानि सत्यानि तथा देखे (गाने ) हुये पदार्थका स्मरण जो पूर्व एवं आत्मा अपि सत्यः भन्यथा एकेन नेत्रग अनुभवसे उत्पन्न हुये संस्कारके उद्घोषसे दृष्ट अन्येन यः पश्यति (जानाति)! होता है वह किसको होगा क्योंकि भन्यकी ता. भा०-अय विषयोंके जाननेवाली देखी हुयी वस्तुका स्मरण अन्यको नहीं ज्ञानेंद्रिपरि भिन्न भारमाफ होने में प्रमाण होसकता तसही समका करनेवाला कोन करते -से पृथिवी भादि महाभूत-प्रमा- होगा शांतनुआ ग्यापार गिनका पसी मांस गानने योग्य होनसे सत्य हे तिसी- इदिप उस स्लमो करनेवाली नहीं हो तर भात्माभी सरपद भन्यपा (सरयन : सरती तसे मंदी नातिन भास्था भाग. मानगि सो) अपांव शानिष्ट्रिपति भिन्न रणति भादिसे संपन्न हूँ इस अनुसंधा. शाता (निरप) न होगा तो एक नको प्रतीति स्पिर भारमासे मन्न ट्रिपस देता पी पग्नुको भन्य सर्व सदोगी तसदी सन्द मशंभादिलित- न३ पश्यति कि-॥
प्रायश्चित्ताध्याय यातधर्मप्रकरण ४ -(४९५) 4 स्थित भया । योंके भोगनेके लिए मन काया वाणीसे उद्योग | भवति सदा हिताहितेषु भावेषु विपरीतमतिः को न करेगा तिससे ज्ञानेंदियोंसे भिन्न आत्मा भवति ॥ . ता. भा०-और तिस नष्ट बुद्धिकी दारा भावार्थ-पहिले सुनी वाणीको उसकी यह (बी) पुत्र मंत्री मेरे हैं और मै इनका वाणी है यह कौन जानेगा वीतेहुये पदार्थको स्वामी हूं इस प्रकार अत्यंत ममतासे व्या: स्मृति और स्वप्न किसीको होगा और जाति । कुल स्थिति होती है और तैसेस्थी हित अ- रूप अवस्था आचरण विद्या आदिसे अह- | हितकारी कार्यके समूहमें सदैव विपरीत कार किसको होगा और कर्म मन वाणीसे | मति रहता है अर्थात् हितको अहित और शब्द आदि विषयोंका उद्योग कोन करेगा | अहितको हित समझता है ।। १५३ ।। यदि ज्ञानेंद्रियोंसे भिन्न आत्माको न मानोंगे तिससे आत्मा इंदियोंसे भिन्न है ॥१५०॥१५१ ज्ञेयज्ञेप्रकृतीचैवविकारेवाविशेषवान् ससंदिग्धमतिकर्मफलमस्तिनवेतिवा ॥ अनाशकानलापातजलप्रपतनोद्यमी १५४ विप्लुतासिद्धमात्मानमसिद्धोपिहिमन्यते ॥ पद-ज्ञेयज्ञे ७ प्रकृती च-एव-विकारे वा- अविशेषवान् १ अनाशकानलापात- पद-सः१ संदिग्धमतिः१ कर्मफलं१ अ- | जलप्रपतनोद्यमी १॥ स्ति कि-न-वाऽ इतिऽ- वाई-विप्लुतः१सिद्धं एवंवृत्तीविनीतात्मावितथाभिनिवेशवान् । आत्मानं २असिद्धः अपिऽ-हि-मन्यते क्रि-॥ कर्मणाद्वेषमोहाभ्यामिच्छयाचवबद्धयते ॥ योजना-यः आत्मा विप्लुतः सः कर्मफलं अस्ति न वा इति संदिग्धमतिः भवति अ- पद-एवंवृत्तः १ अविनीतात्मा १ वितथा- सिद्धः अपिआत्मानं सिद्धं मन्यते ।। भिनिवेशवान् १ कर्मणा ३ द्वेषमोहाभ्यां ३ इच्छया ३ च - एवा- बयते कि-॥ ता०भा०-उपासना विशेषकी सिद्धिके लिये संसारके स्वरूपका विवरण करते हैं योजना-ज्ञेयज्ञे च पुनः प्रकृती वा विकारे जो यह पूर्वोक्त आत्मा विप्लुत अर्थात् अ- | अविशेषवान् भवति अनाशकानलापातजल- प्रपतनोद्यमी भवेत् एववृतः अविनीतात्मा इंकारसे दूषित है यह सब कौमें फल है वा नहीं है इस प्रकार संदिग्ध बुद्धि होजाती है वितथाभिनिवेशवान् सन् कर्मणा द्वेषमो- और तसेही असिद्ध (अकृतार्थ भी अपने हाभ्यां च पुनः इच्छया बद्धयते ॥ आत्माको सिद्ध (कृतार्थ) मानता है॥१५२॥ ता. भा०-ज्ञेयके जाननेवाले आत्मामें अत्माके तीनों गुणोंकी साम्यअवस्थारूप ममदाराःसुतामात्याअहमेपामितिस्थितिः। अकृतिम और अहंकार आदि शिकायरि- हिताहितेपुभाषेपुविपरीतमतिःसदा १५३॥ वेकका ज्ञान नष्टबुद्धिको नहीं होता और पद-मम ६ दाराः१ सुप्तामात्याः १अहं१ | तैसेही अनशन (भोजनका त्याग) अग्नि एषां ६ इति:- स्थितिः १ हिताहितेषु ७ | और जलमें प्रवेश इनमें उद्यम करता है भावेषु ७ विपरीतमतिः १ सदा-॥ इस प्रकार नानाप्रकारके अनथामें प्रवृत्त- योजना-मम दाराः सुतामात्याः संति हुआ नहीं वशीभूत मन जिसके ऐसा अस- एषां अहं स्वामी अस्मि इति तस्य स्थितिः । कर्मके आग्रहसे युक्त मनुष्य उस आम- (४९६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । हसे किये कर्मोसे और रागद्वेष और तात्पर्यार्थ-भा० विद्याके लिए आचार्यकी मोहसे बंधनको प्राप्त होता है ॥१५४-१५५॥ सेवा वेदान्त और पातंजल आदि शास्त्रोंका आचार्योपासनंवेदशास्त्रायपुविवेकिता ॥ विवेक और उनमें कहेहुए ज्ञान और ध- तत्कर्मणामनुष्ठानसंगःसद्भिर्गिरःशुभाः ॥ मौको करना सत्पुरुषोंका संग प्रिय और हित वचन कहना स्त्रियों के दर्शन और स्स- पद-आचार्योपासनं १ वेदशास्त्रार्थेषु ७ शंका त्याग सब भूतोंमें आत्माके समान विवेकिता १ तत्कर्मणां६ अनुष्ठानं १ संगः१ देखना और पुत्र क्षेत्र कलत्र आदि परि- सद्भिः ३ गिरः १ शुभाः १॥ ग्रहोंका त्याग जीर्ण कापाय वस्त्रोंको धारना ख्यालोकालभविगमःसर्वभूतात्मद और शब्द स्पर्श विषयों में श्रोत्र आदि ई. र्शनम् ॥ त्यागःपरिग्रहाणांचजीर्ण- द्रियोंकी प्रवृत्तिको रोकना तंद्रा और आल. स्यका त्याग और शरीरकी अशुद्ध आदि कापायधारणम् ॥ १५७ ॥ अवस्थाका स्मरण और संपूर्ण गमन आदि पद-स्वालोकालभविगमः १. सर्वभूता- प्रवृत्तियोंमें सूक्ष्म २ प्राणियोंके वधको दे स्मदर्शनम् १ त्यागः १ परिग्रहाणां ६ च-खना रजोगुण और तमोगुण रहित प्राणा- जीर्णकापायधारणम् १॥ याम भादिसे अन्तःकरणकी शुद्धि विष- विपयेंद्रियसंरोधस्तंद्रालस्यविवर्जनम् ।योंकी इच्छाका त्याग बाह्य इंद्रिय और शरीरपरिसंख्यानंप्रवृत्तिप्वयदर्शनं१५८॥ अंतःकरणको रोकना इन आचार्य आ- दिकी सेवा आदि उपायोंसे शुद्धहुआ म. पद-विषयेन्द्रियसंरोधः १ तंद्रालस्य- नुष्य ब्रह्मकी उपासनासे मुक्त होता है। विवर्णनम् १ शरीरपरिसंख्यानम्१ प्रवृत्तिपु७ ॥ १५६ ॥ १५७ ॥ १५८ ॥ १५९ ।। अघदर्शनम् १॥ | तत्त्वस्मृतेरुपस्यानात्सत्त्वयोगात्परिक्षयात्। नीरजस्तमसासत्त्वशुदिनि:स्पृहताशमः । कर्मणांसन्निकर्षाच्चसतायोगःप्रवर्तते १६०. एतरुपायैःसंशुद्धःसत्त्ययोग्यमृतीभवेत् ॥ पद-तत्त्वस्मृतेः६ उपस्थानात ५सत्त्वयो- पद-नीरजस्तमसा ३ सत्त्वशुद्धिः१ निः- 'गात् ५ परिक्षयात् ५ कर्मणां ६ सन्निक- स्मृहता १ शमः १ एतः ३ उपायः ३ सं. पति चासतां योगः १ प्रवर्ततक्रि.-1 शुद्धः १ सवयोगीर अमृती १भवत् क्रि-॥ योजना-तत्वस्मृतेः उपस्थानात् सत्त- योजना-आचार्योपासनं वेदशास्त्रार्थेषु वि- योगात् कर्मणां परिक्षयात् चपुनः सतां सं- थकिता तत्कर्मणाम अनुष्ठानं सद्भिः संगः निकर्षात् योगः प्रवर्तते ॥ शुभा गिरः रूमालोकादंभविगमः सर्वभूता- स्मदर्शनम् च पुनः परिप्रदागां त्यागः गीर्ण- 'स्थितिसे और सत्त शुद्धिक योगसे और ता: भाक-आत्मरुप तत्वको निम्बल यापायधारण विषयन्द्रियसंगंधः तंद्रा- कर्मवानों नाशसे और ससुरुषोंक संगस हस्पषिधनम् शरीरपरिसरयानम् च पुनः ! आत्मयांगकी प्रगृत्ति होती हैं ॥ १६ ॥ मासिषु अपदेशनम् नारनस्तमसा सत्य. लिहिन शमः एतः उपापः सं- शरीरमंशषेपस्पमनःस्वस्यमीभरम ॥ सपोगी अमृती भवेत् ॥ भविप्लुतमतिःसम्पाजातिसंस्मरताभियाव!
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण १ ( १९७) . पद-शरीरसंक्षये ७ यस्य ६ मनः १ स- आरमाभी तिस २ कर्मके भोगार्थ कमासे त्वस्थं २ ईश्वर २ अविप्लुतमतिः१ सम्पक पेदा हुए कुब्ज वामन रूम नाना प्रकारोंसे कलेवरोंको पैदा करते है ॥ १६२॥ जातिसंस्मरतां २ इयात् क्रि-॥ योजना यस्य शीरसंक्षये मनः सत्त्वस्थ कालकर्मात्मबीजानांदोषैर्मातस्तथैवच ॥ ईश्वर प्रति व्याप्रियते सः अपिप्लुतमतिः गर्भस्यवैकृतंदृष्टमङ्गाहीनादिजन्मतः १६३।। सम्यक् जातिसंस्मरतां इपात् ।। पद-कालकारभवीजानां ६ दोषः३ तात्पर्यार्थ-नही नष्ट है बुद्धि जिसकी मातुः ६ तथा एव चा- गर्भस्प६ वैकृत ऐसे जिस योगीका सल गुणसे युक्त मन । दृष्टं १ अंगहीनादि जन्मतः मरणके समय ईश्वरमें लगता है-वह यद्यपि योजना-कालकर्मात्मवीजानां दोषः तथैव उपासनाके प्रयोगमें अप्रवीण होनेसे आत्म- मातुः दोपैः अंगहीनादि गर्भस्य घेकृतं । ज्ञानको प्राप्त नही होता तथापि उत्तम सं-जन्मतः दृष्टम् ॥ स्कारकी श्रेष्ठताक वशसे जन्मांतरमें देखे ताभा केवल कर्मही कुब्ज वामन आदिमें, हुए जो कृमि कीट आदि नाना गर्भवासोंके निमित्त नहीं किन्तु काल कर्म पिताका वीर्य दुःख उनके स्मरणको प्राप्त होताहै-अर्थात् माताका दोष येभी सहकारी कारण है इस उसे पूर्वजन्मके दुःखोंका ज्ञान हो जाता है अष्टरूप कारणके समूहसे गर्भका अंगहीन और उन दुःखक स्मरणसे पैदा हुआहे उद्वेग आदि विकार जन्मसे देखा है ॥ १६३॥ जिसको ऐसा वह उस दुःखोंके नाशक मोक्ष प्रवृत्त होजाता है। अहंकारेणमनसागत्याकर्मफलेनच ॥ भावार्थ-जिस योगीका सत्वगुणी मन मर- शरीरेणचनात्मायंमुक्तपूर्वकथंचन १६४॥ के समय ईश्वरमें लगता है भली प्रकार पद-अहंकारेण ३ मनसा ३ गत्या ३ स्थिरबुद्धि वह पूर्व जन्मके स्मरणको प्राप्त | कर्मफलेन ३च:- शरीरेण ३ चना-आरमा . होता है ॥ १६१ ॥ १ अपं १ मुक्तपूर्वः १ कथंचना-1 यथाहिभरतीवर्णवर्णपत्त्यात्मनस्तनुम् ॥ योजना-अहंकारेण-मनसा-गत्या चपुनः नानारूपाणिकुणिस्तथारमाकर्मजास्तनूर कर्मफलेन शरीरेण अयं आत्मा कथंचन मुक्तपूर्वो न भवति ॥ पद-यथा-हि- भरतः१ वर्णः ३ वर्ण- यति कि-आत्मनः६ तर नाना-रूपाणिर प्राकृतिक प्रलयके समय महत्तत्व आदि तामा० कदाचित् कोई शंका करें कि कुर्वागः १ तथाऽ- आत्मा १ कर्मजाः १ अखिल विकारोंके नाश होनेपर कर्म के तनः २॥ आधीन प्रथम देहका ग्रहण कैसे हो योजना-नाना रूपाणि कुर्वाणः भरतः सकता है इससे लिखते हैं कि अहंकार (नया) यथा आत्मनः तनुं वर्णैः वर्णयति मन गति अर्थात् संसारका हेतु दोपोंकी तथा आत्मा आत्मनः कर्मणाः तनूः वर्णयति राशि और धर्मअधर्मरूप काँका फल और तामा जलेराम गवण आदिनानारूपोंको लिंग शरीर इन अहंकार आदिसे तब तक करता हुआ नट शुक्ल पोत कृष्ण आदि यह आरमा छुः नही सका जवतक मोक्ष वर्णास अपने शरीरको रचता है तसदी । नही होता ॥ १६४ ॥ 7 (४९८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । वाधारस्नेहयोगाद्यथादीपस्यसंस्थितिः । उर्ध्वमेकास्थितस्तेपायोभित्त्वासूर्यमंडलम्। विक्रियापिचदृष्टैवमकालेप्राणसंक्षयः १६५ ब्रह्मलोकमतिक्रम्यतेनयातिपरांगतिम् ॥ पद-वाधारस्नेहयोगात् ५ यथाऽ पद-ऊर्द्ध- एकः १ स्थितः १ तेषां ६ दीपस्य ६ संस्थितिः १ विक्रिया १ अपि- | यो १ भित्त्वाऽ- सूर्यमण्डलं २ ब्रह्मलोकं २ च- दृष्टा १ एवंs-अकाले७ प्राणसंक्षयः॥ अतिक्रम्या-येन३ याति क्रि-परांर गतिम्॥ योजना-वाधारस्नेहयोगात् यथा दी योजना-या दीपवत् हदि स्थितः तस्य पस्य संस्थितिः चपुनः विक्रिया दृष्टा एवं अनंताः रश्मयः सितासिताः कर्बुरूपाः अकाले प्राणसंक्षयः दृष्टः॥ कपिलाः नीललोहिताः सन्ति यः एकः तेषां तात्पर्याय-कदाचित् कहो कि पृथकू | मध्ये सूर्यमण्डलं भित्त्वा ब्रह्मलोकं अतिक्रम्य पृथक् कर्मवाले जीवोंका पृथक् २ मरणही ऊ स्थितः तेन परांगति याति ॥ युक्त है एक वार संग्राम आदिमें अकालमृ ताभा-जो यह जीव हृदयमें दीपकके त्यु कैसे होती है-सो ठीक नही कि जेसे ते | समान स्थित है उसकी शुक्ल कृष्ण कवरी लसे भिगोई अनेक प्रकारकी ज्वालावाली नीली लाल अनन्त रश्मि (पूर्वोक्त बहत्तर अनेक वत्ती दीपक और तेल इनके योगसे | सहस्र नाडी ) हैं उनके मध्यमें जो एक दीपककी स्थिति, और अत्यंत चलते हुए | रश्मि सूर्यमण्डलको भेदन करके और पवनकी ताडना रूप विपत्तिके होनेसे एक- ब्रह्मलोकका अतिक्रमण करके अपरको वार नाशरूप विकार होता है तिसी प्रकार स्थित है उससे वह जीव परम गतिको प्राप्त संग्रामके समय अकालमें रथी सारथि वानी | होता है- ॥ १६६ ॥ १६७ ॥ कुंबर आदि जीवोंका युद्धरूप उपरतिका | यदस्यान्यद्रश्मिशतमूर्ध्वमेवव्यवस्थितम् । हेतु हानेसे एकवार अकालमें प्राणोंका नाश तेनदेवशरीराणिसधामानिमपद्यते १६८॥ अनुपपन्न नही-इससे यह बात कही गईकि पृथक् २ कालमें विपत्ति (मरण) का हेतु पद-यत् १ अस्य अन्यत्१ रश्मिशतं? जो जीवोंका अदृष्टया, उसका उससे विरु- | अर्द्ध-एवऽ व्यवस्थितं १ तेन ३ देवशरी- द्धरूप कार्य करनेवाला जो संग्रामरूप दृष्ट | गणि २ सधामानि २ प्रपद्यते क्रि- हेतु उसके होनेसे प्रतिबंध होता है। योजना-अस्प यत् अन्यत् रश्मिशतं भावार्य-चत्ती आधार और नेह इनके ऊर्द्ध एव व्यवस्थितम् अस्ति तेन सधामा- योगसे जैसे दीपकमें स्थिति और विकार नि देवशरीराणि प्रपद्यते (प्रामोति)। देखा है इसी प्रकार अकालमें प्राणोंका तात्पर्यभावार्य-इस भात्माकी मुक्तिका संक्षय होता है ।। १६५॥ मार्ग जो रश्मिहे उससे अन्य ऊपरको संक- डॉ रश्मि स्थित हैं उनसे देवताओंके तेजस अनंतारश्मयस्तस्यदीपवयःस्थितोहदि । शरीर जो केवल सुख भोगके साधन होते हैं सितासिताःकर्युरूपाःकपिलानीललोहिताः। और सुवर्ण रजत रत्नसि रचित देवताओंके पद-अनंताः १ रश्मयः १ तस्य ६ दीप-1पुर उनको प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ यता- यः १ स्थितर इदि सितासिताः । येनेकरूपाश्चापस्तादश्मयश्चमृदुमभाः ॥ करूपाः । कपिलाः । नीललोहिताः १ ॥ ! इदकर्मोपभोगायतैःसंसरतिसोऽवशः १६९ मायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण : (४९९) - पद-येरनकरूपाः१ च-अधस्थात्:-- अगत्या सत्येन च पुनः अनृतेन श्रेयसा सु- श्मयः १ चा-मृदुप्रभाः१इहा- कर्मोपभागाय:खदुःखाभ्यां च पुनः शुभाशुभैः कर्मभिः नि- तः३ संसरति कि-सः१ अवशः १ मित्तशाकुनज्ञानग्रहसंयोगजैः फलैः तारा- योजना-ये नैकरूपा मृदुप्रभाः रश्मयः | नक्षत्रसंचारः जागरेः स्वप्नजेः आकाशपद- अधस्तात् स्थिताः तैः अवशः इह कर्मोप- नज्योति लभूतिमिरैः मन्यतः युगप्राप्त्या भोगाय संसरति । मंत्रोपधिफलैः अपि वेद्यमान तथा जगतः तात्प भावार्थ-और जो अनेक रूप को- कारणं आत्मानं यूयं वित्त-॥ मल कांतिवाली रश्मि नीचेको स्थित है उ- तात्पर्यार्थ-अब भूतोंको जो चैतन्य मानता नसे कर्म फलोंके भोगार्थ उन कमाके आ-ह उसके पक्षका निराकरण करते हैं कि वह धीन हुआ संसारमें जन्म लेताहे ॥ १६९ ॥ यह नेति नेति से जाननेयोग्य अस्थूल अन- वैदेशिाखेसविज्ञानर्जन्मनामरणनच णु अहस्व अपाणिपाद अर्थात् स्थूल अणु हस्व करचरण वालेसे भिन्न आत्मा है आागत्यातयागत्यासत्येनानृतेनच ॥ इत्यादि वेदों से और मीमांसा आ- पद-येदैः ३ शास्त्रः ३ स विज्ञानः ३ | न्वीक्षिकी आदि शास्त्रोंसे और मेरा यह श- जन्मना ३ मरणेन ३ चा-आया ३ गत्या ३ रीर है इत्यादि आत्मासे भिन्न ज्ञानोंसे और तथाऽ-अगत्या ३सत्यन३ हि-अनृतेन ३च- जन्मांतरमें किये अधर्म धर्मके आधान जन्म मरणासें देहसे भिन्न आस्माका अनुमान करी श्रेयसासुखदुःखाभ्यांकर्मभिश्चशुभाशुभैः। और जन्मांतरमें किये काँके कर्ताको नि- निमित्तशाकुनज्ञानग्रहसंयोगजे फलः ॥ यमसे होने वाले दुःखसे और ज्ञान इच्छा पद-श्रेयसा३ सुखदुःखाभ्यां ३ कर्मभिः३ | प्रयत्नवालेसे जो होते हैं उन गमन और चा- शुभाशुभैः ३ निमित्तशाकुनज्ञानग्रहः भगमोंसे भौतिक देहसे भिन्न भात्माका संयोगः ३ फलैः३ अनुमान करो क्योंकि इससे देह चैतन्य नहीं 'तारानक्षत्रसंचारैर्जागरःस्वप्रजैरपि हो सक्ता जिससे कारण गुणोंके ऋमसे कार्य आकाशपयनज्योतिर्जलभतिमिरेस्तया ॥ पार्थिव देहके कारण पार्थिव परमाणुओम द्रव्यमें वैशिषिक गुणोंका आरंभ देखा है और पद-तारानक्षत्रसंचार हजागरेः३ स्वामजः३ चैतन्यका समवाय नही हो सत्ता क्योंकि अपि-आकाशपवनज्योतिर्जलभृतिमिरैः १ | परमाणुसे पने स्तंभ कुंभ आदिकोंमें चैतन्य को नहीं देखते कदाचित् कोई शंका करें भन्यतरयुगमात्यामंत्रीपधिफलैरपि। कि मदशक्तिके सुमान जल आदि दरमर- रके संयोगसे चैतन्य हो जाताहे सो ठीक वित्तात्मानंवेद्यमान कारणंजगतस्तया१७३ नही क्यों कि शक्ति एक साधारण गुणहै पद-मन्वंतः३ युगमाप्त्या ३ मंत्रोपाधफ- इससे भौतिक देइसे भिन्न चेतन्य भादि से आप-वित्तक्रि-आत्मानं २ वेधमानंर का समवायी अंगीकार करना सत्य मार कारणं२ जगतः६ तया:- घटसे श्रेय (हितमाप्ति ) से परलोकके मुत पोजना-वेदः सविज्ञानः शास्त्रः जन्मना मलनेटिनेत्यादि भरपूनमनमास्तम- च पुनः मत माया गत्या तथा परिन् ।' ३ तथा- (५००) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । और दुःखोंसे तैसेही शुभ कर्मके करने और पद-स्वर्गः १ स्वमः १ च-भावानां ६ अशुभ कर्मके परित्यागसे ज्ञानवान्में नियम प्रेरणं १ मनसः६ गतिः१ निमेषः१ चेतना? से रहनेवाले इनसेभी देहसे भिन्न आत्माका | यत्नः १ आदानं १ पांचभौतिकम् १॥ अनुमान करौ भूकम्प और पिंगल आदिसे यतएतानिदृश्यंतेलिंगानिपरमात्मनः ॥ शकुनोंका ज्ञान अर्थात् पक्षियोंकी चेष्टासे शुभ अशुभ जानना सूर्य आदि ग्रहोंके संयो- तस्मादस्तिपरोदेहादात्मासर्वगईश्वरः१५६ गका फल अश्विनी आदिसे भिन्नज्योति वाले पद-यतःऽ-एतानि दृश्यते किलिंगानिरं तारे और अश्विनी आदि नक्षत्र इनके संचारसे परमात्मनः ६ तस्मात् ५ अस्ति क्रि-परः१ शुभ अशुभ फलके जतानेवाले जाग्रत् अव- देहात् ५ आत्मा १ सर्वगः १ ईश्वरः १ ॥ स्थाके छिद्र सहित सूर्य आदिके दर्शनोंसे योजना-अहंकारः स्मृतिः मेधा द्वेषः और तसेही खर वाराहसे युक्त रथमें बैठना बुद्धिः सुखं धृतिः इंद्रियान्तरसंचारः इच्छा आदि स्वप्नके ज्ञानसे तैसेही जीवके उपभो- धारणजीविते-स्वर्गः चपुनः स्वमः भावानां गार्थ रचेहुए आकाश पवन ज्योति जल भू प्रेरणम्-मनसः गतिः-निमेषः चेतना यत्नः तिमिरोंसे और युगांतरकी प्राप्ति जो देहमें पांचभौतिक आदानं-यतःएतानि परमात्मनः नहीं हो सक्ति उससे और ज्ञान बुद्धिसे कि- लिंगानि दृश्यते तस्मात् देहात्परः (भिन्नः) ये हुए मंत्र और ओपाधि आदि क्षुदर कमोसे | सर्वगः ईश्वरः आत्मा अस्ति- इन सबसे साक्षात् वा परंपरासे जाननेयोग्य तात्पर्यार्थ-अहंकार-पूर्व जन्मके अनु- आत्माको हे मुनियों तुमजानो ॥ भवसे उत्पन्न हुआ जो आत्मामें संस्कार भावार्थ-विज्ञान सहित वेद शास्त्र जन्म | उसके उद्बोधसे होने वाली बालकके दूधपीने मरण आतै गमन अगमन सत्य झूट श्रेय आदिको स्मृति-इस लोकका सुख-धीरता सुख दुःख शुभ और अशुभकर्म भूकम्प अन्य इंद्रियके देखे हुये पदार्थ में अन्य इंद्रिय आदि शाकुनज्ञान सूर्य आदिके संयोगका का संचार जैसे जिसको मैं देखा उसका फल अश्विनी आदि नक्षत्रों का संचार जागर ही मैं स्पर्श करताहूं-यह अनुसंधान रूप स्वप्न आदिका ज्ञान आकाश पवन ज्योति इंद्रियांतर संचार-इस प्रकरणमें इच्छाप्रयल जल पृथिवी अंधकार मन्वंतर युगोंकी प्रा- चैतन्य स्वरूपसे लिंगहे और पहिले श्लोकमें. ति और मंत्र ओपधियोंका फल इनसे जानने गमन सत्य वचन आदिका हेतु होनेसे योग्य और जगत्के कारण आत्माको तुम आर्थिक लिंग (प्रमाण ) है इससे पुनरुक्ति जानी ।। १७३ ॥ दोष नहीं है-शरीरका धारण और जीवित महंकारःस्मृतिर्मेधावपोवृद्धिामुखधृतिः ॥ (माणधारण अनियमसे देहांतरमें भो- इंद्रियांतरसंचारइच्छाधारणजीविते १७४ गने योग्य सुख विशेष रूप स्वर्ग-स्वप्न-- पहिले लोकमें शुभ फलके द्योतनार्थ स्वप्न पद-अहंकारः १ स्मृतिः १ मेपा लिंग है यहां स्वरूपसे इससे पुनरुक्ति दोष द्वेषः । बुद्धिः १ सुखं १ धृतिः १ इंद्रियां- नहीं है-तसेही भावों (इंद्रिय ) का विषयमि तरसंचारः १ इच्छा १ धारणनीविते १ ॥ प्रेरण-चेतनके भविष्टानस मनकी गति- स्वर्ग:समश्वभागानांप्रेरणमनसोगतिः ॥ निर्मप-तसेही पंचभूतीका उपादान (म- निमेपशेतनापनादानंपाचभौतिकम् ॥ दिग) गिससे भूतामें न होने वाले सामान .
मायश्चित्ताध्याय यतिधर्ममकरण ४ (५०१) .. वा परंपरासे परमात्माके द्योतक ये लिंग होनेसे असत् रूप-ओर सदसत् रूप आ- (हेतु) दीखतेहैं-तिससे सर्व व्यापी ईश्वर | त्मा है वह क्षेत्रज्ञकहाता है ॥ १७७॥१८॥ आत्मा देहसे भिन्न है॥ बुद्धेरुत्पत्तिरव्यक्ताततोऽहंकारसंभवः ॥ भावार्थ-अहंकार-स्मरण-मेधा-द्वेष-बुद्धी- | तन्मात्रादीन्यहंकारादेकोत्तरगुणानिच ॥ सुख-धैर्य- इंद्रियांतरसंचार-इच्छा शरीर पद-बुद्धेः ६ उत्पत्तिः १ अव्यक्तात् ५ और प्राणोंका धारण-स्वर्ग स्वप्न-इंद्रियोंका | ततःऽ-अहंकारसंभवः१ तन्मात्रादीनि१ अहं.. प्रेरण-मनकी गति-निमेष-चेतना-यत्न- । कारात् ५ एकोत्तरगुणानि १ च - मंच भूतीका महण-जिससे परमात्माके यलिंग योजना-अव्यक्तात् बुद्धेः उत्पत्तिः ततः दीखते है तिप्तसे सर्व व्यापक ईश्वर आत्मा अहंकारसंभवः अहंकारात् एकोत्तरगुणानि देहसे भिन्न है ।। १७४॥१७॥१७६ ॥ तन्मात्रादीनि उत्पद्यते ॥ तात्प०-सत्व आदि गुणोंकी साम्यावस्था- बुद्धींद्रियाणिसार्थानिमनःकर्मेद्रियाणिच ॥ को अव्यक्त कहते हैं उससे सत्त्व रज तमी अहंकारश्चधुद्धिश्चपृयिव्यादीनिचैवहि१७७ गुणमयी तीन प्रकारको धुद्धि उत्पन्न होती है पद-बुद्धीन्द्रियाणि १ सार्थानि १ मनः१ | उस बुद्धिसे वैकारिक तैजस तामस रूप तीन कर्मेन्द्रियाणि१ ची-अहंकारः१ चा-बुद्धिः १ प्रकारका अहंकार उत्पन्न होता है उनमें च-पृथिव्यादीनि १ चा-एव:-हि तामस भूतादि नामके अहंकारसे - भूतोंकी अध्यक्तमात्माक्षेत्रज्ञाक्षेत्रमस्यनिगद्यते । शब्द स्पर्श रूप रस गंध रुप मात्रा और ईश्वरःसर्वभूतस्थःसन्नसन्सदसंश्चयः १७८ आकाश आदि भूत उत्पन्न होते हैं और वे मात्रा एकोत्तर गुणी होती है अर्थात् भूतोंके पद-अव्यक्तं१ आत्मा १ क्षेत्रज्ञः १क्षेत्र१ ) क्रमसे एकरमात्रा बढती जाति है और चशब्द. अस्प६ निगद्यते क्रि-ईश्वरः१ सर्वभूतस्था५ । के पटनेसे वैकारिक और तेजस अहंकारसे सन् १ असन् १ सदसन् १क-यः १॥ ज्ञान और कर्मेंद्रियोंकी उत्पत्ति समझनी ।।. योजना-सार्थानि बुद्धीन्द्रियाणि-मनाच- पुनः कर्मेन्द्रियाणि अहंकारः बुद्धिः-चपुनः बुद्धिसे अहंकारको और अहंकारसे एकोत्तर भावार्थ-अव्यक्तसे बुद्धिकी उत्पत्ति भोर पृथिव्यादीनि-अव्यक्तं (प्रकृतिः) एतत् । गुणी शब्द आदि मात्राओंकी उत्पत्ति अस्य क्षेत्र-यः असो ईश्वरः सर्वभूतस्था होती है ।। १७९ ॥ सन् असन् सदसपः आत्मा अस्ति सः. क्षेत्रज्ञः निगद्यते ॥ तात्प० भावार्थ-प्रोत्र आदि ज्ञानेंद्रिय योयस्मानिसृतश्चैपांसतस्मिन्नेवलीयते ।। और उनके शब्द आदि विषय-मन और पद-शब्दः १ स्पर्शः १ च रूपं कर्मेन्द्रिय-अहंकार पुद्धि और पृथिवी आदि भूत भव्यक्त (प्रकृति ) यह उस परमात्मा का क्षेत्र कहाता है और जो ईश्वर सब भू-त् ५ निसृतः१ च एतां ६ सः तस्मिन्- तामें स्थित और प्रमाणांतरसे जाननेके एव:- लीयते कि । अयोग्य होनेसे सद्रूप और स्पष्ट प्रतीत न शब्दास्पर्शश्वरूपंचरसोगंधश्चतद्गुणाः ।। 4 रसः १ गंधः १ च तद्गुणा: ११ यस्मा- योजना-दः स्पर्शः रुपं रसः चपन:
(५०२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । गंधःइमे तद्गुणाः ज्ञेयाः एषां मध्ये यःयस्मात् ता०भा०-मानस आदि तीन प्रकारके निसृतः सः तस्मिन् एव लीयते ।। कर्मके विपाकसे ईश्वर हुआभी वह ता. भा०उन आकाश आदि पांच भू- आत्मा जिसप्रकार आत्माको रचता है वह तोंके एक २की वृद्धिसे शब्द स्पर्श रूप प्रकार आपको कहा और सत्व आदि गु- रस गंध ये पांच गुण जानने-इन पूर्वोक्त | णभी उसकेही कहै और रजोगुण तमोगुणसे बुद्धि आदि विकारोंके मध्यमें जो जिससे आविष्ट (युक्त) वह इससंसारके विर्षे च- उत्पन्न हुआ है वह उसी प्रकृति आदिमें प्र-क्रके समान भ्रमता है यहभी कहा और लयके समय सूक्ष्म रूपसे लीन होजाताहै- वही अनादि परम पुरुष शरीरके ग्रहण कर- ॥ १८०॥ नेसे आदिमान और कुब्ज वामन आदि यथारमानसृजत्यात्मातथावाकथितीमया । विकारोंसहित और स्थूल आकारके परि- विपाकान्त्रिप्रकाराणांकर्मणामीश्वरोपिसन् माणसे लिंग और इंद्रियोंसे ग्रहण करने योग्य कहा ॥ १८१ ।। १८२ ॥१८३ ॥ पद-यथाs-आत्मानं २ सृजति कि- पिठ्यानोजवीध्याश्वयदगस्त्यस्यचान्तरम् आत्मा १ तथा:-वः ६ कथितः १ मया ३ विपाकात् ५ त्रिप्रकाराणाम् ६ कर्मणाम् ६ तेनानिहोत्रिणोयांतिस्वर्गकामादिवंप्रति ॥ ईश्वरः १ अपि- सन.१॥ पद-पित्यानः१ अजवीय्याः६ च-यत् १ सत्त्वरजस्तमश्चैवगुणास्तस्यैवकीर्तिताः । अगस्त्यस्य ६ च-अतरं १ तेन ३ अग्नि होत्रिणः ६ यान्ति क्रि-स्वर्गकामाः १ दिवर रजस्तमोन्यामाविष्टश्चक्रवद्राम्यतेह्यसौ । प्रतिः-॥ पद-सत्त्वं १ रजः १ तमः १ चा-एव: योजना-अजवीय्याः चपुनः अगस्त्यस्य गुणाः १ एव-भीर्तिताः १ रजस्तमोभ्यां ३ यत् अंतरं असो पितृयानः तेन स्वर्गकामाः आविष्टः १ चक्रवता- भ्राम्यते क्रि-हि- अग्निहोत्रिणः दिवंप्रति यान्ति ॥ असा १॥ ता. भा०-अनवीथी ( देवमार्ग ) भार अनादिरादिमांश्चैयसप्वपुरुषःपरः । अगस्त्यमुनि इनका जो मध्य उसे पितृयान लिंगोंद्रियग्राह्यरूप:सविकारउदाहतः ॥ कहते है स्वर्गकी कामनावाले अग्निहोत्री उस मार्गसे स्वर्गमें प्राप्त होते है ॥ १८४ ॥ पद-अनादिः १आदिमान १ चम्-एव:- येचदानपरा:सम्यगष्टाभिश्चगुणैर्युताः ॥ सः १ एव-पुरुषः १ पर लिंगद्रियग्राहा- रुपः १ सविकारः १ उदाहतः १॥ तेपितेनवमार्गेणसत्यव्रतपरापमा १८५।। योजना-आत्मा शिमकाराणां कर्मणा पद-ये १ चा-दानपराः १ सम्यरह २ विपाकात् ईभरोपिसन् यथा आत्मानं मृगति भष्टाभिः३च:- गुणैः३ युताः १ ते १ अपि तया मया यः युन्माकं कथितः चपुनः सत्यं तेन ३ एव:- मार्गणः सत्यमतपरायणाः॥ रमः समः गुणाः तस्य एप कीर्तिताः रग योजना-सम्पफ दानपराः पुनः भ- स्तमोम माविष्टः सन् भसा मक्रवत् शामिः गुणः युताः पुनः सत्पमतपरायणाः भ्राम्यते सपा परः पुरुषः अनादिः आदि-तपिसेन एव मार्गेज दियं यान्ति। मान लिंगदियमानगपासधिकारः उदाहतः।। ता. मा०-जो मनुष्य दंभको रफर प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्ममकरण १ (५०३) दान आदि स्मार्त कर्ममें तसर हैं और गौ योजना-तावन्तः एव सर्वारंभविवर्जिताः तम आदि मुनियोंके कहे हुए इने दया | मुनयः सप्तर्षिनागवीथ्यन्तः . देवलोकंस- क्षमा अनसूया शौच अनायास मंगल माश्रिताः सन्ति तपसा ब्रह्मचर्येण संगत्या: अकार्पण्य अस्पृहा आठ आत्माके गुणोंसे गेन मेधया युक्ताः तन्न गत्वा यावत् आभूत- युक्त है और जो सत्य वचनमें रत है वेभी संप्लवं तावत् अवतिष्ठते ॥ उसी पिठ्यानसे स्वर्गमें प्राप्त होते है॥१८५॥ ता. भा०-सप्तमपि और नागवीथी तबाटाशीत्तिसाइसमुनयोगृहमेधिनः ॥ (ऐरावतमार्ग ) इनके मध्यमें उतनेही अ- पुनरावर्तिनोवीजभूताधर्मप्रवर्तकाः १८६॥ भसी सहस्र मुनि सब आरंभोंसे रहित के- वल ज्ञानमें तत्सर तप ब्रह्मचर्य और संगका पद-तत्र-अष्टाशीतिसाहस्रमुनयः २ प्रहमेधिनः १ पुनरावर्तिनः १ बीजभूताः १ | वाले वहां जाकर तब तक टिकते है जनतक त्याग और बुद्धिसे युक्त देवलोकमें रहने- धर्मप्रवर्तकाः १॥ सब भूतोंका प्रलय होय और वहां बैठे हुए योजना-अमेधिनः पुनरावर्तिनः बीज- आध्यात्मिक आदि धर्माका सृष्टिके आदिमें भूताः धर्मप्रवर्तकाः तत्र अष्टाशीतिसाह- | उपदेश करते हैं ॥ १८७ ॥ १८ ॥ समुनयः सन्ति । ता० भा०-उस पित्यानमें अठासी सहस्र यतोवेदाःपुराणानिविद्योपनिपद- मुनि गृहस्थी और पुनः आवृत्ति धर्मवाले स्तथा । श्लोकाःसूत्राणिभाप्या- ओर स्वर्गकी आदिमें वेदका उपदेशक णियच्चकिंचनवाङ्मयम् ॥ १८९॥ हॉनेसे वेदरूप धूक्षके बीजरूप हुए अग्निहोत्र पद-पत्ता:- वेदाः १ पुराणानि १ विद्यार आदिके प्रवर्तक हैं-इससे नमित्तिक प्रल- उपनिषदः १ तथा श्लोकाः १ सूत्राणि १ यके समयमें सब अध्यापकोंका प्रलय हो- भाष्याणिश्यतरचा किंचन:- वाड्मयम् १ ॥ नेसे अग्निहोत्र आदि काँका प्रचार कसे योजना यतः वेदाः पुराणानि विद्या होगा यह दोष नहीं ।। १८६॥ उपनिषदः तथा श्लोकाः सूत्राणि-भाप्याणि सप्तर्षिनागवीभ्यन्तर्देवलोकं समाश्रिताः ॥ चपुनः यत्किंचन वाङ्मय प्रवृत्तम् ।। तावंतएवमुनपासारभविवर्जिताः॥१८॥ तात्पर्य-उप्सी दोप्रकारके मुनियों के पद-सप्तर्षिनागवीप्यन्तः:- देवलोकं २स- समूहसे चारोंवेद-पुराण-अंगविद्या और उ- माश्रिताः १ तावन्तः १ एव:- मुनयःरसर्वा- पनिषद-नित्यभूतभी ये पठन पाठनको पर- रंभविवर्जिताः १॥ म्परासे प्रवृतहुए-तिसीप्रकार इतिहासरूपी तपसाब्रह्मचर्यणसंगरपागेनमेधया । श्लोक-शब्दशास्त्र और मीमांसाके सूत्र-और तत्रगत्वावतिष्ठतेयाबदाभूतसंप्लवम्।।१९८॥ | सूत्रोंको व्याख्यारूप भाय और जो भा- पद-तपसा ३ ब्रह्मचर्येण ३ संगत्यागेन ३ | युवेद आदि वाङ्मय ( शास्त्र) है वहभी मेधया ३ तमा-गत्वा अवतिष्ठते क्रि- उनसेही प्रवृत्त हुआ ऐसे वे मुनिधर्मके प्रय, यावत:- आभूतसंप्लवम् १ ॥ या क्षान्तिानमूगा शौचमनापामी मगल दोष नदी- मकामना। तक है-इस गतिसे वेदको अनित्यताका भावार्ष-उनसदी वेद-पुराण-विद्या-उप- (५०४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । है निषद-लोक-सूत्र-भाष्य-और संपूर्ण वान प्रमाणरूप वेद है तिप्तसे वेदोक्त मार्गके य शास्त्र प्रवृत्त हुअ॥ १८९॥ द्वारा वह परमेश्वर संपूर्ण आश्रमवालोंको वेदानुवचनंयज्ञोब्रह्मचर्यंतपोदमः । नानाप्रकारसे जानने योग्य है-उसी प्रकार- मद्धोपवासःस्वातंत्र्यमात्मनोज्ञानहेतवः ॥ को दिखातेहैं द्विजातियोंको द्रष्टव्य अर्थात् प्रत्यक्ष करने योग्य है उप्तमें उपाय पद-वेदानुवचनं १ यज्ञः १ ब्रह्मचर्य १ दिखाते हैं कि श्रोतव्य और मंतव्य है अ- तपः १ दमः १ श्रद्धा १ उपवासः १ स्वात- र्थात् प्रथम वेदान्तके श्रवणसे निर्णय करने व्यम् १ आत्मनः ६ ज्ञानहेतवः १॥ योग्य है और फिर युक्तियोंसे विचार करने योजना-वेदानुवचन-यज्ञः ब्रह्मचर्य तपः योग्य है इस प्रकार करनेसे यह आत्मा ध्या- दमः श्रद्धा उपवासः स्वातन्त्र्यं एते आत्मनः | नसे प्रत्यक्ष होता है जो द्विजाति अत्यंत ज्ञानहेतवः सन्ति- श्रद्धासे युक्त होकर निर्जन देशमें बैठेहुए तात्पर्य भावार्य-वेदपाठ-यज्ञ-ब्रह्मचर्य- पूर्वोक्त मार्गसे इस परमार्थभूत सत्य आ- तप-दम-श्रद्धा-उपवास-स्वातंत्र्यये अन्त:-त्माको उपासना करते हैं ते आत्माको प्राप्त करणको शुद्धिके द्वारा आत्माके ज्ञानमें हेतु होते हैं । है ॥ १९ ॥ भावार्य-सव आश्रमवाले द्विजातियोंको सह्याश्रमैर्विजिज्ञास्यःसमस्तैरेवमेवतु । वह आत्मा जानने और देखने और सुनने, द्रष्टव्यस्त्वयमंतव्यःश्रोतव्यश्चद्विजातिभिः योग्य हैं-जो द्विज वनमें बैठे और उत्तम श्र- पद-सः-हि-आश्रमः ३ विजिज्ञास्यः१ करते है-वे आत्माको प्राप्त होते हैं१९१ १९२ द्धासे युक्तहुए इस सत्य आत्माकी उपासना . समस्तः ३ एवं:-एवा-तु-द्रष्टव्यः १ तु:- अया-मन्तव्यः १ श्रोतव्यः १ च द्विजा- क्रमात्तेसंभवत्यचिरहःशुलंतयोत्तरम् ।। अपनंदेवलोकंचसवितारंसवैद्युतम् १९३॥ यएनमेवंविदंतियेचारण्यकमाश्रिताः। पद-क्रमात् ५ ते १ संभवन्ति क्रि-अ- उपासतेद्विजाःसत्यं श्रद्धयापरयायुताः ॥ चिः २ अहः २ शुई २ तथा:-उत्तरम् २ भयनं २ देवलोकं २ चा-सवितार २ स- पद-ये १ एनं २ एवंड-विंदन्तिक्रि-ये १ वैद्युतम् २॥ चा-आरण्यकम् २ आश्रिताः १ उपासते. कि-द्विगाः १ सत्यं २ श्रद्धया ३ परया ३ ततस्तान्पुरुषोभ्येत्यमानसोबझौकिकान् युताः १॥ करोतिपुनरावृत्तिस्तेपामिहनपिद्यते१९४॥ योजना-हि भतः सः समस्तः आश्रमः पद-ततः तान् २ पुरुषः १ अभ्येत्य:- द्विमातिभिः विभिज्ञास्यः द्रष्टव्यः तुपुनः । मानसः १ ब्रालाकिकान् २ करोति प्रि- मन्तव्यः श्रोतव्यः-पे द्विजातयः एवं मा- पुनः-भागृतिः तपां६६६-न-विद्यते मिन।। रमान परया अदया युताः चपुनः ये मार योजना-ते विदितारमानः अधि: भदः प्पक आमिताः टपासत ते एन सस्य तथा तराई अपनं दे पुनः धंदन्ति । सरगुतं सविताएं कमात् माग अधिः-मा- तात्पर्याप-गिससे नित्य दानेसे भारमॉम' दिसंभपन्ति-ततः मानसः पुरुषः सान् भ- तिभिः ३ ॥
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्मप्रकरण : (५०५) भ्येत्य ब्रह्मलौकिकान् करोति-इह तेषां आ- | पतंगः १ वाई-भवेत् क्रि- कोटः१ अथवा - वृत्तिः पुनः न विद्यते- कृमिः १ तात्पर्य चे विजितात्मा अग्नि आदि योजना ये नराः यज्ञेन तपसा दानः अभिमानी देवताओंके स्थान जो मुक्ति के स्वर्गजितः संति ते धूम निशां कृष्णपक्षं मार्ग हैं उनमें विश्राम करके परमपदको | चपुनः दक्षिणायनं पितृलोकं चंद्रमसं-वायु प्राप्त होते है-अर्थात् अग्नि-दिन-शुक्ल | वृष्टिं जलं मही क्रमात प्राप्य इह संभवंति पक्ष-उत्तरायण-देवलोक-सूर्य-वैद्युत (तेज) चपुनः पुनः एव ग्रजति-यःआत्मवान् एतत् इनमें क्रमसे जाकर ब्रह्मलोकमें प्राप्त होते मार्गद्वितयं न विजानाति सः दंदशकः वा हैं कि फिर अग्नि आदिके स्थानोमें प्राप्त | पतंगः कीटः अथवा कृमिः भवेत् ॥ हुए उनको मानस पुरुष आकर ब्रह्मलोकके तात्प भावार्थ-जो मनुष्य शास्त्रोक्त यज्ञ वासी करता है-इस संसार में उनकी आवृत्ति दान तपसे स्वर्गफलको भोगते हैं वे क्रमसे (जन्म) नही होता-किंतु प्राकृतप्रलयके धूम रात्रि कृष्णपक्ष दक्षिणायन पिलोक समय लिंगशरीरको छोडकर परमात्मामें और चंद्र लोकको प्राप्त होकर-फिर वायु एक हो जाते है। वृष्टि जल भूमिको प्राप्त होकर अर्थात् बीहि भावार्थ-फिर वे क्रमसे अग्नि-दिन-शुक्ल- आदि अन्य रूपसे शुक होकर इसलोकमें पक्ष-उतरायण देवलोक-सूर्य-और तेजरू- संसारी होते हैं और पुनःस्वर्ग आदिमें जाते हैं प हो जाते हैं फिर मानस पुरुष उसको | जो आत्मज्ञानी इन दो मागाको नही जानता आनकर ब्रह्मलोकमें पहुंचताहे फिर उनका अर्थात् दोनों मागाके हेतु धर्मको नहीं इस लोकमें जन्म नहीं होता ॥१९३॥१९४॥ करता वह सर्प पतंग (पक्षी) कृमि वा यक्षेनतपसादानैहिस्वर्गजितीनराः ।। कीट होता है ॥ १९५ ॥ १९६ ॥ १९७ ।। धूमनिशांकृष्णपसंदक्षिणायनमेवच १९५॥ उरुस्योत्तानचरणः सत्येन्यस्योत्तरंकरम्।। पद-यज्ञेन ३ तपसा ३ दानः३ ये १४- उत्तानकिंचिदुन्नाम्पमुसंविष्टभ्यचोरसा ।। स्वर्गजितः १ नराः१ धूम २ निशां २ कृष्ण- पद-उरुस्थोत्तानचरणः १ सव्ये ७ पक्षं २ दक्षिणायनं २ एकऽ चा-।। न्यस्या-उत्तरं २ का २ उत्तानं २ किंचित- पितृलोकचंद्रमसंवावृष्टिंनलमहीम् ॥ उन्नाम्या- मुखं २ विष्टभ्या चा- उरसा ३ ॥ क्रमानेसंभयंतीहपुनरेवनजतिच ॥१९६॥ निमीलिताक्षःसत्त्वस्योदंदैतानसंस्पृशन् । पद-पितृलोकर चंद्रमसंर वायुं वृष्टि २ तालुस्याचलजिहश्चसंवृतास्पासुनिश्चल जलम् २ महीम् २ क्रमात् ५ ते १ संभवं पद-निमीलिताक्षः १ सत्त्वस्थः १ दतैः३ ति कि-इ-पुना-एवम् प्रति क्रि-चा-॥ दंतान २ असंस्पृशन् १ तालुस्थाचल- पतयौनविजानातिमादितयमात्मवान् ॥ जिह्वः १ संवृतास्यः १ सुनिश्चलः १ ॥ दंदशक:पतंगोवाभवेत्कीटोपवामिः१९७सन्निरुपद्रियग्रामनातिनीचोच्छितासनः । पद एतत् २ यः १ न’- विजानाति कि- द्विगुणत्रिगुणवापिमाणायाममुपक्रमेत् ॥ मागद्वितपम् २ आत्मवान् । ददसूकः १ पद-संनिरुध्या-इंदियनाम २ नातिनीचो- (५०६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । च्छ्रितासनः१ द्विगुणं २ त्रिगुणर वाऽ- अपि- है अर्थात् उसका ध्यान करें और उस प्राणायाम २ उपक्रमेत् क्रि- हृदयमें मनसे आत्माको धारे अर्थात् धार- ततोध्येयःस्थितोयोसौहृदयेदीपवत्प्रभुः । णासें आत्मामें मन लगाव-धारणाका स्वरूप धारयेत्तप्रचात्मानंधारणांधारयन्बुधः ॥ यह है कि जानुके ऊपर करके अग्रभागको भ्रमा कर छोटिका (चुटिया) के टकी देने- पद-ततःऽ ध्येयः१ स्थितः१ यःअसो१ का जो समय उसे मात्रा कहते हैं उन पंद्रह हृदये७ दीपवत्-प्रभुःरधारयेत् क्रि-तत्र- मात्राओंसे जो प्राणायाम वह अधम तीस चा आत्मानं २ धारणां २ धारयन् १ वुधः? | मानाओंसे मध्यम-पैतालीस मात्राओंसे उत्तम होता है-इस प्रकार तीनप्राणायामोंकी एक योजना-उरुस्थोत्तानचरणः सव्ये उत्तानं धारणा होती है उन तीन धारणाओंको योग उत्तरं करं न्यस्य-मुखं किंचित् उन्नाम्य कहते हैं और उनही तीन धारणाओंको चपुनः उरसा विष्टभ्य निमीलिताक्षःसत्त्वस्थः धारण कर-सोई अन्ययोगोंके ग्रंथोंमें कहाई- देतेः दंतान् अस्पृशन् तालुस्थाचलजिह्वः | कि कराग्रसें जानुमंडलको प्रदक्षिणाकर संवृतास्यः सुनिश्चलः नातिनीचोच्छ्रितासनः छोटिका (चुटकी) दे वह काल एक पुरुषः इंद्रियग्राम सनिरुद्धय-द्विगुणं वा त्रिगुणं मात्रा कहाती है पंद्रह मात्रा ऑसे अधम अपि प्राणायाम उपक्रमेत ततः यः असौ प्रभुः प्राणायाम कहा है इससे दूना मध्यम और हृदये दीपवत् स्थितः सः ध्येयः च पुनः तिगुना श्रेष्ठ कहा है-तीन-तीन प्राणायामोंसे धारणां धारयन् बुधः तत्र आत्मानं धारयेत् | एक र धारणा और तीन धारणाओंको योग तात्पर्यार्थ-ऊरूओपर स्थित हैं उत्तान | कहते हैं अर्थात् उन पूर्वोक्त . धारणाओं चरण जिसके अर्थात् पद्मासन बांधकर | योग सिद्ध होता है । और उत्तान (सीधे) वाम हाथपर सीधा दक्षिण हाथ रखकर और मुखको और सीधे वाम हाथ पर सीधे दक्षिणहा- भावार्थ-ऊरूपर सीधेचरणको, रखें यत्किंचित् उठाकर और उर (छाती) से थको रक्खै-और मुखको किंचित् उठा- थामकर मिचे हैं नेत्र जिसके सत्व गुणमें कर और छातीसे थामकर-नेत्रोंकोभी स्थित अर्थात् काम क्रोध आदिसे रहित मीचकर और काम क्रोधसे रहित और दां- और दांतोंसे दांतोंका स्पर्श न करता हुआ तोसे दांतोंका स्पर्श न करता हुआ तालुपर और तालुपरस्थित है निश्चल जिह्वा जिसकी जिहाको लगाकर मुखको मीचकर और संवृत (बुचा ) है मुख जिसका और भली | भली प्रकार निश्चल और इंद्रियोंको विषयोंसे प्रकार निश्चल अर्थात् कंपरहित-और न रोककर और नहीं है अत्यन्त नीचा वाऊंचा अत्यंत नीचा और न अत्यंत ऊंचा है आसन जिसका ऐसा.पुरुष दुगुने वा तिगुने आसन जिसका ऐसा चित्तके विक्षेपसे रहित प्राणायामका अभ्यास करे फिर जो यह प्रमु पुरुष-इंद्रियोंके समूहको विषयोंसे रोक कर दुगुने वा तिगुने प्राणायामके. अभ्यासका संभ्रम्य छोटिकां दद्यात्करानं जानुमडले । प्रारंभ करे-फिर प्राणरूप पवनको वशमें मात्राभिः पंचदशभिः प्राणायामोऽघमः स्मृतः ॥ मध्य- होनेसे जो प्रभु हृदयके विष दीपकके समान ) मो द्विगुणः प्रोक्तत्रिगुणो धारणा तया । त्रिभित्रीभ- प्रकाशरूप स्थित है वह ध्यान करने योग्य | स्मृतकका ताभियोगस्तथैव च । .
प्रायश्चित्ताध्याय यतिधर्ममकरण ४ (५०७) हृदयमें दपिकके समानास्थितहै उसकाध्या भावार्थ-अंतर्धान (छिपना) स्मृति को न करें और उसीमें मनको धारणा करताहुआ। मलता दृष्टि दूरसे श्रवण और अपने शरीरको बुद्धिमान मनुष्य धारे॥१९९॥२००॥२०१॥ | छोडकर परायी कायामें प्रवेश इच्छाके अ-- अंतर्धानंस्मृतिःकांतिदृष्टिःश्रोत्रज्ञतातथा ॥ नुसार पदार्थोकी रचना ये योग सिद्धिके. निर्जशरीरमुत्सृज्यपरकायप्रवेशनम् २०२ लक्षण हैं योगके सिद्ध होनेपर जो योगी देह पद-अंतर्धानं १ स्मृतिः १ कांतिः १ को त्यागता है वह मोक्षको प्राप्त होता है दृष्टिः१ श्रोत्रज्ञता तथा निजशरीरं २उ- ( ॥ २०२ ॥ २०३ ॥ त्सृज्य:-परकायप्रवेशनम् १ अथवाप्यभ्यसन्वेदंन्यस्तकर्मावनेवसन् ॥ . अर्थानांछंदतःसृष्टियोगसिद्धहिलक्षणम् । अयाचिताशीमितभुग्परांसिद्धिमवाप्नुयात सिद्धयोगेत्यजन्देहममृतत्वायकल्पते ॥ पद-अथवाऽ-अपि-अभ्यसन् १ वेदंश्न्य-- पद-अर्थानां ६ छंदतः-सृष्टिः१ योगास-स्तकर्मा १ वने ७ वसन् १ अयाचिताशी १ इ.६ हि:- लक्षणम् १ सिद्धे योगे त्यज- मितभुक् १ परां सिद्धिं २ अवानुयात् क्रि-॥ न १ देई २ अमृतत्वाय ४ कल्पते क्रि-॥ योजना-अथवा न्यस्तकर्मा वेदं अपि योजना-अंतर्धानंस्मृतिः कांतिः दृष्टिः अभ्यसन वने वसन् अयाचिताशी मित- तथा ओवज्ञता निजं शरीरं उत्सृज्य परकाय भुक् पुरुषः परां सिद्धिं अवामुयात् ॥ प्रवेशनम् अर्थानां छंदतः सृष्टिः एतत् योग तात्पर्यार्थभावार्थ-अथवा कामनाओंको सिद्धेः लक्षणं भवति योगे सिद्ध सति देह त्यागकर एकान्त वनमें वप्तताहुआ और त्यजन् सन् अमृतत्वाय कल्पते मुक्ती भवती विना याचनासे मिले प्रमित (थोडा ) अन्न- के भक्षण करनेसे शुद्धहै अंत:करण जिस- तात्पर्यार्थ-अब धारणारूप योगाभ्यासके | का ऐसा योगी आत्माकी उपासनासे मुक्ति-- प्रयोजनको कहते हैं कि अणिमा रूप सिद्धि-रूप परम सिद्धिको प्राप्तहोता है ।। २०४॥ की प्राप्तिसे अन्य मनुष्योंको जो न दीखना न्यायागतधनस्तत्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिमियः।। उसे अंतर्धान (छिपना ) कहते है वह अं- श्राद्धकृत्सत्यवादीचगृहस्थोपिहिमुच्यते ।। तर्धान और अतींद्रिय (जानने अयोग्य) पद-न्यायागतधनः १ तत्त्वज्ञाननिष्ठः १ भी विषयोंका मनुष्य आदिके समान स्मरण- अतिथिप्रियः १ श्राद्धकृत् १ सत्यवादी १ कांति (कोमलता) भूत और भविष्यत् च-गृहस्थः १ अपि-मुच्यते अर्थीको देखना और अत्यन्त दूरभी देशमें तात्पर्य भावार्थ-श्रेष्ठप्रतिग्रह आदिसे होनेवाले अर्थात् जहां श्रोत्र इंद्रिय न पहुंच कियाई धनसंचय जिसने तत्त्वज्ञान में है निष्ठा सकै ऐसे शब्दोंका ज्ञान अपने शरीरको जिसकी अतिथियोंकी पूजामें तत्पर और त्यागकर परायी कायामें प्रवेश अपनी वांच्छा- | नित्य नैमित्तिक श्राद्धोंका का और सत्य- के अनुसार साधनोंके विनाही पदार्थोकी वादी ऐसा गृहस्थीभी जिससे मुक्तिको प्राप्त रचना ये योगसिद्धिके लक्षण होते हैं कुछ | होताहै तिससे केवल संन्यासका ग्रहणही येही योगसिद्धिके प्रयोजन नही किंतु योग- मुक्तिका साधन नही ॥२०५॥ सिद्धिके अनंतर जो देहको त्यागताहे वह ब्रह्मको प्राप्त होता है। इति अध्यात्मप्रकरणम् ॥ ४ ॥ त्यर्थः।
(५०८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । अथ प्रायश्चित्तप्रकरणम् ५ भावार्थ-महापातकी महापातकसे पैदा हुये घोर औरदारुण नरकोंको प्राप्त होकरकर्मके महापातकजान्धोरानरकान्प्राप्यदारुणान्। | क्षय होनेपर इस संसारमें जन्म लेते हैं।२०६।। कर्मक्षयात्मजायंतेमहापातकिनस्त्विह२०६ मृगन्धसूकरोष्ट्राणांब्रह्मदायोनिमृच्छति ॥ पद-महापातकजान् २ घोरान् २ नरका- खरपुल्कसवेनानांसुरापोनात्रसंशयः २०७ न२ प्राप्या-दारुणानु२ कर्मक्षयात्५ प्रजायते क्रि- महापातकिनः १ तुः-इहा- ।। पद-मृगाश्वसूकरोष्ट्राणाम् ६ ब्रह्महा १ योनि योजना-महापातकजान पोरान् दारुणान् २ ऋच्छति कि- खरपुल्कसवेना- नरकान प्राप्य कर्मक्षयात महापातकिनः इह नाम् ६ सुरापः १ न:-अनऽ-संशयः १ ॥ प्रजायंते (उत्पद्यन्ते) कृमिकीटपतंगत्वस्वर्णहारीसमामुयात् ।। तात्पर्याय-वर्ण और आश्रमोंके संपूर्ण तृणगुल्मलतात्वंचक्रमशोगुरुतल्पगः२०८ धर्मीको हमारे प्रति कही इस वचनमें पद-कृमिकीटपतंगत्वं २ स्वर्णहारी १ प्रतिपादन ( कथन ) करनेके लिये प्रतिज्ञा | समाप्नुयात् क्रि- तृणगुल्मलतात्वं २ च:- किये छः प्रकारके धर्मसे पांच प्रकारके ध- क्रमशःऽ- गुरुतल्पगः १॥ मको कहकर अव शेष रहे नेमित्तिक धर्मके समूह (प्रायश्चित्त ) का प्रारंभ करते हुये योजना-ब्रह्महा मृगाश्वसूकरोष्ट्राणां- पहिले उसकी रुचिके और अधिकारियाँक सुरापः १ खरपुल्कसवेनानां योनि ऋच्छति दिखानेके लिये अर्थवादरूप कर्मविपाक | अत्र संशयः न अस्ति-स्वर्णहारीकृमिकीट (कर्मीका फल ) को कहतेहैं कि- पतंगत्वं-चपुनः गुरुतल्पगः तृणगुल्मलतात्वं ब्रह्महत्या आदि पांचोंकी महापातक संज्ञा क्रमशः समामुयात् ॥ ब्रह्महामद्यपः इस वचनमें कहेंगे उसके कत्ती तात्पर्याय-ब्रह्महत्यारा मृग कुत्ता सूकर. को महापातकी कहते हैं वे महापातकसे | ऊंट इनकी योनियोंको अपने कर्मके शेषसे. पेदा हुये अपने २ पापोंके अनुसार तामिस्र प्राप्त होता है-मदिरा पिनेवाला-खर (गर्दभ) आदि घोर अर्थात् अत्यन्त तीव्र वेदना | पुल्कस (जो प्रतिलोमज निषादसे शूद्रीमें (दुःख ) के देनेसे भयंकर और दारुण अ- उत्पन्नहो)-वेन (जो वैदेहिकसे अंबष्ठीमें आंत केवल दुःखके स्थान नरकोंको प्राप्त उत्पन्नहो) इनकी योनिको प्राप्त होता है होकर कर्मके क्षयसे अर्थात् कर्मसे मिले इसमें संशय नहीं है-ब्राह्मणके सुवर्णका नरकोंको दुःख भोगके अनंतर कर्मशेषसे चोर-कृमि (जो सजातीयके संभोग विना फिर इस संसारमें अत्यन्त दुःखवाली कुत्ता | मांस विष्ठा गोमयमें उत्पन्नहीं) और उनसे सृगाल आदि योनियों में वारंवार जन्म लेतेहैं | कुछ बडे पक्षके अस्थियोंसे रहित पिपीलिका यहां महापातकीयोंका ग्रहण उपपातकियोंका आदि कीट-पतंग ( शलभ) इनकी योनि भी बोधकहै और उनकोभी तिरछीयोनिकी ओंको प्राप्त होता है और गुरुतल्पग (गु- प्राप्ति कहेंगे रुकी स्त्रीके संग भोग करनेवाला) काश आदि तृण-गुल्म और लता इनकी जातिकी .१ वर्णाश्रमतराणो नो हि धर्मानशेषतः। योनिको क्रमसे प्राप्त होता है-पहभी अज्ञा ।
अत्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५०९) । १ नसे कियेके विषय में समझना जानकर पूर्वोक्त सुरापः १ श्यावदन्तकः १ हेमहारी १ तु:- पाप करनेसे तो दुःख है बहुत जिनमें ऐसी कुनखी १ दुश्चर्मा १ गुरुतल्पगः १॥ अन्य योनियों मेंभी जन्मते हैं-सोई मनुने योयनसंवसत्येषांसतल्लिंगोभिजायते । (अ. १२ श्लो० ५५-५८) कहा है कि अन्नहर्तामयावीस्यान्मूकोवागपहारका ब्रह्मदत्याग-कुत्ता- सूकर-खर-ऊंट-गौ- अश्व-मृग-पक्षी-चंडाल-पुल्कस इनकी पद-यः १ येन ३ संवसति क्रि-एषां ६ योनिको प्राप्त होता है-और मदिरा पीने | सः १ तल्लिंगः १अभिजायते क्रि-अन्नहर्ता? वाला ब्राह्मण-कृमि-कीट-पतंग-और विष्ठा | आमयावीरस्यात् क्रि-मूकःरवागपहारकः॥ खाने वाले पक्षी-और हिंसा करने वाले | धान्यमिश्रोतिरिक्तांग:पिशुनःपूतिनासिका जीव-इनकी योनिको प्राप्त होता है और तैलहत्तैलपायीस्यात्पूतिवक्त्रस्तुसूचकः ।। चोर ब्राह्मण-लूता (अर्णनाभि) सर्प-सरट पद-धान्यमिश्रः १ अतिरिक्तांगः १ पि- (कृकलास ) और जलमें विचरने वाले तिरच्छी योनि-हिंसक और पिशाच इनकी शुनः१ तैलहृतः१ तेलपायी १ स्यात् क्रि-१ योनिको सहस्रों जन्मतक प्राप्त होते हैं और प्रतिवक्त्रः १ तु:-सूचकः १ ॥ गुरुकी शय्या पर गमनका कर्ता तृण गुल्म योजना-ब्रह्महा-क्षयरोगी-सुरापः श्याव- लता-और मांस भक्षक और दंष्टी (जो दन्तकः पुनः हेमहारी कुनखी चपुनः गुरु- दाडसे काटें) और क्रूर कर्म करने वाले इनकी तल्पगः दुश्चर्मा स्यात्-यः एषां मध्ये येन सैंकडों योनिको प्राप्त होता है। सह भवति सः तल्लिंगः अभिजायते अन्नही भावार्थ-मृग-कुत्ता-सुकर ऊंट इनकी आमयावी वागपहारकः मूकः स्यात् धान्य- योनिको ब्रह्महत्यारा-ओरे खर पुल्कस वेन मिश्रः अतिरिक्तांगः पिशुनः पूतिनासिकः इनकी योनिको मद्यप प्राप्त होता है इसमें तैलहतः तेलपायी तुपुनः सूचकः प्रतिवक्त्रः संशय नहीं कृमि कीट पतंग इनकी योनिको स्यात् ॥ सुवर्णका चोर और तृण गुल्मलता इनकी तात्पर्यार्थ- -अप तिर्यग् योनिके अनंतर योनिको गुरुकी शय्या पर गमनका | ब्रह्महत्यारे आदिके मनुष्यमें लक्षण कहते है कर्ता क्रमसे प्राप्त होता है ॥ २०७॥२०८॥ इस प्रकार रोख आदि नरकोंमें और श्वा- ब्रह्महाक्षयरोगीस्यात्सुरापःश्यावदंतकः ॥ सूकर-खर आदि योनियोमेदारुण दुःखभोगके हेमहारीतुकुनखीदुश्च गुरुतल्पगः २०९ आदि लक्षणोंसे युक्त अनेक मानवशरीराम अनंतर पापके शेषसे जन्मके समयही क्षयरोग पद-ब्रमहा १ क्षयरोगी १ स्यात् क्रि उत्पन्न होते हैं कि ब्रह्महत्याराक्षयरोगी अर्थात् 2 वमकरखरोष्ट्राणा गोवाजिमृगपक्षिणाम् ।घडा- राजयक्ष्मी होता है और निपिद्ध सुरापानका गुरुकसानां च ब्रह्मदा योनिच्छति । कामकोट- कर्ता स्वभावसे कृष्णदंत होताई ब्राह्मणक पतंगाना विभुजां चैव पक्षिणाम्।हिनाणा चैव सत्त्वानां सुवर्णका हर्ता निंदित नखवाला होता है मुरापो प्राह्मणो व्रजेत् । लूताहिसरटानां च तिरश्चों गुरुको स्त्रीका गामी दुश्चर्मा ( कुष्टी )हाताई चापुचारिणाम । हिसाणा च पिशाचानां स्तेनो विप्रः । इन ब्रह्महत्यारा आदिके मध्यमें जिसके सहनशः । तृणगुल्मलतानां च फ्रव्यादा दरिणामपि। संग जो मेल करताहे वहभी लसकही चिह्न प्रारकर्माता च तमो गुरुतल्पगः । वाला होता है और अन्नका चार आमयावी (५१०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । । . अजीर्णान्न ) होता है वागपहारक अर्थात् ता०भा०-पराईस्त्री और सुवर्णसे भिन्न विना आज्ञासे पढनेवाला वा पुस्तकोंका चोर ब्राह्मणके धनको हरकर अरण्य (वन) नि- मूक अर्थात् वाणी इन्द्रियसे रहित होता है | जल देशमे ब्रह्मराक्षस होता है ॥ २१२ ॥ धान्यमिश्र (पराये अन्नका मिलानेवाला) हीनजातीप्रजायतपरत्नापहारकः । के छः अंगुलि आदि अधिक अंग होता है पत्रशाकशिखीहत्वागंधाञ्छुच्छंदरीशुभावं और पिशुन जो विद्यमान पराए दोपोंको कहै उसकी नासिकामें दुर्गंध आती है पद-हीनजातौ प्रजायेतक्रि-परलापहा- तलका चौर तेलपीनेवाला कीट होता है | रकः १ पत्रशाकं २ शिखी १ हृत्वाऽ- गंधा- वृथा पराए दोपोंको कहनेवाले सूचकके मु- | न् २ छुच्छंदरी १ शुभान २- खमें दुर्गध आती है-यह भी तिर्यग् योनिके योजना-पररत्नापहारकःहीनजातो प्रजा- प्राप्तिके अनंतर जानना क्योंकि मर्नु (अ० १२ येत पत्रशाकं हत्वा शिखी भवति शुभान श्लो०६८) का यह वचन है कि जैसे तैसे गंधान हत्वा-छुच्छंदरी भवति- पराए द्रव्यको वलसे हरकर और विना ता०भा०-पराए रत्नोंका चौर सुनार वा होमको हविको भक्षण कर मनुष्य ति- पक्षीयोंकी योनिमें प्राप्त होता है सोई मर्नु रछी योनिको अवश्य प्राप्त होता है। (अ० १२ श्लो० ६१) ने कहा है कि म- भावार्थ-ब्रह्महा क्षयरोगी और मद्यप कृ-णि-मोती-मूंगा-इनको और अनेक रत्नों- प्णदंत होता है-सुवर्णका चौर कुनखी और को चुराकर सुनारोंमे जन्म लेता है पत्तोंके गुरुकी स्त्रीका गामी कुष्ठी होता है और इन शाकको हरकर मोर और श्रेष्ठ गंधोंको हर- ब्रह्महा आदिके मध्यमें जो जिसके साथ- कर चुछंदरी अर्थात् राजदुहिता नामकी वसे उसकाभी वही चिह्न होता है जो उस प- मूषिका होती है ॥ २१३ ।। तितका होता है, अन्नका चौर आमयावी और वाणीका चौर मूक होता है धान्य मि- मूषकोधान्यहारीस्याद्यानमुष्टःकपिःफलम् लाने वालेके अधिकअंग-और पिशुनकी | जलप्लव पयःकाकोगृहकारीापस्करम् ॥. नासिकामें दुर्गंध आती है-तेलका चौर ते- पद-मूषकः १ धान्यहारी १ स्यात् क्रि- ल पीनेवाला जीव होता है-और सूचकके यानं २ उष्ट्रः१ कपिः १ फलंर जलं २ प्लवः१ मुखमें दुर्गध आती है॥२०९॥२१०॥२११॥ पयः २ काकः १ गृहकारी १ हि:-उप- परस्ययोपितह्त्वाब्रह्मस्वमपहृत्यच ॥ स्करम् २॥ अरण्येनिर्जलेदेशेभवतिब्रह्मराक्षसः २१२ | मधुदंशःपलंगृध्रोगांगोधाग्रिंधकस्तथा । पद-परस्य ६ योषितं २ हृत्वाऽ-ब्रह्मस्व २ वित्रीवस्त्रंधारसंतुचीरीलवणहारकः २१५ अपहत्याचा-अरण्ये ७ निर्जले ७ देशे ७ भवति क्रि-ब्रह्मराक्षसः १ ।। पद-मधु २ दंशः १ पलं२ गृधः १ गार योजना-परस्य योषितं हत्वा च पुनः गोधा १ अग्निं २ वकः १ तथा:-वित्री ? ब्रह्मस्वं अपहत्य-अरण्ये निर्जले देशे ब्रह्म- वस्त्रं २ श्वा १ रसं २ तु:-चीरी १ लव- राक्षसो भवति- यदा सहा पदव्यमपहत्य पलामर । अवश्य मणिमुक्तावालानि हत्वा लोभेन मानाःवि- याति तिर्यक् जग्या चैवाहतं हविः । विधानि घरलानि ज्ञायते हमकतषु । णहारका १ ॥
प्रायश्चित्ताध्याय मायश्चित्तमकरण ५ (५११) योजना-धान्यहारी मूषकः स्यात् याने ति (गंजा) विष और अग्निके दाता उन्मत हत्वा उष्टा-फलं हत्वा कपिः जलं हत्वा प्लवः गुरुके प्रति हननेवाला अपस्मारी-गोहत्या- ‘पयः हृत्वा काकः उपस्कर हत्वा गृहकारी | रा अंधा-धर्मपत्नीको छोडकर अन्य स्त्रीका मधु हत्वा दंशः पलं हत्वा गृध्रः गां हत्वा । भोगी-शब्दभेदी- भगकाभक्षण करनेवाला गोधा तथा अनि हत्वा बकः वस्त्रं हत्वा कुंडाशी-देव ब्राह्मणके धनका चोर पाण्डु- श्विनी-तुपुनः रसं हत्वा श्वा लवणहारकः । रोगी-न्यास (धरोहर ) का चौर काणा- वीरीस्यात् ॥ स्त्रीके व्यापारसे जो जीवे वह पण्ड ( नपुं- ता. भा०-धान्यका चौर मूसा होता है | सक ) कुमार अवस्थामें स्त्रीका त्यागी-दुर्भा- थानको चुराकर ऊंट-फलको चुराकर वा-गी-स्वच्छ एक मनुष्यके घरका अन्न खाने- नर-जलको चुराकर जलमुरगा-दूधको चु- ( वाला-चातगुल्मी-अभक्ष्यका भक्षक गण्ड- राकर काक और उपस्कर ( मुसल आदि माली-ब्राह्मणीका गामी चीपरहित और गृहसामनी ) को चुपकर गृहकारी (चिडि- क्रूरकर्मका कता वामन-वस्त्रका चौर पक्षी-, या) मधुको चुराकर दंश-मांसको चुराकर शय्याका चौर क्षपणक-शंख और शुक्तिका गीध- गोको चुराकर गोधा-अग्निको चुराकर चोर कपाली-दीपककाचौर कौशिक-मित्रका बगला-वस्त्रको चुराकर श्वित्री (श्वेतकुष्ठी) द्रोही क्षयरोगी-मातापिताकी निंदा करनेवा- ईष आदिके रसको चुराकर कुत्ता लवणको ला-खण्डकार होता है-गौतमने भी कोई चुराकर चोरी (झाँझर) होता है २१४-२१५॥ | विशेष कहा है कि झूट बोलनेवाला उल्वल प्रदर्शनार्थमेतत्तुमयक्तिस्तयकर्माण (जिसकी चारंवार वाणी लग ) स्त्रीका त्यागी जलोदर-झूठासाक्षी श्लोपदी-जिसके द्रव्यप्रकाराहियथातथैवप्राणिजातयः ॥धा और चरण मोठे होजाय-विवाहमें पद-प्रदर्शनार्थ २ एतत् १ तु:-मया ३ / विघ्नकर्ता छिन्नोष्ठ अवगुरणी ( झिडकने- उक्तं १ स्तयकर्मणि ७ द्रव्यप्रकाराः १ हि- वाला ) के हाथ छिन्न होते हैं-माताका- यथा-तथा- एवर-माणिजातयः १- हंता अंधा-पुत्रवधूका गामी वातवृषण-चौरा योजना-एतत् मया स्तयकर्मणि प्रदर्श- हेमें विष्ठा और भूत्रका त्यागी मूत्रकच्छी- नार्थ उक्तं हि अतः यथा द्रव्यप्रकाराः भव- करनेवाला मच्छर-पिताके संग विवादी कन्याको दूषण लगानेवाला नपुंसक-ईयो न्ति तथा एवप्राणिजातयो भवन्ति । अपस्मारी-न्यासका चौर संतानहीन रत्नों- तात्पर्य-चोरीके कर्ममें मैंने ये फल का चोर अत्यंत दरिदी-विद्याका विक्रेता- प्रदर्शनार्थ कहे चुराने योग्य द्रव्यके भेद | मृग-वेदका विक्रेता-गडौं बहुतोको यज्ञक- जैसे २ है वसे वैसेही प्राणियोंके भेद होते है | चनेवाला जलमुर्गा-यज्ञके करनेके अयोग्यों- जैसे कांसीका चुराने वाला हंस होता है की यज्ञकपनेवाला वपह- विनानिमंत्रण अथवा जिस फलके साधन द्रव्यको चुराते हैं | भोजन करनेवाला काक-स्वच्छ एककाही उसी साधनसे रहित होता है अश्वके चुराने भोजन जो करे वह वानर-जहांतहां भोजनका चालर पंगु-शंखनें तो कहीं २ विशेष भी दि- कर्ता माार-तृण और वनको जलानेवाला खाया है कि ब्रह्महत्यारा कुष्ठो तेनका चौर खद्योत ( पटवीजना) स्त्रीका आचार्य मुखमें मण्डली-देव-और ब्राह्मणोंका निंदक खल-1 दुर्गध वाला-पर्युषित (वासी) भांनी कृमि ॥
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । विनादिए पदार्थको ग्रहण करनेवाला बैल- नहीं है क्योंकि घटके कारण जो चक्रचीवर मत्सरी ( पगई बढाईको न सहे) भ्रमर- आदि उनके नाशसे उनसे बने हुये घटका अग्निका नाशक-मण्डलकुष्ठी-शूद्रोंका आ- नाश नही होता और स्वाभाविक (जन्मसे. चार्य काक-गोका हर्ता सर्प-स्नेहका चौर हुये ) कुनख आदि फिर अच्छेनही हो क्षयरोगी-अन्नका चौर अजीर्णी- ज्ञानका सकते-और नरक और तिरछीयोनि आ- चौर मूक-चाण्डाली और पुल्कशीके गमनमें दिके दुखोंकी परंपराको भोगकर उसके अजगर-संन्यासिनीके गमनमें- मारवाडका कुनख आदि विकार चरमफल (अंत्यके पिशाच-शूद्रीके गमनमें दीर्घकीट-सुवर्णा- कार्य ) होते हैं वह उत्पन्न होतेही अपने स्त्रीके गमनमें दरिद्री-जलका चौर मत्स्य कारणरूप अपूर्वके नाशको पैदा कर देते हैं दूधका चौर बगला-वार्धषिक (व्याजलेने- | जैसे मथनसे पैदा हुई अग्नि अरणिको नष्ट वाला) अंगसे हीन-वेचनेके अयोग्योंको कर देती है-तिससे पापके नाशार्थ व्रतोंका वेचनेवाला गांध-राजाकी स्त्रीका गामी ) करना नहीं है और न उसके संग व्यवहार नपुंसक-राजाका निंदक गर्दभ-गोकागामी | के अर्थ है क्योंकि शिष्ट कुनखी आदिके मैडक-अनध्यायमें पढनेवाला भृगाल-परद्र- | संग संसर्गको त्याग देते हैं-पूर्व जन्मके व्यका चौर परायासेवक-मत्स्यकाहंता गर्भ क्षयरोगसे पापका नाश होनेपर सम्यक व्यव- वासी होताहे ये सब अनूवं गमन हैं अर्थात् हारभी सिद्धहो जायगा इससे व्रत करनेका इनकी उर्द्धगति नही होती-स्त्रीभी इन पूर्वो कोई प्रयोजन नही-जो वसिष्ठेने कहा है क्त पापोंके करनेसे पूर्वोक्त जातियोंमें स्त्रीयो कि कुनखी और कृष्णदंत द्वादशरात्रका निको प्राप्त होती हैं-सोई मर्नु (अ०१२ श्लो० | कृछ्र करें वे क्षामवत्य (दुर्वलता ) आदिके ६९)ने कहा है कि स्त्रीभी इसी प्रकार वस्तुओं- समान नैमित्तिक मात्र हैं पापके क्षय और को हरकर इगो जीवोंकी भार्या होती हैं और भली प्रकार व्यवहारके लिये नही यह मानने यहक्षयी आदि लक्षणोंका कहना-प्रायश्चित्त योग्य है ॥ आदि करनेको उद्यत जो ब्रह्महा आदि हैं भावार्थ-चोरीके कर्मके ये पूर्वोक्त फल उनको उद्वेगके लिये है कुछ क्षय आदिरोग | मेनें दिखानेके लिये कहे हैं क्योंकि जैसे २ वालोंको द्वादश वर्षके व्रतकी प्राप्तिके लिए चोरीके द्रव्योंके भेद होते हैं देसी २ ही और उनके संसर्गकी निवृत्तिके लिए नही | प्राणियोंकी जाति होती है ।। २१६ ॥ सोई दिखाते हैं कि प्रायश्चित्त पापक्षयके यथाकर्मफलंमाप्यतियक्त्वंकालपर्ययात् । लिए होता है प्रारब्धका फल पापका अपूर्व जायतेलक्षणभ्रष्टादरिद्राःपुरुषाधमाः२१५ जब नष्ट होचुका तो प्रायश्चित्त करनेका कुछ प्रयोजन नही क्योंकि धनुपसे छुटा पद-यथाकर्म:- फलं २ प्राप्य:- तिर्य- हुआ वाण लक्ष्यकें वीधने वा उसकी और क्त्वं २ कालपर्ययात् ५ जायते क्रि-लक्षण- उसके व्यापारकी सत्ताकी फिर अपेक्षा नही भ्रष्टाः १ दरिद्राः १ पुरुषाधमाः १ ॥ करता-और उसने आरंभ किये हुये फलों- योजना-यथाकर्म फलं तिर्यक्त्वं प्राप्य के नाशार्थभी अपूर्वका नाश टूटने योग्य कालपर्ययात् पुरुषाधमा: 1 वियोप्यतेन कल्पन हत्या दोयमवामुयुः। एते- दरिद्राः जायन्ते ॥ पामेव जन्तूनां भार्यात्यमुपयान्ति ताः। फुनरनी श्यादितश्च छळू दादारानं चौद । लक्षणभ्रष्टाः यश्चितं १ विशुद्धये ४ एवं:- अस्य ६ अंतःहुई हिंसा, उतने ही प्रवृत्ति होनस पिर प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तंप्रकरण ५ (५१३) " ॥ . ताप-भावार्थ-अपने किये पाप कर्मक विशुद्धये प्रायश्चित्तं कर्तव्यं एवं कृते सति अनुसार नरक आदि फल और तिरछी योनि । अस्य अंतरात्मा चपुनः लोकः प्रसीदति ॥ योंको प्राप्त होकर कालके क्रमसे कर्म क्षीण तात्पर्यार्थ-विहित कर्म अर्थात जो आ- होनेपर दुष्ट लक्षणी दरिदी पुरुषोंमें अधम वश्यक संध्योपासन अग्निहोन आदि नित्य (नीच ) होते हैं ॥ २१७ ॥ और अशुद्धके स्पर्शमें कद्दे हुये स्नान आदि ततोनिष्कल्मपीभूताःकुलेमहतिभोगिनः॥ नैमित्तिक, वे दोनो विहित (शास्त्रोक्त) कहा तेहै उनके न करनेसे और निदित (निपिन्ड) जायंसेविद्ययोपेताधनधान्यसमन्विताः सुरापान आदिके सेवनसे और विपयसि ई- पद-तत:- निष्कल्मषीभूताः १ कुले ७ द्रियोंकि न रोकनेसे नर पतन (नरक या महति भोगिनःरजायते क्रि-विद्यया३उपेताः दुःख )को प्राप्त होता है अर्थात् पापी हो- .१धनधान्यसमन्विताः१॥ जाता है कदाचित् काई शंका कर किसं- योजना-निष्कल्मषीभूताः विद्ययाउपेताः पूर्ण इंद्रियोंके विषयों में जानकर आसक्त न धनधान्यसमन्विताः महति कुले भोगिनः हो इस वेचनसे इंद्रियों में प्रसक्ति भी निषिद्ध जायते ॥ है इससे निंदित कइनसे पदभी भागाती- तात्प भावार्थ-फिर दुष्ट लक्षण मनुष्य इंद्रियांके अनिमहसे यह पृथक क्यों कहा जन्मके अनंतर निष्पाप होकर अर्थात् इसका समाधान कहते हैं क्योंकि इंद्रियों में नरक आदिके भोगसे क्षीण पाप हुये पूर्व प्रसंगका निषेध एकांतसे (निश्चयग नि- जन्मके शेषपुण्यसे महान् कुलमें-भोग षेध रूप नही क्योंकि यह नातक ताम विद्या और धनधान्यसे युक्त उत्पन्न पढा है और वहां यह अधिकार है कि इन होते हैं ॥ २१८ ॥ व्रतोंका धारण करें इससे पहा नाक एन. विहितस्याननुष्ठानानिंदितस्यचसेवनात् ॥ नेसे इंदियोंमें प्रशक्ति कानवाला - अनिग्रहाचेंद्रियाणांनरः पतनमृच्छति ॥ धान किया जाता है यह संकन्स नभय गप पद-विहितस्य ६ अननुष्ठानात् ५ निंदि- शंका करे कि विहितका न माना तस्य ६ - सेवनात् ५ अनिग्रहात् ५ च वायी (पापी ) होता है यह किमा निर इदियाणाम् ६ नरः१ पतनं २ ऋच्छति क्रि-॥ किया क्योंकि अग्निहाय मादिका नामो- तस्मात्तेनेहकर्तव्यप्रायश्चित्तविशुद्धये ॥ एवमस्यांतरात्माचलोकश्चैवप्रसीदति २२० अननुष्ठान (न करना )को प्रन्यवायका देत . होता है इससे पृथक, पदा काहाचित काद दना (विधि) हे थर पुरुषको प्रतिष्प बोधन नही करती विषय (कार्य) अनुष्ठान पद-तस्मात्५ तेन३ इहा कर्तव्यं प्रा- ( करने ) को पुरुषार्थ मात्र पांधन करती न करनको प्रत्ययायका दंग म कहगी क्योंकि क्षीण शक्ति दोन उसफामी बाध- पत्मा १ च-लोकः १ - एव:- प्रसी- दति कि-॥ योजना-विहितस्य अननुष्ठानात् चपुनः निंदितस्य सेवनात् चपुनः इंद्रियाणाम् अनि- प्रदाद नरः पतनं अच्छति तस्मात् तेन पह इंदिया गनु म प्रायन कामना २ मातीमानि पारगम्।
(५१४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित। न नही हो सकता-कदाचित् अनुपपत्तिके कि अग्निहोत्रके अधिकारकी असिद्धि रूप उपशम (न होना )मेंभी प्रवृत्तिको सिद्धिके | प्रत्यवायके अभिप्रायसे गति होगी इससे लिये अर्थान्तरकी कल्पना करोगे तो निषे- | कुछ दोष नही कदाचित् शंका करो कि वि. धके योग्य प्रत्यवायके निवारणार्थही उसके हितके न करने में प्रत्यवायके बोधक ये वर्जनेको पुरुषार्थ सिद्धिमेंभी अन्य फलकी | मनु ( अ० १२ श्लो० ७१-७२ )के वचन कल्पना की जायगी और यह किसीकोभी सं: कैसे घटेंगे कि अपने धर्मसे पतित ब्राह्मण मत नहीं है कदाचित् कोई शंका करे कि वांताशी उल्कामुख प्रेत होता है और क्षत्रिय जैसे निषिद्ध पदार्थोंमें अर्थवादसे जाने हुये अमेध्य कुणपाशी कटपूतन होता है और प्रत्यवायके निवारण रूपसेही पुरुषार्थत्व है | वैश्य पूयका भोक्ता मैत्राक्ष ज्योतिक प्रेत तसेही विहितों (शास्त्रोक्त ) मेंभी अर्थवा- होता है और अपने धर्मसे पतित शूद्र चेला- दसे जाने करनसे जन्मे प्रत्यवायको निवार- शक प्रेत होता है इसका समाधान कहते. कता क्यों न होजाय ऐसे मत कहो क्योंकि | है कि जैसे वमनको खानेवाले (वांताशी) सर्वत्र अग्निहोत्र आदिमें तैसे अर्थवाद नही | को उल्कासे दग्ध मुख होनेसे दुःख होता है कदाचित कहो विहितके न करनेसे म- | हे तैसे विहितके न करनेसे इसको होता है नुष्य पतित होता है यह स्मृतिही वाक्य इससे पुरुषके पुरुषार्थको असिद्धि होनेसे न शेषके स्थान में है अर्थात् अर्थवाद रुप है करनेकी निंदा करने में रुचिके लिये है इससे यह ठीक है परन्तु यहभी ठीक नहीं क्योंकि कुछ विरोध नही अथवा पूर्वजन्मके अन्य वाक्यसे बोधन किय कार्यमें वाक्यां- निषिद्ध आचरणसे अनुमान किया और वि- तरसे अर्थवाद नहीं होता अथवा कथंचित् | हितके करनेका विरोधि राग आलस्य आ- (किसी प्रकारसे ) एक वाक्यतासे अर्थ- | दिसे पैदा हुआ वांताशी और उल्कामुख वाद हो तोभी अभाव रूप विहितका न क-प्रेत होता है इससे कहीभी अभाव कारण रना कार्यातरके पैदा करानेको समर्थ नहीं नही यह मानने योग्य है कदाचित् शंका हो सकता कदाचित् शंका करोकि ज्वर | करोकि व्यभिचारिणीका गमन वानर पा और अतीसारमें लंघन परम औषध है इस | खरकी दृष्टि और मिथ्याभिशाप आदिमें आयुर्वेदके वचनसे भोजनका अभावरूप ] कोईभी विहितका न करना आदि नही तो लंघन जैसे ज्वर शांतिको करता है तसेही | प्रत्यवाय कसे घट सकता है और प्रत्यवा- यहांभी क्यों नहो ऐसे मत कहो जिससे | यके न होनेसे प्रायश्चित्त क्यों कहा ॥ यहांभी लंघनसे ज्वरकी शांति नहीं है किंतु इसका समाधान कहते हैं कि इसीसे पापके ज्वरके नाशका प्रतिबंधक जो भोजन उ-क्षयार्थ प्रायश्चित्तका निधान तिससे जन्मां- सका अभाव होनेपर गठयमिके परिपाक तमं किये निपिङ सेवा आदिसे पैदा हुए यश धातुओंकी साम्यतासे ज्वर शांत होता! पापके अपूर्व मिथ्या अभिशाप आदिका मा- है यह मानने योग्य है तिससे विदितके न |क्षेप होता है उसके निमित्त प्रायभित्तसे दूर करने से मनुष्य पतित होता है इस स्मृत्तिकी कसे गति होगी इसका समाधान कहते है मातारागुतामियम भमेणणारी क्षत्रियः परमः । मेवाक्ष- मिलाननुहानामाः पगारादि । रगतिको मरण भाति पुपमा। सारण गोतियोगस्पन परमारपम् । मानिस धमाका प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५२५) करने योग्य कर्म करने की कल्पना करते हैं सुननेसे प्रायश्चित्तकी आवश्यकता जानी 'पुरुषको प्रयलकी अपेक्षाकें बिना कार्यरूप जाती है कि इससे विशुद्धिके लिए नित्य पापकी उत्पत्ति नहीं हो सक्ती और व्यभि-प्रायश्चित्त करें क्यों कि जिनीने प्रायश्चित्त चारिणी आदिके प्रयत्नसे अन्यपुरुषमें पाप- नही किया वे निन्दित लक्षणोंसे युक्त संसार की उत्पत्ति नहीं हो सक्ती क्योंकि धर्म अ- में जन्मते हैं धर्म ये दोनों की समवायी होते हैं अर्थात् भावार्थ-शास्त्रोक्त न करनेसे और निन्दि- इनका फल कतीकोही होताहे तिससे पूर्वो-तके करनेसे और इंद्रियोंको विषयोंसे न क्त तीनों निमित्तोंकी प्रायश्चित्तमें पूर्वगणना रोकनेते नर पतित होताहे तिससे वह ज- युक्तहै सोई मनु (अ० ११ श्लो० ४४) ने गत्में विशुद्धिके लिए प्रायश्चित करें इसप्र- कहा है कि शास्त्रोक्तकर्मके न करने कार इसका आत्मा और जगत दोनों प्रसन्न और निन्दितके करने और इन्द्रियोंका वि- होते हैं ॥ २१९॥२२० ।। षयमें लगनेसे नर प्रायश्चित्त करने योग्य प्रायश्चित्तमकुर्वाणाःपापधुनिरतानराः ॥ होताहै इस वचनमें नरका ग्रहण प्रतिलोम- अपश्चात्तापिनः कष्टानरकान्यांतिदारुणान् जातियोंकोभी प्रायश्चित्तकी प्राप्तिकेलिए है क्योकि उनकोभी अहिंसा आदि साधारण पद-प्रायश्चित्तं २ अकुर्वाणाः १ पापेषु ७ धर्मका व्यतिक्रम (नकरना) हो सका है। निरताः१ नयः१ अपश्चाचापिनः१ कष्टान २ जिससे इस प्रकार निषिद्धाचरण आदिसे नरकान् २ यान्ति क्रि-दारुणान् २ प्रत्यवायो पाप होताह तिससे की है निषिद्ध योजना-प्रायश्चित्तं अकुर्वाणाः पापेषु नि- सेवा आदि जिसने ऐसा वह मनुष्य इसलोक | रताः अपश्चात्तापिनः नराः कष्टान् दारुणान् और परलोकके लिए प्रायश्चित्त करे यह नरकान् यान्ति प्रायश्चित्त शब्द पापक्षयके लिए नैमित्तिक तात्पर्यभावार्थ-शास्त्रोक्तके व्यतिक्रम कर्म विशेषमें रुदहे इसप्रकार प्रायश्चित्त क-1 से पैदा हुए पापोम प्रसक्त और पश्चाताप न रनेसे इस मनुष्यका अंतरात्माभी प्रसन्न हो- करते हुए अर्थात् मैं पाप किया इसप्रकार ताहे और जगतभी उसके संग व्यवहार । उद्वेगसे रहित और प्रायश्चित्त न करते हुए करने के लिए प्रसन्न होताहै. यह कहते हुए मनुष्य दुःसह नरकोंको प्राप्त होते हैं अर्थात् याज्ञवल्क्यने यह दिखाया कि यह प्रायश्चि- महान २ दुखोंको भोगते हैं ॥ २२१ ॥ ताधिकार नैमित्तिक है और उसमें अर्थवाद । तामित्रलोइशंकुंचमहानिरयशाल्मली ।। गत दुरितका क्षयभी जातेष्टिन्यायसे स्वीकार किया इससे पापके क्षयकी इच्छावालाही रौरवंकुमलंपूतिमृत्तिकंकालसूत्रकम् २२२. उसे करे इतनेसे कामाधिकारकी शंका न पद-तामिस्र २ लोहर्शकुं२ च महानिर- करनी जिससे इस मर्नु ( अ० ११ यशाल्मली२गैरवं २ कुटनल २ पूतिमृत्तिक २ श्लो० ५३ ) वचन में न करने में दोष कालसूत्रकं २ १ अकुर्वन् विहित कर्म निदित च समावान्। संघातलोहितादंचसविपसंप्रपातनम् ॥ ममुक्तयन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः । ३ चरितव्यमती नित्य प्रायश्चित्त विशुद्धये । नियहि महानरककाकोलंसंजीवनमहापर्य २२३ ।। लक्षणयुक्ता जायन्ते निष्कृत नसः। पद-संघातं २ लोहितोदं २ चा सविषं २ .
(५१६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद- संप्रपातनं २ महानरककाकोलं २ संजीवन- प्रायश्चित्तरपैत्येनोयदज्ञानकृतंभवेत् ॥ महापथम् २॥ कामतोव्यवहार्यस्तुवचनादिहजायते २२६ अवीचिमंधतामित्रंकुंभीपाकंतथैवच ॥ -प्रायश्चित्तेः ३ अपति कि-- एनः २ असिपत्रवनंचैवतापनंचैकविंशकम् २२४ ॥ | यत् १ अज्ञानकृतं १ भवेत् क्रि- कामतः:- व्यवहार्यः १ तु-वचनात् ५ इह-जायते क्रि पद-अवीचि २ अंधतामित्रं २कुंभीपाकर तथाऽ-एवऽ- च- असिपत्रवनं २ च:- एवः- प्रायश्चित्तैः अपेति ( नश्यति )-जनः इह योजना-यत् एनः अज्ञानकृतं भवत् तत् तापनं २ च- एकविंशकं २ संसारे कामतः कृते एनसि व्यवहार्यः जायते महापातकाररुपपातकजैस्तथा । एनस्तु न नश्यतीत्यर्थः ॥ अन्वितायांत्यचरितप्रायश्चित्तानराधमाः॥ तात्पर्यार्थ-जो पाप अज्ञानसे किया पद-महापातकः ३ घोरैः ३ उपपातक- वह पाप वक्ष्यमाण प्रायश्चित्तोंसे दूर होता है ३ तथा:-अन्विताःयान्ति क्रि-अचरित- और ज्ञानसे किया पाप दूर नहीं होता किंतु प्रायश्चित्तके बोधक वचनोंके वलसे प्रायश्चित्ताः १ नराधमाः १ वह मनुष्य व्यवहार ( सम्बंध ) के योग्य योजना-महापातकजैः घोरैः तथा उप- होता है-इस वचनमें अज्ञानकृत पाप पातकजैः घोरेः अन्विताः अचरितप्रायश्चि- | प्रायश्चित्तासे दूर होता है उस अज्ञानका ताः नराः तामित्रं चपुनः लोहशंकु महानि- प्रतियोगी ज्ञानतः (ज्ञानसे) ऐसा कहनाथा रयशाल्मली रिवं सुझालं पूर्तिमृत्तिकं काल कामतः यह कहाहै वह ज्ञान और काम सूत्रकं संघातं चपुनः लोहितोदं सविषं संप्रपा- इन दोनोंको तुल्यता दिखानेके लिए है- तनं रककाकोलं संजीवनमहापथं भ- सोई दिखाते हैं कि जो अज्ञानीयाँको पाप वीचिं अंधतामिस्रं चपुनः कुंभीपाकं असिपत्र कहा है वह ज्ञानसे दूना होता है तैसेही चनं चपुनः एकविंशकं तापनं यान्ति ॥ अज्ञानसे किये कर्ममें आधा प्रायश्चित्त हैते- ता०भा०-ब्रह्महत्याआदि महापातक और सेही यदि कथंचित् म्लेच्छ शूद्रोफे संग उपपातकोंसे उत्पन्न हुए भयंकर पापोंसे युक्त गमन करे तो-तीन कृच्छ करें और जानकर मनुष्य जो प्रायश्चित्तको नही करते वे नरा- : करे तो द्विगुण प्रायश्चित्त कर-इत्यादि वच- धम जैसे २ दुःखके देनेवाले वेसद्दी नामसे नासै ज्ञान और काममें तुल्य प्रायश्चित्तके जो भिन्न २६ ऐसे इन इक्कीस २१ नरकोंमें दिखानेसे तुल्य फल है और विषय (पदार्थ) • प्राप्त होतेहैं कि तामिस्र १ लोहशंकु २ महा- के ज्ञान और कामनासे पुरुषकी स्वतंत्र निरय ३ शाल्मलिं ४ रिव ५ कुमल ६ । प्रवृत्ति नियमसे है उनमें एकक न होनेसे प्रय- पूतिमात्तिक ७ कालमूत्र ८ संघात ९ लोहि-तिका असंभवहै इससे कामतःयह कहाभ- तोद १० सविष ११ संभपातन १२ महान-थवा ज्ञानाज्ञानतः यह कहोतो कामानाता रक १३काकोल १४ संजीवन १५ महाप१६ शिहित पदरामाना कामासदिगुण मय। अधीचि अंधतामिन १८ कुंभीपाक १९ राणा भपुदिपूझियापाग प्रायशि तपा. मसिपनयन २० औ इकसवा तापन २१ फोनवणता ना सहामा फरएन शरमपु. ॥२२२॥२२३ ॥ २२४ ॥ २२५॥ पील पाना रिज मोद।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ . है क्योंकि कामके बिना अज्ञान नही हो फलकी कल्पनाही न्याय्य (उचित) है केवल सक्ता अभावके ज्ञानमें प्रतियोगीका ज्ञान अर्थवादको नही-इससे यह युक्त है कि कारण होता है-कदाचित् कोई कहै कि प्रायश्चित्तोंसे पाप दूर होता है कंदाचित् चोर आदि जिसे बलसे प्रवृत्त करदें उसे शंका करो कि जानकर किये कर्ममें प्राय- विषयका ज्ञानहै भी कामनाका अभाव होनेसे श्चित्तका अभाव है इससे यह व्यवहारके, अविनाभाव नही-सोठोक नहीं-जिससे यही योग्य कैसे होता है और व्यवहार योग्य न विद्यमानभी ज्ञान प्रवृत्तिका हेतु न होनेसे होना इस वैसिष्ठके और मनुके बचनसे जा-. अप्सदके समान है जो किसीने कहा कि नते है कि अनभिसंधि (अज्ञान) से किये शुष्क स्थलमैभी-गिरनेवाले मनुष्यका अपराधमें प्रायश्चित्त है-अज्ञानसे ब्राह्मणक 'कीचमें पतन होता है यहांभी वा- मारनेकी यह शुद्धि कही-जानकर ब्राह्मणके स्तव ज्ञानके अभावसे. उस ज्ञानकी काम पधर्मे निष्कृति ( प्रायश्चित्त ) नही है यह नाका अभावही है इसी प्रकार अज्ञान और शंका ठीक नहीं है क्योंकि जो मनुष्य कीती कामकाभी व्यभिचार नही है कदाचित् प्रकार महा पाप कर उसका प्रायश्चित्त पर्वत कोई शंका कर कि प्रायश्चित्तासे पाप दूर से और अनिमें पडनेसे अन्य नहीं है जो होता है यह युक्त नहीं क्योंकि कर्मका नाश । प्रायश्चित अज्ञानियाँको कहा हे ज्ञानसे फलसे होता है सौठीक नही क्योंकि जैसे | करनेमें वह दूना होता है इन वचनोंसे ना- पापकी उत्पत्ति शास्त्रसे जानी जाती है इसी । नकर करनेमभी प्रायश्चित्त देखते हैं-जो तो प्रकार पापका नाशभी शास्त्रसे जाना जाता। वसिष्ठका वचन है उसकाभी यह अभिप्राय है इसमें दूसरा प्रमाण नहीं चलसक्ता इसीसे है कि अज्ञानसे किये अपराधर्म प्राथभित गोतमैने पूर्वोतर पक्षकी रीतिसे यही पात शुद्धिको करता है कुछ यह अभिप्राय नही दिखाई है कि प्रायश्चित्त करै वा न कर यह है कि जान कर किये पापमें प्रायश्चित्तका विचार करते हैं कोई यह कहते हैं कि न अभाव है और जो पूर्वोक्त मनुका वचन है करे क्योंकि किया हुआ कर्म नष्ट नहीं होता कि अज्ञानसे ग्राह्मणके मारनेकी यह शुद्धि और कोई कहते हैं कि करे क्योंकि फिर कही जानकर ब्राह्मणके यधर्म प्रायश्चित नही स्तोम यज्ञ करके फिर सवनमें आतेहैं अर्थात् है उसकाभी यह तात्पर्य है कि इथ (यह) -सपनसे होनेवाले ज्योतिष्टोमआदि द्विजाति- इस सर्व नामसे परामर्श किई पारद वर्षकी यौकेजो कर्म उनके योग्य होते हैं-कदाचित् | प्रतच काही उस पचनसे जानकर ग्राम- शंका करो कि यह अर्थवादही है सोठीक नही । णके वधर्म निषेध है पुछ प्रायचित्त मात्र क्योंकि पत्रिमें सत्र न्यायसे अधिकारिक (सबै) का निषेध नही है-पयोंकि मरणा- विशेषणकी आकांक्षा होने पर अर्थवादके तिक आदि प्रायश्चित्त देखते हैं कदाचित शंका करो कि जो जानकर किंपिभी माय कुर्यादित्याहुनहि कर्म क्षीयते इति फुर्यादिसपरे पुनः स्तोमेनेवा पुनःसरनमायान्तीति विज्ञायते मात्यः स्तोमेनट्वा ममपर्य चौदुश्नर सो पा-फामतो मानव नितिने विधीयते । मानं तरति भूगइत्यो घौश्वमेधेन यजते इति पुनः स. न तस्य निति मिना । . तेत्र प्रायश्चित्त कुर्यान्नकुर्यादिति भीमोसन्ते न चित्त है तो अविशपसे पापका माशमी १ वर्ग विशुदिदिता मायाकाRixe . बनमायान्ति। तथा सिदित याकामानो कागासादिगुण मा।
(५१८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहितं । न क्यों नही यदि पापका क्षयभी नही होयतो कुछ पापके क्षयका प्रतिपादक नहीं है और व्यवहार करनेकी योग्यताभी कैसे होती है जो कर्म पतन करनेका हेतु नही और जा- इसका समाधान कहते हैं कि दोनोंके प्राय- नकर किया जाता है उसमें प्रायश्चित्तसे श्चित्तोंमें कुछ विशेषभी नहीं तोभी शास्त्रसे पापका क्षय अवश्य होगा क्योंकि यह मनु फल विशेष जाना जाता है अज्ञानसे किये (अ० ११ श्लो० ४६ ) ने कहा है कि अ- कमी तो सर्वत्र पापका क्षय होता है और कामसे किया पाप वेदके अभ्यास करनेसे जहां- ब्रह्महत्यारा-मदिरा पीनेवाला-गुरु- नष्ट होता है और मोहप्ते कामनासे किया- तल्पग-माता पिताकी योनिमें जिसके अंग- पाप पृथक् २ किये प्रायश्चित्तोंसे नष्ट होता कासंबंध हो-चोर नास्तिक-निंदित कर्मका है-पतन करनेके कर्ममें इच्छासे करनेपर अभ्यासी-पतितका अत्यागी और अपति-मरणांतिक प्रायश्चित्तोंसें पापका क्षय अवश्य तका त्यागी-पतित-और पातकके प्रेरक- होगा क्योंकि अन्य फलका अभाव है-क्यों- ये व्यवहारके अयोग्य हैं इन गौतमके कहे कि आपस्तंबका वचन है कि इसकी महापातक आदिमें व्यवहारकाभी पात- अन्य लोकमें प्रत्यापत्तिः (बदला ) नही कोके संग निषेध हैं उसी पतन करने योग्य है-पापका तो नाश होता ही है । कर्ममें कामसे करनेपर व्यवहार करने यो भावार्थ-अज्ञानसे किया पाप जो होता है ग्य मात्र है पापका नाश नही है-कदाचित् वह प्रायश्चित्तौसे नष्ट हो जाता है और वच- शंका करो कि पापक्षयके अभावमें व्यव-केबल कामनासे किये पापोंमें इस लो- हारकी योग्याताभी अनुपपन्न ( नही हो का विष प्रायश्चित्तासे व्यवहार करने सकती ) है-सो ठीक नही क्योंकि पापकी | योग्य हो जाता है ।। २२६ ॥ दो शक्ति हैं एक नरक उत्पन्न करनेवाली दूसरी..व्यवहार- रोकनेवाली-उनमें नरक ब्रह्महामापास्तेनस्तथैवगुरुतल्पगः ।। पेदा करनेवाली शक्तिका नाश न भी होतो एतेमहापातकिनीयश्चतैःसहसंयसेत् २२७ व्यवहार रोकनेवाली शक्तिका नाश अनुप पद-ब्रह्महा १ मद्यपः १ स्तेनः २ तथा:- पन्न नद्दी अर्थात् अवश्य होगा-तिसमें एवs- गुरुतल्पगः १ एते पर पाप न भी जाय तोभी व्यवहार करने योग्य यः१ वा-तः होना अनुपपन्न नही जो यह मर्नु ( अ० आदिह प्रवृत्तिके हेतु क्रोधजनक होने मा आक्रोशन (निंदा) करना ११ श्लो० ४५ ) का वचन है अ- ' व्यवहित (दूर ) हैं और वह मरनेके अनु- ज्ञानसे किये पापमें बुद्धिमानीने प्रायश्चित्त संधान विनाही प्रवृत्तह अर्थात् वह यह न कहा है जानकर किये पापमेंभी श्रुतिमें देख- जानता था कि मेरे आक्रोश करनेपर यह नेसे कोई पाप कहते हैं-वह वचनभी काम- मरजायगा कदाचित् शंका करो कि व्यव- नासे कियेमेंभी प्रायश्रितकी प्राप्तिके लिये है, हित मनुष्यको भी हिसा आदिका यदि का- 1 प्रमहा गुरापो गुरुतल्पगो मपितृयोनिसं- रण मानोगे तो हिंसा करने वालेके पैदा कर संद्धांगरतननास्तियानिदितफर्माभ्यासपतितात्याग्पप- नेपाल माता पिता भी हननक का हो तितलागिनः पतिताः पातकरयोजयाम । जांयगे सो ठीक नहीं क्यों कि पुट जो पूर्व . २ पामत: छते पापे प्रायश्चित विधाः। का- भावी हो वही २ कारण नहीं होता क्यों कि मकारटतेऽ प्यारेके अतिनिदर्शना । इसलिये अल्पफलहै (५२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । त्तिको बल देते हो इससे हिंसाके फलमें हे- ताहै प्रयोजक स्वतन्त्र कर्ताकी प्रवृत्तिका तु हो सक्ती है-तिसी प्रकार अन्यभी झिड- | जनक है इससे व्यवधान होनेसे उसको कना-ताडना-धनको हरने आदिसे-अन्यो- | अल्प फल होताहे प्रयोजकोंके मध्यमें पराये को क्रोधकरावे-वहभी मरणका हेतु को- अर्थ प्रवृत्त हुए उपदेष्टाको हिंसाका फल धकी उत्पत्तिके द्वारा हिंसाका हेतु हो सक्ता अल्प होताहै कदाचित् कोई शंका करै कि है इसीसे विष्णुने कहा है कि झि- प्रयोजक प्रयोजकके हाथके समान है उसको डकने ताडने वा धन छीननेसे जो मनुष्य | फलका संबंध युक्त नहीं यदि परकी प्रेरणाप्ते निसके उद्देशसे प्राणोंको त्यागदे वह भी प्रवृत्त हुएकोभी हिंसाके फलका संबंध होय ब्रह्मपातक कहाता है तैसेही ज्ञाति मित्र स्त्री तो स्थपति ( स्वामी ) के तलावमें खनिता सुहृद क्षेत्र इनके अर्थ जिसके उद्देशसे प्रा- (खोदनेवाला) आदि जो मूल्यसे प्रवृत्त णोंको त्यांगे उसको भी ब्रह्मघातक कहते हैं होते हैं उनको भी स्वर्ग आदि फलका संब- कदाचित् कहो कि आक्रोश (निंदा वा झि-ध हो जायगा इस शंकाका समाधान कहते डकना) करने परभी किसी २ मनुष्यको | हैं कि शास्त्रका फल प्रयोजकको होताहै क्रोधकी उत्पत्ति नही देखते इससे झिडक- इस न्यायसे अधिकारी जो कर्ता उसको फल ना आदि हिंसाके कारण नहीं हो सक्त सो देनेवाले देवमंदिर कूप तलाव इनके रचने ठीक नही क्यों कि पुरुषोंके स्वभावकी वि- आदि होते हैं और स्थपति और तलावके चित्रतासे जिनको थोडेभी झिडकने पर क्रोध कर्ता आदि देवता कूप तलाव करने आदि आ जाताहै उनसे व्यभिचार नही इससे में अधिकारी नहीं है क्यों कि वे स्वर्ग के कारण हो सकता है और इन अनुग्राहक और कामी हैं और यह परायी प्रेरणासे प्रवृत्त हुये. प्रयोजक आदिकोंसे प्रत्यासत्ति और व्यव- भी हिंसामें अधिकारी हैं इससे उनको हिंसा धान ( तुरन्त बाहेरमें ) की अपेक्षासे और का दोष होसकताद अनुमंताको प्रयोजक व्यापारक गौरव और लाघवकी अपेक्षासे से इसलिये अल्पफल होता है कि वह प्र* हिंसाका फल और प्रायश्चित्तका गौरव और योजकके व्यापारसे बहिरंगहै और अनुम- लाघव जानना क्यों कि यह वचनहे कि तिभी लघुअपराध है. और निमिनकर्ताको जो वारंवार आरंभ करताहे उसको विशेष अनुमंताके सकाश इसलिये अल्पफलंद फल होताहे तसेही स्वयं हिंसामें प्रवृत्त हुए कि उसका जो आक्रोशन (निंदा) करना अनुग्राहकको स्वतन्त्र कर्तृत्वभी हैं तोभी आदिहे प्रवृत्तिके हेतु क्रोधजनक होनेसे साक्षात् प्राण वियोग है फल जिसका ऐसे ! व्यवहित (दूर ) है और यह मरनेके अनु- खङ्गाहार आदि व्यापारवाला न होनेसे सा- संधान विनाही प्रवृत है अर्थात् वह यह न क्षात्कताक समान वारंवार हिंसाका फल न जानता था कि मेरे आक्रोश करनेपर यह होनेसे अल्प फल और प्रायश्चित्त अल्प हो- मरजायगा कदानित शंका करो कि व्यव- हित मनुष्यको भी हिंसा आदिका यदि का- रण मानोगे तो हिंसा करने वाले के पदा कर नयाल माता पिता भी हनन के कता हो जायगे सो टीक नही गया कि पुष्प जी पूरी भायी हो यही २ कारण नहीं होता क्यों कि प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५२१) . कारण होनेसेही पूर्वभावी हो सकताहै वही याश्चत्त नहीं है यह भी उस वैद्यके विषयमे है कारण होता है जो कार्यक पूर्व नियमसे जो आदान और निदानमें निपुण हो-उससे रहे यह निश्चयह कि जो कार्यके स्वरूपसे भिन्नको तो मिय्या आचरण करता हुआ वैद्य भिन्न कार्यकी उत्पत्तिके अनुगुण व्यापार | दंड देनेयोग्य है इस वैचनसे दोष दिखा वाला होताहे वही कारण होताह जो रथं- आये है-और जो मनुष्य क्रोधके निमित्त . तरसामा सोम होय तो ऐदवायवान ग्रहोंको आक्रोश आदि न करनेवालेकाभी नाम ले- ग्रहण करसकताहै ईस वचनसे रथं- कर उन्माद आदिसे अपने आत्माको नष्ट तरकी सामताही ऋतु ( यज्ञ ) की एंद्रवा- ) करदे वहांभी दोष नही क्योंकि यई स्मृति यवाग्रता कारणहै वहां सोमयज्ञरूपते कि जो कोई द्विज विनाकारण माणोंको कारण नहीं क्यों कि उसमे व्यभिचारहे ऐसे त्याग दे वहां उसकोही दोष है जिसका नाम ही मातापिताकोभी पूर्वोक्त लक्षणका योग ले उसको नहीं-जैसे जहां आक्रोश आ- नहीं है इससे कुछ दोष नहीं हैं और आ-(दिसे पैदा हुये क्रोधसे अपने दहमें खड्ग क्रोश आदिके समान कूप खननमें खोदने आदिका प्रहार करे और मरणसे पहिले उ. के निमित्त मरना नहीं है कि इसने फूप | सका आक्रोश करनेवाला धन आदिसे सं. खुदवाया इससे मैं अपने देहका व्यापादन | तोप करदे और वह बहुतसे मनुष्यों के स- (नाश ) करूंगा इससे कूपका कर्ता भी मक्ष ( भागे ) ऊंचे स्वरसे सुनादे कि मैं प्र. कारणहै हिंसाका हेतु नही इससे माता पि- | सन्नहूं इसमें आक्रोश कर्ताका अपराध नही ताके तुल्यही है तसेही कहाँ २ हिंसाका । यहांभी वचनसे दोष नही-सोई विगुने क- निमित्त पोगके होनेपरभी परोपकारक लिये हा कि यदि किसी उद्देशसे क्रोध हुआ अ- प्रवृत्त होने वालेको वचनस दोषका अभाव- | पने देहमें मारे और संतुष्ट हुआ फिर सुना होताहै सोई संवर्तने कहा कि चि- दे कि इसका दोष नही उसके मरनेपर- कित्साके लिये गोके बांधन में और गूदगर्भ दोनोके ऊचे स्वरसे कहनसे दोप नही है- के मोचन (निकालना ) में यान करनेपर और इन प्रयोजक आदिकोंक दोपके गुरु मरण हो जाय तो प्रायभित्त नहीं है औषध । लघुभावको देखकर प्रायभित्तका विशेष स्रह भोजन इनको गौ माह्मण आदिको देने कदंगे ॥ पर मरण होजाय तो यह देनेवाला पापसे भावार्य बनाइत्यारा-मदिरा पीनवाला- लिप्त नही होता दाहका छेदन शिराकाभेद चोर-गुरुस्त्रीकागामी और जो/ इनके संग (फस्त)इन यत्नसि जो प्राणों की रक्षाके लिये संवास को ये पांच महापातकी होते हैं२२७ उपकार करते हैं उनकोभी मरनेपर प्रा- (५२२.) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद-गुरूणाम् ६ अध्याधिक्षेपः १ वेद-च-वचः१ अनृतं १ रजस्वलामुखास्वादार निंदा १ सुहृवधः १ ब्रह्महत्यासमं १ ज्ञेयं १ सुरापानसमानि १ तु:-॥ अधीतस्य ६ चऽ- नाशनम् १ ॥ योजना-निषिद्धभक्षणं जैहयं चपुनः उ- योजना-गुरूणां अध्यधिक्षेपः वेदानंदा | स्कर्षे अनृतं वचः रजस्वलामुखास्वादः ए. सुहृद्वधः चपुनः अधीतस्य नाशनं एतत् ब्र- तानि सुरापानसमानि भवन्ति ॥ महत्यासमं ज्ञेयम् ॥ तात्पर्यार्थ-निषिद्ध लशुन आदिका जान तात्पर्यार्थ-गुरुओंका अधिकतासे अधि- कर भक्षण-इसीसे मैनु (अ०५ श्लो० १९) क्षेप (झूटी निंदा ) क्योंकि गौतमको वचन ने कहा है कि छत्राक-विष्ठाका भक्षक सुकर है कि गुरुकी झूटी निंदा महापातकके समान लहसन-ग्रामका कुक्कुट ( मुर्गा ) पलाण्डु है-यहभी उस दोषकी निंदाके विषयमें है (सलगम ) गाजर इनको जानकर खानेसे जो जगत्मे अविदितहो क्योंकि आपस्तं- | मनुष्य पतित होता है और अज्ञानसे भक्ष- बकी स्मृति है कि दोषको जानकर पूर्व जो गमें तो प्रायश्चित्त मर्नु (अ० ५ श्लो० ३०). श्रेष्ठ है उनके दोपको न कहै और व्यवहा- | नेही कहा है कि अज्ञानसे इन छःको खा- रमें इसको त्याग दे-और नास्तिक होनेके कर सान्तपन कुछ और यतिचांद्रायण व्र- आग्रहसे वेदकी निंदा-ब्राह्मणसे भिन्नभी मि-तको करे और शेष पापोंमें एक दिन उप- त्रका वध-और पढे हुऐ वेदका असत् (बुरे) वास करै-जेय ( कुटिलता) अर्थात् शास्त्रके विनोदसे वा आलस्य आदिसे ना- | अन्यकी प्रतिज्ञा करके अन्य कहना शन (विस्मरण) अर्थात् भूलना-ये सब वा अन्य करना-यद्यपि यहां सामान्यसे कुटि- प्रत्येक ब्रह्महत्याके समान है और जो वेद लता कही है तथापि प्रायश्चित्तके गौरवसे अग्नि पुत्र इनका त्याग उपपातकहै इस व- कुटिलता रूप निमित्तभी गुरुही लेना-अ- चन अधीत ( पढावेद )के त्यागको उप- र्थात् अधिक कुटिलतामें यह प्रायाश्चत्त स- पातकोंके मध्यम गिना है वह उस विस्मर- मझना और नैमित्तिक ( कार्य )के देखनेसे णमें जानना जो कष्टसे कुटंबके पोषणको निमित्तकी विशेषताका ज्ञान देखते है जैसे व्याकुलता और असतशास्त्रके श्रवणकी व्य- जिस पुरुषकी दोनों अग्नि अनुगत हों और ग्रतासे होता है। वे नष्टही जाय तो वहां पुनः आधानही प्रा- यश्चित्त है-इस वैचनमें उभी यह निमित्तका भावार्थ-गुरु की. अधिक निंदा-मि- त्रका वध-आयोग ए वेदका नाश ये ब- विवक्षितभी है तोभी दोनों अग्निके उत्पादक विशेषण है-इससे दोनों हवियोंके समान अ- महत्याके समान जानने ॥ २२५ ॥ पुनः आधेयमें नमित्तिक विधिक दलसे दोनों निषिद्धभक्षणंजैहयमुत्कर्षचवचोनृतम् । अग्मियोंकीही निमित्त रुपसे कल्पना करते रजस्वलामुखास्वादःसुरापानसमानि तु ॥ १ छत्राकं विद्दवराई च लशुन प्रामकुकटं पलाई पद-निपिद्धभक्षणं १ जेयं १ उत्क ७ २ अमत्यैतानि षर् जग्धा कुच्छ मान्तपनं पौत। १ गुरोरहनाभिशमनम् इति महापातकममानि । पतिचांदापणं पारि शेषेयपत्रसंदरः। २ दोष पुडान पूर्वपोलो रुमाझ्याता स्यात्मयत- ३ यस्पोमावगी भनुगती स्वातामभिनिम्लोचदा हारे चैन परिहता गूजनं चमत्याजगध्या पतेनरः। पनराधेय तर प्रायशिन.
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५२३) है-तैसेही यहांभी निमित्तके गोरखकी कल्पना | नही-अन्यथा गमन करे तो दण्ड है और युक्त है और अपनी बडाहीके निमित्त राज- दूषण लगाने में हाथोंका छेदन और उत्तम कुल आदिमें चतुर्वेदी होनेपरभी मै चतुर्वेदीहूं वर्णकी कन्याको दूषण लगाव तो वध कहा ऐसे झूठ बोलना- और कामके वशीभूत है इस वचनेसे वहाही दण्ड विशेषके कहनेसे न होकर रजस्वलाके मुखका सेवन-ये प्रायश्चित्तका गौरव युक्त है और स्वयोनि पांच ५ मुरापानके समान है । (भगिनी) अन्त्यजा (चाण्डाली ) सगोत्रा भावार्थ-निषिद्ध लहसन आदिका भ- | पुत्रकी स्त्री-इन प्रत्येकका गमनभी गुरु क्षण-कपटका करना-उत्तमहोनेके लिए तल्पके समान है यहभी वीर्य सींचनेके अनं झुट बोलना-रजस्वला स्त्रीके मुखका चूमना | तर जानना-सींचनेसे पूर्व निवृत्त हो जायतो ये पांच मदिरापानके समान होते हैं।।२२२॥ गुरुतल्पके समान नही किन्तु अल्पही अश्वरत्रमनुष्यत्रीभूधेनुहरणतया ।। प्रायश्चित्तहै क्योंकि मन (अ० ११श्लो०५८) ने इस श्लोकमें रेतःसेक (वीर्य सींचना) निक्षेपस्यचसवैदिसुवर्णस्तेयसंमितम् २३० यह विशेषण दिया है कि अपनी भगिनी पद-अश्वरत्नमनुष्यस्त्रीभूधेनुहरणं १ त कुमारी-अन्त्यजा-मित्र और पुत्रकी स्त्री- थाऽ-निक्षेपस्य ६ च- सर्व १हि-सुवर्ण- इनमें वीर्यका सींचना-गुरुतल्पके समान स्तेयसमितम् ।। समझना सगोत्राके ग्रहणसेही पुत्रकी स्त्रीका योजना-अश्वरलमनुष्यस्त्रीभूधेनुहरणत- | ग्रहण-सिद्धथा-पुनः-कहना-प्रायश्चित्तको गौर था निक्षेपस्य हरणं तत् सर्व सुवर्णस्तेय-वता कहने के लिये है और गुरुकी निंदा संमितं भवति ॥ आदिको जो ब्रह्महत्याके समान कहना है ता. भावार्य-ब्राह्मणके अश्व-रल-म- वह ब्रह्महत्याके प्रायश्चित्त योधन करनेके नुष्य--स्त्री-भू-धेनु-इनका और सुवर्णसे लिये है कदाचित् शंका करोकि-वेदनिंदा भिन्न निक्षेप (धरोहर ) का हरना-ये सब आदिमें दोष लघु है इससे ब्रह्मदत्या आदि सुवर्णकी चोरीके समान जानने ॥ २३ ॥ गुरु प्रायश्चित्त युक्त नहीं है सोठीक नहीं- सखिभार्याकुमारीपुस्वयोनिप्वंत्यजासुच ॥ क्योंकि गुरुप्रायश्चित्तके दोष बलसेही दोषका गौरव जाना जाता है और प्रायश्चित्तके कह- सगोत्रामुसुतस्त्रीपुगुरुतल्पसमंस्मृतम्:३१ नेके लियही यह वचन नही किंतु दोपके पद-सखिभायर्याकुमारीषु ७ स्वयोनिषु ७ गौरवकाही प्रतिपादक है-यह शंकाभी ठीक अत्यनासु ५ चा- सगोत्रात ७ सुतस्रांषु ७ नहीं क्योंकि केवल-दोष गौरवकाही प्रतिपादक गुरुतल्पसमं १ स्मृतम् १॥ वचन होता तो यह ब्रह्महत्या के समानह यह योजना-सखिभायांकुमारीपु-स्वयोनिषुच- गुरुतल्पके समान है इत्यादि भेदसे पुनः अत्यनासु-सगोमासु-सुतस्त्री गमने। कहना सिद्ध नहीं होता और सम शब्दसे गुरतल्पसमें स्मृतम् ॥ कहा हुआ वह प्रायश्चित्त ब्रह्महत्या भादि तात्पर्याय-सखा ( मित्र ) को भाया और १ समास्वनुदामामु न स्तन्यपा दमः। उत्तम जातिको कुमारी (कन्या )इनमें गमन : दागे तु पर उत्तमागां वपरनमा । फरना गुरुवल्पके समान यदा है क्योंकि २ रेत:मेशः स्यानी एमालाराजाम्य । इच्छा करती हुई अनुलोम जातियाम दोर , मन्यः पुस म श्री मुस्तमनं दिए । - - (५२४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रायश्चित्तोंसे कुछ न्यूनही कहा है क्योंकि योजना-पितुः चपुनः मातुः स्वसारं जगत्में राजाके समान मंत्री है इत्यादि । मातुलानी स्नुषां-मातुःसपत्नी-भगिनों तथा वचनमें किंचित् न्यूनमेंभी सम शब्दका प्रयोग | आचार्यतनयां आचार्यपत्नी तु पुनःस्वसुतां देखते हैं-बडा महान् पातक और अल्प | गच्छन् गुरुतल्पगो भवति तत्र सकामायाः 'पातककी तुल्यता युक्त नही-इससे स्त्रियाः अपि लिंग छित्त्वा वधः प्रायश्चित्तं याज्ञवल्क्यनें ब्रह्महत्याके समान कहे हुए | भवति- वेदका त्याग-वेदकी निंदा-मित्रकावध तात्पर्य-पिता और माताकी भगिनी इनको जो मर्नु ( अ० ११ श्लो० (बुआ मामसी) मातुलानी (माई) पुत्रकी "५६) ने सुपपानके समान कहा है वह वधू-माताकी सपत्नी (सोत ) भगिनी- प्रायश्चित्तके विकल्पार्थ कि ब्रह्म (वेद) का आचार्यकी पुत्री और आचार्यकी पत्नी अ. त्याग-ब्रह्मकी निंदा-झूठी साक्षी-मित्रका वध | पनी पुत्री इनमें गमन करता हुआ गुरुकी निंदित अन्न और घीका भक्षण ये सुरा- शय्यापर गमन करनेवालेके समान होता पानकी समान हैं इसी प्रकार अन्य वचनों है उसका और कामनासे पुरुषोंके संग भोग मेंभी विरोधका परिहार करना और जो व- करने वाली स्त्रियोंका लिंगको छेदन करके सिष्ठेनें लघु प्रायश्चित्त कहा है कि. गुरुको राजा वध करे यहां वधही दण्ड और प्राय- झूठा दोप लगावेतोद्वादश रात्र कृच्छ्र करके श्चित्त है और च शब्दसे राणी संन्यासिनी गुरुके प्रसादसे पवित्र होता है-वह अज्ञानसे आदिकोंका ग्रहण है सोई नारदेने कहा करने वा एक वार करने में जानना ॥ कि माता-माताको भगिनी-सास-मातुलानी- भावार्थ-मित्रकी भायां-कुमारी-भगिनी-| बुआ चाचा मित्र और शिष्य इनकी स्त्री और चाण्डाली और सगोत्रा-पुत्रको स्त्री इनके अपनीभगिनी और भगिनीकी सखी पुत्रकी गमनमें गुरुतल्पके समान प्रायश्चित्त होताहै। वधू-पुत्री और आचार्यकी भार्या-सगोत्रा- पितुःस्वसारंमातुश्चमातुलानीस्नुपामपि । शरणागत-राणी-संन्यासिनी- धाय-साध्वी- मातुःसपत्नीभगिनीमाचार्यतनयांतया ॥ उत्तमवर्णकी-इनमें अन्यतम . ( कोईसी) पद-पितुः ६ स्वसारं २ मातुः ६ च- खोके संग गमन करता हुआ पुरुष गुरुस्त्री- मातुलानी२ स्नुपां २ अपि - मातुः ६ सप- गामी कहाता है-उसमें लिंग छेदनसे ली २ भगिनी २ आचार्यतनयां २तथा:-॥ अन्य कोई दण्ड नहीं कहा-यहांराज्ञी पदसे आचार्यपत्नीस्वमुतांगच्छंस्तुगुरुतल्पगः ।। राज्य करनेवालेकी भार्या लेनी क्षत्रियकी लिंगठित्वायधस्तत्रसकामाया:स्त्रियाअपि नही क्योंकि क्षत्रियकी स्त्रीके गमनमें अन्य प्रायश्चित्त कहा ई-और धात्री पदसे मातासे पद-आचार्यपली २ स्वसुतार गच्छन् १ मिन्न वह लेनी जो स्तन्यदान आदिसे पोप- ता-गुरुतल्पगः १ लिंग २ टिस्वार-वधः १ तमा-सकामायाः ६ निपाः ६ अपि:- माता मातृणमाशयमातुलामी पितृवमा कि- তৃণমনিয়াবা । दुहिम प्रमेता येदनिराकोटमाश्य मषः । ग- पार्यभार्या च सगोत्रा शरणागता 1 मीना धा. दिनासायगोपिः मुगपानममानि पर। ग्री मानी वर्णोतमाग था। भामामन्यसमा गफान २ गोस्लानिये करा द्वादशन गरिता - गुस्सया रयो । शिरोशनात मादी परसासो गुमादानो भाति । दसविधाको।
प्रायश्चित्ताभ्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५२५) णकर-साध्वी पदसे व्रत करनेवाली और पातकसे गुरु जानने-सोई कहा है कि जो वर्णोत्तमा पदसे ब्राह्मणी लेना और यहां पाप महापातकके तुल्य कहे हैं उनकी 'माता पदका ग्रहण दृष्टांतके लिये है और यातक संजा है और उनसे न्यून उपपातक यह लिंगछेदन और वधरूप दंड ब्राह्मणसे होता है सोई अंगिरोने कहा है कि पातको अन्यको समझना-क्योंकि सब पापेमें टिके में सहा वर्पतक महापातकोंमें द्विगुण अप- भी ब्राह्मणकी हत्या न करें इस पचनेसे पातकोंमें चौथाई वर्षोंकी संख्यासे नरक ब्राह्मणके वधका निषेध हे-और यहां वधही होता है। प्रायश्चित्तरूप है-इसका विषय गुरुतल्प भावार्थ--माता और पिताकी भगिनी-माई- प्रकरणमें विस्तारसे कगे-इस श्लोकमें कहे पुत्रवधू-माताकी सपत्नी-अपनी भगिनी हुए गुरु तल्पके समान-पुत्रवधू और भाग- आचार्यकी पुत्री और पत्नी और अपनी नीका जो पुनः ग्रहण है वह प्रायश्चित्त वि-पुत्री-इनमें गमन करनेवाला गुरुतल्पग कल्पार्थ है और यदि ये स्त्रीभी जानकर कहाता है उसका और जानकर पुरुषोंको पुरुषोंको वश करके भोगें तो उनकाभी पुरु- भोगनेवाली स्त्रीका लिंगछेदन करके यही पोंके समानवधही प्रायश्चित्त है और ये जो दंड-और प्रायश्चित्त है ।। २३२ ॥ २३३ ।। गुरुकी निंदास लेकर पुत्रीक गमन पर्यंत है। गोवधोधात्यतास्तेय मृणानांचानमाक्रिया। वे शीघही पतनका हेतु होनेसे महापातक अनाहिताप्रितापण्यविक्रयापरिवेदनम् ।। के अतिदेशके विषय है इससे पातक कहाते पद-गोवधः १ नात्यता १ स्तेयं १ हैं-सोई यमैने कहा है कि माताको भगिनी ऋणानां ६ च - अनपाक्रिया १ अनाहिता- माताकी सखी-पुत्री-बुआ-माई-अपनी बहन मिता १ अपण्यविक्रयः १ परिवेदनम् १ ॥ साप्त-इनके संग गमन करके मनुष्य शीघही भृतादध्ययनादानभूतकाध्यापनंतथा । पतितहोता है-गौतमने तो आरभी पातक । पारदार्यपारिवित्यंवा(प्पलवणक्रिया ॥ कई दे कि माता पिताकी योनिके संग पद-भृतात् ५ अध्ययनादानं १ भूतका- बद्ध है अंग जिसको वद चौर नास्तिक धारंवार निंदितकर्मी-पतितको अत्यागी- बाईप्य १ लवणक्रिया २ ॥ ध्यापनं १ तथा:- पारदार्य १ पारिवित्यं १ और अपतितका त्यागी-और पतित और पातकके संयोजक (प्रेरक) ये पातकी स्त्रीशूद्रविक्षत्रवधोनिदितार्थोपजीवनम् ॥ कहाते हैं इनका पातक और पपातका नास्तिक्यंवतलोपश्चसुतानचियविक्रयः ॥ मध्यमें पाठसे ये महापातकसेन्यून और उप- पद-स्त्रीशुद्धविक्षनवधः १ निदितार्यो- पजीवनम् १ नास्तिक्यं १ प्रतलोपः १.- १न जातु प्राण हन्यात्सर्वपापेष्वदस्थितः। सुतानां ६ - एव:- विक्रयः १ ॥ धान्यकुष्यपगुस्तेयमयाज्यानांचयाजनम् । २ मातृपमा मातृसखी दुहिता च पितृपक्षा। मातुलानी सा वर्गवा सद्यः पतेन्नरः । पिठमावसुतस्यागस्तडागारामविक्रयः ।। महापारायति पापायुक्तानि यानि । मांभ्यासिपतितात्याम्पपतितत्यागिनः पतिताः पात. २ पातफेर सहर स्यान्मा द्विगुणं सपा उपपाये तुरीयं स्यानरक पर्षसंनया। । ३ मातृपितृयोनिसंवद्धांगस्तैननास्तिकनिदितफ तानि पातफसानि तन्यूतमुपावयम् । पासोमाय!
(५२६.) - याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद-धान्याप्यपशुस्तेयम् १ अया- | लवणक्रिया-स्त्रीशुदविक्षनवधा-निंदितायों- ज्यानांची- याजनं १ पितृमातृसुतत्यागः१ पजीवनम्-नास्तिक्यं-वतलोपः-चपुनः सु- : तडागारामविक्रयः १॥ तानां विक्रयः-धान्यकुप्यपशुस्तेयं-चपुनः . कन्यासंदूपणंचैवपरिविंदकयाजनम् ॥ अयाज्यानां याजनं-पिटमातृसुतत्यागः-त- कन्यामदानंतस्यैवकौटिल्यंवतलोपनम् ॥ डागारामविक्रयः-चपुनः कन्यासंदूषण-परि विदकयाजनं तस्य एव कन्याप्रदान-कौटिल्यं- पद-कन्यासंदूषणं १ च-एव:-परिविं- व्रतलोपन-आत्मनः अर्थ क्रियारंभः-मद्यप- दकयाजनं १ कन्याप्रदानं १ तस्य ६ स्त्रीनिषेवण-स्वाध्यायाग्निसुतत्यागः- चपुनः एक:-कोटिल्यं १ व्रतलोपनं १ ॥ बांधवत्यागः-ईधनार्थ · दुमछेदः-स्त्रीहिंसा- आत्मनोथैक्रियारंभोमद्यपस्वीनिषेवणम् । औषधजीवनं-हिंस्रयन्त्रविधानं चपुनः व्यस- नानि-आत्मविक्रयः-शुद्ध प्य-हीनसख्य- स्वाध्यायामिसुतत्यागोबांधवत्यागएवच ।। हीनयोनिनिपेवणं-तथा' अनाश्रमे वास:- पद-आत्मनः ६ अर्थे ७ क्रियारंभः १ परान्नपरिपुष्टता-असच्छास्त्राधिगमन-आक- मद्यपस्त्रीनिषेवणं १ स्वाध्यायाग्निसुतत्यागः१ रेषु अधिकारिता-भार्यायाः विक्रयः-एषां मध्ये बांधवत्यागः १ एव:-चा-॥ एक उपपातकं भवति ॥ इंधनार्यदुमच्छेदःस्त्रीहिंसौपधजीवनम् ॥ तात्पर्यार्थ-महापातक और उनके स- हिंस्रयंत्रविधानंचव्यसनान्यात्मविक्रयः ।। मानोंको कह कर उपपातकोंको कहते है। पद-इन्धनार्थ २ गुमच्छेदः१ स्त्रीहिंसा १ शास्त्रोक्त समयमें यज्ञोपवीत न होना रूप गोवध अर्थात् गौके देहका पातन और औषधजीवनं ? हिंस्रयन्त्रविधानं १ च- प्रात्यता और ब्राह्मण वा ब्राह्मणके समानसे व्यसनानि १ आत्मविक्रयः १ ॥ भिन्नके सुवर्णको चुराना रूप स्तेय-और शूद्रप्रेयहीनसख्यंहीनयोनिनिषेवणम् ॥ ग्रहण किये सुवर्ण आदिका अनपाकरण तयैवानाश्रमेवातःपरानपरिपुष्टता २४१॥ (न देना ) रूप ऋणानपाकरण-तैसेही पद- शूदप्रप्यं १ होनसरव्यं १ हीन- | देव ऋषि पितर इनके ऋणका अनपाकरण योनिनिषेवणं १ तथा:-एव:- अनाश्रमे ७ | लेना अधिकार होनेपर आहितानि न होना. वासः १ परान्नपरिपुष्टता १ ॥ कदाचित् कोई शंका करें कि ज्योतिष्टोम आदि कामनाओंका श्रवण अपने अंगभूत असच्छात्राधिगमनमाकरेप्पधिकारिता ।। अग्निकी सिद्धिके लिये आधानको प्रयुक्त भार्यायाविक्रयश्चैपामकैकमुपपातकं २४२ करता है इसे मीमांसकोंकी प्रसिद्धिस पद-असच्छास्त्राधिगमनं १ आकरेषु ७ जिसका अग्नियोंसे प्रयोजन सिद्ध होता अधिकारिता १ भार्यापाः ६ विक्रयः १ च है उसकीही उसके उपायरूप भाधानमें एषां ६.एककं १ उपपातकं १ ॥ प्रवृत्ति होती है जैसे ग्राहियोंकि अर्थाकी ध- योजना-गोवधः प्रात्यता स्तेयं-चपुनःनके संचयमें और गिसका भग्नियोंस प्रयोग ऋणानां अनपक्रिया-अनादिताग्निता-अप-जन नही तिसको प्रवृत्ति नही होती इससे ज्यविक्रया-परिवेदनम् भृतात् अध्यय ज्योतियोमादियाम युनःस्रोगामिनि. नादान तथा पारदर्यि-पारिवित्यं पा(य- पापमान मधुनो। १ प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (,५२७) . अग्निका आधान न करना दोष कैसे है-इ- गुलि भादिसे योनिका विदारण (छेदन: सका समाधान कहते हैं कि इसीसे आधान लेना भोगनही उसको सखाकी भायों और को आवश्यकता कहनेसे नित्य श्रुतिभी अ- कुमारीका गमन गुरु तल्पके समान है इस धिकारियोंके अविशेषसे आधानको प्रयोजक पूर्वोक्त ववनसे कह आये हैं-परिविंदकका हे यह अभिप्राय स्मृतिकारोंका लखाजाता याजन और उसको कन्याका दान-गुरुको है इससे कुछ दोष नही है-तसेही वेचनेके छोडकर कौटिल्य गुरुके विष कुटिलताको अयोग्य लवण आदिका विक्रय अपण्य वि- तो सुरापानके समान कहा है-और पुनः ब- क्रय-सहोदर ज्येष्ठ भाईके विद्यमान रहते तलोपका ग्रहण तो टपदेश न किये-और छोटे भाईको स्त्री और अग्निका ग्रहणरूप | अनिषिद्धजो व्रत-ऐसे हैं कि हरिचरणका- परिवेदन पण (सरत ) पूर्वक अध्यापक | मलोक देखनेसे पहिले तांबूल भक्षण न करूं. (गुरु) से पदना पणपूर्वाध्यापन-गुरु और गा-उनकी प्राप्ति के लिये है स्नातकयतकी गुरुके समानसे भिन्न पराई दाराका सेवन प्राप्तिकं लिये नहीं क्योंकि उसमें मनुने छोटे भाईके विवाह होने पर बडे भाईका वि- (अ० ११ श्लो० २०३ ) स्नातकके प्रत वाह न होना पारिवित्त्य-वार्धप्य अर्थात् नि- लोपमें अभोजन प्रायश्चित्त-लघु प्रायश्चित्त पिद्ध वृद्धि (व्याज ) से जीविका-लवण- | कहा है तसेही अपने लिये पाकरूप क्रिया- को उत्पन्न करना-आत्रेयीसे भिन्न ब्राह्मणी- का आरंभ-उसका मर्नुने (अ० ३ शो. भी स्त्रीका वध शूद्रवध अदीक्षित वैश्य क्ष- | ११८) वह केवल पापको खाता है जो नियका वध-निंदितार्थोपजीवन अर्थात् राजा- | अपने लिये पकाता है इस वचनसे से भिन्न स्थापन किये धनसे जीविका कर- | निषेध किया इ-क्रियामात्र (सपक्रिया )के ना-नास्तिश्य अर्थात् पर लोक नहीं है यह विषयमें मानोगे तो निषेधकी कल्पनासे गार- आमह-तका लोप यह ब्रह्मचारीको सम- वहो जायगा-मदिरापीनेवाली जाया या स्त्री- झना-स्त्रीका प्रसंग-और सुतों (अपत्य ) का निषेवण ( भोग ) स्वाध्याय (वेद) का विक्रय-बीहि आदि धान्य और तुच्छ का त्याग-प्रोत वा स्मात अग्मियोंका त्याग द्रव्य कुप्य (लाखसीसा आदि ) गो आदि । पुत्रका त्याग अर्थात् संस्कार आदि न कर- पशु-इमकीचोरी-पूर्व कहे हुये स्तेयके ग्रहण ना-पितृव्य मातुल आदि बांधवोंका त्याग- से ही सिद्धथा फिर धान्य कुप्य मादिस्तेय- अर्थात् रक्षा करनेके सामर्थ्य में रक्षा न कर- का प्रहण नित्य के लिये है इससे धान्यसे | ना पाक आदि दृष्ट फरसके लिये वृक्षाका भिन्न द्रव्यकी चोरीमें अवश्य यही मापभित्त | छेदन-आहवनीय अमिकी रक्षाके लिये नही- नही है किन्तु उससे न्यूनभी हो सकता है स्त्रीहिंसा-आपसे जीवन-उनमें स्त्री जीव- इससे यहभी व्याख्यात हुआ कि मांधयके | न यह है कि भापीको पन्यभावमें (वेश्या- त्यागके ग्रहणसेद्दी सिद्धथा पुनः पित्रादिका पना) लगाकर उससे मिले द्रव्यसे जीवन प्रहण न्यून प्रायश्चित्त के लिये है-जाति या वा स्त्रीके धनसे जीवन-प्राणियोंके वधसे जो कर्मसे दुर जो शुद्र मारय मादिभयान्य-जीवन वह हिंसया जीवन-वशी करण आ- नका पज्ञ कराना-अपतित जो पिता माता मुतह उनको परसे निकासना-तलार याग पातमन्नतरांपेय प्रायश्चित्तमभोवनम् । उपान उपवन इनका वेचना कन्याकी में २ भई सकेरल भुक्तेयः परस्पामकारगाव ।
(५२८). याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . दिसे औषध जीवन-हिंस्रयंत्रका प्रवर्तन सवर्णा दारा जिसने वह हीन वर्णकी दाराको (तिल ईख पीडनेका कोल्हू बनाना ) और विवाह और साधारण स्त्रीका भोग-अधि- मृगया आदि अगरह प्रकारके व्यसन-सोई कार होनेपर आश्रमको ग्रहण न करना- मनुने (अ०७श्लो०४७-५३)कहे हैं कि मृगया पराये अन्नसे पुष्टता (पर पाकमें प्रीति ) जूआ दिनमें सोना-निंदा-स्त्री-मद-तौर्यत्रिक- चार्वाक आदि असत शास्त्रका ज्ञान-सुवर्ण- वृथागमन-ये दश कामसे पैदा होते हैं चगली आदिकी उत्पत्तिके स्थानों में राजाकी आज्ञासे साहस-द्रोह-ईर्या-असूया-अर्थमें दूषण ल- | अधिकार-भार्याका विक्रय-च शब्दसे मनु गाना-कठोर वाणी-कठोर दंड-ये आठ आदिके कहे अभिचार (शत्रुमारण) और क्रोधसे उत्पन्न है-इन दोनोंका कविगन अज्ञानसे लशुन आदिका भक्षण लेना-इन जिसे मूल जानते हैं उस लोभको यत्नसे गोवध आदिकी प्रत्येक उपपातक संज्ञा जान- जीते क्योंकि ये दोनों गण क्रोधसे पैदा होता नी-मनुने और भी निमित्त जातिभ्रंशकर-सं- ई-मदिरा पान-अक्ष (जूआ) स्त्री मृगया- करीकरण-अपात्रीकरण-मलिनीकरण नामके इन चारोंको क्रमसे कामजगणमें अतीव | गिने हैं (अ० ११ श्लो० ६५-७०) ब्राह्म- कष्टदायी जाने-दंडका देना कठोर वाणी- णको पीडा करना सूंघने अयोग्य और मदि पदार्थमें दूषण-क्रोधसे उत्पन्न गणमें इन | राको सूंघना जेय (कपट) और पुरुषों तीनोंको दुःख दायी जाने-सर्वत्र है संबंध मैथुन-ये जातिभ्रष्टकर कहेहैं-गधा-अश्व- जिसका ऐसे इस सात वर्गके मध्यमें पहि- ऊंट-मृग-हाथी-बकरी-भेड इनका वध- ले २ व्यसनको आत्मज्ञानी अत्यंत गुरु मीन-सर्प-भैसा इनकावध-संकरीकरण जान- जान-व्यसन और मृत्युइन दोनों के मध्यमें मा-निंदितोंसे धनका ग्रहण-व्यापार-शुदकी व्यसन दुःखदायी कहा है क्योंकि मरकर सेवा और झूट बोलना ये अपात्री करण जानने व्यसनी नरकमें और अव्यसनी स्वर्गमें | कृमि कीट पक्षी इनकी हत्या-मदिरा सहित जाता है और आत्मविक्रय (द्रव्य लेकर भोजन-फल इंधन पुष्प इनकी चोरी-अधी- पराई सेवा करनी) शूद्रकी सेवा-दीनों रता ये मलाबह (मलिनी करण ) जानने- (नीच) में मित्रता करती-नही विवाही है। इससे अन्य जो निमित्तोंका समूह है वह प्रकीर्णक कहाता है-यहद्विष्णुनें तो संपूर्ण १ गयाझा दिवास्यपः परिलादःत्रियो मुदतावा- प्रायश्चित्तके निमित्त उत्तरउत्तर लयु पृथक विक पाट्या च कामजो दशको गणः । पैशुन्यं २ संज्ञाके भेदसे भिन्न २ दिखाये है कि साहस गोद दासूगर्घट्टपणं । पाक्दनं च पारुष्यं ब्रह्महत्या सुरापान ब्राह्मणके सुवर्णकी चो प्रोपोपि गणोष्टकः । श्योरप्येतयोर्मल यं सर्वे कवयो री गुरुदाराका गमन और इन चारोंका विः तं यत्नेन जोसोम तप्रागभी गणे। पा- ! गमक्षाः शिषधेत मृगया च यथाक्रमम् । एतत्कट- । प्रामस्य रजः छत्या घ्रातिरयमधयोः। तमं विपतु फामजगणे- दंत्य पातनं वेग-दाय मैथुन पुसि जातिग्रंशकर स्मृतम् । खगायोष्ट- वारगरप्यायपणे । प्रोपर गणे विधायटमेता, मृगेभानामजाविकाधस्तया। संकरीकरण हेय मी. विकसदा । सप्तकरणास्य वर्गस सांगानुपनिगः नादिमदिरा निदिनभ्यो धनादान यागिग्यं भूसे- प पूर्ण गुरागरं शिपादपसनमात्मवान् । असनस्य ननम् । अाग्रीकरण यमसत्रय मापनमा काम- मृरोधगमन पटमुच्यते । म्यसत्यधोयो मजति पटिययोहत्या मशानुगतभोजनम् फ्लैघामपरवेग- मग मलावहम् । । पम्पनी पुरा प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५२९) संयोग ये पांच महापातक है-माता और वाणिज्य (व्यापार ) कुसीद ( व्याज ) पुत्री पुत्रकी वधूका गमन ये अतिपातक हैं | से जीवन-झूटबोलना-शद्रकी सेवा-ये यज्ञमें स्थित क्षत्रिय और वैश्यका वध रज- अपात्रीकरण हैं-पक्षी-जलचारी और स्वला-गर्भवती आत्रिगोत्रा इनके अज्ञात जलमें उत्पन्न इनको मारना-कृमि कीटोंको गर्भका और शरणागतका मारना ये ब्रह्म- मारना-जिसमें मदिरा मिलीहो ऐसा भोजन हत्याके समानहै-कूट ( झूटी) साक्षी मित्र- | ये मलावह ( मलिनी करण) -जो पाप का वध ये सुरापानके तुल्य है-ब्राह्मणकी नही कहा है वह प्रकीर्णक है-कात्यायनने भूमिका हरना सुवर्णकी चोरीके समान है- तो महापातकोंके समान जो उपपातक चाचा मातामह मामा राजा इनकी पत्नीका विष्णुने कहे हैं उनकी पातक संज्ञा दिखायी गमन गुरु दाराके संग गमन तुल्य है-पिता है कि महापाप-अतिपाप और पातक प्रा- माताकी भगिनी-वेद पाठी ऋत्विज उपाध्याय संगिक इस प्रकार पापके पांच गण हैं-क- और मित्रकी पत्नी-भगिनीकी सखी-सगोत्रा दाचित् शंका करोकि उपपातक आदि और उत्तम वर्णकी स्त्री-रजस्वला-शरण | कैसे पातक हो सकते हैं क्योंकि पतनके आई-संन्यासिनी-निक्षिप्त (रोकी ) इन हेतु नही हो सकते-यदि वेभी पतनके हेतु सब स्त्रियांका गमन अनुपातक है-झूट बो- है तो माता पिताको योनिमे संबद्ध है अंग लना-अपना उत्कर्ष होनेसे राजाकी चुगली | जिसका इत्यादिकोंकी गिनती व्यर्थ है- गुरुके झूटे दोषोंका कथन-वेदकी निंदा कदाचित् ऐसे कद्दो कि महापातक और पढे हुये वेदका त्याग और अग्नि पिता उनके तुल्यपापोंके समान ये सद्यःपतनके माता पुत्र दाग इनका त्याग-खानेके अयोग्य हेतु नही है-तोभी अभ्यासको अपेक्षासे अन्नका भक्षण-परधनका हरना-पराई दा- पतित होनेके हेतु मानने में कोई विरोध नहीं राका गमन-अयाज्योंको यज्ञ कराना-वात्य | क्योंकि निदित कर्मका अभ्यासी पतित है होना-भृतक (नोकरी) होकर पदाना और ऐसा गौतमका वचन है-ऐसा मतकहो-क्योंकि पटना-सव आकराम अधिकारन्महायंत्र | अभ्यासका रूप कह नही सकते दीवार वा (कोलू ) की प्रवृत्ति-वृक्ष-गुल्म लता वल्ली | साँवारको अभ्यास कहोगे-दसमेंभी अवि- भौषध इनकी हिंसासे जीवन-अभिचार | शेपसे मानोगे तो-जो मनुष्य दिन में दो बार (मृत्यु) के मूल जो कर्म उनमें प्रवृत्ति- सोताहै और जो सौबार गोवध करताह इन दो- अपने लिये क्रिया (पाक ) का आरंभ-आ | नोंके पतित होने में विशेष न होगा-यहां यह हिताग्नि न होना-देवता मपि पितर इनके कहते हैं कि जहां अर्थवादमें प्रत्यवाय(पाप) ऋणको दूर न करना--निंदित शास्त्र पटना-1 की विशेषता सुनीमाय वा जिसमें अधिक नास्तिक होना-निंदित स्वभाव-मदिरा पाने- प्रायश्चित्तदो तिस निदित कर्मके जितना भ. वाली स्त्रीको सेवा ये सब उपपातक ई-भ्यास करनेमें महापातकको तुल्यतादी - और प्रामागको दुःख देना-स्पनेके अयोग्य तना भम्पास पातित्यका हेतुइ दिन में सोना और मदिराको सूंघना-कपटता पशु और तो सहस्रबार अभ्यास करने परभी महापातक- के तुल्य नही हो सकता इससे टसके कर- पुरुषों मेथुन करनान्ये सब जातिभ्रंश करणई-पान वा बनके पशुओंकी हिंसा १मा पनिपारा पतकापामामांग- संकरीकरण है-मिदितोंसे धनका प्रदा-1 के घोमानिया पत्रको नमः। .
(५३०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . नेसे पतित नही हो सकता इससे यह बात तम की स्मृति है कि खट्वांग कपा- युक्त है कि उपपातक आदि अभ्यासकी लको हाथमें ले यहांखटांगशब्दसे दंडमें लगा अपेक्षा पतनका हेतु।। शिरका कपालरूप ध्वज लेते हैं कुछ खट्टा- भावार्थ-गोवधसे लेकर भार्याके विक्रय | का एक देश नहीं तिसकी महोक्ष (बडाबैल) पर्यतोंमें एक एक उपपातक कहाताहै उनके खदांग पाशु इत्यादि व्यवहारोंमें जोहै उस- नाम तात्सर्यार्थमें दिखा आये हैं इससे पुनः । में ही खटांग शब्दकी प्रसिद्धिहै यह कपाल- नहीं लिखे ॥ २३४॥२३५॥२३६॥२३७॥ का धारण चिह्नके लिये है और भोजन और भिक्षाके लिये नहीं क्यों कि गौतमकी ॥२३८॥२३९॥२४०॥२४१॥२४२॥ स्मृति है कि मिट्टीके कपालको हाथमें शिरःकपालीध्वजवानभिक्षाशीकर्मवेदयन् । लिये भिक्षार्थ ग्राममें प्रवेश करे तिससे वह ब्रह्महाद्वादशाब्दानिमितभुकशुद्धिमाप्नुयात् ब्राहा वनका वासी हो क्यों कि मनु पद-शिरःकपाली १ ध्वजवान १ भिक्षा- (अ० ११ श्लो० ७२ ) ने कहा कि कुटी शी १ कर्म २ वेदयन् १ ब्रह्महा १ द्वादशा- समीपवसे क्यों कि मर्नु (अ० ११ श्लो०७८) बनाकर बारह वर्ष तक वनमें वस वाग्रामके ब्दानि२ मितभुक्१ शुद्धिं २आप्नुयात् कि-॥ काही कथन है कि वा मुंडन करा- योजना-ब्रह्महा शिरःकपाली ध्वजवान् । कर ग्रामके समीप वा गौओंके अजमें आश्र- भिक्षाशी द्वादशाब्दानि कर्म आवेदयन् सन् । म वा वृक्षकी जडमें सब भूतोंमें रतहुआ मितमुक् शुद्धिं आप्नुयात्॥ वसे वा मुंडन कराकर इस विकल्पके तात्पर्यार्थ 2-इस प्रकार व्यवहारके लिये | कहनसे यह बात जानी गयी कि जटाको। नामके भेदोसहित प्रायश्चित्तके निमित्तोंको धारे इसीसे संवेतने कहोइ कि ब्रह्महा मिनकर नैमित्तिकोंको दिखाते हैं ब्रह्महा | चारह वर्षतक वालोंके वस्त्रों को धारणकर शिरके कपालको धारणकिये और ध्वजा लि-जटा ध्वजाको धारण करे तसेही भिक्षाके ये क्योंकि मने (अ ११ श्ली ७२) ने कहा | भोजनमें शील रक्खे और भिक्षाभी लाल है कि शवके शिरकी ध्वजाको करके मिट्टिके खंड शगवसे ग्रहण करनी क्यों फिर और अन्य शिरके कपालको दंडके कि आपस्तंचर्का वचनहें कि लाल फूटे आगे रक्खे जो वजारूप उनको प्रहण करे | शरावत भिक्षाके लिये प्राममें प्रवेश करे और वह कपाल अपने मारेहुये ब्राह्मणके सात घरों मेंही जिनमें स्वच्छ मिले और जो शिरका लेना क्यों कि शातातपकी यह पहिले संकेत न किये हों उनमेंसे ग्रहण करे स्मृति है कि ब्राह्मण ब्राह्मणको मारकर उस- केहि शिरके कपाल को लेकर तीयों में विचरवह सदांगकपालपाणिः । कपाल न मिले तो अन्य ब्राह्मणकाही कपा- २ मृन्मयफपालपाणिभिभायै प्राम प्रदिशेत् । ललना ये दोनों हायमेही लेने क्यों कि गो ३ ग्रनहा द्वादशान्दानि काटे सावने मत । ४ कृतवानो या निरुत् प्रामात गौरीप वा । या दागिनजम् । भाश्रमे वृक्षाले या सर्वभूतहिते रतः। मानगो मागं घातथिला तर शिःकपाल ५प्रमहा वादशा-दानि यारगसा जटीपानी। मादाय सीपीन्यनुसंगरे । ६ लौहितफेन पंडशो मा मिक्षा प्रायशे। .
मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५३१) क्यों कि वसिष्ठ का वचन है कि अ- उवटना-उपानह-उत्र-काम-क्रोध-लोभ-मोह- -संकल्पित सात घरोंमें भिक्षाके लिए प्रवेश | हर्ष-नृत्य-गीत-निंदा-भय-इमको वर्जदे- करके भिक्षाका आचरण करे और सायंका- इनके अनुकूल धर्मकी प्राप्तिके लिए है-इसी- लमें ही भिक्षा ग्रहण करनी क्यों कि वसिष्ठ से शंखेने कहाहै कि वह ब्रह्मदा-स्थान नेही एककाल भोजन कहा वह भिक्षा | और वीरासनको धारे हुए-मोन-मौजी- ब्राह्मण आदि चार वर्णों में ही करनी क्योंकि मेखला-दंड-कमण्डलु-दीक्षाकाआचरण- संवत की स्मृति है कि खटांग धारे और | अग्निहोत्र-कू-मांटी ऋचाओसे सदा जप मनको रोककर चार वर्णीमें भिक्षा मांगे तसे करे-इस ब्रह्महाको सवन-( संध्या वा यज्ञ) ही ब्रह्महाहूं ऐसे अपने कर्मको विख्यात क- आचमनके और नानके कहने से उसके रता हुआ द्वारपर स्थित हो कर भिक्षा मांगे अंग मंत्र आदिका उच्चारणभी जाना जाता है क्यों कि पराशरकी स्मृति है कि भि- तसही शुद्ध होकर कर्म करे यह सब क- क्षाका अयी ब्रह्मघातक मैं घरके द्वारपर मामें साधारण स्मृतिहे कि प्रतचके अंग खडाहूं और यह भिक्षाके भोजनका नियम | शौच के लिए जो नान-उसक समान संध्यो- पनके फलोंसे जीवन न हो सके तव जानना पासनभी वह कर-क्योंकि संध्याभी शुद्धिकर- क्यों कि संवेर्तकी स्मृति है कि वन- नेके द्वारा सपकाका शेषहे सोई दक्षेने क- के फलोंसे न जी वे तो भिक्षाके लिए ग्राम- हाहै कि जो संध्यासे होनहै वह सदेव अशुद्ध में प्रवेश करे तिसीप्रकार वह ब्रह्मचर्य आदि- और सपकमेिं अशुद्ध है जो कुछ कर्म क- से युक्त रहै क्योंकि गौतमको स्मृति है रता है उसके फल्लका भागी नही होता क- कि खटांगको हाथमें लेकर बारह १२ वर्ष- दाचित् शंका करोकि द्विजातिकमासे हा- तक ब्रह्मचारीहुआ भिक्षाके लिए कर्मको निकोही पतन कहते है-इस वचनसे'द्विजा- कहता हुभा नाममें प्रवेश करे और सज्जनों-तिका कर्म हानेसे संध्योपासनाकी प्राप्ति के दर्शनके लिये गमन करे-स्थान भार ब्रह्माकी न होगी सो ठीक नहीं क्योंकि ए- आसनसे विहार करे ओर निकाल आचमन तितकोही व्रतचर्याका उपदेश किया है - करके शुद्ध होताहै-इस गौतमके वचन में तांका भंग होने से सध्योपासनादिकी प्राप्ति मह्मचारीका ग्रहण इस लिये है कि ब्रह्मचारी ' इससे द्विजातियों के जो पटना-यज्ञ-दान- प्रकरणमें कहेहुए जो ब्रह्मचारीके धर्म कि ' और ब्राह्मगके जो अधिक पदाना- यज्ञ मधु-मांस-गंध-माल्य-दिनमें सोना-अंजन । कराना-प्रतिप्रह-दे इत्यादि प्रतच के अंग द्विमातियों के कर्म है उनकी दो पति- भिमा प्राविशेसप्तामागसरितानि घोड़े ' तको हानि है सब कमाको नही क्योंकि पम् । एकपलाहारः २ पातुर्य यो पागी सातारमगन् । उनकेही साधकर हानिका वचन चरितार्यह मेरमनी शारितिष्ठामि भीक्षा प्रमशातकः। यह नो द्वादश वर्षफी प्रतचयां-मनु-याज्ञव- ४ भिक्षा मागम पनि जीति । १ शारगिनी मानी मानी समस्नुः॥मि. ५ सागपाशातरान् मनपारी मिताये शामिका र पुमोडाभिः सदा जरा माम प्रीमोर मांगभागः पारस २ मंगानोनितमनई समिम । पारक- मादार पानासना हिरसम्मैयाकोसी पिसाने कर्म नसाय फटभामरे । वामन हनः पतनम् । - - (५३२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । ल्क्य-गौतम-आदिने कही है वह एकही हैं अनेक उपकार रूप कार्यकी उत्पत्ति होती और परस्पर सांपेक्ष और अविरोध होनेसे है और ऐसे नहीं कहना-कि द्विज ब्राह्म- भिन्न २ नहीं सोई दिखाते हैं याज्ञवल्क्यने णके वधर्म पाप गुरु होता है इससे गुरुपा-- भिक्षाका भोजन कर्मको कहता हुआ करे पमें गुरु और लघु लघु प्रायश्चित्त होते उसमें कोन भिक्षापात्र-कितने-वा किनके ) है-इस गौतमके वचनसे आवृत्तिसेही प्राय- घरोंमें भिक्षाके मांगे यह आकांक्षा होतीही | श्चित्तका करना युक्त है-सोठीक नहीं क्योंकि है-उस आकांक्षाको लाल फूटे शगवसे | विलक्षण दो कार्योंकी सिद्धि तंत्रसे होसक- भिक्षा मांगे इस आपस्तंबके वचनसे पूर्णकर- ती है जिससे यह वचन आवृत्ति बोधक नहीं ना विरुद्ध नही-इससे सबने एक कल्पका- किंतु कहे हुए गुरु लघु कल्पा ( प्रकार की ही उपदेशसे किसीने कहा है कि मनु-गो- व्यवस्थाका प्रतिपादक है और दूसरे ब्राह्म- तम-आदिकी कद्दीहुई इति कर्तव्यता पर-णके वधमें प्रमाणके अभावसे पाप गुरुभी स्पर सापेक्षभी है तोभी विकल्प है-वह उन- नही होसक्ता और जो मन देवलोंने यह का कथन यथार्थ निरूपण करके नही यह | कहा है कि पहिली विधिसे दूसरे दुगना और. मानने योग्य है-इस प्रकार बारह वर्षतक तीसरेमें तिगुना और चोथैर्म प्रायश्चित्त नही बतचर्याको करके वादा शुद्ध होता है | वहभी प्रतिनिमित्त नैमित्तिक कर्मकी आवृत्ति यहभी जानकर किए ब्राह्मणके वध विषयमें होती है इस न्यायसे द्विज ब्राह्मणके वधर्म समझना क्योंकि मन (अ० ११ श्लो०४) नैमित्तिक शास्त्रको आवृत्तिके अनुवादसे की स्मृति है कि यह शुद्धि अज्ञानसे ब्राह्मण- चामें मावृत्तिके अभावका बोधकह कुछ को मारनेमें कही जानकर ब्राह्मणके मारने दूसरे ब्राह्मणके बुधौ प्रायश्चित्तकी द्विगुण- में तो मायश्चित्तही नही कहा यहां यह वि- | ताका बोधक नहो-अन्यथा वाक्यभेद होजा- चारने योग्य है कि क्या द्विज और ब्राह्म-वर्षका प्रायश्चित्तही युक्त है-जैसे कामनावान यगा-तिससे द्विज ब्राह्मणके वधर्मभी वारद णके वधर्म प्रायश्चित्तका तन्त्र है वा आवृत्ति अनिके निमित्त-अष्टाकपाल पुरोडाशको इ- है उसमें कोई यह मानते है कि ब्रह्मदा बारह त्यादि वेचनोंसे गृहदाइ आदि निमित्तामें वपतक यहां ब्रह्मशब्द एक-दो-बहुतसे त्रा- कहे जो क्षामवती आदि उनका एक वारही झोंके बोधन करनमें साधारण हु-इससे गृहदान आदिमें अनुष्ठान है आवृत्ति नही- एक ब्राह्मणके वधमें जो प्रायश्चित्त है वही इसमें हम यह कहते हैं कि वचनके विरो- दूसरे और तीसरे में है-वहां एक ब्राह्मण व-! धर्म न्याय समर्थ नहीं होता-अर्थात् पच- धके निमित्त एक प्रायश्चित्त करनेपर यह नको नही बाध सत्ता वचन पहिली विधिसे प्रायश्चित किया और यह न किया यह दूसरीमें दुगुना तीसरीमें तिगुना और चौथी नही कहसन और प्रयोगके संबंधी देश में प्रायभित्तके अभावका बोधक होनसे प्रा- काल कर्ता-एक है-इससे अविशषसे तं- दिसामना पापरा गुरुवारनमि मामि बफे अनुष्ठानसेही पापक्षयरूप कार्यको सिद्धियुक्त इ-जैसे आग्न्येय आदि काम गुरुणि टयुनि सपनि । २कियः प्राथमिफादरमाद, दितीय दिगुण भगत । तंत्रसे परे हुए प्रयाज आदिकोंके तंग्रेसही वनय त्रिगुण मौन, गर्ग नारित मिति:। जिरिदिना प्रमाणाकामतो दिन । ३ मशिनिमिता नातिप्रमावर्तते । गामती सामना कितिन पिपते। ४ भाये कामरते पुणेमाले निरि।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायाश्चित्तप्रकरण ५ यश्चित्तको आवृत्तिको कहता है-ऐसा होने- करे और यह बारह वर्षका व्रतं ब्रह्महा पद पर न्यायसे प्राप्त हुए तंत्रानुष्ठानको बाधकर से साक्षात् हतने वालेकोही समझना अनु- आवृत्ति विशेषका कर्ता होगा- ऐसे न ग्राहक और प्रयोजक आदिको तो दोषके -मानोगे तो शास्त्रसे पायी प्राप्तिका अनुवादक | अनुसार न्यून वा अधिक प्रायश्चित्तकी होनेसे वचन अनर्थक होजायगा-कदाचित् कल्पना करनी उसमें अनुप्राहक जिस प्राय- कहो वाक्य भेद है-सो ठीक नहीं क्योंकि च- श्चित्तके भागी पुरुषपर अनुग्रह कर वह उस तुर्थ आदि ब्राह्मणके वधर्म प्रायश्चित्तके प्रायश्चित्तको पादोन (पान) करे इससे निषेधसे और तीनतक प्रायश्चित्तकी आवृ- उसको द्वादश वर्षका प्रायश्चित्त पादौन नौ तिके विधानसे वचनका एक अर्थ है-और वर्षका और प्रायोजकको अौन प्रायश्चित्त चौमें प्रायश्चित्त नहीं इस प्रमाणके देख- ६ छः वर्षका है अनुमंता सार्द्धपाद साडे। नेसे हते हुए ब्राह्मणकी संख्याकी अधिक-चार वर्षका और निमित्ती एकपाद ३ वर्षका तामें दोषकी अधिकता जानी जाती है-ते- प्रायश्चित्त करे इसीसे सुमंतुने कहा है कि सेही देवल आदिका वचन है कि जो विना तिरस्कार किया हुआ निर्गुण ब्राह्मण अपने विचारे पाप कर्म एकवार किया है उसी | देहमें मारकर साहस वा क्रोधसे घर क्षेत्र का यह प्रायश्चित्त धर्मके ज्ञाता बुद्धिमा- आदिके कारण मरजाय तो उस पापकी 'नाने देखा है और विलक्षण-गुरु लघुदोपों शुद्धिके लिए ३ तीन वर्षका व्रत करें का नाश तंत्रसे होभी नही सक्ता-इससे ब्र- और सरस्वती नदीपर प्राची दिशाको महत्या आदि पापोंमें दोपकी गुरुता और गमन करे अत्यन्त निर्गुणी ब्राह्मण अत्यन्त कर्मकी विलक्षणतासे प्रतिनिमित्त नैमित्तिक निर्गुणके ऊपर विना झिडके क्रोधसे मरजाय कर्मको आवृत्ति युक्त है क्षामवती आदिमें तो शुद्धिके अर्थतीन वर्षतक कृच्छ्र व्रत करे तो कार्य विलक्षण नही इससे वहां तं- । और जहां निमित्तवाले अत्यंत गुणवानके उका अभाव युक्त है अब विस्तारसे अलम् | ऊपर अत्यंत निर्गुण मनुष्य आत्महत्या (पूर्ण ) होते है और यह वचन है कि चो- कर तो एक वर्षही ब्रह्महत्या व्रत करे- थेमें प्रायश्चित्त नहीं वहभी महा क्योंकि सुमन्तु ने ही यह कहा है कि केश पातकके विषयमें है क्योंकि पापके अतिगुरु श्मश्च नख आदिका मुण्डन कराकर वनमें होनेसे प्रायश्चित्तके अभावकाही प्रतिपादक ब्राह्मण एक वर्षमें शुद्ध होता है इसी मार्गसे है-इससे शूद्रान्न भोजन आदिका बहुतवार । अनुग्राहक और प्रयोजक आदिके जो अनु- अभ्यास किया होयतो उसके अनुकूल प्राप- ग्राहक प्रयोजक हैं उनकेभी प्रायश्चित्तकी श्चित्तकी आवृत्तिही कल्पना करने योग्य है पुन्छ वहां प्रापश्चित्तका अभाव नहीं इससे ३ तिरस्कृतो यहा विप्रो हयात्मानं मृतो यदि नि- मनु ने कहा है (अ०११ श्लो० १४० ) गुगः साहसात्वोधादृहक्षेत्रादिकारणात् । शर्षिक कि जिनमें अस्थि नही हो ऐसे हने हुए सापति निश्चिताप्रत्यय निर्गुणो वियोधात्पर्य निर्गुणो बत कुर्यास्मतिटोमां सरस्वतीगच्छेदापि विशुम्पर्धेत- जीवोसे गाडी भरजाय तो शूद्र हत्याका प्रत परि । क्रोधाद्वै त्रियते यस्तु निनिमित्त तु मासतः । 1 यत्स्गदनभिसंधाय पापकर्म सत्कृत |त-वत्सरत्रितय फुर्यान्तरः पृच्छ विशुद्धये । स्यं निकातिरथा धर्मविदिमानामभिः । ३ केशरमयुनखादीनां कृत्वा तु वपनं वने। ब्रह्मचर्य २पूर्ण चानस्यनस्यान्तु गहलावतं च । घरविप्रो दरेंगेफेन शुद्धधात ! .
(५३४) • याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कल्पनाकरनी और इस कल्पनामें यह आप- कोभी चीथाई ही प्रायश्चित्त है क्योंकि स्तम्बका वचन मूल है कि प्रयोजक अनु- विष्णु की स्मृति है कि स्त्री वृद्ध रोगी मन्ता कर्ता ये स्वर्ग नरक देनेवाले कमाके इनको आधा बालकोंको पाद प्रायश्चित्त फलभागी होते हैं जो वारंवार करता है | दे यह सब पापोंमें मर्यादा है इससे जो उसको फलका विशेषहोताई तसेही प्रोत्सा- | शंखने ग्यारह वर्षसे न्यून और पांच वर्षसे हक (उत्साह देनेवाला) आदिकोभी दंड | परे प्रायश्चित्तको भ्राता वा अन्यकोई मित्र- और प्रायश्चित्तकी कल्पना करनी सोई पठी-जन करें यह कह कर कहा है इससे अत्यंत नैसीने कहा है कि इंता अनुभंता उपदे- बालक इसका न अपराध है नपातकहै- शका कर्ता संप्रतिपादक प्रोत्साहक सहा- न प्रायश्चित्त है-न राजदंड है-वह शंखका यक तैसेही मार्गका उपदेशक आश्रय और कथनभी संपूर्ण प्रायश्चित्तके प्रभावका बोध शस्त्रका दाता भोजनका दाता और समर्थ हो- कहे कुछ सर्वथा प्रायश्चित्तके अभावका बोध- कर विकर्मीयोंका उपेक्षक दोषोंको जो कहै | क नही आश्रमविशेषकी अपेक्षाको छोडकर अनुमोदक ये सब अकार्य करनेवाले हैं। श्रवण किये जो ब्राह्मणको न मारे ब्राह्मण इनके प्रायश्चित्तकी और शक्तिके अनुप्तार क्षत्रिय वैश्य मदिरापान न करें इत्यादि वचनें इनके दंडकी कल्पना करे तसेही बालक में अवस्था विशेषकी अपेक्षाको छोडकर और वृद्धोंको पापका कर्ता होने परभी प्रायश्चित्त (पाप) कहा है इससे उसके आधेही दंडकी कल्पना करें क्योंकि अंगिरी | प्रायश्चित्तको पिता आदि करें क्योंकि की स्मृति है कि जिसके अस्सीवर्ष हो और पुत्रोंको पैदाकर उनका संस्कार वेद पढाकर जो सोलहसे न्यून वर्षका बालक हो और स्त्री | उनकी जीविकाका प्रबंध कर इसे वचनसे रोगी ये सब आधे प्रायश्चित्तके योग्य होते हैं | पिताही पुत्रकेहितांचरणका अधिकारी है और तैसेही बारह वर्षसे पहिले और अस्सीवर्षके जहां कही एक ब्राह्मणके वधर्म प्रयोजकहो पोछे पुरुषोंका आधा और त्रियोंको चोथाई और दूसरे ब्राह्मणके वधकासाक्षात्कर्ता हो- प्रायश्चित्त होता है तैसेही अनुपनीत बालक जाय वहां गुरु लघु प्रायश्चित्तके संनिपात (मेल) में बारह वर्षका जो गुरु प्रायश्चित्त-. :) के अंतर्गत (मध्य) का प्रयोगकका, लघु १ प्रयोजयितानुमता कर्ता चेति स्वर्गनरफफ- लेषु कर्मसु भागिनो भूय आरभते तस्मिन्फलविशेषः। जाती है-कदाचित् शंका करो कि इसी प्रायश्चित्त है उसकी प्रस्तंगसे, सिद्धि हो २ इंता मतोपदेष्टा च तथा समातिपादकः । प्रोत्सा. हका सहायश्च तथा मार्गानुदेशकः । आश्रयः शत्रदाता १त्रीणाम मदातव्यं वृद्धानां रोगिणां तथा । च मक्तदाता विकर्मिणाम्। उपेक्षकः शक्तिमांवेदोष- | पादी पालेषु दातव्यः सर्वपापैथ्वय विधिः । वक्तानुमोदकः। अकार्यकारिणस्वेषां प्रायश्चित्तं प्रक- २ उनैकादशवर्षस्य पंचवर्षात्परस्य च । प्रायधित्तं ल्पयेत् । यथाशक्त्यनुरूपं च दण्ड चैषां प्रकल्पयेत् । चरेद्भाता पिता वान्यासुजनः । अतो चालतरस्या- ३ अशीतिर्यस्य वर्षाणि चालोचाप्यूनपोडशः । प्राय- स्य नापराधो न पातक । राजदंडी न तस्यास्ति. मायश्चित्त न विद्यते। विसार्धमहंति लियो रोगिण एवच । तथा! अक्तुि ३ ब्राह्मणो न हतव्यस्तस्माद्राह्मणराजन्यों वेश्यश्वः द्वादशादिशातरमेव वा । अर्थमेव भवेत्युंमा सुरां न पियेत् । तुरीयं तत्र योषिताम् । ४ पुन्नानुपाय संस्कृत्यवेदमध्याप्य वृत्ति विध्याद।।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५३५) प्रकार लघु कल्पसे बडे प्रायश्चित्तकीभी शक्त है वह बुद्धिमान् गौदानकर और गो सिद्धि हो जायगी सो ठीक नहीं क्योंकि यहां ओंके अभावमें उनका मूल्यदे इसमें संशय तो महान्के मध्यमें छोटेके आजानेसे उस- | नहीं इसे न्यायसे प्रत्येक प्राजापत्यमें एक २. के करने में विशेषता नहीं जाती इससे प्रसंग धेनु दी जायगी तो धेनुभी तीनसो साठ हो- से कार्य सिद्धेि जानी जाती है और लघुके गी-और सहस्त्र न होंगी इससे पूर्वोक्त विष- मध्यमें महान आ नहीं सकता इससे प्रसंग- यही युक्त है-और जो शंखको पचन है की आशंका कहां-कदाचित् शंका करोकि पूर्वके समान अज्ञानसे चारों वर्गोमें ब्राह्मण- चैत्रके वधसे पैदा हुये पापको निवृत्तिके को मारकर बारह वर्ष छ:-तीन-डेठ वर्ष लिये किये प्रायश्चित्तसे विष्णमित्रके वधसे | व्रतीको वतावे और उनके अंतमें सहस्त्र- पैदा हुये पापकी निवृत्ति कैसे होगी सो टोक पांचसो-अढाईसौ-सवासो-गा वर्णों के क्रम- नही-चत्रका उद्देश (नाम ) को अतंत्रत, सेदे- बारहवर्ष और सहस्र गो के समुच्चय- है-इससे जैसे काम्य नियोगको सिद्धिके का चोधक है वह आचार्य आदिकी हत्याके लिये स्वार्थ किये आग्नेय आदि नित्य | विषयमें देखते योग्य है क्योंकि प्रायश्चित्त नियोगकी सिद्धि होती है उसी प्रकार लघु अत्यंत गुरु है-सोई दक्षने यह कहा. प्रायश्चित्तकेभी कार्यको सिद्धि हो जायगा ब्राह्मणसे भिन्नकोदेना समान है-ब्राह्मणव- और जो मध्यम अंगिराका वचन है कि नाममात्र ब्राह्मण ) को देनेका फल दूना सहन्नगी सुपात्र ब्राह्मणोंको विधिसे दानकर इनका फल अक्षय होता है-सम दूना सह- हे आचार्यको लक्षगुना और वेदपाठीको तो ब्रह्मा सब पापोंसे छुटता है वह वचन सवनमें टिके गुणवाले ब्राह्मणके विषयमें है गुना अनंत फल दान में और हिंसामें और यहभी-सबनमें टिक ब्राह्मणकोदनादत प्रायश्चित्तको कह कर इसी विषयमें कहा है होता हैं-तैसेही आपस्तंब ने द्वादश वर्षके कह इस वाक्यसे विधान किया जो द्वादश कि गुरु और श्रोत्रियको हतकर यहीं व्रत वर्षकी व्रतचर्या से दूना प्रायश्चित्त उसके क- रनेमें असमर्थको जानना क्योंकि प्रायश्चित्त उत्तम उत्साहसे करें-उसमें जीवन पर्यंत अत्यंत गुरु है और आवृत्ति न किये चा- व्रतकी आवृत्ति करनेसे जब तिगुने वा चो- रहवर्षके विषय में नहीं है क्योंकि यहां पार-गुनेकी संभावनाहो तहां समर्थ और बहुत ह दिनों में एक २ प्राजापत्य होता है इस १ प्राजापत्यक्रियाशक्ती धेनु दद्याद्रिचक्षणः ।ग- गिनतीसे तीनों साठ प्राजापत्य होते हैं- वामभाने दातव्य तन्मूल्य वा न संशयः । यद्यपि प्राजापत्य व्रतके अंतमें तीनदिन २ पूर्ववदमतिपूर्व चतुर्यु वर्णेषु विप्र प्रमाप्य उपवास अधिक है-तथापि यहां वनका वास द्वादशवरसरान् पट् बीन् साईसवत्सरं च व्रतान्यादि- जटाकाधारण वनफलोंका भोजन आदि वि- शेत्तेपामते गोसहस तदर्धं तस्यार्धं तद दद्यारसपा शेष तपसे युक्तको उपवासक अभावमभी वर्णानामानुपूर्येण । एक एक द्वादशाह व्रतको प्राजापत्यकी तु- शतसादनं प्रोत्रिय दत्तमक्षयम् । समं द्विगुणसाहस्र- ३ सममत्राह्मण दान द्विगुण माह्मण अवे आचार्य ल्यता है-तिससे प्राजापत्य क्रियामें जो अ- मानत्यं च यथाक्रम । दाने फलविशेषरस्यादिसायां त १ ग सहस विधिवत्पात्रेभ्य प्रतिपादयेत् । ब्रह्म- | द्रदेव हि । हा विप्रमुच्येत सर्वपापेभ्य एव च । ४ गुरु हत्वा श्रोत्रियं वा एतदेव तमुत्तमोत्त- २ द्विगुण सवनस्थे तु ब्राह्मणे व्रतमादिशेत् । मादुच्यासाचरेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५३७) स्वयंभी सान करके ब्रह्महत्यासे शुद्धिको) वारह गोऑकि प्राणोंकी रक्षा करनेसे चीचमें प्राप्त होता है- और मानभी अपने पापको दो-और अश्वमेधक अवभृधनानसे शीघ्रही विदित करके कर-क्योंकि मर्नु (अ. ११ | शुद्ध होता है इसीसे मनु (अ० ११ श्लो श्लो.८२)ने कहा है कि भूमिदेव (ब्राह्मण)| ७८१७९।८१ ) ने बारह वर्षके प्रायश्चित्तकी ऋत्विन उनके और राजा नरदेवके समुदा- | गुणविधि प्रकरणमें ब्राह्मणको रक्षा आदिको समें अपने पापको विदित करके अश्वमेधके | कहकर धारह वर्षके प्रायश्चित्तकाही उपसं- अवभृथमें स्नान करनेसे शुद्ध होता है यदि हार ( समाप्ति ) किया है कि मुंडन करा- घे ब्राह्मण आज्ञा देदें क्योंकि शंखेकी कर वनमें वस-ब्राह्मण और गौके लिए शीघ्र स्मृति है कि अश्वमेधके अवभृथमें जाकर प्राणोंको त्यागे वा गो ब्राह्मणकी रक्षा करे तो और ब्राह्मणोंकी आज्ञास स्नान करके शीघ्र-शीन ब्रह्महत्यासे छुटता है-इस प्रकार ही पवित्र होता है-यहां अश्वमेधक अवभृथ- सदेव दृढ है व्रत जिसका ऐसा ब्रह्मचारी का ग्रहण-अमिष्टोमके मध्यके पंचदशरात्र | बारह वर्षकी समाप्तिपर ब्रह्महत्याको नष्ट आदि जो अन्ययज्ञ है और अग्निष्टोमकी करता है-कदाचित् कोई शंका करे कि समाप्ति करनेवाले जो सर्वमेध आदि हैं | ब्रह्महत्यासे शुद्धिको प्राप्त होता है यह फल उनकामी उपलक्षण है-क्योंकि गौतमकी | ब्राह्मणकी रक्षा और बारह वर्षके प्रायश्चि- स्मृति है कि अश्वमेधके अवभृयमें या | सका एकही है-इससे दोनोंकी स्वतंत्रता अग्निष्टोमके अंतर्गत अन्ययज्ञमें स्नानसे युक्त है अंग नही और प्रधानका विरोधी शुद्ध होता है-यह अवभृथस्नान-उस ब्रह्म- होनेसेभी अंग नहीं कह सक्ते क्योंकि प्रधा- हाके मत समाप्तिकी अवधि कही है| नका अनुग्राहक अंग होता है-और यह जिसने द्वादश वर्षके प्रायश्चित्तका प्रारंभ ] प्रारंभ किए हुए घारह वर्षके प्रायश्चित्तका कररक्खाहो और यथा कथंचित् जो ब्राह्मणों विधान नही-जिससे उसके कार्य, निधा- के प्राणों की रक्षाकर रहाहो-जसे -सारस्वत | नजाना जाय-जैसे सत्र (समाज) को समें पिलखनका प्रस्रवण (सुवा ) प्राणों- ] अवगुरण (नष्ट) करके विश्वजित् यज्ञ करे को रक्षा-एक बैल-सोगो-सहस्र गौऑकन इस वाक्य में सत्रके प्रयोगमें प्रवृत्त हुए होने परदे वा गृहपति (स्वामी ) के मरनेमें | उस मनुष्यको जो सत्रकी समाप्ति करने में सर्वस्वको दे-यहां है- कुछ स्वतंत्र दुसरा असमर्थ है विश्वजितका विधान है-इससे प्रायभित नही है सोई शखने कहा है कि अग्निप्रवेश लक्ष्य भाव-आदिके समान बारह वर्षमें शुद्धिको प्राप्त होताई या ब्राह्मण स्वतंत्रताही युक्त है-कदाचित् शंका कोकि 1 शिष्ट्वा या भूमिदेवानां नरदेवसमागमे । स्वमे के मध्य में पढ़े हैं इससे उसके अंग है-सो वेभी चारह वर्षेके प्रायश्चित्त और उपसंहार- नोभूपे नाया हयमेधे विमुच्यते । २ भयधावभूषं गला तत्रानुशातः प्रातः सधः ठीक नही-जिससे मध्यमे पाउ होनेपरभी पूतो भवति। कृतवापनी वा नियसनायामागाथें गायें वासवः ३ भाषयावये यान्याप्यमिष्टुदन्तश्च । प्राणापरित्यजेत मुच्यते ममहत्यावा गोता गोमा- से परे भुदि प्रात्यंतरा या प्राम पस्य च । एवं तो निरं प्रमचारी समाहितः । भोवरिता गर्ग या बादशनां परित्राणात्मय एवाय. समाते द्वादरे व प्रमहत्यां योनि । ३ सत्रायानगरी विश्वनिता यजेड। परमपयानास पूतो मौत।
(५३८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रयोजनका ज्ञान होनेसे प्रयोजनकी आकां- दीर्घतीवामयग्रस्तंब्राह्मणंगामयापिया क्षाका अभाव है इससे परस्पर अंगागिभाव दृष्टापथिनिरातकंकृत्वातुब्रह्महाशुचिः२४५ युक्त नही जैसे सामिधेनी प्रकरणके मध्यमें वर्तमान जो अग्निके ज्ञाता हैं उनको अग्नि- पद-दीर्घतीनामयग्रस्तं २ ब्राह्मणं २गां२. के भली प्रकार ज्वलनके प्रकाश होनेसे | अथ-अपि-वा- दृष्ट्वाऽ-पथि ७ निरा- और सामधेनीके साथ एक कार्यक कारक | तंकं २ कृत्वा-तु-ब्रह्महा १ शुचिः१॥ होनेसे सामधेनीके अंग नही-और अग्निप्र योजना-दीर्घतीयामयग्नस्तं ब्राह्मणं अथ वेश आदि निश्चयसे बारह वर्षके प्रायश्चित्तक गां दृष्ट्वा तुपुनः पथि निरातकं कृत्वा ब्रह्महा मध्यमें पढेभी नहीं-क्योंकि वसिष्ठ गौतम शुचिः भवति ॥ आदिकोन ये सब बारह वर्षके प्रायश्चित्तसे पूर्वही पढे है-यही स्वातंत्र्य प्रकट करनेको देहमें व्यापक और दुःसह जो कुष्ठ आदि तात्पर्यार्थ-दीर्घ अर्थात् बहुत दिनतका मनुने वाक्य २ में वा शब्द पटा है (अ०११ व्याधि उससे ग्रस्त (पीडित ) वा उसी प्र- श्लो० ७३ ) कि वा शस्त्रधारीका लक्ष्य होय कारको गाको मार्गमें देखकर और उसके वा अपने देहको अग्निमें डाल दे-तैसेही रोगको दूर करके ब्रह्महत्यारा शुद्ध होता मर्नु (अ०११ श्लो० ८६) ने प्रायश्चित्तकादी हैं कदाचित् शंका करोकि ब्राह्मणकी रक्षासे उपसंहारकिया है कि इनमें कोईसी विधिमें शुद्ध होता है यहां कही हुई ब्राह्मणकी र टिककर सावधान हुआ विप्र ब्रह्मज्ञानी क्षाको यहां फिर क्यों कहते है कि ब्राह्मण होकर ब्रह्महत्याके पापको दूर क- और गोकी रक्षासे शुद्ध होता है यह बात रता है- इसीसे अग्निप्रवेश आदिको सत्य है पिछले वचनमें अपने प्राणोके त्या- स्वतन्त्रताही युक्त है-इससे ब्राह्मणको गसे ब्राह्मणकी रक्षा कही और अब औषध रक्षा आदिके अंग होनसे एक फल नही इस शंकाका समाधान करते है कि आदिसे कही यह विशेष है इसी अभिप्रायसे इसका परिहार यह हैं ब्राह्मणको मृत्युसे छ- मर्नु (अ० ११ श्लो ८० )ने कहा है कि टाकर पीच ही छुटता है इत्यादि पूर्वोक्त ब्राह्मण वा ब्राह्मणके निमित्त प्राणों की रक्षासे शंख वचनप्ते अंगता प्रतीत होती है विद्य- शुद्ध होता है । मान अंगकोही प्रधानके द्वारा फलका संबंध भावार्य-दो और महाकठिन रोगसे असे होता है कदाचित कहो प्रधानका विरोध है हुए ब्राह्मण और गोको देखकर उने अच्छा सोभी नही जिससे प्राह्मणकी रक्षापर्यंत व्रत करके ब्रह्महत्यारा शुद्ध होता है ॥ २४५ ।। का करमा फलका साधन विधान किया है- आनीयविप्रसर्वस्वहृतंपातितएवया ॥ इससे विरोध नही॥ तनिमित्तंशतःशस्त्र वनपिविशुद्धयति । मागर्य-ब्राह्मण और मारहगोभीको रक्षा और अश्वमेध अवभृय स्नानसे ब्रह्माद- तित: १ एवा-या:-तन्निमितं २ क्षतः । पद-आनीया-विप्रसर्वस्वं २ दतं २ था- त्यारा शुद्धिको प्राप्त होता है ॥ २४४ ॥ शमा जीवन् १ अपि-विशुध्यति कि-॥ मशिन वारपारमारामान मनाया। योजना-इतं विमसर्यस्व आनीय चारः Pोपमा चिनिसमादित:- FCI परमाता। विमा निमित दासणारा मुफो।
प्रायश्चित्ताध्याय मायाश्चत्तप्रकरण ५ (५३९) , . पातितः वा तन्निमितं शस्त्रः क्षतः पुरुषः । प्रभृति मजांता तनुं एभिः मंत्रः यथाक्रम. जीवन् अपि विशुध्यति ।। जुहुयात् ॥ तात्पर्याय-सर्वस्वकी चोरीसे दुःखी हुए तात्पर्याय-लोमभ्यः स्वाहा इत्यादि में- ब्राह्मणकै भू-सुवर्ण आदि चुराए हुए सं-त्रोंसे लोमांसे लेकर मन्नापर्यंत अपने देहका पूर्ण द्रव्यको लाकर जो रक्षा करता है वह होम को-इस वचनमें इति शन्द करणत्व शुद्ध होता है-अथवा-धनके लाने में प्रवृत्त | दिखानेके लिये है और एवं शन्द प्रकारके हुआ चारोन मार दिया हो या ब्राह्मणों के सूचनार्थ है और हि शब्द अन्य स्मृतियों में सर्वस्व लाने के लिये चोरोंसे युद्ध करता प्रसिद्ध त्वचा आदिका जो प्रभृति शब्दसे हुआ शत्रोंसे क्षत ( मृतककी तुल्य) हो- लिये है उनके द्योतन ( जताना )के लिये है जाय तो जीता हुआभी शुद्ध होता है-यहां । फिर वे लोम आदि होमके द्रव्य चतुर्थी वि- शस्त्रैः पद बहुवचन बहुत क्षत (पाय) भक्तिसे दिखाये है स्वाहाको अंतम पटकर की प्राप्तिके लिये है इसीसे मर्नुने (अ० ११ । उनमंत्रोंसे होम कर और वे होम करने के मो०८०) तीन बार पद ग्रहण किया है कि द्रव्य जो लोम त्वचा लोहित मांस मेदा तीनवार रोकनेवाला या सर्वस्वको जीत कर स्नायु अस्थि मजा आट हैं इससे आठही शुद्ध होता है- इन दो श्लोकोमें जी ये पांच | मंत्र होते है सोई वसिष्ठने कहा है कि ब्रह्म कल्प कहे है वे ब्राह्मणकी रक्षा रूप है- हा वा भ्रूणहा अग्निका स्थापन करके होम इससे ब्राह्मणको छुटाकर बीचमेंदी शुद्ध कर कि लीमोंको मृत्युके निमित्त होमताई होता है इस शंख वचनके संग कोहीकरण और लोमोंके संग मृत्युको मिलाताहूं यह प्र- (मेल) होनेसे पारद वर्षको अवधिमें विनि- थम आहुति है १ त्वचाको मृत्युके लिये हो. योग होनसे स्वतंत्रता नहीं है ।। मताहूं त्वचाके संग मृत्युको मिलाता हूं यह भागार्थ-चुराये हुये ब्राह्मणके सर्व धनको दूसरी २ लोहितको मृत्युके निमित्त होम टाकर पा लौटाने के समय चाफ सकाशसै ताहूं लोहितके संग मृत्युको मिलाताहूं यह मरनेसे-वा धनके लौटाने के निमित्त शस्त्रांके तीसरी ३ मांसको मृत्युके निमित्त होम अनेक घाव होनेसे वारद वर्षके मध्यमेंभी ताहूं मांसके संग मृत्युको मिलाताहूं यह पवित्र होता ॥ २४६ ॥ चौथी 2 मेदाको मृत्युके निमित्त होमताहूं टोमभ्यःस्वाहत्येपदिटोमप्रभृति तनुम् । मेदाके संग मृत्यको मिलाताहूं यह पांचवी मजांतांजुहुयादापिमन्त्री भिषयाक्रमम् ॥ १ प्रदादानिमुपसमाधाय जुहुयारीमानि मृत्योरोम पद-लोभभ्यः ४ स्वादा-इति:-एवं-हि- लोमभिर्मगुं वासय इति मथमा १ रनमृत्योहोमि- लोमप्रभूति-का-तनुम् २ मनांता २ जुहु- सपा मृत्यु वाशय इति द्वनीयाम्-२ सोइन मृत्योर्जुन 'यात् कि-वा:-अपि-मः३ एभिः ३ यथा-होमि टोहिनेन मृत्यु वाध्य इति नागम् ३ मां- सानि मृत्योर्जुहोमि ममिथु बासय सन धतुर्थीम् ४.. योजना-लोमभ्यः स्वादा इत्येवं लोम | मेदोमृत्योदोम मेदसामुगु भाप इति पंचमान ५. सानि भूतो हामि सायभिमृत्यु यार इति - हम अपनि मृत्योर्नुहोमि भरिभि यु वाशयfantीतदादास्वहसमाधिपाया। पाने सप्तमीम् . मामृतोदाम मामि २रावाप्रमोपमितता। वासपमान 1 (५४०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । स्नायुओंको मृत्युके निमित्त होमताहूं दें और भग्निको शांत कर दे-तैसेही का- स्नायुओंके संग मृत्युको मिलाताहूं यह छठी त्यायेनकी स्मृति है कि यदि देवसे अग्नि- ६ अस्थियोंको मृत्युके निमित्त होमताहूं होत्री महापातकी हो जाय तो उसके पापों- अस्थियोंके संग मृत्युको मिलाताहूं यह के नाशतक युक्त होकर पुत्र आदि अग्नि- सातवी ७ मज्जाको मृत्युके निमित्त हो- | यों की रक्षाकरे-जो प्रायश्चित्त न करे वा मताहूं मज्जाओंके संग मृत्युको मिला- | करताहुआ मरमाय तो गृह्याग्निको शांत ताहूं यह आठमी-आहुती है-यहां लोम | करदे और सामग्री सहित श्रीताग्निको जल- आदि देहका होमकर यह कहनेसे लोम में फेंकदे-और देहका अग्निमें फेंकना तो आदि-होमके द्रव्य जाने गये-लोमभ्यः स्वा- | तीन बार उठ २ कर नीचेंको मुखकरके हा यह चतुर्थीका निर्देश होने परभी लोम करना-सोई मनु (अ० ११ श्लो०७३ )ने भादिकोंको देवताओंकी कल्पना नहि करते कहा है अथवा अपने देहको तीनवार नीचे हैं क्योंकि व्यके नाम लेनेसेही मंत्र होम | को शिर किये जलती अग्निमें फेंकदे-गौत- के साधन हो सकते हैं-किंतु लोमभिर्मृत्यु | मनेभी यहां विशेष दिखाया है तीनवार वाशये इत्यादि वसिष्ठके मंत्रोंके देखनेसे भोजनके अभावसे कृश है देह जिसका ऐसे मृत्युकोही हविःका संबंध प्रतीत होता है | ब्रह्महाका अग्निमें गिरनाही प्रायश्चित्त हैं- 'इससे मृत्युकोही देवताकी कल्पना करते सोई कोठक श्रति है कि भोजनके त्यागसे हैं इससे लोम आदिकोंको सामर्थ्यसे अ- कृश ब्रह्महा अग्निमें प्रवेश करे-यह मरणांत पने खड्गसे काटकर मृत्युके निमित्त आठ प्रायश्चित्त जानकर करनेके विषयमें है सोई आहुतियोंसे होम करके अंतमें देहको अ- मध्यम अंगिराने कहा है कि पुद्धिमानोंने मिमें फेंकदे-इससे जो किसीने कहा है कि जो प्राणांत प्रायश्चित्त कहा है वह जानकर जहां हविः नही कहा वहां होम घीकी ह- करनेमें जानना इसमें संशय नही-तैसे हो विसे होते हैं वह विना विचारे कहा इससे जो मनुष्य किसी प्रकार जानकर महापाप त्यागने योग्य है-जुहुयात (होमकर) इस- करे उसकी शुद्धि पर्वतसे और अग्निमें पड़- से अग्नि आजाता-भ्रूणहा अग्निका स्थापन नेके विना नही देखी-यह प्रायश्चित्त स्वतंत्र करके- यहां जो पुनः अग्निका ग्रहण है है-ब्राह्मणकी रक्षा आदिके समान बारह व- वह लौकिक अग्निकी प्राप्तिके लिये है और यह युक्तभी है क्योंकि पतितोंकी अग्निकी १ महापातकसंयुक्तो देवात्स्यादप्तिमान्यदि । पु. प्रतिपत्ति (गति ) कही है क्योंकि उशनाकी वादिःपालयेदमीन्युक्त यादोषसंक्षयात् । प्रायश्चित्तं नकु. स्मृति है कि जो आहिताग्नि ब्राह्मण महा-द्यिः कुर्वन्वा म्रियते यदि। गृह्य निर्वापयेीतमप्स्व- पातकी हो जाय और प्रायश्चित्तोंसे शुद्ध स्येत्सपरिछदम् । 'न होय तो उसकी अग्नियोंकी क्या गति २ पास्यदात्मानमग्नी वा समिद्धे त्रिरवाशिराः । करे-बुद्धिमान् मनुष्य वेतानको जलमें फेंक- ३ प्रायश्चित्तमग्नी सक्तिब्रह्मास्तिरवस्यातस्य । ४ अनशनेन फर्शितोऽनिमारोहेत् । १ अनादिष्टव्यवादाज्यहविष्का होमाः- ५प्राणांतिकं च यत्प्रोक्तं. प्रायश्चित्तं मनीषिभिः । २ आहितामिस्तु यो विमो महापातकभाग्भवेत् । तत्कामकारविषय विज्ञेय नात्रसंशयः । यः कामतोम- प्रायश्चितैर्न शुद्धयेत तदनीनां तु का गतिः । वैतानं | हापापं नरः कुर्यात्कयंचन । न तस्य शुद्धिनिदिष्टा भृ- दग्निपतनाढे। 1 अक्षिपेत्तोये शालानिं शमयेद्बुधः- प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण'५ (५४१) कद आये ॥ के प्रायश्चित्तके अंतर्गत नहीं-यह पहिले करै अश्वमेध यज्ञका करना सार्वभौम (च- क्रवर्ती) क्षत्रियको है क्योंकि पराशेरकी भावार्थ-लोमभ्यः स्वाहा इत्यादि मंत्रोंसे स्मृति है कि महीपति क्षत्रिय, अश्वमेध य- लोम आदि मज्जा पर्यंत अपने देहको क्रमसे ज्ञकरै-और असार्वभौम उक्त यज्ञको न करे अग्निमें होम करे ॥ २४७॥ इस वचनमें सार्वभौमसे भिन्नको अश्वमेध करनेका निषेधभी है-और सार्वभौमको अ- संग्नामेवाहतोलक्ष्यभूतः शुद्धिमवाप्नुयात्।। श्वमेधका करना-जानकर करनेमें मरणांति- मृतकल्पः प्रहारातौजीवनपिविशुद्धयति ॥ | कके स्थान में जानना-क्योंकि इस वचनसे पद-संग्रामे ७ वा:-हतः १ लक्ष्यभूतः१ / यमने-मरण कालमें अग्निप्रवेशके तुल्य म- शुद्धिं २ अवाप्नुयात् क्रि-मृतकल्पः १ प्रहा- हाकतु अश्वमेधको दिखाया है कि महा रातः १ जीवन् १ अपि:-विशुध्यति कि पातकके कर्ता चार जानकर अग्निमें प्र-- योजना-या संग्रामे शस्त्रभृतां लक्ष्यभूतः | वेश करके वा महाकतुमें स्थित होकर हतः सन् शुद्धिं अवाप्नुयात्-प्रहारातः मृत- शुद्ध होते हैं-और स्वर्जित आदि यज्ञोका कल्पः जीवन् अपि विशुध्यति- जिसने प्रथम यज्ञ किया और जो अ- तात्पर्याय-संग्राम ( युद्धभूमि ) में दोनों ग्निहोत्री हो उस त्रैवर्णिक (द्विज') के दलोंने प्ररे हुये चाणोंके पडनेका लक्ष्य के संग है अर्थात् चाहे वारह वर्षका प्राय- लिये विकल्प हो दश वर्षके प्रायश्चित्त- (निशाना ) हो कर मरनेसे शुद्धिको प्राप्त श्चित्त करें चाहे स्वर्जित आदि यज्ञ करे- होता है अथवा बडीभारी वेदना ( दुःख) और वह स्वजित आदिके लिये आधान वा मर्मके प्रदारसे जिससे ऐसा मृतकके तुल्य मूर्छित होकर जीवता हुआ शुद्धिको प्राप्त द्विजातियोंके का अधिकार नहीं है-कदा प्रथम यज्ञको न करे क्योंकि पतितका होता है और लक्ष्य होनाभी-मैं प्रायश्चित्ती चित् कहोकि संध्योपासनके समान कुछ हूं-यहकहकर बुद्धिमान् धनुष विद्याके जा- विरोध नहीं यह युक्त नही है क्योंकि नने वालोंके संग्राममें अपनी इच्छासे करना आधान ऑदि उत्तर ऋतुके शेष नही हैं राजा अपने बलसे लक्ष्य उसको न बनावे वे आधान आदि दक्षिणाकी न्यूनता वा सोई मर्नु (अ० ११ श्लो० १७) ने कहा है अधिकताके आश्रयणसे बारह वर्षकै प्राय- कि वा अपनी इच्छासे बुद्धिमान् शस्त्रधारि- श्चित्तके योग्य जो साक्षात् मारनेवाले हैं. यौंका लक्ष्य हो जाय-यहभी मरणांतिक उनके लिये समझने योग्य हैं। होनसे साक्षात् महापापक कतांको जानकर भावार्थ-अथवा संग्राममें शस्त्र धारियांका करनेके विषयमें हैं-अपि शब्दके देनेसे अलक्ष्य होकर मरनेसे शुद्धिको प्राप्त होता है श्वमेध आदिसेभी शुद्ध होता है सोई मर्नु और शस्त्रोंके प्रहारोसे दुःखी हुआ मृतककै (अ० ११ श्लो० ७४)ने कहा है कि वा अ समान मूर्छित होनेसे जीवता हुआभी श्वमेध-स्वर्जित-गोसव-अभिजित्-विश्वजित | शुद्धिको प्राप्त होताहै ॥ २४८ ॥ निवृत्-अमिष्टुत् इन यज्ञोंसे यमन ( पूजन) १ यजेत वाश्वमेधन क्षत्रियस्तु महीपतिः । लय शवभृतां वा स्याद्रुिषामिच्छयात्मनः। २ नासार्वमीमो यजेत। २ यर्जत वाश्वमेधेन स्यर्जितागोसवेनच । अभिजि ३ महापातस्करिश्वत्वारो मतिपूर्वकम् । अग्नि- विश्वजिद्भयो वा त्रितामिटुतापिता। प्रविश्य शुध्यति स्पिसा या महाते कती।
(५४२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । अरण्येनियतोजत्त्वात्रिर्ववेदस्यसंहिताम् ॥ उक्तके करनेमें जो असमर्थ है उसको कर: शुद्धयेतवामिताशीत्वाप्रतिस्रोतासरस्वतीम् | नेका चोधक है ॥ पद-अरण्ये ७ नियतः १ जावा-निः- भावार्थ-सनमें प्रमित भोजन करता हुआ वैऽ चेदस्य ६ संहिताम्र शुध्येत कि-वा- तीन वार वेदकी संहिताको जपकर वा परि- मिताशी १ इत्वाऽ- प्रतिस्रोत:- सरस्वतीम् २ | मित भौजी सरस्वती नदी में प्रतिस्रोत गमन योजना-अरण्ये नियतः वेदस्य संहिताम् करके ब्रह्महा शुद्ध होता है ।। २४९ ॥ त्रिः जप्त्वावा प्रतिस्रोतः सरस्वतीम् मिताशी पात्रेधनयापर्याप्तदत्त्वाशुद्धिमवाप्नुयात् ॥ सन् इत्वा शुद्धयेत ॥ आदातुश्चविशुद्धयर्थमिष्टिवैश्वानरीतथा ॥ तात्पर्यार्थ-अरण्य (निर्जन प्रदेश) में पद-पात्रे धनंर वाऽ - पर्याप्तम् दत्त्वा- नियतभोजन करता हुआ तीन वार मंत्र शुद्धि २ अवाप्नुयात् कि- आदातुः ६ चः- ब्राह्मणरूप वेदकी संहिताका पाठ करके | विशुद्धयर्थ २ इष्टिः १ वैश्वानरी १ तथा:- ॥ ब्रह्महा शुद्ध होता क्योंकि मनु (अ० ११ श्लो० ७७) ने कहा है कि नियताहार होकर योजना-पाने पर्याप्तं धनं दत्त्वा शुद्धिं अवा• । जपे यहां संहिताका ग्रहण पद क्रमके इष्टिः कथिता-प्रायश्चित्तं भवतीतिशेपः ।। मुयात् चपुनः आदातुः विशुद्धयर्थ वैश्वानरी निषेधार्थ है अथवा परिमित भोजन करता हुआ प्लाक्ष प्रस्रवण (झरना )से लेकर तात्पर्यार्थ-विद्या और आचरणसे युक्त पश्चिमके समुद्रतक स्रोत स्रोतके प्रति पूर्वोक्त लक्षणवाले सुपात्रको गो भूमि सुवर्ण सरस्वती नदीमें गमन करनेसे शुद्ध होताहै आदि जीविकाके लिए पूर्णधन देकर ब्रह्महा और भोजनभी हविष्यका करें क्योंकि मर्ने शुद्धिको प्राप्त होताहै और जो उस धनका (अ० ११ श्लो० ७७ ) को स्मृति है कि प्रतिग्रह लेता है वह वैश्वानर देवताके निमि- इविष्यका भोजन करता हुआ प्रतिस्रोत तयज्ञ करनेसे शुद्ध होता है यहभी आहिता सरस्वती नदीमें विचरे-यह वेदका जप मार- | नि ( अग्निहोत्री ) के विषयमें समझना और नेवाले विद्वान्को और निर्धन अत्यंतगुण- अनाहिताग्निको उसी देवताके निमित्त चरु वान्को प्रमादसे निर्गुणके मारनेमें जानना होताहै आहिताग्निका जो धर्म है वही औपा- और सरस्वतीका गमन तो पूर्वोक्त विष- सन अग्निवालेका है वा शब्दके कहनेसे यमें विद्यासे रहितको समझना निमित्तीके | सर्वस्व वा सामग्रीसहित घरका दान करे-सोई लिये तो यह सुमंतुके वचनसे दिखा आये | मर्नु (अ०११ श्लो०७६) ने कहा है कि वेदके हैं कि तिरस्कार करनेसे निर्गुण ब्राह्मग मर- | ज्ञाता बाह्मगको सब धन वा सामग्री सहित जाय तो पूर्वोक्त प्रायश्चित्त करे और जो घरदे और यह पात्रको धनका दान उसको मर्नु (अ. ११ श्लो ७५ )का वचन है कि है जो निर्गुण धनवान्ने निर्गुणको माराहो अन्यतम वेदको जपकर सो योजन गमन | और ऐसेही विषयमें जिसके संग कुछ संब- करे वहभी वनमें नियत होकर इस वचनमें | ध न हो उसको सर्वस्वका दान और जिसके १जपेदा नियताहारः। संग संबंध हो उसको सामग्री सहित घरका । २ हविष्यभुग्वानुचरेत्प्रतिस्रोतः सरस्वतीम् । १ सर्वस्वं वा वेदविदं ब्राह्मणायशेषपादयेत् । धनंबा- ३ जीपस्वान्यतम वेद योजनानां शतं ब्रजेत् । जीवनायालं गृहं वासपरिच्छदम् ।
प्रायश्चिताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५४३) दान दे यह व्यवस्था है जो पराशने कहाहै | और अपने कर्मको कहे भिक्षाका भोजन कि चार विद्याओंसे युक्त ब्राह्मण विधिपूर्वक करे-दिव्य नदीयोंके संगम-तट-आश्रम- ब्रह्महत्यारेको समुद्रसेतुका गमन और गोष्ठ-पर्वत-झरन-तपोवन-इनमें विचर-स्था- प्रायश्चित्त बतावै सेतुबंधके मार्गमें चार-नपर वीरासनसे बैठे ऐसे वर्षदिनके पूरण वोंसे भिक्षाको मांगे और विकीयोंको होनेपर स्वर्ण-मणि-गो-अन्न-तिल-भूमिधी वर्ग दे और छत्र उपानहको त्यागदे और ब्राह्मणोंको देकर पवित्र होताहै-यह वचनभी यह कह कि मैं निदित कर्मी महापातकी मूर्ख धनवाले हन्ताको जानना-जो यह भिक्षाके लिए द्वारपर खडाहूं और गोकुल वसिष्ठका वचन है कि बारह दिन जलका गोष्ट ग्राम नगर तपोवन तीर्थ नदीयोंके | भक्षण और चारह दिन उपवास करे वहभी झरने इनमें अपने पापोंको प्रकट कर फिर उसके लिये है जिसके मनमें ब्रह्महत्याका वह ब्रह्महा सागर में जाकर और स्नान करके | निश्चय हुआ हो और मारनेकी इच्छाकी पातकसे छुटता है फिर पवित्र हुआ घर निवृत्ति है। और जो यह पत्रिशतका वचन आनकर ब्राह्मणभोजन और वस्त्रोंका दान है कि नपुंसक ब्राह्मणको मारकर शूद्र ह- 'पवित्र मंत्र जपसे पवित्र हुआ गृहमें त्याका व्रत करे वा चांद्रायण या दोपराक प्रवेश कर चार विद्यावाले ब्राह्मणको सो गौ प्रत करें-वहभी उस्त नपुंसकके विषयमें दक्षिणा दे ऐसे चातुर्विद्यकी अनुमतिसे जानना जिसका पुंस्त्व फिर न लोटसके शुद्धि को प्राप्तहोता है वह पराशरका | और जो जानकर मारा हो और इसी वि- कथनभी पात्रको पर्याप्त धन देकर इसके पयमें अज्ञानसे मारनेमें बृहस्पतिने कहाहे ही विषयमें है और जो यह सुमन्तुको कि जगतमें विख्यात अरुणा और सरस्व- वचन है कि ब्रह्महा वर्षदिनतक कुछ तीके संगममें तीन काल स्नान और तीन करे-नीचे सोवै-तीन बार स्नान कर-कालके उपवाससे शुद्ध होताहै-इसी प्रकार अन्यभी स्मृतियोंके वचनको ढूंढकर विष- चातुर्वियोपपत्रस्तु विधिद्रवात के । समुद्र तुगमन प्रायश्चित्त विनिदिशेत् । सेतुबंधपये भिक्षा चातु- यकी व्यवस्था जाननी-और समान वचनों यात्ममाहरेत् । वर्जयिस्य विकर्मस्था छनोपानाव- का तो विकल्प समझना-और द्वादश वर्षके जित: दुष्कतकर्मा मापातककारकः । गृहद्वारे- | प्रायश्चित्तसे धन धान्य पर्यत प्रायश्चित्त ब्रा- पुतिष्ठामि मिक्षार्थी प्रमघातकः । गोकलेपच गोष्टेषु ह्मणके लियेही-क्षत्रिय आदिको तो द्विगुण प्रामेषुनगरेषु च । तपोपनेषु तीधु नदीमत्रवणेषु च । आदिक है-सोई अंगिराने कहाँहे कि जो एतेष ख्वपयेदेनः पुण्यगत्वातु सागरं । महा विप्रमु- ब्राह्मणाका प्रायश्चितहे वह क्षत्रियों को दुगुना येत नाता तस्मिन्महोदधौ । तरा. पूना गृहं प्राप्य और वैश्योंको तिगुना और पर्वतके समान कुस्वा माह्मणभोजन । दरवावलं पवित्राणि पूतात्मा भविशेहहें । गवां वापिरात दयायाविद्याय दक्षिणा । 1 द्वादशरात्रयम्भक्षो द्वादशरात्रमुपवसेत् । एवं शद्धिमवाप्नोति चातुविधानुमोदितः । २ षण्ढतु त्रााणहत्ला दहत्या व्रतं चरेत् । २ प्रमहासंवत्सरं कृ चौधशायी विषवणी चांद्रायण वा कुवत पराकद्वयमेव च । कमविदको भेक्षाहारा दिव्यनाटिनसगमायमगोष्ठ ३ अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकवियते ।शुद्ध पतिपतवणतपोवनविहारीस्यात्स्थानी रामनी संवत्सरे विश्वणनायो त्रिाबोपोषितो द्विजः। পুর্ব ঘোণিঘালালমুদি মাগী। ४ पपंथा वामगाना तु सा एषां द्विगुणा मता । परातो भवति। वैश्यानां त्रिगुणा प्रोक्ता पक्ष व्रतं स्मृत । -- (५४४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । व्रत कहाहै अर्थात् ब्राह्मणको सभाके अनु- समान प्रायश्चित्तको करें-जैसे गृहस्थीयोंक सार व्रत करै-इससे मारने और मरनेवा- शौचसे दूना ब्रह्मचारियोको तिगुना वान लेके गुण विशेषसे ब्राह्मणोंको जो प्रायश्चित्त | प्रस्थाको और चौगुना संन्यासीयोंको-इस कहाहे वही उस गुणसे युक्त क्षत्रियको दुगु- वचनसे दुगुण आदि क्रमसे शोचकी वृद्धि ना तिगुना जानना-इसी प्रकार क्षत्रिय और. होती है इसी प्रकार प्रायश्चित्तको वृद्धि हो- वैश्य आदिकोभी हीनसे उत्तमके वधसे | ती है-ब्रह्मचारीको तो दुगुना प्रायश्चित्त सो- दोषके गौरवसे प्रायश्चित्तकी द्विगुणता आ-लह वर्षसे पूर्व २ समझना-क्योंकि सोलह दिकी कल्पना करनी-और दोपका गौरव | वर्षसे न्यून बालकको आधा प्रायश्चित्त इस दण्डके गौरवसे जाना जाताहै-सोई कहाँहै कि वचनंस कह आयेहैं-कदाचित् शंका करो प्रतिलोम अपवादोंमें दूना तिगुना दंड-और कि बारह वर्षके प्रायश्चित्तको चौगुना होने- वोंके अनुलोमसे उससे आधे २ की हानिसे पर मध्यमें विपत्तिकी शंकासे समाप्ति न होगी दंड होताहै-और जो चतुर्विंशति के वचन है और इससे किसीकी प्रवृत्ति ही न होगी सो कि जो बुद्धिमानोंने ब्राह्मणको प्रायश्चित्त | ठीक नहीं क्योंकि प्रायश्चित्तके प्रारंभ कर्ता- कहाहे उसका पादोन क्षत्रिय और आधा को मध्यमें भी पापका नाश होताही है-सोई वैश्य और एक पाद शूद्ध सब पापोमें करे-- | हारीतने कहा कि प्रायश्चित्तके निश्चयपर वहभी प्रतिलोम वीके किए वार प्रकारके जिस दिन कर्ता मरजाय उसी दिन इस साहसोंसे भिन्न विषयोंके विषयमें है-तैसेही लोक और परलोकमें पवित्र होताहै-व्यासने अनुलोमसे पैदा हुए मूर्दाभिषिक्तोंका प्राय- | भी कहाहै कि धर्मके लिए यत्न करता हुआ भित्त कल्पना करने योग्यहे और दण्डका | मनुष्य यदि न कर सके तो वह उसके न्यूनाधिक भाव वर्ण और जातिके ऊंच नी- पुण्यको प्राप्त होताहै इसमें संशय नहीं।। चसे दण्डका दान करे इस वचनसे कह भावार्थ-सुपात्रको पूर्ण धन देकर पातकी आयेहँ तिससे को ब्राह्मणके व- शुद्धिको प्राप्त होता है और धनके लेनेवाला धमें ब्राह्मणसे अधिक और क्षत्रियसे न्यून शुद्धिके लिए वैश्वानरी यज्ञ करे ॥ २५० ॥ आधा अधिक बारह (१८) वर्षका प्राय- श्चित्त होताहै-इसी रीतिसे प्रतिलोमसे पैदा यागस्थक्षत्रविड्यातीचरेब्रह्महणिव्रतम् । हुओंके प्रायश्चित्तके गौरवकी कल्पना करनी गर्भहाचयथावर्णतयात्रेयीनिपूदकः२५९ ॥ तसेही आअमियोंको अंगिरीने विशेप दिखा पद-यागस्थक्षत्रविड्याती १ चरेत् क्रि- याहै कि यदि आश्रमवाले गृहस्थोंको उक्त | ब्रह्महणि ७ व्रतम् २ गहा १ च यथा पापोंको करें तो ब्रह्मज्ञानसे पहिले शौचके वर्ण २ तथाऽ-आनेयोनिदपूकः १ ॥ योजना-यागस्थक्षत्र विड्याती ब्रह्मणि १ प्रतिलोमापवादेषु द्विगुणतिगुणोदमः। वर्णानामा नुलोम्यतु तस्मादा हानितः । १ एतच्छौच गृहस्थानां द्विगुणं ब्रह्मचारिणां नि-- २ प्रायश्चित्तं यदानात ब्राह्मणस्य। महाभिः । गुण वानप्रस्थानां यतीनां तु चतुर्गुणम् । पादोनं क्षत्रियः कुर्याद वैश्यः समाचरेत् । शूदः २ मायश्चित्ते व्यवसिते कर्ता यदि विपयेत । समाचोत्पादमशेपेवअपि पाप्मसु । पूतस्त दोषासाविहलोके परत्र च । ३गृहस्थोक्तानि पानि कुर्वन्त्यामिणो यदिशी ३ धर्मार्थ यतमानस्तु न चेच्छमोति मानवः। चवच्छोधनं कुर्युराग ब्रह्मनिदर्शनात् । प्राप्तीभवति तत्पुण्यमवै नास्ति सशयः । .
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५४५) लघु जो व्रतं चरेत् चपुनः गर्भहा तथा आत्रेयोनि- प्राप्ति हो जायगी-इससे स्त्री-पुरुष नपुंसक- पूदकः यथावर्ण व्रतं चरेत् ॥ रूपसे विना जानेभी ब्राह्मणके गर्भमात्रसे तात्पर्यार्थ-दीक्षणीय और उदवसानीय | पाए ब्रह्महत्याके व्रतको करे इससे यह पर्यंत सोमयाग करनेमें वर्तमान क्षत्रिय वै- | उपदेशका वचन सार्थक है और स्त्री पुरुष श्यको जो मारे वह उस व्रतको करे जो आदिके चिन्ह प्रकट होनेपरही यथायोग्य ब्रह्मदा पुरुषको बारह वर्षका कहा है यद्यपि प्रायश्चित्त होता है और जो आत्रेयी ( रज- याग शब्द सामान्य यागका वाची है तथापि स्वला )का वध करे तो वहभी आत्रेयीके यहां सोम यागको कहता है क्योंकि सवनमें ( वर्णानुकूल प्रायश्चित्तनत करे और रजस्व- गत क्षत्रिय वैश्यको मारे इसे वचनमें वसि-ला ऋतुस्नाताको आत्रेयी कहते हैं क्योंकी ठनें तीन सवनों से उत्पन्न सोमयागकोही भन एतत्-अपत्यं भवति ( इसमें यह सं- दिखाया है यहां गुरु और तान होती है ) यह वसिष्ठकी स्मृति है कि द्वादश वर्षे आदि ब्रह्महत्याके व्रतहैं उनकी व्यव- और अनिगोत्रकी स्त्रीकोभी आत्रेयी कहते स्था जाति और गुरु आदिकी अपेक्षासे पू- हैं क्योंकि विष्णुकी स्मृति है कि अथवा वैके समान जाननी इसी प्रकार गर्भध अनिगोत्रा नारीको हतकर पूर्वोक्त व्रतको आदिमेंभी समझना-मरणांतिक प्रायश्चित्त- करे यहां यह युक्त समझो कि ब्राह्मणके गर्भ का तो उपदेश व्रतक ग्रहणसे नही है-इ- १ वा ब्राह्मण आत्रेयीके वधमें ब्रह्महत्याका ससे जानकर यज्ञ आदिमें स्थित क्षत्रिय | व्रत क्षत्रिया आत्रैर्याके वध क्षत्रियहत्याकां आदिके वधमें दूना व्रत होता है-और यह व्रत कर इसी प्रकार अन्यत्रभी समझना व्रत संपूर्णही करना-पहिले दोनो वर्षों में वेद चकारसे साक्षीमें झूट बोलनेमेंभी यही व्रत पाठीको मारकर इस प्रकरणमें बारह वर्ष- समझना सोई मर्ने (अ० ११ शो० ८८ ) काही व्रत कहा है-और विनाही स्त्रीयोंके ने कहा है कि झूटी साक्षी कहकर और गर्भको हतकर वर्णके अनुसार प्रायश्चित्त गुरुकै प्रति क्रोध होकर और निक्षपको करे अर्थात् मिस वर्णके पुरुषके वधौ जो चुपकर स्त्री और मित्रको मारकर ब्रह्मह- प्रायश्चित्त कहा है उस वर्णकेही गर्भवधर्म त्याका व्रत कर-यहभी वहां समझना जिस वही प्रायश्चित्त करे-यहभी उस गर्भ में है वचनमें झूट बोलनसे प्राणीयोंका वधदो- जिसके स्त्री-पुरुष नपुंसकके चिन्ह प्रतीत न क्योंकि प्रायश्चित्त अत्यन्त गुरु है-यहां निक्षेप हुयेही क्योंकि मर्नु (अ० ११ श्लो०८७) में ब्राह्मणका लेना और स्त्रीभी आहितामिकी अविज्ञात गर्भको हतकर यह विशेष दि- भार्या वह लेनी जो पतिमताहो और अथवा खाया है कि-यहां यद्यपि ब्राह्मणका गर्भ | जो यज्ञमें स्थित हो सोई अंगिरा और परा ब्राह्मणही होगा-इससे ब्राह्मणके वनिमित शाका वचन है कि आहिताग्नि ब्राह्मगकी वकीही प्राप्ति है तथापि गर्भ में स्त्रीभी हो १ अभिगोत्र नाना। सक्ती और स्त्री-शूद्र-वश्य-क्षत्रिय-इनका • उक्या वाहत साश्ये प्रतिरभ्य वध उपपातक होता है-इस सेभी उसकी। भाहाय व निक्षेप हरा च धीमुहद्ध । ३ आहिलामे हायस्य हरापनीमनिदिता । 1 सतनगती प राजन्यौरयो। प्रमहत्यानन कुर्यादामस्तव ॥सवनरयां जिय २६वा गर्भम विज्ञात । हता नामहत्यानतं चरेव । गुरु तपा (५४६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित | पतिव्रता पत्नीको और आयीको मारकर तात्पर्यार्थ-इसमेंभी यथावर्णका संबंध है ब्रह्महत्याका व्रत करे-सवनमें स्थित स्त्रीको ब्राह्मण आदिके मारनेमें निश्चय करके मार- मारकर ब्रह्महत्याका व्रत करे इससे सवनमें नेके लिए आया मनुप्य और शस्त्र आदिके स्थित अग्निहोत्रिणी-आत्रेयी इनके वध | प्रहार करनेपरभी किसीप्रकार प्रतिघात ब्रह्महत्या प्रायश्चित्त कहने से इनसे भिन्न आदिके प्रतिबंधवश वह ब्राह्मण न मरा स्त्रियाक वधका-स्त्री-शूद्र-विट-क्षत्र-वधे- होय तोभी वर्णके अनुसार ब्रह्महत्या इन टपपातकाके मध्यमें पाठ होनसे उप- आदि व्रतको कर-सोई गौतमैने कहा है पातकका प्रायश्चित्तहैं-कदाचित् कोई शंका कि ब्राह्मणके वधौ प्रवृत्त विना मारेभी प्रा- करे कि ब्राह्मणों न हन्तव्यः अर्थात ब्राह्मण- यश्चित्त करे-कदाचित् कोई शंका कर कि को न मारे इस वचनमें लिंग और वचन मारने और उसके अभाव में एक प्रायश्चित्त नहीं पढे और ब्राह्मणको जाति स्त्री पुरुप युक्त नही यह बात सत्य है इसीसे औपदे- दोनोंमे है-उन दानोंके अपराधके निमित्त शिकों (प्रधान )से न्यून होनेसे अति- प्रायश्चित्त ब्रह्महा द्वादशाब्दानि-अर्थात् देशिक (जो तुल्य मानहो )कॉमें पादोनहीं ब्रह्महा बारह वर्षके व्रतसे शुद्ध होता है- | ब्रह्महत्या आदि द्वादश वार्षिक व्रत होते हैं यह वचन दोनोंमें प्राप्त है तो किस लिए | इसका विस्तार पहिले कह आए और जो तात्रेयी निषूदकः-यह अतिदेशका वचन सवनसे होनेवाले-सोमयाग करते हुए ब्राह्म- किया इसका समाधान कहते हैं कि आत्रेयी णको नष्ट कर उसको द्वादशवार्षिक आदि ब्राह्मणी रहो तोभी अनायोके वधमें जो | व्रत दूना उपदेश करे-और उन गुरु लघु 'महापातकका प्रायश्चित्त है उसकाही अति- व्रतोंकी-जाति-शक्ति-गुण-आदिको - अपे- देश (विधान) है, पातित्य ( पतितपना) क्षासे सवनमें स्थित आदि विशेषके एक- का नहीं-इससे पतितका त्याग आदि जो | रूप होनेपरभी पूर्वके समान ही व्यवस्था कार्य है वह यहां नही होता ।। जाननी-ब्रह्महत्याके समान जो गुरुकी निं- भावार्थ-यज्ञमें स्थित क्षत्रिय वैश्यका | दा आदि हैं उनको आतिदेशिकोंसेभी घाती ब्रह्महत्याके व्रतको करै गर्भ और न्यून होनसे आधा न्यून द्वादशवार्षिक आदि आत्रेयोका पाती वर्णके अनुसार प्रायश्चित्तको प्रायश्चित्त है यह कह आए हैं । करें ।। २५१ ॥ भावार्थ-मारनेके लिए आया हुआ मनु- चरेद्रतमहत्वापिघातार्थचेत्समागतः । प्य विनामारेभी पूर्वोक्त व्रतको करें और स- द्विगुणंसवनस्थेतुब्राह्मणेनतमादिशेत् २५२ वनमें स्थित ब्राह्मणके मारने में दूने व्रतका उपदेश करे॥२५२॥इति ब्रह्महत्याप्रायश्चित्त- पद-चरेत क्रि-व्रतम् २ अहत्वा:-अपि:- प्रकरणम् ॥ धाताथै २ चेत- समागतः १ द्विगुणं २ सवनस्थे ७ तुऽ- ब्राह्मणे ७ व्रतं २ आदि- सुरांबुघृतगोमूत्रपयसामाग्रसंनिभम् । शेत् क्रि-॥ सुरापोन्यतमपीत्वामरणाच्छुद्धिमृच्छति ॥ योजना-चेत् यदि धातार्थ समागतः त पद-सुराम्बुघृतगोमूत्रपयसां ६ अग्नि- हि अहत्वा अपि व्रतं चरेत्-सवनस्थे ब्राह्म- णसति द्विगुणं व्रतं आदिशेत् ॥ १ सृष्टश्चेद्राह्मणवधेऽहत्वापि।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ सन्निभं २ सुरापः १ अन्यतमं २ पीत्वाऽ- | सुराको मुखमें गेरकर उससे मुख जलकर मरणात् ५ शुद्धिम् २ ऋच्छति क्रि॥ मरनेसे शुद्धिको प्राप्त होता है जो दिन मो- योजना-सुरापः सुगम्बुघृतगोमूत्रपयसां हसे सुराको पीकर अग्निवर्ण सुराको पावे य- अन्यतमं अग्निसंनिभं पीत्वा मरणात् शुद्धिं हमने (अ० ११ शो०९० )ने मोहका ग्रह- ऋच्छति ( प्राप्नोति ) ण किया है-वह शावक तात्पर्यको न जा- तात्पर्यार्थ -अप क्रमसे प्राप्त सुरापानके नकर है-यहां यह चिंता ( विचार ) करने प्रायश्चित्तका प्रारंभ करते हैं-सुग-जल-घी योग्य है कि क्या सुराशब्द मद्यमानमें सूट गोमूत्र-दूध-इनमें अन्यतम ( कोईसा) अ- है वा-गोडी-मानी-पष्टी-इन तीनोम अथवा ग्निक तुल्य दाह करनेवालेको पीकर सुर' केवल पेप्टामें-उसमें कोई मग्रमात्रमें रूढ पीनेवाला मरकर शुद्धिको प्राप्त होता है-य- वर्णन करते हैं क्योकि सुराके अभ्या- हां गोमूत्रके साहचर्यते गाकेही पी दूध समें इस पूर्वोक्त वसिष्ठके वचनमें पष्टी लेने और पी दूधक साहचर्यसे स्त्रीलिंग आदि तीनोंसे भिन्नमेंभी सुराशब्दका प्र- गोकाही गोमूत्र लेना चैलका नही-और यह योग देखते हैं-कदाचित् कहो यह गो- गोमूनका पानभी गीले वस्त्रको पहनकर ण प्रयोग है सो ठीक नहीं क्योंकि करना क्योंकि पंढीनसिकी स्मृति है कि मदके पैदा करनेवाली शक्तिरूप उपाधि गीलेवस्त्र पहनकर सुगपीने वाला-अग्नि- होनसे समको मुख्यता होसतो है इससे वर्ण सुगको पावे-तैसेही लोहे के पात्र पाव | गाण की कल्पना अन्याय है यह अयुक्त है क्योंकि प्रचेताको स्मृति है कि सुरा पीने- अर्थात् किसीका कहना ठीक नहीं क्योंकि वाला लोहे वा तामेके पानसे अग्निवर्ण सुरा- पुलस्त्यने सुराको इन वचनोंमें मय विशेष. को पीवे यह प्रायश्चित्तभी एकवार मदि- कहा है कि पानस द्राक्ष माधक खान है कि एकवार सुराको पीकर अग्निवण सू. जाने और बारहमी जो सुरा मद्य है वह स- राके पानमें है क्योंकि अंगिराको स्मात ताल ऐक्षत्र मधूत्य सैर आरिष्ट मेरेय ना- लिकेरज इन ग्यारह मदिराओंको समान राको पीवे जो यह वसिष्ठका वचन है कि सुराके अभ्याप्तमें द्विज अग्निवर्ण सुग-बसे अधम कही है इससे मद्य मात्रमें सुग- को पावे वह सुरासे भिन्न मद्यपानके विष- शब्दका प्रयोग गौण है और अन्य तो पेष्टी यमें समझना-यहभी जानकर मुद्यपानके सोई दिखाते हैं कि यद्यपि भनेकाम सु- आदि तीनों में सुगशब्दको रूट मानते हैं- विषयमें समझना-क्योंकि बृहस्पतिका वचन है कि मानकर किए सुरापानमें जलती हुई | गशब्दका प्रयोग देखते हैं तथापि कि- समें अनादि प्रयोग है यह संदेह होनपर गोडीमाध्वी पष्टी तीन प्रकारको सुरा जाननी १ गुराप आईनासाथ अभिवर्ण सुसम्पयेत् । २ तथा लोहेन पावेग मुरापोभिरणा रामायमेन इस वचनसे गुट पिष्ट मधुके विकामही शान तामेण वा पिवत्र। सुरो पारवा दिजो मोहादीमा मुरो पिरेन । ३ रापान समालाम्पतिवर्णा सुरा शिवत । २ पानसंदाक्षमाकपा मालमतवं मई अभ्यासे नुगुरायाचावनिवर्णो मुरां पियेवा दिजः। सैरमारिष्टं मेरेयं नालिफेरजा समानानि विजानीयान्म- ५ सुरापाने कामहने ज्वलन्तीवा रिनिक्षिपेर। पान्येकारमौरतुद्वादश तु मुरामचं सर्वपामधमस्मृतम्। मुखत यालिनिर्दग्धेतः दमानुपाए । ३ गांडी मावि पटी च विठया त्रिविया सुरा। - (५४८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - अनादि प्रयोगका निश्चय मनुनें कहा है इससे किंतु कार्यका बोधक है-इससे गुरु प्राय- उन्हीमें मुख्यता युक्त है कदाचित् कहोकि श्चित्तका निमित्त होनेसे गौडी और मावीमें अनेकोंमें शक्तिकी कल्पना करनीही दोष है । सुरा शब्द गोण है-इससे अनेक शक्तिकी सो ठीक नहीं क्योंकि उसका परिहार मद श- कल्पनारूप दोष नहीं और उपाधिरूपका, क्तिको उपाधि मानकर होसक्ता हे कदा- | आश्रयणभी नही-और न यहां द्विजोत्तम चित् कहो कि उपाधि ताल आदिकै रस- | ग्रहण द्विजातिका उपलक्षण हैं-इससे सुरा मेंभी विद्यमान है इससे दोष होगा पं. अन्नोंका मल ह-पापको मल कहते है-इस कज आदिके समान योगरूढ़ मानकर पूर्वोक्त मनुके कहनेसे ब्राह्मण क्षत्रिय और कुछ दोष नही जैसे पंकसे पैदा बहुत | वैश्य सुराको न पावै-इस वचनसे पष्टीकाही होते है परंतु पंकज शब्द कमलमें रूद तीनों वर्णीको निषेध है-गाडी-माध्वी मदि- है इससे जैसी एक तैसी सब है इससे राका निषेध तो ब्राह्मणको क्षत्रिय वैश्यको द्विजोत्तमोके पीने योग्य नही यह वचन | नहीं-क्योकि मनु ( अ० ११ श्लो० ९५ )के तीनों सुराओंके समान दोपके कहनेका | इस वचनमें ब्राह्मणेन यह विशेष पद पढा है बोधक नही कुछ गोडी माध्वी सुराओंको कि यक्ष राक्षस-पिशाचोंका अन्न जो-मदा पैष्टी सुराके समानता बोध करनेके लिए ! मांस-सुरासव-है उनको देवताके हविका नहीं द्विजोत्तमका ग्रहण द्विजातिके ग्रह- भोजी ब्राह्मण न खाय-वृहद्विष्णुनेंभी बाह्मण- णका उपलक्षण है यह अन्योंका कथन- । कोही मद्यका निषेध दिखाया है कि मा- भी अयुक्त है क्योंकि बारमी मुरारूप । धूक-ऐक्षव-सर-ताल-खार्जुर-पानस-मधू. मद्य सबसे अधम है इस पूर्वोक्त पुल- त्य-माध्वीक- मेरेय-नालिकरज-ये दशों स्त्यके वचनमें गॉडी और माध्वीसे भिन्न- मद्य ब्राह्मणके लिये अपवित्र हे-बृहद्याज्ञ- भी सुरारूप मद्य दिखाई है-तैसेही सुरा- वल्ल्यनभा क्षत्रिय और वैश्यको दोपका अ- अन्नोंका मल है और पापको मल कहते है भाव दिखाया है कि क्षत्रिय-वैश्य-कथंचित इस मनुके वचन ( अ० ११ श्लो० ९३ ) में | जानकरभी मदिराको पीकर दोषको प्राप्त अन्नके विकारमेंभी सुरा दिखाई है और नही होते व्यासनेभीक्षत्रिय-वैश्यको-माध्वी- भन्नशब्दका प्रयोगभी व्रीहि आदि वि- का पानकी आज्ञादी हैं-कि केशव और अ- कारमेंही देखते है-और गुड़-और मधु- 'जुन दोनोंमें मध्वासवसे उन्मत्त चंदनसे रस रूप है-तैसेही सोत्रामणीग्रहमें अ- ' चर्चित-एक शय्यापर बैठे देखे-इस प्र- नके विकारमही सुरा शब्दके ग्रहणको सु- नते है-तिससे पैष्टीही सुरा मुख्य कही है- १ यक्षरक्षःपिशाचान्नं मयं मास सुरासर्व । ताम- गोडी और माध्वीमें तो सुगशब्द गोण है- 'णेन नात्तव्य देवानामश्नता हविः ।। जो किसी ने कहा है कि गौडी माध्वी-इस २ माधूकमक्षवं सैरन्तारं सार्जुपानसं । मपत्य पूर्वोक्त मनुवचनसे तीनोंमें ही स्वाभाविक चैव माध्वीक मेरेयं नालिकेरज ॥ अमेध्यानि दर्शतानि मनुवचनका निश्चय है सोभी युक्त नही- मद्यानि ब्राह्मणस्य तु । वचन व्याकरणके समान ३ कामादपि हि राजन्यो वेश्यो वापि कथंचन । शब्द और अर्थके संबंधका बोधक नही मद्यमेव सुगं परिला न दोप प्रतिपद्यते । ४ उभी मध्वासबक्षीयों उभौ चन्दनचचिता। ए- १ सुरावे भलमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते । कार्यकरथिनी दृष्टी में केदावार्जुनौ । - जिससे यह प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५६९) कार ब्राह्मणकोही मद्यमानका निषेध होने-कि अंगिएका वचन है कि जो अशानि- परभी-मनु (अ० ११ श्लो० ९४ )ने गाडी- | योंको प्रायश्चित्त कहा है वह ज्ञानसे करनेमें माध्वी-पप्टी जैसी एक तैसी सब इससे दूना हो जाता है इसी प्रकार वृद्ध आतुर 'जो द्विजातियोंको न पीनी-गोडी और मा- आदिमभी समझना तसेही देवताओंकी हदि ध्वीका पृथक् २ निषेध कहा है यह दोषको । खाता हुआ ब्राह्मण उस मदिराको न पावे- गुरु होनेसे सुराकी समानताका प्रतिपादक | इसे मनु (अ० ११ श्लो० ९५) के वचनसे है और यह सुगका निषेध अनुपनीत बा- | सब जातियोंको मद्यका निषेध होनेसे जि- रूक और विना विवाही कन्याकोभी है | सका यज्ञोपवीत न हुआ हो वहभी न पाचे क्योंकि मन (अ० ११ श्लो. ९३ )ने ना- कदाचित् कोई शंका करे कि अनुपनीतको हाण-क्षत्रिय-वैश्य ये मदिराको न पीवे इस किस प्रकार दोप है क्योंकि गौतमका वचन वचनसे जातिमात्रकोही निषेध कहा है इ- है कि यज्ञोपवीतसे पहिले बालकोंको आच- ससे द्विज मोइसे सुराको पोकर अग्निवर्ण | रण-चोलनाऔर भक्षण ये इच्छाके अनुसार सुराको पाव इस प्रायश्चित्तके वाक्यमें जो होते हैं अर्थात् इनके अन्यथा करने में कुछ मनुनें द्विज ग्रहण किया है वह तीनों वर्णोके दोप नही होता-तैसेही यह कुमारका वचन उपलक्षणार्थ है क्योंकि कार्यका विधाननिमित्त है कि मदिरा मूत्र पुरीष इनके भक्षणम जो निषेध उसकी अपेक्षा करता है और पांचवर्षप्से पहिले दोष नही उसके अनंतर निषेध वर्णमान ( सब वर्ण का ग्रहण है। माता पिता वा गुरु ये प्रायश्चित्त करें-इन जैसे जिसके निमित्त हवि दिया है वह चंद्रमा दोनों वचनोंसे बालकोंको दोपका अभाव सन्मुख उदय होता है-इस निमित वाक्यमें | प्रतीत होता है-इस शंकाका समाधान संपूर्ण इवि अभ्युदयका निमित्त जानी गयी कहते हैं कि सुरा और मदिपके निधके उसके सापेक्ष जो तीनवार तंदुलोंका विभाग वचनम जातिमात्रके पढनेसे निषेधकी करे यह नैमितिक वाक्य है उसमें श्रूयमाण प्रवृत्ति नहीं हट सकती-इसीसे अन्य स्मृति में जो तंदुलका महण वह तंटुल आदिस्वरूप निषधका वचन है कि सुरापीनेका निपेध इविमात्र ( सय )का उपलक्षण है इतनातो जातिके आश्रयसे है यह मर्यादा है इससे विशेष है कि बालकोंको पाद प्रायभित्त 'बालकोंको पाद प्रायभित्त सब पापाम देना यताना यह सप पापोंमें विधि है इस वचनसे यह विधि है इस पूर्वोक्त वचनसे सुराके पी- जानकर करनेमेंभी मरणान्त प्रायश्चित्त नही नेमें पादही प्रायश्चित्त है तसेही जातकर्यने किन्तु पाद (चौथाई ) कोही दूना करके मईपीनका प्रायश्चित्त कहा है-कि जो अन- वर्षका प्रायभित चारकोसे करना क्यों- - - याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पनीत बालक मोहसे मद्यको पीवे उसके यहां वालोंका वस्त्र चीर और वल्कलकाभी निमित्त तीन कृच्छ् माता भ्राता पिता करें-- उपलक्षण है क्योंकि प्रचेताकी स्मृति है इससे पूर्वोक्त गौतमका वचन सुरा आदिसे कि सुरापीनेवाला और गुरुतल्पका गामी भिन्न शुक्त पर्युषितं आदिके विषयमें है और चीर और वक्कलोंको धारकर ब्रह्महत्याका कुमारका वचन तो स्वल्प दोपका बोधक है व्रत करें-और जटाओंका धारण मुंडत्वके इसीसे मनुने (अ० २ श्लो०२७) उपनयन- निराकरणार्थ है-ब्रह्महत्याके व्रतको कर से पूर्व किये दोपका प्रायश्चित्त उपनयनही इतनाही कहनेसे सिद्धथा वालोंके वस्त्र कहा है कि गर्भके समयके और जातकर्म आदिका जो ग्रहण है वह अन्यत्र (हत्या) मुंडन उपनयनके होमोसे वीज और गर्भका संभव होनेपर स्वयं धारण किये शिरः कपा- जो पाप है वह द्विजोंका दूर होजाता है ल भादिको निवृत्ति के लिये है-यहभी उ- यहां यह अर्थ है कि तीनों वर्गों को जन्मसे सके विषयमें है जो अज्ञानसे जलकी बु. लेकर पैप्टीका निषेध है और ब्राह्मणको तो द्धिसे सुराको पीवे-क्योंकि पूर्वोक्त(अ० ११ जन्मसे लेकर मद्यमानका निषेध है-और श्लो० ८९) मनुके (यह शुद्धि अज्ञानसे क्षत्रिय और वैश्यको तो कदाचित्भी गौ-द्विजके मारनेकी कही) वचनमें अज्ञानकी डीका प्रतिषेध नहीं है और शूद्रको तो न- उपाधिसे विधान किये बारह वर्षके प्रायश्चि- सुराका निषेध है न मद्यमानका निषेध है ॥ त्तका ही अतिदेश (बोधक ) है और यहां भावार्थ-सुरापीनवाला सुराजल घीगोमूत्र सुरापानको महापातक होनेसे अतिदेश दूध इनमेंसे किसीको आग्निके समान तपा- (माना हुभा) से प्राप्तभी पादोन है तोभी कर पीकर मरनेसे शुद्धिको प्राप्त होता बारह वर्षकाही प्रायश्चित्त करे-पादोन न करे है ॥ २५३ ॥ इसीसे वृद्ध हारीतनें कहा है कि महा- वालवासाजटीवापिब्रह्महत्यानतंचरेत् ॥ पातकी बारह वर्षमें पवित्र होते हैं-अथवा पिप्याकंवाकणान्वापिभक्षयेत्रिसमानिशि॥ पिण्याक (पिडित वा खल) वा कण (कणकी )को तीन वर्षपर्यंत रात्रिमें भक्षण पद-बालवासाः १ जटी १ वा:-अपि:- करे-यह भक्षणभी एकवारही करे क्योंकि ब्रह्महत्याव्रत २ चरेत् कि-पिण्याकं २ वाऽ- मर्ने (अ०११ श्लो०९२) की स्मृति है कि कणान् श्वाऽ-अपिड- भक्षयेत् क्रि-त्रिसमाः२ कण वा पिण्याकको वर्षदिन पर्यंत राशिमें निशि ॥ एकवार भक्षण कर और यह पिण्याक आ- योजना-सुरापः वालवासाः जटी सन् दिका भक्षण भोजनके कार्यमें कहा है इससे ब्रह्मदत्याव्रतं चरेत् वा पिण्याकं वा कणान् अन्य भोजनको त्यागदे-यहभी जलकी विप्तमाः निशि भक्षयेत् ॥ बुद्धिसे सुरापीनेमें छर्दके उत्तर (पीछे ) तात्पर्याय-गौ वा बकरीके वालोंसे बुने हुये वस्त्रको धारकर वा जटाओंको धारण १ सुरापगुरुतल्पगौ चीरवल्कलवाससौ ब्रह्महत्या- किये सुरापीनेवाला ब्रह्महत्याके व्रतको करें | मत चौयाताम् । २ इयं विशुद्धिवदिता प्रमाप्याशामता द्विगम् । गाभोमैतिकर्म चूडामौजानियधनैः । बै ३ द्वादशभिर्वपमहापातकिनः पूयते । जकं गामक चनो द्विजानामगारयते ।। ४ कणान्या भक्षयदन्दं पिण्याक वा सशनिशि। - - प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५५१) समझना-क्योंकि व्यासका वचन है कि सुरापीनेवाला ब्राह्मण बृहस्पतिसव नामके छर्दक करनेपर मद्य पीनेवाला इसी ब्रतको | यज्ञको करके फिर ब्राह्मणोंके समान होता करें और उसकी कायाका शोधन प्रतिदिन है यह वेदकी श्रुति है-जो द्विजोंमें उत्तम पंचगव्यका पीना कहा है और उस जलके सुरापीकर भूमिका दान करें और फिर सुग- पीनेमें नहीं जो सुराके पात्रकी सुगंधवाला | पान न करै वह संस्कार करके शुद्ध होता हो क्योंकि संसर्ग भी सुरप्पना दूर नहीं ह-वेभी दोनों पूर्व वचनके ही विषयमें हैं- होता जैसे आज्य ( घी ना पृषदा- अथवा अन्य दक्षिणाके कल्प (प्रकार) के ज्यमें रहता है-इसीसे न्यायके ज्ञाताओंने | माननेसे बारह वर्षके प्रायश्चित्तके संग इन यह कहा है कि आज्य पीनेवाले ऐसे निग- दोनों प्रायश्चित्तोंका विकल्प है-यहांभी बा- म करने और पृषदाज्यपा ऐसे न करने लवृद्ध आदिकोंको डेढ वर्ष प्रायश्चित्तकी अर्थात् घोको पीवे ऐसे कहना पृषत् (स- और अनुपनीतीको तो नी मासके प्राय- दधि ) घीको पावें ऐसे न कहना-और श्चित्तको कल्पना करनी-जो तो मनु (अ०१ जो तो यह आपस्तंचका यचैन है कि चो- | श्लो० ९२ ) का पूर्वोक्त वचन है कि वालोंके रो-सुगपान गुरुस्त्रीगमन-ब्रह्महत्या-इन-वन और जटा ध्वमा ओंको धारकर को करके चौथे समयमें नियमसे भोजन सुरापानके दोष निवारणार्थ कणोंको था करता हुआ सवनानुकल्प यज्ञमें जाय औ-पिण्याकको एकवार रात्रिमें वर्ष दिनतक र पूर्वक्ति स्थान और आप्तनसे विचरता भक्षण कर-वहभी उस सुराके पाने में जान- हुआ तीन वीमें पापको नष्ट करता है-जो ना जिसका अज्ञानसे तालुमें संयोग हो ग- तो गिराका वचन है कि महापातकोसे या हो-कदाचित कोई शंका करें कि द्रव संयुक्त, तीन वर्षामें पवित्र होते हैं ये दोनों (वहता ) द्रव्यके भोजनको पान कहते वचन उसी विषयमें हैं जो पिण्याक वा क- और कंठसे नीचे गमनको भोजन कहते णोंको भक्षण करे इस वचनका विषय है- ताल आदिके संयोग मात्रको नहीं इससे और जो यमने दो प्रायश्चित्त कहे हैं कि वहां कैसे पानका प्रायश्चित्त होगा-इसका समाधान कहते हैं कि जिस ताल आदिके एतदर मतं पुन्मयप ने कृते । पचाय संपोगके बिना पानक्रियाकी निवृत्ति न हो तु तस्मोक्तं मत्यई फायशोधनम् । उसकाभी पान क्रियाक निषेधसे निषेध है- २ आग्परा इति निगमाः फार्य: न पृाज्यपाः। इससे यद्यपि मुख्य पान नही होनेसे महा- रते हतारो पीता गुरुदारान् गता प्रम- पातक नही है-तथापि उसके निषेधसे - हन्यां प फ़्ता पतु काल मितमोजनी योभ्युपयो- सका अंग गो आवश्यक ताल आदिमें म- सम्मानका सानासनाभ्यां बिहानिभिः पाप दिपका संयोग उसकामी निषेध झनेसे दोप पाठदति । विद्यमान हैं इससे प्रायश्चित्त हो सक्ता है ४ महापान स्मयुना: वा. पति ते विमि. 1 जैसे यहां कि मारनेके लिये जो आया हो ५ रातिमले ने मुरापो प्राणः पुनः । सपत्र । माभगेररिलेश गरिकी श्रुतिः। भूमिमदान यः १ कणान्या मायेद पिण्याक वा सहनिशि। कुमार पौधा दिलोत्तमः । पुननंच चिता तु मुगावापनत्यय बालवासा जटी मनी । २ चौदनसमहत्वापि पाता पसमागतः। EET: स शि। !
(५५२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - वह विनामारेभी ब्रह्महत्याका व्रत करे हत्याक जलको पीवे वह शंखपुप्पोमें पकाये दूध औ- निषेधसे उसके अंगरूप मारनेके निश्चयके रघीको तीन दिनतक पावै, वह प्रायश्चित्त भी निषेधसे प्रायश्चित्त कहा है, जो बौधायन वासीजलके पीनेसे अधिक है अज्ञानसे यम, घृहस्पतिके ये वचन है कि तीन मा- पीनेमें तो मने (-अ० ११ श्लो० १४७)ने सतक विना जाने सुरापान करनेमें कृच्छ्र- यह प्रायश्चित्त कहा है कि सुरा और मद्यके ब्दका चोथाई प्रायश्चित्त करके फिर उपनय- भांडमें स्थित जलोंको पीकर पांचगवतक न करे-सुरापीकर ब्राह्मणको मारकर,ब्राह्मण शंखपुष्पीमें पकाये दूधको पीवे जो विष्णुनें के सुवर्णको चुराकर, और पतितोंके संग कहा है कि सुराके पात्र में स्थित जलको पीकर संयोग करके द्विज चांद्रायण करे-और द्वि- सातगवतक शंखपुष्पीसे पकाये दूधको पीवे ज, गोडी माध्वी पैष्टी-सबको पीकर क्रमसे यह जानकर पाने में समझनाजानकर पीने तो तप्त कृच्छ्र पराक-और चांद्रायण करें-ये- बृहत् यमनें कहा है कि सुराके भांडमें स्थित तीनों वचन उस मुरापीनेके विषयमें जान- | जलको जो द्विजपी ले तोवह बारह दिनतक ने जो ऐसी व्याधि पी हो जो रोग किसी दूधके संग ब्राह्मी और सुवर्चलाको पीवे- औषधसे न गई हो क्योंकि यह प्रायश्चित्त ' सुरापीनेवालेके मुखकी गंधके सुंघनेमें तो अल्प है और जो मुरारसके मिले सके अ- ! मनु (अ० ११ श्लो० १४९ )ने कहा है कि नको भक्षण करे तो फिर उपनयन करे सो- सुरापीनेवाले ब्राह्मणके मुखकी गंधको सूंघ- ई मनुने कहा है (अ० ११ श्लो० १५०) कर सोमको पीनेवाला, जलोंमें तीन प्राणा- कि अज्ञानसे विष्ठा मूत्र और सुरा मिले याम और घृतका भक्षण करके शुद्ध होता है अन्नको खाकर तीनों द्विजाति वर्ण फिर सं- यहप्रायश्चित्त सोमयज्ञ करनेवालेकोही अज्ञा- स्कारके योग्य होते हैं और जो सुराके सूके नसे पीनेमें है और जानकर पीनेमें तो दूना पानमें रक्खे हुये जलको पावे तो शातातपके और जिसने सोम न पी हो उसके प्रायश्चित्त- कहे छर्द घृत भक्षण और अहोरात्र उपवा- | की कल्पना करनी जो साक्षात्सुराके गंधको सको करै, जो बोधायनका वचन है कि सूंघता है उसको तो सूंघनेके अयोग्यका जो मनुष्य सुरापीनेवालेके पात्रमें वासी और मदिराका सूंघना जातिभ्रंशकर है इससे यह मनु (अ० ११ श्लो० १२४ )का १ त्रैमासिकममत्या सुरापाने कृच्छ्राब्दपाद च- कहा प्रायश्चित्त समझना कि जाति भ्रंशकर रिता पुनरूपनयतं-सुरां पीत्वा द्विज हत्या रुक्म हत्ता द्विजन्मनः। संयोग पतितर्गत्वा द्विजश्चान्द्रायणं चीत् १ अपः सुराभाजनस्था मद्यभांडस्थितास्तथा । पौडी माची मुरां पैष्टी पत्तिा विप्रः समाचरेत् सप्त- पचरात्रं पिवेरीत्वा शखपुप्पीशृतं पयः । कच्छ परार्क च चान्द्रायणमनुक्रमात् । २ अपः मुराभाजनस्थाः पीत्वा सप्तरानं शंखपुप्पी भृतं पयः पिरेत् । २ अज्ञानात्माश्य विमत्रसुरासंमष्टमेव च । पुनः ३ सुराभादस्थित तोयं यदि कश्चिपिवेदिजः । यंस्फरमहति त्रयो वर्णा द्विजातयः॥ सहादशाहं क्षीरेण पिवद्रासी सुवर्चलाम् । ३ मराभाण्डोदकपाने छर्दन धृतप्राशनमहोरात्रो ४ ब्राह्मणस्य सुरापस्य गधमाघ्राय सोमपः। प्राणा- बासश्च। नप्सु त्रिरायम्य घृतं प्राश्य विशुध्यति ॥ सुरापानस्य यो भाण्डेप्वपः पर्युषिताः पियेत् । ५ जातिभ्रशकर कर्म कृत्वान्यतममिच्छया । खपुष्पी विपक तु क्षीरं सर्पिः पिवल्यहं ।। चरेत्सांतपनं कृच्छ् प्राजापत्यमनिच्छया ॥ । ४ मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५५३) करे ॥ २५४ ॥ कोईसे कमको जानकर करके सांतपन और मूत्र विष्ठा मांस इनके भक्षण भी यही कृच्छ करे और अज्ञानसे करे तो प्राजा- प्रायश्चित्त है और जोइसी विषयमें मने (अ० पत्य करे ॥ १२ श्लो- १४०) में कहा है कि अज्ञानसे भावार्थ-वालोंका वस्त्र जटा इनको धार- वारुणीको पीकर संस्कारसे शुद्ध होताहे कर ब्रह्महत्याके व्रतको करे या पिण्याक | वहभी तमकृच्छ्के अनंतर करना क्योंकि और कोंको तीनवर्षतक गत्रिमें भक्षण | उसमें गौतमका वचन अनुकूल है और पुन: संस्कारस उपनयन लेना और वहभी आश्व- अज्ञानात्तुसुरांपीत्वारतोविण्मूत्रमेवच । लायन आदिके कहे क्रमसे करना सोई कद्दा पुनःसंस्कारमहतित्रयोवर्णाद्विजातयः ।। है कि जिसका उपनयन हो चुका हो उसके किये और न किये मुंडन और मेधाजनन पद-अज्ञानात् ५ नु:- सुरां २ पौत्वा- नहीं कह परिदान और काल (मुहूर्त ) भी विमूबर एवा-च:- पुनः-संस्कार २ अई- ' नही और उसको तत्सवितुर्वृणीमहे इस तिक्रि-व्रयः १ वर्णाः १ द्विजातयः १ ॥ गायत्रीका उपदेश कहा है जानकर मद्यके योजना-द्विजातयः त्रयः वर्णाः अज्ञानात पीनेमें तो वसिष्ठका कहा हुआ प्रायश्चित्त सुगं चपुनः रेतः विमूत्रं पीत्वा पुनः सं- जानना कि जानकर मद्यके पीने में और स्कारं अइति ॥ सुरासे भिन्नवा सुगके अज्ञानसे पानेमें कृच्छ तात्पर्यार्थ -अव मद्यपानका प्रायश्चित्त क- | अतिकृच्छ घृतभक्षण और पुनःसंस्कार हते है जो ब्राह्मण अज्ञानसे जलकी बुद्धिसे प्रायश्चित्त है अथवा शंखका कहा चान्द्रायण मद्यरूप सुराको पवि और जो ब्राह्मण आदि है कि सुरासे भिन्न मद्यका पानवाला चादा- वीर्य विष्ठर भून इनका भक्षण कर वे तीनोभी यण कर. मद्यके मुखमें प्रवेशमात्रमभी द्विजाति वर्ण तप्तकृच्छको करके फिर उप- आपस्तवका कहा पगर प्रायश्चित्त है कि नयनरूप प्रायश्चितके योग्य होते हैं यहां ' भक्षण पान चाटना इनके अयोग्य वीर्य मूत्र मद्यपानमें जो पुनः संस्कार हे वह ब्राह्मणको विष्टाओंके भक्षणमें प्रायश्निच कसे दो पद्म, गू- ही हैं क्षत्रिय और वैश्यको तो मद्यको लर, पेल, दाक, फुशा, इनके जलको पीकर आज्ञा दिखा आये हैं यहां सुरा शादी छ रात्रमें शुद्ध होताह यहभी ताल आदिकी मयका पोधक है क्योंकि मायश्चित्त अत्यंत लघु है और भज्ञानसे मुख्य मुराक पीनेमें पारद वर्षका प्रायश्चित्त कहा है इसीस गो- तमने यहां मद्यसन्दका प्रयोग दिया है फिअज्ञानसे मध पाने में प्रतिदिन द्ध, घी, जल, वायु, इनको तपाकर पा वही तप्त- गुला पहाता है फिर इसका संम्भार फरे - 1 (५५४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । मद्यके विषय समझना गोडी और माध्वीके | पीकर सात रात्रतक गोमूत्र और जीको अज्ञानसे पानेमें तो वसिष्ठका कहाहुआ पीकर रहे-अत्यंत अभ्यासमें तो हारीतने पूर्वोक्त कृच्छू अतिकृण्छ् पुनःसंस्कार और कहा है कि मदिराके पात्र में स्थित जलको वृतभक्षण प्रायश्चित्त जानना और उनके यदि कोई द्विज पौवे तो बारह दिनतक जानकर पीनेमें तो खल और कणोंको भक्षण | दूधके संग ब्राह्मी और सुवर्चलाको पावै- करके पूर्वोक्त तीन वर्षका प्रायश्चित्त जानना। इन पूर्वोक्त वचनों में द्विजका ग्रहण ब्राह्मणके और जानकर उनके पान के अभ्यासमें तो अभिप्रायसे है क्योंकि क्षत्री और वैश्यको अग्निवर्ण सुराको पीकर मरणसे पवित्र होता निषेध नहीं यह पहिले दिखाय आये यह है यह वसिष्ठेका कहा मरणांतिक प्रायश्चित्त गौडी और माध्वीके पात्रके जल पनिमें स- जानना-यहां सुरा शब्द पैप्टोके अभिप्रायसे | मझना क्योंकि प्रायश्चित्त गुरु है ताल आदि नहीं क्योंकि उसके एकवार पीनेमें मरणां- मदिराके पात्रके जल पीनमें तो प्रायश्चित्तकी तिक प्रायश्चित्त दिखाय आये मदिराकी कल्पना करनी ।। सुगंधिवाले सूके पात्रके जलको अज्ञानसे भावार्थ-अज्ञानसे सुगको पीकर और पानेमें घृहत् यमैने कहा है कि यदि कोई वीर्य विष्ठा मूत्र इनको भक्षण करके तीनो द्वि- द्विज मदिराके भाण्डमें स्थित जलको पावै जाति वर्ण फिर संस्कारके योग्य होते हैं । तो कुशाकी जडसे पके हुए दूधसे तीनदिन व्यतीत करे और अज्ञानसे अभ्यास तो पतिलोकनसायातिब्राह्मणीयासुरांपियेत् ॥ वसिष्ठने कहा है कि मदिराके पात्र में स्थित इहैवसाशुनीगृध्रीसूकरीचोपजायते २५६॥ जलको यदि कोई द्विज पीव तो पद्म-गूलर- पद-पतिलोकं २ न:-सा १ याति क्रि- बेल-ढाक-कुशा इनके जलको पीकर तीन ब्राह्मणी १ या १ सुरां २ पिवेत् क्रि-इहए- रात्र शुद्ध होता है जानकर पीने में तो विष्णूने एवा-सा १ शुनी १ गृधी १ सूकरी १ च:- कहा है कि मदिराके भाण्डमें स्थित जलको उपजायत क्रि-॥ पीकर पांच रात्र तक शंखपुप्पासे पकाये दूधको पावै ज्ञानसे अभ्यासमें तो शंखने लोक न याति इह एव सा शुनी गृधी चपुनः योजना-या ब्राह्मणी सुरां पिबेत् सा पति- कहा है कि मदिराके पात्रमें स्थित जलको सूकरी उपजायते ॥ तात्पर्याथ-जो ब्राह्मणी अर्थात् द्विजाति- १ अभ्यासे तु मुराया अग्निवर्णा सुरां पिवैमरणा- सूतो भवति । योंकी भार्या सुराको पावै वह पुण्य करने- २ मयभाण्डस्थित तोय यदि कधिपिवेद्विजः । परभी पतिलोकमें नहीं जाती किंतु इस कुशमूलाविपकेन त्र्यह क्षारण वर्तयेत् ।। लोकमेंही कुत्ती-गीधनी-सूकरी इन तिरछी ३ मयमादस्थितं तोयं यदि कश्चित्पिपेट्रिजः ! योनीयोंको क्रमस प्राप्त होती है यहां ग्राम पद्मोदम्मरपिल्यानां पलाशस्य कुशस्य च ॥ एतेपा- | णीका ग्रहण जिस द्विजातिको जितनी भाया मुद्रक पीत्वा त्रिरात्रेण विशुध्यति । हों उन सबका उपलक्षण है और वे भाया ४ मघमाण्डस्थित तोयं पीत्वा पंचरात्र शंखपुष्पी को वर्णके क्रमसे तीन कह आये है मृतं पयः पिवेत् । ५ मद्यभाण्डस्थित तोय पत्तिा सनरात्रं गोमुत्रं १ मयभाण्डस्थितं तोर यदि कश्चित्रिपट्टिनः। यारकं पिवेत् । द्वारशाई तु पयसा पियानी मुखर्वलाम् ।
मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५५५) इसीसे मनुने कहाँह जिसकी भार्या सुराको पयन सन् राज्ञे मुशलं अर्पयेत् तेन हतः वा पावे जिसका आधा शरीर पतित हो जाता मुक्तः अपि शुचिर्भवति ॥ है पतित है आधा शरीर जिसका ऐसे उस- तात्पर्यार्थ-जो ब्राह्मणके सुवर्णको चुगता' की निष्कृति (गति) नहीं कही क्योंकि है वह सुवर्णकी चोरी में की ऐसे अपने कर्म- धर्म-अर्थ-कामोमें स्त्री पुरुषको संग अ- को प्रसिद्ध करता हुआ राजाको मुसलका धिकार होनेसे दोनों का एक शरीर होता है अर्पण करे मुसलका अर्पण करना दृष्ट अर्थ- इससे जिस द्विजातिको भार्या सुराको पौवे के लिये होनेसे उस मुसलसे राजा उसको उसका भार्यारूप आधा शरीर पतित हो- हते उससे मरनेसे वा वचनसे शुद्ध होताहै जाता है फिर उसकी गति नहीं होती तिससे यहां हरण शब्दसे प्रत्यक्ष वा परोक्ष बलसेवा ब्राह्मणी आदि द्विजातियोंकी भार्या सुरा- चारीसे खलके हेतु क्रय आदिके को न पावे तिससे ब्राह्मण क्षत्री वैश्य सुरा- विना ब्राह्मणके मुवर्णका ग्रहण लेना को न पवि इस पूर्वोक्त निषेधकी विधियद्यपि मुसलका अर्पण करे यह सामा- मुल्लिंगको अविवक्षित होनसे तीनों वाकी न्यसे कहा है तो भी उस मुस्लको मारने के भार्याओंको निषेध सिद्ध था पुनः पचन इस- | लिये होनेसे मारनेमें समर्थ लोहे आदिका लिये है कि शूद्राभी द्विजातियोंकी भार्या मुसल लेना इसीसे मनु ( अ०८श्लो-३१५) सुगको न पावे इससे द्विजातियोकी भार्या ने कहा है कि कांधेपर मुसलको वा खैरके सुरा पानेमें आधा प्रायश्चित्त करें शूद्रकी लकुट (लट्ट )को वा दोनों तरफसे पैने भार्या जो शूदा है उसको तो शूद्रके समान खड्ग वा वनछी वा लोहके दंडको लेकर सुरा पीनेका निषेध नहीं है मुरापानके तुल्य राजाके समीप जाय- शंखने भी यहां विशेष जो निषिद्ध भक्षण आदिहैं उनमें सुरापानका कहा है कि सुवर्णका घोर केशोंको खोलकर आधा प्रायश्चित्त यह लेकर आये हैं।। गालवस्त्र पहिने लोहेका मुसल लेकर जाय भावार्थ-जो ब्राह्मणी सुराको पावै वह पति- और कहे कि मैं यह पाप किया है इस मुसल- लोकको नही जाती कितु इसी लोकमें कुत्ती से पवित्र होता है यहां मारनाभी मुसलसे से मुझे मारो- फिर वह राजाकी शिक्षा देने- गीधनी और सूकरी उत्पन्न होतीह ॥२५६॥ वारंवार शास्त्रमें नहीं कहां इससे एकवारही इति सुरापानप्रायश्चित्तप्रकरणम् करना इसीसे मन ( अ० ११ श्लो० १००) ब्राह्मणस्वर्णहारीतुराशेमुशलमर्पयेत् । में कहा है कि राजा मुसल लेकर उसे एक- स्वकर्मख्यापर्यस्तेनइत्तीमुक्तीपिवाशुचिः ।। वार स्वयं मारे एकवारकी ताडमासे मरजाय तो शुद्ध होता है और मरनेसे बचजाय तो पद-ब्राह्मणस्वर्णहारी १ तु:-राज्ञे ४ जीताहुआभी शुद्ध होता है सोई संवर्तन मुशलं २ अपर्यत् क्रि-स्वकर्म २ ख्यापयन्१ तेन ३ हतः १ मुक्तः१ अपिड-वा- शुचिः॥ १ संधैनादाय मुसल लकुटं वापि खादिरम् । अ- योजना-ब्राह्मणस्वर्णहारी स्वकर्म ख्या- सिंचोभयतस्तीक्ष्णमायस दहमेव वा। २ सुवर्णस्तनः प्रकीर्णकेश आदिवासा आयसं १ पतस्पर्धे शारिस्य यस्य भार्या मुरा पिरत । पति मुशलमादाय राजानमुपतिष्ठदिद मया पापं कृतमनेन ताध शरीरस्य निस्कृतिनै विधीयते । मुरलेन मा धातयस्वैति स राहा शिष्टः सन्पूतो भवति । २ ब्राह्मणराजन्यो वैश्शश्च न सुरां पिवेत् । ३ ततो मुशलमादाय सकृदन्यातु तं स्य। -- याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा है कि फिर राजा मुसल लेकर उसे श्चित्तीयते नरः) यह नरमात्रका ही उपल- स्वयं हते यदि वह चोर जीजाय तो यह चो- क्षण है और मनुके (अ० ११ श्लो० ५४ ) रीके दोपसे शुद्ध होता है सोई ब्रह्मवधौ | ब्रह्महत्या-सुरापान चोरी-और गुरुस्त्रीगमन कहा है कि प्रहारोंकी ताडनासे मृतककी चार महापातक हैं इस निमित्तवाक्यमें 'तुल्य होनेपर जीता हुआभी शुद्ध होता है विशेषका ग्रहण नहीं किया उसकी हे अपे- कदाचित् कोई शंका करै कि ताडनांके वि-क्षा जिसको ऐसे ( सुवर्णस्तेयकृतिप्रा) नाभी राजाका छोडाहुआ चोर शुद्ध होता ! इस नैमित्तिक वाक्यों सुनेहुये विप्रपदको- है यह अर्थ क्यों नहीं मानते इसका समा- भी उपलक्षण मानना युक्त है जैसे अभ्यु- धान कहते हैं कि न मारनेसे राजा पापी दित इष्टि ( यज्ञ ) में जिसकी हवि तंडुल होता है इस गौतम के वचनमें ताडना न है इस वाक्यमें तंड्डलका ग्रहण संपूर्ण हवि- करते हुये राजाको दोष कहा है कदाचित् का उपकक्षण है और यह राजाका मारना कहो कि राजाको दोष रहो शास्त्रके निषेध- ब्राह्मण भिन्नके विषयमें समझना क्योंकि सब को न मानकर राजा स्नेह आदिसे छोडदे तो | पापोंमें टिकेभी ब्रह्मणको न मारे इस वचनसे चौरकी शुद्धि कैसे न होगी-इसका समाधा- मर्नु ब्राह्मणके वधका निषेध किया है न कहते हैं कि ऐसा मानोगे तो विनाकारण (अ०८ श्लो० ३८०) यदि किसीप्रकार शुद्धि हो जायगी, कदाचित् कहो कि छोड- निषेधको न मानकर राजा ब्राह्मणको हते नेके पीछे बारह वर्षका प्रायश्चित्त करनेसे तोभी पवित्र होता है क्योंकि चोर ब्राह्मण शुद्धि मानी है इससे विनाकारण शुद्धि न- वधसे वा तपसे शुद्ध होता है इसे बचनमें ही वहभी सुंदर नहीं क्योंकि (मुक्तः शुचिः) मनु (अ० ११ श्लो० १०० ) ने ब्राह्मणकी यह कहनेसे छोडनाही शुद्धिका हेतु भी वधसे शुद्धि कही है कदाचित् कहो कहा है इससे पहिलाही अर्थ ठीक है- यह (तपसेव वा ) इस एव पदसे वधका निषेध रणांतिक प्रायश्चित्त सब वर्णके चोरको है है सो ठीक नहीं क्योंकि वह केवल तपसेभी कवल ब्राह्मणके ही चौरको नहीं क्योंकि शुद्धिका चोधकहै यदि वधका निषेध है तो (ब्राह्मणस्वर्णहारी ) इस नैमित्तिक वचन- वा तपसे शुद्ध होता है यह विकल्पका कहना में सुवर्णका चोर यह सामान्यसे पढा है और 'प्तिद्ध न होता कदाचित् कहोकि विकल्पका क्षत्री आदिभी महापातकी होसकते हैं उ- कहना दंडके लिये है सोभी ठीक नहीं क्यों- नका दूसरा प्रायश्चित्तशास्त्रमें नहीं कहा जो तो कि वचनमें दंड नहीं दिखाया-और उनका मनुके वचन ( अ० ११ श्लो० ९९ ) में ही विकल्प होता है जिनका एक अर्थ हो कहा है कि सुवर्णका चोर विप्र (ब्राह्मण ) इसे न्यायसे व्रीहि और यक्के समान एका- पूर्वोक्त प्रायश्चित्त कर उसमें विप्रका ग्रहण काही विकल्प होता है-दण्ड और तप नरमात्रका उपलक्षण है क्योंकि ( प्राय- ये दोनों एकार्थ नहीं, क्योंकि दण्ड दमन तितो मुसलमादाय सद्वन्यात्तु तं स्वयं । यदि ब्रह्महत्यामरागनं स्तेय गुगनागमः विति स स्तनस्ततः स्तेयाद्विशुद्धयते । २ अभ्युदितेष्टयां यस्य । हविः। २ मृतसरा प्रहारातो जीवन्नपि विशुद्ध्यति । ३ न जातु प्राह्मण हल्यात्सर्वपापेष्यपि स्थितं । ४ बधेन शुद्धयति स्तनो प्राह्मणस्तपत्र वा। ४ सुवर्णस्तयकतिपः प्रायश्चित्तीयते नरः । ५ एकार्यास्त विकल्पग्न। । ३ अपनेनस्वी राजा।
प्रायश्चित्वाध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ करनेके लिये, और तप पापक्षयके लिये एक लिक्षा, और तीन लिक्षाओं की एक होताहे कदाचित् शंका करोकि चोरवधसेशु- राई तीन गईओंका एक गौर सर्षप छ गो- द्ध होता है इस सामान्य विषयक वधके संग रसपी ( सरसों) का एक मध्ययव तीन ब्राह्मण तपसे ही शुद्ध होता है इस वि- मध्ययवोंका एक कृष्णल, पांच कृष्णलोंका शिष्ट विषयक तपका विकल्प हो जायगा एक मासा होता है और सोलहमासेका सो ठीक नहीं क्योंकि ब्राह्मणोंकोदधि दो और एक सुवर्ण कद्दाताहे इससे ब्राह्मणके सुवर्णकी कौडिन्यको तकदो ऐसे विषयमें विकल्प नही चोरी महापातक होती है इत्यादि प्रयोगोंमें होता तिससे दोनोका सामान्य विषय माननाही किया हुआ हैं परिमाण जिसका ऐसे सुद- युक्त है अथवा क्षत्रियकोभी निषेध नहीं का ही ग्रहण युक्त है परिमाण (तो.) क्योंकि मनुने सुवर्णकी चोरी करनेवाला बा- का करना दृष्टके लिये है अदृष्ट (परलोक)क ह्मण यह कहकर राजा मूसल को लेकर उ-लिये नहीं और न लोकव्यवहारके लिये है सको एकवार स्वयं मारे इस वैचनमें (अ० क्योंकि इनके लिये स्मृतिकारोंकी प्रवृत्ति ११ श्लो० १००) तं इस सर्वनामस इस प्र- नहीं हुआ करती इप्सीसे न्यायके ज्ञाता- करणमें पढे ब्राह्मणकाही हनन कहा है कि आने कहा है कि कार्यके समयमें संज्ञा और. ब्राह्मणको कदाचित् न मारे यह पूर्वोक्त व- परिभाषाओंको उपस्थिति होती है-तैसे ही चन पायाश्चत्तसे भिन्न दण्डरूप हननके नामभी गुण और फलके संबंधसे काममें विषयमै चरितार्थ होजायगा, और यह मर- आता है पंचदश (१५) याज्य यहां तो णांतिक प्रायाश्चत्त जानकर सुवर्णकी चोगमें । दण्ड मात्रके उपयोगी परिमाणका स्मरण समझना क्योंकि मध्यम अंगिराका वचन है नहीं है उतनाही अर्थ मानने प्रमाण नही कि बुद्धिमानोंने जो मरणांतिक प्रायश्चित्त इससे विशेषके अभावसे सबका शेष मान- कहा है वह जानकर किये पापमें समझना नाही युक्त है किंच (और) दण्ड दमनके इसमें संशय नहीं और यहां सुवर्ण शब्द सु- लिये है दमन परिमाण विशेषके विनाभी हो- , वर्णरूप तोलसे तुले सुवर्णका वाची हैं जाति- सकता है इससे परिमाण विशेषका अत्यंत मात्रका वाचक नहीं क्योंकि इन वैचनासे । उपयोग नहीं केवल शब्दसे जाने हुये महा- सोलह मासे सोनेम सुवर्ण शब्दको कहा है पातकी आदिकीमें निश्चयसे परिमाणके स्म-- कि झरोखमें सूर्यको किरणोंमें टिकहुये र- जको बसेरणु कहते हैं, आठ बसरेणुओंकी वर्णक हरनेमेंही महापातकी होता है और रणका उपयोग है इससे सोलह मासेभर सु-.. १ ब्राह्मणेभ्यो दधि दीयता तक कौडिन्याय वा । उसके निमित्त मरणांतिक प्रायश्चित्तका वि.. २ गृहीत्या मुसल राजा सहन्यात त स्वयम् । धानभी उसमेंही है और दो तीन मासे ३ मरणातिक हि यत्प्रोक्त प्रायावत्त मनीषिभिः । ( आदि सुवर्णकी चोरीतो क्षत्री आदिका जो- तत्तु काम कृते पापे विज्ञय नात्र सशय. । सुवर्ण उसको चोरीके समान उपपातकही ४ जाल मूर्यमरीचिस्थ प्ररेणूरज स्मृतम् । तेऽ धौ रिक्षा तु तास्तिस्रो राजसप उच्यते । गोरस्त ते है और सुवर्णसे न्यून सोनेकी चोरीमें तो नया पार्योमध्यस्तु ते यः । कृष्णलः पच ते अन्य प्रायश्चित्त कहा है इससे सुवर्ण भर मापास्ते सुवर्णस्तु पोडश। सनिक हरणमें मरणान्तिक प्रायश्चित्तही (५५८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । युक्त है सोई पत्रिंशत्के मतमें कहा करही करना क्योंकि यह स्मृति है कि ब्रा- है कि वालके अग्रभागभर सोनकी चोरी- ह्मणके सुवर्ण आदिको चुराकर चुरानेवाला में एक प्राणायाम करे-लिक्षामानकी चो- | ग्यारह अधिक सुवर्ण धनके स्वामीको देते- रीमें तीन प्राणायाम, राई भरको चौरीमें सेही मर्नुका (अ० ११ श्लो० १६४ ) वचन चार प्राणायाम करे और पापकी शु- है कि उस धनको देकर अपनी शुद्धिके लिये द्धिके लिये आठ सहस्र गायत्री जपे और सांतपन कृच्छ करैदण्डके प्रकरणमें भी क- गोरसप (सरसों) भरकी चोरीमें दिन- हा है कि शेषपापी ग्यारह गुना दंण्ड दे और भर सावित्री जपे, जौंभर सौनको चुराकर स्वामीको धन दिवादे और जब राजाअशक्ति- दो दिन प्रायश्चित करे, कृष्णलभर सोने- से नमारसके तो वसिष्ठका कहायह प्रायश्चि- को चुराकर द्विजोंमें उत्तम उस पापकी शु- | त्तजानना कि चोर केशोंको खोले राजाकी द्धिके लिये सांतपन कृच्छू करे सुवर्णकी याचना करे फिर राजा उसको तावका शस्त्र चोरीमें वर्ष दिनतक जो पावे इसके ऊपर दे उससे अपनी आत्माको हते तो मरणसे मरणांतिक प्रायश्चित्त वा ब्रह्महत्याका व्रतभी | पवित्र होता है यह शास्त्रमे जानते हैं और प्रायश्चित्त जानना, और यह वर्षदिनतक जो उसेनें दूसरा प्रायश्चित्त कहा है कि जौंका भोजन कुछ कम सुवर्णभर सोनेकी विना समयके भी गोके घी को देहमें मलकर चेरिमें जानना क्योंकि सुवर्णभरकी चो- | गोमयकी अग्निसे पादसे लेकर अपने देहको रीमें मनु आदि बडी बडी स्मृतियों में बारह | मारकर पवित्र होता है यह शास्त्रसे जानते है वर्षका प्रायश्चित्त कहा है जो यह वचन है | वह प्रायश्चित्तभी गुरु वेदपाठी यज्ञमें स्थित कि जो मनुष्य जानकर पण्य धनको बलसे | ब्राह्मणके द्रव्य चुगने में वा क्षत्रिय आदि चोर- ग्रहण करते हैं उन बलसे हरनेवालोंको | के विषयमें, समझना और निष्कालक पदसे प्राणांतिक प्रायश्चित्त कहा है यह प्रायश्चित्त केश श्मनु लोम इनका मुण्डन कहा है तैसे सुवर्णसे न्यूनमेंभी समझना और यह चो- | ही अश्वमेधके करनेसे शुद्धि होती है क्यों- रीका प्रायश्चित्त चुपये धनको स्वामीको दे- कि प्रचेताने मरणांतिक प्रायश्चित्तको कह- १ वालाप्रमात्रेऽपहृते प्राणायामं समाचरेतालिक्षा- | करके शुद्ध होता है यहभी वैश्य और क्षत्री कर कहा है कि अश्वमेध वा गोसव यज्ञको मापि च तथा प्राणायामत्रयं युधः ॥ राजसर्पपमात्रे तु चोरको समझना ॥ प्राणायामचतुष्टय । गायत्र्यष्टसहस्रं च जपेत्तापवि- शुद्धये ॥ गौरसर्पपमात्रे च सावित्रों वैदिनं जपेत् । य. १ स्तेये ब्रह्मस्वभूतस्य सुवी दिः कृते पुनः । वमात्रे सुवर्णस्य प्रायश्चित्तं दिनद्वय।।सुवर्णकृष्णलं ोक स्वामिनेऽपहृतं देय हालेकादशाधिकम् ॥ मपहृत्य द्विजोत्तमः । कुर्यात्सांतपनं कृच्छ्र तत्यापस्या- २ चोत्सांतपनं कृच्छ तन्निर्यायात्मशुद्धये । शेषे. पनुत्तये ॥ अपहृत्य सुवर्णस्य माघमात्रं द्विजोत्तमः। ध्वेकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तन्द्रनम् ॥ ३ स्तेनः प्रकीर्णकेशो राजानमभियाचयेत् तत- गोमुत्रयापकाहारखिभिमांसैविशुद्धयति । मुवर्णस्या- स्तस्मै राजौटुम्मर शस्त्रं दद्यात्तेनात्मानं प्रमापयेत्र पहरणे वत्सरं यावकी भवेत् ।। उर्व प्राणान्तिक ज्ञेय- मरणारपुतो भवति इति विज्ञायते । ४ निष्कालको गोताक्तो गोमयामिना पादप- २ पलाये कामकारण गृहीत स्वं नराधमाः। तेषां भृत्यात्मानं प्रमापोन्मरणात्प्तो भ्यति इति विज्ञायते। तु बलदर्तणां प्राणांतिकामहोच्यते । ५ दृष्ट्वा वाश्वमेधेन गोसवेन वा रिशुद्धयत् । मथरा ब्रह्मदनतम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ भावार्थ-ब्राह्मणके सुवर्णका चोर अपने (चोप)में यह प्रायश्चित्त नहीं क्योंकि कर्म (अपराध)को कहता हुआ गजाको | उसमें मुख्य जातिका संबंध नहीं है और मुसल दे उससे मरने वा बचनेसे शुद्ध होता। मुख्यकी तुल्यता मानसे गाणमें मुख्यक धर्म है ।। २५७ ॥ नहींहोसकते यद्यपि सुवर्णके सदृश सुवर्ण भिन्न द्रव्यकी भ्रांतिसे चुराता है तोभी यह अनिवेद्यनृपेशुध्येसुरापयतमाचरन् । प्रायश्चित्त नही होता क्योंकि सुवर्णसे भिन्न- मात्मतुल्यंसुवर्णवादद्याद्वाविप्रतुष्टिकृत् ॥ का चोर है कदाचित् कहो ब्राह्मणके वधर्म प्रवृत्त हुआ विना मारेभी प्रायश्चित्त करे पद-अनिवेद्या-नृपे७ शुध्येत् क्रि-सुष- इसके समान यहांभी दोप है सोठीक नहीं पव्रतं २ आचरन् १ आत्मतुल्यं २ सुवर्ण २ | क्योकि सुवर्णसे भिन्नमें प्रवृत्त होनेसद्दी पूर्वे या दद्यात् क्रि-वाऽ-विप्रतुष्टिकृत् १ ॥ क्त वचनका यह विषय नहीं, जो यह बचने है कि मनसे पापका ध्यानकरके ओंकार योजना-नृपे अनिवेद्य सुरापत्रतं आच- रन् शुध्येत् आत्मतुल्यं सुवर्ण वा विप्रतुष्टि- पूर्वक व्याहृति मनसे जपे और तीन प्राणायाम करके आचमन करे पापमें प्रवृत्त होजायतो कृत् दद्यात् ॥ द्वादशरानका कृच्छू करे वहभी यथार्थ धनकी तात्पर्यार्थ-अपनी चौरीको राजाके यहां | प्रवृत्तिके विषयमें है इससे ऐसा सुवर्णका अप- निवेदन न करके बारह वर्षके सुरापवतको हार प्रायश्चित्तका निमित्त नहीं होसकता किंतु करता हुआ शुद्ध होता है यहां सुरापत्रतका पूर्वोक्त रजत बुद्धिसे सुवर्णका अपहारही हो कथन शवके शिरकी ध्वजा और कपाल, सकता है यदि पूर्वोक्त सुवर्णका चौर अत्यंत इनके धारणके निषेधार्थ है यहभी अज्ञानसे | महा धनी होयतो अपने देहकी तुल्य सुवर्ण करनेके विषयमें है क्योंकि मनु(अ०११श्लो० दे यदि उतना धन नहो और तपकोभी न- ८९) ने अज्ञानसे विधान किये बारह वर्ष- | कर सके तो ब्राह्मणके संतोपकारी अर्थात् के प्रायश्चित्तकाही अतिदेश किया है कि' जीवनभर कुटुंघपालनके योग्य धनको दे अज्ञानसे द्विनको मारनेवालेकीही यह शुद्धि यदि निर्गुण स्वामीके द्रव्यको चुरावे तो इसी कही है कदाचित् शका करोकि अज्ञानसे | व्रतको वह चोर पादसे न्यून करे इस व्यासके चोरी ही नहीं होसकती इससे उसका विषय | वचनसे कहा नव वर्षका प्रायश्चित्त जानना कैसे हो सकता है इसका समाधान कहते और जब पूर्वोक्तही द्रव्यको क्षुधासे दुखी हैं कि जब वस्त्र के प्रान्तमें बंधे हुये सुवर्ण | कुटुंबकी रक्षाके लिये चुरावि तो अनिके आदिको अज्ञानसे चुरावे अथवा रजत आदिकी बुद्धिसे चुरावे और चुरानेके अनं- मनसा पाप ध्यात्वा प्रणवपूरक व्याहतीमन- तरही किसी अन्यको देदे वा नष्ट करदे और सा जपेत् व्याहृत्य प्राणायाम त्रिराचमेत् मवृत्ती कृच्छ्र स्वामीके प्रति फिर न देतो अपहारहो सकता है और जो ताम्र आदिधातु रसवेध द्वादशरात्र चरेत् । आदिसे सुवर्णके रंगकीहो उसके अपहार २ एतदेव व्रत स्तेनः पादन्यून समाचरेत् । ३ पइन्दं वा चरेत् कृच्छं यजेता ऋतुना द्विजः १ इयं विशुद्विददिता प्रमायाकामतो द्विजम् । तीर्थानि वा भ्रमन्विद्वास्ततः स्तेयाद्विमुच्यते ।
(५६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । कहे छ वर्षके प्रायश्चित्त स्वर्जित आदि यज्ञ तीन वर्ष आदि लघु प्रायश्चित्तका विषय और तीर्थयात्राको करें कि द्विज छ वर्षका सुवर्णसे भिन्न होनेसे नहीं किंतु उपपातक- कृच्छ्र प्रायश्चित्त वा यज्ञ करै वा तीथामें | के प्रायश्चित्तकाही विषय है और जो आप. भ्रमता हुआ विद्वान् चोरीसे छुटता है यदि स्तंबने अन्य कुछ कहा है कि चोरी और चुरानेके अनन्तरही मैं बडा कष्ट किया यह मदिराको पीकर सांवत्सर कृच्छ्र करे वह पश्चात्ताप करके स्वामीको देदे या त्यागदे तो सुवर्णसे कम और मासेसे अधिक परिमा- आपस्तंबक कह चौथे कालमें प्रमित भोज- णके द्रव्यमें समझना जो तो सुमंतुने कहा नसे तीन वर्षका प्रायश्चित्त, अथवा अंगिराका है कि सुवर्णका चोर मासतक आठ सहस्र कहा वज्रनामका तीन वर्षका प्रायश्चित्त जा- गायत्रीसे घीकी आहुति प्रतिदिन दे तीन नना, कदाचित् कोई शंका करे कि स्वामी रात्र उपवास और तप्त कृच्छ्से पवित्र होता को लाठाने का त्यागने में अपहार हो चुका तो है उसका पूर्वोक्त मासेभर सुवर्णकी चोरीका अल्प प्रायश्चित्त कैसे होसकताहे यदि अप- जो प्रायश्चित्त उसके संग विकल्प समझना, हार नहीं हुआ तो प्रायश्चित्तका अभावही और जो उसीने अन्य कहा है कि सुवर्णका होगा प्रायश्चित्तकी न्यूनता न होगी ऐसा मत चौर बारह दिन तक वायके भक्षणसे पवित्र कहो क्योंकि अपहार उपभोग आदि फल पर्य- | होता है वहभी उसको समझना जो मनसे त होता है इससे उपभोगसे पहिले निवृत्त हो चोरीमें प्रवृत्त हुआ हो और स्वतः ही हट नेमें पुष्कल (पूरा) अपहारके अर्थका अभाव गया हो यहांभी वालवृद्ध आदिकोंको आधा है इससे प्रायश्चित्तकी न्यूनता इस प्रकार युक्त प्रायश्चित्त जानना और सुवर्णकी चोरीके हजैसे पान के अयोग्य द्रव्यको पीकर वमनमें समान कही जो अश्व, रत्न, मनुष्य, स्त्री, होती है अर्थात् मरण आदि फल नहीं होता | भूमि, धेनु, इनकी चोरी है उनमेंभी आधाही कदाचित् शंका करोकि चोरके हाथसे बलसे प्रायश्चित करना और जो चतुर्विशति म- छीनकर ग्रहण करनेमेभी उपभोग (वर्तना) तो वचन है कि द्विज अज्ञानसे चांदीको रूप फलका अभाव है वहांभी अल्प प्राय- श्चित्त हो जायगा तो ठीक नहीं क्योंकि चो- कसे आगे और सौ तक दूना, और सहस्र चुराकर चान्द्रायण व्रत करै दश गद्याण- रकी उसके त्यागमें स्वयं प्रवृत्ति नहीं है और फलपर्यंत स्वयं प्रवृत्ति है और जो रजत ताम्र आदिसे मिले सुवर्णका अपहार है उसमें २ सुवर्णस्तथी माम सावित्र्याष्टसहतमाग्याहुती- यह लघु प्रायश्चित्त नहीं क्योंकि संसर्गमेभी जुहुयात् । प्रत्यहं विगयमुपवासं तप्तकच्छण च सुवर्ण इस प्रकार दूर नहीं हो सकता जैसे पतो मवति । पृषदाज्यमें आज्य इससे वहां बारह वर्पका ३ सुवर्णस्तेयो द्वादशरात्र वायुभक्षः पूतो भवति प्रायश्चितही युक्त है कदाचित् कहो कि वह ४ रुप्प हत्वा द्विजो चमोहाचोचारायण स्तम् । | सुवर्णके सदृश दूसराही द्रव्य है इससे लघु | गदाणदशकालमा शनाद्विगुण चोत् । आसहस्रात्तु प्रायश्चित्त कहा है सोठीक नहीं क्योंकि वहां | त्रिगुणमूः हेम विधिः स्मृतः । सर्वेषां धानुलोहानां पराकं तु समाचरेत् । धान्याना हरणे कृच्छतिलाना- १ स्तेय कृता सुरां पीत्वा छच्छू सांवत्सर चौद। मैन्दव स्मृतम्। रलानां हरणे विपश्वरेचांद्रायण मतम् ।
मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५६१) तक तिगुना, प्रायश्चित्त करें उससे आगे | पर सोनेसे मरजाय इस प्रकार शयन करके सुवर्णकी चोरीका प्रायश्चित्त कहा है संपूर्ण देहको त्यागदे अर्थात् मरजाय और शयन धातुं और लोहेकी चौरीम पराक व्रत करे | भी मैं गुरुकी स्त्रीके संग गमन किया ऐसे धान्योंकी चोरीमें कृच्छ्र और तिलोंकी चोरीमें | अपने कर्मका विदित करके करना क्योंकि ऐदव कहा है और रत्नोंकी चोरीमें ब्राह्मण | मनुको स्मृति में गुरु तल्पग (अ० ११ श्लो. चान्द्रायण व्रत करै-वहभी सहस्र गद्याण- | १०३ )को पापको कहकरही यह प्रायश्चित्त कसे अधिक चांदीकी चोरी में सुवर्णको चौरीके | कहा है तसेही स्त्रीका आलिंगन करके शयन समान प्रायश्चित्त कहने के लिये है कुछ प्राय करें क्योंकि वृद्धहारीतकी स्मृति है कि श्चित्तको निवृत्ति के लिये नहीं और जोरत्नों-गुरुतल्पग मिट्टि वा लोहे कि प्रतिमाको की चोरीमें चान्द्रायण कहा है वहभी सहस्र | अग्निके समान तपाकर लोहेकी उस प्रति गद्याणकसे हीन मूल्यक रत्नकी चोरीमें | माके संग स्पर्श करके पवित्र होता है तैसे जानना उसके आगे सुवर्णकी चोरीके समान ही लोम और केशीका मुंडन ओर देहमें प्रायश्चित्त है। घोको मलकर यह प्रायश्चित्त करे क्योंकि भावार्थ-अपनी चोरी राजाके यहांन कह वसिष्ठकी स्मृति है कि मुंडन, और धोको कर पुण्य व्रत (१२ वर्ष) को करता हुआ ! मलकर तपाई हुई लोहेको वा मिट्टीकी स्त्रीके शुद्ध होता है अथवा अपने देहके तुल्य | संग स्पर्श करके मरनेसे पवित्र होता है सुवर्ण वा ब्राह्मणके संतोष योग्य धनका दान कदाचित् कोई शंका करे कि गुरुतल्पका करे ।। २५८॥ गामी अपने पापको कहकर तपाई हुई लोहे- की शय्यापर सोवे अथवा जलती हुई प्रति- इति सुवर्णस्तेयप्रायश्चित्तप्रकरणम्- माका स्पर्श करके मरनेपर वह शुद्ध होता है तप्तेयःशयनेसार्धमायस्यायोपितास्वपेत् ॥ इस मर्नु ( अ० ११ श्लो० १८३) वाक्यके गृहीत्त्वोत्कृत्यवृपणौनत्यांचोत्सृजेत्तनुम् अनुरोधसे तपाये लोहेपर शयन और पद-तप्ते ७भयःशयने ७ सार्द्ध-आय- प्रायश्चित्तहैं सो ठीक नहीं क्योंकि लोहेकी तपाई स्त्रीके संग स्पर्श ये दोनों पृथक्पृथक स्या ३ योषिता ३ स्वपेत् क्रि-गृहीत्वा-उ- बीके संग मौवे, कहा सोवे इस आकांक्षा त्कृत्य - वृषणा २ नैऋत्यां ७ ७च-उत्सृजेत् पर तपाई हुई लोहेकी शय्या पर सोवे इस कि-तनुम् २ ॥ वचनसे आकांक्षा पूर्ण होती है इससे परस्पर योजना-गुरुतल्पगः आयस्या योषितासाई तप्ते अयःशयने स्वपेत् चपुनः वृषणो उत्कृ- त्य गृहीत्वा नैर्ऋत्यां तनुं उत्सृजेत् ॥ १ गुरुतल्यभिभाध्यैनः। तात्पर्याय-अव गुरुतल्पगमनका प्राय २ गुरुतल्पगो मृन्मयीमायसी वा स्त्रियः प्रति- श्चित कहते हैं (समा वा गुरुतल्पगः) कृतिममिवर्णा कृला कार्णायसायने अयोमय्या इस भप्रिम श्लोकके गुरु तरूपग पदका यहां स्त्रीप्रतिकृया समालिंग्य पतो भवति । संबंध होता है गुरुकी स्त्रीका गामी तपाई वा परिष्वज्य मरणास्यूतो भवतीति विज्ञायते । ३ निकालको घृताभ्यक्तस्तप्ता तां सभी मृन्मयों हुई लोहेकी खीकी प्रतिमाके संग तपाई ४ गुरुतत्पौभिमाध्यैनस्तते स्तप्यायोमये । सूमी हुई लोहेकि ऐसी शय्या पर सोवे कि जिस ज्वलंती वालिप्य मृत्युना स विशुध्यति ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराम्रकाशसहित । सापेक्ष होनेसे एकही प्रायश्चित्त है निरपेक्ष मल हुपे स्वर्गको उप्त प्रकार जाते हैं जैसे दो नहीं यह युक्त है अथवा लिंग सहित पुण्यात्मा संतजन, धनके दंडसेभी प्रायश्चि- वृषणोंको अपने हाथसे काटकर और अंजलिमें त होता है क्योंकि मैने ही कहा है (अ० लेकर दक्षिण और पश्चिमके मध्यको नति ९ श्लोक २४० )कि शास्त्रोक्त प्रायश्चित्तको दिशामें मरण पर्यत सीधी गतिसे गमन करके | करते हुये मनुष्योंके मस्तक पर गजा चिन्ह देहको त्यागदे सोई मनु (अ० ११ श्लो० (दाग ) न करे किंतु उत्तम साहस दण्डदे १०४)ने कहा है कि स्वयं लिंग और वृषणों । इनदोनों मरणांतिक प्रायश्चित्तोंके मध्यमें को काटकर अञ्जलिमें लिये मरण पर्यंत | एकभी प्रायश्चित्तके करनेसे गुरुतल्पग शु- सोधी गतिसे गमन करे और गमनभी पीछे द्ध होता है यहां गुरु शब्द मुख्यवृत्तिसे को न देखकर करें क्योंकि शंखलिखितकी | पितामें वर्तता है क्योंकि निषेक ( वीर्यका स्मृति है कि छुरीसे लिंग और वृषणोंको सेचन ) आदि कर्मोको जो विधिसे करे काटकर न देखता हुआ गमन कर इस प्र- और अन्नसे पालना करै वह ब्राह्मण गुरु कार गमन करते हुयेको जहां कुड्य (भीत) कहाता है मर्ने (अ० २ श्लो.. १४२ )के आदिका प्रतिबंध ( रोक) हो जाय तो मर- इस गुरुत्वके बोधक वाक्यमें निषेक आदि- ण पर्यंत वहां ही टिका रहे क्योंकि वसिष्ठ | का कर्ता जनक (पिता) ही गुरु कहा है की स्मृति है कि वृषण और लिंगको काट- और योगीश्वर( याज्ञवल्क्य ) निषेक आदि कर और अञ्जलीमें लेकर दक्षिणदिशाको कर्मके अभिप्रायते कहा है कि जो कर्मको गमन करे और जहां रुक जाय वहां ही मरण करके इसको वेद पढावे वह गुरु होता है पर्यंत टिका रहै सोई नारदने कहा है कि कदाचित् कोई शंका करे कि गुरु शब्दका इनमें किसी स्त्रीक संग गमन करता हुआ | प्रयोग अन्यत्रभी देखते है गुरु शिष्यका गुरुतल्पग कहाता है और लिंगके काटनेसे | उपनयन कराकर इसे वचनमें आचार्य, अन्य उसमें दंड नहीं कहा है इस प्रकार थोडा.वा बहुत वेदका जो उपकार करै उ- दंडके लिये कियाभी लिंगका छेदन पाप सकोभी गुरु जाने इस मनें (अ०२ श्लो० नाशके लियेभी होता है इसी मरणांतिक | १४९ )के वचनमें उपाध्यायमें प्रयोग देखते दण्डके अभिप्रायसे मनुने कहा है (अ० ११ है व्यार्सनेभी अन्यत्र गुरु शब्दका प्रयोग दि- श्लो० ३१८) कि राजाओंने दिया है दंड जिनको ऐसे मनुष्य पापोंको करकेभी नि- प्रायश्चित्ततु कुरणाः सर्वे वर्ण यथोदितम् ।ना- १ स्वयं वा शिश्नपणावत्कृत्याधाय चाजलौ । नै- | क्या राज्ञा ललाटे स्सुप्यास्तृत्तमसाहसम् । ती दिशमातिटदा निपातादजिह्मगः । ३ निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधिः २ सुरेण शिश्नवृषणावत्कृत्यानवेक्षमाणो बजेत् । संभावयति चानेन स विनो गुरुरुच्यते । ३ सवृषणं शिश्नमुक्तस्यांजलावाधाय दक्षिणाभि ३ स गुयः नियों कृत्वा वेदमस्मै प्रयच्छति । मुखो गच्छेद्यत्रैव प्रतिहतस्तत्रैव तिष्टेदा मलयात् । ४ उपनीय गुरुः शिष्यम्। ४ आसामन्यतमा गच्छन्गुरु तल्पग उच्यते । शि ५ स्वल्पं वा बहु वा यस्य श्रुतस्योपकरोति यः लोकतनात्तत्र नान्यो दण्डो विधीयते। तमपीह गुर विद्याद । ५राजभितदण्डास्तु फुत्ता पापानि मानवाः ६ गुरवो मारपितपत्याचार्यविद्यादातम्येष्टनावर निर्मला:स्वर्गमायान्ति संतः सुकृतिनो यथा । ऋविजो भयग्रानान्नदाता च ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५. (५६३) खाया है कि माता, पिता, पति, आचार्य, वि- क्योंकि वहां अन्यका बोधक गुरु शब्द द्याका दाता, ज्येष्ठ भ्राता, ऋत्विज, भयसे नहीं हो सकता और जो व्यासका माता और अन्नका दाता ये सब गुरु होते हैं | वचन है यह सेवा और पूजाकी विधिले कदाचित् कोई शंका करे कि गुरु शब्दके । स्तुतिके लिये अन्य माता आदिका बोध- अनेक अर्थकी कल्पना रूप दोष होगा। कहै-इससे गुरुके प्रतिपादन में तत्पर (नि- सो ठीक नदी क्योंकि गुरु शब्दको प्रवृत्ति- पेकादि ) इस मनुके वचनसे पिताकोही का निमित्त पूजाकी योग्यता सबमें विद्यमा- मुख्य गुरुत्त्व स्थित भया-इसीसे वसिष्टने न है और पूजाकी योग्यताको योगीश्वरने आचार्य पुत्र शिप्य इनकी भाषाओंमें भी प्रवृत्तिनिमित्त दिखाया है कि ये पूर्व २- ऐसेही करे इस वचनसे आचार्य आदिकों मसे मान्य है और इन सबसे माता श्रेष्ठ है। की स्त्रियों में भी अतिदेशस गुरुतल्प प्राय- अर्थात् मान्य है यह प्रारम्भ करके माता चित्त कद्दाहै तेसेही जातूकर्ण्य आदिकोभी अत्यंत श्रेष्ठ है यह उपसंहार ( समाप्ति ) आचार्य आदिकोंकी भार्याओंके गमनमें गुरु- करके सबको पूजाके योग्य कहा है कदा- तल्पव्रत करना काहे यदि आचार्य आदि चित् कोई शंका करें कि उपाध्यायसे दश- मुख्य गुरु होते तो गुरुके कहनेसेही प्रतकी गुना आचार्य और आचार्यले सोगुना पिता प्राप्ति हो जाती अतिदेश मानना अनर्थक होता है इस मर्नु (अ० २ श्लो० १४५ ) हो जाता और संवर्तने तो स्पष्टही पिदार ने उपाध्यायसे अधिक आचार्यको और | पद पढाइ कि पिताकी दारा जो मातासे आचार्यसे अधिक पिताको ही अत्यंत श्रेष्ठ भिन्न उनके संग गमन करके उक्त प्राय- कहनेते वही मुख्य गुरु है सो ठीक नहीं | श्चित्त कर-पत्रिशतके मतमें भी जानकर क्योंकि पैदा करने वाले और वेद देनेवाले पिताकी सवर्णाके संगमोगमन करे वह उक्त पिताओंमें ब्रह्म (वेद ) देनेवाला पिता प्रायश्चित्त कर यह कहाहै इन वचनोसभी अत्यंत श्रेष्ठ है इस वचनसे मर्नु (भ.२ निषेक आदिका का पिताही मुख्य गुरुहे सो० १४६)ने आचार्यकोभी अत्यंत श्रेष्ठ और वह गुरुत्व चारों वामें समान क्यों कहा हे गौतमें नेभी कहा है कि गुरुओंमें कि चारोंवर्ण निषेक आदिक कच हो सकते आचार्य श्रेष्ठ होता है और अत्यंत श्रेष्ठ मा- हैं इससे उस विप्रको गुरु कहते हैं इस वचन- असेही मुख्यता कहोगे तो सदन गुना कह- में विप्र पद उपलक्षणहे इससे पिताकी पली- से माताकोही गुरुत्व होगा तिससे यही | का गमनही महापातकहे और गमन (भोग) युक्त है कि सर गुरु हैं और उनकी पलोको भी वीर्यके त्याग पर्यंत कंहलाई उससे पहिले गमनकोही गुरुतल्पगमन कहते हैं, इस ) निवृत्तिमें तो महापातकी नहीं होता इसमें शंकाका समाधान कहते हैं कि (निएकादी- तपाई लोदेकी शय्यापर और तपाई नि) यह पूर्वोक्त मनुका वचन निपेक आ-लोदेकी प्रतिमाके संग सोवे ये जो मर- दिके कती जनककोही गुरुत्वका बोधक है १ भाचार्यपुत्रशिष्यमार्गमु चैवम् । एने प्रान्या पयामेभ्यो माता गरीयसी । २ आधादिस्तु मार्योमु गुरुतल्पयत परे । २ उपाध्यायादशाचार्य आयाण शत पिता। ३ पित्रदारान् समापय मावरच नराधमः ।. ३ नाकामानोर्गीयान्त्रमदारिता ! ४ विक्रमायो विभाग व योपिगराव। ५समिमी गुरुरच्यते। 1- -- vभायाःवेटो गुरुणाम् ।
(५६४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । णांतिक दो प्रायश्चित्त हैं वे दोनों अज्ञानसे लाना ) करके गमन करे तो स्वयं वृषणों- जननीके गमनमें और जननीकी सवर्णा और | को काट और अञ्जलीमें लेकर यह दूसरा उत्तम वर्ण जो सपली (सौत ) है ज्ञानसे | प्रायश्चित्त करें क्योंकि संबंधकी अधिकतासे उसके गमनमें जानने क्योंकि पत्रिंशन्मत- | प्रायश्चित्त गुरु कहाहै यदि माताही पुत्रका मैं यह कहाहै कि जो मनुष्य ज्ञानसे पिताकी प्रोत्साहन करे तो तपाई हुई लोहेकी शय्या- सवर्णा स्त्रीके संग और अज्ञानसे जननीके में शयन और जलती हुई लोहेकी स्त्रीकी संग गमन करताहे वह विना मरे शुद्ध नहीं प्रतिमाको स्पर्श इन दोनोंमें कोईसा प्राय- होता जानकर जननीके गमनमें तो वसिष्ठ श्चित्त जानना जो तो शंखने बारह वर्षका ने कहाहे कि मुण्डन और धीका उवटना | प्रायश्चित्त कहांहे कि सुवर्णका चोर सुराप करके गोमयकी अग्निमें चरणोंसे लेकर ब्रह्महा गुरुतल्पग ये महापातको भूमिपर देहको दग्धकर दे कदाचित कोई शंका | सोना जटा धारण पत्ते मूल फलका एक काल करें कि माताकी सपत्नी और भगिनी आ- भोजन करें इस प्रकार बारह वर्षके व्रतसे चार्यकी पत्नी और पुत्री और अपनी पुत्री | शुद्ध होते हैं-यह शंखका प्रायश्चित्त सजा- इनके संग गमनका कर्ता गुरुतल्पग कहा- तीय वा उत्तम वर्णकी दाराके गमनमें वा ताहै इस वचनमें अति देशके कहनेसे मा. अज्ञानसे गमनमें जानना और वहांही जान ताको सपत्नीके गमनमें औपदेशिक (मुख्य) कर प्रवृत्ति और वीर्य सींचनेसे पहिले छ। प्रायश्चित्त कहना युक्तहै इसका समाधान वर्षका और अज्ञानसे प्रवृत्तिमें तीन वर्षका कहते है कि ( पितृभार्या सवर्णी) यहां सव- प्रायश्चित्त जानना और जननीमें जानकर के ग्रहणसे हीनवर्ण पिताकी सपत्नीके विषयमें यह आतिदेशका वचनहे इससे कुछ प्रवृत्ति और वीर्य सींचनेसे पहिले निवृत्तिम विरोधनहीं यह प्रायश्चित्तभी मुख्य पुत्रको- बारह वर्षका और अज्ञानसे प्रवृत्ति छः हीहै अन्य पुत्र तो पुत्रके कार्यकारी, मुख्य वर्षका प्रायश्चित्त कल्पना करना और जो नहीं सोई मर्नु (अ. ९ श्लो० १८०)ने | संवर्त्तने ( पितृदारान् ) इस पूर्वोक्त वचनसे कहा है कि क्षेत्रज आदि क्रमसे कहे ग्यारह पिताकी भार्याकी शय्यापर चढने मात्रसे ये पुत्र बुद्धिमानोंने क्रियाके लोपसे पुत्रके तप्तकृच्छु कहाहै वह हीनवर्ण गुरुकी प्रतिनिधि कहेहैं-उसमें दोनोको इच्छासे | दाराओंमे वीर्य सींचनेसे पहिले जानना ॥ गमन (भोग) में प्रवृत्ति होय तो तपाई हुई भावार्थ-गुरुकी स्त्रीका गामी तपाई हुई लोहेकी शय्याका शयन रूप पहिला प्राय- लोहेकी शय्यापर तपाई हुई लोहेकी स्त्रीके श्चित्त कर यदि पुत्र स्वयं प्रोत्साहन (फुस- | संग़ सोवै अथवा लिंग और वृषणोंको काट- १ पितृभाों तु विज्ञाय सवर्णी यांधिगच्छति । कर और अञ्जलीमें लेकर नेति दिशामें जननी चाप्यविज्ञाय नामृतः शुद्धिमानुयात् । गमन करके देहको त्याग दे-॥ २५९ ।। २ निष्कालको घताभ्यक्तो गोमयामिना पादप्र. भृत्यात्मानमवदायेत् । १ अधाशायी जटाधारी पर्णमलफलाशनः । एक- ३ मातुः सपत्नी भगिनी आचार्यतनयां तथा, आचार्यपत्ती स्वसुतां गच्छंस्तु गुरुतल्पगः। कालं समनीत वर्षे तु द्वादशे गते। स्पमस्तेयी सुराप• क्षेत्रमादीन्सुतानेतानकादश यथोचितान् । पु- थ ब्रह्महा गुरुतल्पगः। प्रतेनतेन शुध्यनित महापातकि यप्रतिनिधीनाः क्रियातोपान्मनीषिणः। नस्विमे।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५६५) प्राजापत्यंचरेत्कृच्छ्रेसमावागुरुवल्पगः ।। के संग जानकर गमन करके द्विज अंडको- चांद्रायणवात्रीन्मासानभ्यसेवेदसंहिताम्॥ शोके विनालौंगको काटकर मारनेसे शुद्धहोता पद-प्राजापत्यं २ चरेत् क्रि- कृच्छं है-इसी विषयमें यदि वह प्रायश्चित्त न करना समाः २वा-गुरुतल्पगः १ चांद्रायणं२वा - चाहे तो प्रायश्चित्तके स्थानमें याज्ञवल्क्यका श्रीन् २ मासान् २ अभ्यसेत् क्रि- वेदसं- कही यह वधका दंडही जानना कि उसक हिताम् २- और कामना सहित स्त्रीका लिंगको छेदन योजना-गुरुतल्पगः प्राजापत्यं कृच्छं करके वधकर-और वैश्य जातिकी गुरु भा- समाः चरेत् वा चांद्रायणं- वेदसंहितां त्री-योके संग जानकर गमनमें छः वर्षका प्रा- न्मासान् अभ्यसेत्- यश्चित्त है इसीसे अन्य स्मृतिका वचन है तात्पर्यार्थ-अथवा आगे जो कहेंगे उस कि ब्राह्मणीका पुत्र क्षत्रिया माताके संग प्राजापत्य कृच्छ्रको तीन वर्षतक गुरुतल्पम | गमनमें एक पादसे न्यून वह वर्ष (९ वर्ष) करे यहभी ब्राह्मणीके पुत्रको शूद्र जातिकी | का प्रायश्चित्त करे इसी प्रकार अन्य वाम गुरु भार्याके जानकर गमनमें समझना-औ- जानना-अर्थात् यदि वही ब्राह्मणीका 'पुत्र र जब व्यभिचारिणी (वेश्या ) गुरुपत्नीके | माताकी सपत्नी वैश्यामें गमन करे तो छ. संग अज्ञानसे गमन करे तब तो वेदसंहि- वर्षका और शूद्रामें गमन करे तो तीन व- ताके जप सहित तीन चांद्रायण करे और | पका प्रायश्चित्त करे-इसी प्रकार क्षत्रियाके उसके संग जानकर गमन करे तो उशनों पुत्रको वश्या माताके गमनमें नोवर्षका के कहे इस प्रायश्चित्तको करे कि गुरुतल्प- ओर शुदामे छः वर्षका प्रायश्चित्त है-इसी का गामी संवत्सरतक ब्रह्महाका व्रत-वा प्रकार वश्याके पुत्रकोभी समझना-और छः मासतक तप्तकृच्छ्र करै-और जानकर वैश्यामें जानकर गमनके अभ्यासमें तो क्षत्रियाके गमनमें तो याज्ञवल्क्य का कहा मरणांतिकही प्रायश्चित्त है क्योंकि लोगाक्षि नव वर्षका प्रायश्चित्त करें क्योंकि माताको की स्मृति है कि जो मनुप्य गुरुकी भाया सपत्नी और आचार्यकी पुत्रीके गमनमें गु- वैश्याके संग जानकर वारंवार गमन करे रुतल्पवत् करनेका ही अतिदेश है और वह लिंगके अग्रभागको छेदन करके पापसे यह अतिदेशका प्रायश्चित्त सवर्णा गुरुभा- | शुद्ध होता है-और शूद्रामें जानकर अभ्या- यांके गमनमें नहीं होता क्योंकि वहां जान- स करनेमें तो बारह वर्षका प्रायश्चित्त है कर मरणांतिक और अज्ञानसे यारह वर्षका क्योकि उपमन्युकी स्मृति है कि यदि विम प्रायश्चित्त कहा है इससे क्षत्रियाके विषय सावधानीमें गुरुकी शूद्रा भार्याके संग जान- • मानना ही युक्त है-उसकेही जानकर अ- छिता लिंग वधस्तस्य सकामायाः त्रिया- 'भ्यासमें तो मरणांतिक प्रायश्चित्त है क्योंकि स्तथा । कण्वकी स्मृति है कि क्षत्रिया गुरुकी भार्या- हान्या द्वादश वार्षिकमेवमन्यवर्णास्वपि । २ ब्राह्मणी पुत्रस्य क्षत्रियायां मातरि गमने पाद १ गुरुतल्पाभिगामी मवत्सरं प्रमहनत घमासा- ३ गुरोमायों तु यो वैश्यां मत्या गच्छेत्पुनःपुनः। ना तप्तम चरेत् । लिंगान छेदयित्वा तु ततः शुद्धधेत्म किल्विात् । २ मातुः सपली भगिनीमायावतनयां तथा । ३ मत्या गा पुनर्भार्या गुरोः क्षत्रसुतो द्वितः । ४ शूदायां तु कामतोऽभ्यासे द्वादशवार्षिक । पुनः शूदां गुगेर्गत्वा वृद्धया विमः समाहितः । ब्रह्मचर्यमदृष्टारमा संचरे दादशादिकम् । भंडाया रहित लिंगमुत्यस्य स मृतः शुचिः ।
(५६६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कर गमन करे तो शुद्ध मनसे बारह वर्षका धार और चौर वन्न. और श्मश्रु दाडी मूर्छ ब्रह्मचर्यरूप प्रायश्चित्त करें और क्षत्रिया धारण किये विजन वनमें एक वर्पतक साव- गुरुभायांके अज्ञानसे गमनमें यमका कहा धानीसे प्राजापत्य कृच्छ कर-अथवा गुरु- प्रायश्चित्त जानना कि आठमें कालमें भोजन | दागका गामी कंटकी वृक्षकी शाखाका स्पर्श ब्रह्मचर्य और व्रतको स्थान और आसनसे | भूमिमें शयन, त्रिकाल स्नान भिक्षाका भोजन विहार और दिनमें तीनवार जलपान, और करता हुआ पवित्र होताहै उसकेही अभ्यासमें भूमिमें शयन करता हुआ तीन वर्षमें उस मनुने (अ. ११ श्लो. १०६) कहा है कि पातकको दूर करता है और क्षत्रियामें गम- अभ्यास करके इंद्रियोंको वशमें करके तीन नके अभ्यासमें जाकर्ण्यने कहा है कि मासतक चान्द्रायण करें और क्षत्रियाम गुरुकी क्षत्रियाभाय में अज्ञानसे गमन करने- | जानकर प्रवृत्त हुआ जो मनुष्य वीर्य सींचनसे से अण्डमात्रको काटकर जीनेसे वा मरनेसे पूर्व निवृत्त हुआ होयतो व्याघ्रके कहे इस शुद्ध होता है और वैश्यामें तो अज्ञानसे प्रायश्चित्तको करें कि ब्राह्मण गुरुकी क्षत्रिया करने में याज्ञवल्क्यैका कहा प्राजापत्य स्त्रीके संग गमनमें तीन मासतक कृच्छ, कृच्छ्र कहा है सोई वृद्ध मर्नुनें कहा है कि अतिकृच्छ प्रायश्चित्त कर यहां यह अज्ञानसे गुरुकी और पिताकी भार्या के गम- व्यवस्था है कि स्त्रीने प्रोत्साहन किया नमें तीन वर्षतक कृच्छ कर उसीके अभ्या- होयतो तीन मासतक प्राजापत्य करे समें हारतेने कहा है कि अज्ञानसे मोहित | दोनोंकी इच्छासे प्रवृत्तिमें तीनमासतक हुआ ब्राह्मण गुरुकी वैश्या भार्या अभ्याससे अति कुच्छ्र करे और स्वयं गुरुपत्नीका गमन करके जीवन पर्यंत पडंग ब्रह्मचर्य प्रोत्साहन करा होयतो तीन मासतक कृच्छा करें शूद्रा गुरुभायीक अज्ञानसे गमन कर- तिकृच्छ करें और उसीमें जानकर प्रवृत्त नमें मर्नु ( अ० ११ श्लो० १०५)के हुआ हो और वीर्य सींचने से पूर्व निवृत्तिम या सुमंतुक कहे प्रायश्चित्तको करें कि खदांग कण्वका कहा प्रायश्चित्तमानना कि एकवार क्षत्रिया गुरुकी भार्याक अज्ञानसे गमनमें- १ फालेटमे वा भुंगानो ब्रह्मचारी सदा प्रतीरिया- 'द्विज चांद्रायण तप्तकृच्छ और अतिकृच्छ नासनाभ्यां विहरबिरहोऽभ्युपरनृपः। अधाशायी-, कर स्त्रीने प्रोत्साहन किया होयतो अति- निभिपिस्वपोदेत पाता। कृच्छू और दोनोंकी इच्छासे प्रवृत्ति हुयी २ गुगः क्षत्रगुता भाषा पुनर्गदा व कामतःभरट . होयतो तप्तकृच्छ, और स्वयं पुनने मोत्सा- मा समुदत्य शुरुजीवन्मृतोऽपिया। ३ प्राजार गरेत्यायो। हन किया होयतो चांद्रायण करें और बैं- ४ गमने गुस्मापा: पिगमायांगमे तपा । अन्द. श्यामें जानकर प्रवृत्ति और वीर्य सींचनेसे अपमशानात एका कि समाचात् । ५ मभ्यर तिमी पापां गुरोरझानमोदितः । धामायणं या ग्रीन्मासानन्पत्य निन्दिपः। रंग प्रमगर्व ग मगरेया। ६सांनी गावासा या मटो पिजने यने । २ पृष्य पारि ग तपा मा. भामा रमारमेक समादितः । माम् । गोन्मासीमा क्षत्रिाममने मुः। . गुरागामामी गरम कन्टमिनीशी प. ३ दिन महापाटिका तार । रिपगारापानी भशाहारः पूठो मति । मराम गुरोभापमानामिनः । - प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५६७) पूर्व निवृत्तिमें कण्वका कहा यह प्रायश्चित्त उपवास करै इति-इसी मार्गसे अन्यभी स्मृ- है कि गुरुकी वेश्या भार्या में जानकर एक- | तियोंके वचनोंको विपयव्यवस्था कल्पना वार गमन करनेमें तप्त कृच्छ्र, पराक, और करनी-पुरुषोंके समान स्त्रियोंकोभी यहां सांतपन कृच्छ एक मासतक द्विज करे- महापातकता, अविशेषसे है-सोई का- यहांभी दोनोंकी इच्छासे प्रवृत्तिमें तप्त कृच्छू त्यायनेने कहा है कि यह दोष और शुद्धि. स्वयं प्रोत्साहन करने में पराक और गुरुकी पतिताकी जो कही प्रसक्त स्त्रियोंकीभी यही भायांने प्रोत्साहन किया होयतो सांतपन विधि कही है-इससे उसकीभी जानकर प्र. करना इसी अज्ञानसे प्रवृत्त हुआ होयतो वृत्तिमें अविशेषते मरणांतिक प्रायश्चित्त है- प्रजापति ने कहा है कि द्विज अज्ञानसे इसीसे पुरुषको मरणांतिक प्रायश्चित्त कह- एकवार गुरुकी वेश्या भार्या में गमन करके कर स्त्रीकोभी, योगीश्वरने लिंगका छेदन पांच सात वा आठ दिनतक भोजन न करे करके पुरुषका और सकाम स्त्रीका वधरूप स्त्रीने प्रोत्साहन किया होयतो पांचरात मरणांतिक प्रायश्चित्त दिखाया है और अ- दोनोंको इच्छासे प्रवृत्ति में सातरात स्वयं कामसे तो मन (अ० २१ श्लो० १८८) प्रोत्साहन किया होय तो आठ राततक भो- का कहा जो पतित स्त्रीभी यही प्रत कर चा- जन न करे शूद्रामें जानकर प्रवृत्त हुआ हो रह वर्षका प्रायश्चित्त है वहीं आधा कल्पना और वीर्य सींचनेसे पूर्वनिवृत्तिमें जावालि में करके करना और जो मित्रकी भार्या सजा- कहा है कि ब्राह्मण गुरुकी शूद्रा भायाम तीय कुमारी, अन्त्यज, सगोना, पुत्रकी स्त्री, जानकर एकवार गमन करके अतिकृच्छूतप्त इनका गमन गुरुतल्पके समान है इसे वच. कृच्छू और पराक व्रतको करे स्त्रीने प्रोत्साहन नसे गुरुतल्पके समपाप हैं और जो इसे व- किया होयतो अतिकृच्छ दोनोंकी इच्छासे । चनसे अतिदशके विषय कहे है कि पिता प्रवृत्तिमें तप्तकृच्छ और स्वयं प्रोत्साहन और माताकी भगिनी, मातुलकी स्त्री,पुत्रकी करनेमें पलक करे और उसीमें अज्ञानसे वधू, माताकी सपत्नी और अपनी भगिनी प्रवृत्तिमें दीर्घतमाने कहा है-गुरुकी शू- ' आचार्यकी पुत्री और स्त्री और अपनी पुत्री दाभायोंमें सावधानीसे एकवार गमन करके इनमें गमनका कर्ता गुरुतल्पग कहाता है प्राजापत्य सांतपन और सातगवतक उपवा- इनमें एक रात्रसे आगे जानकर अभ्यास स करे-स्त्रीने प्रोत्साहन किया होयतो प्रा- किया होय तो क्रमसे छ: वर्षका और नत्र जापत्य-दोनोंकी इच्छासे प्रवृत्तिम सांतपन वर्षका प्रायश्चित्त जानना इसी विषयमें और स्वयं प्रोत्साहनकरनेपर सात रात्रका . एप दोषय शुद्धिश्च पतितानामुदाहवा । खी- १ सप्ताहच्छ परा च तथा सांतपने गुरोः। मायाँ , णामपि प्राक्तानामेष एव निधिः स्मृतः । 4 महलत्या युद्धया मासं रोहिजः । २हित्वा लिंग बयस्तस्य सकामायाः त्रिपास्तथा २ पचरान तु नाश्नीपारससाटो वा तव चा वरयां ३ एतदर व्रत कार्य योपिासु पतितारवाणि । माया गुर्गला सरदान तो द्विजः । ४ तस्विभार्याकुमारीपु स्वयौनियन्त्यजामु च । ३ अविच्चा तसायं एक या नपच । गुगेः . सगोबासु मुतवी गुरुतल्याप्तमं स्मृतम् । साता बुट्या विष: समाचरेत् । ५ पितुः स्वसार मातश्चमातुलानी स्तुपामपि मा- मासापर सांतान महरातोपरामयम् । गुरोः तुः सपली भगिनीमाचार्यतनयां तया । आनायर्ष- Tो करारा रोजिम समाहितः । ली स्तसुना उत्तु गुरुतश्पणः ।
(५६८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . जानकर अभ्यासमें मरणांतिक प्रायश्चित्त वृषली शब्द चाण्डालीको कहता है है सोई बृहत् यमने कहा है कि सजातीय | क्योंकि अन्य स्मृतिमें वृपलीशन्दका प्रयोग कुमारी, और अंत्यजा, सपिण्डकी स्त्री और इनमें देखा है कि चाण्डाली, बन्धकी, वे. पुत्रकी स्त्री इनमें वीर्यको सींचकर प्राणोंका श्या, रजस्वला, कन्या, और विवाही हुई त्याग करै महा अंत्यज मध्यम अंगिरा के | सगोत्रा ये पांच वृषली कही हैं बन्धको स्वै. कहे ये जानने कि चाण्डाल,श्वपच,क्षत्ता स्त, रिणी ( व्यभिचारिणी ) को कहते है कदा- वदेहिक,आयोगव, ये सात अंत्यावसायी होते | चित् शंकाकरो कि यहां अभ्यासका ज्ञान रजक और चर्मकार आदि नहीं, क्योंकि कैसे होगा, इसका समाधान कहते हैं कि उनमें लघु प्रायश्चित्त कहा है तैसेही मर्नु (यत्करोत्येकरात्रेण) इस पूर्वोक्त मनुके व- (अ.११ श्लो.१७५) ने चाण्डाल, अंत्यज, चनमें एकरात्रेण यह अत्यंतसंयोगमें तृती- इनकी स्त्रियों में गमन और इनका भोजन या है, अत्यंतसंयोग गमनके अभ्यास विना और इनका प्रतिग्रह अज्ञानसे करे तो पतित नहीं हो सकता इससे गमनका अभ्यास जाना होता है और ज्ञानसे करनेमें इनकी तुल्य | जाता है इसीसे एक रात्रसे अधिक कालके हो जाता है इस वचनसे चाण्डाल आदिको अभ्यासमें पूर्वोक्त बारह वर्ष आदिका गुरु- तुल्यता कइ कर जानकर अत्यंत अभ्यास तल्प व्रत और अतिदेशसे पाया मरणांतिक में मरणांतिक प्रायश्चित्त दिखाया है अर्थात् | प्रायश्चित्त जानना और यदि चाण्डाली आदि अज्ञानसे चाण्डालीगमनके अभ्याससे स्त्रियोंके संग ज्ञानसे एकवार गमन करे पतित होता है इससे पतितको कहा द्वादश | तो यमओदिका कहा वर्ष दिनतक कृच्छ प्रायश्चित्त करें और जानकर अत्यंत अभ्यास करे और अज्ञानसे दो चान्द्रायण कर कि करे तो चाण्डालोंके तुल्य होजाता है इस चाण्डाल और पुल्कस इनका भोजन और से बारह वर्षसे अधिक मरणांतिक प्रायश्चित्त इनकी स्त्रियोंसे गमन जानकर करनेसे कृ. करे यहभी बहुत कालक अभ्यासमें है एक- जगन्द और अज्ञानसे दो चान्द्रायण करे रानके अभ्यासमें तो तीन वर्षका प्रायश्चित्त और ( स्वयोनियंत्यजासु च ) इस एक है सोई मर्ने (अ. ११ श्लो. १७८ ) ने वाक्यके समभिव्याहार (कथन ) से यही कहा है कि एकरात्रभर वृपलीके सेवनसे व्यवस्था जाननी मरणांतिक अग्निप्रवेशको जो पाप द्विग करता है उस पापको कहते है क्योंकि कात्यायनकी स्मृति है कि भिक्षाका भोजन और जप इनको जननी, मगिनी, अपनी पुत्री, पुत्रकी वधू इन करता हुआ तीन वर्षमें नष्ट करताहै यहां का गमन अतिपातक जानना ये अतिपा- तकी अग्निमें प्रवेश करे यहां जननीके संग तः सित्ता फुमार्गषु स्वयोनिपंसनामु च । म पिपाए प्राणत्यागो विधीयते । चाण्डाली रन्धकी वेश्या रजस्था या चप- २ चाण्डालः अपनः क्षत्ता सतो वहिकस्तया । न्यका । उना याच सगोत्रा सादृपयः पच फीर्तिताः । मागधायोगी नेत्र सप्ततेऽज्यावसायिनः । २ पाण्डालपुकसाना तु मुक्ता गता च योनि- ३ गाडासायनियो गता भुपलाच मतिराव च। तम् । यादमावीमानामानामागं । पतत्यानतो विमो शानारसाम्यं तु गछति । ३ जनन्यां च भगिन्यां न समुनायो तवग । ४ परकोतकरात्रेण गुगली सेवनादिनः । तस- माय गमन र नियमनिपानकः । भातात. भर मामिल प्रिमियपदिति । फितरतेवे मीनापन।
(५६९) मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ एकवार गमनमें और भगिनीआदिके संमद्रायण तसकृच्छ्र रूप प्रायश्चित्त क्रमसे जा- वारंवार गमनमें अग्निमें प्रवेश जानना नने और गुरुकी भोगी हुई भी साधारण क्योंकि जननीका गमन महापातक है और स्त्रियोंके गमनमें गुरुतल्पत्वका दोष नहीं है भगिनीआदिका गमन महापातकके अति- क्योंकि व्याको स्मृति है कि जातिमें देशका विषय अतिशतक है उन दोनोंकी | कहा, और पराई दाराका भोगरूप पारदार्य तुल्यता नहीं होसकती और जो वृहत् ये- और कन्याका दूपन और गुरुतल्पगमन का मने कहा है कि चाण्डाली पुल्कसी म्लेच्छी दोष ये सब साधारण स्त्रियोंमें नहीं होते. पुत्रको वधू भगिनी सखी मातापिताकी भ- इसी प्रकार अन्य भी छोटे बड़े प्रायश्चिवोंके गिनी निक्षिप्त ( सौंपी हुई ) शरणागत मातु- वचनोंको ढूंढकर उनकी विषय व्यवस्था स- लानी संन्यासिनी अपने गोत्रको और राजा | मझना-हम ग्रंथके विस्तार भयसे नही लि. शिष्य और गुरु, इनकी स्त्री इनके संग ग-1 खते- ॥ मन करके चान्द्रायण करे और जो अंगि- भावार्थ-गुरुतल्पग वर्ष दिनतक पाना- राका वचन है कि पतित ओर अंत्यजों । पत्य कृच्छ्र करे वा चांद्रायण और वेदकी की स्त्री संग गमन और भोजन और प्रति- संहिता का तीन मासतक अभ्यास करे, २६० ग्रह लेकर मासोपचास वा चान्द्रायण करे इति गुरुतल्प प्रायश्चित्त प्रकरणम् । वृहत्यम और अंगिरके यह दोनों वचन एभिस्तुसंवसेद्यौववत्सरंसोपितत्समः ॥ गुरु तल्पके अतिदेश ( तुल्य) के विषयों में जानकर जो प्रवृत्त हुआ हो उसका वा कन्यांसमुद्रहेदेपासोपवासामकिचनाम् ।। पद-एभिः ३ तुः- संवसेत्-क्रि-यः १ सर्वतका वचन है कि भगिनी माताको ब- हिन और अन्य माताप्से पैदाहुयी भगिनी इन न्यो २ समुदहेत क्रि-एषां ६-सोपवासां र खियोंके संग माइसे गमन करक तप्तकृच्छ । अकिंचनाम् २ ॥ को-वह वचनभी पूर्वक्ति विषयमें अज्ञानसे योजना-एभिः ( महापातकिभिः ) सद प्रवृत्त हुआ दो और वीर्य सींचने से पूर्व नि- यः वत्सरं संवसेत् सः अपि तत्समः भवति गृति होगई हो वहां ही जानना-जा अत्यंत एपा (महापातकिनी ) सोपवासां कि- व्यभिचारिणो इन ( पूर्वोक्त) के संग जान- चनां कन्यां समुहहेत-॥ फर वा अजानसे गमन करे तोभी येही चां- तात्पर्यार्थ अब संसर्गीके प्रायश्चित्तको कहते है-इन पूर्वोक्त ब्रह्महा आदिकोंके १ धागाली यु-शमी म्लेच्छा स्तुगां च भोगनी (संगआचरण) करे वहभी उनकेही समान संग जो मनुष्य वर्ष दिनतक अत्यंत संवास सींचनेते पूर्व निवृत्तिमें जानने और जो यह वासर २ सः १ अपि:- तत्समः १ क- माम् । मातापियो:मार यतिक्षिमा शरणागताम्। हो जाता है अर्थात् जो जिसके संग आच- मायानी प्रत्रजिना बमोवो नृपोषितम् । शिष्य रण कर वह टसंकदी प्रायश्चित्तको कर ऐसे माया नगरोभाया माता पान्दायण घरेत् । उसके प्रायश्चित्तक अतिदेशक लियेही त- तितायोपोरता मुत्ता च प्रतिशच! ममेरा ति पदारमारिया। सम पदका ग्रहण किया है कुछ पातकके मस्निी मानुगत म सार धान्यमानाम् । १ आसुकै पारहार्य व कल्याषणमेव चा साधार- तामोशत समाचरेत् । जानो नास्ति मुरवतमेव च।
(५७०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । - अतिदशार्थ नही-क्योंकि वह तो जो उन- अज्ञानसे संसर्गमें तो वसिष्टंने कहा है कि ब्राह्म के संग संवाप्त करे इतने कहनेसेही सिद्धथा (पठनपाठन ) यौन ( विवाह आदि ) स्रोव यहां यद्यपि अतिदेश है तो भी संपूर्ण ही (होम आदि) से पतितके संग जो व्यवहार बारह वर्षका प्रायश्चित्त करे क्योंकि संसर्गी किया होय तो पतितोंसे जो धन मिलाही साक्षात् महापातकी है-अपि शब्दसे यह उसको त्यागदे और उनके संग न वस और दिखाया कि केवल महापातकी का संयोगी उत्तर दिशामें जाकर भोजनका त्याग आर ही उसके समान नहीं होता किंतु अतिपा- संहिताका पाठ करता हुआ पवित्र होता ह तंकी, पातकी, उपपातकी आदिकोंके मध्य- यह शास्त्रसे जानते हैं-तैसेही वचन है कि में जो जिसके संग संसर्ग कर वह भी उसके ब्रह्महा-मद्यप-चोर और गुरुतल्पग आर समान होनेसे उसके ही प्रायश्चित्तकोकरे-इसी जो उनके संग वस ये महापातकी होते हैं से संपूर्ण प्रायश्चित्तको कहकर मनु (अ० ११ इससे सब निर्दोष है-(तः) इस तृतीयांत श्लो० १६१ )ने कहा है कि जो मनुष्य इनके सर्वनामसे परामर्श (जाने ) किये ब्रह्मदा मध्यमें जिस पतितके संग संसर्ग करे वह सं- आदि चारका संसर्गीही महापातकी कहाह सर्गके पापकी श्रुद्धिके लिये उसके ही व्रत- उस संसर्गीका जो संसर्गी है वह महापातकी को करे-विष्णुने' भी सामान्यसे उपपातकी नही होता-कदाचित् कोई शंका कर कि आदि पापियोंके संसर्ग में उसकेही प्रायश्चि- महापातकीका संसर्गही महापातकी होनेमें तका भागी दिखाया है कि जिस पापात्माके हेतु है कुछ ब्रह्महा आदि विशेषोंका संसर्ग संग संसर्ग करे वह उसके ही व्रतको करै इ- 'महापातकी होनेमें हेतु नहीं है क्योंकि उनके सीसे मनु (अ ११ श्लो १८२ )ने सामान्यसे । संसर्गमें एकन एकका व्यभिचार है इससे सब पापियोंका निषेध किया कि पापियोंके । यहां ब्रह्महा आदिका जो संसर्गीका संसर्गी संग प्रायश्चित्त करनेसे पहिले किसी अर्थकोन उसकोभी महापातकीका संसर्ग हद्दी-उस- करे और पापीभी प्रायश्चित्त किये विनासज्जनों कोभी महापातकित्व हो जायगा क्योंकि न का संसर्ग न करे-यहभी बारह वर्षतक जो होनेमें निषेध कोई नहीं है-इस शंकाका पतित हैं उनकेही जानकर संसर्गके विषयमें समाधान कहते हैं कि यह बात होजाय यदि ई-क्योंकि देवलेकी स्मृति है कि जानता हुआ अन्य प्रमाणसे महापातकित्व होगाय और तर पतितके संग वर्ष दिनतक वसकर उसक शब्दसेही महापातकित्व मानोगे तो तिस पेलसे वहभी वर्षके अंतमें पतित होता है- शब्दसे ऐसे महापातकित्व नही हो सकता क्योंकि तः इस प्रकृत (प्रकरणक) विशे- १ यो येन पतिननेषां समर्म याति मानवः । पोंके वोधक सर्वनामसे ब्रह्महा आदि विशे- । तस्यैव मत कुर्यात्तत्समविशुद्धये । पोक संसर्गकोही महापातकित्यके देवत्वकी २ पापारमना येन सह ममज्यतस तस्यैव प्रतं कु.- | १ पतितसमपोगे तु बाढोण योनेन वा घोषण या पास्तेभ्यः सकाशमाया उपलब्यास्तासा परित्याग- स्तंश्च न संबसेदुदीची दिशगवानसन्सदिताध्ययनम- ३ एनसिभिरनिगिनना कंचित्ममाचरेत् । धीयानः पतो भवतीति विज्ञायते । ४ पतितेर सदोपिताजानन्संवत्सर नरः । मिनि- २ प्रमहा मधपः स्तेमस्तव गुरत पगः। एतम. रतनेसोन्दात सयं च पतितो भोत् । हापातकिनः यमः सह संवसेत् । - ।
प्रायश्चित्ताध्याय मायश्चित्तमकरण ५ (५७१) प्रतीति हुयी है-इसीसे प्राप्तिके अभावसेही बैठना-पंक्ति भांड पाक अन्नमिश्रण याजन प्रतिपेधका अभावभी हेतु नही है-इससे अध्यापन-यान-सहभोजन-यह नव ९ प्र. संसर्गीक संसर्गीयोंको द्विजातिके कासे कारका संकर कहाहे वह अधोंके संग न हानि नही होती प्रायश्चित्त तो होताही है करना-देवलेनेभी कहा है कि संलाप स्पर्श कदाचित् कहा कि संसर्गीका संसर्गी पतित निःश्वाप्त-संग यान आसन और अशन नही तो प्रायश्चित्त कैसा-सो टीक नही (भोजन) याजन अध्यापन योनि इनके क्योंकि प्रायश्चित्त करनेसे पहिले किसी करनेसे मनुप्योंको पापका संक्रम (प्राप्ति) पापीके संग व्यवहार न कर इस पूर्वोक्त मनु | होता है-अर्थात् एक शय्यापर बैठने एक (अ. ११ श्लो. १८९) वचनमें सामान्यसे | पंक्तिमें भोजन-एक पात्रमें पाक-अन्नका पापी मात्रके निषेधसे महापातकीके संस-मिश्रण (संसर्ग उसके अन्नका भोजन) का संसर्गभी निषिद्ध है इससे पतित न भी पतितको वा पतितसे यज्ञ कयना-पतितको हो तोभी पादहीन (कम) प्रायश्चित्त युक्तही पढाना वा पतितसे पढना-यान पतितको है क्योंकि व्यासको वचन है कि जो मनुष्य कन्या देना वा पतितसे कन्या लेना-सह जिनके संग वर्ष दिनतक वसै वहभी उसके, भोजन ( एक पात्रमें भोजन )संलाप (भा- तुल्य हो जाता है और वहभी तिस पापीक पण) देहका स्पर्श-नि:श्वास (पतितके प्रतको पादहीन करै-इसी प्रकार चोथे और मुखकि वायुका स्पर्श) सहयान (एक पांचवे कोभी जानकर संसर्गमें आधा और अश्व आदि पर चढना)-इन सबके मध्यमें चौथाई प्रायश्चित्त जानना-इससे यह सिद्ध जिस किसी कर्मसे कितने कालमें पतित भया कि साक्षात् ब्रह्मा आदिके संसर्गी होता है वह तो वृद्विष्णुने कहा है कि हीको ब्रह्मदा आदिके प्रायश्चित्तकी प्राप्ति है। पतितके संग एकयान भोजन आसन शयन संसर्गीके संसर्गीको नही यहां यद्यपि जानकर इनको करे तो घर्ष दिनमें और योन स्राव करनेमें ब्रह्मदा आदिकोंको मरणांतिक ' मुख्य काँसे सदः ( उसी समयमें ) पतित प्रायश्चित्त कहा है तोभी संसर्गीको उसका होता है-यहां एक भोजनसे एक पंक्ति में अतिदेश नहीं है क्योकि वह उसकही व्रतको भोजन लेना-क्योंकि एक पात्रमें भोजन तो कर इस पूर्वोक्त वचनसे व्रतकाही अति- सद्याही पतित करता है क्योंकि देवलको देश है और मरण व्रतरूप नहीं है इससे ' स्मृति है कि याजन-योनि संबंध-स्वाध्याय यहां जानकर कियेभी संसर्गमें बारह वर्षका (पटना) सह भोजन इनको पतितके संग और अज्ञानसे किये संसर्गमें उसका आधा करके सद्याही पतित होता है और लावा प्रायश्चित्त है और संसर्ग अपने निबंधन क- शब्दसे याजन और मौके भेदसे अनेक प्रकारका होता है-सोई । अध्यापन लेना-यद्यपि ( यौनस्रावमुख्यः ) वृद्ध वृहस्पति ने कहा है कि एक शय्या पर संलापस्पर्शनिःश्वाससहयानासनाशनाद । या- १ यो येन सबसेदर्प सोपि तत्समतामियात् ।पा- जनाध्यापनाद्यानासाप संक्रमते नृणाम् । दहीने चरेत्सपि तस्यतस्य व्रतं द्विज । २ सवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् । एकयान- २ एकशय्यासन पक्तिभण्डपत्यन्नमिश्रणम् । भोजनासनशयनोनलीवमुख्यस्तु सवधैः सद्यएव । याजनाध्यापने योनिस्तथा च सहभोजनम् । नवधास- ३ पाजन योनिसषधं स्वाध्यायं सहभाजनम् । करः मोक्तो न कर्तव्योश्चमैः सह । कृत्वासदः पतलेर पतितेन न संशयः । मुख्य शब्दसे (५७२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । यह बंद समासका निर्देश है तोभी वे (अ. ११ श्लो. १८०)ने यान आदि चाही पृथक् ही सद्यः पतनके हेतु हैं क्योंकि सुमंतु पतितके हेतु कहे हैं कि पतितके संग वर्ष की स्मृति है कि जो पतितोंके संग योन दिनतक यान आसन भोजन करता हुआ स्रोव मुख्य संबंधों के मध्यमें अन्यतम (को- वर्ष दिनमें पतित होता हे और याजन अ- ईसा ) संबंधको जो करे उसकोभी वही ध्यापन यौनसे वर्ष दिनमें पतित नहीं होता प्रायश्चित्त है-एक यान आदि तो चारों मिल | किंतु शीघ्रही पतित होता है यहां आसन करही पतनके हेतु, क्योंकि (एकयान का ग्रहण शयनका भी उपलक्षण है और भोजनासनशयनः ) यह इतरेतरयोग यहां पूर्वोक्त विष्णुवचनके अनुरोधसे और द्वंद्व समासका निर्देश है-प्रत्येकका करना | तैसेही इस वचनसे ( यानासनाशनात् ) पतनका हेतु तो नही तोभी दोषका हेतु तो इस व्यवहित (चौथा) पदके संग पहिले है ही क्योंकि इस परांशरके वचनसे निर- | दोपदोंका संबंध है और तीसरे पदके संग पेक्षभी पापके हेतु कहेहे-कि आसन शयन | नहीं पतितके संग सदैव वर्ष दिनतक भो- यान संभाषण सहभोजन इनसे इस प्रकार जन आसन शय्या आदि करता हुआ एक पाप लगते हैं जैसे जलमें तेलकी बूंद-संलाप वर्षमें पतित होता है कहाचित् कहो कि म. स्पर्श निःश्वास ये तीनों यान आदि चारोंमें नुके वचनम अनन्वय दोष होगा अर्थात प्रसंगसे होते हैं अर्थात् संग बैठेगा तो संभा (यानासनाशनात् ) यह पंचमी (पतितेन पण होहीगा-इससे समुचित (मिले हुये सहाचरन् ) इसके संग नहीं घटसकती सो- सय ) ही पापके हेतु पृथक् २ नही क्योंकि ठीक नहीं क्योंकि यान आसन और ) ये सब अल्प दोष और पापके हेत तो अशन आदिके हेतु आचरन् नाम आ- ही-ययोंकि (संलापस्पर्शनिःश्वास ) यह चार करता हुआ पतित होता है ऐसे भदकी देवलका वचन दिखाआयेहैं इससे संलाप आ- विवक्षासे संबंध होजायगा जैसे इस आधेय दिके बिना सहयान आदि चारोंके करनमें संमतिसे यज्ञ करके इस श्रुतिमें तृतीया का पंचम भागसे कम बारह वर्षका प्रायश्चित्त करें | अन्वय होता है अथवा भाचरन् इस शट और संलाप भी कर तो पूर्ण प्रायश्चित्त कर प्रत्ययसे हेतुका अर्थ प्रतीत है इससे ( या ऐसे कहनेसे इनके संग वर्ष दिनतक जो नासनाशनात् ) यह पंचमी द्वितीयाके अ- वसे वहभी उनकी तुल्य होता है इस योगी- 'धमें है और याजन अध्यापन यौनसे तो भर के वचनमें भी सहयान आदि चारही वर्ष दिनमें पतित नहीं होता किंतु शीण लेने युक्त है इससे संलाप आदि पृथक् प-होता है यह अर्थभी पूर्वोक्त वचनोंके अनु- तित करनेके हेतु नहीं है इसीसे मर्नु रोधसेही जानना इससे यान आदि चारोंके ..यः परितः साह यान मुख्ययोतानां सपानाम- करनेसे शीग्रही पतित होता है और यान सतम संबंध पुरात्तस्याप्येतदेव प्रायधित्तम् । | आदि चाक अभ्यासको वर्ष दिनतकानि २ भासनापानापानासंभागमदभौजना । सं- तर करनेसे पतित होता है यह युक्त है और TAITदानि गरिवीमिति । (यत्सरं सोपितरतमः) इस श्लोक वत्सरं एभिग्नु गरबासर सोऽपि तरसमः। यह अत्यंत संयोगमे द्वितीयादेखते है इससे ४संगसोण की परिमेन सदापरन् । गाजना. नानासानागनाशनार ॥ एनस पुनापामा प्रायश्चित्ताभ्याय मायश्चित्तमकरण ५ (५७३) . ध्यवहित दिनोंको गिनती करनी जब ती- ने बारह वर्षका प्रायश्चित्त कहा है जो बृहन नसौ साठ ,३६० दिन संसर्गके पूरे होजाय पतिका वचन है कि याजन अध्यापन आ- तो पतितका प्रायश्चित्त होता है और उससे | दिसे एक आसन और शय्यासे पतितके सं- न्यूनमें तो अन्यही प्रायश्चित्त है सोई पगशे- ग छः मासतक संसर्ग करे तो आधा प्राय- रने कहा है कि अज्ञानसे पतित आदिको | श्चित्त कर, याजन अध्यापन यौन एक पान का संग पांचदिन दश वा बारह दिन मा- | भोजनोंको छः मासमें पतित करनेके हेतु सार्द्ध एक मास वा तीन मास आधा वर्ष वा | कहता है,वह वचन अज्ञानसे अत्यंत आपत्ति एक वर्ष करे तो पहिले पक्षमें त्रिरात्र दूसरे-पंच महायज्ञ आदिका याजन और व्याक- में कृच्छू तीसरेमें सांतपन कृच्छ्र चौथेमें | रण आदि अंगोंका पढाना और दुहिता और दशरात्र पांचवेमें पराक छठेमें एक चान्द्रा- भगिनीके संग संबंधसे भिन्न संवैधमें जानना यण सातवेमें दो चान्द्रायण और आठमें 4- क्योंकि उत्तम उत्तम याजन आदिकोसे तो क्षमें छः मासतक कृच्छ करें और वर्ष दि- शीघ्रही पतित होना कह आये है इसी प्रकार नसे अधिक संसर्गमें तो उनके समान होता पुधी भगिनी पुत्रवधु उनके गामी जो अति है. जानकर संसर्गमे तो विशेषकर अन्य स्मृति । पातकी हैं उनके संसर्गियोंको ज्ञानसे नव कहा है सुमंतुका वचन है कि पांच दि- वर्षकी और अज्ञानसे सादेचार वर्षको क- नके संसर्गमें कृच्छ्र दशदिनके संसर्गमें तप्त ल्पना करनी सखी पितृव्यदारा (चाची) कृच्छू आधमासमें पराक और एक मासके । आदिकोंके गामी जो पातकी हैं उनके सं. संसर्गमें चान्द्रायण कर तीन मासके संसर्गमें | सगियों को जानकर छः वर्षका और अज्ञा- कृच्छ और चांद्रायण करें छ: मासके सं-नसे तीन वर्षका और उपपातकी आदिके सर्गमें पाण्मासिक कृच्छ करै वर्ष दिनके सं- संसर्गियोंकोभी जानकर तीनमासके और अ- समें मनुष्य वर्ष दिनतक चान्द्रायण करे ज्ञानसे डेढ मासके प्रायश्चित्तकी कल्पना क- यहां वर्ष दिनका संसर्ग कुछ न्यून (कम) नी-पुरुषोंके समान स्त्रीभि महापातको आ- लेना क्योंकि पूरे वर्षके संसर्गमें मनुआदिकों दिकीक संसर्गसे पतित होती हैं सोई शोन- कने कहा है कि जो पुरुषोंके पतनके निमि- १ संसर्गमाचाम्विनः पतितादिष्यकामतः पिचाई न हैं वही स्त्रियों के भी हैं और ब्राह्मणी हीन वादशहं वा द्वादशाहमथापियामासार्द्रमासमेक का वर्णकी सेवा अधिक पतित होती है इससे मासत्रयमयापि वादाईमैकमब्द वा मवर्षतु त-त्रियोंको भी जिन महापातकी आदिकोंके समः। त्रिरात्र प्रथमेपने द्वितीये कच्छ्रमाचरन् । चौ- मध्यमें जिसके संग संसर्ग हो उसकेही प्रायश्चि सांतपनं कृ तृतीय पक्ष एव तु । चतुर्थे दशरात्रं त्तको आधा करके करवे इसी प्रकार बालक स्थासराफा पंचमे ततः । षष्ठे चान्द्रायण कुर्यात्सप्तमे वृद्ध और आतुगेको जानकर आधा और अ- चैन्दवदयम् । अमे च तथा पझे पण्मासान् कृच्छ्रशानसे चौथाई तैसेही अनुपनीत बालकोंको माचरेत्। जानकर चौथाई अज्ञानसे उसका आधा प्राय- २ पञ्चाहे तु चरेकर दशाहे तप्तकमूकम् पराकस्त्वधमाप्ते स्यान्मास घान्द्रायणे चोख । मात पाण्मासिकेतु संडगे याजनाध्यापनादिना। एक ये प्रति कई धान्दापणोत्तरम-पाण्मासिके सुभासनशम्याभिः माथिसार्धपाचौत । संसर्ग का वन्दार्थमाचरेत् । संसर्गेवादिके कुर्याद २ पुरुषस्य यानि पतननिमित्ताने खीणामपि तान्ये चान्द्रायणे नरः। ब्रह्मणी हीनवर्णसेवायांमधिक पतति।
(५७) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशमहित । . श्चित्त जानना-इति दिक्-अर्थात् यही मार्ग है किया है उपवास जिसने ऐसी इनकी अकि- अब पतितके संसर्गके निषेधसे निषिद्ध जो चन कन्याको विवादले॥२६॥ इति.संसर्ग- यौन संबंध उसका कहीर प्रतिप्रसव (विधि) प्रायश्चित्तप्रकरणम्-॥ कहते हैं-इन पतितोंकी पतित अवस्थामें चांद्रायणंचरेत्सर्वानवकृष्टात्रिहत्यतु । उत्पन्न जो कन्या, वई यदि सोपवास हो अर्थात संसर्ग कालका उचित प्रायश्चित्त शूद्रोधिकारहीनोपिकालेभानेनशुद्धयति ।। करचुकी हो और अकिंचन हो अर्थात् जिस पद-चांद्रायणं ६ चरेत् क्रि-सर्वान् २ ने वस्त्र अलंकार आदि पिताका धन ग्रहण अवकृष्टान २ निहत्य:- तु- शूद्रः १ अधि- न कियाहो उसेभी भली प्रकारसे विवाह ले कारहीनः १ अपि- कालेन ३-अनेन ३ कन्याको विवाह ले यह कहनेसे यह सूचित शुद्धयति क्रि-॥ किया है कि त्यागा है पतितका संसर्ग योजना-सर्वान् अवकृष्टान् निहत्य चां- जिसने ऐसी कन्याको स्वयंही विवाह पति- द्रायणं चरेत्-अधिकारहीनः अपि शूद्भः तके हायसे ग्रहण न करें-ऐसे होनेसे पति- अनेन कालेन शुद्धयति ।। तके संग यौन संबंधके निषधका विरोध भी होगा यही अर्थ वृद्ध हारीतेने स्पष्ट कियाई प्रायश्चित्त कहते हैं-प्रतिलोमसे उत्पन्न सूत तात्पर्याय-अव प्रतिलोमोंके वधका कि पतितकी ऐसी कुमारीको तीर्यमें वा अपने घरमें विवाह ले जो वस्त्रास रहितहो-निसन् करे सोई शखने कहा है कि संपूर्ण अव- मागध आदि प्रत्येकको हतकर चांद्रायण अहोरात्र उपत्राप्त किया हो और जिसको कृष्टोंके प्रत्येकके वधर्म चांद्रायण कर- प्रातःकालके समय शुक्ल नवीन वस्त्र धारण कराये हो और निसने ऊँचे अथवा भगिराके कहे पराकको करे-कि स्वरसे तीनवार यह कह दिया हो कि न मैं संपूर्ण अत्यकि गमन भोजन संप्रमापण इनकी हूँ भोर न ये मेरे है-तैसेही इनकी (मारना ) में परफसे शुद्धि होती है यह कन्याको विवाह ले यह कहनेसे यह दिखा- अगिएका कथन है-उसमें भी जानकर सूत याकि कन्यासे भिन्न इन पतितोंकी संतान आदिके वधमें चांद्रायण और अज्ञानसे संसर्गके अयोग्य है-इसीसे वसिष्टेने कहा सूतके वधौ पराक-वेदेहिकके वधमें पादोन है कि त्रीको छोडकर पतितसे उत्पन्न पति- पपक चांडालके यधमे द्विपाद पराक-माग: त होता है क्योंकि वह स्त्री परगामिनी (पर-धके वधौ पादोन पराक-क्षताके यधर्मे द्वि- यर जानेवाली है भरिक्या (जो पतितका पाद पराक-आयोगवके वध दीपाद पराक धन न हो) है उसकी विवाह ले । कर-इसी प्रकार चांद्रायणकभी तारतम्य भावार्य-इन पतितके संग वर्ष दिनतक (न्यून अधिक ) की कल्पना करनी-जो जो यसै वहभी पतितोंके तुल्य होता है और मागका वचन है कि प्रतिलोमसे पैदा पतितश दुगुमारी सिमामोराग्रोपोषितां सर्वेशामायानां पधे प्रत्साशन । मतमोजावन वारामामादिता नाइमेसेपी ने २सतानां मरने भौरने सम्मापरेपोन. म रवि विरपरमिदपानात हे मोदईद । शनि: स्पादित्पांगिरसमापितम् । २पनियादी भगत अन्यत्र छिपा: ३ प्रतिलोमरसताना मी माघायः स्मृतः । राह परामनी सामकिशोर भासमान मनादान गरि - .
रो-अथवा द्विजोंकी सेवासे शुद्ध होता है- तु:- गाः २॥ प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५७५) हुयी स्त्रियोंको मासकी अवधि कही है और जो मनु (अ० ४ श्लो० ८० ) का वचन अंतरमें टत्पन्न सूत आदिकी चार दो छः कि शूद्रको न धर्मका उपदेश करे और न मास प्रायश्चित्तकी अवधि कही है-वह वच- व्रत करनेको कहे-शुद्रको व्रतके निषेधका न आवृत्ति (वारंवार ) के विषयमें है-उसमें बोधकहै वह उस शूद्रके विषय में हैं जो श- सूतके वधमें छः मास वैदेदिकके वध चा- रण न आया हो और जो स्मृत्यंतरका 4- रमास-चांडालके वधमें दो मास होते हैं इस चन है कि इन कृच्छोंको सदैव तीन वर्षमें प्रकार योग्यतासे अन्वय समझना-तैसेही करे और इन कृच्छोंमें शूद्रका अधिकार मागधके वधमें चारमास-क्षताके वधमें दो नही कहा है-वह वचन उन कृच्छों के विष- मास-आयोगवके वधर्म तीन मासका प्राय- यमें है जो कामनाके लिये किये हो-इससे श्चित्त जानना यह व्यवस्था है-अब आधे स्त्री और शूद्रोंको और प्रतिलोमीको ती- लोकसे शूद्रोंकी शुद्धिको कहते है-यद्यपि न वर्षाके समान प्रतका अधिकार है यह शुद्ध जप आदि संस्कारसे हीन है तथापि सिद्ध भया-जो गौतमको वचन है कि प्र- धारह वर्षके समयका जो प्रायश्चित्तरूपत तिलोम धर्मसे हीन होते हैं-वह उपनयन दुससे शुद्ध होता है यहां शद्धका ग्रहण नी आदि विशिष्ट धर्मके अभिप्रायसे हैं । और प्रतिलोमसे उत्पन्नोंकाभी उपलक्षण है भावार्थ-संपूर्ण प्रतिलोमोंको मारकर चां- यद्यपि शूदको गायत्री जपका असंभव है द्रायण कर-आर अधिकारमें हीनभी शूद्र इसी तथापि नमस्कार मंत्रका जप होता है इसी बारह वर्षके कालसे शुद्ध होता है ॥२६॥ से स्मृत्यंतर में कहा है कि शूद्रको रच्छिष्ट इति पंचमहापातकप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ भोजन और नमस्कार मंत्रकी आज्ञा शास्त्र पंचगव्यंपिवेद्गोनोमासमासीतसंयमः ॥ कारोंकी है-अथवा वचनके वलसे जप आ- गोष्ठेशयोगोनुगामीगोमदानेनशुद्धयति ।। दिसे रहित ही प्रतको करे-पयोकि अंगिरा पद-पंचगव्यं २ पिवेत् कि- गोनः १ की तिससे शुद्रको प्राप्त (देख ) होकर- मासं २ आसोत क्रि-संयमार गोष्ठेशयः । | गोनुगानी १ गोप्रदानेन ३ शुद्धयति कि-।। प और होमसे विवजित प्रायश्चित्त दे (वता- कृच्छंचैवातिकर चचरेद्वापिसमाहितः । दयात्रिरात्रंचोपोप्यवृपभैकादशास्तुगाः ।। पद-कृच्छ २ च:- एव:- अतिकृच्न २ (१२ वर्ष ) से या दान देनेसे वा उपवासों-गि २ - उपोप्या-पभकादशाः२ चा-चरेत मि-बा-भपि-समाहिताश्दद्यात् धर्मका ज्ञाता-धर्म मार्गमें स्थित शूद्रको ज- । ये.) से औरभी अंगिपनेही कहा है कि गे. और ब्राह्मगोंके हितमें तत्पर शूद्र काल सिट पास्य भोजनमनुहातोश नमस्या- रोमप्र:। २वरमा समासार समाधर्मपस्थितम्। प्राय- चितामा जोगिनतम् । योजना-गोगः पंचगव्यं पिवेत् संयमः सन् मासं आसीत-मोठेशयः गोनुगामी, सः गोप्रदानेन शुध्यति-च पुनः समाहितः नचास्योपदिशेदमें नगारा ममारिन। कारेन सदये गोमतरतः। राम- पोधेत सदर नाधिकारो। १ कृमहाग्येवानि कार्याणि सहा वायोग ३ मतिटोमा धमीनाः। यांनी दिलशुधापा टप्पा ।
(५७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । . सन् कृच्छ्रे चपुनः अतिकृच्छ् चरेत्-चपुन निवृत्ति होती है इससे मासभर निरंतर सा- निरानं उपोप्य वृषभैकादशाः गाः दद्यात्- वधान होकर कृच्छू कर और गोष्ठमें सोवै तात्पर्यार्थ-अन उपपातकोमें प्रथम गो- और गौओंका अनुगमन करे यह दूसरा वधके प्रायश्चित्तको कहते हैं-गोको जो हते । प्रत है-इसीसे जाबालने मासभर प्राजापत्य उसे गोन कहते हैं यहां हन् हिंसायां इस पृथक् प्रायश्चित्त कहा है कि अज्ञानसे गौ- धातुसे 'मूलविभुजादिभ्य उपसंख्यानम् ' इस ) को हते तो मासभर प्राजापत्य कर और वार्तिकसे क प्रत्यय होता है-वह गोन मास भर गोओंका हितकारी और गौओंका अनुगाभी. सावधानीसे बैठा रहै क्या करता हुआ इस वह गोदान करनेसे शुद्ध होता है-अथवा अपेक्षामें कहते है पंचगन्यको अर्थात् गौके तिसी प्रकार अति कृच्छ्र करे यह तीसरा जो गोमूत्र गोमय दधि दूध घृत पांच हैं उ- व्रत है-कृच्छ्र और अतिकृच्छ्रका लक्षण नको शास्त्रोक्त विधिसे मिलाकर पोवे अ-आगे कहेंगे-अथवा तीन रात्र उपवास कर न्य भोजनके त्यागसे भोजनके कार्यमें उ- के वृषभ (बैल) है ग्यारहवां जिनमें ऐसी नकाही विधान है-गोष्ठेशय रहे प्राप्त हुये दश गो दे यह चौथा व्रत है-ये चार व्रत हैं शयनके अनुवादसे गोष्ठ की विधिसे और उनमें अज्ञानसे जातिमात्र ब्राह्मणकी गौका दिनमें शयनका निषेध है इससे रात्रि में गो- वध करे तो उपवास करके एक वृषभ-दश शालामें सेवि-और गोनगामी गोओंके जो गौओंका दान तीनरात्र उपवास जानना अनु (पीछे ) गमन कर उसे गोनुगामी क- | क्योकि श्रेष्ठ स्वामीकी और उत्तम गुणवाली हते है-अर्थात् गौओंके पीछे गमन करना | गोके वधमें गुरु प्रायश्चित आगे कहेंगे क्ष- ही जिसका व्रत है यहां 'ते' इस विथकी गोके उसी प्रकार वध, मास भर सूत्र गिनि प्रत्यय होता है-इससे जिन- पंचगव्यका भोजनरूप प्रथम प्रायश्चित्त है गोओंके गोष्ठमें सोवे प्रातःकाल वनमें जाती | यहां मास भर पंचगव्यका भोजन अत्यंत हुई उन्ही गौकि पीछे गमन करे-( अनु- स्वल्प है इससे मासोपवासके तुल्य है तित गच्छेत् ) अनुकूल गमन करें यह कहनेसे से छः छ. उपवासोंसे एक एक प्राजापत्यकी जय वे गौचलें तभी पीछे २ आपचल दे ज कल्पना करने पर पांच कृच्छोंके प्रत्याना- घवे खड़ी हो जाय तब चले तो पीछे गमन | यसे पांच गौ और एक गोदान मासके अंत नहीं हो सकता इससे आपभी खडाहो जाय , में इस प्रकार छः गा होती हैं और पूर्वोक्त यह अर्थात् जानागया और अनुगमनके ब्राह्मणको गोके वधर्म एक बैल दश गाऔर विधानसेही जव सायंकालको ये गोठमें चलें तीन रात्रका उपवास है इससे यह प्रायश्चि- तव उनके संग पीछे २ गोष्ठमें प्रवेश करें त उससे लयु ई-कदाचित कहो कि प्रा. यहभी अर्थात् सिद्ध है-ऐसे करता हुआ मणकी गौओंको गुरुत्व कैसे है इसका उ- मासके अंतमें एक गाके दान करनेसे शुद्ध तर यह है कि नारदने देवता, ब्राह्मण, रागा. होता है अर्थात गोहत्याका दोष निवृत्त हो इनका द्रव्य तम जानना इस वचनसे प्रा. जाता है यहां तक एक प्रत हुआ-गोठमें मणके द्रव्यको उत्तम कहा है और (गोपु- 'शपन और गोओका अनुगमन यहां भी ५ प्राजापत्ये सोन्मास गोईता घेदयामामोहितो (दूसरे प्रतमें ) लेते हैं और कृच्छको वि- गोनुगामी स्यानोप्रदानेन शुद्धपति । घिसे पंचगव्यके आहार (भौगन ) की तो २ देनमागको तु विनय द्रव्यमुरामम् । 3 प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५७७) ब्राह्मण संस्थासु ) इस वचनसे दंडभी अ- भोजन करें ये पांचों प्रायश्चित्त याज्ञवल्क्यके धिक दिखाय आये हैं और वैश्यकी उसी कहे पंचगव्य भोजनके समान विपयमें सम- प्रकार गोके वधर्म मासभर अति कृच्छ करै झने और जो शंख और प्रचेताओं ने कहा है पहिले आद्य अति कृच्छ्में नव दिनतक कि गौकाहंता पंचगव्यका भोजन और पच्चीस पाणिपूरान्न ( अंजलिभर ) भोजन कहा है | रात्रतक उपवास करे और शिखा सहित अंतके कृच्छ्में तीनरात्र उपवास कहा है मुण्डन करके गोके चर्मको धारण कर और इस प्रकार अतिकृच्छ्रके धर्मसे मास व्रत गौओंका अनुगमन करे गोष्ठमें सोवे और एक करने पर छः रान उपवास होता है और गोदान करै यह प्रायश्चित्त राज्ञवल्क्यक कहे चोवीस दिन पाणिपूरअन्नका भोजन तिस- मासातिकृच्छ् व्रतके विषयमें समझना, और से कृच्छुके प्रत्याम्नाय (बदला ) की कल्प- पूर्वोक्त तीन रात्र उपवास करके एक बैल नासे किंचित् न्यून पांच गो होती हैं इससे दशगोदेना अत्यंत गुणवाले ईताको जानना पहिले दोनो व्रतासे यह लघु है तिससे - इसी विषयमें जो पंचगव्य पीनेको असमर्थ श्यको गौके वधमें यही व्रत युक्त हैं उसी चित्त जानना कि छठे कालमें दूधको पीवे है उसको कश्यपंका कहा हुआ दूसरा प्राय- प्रकार शूद्रकी गोहत्यामें मासभर दूसरा प्रा- गमन करती हुई गौओंके पीछे गमन कर जापत्य व्रत है वहां सार्द्ध दो प्राजापत्य और वे सुखसे बैठी होयतो बैठ जाय और (अढाई )के प्रत्याम्नायसे किंचित् अधिक दो गो होती है इससे इसको पहिले तीनासे अत्यंत कूद कर न चले और न अत्यंत वि- अत्यंत लघु होनेसे शूदकी गोहत्याके विष- पम ( कठिण ) भूमिमें उतारे अल्प जल यमें मानना उचित है और ये चारों प्रायश्चि- जिसमें होय वहां जल न पिलावे अंतमें बा- ह्मणोंको भोजन कराके तिलधेनुदे और त्त साक्षात् तो वध कर्ताके अनुग्राहक, म- इसमेंभी जो असमर्थ है उसको पेठीनसीका योजक, अनुमंताओंमें गुरु लघु भावके कहा यह प्रायश्चित्त जानना कि गौका हंता तारतम्यकी अपेक्षासे पूर्वोक्त विषयमें ही | मासतक अंजली भर तण्डुलोंकी पकाई युक्त करने जो विष्णुने तीन व्रत कहे हैं कि यवागू ( लपसी) का भोजन और गौओं गोन (गौका हंता) मासभरतक तीनपल का प्यार करता हुआ शुद्ध होता है, जो पंचगव्य भक्षण करै अथवा पराक व्रतको | सुंमतुकों वचन है कि गोहताको गौका दान करे वा चान्द्रायण करे और जो कश्यपका वचन है कि गोको मारके उसके चर्मको १ गोप्नः पंचगव्याहार: पचविंशतिरात्रमुपवसेरस- ओढे हुये गोष्ठमें सोवे त्रिकाल स्नान और शिख वफ्न कृत्वा गोचर्मणा प्रावृतो गाश्चानुगच्छ- नित्य पंचगव्यका भोजन करे और जो शा- न् गोष्ठेशयो गां च दद्यात् । २ मास पचगव्येनैति पटे काले पयोभक्षो वागच्छ- तातपका वचन है कि मासभर पंचगव्यका न्तीष्वनुगच्छेत्तामु सुखोपविष्टामु चोपविशेन्नातिप्लवंग: च्छेन्नाति विषमेणावतारयेनाल्पोदके प.ययदन्ते गोनस्य पचगव्यैन मासमेक पलत्रयम्। प्रत्यह-प्राम्हणान्भोजयित्ता तिलधेर्नु दद्यात् । स्थात्पराको वा चान्द्रायणमथापि वा। ३ गोमो मास यवागू प्रतितन्दुलमृता भृजानो २ गो हत्या तधर्मणा प्रातो मास गोष्टैशयनिषद- गोभ्यः प्रियं कुर्वन् शुद्धयति । णमायी नित्यं पंचगव्याहारः। ४ गोलस्य गोप्रदान गोष्ठ गयनं द्वादशरात्रं पंच. ३ मास पंचगव्याहारः। गन्यप्राशनं गवानुगमन च।
(५७८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । गोष्ठमें सोना द्वादश रात्र पंचगव्य भोजन मास तक शाक आदिका भोजन, एक बैल और गौओंका अनुगमन, प्रायश्चित्त है और दश गौओंका दान, करे ये तीन प्रत और जो संवर्तनें कहा है कि सक्त यावक कहे हैं कि उपपातकसे युक्त गौका हंता भिक्षाका अन्न दूध दही घी इनको एकवार | मासभर जौको पीवे-मुंडन करके गोष्ठमें क्रमसे आधे मासभर तक सावधान होकर | वसे-गोले चर्मसे ढका रहै और चौथे कालमें भोजन कर, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराकर खारे और लवणको छोडकर प्रमित भोजन अपनी शुद्धिके लिये गोदान करे-जो धृह कर और इंद्रियोंको वशमें करके दो मास स्पति ने कहा है कि द्वादश रावतक पंच तक गोमूत्रसे स्नान करे और दिनमें उन गव्य भोजन करें ये तीनों प्रायश्चित्तभी याश- | गौओंके पीछे चले-ऊर्ध्व (सीधा) खडा वल्क्यक कहे मातभर प्राजापत्यके विषयमें हुआ रजको पावे और गाओंकी सेवा और वा मृतक तुल्य गोहत्याके विषयों वा । नमस्कार करके रानिमें वीरासनसे वस- विषम देशके दुःखसे पैदा हुई व्याधिसे जो ) और गौओंके खडे होने पर खडा होजाय मरी हो उसके विषयमें जानन, यह पूक्ति और चलती हुईयोंके पीछे चले और जब संपूर्ण प्रायश्चित्त अज्ञानके विषयमें जानना | बठे तव बैठा जाय और सावधान रहै और और जब ऐसीही तुच्छ ब्राह्मणकी तुच्छ । मत्सरको त्यागदे और आतुर और अभि गोको मारे तो मन ( अ. ११ श्लो. १०५ से | शस्त (हिंसित ) चोर व्याघ्र आदिके भयसे ११६) ने मास भर यवागूका पीना दो मास | पतित वा पंकमें धसीको संपूर्ण उपायोंसे तक चौथे काल में हविष्यका भोजन, तीन छुटावे और उष्णकाल-वर्षी शीत अत्यंत १ सक्तयावकभक्षाशी पयोदधिघृत सकृत् । एतानि | पवनके चलने पर यथा शक्ति गोकी रक्षा मोऽश्नीयान्मासाई व समाहितः । ब्राह्मणान्माज विना किये अपनी रक्षा न करें और अपनी यित्वा तु गो दद्यादात्मशुद्धये। अथवा अन्यकी गृह, खेत, खलीयानमें भ. २द्वादशराब पंचगव्याहारः। क्षण करती गो को न बतावे और न पीते ३ उपपावकसयुक्तो गोनो मासं यान्पिवेत् । कृत- । हुये वत्सको बतावे-इस विधिसे जो मनुष्य वापो सेगोठे चर्मणाईण सकृतः । चतुर्यकालमश्नीया-गो ओंका अनु गमन करता है वह गोह- दक्षारलवणं मितम् । गौमूत्रेण चोत्स्नान द्वौमासौ नि- | त्याके पापको तीन मासमें नष्ट करता है यतेन्द्रियः।दिवानुगच्छेत्ता गास्तु तिष्ठन्य रजः पिवेता | और भली प्रकार इस व्रतको करके एक शुपिता नमस्कृत्वा रात्री वीरासन वसेत् । तिष्ठती- बैल, दश गौदे-गौ न होंयतो वेदके ज्ञाता- वनुतिष्ठेत्तु प्रजन्तीष्वप्यनुवजेत् । आसीनासु तयासीनो | ओंको सर्वस्वका दान करे-न्ये तीनों व्रत नियतो वीतमत्सरः1आतुरामभिशस्तां वा चौरव्याना- | याज्ञवल्क्यके कहे मासभर प्राजापत्य-मास- दिभिःपारितां पकलमां का सर्शपापविमोचयेत् । भर पंचगन्यका भक्षण और एक बल दश उष्णेवर्षति शीतवा मारुते वाति वा भृशम् । न कुर्वीता-गो ओंके दान सहित तीन रात्र उपवास- रमनखाणं गोरकृत्वा तु शक्तितः । आत्मनो यदि वान्येषां गृहे क्षेत्रेय वाखले (मक्षयती न कथयपिया इन तीनों व्रतोंके विषयमें क्रमसे जानने- चैव वत्सकम् ।भनेन विधिना यस्तु गोनो गा अनुग और जो अगिराने मनुके कहे कर्तव्य सहित च्छति। स गोहत्या कृतं पापं त्रिभिर्मासैयरोहति । वृष- १ अक्षारलवणे संपष्ठ कालेस्य भोजनम् गोमती भैकादशागाश्च दद्यारसुचरितत्रतः । अविद्यमाने सर्वत्र वा अपेद्विद्यामोंकार वेदमेव च । व्रतवदारयेदंडं सम- वेदविद्धपो निवेदयेत् । त्रां चैत्र मेखलाम् । - प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५७९) तीन मासके व्रतको कहकर अधिक कहाहै | गोका दान करे-और जो देव ने कहा है कि खारा और लवण जिसमें नहो ऐसा कि गोन पुरुष छः मासतक गोके चर्मस रुखाअन्न भोजन,छटे कालमें करै-वा गोमती | आच्छादित रहे गो उनमें निवास कर-गौ- विद्या-ओंकार-वेद इनका जप करे और | ओंके संग विचरे तो पापसे छूटता है-ये यज्ञोपवीतके समान दंड और मंत्रोंसहित दोनों प्रायश्चित्त हारीतके कहे प्रायश्चित्तके मेखलाका धारण करे--यह वचन मनुके विषयमें हैं-यदि वही जानकर किया होय कहे विषयमें जानना-इसी प्रकार पुष्ट-तरुण तो कात्यायने का कहा त्रैवाषिक प्रायश्चित्त आदि किंचित् विशेष गुणोंसे युक्त गोको जानना कि गोन (गोहत्यारा ) गोके चर्मको हत्यामें प्रायश्चित्त जानना-क्योंकि पुष्ट और ओढकर गोष्ठमें वसै और निरंतर गोभोंका तरुणसे भिन्न गामें आधा प्रायश्चित्त इसे अनुगमन करे और मौन धारे वीर आसन वचनसे देखते हैं कि अत्यंत बालक,अत्यंत | आदिसे वर्षा-शीत-धूप-क्लेश-अग्नि-भय-पंक कृश-अत्यंत वृद्ध-रोगिन-गोको मारकर ! इनसे पीडित गोओंको सब प्रकारके यत्नोंसे पूर्व विधिसे द्विज आधे व्रतको करे और छुडावे-एसे करनेसे तीन वर्षमें पवित्र होता है जब याज्ञवल्क्यके कहे मास अतिकृच्छ और जो शंख ने वैवार्षिक कहा है कि शू- व्रत जिससे करना पडै ऐसी तुच्छ स्वामीको हत्या-रजस्वलाका गमन-इनमें पाद (चौ- जातिमात्र(नामकी)गोको जानकर नष्ट करता थाई)प्रायश्चित्त करे-वहभी कात्यायनके कहे है तबजो अज्ञानियोंको कहाहै वह ज्ञानसे दूना विषयके समान विषयमें हैं और जो यमने कर इस न्यायसे अज्ञानियोंको कहा पूर्वोक्त अंगिराके कहे कर्तव्यको कहकर सहस्र गो- ही मातातिकृछ व्रत द्विगुण करें और दान-शत गोदान युक्त दो मासके दो व्रत जो हारीतने गा चर्मके धारणको और मनुके कहे हैं कि भली प्रकार किया है व्रत नि- कहे कर्तव्यको कहकर कहाहै कि एक बैल सर्ने ऐसा गौग्न-सहस्र गो वा सौगो दे-गोन दश गो देकर तेरहवें१३मासमें पवित्र होताहै होय तो वेद पाठियोंको सर्वस्वका निवेदन (दान) करदे-उनदोनों प्रायश्चित्तोंमें जब- वह वचन सवनमें स्थित जो वेद पाठी उ- सकी गौके अज्ञानसे वधर्म जानना-औरजो सवनमें स्थित वेदपाठी अत्यंत दुर्गति-- वसिष्ठेने पाण्मासिक कुच्छ तप्तकृच्छ्र करना हुत कुटुंबी-ब्राह्मणको कपिला कर्म (होम कहा है कि गौ को हते तो उसके गोले च- आदि ) के योग्य-गर्भिणी बहुत दूधवाली तरुण-आदि गुणवाली गोको, निर्गुण-धन- मको ओट कर छः मासतक कृच्छू तप्तक- च्छू करे वृषभ और वेहत (जिसके गर्भ नरहे) १ गोमः पण्मासास्तचर्मपरिवृतो गोवजनिवासी गोभिरेव सहचरन् प्रमुच्यते । २ गोतस्तचर्मसंवीतो चद्रौटेऽयथा पुन: गाथा- 1 अतिवालामतिकशामतिवृद्धां च रोगिणीम् । नुगच्छेत्सतत मीनी वीरासनादिभिः । वर्षशीताल पले- हवा पूर्व विधानेन चोद व्रतं द्विजः। शवपिंकमयादिताः । मोक्षयेत्सर्वयत्नेन प्यते वत्सरे- २ विहित यदकामानां कामात्तद्विगुण चरेत् । ३ दृषभकादशाश्व गा दत्ता त्रयोदशे मासे पूतो ३ पाद त शबहत्यायामुवयागमने तथा । गावधे च तथा कुर्यात परस्त्रीगमने तथा । ४ गा चैद्धन्यात्तस्याश्चर्मणाण परिवटितः षण्मासा. ४ गोसदृष्य शत वापि दद्यासुचरितव्रतः । अ- नमतप्तकृच्छावा तिवृषमवेहती दद्यात् । विद्यमाने सर्वस्व वेदविभ्यो निवेदयेत् । त्रिभि । . भवति ।
(५८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । वान्-मनुष्य बडे यत्नस खड्ग आदिसे मार ) कहा है कि काठ, डेला, पत्थर, वा श- तब तो सहस्र गोदान युक्त दो मासके व्र- स्त्रोंसे गोहत्या की होय तो शस्त्र शस्त्रका तको करें क्यों कि बृहस्पति के इस वच- प्रायश्चित्त कसे करना कहा है-काठसे मार नसे विशिष्ट गामें विशेषही प्रायश्चित्त देखा है तो सांतपन कर लोटसे मारे तो 'प्राजापत्य कि गर्भवती-कपिला-दूध देती-होम धेनु- करें पत्थरसे मारे तो तप्तकृच्छ्र-शस्त्रसे सुशील-गोको जो खड्ग आदिसे मारे वह | मारे तो अतिकृच्छ्र करे-प्रायश्चित्त करनेपर द्विगुण व्रतको करै-इसीसे प्रचेतानें ऐसेही ब्राह्मणभोजन करावे और उनको तीस ३० गोवधक विषयमें ब्रह्महत्याका व्रत कहा है गो एक बैल दक्षिणादे वह यमका वचन पू- कि-गर्भिणी स्त्री, और गर्भिणी गा, बालक, | क्ति सहस्र वा शतगोदान और त्रैवार्षिक वृद्ध, इनके वधर्म भ्रूणहा होता है-दूसरा | प्रतके विषयोंमेही काठ आदि विशेष साधन तो यमका कहा सौ गोदानसे युक्त दो मा- (कारण ) से उत्पन्न वधके लिये इस अर्थ सका व्रत-कात्यायनके कहे व्रतके विषयमें है कि सांतपन आदिको करकेही कर उनके धनवानको जानना और जो गौतमैने एक विना न करे क्योंकि प्रायश्चित्त लघु है-ति- बैल सौ गौओंके दान सहित तीन वर्षके पू- ससे जो विशेषतासे प्रायश्चित्तैविशेष क- वोक्त ब्रह्मचर्यको वैश्यके वध कहकर उ- सकाही अतिदेश (मानना') गोवधौ हा है कि अतिवृद्ध-अतिकृश अतिवाला किया है कि गोकोभी मारकर वैश्यको ह- रोगिणी-ऐसी गोको हतकर पूर्वोक्त विधिसे त्याके समान प्रायश्चित्त करै-यह व्रत-तीन आधा प्रायश्चित्त द्विज कर शक्तिसे ब्राह्मणोंको वर्षके व्रतका प्रत्याम्नाय जो नव्वे ९०धेनु, उन जिमावे सुवर्ण और तिल दान कर-नीरोग सहित-एक बैल सोगी एकसो इक्कानवे(१९१)गोके वधर्मे जो कहा है उसका आधा प्राय होती हैं इससे सहस्र गोदानसे युक्त दो मा- | श्चित्त करै-वृहत्मचनिभी यहां विशेष क- सके तसे न्यून (कम ) होनेसे-पूर्वोक्त वि- हा है कि एक वर्षके वत्सको हताहोय तो षयमें जानकर किये गोवधर्म समझना-अथवा | कृच्छ्रका पाद कहा है अज्ञानसे दो वर्षके पूर्व विषयमें गर्भरहित गोके जानकर वधमें वत्समें दोपाद कृच्छ्र-तीन वर्षकैमें तीन समझना और वैसीही गर्भरहित गोके अज्ञा- पादकृच्छ्र करै इससे परे प्राजापत्य होता है नसेहतनेमेंभी कात्यायनका कहा तीन वर्षका तैसेही गर्भिणी गोके वधमें यदि गर्भभी नष्ट प्रायश्चित कल्पना करना और जो यमने होजाय तो निमित्त २ के प्रति नैमित्तिक १ गभी कपिलांदोग्धी हामधेनु च सुव्रताम्।ख- कर्मकी आवृत्ति होती है इस न्यायसे द्वि- द्गादिना घातयित्वा द्विगुणं व्रतमाचरेत् । २ स्त्री गर्भिणी गो गाँभणी बालवृद्धवधेपु भ्रुण १ अतिवृद्धामतिकशामतियाला च रोगिणीम् । हा भवति। हत्ता पूर्व विधानेन चरेदप्रतं द्विजः। ब्राह्मणान्भोजये. ३ गो च हवा वैश्ययत् । ४ काष्ठलोटाश्मभिर्गावः शस्त्रैर्वा निहता यदि। प्रा- च्छत्तया दद्याद्रेम तिलांस्तथा । यश्चित्तं कथं तत्र शचे शास्त्रे विधीयते ! काठे सांतपनं २ एकवर्षे हते वसे कृच्छ्रपादो विधीयते । अबु- कुर्यात्माजापत्यं तु लोटके । तप्तकच्छू तु पाषाणे द्धिपूर्वे पुसः स्थाष्टिपादस्तु विहागने।बिहायने त्रिपादः चाप्यतिकच्यूयम् । प्रायश्चित्ते ततश्वीरें कुर्याद्वारण | स्यात्प्राजापत्यमतः परम् । भोजन ! विशद्गा वृषमं चैकं ददात्तेभ्यश्च दक्षिणाम् । ३ प्रतिनिमित्तं नैमित्तिकमावर्तते ।
(५८२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । व्यापार का योग करते हैं वे निमित्ती हैं उन स्मृति है कि अंकन और लक्षण को छोड़. को संपूर्ण व्रतका संबंध नहीं किंतु कृच्छ्र के कर वाहन और मोचन में और रक्षा के लिये पाद और द्विपाद आदि का संबंध है उसनें | सायंकाल के रोकने और बांधने में दोष भी रोकने आदि संपूर्ण अविशेषसे यद्यपि नहीं, स्थिर चिन्हको अंकन कहते है और दूर के व्यापार हैं तो भी वचन से कहीं पाद तत्काल के चिन्ह को लक्षण, और वाहन कहीं द्विपाद, और कहीं पादोन, प्रायश्चित्त भी शास्त्रोक्त मार्गसे लेना और रक्षा के लिये करना युक्त है यहां पराशर ने यह कहा है | भी नालिकेर आदिसे बांधने में दोष होता है कि गौओके बांधने वा संयोग करने से क्यों कि व्यासकी स्मृति है कि नारियल, अज्ञानसे मृत्यु होजाय तो अज्ञानसे किये सण, वाल, मुंज, बांधने को सांकल, इनसे पापके लिये प्राजापत्य बतावे और प्राय- गौओंको न बांधे और गौओंको बांधकर चित्त करनेपर ब्राह्मण भोजन करावे और रक्षार्थ फरसा लिये खडा रहे और कुश और ब्राह्मण को बैल सहित गाकी दक्षिणादे और कासासे ऐसे स्थान में बांधे जहां कुछ भय यह प्राजापत्य उसको जानना जो रोकने नहो तैसेही अन्यभी विशेष व्यासने ही आदिको करके रोकने आदि से पेंदाहुये कहा है कि घंटाभार के दोपसे गौ मर प्रमादके परिहारको वाट देखता हो, क्यों जाय तो कृच्छाई प्रायश्चित्त होता है। क्यों कि, अज्ञानसे किये पापका, यह विशेषण कि वह भूपण के लिये कहा है अति दुहनें श्लोकमें पडा है और यदि प्रमादका अनुस- अत्यंत दमन, समूह में योजन, खल रण करै तब अंगिरी के कहे त्रैमासिक का | और पाशों से वांधने में, गो मर जाय पाद वा कुछ आधिक, वा वीसदिन का गोवध तो पादोन कृच्छ्र करे और रक्षा करने व्रत करे कि रोकने में एक पाद, बांधने में | आदिकी उपेक्षा में व्यासेनें ही कहीं प्राय- दो पाद, योजन में तीन पाद, गिराने में श्चित्तका विशेष कहा है कि जलका है वेग संपूर्ण व्रत करे-आपस्तंबने भी विशेष जिसमें ऐसे पल्वल (छोटा तलाव) में कहा है कि अत्यंत दुहने, अत्यंत वाहन १ अन्यत्रोऽकनलक्षाभ्या वाहन मोचने तथा। सा- नासिकाका छेदन, नदी और पर्वत में य सगोपनार्थ च न दुष्येद्रोधयंधने । रोकने से गौ मरजाय तो पादोन प्रायश्चित्त २न नालिकरण न शाणारीनचापि मौजेन न करें, और लक्षण मात्रके उपयोगी दाह बन्धखलैः । एतस्तु गावो न निवन्धनीयायद्धातु ति-- (दाग ) में दोष नहीं क्यों कि पराशरकी छेत्परशु गृहीत्वा । कुशेः काशैश्च यधीयात्स्थाने दोष ३ घण्टाभरणदोषेण विपत्तिर्यत्र गोर्भवतागोकच्दा- १ गायधनयोक्नस्तु भवेन्मृत्युरकामतः । अकाम-धं भवेत्तत्र भूषणार्थ हि तत्स्मृतम् । अतिदोहातिदमने. कृतपापस्य प्राजापत्यं विनिर्दिशेत् । प्रायश्चित्ते ततश्ची- | सघाते चैव योजने । यद्धाश्खलपाशैश्च मृते पादौन- ऐं कुर्याद्राह्मणभोजनम् । अनदुत्सहितां गां चदयादिमा- माचरेत् । यदक्षिणाम् । ४ जलौघपल्वले मना मेघविद्युद्धतापि वा।श्व वा २ पादमेक चरेद्रोधे द्रौपादौ पन्धने चरैत । योजने | पतिता कस्माच्यापदेनापि भक्षिता । प्राजापत्य चरे- पारहीन स्थाचरेत्सर्व निपातने । स्कृच्छू गोस्वामी नतमुत्तमम् । शीतवाताहता वा स्या- ३ अतिदोहातिवाहाभ्यां नासिकाशेदने तया। इद्वधनहतापि वा ।न्यागार उपेक्षाया प्राजापत्यं धि- नदीपर्वतसरोधे मृते पादोनमाचरेत् । निर्दि-शेत् । विवाबिते।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५८३) टूवी और मेघ और विनलीसे हती और से मरने में और गौओंके हितार्थ दाहका अकस्मात् गड्ढे में पड़ी और अकस्मात् छेदन शिषकोभेद (फस्त) आदि प्रयोगासे श्वापद ( भिडा)ने भक्षण की-ऐसी गौके ) गाओंका उपकार करते हुये द्विजाको प्राय- मरनेमें गौका स्वामी प्राजापत्य कृच्छ् व्रत | श्चित्त नहीं है-यहां पराशरने भी कहा है कि करे-और शीत पवन धूप इनसे मरी हो या अतिवृष्टिसे हती हुई गौओंका-और धर्मार्थ उद्वंधन (भाधना) से हती हो-शून्य घरमें फूपकं खोदनेमें घरके दाहमें ग्रामके दाहमें उपेक्षासे (बेखबरी) से भरी होय तो प्राजा- | और घोर उपद्रवमें जो गी मरी हो तो प्राय- पत्य करे-यही कार्यातरकी व्यग्रता (ल- श्चित नहीं है-यह वचन तो उस विषयमें है गना) के अभावसे उपेक्षामें जानना और | जहां बंधनहित (खुला) पशु घरके दाह अन्य कार्यमें व्यग्रता होयतोआधा प्रायश्चित्त ! आदिसे मरगया हो-ऐसा न होयतो आप- करें क्योंकि विष्णुकी स्मृति है कि पल्व-स्तंबने कहा है कि वन-दुर्ग (किला) लका वेग-मृग-च्यान-श्वापद आदिसे मर- घरका दाइ-खल-इनमें गौका मरण हो नेमें-गटामें गिरना सर्प आदिसे मरनेमें जाय तो एक पाद प्रायश्चित्त कहा है-तैसेही आधा कृच्छ्र करे-पाल (ग्वाल )न होय अस्थि आदिका भंग होनेपर मरणके अभा- और शून्य घरमें मरजाय तो कृच्छ् प्रायश्चित्त वर्मभी कहीं प्रायश्चित्त कहा है कि गौओंका होता है और पूर्वोक्त मरण होभी जाय तोभी अस्थिभंग और लांगूलका छेदन-दांत कही २ वचनसे दोपका अभाव है सोई सं- और सींगोंका तोडना इनको करके मास- वर्तन कहा है कि चिकित्साके लिये गौके | तक जौको पीव-जो तो अंगिराका वचन यंत्रण और मरे गर्भके निकासनेमें यल है कि सींग दांत अस्थि इनके भंगचर्मके करनेपर गौ मरजाय तो वह मनुष्य पापसे निर्मोचन (छुटाना ) में यदि गौ स्वस्थभी लिप्त नही होता-च्याधिके दूर करणार्थ हो जाय तोभी दशराबतक वनको पावै- तीक्ष्ण अंकुश आदिके प्रवेश यंत्रण वन शब्दसे क्षीर आदिका वर्तना कहा है- हैं-तैसेही वचन हैं कि औषध घी भोजन वह व्रत अशक्तके विषयमें है-यह प्रायश्चि- इनको गो ब्राह्मणोंको द्विज देता हो और तभी तब करना जब मृतक गौके समान गो देनस मरण होजायतो वह पापसे लिप्त नहीं गौके स्वामी देदी हो-सोई पराशरने होता-मामके घात (दुःख वा मरण) वा- गोसे मरण हुआ हो-घरके भंग (गिरना ) १ अतिवृष्टिहतानां च प्रायश्चित्तं न विद्यते । कुपखा ते च धी गृहदाहे च या मृता । प्रामदाहे तथा घोरे १ पल्बलौघमृगव्याधश्वापदादिनिपातने । श्वन | प्रायश्चित्तं न विद्यते । प्रपातसपायेमृते कृच्छाईमाचरेत् । अपालवात्तु २ कातारेष्वष दुर्गेषु गृहदादे खलेषु च । यदि तत्र कृच्छ स्यान्यागार उपलने । विपत्तिःस्यात्पाद एको विधीयते । २ यत्रणे गोचिकित्सार्थे मूदगर्भविमोचने । यले ३ अस्थिभंग गर्वा कृत्वा लांगूलच्छेदन तथा । कृते विपत्तिः स्यान्न स पापेन लिप्यते । पाटन दंतशृंगाणां मांसाई तु यथापित । ३ औषधं स्नेहमाहारं ददद्गोत्राह्मणे, द्विजः । दीय ४ शृंगदतास्थिभगे वा चर्म निर्मोचने पिवा । द- माने विपत्तिश्चैत्र सपापेन लिप्यने । प्रामघाते शरौण शात्रं पिवद्वा स्यस्यापि यदि गौभवेत् । वेश्मभंगानिपातने दाहच्छेदशिराभेदप्रयोगरूप ५प्रमाणे प्राणभृतां दद्यात्तामतिरूपकम। तस्या- कुर्वताम्। विजानां गोहितार्थं च प्रायश्चित्तं न विद्यते । नुरूप मूल्य वा दद्यादित्यमवौद्यमः। - ।
(५८४) ) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा है कि प्राणधारियोंके मारनेमें उसका ने कहा है कि पाद प्रायश्चित्तमें अंगके प्रतिरूपक (बदला)दे वा उसका मूल्य दे यह रोमोंका मुंडन-द्विपादमें श्मश्रुकाभी और यमने कहा है-मनु (अ०८श्लो०२८८) नेभी त्रिपादमें शिखाको छोडकर, और मारनेमें कहाहै कि जानकर वा विना जाने जो जिसके | शिखा सहित मुंडन कहा है अर्थात्पाद- द्रुष्योंकी हिंसा करे वह उसका संतोष करे | प्रायश्चित्तके योग्यके कंठसे नीचे अंगके और उसके समान राजाको दे-यह पूर्वोक्त | रोमोंका मुंडन करना-आधे प्रायश्चित्तके संपूर्ण प्रायश्चित्त-मारनेवाले ब्राह्मणकोही । योग्यके श्मश्रु सहित पूर्वोक्त अंगरोमोंका जानना-क्षत्रिय आदि मारनेवालेको तोवृह- और पादान प्रायश्चित्तके योग्यका शिखाको द्विष्णुने विशेष कहा है कि ब्राह्मणको संपूर्ण छोडकर-चारोंपाद प्रायश्चित्तके जो योग्य है प्रायश्चित्त देना-क्षत्रियको पादोनवैश्यको उसके शिखा सहित संपूर्ण केशांका, मुंडन आधा और शुद्र जातियोंमें पाद (चौथाई ) | कराव-इसी मार्ग (रीति ) को स्वीकार श्रेष्ठ कहा है-और जो अंगिराको वचन है | करके स्मृतिके वचनोंका विषय निरूपण कि जो ब्राह्मणोंको सभा है वह क्षत्रियों को करना ( कहना) दूनी वैश्योंकी तिगुनी और पर्षत् (सभा)के भावार्थ-गौका हत्यारा पंचगव्यको पीवे उक्त समान व्रत कहा है-वह प्रतिलोम रीति- और मासभर संयमसे बैठा रहै-गोष्ठमें से कठोर वाणी और कठोर दंडके विषयमें | सोवै और गोओंका अनुगमन करे और गौके जानना, तैसेही स्त्री वृद्ध बाल आदिकोंको दान करनेसे शुद्ध होता है और सावधानीसे आधा और अनुपनीत वालककोभी पूर्वोक्त | कृच्छ्र अतिकृच्छू करे और तीन गत्र उप- आधा समझना-स्त्रियोंको पराशरने विशेष | वास करके एक बैल दश गोओंका दान कहा है कि स्त्रियोंका मुंडन-अनुगमन-जप | करै ॥ २६॥२६४ ॥ आदि-गोष्ठमें शयन और गोचर्मका धारण इति गोवधप्रायश्चित्तप्रकरणम् । नहीं होता और संपूर्ण केशोंको ऊपरको दो अंगुल छेदन कर-सव का स्त्रियोंका | उपपातकशुद्धिःस्यादेवंचांद्रायणेनका ।। यही मुंडन कहा है-पुरुषोंमें विशेष संवर्त पयसावापिमासेनपराकेणायवापुनः २६५ १ यो यस्य हिस्याव्याणि ज्ञानतोऽज्ञानतोपि वा। पद-उपपातकशुद्धिः १ स्यात् कि- स तस्योत्पादयेत्तुष्टिं राज्ञे दद्याच तत्सम । एवंड- चांद्रायणेन ३ वाऽ-पयसा ३ वाई- २ विमे तु सकलं देय पादोंने क्षत्रियेस्मृतम्। वैश्ये | अपि - मासेन३ पराकेण३ अथवा:- पुनः:- ई पाद एकस्तु शस्यते भूदजातिषु । योजना-एवं वा चांद्रायणेन, वा मासेन ३ पर्षद्या ब्राह्मणानां तु सा राज्ञां द्विगुणा मता ।वै- पयसा, अथवा पराकेण, उपपातकशुद्धिः शानां त्रिगुणा प्रोक्ता पपञ्च व्रत स्मृतम् । स्यात् ॥ ४ वपन नैव नारीणां नानुमज्या जपादिकम् । न गोठे शयनं तासांन वसीरन् गवाजिनम् । । सर्वान्केशान्समुद्ध- तात्पर्यार्थ-अव अन्य उपपातकोंका प्राय- त्य छेदयेद्गुलद्वयम् । सर्वत्रैव हि नारीणां शिरसोमुंडन | श्चित्त कहते हैं इसी प्रकार उक्त रीतिसे गो- स्मृतम् । वधके-मासभर पंचगव्य भक्षण आदि-व्रतसे ५ पागोमवपनं द्विपाद श्मश्रुगोपिच । त्रिपादे | अन्यभी प्रात्यता आदि उपपातकोंकी शुद्धि तु शिखावज्य सशिखंतु निपातने । होती है अथवा चांद्रायण (जोआगे कहेंगे)से प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५८५) r • वा मासभर पयो (दूध)व्रतसे-वा पराक व्रतसे लिये वृक्षाका छेदन-वृक्ष, गुल्म, लता, वीरुत् शुद्धि होतो है-यहां अतिदेश ( तुल्यता ) | इनके छेदनमें सो ऋचाओंका जो जप के सामर्थ्यसे-गोचर्म धारण-गौकी सेवा- उसके समान है' इससे प्रात्यता आदिमें आदि जो गावधर्म असाधारण व्रत है इस शास्त्रम वा अन्य शास्त्रोम देख जो प्रा- उनमें कतिपय ( कितनेक ) व्रतोंकी न्यून यश्चित्त उन प्रायश्चित्तोंके संग, उपपातककी ता जानी जाती है ये इसी वचन में कहे चारों | शुद्धि इस पूर्वोक्त प्रकारसे होती है इस अत-अज्ञानसे किये पापमें शक्तिकी अपे | श्लोकमें पढे ( स्यादेवं ) इत्यादिसे कहे चार क्षासे विकल्पसे जानने-जानकर करनेमें तो व्रतोंका तुल्य और विषयकी कल्पनासे वि- यह मनु ( अ. ११ श्लो ११७ ) का कहा कल्प वा विषयविभाग मानना, वे अन्य तीन मासका व्रत जानना कि उपपातकी स्मृतियों में कहे प्रायश्चित्त व्रात्य आदिकोंमें द्विज इसी अत्तको करे अथवा अवकीर्णीको पाठके क्रमसे हम युक्त करेंगे उनमें. व्रात्य छोडकर चांद्रायण करें-इसी वचनसे यह होने पर मनुने यह कहा है ( अ. ११ श्लोक प्रायश्चित्तका अतिदेश-उपपातकगणमें पढे १९१ )कि जिन द्विजोंको विधिसे गायत्रीका हुये सबको चाहे प्रायश्चित्त उनका कहा हो उपदेश न हुआ होय तो उनसे तीन कृच्छ्र वा न कहाहो अवको को छोडकर अविशे- कराकर विधिसे यज्ञोपवीत करावे, और पसे जानना-अवकीर्णीको तो प्रतिपदोक्त | जो यमैने कहा कि जिसकी गायत्री पन्द्रह (जुदा)ही प्रायश्चित्त है-कदाचित् कोई शंका वर्पतक पतित होजाय वह शिखा सहित करे कि उनकाही अतिदेश युक्त है जिनका मुण्डन कराकर सावधानीसे व्रत कर इक्की प्रायश्चित्त न.कहा हो-ऐसे न मानोगे तो सदिनतक अंजलीभर जौ पावे और प्रतिपदोक्त प्रायश्चित्तके बाधकी अपेक्षाका सात वा पांच ब्राह्मण हविष्य अन्नसे जिमावे प्रसंग हो जायगा-ऐसा मतकहो क्योंकि फिर नौसे शुद्ध हुये उसका यज्ञोपवीत ऐसा मानने पर उक्त प्रायश्चित्तोंका पाट उप-करावे ये दोनों व्रत याज्ञवल्क्यके कहे 'पातक गणमें अनर्थक हो जायगा-यदि मासभर पयोव्रतके विषयमें समझने, और उपपातकके मध्यमें सामान्यसे पढे हुये काभी जो वसिष्ठने कहा है कि जिसकी सावित्री अन्यत्र प्रायश्चित्त अन्यही विशेष कर कहते है (जैसे अयाज्योंको यज्ञ करावे तो तीन प्यमृक्शतम् । १ इंधनार्थ ठुमच्छेदः वृक्षगुल्मलतावीरच्छेदने ज- कृच्छ्र करे और व्रात्योंका याजक और २ येषां द्विजाना सावित्री नानच्येत यथाविधि। सां अभिचारके कर्ताभी यही करें ) वहीं नियम धारयित्वा श्रीकृच्छन् यथाविपनापयेत् । केवल न्यून होगा और विशेषसे पटितका ३ सावित्री पतिता यस्य दशवपीणि पच च । स- अन्यत्रभी जहां विशेषही प्रायश्चित्त कहा है- शिखं वपन कात्या बतं कुर्यात्समाहितः । एक वेश- वहभी न्यून न होगा जैसे यह की इंधनके तिरात्रं च पिवेत्ममतियावकम् । हविषा भोजयेश्व ततो यारशुद्धस्य तस्योपन १ एतदेव व्रत कुटुंरुपपातकिनो द्विजाः । अव- कागवर्य शुदपर्षे चांद्रायणमथापि वा । ४ पतितसावित्रीक उद्दारकावत चरेट डी मा- सौ यावकेन यर्तयेन्मास पयसा पक्षमामिक्षयाऽटरा- २ भयाज्यानां च याजनं । मीन्कृच्छानाचरेत व्रात्य- व घृतेन पट्टावमयाचितेन त्रिरात्रभन्मक्षोऽहोरात्रमु- पवसरश्वमेधावभृथं गच्छद्रात्यस्तोमेन वा यजेत । ब्राह्मणान्तप्तपच च । यनं स्मृत। न्याजको ऽभिचरनपि।
(५८६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पतित हो गई हो वह उद्दालक व्रतकर की चोरीमें ब्राह्मण चोरको ही यह प्राय- कि दो मासतक जौको भक्षण करे एक | चितह-क्षत्रिय आदिको तो अल्प प्रायश्चि- मास दूधसे, एक पक्ष आमिक्षा (सिकरन) त्तकी कल्पना करनी क्यों कि इस वचनने से, आठ रात्र घीसे, छः रात्र अयाचितसे, क्षत्रिय आदि चौरको अल्पदंड देखते हैं कि तीन रात्र जलके भक्षणसे बितावे, अहोरात्र चोरीका पाप शूद्रको अष्टापाद्य ( आठ उपवास करे, अश्वमेधके अवभृथमें मान पाद ) होता है और इतर वर्णाको क्रमसे करे अथवा प्रात्यस्तोम यज्ञ करे यहां यह दूना होता है और विद्वान्को तो अतिक्रम व्यवस्था है कि जिसके यज्ञोपवीतका समय (चोरी आदि) में प्रतिवर्ण अधिक दंड होता उपनयन करानेवालेके अभावसे बीत गया है-तैसेही पादहानि(कमी) से प्रायश्चित्त इस होयतो वह याज्ञवल्क्यके कहे व्रतमिर वचनसे देखते हैं कि ब्राह्मणको पूरा-क्षत्रिय कोईसे व्रतको शक्तिके अनुसार करे विना को पादान प्रायश्चित्त, कहा है-तैसेही क्षत्रिय आपत्तिके समय वीतगया होयतो मनुका आदिको चौरीमेंभी दंड के अनुसार प्रायश्चि- कहा त्रैमासिक व्रत कर और विनाआपत्तिकै त्तकी कल्पना करनी-इससे क्षत्रियकी पंद्रह वर्षसे अधिकभी कुछ काल वीत जाय चौरीमें छः मासतक, वैश्यकी चोरीमें तीन तो उद्दालक व्रत वा व्रात्यस्तोम यज्ञ करें मासतक गोवध व्रत करे और शूद्रकी और जिनके पिता, आदि अनुपनीत होय तो चोरी में चांद्रायणकी कल्पना करे-इसी उनको आपस्तंबका कहा ब्रह्मचर्य है कि आगेभी समझना-यहभी दश कुंभ जिसके पिता, पितामह दोनों अनुपनीत धान्यकी चोरी में है अधिक में तो इस होय उसको वर्ष दिनतक विद्यक ब्रह्मचर्य वचनसे वध देखते हैं कि दश कुंभ धान्यकी करना और जिसके प्रपितामह आदिके यज्ञो-जो चोरी करै उसको उत्तम साहस दंड पवीतका स्मरण न होय उसको उपनयन होताहै और सहस्र पलसे अधिक चुरावे तो करावे और वह बारह वर्षका त्रैविद्यक ब्रह्म- | वदंड दे-पांच सहस्र पलको कुंभ कहते हैं- चर्य करे, तैसेही चोरीममी साधारण उप-धान्यके साहचर्य से अन्न और धनभी इतने पातकर्म प्राप्त चार व्रतोंका अपवादरूप ही परिमाणके जानने-अन्न शब्दसे तंडुल प्रायश्चित्त मर्नुने कहा है ( अ० ११ आदि और धन शब्दसे ताम्र रजत आदि श्लो० १६२ ) कि धान्य, अन्न, धन, कहते हैं-यह प्रायश्चित्तभी जानकर करनेक इनकी चोरी सजातीय घरसे जानकर करे विषयमें समझने-अज्ञानसे करनेमें तो तीन तो आधा कृच्छ्व्रत करे- द्विजोत्तमका मारुका गोवध व्रत प्रायश्चित्त है तैसेही सजातीय, ब्राह्मण ही होता है इससे ब्राह्मण मनुष्य स्त्री क्षेत्र घर कूप और वापी का जल- प्रकार •~ १ यस्य पितापितामहावनुपनीतौ स्याता तस्य सं- वत्सरं विद्यक ब्रह्मचर्यम् यस्य प्रपितामहादे नुस्म- येते तस्य उपनयनं तस्य द्वादश वर्षाणि विद्यकं - ह्मचर्यम् । २ धान्यानधनचौर्याणि कृता कामाद्विजोत्तमः। सजातीयमहादेव कृच्छ्रार्द्धन विशुद्धयाति । १ अथाष्टापाद्यं स्यकिल्विषं शूद्रस्य द्विगुणोत्त राणीतरेषां प्रतिवर्ण विदुषोऽतिक्रमे दंहभूयस्त्वम् । २ विप्रेतुं सकलं देय पादोन क्षत्रिये स्मृतम् । ३ धान्य दशभ्यः कुंभेभ्यो हरतो दम उत्तमः । पलसहस्रादाधिके वधः।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५८७) इनके हरनेमें चांद्रायणसे शुद्धि होती है। जो प्रायश्चित्त उसका अपवाद है और यह यह चांद्रायण अढाईसौ २५० पण द्रव्य प्रायश्चित्त, चान्द्रायण का निमित्त जो द्रव्य जीससे पैदा हो ऐसे जलकी चोरीमें प्राप्तभीथा | उससे आध तीनसी है मोल जिसका उससे तोभी अन्यजो गोवधके व्रतहैं उनकी निवृ- पंद्रहवे अंशसे आधे वपु सीस आदि की त्तिके लिये कहाहै-और अढाई सौ पण है | चोरीमें, जानना क्योकि वह चांद्रायणके मूल्य जिसका ऐसे जलकी चोरीमें तो पानी | पन्द्रहवे भाग रूप है-तसेही द्रव्य विशेषमें और तृणकी चोगिमें उसके मूल्यसे दूना | सामान्य उपपातकों में पाये व्रतका अपवाद दंड होताहै इसे वचनसे चांद्रायणके विषयमें है, मर्नु (अ. ११ श्लो. १६५) ने कहा है पांचसा ५०० पण दंडके विधानसे उक्त परि कि भक्ष्य, भोज्य, यान, शय्या, आसन, पुष्प, माणका दंड और चांद्रायण इन दोनोंको मूल, फल, इनकी चोरी में पंचगव्य पानसे गोवधआदिमें सहचरित होनसे,तसेही कृच्छ् शुद्धि होती है, यहभी एक बार भोजन मीतकृच्छ्र और ऐंदव (चांद्रायण) इनमें भी के योग्य भक्ष्य, भोज्यकी चोरी में पांचसो पण दंड है इस वचनसे चांद्रायणके समझना दो तीन वारके भोजन की विषयमें पांचसो पण दंडका विधान है-इससे चोरीमें तो त्रिरात्र उपवास है, सोई पठी- पूर्वोक्त प्रायश्चित्त अज्ञानसे करनेमें है यह नसी ने कहा कि उदरके भरनेभर भक्ष्य, ठीकई-और यह क्षत्रिय आदिके द्रव्यको भोज्य अन्नकी चोरीमें तीन रात्र वा एक रात्र चोरीमें जानना-ब्राह्मणके द्रव्यकी चोरीमें उपवास और पंचगव्यका भोजन प्रायश्चित्त १ तो यह मर्नु ( भ. ११ श्लो. ५७) का कहा हैं और भक्ष्य भोज्यके सादचर्यसे इतने ही प्रायश्चित्त जानना कि निक्षेप (धरोर ) नर, अश्न, चांदी, भूमि, वज्र,मणि इनकी चोरीम मोलके यान आदि की चौरीमें यह पूर्वोक्त प्रायश्चित्त सुवर्णकी चोरीके समान दंड कहाह-तसही व्यक न्यून अधिक भावसे गुरु और लघु समझना, सब जगह चोरीके मर्ने (अ. ११ श्लो. कि पराये घरसे अल्पसार (तुच्छ ) द्रव्यों प्रायश्चित्त की कल्पना करनी, तैसे ही मर्ने की चोरी कर तो उनको लौटाकर अपनी तृण, काठ, वृक्ष, शुष्क अन्न, गुड़, तेल,चर्म, (अ. ११ श्लो. १६६) का वचन है कि अपनी बुद्धिके लिये सांतपन कृच्छ कर-मांस इन की चोरीमें तीन रात्र भोजन न कर अल्प प्रयोजन वाल वपु सीस आदि द्रव्यों- इन तृण आदि की चोरीमें भक्ष्य आदिसे की चोरीमें उपपातक रूप सामान्य चोरीका | तिगुने त्रिरात्र प्रायश्चित्त के देखनेसे उनसे मनुष्याणां च हरणे सांगा क्षेत्रगृहस्य काफपवा | तिगुने मोलके तृण आदि की चोरीमें ही. पजिलानां घ शुट्रिबादायणेन तु । २ पानीयस्य तृणस्य च तन्मयाद्विगुणो दण्ड इति १ भदरभोज्यापहाणे यानशव्यासनस्य च । पुष्प ३ एमतिन्दवायोः पणाचशत तपा। भूटपटानां च पंचगन्य विशोधनम् । निक्षेपस्यारहरणे नराधरजतस्य च भूमिका २ मश्याभोग्यावस्याहरपुरणमात्रहरणे मिक मीना वमरतेयसम स्मृतम् । रात्र वा पंचगव्याहारय। ५दगाणामपसारागो स्तेये कृतान्यवरमनः । ३ तणासुमागा १ गुफामस्य गुहस्य या चोचोपन कम निर्मात्याममुवे । सलचर्मामिपाणी पत्रिरा स्यारभोजन । १९४) के एक्शन तपा। Y (५८८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । ‘यह प्रायश्चित्त जानना तसेही मने (अ.११उपपातक है इस विषयमें मने (अ० ११ श्लो. १६७) ने कहा कि मणि, मोती, श्लो० २७)ने कहा है कि पशु और सोम यज्ञ मूगा, तांचा, चांदी, लोहा, कांसी, पत्थर, न किये होय तो उनके प्रायश्चित्त के लिये इनकी चोगमें चारह दिनतक कुरिसत अन्न, वर्षदिनके अंतमे वैश्वानरी यज्ञ कर-तिसी भक्षण करें-यहांभी भक्ष्य आदिके समान तो भी यही चारों व्रतवर्षदिनके अनंतरभा- प्रकार यज्ञका अधिकारी अमिहात्री न होय बारह गुना प्रायश्चित्त देखनेस उनके मूल्यसे | पत्तिके समय शक्तिके अनुसार करने आ- बारह गुना मूल्य है जिनका ऐसे मणि, मोती, पत्ति न होय तो मनुका कहा मासिक व्रत आदि की चोरीमें यही प्रायश्चित्त जानना, | कराव और वर्षदिनस पहिले तो कार्णाजि- तसेही मनु ( अ. ११ श्लो. १६८) ने कहा , निनें विशेष कहा है कि ब्राह्मण अग्निका हकि कपास, रेसम, ऊन, दो और एक आंधान करके कमाको विधि पूर्वक समयपर खुवाले पशु, पक्षि, गंध, औषधि, रस्सी, कर, उनको न करे तो मास मासमें विरात्र इनकी चोरीमें तीन दिनतक दूध पावे यहांभी न होय और पुत्र यज्ञ कियाचाहे तो वह व्रतसे शुद्ध होता है यदि पिता अग्निहोत्री भक्ष्य आदिसे तिगुना प्रायश्चित्त देखनेसे प्रायश्चित्त के लिये व्रात्य पशु यज्ञ करे, एका- सिगुने मोलके कपास आदि की चोरीमें यह | निके लिये विशेष उसनेही कहा है कि जो- प्रायश्चित्त जानना, चुराये हुये द्रव्यक न्यून | गृहस्थी ज्येष्ठ होकर घरमें उपासन अग्निका अधिक भावसे अल्प और महान् प्रायश्चित्त- | आधान न करे वह वर्षभर चांद्रायण करे को कल्पना करनी योग्य है,यह चोरीका प्राय- अथवा प्रतिमास एक उपवास करें-तसेही श्चित्त चुराये द्रव्यके पीछे दिये भी जानना | विक्रय करनेके अयोग्यके विक्रय करने में सोई विष्णुने कहा है कि चुराया हुआ द्रव्य सोई हार्तिने कहा है कि गुड, तिल, पुष्प, प्रायश्चित्तका विशेष अन्यस्मृतिमें कहा है, स्वामीको देकर व्रत करे-ऋणका दूर क- रना पुत्र पोन ऋणको दें इस वेचनसे पुत्र ११ष्टिं वैश्वानरी चैव निवपेदन्दपर्यये । दुतानांपशु- पौत्रोंको कहा है उसकेन दूर करने में तसही सोमानां निष्कृत्यर्थमसंभव इति । उत्पन्न होता ही ब्राह्मण तीन ऋणवाला हो- तपःकुंवन् त्रिरात्रेण मासि मासि विशुध्यति ।अनाहिता- २ काले त्वाधाय कर्माणि फर्याद्विषो विधानतः। ताह इस वाक्यते स्तुति की है जिनको ऐसे भी पित्रादी यक्ष्यमाणः सुतो यदि । सहि व्रात्येन पशुना वेदोक्त यज्ञादिक न करनेमेंही (उपपातक | यजेत्तन्निप्नयाय तु । शुद्धिः स्यादेवं ) इस वचनसे सब उपपात ३ कृतदारो गृहे ज्येष्ठो योनादध्यादुपासनम् । चा- कों में कहे जो चार व्रत वे,शक्तिकी अपेक्षासे न्द्रायण चरेद्वर्घ प्रतिमासमहोपि वा। समझने क्यों कि ऋणका दूर न करना भी ४ गुडतिलपुष्पमूलफलपक्कानविक्रय सोमपानं सौम्यः कृच्छालाक्षालवणमधुमासतैलरिदधिपतगंधतकाचर्म वाससामन्यतमविक्रयेचाद्रायणम् ।उकिशकेशरीधे- १ मणिमुक्ताप्रवालाना ताम्रस्य रजतस्य च । अ- नुवेश्यारमशस्त्रविक्रयेच भक्ष्यमांसस्त्राय्वस्थिशृंगनखशु- “यस्कास्योपलानां च द्वादशाई कदन्नता । क्तिविक्रयेतप्तकृच्छः। हिंगुगुग्गुलहरिताटमन शिला- २ कापीसकोटमोर्णानांहिवरकखुरस्य च । पक्षि- जनगरिकक्षारलवणमाणिमुक्तामवालवणवणुसन्मययुच गधौषधीनां च रज्ज्वाश्चैव यह पयः। तप्तकृच्छ्रः । आरामतडागादपानपुष्करिणीम् कृत वि- ३ दरवापहृत द्रव्यं स्वामिने तमाचरेत् । क्रय त्रिपवणलाय्यघःशायी चतुर्यकालाहारो दशसहसं ४ पुत्रपौत्रण देयम् । जपन् सवत्सरेण पूतो भवति हीनमानोन्मानसंकर ५ जायमानो वै ब्राझणः । सकोर्णविनय च।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५८९) मूल, फल, पक्वान्न इनको वेचकर सोमपान | क्यों किया-परिवेत्ताका लक्षण पहिले कह और सौम्यकृच्छ कर-और लाख,लवण, मधु, | आये हैं और जो हारीतने कहा है कि ज्ये- मांस तैल, दूध,दही, घृत,गंध,मठा, चर्म वस्त्र, | ठके निवेश (विवाह) किये बिना छोटा इनमें-अन्यतम (कोईसा) के वेचनेमें चां-भ्राता निवेश करै तो परिवेत्ता होता है और द्रायण करें-तेसेही उन केश केशरी भू धेनु ज्येष्ठ भ्राता परिवित्ति और कन्या परिवेदिनी घर पत्थर शस्त्र भक्ष्य मांस स्नायु अस्थि कन्याका दाता परिदायी और याजक परि- शृंग नख शुक्ति (सीप )इनके विक्रयमेंतप्त- यष्टा होता है ये सब पतित होते हैं और कृच्छ करे-और हींग-गुग्गल-हरिताल-म-वर्ष दिनके कृच्छ्रसे पवित्र होते हैं और जो नसिल अंजन-गेरु-खारालवण मणि मोती | शंखे ने कहा है कि परिवेत्ता और परिविति मूंगा वासकी वस्तु, वांस, मिट्टीके पात्र इ- | वर्ष दिनतक ब्राह्मणों के घरोंमे भिक्षाटन करें- नके वेचनमें तप्तकृच्छ्र कर-और आसम | ये पूर्वोक्त दोनों वचन ज्ञानसे और कन्याक (वाग) तलाव-उद्पान ( चोवच्चा आदि)| पिताकी आज्ञाके विना विवाहके विषयमें स- पुष्करिणी-पुण्य इनके विक्रयमें निकाल | मझने क्यों कि प्रायश्चित्त गुरु (भारी ) है- स्नान-भूमिमें शयन-चायकाल भोजन-दश | और जब जानकर पिता आदिकी दी हुई क- सहस्र जप करता हुआ वर्षदिनमे पवित्र हो- न्याको विवाह तब मनुका कंहा त्रैमासिक प्रत ता है और जिनका तोल कम हो और संकर | करै-औरपूर्वोक्त कृच्छ अतिकृच्छ और याज- संकीर्ण (मिलावटी ) इनके बेचने में भी पू- वल्क्यके कहे चारों व्रत अज्ञानके विषयमें सम- वोक्त प्रायश्चित्तही करें-इसी प्रकार अन्यभी | झनेयमने भी यहां विशेष कहा है कि पारिवे- शंख विष्णु आदिके वचनों में जहां प्रायश्चित्त द्यमें दोनोंको कृच्छ्र और कन्याको भी कृच्छ विशेष नही कहा वहां उपपातकोंमें साधारण है-और दाता अतिकृच्छू करे और होता चां- मनुका कहा त्रैमासिक व्रत आपत्ति न होय | द्रायण करें-यह प्रायश्चित्त पहिताग्नि (जि- तो करें और आपत्ति तो याज्ञवल्क्यके कहे | सने ज्येष्ठ भ्रातासे पहिले अग्निहोन ग्रहण चारोंवत शक्तिके अनुसार करने तेसेही परि- कियाहो ) आदिकोंकोभी एक योगमै पढनेसे वेत्ता में वसिष्ठं ने प्रायश्चित्त विशेष कहा है कि समान है सोई गौतमने कहा है कि परि- परिवेत्ता कृच्छू अतिकृच्छ करके और ज्येष्ठ वित्ति, परिवेत्ता, पर्याहित, पर्याधाता, अग्रे- भ्राताको वही विवाही हुई कन्या देकर फिर गृहस्थमें प्रवेश और अपनी विवाही हुई उसी कन्याको जो ज्येष्ठ भ्राताको निवेद- भवति परिवित्तियेष्ठः परिवेदिनी कन्या परिदायों ज्येष्ठेऽनिविष्ट की निविशमानः परिवत्ता नकीथी ज्येष्ठ भ्राताकी आज्ञासे विवाहले- दाता परिया याजकस्ते सत्रं पतिताःसंवत्मर माना- यहां ज्येष्ठको उसका दान भागके लिये नही | पत्येन पच्दैग पावययुः समझना किं तु ब्रह्मचर्य में मांगी हुई भिक्षाके २ परिवित्तिः परित्ताच संवत्सर अाह्मणहिर समान इसलिये निवेदन है कि ज्येष्ठ भ्राता | भय नरेपाताम् । कुद्ध न हैं कि इसने हमसे पहिले विवाह ३ कृच्छा यो: पारिवये कन्यागः एच् एव च। अतिकम धरेदाता होता पाया माद । परिशिीशनः कृपातिकृच्छो चरिता तस्मै ४ परिीितिपरिवेतृपयाहतपयधिावप्रेरियादि- दा पुननिता शेपपत। पिशवीता संवत्सर प्रात प्रमापर्यम् । .
: (५९०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । दिधिषू, दिधिपूपति, ये संवत्सरतक प्राकृत दिया है उनको मनुने पतित कहा है यह ब्रह्मचर्य करें इसीसे वसिष्ठने अग्रेदिधिपू- कथन है-यहांभी पूर्वोक्त व्रतोंके संग शक्तिकी पति आदिकोंको यही प्रायश्चित्त कहा है कि अपेक्षासे इसका विकल्प समझना, तसेही अग्रेदिधिपूकापति द्वादश रात्र कृच्छ् । पराई दाराके गमनमें सब उपपातकोंमें प्राप्त करके निवेश करें और उसीको विवाह ले, मनुके कहे त्रैमासिक व्रतका, और याज्ञ- दिधिपूकापति कृच्छ्र अतिकृच्छू करके वल्क्यक कहे पूर्वोक्त चारों व्रतोंका गुरुकी उसीको दी हुई दिधिषूको फिर विवाहले अग्रे स्त्रीमें अपवाद ( निषेध ) कहा है-तिसी दिधिपू आदिका लक्षण अन्य स्मृतिमें कहा | प्रकार अन्य ग्रन्थोमभी गौतम आदिकोंने है कि जेठी कन्याका विवाह न होने पर छोटी किसी २ परदाराके गमनमें अपवाद कहा कन्या जो विवाही जाय वह अग्रेदिधिपू हे सोई गौतमैने कहा है कि पर दारामें दो और जेठी दिधिपू होतीहै उनमें अदिधिपू - वर्ष और वेदपाठीको दायमें तीन वर्ष ब्रह्म कापति प्राजापत्य व्रतको करके उसी जेठी चर्य है-तसेही वर्षभर प्राकृत ब्रह्मचर्यक को तब विवाहे जब उसका अपने विवाहसे प्रस्तावमें गौतमने ही कहा है कि उपपात- पीछे किसी अन्य पुरुषके संग विवाह(संबंध) | कॉमेभी ऐसेही समझना, उनका यह व्यवस्था हो चुका हो और दिधिपूकापति कृच्छ्र है कि ऋतुकालमें जानकर जातिमात्र अतिकृच्छू करके अपनी विवाही जेठी क- | ब्राह्मणीके गमनमें वर्षभर प्राकृत ब्रह्मचर्य न्याको छोटी कन्याके पतिको देकर किसी प्रायश्चित्त है और ऋतु कालमेंही कार्यके अन्य कन्याके संग विवाह करले-इति परि- साधक गुणवाली ब्राह्मणीके गमनमें दो वर्ष वेदनम्-तैसेही भूतकाध्यापक और भृतका तक प्राकृत ब्रह्मचर्य करे और वैसीही वेद 'ध्यापित इन दोनोंकी, दूधसे सुवर्चलाको पाठीकी भार्याके गमनमें तीन वर्षतक प्राकृत 'पावै इस अधिकारमें विष्णुने कहा है कि ब्रह्मचर्य करे अथवा यह व्यवस्था है कि भृतक (नौकरी) से अध्यापन ( पढाना ) वेदपाठीकी गुणवती, ब्राह्मणी, पत्नीमें तीन करके और भृतकसे पढके अनुयोगके | वर्षका और वेसीही क्षत्रिया पत्नीमें दो प्रदानसे तीन पक्षतक नियमसे दूधके संग | वर्षका और वैसीही वैश्या पत्नीमें एक ब्रह्म सुवर्चलाको पावै बडाईके लिये पढते । वर्षका ब्रह्मचर्य करे इसी रीतिसे शूद्रामें छः हुये तैने नाश किया ऐसे कथनको अनु- मासके प्राकृत ब्रह्मचर्य की कल्पना करनी योग प्रदान कहते है इसीसे अन्यस्मृतिमें ! इसीसे शंखने वर्णके क्रमसे प्रायश्चित्तकी 'पटनेवालेको जिन अध्यापकोंने अनुयोग | न्यूनता दिखाई है कि वैश्या अवकीर्ण , अदिधिपतिः कृच्छू द्वादशात्रं चरित्ला नि- दत्तानुयोगानध्येतुः पतितान्मनुरनारीत् । 'विशेत तां चैवोपयच्छेत् दिधिषपतिः कृच्छ्ातिकृच्छी २ कै परदारे त्रीणि श्वोत्रियस्य । चरित्वा तस्मै दत्तां पुनानविशेत। २ ज्येष्टायां यद्यनूदायां कन्यायामुद्यतेऽनुजा । ३ उपपावकेषु चैवम् । “या साऽप्रेदिधिपूर्वेया पूर्वा तु दिधिषः स्मृता । ४ वैश्यामवकीर्णः संवत्सर ब्रह्मचर्य त्रिपवर्ण ३ भृतकाध्यापनं कृत्वा भृतकाध्यापितस्तया । चानुतिष्ठेत् क्षत्रियायां दे वर्षे त्रीणि ब्राह्मण्यो वैदयार्या अनुयोगप्रदानेन त्रीन्पझानियतः पिवेद । गदायां ब्राह्मणपरिणीतायां ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५९१) करना . (वीर्यसेचन करने वाला ) होयतो वर्ष दिन इनके गमनमें तीन वर्षका जो प्रायश्चित्त ब्रह्मचर्य और त्रिकाल स्नान करे, क्षत्रिया | उसके स्थानमें याज्ञवल्क्यका कहा जो दो वर्ष, ब्राह्मणीमें तीन वर्ष, कर, वैश्या. | एक बेल दश गौओंका दान, मासभर और शूद्रा, ब्राह्मणकी विवाही होयतो रक्त प्राजापत्यका क्रमसे जानना प्रायश्चित्त समझना इसी प्रकार क्षत्रियकोभी शूद्राके गमनमें तो ज्ञानसे गमनमें कहा जी क्षत्रिया आदि स्त्रियों में दो वर्षका एक वर्ष- माहवत वही आधा समझना-इसीसे का, छः मासका ब्रह्मचर्य पूर्वोक्तही विषय | संवत' ने कहा है कि मास वा आधे माप्त तक ब्राह्मण सदाका गमन करके गोमूत्र समझना, और वेश्यको वैश्या और शूद्राके और जो को पीकर उस पापको मुक्तिके अर्थ गमनमें एक वर्षका और छः मासका प्राय- टिका रहै-इस वचनम अज्ञानसें गमनमें श्चित्त करे-और शूद्र पराई शूद्राके गमनमें | आधा मास समझना-और यदि ब्राह्मण छ. मासका ब्रह्मचर्य करे-और जो आप- जानकर ब्राह्मणकी दाराआके संग गमन स्तंचका वचन है जिसने अन्यका संग न करे तो जिसका धर्म कर्म निवृत्त हो चुकाहो किया हो ऐसी सवी स्त्रीक गमनमें पाद | वह कच्छू ओ जो धर्म कर्म में निष्ठहो वहू प्रायश्चित्त कहा- और अभ्यासमें पतित | अति कृच्छ करे-ये वचन ब्राह्मणकी भार्या . होताहे- और चौथे गमनमें संपूर्ण प्रायश्चित्त जो शूद्रा उसमें समझने अथवा दो तीन होताहे यह वचन गौतमके कहे तीन वर्षके , वार किया है व्यभिचार जिलोंने ऐसी ब्राह्म- प्रायश्चित्तका जो विषय उसमें समझना, णकी विवाही हुयी द्विजाति स्त्रियों में अज्ञा- जिसका अन्य पुरुपके संग संयोग न हुआ न गमन में समझने-सोई संवत ने कहा हो उस स्त्रीके चार वार अभ्यासमें चारह | कि नहीं है स्वजन (पति) जिसके ऐसी वर्षका प्रायश्चित्त कहाँहे- इससे एक तोके ब्राह्मणोके संग गमन करके प्राजापत्य करे- विषय गमनके अभ्यासमें यह प्रायश्चित्त ज्ञानसे करें तो यह यमका कहा प्रायश्चित्त नहीं किं तु गमन २ के प्रति एक २ पाद साध्वी और उत्तम वर्णकी और सगोत्रा इन जानना कि राणी-संन्यासिनी-धात्री (धाय) न्यून प्रायश्चित्तकी कल्पना करनी- यह सय प्रायश्चित्त ज्ञानसें करनेमे समझना अज्ञानसे चार का चारसे अधिक अभ्यास होजाय तो का गमन करके दो कृच्छ कर-यदि व्यभि- करनेमें तो यह प्रायश्चित्त पूर्वोक्त विषय | शंखे का कहा यह प्रायश्चित्त जानना कि आधा समझना ऋतुसे भिन्न कालमें तो ज्ञानसे जातिमात्र ब्राह्मणीक गमनमें मनुका 1 शूर्दा तु ब्राह्मणो गता मास मासा मन था। कहा प्रेमासिक प्रतह-और क्षत्रिया आदि गोमूत्रपाकाहारस्तिठेतत्यामुक्तये । जीनामस्तजनो गत्ता प्राजापत्यं समाचरेत् । जाति मात्र स्त्रियोंके पूर्वोक्त समयके ज्ञानसे ३ गता प्रजिता साध्या धात्री यत्तिमामिति । गमनमें उनको कहेही दो मासका चान्द्रायणप्ष्ट्रय प्रकुर्तित सगोत्रापभिगम्य प। और मासिक प्रत समझने और क्षत्रिय - ४ स्नेरिया पत्त्यामरकीर्णः सर्चलनात रद- दिकोंको तो क्षत्रिया भादि स्त्रियोंमें दमा- फुझ पाद् प्रामणाय पापा च चतुर्पकालाहारो सिक आदि प्रत समझने-और अज्ञानसे | मानणाभोभयेपासमार च गाभ्यो दयाव क्षत्रियायो विशात्रोपोषितो पृतपात्रं दया प्राण्या पटानी- सामनन्यायो मासनिशाने पर: पोपितो गौ दशाह गोषकाणः प्राजापन्य परेव त्यामन्यामे पागदपतुर्षे सर्वम् । भामरीमा पाठमा सीतमाघ गन ।
(५९२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । व्यभिचारिणी शुद्रामें गमन करे तो सचे- | जानना गर्भ की उत्पत्ति होजाय तो जिस. लस्नान करके जलका घट ब्राह्मणको दे-और | विषय में जो प्रायश्रित्त कहा है वही वहां दूना वैश्याम करे तो चथिकाल भोजन कर करना क्योंकि उशना की स्मृति है कि ब्राह्मणोंको जिमाव-भूसका भार गांओंको दे-गमनमें जो व्रत होता है वह गर्भमे दूना क्षत्रियामें करें तो तीनरात्र उपवास करके | कर-शूद्रामें गर्भाधान करते हुये पुरुषको धीका पात्र दे-और ब्राह्मणीमें गमन करे तो चतुर्विशति के मतमें विशेष कहाहै कि छः रात्र उपवास करते, गो दान करे-गाओं शूद्रामें गर्भाधान करें तो तीन वर्षतक का गमन ( भोग ) करें तो प्राजापत्य कर- चौथे समय भोजन करें और जो मर्नुका विना विवाही कन्याके संग गमन करे तो वचन है (अ. ३ श्लो. १७) कि शूद्राको पलालका भार और मासे भर सीसा दे-यह | शय्यापर बैठाकर ब्राह्मण अधोगतिको प्राप्त 'भी चार आदि अभ्यासके विषयमें इससे | होता है और उसमें पुत्रको उत्पन्न करके जानना कि चौथे व्यभिचारमें स्वैरिणी और ब्राह्मणही नहीं रहता वह वचन पापकी पांचों में बंधकी मानीहै यह अन्य वचने अधिकता जतानेके लिये है-और प्रतिलोम में कहाह-इस विषयमें पत्रिंशत् के मतमें | ( उंचेवर्णको स्त्री) गमनमें तो सब जगह भी कहाहै कि बंधकी ब्राह्मणीके संग गमन पुरुषका वधही प्रायश्चित्त है क्योंकि यह करके ब्राह्मणको कुछ दे-क्षत्रियामें गमन | वचन हैकि प्रतिलोम में पुरुषका वध और करके धनुष दे-वैश्याक गमनमें वस्त्र दे- | स्त्रीके कान आदिका छेदन कहा है-और जो शूद्राके गमनमें ब्राह्मण ब्राह्मणको जलका वृद्धप्रचेता का वचन है कि मोहसे ब्राह्मणीका घट दे-वा एक दिन उपवास करके | गमन करते और शुद्धि चाहते हुये शूद्रको ब्राह्मणको भोजन दे-अनुलोमके व्यवाय | यह व्रत दे क्योंकि वह उसकी माता है और (भोग) में गर्भ रह जाय तो दूना प्रायश्चित्त | अन्य वर्णकी स्त्रियोंमें गमन करते हुये शूद्रको तभी होताहे यदि वह स्त्री भतिदूषित नहो एक २ पादसे न्यून व्रत वर्षों के क्रमसे दे- और प्रतिलोम (नीचावर्ण ) के संग उसने यह बारह वर्षके अतिदेश का वचन अपनी गमन न कियाहो-अन्य जातिके गमनमें | भार्याकी भ्रांतिसे गमन के कर्त्ताको जानना- दूना प्रायश्चित्त होताहे-प्रतिलोम गमनसे क्योंकि वचनमें मोहसे यह विशेषण दियाहै- दूपित-अंत्यावसायी-और चांडाली गर्भ रहने में गुरुतल्पके समान व्रत समझना १ गमनेतु व्रतं यत्स्याद्र्भे तद्विगुण चरेत् । तसेही किंचित् न्यून तारतम्यकी कल्पना २ वृपल्यामभिजातस्तु त्रीणि वर्षाणि चतुर्थकाल- करनी-चांडालीके गमनमें वार्षिक और समये नक्त मुंजीत । गर्भ रहने पर गुरुतल्प व्रत जानना यह ३ शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगति ।जन- प्रायश्चित्तका समूह गर्भकी उत्पत्ति प्रथम २ यित्वा सुतं तस्या ब्राह्मण्यादेव हीयते । १ चतुर्थ स्वरिणी मोक्ता पंचमे वधीमता। ४ प्रातिलाम्ये वधः सो नार्याः कर्णादिकर्तनम् । २ ब्राह्मणों बंधकों गत्वा किंचिद्द्याटिमातये । राजन्यो चैनुर्दद्यादिस्यां गत्वा तु चैलकम् शूद्रो गला ५ शूदस्य ब्राह्मणी मोहादच्छतःशुट्रिमिच्छतः । तु वै मि उदभं द्विजातये । दिवसोपोपितो वास्य । पूर्वमेतद् व्रतं देय माता यस्माद्धि तस्य सा । पादहा इद्याद्विमाय भोजनम् । न्यान्यवर्णासु गच्छतः सार्ववणिकम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय मायश्चित्तप्रकरण ५ (५९३) और जो संवतका वचनहै कि क्षत्रिय वा तुत्य हैं, सोई उशनोने कहा है कि एक वैश्य कथंचित् ब्राह्मणीसे गमन करे तो धर्मवाले बहुतोंके मध्यमें जो एकको कहा शुद्धिक लिये सांतपन कृच्छ् करें और हो वह कार्य सयको होता है क्यों कि वे एक कामसे मोहित शद ब्राह्मणीक संग गमन रूप कहे हैं-अज्ञानसे गमनमें तो यह आं- कर तो गोमूत्र और जीको खाता हुअर | पस्तंचका कहा जानना कि चाण्डाल, मेद, एक मासमें शुद्ध होता है-वह अत्यंत व्याभ- श्वपच, कपाल व्रतके कती अनानसे इनकी चारिणी ब्राह्मणीक विपपमें जानना-अंत्यना | स्त्रियों में गमन करके पराक व्रत कर-और के गमनमें प्रायश्चित्त घृहत्संवर्तन' कहा जो संवर्तको वचन है कि रजक, व्याध, शे- कि रजक व्याध शेलूप (नट ) और जो लूप, वांस और चर्मसे जो जीव इनकी स्-ि वांस और चर्मसे जीव इनकी स्त्रियोंके संग । योंके संग ब्राह्मण गमन करे तो कृच्छ्र चां- गमन करके ब्राह्मण दो चान्द्रायण करें, यह द्रायण कर यहभी अज्ञानके विषयमें सम- भी ब्राह्मणको जान कर एक वार गमनके झना और जो शातातपने कहा है कि के विपयम समझना और क्षत्रिय आदिकों तो वर्ती रजकी वांस और चमसे जीने वाली क्रमसे पाद २ न्यून प्रायश्चित्तकी कल्पना इनके गमनमें प्राजापत्य कृच्छसे शुद्ध करनी-इसी विषयमें आपस्तंपने कहाई होता है-वहभी वीर्य सींचनेसे पूर्व निवृत्तिके कि म्लेच्छी, नटी, चर्मकारी, रजकी, बुरुटी विषयमें समझना और जो देशनाने कहा है इनमें गमन करके दो चान्द्रायण करे- कि करपालिकोंके अन्नके भोक्ता और . अंत्यजभी आपस्तंने ये दिखाये होंकि रजक नकी स्त्रियोंके गामी जो हैं उनको ज्ञानसे चर्मकार, नट, बुरुड, कैवत, मेद भील, वर्षभर कृ और अज्ञानसे चान्द्रायण कहा सात अंत्यज कहे हैं और जो चाण्डाल है येभी अभ्यासके विषयमें समझना, और जय चाण्डाली भादिके गमनसे गर्भ होजाय आदि अंत्यावसायी है उनकी स्त्रियोंके गमन तब चाण्डाली में गर्भ धारण करके गुरुतल्प में महान् प्रायश्चित्त गुरुतल्पप्रकरणमें दिखाय आय-इन अपनोंको त्रियोंक प्रायश्चित्त जानना और आपस्तवका यह व्रत करे यह दशनाका कहा थारह वर्षका मध्यमें एकक गमनमें जो प्रायभित्त कहा है वह सबके गमनमें होता है क्योंकि वे सब- (५९४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । वचन है कि अंत्यजामें जो पैदाहुआ उसका अन्य प्रायश्चित्तोंकी अपेक्षाको छोडकर शु- प्रायश्चित्त नहीं उसको अंकित करके देशस | द्धिका कारण है-ब्राह्मणीके प्रतिलोम द्विजा- निकाल दे इसमें संशय नहीं, वहभी जानकर तियोंके संग भोग करनेमें अन्य प्रायश्चित्त भी करनेमें समझना, स्त्रियोंको भी सवर्ण और संवत्तंने कहा है कि ब्राह्मणी अज्ञानसे क्ष- अनुलोमके गमनमें वही प्रायश्चित्त होता है | त्रिय और वैश्यके संग गमन कर तो गो- क्यों कि मनुको स्मृति है (अ० ११ श्लो. मूत्र और जीका भक्षण करनेसे एक मास १७६) कि परदायक गमनमें जो पुरुषको और अर्ध मासमें क्रमसे शुद्ध होती है गा- है वही व्रत स्त्रीसे करावै प्रतिलोमके गमनमें नकर गमनमें तो दूना प्रायश्चित्त इस वच- ही स्त्री और पुरुषको प्रायश्चित्तका भेद है- | नसे होता है-पत्रिंशतके मतमें भी कहा सोई वसिष्ठने कहा है कि यदि शूद्र ब्राह्मणी है कि क्षत्रिय और वैश्यकी सेवा ( भोग) में गमन करे तो वीरणों (तृणु ) से लपेट- में ब्राह्मणी अतिकृच्छ्र और कृच्छातिकृच्छ कर शूद्रको अग्निमें फेंकदे और ब्राह्मणीके कमसे कर-क्षत्रिया-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य इ- शिरका मुंडन कराकर और खरपर च-नके भोगमें-कृच्छ्का अर्ध प्राजापत्य-अति- टाकर महापथ (सडक ) में गमन करावे कृच्छ्र क्रमसे कर-वैश्या, ब्राह्मण क्षत्रिय तो पवित्र होती है-यदि वेश्य ब्राह्मणीके वैश्य इनके भोगमें कृच्छपाद-कृच्छाध-प्रा- संग गमन करे तो-लालकुशाओंसे लपे- जापत्य क्रमसे कर-शूद्रा शुद्रके भोगमें प्रा- टकर वेश्यको अग्निमें फेंकदे और ब्राह्मणी | जापत्य करे-और नाह्मण क्षत्रिय वैश्य इनके पूर्वोक्त प्रायश्चित्त (मुंडन आदि ) से शुद्ध भोगमें तो क्रमसे अहोरात्र त्रिरात्र कृच्छार्ध होती है-यदि क्षत्रिय ब्राह्मणीमें गमन करे | करे-शूद्रकी सेवामें तो विशेष बृहत्प्रचेताने तो शरकेपत्ते लपेटकर क्षत्रियको अग्निमें फें- कहा है कि ब्राह्मणी शूद्रकी सेवामें यदि कद-और ब्राह्मणी मुंडन आदि पूर्वोक्त प्रा- यश्चित्तसे शुद्ध होती है-यह शास्त्रसे जानते १ ब्रामण्यकामा मच्छेन्चत्क्षत्रिय वैश्यमेव वा। गो- हैं-इसी प्रकार वैश्य क्षत्रियामें और शूद्र क्ष- ग्रयावकर्मासात्तपर्धाञ्च विशुद्धयति । त्रिया वेश्यामें गमन करे तो प्रायश्चित्त जा- २ कामातद्विगुण भवेत् । नना-पवित्र होती है यह कहनेसे यह दि ३ ब्राह्मणी क्षत्रियवैश्यसेवायामतिकृच्छ कृच्छाति- खाया है कि राजमार्गका गमनही दंडरूप कृच्छौ चरेत् । क्षत्रिययोषित ब्राह्मणाजन्यवैश्यसे- १ यत्पुसः परदारेषु तचनां चारयेद्वतम् । वाया कृच्छार्दू प्राजापत्यमतिकृच्छ्र- वैश्ययोषित २ शदश्वब्राह्मणीमभिगच्छेदारणष्टयित्वा शूदमनो ब्राह्मणराजन्यवैश्यसेवायां कृच्छ्रपादं कृच्छाधै प्रास्ये प्रामण्याः शिरसि वपन कारयित्वा सर्पिपाभ्य- प्राजापत्यं शूद्रायाः शूद्रसेपने प्राजापत्यं ब्राह्मणराजन्य- ज्य ननां गौरखरमारोप्य महापथमनुसंमाजयेत्यूता | वैश्यसेवायां त्वहाराचं चिरात्रं कृच्छ्रार्द्धम् । 'भवतीति वैश्यश्चेबाह्मणीमभिगच्छेलोहितदभैर्वेष्टयित्वा ४ विप्रा शुदैण संपृक्ता नचैत्तस्म त्सस्यते । माय- वैदयमानी प्रास्य ब्राह्मण्याः शिरसि वपन कारयित्ता | चित्तं स्मृतं तस्याः कृच्छं चांद्रायणत्रयम् । चांद्रायणे सामान्यज्य ननां गौरखरमारोप्य महापथमनुसबजये-दे कृच्छश्च विप्राया वैद्यसेवने । कृच्छ्यांदायणे पता भवतीति । राजन्यश्च ब्राह्मणीमभिगच्छेच्छरपत्रे | स्यातां तस्याः क्षत्रियसंगमे । क्षत्रियागदसंपर्क चष्टपिता राजन्यमनी प्रास्यद्राह्मण्याः शिरसि वपन | कृच्छचांद्रायणद्वयम् । चान्द्रायणं सकृच्छं तु चरे- कारयित्वा सपिपाभ्यज्य ना गारखरमारोप्य महा- | ईश्येन संगता । गत्वा चरेश्या कृच्ळू चांदाय- मथमनुसंवाजयेत्प्तामवाति विज्ञायते । णोत्तर । आनुलोम्ये प्रकुर्वीत कृच्छ पाहावरोपितम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (५९५) प्रसूता न होय तो उसका प्रायश्चित्त तीन चां- प्रायश्चित्त करै क्योंकि यह अन्य स्मृति में द्रायण कृच्छ्र कहा है-यह प्रायश्चित्त इच्छाके देखतेहैं कि जो गर्भवती नारी बलात्कारसे अभावमें वा अपने पतिके भ्रमसें गमनमें जा- | किसीकाभी पुरुषका संग करे तो वह गर्भ नना-और वैश्यकी सेवामें ब्राह्मणीको चांद्रा- | निकसनेसे पहिले प्रायश्चित्त न करे-चालक यण और दो कृच्छू हैं और ब्राह्मणीको क्ष- पैदा होने पर मासतक यावक व्रत करै उ- त्रियके संगममें-कृच्छ्र और चांद्रायण है- | सको गर्भका दोष नही उस बालकका विधिसे और क्षत्रियाको शूद्रके संसर्गमें कृच्छ और | संस्कार करे और जो उद्धत हुयो प्रायश्चित दो चांद्रायण हैं-और क्षत्रियाको वेश्यक सं- न करे तो नारीके पूर्वोक्त कान आदिका, गममें कृच्छ्र और चांद्रायण कर-और वैश्या छेदन करे-अंत्यज आदिके गमनमेंभी स्त्रि शुदका संगम करके चांद्रायण और कृच्छ् याका प्रायश्चित्त अन्य स्मृतिमें दिखाया है करें-और-अनुलोम गमनमें एक २ पाद अ- कि रजक-व्याध-लट-वांस और चर्मसे जो धिक कृच्छू क्रमसे करे-और प्रसूताकरे तोच- | जीवे इनके संग अज्ञानसे ब्राह्मणी गमन करे तुर्विशतिक मतमें विशेष कहा है कि अज्ञा- | तो तीन ऐदव प्रत करे-तसेही चांडाल नसे ब्राह्मणके गर्भमें पराक-क्षत्रियके गर्भ में ऐं- आदि अंत्यजोंके गमनमेंभी यह है कि दव ( चांद्रायण ) और वैश्यक गर्भमें ऐंव इनके संग अज्ञानसे गमन करके ब्राह्मणौ चांडाल-पुल्कस-म्लेच्छवपाक और पतित और पराक और शूद्रके गर्भमै त्याग होताहै क्योंकि वह चाण्डाल होता है और धातु- जानकर गमनमें दूने प्रायश्चित्तकी कल्पना चार चांद्रायण करे--अज्ञानसे यह कद्दनेसे ओंके दोषोस गर्भका स्राव हो जायतो तीन करनी तसेही वचन है कि चांडालके संग चांद्रायण करे अज्ञानसे यह विशेषण देनेसे पराक आदि व्रत द्विगुण करैऔर जवगर्भके १ अंतर्वली तु या नारी समेताकम्य कामिना । न गिरने पर दश मासतक स्थित रहनसे | प्रायश्चित न कुर्गापा यावद्गर्भो न निःसृतः । गर्भ बालक होयतो प्रायश्चित्तका अभावहै क्योंकि जाते प्रत पश्चात्तुर्यान्मासं तु यावकम् ।न गर्भदो- वसिष्ठकि स्मृति है कि ब्राह्मण क्षत्री वैश्य यस्तस्यास्ति सस्कार्यः स यथाविधि । इनकी भार्या शूद्रका संगम करें तो चालकक २ रजकल्याधशल्पवेणुवर्मोपजीविनः । सामन्ये- जन्मसे पहिलेही प्रायश्चित्त शुद्ध होती है तान्यदगच्छेदकामादेवनयम् । अन्य नहीं और यदि गर्भ रहनेके पीछे ३ चाहाले पुल्कम म्लेच्छ श्वपाक पतितं तथा । बामण्यकामतो गमग चांद्रायणचतुष्टयम् । शूद्र आदिके सेंग व्यभिचार करे तो तप गर्भपात होनेकी शंकासे प्रसवके अनंतरही ४ चांडालेन तु संपर्क यदि गच्छेक्यचनासशिख वपन शर्या जीयायावकोदनम् । निराधमुपवासः 1 विगर्भ पराकः साक्षत्रियस्य तदवम् । ऐंदव- मोदककर्दमे । नत्र स्थित्ता निराद्वारा सा गिरावं ततः स्यादेकराय जले वसेत् । आत्मना समिते पे गो धरामय वैश्यस्याफामकारतः । शूद्रगर्भ भवेत्याग- | क्षिपेत् । दासपुप्पीटतामूलं पत्र या कुमुम फल । क्षरे श्रांडालो जायते यतः। गर्भसावे धातु दोपैश्चरेचोदा- सुरममिय काययिता ततः पियेत् । एफमक्त पो. स्पश्चाद्यावरपुष्पवती भदेव । पहिस्तावच निवसेवाव २ प्रामणक्षाविपविशां भायाः शदेण सगताः । अति तद्रतम् । प्रायश्चित्ते ततश्चीनं कुर्याहामणभो- अपमाता रिगुन्द्रपति प्रायश्चित्तन नेतराः। जनम् ।गोइय दक्षिणा दाशुद्धी सायंभुवाप्रवति । . पणत्रयम्।
(५१६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कोसी प्रकारगमन करतो शिखा सहित मुंडन अंत्यजक संग मैथुन संपर्क भोजन करतो करावे और जामोदनको भक्षण कर तीनरात्र जलती हुयो अग्निमें प्रवेश करके वह मृत्युसे उपवासकर एकरात्र जलमें वस और अपने शुद्ध होती है और यदि उक्त प्रायश्चित्त न तुल्य कूपमें-गोमयके जलके कीचमें निराहार करे तो स्त्रीके देहमें पुरुषका चिन्ह करदे टिक कर तीन पत्र वितावे-फिर शंखपुष्पील- वा वंध्या होजाय-क्योंकि पराशरेकी स्मृति ताका मूल पत्र, फूल, फल इनको दूधमें सु- है कि जिस स्त्रीको हीनवर्णने भोगीहो उ- वर्णकोमिलाकर पका कर पाव-फिरजबतक | सके चिन्ह करदे अथवा वह वैध्या होजाय पुप्पवतहिा एक समय भोजन करें और इतने उ | तैसेही परिवित्तिके प्रायश्चित्तोंकी व्यवस्थाभी सनतको करे घरसे बाहिर रहें और प्रायश्चित्त । परिवेत्ताके प्रायश्चित्तोंके समान जाननी- करनेके अनंतर ब्रह्मणोंको जिमावे औरदोगो इतना तो विशेष है कि परिवेत्ताको जिस दक्षिणा शुद्धिके लियदे यह स्वायंभुवमनुनें | विषयमें कृच्छ् अतिकृच्छू हैं उसमें परि- कहा है-यहभी अज्ञानके विषयमेंही समझना वित्तिको प्राजापत्य होता है क्योंकि यह क्योंकि किसी प्रकार गमन कर यह वचनमें वसिष्ठ की स्मृति है परिवित्ति-द्वादश रान कहा है ऋष्यशृंगनेभी अंत्यजाके मैथनमें कृच्छ्र कर फिर निवेश करें और उसकोही अन्य प्रायश्चित्त कहा है कि जो अत्यंजोंके | विवाहले-वार्धप्य (व्याज लेना ) लवणका संग संपर्क करें वह स्त्री कृच्छाब्द करें-यह विक्रय इन दोनों में तो मनु और योगीश्वर । जानकर एकवार गमनमें समझना और ने कहे जो सामान्य उपपातकोंके प्रायश्चित्त यदि गर्भवतीकाही पीछेसे चांडाल आदिके (वही जाति शक्ति गुण आदिकी अपेक्षासे : संग संगम हो जायतो डेसनेही विशेष कहा युक्त करने (समझने )- है कि गर्भवती युवति अत्यंयोनीके संग भावार्थ-इसी पूर्वोक्त प्रकारसे उपपातक संपर्क करै तो वह गर्भके निकसने तक की शुद्धि होती है वा चांद्रायणसे-वा मास प्रायश्चित्त न करें और घरमें भीन फिर और भर दूध पीनेसे-अथवा पराक व्रतसे सब न अपने अंगोंका प्रसाधन करे न भर्ताके | उपपातकोंकी शुद्धि होती है ॥ २६५ ।। संग सेविन बांधवोंके संग भोजन करें और गर्भके पैदा होने पर कृच्छ आदिप्राय- ऋपभैकसहस्रागादद्यात्क्षत्रवधेपुमान् । श्चित्त करै सुवर्ण वा गो ब्राह्मणको दाक्षिणादे । ब्रह्महत्याव्रतवापिवत्सरत्रितयंचरेत्।२६६।. और जब जानकर अत्यंत संपर्क करें तो पद-ऋषभैकसहस्राः २ गाः २ दयाद उशनाका कहा यह प्रायश्चित्त जानना कि क्रि-क्षत्रवधे ७ पुमान १ ब्रह्महत्याव्रतं २ १ संपृका स्यादात्यर्या सा कृच्छ्राब्दं समाचरेत् । वा:-अपि-वत्सरत्रितयं २ चरेत कि- • २ अंतर्वली तु युवतिः संपृक्ता चात्ययोनिना। वैश्यहाब्दचरैदेतद्दद्याद्वैकशतंगवाम् । प्रायश्चित्तं न सा कुर्याद्यावदों न निःसृतः । न प्रचारए हे कुर्यान्न चांगेषु प्रसाधनम्न शयीत सम भर्ना नवा षण्मासाच्द्रहाप्येतद्धनूर्दद्याद्दशाथवा ॥ भुंजीत गांधवैः। प्रायश्चित्त गते गर्ने विधि कृच्छाब्दिक घरद । हिरण्यमया धेनुं दद्याद्विप्राय दक्षिणाम् । १ हीनवर्णोपभुक्ता या सांक्या यध्यायका भवेव। ३ अंत्यजेन तु संपकें भोजने मेथुने कृते । विशेसं २ परिवित्तिः कण्ठं द्वादशरात्रं चरित्वा पुननि- प्रदीप्तमी मृत्युनासा विशुद्धयति । विशेत तां चैवोपयच्छेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५९७) . पद-वैश्यहा १ अब्दं २ चरेत् क्रि- स्मृति है कि गुरुपूजा-घृणा-शौच-सत्य इ- 'एतत् २ दद्यात् क्रि-एकशतं २ गवाम् ६ द्रियोंका रोकना-हित करना यह सब वृत्त पृण्मासान् २ शूद्रहा १ अपि-एतत् २ धेनूर / कहाता है और जो वृद्ध हारीतका वचन है दद्यात् क्रि-दश २ अथवाऽ- कि ब्राह्मण क्षत्रियको मारकर छः वर्ष व्रत योजना-पुमान् क्षत्रवधे ऋषभेकसहस्रा करे-और द्विज वैश्यको मारकर इसी व्रत- गाः दद्यात् वा वत्सरवितयं ब्रह्महत्याव्रतं | को तीनवर्पतक करे-वैश्यको मारकर वर्ष- चरेत् वैश्यहा एतत् अब्दं चरेत् वा गवां | भर व्रतको करे और एक वृषभ दशगौओं- एकशतं दद्यातू-शुदहा अपि एतत् षण्मा- | का दान करे-यह ज्ञानसे करने में समझना सान् चरेत् अथवा दश धेनूः दद्यात वेदपाठी क्षत्रिय आदिके वध तो यह वृद्धः तात्पर्थि -ऋषभ (बल) है एक अधिक हारीतका कहा जानना कि क्षत्रियके वधर्म जिनमें ऐसी सहस्र गौ क्षत्रियके वधको क-एकपाद न्यून ब्रह्महत्याका व्रत कर-वैश्य- रके पुरुषदे- अथवा बडा प्रायश्चित्तरूप न- के वधमें आधा और शूद्रके वधमें चौथाई महत्याका व्रत तीनवर्षतक करै वैश्यका करे-और जो वसिष्ठका वचन है कि ब्राह्मण घाती-इस ब्रह्महत्याके व्रतको एकवर्पतक क्षत्रियको मारकर आठ वर्ष व्रत करै-वैश्य- करे और ऋषभ है एक जिनमें ऐसी सो गो | को हतकर छः वर्ष-और शूद्रको मारकर दान कर-और शूद्रका घाती तो छ:मासतक तीन वर्ष व्रत कर वहभी हारीतक कह वि- ब्रह्महत्याका व्रत करे-वा तत्काल प्रसूता- पयमें ही समझना-और ईषतन्यून गुणवा- और सवत्सा दश गौओंका दान करें-यह ले क्षत्रियमें तो इतना विशेष है कि जब क्ष- प्रायश्चित्त अज्ञानसे जातिमात्र क्षत्रिय आ-त्रिय वेदपाठी और वृत्तमें स्थित हो तब तो पू- दिके वधमें समझना-कि अज्ञानसे राजाको वेके दोनों वर्गों में वेदपाठीको मारकर यह आ- मारकर इस प्रकरणमें येही प्रायश्चित्त मनुनें | पस्तंबका कहा बारह वर्षका प्रायश्चित्त जा- कहे है और दान और तपकी व्यवस्था श- | नना-जिसने यज्ञका प्रारंभ कर रक्खा हो क्तिकी अपेक्षासे जाननी-अल्पवृत्तमें स्थित ऐसे वेदपाठीसे भिन्न क्षत्रिय आदिके मारने- वैश्य और शूद्रके विषयमें तो यह मन (अ. | में तो यज्ञमें स्थित क्षत्रिय और वेश्यका ११ श्लो. १२६ )का कहा जानना कि ब्रह्म-पाती ब्रह्महत्याका व्रत करै-यह व्रत जान- हत्याका चौथा भाग क्षत्रियके वधमें कहा है ना-और यज्ञमें स्थित वेदपाठी क्षत्रिय आ- और वैश्यके वधमें आठवां भाग और शू- दिमें ब्राह्मण क्षत्रियका वध करे तो छः व- द्रको हत्यामें सोलहवां भाग जानना और १ ब्राह्मणः क्षत्रिय हत्वा षषणि व्रतं चरेत। सदाचारी क्षत्रियके वध तो साढेचार व- वैश्य हत्वा चरेदेवं व्रत त्रैवार्षिकं द्विजः । शूद हत्ता के प्रायश्चित्तकी कल्पना करनी-यहां वृत्त | चरेई वृभिकादशाश्च गाः । शब्दसे गुण आदि लेने क्योंकि मनुकी २ तुरीयोन क्षषियस्य वधे ब्रह्महणि प्रतम् । अर्दू वैश्यवधे कुर्यात्तुरीय दृपलस्य तु! 1 तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः । ३ग्राह्मणो राजन्य हलारी वर्षाणि प्रतं चात् पिटू वैश्येष्टमांशो वृत्तस्थे शूदे शेयस्तु पोशः । २ गुरुपूजा घृणा शौच सत्यमिद्रियनिग्रहः । प्रवर्तन ४ पूर्वयोर्वर्णपोर्वेदाध्यायिनं हवा द्वादशवापिकं हितानां च तत्सर्व वृत्तमुच्यते । चरेत् । वैश्य त्रीणि शदम् ।
(५९८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । पंका प्राकृत ब्रह्मचर्य करें और एक बल सह- (अ० ११ श्लो० १२७) कि ब्राह्मण अज्ञानसे स गौ दे, वश्यके वध तीन वर्ष ब्रह्मचर्य क्षत्रियको मारकर ब्राह्मण और क्षत्रियके. एक चैल सो गो दे, शूद्रके वधर्म वर्षदिनका वधमें ब्राह्मण क्षत्रीको मारकर पूर्वोक्त प्राय- ब्रह्मचर्य करें एक बैल दश गो देह गो- | चित करें और क्षत्रिय आदिके किये क्षत्रि- तमके कहा दान और तपका समुञ्चय जा- | य आदिक वधमें तो एक पाद न्यून प्राय- नना यहभी अज्ञानके विषयमें जानना क्यों- मित्त है क्योंकि वृद्धविष्णुकी स्मृति है कि शंखकी स्मृति है कि अज्ञानसे चारों ब्राह्मणको संपूर्ण प्रायश्चित्त देना क्षत्रियको वर्णोको मारकर बारह छः तीन एक वर्षतक एकपादन्यून वैश्यको आधा शूद्रको एकपा- ब्रह्मचर्य करे और उनके अंतमें सहस्त्र, पांचसाद कहा है-और जो पूर्वोक्त अंगिराका यह अदाइसा सवासी गो वाँके क्रमसे दे-यह वचन है कि जो ब्राह्मणोंकी पर्षत (मार्ग ) है बारह वर्षका व्रतभी गौतमकेही कहे विषयमें वह क्षत्रियोंका दूना वैश्योंका तिगुना कहा है है किंचित् न्यून गुणवाले क्षत्रियों और अ- और पपदक समान व्रत कहा है वह वचन धिक गुणवाले वैश्य और शूद्रमेभी जानना | कठोर वाणी और कठोर दंडके विषयमें क्योंकि (स्त्रीशूद्रविक्षनवध ) स्त्री शूद्र | समझना यह गोवध प्रकरणमें कह आये वैश्य क्षत्री इनके वधर्म इस वचन में विशेष | मूविसित आदिक वधर्मे यह प्रायश्चित्त- कर उपपातकके मध्यमें पटनेसे उत्सर्ग अ का समूह नहीं होता क्योकि वे क्षत्रिय आ- पवादन्यायका विषय नहीं इससे सामान्य | दि नहीं हैं इससे इनके वधर्म इंडके अनु- उपपातकोंके प्रायश्चित्तभी यहां समझने उन- सारही पूर्वोक्त व्रतोंकी वृद्धि और न्यूनता में दुराचारी क्षत्रिय आदिके जानकर वधमें कल्पना करनी वह दंडकी वृद्धि और न्यू- मनुका कहा तीन मास तीन वर्ष और दो नता वर्ण और जातिके ऊंच नीचके अनु- मास व्रत और चान्द्रायण वर्णके क्रमसे सार दंड देना इसे वचनमे दिखाय आये हैं। जानना और अज्ञानसे तो योगीश्वरका कहा भावार्थ-मनुप्य क्षत्रीके वधमें एक बेल तीन रात्र उपवास सहित एक बैल दश गो सो गाँदे वा तीन वर्पतक ब्रह्महत्याका व्रत दान-मासभर पंचगव्य भोजन और-मासभर | करे वेश्यका हत्यारा एक वर्षतक ब्रह्महत्या तक पयोव्रत क्रमसे जानना-यह पूर्वोक्त | का व्रत करें और एक सौ एक गौदे शूद्रका व्रतोंका समूह ब्राह्मणके किये क्षत्रिय आदि- हत्यारा भी छः मासतक ब्रह्महत्याका व्रत के वधमें जानना क्योंकि इन मनु गौतम करें और दूध देती हुई सवत्सा दश गो हारीतके वचनोंमें ब्राह्मणका ग्रहण है दे ॥ २६६ ॥ २६७ ॥ इति क्षत्रियादिवधप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ ब्राह्मणस्य राजन्यवधे पडवार्षिक प्राकृतं ब्रह्म- चर्यमृपभैकसहस्राश्च गा दद्याद्वैश्यवधे त्रिगाकमृषभैक १ अकामतस्तु राजन्यं विनिमत्य द्विजोत्तमः । शताश्च गा दद्यात् । शुदयधै सांवत्सरिकमृषभकादशाच तथा ब्राह्मणगजन्यवधे पटवार्षिक तथा ! ब्राह्मणः क्षत्रिय हवा। २ पूर्ववदमतिपूर्व चतुर्ष वर्णेषु प्रमाप्य द्वादश पट् २ वि तु सकलं देयं पादानं क्षत्रिये स्मृतम् । त्रान् संवत्सरं च मतान्या दिशेत् । तेषामन्ते गोसहस्र | वैयेऽर्धमेकपादस्तु शद्रजातिषु शस्यते । च ततोऽर्थे तस्यार्धमधे दद्यात् सर्वेषा मानुएव्येण । ३ दंडप्रणयनं कार्य वर्णजात्युत्तराधरे । गादद्यात् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (५९९) दुर्वृत्तब्रह्मविदक्षत्रशूद्रयोषा:प्रमाप्यतु ।। कि ब्राह्मणीके वधमें ब्राह्मणको कोश और दृर्तिधनुर्वस्तमविक्रमाद्दद्याद्विशुद्धये २६८ | कूपका दान करै-और क्षत्रियाके वधर्म धेनु, वैश्याके वध वस्त और शुद्राके व- पद-दुर्वृत्तब्रह्मविदक्षत्रशूद्रयोपाः २-प्रमा- | धर्म अवि दे यदि वह वैश्यवृत्ति करती प्या-तु-हात २-धनुः २-वस्त२-अविर- होय तो मनुष्यं जल दे-यदि प्रतिलोम - क्रमात५-दद्यात्-क्रि.-विशुद्धये ॥ मसे क्षत्रिय आदिके संग व्यभिचार करती योजना-दुर्वृत्तब्रह्मविट्क्षनशूद्रयोपाः प्रमा- हुई ब्राह्मणी आदिको मारे तो गोवधक प्रा- प्य घर्ति धनुः बस्तम्, अविम् विशुद्धये यश्चित्तही तथा योग्य समझने ॥ क्रमात् दद्यात् ।। भावार्थ-दुष्टाचारिणी जो ब्राह्मण, वैश्य, तात्पयार्थ -अव स्त्रीके वधका प्रायश्चित्त क्षत्रिय, शूद्रीकी स्त्री हैं उनको मारकर क्र- कहते है दुर्वृत्त ( व्यभिचारिणी) ब्राह्मण मसे दृति (मसक) धनुष-बस्त (बकरा) क्षत्रिय वैश्य शूद्र इनकी स्त्रियोंको मारकर अवि (भेड ) इनको शुद्धिके लियेदे २६८ कमसे हति अर्थात् जलाधार चर्मकोश (म- सक) धनुष, बस्त (बकरा ) आवि ( भेड) अप्रदुष्टांस्त्रियंहत्वाशूद्रहत्याव्रतंचरेत् ॥ इनको क्रमसे शुद्धिके लिये दे यह प्राय- अस्थिमतांसहस्रंतुतथानस्थिमतामनः ॥ श्चित्त प्रतिलोम क्रमसे अंत्य जातिसे पैदा- पद-अप्रदुष्टां २ स्त्रियंर हत्वा:-शूद्रहत्या हुई ब्राह्मणी आदिके अज्ञानसे वधमें सम-व्रतं २ चरेत् क्रि-अस्थिमता ६- सहस्रं २ झना ज्ञानसे वधर्म तो ब्रह्मगर्भने यह क-तु-तथा- अनस्थिमताम् ६ अनः२॥ हा है कि प्रतिलोमसे पैदा हुई स्त्रियोंके वधमें एक मासकी अवधि कही है-और जो अं- योजना-अप्रदुष्टां स्त्रियं तु पुनः अस्थि- तरप्रभव सूत आदि हैं उनकी अवधि चार | मतां सहस्रं तथा अनस्थिमतां अनः (श- दो छः मासकी है यहां योग्यतासे यह अ- कटं) हत्वा शूद्रहत्याव्रतं चरेत् ।। न्वय समझना कि ब्राह्मणीके वधमें छः मास तात्पयार्थ-यादि अत्यंत दुष्ट नहीं और क्षत्रियाके वधमें चार और वैश्याके वधर्म किंचित् व्यभिचारिणी हों ऐसी ब्राह्मणी दो और जब वैश्यके कर्मसे जीविका करती आदिकोंको नष्ट कर तो शूद्रहत्याका पा- हुई को मारे तब, कुछ दान करै-क्योकि मासिक व्रत करै अथवा दशधेनु दे यह गौतमैकी कही स्मृति है कि वैशिक (वे-छः मासका बत अज्ञानसे ब्राह्मणीके वधर्म श्यका कर्म) से जीविका करती हुई को और जानकर किये क्षत्रियाके वधमे जानना- मार तो किंचितही दे और वह किंचित् न- ल लेना क्योंकि अंगिराकी यह स्मृत्ति है और जानकर शूद्राके वधमें तो सब उपपा- और जानकर वैश्याके वधर्म दशधेनु दे- १ प्रतिलोमप्रसूताना स्त्रीणा मासावधि स्मृतः। | तकोंमें साधारण जो मासभर पंचगन्यका भ- अंतरप्रभवाणां च सृतादीनां चतुर्दिषट् । २ वैशियन किंचित्। क्षण उसको कर-यदि जानकर ब्राह्मणीको ३ कोशे करे च विप्रे वा ब्राह्मण्या प्रतिपादयेत् । मारे तो द्वादशमासिक व्रत कर-आर क्ष- वधे धेनुः क्षत्रियाया यस्तो वैश्यावध स्मृतः। शूद्राया- | त्रिया आदिके तो अज्ञानसे मारनेमें त्रैमासि- माविक वैश्यां हवा दयानल नरः । क-डेदमास-साढेवाईसदिन व्रत को सोई प्र- - (६००) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । चेतो ने कहा है कि जिसके ऋतु न हो ऐसी और जिनमें अस्थि नहीं उनके वधमें ब्राह्मणीको मारकर वर्षभर वा छः मासतक | प्राणायाम करे यह आगे कहेंगे-तैसेही कृच्छू करें-क्षत्रियाको मारकर छः मास | अनस्थिवालों का अनः (गाडा) यह वा तीन मासतक वश्याको मारकर तीनमास वचनभी क्षुद्रजंतुओंके विषयमें है स्थूल वाडेढ मासतक औरशूद्राको मारकरडेटमास | और अनस्थि घुण आदि जीवोंके वधर्म तो- वा साढेवाईस दिनतक कृच्छ्र करै-और कृमिकीट पक्षी इनकी हत्या मलिनीकरण जो हारीतने छः वर्ष क्षत्रियमें प्राकृत ब्रह्म- | है और मलिनीकरणोंमें तप्तयावक (तपा- चर्य और तीनवर्ष वैश्यों और डेढवर्ष शू-ये जो) तीन दिनतक होताहे यह मनुका में है यह कहकर कहा है कि क्षत्रियके कहा प्रायश्चित्त जानना- समान ब्राह्मणीमें, और वैश्यके समान क्षत्रि भावार्थ-जो अत्यंत दुष्ट नहो ऐसी स्त्री यामें-और शूद्रके समान वैश्या है और को और अस्थिवाले सहस्र जीवोंको और शूद्राको हतकर नवमास ब्रह्मचर्य है-वहभी जिनमें आस्थ नहो ऐसी शकट (गाडा) उन स्त्रियोंके मारनेमें जानना जो कर्मके सा- भर जीवोंको मारकर शूद्रहत्याके व्रत अर्थात् धन गुणोंसें युक्तहों-अज्ञानसे तो सब ज- पाण्मासिक प्राकृत ब्रह्मचर्य करै ।। २६९ ॥ गह आधे प्रायश्चित्तको कल्पना करनी रज- मार्जारगोधानकुलमंडूकांश्चपतत्रिणः ।। स्वलाके विषयमें तो पहिली कहआय ॥ इति स्त्रीवधप्रायश्चित्तप्रकरणम्- हत्वाम्यहंपिवेत्सरंकृच्छ्वापादिकंचरेत् ॥ अस्थि है जिनमें ऐस कृकलास (क पद-मार्जारगोधानकुलमंडूकान २ च:- रकंटा) आदि उन प्राणियोंके मध्यमें जि- पतत्रिणः२ हत्वाऽ-त्र्यहं २ पिबेत् कि-क्षीर२ नका प्रायश्चित्त नहीं कहा सहस्रको मारकर कृच्छ्रे २ वाइ- पांदिकं २ चरेत क्रि- और जिनमें अस्थि नहीं ऐसे यूका मत्कुण योजना-मार्जारगोधानकुलमंडूकान् च देश मशक आदियोंका शकट (गाडा ) अ- पुनः पतत्रिणः हत्वा व्यहं क्षीरं पिबेत् वा र्थात् जितनेमें शकटभरे उतने मारकर शू-पादिकं कृच्छं चरेत्- द्रहत्याका व्रत (छ:मासका ब्रह्मचर्य)करेवा तात्पर्यार्थ-माजीर, नकुल, गोह, मेंडक, दशधेनु दे-यहां सहस्र इस नियमसे स- और पतत्रि (पक्षी) इनको मारकर तीन हस्रसे अधिकके वधमें अन्य प्रायश्चित्तकी रात्रतक दूध पीवे वा पादकृच्छू करै और कल्पना करनी और उससे पूर्व २ प्रत्येकके वा शब्दके पढनेसे योजन गमन आदिको वध तो अस्थिवालोंके वध किंचित् दे- कर सोई मनु (अ० ११ श्लो० १२२) ने १ अनूतुमती ब्राह्मणों हत्वा कृच्छाब्दं परमासान्वे- कहा कि तीनरान दूध पीवे वा एक योजन ति । क्षत्रियां हत्वा पप्मासान्मासत्रय वैति । वैश्या मार्गमें गमन करे वा वहतीनदीमें जलका हता मासत्रयं मार्धमास वेति शुदा हत्या सार्धमास स्पर्श (स्नान) करे वा जलहै देवता जिनको साविशत्यहानि वा। २ पदणि राजन्ये प्राकृतं ब्रह्मचर्य त्रीणि वैश्येसार्दै १ कृमिकीटक्यौहत्या । मलिनीकरणीयेषु तप्तः गरे । क्षत्रियवद्राह्मणीषु वैश्यवत् क्षत्रियायां शुदा ह- खा नवमासान्। २ पयः पियेत्रिरात्रं वा योजनं वाचनो प्रजेत् । ३ किंचिरसास्थियधे देय प्राणायामस्त्वनस्थिके। अप: स्पृशेत्स्ववत्या वा मूक्त वाग्दैवत जपेत् । स्याद्यावकस्थ्यहम्।
प्रायश्चित्ताध्याय मायश्चित्तप्रकरण ५ ऐसे मंत्रोंका जप-यहभी प्रत्येक वध है पांच नीले बैलदेवकरी, भेड, खर, बेल इनको समुदाय (इकट्टे) के वधमें तो यह मैनु मारकर एक वर्षका बछडादे ॥ २७१ ।। (अ० ११ श्लो० १३१) का कहा पाण्मा- हंसश्येनकपिकव्याजलस्यलशिखंडिनः । सिक व्रत जानना कि मार्जार, नकुलको भासंचहत्वादद्याद्नामकन्यादस्तुवत्सिकाम् और चाप, मेंडक को- कुत्ता, गोह, उलूक काक इनको मारकर शूद्रहत्याका व्रत करे पद-हंसश्यनकापक्रव्याज्जलस्थलशिखं- और जो वसिष्ठेने, कहाँहे कि कुत्ता, मार्जार, डिनः २ भासं २ च हत्वा दद्यात् क्रि- नोला, मेंडक, सर्प, दहर ( छोटा मूसा वा छु । गां २ अक्रव्यादः २ तु वत्सिकां २ हुंदरी) मूसा-इनको मारकर द्वादशरात्र योजना-हंसश्येनकापक्रव्याजलस्थल- कृच्छ करें और कुछ दान करै-वह जानकर शिखंडिनः च पुनः भासं हत्वा गां दद्यात् अभ्यासके विषयमें जानना ।। तु पुनः अक्रव्यादः हत्वा वत्सिकां दद्यात्- भावार्थ-मार्जार-गोह-नोला-मेंडक और तात्पर्यार्थ-ईस श्येन (शिकरा ) कपि काक आदि पक्षी इनको मारकर तीनदिन | ( वानर )व्यात् अर्थात् कच्चे मांसके खाने दूध पावे वा पादकृच्छ करे ॥ २७० ॥ वाले व्याघ्र शृगाल आदि मृगविशेप वानर गजेनीलवृपा:पंचशुकैवत्सोदिहायनः ।। के साहचर्यसे लेना तसही हंस और श्येन खराजमेपेपुवृपोर्दयाकौंचेत्रिहायना२०१॥ के साहचर्य से कक और गृध्र आदि पक्षी विशेषभी कव्यात् पदसे लेने और जल पद-गजे ७ नीलवृपाः १ पंच १ शुके ७ शब्दप्त पगला आदि जलचर और स्थल वत्सः १ द्विहायनः १ खगजमेषेषु ७ वृषः १ शब्दसे (कबूतर आदि) स्थलचर लेने देयः १ क्रौंचे ७ विहायनः १ | शिखंडी (मोर) और भास (पक्षिविशप) इन योजना-गजे हते सति पंच नीलवृषा देयाः शुके हंत द्विहायनः वत्सः खगज- अक्रव्याद् अर्थात् कच्चे मांसके न खाने प्रत्येकके वधर्म एक गाका दान करे-और मेषेषु हतेषु घृषः देयः क्रौञ्चे हते बिहायनः वाले हरिण आदि मृग और खजर आदि वत्सः देयः- ताभावाय-हाथीको मारे तो पांच नील पक्षियोंको मारकर एक बछियाका 'दान वृषदे, शुक (तोता) पक्षी को मारता कर-सोई मनुने' कहाहै (अ० ११ श्लो दो वर्षका बछड़ा दे, खर, बकरी, भेड, इन वानर, श्येन, भास, इनको मारकर ब्राह्मण १३५-१३७)कि हंस. बलाका, बक, मोर, प्रत्येककी हत्या में एक वेलदे मनुनेभी यहां को गोदे-कच्चे मांस भक्षक मृगोंको मारकर (अ० ११ श्लो० १३६) विशेष कहा है कि अश्वको मारकर वख दे हाथीको मारकर खाते उनको मारकर बछिया दे-झटके दूध देती गो दे और जो कच्चे मांसको नहीं मानारनकुली हत्वा चार मडूयमेव च ।य मारकर कृष्णल दे ॥ मोधोटकराकार शूद्रइत्या वत चौद । २ मार्जारनकुलमहकमपदहरमूषिकान् हवा हवाहम पलाका च थक बहिणमेव चावानरं कृष्ण द्वादशरात्र चोत किंचिद्दद्यात् । श्येनभासी च पशयब्राह्मणाय गाम् । क्रव्यारस्तु ३ वामी दयाय हत्वा पचनीलानपान्गजम् । मृगान् हत्ता धेनु दद्यात्पयस्विनीम् । अयादो अनमेगावनमाई मां इत्तेकदायन । वत्सतरीमुष्ट हत्वा तु कृष्णलम् । - (६०२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भावार्थ-हंस, शिकरा, वानर, कच्चे मांस सोई मनु (अ० ११ श्लो० १३३ )ने कहा के भक्षक जलस्थलके जीव, मोर, भास इ- | है कि ब्राह्मण सर्पको मारकर काले लोहेका नको मारकर गौ दे जो कच्चे मांसके भक्षक शस्त्र दे और नपुंसकको मारकर पलालका नहीं उनको मारकर बछिया दे ॥ २७२ ॥ भार और मासेभर सीसा दे। उरगेप्वयसोदंडोपंडकेत्रपुसीसकम् ।। भावार्थ-सोको मारकर लोहेका दंड-न- कोलघृतपटोदेयउष्ट्रगुंजाहयेशुकम् २७३॥ पुंसकको मारकर वपु और सीसा दे और शूकरको मारकर घीका घडा-ऊंटको मारकर पद-उरगेषु ७ अयसः ६ दण्डः १ पण्ड- गुंजा-और घोडेको मारकर वस्त्रदे॥ २७३ ।। के ७ पु १ सीसके १ कोले ७घृतघटः १ देयः १ उष्टे ७ हये ७ अंशुकम् २ ॥ तित्तिरोतुतिलद्रोणंगजादीनामशक्नुवन् । योजना-उरगेषु हतेषु अयसः दंड:- दानंदातुंचरेत्कृच्छ्रमकैकस्यविशुद्धये२७४ पंडके हते पुसीसकं-कोले घृतघटः देयः पद-तित्तिरी तुऽ-तिलद्रोणं २ गजादी- उष्ट्र हते गुंजा, ये हते अंशुकं देयम् ॥ नां ६ अशक्नुवन् १ दानम् २ दातुं:-चरेत् तात्पर्यार्थ-सपोको मारे तो तक्ष्णिहै धार कि- कृच्छ्रे २ एकैकस्य ६ विशुद्धये ४ ॥ जिसकी एसा लोहेका दंडदे पण्डक (नपुं योजना-तित्तिरी हते तिलद्रोणं दद्यात् सक) को हते तो मातेभर नपु वा सीसा गजादीनां दानं दातुं अशक्नुवन् पुरुषः ए- अथवा पलालका भारदे-श्योंकि अन्य कैकस्य विशुद्धये कृच्छं चरेत्- स्मृतिमें यह कहा है कि पण्डकको मारकर पलालका भार वपु, वा सीसा, दे-यद्यपि तात्पर्यार्थ-तित्तिर पीके मारनेमें तिलों- लिंगसे हीन पण्डक होता है और वह सं- का द्रोण दे यहां द्रोणशब्दसे वह परिमाण स्कारके योग्य नहीं होता-इस देवलके व- लेते हैं जो इस वचन में कहा है कि आठ चनसे सामान्यरुपस रहित पंडक दिखाया मुष्टिभर अन्नको किंचित् और आठ किं- है तथापि यहां गो ब्राह्मण रूप पण्डकी चितोंका एक पुष्कल चार पुष्कलोंका विवक्षा नहीं क्योंकि गो और ब्राह्मणके वधका एक आटक और चार आठकोंका एक निषेध जाति मात्रके विषयमें है और लिंगसे द्रोण होता है यह मानका लक्षण है- रहित पंडकमेंभी वह जाति है उससही यदि पूर्वोक्त गज आदिके मारनेमें नि- लघु प्रायश्चित्त कहा है-तिसरी यहां मृग करनेको मनुष्य असमर्थ होय तो शुद्धिक धन होनेसे पांच नीलवृष आदिका दान और पक्षीही पंढक लेने और मृग और पक्षि लिये प्रत्येकके वधर्म कृल करे-यहां कुच्छ योका सहचारभी होनसेभी पक्षिरूप पण्ड कका लेनाही उचित है और कोल (शुकर) शब्द लक्षणास प्लेशसे होनेवाले तपमा- को हतकर पृतसे भरा घट दे अटको हत- १ आत्र कायसी दयमहत्या द्विजोत्तमः। कर गुंगाओंको दे अश्रको हतकर वस्र दे पटालभारफ. परदे समक धामापफन् । ३ भरमार मवेथिचित्किाविष्टा सु पुरफलम। महता पाटभारन्त्र साराकंवा दया। पुष्पलानि तु यतारि आयः परिकासितः । गतु• २५यो लिगदानः स्वासस्काराईच व सः! रायो मोहदोन इत्येतन्मानलक्षणम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ + त्रका बोधक जानना वे तप गौतमने दि-भक्षण साधन है और यह घृतका भक्षण खाये हैं कि एक वर्ष छः चार तीन दो | भोजनके कार्यमें कहा है क्योंकि प्रायश्चित्त एक मास-चौवीस बारह छः तीन दिन तपरूप होता है और वह प्रायश्चित्तका तप और अहोगत्र यह तपका काल है जहां रूप आंगिरसने प्रायश्चित्त पदके अर्थक व- प्रायश्चित्त नहीं कहा वहां येही विकल्पस हानेसे दिखाया है कि प्रायः नाम तप कह- गुरुपापमें गुरु और लघु पापमें लघु किये ता है उसके निश्यको चित्त कहते हैं तप जाते हैं यदि कृच्छ्र शब्दसे मुख्य अर्थ और निश्चयसे जो युक्त उसे प्रायश्चित्त कह- लेते तो गज और शुककी हत्यामें वि- ते हैं अब सामान्यसे प्रायश्चित्त कहते हैं- शेष कर प्राजापत्यही होता, वह यक्त नहीं, कृकलास (करकंटा) आदि अस्थिवाले और जब कृच्छ शब्द तपमात्रका बोधक है अत्यल्पही धान्य हिरण्य आदि दे-और जि- प्राणियोंमें सहस्रसे न्यून प्रत्येकके मारने में तबतो दानके गुरु और लघु भावको देख-नमें अस्थि नहीं उनके वध तो एक प्रा- कर तपकाभी गुरु और लघुभाव युक्त होजा | णायाम कर-उसमें जब किचित् सवर्ण दिया ता है तिससे गजकी हत्यामें दो मासतक जाय तब पणभर सुवर्ण दे-क्योकि सुमंतु जौंका भोजन, और शुककी हत्यामें उपवास की स्मृति है कि अस्थिवालोंके वध पण- करना-इसी प्रकार अन्यत्री दानके अनु-भर सुवर्ण देना और जब धान्य दे तो आठ सार प्रायश्चित्तकी कल्पना करनी ॥ मुष्टि दे क्योंकि यह स्मृति है कि अष्टमुष्टि भावार्थ-तितिरकी हत्यामें तिलोंका द्रोण किचित होता है-यहभी उन प्राणियोंक व- दे और गजादिकोंकी हत्यामें दान देनेको धर्म समझना जिनके वधर्म प्रायश्चित्त नहीं असमर्थ मनुष्य एक २ की शुद्धिके लिये कहा-और जहां विशेष प्रायश्चित्त सुना जा- कृष्ट कर ॥ २७ ॥ ता है वहां तो वही होता है-सोई पराशरेनें प्रायो नाम तपः प्रोक्तः चित्तं निश्चय उच्यते । फलपुप्पानरसजसत्वधातेघृताशनम् । तपोनिश्यमयुक्तः प्रायश्चित तदुच्यते । चिकित्सास्थिवधेदेयंप्राणायामस्त्व नस्थिके २ अस्थिमतां वधे पणो देयः। पद-फलपुष्पान्नरसजसत्वषांत घृताश ३ अष्टमुष्टि भवेत किंचित । नं १किंचित-सास्थिवधे ७ देयं १ प्राणा ४ हससारसचकाक्रोचटधातकः । मयुगमा यामः १ तु:-अनस्थिक ॥७॥ हला च एम्भतेन शुद्ध यति । म च टिभि चव योजना-फलपुष्पान्नरसजसत्वघाते वृता : शुरु पारावत तशा । भाडिकां च यफ हता शुद्धये, शनं शुद्धिसाधनं भवति सास्थिक किंचित् । नक्तभाजनात् । चापफारकपोतानो सागैतिीतर देयं तु पुनः अनस्थिके हते सति प्राणायामः घातकः। अंतर्जल उभे प्तध्ये प्राणायामेन शुद्धयति-गृ- कर्तव्यः- धश्येनविहगानामलकस्य च घातकः । अपक्काशी दिन तात्पर्यार्थ-गूलर आदिका फल मधूक सजगारीमान् । प्रत्येक भोजडिप्रान् लोदश्य तिष्टी काली मारनाशनः । हत्वा मापकमाजीर अदिका पुष्प और चिरकालके भात और सक्त आदि अन्न और गुड आदि रस इनमें ताकालगुजारी अहोरात्रेण शुद्धनि । मृगगेदिदरा- इक्षिणा। संधाकच्छपगोधाना शशशल्ययातकः। लो जीव पैदा होता है उनकी हत्यामें घृतका हाणामविकायस्तघातने वृकजकक्षाणांतरभूषांच १ संवत्सरः पश्मामावतारखयो द्वापेकचतुतिय य- घातकः। तिल प्रस्थ त्ससी दद्यात् वायुभक्षो दिनत्रयम् । होदादशाहः पदव्यहोहोरात्र इति पालः एगन्ये- । गजमेपत्तागोमवयानां निशतने । प्रायश्चित्तमहोरात्रं यानादेशे फिल्पेन क्रियग्रेनाप्ति गुरुराण गुमग त्रिमय चारगादनम् । बरसातमिहनां चित्रकव्याघ्र- सनि रमूनि । घातका शुद्धिमेति त्रिपोग वामगाना व भोजनः। . J (६०४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कहा है कि हंस सारस-चकवाक-क्रौंच-फुकु- ऋक्शतम् १ स्यात् क्रि- ओषधिवृथा- ट-मोर-भेड इनको मारकर एकभक्तसे च्छेद ७ क्षीराशी १ गोनुगः१ दिनम् ॥ २॥ शुद्ध होता है-मगु-टिट्टिभ-तोता-कबूतर-आ योजना-वृक्षगुल्मलताबीरुच्छेदने ऋक्- डिबक-इनको मारकर नक्तभोजनसे शुद्ध शतं जप्यं स्यात् ओषधिवृथाच्छेदे क्षीरा- होता है-चाप, काक, कपोत, सारी,तित्तिर इ- शी सन् दिनं गोनगः स्यात् ।। नका घातक दोनो संध्याओंके समय जलके तात्पर्यार्थ-फल देनेवाले आम पनस मध्यमें प्राणायामसे शुद्ध होता है गृध्र-श्ये- आदि वृक्ष और गुल्म आदि इनका यज्ञ आ- न-विहंग (पक्षी ) उलू-इनका घातक अप दि अदृष्ट अर्थके विना छेदन करके गाय- क(फलआदि)का भोजन वा मारुत (पव-त्री आदि सो ऋचाओंका जप करे-और न)का भोजन करके एक दिन टिके-मूसा | ग्राम और वनकी ओषधियोंको प्रयोजनके मारि-सर्प-अजगर-डुडुभ-इन प्रत्येकके | विना वृथा छेदन करें तो दिनभर गोओंका वध ब्राह्मणों को जिमावे और लोहका दंड | अनुगमन करके दूध पावे अन्य कुछ भोजन दक्षिणा दे-सेह-कछुआ-गोह-शशा-शल्य- न कर-पंच यज्ञके लिये तो दोष नहीं-यह क-इनका घाती-बैंगन गुंजा इनका भक्षण | प्रायश्चित्त उनमें जानना जो वृक्ष फल आ- करक अहोरात्र में शुद्ध होता है-मृग रोही- दिके द्वारा उपयोगी हैं क्योंकि मनु (अ.११ वराह-भेड-बकरा-वृक--जंबूक (गीदड ) श्लो.२४२) की स्मृति है कि फल देनेवाले ऋक्ष-तरक्षु-इनका घातक तीनदिन वायुका वृक्षोंके छेदनमें सौ ऋचाओंको जपे और भक्षण करके प्रस्थभर तिल दे-हाथी-मेष-: गुल्मलता-वल्ली और पुष्पवाले वीरुध इनके अश्व-उंट-गवय ( नीलगाय) इनके मारने- छदनेमें भी पूर्वोक्त जप करें-दृष्टार्थ (लोकमें में त्रिकालस्नान और अहोरात्र प्रायश्चित्त प्रयोजन ) मेंभी कृपिके अंग हल आदिके होता है- खर, वानर, सिंह, चीता, व्याघ्र-इ- अर्थ दोष नहीं क्योंकि वसिष्ठकी स्मृति है कि नका घातक तीन रात्रमें ब्राह्मणोंको भोजन | फलपुष्पवाले वृक्षाकी हिंसा न कर कर्षण कराकर शुद्ध होता है-इसी प्रकार अन्यभी (खेती ) आदिके लिये तो हिंसा कर और स्मृतियोंके वचनोंकी देशकाल आदिकी अ. जहां स्थानकी विशेषतासे दंडकी अधिक- पक्षासे विषयव्यवस्था कल्पना करनी ॥ ता है वहां प्रायश्चित्तकीभी अधिकता कल्प- भावार्थ-फल पुष्प अन्न रस इनमें उत्प- ना करनी सोई कहा है कि चैत्य (चवूत- न हुये जीवोंकी हत्यामें घृतकाही भक्षण क रा)श्मशान-सीमा- पवित्रस्थान-देवालय रे-और अस्थिवाले जीवोंके वधमें किंचित् इनमें उत्पन्न और प्रसिद्ध वृक्षोंके छेदनमें ही दे-और जिनमें अस्थि नहीं उनके वधर्म दूना दंड होता है-और यह सांऋचाओंका प्राणायाम कर ॥ २७ ॥ १ फलदानां तु वृक्षाणां छेदने जप्यरुशतम् । इति हिंसाप्रायभितप्रकरणम् ।। । गुल्मवशीलतानां तु पुष्पिताना व वरियां । सगुल्मलतावीरुच्छेदनेजप्यमृक्शतम् ।। २ फलपुप्पोगापादपादिस्याणकरणार्य । चोपदन्यात् । स्यादोपषियाच्छेदेखीराशीगोनुगोदिनं॥ ३ गैत्यरमशानसीमामु पुण्यस्याने मुरालये । पद-वृक्षगुल्मलतावीरुच्छेदने७ जप्यम् । जातहमाणां द्विगुणो दमो क्षेप विश्रुते । - ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६०५) जप द्विजातियांके विषयमें है शूद्र आ- अर्थ होते हैं-यहभी अशक्तके विषयमें दिके विषयमें नहीं-क्योंकि उनका जपमें समझना और कुत्ता सृगाल-भृग-भसा- अधिकार • नहीं-इससे उनको दंडके वकरी-भेह-खर-करभ ( हाथीकाबच्चा ) अनुसार द्विरात्र आदि प्रायश्चित्तकी नोला-मानार, मूसा-प्लव (मुरगा) बगला- .कल्पना करनी-उपपातकोंके मध्य में पढ़े हु- | काक-पुरुष-इनका जो डसा हो वह आपो- यकी अनर्थकता दूर करनेके लिये उपपात- हिष्ठा इत्यादि मंत्रोंसे स्नान और तीन प्राणा- कोंका जो साधारण प्रायश्चित्त है वहभी य-याम करें-यह सुमंतुका वचन नाभिस नीचे हां होता है-यह प्रायश्चित्तभी गुरु होनेसे अल्प डसनकै विषयमें समझना और जो अभ्यासके विषयमें समझना- अंगिराका वचन है कि ब्रह्मचारीको कुत्ता भावार्थ-वृक्ष गुल्म लता वीरुध इनके इस ले तो तीन दिन सायंकालके समय छेदनमें गायत्रो आदि सो ऋचाओंको दृध पाब-गृहस्थीको डस तो दो पत्र और जप औषधियोंकि वृथा छदनमें दिनभर अग्निहोत्रीको डस तो एक दिन दूध पीव- गोअनुगमन करके दूध पावै ।। २७६ ॥ नाभिसे उपर उसे तो वही व्रत दूना होजाता पुंश्चलीयानरसरैर्दष्टश्चोष्टादिवायसैः ।। है और मुखमें तिगुना और मस्तकमै टस तो चतुर्गुण (चौगुना) होता है-वह वचन प्राणायामजलेकृत्वातंप्राश्यविशुद्धयति॥ अधिक इसने में समझना-क्षत्रिय और वैश्य पद-पुथलीवानरखरः ३ दृष्टः १ च - को तो एक २ पाद न्यून प्रायश्चित्तकी क- उष्टादिवायसःप्राणायाम २ जलं ७ कृत्या-ल्पना करनी और शुद्रको तो वृहत्अंगि मृतं २ माश्य:-विशुद्धयति कि- गका कहा यह प्रायश्चित्त जानना कि मुद्रांकी योजना-पुनलीवानरखरः उष्ट्रादिवायसः । उपवास वा दानसें शुद्धि होतीहै अथवा दष्टः पुरुषः गले प्राणायाम कृत्वा घृतं शुद्धिके लिये एक गो और एक बैल बार- माश्प विशुद्धयति ॥ णको द और जो वसिष्ठेका वचन है कि तात्पर्याय-पुंभली (व्यभिचारिणी घो) कुत्तका डसा ब्राह्मण-समुद्र में जानेवाली पानर-वर-उट आदि-वायस (काक) नदीमें जाकर सौ प्राणायाम और घृतका इन्होंने जो रसा हो वह जलमें प्राणायाम भक्षण करके शुद्ध होताहै-वह वचन उत्तम और पृतका भक्षण करके शुद्ध होताहै-यहां , वगार मृगमशिनारिकमायरमनारमा- आदिपदस मुगाल आदिका प्रहण है-सोई मोरपियालयका पुरानामापहिरवादीमः म (म. १ली. १९९) ने कहा है कि प्रान मामय । कुत्ता-सुगाल-वर-प्रामक भौर कामे मांसक २प्रप्रयाग शुना दरयां साय ग्विाम्यहरय. भक्षक जीव-नर-मश्न-उंट पराह इनका राित्र एकाई योमिहोत्रान् । मातरम्य रसा मनुष्य प्राणायामस शुद्ध होताहै-यहां पर दिगुण मौर। स्वादलम्रिगुण वो मानक गृतशा भाग भोगनक स्थानमें समझना- गगंगन् । गोंकि तपरुप प्रापमित-दागर संतापके ३ला चोपवासेन शुदिरानेर वा पुनः । गों दा र म प्रारनाय विमुदये। . या उत्येि मामः समाहित ग ४ वास्तु गुना दटो नदो गता सहगा। सोपान भरन। मागमा तामासग्मुिदति । - (६०६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अंगमें उसनेके विषय समझना-त्रियोंका मनुने विशेष कहा है कि ब्राह्मणके व्रणमें । तो यह पराशरका कहा प्रायश्चित्त जानना | पूय और शोणितके संभवसे कीट पैदा हो कि ब्राह्मणीको कुत्ता जंबुक-वृक (भिडा ) जाय तो प्रायश्चित्त केसे हो-गौओंके गोवर ये डसलं तो उदय हुये ग्रह और नक्षत्रोंको और गोमूत्रसे त्रिकाल स्नान कर और देखकर शीघ्रही शुद्ध होतीहै और जो स्त्री त्रिकाल पंचगव्यका भोजन करे तो नाभिसे* कृच्छू आदि व्रतको करती हो उसके लिये नीचेके व्रणकी शुद्धि होती है और नाभि उसनेही विशेष दिखाया है कि यदिव्रतवाली | और कण्ठके मध्यके व्रणमें कृमि होय तो छः स्त्रीको कुत्ता डंस तो तीन रात्र उपवास रान वा तीन दिन पंचगव्यका भक्षण करना कर और धी सहित जौंको खाकर शेष ब- कहा है-और कुत्ते आदिके दंशका व्रण तको समाप्त करे-रजस्वलाके लियेभी विशेष | होय तो डसनेका प्रायश्चित्त करके यही प्राय- पुलस्त्यने दिखाया है कि रजस्वलाको कुत्ता श्चित्त करना और शस्त्र आदिके पावमें तो जंबुक रासभ (गधा) डसें तो पांच रात्र यही तीन दिन तक पंचगव्यका भक्षण निराहार रहकर पंचगव्यसे शुद्ध होती है आदि प्रायश्चित्त है-क्षत्रिय आदिकॉमें तो और नाभिसे उपर इस तो दुगुना मुखमें वर्ण २ के प्रति एक २ पाद न्यून प्रायश्चित्त टस तो तिगुना और मस्तकपर डसे तो की कल्पना करनी ॥ चोगुना, यही प्रायश्चित्त होता है और रज भावार्थ-व्यभिचारिणी स्त्री वानर खर स्थलासे भिन्न अवस्थामें डसे तो नान- ऊं काक इनके डसने पर जल में प्राणायाम मात्रसेही शुद्ध होती है और जिस और घृतका भक्षण करके शुद्ध होताहे२७७ मनप्यको कुत्ता आदि सूंघले उसको शाता तपर्ने विशेष कहा है कि कुत्ता जिसको यन्मेद्यरेतइत्याभ्यांस्कनरेतोभिमंत्रयेत् ।। मुंपले वा चाटले वा नखोंसे खोद दे स्तनांतरंभूयोर्मध्यंतेनानामिकयास्पृशेत् ॥ तो जलोंसे प्रक्षालन ( धोना ) और पद-यन्मेद्यरेत इति:-आभ्याम् ३स्कन्नर अग्निसे उपफूलन (तपाना ) करे और जो रेतः २ अभिमंत्रयेत् क्रि-स्तनांतरं २ युत्ते आदिके डसने और शस्त्रके लगनेसे वोः ६ मध्यं २ तेन ३ अनामिकया ३ पैदा हुये घाबमें कृमि ( कीट) होजाय तो स्पृशेत् क्रि- योजना-स्कनं रेतः यन्मेरेत इति० आ- १ प्रामणी तु गुना दष्टा जंयुसैन के वा1 उदित- भ्यां मंत्राभ्यां अभिमंत्रयेत् तेन (रेतसा) मह नक्षयं दृष्ट्या सधः शुचिर्भवेत् । अनामिकया स्तनांतरं-भुवोः मध्यं स्पृशेत् ॥ २ निगमेवोपसच्चना दया नु मुमता । सतं तात्पर्याय-अब वीर्यके स्कंदन (पटना) यारम भुपत्ता प्रतशेष समापयेत् । का प्रायश्चित्त कहते हैं-यदि किसीमकार ३ रजस्सला यदा दटा शना जम्यूफरामभैः । पच- रात्र निगहारा पंचगव्येन शुधति । उर्ज तु द्विगुर्ण १ बाझगस्य प्रगदारे पुराणोनितसंभो । फमि- नागिने तु भिगुणं सया। चतुर्गुण स्मृत मान दरेऽ- माय यस्य प्रायश्चित्त कार्य मोत् । गा मागि न्यत्रातिर्म। विसंध्य सागमायोव विरानं पंचगवारी सधोना- लाप्रापाटीदस्य नाटिस्तिस्य पारि भ्यारिशुद्धपति । नाभिकष्टानागो ममे चोपों झारनंदीरममिना थोपाठनम् । मिः । पडावं तु नई पंचगव्यायनमिति रमान !
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ स्त्रीके संयोग विनाभी हठसे वीर्यरूप चरम भावार्थ-यन्मेरेतः पुनर्मा० इन दोऋचा- धातु निकस जाय तो उस निकसे हुये रेत ओसे स्कन्न ( गिराहुआ) वीर्यका अभिमं- (वार्य ) को लेकर यन्मरेतः पृथिवी पुनमी त्रण करे और मंत्र पढे हुये उस वीर्य से अना- मंत्विंद्रियं. इन दो मंत्रोंसे अभिमंत्रित कर | मिका अंगुलिसे स्तन और भृकुटीके मध्यका अर्थात् ये दो मंत्र पंढ-और उस अभिमं-स्पर्श करे ।। २७८ ॥ त्रित वीर्यका अनामिका अंगुलिसे स्तन और मयितेजइतिच्छायांस्वादृष्टांबुगतांजपेत् ॥ भ्रफुटीके मध्य स्पर्श करे-अन्य तो यह क- सावित्रीमशुचौदृष्टेचापल्येचान्तपिच २५९ हते हैं कि निकासा हुआ वीर्य अशुद्ध है इ- ससे स्पर्शके अयोग्य होनेसे तेन (तिससे) पद-मयि ७ तेजः १ इतिऽ- च्छायां २ इस पद अनामिका पदके साहचर्यसे अ-स्वां २ दृष्टाऽ-अंबुगतां२ जपेत् क्रि-साविचार पनी बुद्धिमें स्थित अंगुष्ठ लेते हैं तिससे अशुचौ ७ दृष्टे ७ चापल्ये च-अनृते ७ अंगूठा और अनामिकासे स्पर्श करें और अपि च ॥ श्लोक भंगुष्ठ पद पढते तो छंदका भग योजना-अंबुगतां स्वां छायां दृष्ट्या माय- होता-यह उनका कहना ठीकनहीं क्यों कि तेजः इतिमंत्र जपेत् अशुची दृष्टे चापल्ये अंगुष्ठ बुद्धिमें स्थित नहीं है और शब्दकी सं-चपुनः अनृते अपि सावित्री (गायत्री) ज- निधि( समीपता )को छोडकर अर्थात् बुद्धिम पेत् ॥ स्थितका अन्वयभी युक्त नहीं सोई कहा है तात्पयार्थ-यदि अपनी छायाको जलमें कि गम्यमान (प्रतीत हुये ) अर्थका विशे- देखले तो मयितेनः इस मंत्रको जप-और पण शब्दांतर विभक्तिसे, यह धूम जलता है अशुद्ध द्रव्यके देखने, वाणी हाथ चरण इ- ( प्रकाशित है ) इसके समान कही नहीं नको चपलता करने, और झूठ बोलने में सा- देखा और वीर्यको अशुद्ध होनेसे स्पर्शकी वित्री ( गायत्री ) का जप करे-यहभी जान- अयोग्यताभी नही क्योंकि विधिसेही प्राय- कर करनमें जानना अज्ञान से करने में तो पित्त के लिये जो स्पर्श उसमें ऐसे योग्यता जानी जाती है जैसे प्रायश्चित्तके लिये म- मनका कहाहुआ आचमन जानना किश- दिप पीनेकी-और यह प्रायश्चित गृहस्थको लपीना और पढ़ना इनमें सावधान होकर यन भोजन छोकना थूकना झूठ बोलना ज- ही अज्ञानसे वीर्यक पातमें है क्योंकि ब्र- हान्दारीको तो स्वम और जागरण भवत्याने कि छोकना भूकना दांतों में अन्नका लगना आचमन करे-और जो संवर्तका वचन है गुरु प्रायश्चित देखते है-और तो मर्नु का वचत है कि हर मानकर वीर्यका पात क्षिण कानका स्पर्श करे-वई वचन अल्प- बोलना पतिताक संग बोलना इनमें द- भूमिमें करें तो तीन प्राणायामांसहित एक प्रयोजन वा अभावमें जानना-स्त्री शूद्र वैश्य सहस्र गायत्री जप-यह वचन जानकर वी- क्षत्री इनके वधके अनन्तर उपपातकोंमें यके पातमें है। + पम्पपारस्प पार्थम्य नै हट शिरणम् । मुत्रा मुराररा च भुला पनिटीम्योक्त्यास्ता- सदरामनया वा मोर चालतीति । निच । पीतारोपमा मानमित्मयतोपि सन् । २ डाप: यामतः पुदिततः स्रंदन मति । २ मते मिष्टाने र दन्तशिट तपादृते । महमं तु मेरमाः प्राणायामैमिभिः सह । पतिताना पसंमार दक्षिण प्रवण स्पृशेत् ।
(६०८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । निन्दित धनसे जीविका करनी पड़ी है पद-अवकीर्णी १ भवेत् क्रि-गत्वा-ब्रह्म- उसमें मनु और योगीश्वरने कहे जो उपपा- चारी २ तुऽ-योपितंर गर्दभं २ पशु २ आल- तकोंके प्रायश्चित्त वेही जाति शक्ति और | भ्यऽ-नैऋतं २ सः १ विशुद्धयति-कि ।। गुण आदिके अनुसार जानने-और नास्तिक योजना-ब्रह्मचारी योपितं गत्वा अव- तासेभी वेही प्रायश्चित्त वैसेही समझने-और की भवेत् स नैऋतं गर्दर्भ पशुं आलभ्य नास्तिकतासे वेदकी निन्दा लेते है उन विशुद्धयति- दोनोंमें वसिष्ठने अन्य प्रायश्चित्तभी कहा है कि नास्तिक द्वादश रात्र तक कृच्छ्र करके तात्पर्याय-अब अवकीणिका लक्षण और नास्तिकताको छोड दे और नास्तिकसे जि- | उसका प्रायश्चित्त कहते हैं-उपकुर्वाणक सकी जीविका हो वह करें, यह और नैष्ठिक ये दोनों ब्रह्मचारी स्त्रीका संग भी एकवार करनेमें समझना क्यों कि उपपा- | करके अवकीर्णी होजाते हैं-चरम धातु तकोंके प्रायश्चित्त अभ्यासके विषयमें हैं और (वीर्य) के विसर्ग (गिरना) को अवकीर्ण । जो शंखने कहा है कि नास्तिक, और ना- | कहते हैं-वह जिसके हो वह अवकीर्णी कहा- स्तिकसे जिसकी जीविका होय वह, कृतघ्न ताई-वह ब्रह्मचारी निऋतिहै देवता जिसका झूठा व्यवहाग, मिथ्या दोप लगानेवाला, ये | ऐसे गर्दभ पशुसे यज्ञ करके शुद्ध होता है- पांचों वर्ष दिनतक ब्राह्मणके घरमें भिक्षा | यद्यपि गईभको पशुत्व सिद्ध था तोभी पुनः मांगें और जो हारीतने नास्तिक और ना- | पशुग्रहण ( अथ पशुकल्पः) अब पशुके स्तिक वृत्ति, यह कहकर कहा है कि ग्रीम | कल्प( प्रतिनिधि ) कहतेहैं इस आश्वलायन वर्षा और हेमंतऋतुओंमें क्रमसे पंचाग्नि | आदि गृह्यसूत्रमें कहे पशुधर्मकी प्राप्तिके तपना, वर्षा नग्न खडा रहना जलमें सोना, | लिये पशुपदका ग्रहणहै-यह यज्ञ, वनके इनको करे ये दोनों वचन अत्यंत आग्रहसे विषय, चौराहेमें, लौकिक अग्निमें, करना बहुत कालके अभ्यासमें समझने ॥ क्योंकि वसिष्ठकी स्मृतिहै कि ब्रह्मचारी भावार्थ-जलमें अपनी छायाको देखकर स्त्रीका संग करें तो वनके विषय चौराहेमें मयितेजः० इस ऋचाको जपै और अशुद्ध | लोकिक अग्निमें रक्षाहै देवता जिसका ऐसे पदार्थके देखने, चपलता करने, और झूठ गईभ पशुका आलेभन कर अर्थात् यज्ञ करे बोलने में गायत्रीको जपे ॥ २७२ ।। और तैसेंही काणे गद्दभसे रात्रिमें करे-सोई . अपकीर्णीभवेद्गत्वाब्रह्मचारीतुयोपितम् ॥ | मैनुने कहाहै (अ० ११ श्लो० ११८ ) गर्दभंपशुमालभ्यनतंसविशुद्धयति २८० कि अवकीर्णो काणे रासभसे चोगहेमें पाक नास्तिकः कृच्छ्रे द्वादशरात्र चरित्या विरमे यज्ञकी विधिसे रात्रिमें नितिके निमित्त नास्तिक्यान्नास्तिकवृत्तिस्त्यतिकृच्छ्रम् । यज्ञ कर-पशु न मिले तो चरुसे यज्ञ करे. २ नास्तिको नास्तिकत्तिः कृतमः कूटव्यवहारी मिथ्याभिशंसी इत्येते पचसंवत्सरं ब्राह्मणगृहे भक्षं चरेयुः। १ ब्रह्मचारी चस्त्रियमुपैयारण्ये चतुष्पथे टी- ३ नास्तिको नास्तिकवृत्तिरिति प्रक्रम्य पंचतापो | कितनी रक्षावत गर्दमपशमाटभेत । नावकागजलमयनान्यनुतिष्ठयुरिति प्रीष्मवी २ अवकीर्णी तु काणेन रामभेन चतुप्पथे। पाकर हेमंतेषु । ज्ञविधानेन यजेत निकात निशि ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ क्योंकि वसिष्ठकी स्मृतिहै कि निति- कीर्ण होय तो एक वर्षतक निकाल स्नान पशु वा चरुको दे-और उसका होम करे-और क्षत्रियामें दो वर्षतक और ब्राह्म- इन मंत्रोंसे करें काम-काम काम-निति णीमें तीन वर्षतक त्रिकाल स्नान करे-और रक्षोदेवता इनके निमित्त स्वाहा है-यहभी । जो अंगिराका वचन है कि अवकीर्णके नि- असमर्थक विषयमें है-समर्थको तो यह | मित्त ब्रह्महत्याका व्रत करे और छः मास गौतमका कहा वार्षिक तप सहित पशुयज्ञ तक चीर ( जो मार्ग में पडे और फटे मिलें) वा चरु, जानना कि अवकीर्णी नितिका वस्त्रोंको धारण करें तो पापसे छुटता है वह चौराहेमें यज्ञ करे और ऊपरको है वाल अज्ञानसे किये और मनुके कहे वार्षिक जिसके ऐसे उसके चर्मको ओठकर अपने | प्रायश्चित्तके विषयमें अथया अल्प व्यभि- कर्मको कहता हुआ लोहित (रक्त ) पात्रमें चारिणीके विषयमें समझना और जो अत्यंत सात घरोंसे भिक्षा मांगे तो वर्षदिनमें शुद्ध व्यभिचारिणी हैं उनमें तो शंख लिखितक होताहे-तैसेही त्रिकाल स्नान और एकका- कहे ये प्रायाश्चत्त जानने कि व्यभिचारिणी ल भोजन जानना-क्योंकि मनु (अ० ११ | शूद्रामें गमन करे तो सचैल स्नान करके | श्लो० १२२-१२३)की स्मृति कि इस पा- जलका घट ब्राह्मणको दे, और वैश्यांमें करै पके करने पर गधेके चर्मको धारणकर अपने | तो चौथे काल भोजन करे, ब्राह्मणोंको जिमाव, कर्मको कहता हुआ सात घरोंसे भिक्षा मांगे मुंसका भार गौओंको दे-क्षत्रियामें करे तो . उनसे मिली हुई भिक्षासे एक काल भोजन तीन रात्र उपवास करके घीका पात्र दे-और करें और त्रिकाल स्नान करे तो एक वर्ष में शुद्ध होता है-और यह वार्षिक प्रायश्चित्त ब्राह्मणीमें गमन करे तो छः रात्र उपवास वेदपाठीसे भिन्न ब्राह्मणकी पलीमें वा वेदपा- | करके गोदान करै-गौओंका गमन (भोग): ठीकी वैश्या पत्नीमें जानना और यदि गुण- करे तो प्राजापत्य करे-नपुंसकीके संग वाली ब्राह्मणी और क्षत्रिया जो वेदपाठीको गमन करे तो पलालका भार और मासे पत्नी है उनमें वीर्य डारेतो क्रमसे तीन वर्ष- भर सीसा दे यह अवकीर्णीका प्रायश्चित्त । का वा दोवर्षका प्रायश्चित्त जानना-सोई शंख तीनों वर्गों के ब्रह्मचारियोंको समान है क्योंकि और लिखितने कहा है कि वैश्यामें अब क्षत्रिय, वैश्य, ये खरपशु यज्ञ करके भिक्षाका शांडिल्यकी स्मृति हैकि अवकीर्णी ब्राह्मण, नैक्रति वा चरु निर्वपेत् तस्य जुहुयात् । २ कामायस्वाहा कामकामाय स्वाहा नित्य- साहा रक्षोदेवताभ्यः स्वाहा । १अवकीर्णनिमित्त तु ब्रह्महत्यानतं चोत् । चीरवा- ३ गभेनायकीणी निति चतुष्पथे यजेत् तस्या- सास्तु पण्मासांस्तथा मुच्येत किल्विपात् । जिनमर्द्धशाल परिधाय लोदिनपात्रः सप्तगृहान् २ स्तरिण्यावृपल्यामवकीर्णा सचैलं लात उदकुंभं- भक्षं चरेत् कर्माचक्षाणः सवत्सरेण शुद्धयति । दद्याद् ब्राह्मणाय वैश्यायां चतुर्यकालाहारो ब्राह्मणा. ४ एतस्मिन्नेनसि प्राप्त वसिला गर्दभाजिनम्। सप्ता. भोजयेत् यवसभार च गाभ्यो दद्यात् क्षत्रियायां त्रि- गार चौदक्ष स्वकर्म परिकीर्तयन् । तेभ्यो लब्धेन भक्षे-रात्रमुपोषितो घृतपात्र दद्यात ब्राह्मण्या पट्टानमुपो- प वर्तयनेककालिकम् । उपस्पृशंसिपवणमब्देन स ति | पितो गो च दद्यात् गोप्वयकीर्णः प्राजापत्य चरेत प. दायामवकीर्णः पलालभार सीसमापक च दद्याद । ५ गुप्तायां वैश्यायामाकीर्णः संवत्सर त्रिषवणमनु- ३ भवकीर्णोदिजो राजा वैश्यश्चापि खरेण तु । इष्टा तिदेव क्षत्रियायां तु ३ वर्षे ब्राह्मण्यां त्रीणि वर्षाणि । | भेक्षाशिनो नित्यशुद्धथत्यन्दात्समाहिताः । . + गुदयति । + (६१०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । भोजन सावधानीसे करते हुये वर्ष दिनमें से वह साठहजार वर्ष तक विष्ठामें कृमि शुद्ध होतेहैं और जब स्त्रीके भोग विना होता है-सोई प्राशरने कहा है कि जो जान कर वीर्यका त्याग करै, दिनमै वा स्वप्नमें संन्यासी ब्राह्मण संन्याससे वा अनशन व्रतसे करतबनैर्ऋतिके निमित्त यज्ञमात्रही प्रायश्चित्त निवृत्त होकर गृहस्थको इच्छा कर तो तीन जानना क्योंकि वसिष्ठने यत्नसे वार्यके दिन | कृच्छू और तीन चांद्रायण करे और वह वा स्वप्रेमें त्यागने में यही गर्दभयज्ञमात्र जातकर्मआदि संस्कार करनेसे शुद्ध होता प्रायश्चित्त कहा है और कुच्छ्रचांद्रायण है उसमें ब्राह्मणको छः मासका कृच्छू और आदि जो ऐसे व्रतहैं जिनमें ब्रह्मचर्य रखना | फिर संस्कार, क्षत्रियको तीन चांदायण, पड़ता है उनमेंभी इस वचन यही यज्ञ और वेश्यको तीन कृच्छ, यह व्यवस्था है मात्र प्रायश्चित्त कहा है-स्वप्नमें वीर्यके त्या- | अथवा शक्ति, एक और अभ्यास, आ- गने में सो मनुको कहा प्रायश्चित्त (अ. २ दिकी अपेक्षासे ब्राह्मणकोही ये तीनों प्राय- श्लो. १८१) जानना कि ब्रह्मचारी द्विज, श्चित्त जानने तैसेही मरण संन्यासिओंकोभी स्वप्नमें वीर्यको सींचकर स्नान और सूर्यका यमेने प्रायश्चित्त कहा है कि संन्यस्तके पूजन करके तीन वार पुनमा इस ऋचाको नाशसे और जल, अग्नि, बंधनसे, और विष जपे, और वानप्रस्थ आदिकोंकोभी ब्रह्म- पर्वत आदिसे पतन इनसे जो नष्टं हुये हैं ये चयके खंडनमें यही अवकोणी व्रत तीन सब जगत्से बहिष्कृत संन्यास। नहीं हैं। कृष्ट अधिक होता है क्योंकि शांडिल्येकी और वे चान्द्रायण वा दो तप्तकूछोंसे शुद्ध स्मृति है कि वानप्रस्थ और सन्यासी जान होते हैं ये चांद्रायण और दो तप्तकृच्छू कर वीर्यका पात करें तो तीन पराक सहित रूप दोनों प्रायश्चित्त शक्ति आदिको अपेक्षा अवकीर्णी व्रत करें और जब फिर गृहस्थी ) से व्यवस्थित जानने और जब ( शस्त्रघात- होकर संन्यास पतित होजाय अर्थात् सं- हताः ) यह पाठ है तब देहका त्याग आदि न्याससे फिर गृहस्थमें आजाय तब संवतका अशास्त्रोक्त मरणके निमित्त उस संन्यासीके कहाँ प्रायश्चित्त जानना कि जो कोई दुर्मति पुत्र आदिको उपदेश जानना और जो वसि- संन्यास लेकर लौट आवे वह विश्रामको छो ने कहा है कि जीता हुआ जो देहको डकर छः मासतक कुच्छ कर-यहां लाटना त्यागे वह द्वादशरान कृच्छू और विरात्र गृहस्थका स्वीकार लेना इसीसे वसिष्ठने कहीं है कि जो संन्यासी होकर फिर मैथुनको उपवास करे वह वचनभी उसकेलिये जानना १ एतदेव रेतसः प्रयत्नोत्सर्गे दिवा स्वप्ने च । १ यः प्रत्यवसिता विमो प्राज्यातो विनिर्गतः । २ मतान्तरेषु चैव । अनाशकनिवृत्तश्च गार्हस्थ्यचौञ्चकीपति । स चरेत्रीणि ३ स्वप्ने सिपसा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः । कृच्छाणि त्रीणि चांद्रायणानि च जातकदिभिः सर्वैः स्रावामर्चयिता त्रिः पुनमित्यूच जपेत् । संस्कृतः शुद्धिमाप्नुयात् । ४वानप्रस्थो यतिचव स्कंदने सनि कामतः ।पराक २ जलाग्न्यदूंपनभ्रष्टाः मत्रज्यानाशफच्युताः । अपसंयुक्तमवकीर्णवतं चरत । विषप्रपतनप्रायःशस्त्रघातच्युताश्चये । नैव ते प्रत्यव- ५ संन्यस्य दुर्मतिः कश्चित्प्रत्यापत्तिं ब्रजेयदि । सिताः सर्वलोकहिष्कृताः । चान्द्रायणेन शुद्धयति स कुर्यात्कृच्छ्रमांतः पण्मासान्प्रानतरं । सप्तकृच्छ्रद्वयेन या। ६ यस्तु प्रजितो भूत्वा पुनः सेवेत मैथुन पटिया ३ जीवनात्मत्यागी कृच्छा द्वादशरानं चरेत् निरानं सहस्राणि विठाया जायते कृभिः । चोपयसेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६११) कि जिसने अशास्त्रीय मरणका निश्चय कर रजस्वला, इनके संग तेल लगा कर दिनमें लिया हो और जीवनकी शक्ति हो, अथवा और जल में गमन करे तो अवकोणी होता यह व्यवस्था जाननी कि मरणके निश्रय है, कदाचित् कोई शंका करे कि ब्रह्म करनेमें त्रिरात्र, और शस्त्र आदिके घाव चारीको स्त्रीके विषयमें जो ब्रह्मचर्यको लगानेमें द्वादशरात्र जानना, और यह अव- स्खलन है वह अगम्यमें गमन रूप नहीं कोर्णीका प्रायश्चित्त गुरुकी स्त्री उसके समान क्योंकि पुत्रीक गमनमें अगम्यागमनका स्त्रियोंसे भिन्न जो गमन करनेके अयोग्य दोष नहीं सोई दिखाते हैं कि पुत्रिका यो- स्त्रीहै उनमें जानना, क्योंकि गुरुपत्नी निके क्षत होनेसे कन्या नहीं, और दानका आदिकोंमें गुरु प्रायश्चित्त देखते हैं और | अभाव होनेसे परभार्या नहीं, और व्यभि- लघु अवकीर्णी व्रत बारह वर्षके प्रायश्चित्तसे चारसे जीविका न करनेसे वेश्याभी नहीं, दूर करने योग्य महापातकके दोपको दूरभी और पतिक न मरनेसे विधवाभी नहीं नहीं कर सकता कदाचित् कहो कि ब्रह्म- | इससे पुत्रिकाका किसीमें अंतर्भाव न होनेसे चारी होनेसे लथुप्रायश्चित्तकी विधि युक्त है। निषेधभी नहीं उसमें जो वीर्यपात करें सो ठीक नहीं क्योंकि गृहस्थसे भिन्न आश्र- उसकोही केवल अवको का व्रत है और मोको दूने प्रायश्चित्तको विधि ब्रह्महत्याके अन्यमें जो वीर्यपात करे उसमें तो अन्यभी प्रकरणमें दिखाय आयेहैं और यहां गमन निमित्त मिल सक्ते हैं इससे अवकीर्णावत करनेके अयोग्य स्त्रीके गमनका प्रायश्चित्तभी और तिस २ का अन्यभी प्रायश्चित्त करने पृथक् न करना क्योंकि ब्रह्मचारीको स्त्रीके वह किसीकी शंका ठीक नहीं क्योंकि पुनि विषय ब्रह्मचर्यका स्खलन, अगम्यागमन | काकाभी पराई भार्या में अंतर्भाव है अर्थात् तुल्य है, इससे जिस निमित्तमें जो दूसरा वह पराई स्त्री है और दानका अभावभी निमित्त सम, वा न्यून होय तो अवश्य होने | होय तो उसका विवाह संस्कार तो हुआ है वाले उसमें वह दूसरे प्रायश्चित्तका प्रयोजक | जैसे गांधर्वविवाहसे विवाही स्त्री पराई नहीं होता जैसे मनुके इसे वचनमें (अ.११ | होती है कदाचित् कोई शंका करे कि श्लो. २०८ ) कि शस्त्रको उठाकर कृच्छू जिस कन्या भ्राता न होय और पिता न होय गिराने में अतिकृच्छ, और रुधिरके गिरनेमें | बुद्धिमान पुरुष पुत्रिका धर्मसे उसे न वि. कृच्छातिकृच्छ, और चमके भीतर रुधिर | वाहै इस निषेधसे पुत्रिकामें इसप्रकार भार्या- कर रुधिरकी उत्पत्तिके नि- | त्व पैदा नहीं होताजैसे सगोनाम,सो ठीक नहीं मित्तमें शस्त्र उठाना और गिराना ये दोनों क्योंकि वह निषेध दृष्टअर्थ के लिये ऐसेह जैसे अवश्य होयगे तोभी अपने कृच्छ्र अति- व्यंजनासे जाने व्यंगीका होताहे और उसको कृच्छ् प्रायश्चित्तके प्रयोजक नहीं होते इसी दृष्टार्थ होना, पुत्रिकाधर्मको शंकासे, इस प्रकार अन्यत्रभी जानना और जहां निमि- हेतुके कहनेसे है-कदाचित् कहोकि केवल कि अंतभीव ( बीचमें आना) का नियम पुत्रके लियेही विवाह नहीं अपितु धर्मार्थभा नहीं वहां नैमित्तिक प्रायश्चित्त पृथक् २ होते है इससे जिसके पुत्रहो और भाया मरगई हो हैं वे निमित्त ऐसेहैं कि जब पर्वमें परमाया, वह धर्मके लिये विवाह करे तो क्या विरोध . अवर्य चोकच्छ मति कृनिपातने । यस्यास्तु न भवेदाता न विनायत पा पिता फराछीतालोऽमकपात कृच्छोऽभ्यंतरशोणिते । नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशफया । . रहने में कृच्छ्, (६१२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । है इसको विस्तारसे पहिले कह आये अब इस मंत्रसे अग्निका उपस्थाने कर-यह प्राय- अत्यंत प्रसंगके कथनसे अलंहुये तिससे ( भित्तभी तब जानना जब गुरुसे वा आदि- ब्रह्मचारीको स्त्रीके विषय जो ब्रह्मचर्यका | गुरु (बडे ) कार्यमें व्यन होकर भिक्षा स्खलन (वीर्यका पात) वह अगम्याका जो और अमिका कार्य न कियाहो और जय गमनरूप नहीं इससे पृथक् प्रायश्चित्तका अव्यन होकरही भिक्षा और आग्निकार्य प्रयोगक नहीं यह ठीक कहा- दोनोंको त्यागता है तब मनुका कहा यह भावार्थ-ब्रह्मचारी स्वीका संगम करके प्रायश्चित्त जानना कि भिक्षाटन और अग्नि अवकीर्णी होता है वह गईभ पशुका आलंभ | का प्रज्वलन इनको सात दिन न करके ( मारकर यज्ञ ) निति देवताके लिये. अनातुर ब्रह्मचारी अवकीर्णोके उतको करे करके शुद्ध होता है-२८० यज्ञोपवीतके नाशमें तो हारीतने यह भैक्षानिकायैत्यक्तातुसप्तरात्रमनातुरः। प्रायश्चित्त कहा है कि मनोवतपतीभिः कामावकीर्णइत्याभ्यांजुहुयादाहुतिद्वयम् ॥ ऋचाओंसे चार घीको आहुति देकर फिर पद-भक्षामिकोय २ त्यत्काऽन्तु सप्त- यथार्थ यज्ञोपवीतमें कहे मार्गसे मंत्रसहित रानं :- अनातुरः १ कामावकीर्णः इत्या- | यज्ञोपवीतको धारण करे- मनोवतपती. आभ्यां ३- जुहुयात् क्रि-आहुतिद्वयम् २- ऋचा वे होती हैं जिनमें मनका चिह्न वा.. व्रतका चिह्न हो जैसे मनोज्योतिः० यह और उपस्थानंततःकुर्यात्समासिंचवनेनतु । त्वमग्ने व्रतपा आस० यह हे-और निंदित मधुमासाशनकार्य:कृपाशेपवतानिच ॥ भिक्षाके भोजन, अभ्युदित और अभि- पद-उपस्थानं २-ततःऽ-कुर्यात् क्रि-समा- निर्मुक्त अर्थात् सूर्योदयपर सोना और सिंचंतु क्रि-अनेन ३ तु-मधुमांसाशने ७- युद्धसे छुटे सूर्यके समयमें पंढने में-वमन, कार्यः १-कृच्छूः १ शेपघ्रतानि २-च- | दिनमें सोना-नमस्त्रीका देखना-नम होकर योजना-अनातुरः ब्रह्मचारी सप्तरानं । सोना-श्मशानमें जाना-अनपर चढना- भैक्षाग्निकार्ये त्यक्त्वा कामावकीर्ण इति आ- पूजाके योग्य पिता आदिका अवलंघन, भ्यां ऋग्भ्यां आहुतिद्वयं जुहुयात् ततः । इनमेंभी प्रज्वलित अग्निमें इन्हीं मंत्रोसे समासिचंतु अनेन मंत्रेण उपस्थानं कुर्यात् । होम करे और स्थावर और सर्प आदिके मधुमांसाशने कृते सति कृच्छुःकार्यः च पुनः शेषव्रतानि कार्याणि- १ समासिचंतु मरुतः समिरा संपृहस्पतिः । समायमद्भिः सिंचंता यशसा प्रावर्चसेन च । तात्पर्यार्थ-अप ब्रह्मचारीके प्रसंगसे २ अकृत्वा भैक्षचरणमसमिद्धय च पावकम् । अन्यभी उपपातकका प्रायश्चित्त कहते हैं- अनातुरः सप्तरात्रमवकोणिप्रत चरेत् । जो ब्रह्मचारी अनातुर ( विनारोग ) अव ३ मनोवतपतीभिश्चतस भाज्याहुतार्हता पुनर्य- स्थामें निरंतर सात राबतक भिक्षावाअग्मिके यार्थ प्रतीयादसट्टैक्षभोजनेऽभ्युस्तेिऽभिनिर्मुक्त बांते कार्यको त्याग दे वह कामावकीर्ण० इने ! दिवास्वमें नारीदर्शने नास्वापे स्मशानमार- दो मंत्रोंसे दो आहुति देकर समासिँचतु. म्य हयादीनारुख पञ्यासिक्रमे चैताभिरेव जुहुया- पिसमिधने स्थावरसरीरमादीनां वधे यद्देयादवहेडन- , कामावकीर्णोध्याकाणस्मिकामफामायस्था- | मिति रुपमाडीभिराज्य जुहपाच मणिवासोगवादीनां हा फामावपोस्म्यापनोस्मिकामकामायस्वाहा । प्रतिप्रहे सावित्र्याटसहसं जपेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ ( ६१३) ॥ वधर्म यद्देवादेवहेडनं इत्यादि कूप्मांडी ऋचा | चिकित्सा करनेकी इच्छा करे उससे जब ऑसे होम करे और मणि वस्त्र गौ आदिके | रोगसे रहित हो जाय तब हंसःशुचिषतः प्रतिग्रहमें आठ सहस्र गायत्री जपे-और इस मंत्रसे खडा होकर सूर्यकी स्तुति करें यज्ञोपवीतके विना भोजन आदिके करनेमें मधु ( सहत वा मदिरा) काभी अज्ञानसे तो यह मरीचिका कहीं प्रायश्चित्त जानना भक्षण हो जाय तो दोष नहीं क्योंकि वसिष्ठ. कि यज्ञोपवीतके विना भोजन कर वा मल | की स्मृति हैकी अज्ञानसे मिला मधु वाजस-. मूत्रको त्यागे तो आठ सहस्र गायत्रीके जप | नेयी संहितामें दूषित नहीं है अन्य जो, और प्राणायामसे शुद्ध होता है और ब्रह्म- | सूतकके अन्न आदिका भक्षण है उसका चारी अज्ञानसे मधु मांसका भक्षण करले तो प्रायश्चित्त अभक्ष्य प्रायश्चित्तके प्रकरणमें कृच्छ कर फिर शेष अपने व्रतोंको समाप्त कहेंगे। करें-यहभी शिष्टोंके भोजन योग्य शश भावार्थ-विनाऐग सात रात्रतक भिक्षा आदिके मांसके भक्षणमें समझना क्योंकि | और अग्निकार्यको त्यागकर कामावकीर्णः० । वसिष्ठकी स्मृति है कि ब्रह्मचारी शिष्टोंके इन दोऋचाओंसे दो आहुतियोंसे होम करे ( भोजनयोग्य मांसका भक्षण करे तो द्वादश | फिर समासिंचंतु इस मंत्रसे अग्निकी स्तुति रात्र कृच्छू करके शेष व्रतको समाप्त करै- | करै-और मधु मांसका भक्षण ब्रह्मचारी करे यहां द्वादशरात्र पदका ग्रहण जानकर तो कृच्छू करके शेष व्रतोंको समाप्त करे- और अभ्यासकी अपेक्षासे अतिकृच्छू और २८१-२८२ । पराक आदिकी प्राप्तिके लिये ह-और जब पर प्रतिकूलंगुरोकृत्वाप्रसाचैवविशुद्धयति । ऐसीही व्याघिसे अभिभूत (तिरस्कृत) हो जो मांसभक्षणसही निवृत्त होय तो कृच्छ्त्रयंगुरुःकुर्यान्म्रियतेप्रहितोयदि ॥ गुरुके उच्छिष्ट मांसका भक्षण करे क्योंकि पद-प्रतिकूल २-गुरोः६-कृत्वा प्रसाद्य वसिष्ठनेही कहा कि जो ब्रह्मचारी रोगी | एव:- विशुद्धयति क्रि-कृच्छ्वयं २-- गुरुः १ होय तो औषधिके लिये गुरुकी उच्छिष्ट सब | कुर्यात क्रि-नियते क्रि-प्रहितः १-यदि:-॥ वस्तुओंको इच्छाके अनुसार भक्षण करे| योजना-गुरोः प्रतिकूलं कृत्वा प्रसाद्य यहां सर्वका ग्रहण मांस लशुन आदि संपूर्ण एव विशुद्धयति-यदि गुरुणा प्रद्वितः शिष्यः अभक्ष्योंके ग्रहणके लिये है और जब मांसके म्रियते तदा गुरुः कृच्छ्रत्रयं कुर्यात् ।। भक्षणसे व्याधि दूर हो जाय तब सूर्यकी तात्पर्यार्थ-गुरुकी आज्ञाके प्रतिघात(न- स्तुति करेसोई बौधाय ने कहा हैकी जिससे मानना ) आदिसे गुरुके प्रतिकूल (विरुद्ध) १ ब्रह्ममूत्र विनाभुक्ते विण्मन कुरुतेयवा । गायत्र्य आचरण करे तो चरणों में प्रणिपात (दंड- एसइसेण प्राणायामेन शुद्धयति । वत् ) आदिसे गुरुको प्रसन्नता करके शुद्ध २ प्रद्मचारीचेन्मासमीयाच्छिटभोजनीय कृच्छ्र होता है अर्थात् अन्य प्रायश्चित्तकी अपेक्षा द्वादशगन चरिता प्रतशेष समापयेत् । नहीं है-जो गुरु चौर सर्प व्याघ्र आदिके भ- ३ सचेत् घ्याधितः कामंगुरोपच्छिष्ट भैषज्याचे सर्व । यसे आकुल (युक्त) देशमें और सपन ४ येनेच्छेनु चिकित्सितुं स यदाऽगदोभनति तदो- अंधकार है जिसमें ऐसे अर्द्धरात्रके भव- पागादियमुरतिटन हंसःसुचिपदिति । 1 अकामोपनत मधु वाजसनेयकेन दुप्यति । प्राश्नीयात् ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । सर (समय) में कार्यके लिये शिष्यको द्विः समः १ भूतवादिनः६- मिथ्याभिश- 'रै (भेज) और गुरुका प्रेराहुआ वह शि- स्तदोषं २ चा- समादत्ते क्रि-मृषा-वदन॥ प्य देवसे मरजाय तो वह गुरु प्राजापत्य योजना-क्रियमाणोपकारे विमे मृते सति आदि तीन २ कृच्छ कर-और यह अर्थ पातकं न भवति मिथ्याभिशंसिनः दोपः द्विः नहीं कि तीन प्राजापत्य कृच्छ करे ऐसा (द्विगुणः) भूतवादिनः समः भवति च पुनः मानोंगे तो पृथक् निवेश (योग) वाली सं- मृषावदन् पुरुषः मिथ्याभिशस्तदोष समादत्ते ख्या (त्रित्व ३) की. उपपत्ति न होगी अ तात्पर्यार्थ आयुर्वेद ( वैद्यकशास्त्र ) के र्थात जितने कृच्छू हैं उन सबमें उक्त सं- | अनुसार औषध पथ्य देने आदि चिकित्सा ख्याका अन्वय न होगा कदाचित् कोई करनेसे किया है उपकार जिसका ऐसा शंका करे एकादश (ग्यारह ) प्रयाजोंसे ब्राह्मण कथंचित् देवसे मरणाय तो पातक यज्ञ करता है इसके समान आवृत्तिकी अ- नहीं होता यहां ब्राह्मणका ग्रहण सव माणि- पेक्षासे संख्याका अन्वय हो जायगा अर्थात् योंका उपलक्षण है इसीसे संवर्त आदिकों अय पदकी आवृत्ति करके प्रत्येकमें वित्व ने यह कहा है कि चिकित्साके लिये गोके संख्याका अन्वय हो जायगा यह ठीक है-बांधने, और भीतर रहे गर्भके निकासनेमें सोभी यथार्थ नहीं क्यों कि जय स्वरूपसेही यल करनेपर गौ मरजाय तो वह वैद्य पृथक्त्व (भिन्नता) प्रतीत होय तो आ- पापसे लिप्त नहीं होता-इसका विस्तार वृत्तिकी अपेक्षा अन्याय है-और जो यह सं- पहिले कह आये-जो मनुष्य पराई बडाईकी ख्या उत्पन्नमें स्थित होती तो कथंचित् आ- ईप्से पैदा हुये क्रोधसे मलीन अंतःकरण वृत्तिकी अपेक्षा होभी जाती सो हैनहीं किंतु होकर संपूर्ण जनोंके सन्मुख मिथ्याभिशा- यह संख्या उत्सत्तिमें स्थित है इससे तीन पका आरोप करता है अर्थात् इसने ब्रह्म- घीकी आहुति होमता है इसके समान स्व- हत्या की, यह वृथा करता है, उस कहनेवा- रूपके पृथक्त्वकी अपेक्षासेही त्रित्व संख्याको लेको ब्रह्महत्याका दोष दूना होता है और 'घटना युक्त है-२८३ ॥ जो भूतवादी है अर्थात् जगतमें विदित न भावार्थ-गुरुके प्रतिकूल आचरण करे तो हुये विद्यमानही दोपको जनोंके सन्मुख प्र- गुरुको प्रसन्नता करके शुद्ध होता है-गुरुका | काश करता है उसकोभी पातकीके समान घेरा हुआ शिप्य मरजाय तो गुरु तीन २ दोप होता है-सोई आपस्तंबने कहा है कि कृच्छ् (प्राजापत्य आदि) कर ।। दोपको जानकर, अन्यको पतितके दोपोंको म कहै और जो कहै उसे धमासे त्याग दे- क्रियमाणोपकारेतुमृतेविप्रेनपातकम् । और वह मिथ्याभिशंसी केवल दूने दोषका मिथ्याभिशीतनोदीपोद्विःसमीभूतवादिनः भागी नहीं होता किंतु जिसे मिथ्याभिशाप मिथ्याभिशस्तदोपंचसमादत्तेमृपावदन् । दिया है उसका जो अन्यभी पापोंका समूह दप-क्रियमाणोपकारश्तु-मृते ७ विप्रे आगे प्रायश्चित्त कहेंगे उसका अर्थवाद है है उसकोभी प्राप्त होता है-यह वचन जो न:- पातकं १ मिथ्याभिशंसिनः ६ दोषः १ १ यले कृते विपत्तिः स्यान स पापेन लिप्यते । एकादशमयाजान्यजति । २ दोपं युटा न पूर्वः परेभ्यः पतितस्य समाख्याता २ तिसभाज्याहुती होते। स्थासरिहरेचैन धर्मेषु।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ यहां कुछ दूने पापका कहना विवक्षित नहीं | यह प्रायश्चित्तभी ब्राह्मणको ब्राह्मणकेही क्यों कि निमित्त (दोप) लघु है और उसका दोष लगानेमें जानना यदि ब्राह्मण क्षत्रिय लघु प्रायश्चित्त कहेंगे अन्यथा कियेका नाश | आदिको दोष लगावे वा क्षत्रियआदि ब्राह्मण और न कियेका आगमन हो जायगा अ- को दोष लगावे तो प्रतिलोम निन्दाओंमें 'र्थात् जिसने किया उसको दोष होगा और | दूना और तिगुना दंड होता है और वाँकी जिसने न किया उसको होगा । अनुलोम निन्द्रामें उससे आधा २ न्यून दंड भावार्थ-उपकार करनेपर ब्राह्मण मरजाय | होता है इस दंड के अनुसार प्राय- तो पातक नहीं होता मिथ्या दोप लगाने-श्चित्तकोभी वृद्धि और न्यूनताकी कल्पना थालेको दोष दूना और यथार्थ कहने वालेको करनी छोटा वर्ण बडे वर्णकी निन्दा करे तो तुल्य होता है और मिथ्या दोषोंकों कहता प्रातिलोम और बडा छोटे वर्णकी निंदा करै हुआ पुरुष जिसे मिथ्या दोष लगाया हो तोअनुलोम क्रम होता है और यथार्थ दोपके उसके किये अन्यभी पापोंको प्राप्त होता | वक्ताको तो पूर्वोक्त अर्थवादके और दंडके अनुसार उससे आधे प्रायश्चित्तकी कल्पना महापापोपपापाभ्यांयोभिशंसन्मृषापरम् करनी तसेही आत पातक दोष लगाने- चालेको यही व्रत पादोन और पातकका अब्भक्षीमासमासीतसजापीनियतेंद्रियः ॥ दोप लगाने वालेको आधा और उपपातक पद-महापापोपपापाभ्यां ३ यः १ अभि- को दोप लगाने वालेको चोथाई करना, । शंसेत् क्रि-मृषाऽ-परं २ अन्भक्षः १ मासं २ .क्यों कि म के इस वचनमें ( अ० आसीत कि सः १ जापी १नियतन्द्रियः१॥ ११ श्लो-१२६ उपपातकरूप क्षत्रियके योजना-यः महापापोपपापाभ्यां परं मृषा वधर्म महापातकका चौथाई प्रायश्चित्त देख अभिशंसेत् सः अब्भक्षः जापी नियतेन्द्रियः ते हैं कि ब्रह्महत्याका चौथाई भाग कहा सन् मासं आसीत ॥ इसी प्रकार प्रकीर्णका दोष लगानेवालेकोभी तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य ब्रह्महत्यादि महा उपपातकसे न्यूनप्रायश्चित्तकी कल्पना करनी पाप और गोवधादि उप पापोंसे वृथाही अन्य क्योंकि शक्ति और पापको देखकर पुरुषको दोष लगावै वह मास भर जलका प्रायश्चित्तकी कल्पनाकरे यह स्मृति है भक्षण और जप करे और जितेन्द्रिय रहे और और जो शंखलिखितने गुरु प्रायश्चित्त जपभी शुद्धवती ऋचाओंका करें क्यों कि कहाहै वह अभ्यासके न्यून अधिककी वसिष्ठकी स्मृतिहे कि ब्राह्मण को झुठा अपेक्षासे समझना कि नास्तिक, कृतघ्न पातक वा उपपातक दोष लगाव तो मास भर जलका भक्षणकर शुद्धवती ऋचाओंक १ प्रतिलोमापवादेपु द्विगुणनिगुणो दमः। वर्णानामा- पाठ करे अथवा अश्वमेधके अवभृथमें स्नान नुलोम्येन तस्माद(4हानितः। करे-महापाप और उपपापोंका ग्रहण अन्यभी २ तुरीयो ब्रह्महत्यायाः क्षत्रियस्य वधे स्मृतः । ३ शक्ति चावेक्ष्य पाप च प्रायश्चित्त प्रकल्पयेत् । अतिपातक आदिकोका उपलक्षण है ४ नास्तिकः कृतनः कटव्यवहारी ब्राह्मणत्तिनो १ ब्राह्मगमनृतेनाभिशस्य पतनीयेनोपपातकैन वा मिप्याभिशसी घेत्येतेषाणि ब्राह्मणरहेषु मसंचरेयु: मासमभक्षः शुद्धरतीरावर्तयेदवमेधावभ्यं वा ग. सवत्सरं धौतभेक्षमश्नीयुः षण्मासान्या गा अनुग- च्छेत् । च्छेयुः।
(६१६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । कपटसे व्यवहारी, ब्राह्मणकी जीविकाका कहा है कि जिसे झूठका दोप लगा हो वह नाशक मिथ्या दोष लगाने वाला, ये छःवर्ष- पातकोंमें मास तक और महा पातकोंमें दो तक ब्राह्मणीके घर भिक्षाटन करे और मास तक कृच्छ करे वह वसिष्ठके कहे वर्षदिन तक धोई हुई भिक्षाका भोजन करे | विषयमेंही समझना और बोधायन ने कहा वा छः मासतक गाओंका अनुगमन कर है कि पातकका दोष लगावे तो कृच्छु करे भावार्थ-जो किसी अन्यको महा पाप | और जिसे लगावै वह आधाकृच्छ करे वह और उपपापका झूठा दोष लगाव वह जिते वचनभी उपपातकके विषयमें, वा अशक्त न्द्रिय होकर मासभर तक जलका भक्षण के विषयमें समझना इसी प्रकार अभिश- और जप करे ।। २८५॥ स्तके विषयमें जो अन्यभी छोटे बड़े प्राय- अभिशस्तीमृपाकृच्छंचरेदाग्नेयमेववा । श्चित्त हैं उनकी व्यवस्था काल और शक्ति- निर्वपेत्तुपुरोडाशवायव्यंपशुमेववा।।२८६॥ की अपेक्षासे जाननी-सोई मनुने कहा है (अ० ११ श्लो० २७७) कि जो अपांक्त पद-अभिशस्तः१ मृषाऽ कृच्छं २ चरेत् (पक्तिमें भोजन करनेके अयोग्य)है उनका क्रि-आग्नेयं २ एवs-वा-निवपेत् क्रि-तु- ! शोधन, छठे कालमें भोजनवा मासभर पुरोडाशम् २ वायव्यं २ पशु २ एव:-वाऽ- संहिताका जप, और शाकलशाखामें इस योजना-मृपा अभिशस्तः कृच्छ्रे चरेत् | सूक्तसे कहे मास भर तक होम होते हैं और वा आग्नेयं वायव्यं पुरोडाशं वा पशु एव अभिशस्त आदि, अपांक्तोंके मध्यमें पढे हैं य- निर्वत्- द्यपि जिसे झूठा दोष लगाया होय उस अभि- तात्पर्याथ-जिसको मिथ्या दोष लगायाहै शस्तका कोई निषिद्धाचरण नहीं दीखता यह प्राजापत्य कृच्छू करे अथवा अग्नि है तथापि मिथ्याभिशाप (दोष)लगने रूप लिंगसे देवता जिसका ऐसे वा वाय है देवता जिस- पूर्वजन्मके निषिद्ध आचरणका अनुमान का ऐसे पुरोडाशसे अथवा वायु है देवता | होता है उसके लिये यह प्रायश्चित्त उस- जिसका ऐसे पशुसे यज्ञ करे इन सबपक्षोंकी प्रकार जानना जैसे कृमि ( कीट ) से डसे व्यवस्था शक्ति और संभवकी अपेक्षासे मनुप्यको होता है इससे कुछ विरोध नहीं । जाननी और जो वसिष्ठने मासभर जलका भावार्थ-जिसको मिथ्यादोष लगाया हो- भक्षण-यही प्रायश्चित्त अभिशस्तको समझना य वह कृच्छ्र करे अथवा अग्नि और वायु है इस वचनसे कहा है वह उस अभिशस्तको देवता जिसका ऐसे पुरोडाशसे वा वायु है है कि जिसने कुछ कालतक प्रायश्चित्त न देवता जिसका ऐसे पशुसे यज्ञ करे-२८६॥ कियाहो क्योंकि वर्ष दिनके अभिशस्त अनियुक्तोनाजायांगच्छंश्चांद्रायणंचरेत् । दुष्टको दूना दंड होता है इस वचनसे अ- त्रिरात्रांतेघृतप्राश्यगत्वोदक्यांविशुद्धयति धिक दंड देखते हैं और जो पैठीनसी ने पद--अनियुक्तः १-भ्रातृजायां २-ग- १ एतेनैवाभिशस्तो व्याख्यातः । १ पातकाभिशीसन कृच्छ्रस्तदर्धमभिशस्तस्य । २ संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः। २ पठानकालतामासं सहिताजप एव वा । होमाध ३ अमृतेनाभिशस्यमानः कृच्छ् चरेन्मास पातके-शाकला नित्यमाक्तानां विशोधनम् । पु महपातकेषु द्विमासम् । ३ देवकृतस्येनसोऽवयजनमसीत्यादिकम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ . (६१७) च्छंन् १-चांद्रायण २-चरेत् कि-विपत्रांत वर्षका प्रायश्चित्त कहा है कि शूद्रहत्या और घृतं २ प्राश्य:- गत्वाऽ- उदक्यां ७- वि-! रजस्वलाके गमनमें ब्रह्महत्याका पाद प्राय- शुद्धयति कि॥ श्चित्त होता है-वहभी जानकर निरंतर अ- योजना-अनियुक्तः पुरुषः भ्रातृजायां ग- भ्यासक विषयमें समझना-और रजस्वलाको च्छन् सन् चांद्रायण चरेत-उदक्यां गत्वा । रजस्वला आदिके स्पर्शमें अन्यस्मृतिमें क- त्रिरात्रांते घृतं प्राश्य विशुद्धयति । हा प्रायश्चित्त जानना-सोई बृहद्वसिष्ठने तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य नियोगके बिना कहा है कि एक है भर्ता जिनका ऐसा स- जेठे या कानेष्ठ भ्राताको वधूके संग मेथुन वर्णा रजस्वला जानकर वा अज्ञानसे परस्पर करता है वह चांद्रायण करे-यहभी अज्ञा- स्पर्श करलें तो शीमही स्नानसे शुद्ध होती नसे एकवार गमन के विषयमें जानना और हैं और असपत्नी सवर्णाओंके अज्ञानसे जो शंखका वैचन है कि परिवित्ति और परि- स्पर्शमें तो सानमात्र है-क्यों कि मार्क- वेत्ता वर्ष दिनतक ब्राह्मणोंके घरोंमें भिक्षा डेय की स्मृति है कि सवर्णा रजस्वलाको मांगें और जेठे वा छोटे भाईकी भार्या नि- सवर्णा रजस्वला स्पर्श करले तो उसीदिन योगके विना गमन करनेवालाभी यही प्रा- स्नान करनेसे शुद्ध होती है-इसमें संशय यश्चित्त करे वह वचन जानकर गमनमें नहीं-जो कि कश्यपको यह वचन है कि समझना और जो उदक्या ( रजस्वला) हुई। यदि रजस्वला ब्राह्मणी-रजस्वलाही ब्राह्म- अपनी भाभी गमन करता है वह तीन-णीसे स्पर्श करले तो एक दिन निराहार र- रात्र उपवास करके और अंतमें घृतका भ-हकर पंचगव्य पावै तब शुद्ध होती है वह क्षण करके शुद्ध होता है-यह अज्ञानसे एक | वचन काम ( ज्ञान )से किये स्पर्शके विष- चार गमनके विषयमें है-उसमेंही गमनके यमें है असवर्ण रजस्वलाके स्पर्शमें तो अभ्यासमें-रजस्वलाके गमनमें सातयत्र उ-| बृहद्वसिष्ठने विशेष दिखाया है कि रज- पवास करै यह शातातपका कहा प्रायश्चित्त स्वला ब्राह्मणी और शूद्रकी कन्या ये जानना-जानकर एकवार गमनमेंभी यही | यदि परस्पर स्पर्श करलें तो ब्राह्मणी प्रायश्चित्त है-और जो बृहत्संवर्तने कहा है | कुच्छ प्रतसे और शूद्रा दानसे शुद्ध कि जो रजस्वला-गर्भिणी-पतित-इनमें गमन होती है यहां दानेन-इस पदका यह करता है उसके पापकी शुद्रिके लिये अति- अर्थ है कि पादकृच्छ्रका प्रतिनिधिरूप कृच्छ्रही शोधन इ-वह वचनभी जानकर जो निष्क सुवर्णका चतुर्थाश (चौथाहिस्सा) अभ्यासके विषयमें है और जो शंखेने तीन | उससे शुद्ध होती है-येभी उसी स्मृतिक १ स्पृष्टे रजस्वलेऽन्योन्य सवर्णे वेकमक १ परिवित्तिः परिवेत्ता च सवत्सर ब्राह्मणगृहेषु कामादकामतो वापि सः स्नानेन शुद्ध्यतः । भैई चरेयाता ज्येठभार्यामनियुक्तो गच्छस्तदेव क २ उदश्या तु सवर्णा या स्पृष्टा चेत्स्याहुदक्यया । तस्मिन्नेवाइनि स्नात्वा सुद्धिमानोत्यसशयम् ॥ २रजस्वलागमने सप्तरात्रम् । ३ रजस्वला तु सस्पृया नाझम्या ब्राह्मभी यदि । ३ रजस्वला तु यो गच्छेन्द्रामिणी पतितां तथा । एकरात्रं निराहारा पचगव्येन शुद्धयति । तस्य पापविशुद्धयर्थमतिकृच्छ विशोधनम् । ४ स्पृष्ट्वा रजस्वलाऽन्योन्य ब्राह्मणी द्रिजापि च । पादस्तु शूद्रहत्यायामुदक्यागमने तया ।। कृच्छ्रेण शुद्धयते पूर्वा शनी दानेन शुपति निष्ठभार्यो च । ४ (६१८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । व चेन हैं कि ब्राह्मणी और शूद्रा ये परस्पर है-चांडाल आदिके स्पर्शमें तो वृहद्वसिष्ठने स्पर्श करलें तो-ब्राह्मणी पादहीन (तीन | विशेष दिखायाहै कि पतित अंत्यज श्वपाक हिस्से ) कृच्छ्वतको करे और शूद्रा एक- ये रजस्वलाका स्पर्श करलें तो उन रजो- पाद कृच्छ्नतसे शुद्ध होती है-तिसी प्रकार धर्मके दिनोंको वितायकर प्रायश्चित्त करे रजस्वला ब्राह्मणी और क्षत्रिया ये परस्पर पहिले दिनके स्पर्शमें त्रिरात्र-दूसरे दिनके स्पर्श करलें तो ब्राह्मणी आधे कृच्छ्र और क्ष- स्पर्शमें दोदिन-और तीसरे दिनके स्पर्शमें त्रिया चौथाई कृच्छ्से शुद्ध होती है और र- | अहोरात्र-और उससे परे नक्त व्रतको करें जस्वला क्षत्रिया और शूद्रकी कन्या प- | और उच्छिष्ट शूद्रा और श्वान रजश्वलाका रस्पर स्पर्श करे तो क्षनिया तीन उपवास स्पर्श करले तो दो दिन उपवास कर-और और शुद्रकी कन्या अहोरात्रके व्रतसे शु- यहां उनदिनोंका विताना अनाशक (भोजन- द्ध होती है और क्षत्रिय और वैश्यकी का त्याग ) व्रतसे समझना यहभी जानकर कन्या यदि परस्पर स्पर्श करलें तो क्षत्रिया स्पर्शक विषयमें है अज्ञानसे स्पर्शमें तो यह तीन रात्रका उपवास और वैश्यकी कन्या । बौधायनका कहा जानना कि रजस्वलाका देदिनका उपवास कर तो शुद्ध होती है। स्पर्श चांडाल, अंत्यज, कुत्ता, काक करले और रजस्वला वैश्यकी कन्या और शुद्रा युदि परस्पर स्पर्श करें तो वेश्या तीन रात्र तो इतने निराहार रहे जबतक रजोधर्मकी और शूद्रा दोदिनमें शुद्ध होती है-इस प्र- शुद्धि हो-और जो उसनेही कहा कि कार-इच्छासे स्पर्श करनेमें वर्णोकी सना- ग्रामके मुरगे सूकर कुत्ता रजस्वलाका स्पर्श तनी (सदैव ), शुद्धि समझनी- और जो करलें तो चंद्रमाके दर्शनतक स्नान करके अकामसे स्पर्श किया हो उसमें तो बृहू-। बैठी रहे-वह वचन अशक्तके विषयमहै और द्विष्णुने स्नान मात्रही कहा है कि यदि जब भोजन करती हुयीको कुत्ता आदिका रजस्वलाको हीनवर्णकी रजस्वला स्पर्श करले तो शुद्ध होने तक भोजन न करे और स्पर्श होजाय तो अन्यस्मृतिमें विशेष कहाहै 'सवर्णा वा अधिक वर्णाका स्पर्श करके कि याद भोजन करती हुयी रजस्वला फुत्ता स्नान करनेसे सद्यः (शीघ्र ) शुद्धि होती अंत्यज आदिका स्पर्श करले तो गोमूत्र १ स्पृष्टा रजस्वलान्योन्यं ब्राह्मणी वैश्यजापि च। और जौका भोजन करके छः रात्रमें शुद्ध पादहीन चरेत्पूर्वी पादकृ तथोत्तरा । स्पृष्टा रज १ पतितांत्यश्वपाकेन संस्पृष्टा चेद्रजस्वला । स्वलान्योन्य ब्राह्मणी क्षत्रिया तथा । कृता । तान्यहानि व्यतिक्रम्य प्रायश्चित्तं समाचौत् । प्रथमेज़ि शुद्धयते पूर्वा तूत्तरा च तार्धतः । स्पृष्टा रजस्वल त्रिरात्र स्या। द्वितीये यहेमव तु-अहोरात्रं तृतीये तु न्योन्य क्षत्रिया शूद्रजापि च । उपवासत्रिभि परतो नक्तमाचरेत् । शद्रयोच्छिष्टया स्पृष्टा शुना चै. पूर्वी लहारात्रेण चोत्तरा । स्पृष्टा रजस्वलान्योन्य द्यहमाचरेत् । क्षत्रिया वैश्यनापि च । त्रिरात्राच्छुध्यते पूर्वा त्व २ रजस्वला तु संस्पृष्टा घोडालांत्यश्ववायो। होगयेण चीत्तरा । स्पृष्टा रजस्वलान्योन्यं वैश्या | तावत्तिनिराहारा यावकालेन शुद्धयति । शूद्रीतथैव च । निरावाच्छुद्यते पूर्वा तत्तरा च दिन ३ रजस्वलातु सस्पृष्टा प्रामकुकुटसूकरः । श्वभिः द्वयाद । वर्णानां कामतः पदो शुद्धिरेषा पुरातनी। लावा क्षिपेत्तावद्यावञ्चद्रस्य दर्शनम् । २ रजस्वला हीनवर्णो रजस्वला स्पृष्टा न तावदनी ४ रजस्वला तु भुजाना श्वांत्यजादन्स्पृिशेयदि याद्यावन शुद्धासात सवर्णामधिकवर्णो वा स्पृष्ट्वा । गोमूत्रयावकाहारा पट्टा रिशुध्यति । अशक्ती को सद्यः माला विशुद्धयति । चन दद्याद्विप्रेभ्यो वापि भोजनम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६११) होती है और असमर्थ होय तो ब्राह्मणोंको चतुर्विंशति मतमें कही जानना कि नारीका सुवर्ण व भोजन दे-और जब दोनों उच्छि-विक्रय करके चांदायण करे और पुरुषको टोका परस्पर स्पर्श होय तो अत्रिका कहीं वेचकर दूना व्रत बुद्धिमानोंने कहा है-और यह प्रायश्चित्त जानना कि उच्छिष्ट रजस्वला जो पैठीनसि ने कहा है कि आराम (बाग) स्त्री उच्छिष्ट रजस्वलाको स्पर्श करले | तला उदपान (चोवच्चा) पुष्करिणी तो पहिलो कृच्छ्रसे शुद्ध होती है और (तलैय्या) पुण्य पुत्र इनके विक्रयमें निकाल दूसरी शुद्धा दान और उपवाससे शुद्धिको स्नान भूमि पर शयन चौथे काल भोजन प्राप्त होती है और जब उच्छिष्ट द्विजोंका करता हुआ वर्षीदनमें पवित्र होता है-वह स्पर्श रजस्वला करले तो मार्कडेयका कहीं वचन एक पुत्रके विषयमें समझना-उसके यह प्रायश्चित्त जानना कि रजस्वला स्त्री पीछे (धान्यकुप्यपशुस्तयम् )भन्न धन पशु उच्छिष्ट ब्राह्मणोंको किसी प्रकार ठूले | इनकी चोरी उपपातक कहा है उसके प्राय- तो नाभिसे नीचेके स्पर्शमें अहोरात्र | श्चित्त चोरीके प्रकरणमें विस्तारसे कह आये। और ऊपरके स्पर्शमें तीन दिन निरा भावार्थ-नियोगके विना भ्राताकी पत्नीमें हार रहकर ध्यतीत करें-इस प्रकार अव- | जो गमन करे वह चांद्रायण करे-और रज- कीर्णिके प्रसंगसे कोई २ उपपातकका प्राय- स्वलामें गमन करके विरात्र उपवासके श्चित्तभी कहकर अप प्रकरणके विषयमें अनंतर केवल घृतका भक्षण फरके शुद्ध कहते हैं-वहां अवकोणके पीछे (सुतानां होता है-२८७१ २८८ ॥ चैव विक्रयः) संतानका धेचना-यह कहा है उसमें मनु और योगीश्वरके कहे त्रैमासिक- जीन्कृच्छ्रानाचरेदयात्ययाजकोभिचरन्नपि । आदिही प्रायश्चित्त-ज्ञान, अज्ञान, शक्ति, वेदप्लावीयवाश्यन्दत्यकाचशरणागतम् ।। आदिकी अपेक्षासे पूर्वके समान व्यवस्थासे पद-चीन २ कृच्छान २ आचरेत् कि- समझने-और जो शर्खका वचन है कि देव | प्रात्ययाजकः १ अभिचरन् १ अपि-वेद- ताका घर, प्रतिश्रय (आश्रय), उद्यान, प्लावी १ यवाशी १ अन्दं २ त्यक्त्वाऽ-च:- आराम, सभा, प्रपा (प्याऊ), तलाव, पुण्य, शरणागतम् २ ॥ पुल, पुत्र, इनको वेचकर तप्तकृच्छू करे- योजना-प्रात्ययाजकः अभिचरन् अपि और जो पराशरने कहा है कि कन्या द्विजः नीन् कृच्छ्रान् आचरेत् वेदप्लावी और गोको वेचकर सांतपन कृच्छू करै- च पुनः शरणागतं त्यक्त्वा अन्दं यवाशी वे दानोभी वचन आपत्कालमें अज्ञा- भवेत् ।। नके विषयमें समझने और जानकर तो यह तात्पर्यार्थ-अब अयाज्योंक याजनका प्रायाश्चत्त कहते है-जो मनुष्य सावित्री १ उच्छिटोच्छिष्टया स्पृष्टा कदाचिस्त्री रजस्वला। (गायत्री) से पतितांको यज्ञ कराता है वह कृच्छ्रेण शुद्धयते पूर्वा शूदा दानरूपोषिता । २ द्विजान्कचिदुच्छिष्टान् रजस्या यदि सस्पृशेत् । नारीणां विक्रय कृत्वा चौञ्चांदायणप्रतम् । अधोछिटे स्वहोरात्रमवाच्छिष्टे यह क्षिपेत् । द्विगुणं पुरुषस्यव प्रतमाहुर्मनीषिणः । ३ देवगृहपतिश्योद्यानारामसभाप्रपातडागपुग्यसेतु २ आरामतडागौरपानपुफरिणीमुतनुतविक्रये मुतविकत्यं वा तप्त; चरेत् । त्रिपवणनाप्यधःशायी चतुर्शकालाहारः संवत्सरेण ४क्रिीय कन्यको गा र इच्छू सातपनं चरेत् ।। पूतो भाति । - ।
(६२०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्राजापत्य आदि तीन कृच्छोंको करे और दिकोंको बढकर प्रचेता ने कहा है कि उन गुरु लघभूत तीन कृच्छोंकी कल्पना पंचाग्नि तपना-वामें खडा रहना-जलमें निमित्त (पाप)के गुरुलघुभावसे करनी तसेही सोना-इनको ग्रीष्म-वर्षा हेमंत ऋतुमें अभिचार (शत्रुका मरण ) करता हुआभी क्रमसे करें-और मासभर गोमूत्र जोको यही प्रायश्चित्त करे-यहभी अग्नि लगानेवाले भोजन करें-वह जानकर अभ्यासके विषयमें आदि आततायीसे भिन्नमें समझना क्योंकि है-और जो यम ने कहा है कि जो ब्राह्मण छः ओंमें अभिचार करता हुआ पतित नहीं | शुद्रका पुरोहित होता है-अर्थात स्नेह वाध- होता यह वसिष्ठ की स्मृति है-अपिशब्द ही | नके लोभसे शुगको यज्ञ कगता है-उसकी नके याजक और अंत्येष्टिके याजकोंके परि- कृच्छ्रसे शुद्धि होती है-वहभी अशक्तके ग्रहके लिये है-इसीसे मनु (अ० ११ श्लो० विषयमें है और जो पठीनसि ने कहा कि १९७) ने कहा है कि व्रात्योंका याजन | शूद्रका याजक सब द्रव्यके त्यागनेसे और और अन्योंका अंत्यकर्म और अभिचार दश सहस्र १०००० प्राणायाम करनेसे अहीन, इनको करके तीन कृच्छोंमें दोषको | शुद्ध होता है-वहभी अज्ञानसे अभ्यासके करता है-और अन्योंका अंत्यकर्म, यह | विषयमें है जो गौतम ने कहा कि निषिद्ध . अत्यंत अभ्यासके विषयमें वा शूद्र के अंत्य- ( पतित आदि ) को यज्ञ कराने और कर्ममें समझना क्योंकि प्रायश्चित्त गुरु पटानरूप मंत्र प्रयोग आदिका बहुत दिन- है, अहीन दोरात्रसे बारह रात्रपर्य- तक अभ्यास करें तो सहस्रवाक् (सर- त दिनोंके यज्ञको कहते हैं-जो शातातप स्वती) की स्तुति करें यह प्राकृत ब्रह्मचर्य ने कहा है कि जिनको सावित्रीका उपदेश का उपदेशभी जानकर अभ्यासके विषयमें नहीं हुआ उनको यज्ञोपवीत न दे न पढाव है-जो अपने वेदका विप्लव करै-अर्थात जो यज्ञोपवीत दे वा पढावे वा यज्ञ करावे | पर्वमें-चाण्डालको सुनाकर और अनध्या- उद्दालकव्रत करै वह जानकर करनेमें है योंमें जो पढे उसको, और जो शिष्य बडा- व्रत पहिले दिखाय आये ये तीनों ईके लिये पढे और उसको गुरु-तुं क्या पढता ८. साधारण उपपातकोंका जो प्रायश्चित्त है तुझने नाश किया-ऐसे पर्यनुयोग-देदे उसका अपवाद है-इससे उपपातकोंका उसको विप्लव कहते हैं-और जो रक्षाकर- साधारण प्रायश्चित्त शूद्र आदि जो अयाज्य- नेमें समर्थभी चौरसे भिन्न शरणागतकी उनके यज्ञ कराने में समझना-उसमेंभी जान-उपेक्षा करै वहभी वर्ष दिनतक नौ ओदन- कर त्रैमासिक और अज्ञानसे योगीश्वरके | को भोजन करके शुद्ध होता है-इसीसे कहे मास व्रत समझने और जो शूद्रयाजका १ एते पचतपोऽभावकाशजलशयनान्यनुतिष्ठेयुः १ षट्स्वभिचरन्न पतति । क्रमेण ग्रीष्मवीहेमन्तेषु मासं गोमूत्रयावकमनीयुः । २ प्रात्यानां याजनं कृत्वा परेपामत्यकर्मच।अभि-प्रसंगाद्वा तस्य कृच्छो विशोधनम् । २ पुरोधाः शूद्रवर्णस्य ब्राह्मणो यः प्रवर्तते नेहाद- चारमहीने च त्रिभिः कृच्छेळपोइति । ३ दयाजकः सर्वव्यपरित्यागात्पूतो भाति प्रा- ३ पतितसावित्रीकानोपनयत--नाध्यापयेत् य एता- | णायामसहस्रेषु दशकृत्वोऽभ्यस्तेषु । नुपनयध्यापयेधाजपेद्वा स उद्दालकरतं चरेत् । * निषिद्धमंत्रमयोगे सहस्रबागुपतिष्ठेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६२१) अन्यस्मृति में कहा कि जिनको अनुयो- त्यागी इसवचने से अपांतों (पंक्तिबाह्य ) ग दिया हो वे मनुने पतित कहे हैं और जो | में पटहै कि विनाकारण माता पिता गुरु वसिष्ठ ने कहा है कि पतित चांडाल शव इनके त्याग अपांक्त होते हैं उसका भी प्राय- इनको वेद सुना कर-निराव मान रहे भोजन श्चित्त उसको होताहै-सोई मनु (अ० ११- न करें सहस्रवार गायत्रीका अभ्यास करके श्लो० २०० ) में कहा कि छठे काल पवित्र होते हैं यह शास्त्रसे जानते हैं यही प्रा- भोजन मासभर संहिताका जप और शाकल यश्चित्त निंदितोंके अध्यापक और याजकों- मंत्रोंसे होम-यह अपांतोंका शोधनहे और का है और दक्षिणाके त्यागसेभी पवित्र होते हैं | वे अपोक्त श्राद्धकाण्डमें-स्तन-पतित- यहभी अज्ञानसे करनेमें समझना और जो क्लीन-इत्यादि वचन से दिखाये हैं-तडाग- षट्त्रिंशतके मतमें कहा है कि चाण्डालके आराम-इनके विक्रयमें-कितनेक विशेष कणके समीप श्रुति वा स्मृतिको पढे तो एक | प्रायश्चित्त-उनके विषय-सुतविक्रयके प्राय- रात्र भोजन न करै वहभी अज्ञान के विषयमें श्चित्तके समयमें कह आये-उसके आगे है और जब सर्प आदि गुरु और शिप्यके कन्याका दूषण कहा है-उसमें त्रैमासिक बीचमें निकल जांय वहां फिर न पढे और द्वैमासिक-चांद्रायण आदि सरवों को सवर्णा उसका प्रायश्चित्त यम ने कहा है कि सर्प, कन्याके विषयमें समझने-और अनुलोमोमें नकुल, अजा, मार्जार, उंट, मैडक, पुरुष तो दूधका-भक्षण वा प्राजापत्य समझना-क्यों- भेड, कुत्ता, अश्व, खर, इनके मध्यमें गम- कि सकाम अनुलोम कन्याओंमें दोष नहीं नका शीघ्र यह प्रायश्चित्त सुनो तीन दिन अन्यथा दण्ड है इस वचने से अल्प दण्ड तक उपवास अभिषेक कर अथवा जानु टेक | दिखा आये हैं और जो शंखने कहा है कि टेक दूसरे ग्राममें चलाजाय और पिता कन्याका दोषी, सोमका विक्रयी, अब्भ- माता पुत्र इनका त्याग,तडाग आराम इनका क्षण कृच्छ्र करें और जो हारीतका वचन है विक्रय इनमें मनु और योगीश्वरके कहे जो कि कन्या दूषक, सोमका विक्रयी, वृषली- उपपातकोंके साधारण प्रायश्चित्त है-वेही पति, बालक दारा इनका त्यागी, सुरा, और पूर्वके समान जाति शक्ति गुण आदिकी १ अकारणे परित्यक्ता मातापित्रोणुरोस्तथा। अपेक्षासे समझने उनमें माता पिताके २ पठानकालता मास सहिताजप एव था । हो- माश्च शाकला नित्यमपोक्ताना विशोधनम् । . दत्तानुयोगानध्येतुः पतितान्मनुरवीत् । ३ येस्तनपतितलीबाः। २ पतितचाहालवश्रावणे त्रिरात्र वाग्यता अ- नश्नन्त आसीरन् सहसपरम वा तदभ्यस्पत. पूता ४ सकामास्वनुलोमासु न दोपस्त्वन्यथा दमः । भवति इति विज्ञायते। ५ कन्यादोषी सोमविनयी च कृच्छमभक्ष चरे- ३ चाण्डालश्रोत्रावकाशे श्रुतिस्मृतिपाठे एक | याताम् । रात्रमभोजनम् । ६ कन्यादा सोमविक्रयों पलीपतिः कौमार- ४ सर्यस्य नकुलस्याथ अजमारियोस्तथा । दारत्यागी सुरामद्यपः शूद्रयाजको गुरोः प्रतिइन्ता मूषकस्य तथोष्टस्य मण्डूकस्य च योषितः । पुरुषस्यैड- ! नास्तिको नास्तिकवृत्तिः फत्तमः कूट व्यवहारी कस्यापि शुनौऽश्वस्य खरस्य च । अंतरा गमने सद्यः मित्रक शरणागत्याती प्रतिरूपकवृत्तिरित्यते प्रायश्चित्तमिदं शृणु । विरात्रमुपवासश्च त्रिरतश्चाभिषे- पच तपोनारकाशजलययनान्यनुतिष्टयुमाध्मवाहमते चनम् । प्रामातरं वा गतव्यं जानुभ्या नात्र संशयः धु मातमग्रीमत्रयारकमधीयुः।
(६२२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - , मद्यका पीनेवाला, शूद्रयाजक, गुरुका पत्तिके विषयमें समझना, अग्निके त्यागमें तो प्रतिहंता, नास्तिक, नास्तिकवृत्ति, कृतन उसने ही विशेष दिखाया है कि जो अमि- कपटव्यवहारी, मित्रका द्रोही, शरणागतका योंको त्याग देवे वह द्वादशरात्र कृच्छ वाती, प्रतिरूपक वृत्ति, (विरूपिया) ये करके फिर अग्न्याधान कर-यहां द्वादश सब पंचाग्नि ताप, वर्षा स्थिति, जल शयन रात्रका ग्रहण त्यागके समयकी अपेक्षासे इनको ग्रीष्म, वपी, हेमंतोंमें करे और प्राजापत्य आदि गुरु लघु कृच्छोंकी प्राप्तिके मारू भर गोमूत्र और जौका भक्षण कर ये लिये है-उनमें दो मासके त्यागमें प्राजापत्य, पूर्वोक्त दोनोंभी वचन क्षत्रिय और वेश्यको चार मासके त्यागमें अतिकृच्छ और छ:मास- प्रतिलोम वर्णकी कन्याके दूपणमें समझने के त्यागमें पराक कर और छ:मासके अनंतर और शूद्रका तो वध ही है क्योंकि इसे | योगीश्वरके कहे उपपातकके सामान्य प्राय- वचनसे वधकोही देखते हैं कि कन्याके | श्चित्त काल आदिकी अपेक्षासे समझने वर्ष दूपणमें करका छेदन, और उत्तम वर्णकी दिनके पीछे तो मनुका कहा त्रैमासिक और कन्याके दूषणमें शूद्रका वध करे परिविंदकको द्वैमासिक समझना येभी नास्तिकतासे यज्ञकराना औरकन्या देना, कुटिलता, और त्यागमें समझना सोई व्याने ने कहा हैकि शिप्टोंने जिसका निषेध न कियाहो उसका | जो द्विज नास्तिकतासे आग्निको त्यागे वह लोप, अपने लिये पाक क्रियाका प्रारंभ, मद्यप द्विज प्राजापत्य करे और जब प्रमादसे त्यागे कीस्त्रीका सेवन, इन सबमें पूर्वके समान | तब भारद्वाज गृहामें विशेष कहा है कि तीन साधारण उपपातकका प्रायश्चित्त समझना | रात्रके त्यागमें सौ १०० प्राणायाम वीस २० और पहिले दोनाम तो विशेष प्रायश्चित्त राबतक उपवास उससे आगे साठ रात्र परिवेदन और अयाज्य याजनके प्रायश्चित्त | तक तीन रात्र उपवास उससे आगे वर्ष कथनके प्रस्तावमें दिखाय आये-उसके दिन तकके त्यागमें प्राजापत्य करै-उससे आगे स्वाध्यायका त्याग कहा है-उसमें आगे अधिक कालके त्याग दोपभी अधिक int होकर त्यागने में तो अधी- होता है यदि आलस्य आदिसे त्यागे तो " अधीतका नाश इस वच- उसनेही विशेष कहा है कि चारह दिनके नसे ब्रह्महत्याके समान प्रायश्चित्त कहआये त्यागर्ने तीन दिन उपवास, मासके त्यागमें यदि शास्त्रश्रवण आदिमें व्याकुल होकर मासभर उपवास वा दूधका भक्षण कर-सं- बारह दिन उपवास और वर्ष दिनके त्यागमें स्वाध्यायको त्याग तो त्रैमासिक आदि उप- पातकके प्रायश्चित्त जाति और शक्तिकी १ योऽमीनपविध्येत्स कृच्छं द्वादशरात्रं चरित्या पुनराधेयं कारयेत् । अपेक्षासे समझने और जो वसिष्ठने कहा २ योऽमित्यजीतनास्तिक्याप्राजापत्यं चरेद्विजः । है कि वेदका त्यागीद्वादश रात्र कृच्छ्र करके ३ प्राणायामशतमात्रिराबादुपवासः स्यादाविंशति. फिर आचार्यसे वेदको पढे वह अत्यंत आ- रानात् अत ऊर्ध्वमापटिरात्रात तिस्रो रात्रीपरसे दतर्वमासंवत्सरात् प्राजापत्यं चरेत् अतउर्व १ दूषणेतु करच्छेद उत्तमायर्या वधरतथा । कारबहुवे दोषगुरुत्वम् । ४ द्वादशाहातिक्रमे त्र्यहमुपवासो मासातिक्रमे २ ब्रह्मोहः कृच्छं द्वादशरानं चरित्वा पुनरुप द्वादशाहमुपपासः संवत्सरातिकमे मासोपवासः पयो मंजीत वेदमाचार्यात् । भक्षणं च। आस्यच निम् प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६२३) . वत्सरके आगे तो वृद्ध हागतेने विशेष कहा दिन बारह दिन,छः दिन,बारह दिन,तीन दिन, है कि संवत्सर तक अग्निहोत्रके त्यागमें तीन दिन,एक दिनका व्रत करे इस वचनसे चांदायण करके फिर आधान करे दो वर्षके द्यूतमें वार्षिक व्रत कहा है वह अभ्यासके त्यागमें चांद्रायण और सोमायन करे तीन विषयमें समझना और जो प्रचेता ने कहा है वर्षके त्यागमें संवत्सरका कृच्छ्र करके फिर कि मिथ्यावादी, तस्कर, राजाका भृत्य आधान करे सोमायनको कृच्छूकाण्डमें वृक्षोंके लगानसे जो जीव विष और अग्नि- कहेंगे-शखनेभी विशेष कहा है कि अग्निका | का दाता, अश्व, रथ, और हाथी, इनपर त्यागी संवत्सरका प्राजापत्य और गोदान चढकर जो जीव और रंगोपजीवी, वागणिक कर सुत और बंधुके जानकर त्यागमें त्रैमा (जो बहुतसे कुत्ते रक्खे ) शूद्रका उपाध्या- सिक गोवधका व्रत करे अज्ञानसे त्यागमें | य, वृषलीका पति,भाण्डिक, अर्थात् बंदीज- तो योगीश्वरके कहे चारों प्रत शक्ति आ- नोंसे भिन्न राजाओंको तूरी आदिकोंके शब्दों- दिकी अपेक्षासे समझने वृक्षके छेदनका से जोजगावे, नक्षत्रोपजीवी अर्थात् पत्र में नक्ष प्रायश्चित्त पहिले कह आये और स्त्री और त्र बताकर जो जीव-कुत्तसि जो जीव-अथवा प्राणियोंका वध, और वशीकरण आदिसे | श्ववृत्ति ( सेवक)ब्रह्मजीवी मूल्यलेकर जीवन, तिल और ईखके यंत्र ( कोलू ) का ब्राह्मणका सेवक-चिकित्सक (वद्य) देव- प्रवर्तन, इनमेंभी वेंही प्रायश्चित्त तिसी प्रकार लक (मूल्यसे देवताका पूजारी)-पुरोहित- समझने और यूत, मृगया आदिव्यसनामेभी कितव ( कपटी) मदिरा पीनेवाला-कूट वेही प्रायश्चित्त तिसीप्रकार समझने और जो (छल) का कर्ता-अपत्य ( संतान ) का बौधायनने कहा है कि अब अशुद्ध करने विक्रयी-मनुप्य और पशुओंका विक्रेता- वाले कर्म कहते हैं द्यूत अभिचार अनाहि | इन पातकियोंका उद्धार इकट्ठा होकर न्या- ताग्निकी उंछवृत्ति, समावृत्त ( गृहस्थी ) का | यसे वा ब्राह्मणोंकी व्यवस्थासे करे-सब द्र- भिक्षाटन और उसकाही गुरुकुलमें वास व्यके त्यागसे चौथे काल भोजन करते हुये चार माससे अधिक उसको पढाना, और | वर्ष दिनतक त्रिकाल स्नान करै-उसके पीछे नक्षत्रका सूचन, ये कर्म अशुचि करनेवाले | देवता पितरोंका तर्पण और गौओंको आ- हैं इनमें क्रमसे बारह मास, छः मास, बारह निक ( भोजन व घास ) दें इसप्रकार व्यवहार करनेके योग्य हैं-वहभी बै- १ सवत्सरोत्सन्नेऽग्निहोने चोदायण कृत्वा पुनरा धायनके वचनका जो विषय है उसमेंही है- दध्यात् द्विवर्योत्सन्ने चाहायणं सोमायनच कुर्यात् त्रि- वरिसन्ने सवत्सर कृच्छमभ्यस्य पुनरादध्यात् । १ अमृतवाक् तस्करो राजभृत्यो वृक्षारोपक- २ अभ्युत्सादी सवत्सर प्राजापत्य चरेगां च वृत्तिः गरदोऽग्निदोऽवस्थागजारोहणवृत्ती रगोप- दद्यात्। जीवी वागणिकः शूद्रोपाध्यायो तृपलीपतिमाडिको ३ अयाचिकरीणि यतमभिवारोऽनाहिता नक्षत्रोपजीवी श्ववृत्तिः ब्रह्मजीवी चिकित्सको देव- रवृत्तिः समावृत्तस्य मनचर्या तस्यच गुरुकुले | लकः पुरोहितः किववो मद्यपः कूटकारकोऽपत्य- वाप्त उर्च चतुर्यो मासेभ्यो यश्च त मध्यापयति नक्षत्र ! विक्रयी मनुष्यपशुविक्रेता चेति तानुद्धोत्समेत्य न्याय- निर्देशनं चीत द्वादश मासान्द्वादशार्धमासान्दादशाहा | तो ब्राह्मणव्यवस्थया सर्वव्यत्यागे चतुर्थकाला- द्वादशहान्द्वादशत्यहाश्च यहमेकाहमित्यशुचि- हाराः संवत्सरं त्रिपवणमुपस्पृशेयुस्तस्यान्ते देवपित- तर्पण गवान्हिकचेत्येवं व्यवहार्याः करनिर्देशः ।
(३२४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - मनुके कहे मासभर छठे कालमें भोजन भादि कि ब्राह्मण पहिले क्षत्रियकी कन्याको वि-- अपक्तियों (पंक्तिसे बाथ) के प्रायश्चित्त चाहे तो द्वादश रात्र कृच्छ करके निवेश जाति आदिकी अपक्षासे समझने क्यो कि कर अर्थात् कृच्छके अनेतर सवर्णाको वि- मनुके कहे अपक्तियों के मध्यमेंभी कितव ! वाह और अनंतर उस क्षत्रियाकोभी वि- आदि पढे हैं-आत्म (अपना ) विक्रय और बाह ले वैश्याको पहिले विवाह तो कृच्छाति- शूद्रकी सेवा पूर्वके समानही सामान्य प्रा- कृच्छ्र करें शूद्राको पहिले विवाहै तो कृ- यश्चित्त समझने और जो बौधायने ने कहा च्छातिकृच्छू करें और क्षत्रिय, वैश्याकोही है कि समुद्रका गमन-ब्राह्मणके न्यास (ध- रोर) का हरना-संपूर्ण अपण्यों (वचनेके पहिले विवाहै तो द्वादश रात्र कृच्छ्र क- रके निवेश कर और उस वश्याकोही अयोग्य ) का व्यवहार-भूमिके निमित्त अ- नृत ( झूठ) बोलना-शद्रको सेवा और जो पुनः विवाहले और श्रद्धाको पहिले विवाह शुदामें पैदा हो उसकी संतान-और उनका तो अतिकृच्छ्र कर और वश्य, शुद्राको निर्देश (आज्ञाकरना )इनके कर्ता सब, चौथे पहिले विवाह तो यारह दिनका अतिकृ- काल प्रमित भोजन और जलोंसे आचमन करें। च्छ्र करंक उस शूद्राको पुनः विवाहले यहां त्रिकाल स्नान और स्थान आसनसे विहार यह अर्थ है कि निवेश कर और उसको इस प्रकार करतेहुये तीन वर्षसे उसपापको विवाहले यह कहनेसे कृच्छू करनेके अनं- नष्ट करते है-यह वचन बहुतकालको से- | तर सवर्णा कन्याके विवाह करनेके, अनंतर वाके विषयमें समझना-हीन जातिकं संग | उस क्षत्रिया आदिको केन्याकोभी विवाहले मित्रतामें तो उपपातकोंके.सामान्य प्रायश्चि- यहभी अज्ञान के विषयमें है-और जानकर तही समझने-और जोप्रचेता ने कहा है कि | तो उपपातक सामान्यका प्रायश्चित्त हेही, मित्रक भेदको करके अहोरात्र भोजनको | यह जानना-साधारणत्रीको सेवामें हीन यो- न करके होम करे और दूध पवेि वह उत्त-निका सेवन ( भोग ) कहा है उसमेंभी पशु. मकी मित्रताके भेदमें समझना हीनयोनिकी | वेश्याके गमनमें प्राजापत्य कहा है यह सं- सेवामेभी उपपातकके जो सामान्य प्रायश्चित्त वर्तका कहा प्रायश्चित्त अज्ञानसे करनेमें चेही समझने-और जो शातात ने कहा है समझना-जानकर करनेमें तो यमैका कहा १ समुइयानं ब्राह्मणस्य न्यासापहरण सर्वापण्यै जानना-कि वेश्यागमनसे पैदा हुये पापको य॑वहरणं भूम्यवृतम् शुद्रसेवा यश्च शूद्रायामभिजायते द्विजाति सातरात्रतक एक २ वार तपाये तदपत्यं च भवति तेषां तु निर्देशश्चतुर्थकाले मित- कुशाओंके जलको पीकर नष्ट करते हैं- भौजिनः स्युरपोभ्युपेयुः सवनानुकल्प स्थानासनाभ्यां और उपपातक सामान्योंके जो प्रायश्चित्त है विहरतसिभिवर्षस्तदपन्नति पापम् । २ मित्रभेदकरणादहीरात्रमनश्नन् हुत्वा पयः पि-क्षासे समझने-उसमें जानकर अभ्यासमें वे ज्ञानसे, अज्ञानसे और अभ्यासकी अपे- पेत् । ३ ब्राह्मणो राजकन्यापूर्वी कृच्छ द्वादशरात्रं च. निमित्त २ के प्रति नैमित्तिककी आवृत्ति रित्या निविशेत्तां तु चौपयच्छत--वश्यापूर्वी कृच्छा- होती है इस न्यायसे निमित्त २ के प्रति नै- तिकृच्छ-शूद्रापूर्वी तु कृच्छातिकृच्छू-राजन्यश्चे पशुवेश्याभिगमने प्राजापत्य विधीयते । द्वैश्यापूर्वी इच्छं द्वादशरात्र चरित्या निविशेतां चो २ वेश्यागमनज पाप व्यपोइंति द्विजातयः । पीत्या एयच्छेत् सदापूर्वी लतिकच्छ-वैश्यश्चेच्दापूर्वी स्व-सकत्सकृत्तप्त संतरानं कुशोदकम् । तिकृच्छ्रे द्वादशरात्रं चरित्वों तां चौपयच्छेद । ३ मतिनिमित्त नैमित्तिकमावर्तते।
'मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६२५) मित्तिककी आवृत्ति पाई, परंतु लोगाक्षिने | जो गृहस्थ आदि किसी आश्रममें नहो वह विशेष कहा है कि माससे पूर्व २ के अ- प्राजापत्य कृच्छू करके आश्रममें आवे- भ्यासमें दिनोंको दुगुने आदि करके वृद्धि दूसरे वर्षमें अतिकृच्छ्र, तीसरे वर्षमें कृ- होती है फिर वर्षदिनतक अभ्यासमें मासगु- च्छातिकृच्छ करै उसके आगे चांद्रायण नी-फिर जबतक पाप करे वर्षगुनी वृद्धि | करना कहा है-यहभी असंभवके विषयमें होती है-यहभी जानकर विषयमें है-अज्ञानसे | है-संभवमें तो सामान्यसे उपपातकोंके करनेमें तो चतुविशतिके मतमें विशेष प्रायश्चित्त ज्ञान और अज्ञानकी व्यवस्था- कहा है कि एकवार करनेमें जो पाप है वह | से समझने परपाकमें रुचि निषिद्ध शास्त्रको तीन दिनमें तिगुना मासभरमें पंचगुना-छः | पढना आकर ( खजाना) का अधिकार मासमें दशगुना-वर्षदिनमें पंद्रहगुना-तीन भार्याका विक्रय इनमें मनु और योगीश्वरके वर्ष वीसगुना होता है उसके आगेभी शा- तातपके वचनानुसार इसी प्रकार कल्पना | कहे उपपातक सामान्यके प्रायश्चित्त जाति, करनी-ओर जो यह वचन प्रति निमित्त शक्ति आदिकी व्यवस्थासे समझने- भावार्थ-नात्योंका यज्ञ कराने वाला और आवृत्तिका विधायक है कि पहिली आवृत्ति- से दूसरीमें दुगुना करे वह महापातकके विष- | आभिचारका कर्ता तीन कृच्छीको कर वेद- यम है यह पहिले कह आये और जो येमने | का नाशक और शरणागतका त्यागी,वर्ष- साधारणी (वेश्या) गमनके अधिकारमें | भर जौंको भक्षण कर-२८९ गुरुतल्प प्रतका अतिदेश किया है कि कोई गोष्ठेवसन्ब्रह्मचारीमासमेकंपयोवतः ॥ गुरुतल्प प्रतको कोई चांद्रायणको कोई गायत्रीजाप्यनिरतःशुध्यतेऽसत्प्रतिमहात् गोहत्याके व्रतको और कोई अवकीर्णीके प्रतको कहते हैं-यह वचन जन्मसे लेकर पद-गोष्ठे ७ वसन् १ ब्रह्मचारी १ मासं २ प्रतिज्ञासे निरंतर अभ्यासक विषयमें है- एकं २ पयोव्रतः १ गायत्रीजाप्यनिरतः १ उसके आगे तैसेही आश्रमके विना वसना शुद्धयते त्रि- असत्प्रतिग्रहात् ५- (रहना) कहा है-उसमें हारीतेने विशेष योजना-ब्रह्मचारी गोप्ठे वसन् एकं मासं कहा है कि वर्ष दिनतक अनाश्रमी अर्थात् पयोव्रतः गायत्रीजाप्यनिरतः सन् अस- १ अभ्यासेऽहर्गुणावृद्धिर्मासादग्विर्धायते । ततो | त्प्रतिग्रहात् शुद्धयते- मासगुणा वृद्विर्यावसंवत्सरं भवेत् । ततः सवत्सर तात्पीर्थ-अब निदित प्रतिग्रहका प्राय- गुणा यावत्पाप समाचरेत् । श्चित्त कहते है जो ब्रह्मचारी निंदित प्रतिग्रह २ सकरकृते तु यत्रोक्त त्रिगुण तविभिदिन मासा करता (लेता) है वह गोशालामें वसता संचगुण प्रोक्त पण्मासाद्दशधा भवेत् । सवत्सराराच- और गायत्री जपता हुआ एक मासतक पयो- दशं त्र्यब्दादिशगुण भवेत् । ततोप्येव प्रकल्प्यं स्या- च्छातातपयचो यथा । व्रत (दूध पीना ) से शुद्ध होता है और दाताकी जाति और कर्म से प्रतिग्रह निषिद्ध ३ विधेः प्राथमिकादस्माद्वितीये द्विगुण चरेत् । ४ गुरुतत्परत केचित्केचिच्चादायणवतमा गोन्नस्य- होता है जैसे चाण्डाल और पतितका प्रति- च्छन्ति केचिच्च कोचिदेवावकाणिनः । ग्रह तसेही देश और कालसेभी प्रतिग्रह ५ अनाश्रमी सवत्सर प्राजापत्य कृच्छ् थरिता- निषिद्ध होता है जैसे कुरुक्षेत्र और श्रममुपेयाद द्वितीयेतिकृच्छू वृत्तीये कृच्छातिकृच्छ- इनमें, तसेही प्रतिमहके योग्य द्रव्य- मत गर्ने चाद्रायणम् । सेभी प्रतिग्रह निषिद्ध होता है जैसे (६२६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । सुरा भेड़ मृतकको शय्या और उभ- पर शुद्ध होता है वह वचन पूर्वोक्त विषयक यतोमुखी (अर्थात् जब व्यानेके समय बच्चे | अभ्यासमें समझना अथवा पतित आदिसे का मुख योनिमें हो ) गा इनका प्रतिग्रह कुरुक्षेत्रके ग्रहण आदिमें काले मृगचर्मके और जब पतित आदिसे भेड आदिका | प्रतिग्रह आदिमें समझना तैसेही प्रतिग्रह प्रतिग्रह ले तब यह प्रायश्चित्त गुरु समझना | इव्यकी अल्पतासभी अल्प प्रायश्चित्त होता क्योंकि दो व्यतिक्रमके देखनेसे, अर्थात् हैं सोई हारीतने कहा है कि मणि, वस्त्र, गा, दाता और द्रव्य इन दोनोंको निषिद्ध होनेसे आदिक प्रतिग्रहमें आठ सहस्र गायत्री जपे निमित्त ( दोष ) भी गुरु है वहां जपमें मने तसेही पात्रंशन्मतमें कहा है कि भिक्षा ने संख्या की विशेषता कही है (अ० ११ | मात्रको लेकर पुण्यमंत्रको पढे सब प्रति श्लो० १९४) कि मास भर तीनसहस्र ग्रहोमें छा अंश दान करदे यह संपूर्ण गायत्रीको गौशालामें जपकर और दूध प्रायश्चित्तका समूह द्रव्य त्यागनेके अनंतर पीकर निपिद्ध प्रतिग्रहके दोपसे छुटता है | समझना क्योंकि मनुकी स्मृति ई. कि यहां प्रतिदिन तीन सहस्र जप जानना (अ० ११ श्लो० १९३) जो ब्राह्मण निंदित क्योंकि ( मासं ) इस अत्यंत संयोगमें कर्मसे धनका संचय करते हैं वे उसके द्वितीयासे तीन सहस्र जप प्रतिदिन व्यापक | त्यागसे और जपतपसे शुद्ध होते हैं इस प्रतीत होता है और जब न्यायवती ब्राह्मण | प्रकार अन्य स्मृतियांके वचनोंकीभी द्रव्यका आदिके सकाशसे निपिद्ध मेष आदिको ग्रह- सार अल्पता और अधिकतासे सब विषयोंमें ण करता है अथवा पतित आदिक सकाशसे | व्यवस्था समझनी इति उपपातकप्रायश्चित्त अनिषिद्ध भूमि आदिका प्रतिग्रह लेताहै | प्रकरणम् ।। तब पत्रिंशन्मतका कहा यह प्रायश्चित्त जाति और आश्रय आदिके दोपसे जानना कि पवित्र यज्ञके करनेसे सब घोर और निंदित अन्न आदिके शब्दसे योगीन्द्र प्रतिग्रह शुद्ध होते हैं और ऐंदव, मृगारेष्टि, (याज्ञवल्क्य ) ने जो व्रतोंका समूह कहा है मित्रविंदा, गायत्रीका लक्ष जप इनके करनेसे अब उसको विस्तारसे कहते हैं उसमें जाति दुष्टप्रतिग्रहोंकी शुद्धि होती है और जो वृद्ध से दुष्ट पलांदु ( सलजम) आदिका भक्षण हारीतको वचन हैकि राजाका प्रतिग्रह लेकर जानकर एकवार करे तो इस वचनसे मासभर सदेव जलमें वसे छठे कालमें दूधको तो इसे वचनसे सुरापान के समान प्राय- चांद्रायण कहा है और जानकर अभ्यासमें पीकर और ब्राह्मणोंकी कामनाको पूर्ण करें इसप्रकार निरंतर व्रत करके पूरा मास होने में सांतपन और अज्ञानसे अभ्यासमें श्चित्त कहा है और अज्ञानसे एकवार भक्ष- १जपित्वा नीणि सावित्र्याः सहस्राणि समाहितः । १ मणिवासोगवादीनां प्रतिप्रहे सावित्र्याटसहस मासं मोठे पयः पीला मुच्यतेऽसत्यतिप्रदात् । २ परिप्रेट्या विशुद्धयन्ति सर्वे घोराः प्रतिग्रहाः । २ भिक्षामात्रं गृहीत्वा तु पुण्यं मत्रमुदीरयेत् । ऐश्वेन मृगारेष्ट्या कदाचिन्मित्रविंदया । देव्या लक्ष | प्रतिग्रहेषु सर्वेषु षष्टमशं प्रकल्पयेत् । जपनैव शुद्धयते हुयतिग्रहात ।। ३ यदहितेनार्जयति ब्राह्मण कर्मणा धनम् । ३ राज्ञः प्रतिग्रहं कृत्वा मासमप्सु सदा यसेत् । तस्योत्सर्गेण शुद्धचंति जप्येन तपसेव च । पष्ठे काले पयोमक्षा पूर्णमासे विशुद्धयति । तर्पयित्वा ४ पलाण्डु विदुराद च । द्विजान्कामः सतत नियतत्रतः। ५ निषिद्धभक्षणे जैहय । जपेत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६२७) यतिचान्द्रायण कर क्योंकि मनुका वचन है | कहा प्रायश्चित्त जानना और अज्ञानसभा (म०५ श्लो०२०)कि अज्ञानसे इन छ: अभ्यास होजाय तो प्रायश्चित्तकोभी आवृत्ति का भक्षण करके सांतपन कृच्छू वा यति । कल्पना करनी और अत्यंत अभ्यासमें तो चांद्रायण करे और शेष निपिद्धोंके भक्षणमें | यह प्रचेताका कहा जानना कि ससर्गसे एक दिन उपवास करे और जो वृहत यमने वा अज्ञानसे क्रियासे वा स्वभावसे दुष्ट जो कहा है कि खट् (पक्षी वा कुसुंभ ) बैंगन, | अन्न है उसका भक्षण करके तप्तकृच्छ्र करे कभी (तखुज) काटनेसे पैदा हुये गौद नीलके तो अज्ञानसे एकवार भक्षणमें चां- भूण शिगू खखंड कवक (राईके शाक) द्रायण कर क्यों कि आपस्तंचे का वचन इनका भक्षण करके प्राजापत्य करें है कि यदि ब्राह्मण प्रमाद (अज्ञान) से कदा- वह वचन जानकर अभ्यासके विषयमें स- चित् नीलका भक्षण करे तो चांद्रायणसे मझना क्यों कि मत्स्योंको जानकर भक्षण करके भोजनके विना तीनदिन व्यतीत कर शुद्धि होती है यह आपस्तंब मुनिने कहा है, अर्थात् उपवास कर इस वचनसे योगीश्व- जानकर अभ्यासमें तो आवृत्तिकी कल्पना ने ज्ञानसे एकवार भक्षणमें तीन दिन कहे करनी और जो पत्रिंशत्के मतमें कहा हैं-यहां खट्द पदसे पक्षी वा कुसुंभ-कवक है कि शणका पुप्पशाल्मली (सेंभल ) हा- पदसे राई और खुखंड पदसे राईका भेद थसे मथीदधि वेदिसे बाहिर पुरोडाश इनको लेना वह गोवलोवर्द न्यायसे पृथक् लि- | भक्षण करके एक गत्रिदिन भोजन न करें खा है और शिग्न पदसे सोहंजना लेना और वहभी अज्ञानके विषयमें है और जो सुमंतु जो यमैंने कहा है कि तंदुलीयक (चौरा- ने कहा है कि लहसुन पलांडु गाजर ईका शाक) कुंभीक (तखुज ) व्रश्चन कवक-इनके भक्षणमें आठसहस्र गाय- ( काटना) से उत्पन्न (गोद ) नालिका | श्रीको जपकर मस्तकपर जलको डॉर वह (नरसल ) नालिकेरी शाकका भेद नहीं चाहतेहुये को बलात्कारसे भक्षणके श्लेष्मातकका फल ( भोकर) भूतण शिगू विषयमें है अथवा ऐसे रोगको निवृत्तिके खटुपक्षी कवक इनका भक्षण करके प्राजा- लिये भक्षणमे है जो इनकेही भक्षणसे निवृत्त ‘पत्य व्रत करै वहभी जानकर अभ्यासके वि- होता हो इसीसे उससे आगे उसनेही कहा षयमें है अज्ञानसे एकवार भक्षणमें तो शे- • पापोमे एकदिन उपवास करे यह मनु का १ अमत्यैतानि पट जवा कृच्ट्र सातपन चरेत् । , संसर्गदुष्टं यच्चान्न क्रियादुष्टमकामतः। भुत्ता यतिचांद्रायणं वापि शेपेपवसेदहः । स्वभावदुष्टं च तत समाचरेत् । २ खट्वार्तीककुमीकनश्चनप्रभवाणि च । भण २ मायेयदि नीली तु प्रमादाद् ब्राझणः कचित् ! शिक चर सुखड कवकानि च । एतेषां भक्षण कृत्वा चांद्रायणेन शुद्धिः स्यादापस्तम्मोऽत्रवीन्मुनिः। प्राजापत्यं चरेविजः। ३ मत्स्याध कामतो जग्ध्वा सोपवासघ्यह क्षिपेतः पुरोटाश जम्दा नाद्यादहाशम् । ३ सयुप्प शाल्मल च करनिर्मपितं दधि । बहिदि ४ तदुलीयककुभीकत्रश्चनप्रभस्तथा । नालिका मालिकेरी च श्लेमातकफलानि च । भूतृण शिक ४ रशुनपलाएंजनकवकमाणे सावित्र्याटसह- चर सटाख करक तथा । एतेषा भक्षण कृत्वा सण मनिं संपातान्नयेत् । "प्राजापत्य व्रत चरेत् । ५ एतान्येव व्याधितस्य मिपक्रियायामप्रतिषि- ५ शेषपवसेदहः1 द्धानि भवति यानि चैव मशागणि तेप्यपि न दोपः (६२८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । है कि येही पदार्थ रोगीको वैद्यकी क्रियामें शंखने यह यावकव्रत कहा है कि जितने निपिद्ध नहीं हैं औरभी जो ऐसे हैं उनके क्षीर अभक्ष्य हैं उनके विकारोंके भक्षणमें भक्षणमेंभी दोष नहीं है-अब जातिसे दुष्ट बुद्धिमान् मनुष्य सावधानी और प्रयत्नसे संधिनी आदिके दूधका जो भक्षण उसका | सात गत्रतक व्रत कर ये दोनोंभी. वचन.. प्रायश्चित्त कहते हैं-तहां अकामसे एकवार जानकरअभ्यासके विषयमें है-और जो शं- संधिनीका दूध पीया होय तो यह मनुका खंने कहा है कि संधिनी और अपवित्रोंके कहां समझना कि-(अ० ५श्लो० ८-१०-) भक्षणमें पक्षव्रत करै-वह अभ्याके विषयमें है जिसको प्रसवसे दशदिन न व्यतीत हुएहों क्योंकि सकृत्पीनेमें विष्णुने यह उपवास क- ऐसी गोका और उष्ट्र एकशफ (अश्वआदि) हा है कि गो वकरी भैंस इनको छोडकर अवि (भेड) संधिनी-(जो ग्याभन दूध देती। समस्त दूधोंको एकवार पीकर उपवास करे हो) जिसका बछडा नहो ऐसी गौ और सब और दश दिनके भीतर और संधिनी-यमसू. वनके जीव इनका दूध और सब शुक्त (जिसके दो बच्चे हुये हो) स्पंदिनी ( रज- विकारसे (खट्टेहों) इनको भोजनमें वर्ज दे | स्वला) बछडासे हीन इनका दूधभी अभक्ष्य और शुक्तोंमेंभी दधि और दधिसे पैदा हुए है और उसके पीनेवाले अपवित्र होते हैं-तैसे तक आदि पदार्थ ये भक्ष्य हैं उनसे अन्य ही वर्गों के आश्रसेभी निषेध है कि सदाचा-- सव अभक्ष्य पदार्थों में इस वैचनसे मनुका | रमें स्थित जो क्षत्रिय वैश्य और शूद्र कपि-- कहा उपवासकर कामसे करनेसें तो यह लाका दूध पीवे तो उससे अधिक कोई पापी योगीश्वरका कहा तीन रात्रका उपवास स-नहीं है-इत्यादि पदार्थोंमें जहां प्रति पदोक्त मझना जो कि पेठी नसिने यह कहा है कि प्रायश्चित्त (नाम लेकर ) न दीखे शेषोंमें अवि-खर-उष्ट्र-और स्त्री इनके दूधके पी- एक दिन उपवास कर यह मनुका कहा प्रा- नेमें तप्तकृच्छू और फिर उपनयन कर्म | यश्चित्त जानना-उसके अनंतर स्वभावसे करावे-और अनिर्दशाह ( व्यावनेके पीछे | दुष्ट मांस आदिके भक्षणमें प्रायश्चित्त दश दिनके बीतने विना ) गो और भैसके कहा है उनके जानकर एकवार भक्षण- दूध पीनेमें छः रात्रि भोजन न कर समस्त में तो शेपोमें एक दिन उपवास करे दोस्तनवालीयोंके दूध पीनेमेभी-अजाको यह मनुका कहा साधारण प्रायश्चित्त जान-- छोडकर-यही प्रायश्चित्त समझना और जो ना और जान कर तो चाप रक्तपाद (हंस) सौन (कसाईके घरका) वल्लूर मत्स्य इनको १ अनिर्दशाया गो-क्षीरमौष्ट्रमेकशफ तथा । आविक | भक्षण करके तीन दिन उपवास करे यह संधिनीक्षीर विवत्सायाश्च गोः पयः ।आरण्यानाच सर्वेपा १ क्षीराणि यान्यभक्ष्याणि तहिकाराशने युधः। मृगाणां महिषीं विना । स्त्रीक्षीर चैव वानि सर्व सप्तरात्रत्रतं कुर्यात्मयत्नेन ममाहितः । शुक्तानि चैव हि। २ सधिन्यमेध्यभक्षयोर्भुक्ता पक्षबत चरेत् । २ शेषेषूपयसेदहः। ३ गोजामहिषीवयं सर्वाणि पांसि प्राश्योपव- ३ भविखरोष्ट्रमानुपीक्षीरमाशने तप्तकृच्छः पुनरुप | सेत् अनिर्दशाह तान्ययि सधि यमस्यीदनीविय-- चयनं च अनिर्दशाहगोमहिपीक्षीरप्राशने पात्रम- साक्षीर चामध्यभुनश्च । भोजनम् सर्वासां द्विस्तनीनां क्षीरपानेऽप्यजावय ४ क्षत्रियश्चापि वृत्तस्थो वैश्यः शूद्रोथ वा पुनः ।। मेतदेव। यः पिबेत्कीपलाक्षीरं न ततोन्योस्त्य पुण्यकृत् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६२९) योगीश्वरका कहा प्रायश्चित जानना-जान- कुछुट पार्षत वानर चीता चाक कव्याद कर अभ्यास में तो अभक्ष्य मांसको खाकर ( कच्चे मांसके भक्षक ) खर ऊंट गज वा- सातरात्र जाँको पीवे यह मनुको कहा प्राय जी विराह (विष्ठाका भक्षक ) गो मनुप्य "श्चित्त जानना (अ० ११ श्लो० १५६) यह- | इनके मांस भक्षणमें तप्तकृच्छू कर और भी विष्ठाके भक्षक सूकर आदिक मांससे इनके मूत्र और विष्ठाके भक्षणमें अतिक- भिन्नमें समझना क्योंकि मर्नु (अ० ११ च्छ करें यहभी जानकर करनेमें समझना शो० १५६)ने जातिके भेदसे यह प्रायश्चित्त ! और जो उशनाको वचन है कि नर कुत्ता कहा है कि कच्चे मांसके भक्षक, विष्ठाके-/गा अश्व और पंचनख इनके मांसको खा. सूकर, कुक्कट, नर, काक, खर, इनके भक्ष-कर महासांतपन करे वह अज्ञानसे करनेमें णमें तप्तकृच्छ्से शुद्धि होती है और इन- ) समझना और जो अंगिरीका वचन है कि के मूत्र और विष्ठाके भक्षणमेंभी यही प्राय- बलाका भास गीध मूसा खर वानर सूकर श्चित्त है क्योंकि बृहधमकी यह स्मृति है इनके मलमूनको देखकर और स्पर्श करके कि वराह अश्व आदि एकशफ काक कुछ- आचमनसे शुद्ध होता है और इच्छा से मल ट और संपूर्ण कच्चे मांसके भक्षक और जो भूनको भक्षण करके सांतपन और जानकर शास्त्रमें अभक्ष्य कहे हैं इनके मांस मूत्र वि- भक्षण करे तो तीनों द्विजातीय प्राजापत्य शाको और गौ कुत्ता गोदड वानर इनके कृच्छ करै वह वुचन भक्षितके वमन करने मांसको खाकर तप्तकृच्छ्र, करे अथवा बा- पर समझना और सांतपन शब्दसे महा- रह दिन उपवास करके कुश्मांडी ऋचाओं सांतपन लेना क्योंकि अज्ञानमें प्राजापत्य से घोका होम करै-उसमेंभी यह व्यवस्था है | कहा है और जो अगिरीका वचन है कि नर काक खर अश्व गज इनके मांस मल कि जानकर भक्षणमें तप्तकृच्छ, और अ-और मूत्रको खाकर द्विज चांद्रायण कर भ्याससे कूश्मांड सहित पराक करे-तैसेही । और जो बृहत्यमने कहा है कि शुष्क मां- प्रचेतानेभी कहा है कि कुत्ता शृगाल काक | सके भक्षणमें ब्राह्मण चांदायण व्रत करे ये दोनों वचन जानकर अभ्यासके विषयमें हैं। १ चापांश्च रक्तपादाश्च सौन वल्लरमेव च । मत्स्या और जो शंखेंने कहा है कि जिनके दोनों श्च कामती जग्धा सोपवासष्यहं वसेत् । तरफ दांत हैं और जिनके एक शफ है जनको और ऊंठ और गोके मांसको खाकर २ जावा मांसमभक्ष्यं तु सप्तगर्न यवान्पियेत् ३ व्याट्किरोष्ट्राणां कुकुटाना च भक्षणे । नामास श्वमांस वा मामसिं चाश्वमेव वा । नरकाकखराणा च तप्तरच्छू विशोधनम् । भुगवा पचनशानां च महासांतपन चरेत् । .४ चराईकाशफाना तु काकफुट्योस्तथा । २ वटाकामासणनाखखरवानरमुकरान् । दृष्ट्वा चै- ऋन्यादानां च सर्वेषामभक्ष्या ये च कीर्तिताः । मास- पाममध्यानि स्पृष्ट्वाचम्य विशुद्धयति । इच्छयैषाममे- .मूत्रपुरीपाणि प्राश्य गोमांसपेव च ! श्वगोमायुकपी | माजापत्यमनिच्छया । ध्यानि भक्षयित्वा द्विजातयः । कुर्यः सांतपनं कृच्छं ना च ततकृच्छ विधीयते ।उपोष्य वा द्रादशाह कूष्मां- ३ नरकाकखराश्वानां जग्वा मांस गजस्य च । हेर्जुहुयादवृतम् । ५ श्वगालकाककुकुटपार्पतवानरचित्रकबाप- एषा मूत्रधुरीपाणि विजयांदायणं चरेत् । ४ शुष्कमांसाशने विप्रो व्रत चांदायणं चरेव । प्रव्यादखरोष्ट्रगजवानिविष्टुराहगोमानुषभासमक्षणे तप्त ५ भुत्रत्वा चौभयतोदतांस्तथा चैकशफानपि। औष्ट्र ‘कृच्ट्रमादिशेत् एतेषा मूत्रपुरीषभक्षणेत्यतिकृच्छ्र । गय तथा अग्ला पामासान्त्रतमाचरेत् । + याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । श छः मासतक व्रत करै वह जानकर अत्यंत स्पर्श करके रस अन्नमें भस्मका स्पर्श कर. अभ्यासके विषयमें समझना और जोस्मृत्य- यह श्लोके प्रसंगसे लिखा है अंत्यत सूक्ष्म तरम कहा है कि मनुष्योंका मांस विद्दराह कृमि कीट अस्थि इनके भक्षणमें तो हारीत खर गौ अश्व हाथी ॐ और सम पंचनख ने विशेष कहा है कि कृमि कीट पिपीलिका क्रव्याद् ग्रामका कुकुट इनको भक्षण करके (चेंटी) जलौका (मजौंक)पतंग (पक्षी) इनके संवत्सरबत करे वह अत्यंत और निरंतर अस्थियोंके भक्षणमें गोमूत्र और गोमयको अभ्यासके विषय में समझना इस प्रकरणमें भक्षण करके त्रिरात्र शुद्ध होता है इस- मून और पुरीए (मल) का ग्रहण वसा प्रकार पशुपक्षी जलचरोंके मांस भक्षणके प्रा- शुभ मज्जा इनकाभी उपलक्षण हे कर्णके यश्चित्त संक्षेपसे दिखाये ग्रंथ गोरखके भयसे मल आदि छः के भक्षणमें तो आधे प्राय- व्यक्ति २ के प्रति नहीं लिखते अव अशु- चित्तकी कल्पना करनी केश आदिके भक्ष- | असे स्पर्श किये पदार्थ भक्षणका प्रायश्चित्त णमें तो पत्रिंशन्मतमें विशेष कहा है कि कहते हैं उसमें पहिले उच्छिष्ट जो अभक्ष अजा भेड महिष मृग इनके कच्चे मांसके उसके भक्षणका प्रायश्चित्त कहते हैं उसमें और कैश नख रुधिर इनके नानकर भ- मनुको वचन है (अ.११ श्लो. १५५) कि क्षणमें त्रिरात्र और अज्ञानसे भक्षणमें उपवास विडाल, काक, मूसा, कुत्ता, नकुल, इनके होता है और जो प्रचेताने कहा है कि नख उच्छिष्टको और केश कीटसे युक्त अन्नको केश मिट्टी इनके भक्षणमें अहोरात्र भोजनके भक्षण करके ब्राह्मी और सुवर्चलाको एक- अभावसे शुद्धि होती है वहभी अज्ञानसे एक रात्र पावे यहभी जानकर भक्षणमें समझना वार भक्षणके विषयमें समझना और जो और जो विष्णुने कहा है कि पक्षी श्वापद स्मृत्यंतरका वचन है कि केश कीट नख इनके भक्षित बहुतसे रस और अन्न जो सं- मत्स्यका कांटा इनको भक्षण करे तो सोने-स्कार रहितभी है उनके भोजनमें कृच्छ्रपादः से तपाये धोको पीकर उसीक्षणमें शुद्ध होता है करै वह जानकर करनेमें समझना और वहभी मुखमानके प्रवेशमें समझना और जब | अन्न आदिका संस्कार (देव द्रोण्यां०) इस पात्रमें परसा हुआ अन्न केश आदिसे बचनसे देवगव्य शुद्धि प्रकारणमें कहाहुआ दूषित होजाय तो प्रचेताका कहा यह प्रा- जानना और जो शातात ने कहा है कि यश्चित्त जानना कि भोजनके समयमें अन्न, श्वा, काक आदिके चाटे और शूद्रके उ-- मक्षिकाकेशोंसे दूषित होजाय तो जलका १ अन्ने भोजनकाले तु मक्षिकाकेशदूपिते । अ-- १जगवा मास नराणां च विदुराह खर तथा। मजा- नंतर स्पृशेदापस्तच्चान्न भस्मना स्पृशेत् । श्वकुंजराष्ट्राणां सर्व पांचनख तथा । ऋच्याद कुछटं २ कृमिक्रीटपिपीलिकाजलौकापतगास्थिप्राशने गौ- प्राम्य कुर्यारसंवत्सर प्रतम् । मूत्रगोमयाहारविरात्रेण विशुद्धयति । २ अजाविमहिषभूगाणां आममांसभक्षणे केश- केशकीटावपन्न च पिवद्राही सुवर्चलाम् । ३ विडारकाकाम्वच्छिष्ट जम्ध्या श्वनकुलस्य च । नखरुधिरमाशने पुद्धिर्व निरानमज्ञानादुपवासः । ४ पक्षिश्वापदनग्धस्य रसस्यानस्य भूयसः । सं- ३ नखकेशमृलोटमक्षणेऽहोरात्रमभोजनाच्हाद्वैः । स्काररहितस्यापि भोजने कृच्छपादकम् । ४ कैशकीटनखं प्रात्य मरस्यकटकमेव च । हेमतप्त ५ वकाकाद्यवलीशूद्रोटिभोजने त्वति- घृतं पीत्वा तक्षणादेव शुद्धयति ।
मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६३१) च्छिष्ट भोजनमें अतिकृच्छ करे वह अज्ञा-च्छिष्ट भक्षणमें तीनरात्र उपवास करके नसे अभ्यासके विषयमें समझना और जो | ब्राह्मी और सुवर्चलाको पावे और शूद्रके उ- शैखने यावक व्रत कहा है कि कुतेके उ-च्छिष्ट भक्षणमें छः रानतक भोजन न करे च्छिष्टको खाकर एक मासतक और काकके वह अज्ञानसे करने में है और अज्ञानसे उच्छिष्ट गौके सूंघे अन्नको खाकर एक प- अभ्यास होजाय तो दूने आदि प्रायश्चित्तकी क्षतक व्रत कर वह जानकर अभ्यासके वि- कल्पना करनी यहभी पिता आदिसे भिन्नमें पयमें है ब्राह्मण आदिके उच्छिष्ट भोजनमें समझना क्योंकि आपस्तंबकी स्मृति है तो वृद्विष्णुने कहा है कि ब्राह्मण शूद्रके कि पिताका और ज्येष्ठ भ्राताका उच्छिष्ट उच्छिष्ट भक्षणमें सात रात्र पंचगव्य पो भोजन करने योग्य है और जो वृहद्वयास वैश्यके उच्छिष्टमें पंचरात्र क्षत्रियके उच्छि- का वचन हैकि माता भगिनी भार्या और ष्टमें त्रिरात्र और ब्राह्मणके उच्छिष्टमें त्रिगत्र अन्यत्री उनके संग भोजन न करे यदि पंचगव्य पावे वहभी ज्ञानसे भक्षणमें समझना के विषयों है उच्छिष्ट मात्रके भोजनमें तो करे तो चांद्रायण करे वह वचन संगभोजनं और जो यमको वचन है कि ब्राह्मणके संग भोजन करके प्राजापत्यसे क्षत्रियके संग और स्त्रियोके उच्छिष्ट भोजनमें सात रात्र यह आपस्तंबका कहा जानना कि शूद्र अन्नको भोजन करके तप्तकृच्छ्से और वै- श्यके संग भोजन करके अतिकृच्छ्से शुद्ध वचन हैकि ब्राह्मणीके संग वा ब्राह्मणीके तक भोजन न करें और जो अंगिका होता है और शूद्रके संग अन्नको खाकर | उच्छिष्टको जो कदाचित् भक्षण करै तो चांद्रायण कर वह जानकर अभ्यासके वि- उसमें संपूर्ण पंडित जन दोपको नहीं मानते षयमें है और जो शंखको वचन है कि ब्रा- मणके उच्छिष्ट भोजनमें महाव्याहतियोंसे वह विवाह वा आपत्तिके विषयमें है और अंत्यजोंके उच्छिष्ट भोजनमें तो यह आप- जलोंका अभिमंत्रण (पटना) करके पावे | स्तबका कहा जानना कि अत्योंके भोजनसे क्षत्रियके उच्छिष्ट भक्षण में ब्राह्मीके रससे शेष अन्नको खाकर द्विजाति अर्थात् ब्राह्मण पकाये दूधको तीन दिन पावे वैश्यक उ- | क्षत्रिय वैश्य क्रमसे चांद्रायण कृच्छ् अर्द्ध १ शुनामुच्छिटक मुक्त्वा मासमेक प्रती भवेत् । कृच्छ् करें अंत्यावसायियोंके उच्छिष्ट काकोच्छिष्ट गवानात भुक्ता पक्षं व्रती भवेत् । भक्षणमें तो यह अंगिरांका कहा महा २ प्राह्मणः शूद्रोच्छिष्टाशने सप्तरात्र पचगव्य पिये. देश्योच्छिटाशने पचरात्रं राजन्योच्छिष्टाशने त्रिरात्र १ पितुज्येष्ठस्य च भ्रातुच्छिष्टं भोज्यम् । २ माता या भागनी वापि भार्या वान्याश्च योषि- ब्राह्मणोच्छिाशने वेकाहम् । ३ भुक्त्वा सहबाह्मणेन प्राजापत्येन शुद्ध्यात भमुजा तन ताभिः सह भौजव्य भुकता चाहायणी चरेत। सह भुक्त्वान ततकच्ट्रण शुद्ध यति । वैश्यैन सहभु- ३ शुद्रोच्छिष्टभोजने सप्तरात्रमभोजन स्त्रीणां च । यत्वान्नमतिकच्छ्रेण शुद्धयति । शूद्रेण सह भुक्त्वान्न चा- ४ ब्राह्मण्या सह योश्रीयादृच्छि वा कदाचन । तत्र द्रायणमथाचौत। दोष न पश्यात सर्वएव मनीषिणः। ४ ब्राह्मणोंच्छिाशने महाव्याहृतिभिरभिमत्र्या ५ अंत्याना भुक्तभेष तु भक्षयित्वा द्विजातयः । पविक्षत्रियोच्छिष्टाशने ब्राझीरसविपक्केन यह चांद्र कृच्छू तदर्थे च ब्रह्मक्षत्रविशां विधिः । क्षीरेण वर्तयेत् पश्योच्छिष्टाशने त्रिरात्रोपोपितो चाडालपतितादीनामुच्छियनस्यभक्षणे। चांदा. ब्राझी मुवर्चलां पिवैत शूद्रोच्छिष्टभोजने षड्रावमभो-यणं चरीमाक्षवः सातपन चरेत् । पात्रंच निरानंच जनम्। वर्णयोरनुपर्वशः।
(६३२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । सांतपन जानना कि चांडाल पतित आदिके स्नायु अस्थि चर्मसे स्पृष्ट (छूआ) इनका उच्छिष्ट अन्नके भक्षणमें ब्राह्मण चांद्रायण- भोजन करके एक दिनका उपवास करै क्षत्री सांतपन-वैश्य छः रात्र व्रत और शूद्र । सोई शातातपने कहा है कि केश की- त्रिरात्र व्रत करै-आपत्कालमें तो यह परा- टसे युक्त और रुधिर मांस आदि स्पर्शके शरको कहा जानना कि यदि विपत्तिमें ब्रा- अयोग्योंसे स्पर्श किया और भ्रूणहत्यारे- ह्मण शूदके घर भोजन करे तो मनके पश्चा- का देखा-पक्षीका चाटा कुत्ता सूकर गौ इ- त्तापसे शुद्ध होता है और सौ १०० द्रुपदा नका सूंघा-शुक्त (खट्टा) पर्युपित (वासी) मंत्रको जपे-और जो बृहत् शातातपने के- वृथापकाया-देवताका अन्न-हविः (साकल्य) हा है कि पीत जलका शेष जो पात्रमें मुख- इनके भोजनमें उपवास और पंचगव्यका से गिराहो उसको भोजनके अयोग्य जाने भक्षण कर-ये दोनों वचन अज्ञानके विषय- और उसको खाकर चांद्रायण करे-वह व- में है-जानकर तो यह विष्णुका कहा सम- चन अभ्यासके विषय में है क्योंकि निमित्त । झना कि मिट्टीमिलाजल-कुसुम ( फूल ) (दोष ) अत्यंत लघु है, और जो यह वच- फल कंद ईख मूली विष्ठा मूत्रसे दूषित इन न है-कि पीनेसे शेपपानीको ब्राह्मण कदा- सबका भक्षण करके कृच्छू पाद करें और चित् पीकर था वामहस्तसे पीनेसे इनके संसर्गमें अर्धकृच्छ और कृच्छ्रसे शुद्धि विरात्र व्रत करें-यहभी ज्ञानसे पीनेके विष- होती है यहां यह व्यवस्था है कि अल्ल यमें समझना-अज्ञानसे तो आधे प्रायश्चि- । संसर्गमे पादकृच्छ्र और महासंसर्गमें अर्द्ध तकी कल्पना करनी-दीपकके उच्छिष्टमें तो पत्रिंशत् मतमें कहा जानों कि दीप- और क्रियासे दुष्ट और स्वभाव से जो दुष्ट हैं कृच्छ्र करे और जो व्यासने कहा है कि संसर्ग कका उच्छिष्ट तैल और रात्रिमें रथ्या (गलो) उनको जानकर भक्षण करके तप्तकृच्छ करे का लाया पदार्थ और अभ्यंग (उवटना ) यहभी वहां जानना जहां पृथक् अपवित्र रस का शेष इनको भक्षण करके नक्तवतसे प्रतीत होता हो, रजस्वला आदिके स्पर्शमें शुद्ध होता है-अव अशुद्ध द्रव्यसे स्पर्श कि- तो शैखका कहा जानना कि अपवित्र पति- यके भक्षणका प्रायश्चित्त कहते हैं-उसमें त-चांडाल-पुल्कस - रजस्वला-अवधूत- संवर्तकों यह वचन है कि केशकीटसे यु- कुणि-कुष्ठो-कुनखी इनके स्पर्श कियेको क्त-और नील और लाखसे संयुक्त-और १ केराकोटावपन्नं च रुधिरमांसास्पृश्यसंस्पृष्टभ्रूण- १ आपत्कालेतु विप्रेण भक्त शुद्राहे यदि। मनस्ता पेन शुद्धभेत्तु द्रुपदानां शतं जपेत् । भावक्षितपत यवलीढश्वसूकरगयाघ्रातशुक्तपर्णपित- थापकदेवान्नहविषां भोजने उपवासः २ पातशेपे तु यत्किविद्भाजने मुखनिःस्त । अभी- ज्यं तद्विजानीयाद्भक्सा चांद्रायण चरेत् । २ मृद्वारिकसुमादींश्च फलकंदेक्षमलकान् । विमू- ३ पीतोच्छिष्टं तु पानीयं पीखा तुब्राह्मणः क्वचित्। पितान्प्राश्य कृच्छुपाई समाचोत :सनिकृष्ऽ पेत्र निरानं तु व्रत कुर्यादामहस्तेन वा पुनः स्थाव कृच्छ्रस्याच्युचिशोधनम् । ४ दीपोजिट तु यतलं रात्री रप्याहृतं तु यत् । ३ ससर्गदृष्टं यथान नियादृष्टं चंकामतः। भुक्ता अभ्यंगाचैव यच्छिर भुत्ता नक्तेन यति । स्वभावदुष्ट च तच्छं समाचरेत् । ५ येशकीटावपन तु नीलीलाझोपघातितम् । ४ अभेध्यपतितचाण्डालपुल्कमरजस्वलावधूतकुणि सानास्पचर्मसंस्पृष्ट भुक्त्वा तपवसेनः । कुटिफुनखिमाने मुक्त्वा कृच्छू चांद । पंचग- व्याशन च ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६३३) खाकर कृच्छ्र करे-जिसके हाथ नहीं उसे होकर वा फूटे पात्रमें भोजन करे तो सान्त- कुणि कहते है-यह जानकर भक्षणमें जान-पन करे यह वैवस्वतनें कहाहै-तिसी प्रकार ना-अज्ञानसे करनेमें आधा समझना-और इसमें पाराशरनेभी कहा कि भोजनके स्पर्शक अयोन्यसि और अशोची-केश की-लिये एक पंक्तिमें बैठे हुए ब्राह्मगोंके मध्यमें ट इनसे दूपितको खाकर कुशा, गूलर, वेल | यदि एकभी ब्राह्मण भोजनके पात्रको त्याग पनस. कमल, शंखपुष्पी, सुवर्चला, इनके- दे तो ब्राह्मण शेष अन्नको न खाय-यदि काथको पीकर शुद्ध होता है-यह जो विष्णु-उस पंक्ति में जो कोई उस उच्छिष्ट भोजन- ने कहा है वह अशक्त के विषयमें है अथवा को खाले वह प्रायश्चित्त और कृच्छ्र सान्त- रजक आदिके स्पर्श कियेक विषयमें है-शू- पन व्रतको करे-शव आदिसे छूए हुए कूप दआदिके स्पर्श कियेमें तो हारीतका कहा आदिके जलके पीनेमें तो विष्णुने यह कहा जानना कि शूद्रका उपहत ( स्पृष्ट ) भोज- है कि जिस कूपमें पडकर पांचनख वाला नके अयोग्य है और शुद्ध पदार्थके कोटाते (वानर आदि ) जन्तु मर गयाहो वा अ- जो युक्तहै वहभी भोज्यंह-और ब्राह्मणोंके | त्यन्त स्पर्श जिसके साथ हुआहो ऐसे कूप- भोजन करते हुये जहां शूद्र स्पर्श करले | के जलको पीकर ब्राह्मण तीन दिन-क्षत्रिय वा अयोग्य होनेसे भोजन करते हुये ब्राह्म- दो दिन-वैश्य एक दिन-और शूद्र एकरात्र गोंकी पंक्तिमें उठकर उच्छिष्ट परस देवा उपवास करे-ये सब उपवासके अन्त में पंचग- आचमन करले वा जहां निंदा करके ब्रा- | व्यको पावें-“ अत्यंतोपहतादा" इस पदसे ह्मणोंको अन्न दें वहां भोजन करने में अही- | यह समझना कि मूत्र पुरीष आदिसे स्पर्श रात्रका प्रायश्चित्तहै-उच्छिष्ट पक्तिमें भोज- हो गया हो और जव शव (मुद्दी) उच्छून नकाभी यही प्रायश्चित्त है क्योंकि ऋतुकी (गलना) होकर उस कूपमें भिन्न हो जाय तो स्मृति है कि जो द्विज कदाचित् उच्छिष्ट | हारीतने विशेष कहा है कि शवके गलने पंक्तिमें भोजन करै वह अहोरात्र उपवास और भेदन हुये कूप आदिके जलको यदि करके पंचगव्यसे शुद्ध होताहे-और वाम पावे तो शुद्धिके लिये चांद्रायण वा तप्तकृच्छु हाथसे दिये भोजनके विष तो पत्रिंशतके | करे, और जो कोई ब्राह्मण प्रमादसे उसमें •मतका कहा हुआ जानना-कि जो खडा स्नान कर तो जप और त्रिकाल स्नान करता १ भुक्त्वाऽस्पृश्यस्तयाशौचिकेशकीटेश्च दूषित । १ एकपक्युपविष्टाना विप्राणा सह भोजन। यद्यको कु.शोदवरविस्वायैः पनसाम्बुजपत्रकः । शखपुष्पीसु- | पित्यजेत्यावशेषमन्न न भोजयेत् । मोहाद्भजीत यस्तत्र वर्चादिकाय पीत्वा विशुद्धयति । पत्त्यामुच्छिष्टभोजन. । प्रायश्चित्त चरेदिमः कृच्छं २ शूदेणोपहतं भोज्य कीटैर्वा मध्यसैविभिः ।भुजाने | सान्तपन चरेत् । पुतु वा यत्रशद उपस्पृशेर । अनहवारस पक्ता तुभुजा २ मृतपचनखात्पादत्यन्तोपहतादोदकं पीला नेषु वा यत्रोत्यायोच्छिष्ट प्रयच्छेदाचमा कुत्सित्वा | ब्राह्मणघ्यहमुपवसेत् यह राजन्य एकाह वैश्यः या यत्रान दास्तत्र प्रायश्चित्तमहोरात्र । शूद्रो नक्तः सर्वे चान्ते पचगव्य पियेयुः । ३ यस्तु भुक्ते द्विजः कश्चिदुच्छियायां कदाचन । ३ क्लिोभिन्न शवे तोयं तत्रस्थ यदि तत्पियेताशुद्ध अहोरात्रोषितो भूत्वा पचगव्येन शुद्धयति । चांद्रायण कुर्यात्तप्तकृच्छ्रमथापि वा । यदि कश्चित्ततः ४ समुत्थितस्तु यो भुक्ते यो भुक्ते मुक्तभाजने । स्त्रायात्प्रमादेन द्विजोत्तमः । जपंत्रिपवणनायी अहो- एवं वैवस्वतः प्राह भुक्त्वा सान्तपनं चरेत् । रात्रेण शुद्धयति ।
(६३४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । हुआ शुद्ध होता है यह चांद्रायण जानकर पुष्करिणी वा कुंडमें म्लेच्छ आदिके जल- उस कूपके जल पीनेमें हैं जो मनुष्यशवसे | को पीकर जानुतक जो गहरा हो वह शुद्ध उपहत हो और अज्ञानसे तो छः रात्रसम- जानना और उससे जो न्यून होय तो अशुद्ध झना क्योंकि देवले कि यह स्मृति है कि होता है उस जलको जो ब्राह्मण ज्ञानसे वा यदि कूपमें स्थित शव क्लिन्न (गलजाय) भिन्न (फूटना ) हो जाय तो विराबतक अज्ञानसे पावेतो,अज्ञानसे पाने में नक्त भोजन दूध पीवि और मनुष्यशव होय तो दूना कहा और जानकर पाने में अहो गत्र कर रजक है और चांडाल आदिके कूपके जलको पावै । आदिके पात्रके जल पनिमें तो यह परा- तो आपस्तंबका कहा जानना कि चांडालके पात्रके जल, दथि, दूध, को ब्राह्मण क्षत्री शरको कहा जानना कि जो अंत्यजोंके कूप वा पात्रक जलको जो मनुष्य प्रमादसे वैश्य शूद्र प्रमादसे पावै तो द्विजातियोंकी पीता है तो वहां वर्ण २ का प्रायश्चित्त कैसे वृताव ब्राह्मण सांतपन करे क्षत्री प्राजापत्य | ब्रह्मकूर्च उपवाससे, और शूद्रकी उप वास वश्य आधा प्राजापत्य और शूद्र चौथाई वा यथाशक्ति दान करनेसे, शुद्धि होती है प्राजापत्य कर यह जानकर पीने में है अज्ञान और जानकर पीनेमें तो दूना प्रायश्चित्त से तो यह देवलको कहा जानना कि चांडाल- | होता है और अंत्यजोंके खुदवाये जो कूप कूप और पात्रके जलको जो पावै वह तीन तलाव वावडी हैं उनमें स्नान और जलपान दिनमें और शूद्र एक दिनमें शुद्ध होता है | करके प्राजापत्यसे शुद्धि होती है यह और चांडाल आदिके संबंधवाले अल्पज | आपस्तंवको वचन अभ्यासके विषयमें स- लाशयोमभी कूपके समान शुद्धि है क्योंकि मझना और जो यह आपस्तम्बने चांडालके यह विष्णुको स्मृति है अल्प २ जलके स्थान कूप आदिके जलपानमें पंचगव्य पाना और स्थावर जो पृथिवी पर हैं उनकी शुद्धि कहा है वह अशक्तके विषयमें समझना कि कूपके समान है और जो महान् ( पडे) है। प्याऊ घनका घट सोद्रोणि (छोटीतलैय्या) और कोशसे निकसा जल उनमें दूषण नहीं है और पुष्करिणी (पावडी) चाहालके हाय तो जल पीकर पंचग- श्नपाक आर आदिमें यह आपस्तंवका कहा जानना कि | व्यसे शुद्धि होती है प्याऊ पर जाकर जो सरिन भिन्नं शरं चैत्र कृपस्य यदि जायते । पयः | जलके विना (धूल आदिसे ) शरीरको सी- पियन्त्रिराग मानुगे द्विगुण स्मृतम् । चता है वह एक दिन उपवास करके सचेल. २ चांडालकूपभांडस्य नरः कामाचल पिये। १ हस्थमंत्यजाना तु जल दाध पयः पित प्रायश्चित कयं तत्र वगैरणे विनिदिशेत् । चौरसांतपनं । ग्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूधैव प्रमादतः।मम!पवा- विमः प्रागापयं च भूमिः । तदर्धे तु चरेश्यः शूद्र सेन द्विजातीना तु निष्ठतिः ।शूदस्य चौपवासेन तथा पार विनिर्दिशद । दानेन शक्तितः। ३ पांडालरुपभांहस्थमज्ञानादुदकं पियेत् 1 स तु २ अंत्यजे: खानिवाः पास्तागो वाय एगच । त्र्यहेग शुदपेत दस्तेफेन शुमति । एष धारया च पीत्वा च प्राजापोन शुदति । ४ जलाशयेणया पेषु स्पारेषु महोतले।कृपयरक ३ प्रपास्सरण्यघटयो प सादोगो जलं फोक्ष- पाशुदिमहन्म तु न दूपणम् । विनिर्गतं धावपाकचाण्डालपरिग्रहेषु पीता जल पंच- ५ म्लेच्छादन गलं पीला पुष्करिभ्यो देपि वा। गव्येन शुभेत मांगतो पिना तोय कीर यो निर- जानुस् एगि यमपरतारपि स्मृतम् । तत्तोय यः | पति । एकादक्षपन का संचल भानगायोय। पिपटिश कामतोऽकामतोऽपिस । मकामानतमीजी | सुरापटमपातीय पीत्या नायं मल तया । अहोगा- मादोराय तु पामतः। पितो मत्ा पंगगर्य जलम्पिन्न । .
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६३५) स्नान करें सुराका घट और प्याज नवका ] कालसे दुष्टके भक्षणका प्रायश्चित्त कहते हैं इनके जलको पीकर अहोरात्र उपवास कर- | पर्युषित अन्न और दश दिनके भीतर गो. के पंचगव्यसे शुद्धि होती है, अब भाव- ( आदिका दुग्ध कालदुष्ट कहाता है अज्ञानसे दुष्टका जो भक्षण उसका प्रायश्चित्त कहते हैं | उसके भक्षणमें शेषोंमें एक दिनका उपवास वर्णका आकार विसदृश (भिन्न रूप ) हो करें यह मर्नुका कहा प्रायश्चित्त जानना- कर जो शरीरके मल आदिकी वासनाको जानकर भक्षणमें तो यह शंखका कहा प्राय पूरी कर वा शत्रुके दिये विपकी शंकाको करें श्चित्त जानना कि जिनमें घी आदिन हो ऐसे वह भावदुष्ट कहाता है उसके भक्षणमें पा- | केवल शुक्त और पर्युषित (नासी) अन्न और. राशरेनें यह कहा है कि वाग्दुष्ट भावदुष्ट | ऋजीप (लोहपात्र ) में पका हुआ अन्नको और भावसे दुष्ट पात्रके अन्नको ब्राह्मण खा- | खाकर तीन पत्र व्रत करे दश दिनके भीतर कर त्रिरात्रमें शुद्ध होता है यह वचन जान | गोके दुग्ध आदिके पानेका प्रायश्चित पहिले कर भक्षणमें समझना और जो गौतमैने पंच- | दिखाय आये नवीन जलके पाने में तो पंचगव्य नखोंसे भिन्न भाव दुष्टके भक्षणमें वमन और | पौवे क्योंकि बृहद्याज्ञवल्क्य की स्मृति है घृतका भक्षण कहा है वहभी अज्ञानके विष- कि सौंग अस्थि दांत शंख शक्ति कपर्दिकर यमै समझना शंकामें तो वासष्ठका कहा प्राय- (कोडी) इनके पात्रों में और नवीन जलको श्चित्त यह जानना कि अभोज्य और अभ- पीकर पंचगव्यसे शुद्धि होती है जानकर क्ष्यको शंका पैदा हो जाय तो भोजन शुद्धि- पावे तो उपवास करै क्योंकि स्मृत्यन्तरमें को, कहते हुए मुझसे सुनो जिसमें खारा , यह देखते हैं कि वर्षाकालका नवीन जल लवण न हो ऐसी सूखी सुवर्चला( ब्राह्मी ) व | शुद्ध है उसे तीन दिन न पावै और वर्षासे शंखपुष्पीको ब्राह्मण तीन दिन पारे अथवा | भिन्न कालमें दश दिन न पावं, पौवे तो अहो ढाक वेलके पत्ते कुशा पद्म गूलर इनका साथ रात्र भोजन करे ग्रहण कालके भोजनमें तो करके जल पावे तो त्रिरत्रमें शुद्ध होता है चांदायण करे क्योंकि शातातपको स्मृति मनभी अभोज्यके भोजनकी शंकामें कहा है | है कि नवश्राद्ध ग्रामयाजकका अन्न ग्रहण (अ. ५ श्लो. २१) कि ब्राह्मण अज्ञानसे | स्त्रीयोंके प्रथम गर्भका भोजन इनको करका 'ओर विशेष कर जानकर भोजनकी शुद्धिके | चांद्रायण करें और जो ग्रहणसे भिन्न निपि- लिये वर्ष दिनमें एकही कृच्छूको करें अब १ वाग्दुष्टं भावदुष्ट च भाजने भाइपिते भुक्त्वा- १झेपेप्पवसेदहः । बाह्मणः पश्यात्रिरत्रेण विशुद्ध्यति । २. केवलानि च शुक्तानि तथा पर्युषितं च यहाऋ.. २ प्राक पंचनखेभ्यश्चर्दन घृतप्राशन च । जीपपक्क भुक्त्वा तु विरात्रं तु व्रती भवेद । ३ शकास्थाने समुत्पन्ने अभोज्याभक्ष्यसहित । ३ शृगास्थिदंतः पाचैः शंखतिपदकः पिता आहारशुद्धि वश्यामि नन्मे निगदतः शृणु । अक्षार: नवोदक चैव पंचगयेन शुद्धति । लवर्णा रूझा पिवेदूवाझी मुवर्चलां । निरानं शंखपुष्पी वा ब्राह्मणः पयसा सह । पसाशविल्वपत्राणि कुशान्प. ४ काले नवोदक शुद्ध न पिच त्र्यहं हि तत् ।. धमुदुम्परम् अपिपत्काययित्ता निरात्रेण विशुद्धयति । अकाले तु दयाहं स्मातीला नावाददनिशन् । हमरस्यैकमपि चोर द्विजोत्तमः। अज्ञा ५ नवपार्टी प्रामयाजतन्न संग्रहभोजन । नारीगां. तमुक्त शुद्धयर्थ जानस्य तु विशेषतः । प्रयमे गर्ने भुक्ता शदायण चोत् ।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । द्ध कालमें भोजन करे तो मार्कण्डेयेने यह एक दिन उपवास करै अव गुणसे दुष्ट शुक्त कहा है कि चंद्रमा और सूर्यका जिस दिन ग्र- आदिके भक्षणका प्रायश्चित्त कहते हैं उसमें हणहो उसदिन ग्रहणसे पूर्व भोजन न करे और मन (अ. ११ श्लो. १५३ ) ने कहा है कि सूर्योदयसे पहिले तारागणकि दीखते और शुक्त और कपाय और अपवित्र वस्तु इनको सूर्यके अस्त होनेसे भोजन न करे और न उद- पीकर इतने अप्रयत ( असावधान ) होता यसे पूर्व भोजन करे चंद्रमाका ग्रहण प्रहरके है इतने वहनीचे नही निकसता अज्ञानसे तो अनंतर होय तो आवर्तन ( मध्यान्द ) से जो एकदिन उपवास मनुका कहा है वह जा- पूर्व भोजन न करे प्रथम प्रहरमें ग्रहण होयतो नना-जानकर करनेमें तो शंखका कहो जा- प्रथम प्रहरसे पहिले भोजन न करे और नना कि केवल शुक्त पर्युषित अन्न ऋची - अपराह्न मध्याह्न सायाह्न संगवमें भोजन पक्व (लोहपक) इनको खाकर तीन रात्रग्रत 'न करें और संगवमें ग्रहण होय तो पहिले | करै यहभी आमलक आदि फलसे युक्त भोजन न करें जो मनुने कहा है कि सं- कांजी आदिसे भिन्न विषयमें जानना क्यों धिक समय अत्यंत प्रभात अत्यंत सायंकाल कि यह स्मृति है कि जो कुंडी फलसहित में भोजन न करे इत्यादि और जो वह बृहत घरमें रक्खी हो उसकी कांजी ग्रहण करनी शतातपैने कहा है किधान दधि सक्त इनको अन्य पात्रको कदाचित् ग्रहण न करनी ओर लक्ष्मीका अभिलापी रात्रि वर्ज दे और न जिनका स्नेह निकास लिया हो उनमें तो यह तील मिला भोजन न तिलासे स्नान वृद्धि गौतमकों कहा प्रायश्चित्त जानना कि जि- मान् मनुष्य कर इत्यादि जो ऐसे हैं जि- नौसे स्नेह निकास लिया हो ऐसे विलयन नका प्रायश्चित्त नहीं कहा उनमें योगीश्वरके (घीका मल ) पिण्याक ( खल ) मथित कहे सौ प्राणायाम जानने कि सबपापोंके (मठा ) इनको तब न भक्षण करे जब इ- दूर करनेके और उपपातक और प्रायश्चित्त नका सारांश निकल गया हो और पंचन- न कहा हो उस पापकी निवृत्तिके लिये सो खोसे जो पूर्व कहे हैं उनके भक्षणमें वमन प्राणायाम कर और अज्ञानसे करनेमें तो म- कर दे और घृतका भक्षण कर नहीं होने नुको कहा उपवास जानना कि शेष पापोंमें हुये अन्नक भक्षणमें तो लिखितँने कहा है १ चदस्य यदि या भानोस्मिनहनि भार्गव । ग्रहणं तु भवेत्तस्मिन एवं भोजनप्रिया । नाचरेत ५ शुक्तानिच कपायांश्च पीलामध्यान्यपि द्विजः। सग्रहे चैव तवास्तमुपागते । यावत् स्यानोदयस्तस्य तावद्भवत्यप्रयतो यावत्तन प्रनत्यधः । नाभीयातारदेय तु । ग्रहणं तु भवेदिन्दोः प्रथमादधिया ६ केवलानि च शुनानि तथा पर्युपितं च यत् । - मतः जीतावर्तनासु प्रयमे प्रथमादधः। अपरहेन चीपपक्क मुफ्ला च निरानं तु प्रती भवेत् । मध्यादै सायादे नतु सगरे । मुजीत सग चेत् स्थान ७ कुंडिका सफला येषु गृहेषु स्थापिता भवेतति- से भोजनकिया। स्थास्तु काजिका ग्राह्या नेतरस्याः कदाचन । २ नाभीयाधिवेलायां नातियगे नातिसार्य । ८ उद्धतहविलयनपिण्याफमथितमभृतानि चात्तवी- २ धानादधिच सक्तध ग्रीकामा वर्जयेनिशिमो, योगिनाश्रीयातू-माक्पयनखेभ्यन घृतप्राशन प। जन तिटसरद मानं चैव विचक्षणः। ९ यस्य चामी न शिरते यस्य पानं न दीयते । न ४ भागापामशतं फार्य सम्पापापनुत्तरे । उपपा- ! तोग्य द्विजातीनां मुमता चौपरसदहः। याहसर- तकतातानामनादिरस्य व हि। सयावणयमापूपरामुलीः । आहितामिाजी भासा ५शरपूर रसेदः । प्राजापत्यं समायो - मायश्चित्वाध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६३७) - कि जिसमेंसे होम न किया हो, वा दिया न हाथमे दिये भोजनमें ब्राह्मणसे भिन्नके समी- हो वह भन्न दिजातियोंको भोजनयोग्य नहीं पमें भोजनमें दुष्टोंकी पंक्ति और पक्तिसे प्र- यदि भोजन करें तो एकदिन उपवास कर यम भोजनमें और उवटना किये मलमूत्र कृसर संयाव पायस शकुली वृथा (देवताके करनेमें और मृतक सूतकम, शूद्रा के निमित्त न होम ) जो येहैं उनको खाकर भोजनमें और शुद्रोंके संग सोने में विरात्र अग्निहोत्री द्विज प्राजापत्य करे और अग्नि- भोजन न करे और पर्यायका अन्न दनेमें होत्रीसे भिन्नको तो पूर्वोक्त मनुका कहा र-तो यह वृद्धयाज्ञवल्क्यका कद्दा जानना पवास जानना और भिन्न (फूट) पात्रमें कि ब्राह्मणके अन्नको शद परसे और शू- भोजन करे तो संवतंने कहा है कि शूद्रोंके द्रके अन्नको ब्राह्मण परसे तो ये दोनों अन्न वा फूट पात्रोंमें भोजन करके अहोरात्र उप- अभोज्य हैं इनको खाकर एक दिन उपवास वास और पंचभव्य पौनसे शुद्धि होती है तै- कर शुद्धके हायसे भोजनमें तो यह ऋतुका, सेही अन्यस्मृतिमभी कहा है कि वह आख कहा जानना किसके हाथ जो भोजन करें पीपल इनके और कुंभी (तरबून) तेंद् को-' वा कदाचित् पानी पावं तो अहोगन उपवास विदार कदंब इनके पत्तोंमें भोजन करके चां- ' करके पंचगव्यसे शुद्ध होता है धमन (फू- द्रायण करें औ दाक पद्म इनके पत्तीम खा- ' क मारना) से दुष्टमें तो यह उसनेहीक- कर गृहस्थी ऐंदव कर और वानप्रस्थ और हा है कि आसनपर आरूढ पाद (उकडू) संन्यासी चांद्रायणके फलको प्राप्त होते है होकर या आधी पोतोको भोटकर या मु- अर्थात् उनको इन पत्तैमें भोजनका निधन खसे धमन करक जो भोजन करता है वह ही है अब हायसे दिये आदि क्रियादुष्ट सांतपन कृच्छ करे पिता आदिके निमित्त अभोज्य अन्नके भक्षणमें प्रायश्चित्त कहते है दिये अन्न (श्राद्ध ) के भोजनमें तो यह उसमें पराशरका वचन है कि माक्षिक (स भारद्वाजा कहा जानना कि पार्वणश्रा- हत) फागित (ईखक रसका विकार) में भोजन कर तो छः प्राणायाम करें त्रि- शाक गोरस लवण घृत हायसे दिय इनको मास और वर्षी पर्वतके भोजनमें उपवास खाकर एकरात्र भोजन न करेगानकरभक्षण करे वृद्धिश्राद्ध (नांदीमुख ) में तीन प्रा- करने में तो यह हारीतका कहा जानना कि मामगात्र पदमा मान्न सामना पाया। एकागो भाजनेभुराभुरला पामिनभानने। मतदमोय म्याडमया तपादयः । अरोगनोलो भाग पंपगमेन गुरमीत । २ अहम्नेन यो भुत्ते. पानाच या बिगनिन । २ पटायरमेषु भातिदुरुपयः । को. अहोरामेरितो भूता पगगयेन शहमति । सरकारे माता पास गोता। पाय ३ भागमापादो वा यनामाता या मलेन ग्रही भीमा परेर पानी निमो घमिन मुगा गिरनं घरेष पादिक परम्। भने नया मागापामान् परावद। ३माक्षिा पाना मोम साप मन । THपिनामा पत्मानिन- समसनि भाता तु दिनभरभीमनन । प्रसादीरात्र माने । भगोरगृत मनमviEnोरे मोनने दुस- नमानो तानमात्रि - निभने पभोशागार जनेदाप रमन सपने मान- मा मो. हसने साम- कोरियामा बिनाः शित भोदरम् । पनीमारमा गांगरल पोर।
(६३८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकारासहित । णायाम और सपिंडीमें अहोरात्र उपवास नित्यके श्राद्ध में एक दिन उपवास करे- कर और असरूप (भिन्न वर्णका वा विधिसे क्षत्रीआदिके श्राद्धमें विना आपत्ति भोजनमें हीन) में नक्त और तैसेही व्रतकी पारणामें | तो वहांही विक्षेप कहा है कि नवश्राद्धमें भोजन करे तो नक्तव्रत करे यही प्रायश्चित | चांदायण-मासिकमें पपक पक्षिकमे सांत- क्षत्रियकमें दूना वैश्यकेमें तिगुना और पन द्वैमासिकमें कृच्छ करना क्षत्रियके नव- साक्षात् शूद्रके भोजनमें चौगुना कहा है श्राद्धमें यह व्रत कहा है और वैश्यके और अतिथीके द्वारपर टिकनेके समय | श्राद्धमें क्षत्रियोंसे आधा अधिक बुद्धिमानोने 'जो द्विण जल पीते है वह जल रुधिर होता | कहा है-शूद्रके तो नवश्राद्ध में दो चांद्रायण है उसको पीकर चांद्रायण करें और और मासमें डेढ चांद्रायण और त्रिपक्षमें हारीतने भी कहा है कि एकादशाह और ऐंदवव्रत-दोमासमें पराक उसके आगे सांत अस्थिसंचयनमें अन्नको खाकर विधिसे | पन कहा है-और जो शंखका वचन है स्नान और उपवास करके कूष्मांडीमंत्रसे घी की कि नव श्राद्ध में चांद्रायण-मासिकमें पराक आहुति दे विणनेभी कहा है कि नवश्रा- त्रिपक्षमें अतिकृच्छ छः मासमें कृच्छ्र- द्धमे प्राजापत्यु आद्यमासिक श्राद्ध में पादोन वार्षिकमें पादकृच्छ्र-पुनः आब्दिक ( दूसरा- प्राजापत्य और विपक्षमें आधा प्राजापत्य वर्ष ) में एक दिन उपवास इससे आगे करै द्विमासिक श्राद्ध में पंचगव्य पी वै यहभी शंखके वचनानुसार दोष नहीं-- वह वचन आपत्तिके विषयमें है विना आपत्तिमें तो उस मनुष्यके श्राद्धोमें है जो सर्प आदिसे यह होरीतका कहा जानना कि नवश्राद्धम | मराहो-अथवा जो चोर पंतित कीव आदि चांद्रायण और मिश्रकमें प्राजापत्य और पु- पंक्तियाह्य हैं उनके विपक्ष में है क्यों कि राणे श्राद्धोंमें एक दिन उपवास और प्रा- इन वचनोंसे भरद्वाजने गुरु प्रायश्चित्त कहा जापत्य करे यहां मिश्रक शब्दसे आद्यमा- सिक लेते हैं-द्वितीय मासिक आदिमें तो १ चांद्रायणं नवश्राद्ध पाको मासिके स्मृतः । यह पत्रिंशन्मतमें कहा जानना कि नवनवाद व्रतमेतदशहतम् शस्पार्धाधिक प्रोक्त पक्षिके सांतपनं कच्टो मा सइये स्मृतः। क्षत्रियस्य श्राद्धमें प्राजापत्य-आद्यमासिकमें पादोन- क्षत्रियात्तु मनीषिभिः । अस्य तु नवश्राद्धे चो: त्रिपक्षकेमें उसका आधा-द्वैमासिकमें प्राजा- | चांद्रायणद्वयम् । सार्ध चांदावण मासे विपक्षे बैन्दवं पत्यका पाद और छः मास और वार्षिको । व्रतम् । मासये पराकः स्याद सातपनं स्मृतम् । पादोनकृच्छ्र-और अन्यमासोंमें निगत्र और २ चांद्रायण नवश्राद्धे पराको मासिके स्मृतः। पर १ एकादशाहे भुस्यान भुक्त्वा सचयने तथा । ज्येतिकृचः स्यात्पग्माते कृच्छ्र एव तु । आन्दिके उपोप्य विधिवत् स्नाला फूष्मांडैर्जुयादतम् । पादच्छः स्यादेकादः पुनराब्दिक अतअन दोषः २ माजापत्य नवनाद्धे पादौन चाधमासिके । प-! स्याच्छखस्य वचन यया । सिके तदर्थ तु पचगव्य द्विमासिके। ३ चांडालाटुदकारसपीब्राह्मणाद्विशतानी इंष्टि- ३ चांद्रायणं नवना प्राजापत्यं तु मिझके । ए भ्यश्च पशुभ्यश्च मरणं पापकर्मणाम् । पतनानाशकचैव काहस्तु पुराणेषु प्राजापत्य विधीयते । विषोद्वधनकस्तथा। भुवयां घोडशश्राद्धे कुर्यादिंदु, ४ प्राजापत्य नवनाद्वे पादौनं चायमासिके । प- प्रतं द्विजः । अक्तियान्यनुदिश्य प्रादमेकाशिनि । क्षिके तदधैं स्यात्यादी मासिके तथा । पारोनकच्छ ग्रामगस्तत्र भगवान शिशुनांदायणं परत । भाम- 'निदिष्ट पण्मासे च तथा द्विय । चिरात्रं चान्यमासेषु पाटे तथा भुक्रवा तप्तकच्ट्रेण शुद्धपति संकल्पिते प्रत्यई चैदहः स्मृतम् । । ता भुक्ता निराक्षपणं भवेद। .
मायश्चित्ताध्याप प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६३९) है कि चांडाल जल सर्प ब्राह्मण बिजली सका चूडाकर्म होचकाहो उसके और नाम दाढवाले पशु-इनस पापियोंका मरण होता करणसे प्रथमके और जातकर्मके श्राद्धमें- ह-पतन (गिरना ) अनशन-विप-रद्वधन | भोजन करके सान्तपन कर-इससे अन्य (द) इनसे जो मरे हों-इनके श्राद्ध संस्कारोंमें भोजन करता हुआ निषिद्धभोजी भोजन करके दिन इंदुव्रतको करे तसेही दिन-गुरुकी आज्ञाके अनुसार शुद्ध होता है अपक्तियोंसे अन्योंके उद्देश (निमित्त) से सीमन्तोन्नयन आदिमें तो धीम्यने विशेष एकादशाहके दिन ब्राह्मण श्राद्धको खाकर शिशुचान्द्रायण करें- आमश्राद्ध में भोजन कहा है-ब्रह्मौदन-सोम सीमन्तोन्नयन-जा- करके तप्तकृच्छ्रसे शुद्धि होती है और तश्राद्ध-नवश्राद्ध-इनमें भोजन करता हुआ संकल्प किये श्राद्ध में भोजन करके द्विज चांद्रायण करै-यहां ब्रह्मोदन पदसे भोजनके विना, तीनरात्र विताव-ब्रह्मचा- सोमके साहचर्य से यज्ञका अंगकर्म लेना- रियोंमे तो बृहत्यमने विशेष कहा है | अब पग्ग्रिह-अशुचि अन्नके भोजनका प्रा- कि जो दिन व्रतनकी समाहिसे पहिले । यश्चित्त कहते हैं-जो स्वरूपसे निषिद्ध न मासिक आदि श्राद्धोम भोजन करे उसको हो और किसी विशेष पुरुषकै सम्बधसे अ- -तीनरात्र उपवास प्रायश्चित्त कहा है-और भोज्य कहा जाय-उसमें योगीश्वरने अग्नि- तीन प्राणायाम और घृतका भक्षण करके हीनके विना दिये अन्नको आपत्तिके बिना शुद्ध होता है-यह अज्ञानके विषय में है भोजन न करें-इस शोकसे लेकर-साढपांच जानकर भोजनमेभी उसनेही कहा है तो जो मधु मांसका श्रन्द्र और सूतकमें भोजन | श्लोकतक जिनका अन्न भोजन नहीं करना करे वह प्राजापत्य व्रत करके शेष व्रतको वेकहे हैं और मर्नु (अ. ४ श्लो. २०५-२१७) समाप्त कर-आमश्राद्ध में तो सर्वत्र आधा | नेभी कुछ अधिक वेही कहे हैं कि वेदपाठीसे प्रायश्चित्त है क्योंकि पत्रिंशत् मतमें आम-भिन्न के किये यज्ञमें मामयाजक-स्त्री नपुंसक आद्धमें सर्वत्र आधा प्रायश्चित्त कहा है-और १ौदने च सोमे च सीमंतोन्नयने तथा । जात- जो उशनाने कहा है कि श्राद्धका भोक्ता श्राद्धे नत्रया द्विजश्चांद्रायण चरेत् । द्विज-गायत्री पढकर दुशवार जुल पावै-फिर संध्या करने से शुद्ध होता है-वह वचन मिया लोधेन च हुते भुजीत ब्राह्मणः क्वचित मत्तऋद्धा- २ नाश्रोत्रियतते यज्ञे मामयाजिहुते तया । उस श्राद्धक विषयमें है जिसका प्रायश्चित्त नहीं कहा-संस्कारका अंग जो श्राद्ध उसके तुराणान्नु नभुंगीत कदाचन । गणान्न गणिकान्न च वि- भोजनमें तो न्योसने विशेष कहा है कि जि- दुषा व जुगुप्सित स्तेनगायकयोश्चान तर गो वाषि- कस्व च । दीक्षितस कदर्यस्य यस्य निगःस्य च । १ मासिकादिषु योश्रीयादसमाप्तवतो द्विजः । त्रि- अभिशप्तस्य पंढस्य पुंधल्या दाभिकस्य च। चिकि- समकामस्य मयादित विषपाते। मणमय सकस्य मृगयोः परस्याच्छिष्टाजिनः । उग्रान्न सू- कृत्वा घृत प्राश्य विशुद्ध्यति । २ मधु मांस च योनीयाच्याद सूतकमेव वा। तिकान्न च पर्यायान्नमनिर्दशम् । अनचितं पृथा मांस- माजापत्य चरक मतशेष समापयेत् मवीरापाश्च योषितः द्विपदन्न नगर्यन पतितानम- ३ आमश्रादे तदद्धन्तु प्राजापत्य तु सर्वदा । वक्षुत । पिशुनानृतिनोचैर ऋतु विपिणस्तथा । श- ४ दशकृतः पिचापो गायया यादभुक् द्विजः। ट्यतंतुवायान्न कृतनस्यानमेव च । कारस्य विषादस्य ततः संध्यामुपासीत अध्येत्तु तदनन्तर । रगावतरणस्य च । सुवर्णकर्तुणस्य दाखविप्रायिणस्तया। ५ निवृत्तचूडाहोमे तु प्रानामकरणात्तथा । यातां शौष्टिकाना च चैलनिर्णजकस्य च । रजकस्य • चौत्सान्तपनं भुक्त्वा जानकर्मणि चैव हि अतोन्येषु तु | नृशंसस्य यस्य चोपपतिरहे । मृणति ये चोपगते मुस्तान संस्कारेषु द्विजोत्तमः । नियोगादुपसिन । नीजितानां च साशः भानर्दशं च मेतान्नमतुष्टि- मुदत निन्यभोजनः । करमेव च । । - (६४०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । पठकर इनके किये होममें ब्राह्मण कदाचित् भोजन खाकर कृच्छ कर-पैठीनसीनेभी अज्ञानसे न करै-मत्त क्रोधी रोगी इनके यहां भोजन तीन रात्रही कहा है कि कुनखी श्यामदंत- न कर-गण (समुदाय-चंदा-) का और पिताके संग विवादी-स्त्रीजित-कुष्ठी-पिशुन- वेश्याका अन्न और बुद्धिमानोने निंदित जो सोमका विक्रयी-वाणिजक (व्यापारी) ग्रा- कहा वह अन्न-चोर-गानेवाला-बढई वाधु- मंका याजक-अभिशस्त-शूद्रका पुत्र-परि- पिक ( जो व्याजसे जीवे )-दीक्षित-कदर्य वित्ति-परिवेत्ता-दिधिषका पति-पुनर्भूका पुत्र- बंधा हुआ (जिसके बेडी पडीहों) अभि- चोर-कांडपृष्ठ-सेवक-ये सब अभोज्यान हैं शस्त (जिसे हिंसाका दोष लगाहो) पंढ | अपांतेय, श्राद्धके अयोग्य, हैं इनका अन्न (नपुंसक ) पुंश्चली (व्यभिचारिणी ) दां- खाकर-देकर-अज्ञानसे त्रिरात्र होता है- भिक (डिभधारी ) चिकित्सक (वैद्य) | शंखने तो कुछ अधिक मृगयु (हेडी) क्रूर स्वभाव-उच्छिष्टका भाजी- चांदायण कहा है वह अभ्यासके विषयमें उम्र (प्रचंड) भूतिका-पर्यायका-दशदिनसे समझना-गोतमनें तो उच्छिष्ट पुंभली अ- प्रथम सूतकका और अनर्चित वृथामांस | भिशस्त इत्यादिसे अभोज्य है अन्न जिनका (जो देवताके निमित्त न पकाया हो) और उनको पठकर पंचनखोंसे पूर्व २ के भक्ष- जिसके पति न हो ऐसी स्त्रीका अन्न-शत्र, | णमें वमन और घृतका भक्षण प्रायश्चित्त क- नगरी, इनका अन्न पतितका अन्न अवक्षुत | हा है वह आपत्तिके विषयमें है जो बलात्कारसे (जिसपर छिका हुयी हो ) अन्न-पिशुन खाता है उसके लिये आपस्तंबने विशेष क- (चुगल) झूटा इनका अन्न-यज्ञ विक्रय हा है कि जिनको म्लेच्छ चांडाल चोरोंने करनेवालेका अन्न नट तंतुवाय (जुलाहा वा कोली) कृतघ्रकार (लुहार ) निपाद १ कुनखी यात्रतः पित्रा विश्रदमानः खोजित:- रंगरेज-सुनार वेण-शस्त्र वचनेवाला-कुत्ते- कुष्टी पिशुनः सोमश्रियी वाणिजको प्रामयाजकोऽ- वाले, शौटिक (दिसक) धोपी-रजक-नृभिशरलो पल्यामभिजातः परिवित्तिः परिविंदानो शंस (कर) जिसके घरमें जार रहता हो । विधिपतिः पुनर्भपत्रधारः पांडः सेवकोप- और जारको सहतहों- जिनको बोने जीत भाग्याना अपनिया अश्राद्वाहीः एषां भाला दत्ता लिया हो इन सबका अन्न और दश दिनसे या अपितानात्रिरात्रम्। पहिले प्रतका अन्न और जिससे मनको । २ मार पंचनभ्यार्दनं धृतमारानं च। प्रसन्नता न ही ऐसा अन्न-इतने अन्न भो- जनके अयोग्य है-इस विषयक पदार्थ अभ- ३ पलादासता ये तुम्टेच्छचोटालदायभिः । क्ष्य कांटमें कद आये है-इसमें प्रायभित अशुभ कारिताः कर्म गरादिमापिदिसनम्। चार- मने (भ. ४ श्लोक १२२) ने कहा है कि , पामाभिपस्यभक्षा मातस्त्रीलाय तथा संगरताभिय मार्जन भाव सपोरिधरस्प मोजनम् । सरोगविरादा. अज्ञानसं इनमस किसी अन्नको भक्षण ! सहभोजनमामामोति जिजाता तु माजाम - कर तीन दिन उपवास कर-और गानकर धनम् । गांदा साहितामः परापरतापवा भाव। पूर्वाका भोगन, और वीर्य विष्टा मृगको , alream वानरमपन्सवितः I Rरोपित: शमीमाताई पायं. पिन्त । माममायोगिता : भरमसम्मानममायाक्षान पाई । मत्या व मुदत संसराप्य माधम भरता परमोरियमेर प । हिमोत्तमः सभासदाम मिति मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६४१) बलसे दासकर लिये हैं और उनसे गोहिंसा भोजन करके द्विज सांतपन कर-क्षत्रियके आदि अशुभ कर्म करा दिया है और उच्छि- अशौचमें तप्तकृच्छ्र-वैश्यक अशीचमें म- टका मार्जन या भोजन करा दिया है वा हा सांतपन-और शूद्रके अशौचमें भोजन खर-उंट-विवराह इनके मांसका भक्षण क- | करके तीन मासका व्रत कर-और जो शं- रायाहो-और उनकी स्त्रियोंका संग और खने कहा है कि शूद्रके सूतको भोजन क- स्त्रियोंके संग भोजन किया होय तो, द्विजा-रके छः मासतक व्रत करे-और वैश्य- तियोंका शोधन उनके संग एकमासके वा- के सूतकर्मभी तीन मासतक व्रत समें प्राजापत्य है-और आहिताग्निका चां- | और क्षत्रियके अशोचमें दो मासका व्रत द्रायण वा पराक होता है-और वर्षदिनतक और ब्राह्मणके अशीचमें भोजन करके वास करके चांद्रायण वा पराकको करै-और | एक मास व्रत करै-यह वचन अभ्या- शून वर्षदिन वास करके पक्षभर जो पीवे वा सके विषयमें है और यह प्रायश्चित्त अशा- शूद्र मासभर घास करके कृच्छपादसे शुद्ध चके अनंतर जानना क्योंकि विष्णुकी यह होता है और वर्ष दिन अधिक वास करने स्मृति है कि जो ब्राह्मण आदिकोंके अशा- में तो द्विजों में उत्तम प्रायश्चित्तकी कल्पना चमें एक वारभी भोजन करता है उसको करें-और तीन वर्ष चांडाल आदिकोंके संग उतनाही अशीच है जितना टनको होता है से तो उनकेही भाव (जाति) को प्राप्त | और अशौचके बीतने पर प्रायश्चित्त करे- हो जाता है-आशाच जिसको है उसके ग्र- जिसके पुत्र न हो उस आदिके अन्न भक्षण हण किये अन्नमें तो छागेलने कहा है कि करनेमें तो लिखितने कहा है कि व्याजलेने अज्ञानसे सूतक वा मृतकका भोजन करने वाला व्रतहीन और पुत्रहीन और शुद्र इनक में सो प्राणायाम करके शूद्रके सूतक-त्रा- अन्नको खाकर तीन रात्र भोजन न करें ह्मण शुद्ध होते ह-वेश्यके सूतक, साठि सेहि जो पराये पाकसे निवृत्त है और जो ६. और क्षत्रियके सूतक, वीस-और बा- पपये पाकमें तत्पर है भार अपच इनके ह्मणके सूतकमें दश प्राणायाम करें और अन्नको खाकर द्विज चांद्रायण कर यहभी ब्राह्मण आदि क्रमसे एक-तीन-पांच-सात । अभ्यासके विषयमें है परपाकनिवृत्त भादि रान भोजन न करें फिर इनकी शुद्धि पंचगव्य पीनेसे होती है-पदभी अज्ञानके १ शुद्रस्य सूतक मुरत्या परमासान्त्रतमारय । विषयमें समझना-जानकर भक्षणमें तो मा- वैशस्य तु तया भुक्तानीन्मासान्त्रतमांगरेत् । क्षत्रि. कंडेय ने कहा है कि ब्राह्मणके अशॉचमें यस्य तदा मुस्ता तामामा इतमापरेन् । प्रानगरप १ अज्ञानादानने शिः सूतके मृतयेति वा । तयागोचे भुक्ता माम प्रती । माणायामशत र शुदपने दस्तके । वश्य परिर्भ- २ मानणादीनामामाचे यःमरदेवासमातित- मेदाति विसतिप्रीमणे दशा एकाह च यह पंच सप्त- स्य तामागंच यावत्तेपामाचीर्थ म्यपगमे त प्रापधार रायमभोजनमा ततः भिगोपनगन पियत्ततः। पुर्यात् । २मुस्ता तु मामाशाचे थोत्मांतनं दिजः । ३ भात्ता वापिसम्यानमार यामुगापा- मुस्तान क्षत्रिकाये नमो धीयते । येश-पप तथा माता प्रिगत्रं स्वादामनम् । परणय- ने मुस्ता महासातपन घाव । शरीर तथा निवस्य परपासताराम । भाचस्प च भवानं मुस्ता प्रियासान्यामापाव । विजयादापण पोत। ४१ .
(६४२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । का लक्षणभी उसनेही कहा कि जो उपपातकसे युक्तके अन्नको एक वर्षतक अग्निको ग्रहण करके और समारोप (स्था- | निरंतर भक्षण करके द्विज शुद्धिक लिये पन ) करके पंचयज्ञोंको न कर वह मुनि पराक करै यह अभक्ष्यभक्षणके समुदायका योने परपाकनिवृत्त कहा है और जो पंच विशेष और दिनोंके व्रतोंका समूह ब्राह्मणको यज्ञ करके पराये अन्नसे नियमसे प्रातः है क्षत्रिय आदिकोंको तो एक २ पाद कम काल स्टकर जीवे वह परपाकरत है जो होता है क्योंकि विष्णुकी स्मृति है कि ब्राह्म- गृहस्थ धर्ममें स्थित होकर दानसे रहित है णको संपूर्ण क्षत्रियको पादोन वैश्यको आधा धर्मतत्त्वके ज्ञाता ऋपियोंने वह अपच कहा और शूद्रजातियोंको. एक पाद प्रायश्चित्त है और जो ब्रह्मचारी आदिके अन्न भोजनमें देना इति अभक्ष्यभक्षणप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ वृद्धयाज्ञवल्क्यने कहा है कि यति और निमित्तांकी गिनतीक समय उपपातकके ब्रह्मचारी ये दोनों पक्वान्नके स्वामी हैं | अनंतर जातिभ्रंशकर गिने हैं अब उनके अर्थात् अन्यका किया पाक खाते हैं उनका प्रायश्चित्तोंको कहते हैं उसमें मर्नु (अ०११ अन्न न खाय और खांव तो चांदायण कर श्लो०१२४-१२५) ने कहा है कि जातिभ्रंश और जो पार्वणश्राद्ध न करने वालेके भोजन करनेवाले किसी एकभी कर्मको जानकर में भरद्वाजंने कहा कि पक्ष वा मासमें करके सांतपन कृच्छ और अज्ञानसे करके जिसके यहां देवता नहीं खाते उस दुरात्मा ! प्राजापत्य करे और संकर अपात्रकृत्या का भोजन करके द्विज चांद्रायण करें ये दो- | इनमें मासभर ऍदवसे शुद्धि होती है और नोभी वचन अभ्यासके विषयमें हैं पहिले । मलिनीकरणीयोंमें तीन दिन तप्तयावक गिने हुयोसे भिन्न जो निषिद्धाचारी हैं उनके भक्षण प्रायश्चित्त है यहां अन्यतम (कोईसा) अन्न भोजनमें तो पत्रिंशन्मतको कहा इसका सर्वत्र संबंध है और यहां विशेष प्रायश्चित्त जानना कि आचारसे रहित और यमने कहा कि संकरीकरण कर्मको निपिद्धाचार्गजो द्विज उसके अन्नको करके मासभर जी भक्षण कर अथवा कृच्छा- खाकर चांद्रायण करे इसकेही वर्षभरके तिकृच्छू प्रायश्चित्त कर अपात्रीकरण अभ्यासमें पत्रिंशत्मतेमही कहा है कि कर्मको करके तप्तकृच्छ्रसे शुद्ध होता है १ गृहीत्वा समारोप्य पंचयज्ञान निर्षित् । वा शीतकृच्छ्से वा महासांतपनसे शुद्धि परपावनिसासी मुनिभिः परिकीर्तितः । परज्ञांस्तु यः गृत्सा परामादुपजीपति सतत प्रातरत्याय पापाका १ विमे तु सकलं देयं पादानं क्षत्रिये रमृतं । व- रतस्तु सः । गृदस्यमहत्तो यो ददाति परिवर्जितः । ये पार एकस्त शरजातियु दृश्यते ॥ कपिभिधमंताहिरपयः संमकीर्तितः । २ नातिनशकर कर्म कृत्यान्यतमामच्याच. २ पतिय प्रमचारी घ पकानस्वामिनानुमौ । त- 'रेमांतपनं कच्छू पानापरण्मनिम्छया : संकरा- पोरेग्न न भोतार्य भरता बांदापर्ण घोत् । घालामु मासः शोधनमदवः । मलिनीकरणीयेप ३ पसे या यदि वा मा यस्य नाश्नति देवताः । तप्तः स्पाचारकम्यहम्। मुरा राम्नस्तस्य दिजशोदापण चरेत् । ४ निरापास्य पि निषिद्धाचरणस्य च । भन्न ३ सकरीकरण तामासमभाति यायकाच्छा. भाग : पुहिन रुममोजनम् ॥ तिरमामाया प्रायश्चिन समाचरेत् । अपानीका ५सातपयुकरण भयो निरंतरम् । भन्नं एता सप्तमयोग शुद्धपति सतरगया गंदम- मारा दिमः कुतोहरा तु योपनन । हामान्द्राश्नेन वामरिनीकरणीय तारोपन । - प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६४३) . होती है मलिनीकरणीय कर्मोमें तप्त कृच्छ्। क्योंकि यह मने की स्मृति है (अ० ११ से शुद्धि होती है वृहस्पतिनभी जाति-श्लो० २०१) कि राष्ट्रयानमें और खरके भ्रंशकरमें विशेष कहा हकि ब्राह्मणकी पीडा | यानमें जानकर बैठे तो सचैल स्नान करके. और रासभ आदिका प्रमापण (हिंसा) सदैव शुद्ध होता है अज्ञानसे बैठनेमें तो और निंदितोंसे धनका ग्रहण करके आधा स्नानमात्रको कल्पना करनी और साक्षात् ख- कृच्छ् शोधन होता है मनु आदिकोंके कहे | रपर चढ़े तो दूने प्रायश्चित्तकी कल्पना जो ये जातिभ्रंशकर आदि काँके प्राय- | करनीक्योंकि उसके चढनमेंका पाप गुरु है। श्चित्त हैं उनके विषयका विभाग जाति शक्ति भावार्थ-वर और ऊंटके यानपर चढकर आदिकी अपेक्षासे जानना इस पूर्वोक्त और नग्न होकर स्नान और भोजन करके प्रकारसे योगीश्वरके हृदयमें स्थित अभक्ष्य- और दिनमें स्त्रीसे गमन करके जल में स्नान भक्षण आदिका प्रायश्चित्त संक्षेपसे दिखाया और प्राणायामसे शुद्ध होता है-२९१ अब प्रकरणमें अनुसरण करते हैं अर्थात् प्रकरणकी बात कहते हैं। गुरुंटुकृत्यत्वंकृत्य विप्रनिर्जित्यवादतः । भावार्य-गोप्टमें वसता, और मासभर के- बद्धावावाससाक्षिप्रसाद्यौपवसेद्दिनम् । वल दूधको पीता और गायत्री जपको क- पद-गुरुं२-हुंकृत्या-त्वंकृत्पा-विकं २-- रता हुआ, ब्रह्मचारी निदित प्रतिग्रह लेनेसे निर्जित्यः-वादतः:- पध्वा-याऽ-चासता ३- शुद्ध होता है ।। २९० ॥ क्षिप्रंड-प्रसाध:-उपवसेत् कि-दिनम् २- प्राणायामीजलेस्नात्वाखरयानोष्ट्रयानगः । योजना-गुरु वंकृत्य विप्रं हुं कृत्य, वा- नग्नासात्वायभुक्काचगत्वाचैवदिवास्त्रियम् दतः निर्जित्य वा वाससा बद्धा क्षिप्रं प्रसाद्य पद-प्राणायामी १- जले ७ स्माता- दिनम् टपवसेत् ॥ खरयानोष्ट्रयानगः १-नमः १-स्नात्वा-वा- भुक्त्वा च गत्वा-चा-एक-दिवा-स्त्रियम्- तात्पर्य-पिता आदि गुरुको हुँ करके अर्थात् तू इस प्रकार मत कह तेने इस योजना-वरयानोष्ट्रयानमः च पुनः नग्नः प्रकार किया इस प्रकार युग्मच्छन्दको एक स्नात्वा च पुनः दिवा स्त्रियं गत्वा जले सात्वा प्राणायामी शुद्धयेत् ॥ वचनान्तकहके झिडकर बडे याअपने समान तात्पर्याय-अव प्रकीर्णकका प्रायभित्त या छोटे ब्राह्मणको क्रोधसे हुं करके अर्थात् कहते है खर और ऊंटसे युक्त रथ आदि : आक्षेप करके और जयके फल, जो जल्प हुँ तूणीरहो हुँ ऐसे मतकहो इस प्रकार यानम जो गमन करे और नग्न होकर जो और वितण्डा इनसे ब्राह्मणको जीतकर म्रान या भोजन करें और दिनमें अपनी और कोमल वलसभी कंठमें बांधकर स्त्रीक सग जो भोग कर वह तडाग और शीग्रही चरणोंमें नमस्कारसे प्रसन्न करके तरगिणी भादिमें मान भार प्राणायाम करके । अर्थात् टसके क्रोधको दूर कराकर एकदिन शुद्ध होता है यहभी मानकर करने में है मानना ताराममादि प्रभाग नि. दिगो धनादान मामाची । रदान समापय मापानन्तु पामतः सवासा- अलमारय माणसमन शुदर्णत:
(६४४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । उपवास कर और जो यमने कहा है कि वादसे तो एक दिन उपवास और स्नान करनेके ब्राह्मणको जीतकर प्रायश्चित्त किया चाहै | अनन्तर ब्राह्मणको प्रणाम करके उसको तो तीनरात्र उपवास और स्नान करनेके प्रसन्न कर मैनु (अ. ११ श्लो. २०२) ने तो अनन्तर प्रणाम करके ब्राह्मणको प्रसन्नता अन्यभी प्रकीर्णकके प्रायश्चित्त दिखाये हैं करै वह वचन अभ्यासके विषयमें समझना। कि जलोंके विना अर्थात समीपमें जलको भावार्थ-गुरुको तुं और ब्राह्मणको हुँ | न रखकर अथवा जलोंमें जो दुःखी मनुष्य और वादसे जीतकर वा वस्त्रसे बांधकर शीघ्र मलमूत्रको त्यागता है वह सचैल स्नान प्रसन्न करके एक दिन उपवास करे ।। २९२ | और गोका स्पर्श करके शुद्ध होता है यह विप्रदंडोद्यमेकृच्छ्रस्त्वतिकृछो वचन अज्ञानके विषयमें है जान कर तो यह निपातने । कृच्छ्रातिकृच्छ्रोसृक्- यमको कहा प्रायश्चित्त जानना कि जो आ- पत्तिके समय जलके विना मल मूत्र करें वह पाते कृच्छ्रोभ्यंतरशोणिते ।। २९३ एक दिन उपवास करके जलमें सचैल स्नान पद-विप्रदंडोद्यमे ७- कृच्छः १-तु-अ- करे और जो सुमंतुका वचन है कि जल तिकृच्छ:७-निपातने १-कृच्छातिकृच्छ्रः१- और अग्निमें जो मलको त्यागै वह तप्त अमृपाते७-कृच्छ्रः१-अभ्यन्तरशोणिते७- कृच्छ करे वह रोगीसे भिन्नके विषयमें वा. योजना-विपदंडोद्यमे कृच्छ्रः तु पुनः नि- अभ्यासके विषयमें समझना और नित्य जो पातने अतिकृच्छः असृक्पाते कृच्छ: अ- | वेदोक्त कर्म है उनके लोपमें तो मनु (अ.११. भ्यन्तरशोणिते कृच्छः शुद्धिहतुः भवति ॥ श्लो. २०३)ने कों है कि वेदोक्त नित्य , तात्पर्यार्थ ब्राह्मणके मारनेको इच्छासे | कर्मोंके और स्नातकके प्रतीके लोपमें भोजन दण्डको उठावै तो कृच्छू करनेसे शुद्धि न करनाही प्रायश्चित्त है वेदोक्त दर्श पौर्ण- होती है और दंडसे ताडना करे तो मास आदि कमीमें और स्मृतियोंमें उक्त अति कृच्छ्र और रुधिर निकस आवे तो नित्य होम आदिकोंमें जो प्रतिपदोक्त (प्र- कृच्छातिकृच्छ्र और अभ्यन्तर (भीतर )शो- | ति कर्ममें नाम लेकर कहे ) जो प्रायश्चित्त /णित होय तो कृच्छ्र शुद्धिका हेतु होता है उनके संग उपवासका समुच्चय है अर्थात् बृहस्पति नेभी यह विशेष कहा है कि काठ | परभी जीर्ण और मलीन वस्त्र धारण करें और उपवास दोनों करने और धन होने आदिकी ताडनासे त्वचा फट जाय तो इत्यादि पूर्वोक्त स्नातकके व्रत समझने स्ना-- कृच्छ्र अस्थि टूटजाय तो अतिकृच्छ्। तक व्रतोंके अधिकार (प्रकरण )में क्रतुं करे अंग कोई कट जाय तो पराक कर पादके प्रहारमें तो यमने कहा है कि ब्राह्मणका १ विनाद्भिरप्सु याप्यात्तःशारीरं सनिपेय तु । सच-- चरणसे स्पर्श करके प्रायश्चित्त किया चाहें लो बहिराप्नुल्य गामालभ्य विशुद्धयति । २ आपद्गतो बिना तोयं शारीर यो नियते । एकाह १ वादेन ब्राक्षणं जित्वा प्रायश्चित्तविधित्मया । क्षपणं कृत्वा सचैलो जलमाविकोत् । त्रिरात्रोपोषितः वाला प्रणिपत्य प्रसाइयेत् । ३ अप्स्वग्नौ वा मेहतस्ततकच्छूम् । २ काठादिना ताडपिता त्वग्भेदे कृच्छ्माचरेत् । ४वेदोदितानां नित्यानां कर्मणां समतिप्रमे। भस्थितिकृचः स्यात्सराकरवगकर्तने । स्नातकवतलोपे च प्रायश्चित्तमभोजनम् । ३ पादेन ब्राह्मण स्पृष्ट्वा प्रायश्चित्तविधित्सया । ५ एतेपामाचागणामेकैकस्य व्यतिक्रमे गायत्र्य.. विसोपोषित: माया प्राणिपत्र प्रसादयेव । प्रशतं जप्यं कृत्वा पूतो भवति ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तभकरण ५ नेभी कहा है कि इन आचरणोंमें एक २ के । मेने कहा है कि न पंक्ति में विषम देन मांगे अवलंघनमें आठसौ गायत्री जप करके न दिवावे क्योंकि याचक दायक और दाता पवित्र होता है पंच महायज्ञोंके न करनेमें । ये तीनों स्वर्गमें नहीं जाते और प्राजापत्य तो बृहस्पति ने कहा है कि जो गृहस्थी करनेसे उस कर्मसे छुटते हैं और नदीके अनातुर और धनी होकरभी पांच महाय- संक्रम (मार्ग वा पुल) को जो नष्ट करै ज्ञोंके प्रतिदिन किय विना भोजन करता है | और जो कन्याके विवाहमें विन्न करे और वह कृच्छाधसे शुद्ध होता है जो आहितानि जो पूना आदि सममें विषम करें इनका होकर अग्निका उपस्थान (सेवा) पर्वके समय प्रायश्चित्त नहीं है इन तीनों काँका प्राय- नहीं करता और ऋतुके समय भार्याका श्चित्त ढूंढने योग्य है अर्थात् नहीं है और गमन नहीं करता वहभी कृच्छार्द्ध कर दू- | ब्राह्मण भिक्षासे मिले अन्नसे चांद्रायण करे- सरी भार्या आदिक मरनेमें तो देवलने कहा इंद्रधनुपके दर्शन आदिमें तो ऋप्यशृंगने है कि पहिली भार्याके जीवते हुये जो दूसरी कहा है कि जो इंद्रका धनुष और पलाश भार्याको वैतानिक अग्नियोंसे दग्ध करता (टाक ) की अग्नि यदि अन्यको दिखावे है वह कर्म सुरा पानेके समान है अपनी तो अहोरात्र प्रायश्चित्त और धनुषका दंड भार्याके अभिशंसन (निंदा ) में तो यमने दक्षिणा प्रायश्चित्त है पतित आदिक संभा- कहा है कि जो मनुष्य अपनी भायीको क्रो- पणमें तो गौतमने कहा है कि म्लेच्छ थसे ऐसे कहता है कि तू गमनके योग्य नहीं अशुचि अधार्मिक इनके संग संभाषण न वह ब्राह्मण होय तो प्राजापत्य करे क्षत्री नौ करे. करे तो पुण्यात्माओंका मनसे ध्यान दिन, वैश्य छः दिन, शूद्र तीन दिन, व्रत करवा ब्राह्मणके संग संभाषण करे शय्या अन्न करें स्नान के विना भोजनमें तो यमने कहा है धन इनकालाभ औरवधतोपृथक् वर्षीका कि रिक्त (खाली) कमंडलुको धारण और प्रायश्चित्त है अर्थात् भार्या के अन्नधनको लेना विना स्नान भोजन करे तो अहोरात्र उपवास और नष्ट( विघ्न) करनेमें प्रत्येक कर्ममें वर्ष दि- और एक दिन जपसे शुद्धि होती है एक नकाप्राकृत ब्रह्मचर्य प्रायश्चित्तहै तैसेही यज्ञो- "पंक्तिमें बैठे हुयोंके मध्यमें जो स्नेह आदिसे पवीतके विना मलमूत्र करने में स्मृत्यंतरमें विषम (न्यून अधिक ) परसता है तो य- १ अनिवत्यै महायशान्यो भुक्तेः प्रन्यहं गृही। अना नपत्तयां विषमं दद्यान्न याचेत न दापयेत् । याचको ताः सति-धने कड़ान विशुद्धयति । आहितानिरुप- | दागको दाता नास्य गामिनः।मानापोन कुच्छे स्थान न कुर्यायस्तु पणि । ऋती न गच्छेद्भार्या , ण मुच्यते कर्मगस्ततः । नसिक्रमहंतुच कन्याविन चा सोपि कृच्छाधमाचरेत् । करस्य च ।समे विषमकर्तुश्च निष्कृतिनापपद्यते । या- २ मृता द्वितीयां यो भाया दहेद्वैतानिकाग्निभिः । णामीप चैतेपा प्रत्यापत्तिस्तु मार्गताम् । भैक्षलन्धेन जीवस्या प्रयमाय तु मुरापानसम हि तत् । चान्नेन द्विजांदापर्ण चौतु । ३ स्वमार्यों तु यदा क्रोधादगम्यति नरो देव । २ इंद्रनाप पलाशामि यद्यन्यस्य प्रदर्शयत् प्रायश्चि- प्राजापत्य चोभिः क्षत्रियो दिवसानवा पात्र तु चरे- । त्तमहोरात्र घनश्च दक्षिणा । देखिरात्रं झाद आचौता ३ न म्लेच्याशुचधामकैः सह सभाषेत संभाष्य ४ घन्कमडलु रिक्तममातोश्च भोजनम् । पुण्यकृतो मनसा ध्यायेत् ब्राह्मणेन सह वा समापत अहोराण शुद्धिः स्यादिनजन्येन चैवदि । त पानधनलामवधे पृथक् वर्षाणि । ।
(६४६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रायश्चित्त कहा है कि यज्ञोपवीतके विना जो ब्राह्मण भोजन करता है वह अहोरात्र जो द्विज उच्छिष्ट होता है तो अहोरात्र उ- उपवास और पंचगव्य पीनेसे शुद्ध होता है पवास और आठसी गायत्रीका जप प्राय- नीलके विषयमें तो आपस्तंचने कहा है कि श्चित्त है उसमेंभी नाभिसे ऊपर उच्छिष्टमें नीलसे रंगे वस्त्रको ब्राह्मण अंगमें धारण उपवास और नाभिसे नीचे उच्छिष्ट होकर | करें तो अहोगन उपवासके अनंतर पंचगव्य जलपान आदिको करें तो गायत्रीका जपकर पानसे शुद्ध होता है और जो नीलका रस यह व्यवस्था जाननी अज्ञानसे करनेमें रोमकूपोंमें चलानाय तो तीनों वर्गों में सा- तो स्मृत्यंतरमें कहाँ यह प्रायश्चित्त मान्यरीतिसे तप्तकृच्छ्र शोधन है नीलकी जानना कि जो यज्ञोपवीतके विना जल पावे वा मलको त्यागे वह तीन वा छः प्रा- रक्षा विक्रय और नीलकी वृत्तिसे जीव तो णायाम, और तीन नक्तवत, क्रमसे करैभी- ब्राह्मण पातको होता है और तीन कृच्छोंसे जन करके उत्तरापाशन किये विना उ-पापको दूर करता है नीलका काष्ठ ब्राह्मणके ठनेमें तो यह स्मृत्यंतरमें कहाँ प्रायश्चित्त । शरीरको वोध दे और रुधिर दीख पडे तो जानना कि भोजन करके विना आचमन द्विज चांद्रायण करे और स्त्रियोंके क्रीडार्थ और विना जलपान जो उठता है वह शीघ्र भोगकी शय्यापर नीलका दोष नहीं है- स्नान करें अन्यथा (न करे तो ) पतित भृगुनेभी कहा कि स्त्रीका धारण किया होता है चोर आदिके उत्सर्ग (त्याग ) में नील ब्राह्मणोंमें दूपित नहीं है और क्षत्रियों- तो वसिष्ठने कहा है कि दंड देनेके योग्यके के यहां वृद्धि में अर्थात् पुत्रोत्सव आदिमें त्यागमें राजा एकरात्र, पुरोहित तीनरात्र, उ- और वैश्यक यहां पर्वोको छोडकर धारण पवास करे और दंड देनेके अयोग्यको दंड | करना युक्तहै-तैसेही वस्त्र विशेपमेंभी नी- देनेमें पुरोहित कृच्छ्र, और राजा त्रिरात्र, लका दोष नहीं क्योंकि यह स्मृति है कि उपवास करें, और कुनखी और श्यामदंत । कंबल और पट्टसूत्र (रेशम) में नीलका ये दोनों द्वादश रात्र कृच्छ करें और निदित | रंग दूषित नहीं-वृक्ष विशेषसे बनाये खदाके लेख और दांतोंको उखडवाय दें चोर प- तित आदिकी पंक्तिके भोजनमें तो मार्क- डेयने कहा है कि पंक्तिसे वाहकी पंक्तिमें १ नीलारक्त यदा यस्त्रं ब्राह्मणोंगेषु धारयेत् । अहो १ बिना यज्ञोपवीतेन याच्छिष्टो भवेदिजः । प्राय- रात्रोपितो भूत्य पंचगव्येन शुद्धयति । रोमकर्यदाग- श्चित्तमहोरात्र गायव्यष्टशत तु वा । चंद्रसो नीत्यास्त कस्यचित् । त्रिपु वर्गेषु सामान्य २ पिवतो मेहतश्चैव भुजतोऽनुपवीतिनः । तप्तकृच्छ विशोधनम् । पालनं विक्रय चैव तदृत्या तूप- प्राणायामात्र क षटुं नक्त व त्रितय प्रमात् । जीवनम्। पातकी च भौप्रिनिभिः कृमयपहिति ३ यातिष्ठत्यनाथातो भुक्त्वा वानशनात्ततः । नीलीदार यदा मियाद्राह्मणस्य शरीरतः । शोणित दृ- सधः स्नान प्रकुर्वीत सोन्यया पतितो भवेत् । श्यते यन दिनथांदायर्ण चात् । त्राणां क्रीडासंघोगे ४ देख्यौत्समें राजकराप्रमुपवसेन्निरानं पुगहितः कृच्छूमदब्य दंडने पुरोहितखिरात्रं राजा कुनखीझ्याव शयनीये न टुप्यति । दंतश्च कळू द्वादकारानं चरितोद्भरैयाताम् । २ सीता शयने नीली ब्राह्मणस्य न दुप्यति । ५ अक्तियस्य यः कश्चित् पत्तो भुक्त द्विजोत्तमः । नृपस्य वृद्धी वदयस्य पर्ववयं विधारणम् । अहोरात्रोपितो मता पंचगव्येन शुद्धपति । ३ कंबले फलेच नीलीरागो न दुध्यति । .
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६४७) ऊपर चढनमें तो शंखने कहा है कि द्विज करले शंखेनेभी कहा है कि अग्निमें चरणोंको ढाकके वृक्षको शय्या यान आसन खड़ाऊं | तपाकर और अग्निको नीचे करके और इनपर चढकर विरात्र व्रत करे-प्राणोंकी कुशोंसे चरणोंका माजन करके एक दिन रक्षाका अभिलाषी क्षत्रिय रणमें पीठ दे कर व्रत कर क्षत्रिय आदिको नमस्कार करने में और फलके दाता वृक्षको काटकर-संव- | तो हारीतने कहा है कि क्षत्रियको नमस्कार त्सरतक व्रतको कर दो ब्राह्मणोंके और करने में अहोरात्र वेश्यके नमस्कारमें दो रात्र ब्राह्मण अग्निके-स्त्री पुरुषके-गो ब्राह्मणके | और शूद्रके नमस्कारमें तीन रात्र उपवास बीचमेको निकसै तो सांतपनकृच्छ करे | करे तैसेही शय्यापर बैठे खडाऊं उपानह होमके समय और तैसेही दुहने और पढने-! इनको धारण किये उच्छिष्ट अंधकारमें के समय और विवाहके समयमें द्विज बीच- स्थित श्राद्ध करनेके समय जप देवपूजा को निकसे तो चांद्रायण करै यहाँ दुहना इनमें जो तत्पर इन सबको नमस्कार करने सान्नाय्य (हविविशेष ) का अंग लेना मेंभी तीन रात्र उपवास होता है और अन्य- यहभी अभ्यासके विषयमें है छिद्र सहित | के निमंत्रणको स्वीकार करके अन्यत्र भोजन सूर्य आदि अरिष्टांके दखिनेमें तो शंखने | करे तो नियत्र उपवास करे और जिसके कहा है कि दुष्टस्वप्न और अरिष्ट आदिके | हाथमें समिध पुष्प आदि हों उसकेभी नम- दर्शनमें वृत और सुवर्णका दान करें किसी | स्कारमें यही प्रायश्चित्त है क्योकि इस आप- देशविशेपके गमनमेंभी देवलैने कहा है कि स्तंबके वचनमें जप आदिके संग यहभी पढा सिंधुसावीर सौराष्ट्र और इनके प्रत्यंतवासी | है कि समिध पुप कुशा पी जल मिट्टी अन्न अंग बंग कलिंग आंभ इन देशोंमें जाकर | अक्षत ये जिसके हाथमें हों और जो जप पुनः संस्कारके योग्य होता है यहभी तीर्थ होम करता हो उत, द्विजको नमस्कार न यात्राके विना समझना अपने विष्ठाक देखनेमें | करें और नमस्कार करनेवालेकोभी यही तो येमने कहा है कि सूर्यके सन्मुख मल प्रायश्चित्त है क्योंकि शंखेने इस वचनसे कोन त्यांगे और अपने मलकोन देखे और उसकोभी निषेध किया है कि जलका घट देखें तो सूर्य गौ अग्नि ब्राह्मण इनका दर्शन | हाथमें लिये, भिक्षाटन करते, पुप्प घृत हा- थमें लिये, अशुद्ध, जप करते, देव पितरोंका १ अध्यस्य शयन यानमासन पादुके तथा । द्विजः कर्म करते, और शयन करते समयमें नम- पलाश रक्षस्य त्रिरात्र तु व्रती भवेत् । क्षत्रियस्तु रणे स्कार न करे इसी प्रकार अन्यभी वचन पृष्ठ दत्वा प्राणपरायणः । मवत्सर व्रतं कुर्याच्छि- त्विा वृक्षं फलप्रद । विप्रो ब्राह्मणानी या दपती गोद्धि १ पादप्रतापन कृत्वा कृत्वा वह्निमधस्तथा कुशैः जोत्तम।अतरण यदा गच्छेत्कृच्च सातपन चरेत् । हो- प्रमृज्य पादौ तु दिनमेक व्रती भवेत् । मकाले तथा दोहे स्वाध्याये दारसमहै । अतरेण य २ क्षत्रियाभिवादनेऽहोरानमुपवसेत् । वैदयाभिवादने दा गच्छेदीदजश्चाद्रायण चरेत् । द्विरात्र शूद्रस्याभिवादने त्रिरात्रमुपासः । २ टु स्वमारिष्टदर्शनादी घृत सुवर्ण च दद्यात् । ३ समित्युप्पकुशााचुमुन्नाक्षतपाणिकम् । जर्प ३ मिधुसौवीरसौराष्ट्रांस्तथा प्रत्यतवासिनः। अग होम च कुर्वाण नाभिवादेत वै द्विजम् । बंगकरिगाधान् मत्वा सस्कारमहति । ४ नोदकुंभहस्तोऽभिवादयेत् न भक्ष चरन्नपुष्पां- प्रत्यादित्य न मेहेत न पश्येदात्मनः शकृत । दृष्टा । ज्यादिहस्तो नाशुचिर्ने जपन्न देवपितृकार्य कुर्वन , मय निरीहत मामांन ब्राह्मणं तथा । शयानः।
(६४८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । अन्य स्मृतियोमसे ढूंढने ग्रंथके गौरवके समीप रहने वालोंको किया जाय-अथवा भयसे यहां नहीं लिखते ॥ अत्यन्त शीत (जाडा) जिसमें पडताहो भावार्थ-ब्राह्मणको हिंसाके लिये दडं उठा- ऐसे शिशिर आदि कालमें किया जाय तो- नेमें कृच्छू और दंडके मारनेमें अतिकृच्छ उस करनेवालेके प्राणोंकी विपत्ति हो जायगी रुधिरनिकासनेमें कृच्छातिकृच्छ्र और रुधि- इससे यह जलमें निवासकी कल्पना उस देश रके भीतर रहने में कृच्छ्र प्रायश्चित्त होता है । | कालको छोडकर करनी-तिसी प्रकार कहीं इति प्रकीर्णकप्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ अवस्था विशेषसेभी प्रायश्चित्तकी कल्पना हो ती है जैसे कि बारह वर्षका प्रायश्चित्त यदि. देशकालंवय शक्तिपापंचावेक्ष्ययत्नतः । नबह ९० वर्ष आदिकेको अथवा बारह वर्ष प्रायश्चित्तंप्रकल्प्यस्यायत्रोक्ताननिष्कृ जिसको अवस्था पूर्ण नहीं-उसको वताया जाय तिः॥ २९॥ तो अवश्य प्राणोंकी विपत्ति होजायगी इससे पद-देश २-कालं २-वयः २-शक्ति २- उस प्रायश्चित्तकी कल्पना अन्य अवस्था वा- पाप २-च:- अवेक्ष्य- यत्नतःऽ-प्रायश्चित्तं १- लेके विषय करनी-इसीसे स्मृत्यन्तरमें वृ- प्रकल्प्य१-स्यात् क्रि-यत्र:-च-उक्ता १द्ध आदिके पिययमें कहीं-आधा और कहीं -निष्कृतिः १- चौथाई प्रायश्चित्त कहा है-वह पूर्वमें विस्ता- योजना-दशंकाल वयः च पुनः शक्ति यत्नतः रसे कह आये-तिसी प्रकार धन दान और अवेक्ष्य-तथा यत्र निष्कृतिः न उक्ता तत्र क्योंकि पात्रको पूर्ण धनदे इत्यादिसे जो पूर्व तपयेभी शक्तिको अपेक्षासेही समझने- प्रायश्चित्तं प्रकल्प्य स्यात्- तात्पर्याय- निमित्त अनन्तहैं इससे श- प्रायश्चित्त कहा है वह निर्धनके विषय संभ- रीर के प्रति प्रायश्चित्तक निमित्त नहीं आदिकी अधिकता हो उसको पराक आदि व नहीं हो सक्का-तिसी प्रकार जिसके पित्त कह सक्त-जो सामान्य रीतिसे निमित्त पूर्व और स्त्री शूद्रको जप आदि संभव नहीं हो कह आए और जो नहीं कह उसमें प्राय- सक्त-इसीसे यह कहा है कि गज आदिके त्ति विशेषके जानने के लिये यह प्रकरण दान करने में असमर्थ एक एककी शुद्धिक कहते हैं। लिए कृच्छ्र व्रतको कर-तिसी प्रकार तप जो पूर्व प्रायश्रित कह आये और जो करने में जो असमर्थ है उसको स्मृत्यंतमें आगे कहेंगे वह प्रायश्चित्त देश-काल 'पूर्व प्रायश्चित्तका हास-(न्यूनता) इस व- शक्ति और अवस्था इनको देखकर उस · चनसे दिखाई है कि स्त्री और रोगी ये आ- विशेष विषयमें समझना कि जिसमें करने धे प्रायश्चित्तके योग्य होते हैं-मदापातक वालोंके प्राणोंपर कुछ विपत्ति न हो अन्यथा आदिरुप है-वा ज्ञानपूर्वक है-अज्ञान पू. प्रधान प्रायश्रितको निवृत्ति हो जायगी-वैक किया है-वा एकवार किया है-वा जैसे कि आगे यह कहिंग कि दिन में वायुको अभ्याससे ( वारंवार ) किया है-इस प्रकार खाता हुआ और रात्रिको सूर्यके दर्शन प- महापातक आदि रूपसे पापको देखकर- यंत जस्ट में पेठकर कालको व्यतीत करे सो फिर समस्त धर्म शास्त्रीको पालोचना इस प्रायभित्तमें रात्रिक समय जलमें निया- स करनेका उपदेश यदि हिमाचल पर्वतके प्राधितामहन्ति त्रियो रोगिण एवं प । .
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६४९) करके उसके प्रायश्चित्तकी कल्पना कर-ति- कहा है वह सत्य है तथापि सबमें देशका- समें जो प्रायश्चित्त अकामसे किये पापके ल आदिकी अपेक्षा होती है इससे कल्पना विषयमें लिखा है वही प्रायश्चित्त कामकृत करनेका अवसर अवश्य होता है क्यों- पापमें दुगुणा-और जो कामसे वारंवार पाप कि निमित्तको लघु ( थोडा ) होनेसे किया है उसमें चौगुणा-इस प्रकार अन्य सब इंसने मुंभण आदि निमित्तमें सौ १०० स्मृतियोंके अनुसार प्रायश्चित्तकी कल्पना प्राणायामरूप प्रायश्चित्त युक्त नहीं है है-तिसी प्रकार महापाप और उपपाप इन-1 इससे पापकी अपेक्षासे हासकी कल्पना को करके जो दूसरेसे मिथ्या कहते हैं-वह करनी वा अन्य प्रायश्चित्त करना कदाचित् जलमात्रको खाता हुआ महीनेतक बैठे | कोई शंका करे कि अकस्मात हंसने आदि यह जो प्रायश्चित्त कहा है इसमें महापाप पापको लघुत्व किस प्रकार है जिसकी और उपपातकका समान ( तुल्य) प्रायश्चि- अपेक्षासे तुम प्रायश्चित्तके हासकी कल्पना त्त कहना अयुक्त ( ठीक नहीं है-इससे करते हो वहां प्रायश्चित्तकी अल्पता तो पापकी अपेक्षासे मासिक व्रतको हासकी निष्कृति ( प्रायश्चित्त ) के न कहनेसेही कल्पना करनी और जो-हसना-जंभाई ले- | सिद्ध है सो ठीक नहीं क्योंकि अर्थवादक ना-स्फोटन-इनको अकस्मात् न करे-स- कहनेसे बुद्धिपूर्वक और अबुद्धिपूर्वक मुद्रके जलमें स्नान न कर-श्मश्रु ( डाढी और अनुबंध आदिकी अपेक्षासे पापमें गुरु मुंछ ) को न कटवांव-गर्भवालीस्त्रीका पति लघुभाव साक्षात् प्रतीत होता है तिसी इनको करता हुआ प्रजाहीन हो जाता है- प्रकार दण्डके हास और वृद्धिकी अपेक्षा इत्यादिमें जो प्रायश्चित्तका उपदेश नही कि- सेभी प्रायश्चित्तमें गुरुलघु भाव समझना या हे यहांभी देश आदिकी अपेक्षासे प्राय- जैसे कि ब्राह्मणके अवगोरण( दंड उठाना) श्चित्तकी कल्पना करनी-कदाचित् कोई य- आदिकरने पर सजातीयको प्राजापत्य आदि हो यह शंका करै कि कोईभी पाप ऐसा न- कहा है तिसमें यदि अनुलोम वा प्रतिलोम वा हा है कि जिसका प्रायश्चित्त न मिल- जिनका राज्याभिषेक हुआहे ऐसे क्षत्रिय आदि लता हो क्योंकि आगे जिनका प्रायश्चित्त | ब्राह्मणकाअवगोरण करैतो उसमें दण्डका ता नहीं कहा उनकाभी इस वचनमें प्रायश्चित्त । रतम्य (अधिक वा न्यून) देखनेसे उस दण्डके कहगे कि सब पापोंकी तथा उपपातक | अनुसार दोषको अल्पता (थोडा)और महत्त्व और जिनका प्रायश्चित्त नहीं कहा है उन पा- (बहुत ) समझना उसकेही अनुसार प्राय- बाँकी निवृत्तिके लिये सौ १०० प्राणायाम | श्वित्तकाभी गुरुलघु भाव समझना दण्डका करे तिसी प्रकार गौतमनेभी इस वचनसे गुरुलघुभाव इसेवचनसे दिखाया है कि एक दिन आदि प्रायश्चित्त कहे है कि इनको प्रतिलोमको कुत्सित बोलनेपर दुगुना वाति- ही जिनका प्रायश्चित्त नहीं कहा उन पापोंमें । गुना दण्ड दे। विकल्पसे कर-उस शंकाका समाधान करते हैं कि यद्यपि सामान्यरोतिसे जो प्रायश्चित्त भावार्थ-देश काल अवस्था शक्ति और प्राणायामशत कार्य सर्वापापनुत्तये। उपपातक- पाप इनको पत्नसे देखकर और जिसमें जातानामनादियस्य चैव हि । २ एतान्यैवानादेशे विकल्पेन क्रियरन् । १ प्रातिलोम्यापदादेषु द्विगुण स्वि गुणो दमः ।
(६५०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रायश्चित्त न कहा हो वहां प्रायश्चित्तकी जलदान पिण्डदान आदि प्रेतक्रियांक किये कल्पना करे-२९४-- पीछे करना क्योंकि गौतमे की स्मृति है कि दासीकुंभंबहियामानिनयेरन्स्वबांधवाः । उस पतितके विद्यागुरु और सपिण्ड सब पतितस्यवहिःकुर्युःसर्वकार्येपुचैवतम् २९५ इकट्ठे होकर सब जलदान आदि प्रेतकि- याको करें इसके पात्रको औंधा मारै अथवा पद-दासीकुंभर--बहिनामात्ऽ-निनयेरन् दास ( धीमर ) वा कर्म करनेवाला अबकर क्रि-स्वबांधवाः १-पतितस्य६-बहिःऽ-कुर्युः (आवा ) से पात्रको लाकर और दासीसे क्रि-सर्वकार्येषु ७-चऽ-एवऽ-तम् २ उस पात्रको भरवाकर और हाथमें लेकर योजना-पतितस्य स्वबांधवाः दासीकुंभं दक्षिणाभिमुख होकर पावसे पात्रको उलटा ग्रामात् वहिः निनयेरन् च पुनः तं पतितं करदें वे सब इस पात्रको जलसे रहित कर सर्वकार्येषु बहिः कुर्य:- ताहूं इस प्रकार नाम लेते हुए उसको सम्म- 'तात्पर्यार्थ-जीते हुए पतितके जो मातृ ति दें और प्राचीनावीति (सव्य ) होकर पक्ष और पितृपक्षक जातिके बांधव हैं वे और शिखाकी ग्रंथिको खोलकर विद्यागुरु सब इकट्ठे होकर सपिण्ड आदिने प्रेरी हुई और योनिसंबंधी सब उसे देखें फिर जलसे दासी (धीमरी) के लाये हुए जलसे भरे आचमन करके ग्राममें प्रवेश कर यह पतित घटको ग्रामसे बाहिर लिवा लेजाय यह घट का त्याग जब समझना कि जब पतित, बांध- निस्सारण चतुर्थी आदि रिक्ता तिथिके वि वॉकी प्रेरणासेभी प्रायश्चित्तको न करें क्योंकि दिनके पांचमें भागमें करना क्योंकि यह शंखको स्मृति है कि उसके दोपौंको गुरू मनु (अ० ११ श्लो० १८२ ) का वचन है बांधव और राजा इनके आगे प्रकट करके कि सपिण्ड बांधव पतित मनुष्यकी उदकक्रिया । फिर इसको कहा गायकि तू पुनः (फिर ) निन्दित दिनके वि सायंकालके समय ज्ञाति- सदाचारमें प्राप्त हो इस प्रकार कहने परभी मनुष्य ऋविन और गुरु इनक समीप करें याद इसकी मति सदाचारमें अवस्थित अथवा सपिण्ड आदिको प्रेरी हुई दासीही उस नहो तब इसके पात्रको विपर्यस्त (उलटा) घटको लेजाय जैसे कि मनु (अ० ११ कर फिर जलदान किएपीछे उस पतितको श्लो० १८३) ने कहा है कि दासी जलसे संभाषण और एक आसनपर बैठना इत्यादि भरे घटको प्रेतके समान चरणसे ओंधा कार्योंसे वहिर्भूत करें सोई मनु (अ० ११ मारदे और वे प्रेतके बांधव अहोरात्र उपवास कर और दासीको प्रतके वांधवोंके समान एयुदकादीनि प्रेतकर्माणि कुर्यु: पात्र चास्य विपर्यस्येयुः १ तस्य विद्यागुरुयोनिसंबंधाश्च सत्रिपत्य सी- अशौच नहीं है यह वचन दक्षिणकी तरफ दामः कर्म करो वाऽरापात्रमानीय दासी घटान पर मुख करके और अपसव्य होकर इस पित्ता:दक्षिणाभिमुखः पदा विपर्यस्यदिदम् अमुमनुदक विधिको प्राप्तिके लिये है यह घटका लेजाना कोमीति नामप्राह त सोऽन्यालमेन्प्राचीनातिनो मुक्तशिखा रिद्यागुरको योनिसरंधाश्च वोलेरन् अप १ पतिवन्योदय कार्य सपिचान्धवहिः। निन्दि- ' उपस्पृश्य प्रामं प्रविशेयुः । रोहनि सागा झागृतिगुरुसनिधी । २ तस्य गुरोयोधशनाराजश्य समक्षं दोपानमिया- २ दासी घटमपाम्पूर्ण पर्यस्यैरप्रेतवददा अहोरात्र- यानुभाष्यपुनः पुनगचार लभस्टेति स ययेवमध्य- मुगारमाशायाधीरसद। नवस्थितमतिः स्यात्तस्य पान विपरीत। -- (६५२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । योजना-पतितानां स्त्रीणां एष एव विधिः त्त हैं-और अपि शब्दसे जो-महापातक- प्रकीर्तितः तासां स्त्रीणां वाप्तः गृहान्तिके अतिपातक-और वारंवार अभ्यास किए जो देयः तथा-सरक्षणं अन्नं वासः देयम् ॥ उपपातक पुरुषके पतित होने में निमित्त कहे। तात्पर्यार्थ-जो मनुष्योंके परित्यागमें पि- है वेभी निश्चयसे स्त्रियोंके पतित होने में कारण ण्डदान और जलदानको विधि है-जिनोंने हैं-इसीसे शौनकने कहा है कि जो पुरुषके प्रायश्चित्त कर लिया है उनके ग्रहण करनेमें पतनमें निमित्त हैं वेही स्त्रियोंकेभी प- परिग्रहकी विधि कही है वही विधि पतित तनमें निमित्त हैं और ब्राह्मणी हीन वर्णके स्त्रियोंके त्याग-और परिग्रहमेंभी समझनी- साथ गमन करनेसे अधिक पतित हो परन्तु इतनीही विशेष विधि है कि-जो प- जाती है-जो कि वसिष्ठने यह कहा है तित स्त्री है जिनका घटस्फोट आदि कर- कि धर्मके जाननेवाले लोकमै स्त्रियोंको चुके हैं उनको तृण और पत्तोंकी बनाये हुए भर्ताका वध भ्रूणहत्या अपने गर्भका पतन कुटीरूप गृहमें निवास-अपने प्रधान गृहके करना ये तीन पातक कहे हैं और इनमें समीप देना और प्राणों की धारणा मात्र अ.जो भ्रूणहत्याका ग्रहण किया है वह दृष्टा- न-और मलीन वस्त्र देना और फिर अन्य न्तके लिये है कुछ अन्यमहापातक आदि- मनुप्यसे उपभोग आदिमें प्रवृत्त हुई उनको कोको स्त्रियोंके पतनमें कारणताको निय- निवारण आदि रक्षा करे- त्तिके लिये नहीं और जो कि फिर वसिष्ठ भावार्थ-जो पतित मनुष्योंको पूर्व घट- नेही शिष्य गुरु इनसे भोग करने वाली और स्फोट आदि विधि कही है वही विधि पति- पतिके मारनेवाली और जो निन्दितसे विषय त स्त्रियों के विषयभी समझनी-उन स्त्रियोंको करें ये चार स्त्री परित्यागके योग्य होती हैं घरके समीप वसावे-अन्न और वस्त्र आ- | इस वचन में चार स्त्रियोंकाही परित्याग लिखा दिसे रक्षा कर और अन्य पुरुषमें फिर आ- | हे उसकाभी वह अभिप्राय है फि प्रायश्चित्त सत्त न होने दे ।। २९७ ॥ को न करती हुई पतित स्त्रियोंके मध्यमें ये नीचाभिगमनं गर्भपातनंभरी हिंसनम् । चार शिष्यगा आदि स्त्रीही वन अन्न गृहमें निवास आदि जीवनवृत्ति को न देकर विशेषपतनीयानिस्त्रीणामेतान्यपिध्रुवम् ॥ : त्यागने योग्य होती हैं अन्य नहीं अर्थात इन पद-नीचाभिगमनं गर्भपातनं १ भर्तृ- त्रियोंको अन्न आदि न दे और इनसे अन्य हिंसनं १ विशेषपतनीयानि १ स्त्रीणां ६ स्त्रियोंको तो अन्न आदि देकर वसावे इससे एतानि १ अपि-ध्रुवम् यह बात जानी गई कि प्रायश्चित्तको न करती योजना-नीचाभिगमन-गर्भपातनं भर्त- हुई अन्य पतित स्त्रियोंको गृहके समीप हिंसन-एतानि अपि स्त्रीणां ध्रुवं विशेपंप- तनीयानि-सन्ति-॥ पुरुषस्य यानि पतननिमित्तानि स्त्रीणामपिता- पत्र प्रानगी हीनमेगरामधिक पतति। तान्पयार्थ-हीन वर्णके साथ भीग ब्राह्म- २ प्रीति नियाः पातानि लोर. परिदो दुः। गोसे भिन्न कभी-गर्भका पातन-और ब्राह्मण मधो भगदत्या सस्य गर्भप पाउन । से असिरितभी भर्ताका दिसन (मारना) ३ परशु परित्याग्राशयगा गुरगा पया। ये सियोंकि पतित हनिमें असाधारण निमि-पशिष गिताप यया ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ जब वास ( वासी गृहान्तिके देयः) इत्यादिसे फिर जिसने प्रायश्चित्तरूपी प्रत करलिया हो जो कहा है वह करने योग्य है । उसके विषे विशेष विधिको कहते हैं-कुण्डसे भावार्थ-नीच पुरुषके साथ गमन गर्भका जलके भरे घटको निकालने के पीछे प्रायश्चित्त पातन पतिका मारना ये स्त्रियोंको अवश्यही करने वाला मनुष्य सपिण्ड आदिके मध्यमें पतित करने वाले हैं ॥ २९८ ।। स्थित होकर गौओंको यवस (बुस)दे गौ उस पतितका सत्कार करलें उसके शरणागतयालस्त्रीहिसकान्संवसेनतु । अनंतर फिर ज्ञातिवांधव उसका सत्कार चीर्णवतानपिसताकृतनसहितानिमान ।। करें गौका सत्कार यह होता है कि उस पद-शरणागतवालस्त्रीसिकान् २ संव- पतितके दियेउस यवसको निश्शंक होकर सेत् क्रि-न-तु:-चीर्णव्रतान् २ अपि:- भक्षण करना यदि गौ उसके दिये यवस सतः २ कृतनसहितान् २ इमान् २॥ को न खाय तो वह पतित फिर उस प्राय- योजना-शरणागतचालस्त्रीहिंसकान कृत- श्चित्तको कर जसेकि हारतेने कहा है कि नसहितान् चीर्णवतान् अपि सतः इमान् गो उसको ग्रहण करले तो बांधव उसके. अपने शिरसे यवसको लेकर गोको दे यदिवे न संवसेत् ॥ ता. भा०-शरण आयेको बालक और साथ यथावत् व्यवहार करें अन्यथा नहीं इस स्त्री इनको मारनेवाले और जो कृतघ्न है। प्रमाणको स्वीकार करना ।। इनके दोप यदि प्रायश्चित्तसे क्षीण होगये हों भावार्य-घटके दूर करने पर पतित अ- तोभी इनके साथ व्यवहार न करें ये वा- पने बांधवोंके मध्यमें स्थित होकर गो चनिक प्रतिषध है इससे वचनको न मानना। ओंको यस दे क्योंकि पूर्व उस गौके सत्कार. चाहिये ये बात न करनी क्योंकि वचन- किये हुएका सत्कार होता है । ३०० ॥ का बडा भार होता है-इससे यद्यपि व्यभि- विख्यातदोषाकुतिपर्षदोनुमतंवत्तम् । चारिणी स्त्रीक वधमें थोडाही प्रायश्चित्त कदा अनभिख्यातदोपस्तुरहस्यंमतमाचरेत् ॥ है तथापि उसके साथभी व्यवहारका प्रति- पंध इस वचनस सिद्ध है ॥ २९९ ॥ पद-विख्यातदोषार-कुर्वीत क्रि-पर्षदाद... पटेऽपयनितजातिमध्यस्थोयवसंगवाम् । अनुमतं २- व्रतं २- अनभिख्यातदोपः १- पदयात्मयमंगोभिःसत्कृतस्पहिसकिया। तु:-रहस्यं २-व्रतं २-आचरेत् कि- योजना-विख्यातदोषः पर्पदःअनुमतं व्रत पद-घटे७ अपवनिते ५ नातिमध्यस्थः कुर्यात् तु पुनः अनभिख्यातदोषः रहस्य यवसं २-नगवां ६-प्रदद्यात् कि प्रथम२- मतं आचरेत् ॥ गोभिः ३ सस्कृतस्य ६-दि-प्सक्रिया ॥ ! तात्पयार्थ-जितना पाप जिसने कियाही योजना-घटे अपवजिते सात ज्ञातिमध्य- उस सपको यदि अन्य पुरुष जानलें तो स्थः गया यवसं प्रथमं दद्यात् पिता, पर्षद सभाके बताये हुए मतको करें यद्यपि प्रय गोभिः सस्कृतस्य सस्क्रिया भवति । आप संपूर्ण शास्त्रोंके अर्थक विचारमें चतुर तात्पर्याय-इस प्रकार प्रसंग लियाको १ स्वशिरसा यसमादाय गोयो दद्यायदि ता- निश विसर विधिको कहकर प्रकरणवशसे । प्रतिगृहपुरपत्र प्रवर्तयेयुः (६५४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । हो तथापि पर्पदके समीप जाकर और पर्षद कहाती है तिसीप्रकार अन्यभी दो उसके साथ विचार करके उसकी अनुमति पर्पद दिखाये है कि ऋग्वेद यजुर्वेद और के अनुसार व्रतको करै-तिसके समीप । सामवेद इनके जाननेवाला धर्ममें संशयके जानेके विपय अंगिराने विशेष कहा है | निर्णय करनेमें यह दूसरा पर्षद कहा है ति- कि निःसंशय पाप करनेके, अनंतर जव- सीप्रकार एकभी वेदके जाननेवाला सावधा- तक पर्पदके समीप न जाले तबतक भोजन न होकर जिस धर्मको निश्चय करले वहहीं न करे क्योंकि पर्षदके समीप, पापक वि- परम धर्म समझना और अज्ञ (मूर्ख ) द- ख्यात किये विना भोजन करताहुआ मनुष्य शसहनभी हों तथापि उनका कहा नही और पापको बढाता है वह पतित सबैल, मोन, इन पपदीको व्यवस्था संभवको अपे- होकर स्नान करें और आई (गोले ) व क्षासे वा महापातक आदिको अपेक्षासे स्त्रोसेही सावधान हो पर्पदके समीप जाकर समझनी जो कि स्मृत्यन्तरमें कहा है कि उसको अनुमतिसे अपने पापको विख्यात पातको सौ १०० मनुष्योंकी पंषद् महापा- करे और बतको लेकर फिरभी स्नान करके काम सहस्रकी और उपपातकोंमें ए- व्रतको करे यह पापका विज्ञापन दक्षिणा दे- नेके अनंतर करना क्यों कि पाराशरने चासकी पर्पद होते है और तिसीप्रकार अ- कहा है कि पापी मनुष्य अपने पापको गोवाल्पपापमें अल्पपर्पद समझनी यह वचन म- वृपको देकर विख्यात फेरे यह दान उपपा- | हापातक आदि दोपों के अनुसार पर्पदोंका तकके विषय समझना महापातक आदिमें तो | गुरु और लधुभाव होता है इस घातके प्रति- अधिक दानकी कल्पना करनी नो कि यह पादन (कहने ) के विषयमें है संख्याके वचन है कि पापको प्राप्तहुआ मनुष्य एक | नियमके लिये नहीं क्यों कि नियम मानोंगे वार जहमें कूदकर और पर्षदोंसे पा- तो मन आदि महास्मृतियोंके साथ दोष पको विख्यात करके और कुछ देकर - आवेगा तिसीप्रकार देवलने भी यहां विशे- तको करे यह प्रकीर्णक पापक विषयमें स- प दिखाया है कि अल्पपापोंके प्रायश्चित्तको मझना पर्षदका स्वरूप मनुने यह दिखाया तो ब्राह्मण शास्त्र आदिकै विनाही स्वयं क- है कि तीनोंवेद न्याय निरुक्त और मीमांसा | हदें और महापापोंकी निस्कृति (प्राय- आदिक अर्थक जाननेवाला और तीनों श्चित्त) को तो राजा और ब्राह्मण शास्त्रसे आश्रमो ये न्यूनसे न्यून दश जिसमें हों वह परीक्षा करके कहें पपदको व्रतका उपदेश गृते नि:सशये पारे न भुनीतानुपस्थितः । भु- अवश्यही करना चाहिये क्यों कि गिराकी जानी वधात्याप यानास्याति पदि। सचेल वाग्यतः ऋग्वेदविद्यज्ञविच सामवेदविदेव च। अपरापर्ष- सामकिन रासाः समाहितः । पादानुषतस्तत्त्व सर्वेक्षया धर्मसंशयनिर्णये । एकोपि वैदरिदम यध्यवस्थे- विण्याप पनरः । मतमादाय भूयापि तण मावा ते समाहितः। स शेयः परमो धर्मो नाज्ञानामुदितोयुतः । घरेय। २ पात फैषु शत परसहस मददासि । उपपापा २ पापं रियायलाणे दया धेनु तपा । पंचाशस्वल्य ससे तथा भवेत् । ३ तस्माद्विजः प्रातपाय: सरदाप्तुत्य पारिणि । ३ सयनु मानगारपदोपे मिटति । रा. 'पिण्याप्य पाप पपंद्रयः किरिहयाम चरेत् । जाघ प्रामणधैव महमु र परीक्षिताम् । ग्रीयो करतको नरको धर्मपाटयः ।।. ४ भाताना मार्गमागानां मायावतानि येदिमाः। एवामिनः पूर पदेश सावरा । जानन्तो न पच्छन्ति ते पान्ति समता : ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ स्मृति है कि जो दुःखी मनुष्य प्रायश्चित्तका अब रहस्य प्रायश्चित्तको कहते हैं कि मार्गण ( ढूंढना) करते फिरते हैं उनके प्रा- श्रीयाज्ञवल्क्य मुनि विख्यात ( ज्ञात) यश्चित्तको जानतहुए द्विज जो प्रायश्चित्तको पापके नाश करनेवाली व्रतको सन्तति नहीं पताते वे उनी पापियोंके समान हो- (समूह) को कहकर-अब एकान्तमें किए जाते हैं तिसीप्रकार पर्पद जानकरही व्रतका अप्रसिद्ध पापके नाश करनेवाली निस्कृति उपदेश करें क्यों कि वसिष्ठको स्मृति है (प्रायश्चित्त)को कहते हैं-तिसमें प्रथम सक- कि जो पर्पद धर्मशास्त्रके विना जाने प्राय ल रहस्यमतके साधारण धर्मको कहते है- श्चित्तको देती है उस प्रायश्चित्तसे पापी शुद्ध होजाता है और पर्षद उसके पापको प्राप्त जिसका पाप न जाना हो ऐसा मनुष्य रहस्य कासे व्यतिरिक्त ( भिन्न ) पुरुषोंने होती है पापक करनेवाले क्षत्रिय आदिको धर्मके उपदेश करनेमें तो अंगिराने यह (किसीको ज्ञात न हो ) प्रायश्चित्तको करें 'विशेष दिखाया है कि ब्राह्मण जिन क्षत्रिय कर्तृव्यतिरिक्तः ऐसा कहनेसे स्त्रीसंभोग आदिने पाप किया है उनके मध्यमें (आगे) आदिमें उस पापक करनेमें स्त्रीभी कर्ता है- ब्राह्मणको करके संपूर्ण प्रतका उपदेश करे | इससे उससे भिन्न पुरुपोंने जिसको दोषको तिमीप्रकार धर्मपूर्वक शूद्रको सदा प्रायश्चित्त- न जानाहो ऐसे पुरुषको रहस्य व्रतका-अ- का उपदेश जप होम आदिसे अतिरिक्त करे | धिकार है यह समझना-इसमें यदि कती तिसमें याग आदि अनुष्ठानके करने वालोंको स्वयंही धर्मशास्त्रमें कुशल होय तो अन्यको जो जप आदिका और अन्य सवको तपका उस दोपको प्रकट किये विना अपने पापक उपदेश करना क्यों कि यह वचन है कि अ- पने कर्म और तपके बीचमें सावधान जो नाश करने में उचित प्रायश्चित्तको स्वयं ही मनुष्य है वे कदाचित् पापको प्राप्त हो- करे-और स्वयं उस प्रायश्चित्तको न जान जाय तो दनको विशेषतः जप होम आदि | ता होय तो किसीने एकान्तमें ब्रह्महत्या आ- का उपदेश करें-और जो नाममात्रक धार-दि पाप किया है उसमें रहस्य प्रायश्चित्त करने वाले विप्र है अर्थात् अपने धर्मसे क्या है इस प्रकार भन्य पुरुषके इस प्रकार शून्य है और जो-मूर्ख-और धनते रहित है वहानसे पूछकर रहस्य प्रायश्चित्तको कर- उनको विशेषस कृच्छचांद्रायण आदिका इससेही स्त्री-शूद्रकोभी इसी मार्गसे - उपदेश करे- हस्य व्रतके ज्ञानकी सिद्धि होनस रहस्य व्र- इति प्रकाशप्रायश्चित्तप्रकरणम् ।। सकर अधिकार सिद्ध है-कदाचित् कोई १ मनावा धमशास्त्राणि प्रायश्चित्त ददाति यः। प्रायश्चिती भरपूनः शिविर पर्षद प्रजेत् । शंका कर कि रहस्य प्रतमें जप आदि प्रधा- २ न्यायती प्रामणः क्षिम क्षत्रियाः पृर्तनसः । न होते हैं और स्त्री शुदको विद्याके न हो- अन्तरा धामण पृता मत सर्व समादिशई । तपा शुद्र नेसे उन जप आदिके अधिकार न होनेसे- समासाद सदा धर्मपुरःसर । प्रायचित्त प्रदातव्यं रहस्य प्रतका अधिकार नहीं-सी ठीक नहीं जपहीमीमांप्रतम् । क्योंकि इस्य व्रताम जप आदिकी प्रधान- ३ कनिटावनिहा कदानिरपामागता जप- होमादिकतेभ्यो विशेषेण प्रदीत। ये नामधारका विप्रा ता एकान्ततः (सर्वथा ) नहीं- क्योंकि-. पूर्ण धनसिजिताः । नादापनादानि यो उनमें दान आदिकाभी उपदेश है-और गो- पचपत तमके कहे हुए प्राणायाम आदिभी है-और याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराभकाशसहित । इतर जप आदिके अधिकारमेभी-देवता- जिसका छन्द है भाववृत्त जिसका देवता है. मंत्र-ऋषि-छन्द-इनका परिज्ञानही उपयो- ऐसे 'ऋतं च सत्य इत्यादि हच सूक्तको जप गी है-कुछ स्त्री शूद्रसे अन्यका विषय नहीं कर और तीन रात्रके अन्तमें एक दूध देती जैसे कि तडाग आदिके बनानेमे यह विप्र- हुई गाँको दे कर ब्रह्महत्यारा शुद्ध होता है तिपत्ति नही होती कि इसको ज्योतिष्टोम | जपजलके भीतर तीन वार करना-जैसे कि सु- आदिका अधिकार है-चा नही-किन्तु-केव- मंतुने कहा है कि-देवता-द्विज-और गुरु ल देवताके परिज्ञानमात्रकीही अवश्य अपे- क्षा होती है क्योंकि व्यासको स्मृति है कि इनको मारकर जलके भीतर तीनवार अघम- पण सूक्तकोजपे-माता-भगिनी-मौसी-पुत्र- ऋपि-छन्द-देवता-और योग इनको विना जाने जो पढावे वा जपे है वह अत्यंत पापी | वधू-सखी-इनको और जो अगम्य हैं उन- होता है-इससे स्त्री शूद्रकोभी रहस्य व्रतका के साथ गमन करके जलके भीतर तीनवार अधिकार है-इसमें जहां आहार विशेष नहीं अघमर्षणका जप कर तो शुद्ध होता है यह कहा वहां दुग्ध आदि-और जहां काल वि- प्रायश्चित्त काम ( जानकर) से जो किया है- शेष नहीं कहा वहां संवत्सर आदि-देश वि- उसके विषयमें समझना और जो कि यह शेष नहीं कहा वहां शिलोच्चय आदि गो- | मैनु (अ० ११ श्लो० २४८ ) का वचन है तम आदिक कहे हुए प्रकाश प्रायश्चित्तकी कि व्याहृति-और कार सहित षोडश प्रा- समान अन्वेषण (ढूंढना) करने । णायाम मासपर्यंत प्रतिदिन करे तो भ्रूण- भावार्थ-जिसका पाप प्रसिद्ध हो गयाहो- हा पवित्र होता है वह वचनभी इसी विषय- वह पर्पदकी अनुमतिसे व्रतको करें और में उसको समझना-जो गौक देनेमें असम- जिनका दोष विख्यात नहीं है वे रहस्यमत-है-जो कि-गौतमनें छत्तीस ३६ दिनके को फैर ॥ ३०॥ व्रतको कहकर यह कहा है कि ब्रह्म- त्रिरात्रोपोपिताजत्वाग्रह्महात्वयमर्पणम् । हत्या-सुरापान-सुवर्णको चोरी-गुरुकी स्त्री- अंतर्जलेविशुद्धचंतदत्वागांचपयस्विनीम् ॥ के साथ गमन-इन पापा, उस व्रतके ही कर-प्राणायामासहित स्नान करके पद-विरात्रोपोषितः१ - जवाऽ-ब्रह्मदार- अघमर्षणको जप-यह प्रायश्चित्त अकाम तुः-अघमर्षणम् २-अन्तर्जले ७-विशुद्धयत ( अज्ञानसे ) वधके विषयमें हे-और जो क्रि-दत्त्वा-गां२च- पयस्विनी २॥ योजना-ब्रह्मदा विगत्रोपोपितः सन् देवद्विजगुम्हन्ताप्मु निमोऽधमपंग मुक्त अन्तर्जले अघमर्षणं जप्त्वा च पुनः पयस्वि-! त्रिरावतयेत् मातरं भगिनी गवा मावष्वसार स्तुपां नी गां दत्त्वा विशुद्धयेत ॥ सखी पान्यागम्यागमनं फुलाऽधमर्पणमेवान्त तात्पर्याय-तीन रात्र उपवास करके गलके बिरावयं तदेतरमापूतो भवति । भीतर अघमर्षणऋषि है जिसका अनुष्टुप् २ सम्पाहतिमणवकाः माणायामासु पोझा । भपि भ्रमरनं मासानन्य पदारताः । , अपिदिल्या कार छन्दो देवतं योगायो. ३ तद्न स ग्राहरयासुरापानमुर्गस्तेवगुत्तर पारग्रामि पापीपाजायसेतु सः। मागारामःमातोश्यमांगे गोत्र ।
मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६५७) कि बोधायनेने कहा है कि ग्रामसे पूर्व दिकियाहो उसके विषयमें है जोकि बृद्धिष्णु शा उत्तरदिशाको निकलकर स्नान और ने यह.कहा हैकि ब्रह्महत्याको करके पुरुष शुद्धहो शुद्ध वखौंको धारणकर जलके , ग्रामसे पूर्वदिशा वा उत्तरदिशामें जाकर सभीष स्थलकी भूमिको लीपकर एकवार बहुतसे इंधनमें अग्निको प्रज्वलित करके भाई किये वस्त्रोंसे युक्त और एकवार पवित्र । उसमें अघमर्षण मंत्रसे आठ सहस्र ८००० किये पाणिसे (हाथ ) अघमर्षण और वेद घीकी आहुति दे तिसके अनंतर इसकर्मसे इनको सूर्याभिमुख होकर पढे और प्रातः- पूत ( पवित्र ) होजाता है वह वृद्धिष्णुका काल मध्याह्नकाल और सायंकालके समय वचन निर्गुण ब्राह्मणके मारनेके विषयमें वा सोती और नक्षत्रोंक उदय होनेपर एक पस अनुग्राहकके विषयमें समझना जोकि यमने यावकको खाय इस प्रकार करता हुआ पापी | कहा हैकि युक्त होकर तीन दिन उपवास ज्ञानसे किये वा अज्ञानसे किये उपपातकोसे करे तीन दिन जलपीकर रहे और तीनवार सात रात्रिमें और महापातकोंसे मारह | अघमर्षणको जपें तो सब पातकोंसे छूटता पत्रिमें मुक्ताहो जाता है और जोकि यह है वह वचन गुणवाले हतासे यदि निर्गुण कहा कि ब्रह्महत्या सुरापान सुवर्णस्तेय ब्राह्मण मारा जाय तो उसके विपयमें वा इनको वर्गकर उन महापातकोंकोभी इकोस प्रयोजक और अनुमंताके विश्यमें समझना रात्रिमें तर जाता है वह कामसे करनेवाले जोकि हारीतने कहा हैकि महापातक पतितके विषयमें है अथवा अकामसे किये अतिपातक और उपपातक इनमें किसीके. श्रोत्रिय आचार्य और वानप्रस्थके विषयमें हनिमें अथवा तीनोंके होनेमें तीनवार अप- है जोकि मनुने यह कहा कि (अ० ११ मर्षणको जपे वह वचन निमित्त (पाप) के शो२५८ ) वनके विष प्रयत्लसे तीनवार कांके विषयमें समझना इसी प्रकार अन्य- वेदको संहिताको पढकर तीन पगकों (कृ- भी स्मृतिभोंके वचन देख देखकर इसी. का भेद ) से शुद्ध हुआ सब पातकोंसे प्रकार तिसर विषयकी विषयता पृथक् पृथक मुक्त होजाता है वह कथन कामसे श्रोत्रिय समझना ग्रंयके वढनके भपसे हम नही लिखते आदिक वधक विषयमें है और अन्यत्र यहीयत यागस्थ वी क्षत्रिय वैश्य आत्रेयी. कामसे जो अभ्यास (वारंवार ) से पाप , आमिहोत्रीकी स्त्री गर्भिणी और बिना जाने गर्भइनके मारनेमें चौथाई कम करके करना मामागचा गोदीची दिशमुपानफ्रम्य प्रातः मितिमा: उदगान्ते स्पण्डिसमपटिप्य स- अघमर्षणको जलके भीतर जपकर और भावार्य ब्रह्महत्यारा नियत्र टपपास और पहिसा: सतेन पानिनादित्याभिमुखोप- पयस्विनी गो देकर शुद्ध होता है-1॥३०२४३ मांग सायायमधीपीन प्रात: शत मध्याशनमः पराहे पर परिमिरा गोदिनेषु नक्षत्रे प्रगतिशय प्रया एसा मामालाधी उदीची या रिला- शामापात तेभ्योभनातेभ्यशेतातफेगः रामा रसरातमुको सामागतोयो - रागनगरनारवेशन पपिता एकाति- पघातागोताला पातकः समिपितापमपंगत् । १भावाशिम यो देशमारला । मुच्यते ३ महागादिसतोपातकालमियतमैन है- सौं: राक्षसोपिटापभिः । विपत वाध्यमांना प्रिन् । ० P 1.
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । . ऋचाका जप लोमभ्यास्वाहेत्यथवादिवसंमारुताशनः ॥ पापसे अपवित्र मानता है वह कूश्मांडी जलेस्थित्वामिंजुहुयाचत्वारिंशवृताहुतीः ॥ ऋचाओंसे होम करे तिससे जितने भ्रूण हत्यासे कम पाप हैं उन सबसे छुटता है पद-लोमभ्यः ४-स्वाहा: इति-अथवा:- अथवा स्वप्रसे अन्यत्र अयोनिमें वीर्यको गेर दिवसं २- मारुताशनः १-जले स्थित्वाऽ- कर इसी होमसे शुद्ध होता है जो कि मनूने अभिजुहुयात् कि-चत्वारिंशत् घृताहुतीः२ । यह कहा है (अ. ११ श्लो. २६२) आपो- योजना-अधवा दिवतं अभिव्याप्प मारु हिष्ठा इत्यादि वसिष्ठ जिनका देवता है ऐसी ताशनः लोमभ्यःस्वाहा इति चत्वारिंशत् तीनचा माहित्य और शुद्धवती ऋचाओंको घृताहुतीः जले स्थित्वा अभिजुहुयात् जपकर सुरापानवालाभी शुद्ध होता है ता० भा०-अथवा अहोरात्रका उपवास | इत्यादि श्लोकसे जो एक मासतक प्रति करके रात्रिमें जलमें वसकर प्रातःकाल | दिन पोडश १६ वार इस वासिष्ठे 'ऋचा जलसे निकल कर लोमभ्यः स्वाहा इत्यादि ओर महिनीणामवोस्तु । एतोन्विद्रंस्तवाम आठ मंत्रों से एक २ सेपांच २ आहुति इस | इस माहित्री और शुद्धवती इनमें एकका प्रकार चालीश धौकी आहुति अग्निमें दे इस कहा है वह जप प्रायश्चित्तका विषय पूर्वोक्त प्रायश्चित्तके | निरान उपवास और कूश्माण्डी ऋचाओंसे समान समझना क्योंकि जलमें पसनेमे | होम करनेमें जो असमर्थ है उसके विषयमें कैश बहुत होता है ।। ३०३ ॥ समझना और यह वचन अकामसे जो पैष्टी विरात्रोपोपितोदुत्वाकूश्मांडीभिघृतंशुचिः। मदिराका पान एकबार कियाहो उसके ब्राह्मणस्वर्णहारी तुरुद्रजापीजलेस्पित्तः ॥ विषय और गोडी माध्वी मदिराका पान जो वारंवार किया हो उसके विपयमें समझना पद-त्रिरात्रोपोपितः १-दुत्वा:- कूश्मा । जो कि मनुने फिर (अ. ११ श्लो. २५६) डीभिः ३ घृतं २ शुचिः १ ब्राह्मणः १स्वर्ण-कि शाकल होमके मंत्रोंसे वर्ष दिन घृतका हारी रतु:-रुद्रजापी १जले स्थितः१ होम वा नम इत्यादि तृचाको जप करने योजना-विरात्रोपोषितः कूश्माण्डीभिः । वाला बडे भारी पापकोभी नष्ट करता है इस धृतं हुत्वा शुचिः भवति तुपुनः स्वर्णहारी | श्लोकमें एक वर्ष तक प्रतिदिन (देवकृतस्यै- जले स्थितः रुद्रजापी शुचिः भवति नस) इत्यादि आठ प्रचाओंसे होम अथवा तात्पर्याय-तीन रानटपवास करके मनुष्ट- (नम इदुमं नम आविवास) इस ऋचाका जप जिनका छंद है और मंत्रालिंग जिनका देवता | जो कहा है वह कामसे पाप करने याले पुरु- है ऐसी यद्देवादेवहेडनम् इत्यादि कुश्मांडी | पके विषय में है और जो कि महापातकसे युक्त ऋचाऑसे अमिमें चालीश घोकी आहुति मनुष्य सावधान होकर गोभीका अनुगमन देकर सुरा पीनेवाला शुद्ध होता है तिसी प्रकार और पावमानी ऋचाओंका वर्षदिनतक बोधायननेभी कहा है कि जो अपनी भारमाको , मासं जत्याप इत्यतामिष्टं धन प्रतित माहिम शुदवत्यश्च मुरापोपि पिशुपति । , भपरमाटीमिपायोऽपून एवात्मानं २ भपनः शोशुगमय प्रतिस्तोमेभिरपर्स। मन्त पााचीनभेनो भूपत्यापास्तस्मान्मुयने ३ मंत्रः नाफटदोमायरन्द हुसा एतं दितः भपानी पा रेत: शिलान्यासमा स गुप्याान्यतो अपना या नम एवं । .
प्रायश्चिताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६५९) जा और भिक्षाको भोजन करता है वह गुणवान हो वा सुवर्ण न्यून परिमाण (थोटो) शुद्ध हो जाता है यह वचन है वह अभ्याप्तसे वाला हो अथवा अनुग्राहक वा प्रयोजकके वारंवार किये पापक विषयमें बा जिसने सब विषयमें समझना और उस पापकी आवृत्ति महापातक किये हो उसके विषयमें हैं। अर्थात् वारंवार करने में तो (महापातक जो ब्राह्मण स्वर्णको चुराव वह तीन रात्र संयुक्तोनुगच्छेत् ) इत्यादि श्लोकमें कहा उपवास करके जलके मध्यमें बैठ कर नम- हुआ प्रायश्चित्त समझना- स्ते रुद्र मन्यव इत्यादि शत रुद्रीका जप भावार्थ-तीन रात्र उपवास करके कूष्माण्डी करता हुआ शुद्ध होता है शातातपैने इसमें ऋचाओंसे अग्निमें घीका होम करके सुराप विशेष दिखाया है कि मद्यपान गुरुकी स्त्रीसे शुद्ध हो जाता है और सुवर्णके चुरानेवाला गमनस्तेय और ब्रह्महत्या इनको करके भस्म शरीरसे लपेट और भस्मरूपी शय्या पर सोता ब्राह्मण जल में बैठकर रुद्रके जप करनेसे शुद्ध होता है ।। ३०४॥ हुआ मनुष्य रुद्रीक पठन करनेसे सय पापोंसे छुट जाता है रुद्रीका जप एकादश सहस्रशीपीजापीतुमुच्यतेगुरुतल्पगः। ११ यार करना क्योंकि अनि की स्मृति है । गौर्दयाकर्मणास्यांतेपृथगोभिःपयस्विनी ।। कि धर्मके जाननेवाला एकादशवार रु- द्रका जप करके बडे पापांसे युक्तभी छुट पद-सहस्रशीर्षाजापी रतु:-मुच्यते कि- जाता है इसमें संशय नही जो कि मर्नु (अ. गुरुतल्पगः १ गौः १ देया १ कर्मणः ६ ११ श्लो. २५०) ने एकवारभी शिवसंकल्प- अस्यदअन्ते ७ पृथक्रएभिः ३ पयस्विनी- मस्तु इत्यादि ऋचाको जपता हुआ मनुष्य योजना-तुपुनः गुरुतल्पगः सहनशी- सुवर्ण चुग करभीक्षण मात्र निष्पाप हो जाता जापीसन् मुच्यते एभिः पापिभिः अस्य क- हे इस शोकमें वामन सूक्तको ५२ ऋचा मणः अन्ते पयस्विनी गोः पृथक् २ देया- है संख्याको जिसमें ऐसे (अस्य वामस्य पाल तात्पर्याध-गुरुको स्त्रीसे गमन करने तस्य होतुः) इस सूक्तका तथा ( यजाम- वाला नारायगका देखा अनुएए जिसकाछंद •तो दूरमुदत देवे) इत्यादि शिवसंकल्पको हुई ऋचाओंका एकवार जप कहा है ऑक सूक्तको जप तो तिस पापसे मुक्त हो ६ पुरुष जिसका देवता है ऐसी पोडश ऋचा वह उस सुवर्गस्तपके विषयमें है जिसका खामा अत्यन्त निर्गुण हो और हरनवाला डोल्यमें मिनिमत्यय है अर्थात् सहन जाता है सहनशीर्षाजापी इस पदमें ता- महालकमयुनोनुगच्छदाः समाहितः।अभ्यः शीपाके जप करने में जिसका शील (स्वभाव) सापारमानी शाही पिगुमति । हो वह सहस्रशीर्शनापी होता है इससे २ मयं परमार मला से रस्या प्रम- सूक्तकी भावृत्ति प्रतीत होती है आवृत्तिम माग गला । भरमारसम्मो मम्मको पातो. संख्याकी अपेक्षा हुई तो इस श्लोकसे नीचले सायी कुरणते सांगाः । भावारि माना घरमा मसोममें नौ चालीश संख्या कही है उसीका और frag मात्र सर। भनुमान होता है इससे वही संख्या समझनी Y TER का शिरमेन च । । इस लोकभी पूर्व शोकमें कई विरानोपा- प्रामगरि गालाति निर्मटः। पित इस पदका संबंध होता है इसीसे वृह-" ।
(६६०) याज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षराप्रकाशसहित । . द्विष्णने कहा है कि तीन राब उपवास करके इनको जपकर सब पातकोंसे छुटता है वह गुरुतल्पग, पुरुपसूक्तका जप और होम | वचन व्यभिचारिणी स्त्रीसे गमन करनेके वि- करनेसे शुद्ध होता है.सुराप सुवर्णका चोर पयमें है और जो गुरुतल्पके अतिदेश (स- गुरुतल्पग ये तीनों इस तीन रात्रके व्रतकें मान माने) के विषय वा उसके समान पातक अंतमें बहुत दूध देनेवाली गौको दे यह अ- और अतिपातक हैं उनमें क्रमसे इस प्राय- कामसे किये पापके विषयमें समझना जोकि | श्चित्तका चतुर्थाश वा अर्ध अंश कमकरके : मन (अ० ११ श्लो० २५१ ) ने गुरुतल्पग । प्रायश्चित्तकी व्यवस्था समझनी अथवा इस इविप्पांती नतमंद इन दो ऋचा और पुरुष | हारीतका कहा प्रायश्चित्त समझना कि पा- सूक्तको जपकर पापसे मुक्त होता है इस तक अतिपातक उपपातक और महापातक श्लोकमें हविप्पांतीमजरं स्वर्विदा इसका वा | इन एक २ के वासमस्तोंक होने में अघमर्षण- नतमंदो नदुरितं इसका वा इति मेमनः । कोही तीनवार जपे महापातकका संसर्ग जिसे वा सहस्रशीर्षा इसका महीनेतक प्रतिदिन हुआ हो वहभी इस वचनसे उसीके प्रायश्चि-- पोडश२ ऋचाओंका चालीस वार जप कहा त्तको करे जिसके साथ संसर्ग हो कि वह है वह अकामसे किये पापके विषय में स-संसर्गी उसीके प्रायश्चित्तको करे कदाचित मझना और जो काम ( जानकर ) कृतपाप | कोई शंका करे कि अध्यापन आदिके सं- हे उसमें तो (मंत्रैः शाकलहामायः) इ-सर्गमें अनेक कर्ता होते हैं इससे उसके त्यादि ऋचासे जो प्रायश्चित्त कहा है वह प्रायश्चित्तमें रहस्यत्त्वकी अनुपपत्ति है. सो समझना क्योंकि पत्रिंशत्के मतमें कहा ठीक नहीं क्योंकि जैसे अनेक कर्ताआंसे है कि द्विजन्मा महाव्यातियोंको पढकर होने परभी पराई स्त्रीके गमन रूप पापके तिलोंसे होम कर उपपातककी शान्तिके प्रायश्चित्तमें रहस्यत्व है इसी प्रकार यहांभी लिये सहस्र आहुतियाँसे होम करे और जो क से व्यतिरिक्त तृतीय ' आदि (भिन्न) महापातकसे युक्त होय तो लक्ष आहुतीसे | के न जानने मात्रसेही रहस्यता (गुप्त) है शुद्ध होता है वह वारंवार किये पापके वि- इससे अध्यापन आदि पापकाभी रहस्य 'प्रा.. पयमें समझना जोकि यमने कहा है कि अ- यश्चित्त होताहै इसी प्रकार अतिपातक आ- स्यवामीयं वा पाबमानी वा कुन्ताप वा वा- |दिक संसर्गकोभी उसी अतिपातकीको कहा लखिल्य निवित्प्रेष वृषाकपि होता वा रुद्र प्रायश्चित्त समझना । ::त्रिरात्रोपोषितः पुरुषसतजपदोमाभ्यां गुरु- भावार्य-गुरुकी स्त्रीसे गमन करनेवाला गः सुद्धभेद । सहस्रशीषा इस सूक्तके आपसे शुद्ध होताहै २ विप्रान्तीयमभ्यस्य नतमद इतीति च। और ये गुरुतल्पग आदि प्रायश्चितके अंतमें जाया पीरपं मनं मुच्यते गुस्तल्पगः । गाँको दे ॥ ३०५॥ इति महापातक रहस्य. ३ महान्यातिभिहोमस्निलः कार्यों द्विजन्मना । प्रायश्चित्तप्रकरणम् ॥ उपपातगाददर्श सहसपरिमन्यया । महागतकम- प्राणायामशतकार्यसर्वपापापनुत्तये । गुत्तो रमाहोमेन शुद्धपति । ४जोहानसमायं पामानीरवाशीया। पुं- उपपातकजातानामनादिष्टस्यचैवदि ३०६ ता वारशियाय मिपावपिन । होता १पातकातिपातकोपावनामयतम सनिपति सनर मुरण्ठे समाज। वा भयमपत्रमा निर्माता .
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ पद-प्राणायामशतं १-कार्य-सर्वपापा- | रह २ प्राणायामाको करे और जो पातक नुत्तये ४ उपपातकजातानां ६ अनादिष्ट- उपपातकोंसे भिन्न अन्य पाप इसी प्रकार स्य ६.चा-एव:-दि- केही उनमें पन्द्रह दिनतक वारहरप्राणायामों- कोकर और जिनसे पतितहो जाय ऐसे पातक योजना-गोवधादिसर्वपापानुत्तये चपुनः उपपातकीको छोडकरजो इसी प्रकार के अन्य उपपातकजातानां अनादिष्टस्य पापस्य अप- पापहैं उनमें महीनातक वारह २ प्राणायामाको नुत्य प्राणायामशतं कार्यम् ॥ कर और अन्यपातकोंको छोडकर जो इसी तात्पर्याय-गोवध आदि छप्पन ५६ उप- प्रकारके पाप हैं डुनमें पन्द्रह दिनवारहरमा- 'पातक और जिनका रहस्य प्रत नहीं कहा । णायामाको करे और पातक रूप पापक हो- ऐसे जातिभ्रंश करने वाले सब पापांके दूर करे बोधायनके कहे विशेषमें?-वाक् चक्षुः इ. नेमें वर्ष दिनतक बारह २ प्राणायामोंको करनेके लिये सी १०० प्राणायाम करने तथा १ अपि वाकय योजत्वमाणमनोव्यतिक्रमेषु महापातकसे लेकर प्रकीर्णपर्यत जितने মিমি: আগামঃ সুব, খুশিমলাদৗলসন্তু पाप हैं उन सके दूर करनेके लिये प्राणा- याम करने तहाँ महापातकके लिये चारस भाज्यामध्यप्राशनेषु तथा वापण्यविक्रयेषु मधुमास- पृथक् पृथक सप्ताह सप्त माणायामाधारयेत, अभिस्या- १०० और अतिपातकोंक लिय तीन सौ पुततेलामालवणरमानजितेषु, यच्चान्यदयेवयुक्त ३०० और अनुपातकोंके लिये दो सौ२०० | स्याद् द्वादशाह द्वारा द्वारा माणायामान्धारयेत, अप इस प्रकार संख्याको विशेष वृद्धि समझनी । पातकोरपातकाचे यशाप्यन्यदप्येवं युक्त स्रा- उपपातकरूप पापामें महापातकके प्राय मासे श द्वादश प्राणायामान्धारयेत् उपपातेक- भित्तका चतुर्थांश रूप प्रायभित्त देखा पतनीयवऽयचाप्यादेवं शुक्र स्यान्मास द्वादशार्थ- जाता है इसीसे प्रकीर्णकरूप पापमें प्राय- याप्यन्यदप्ये युक्तं अर्धमास द्वादश द्वादश मामान दादश द्वादश प्राणापामान्धारयत, भय पातक- भित्तके दास (कमी) की कलना करनी । प्राणायामाधारगेन । भय पातकोषु संवत्सर द्वादश- इसीसे यमने कहा है कि दश १० ओंकार दश प्राणायामान्धारयेत् । सहित चार सो ४०. प्राणायामाके करनेसे . इस बीधारक वचनका जो अर्थमि- ब्राह्महत्या से छुटता है अन्यपातकोंकी तो ताहरामें लिखा है उसकेही अनुसार भार क्या वाती है घाधायननभी यहां विशेष दि-लिसा है परन्तु धायन के अनुसार बद्द संध्या -तापाई कि वाणी चक्षु प्रोत्र त्वचा प्राण प्राणायामोंकी नही मिलनी जो मिताक्षरामें लिखी -मन इनकेभी व्यतिकम (अन्यया होना) क्योंकि नवा ५ में दाशार्थमासान इस पदके न में तीन प्राणायामासे शुद्ध हो जाता हैशुद्र होनेसे ३६० मायामोंकी सन्यासक होसकती है का गमन और भन्नक भोजनमें पृथक् २दो सहर दौमा सा. २२६. जो प्रागाराम नबर में अर्थ मास में प्रतिदिन पारदर. दिसाब से सात दिन सात मागा यामाका करे अभक्ष्य लिने है टीक नहीं दोसकते-दमसे नंबर अभोग्य और अमेध्य वस्तुक भोजन करनमें ' ६ भमरस के स्थान में 'पग्मास' योगायनकवचनामें का मधु मांस पी तेल लाव लवण इनसे अन्य भार मिताक्षराम पटपविकसितमहिनदिमहस- अन्य वस्तुक वचनेमें भार इसी प्रकार संग्रामा १२६. के स्थान में पटरिनातदिन- गो अन्य पापही उनमें पारइ दिनतक या द्विमाय संसाः प्रामाः २१६. भया से तहमा एमसी माठ प्राभायाम करने दीको MART मुहमने हमलो पटक कापियोंगी सक्ति में methl दरतार करना नहीं .
(६६२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । त्यादि वचनसे जो तीन प्राणायाम कहे हैं ओंकाराभितःसोमसलिलंपावनंपियेत् ॥ वे प्रकीर्णक पापके अभिप्रायसे हैं और कृत्वातुरेतोविण्मूत्रप्राशनंतुद्विजोत्तमः ।। २-शूद्रस्त्रीगमनान्न भोजन इत्यादि वचनोंसे जो उनचास ४९ प्राणायाम कहे हैं वे उप- पद-ओंकाराभिष्टतं २ सोमसलिलं २: पातक विशेपोंके अभिप्रायसे है-तिसी प्रकार | पावनं २ पिवेत् क्रि-कृत्वाऽ-तु-रेतीवि- ३-अभक्षाभोज्य इत्यादि वचनसे एक सौच- मूत्रप्राशनं २ तु:-द्विजोत्तमः १ ॥ वालीस १४१ प्राणायाम जो कहे हैं भी योजना-तुपुनः द्विजोत्तमः रेतोविण्मूत्र- उपपातक विशेषोंके अभिप्रायसेही समझने- प्राशनं कृत्वा ओंकाराभिष्टतं पावनं सोम-' ४-अथ पातकापपातकवयं-इत्यादिवचनसे सलिलं पिबेत् ॥ 'जो एकसौ अस्सी १८० प्राणायाम कहे हैं तात्पर्यार्थ-ब्राह्मण-वीर्य, विष्ठा, और मूत्रः वे जातिभ्रंशकारक आदि पापोंके अभिप्रायसे इनको खाकर ओंकारसे अभिमंत्रित किये समझने-औरष-उपपातक पतनीयवज्य-इत्या- शुद्धिका साधन रूप जो सोमलताका रस- दिवचनसे जो तीनसी साट ३६० प्राणायाम है उसको पावै वह प्रायश्चित्त अज्ञानसे कहे हैं वे गोवध आदि उपपातकोंके अभिप्रा- किये पापके विषयमें हंज्ञानसे किये पापमें तो यसे हैं६-अथपातक वयं-इत्यादिवचनसे जो सुमन्तुने यह कहा है कि लहसन, सलगम, दो सहस्र दो सौ साठ २२६० प्राणायाम कहे गाजर, और कुम्भिका, (तरबूज ) आदि हैं वे अतिपातक और अनुपपातक रूप पा- तथा हंस ग्रामका कुक्कुट कुत्ता गीदड आदि पोके अभिप्रायसे हैं और इसीप्रकार जो का मांस इनको भक्षण करके कण्ठतक ज- ७-अथपातकेषु-इत्यादि वचनसे चार सहस्र लमें प्रविष्ट होकर शुद्धवती ऋचाओंसे प्रा- तीनसो वीस ४३२० प्राणायाम कहे हैं वे णायाम और महाव्याहृतियोंको पढकर - महापातक रूप पापोंके विषयमें समझने जो रस्थल (छाति) पर आये हुये जलको कि मनु (अ. ११ श्लो. १५३ ) ने स्थूल पीकर शुद्ध होता है मर्नु (अ. ११ श्लो१५३) (गुरु) और (लघु ) पापोंको अपनोदन नेभी सात सात प्रकारके अभक्ष्यके भ, (दूरकरना ) करनेकी इच्छा करताहुआ पु-क्षणमें अन्य प्रायश्चित्त कहा है कि कि प्र-- रुपअवेत्यूचं वायत्किचेदम् इस ऋचाका वर्ष तिग्राह्य (ग्रहण करनेके योग्य) नदो ऐसे दिनतक जप करे इस श्लोकसे वर्ष दिनतक प्रतिग्रहको लेकर और निन्दित अन्नको खा- प्रतिदिन अर्थान्तर ( अन्यकार्य ) का जि- कर जो मनुष्य तरसमंदी ऋचाको जफ. समें विरोधनही ऐसे कालमें अवते हेळोव- रुण इसका या यत्किचेदम् वा इति मनः १रतोषिण्मुत्रमाशनं पता लशुनपलाडगूज- शिवसंकल्पमस्तु इस ऋचाका जप कहा है नकुम्मिकाहीनामन्येषां यामध्यभक्षणं करता हंस-- वह अभ्याप्ससे किये पापक विषय में समझना ॥ मामकारवगालदिमासमक्षण योजना-सर गोवध आदि पाप उपपातक कण्ठमांत्रमुदकमवतीर्थ शुद्धवतीभिः प्राणायाम प्रत्या ओर जिनका प्रायश्चित्त नही कहा दन पा- अब महान्याहात भिवोगमुदतं पीता देतस्मात्स्तो पॉकें दूर करनेमें शत प्राणायाम कर ॥३०६॥ भवति । १एन एटमूभागों चिकीर्षमानोली भोय २ प्रतिमाचापतिमाझं भरता चार्य विहिता अमेर यत्किदामंतीति । जय तरसमंदीय पते मानवध्यहा । . संतः मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ करता है वह तीन दिनमें शुद्ध होता ना की हुई संध्या झूट मद्यको गंध दिनमें है-अप्रतिग्राह्य (प्रतिग्रह लेन अयोग्य ) श- मैथुनकर्म और शूद्रका अन्न इन सब न्दसे विप शस्त्र सुरापान आदिसे जो पति-) को पवित्र करती है - त हैं उनका द्रव्य समझना जोमनुष्य जलमें भावार्थ-रात्रि वा दिनके विर्ष जो मनुष्य वीर्य विष्ठा और मूत्र आदि शरीरके. मलको अज्ञानसे पाप करता है, वह सब त्रिकाल. छोडता है उसके विषयमेंभी मनुने कहा है | संध्याके उपासनसे नाशको प्राप्त हो जा- कि जलोंके विषे मल आदिका पतन करके ता है ॥ ३०८ ॥ भिक्षाका भोजन करता हुआ महीनेतक- शुक्रियारण्यकजपागायच्याश्चविशेषतः । स्थित रहे । भावार्थ-द्विजोत्तम वीर्य विष्ठा और मूत्र | सर्वपापहरा तेरुद्रकादशिनीतया॥३.९॥ इनको जल में गेरकर ओंकारसे अभिमंत्रण पद-शुक्रियारण्यकजपः १ गायच्याः६ किये शुद्ध सोमलताके जलको पावे ॥३०७॥ | च:- विशेषतःऽ-सर्वपापहाः रहि:- एते १ निशायांवादिवावापियदज्ञानकृतंभवेत् ॥ | रुद्रेका दशिनी १ तथाऽ-'. त्रैकाल्यसंध्याकरणात्तत्सविप्रणश्यति ॥ योजना-शुक्रियारण्यकजपः च पुनः वि- पद-निशायां वा -दिवा- वाऽ अपि:- शेषतः गायन्याः जपः तथा स्नैकादशिनी-. यत् १ अज्ञानकृतं ? भवेत् कि-त्रैकाल्यसंध्या- | जपः एते हि (निश्चयेन) सर्वपापहरा भवति । करणात् ५ तत् १ सर्व १ विप्रणश्यति कि- तात्पपार्थ-विश्वानि देव सवितः इत्यादि योजना-निशायां वा दिवा (दिनविषये) वाजिसनेयकमें पढे हुए आरण्यकको शुक्रि अपि यत् अज्ञानकृतं भवेत् तत् सर्व नका- य और उसी स्थानमें पढे यजुः ऋचं प्रपद्ये ल्यसंध्याकरणात् विप्रणश्यति ।। मनो यजुः प्रपद्ये इत्यादि ऋचाको आरण्यक तात्पर्यार्थ-रात्रि वा दिनमें जो प्रमादसे कहते हैं उन दोनोंका जप सब पातकों के मानस और वाचिक पाप वा उपपातक रूप हरनेवाला होता है तिसी प्रकार गायत्रीका पाप किया है वह सब प्रातःकाल और मध्या महापातकोंके विपे लक्ष १००००० जप, औ. न काल आदि तीनोंकालोम किये र अतिपातक उपपातकके विष दश सहस्त्र हुए नि- त्यसंध्योपासन रुप कर्मसे नष्ट हो जाता १०००० जप उपातकांके विष सहस्र २००० है सोई यमने कहा है कि जो दिनमें मनुष्य भीर प्रकीर्णक पापोंके विपे १०० शत जप कर्म मन और वाणोसे पाप करता है वह इस प्रकार विशेषसे किया जप सब पापोंके सब पश्रिम ( सायंकाल ) संध्यामें स्थित हरनेवाला है तिसी प्रकार गायत्रीका अधि- हुआ मनुष्य प्राणायामांसे नष्ट करता ई-शा- कार करके शखने श्लोक कहा है कि सोबार तांतपनेभी कहा कि सायंकालमें उपास- जपी हुई गायत्री महापातकोंक नाश करने भशस्त तु सत्ताप्पु मासमासीत भैरमम् । १ शत जता तु सावित्री महापातकनाशिनी। २ याकुरते पाएं कर्मणा मनसा गिरा । सहयजन्ता तु तथा पातशेभ्यः प्रमोचिनी । साहस माशीनः पथिका सध्या प्राणायामनिहन्ति तव । जायन सर्वकिल्विषनाशिनी । र जसा तु सा देवी ३ अनून मय व दिवा भैगुनमैन य । पुनाति महापातकनाशिनी । सुपर्णरतेफोभी प्रमहा गुद- वाटाने पसंभावहिपसता। सन्गः । मुराएर विगाइयन्ति ए जान संशयः .
। (६६४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । वाली और सहस्रबार जपी हुई पातकोंसे के समुच्चयके लिये है जैसे कि वसिष्ठने क- छुटाने वाली, और दश सहस्र चार जपी हुई हा है कि इससे परे सब वेदोमें जो. पवित्र सब किल्विषोंके नष्ट करने वाली, और लक्ष- करने वाली ऋचा है उनको कहता हुं जिनके वार जपी हुई महापातकोंके नष्ट करनेवा- जप और होम करनेसे सब प्राणी पवित्र होते ली, होती हे-सुवर्णका चौर ब्रह्महत्यारा हैं इसमें संशय नही देवताका किया अधम- गुरुकी स्त्रीसे गमन करनेवाला विप्र, लक्ष पण शुद्धवती तरत्समाः कौश्माण्डी पावमानी गायत्रीका जप करनेसे शुद्ध हो जाता है इस व्याहति भारदंडसाम गायत्र खत पुरुष- दुर्गा सावित्री अभिपङमा पदस्तोम साम में संशय नहीं जो कि चतुर्विशतिक मतसे व्रत भास देवव्रत आलिंग बार्हस्पत्य वाक्सू- कहा है कि किरोड गायत्रीको जप करत मध्वृच शतरुद्रीय अथर्वशिय त्रिसुपर्ण ब्रह्महत्यासे और अस्सी लक्ष वार जप क- महाव्रत गोसूक्त अश्वसूक्त इंद्र शुद्ध ये रनेवाला सुरापानके पापसे और सत्तर लक्ष दोनों साम तीन आज्यदोह रथन्तर अग्नि- वार जप करनेवाला सुवर्णचौरी रूप पापसे व्रत वामदेव्य वृहत् ये चौतीस ३४ गाई हुई और ६० लक्ष वार गायत्रीके जप करनेवाला ऋचा सब जन्तुओंको पवित्र करती हैं यदि गुरु स्त्रीके गमन रूपी पापसे छुटता है वह इच्छा करे तो मनुष्य पूर्व जन्मकी जातिका जप रूपी प्रायश्चित्त गुरु है इससे प्रकाश स्मरणभी इनसे होजाता है- पापके प्रायश्चित्तके विषयमें समझना तिसी भावार्थ-शुक्रिय आरण्यकका जप चपुनः प्रकार एकादश रुद्रानुवाकोंके समूहको नाका जप सबपापोंके हरनेवाला है-३०९ विशेषकर गायत्रीका जप और रुद्रकादशि- रुद्रेकादशिनी कहते हैं उसको विशेष कर जपे तो सब पाप दूर हो जाते हैं क्योंकि यत्रयत्रचसंकीर्णमात्मानंमन्यतेद्विजः । महापातकोंके विषे रुद्रीको एकादश आवृत्ति तत्रतत्रातले होमोगायच्यावाचनदिजः ॥ इस श्लोक, कही है कि धर्मके जाननेवाला पद-यत्र यत्रा चर-संकीर्णरआत्मानर पुरुष एकादश रुद्रीकी आवृत्ति करके महा- मन्यते कि-द्विजः १ तक्र-तत्र:-तिलः ३ पापोंसे मुक्त हो जाता है इसमें संशय नही होमः १ गायच्या ३ वाचनं २ द्विजः १ अति पातक आदिमें तो चतुर्थाशका हास (न्यून ) करके प्रायश्चित्तकी कल्पना करनी पंच होमच प्यन्ते नात्र संशयः । अघमर्पण देवरुतं १ सर्ववेदपवित्राणि वक्ष्याम्यहमतःपर । येषां युक्त है इस श्लोकमें च शब्द अघमर्पण आदि- शुद्धवत्यस्तरममाः । कमाण्ड्यः पाउमान्यश्च दुर्गासा- वित्रिोव च ।अभिगाः पदस्तोमाः सामान व्याहति- गायत्र्यास्तु जपेत्रोटि प्रमहत्या व्यपोहति । म्तयार मारदहा निसामानि गायत्रं रैवले सया।पुरुषमतं लक्षााति जपेयस्तु मुराणानाद्विमुच्यते । पुनाति हेम २ मार्म च तया देवनतानि च। भालिंग पाईस्परपंच हतार गायन्या टक्षसप्ततिः । गायया लक्षपष्टमा तु | वारमुक्त मश्च स्तथा 1 शतदियायाशिनिपुर्ण मुच्यते गुस्तापगः । महायत । गोमूक्त चाश्वमक्तं चपराध मामनी । चोप्यायदोद्दानि स्यंत व संपत यामदेगे पृदा । २एफारसगुणान्यापि रमानाम्य धर्मपितामहड़पा एतानि गीतानि पुनन्धि जन्तजातिस्मात समो मतु पापेभ्यो मुहानाय संशयः । पदच्छेद। - - -- प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ १ योजना-द्विजः यत्र यत्र आत्मानं संकीर्ण (वशं) में करके जो ब्राह्मणके लिये तिल मन्यते तत्र तत्र तिलैः गायच्या होमः तथा धेनुको देता है वह ब्रह्महत्या आदि पापसे द्विजः वाचन कार्य:- छुटता है इसमें संशय नही इसी प्रकार तात्पर्यार्थ-जिस जिस ब्रह्मबध आदिसे । इत्यादि रहस्यकाण्डमें कहे हुए दान मूर्व उत्पन्न हुए पापसे आत्माको यदि द्विज लिप्त | द्विजाति और श्री शुदके लिये समझने मानें तो तिस तिस पापको शान्ति के लिये जोकि यमने कहा कि जो प्रातःकाल गायत्रीमत्रसे तिलोंका होम करे तहां यह तिलोका दान स्पर्श भक्षण स्नान और होम व्यवस्था है कि महा पातकोंमें तो गायत्री मंत्रसे करता है वह सब पापोंको तरता है तथा लक्ष होम करें क्योंकि यमकी स्मृति हेकि । इद्रियोंको जीतकर जो मनुष्य वर्ष दिनतक गायत्रीमंत्रसे लक्ष होम किया जाय तो मास मासकी दो अष्टमी तथा चतुर्दशी मनुष्य सब पातकोस छुटता है अतिपातक अमावास्या पूर्णमाप्ती सप्तमी और दोनों आदिमें तो पादपादके (चतुर्थाश ) प्राय- द्वादशी इनको भोजन नहीं करता वह सर्व श्चित्तमेंसे हासकी कल्पना करना उचित है पातकोंसे छूटकर स्वर्गलोकको जाता है तथा तिलोंसे वाचन अर्थात् दान करना और जो अयि ने कहा हैकि आपाढको पूर्ण- तिसी प्रकार रहस्याधिकारमें वसिष्ठेने मासीके दिन विष्णु क्षीरसमुद्रके. विषे कहा हैकि वैशाखको पौर्णमासीके दिन पांच शेषरूपी शय्यापर सोते हैं और कार्तिकको वा सात ब्राह्मणों के लिये सहतयुक्त काले पोर्णमासीके दिन निद्राको त्यागते हैं उन वा शुक्ल तिलोंका दान करके यह कहै कि दोनों पौर्णमासीयोंको जो हरिको. पूजे वह हे धर्मराज आप प्रसन्न हो ऐसे कहनेसे शीघही सब पापोंको नष्ट करता है उन जो मनमें पापहों वे सब और यावजीव किये सब यम आदिके कहे हुए वचनोंको व्यवस्था हुए पाप उसी क्षणमें नष्ट होजाते है अनियत ) विद्यासे हित पुरुषोंके विर्षे ज्ञान अज्ञान कालमेंभी दान उसी बसिष्ठने कहा कि सकृत् ( एक वार ) और अभ्यास आदिसे कृष्णमृगचर्मके ऊपर तिल सुवर्ण मध और किये पापको विशेषतासे समझनी- सर्पिः इनको रखकर जो ब्राह्मणको देता है भावार्य-जिस जिस पापसे लिप्स आत्मा- वह सब पापाको तरजाता है तिसी प्रकार को द्विज माने उसी २ पापकी शांतिके यार्सेनभी कहा है कि आत्माको संयत | लिये गायत्री मंत्रसे तिलोंका होम और दरन करे १५३२०१७ १ गायत्र्या लक्षहोपे तु पुच्यते सर्वपातकः। २ वैशात्या पार्णमामा घायमान् पच सप्त तिलान्ददातिय:प्रातस्तिलान् स्पृशति खाद- माझंदपुन:स्तिटः कृष्णेवीचयेरवतः । प्रीयता ति। तिटस्नायो तिटाजुइन्सर्वे तरति दुशनं । टेवा- धर्मराजेति यार मनास वर्तते । यावततं पापयामासस्य चतुर्दश्यां तवचाभमावास्या पूर्णमासी तत्क्षणादेव नाति। सप्तमी वादीदय । संवासाममुंगानः सततं विजिते- ३ फूणानिने तिलारता शिर्थ मपसपिपा! दियः । मुच्यते पातक सौंः वगटोक च गच्छति साति यस्तु विप्राय सर्व तरति दृष्य । २ क्षीराच्या पायो भाषामा सविरोहिः। ४ तिलग्नु प यो दयारसंरतामा द्विजन्मने । म निदां त्यजति फातिको तरीः मपूजयटारें।मदरा सइत्यादिभिः पापैर्मुध्यते ना सरायः । दिक पापं क्षिप्रमेव व्यपोइति ।
(६६६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । . . वेदाभ्यासरतक्षांतपंचयज्ञक्रियापरम् ।। भावार्थ-वेदके अभ्यासमें तत्पर शान्त' । नस्पृशंतीहपापानिमहापातकजान्यपि३११ स्वरूप और पंचमहायज्ञोंमें तत्पर मनुष्य- को महापातकोंसे उत्पन्नहुएभी पाप स्पर्श पद-वेदाभ्यासरतं २ क्षान्तं २ पंचयज्ञ नहीं करते ॥ ३११ ॥ .. क्रियापरं २न:- स्पृशन्ति कि-इहा- पापानि १ महापातकजानि १- अपि:- वायुभक्षोदिवातिष्ठरात्रिनीत्वाप्सुसूर्यदृक्॥ जत्त्वासहस्रंगायच्याशुद्धयेद्रह्मवधाहते३२ योजना-वेदाभ्यासरतं क्षांतं पंचयज्ञ क्रि- यापरं द्विजा इह लोके महापातकजानि अपि पद-चायुभक्षः १ दिवा-तिष्ठन् १ रात्रि पापानि न स्पृशन्ति-- नीत्वाऽ-अप्सु ७ सूर्यदृक् १ जप्त्वाऽ-सह- तात्पर्यार्थ-पूर्व वेदका स्वीकार-फिर विचार २ गायन्याः ६ शुध्येत् क्रि-ब्रह्मवधात५ फिर अभ्यास-उसके अनंतर जप और फिर ऋते- उसकाही शिष्यों के लियेदान इस प्रकार पांच योजना-वायुभक्षः दिवा तिष्ठन् तथा प्रकारका वेदाभ्याप्त जो कहा है इसी क्रमसे रात्रि अप्सुनीत्वा सूर्पर सन् गायत्र्याः स- जो वेदके अभ्याप्तमें तत्पर और तितिक्षासे हनं जप्त्वा ब्रह्मवधात् ऋते शुध्यत् ।। युक्त और पंचमहायज्ञके अनुष्ठानमें तत्पर तात्पर्यार्थ-उपवाप्त करता हुआ मनुष्य जो मनुष्य है उसको महापातकोंसे उत्पन्न दिनको, और रात्रिको जलमें बैठकर व्यती- हुएभी पाप स्पर्श नहीं करते प्रकीर्ण और त कर फिर सूर्योदयके पीछे सहस्र (हजार) वाणी और मनसे उत्पन्न हुए पाप तो क्याकर गायत्रीको जपकर ब्रह्महत्यासे अतिरिक्त सक्ते हैं प्रकीर्ण इत्यादि अर्थ, यहां अति- सब महापातक आदि पापसे छुटताह इससे शब्दसे लब्ध होता है यह वचन अकामसे यह वचन उपपातक आदिके अभ्यास वा किये पापके विषयमें समझना इसीसे वसिष्ठ अनेक पापो समुच्चयमें समझना क्योंकि ने प्रकीर्णक आदिके अभिप्रायसे कहा है जो विषयह ऐसे विषयका सम (समान) 'कि जो वेद और संकटों भकायोंको धारण करना अन्याय होताह इसीसे वृद्ध वसिष्ट- करता है उसके कि सेकही उत्कट अकायों ने महापातक और उपपातकोंके विप व्रत- (पाप) को उसकी वेदाग्नि ऐसे दाध कर विशेष कालविशेषमें कहा कि यवोंकी प- देती है जैसे अग्नि इंधनको यह कहकर यह कहा हकि वेदक बलको प्राप्त होकर यानां प्रमतिमंजलि धामापमार्ण घृतं चामि पापमें रत नो अर्थात् पाप नकर क्योंकी मंत्रयेत योसि धान्यराजस्व वारणो मधुसयुतः। गजान वा प्रमादसे जो कर्म किया जाता है। निर्णोदः सर्वपापानां पवित्रषिभिः स्मृत इत्यनेन कही दाध होता है इतर नहीं- घृत यवा मधु याः पवियममृतं ययाः सई पुनंतु मे पारं वामनः कागसंमत्रमित्यनेन वा भीमकार्य न फुतिते न भूतपति तपा । नान भिक्षां नातिथ्य म चोमिट १ पापेशतं सामंत वैदश्च धागते । सर्व परित्यजेत् । मेयामनोजाता मनोयुनः सुरक्षाः दक्षपि- सगरम येदारित्यशिविन्धन ! न वेदपलमाथि राते नः पातु सेनाऽजन्तु तेभ्यो नमरतेभ्यः स्महत्या- पारमार्मिी । भगनाए प्रमाण पते कर्म मेलनि अहुपात्रिमेयामिरो पापक्षपाय गिराने ससरा प्रमादिप दाहारा पतितासन मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ 1 कीहुई प्रसूति वा अंजलिको और घृतको योजना-ब्रह्मचर्य दया क्षांतिः दानं सत्यं इस मंत्रसे अभिमंत्रित करे कि तू जो है अकल्कता अहिंसा अस्तेयमाधुर्ये च पुनः धान्योंका राजाहै और वरुण तेरा देवताहै | दमः इति यमाःस्मृताः मन्वादिभिरिति शेप:- मधुसे युक्तहे सब पापोंको दूर करनेवाला स्नानं मोनोपवासेज्या स्वाध्यायोपस्थनिग्रहाः ऋषियोंने पवित्र कहाहै अथवा इस मंत्रसे गुरुशुश्रूषा शौचाक्रोधाप्रमादता एते नियमाः कि घृत और जौं मधु और जौं पवित्र अमृ- स्मृताः १ मन्वादिभिरिति शेपः ॥ त यव, मेरी वाणी मन कायासे पैदा हुये तात्पर्यार्थ-अब व्रतके अंग धर्माको क- सब पापोंसे पवित्रकरो और अग्निकार्य न हते हैं ब्रह्मचर्य अर्थात् संपूर्ण इंद्रियोंको कर और तिससे भूतबलि न करे अग्रभिक्षा विषयोंसे रोकना दया क्षमा दान शटताका आतिथ्य उच्छिष्ट इनको न त्यागै जो देवता | त्याग अहिंसा अस्तेय (चोरीन करना) मनोजात, मनोयुज, सुदक्ष, दक्षपितर हैं ये | मधुर वचन कहना और इंद्रियोंका दमन हमारीरक्षाकरो २ तिनको नमस्कार है.उन-(दवाना) ये दश मनु आदिकोंने यम कहे के लिये स्वाहा है इस मंबसे बुद्धिकी हैं और जो मनुने यह कहा है कि अहिंसा वृद्धि और पापके क्षयार्थ त्रिरात्र होम कर सत्य अक्रोध आर्जव (कोमलता ) इनको और ब्रह्महत्या आदिमें सप्त रात्र और करे वहभी इनका उपलक्षण है कुछ गिनने पतितसे उत्पन्न होय तो द्वादश रात्र हवन केलिये नही और यहां दया क्षांति आदि करे इसी प्रकार अन्यभी स्मृति के वचनोंका पुरुषार्थ रूपसेही प्राप्त थे पुनः विधान प्राय- विवेक करना ॥ श्चित्तके अंगजतानेके लिये है क्वचित् (कहीं) भावार्थ-दिनमें खड़ा होकर वायुको विशेषभी है जैसे विवाह आदिकौमें अनुज्ञा-- भक्षण करता और रात्रिको जल में वस कर तभी अनृत ( मिथ्या ) वचनकी निवृत्तिके और प्रातःकाल सूर्यके दर्शन किये पीछे लिये सत्यका वचन है और पुत्र शिष्य आ- एकसहस्र गायत्रीको जपकर ब्रह्मवसे दिकीभी ताडना न करे इसके लिये अहिंसा भन्य जो पाप उनसे छुटता है ॥ ३१२ ॥ का विधान है और स्नान मौन उपवास यज्ञ इति रहस्यप्रायश्चित्तप्रकरणम् । स्वाध्याय (वेदपाठ) और उपस्थ (लिंग)का ब्रह्मचर्यदयाक्षांतिनंसत्यमकल्कता। निग्रह ( वशमें रखना) यहभी ब्रह्मचर्यसेही अहिंसास्तेयमाधुर्यदमश्चेतियमा:स्मृताः॥ . आजाता पुनः पृथक् निर्देश ( पढना ) गो पद-ब्रह्मचर्य १ दया १ क्षांतिः १ दानर बलीवर्दन्यायसे है जैसे गामानयबलीपर्द सत्यं १ अकल्कता १ अहिंसा १ अस्तेय- चानय इस वाक्यमें गोके कहनेसेही बेल माधुर्ये? दमःर चर- इति:- यमाः स्मृताःर- आजाता पृथक् पाठ विशेषताके लिये है स्नानमानीपवासेज्यास्वाध्या- गुरुकी शुश्रूषा शौच क्रोध और प्रमादका योपस्यनिग्रहाः । नियमागुरु- त्याग ये दश नियम आचायांने कहे हैं। शुश्रूषाशीचाकोघाप्रमादता ॥ भावार्थ-ब्रह्मचर्य दया क्षमा दान सत्य पद-स्नानं १ मोनोपवासेज्यास्वाध्यायो अकुटिलता अहिंसा अस्तेय मधुरस्वभाव पस्थनिग्रहाः १ नियमाः १ गुरुशुश्रूषा १ । दम ये दश यम और स्नान मान उपवास यज्ञ शौचाक्रोधाप्रमादता १॥ - , (६६८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । वेद (पढना) लिंग इंद्रियको रोकना गुरुकी और कुशाका जल यहपंचगव्य कायाका शो- शुश्रूपा शौच क्रोध और प्रमादका त्याग ये धन पवित्र कहा है ताम्न वर्णकी गौकागोमूत्र दश नियम आचार्योंने कहे हैं।।३१३॥३१॥ श्वेत गोका गोमय सुवर्णके समान वर्णकी गोमूत्रंगोमयंक्षीरंदधिसपि कुशोदकम् । का दूध- नीली गौका दधि- काली गौका जग्ध्वापरयुपयसेत्कृच्छंसांतपनंपरम्३१५ घृत ग्रहण करे अथवा यदि सब वर्णोकी गो न मिले तो संपूर्ण गोमूत्र आदि कपिला पद-गोमूबं२ गोमयंरक्षीरंदधिरसपिः२ गोके लेने पंचगव्योंके विषय यह विधि है- कुशोदकम् २ जग्ध्वाः-परे ७ अनि ७ उपव- आठमासे गोमूत्र-सोलहमासे गोमय-वा- सेत् क्रि-कृच्छू १सांतपनं २-परम् १॥ रह मासे दूध- दशमासे दधि- कहीहै योजना-~ गोमूत्रं गोमयं क्षीरं दधि और गोमूत्रके समान धृतकेभी आठभाग सर्पिः कुशो दकं पूर्वे अह्नि जग्ध्वा परे अह्नि | कहे हैं और उससे आधा कुशाका जल उपवसेत् एतत् परं सांतपनं कृच्छं स्मृतम्- होताहै, गायत्री पढकर गोमूत्रको ले-और तात्पर्याय- पहिले दिन अन्य भोजनको गंधद्वारा इस मंत्र से गोमयको और आप्या- त्यागकर गोमूत्र गोमय दूध दधि घी इन यस्व. इस मंत्रसे दूधको और दधिकागो. पांचा द्रुयोको और कुशाके जलको मिला इस मंत्रसे दहीको और तेजोसि• इस कर पीवै और दूसरे दिन उपवास करें यह मंत्र घीको- और देवस्यत्त्वाः इस मंत्रसे दो दिनका सांतपन कृच्छू होताहै- यहां कुशाजलको ग्रहण करे ऋचाओंसे पवित्र मिलाकर पांचोंको पीना इससे जाना जाता किये पंचगव्यको अग्निमें होम करे- सात है कि अगले श्लोकमें पृथक् २ पीना कहा पत्तोंके ओर अग्र भाग सहित और शुद्ध ह- कृच्छ् जो कष्टसे हो यह अन्वर्थ संज्ञा प्रकाशरूप कुशोंसे विधिपूर्वक पंचगव्यका क्योंकि यह सांतपनरूप व्रत क्लेशसे होता है | होम करें और इरावती० इदंविष्णुः मान- अन्वर्थ संज्ञा वह होती है जिसका अर्थ भी स्तोके. शंवती० इन मंत्रोंसे होम करे और : संज्ञी ( अर्थ ) में घट जाय और जव पहिले होमके शेष पंचगव्यको द्विज पीवे-और दिन उपवास करके अगले दिन मंत्रोंसे पं- ओंकारसे आलोडन (विलाना वाचलाना) चगव्योंको मिलाकर मंत्रोंसही पंचगव्य पीया और ओंकारसेही अभिमंत्रण और ऑफारसे जाय तो वह ब्रह्मकुर्च कद्दाता है-सोई पाग- उद्धत (उठाना वा लेना) करके ओंकारसेही शने कदाह कि गोमूत्र गोमय दूध दही घी दधितिजोसि शुक्रमित्याज्यं देवस्य वा कुशोदफा पंच: १ गोललं गोमयं हीर दघि सार्पः कुशोदक । गयमचाएतं होमयेदमिसनिधी । समपमाच ये दर्मा निदिष्टं पंचगव्यं तु प्रत्येक कायशोधनं । गोमन साम्र- अविनामा: चिलिफाएतरदाय होतव्यं पचगळ पर्णाशः यतायाश्चापि गोमय । पयः यांचनवायाः । यथाविधि । इरावती पिष्णुर्मानस्तोफे पसंतती । नोलायाध तथा दथि । घृतं ययगवायाः सर्व का एनाभिधव दोतव्यं हुतशेष पिपेटिजः । प्रगोन समा. रिलमेर या । भलाभ सीनां पंचगव्येप लिपिः। टोना प्रणवेनाभित्र्य च । प्रणोन समुदाय वित- गोनी मारकारली गोमयस्य तु पोटश क्षीरस्य | वणवेन तु । मध्यमेन पला शस्य पमपमेण या पित। बादश मोका मस्तु दश कौतिताः गोमतपत-वर्णपात्रेश ताण प्रगतीयन या पुनः मतगस्थिगत- गो तदर्थ तु कुशोदक । गाय गदार गोमूत्र गंध- पाप है तिष्टति मान । प्रकोपवासस्नु दारा- प्रारति मामाभानिय क्षीर दधिकार ति वे| तिरिन्धनम् । । 1 'प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६६९) पावे और ढाकके मध्यके पत्तेसे वा पद्मके पत्तेसे कृच्छः महासांतपनः स्मृतः मन्वादिभिरि- पावे अथवा सुवर्णके पात्र वातायेके पानसे पावे |तिशेषः । अथवा ब्रह्मतीर्थसे पाये और पीने के समय तात्पर्यार्थ-सात दिनमें जो किया जाय इस मंत्रको पठे कि जो मेरे शरीरके विषय | वह महासांतपन कृच्छ जानना कैसे जान- त्वचा अस्थियोंमें पाप है उसको ब्रह्मकूर्च ना इस अपेक्षामें कहा है कि पृथक् २ कि- उपवास इस प्रकार दग्ध करो जैसे अग्नि ये छओं गोमूत्र आदिको पीकर एक २ दिन इंधनको करतीह- और जब यही पंचगव्य व्यतीत करें और सातवें दिन उपवास करे मिलाकर तीन पत्र पीयाजाय तब यति- यह महा सांतपन कृच्छ कहा है यमने तो सांतपन कहाताहै- क्योंकि शंखेकी स्मृति | पंद्रह दिनमें जो किया जाय वह महासात- कि इसकाही तीन दिन अभ्यास किया | पन कहा है कि तीन दिन गोमूत्र तीन दिन जाय तो यतिसांतपन कहाहे- नाबालेने गोमय, तीन दिन दही, तीन दिन दूध, तीन तो सात दिनमें जो किया जाय यह सांत- दिन पी पीनेसे शुद्ध होता है यह महासांतप- पन कहाँह कि गोमूत्र गोमय दूध दही | न सब पापोंका नाशक है जावाल ने तो इ- घी कुशाका जल इन एक एकको प्रतिदिन कोस गत्रमें जो हो वह महासांतपन कदा पीकर अहोरात्र उपवाप्त करें यह सांतपन है कि इन गोमूत्र आदि छओमसे एक २ कृच्छ सब पापोंका नाशक है और इन गुरु को तीन २ दिन पावै और पिछले तीन दि- लघु कृच्छोंकी व्यवस्था शक्ति आदिकी अ न उपवास करें और जब इन्ही सांतपनद्र पेक्षासे जाननी इसीप्रकार आगेभी व्यवस्था | व्योमसे एक २ को दो २ दिन पीत्र तो अ- तिसांतपन होता है सोई यमने कहा है कि जाननी॥ इनको ही एक २ करके दो २ दिन पार भावार्थ-पहिले दिन गोमूत्र गोमय दूध | तो यह अति सांतपन नामका कृच्छ धपा- दही घी और कुशाका जल इनको पीक ककोभी शुद्ध करता है यहां श्वपाककोभी र अगले दिन उपवास करे यह श्रेष्ठ सांत- शुद्ध करता है यह अर्थवाद है अर्थात् पन कृच्छ्र कहाता है ।। ३१५॥ श्वपाककी शुद्धि नहीं हो सकती ।। भावार्य-इन छओं सांतुपनके द्रव्योंको पृथक्सांतपनद्रव्ये पडहासोपवासकः । पृथक २ छुः दिन पावै और सातवें दिन सप्ताहेनतुच्छोयमहासांतपनास्मृतः ॥ उपवास करे यह सात दिनमें करने योग्य महा सांतपन कहा है ॥ ३१६ ॥ पद-पृथक्सांतपनद्रव्यैः ३-षडहः१ सो- पढुिंवरराजीवविल्वपत्रकुशोदकैः । पवासकः १ सप्ताहेन ३-तु कृच्छ्रः अ- प्रत्येकंप्रत्यहंपीतेःपर्णकृच्छूउदाहतः३१७ यम् १ महासांतपनः १ स्मृतः-१॥ योजना-पथक्सांतपनद्रव्ये : सोपवासकः १ यह पिवेत्तु गोमूत्रं यह चे गोमय पित पडहः चेत् गच्छति ताई सप्ताहेन अयं । पई इघि यह क्षार व्यहं सस्तितः शुचिः । महा- सांतपन ह्यतत्सर्वपापप्रणाशनम् । १ एतदेव त्र्यहाभ्यस्तै यतिसांतपन स्मृतम् । २ पण्णामेकैकमेतेषां त्रिगत्रमुपयोजयेत् । व्यदं २ गोमूत्र गोमय क्षीरं दधि सर्पि कुशोदकम् । एकै- चौपवसेस महासांतपन विदुः । के प्रत्यह पीता लहोरात्रमभोजनम् । कृच्छू सांतपनं ३ एतान्येव यदा पेयादेकैकं तु यह दवई अति नाम सर्वपापप्रणाशनम् । सांतपनं नाम श्वपाकमपि शोधयेत् ।
(६७०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । पद-पर्णोदुम्बरराजीवविल्वपत्रकुशोदकैः३ | तप्तक्षीरघृतांबूनामेकैकंमत्यहपिवेत् । 'प्रत्येकं २ प्रत्यहं २ पीतेः ३ पर्णकृच्छ्रः १ एकरात्रोपवासश्चतप्तकृच्छूउदाहृतः ३१८ उदाहृतः १- योजना-प्रत्येकं प्रत्यहं पातः पर्णोदुम्बर पद-तप्तक्षीरवृताम्बूनां ६- एकैकं २ प्र- राजीवबिल्वपत्रकुशोदकः पर्णकृच्छ्र: उ-त्यहं २ पिवेत् क्रि-एकरात्रोपवासः १ का दाहृतः॥ तप्तकृष्टः १ उदाहृतः १ ॥ तात्पर्यार्थ-दाक गूलर कमल बेल इन योजना-तप्तक्षीरघृताम्बूनां ६ एकेक प्र- एक २ के पत्तोंके काथके (जल)को प्रति- त्यहं पियेत् च पुनः एकरात्रोपवासः असो दिन पवि और फिर एकदिन कुशाका जल पावे तप्तकृच्छ्रः उदाहृतः॥ यह पांचदिनमें करने योग्य पर्णकृच्छ्र कहा है.और जव ढाक आदिके पत्तोंको इकडे तात्पर्यार्थ-तपाये हुए दूध घी जलोंमसे करके तीनरात्र उनका साथ पियाजाय तब एक एकको प्रतिदिन पावे-फिर एकरात्र पर्णकूर्च होता है सोई यमने कहा है कि उपवास करे यह चार दिन में होने योग्य म- इन संपूर्णीको तीनरान उपवास करनेके अ- हातप्तकृच्छू कहा है और इन सबको एक- नन्तर शुद्ध होकर काथ करके पावे तो यह दिन पीकर आर एकदिन उपवास करे तो जलोंका ब्रह्मकुर्च कहा है और जब बेल दोदिन में होने योग्य वह तप्तकच्छ्र कहाता है आदि प्रत्येक फलोंको क्वाथ करके मासभर मनुने तो बारह दिनमे जो किया जाय वह पावै तो उसको फलकृच्छ्र संज्ञा होती है | तप्तकृच्छू कहा है (अ० ११ श्लो० २१४) सोई मार्कण्डेयने कहा है कि एक मासभर | कि तप्तकृच्छूका आचरण करता हुआ ना- फलोंके छाथको पावे तो बुद्धिमानोंने फल ह्मण जल घो दूध पवन इन प्रत्येकको उष्ण कृच्छ कहा है श्रीफलोंसे श्रीकृच्छ पद्मा- करके सीन २ दिन एकदिन स्नान करनेके क्षोंसे पनकृच्छ और इसीप्रकार आमलकों के अनन्तर सावधानीते पावे दूध आदिका मातभर छाथको पीव तो अन्यभी श्रीकृष्ट परिमाण तो पराशरका कहा जानना कि 'कदा है पत्रोंके पीनेसे पत्रकृच्च पुष्पोंके तीन पल जल पावे दोपल दुध एकपल पी पानसे पुष्पकृच्छ और मूलके पानसे मूलकृच्छ और तीन रात्र तक टप्ण पवन पाव अर्थात् और जलके पानसे तोय कृच्छ कहा है । विरात्रतक उष्ण जलकी याप्प पाव और भावार्य-टाक गृलर कमल, वेल इनके जव शीतलही दूध आदिको पीवे तो शीत पते और कुशाका जल इन प्रत्येकको प्र-कृच्छ कहाता है क्यों कि यमकी स्मृति है कि तिदिन पीव तो पर्णकृच्छ कहा है ॥३१७॥ तीन दिन ठंदा जल-तीनदिन शीतल दूध- एतान्येत्र समस्तानि त्रिरात्रोपोशितः शुचिः । प्राययिता दिददः परभिधीयते । रातको चरविप्रो जलक्षीतानिलान् । २ पटमामेन झपितः फटकच्या मनीषिभिः। श्री | प्रति क्विदुष्मान् सदनायी समाहितः ! पराधीले प्रोतः पारस्तया । महिनाम २ अपितु निग्लं सुपर पिद द्विपल पल- सो श्रीपयामा स्मृत । पर्मतः पटलः मेर्फ पिपरसापावरा घोलमारुतम् । पुस्तक टमाते । मूलतः स्मो मलैलोर- ३ यह गीत रिचतोयं महंगीत पयः वि। एसो जलेन । पति पतं पारा वायुमक्षा पदम् ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६७१) तीनदिन शीतल पी- और तीनदिन शीतल है कि प्रातःकाल इविन्यका भोजन करके पवनको पवितो शीत कृच्छ होता है। तीन पशि भोगन नकर इसी प्रकार नाक "भावार्थ-तपाये हुए दूध पी जल इन भोगनकी विधि भी समझाना-नही है याचित. प्रत्येकको एक २ दिन पाव तो तप्तपृच्छ जिसमें उसे भयाचित कहते हैं उसमें विशेष कदाताह ॥ ३१८॥ कालका कथन नही इससे दिनरात्रिों विना मांगे जो मिले टसे एकवार भोजन एकभननोनतवायाचित्तनच ॥ करें क्योंकि कृच्छ् तपम्प है दुसरीवार उपासनचवायंपादच्याप्रकीर्तितः ॥ भोगन करनेमें तप नही होसक्ता औरअया- पद-एकभक्तेन ३ नक्तेन३ तथा:- एवाचित पदरी कुछ पराये अन्नको याचनाका अपाचितेन ३ - पचासेन ३ च-ए-निषेध नदी किन्तु अपनाभी अन्न सेवक और भार्या मादिसिन मांगना क्योंकि अयं १ पादकृच्छः १ प्रकीर्तितः१ यांश प्रषण और अध्यषण में समान होती है योजना-एकभक्तन नक्तंन चपुनः तथा इससे अपने परमभी सबक और भार्या अयाचितेन तथा उपयासेन अयं पादकृच्छः आदि विना याचन करनेसे देदे तो टेले प्रकीर्तितः- अन्यथा नहीं इसी अभिप्रायस गीतमने तात्पर्याय-दिनमेंही एकवार भोजन करके कहा कि फिर तीनदिनतक क्रिसीकी एक महोगनको व्यतीत को क्योंकि नक्तेन याचना नकर इसमें प्राप्त संख्याका नियम इसपदसे रात्रिकोही भोगन करके नक्तवत । पराशर ने दिखाया हैकि सायं कालको पारद का पृथक् उपादान हे तिसमें दिनमेंही यह । पास प्रातःकाल पंद्रह और याचनाके चौवी कइनसे रात्रिभोजनका निषेध और एकवार | स २४ पास कहे हैं और आपस्तम्बने तो कहनेसे दोवार भोगनका निषेध-भोजन यह | अन्यथा कहा कि सार्यकालको वतीस कहनेसे उपवासका निषेध समझना-कृच्छ् । मास प्रातःकाल छब्बीस और याचनाके आदिकोंको प्रतरूप होनेसे पुरुषार्थभोजन | चौवीस २४ और तीनदिन पयासके होते के निधसे कृच्छके अंग भोजनका विधान हैं और कुझुट भंटके प्रमाणका सा है सोई आपस्तम्बने कहा हैकि तीनदिन । मुखमें सुखसे चला जाय तैसा पास होता रात्रि में भोजन नकर भार तीनदिन दिनमें है इन दोनों कल्पोंका शक्तिको अपेक्षासे नकर और तीनदिन अयाचित व्रतको करे विकल्प समझना, आपस्तंबने तो प्राजापत्य और तीनदिन कुरभी भोजन नकर इस 'सायन्तु द्वारा प्रासाः प्रातः पचरस स्मृताः। आपस्तम्बके वचन में अनत्ताशी इस पदमें प्रत चतुरिंशतिराशच्याः परं निरशनं स्मृन । अर्थमें णिनि प्रत्यय करनेसे नक्त (रात्रि) २ सार्यद्वाविवतिसा: प्रातः पदिशतिः स्साः । भोजनके निषेधसे दिनमें भोजनका नियम | चतुविशीतगयाच्याः परं निरशनाप्रयः। माटोडममा- प्रतीत होता है गोतमनभी यही स्पष्ट किया | णस्तु यथा चास्य विश्चत्सुख । ३ यह निशम पारः पाश्चायाचितम्यई । सार्य १ व्यहमनताश्यीदवासी ततक्यहव्यहमयाचित | यह तया पादः पादः मातस्तथा व्यई । मातः पादं घर-, अतष्यहं नानादि किंचन । सदा सार्य देसस्प दापयेत् । अयाचित तु राजन्ये २ इविप्यान्प्रातराशाभुश्वातितोरात्रीनश्निीयार । त्रिरात्र मामणे स्मृतं ।
(६७२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । प्रायश्चित्तका चार प्रकार विभाग करके चार तात्पर्यार्थ-यही पाद कृच्छ् यथाकथंचित पादकृच्छू करनेके अनंतर वर्णोके क्रमसे दंड कलितके समान आवृत्ति वा अपने व्यवस्था दिखाई है कि तीनदिन उपवास स्थानकी वृद्धि अनुलोम- और प्रतिलोम न करना यह एकपाद और तीन दिन अ-: क्रमसे किया जाय और वक्ष्यमाण जप आ- याचित और तीन दिन सायंकाल और तीन दिसे युक्त होय वा रहित होय और तीन दिन प्रातःकाल भोजन करे यह एक २ वार किया जाय तो प्राजापत्य कहाता है उ- पादकर प्रातःकालके पादको शूद्र करे सा- समें दंड कलितके समान आवृत्तिका पक्ष वसि यंकालके को वैश्य और अयाचितको क्षत्री ने दिखाया है कि एक दिन प्रातःकाल एक और त्रिरात्रके उपवासको ब्राह्मण करे और दिन नक्त एक दिन अयाचित भोजन करे जब अयाचित उपवास तीन २ दिन किये | और एक दिन पराक व्रत करे इसी प्रकार जाय तब तो अद्धकृच्छू और सायंकालको | औरभी चार दिन व्यतीत करे धर्मधारियोंमें छोटकर तीनों कृछु किये जायतो पादोन | श्रेष्ठ मनुने ब्राह्मणोंके अनुग्रहार्थ बालक कृच्छू जानना क्योंकि उसनेही यह कहा है | वृद्ध आतुरोंके लिये यह शिशुकृच्छ्र कहा है कि सायंकाल प्रातःकालके विना अर्द्ध अनुलोम क्रमसे स्वस्थानकी विशेष कर. कृच्छू और सायंकालको छोडकर पादोन वृद्धिका पक्ष तो मनुने दिखाया है कि तीन कृच्छ होता है अर्द्धकृच्छका दूसरा प्रकारभी | दिन प्रातःकाल तीन दिन सायंकाल तीन उसने दिखाया है कि एक २दिन सायंकाल दिन अयाचितका भोजन करे और फिर प्रातः काल भोजन कर और दो दिन अया- प्राजापत्यको करता हुआ ब्राह्मण तीन दिन चित प्रत कर और दो दिन उपवास करे कुछ भोजन न कर प्रातिलोम्यकी आवृत्ति तो कृच्छार्द्ध कहाता है । तो वसिष्ठेने दिखाया है कि ब्राह्मण प्रति.. भावार्थ-एक दिन एक भक्त, एकदिन | लोम्य फ्रमसे कृच्छको करे और उसके. नक्तं एक दिन अयाचित भोजनको करे | अनंतर चांदायण कर और जप आदिसे और एक दिन उपवास करे, इस प्रकार रहित पक्ष तो वो शूद्र आदिके विषयमें अं- चादन करनेसे पादकृच्छ कहाहै ॥ ३१९॥ | गिरीने दिखाया है कि तिससे धर्ममार्गमें यथाकथंचित्रिगुणाप्राजापत्योयमुच्यते । स्थित शूद्रको जप और होमसे रहित प्रायश्चि- अयमेवातिकृास्यात्पाणिपूरानभोजनः त्तदेना आरजपआदिसे युक्त पक्ष तोपरिशेपसे और योग्य होनेसे तीनों वर्णाके विषयों है पद-यथाकथंचित् १ त्रिगुणः १ प्राजाप- त्यः १ अयं १ उच्यते क्रि-अयं १ एव:- १ अहः प्रातरहनक्तमहरेकमयाचितं । अहः पाक भतिकृच्छारस्यात् कि-पाणिपूरानभोजनः१ तकमेर चताही परो । अनुप्रहार्थं विमाणा मनुर्धर्म- योजना-यथाकचित् विगुणः अयं प्रा- भृतां वरः । बालवृद्धानुरेष्येवं शिशुच्छ्रमुवाच ह । जापत्यः उच्यते अयं एव पाणिपूरानमां- २न्य प्रातःज्य साध्यहमवाद याचित 14t. जनः चेत् भतिकृच्छा स्यात् ॥ श्य प नाभीयाराजापत्य चौद्धिमः। ३ प्रासिटोम्यं चरेदियः पर चोदायगोताम् ।। १ मा प्रातस्तर दिनदयमयाचिस दिन- ४ तस्मादं समासाद्य सदा धर्मपये रिपत। पंप मापा सविधायते । प्रायोपत्तं प्रदातम्यं मरहमादितिः । - प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५. (६७३). . . और वह गौतम आदिने दिखाया है कि प्रजापति और स्विष्टकृत अग्निक निमित्त इसके अनंतर कृच्छोंको कहते हैं प्रातः । स्वाहा है उसमें दिनमें और गनिमें, क्षिम काल हविष्याको भोजन करके तीन काम हुआ टिकै इसका यह अर्थ है कि च- रात्र भोजन करे फिर तीन दिन नक्त डेभी पापसे एकही शीघ्र कृच्छ्रसे छुटजाऊं ऐसी और तीन दिन अयाचित भोजन करे जो कामना कर वह दिनमें कर्मके अविरोधी फिर तीन दिन उपवास कर. और शीघ्र | कालमें खडा रहे और पत्रिमें बैठनाय इसी- प्रायश्चित्तका अभिलाषी दिन और रात बैठा प्रकार योगीश्वर आदिके नही कहेभी रोर-: रद सत्य बोले अनायोंके संग न चोले गैरेष- वयोध नाम सामके जपको और नमोन्हं योधा मंत्रको नित्य जपे त्रिकाल स्नान कर स्वाय इत्यादि तपणको और सूर्यको स्तुति और पवित्र आपोहिष्टा इन तीन ऋचाओंसे और चरुके पाक आदिको शीघ्र कामनाका, और हिरण्यवर्णाःशुचयःपायका इन आठ | अभिलाषी करे इससे योगीश्वरके कहे दो ऋचासि मार्जन करे फिर इन मंत्रोंसे प्राजापत्योंके स्थानमें गौतमके कहे अनेक तर्पण कर यही सूर्यका उपस्थान है यही कर्तव्यों सहित प्राजापत्य समानां इसी प्र- घृतकी आहुति हैं बारह दिनके अंतमें चरु को पका कर उन देवताओंके निमित्त आहु । हूंटने और यहीं एकभक्त आदि प्राजापत्य कार अन्यस्मृतियों में कहे अन्यभी प्रायश्चित्त तिदे अग्नीषोम इंद्राग्नि इंद्र विश्वेदेवा ब्रह्मा धर्मसे युक्त अतिकृच्छ्र होता है इतना तो १ अपातःकृच्छान्व्याख्यास्यामो हविष्यान्मातराशा- विशेष है कि पहिले तीन दिनमें पाणिपूर न्मुक्त्वा तियो रात्री श्नीयादयापर त्र्यहं नक्तं भुजी- (अंजलिभर ) अन्नको भोजन कर बाईस तरथापरं व्यहं न कचन याचेताथापरं व्यहमुपवस-मास आदि न करे और यहां प्राप्त भोजनके स्तिटेदहनि रानावातीत क्षिप्रकामा सत्यं वदेदनाः अनुवादसे अर्थात् रागसे प्राप्त भोजनके के- सह न भांपत रोरवयोधां जपेनित्यं प्रयुजीतानुसवन थनसे अंजलिभर भोजन के विधानसे अ- मुद्रकोपस्पर्शनमापोहिष्टेति तिसृभिः पवित्रवती भिर्जियात हिरण्यवर्णाः शुचयः पारकाः इत्यष्याभिरथी- तके तीन दिनमें अति देशसे पाया उपवास दर्फतर्पण। नमोहमाय मोहमाय मेहमाय धन्वने तापसाय | अप्रतिपक्ष हे अर्थात् उसे कोई नही हठा- पुनर्वसधै नमो मौज्याय औाय वमुर्विदाय सर्व- सक्ता यहांभी पूर्वक समानही कृच्छोंके पा- विदायनमः पारय सुपाराय महापाराय परपाराय पार- (दोंकी व्यवस्था जाननी और जो मनु (... विष्णवे नमः । रुद्राय पशुपतपे महते देवाप व्यकार | ११ को० २१३) ने कहा है कि पूर्वके स- कचरायाधिपयतये हराय शर्वेशानाय उमाय वजिणे मान पहिले तीन २ दिन एक २ मास खाय. घृणिने कपदिनेनमः। नीलग्रीवाय शितिकठायनमः।- और अंतके तीन दिन उपवास अतिकच्छ ष्णाय पिंगलायनमः । ज्येष्ठाय श्रेष्टाय वृद्धायेन्द्राय हरि- करता हुआ करे वह वचन पाणिपूरानकी केशाय उरतसनमः । सत्वाय पावकाय पावय-वर्णा- | अपेक्षा अल्प होनेसे समर्थक विषयमें है ।। यैकवाय कामाथ कामरूपिणे नमः । दीप्ताय दीत भावार्थ-जिस कीसीप्रकार तीनवार अभ्यास पिनमः तीक्ष्णाय तीक्ष्णपिणेनमः सौम्याय पुरुषाय किया सान्तपन प्राजापत्य कहाता है और महापुरुषाय मध्यमपुरुषाय उत्तमपुरपाय ब्रह्मचा- अंजलिभर अन्नका जिसमें भोगन हो ऐसा रिणे नमः चदललाटाय कृत्तिवाससेनमः। २ अनये स्वाहा सोमाय स्वाहामीणोपाभ्याम- यह प्राजापत्य अतिकृच्छ्र होता है ॥३०॥ दामिभ्यामिदाय विश्वेभ्यो देवेभ्यो प्रश्न प्रजापतयेऽ एकैफ प्रासमनीयाध्याणि प्रीणि पूर्ववव भये स्विटकते। यह घोपर्व सेन्यमतिए परन् दिजः । ४३
(६७४)
पाज्ञवल्क्यस्मृत्ति मिताक्षराप्रकाशसहित ।
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कृच्छातिकृच्छ्रापयसादिवसानेकविंशतिम्। मसे तीन दिन भक्षण करे और चौथे दिन
द्वादशाहोपवासेनपराकापरिकीर्तितः ॥
भोजन न करें और वस्त्रकी दक्षिणा दे यह
सोम्यकृच्छ्र कहा है ३२२ ॥
पद-कृच्छातिकृच्छः १ पयसा ३ दिव-
सान् २ एकविंशति २ द्वादशाहोपवासेन ३
एषांत्रिरात्रमभ्यासादकैकस्ययथाक्रमम् ।
पराकः१ परिकीर्तितः १॥
तुलापुरुपइत्येपज्ञेयःपंचदशाह्निकः॥३२३
योजना-एकविंशतिदिवसान् पयसा अति पद-एषां ६ त्रिरात्रं २ अभ्यासात् ५ए-
वर्तनं कृच्छातिकृच्छ्र: स्यात् द्वादशाहोप- | केकस्य ६ यथाक्रमम्-तुलापुरुषः १इति:-
वासेन पराकः परिकीर्तितः ॥
एपः १ ज्ञेयः१ पंचदशाह्निकः १॥
तात्पर्यार्थ-भावार्य इक्कीस रात्रितक दूधको योजना-एषां एककस्य यथाक्रम त्रि-
ही पीना वह कृच्छातिकृच्छ् जानना गौतमने | रात्रं अभ्यासात् पंचदशादिकः एषः तुला-
तो बारह दिन केवलजल पीनेको कृच्छाति । पुरुषः ज्ञेयः॥
कृच्छु कहा है कि तीसरा जलकाही भक्षण तात्पर्यार्थ-इन पांचों पिण्याक आदिके
जिसमें हो वह कृच्छातिकृच्छ्र जानना | मध्यमें एक २ के क्रमसे तीन २ गत्र अ.
और बारह दिनके उपवासको पराक कहते भ्याससे यह पंद्रह दिनका तुलापुरुष नामका
हैं ॥ ३२१ ॥
कृच्छ् कहा है यहां पंद्रह दिनको व्यापक
पिण्याकाचामतकांबुसन्नांमतिवातरम् ।
कहनेसे उपवासको निवृत्ति जाननी यमेने
एकरात्रोपवासश्चकृच्छ्रःसोम्योयमुच्यते ॥
तो इछीस दिनका तुलापुरुष कहा है कि
आचाम पिण्याक मठा जल सक्त इनको क्र-
पद-पिण्याकाचामतकाम्बुसस्तूनां ६ प्रति | मसे तीन २ दिन और छः दिन वायुका भ-
वासरं- एकरात्रोपवासः १चा- कृतः क्षण कर तो यह इकोस रानका तुलापुरुष
सौम्यः १ अयं रटच्यते क्रि-॥
कहाता है इसमें हारीत आदि प्रपियान इति
। योजना प्रतिवासरं पिण्याकाचामतका कर्तव्यता ( करनेका प्रकार) कही है -
नुसत्तूनां भोगनं चपुनः एकपमोपवासः ] सको यहां प्रथगाख (पटना) के भयसे
अयं सौम्यः कृच्छ्र: उच्यते ॥
नहीं लिखते ॥
तात्पर भावार्य-पिण्याक (खल) आ-
भावार्य-इल पिएमक अदि पंचकम-
चाम ( भात ) तक जल सत्तू इन पांचोंके ध्यमें एक २ को क्रमसे तीन २ दिन भ-
मध्यमें एक २ को प्रतिदिन खाकर छठेदिन 1क्षण करे तो यह पंद्रह दिनका तुलापुरुष
टपास फर यह सौम्पकृच्छ कदाता है। कृच्छ्र जानना ॥ ३२३ ।।
और द्रव्यका परिमाण तो प्राणयामा (पे-
तियिवृदयाचरेपिडान्शुक्कैशिस्य
टभरना ) भर जानना जापालन तो चार
दिनमें . जो कियागाय वह सोम्यकृष्ट
उसंमितान् ॥ एकैकंहासपेकणे
कहा है कि पिग्याक सत्तु मठा इनग ग्रा-
पिंडचांद्रापर्णचरन् ॥ १२ ॥
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६७५) पद-तिथिवृद्धया ३ चरेत् क्रि-पिण्डान् २ | मध्य कहाता है और यही व्रत जब कृष्ण शुक्ल ७ शिख्यण्डसमितान् २ एककं २ पक्षकी प्रतिपदाको प्रारंभ करके पूर्वोक्त हासयेत् क्रि-कृष्णे ७ पिण्डं चांद्रायणं २ क्रमसे किया जाय तो तब पिपीलिका (चैटी) के समान मध्यमें हस्व (लघु) होता है चरन् १ ॥ योजना-चांद्रायणं चरन् द्विजः शुक्के | तब पिपोलीका मध्य कहाता है सोई कहते पशिष्यण्डसमितान् पिंडान् तिथिवृद्ध्या है कि पूर्वोक्त क्रमसे कृष्ण पक्षको प्रति चरेत् कृष्णे एकैकं पिंड हासयेत् ॥ . पदाको चौदह ग्रास भक्षण करके एक २ ग्रासके अपंचय ( न्यूनता) से .चतुर्दशी तात्पर्यार्थ-चांद्रायण व्रतको जो कराचा है वह मोरके अंडेके समान पिंडों (ग्रास) तक भोजन कर फिर चतुर्दशीको एक ग्रा- को शुक्लपक्षमें तिथियोंकी वृद्धिके अनुसार सका भक्षण करके और अमावस्याको उप भक्षण कर अर्थात् जैसे प्रतिपदा आदितिथि वासके अनंतर शुक्लपक्षको प्रतिपदाको योमें एक २ चंद्रमाकी कला आधे मासमें एकही ग्रास भक्षण करे फिर एक मासकी बढती है तिसीप्रकार पिंडोंकोभी प्रतिपदा में वृद्धिसे पक्षके शेषके विताने पर पोर्णमासी- एक ग्रास द्वितीयामें दो प्राप्त इस प्रकार | को पंद्रह ग्रास होनाते हैं इससे इसका . पूर्णिमा पर्यत एक २ ग्रास बढाता हुआभ- पिपीलिका मध्य होना ठीक है सोई वसिष्ठने क्षण करे फिर पूर्णिमाको पंद्रह ग्रास भक्षण | कहा है कि मासके कृष्णपक्षको आदिमें चोद- करके कृष्णपक्षको प्रतिपदाको चौदह हमास भक्षण कर एकरपासको न्यूनतासे भो- ग्रास और द्वितीयाको तेरह ग्रास इस प्रकार जन करता हुआ शेप पक्षको समाप्त करे तैसेही पर्यंत भक्षण करे फिर चतुर्दशीको एक ग्रास करदे और जब तिथिकी वृद्धि और हानिके एक २ ग्रासको न्यून करता हुआ चतुर्दशी शुक्लपक्षको आदिमें एक मासको भोजन कर- के फिर एकरमास बढाकर शेषपक्षको समाप्त भक्षण करके अमावस्याम अर्थात् पाये उप- होनेसे एकही पक्षमें सोलह वा चोदह दिन वासको कर सोई वसिष्ठने कहा है कि शुक्ल हो जातेहैं तब प्राप्तीकीभी वृद्धि और हास पक्षमें एक २ पिंड वढाव और कृष्णपक्षमें एक २ न्यून (कम) करे और अमावस्याको समझने क्योंकि तिथिकी वृद्धिसे पिंडोंका भोजन न करे यह चांद्रायणको विधि है | भक्षण करनेका नियम है गोतमने तो यहां चंद्रमाके अयन (गमन ) के समान हैअ- विशेष दिखाया है कि अब चौद्रायणको यम (चरण वा भक्षण) जिसमें अर्थात् चंद्र मासस्य कृष्णपक्षादी प्रासानद्याच्चतुर्दश । माकी कलाके समान जिसमें ग्रासोका हास प्रासापचयभाजी सन्पक्षशेष समापयेत् । तथैव शुभ- वृद्धि (न्यूनता अधिकता ) हो उसे चांद्रा पक्षादी प्रासं मुंजीत चापर । मासोपचयभौजी सन्पक्ष- यण कहते हैं यह एक व्रतकी अन्वर्थ संज्ञा शेष समापयेत् । है यहां "संज्ञायांदीर्घः" इससे दीर्घ होता है २ भातश्चान्द्रायण तस्योक्तो विधिः कच्छे और यही चांद्रायण जब यवके समान आदि- वपन च मतं चरेत सोभूतां पौर्णमासीमुपवमेत अंतमें सूक्ष्म और मध्यमें दीर्घ हो तब यव आप्यायस्थ, सते पयासि, नवोनव इति चैताभिस्तर्पण- माग्यहोमो इविषयानुमत्रणमुपस्थानं च चंद्रमसः 1 एकर वयरिसंड शुले कृष्णे च हासयेत् ।। यद्देवादेवहेडनमिति चतराभिराज्य जहयादेवछतो- इंदुसये न भजीत एष चांद्रायणो विधिः । ति चान समिद्भिः।
(६७६) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । - कहते हैं उसकी यह विधि कही है कि कृ- रके अण्डेका प्रमाण, पत्तोंके दोने आदिमें च्छमें मुण्डन और व्रत करे और प्रातःकाल | भरकर समझना तिसीप्रकार कुकुटके अ- जो पूर्णिमा आवेगी उसमें उपवास करें | ण्डेका और आर्द्र आवलेभर जो ग्रासके प्र- आप्यायस्व. संतेपयांसि. नवोनव०माण अन्य स्मृतियों में कहे हैं वे शक्तिके इन ऋचाओंसे तर्पण, घीका होम, और ह-! अनुसार समझने क्योंकि वे मोरके अंडेसे विका अनुमंत्रण और चन्द्रमाकी स्तुति | लधु होते हैं और जो किसीने बत्तीस दि- करें और यद्देवादेवहेडनं. इन चार ऋ- नका चान्द्रायण कहा है वह पक्षांतर दि- चाओंसे आज्य (घी) का होम कर और खानेके लिये है सार्वत्रिक नहीं कि जो यहां देवकृतस्य. इस मंत्रसे होमके अंतमें पूर्णिमाको उपवास कहा है उसको चतुर्द- समिधोंसे होम करे और इन ऑभूः इत्यादि शीमें करके पूर्णिमाको पन्द्रह ग्रास भोजन मंत्रो' ग्रासोका अनुमन्त्रण करे और मंत्र२ करै इत्यादि, योगीश्वरके वचनानुरोधसे के प्रति मनसे नमः स्वाहा. यह कह- तीस दिनकाही प्रतीत होता है जो यह सा. कर इन्ही मंत्रोंसे संपूर्ण ग्रासोका भोजन वत्रिक अर्थात् सर्वत्र मानने योग्य होता तो कर और आसका प्रमाण जिससे मुखमें वि- । वर्षदिनमें निरंतर बारह चान्द्रायण न होते कार नहो अर्थात् सुखसे मुखमें पहुंच ) और बत्तीस दिनके चान्द्रायणमें चंद्रमाकी जाय वह करना और चरु भिक्षाका अन्न- गतिका अनुसारभी सिद्ध न होता- सक्त कण जी शाक दूध दही घी मूल फल जल भावार्थ-चान्द्रायणका अभिलाषी पुरुष इविः ये उत्तरोत्तर (क्रमसे ) श्रेष्ठ है पू. शुक्लपक्षमें मोरके अण्डेके समान तिथियों र्णिमाको पन्दह ग्रास खाकर एक २ ग्रासकी की वृद्धिके अनुसार ग्रासोका भक्षण करे न्यूनतासे कृष्णपक्षमें भोजन करे और अ-और कृष्णपक्षमें एक२ ग्रास न्यून करके भ. मावास्याको उपवास करके एक २ ग्रासको क्षण करे ॥ ३२४ ॥ बढाता हुआ शुक्ल पक्षको समाप्त करें और किसीक मतमें यह चांदायणका मास वि- ययाकथंचिस्पिंडानांचत्वारिंशच्छतद्वयम् । परीत है और मुखमें जिसमें विकार न हो मासेनवोप जीतांद्रायणमयापरम् ३२५ यह ग्रासका प्रमाण चालकोंके लिये है क्यों कि वे मारके अण्डके समान पन्द्रह ग्रास पद-यथाकथंचिता-पिण्डानाम्चत्वारिं- नहीं खासक्ते दूध आदि हवियोंमें तो, मो- शच्छतद्वयम् २ मासेन ३ एव:- उपभुनोत कि चान्द्रायणम् १ अथा-अपरम् १ ॥ १७: भूस्व.महाजनः ॐ योजना-पिण्डानाम् चत्वारिंशच्छतद्वयं तपः असत्य यशः श्री अफ इट् ओजः तेजः पुरुषः यथा कथंचित् मासन एवं उपभुनीत एतत्. धर्मः शिव इत्यामात्मानुमंत्रण प्रतिमंत्रण मनसा नमः स्वाहेति वा उनतरेव मासान्भुजीत तासप्रमाण- मारपारिकारेण । परभेससक्तकणयापरशारुपयोद तात्पर्याय-दोसे चालीस २४० पासोको. धिगृतमूलफलौदफाने बौषि उत्तरोत्तरप्रशस्तानि । एक मासमें भोजन यथाकथंचित् प्रति- पोर्गमास्यां पंचदशप्रासान् भपता एकापचनापर- पक्षमधीगात अमारास्यायामुपाप्यायोपचयेन पूर्व , चतुर्दश्यामुपयासममिधार पौर्णमास्यां पाश पर विपरीत सामेर धान्दागो मासः। प्रासामुक्ता। - अपरं चान्द्रायणम्- मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६७७) दिन करे कि मध्याह्नमें आठ ग्रास अथवा चंदमाको गतिके अनुसारकी. अपेक्षा नहीं रात्रि और दिनमें चार ग्रास अथवा एक इससे तीस दिनके मासको मानकर निरंतर दिन चार ग्रास दूसरे दिन बारह १२ ग्रा- चान्द्रायण किया जाय और यदि कथंचित् सोंको भक्षण करे फिर एकपत्र उपवास क- तिथिकी वृद्धि और हानिके वस पंचमी आदि रके दूसरे दिन सोलह ग्रास भोजन करे इन तिथिमेंभी किसी चान्द्रायणका आरंभ होय प्रकारोंमसे किसी एक प्रकारसे शक्तिके अ- तोभी दोष नहीं और जो मार्कडेयेने सोमा नुसार भोजन करे यह पूर्वोक्त दोनों चान्द्रा- यन नामका मासव्रत कहा है कि सात यणोंसे भिन्न चान्द्रायण है क्योंकि पूर्वोक्त पत्र तक गोके चारों स्तनोंका दूध पीवे- . दोनों चान्द्रायणों में ग्रासोंकी संख्याका यह | और सात राबतक तीन स्तनोंका और नियम नहीं किं तु दोसो पञ्चीस २२५ ग्रास सात रात्रतक दो स्तनोंका भीर छः रात्र होते हैं और मैनुने ये प्रकार दिखाये हैं। तक एक स्तनका दूध पीवे और तीन रात्र (अ० ११ श्लो० २१८-२२०) कि मध्या- | तक वायुका भक्षण करे यह सोमायन नाम- हमें आठ २ ग्रास हविष्य अन्नके मनकी का व्रत पापोंको नष्ट करता है और स्मृत्य सावधानीसे वह मनुष्य भक्षण कर कि जो तरमें यह कहा है कि सात दिन तक गौके यतिचान्द्रायण करे और जो शिशुचान्द्रा- संपूर्ण स्तनोंको पावे फिर तीन फिर दो फिर यण करे वह विप्र चार ग्रास प्रातःका- | एक स्तनको पीवे और तीन दिन उपवास लको और चार ग्रास सूर्यके अस्त हो- करे तो वहभी मासमें सोमायन होता है वह नेपर सावधानीसे भक्षण करे और यथा | सोमायनभी चान्द्रायण धर्मक है अर्थात कथंचित् हविष्यके दोसौ चालीस २४० | उसके करनेसेभी चान्द्रायणका फल ग्रास भक्षण करता हुआ चंद्रमाके लो- मिलता है क्यों कि हारीतने अब चान्द्रायण कको प्राप्त होता है तैसेही दोसो चालीस | का प्रारंभ करते हैं इत्यादि ग्रंथसे करने २४० संख्यासे न्यून ग्रासोंसे जो होय उसके | के प्रकार सहित चान्द्रायणको कहकर इसी ग्रहण करनेके लियेभी इस योगीश्वरके प्रकार सोमायन है यह अतिदेश कहा है- वचनमें अपर पदका ग्रहण है सोई यमने और जो हारीतने कृष्णपक्षको चतुर्थीसे कहा है कि हद है व्रत जिसका ऐसा मनसे १ गोक्षीर सप्तरात्र तु पिवेत्स्तनचतुष्टयात् ।स्तनत्र- सावधान पुरुष हविष्य अन्नके तीन २ ग्रा- यात्सप्तरानं सप्तरात्रं स्तनद्रयात् । स्तनेनैकेन पात्रं सोंको भक्षण करे तो वह ऋषिचांद्रायण | त्रिरात्र वायुभुक भवेत् । एतत्सोमायनं नाम प्रत कहा है और इन यतिचान्द्रायण आदिकोंमें | कल्मपनाशनम् । २ सप्ताहं चेत्येतद्रौस्तनमखिलमय ग्रीन्स्तनान्द्री १ अशावटी समश्नीयासिडान्मध्यदिने स्थिते ।नि- सोमायनं तत् । तथैकं कुर्यात्रींचोपवासान्यदि भवति तदा मासि यतारमा हविष्यस्य यतिचान्द्रायण चरेत् । चतुरः प्रातर ३ चतुर्थीप्रभृति चतुःस्तनेन त्रिरात्रं त्रिस्तनेन त्रिरात्रं श्रीयापिंडान्विप्रः समाहितः।चतुरोऽस्तमिते सूर्ये शिशु- | द्विस्तनेन त्रिरानं एकस्तनेन त्रिरात्रमेवमेकस्तनप्रभृति चांदायण चरेत् । यथाकथचिपिडाना तिम्रोशीती: ! पुनश्चतुस्तनांत या ते सोमचतुर्थी तनूस्तया नःपाहि समाहितःामासेनाभन्हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम्। | तस्यै नमः स्वाहा या ते सो म पचमी षष्ठीत्येवं यागार्य २ श्रीबीपिहान्समश्नीयानियतारमा दृढव्रतः । स्तिथि होमाः एवं स्तुत्वा एनोभ्यः पूतश्चंद्रमस: हविष्यान्नस्य वै मासषिचाद्रायण स्मृतम् । समानता सलोकतां सायुज्य च गच्छति ।
(६७८) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । लेकर शुक्लपक्षको द्वादशीपर्यंत सोमायन और जो शंखने कृच्छोमें त्रिकाल स्नान कहा है कि चतुर्थीसे लेकर चारस्तनोंसे ! कहा है वह अशक्तके विषयमें है कि तीन तीन रात्र और तीन स्तनोंसे तीनरात्र और वार दिनमें और तीनवार रात्रिमें सचल दो स्तनोंसे तीनरात्र और एकस्तनसे तीन | जलमें प्रवेश करे और जो वैशंपायनने द्वि- रात्र इसी प्रकार फिर एक स्तनसे तीन | काल स्नान कहा है वह उसको जानना जो दिन दोस्तनोंसे तीन और तीनस्तनोंसे त्रिकाल स्नान करनेमें असमर्थ हो कि द्वि- तीन और चारस्तनोंसे तीन दिन व्यतीत करे | जातिकास्नान द्विकाल वा त्रिकाल होता है और हे सोम जोतेरी चौथी तनू है उससे | और जो गार्यने कहा है कि एकवासा (गीले हमारी रक्षाकर तिस तनूको नमस्कार और वा एक वस्त्र धारे) भिक्षाटन करे और स्नान स्वाहा है इसी प्रकार जो तेरी पांचवी छठी करके वस्त्रोको न निचोडे वहभी शक्तकोही है आदि० इसी प्रकार यज्ञ है अर्थ जिनका क्योंकि इस वचनसे शंखने एक वस्त्रभी पक्षमें ऐसे तिथियोंमें होम होते हैं इस प्रकार स्तु-विधान किया है और स्नानमें हार्यतने विशेष, ति करके पापोंसे पवित्र होकर चंद्रमाके | कहा है कि कमसे कम तीनवार शुद्धवती लोकमें और सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होता है ऋचाओंसे स्नान और जलके भीतर अघमर्ष- यह चावीस दिनका सोमायन कहा है वह णको जपकर और धुले और नवीन वस्त्रोंको अशक्तके विषयमें है धारण करके सौम्य सामवेदसे सूर्यको स्तुति भावार्थ-जिस तिस प्रकारसे दोसोचा | करे स्नानके अनन्तर पवित्र ऋचाओंका लीस पास एकमासमें भोजनकरे यह अपर ! जप करै वे पवित्र भघमर्पण देवकृतः-शुद्ध- (अन्य ) चांद्रायण है ॥ ३२५॥ वत्यः-तरत्समाः इत्यादिक हैं वसिष्ठ आदि कुचिपवणनायीकृच्छंचांद्रायणतया ॥ के कहे हुमसे अन्यतमोंको अर्थक अ- पवित्राणिजेपीत्पडान्गायत्र्याचामिमंत्रयेत्। मनुको स्मृति है कि (अ. ११ श्लो० २२२) विरोधी कालोंमें जलके भीतर जप क्यों कि पद-कुर्यात् क्रि-त्रिपवणस्नायी ? कृच्छ गायत्री वा पवित्र ऋचाओंको शक्तिसे प्र- २ तथाऽ-पवित्राणि २ जपेत् क्रि-पिण्टा २ तिदिन जपे भोर जो गौतमैने कहा है कि गायच्या ३ च अभिमंत्रयेत् क्रि-॥ गरवयोधाओंका नित्य जप आर प्रयोग योजना-निषवणनायी पुरुषः कृच्छं तथा वहभी पवित्र होनेके लिये हे नियमके चांद्रायणं कुर्यात् पवित्राणि जपेत् चपुनःपिं लिये नहीं नियमके लिये होता तो अन्य- टान गायन्या अभिमंत्रयेत् ॥ १ विरति त्रिनिभायां तु. समासा जलमाविशेत् । तात्पर्य-प्राजापत्य आदि कृच्छ् वा २ धान द्विकालमेव स्यात्रिकालं या दिजन्मनः।। चांद्रायणको त्रिकाल स्नान करके कर यह ३ एकतासाथ सं माता यासोन पहिये । भी तप्तकृच्छ्से भिन्नमें है क्यों कि वह एक ४ एकापासा भावासावाटम्याशी: स्थहिलंशयः। वार स्नान और सावधान होकर तप्तकृच्छ पिता धौतमहत वासः परिणाय साना सौम्येना- ५व्यवरं गवतीभिः साताघमर्षणमंतर्मत कर इसवचनसे मनुने विशेष विधान किया है दिमुनिष्ठेत् । ६ सावित्री बाजपेमियपरिमाण पातितः। सगरमापी समाहितः ७ रोरवयोधा जनिय प्रयंजीत ।
भापश्चित्ताध्याय मापश्चिमकरण ५ (६७९) . श्रुतिमूलकी कल्पना करनी पड़ती इससे आभिमंत्रण करे तोही यमेनेभी विशेष कहा जिसने सामवेद न पाहो बह गायत्री भा- है कि अंगुलियोंके आगे स्थित गायत्रीसे दिकोही जपे और जो यह कहा है कि न. [ अभिमंत्रित प्रासको भक्षण और आचमन मोदवाय मोहमाय इत्यादि पढकर यही | करके फिरः अन्यग्रासका अभिमंत्रण करे आज्याहुति हैं वहभी नियमके लिये नहीं इससे जो गौतमने भूर्भुवः स्वः इत्यादि किन्तु विधिके लिये हैं ही क्यों कि मन (अ.प्राप्तीका आभिमंत्रण करनेके मंत्रोंके संग ११-श्लो० २२२) ने द्विजाति महाव्याहृति इनका विकल्प कहा है और आप्यायस्व योसे वा तिलोंसे होम करे इस वचनसे सन्तेपयाप्ति इत्यादि मंत्रोंसे पिण्ड करनेसे महा व्याहतियोंसे होमकरना तसेही पत्रिंशत् । पहिले हविका अभिमंत्रण कहा है उन दो- मतभी कहा है कि कृ जो पहोम नोंको भिन्नकार्य होनसे उनाने इतके संग आदि कहा है वहन हो सके तोवह सब महा-समुच्चय है और जब ये कृच्ट्र आदि व्रत व्याहृतियोंसे वा गायत्री वा प्रणवसे करें प्रायश्चित्तके लिये किये जाते हैं तब केश आदिके ग्रहणसे जलतर्पण और सूर्योप- आदिक मुण्डन पूर्वक ग्रहण करने क्यों स्थान आदि लेने इसीसे वैशंपायनने कहा तमको स्मृति है अभ्युदयके लिये जो कि मुण्डन सहित व्रतको करें यह गौ- है कि नान करके सूर्यको ऋचाओंसे हाथ कियानाय टसमें मुण्डन नहीं करना वसिष्टं जोडकर सूर्यकी स्तुति करे इसीप्रकार अ- नभी यहां विशेष कहा है कि व्रतरूप कु- न्यभी विरोधी पदार्थमें विकल्पका अनुसंधान करना और जिसमें विरोध नही उनमें सम- च्छोंके मध्यमें कुाक्षरोम शिखा इनको छो- .. ञ्चय समझना और शाखान्तराधिकरणन्या- डकर श्मश्रुकेश आदिकोंका मुण्डन करावे यसे सब कर्म संपूर्ण स्मृतियोंकी साक्षीसे यहां कृच्छोंके व्रतरूप मुण्डन आदि अंग होता है और जप संख्यामें विशेषभी उसने | कहेगे यह समझना पर्षद् ( धर्मरुभा) के दिखाया है कि ऋषभ-विरज-अघमर्षण वा कई व्रतका ग्रहण व्रत करनेके दिनसे प- वदोकी माता पवित्र गायत्रीका जप शत वा हिले दिन संध्याके समय करना सोई व- अष्टशत वा अधिकसे अधिक सहल करें सिष्ठेने कहा है कि सब पापोंके लिये स- उपांशु (मन २) में उच्चारण वा मनसे जप करे १ अगुल्यपस्थित पिण्ड गाय-या चाभिमत्रितं पितर देवता मनुष्य भूत इनको शिरसे प्रणा- प्राश्याचम्य पुनः कुर्यादन्यस्याप्यभिमंत्रण । म करके तर्पण कर तैसेही गायत्रीसे ग्रासोंका २ वापनं व्रत चरेत् । ३ च्या तरूपाणां श्मश्रुकेशादि वापयेत् । १ महान्याहृतिभिहमिस्तिलेः कार्यो द्विजन्मना । कक्षिलोमशिखावय॑म् । २ जपहोमादि यत्किचित्कृच्छोक्तं संभवेन्न चेत् । ४ सर्वपापेषु सर्वेषां प्रतानां विधिपूर्वक । ग्रहण सर्व व्याहृतिभिः कुर्यादायथ्याः प्रणवेन च । संप्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तै चिकीपित। दिनान्ते नखरोमा- ३ नातोतिछेदादित्य सौरी भिस्तु कृताञ्जलिः। दीन् प्रवाप्य स्नानमाचरेत् । भस्मगोमयमृदारिपंच- ४ ऋषम विरज चैव तथा चैवाघमर्षणं । गायत्री गव्यादिकल्पितः । मलापकर्षण कार्य बाह्यशाचौप- वा जपेदेवी पवित्रों वैदमातर । शतमष्टशतं वापि सिद्धपे । दन्तधावनपूर्वेण पचगव्येन संयुते । मतं निशा- सहनमघवा परंपांशुमनसा वापि तर्पपितृदेवताः मुखे ग्राह्य बहिस्तारकदर्शने । आचम्यातः परं मौनी मनुष्यांश्चैव भूतानि प्रणम्य शिरसा ततः तथा पिण्डांश्च | ध्यायन्दुष्कृतमात्मनः । मनः सतापनन्तीप्रमुइहेच्छो- प्रसके गायच्या चाभिमत्रयेत् । . कमन्ततः।
(६८०) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहित । , म्पूर्ण व्रतोंका प्रायश्चित्त करनेकी इच्छा होय | नही है जाबालि नेभी यहां विशेष कहा है तो विधिपूर्वक ग्रहण कहता हूं दिनके अंतमें | कि मच कृच्छोंके प्रारंभ और विशेष कर नखरोम आदिका मुण्डन कराकर स्नान समाप्तिमें अन्यसेही शालाग्निमें व्याहृतियोंसे भस्म गोमय मिट्टी गोवर पंचगव्य आदिसे पृथक् २ होम करे और व्रतके अन्तमें श्रा- कर और बाह्य शुद्धिके लिये शरीरके म-द्धकर और गौ सुवर्ण आदिको दक्षिणादे- लको दुन्तधावन और पंचगव्यसे करे और और यमने भी यहां विशेष कहा है कि पश्चा- तारागों के दीखनेपर सायंकालके समय ताप, पापसे निवृत्ति, स्नान ये व्रतके अंग कहे व्रतको ग्रहण कर और आचमनके अनंतर हैं और संपूर्ण नैमित्तिक कोका कथनभी मौन होकर अपने पापका ध्यान करे मनमें व्रतका अंग है और तेसेही गात और सि- तीब (:भारी) दुःखमाने और अंतःकरणमें रका उवटना तांबूल चंदन आदिका लेपन शोक करे यहां बाह्य शोचसे ग्रामसे बाहिर | और जो अन्यभी बलकारी पदार्थ हैं उन मलका त्याग लेना स्त्रीभी इसीप्रकार व्रतको कोभी व्रतमें स्थित मनुष्य वर्जदे ऐसे पूर्वोक्त ग्रहण करे स्त्रीको केश श्मश्रु नखौंका मु- आदि इति कर्तव्यता (करनेका प्रकार) का ण्डन तो नहीं है क्योंकि बौधायनकी स्मृति समूह अन्य स्मृतियोंसे ढूंढना इस प्रकार है कि स्त्रीभी केशोंके मुण्डनको छोडकर पूर्वोक्त विधिसे व्रतको ग्रहण करके अवश्य चांद्रायण आदिमें ऐसेही करें और जो मु- समाप्त करना अन्यथा प्रत्यवाय (पाप) ण्डन न चाहता हो उसके लिये हारीतेने होता है क्योंकि छाग लेयकी स्मृति है कि विशेष कहा है कि राजा राजाका पुत्र वा बहु जो काममोहित पुरुष पहिले व्रतको श्रुत ब्राह्मण केशोंको मुंडवा कर प्रायश्चित्त । ग्रहण करके न करे वह जीवता हुआ चा- कर और केशीको रक्षाके लिये दुगुना व्रत | ण्डाल और मरकर श्वा होता है प्रपंचसे करे और दूना व्रत करने पर दक्षिणाभी अलं हुये अर्थात् विस्तारको समाप्त करते है दूनी होती है यह महापातक आदि दोपोंक भावार्थ-कृच्छ्र और चान्द्रायणको त्रि- अभिप्रायसे जानना क्योंकि मनुकी यह काल स्नान करके करें और पवित्र मंत्रको स्मृति है कि विद्वान् ब्राह्मण राजा स्त्री जपे और गायत्रीसे ग्रासोका अभिमंत्रण इनके और महापातकी और गोहन्ता और कर-२२६ ॥ अवकोणी इनके व्रतमें केशोंका मुण्डन इष्ट १ आरभे सर्वत्राणां समाप्ती च विशेषतः । फेसरमधुलोमनसवपन तु नास्ति चांदायणादि- अन्नैव च शालामो अहुयाइपाहती: पह। पाई घेतदेव खियाः फेसम्पन सायम् । फांद्रतान्तै तु मोहिरण्मादिदक्षिणा । २ राजा बारामपुत्रो या मानगो या यहुश्रुतः । २ पश्चात्तापो निवृत्तिय मानं चांगतयोदित :-- गौशाना पपनं हत्या प्रायश्चित समाचरेत । येशानां मित्तिकानां सर्वेको तथा चानुकीर्तन गायाभ्यंगशि- क्षणातु द्विगुण तमाचरेत् । गुणे तु पते चार्ग रोभ्यंगतोयूलमनुलेपनं । प्रतस्यो यजयेसा यशान्य. पक्षिगा दिगुणा भवेत् । दलरागद । ३ किमाविमन्पनीयां नेप्यते फसवान ३ पूरे प्रतु गृहीत्वा तु नाचोरेकाममोदितः । महापायिती गोरन्नुमागिनः । जीरन्मशत पाण्डालो मृतः या ना जायते ।
प्रायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण ५ (६८१) अनादिष्टेषुपापेपुशुद्धिश्चान्द्रायणेनच॥ है कि जिसमें प्रायश्चित्त नहीं कहा ऐसे. धर्मार्थयश्चरेदेतच्चन्द्रस्यैतिसलोकताम् ।। लघु दोषमें प्राजापत्य करे गौतमनभी प्रा- पद-अनादिष्टेषु ७ पापेषु ७ शुद्धिः२ जापत्य आदिको निरपेक्षता कही है कि चान्द्रायणेन ३चा-धर्मार्थ २ः१ चरेत्-क्रि प्रथम प्राजापत्य करके शुद्ध और पवित्र एतत्र चंदस्य ६ एति कि- सलोकताम्॥ | होकर कर्मके योग्य होता है दूसरे प्राजा- पाप थोजना-अनादिष्टेषु पापेषु चान्द्रायणेन च | पत्यको करके महापातकसे भिन्न जो. शुद्धिर्भवति यः एतत् धर्मार्थ चरेत् सः करता है उससे छुटता है और तीसरे प्राजा- चंद्रस्य सलोकताम् एति ॥ पत्यको करके सब पापोंसे छुटता है अर्थात् तात्पर्यार्थ-जो आदेश किया जाय उसे | महापातकसेभी निवृत्त होता है और मर्नु- आदिष्ट कहते हैं नहीं है आदिष्ट (प्राय- | नेभी कहा है (अ. ११ श्लो. २१५ ) कि श्चित्त ) जिनमें उन पापोंको अनादिष्ट कहते | पराक नाम यह कृच्छु सब पापोंका नाश हैं- उनको शुद्धि चान्द्रायणसे होती है-अ- करनेवाला है हारीतेनेभी कहा है कि चां- र्थात् उन पापोंका प्रायश्चित्त चान्द्रायण हैद्रायण यावक तुलापुरुष और गौओंका और च शब्दके पढनेसे ऐन्दव सहित प्राजा- अनुगमन सब पापोंको नष्ट करता है और पत्य आदि कृच्छ्रोंसे शुद्धि होती है सोई | गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी, कुशाका पत्रिंशन्मतमें तीनोंका समुच्चय कहाहै कि जल, और एक रात्रका उपवास ये श्वपाक जो कोई गुरुसेभी गुरु पाप हैं वे कृच्छ्रअति कोभी शुद्ध करते हैं तैसेही तप्तकृच्छ्के कृच्छू और चान्द्रायणोंसे शुद्ध होते हैं- | अधिकारमें उसनेही कहा है कि दो वार उशनाने तो दोका समुच्चय कहा है कि अभ्यास किया यह पातकोंसे छुटाता है और दुरित ( उपपातक ) दुरिष्ट ( पातक ) जो न्यायसे तीन वार अभ्यास किया यह शूद्र बडेभी पाप हैं उनमें उन सवका नाशक हत्याको दूर करता है और उशनानेभी कहा कृच्छ्र चान्द्रायण है गोतमने तो कृच्छ्रा- है कि जहां महापातकका नाश कहा हो तिकृच्छो चान्द्रायण यह सब पापोंके | वा न कहा हो वहां प्राजापत्य कृच्छ्से प्रायश्चित्त हैं इस वचनमें समासके न कर शुद्धि होती है इसमें संशय नहीं ये प्राजा- नेसे कृच्छ्रातिकृच्छ्रको चान्द्रायणकी और पत्य आदि कृच्छ्र जिन उप पातकोंमें प्राय- चान्द्रायणको उन दोनोकी निरपेक्षता १ प्रथम चरित्वा शुचिः पूतः - कर्मण्यो भवति सूचित कीई है और इतिशब्दसे तीनोंका द्वितीय चरित्वा यदन्यन्महापातकेभ्यः पाप कुरुते समुच्चय कहा है और केवल प्राजापत्यका | तस्मात्प्रमुच्यते तृतीयं चरिता सर्वस्मादेनसो मुच्यते । तो निरपेक्षता चतुर्विशति मतमें कहा २ पराको नाम कृच्छाये सर्वपापापनोदनः । १ यानि फानि च पापानि गुरोर्गुरुतराणि च । चैवानुगमनं सर्वपापप्रणाशनम् । गोमत्र गोमयं क्षीरं ३ चोन्द्रायणं यावकाश्च तुलापुरुष एव च । गवां पृच्छातिकृच्छ्चान्द्रयैः शोध्यते मनुरप्रवीत् । २ दुरितानां दुरिष्टानां पापानां महतामपि 1 कृच्छु | शोधयत् । दधि सार्पः कुशोदकम् । एकरात्रीस्वासश्च श्वपाकीप चान्द्रायणं चैव सर्वपापप्रणाशनम् । ३ प्रतिकृच्छी चान्द्रायणमिति सर्वप्राय- | त्रिरभ्यस्तो यथान्याय शूद्रइत्या व्यपोहति ४ एप कृच्छो हिरभ्यस्तः पातकैभ्यः प्रमोचयेत् । श्चित्तम् । ५ यत्रोक्त यत्र वा नोक्त महापातकनाशनम् । ४ लादो तनादिष्टे प्राजापत्यं समाचरेत् । प्राजापत्येन कृच्ोण शोधयेनात्र संशयः।
(६८२) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षराप्रकाशसहित । श्चित्त नहीं कहा उनके एक वार अभ्यासस) करसके तो छत्तीस लाख गायत्रीका जप करें- करनेकी अपेक्षासे व्यस्त(पृथक् २)वा स- क्योंकि पराशेरकी स्मृति है कि कृच्छू दश- मस्त युक्त करने और तैसेही जिनमें प्रायश्चित्त सहस्र गायत्रीका जप और उदवास ( जलमें कहा है उन महापातक आदिमेंभी अभ्या वसना) और धेनुका दान ये चारों समान सकी अपेक्षासे युक्त करने इसीसे यमने | हैं और जो चतुर्विशैतिके मतमें कहा है जहां प्रायश्चित्त कहा हो वा न कहा हो वहां कि एक कोटि गायत्रीको जपे तो ब्रह्मह- प्राजापत्य कुच्छ्रसे शुद्धि होती है इसमें सं- हत्याको दूर करता है-अस्सी लाख जपे तो शय नहीं गौतमैनेभी कहा है सब प्रायश्वि- | सुरापानसे छुटता है- सत्तर लक्ष गायत्री तोंके संग्रहके लिये सर्व प्रायश्चित्तीका ग्रहण | सुवर्णके चोरको पवित्र करती है और साठ किया है तसेही जो उसने कहा है कि दूसरे लक्ष गायत्रीसे गुरुतल्पग छुटता है-वह प्राजापत्यको करके महापातकसे भिन्न सब वचन बारह वर्षके तुल्य विधानसे कहा है पापोंसे छुटता है यह कहकर तीसरे प्राजापत्य- | कुछ असमर्थक विषयमें नही है इससे विरो- को करके सब पापोंसे छुटताहे वहभी महापात- ध नहीं-इसी प्रकार अन्यभी कृच्छ्र दश कके अभिप्रायसे है कुछ क्षुद्र पापोंके अभिप्रा- सहस्र गायत्री-दो सौ प्राणायाम-सहस्र . यसेनही है और महापातक ऐसा नहीं है जिस- तिलोंसे होम और वेदका पारायण इत्यादि का प्रायश्चित्त शास्त्रमें न कहाहो तिससे उन । प्रत्यानाय ( प्रतिनिधि ) जो चतुर्विशति पातकोंमेभी प्राजापत्य आदि युक्त करने और मनु आदि शास्त्रों में कहे हैं उनको जिनका प्रायश्चित्त कहाहै तिससे बारह तीनसौ साठगुने करके महापातकोंमें जानने वर्षके व्रतरूप प्रायश्चित्तमें बारह २ दिनमें अतिपातकोंमें दोसो सत्तर प्राजापत्य करने एक २ प्राजापत्यकी कल्पना करनेपर गि- | वा उतनही प्रत्याघ्राय (बदलेकी) धेनु देनी नेहुये प्राजापत्य तीनसौ साठ बारह वर्षके और पातकोमें एकसो अस्सी १८० प्राजा- व्रतमें विकल्पसे करने होंगे उनको न कर-पत्य, वा उनकेही प्रत्याम्राय, उतनीही धेनु- सके तो उतनीही धेनु दे-वेभी न दे सकैतो देनी-तैसेही चतुर्विशतिके मतमें कहा है कि तीनसौ साठ निष्क दे सोई स्मृत्यंतरे में | जन्मसे लेकर नाना प्रकारके ब्रह्महत्यासे कहा है कि प्राजापत्यके करनेमें अशक्त मनुष्य धेनुको दे-धेनुके अभावमें उसके १ कृच्छोऽयुत तु गायत्र्या उदवासास्तथैव च । तुल्य मोल दे-अथवाआधा मोल वा निष्क- धेनुप्रदान विमाय सममेतच्चतुष्टयम् । २ गायत्र्यास्तु जपन्कोटि ब्रह्महत्यां ध्यपोहति । अथवा आधानिष्क शक्तिके अनुसार दे लक्षाशीति जपेद्यस्तु सुरापानादिमुच्यते । पुनाति क्योंकि यह स्मृति है कि गौओंके अभावमें हेमहतारं गायत्र्या लक्षसप्ततिः। गायत्र्याः पष्टिभिर्ल - निष्क आधानिष्क वा पादनिष्क दे मूल्यभी मुच्यते गुरुतल्पगः । न देसके तोउतनेही उदवास करने-वेभी न ३ कृच्छो देव्ययुत चैव प्राणायामशतव्यम् ।तिल- होमसहस्रं तु वेदपारायणं तथा । १ निष्कृतीनां संग्रहार्थ सर्वप्रायश्चित्तग्रहणं कृतम्। ४ जन्मप्रभृतिषापानि बहूनि विविधानि च । २ प्राजापत्यक्रियाशक्तो धेनुं दद्याद्विचक्षणः । त्वावर्वाग् ब्रह्महत्यायाः पडब्दं मतमाचरेत् । प्रत्यानाये धेनोरमावे दातव्यं मूल्यं तुल्यमसंशयम् । गर्वा देयं साशीति पनिमा शतम् । तथाटादशलक्षागि ३ गवाममावे निष्कं स्यात्तदर्ध पाद एवं वा । गायमा का जपेयुधः।
उपवासाके तुल्य ह और उससे दूना अति-सिक व्रत होता है उन उपपातकोंमें तीस भार नमासिकके विषयमें सांदेसात प्राजा- दिनोंमें प्रातःकालके तीन भोजनोंकी नि- पत्य भार उतनेही धेनुटदवास आदि प्रत्या- | वृत्तिसे दूसरा उपवास और तसेही अया- माय होते है-मासिक व्रतके विषय में तो चित भोजनके तीन दिनोंमें सायंकालको अदाई प्राजापत्य आर उतनाही प्रत्याम्नाय तीन भोजनोंकी निवृत्तिसे तीसरा उपवास होता है और जिन उपपातकाम चान्द्रायण हुवा इस प्रकार नो दिनों में तीन उपवास हुये करना पड़ता है उनमें तीन प्राजापत्य और तीन उपवास अंतके इससेप्राजापत्यको और उनके करने अशक्तको उतनाही छः उपवासके तुल्य मानना ठीक है बेल प्रत्यानाय होता है- और जो चतुविशतिके | और दश गोदान सहित त्रिरात्र उपवासरूप मतमं कहा है कि चान्द्रायणके प्रत्यानापमें | गोवध व्रतमें तो सादे ग्यारह प्राजापत्य और सदव आठ गा देनी यहभी धनवान् पुरुषको उतनेही प्रत्याम्नाय समझने और मासभर पिपीलिकामध्य आदिचांद्रायणक प्रत्यानायमें पयोव्रतमें तो अढाई प्राजापत्य और पराक समझना-और मासातिकृच्छ जिनमे करना | रूप मास व्रतमें तीन प्राजापत्य होते हैं क्यों पडता हे उन पातकोंमें तो साढ़ेसात प्राजा- कि पत्रिंशन्मतमें यह कहा है कि पराक पत्य और उतनेही धेनु आदि प्रत्याम्नाय तप्तातिकृच्छके स्थानमें तीन कृच्छ्र करें होते हैं क्योंकि चतुर्विशतिमतमें यह कहा | और असमर्थ होय तो आधा सांतपन प्रत है कि माजापत्यमें एक गो सांतपनमें दो / करे और तीन प्राजापत्य रूप द्वादश वा- तीन २ गौ दे, यहभी आमलकके समान चछातिकृच्छ्र तो एकसौ वीस १२० करने और पराकमें और तप्तकृच्छ्र अतिकृच्छामें र्षिक व्रतके स्थानमें चान्द्रायण पराक कृ- एक २ ग्रासको भक्षण कर-इस वचनसे और उनके प्रत्याम्नाय धेनु आदि ती तिगुने कहे आंवलके समान ग्रास पक्षमें जानना- करने और अतिपातकोंमें नव्वह ९०चान्द्रा- पाणिपूरानभोजन पक्षमें तो दो धेनुही यण आदि होते हैं और उनके तुल्य जो प्रत्यानाय होती है क्योंकि प्राजापत्य छ। १ अशे चान्द्रायणे देयाः प्रत्यान्नायविधी सदा । २माजापत्येतु गामेका दद्यात्सांतपने इयम् । परा- मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६८३) इतर बहुतसे इतर पापोंको करके छः वर्षका कृच्छ होता है-यद्यपि नव दिनतक पाणि- बत करे-भयवा धनी होय तो उसके प्रत्या- पूरान्न भोजन होता है तथापि निरंतर बारह माय एकसौ अस्सी गादे-अथवा अठारह दिनतक प्रत किया जायतो अधिक क्लेश लक्ष गायत्रीका जप बुद्धिमान् पुरुष करे- होनेसे छ: दिनके उपवासकी तुल्य जो दो बारह वर्षके प्रायश्चित्तमें बारह २ दिनके प्राजापत्य उनकी तुल्यता ठीक है और एक २ प्राजापत्यकी कल्पनामें यही वचन प्राजापत्यको छः उपवासकी तुल्पता प्रमाण है इसी प्रकार तीन वर्ष प्रायभित्तके युक्त ही है-सोई दिखाते है कि विषय जो उपपातक हैं उनमें नब्बे ९० प्राजापत्य और उतनेही प्रत्याम्नाय जानने-नकी निवृत्ति एक उपवास और दूसरेतीन पहिले तीन दिनों में सायंकालके तीन भोज- पातक हैं उनमें साठ ६० और जिनमें त्रैमा- चांद्रायण होते है और त्रैमासिक गोवध प्र. चरेव " कताठच्यातिकृच्छ्रे तिवस्तु गास्तथा । १ पराकतसातिकृच्छ्रस्याने कृच्छ्वय सांतपनस्य चाध्यमशतो मतमाचरेत।
(६८४) याज्ञवल्क्यस्मृति मिताक्षरामकाशसहिता तके स्थानमें गोमूत्र स्थान आदिकांकी क- | तक उनकी आवृत्तिके विषयमें है और जो तव्यताकी अधिकतासे तीन चान्द्रायण क- | मनुष्य तप करनेमें असमर्थ है और धान्य- रने और योगोश्वरके कहे मासिक व्रतमें तो समृद्ध है वह कृच्छ्र आदि व्रतोंको मुख्य २ एकही चान्द्रायण होता है और धेनु उदवास ब्राह्मणोंके भोजनद्वारा कर सोई स्मृत्यंतर आदि प्रत्याम्नाय तो सर्वत्र तिगुनाही होता में कहा है कि कृच्छ्रमें प्रतिदिन पांच अ- है और प्रकीर्णकोंमें तिस २ प्रायश्चित्तके तिकृच्छमें तिगुने पांच (१५) ऐसेही तीसरे अनुसार पाद आदिकी कल्पनासे प्राजापत्य (कृच्छ्रातिकृच्छमें) तीस तप्त कृच्छ्रमें चा- समझना और आवृत्ति ( अभ्यास ) में तो लीस और पराकमें त्रिगुणित वीस (६०) चान्द्रायण आदि करने इसी रीतिसे अन्यत्र | और सांतपननामके कृच्छ्में वेही त्रिगु- भी कल्पना करनी और जो बृहस्पतिने क-णित वीस छः अधिक (६६) और चां- हा है कि जन्मसे लेकर जो पातक और उ- द्रायणमें उनसे दो हीन कम (६४) पपातक किया है उसमें तबतक कृच्छ्रकी मुख्य २ ब्राह्मणोंको वह जिमावै जो तप आवृत्ति कर जबतक साठगुणा हो वह व- करनेमें वलसे हीन हो यहां प्रतिदिनका स- चन परस्त्री गमनमें दो वर्ष व्रत करे इस र्वत्र संबंध समझना यहां प्राजापत्यके दि- गौतमके कहे द्विवार्पिकके समान विषयमें नोंकी कल्पनासे साठि ब्राह्मणोंको भोजन अथवा उस उपपातककी आवृत्तिके विषयमें होता है और जो चतुर्विशति मतमें कहा है है जिसमें त्रैमासिक व्रत करना पडता है | कि बारह ब्राह्मणोंको जिमावे अथवा पावके अथवा पातक रूप चाण्डाल आदि स्त्री ग-|ष्टि (वैश्वानर यज्ञ) अथवा अन्यकोई पावनी मनके दोवार अभ्यासके विषयमें समझना | यज्ञ इन सबको बुद्धिमानोंने समान कहा क्योंकि वहां एक वार जानकर गमनमें इस | है इस वचनसे प्राजापत्यके स्थानमें बारह वचनैसे कृच्छाब्द (वर्ष भरका कृच्छ्र)कहा है ब्राह्मणोंका भोजन कहा है वह निर्धनके वि- कि जानकर कृच्छ्राब्द और अज्ञानसे दो ऐं- षयमें है और जो वहांही चांद्रायणका प्रत्या- दव कहे हैं उसके अभ्यासमें द्विवर्षकी तुल्य | नाय कहा है कि चांद्रायण मृगारेष्टि पवि- साठ कृच्छ्रका विधान युक्तही है और जो | त्रेष्टि मित्रविंदा पशु तीन मासका कृच्छकरें सुमंतुने कहा है कि जो जानकर एकवार और नित्यनैमित्तिक और काम्यकौके और अभ्यास किया महापाप है वह महापातक- को छोडकर अन्द कृच्छ्रसे शुद्ध होता है १ कृच्छे पचातिकृच्छ्रे त्रिगुणमहरहस्त्रिंशदेखें वहभी उपपातक आदिकी आवृत्ति के विषयमें तीये चत्वारिंशञ्च तप्ते विगुणितगुणिता विंशतिः और वा तैसे ही अज्ञानसे दो ऐदव करै विंशतिः सैव हीना दाभ्यां चांद्रायणे स्यात्तपसि कृशव- स्यात्पराकै । कृच्छ्रे सांतापनाख्ये भवति पदधिका इस यमके कहे दो ऐंदवोंके विषय जो पा- लो भोजयेइिप्रमुख्यान् । २ विप्रा द्वादश चा भाज्याः पारष्टिस्तथैव च । १ जन्मप्रभृति यत्किचित्पातकं चौपपातक । अन्या का पावनी काचित्समान्याहुमनीषिणः । तावदावर्तयेत्कृच्छ्र यावत्पष्टिगुणं भवेत् । ३ चांद्रायणं मृगारेष्टिः पवित्रेष्टिस्तथैव च । मित्र- २ ज्ञानात् कृच्छाब्दमुद्दिष्टमज्ञानदिन्दवद्वयम् । | विंदापशुश्चैव कृच्छ् मासत्रयं तया! नित्यनैमित्तिकानों ३ यद्यप्यसकृदभ्यस्तं पुद्धिपूर्वमघं महत् । तच्छु च काम्यानां चैव कर्मणां । इष्टीनां पशुवधानामभावे द्वयत्यन्दकृच्छ्रेण महतः पातकाते । चरवः स्मृताः।
मायश्चित्ताध्याय प्रायश्चित्तमकरण ५ (६८५) . पशुबंध इष्टियोंके अभावमें चरूं कहे हैं- . योजना-धर्मकामः कृच्छ्रकृत् तथा म- वही उसके लिये है जो चांद्रायण करने में हतों श्रियं आनुयात् यथा गुरुकतुफलं सु- असमर्थ हो और जो तीनमास कृच्छू करें समाहितः प्राप्नोति- इस बेचनसे आठ कृच्छ कहे हैं वहभी वृद्ध तात्पर्यार्थ-जो अभ्युदयका अभिलाषी और मूखके विषयमें है क्योंकि तीन कृ- धर्मकेलिये प्राजापत्य आदिकृच्छको क- च्छोंसे चांद्रायणका फल मिलता है यह रता है वह उस प्रकार राज्य आदि महती दिखा आये हैं अब ग्रंथके प्रपंच (विस्तार) | (बडी ) लक्ष्मीको प्राप्त होता है जैसे रा-- को समाप्त करते हैं और प्रकृतका अनुस- जसूय आदि बडीर यज्ञोंको, भलीप्रकार सा- रण करते हैं अर्थात् प्रकरणक विषयमें क- | वधानीसे करनेसे उनका कर्ता स्वाराज्य हते हैं और अभ्युदयका अभिलाषी धर्म आदि यज्ञोंके महान् फलको प्राप्त होता है अर्थ कामकी इच्छासे उस चांद्रायणको करें तैसेही यहभी यथार्थ संपूर्ण अंगोंसे युक्त और प्रायश्चित्तके लिये नही करे तो वह करता हुआ प्राप्त होता है इस प्रकार महि- चंद्रसालोक्य रूप स्वर्ग विशेषको प्राप्त होता माके प्रकाशनार्थ यज्ञका दृष्टांत दिया है है यह वर्ष दिनकी आवृत्तिके अभिप्रायसे सुसमाहितः इस पदसै अविकल ( यथार्थ) है क्योंकि गौतमकी यह स्मृति है कि एक शास्त्रोक्तके करनेको कहता हुआ योगीश्वर चांद्रायणको करके पापसे रहित होकर सब अंगसे हीन काम्य कर्ममें फलकी असिद्धिको पापोंको नष्ट करता है दूसरेको करके दश-] द्योतन करता है इससे यहां प्रायश्चित्तौके पिछले और दश अगले पुरुषोंको और इ- ( विषही जितने संभव हो उतने अंगोका अ- कासवे आत्माको और पंक्तिको पवित्र क- नुष्ठान अंगीकार करना इस प्रत्यान्नायका रता है और एक वर्षतक चांद्रायणको क- उपादान दूरोत्सारित हुआ (दूर फेंका गया) रके चंद्रमाके लोकको प्राप्त होता है- भावार्थ-जिनका प्रायश्चित्त नही कहा उ- अधिकारीके फलकी आवृत्ति कर्मके आरं-. कृच्छ्र आदि अनुष्ठानोंकी आवृत्तिमें तो नकी शुद्धि चांद्रायणसे होती है और नो भिसे भावी होते हैं इस न्यायसे हो सकती धर्मके लिये इस चांद्रायणको करता है वह ही है इससे वह विवक्षित नही- चंद्रलोकको प्राप्त होता है ॥ ३२७ ॥ भावार्य-धर्मका अभिलाषी कृच्छ करता कृच्छुकृद्धर्मकामस्तुमहतीश्रियमाप्नुयात् ॥ हुआ महती लक्ष्मीको उस प्रकार प्राप्त यथागुरुकतुफलंमामोतिसुसमाहितः ३२० होता है जैसे भली प्रकार सावधानीसे क- पद-कृच्छकृत् १ धर्मकामः १ तु:-म- रता हुआ मनुष्य गुरु (वडी२) यज्ञोंके फ- 'इती २ श्रियं २ आप्नुयात कि-यथा-गुरु-लको प्राप्त होता है ॥ ३२८ ॥ तुफलं २ मामोति क्रि- सुसमाहितः १ श्रुत्वैतानृपयोधर्मान्याज्ञवल्क्येनभाषितान्। इदमचुर्महात्मानयोगांद्रममितौजसम ॥ २ चादायण त्रिभिः कृपः। ३ एकमात्वा विपापो विपाप्मा सर्वमेनो इति पद-श्रुत्वाऽ-एतान् २ऋषयः १ धर्मादर द्वितीयमात्वा दशपूर्वान्दशापरान् आत्मान चैकविशं | याज्ञवल्क्येन ३ भाषितान् १ इदम् २ पंक्ति च पुनाति संवत्सर वावा चद्रमसः सलोक- सामानोति। फर्मण्यारभभाव्यत्वात् । कृच्छ मासत्रय तथा।
याज्ञवल्क्यस्मृति मिताहाराप्रकाशसहित । . 'ऊचुः क्रि- महात्मानं २ योगीन्द्रम् २ अ-धनका कामी धनको और आयुका' 'मितीजसम् २- लापी आयुको और ‘लक्ष्मीको इच्छा योजना-ऋषयः याज्ञवल्क्येन भापितान् महालक्ष्मीको प्राप्त होता है ॥ ३३१ ॥ एतान् धर्मान् श्रुत्वा महात्मानं अमितौजस लोकत्रयमपिह्यस्माद्याश्राद्धेश्रावयिष्या योगीन्द्रम् इदम् ऊचुः- पितृणांतस्यत्तिस्यादक्षय्यानात्रसंशय ताप भावार्थ-इस ग्रंथमें वर्ण और आ- श्रमसे भिन्न छःप्रकारके धर्म कहे हैं उन पद-लोकत्रयम् २ अपि:-हि:-अस्मा संपूर्ण, योगीश्वरके कहे धर्माको सुनकर यः १ श्राद्धे ७ श्रावयिष्यति क्रि-पितॄणां आनंदसे प्रफुल्लित हैं नेत्र जिनके ऐसाप तस्य ६ तृप्तिः १ स्यात् क्रि-अक्षय्या ना महिमा और गुणवाले अचिंतनीयशक्ति अवा-संशयः १ ॥ जिसकी ऐसे योगीन्द्रके प्रति यह वक्ष्यमाण अपि श्राद्धे श्रावयिष्यति तस्य पितॄणां अक्ष- योजना-यः पुरुषः अस्मात् श्लोकवर, वचन बोले ॥३२९ ।। य्या तृप्तिः स्यात् अत्र संशयः नास्ति । 'यइदंधारयियतिधर्मशास्त्रमतंद्रिताः ।। ता० भा०-जो मनुष्य इसके तीनभी इहलोकेयशःप्राप्यतेयास्यतित्रिविष्टपंम् ॥ श्लोक श्राद्धमें पितरोंको सुनाता है उसके पद-ये १ इदं २ धारयिष्यति क्रि-धर्म- पितर उन श्लोकोंके सुननेसे अक्षय तृप्तिको शास्त्रं २ अतंद्रिताः १ इह-लोके ७ यशः२ प्राप्त होते हैं इसमें संशय नहीं ॥ ३३२ ॥ प्राप्य:-ते १ यास्यंति क्रि-त्रिविष्टपम् २॥ ब्राह्मण पात्रतांयातिक्षत्रियोविजयीभवेत् ।। योजना-ये इदं धर्मशास्त्रं अतंद्रिताः धा- वैश्यश्चधान्यधनवानस्यशास्त्रस्यधारणात् रयिष्यंतिते इह लोके यशः प्राप्य त्रिविष्टपं न्यास्यति- पद-ब्राह्मणः १ पात्रतां २ याति कि- तात्पर्यार्थ-जो मनुष्य इन धर्मशास्त्रको क्षत्रियः १ विजयी १ भवेत् क्रि-वेश्यः १ आलस्य छोडकर धारण करेंगे अर्थात् प- चा-धान्यधनवान् १ अस्य ६ शास्त्रस्य ६ धारणात् ५॥ देंगे वे इस लोकमें यशको प्राप्त होकर स्व- योजना-अस्य शास्त्रस्य धारणात् ब्राह्मण:- गमे प्राप्त होते है- ॥ ३३० ॥ पात्रतां याति क्षत्रियः विजयी च पुनः वेश्यः विद्यार्थीमामुयाद्विद्यांधनकामोधनंतथा ॥ धान्यधनवान् भवेत् ।। आयुफामस्तयैवायु:श्रीकामोमहतींश्रियं ॥ ता० भा०-इस शास्त्रक धारण करनेसे पद-विद्यार्थी १ प्राप्नुयात् क्रि- विद्याम् ब्राह्मण पात्रतासे क्षत्रिय विजयसे और वैश्य धनकामः १ धनं २ तथाऽ-आयुकामः १ धनधान्यसे युक्त होता है इस प्रकार इन तथाऽ- एव:- आयुः२श्रीकामः १ महती २ ऋषि अनेक प्रकार प्रार्थना करते भऐ ।। प्रकट अर्थवाले श्लोकोंसे सामश्रवः आदि श्रियम् २ योजना-विद्यार्थी विद्यां तथा धनकामोधनं यइदंश्रावयेद्विद्वान्दिजान्पर्वमुपर्वसु ॥ आयुष्कामः आयुः श्रीकामः महती श्रियं अश्वमेधफलंतस्यतद्भवाननुमन्यताम् ३३४ आमुयात् ।। पद-यः १ इदं २ श्रावयेत् क्रि-विद्वान्१: ता० भा०-विद्याका अभिलापी विद्याको द्विजान २ पर्वसु ७ पर्वसु ७ अश्वमेध १ प्रायश्चित्वाध्याय प्रायश्चित्तप्रकरण:५ (६८७) तस्य ६ तत् १ भवान् १ अनुमन्यतां कि- | बोधक यह मेरी रची हुयी मिताक्षरा किस योजना-यः विद्वान् इदं शास्त्रं द्विजान विद्वान्के कानोंमे अमृतको न संचिगी 'पर्वसु पर्वसु श्रावयेत् तस्य अश्वमेधफलं | अपितु सर्वकही अवों में अमृतका सेचन भवति तत् भवान् अनुमन्यतां ।। करेंगी २ गंभीर और प्रसन्न और अधिक ता. भा०-जो विद्वान् इस धमशास्त्रको अर्थको बोधक और अल्पवाणीयों से यह प्रतिपर्व ब्राह्मणोंको सुनावेगा उसको अश्व- मिताक्षरा विवृति रची है ३. क्षितितलम मेधका फल प्राप्त हो-इस वचनसे श्रवण कल्याणपुरके समान पुरी नहुई नहो-ओर करानेकी विधि कही-ऋषि कहते हैं कि सूर्यरूपश्रीविक्रमके समान कोई क्षितिपति इस हमारे प्रार्थना किये.अर्थमें आप अपनी (राजा) हुया नहो-और विज्ञानेश्वर पंडि- संमति दो ॥ ३३४ ॥ तभी अन्य पंडितोंके समान अन्य किसीको श्रुत्वैतधाज्ञवल्क्योपिमीतात्मा नही भजता तिससे ये तीनों कल्पपर्यत स्थिर मुनिभापितम् ॥ एवमस्त्विीतहो हो-४ संपूर्ण आश्चर्योकी अवधि मधुर २ वाचनमस्कृत्यस्वयंभुवे ॥ ३३५ ।। वाणीयोंका वक्ता और अर्थि ( याचक) योंकी प्रार्थनाके अनुसार धनोंका दाता और पद-श्रुत्वा:- एतत् २ याज्ञवल्क्यः १ अपि-प्रोतात्मा १ मुनिभापित २ एवं:- मुरके विजयी (श्रीकृष्ण) की मूर्तिका अस्तु क्रि-इतिह-६- उवाच क्रि-नमस्कृत्या ध्याता और शरीरके संग जन्मे हुये (ई- स्वयंभुवे ४ द्रिय रूप ) शत्रुओका नेता तत्त्वविज्ञाननाथ योजना-याज्ञवल्क्यः अपि एतत् मुनिभा-- | सूर्य और चन्द्रमाकी स्थिति पर्यत पितं श्रुत्वा प्रीतात्मा सन् स्वयंभुव नमस्कृत्य एवम् अस्तु इति उवाच ।। ता०भावार्थ-इस ऋषियोंके वचनको सुनकर योगीन्द्र-याज्ञवल्क्यभी-अपने रचे हुए धर्मशास्त्रकी धारणा आदिके फलकी प्रार्थनाके लिये-अपने मुख कमलको भौंचकर स्वयंभू ब्रह्माको नमस्कार करके तुह्मारी संपूर्ण प्रार्थना इसीप्रकार हो इस ऐसा विक्रमादित्य देव इस संपूर्ण जगत्की प्रकार कहते भए ।। ३३५॥ रक्षाकरो-६-यदि इंद्रिय अंतर्मुख (वशमें) इस अध्यायमें ये प्रकरण है कि-प्रथमतो हैं तो तप क्या वस्तु है अथीत निष्फल है सूतिका प्रकरण-आपद्धर्म वानप्रस्थ-अध्या- यदि इंद्रिय अंतर्मुख नहीं हैं तो तप क्याकर त्मप्रायश्चित्त-कर्मविपाक-महापातक आदिके | सकता है, और याद हरि अन्तःकरणमें निमित्तोंकी गणना- आतिदेशिकसहित और बाहिर है तो तप क्या वस्तु है, और आपातकप्रायश्चित्त-उपपातकप्रायश्चित्त-प्र- याद हरि अंतःकरण और वाहिर नहीं है कप्रायश्चित्त-पतितत्यागविधि-व्रतग्रहण- तो तप क्याकर सकता है-७ ॥ विधि-रहस्यमायश्चित्ताधिकार- और कृच्छ्र- इति श्रीमद्विशवरपडितहरिसहायांगजपण्डि- आदिके लक्षण-इति प्रकरणानि ॥ उत्तमात्मेश्वरके शिष्य विज्ञानेश्वर योगी- तरामरक्षात्मजपं०मिहिरचन्द्रशास्त्रिकृतायां का किया यह धर्मशास्त्रका विवरण है . क्षयर्थदीपिकायां प्रायश्चित्ताध्यायस्तृतीयः श्रीकृष्णदासात्मजखेमराजश्रष्ठिकारितमिता. याज्ञवल्क्यमुनिके रचे शास्त्रकी विवृति पूर्णतामगमत् ॥ औरस्तु ।। (विवरण वा व्याख्या), और अमित अक्षर- वालीभी होकर विपुल (अधिक ) अर्थकी संपूर्णश्चायं ग्रन्थः।
समर्पण। खबाणनन्देन्दुमितास्यवत्सरे नभस्यमासस्य सिते समापिता । ग्राह्या gi केहिकुजे नृणां गिरा मिताक्षरा गूढतमार्थदीपिका ॥ १ ॥ श्रीकृष्णदासात्म खेमराजगुप्तेरितः श्रीमिहिरादिचंद्रैः ॥ नृणां गिरा दीपयती पदार्थान् । स्थर चिरं विचरणमसादात् ॥ २ ॥ मायापुर्यादक्षिणे दिङ्गितम्मे पूलीखेति श्यामर्द पूर्वभागे ॥ तत्राभूज्ज्ञी रामरक्षाभिधानस्तत्पुत्रोहं पुप्पवन्ताभिधेयः ॥ ३ ॥ मद्राजारामशास्त्रिप्रसादात तेनाप्तं यद्धर्मशास्त्रस्य तत्त्वम् ॥ तत्सर्व मे नुगिरा विस्त तं स्याटु त्यस्यां दीपिकायां निबद्धम् ॥ ४॥ मन्दाः किन्न वसन्ति भूमिपटई विज्ञान सर्वे यतो ज्ञात्वा मन्दमतेः कृतिबंधजनीयति तानर्थये ॥ नेयं विज्ञहरे मयाऽकृत बुधा भाषाविदाम्प्रीतिदा । अस्त्वेतन्मनसा विचार्य भवतां पत्कन योरप्यते ॥ ५ ॥ इंतिशम् । स्वभही भी दीवान भाई संस्कृत पाठशाला. - १२५. गुलालघाडी, मुम्बा 0 अस्य ग्रंथस्य पुनर्मुद्रणाद्यधिकाराः १८६७ तमादीय २५ तमराजनियमनिवद्धराज- पहारुदीकरणेन "श्रीवेंकटेश्वर" यंत्रालयाधिपत्यधीनाः सन्ति । पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास "श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-बंबई