Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Pravas Kusumawali [ Part - Ii ]
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॥ श्रीः॥
प्रवास-कुसुमावली
द्वितीय गुच्छ ।
मरदेशीय, अग्रवशी-
शिवचन्द्र भरतिया,
उपनाम
"चन्द्र कवि' विरचित ।
"सवा व्यवहतय्ये कुतो खवचनीयता ।
यथा स्त्रीणा तथा वाचा साधुत्वे दुजनो जन ॥"
(राजनियमानुसार सर्व अधिकार सरक्षित है )
पम्प,
" प्रेसमें मुद्रित ।
गुजराती
सवन् १९६४, शके १८२९
कीमत छ आना।
३१०
निज धर्म-वश जाति-
स्वदेश-भाषा-सुधार करना ही ।
सवका कर्त्तव्य सदा
परहित किसको सुपुण्यकर नाही ? ।।
NA
दिग्दर्शन । निज कवित्त केहि लाग न नीका ? सरस होऊ अथवा अति फीका ।। जे पर भणित सुनत हरखाही, ते वर पुस्प बहुत जग नाहीं ॥ --तुलसीदास। गत वत्सरम जब इसका प्रथम गुरु प्रकाशित हुआ तब मेर प्रस्ताव अनुसार, 'गणटताम विशुद्ध हिन्दीकी कविता अल्प और ऐसी पनितारा प्रचार भा अपतर, मिवाय शिरारिखित महात्मा वचनानुमार रसिकजनाना भी अभाव-इन कारणोसे उसके मादर स्वीकारमें कुछ कुछ शरा थी । जो सस्कृतरी कविता ममम है वेही इस कवितामा आदर कर सकते हैं, और जो पुरान दगी कविता प्रेमी हरु तो इसके पढ़ने हीमें दिवत होती है तब वे इसरा कैसे आदर कर सकग ? तथापि आनकर इम और हिन्दीप्रेमियामा चित्त आपित हुआ है इतना ही नहीं, वरच काशीनागरीप्रचारिणी सभाने भी इस विषयमें एक रेग्युलशन पास कर दिया है, तथा 'अन्यान्य काव्यानुरागी महाशयान प्रथम गुच्छया सादर स्वीयर कर अभिनन्दन किया, निसा साराश अयत्र उदृत है-अतएव इस द्वितीय मुठा निमाण परने में मुझो विशेष उत्साह हुआ। जिस समय राष्ट्रभाषा हिन्दी बननरा और वह वैसी बन जाय वहाता भित्र मिल भाषाय देवनागरी लिपिम रिखी जानो लिये आदन हो रहा है, नागरी प्रचारिणी सभाय इसकी उन्नतिरे लिये दर परिसर है और अन्यान्य बगाली महाराष्ट इत्यादि अन्य भापानभिज्ञ महानुभाव भी हिन्दीमी और झुबै है तो क्या अब गणमात्रासद करिता देवीशी हि हिन्दी महापीठपर प्रतिम नही होनी चाहिये !! विपी परिने पहा रि- ते धन्यास्ते महात्मानस्तेपा लोके स्थिरं यशः । यैर्वा निबद्धानि काव्यानि ये वा काव्येषु कीर्तिताः ।। अयान जि होने कान्यनिमाण किये है अथवा मिना पायम वणन हुभा हे वे! घय है, वे महात्मा है और लोकम उन्हींका यश स्थिर है-मम क्या मदेह है ? यश, अथ, मग और उपदेशो करनेवारी मिपाय पनिता अन्य पौन है। जगदमें करिता नही होती तो वेद, उपनिषत्, शाल, स्मृति, पुराण आदि कल्प नातीत सैकहाँ ग्रप आज हमको कहासे प्राप्त होते? यविता ही एकमात्र हमारे देशरी पीति हमी, समृद्धि, धमस्थिति, मानप्रदायिनी और कल्याणकारिणी है । कविता दौरे प्रभावप्त आज-पृथ्वीराजो समयी, क्चीरनानयो समयकी, मरदास तुल्सीदामके समययी और अन्याय महात्माभाये समयकी हिन्दीभापारा परिचय होने उस पाल्पी भापास्थितिका दिग्दर्शन होता है। कारस्य कुटिला गति इसी नियमानुसार जैसी जैसी इम देशकी अवनति हाती गइ वैमी वैसी परिस्थितिकीभी भिन्नता होती गइ। एक दिन सवत्र देशभर मातृभाषा गीर्वाणा प्रचार था, पीछे थोडे ही कालम प्राकृतका प्रचार हुआ, होते होते अनेक भापायें बनी । बनता बनती दस चीस मील परभी उनमें भिषय हो गया ।। कहिये, अब विप्त प्रभार भापैक्य हो' भारतके अतिरिक्त अन्यान्य देशोंगी और देखा जाय तो भापैश्यसे सबका दतभार महज परिस्फुट होनेसे कैसा परम्पर एकमत है। आज हमारे सिर पर विशनिभयप्रचारिणी शक्तिशाग्निी न्यायशीला गवनमटका शीतलज्त्र है ता ऐमे शान्तकालमें हमारा परम क्त्तव्य है कि प्रथम हम अपनी मातृभापारा सुधार कर । हिदुस्थानकी भाषा एक मात्र हिंदी ही है, और यथायादार वणमाल भी एक मात्र नागरी है। अब यथारचि उमे कोइ उद कहे, कोइ ब्रज को, --- फोहम्बडी कहे और कोई पिछह कहे-हे तो हिन्दीकी हिन्दी ही। जिस भाषामें कविता प्रगल्भ दशाको पहुच जाती है वह भाषा परिष्कृत होके प्रधान बन जाती है। सस्कृतको तो रहने दीजिये ---जरा वगला, मराठी और गुजरातीकी ओर तो देखिये,पैमी उनत है ? जैसी जैसी इन भाषाओंकी करिता प्रचरित भाषामें आवित होती गई वैसी वसी अधिकाधिक अधिकृत होती हुई आज प्रधान बन गोर! वान्वित हो रही है । ईश्वर कभी न कभी हमारी इस वुमारीभावहीना मुग्धहिदीको भी भावपूर्ण साहित्यार कृत कवितासे विभूपित कर प्रादा और प्रगल्भ करेहीगा। क्या कि-" कालो ह्यय निरवधिविपुला धरित्री" काल निरवधि है और पृथ्वी निपुर है-इस भवभतिषी उतिपर हमारा पूर्ण विश्वास ह। उस पतितपावन जगनिवासका कोटिश धन्यवाद है कि इस धरवणनात्मक प्रयासकुसुमावलीका द्वितीय गुच्छ मेरे जैसे दोहदविज्ञानहीन अकुशल मालामा हाय प्रथित करना अपने चरणारविन्दपर अर्पण कराया। वैसे ही प्रस्तुत प्रेमी महोदयगणका धन्यवाद है कि जिहोंने इसके प्रथम गुच्छा सादर स्वीकार कर मुझे उत्साहित रिया । इति शम् ।। इदोर सिटी, परमविनीत- शिवचन्द्र भरतिया। १५-६-०७ Poets must be lil e Byron That star of Iiberts- Whiose pea solely devolod To the noble Greece Shattered that nation's Shackles from the Ottoman, yohe Extol thy country-" Ashak' ! Guide, cheer and assist it Poets must have at their heart One grand aim to serve their native countıy Ashak's GL chapter Il कपि अवश्य ही बायरन् जम हा मिना स्वातत्र्या सितारा था, जिसकी लेग्वनी श्रष्ठ ग्रीस की सवाम सवथा समापत थी, जिसने ओटोमन लोगाका धुरसे परतत्र राज्यों बधन नष्ट किया। आशर । तू अपने देशरी तारीफ कर, उसमा बिनता हा, उसमें उत्साह और मदद दे। अपने देश की सेवा करनका बटा भारी व्रत कवियाक हृदयम अवश्य हाना चाहिये।
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॥ श्री ॥
Baeed
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
मगलद्वादशी।
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(आया)
ॐकाराकृति जग जो, इच्छामात्र स्वय बना सारा !
नमन करू मै उसका, अम हरने जोड हाय मदा ।।
मोह मिटाने दी है, भारत हमको प्रधान पुण्यधरा ।
भवतारक ईश्वरने, नमन उसे बारबार सदा ॥
गति है जहा हमारी, उस मिट्टीको सटा नमस्कार ।
वन, गिरि, मारता, मारुत, जलान्न, सबको प्रणाम सदा ॥
तेज प्रभाव जिनका, क्या था जगमें विशाल विख्यात ।
वाक्पति थे वे कैसे ? पूर्वन-उनको प्रणाम सदा ।।
सुध बुध जिसने हमको, दी वह मापा नमू सुधासार।
दे ऐक्यभाव करती, सुधार सबका स्वदेशमला ।।
वाणी प्रधान जगमें, हृद्धावार्थप्रकाशका मधुरा ।
यहि है मगरदात्री, हमपर होओ प्रसन्न सदा ॥
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विनयपोडशपदी।
(वसन्ततिलका)
है विश्वकीर्तिजननी, जननीतिसारा,
धारा सुधारसकरा, कवितासुधारा ।
भारा वही कटुतरा यदि भावहीना,
दीना न हर्प करती, कभि हो मुलीना ॥
है काव्य सुन्दर नहा रमणीयताकी,
सीमा कहीं न जगमें निज एकताकी ।
है काव्य नव्य यदि वीररसप्रधान,
देशानुराग करता सुखसनिधान ।।
है धन्य देश जिसमें कवि काव्यकारी,
होते स्वदेश-हित चिन्तक पुण्यकारी ।
है कान्य जीव सबका श्रमदुःखहारी,
गाते जिसे सब कहीं कविताविहारी ॥
हे रम्य भव्य कविते । ललितानुरागे ।
कल्याण शीघ्र कर भारतका अभागे।
हो तू यहा भकट, भाव दिखा नवीन,
हिन्दीमुधार कर तू झट हो भवीन ।।
॥श्री॥
प्रवास-कुसुमावली।
द्वितीय गुच्छ ।
श्लोक।
माळव वर्णन।
उपजाति
इन्दोर है मालवै राजधानी,
वही हमारी वसती पुरानी ।
फिया यहा आकर फेर वास,
परन्तु था शेष अभी प्रवास ॥
शार्दूलविक्रीडित
कैसा माल्य था प्रसिद्ध जगमे पुण्यप्रतापी महा ?
कैसे वीर नृप प्रजौप्रिय हुए देशोपकारी यहा ? ।
१ मालवेकी राजगद्दी, इसकी सीमा ऐसी है -उत्तरम मेवाड और राजपुताना,
दक्षिणम वियादि और सानदेश, पूवमें मध्यप्रदेश और पश्रिममें गुजरात । यह
भूमि विध्यपर्वतके शिरोभागवत्तिनी है । पर्वतके ऊपरका जमीनको "माल" कहत है,
इसी लिये इसका नाम हुआ है। २ बाकी । ३ प्रजाके प्यार ।
मालव
प्रवासकुसुमाघली। 4 . श्रीमद्विषम सार्वभौम नृपकी सत्कीर्ति कैमी अहा गज भोज समान फोन नृप था का-यानुऽरागी कहा। or यसततिळया फैसी पुगे रचिर उज्जयिनी यहा थी? सामन्त ये नृप जहा यहु अश्व हाथी । क्या थी विशाल जगमे, उसके समान- कोई न थी अतुल वैभवे शोभमान ॥ सिप्रा जहा विमल गधवती-प्रवाह- सयुक्त थी उपवनाधित गन्धवाह । देता सुगन्ध, जन ये सर सृन गजी, प्ररयात थी गगनचुम्बित सौध-राजी ।। ४ यगीचोंमें घूमा १ श्रीमान् विक्रम राजाको हुए लगभग दो हजार वर्ष हो चुके हैं। २ धारा पुरीका प्रम्यात एक राजा-जिसे होने लगभग नौसो पप हुए हैं। ३ पवितामें प्रीति रगनेवाला, कविताप्रेमी। ४ सार्वभौमको घर देनेवाला माडलिक राजा । ५ अनु पम पमयसे शोभनयाली । इस नामकी नदीकी धारा । हुभा. ८ वायु, हवा । ९ भावाशसे मिली हुई, सबसे ऊची । १० राजमह यी कतार-पत्ति । एक दिन यह नगरी भारतवपरी अद्वितीय राजधानी थी-इसी लिये इसफो माशपुरी मानी गई है । यद्यपि यहां इस वक्त कई प्रारीन चिह पाकी नहीं है सांभी श्रीमहापारफे पवित्र दर्शनोंसे उसका स्मारक बना हुआ है। २
"++ ++ प्रवासकुसुमावली।
उपजाति
निराजते थे स्वयमेव ईश,
घरे हुए पूरन चन्द शास ।
वहा सदा दे सनको उजाला,
अन्वर्थ की थी नगरी विशाला ।।
मन्दाक्रान्ता
कैसा राजा विनयनत था, पूर्ण विद्या-निधान,
मानी, न्यायी, परम सुकृती, विक्रमार्क प्रधान ।
लक्ष्मी, विद्या, सरस कविता थीं जहा एक-भाव,
देशोद्धारी सकल जगमें पूर्ण था यत्प्रभाव ॥
१ महाकाल शिव-रघुवंश काव्यमें कालिदासजीने लिखा है कि, "असी महाकाल.
निक्तनस्य धसभरे क्लि चन्द्रमाले ॥ तमिसपशेऽपि सह प्रियाभित्निावतो निर्विशति
प्रदोपान् ॥" अर्थात् यह राजा चद शीस पर है ऐसे महाकाल शिवजीक मन्दिरके समिध
रहता है, इस लिये कृष्णपक्षमें भी प्रियाओंके साथ चादनेमें प्रदोषकाल-रानिका प्रथम.
माग-व्यतीत करता है । इसीका यहा अनुलक्ष्य किया गया है । २ यथार्य, जता
"विशाला" नाम है वैमी विशाल अथात् यदी। ३ उम्बयिनी-यह पुरी यहुत बड़ी थी
इस लिये इसका नाम "विशाला" भी था ! ४ मुख्य । ५ देशका उद्धार करनेवाला।
६ जिसका प्रभाव-तेज । अत्यन्त सैदको बात है कि ऐसे पुग्यप्रतापी राजाका इस वक्त
पुछभी इतिहास उपलब्ध नहीं है।
३
प्रवासकुसुमावली ।
शार्दूलविक्रीडित
वैसा भोज हुआ प्रसिद्ध जिसकी धारो पुरी थी यहीं,
देता था सुनके नवीन कविता लाखों रुपया वहीं ।।
विद्या वैभव नीतिपूर्ण जिसने सर्वन की थी मही,
कोई भूप हुआ न फेर जगमें प्ररयात ऐमा कहीं ।।
७
वसततिलका
श्री कालिदास करि रत्न यहीं हुआ है,
वाणी-मुधोरम यहीं जिसमा वहा है
ये सभ्य, थी नृप सभा, नग्न भारी,
ये चारुदत्त सम रोक परोपकारी ॥
१ इस वक जिसको “धार" कहते है वह । २ विद्या, ऐवय और
न्यायसे पूरी । ३ कवियोंमें रत्नश्रेष्ठ । ४ वाणीका अमृतरूपी प्रवाह कविता अथात्
रघुवश, शाकुन्तल, मेघदूत आदि काव्य यहीं यने थे ।५
"धवन्तरि क्षपणको
ऽमरसिंहशर्वेतालभ घटकपरकारिदासा ॥ त्यातो वराहमिरो नृपते सभाया रनानि
वै वरसचिव विक्रमस्य ॥ धन्वन्तार, क्षपणक, अमरसिंह, शकु, बेतालभ',
पटकपर, कालिदास, घराहमिहिर वररुचि-ये नवरत्न महागन विश्मकी सभामें
विद्यामान थे। ६ यह एर उनयिन में या धनिक था, इसने परोपकारमें अपना सर
धन हटा दिया था । शद्रक कविने इस पर "मृच्छकटिक" नामक नाटक लिखा है।
देगनेही योग्य है।
* प्रवासकुसुमावली।
मदाकाता
हा हा । होती भरत-वसुधा नामशेपा तथापि,
ऐसे होते नृप न कवि वा, पूर्ण पुण्य-प्रतापी ।
विद्या, धर्म क्षण न रहते बीज ना आज पाता,
हिन्दूका हा । कहिं न जगमें नामभी याद आता ॥
शार्दूलविक्रीडित
भूलोगे न कभी सिकन्दर-कथा, यी नीच दुर्देवकी,
कैसा था महमूद-आक्रमण हा । वाती पृथीगंजकी ? ।
गोगै आर गुलाम वा मुर्गल ये केमे प्रमादी यहा ?
कैसी की कतले कराल ? सुनके गेमाच होता महा ॥
१ईसाई सन्कै ३२७ वर्ष पहिले जिसने यूनानसे आकर हिदपर आक्रमण किया
था। एक यनानी एलची चन्द्रगुप्तरे दरवारमभी था । २ इसने सन् १००१ से १०२४
तक हिन्दपर हमले किये जिसमें देशको बहुतही सवा करके करोडाका माल अपने देश
ले गया। ३ थानेसरमें महम्मद गोरीके साथ वडा भारी युद्ध हुआ जिसम यह सन्
११९३ में काम आये, वे पृथ्वीराज चौहान । ४ सन् ११९९ तक बगालेतक इस सान
दानकी सत्ता हो चुकी थी और इसका राज्य १२०६ तक रहा । ५ इस
सानदानकी सत्ता १२०६ से १२८८ तक रही । ६ इनकी सत्ता १५२६ से
१८५७ तक रही।
प्रवासकुसुमावली । * ++
पृथ्वी
कृतान्त सम थे कडे, अनय था जिन्होरा हिया,
स्वधर्म मनका हरा, कर लगा बुरा जेजियाँ ।
हरी नृपति:न्यका, छल विचित्र भारी किया,
निपात कर भारत प्रगल हो सभी ले लिया ।
शादूलवितरित
छा
होते ना गुर गमटार्स अथवा गजा सिनाजी यहा,
सिन्दे, हुस्कर, पेशवादिक कमी होते बुरे हाल हा ।।
१ यम, काल। • अन्यायी । ३ हि दुआको मुसलमान यनना अवश्य होनेक लिये
औरगजेबने इस नामरा एक मडा भारी कर लगाया था। ४ माडलिक राजाओकी
बेटीके साथ शादी करते थे। ५ आखरी रिना। ६ यह मिवाजी महारा के गुरु थे।
सिवाजीने इनको अपना सब राज्य दान कर दिया था, तथापि इहोंने उसको वापिस
करके सिर्फ अपना चिद्र भगवा झाडा-पताका कायम रमसा । ७ यह हिंदुपदपाद
शाहीके सस्थापक प्रभावशाली धर्मसरसक सताराके छत्रपति राजा हुए । इनका
जम सन् १६२७ में और मृत्यु सन् १६८० में हुई। ८ इनके आदि पुरुष रानोजी
राय सिदिया हुए। सन् १७४० से अब तक इनका गादी ग्वालियरमें विद्यमान है।
९ आदि पुरुष मल्हारजी होलार "होल मुरुम" गावके रहनेवाले थे, इनकी गादी
सन् १७१३ से माल्में आजतक विद्यमान है। १० इम प्रतापी महाराष्ट्र मानण
सानदानका आदि पुरुष "पारामा विश्वनाथ" था, जिसकी मृत्यु १७२० में हुई।
पेशवाई सन १८१८ ता पूनाम रही।
m
प्रवासकुसुमावली
१२
जाता धर्म, न भारतीय रहता । कैसी दगा देशकी-
क्या होती फिर? कौन जान सकता लीला भला ईशकी ||
होते ना उस वक्त होलकर वे मल्हारैजी, मालगा-
आता हाथ न, दूर होति तुरकी-सत्तो कभी ना लबों ।
सिन्दे मोहदजी न शूर बनते "पाटील वावा" वही-
होते रयात न, छीनते न यदि वा इस्लामियोसे मही ।।
इन्दोर राज्य-वर्णन ।
शिखरिणी
"
फप्ता
अहल्या वाई थी शुभ कुलवधू होलारकी,
चलाई थी सत्ता पति निन सदा राज्य-भरकी ।
१ हिन्दू । २ इनका जम सन् १६६३ में और मृत्यु सन १७६६ में हुई।
३ मुसल्मानासी अमलदारी । ४ थोडीसी भी । ५ इनका जन्म सन् १७४३ में और
मृत्यु १७९४ में हुई। यह बड़े पराक्मी थे। पानीपतकी लडाईमें लगडे हो गये थे
६ पेशवाकी तरफसे इनको यह पदवी मिली थी । ७ यह मल्हारराव होलकरकी स्नुपा
अर्थात् पुत्रवधू और खडेरावकी रानी थी। इनका पात सन् १७५५ में युद्धमै स्वर्ग
वासी हुआ तब इनके श्वशुर मल्हारराव विद्यमान थे। उनके पीछे इन्होंने सन १७६७
से १७९५ तक बहुतही धमनीतिसे राज्य चलाया। सन १७७० में इहीने एक छोटेसे
गावको इदोर शहर बनाया था। ८ सप होलकर राज्यकी ।
1
७
प्रवासयुसुमारली। @ @ . . . रिया भाग नान, प्रत नियम पूजा विविध की, बनी साभाद्देनी, प्रभु बिन नहीं अन्य मुर की ॥ शार्दूलविक्रीडित से वे यचन्तगर पटु ये सग्राममें हारकी- जानी बात भी न, कायम ग्सी गाटी "मुभेदार"की । सिंन्दे मार हटाय दूर करके, जो पेर्गेवासे रडे, होते थे सुनतेहि नाम जिनका गेये सभीके सडे ।। १५ भुजगप्रयात अर्याजी तुकोजी महागज, भूप- हुए मालवेमें अभी जो अर्नूप । १ इनका जन्म सन् १७९७ में और मृत्यु सन् १८११ में हुई । २ पेशवाकी ओरमे मल्हारराव मारवाके सूवा हुए थे तबसे इनको सव “सुभेदार" कहते थे । ३ दौलतराव सिदियाने इनका राज्य छीन लिया था। फिर इहोंने खुब सेना इकी करके सन् १८०१ में अपना राज्य वापिस लिया । ४ इसके अनन्तर थोडेही समयम सन् १८०२ में पेशवाके साथ यगडा हुआ उसम उनके साथ जोरसे लडकर उनसे परास्त क्यिा । ५ यशव तरावका ! ६ इनका जम सन् १८३३ में और मृत्यु १८८६ म हुई। यह दत्तर आये थे इनका पूर्व नाम “भागीरथराव" था। ७ नमा जाम और मयु महाराना जयाजी राव साथ साथ हुई । घोटही दिनका अतर रहा । ८ निरुपम, तुलनाहीन ।
abp++ प्रवासकुसुमावली । स्वय राज्य ग्क्सा दिसा आत्मशक्ति, प्रजाकी बढाई सदा राजभक्ति ।। मालिनी अमल यश जिन्होंका योग्य है कौन गाने ? अतिशय जिनकी थी योग्यता कौन जाने । नियमित सग्ला थी कार्यवाही, विचार- उचित कर चलाया राज्यका कारभार ।। ७ स्रग्धरा क्या ये दूजे सिवाजी पुनरपि जनमे ? नामभी है सिवाजी, वैसाही था जिन्होंका अनुकरण सदा,देव था हान गजी। होता वैसों अधेरा इस समय कभी, कार्यवाही निसाते- सी अच्छी सिगाजीगते नृपसम बा, ना कहीं हार साते॥ वसन्ततिरा हा ' कारकी फुटिरता अति है विचित्र । होना पडा नितय आश्रम ले पविन । १ निजकी शक्ति, 7 भूतपूर्व सिवानी महाराज । ३ समान प्रति । ४ भूतपूर्व सिवाजी जगा । ५ भूतपूर्व । ६ तीसरा । ५ यानप्रस्थाश्रम-"पुत्रमुत्पाद्य यनवास कृत्वा भाट पच्यफगदि मक्षथिया ईश्वरापान रोति य स वानप्ररथ" पुत्रको उत्पनकर पनमें आके फलादिकोका भक्षण पर जो ईश्वरका आराधन परता है उसमे "यानप्रस्य" कहते हैं।
प्रवासकुसुमावली है योग्य, वर्महरे वा युवराज मान, छोडा नृपासन, वशी र के समान ।। उपजाति वे नर्मदाके अब तीर जा बसे, निवृत्त होके सब कामकाजसे । देके उन्हे ईश्वर पूर्ण शान्तता कगे मनीपा सकीर्थ-सगता ॥ २० वसततिद्धका दर हो सिलत दी, युवगज भूप- माने गये, नियत कौन्सिल हो अनूप । होना प्रेनन्ध, जन रों नृप योग्य होवे, ले सम्मति त्रिटिशकी प्रभुती चलने ॥ १ क्वच कुदल धारण करने के लिये योग्य, तरुण । २ राजकुमार, राजपुन । ३ जितेन्द्रिय, जिसने इन्द्रियारो जीता है वह 1४ यह भगवान् रामचन्द्र के परदादा थे और दिलीपके पुन थे । काटिदासने रघुवशमें लिखा है कि, "न हि सति कुलधुयें सूयवस्या गृहाय' पुलको चरानेवाला पुत्र होने पर सूयवशी कभी घरमें रहते नहीं । ५ वा० ३१ जनवरी सन् १९०३ को राज्यका इस्तिा देके अलग हुए। ६ सब अय घन मानादिक जिसमें मिले हुए है ऐसी । ७ सावभौमभप्रेन साकार की तरफसे ता०३१ जनवरी १९०३ को राज्यपद युवराजको दिया गया उसका सरीता । ८ विचारकोंकी सभा १९ कारोवार।. अप्रेज सरकारकी ११ राज्यशासन ।
+ + प्रवासकुसुमावली ।
शार्दूलविक्राडित
-
.
देने शिक्षण योग्य, वाल नृपको, दे हाथ अग्रेजके,
विधा नीति पढाय शिक्षित किया कालेजमे भेजके ।
राजा बालक है परन्तु उनको प्रों वडी तेज है,
क्या होता शिशु सिहका हरिणसा? कैसाभि निस्तेज है । ॥
२२
भुजगप्रयात
सवाई तुकोजी महाराज नाम,
यशस्वी जिन्होका, करू मै प्रणाम ।
महाराज भावी यहाके, प्रभीवी,
प्रजाभाव-भावी', वनो सत्स्वभानी ॥
२३
.
वसततिलका
देवो महेश इनको अमित प्रताप,
कम्पायमान रिपु हो सहके न ताप ।
प्ररयात हो विमल कीर्ति महाप्रभार,
पालो प्रजा, वन चिगयु पवित्र-भाव ।।
२४
१ छोटे महारानको । २ "केपटन फोर्स" और "परसीहाइड" वगैरह अप्रैज ।
डेली और मेओ कालेजम । ४ बुद्धि । ५ वालक । ६ तेजहीन, निर्मल । - होनहार।
प्रभावशाली, तेजस्वी । ९ प्रजाके भावमें जिनका शव मिला हुआ ऐसे । १० अच्छे.
वभावके । ११ गुद्ध है भाव जिनका ।
प्रयासकुसुमावली । * *
शार्दूलविक्रीडित
वैसे नानकचन्दजी सचिव है, न्यायी गुणी सन्मति,
रक्सा राज्य विचारयुक्त चरके, सेवा बना कीमती ।
पाया मान इनाम सब नृपसे सम्राट महागजसे-
सोनेका पदक, प्रधान पदवी" सी आय ई "काजैसे ॥
भुजगप्रयात
तुकोजी सिवाजी रहें तुष्ट भारी-
इन्हाके गुणों पै, किये कारभागे।
रंजीडेन्ट, एजेन्ट, अग्रेज सारे,
गुणी मुज्ञको कौन पैसे पिसारे ? ।।
,
२६
१ प्रधान मनी । श्रीमान् तुकोजी महाराजा और श्रीमान् सिवाना महाराजासे ।
३ अप्रेज सरकारकी तरफसे इनको “क्सरे हिंन्द गोल्ड मेडल' ता० २६ मई सन्
१९०० को मिला है और "सी आय ई" का समाननीय पद ता. २१ नववर सन्
१९०१ को मिला है। इनको यहा पुस्त दर पुस्तके रिये जागीर भी दा गई है, इनाम
मिला है और इनके परम माननीय स्वर्गवासी पिताके पद "मशीमहारा' और "राय
यहादुर" के खिताब इनके लिये कायम रखे गये हैं। ४ कारवाईसे । ५ मुशी नानर
चदजीके । ६ मि. जेनिंग, क्नल बार, यगहस्वड आदि । ७ मध्य भारतके गवर्ना
जनरल एजट । ८ अन्याय अग्रेज ।
-
१२
** प्रवासकुसुमावली ।
शिखरिणी
रही सत्ता भारी पर नहि निसारी उपकृति,
सदा मीठी बोली श्रवणसुस हो ली, न विति ।
कहींभी ना मोहे, सचिवपद सोहे, शुभ रति-
शिर्वोचमि पाइ, दृढतर मिलाई उपरति ॥
२७
उपजाति
रचा गया कौन्सिल मेम्बरोसे,
होने लगी बैठक नम्बरोंसे ।
होता सता न्याय मताधियोंसे
इन्साफ पाके जन कौन कोसे ॥
२८
भुजगप्रयात
भुजकेतुं जैसे रजीडेन्ट भागे,
हुए प्रेसिडेन्टै प्रजा सौरयकारी ।
सदा कौन्सिल स्थान शोभा बढाई,
प्रजाको सरा न्याय दे कीर्ति पाई॥
२९
१ उपकार । २ कानको प्यारो लगनेवाला । ३ विकार । ४ शिवके पूजनमें । ५ हृदय
पदाथ नाशवान हैं ऐसी भावना । ६ अधिक मतसे । ७ मि. वोगाकेट। ८ सभा
पति, मीरमजलिस।
१३
प्रवासकुसुमावली ।
महू-वर्णन ।
-Ne..
वसन्ततिलका
है छावनी निक्टही महुकी प्रधान,
सेनी सितासित जहा विविधै-प्रमान ।
है वस्ति चालिस हजार शुमार सारी,
हैं मारवाडि जिसमें धनिॉर्थकारी ॥
उपजाति
परन्तु विद्या-विमुस-स्वभाव,
है मारवाडी जन निर्धभाव
न जानते रीति कुरीति कैसी ।
स्त्रिया बनी हैं अति मृढ वैसी ॥
मारिनी
कर उचित बनेंगे सीस विद्याविचार ?
कय अधिर बनेंगे श्रीयुत श्रीपचार ? |
पोज । २ गोरी और काली । ३ न्यारे यारे प्रकारकी गिनतीची । ४ धनवान्
भार प्यापारी १५ विद्या सोसनेमें मुंह मोडनेवाले। ६ तेजहीन । ७ धनवान् । ८ धनका
प्रचार करनेवाले।
++ ++ प्रवासकुसुमावली ।
किस समय तजेंगी वे स्त्रिया ग्राम्य गीत ।
कन वह सुधरेगी कौन जाने कुरीत ॥
३२
| वस ततिलका
काटे यहा दिन घने करके विचार,
की ग्रन्थ-काव्य रचना विविधप्रकार ।
इच्छा हुई प्रवल, भारत-राजधानी-
जा देसने फिर, महा नररत्नसानी ।।
३३
मालिनी
कठिन दृढ विचित्र प्रेमका पार्टी भारी,
पर शिथिल किया हा । देवने हो कगरी ।
प्रणय विविध छोडा, रेल्में हो सवार,
झट गमन किया ले साथ प्रेमोपहार ॥
१ गालियां, अभद् गीत । २ नाना प्रकारकी । ३ क्लकत्ता । ४ नररूपी रत्नोंकी
रगन अर्थात् जहाँ श्रेष्ठ पुरुषोंका निवास है उसे । ५ वधन-एक कविने कहा है धनानि
क्लि सन्ति बहूनि प्रेमव धनमवेहि विचिाम् ॥ दारुभेदीनपुणोऽपि पडधिनिधियो
भवति पत्रकोशे ॥" अर्थात् य धन बहुत हैं पर उन सपमें प्रेमवधन वा विचित्र
है। लाडीको छेद करनेवाला भ्रमरभी कमलकोशमें बद्ध हो जाने पर चुप हो जाता है।
६ प्रीति । ७ प्रेमका उपायन ।
...
प्रवासकुसुमावली ।
वि-य वर्णन ।
उपजाति
आडा पडा जो सबसे पडा है,
विन्ध्योदि रोके पथको सडा है ।
ढरी गुहा हैं जिसमें विगाल,
है श्वापदोंका गृह जो कराल ॥
३
| वसन्ततिलका
विन्ध्योटवी यदि न दुर्गम होति आज,
टट्यों न शूर धनता छिप डॉकुराज ।
आता न हाथ किसके वह दे दिमाई,
क्या थी मजाल । यदि होति न दीर्घ साइ ।।
१ विध्य नामा पवत, मातपूडा । २ हिसक पशु । ३ सातपूहे पवतका अरण्य । ४ यह
एक यडा भारी डाकू था । इसी पर्वतमें छिपकर अपना अद्भुत पराक्रम दिखाया करता
था । बडे बडे पुलिस अफसर इसरे पकडनेम असमय हाके चकरा गये थे।
आय है कि डार होने परभी धम पर आरूढ था । इसका जापनचरित प्रसिद्ध
हो चुका है। ५ यह पवत पूर्व कालम बहुतही ऊचा था तथापि इस वक्त भी इतना
हुआ
कि कोसों इसका विस्तार है और इसमें लबी चौड़ी मार गहरी अनेक
साई गुहा आदि है।
फैला
१६
** (प्रवासकुसुमावली । उपजाति आश्चर्य क्या? जो रेरिको छिपाता। वहा फिसीका पथ कौन पाता । वटे बडे वीर जहा समाये, चला पता ना कहि, हाथ आये । बस ततिलस ऐसा भयान गिरि, मिन्तु वहा दिसार- स्वाभाविक प्रिय बड़ा वनरोजि-भार है ठौर ठौर तरुपुज, निकुनें भागे, है पाक्ष जित जहा श्रुति सौरर्यकारी ।। -- १ पुरा कालम यह पवत बडा ऊचा और हठाला था। अपने शृग ऊपर वटाकर सूर्यके पथका रोक देता था, इस लिये सबको यहा क्लश हाने लगा । उस वक्त सब रोगाने मिरकर श्रीसूर्यनारायणकी प्राथना की, उस परसे श्रीसूर्यनारायणने अगस्ति ऋपिका कहा कि विध्यादिवो आप उपदेश करके ऊपर बहनसे राक आर लोगाका क्लेश दूर करें । उसपरसे दक्षिण दिशामें जाते वक्त अगस्ति ऋपिने उसको ऊपर बन्ने है राका था-ऐसी क्या वामन पुराणम है । २ वनकी कतारोंका सुन्दरता । ३ है वृक्षसमूह । ४ झाड़ बेलते बनी हुई गुफ्त । ५ पक्षियोंका शब्द । ६ कानोंको आनद देनेवाला, मोटा । इस पवतमें ऐस सुदर स्थान और गुपक्षा अनम जगह है।
प्रगासफुसुमायरी। ® -
ALAN
गाडी जैसी पवन चपला जा घुसी "बोगटे" में,
आया याट लरित कैरिका हमपया हमें |
आने जाने परशुरने मारके वाण मिद्ध,
गोता था जो विर गिग्मेिं चंपन्ध्र प्रसिद्ध ॥
शादूरविवादित
प्प
क्या वैज्ञानिक शक्ति एक दिन थी साई भारी, तथा
जो "शापापि" वा गिलपि" यहा विज्ञान रियात था ।
१ हवा समान वेग है जिसका ऐसी । • बडे बडे पवतके शिखर खोदक
मागगाडा जानेके लिये जो रास्ता बनाया गया है यह "युगदा", विवर । ३ श्रा
कालिदास कविरा वर्णन क्यिा हुआ। ४ हिपाल्यके उत्तरकी तरफ मानस सरोवरमें
हसॉके जानके लिये पवतके शिखरमें जो मार्ग किया हुआ है-वह । ५ परशुरामने । ६
कोच पर्वतक शिखर-यहा परशुरामने याण मारकर भारपार रस्ता बनाया था। ७ सोच
पर्वतमका र विवर, युगदा “ हमद्वार भृगुपतियशोवर्म यत्तौंचरत्रम् " ऐसा पालिदा-
सने लिखा है । यह शिसर हिमालय निक्टवनी है। ८ विज्ञान-शिल्प, कारीगरी, पदा
विज्ञान-निसको अंग्रेजीमें "Sencnce" सायस कहते हैं- उस सबकी
मयसे
उची, श्रेष्ठ। १० शापसे । ११ वाणसे-अधान् “चत्वारयानतो वदा पृष्टत सशर धनु ।
इद बाममिंद क्षात्र शापादपि शरादपि " अर्थात् आगे चारों वेद, पीछे वाण लगा हुआ
धनुष ऐमा यह ब्राह्मतेन और क्षानतेन शापसे और पाणसे समय है।
-*प्रवासकुसुमावली ।
?
कैमी उन्नत थी अपूर्व सनकी अध्यात्म-निया महा
गाडी, तार, विमान, यत्र सर थे स्वाधीन जिस्से यहा ।।
द्रुतविलम्पित।
नमन है उस चालक कालको,
म्मरण-मात्र क्यिा सर हारको ।
अतुल भारत था जगमें नही,
अहह । दीन हुना, रति ना रही।
४१
नर्मदा सेतु-वर्णन ।
.
भुजगप्रयात
नदी नमना हुँद्वतोया पवित्रा,
इसी विंध्यमेंसे वही है पिचिना।
उसी पे बना दो तला भारि सेतु
नमस्कार मेग, करो पूर्ण हेतु ॥
.
१ वह विद्या कि सिम आत्मतत्त्वका विचार है, परब्रह्म ज्ञान, वेदान्त विद्या । २ च
गनेवाला । ३ यादगार, स्मारक । ४ पविन, स्वच्छ है पानी जिसका वह । ५ नासे
बेळगारी और ऊपरसे रेलगाडा जानका रस्ता क्यिा हुआ है ऐसा दो मनिल्याला ।
पुढ-यहबग्वाय और मोरटकाके वाच बना हुआ है ।
प्रवासकुसुमारली।
मदापाता
आने गाडी पुल्पर जन प्रान्तका भाग भारी,
दीसे रना उभय तटका दृश्य चित्तापहारी।
मानो होके शिथिल-शिथिला, नर्मदा धार बीच
छाया द्वारा प्रतिति वना, जा रही चित्रं सींच ॥
४३
मालिना
जिस समय तुकोजी भूप थे विद्यमान,
उस समय सुला है सेतु लम्पायमान ।
सुखद चिर कैसा काल था भासमान ?
अब कठिन वही है कालका कार्लमान ॥
ॐकारनाथ-मान्धाता वर्णन ।
उपजाति
ॐकारनाथ प्रभुका पवित्र,
समीप है मन्दिर चाम-चिन ।
किनारोंकी हद्द मध्यभाग। २ चिप्तको हरण करनेवाला, सुदर। मद मन्द,
धामा धामा । ४ अक्स, मेराके वाचके अपर जो प्रतिविम्ब पडता है वह 'फोकस'।
५ तसवार, "फोटो' । ६ लवा । ७ अनुभवम आनवाला, दाखनेवाला, चमकला। ८
समयका परिमाण । ९ मुन्दर है चिन जिसका वह ।
२०
++ ++ प्रवासकुसुमावली ।
है नर्मदाके तट पै विशाल,
अत्युच, झाकी जिसकी क्माल ।।
वये हुए हैं चहुँ ओर घाट,
लगा हुआ हैं सन ठौर ठाट ।
है यात्रियाकी ठठ नित्य भाग,
जहा बिगजे शिव चन्द्रधारी ।।
MC
शालिनी
मान्धातासे नर्मदा-तीर एक,
सोहे भारी, दृश्य अन्छे अनेक ।
कैसी चीडी सीढिया पार जाने-
वाधी है ? वा तीर भार्ग सजाने ? ॥
४७
शार्दूलविक्रीन्ति
एछ
ॐकारेश्वरका निवास येहि था पूग पुग कालमें,
जा बैठे पर तीर पै, यवनके उच्छेदके हालमें ।
१ जिसने अपने सिर पर चन्द्र धारण किया है वह । • श्रीओंकारेश्वर द्वादश ज्योति
लिंगोंमेंसे है । महमूद गजनवीने और सतरहवीं तथा अठारहवीं शताब्दीम यवनोंने इसके
असली मदिरको छिपविछिन कर दिया था । पिर पेशवाने पर तीर अधात् उत्तरके
किनारे पर नया मदिर बनाया । ३ उत्तरके तौर पर । ४ नोडताह, धूमधाम ।
प्रवासयुसुमारली । - -
हाहा ! काल । विचित्र शक्ति महिमा तेरी, तुही काले है,
हा कैसा ! उस काल-काल निभुका तृही महाकाल है ? ॥
मालिनी
विमल जल भरा है नर्मदाके किनारे,
उछल उछल भारी मच्छिया जोर मारे।
सम्ल जन नहाके, भक्तिसे गा चरित्र,
शिव-चरण चढाते नीर, होने पनि ॥
वस ततिलया
श्रीसिद्धनार्थे-गिन-मन्दिर जो निगीर्ण,
टूटा उजाड गिरि ऊपर है विकीर्ण ।
प्रासाद भिह-नृपका गिरिम यवर्ती,
सोहे नितान्त पणनीथि तटान्ती ।
५०
मालिनी
अधिकतर सताते यानियोको पुजारी,
द्विज पर नहिं होते तुष्ट ले दान भारी ।
१ सहार तो । २ कालकाभी सहार करनेवाला । ३ या काल । ४ यह पुरातन
मदिर उत्तरीय पहादी पर है । ५ पुराना । ६ पिसरा हुआ,। ७ राजाका महल । ८
भील जातिके राजा । पहाडरे । १० यानारका मार्ग ११ तट समाप ।
२२
--*-- प्रवासकुसुमावली । कठिनतर इसीसे तीर्थयात्रा बनी है, हर हर । जन ऐसे कौन माता जनी है । रेल-वर्णन। मालिनी नमन कर, शिवाज्ञा मान, मानो प्रवास- ग्रहण कर चला हू, देखने सन्निनास । झटपट पहुची जा खडवे रेल-गाडी, उतरकर चढ़ा में "मेल" में हो अगाडी ॥ Ltd शिखरिणी धरती। चली भारी “मेल" प्रलचपला शन्द करती, सुदूरा यूँ होवे निकट, निकटा दर पिछाडी दौडे वे तेरु, चपल हो चीड पथकी, हुई याद स्पर्धी उस समय दुर्घ्यन्त रथकी ।। १ अच्छा निवास उत्तम ठिकाना । • जोरसे तेज चलनेवाला । ३ बहुत दूरको । ४ पृथ्वी, जमीन । ५ पक्ष । ६ रेलवेके दोनों तरफकी तार लगी हुई चाड अर्थात् "fencing" | ७ वरावरी करनेवाला । ८ दुष्यन्त राजाका रथ- कालिदासने अपने शाकुन्तल नाटकमें इसरा यों वर्णन किया है-" यदा लोके सूक्ष्म प्रजात सहसा तद्विपुलता यदद्ध विच्छिन्न भवति कृतस धानमिव तत् ॥ प्रकृत्या यत्र तदपि समरेख नयनयोनमे दरे किचिकिमपि च न पा रथजवात् ॥' २१80
प्रवासयुसुमावली। * +
1 शालविक्रीडित
है
--
10.भा
हता आय इटाग्मी निकटही, आया जबलपूर वा,
सायकाल हुआ चिगग जलके गाडी चली भोग्यो ।
हो माणीकपुर प्रयाग ठहरी, मध्यान्ह या गतका,
भारी भीड वहा, प्रबन्ध कुछ ना देसा क्सिी चातका ।।
मदाकान्ता
एक छप्पा
हा हा । कैसे पथि जनसे रेलवे कर्मचारी-
देते त्रास अम । यह कथा ना कही जाय साग ।
तौभी आया अनुभव मुझे सो कट्ट अल्प आज,
तीजों दर्जा अति कठिन है रेलमा जेलंगज ।।।
६५
शिखरिणी
फटे टूटे माथा, कर पद नबे रेल चलके,
गिरे यो वैसे, अगणित मरे हैं कुचलके ।
हुए दु सी टट्टी दिन पथिर निण्मत्र रस्के,
रहे वैसे नीचे उतर कितने, "ट्रेन" हो ।।
१निसका शद भयकर है वह । • मध्यकाल, आधीरात । ३ मुसाफिर, प्रवासी ।
४ तीसरा मास । ५ जेलोंका राजा अथान् जेसेंसेभी भयर । ६ पाखाना, पेशाब ।
७ गाढा मी घटनायं गन्ध होता है।
४
a) @ ? --* प्रवासयुसुमावली ।
মাঙ্গালী
-
भारी भीड, स्थर न सिने पैर, तौभी हटाके,
लारे यात्री अधिक भरते, कर्मचारी गरे ।
बोडेमें ला मर करिया भेड मानो भग है।
देके ताला पथिक करते घन्ट, काग खर्ग है ।।।
५७
.
प
ए
शालापीडित
सानेको कुछ भी न, ना मिलता अन्छा, नहीं म्यान वा,
लेने म्देगन पै विराम सिको, कैसी व्यवस्था ना १ ॥
लेनेमे टिकट प्रयास पडता, होता महा त्रास हा
आने : नहिं "ट फार्म पर वे, हल्ला न जाता सहा। 1॥ ५८
MA
4.
: मालनी
अहह । टिक्टना नाम दे नाग्चार,
टिकट निग्स टेसे, बोझ तौले उतार ।।
इधर उधर दौडे यात्रियोंको सताने,
कुछ न कुछ वटोरे, बात साली न माने। ॥
५९
१ वरिया और भेड रहोकी जगह । २ जेलयाना । ३ पाती । ४ तगपीज,
कारोवार । ५ नई, अच्छी । ६ श्रम, कष्ट । ७ गाडी सदी रहती है वहाका
चातरा । रेवे।
-
wr
प्रवासकुसुमावली। -- *
धरम, धन, भलाई, रेलवेने हमारी-
सुध बुध सब छीनी, सृन की जानमारी।
कुछ वन नहिं आता, ना चले काम काज,
उस दिन हम सारे हो गये पY आज ॥
m
प
बहुत कठिनतासे मार्ग वीता हमारा,
पर झट हवंडेमें "मेल" ने ला उताग ।
नियत समय लेने "रामरे लाल" आये,
घर पर-कर भारी प्रेम सत्कार-लाये ॥
भूतपूर्व-तीर्थयात्रा-वर्णन ।
क
मालिना
प्रथम जन हुई थी तीर्थयांना हमार्ग,
तय यह क्रफत्ता राजधानी न सारी ।
फिरकर निग्गी थी, ना स्सिीसे मिला था,
समय नहिं रहा था, चित्तभी ना खिला था ।
६
गतिहीन, लुम । २ छलकत्ता आसरी स्टेशन । रामलाल नेमाणी । ४ सय
१९४८ में तीर्थयात्रा की थी। तब जगनाथ स्वामाके दानोंक लिये जानका था इस
लिये कलकत्ते में ठहरा था। उस वक्त चिन शत न होनेगे सब शहर देसा नहीं औ
नीिस मिला भी था।
++ प्रयासकुसुमावली ।
शिखरिणी
जगन्नाथ स्वामी दरश कर सन्ताप हरने,
मनीपा थी भारी अनुपम पुरी धाम करने ।
न रस्ता दूजा था, नहिं जलधिका शान्त पथ वा,
रहा, पीठा लैटा झट, निहत था दैव अथवा
॥
maratha
वसततिलका
श्रीतारकेश्वर महा शिनके नितान्त,
वे पुण्य दर्शन हुए उस वक्त शान्त ।
है श्रेष्ठ भाग्य जिसके उसको सुयोग,
होता अपूर्व यह पाचन-सत्प्रयोग ।।
६४
पाने निजेसित वहा कितनेहि लोक,
सोते समीप शिवके कर दुस शोक ।
होके प्रसन्न करुणाघन इष्ट देता,
है भाग्यहीन जन दर्शन जो न लेता ॥
१ पूर्व दिशाका एक बड़ा धाम । २ समुद्र । ३ धुरा, दुदैव । ४ यह स्थान बगालम
प्रसिद्ध है। ५ पविन करनेवाला अच्छा प्रयोग अर्थात् निदशन । ६ मनचाहा, इष्ट ।
- दयाका मेघ अर्थात् कृपापूर्ण ।
1
4
प्रवासकुसुमावली।
नित्यक्रम-वर्णन।
मारिनी
m
अब हम सब भूले "गमके लाल" पास,
रहकर दिन सोते, साथ वा आसपास ।
फिरकर सन देसी गजधानी विशेप,
पर कभि न हुआ है चित्त सन्तापैशेष ॥
मधुर मधुर पाते दी सुनाई अपार,
पर कभि न हुई थी शेष, पाया न सार ।।
यदि हम फँस जाते देयके शुभान,
कभि न दित होता मारवाडी-स्वभाव ।।
कलकत्ताचर्णन।
पर्व इतिहास ।
६
शादलविक्रीडित
सोल्सो सन वीच नीर पडि थी, थी अल्प वस्ती यहा,
सम्राट अपर था सुशील, पर ये नव्यार जुल्मी महा।
१ स्वस्थ । २ याकी । ३ सूखा भाव । ४ क्लवत्तेकी नीष सन् १५९६ में पर्ट
थी। ५ उस वफ कुल १२००० आदमियोंकी वस्ती था। ६ मुर्शिदागदवे नवार
२८
() - प्रवासयुसुमावली ।
पीछे एक सेटी यहा पर हुई अग्रेजी स्थापना,
मुख्य स्थान बना यही, नृपं हुए व्यापार फैला घना ।।
शिसारणी
।
शिराजुद्दौला था नरपति रडा
सस्त सरसे,
किया अप्रेजोंका वध, अधिक हो र यमसे
जहा ऐसा योग्य म्थले न ग्सने पाच दसके,
वहा लाके से गर्त अधिक । कैसे रह सके ? ॥
१९
मालिना
सन जन अति छोटी कोठंडीमे भरे थे,
स्थल जल दिन सारे रातहीम मरे थे।
अहह । बहुत थोडे लोग कोई वचे थे,
निज अहित कगने पाप क्या ये रचे थे।
७०
१ सन् १६९६ क शुमारम । २ बध व्यापार रक्हा हिंदुस्थानके राता हुए है।
३ इसने सन् १३५६ में अप्रेजास नाराज होके उनपर एक्दम आक्रमण किया और
उनके १४६ अफसर कैद करके एस बास फुटवाली छाटीसा कोठडीम रक्खे। जगह
और पानीकी तीसे पहुधा सब लोग रातहीमें मरे ! उनमेंसे सिफ २३ आदमी बचे थे
इतना यह निदय था । ४ क्त्तल, हिसा। ५ जगह, स्थान। ६ सौसे ज्यादा अथात्
१४६ । ७ जिसका पैमाना बोस फुटका था वह । ८ सिफ तेइम आदमी ।
खराबी।
९ युराइ,
२१
प्रवासयुसुमावली। **
उपजाति
प्रसिद्धि पाया वह "ब्ला-होल"
पना वहा स्मारक चित्त सोल ।
वृत्तान्त मारा लिस टु समागे,
पहा रिया पथर सम भाग।
७
शिखरिणी
मैगठोंका झडा उस समय सर्वत्र भर्गेवा-
वना वगालेको, फिर कर गडा था भय गवा ।
वहा अग्रेजोंने अपन करने ठीक अपना,
बनाई थी सोई, पर कर गई आज सपना ।
१ जहा ये लोग मरे ह उसका नाम "Binck Hole" अर्थात् काला छिद्र-ऐस
शोरदशक रस्सा है। २ अव जनरल पोष्ट आफ्मिके निकट एक पाथरका खभ खड
करके इसरा स्मारक बनाया गया है । इसी जगह वह कालकोठडी थी । ३ सन् १७४
से १७४९ तर वगालेमें रघूजा भोसलाके दीवान भास्कररावने सनाधिपत्य कर यगाले
वडे जोरवा आक्रमण किया था । ४ मराठोंके झडेका रंग भगवां है जिसका कारण
६ पेजकी ६ टिप्पनामें दिया गया है। • कलकत्तके नाउदीक इनका सेनानिवेग हुआ
था। ६ रक्षण । ७ सन १७४२ में मराठोंके आश्मणसे बचनः लिये अग्रेनोंने क्रम
तो चहु और तीन माल ली साइ बनाई थी।
D # - 8 -* प्रवासकुसुमावली।
अग्रेज-पराक्रम ।
....
शार्दूलविक्रीडित
पापा
प्रोसीके रणमें हटा यवनको, छोईन वाट्सन्महा,
जीते पृरख देश, हार अपना सोया नहीं जन्म हा ।।
कल्कत्ता सन ले लिया, न बदला छोडा उमी कॉल्में,
वे है धन्य सरे, परन्(हितके कर्ता सभी हालमें ।
-
उपजाति
किला बना है उम काल्हीमे,
जो "फोर्ट विल्यम्" वढके महीमें ।
विरयाति पाया पर-गज्य
हुए वहा सर्च करोड तीन ।
छीन,
७४
१ यह प्रसिद्ध युद्ध सन् १७५७ में हुआ था और इसी युद्ध के विजयने यहा अग्रेजोंके
पैर जमाये । २. शिराजुद्दौला नव्वाय । ३ यही कर्नल क्वाइन वगाल में अयेजी राज्यके
सस्थापक हुए और पीछे लाड वने । ४ यह ऐडमिरल अर्थात् सेनापति थे । ५ "ब्लाक
होल" की घटना अन तर एकही सालम । ६ अपने भाइयोंका कल्याण । ७ इस नामका
किला उही शूर लाइव्ह साइबने सन् १७५७ में बनाना आरभ किया था जो वीस
सालम पूरा हुआ आर उसे बीम राय पोट खर्च हुए अर्थात् तीन करोड । ८ शत्रुआके
राज्य । यह किला बहुतही मजबूत आर देसने टायर है
३१
प्रवासकुसुमावली।
.
मदानान्ता
धीरे धीरे चहु दिश फिरे, देशमा भाग सारा,
देखा जाके, जन वंश किये मृग धधा पसाग ।
छोटे मोटे क्लह झगडे नित्य होते तथापि,
व्यापारी हो प्रनल बनके हो गये ये प्रतापी ।।
शार्दूलविक्रीडित
तापरता
म्हेन्छोंका अति ताप था, न कहि था इन्साफ पूग भला,
थे दुसी सन लोग, धर्म रविको था अस्त होता चला ।
वैसा था अनुकूल काल इनका, विश्वेश की थी दया,
क्या होती फिर देर गज्य वढते ? विस्तार होता गया ।
विद्या, उद्यम, धैर्य, साहस, कला, वैसी मिला एकता,
लक्ष्मीको कर हस्तगा, प्रकट की सर्वत्र सत्ता मता ।
पीडा ला हमको दिया विपुलही "सायन्स"-विज्ञान-वा,
था सकेत यही दयाल विभुका होना इन्हीसे ना ॥
. हाथर्म ।
१ हाथमें लेना । • मुसल्मानोंका । ३ धर्मरूपा सूरजका । ४ लोप।
६ सर्व मान्य । ७ "Serence"-विज्ञान । ८ योग्य, ठीक । आज जगत्मरमें जो इनका
उद्योग और साहस वठा हुआ है उसका आदि कारण यही है इससे अनक अघटित बातें
वना अमेजाने सबको हैरतमें डाल स्वरया है।
३०
++ ++ प्रवासकुसुमावली।
उपजाति
स्वतंत्रता ले
परतत्रता दी,
दिनेशकोभी नहिं अस्तता दी ।।
देके उजाला
दिनरात
करे इन्हींकी वह चित्रकारी ॥
भारी,
वे आग, पानी, चपी प्रकाम
करें इन्होंके दिनरात काम ।।
क्या ईशने दे निज शक्ति सारी,
दी पचभूत-प्रेभुताऽर्थकारी ॥
७९
ร์รี
विज्ञान क्या दे न किसे महीमें ?
मूल
"विया" उसका मभीमें ।
क्या थे न ऐसे पुरुसा हमारे ?
परतु हैं, अब दीन सारे॥
.
१ स्वाधीनता । २ परवशता । ३ सूर्य । ४ छिप जाना, अस्त हो जाना । इस वक्त
अग्रेजोंके राज्यम सूर्यका अस्त नहीं होता हे-अर्थात् राज्यका इतना बड़ा विस्तार है कि
इनके राज्यके एक भागमें सूयका अस्त हो जाता है तो दूसरे भागमें साथही उसका उदय
हो जाता है । ५ फोटोग्राफी, सूर्यके किरणोंसेही अक्स आती है। ६ बिजली, विद्यत् । ७
चाहा हुआ, इच्छित । ८ वल, अधिकार । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और भाकाश इन
पच महाभूतों परकी इच्छित द्रव्यकारक प्रभुता अर्थात् सत्ता।
प्रवासकुसुमावली। . . + + +
वसन्ततिलका
उद्योग, धर्मरैति, देश-निजाभिमान,
स्वातन्य, ऐक्य, ममता, उपकार, मान ।
विद्या, क्ला, विनय, नीति, समानभाव,
डालें अटूट सब पे अपना
प्रभार ॥
।
शादूलविकोडित
ना भूलो, भटको, कहीं मत फिरो, सीसो इन्हींसे यही-
वाते, जा परदेशमें कर बडा उद्योग देसो मही।
ऐसा सुन्दर शान्त काल तुमको स्वातत्र्य पाके कभी-
आने हाथ न, राजभक्त बनके पूरो मनीपा सभी ।।
श्रीकालीजीका स्थान ।
उपजाति
ऐसा न कोई स्थल है प्रसिद्ध,
यहा पुराना इतिहास-सिद्ध ।
तथापि है स्थान वडा निचिन,
श्रीकालिकाका अतिही पवित्र ॥
८३
१ धर्मकी श्रद्धा । २ देशका और अपना अभिमान, स्वात्मभाव । ३ यूरोप आदि ।
। पृथ्वी । ५ स्थान । ६ इतिहाससे मिद्ध, प्रत्यात । ७ श्री काली माता-कलकत्तमें
प्रसिद्ध है।
20 O+ प्रवासकुसुमावली ।
वसन्ततिलका
जो विश्वधर्धाम, जननी, परिपूर्णकाम,
प्राचीन वा न कहीं उसका न धाम ।
भक्तार्थही जर कहीं अवतीर्ण होती,
होता वहा स्थल नया, भवदु स सोती ॥
वैसाहि मन्दिर यहा इसका नना है,
प्राचीन तीन शतका सुर्थरा धना
श्री कालिका शिकग इसमें रिंगजे,
है उग्रर्मूर्ति पर भक्तंटयाई छाने ।
भुजगप्रयात
ह -
हुआ कालिकासे यही कालिकाता,
बना हिन्दकी गजधानी सुहाता ।
हुआ कालिका घाट वैसा प्रसिद्ध,
सदा ठाठ भारी चहू ओर सिद्ध ॥
१ सारा जगत् है धाम-गृह जिसका वह । २ जिसकी इच्छा पूर्ण है वह, निरिन्छ ।
३ पुरातन, पुराना । ४ नया । ५ प्रकट होना, अवतार लेना । ६ मुन्दर, अच्छा । ७
कल्याण करनवाली, भला करनेवाली। ८ भयकर है मूति जिसकी वह । ९ भक्तों के लिये
दयासे भीनी हुई अर्थात् कृपाल । १० अच्छा, सुन्दर ।
प्रवासासुमापली । ....
4.A..
मारिनी
प्रथम जर हुए ये दर्शन क्षेमकोरी,
तर विनय यही थी फेर हो पुण्यकारी ।
स्मरण कर बुलाया “रामके लाल" युक्तं-
कर झट उनका वा मानसे प्रेमयुक्त ।।
मदापाता
8
आतेही में प्रथम झट ले "रामके राल" साथ,
आया माई-दरश करने जोडके खून हाय ।
भारी भीड प्रतिदिन यहा प्रेक्षकों को प्रपूर ।
तौभी माता कन रह सके पुनको देस दूर ॥
प्रार्थना ।
शालविक्राडित
हे अम्बे । करुणानिधे । सकल्की माता तुही है सरी,
भत्तोके अवार्थ तू अपतरी विज्ञानकी वैसरी ।
तू है शक्ति, सगक्त सर्व तुझसे, तेरी त्रिर्धी शक्ति है,
ऐसी तु, फिर क्यों अशक्त हम है ? पूरी न था भक्ति है ?॥ ८९
१ कुशल करनेवाले। २ योजना क्यिा हुमा । ३ चित्त । ४ पूरी, सपाखच ।५ रक्षण
करनेके लिये । ६ वाणा । ७ शातियुक्त । ८ वर्तम्, अक्त्तुम् और अन्यथा क्त्तुम्-शक्ति ।
३६
* प्रवासकुसुमावली ।
तु अम्बे मधुकैटभ-प्रमथनी, ब्रह्माति-सहौरिणी,
तू ही महिपासुरादि रिपुकी, इन्द्रौदिसत्कारिणी ।
मारे शुभ निशुभ राक्षस घने, तू रक्तबीजाशनी,
चामुडे 'शिर चड मुड रिपुके तू काट चडी धती ।।
,
तू है सर्व मतिस्थ, चक्र सम वा सारी फिराती मही,
देती तू सनको स्मृति-स्फुर्रण वा, निष्काम तू कामेहीं ।
तू आत्मोन्नतिकारिणी, प्रकृति वा माया तुही शक्ति है,
झूठा है सर कारवार जगका, तेरी सरी भक्ति है ॥
तृ पूर्णा जगमे निरिन्ठे रहती, तू जानती है सभी,
'तू देती कुछ मागती न किससे, साती न पीती कभी ।
होता मन्दिरमें अनाथ पशुका क्यो फेर सहार हा
होना जो निजका प्रशस्त, यह तो जाता रहा दर हा ।।।
१ मवु और कैटभ नामक दो राक्षसोंको मारनेवाली । २ ब्रम्हाके दु सको दूर करने
वाली । ३ नाशकरनेवाली । ४ महिपका रूप धारण करनेवाले राक्षस आदि । ५ इन्द्रादिक
देवोंका सत्कार करनेवाली। ६ जिसका रक्त भूमिपर गिरनेसे उसके सदृश राक्षस उत्पन
होनेवाले रकचीजको खानेवाली। इसके युद्धमें देवोंको बड़ा भय प्राप्त हुआ क्यों कि
इसके सहस्रों रत्तविदु भूमिपर गिरनेसे उसके सदृश सहस्रों वीर पेदा होने लगे।
पर जगजननीने उस वक ऐसी युक्ति निकाली कि उसका रक्त भूमिपर गिरने न पावे
ऊपरका ऊपरही शक्ति चाट ले-इससे यह मरा और सबका भय परास्त हुआ।
७ सबकी बुद्धिमें रहनेवाली। ८ स्मरणशक्ति। ९इच्छा, आशा । १० आत्माकी उमति-
प्रगति करनेवाली । ११ जगदुत्पादिका शक्ति, स्वभाव, तरियत । १२ निष्काम ।
प्रवासकुसुमावली । - ++
कैसा आत्मनलि प्रसिद्ध जगमे धर्मार्थ था? देशकी-
रक्षा ? तनुका त्वर्थ वलि वा हत्या न थी मेपैकी ।
थे राना-कुल वान्यं वीर सपही प्ररयात, सन्ताप हा
लेते प्राण तवॉर्थ दीन पशुके, कैसा महा पाप हा ॥
-
तहीं है गति सनकाल जगकी, सर्वत्र तू है भरी,
तू मोरी वनती, अकाल कार्ह वा तू प्लेग हो ऊभरी ।
होता आत्मलि-प्रदान अर ना-तू जान ऐसा कहीं,
लेती है स्वयमेव आत्मगलि वा जाने नहीं एकही ।।
हे वैज्ञानिक काल आज, नहिं है वैसी महा यामिनी,
जो देके बलिको निराश्रित करे पुनादि वा कामिनी ।
तू लक्ष्मी सनकी प्रधान मति है, विद्या महा मगेला,
होके तू अवतीर्ण रक्ष हमको वाणी ग्मी सगै ा ॥
१ आत्मसमर्पण, आत्मत्याग। २ अपने धमके लिये । ३ त्वत्-अर्थ तेरे कारण ।
४ भेट । ५ चित्तारके महाराना लक्ष्मणसिंहने अपना और अपने पुनाका बलिदान क्यिा
था। महाराना प्रतापसिंहने उमर भर युद्ध करके अपने राना कुलकी पविनता कायम
रक्खा था। पद्मिनी और कृष्णाकुमारीका आत्म बलिदान किसीसे छिपा नहीं है। वैसेह
अपने पातिनत्यके रक्षणाथे हजारों खिया चित्तार गढमें जल मरों-यह बातभी क्सिीसे
छिपा नहीं है । ६ वा अन्य अथवा दूसरे। ७ तव-अर्थ-तेरे कारण । ८ गम्ता उपाय ।
९ महामारी, मारनेवाली । १० अपनी आत्माका बलिदान । ११ अंधेरी रात, अधाधुधका
समय । १२ कल्याण करनेवाली । १३ सरस्वती, विद्या । १४ लक्ष्मी, धन, वैभव ।
१५ अपने साथ ।
» प्रवासकुसुमावली ।
मालिनी
बस यस । अब देवी कालिके । कालरात्री,
मत कर जगदम्बे । नाश तू लोकधानी
शरण अब हमारी एक तूही भगानी,
तव गति, मति, इच्छा, मा। किसीने न जानी ॥
शालिनी
आता था मै दर्शनोको पुकार,
ऐसी की है प्रार्थना वारवार ।
वाग्वार प्रार्थना फेर भी है,
मेरी अम्बे, रक्ष सारे सभी हैं ।
--
रामप्रेस ।
-
M
द्रुतविलम्बित
कनकसुन्दर जो मरुभौपिणी
छप रही नित थी उपकारिणी।
वहिं रहा ना मुद्रण-यत्रमें
मधुर राम सुनाम कुंतमें ॥
न
का
९८
क
।
१ देवीका एक नाम है । २ लोकजननी । ३ स भी भय-युक्त। ४ इस नामका
एक उपन्यास । ५ मारवाडी बोलनेवाली अर्थात् मारवाडा भाषाकी । ६ छापखाने में ।
७ मीटा रामका नाम है जिसका ऐसे अव्यवस्थित रामप्रेसम ।
प्रघासयुसुमावली | **
उपजाति
वहा मिली थी रघु, एक कोठठी,
रहें उसीमे सह यत्रेणा यडी।
आती सायाद समीप हो सडी,
अप्रेजहनी वह काल-कोठडी ॥
वस ततिलका
जो "राम प्रेस" गृहसस्थित गर्भ रोन,
हो आज विस्तृत जरा प्रतिबन्ध हीन ।
पापी कराल वध-कारक "लाक होल"
मानो हुआ फिर वही अवतीर्ण गोल ।।
१००
योर्श शुद्ध मरुदेशज रामलाल,
है श्रीनिवास जन एक वहा दलाल ।
है गीधके निकट काक जहा प्रधान,
होता पवित्र, अपवित्र वहा विधान ।।
१०१
१ वेदना, दुस, पीडा । २ अप्रनोंको मारनेवाली । ३ लाकहोल"। ४ घरमें ।
५ वीवमें । ६ लवा, फैला हुआ । ७ रोकटोक विनाका । ८ छापखानके मालिक ।
९ सीधेसादे । १० पक मारवाहा। ११ यह एक लाहिया उपनाम के अग्रवाल महाजन
है। रामलालजी इहींकी सलाहसे चलते थे। यद्यपि वे परे मारवादी हैं तो भी इनके
आगे उनका कुछ नहीं चलता था।
४०
प्रवासकुसुमावली । गकी दुर्दशा। r लुवा बाजार गुल्जार चा, पनता कामीजनोंको रेवा ॥ क्ति तव है, कैसी स्त्रिया ला धरी, नस उन्हें वेश्या बनाके सरी ।। गमे कीर्ति कैसी खिली है ? जो सती हो जली है। जके, कार्मेलीला विचित्र, कर रहीं ? हो गया कॉल चित्रं ॥ ॥ १०९ [ दोप उनका, दोपी हमी लेक हैं, ह, उनको हा । वेचते शोक है ।।। +a- पालोको, न्यभिचारियोंको। २ योग्य, यक नो पतिको प्यारा माननेपाली ४ जिन । ७ छोटी कन्याके साथ 10 कन्याविषय। ४३
प्रयासपुसुमावली । क १ . * ?*
शालिनी
पोल्टोलो, रायाजार-दोरे,
मोर्मो, श्याम प्रान्त, यागान चोर ।
मुंगीहट्टा हाट, याजार गर्धा,
देये सारे छोटके एक आया ।
मालिनी
सिदिरेपुर, भनौनी, कालिया घाट-भाग,
अलिपुर पथ वैसा देसने योग्य नाग ।
तट-पथ यहु लमा रम्य गगा नदीमा,
नव पथ बडेका, सल्किया मार्ग नीरा ॥
मदाकाता
तूलापट्टी लघु पथ जहा मारवाडी प्रधान,
चौरस्ता है सर शहरमें रयात सट्टानिधान ।
छोटासा है यहिं पर वही गमका छापसाना,
देवेच्छासे यहिं हम रहें-हाल जाता लिसा ना ।।
१०७
१,२ राजमागके नाम । ३ आसरी भाग । ४ शोभा यातार । ५ श्याम बाजारका
मध्य भाग । ६ चोर वागान । ७ एक वाजार । ८ राधा बाजार । ९ शहरके
बाहरका एक रस्ता । १० भवानीपुर । ११ काली माताके निकटके घाटका भाग
१२ गगा किनारेका माग । १३ गगापारका एक मार्ग। १४ छोटी गली।
प्रवासकुसुमावली।
स्त्रियोंकी दुर्दशा।
शार्दूलविक्रीडित
वैसा है निकट प्रसिद्ध महुवा बाजार गुल्जार वा,
सायकाल जहा सुदृश्य बनता कामीजनोंको रेवा ।।
हाहा
। देव । विचित्र शक्ति तव है, कैसी स्त्रिया ला धरी,
ना दीसा जिनका कहीं नस उन्हें वेश्या बनाके सरी ॥॥ १०८
मन्दाक्राता
हिन्दू स्त्रीको सकल जगमें कीर्ति कैसी सिली है ?
भर्तृप्राणा विरहभयसे जो सती हो जली है ।।
वेही प्यारा स्वपति तजके, कार्मेलीला निचित्र,
हा धिक् । कैसी अब कर रहीं ? हो गया कॉल चिर्न ॥ ॥ १०९
शार्दूलविक्रीडित
वे दोपी नहि है, न दोप उनका, दोपी हमी लोक हैं,
बेजोडौं करते विवाह, उनको हा । वेचते शोक है ॥
-
१त्रियोंकी इच्छा रखने वालेको, व्यभिचारियोंको। २ योग्य, ठीक ।
३ पति है
प्राग जिनका अर्थात् प्राणसे भी पतिको प्यारा माननेवाली । ४ कामदेवकी नीडा-
व्यभिचार । ५ समय । ६ अजब । ७ छोटी कन्या साथ बूढेका और बड़ी कन्याके
साथ छोटे वरका, अनमेल 1 ८ कन्याविन्य।
प्रवासयुसुमावली ।
देते त्रास बना गुलाम, कुछ भी विद्या पढाते नहीं,
लनाहीन बुग मना न करते अश्लील गाना कहीं ॥
उपजाति
सेठानियोंके पगमें रगाती,
जो मेहदी, गीत अभंद्र गाती ।
पुरोहितानी, उनका कुसग,
करे न पैसा फिर नीति-भग १॥
१११
-
-
जो देवहूति प्रभृति स्त्रिया थी,
पविन कैसी उनकी क्रिया थी।
ये हो उन्हींकी कुल्फैन्यका हा ।
धधा करें गर्हित कर्मका हा
॥
११२
--
रसोइया ब्राह्मण ग्रॉल सिद्ध,
"गोपाललीला" जिनकी प्रसिद्ध ।।
सेठानियोंके निज कारभारी,
ये ही बने हैं कर कार भारी ॥
-
।
१ ग्राग्य, गालिया, सीटने। २ चुरे, भद्द । ३ नीतिका भग अथात् बुरे काममें
प्रवृत्त होना। ४ कपिल महा मुनिकी माता जो विदुषी और ब्रह्मनिष्ठ थी। ५ कुलमें
उत्पन्न हुइ हुइ कन्या । ६ नीच । ७ घरमें काम करने वाला मज्दुर, गहिया, मुटिया ।
पृष्ण समान श्रीडा।
? ++ ++ प्रवासकुसुमावली ।
कुसगसे भ्रष्ट बने विचारी,
अज्ञान ये तो अपलो विचारी ।
समीप जो हो, लिपटे लतो सी,
स्वधर्म सोती वन पापरासी ॥
वसन्ततिलका
सोते नहीं हम कभी व्रत एकपत्नी,
होते बुरी न करने इनको प्रयत्नी ।
प्रेमभाव रसते समभार वैसा,
बाजार आज इनका रगता न ऐमा ॥
११५
दासी, गुलाम, बर्टकी नहि है हमारी,
अधांगिनी नर-सनि प्रिय मित्र नारी ।
पूजार्ह नित्य कहते स्मृति-शास्त्रकार,
माना न हा तन हुआ उलटा प्रकार
1
१ विचारवान, ज्ञाना । २ बलहीन, विचारहीन । ३ बेलके समान । ४ पापकी
भागिनी । ५ अपनी विवाहिता स्त्रीके सिवा अय स्त्रीको माता समान समझना ऐसा ।
६ प्रयत्नवान्, उपाय करनेवाले । ७ प्रेमका प्रताप । ८ लौंडी। ९ स्त्री पुरुषका आधा
अग माना गया है इस लिये उसे " अागिनी" कहते हैं । १० नरकी सान-" नारी
निन्दा मत करो, नारी नरकी खान ॥ तिस नारीसे ऊपजे, ध्रुव प्रल्हाद समान
११ पूजा-अह-पूजाक-सत्कारके योग्य, “यन नार्यस्तु पूज्यन्त रमते तत्र दवता ।
यतास्तु न पूज्यन्ते सवास्तनाऽफला क्रिया ॥" जहा स्त्रियोंका सत्कार होता है वहा
देवता रममाण होत हे । जहां इनका सत्कार नहीं होता वहा सब क्रिया निष्पल
होती है-इत्यादि स्मृतिकारोंने बहुत लिखा है। १२ स्मृति और शास्त्रको बनानेवाले ।
"
प्रवासयुसुमावला !
होता चला प्रतिदिन भय शुद्धे वीज,
हा । देश है इस लिये कुलभी न चीज ।।
जाता रहा स्वकुल-देश-निजाभिमान,
हा । हन्त । धर्म न रहा, धन, धान्य, मान ।।
दक्षिणोत्तर भाग।
११७
स्रग्धरा
8
देसे वाजार सारे, फिरकर सगरे भाग दोनों निहारे,
गोरो है दःणीय, प्रतिकृति नव है, मार्ग है स्वच्छ सारे ।
काला है उत्तरीय प्रति पथ गृह वा कॉल का कालराज ।
गोरा काला समान क्षण न बन सके पूर्ण सिद्वान्त आज ॥ ११८
दक्षिण भाग।
शालविक्रीडित
भाग दक्षिण भागमें सलपरी अप्रेज बाजारकी,
चाहा माल कमाल, एक दर, ना मीमा सरीदारकी ।
-
१ निखालस, ये मिला हुवा । २ अपने कुल्का, देशका और अपना अभिमान ।
सफेद, शुभ्र, यहा बहुधा अग्रेज लोग रहते हैं । ४ दक्षिण भाग । ५ चिन,
टो, प्रतिमा । ६ उत्तर भाग । ७ वाला, यम, समय । ८ कालका राजा अर्थात्
- मैला, खराव । ९ बहुत घटिया । १० माल सरीदने वालोंकी ।
४६
+ ++ प्रवासकुसुमावली ।
व्यापार स्वयमेव मूर्त सरको मानो दिसाता यहा,
कैसा है अपना प्रभाव जगमें, वर्चस्व सत्ता महा
१
॥
मालिनी
अति रुचिर किये हैं “पार्क से मार्ग-भाग,
पर विशद सभीसे "ईडन" श्रेष्ठ वाग
समय समय वाजे "प्रेण्डे" एकत्र होते-
सकल, तरुलता की सा हवा ताप सोते ॥
१२०
पद पद रिजलीकी गेशनी हो नितान्त,
अति सुसद यहाका रम्य होता दिनान्त ।
पवन सुरभि टेके ग्रीष्म-सन्तोप-हारी,
श्रम सर हर लेता, शान्त गगविहारी ॥
१२१
शार्दूलविक्रीडित
कैसा रम्य पदार्थ सप्रहनोहे ? प्राचीन वैसी नई,
चीजें ला विविधा असरय जिसमे सर्वत्र रक्सी गई ।
१ मुर्तिमान, प्रत्यक्ष १२ बडप्पन, श्रेष्ठता । ३ रस्तमेंके छोटे छोटे बैठकी बगीचे।
* इस नामका एक पाग। ५ अग्रेजी बाजा । ६ शाह और बेल । ७ सायकल
८ मुगध । ९ धूपकालका ताप हरनेवाला । १. गगाके जल्पर फिरा हुआ । १५
जहा नाना प्रकारकी वस्तुओंका संग्रह है वह, “म्यूपियम" अजायब घर । १२
नानाप्रकारकी।
प्रवासयुसुमावली | 2 + ++
होती है मति मुग्ध देस रचना प्रत्येक ही भौगकी,
आती याद विचित्र लुप्ते अपने साम्राज्यके भागेगी ।
१२२
भदाकाता
क्या क्या देखें? अगणित यहा रम्य चीजें हमारी,
देसी सासी कर्ल कुशलता स्मारकप्राप्त सारी ।
होता भारी पुरण करने वस्तुसंग्राह्य देश,
था भी वैसा, पर अब नहीं शिल्पैविद्या-प्रवेश ।।
१२३
स्रग्धरा
वागीचा श्वापदाका विविध तरुलता-पूर्ण सौदर्यरासी,
भालूसिंहादि वन्य प्रनल पशु जहा देशदेशान्तवासी ।
नाना पक्षी मृगादि, स्थलजलचर है सँपभी उप्र भारी,
अत्यन्त प्रेषणीयाकृति पंथ जिसके देश्य आश्चर्यकारी ॥
१२४
१ मोहित, स्तब्ध । २ वस्तुसप्रहके स्थानके भाग। ३ लोपा हुआ, नामशेष । ४ सार्व
भौम राज्य । ५ दव, नसीव । ६ यत्र । ७ कारीगिरी। ८ यादगार, स्मरणरने योग्य ।
जोश । १० पदार्थाका सग्रह जिसमें होना योग्य ऐसा। ११ कल, कुशलता, कारी
गरी इत्यादि विद्याका प्रवेश । १२ हिंसक पगु । १३ थाड वेलसे भरा हुआ। १४ रीछ,
सिंह आदि। १५ पनमें रहने वाले। १६ देश देशान्तरके । १७ पृथ्वी और जल्में रहन
वाले। १८ एक विभागमें नाना प्रकारके सप ररुपे हुए हैं। १९ दसनेके योग्य है रच
ना जिसकी। २० मार्ग। २१ देसाव, नि सशय यह अलापुरका वर्गाचा देसने योग्य है।
(+ + ++ प्रवासकुसुमावली ।
मालिनी
अनुपम डलहौसी-स्केअर-प्रान्त-भाग,
सग्कल पथ, वैसे लटके हर्म्य चाग ।
अगणित गृह, वाडी, राजकार्यालयादि,
रुचिरतर घने है गजलक्ष्मीप्रसादी ॥
१२५
चपल चपल विद्युत् तार-गामी बनाके,
सर जगह चलाई "ट्रोम" पसा सिंचाके।
विधुसम उजियाला स्वच्छ जिस्से कराया,
अघटित घटना की, खून विज्ञान पाया ॥
१२६
शार्दूलविक्रीडित
विद्युद्यद्यपि की रसोयनगता, वा तारमं ला भरी,
गाडी यत्र चला पदार्थगत की तौभी स्वतनों सरी ।
-
१ डलहौसी स्वेअर नामक रस्तेश मध्यभाग। २ बडे बडे रस्तोंमें सरकल
कये गये हैं वे सरक्ल रोड कहलाते है । ३ गवरनर जनरलके। ४ राजमहल । ५
चहरिया, न्यायालयादि। ६ अतिशय सुन्दर । राजलक्ष्माका प्रसाद है जिसम । ८ वि
ली। ९ तारमें चलनेवाली । १० विजलीसे चलनेवाली ट्राम गाडी। ११ चद्रमाके
मान ! १२ विद्युत्-यदि-अपि-जो कि विजला । १३ रसायन नियाम। १४ पदार्थमें।
५ स्वच्छद, स्वाधीन ।
४
४९
बे
प्रवासकुसुमावली। ,
होती वक्र कभी, न काम करती, या स्पर्शसे मारती,
तेजस्वी व्यसनौत हो न उसकी जाती छिपाई ती ॥
१२७
शिखरिणी
अहा | गगाधारा नगर रिच कैसी यह रही ?
वडी छोटी लेके तरणि-सैसिया साथ सनही ।
चली मान वेशा जलधिनिक्ट क्लेश-हरणी,
अकेली ना सोहे पति विन कभी दृर ग्मणी ॥
१२८
भुजगप्रयात
बधे हैं किनारे कहीं खुर घाट,
लगा प्रेयकोंका जहा ठाटवाट ।
हजारों करें स्नान आके प्रभात,
करें देवपूजा सभी भात भात ॥
१२९
भालिनी
हर हर | पर देसा खिजनोंका नहाना-
पुरुपनिकरके हो बीच, रजा वहाना ।
१ टेढी । २ छुनेसे । ३ व्यसन-आत-सकटसे दुखी । ४ तेज, प्रभाव । ५ जहाज,
भागयोट मानो जिसकी सखिया है उनको। ६ मानरे आवेशसे अयान वेगसे । ७ समुद्रके
नजदीक । ८ पुरुषका समुदाय, आदमियानी भीड।
प्रवासकुसुमावली। गतहदय यहाके लोक कैसे ? न घाट- अलग कर न्हुलाते, वा बना अन्य बाट । सग्धरा छोटी मोटी घनेरी लघुगति चपला आगगोटें सुहाती, आती जाती हिलाती सत्र जल, ल्हॅरी तीर पै ला बहाती । होता है भारभोंटा तब बहु हिलती, खूर सीटी वजाती, ऐसी है धूमधाम प्रतिदिन इनकी, तीर भारी सजाती ।। १३१ शालिनी यानी भाडा नाविकोंसे जचाते, डोंगेवाले धूम भारी मचाते । गगाजीका मध्य-धारा-विहार, देता शान्ति, श्रेष्ठ पुण्योपैहार ॥ १३२ शार्दनविकीडित दोनों तीर भरी हुई लहलहा गगा चरी जोरसे, मीलें, यन, गृहादि याग तट पै सोहें चह औरसे । १ हृदयशून्य, विचारहीन । २ धारे चलनेवाली । ३ अच्छी देख परती । ४ पानीका तरग। ५ समुद्रके पानीका चयव उतार । ६ नाव चरानेवाले । ५ पुण्यकी भेंट ।
प्रयासकुसुमावली । ...
कैसा दृश्य मनोहर प्रकृतिका तीरस्थ लमा बना ?
मानो पक्ति रची सुदृष्टिथके सोपानकी शोभना ॥
१३
मालिनी
पुल नहिं हबडेका, बाहु मानो धराने,
अति ललित पसारा, मेल पूरा कराने ।
उभय तटनिवासी त्रास कोई न पाने,
हिलामल अपनी वे नित्य मैत्री वढावें ॥
पृथ्वी
अनन्तपय सुन्दर प्रभुपदान्ज मानो यहा,
धरा सकल नापके निपथगागत क्लेशही ।
हुआ पुल वही,सिंचा प्रकृति अस वा पादका,
तभी चरणों वही पदतले पविनोदका ।।
१३
१ स्वाभाविक कारीगरी, निसगरचना । २ तीरपरका । ३ कतार । ४ अच्छी टिका
पाग । ५ जीना, सीटी। ६ मुदर । ७ जिसमा अत नहीं यह आकाश उसका माग
८ ईश्वरका पदकमल, यह वामनावतारकै पदया वणन है, जिसने बटुक पन बलिसे त्रिपाट
भूमि मांगी थी पर दोही पादमें सब भूमिका आरमण करके तीसरा पाद बलिके सिरपर
घरके उसको रसातल पहुचाया। ९ पृया। १० भागीरथीमें 1 ११ दुस दूर करनेवाला
१. स्वाभाविक रचना । १३ फोटो । १४ गगा, भगवान् विष्णुके चरणसे निस्ली है।
१. पेरक नीच। १६ युद्ध है जल जिसका।
- प्रवासकुसुमावली ।
मन्दाक्रान्ता
गगा धारा लधु, पर वडा द्वार न्यौपारका है,
आने जाने सुगम बहुधा मार्ग यूरोपका है ।
वैसाही है उभय तटका जोड, सन्मार्गकारी,
भारी लगा, तरैल बडा-सेतु चित्तापहारी ॥
उत्तर भाग।
शादूलविक्रीडित
काढा है नव मार्ग हारिसनका सीधा यहींसे भला-
लया, विस्तृत स्यालदातक जहा विद्युप्रभा निर्मला ।
है बाजार वडा विशाल वसती काले जनोंकी यहीं,
काला है सब कारवार यहिका गोर्रत्व है ना कहीं ॥
मदानान्ता
मैला कूडा सर कहिं पड़ा पूतिगध-प्रयुक्त,
काली काली मलिन गलिया, मार्ग है कीचयुक्त ।
होती वैसी ठठ बहुत ही मालकी गाडियोंकी,
सोटी होती गमन रकके मार्गगामी जनोंकी ।।
१मार्ग । २ अच्छा रस्ता करनेवाला । ३ हिलनेवाला, हलका। ४ यह एक रेशनका
मार्ग है। विजली की रोशनी । ६ गोरापन । ७ दुर्गन्ध, यदवू ।
।
प्रवासकुसुमायली। ...
शादूलविशीडित
झाइ ना फिरता घरावर जहा, ग्ते कहीं साफ ना,
होती है घरसात, कीच उडके पोपाक होती फना।
पानी ना वहता, वहीं सडकमें होता इक्ट्ठा सदा,
रस्ता हो जलपूर्ण "ट्राम" रुकती । कैसी गति त्रासदा ॥ १३९
मालिनी
पदथ नहिं पूरे, धूम है गाडियोंकी,
अति कठिन दशा है पादचारी जनोंकी ।
अलग अलग कोई है न बाजार एक,
कहिं कुछ कहिं कैसा मित्र है एकमेक ॥
१४०
स्रग्धरा
वे राजा मारवाडी यहि पर रहते, फाटका वा दलाली,
अग्रेजोंकी सदाही कर बहु धनवान् जो हुए भाग्यशाली ।
१ खराब । २ पानांसे भरा हुआ । ३ नास देनेवाली । ४ पगरस्ते "FOOTPATA"
५ पाव चलनेवाले । ६ मिले हुए। ७ सन १९०४ जनवरीमें मारवाडी एसोसिएशनका
वार्षिकोत्सव हुआ था, उस वक्त अपनी वक्तृतामें बाबू दुल्हीच दने "क्लात्तेके मारवानी
राजा है ऐसा कहा था-उसका यहा अनुलक्ष्य है। ८ भाग्यवान् ।
+ प्रवासकुसुमावली । लोडी, गाड़ी, बगीचा रस, अब वहुधा सीखके सभ्य चाल, चश्माबूटादिधारी, चुरुदमुख, बडे हो गये सेठ लाल ।।१४१ मन्दाक्रान्ता । भोले भाले सरल मतिके पूर्वजोकी सुचाल- छोडी, भूलें सुपथ उनका, हो गया गोलमाल ।। सीधा वैसा अन नहिं रहा, हो चला वक्र काल, विद्याही है इस समयमे सर्वदात्री विशाल ॥ १४२ ASA शार्दूलविक्रीडित भारी सर्च वढा, कुरीतिपथसे लक्ष्मी गमाई सदा, कन्या पुत्र पढा न शिक्षित किये, न स्वोन्नति श्रीदा। सम्बन्धकम, भूपर्णादि विधि वा, कैसी विवाह-प्रथा- हो ली अद्भुत ? नाशकारक तथा मृत्युक्रियाकी कथा ॥ १४३ १ छोटी राड़ी, बडी राड़ी और प्यारी लाही । २ सय कुछ देनेवाली । ३ अपनी उमति-सुधार । ४ लक्ष्मी देनेवाली, धन बढानेवाली । ५ सगाईका तरीका। ६ सगाई विवाहके वक्त जेवर इत्यादिकोंकी विधि । ७ विवाह की रीत । ८ मृतकवाद, मौसर । मारवाडी जातिने सगाई, विवाह और मृत्यु क्रियामें इतनी फजूल राची घडा रक्सी है जिससे क्तिनेही तयाद हो गये, दीवालिये बन गये और वरवाद हो गये तो मी-अफ सोस ह-इस कुरीतिको नहीं छोडते !! "
प्रयासयुसुमायली। क? --*
मालिनी
उपनयन-कया था ब्रह्मचर्यादि भूल,
पर यहु गिगु-वृद्धोद्वाह की सूत्र भूलें।
निज पिपशु-रक्षा धर्म वाणिज्य छोडा,
स्वकुलपय निसार, भ्रान्त हो पाप जोडा॥
विरारिणी
"इय गेहे लक्ष्मी " कविवचन ये भूल, अब हा
लिया की है दासी विगतभय, लज्जा सर वहा ।
सिखाई ना विद्या, गृह उचित वा शिक्षण दिया,
पतिप्रीतिश्रद्धो रहि न कुल भी सर किया ॥
1
१ जनेऊ, मौजीवधन । २ वीस वर्षतक पूरा ब्रह्मचर्य रखकर विद्याभ्यास पूर्ण होनक
अन तर विवाह करना इत्यादि । ३ वाल और वृद्ध विवाह । ४ गफलतें । ५ " कृषिगो-
रक्ष्यवाणिज्य वैदयकर्म स्वभावजम् " अर्थात् खेती, गौका पालन और न्यौपार ये वैदयोंके
स्वाभाविक र्म है-वे खेती और गोपालन। ६ न्यौपार । ७ पूर्जीका माग, अपने
कुलका रस्ता। ८ भ्रान्तिगत हो । ९ "यह घरमें लक्ष्मी है" भवभूतिने उत्तररामच
रितमें यह पद्य लिसा है-" इय गेहे लक्ष्मीरियममृतवर्तिनयनयोरसावस्या स्पर्शो वपुषि
यहलश्चन्दनरस ॥ अय क्ण्ठे बाहु शिशिरमसृणो मौक्तिक्सर किमस्या न प्रेयो यदि
पुनरसह्यो न विरह । १० जिनका भय जाता रहा है ऐसी। ११ पतिमें प्रेम और
श्रद्धा । १२ मिश्रीकरण, वर्णभ्रष्टता, गोताम कहा है-"श्रीषु दुष्टासु वाष्णय जायते
वर्णसकर । सरो नरकायैव कुलभाना कुलस्यच "॥ अर्थात् खाजाति बिगड जाने
सेही वर्णसकर ोता है।
।
"
* प्रवासकुसुमावली । इन्द्रवजा गाती फिरे गीत गली गली हा अश्लील वाणी मुससे चली हा पेटी यह जान न मार्ग जाती, होते खुशी छेड उसे स्वजाति ।। १४६ वसन्ततिलका जो गा सके न कुलटो अपशन्द नीच- गाती पिता स्वजन वन्धु समाज बीच ।। होते प्रसन्न सुनके, उलटे मजाक- हा हा ! करें सब, कहा फिर लाज धाक ? ॥ शार्दूलविक्रिडित देसे हैं सब "हाय हाय" करते श्रीमान्दरिद्री तथा, पैसा हाय बना" स्वधर्म कुलके उद्धारकी ना कथा 11 विद्या, देशसुधार याद इनको आवे क्हासे भला ? सारा विश्व जहा "स्वाम" जिनको मईकसा एफ्ला ।। १ मारवाडी । २ वेश्या, व्यभिचारिणी । ३ अपना घर ४ मेंडक जैसा-"कूपमडूक- भयान मडकको अपना खुवाही सारा जगत् होता है । " याय ५७
प्रवासकुसुमावली।
हरिणी
हर हर । तभी होना है "शायलाफ" समान ही,
विदित इनका भारी, न्यौपार पूँढ छिपा नहीं ।
निज पर न जाने वा, पैसे बिना पहिचान ही,
मनुज धनके वास्ते, क्या क्या अहा करता नहीं ? ॥
१४९
वसततिखका
खर्च हजार लगता जब एक पैसा,
वैसे हजार लगते तन दे न पैसा ।।
छोडे न बन्धु सुतको कमि एक पैसा,
देते पर प्रलको प्रिय सर्व पैसा ॥
इद्रवज्रा
है ऊद साहक शी गामी,
है वाजरा अन्न कठोर नामी ।
है चर्म-पानी मरु देश वैसा,
होता सदा अकुर वीज जैसा ॥
१ यह एक यहुदी इतना दुष्ट व्याजसोरा था कि जिसने रुपयेके बदले में एटोनियोकेशरी
रका माप्त काट लेनेमें वेहद्द निदयता दिसाई था । २ कपट । ३ जबरदस्त । ४ ले जाने-
वाला वाहन । ५ जल्द चल्नेवाला । ६ चमड़ेका पानी ७ । मारवाड, निजलप्रदेश
* प्रवासकुसुमावली।
शार्दूलविक्रीडित
देके नाम असोसिएशन"सभा, कामर्स" की "चेम्बर",
सोली वैश्यसभा यहा, यहु हुए उत्साहसे मेम्बर ।
वैसी शुद्ध-पदार्थ-विक्रयकरी दूकान एकाध वा,
गोगाला, विधवासहायक खुली फडप्रथा भी नवा ॥
वसततिल्का
विद्यालय प्रवर सोल किया घनेरा-
विद्या-प्रचार, तन भी न मिटा अधेरा ।
चन्दा किया प्रबल साहससे इकठ्ठा,
तौभी परस्पर मिटी न समाजठठ्ठा । ॥
१५३
शादूलविक्रीडित
?
क्या होता ? जब लो सुधार घरका होने न आदर्श हो,
क्या भारी पडता प्रभाव किस पे सम्पूर्ण संदर्श हो ।
विद्यासन्मतिहीनको न मिलते सत्कीर्ति सन्मान ही,
जन्मा है वहि जो "कुलोन्नत करे" वैसा न-जन्मा नहीं ।। १५४
१ मारवाडी एसोसिएशन । २ "चम्बर आफ कामर्स' । ३ शुद्ध पदाथ बेचनेवाली।
४ पीजरापोल, गाय पालनेकी जगह । ५ विधवाओंकी सहायता करनेवाली । ६ नई,
अच्छी । ७ मारवाडियोंका विशुद्धानन्दविद्यालय । ८ विद्या पढाना । ९ दपणस्वरूप, प्रति
बिम्वरूप, स मार्गगामी । १० उत्तम दीखनेवाला । ११ कुलको ऊचा करना श्रेष्ट करना।
प्रवासकुसुमावली।
-
होली का जलसा विचित्र इनका देसा यहा, देव हा
होता है फिरना अगस्य पथमें, लजादि देते वहा ।।
मिट्टी धूल उडा विनोद करते अश्लील बात सुना,
फेंके पाग,करे सगन कपडे-सन्मार्ग कैसा चुनी ॥
वसततिलका
माता पिता वहिन बान्धव को न माने,
रस्ते चली युतिको फिर कौन जाने ।
टटा पिसाद करते पैरको मि छेड ।
हाहा । अदालत करे इनकी निवेड ॥
१५६
भुजगप्रयात
1
जहा रोशनीमा नया ठाटवाट,
वहा मारवाडी गये भूल बाट
मिली सभ्यता ना, न की देश सेवा,
क्येि दोघेडे वा, ल्डे बन्धुसे वा। ॥
१५७
दिसाया कभी ना कहीं प्रेमभाव,
नहीं मित्रता मेल, रूसा स्वभाव ।
न की बात प्यारी, न सची किसीसे,
रिझाया न जी साथियोंका खुशीसे ॥
१५८
१ स्वीकार करना या दूसरी जातके लोगो भी । मुधारा ५ जातके दो दल।
६.
* ++ प्रवासकुसुमावली ।
इन्द्रवना
"ऐड्रेसे"
" लेके तुमको कहा था-
क्या लाटने ? गौरव क्या रहा था
भूले न होंगे? घरका सुधार,
क्या क्या किया ले फिससे उधार
१५९
सरधरा
राजा होता वही जो सन जन अपने हाथमें ले चलाता,
माने आज्ञा जिसीकी सब, सन जनको नीतिगामी बनाता।
आज्ञा माने न कोई, घर तक जिनका अल्पही शन्द जाके,
कैसे राजा बने है ? हर हर जन ये मारवाडी प्रजाके । ॥ १६०
शार्दूलविक्रीडित
सत्ता है प्रभुकी अगोंध, उसकी जाने न कोई का,
क्या था देश महा वली ? अब वही कैसा हुआ वेकला।
चारो वर्ण समान-भाव, अतुला थी धर्मश्रद्धा तथा-
स्वार्थत्याग, परोपकार जिनका कैसा सुविख्यात था।
१ मानपत्र-बगालके श्रीमान् छाटे लाटको मारवाड़ी एसोसिएशनका तरफमे
दिया गया था। २ समान । ३ नीतिसे चल्नेवाले । ४ छोटासाभी । ५ गहरी, दुर्भाय ।
६ विभूति, सामथ्य । ७ अपने अर्थका त्याग । ८ बहुत प्ररयात, बड़ा मशहूर ।
प्रवासयुसुमायली । क. अजगप्रयात रेगा वही इंश होके प्रसन्न, पभी ना कभी देशो सोपपन्न । अभी ज्ञान होता चरा एफ्तारा, चदेगी यभी धर्मी भी पतारा ॥ वगाली साहित्य । रुग्धरा + जाना अगालियोंका कुछ पुन्छ लिसना, भाषणादि प्रकार, वैसे प्रन्यादि देने, फुछ पुन्छ उनका जान साहित्य-सार । विशा भाषा उन्होंकी सरस बहुतही, श्रेष्ठ देशभिमान- पूरा पूरा भरा है, विनय नय सदा प्रेम-भावप्रधान ॥ १६३ पृश्या नवीन पथ धर्मका रच समाज सोसाइटी, सुधार अपना किया स्वकुल्की अविद्या हदी। कमाल निज काजमें बहुत को सुधासार ही, प्रबन्ध कविता रची, युवतिमूढता ना रही। १ क्लादिकोंसे युक । २ काम्यादि साहित्यका सार । ३ प्रेमका भाव है मुख्य जिसमें । ४ ब्रह्मो समाज । ५ सभा, परिपत् । ६ अज्ञान, अधेरा । ७ भमृतका सार। ८ खियोंकी मूदता ।
प्रवासकुसुमावली।
इवमा
साहित्य-भाडार अटूट भारी,
है ग्रन्थकी कुरैशील नारी ।
है लोक सशोधक सत्स्वभाव,
वगाल-भू है प्रेथित-प्रभाव ॥
हिन्दी भापा।
मालिनी
इस समय यहा है हिन्दिके पत्र तीन,
सुमति, कुमति-वासी, मित्र-वार्ता नवीन ।
अति विशद पुगनी हिन्दी राजधानी,
शिशुमति पर हिन्दी, मातृभापी अजानी ॥
भुजगप्रयात
बनेगी यही राष्ट्रभाषा प्रधान,
वही नागरी वर्णमाला निधान ।
नहीं लक्ष्य जाता इन्हीं पे हमारा,
इसीसे हुआ है वृथा जन्म साग ।
१ साहित्यका खजाना । २ पथ रचने वाली । ३ पुष्वती, शालवती ।
४ खोज करनेशले । ५ प्रसिद्ध है प्रभाव जिसका । ६ हिंदी बगवासी पन । ७ भारत
मिन पन । ८ हितवाती पन । ९ बालकवुद्धि । १० देशव्यापी भाषा ।
प्रवासफुसुमावली।
मन्दानाता
फैसी भाषा सरल मधुरा आज हिन्दी हमारी,
सद्बोधों है प्रकृतविपया पूर्ण देशोपकारी ।
भाषा ही है सकल जगमे सर्वदा सन्निधान,
होती ना तो कर न सक्ते भावना हृद्विर्धान ।।
इवत्रा
भापैक्य होता निज राष्ट्रकारी,
युरोप दृष्टान्त मतेक-धारी ।
भापैक्यकी है लिपि एक नीव,
होता इन्हींसे सुकृतार्थ जीन ॥
वसन्ततिलका
कर्तव्य है परम आज यही हमाग,
भार्फतार्थ करना लिपिका सुधारा ।
भाषा प्रधान, सर एक लिपिस्थ होना,
होगा यही सकल-भिन्न-विचार-सोना।
१ अच्छा बोध देनेवाली अर्थात् शीघ्र समयमें आनेवाली । २ अधिकृत
विषया-जिसमें हर कोई विषय ठीक दिखा जाता है वह । ३ चित्तकी भावना-
स्यालात । ४ हदयके उद्गार । ५ भाषाका एक्ता। ६ राज्य करनेवाला ।
७ एकमत धारण करनवाला । ८ एक भाषा हानेके लिये ।९ वर्णमाला ।
क + + + प्रवासकुसुमावली ।
सम्पादक-प्रवरका यह मुख्य काम,
जो हैं समर्थ करने परिपूर्ण काम ।
हा सेद । देस उनका वह बुद्धि-फेर,
आशा वृथा, समयका यह हेरफेर।।
वैश्योपकारक।
वसततिलका।
जो अप्रवाल उपकारक जाति-पर्ने,
था एक ही कुपथ तापहरातपत्र ।
जिस्को स्वाति अजमेर सभा चलाती-
थी जो सुमार्ग चलना सरको सिसाती।
१७२
शादूलविक्रीडित
हो ली थी जन " गम प्रेस" गृहकी थोडी व्यवस्था नवा,
लेके पत्रं यहा प्रसिद्ध करना-ऐसा हुआ ध्यान वा।
वैश्योंका उपकारक प्रिय किया, चित्रादिकोंसे सजा,
मैं सम्पादक, गमलाल उसके स्वामी वने बेजा ।।
१ अच्छ सपादकोंका । २इच्छा, आशा
नामका एक पन।
४ मारवाटियोंका । ५ कुरातिका ताप निवारण करनेवाला छन । ६ अग्रवाल सभा ।
७ तजवाज, तरद । ८ अग्रवाल-उपकारक । ९ वैश्योपकारक ।
प्रयाससुमापली । . . * १ + +
भुजंगप्रयात
परा तीन ही मास सोत्माइ भारी,
हटे "गमरे राल" हो थेरारी ।
उसीसे हुआ छोड देना, अगाडी-
पिसीके हुए हैं कभी मारवाही ? ।।
१७४
वसन्ततिला
थे मिश्र वैश्य-गुरु "माधने प्रमाद"
सम्पान्य प्रिय "सुदर्शन" माधु-या।
दे हाथ पर इनके ठहरा चलाना,
तौभी यथासमय ठीक कभी चला ना ॥
१७५
हिन्दी साहित्यसभा।
साहित्यकी कर यहा कुछ भी न चचा,
पर्चा निकाल क्सिने कामे की न चर्चा ।
हिन्दी धनी अशरणा, कनिता अजान,
उद्धार पूर्ण इनका किसने क्यिा न ॥
1
१ मारवाडियाफ गुरु । २ भिवानीनिवासी श्री माधवप्रसाद मिश्र ।३ जिनका
भाषण था कीर्ति अच्छी है वे । ४ सेवा । ५ आययहान, निराधार ।
ल** प्रवासकुसुमावली ।
मालिनी
पर इधर बनी थी भावना मिश्रजीकी,
अतिशय शुभ चर्चा हिन्दि साहित्यकी की।
सब सुजन बुलाके स्थापना की सभीकी,
झट नियम बनाके यत्नकी पूर्णता की ।
१७७
भुजगप्रयात
सभाध्यक्ष लाला हुए फूलचन्द,
हुए कार्यकारी, बने सभ्य चन्द ।
विनेा हुए रूडमल्ल प्रयुक्त,
व्यवस्थाधिकारी हुआ मैं नियुक्त ।
प्रयाणा
मालिनी
अब अधिक नहीं था अन्नपानी यहाका,
स्थिर हदय नहीं था, काल था खूब वाका ।
झट घर चलनेकी सिद्धता पूर्ण हो ली,
सहदय सुजनोंके प्रेमकी गाठ सोली ॥
१ माववप्रसाद मिश्र । २ हिन्दी साहित्यसभा । ३ "प्रेसिडेट" सभापति ।
४ लाला फूलच द हलवासिया। ५ सभासद, मेम्बर । ६ चलानेवाले, अग्रसर
७ बाबू रूडमल गोएन । ८ सम्पादक, सिक्टर । ९ तैयारी। १० अच्छे दिलवाले।
प्रवासकुसुमावली । ( शार्दलविक्रीडित आये स्टेशन पै मिलाप करने सन्मित्र मेरे सभी, चुन्नीलाल हकीम, टीबरं तथा वे "रामके लाल" भी । पीछे बालमुकुन्द गुप्त पहुचे, सारे मिले नेहसे, गाडी " मेल" चली, चला नयनसे प्रेमाश्रुको मेहँसे ।। १८० मार्गस्य स्थानवर्णन । वसतातडका देसा हुआ प्रथम था पुर वर्धमान- आया, जहा बहु शिवालय शोभमान । प्रासाद घाग नृपके रमणीय भारी, गजा मुशिक्षित यहा जनतापहारी ।। मादाक्रान्ता रोनीगज, प्रथम यहिं थी रेसीमा, अगाडी- अटो पैसे उतर हाडे जा वसे मारवाडी। १पडित चुनीलाल शर्मा हकीम । २ वायू राधा'ण टीवडेवाला । ३ भारतमित्र सम्पादक । ४ आनदके भव । ५ मेह जसे, वरसात समान । ६ वरद्वान । ७ यहा १०८ शिवालय बहुत मुदर बने हुए हैं। ८ प्रजाका दुख हरण करनेवाला सन १८५७ में रेल यहींतक थी। १० रेलवे हद्द । ६८ प्रवासकुममावली। खाने भारी विशद निराली कोयलोंकी अपार, क्या क्या चीजें सनिगते कहा, पा लिया कौन पार॥ १८२ वसततिलका श्री वैद्यनाथ शिवदर्शन पुण्यकारी- थे हो लिये, प्रथम यार भवान्तकारी। मैं हाय जोड यहिसे करके प्रणाम- आगे चला झट मिला पटना सुधाम ।। १८३ शार्दूलविक्रीडित क्या था पुष्पपुर प्रधान जगमें ? चाहा जहा शर्य था, कैसा शासक चन्द्रगुप्त नृप था, कौटिल्य चाणक्य था। मारे नन्द, अमात्यै गरसे किया मुद्री मिला युक्तिसे, हाहा | काल हुई कथा स्मृतिगता, तेरी महा शक्तिसे । ॥ १८४ " पालिसी १ खानाम रही हुई । २ शिवजीका एक प्रसिद्ध स्थान है । ३ नम मरणका नाश करनेवाला । ४ इस नामका प्रसिद्ध शहर । ५ पटना, पाटलीपुन । ६ चाहे सो मिलता था । . हुक्मत करनेवाला, राजा । ८ यह प्रसिद्ध सार्वभौम राना ईसाई सनके ३१५ वर्ष पहिले पटनामें हुआ था। ९ कुटिल नीतिसे चलनेवाला, बाज"। १० इसका असली नाम विष्णुगुप्त था, इसने चन्द्रगुप्तका प्रधान होने पर यह नाम पाया ! ११ नव नन्द । १२ प्रधान मत्री। १३ इस नामका एक नन्दका प्रधान था। १४ मुहर, सिका। इस पर विशाखदत्त कविने “मुद्राराक्षस" नाटक लिखा है। देखने ही योग्य है।
प्रवासकुसुमावली। .
भुजगप्रयात
गयाजी यहाँसे पुरा में गया था,
क्रियाकर्म मैने जहा हा । किया था ।
गवा तीन रत्ने श्रमी था जनों में,
फिरा था वहीं शोकके काननों" मे ।।
मालिनी
छलकर बहु पडे यात्रियोंको सताते,
प्रमुदित बन पूरा श्राद्ध भी ना कराते ।
"पितर सरग तेरे हो गये" बोल ऐसा,
कर पर धर माला छीनते खून पैसा ॥
१८६
इट्रवजा
क्या ये न जाने-अपना भि ऐसा
हो श्राद्ध होगा न बनाव वैसा।।
हा त्रास देते फिर क्यों सताके ?
क्या काल टेढा इनको न ताके ।।
१ स्त्री, पुन और कया ये तीन रत्न । २ "शोकवानन" नामक एक पुस्तक
३ आनन्दित, रानुष्ट । ४ फूलोकी माला-यात्रियोंसे मनमानी दक्षिणा लेनेके लिय
श्रादकिया समाप्त हानेपर गयावाल एक फूलको माला उनके हाथोंमें डाल देता
है और मनमानी दक्षिणा मिलनेपर उनको मुक्त करता है।
७०
* प्रवासकुसुमावली।
पृथ्वी
समीप इसके भली श्रेमहरा गया युद्धकी,
यही तप किया कडानिज तनु स्वय शुद्ध की।
स्वधर्म उपदेशक प्रनल था सदा गौतम,
प्रसार जिसने किया स्वमतका, हरा हृत्तम ।।
.
वसन्ततिलका
.
१८९
जापान, चीन, वह तिन्त्रत वा सिलोन,
है बौद्ध धर्म इनका, पर है बलोन।
जापान आज विजयी जगदाप्तमान,
है मुख्य वीज निज धर्म-कुलाभिमान ।।
होता स्वधर्म सनको अति लाभकारी,
वैसा भयावह सदा परधर्म भारी ।
सिद्धान्त भूल यह भारतके निवासी,
सो एकता बन गुराम हुए प्रवासी ।।
१९०
१त्रास हरण करनेवाली। • बुद्धगया-यह बौद्ध धम सस्थापक ईसाइ सनके
६ सौ वर्ष पहिले विद्यमान था। यह राजपुन था । इसके पिताका नाम शुद्धोदन
और माताका नाम मायादेवी था । ३ यह युद्धका नाम था। ४ धौद्धधर्म । ५ हृदयका
अधकार, अज्ञान । ६ बल-ऊन-परसे कम, कमताकत । ७ जगत्-आप्त-मान-सारे
ससारसे जिसको मान मिला है वह।
प्रवासकुसुमावली । ++ + +
--
शार्दूलविक्रीडित
महाशा
रस्तेमें सह ताप खून पहुँचा कानी पुरी धामको,
लीने दर्शन विश्वनाथ शिनके देसा परधामको ।
दुढीराज, गणेश, भैरवं तथा दुर्गार्नपूर्णा शिवा,
अस्सीघाट, पिर्याचमोचन, सभी छोडे न देरे सिवा ॥
१९१
उपजाति
देसी पुरी थी यह एक वार,
तौभी लगी मुन्दर वार वार
जहा तहा नित्य नई मुहवि,
वही सरी सुन्दरता क्हावे॥
१९२
मुजगप्रयात
किया जाह्ववी-स्नान पापापहारी,
वहासे सभी घाट-शोभा निहारी ।
बने हैं यहा ये पय पान-सीमा,
बहे नीर गम्भीर हो खुन धीमा ।।
१ श्रेष्ठ स्थान, मुक्तिधाम । २ यह एक गणेशनीका स्थान है । ३ कालभैरवका स्थान ।
४ दुर्गादेवी और अन्नपूणा । ५ यहा अस्सी नदियोंका सगम है। ६ यह एक तीर्थ है।
७ सुन्दर दास। ८ गगास्नान । पानीके पानकी हा।
-
* 'प्रवासकुसुमावली ।
पृथ्वी
अगाध जल्में किया पुल बडा विचिकृति,
विशाल यहु दोतला, विहित विश्वकर्माकृति ।
अहा निपधैगा यहा धन चतुपैया जा रही,
बने पतिपदोत्सुका बहुपैया सती नार ही ॥
१९४
शादूलविक्रीडित
जो है पापहरा, पैग, तट धर्रा-श्रगार पूर्णोदरा,
सहारा भवकी, नितान्त मधुग-धौरा, धग-मुन्दरा।
साकोरा, रुचिराति श्रमहरा, कल्लोलहन्मोदका,
श्रीकारिशिगेधरा, प्रियकँग, श्रीविष्णुपादोदका ॥
१९५
१ आचर्य कारक है आकार जिसका वह । २ योग्य है विश्वकर्माको कृति जिसमें
अर्थात् शिल्पविद्या पूर्ण जिसमें है । ३ तीन मार्गोंके मेलसे बहनेवाली, गगा। ४ चार
मागवाली , पुलमें चार रस्ते हैं-ऊपर रेलका, नीचे वीचमें गाडीका आर दोनों और
मनुष्योका ऐसे चार मार्ग है इस लिये मानो चतुप्पया बनी । ५ पतिके पदके
लिये उत्कठित । ६ बहुत मार्गवाली । ७ ८ किनारेकी भूमिका
गगार । ९ मिष्ट हे धारा-पानी जिसका । १. पृथ्वीको सुदर करनेवाला ।
११ साक्षात्, मूर्तिमान् । २ सुन्दर है मूति जिसकी वह । १३ तरगसे आनद
देने वाली । १४ महादेवजीने शिरपर धारण की हुई 1१५प्रिय करनेवाली। १६ श्रीविष्णु
भगवान् के पादसे निकली हुई ।
. प्रवासकुसुमावली। - * + भुजगप्रयात हरिश्चन्द्रका सत्त्व देसा गया था- यही, कवटें ले धनोंने दिया था । स्वय जीव प्यारा, मरे मुक्ति पाने । अहा ! काल्की वक्रता कौन जाने । १९६ वसाततिलका बौद्धाधिकार रहके नव "सारनाथ' साली बना, पर किया सबको अनाथ । इस्लामधर्म-धरने बहु मन्दिरोंको- तोड स्वय रचि वहीं निज मस्जिदोको ।। १९७ शार्दूलविक्रीडित भूलेंगे न कराल काल । अतिही उन्माद तेरा कभी, कूदे शकर कूपम छिप रहे, भागे पुजारी सभा । कैसा नाश किया प्रमत्त बनके इस्लामियोंने यहा, धर्मग्रन्थ जला, स्वधर्म सनका छीना वलात् हाय हा ॥ १९८ १ यहा एक कूप है वहा करवट लेके मुक्तिपानेके लिये श्रद्धावान् लोग भारमघात करते य । २ एक पुरातन बौद्धका स्थान । ३ पुसत्मानोंन । ४ ज्ञान- वापीमें। ५ बलात्कारसे, जगन् ।
++ ++ प्रयासकुसुमावली ।
उपजाति
मिला यहाके सय सजनोंसे,
इच्छा हुई पूर्ण धने दिनोंसे ।
देसा नया मन्दिर नागरीका-
प्रचारकी सुस-सागरी का ॥
१९९
वसततिलका
सारे सभासद नभी प्रयतैक-भार,
होंगे तभी सफल पूर्ण महानुभाव ।
अच्छा अभी समय है, नव नागरीका-
होने प्रचार बहुधा गुण-आगरीका ।।
२००
उपजाति
हुआ रवाना अब मै यहासे,
जहा तहा देस सुद्देश्य सासे ।
श्री विन्ध्यदेवी निकट प्रसिद्ध,
की फेर याद प्रतिर्मा सुसिद्ध ।
१ नागरी प्रचारिणा सभाका । २ सुखक समुद्रका । ३ यत्नपूर्वक एक भाव वाटे ।
४ सिद्धमनोरथ । ५ सजन । ६ अच्छे दिसाव । ७ मिर्जापुरके समीप श्रीविध्यवासिना
देवीका स्थान है वह । ८ मूर्ति, झाकी।
प्रवासयुसुमावली। 0 +१+
वसततिलका
आया यहा निग्सने फिर तीर्थराज,
युक्तंप्रदेश-नगरी रमणीय आज ।
कॉलेज, हार्ले, कटरों, पथ जानसेन,
याजार, चौक-मुथरे सगते किसे न॥
देसा पुरातन यहा बुझरो-बगीचा,
अल्फेड-पार्क उससे पर है न नीचा ।
काशी समान घुल विस्तृत है कमाल,
है "रेल-जकर्शन" जहा बहु गोलमाल ||
वैसा पुरातन किलो अति दर्शनीय,
अक्षय्य है वेट जहा बहु पूजनीय }
है पास पापहरणी रचिग त्रिवेणी,
होती पवित्र युवती कर दान वेणी"!!
१प्रयाग। पश्चिमोत्तर प्रदेशको राजधानी । ३ म्यूरकालेज । । मेयो ।
५ एक पाजारका नाम है। ६ एक मार्गका नाम । ७ एक पुरातन
शाहा वगाचा । ८ सन १९७० में श्रीमान् ड्यूक आफ एडिम्बरोंके सन्म
बनाया गया था । ९ रेलवेका पुल । १० वम्बई और दिहीसे आनेवाली रे
रियांका यहीं मेल होता है। ११ विणा सगमके समीप नदी किनारे पुर
बादशाही किला है । १२ इसी क्लेिमें प्राचीन पूज्य अक्षयवट है । १३
यमुना और सरवतीका सगम । १४ चोटी।
२
।
* प्रवासकुसुमावली ।
शार्दूलविक्रीडित
वेणीमाधव, वासुकी विरत है वैसा भरोज हा ।
लेटे हैं हनुमान, लोप युत है देवी अलोपी जहा ।
न्हाके सगममें, मिलाप सरका लेके यहासे चला,
आया तीरथ चित्रकूट पथमे, देसा हुआ था भला ॥
२०५
उपजाति
मन्दाकिनी-सुन्दर-रामघाट,
दे स्नानसे मुक्ति-विशाल-बाट ।
परिक्रमा कामदेनाथकी है,
झाकी बडी सुन्दर मार्गकी है ।।
पृथ्वी
२०६
पवित्र जलसे भरा भरतकूप, देवागेना,
शिला स्फटिककी जहा, चरणपादुका शोभना ।
प्रमोदवर्ने दृश्य है रुचिर, रामका चोतरा,
सुरम्य कपिधोरै है निरस ले यहा-सो तरा॥
२०७
१, २ प्रसिद्धस्थान । ३ हटे हुए। ४ एक स्थान । ५ किलके समीप एक हनुमानकी
बत लेटी हुई है । ६ देवीका स्थान । ७ यह एक तीर्थ है। ८ नदी परका सुदर
मघाट । ९ पुत्ति की चोटी सडक । १० प्रदक्षिणा | ११ इस नाम पहाडीकी। १२
इ एक स्थान है। १३ यह एक शिला है । १४ यह एक बहुत मुदर वन है। १५
डा रामचदरी भरत मिले थे। १६ हनुमान धारातीर्थ ।
---
प्रवासकुसुमावली । के, मालिनी पुनरपि झट आया सडवा मेल छोडी, परिचित ल्यु गाडी संज थी देर थोडी । समय पर महको ला उसीने उतारा, कुछ कुछ चमका है भाग्यका आज तारा॥ २०० शाटिनी आके देखा फेर इन्दोर सारा, रस्तेमेंका सेदै सारा विसारा । मिनोंकी ले प्रेमसे भेंट, जाना- सारा हाल, देशका भाग जाना ॥ २०९ उपसहार। RA मालिनी सुखद रुचिर ऐसा गजधानी प्रवास, हितकर बहु देके बोध, हो हृनिवास विगतगति दरिद्री देश सपन्न फेर- विपुलै-विभव होने, श्रीपते ! हो न देर । २१० १ छोटी । २ तैयार । ३ थकावट । ४ दुखका। ५ कलकत्ता । ६ कल्याण कर नेवाला । ५ हृदयमें रहने वाला । ८ निस्तेज, प्रभावहीन । ९ बहुत वैभवशाली । ७८
6- + अपमni
गनम माना।
र मrinी मुभा,
Twiru
"
for मामाम,
पत्रका: TIRI
भारिप-गुभार-11,
है भी गाम-शि ||
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ग्गा मा ति पंगे प्रभो।
सा सुमाग्दी र पशि भो।
मानरमारमिग मी मया गादो भाग,
पानिपागण-मारी भगादपा ।।
ॐ सन्सन् ।
१ भारत । २ अ । मारयादियो । ४ ली पर।
परपपोपन । विषय मारया में पर है भो। गारमा । ७भमर,
भयरा.
८ गयर पदम रजय विहारी अपार रामनी पदपर रमने
पाग। रक्षारपन पणिमा, भाषण गुग । १. गाराम, अन्द।
१२ गवत् १९६२
प्रवासकुसुमावली। क. * - *
शुभ-भावना।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
अंकाराकृति देशको अरूपी नित मान ।
नमस्कार उसको कम नम्र-भाव चित आन॥
मोक्ष न होवे देशका मोह मिटे न अकान ।
भव-तारक प्रमुके बिना भक्त-भक्त प्रमुराज ॥
गज पाचाली रक्षके गति दी कर निष्काम ।
वक कालका काल है वही एक सुख-धाम ||
तेनोमय प्रभु आप है तेज न मन्द निदान ।
वाणी है कविकी वही वाक्पति कान्यनिधान ।
सुखका अवसर पायके सुकवि मिलाता देश ।
देशभक्त कवि देशको देवे हृदय-प्रदेश ॥
वाणी उसकी दुखका वाम करे झट दूर ।
यही हरे परतनता यश देवे भरपुर ।
८०
@ + प्रवासकुसुमावली ।
॥ श्री॥
स्फुटपद्यसग्रह।
मालती।
[1]
कैसी फूली उपवन-लतो मालती चाम-गया ?
होके मत्ता सुरभित किया गध दे, वायु
गधों
शोभा भारी निरस इसकी कौन ना मोह पावे?
हा हा । ऐसे शुभ समयमें भृग क्यो छोड जावे ॥
[२]
देसे प्यारी निशिदिन अहा । बाट सोत्कण्ठ भारी,
दुसी होके सहकर रही वागमें धूप वारी ।
तौभी आया भ्रमर न अभी, लूध जो था स्वतन्त्र,
हाहा । कैसा विधि अद्य तू ? की नियां अन्य॑तत्र ।।
[३]
अब रवि कुसुमोको रोज इस्के सुसाने,
पवन सुरभि लेके दूरसे भाग जाने ।
१ यगाचे की येल । २ अच्छे सुवास वाली । ३ मस्त । ४ गधयुक्त, मुवासिक ।
५ गधहीन, बदयूवाला 1 ६ भवरा । नी।८ परतन।
६
८१
प्रवासकुसुमावली। * +
-
जलद वरस भारी खूब इस्को रलवे,
पति दिन अगाको क्यों न कोई सताने॥
[४]
मधुकरे अब आया मूढ, सर्वस्व सोया ।
विगत-भुसुम-पत्रों मालती देख रोया।
अब सुरभि कहा है ? पेड सूसासडा है ।
पति विरह कडा है, प्राण-दाही बडा है ।।
[५]
स्त्रीकी शोभा पति है,
वैसी पतिकी स्वकीय नारी है।
अन्योऽन्य-भावे ऐसा,
नैसर्गिके, जनमहोपकारी है ॥
प्रश्नोत्तर ।
मधुर भुवनमें क्या ? कोमला याल-लीला,
मधुरतर सदा क्या ? कामिनी है मुशीला ।
मधुरतम इन्होंसे ? सत्य शब्दार्थ-माला,
प्रति रुचिर सदर्भा पद्य माला विशाला ॥
भेवरा । २ फूल और पत्ते नहीं है ऐसा । ३ प्राणोंको जलाने वाला । ४ परस्पर
भाय । ५ स्वाभाविक । ६ जन महा-उपकारी लोगों पर वहा उपार करनेवाला
. रुचिर-सन अर्था=मुन्दर और अच्छा अर्थ है जिसमें ऐसा ।
* प्रवासकुसुमावली।
चातकी-प्रवाह ।
(चित्तौर-चातकी नामक पुस्तककी गगाप्रवाह घटना)
श्लोक।
(मन्दाकान्ता)
कैसा आया कठिनतर हा दुसदायी प्रसग
हाहा । कैसी जल रिच बहू ? छोडके तात-सग ।
ऐसाही था उचित तुभको क्यों दिया जन्म तात !
कैसा मेरा अन कर रहे ? हाय हा प्राण-घात ।।
गगाजीका सलिले गहरा देसके मृत्यु-घाट,
हा हा । रोई रणग्वसे चातकी छोड हाट ।
है ना कोई इस जगतमें प्राणसा अन्य प्यारा,
वैसाही ना मरण भयसा र कोई हत्यारा ॥
(शार्दूलविक्रीडित)
कैसे निर्दय राजपूत । तुम हो, मैंने बुरा क्या किया ?
देते हो मुझको यहा, कठिन है कैसा तुम्हारा हिया ।
पिताका सहा २ निमाण करना। ३ नाश । ४ पानी । ५ जिस घाटपर से
यहाई यह, मणिकर्णिया । ६ चित्तार चातकी । ७ राजपूत पाक्षिक पत्र ।
प्रवासकुसुमावली। क *
।
स्त्रीका घात किया किसी न नरने, पेसी न क्यों हो बुर्ग,
हा हा । भत्रियके न योग्य कृति है ऐसी महा आसुरी' ।
मैं निदीप कुलीन शुद्ध मुझको जैसी बनाई वनी,
दोषी है मम तात एक, जगमें कोई न मेरा धनी ।
हो जाता यदि मत्कर-प्रहण वा, कैसे डुबाते ? कहो
स्त्रीका रक्षक कोन है पति निना, कैसाहिहा । क्यों न हो।
-
(मालिनी)
वस यस | अन डूबो बीच गगा-प्रवाह,
विमल-जल-समाधि-प्राप्ति है स्वर्ग-राह ।
सकल अर्धे तुम्हाग क्षीण होके वसोगी,
अमर-पति-सभामें अप्सरा हो हसोगी ।।
(मदात्राता)
हा हा । डूनी विमल जल्में चातकी हो विरक्त,
गेये सारे विरह-भयसे हा । उपन्यास-भक्त।।
ऐसी लीला चरम इसकी देस, ना कौन मोहे ?
कैसा चित्रं प्रकृत इसका भावना पूर्ण सोहे। ॥
१राक्षसी 17 मेरा कर हस्त का प्रण अथात् वित्र्य । गगाजल में डूबना । पाप ।
५ इन्दकी सभा। ६ उपयासके प्रेमी। ७ चातकीकी चरमलीलाका चित्र "सरस्वती'
भाग ४ सत्या ११ पृष्ट ४०६ पर दिया गया है। उसीका अनुलक्ष्य कर यह कविता
रिखा गइ है। ८ विद्यमान, अधिकृत।
८४
* प्रवासघुसुमावली।
चतुर्भापी पय ।
(सस्कृत, मराटा, हिदी आर गुजराती)
श्लोक।
कृष्णोऽह नवनीलनीग्दरुचिस्त्व मे प्रिया राधिका,
विद्युद्दामसमा नितान्त रुचिरा आहेस रूपाधिका ।
कैसा योग बना यहा प्रियतमे ! देसो तडित् मेघका,
जावो सेलिशु आज कुजवनमा केवो यन्यो ओघ का? ॥
घालोनि कठिं तुलसीवनपुष्पमाला,
हस्ते निधाय सरसा नववशयष्टिम् ।
सकेत क्यों कर रहा हमको निहार ?
छे कोन चूर्त ससि । आ ? नहिं नन्द-पुन ॥
देखें रम्य वहा प्रफुल्लित तरु, प्रीत्या गतो वाटिका,
होती तेथ मनोज्ञ एक तरणी, या पुष्पलावी स्थिता ।
जोईने मधुप प्रयत्न करतो, गुजन्मुखाग्रे भ्रमन,
हा हा! हन्त । पपात मूर्छित-तनुर्जाता भयात्सुन्दरी ॥
क्रीडाकन्दुक्सन्निभ निजकरे भूगोलमुद्धामयन,
ऐसें विस्तृत भूमि-मडल दिले माते, न जेथे रवि ।
होवे अस्त कदापि, अद्भुत अहा ! ग्रीडा तुम्हारी प्रभो ।
हछ धन्य सता रवी रजनिमा जोवे छ मारी प्रजा ।
८.
प्रवासकुसुमावली।
का मे माता ? भरत-वसुधा, जेथ भी जन्मले की,
तात को मे ? स्वकुलगृहका धर्म है मोक्षदायी ।
का मे भाषा ? सकलजननी सस्कृता वाऽय हिन्दी,
का वा विद्या ? भव-भय-हरा वेदवाणी न दूजी ।।
पदकमल तुम्हारे, फार आहेत गोड,
मरणभय मिटावें, तोडिने कर्म-जाल ।
सकल अघ हमारा, क्षीणता याति तूर्ण,
गुरुवर । यदि होवे आपका प्रेम पूर्ण ॥
गुलाब।
अन्योक्ति
(१)
आया गुलाब
| जबसे इस देशम तु,
सर्वत्र सौरभ दिया बन वश-केतू ।
मोहा न एक अलिही सको भुलाया,
क्या मोहिनी-सुरभि-साथ अपूर्व लाया ॥
(२)
भूले सारे निज कमलको देसके पुष्प तेरा,
मोहे रेके सुरभि, निजको मत्त होके न हेरा।
धीर धीरे चहु दिशि हुए मान सन्मान तेरे,
प्यारा होके शिरपर चढा खून काटे बिखेरे ।।
++ ++ प्रवासकुसुमावली । (३) तेरा गध अपूर्व सुदर यहा भारी वना कीमती, जीता रत्न सुवर्णको, हरण की अच्छी सोंकी मती । डाला देश सभी विलास रसमें, स्वातन्य सारा लिया, लाके हा । यवन प्रमत्त रिपुको सहार तूने किया ॥ तेरे पीछे पधारे समय समयमे अन्य देशीय मानो, तेरीही सोज लेने विकल बन सदा,हीन हा देव जानो। छीनी सत्ता हमारी धन विभव, हमें दास पूरे बनाके, हा हा । कैसे सताया ? यवन निकरने रोक सर्वत्र नाके॥ (५) क्या पुष्प थे सुरभि-हीन सभी हमारे, क्या मालती बकुल चपक पद्म सारे । थे ये यहा न ? हम मूढ बने विचित्र- लेके गुलार पर पुष्प सदा आमंत्र ॥ रुचिर रुचि हमारी हो गई आज न्यारी, कुसुम सम हमारी हो गई देह प्यारी । अपरिचित हुई है देशकी चीज सारी, हम सब कुछ भूलें, देश-सेवा निसारी !॥ क प्रवासफुसुमावली। भाई वसन्त वसन्तपचक। (वस ततिलका) आयो वसन्त । तुमसे सर लोग गजी, फूले पलाश रमणीय गुलन-राजी । होते न मिन| जगमें तुम, वा न आते, ऐसे सदा हम कभी हसते न गाते ॥ । तुमने हमको दिया है, आनन्द-गान, उपकार वडा किया है। क्या क्या न मित्र | तुमको हम वधाई, एकन हो सक्ल खून मजा उडाई ।। वीणा, मृद्ग, करताल, सितार, सार- ले हाथमें हम करें स्तुति वारबार। दु सश्रमादि सके हरके, अपार- दे हर्प, कौन तब हो न कृतोपकार || आनन्द लभ सम लभ न अन्य कोई, लूटा न हाय जिसने निज शान्ति सोई। देवे वसन्त दिन कौन भला बधाई ? आनन्दकी सक्ल ठौर धजा उडाई ।। (मालिनी) निज मत मत भूलो, गान अश्लील छोडो, विनय नय सदाही हर्पके साथ जोडो ।
+ * ( ६ + * प्रवासकुसुमावली ।
मधु भातु जन आवे हर्ष ना कौन पावे ?
सकल मिल रमावे एकताको पढावे ॥
ग्रीप्मवर्णन ।
(शार्दूलविक्रीडित)
आवो ग्रीष्म । सुहावने तुम बनो, होके वसन्ताऽनुज.
कैसे तापद हो रहें। किरण ये घसीयके भानुज
भ्राताके गुण क्यों लिये न। उससे क्या हो निरोधी यहा ?
कैसा वन्धु समान मित्र जगमें शत्रु स्वय होय हा ।।
शोभा ली वनकी, हरी पननकी शान्तिप्रदा शीतता,
कीने शुष्क जलाशय, प्रगट की अत्युम तेजस्विता ।
चाहे जीव समस्त मस्त मधुको, कोई नहीं आपको,
हा धिर जीवित ! चाहना न जिसकी, भागी सदा पापको ।।
कैसे निर्दय हो । सभी जन डरे, कोई न लें नामही ।
स्त्रीमें प्रेम जरा न मित्र ! तुमको सोहे जिन्होंसे मही ।
देके कोमल हस्तमें व्यजनको, दे त्रास कैसे श्रमी
वारवार क्रो ? उनास तुमसे सारे गृहस्थाथमी ।।।
(शिखरिणी)
अहा पेसी माला पुसुम-रचिता, चन्द्र-किरण,
हमारा फव्वारा, मलयजरजस्ताप हरण ।
.
८.
प्रवासफुसुमावरी। * + +
निराजे अर्धांगी व्यजन-धृत-हस्ता शयनमें,
परन्तु प्राप्मर्तु प्रसर करती ताप तनम ।।
(मन्दाक्रान्ता)
आनो ग्रीष्म । क्षणिक तुम हो, कूच होगा यहासे,
जावो ऐसी कृति कर सदा मिन ! कोई न हासे ।
दोही बातें इस जगतमें वा धुरी वा भली है,
पाई शोभा तुम न, मधुकी-क्या किसीको मिली है ? ॥
मेघ-स्वागत ।
(मन्दानान्ता)
आवो आवो प्रिय । तुम यहा, स्वस्ति है मेघराज ।
सारे दुसी तुम निन ससे । सूझता है न काज ।
देके प्यारे ! सर जगतको जीवन त्राणकारी,
रक्षो मिन । प्रणति तुमको, हो प्रजा सौख्यकारी ।।
(शादलविकीडित)
देखें ये कृषक-स्त्रिया प्रणयसे होके सदा साटर,
नाचे मोर पसार पस, उडके पक्षी करें आदर ।
आये चातक सामने, पिक करें सन्मान आलापसे,
श्रीमन्मेध | दया धन्य तुम हो, सारे सुसी आपसे ।।
** प्रवासकुसुमावली ।
(मालिनी)
प्रणय-कुतुक-नादी सर्व पक्षी, वनश्री-
रुचिर-हरित वेपा हो रही ले घनश्री ।
मदन धनुष लेके हो रहा सज्ज भारी,
विधुर जन सताने कान्तहीना सुनारी ॥
कर विपुलजा तू आपगा पूर वारि,
कर पवन सदा तू शान्त होके दवारि ।
। विपुल देके धान्य,
हो मान्य मित्र
उपकृति सम कोई है न धधा पवित्र ॥
(वस ततिलका)
वर्पा प्रशान्त बनके कर तू कृपाल !
हे मेघ मान्यवर तू हमको सभाल ।
आधी चलान, चपला मत फेंक नीचे,
दे धान्य तू, सफल सेत वना बगीचे ।।
यास मेघ ।
हर अफाल ससे।
(द्रुतविलम्बित)
दया कर जोग्मे,
सब ठोरसे।
भरतभू विकला विनतानना,
कर मुरी फलदायक-कानना ॥
प्रवासकुसुमावली ।
कलकत्तेकी मारवाडी एसोसिएशन ।
दोहा।
असोसिएशन नामको, मारवाड जन धार ।
कामर्सकी चेम्वर बने, करने देश सुधार ।
सुनके नाम विचित्र यह, अचरज हुआ अपार ।
क्या भाषा अपनी वनी, शब्द-शेष नि सार।
साली लेके नामको, वने हमारे लोग।
क्या अग्रेज सुहावने । करने मौज अोग ॥
क्या कोनो हित देशको, अथवा जाति-सुधार"।
धार विदेशी नामको, क्या पायो आधार' ॥
विद्या सीसी ना गयो, मोह वन्यो अग्यान ।
राहरीति सुधरी नहीं, गाली गीत भडान ॥
अपने मुससे स्त्री के, नीच शब्द अश्शील,
शोभा क्या इसमें बढे १ होते जन दु शोर ॥
स्त्रीको शिक्षण क्या दियो, क्या कीनो उपकार ।
क्तिनी बैठी हाटमें, स्त्रिया छोड घरवार ।
++ प्रवासकुसुमावली ।
क्या कानो परदेशमें, जाकर निज व्यापार
क्या वढाय निजधर्मको, कीनो पुण्य-प्रसार
?
॥
"केसर-निलास" हाथमें, ले देसो क्षण एक ।
क्या है चित्र समाजको, रासो अपनी टेक ॥
ले अग्रेजी नामको, साहब बनो न आज ।
उन सम उद्यम ठानके, कारये सुसी समाज ।।
श्लोक।
(शार्दूलविक्रीडित)
.
कीनो कम्युनिटी भलो न, युनिटी कीनी न दे लेक्चर,
सोला ना गृह आर्फनेज, विधवा पाली न, की दुश्वर ।
धान्यो नाम असोसिएशन, बने कामर्सकी चेम्बर,
त्यागे वस्त्र विलायती न पहरे देशी कभी अम्बर ।
ना कामर्स किया युरोपियनसा सोली कहीं कम्पनी,
साली चेम्बर सोल नाम धरके की खून हृत्कम्पनी ।
ना सीसा “यस, नो" निना अधिक वा स्त्रीको दिया शिक्षण,
लेके नाम वृथा रिफार्मर बने, त्यागे न दुर्लक्षण ॥
प्रवासकुसुमावली। . . +
फ्न्यापुत्र-विवाहको न सुधरी गति, स्वकीयोन्नति,
कीनी न, प्रमदाप्रचार सुधरे, ना धर्ममें सन्मति ।
गाने बन्द हुए न शुद्ध कुल्में गीत अश्लील वा,
साली नाम ' असोसिएशन" लिया। श्रद्धा बढी ना ल्वा ॥
यात्रा लडनकी अभीष्ट बनने क्या योग्य घेरिस्टर ?
क्या वाबू बनने उतार पगडी होके वडे मिस्टर ।।
लेडीका कर हाथमें परहके वाकिंग तुम्हें इष्ट है ?
छोडो ये उनके प्रचार, कृतिको लेवो यही इष्ट है ।
जैसा साहस नाम धार तुमने प्यारे । किया है यहा,
वैसे शीघ्र दिसायिये स्वकृतिको होके यशस्वी महा ।
वैसा है अपना समाज पतित-प्रत्यक्ष देसो जग,
दु खग्रस्त हुआ, कुरीति-पथसे छाई सभी पै जरा ॥
(मालिना )
प्रभुवर
यह मेरी प्रार्थना हाथ जोड,
मरुधर सुजनोंकी मूढता शीघ्र तोड ।
प्रवर कर उन्होंका वश, विना, विचार,
युवति जन सदा हो श्रेष्ठ रीति-प्रचार ॥
९"
MINNIMMMMMMMMMMMITMO TUTTIM
WULO OULU
HW UGUSTISASUR
,
देश-दशा।
लोक।
है धर्म, देश, जन सर्व विराजमान,
है भूमि, अन्न, जल, औषधि विद्यमान ।
है
शास्त्र सत्पथ अभी सवका समान,
हा हाय ! किन्तु रति क्यों न निजाभिमान ? ।।
है आज देश किस घातक वेदनामें।
हा ! फूट क्या बढ़ रही विगडी दशामें ।
कोई सहायक नहीं, किसका न मित्र,
होता चला प्रतिदिन क्षय सच्चरित्र ।।
क्या क्या कुरीति अपने कुलमें चली है,
कैसा सुधार करना ? रति क्यों ढली है ?
भूलें सदा हम हमें, कुल, जाति, देश,
कोई सुने न करता स्वहितोपदेश ।
क्या था अपूर्व जगमें अपना स्वदेश ?
सर्वोच्च था, धनिक था, कपि-सत्पदेश ।
हाहा ' दशा अब हुई इसकी विचित्र,
कोई सहायक नहीं, इसका न मिव ।।
-
-
MMSMITAARENAAL
.
wwITARIKEAWTWITTARIKEUM
ELAMMATLATIOnroamanarunmuninancexcuci.in ? - क्यों जानते न अपना हम देश-काज ? क्यों हो गया अहह ! लुप्त निजत्व आज'। कैसे बने हम दरिद्र, सुदीन, हीन ? क्यों बन्धुभाव, समता हमसे विहीन ॥ क्यों सद्विचार तजके मति हृत्पदेश- जाके वसे विनय, शिक्षण अन्य देश' । व्यापार हा ! अव कहा ' रति है हमारी? भूखे मरे हम सदा कर जानमारी !! ॥ सट्टा करें बन दलाल विचित्र धन्धा, लूटे गरीव-उनको कर खूब अन्धा ! । जाने न धर्म अपना, कृपि, वैश्य-वृत्ति, गोरक्ष्य, देश-हित कारक सत्मवृत्ति ।। होगा यहा जब कभी प्रभुका प्रसाद, होगा सुधार तबही हटके प्रमाद । हे सर्वशक्ति परमेश्वर ' हे कृपाल ! होके प्रसन्न अव तू हमको सभाल ॥ । ERLIAMERITTEURURTIESPIRITIRITEMEETIMEBSus
॥श्री॥
प्रवास-कुसुमावलीके प्रथम गुच्छके कुछ
अभिप्रायोंका साराश।
ई
एक प्रति
१ श्रीमान् रायबहादुर मुन्शी नानकचन्द साहब, सी आय् माइम
मिनिस्टर, इन्दोर स्टेट-ता० २७-९-०४
प्रवासकुसुमावली " की पहुची । सायन्त पढी ।
निहायत खुशी हाँसिल हुई । आपकी कविता बहुतही रसीली और
सरल है । अगरेजीम जैसी " पर कवि " की तारीफ है वहीं हाल
आपका है । इसी तोरसे आप लिखते रहेंगे तो हिन्दी भाषाकी
कविता पुरानी नहीं होने पावेगी।
• श्रीमान् वाबू तुलापतिसिंह, माइवेट सेक्रटरी महाराजा दरभङ्गा-
ता०-२२-९-०४
I have lead it with great interest and liave much
pleasure in saying that it is worth rending
३ श्रीमान् कमलानन्दसिंह, राजा साहब श्रीनगर पुनिया-
ता०-२५-९-०४
आपकी भेजी हुई "प्रवास-कुसुमावरी" कलकी डाकसे मेरे पास
पहुची जिसे धन्यवादपूर्वक स्वीकार कर मै अत्यन्त आनन्दित हुआ ।
* में दत्तचित्त हो आपकी कवितार्य आयो पान्त पर गया । यद्यपि आनकल समवृत्तमें हिन्दीभापारी कवि ताओंका प्रचार बहुत कम है तथापि आपने अपनी इस रचनाके द्वारा अच्छा कवित्वकौशल दिग्वलाया है। शब्दको बिना विगटे हुए समवृत्तमें हिन्दीको शुद्ध कविता करनी सहन नहीं है । मेरी समझम तो आपकी कविता बहुतही रोचक हुई ह ओर प्रसाट गुणमे भृपित । छन्दमें भी कही कुछ गडबड देखनमें नहीं आता । शब्दविन्यास भी उत्तम रीतिसे किया गया है जो पढने में अत्यन्त प्रिय मालूम होता है । "प्रवासामुमावली" से इतिहास सबधी अनेक बातें विदित होती है, और भी कई प्रकारके नये नये भाव न्यनित होते है । "चाती प्रवाह" पर जो आपने कविता की ह वह विशेष हयग्राहिणी हुई है । चतुर्भाषी पद्य भी भावप्तगठित है तथा आपकी अनेक भाषाका पाटन तथा कवित्वशक्तिका अभिव्यनक है। आपका एतद्विषयक उत्साह और परिश्रम सर्वथा प्रशसनीय है। इसमें कुछ सदेह नहीं कि आपने मारवाडी बोलीमें भी "केसरविलाम" आदि अनेक पुस्तकें रचकर अपने देशका गौरव बाया है । ४ पडित माधवप्रसाद मिश्र, भिवानी-ता०२५-९-०४ आपकी प्रवासकुसुमावली कुसुमोकी आवली होने परभी हृदयहारिणी कुसुममाला है । जितनी यह आभिनव है उतनी पुरातन इतिहासकी अभियनक है और जितनी सरला है उतनी रसवती है। आपका यह पुष्पहार किम रसिकके हृदयका आभूषण न होगा और किम सहदयके कठकी शोभा न बढावेगा? ।
५ श्रीमान मुन्शी देवीप्रसाद साहब, जोधपुर-ता०-२८-०-०४ आपकी कविता खडी बोलीमें है इससे उम उद्देश्यकी वम उन्नति होगी जो देशहितपो लोग कर रहे है । इतिहासके प्रमाणभी आपने ठीक दिये हैं। ६ भारतजीवन, काशी-ता०-२६-९-०४ मारवाडियोंके सुधारके लिये मारवाडी भाषामें पुस्तकें लिखने- वाले अग्रवशी पाव शिवचन्द्र भरतियाने यह "प्रवास-कुसुमावली" हिंदी कविता लिखी है। कविता सस्कृत वृत्तोंमें है और सरल, उपयोगी है नमूना देखिये- * कविता पढते समय स्थान स्थानपर कनिकी योग्यता, टेशहितषिताका स्पष्ट परिचय मिलता है । पुस्तककी छपाई सफाई बहुत बढिया है। हम अपने पाठ- कोंसे अनुरोधपूर्वक कहते है कि वे एकवार इस किताबको अवश्य देखें। ७ श्रीवेंकटेश्वर समाचार सम्बई-ता० ०-१४-१०-०४ हिन्दीके पाठक बाबू शिवचन्द्र मरतियासे अपरिचित नहीं हैं। भापने जिस प्रकार मराठी कवितामें नाम पाया है, मारवाडी बो- रीमें पुस्तकें लिखकर प्रशसाका काम किया है, उसीप्रकार स- म्कृतपद्यरचनाकाभी अभ्यास करके हिंदी कविता करनेमें सफलता प्राप्त की है। यह प्रवास कुसुमावली उन्हीं बाब शिवचन्द्र भरतिया की लिखी हुई है। इसमें उन्होंने अजमेर, कृष्णगढ, जयपुर, में-
।
*
*
वाड और जोधपुरकी यात्राका वर्णन तथा वहाके देखे दृश्योंका
चित्र खडी बोलीके गणवृत्तोंमें किया है।
कोई कोई पद्य ऐसे है जो हृदयको बिल्कुल तल्लीन बना देते है ।
विशेषकर ६१ से ६७ तककी कविता तो बहुतही अच्छी बनी
है। अन्तम मालती और चातकीप्रवाहकी कविता दी गई है।
चातकीप्रवाहकी कविता पढतेही उपन्यासी अगडेकी सब बातें
ताजी हो जाती हैं और चातकीका विलाप हृदयमें ऐसा स्थान कर
लेता है कि सहसा ईश्वरसे यही प्रार्थना करनेकी इच्छा होती
है कि हे ईश्वर | हिन्दीके लेखकोंको मुमति दे जिससे अब
चातकीकी ऐसी घृणित पुस्तके हिन्दीमें न निकलें और न
हिन्दी साहित्यमें इस प्रकार पुस्तकप्रवाहकी घटनाका अवसर
आवे ।
८ श्रीमान् सेक्रेटरी, काशी नागरी प्रचारिणी सभा काशी-
ता०-७-७-०५
आपकी प्रवास-कुसुमावलीमा नाम समाने इस वर्षकी प्रशसित
पुस्तकों में सम्मिलित किया है और इसका उद्देव इस वर्षकी वापिक
रिपोर्टमें होगा।
९
केसरी, पना-ता०४-१०-०४
प्रवासकुसुमावली-(हिन्दी) हे शिवचन्द्र भरतिया यानी
लिहिले सदर गृहस्थास मारवाडी, मराठी, हिन्दी व सस्कृत
भाषा उत्तम येत असून त्या चारही भाषान त्यानी काय केली
आहेत. या पुस्तकात श्लोकाटि वृत्तान हिन्टीम ये कविता
करण्याची नवी प्रवृत्ति यानी घातली आहे
० काळ, पूना-ता०-१-२-०५
प्रवासकुसुमावरी-हें एक हिंदीमधील कविता पुम्नक आहे
शिवचद्र भरतिया हे याचे कत्ते आहेत सम्कृतमधील वृत्ते घेऊन
यानी हिंदीमध्ये मुलभ पद्यरचना केलेली आहे पुस्तकाचे बाह्याग
आणि अतरग टोन्ही मधुर आहेत
॥ श्री॥
मारवाडी भापाकी अपूर्व पुस्तके
-
इनाम १००० रुपया।
( मारवाडी भाषामें एक नई चीज )
फाटकाजजाल नाटक।
मारवाडी भाषा तो कुछ चीज नहीं-परतु बगाली, मराठी, गुजराती अथवा
हिटीभी इस नाटकके समान आगे छपी हुई पुस्तक कोई महाशय दिखा
देगा तो उसको उपर्युक्त इनाम दिया जावेगा ।
इसमें मारवाडी जातिकी गृहस्थिति, चालचलन, रहनसहन तथा व्यापार
आदिका-पाच मनोहर फोटूके चित्रोंके साथ भावपूर्ण उपदेशमय चित्र खींचा
गया है, जिसको पढतेही चकाचौध दूर होके हृदयमें प्रकाश पड जाता है ।
इस पुस्तकी जिल्द पक्की, रगबरगी कीमती कपडेकी तीन सुनहरी नामों
सहित और ऊपर भगवान श्रीकृष्णचद्रकी मनमोहनी मूर्तिके साथ बनाई
गई है निसको देखतेही मन मुग्ध हो जाता है । डेमी साट्नके २५० से
अधिक पृष्ठ हैं । उपाई मोठे अक्षरोंमें बहुतही साफ और सुन्दर है । देशा
भाषाआमें शायदही कहीं ऐसी पुस्तक छपी हो।
कीमत रुपया २) डाक खर्च ।)
बुढापा की सगाई नाटक । - - इसमें मारवाडी नातिमें सगाईके क्या प्रकार होते है, बचपनमें सगाई करनेसे क्या क्या अर्थ होते है-उसका चित्र खींचा गया है । स्त्रियोंकी स्वतत्रताकी सीमा, उसका परिणाम, वृद्वावस्थामें विवाहकी इच्छा, उसका बधन और उस बधनका परिणाम जहा तहा प्रदर्शित किया है । पुस्तकमें सर्वत्र नीति, उपदेश, बोध, धर्म ओर शास्त्रका विचार किया हैं। भाषा इतनी सरल और स्वाभाविक रक्खी गई है कि उसकी कृत्रिम रचनाका कुछ भास नहीं होता । और मानो यह कोई सत्य पटना है ऐसा प्रतीत होता है। पुस्तक बहुत सुन्दर अच्छे कागजपर छपी है । सवासोसे अधिक पृष्ठ है। कीमत 1) आना डाक खर्च =) आना । पुस्तकें अब बहुत थोटी रह गई है इस लिये जल्द मगाकर इससे आनन्द लाभ करें। कनक सुन्दर । । यह एक मारवाडी भाषाका एकमात्र भावपूर्ण उपन्यास है । इसमें ईमा- नदारीसे व्यापारमें मनुष्य कैसी तरक्की और धन कमा सकता है उसका खाका खींचा गया है। हमे पूर्ण विश्वास है कि इस पुस्तकके उपदेशके अनुसार चलनवाला अवश्यही धनमपन्न होके अपना और अपनी जातिका अच्छा सुधार कर सकेगा। पुस्तक सुदर फोटोके चित्रके साथ बहुत सुन्दर छपी है। कीमत |) डाक खर्च) आने ।
केसरविलास नाटक।
(दुसरी आवृत्ति)
वैसाही सुन्दर और मोटे कागनपर छपा है । पहिलेसे पुस्तक दुगनी
टेग्व पडती है । कीमत वही रुपया १J डाक खर्च ।।
प्रवास-कुसुमावली ।
(प्रथम गुच्छ)
गणवृत्तोकी कवितामें मारवाड, मेवाड आदिके वीर पुरुषोंका वर्णन
किया गया है । पुस्तक आर्टपेपर पर बहुतही सुन्दर छपी है । कीमत ।।
आना, छाक खच
सब पुस्तकोंके मिलनेका पता-
शिवचन्द्र भरतिया,
इढोर (मालवा)
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