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Sanskrita Shiksha 2
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संस्कृत-शिक्षा
भाग-२
लेखक
पद्मश्री डॉ० कपिलदेव द्विवेदी आचार्य,
एम० ए०, डी० फिल०, पी० ई० एस० (अ० प्रा०)
पूर्व कुलपति, गुरुकुल महाविद्यालय, ज्वालापुर, हरिद्वार
विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी
पचम सस्करण १६६३ ई०
मूल्य: बारह रुपया
नाम,
Name"
कक्षा,
Class
विभाग, Section
विद्यालय, School
प्रकाशक
विश्वविद्यालय प्रकाशन, विशालाक्षी, चौक, वाराणसी-१
वाराणसी एलेक्ट्रानिक कलर प्रिण्टर्स प्रा० लि०, चौक, वाराणसी-१
विषय-सूची अभ्यास शब्द प्रत्ययादि वर्ग पृष्ठ राम कारक प्रथमा, स० द्वितीया ६ . ३ १० ४ १२ तृतीया १४ ६ १६ . १८ चतुर्थी धातु शूलट् लोट् लड् दि० लिड् लुट् पठ् लिख हस् चल् वद् पत्. स्था गम् पा प्रच्छ दृश् क्रीड़ खाद् रक्ष पचमी गृह रमा हरि गुरु सखि कर्तृ भगवत् नदी वधू मातृ वाच् वारि शर्मन् पयस् सर्व किम् तद् इदम् युष्मद् अस्मद् एक द्वि त्रि १२ १३ २२ २४ विद्यालय वर्ग २६ लेखनसामग्री वर्ग २८ क्रीडासन वर्ग ३० वस्त्रादि वर्ग ३२ भोजन वर्ग षष्ठी क्त mr my १ क्तवतु कत्वा my my गृह वर्ग ७ . my १८ शरीरांग वर्ग संबन्धि वर्ग जाति वर्ग ४० १६ ४२ सप्तमी ल्यप् तुमुन् तव्य अनीय वृद्धि सधि यण अयादि पशु वर्ग २१ नम् नी २२ ४६ ४८ . " पक्षि वर्ग जल वर्ग फल वर्ग प्रश्नोत्तर . ५० 7 ५२ परिशिष्ट (क) शब्दरूप-संग्रह (ख) धातुरूप-संग्रह ५४ ५६ संस्कृत-शिक्षा की विशेषताएँ १. इसमे भाषा-शिक्षण की नवीनतम वैज्ञानिक पद्धति अपनायी गयी है तथा अत्यन्त सरल और रोचक ढंग से संस्कृत की शिक्षा दी गयी है । २. सस्कृत-शिक्षा ५ भागो मे पूर्ण हुई है । यह कक्षा ६ से १० तक के छात्रो के लिए विशेष उपयोगी है । प्रत्येक कक्षा के लिए एक-एक भाग है । ३. प्रत्येक भाग मे प्रयत्न किया गया है कि उस स्तर से संबद्ध व्याकरण का अंश उस भाग मे विशेष रूप से सिखाया जाय। ४. अभ्यासो के द्वारा व्याकरण की शिक्षा दी गयी है । ५. प्रारम्भिक छात्रों के लिए उपयोगी सभी बाते इसमे दी गयी हैं । ६. प्रत्येक अभ्यास के लिए केवल दो पृष्ठ दिये गये है । ७. प्रत्येक अभ्यास मे व्याकरण के एक या दो नियमों का अभ्यास कराया गया है । साथ ही, आवश्यक शब्दावली भी दी गयी है। ८. उदाहरण-वाक्यो के द्वारा व्याकरण के नियमों को स्पष्ट किया गया है । उनसे मिलते-जुलते हुए ही वाक्यो का संस्कृत मे अनुवाद कराया गया है । ६. प्रत्येक अभ्यास में कुछ विशेष शब्दो, धातुओं या प्रत्ययो आदि का अभ्यास कराया गया है ! १०. परिशिष्ट मे आवश्यक शब्दो और धातुओं के रूप दिये गये है । कपिलदेव द्विवेदी आचार्य आवश्यक निर्देश -१. एकवचन १. संस्कृत मे ३ लिंग (Genders) होते है । उनके नान और सक्षिप्त रूप ये है -१. पुंलिंग (पुं०) (MasculineGender), २. स्त्रीलिंग (स्त्री०) (Feminine Gender), ३. नपुसकलिंग (नपु०) (Neuter Gender) | २. संस्कृत मे ३ वचन (Numbers) होते हैं। उनके नाम और सक्षिप्त रूप ये है (एक०) (Singular Person), २. द्विवचन (द्वि० या द्विव०) (Dual), ४. बहुवचन (बहु०) (Plural) | ३. संस्कृत मे ३ पुरुष (Persons) होते है । उनके नाम और संक्षिप्त रूप ये है -१. प्रथम पुरुष या अन्य पुरुष (प्र० पु० या प्र०) (Third Person), २. मध्यम पुरुष (म० पु० या म०) (Second Person), ३. उत्तम पुरुष (उ० पु० या उ०) (First Person) ! ४. संस्कृत मे अधिक प्रयुक्त लकार (Tenses & Moods) ५ है । उनके नाम तथा अर्थ ये है --१. लट् (वर्तमान काल) (Present Tense), २. लोट् (आज्ञा अर्थ) (Imperative Mood), ३. लड् (भूतकाल) (Imperfect Tense), ४ विधिलिड् (आज्ञा या चाहिए अर्थ) (Potential Mood), लृट् (भविष्यत् काल) (Future Tense) | ५. संस्कृत मे ८ विभक्तियाँ (कारक) होती है । उनके नाम, संक्षिप्त रूप और चिह्न ये हैं विभक्ति कारक चिह्न Case सं० रूप १. प्रथमा (प्र०) कर्ता ने Nominative २. द्वितीया (द्वि०) कर्म को Accusative (तृ०) करण ने, से, द्वारा Instrumental ३. तृतीया ४. चतुर्थी (च०) संप्रदान के लिए Dative ५. पंचमी (पं०) अपादान से Ablative ६. षष्ठी (ष०) सम्बन्ध का, के, की Genitive ७. सप्तमी (स०) अधिकरण मे, पर Locative ८. संबोधन (सं०) संबोधन हे, अये, भोः Vocative
अभ्यास १
चोर,
-
शब्दावली—छात्र.विद्यार्थी, student, नरः-आदमी, man, अश्वः-
अश्वः-घोड़ा, horse,
चन्द्र.-चन्द्रमा, moon, प्राज्ञ.-विद्वान्, a learned man, मूर्ख मूर्ख, fool, चोर.
thief, पत्-गिरना, to fall, धाव्—दौड़ना, to run, भवत्-आप, (पुं०), a respected
man, भवती-आप (स्त्री०) a respected woman.
नियम १-(प्रथमा) कर्ता (व्यक्तिनाम, वस्तुनाम आदि) मे प्रथमा होती है । रामः गच्छति ।
छात्रः क्रीडति !
!
नियम २-(संबोधन) किसी को संबोधन करने (पुकारने) में संबोधन विभक्ति होती है ।
हे राम ! हे
कृष्ण
नियम ३–(प्रथम पुरुष) भवत् शब्द के साथ प्रथम पुरुष होता है । भवान् गच्छति-
आप जाते हैं । भवती गच्छति-आप जाती हैं ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढ़ो :-
छात्राः विद्यालयं गच्छन्ति । नराः ग्रामं गच्छन्ति । अश्वाः धावन्ति। चोर:
धावति । प्राज्ञाः पठन्ति लिखन्ति च । मूर्खाः चोराः च पतन्ति । बालः चन्द्रं
पश्यति । त्वं कुत्र गच्छसि ? अहं विद्यालयं गच्छामि । हे कृष्ण ! अत्र आगच्छ ।
हिन्दी में अर्थ लिखो :-
बालकाः पठन्ति लिखन्ति च.
भवान् ग्रामं गच्छति
भवती गृहं गच्छति
मूर्खाः पतन्ति हसन्ति च
:
........
७ संस्कृत बनाओ :-- वह बालक घर जाता है। वे बालक घर जाते हैं आप गाँव जाते हैं। आप घर जाती हैं। छात्र पुस्तकें पढ़ते हैं। घोड़ा दौड़ता है। चोर दौड़ते हैं और गिरते हैं। विद्वान् पुस्तकें लिखते हैं: दो बालक चन्द्रमा को देख रहे हैं। तुम कहाँ जा रहे हो ? मैं घर जा रहा हूँ: इन वाक्यों को शुद्ध करो :- बालका: गृहं गच्छतः नरः ग्रामं गच्छन्ति' बालकौ चन्द्रं पश्यन्ति' वयम् अत्र तिष्ठामि. गम्, पत्. धाव् धातु के लट् म० पु० और उ० पु० के रूप लिखो : .. ......... ...... - "म० "उ० "म०" 'उ० "म०. "उ० दिनाङ्कः हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य अभ्यास २ fruit, शब्दावली-ज्ञानम्-ज्ञान, knowledge, पुष्पम्फू ल, flower, फलम्-फल, जलन्-जल, water, अन्नम्-अन्न, food, नगरम्-नगर, city, अध्ययनम्-पढ़ना, to study, सुन्दरम् – सुन्दर, beautiful, शोभनम्-अच्छा, good, मधुरम्-मीठा, sweet. नियम ४—(द्वितीया) कर्म कारक में द्वितीया होती है । पुस्तकं पठ । गृहं गच्छ । ज्ञानम् इच्छ । सत्यं वद | धर्म चर-धर्म करो । नियम ५—(द्वितीया) उभयत., सर्वत., प्रति, धिक्, विना के साथ द्वितीया होती है । विद्यालयम् उभयतः पुष्पाणि सन्ति । गृहं सर्वतः वृक्षा. सन्ति । विद्यालय प्रति गच्छ । धिक् दुर्जनम् । ज्ञानं विना न सुखम् । नियम ६—विशेषण शब्दो और सर्वनामो का वही लिंग, विभक्ति और वचन होता है, जो विशेष्य का होता है । जैसे-एक. मनुष्य., एका. लता, एकं पत्रम्, तस्मिन् वृक्षे । इन वाक्यों को ध्यान से पढो : - ज्ञानम् इच्छ । गृहं गच्छ । पुस्तकानि पठत, लेखं च लिखत | पुष्पाणि पश्यत , फलानि च खादत । जलं पिब | अन्नं खाद | नगरं गच्छ । अध्ययन कुरु | मधुरं फलं खाद | शोभनं कार्यं कुरु । सुन्दरं पुष्पं जिघ्र । तस्मिन् वृक्षे पत्राणि सन्ति । एक पत्रम् आनय । विद्यालयं सर्वतः फलानि पुष्पाणि च सन्ति ।
JM .... संस्कृत बनाओ :- सत्य बोलो. धर्म करो. पुस्तक पढ़ो। लेख लिखो. ज्ञान चाहो. फूलों और फलों को देखो फलों को खाओ मधुर जल पीओ सुन्दर फूल सूंघो. विद्यालय के चारों ओर वृक्ष हैं: ग्राम के दोनों ओर नदी है। एक फूल लाओ एक फल खाओ. अध्ययन करो.. रिक्त स्थानों में लोट् म० पु० एक० के रूप भरो :--- सत्यं. (वद्)। धर्म: पुस्तकं (पठ्) | फलम् गृह (गम्)। अन्नं पठ् और वद् के लोट् म० पु० और उ० पु० के रूप लिखो :- "म० .. (चर्) । (आनी) । (खाद्) । .. "उ० 'म० 'उ० दिनाङ्कः हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास ३
शब्दावली-लता-लता, creeper, क्रीडा-खेल,
game,
विद्या-विद्या, knowledge,
माथ-पत्नी, wife. माला-माला, gariand, प्रजा—प्रजा, subjects, लज्जा-लज्जा,
shame, modesty, आगन्—आना, to come, दृश्—देखना, to see, स्था—रुकना, to
stand.
नियम ७-(द्वितीया) गमन (चलना, जाना) अर्थ की धातुओं के साथ द्वितीया होती है ।
गृह गच्छति । नगरम् आगच्छत् ।
नियम ८—(द्वितीया) अन्तरा और अन्तरेण के साथ द्वितीया होती है । गङ्गा यमुनां च
अन्तरा प्रयाग अस्ति-गगा
और
यमुना के बीच में प्रयाग है । विद्याम् अन्तरेण न सुखम् -विद्या
के बिना सुख नही है ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
बालक: लताम् अपश्यत् । छात्राः क्रीडाम् अक्रीडन् । शिष्याः विद्याम्
अपठन् । नृपः भार्याम् अवदत् । नरः मालाम् अधारयत् । नृपः प्रजाम् अरक्षत् ।
भार्या लज्जाम् अधारयत् । वयं गृहम् अगच्छाम । अहं क्रीडाम् अपश्यम् । वयम्
अत्र अतिष्ठाम | विद्याविहीनः पशुः ।
हिन्दी में अर्थ लिखो :-
विद्याविहीनः पशुः
विद्याम् अन्तरेण न सुखम्
गङ्गां यमुनां च अन्तरा प्रयागः अस्ति'
नृपः प्रजाम् अरक्षत्
.......
. संस्कृत बनाओ :- बालिका ने लता देखी. बालकों ने खेल देखा। शिष्य ने विद्या पढ़ी. राम ने भार्या से कहा कृष्ण ने माला पहनी राजा ने प्रजा की रक्षा की. बालिका ने लज्जा की छात्र विद्यालय आए' वे कहाँ रुके ? गंगा और यमुना के बीच में प्रयाग है ज्ञान के बिना सुख नहीं हमने खेल देखा। कोष्ठ में दिए शब्दों में से उचित शब्द को छॉट कर भरो :- यूयं पुस्तकानि । (अपठम्, अपठत, । (अपश्यत्, अपश्या नृपः राज्यम् । (अरक्षन्, अरक्षत् । (अधारयम्, अधार दृश के लङ् के रूप लिखो :- आगच्छत् 'प्र० अपश्यत् 15 वयं लताम् कविः मालाम् आगम् और .. *"म० "उ० दिनाङ्क हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास ४
शब्दावली-हरि-विष्णु, Vishnu, यति -सन्यासी, an ascetic, रवि--सूर्य, sun,
अग्नि-आग, fire, गिरि---पहाड, mountain, तुद्-दुख देना, to pain, इष्–चाहना,
to desire, स्पृश्-छूना, to touch, प्रच्छ-पूछना, to ask.
नियम ६-(द्वितीया) समय और स्थान की दूरी के वाचक शब्दो में द्वितीया होती है ।
पञ्च वर्षाणि पठति-पॉच वर्ष तक पढ़ता है । क्रोशं गच्छति—कोस भर चलता है ।
नियम १०
(द्वितीया) इन धातुओ के साथ दो कर्म होते है .दुह् (दुहना), याच (मॉगना),
प्रच्छ (पूछना), नी (ले जाना) । गां दुग्ध दोग्धि-गाय का दूध दुहता है । नृप धन याचते-राजा
से धन मॉगता है । गुरु शिष्य प्रश्न पृच्छति-गुरु शिष्य से प्रश्न पूछता है । अजा ग्राम
नयति-बकरी को गॉव मे ले जाता है ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
हरिः यतिं पृच्छेत् । रविः तपेत् । अग्निं स्पृश । गिरिं गच्छ । हरिः दुर्जनं
तुदेत् । शिष्यः फलम् इच्छेत् । स पठेत्। त्वं पुस्तकं पठेः । अहं लेखं लिखेयम् ।
हिन्दी में अर्थ लिखो
कृष्णः गां दुग्धं दोग्धिः
गुरुः शिष्यं प्रश्नं पृच्छति
पञ्च वर्षाणि विद्यां पठेत्
रामः क्रोशं गच्छति
।
....
......
....
......
...
संस्कृत बनाओ :-
हरि को देखो
यति राजा से पूछता है।
राम फूल छूए"
शिष्य विद्या चाहे
कृष्ण पाँच वर्ष तक पढ़ता है।
राम कोस भर जाता है।
सूर्य तपे.
......
तू पहाड़ पर जा'
कृष्ण गाय का दूध दुहता है।
गुरु शिष्य से प्रश्न पूछे.
वह बकरी को गाँव में ले जाता है।
वह राजा से धन माँगता है।
इन प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर दो :-
त्वं
कुत्र
गच्छसि?
त्वं किं पठसि ?.
त्वं किम् इच्छसि ?..
त्वं किं स्पृशसि?..
इष् और प्रच्छ के विधिलिङ् के रूप लिखो :-(पठ् के तुल्य)
इछेत्
'प्र० पृच्छेत्
'म०
"उ०
दिनाङ्क.
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास ५ नी-गुरु:-गुरु, teacher, भानुः—सूर्य, sun, इन्दुः-चन्द्रमा, moon, वायु:- साधु:-सज्जन, a gentleman, प्रात.-सबेरे, -सबेरे, morning, सायम्-सायंकाल, नक्तम्-रात्रि, night, सह-साथ, with. ११—(तृतीया) करण कारक मे तृतीया होती है । कन्दुकेन क्रीडति-गेंद से खेलता चलति-डंडे से (डंडे के सहारे) चलता है । लेखन्या लिखति-कलम से लिखता - १२-(तृतीया) सह (साथ) के साथ तृतीया होती है । जनकेन सह गृहं गच्छति—पिता र जाता है । प्यों को ध्यान से पढ़ो :- विद्यालयं गमिष्यति । छात्राः पुस्तकं पठिष्यन्ति । प्रातः भानुः उदेति होता है) | नक्तम् (रात में) इन्दुः उदेति । अहं सायं भ्रमणार्थ | रामः जनकेन सह उपवनं गमिष्यति । छात्रः कन्दुकेन क्रीडिष्यति । या लेखं लेखिष्यति । साधुः सत्यं वदिष्यति । वायुः चलति । तुओं के लृट् प्र० पु० एक० में ये रूप होते हैं । पठ् धातु के लृट् के तुल्य इनके रूप चलेंगे :- -पठिष्यति, लिख्-लेखिष्यति, गम्-गमिष्यति, दृश्-द्रक्ष्यति, वद्- चल्-चलिष्यति, पत्-पतिष्यति, स्था-स्थास्यति, पा–पास्यति, क्ष्यति, क्रीड्-क्रीडिष्यति, खाद्-खादिष्यति । m- १५ . राम कृष्ण 2. संस्कृत बनाओ :- गुरु विद्यालय जाएगा छात्र घर जाएँगे सूर्य सबेरे उदय होता है। चन्द्रमा रात में उदय होता है। सज्जन सत्य ही बोलेगा. के साथ खेलेगा. हवा चलेगी. देवदत्त गेंद से खेलता है। कृष्ण कलम से लिखता है मैं प्रातः घूमने के लिए जाऊँगा श्याम पिता के साथ बगीचे में जाएगा इन वाक्यों को शुद्ध करो :- ते पुस्तकं पठिष्यति त्वं जनकस्य सह गृहं गच्छ अहं लेखं लेखिष्यामः यूयं क्रीडिष्यसि इन धातुओं के लुट् प्र० पु० एक० के रूप लिखो :- लिख् .. .. 6. ... ...1 पठ् । दृश --! वद् 03.. गम् खाद् दिनाङ्क: हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य' अभ्यास ६ शब्दावली—किं कार्यन्—क्या लाभ, what use of, कोऽर्थ-क्या लाभ, what use of, कि प्रयोजनन्—क्या लाभ, what use of, अलम्—बस, no use of, स्वकीयः-अपना, own, परकीय-पराया, of others, त्वदीय --तेरा, your, मदीय --मेरा, mine, भवदीय.--आपका, your. नियम १३-तृतीया) कि कार्यम्, कोऽर्थ., कि प्रयोजनम् (क्या लाभ ) के साथ तृतीया होती है । जैसे—दुर्जनेन पुत्रेण कि कार्यन्, कोऽर्थ , किं प्रयोजनम्-दुर्जन पुत्र से क्या लाभ ? नियम १४—(तृतीया) अलम् (बस, मत) के साथ तृतीया होती है । जैसे—अलं विवादेन- झगड़ा मत करो। इन वाक्यों को ध्यान से पढो :- मूर्खेण शिष्येण कोऽर्थः । अलं हसितेन-मत हँसो । कृष्णः मम सखा अस्ति । रामः सख्या सह क्रीडति । इदं मम सख्युः पुस्तकम् अस्ति । स्वकीयं पुस्तकं पठ । परकीयं धनं न चोरय । त्वदीयं पुस्तकं कुत्र अस्ति । मदीयं पुस्तकं गृहे अस्ति । अहं भवदीयः शिष्यः अस्मि । हिन्दी में अर्थ लिखो :- मूर्खेण शिष्येण किं प्रयोजनम्। अलं विवादेन परकीयं धनं न चोरया अहं भवदीयः छात्रः अस्मि'
संस्कृत बनाओ :-
दुर्जन मित्र से क्या लाभ ?
विवाद मत करो
मत हँसो
राम मेरा मित्र है
यह मेरे मित्र की
पुस्तक
है
अपनी पुस्तक पढ़ो
पराया धन न चुराओ
तेरा मित्र कहाँ रहता है ?
यह मेरी
मैं आपका शिष्य हूँ:
उसने अपनी पुस्तक पढ़ी
रिक्त स्थानों में पठ् धातु के लोट् के रूप भरो :-
त्वं स्वकीयं
पुस्तकं.
सः रामायणं.
ते महाभारतं.
वयं गीता
पठ् धातु के लङ् और विधिलिङ् के रूप लिखो
अपठत्
''प्र० पठेत्
पुस्तक है।
......
...
"म०
"उ०
दिनाङ्क.
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास ७
शब्दावली-कर्ता—करनेवाला, doer, हर्ता-चुरानेवाला, thief, धर्ता-धारण करनेवाला,
supporter, श्रोता-सुननेवाला, listener, दाता-देनेवाला, giver, उच्चैः-ऊपर, high,
above, नीचै.-नीचे, below, शीतलम्-ठडा, cold, उष्णम्-गर्म, hot, warm
नियम १५—(तृतीया) अंग-विकार होने पर विकृत अंग में तृतीया होती है | नेत्रेण काण.-
एक आँख से काना ।
नियम १६—(तृतीया) प्रकृति आदि शब्दो मे तृतीया होती है । प्रकृत्या साधु.---स्वभाव
से सजन | सुखेन जीवति—सुख से जीता है । दु.खेन जीवति–दुःख से जीता है |
इन वाक्यों को ध्यान से पढ़ो :-
सः नेत्रेण काणः अस्ति । रामः प्रकृत्या सज्जनः अस्ति । देवदत्तः सुखेन
जीवति । कृष्णः दुःखेन जीवति । अहं कार्यस्य कर्ता अस्मि । त्वं पुस्तकस्य
हर्ता असि । संसारस्य धर्ता ईश्वरः अस्ति । श्रोता भाषणं शृणोति (सुनता है) ।
दाता धनं ददाति (देता है) । मनुष्यस्य भाग्यम् उच्चैः नीचैः च गच्छति । इदं
जलं शीतलम् अस्ति, तत् च उष्णम् ।
हिन्दी में अर्थ लिखो :-
रामः प्रकृत्या साधुः अस्ति'
श्रोता व्याख्यानं शृणोतिः
भाग्यम् उच्चैः नीचैः च गच्छति
किम् इदं जलं शीतलम् अस्ति?...
......
१६
....
संस्कृत बनाओ :-
वह एक आँख से काना है
कृष्ण स्वभाव से सजन हैं।
सजन सुख से जीते हैं।
दुर्जन दुःख से जीते हैं।
मोहन पुस्तक का हर्ता है
मैं कार्य का कर्ता हूँ
तू व्याख्यान का श्रोता है।
ईश्वर संसार का धर्ता है।
दाता धन देता है।
यह जल गर्म है।
गंगा का जल ठंडा है।
भाग्य नीचे और ऊपर जाता है
कोष्ठ में दिए शब्दों में से उचित शब्द छॉट कर भरो :--
ते लेखान्
। (अलिखत, अलिखन्, अलिखम्)
यूयं शोभनं लेख
| (लिखन्तु, लिखत, लिख)
वयं सुलेखं
। (लेखिष्यन्ति, लेखिष्यामः )
लिख धातु के लोट् और लङ् के रूप लिखो :-
लिखतुः
''प्र० अलिखत्
'म०
"उ०
दिनाङ्क
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य'
अभ्यास
शब्दावली—भगवत्-भगवान्, God, श्रीमत्-श्रीमान्, Sir, wealthy, बुद्धिमत्-
बुद्धिनान्, wise, धनवत्-धनवान्, wealthy, बलवत्-बलवान्, powerful, श्वेत.—सफेद,
white, हरित –हरा, green, नील नीला, blue, रक्त -लाल, red, पीत -पीला,
yellow. कृष्ण-काला, black.
नियम १७—(चतुर्थी) सप्रदान कारक (दान देना आदि) मे जिसको दान दिया जाता है,
उसमे चतुर्थी होती है । जैसे—ब्राह्मणाय धन ददाति—ब्राह्मण को धन देता है | बालकाय
पुस्तकं यच्छति-बालक को पुस्तक
देता है ।
नियम १८-(चतुर्थी) नम और स्वस्ति के साथ चतुर्थी होती है । जैसे—गुरवे नम -गुरु
को नमस्कार । शिष्याय स्वस्ति-शिष्य को आशीर्वाद ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
भगवन्तं भज | श्रीमते नमः | बुद्धिमते पुस्तकं यच्छ | धनवतः इदं गृहम्
अस्ति । बलवन्तं पश्य । इदं वस्त्रं श्वेतं वर्तते । इदं पत्रं हरितं वर्तते । आकाशः
नीलः अस्ति । इदं पुष्पं रक्तम् अस्ति, इदं च पीतम् । काकः कृष्णः अस्ति ।
इन वाक्यो का हिन्दी में अर्थ लिखो :-
ब्राह्मणाय धनं यच्छ
बुद्धिमते नमः
....
..
पुत्राय स्वस्तिः
बालकाय मोदकं यच्छ'
२१
.
संस्कृत बनाओ :-
वह बालक को लड्डू देता है।
वह ब्राह्मण को धन देता है।
गुरु
को नमस्कार'
शिष्य को आशीर्वाद'
वह पढ़े और हँसे.
भगवान् को भजो.
यह बुद्धिमान् की
पुस्तक है।
यह धनवान् का घर है।
इस बलवान् को देखो
यह फल लाल है।
यह वस्त्र पीला है।
यह फूल नीला है
यह पत्ता हरा है
इन प्रश्नों का संस्कृत में उत्तर दो :-
इदं पुष्पं कीदृशम् (कैसा) अस्ति ?
इदं वस्त्रं कीदृशम् अस्ति ?
त्वं कस्मै मोदकं यच्छसि ?...
हस् धातु के लोट् और लड् के रूप लिखो :-
हसतु
'प्र० अहसत्
'म०
'उ०
दिनाङ्क.
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य'
अभ्यास ६
-नदी-नदी, river, सखी-सखी, a female friend, पुत्री-पुत्री,
सो-नौकरानी, a maid-sers ant, नारी-स्त्री, woman, वाणी–वाणी,
ती-रात्रि, night, चेत्-यदि, तो, if. नो चेत्-नहीं तो, otherwise.
—(चतुर्थी) रुच् (अच्छा लगना) अर्थ की धातुओं के साथ चतुर्थी होती है ।
मोदकं रोचते-शिष्य को लड्डू अच्छा लगता है । पुत्राय दुग्ध रोचते ।
—(चतुर्थी) क्रुध् और द्रुह् अर्थ की धातुओ के साथ चतुर्थी होती है । राम.
द्रुह्यति वा—राम मूर्ख पर क्रोध करता है ।
के ध्यान से पढ़ो
ते (बहती है) । सखी अचलत् । पुत्री चलेत् । दासी कार्यं कुर्यात् ।
क्रुध्यति । मधुरां वाणी वद । रजन्यां चन्द्रः शोभते । सुखम् इच्छसि
पद, नो चेत् दुःखं प्राप्स्यसि ।
र्थ लिखो
मूर्खाय क्रुध्यति
मेष्टान्नं रोचते.
....
नं
...
कुरु
न न चल'
9 ... संस्कृत बनाओ- बालक को दूध अच्छा लगता है शिष्य को मिठाई अच्छी लगती है गुरु मूर्ख पर क्रोध करता है दुर्जन सञ्जन से द्रोह करता है। नदी में प्रतिदिन स्नान करो। सदा मधुर वाणी बोलो दासी चली. रात्रि में चन्द्रमा शोभित होता है। सुख चाहते हो तो सत्य बोलो. विद्या पढ़ो, नहीं तो दुःख पाओगे वह नारी सखी से बोली. इन वाक्यों को शुद्ध करो :- दुर्जनः सज्जनात् द्रुह्यति' शिष्यं मिष्टान्नं रोचते. गुरु: मूर्खे क्रुध्यति मधुरं वाणी वद. चल् धातु के लड् और विधिलिङ् मे रूप लिखो अचलत्' 'प्र० चलेत् 2. 'म० "उ० दिनाङ्क हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास १०
-बहू, wife, तनू-शरीर, body, श्वश्रूः-सास, mother-in-law,
पानही तो, otherwise, सकृत्-एक बार, once, असकृत्-अनेक
तुर्थी) कथ् (कहना) और निवेदय (निवेदन करना) धातुओ के साथ चतुर्थी
कथयति-शिष्य से कहता है | गुरवे निवेदयति--गुरु से निवेदन करता
तुर्थी) जिस कार्य के लिए जो वस्तु या क्रिया होती है, उसमे चतुर्थी होती
-मोक्ष के लिए हरि को नमस्कार करता है । शिशु दुग्धाय क्रन्दति बच्चा
---
न से पढो :-
तनूम् अलंकरोति (सजाती है) । वधूः श्वश्र्वै निवेदयति ।
से, सत्यं वद, धर्म च कुरु, अन्यथा दुःखं प्राप्स्यसि | सकृद्
पद | असकृत् परिश्रमं कुरु । रामः सदा सत्यं वदिष्यति ।
देष्यामि ।
खो:
-
निवेदयति
पयसि?.....
गय क्रन्दति
अलंकरोति
. ..... संस्कृत बनाओ :- बहू सास से निवेदन करती है बहू अपने शरीर को सजाती है। शिष्य गुरु से निवेदन करता है। गुरु शिष्य से कहता है। कृष्ण मोक्ष के लिए विष्णु को भजता है। शिशु दूध के लिए रोता है। यदि धन चाहते हो तो श्रम करो' नहीं तो दुःख पाओगे मैं सदा सत्य बोलूँगा. एक बार भी झूठ न बोलो' अनेक बार पुरुषार्थ करो। रिक्त स्थानों में वद् धातु के लोट् के रूप भरो :- सदा सत्यं. | असत्यं न. यूयं सत्यं । ते अपि सत्यं अहम् असत्यं न | वयं सत्यं वद् धातु के लङ् और विधिलिङ् के रूप लिखो :- अवदत् 'प्र० वदेत् .. .... "म० .. "उ० दिनाङ्कः हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास ११
शब्दावली—मातृ-माता, mother, प्रश्न -प्रश्न, question, अङ्का.—अंक, marks,
उत्तरम्-उत्तर, answer, पृष्ठम्-पन्ना, page of a book, श्रेणी—कक्षा, class, वादनम्-
बजे, o'clock, अवकाश –छुट्टी, recess, holiday, पत्-गिरना, to fall, विशति-बीस,
twenty,
अशीति.--अस्सी, eighty.
नियम २३– (पचमी) अपादान कारक मे पंचमी होती है । वृक्षात् पत्र पतति-पेड़ से
पत्ता गिरता है । अश्वात् मनुष्य पतति- घोडे से आदमी गिरता है ।
नियम २४–(पंचमी) भय और रक्षा अर्थ की धातुओं के साथ भय के कारण मे पंचमी
होती है | चोराद् बिभेति-चोर से डरता है । चोरात् त्रायते-
| चोरात् त्रायते- चोर से बचाता है ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
मात्रे नमः । वन्दे मातरम् । अयं विद्यालयः अस्ति । विद्यालये षट् अध्यापकाः
शतं च छात्राः सन्ति । गुरुः प्रश्नं पृच्छति, शिष्यः च उत्तरं ददाति । रामः
परीक्षायां त्रिंशत् (३०) अङ्कान् प्राप्नोत् (पाया) | अहं सप्तमश्रेण्यां पठामि ।
दशवादने विद्यालयस्य कार्य प्रारभते (प्रारम्भ होता है) । अद्य विद्यालये अवकाशः
अस्ति ।
मातृ शब्द के इन विभक्तियों में रूप लिखो:-
..
"द्वि०
'च०
....
"ष०
'स०
.... मैंने संस्कृत ८० संस्कृत बनाओं:- यह मेरा विद्यालय है। इस विद्यालय में दस अध्यापक हैं। विद्यालय में १०० छात्र पढ़ते हैं।' गुरु शिष्यों से प्रश्न पूछता है' छात्र उत्तर देते हैं। आज ८० छात्र उपस्थित हैं। आज २० छात्र अनुपस्थित हैं। मैं सातवीं श्रेणी में पढ़ता हूँ में अंक पाये मेरी कापी में २० पृष्ठ हैं। मैं ६ बजे विद्यालय जाता आज विद्यालय में छुट्टी है पेड़ से पत्ता गिरा घोड़े से आदमी गिरा' बालक चोर से डरता है। राजा बालक को चोर से बचाता हैं। कोष्ठ में दिये शब्दों में से उचित शब्द छॉटकर भरो:- गुरुः 'प्रश्न पृच्छति। (शिष्यान्, शिष्येभ्यः) विद्यालये 'छात्राः पठन्ति। (शतम्, शतानि) मम संचिकायां विंशतिः 'सन्ति । (पृष्ठानि, पृष्ठम्) अहं संस्कृते अशीतिः अङ्कान् । (प्राप्नोत्, प्राप्नवम्) दिनांक. हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य ...... 83....
अभ्यास १२
शब्दावली—वाच्–वाणी, speech, त्वच्-त्वचा, skin, मसी–स्याही, ink,
मसीपात्रम्-दावात, inkpot, सचिका-कापी, exercise book, लेखनी-कलम,
pen,
स्था-रुकना, to stand. to stay.
नियम २५–(पंचमी) जिससे विद्या पढी जाय, उसमें पञ्चमी होती है । गुरो. विद्यां
से विद्या पढता है ।
पठतिगुरु
नियम २६–(पञ्चमी) जिस वस्तु से किसी को हटाया जाय, उसमे पञ्चमी होती है ।
कृषक यवेभ्यः पशुं वारयति निवारयति वा—किसान जी से पशु का हटाता है ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो:-
मधुरां वाचं वद ! काकस्य त्वक् कृष्णा भवति । तव वाचि मधुरता वर्तते ।
मम मसीपात्रे मसी अस्ति । अहं संचिकायां लेखन्या लिखामि । मम संचिकायां
चतुःषष्टिः (६४) पृष्ठानि सन्ति । त्वमत्रैव तिष्ठ !
हिन्दी में अर्थ लिखो:-
शिष्यः गुरोः विद्यां पठति
गुरु: शिष्यं पापात्
त्वमत्र एव तिष्ठः
सदा मधुरां वाचं वदः
संचिकायां लेखन्या लिख
..........
..
......
पापात् निवारयति
.....
..
....
- संस्कृत बनाओ:- कापी पर कलम से लिखो। तुम्हारी कापी कहाँ है ? मेरी कापी में ६४ पृष्ठ हैं। मेरी दावात में स्याही नहीं है। मधुर वाणी बोलो. कौए की त्वचा काली होती है। मैं गुरु से विद्या पढ़ता हूँ तुम यहीं रुको मैं वहाँ रुकूँगा कृष्ण अब रुक गया है। गुरु शिष्य को पाप से हटाता है। इन प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर लिखो:- कः शिष्यं पापात् वारयति ? कीदृशीं वाचं वद ?.... तव मसीपात्रे किं न अस्ति? त्वं कस्यां कक्षायां पठसि ? के लङ् और लुट् के रूप लिखो: अतिष्ठत् .. .. - स्था धातु .... ""प्र० स्थास्यति. "म० "उ० दिनाङ्क. हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य अभ्यास १३ शब्दावली—वारि-जल, water, शुचि-स्वच्छ, pure, सुरभि-सुगन्धित, fragrant, क्रीडक:-खिलाडी, player, आसन्दिका—कुर्सी, chair, फलकम्—मेज, table लेखन- पीठम्-डेस्क, desk. काष्ठासनम्—बेच, bench. नियम २७—(पचमी) उद्भवति, प्रभवति, उद्गच्छति, जायते (ये जब उत्पन्न होना या निकलना अर्थ मे हो), निलीयते (छिपता है) के साथ पंचमी होती है । हिमालयात् गङ्गा उद्भवति, प्रभवति, उद्गच्छति वा–हिमालय से गंगा निकलती है । बीजेभ्यः अङ्कुरा. जायन्ते-- बीजो से अंकुर उत्पन्न होते है । नृपात् चोर निलीयते-राजा से चोर छिपता है । नियम २८–(पंचमी) तुलना मे जिससे तुलना की जाती है, उसमे पंचमी होती है । रामात् कृष्ण पटुतर —राम से कृष्ण अधिक चतुर विद्या गुरुतरा-धन से विद्या बढ़कर है । इन वाक्यों को ध्यान से पढो :- शुचि वारि पिब । सुरभि पुष्पं जिघ्र । क्रीडकः पादकन्दुकेन क्रीडति । गुरुः आसन्दिकायाम् उपविशति (बैठता है) । फलके पुस्तकानि सन्ति । लेखनपीठे छात्राणां पुस्तकानि सन्ति । काष्ठासने छात्राः उपविशन्ति । वारि शब्द के इन विभक्तियों में रूप लिखो:- "द्वि० 'तृ० है । धनात् ... "ष० "स० ३१ ... ... संस्कृत बनाओ:- यमुना हिमालय से निकलती है बीजों से अंकुर होते हैं। चोर राम से छिपता है। राम श्याम से अधिक चतुर धन से विद्या बढ़कर है। सुगन्धित फूल सूंघो खिलाड़ी फुटबाल खेलता है। वे क्रीडाक्षेत्र में खेल रहे हैं। राम कुर्सी पर बैठा है। मेज पर पुस्तकें हैं डेस्क पर छात्रों की कापियाँ हैं। बेंच पर छात्र बैठे हैं। इन वाक्यों को शुद्ध करो:- रामः श्यामात् पटुः सुरभिं पुष्पं जिघ्रः धनात् विद्या गुरुतर: वर्षायाः जलं शुचिः भवति गम् धातु के लङ् और विधिलिङ् के इन पुरुषों में रूप लिखो:- .. .. "म० "उ० दिनाङ्क. हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास १४
शब्दावली-शर्मन्—सुख, happiness, पर्वन्—पर्व, festival, जन्मन्-जन्म, birth.
कञ्चुक.-कुर्ता, shirt, अधोवस्त्रम्-धोती, dhoti, शाटिका-साडी, saree, अङ्गप्रोक्षणम्-
अंगोछा, towel, मुखप्रोक्षणम्-रूमाल, handkerchief.
नियम २६-(षष्ठी) सम्बन्ध कारक के अर्थ मे षष्ठी विभक्ति होती है । रामस्य पुस्तकम्-राम
की
पुस्तक | देवदत्तस्य
गृहम् ।
नियम ३०—(क्त प्रत्यय) भूतकाल
अर्थ मे
धातु
से क्त प्रत्यय होता है । क्त का त शेष
रहता है । कुछ धातुओं में त से पहले इ लगता है, कुछ मे नहीं। जैसे—पट्—पठितम् (पढ़ा),
लिख-लिखितम् (लिखा), कृ—कृतम्(किया), गम्—गत.(गया) |
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
शर्म इच्छ । अद्य दीपमालिकायाः पर्व अस्ति । तस्य जन्म रविवारे अभवत् ।
रामः कञ्चुकम् अधोवस्त्रं च धारयति । सुशीला शाटिकां धारयति । रामः:
अङ्गप्रोक्षणेन शरीरं मार्जयति (पोंछता है), मुखप्रोक्षणेन च मुखम् । रामेण पुस्तकं
पठितम् । कृष्णेन लेखः लिखितः । मया कार्यं कृतम् । श्यामः विद्यालयं गतः ।
शर्मन् शब्द के इन विभक्तियों में रूप लिखो :-
"प्र०
'तृ०
........
"ष०
'स०
" . ..... संस्कृत बनाओ :- यह मेरी पुस्तक है। यह कृष्ण का घर है सदा सुख चाहो' आज रक्षाबन्धन का पर्व है। कृष्ण का जन्म रात्रि में हुआ श्याम कुर्ता और धोती पहनता है। रमा साड़ी पहनती है। कृष्ण अंगोछे से हाथ पोंछता है। श्याम रूमाल से हाथ पोंछता है। गोपाल ने पुस्तक पढ़ी देवदत्त ने लेख लिखा' कृष्ण ने काम किया। बालक विद्यालय गया' रिक्त स्थानों में पा (पीना) धातु के लङ् के रूप भरो:- स जलम् ते वारि । यूयं क्षीरम् | वयं पानीयम् पा (पीना) धातु के लोट् और विधिलिङ् के रूप लिखो :- पिबतुः 'प्र० पिबेत् - | त्वं दुग्धम् अहं चायम् "म० 'उ० दिनाङ्क हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य अभ्यास १५ शब्दावली-यस्-जल, दूध water, milk, यशस्—यश, fame, शिरस्-सिर, head, सरस्-तलाव, pond. पाचक रसोइया, a cook. रोटिका-रोटी, bread, शाक -साग, legerable, निष्टान्नन्—निठाई, sheets. नियम ३१-घटी) स्मरण अर्थ की धातुओ के साथ (खेदपूर्वक स्मरण मे) कर्म मे षष्ठी होती है । शिशु मातु स्मरति-बच्चा माता को खेदपूर्वक याद करता है ! नियम ३२-(क्तवतु प्रत्यय) भूतकाल अर्थ मे धातु से क्तवतु प्रत्यय होता है । इसका तवत् शेष रहता है । क्त प्रत्यय वाले रूप में बाद मे वत् और जोड देने से तवत् प्रत्यय वाला रूप बन जाता है ! इसके रूप पुलिग में भगवत् के तुल्य चलेंगे, स्त्रीलिग मे ई अन्त मे लगाकर नदी के तुल्य । स गृहं गत्वान्—वह घर गया । सा कार्य कृतवती—उस स्त्री ने काम किया । इन वाक्यों को ध्यान से पढो:- पयः पिब | यशः इच्छ । शिरसि केशाः सन्ति । सरसि छात्राः तरन्ति । पाचकः रोटिकां शाकं सूपं च पचति । अहं मिष्टान्नं खादामि | गुरुं प्रश्नं पृच्छ । छात्रः विद्यालयं गतवान् । बालकाः कार्यं कृतवन्तः । अहं पुस्तकं पठितवान् । त्वं लेखं लिखितवान् । पयस् शब्द के इन विभक्तियों में रूप लिखो :- .."द्वि० "तृ० "ष० "स० संस्कृत बनाओ :- बच्चा माता को याद करता है। मैने जल पिया. ... ... . .. तू यश चाह मेरे सिर पर बाल हैं। तालाब में बालक तैर रहे हैं रसोइया रोटी और दाल पकाता है। मैंने मिठाई खाई राम ने गुरु से प्रश्न पूछा राम विद्यालय गया' बालक ने यह काम किया तूने पुस्तक पढ़ी मैंने लेख लिखा रोटी और साग खाओ। कोष्ठ में दिये शब्दों में से उचित शब्द छॉट कर भरो:- बालका: विद्यालयं. रमा कार्य वयं पुस्तकानि प्रच्छ धातु के लङ् और लृट् के रूप लिखो: अपृच्छत् 'प्र० प्रक्ष्यति .. ... .. । (गतवान्, गतवन्तः) । (कृतवान्, कृतवती) । (पठितवान्, पठितवन्तः) - "म० 'उ० दिनाङ्क. हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य अभ्यास १६ - शब्दावली-भवनम् -मकान, mansion, द्वारम्—दरवाजा, gate, कपाटम्—किवाड़, door, गवाक्षः-खिडकी, window, सोपानम्-सीढी, stairs, प्राङ्गणम्-आँगन, courtyard, शय्या-बिस्तर, bed, सर्व-सब, all, दृश् (पश्य)—देखना, to see, मा-मत, not. नियम ३३-(षष्ठी) बहुतो मे से एक को छॉटने अर्थ मे, जिसमे से छाँटा जाय, उसमे षष्ठी और सप्तमी दोनो होती है । छात्राणा छात्रेषु वा राम श्रेष्ठ -छात्रो में राम श्रेष्ठ है । नियम ३४—(क्त्वा प्रत्यय) 'कर' या 'करके' अर्थ में क्त्वा प्रत्यय होता है । इसका त्वा बचता है । इसके रूप नहीं चलते है । जैसे—पठित्वा-पढ़कर, कृत्वा-करके, लिखित्वा—लिखकर, गत्वा--जाकर, दत्त्वा-देकर, पृष्ट्वा-पूछकर, दृष्ट्वा-देखकर । इन वाक्यों को ध्यान से पढो :- सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः (नीरोग) | सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग् (दुःखी) भवेत् । इदं नृपस्य भवनम् अस्ति । इदं मम गृहम् अस्ति । गृहस्य द्वारे बालकः अस्ति । गृहस्य कपाटं गवाक्षं च उद्घाटय (खोलो) | सोपानेन उपरि गच्छ । गृहस्य प्राङ्गणे क्रीड । शय्यायां शयनं कुरु । फलं पश्य । किं त्वं जन्तुशालां (अजायबघर) द्रक्ष्यसि ? कवीनां कालिदासः श्रेष्ठः । पाठं पठित्वा, लेखं च लिखित्वा विद्यालयं गच्छ । सर्व शब्द पुं० के इन विभक्तियों के रूप लिखो :- "द्वि० 'च० ............ "ष० 'स० .. संस्कृत बनाओ :-- सब सुखी हों। सब नीरोग हों. सब सुख देखें. कोई दुःखी न हो कवियों में कालिदास श्रेष्ठ है पाठ पढ़कर विद्यालय जावो. विद्यालय जाकर विद्या पढ़ो' अपना काम करके खेलो. प्रश्न पूछकर कापी पर लिखो. मार्ग देखकर चलो. यह मेरा घर है। किवाड़ खोलो. आंगन में बालक खेल रहे हैं इन प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर दो :- कवीनांक: श्रेष्ठ:?.. गृहस्य द्वारे कः तिष्ठति ? कुत्र शयनं कुरु ? ?... जन्तुशालां कः द्रक्ष्यति ? दृश् धातु के लङ् और लृट् के रूप लिखो :- अपश्यत् .. "प्र० द्रक्ष्यति 'म०" "उ०. दिनाङ्क हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य'
अभ्यास १७
no.
शब्दावली-शिर.-सिर, head, केशा बाल, hair, नासिके—दो नाक, noses,
नेत्रे-दो आँख, eyes, कर्णौ-दो कान, ears, उदरम्-पेट, belly, पृष्ठम्—पीठ, back,
पादौ—दो पैर, feet, किम्-कौन, क्या, who, what, क्रीड्-खेलना, to play,आम्हॉ,
yes,
नहि-नहीं,
नियम ३५–(षष्ठी) उपरि, अध., नीचै., पुरः, पश्चात्, अग्रे के साथ षष्ठी होती है । वृक्षस्य
उपरि, अध., नीचे., पुर., पश्चात्, अग्रे च पक्षिण सन्ति-वृक्ष के ऊपर, नीचे, सामने, पीछे
और आगे पक्षी हैं ।
नियम ३६—(ल्यप् प्रत्यय) यदि कोई उपसर्ग (प्र, निर्, सम्, आ, वि आदि) धातु से पहले
हो तो त्वा के स्थान पर ल्यप् (य) होता है । जैसे—आदाय-लेकर, आगम्य, आगत्य -आकर,
आनीय-लाकर, आहूय—बुलाकर, विहृत्य-घूमकर ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो:-
मम द्वे नेत्रे, द्वे नासिके, द्वौ कर्णौ, द्वौ पादौ, एकम् उदरम् एकं पृष्ठं च
सन्ति । मम शिरसि केशाः सन्ति । वृक्षस्य उपरि अध: च के सन्ति ? पक्षिणः ।
गृहस्य पुरः पश्चात् च के क्रीडन्ति ? बालकाः । पुस्तकम् आदाय पठ | जलम्
आनीय पिब । शिष्यम् आहूय पृच्छ । गृहम् आगत्य भोजनं भक्षय | वाटिकायां
विहृत्य पुष्पाणि पश्य ।
किम् शब्द पुं० के इन विभक्तियों के रूप लिखो :--
'द्वि०
*"प्र०
"च०
"तृ०
"ष०
...
"स०
... .... ३६ संस्कृत बनाओ मेरे सिर पर बाल हैं: मेरी दो आँखें और दो कान हैं। मेरे दो पैर और दो नाक हैं। मेरे पेट में पीड़ा है। घोड़े की पीठ पर एक आदमी है मैं पैरों से गेंद खेलता हूँ बालक गेंद से खेलते हैं। क्या तुम आज खेले थे? हाँ, मैं आज गेंद से खेला था नहीं, मैं आज नहीं खेला पुस्तक लेकर पढ़ो जल लाकर पीओ.. घर आकर खाना खाओ. बगीचे में घूमकर फलों को देखो निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करो :- गृहम् उपरि पक्षिणः अस्ति वृक्षस्य नीचैः छात्राः अक्रीडत्' त्वं कं फलं यच्छसि ?... क्रीड् धातु के लोट् और लङ् के रूप लिखो :- क्रीडतु 'प्र० अक्रीडत् ... .. ... "म० 'उ० हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य दिनाङ्कः
अभ्यास १८
शब्दावली-जनक:-पिता, father, अग्रज –बडा भाई, elder brother,अनुज.-छोटा
भाई, younger brother, पुत्र-पुत्र, son, पौत्र -पोता, grandson, भगिनी-बहिन,
sister, खाद्-खाना, to eat.
नियम ३७—(षष्ठी) कृते (लिए), समक्षम् (सामने), मध्ये (बीच मे), अन्त. (अन्दर) के साथ
षष्ठी होती है । भोजनस्य कृते-भोजन के लिए ! गृहस्य समक्षम्, मध्ये, अन्त वा—घर के
सामने, बीच मे या अन्दर ।
नियम ३९–(तुमुन् प्रत्यय) को, के लिए, अर्थ को प्रकट करने के लिए धातु से
तुमुन्
प्रत्यय होता है । तुमुन् का तुम् शेष रहता है । जैसे—कर्तुम्—करने को, पठितुम्—पढने
को, लेखितुम्—लिखने को, गन्तुम्-जाने को, खादितुम्-खाने को, दातुम्—देने को,
पातुम्-पीने को ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढ़ो :-
मम जनकः जननी च अत्र स्तः । मम एकः अग्रजः, द्वौ अनुजौ, एका
भगिनी, त्रयः पुत्राः, चत्वारः पौत्राः च सन्ति । भोजनस्य कृते गृहं गच्छ ।
गृहस्य समक्षम् एकः नरः तिष्ठति । त्वं विद्यां पठितुं, लेखं च लेखितुं विद्यालयं
गच्छ । कार्यं कर्तुं, भोजनं खादितुं, जलं च पातुं गृहं गच्छ । तस्मिन् वृक्षे खगाः
सन्ति । किं त्वं भोजनम् अखादः ।
तत् शब्द पुं० के इन विभक्तियों के रूप लिखो :-
"द्वि०
.....
"प्र०
"ष०
"स०
..
संस्कृत बनाओ
मेरे पिता जी घर में हैं।
मेरे दो बड़े भाई हैं
मेरी एक बहिन है
मेरे तीन छोटे भाई हैं
भोजन के लिए घर जाओ'
घर के सामने कौन खड़ा है?
घर के अन्दर तीन आदमी हैं।
विद्या पढ़ने को विद्यालय जाओ।
खाना खाने को यहाँ आओ..
जल पीने को वहाँ जाओ।
उस पेड़ पर तीन पक्षी हैं।
हाँ, मैंने खाना खा लिया
रिक्त स्थानों को भरो :---
जलं.
'अत्र आगच्छ । विद्यां'
गृहस्य'
...'जनाः तिष्ठन्ति । मम'
'वृक्षे खगाः सन्ति । कार्य:
खाद् धातु के लोट् और लृट् के रूप लिखो
खादतु
"प्र० खादिष्यति
"विद्यालयं गच्छ ।
"अनुजौ स्तः ।
अत्र आगच्छ ।
"म०
'उ०
दिनाङ्क.
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास १६ तव्य - शब्दावली-स्वर्णकार --सुनार, goldsmith, स्वर्णम्—सोना, gold, लौहकार.--लोहार, blacksmith, लौहम्-लोहा, iron, चर्मकार.-चमार, shoe-maker, पादत्राणम्-जूता, shoe, रक्ष-रक्षा करना, to protect, रच-बनाना, to make, निर्मापि—बनाना, to make. नियम ३६-(षष्ठी) दूर और समीपवाची शब्दो के साथ षष्ठी और पचमी दोनों होती हैं । ग्रामस्य ग्रामाद् वा दूरम्-गॉव से दूर । जनकस्य समीपात्-पिता के पास से । गुरो. पार्थ्यात्-गुरु के पास से । नियम ४०—(तव्य प्रत्यय) 'चाहिए' अर्थ मे धातु से तव्य प्रत्यय होता है । जैसे—कृ + कर्तव्यम् (करना चाहिए) । इसी प्रकार पद-पठितव्यम्, लिख्लेखितव्यम्, गम् ---गन्तव्यम् , हस्-हसितव्यम्, खाद्-खादितव्यम्, वच्--वक्तव्यम् । इन वाक्यों को ध्यान से पढो :- अस्मिन् नगरे बहवः स्वर्णकाराः लौहकाराः चर्मकाराः च वसन्ति । अयं स्वर्णकारः स्वर्णेन आभूषणानि रचयति । लौहकारः लौहेन पात्राणि निर्मापयति । चर्मकाराः पादत्राणं रचयन्ति । इमे सैनिकाः स्वदेशं रक्षन्ति । त्वं भारतं रक्ष । ग्रामस्य दूरं नदी अस्ति । अहं जनकस्य समीपात् आगच्छामि । गुरोः पार्वं गच्छ | त्वया कार्य कर्तव्यम् । मया पाठः पठितव्यः । त्वया सत्यं वक्तव्यम् । त्वया गृहं गन्तव्यम् । इदम् शब्द पुलिङ्ग के इन विभक्तियों के रूप लिखो :- 'द्वि० ... 'प्र० 'ष० ""स० ४ kal .... संस्कृत बनाओ :- इस गाँव में एक सुनार है सुनार सोने से आभूषण बनाता है लोहार लोहे से बर्तन बनाता है। चमार जूता बनाता है। इस नगर में बहुत लोहार हैं: सैनिक देश की रक्षा करते हैं तुम भी देश की रक्षा करो उसने बालक की रक्षा की पिता के समीप जाओ। मैं गुरु के पास से आ रहा हूँ तुझे पाठ पढ़ना चाहिए। तुझे विद्यालय जाना चाहिए' मुझे कार्य करना चाहिए' कोष्ठ में दिए शब्दों में से उचित शब्द को छाँटकर भरो:- मया विद्यालयः | (गन्तव्यः, गन्तव्यम्) । त्वया सत्यं | (वक्तव्यः, वक्तव्यम्) । मया भोजनं. । (खादितव्यः, खादितव्यम्) । रक्ष धातु के लोट् और लङ् के रूप लिखो :- रक्षतु 'प्र० अरक्षत् .. “म० "उ० दिनाङ्कः हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य'
अभ्यास २०
शब्दावली-गौ---गाय, cow, वृषभ.--बैल, bull, अश्व.—घोड़ा, horse, उष्ट्र.-ऊँट,
camel, सिहः—शेर, lion, मृग.-हिरन, deer, वानर बन्दर, monkey, स्मृ—याद करना,
to remember, to learm, कति-कितने, how many.
नियम ४१-(सप्तमी) अधिकरण कारक में सप्तमी होती है । विद्यालये पठति—विद्यालय
में पढ़ता है । गृहे वसति-घर मे रहता है | वृक्षे खगाः सन्ति-पेड़ पर पक्षी हैं ।
नियम ४२-(अनीय प्रत्यय) 'चाहिए' अर्थ मे धातु से अनीय प्रत्यय होता है ।
जैसे-कृ+अनीय-करणीयम् (करना चाहिए) । पट्—पठनीयम्, लिख-लेखनीयम्, गम्-
गमनीयम् ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
अस्मिन् नगरे गावः, वृषभाः, अश्वाः, उष्ट्राः, वानराः च सन्ति । तस्मिन् वने
सिंहाः मृगाः च सन्ति । प्रतिदिनं स्वकीयं पाठं स्मर | शिशुः मातुः स्मरति ।
अहं विद्यालये पठामि । त्वं गृहे वससि । वृक्षे कति खगाः सन्ति ? त्रयः ।
त्वया कार्य करणीम् । त्वया पुस्तकं पठनीयम्, लेखः लेखनीयः, विद्यालयः च
गमनीयः । त्वां वदामि । तुभ्यं फलं ददामि । तव एतत् पुस्तकम् अस्ति ।
त्वयि धैर्यम् अस्ति ।
युष्मद् शब्द के इन विभक्तियों के रूप लिखो :-
"द्वि०
"प्र०
....
'तृ०
"च०
"ष०
"स०
संस्कृत बनाओ :-
इस गाँव में गाय और बैल हैं:
नगर में घोड़े और ऊँट हैं:
पेड़ पर बन्दर हैं:
पेड़ पर पक्षी हैं।
वन में शेर और हिरन हैं.
प्रतिदिन अपना पाठ याद करो।
बच्चा माता को याद करता है।
घर में बालक रहते हैं।
वह विद्यालय में पढ़ता है
तुझे लेख लिखना चाहिए
मुझे काम करना चाहिए
तेरी पुस्तक कहाँ है ?.
तेरे पास कितनी पुस्तकें हैं ?
इन प्रश्नों के संस्कृत में उत्तर दो :-
वृक्षे कति खगाः सन्ति ?
तव समीपे कति पुस्तकानि सन्ति ?..
विद्यालये के पठन्ति ?.....
स्मृ धातु के लृट् और विधिलिङ् के रूप लिखो :-
स्मरिष्यति
"प्र० स्मरेत्
"म०
'उ०
दिनाङ्क.
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
अभ्यास २१
शब्दावली-खन --ओ, birti. चटक:-चिडिया, sparrow, काक-कौआ, crow,
शुक-तोट 40:, स्परिक
स्मारक-मना, a kind of bird. मयूर -मोर, peacock. हस हस,
Skin के कल-कायल, ...k00, नन्ननस्कार करना, to salute, नृत्-नाचना, to
dance.
%D
नियम ४३— सतनो, विषय ने बारे में, अर्थ मे तथा समय बोधक शब्दो मे सप्तमी होतो
है । तत्य में इच्छा अस्ति-उसको नोक्ष के बारे मे इच्छा है । त्व प्रात काले अत्र
आगच्छ—तुन सब यहाँ आना : त्व मध्याह्ने सायकाले वा कार्य कुरु ।
नियम ४४-वृद्धि सधि) वृद्धिरेचि) (१) अ या आ के बाद ए या ऐ होगा तो दोनो को
'ऐ' होगा । (२) अ या अ के बाद ओ या औ होगा तो दोनो को 'औ' होगा । जैसे-अत्र +
अत्रैव । नत -
ऐक्यन् मतैक्यम् । तण्डुल + ओदनम्
ओदनम् = तण्डुलौदनम् !
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
अस्मिन् वृक्षे बहवः खगाः, चटकाः, काकाः, शुकाः, सारिकाः, कोकिलाः च
सन्ति । अस्मिन् उपवने मयूराः हंसा: च सन्ति । मयूराः नृत्यन्ति । छात्रः गुरुं
नमति । अहं स्वकीयं जनकम् अनमम् । मम धर्मे अभिलाषः अस्ति । प्रातःकाले
पुस्तकं पठ । शैशवे विद्यां पठ । रात्रौ शयनं कुरु ।
अस्मद् शब्द के इन विभक्तियों में रूप लिखो :-
'द्वि०
...
"प्र०
"तृ०
'च०
""ष०
'स०
.
संस्कृत बनाओ
बनाओ :-
इस पेड़ पर चार पक्षी हैं।
इस लता पर बहुत चिड़ियाँ हैं
उस पेड़ पर कौवे और तोते हैं।
उस बगीचे में मोर नाच रहे हैं।
वह गुरु को नमस्कार करता है।
मैंने गुरु को नमस्कार किया'
मेरी सत्य के बारे में इच्छा है
वह सबेरे पढ़ता है।
राम ने बचपन में विद्या पढ़ी
दिन में खेलो, खाओ और पढ़ो
रात्रि में सोओ.
मुझमें सत्य और अहिंसा हैं।
निम्नलिखित वाक्यों को शुद्ध करो :-
अस्मिन् लतायां बहवः चटकाः अस्ति'
रामेण शैशवे विद्याम् अपठत्
मयि सत्यम् अहिंसा च अस्ति'
स गुरुं नमिष्यति
नम् धातु के लङ् और लुट् के रूप लिखो :-
अनमत्"
'प्र० नंस्यति.
O
"म०
“उ०
दिनाङ्कः
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य'
अभ्यास २२
शब्दावली-सरोवर-तालाब, lake, तडाग.तालाब, pond, समुद्र.-समुद्र, sea,
मत्स्य.—मछली, fish, कच्छप-कछुआ, tortoise, दर्दुर.-मेढ़क, frog, तटम्-किनारा,
bank, कूप-कुआँ, well, नौका-नौका, boat, नी—ले जाना, to carry; विचर् -घूमना,
to move.
नियम ४५—(सप्तमी) एक क्रिया के बाद दूसरी क्रिया होने पर पहली क्रिया मे सप्तमी होती
है । जैसे—राने वनं गते भरत आगत -राम के वन मे जाने पर भरत आए । मयि भोजने
कृते पिता आगत.—मेरे खाना खा लेने पर पिता आए ।
नियम ४६—(यण् सन्धि) (इको यणचि) इ ई को य, उ ऊ को व्, ऋ को र् होता है,
बाद मे कोई स्वर हो तो । समान (वैसा ही ) स्वर हो तो नहीं । (१) प्रति + एक. = प्रत्येक.,
यदि + अपि = यद्यपि ! (२) मधु + अरि = मध्वरि । (३) मातृ + आ = मात्रा ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढ़ो :-
अस्मिन् तडागे मत्स्याः, दुर्दुराः, कच्छपाः च सन्ति । सरोवरे नौकाः
विचरन्ति । समुद्रस्य तटे मुम्बईनगरी अस्ति । कूपे जलम् अस्ति । भृत्यः भारं
नयति । अहं पुस्तकं विद्यालयम् अनयम् । एकस्मै बालकाय एकस्यै बालिकायै
च एकं फलम् एकं पुष्पं च यच्छ । तत्र एक: नरः एका नारी च स्तः ।
सन्धि करो :-
सन्धि-विच्छेद करो :-
प्रति+ एकः =
1 इत्यत्र
गुरु + आज्ञा
। यद्यपि
कर्तृ + आ =
...
'। मात्रे
...... .. संस्कृत बनाओ :--- इस तालाब में मछलियाँ हैं: उस कुएँ में जल है। तालाब में नौकाएँ घूम रही हैं। उस तालाब में कछुए और मेढ़क हैं। समुद्र के किनारे मद्रास नगरी है। राम के वन जाने पर भरत आये. मेरे खाना खा लेने पर पिता आये. नौकर बोझा ले गया' मैं पुस्तकें विद्यालय ले गया' वहाँ पर एक छात्र और एक छात्रा हैं। एक बालक को एक फल दो. एक बालक की यह पुस्तक है। रिक्त स्थानों को भरो 'बालकाय फलं यच्छ । एकस्यै भृत्यः अनयत् । रामे वनं. सरोवरे नौका: | समुद्रस्य तटे. धातु के लोट् और लङ् के रूप लिखो :- नयतु 'प्र० अनयत् .... "पुष्पं देहि । 'दशरथः मृतः । 'अस्ति । ...... "म० 'उ० दिनाङ्कः हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य"
अभ्यास २३
शब्दावली—आनम्—आम, mango, दाडिमम्-अनार, pomegranate, द्राक्षा—अंगूर,
grapes, बदरीफलम्बेर, fruit of jujube, सेवफलम्-सेव, apple, कदलीफलम्-केला,
banana, दृढबीजम् -अमरूद, guava, पा–रक्षा करना, to protect.
नियम ४७—(सप्तमी) प्रेम, आसक्ति और आदर-सूचक शब्दों और धातुओं के साथ सप्तमी
होती है ! पिता पुत्रे स्नेहं करोति-पिता पुत्र पर स्नेह करता है । रामः रमायाम् आसक्तः
अस्ति-राम रमा पर आसक्त है । गुरो शिष्येषु आदर अस्ति-गुरु का शिष्यो में आदर
है
नियम ४५-(अयादि सन्धि) (एचोऽयवायावः ) ए को अय्, ओ को अव्, ऐ को
आय्
और
औ को
आव् हो जाता है, बाद मे कोई स्वर हो तो । शब्द के अन्तिम ए आ ओ के बाद अ
होगा तो नहीं । (१) हरे + ए = हरये । (२) भो + अति = भवति । (३) गै + अक. =
गायक. । (४) पौ + अक = पावक. ।
इन वाक्यों को ध्यान से पढो :-
अस्मिन् उपवने आम्राणि, दाडिमानि, द्राक्षाः, बदरीफलानि, कदलीफलानि,
दृढबीजानि च सन्ति । अहं प्रतिदिनं भोजनान्ते सेवफलानि, कदलीफलानि,
दृढबीजानि वा खादामि । तत्र द्वौ नरौ, द्वे ना?, द्वे पुस्तके च सन्ति । द्वयोः
बालकयोः एतानि पुस्तकानि सन्ति । ईशः संसारं पाति । त्वं स्वदेशं पाहि ।
सन्धि करो :-
सन्धि-विच्छेद करो :-
| अग्नये.
पो+ अनः'
| भवति
द्वौ + एतौ
नायक:
कवे + ए
.....
0.saas. ...... ..... संस्कृत बनाओ :- मैं प्रतिदिन केला खाता हूँ मैं सेव और अंगूर भी खाता हूँ मैं भोजन के बाद फल खाता वहाँ अनार, बेर और अमरूद हैं। यहाँ दो आम और दो अमरूद हैं। भोजन के बाद प्रतिदिन फल खाओ हरि संसार की रक्षा करता है तुम अपने देश की रक्षा करो। माता पुत्र पर स्नेह करती है। अध्यापक का शिष्यों में आदर है। वहाँ पर दो छात्र और दो छात्राएँ हैं। दो छात्रों की ये दो पुस्तकें हैं। कोष्ठ में दिए शब्दों में से उचित शब्द को छोट कर भरो:- तत्र" 'बालको 'बालिके "फले च सन्ति । (द्वौ, द्वे, द्वे) 'बालकाभ्यां "पुस्तके देहि । (द्वाभ्याम्, द्वौ, द्वे) अहं तत्र पुस्तकम् | (अनयत्, अनयम्) पा (रक्षा करना) धातु के लट् और लङ् के रूप लिखो :- पाति' .."प्र० अपात् ..... ..... ...... .. ....." "म० ... "उ० दिनाङ्कः हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य अभ्यास २४ शब्दावली—पितृ-पिता, father, भ्रातृ-भाई, brother, भगिनी--बहिन, sister, लग्न.-लगा हुआ, engaged, दक्ष-चतुर, skilful, दा-देना, to give. नियम ४६—(सप्तमी) सलग्न और चतुर अर्थ वाले शब्दो के साथ सप्तमी होती है । स पठने संलग्न., लग्न ,तत्पर , युक्त , आसक्त वा अस्ति—वह पढाई मे सलग्न है । राम. धनुर्विद्याया कुशल , निपुण., चतुर , पटुः, दक्ष वा अस्ति–राम धनुर्विद्या में चतुर है । नियम ५०—(सप्तमी) फेकना अर्थ की धातुओं के साथ तथा विश्वास और श्रद्धा अर्थ की धातुओं और शब्दो के साथ सप्तमी होती है । मृगे बाणं क्षिपति मुञ्चति वा-मृग पर बाण फेंकता है । तस्य धर्मे विश्वास. अस्ति । स धर्मे विश्वसिति-वह धर्म पर विश्वास करता है। इन वाक्यों को ध्यान से पढो :- मम नाम भारतेन्दुः अस्ति । मम पितुः नाम कपिलदेवः अस्ति । मम द्वौ भ्रातरौ द्वे भगिन्यौ च सन्ति । मम भातुः नाम धर्मेन्दुः अस्ति । मम भगिन्याः नाम भारती अस्ति । अहं सप्तमकक्षायां पठामि । अहं संस्कृतविषये गणितविषये च कुशलः अस्मि । पिता पुत्राय फलं ददाति । मह्यम् एकं पुस्तकं देहि । तत्र त्रयः छात्राः तिस्रः बालिकाः च सन्ति । त्रि शब्द के पुं० में पूरे रूप लिखो :- "प्र० 'द्वि०. 'तृ० 'च० "पं0 ष०" - "स०
ka)
.....
संस्कृत में उत्तर दो
तव किं नाम अस्ति?
तव पितुः किं नाम अस्ति?...
तव कति भ्रातरः सन्ति ?..
तव कति भगिन्यः सन्ति ?
तव भातुः किं नाम अस्ति ?
तव भगिन्या: किं नाम अस्ति ?....
त्वं कस्यां कक्षायां पठसि?
तव विद्यालयस्य किं नाम अस्ति?..
तव विद्यालये कति अध्यापका: सन्ति ?..
तव विद्यालये कति छात्रा: सन्ति?..
तव कक्षायां कति छात्राः सन्ति?
तव कक्षायां कति बालिका: सन्ति ?.
कः तव प्रधानाचार्यः अस्ति ?..
कः तव संस्कृताध्यापकः अस्ति ?...
तव विद्यालये क्रीडाक्षेत्रम् अस्ति न वा ?
त्वं कस्मिन् नगरे निवससि ?
कान्
पठसि?...
त्वं कस्मिन् विषये कुशलः
असि?..
तव जन्मस्थानं कुत्र वर्तते ?...
दिनाङ्कः
हस्ताक्षरम् उपाध्यायस्य
...
...
विषयान्
परिशिष्ट कार कर्तृन् कर्तृभि कर्तृभ्य " .. .. कर्तृणाम् कर्तृषु हे कर्तार वध्व (क) शब्दरूप-संग्रह (१) सखि (मित्र)-पुंलिंग (२) कर्तृ (कर्ता)-पुंलिंग सखा सखायौ सखाय Яo कर्ता कर्तारौ सखायम् सखीन कर्तारम् सख्या सखिभ्यान् सखिभि तृ० का कर्तृभ्याम् सख्ये सखिभ्य च० कत्रे पं० कर्तु सख्यो सखीनाम् ष० कों सख्यो सखिषु स० कर्तरि कों हे सखे हे सखायौ हे सखाय स० हे कर्तः हे कर्तारौ (३) भगवत् (भगवान्)-पुंलिंग (४) वधू (बहू-स्त्रीलिंग भगवान् भगवन्तौ भगवन्त प्र० वधू वध्वौ भगवन्तन् भगवत द्वि० वधूम् भगवता भगवद्भ्याम् भगवद्भिः तृ० वध्वा वधूभ्याम् भगवते भगवद्भ्यः च० वध्वै भगवतः प० वध्वा. भगवतो. भगवताम् वध्वो भगवति भगवत्सु स० वध्वाम् हे भगवन्तौ हे भगवन्त. स० हे वध्वौ (५) मातृ (माता) -स्त्रीलिंग (६) वाच् (वाणी)-स्त्रीलिंग माता मातरौ मातर. प्र० वाक्-ग वाचौ मातरम् मातः द्वि० वाचम् সামা मातृभ्याम् मातृभि तृ० वाचा वाग्भ्याम् मात्रे मातृभ्यः च० वाचे मातु पं० वाच मातुः मात्रो मातृणाम् ष० वाचो मातरि मातृषु स० वाचि हे मातरौ सं० हे वाचौ वधू वधूमि वधूभ्य . . हे भगवन् वधूनाम् वधूषु हे वध्व हे वधु वाचः . वाग्भिः .. वाग्भ्य . .. हे मातः वाचाम् वाक्षु हे वाच. हे मातरः हे वाक्-ग शर्मनि . . . . 7 पय. (७) (वारि) जल-नपुं० (८) शर्मन् (सुख)-नपुं० वारि वारिणी वारीणि प्र० शर्म शर्मणी शमाणि दि० वारिणा वारिभ्याम् वारिभि तृ० शर्मणा शर्मभ्याम् वारिणे वारिभ्य च० शर्मणे शर्मभ्य. वारिण पं० शर्मणः वारिणोः वारीणाम् ष० शर्मणो शर्मणाम् वारिणि वारिषु स० शर्मसु हे वारि,वारे हे वारिणी हे वारीणि हे शर्म, शर्मन् शर्मणी शर्माणि (६) पयस् (दूध,जल) नपुं० (१०) किम् (कौन)-पुं० पयसी पयासि प्र० को के पय पयसी पयासि द्वि० कम् को कान् पयसा पयोभ्याम् पयोभि केन काभ्याम् कै पयसे पयोभ्याम् पयोभ्य च० कस्मै काभ्याम् केभ्यः पयस पयोभ्याम् पयोभ्य प० कस्मात् काभ्याम् केभ्यः पयस पयसो पयसाम् कस्य कयोः केषाम् पयसि पयसो स० कस्मिन् कयो केषु हे पय हे पयसी हे पयांसि सं० (११) सर्व (सब)—पु० सर्व सर्वी सर्वे (किम् के तुल्य) । (१२) एक (एक)-केवल एक० मे रूप चलेगे । प्र० आदि के रूप ये है:- पुं० एकम्, एकेन, एकरमै, एकस्मात्, एकस्य, एकस्मिन् नपुं० एकम्. एकम्. एकस्मै. एकस्मात्, एकस्य, एकस्मिन् स्त्री० एका, एकाम् एकया. एकस्यै, एकस्या, एकस्याः, एकस्याम् (१३) द्वि (दो)-केवल द्विवचन मे रूप चलेगे । प्र० आदि के रूप ये है: पु० द्वौ, द्वाभ्याम्, द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वयोः. द्वयोः नपुं०,स्त्री० दे, द्वे, द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वयोः (१४) त्रि (तीन)-केवल बहु० मे रूप चलेगे । प्र० आदि के रूप ये हैं: पुं० त्रयाणाम् त्रिषु नपुं० त्रीणि त्रीणि. त्रिभि., त्रिभ्य., त्रिभ्य.. त्रयाणाम्, त्रिषु स्त्री० तिसृभि, तिसृभ्य., तिसृभ्य., तिसृणाम्. तिसूषु ष० पय सु एक, एकेन. हो. द्वयोः, त्रयः, त्रीन्, त्रिभि , त्रिभ्य., त्रिभ्य.. तित्र , तिस्त्र, ५६ (ख) धातुरूप-संग्रह सूचना- गम्, पा(१) और प्रच्छ के रूप पठ् के तुल्य चलेगे । इनके पाँचों लकारो के प्रथम रूप यहाँ पर दिये गये है। अर्थ धातु लट् लोट लड् विधिलिड् लुट् गम् गच्छति (जाना) गच्छतु गमिष्यति गच्छेत् अगच्छत् पा(१) (पीना) पिबति (२) अपिबत् पिबतु पास्यति पिबेत् (३) प्रच्छ (पूछना) पृच्छति प्रक्ष्यति पृच्छतु अपृच्छत् पृच्छेत् (४) पा (२) रक्षा करना (५) दा (देना) लट् लट् पाति पान्ति ददाति पात प्र० ददति दत्त पासि पाथ ददासि म० पाथ. दत्थः दत्थ पामि पाव पामः ददामि उ० दद्व. दद्मः लोट् लोट् पाताम् पातु पान्तु प्र० ददातु दत्ताम् ददतु पाहि पात म० देहि पातम् दत्त दत्तम् पानि पाद पाम उ० ददानि ददाव ददाम लड़ लड् अपात् अपाताम् अपुः, अपान् प्र० अददात् अदत्ताम् अददु अपा. अपातम् अपात म० अददाः अदत्तम् अदत्त अपाम् अपाव अपाम उ० अददाम् अदद्व अदद्म विधिलिड् विधिलिड् पायात् पायाताम् पायु प्र० दद्यात् दद्याताम् ददयुः पायाः पायातम् पायात म० दद्या दद्यातम् दद्यात पायाम् पायाव पायाम उ० दद्याम् दद्याव दद्याम लुट् लुट् पास्यति पास्यतः पास्यन्ति प्र० दास्यति दास्यत दास्यन्ति पास्यसि पास्यथः पास्यथ म० दास्यसि दास्यथ दास्यथ पास्यामि पास्यावः पास्यामः उ० दास्यामि दास्यावः दास्यामः