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Hindi Vyakran Ki Roop Rekha
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हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा
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हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा
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हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा
ज०म० दीमशिरस, पो
हिना उदू प्राध्यापक जनराष्टीय सवधा का प्रतिष्ठान, माया
एच. टी.
राजगत
राजकमल प्रकाशन
प्रकाव
राजवमल प्रकाशन प्राइवट लिमिटेड
दिल्ली
© १६६६, राजकमर प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली
प्रथम मस्करण, १९६६
मूय दम रुपय
नवान प्रम
प्राक्कथन डॉ. दीमगिस की हिदी व्याकरण की रूपरेखा एक रूसी विद्वान द्वारा हिंदी म लिखित पहला हिंदी व्याकरण ही नहीं, बल्कि हिंदी व्याकरण के क्षेत्र मे एक नई परम्परा का सूत्रपात है। हिही अध्येता अभी तक देशी व्याकरणा के अतिरिक्त हिंदी व्याकरण को मुख्यत अग्रेजी परम्परा म ही परिचित रहे हैं। रूस मे हिंदी सम्बधी जो काय हुए हैं उनकी छिटपुट सूचनाएँ तो थी, किन्तु इस बात का पूरा पता दन वाली सामग्री हमारे सामने न आई थी कि रूम म हिंदी सम्बन्धी अनुशीलन की सदियों पुरानी सुदीघ परपरा है जिसे समाजवादी प्राति के बाद सोवियत भाषाविद और तत्परता से विकसित एव समृद्ध कर रहे हैं। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद जब भारत न 'पाश्चात्य जगत' के बाहर के अन्य देगा के साथ स्वतत्र रूप स सपक स्थापित किया ता भारतीय विद्वानो को उन देशा मे क्येि गए भारतीयविद्या मम्बधी अनुसघाना पा भी अभिमान हुआ और इस दृष्टि से भारत स्म मैत्री का विशेष महत्व है । जैसा कि डा० दोमशिल्म ने इस न य की प्रस्तावना म कहा है, 'यूरोप म हिंदा आदि विचौन भारतीय भाषाओ का अध्ययन रेवल व्यावहारिक उद्देश्या स ही हा रहा था तथा यूरोप के अनेक देशा की उपनिवगवादी नीति का हो वह एक अग था । परन्नु रूम म वनानिक भारतीय विद्या का विकाम बिल्कुल अय उद्देश्य तथा आधार पर हो रहा था। वहा इसका विकास वैनानिक जानकारी के प्राप्त्यथ नया भारत की महान तथा अद्वितीय सम्मृति मम्मी सामाजिक क्षेत्रा की गहरी रुचि के कारण हो रहा था।" अक्तूबर समाजवादी क्राति के द्वारा इस अनु सधान को और भी बल प्राप्त हुआ तथा अर्वाचीन भारतीय भाषाओं का अध्ययन विधिवत प्रारम्भ हुआ । इसका बहुत कुछ श्रेय अकादमीगियन अ० प० वरान्नि कोव को है जिनके पवित्र नाम स प्राय सभी हिंदी प्रेमी पूणत परिचित है। श्री वरातिकोव द्वारा गुरु किये गए काय को आज भी उनर सुयोग्य मठ गिप्य तथा प्रणिप्य साग वडा रह हैं जिनम स एक डा. दीमगिरस भी हैं। हिंदी कीजनेक पत्र-पत्रिकामा मडा० दामात्मक हिंदी-व्याकरण सम्बधी हुए उहाने गोधपूण निव घ प्रकाशित हो चुके हैं जिनस अनर हिती पाठक भलीभांति परि चित है। इसलिए जब वे इस बार भारत आए ता हमने उनम हिंदी या एक सम्पूण यावरण प्रस्तुत करन का अनुरोध किया जिम उहाने अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद स्वीकार करन की कृपा को जोर कटिन अम पर अपन दम बारह वों के अध्ययन को रगभग तीन महीन म हो हिंदी माध्यम स प्रस्तुत कर देने की तत्परता भी तिसराई। प्रवास की सक्षिप्त अवधि को देखत वृहत व्याकरण का लोभ सवरण क्रय 'स्परया ही प्रस्तुत की है कि तु विन अध्येताआ की दष्टि में यह तथ्य प्रकट हुए बिना न रहेगा वि रेखक न जिम विनम्रतावा रूपरेखा कहा है उसम भी सामा य सरलीकरण के स्थान पर यथास्थान हिंदी व्याकरण का अनक जटिल समस्याआ का विश्लपण पापी बारीको म जाफर दिया गया है-विपन प्रिया प्रकरण पद निमाण एवं वाक्य गठन प्रभृति विषया में। जैसा कि दूसर बात स रखका ने किया है उनके विपरीत डा. दीम गित्स ने अय व्याकरणा + आधार पर एष और यावरण तयार करा का आसान तरीवा नहीं अपनाया है बल्कि उहान परिश्रम एव विवक्पृथक हिली को पत्र पत्रिकाआ तथा माहित्यिक पुस्तकों में भापा के प्रचलित प्रयोगा को सकलित पर उनका विश्लपण किया है इस दष्टि से प्रस्तुत घ्यावरण म हिंदी के ययामभय नय-से नय प्रयोगो का भी आक्रन हुआ है-यहां तक कि साधु असाधु प्रयागा का विधार किए बिना भी बहुत से उनाहरण उल्लिपित हुए हैं जस किया ये सात यबोधक स्पा का विवरण देते हुए पत्ता हाता है', 'पढ़ रहा होता है' 'पढना हाता था' पढ रहा होता था आदि की गणना । इमी प्रकार अग्रेजी के अक्षरस अनुवाद 'ममद म चल रहा बम म भाग रन हुए जैसे प्रयागा को भी हा० दीमशित्म ने अपने व्याकरण म निघटक भाव मे स्थान दिया है। प्रचलित प्रयागा का विविधता के साथ ही डा० दीमागम का यर धारण नवीन व्याकरणिव श्रणिया के निमाण वादष्टि में भी पयाप्त समृद्ध है । भाषा म्पा का विवरण दत समय जहाँ उह परम्परा म को परिभाषा अथवा अवधारणा प्राप्त न हा मका, वहां उहोंन अपनी जार से नई अव धारणाएँ प्रस्तावित की है जस निर्माण के मदभ म अद्ध उपसग तया व्यधिकरण के योग में बनने वार श । सामाय वतमान कार तथा अपूण भूतकाल म होना क्रिया के जटिर भद वार प्रयागा का विवचन करत हुए उद्दाने विसी घटना या व्यापार की प्रायिकता का उल्लेख किया है जा मरी (ग) ही तरह मभवत औरा के लिए भी अपरिचित हा । इसी प्रकार पद्धति और 'पटन' को दष्टि से भी इस व्या रण म ऐसी अनेक नई बातें दष्टिगार होती हैं जिन सवा उलय करना यहां सभव नहीं है। एक झिी पाठन के नात प्रसगान में इतना ही कह सकता हूँ कि अपना भाषा को एमा बहामी विशेषताएं हैं जिनकी आर 'अतिपरिचया? अवना' के कारण मामा यत हमारा ध्यान नहीं जाता उह प्रकाश में गार डा० दीगिसन प्रमाणित कर दिया कि रिसी भापा का व्यावरण कमो कभी अय भाषा भाषी अधिक सफरता से लिया जात हैं यानि उनम प्रथम परिचय तथा प्रथम-दशन की जनाविल जिनामा होती है । इस दृष्टि स इस व्याकरण रा अयधिर व्यावहारिक महत्व है । मरा मौभाग्य है कि मुर्वे यह प्रय पाडुलिपि प म ही देखन को प्राप्त हो सका और इसके प्रणयन की प्रत्य गतिविधि का निट मे जान सक्ने का मदार मिला। स्पष्ट ही डा० दौमशिस के इस वैतानि काय लिए भर मन म सौहाद पूण गुभाशसा है, साथ ही यह आकाक्षा भी कि इसके बाद वगीय हा हिंदी का एक बहद व्याकरण भी तयार करन म सपर हा । -नामवरसिंह
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विषय-सूची प्राविकपन प्रस्तावना १ १ ध्वनि और वरण विवार पर रघु' का अनुच्चारण र अ' के अनुच्चारण में कुछ नियम-लघु अ' उच्चारण के कुछ नियम-यजन----- व्यजन सयोजन-द्विब घ्यजन-अक्षर-स्वराघात- लिपि-मयुक्त अधर-~~~बहुधा प्रयुक्त होने वार सयुक्रा अधरों की मूची। २ शब्द विचार तथा पदरचना शल भेट। ३ प्रधान शब्द भेद सजा लिंगसना शब्दा क रिगा का वर्गीकरण-प्राणी- वाचक संज्ञाशन्द में लिंग भेद-आ और पक्षियो म लिंग भेदमनायेकेग म अनियमितता अय भाषाओ से संग्रहीत शब्दो का लिंग भेद-वचन लथा कारक कारका का निर्माण सामाय कारक असामाय वारक-सम्बोधन कारप-सामाय तथा अयामय पारख म सजासदाका प्रयोगसताराब्दा की पुारुक्तियां सना गन्दो की निश्चितता तथा अनिश्चितता को अभिव्यक्ति । ४ विशेपण विरोपण विकार----तुलना--तुल्नावस्याओ को अभिव्यक्ति विपणी का सतारण-विशेषण की पुनरपिन ।
५ सख्याशब्द सण्डवाचक मण्यााद-भिन-ममुदायवाद माया'- आवृत्तिवाचक सरयाशद-रगभग मात्रा को अभिव्यक्ति- प्रमवाचक सम्पारा।। ६ सवनाम सवनामा का प्रयोग-पुरुषवाचर सवनाम-निर्देवाचक सवनाम-प्रग्नवाचक सवनाम-स्वामित्ववाचर सवनाम-- निजवाचक सवनाम-सम्बधवाचन सवनाम--निश्चयवाचक सवनाम-अनिश्चयवाचक सवनाम-सयुक्त सवनाम-वाक्य म सवनामा वा काय-सज्ञा-सवनामा का विकार-विरोपण सवनाम का विकार-गयुमन रावनामा या विकार-सग्न्या मवनामा का विकार-सवनामा के निश्चयायन प ६५ ७ क्रिया मिया | अपुरपवाचक रूप--प्रिया का सामाय स्प-त्रिया की धातु कृद तक्तृ वाचन और क्मयाचक कृद त-कृरता का निमाण-पतृ वाचर करता का निमाण-कमवाचक कृदता का निर्माण-वृदत विषार-वृदाता वा प्रयोग-कृल तो वे स्वतत्र प्रयोग की कुछ विपिता-मामाय वतमानकालिन कृदन्त-मामा य भूतकालिक् दत-मयुक्त वतमानकारिक रदन---मयुक्त भूतकालिक कृत- वाग' प्रत्ययान वृदत –विसपणा और मनाआ म कृता वा मत्रमण-सातत्य वाधमालिक कृटत–पूर्वकाल्वि वृदत-पूववारिक वृदता स समय निर्देश-पूर्वकालिक कृट ता का निर्माण-पूर्वकाग्वि वृदता का प्रयोग-क्रिया के पुरषवाचक म्प काल प्रकार-निग्चयायक प्रकार-वतमानकार तथा उसके भेद---- सामाय वतमानकार--सामा य वतमानकार वा निमाण- (ख) सामा य वतमानवार का प्रयोग--जटिल वतमानकाल--- बटिर वतमालकार का प्रयोग मातत्यवोधर वतमानकाल-~ सातत्यबोधन वतमानकार वा प्रयोग-जटिल सातत्यवोधर वतमानवाल-जटिल मातत्यबोधक वनमानवाल का प्रयोग--- भूतकाल नथा उसके भेद-सामा य जपूण भूतकार-सामाय अपूण भूनकार का निमाण–सामाय अपूण भूनकाल का प्रयोग-जरिल जपूण भूतकाल-जटिल अपूण भूतकाल का प्रयोग--सानत्यबोयक भूतकाल~~ सातत्यवाधक भूतकाल का प्रयोग-जटिर सातत्यवोचर भूतकार-जटिल सातत्यबोधक भूतकाल का प्रयोग--सामाय भूतकाल-सामा य भूतकाल का प्रयोग-आसन भृतकार-आसन भूतकाल का प्रयोग पूर्ण भूतकाल-पूण भूतकाल का प्रयोग-भविष्यत्कार तथा उस भद-प्रथम भविष्यनकार-प्रथम भविष्यतवाल का प्रयाग---द्वितीय भविष्यतकाल-द्वितीय भविप्यतकाल का प्रयोग-तृतीय भविष्यकार -तृतीय भविष्यतकार का प्रयोग-सातत्यवोवर भविष्यतकाल-सातत्यवोधक भविष्यत कार का प्रयोग-माज्ञायक प्रकार आनाथन प्रकार का माधारण भेद-आज्ञायक प्रार का जादरमृचक भेद- जाताथव प्रकार के काय म निया के सामा य प तथा सम्भावनायक प्रकार सामाय भेद वा प्रयोग -सम्भाव नाथव प्रकार सम्भावनावर प्रसार के सामाय भेद का प्रयाग- सम्भावनायब प्रकार का अपूण जटिल भेद ~मम्भा वनाथन प्रकार वे अपूण जटिल भद का प्रयाग---सम्भावनायक प्रकार वा पूण जटिल भेद-सम्भावनाथय प्रचार के पूर्ण जरिर भेट वा प्रयोग- सम्भावनायक प्रकार का सातत्यवायक भेद-सम्भावनायक प्रवार के मातत्यशोधक भेद का प्रयाग-- सनाथ प्रकार वा सामाय भेद-सनायक प्रकार के सामाय भेद का प्रयोग---मताथव प्रकार का अपूण जटिल भर-सातायर प्रकार के अपूण जटिर भेन का प्रयोग- मुक्त्ताथर प्रकार का पूर्ण अनिर भेट-सवेताथव प्रभार के पूण जरिए भेद का प्रयोग-सबनाया प्रकार का मानत्यवाधक ( क ) ५ सस्वाशब्द ७० मण्डवाचन मायागर-भिन समुदायकाचा गाया--- आवृत्तिवाचक सायााद-रगमग मात्रा को अभिन्यस्ति- अमवा मग्यायद। ६ सवनाम सपनामा का प्रयोग-~-पुस्पयापर सवनाम-~-निगवाधर सपनाम-प्रश्नवाचक सपनाम-स्वामित्ववाचर मवनाम-~- निजवाचक सधनाम-~~-राम्ब पवाचक सवनाम 1-निश्चयवाचक सवनाम--यनि चयवाचा मवनाम-मयुक्त सवनाम-वाक्य सवनामा वा बाय-सना मवनामा वा विचार-विशेषण मवनाम का विकारमयुत सवनामा या विकार-सस्या सवनामा का विकार-सवनामा निश्चयायन ७ क्रिया किया ने अपुर पवाचक हप-निया का सामाय प्रिया की धातु कृय तक्तृ वाचर और कमवाचक कृदात--दता का निमाण-पतृ वाचव कृरता का निमाण-मवार वृदनो का निर्माण~दत विधार---पूरता का प्रयोग-वृदना के स्वतत्र प्रयोग को कुछ विशेषताm-मामाप वतमानवाशिव पदत-~सामाय भूतकालिक वृदा-गयुक्त वतमानकालिप कृदन मयुका भूतकानिक रन-वारा प्रत्ययान | -विपणो और मना मरता का गणमण-~सान य बाधकारिकत-पूर्वकारिक कृरत-पूववारिक पृदता स ममय निर्देग-भूपकालिब वृदता का निर्माण-पूववालिय दता का प्रयोग किया वे पुग्पवावा म्प साल प्रसार---निग्यायक प्रकार~~वमानवार तथा उसने भेर--- सामाय बतमानवार-सामाय वतमानकारना निमाण- सामाय वतमानकाल का प्रयोग-जटिल वनमानकार- जटिल वतमानकाल का प्रयोग---मातत्यवोधर वतमानकाल-- सातत्यबोधक बनमानकार का प्रयोग---जटिल सातत्यवोधन वतमानवाल-जटिल सातत्यवोधक वतमानकार का प्रयोग- भूतकाल तथा उसके भेद--सामाय अपूण भूतकाल-सामाय अपूण भूतकार का निमाण–सामाय अपूण भूतकाल का प्रयोग-~जटिल अपूण भूनकाल–जटिल अपूण भूतकार का प्रयोग--सातत्यबावर भूतकार- सातत्यवोधक भूनकार का प्रयोग-जटिल सातत्यवोधन भूतवाल-जटिल सातत्यमोधक भूतकार का प्रयोग-सामाय भूतकाल-सामाय भूतकाल का प्रयाग-आसन भूतकाल-आसन भूतकाल का प्रयोग पूण भूनकाल–पूण भूतकार का प्रयोग-भविष्यतकाल तथा उसके भेद-प्रथम भविप्यतकाल-प्रथम भविप्यतकार का प्रयोग--द्वितीय भविप्यतकाल-द्वितीय भविष्यतकाल का प्रयाग-तृताय भविप्यनकार-तृतीय भविष्यतकार का प्रयोग-सातत्यवोधक भविप्यतकाल-सातत्यबोधक भविष्यत पाल का प्रयोग-नानाथ प्रकार-आनायक प्रकार का माधारण भेद-लानायक प्रकार का जादरसूचक भद- आनाथा प्रकार के काय म निया के मामाय म्प तथा मम्भावनाथ प्रकार के मामा य भेद का प्रयोग -सम्भाव नाथन प्रकार--सम्भावनायक प्रकार के सामाय भेद का प्रयोग-सम्भावयव प्रकार का अपूण जटिल भेद-~-मम्भा वनायक प्रकारचे अपूण जटिल भेद का प्रयाग-सम्भावनाथक प्रकार का पूण जटि भेद-सम्भावनायव प्रकार के पूण जटिर भेद वा प्रयोग- सम्भावनायक प्रकारका मातत्यवोधन भेट- सम्भावनायक प्रकार के मातत्यवोधय भेद का प्रयाग- सकेता प्रकार वा सामाय भेद-मरेतायक प्रवार के सामा य भेद का प्रयोग-~मकेताया प्रकार का अपण जटिल भेद-सकाता प्रकार वे अप्ण जटिल भेट का प्रयोग- मरताथप प्रकार का पूर्ण नतिर भेद-सक्ताय प्रसार के पूण जटिस भेद का प्रयोग सकेनायक प्रकार का मानत्यवाक (ग) भेद- सवैताया प्रकार के मातत्यबोधन भेट का प्रयोग, विधि-विधि का नित्यतावोधर म्प-विधि वा प्रत्रमण वोधन प--विधि का अभ्यामबोधन स्प याच्य-वाच्य वा प्रयोग सवस्था १६५ ८ क्रियाविशेषण त्रियाविपणो ये निश्चयाथव स्प ६ सहायक शब्द भेद २१० विभक्ति चिह्न सामा य विभक्ति चिह्न-जटिन विभक्ति चिह्नपतिपय जटिल विभक्ति चिह्ना का प्रयाग-विभक्ति चिह्न वापर गन्दसमुदाय । १. निपात २१४ योजक नन्द हिदी म निपातो का प्रयोग ११ विस्मयादिबोधक (मनोभावद्योतक) २२५ २२७ १२ शब्द निर्माण सशागदा का निर्माण-प्रत्ययो नारा मनाशता का निर्माण पुल्लिगपरवयक्तिवाचा सज्ञागा निर्माणकारी प्रयय- पुल्लिंगपरक व्यक्तिवाचक सज्ञानदा क निर्माणकारी अद्ध प्रत्यय-स्त्रीगिपरक व्यक्तिवाचा मनाशा क निमाणकारी प्रत्यय-पगुवाचा सनागावे निमाणकारी प्रयय-वस्तु वाचन सनागा निमाणकारी प्रत्यय भाववाचा सना दाग के निमाणकारी प्रयय-ज्नतावाचन ममाटो के निर्माणकारी प्रत्यय---उपसगों द्वारा सनाका निमाण- (घ) मनामदा के निर्माणकारी अद्ध उपसगाद सयोजन---- विशेषणा का निमाण-विशेषणा के निमाणकारी प्रत्यय-- विशेषता के निमाणकारी अद्ध प्रत्यय-विशेषणा के निर्माण कारी उपसग--विशेषणा के निर्माणवारी अद्ध उपसग--- शाद सयोजन से विशेषणा का निर्माण-नियाआ वा निमाण---नामिक नियाएँ-व्युत्पन सक्मक तथा प्रेरणाथक क्रियाएँ-प्रेणाथक क्रियानो का प्रयाग- अवधारणबांधक क्रियाएँ--अवधारणबोधक प्रियाओ में प्रयुक्न सहकारी त्रियानो की विशेषताएं --समानाथक रियायो तथा विपरी ताथक क्रियाआ के सयोजनो द्वारा--नियाजो का निमाण-~- क्रियाय समुदाय । १३ शब्दसमुदाय तथा वाक्यरचना २७० शब्दसमुदाय वाक्य--वारय म श दो के सम्बधा के प्रकार-- साधारण वाक्य--वाक्य के प्रकार-दो अगा वाले वाक्य- वाक्य के मुख्य अग--उद्देश्य-विधेय---त्रियाविधेय-नामिक विधेय-वास्य व सहायक अग--कम---गुणनिर्देशक- विशेषतानोधक-विषेय का वाश्य के उद्देम तथा प्रधान का से अवय-एक अग वाले वाक्य-निश्चित पुम्पवाचक वाक्य--अनिश्चित पुरषयाचा वाक्य-~-अपुरुपवाचक वाक्य--- अपूण वावम-शब्द क्रम-या दसमुदाय में दम- वाक्य में शद प्रम-संयुक्त वाक्य-सयुक्त समानापिकरण वापय-- सयुक्त व्यधिकरण वाक्य--- उद्देश्य उपवाक्य-विधेय उप वाक्य--म उपवाक्य-गुणनिगम उपवाक्य-सयाजल उपवाक्य-विशेषताबाधक आश्रित उपवाक्य-उपवाक्यबद्दल सयुक्त अधिरण वाक्य-प्रत्यक्ष क्यन तथा पराक्ष नयन ।
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प्रस्तावना भारत की राजभाषा हिनी ममार म सवम अधिक व्यवहार म आने वाली भापाआ में से है। परतु हि दी जाधुनिक भारत की एक्माश भाषा नहीं है। भारत म दो मौम अधिप भापाए नया बालियां भारत के स्थानीय भागा मे बारी आता हैं । १० से अधिक प्रतिशत लोग हि दो, उदू बगला, तमिल तर मराठी, पजाबी, गुजगती, कन्नड, बिहारी, उडिया राजस्थानी आदि बोलने हैं। अधिकतर भारतीय भाषामा की अपनी अपनी स्वतत्र लिपियां हैं। आधुनिक भारत तथा पाकिस्तान की भापा निम्नलिखित समुदामो म बाटो ना सकती हैं (0) अतर भारताय (२) द्रविड (1) तिब्बत-वर्मी () मुडा (1) मान मर। उपगत में सबसे बड़ा प्रथम ममुदाय है । यह भारोपीय भाषा) क परिवार का है। कई युमा म उत्तर भारतीय मापाए अपने व्याकरण विषयक स्पा के मुधार की दिशा में अपने आतरिक नियमा के अनुसार विकसित होती रही हैं। उत्तर भारतीय भाषाए इन तीन कोंम विभाजित हैं--(१) पुगतन युगौन उत्तर भारतीय भाषाएँ (२) मध्ययुगीन उत्तर भारतीय भाषाएँ तपा {}) অবাৰীন যুগান নং মনীয মাথাই। पुरातन युगीन उत्तर भारतीय भाषाएँ वेदो तथा महागाव्या में प्रयुक्त भाषाए है । इन भाषामा का विवास ईमा म लगभग बारह मदिया पूर्व हुआ। सबसे अधिक प्राचीन साहित्यिक कृति, जो भाषा की दृष्टि स सक्षम अधिर समृट है यह है ऋग्य। ऋग्वद ने पाचात् मय वही कृतियाँ रची गई जो पुरातन मुगीन भाषाओ रा बहुमूल्य माहित्यिर निधि हैं। इनम स सबम अलिम कृत्रियो रबी गई पाराय सहित सात मताहिय का विकास सुचारु रूप स मना मदिपा तर होता रहा । ईमा मे लगभग पांच सती पहले मध्ययुगीन भारतीय भाषाओ का प्रादुभाव हुआ। इन मापाई का तब व्यापर माम पहा प्रापर भाषा--- इनमें पानी, गोरगेनो, महाराष्गे मागी मदमागयो रा समावेश है। उनt २ स्थान पर ईसा क बाद या प्रारम्भिव सदियो म उन परवी अपभ्रम्पा का प्रारम्भ होता है । ये अपना रूप प्राकृतो तया वतमान वाल तक की दम मरिया म विवामिन होती आ रही आधुनिक उत्तर भारनीय भाषामा बीच वी एक कडी थी। अचान उत्तर भारतीय भाषाआ वी सम्बधित अपभ्र गा स उत्पत्ति हुइ । उही म स एक है हिंदी भाषा वह आधुनिर भारत म सवम अधिक प्रचरित है। भारत के एगभग २५ करो- आरमी उमका व्यवहार करत हैं । हिदा म समृद्ध साहित्य तथा पत्र पत्रिकामा का प्रकाशन हो रहा है। हिंदी भाषा अर्वाचीन भारतीय भाषाओं के उत्तरीय समुदाय के परिवार की है। आधुनिक भारत म हिदो वे सबस निकट भाषा उद् है। हिती तथा उदू का प्राभाव थोर उनको आजकल की स्थिति इम बान के परिचायक हैं कि उनका आधार-व्यावरण विषयक ढांचा मौरिव भार तथा ध्वनि सम्बधी प्रणा प्राय एक सदा हैं । हिला तथा उदू की भिनताएँ मुन्यन गावा तथा आणि म्प में शटल निर्माण और वाक्य रचना के क्षेत्र मदावन म जाती। जगा वि मुर्विरित है अपने विकाम की प्रतिया म भापामा म विभिन्न परिवतन आया करत मापा की ध्वनियों नथा पाचना-मम्बधा नाच नादि वटा जाते हैं। भाग्नीय भाषाएँ भी अपन विकास के रम्ब तथा जटि माग स गुजरी है जिसमें पदरचना-सम्बधी दांचे में मोलिव परिवनन लाया है । यह परिवतन एम्बी अवधि व अदर होता रहा है । परिवतन की प्रक्रिया प्रारम्भ में मध्य युगीन भाषाआ जयान प्राकृत भाषाआ में मदरपणात्मक ढांच के न शनै लोप फिर अपभग भाषाभो म उनके पूण लोप तथा जत म अर्वाचीन भारतीय भाषाआ व विपणात्मक ढांचे के निर्माण में प्रकट हुई है । अवाचान भारतीय भाषा के विलेपणाम दांचक ऊपरा विनाम न आधार पर उनम पुगतन भारतीय सश्लेषणात्मक पास सवथा भिन नवीन सरपणात्मक म्पो का प्रादुर्भाव दष्टिगोचर हाना है। मश्लेषणात्मक ढांचे वाली भाषाआ म व्यावरण विषयक स्प तथा वाक्य म शटा कबीच सम्बध स्वय शोरे रूपो क विकार स व्यक्त होते हैं । विशे पणात्मक ढाच वारा भाषाए इस तरह का भाषाएँ कहलाती हैं जिनम व्याकरण- विषयक रूप तथा वाक्य में समें के बीच सम्बध गण रूपा द्वारा नहीं अपितु । म महायक पदो आणि मे व्यक्त हात हैं। माणपणात्मक ढांचे वारी भाषा का ज्वर त नमूना वगिक भाषा है जो ३ उम युग को बोलचाल की साहित्यिक भाषा थी। एक वदिक कालीन उपभाषा से विवामित शास्त्रीय सस्कृन एमी भाषा थी जिसमे सश्लेषणपरक स्पा का आधिक्य था। अपभ्रग भाषाएँ साहित्य म मध्ययुग के आरम्भ म प्रयुक्त होने लगी। उनके अर्वाचीन रूप ध्वनिया तथा पदरचना की दषि से उत्तर भारतीय भाषाओ के पूर्व रूपा से प्राय मिलत जुलत थ । अर्वाचीन उत्तर भारतीय भाषाओं के विकास का प्रक्रिया केवल १५वा सदी म पूर्ण हुई है जब आधारभूत विभक्ति चिह्नो तथा जवाचीन उत्तर भारतीय भाषाओ की क्रियाओं के विश्लेषणात्मक पा का पूर्ण विकास हुआ। लगभग इसी ममय एक विश्रेषणात्मक टाच वारी भाषा पूर्ण रूप से विकसित हुई जिसको ही बाद में जाकर हिली नाम दिया गया। हिंदी भाषा मे अधि काश त्रिया सम्बधी रूप विश्लेषणात्मक ढग म कृदता तथा विभिन सहायक नियाजा के स्पा सयोजन द्वारा बनत हैं । वाक्य मे शब्दा वे सम्वध विभक्ति चिह्नो द्वारा व्यक्त होते है जो नामिक गब्दा या सवनामो के असामा य कारक के माथ जुड़े होते है। जैसा कि सवविदित है गुर विश्रेषणात्मक या शुद्ध मपणामक भाषाएँ नही होती है । भाषा मे गला व्याकरण विषयक कार्यों तथा वाक्य में गदा के सम्बधा की अभिव्यक्ति के लिहा निश्चित प्रकार की वहुलना के अनुसार ही भाषाएँ विशेषणात्मक प्रधान या मश्लेपणात्मक प्रधाा समयी जाती हैं। मस्कृत म भी मश्लपण प्रधान रूपा के माथ कुछ थोड में विश्लेषणात्मक रूप दखने में आते है। हिदी का व्याकरण सम्बधी ढाचा भी शुद्ध विश्रेषणात्मक नहीं है । विश्लेषणात्मक म्पो के साथ साथ भाषा म जिनका बाहुय है तथा इसीलिए हिदी भाषा की परिगणना विश्लेषण प्रधान भाषाओ म की जाती है मरपण के तत्व भी विद्यमान हैं । ये तत्त्व हिंदी भाषा के विधाम के भिन भिन्न काला में मम्बधित हैं। जैसे, मध्ययुगीन भाषाओ के अवशेष 'मुये, 'तुझे', तथा नय सपणात्मक रुप जो विश्लेषणात्मक ढाचे के विकास में ममय म उपन -रक्यिा' 'बोरती' इत्यादि। हिन्दी मे विश्लेषणात्मक रूप क्रियाविशेषणा का छोटकर अय सभी प्रधान गर भेदो में विद्यमान हाने हैं । जसे (क) मनान्दों में सव मनाआ असामान्य कारव तथा सम्बोधन कारक बहुवचन रूपा का तथा आवारात व आवागत मनागदा के अमामा य नारक तथा सम्बोधन वारस एष वचन पावा निर्माण हान समय । (स) विकारी विपणा आकाग त विशेषण मवनामो तथा मवाचन - ४ स्याआ में लिंग, वचन नया का अनुमार उदरन ममय। (ग) मजा मरनामा म (१) लवपन, पारात तथा एपारान्त कमकारक के प्रयाग म । (२) मव तथा 'बई सवनामा के अमामार वार सबा' तथा 'वइया प्रयोगम। (4) पियाआम 1 (1) आज्ञापन प्रकार के मैदा, सम्भावनापक प्रकार के मामाय भेद तथा निश्चयाचा प्रवार व प्रथम भविष्यवार या निमरण हाल ममय । (२) गि नथा वचन मता व विकार म। (२) पुरुष तथा बबन म सम्भावनायव प्रसार मामाय भवारी प्रियाला विचार में। (४) वनमान वा म पुम्प नया वचन में हाना प्रिया + विकार म । (4) प्रथम भविष्यकाल म पुरुष वचन तथा लिंग में निषाआ विकार म! () अपूण भूतकार म रिग नथा वचन में सहायर पिया होना परिवार में । (८) लिग तथा वचन म या विभति चिह था मा निपात, विकार म। नामिक पा तथा निया | Fपा म नय सरपण मगटी, बगला तथा भय जवाचीन भारतीय भाषाआ म भी दक्षिणावर हाने हैं। प्रादुभाव की प्टि स हिंदी भाषा कागद भण्गर दो प्रकार गदा में सम्पन हआ है-देशी और विरेगी। दगी गाना श्रेणियाँ है-~नमें पहा श्रणी व य है जो पुरातन भारतीय कार म मय काल में में गुजरात हुए आधुनिक बायनर लम्बा माग तय कर हिदो में पाडा-बहुत मप बदर कर आए हैं । उह कहते हैं तदभव ! दूसरी श्रेणी के वश है जा प्राचीन रास्वत भाषा सचिना विमी पालर कन्टिी में आये है । इह कहत है मम गदा विदेशी गदर आय है मुग्य य म निम्नलिखित भापामा मइरानी तुरी, अरबी पुतगाली फामीसा मग्रजा तथा आशिप में उसी । मस्कृत स आय हुए हिरवीगावली का सबसे मह वपण भाग है। य मक्त " दाज अर्यात अय भारतीय साथ नवीन गदा तथा समुदाया नै निर्माण का आधार होते है । ये धम शिक्षा प्रणाली, क्य, दिनान और प्रशासन-सचालन इत्यानि सम्बधा मामाजिर राजनीतिर मावली की रीढ हैं। यT मुख्य रूप से माहित्यिक प्रतिया ६ मा यम से हिली भाषा में आये हैं। ईरानो भाषामा स आय हुए शब्द विदेशी भाषाओ देश में मुख्य स्थान पर है। द हिलरी म दा रीतिमा म आप है। एक स्थानीय लोगा नया ईरानी भाषाभाषिया २ मोध सम्पर द्वारा और दूसरे प्रशामनिर सस्थानो, - ।
५ सेना, स्कूर धम, माहित्य तथा करा आदि द्वारा, जिनमें १९वी मदी में मध्य तब पारसी भाषा का वोग्वालाया। सुक शम मुख्यत हिदी नापा म बोलचाल द्वारा आये है। जसे कुरी, बचा तोप बदू दारागा आदि । अरबी शब्द अधिकतर अरयो गदा मे समृद्ध इगनी नया तु भाषामा द्वारा हिदी म आय है। पुतगाली तथा फरसीसी शब्द सारहवी तथा मत्रहवा मदियर मे वोलचाल द्वारा हिंदी म प्रयुक्त हान लग! हिदी म उनका भाग नगण्य मा ही है। मारण पुनगलिया तथा सामोमिया का भारत म प्रा अपेक्षाकृत जल्पका नक रहा और दारण भारत में कुछ इस तर ही सीमित रहा । सलिए व भारत की नाम जनता को भापाआ तया रहल महल को बहुत प्रभावित नहीं कर सके। हिंदी में अपनाय गय पुतगार्ग तथा प्रामीमा कतिपय गन नमून के तौर पर हम दत है धुनगरी अल्मारी, आया, आलपान, इम्लरी, कमीश, कमरा काजू काफी इत्यादि। प्रासामी शद कारतूम, कूपन बग्न बुरश आदि । अप्रजो गन्द भारतीय भाषामा म सारहवी सदी म प्रयुक्त होन 71 अग्रेजा व उपनिवगवानी वाय के प्रारम्भिर बालम अग्रेजा गयका प्रयोग टेस्ट इण्डिया कम्पनी के क्मचारिया में पदों नया मंनिक उपाधिया का निर्देश करन के लिए किया जाना था। आग चार भारत म त्रिटिरा प्रभुत्व के टावरण व माय माय स्थानीय भापाआ पर अग्रेजी भाषा का प्रभाव प्रवर हुमा, जव सन १८५७ १८५८ वे राष्ट्रीय भावनापूर्ण विद्राह के दमन र पचान अरेजी भाषा तवालीन प्रिटिंग हुकूमत का सरकारी कामकाज का भाषा पापिन गया थी। प्रत्यर आदमी के लिए जा सरकारी नौकरी मरिया जाता था, अंग्रेजी भाषा का जानना अनिकाय था। मुग्यम्पस अग्रेजी भाषा के माध्यम रा हा नव भारतीया वा पश्चिमी विनान तक्नाको तथा मस्कृति का परिचय प्रान होता था। इस प्रकार माग्न म अप्रेजा दे दीघकालीन प्रभुव के समय हिदा म तया दूसरी भाग्नाय भाषाआ म भी विणि प्रशासनिक प्रणाली, सरकारी प्रध-व्यवस्था, मेना शिक्षा प्रणाली, विनान, नवनीती, प्रस तथा भारताया र राष्ट्रीय जागति आदि सम्बधी अग्रजी दाल आ गय हैं। रसो शमहिती म मुम्पन अग्रेजी के माध्यम से आप हैं । जन गाविपत महो नि भरखाज, स्वर इत्यादि। सीधे साम बन श- हिमग्यि गय है। इस प्रकार में विनर द साध सा मुहावरे नहीं बल्कि FAT या रगी मुहावरा की प्रतिच्छाया है जा मावियत संघ की परिस्थिति र प्रगति सम्बधानय विचारावर व्यरन करने लिए अग्रजी तथा हिदी सस्कृत T आधार पर बनाय गय है । जस पनवर्षीय योजना अणु बिजलीघर नाति पुरस्कार विजना पर विशारद मम्मृति भवन इत्यादि। पिकी भापा का भण्गर निर तर नय गदा तथा मुहावरा म भर रहा है। य नय शम् तथा मुहावरे न वे वर इतर भाषा से लिए जा रहे हैं बल्कि हिदी की अपना विद्यमान शावर आधार पर भाग निमा वई प्रकार द्वारा य हिदी का ममद कर रहे है। हिदा भापा मगर निमाण वे नियम निम्नलिखित परार है-- (१) पररचना विषय प्रबार अथान आगम प्रत्यया द्वारा निमाण। (२) वाक्यरचना पररचना विषयव प्रकार । (३) शतावरी भावाय विषयक प्रकार । प्रत्यक प्रकार के पद निर्माण में अपने अपन उप प्रकार हान है । हिदी भाषा म पटरचना विपया प्रकार के निम्न अवातर प्रकार है- (4) ध्वयात्मक पदरचना प्रकार जिमम निम्न मला का समाश होता है (१) प्रत्ययरहित भेट इमम स्वर दोघ या हस्व हा जाता है अथवा स्वर का रूपातर हो जाता है । साथ साम कभी कभी पातरित पजन म भट मुग्म रूप स सबभव तथा प्ररणायव क्यिाा निमाण म दखन म आते है । जगे समझना सम्शाना पीना पिलाना टूटना तोना घटना छोडना (२) प्रत्ययसहित भेट इसम मना के पहर अपर के स्वर म ध्वयात्मक परिपतन होता है । यह परिवतन नव होता है जब इ२' प्रत्यय द्वारा सनाआ म विपण बनते है। सनाआ प्रथम अक्षराम दयामर परिवतन निम्न प्रकार होत अ मा म परिवर्तित होता है आ अपरिवर्तित ही रहता है। इऐ में परिवर्तित होता है।
७ ई ऐम परिवर्तित होता है। उ और ऊ दोनो ही 'औ म परिवर्तित हाते है । 'ओम' म परिवर्तित हाता है। उदाहरण समय सामयिक इतिहास ऐतिहासिक नीति नतिक उपचार औपचारिक भूत भौतिक लो लोक्कि (ब) प्रत्ययसहित भेद, जिसम शब्दा का निर्माण केवल प्रत्ययो द्वारा होता है । जैस रेख लेखक खेत खेता - মৰৰ मददगार बलवान (ग) उपसगसहित भेद, जिसम नय गन का निर्माण उपसर्गों से होता मेल देश विदेश अपमान गुण अवगुण जान अनजान (घ) मिमित भेद जिसम नये शब्दों का निर्माण प्रत्ययो तथा उपसर्गों दोनाम हो होता है। जसे अनमेलपन मारत अभारतीय स्वतत्रता होग बेहोगी (८) मध्यन सयमहित भेट, जिसमे नय न वा निमाण मध्यप्रत्ययो में होता है। इस म क अनुमार सक्मा प्रियाए बनता है, जैम निक्लना स निकालना, मरना से मारना और बटना से बांटना सक्मक त्रियाएँ बनती है। विभिन गन्द भेदा म शब्द निर्माणारी प्रक्रियाएँ विभिन होती हैं ।
नातिपूर्ण उदाहरण के लिए सज्ञामा निमाण म उपसर्गसहित कम प्रयुक्त होता है। जैसे साहस दुसाहस मानव अतिमानव काल दुप्काल यह भेद अधिकतर विगषणा के निमाण में दप्टिगोचर होता है । जस था अनधन फल विफल पता लापता उम्मीद नाउम्मीद प्रत्ययमहित भेट सना शदा के निर्माण तथा विपण गला निर्माण दोना म व्यापर रूप से व्यवहृत होता है। रिया गदा निर्माण म उनका व्यवहार अपेक्षाकृत कम होता है। जैस भूमि भूमिधर अधीन अधीनता गाति अपना अपनाना आधुनिक हिंदी म जपन उपयोग की दष्टि से सारे प्रत्यय और उपसग निम्न दा मुख्य वर्गो म बाँद जा सक्त है (१) उत्पादक अर्थात प्रचलित प्रत्यय और उपसग जिनका आधुनिक भापा म नय गदा के निमाण में प्रयोग होता है। इनम सवम पहा जान है नकारात्मक उपसग, जम नि अ अन व गैर और भाववाचक मनाआ + प्रत्यय जस ई वार ना पन आदि । उदाहरणाथ- सहकारी असहकारी सुना अनसुना फायदा बेकायदा सरकारी गर सरकारी चुरा युराई साम्राज्य साम्राज्यवाद स्वाधीन स्वाधीनता लडकपन (२) अनुत्पादक अथात अप्रचरित उपसग और प्रत्यय जिनके द्वारा - ६ मान अदव आधुनिक हिंदी भाषा म नये गदा को निमाण नही होता है। उनम निम्न उपसग और प्रत्यया का समावेग होता है नि, अधि, अभि, बिला, वा, ति, वा हा, आक आदि। उदाहरण खोट निखोट अधिराज अभिमान बिला गत बाअदब नी नौति देना देवा चरवाना चरवाहा तरना तराक हिदी भाषा मगर निर्माण के पदरचना विषयक प्रकारा को वाक्य रचना विषयव प्रकाग से पृथक करना काफी कठिन होता है क्योंकि रगभग सब मयुक्त गदो मे जो वाक्यरचना विषयक प्रकार से अधान गब्द मयाजन से बन है उना जग एक-दूसरे पर निश्चित पदग्चना की प्टि म निभर करते है । हिंदी भाषा म श द निर्माण का विशुद्ध वाक्यरचना विषयक प्रकार बात दो या तीन शा का समान मयाजन गौण महत्त्व वाग होता है। इस प्रकार के जनगत निम्ननिसित श्रेणी के गला का निर्माण होना है मा वाप, दिन रात आदि। उक्त मयुक्त श दा के दो अग पदरचना की दृष्टि से एक दूसर पर आनित नहीं हात है और उनके बीच योजक 'और' या 'तथा' प्रयुक्न हो सकता है। हिदी भापा म गब्द निमाण का वाक्यरचना पदरचना प्रकार मबसे अधिक प्रचरित है । म श्रेणी म निम्न अवा तर भेद हान हैं (क) गद मयोजन जैस गानिप्रेमी (गान्ति+प्रेमी), देगनिकार (दा+निकारा), बिजलीघर (विजरी+घर) आदि । (ब) विशेषणों रिया के सामाय रूपों कृदता और यहा तक कि निपाता वा मनीकरण । जमे धनी वनानिक, उसके जाने तक, कहा, घेर- हाँ में ही मिलाना नहीं करना भारत का नाज और कल । गद निर्माण से वाक्यरचना-पदरचनाविपयर प्रकार म विभिन्न गट १० भेदो का क्रियाविशेषणीकरण भी समाविष्ट है। हिदी म त्रियाविशेषण के अथ म निम्नलिखित प्रयुक्त हात है (१) सनाएँ और मनाआ की द्विमुक्तियाँ । जस सुबह, राज दिन दिन, इत्यादि। (२) विशेषण । जस अच्छा पुरा, माफ, धोरे आदि । (३) सवनाम । जस इतना उतना, ऐसा वैसा आदि । (४) पूर्वकालिक वृदन्न । जस जान-बूयकर छिपकर मिलकर इयादि। (ग) गाद निर्माण में वाक्यरचना पदरचना प्रकार से मना तथा विशेषणपरक श दा के क्रियापक गट भेट विनिमय (क वशन) का गहरा सम्बन्ध है । इस तरह के गब्दभेद विनिमय वा अर्थ यह समझा जाता है कि सना या विशपण से बिना विमा उपसग या अव्यय के प्रिया का निमाण होता है । इस किस्म के गन्दा का अथ वाश्या म उन स्थान तथा निश्चित गन्द भेद म निहित विपताना पर निभर होता है । हि दो म इम त्रियापक गद भर विनिमय के अतगत नियाआ के रूप म कुछ स्त्रीलिग मज्ञाजा और विषणा का प्रयोग होता है । जम मगहना, रचना स्थापना झूरना रोना आदि। श- निर्माण का दावली भावाथ विषयक प्रकार व्यवहृत तब होता है जब नये विचारा को व्यक्त करने के लिए शन्ता का जय अर्थों में प्रयोग होता है । जसे जवान शट युवा है किंतु यह बोलचाल की भाषा म सनिक म प्रयुक्त हाने लगा है। यान' - जिसका पहले अथ था परिवहन का माधन कितु अब मुग्यत हवाई जहाज के अथ म यवहृत हान लगा है। यूरोप म वनानिक भारतविद्या का प्रारम्भ म म हुआ था। अफानामी निकितिन तथा गेरासिम लेविदव की उत्कृष्ट कृतियो ने वनानिक भारतविद्या की आधारशिला रखी। इससे भारतविद्या के विकास को भारी प्ररणा मिला। उहान सबसे पहले दुनिया का भारतीय जनता की पुरानी मस्कृति तथा उसर कलात्मक और ऐतिहासिक स्मारका में परिचित कराया। यूरोप म अवाचीन भारतीय भाषाआ का अ ययन जिनमे हिदी भी है, अठारहवी सदा के त म ही प्रारम्भ हुआ। यूरोप म इन भाषाआ का अध्ययन केवल व्यावहारिक उद्देश्या से ही हा रहा था तथा यूरोप के अनेक दगा की उपनिवेशवादो नाति का ही वह एक अग था । स म वनानिक भारतविद्या का विकास विरकुर अय उद्देश्य तथा आधार पर हो रहा था। वहाँ इसका विकास वज्ञानिक जानकारी प्राप्त्यथ तथा भारत की महान तथा द्वितीय ११ मम्कृति म सी सामाजिक क्षेत्रो की गहरी रचिया के कारण हो रहा था। परतु अक्तूबर क्राति से पूर्व के रुसी भारतविद्या के साहित्यशास्त्र तथा भाषा शास्त्र के क्षेत्र मे पर्याप्त सफलता एव सिद्धि के बावजूद कई कमिया थी जिनके कारण म्सी भारतविद्या के विकास म बाधाएँ पड रही थी। उन कमिया में एक मौलिक कमी यह थी कि सब भारतीय भापाआ म से केवर पुरातन भारतीय भाषाआ अर्थात वदिक तथा शास्त्रीय सस्कृत और आगिक रूप से मध्ययुगीन भाषाआ का अध्ययन हो रहा था । अर्वाचीन भारतीय भाषाओ का अध्ययन नाममात्र का ही हो सका था । अक्तूबर नाति से पूर्व के केवल एक रूसी भारतविद्याविद प्रोफेमर ई० १० मीनायव, जिहे पुराता तथा जवाचीन भारतीय भाषाआ तथा साहित्या का अच्छा ज्ञान था भारत की सास्कृतिक विविधता के अध्ययन का महत्व समझते थे । रूस में अवाचीन भारतीय भाषाआ का अ ययन अक्तूबर समाजवादी श्राति के पश्चात ही विधिवन प्रारम्भ हुआ तथा भारतविद्या के प्रमुख सोवियत प्रतिनिधि अकादमीशियन अ० १० बरानिकोव के पवित्र नाम के साथ उसका अविनाभाव सम्बध है। श्री बरानिकाव को सावियत भारतविद्या के नये पथ प्रशस्त करन तथा भारतीय इतिहास व सरकृति के बहुमुखी अध्ययन के आधार के रूप म महत्त्वपूण उवाचीन भारतीय भाषाआ का अध्ययन आरम्भ करन का श्रेय है। अकादमीशियन बरानिकाध न दाउद अनादत्त के माथ मिलकर लेनिनग्राद विश्वविद्यालय में हिंदी, उर्दू मगठी बँगला तथा पजाबी भाषाओ के अ यापन का समुचित प्रबंध किया । उन दोना ने अर्वाचीन भारतीय भाषाओ तथा साहित्या के विशेषना को तयार किया। अकादमीनियन बरानिकोव न अनेक नथ तथा पाठयपुस्तका का प्रणयन किया। इन अथो में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पाठ्यपुस्तक है हिदुस्सानी (हिदी व उदू)। श्री वरानिकोव द्वारा गुरु किये गए उक्त साहित्यिक काय एव माधना को आग घटा रह है जाज भी उनके सुयोग्य कमठ शिप्य तया प्रशिप्य । हिन्दी माहित्य के क्षेत्र में सफलतापूवक काय कर रहे है य० पा० चेग्रोिव । उनके द्वारा हिंदी कविता पर लिखी गई पुस्तक 'परम्पग तथा नवीन शरी गान ही प्रकाशित हाने वाली है। हिटी रूसी तथा स्मी हि दी गदको प्रणयन तथा सकरन म महत्त्वपूर्ण योग दिया है डास्टर व०म० वस्त्रोवनाय ने ! उनके द्वारा सबस्ति हिंदी रूमी शनवार के दा मरकरण प्रकाशित हो चुके है। भाजक्ल र डाक्टर २० लिपिगस्ती तथा दाक्टर ग. जोग्राफ के साथ मिरकर नय वहट रूसी हिदी गदका प्रकाशन की तैयारी म रग हुए हैं । डाक्टर हिदी भाषा में दीघ तथा ह्रस्व स्वर का आपम म विनिमय हुआ करता है। विनिमय हाने वाले स्वरा के निम्न युग्म होत है जा अ, इ, ts, ऊ उ ओ उ । ह्रस्व स्वरा का विनिमय आ ई-, इ ए ए इ ए इ, उ ओ सनमक तथा प्ररणाथर कियाआ + निमाण में देखा जाता है। ओउप्राम जैस- बनना बनाना पीना पिलाना फिरना फेरना देखना दिखाना बैठना बिठाना रोकना सोना सुलाना शब्द निमाण के विभिन्न प्रकारो म दीघ म्वर प्राय रघु हा जात हैं । वसे शट-सयोजन में सयुक्त के पूर्वअश म दीघ स्वर ह्रस्व हो जात है । जैसे-अधपका (जाधा-+-पका) घुटचढा (घाटा+धता)। कतिपय स्वराघान रहित प्रत्यया द्वारा बनने वार शब्दा म दीघ स्वर हम्ब स्वर हा जात है । जम-विटवा (बटा+वा)। लघु 'अ' का अनुच्चारण हिदी म प्रयुक्त शटो म कभी कभी ज का उच्चारण नहीं होता है । 'अ' का उच्चारण या उमका अनुच्चारण किमी द म उसकी स्थिति पर निभर करता है । अ स्वर गट क अन्त म सयुक्त व्यजना के पश्चात प्राय उच्चारित नहीं हाना है कि तु जव श क अत म सयुक्त व्यसन होता है तब 'म म्वर का उच्चारण सुनाई देता है । जस-अन्न इन्द्र, शात, युद्ध इत्यारि । दान के प्रारम्भ म 'धु 'अ का सदैव स्पष्ट उच्चारण होता है । जमे-अक्षाश, गमन बचपन । बोलचाल मे 'अ' के अनुच्चारण के नियम लभु 'अ का बहुधा उच्चारण नही होता है- (१) शट के अत म असयुक्त यजना न बाट । जसे-घर, रात, कमल, पुस्तक । (२) तीन अक्षरा वारे गा के दूसरे अधर में जब र के अन्त में
कोई दोध स्वर होता है । जैम -मरा, "कडी, बकग करना,
बोलना इत्यादि।
(३) चार अक्षरा वाले दागम अतिम अक्षर से पूर्व अक्षर म जब
शन के अल में कोई दीघ स्वर होता है । जम-~~-मुनहरा
अपहरी समझना, निमरना इत्यादि ।
16) चार अक्षरो वाले गन्दा म झर तथा चौये यमन के पश्चात्
जब श क अत म असयुक्त व्यजन होता है। जैसे-~~~खटमल,
पटसन ।
(५) क्रिया के सामाय स्पा कमरे अक्षरा म जब अन्तिम अक्षर मे
व अक्षर मनीष 'आ होता है। जमे-~~-समयाना बदलाना
रत्यादि।
लघु 'म' के उच्चारण के कुछ नियम
लघु 'ज' का मदैव स्पष्ट उच्चारण होता है
(१) नवे पहर भर म । जैमेव तब मबाट, जवाब ।
(२) अलिम प्रमयुक्त व्यजना से पूव । जसलाह, घडव, तर",
परखा
(३) संयुक्त अनिम अक्षर में । जमे-सत्य, धम बुद्ध ।
(४) ' मत्य शमा म जब 'य म पो आ' ५, ६ अम्बरा
म सपाई हाता है । जसराय तिय राजवाप गजसूय ।
(५) एकाक्षा में । जैमन, व ।
(६) चार अक्षरों वाली त्रिमा सामाय रूप में द्वितीय अक्षर म !
जस-निमरना, ममयना बदल्ना इत्यादि ।
(0) सयुक्न व्यगर मे पूर्वाक्षर म । जस मुकाह, उमग, मुअतिल ।
(6) विभिन्न शिरूतियों से बने शो में से~कटनी, खटपटाना।
"रजन वाग् इद्रिय भी एसी ध्वनियां है जिनमे उच्चारण म मुख म
निवमित होन वारी वायु के लिए अनेर बाधा आनी हैं। हिनी में यजन के
निम्नरिखित भेद हैं- (१) म्पा व्यजन । क स ग, घ ८ च छ, ज, झज ट ठहण त थ, द, ध, न प फ7 भ,म (२) अतस्य यजन । य र र, व । (३) ऊम यजन । १ प स, है । उच्चारण के स्थान के अनुमार व्यजना ये निम्नरिसित भेट हैं- (१) कण्ठय-T, ख ग घ द ह । (२) तालव्य-च छ ज य ज, य ।। (३) मूध य-ट ठ ? ढ ण र प। (४) दत्य-त थ द ध, न 7 म । (५) जापल्य-१ प व भ म। (६) अनुनासिक -- ज ण न म। (७) दन्ताप्ठय-व। उच्चारण व नान या श्वाम के अनुमार यजना व दा मुग्य भद हैं- घाप तथा अघाप । घोप-जिन व्यजना का उच्चारण करत समय नाट का उपयोग होता है उह घोप व्य जन कल है। जसे- घ, र ज अ ब ड ढ ण द ध नव भम, य,रर व है। अघाप-जिन व्यजना के उच्चारण म *वाम का उपयोग होता है व अघाप व्यजन वहान है। जैम- ख च, ट ठ त थ, प फ श, - प,स। अय आधुनिक भारतीय मापाआ का मांति हिन्दी व्यजना की एक विपता यह है दि म्परा व्यजना म कुछ एस व्यजन हैं जिनम ह की हकी सी ध्वनि उच्चारण म सुनाई देती । इमीलिए व महाप्राण भी पहात है । जम- स,घ छठ थ ध म। दूसरी विशेषता यह है नि व्यजना में एम च्यजन हैं जा मूर्धा स उच्चा रिल होते हैं । जस-ट ठ ड र ण ५। इनर उच्चारण में जिह्वा का स्पश मूर्धा भाग से हाता है।
च्यजन सयोजन हिदी मे व्यजनी का मयोजन भी हाता है । जसे-वर झण्डा, गूजना बागा रास्ता, सब्जी, जिल आदि। बोग्चार म व्यजना का मयोजन भी कभी इस तरह से उच्चारित किया जाता है जमे उनमे कोई सयाजन न हो। इस प्रकार के उच्चारणो में कुछ यजनो के बीच ह्रस्व अ का प्रयोग किया जाता है। जैस- वफ बरफ माग मारग रतन धम घरम कम करम द्वित्व व्यजन हिदी म द्वित्व व्यजनो का भी प्रयोग होता है। इनका प्रयोग किसी मी गब्द के प्रारम्भ म नहीं किया जाता म य या अत म कही भी हो सकता है। जमे--अन्न पटट चित्त वल्लभ आदि । व्यजना के द्वित्व के कारण शद अपन से मिग्ते जुलत गब्द से भिन्न हो जाते हैं। जमे ~~-पता लौर पत्ता, रता और लता। उच्चारण करत समय कुछ गदा मे द्वित्व व्यजना की-सी ध्वनि प्रतीत हुआ करती है यद्यपि वे वास्तव म द्वित्व व्यजन नहीं होने है । जम छीनना का छीन्ना, बनना का बन्ना और रोक्कर को रोककर की भाति कभी-कभी उच्चा रित किया जाता है । उपरोक्त शब्द यजनो के द्वित्वाभास के उदाहरण समझे जाने चाहिए। प्रक्षर हिन्दी मे ह्रस्व तथा दीघ अक्षर होत ह । ह्रस्व अक्षर व हात है जिनम अ, इ, उ, अं इत्यादि ह्रस्व स्वर होते हैं या व अक्षर ह्रस्व गिन जात है जिनमे व्यजन के साथ ह्रस्व स्वर मिले होते है । जस-उछ र ना प व न । दोध अक्षर वे हैं जिनम आ ई ऊ ए, ए जो जो नादि दाघ स्वर होत है या दीघ नक्षरो म उनका पग्गिणा होता है जिनम यजन के साथ दीय स्वर मिले होते हैं । जैसे-आ श का ऊ दा आ झा। हिन्दी में गदा म अभर की मीमा मा उमवे अन्य स्वर ना होती १८ है नया रस प्रसार उसका वह परवर्ती जशर में पथव करती है । जसे-जाना। ग या रत्यादि। हिती म जमयुक्त यजन एक स्वतत्र एव पथक जार मान जाते है। जसे--निक 7 ना, या ल ना बर र ना। यदि ग म द्वित्व व्यजन होता है ता उमस पूर्ववर्ती बभर की सीमा उम अभर के अत्य म्बर तक हानी है। जसे-य हा अन भट्टा। स्वराघात पता के उच्चारण म किसी म्वर पर विशेप वर लगना है। इस बल रगन की निया का स्वराघात कहत है। प्रत्यक हिती शरम जिमम एव स अधिन अक्षर नोन में अपना स्वरा पात हाता है। हिदी म स्वराघात का स्थान स्थायी नहीं हाता जर्थात अनेकाक्षरी राम वह शट जारम्भ में मध्य म तथा जन में किसी भी भाग पर हा मक्ता है । जस—सालन चलाना जल्ली। गद विकार में स्वरापान जपरिवतनशील रहता है जथान गट क जधि कारी प म जिस भाग या अक्षर पर स्वराघात होता है उसके विभिन रूपा में भी उमा भाग या अक्षर पर स्वराघात होता है । जस-मज--मन-मेजा। जाना-जाकर--जाऊ। किसी प्रत्यय के नागम स म्पराघात का स्थान बदल सकता है । जसे- बरना-बढाव | मछ-मछवा। हिटी म स्वराघात का स्थान ह्रस्व तथा दीघ जमरा की मग्या तथा स्थिति पर निभर करता है। ग म प्राय किमी एक अक्षर पर स्वराघात होता है। म्वगघात सम्बधी कुछ मामाय नियम नीचे दिय जात ह- (१) जिम में कवर हस्व अक्षर और अत म समयुक्त व्यजन दोन हैं उमम निम अमयुक्त यज्न र पूवाधर पर स्वराघात हाता है | जसे-मडक नमा। () जिन ग ा म द्वित्व या मयुक्त यजन होत है उनम स्वराघात उक्त यजना मे पर वार जवर पर होता है। जम-दिल्ली ( ) पनि विसी । म दो या तीन अक्षर हैं और उनम में कोई अक्षर नीघ है तया जय ह्रम्व है तो म्वगघात दीवार पर १६ हाता है। जमे-घडी, परी सिटकी करना, पढगा, क्ता, पटना, किया, खिा क्रा, बनावर । (४) यदि गद म दा या दो मे अधिक अक्षर हाल हैं और उनम दो या दो से अधिक दीघ अक्षर होते है तो जतिम से पूवाक्षर पर म्वराघात होता है। जैम-किराया जासानी मिचलाना, वटवटाना। (५) यदि शब्द म चार या उससे अधिक अक्षर है और उसम तिम अक्षर दीघ है तथा उमम पूव का अभर हस्व है तो स्वराघात उम हम्ब अधर में पहरे अक्षर पर हाता है । जैसे-कचहरी, मुनहरा, परवना पहुंचना ममयना। (६) यदि शब्द में केवः हम्ब अक्षर है ता स्वराघात होता है उपात्प अपर पर । जमेपटसन दुलह्नि अचक्न । (७) उन गदा में जा द्विरक्नियो म बने होत है स्वराघात होता है अन्तिम दाघाभर पर। जम--सरसरी, बुम्बुला, गुदगुदा। (८) 'नही' निपात तथा मावनामिक क्रियाविरूपण में स्वगघात होता है शद के द्वितीय अक्षर पर 1 जैम-नही यहा वहा, कही। (6) समाम वाल गन्दा म स्वराघात या तो ठोक उही भागो पर होता है जिनम अममस्न रूप में होता है या बहुधा उनम अन्तिम दीप अथर पर प्रवर स्वगपात हाता है और ममामवाले गद के पूर्व भाग पर हन्बा मा म्वराघात । जैस---मा बाप कूडा कचरा, चार तार, नोकर-चाकर, गुस्लखाना दवापराश । (१०) यति पद प्रत्यय जुटार बनत हैं ता उन प्रत्यया में अपना म्बरापात है नद्र प्रत्यया का वही स्वगधाल प्राय प्रत्ययमहिन ममग्र गाव का होता है । एम गब्द म मूल गर का स्वराघात गाण होता है। जैसगाटी वाग, लकडहारा रफूगर । लिपि व चिह्न, जो वाग् धनिया का प्रकट करन के रिए प्रयुत्रन गोत है उह वण या जक्षर भी कहत है। जम-अ, ग य श । वर्णों या अक्षग के ममूह को वणमाला या लिपि वह्न है । हिंदी में प्रयुक्त निपि का नाम 'देवनागरी या नागर्ग है। हिता रिपि व प्रयक अण का पधव बनाा के लिए उम वण के पीछे कार रगाया, २० जाता है । जम-लकार इकार उकार पकार मकार । हिदी वर्णमाला में वर्णो का नम उनका ध्वनिया के उच्चारण के स्थान के अनुसार है। तदनुसार वणमाला म मवप्रथम व ग्यारह वण आत है जा स्वग वा ध्वनिया के चिह्न है । उन बाद आत है व २॥ वण जिनमें प्रयर पाच वा एक वग है जौर जा स्पश यजना की ध्वनिया के चिह्न हैं। तन्नन्तर जान हैं चार वग जो अतस्थ यजनो की ध्वनिया के चिह्न हैं। दनक बाट आत हैं उष्म “यजना की ध्वनिया व चिह्न । इस प्रकार वनमान हिदी वणमाला म 6४ म्वतन वण या नक्षर हैं । सरों की ध्वनियों को व्यक्त करने वाले वर्ण- ऐ जो औ म उ आ ऊ ए - ड अन्य रूप म लिसे जाने वाले कुछ स्वर अ आ ओ औ। यजनों की ध्वनियों को व्यक्त करने वाले वरण- कवग-1 ख ग घ च यग-4 छ ज (झ) झ ञ ट वग-ट ठ ड, र, ण (ण) त वग--त थ द घ न पवग-प य र ल व। T प म है। उपरोक्त वर्णों व अतिरिक्त हिदी वणमाा म प्रयुत्रत होत है निम्न वण भी-ड ढ न स ग ज फ। हिदाइतर भाषाआ से आई ध्वनिया को व्यक्त करन के लिए इन वर्गों का उपयोग किया जाता है। ये वण स्वतत्र नहीं होते है तथा हिंदी के गरकोना म इन वणा वाले दो का स्वतत्र म्प से उल्लेख नही क्यिा गया है अपितु गदको म वणनमानुसार ड ढ, के म ग, ज फ वर्णों वाले श ा क माय व दे दिय जाने हैं । जस-क्तग-तरा । कफ-वफ। क्ष-क्ष तथा न सयुक्त नभर कभी कभी पथक वण समये जात हैं, कितु वास्तव में वै पयर वण नहीं है । व वणमारा अमा + वग तथा ज ।
वग के अन्तगत ही है । टमीगिरा हिन्दी व कोया में क्ष=क्ष तथा न वाले शच्या को वणप्रमानुसार क नया 'ज वर्णो कारगना के साथ दिया जाता है। 'बम को छोड करने के म वन मयुक्नाभरा वारे गदा के बाद क्ष का नम आता है। 'ज म बने मयुक्ताक्षरा स पहा न' वाले गब्द गव्दवाना में न्यि जात हैं। जैम-क्विनाईन के बाद क्षनन्य जम गदजार 'ज्या म पूव नेय जैसे गन्द । हिदा वणमा ग म प तथा न ममेन कुल मिलाकर नौ जतिरिक्त वण या अभर है। गप मान अथर है-ड द व ग्ब, ग, ज फ। अतिरिक्त चिह्न हिटी रिपि म वर्णा माथ माय निम्नलिखित कुछ अतिरिक्त चिह्नो का प्रयाग दिया जाता है- (१) म्बर के चिह्न अथान् मानाएँ । नका प्रयोग उन स्वग का व्यक्त करन क लिए किया जाता है जो यजना म जुडकर ही प्रयुक्त हात हैं। स्वरो के अधिकारी चिह्न म्वर वर्णों के खण्डिन म्प चिह हात हैं । तम-- आ का खण्डित रूप चिह्न है ईश सण्डित रप चिह्न है इ का खण्डित रूप चिह्न है उका खण्डित स्प विह्न है ऊ का खण्डित रूप चिह्न है ऋका खण्डित रूप चिह्न है एका खण्डित रूप चिह्न है ऐ का खण्डित रूप चिह्न है मओ का खण्डिन रप चिह्न है मी का खण्डित स्प चिह्न है जस गा गि गो, गु गू ग, ग, ग गा गो। म्दर वण वेवर तव प्रयुक्त होत है जव उनम व्यक्त ध्वनिया गट आरम्भ म या म्बरा व पचात ही हाती है। जमे-आम मत, मुजावजा । (२) गिरारखा वे पर दिये जान दाग उघचद्र चिह्न । नरा उपयोग अग्रेजी स आय या ग्रेडाक गाव आ स्वर का व्यक्त करन हिए किया जाना है। नम-टाक्टर ऑपरा। ( ) अनुनामिक या पदविट चिह्न'। यह चिह्न यह मक्त करता है कि म्वर अनुनामिव है । जैम-यांना *धना । परन्तु वनमान हिदा म स्वर , I,I, २२ की अनुनामिक्ता को यक्त करने वाल चद्रविदु व स्थान पर केवल अनुम्वार बिदु भी लिखन की प्रथा है । जसे-पाच जाए । (४) हात चिह्न । सका प्रयोग किया जाता है यजन वर्णों में ह्रस्व के तोप का टियान लिए । जम- न प । (२) *अनुम्बार पिदु चिह्न । सका प्रयोग किया जाता है- (क) वर्गों के पचम वण के स्थान पर। नम-गगा चचर कठ सतप। (ख) म्वर की जनुनामिाता निखारिए। यह प्राय तब प्रयुक्त होता है जब म्वर एम चिह्न म यक्त किया जाना है जा गिराग्वा के ऊपर हाता है या म्पर वण म गिरखा के ऊपर काई चिह्न हाता है। जम-खीचना भम मर्ने नेतामा। () विमग चिह्न । इसका प्रयाग किया जाता है कतिपय सस्कृत पादाम तथा उपसगों म उच्छवास का यत्रत करने के लिए। विगग का उच्चारण प्राय : का भाति होना । जसलत नि गुल पुन म्यापिन । विमग का प्रयोग पतिपय हिलामा म भा ह के स्थान पर किया जाना है । जस छह के स्थान पर छ भा लिया जाता है। । सयुक्त प्रक्षर हिती वणमाग के प्रत्यक हन रहित यजन अक्षर एव वण म हम्ब अ मिला हुआ रहता है । जस ३ प त मानमगिा यजन जारा + जिन मयोजनों म हम्व ज नहीं है उनका लिपि द्वारा प्रकार बग्न के लिए सयुक्न जक्षर प्रयुक्त होत है। मव यजन अक्षरा म कुछ स्थायी सामा य ा होत है-अथात उनमें पडा रेवाए तथा बडी रेखाए हाती है जा माना जभर का मटण्ड हाना हैं । पडा रखा सण्डित ना मक्ती है जम य 4 म द ह ह । पर तु प्रयर न्यजन अक्षर का जपना दिगप चिह हाता है। यह विगप चिह्न व्यजन अभर का वह भाग है जो उसम नव भी बना रहता है जब न्यजन अथर म व पढी रमाएँ तथा बनी रखाए नहा है जा मार व्यजन नभग कगि सामा य है। जमे हिदो गरकोशों मे व शर, जिनम अनुनासिक या लनुस्वार चिह्न हैं, प्राय दूसरे से पहले रिय जाते हैं । जसे- झास पहल झासा गन्द दिया जाता है और गुट से पहले 'गुवः'। * 'ग' अक्षर वा विपचिह्न '' है और 'ज' का विरोप चिह्न है ' ! 'प्रासाद दिया जाना है और 'गुच्छ मे पहा 'गु वत' । हिंदी म तीन व्यजन जरा सयाजन से बने मयुक्ताभर प्रयोग म बहुत नदी आन है। अधिकतर सयुक्न अभर दो यजन जरा ६ सयोजन स बनत है। मयुक्त अक्षर रिपि का दष्टि म या नो वडा रवाआ बाल होन है या प्राय पड़ी रेपाना वा खनी रेवाभा वाली आरति १ सयुक्त र म प्रथम व्यजन पर अबडित रूपम लिय जाते है और अतिम व्यजन अभर या विशेष चिह्न उनके नीच जुडना है । जम-~-ट्ट । पड़ी रवाओ वार सयुक्त अक्षर मे अखण्डिन रूप में अतिम यजन अक्षर लिया जाता है। उसके पूर्व जुदना है प्रथम व्यजन जर का विसप चिह्न । जम----+नग्न ! प+यय । सुरमयुक्न जनर खड़ी रयाको वारे तया पडी गाला वाल दारा ही हो मवन' । जैस-- 'ल तथा का । व तथा इ । व तथा 'ध । ५ यद्यपि म+पये सयोजन म तथा न +14 सयोजन स वन सयुक्न अपर है। किंतु व प्राय स्वतन र मान जात हैं। मयुक्त अभरा म र अथर कापी परिवर्तित आपति माथ लिया जाता है। प्रथम यजन सर पे साय मयाजन म र माला रसा में “यजन र मिर' भामजाडार रिया जाना है। जमकर-7 ज+रम्बाद+7+र-प्रव+7-7। परवर्ती यजन अक्षर के साथ गयाजन म र रपय चिह्न ( ) कप मे अस्तिता है जो अमर के ऊपर गिया जाता है । जमर+व+ - परवर्ती व्यजा अशर के माथ काई दीघमात्रा चिह्न हाना है तो उस दीघमात्रा चिह्न क प वे तुमार रफ निह यजन अभर के उपर नहीं अपितु दाधमाना चिह्न ऊपर या पचात छिपा जाता है। जमे~-र-पा= पा। र+मा-माँ। तर ४ र ढगर माथ न सयुक्न भरा म र व्यजन अगर ' चिह्न प म सक्ति हाना है। यह 'चिह्न उसयजन अपरा के नीचे जाहार खिा जाता है । जम-~-ट+र+र। ",२, प, न म य पांच अनुनामिन यजन पर मयुगा अगर रूप में अपन वग व व्यजन अक्षरी माय ही मियर लिग जान है ॥
२४ र+इ । जन- जजण+8=ण्ठ न+द-द। म+वम्व । वनमान दिदी म उक्त पाँच जनुनामिक यजन अक्षरा के स्थान पर प्राय अनुम्वार रिवन का प्रदनि पा जाता है । जसे-अप' कुजा कठ हिंदी रचा। बहुधा प्रयुक्त होने वाले सयुक्त प्रक्षरो की सूची क+=कर व ख-यब क+त-वन त +म= कम क-य-क्य कर += +7=वर ++ववव ब+ प-क्ष ने व+-+म-क्ष्म व+म-म । ख+तपत ख+य-रय ख+रख ब+ग-रूप। ग+7=ग+धव ग+नग्न ग+म-ग्म ग+य= ग्य ग+र=ग ग+र -7 घ+न = न घ+य-घ्य घ+र-घर+4+ सर+ग-+घ । च+चच च च+छ-छ च+य-च्य। छर-21 ज+ज-ज्ज ज+झ---ज्झ ज+जन ज+मम ज+य- ज्य ज+रच ज+व-ज्व। द+7-ट्ट +=ट्ट ट+यटय ट+र-ट्र। 8+य=ठम ठ+र-छ। T+ गड+ड ड+4= डच ड+रड । द+य-य+र-7 । ण ट- ण+1= पठण+इ=ण्ड ण+ढ= णाण= पण ण+य=ण्य। न++त+त त त+त+व-त्व त+य-स्थ त+न स्न लन-प-प त+य त्य त+म (म त+रत्र ल त+स - त्स त+म- नत्स्न त+स+यस्य । थ+य-थ्य य+र- थ+व-ध्व । द- द+द द्दद+ध द्धन-द्र+म-द्र द-+-म-म दय= 1+र%द्र द+व-द। घ नन ध+म-म धन्य ध्य घ+र-ध्र ध+वम् न+तरून न यस्य न-द-दन+द+र-द्र, न+ - न+ध-जयध्य न+नन न न+मम नय- य, ज+र+व वन म- सन-१-ह! 4- नप्त प्त, प+न- प्न-~~-प्प, 9+ य-प्य प+ मम, --रन +7=प्र प्ल,प-मम । +--नरूपन, यरूपय पर। व+जज +-+ध व+नन +4= व बम भ +यय व+र। मन-भ्न भ+य-भ्य भ-भ्र। म+नम्न म्+पम्प, म+4 भ.74-म्ब, म+म सम्म म्- मम म-य- म्य म+Trl म+रल, म. य-य-य्य। +4= र+द-दर+य । 77% Tar+7द 7-4-प+ram व च+ययव-व व T-4,+चमत, नन , T+यय, परिस्थ, +र+वश्व, श्व । ५+12.क, प+2-2 पर 2-1-प्ट, +8ठ य--- प.प म:म पय-प्प, प+वव। म+-स्व म+म% सप, मन-2-स्ट स-+त-स्न स्+त+ रस, म्ब म+थम्य, स.r+यस्थ्य, म+नल, म+4- स्प ग-4-फ, स+घ म- मरम, म+यम्य, स-1-72, मर-7 मवम्व, म+मम्म! -न-ह, ह+म-ह्म है, यह, ह +रह है,-ल- हरवह।
२ शब्द-विचार तथा पद-रचना हिंदी भाषा भारोपीय परिवार के भारतीय भाषा ममूह की भाषा है। पिता भाषा पद रचना के अनुसार विपणात्मक प्रकार की भाषामा म गिनी जाता है क्यापि उगम अधिकतर क्रिया सम्म यो रूप मामा य वृता तथा विभिन महायर कियाआFFपा व मयाना म बनत - और वाक्य च जगा के मम्बध विभक्ति चिह्ना राग मचिन नान । य विभक्ति चिह नामिव पदा व माथ प्रयुक्त हान । मिली भाषा का गरन विशुद्ध विपणा मर गठन नहा है। अधिकतर विरपणात्मक पाक माय माय पिटाममारपण व अगभा विद्यमान ह 14 मत मापा क विकाम व विभिन वाव द्यान - | हिनी म पियाविपणा को छाकर मव प्रधान - भटा म सरपण पाया जाना है। जसलका डब रबा बा बडी वड पांवा पाचवी पाचर हम हम जाना जाऊ जाऊगा जाऊगा जायग। सरपण अगग्गि तथा वचन म का विभक्ति चिह्न तथा मा निपात के विकार म भा पाय जात ह । जग-पिता का घर पिता को पुस्तक पिता व पत्र बहुन मा कागज उन मी विनार पहुन स ममाचारपत्र । शब्द भेद अपन जावाग्भून था और यावरण मन्त्र पीपा के अनुमार हिला भाषा क मारे गट गटावा व याकरण सम्व या उणिया म विभाजित हो जान 7 जा T भट कन्यत-1 र ग भत जिसका गावला या व्यावरण सम्पधा निग्चिन जथ है उमम निग्नि पदरचना विपया स्वरूपा और द निमाण मम्बा Fपा विापता हाना है और वाक्य म वह अपनी भूमिका अदा करता है। हिदी म मार मन व जनुमार नीन प्रकार : भदह-~-प्रधान श. भेट महायक सभा और विस्मयारिवावर १0 भर।
२७ प्रधान श द भेद वाक्य के विभिन अग होत ह जा वस्तुआ का उनकी विपनाना, उनकी सस्या, उनके व्यापारा और जवस्थामा तया उन व्यापाग और अवस्थाका विपता कर वनात । अयात व गर भेद वस्तुस्थिति को उमदी वस्तुआ व्यापारा और विपनामा म प्रनिनिम्विन कर दत है। प्रधान र भेना म निम्न का ममावा होता है-- Tना विगषण मन्या प्रिया और रियाविशेषण । प्रधान र भेदा म मवनाम भी आर र यद्यपि व वस्तुमा और उनकी विनपता का ना बनाना व ना कर उन वस्तुमा का निर्देश करत। सहायर पद मेदो म विभक्ति चिता सयाजक गया और निपाना का समावा होता है। महायर गर भन वाक्य के म्वनत्र अग नहीं हाल है। व गन्दा भार वाक्या क वाच विभिन सम्बधा को व्यक्त करत ह जथवा रिहा गाना या पूरे वाया का भावाय मूचित करते है। विस्मयादिबोधन गद भेद प्रधान गदभर और महाया मज भेनम मिन श्रेणी का होता है। प्रधान T मा म विस्मयादिवोवर द भद को भिन्नता टयम है कि निम्मयादिवाधर बस्नुना आर उनकी विपनाना का ना बताल । महायर T” भनाम व दमगिा भिन हवि व गा के बाद सम्बधा कानी प्राट बरत औरन का भागाथ व्यस्त करत । विस्मयाग्विापर - देवर मानमिव भावा वोव्यक्त करत । विग्मयादिवाधर गदर प्रधान गर भर और माया गर भेद म मष्टिम भी भिन्न है कि वाक्य म विस्मयादिसावा यावरण पियर मम्मघ नहा गाना। गिरीभापा म प्रयाद मन की अपनी अपनी गावा पररचना व वापरचना-मम्बधा दिशपना हानी । सका कार मेद व्यापक प म वम्नुमा का निर्देश करता। हिला भापा ममता व वचन गिजार बारव नातह। वाक्य में मनाएं मामाय तथा अमामाम नाना कारया में प्रयुक्त होता है । मामा य कागद ववचन का रूप नाक व वारीपा का निमाण करन के लिए आधारभूत रुप है। असामाय वाग्य प्राय निभनि चिह्न वे माय प्रयुक्न गाता है । वाक्य में मनाएँ उद्देश्य गर म प म व्यवहन गती ह हायति व दूमर काय भी कर माता है अयान विधेयर का अग, विषण तथा प्रियाविशपण भी हा माना। विशेषण वम्नु + गुण ताप जाति विशपताजा का बताना नै । उमा दो वाग्य हान-मामाय वार और अमामाय वा । विवाग शिपा के वचन गिग तया तुग्नावम्या गतह । वाक्य में मप्रसार र गुणनिगर तथा विधेयक क जग व रूप म प्रयुक्त होत ह । वाक्य दूिमर जगा म उनका प्रयाग उद्देश्य मि आदि व रूप म कम होता है । सस्पा वस्तुआ परिणाम तथा उनव श्म का बताती है। माया के निम्नलिखित अनक भेद होन है-गणनावाचा मनाचा जावत्तिवाचक और समुदायवाद। गणनावाचा मग्या तथा समुदायवाचक मरया जविवारी हाती हैं। श्रमवाचक सरया व वचन, लिंग तथा कारक हान है। उनके रुप जाकागन्त विपणा का तरह बनत हैं। जावत्तिवाचक मग्या विकारा या विषारी दाना ही हा मक्ता है । वाक्य म कोई भी सय्या प्रधानत गुणनिर्देगर व प म यबहुत होती है यद्यपि उमका उपयोग विधयक व अग या उद्दे य कम्पम भी हा सकता है । मषनाम मनाआ के स्थान पर प्रयुक्त होने है। पिनी भाषा म मवनाम मुग्य प म तीन प्रकार क होन - सज्ञा सवनाम (मैं तू म नादि) विगषण सवनाम' (एमा जसा कमा जारिन) और 'सरया सवनाम' (इतना उतना कितना आदि)। वाक्य म य तीन प्रकार मवनाम वहा काय करत हैं जो सना विपण तथा सरया क्यिा करत है। कुछ मवनाम विकाग हात है और कुछ अविकारी होन है। मना भवनाम तीन कारक होत है --मामाय बारक' जमामाय पारक और कम कारक । उदाहरण के गिए- मैं मुझ मुये। कम कारक के माथ कार भी विभक्ति चिह्न प्रयुक्त नहीं हाता । विगपण मवनाम तथा सरया मवनाम विकारी विपण तथा मवाचक मण्या की तरह म्प बनला वरत है। क्रिया कागद भेट व्यापार या जवस्था को यक्त करता है । क्यिा 4 पुरुष वचन कार प्रकार और वाच्य होत है। वाक्य म प्रिया प्राय विधेय केम्प म प्रयुक्त हानी है। वाक्य म अय काय निया + मरम्प अर्थात सामाय म्प वृटत प पूवकाग्वि वृटत रूप जाति किया करते है। निया 4 व्यापार का पूर्णता जोर अपूणता भाव स्मिकना दोघगरिक्ता आनि यस्त करन वाल क्रिया के विभिन म्पारण भाषा म म्पप्ता जाती है। क्रियाविशेषण प्रिया की विगपता का या जय क्रियाविशेषण की विसपना को बनाता है। जम-खूब रिवना जनी चलना बहुत जाहिस्त, अनि गाघ्र त्यानि । हिनी म क्रियाविगपण अविकारी हान है। विभक्ति चिह्न हिला भाषा म वाक्य म तो मम्य ध प्रकट करत है और वस्तुआ म या वस्तु और पिया के यापार वा अवस्था म विस्तार कार २६ कारण आदि विषयक मम्वचा को दशात है। का विभक्ति चिह्न का छाड करके बाकी मब विभक्ति चिह्न अविकारी होते है। विभक्ति चिह्न का म्वत्र अग नही हा सकता है । वह वाक्य के स्वतन अगा म सम्बव का मावन हाता है और उनकी एक दूमरे की अधीनता का बनाता है। सयोजक सयाजक शब्दसमुदाया और वाक्या का जाडते है । विभक्ति- चिह्ना की तरह व वाक्य के स्वतंत्र ग नही होत है। य सयोजक पद अवि- कारी होन है। निपात निपात पूरे वाक्य को तथा वाक्यान्नगत गन्दा का विभिन भावाथ प्रदान करता है। सा का छोड़कर बाकी मब निपात अविकारी होत हैं । निपान वाक्य का स्वतन अग नहीं होता है। विस्मयादिबोधक शद जसा कि लेख के प्रारम्भ म प्रतिपादित किया गया है कि वन तो स्वतत्र गब्द भेद के अन्नगत आत जोर न महायक गद भेद के अन्तगत । व वाक्य से पृथक् होत है । हिन्दा भापा म विभिनगद भेद एक दूसरे मे पृथक नहीं हान है प्रत्युन वे एक-दमर स सम्बयिन होत है । शब्द भेद अथात् श द वर्गीकरण की मीमाएँ बहुत अस्थायी होती है। अक्सर एमा हाता है कि एक प्रकार के शद भेद का समावश गर म हा जाता है या एक शत भद के शब्द टूमरे श द भेद का काय कर रह हान है । उगहरणाथ बहुत मी सनाएँ और शटर-समुदाय क्रियाविशेषण हो जात है और अविकारी बन जात हैं माना उहाने एक म्प धारण कर रिया है । जैम कि, सुबह' गज 'दव पाव "दिन चढे 'इस प्रकार' किमी-न- विसी तरह इत्यादि। हिटी में विभिन्न शद भेदा का मनीकरण बहुत व्यापक रूप में हाता है । हिदी म विगेपणा, कृदन्ता और त्रिया के मामाय रूपा का मनोकरण प्रमुख रूप में होता है । जैम धनी, हा मान मे , जान के लिए , इत्यादि । आम तौर पर हिनी म समाआ और विपणा के बीच अतर वडा मूम सा है। वाक्य म पृया इस प्रकार के गन्दा बार म यह बताना आमान नहीं होता है दि व मनाम्चा न है या विशेषणसूचक गल जसे माम्राज्यवाटी, बद्ध जवान आदि। इस प्रकार का का अथ क्वल किसी वाक्य से ही स्पष्ट होता है। वृन्ता में विपण बनने के उदाहरण प्राय दृष्टि म आन है। इम प्रक्रिया म विशेषणा द प म वृदन्ता का उपयोग महायर हाता है। विशेषणा में कृन्ना की पूण परिणति नब होती है जब विभीकृ दन्त का अर्थ उम त्रिया ३. अथ म भिन मा हो जाता है, जिस क्रिया में वह बना है। जैसे "लिखना- पढना लिखा पा' टत्यादि। विपणा और गुणवाचक क्रियाविगपणा म भा अतर पदा सूक्ष्म-सा है । प्राय स विपण जो गुण या विगपता सूचक हान है, क्रियाविशपण के रूप में प्रयुक्त हात है। जस कि खूब अच्छा बुरा, माधा, इत्यादि । किमी भी शर का वर्गीकरण अथात भद विमी निश्चित शब्द भेद द्वारा बताना क्वल वाक्य पर निभर करता है। टमम शद की पदरचना व वाक्य रचना सम्बन्धी विशपताएँ म्पष्ट हो जाती है और उम एक शब्द वा जय प्रकट हो जाना । जम वह जच्छा आदमी है, वह अच्छा पत्ता है।
३
प्रधान शब्द-भेद
सज्ञा
हिदी मे मना के ग भेद मम्ब धी जपने वाक्य रचना व पदरचना
विषयक कई स्वम्प चिह्न है। वाक्य रचना विषयक स्वरूप सूचक चिह्ना मे
मुख्यत वाक्य म निम्नलिखित रूपो में प्रयुक्त हान का मनाओ का सामथ्य है .
१ उद्देश्य के रूप म जसे, उमका लडका स्कूल में पढता है ।
२ विधेयक के नामिक जग के रूप म जसे, वह अध्यापक है।
३ गुण निर्देशक के रूप में जम बाप का घर ।
। ममानाधिकरण के रूप म जमे हि दुस्तान समाचार पत्र ।
५ प्रधान कम के रुप म जैसे, यह पुस्तक उसने मेरे लिए खरीदी है ।
६ अप्रधान कम के रुप म जैसे मन जपने मित्र को चिटठी लिखी थी।
७ विशेषता बोधका रूपम
(क) ममय विशेषताबोधक के रूप मे । जस दिन म, साझ का गमियो
म। कभी कभी समय विशेषतावाधक के रूप में सनाएँ विभक्ति
चिह्ना के विना भी प्रयुक्त हाता है । जस मुबह सायम, रान ।
(ब) स्थान विशेषतावायक के रूप म । जैस, घर के ऊपर नगर में,,
मेज़नीच ।
गतिबाधक क्रियाओ माथ प्रयुक्त होत समय मनाएँ त्रिया की निगा
निर्दिष्ट कर देती हैं । जैम, वह बम्बई जाता है ।
(ग) प्रकार विपनावावक क प म जम जोर मे, अच्छी तरह
उमवी मानिद।
८ परिमाण व भार निर्देशक के रूप म जसे, चार टन लोहा । आठ माटर
कपडा । पाच क्लिामाटर दूर ।
इम प्रकार दिनाम क्वल मनाएँ ही काय कर सकती है।
अयर भेदा वा विप परके विषण तथा निया के साथ मना का
प्रयाग भा मजा का वाक्य रचनाविषयक स्वाप मूचक चिह्न होता है ।
विकारी विगषण ने लिंग, वचन, और कारव रूप मना के लिंग, वचन
1 और कारक के अनुसार होते है और रियामा क प वर लिग और वचन में सज्ञा २ जनुमार होल है। उदाहरणाप छोटा एका छोटा रडका छात्र रड छाटी लड़कियां छोटे ल्डने वा छोग का सेकना है छोटी लडकी मलती है छोटी रडविया खल्तीने कई जवसरा पर मनाया याद्य म्प नहीं बदलता है रितु विशेषण या त्रिया के रूप मना क वचन निनिष्ट कर देत है। जम अच्चजानमा । यह आदमी कम काम करता है 1 व आदमी गोल्त हैं। सना का एक और स्वम्प चिह्न यह होता है कि वह क्रिया दिएपण के साथ प्रयुक्त नहीं होता है। मना - मवनामा क्रिया के मामा यम्पा तथा कृदन्ना की भांति विभक्तिया के साथ प्रयुक्त हान है जा विभिन्न प्रकार के कम विस्तार कारण जाति सम्बधोका अभिव्यक्त करते है। ऊपर दिये गये मता के वाक्य रचना विषयक स्वरुप चिह्ना म मबस प्रमुख स्थान उद्देश्य और वम व प म उसके प्रयोग का है क्यापि इन वाक्य- रचना विषयक स्थिनिया में मना | प्राय मृत पार्थों तथा उनमे निहित मब लक्षणो को सूचित करते है। हिदी म क्योकि जयद भेट पदाथ का भाव यक्त करा के मामध्य वा नहीं होने अत व इस प्रकार के वाक्य रचना विपया काय नहीं करते है। हिन्दी में भावाथ और इसस सम्बधित यावरण विषयक विपताना वो दष्टि स मनाएँ जातिवाचा तथा यक्तिवाचक होती है । जातिवाचक संज्ञाएँ एक ही प्रकार के व्यक्तियो वस्तुआ नादि का बोध कगती है तथा हिन्दी में प्रमुख होती हैं । जातिवाचक सनाआ म गिन जात हैं-~- (क) सम्बघिया व्यवमायो पटा कार्यों आदि के नाम ! गम भाई बढई मत्री अध्यापन । (ख) पशुओ पपिया मत्म्या कोट पनगा के नाम । जम घाडा कौआ ग्राह मक्वी तितली। (ग) वस्तुआ ये नाम । जम घही पुस्तक मज । (घ) पौधा घातुआ सनिगा के नाम । जम नीम चादी वायला । (क) प्राकृतिक नत्वा नाम । जम वपा जाधा, विजली जाडा । (च) मामाजिव घनाआ क नाम । जम राज्य प्राति युद्ध निवाचन । (छ) मामाजिक व राजनीतिक सिद्धाना नाम । जय माक्सवात समाजवादद्वतवाद भौतिक्वान (ज) गुणो क नाम । जैसे वीरता, ईमानदारी, लम्बाई । (थ) व्यापारा तथा अवस्थाआ के नाम : जमे बुनाई, पढाई, बीमारी नीद। (ज) भावावेगा के नाम । जसे हप शोर स्नेह, घणा, रोप। जातिवाचक सज्ञाओ में समूहवाचक मज्ञाएँ भी परिगणित होती है । ममूहवाचक मनाएँ वस्तुआ के समूह को समग्रता के रूप म एकवचन या बहुवचन में व्यक्त करनी है । जैसे परिवार, भीड युण्ड । बहुवचन मे वस्तुआ का समूह व्यक्त करने वाले समूहवाचक संज्ञा शब्द प्राय रो।' 'जन' 'गण' 'मण्डल' आवली, 'द आदि जैसे जातिवाचक शदा के साथ व्यवहृत होते हैं। ये शब्द जातिवाचक मज्ञाओ नथा सनाआ क अथ में प्रयुक्त होने वाले विशेषणो के साथ जुड़कर इस्तमाल किये जाते है। सनाआ तथा विशेषणा के साथ जुडकर उक्त सनाएँ अपना अथ खो दती हैं तथा बहुवचन म वस्तुओ के समूह का हो बोध कराती है । बहुधा ये शब्द अपने पूर्व वर्ती दाल के साथ मिलकर समन शब्द का नया अथ ध्वनित किया करते हैं। जसे मज़दर लाग गरीष लोग, भक्त जन, विद्यार्थीगण, मत्रीमण्डल अधावली, व्यक्तिवाचक समारों रिसी एक ही वस्तु या व्यक्ति का बोध कराती हैं। व जातिवाचव मनाओ की तुलना में कम हैं। इन सज्ञाआ मे परिगणित हाते हैं- (क) व्यक्तिया के निज नाम ! जसे राम, गोपाल धमचद्र। (ख) निशाआ के नाम । जैम उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम । (ग) दशा के नाम । जैस भारत, स्म काम । (घ) जातियो के नाम । जैसे भारतीय, सी, अग्रेछ । (ड) समुद्रात नाम । जसे काला सागर, प्रगात महासागर । (च) नलिया व नाम | जसे गगा, सिधु, बोलगा। (छ) पवता के नाम । जस हिमालय विध्याचल । (ज) नगरा, चोका तथा सहरा के नाम । जेभ दिल्ली, चांदनी चौर जनपथ । (5) पुस्तकों तथा समाचारपत्रा के नाम । जसे गान', 'ऋग्वद', माप्ताहिक धममुग । (स) एनिहामिर परनामा नाम । जैस अक्तूबर शान्ति, मई दिवस स्वतमना दिवस । ५ ३४ (ट) दिनो तथा मासा के नाम । जस सामवार चैत्र जनवरी। (ठ) उत्मवा के नाम । जस दीपावरी रक्षावधन । जातिवाचक तथा व्यक्तिवाचक दोनो ही सनाओ म प्राणावाचक और अनाणीवाचक वस्तुया का समावा हाना है। प्राणावाचक तथा अप्राणीवाचन सज्ञा शब्ता की व्याकरण विषयक भिनता प्रधान कम क काय म सामा य काम के रूप में प्रयुक्त हात समय प्रकट हाती है। प्राणावाचक सना शद विशेषण के साथ प्रयुक्त हात हुए भी प्रधान कम के काय म सामाय कारक के रूप म प्रयुक्त हो सकते हैं । जस मैं यह किताब पढता हूँ। जबकि प्राणीवाचक सना शद विपण के बिना प्रयुक्त होते हुए भी प्रधान कम के काय म सामाय कारव के रूप में प्राय प्रयुक्त नहा हात । जसे मै लडका को देखता हूँ। हिदा म सज्ञा शद इस बात के अनुसार नि ध एसी वस्तुआ को निर्दिष्ट करते हैं जो गिनी जा सकती हैं या नहीं गिनी जा सकती हैं गणनीय तथा मगणनीय सज्ञा श दो मे विभाजित होते है। गणनीय सज्ञा शब्दो म मूत सनाएँ आ जाती है। व गिनी जाती हैं और गणनावाचक संख्याआ के साथ प्रयुक्त होती हैं । उनका व्याकरण विषयक विशेषता यह है कि उनके बचन बदलत है। जसे मेज-मेजें । लडका-लडके । पांच लडकिया । अगणनीय सनामा मे पदाथवाचक तथा भाववाचक सज्ञा शद गिने जान हैं। पदाथवाचक सना श द प्रकट करते हैं पदार्थों को। जैसे हा पसर, एकदा चना । भाववाचक सना गट यस्त करत है- (क) भावना । जैस प्रम मित्रता पत्रुता । (ख) गुण । जैसे दढता दुवस्ता। (ग) व्यापार । जस दढीकरण पढाई। (घ) अवस्था । जम एडक्पन जवानी बुढापा । (घ) अय अमून भावना । जम मिठास बड़वापन रोप क्षाभ, व्यग्य। व्याकरण की दष्टि से पर थवाचर तथा भाववाचन सना शब्दा की विगपना यह है कि उनका एक्वचन होता है और व गणनावाचव सस्याआ के साय प्रयुक्न नहीं होन हैं। बहुवचन म कुछ पायवाचर तथा भाववाचक सज्ञा शाला का प्रयोग उन स्पष्टीकरण पर निभर करता है। पदाथवाचक संज्ञा टार ववचन म प्रयुक्त होत है जब व उम पठाय विभिन्न प्रकार का अभि व्यक्त करते हैं । जसे तज शराबें मीठी शरावें। भाववाचक सज्ञा शब्द भी तव बहुवचन में प्रयुक्त होते हैं जब उनकी अमूतता के सूचक अय क्म हो जाने हैं। जैसे म्वतत्रता-जनवादी स्वतत्रताए शक्ति-गाति की शक्तियाँ, जननत्र जनता के जनतत्र गहराई--समुद्र की गहराइया । लिंग आधुनिक हिदी म लिंग सनाआ के वस्तु-सम्बधी अथ की अभिव्यक्ति का आधारभूत मावन होता है और मना की खास विशेषता है। यदि विकारी विशेषण क्रमवाचक संख्या कृदन्त और कार के रूप म अवय के अनुसार लिंग ग्रहण कर लेते है तो सना का लिंग सज्ञा मे निहित लाक्षणिक गुण होता है। हिन्दी भाषा की सजाआ के दो लिग होते है, एक पुल्लिंग और दूसरा स्त्रीलिंग। जैसे (१) पुल्लिंग–वाप भाई बेटा घर पेड । (२) स्त्रीलिंग-माता, बहन बेटी, पुस्तक, छत । हिदी भाषा म लिंगो की अभिव्यक्ति प्रधानतया वाक्या में होती है- (क) उन विकारी विशेषणो और स्वामित्ववाचक सवनामो के स्पो से जो मना से अवय करते हैं । जसे (१) यह बडा बाग है । (२) वह मेरा घर है। उक्त दो वाक्यो में वडा' विशेषण और मेरा सम्बधवाचक सवनाम के रूप निर्देग करत हैं कि सज्ञाएँ 'वाग और 'घर' पुल्लिंगवाची हैं। (१) यहा एक बडी नदी है। (२) यह मेरी विताव है। इन दा वाक्या म 'बडा' विशेषण और मरा' स्वामित्ववाचक मवनाम के रूप में ही पता चलता है जिमनाएँ 'नदी और किताब' स्त्रीलिंगवाची हैं। (ख) निया के रूप में। जैम (१) पक्षी उदना है। (२) नदी बनती है। इन दा वाक्या म पक्षी' मना गदर पुल्लिंग है और नदा सना शब्द स्नालिंग है । यह उटना और वना' क्रियाआ वाले विधेया म ममाविष्ट मामाय वनमानवाग्वि वृदन्ता से मूचित होता है। (ग) सनाआ के बहुवचन स्पा से। जम (१) इम कमर म दो वाज हैं। (२) उस कमरे म दो खिडरियाँ हैं । इन दो वाक्या म 'दग्दाजा' सना गद पुल्लिग है और खिडका' मना शब्द त्रालिंग है क्यापि ए असामा य कारक वारे प्रत्यय बहुवचन म मिफ पुलिंगवाची मनाआ अन्न म गा करते हैं। इसी । तरह 'इया असामा य कारक वारे प्रत्यय बहुवचन मे केवल इकारात स्त्रीलिंग सनाओ व अत म लगा करत है। इसके अलावा हिंदी भाषा म सना शटना वा लिंग उनके अपन अथ से या पुरिलग और स्त्रीलिंगवाचो सनाआ के प्रत्यया से निर्धारित किया जा सकता है। अथ के अनुसार सना दा के लिंग का भेद क्व पुल्लिगवाची और स्त्रीलिंगवाचा मनुष्य प्राणिया और मनुष्यतर प्राणिया म होता है। जग (पुल्लिंग) राजेद्र गोपाल पुरुप वर आदि । (स्त्रीलिंग) गगा गाय जादि । इस प्रकार हिंदी म मनुष्य प्राणीवाची और मनुष्येतर प्राणीवाची सनाआ म लिंगभेट मनुष्य या पगु के लिंग के अनुमार हाता है यदि इन सनानो का लिंग उनके अपन अथ विपयव भाव से साधत होता है। जप्राणीवाचा सना शदा म ऐमा अथ विपयक विशेषताएँ बिलकुर नहीं हैं जिनमे लिंग निर्दिष्ट हो सके । जयात इम किस्म क सज्ञा गब्दो के लिंग शद के अथ पर निभर नहीं हात हैं। जमे मज सना शब्द स्नोलिंग है 'एतराज' सना पर पुलिंग है। कुर्मी मना शट स्त्रीलिंग है और 'मोती' सना शद पुल्लिग है। सज्ञा शब्दों के लिंगों का वर्गीकरण (क) सना गन्दा के अपन अर्थों क अनुसार गि निर्धारण म निम्न नियमितताएँ हाती है- याब पुल्लिंगवाची होन है-- (१) पुरुषवाची नाम । जसे पति पुरुष आदमी चाचा बेटा नादि । (२) कई नर जानवरो के नाम। जय भटा, माड, घोडा, वारा आदि। (३) धातुआ सनिजों और मणि प्रस्तरा नाम । जस साना, लोहा ताम्बा कोयला हारा हाल जादि । इसम अपवाद है--चादी । (४) अनेक द्रव या तरर पदार्था के नाम । जैस तर दूध पाना, गर्वत मद्य आदि। (५) अनक वक्षा के नाम । जम सागवान दवदार चीड, पीपल आम जाहिं । इमम अपवाद है-इमली। (६) जना फ्मग नाम । जम गहूँ धान मटर मक्का, जो, वाजग चावर आदि । दसम अपवार है-ज्वार और जनक दावें।
(७) आकाश क ज्याति पिण्डो के नाम | जसे सूप चाद, भगल बुध, गनि, सोम आदि। (८) पवना और देगा के नाम। जैसे झिाल्य विध्य, भारत, पाकिस्तान, चीन आदि। (६) महीना और दिनो के भारतीय नाम ! जैसे चन बैसाख, ज्यष्ठ, रविवार सोमवार आदि। (१०) शरीर में अनेक अगा व नाम । जमे सिर, गार वान, हाट मुह हाथ पैर आदि। (११) पहनने की अनेन वस्तुओं के नाम । जसे जूता कुरता, घाघरा जांघिया पाजामा, कोट आदि । (१२) भाववाचक सजाओ वाले शमन । जसे प्रेम प्रोष आनद- दुव आदि। इस प्रकार के गब्द स्त्रीलिंगवाची हान है~~ (१) नारीवाची नाम । जम स्त्री महिला, बहन भाभी वटी इत्यादि। (२) अनेक मादा जानवरो नाम । जसे गाम, भेड, भैस, बकरी, बिरी आदि। (३) नदिया के नाम । जसे गगा, यमुना कावेरी, कृष्णा इरावती इसम अपवाद है एस जिनो साथ नर' शद का प्रयाग होता है । ज से मिधु ब्रह्मपुत्र गोण आदि। (४) अनेक मसाला और भाज्य पदार्थों के नाम । जो लोग स्त्री, मिच, राई, खिचडी, कटी सीर इत्यादि । (५) गरीर के जनक अगा के नाम । जम आंख नाव जवान, टांग- ठाडी, गदन छाती अँगुला, पिंडला नाडी इयादि । (६) पहनन का अनव वस्तुआ नाम । जैम टागा, मोज धोती चार, पगडी, माडी, मेमला पतलून, बनियान, जुराव इत्यादि। (७) अनक रोगा के नाम । जैसे साज दाल, चचा, खामी, गुहौर मादित (6) भाषाआ के नाम | जसे हिंदी, मी, मराठी अप्रैशा, फारसी अग्बी इमादि। (स) व्याकरणामर गटन के अनुसार सज्ञा गन्दा का लिंगभेद निम्न लिखित प्रकार का होता है- ३९ पन य पुल्लिगवाची होने है- (१) सर मना ग जो पुरुषवाचक प्रत्यया द्वारा नै हात हैं। जम कमाऊ क्ता करापार गवैया, तराक दूरानवाग लडाकू, लुटेग, लोहार सहायक इत्यादि। (२) जो विभक्ति चिह्न रहित मना श द अथवा आवागत (मस्कृत, पारसा और अरबी भापाओ के तत्सम शो को छोडकर) सना शब्द हो । जसे घर पड़ घडा पडा घाघरा आदि । (३) जिन सना गटोक त म जा आता हा 1 जम कुओं धुआ इत्यादि। (४) भाववाचक सना गद जिनके जन्त म आन आव प्रत्यय रगत हा । जस रम्बान चढाव बटाव महब बचपन आदि । (५) अना सना शट जिन त म उ ऊ और 'व' जात हैं। जसे मधु आलू कचाल भाव आदि । (६) गेम भाववाची सज्ञा गद जिन अत म ना प्रत्यय आना है और जा क्रिया के मामाय रूप हाते हुए मज्ञा गन्दो + अथ में प्रयुक्न हान हैं ! जसे करना गाना लिपना पढना बोलना हमना दत्यादि । (७) म सना गद जिनक बत में प्रत्यय आन है। जस गमन स्त्र वस्त्र अस्त राज्य नत्य भत्य सत्य न्यादि। (८) सामाजिक और राजनीतिक प्रकार के एसे सना श द जिन अन्त में वाद गद गा हाता है । जस-समाजवाद साम्यवाद पूजीवार साम्राज्य वाद इत्यादि। (६) पारमा भाषा से लिय गए ऐस श- जिन अत में हिंदी में 'या पाता है । जस-पदा गुस्मा विस्मा रास्ता चश्मा आदि । निम्न प्रकार के गट स्वालिंगवाची होत है-- (१) जनक मना गद जिनवे अत म ह्रस्व इ' होता है (और जो पुरुष व अथमूचक नही होते हैं)। जैस रात्रि हानि वृद्धि मति गति प्रति (बहुवचन म प्रनियाँ) इत्यादि । (२) भाववाचक मना जो ई या आई प्रत्यया द्वारा वन हैं। जैसे बुराई भगई चाई रम्बार्ट पार्ट रिवाई टत्यादि । (३) अधिकतर ईकारान्त मज्ञा गर। जम कुर्सी घडी स्याही, मिट्टी केटी चिट्ठी रोटी टोपी टत्यादि । इसम अपवाद हैं-पानी दही, मोती, घो। न न य (४) आकारात सस्कृत तत्सम शद (पुरुष अथमूचक संज्ञा शदो को छोडकर)। जसे कृपा, भापा, इच्छा, सभा, आज्ञा, सेना, निदा, चिकित्सा आदि। (५) भाववाचक संज्ञा शब्द जिनके अत म ता आता है। जैसे मित्रता, सुदरता, स्वतन्त्रता, दासता इत्यादि । (६) भाववाचा सज्ञा शब्द जिनक अत मे ट वट और हट आता है । जैसे आह्ह स्कावट, सजावट लिखावट, वुलाहट घबराहट इत्यादि। (७) हिंदी के अनेक सना शब्द जिनके अन्त म त' आता है। जैस रात लात, बात, जात, छत, भीत, रीत पत, स्त इत्यादि । (८) अरबी से लिये गए अनक ऐसे सना शद जिनक जल में त आता है । जैसे दावत, गल्त, तबियत, इज्जत हुकूमत इत्यादि । (६) अनेक सज्ञा शब्द जिनके अन्न म 'स' आता है । जसे मिठास प्याम, साम, वास इत्यादि। (१०) क्रियाओ से बने सज्ञा शब्द जिनके अन्त मे 'न' जाता है । जमे रहन, जलन सूजन उल्झन "त्यादि । (११) कुछ सना शद जिन अन्त मे दोघ 'ऊ' आता है। जैसे दारू, लू इत्यादि। (१२) इसा' प्रपयान शब्द । जैस खटिया, डिपिया, इत्यादि । (१३) क्रिया को धातुएँ जो सना श द की तरह प्रयुक्त होती है। जैसे मार, जीत हार, पहचान, समझ आदि । (१४) अनेक सना शब्द जिनके मन म 'ख' आता है । जसे • ईस, भूख, राख काख, कोख, साव इत्यादि । (१५) फारमी म रिये गए सना गद जिनके अत म 'इश' आता है। जसे बारिश, साजिश, परवरिश इत्यादि। (१६) अरवी से रिये गए आकारान्न शब्द । जस बा, दवा, सजा, दुआ इत्यादि। (१७) अरवा और फारसी से आये हुए गाद जिनके अत 'ह' आता है । जैसे सुबह, तरह, राह आह सराह आदि । प्रारणीवाचक संज्ञा शब्दो मे लिा भेद (क) मनुष्पदाचा पुल्लिंग और स्त्रीलिंग का भेद अभिव्यक्त होता है (१) भिन्न अथ एव तात्पय के अला अलग रादा द्वारा। जैसे मां पाप, माता पिता, बह्न भाई, स्त्री पुरुष, औरत मद वधू वर इत्यादि। (२) एक गब्द की रचना के विभिन्न रूपा से । जमे वृद्ध वृक्षा मुत-सुता महाशय महागया, पुत्र-पुत्री लडका-लडकी, चाचा चाची मामा मामी बालक बारिया, पाठन-पाठिका इत्यादि। (ख) जिन सज्ञा-शब्दा म लगा के पेशा, धधा, जाति सामाजिक और सावजनिक प्रतिष्ठा के पद या स्थिति का पता चलता है, उनम लिंग भेद की निम्न से अभिव्यक्ति होती है (१) पुल्लिग वाले समागता के माथ स्नीवाची गा के सयोजन से। जैसे कवि-स्त्री कवि या महिला कवि । डाकार-स्त्री डाक्टर, महिला डाक्टर । मजदूर-औरत मजदूर, महिला मजदूर । (२) गडद रचना के विभिन रूपा से । जसे जुलाहा (पु.) जुहिल (स्त्री०) घोबी धोधिन, छात्र छात्रा विद्यार्थी विद्यार्थिनी अभिनेता-अभिनेत्री कवि क्वयित्री स्वर- रसिका अध्यापक अध्यापिका पण्डा पण्डाइन, नौकर नौकराना, अध्यभ-अध्यना, सदस्य मदस्या इत्यादि । गर रचना के उक्त रूप अनेक मना गदा के न कवल एक ही पेगे या जानि के अन्तगत लिंगभेद को प्रकट करते है बलि उनके पारिवारिक सम्बन्ध को भी बात हैं । जैम तेला-नलिन (तली की पत्ला), माली मालिन (माली की पनी), नाई नाइन (नाई की पत्नी), आकुर ठकुरानी (कुर की पत्नी) सेठ-सेठाना (सठ की पत्नी), जैठ जैठानी (जैठ की पत्नी)। पशुप्रो और पक्षियों मे लिंगभेद यह लिंगभेद गदा अथवा गद रचना से इस प्रकार अभिन्यक्त होता है। (4) अग अलग गदा से । जसे गायत्रीलिंग और साड---- पुल्लिग। (स) रचना के विभिन्न रूपा स । जस वदर (पु.)-बदरी (स्त्री०), घोग (पु.)-घोडी (स्त्री०), बकरा (पु०)-चक्री (स्त्री०), भेड (स्त्रा०)--भेडा (पु०) भम (स्त्री०)-भमा (पु०) बाघ (पु.) वापिन (स्त्रा०), अट (पु०)-ऊटनी (स्त्री०), रीछ (पु०)~ रीछनी (स्त्री०), मुर्गा (पु०)-मुर्गी (स्त्री०), मोर (पु०)-मोरनी (स्त्री०) । पशुओ, पलिया और कृमि पनिगा के अधिकतर सना शब्दा मे पुल्लिग और स्त्रीरिंग के लिए जुडवा नाम नहीं हैं। उनमे से कोई वेवर पुल्लिगवाची होते हैं और दूसरे केवल स्त्रीलिंगवाची हात है। जैसे पुल्लिगवाची निम्न ये ब्द हैं भेडिया, चीता, भार पक्षी, उल्लू कौवा, खटमल आदि । स्त्रीलिंग- वाची निम्न शब्द है लोमडी, चिडिया, चील, कोयल, मक्खी, तितली आदि । उक्त सना शदो का लिगभेद प्राय सम्बवत मनाशदा के साथ नर और मादा जैसे श दा के सयोजन से सहज ही अभिव्यक्त होता है । जस भेडिया-मादा भेडिया। नर सज्ञा शब्दो के लिंग में अनियमितता हिंदी भाषा मे कई कारणों से मना गदा के लिंग म अनियमितता दष्टिगोचर होती है । कुछ सना सदा के लिंग प्राय अथ पर निभर नही करते और जनक मना श द उभर्याग्गी होने हैं । यथा वसर, वायु जादि । कि हो सना शब्दो के लिंग म अनियमितताएँ पयायवाची सना गन्दा के प्रभाव के परिणाम हैं। जैसे स्त्रीलिंगवाची 'वनी' शब्द के प्रभाव से उमका पर्यायवाची शब्द 'करम का स्त्रीलिंग म भी प्रयोग होता है। स्त्रीलिंगवाची 'भांति' श” और पुल्लिगवाची 'प्रकार पर के प्रभाव से 'तज' शब्द कभी म्त्रीलिंग म और कभी पुल्लिंग में व्यवहृत होना है। स्त्रीलिंगवाचा 'सडक' शद और पुल्लिंगवाचा 'माग शब्द के प्रभाव स ही दोना लिंगा म 'वाट गट का प्रयोग होता है। पुल्लिगवाची 'प्रकार द के उमर स स्लोगि वाची विस्म गद कभी कभी पुल्लिग में भी वोरा जाता है। कभी रिंग में अनियमितताएँ कि हो मना शटा के भिन भिन अर्थों में प्रयोग के कारण होती है। जसे चन्द्रमा के अथ मे 'चादाद पुल्लिग है, पर सिर के कपर के भाग के अथ म प्रयुक्त यही 'चाद गर स्त्रीलिंग में आता है। 'तारा T स्त्रा नाम के अय म नीलिंग है पर नशन के मय म पुल्लिग है । लिग म अनियमितताएँ इस कारण भी होती हैं कि कुछ पुरुष वाचर सना गदा म लिंगभेद नहीं होता है । यसमा शब्द प्राय पुल्लिगवाची होत हैं, पर जब वे स्त्री का अघ देन हैं तब वे स्त्रीनिंग में प्रयुक्न होत हैं । जसे पुल्लिगवाची 'यतीम , 'गागिद', "पिथक आदि गब्द स्त्री के प्रसग में बोले जात हैं।
४२ प्रय भाषामो से गहीत शब्दो का लिगभेद हिदी भाषा में अय भाषामा स अनगिनन शद आए हैं। विशेषकर वहुत शब्द सस्कृत से तत्सम या तदभव रुप में आए है। इसी तरह फारसी तथा अग्रेज़ी से भी पर्याप्त संख्या में शब्द लिय गए हैं। फारमी के जरिय हिदी म अरवी शद भी आए। पुल्लिगवाची और स्त्रीलिंगवाची सस्कृत गदा का लिंग प्राय सस्कृत के लिंग के अनुमार ही बना रहा । नीचे हम इम स्पप्ट करने के लिए तालिका देत हैं संस्कृत मे लिग हिदी मे लिग नियम पुल्लिग पुल्लिग खण्ड पुल्लिग पुल्लिग माया स्त्रीलिंग स्त्रीलिंग इच्छा स्त्रीलिंग स्त्रीलिंग रोति स्त्रीलिंग स्त्रीलिंग सस्कृत के नपुमक लिंगवाचा गढ हिटी म प्राय पुल्लिंगवाचा हो गए हैं । जसे सस्कत मे लिंग हिदी मे लिंग दासत्व पुल्लिग रत्न साहित्य नत्य कितु मस्कृत के कुछ सना शद विभिन्न कारणो स हिदी म अपना सस्कृत भाषानुसारी लिंग नही रख मरे । जस सस्कृत में लिंग हिदी मे लिंग अग्नि पुल्लिग स्त्रीलिंग आत्मा पुल्लिग स्त्रीलिग आयु स्त्रीलिंग स्त्रीलिंग देवता स्त्रोलिग पुल्लिग पुस्लिग और नपुसक लिंग स्त्रीलिंग पुस्तक स्त्रीलिंग नपुसक लिंग . " " " नपुसकलिंग नपुसकलिंग नरसकलिंग ४३ नपुसक लिंग नपुसकलिंग वस्तु स्त्रीलिग ग्यक्ति स्त्रीलिंग पुल्लिा शपथ स्त्रीलिंग क्योंकि फारसी म लिंगभेद नही होता है अत पारसी गब्द हिदी के गेगा म से कोई एक लिंग ग्रहण कर लेन है । प्राय हिंदी भाषा म व अपने पयायवाची शब्द के सदश रिंग ग्रहण कर लेते है। जैम 'शव' गन्द रात दाब्द के अनुकरण म स्त्रीलिंग में प्रयुक्त होने लगा। इसो नरह निम्न शब्द हिंदी में अपने हिदी पर्यायवानियो के अनुसार लिंग में प्रयुक्त होने लग । जैसे 'याद'-'धारणा' के कारण शम --'लज्जा के कारण जमीन'- भूमि' के कारण, और 'जबान -जिह्वा के कारण स्त्रीलिग म बोले जान लगे । इमी तरह 'वच शब्द-- व्यय के कारण पुल्लिग मे हो गया है। जरवी शन प्राय हिन्दी में अपना लिंग नही बदलत है। जैसे हिदायत हिफाजन हालत, हुकूमत जादि स्त्रीलिंगवाची है । शा पक नादि पुलिगवाची हैं। हिदी मे पयायवाची सज्ञा गदा के प्रभाव के कारण जरबी शदा मे भी लिंग सम्बयो अनियमिाताएँ कभी कभी होती हैं । जस 'क्रम' श द जरनी म पुलिंगवाची होता है, लेकिन हिना में उसके पयायवाची 'लेखनी शब्द के प्रभाव से स्त्रीलिंग में भी प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार स्त्रीलिंगवाची 'किस्म' शब्द हिंदी में पुल्लिगवाची प्रकार शब्द से प्रभावित होकर पुल्लिग म भी व्यवहृत होता है। अग्रेजी भाषा मे भीगा के रूप म गिभेत प्रगट नहीं होता है । इमलिए अग्रेजा गद हिदी म या तो सम्बधित हिदी पर्यायवाची शद का लिंग ग्रहण कर लेने हैं या फिर अपने रूप के अनुमार लिंग स्वीकार कर लेते हैं। जस निम्न अग्रेजी सना गला ने हिदी म पयायवाची शदा क लिंग ग्रहण कर लिए हैं। हिदी गद जूता-पुल्लिगवायी बूट-पुल्लिगवाची दीया- जग्रेजी शब्द 7 अ- दक्षिणा-स्त्रीलिंगवाची फीस-स्त्रीलिंगवाची मीटिंग- सभा- " " ४४ जाकारात अग्रेजी द हिदी में पुल्लिगवाची हा गए है । जस सोडा, डेल्टा क्मरा आदि । अग्रेजी मना शत जो हिदी म ईकारान्त हो गए हैं वे स्वालिग म प्रयुक्त होते है । जसे पम्पनी कमटा चिमनी म्युनिसिपल्टिी आदि। अनेक अंग्रेजी सना शब्द हिदी में या तो पुल्लिंगवाची हा गए हैं (जस दिक्ट, नोट जानि) या स्त्रीलिंगवाची हो गए हैं (जम काग्नेस बौसिल, रिपाट, अपील आदि)। कइ अग्रेजी सना श द हिदी म दोना लिंगा म प्रयुक्त होते है । जम फिल्म क्लाम टूनामट आदि । वचन तथा कारक हिदी म रूप परिवतन को दष्टि से सना की विशेषता वचन और कारक में होती है । वचन और कारक के अनुमार सज्ञाआ का रूप परिवतन उनमा प्रमुख पदरचना विषयक स्वरूप चिह्न होता है। नीचे हम यह देखगे नि सनाओ का रूप परिवतन वचन के अनुसार किम तरह होता है । सनाओ के बहुवचन का निर्माण अमुक सना के एक वचन वाले लिंग और सत्य प्रत्यया के अनुसार होता है कि तु हिला म सभी सज्ञाआ का वचन परिवतन नहीं होता है। कुछ ऐमी समाएँ है जो केवल एकवचन मही प्रयुक्त होती हैं । इनमें निम्नलिखित हैं १ अधिकार पदाथवाचक संज्ञा शब्द । जसे चादी मोना चाय दूध आटा आदि। २ भाववाचक सना गर जो गुण विशषता अवस्था व्यापार आदि धर्मों का निर्देश करते है। जसे लम्बाइ चौडाइ मिठास दढ़ता जवानी, पटाई आदि । हिंदी में एसी समाएँ भी है जो भाववाचक जथ मे केवल एकवचन म प्रयुक्त होती है परतु मूत रूपसूचक अथ म या गुण की अभिव्यक्ति मे उनका बहुवचन भी प्रयुक्त होता है । जम कविता कविताए बीमारी (सत की) बीमारिया ३ अधिकारी व्यक्निवाचक सनाए । जस दिल्ली ताजमहल कृष्ण आदि। ४ कुछ सनाएँ जब समूहवाचक अथ म प्रयुक्त होती हैं (रुपया माल, ४५ मामान, ताश आदि)। जैसे (१) कई राख स्पया इस निमाण काय मे खच हो चुका है। (२) भारत में सोवियत संघ से कई तरह का माल आता है। दूसरी ओर कुछ सनाओ का केवल एक्वचन होता है। उनम निम्न लिखित का समावेश होता है १ समूह विपयर वे सज्ञाएँ जो लोग गण, जन, वद जादि शब्दो के साथ सयोजन से बनती है। जैसे किसान लोग, छात्रगण, स्त्रीजन, बालक्व द २ प्राण, दशन, होश तथा इस प्रकार की अय सज्ञाएँ (यद्यपि अथ के अनुसार उनका एकवचन में प्रयोग होना चाहिए)। जैसे उसने मेरे प्राण बचाए । (२) बहुत दिनो से जापके दशन नहीं हुए। (३) उसके होश उड़ गए। ३ कुछ युग्म शब्द समुदाय, जब वे एक सी वस्तुओं के समूह का सक्त करते हैं । इस किस्म के शब्द समुदायो का प्रथम भाग एक्वचन मे तथा द्वितीय भाग बहुवचन मे प्रयुक्त होता है। जैसे गाय भस, भेड बकरिया। ४ एसे मना गन्द जो समय की अवधिया तथा ऋतुओ का निर्देश करते है। जमे छुट्टिया, गर्मिया, गर्मियो मे जाडा मे। उपयुक्त प्रकार के सज्ञा श द एकवचन में भी प्रयुक्त हो सकते है । जमे छुट्टी, गर्मी, जाडा। हिदी म सनामा का बहुवचन निम्नलिखित नियमो के अनुसार बनता । (क) आकारात और आवारात को छोटकर सब प्रकार का पुल्लिंग यजनान्त व स्वरान्त सनाभा का बहुवचन में रप अपरिवर्तित रहता है । जस एकवचन ववचन बाप बार घर घर भाई पति पति प्रहपाव प्रस्ताव (ख) आकारात पुल्लिंग सज्ञाला म बहुवचन म आ के स्थान पर ऐ हो जाता है। जस एक्धन बहुवचन कारखाना कारखाने गतका गतके मेला सस्कृत फारसी और जरवी भाषाओ से हिंदी में लाए पुल्लिग आकारान्त शब्द तथा सम्बधमूचक आवारात शर उक्त नियक + अपवाद हैं। जस एक्यचन बहुवचन आका आका खुदा खुदा दरिया दरिया नेता नेता राजा राजा पिता पिता चाचा चाचा मामा मामा दादा दादा पूर्वोक्न प्रकार की सनाआ का वचन प्रसग म ही पता चलता है । (ग) आकागत पुल्लिग वारे सना शदा म ला के स्थान पर एँ हो जाता है । जस एकवचन बहुवचन कुआ धुओं धुए रोआ रोए (घ) इवागत स्त्रोग्गि वार मना र म इक साथ या जुट जाता है। जसे एकवचन रीति वहुवचन रीतियां बुढ़ियों तिथि तिथिया पक्ति पक्तियाँ (ड) ईकारान्त स्त्रीलिंग वारे सना गम ई' के माथ 'या जुड़ जाना है। या' जुडत वक्त दीघ ई रघु हो जाता है । जैस एक्वचन बहुवचन बेटी बेटिया लडकी लडकिया नदी नदिया खिडकी खिडक्यिा (च) 'इया' जिन स्त्रीलिंग वाले सना-गब्दा के अन्त म हाता है उनका अन्तिम आ' बहुवचन म अनुनामिक हो जाता है । जमे एकवचन बहुवचन चिडिया चिडियों बुडिया पुडिया पुडियां दिविया डिवियाँ (8) 'इ, ई और 'इया जिन स्त्रीलिंग गन्दा के अन्त म आता है उन्ह छोडकर भय मब व्यजनान्त व स्वरान सना गदा में 'एं या 'ये रुग जाता है। नागत स्त्रीटिंग सना शदा के बहुवचन में दोष 'ऊ रघु उ हो जाता है । जैसे एकवचन बहुवचन माता माताएँ यात्रा यात्राएं सेना सेनाएं वस्तु वस्तुएं वहन बहनें पुस्तक पुस्तकें बहुएं लुएं जोर जोरएं हिंदी भाषा म मनाएं अपने रिंग और प्रत्ययाना के अनुमार कारका म अपने एप बदरती हैं।
४० कारव नामिक शब्दा वा वह रुप होता है जा दार समुदाय में तथा वाक्य में अय गदा प्रति नामिव गला के सम्बध यक्त करता है। वाक्य के क्सिी अग के काय म नामिरश का प्रयोग मदा किसी न किसी कारव रूप में होता है। मारे मतानुमार हिंदी के सज्ञा शता के तीन कारक होत है--सामा य कारक (डायरेक्ट वेस) अमामा य कारक (इ डायरक्ट केस) तथा मम्बाधन पारक। सामा य कारक के विशेष प्रत्ययात नहीं होते हैं जो वाक्य मे दूसरे शब्दा के साथ सज्ञा गब्द का सम्य व "यक्त करत है। ये सम्बध वारय मे केवर सना शब्द के स्थान से पता चरते है। हिदी म सामा य कारक असामाप कारक , विपरीत हाता है। असामा य कारक कम विपनाबोधक तथा गुणनिर्देशक विषयक सम्बन्धो को व्यक्त करता होता है। हिदी म जमामा य वारक प्राय स्वत त्र रूप में प्रयुक्त नही होता है । वह रगभग सदा किमी न पिसा विभक्ति चिह्न के साथ व्यवहृत होता है जो असामा य कारक वे “यापक अथ को सीमित तथा मत बना देता है। जम लहर का लडके का लडके पर आदि । परतु किसी न किसी विभविन चिह्न के साथ सना का प्रयोग कारक रूप नहीं है क्यादि विभक्ति चिह्न कारण प्रत्यय नहीं हैं व स्वतन रूप से वाक्य में अयपदा के साथ मना के सम्बयो का निर्दिष्ट नहीं करते हैं । य सम्बध असामाय कारक के विभक्ति चिह्न के मयो जन से ही निर्दिष्ट होत हैं। हिदी म एसे भी उदाहरण मिरत है जिनम अमामाय कारक विभक्ति चिह्न के बिना प्रयुक्त होते हैं । ऐसा होता है कि कुछ विशेषताबोधव र समुदाया मे क्रियानामिक समुदाया म गतिवाधक नियाआ के माथ प्रयुक्त होते समय और असामाय कारक म सज्ञाआ का दुमरे । भेदा में (त्रियाविशेषणा और विभक्ति चिह्ना म) सश्मण होते ममय । जस इस समय पिछले माल भूखा मरना अपनी आखो देखना नारा चने चबवाना अपने घरा जाना भवरे दिना दिन खुर हाया के सामन । सम्बोधन कारक सना का एसा स्प है जिम द्वाग किमी का पुनारना या चाना सूचित होता है।
कारको का निर्माण सामान्य कारक सामाय कारक एक्वचन का प मनाम प स मिलता है जो सवाम दिया गया हाना है। सामाय कारक बहुवचन के स्पसना क वहीं बहुवचन प हैं जिनका म्प विर"पण किया जा चुरा है। प्रसामायकारक सना का असामा य काल एक्वचन निम्नलिमित नियमा क अनुनार {4) पुल्लिग मागन और आकारात सनाआ में असामा य कारक २ एक्वचन म आ तथा या के स्थान पर ए' और ऐ' हा बात हैं । अर्थात एकवचन म इस पकार की सनासा के सामान्य कारक रप बहुवचन म सना के मामाय कारक रूप से मिग्न जुरत है । जैस एकवचन सामामकारक असामायकारक सडक कमरा कमरे कुर्मा (म) एक्वचा वार असामा य कारक काम्प एक्वचन वा सामाय वारस म्प स निम्न प्रकार व सना गाम मिरता-जुगता होता है (१) मारे स्त्रीलिंग मना गदातमा पुलिग मना-शब्दा म (आगारात सया आकारात पुलिग सादा का धारकर) जम सानायकारक असामायकारक वहन बहन सडको भाषा दुनिया दुनिया घर (२) आधारान्त पुलिग सा गन्दा म जा हिन्दी म सहत, पारसी, अरबी तथा अमेजा म ॥ है। न ।
असामायकारक सामायकारक राजा राजा खुदा तुम सोडा (३) पुरिल्ग मना ।दा म जा पारिवारिक सम्बध का सकेत करते सोडा 1जस सामायकारक असामायकारक दादा दादा नाना मामा मामा टोना लिंगा वाल सना-सदा का बहुवचन असामाग्य कारक रूप आ प्रत्यय द्वारा बनता है । यह प्रत्यय या ता सना व मूल रूप के साथ जुड़ जाता है या सना के बहुवचन मामान्य कारक रूप के प्रत्यय व स्थान पर आ जाता है । ईकारान्त पुल्लिग मना गन्दा म बटुवचन मामा य कारण म प्रयुक्त होते ममय आ प्रयय से पहले य वण का आगम हा जाता है तथा अतिम दीप ई रघु ट म बद’ जाता है। ओ' प्रत्यय म पूर्व पुल्लिग सना गटा का ऊ भा "धु उ म बदल जाता है । जस एकवचन सामा य कारक बहुवचन सानायकारक बहुवचन असामाय कारक अध्यापक अध्यापक मध्यापकों भाई भाई भाइयों विद्यार्थी विद्यार्थी विद्यापियो पिता पिता पिताओं बेटा बेटा बेटों कुआँ यहन बहनें वह्नो बेटियां बेटियो चिडिया विडिया चिडियो बहुए बहुओं डाक डाक डाकुओं कुणों . सम्बोधन कारक आवागत पुलिंग गमा वा छोडकर मारे मनाना का एक ५१ वचन सम्वोधन वारव रूप एकवचन सामाय कारव प स मिलता जुलता है । जस एकवचन सामायकारक सम्बोधन कारक भाई भाई। बेग बहन दादा राजा जावारात पुल्लिग सना शटर (उन मना गया वो छोटवर जो पारि- वारिक सम्बध व्यक्त करते है या दूसरी भाषाआ से आए है) एक्वचन सम्बाधन कारक म या ता अपरिवर्तित रहत है या जा के स्थान पर ए हो जाता है । जम दादा। एकवचन सामय कारक सम्बोधनकारक लडका लडका! लडके। बेटा बेटा। बेटे बच्चा रस्चाबच्चे। दाना लिंगा के सना गदा वा बहुवचन मम्बाधन कारख 'ओ प्रत्यय द्वारा बनता है। ओ प्रत्यय या नो मीधे सना व मूर प म जुह जाता है या वहुवचन सामाय बारव अत्यप्रत्यय व स्थान पर आ जाता है । बहुवचन सम्बध पारव बनत ममय इकारात सना गदा म आ प्रत्यय स पहर 'य वण आ जाता है और दीघ इ हम्व इ' बन जाती है। ओ प्रत्यय से पहले पुल्गिावाचा सना-गदा वा अन्तिम छ' भी हस्व हो जाता है । जैसे सामायकारक सामायकारक सम्बोधन कारक (एक्वचन) (बहुववन) (बहुवचन) अध्यापक अध्यापन अध्यापको। विद्यार्थी विद्यार्थी विद्यापियो। पिता पिताओ। बटा पिना वटे बटो।
५२ बहनो। बेटी डाकू डाकुओ! बहन बहनें बेटियो बेटियो! डाक सम्बोधन कारक म मज्ञा शदो स पढे प्राय य विस्मयादिबोधक शद प्रयुक्त हान हैं हैं जो ए अजी, र (पु०) अरे (पु.) री (स्त्री०), अरी (स्त्री०) । जसे जो रडक । तू कहा जाता है ? व्यक्तिवाचक सना शद प्राय अपने मूल सना रूप म ही प्रयुक्त होत है अथात उनक कोई कारक मम्बधी प्रयय नहीं होते है । । सामाय तथा असामान्य कारक मे सज्ञा शब्दो का प्रयोग सामान्य कारक म मना गदा का प्रयोग होता है- (क) उद्दश्य के रूप म । जसे बहन पुस्तक पढती है । (ख) विभिन्न विषया नामिक जगा क प म । जैस (१) मरा मित्र अध्यापर बन गया है। (२) भगत लोग उमे पोर मानने थे । (३) जिन लोगा ने इसे राजनीतिक पतरेबाजी कहा था जब यह सहायता हि दुस्तान की सरकार को वाँटने लिए दे दी गई तो उनके मुह से बाल भी न फूटा । (ग) प्रधान कम के रूप म । जसे वह उठी और दरवाजा अदर स बाद दिया। (घ) परिमाण व भार निर्देशक के रुप म । जसे स्टेशन पर तीन टन गेहूँ पना है। (2) समानाधिकरण ( रूप मे । जस डाक्टर साब भी नही आय । असामा य कारव म मना गदा का प्रयाग निश्चिन विभविन चिह्न पर निभर करता है। असामा य कारक का विभक्ति चिह्न सलि मना गद प्राय गुण निर्देशक का काय करता है तथा सम्मा का अय दता है । जस-उसन मुझे मित्र का घर दिसाया । अमामा य कारक म को विरित चिह्र सहित सना गद प्रधान कम या अप्रधान कम का काय करता है तथा कम या सम्प्रदान का अथ सूचित करता है। जैस (प्रधान कम) उसने मोहिनी को बुलाकर पूछा क्या री जितेन के बारे म तुझे कुछ मालूम है अप्राणीवाचक मना शर प्राय प्रधान कम + रूप म सामाय कारक में प्रयुक्त होते हैं। जसे देर तर अखबार वह नप्टि के मामन रिये रहा । अपाणीवाचद मना शट 'या' सन्ति जसामा य कारक म प्रधान कम देहप म तब प्रयुक्त होते है जब प्रधान कम पर जोर दिया जाता है या दुविधा को दूर करना होता है। जस (१) उसने अपने मुह को छिपाया और धीमे धीमे सिमर उठो । (२) नदी के उस पार में घरों को देखता । जार इस अतिम वाक्य में 'को न हाता तो प्रधान कम का रूप घर होता औ उससे यह मदह हो मक्ता था कि गाय एक ही घर देखा जा रहा है क्यानि एक्वचन और बहुवचन दाना मे ही घर यह रूप होता है। प्राणीवाचक मना गब्द प्रधान क्म के प म प्राय 'को महित असामा य कारक म प्रयुक्त होत है। जैसे रिही जपन पुराने महपाठी सहाय को वह ध्यान में नहीं ला पाती थी (जप्रवान क्म) । दनिक व्यायाम मनुष्य के शरीर को बर देता है। जप्रधान कम के प म मम्प्रदान का जय के लिए, के बास्न हेतु , के निमित्त', पाम' यहा तक मि का विभक्ति चिह्ना सहित भी अमामा य कारण ममता शदा द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। जैसे-वैद्र न अकाल्पीडिता के लिए सहायता भजा है। (२) करीम न राम के हेतु अपना हिम्सा छाड दिया। (३) मात्र भूमि को सेवा के निमित्त वह अपना मवस्व दे रहा है। (४) मैं भाइ के पाम चिट्टी भन रहा हूँ। (५) नगर सहा यता समिति का केद्र आजमगढ शहर और जामपास क्षत्रामबाढ-पीडिता की मदद करता है। अमामायकारक म म, का, 'द्वारा, व द्वारा', अरिय', 'की और म' तथा 'की तरफ से विभक्ति चिह्ना सहित मना गद करण का वाघ रगल है तथा वाक्य म अप्रधान कम का काय करत है। करण के अधम उपराक्न विभरित चिहा महिन असामान्य कारक सना गाटा का निम्नलिखित प्रयोग होता है-- (१) 'म विभक्नि चिह्न माय अवालिखित प्रयाग ! (4) प्रेरणायक नियाजा व्यापार में बना को न्यात करने के लिए। जम आपन या काट किन्त दर्जी से मिलवाया है? (ग) कमवाच्य वाक्या म प्रिया के व्यापार क्ता को व्यक्त करने के गिए। जम राम से यह घर रचा गया है। (1) उन क्तृ वाच्य वाक्या म त्रिया व्यापार के क्ता को व्यक्त करन के लिए जिनम विषय अक्मक क्रिया वाले होते हैं। मे ओला बहनो। बेटियो। भकुओ! बहन बहनें बेटी बेटिया डाक डाक सम्बोधन कारक म सना शनी से पहले प्राय ये विस्मयादिबोधव शद प्रयुक्त होत है-है आ ए जी र (पु०) अरे (पु०) री (स्त्री०), जरी (स्त्री०) । जैसे जो लडके | तू कहा जाता है यक्तिवाचक मना शब्द प्राय जपन मूल सना रूप म ही प्रयुक्त होत है अथात उनके कोई कारक सम्म यी प्रयय नहीं होते है । 7 सामा य तथा असामा य कारक मे सज्ञा शब्द का प्रयोग सामा य कारक म सना गदा का प्रयोग होता है- (क) उद्देश्य के रूप म । जमे बहन पुस्तक पढती है । (ख) विभिन विवेया क नामिक अगा के रूप म । जैस (१) मेरा मित्र अध्यापक बन गया है। (२) भगन गेग उसे पोर मानते थे । (३) जिन लागा न इसे राजनातिक पतरेबाजी कहा था, जब यह सहायता निन्दुस्तान की सरकार को वाटने व लिए दे दी गई तो से चाल भी न फूटा। (ग) प्रधान कम के रूप म ! जसे वह उठी और दरवाजा दर से बद उनके मुह दिया। (घ) परिमाण व भार निर्देशक कम्प म 1 जम स्टेशन पर तीन टन गेहूँ पड़ा है। (ड) ममानाधिकरण के प म । जस डाक्टर साह अभी नही आय । असामाय कारव म मना गदा का प्रयाग निश्चित विभवित चिह्न पर निभर घरता है। असामाय कारक का विभक्ति चिह्न सहित सना शद प्राय गुण निर्देशन का काय करता है नया सम्बन का जय देता है । जसे-उसने मुझे मित्र का घर दिपाया। असामा य कारण म का' विभक्ति चिह्न सहित सना गद प्रधान कम या अप्रधान कम का काय करता है तथा कम या सम्प्रदान का जथ सूचित करता है । जस (प्रधान कम) उमन मोहिनी को बुरावर पूछा क्या रो, जितेन के पार म तुये कुछ मालूम है अप्राणीवाचक मना र प्राय प्रधान कम न प म मामा य कारक ?"
५ में प्रयुक्त होने है । जैसे दर ता अखबार वह दष्टि के सामन रिये रहा अप्राणीवाचक सना गट 'का' सहित असामा य वारक म प्रधान क्म के रूप म तव प्रयुक्त होत है जब प्रधान कम पर जोर दिया जाता है या दुविधा को दूर करना होता है। जैस (१) उसन अपने मुह को छिपाया और धीमे धीमे मिसक उठा । (२) नदी के उस पार मैं घरो को रखता ह । जगर इस अतिम वाक्य मे को न होता तो प्रधान कम का स्प घर' हाता और उससे यह मदेह हो मक्ता था कि गायद एक ही घर दया जा रहा है क्याकि एकवचन और बहुवचन दोना म ही घर' यह म्प होता है। प्राणीवाचक मना गव्द प्रधान कम के रुप म प्राय 'को' सहित जसामा य कारक में प्रयुक्त होत है। जैसे कि ही जपन पुगने महपाठी सहाय को वह ध्यान में नहीं रा पानी थी (अप्रधान क्म) । दैनिक व्यायाम मनुष्य के शरीर को वर दता है। जप्रधान कम क प म सम्प्रदान का अप के लिए के वास्त' के हेतु निमित्त कपास यहा तक कि का विभक्ति चिह्ना सहिल भी असामा य कारक ममता श दो द्वारा यक्त किया जा मकता है । जसे-केद्र न जकारपीडितो के लिए महायता भेजी है। (२) क्रीम न राम के हेतु अपना हिस्सा छाड दिया । (३) मातृ भूमि की मवा के निमित्त वह अपना सवस्व दे रहा है। (८) म भाई के पाम चिट्टी भेज रहा हूँ। (५) नगर सहा यता समिति का केद्र आजमगढ़ गहा और जामपाम के क्षत्रा म वाढ-पीडिता की मदद करता है। अमामायकारक म स' का' द्वारा कद्वारा 'का आर स' तथा 'का तरफ मे विभक्ति चिह्ना महित मना-द करण का बोध कंगन है तया वाक्य म प्रधान कम का काय करत हैं। करण क अथ म उपराक्न विभक्ति चिह्ना मह्नि अमामान्य वारस है सना-गदा का निम्नरिवित प्रयाग होता है- (१) 'म विभविन चिह्न के साथ अधानिखित प्रयाग । (क) प्ररणायक रियाजा व्यापार व कता का व्यवन कग्न के लिए जैम जापन यर काट किस दर्जी से मिलवाया है ? (स) क्मवाच्य वाक्या म पिया के व्यापार क कता का व्यान न रिए। जम राम से यद् घर पना गया है। (ग) उन वतृ वाच्य वाक्या म त्रिया व व्यापार कता को दम करन के रिए जिनम विधेय अनमक श्यिा वार हान । ने + ग्यि, - की पडा मार से झामामूमी गाँव मुखरित हो उठा । (५) कतृ वाच्य वाया म साधन का व्यक्त करने के लिए । जस विद्यार्थी सम्त पर खडिया से लिखता है। (2.) कमवाच्य वाक्या म माधन को व्यक्त करने के लिए। जम तर मा कुआँ खुद जाने पर तल पम्प से निकाला जाता है । १२) 'का विभक्ति चिह्न के माथ प्रयाग । सक्मक भूनकारिक कृदन्ना के कर्ता का व्यक्त करने के लिए। जमे हमार शिक्षक की लिखी हुई पुस्तक है। (३) द्वाग द्वारा तथा के जरिय विभक्ति चिह्ना के माय प्रयोग। (क) प्ररणायर क्रियाआ के व्यापार के कना वा व्यक्त करन के लिए। जमे यह पत्र बहन द्वारा (के द्वारा) (क जरिय) लिखाओ। (स) कमवाच्य वाक्या में क्रिया के यापार के कर्ता को व्यक्त करन के शि। जस दक्षिण हिवी प्रचार सभा द्वारा दक्षिण भारत म हिटी वा अधिक प्रचार करन का निश्चय किया गया है। (ग) उन कतृ वाच्य वाक्यो म व्यापार के कर्ता को व्यक्त करन क लिए जिनम विधेय अकमक प्रिया पार हान है। जस मविषयों के उरिये (द्वाग) हैजा दम्त नादि वीमारियां पैरती है । {घ) क्तृ वाच्य वाक्या में साधन का व्यक्त करन के रिए। जम व हवाई जराज द्वारा (के जरिय) मास्को गय । (5) क्मवाच्य वाक्या म साधन को व्यक्त करन के रिए । जस (१) संबडो हजारा एण्ड सर जमीन को जहां पानी वा नापानिगान ना नया ममुचिन सिंचाई द्वारा हरा भरा बना दिया गया है । (१) मिट्टी का तन मशीनों के जरिये माफ रिया जाना है। (6) का और म तया की तरफ से विभक्ति चिह्ना के माय प्रयोग- (क) कमवाच्य वाश्या म त्रिया यापार + क्ता को व्यक्त करन के लिए। जैम (१) इस नगर की स्थानीय गावा की ओर से परह अगग्न की स्वन त्रता दिवस मनाया गया । (२) गुलाम बनाया गई पूरोपीय कौमों की तरफ से हिटलर के विरुद्ध भारी मघष छडा गया था। (स) वतृ वाच्य वाश्या म क्रिया के व्यापार व पना को यात करने के लिए। जैस (१) सहायता समिति की ओर से जिले म तीन केद्र बनापर काय हो रहे हैं। (२) फिरोजागर में मजदूरो की तरफ से सात नवम्बर को एक आम सभा हुई। असामान्य कारक में पर, का', 'म, 'की बनिस्बत' विभक्ति चिहो तमा 'के बारे म', 'क विषय म , 'के सम्बध मे' विभक्तिचिह्नवाचक गन्द- समुदाया सहित मशा शब्द अधिकरण का वाध व्यक्त करते है। वाक्य म ये सजा-शब्द अप्रधान क्म का काम किया करत हैं। अधिकरण के अथ म उपरोक्त विभक्ति चिह्नो तया विभक्ति चिह्न चाचर दाब्द समुदाया महित असामा य कारक के सज्ञा शब्दा का निम्नलिखित प्रयोग होता है (१) पर विभक्ति चिह्न कमाथ प्रयाग~~ (क) जिसके विषय म बात है उम व्यक्त करने के लिए । जसे किसानो के सघष पर शानदार फिल्म 'जमाना बदल गया है। (स) त्रिया में व्यापार या अवस्था का स्थान व्यक्त करन के लिए। जैसे (व्यापार) सिपाही तट पर उतरने लग। (अवस्था) किताब इस मेज पर रखी है। (ग) जिमने ऊपर किसी का काई व्यापार होता है उस व्यक्ति या वस्तु का व्यक्त करने के लिए। जम बहुत अरसे से सामाग्यवादी एशिया में अपने लिए नइ तिजारती मण्डियां बढ रह थे और एशिया के देशों पर अपरालची निगाह जमाम बैठे थे। (२) का विभक्ति चिह्न के साथ प्रयोग-- (क) जिसके विषय में वान है उस व्यक्त इग्न के लिए । जसे (१) व दाना चुप हो गए और बढ़ भविष्य के सुनहर सपन देखने लग। (२) हर महीने उसे मखनी के बाप क एक-दो पर आ जात थे जिनम उमकी आने वाली शादी की चर्चा होती थी। (३) 'म विभक्ति चिह्न व साय प्रयाग (क) किया के व्यापार का स्थान या ममय व्यक्त करने के लिए ! जस (स्थान) उस समय रफी घर में नही था, वह वाटिका म फर तोड रहा था। (समय) मात्र के अत मे का का सम्मलन होन वाला है। (म) परिधान को निसान के लिए। जम अव ता गरमी लगती है। पिताजी भी आज देवर मोड और धोती में वाम पर गय हैं।
सुदरता (४) जिम व्यक्ति या वस्तु पर बात हो रही है उसे यक्त करन करिए कबारेम + विषय म, के ममव में विभक्तिवाचक गद समुदाया तथा की निस्वत आदि विभक्ति चिह्न के माथ प्रयोग । जस (१) जितेन के बारे मे तुझे कुछ मालूम है । (२) ताजमहल की के विषय मे बहुत कुछ लिखा गया है । (३) इस आदमी की निस्बत में कुछ नहीं जानता । सज्ञा शब्दो की पुनरक्तिया हिदी माता पर बल देने का सबसे प्रचलित साधन है शब्दो की पुनरक्ति अथात उन्हें दोराना। यह हिदी भाषा की उत्खनीय विपता है । गदा की पुनरक्तिया साहित्य तथा बोल चार दोना म हो यवहृत होती है । श दा की पुनरुक्ति वाले शब्दो का भाव अधिक स्पष्ट एव जोरदार हो जाता है । प्रमग के अनुसार उनसे पूणता अखण्डता, बहुवचन तथा विभाजन का निर्देश होता है। हिदी म योजक अव्यया तथा निपात अव्यया को छोडकर वाकी सब श द भेदा म पुनरुक्तियाँ यवहृत होती है। हिटी म मनाआ की तान प्रकार की पुनरुक्तियाँ हातो हैं- (१) पूण पुनरक्ति (२) अपूण पुनरुक्ति और (२) समानायक पुनरुक्ति। पूण पुनरुक्ति कहते है एसी आवृत्ति को जिसम विसी एक सना गद की आवृत्ति होता है । जसे अबा, लगा। मुझे भी अपने माय लो। हिदी म उक्त प्रकार की पुनरविनया निम्न अर्थों म व्यवहृत हाती है- (क) सम्वोधन को अधिक सशक्त बनाने के लिए । जस रमा रमा । इधर आओ। (ख) बहुवचन पूणता तथा विभाजन को यक्त करन के लिए । जग दादा बार बार स्थान-स्थान समय समय । ऊपर वणित पुनरक्निया साथ साथ हिदी म सनाआ की एमी पूण पुनरुक्तिया का प्रयोग बटुन व्यापक रूप से होता जिनम सनाआ के म य म फारसी में आया ब उपमग हा और सा निपात तथा 'का और पर विभक्ति चिह्ना का जागम होता है । पर विभक्ति चिह्न मनाआ के मध्य मे या मनामा की पुनरक्ति के प'चात प्रयुक्त होता है। व उपमग तथा पर विभक्ति चिह्न वाली मनाआ की पूण पुनरुक्तिया . सामा यता तथा आवृत्ति का प्रक्ट करती है। वै प्राय विभाजन अथ वाली होती है । जम रोजमरोज सारवमाल दिन पर दिन कदम पर कदम, पदम-कदम पर, समय समय पर । ही निपात वाली मनाना की पूण पुनरुक्तिया प्रसगानुसार या तो विभाजनसूचक होती हैं या पुनरविन म प्रयुक्त मना पर वर द रही होती है । जमे गात ही बात पानी ही पानी, रत ही रन विजय ही विजय। 'सा निपात वाली मनाना को पूण पुारक्तिपरक जात्तिया सामान्यता और समानता का भाव प्रकट करती हैं। जैस घर सा घर मिन सा मिन, गली सी गरी। 'का ( की) विभक्तिचिह्न वाली मनाआ की पूण पुनर क्लिया निम्न भाव प्रकट करती है (क) पूणता और सनाओ को अधिक सशक्त बनाना यदि पुनरविन म 'का (को, के) विभक्तिचिह्न के पश्चात प्रयुक्त मना मामा य कारक म है । जस मार का साल घर का घर, पानी का पानी पटन की पल्टन युग के धुण्ड । इन मबम का, 'का , 'क' विभक्ति चिह्ना का प्रयोग पूणता के लिए व्यवहृत हुआ है। (ख) विभाजन या मनाजा को अधिक सान बनाना यदि पुनरविन म 'का' (की के) विभक्तिचिह्न के पश्चात प्रयुक्न सना असामा य कारक म विभक्तिचिह्न के साथ या उमरे विना यवहत है । जैम मार व माल महीने के महीन, वात की बात म दम दम म। अपूण पुनरुक्ति करत हैं ऐसो यावृत्ति को जिसम आत्ति का पूर्व या उत्तर भाग स्वय प्रयुक्त नही होता है, किन्तु उत्तर भाग म जुडकर इस प्रकार म आवता होता है जो जानि के पूर्व या उत्तर भाग को सशक्त बना देता है। जम अदला बदला बनोम पडोम । उक्त प्रकार की पुननिया म पहा भाग म्बय प्रयुक्त नही हाता है वह केवल आवनि में उत्तर भाग को अधिक माक्त बनाता है यद्यपि उसका भी गगन जथ वही होता है। निम्नलिखित जपूण पुनाक्तिया म उत्तर भाग स्वतत्र एव पृथक प्रयुक्त नहीं होना - जम छूनछान, पूछनाछ धूमधाम । अपूर्ण पुनक्तिपरक मनाआ की आनिया एसी भी ममयी जाती हैं जिनम पूर्व भाग में प्रथम व्यजना के स्थान पर 'म 'व तथा 'म व्यजन प्रयुक्त होते हैं। इस प्रकार की पुनरनिया मना का अधिक सगन बनान के अलावा उनका बहुवचन भी प्रकट करती है। जैसे मिठाई सिठाई, खाना वाना राटी वोटी, पानी वानी झूठ मूर। समानायक पुनक्ति कहते है एमी आवृत्ति को जिसम प्रत्यक भाग वा अपना अथ होता है और पुनरुक्ति के बिना भी वह भाग प्रयुक्त हो सकता है । ममानायव पुनरुक्तिया हिन्दा मे बहुत अधिक प्रचलित है। व या तो अपन भागा के अर्थों का सशक्त बनाती है या समूह का भाव व्यक्त करती हैं । जसे रग-ढग (ग्ग और ढग), आदर सम्मान (आदर और मम्मान) कूडा-कचरा (कूटा और कचरा) नौकर चाकर (नौकर और चाकर) । सज्ञाआ की समानाथक पुनरुक्तियो मे निम्न शब्द आ सकते हैं (क) सस्कृत तत्समा के दा सना शन्द । जैसे सम्बध-सम्पक (सम्बध और सम्पक) धन सम्पत्ति (धन और सम्पत्ति) आचार-व्यवहार (आचार और व्यवहार)। (ख) अग्बी और फारमी के तो सना गद। जस गोर गुल (गोर और गुल) पता कसूर (खता और मूर) कौल-करार (कौल और करार), साज मामान (माज और मामान) । (ग) हिदी के दो सना गद। जस ओढना बिछौना (ओढना और विछोना), आन मान (जान और मान) सुध बुध (सुध और वुध)। (घ) हिदी को किया की दा धातुएँ जो सना गदा के जय में प्रयुक्त होती है। जस मार-पीट (मारना और पीटना) चीर फाड (चोरना और पाडना) चीख पुकार (चीखना और पुकारना)। (e) हिदी गद और मस्कृत तत्सम पद । जस सोच विचार (सोच और विचार) जड मूल (जड और मूर)। (च) अरबी फारमी गट और मस्कृत तत्सम या हिती गद । जमे मर मपाटा (मर और सपाटा), चीज़ वस्तु (चीज़ और वस्तु) शादी विवाह (गादी और विवाह) आब-पानी (पानी और आब) मिस्मा-कहाना (विसमा और कहानी)। (छ) मस्कृत तत्सम T? या हिदी । और अरवा या फारमी गत। जम सवा चाकरी (सवा और चाक्री) धन दौलत (धन और दौलत) बाल वच्च (वाल और बच्च), भाई पिरावर (भाई और बिरादर)। वाक्य म सनाआ की पुनरुक्तिया प्रयुक्त होती है- (क) उद्देश्य के म्प म । जसे उहान साचा था कि सब जगह उनकी विजम-ही विजय हागी। उमा पास न धन दौलत है न महल अटारिया न नौकर-चार हैं। (स) कम क प म जैमे पाई-पाई मुये पसीन १ बर मानी होती है। (ग) गुणनिर्देशक के पम नमे इस घटना म दादा की आम जनता का दिर अपार उमाह मे भग है। (घ) विधेयक में अग के पम। स य रडारडकियां उमा चार-बच्चे हैं। () विभिन्न प्रकार के विपनाबोधका रुपमा जम (१) मोहेनजोदारो में जगह-जाह पा होज भी मिलन है। (२) मैंन उसका घर घर त किया । (३) इम सम्मरन लिए विश्व में कान-कान म पतिनिधि आप हैं । (४) ममय-समय वह भाग्न आना है। (५) वात-ही-बान व झगड़ने उगते हैं। (६) बाल-की-वान म हवाई जहाज नष्टि म आझल हो गया। सज्ञा शब्दों की निश्चितता तथा प्रनिश्चितता की अभिव्यक्ति (१) हिदी म यस्ति या वस्तु का अनिश्चितता एक सन्यावाचन T तथा 'का, कुछ कतिपय ' 'चन्द, 'वाज अनि चयवाचर' सब- नामा द्वारा व्यक्त को जाता है। (क) सध्यावा एष का प्रयाा एकवचन म जनिश्चितता सूचित करन क लिए होता है। जैम (१) नुम्हारे यहाँ एक आदमी आया है। (२) यहाँ एक रडा है। (स) 'को अनिश्चयवाचक मवनाम एकवचन मा बहुवचन दाना म हो अनिश्चितता का मूचा है । जस (१) कोई औरल आपकी प्रतीक्षा कर रही है । (२) वहां कोई मजदूर है। (ग) "Jछ अनिश्चयवाचा मवनाम गणनीय नया अगणनाय मना गला व माय प्रयुक्त होता है । गणनाय सण-सदा के माथ प्रयाग म कुछ सपनाम का अर्थ होता है 'कई या 'योडा । स (१) मज पर कुछ पुनरें पटरी है। (२) मेर पाम कुछ रुपय है। अगणनीय सना गा साथ प्रयोग म 'दुध मवनाम का अर्थ होता है 'योडा-मा' । जम कृपया कुछ पाना राइन । (घ) 'कर, 'कतिपय 'वन, वाज अनि चयवाचर बनाम बहः वचन में अनिश्चितता यन करन के लिए प्रयुक्त होत हैं । नमें कई विद्यार्थी अपन अध्यापका स मिलन गये । (२) हिदी में सना गना की निश्चितता व्यक्त होती है- (क) यह वह निर्देशवाचा मवनामा तथा मर हर प्रत्येक आदि निश्चयवाचक सवनामा द्वारा । नम (१) यह आदमी मेरा शिक्षक है । (२) वह स्तिाव उसका नहीं है। (३) आज मव विद्यार्थी श्रेणी म उपस्थित है। (स) स्वामित्ववाचक मवनाम द्वाग । जस मरी कापी कहाँ है ? (ग) का' विभक्तिचिह्न महित सज्ञा शद या क्रियाविशेषण द्वारा। जस (१) रमेरा का वाप डाक्टर है । (२) मुझे आज वा ममाचार पत्र नहीं मिला है। (घ) मवाचक मरया गद द्वाग। जस वह तीसरी मजिल पर रहते हैं। मना गर निश्चितता या जनिश्चितता सूचक दा के बिना तय प्रयुक्त हान है जब कोई बात किसी निश्चित वस्तु के वार म नहीं अपितु एक सी वस्तुआ म से किसी एक के विषय म कही जाती है जथवा क्सिा निश्चित व्यक्ति या वस्तु के बारे म कोई चचा होती है और यक्नि या वस्तु की निश्चितता प्रमग म पता चरती है। जैसे (१) क्या इम कमरे म कुर्सी है ? (२) वह पानी भग्ने गर्ट 1 (३) तुम्हारे घर मे चीज ग तुम्हे देनी पडेगी । उपयुक्न तीसरे उदाहरण म प्रसग है गायव हुई कण्ठमाला वा ।
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विशेषण
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विशषण एमा शब्द भेट है जो वस्तु के गुण, दोप आदि विशेषताआ को
बताता है और सजा गद के साथ प्रयुक्त होता है। जन अच्छा आदमी चौडी
मज, पराव दरवाजा, महत्वपूर्ण ममस्या औद्योगिक विकास ।
हिंदी में विशेषण गन्द मनाजा को निम्नलिखित चिोपता को सूचित
करते है-
रंग-जस लार, पीरा नीला भूरा पाल।
परिमाण~~-जैस चौडा ऊँचा, नीचा, लम्वा, बडा छाटा आदि ।
आबार जैस गरर टेढा, नुबाग चौकार आदि ।
गुण-~~-जैसे नया, पुराना, मजबूत, चतुर गाति ।
अवस्था~-रोगा, बूढा, गोग, मुखा आदि ।
पदाय उनी, मूता, फौगदी, कागजी रेतीला इत्यादि।
व्यवसाय-~~-व्यापारी, औद्योगिव आदि ।
स्थान-पटासी ननदीकी, दूर, द्रवर्ती ।
समय आगामा अगय पिछ।
दिरापूर्वी, पश्चिमी, उत्तरो दक्षिणी आदि ।
अपन अों और व्याकरण-गम्ब या विगपतामा अनुमार हिली म
सारे सिपण दो भागा मटन है..गुणवावर विपण और सम्बधवाचक
विरोपण । गुणवाचा विषयण वस्तु का गुण या विशेषता मरी वस्तु के प्रति
निरपण भाव में वनात है। 4 गुण या विपता वन्तु म अपिन या यून
परिमाण म हा सकन हैं अतएव जय विहो निश्चित स उनका निर्देश
दिया जा सकता है । जम
सुदर---अधिक सुदर, कम मुदा बहुल मुदर।
भगवून-श्यामह मजबूत कम मजब्त, बहुत मजब्त ।
गुणवाचा विश्पण वस्तुआ प उन गुणा तथा विपता का व्या
६२ उदार करते हैं जो प्रत्यक्ष रूप में द्रिया में अनुभूत होत है । जम (क) वाह्य भौतिक विशेषताए- रग-काल मफ हग पीग जाति । तापमान-गरम ठण्य आदि । ममय-पिछग जगग आदि । स्वाद-मीठा पट्टा नमकीन जाति । भार-हका भारी वजना जादि । आयु-जवान अधड यूटा जाति । (ख) गा और पशुआ की शारीरिक विशेषताएँ-- जस अधा लगडा मजबूत बन्ग मजार वीमार तदुरस्त आदि। (ग) आदमी के चरित्र व बुद्धि-गम्बधी विशेषताएँ-----जसे लाग्ची बुद्धिमान युद्ध वहादुर चालाक नाटि। (घ) वस्तु की मूल्याकनपरक विशेषताए-जम आवश्यक महत्व पूण लाभदायक हानिकारक उचित गरन आदि। वाक्य मे गुणवाचक विशषणा का निम्नलिखित प्रयोग होता है- (१) गणनिर्देशक क प म । जमे इन श ा म कडवा सत्य था । (२) विधेयर के नामिर अग के रूप में। जैम (१) मामूली थे मगर उनका मतलर मामूली न था। (२) इन कपडा म वन बहुत सुन्दर निवाई देती था। मन वाचा विषण वस्तु की विपिता अन्य वस्तु के मम्बध म बताता है। टम प्रकार विपण सना गा रियाविशेषणा तथा क्रियाओं मे बन हान है। जम शानिमय (गानि मना से) भीतरी ( भीतर नियाविशेषण म) खुग (खुटना क्रिया स)। मम्ब वाचर विपणा म अभिनित विशषता वस्तु म निह्नि हाती है । य विपना न कम और न अधिक हो सकती हैं। उनका अभिव्यक्ति यूनाधिक परिमाण म नती हा मक्ती है क्योंकि मम्ब पवाचा विषण वस्तु यो अपग्वितनाय विशपताजा को बताता है। रिटी म सम्बधवाचक विशषण मूचित परत है-- (क) वस्तु का रक्ष्य । जम पोजी जगज (फौजा विपण फौज मना म बना है) व्यापारा वा (व्यापारी बिएपण व्यापार सना से बना है)।
(ख) किसी दा में सम्बध या जाति । जस सा (स' व्यक्ति
वाचा सना से बना है) भारतीय ( भारत व्यक्तिवाचक सना
म बना है।
(ग) वस्तु का स्थान या समय में सम्बध । जैसे पहाडी गस्ता
(पहाटी विशेषण 'पहाड सलाम बना है)। साप्ताहिक पन
(माप्तादिन विशेषण 'मप्ताह मना में बना है)।
(प) वह पदाथ जिसस कोई वस्तु बनी है। जम फौलादा छरी
(फौगदी विशेषण 'फौलाद पदाथवाचक सना में बना है)
रशमा कपग (रेरामी विषण रेशम पदाथवाचक मजा से
बना है)।
(८) सम्बधवाचन विरोपण उन भाववाचक गन्दा म भी सम्बन्ध
“यक्त करते हैं जो व्यापर Fपम विनान तकनीकी और
मामाजिक भावन रक्षर म व्यवह्त होत हैं। जैसे वनानिक
(भाववाचक मना विमान में बना है। रामायनिक (भाववाचन
मना 'रसायन म) गजनीतिय (भाववाचर ममा राजनीति
म), मामाजिक (भाववाचक सजर समाज म} {
वाक्य ममम्बधवाचन विशेषणो वा निम्नलिखित प्रयोग होता है-~-
(1) गुणनिर्देशक के रूप में । जम रेग्नि इतना मुये जमा
उम्मीद है कि अगर कोई दूसरा सिपाहा इस मा का पदेगाना
मरन वार का फौजी वर्दी की वाइ तरप की जब म जमा हाल
(य) विधेय के नामिस मग प म । जमे यह पब एम गाव को यात
है जहाँ को आयादी जाति मे पहा रिबुर निरक्षर था।
स्मरण रह कुछ पारिभापि सम्बधवावर विशपण नामिव विधयक म
बहुत कम प्रयुक्त होन हैं । जम भौगोलिक, भौगभित्र प्राविधिर ल्याटि।
विशेषण विकार
T विचार का विपना अनुसार हिदा म विपण या वर्गो म
चत है--विरारी विशेषण और अविकारी विशेषण । विरारी विपण या
सना मे मर (अवय) होता है। अविकारी विशेषण या मना म बाइ भर नरी
होता है । मना म म हान हुए प्रपम् धग द विशेषण लिंग, बचन नया रस
माप वान है परतु म प्रचार के वियपा शिग वचन नया शायौं
वै रूप स्वतन नहीं होत है । व सना से विशेषण का सम्बध व्यक्त करते हैं तथा उम मनावे लिंग, वचन तथा कारक के अनुसार होत हैं जिसस क्सिी विशेषण वा मल होता है । द्वितीय वग के विशेषण अपने रूप म नहीं बदलते है। विकारी विशेपणो म नाकारात तथा जावारान्त विगेषण परिगणित होत है। जस जच्छा, बडा चौडा दाया वाया ढग्या जादि। मामाय कारक म विकारी विशपण के निम्नलिखित अन्त्य प्रत्यय होते " दायें हाथ दाइ आँखें एकवचन बहुवचन (पुल्लिग) आ आ एए (य) (स्त्रीलिंग) इस प्रकार सामाय कारव म विकारी विशपणा का वचन म सना में मर क्वा पुल्लिंग रूप म यक्त हाता है । स्त्रीलिंग म एकवचन तथा बहुवचन मे जत्य प्रत्यय एव जस होत हैं। एकवचन बहुवचन (पुल्लिा) अच्छा लडका अच्छे लडक दाया हाय (स्त्रीलिा) अच्छी लडकी अच्छी लडकिया दाइ आंख अमामा य कारक तथा सम्बोधन वारख मे भी विकारो विशपणो के अत्य प्रत्यय एक जम हाते है । दोना वचना के पुल्लिंग असामाय वारक तथा सम्बोधन कार में विकागे विशेषणात्य प्रयय ए तथा ए है जा वहुवचन सामाय कारक के सत्य प्रत्यया म मिरते जुलत हैं । जसामा य कारक तथा सम्बोधन कारबम विकारी विपणा के निम्नलिखित अन्त्य प्रत्यय होत है एकवचन बहुवचन (पुल्लिग) (स्त्रीलिंग) ई इजसे (पुल्लिग) प्यारे बेटे को प्यारे बेटो को अरे पार बेटे। अरे प्यारे बेटो! (स्त्रीलिंग) प्यारी बेटी को प्यारी बेटियों को अरी प्यारी बेटी। अरी प्यारी बेटियो! जमादि ऊपर लिय गए उदाहरणो स दाखता है कारख म विशेषणा का सनाआ में मेल क्व' पुल्लिग में होता है।
पति विद्यारी विपादा या दास अधिक विभिन्न शिवाली सलामो के मार प्रयुक्त होता है तो उन लिंग और वचन निक्टवनी सना व अनुसार हात है। जैन छाट दिया। विधारी विगेपपा में आरारान्त तथा आधारान दिपणा को छोड़- पर अन्य नव स्वरान्न तया व्यसनाल विशेषण आ जाल हैं। इस वाक विप्रेषणा का सनामा न काइ मल नहीं होता है। कारक में केवल सा रूप बग्न है तथा उनने सम्बनित विशेषण के प नहीं बदलते हैं । सामाय कारक (पुषिता) एकवचन स्निान लडका धनो मारमी দিন দত্ত बहुवचन बुद्धिमान लडा घनौ भादमी बुद्धिमान लडक्यिों . (नोलित) असामय कारक वहुववन (पुलिा) एकवचन बुद्धिमान लडके पना आदमी बुद्धिमान लडकी बुद्धिमान लड़कों धनो मामियों बुद्धिमान तडपियों (स्त्रीलिंग) बुद्धिमान को सम्बोधन कारक एरवचन बहरचन (पुलिस) बुद्धिमान लडके ! धनीमादमी। पनी आभियो। (स्त्रीलिंग) बुद्धिमान लडकी बुद्धिमान नदियो! अविशागे विपणा में कुछ एमे नाकारान्त विपणा का नी परिगमन हाता है जो हिना में बरची और फारसा म आम हैं । जैन उम्दा, पर जुर, নাৱা ৱিান্য পৃমি নাকি। अधिकारी विशेष म हम हिन्दा म प्रयुक्त सस्थत बागि विशेषतो का भी ममाया र मरत है। इस प्रकार के विपणमि अपनाप नही बदलत हैं। उनका उपयाग कवर पोग्गिवाची मनाला माय रिया जाता है परन्तु उन गिनर विवागे विपकी नाति fre अनुसार नहीं होता है बल्लि पुल्लिंगवाची विशेपणा के साथ ग प्रत्ययो द्वारा बनता है। जैस प्रातिकारिणी (प्रातिकारी' विशेपण मे बना है), गक्ति शारिनी ('शक्तिशाली' विगषण से बना है), इत्यादि। तुलना हिदा में तुलना की दष्टि स विशपणो की तीन अवस्थाएँ होती हैं- मूलरावस्था उत्तरावस्या और उत्तमावस्या । मूलावस्था म विशेषण वस्तु को अय वस्तुआ से निरपक्ष भाव से सीधे निदिप करत हैं । इस अवस्था में एक वस्तु को दूसरी वस्तु से गुण या दोष को मात्रा म तुलना नहीं की जाती है। इसलिए मूगवस्था म विशेषण की तुलना स्पष्ट रुप से नही प्रतीत हुआ करती है । मूलरावस्था वाग विरोपण प्राय शद- कोश म दिया होता है । जसे अच्छा बुरा मजबूत । उत्तरावस्था मे दो वस्तुआ को तुरना करके उनम में एक वस्तु के गुण या दोप अधिक बतलाय जान हैं । जस लोहा रकची स कहा है। उत्तमावस्था म क्मिी वस्तु को मबम अधिक गुण गाली या दाषा बताया जाता है । जम वह हमारी रक्षा म सबम अच्छा विद्यार्थी है। हिदी म केवल गुणवाचन विशेषणो का तुम्ना अवस्था होती है क्यादि य विशपण वस्तुआ के उन गुणा या दापा का व्यक्त करत है जा वस्तुआ म जधिक या यून मात्रा महोत है। सम्ब चवाचन विपण एसी विशेषताजो को वतात हैं जा अधिक या यून मात्रा म नहीं हो सकता है। इसलिए उनकी तुलनावस्थाएँ नहीं होती हैं। परतु हिदी म एम गणवाचक विशेषण भी होते हैं जिनकी तुलनावम्याएँ नहीं होता है। इनम निम्नलिखित वा परिगणन है- (4) अधिकाग नवाराथक विगषण। जम जमिन अक्षम्य अप्रिय जादि। (प) ऐम विरूषण जिनके द्वारा यक्त गुण या नोष को तुरना नहीं का जा सकती । जमे अघा वा नगा अतिरिक्त आदि। तुलनावस्थानो को अभिव्यक्ति हिंदी म तुलनादम्या व्यक्त करने लिए गुणवाचक निरोप अपन पररचना विषय म्प नहा हात है। इसलिए तुरनावम्याआ का प्रतीति घोष वाक्यरचना विपयव गट समुदाया मे हाता है। म विशेषणा के कुछ अपबाट होत हैं जो सम्कृत या पारमो मे हिटी में लाए हैं। म प्रकार के ६७ विशेषणा की तुलनावस्थाएं हिन्दी मे उक्त विशेषणा के माथ प्रयुक्त प्रत्ययो के द्वारा व्यक्त की जाती हैं। उत्तरावस्था हिन्दी मे निश्चित वाक्यरचना द्वारा निर्दिष्ट होती है जिसमे तुलना की जाने वाली वस्तु उद्देश्य होती है मूलावस्था में प्रयुक्त विशेषण विधेयक का अग होता है और सज्ञा शब्द या सवनाम जिससे दूसरी वस्तु की तुलना की जाती है किसी निश्चित विभक्ति चिह्न के साथ असामाय कारक मे होता है। उत्तरावस्था में निम्नलिखित विभक्ति चिह्नी का प्रयोग होता है- (क) से । जैसे (i) यह सेव शहद से मीठा है। (n) मेरा भाई उससे बडा है। (ख) म, म से । जसे इन घरो म (मे से) हमारा घर ऊँचा है। (ग) को अपक्षा की तुलना मे के मुकाबले, की बनिस्बत । जमे (1) मस्कृत की अपेक्षा हिदी सरल है । (1) उसको तुलना में मेरा भाई बलवान है। (u) यह किताब उस किताब के मुकाबले दिलचस्प है। (iv) गधे को बनिस्बत घोडा मजबूत है। उत्तरावस्था के नागे' और के सामने विभक्ति चिह्ना द्वारा भी व्यक्त की जा सकती है । जैसे वह मेरे आगे छोटा है। स्त्री पुरुष के मामने कमजोर होती है। सस्कृत से आए विरोषणा की उत्तरावस्था तर प्रत्यय द्वारा भी प्रकट की जा सकती है । जमे उच्चतर श्रेष्ठतर हीनतर कोमल तर आदि । उत्तमावस्या हिदी म निम्न प्रकार से अभिव्यक्त होती है । (क) निर्देशक मवनाम 'मब तथा विभक्ति चिह्न 'से था म के सयोजन द्वारा मूलावस्था में प्रयुक्त विशेषण के साथ । जैसे (1) हमारे नगर में यह सबसे लम्बी सडर है । (i) यह घनी मबम अच्छी है। (ख) से या म विभक्ति चिह्ना द्वाग। टम दशा म निर्देशक सवनाम सब विभक्ति चिह्न स' या 'म मे पहले नहीं प्रयुक्त होता है, वह प्रयुक्त होता है उस सज्ञा से पहले जिसम तुलना की जाती है। इसम विरोपण मूलावस्था जैसे ही होत है । जम यह घर सब घरा से (मे) बड़ा है । (ग) मे विभक्ति चिह्न के माय विशेषण की आवृति द्वाग। जैस (1) बडे म वडा पर । (i) अच्छी-मे अच्छी पुस्तक । सस्कृत स जाए विरोषणा की उत्तमावस्था 'तम' प्रत्यय द्वारा भी प्रकट की जा सकती है। जम उच्चतम अप्ठतम, हीनतम, कोमग्नम आदि । हिन्दी में विगपनाआ की यून या अधिक मात्रा उन निम्नलिखित गाता द्वारा यवन की जा मरती है जो मूरावस्था पार विशेपणो स जुड़ जाते है-- अधिक, पयादा, कही, कम वहुत याडा, जरा विचित और (और भी), कुछ, बडा, काफी, विरकुल । जमे अधिक बग्वान ज्याला मजबूत, वही अच्छा, कम चौडा बहुत ठडा, थाना लम्बा जरा ऊँचा और गम, जौर भी गम कुछ नग बडा सुदर, काफी लाभदायर पिटकुर अनुचित । विशेषणों का सज्ञाकरण विशेषणा के मज्ञाकरण का अथ सनाआ म विपण का सरमण है । हिदी म सना के गट भेद म केव' कुछ विपणो का पूण सरमण हुआ है । ऐस विशपणा म 'वनी, कदी आदि जसे गट गिन जा मक्त हैं। अधिकाश विशेषण सनाओ के अथ म प्रयुक्त हात है तथा विशेषणा चे अथ म । य प्राय व्यक्तिया में निहित गुणा वाले विशेपणा में सम्बधित होते हैं। जैस गरीब धनी, बकार, बामार जवान जवा, बहरा आदि । सना अथ में प्रयुक्त हात समय इस प्रकार के विशेपण वस्तु की विशेषता को ही बल्कि स्वय उम वस्तु का ही निर्देश करने लगत हैं । सना क अथ म प्रयुक्त विशेषण उस निर्दिष्ट वस्तु के अनुमार पुल्लिग और स्त्रीलिंग म व्यवहृत हो सकन है परतु प्राय व पुल्लिंग म प्रयुक्त हात हैं। स्वीरिंग म उनका तब प्रयाग होता है जब व स्नीरिंगवाची व्यक्निया का निर्देश करते है । जसे अधा (पुस्प) अधी (स्त्री) बहरा (पुरप) बहरी (स्त्री) । सना के जय म प्रयुक्त विरोपणा का रूपान्तर उनके सदा रिंग और अन्त्य प्रत्यय वाला सनाया की मानि होता है। विकारी विशेषणो का रूपान्तर लडका बटा आदि मना गन्दो की भाति होता है। अधिकारी विशेषणो का रूपान्तर किमान भाई, आदि सना गन्दा की भाति होता है । जसे सामायकारक बहुवचन अये एकवचन (पुल्लिा) अपा जवान धनी जवान घनी प्रमामा य कारक (पुल्लिा एक्वचन अधे जवान धनी " बहुवचन अघो जवाना धनिया सम्बोधन कारक एकवचन (पुल्लिग) अधे ! जवान! घनी। " " बहुवचन अघो। जवानो। धनियो। विशेषरण की पुनरुक्ति हिदा म विशेपणा की पुनरक्ति का बहुत प्रचलन है। इस तरह की पुनरपित म विरोपण अवधारणसूचक होता है। जैस (१) छाटी छोटी एडनी। (२) लम्ब-रम्ब वार । विशेषणो का पुनरक्तियाँ अवधारणपरक निम्नलिखित अथ व्यक्त करती है- (क) भिनता । जैम नय नय सेर । (ग्व) एवजातीयता । जैस बड पडे रोग तथा छोटे ठोट वच्च अपनी- अपनी जगह वठय। (ग) अतिमायना । जम मीठ मीठे अगूर । (घ) "यूनता । जम खटट बटटे नातू ।
५ सख्या-शब्द मरया से गठन भर को कहत है जिमम एम शटा का समावेश होता है जो अका तथा जका में सूचित मात्रा एव परिमाण को यक्त करत हैं। हिटी म सम्या श * अपने गठन के अनुसार तीन प्रकार व होत हैं- सामा य जरिल तया सयुक्न । सामाय सख्या शब्द व वहान है जो स्वतत्र मूल + हान है। इन मामा य सम्या शब्दा म निम्नलिखित का परिगणन होता है-~- (क) एक से दस तक की सस्याए। जसे एक दो तीन आदि । (ख) का के नाम । जैसे दस वोम, तीम चालीस जा!ि (ग) सौ हजार लाख करोड अरब आदि । जटिल सख्या-शद वे कहलाते है जो दो मूल वाल हात हैं। उनमें समावश होता है यून दशक मन्या शब्दो का छोडकर ग्यारह के बाद प्रारम्भ होने वाले प्रत्यक दशक के तमाम मग्या का। जस चौतह इक्कीस बाईम तईस, चौबीस पच्चीस, छत्रीम सताईम और अट्ठाईस । (इमी तरह फिर हर दशक म मो तक)। इस समय जटिल सख्या गटो निर्माण के सामाय मिद्धान्ता को निर्धारित करना सामान नहीं है । कारण, उनम समाविष्ट अगो का जपना मूल स्प काफी रूपान्तरित हो चुका है। किंतु प्रत्यर दशक के सम्या शदा म मयोजन का निम्न निश्चित कम है पहले आन हैं बटले हुए प म एक स नौ तक के मामाय सच्या शद इसके पश्चात आत हैं प्राय बद' हुए प म दाकों के मख्या गर जस चौवीम (चार का बदला स्प 'चौ बीस)। इसठ (एक का वदता रूप 'इक साठ का वाला रूप 'सठ)। नवासी तथा नियानव सख्या गो को छोडकर उन्नीम उन्नीम उन्नालीस आदि गर मयाजन से नही बलि ऊन द्वारा वनन है। 'ऊन' का यहाँ अप होता है एक मा कम । 'ऊन इस अथ में दाको के नाम के पूर्व जुडता है। जैसे उतीस, उनसठ, उनासी । नवासी तथा निन्यानवे जटिल सख्या शब्द है। उनका निर्माण अन्य जटिर सख्या-शब्दो की भाति हुआ है। सयुक्त सत्या शब्द वे कहलाते हैं जिनमे दो या दो से अधिक (मामाय या जटिल) सस्या शब्दो का समावेश होता है। हिंदी में ये सख्या-शब्द होते हैं 'सो सख्या-शब्द के बाद । जैसे एकसौ एक दो सौ तीन सौ बीस चार- सौ उन्तालीस इत्यादि। अपने अर्थों के अनुमार हिदी म सरया शब्दों के दो मुस्य भेद हैं ---- गरगनावावक तथा क्रमवाचक | गणनामाचा सख्या शब्दो मे निर्माण तथा उप- योग की दष्टि से समुदायवाचक संख्या गन्दा का विशेष ममावेश होता है । सग्या शब्दा की विशेष श्रेणी म आत है खण्डवाचक मख्या शब्द तथा मिधित संख्याओं के सूचक शब्द और शब्द समुदाय पृथक् श्रेणी में आते हैं 'आवृत्तिवाचक सध्या शब्द तथा 'लगभग मात्रा सूचक शब्द । गणनावाचक सरूपाएँ हिंदी में गणनावाचक मख्या शन्द स्वतन रूप स या सजा शब्दो के साथ प्रयुक्त होते हैं। सज्ञा शब्दो के साथ इनका प्रयाग सदा मामान्य कारक म होता है और लिंग तथा वचन अपरिवर्तित रहते हैं । जैसे पांच आदमी, पांच आदमिया के लिए। सात लडकियां सात लडकियो के लिए। गणनावावक सस्या शब्द एक अनिश्चयवाचक भवनाम 'कोई के अप में एकवचन मे अनिश्चितता व्यक्त करने के लिए प्राय प्रयुक्त हुआ करता है। जैसे यहाँ एर आदमी आया था। गणनावाचा सल्या शम्दो की पुनरुक्तियाँ विभाजक्ता का अय दिया बरती हैं । जस एक एक, दो-दो इत्यादि। हजार, माल, करोड, अरब आदि जैसे गणनावाधक सख्या शब्द प्राम विशेष गणनक शब्द समझे जाते हैं और सम दशा म बौसी, सैकडा आदि गणना शना की भांति 'आ' प्रत्यय उनरे अत मे जुड़ता है जिससे अनिश्चयापक ममुदायवायर सस्पा शब्द बन जाते हैं, जैस बोसियों, हजारों लाखा, करोडो आदि।
एक से सौ तक के गणनावाचक सस्था गब्द इवाई१ ३ 6 ६ ७ ८ दाक नौ दस १ एक दो तीन चार पाच सान जाट २ ग्यारह बारह तेरह चौदह पद्रह सोलह सत्रह अठारह उनीस बीस ३ इक्कीस बाइस तेईस चौबीस पच्चीम छब्बीस सत्तास अठाईस उत्तीस तास ४ इकत्तीस बत्तीस ततीस चौतीम पतीस छत्तीस सतीस जडनीस उतालीस चालीस ५ इक्तालीस बयालीस तितालीस चवालीस पतारीस छियालीस मतारीम अडतालीम उनचास पचास ६ इक्यावन वावन त्रेपन चौवन पचपन छप्पा सनावन अठावन उनसठ साठ ७ इक्सठ बामठ असठ चौमठ पसठ छियासठ सडमठ अडमठ उनहत्तर सत्तर ८ इकहत्तर बहत्तर तिहत्तर चौहत्तर पचहत्तर छिहत्तर मनहत्तर अठहत्तर उनामो अस्सी ६ इक्यासी वयासी तिरासी चौरासी पचासी छियासी सतामीठासी नवामी नवे १० इधयानव बानव तिरानवे चौरानव पिचानव छियानव मनानव अठानवे नियाव मो खण्डवाचक सख्या शब्द हिदी म निम्नलिखित खण्डवाचक मान्याएँ पृयक राता से व्यक्त की जाती हैं । जस पाव चौथ चौथाई निहाई आधा पौन, पौना पौन सवा डेढ टाई, अढाई सादे। दोष खण्डवाचक सस्याआ को -यवन करन के लिए हिदी मे कोई पथक शद नहीं है। प्याररण-सम्बधा विशेषताओ की दष्टि से हिदी म स्खण्डवाचन सख्या- पाद एक जैस ना हैं। तिहाई तथा 'चौथ व चौथा सग्या गद वास्तव म स्त्रीलिंग सना गरट होन है । व खप वाचक सध्याआ का यक्त करत हैं। प्राय एक, दो तथा तान गणनावाचक सत्या गटाके मात्र प्रयोग म। जमे एक निहाई दो तिहाई एक चौथाई दा चौधाई इत्यादि । आषा तथा पौना खण्टवाचा सत्या गट अपन म्प के अनुसार विकाग विपण हाल हैं। उनके लिंग वचन नथा कारक रूप अपने विशप्या के अनुमार बदरत हैं । जम आधी दजन, आधा घण्टा आध घण्टे तक, पौना घण्टा पौन ७३ . . घण्टे में आदि । 'आधा' सरया शब्द पुल्लिग सज्ञा शब्द की भाति प्रयुक्त हो सक्ता है । जसे आधे से कुछ अधिक । शेष वण्डवाचक सरया शब्द अविकारी होते है । 'डेढ , 'ढाई' तथा 'जदाई खण्डवाचक सरन्या श दा के माथ या सौ, 'हजार', 'लाख' 'करोड' आदि जसे गणनावाचक मरया शब्दा के साथ प्रयुक्त होते हैं । जैमे डेढ दिन, ढाई दिन, अढाई दिन, डेढ सौ, डढ हजार डेढ राख, करोड, ढाई सौ और ढाई हजार, ढाइ लाग्व, ढाई करोड आदि । 'पौन 'सवा' 'साढे खण्डवाचा सरया शब्द केवल गणनावाचक सरया गदा के माथ प्रयुक्त होते है। उनमे 'साढे खण्डवाचक मण्या श द का प्रयोग गणनावाचक तान सप्या श द से लेकर अगली सब गणनावाचक सरयाओ के साथ ही होता है। 'पौने', 'सवा , 'डेढ , 'ढाई , 'अढाई तथा 'साढे' खण्डवाचक सग्या शब्द ममय बताने के लिए भी प्रयुक्त होते हैं। जैसे पौन दो बजे (१४५) सवा चार बजे (४ १५), डेढ बजे (१ ३०) ढाई बजे (२ ३०), मारे पाच वज (५३०)। दशमलव भिन हिदी म तीन प्रकार की भिन्न होती है-~परल भि न, मिन तया मिश्र भिन । सरल मि न तीन या चार [दा वाले शब्द ममुदाय से व्यक्त की जाती है । इसम पले वे मन्या गट होते है जो पूर्णाव होते हैं दूसरे सय्या शब्द भाज्य को सूचित करते है, तीसरा शब्द 'बग्ना' क्रिया का सामाय भूतकारिक दत 'वटा' होता है जो भाग करने का व्यापार मूचित करता है और चौथा सग्या गद भाजक का मूचित करता है। भिन म जब काइ पूर्णाक होता है तब चार गन्दा का समुदाय उम भिन को व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है अयथा तीन शब्ना का ही समुदाय प्रयुक्त होता है । जैस (१) पाच पूर्णा मात बटे आठ (= ५१) । (२) चार बरे पाच (3) पूर्णा के स्थान पर सही गद का व्यवहार भी होता है। दशमलव भिन इस नरर लिखा तथा पढी जाती है-जमे ०७ पो पढंगे पूय दगमाव मात । ० ७८ वो पहेंगे गूय दामरव सात आठ । ३२ को पटग तीन दामस्व चार तीन । मिथ मिन व हैं जिनम मरर भिन्न तथा दगमरव भिन्ना का ७४ मयुक्त रुप से प्रयोग होता है । जसे २३+१७८ । इस तरह की मिश्र भित का पढेंग दो पूर्णाव तीन वटे पाच योग एप दशमलव साा आठ । समुदायवाचक सख्या शब्द समुदायवाचक सरया श द वस्तुआ की मात्रा एक समूह के रूप में मूचित करत है । उनका निमाण गणनावाचक मस्या शक्षा के माय ओ प्रत्यय के मयोजन से होता है । जैस दोना तीना चारो इत्यादि। प्रावृत्तिवाचक सख्या शब्द आवत्तिवाचन मग्या गदो का निर्माण गणनावाचा सग्या श दा के साथ गुना प्रत्यय के मयोजन म होता है । दा तीन चार पाच सात आठ के मूल रूपो में 'गुना प्रत्यय के सयाजन से परिवतन विकल्प म हो सकता है । जस दागुना, या दुगुना । तीन गुना या तिगुना । चारगुना या चौगुना आदि। आवतिवाचक मम्या गदा का अपन विशेष्य के अनुमार लिंग वचन तथा कारक म रूप कभी बदलता है कभी नही बदरता है । जसे पचगुनी वद्धि । मातगुना विस्तार के लिए। 'लगभग' माना की अभिव्यक्ति हिदी मे लगभग मात्रा व्यक्त होती है-- (4) गणनावाचा मया गन्ना के साथ लगभग करीव तथा तकरीवन शन्दा के प्रयोग स । जस लगभग पाच बजे। करीब दस रुपये जारीबन बीस आदमी। (ख) गणनावाचक सम्या शब्ग के साथ कोई अनिश्चयवाचक संप नाम के प्रयोग से । जम बाई तीस व्यक्ति । (ग) गणनावाचक सस्या गदा के पश्चात एक सम्या गद के प्रयोग से । जसे सात एक कापिया। (घ) दो गणनावाचक सम्याग एक साथ प्रयाग से । जैस दो चार तीन चार आदमा चाहिए। . क्रमवाचक सख्या शब्द "एक दो तीन चार तथा छ गणनावाचन सम्या गब्दो के जमवाचक रूपमा होते हैं पहला दूमरा तीमग, 'चौथा तथा छठा' ।
मो समेत परमवाचक सग्या गदा क पाछ वा प्रत्यय डन से। जर पाचका सातवा सदा पचासवां मौवा । सयुक्त अमवाचा सरया गदा का निमाण मयुक्त गनावाचा सम्पा- पाक समुदाय के अन्तिम भाग व मार 'वा प्रत्यय लाइन स हाना है। जम चार सौ वीसवा। हिदी म मवाचक मख्या द अपने विध्य ३ अनुमार लिंग वचन नया कारख म अपना रुप बदरत है। मवाचा सामागदा का विकार विकारी विशेषणा की भाति होता है। जैम चौथा रडबा, नौयो रडकी औय डिके को चौथी लडकी को चौथे रडा, चौथी रडका पांचवा दिन पाचवें दिन के लिए, पाचवी तिथि पाचवा तिथि का। मयुक्त मनाचर सस्या गन्दा म विकारी हाना है अन्निमिक शब्द । जग दो सौ तीसरा आदमी से सौ तीसवें आरमा कर, दो सौ तीसवां स्वी। 'दूसरा' अमवावक यस्या" अय पर अथ म भा प्रयुक्त किया जाता है । जय उन लोगा ने अगवा दूसरा आगमा भी यहा आया था। वाक्य म क्रमवापर मरया र प्राय गुणनिर्देशक हार है या विधय के नामिक आ होते है । नमे (१) वह उनका तीसरा बच्चा है। (२) हमारा गाडी का डिव्या दप्तका है। मज्ञादी के साथ प्रयाग म अमवाचक सध्या वाक्य में विशेषतारोधको का वाय भी कर सकते हैं। जम सडक दूसरी आर मरा मित्र खडा था। (२) वह बीमवी परवरी को आयेगा। हिदाम भावभी महत व अमवार सध्या-सदा का प्रमाण होता है। जम प्रथम द्वितीय, तनीय, चतुथ, पचम आदि।
७४
संयुक्त म्प से प्रयोग होता है । जस २३+ १७८ । इस तरह की मिश्र भिन
का पढग दो पूर्णाव तान बटे पाच योग एक दामलव सात आठ ।
समुदायवाचक संख्या शब्द
समुदायवाचक सस्या शद वस्तुओं की मात्रा एक ममूह व रूप में सूचित
करते है। उनका निमाण गणनावाचर सख्या गला के माय 'आ प्रत्यय के
मयोजन स होता है । जैसे दोनो तौना चागे इत्यादि ।
प्रावृत्तिवाचक सरया शब्द
आवृत्तिवाचक मण्या गरा का निर्माण गणनावाचा सग्या सदा
साय गुना प्रत्यय के संयोजन से होता है । दा तीन चार पाच सात आठ
के मूर रूपा में गुना प्रत्यय के सयाजन से परिवतन विकरप से हो सकता है ।
जसे दागुणा या दुगुना । तीन गुना या तिगुना । चारगुना या चौगुना जाति ।
आवत्तिवाचक सध्या सदा का अपन विशष्य के अनुसार लिंग वचन
तथा कारक में रूप भी बदलता है कभी नहीं बदलता है । जसे पचगुनी
चद्धि । सातगुना विम्नार के लिए।
।
'लगभग' माना की अभिव्यक्ति
हिदी म 'लगभग मात्रा यक्त होती है-
(क) गणनावाचा मया गा के साथ लगभग करीब' तथा
तकरीबन गदा के प्रयोग से । जैस लगभग पांच बजे ।
करीब दस रुपये जबरीवन बीस आदमी।
(ख) गणनावाचक सम्या सदा के माथ कोई अनिश्चयवाचक संघ
नाम प्रयोग से । जम को तीस व्यक्ति ।
(ग) गणनावाचक सस्या गदा के पश्चात एक मम्या गर के प्रयोग
से । जसे मात एक कापिया।
(घ) दो गणनावाचा सस्या गदा एक माथ प्रयाग स । जम दो
चार तीन चार आदमी चाहिए।
कमवाचक सख्याशब्द
एक दो तोन चार तथा 'छ गणनावाचक सम्व्या शब्दो के
अमवावर पत्रमा होत हैं पहला दूसरा तीसरा, 'चौथा तथा छठा ।
७५ 'मो ममा गेप कमवाया सस्या-गाके पीद वा प्रय'नाइन से। जम पाचवा, मातवां दमवा पचामा सौवा । मयुक्त मवाचा सस्या का निमाण मयुक्त गगनावाचर मस्या भाग क ममुदाय के अन्तिम भाग क माय 'दा प्रत्यर जाइन में होता है। जम चार मो बीमवा। हिन्दा म नभवाचा सध्या गद अपन विगष्य के अनुसार लिंग वचन नया कारस म अपना प वदरत है। अमवार सल्या पदाका विकार विकारी विपणा की भाति हाना है। जम चौया रडका, चौथी लड़की, चौथ लडके को चीयो लडकी को, चौथे सडक चौथी लडकी । पाचवा दिन पाचवें दिन लिए, पाचवी रिथि पाचवी तिथि को। मयुस्न मनाचर सव्या गन्दो म विकारा हाना है अन्निमिन्द। जम दो सौ तीसवा आदमी । दो सौ तोस नादमा का, दो सौ तीसवीं स्त्री। 'दूसरा मवाचक सध्या-मद पद के जय म भी प्रयुक्न नि जाता है । जस उन रोगा अरावा दूसरा नादमा भा यहा आया था। वाक्य म मवाचन सम्या-ग- प्राय गुणनिर्देगक हान हैं या विकार नामिर अग होते हैं । नम (१) वह उनका तीसरा बच्चा है। (): गाडी वाडि वा दसवां है। %3-
.
६
सर्वनाम
सवनाम एसे गर हैं जो मना गदो विशेषणा तथा सरया गदा के
स्थान पर प्रयुक्त होते हैं । सना गन्दा विशषणा तथा सस्या शब्दा स सवनामा
का यह भेद है कि वे वस्तुजो तथा उनकी विशेषतानी और निश्चित मात्रामा
को साक्षात नहीं बतान है केवल उनका निर्देश करते हैं। सवनामा का अपना
कोई स्थायी अथ नहीं होता है वे उस पद वा अथ ग्रहण कर लेते है जिसक
स्थान पर वे प्रयुक्त होत हैं । इसरिए प्रसग से ही पता चलता है कि क्या वस्तु
विशपता या मात्रा अमुक सवनाम सूचित कर रहा है।
अपने अर्थों के अनुसार हिती म मघनामा के निम्नलिखित भेद हैं-
(१) पुम्पवाचर सवनाम । जसे मैं तू यह वह तुम म जाप
यवे।
(२) निर्देशवाच । जसे यह, वह य व, एमा, वैसा इतना
उतना।
(३) प्रश्नवाचक । जैसे क्या कौन क्सा, कौन सा क्तिना।
(४) रवामित्ववाचक । जसे मेरा तेरा हमारा तुम्हाग अपना ।
(५) निजवाच । जमे नाप ।
(६) सम्व धवाचक । जम जो जैसा जितना ।
(७) निश्चयवाचर । जस आप स्वय, खुद सव
समूचा हर, प्रति प्रत्यक ।
(८) अनि चयवाचक । जम काई कुछ वई अनक चट, बाज ।
हिदी भ नकारामक सत्रनाम नहीं है। उनका काय करत हैं 'काई',
तथा 'कुछ अनिश्चयवाचक मवनामा + माय नही तथा ननिपाता के
सारा तमाम
प्रयोग।
सर्वनामो का प्रयोग पुरुषवाचक मवनाम पुष्पवाचक मवनामा व तीन पुरुष हात है. उत्तम पुरप, मध्यम पुरुप तथा मय पुरए । उनो एक्वचन तया बहुवचन हात हैं। एक्वचन पहुवचन में हम उत्तम पुरष मयम पुष्प जय पुष्प तुम, माप मे, वे पुरुषवाचक मवनामो का अपना कोई स्थायी लिंग नहीं होता है । व म्यान पर प्रयुक्त हान हैं उसाद के अनुसार वाक्य म उनका गिनिधारित होता है। सब पुरुषवाचा भवनाम बार में स्वत न प में प्रयुक्त हान हैं। व उदेश्य, कम तथा विधेय व नामिज अग का काय करत हैं। 'मैं' सवनाम वक्ता अपने बार म कोई बात व्यवन करन के लिए प्रयुक्त किया करता है। 'तू मवनाम उम व्यक्ति को भूचित करता है जिसको सम्बोधन करव बात कही जाती है। 'तू सपनाम का प्रयाग अपक्षाकृत कम होता है । वह प्राय तव प्रमुस्त होता है जब पिसी छोट बन्ने को बन धनिष्ठ व्यक्ति को, भगवान एव अभीष्ट देवता को या अनादर भाव भूचित करने का सम्बोधन करने कुछ रहा जाता है। 'हम' सवनाम व्यक्रिया के एमें समूह का भूचित करता है जिसम उत्तम पुरप के बरता क माय एर या एक म अधिक अस व्यक्ति भी होते है। 'तुम' मवनाम दो या दो से अधिक उन व्यविनया को भूचित करता है जिनका सम्बोधन कर बात कही जाती है । 'तुम सवनाम मामाप सम्बोधन म मरम अधिर प्रयुक्त होता है । दम सवनाम का प्रयोग एर व्यक्ति को भी मम्बोधन कर काइ बान बल म किया जाता है । तुम' का यह प्रयोग होता है प्राय मारिया घनिष्ट मित्रा तथा मम्बधिया का मम्बाचन पर कुछ रहने । आप' भवनाम मन्यम पुरुष का काय बग्न हुए विशेष आरमूचर मम्बाधन म प्रयुक्तता । उमर माथ किया वा पवहुवचन जयप का प्रयुक्त आता है । जम आप को जान है? 'यह', 'वह', 'ये', 'वे' सवनाम उन व्यक्ति या वस्तु का मत्रित करत - य हैं जिसके बारे म बात हो रही हानी है। यह तथा य' मवनाम निकटवर्ती व्यक्तिया या वस्तुओं को मूचित करते है। वह तथा 'वे' सवनाम दूरवर्ती या अनुपस्थित पक्तिया या वस्तु को सूचित करन है। बहुवचन अथ म य तथा वे के स्थान पर कभी-कभी यह तथा वह भी प्रयुक्त किये जात हैं। व तथा यह वह' का प्रयोग प्राय अनेक यविनया के स्थान पर केवर एक यक्ति के लिए क्यिा जाता है । इस तरह प्रयोग में आदर का भाव मूचित होता है। अत त्रिया बहुवचन रिया प्रयुक्त होती है । जसे (१) यह (ये) यहा पढत हैं। (२) वह (व) शिक्षक हैं । ये 'द यह वह एक या अनर यषितया क लिए वाक्य में प्रयुक्त हुए है इसका प्रमग स पना लगता है । एकवचन अयपुस्प के अथ म प्राय आप' मवनाम का प्रयोग होता है। एसे प्रयोग से उम व्यक्ति के प्रति आदर व्यक्त किया जाता है जिसक नाम का उल्लेख हा चुका है । जम आज सावजनिक सभा म मत्री महोदय ने भापण किया। भाषण में 'आपने जनता से गाति का मुदढ करन की अपील की। 1 निर्देशवाचक सवनाम यह' तथा 'ये' निर्देशवाचक मवनाम निकटवर्ती व्यवितया या वस्तुना को मूचित करते है। वह' तथा वे सवनाम दूरवर्ती तथा अनुपस्थित यक्तिया या वस्तुजा को मूचित करने के लिए प्रयुक्त होते है। उनका अपना कोर्ट लिंग नहीं होना है। जस यह लडका यह लडका । य लडके ये एडकिया । वहुवचन अप म बहुधा य तथा व' के स्थान पर यह तथा वह का प्रयोग भी किया जाता है । जम यह (य) पुस्त हैं। य तथा व भवनाम एक व्यक्ति के प्रति आदरमूचा भाव व्यक्त करन के लिए भी प्रयुक्त होत हैं। 'सा, वसा, 'इतना' तथा उतना' निर्देशवाचक सवनाम गुणनिर्देशक + रूप में या स्वतंत्र रूप में भा प्रयुक्त होत हैं । जस ऐसा आदमी वमा आरमी इतना दूध ऐसा के लिए तनो को। मा तथा वसा सवनाम गुणा का निर्देश करते हैं और इतना तथा उतना सवनाम मात्रा का । जम एमी पुस्तक । इतना पुस्तकें । एमा तथा इतना मवनाम निकटवर्ती यक्तियो था वस्नुभा का निग करन जौर वमा तथा उतना विहा दूरवर्ती एव अनुपस्थिन यक्निया या वस्नुआ का।
VE १ प्रश्नवाचक सवनाम प्रश्नवाचक मनाम दिसा व्यक्ति या वस्नु, उनकी विशपता या स्वामित्व मा उनकी सध्या के विषय में प्रन व्यक्त करने लिए प्रयुक्त होता है। 'क्या' तथा कौन प्रश्नवाचार मवनाम का लिंग नहीं होता है । मामाय रारक म उनके बहुवचन प नहीं होते हैं। य मवनाम किमी भी गि नया वचन वे मना गदा माथ व्यवहत हा सक्त हैं। जैम क्या पुस्तक क्या पुस्त। कौन पुग्प फोन स्त्रियां ? यमामाय बारव में उक्त प्रानवाचक मवनामा का वचन विरोप्य मना गों के अनुसार होता है। 'क्या' सवनाम का प्रयोग स्वरुप में या मनात साय होता है। बात्र प्रयोग म क्या मवनाम जानवरा तया अप्राणीवाचक वस्तुओं का निर्देश करता है। मना गा माप उसवा प्राणीवाचर तथा अप्राणीवापर दाना के माय प्रयोग होता है तथा वस्तु को विशपता बजाय वह सामा यता का निर्देश करता है। जैम (१) (अन्न) यह क्या है ? (उत्तर) यह कुना है। (२) यह क्या पुस्तक है ' (३) यहाँ क्या आगमी है दोन प्रश्नवाचक सरनाम प्राय व्यक्तिया विषय म प्रयुक्त हाता है । यह मवनाम मा स्वतत्र रूपम या व्यक्तिवाना मना ग माप व्यवहृत होता है । जैम (१) (अन) यह वोन है ? (उतर) यह हमाग गिभर है। (२) आज कोन विद्यार्थी अनुपस्थिा है 'पा तथा कौनमा प्रग्नवाचक मवनाम वहुधा मला व माय प्रयुक्त हात है। क्मा मवनाम वस्तु के गुण का बोध कराना है। 'कौन मा मवनाम का प्रयाग तब होता है जब अना ए सा वस्तुमा म म पिसी का निगमाना भीष्ट हाता है या जब सनर प्रमका का पता रगान की इनोता है। जैसे (१) (प्रश्न) यर कमी पैमिर है ? (उत्तर) या पमिल है। (२) (प्रान) यह कौनमी किताव है ? (उ०) वर ग्लिोरी किताब है। (३) तुम्हारे पर का नम्बर दोन सा है? कितना प्रनवाचर मवनाम स्वतत्र पम या मताने माय प्रयुक्त हा मकना है । जम (१) यह विनों का मालूम है ? (3) कमर म रितुना मजें हैं। १ ?
८२ साथ या स्वतत्र रूप म प्रयुक्त हा सस्ता है । जैस (1) मव लाग (1) आज मब उपस्थित हैं। शप निश्चयवाचव मवनामा का प्रयोग सना शब्दा के माथ होता है। आप स्वय खुद सवनाम सना गब्दा तथा पुरंपवाचन मवनामा के माथ प्रयुक्त होत हैं। 'तमाम समूचा सारा' 'हर प्रत्यक क्वल सना नदो के साय व्यवहृत होते हैं । गणनीय सना गब्द सब तथा तमाम सवनामा के साथ प्रयोग म बहुवचन म होता है जबकि हर प्रति, प्रत्यक मवनामा के साथ एकवचन मे । प्रति सवनाम प्राय त्रियाविगपणायक ग ममुदाय म प्रयुक्त होता है । जमे प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति । तमाम समूचा , 'मारा हर प्रति प्रत्येक मवनाम जपन विगोप्य से पहले प्रयुक्त होते हैं। आप तथा स्वय मवनाम विगेप्य में पहले या पश्चात कही भी प्रयुक्त हो सकते हैं । जसे मैं आप हम खुद खुद म व स्वय यसब सवये। अनिश्चयवाचक सवनाम अनिश्चयवाचक मवनाम अज्ञात अनिश्चित यक्तिया तथा वस्तुजा और उनका विपताआ का निर्देश करते हैं इमलिए उनव अप स्पष्ट नहीं हान हैं। अनिश्चयवाचा सवनामा का रिग नहीं हाता है। अनि चयवाचक सवनामा का प्रयोग या सना शश के माथ हाता है या स्वतत्र रूप म । व मटा विरोप्य मे पूर्व प्रयुक्त होते है । कोई तथा कुछ अनिश्चयवाचक मवनाम एरवचन म या बहुवचन अथ में प्रयुक्त हा सक्त है रितु कई चद तथा वाज कवर वहुवचन अथ म प्रयुक्त होत हैं। पद चन्द तथा बाज पेवर गणनीय मना श दा के साथ इम्नेमाल हान है। कुछ तथा काइ गणनीय तथा भगणनीय दाना ही सज्ञा गन्ना माथ व्यवहुत हा मक्त है। गणनाय मना गर कुछ कई अनेक चद तथा 'वाज सवनामा व साथ मदा बट वचन म प्रयुक्त होते है । जस वुछ पुस्तमें कई (चट बाज) रडवे । सयुक्त सवनाम भयुक्त मवनाम पृथक श्रेणा के मवनाम है । वम जपन गर्थो क अनुमार सयुक्त मननामा का ऊपर वर्णिन यवनामा के क्मिी न किमी भद म ममावत हा मरना है परतु मवनामा + मय भना स उनका भिनता इसलिए है क्याकि उनम एक गद नही बल्कि एक से अधिक गब्द होते है। सयुक्त सवनाम स्वतत्र रूप से या सना-शब्ना के साथ भी प्रयुक्त होते है । मयुक्त सवनामो का निर्माण होता है- (क) जो सब हर सवनामा तथा 'और विशेषण के साथ कोई तथा कुछ अनिश्चयवाचक सवनामो + मयाजन से । जसे जो कोई 'सब कोड, 'हर कोइ, 'और कोई, कोई और जो कुछ' सब कुछ और कुछ' कुछ और । (ख) कोई तथा कुछ अनिश्चयवाचक सवनामा के साथ एक मय्यावाचक तया भा निपात के मयाजन से। जैसे कोई एक, 'एक कार्ट 'कोइ भी कुछ एक , कुछ भी । (ग) हर' निश्चयवाचक सवनाम के साथ एक सख्या शब्द के सयोजन से। (घ) को तथा कुछ जनिश्चयवाचक सवनामो की पुनरक्तिया में जिनके बीच 'न निपात होता है । जस कोई न कोई, कुछ न- कुछ। (ड) काई तथा 'कुछ अनिश्चयवाचक मवनामा की पुनरलिया स । जस काइ-बार कुछ कुछ। वाक्य मे सवनामो का काय मवनाम एमा विशेष गत भद है जिमका सना गदा विशेषणा और सम्या-या के माय मम्बध हाता है । अपन विकारी रूपा, ऊपर वणिता मे सम्बया नथा वाक्य म अपन कार्यों के अनुमार हिदा में मवनामा के निम्न- लिमित तीन प्रकार हैं- 'सना मवनाम, विगेपण सवनाम तथा 'सम्या मवनाम । हिदी म वहुधा एक ही सवनाम वाक्य म अपने काय के अनुसार सना गवनाम या विशेषण मवनाम के रूप म प्रयुक्त हा मक्ता । जम (1) कौन आया 7 (1) कौन आरपी आय है ? (1) एमा वा घर म न आन दा । (av) मा घर मुये पमद है। सजा सवनाम वाक्य म मनागा या निटंग करते है। उनम समाविष्ट हैं- (1) मारे पुरपवाचर मवनाम । (म) 'कौन तथा का प्रावाचा मवनाम ।
- (ग) 'आप निजवाचक सवनाम । (घ) निजवाचक मवनाम के य म प्रयुक्त 'अपना' स्वामित्ववाचक सवनाम। (ड) जो सम्बन्धवाचक मवनाम । (च) 'सर , 'हर हर एक 'प्रत्यक निश्चयवाचक सवनाम । (छ) 'कोर्ट और कुछ अनिश्चयवाचक मवनाम । कुछ सवनाम को छोड़कर मव सना सवनाम कारव' म विकारी होते हैं । सना सवनामा का अपना कोइ लिंग नहीं होता है। सामान्य कारक म एकवचन म बदलत हैं केवर उत्तम तथा मध्यम पुरुष के पुरगवाचक सवनाम । असामा य कारक म 'कोई' बुछ' तथा आप सवनामो को छोड़कर सबके बहुवचन रूप हान हैं। विशेषण सवनाम वाक्य म विशेपणो तथा अमवाचन सत्यागना का निर्देश करत है। दिगेपणा की तरह वे वाक्य मे प्राय सना ग दो क माथ प्रयुक्त होत है। उनमे परिगणित होते है- (क) इतना तथा उतना सवनामा को छोड़कर शेष निर्देवाचक सवनाम। (ग्व) क्तिना सपनाम को छानकर अय प्रश्नवाचक सदनाम । (ग) स्वामित्ववाचक भवनाम । (घ) जितना' सवनाम को छोकर अय सम्म वाचक सवनाम । (इ) निश्चयवाचर मबनाम । (च) 'कोई तथा कुछ अनिश्चयवाचक सवनाम । मयुक्त सवनाम सना भवनामा या विरोपण सवनामो की भाति वाक्य म प्रयुक्त हो सकते हैं। सस्या सवनाम चाक्य म सग्या गदा का निर्देश करते है। गणना वाचा सख्या गरा की भानि व वास्य म उद्देश्य कम तथा गुण निगव के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं। मन्या सवनामा म परिगणित हान हैं (4) इतना नया 'उतना निर्देशवात्रा मवनाम । (ख) स्तिना प्रश्नवाचक मवनाम । (ग) पई 'अनेक च तथा वाज अनिश्चयवाचर मवनाम ।
सर्वनामो का विकार सज्ञा-सवनामो का विकार सना सवनामा के विकार में भी वही नियम रागू होते है जो मनाओ के विकार मे रागू होते है। तदनुसार सता सवनामा के सामा य कारक मे रूप विभक्तिचिह्ना के बिना होत हैं तथा असामाय कारक मे रूप विभक्ति चिह्नो के साथ प्रयुक्त होते है । परतु मना सवनामा के विकार की निश्चित विपताएँ हैं- (क) उनके मम्वोधन कारक होते हैं । (ख) उनके सामा य कारक रूप सामा य कारक स्पा से बहुत भिन होो है। (ग) कुछ सज्ञा सवनामा के विशेष बटुवचन असामा य कारक रूप होते हैं जो न विभक्नि चिह्न के साथ प्रयुक्त होत हैं । (घ) अधिकतर सना सवनामा का क्म कारक होता है जिसम एक वचन में 'ए कारकात प्रत्यय होता है तथा वहुवचन मे 'ए या 'हे कारकात प्रत्यय होते है। प्रयोग के अनुसार यह कम कारक को' विभक्तिचिह्न सह्नि असामा य कारक रूप के समान होता है। इस प्रकार सम्बोधन कारव के अभाव के होत भी 'आप' मव', कोई' तथा कुछ मवनामा का छोडकर गोप सना सवनामा के तीन कारक होते हैं सामाय कारक, असामा य कारक और कम कारक । सना-सवनामा का सामान्य कारक स्प शब्दकोश म दिया गया रूप होता है। असामा य कारक विभक्तिचिह्ना के साथ प्रयुक्त सवनामो का रूप होता है। मवनामा के अमामा य कारक रूप का प्रयोग स्वतत्रम्प से नहीं होता है उनके अथ का निर्धारण उम विभक्तिचिह्न द्वाग होता है जिसके माथ व प्रयुक्त होत हैं। धम पारक स्वन त्र म्प से विभक्तिचिह्ना के बिना प्रयुक्त हाते हैं। वह मम्प्रदान और कम का अथ देता है। .
पुरुषवाचक सवनाम कारक उत्तम पुरुष मध्यम पुरुष अय पुरुष एकवचन बहुवचन एक्वचन बहुवचन एक्वचन बहुवचन हम न तुम यह वह य, मुझ हम तुम इस उस इन उन सामान्य वारक जमामा य कारक ने के साथ प्रयुक्त अमामाय कारव मैं हम तुम तुम इम उमइहा उन्हा कम कारक मुष हमे तुझे तुम्हे इसे उसे इह, उह उपरोक्त तालिका में पता चलता है कि आप पवनाम व विकारी रूप नहीं होत है। हम तया तुम उत्तम तथा मध्यम पुम्प वाले मवनामो क असामा य नारकप उनके रूपो के समान होत है। ने दे माथ प्रयुग्न उत्तम तया म यमपुस्प वान मवनाया के मामा य कारक ए भा सामा य कारक व समान होत है। जय पुष्प वा सवनाम यह तथा वह तथा वे न के साथ विप जमामाय कारक रूप म प्रयुक्त होते है। इसक जलावा उखनीय बात यह है कि दानो वचना के उत्तम तथा म यमपुरुष वाल पुरपवाचक सवनामो का असामा य कारक स्पउन जग्लि विभक्तिचिह्ना व माथ प्रयुक्त नहीं होता है जिनवा पूर्व भाग होना है के या पी' विभक्तिचिह्न । उक्न पुम्पवाचक सवनामो के जमामा य कारक स्प के स्थान पर स्वामित्ववाचक सपनामा का प्रयाग हाता है। 'क्या' तथा 'कौन' प्रश्नवाचक सवनाम कार एकवचन बहुवचन क्या क्सि कौन किम क्या किन किन सामायकारक जमामायकारक ने के साथ प्रयुक्त असामायकारक कम कारक क्सि दिसे किहा विहा विह विम विह जसारि आर दा गर्द तारिका से स्पष्ट है क्या तथा कौन सवनामा के विकारी प एकम हाते हैं। बहुवचन म उनका विरोप अमामान्य कारक कए है जो केवल न विभक्तिचिह्न के साथ प्रयुक्त होता है।
प्राप' निजवाचक सवनाम 'आप' निजवाचन मवनाम का कम काम नहीं होता है और उसका अमामा य कारक माप प्राय मामा य कारव कप जैसा होता है। उदाहरणार्थ, आपका,आपम, आपम । कभी-कभी आप मवनाम का पुराना नमामा य वारक प 'आप' प्रयुक्त होता है । इस पुगन ५ का प्रयोग केवल 'का' तथा 'म' विभक्निचिहो के माथ होता है । जैम आपस का, आपस म। जमा उल्लेख किया जा चुका है निजवाचर भवनाम का काय बहुधा किसी भी विभक्निचिह के साथ 'अपना स्वामित्ववाचक सवनाम का अमामाय चार कर रहा हाता है। जम अपन का जपन स, अपने म । आप तथा 'अपना मवनाम दानो वचना के अर्थो म प्रयुक्त होत हैं तथा व दाना ग्गिा में नोना पुग्पा म सम्बधित हो भक्त हैं। 'आप तथा 'अपना एक माप प्रयोग में दोनो सवनाम अपन अथ का अतिशयता का प्रकट किया करत है । जम अपने आप का अपने आप स । जब अपना मवनाम मना-मवनाम को भाति प्रयुक्त होता है तब उसका विकार आवारात समागा समान होता है। कारक एकवचन बहुववन अपन सामान्य कारक अमामायकारक मनोवन कारन अपना अपने अपना । अपने। अपना अपना। 'जो सम्बधवाचक सवनाम कारक एकवचन सामाय जो जिम बहुवचन जो जिन अमामायकारक न' साथ प्रयुक्त जिम जिहा अमामायकारक पम पारक जिह माय पुरुप वाले मवनाम नया 'क्या और दोन' नवाचर भवनामा की भांति जा' सम्बधवाचक सवनाम का 'ने विभक्ति चिह्न के साथ प्रयुक्त होने वाला विशेष सामाय कारव रूप है। निश्चयवाचक सवनाम सज्ञा मवनाम के रूप में प्रयुक्त 'सब निश्चयवाचक सवनाम के दो कारक होते हैं। मामा य कारक तथा असामाय कारक । जैसे मव, सबों। सवनाम विभषितचिह्ना के साथ मामा य वारक के प म भी प्रयुक्त हो सकता है । जसे सरको, मवरे साथ इत्यादि। हर हर एक प्रत्यर निश्चयवाक मवनाम अविकारी होत हैं। परतु सब अनिश्चयवाचक सवनाम सना मवनामा के रूप में प्रयुक्त कोई अनिश्चयवाचक सवनाम के असामान्य कारक का एक्वचन तथा बहुवचन म एक ही रूप होता है। "मी रूप का उपयोग ने विभक्तिचिह्न के साथ भी होता है। जैसे सामाय कारक है कोई और असामा य कारक है क्मिो' । 'कुछ अनिश्चयवाचक सवनाम अविकारी है। विशेषण सवनाम का विकार विशेषणा की भांनि विशेषण मवनाम विकार की विपनामा के अनुमार विकारी तथा विकागे दो तरह के होन है। विकारी विरोपण सक नाम अपन विशेष्य सनाशदा के अपने पदान 1 अविकारी विशेषण सव नामों के रूप परिवर्तित रहते हैं। विकारी विशेषण सवनामा म ममाविष्ट हैं निम्नलिखित मवनाम- (क) 'यर वह , ये वे ऐसा' तथा वमा निर्देवाचर मवनाम । (ख) 'क्या बौन क्सा तथा कौन सा प्रश्नवाचक सवनाम। (ग) मरा नरा हमारा तुम्हारा तथा अपना स्वामित्ववाचा मबनाम। (घ) जो नया जमा सम्बधबाचा सवनाम । (ड) ममूचा नवा मारा निश्चयवाचर सवनाम । (च) कोई अनि चयवाचक सवनाम । अविवारी विशेषण सवनामा म ममाविष्ट हैं निम्नलिखित- (4) आप, स्वय , 'खुद 'मब तमाम', हर', 'प्रत्यक निश्चय ८ , वाचक मर्वनाम। (ख) 'कुछ' अनिश्चयवाचक मवनाम । 'यह , 'वह ये', वे तथा 'जो विशेषण-मवनामा का कारक म्प अपने विशेप्या के अनुसार वदग्ना है। 'एमा' "वमा', कैमा', कौन मा, मेरा' तरा 'तुम्हारा, हमारा', 'अपना 'जैमा', 'ममूचा', 'मारा विरोपण सवनाम अपन विध्य सना शब्दा पं अनुमार आकारात विकारी विपणा की भाति लिंग, वचन तथा कारक म बदलते हैं। जम ऐमा रहका ऐमे रडके ऐमी लडकी एसी र डरिया एमे रहके को, एमी रडकी का मेरी पुम्नक मेरी पुग्नक, मेरी पुस्तक म। कोई विशेषण मवनाम अपने विरोप्य मना श द के अनुमार प्राय कारक म बदलता है। निर्देशवाचक सवनाम 'यह', 'वह' य' तथा वे निर्देशवाचक मवनामा के केवल दो कारक हार हैं-मामाय वारक तथा अमामा य कारख । कारक एकवचन बहुवचन मामायकारक य यह वह इस व असामायकारख उस उन - 'एमा तथा उसा' निर्देवाचक मवनामो के दो कारव हान है- मामाय बारव तथा सामा य कारक । पुल्लिग म दोना वचना का कारक म्प बहुवचन के मामाय कारक म्प के समान होता है । स्त्रीलिंग मे दोनो वचना म ई अत्य प्रत्यय सामाय है। कार एकाचा बहुवचन पुल्लिग स्त्रीलिंग पल्लिग स्त्रीलिंग सामायबारक एमा एमी एमे ऐसी वैमा वमी वसे वमा असरामाय कारव एमे एमी एमे एमी बम वमी बसे वमी प्रश्नवाचक सवनाम 'क्या तथा कौन प्रश्नवाचक सवनामा के दो कारक हान है-मामान्य तथा जसामाय । 'क्या तथा 'कौन मवनामो के असामाय कारक एक जसे होते हैं। कारक एकवचन बहुवचन मामा य वारक क्या कौन क्सि विम क्या कौन विन किन जसामायकारक क्मा तथा कौनमा प्रग्नवाचक भवनामा + भी दो कारक हाते हैं-सामा य तया अमामा य । इन सवनामा स्प भी एमा तथा वमा' निर्देशवाचक मवनामा की भाति बरत हैं। स्वामित्ववाचक सवनाम मरा, तरा' हमारा तुम्हारा तथा जपना स्वामित्ववाचक सवनाम मना गटाके माथ तीना कारका अथात मामाय असामान्य और मम्बोवन वारका मे प्रयुक्त हा सकन हैं । मामाय तथा सामाय कारक म य सवनाम वे अत्य प्रत्यय ग्रहण कर रत है जा एमा तथा 'वमा निर्देशवाचक मवनाम ग्रहण किया करत हैं । सम्बावन कारक मे उनक अत्य प्रयय अमामा य कारक के अत्य प्रत्यया जम होत है। कारक एकवचन बहुवचन पुल्लिग स्त्रीलिग पुल्लिग स्त्रीलिंग मामा य कारव मेरा मरी मेरा अमामाय कारक मेरे मंगे मर मरी मम्वाधन कारक मरे मरी मरा --- तरा हमारा तुम्हारा तथा अपना स्वामि ववाचक सर्वनाम मरा मवनाम की तरह अपन कारक म्प वनस्त हैं। जब स्वामिववाचक मवनामा का प्रयोग जनि- विभक्निचिह्ना के माय होता है तर जनिर विभक्ति चिह्ना के पूर्व भाग + या की का रोप हो जाता है और स्वामि ववाचक ६१ विभक्ति चिह्न का पूर्व भाग के विभक्तिचिह हा या स्त्रीलिंग 'इ अ य जत्यय ग्रहण कर लेत हैं वसत जटिल विभक्तिचिह्न का पूर्व भाग की विभक्तिचिह्न हा। जस मरे पास (के पास) । हमारी आर (की जार)। सम्वन्धवाचक सर्वनाम 'जा' सम्बधवाचा सवनाम के दो कारक होत है सामाय नया असामाय। कारक एक्वचन बहुवचन मामायकारक जो असामायकारक जिम जसा सम्बधवाचक सवनाम एसा' तथा वैमा निदेवाचा सपनामा की भाति नारसा प अपना रूप बदरत है। निश्चयवाचक मवनाम समूचा तया सारा' निश्चयवाचक सवनामा केप कारको म एमा' तथा वमा' निर्देवाचक सवनामा की भाति बदलते है । 'कोई प्रनिश्चयवाचक सवनाम 'बोई अनिश्चयवाचा मवनाम के दो कारक है सामा य तथा सा माय। मामाय कारक के दानो वचना में उसका स्प हाता है 'कोइ किन्तु अगामाय वारस एक्वचन म क्सिी' तथा बहुवचन म मिही हाना है। जम कोई पुनर, काइ पुस्तर । विमा पुस्तर में किही पुस्तका म । सयुक्त सपनामो का विकार 'काइ वे माय निर्मित सयुक्त सपनामा दावार हात हैं-सामाय तथा अमामायाजस सवनाम सामाय कारक एकवचन असामयकारक एक्वचन वहवचन जिम मिमी जिन किमी मव विसी जो कोई बहुवचन जा कोई मर वाई जा काइ सब वा हरवोद - हर किमी सवनाम सामाय कारक एकवचन बहुवचन और कोई और कोई और कोई को और कोई और वाई और दूसरा कोई दूसरा कोई दूसरे काई असामय कारक एक्वेचन बहुवचन जौर विसी और दिहा किमी और दूमरे क्मिी दूसरे किहा क्सिी दूसर विही दूसरे विही जोर कोई दूसर मार्द दूसरा कोई एक कोई दूसरा कोई एक किसी एक एक काई एक कार्य - किही भी सब कुछ एक क्मिी काई भी का भी कोई भी किमी भी कोई न कोई काइ न काई काई न कोई किमी न किमी किही न विही पाई काई काई काई काई काइ क्मिी किसी किहा किही कुछ के साथ निर्मित सयुक्न मवनाम । जस 'जा कुछ 'और कुछ इत्यादि । इन विकारी स्प नही हात हैं। हर एक मयुक्त मवनाम भी विकारी है। सख्या सवनामो का विकार सम्या मवनाम जपने विकाग की विगपताआ तथा वाक्य म उनके काय के अनुसार होन (क) विकारी। जम इतना उतना कितना जितना । (ब) आशिर रूप मे विकारी । जस बनक तथा बाज़ । (ग) अविकारी | जसे 'चद । स्वतत्र प्रयोग म इतना , उतना कितना तथा जितना सरन्या सवनामा का विकार आकारात सना शट का भाति हाता है । मना श दा क साय प्रयोग म उनके लिंग वचन तथा कारक जपन विरोप्य के अनुसार हात है। जमें इतना दूध इतनी रागि इतन घर इतनी कापियाँ इत्यादि। उद्देश्य के प म भी उक्त रया मवनाम प्राय उम मना गर वा गि ग्रहण करते हैं रिमका बनिग करत होत ह । जस (1) आज दो विद्यार्थी अनुपस्थित है कर भी उतने अनुपस्थित थे 1 () मर पाम पाच पुस्तक हैं आप पास कितना कई कई जनेक तथा वाज सग्या सवनाम म्वतत्र प्रयोग म (अथात उद्देश्य तथा वम के म्प म) कारण म जपना रप बदलत हैं। सजा गया के साथ प्रयोग में कारक म वे अविकारी होत 'हैं। जसे कई (अनेक, वाज) औरतें । कई (अनेक वाज) औरता के लिए। 'चद सरया सवनाम स्वतत्र या मना शब्दा के साथ प्रयोग म अविवारी ही रहता है। जव 'क', 'अनक तथा 'वाज सय्या सवनाम वाक्य मे उद्देश्य का काय करत है तब उनका विधेय बहुवचन म होता है । जैसे का (अनक बाज) आज आये है, कई कर । मना शदा के साथ प्रयोग म 'इतना उतना' क्तिना' तथा 'जितना सस्या-सवनामा के दो कारक होते हैं-सामा य तथा असामा य । उनके वहीं अ य प्रत्यय होत हैं जो एसा' तथा 'वैमा' निर्देशवाचर सवनामा के हात हैं । उसे कारक एकवचन बहुवचन पुल्लिग स्त्रीलिंग पुल्लिग स्त्रीलिग सामाय वारक इतना इतनी इतने इतनी असामाय कारक इतन इतनी इतने इतनी 'उतना, क्तिना' तथा नितना सध्या मवनाम सज्ञा गदा के साथ प्रयोग म इतना सवनाम की माति बदलत हैं। स्वतन प्रयोग म इतना 'उनना , "क्तिना तथा जितना सस्या-सवनामा पेदा कारक हात हैं-सामाय तथा असामाय । जैस कारक एक्वचन बहुवचन मामाय कारक इतना इतन अमामायकारक इतने इतना प सवनाम -तन की भाति अपने Fप बदलत हैं । कई अनक तया 'वाज साया सवनामा के दो कारक हान हैं-- मामाय तया जमामाया मामाय वारक अनव 'बाज़ । अमामाय कारक-या अनेरा, 'बाजा । परन्तु उक्त सबनाम विभक्तिचिह्ना के साय कमी-कमा सामाय कार के पम भी व्यवहृत होते है। . सवनामा + निश्चयार्यक रूप नामो तथा जो मम्द धवाचक सवनाम के निश्चयाथव रूप हात हैं जा एकवचन म ही तथा ई निपाता के योग से और बहुवचन म ही तथा इ' निपाता के योग मे बनते हैं । निश्चयाथक रूप में उक्त सवनामा का प्रयोग स्वतत्र रूप से या मना गा के माथ होता है। अयपुम्प के मवनामा तथा निर्देवाचक सवनामा के निश्चयाथक रूप एक्मे होते है। एकवचन सामायकारक असामायकारक बहुवचन सामा पकारक असामायकारक मैं ही तुझा जाही मुथी हम ही, हमी हमी तृ ही तुम्हा तुम्ही तुम्ही यही दमी य ही, इही वही उसी वही जो ही जिसी जिहा उत्तम तथा मध्यम पुम्प के सवनामा अमामाय कारव के एक्वचन मे निश्चयाथक रूपा मुझा तथा तुया को छोड वरके सवनामा के उक्त मार निश्चयाथक म्प असामाय पारक म ने विभक्तिचिह्न के माथ भा प्रयुक्त हात हैं । उत्तम तथा मध्यम पुस्प र सवनाम एक्वचन में न विभक्तिचिह के माथ प्रयोग म अमामा य कारव व प म व्यवहृत हात है । जसे मै ही न यह कहा । तू ही ने यह काम किया। सब मवनाम का निश्चयाथव प नै मभी । वह स्वतत्र रूपम या सज्ञा गदा माय प्रयुक्त होता है ।
क्रिया किया म ऐमे शरदा का समाया होता है जो व्यापार या अवस्था को ध्यान करते हैं। वाक्य म क्रिया मुख्य रूप से विधेय का बाय किया करती है। इसलिए क्रिया के विधेय सम्बनी विरोपप है-~-प्रकार (मूड), काल, विधि (ऐम्पक्ट) वचन, पुरप इत्यादि। वस्तुस्थिति प्रति व्यापार र मम्ब धा का व्यक्त करन के लिए हिती म जिया के चार प्रसार होत हैं नि चयापा, मानायक, सम्भावनायर तथा मस्ताथक। नियामप्रसारा के साथ हिदी म कार का घनिष्ट सम्बध है। कार किया रे व्यारार के समय के माथ त्रिया व व्यापार या अवस्था का सम्ब व्यक्त करता है। त्रिया विभिन प्रशारा नियापद भद जग-अलग साया वार हैं । निश्चयाथा प्रसार म १५ प्रियापरव भेट है। सम्भावनाथन तथा सक्ताय प्रकार म चार चार नियापन भेद हैं । आनाया प्रचार म विया विशप भद है। हिदी मरिया र दो वचन होत हैं. एरवचन तया बहुवचन । प्रत्यय वचन के तीन पुस्प होत हैं-उतम, मध्यम और अन्य । पापारने वम की दष्टि स प्रियाएँ होती है भरमा तया अक्मर । मरमर रियामा व माय प्रधान कम हान है जा उस वस्तु का व्यक्त परत है निग पर व्यापार का प्रभाव होता है, जम पानी पीना, या उम वस्तु का यन बने हैं जो व्यापार वापर होती है । जस पर वनाना। उन प्रिया ने साथ प्रधान रम नहीं आता है जा एम व्यापार या अवस्था को स्पस्त करता है जिनका प्रभाव दूसरा वस्तुपर नहीं होता है । जस Pा पाना पहुँचना आलि । इस प्रकार वो पियाबा म समाविष्ट हाना हैं बत वाच्य और कमवाच्य । जम पढना, पढा जाना। लिखना, रिखा जाना। (च) प्रिया का सामाय रूप मामा य त्रिया विधेय का काय कर सकता है। एसा तब होता है जब क्रिया के यापार की प्रेरणा, जाना या निषध व्यक्त करना हाता है। जसे आज ही यह वरना । वहा कभी मत जाना। (छ) क्रिया के मामाय रूप म एसी वाक्यरचना बनती है जा अथ' के अनुसार पिया के पुरुषवाचक स्पा की भाति होती है । जस दानी * सब बाल मफेट हो जाने के बावजूद गगा न चिगगदान क बाप न दुलगनी का पहचान लिया । हिदी म प्रिया का सामा य रूप व्यापार का निरश करने के साथ माय कियाथक भाववाचक सना भा हाता है। जमे जाना खाना पाना। क्रियाश्रर भाववाचक सना हात हुए त्रिया मामा य प वी सजा सम्बया निम्न विशेषताएँ है- (क) क्यिा के सामा य रूप का रिंग होता है पुल्गि। (स) रिया सामाय Fप के दा कारक होते हैं मामा य कारक नया असामाय कारक ।कारका म रिया । सामाय रूप बदलते हैं कवल एक्वचन मा त्रिया मामायरूपमामायकारक काजत्य प्रत्यय उमो हिदी गदकोप म दिय रूप जमा होला है । उमर असामा य कारक काय प्रत्यय होता है । जा हिंदी के जाकागत सना राग के एक्वचन अमामा य कारव सत्य प्रत्यय की भांति है। जम खाना खान। (ग) असामाय कारव म क्रिया का मामा य रूप उही विभक्निचिह्ना के साथ प्रयुक्त होता है जो सवाणा व साथ प्रयुक्त होत है । जमे खाने का खान का खान के लिए त्यादि। (घ) क्रिया के सामाय रूपा क साय विशेषण गवनाम तथा सनागर का प्रयोग हो सकता है । जम मुझे अच्छा पढना पमद है। मरे आन से वह प्रसन हुआ। गम के जाने म काम म बाधा पहुँचा। (ड) क्रिया का मामाय म्प वाक्य म वह काय मा कर मरना है जा मज्ञानर करत है। जग (उग्य) नहाना अच्छा है।
९६ - उन - चिडियो के चहचहाने ने मुये जगा दिया । (गुण निर्देशक)- लिखने की मेज ! (विधेय के नामिक अग)--विद्यार्थियो का क्तव्य पढना है। (विशेषताबोधक)-पति के आने पर भी वह औरत चुप न रही। क्रिया के मामाय प म त्रिया तथा मना सम्बधी विपताआ + माय-माथ उमको विरोपण मम्बधी विगपनाएँ भी हैं। क्रिया के सामाय म्प में विशेषण मम्बधी विशिष्टताएं देखन म आती है उद्देश्य के म्प म नियाआ क माथ सयाजना में तथा क्रियानामिक गदसमुदाया म जो व्यापा का आरम्भ या ममाप्नि मूचित करत हैं (आरम्भ हाना गा होना आरम्भ वरना, तुम करना, मत्म होना सत्म करना पड हाना, वद करना छाडना आदि), चाहना तथा पमद करना जमी क्रियाआ क साथ मयाजना म और बाध्यनामूक तथा आवश्यक्तामूलक वाक्या में। क्रिया का मामा य प रिंग तथा वचन म उम उद्देय के अनुसार हा सकता है जो मामा य कारक म मनारा द म व्यक्त होता है वगर्ते विधेय म जक्मक पिया हो और गिग नथा वचन म उम प्रधान कम के अनुसार हा जा मामा य कारक म सनागल से व्यक्त होना है वार्ते विधेय म किया सवमा हो । निया के मामा य प लिंग तथा वचन म सनागद के अनुसार हात हा आवारान विषणा की भाति बताते है । जम (१) दाना तरफ के दरवाजे बाद हान बहतर है । (२) इतन गद याद करन मुदिकर हैं। (३) बमाग्व के महीन म बन क्रन गु हो जान है । () उसन कविता पढनी गुरू की। (५) गाव भर न उमम वान करनी छोट नी । (६) मैं उमको एक चिटठा भेजनी चाहती हैं। (७) दीदार चाई म कम होनी चाहिए। (८) यह रिपोट पह अपर तक रचनऊ पहुँच जानी चाहिए। (६) आ7 मुझे बनुन काम करना है। (१०) इमक गिा अपना नमाम गस्तिया जमा करनी आवग्यर क्रिया की धातु क्रिया के मामाय म्प स च ना प्रयय पृया दिया जाय ता क्रिया मे पातु गप रही है । म 'पना वो धातु है पर ग्विना' का धातु है मि और वारना का धातु है पर । वित्रा की धातुएँ हाता हैं नव्युपन नया पुतान । गम अव्यु पन धातु वितु पढा नया परदा है युपन धातुए। पिसाना को ज पुरन धातु प्राय म्बोरिसा भावराचा मतामा वा पर .
१०० पढ़ भांति प्रयुक्त होना है । जैम ममझ चमक र आदि । रियानो की अनक धातुजा ने मूत जय ग्रहण कर लिय और इसके माय ही वचन भी । जस माग --मागे 'लूट-लूटें। सिद्धातत क्रिया की प्रत्यक् अव्युत्पन वातु भाववाचर माग द की भाति प्रयुक्त हो सकती है, परनु वतमान हिरी भाषा म किया की अनक अव्युत्पन धातुजा का प्रयाग सनाश दो की तरह नहा हाता है। जमे लिख, कह । रिया की युत्पन धातुएँ त्रियाथक सनाश दो की भांति कभी भी प्रयुक्न नहा हाती हैं उनसे क्रिया के अपुरुषवाचक तथा पुरुषवाचय' म्पा का निमाण हाता है । इस प्रकार का घातुमा मे समाविष्ट हाती है व सामा य नामिक क्रियाओं की धातुएँ जो ना अत्य प्रत्यय द्वारा बनी होता हैं। जैस बदलना-बदल । विचारना-विचार। वास्तव में उक्त नियाआ की धातुए मूल समाशब्द के व्यावरणपरक समनाम गल हैं जिसम स्वतत्र प्रयोग में अपन म निहित स्वरूप चिह्न बने रहते हैं । जस दग्ना क्रिया की धातु है डर । यह डर पुल्लिग सनाश की भानि प्रयुक्त होता है क्याकि इसमे निया बनने से पूर्व उसका पुल्लिंगवाचा प्रयोग हा था। परीदना निया की धातु है खरीद । यह खरीद स्वतत्र प्रयोग म स्त्रीलिंग है कि तु वह स्त्रीगि इमलिए नहीं है क्याबि वह धातु है प्रत्युत इस लिए है क्याकि वह अपने से बनी खरीदना त्रिया म पूव स्त्रीलिंग थी। व्यु पन्न नथा जव्युत्पन दोनों प्रकार की क्रिया की धातुएँ पूर्वकालान वृदन्त तथा आनाथक प्रकार के एक्वचन मध्यम पुरुप के रूप में मिलती जुलती होती है। जस घरा म लोग आग 4 चारा तरफ बठ तम्बाकू पी रह थ । उठ बोल | जा। पिठा। क्रिया की धानुआ स निम्नलिखित का निर्माण होता है मामाय बतमानवारिक कृदन्त मामा य भूतकारिक कृदत, सातत्यवोधक कृदन्त प्रथम भविष्यतवार सम्भावनायक प्रकार का सामा यम्प याज्ञायक प्रकार स्प, 'सक्ना तथा चक्ना जपूया श्यिाआ साथ क्यिापरक सयोजन गग्नि बोधक मयुक्न त्रियाए आदि । कृदन्त कृष्न क्रिया का एमा म्प हाता है जिसम एक माय रिया तथा विशेषण दोनो को विपनाएं हाना हैं मलिए कृदत या क्भा-कमा क्रियाथक विशेषण १०॥ कृरत प्रिया का अपुरपवाचा स्प है अन उमरे प्रकार (मूर) तथा पुरुष नहीं होते है । हिदी म कई विस्म के कदन्त है--सामाय वतमानकापि वृदन सामाय भूतकालिद वृक्षत, सयुक्त वतमानकारिक घरत, मयुन भूत- वाग्नि दल 'वारा प्रत्ययात वृदन्त सानत्यायवाग्दि दान आदि । उपरिनिखित कृदता का श्रिया सम्बधो निम्न विशपनाएं है (क) कृदत सक्मद और जकमा दोना ही हा मक्त हैं। मरमर क्रियामा म सरमव कृदन बनत है और अपमा क्रियाना स जनमक वृदन्त । जम (१) विनाव पदनी (हुई) लडकी । (२) चिटटो रिवन वा लडका। (३) पत्नी (हुई) गाडा (1) रिला (हुआ) पूर। (२) नाम कर रहे मजद । (६) हो रहा मम्मेलन । (ब) सामक कृता के माय प्रधान वम प्रयुक्न हा मक्ता है । जसे (१) गानको काट पहाती हुई घर मे निकरो। (-) यहा पर माना उगल्ने वा, जमीन है। (ग) कृदना व माय म्यान ममय आदि विरोपनावाधर प्रयुक्त हो मरन हैं। जम (१) तुमका दूकान पर वद गम नहीं आती? (०) वह आज जान वाग है। (३) महा पर माला तक पर हुए दरिया और यी हैं। (घ) अदला के माय प्रिया वे पुम्पचाचब FT के विभक्तिचिह्न हो प्रयुक्त होत हैं । जैम पारी म निकला हुआ नाग। (२) बच्चे वम्त वगाल म दवाय स्वर में वापस आ रय। (३) मनी का पिन म हथियाग्वन को दजाजन दन पारे पति ममयान। (1) रिया की माति मवमा वृदन्ता पदा वाच्य भान-7- वाच्य और रमवाच्या जम क्त वात्र मवाच्य सुनता (हमा) सुना जाता (हुआ) मुना (हुआ) सुना गया सनने वाला सुना जाने वाला कर रहा दिया जा रहा इभरे बगवा स्वयं वदना म वाच्य की विभि ननाएँ पर हाती हैं। रिया में अय के अनुसार वृदन्ना क अथ मा तो स्तृवाच्य हा मरत हैं या वमवाच्य । गवमा तथा अवमय प्रियाओ के मामाय व मयुक्त वनमान कारिक दल, दाग प्रत्ययान वृदन सात पवाधवाबिन्त तथा अरमन रिमाया ऐ मामाय य सयुक्त भूतग्वि वृदत मला पतृ धान्य होत हैं । जैम परता १०२ (आ) आता (हुआ) आया (हा) बग्न वाग, लिख रहा । मस्मक नियाआ | मामा य व मयुक्त मतमालिक कृ त कतृ वाच्य या कमवाच्य म म काई भी हो सकता है। जम (१) पक्डा (हई) निनगे। (0) नाम पाया (हुला) रया। (च) कृदन यापार की पूर्णता या अपूर्णता का रिसात है। मामा य एव मयुक्त वनमान कालिक कृदत तथा मानत्यवोधकाबि कृदन जपूण यापार मूचा हात । जस दखता (हुआ), पहुँचता (हुआ) चर रहा । सामाय व सयुक्न भूनकारिक वृत्त पूर्ण व्यापारमूचक हात हैं । जमे दया (हुआ), पहुचा (हुआ)। वाला प्रययात कृत प्रसग 4 जनुमार या ता जपूण घ्यापारमचा नाता है या पूण यापारमूचक । जम (१) मरन चारा जादमी। (२) म ग्यवर म मग्ने वारे व रिश्तदाग म मी का का पहलू नही निकल था। (छ) कृदन मापत्रिक वाठ का दिखात है। मामा य व सयुक्त दत म्वत पम्प म प्रयुक्त हात ममय एमा कार तिवात है जो प्रिया के पुरुषवाचक म्प स निर्दिष्ट कार मदा हाना है या उमस पूर्व + कार जसा होता है । जम (१) मैंन कर आपको रामनाथ क साथ बातचीत परत (हुए) दवा। (२) उमन पाड़ पर चढे वदूक चलायो । त्रिया व मयुक्न पुग्पनाचा स्पा म सामान्य तथा सातयाधर काल वार कृद त म निर्दिष्ट यापार का कार क्रिया कार में स्पष्ट किया जाता है। जमे मैं परता हू । मैं पटना था । मैं पत्ता रहेगा। य विताव पढा जायगा। वह पर रग है। वारा प्रत्ययात तथा गुणनिशक प म प्रयुक्त सान यवो पर कार वा वृदत व्यापार का कार मदा क्रिया के पुरुषवाचा म्प स निर्दिष्ट व्यापार व कार पर नाश्रित होता है । जम (१) गाति आदोग्न म हिम्मा रन वार हर व्यक्ति वा तकाजा है विदमो मजबूत बनान म कोई कमर न रम । (२) उमन चौयी पचवार्षिक याजना पर हो रही बह्म में भाग लिया। (.) यह प्रस्ताव पाच म रेकर तीम म तक हान वा अधिवान म पास किय जायेंगे। (ज) वाग प्रयया न तथा सातत्यगोधकालिक कृरता को छानकर अय मर कृतना म एमी वाक्यरचना बन जाता है जो जय क अनुसार क्रिया के पुरंपवार म्पा की तरह हैं। जस मुय जदी दौडन (हुए) चाट गा। (२) उम गय (हुए) दो महीन हा गय है।
१०३ कृदन्ना की दिगपण मम्बधा निम्नलिदिन विशेषताएं हैं (क) विकारी विगेपणा का तरह कृदत अपन विगेप्य सनाादक गि, वचन और वाग्क अनुमा म्पान्तरित होत हैं। म वह्ना (हुआ) पानी । गाती (हु) रडकी । खेत (हए) लडवे का। (ब) वास्य म कृदन्त वहा काय करत हैं जा विशेषण क्यिा करन है । अयान गुणनिर्देगर तथा विधेय व नामिक अग के रूप म काय करत है । जन (१) बना पानी साफ होता है । (२) वह आया हुआ है । (३) मैं अपन मित्र ना चिटठी रिस्खन वागहूँ। कतृ वाचक और कमवाचक कृद त जमाथि ऊपर बनाया गया है हिंदी म क्तृ वाचा जोर कमवाचक दो प्रकार व कृदत होत हैं । मक्मक क्रिया मे क्तृ वाचक और कमवाचक कृदन वनन हैं । जनभर नियात्रा म देवर क्तृ वाचक करत वनत हैं। क्तृ वाचक क्दन उस वस्तु की विशेषता को बताता है जा स्वय व्यापार करता है । जैन (१) काम करती (हुई) औरत । (२) खोरता (हुआ) पानी। (२) सोया (हा) बच्चा। (४) किनाव पढन वाला रडका। बतृवाचक कान उस वस्तु की विशेषता बताता है जा अय वस्तु के व्यापार स प्रभावित होता है । क्तृ वाचक कृदत से निर्दिष्ट व्यापार का माधन प्रकट या अप्रक्ट रह सकता है । अगर यह साधन प्रक्ट है तो वह 'म 'द्वारा', की आर स तया इस प्रकार के अय विभक्तिचिह्ना + साय असामान्य कारक के प म प्रयुक्त होता है । जम (१) डाक से भेजा गया चिटठा । (२) पमिळ द्वारा ग्वीचा गया चित्र। (३) मावियत मरवार की आर म भारत का दी गया सहायना। कृदन्तो का निर्माण कतृ वाचक कृद तो का निर्माण (क) मामा य वतमानकारिक कृदन क्रिया की धातु में माप ता प्रत्यय जाग्न स बनता है । जम सामायवतमानकालिक कृदत बोल बाला लिक्ष लिवता क्रिया को धातु पद्धता १०४ लिख पद क्रिया को धातु (ख) सामाय भूतकारिक क्दन्त प्रिया की धातु के साथ 'आ प्रत्यय जोडन स बनता है। जसे क्रिया का मूल रूप सामाय भूतकालिक कृरत बोल बोला लिखा पढ़ा अगर क्रिया की धातु आकारात एकारात ओगरात या ईवारात होता है ता क्रिया की धातु तथा आ प्रत्यय के बीच य वण का जागम हो जाता है । जस सामाय भूतकालिक पुदत आ आया से सेया यो बीया पो पीया (पिया) होना धरना देना लेना जाना, ठानना और मरना नियाआ व सामाय भूतकालिए कृदत उपरोक्न नियम के अपवाद हैं। इन युटता का निर्माण होन समय जभरा म परिवतन निम्नलिखित प्रकार से होता है ओ ॐ म परिवर्तित होता है आ' 'इ' म परिवर्तित होता है 'ए इ म परिवर्तित हाता है 'आ' अ म और अ 'उ म परिवर्तित होता है। वरना , 'ठानना और मरना प्रियाआ से बन वृद ता में कुछ व्यजना का राप होता है जिससे निया की धातु काफा परिवर्तित हो जाता है। जाना प्रिया का सामाय भूत वारिक वृदत 'गया अय त्रिया को धातु स वना है । उदाहरणाथ क्रियाका सामाय स्प सामाय भूतकालिक कृत होना हो हमा करना क्यिा ('करा हिनी बोलियों तथा कविता में प्रयुक्त होता है) देना दिया लिया ठानना ठान दया, ठत्या, मना मुया (कविता में प्रयुक्त होना है) मरा भाना गया क्रिया की धातु लना मरना मा १०५ । (ग) मयुक्त वतमानकारिय कृदत सामाय वनमानकालिक कृदत तथा 'होना मिया के सामाय भूतकालिक कृदत के साथ सयोजन मे बनता है । जमे कमा कासामा य रूप सामा य वतमानकालिय मयुक्त दतमानकारिक कृदत कृत बोलना बोलता बोलता हुआ करना पदना पढता पड़ता हुआ (घ) सयुक्त भूतकालिक कृदत सामाय भूतकारित कृदत तथा होना' त्रिया के सामाय भूतकारिक वृदत के माथ सयोजन स बनता करता करता हुआ आया भेजा हुआ लिया हुआ या का सामाय रूप सामा य भूतकालिक कृद त सयुक्त भूतकालिक कृद त आना आया हुआ मेजना नेजा लना निया (E) वाला प्रत्ययात कृदत प्रिया के सामा य रूप के असामा य पारख के साथ उक्त प्रत्यय के सयोजन से बनता है। जस प्रया का सामाय रूप दिया के सामा य प का वाला प्रत्ययात कृदात असामा कार पढ़ना पढने पढने वाला দিনী लिखने लिखने वाला होना होने होने वाला (च) सातत्यवाधर वृदत क्रिया को पातु के साथ रहना किया व सामान भूतकारिक कृत के सयोजन स बनता है । जैस किया का सामा परप • सातत्यबोधन दत जिया को धातु हेलना चल रहा चल्ना होना हो रहा कमवाचक कृदाता का निर्माण हिराम मवमन रियानों मरगमग मर रनृ वाचर रनों के सम्ब धिन जमवावर ध्यान है ना मामाय भूतारिक वे माथ 'जाना १०६ पढ़ना पढा निया के विभिन वृदता के मयोजन म बनत है। (क) कमवाचक सामा य वतमानकालिक कृदन मक्मक क्रिया के मामाय भूतकालिक कृदन्त के साथ जाना क्रिया के मामाय वतमानकारिक कृदात व सयाजन से बनता है । जम क्रिया का सामाय रूप सामाय भूतालिक कृदत क्मवाचक सामा य दत मानकानिक कृद त पढ़ा जाता भेजना भेजा भेजा जाता छोडना छोडा छोडा जाता (ख) कमवाचक सामाय भूतकालिक त सक्मक प्रिया क सामार भूतकालिक कृत त क माथ जाना पिया र सामाय भूतकालिव कृदन के सयोजन से बनता है । जसे क्रियाका सामा य रूप सामाय भूतकारिक कमवाचक सामाय कृदात भूतकालिक कृदत पढ़ना पा पढा गया मजना मेजा भेजा गया छोडना छोडा छोडा गया (ग) क्मवाचक सयुक्त वतमानकालिक कृदत सकमक क्रिया वे सामा य भूतकालिक दत साथ जाना क्रिया के सयुक्त वतमातरालिक कृदत + मयोजन म वनता है । जस क्रिया का सामrय रूप सामाय भूतकालिक कमवाचक सयुक्त वतमान कदत कालिक कदत पढना पढा पढा जाता हुआ भेजना भेजा भेजा जाता हुआ छोडना छोडा छोडा जाता हुआ (घ) क्मवाचक 'वा प्रत्यया न कृतत मामक क्रिया के मामार भूनकारिख कृत के साथ जाना रिया के वाला प्रत्ययान्त कृदन्त के सयोजन स बनता है । जस क्रिया का सामाय रूप सामाय भूतकालिक क्मवाचक वाला' प्रत्ययात क्दत कदत पड़ना पहा पढ़ा जाने वाला मजना भेजा भेजा जाने घाला १०७ छोड़ना छोडा छोडा जान वाला (८) क्मवाचा सातत्यबोधक कृदत सदमा निया के मामाय भूत मालिक दात के साथ 'जाना' क्रिया के सातत्यवान करत क सयोजन मे बनता है । जैम क्रिया का सामाय रूप सामा य भूतकालिक कमवाचक सातत्यबोधक कदत क्दत पड़ना पढ़ा जा रहा करना किया पढा किया जा रहा कृद त विकार हिंदी में कदत का विकार वदता क प्रयोग पर निभर करता है । सामाय यतमानकालय तथा मामाय भनरारिक कृदन क्रिया के पुरुषवाचक रूपो ने जग हाते हुए क्वल लिंग और वचन म बात है। जाकारात विकारी विपणो सदश अत्य प्रत्ययो के अलावा स्त्रीलिंग बहुवचन म त्रिया के पुरपवाचर रूप म जब कद त सहायक निया में बिना प्रयुक्त होत है तब उनके अत्य प्रत्यय 'इवारात बन जाते हैं । जम दुल्लिग एकवचन वहुवचन एकववन बहुवचन बोलत बोलतो बोलतो, बोलती लिखते लिखती लिखतो लिखता पडते पदती, पद्धती मब प्रकार के करत स्वतत्रस्प से व्यवहृत गाते हुए लिंग, वचन और शारर म जान रुप बदलत हैं। लिंग वचन और वारक म अपना रूप बरते हुए उना साथ वही अत्य प्रत्यय जुडत है जो आकागन्न विकारी विशेषणा के साथ जुड़त हैं । जस “ए अत्य प्रत्यय, जो पुलिाग बहुववन सामा य कारण म तथा दाना वचना म अमामाय कारक प्रयुक्त होता है और "ई अत्र प्रयय जो स्वारिंग म दोना वचनो और बारका में प्रयुक्त होता है । जैम बोलता पढता सामाम कारक एकवचन परहता (आ) पास (आ) पाडतो (हुई) पडो (हुई) भेजा निया के विभिन कृदता के मयोजन म बनत है। (क) कमवाचक सामाय वतमानकालिक कृदत मकमा त्रिया सामाय भूतकालिक कृदत के साथ 'जाना रिया के मामा य वतमानवालिक कृदत के सयोजन स बनता है । जस क्रिया का सामाय स्प सामाय भूतकालिक कृदत कमवाचक सामाय बत मानलिक कृद त पढ़ना पहा पढ़ा जाता भेजना भेजा जाता छोडना छोडा छोडा जाता (ख) मवाचा सामा य भूतकारिक वृदत सक्मक क्रिया सामाय भूतकालिक कृदत के माथ जाना किया वे सामाय भूतकालिक कृटत ६ सयोजन स बनता है । जस क्रिया का सामा य रूप सामाय भूतकालिक कमवाचक सामाय कृदत भूतकालिक कूदत पढना पा पना गया मेजना भेजा भेजा गया छोड़ना छोडा छोडा गया (ग) कमवाचा सयुक्त वतमानकारिक कृदत सक्मक त्रिया क सामा य भूतकारिक कृदत के साथ जाना निया के सयुक्त वतमानकालिक कृदन के मयोजन स वनता है । जैस क्रिया का सामाrय स्प सामाय भूतकारिक क्मवाचक सयुक्त वतमान क्दत कालिक कदत पढना पढा पढा जाता हुआ भेजना भेजा भेजा जाता हुआ छोडना छोडा सोडा जाता हुआ (घ) क्मवाचक वाला प्रत्ययात कृदत सक्मक क्रिया के सामान्य भूनकारिक वृदत के साथ जाना रिया के वाग प्रत्ययान्त कृदन्त के सयोजन स बनता है । जस क्रिया का सामाय स्प सामाय भूतकादि क्मवाचक वाला प्रयया त क्दत कदत पढ़ना पढा पढ़ा जाने वाला मेजना भमा जाने वाला । भेजा १०७ छोडना छोडा छाडा जाने वाला (3) कमवाचन सातत्यबोधक कृदन्त मकमा क्रिया सामाय भूत- कालिक कृदन साथ जाना रिया में सातत्यबाधा वृदन्त के सयोजन मे बनता है । जम क्रिया का सामान रूप सामा घ भूतकालिक फमवाचक सातत्यबोधक मदत पटना पढ़ा जा रहा किया किया जा रहा कदत कृदन्त विकार हिन्दी म कदत का विकार तो क प्रयोग पर निभर करता है। सामाय वतमानकारिक तथा सामाय भूतकालिप पत क्रिया के पुरुषवाचक पो जग हात हुए क्वल लिग और वचन म बदलत है । आकारात विकारी विरेपणा के सदश जत्य प्रत्यया अरावा स्वालिंग बहुवचन म निया के पुरुषवाचर प म जब करन महायक किया क बिना प्रयुक्त हात हैं तब उनक अन्त्य प्रत्यय ईकारात वन जान हैं । जय पुल्लिा स्त्रीलिंग एक्वचन बहुवचन एक्वचन बहुवचन बोलता बोलते बोलती बोलती, बोरती लिखते लिायती लिखता लिखती पढती पडती, पढती मब प्रकार के करत म्वत प स यवत होत हुए गि, वचन और कार म अपन प बल हैं। लिग वचन और कारर म अपना म्प बाते हुए उनके साथ वही मत्य प्रत्यय जुडल है जो आकारान्त विकास विरोषणा साथ जुरत है। जम '' अश्य प्रत्यय जो पुगि बहुवचन मामाय वाख म तया जाना ववना म अमामायकारक प्रयुक्त होता है और अन्य प्रय जा स्त्रासिंग म दाना वचनो और कारखा म प्रयुक्त होता है। जम पडता पदत सामायकारक एकवचन पुलिग स्त्रीगि पडता (इया) पा (मा) घर (1) पकाली (४) पक्डने वाल' पक्ड रहा पाडने वाली पकड रही मसामा य कारक एकवचन पुल्लिग स्त्रीलिग पाडते (हुए) पकडती (हुई) पकडे (हुए) एकडो (हुई) पकड़ने वाला पटने वाली पक्डी रही पक्ड रहे सामाय कारक बहुवचन पुल्लिग स्त्रीलिंग पडते (हुए) पकडती (हुई) पक्डे (हए) पक्डी (हुई) पकडने वाला पक्डने वाली पकड रहे पकड रहो असामा य कारक बहुवचन पुल्लिग स्त्रीलिंग पक्रत (हुए) पक्डती (हुई) पक्डे (हुए) पक्डी (हुई) पाडने वाला पकडने वाली पकड रहे पकड रही सामा य तथा सयुक्त कृटतो के पुल्लिग असामा य वारव स्प की विशेषता यह है कि उस माथ प्राय काई विभरितचिह्न नही लगता है। सामास जोर सयुक्त कृता का असामाय कारक के स्थायी अविकारी रूप में विभिन वाक्यरचना सम्बधी कार्यो म व्यवहार होता है । विशेष करके विरूपता वाधर तथा विधेयक + अग के कार्यो म और स्वतत्र (मात्यूट) धावयरचना म। जस (१) दा औरत एक दूसरे से बात करत (हुए) रास्त पर जा रही थी। (२) वह परत-परम सा गया । (३) मैं आँखें बट किय सोचने लगा। (6) एक विमान अनाज से भरी (हुई) गारी यि नाम आया। (1) मुखिया एक हाथ म बच्चे को पराई (हुए) थी। (६) घर गिर चार महीने बीत अक्मक क्रियाआ के मयुक्त वतमानकालिब वृदता मयुक्त भूतकालिक कृरतो तथा प्रयर प्रसार की मरमर या अरमर मियाआ के बाला' अत्य प्रत्यय दातो का सना के अब म प्रयोग होता है और उनके रूप आकारात सनासा का भानि बनते हैं। सामान्य कारक एक्वचन बहुवचन गिरता हुआ आपा हुआ गिरत हुए आये हुए सुनने वाला सुनने वाले मसामायकारक एकवचन बहुवचन गिरत हुए गिरत हुओं आपे आये हुआ सुनने वाले सुनने वालो सम्बोधन कारक एकवचन बहुवचन गिरते हुए। गिरते हुओ। आये हुए भाये हुओ! सुनने वाले ! सुनने वालो! उदाहरणाथ (१) मैंने इन गट हुआ को फारम पर रहने और काम करने के लिए युगया है । (२) मैं बदिक्ट मार करने वाला को परडा करता था। कृदाता का प्रयोग हिदी म दाता का बनुन व्यापकप में प्रयोग होता है। व प्रिया के विभिन्न वाल्वि स्पा और पुरुषवाचर पान निमाम तथा म्बन रीति से व्यवहत हाले है। पत्र वाचा धनमानरालिर तथा भूतरान्ति नहीं देगा कृदत कमवाचन सामा य वतमानकारिक तथा भूतकालिक कृदत और मातत्य बोधर कृदत प्राय त्रिया पुरुषवाचक रूपों के अग की भांति प्रयुक्त होन हैं। अपुरुषवाचक रूप म अथात स्वतत्र रूप म सब कृटता का यवहार नहीं होता । उदाहरण के लिए कमवाचक मामा य वतमानकालिक कृदत म्वतन म्प से प्राय प्रयुक्त नही होत हैं। अय प्रकार के वृदत स्वतत्र गला की भानि प्रयुक्त होते हैं। स्वतन शब्दों की भांति के प्रयाग मे वाक्य में कृरता + काय मिन भिन होत है। उनके प्रयोग गुणनिर्देशको (एटीट्यूट) विपनाबोधको तथा विधेय के अगा के रूप में हो सकत हैं । मनागदा के अब म प्रयुक्त कृत वाक्य म उद्देश्य कम तथा विगपताबोधक हा मवन है। 1 कृदन्तो के स्वतन्त्र प्रयोग की कुछ विशेषताएं सामा य वतमानकालिक कृद त मामाय वतमानकारिक ट तो का निम्नलिग्विन स्वतत्र प्रयोग होता - (4) उद्देश्य के रूप म । जस मरता क्या ना करता। (ख) कम के म्प म । जस हबत का तिनवे का सहारा । (ग) गुणनिगव व प म । जस चरती गाडी उडता पक्षी। (घ) विवेय के नामिक जग व प म । जस (१) गाडी निक्ट भाती दिखायी दे रही है। (२) उसे किसी ने यह काम करते नही दवा। (ड) ममय विशषतावाधक क प म । जस (१) सोते में भी वह भूम रहत हैं और जागते म भी भूसे रहत है। (२) तुमको दुकान पर बठते गम नहीं जाता। ममय विशपताबोधव क प म प्राय प्रयुक्त होत है असामान्य कारण में सामा य भूतकालिख टन हा निपात मयोजन से। इस मयाजन का प्रयोग एसे पूरक व्यापार का निर्देश करने के गिा हाता है जो विधय स अभि हित व्यापार में ही पूव हुना या हो रहा है। ही निपात के माथ मामाय वतमानकारिक कृदन्त २ सयोजन वा जथ ज्या ही सटश होता है। जम दर आते ही वह वठ गया। उक्त मयोजन म मामा य वनमानवारिक पृटत काम्प उम वाश्य में दय में गि पुष्प वचन नया वारक म प्रभावित नही होता है जिसके विधय के साथ य सयोजन सम्बधित होते हैं । जस (१) पहुँचत ही मैं अपने मित्र से मिलने गया । (२) आते ही वह पत्र लिखन लगा (लगी रग)। (३) मह ममाचार मुनत ही मान वर का एक तार भेज दिया। ऊपर दिय गय उदाहरणाम ही निपात के साथ सयाजनो म दाता बता तथा वाक्या के उद्देय एक ही है परतु हिदी म ही के माथ प्रयुक्त वृदन का प्राय अपना कर्ता होता है जो वाक्य के उद्देश्य स भिन भी हा मकता है। एसी स्थिति म वृदन्त का क्ता मनाशद के सामाय कारक या में विभक्ति चिह्न महित अन्य पुस्य वाचर मवनाम व असामा य कारक स अभि व्यक्त होता है । जैम (0) मरी छुट्टिया गुरु हान ही हम दोनो शिमला जाना बात है। (0) मरीज वे आत ही शक्टर ने उमे बैठन का कहा। (३) उR चिट्ठी लियन हो हम डाव पर गये । अगर वृदत का बना होता है उत्तम या मध्यम पुरुषवाचन सवनाम तो वह असामाय पार म सम्बधित स्वामित्ववाचक सवनाम में अभिव्यक्त होता है । जस (१) मेरे जात ही बह अखबार पढने लगा । (२) तुम्हारे जाते ही घर चुप हो गयी। 'हो' निपान के साथ प्रयुक्त मामा य वतमानकादि वृत्तपमा व्यापार यवन काल है जो त्रिमा के पुरपवाधाप से निदिष्ट “यापार से पूर्व हाता है । इस वृदत म व्यक्त व्यापार का कार प्रिया में पुरुपवाचन प स व्यक्त कार पर निभर करता है। जब विषय म रिया वतमान काल म होती है तब 'हा निपात माय प्रयुक्त मामाप वतमानवादि कृपल पूर्व वनमान काल को व्यवर राना है। जम शिकवणो म आत हो विद्यार्थी उठ जाते है। यति विधेप म मिया भूतकाल म होती है ता हा' निपान के साथ प्रयुक्त गामा य वतमानकाग्नि करत पूर्व भूनकार व्यक्त करता है । जम बुना दम्पतीबच्चा डरबर रो उठा। जब विधेय म पिया भविष्यनकार म होता है तब 'हो' निपान व माय अपुन सामा य वतमानकारिय कृ ष पूर्व भविप्यार व्यक्त करता है । जम घर पात हा मैं टीपोन वरूगा। 'ज्या हाक अथ म ही निपात वे माय मामाय भूननारियन की पुनरक्ति भी व्यवहत हाता है । जम आन ही आत उसने य” पहा । ममय विसपनावाधर म समामाय वारद म मामाय वनमान जाग्नि दत नया समय या 'वन ३ मयाजनो गा मा प्रमाण होता है। जग गात गमय (TR) दिन ममय (दान) । -- ११२ 'ममय तथा वक्त' के साथ प्रयुक्न सामा य वतमानकालिक कृदन यह दिसात हैं कि विवेय म निर्दिष्ट मुरय व्यापार की पूर्ति म उद्देश्य क्या करता है । इस प्रयाग म सामाय भूतकालिक कृट त का कर्ता तथा वाक्य का उद्देश्य अलग अग हो सकता है। मामा य भूतकारिक ट त का क्ता प्राय निर्दिष्ट नही हाता है, परतु वह प्रसग से पता चलता है । जस (१) काम करत ममय (वक्त) वह कभी नही वालता है । (२) आज घर वाप बग्न समय (वक्त) मुखे अपना पुराना मित्र मिला। (च) प्रकार दिनपतावोधक के रूप म । प्रवार विशपताबाधक के रूप म सामा यतया सामाय वतमानकारिक कृदत की पुनरक्तिया व्यवहत होती है जा अपने से अभिहित यापार के सातत्य का सूचित करता हैं । इस (१) दौडना दौडता घर गया और तितलियो वाला डबा ले जाया । (२) अम्मा रात रात सो गया था। स्वतत्र प्रयोग सामा य भूतकालिक कृद त सामाय भूतकारिक वृदता या निम्नलिखित होता है (क) गुणनिर्देशक क प म । जस साया बच्चा । लिखी चिटठा । (ख) विधय के नामिक जग के रूप में । जस (१) आज वहाँ का स्थिति पदली नजर आ रही है । (२) सडक क बीच खून से लाल हुई जगह पर एक आदमी बहोग पडा था। (३) दूसर दिन मुबह गाव वालो न छत्रपति को इस चट्टान पर बैठा पाया । हिती म बहुधा विधेय के नामिक जग के रूप में सकमा मामाय भूतकालिक कृदन्त भी प्रयुक्त होने हैं। विधेय के नामिक अग के रूप म सक्मक सामाय भूतकाल्वि कृदता का दो प्रकार का प्रयोग होता है। एक प्रकार के प्रयोग म व नमामा य कारव म अविकारी पुल्लिग वाल होत है । जसे वह नया कोट पहने था। दूमरे प्रकार के प्रयोग म व विधेय के नामिव अग क प म लिंग तथा वचन (पुरिग) म उद्देश्य का अनुगमन करत है । जस लिफाफे पर तीन टिक्ट लगाय हैं। पहले प्रकार वे उपराक्त प्रयाग म सबम मामाय भूतालिब कृदन्ता का क्त वाच्यपरक अप हाता है। दूसरे प्रकार के प्रयाग म उन कृरन्तो का कमवाच्यपरक जय हाता है। मवाच्यपरक अथ वाले कृदन्त भूनकाल के एसे ममानित व्यापार का निर्देश परत है जा अपने फ्ला के कारण वतमान भूत या मविप्यतवाल ग सम्बन्धित है जिमझा मवेत हाना महायर किया करती है । जैस सर मेजें मजपोशो स ढकी हैं (की थी ढंकी होगी । (ग) पकार विशपतावाधर के रूप मा प्रकार विजयतावाधक के म्प म मामा य भूनकालिक कृदन्त (क) विना तथा (के) बंगर विभक्ति चिह्ना + साय प्रयुक्त होते हैं। इस पयाग म विभक्तिचिह्न या तो कृरत से पद प्रयुक्त हो सकत हैं या पश्चात् । जैसे उससे मिले बिना, वगैर रखे। (के) बिना' तथा (क) बगर विभक्निचिहो के साथ प्रयुक्त सामा र भूतकालिन कृन्त पूरव नकारात्मर व्यापार व्यक्त करत है । जैम (१) ठाकुर न विना रत्तीभर इधर उधर हिल हुन् पूछा क्या ? (२) उमस वार्ते रिय बगैर मैं क्या कर सकता हूँ? प्रकार विरोपतानाधा कप म (के) विना तथा '(के) बगर विभक्निचिह्ना के साथ सामाय भूनकालिब वृदन्त का विरोष व्यापर प्रयाग उन नाराथय वाक्या म हाता है जिनम अथ दे अनुमार दो नकारायक निपाता की लावश्यकता होती है। इस तरह य वारया म विवेय 'रहना त्रिया या रह सकना कियापरव गन्दसमुदाय म व्या होता है । ऐम वाक्या म विधेय म पूच एक नवागयत निपात प्रयुक्त होता है जा प्राय न निपात होता है। जैसे (१) मैं इम पर हैस विना न रहूगा । (२) वह मरा चिटठी का उत्तर लिय बगर न रह सका। (घ) यवस्यावाच प्रकार विगैपताबोवा के ममइस काय म वकर अमामा य कारक म अविकारी पुल्लिगवाले प म प्राय सरमा सामाय भूतकारिक कृदन्तो का प्रयोग होता है। य विपनाबोधन उम अवस्था वा निग करते हैं जिसम मुग्य व्यापार हो रहा होता है और साथ ही साथ य उस व्यापार का स्पष्ट कर दते हैं । अवस्थावाचा प्रसार विपनावाधर के रूप म मामाय भूतकारिक त कतृ वाच्य का अय देत हैं । जम (१) एव फटा जी रमाई ओटे ठार बाहर निकर आया । (२) मय अपना मुनहा थाल रिम पूरब म पश्चिम में जा पहुंचा था। सयुक्त वतमानकालिक कृदात मयुग्न वतमानकालिग वृदन्तावामा म्वाप्रपाम होता है। यह प्रयाग प्राय निम्ननितिहाग है - (4) शनि म । मयुम दतमाननिय कृना वार गुणनिर्देगक दो प्रकार के हात है--भूववर्ती तथा परवर्ती । पूरवर्ती गुणनिर्देशन वे रूप म मयुक्न वतमानकालिक कृदन रिग वचा तथा कारक म आकारान्त विपणा को भांनि विगेय का अनुगमन करते हैं। जम जाता हुआ आदमी जाते हुए आत्मी जाने हुए आरमियो म जानी हुई औरत जानी हुई औरतें। परवर्ती गुणनिर्देगर के रूप म जो प्राय विधयवाचक हो। है सयुक्त वतमानवालिस कृत लिग तथा वचन म वाक्य के उद्दश्य के अनुसार होते हैं । जम (१) एक रटका मिर के बडे बडे वारो को खुजलाता हुआ चला आ रहा है। (२) पीछे उसकी पत्नी कराती, कापती हुई गठरी-सी बनकर सिमट गई। (ख) विधेय क नामिर अग के रूप में । विधय के नामिक अग के रूप में सयुक्त वतमानकालिक कृटत वाक्य का उद्देश्य या वाक्य का प्रधान कम निर्दिष्ट करते है। उद्देश्य को निर्दिष्ट करते हुए वाक्य के विधय व क्रियापरक जग के उप में निम्न अकमक क्रियाएँ तथा रियानामिक वारसमुदाय प्रयुक्त हाते है --दिखाई देना दिखाई पडना जान पडना नजर जाना मालूम होना, प्रतीत हाना आदि | मयुक्त वतमानबालिक कृदत वाक्य के उद्देश्य का अनु- मरण करते है। जस (१) इतन म ही गुरलीन आना हुआ निखार दिया । (२) बहुत रडक्यिा जगर की ओर जाता हुई नजर आ रहा हैं। जब सयुक्त वतमानकारिक पदत वाक्य के प्रधान क्म का निर्देग परता है तब विधेयक क्रियापरव अग के प म प्रयुक्त होती है दग्वना मुनना पाना जसी क्रियाएँ । विधेय के नामिक अग का प्रधान कम के साथ याकरण- पर मम्ब व प्रधान कम के रूप के अनुसार नामिक जग द्वारा अभिव्यक्त होता है। विधेय के नामिव जग के प म मयुक्त वतमानकारिक कृदन मामा य कारव म प्रधान क्म के लिंग तथा वचन में अनुमार होत व एक गारी निकट आती हुइ देख रग है। परि प्रधान क्म को' विभक्ति चिह्न मह्नि अमामा य कारक म मना गर तथा मवनाम है या क्मकारव म सवनाम है ता विधेय व नामिक जग कप में प्रयुक्त संयुक्त वतमानकारिक कृदन्त वालवय प्रधान कम के क्वा कारण स होता है या वह मयुक्त वतमानकारिक कृन्त मामाय वाग्व वचन पुलिंग में होता है । जैसे (१) उमे बाज नव किसी ने बात कग्न ए ना मुना । (२) अभी मैंने उनका सटक पर जाता हुआ देखा। रिया र नामिक जग व प म प्रयुक्न तथा विधयवाचर गुणनिगाव वे रूप म प्रयुगा गयुक्त वनमानरालिव टला म भन किया जाना चाहिए।
विधयवाचक गुणनिर्देगक वास्य व उद्दश्य तथा विधेय दाना का निदा करते हैं रितु अथानुमार उनका अधिक सम्व व विधय म ही होता है । जस लडकी हमती हुई जा रही थी। विधेय का नामिक अग विधय म त्रिया अनुमार क्वल वाक्य के उद्देश्य का या क्वल वाक्य व प्रधान कम का निग करता है । नमे (१) दूर स वह चीज चरती हुई दिखाई पडता है। (२) उहान तो रडका वा नदी म डूबते हुए पाया। इसक अतिरिक्त वाक्य म विधयवाचक गुणनिर्देशक तथा विधेय के वीच विपता वाधक क्म और यहा तक कि उद्दश्य भा ना सक्त हैं जबकि विधेय का नामिर अग तथा विधय का क्रियापरव अग साथ साथ रहत है और उनके मध्य मनिपाना वो छोडकर वाक्य का कोई भी अय अग नहीं आ सकता है। जस (विधयवाचा गुणनिर्देशक)-(१) रावी उसका हाथ पक्डवर धमीटता हुआ गली म र चला। (२) पल्लावर साचता हुआ वह चुपचाप घर म निकला। (विधेय का नामिक अग)-उम दिन बाद उम किसी ने मुमारात हुए नहीं देम्वा । (ग) ममय विभपताबोधर व प म । म तरह के प्रयाग म मयुक्त वतमानकालिब कृटत पूण स्वतत्र होते हैं। स्वतत्र कृपल का क्ता वाक्य वे उद्देश्य से भिन्न होता है । जैसे घर जाते हुए मरा मिर दर करने लगा। इस वाक्य म मर्यानुमार कृदत का कता है 'मैं किन्तु वाक्य म उद्देश्य है मिर । (घ) प्रकार विरुपताबोधर के प म । प्रकार विपनावोधन ५ म गयुक्त वतमानकारिय कृटत मला अविवारीप म विभक्तिचिह्न रहित असामा यवाग्य म प्रयुक्त होते हैं। जैसे (१) बडे दुगर में उमका मुह पाछन हुए उम रेकर वह फाटर के बाहर चला आया। (२) टटारत हुए. सरा मे मिट्टी वी शिवरी जलावर वह पट कम्बर व नीचे कुछ सोजना। (ड) मति अथय (वन्मान') विशपतावाधर व रूप म । सति- अथक विपनादोधा प म मयुक्त वतमानकारि वृटल भी निपात क माष अमामाय पाग्य म प्रयुक्त होते हैं। जैम (१) बहुत डरत हुए भो मैंन, उनरा वाता र जवाब म एक भाषण तयार रिया । (२) यह जानन हुए भी रग या आगा यो नि चगलरवा पारिनी और ममया है। सयुक्त भूतकालिक कृदत गयुक्त भूतत्रापि कदन्न सा ग्वाम्पम प्रयुक्त गत हैं। बता 3- स्प से सामा य भूतमालिक कृटता की उपेक्षा इनका प्रयोग अधिक प्रचलित है। उनका प्रयोग प्राय निम्नलिखित होता है- (क) कम के रूप म । इस रूप म बहुधा अक्मक सयुक्त भूतकारिक कृदन्ता का इस्तेमाल होना है । जस इन लौटे हुओ को फारम पर रहन और काम करने के लिए बुलाया गया है । (ख) गुणनिर्देशक क रूप म । जस (१) इमक बाद दिनभर वे थवे हुए पति पत्नी मो गये । (२) उहान फटी हुई पतग उठाकर देखी । जरमा सयुक्त भूतकालिक क्दत परवर्ती विधेयवाचक गुणनिर्देशव के Fप में भी प्रयुक्त हात है। जैसे वाका गुमान अपनी कोठरी के द्वार पर वठा हुजा यह कौतुक वड ध्यान स दख रहा था। गुणनिर्देशक के रूप म मक्मक सयुक्त भूतकालिक कद त प्राय कम वाच्य का अथ दत हैं। यदि एम कृतन्ना का कर्ता अभिहित हाता है तो वह सामाय कारक म का (क की) विभक्ति चिह्न सहित सनाशद या भव नाम होता है । यदि उन करता या क्ना उत्तम या मध्यम पुरुप वाला सवनाम होता है ना वह सम्बधित स्वामित्ववाचक मवनाम म भि यक्त होता है । नस (१) दिल् । लौर भारत के दूसरे भागा म इन बादशाहा की वनवायी हुई इमारता क खण्डहर आज भी देख जाते है । (२) उसको पढी हुई पुस्तक । (३) मेरो लिखी हुइ चिट्ठी। जब गुणनिर्देक क प म मक्मक सयुक्त कृदत का अपना प्रधान बम हाता है ता वह क्त वाच्य का अथ देता है । जैम मैंन घुटनो स ठुडडी रगाय हा एक निराह बा "क का दखा। (ग) विधय क नामिक अग म्प म। जैस (१) उत्तर म भारत की मीमा अफ्गानिस्तान और चीन की मीमाआ स मिरी हुई है। (२) वह बहुत पराया हुआ मालूम होता या। (३) अब में जब भा छाटी लडकी की जाख मूजी हुई और गाल ला देखता हूँ ना समझ रता हूँ कि किसी बडे घर म चीनी व वतन टूट हैं। जव विधय व नामिक रूप म मकमा सयुवन कृदना का प्रयाग होता है तव व मामाय कारव म अविकारा पुल्लिंग वार प म हात है या व लिंग तथा वचन (पुगि) उग्य का अनुगमन करत 1 विकाग म्प प्रयाग म मरमर मयुक्त मनकारिय पृष्ल पन वायपर अय तहै। जहा मम्मृति पत्र म भारत अपनी विपना वनाप हुए है। विवाग प्रयाग म व कमवायपरत्र अथ दन हैं तथा मामा य नूनकालिय ।
वृदन्तो को भौति ऐसे सम्पादित व्यापार का निर्देश करते हैं जो अपने फ। वे मारण उस वलमान, भूत या भविष्यत पार से सम्बधित है जिसका मकेत महाया निया करती है। जैस अलमारी म किताव रखी हुई है (थी हागो)। (ग) समय विशेपत्तावोधन के रूप म } इस तरह के प्रयोग म संयुका भूतकालिक पुरन्त प्राय पूर्ण स्वत न होत है । जैस (१) उस गय हुए दो महीने हो गये है। (२) यह घोडा खरीदे हुए तीन साल हो चुके है। (घ) अवस्थावाचन प्रकार विशेषता बोधक वे म्पमे। इस तरह का प्रयोग में देवर अमरामा य वारक म अविवारी पुगि वारे प म प्राय सबमम सामाय भूतकानि ताकाव्यधगर होता है। इस प्रकार के विरूपतावोधक उस अवस्या का निदा किया करते हैं जिमम मुन्य व्यापार हो रहा होता है। इसके साथ ही ये उक्त व्यापार को भी स्पष्ट किया करत है। इस प्रकार के समुक्त भूमकारिक हदत पत वाच्यपरक अथ दिया करते है। जो {२} पन्दो मारी या दरवाजा ढकलकर वालक को लिय हुए वह भीतर पहुँचा। (२) बुना दुम दबाये हुए लारी के पास पहुंचा। M 'वाला' प्रत्ययात कृद त बाला' प्रत्ययात वृदता वा क्वल स्वतत्र प्रयाग तर हैन लिमी वस्तु की एसोनिया पिता का निर्देश दिया करते है जो भगा नुसार यतमान भविष्यन तथा भूतकार म म किसी भी कार में भक्ति हा सकता है अथवा जानिया के मामा य प म व्यस्त व्यापार का उदयत्तता या तैयारा मूचिन परती है । वाला' प्रत्ययात प्रान्तों का निम्नलिखित प्रयाग होता है (4) उदयप मा जम बताने वारान बताया गिराव मह छाती, मुटटी और पग पर यफ की हली-मा चादर विप गई थी। (ग) कम प प म । जस दर में आने वागेको ममा म घटन की जगह नहीं मिगे। (ग) गुणनिदेर रे ग म । इस तरह प प्रयाग मदत थे frn वचत तथा कारब अपन विष्य र अनुमार हात है । जैम वह माय ने गन पारी वस्तुओं को वधारलगा। वाक्य में जर वारा प्रत्ययान एक से अधिपत विमी एव हो विमान है तब "धारा प्रत्यय प्राय विशेष्य में पूर्व एव हा वार प्रमुषत्र स्प से सामाय भूतकारिप दता की अपक्षा इनका प्रयाग अधिष प्रचलित है । उनका प्रयाग प्राय निम्नलिम्विन हाता है--- (क) क्म के रूप म । इम प म बहुधा अक्मन मयुक्त भूतकारिव कृन्ता का इस्तमाल होता है । जस इन लौटे हुआ को फारम पर रह्न और शाम करने के लिए बुराया गया है । (ख) गुणनिर्देशक के रूप म । जस (१) इसके बाद दिनभर के थर हुए पति पत्नी सो गये । (२) उहोन फी हुई पतग उठाकर देखी । जकमा सयुक्त भूतकारिक क्दत परवर्ती विधेयवाचक गुणनिर्देशक के स्प म भा प्रयुक्त होत है। जम बाका गुमान जपनी कोठरी के द्वार पर बठा हुआ यह कौतुक वड ध्यान म दय रहा था। गुणनिर्देगर क प म सक्मक सयुक्त भूनकारिक क्दत प्राय वम वाच्य का जप रत है। यदि एम कृटता का क्ना अभिनित होता है तो वह असामा य कारक म का (क की) विभक्ति चिह्न सहित सनाश द या सव नाम गाता है । यदि उन वदला का कता उत्तम या मध्यम पुरुष वारा मदनाम होता है ना वह मम्बधित स्वामित्ववाचक मदनाम स अभिव्यक्त होता है। जस (1) दिल्या और भारत के दूमर भागा म इन बादशाहो का वनवायी हुइ इमारता क खण्टहर आज भी देस जान है । (२) उसको पढी हुइ पुस्तक । (३) मेरी लिखी हुइ चिट्ठी। जब गुणनिर्देक के रूप म सकमा सयुक्त कृदन का अपना प्रधान कम हाता है तो वर क्त वाच्य का अथ देता है । जस मैंने घुटना म ठुटी लगाय हुए एक निराह बालक को देखा। (ग) विधेय व नामिक अग के रूप म । जस (१) उत्तर म भारत की मामा जफगानिस्तान और चीन की सीमाआ स मिली हु है। (२) वह बहुत धाराया हुआ माम हाता था। (३) अब मैं जब कभी छोटा लडकी की आखें मूजा हुई और गार पर देखता है तो समझ लता है कि किसी बडे घर म चीना के बनन टूट है। जब विधेय क नामिक प म मकमक सयुक्न कृटता का प्रयाग होता है तब व अमामा य काग्र म विकारा पुलिंग दाल प म हात है या व गि तथा वचन (पुगि) उज्य वा अनुगमन करत हैं। विशारा प प्रयाग म सरमा मयुक्त भूतकारिक टन क्न वाच्यपरक अय दन हैं। जम मस्कृति ६ भत्र म भाग्न अपना विरापना वनाय गा है। विकाग प्रयाग म व कमवाच्यपरक नथ न्न हैं तथा मामाय भूतबालिग कृदना की भानि एसे मम्पादिन व्यापार का निर्देश करते हैं जो अपने फला के कारण उस वतमान, भून या भविष्यत कार से सम्बन्धित है जिसका सकेन सहायक क्यिा करती है । जैस अलमारी मे किताब रखी हुई है (थी होगा)। (ग) समय विशेषतावोवष के रूप म । इस तरह के प्रयोग मे सयुक्न भूतकालिक कृदत प्राय पूर्ण स्वतन होत है । जसे (१) उमे गय हुए दो महीने हो गये है। (२) यह घाडा खरीदे हुए तीन साल हो चुके है । (घ)अवस्थावाचक प्रकार विरोपना बोधक के रूप में। इस तरह के प्रयोग में केवल अमामा य कारक म अविवारी पुल्लिंग वाले रूप म प्राय सामाय भूतकालिक कृदतो का व्यवहार होता है । इस प्रकार के विशेषताबाधक उम अवस्था का निर्देश क्यिा करो है जिमम मुख्य आपार हो रहा होता है। इस माथ ही य उक्त व्यापार का भी स्पष्ट किया करते हैं। इम प्रकार के मयुक्त भूतकालिक कृदत क्त वाच्यपरक जय दिया करत है । जैसे (१) एक गदी कोठरी का दरवाजा ढवेलकर बालक को रिय हुए वह भीतर पहुंचा। (२) कुत्ता दुम दवाय हुए लारी चे पाम पहुँचा। सम्मक 'वाला' प्रत्ययात कृदत होता है । जम बम्बई म बहुत रेशमा कपडा बनान और रंगन बाल कारवान है। (घ) विषय व नामिक जग क प म । इस तरह के प्रयाग म वाला प्रत्यायन्त कृदन्ता के रिंग तथा वचन वाक्य के उददम्य व अनुसार हान है । जम (१) मर तीन मित्र करमत्ता जान वारे है। (२) उमकी वह्न कल ही आने वाली था। विशेषणो और सज्ञानो मे कृद ता का सक्रमण निटी म कुछ कृदन्त अपनी रियापरक विशपताएँ (काल वाच्य आदि) खा कर और गुणनिर्देगक या वस्तुपरव अथ ग्रटण कर मा विशपण या मना क श भद म परिगणित होत है। विशेषण या मना कशभर म पनि गणित हात समय कृदन्न अपना मुख्य अथ (जथान कार म होने वार व्यापार के रूप म क्मिी निश्चित गुण की अभिव्यक्ति का खा टन हैं । जस थका, सूखा रहा फाग रहन वाला। विपणा म मवसे विक अक्मक क्रियाआ के मामाय भूतालिक वृटत परिगणित हात है। जम खुरा पा टूटा घिमा आदि। विशेषणा भेर म ममानायक क्रियाआ के मामाय भूनकारिक वृतता व सयाजन भा परिगणिन गत है । जम टूटा फूटा (टटना स्टना) भूला भटका (भूग्ना भटकना) घिसा पिटा (घिमना पिटना) पटा गिता (पटना लिखना)। विपणा व नथ म ममान मूर म बनी अवमा तया सक्मक क्रियाओ के मामाय भूनकालिय दता क मयोजना का भी प्रयाग हाना है। जम बना-बनाया (बनना बनाना) पका पकाया (पकना पकाना) पिा पिया (पिटना पोरना) सनाआ + गभेद म प्राय सकमर प्रिया के क्तृवाच्य मामान्य भूनकारिक कृटत तथा वाला जन्त्य प्रयय वृदन्ता का परिगणन होता है। मनाभा क गम्भद म परिगणिन मवमा क्रिया क सामा य भूनकारिक वृदत भाववाचव सनाएँ हाता हैं जा व्यापार को प्रक्रिया या उसका पर दिग्वाता हैं। जम विया रहा छापा फाग। वारा प्रत्ययात कृदन्न प्राय मनुष्यवाचन हान है । जस पान वाला वचन वारा जादि । सजायनो का भौति प्रयुक्त वाला प्रत्ययान्त कृदन क अपन म निरिष्ट व्यक्ति के अनुसार पुल्लिग या स्त्रीगि हो सकत हैं, - रितु व बहुधा पुरिग म ही प्रयुक्त हात है। स्वाग्गि में उनका प्रयाग तब हाता है जब व कवल स्त्रीजाति में से किसा व्यक्ति को मूचित्त परत है। पद रचना की दृष्टि स इसका पता चलता है 'वाला प्रत्यय के अतिम आ' 'ई' म परिवतन म । जस पढन वाला, पढन वाली रहन वाला रहन वानी। ईकारात वाला प्रत्ययात कृदन्ता का विधार ईसारात स्त्रीलिंग वाचा सना शदा बा भांति होता है। जस लिखने वारी लिखन वालिया रिखन वालिया लिपन वारिया। विपणा तथा मनाआ दभेदा म सब प्रकार की क्रियाआ के मामा य और संयुक्त वतमानकारिक कृदन्त तथा सरमन पियामा के संयुक्त भूनकालिक कृदन भी भी परिगणित नही होत है। विगषणा तथा सनाआ काभेदा म बमवाचक वृदला ग भी परिगणन नहीं होता है। विशेषणा तथा मनाआ के मदभेदा में अक्मक क्रिया के मयुक्त भूतकारिक कृता का परिगणन विरला ही होता है । जस अथात चालाय । छटा हुआ' अर्थात् धोवेवाज । धिमा हुआ। सातत्यबोधकालिक दन्त स्वर रूप स सातत्यवावकालिक कृदन्त क्वल गुणनिर्देशन में काय म प्रयुक्त होत हैं । गुणनिर्देशक के काय में प्रयुक्त उक्त कृदन्त क्रिया का धातु स निरिप्ट उस व्यापार मा अवस्था सातत्य का सूचित करते हैं जो बतमान या भूतकाल से सम्बंधित हात है । सातत्यवाधवाटिक वृदन्त का कार विधय म पिया में कार पर निभर करता है । जम (१) व चर रही बहस म भाग रत है। (२) म उस हर म रात का एक बजे तारा ने मिनार की उम भीगा, वर-मा ठण्डा हो रही लोह की वन पर बठ गम । पूर्वकालिक कृदात हिता म पूवारिस दन्त प्रिया का एमा अधिकारी अपुरुषवापर गए हाता है जिमम एन साय प्रिया तथा त्रियाविपण दाना को विपनाएँ होती है । पूवारिक कृदन्त वाक्य म विशपताबोधर मा वाय बात हुए दूसरा क्रिया का स्पष्ट कर दत है तथा उमस सम्यधित पूद व्यापार वा निग भरत है। धूमास्तिता की रियासम्बधा निम्न विशषताएं है-- १२२ यदि वाक्य म पूर्वकालिक कृरता स निर्दिष्ट एक से अधिक एक सदृश पूरक व्यापार होत है ता पूर्वकालिक कृदत का प्रत्यय प्राय वर अन्तिम प्रिया का धातु के पश्चात ही प्रयुक्त हाता है। जम खा पीकर रडका स्वल गया। हिदी म पूवकारिक वृदन बहुधा कतृ वाच्य नियाा म बात हैं। उन वाक्या म जहा विधेय कमवाव्यपरख क्रिया से अभिव्यक्त होता है प्रवकालिक वृदत क्मवाच्य का अथ ग्रहण कर लत है तथा पूण म्वन न हो जात है । जमे (१) यह मदिर घट्टानो का काट कर बनाया गया था। (२) हाथ पकडकर जरा बठन के लिए इस जार मे बठा लिया गया ता और बारा न रहा लाचार बठा रहना पड़ा। पूर्वकालिक कृदातो का प्रयोग वाक्य म पूर्वकारिक टन अधिक्नर एसे पूरक यापार का निर्देग करत है जो क्रिया के पुरषवाचक रूप स यवन मुग्य व्यापार का भाति उस व्यक्ति म सा धन होता है जो वाक्य म उद्देश्य का काय कर रा हाता है । जम होटल के बाहर जाकर मित्र ने अपनी जेब म हाथ डालकर कुछ टटा।। उत्रत वाक्य मे पूवकालिन कृतन्ता म निदिए जाकर तथा डाटकर' पूरक व्यापार और टटालला रिया के टटोला प से अभिहित व्यापार एवं ही व्यक्ति मित्र' से सम्बन्धित है जो इस वाक्य म उद्दश्य का वाय कर रहा है। अर्थात मित्र होटल के बाहर आया उसने जेव म हाथ गला और उसने कुछ टटोला। पूवकारिक कृदत स निदिष्ट पूरक यापार का सम्बध वाक्य व उद्दश्य से इतर व्यक्ति या क्ता स भी हो सकता है । एम प्रयाग म पूर्वकालिक कृटन पूर्ण स्वतत्र हो जाता है। जस यहा की दीवारा पर बन चित्र देखकर जाज भी भारत का पुरानी कला के लिए श्रद्धा स मिर झुक जाता है-इस वावय म देवकर पूवकारिक कृदन्न स निर्दिष्ट व्यापार तथा युग जाना' क्रिमा झुक जाता है स्पस यक्त यापार में अलग-अलग क्ता है। पुवकालिक कृन्त से अभिहित व्यापार का वर्ता इस वाक्य म कोई भी व्यक्ति या पुरुषवाचक सर्वनाम है और त्रिया पुम्पवाचक प म व्यक्त मुन्य व्यापार का बना अथात् उद्देश्य है सना-गद सिर। जिन वाक्या म त्रिया में पुरुषवाचक म्प का जय गौण-मा रहता है और पूर्वकाग्धि वृदत का मुख्य गा रहता है उन वाक्या म वस्तुत पूर्वकालिम १२३ । कृरल वाक्य मुग्य यापार का बायनिर्देगन हाता है । जम (१) उसन बच्चे का मिर छूकर दखा । (२) सरदार माहव न उह (उन पना का) खारकर भी न देखा था। (३) शामत का मारा रज्जब इमा ठाकुर के दरवाज पर अपनी ज्वरग्रस्त पत्नी को वर पहुंचा बहुधा पूवकालिक कृदन्त मुख्य यापार के लिए पुरक व्यापार का नहा बल्कि उम पूर्ववर्ती सदृश व्यापार का निर्देश करता है जा विधय म किया म व्यक्त मुग्य व्यापार स स्वतत्र हाता है। एस प्रयोग म पूर्वकालिक कृदन्त का अथ किया व पुरुषवाचक म्पक अथ जैसा हाता है और वाक्य म वह विधय के सदा काय कर रहा होता है। जस (१) फिर दाना वठकर द्वार वनान रगे। (२) जाकर पानी राआ। (३) दाना काठरी छोडकर चल पडे । (6) मुन्नी, मैं सच कहता हू मैं घर छाडकर भाग जाऊंगा। कभी-कभी पूर्वकारिक कृदत मुन्य व्यापार के लिए पूरव व्यापार का निर्देश न करके मुख्य व्यापार का क्वर अधिक स्पष्ट कर दत है। जैम (१) वसास के महीन म गहू पसर तयार हा जाता है । (२) यांवर देवा चोर दरवाजे म दो स्वयसव बड य । अनक बार पूर्वकारिक कृरन्त पूरब व्यापार का व्यक्त करत हुए मुग्य व्यापार व प्रसार या माधन का निर्देश करत हैं । जम (१) म तुये समया कर हार गय। (२) हमन डाक्टर का टलाफान करक बुगया। (३) मैं वम म वठार घर जाता है। वारय म भा निपात व माथ प्रयुक्त पूवरारिक कृन्त मति अयर विपनावोधक का वाय बरत हैं। नम (१) क्या व क्या रपय दवर भी सेंन-मत का बठना पाता है ? (२) वन पर आकर भा में उमम न मिन्ग। हिदी म पूवारिक कृतता का पुनरक्तियां प्राय एम व्यापार का निटंग करता हैं जिसका मातत्य अवरुद्ध-सा हाता है। जम (१) वच्चा ग रार सा गया । (२) ई वे सा म भाप र वाटर हमारे मिग का ट्र-छूकर वराग घूम रहा था नकाराय वाक्या म नकाराय निपात जो प्राय विधयक पूत्र ही होत है पूवालिब कृपला सभा सम्बधित हात है। जम हाथ-मुह धार वन ग्याना मान नही बैठता है। एम वाक्या ब विधेय म किया व व्यापार म हा नहा अपितु पूर्वकारिन कृटल म निटिप ब्यापार म भा इनवार रिया जाना है। जब पूवानिव कृपन स निम्प्टि व्यापार स इनकार दिया जाता है तब वह व्यापार बहुधा विधय म प्रिया के न्यापार का वारण होता है। पूर्वकालिक कृद तो के साथ प्राय न' निपात का प्रयोग होता है । जसे प्रश्न न समझकर मैंने उसे दोहराने को कहा। क्रिया को धातु के रूप म पूववालिक कृदता द्वारा पुरुषवाचक प्रिया के माथ जुड़ने से वाक्य रचनापरक दममुदाया का निर्माण होता है। इन सदममुदाया के जगा (जयात पूर्वकालिक दत तथा पुरुषवाचक क्रिया) के श्रथ पूणत बने रहत है और एक दूसरे के वाद हो रह दो व्यापारा की अभि- व्यक्ति होती है। इस प्रकार के गदसमुदाया म पूर्वकालिक दत किया के पुरपवाचक रूप जसा काय कर रह होते है और वाश्य में विधेय-जसा काय। जम (१) वह यह कह गया (अर्थात उसने यह कहा और गया)। (२) कुछ काम देंगे हजूर ? हाँ दर दूगा। बहुधा पूर्वकालिक कृट त एसे गब्दसमुदाय म ममाविष्ट होते हैं जिनक अथ उक्त शब्दसमुदाय के अगा से भिन होते है। इस प्रकार व समुदाय में कृनता का अथ गौण हो जाता है और समग्र समुदाय विधिपरक या आकस्मिवता आदि जस निचयपरक अथ ग्रहण करते है । जस रे जाना ने चलना आ पहुँचना जा पहुँचना हो लेना आ कूदना ना निकरना, जा घमाना। 'छोडना क्रिया से बना 'छोडकर पूर्वकालिक कृदात को विभवित चिह्न के सयाजन म 'सिवाय वा अथ देता है । जसे उसको छोडकर सब विद्यार्थी श्रेणी म उपस्थित हैं। लेना' प्रिया से बना कर पूर्वकालिक दात का विभक्तिचिह्न साहिल या वो के बिना भी के साथ का सय दिया करता है । जस वह कुने को लेकर शिकार खेरने गया । 'होना क्रिया से बना होकर पूर्वकालिक वृदत माग स' का अर्थ दिया करता है । जमे वह तिला हावर कलकत्ता जाएगा। क्रिया में पुरुषवाचक स्प हिटी म निया के पुरुषवाचक म्प त्रिया को अपरिवर्तित या परिवर्तित घानु म विगप क्रियापरक पुरुषवाचक प्रत्यया अथवा वृत्ता द्वारा बनते है। त्रिया व युरपवायक रुप जो रिया की धातु म विशेष पुरुषवाचय प्रयया से यत हैं हि दा मर की माया बढ्न नही है । उनम परिगणित हात हैं (क) निश्चयाय प्रकार का 'हाना' विया के सामाय वतमान कार का सरल भद। (ख) प्रथम भविष्यत कार । (ग) आनायक प्रकार के भेद । (घ) सम्भावनायक प्रकार का सामाय भेद । शेए सब पुरपवाचक रूप वृदनो द्वारा वनत है । वदन्तपरव पुरपवाचक एप कृदन्ता स बन होत है या वृदना तथा सहायक क्रिया स वन होत है । रिया रे पुरुषवाचक रूप जो क्रिया की धातु से पुरपदाचा प्रयया द्वारा बनने हैं या क्वल कृद तो में बनत हैं वे सामा य पुरपवाचन बहाते है और जो कृद तो तथा सहायक क्रिया से बनते है वरिल पुरुषवाचर प रहाते है । सामाय इदतपरम पुरुपाचर रूपा मे सामाय वतमानकालिक मदत सामाय भूतकारिक त तथा सातत्यवोध परत प्रयुक्त होते है । जटिल वृदतपरक पुरुषवाचक स्पो म सामाय वतमानकारिक पत वाचन तथा चमवावर वृदना का प्रयोग हाता है। सहायक प्रियाआ रूप में होना' रहना , 'जाना आना , 'करना' तया कुछ अन्य क्रियाओ का प्रयोग होता है । विया के पुरपयाचक स्पा म परिगणित हात है का प्रकार निधि तथा वाच्य । काल हिदाम का क्रियापरक स्पाका एसा समवाय है जो भापा म प्रत्यक्ष एष वास्तव म विद्यमान समय का प्रतिविम्वित करता है और प्रिया से अभिव्यक्त व्यापार या अवस्या के सम्बध का क्यन के क्षण व प्रति निरता है । एतिगसिर वणना म कार, भूपारिक्ता, आनुपूविता तथा समानता का निर्देश करता है । काल तान मुरय भेद हैं वतमान भूत तथा भविष्यत । वतमान पाल ऐस यार या उवस्या का निर्देश करता है जो क्यन के क्षण म हाना है मा गाश्वत सत्य होता है । जैग (१) वह एक जगवार पाता है। (२) पृथ्वी सूय का परिश्रम करता है। भूतकाल एम “यापार या अवस्या का निर्देश करता है जा रयन क Pण स पूच हा रहा थापा हुआ था । जैम जमना सगरा म रन्ना थी। मध्यिकाल एग व्यापार मा अवस्था का निवरता है नाक्यन के क्षण व परचात सपा । नम मैं कर वापस मरठ चा जाऊगा। उपरगाहमा गसष्ट है कि इम पा इस कारन सम्बन्धित १२६ यापार वतमान भन या भविष्यतकाल के क्मिी निश्चित रूप में अभिहित होता है। कइ मापाआ म निया के कागद तान मुग्य भेटा के अनेक जवा तर भेट होत है । मिला म भी निया के काला क इसी तरह बनक अवा तर भेद होत है। ये भेद इमलिए हात है ताकि काल व विभिन भेटों स “यापार की पूर्णता या अपूणता यक्त हा मरे । अतएव हिदा म कालाब बहुसख्यक भेट व्यापार के सम्पादन का निर्देश करन क साथ माथ उसकी पूणता या अपूर्णता का भी निर्देश करते है। प्रकार त्रिया के प्रकारो का ऐम नियापरक रूप कहत हैं जो वस्तुस्थिति के प्रति वक्ता स अभिहित त्रिया के व्यापार या अवस्था का निर्देश करते हैं। क्रिया के प्रकार जो अथ देन हैं उन्हे प्रकारपग्र कहत है। हिंदी म अनुमान द्विविधा सम्भावना आदि जस भाव कवठ क्रिया के प्रकार से ही नहीं अपितु जय माधना से भी व्यक्त हो सकते है । एम साधनो म समावेश है विन्ही विप पता, निपाता नथा विगप नियाओ के प्रयोग वा जा प्रकारपरक अथ दत हैं । जम (१) गायन वह यहा ती रहता था । (२) सम्भव है कि मेरी वहिन आज ही जा सकेगी। परतु प्रकारपरक भावा वो यवत करने का मुग्य साधन है श्यिा के अन प्रकार। हिदा म ये क्यिापरक स्प मश्रिप्टात्मक या विग्रिप्टात्मक होते है । पदरचनापरक तथा भावाथक विपताआ द अनुसार हिती म कियाओ के ये चार प्रकार है (१) निश्चयाथक प्रकार, (२) आनाथव प्रकार, (३) मम्भावनाथ प्रकार तथा (४) सकेनाथक् प्रकार । निश्चयायक प्रकार त्रिया व निश्चयाथक प्रसार का कार्य जपना पदरचनापरव चिह्न नहीं है जो उमवा पूण निर्देश का मक । नि'चयाथक प्रकार की यह विशेषता है दि उमर कार केम्प हात हैं। नि चयापक प्रचार निया में व्यापार की दम्तविकता का दाता हुआ बनाता है कि ववता उम व्यापार या एक तथ्य ममता है और उममा वतमान भत या भविष्यतबार मे मम्मध जोडता है । नि चयाथर प्रकार में तीन मुम्य वागन पद्न अवानर भद होत हैं । मुविधा के लिए हम इन अवातर भेटो को या ना नाम टंगे। उनम बतमानकाल में निम्न बा परिगणन होता है (क) मामाय बतमानकार। (ख) जटिर वतमानकाल । (ग) सातत्यबाधा वतमानवार । (4) जटिर मातत्यवाधर वतमानकार। भूतकार म निम्न का परिगणन होता है (4) सामा य अपूर्ण भूतवाल । (स) जटिर अपूण भूतकार। (ग) सन याक भूनकार । (घ) जटि मात यवोधर भूतमा। (इ.) मामाय भतकार। (च) आसन भूतकाल । (छ) पूण भतकार। भविष्यत्कार म निम्न का परिगणन होता है (1) प्रथम मविप्यतवार । (स) द्वितीय भविष्यतवार । (ग) तृतीय भविष्यतकार। (4) मातत्यवाधक भविष्यतबार । वर्तमानकाल तथा उसके भेद सामाय वर्तमानकाल 'हाना' त्रिया के सामाप वतमानकार म दा भेट हात है मरर नया जटिर' । हाना' शिया वतमान का मरर भेद उक्त क्रिया की परिवति। धातु म पुरपनावर प्रयया से बनता है । वतमान कार से मार भेद म हाना निया के कप कवर पुरप तया वचन म बदरने हैं । एक वचन में मध्यम तथा अप पुप प म जैम हात हैं । च व म उत्तम मध्यम (आरयूचर आप भवनाम मे मम्बधिन) नथा अ य पुष्प दे KE जम हात हैं। सामाय वतमान काल के सरल भेद मे होना' क्रिया को स्परचना एकवचन बहुवचन (में) है उत्तम प्रश्प मध्यम पुरुष प्रय पुरुष (तुम) हो, (आप) है सामा य वतमानकाल का निर्माण सामा य वतमानवार निया के सामा य वतमानकारिक वृदत तथा होना रिया के सामाय वतमानकाल में सरल भेद के रूप में सयोजन से बनता है । जमे कॉटेज पे लडका को दखता हूँ जा ज़ोर ज़ार स हसत है। रापरवाह रह्न है और कभी इमको बनाते है कभी उमस मजार करत है। सामा य वतमानकाल म सामाय वतमानकारिक दात लिंग तथा वचन (पुल्लिग) म वदरत है और हाना' सहायक क्रिया बटरती है पुस्प और वचन मा एकवचन स्त्रीलिंग बहुवचन स्वालिंग सामायवतमानकाल मे पढना' क्रिया को स्परचना एक्वचन पुल्लिग (मैं) पढता हूँ (में) पढती हूँ (तू) पढ़ता है (तू) पढती है (यह यह) पता है (यह वह) पडती है बहुवचन पुल्लिग (हम) पढते हैं (हम) पढतो है (तुम) पढते हो (तुम) पडतो हो (आप) पढते हैं (आप) परती हैं (ये, वे) पढ़त हैं (ये, वे) पड़ती हैं यदि सामाय वतमानकार म क्रिया के साथ 'नहीं' नवाराथक निपात प्रयुक्त होता है तो हाना महायर क्रिया का लोप हो सकता है आर स्त्रीलिंग बहुवचन स्पा मे सामा य वतमानकारिक कृदत इ अत में लग जाता है। जस य एडक्यिों नहीं खेलती। सामाप वतमानकाल का प्रयोग हिदी म सामाय बनमानकार का प्रयोग होता है (4) एसे व्यापार का निर्देश कग्न लिए जा क्यन व क्षण के माय साप हा रहा है । म क्या जाप अमबार पढन हैं ? नहा मैं पत्रिका परता हूँ। (ग) एम ब्यापार का निर्देश करन लिए जिसमा क्थन क्षण से १२६ सम्बध नहीं होता है। जैसे यह लडका अभी स्कूल में पढता है। (ग) एम व्यापार का निर्देश करन के लिए जा नित्य एव गवदा हाता है। जैस (१) पृथ्वी मूय को परिक्रमा करती है । (२) Fस म शीत वार मैं नयां जम जाती है। (घ) ऐम मावी व्यापार का निर्देश करने के लिए जिसम उस “यापार का निपानता को उद्यतता या मामीप्य की विभा होती है। जो (1) मैं अभी जाता है, मकार । (२) मैं आपरे पैरो पडती है मकान इस वक्त न वचें । (३) तुम याओ मोह्न । तुम्हें नोट जल्ली आ जाती है । यदि त्रिया के व्यापार को अनुमानपरख ममया जाता है ना मामाय वतमानकार म प्रिया सम्भावना विपतावोधर उपवाक्यो म भी मावी व्यापार का निर्देश पर मक्ती है। जैसे आप लोग क्त है तो मैं तीस हजार की यातचीत रहेगा। (ड) एम भूतकालीन व्यापार का निर्देश करने के लिए जिसम वक्ता उस व्यापार को वतमान की भाति प्रस्तुत करना चाहता है । जैम (१) वह भा समय गई ठीक हो रहता । (२) मैं दा चार हजार के लिए यूठ न बालूगा, नहीं नहीं यह मैं क्व कहता हूँ। सापाप वतमानकाल मे होना' निया का जटिल भेद सामाय वतमानवार का होना' त्रिया वा जटिल भेद अय विमामा के मामा य वतमानवार की भाति बनता है अर्थात 'होना किया सामाय वतमानकारिक वृदत नया 'होना' क्रिया के सामाय वतमानमार के मरन भेर स्पा के सयोजन से बनता है। सामान्य वतमानकात के जटिल भेद मे होना' क्रिया को स्परचना एक्वचन पुल्लिग एक्वचन स्त्रीलिंग (मैं) होता है (म) हानी हूँ (त) होता है (तू) होती है (यह वह) होता है (यह, वह) होती है यहुवचन पुल्लिग (हम) होत हैं (हम) होती हैं (तम) होते हो (तुम) होता हो बहुवचन स्त्रीलिंग (आप) होते हैं (ये, वे) होते हैं (आप) होती है (ये, वे) होती हैं जटिल वतमानकाल जरिल वतमानकार किया + सामाय वतमानकालिक कृदन्त तथा होना' क्रिया के सामाय वतमानकाल के जटिल भेद क पा के सयोजन से बनता है । जसे वह मात अपा जूते पर पालिश करता होता है । जटिल वतमानकार म सामा य वतमानकालिक कृदन्त लिंग तथा वचन (पुल्लिग) में बदस्त हैं और 'होना' क्रिया के मामा य वनमान काल के मरल भेद के रूप पुरुष और वचन में बदलते हैं। जटिल वतमानकाल मे 'पढना' क्रिया की रूपरचना एकवचन पुल्लिग एकवचन स्त्रीलिग (म) पढता होता है (म) पढती होती है (तू) पढता होता है (तू) पढती होती है (यह, वह) पत्ता होता है (मह घह) पढती होतो है बहुवचन पुल्लिग बहुवचन स्त्रीलिंग (हम) पढ़ते होते हैं (हम) पढती होती हैं (तुम) पदते हो, (तुम) पढली होती हो, (आप) पढ़ते होते है (आप) पढ़ती होती हैं (ये, ३) पढते होते हैं (ये, ये) पड़ती होती हैं जटिल वतमानकाल का प्रयोग हिटी म जटिल वतमानकाल ऐस व्यापार का निदश करन के लिए प्रयुक्त होता है जा वतमान में क्सिो यक्ति के अभ्यास या म्वभाव में मम्बधित हाता है । जम उमका भाई यहा घूमने के लिए आता हाता है। सातत्यबोधक वतमानकाल मातत्यबाधक वतमानगल त्रिया सातत्यवोधक कृदन्त तथा होना' त्रिया क सामा य नतमान न सरल भेद द रूपा व मयाजन में बनना है । जैसे वह घर म जा रग है। मानत्यपाधव वतमानमा म सानत्यवोधव कृदन लिंग तथा वचा बहुवचन स्त्रीलिंग बहुवचन स्त्रीलिए (पुल्लिग) म बलत है और 'हाना' क्रिया के सामाय वतमानकार व मरल भेद के रुप पुरुष तथा वचन म बदलते है सातत्परोधक यतमानकाल में 'पदना' क्रिया की रूपरचना एकवचन पल्लिग (म) पढ रही है (त) पर रही है (यह, वह) पढ रहा है (यह, वह) पह रही है যমন বুলি (हम) पढ़ रही हैं (तुम) पढ रही हो, (आप) पढ़ रहे हैं (आप) पढ रही हैं (ये, 2) पढ़ रहे हैं (प, वे) पा रही हैं सातत्यवोधर वतमानबाट म यदि क्रिया के साथ 'नहीं' नकारायन निपात प्रयुक्त होता है तो होना' महायर क्रिया वेप कभी कभी गुप्त हा हो जाते है । जैस वह म घर म नही रह रहा । सातत्यबोधक वर्तमानकाल का प्रयोग हिन्दी में मातत्यबोधर वतमानकार का प्रयोग होता है (क) ऐस सातत्यबोधपरक व्यापार का निर्देश करन के लिए जो क्यान से क्षण के साथ-साथ होता है । जस पडों पर चिडिया बोल रही हैं। (ख) ऐम मानत्यबोधपरक व्यापार का निर्देश करन ने लिए जिमा क्यन के क्षण स मम्बध नही हाता है । जस हम डाक्टर की दवा खा रहे हैं। (ग) स मातत्यवोधपर व्यापार का निर्दी करन के गिा जो निय एवं गवदा होता है । जमे पावो अपनी धुरी पर घूम रही है। (घ) गमे व्यापार कागि करन के लिए जिमका मम्पादन निरर भविष्य में होगा। एम प्रयाग म वाक्य प्राय ममयविशेषताबोधन भविष्य या मरत परता होता है । म मेरे मित्र को यहिन आज मांझका वम्बई जा जाना पिया वा मायापर वनमान अमामाय बारव मनिया के मामाय RT गगन म प्रिया मामाय प म निर्दिष्ट यापार के गम्पादन वाध्यय प्रमर कान लिए प्रयुत हाता है । म (१) वह चिठी - लिखा जा रहा है। (२) यह सभा परमा शाम को पाच बज हान जा रही है। जटिल सातत्यबोधक वतमानकाल जटिल सातत्यबोधक वतमानकाल निया के सातत्यबोधक दात तथा होना निया के मामा य वतमानकार व जटिल भेट के रूपा के सयोजन स बनता है । जस पुन का उनति को दखकर पिता प्रसन हा रहा होता है। जटिल सातत्यदाधक वनमानकार म मातत्यबाधक कृत तथा हाना क्रिया का वतमानकाग्वि वृदत लिंग और वचन (पुल्गि) म बदते है और होना रिया के सामा य वतमानकार क सरल भेद के रूप पुरुष तथा वचन म बदलत है। - बहुवचन स्त्रीलिंग जटिल सातत्यबोधक वतमानकाल मे 'पढना' क्रिया की रूपरचना एकवचन पुल्लिग एक्वचन स्त्रीलिंग (मैं) पढ रहा होता है (मैं) पढ रही होती है (तू) पड़ रहा होता है (तू) पढ रही होती है (यह वह) पढ़ रहा होता है (यह, यह) पद रही होती है चाहवचन पुल्लिग (हम) पढ रहे होते हैं (हम) पढ रही होती है (तुम) पढ़ रहे होते हो, (तुम) पढ़ रही होती हो, (आप) (आप) पढ रहे होते हैं पढ रही होती हैं (ये, वे) पढ रहे होते हैं (ये वे) पढ़ रही होती हैं जटिल सातत्यबोधक वतमानकाल का प्रयोग हिदी म जदिल सातत्यबोधव वतमानकाल एमे सातत्यवोधन यापार का निर्दे। करन के लिए प्रयुवा हाता है जो वतमान म किसी यक्ति के अभ्यास या स्वभाव से सा घत हाता है । जसे मेरा मित्र भोजन के बाद आराम कर रहा हाता है। भूतकाल तथा उसके भेद सामाय अपूरण भूतकाल हाना प्रिया के सामाय अपूण भूतकाल म भा दो भर हात हैं मरल तवा जरि । होता क्रिया क मामा य अपूण भूनकाल मरर भद व काय में 'या' महापर प्रिया प्रयुक्त होती है । यह सहायद त्रिया वेवर लिंग नया वचन म बदलती है। जैस एकवचन पुल्लिा एकवचन स्त्रीलिंग (तू) पा (यह, वह) या (त) यो (पह, वह) यो बहुवचन पुस्लिग बहुवचन स्त्रीलिंग (तुम) थे, (आप) ये (तुम) पीं, (आप) थों जम छोटा सा मकान पा परतु उसके गाव वाल गढी' के आदर ध्यजन भब्द स पुकारा करते थे और ठाकुर को डर के मारे रामा द से सबोधित करते थे। सामान्य प्रपूण मृतकाल का निर्माण सामाय अपूण भूनकाल रिया के सामाय वतमानकालिक दात तथा होना लिया व सरमाय अपूर्ण भूतकाल के सरर भेा पा ममोजन से बनता है। सामा य वतमानकाल मे तया सामारय अपूरण भूतकाल में होना' क्रिया के सरल भेद का प्रयोग उक्त दायाम होना पिया र मरर भेद का उपयोग होना है (A) स्वत्त वप में । इस प म हाना किया सरर भेट मिसी का उपस्थितिमा विद्यमानता का मामाय निग करत हैं 1 जम (१) वह यम्बई मे है । (२) मह पुस्ता मज पर है (पी)। (स) मुग्य गियामा पाप निर्माण म । जैम वर पडना है (था)। (ग) महायक पिया प म । समापन के माथ प्रयुक्त हाना किया का तप्य वा निग वरनी है। जैस पर विद्यार्थी है (था)। विपण माय प्रयुक्त हाना रिया निर्दा बसा है (1) किमी अकाग्य मस्य का। म (१) पप्वी गोर है। (२) प्राचान वालम यूरोप वा जगवायु विर गरम था। (२) रिमा एर घटना मा । जस का बीमार है (पा) ।
(३) पब यी वस्तुमा क ममूह में म तिमी एक निश्चिन का। जमे वह म्याही कारी है (थी)। सामाय अपूरण भूतकाल मे 'पढना' क्रिया की रूपरचना एकवचन पुस्तिग एकवचन स्त्रीलिग (मैं) परता था (मैं) पढतो यो (तू) पढता था (तू) पर ली थी (यह, बह) पता था (यह वह) पढती थी बहुवचन पुल्लिग बहुवचन स्त्रीलिंग (हम) पढते ये (हम) पढती थीं (तुम) पढते , (आप) पढ़ते थे (तुम) पढतो या (आप) पत्ती यों (प, वे) पडते थे (पे वे) परती था ऊपर दी गयी तारिवाआ स स्पष्ट है कि पुल्लिग में वचन म सामान्य वतमानकालिक मदत तथा सहायक क्रिया दाना ही बदलत हैं। स्त्रीगि म सामा य वतमानकालिक वृदत वात्री मुग्य त्रिया दाना वचना म अपरिवतित रहता है । वचन म देवर सहायक रिया बदलती है। यदि निया के साथ नहीं नागयक निपात प्रयुक्त हाता है ता सहायक रिया के रूप लुप्त भी हो सक्ने हैं । जस वह कर काई पुस्तक नही पत्ता । जब महायर त्रिया का रोप दाना है तर सामान्य वतमानकारिक त बहुवचा म ती व म्प में प्रयुक्त हाता है जैम परमा य रदरिया नहीं घूमती । यदि भूतकार म त्रिया व व्यापार की जानि भीष्ट होना है ता सामा य अपूण भूतका' म नहा नवाराथव निपात के प्रयाग के अभाव में भी सहायक प्रिया का गप हा जाता है । जम (१) वभा उस बाई काल रंग का समाज सिरवा दता और कभी वाई पाजामा वनवा दता। (२) हक प्रकाश और अधियारेस रगकर कभी नीले दोसल कभी सफर और फिर दरम अरुण पड़ जाते। (३) एम ममय म अक्री कमर म चुपचाप काइ स्तिाव पडती या अपनी समवयस्वाआ स जो उम शवन या मिग्न आयी होती बात करता प्रभा के पास व पाना वी इग्यिा और पानदान रख जाती। सामाय अपूरण भूतकाल का प्रयोग सामाय अपूण भूतार म हाना पिया का जटिल भट अन्य प्रियामा के सामाय अपूण भूनकार की भांति बनना है अथात 'हाना किया के मामा य पत्तमानकालिन्त नया 'होना क्रिया के सामाय अपूर्ण भूतकार में सरल भेद के रूपादे मयाजन स बनता है। सामाय प्रपूण भूतकाल के जटिल भेद में होना' क्रिया को स्परचना एक्यवन पल्लिग एकवचन स्त्रीलिंग (मैं) होता था (मैं) होतो यो (तू) हाता था (त) होती थी (पह, यह) होता या (यह, वह) हाता पी बहुवचन पुस्लिग बहुवचन स्त्रीलिंग (हम) होते थे (हम) हाती थीं (तुम) होत थे, (आप) होत ५ (तुम) होती थी (आप) होती पाँ (ये, 4) हात थे (ये, वे) होती थीं - सामान्य वतमानकाल मे तथा सामान्य अपूण भूतकाल में होना' क्रिया के जटिल भेद का प्रयोग उपरोक्त शीपर म दिय काराम होना क्रिया का जटिए भेद स्वतंत्रता स तथा सहायर किया के तौर पर प्रयुक्त होता है । स्वतत्र श्याग म यह किसी यो उपस्थिति या विशमानता का प्रायिकता का निर्देश करता है । जैसे (१) यह पुस्ता मज पर होती है (पी) । (२) उसमें यहाँ रहुत महमान हान है (५) । (३} इन स्थाना में बहुत जानवर होते हैं {थ)। (४) मेर भाई वे पाम मग पैमा होता है । (५) उम आदमी के पास बहुत बडा सोटा होता था। विपण के साथ प्रयुक्त सहायर रिया र तौर पर 'हाना' किया निग वरती है- (क) मिमी वस्तु के स्थायी गुण या विशेषता का ! जैम (१) साहा बड़ा होता है । (२) कौए का हान है । (ग) किसी घटना की प्रायिवना या आवति या जमे (१) यह लडका अपमर बामार होता है {था) माद में माय प्रयुत हाना त्रिया बधुता का भी निर्देश करती है । जैस वह मरा चाचा होता है। गयुरा नामित क्रियाआ तथा रियानामित दिममुदाया म चियापरव अग तौर पर हाना किया ये जतिभा आमा व्यापार की प्रायिकता का - निर्देश करने के लिए प्रयुक्त होते है । जम (१) हमार पाठ सुबह नौ बने गुरु होते हैं (थ) । (२) उस शहर पर बहुत हमले होत थ । बाध्यतामूलक वाक्या म 'होना' पिया द जटिर भेद क्रिया के सामाय रूप से व्यक्त व्यापार का प्रायिकता का निर्देश करता है। जम मुझे वहाँ जाना होता है (था)। जन प्रात जटिल अपूण भूतकाल जटिल अपूण भूतकाल निया के सामाय वतमान कालिक कृदन्न तथा होना क्रिया के सामा य अपूण भूतकाल जटिल रूपा के सयोजन से बनता है । जैस ६ बजे म उसके घर जाता था तब भी वह सोता हाता था। जटिल अपूण भूतकाल म वचन (पुल्लिग) म सामाय वतमानकारिक इदत तथा सहायक क्यिा दाना ही बदलते हैं। स्त्रीलिंग मे सामा य वतमान कार वाली मुग्य क्यिा दोना वचना म परिवर्तित रहती है। वचन में क्वल सहायर किया बदलती है। जटिल अपूण भूतकाल मे 'पढना' क्रिया की रूपरचना एक्यचन पुल्लिग एक्वचन स्त्रीलिंग (में) पदता होता था (मैं) पढती होती थी (तू) पढता होता था (तू) पढती होती थी (यह घर) पढता होता था (यह वह) पढती होती थी बहुवचन पुल्लिग (हम) पढ़त होते थे (हम) पत्ती होती थीं (तुम) पढते होते थे (आप) (तुम) परतो होनी थीं (आप) पढती पढत होत थे होती थीं (ये 4) पढते होते थे (ये, वे) पढती होती थीं बहुवचन स्त्रीलिंग जटिल अपूरण भूतकाल का प्रयोग हिदा म जटिर अपूण भनवार एम व्यापार का निर्देग करन के लिए प्रयुक्त हात हैं जो भूतका' म किसी व्यक्ति के अभ्यास या स्वभाव म सम्बन्धित हाता है । जरा राममूर्ति प्रात उठार नियमपूर्वक व्यायाम करता हाना था ।
सातत्यबोधक भूतकाल सातत्यवाधर भूतकाल क्रिया २ मातत्याधर वृटन नथा हाना' निया के सामाय अपूर्ण भूतकाल सगर भेद व रूपोर मयाजन स बनता है । जैसे कर बडे जोर स पानी वरम रहा था। सातत्पबोधक भूतकार मे सातत्यवाधा कृदन्त लिंग तथा वचन (पून्टिग) म बदलता है। 'हाना क्रिया के मामाय अपूण भूतकार के सरल भेद के पलिंग तथा वचन म बदलत हैं । सातत्यबोधक भूतकाल मे पढना' क्रिया की रूपरचा एक्वचन पुल्लिग एकवचन स्त्रीलिंग (मैं) पढ़ रहा पा (मैं) पढ़ रही थी (त) पढ़ रहा था (तू) पद रही थी (यह वह) पढ़ रहा पा (यह, वह) पढ रही थी बहुवचन पुल्लिग (हम) पढ़ रहे थे (हम) पड़ रही थी (तुम) पढ़ रह पे, (आप) पढ (तुम) पह रही थी (आप) पह बहुवचन स्त्रीलिग (ये, वे) पड रही यो सातत्यबोधक भूतकाल का प्रयोग हिला म सातत्याधर भनकार का प्रयोग होता है (4) हम सातत्यबोधन व्यापार का निर्दे। करन के भूत कार किमी क्षण म या विमा अन्य व्यापार सम्पादन के भण म होता था । जैम (१) मैं उम ममय एम बिनाब लकर पग्न का वहाना कर रहा था। (२) मुये ता मुखर म ही इस चार पर आरचय हो रहा या कि क्या वर दम इनती मह वपूण वान का अत्यन तुच्छ बनाकर उडाय हुए है। (-) एर दिन मध्या समय जाजारामबापर रहग रह व बुद्धाया नामा गांव म व पाणी निपार ब्राह्मण य द्वार पर नाया। (५) जर तामरे दिन बजारमो वारकर पहुंचा तो गाग्दा बगल मामन पाम पर रग थी। (4) ग मानत्यवोधामा पा निग्न व गिा जिसकी पृष्ठभूमि में क्सिा जय व्यापार का सम्पादन हुआ है। जैस (१) मरो धमपत्नी और लाल की मा एक दिन वठी हुई बातें कर रही था कि म पहुँच गया । (२) धूप का गरमी स मुखी होकर वह चिता भुलान का प्रयत्न कर रहा था कि किसी ने पुकारा--भर जाटमी रह कहाँ ? कभी भी बल देने के लिए मुग्य निया की धातु के बाद ही निपान का प्रयोग किया जाता है । जस व स्टगन ना ही रह थे कि गाडा निकल गयो । जाना निया का मातत्यवोधक भूतकार उमामा य कारक में निया के सामाय रूप के सयोजन से निया के सामा य प द्वारा निर्दिष्ट भूतकालिक व्यापार के सम्पादन का ध्यय प्रकट करने के लिए प्रयुक्त हाता है । जस (१) वह वही चिट्ठा रिग्वन जा रहा था। (२) म जावाज लगान जा ही रहा था कि वह उतर कर सामने खड़ा हो गया। जटिल सातत्यबोधक भूतकाल जटिल सानत्यबाधक भूतका क्रिया मातत्यनाधक कृदत नया हाना निया के सामा य अपूण भूतवा' क जटिर भेद कम्पो क मयोजन स वनता है । जस जब म उसक घर जाता था वह प्राय कोइ पुस्तक पढ रहा होता था। जटिल मानत्यबाधक भूतकाल म सातत्यवाधक कृदत तथा हाना प्रिया का वतमानवालिक वृदत लिंग तथा वचन (पुल्गि) म बदल्न है और होना प्रिया के सामाय भूतकार वे सरर भट कप लिंग तथा वचन म बनरत हैं। जटिल सातत्यबोधक भूतकाल मे 'पढना' क्रिया की रूपरचना एकवचन पल्लिग (मैं) पढ रहा होता था (मै) पर रही होती यो (तू) पर रहा होता या (तू) पड रही होती थी (यह, वह) पढ़ रहा होता था (यह वह) पढ़ रही होती थी बहुवचन पुल्लिग (हम) पढ़ रहे होत थे (हम) पड़ रही होती थीं (तुम) पर रह होत थे (आप) (तुम) पड़ रही होता थीं (आप) पड़ रह हात ये पह रही होती थीं (ये, ये) पा रह होते थे (पे, वे) पड़ रही होती थों एक्वचन स्त्रीलिंग बहुवचन स्त्रीलिंग जटिल सातत्यबोधक भूतकाल का प्रयोग हिदी म जदिर सातत्यरोधर भूनाल एम मानत्यत्रोघर यापार का निर्देश करन क लिए प्रयुक्त होता है जो भूतकार म विसी व्यक्ति के अभ्यास या स्वभाव से सम्बधित होता है । जमे यह प्रात उबर प्रतिदिन सर करन जा रहा होता था। सामा य भूतकाल सामाय भूाकार सामाय भूतकालिक कृदन्न मे व्यरत होता है । जसे (१) रडका आया । (राडोवान चुपचाप बैला का हाक्न गा! सामाय भूतकापा निमाण म रिया को अक्मकता ममता के अनुसार भद किया जाता है। আমায় পুরাত ম ম সঙ্গম গিযা ৰী Fষনা দিন অশখ के अनुमार होता है सामा य भूतकाल में पहुँचना' अकमक क्रिया को रूपरचना एकवचन पुल्लिग एकवचन स्त्रीलिए (मै) पहुंची (द) पहुँचा (तू) पहुंची (मह वह) पहुँचा (यह वह) पहुँचो बहुवचन पुलिग बहुवचन स्त्रीलिंग (हम) पहुँवों (तुम) पहुंचे, (आप) पहुंचे (नुम) पहुँचौं (आप) पहुँवों (ये, ३) पहुंची उपराक्न तारिका में स्पष्ट है नि सामाय भनवार में पिया रिग नया वचन म यदरता है। उन्नुमार वाम म सामाय भूतकार म विचा से अभि ध्यान विधेय वे गि तथा वचन उदेय का अनुमान करन हैं। एसा वापरचना जिमम विधय काप उद्दश्य (क्नी) नुमार हाता है क्तृ धान्यपरर वाश्य रचना बहाना है। किया ३ पुष्पवावा अय पा की भौति जिनम मामान्य भूतकानि वृदन्न का गमावे? हाना है मामाय भूतकार का प्रयोग त्रिया व अय पर निभर करता है। मय अमर रिया केवा रत वाज्यपाव वाक्यरचना म प्रयुक्त होती हैं । सक्मक क्रियाएँ प्राय उक्त प्रवार को वाक्य रचना में प्रयुक्त नहीं होती हैं। सामाय भूतकाल म तथा दूसर पुरुषवाचक म्पो म जिनम सामाय भूतकारिक कृदत समाविष्ट होत हैं रिया की म्परचना में 'ने विभक्तिचिह्न का प्रयोग अनिवाय है जिसके कारण वाक्य म उद्देश्य सामाय कारक म नही बल्कि 'ने विभक्तिचिह्न सहिन अमामा य कारक में प्रयुक्त होते हैं। ऐमी वाक्यरचना म विधेय लिंग तथा वचा म उद्देश्य के अनुसार नहा बल्कि सामाय कारव म प्रधान कम के अनुमार होत हैं। जसे पिताजी ने एक लिफाफा खरीदा। (२) पिताजी ने तान लिफाफ खरीदे। (३) भाई ने एक चिठी रिसी। (1) भाई ने बहुत चिटिठयां लिपी। ऐसी वाक्य रचना जिमम विधेय का रूप प्रधान कम के अनुमार होता है कमवाच्यपरक वाक्यरचना क्ाती है। वाक्य म प्रधान कम भाव में या उस स्थिति में जब प्रधान कम को विभक्तिचिह्न सहित असामा य कारक म होता है अथवा वह प्रधान कम कमकारक म कोई मवनाम होता है तो वाक्य म विधेय क्सिी का अनुगमन नही परता है और वह एकवचन अय पुरुष पुल्लिग अविकारी रूप में प्रयुक्त हाता है। जमे (१) विद्यार्थी ने काले तरते पर लिखा। (२) लडकी ने अपने चाप को दप ग्यिा । (३) मरे दोस्त ने मुझे यहाँ भेजा। एसी वारयरचना जिमम विधेय तीना पुस्पा साना बचनो व लिंगा के लिए एक्वचा जय पुरप पल्लिग अविकारा प म प्रयुक्त होता है वह माव वाच्यपरक वाक्यरचना बहाती है। सामा य भूतकाल मे लिखना' सकर्मक क्रिया की रूपरचना कमवाच्यपरक वाक्यरचना एक्वचन मैंने चिटठी लिखो (चिटिठया लिपीं) तूने चिट्ठी लिखी (चिटिठयां लिवी) (इसने, उसने) चिटठी लिखो (चिटिटयां लिलयों) बहुवचन हमने पत्र लिखा (पत्र लिग्ने) तुमने पत्र लिखा (पत्र रिखे) आपने पत्र लिखा (पत्र लिये) (इहोंने, उन्होने) पत्र लिखा (पत्र लिखे) भाववापपरक वाक्यरचना एकवचन मने चिटका (चिदिठयों) का लिखा तूने चिट्ठी (चिटिठया) को निसा (इसन, उसने) चिटठी (चिटिटयो) को लिखा बहुवचन हमने चिट्ठो (विट्टिया) को निषा (तमने, मापने} चिट्ठी (चिट्टियों) को लिखा (इहोंने उन्होंने) चिट्ठी (चिट्टिया) को लिखा सामrय भूतकाल का प्रयोग दिदी म गामाय भूतकार का प्रयाग होता है (1) महद सम्पादित व्यापार का निर्देशन करने के लिए। जैसे इहा दिना म इलाके के तहसीलदार साहब न अपने दौरे के लिए मागग का गांव चुना। (य) मद या अनक अनुमिक सम्पादित यापार का निर्देश करन में लिए । जैस (१) कोई हुक्का पीन लगा, कोई ताश खेरने लगा, काई अखबार उटापर देवन लगा। (२) महमूद ने शरारत भरी आँसो स मरी तरफ देखा और एर आँख भीच ली। (ग) एमे सम्पादित व्यापार का निर्देग करने के लिए जो माद रितु अनर वार्यों वाला होता है । जैस {१) नीला रफी के घर कई बार आयो । (२) बाजार म, गत्ती म, सहब पर जहाँ यही वह मिल गया रडका न उस सगाना शुरू कर दिया। (भ) एम व्यापार का निर्देश परल लिए जो सम्पादन क्षण में निरसधा रहार सम्पादित हा ममया जाता है । जैस (१) वह बम्बई पता गया । (२) उहोन मुझस कुछ ना रहा । (1) वतमानका म होन वार एमे व्यापार का निर्देग बरन के लिए जा सम्मानित हुए पम प्रस्तुत किया जाता है । जस (मैं अभी चला। (२) जरा नीच आ विटिया । जवाब म जरा-मा पर प्रभा ने जवाव निपा, आयी अम्मा जा।" (च) मात तितावाधर उपवारया में मावो व्यापार रा निग करन लिए । जस यति उमन मा किया तो उम म पर पटना:m १४२ प्रास न भूतकाल जासन भूतकाल रिया के सामा य भूतालिब कृटत तथा होगा प्रिया के सामाय वतमानकाल मगर भेद के रूपा ये मयोजन से बनता है। जमे बच्चा सो चुका है। बहुवचन स्त्रीलिंग कर्तृवाच्यपरक वाक्यरचना प्रास न भूतकाल में पहुचना' प्रकमक क्रिया को रूपरचना एक्वचन पुल्लिग एक्वचन स्त्रीलिग (म) पहुँचा हूँ (म) पहुँचा हूँ (तू) पहुँचा है (तू) पहुँची है (यह, वह) पहुँचा है (यह, वह) पहुँची है बहुवचन पुल्लिग (हम) पहुँचे हैं (हम) पहुंची हैं (तुम) पहुँचे हो (आप) पहुंचे हैं (तुम) पहुँचो हो, (आप) पहुंची हैं (ये, थे) पहुँचे है (ये, घे) पहुंची है उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि क्तृ वाच्यपरक रूपरचना में आमन्न भूतकाल में सामान्य भूतरारिप कृदत लिंग तथा वचन (पुरिलग) म बदरत हैं । 'हाना सहायक क्रिया पुरुष तथा वचन म बरती है। यदि त्रिया सकमक है तो क्मवाच्यपरक या भाववाच्यपरक वाक्यरचना प्रयुक्त होती है। जैस (समवाच्यपरक रूपरचना) १ उसन यह अखबार पढा है। २ स्ड ने दो चिटिठयां भेजी हैं। (भाववाच्यपरक परचना) १ हमन एव आदमी को देखा है । २ उन्होने लिखा है। प्रासन्न भूतकाल मे लिखना' सकर्मक क्रिया की रूपरचना कमवाच्यपरक वाक्यरचना कमवाच्यपरख वाक्यरचना म मामा य भूतरारिक करत वाली प्रिया के जामन भूनकाधिपगि नया वचन (पुगि) म बदलने हैं । 'हाना सहायक त्रिया वेवर वचन म बदरती । एश्वचन मने चिट्ठी लिखी है (चिट्ठिया लिखो हैं) सूने चिट्ठी लिपी है (चिट्टियाँ लिखी हैं)
इसने, उसने चिट्ठी लिखी है (चिट्ठियां लिखी है)
बहुवचन
हमने पत्र लिखा है (पत्र लिखे हैं)
तुमने आपने पत्र लिखा है (पत्र लिखे हैं)
होंने उहोंने पत्र लिखा है (पत्र लिखे हैं)
भाववाच्यपरक वाक्यरचना
भाववाच्यपरक वाक्यरचना म सामाय भूतकारिक कृदन्त वाली क्रिया
पा मासन भूतवाल्वि स्प सदा पुल्लिग एक्वचन में प्रयुक्त होता है और
होना सहायक क्रिया अय पुरुप एक वचन म ।
एण्वधन
मने चिट्ठी (घिट्टियों) से लिखा है
सूने चिट्ठी (चिट्टियों) को लिखा है
इसने उसने चिट्ठी (घिट्टियों) को लिखा है
बहुवचन
हमने चिट्ठी (चिट्टियों) को लिखा ह
तुमने मापने चिट्ठी (चिट्ठियों) को लिखा ह
होंने ग्रहोंने चिट्ठी (चिटिटयों) को लिया
है
प्रास न भूतकाल का प्रयोग
हिती म आसन भूतवार ऐस व्यापार का निर्देश करने के लिए प्रयुक्त
होता है जो एक निश्चित क्षण म सम्पादित हुआ होता है तथा अपन परिणाम
के रूप म जारी है । यह बार मूचित करता है दि व्यापार क्यन क्षण म
विद्यमान है । इस प्रार आमन्न भूतवार से निरिप्ट व्यापार का समय भूत
तथा वनमान दाना पारा स मम्बधित होता है । जैस (१) अब पांच बजे
हैं। (२) बातों से भी रगता है नि अब समय आ गयो । (.) एक दफा
राकर मार उसरा आसुर गया है।
पूण भूतकाल
पूण भूतराल त्रिया व माय भूनपारिक कृदन्न तथा हाना किया
व मामाय अपूण भूतरा व मनपा समाजन म बनता है। जम
पहन भा गरी आया था।
- पूण भूतकाल तब भी प्रयुक्त होता है जब किमी अय व्यापार से पूर्व सम्पादित व्यापार का उल्लख अपन से पश्चादवर्ती व्यापार + अननर होता है। वाक्य म प्राय टस अप अधिक पश्चातकालीन व्यापार वा उल्लब नहीं क्यिा होता है लेकिन उसका प्रसग म पता चलता है । जमे (१) मैं बाहर नहीं गया था उस समय मैं मोया था। (२) जम्मा को जावाज मुनो बडी आइ दाल तो मैंन चख ली थी। (३) वाइजी से 7 भागना पड इमलिया तो मैं जम्मा के पास गया ही था। (ख) ऐसे पूर्व व्यापार वा निर्देश करने के लिए जिम पश्चात किमी अय व्यापार का सम्पादन हुआ हो । जैम (१) श्रणी माय थ नि पाठ शुरू हुआ । (२) म धोर म निकला ही था कि मरा मित्र आया । (ग) मे यापार का निर्देश करन के रिए जा भूतकालिद जय व्यापार के सम्पादन से पूर्व सम्पादित न हा पाया है। प्रेम प्रयोग म किया म पहा न निपात का यवगर हाता है । जस (१) भी हम पहुच न 4 कि व चल गय । (.) अभा वह एव नग गली पर या हा था कि वाला फिर से सिमवन की उस आहट मिली। (३) जम्मा न कुछ बन्ने 4 रिए मह खाला ही था कि अचानव मुनी क फू फरकर गने में मव चौक गय । मिश्रित पाया म जिनम सम्भावना विशपनाबाधक उपवाक्य हाना है पूर्ण भूतकाल एस पूवकालान यापार का निर्देश भी कर सकता है जा उपवाक्य व विधेय में निरिष्ट व्यापार स पूय सम्पादित न हा पाया हो और उपवाक्य मनकाग निपात वा प्रयोग न किया गया हो। जस जगर हम लोग दौडकर पक्ड न रतना जान ही द दी था। (घ) स व्यापार का निदा करन के लिए जा भूतका' म पयाप्त समय पूच मम्पादिन टुआ होता है। जय अक्रबर समाजवादा प्रानि मन १९१७ म हुई था। कुछ क्रियाए अपन जय व अनुमार मक्मर मामा य भूतकाल जाम न भूनका पूण भूनवाल तथा दूमर पुस्पवाचक म्पा म भी जिनम मामा य भूत कायि वृदत समाविष्ट होता है जबमा त्रियाआ को भौनि प्रयुक्त हा मरनी है। एसी प्रियाआ म परिगणित लगती है भूएना ममयना मोपना हारना जोनना आदि। साना त्रिया व म्प जवमा त्रियाआ का भाति बनन । हम य पान यहा राय (है) (थ)।
भविष्यत्काल तथा उसके भेद प्रथम भविष्यत्काल प्रथम भविष्यत कार क्रिया की धातु म निम्न पुरुषवाचा प्रत्यया के जोडन बनता है एकवचन पल्लिग उत्तम पुरुष ऊगा एकवचन स्त्रीलिंग मध्यम पुरुष अ य पुरुष एगा एगा ऊगो एगी एगी बहुवचन पहिल्ग उत्तम पुरुष मध्यम पुरुष अ य पुरुष ओगे एगे बहुवचन स्त्रीलिग एगी भोगी एगी (में) पढगा प्रथम भविष्यत् काल मे 'पढना' क्रिया की रूपरचना एक्वचन पल्लिग एकवचन लिग (मैं) पढ़ गी (तू) पढेगा (तू) पदेगी (यह वह) पढेगा (यह, वह) पदेगी बहुवचन पुल्लिग बहुवचन स्त्रीलिंग (हम) पढेगे (हम) पढ़ेंगी (तुम) पढोगे, (माप) पहेंगे (तुम) पढोगी, (आप) परेंगी (ये थे) पढ़ेंगे (ये 4) पटेंगी उपगत तारिवा म स्पष्ट है कि प्रथम भविप्यत कार म पिया पुरप चन तथा लिंग म वानी है। एरवचन म मध्यम तथा अय पुष्प वप एक रानात हैं। बहुवचन म उत्तम मध्यम (आरमूचर 'आप म मम्पवित) र जय पुरप व प एक जम हात है। यति प्रिया की धानु के अन्न म आ ई, 3 ए'मस कोई स्वर है तो उन तया प्रथम भविष्यत वार व पुरपवाचर प्रत्ययो व वीच वभा . व अथवा य यजन वा आगम हा जाता। य यजनक आगम में ती तीघ ई तया ऊ हस्व' हा जात है। जन जाना-हम जायगे। -~पारगा (पारगा) । एना-वयगा।
१४८ एकवचन स्त्रीलिंग बहुवचन स्त्रीलिंग दोघ 'ई' तथा 'ऊ' तब भी हस्व हा जात है जब प्रथम भविष्यत कात दे पुरुषवाचक प्रत्यय निया की पातु मे सीधे जुइन है। जम मीना- हम 'सिएंगे। छूना-तू एएगा। लेना तथा देना नियाजा के प्रथम भविष्यत कारिक म्प उपरोक्त नियम के अपवाद है । इनम उक्त पुरुपवाचक प्रत्यय क्रिया की धातु से नहीं अपितु उसके परिवर्तित रूप से जुन्त हैं । जस एक्वचन पुल्लिग (मैं) लूगा (गा) (मै) लगी (दू गी) (तू) लेगा (देगा) (तू) लेगी (देगो) (यह वह) लगा (देगा) (यह वह) लगी (दगी) बहुवचन पुल्लिग (हम) लेंगे (देंगे) हम) लेंगो (गी) (तुम) लागे (दोगे) (आप) (दुम) लोगी (दोगो), (आप) लोगो (दोगो) (ये, वे) लेंगे (दंग) (ये, ये) लेंगी (देंगी) होना निया के प्रथम भविष्यन काटिव Fपो का निमाण अय क्रियाओ के प्रथम भविष्यत कालिक रूपा के निर्माण से काफी भिन्न होता है । जसे एक्वचन पुल्लिग एक्वचन स्त्रीलिंग (मैं) हूँगा (में) हूँगी (तू) होगा (३) होगी (यह वह) होगा (पह यह) होगी बहुवचन पुल्लिग (हम) हांगे (दम) होगी (तुम) होग (आप) होगे (तुम) होगो (आप) होगी (पे वै) होगे (पे, वे) होगी लोगे (दोगे) वहुवचन स्त्रीलिंग प्रथम भविष्यत् काल का प्रयोग प्रथम भविष्यत वार म व्यापार सम्पादन का निग करने के लिए प्रयुक्त होता है जो वयन व क्षण के बाद हो । जस (१) माचा या नि चुप बार जाकर परम पर सा जागा। (-) जव मैं चरगा तो वह पीदम आकर मेरा हाथ या चुनें का हार पर -गी।
१४६ महातो तथा लोवोक्तिया म प्रथम भविष्यत वाल समय से निरपेक्ष व्यापार का निर्देश भी कर सकता है। जैसे जो वावगा सो काटगा। जब वाक्य म एव म अधिर विवेय होत है जार व प्रथम भविष्यत पालिक ग्यिा चार हात है तव भविष्यत् कार वा गा सत्य प्रत्यय कभी-कभी अतिम त्रिया में साथ विधेय व उद्देश्य र शुमार एक बार जुनता है । जैसे जान मे पहले क्या कुछ खाआ पियोग? 'होना' क्रिया के प्रथम भविष्यत् कातिक स्पो का प्रयोग 'हाना निया में प्रथम भविष्यत बारिक म्पा का प्रयाग क्वर भविष्यत् काल का निर्देश करने में रिए ही नहीं होता है अपितु उनका यापक प्रयोग अनुमान सम्भावना दुविधा जनिश्चिाता के प्रवारपरक भावो को व्यक्त करने थे रिए भा हाता है । बसे (जनुमान)-~-उमरी उम्र बास मार की होगी। (सम्भावना) आपकी औरत होगी। (अनिश्चितता) किमी समय पह इमारत सूबसूरत होगा। हाना त्रिया के प्रथम भविष्यन कालिक Fपा से निलिष्ट अनुमान, सम्भावना तया अय प्रकारपरक भावा का अधिक निश्चित रूप स न्यपत करने के लिए वाक्य मे बहुधा गायद 'सम्भवत' आदि जस प्रकारपरप गच्द प्रयुक्त हाल हैं। जम माई भाब गायद भा वम्बइ म ही होग। उक्त प्रकारपरक भाव ताना वाला म में किसी भी वारस सम्बधित हो परना है। 'हाना निया के प्रथम भविष्यत कारिक रूप अनुमान व्यक्त करने चे लिए स्वन ताम भी प्रयुक्त हाा है। जैसे (१) बुद्ध न कहा था कि यह दुनिया धोखा है माया है । हागी किन यकीन नहीं होता । (२) (प्रश्न) वह घर पर होगे ? (उत्तर) हाग। द्वितीय भविष्यत् काल द्वितीय भविष्यत कार प्रिया के मामा य बनमान कारिय पदत तथा 'धना गिया प्रथम भविष्यत वाग्वि स्पा के मयोजन म बनता है। जैसे . वर आता होगा। द्वितीय मविप्यत वार म मामाय वतमान वाग्वि दात लिंग तथा वचन (लिंग) म बारना है और हाना मगयर रिया पुरप, वचन तथा रिंग म बरती है।
१५० बहुवचन स्त्रीलिंग द्वितीय भविष्यत् काल मे पढना' क्रिया की रूपरचना एकवचन पुस्लिम एकवचन स्त्रीलिंग (मैं) पढता हूँगा (मैं) पढ़ती हूँगी (तू) पढता होगा (तू) पडती होगी (यह वह) पढता होगा (यह, वह) पढती होगी बहुवचन पुलिंग (हम) पढ़त होग (हम) पढती होगी (तुम) पढते होग, (जाप) (तुम) पढती होगी (आप) पद्धती पढते होंग होगी (ये 4) पढते होग (ये वे) पढती होगी द्वितीय भविष्यत् काल का प्रयोग हिदी म द्वितीय भविप्यन काल भविष्यत काकि जसम्पादित या अपूण यापार का निर्दे। यरन के लिए प्रयुक्त होता है। जम (१) आप देखेंगे कि वह अपनी गरती पर पछताना होगा । (२) चारपा न हा तो मैं डाले जाती हूँ। यहा जभी तुम्हार जठजी जात हागे । जाधुनिक हिदी म हाना प्रिया के प्रथम भविष्यत कार पा म निहित प्रकारपरक मावा तथा द्वितीय भविष्यत कार के रूपा की विशिष्ट रचना के कारण इस कार का जय पयाप्त माना म बटर चुका है । इम समय द्वितीय भविष्यत पाल या प्रयोग अधिक्तर वतमान काल या निकट भविष्यत कार स सम्बयित यापार के सम्पादन के प्रति सम्भावना व्यक्त करन क पिए किया जाना है । जस (१) ग यहीं ना कहत नाग कि राय साह्न के आदमी एम बदमाश और चार है । (२) नहा भया एसा नहीं करते। यह तो घर की रीत है। जन त्वता का कही जपमान दिया जाता हागा ? (३) भी बाप आन हाग। तृतीय भविष्यत् काल तृतीय भविप्यन काल दिया + मामाय भूतकारिक वृदत तथा हाना निया व प्रथम भविष्यत कारिप पा सयाजन ग वनना है । जस वह माया होगा। निया में अय पुरुषवाचन म्पा को भांनि जिनम सामा य भूतकाग्दि दरत का ममावा हाना है तृतीय भविष्यत कार वा निमाण प्रिया की अपमाता तथा समक्ता पर निभर करता है। ततीय भविष्यत काल म अक्म मियाआ भी स्परचना निम्नलिखित - कर्तृवाच्यपरक वाक्यरचना कत वाच्यपरक वाक्यरचना म तृतीय भविष्यत काल म सामाय भूत बारिक कृदन रिंग तथा वचन (पुल्लिग) म वदरत है और हाना सहाया किया पुरुष वचन तथा लिंग में बदरती है। एकवचन पुलिग एकवचन स्त्रीलिय (मैं) पहुँचा हूँगा {मैं) पहुँची हूँगो (तू) पहुँचा होगा (तू) पहूँची होगी (यह, वह) पहुँचा होगा (यह, वह) पहुँचो होगी মন बहुवचन शालिग (हम) पहुँचे होगे (हम) पहुँची हागी (तुम) पहुंचे होगे, (आप) (तुम) पहुँची होगी, (आप) पहुँधी होगी (ये, वे) पहुँचे होंगे (4) पहुँचा होगी यदि पिया सामर है ता तृतीय भविष्यत कार म कमवाव्यपरक या भाववाच्यपरक वाक्यरचना प्रयुक्त होती है। जम (कमवायपरक वायरचना) उहान यह पुस्तक पढ़ी होगी। (भाववाच्यपरस वायरचना) हमन इस फिल्म वो देखा होगा। पहुँचे होंगे तृतीय भविष्यत् काल मे लिखना' सम्म निया को स्परचना बमवाच्यपरक वाक्यरचना कमवाच्य परस पाक्यरचना म मामाय भूतवानिवृत गि तथा वचन (पुगि) म बरते है और हाना सहायर रिया गि तथा ववन म बदरनी है। एकवचन मैंने चिट्ठी लिखी होगी (चिट्टियां लिपी होंगो) ने चिट्ठी लिखी होगी (विष्टियां रिलो होतो) इसने, TRA vिो लिटी होगी (चिट्टिया रिपो होगी) १५२ बहुवचन हमने पर लिखा होगा (पत्र लिसे होंगे) तुमने, पापने पत्र लिखा होगा (पर लिखे होग) इ हाने उहोने पत्र लिखा होगा (पत्र लिखे होगे) भाववाच्यपरक वाक्यरचना भाववाच्यपरक वाक्यरचना म मामा य भूतकालिक कृदात सदा पुल्लिंग एकवचन म प्रयुक्त लगता है और हाना' सहायक निया पुरिंग एक्वचन जय पुरुष मा एक्वचन मैंने चिट्ठी (चिट्ठियो) को लिखा होगा तूने चिट्ठी (चिट्ठियों) को लिया होगा इसने, उसने चिट्ठी (चिट्ठिया) को लिखा होगा बहुवचन हमने चिट्ठी (चिट्ठियों) का रिखा होगा सुमने, आपन चिट्ठी (चिट्ठियों) को लिखा होगा इ होंने, उ होंने चिट्ठी (चिट्ठियो) को लिखा होगा तृतीय भविष्यकाल का प्रयोग हिदी म तृतीय भविष्यत् काल भविष्यवालिय सम्पादित या पूण व्यापार का निर्देग करन के रिए प्रयुक्त होता है । यह व्यापार प्राय जय भविष्यकारिप यापार म पूब हुआ होता है । जम (१) अगर जाज सुबह वह राहौर स चरा तो गाम का रावर पिण्टी पहुंच गया हागा। (.) जब यह वापस घर लौटग ता या जादा भी आधा चीत चुका होगा। आधुनिक विदा म हाना क्रिया के प्रथम भविष्यत का दम्पा म निहित प्रकारपस भावा तया तृतीय भविष्यत कार व Fपा का विलिट रचना के कारण इम का' या भाजथ पर्याप्त मात्रा म वर चुका है। इस समय तृताय भविष्यत कार का प्रयोग विस्तर भूतकार और कभी सभा भविष्यत का' में सम्बधित व्यापार ६ म रामन व प्रति मम्भावना जनुमान जानि व्यक्त करने करिए दिया जाता है । जम (१) पद दिन हा गय हांगे । (२) वर तर तुम यह काम समान कर चुद नागे। (२) भारत की प्रानिक दया आर जलवायु व वणन म यह जान गय हगि पि भारत के कुछ भागा वा मिट्टी