Lbs National Academy Of Administration

Padarthamimansa Vol-i (1955)

Sharma Pandit Ayambkanath. · 2010/02/15

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OL SANS 181.41
SHA
125205
LBSNAA
की राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी
Academy of Administration
मसूरी
MUSSOORIE
पुस्तकालय
LIBRARY
125205
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अवाप्ति संख्या
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वर्ग संख्या
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पुस्तक संख्या
Book No.
121.41
शर्मा
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©
पदार्थमीमांसा
(प्रथमभाग)
लेखक एवं प्रकाशक
आयुर्वेदाचार्य पं० त्र्यम्बकनाथ शर्मा
शास्त्री, साहित्याचार्य, ए.एम.एस. (का.वि.वि.)
भू० पू० चिकित्सक श्री मूलचन्द औपधालय,
भू० पू० प्रिंसिपल कान्यकुज आयुर्वेदिक विद्यालय,
लखनऊ
-
मुद्रक :-
बनारसी दास मेहरोत्रा
रामाप्रस, नजीराबाद, लखनऊ
१ जनवरी १६५५]
प्रथमावृत्ति
[मूल्य ३)

" श्रीगणेशायनमः"
* समर्पणम् *
次多
विद्वन्नागरिकशासकन्दसम्मानित स्वायत्ताखिलविद्या-
कमनीयकलाः, नीर्तिन्यायशास्त्रपारङ्गताः, समस्तोत्तर
प्रदेशस्थखाद्यस्वास्थ्यचिकित्साधिकारिशिरो.
मणयः, लक्ष्मणेपुख्यि राजधानीगौरवाः,
माननीयस्वास्थ्यमन्त्रिमहाभागाः
श्रीचन्द्रभानुगुप्तमहोदयाः
प्रसीदन्तुतरामनया-
सबहुमानसमर्पितथा
पदार्थमीमांसया--
चन्द्रस्यशैत्यं ज्वलनञ्चभानो द्वयोःप्रतीतीभुवनेऽखिलेस्तः।
उभौ समाहारकृतौ नु तस्मिं यश्चन्द्रभानु लेखनाख्यपुर्याम् ।।
श्राह्लादिकत्वादिगुणैः सुयुक्तः शवोविनाशायक्षमः स ार्यः।
शासच्चकासच्च महामना च परोपकासय व्रती विरागी॥
सकर्णधारो दिशिचोत्तरस्यां संचालक: कांग्रसमानवानाम् ।
सम्पूजितःशासकमण्डलीभिः सम्मानितोमान्यमहोदयैश्च ॥
सुशक्तनीतिविदितो घरायां प्रसिद्धकीर्ति विभारतस्य ।
कराम्बुजे तस्य गुणान्वितस्य विराजतां मञ्जुकृतिर्मदीया ॥
निवेदयति
त्र्यम्बकनाथशर्मा
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परमश्रद्धेयाः माननीयमान्यवराः स्वास्थ्यमन्त्रिमहाभागाः "श्री चन्द्रभानु गुप्ताः" है निवेदन मृष्टि में जितने भी पदार्थ या तत्व पाये जाते हैं सबकी कल्पना पुरुष शरीर में को गई है । भगवान् श्रात्र य ने 'पुरुषोऽयं लोकसम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुरात्र यः । यावन्तो हि मूर्तिमन्तो लोके भाव विशेषास्तावन्तः पुरुधे, यावन्ता पुरुषे तावन्तोलोके' स्पष्ट निर्देश किया । यही कारण है कि चरककार श्रादि ऋषियों ने समस्त तत्वों का सुन्दर विवेचन किया है । वस्तुत: आयुर्वेद को श्राधार शिला दर्शन शास्त्र के पदार्थ या तत्व ही हैं जैसा कि चरककार ने स्पष्ट निर्देश किया है कि -"सामान्यञ्च विशेषञ्च गुणान्द्रव्याणि कर्म च । समवायञ्च तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विविमास्थिताः ।" च. सू. अ. १ यही मूलतत्व न्याय एवं वैशेषिक शास्त्र के आधार भारतीय साहि- य एवं आयुर्वेद के उद्गम के मूल स्रोत हैं । विना पदार्थों के विस्तृत अध्ययन के श्रायुर्वेद के स्वरूप की सत्ता ही समाप्त हो जाती है, अत: प्राचीन समय से आयुर्वेद दर्शन अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखता चला श्रा रहा है। किन्तु अाज .... "कतिपय स्थानों के अधिकारी, जिन्हे भारत य साहित्य का पूर्ण ज्ञान नहीं है, बाल्यकाल से विदेशी शिक्षा में दोक्षित होने के कारण उससे कुछ अनुराग भी रखते हैं, वह आयु- वेद में केवल निदान एवं चिकित्सा द्रव्यों का अध्ययन ही पर्याप्त समझते हैं, जो कि केवल अायुर्वेद के लिये घातक नहीं है, अपितु भारतीय साहित्य एवं संस्कृति का भी घातक है। यह दर्शनशास्त्र स्वकोय महत्ता के आधार पर अनेक शाखाओं में विभक्त होता है । :१-तत्वमीमांसा-इसमें सत् को प्रतीति से पृथक किया जाता यह भी भौतिकवाद एवं मानसिकवाद द्वारा दो भागों में विभक्त है जो लोग भौतिक तत्वों को वास्तविक मानते हैं वे भौतिकवादी कह- लाते हैं जैसे चार्वाक ने “यावज्जोवेत्सुख जीवेटणं कृत्वा घृतं पिवेत् । भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥” स्पष्ट कहा है। वस्तुत: चार्वाकदर्शन वास्तववादो है क्योंकि यह जिस इन्द्रिय द्वारा जिस पदार्थ को जिस रूप में ग्रहण करता है, उसी प्रकार वास्तविक रूप में स्वो.

है ato - ( ख ) कार करता है । कुछ दार्शनिक मानस व्यापार की वास्तविक रूप में स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार कर भौतिक पदार्थों को प्रतीत स्वरूप मानते हैं ये प्रत्ययवादी कहलाते हैं इनमें बौद्ध दर्शन प्रधान । कछ दार्शनिक भौतिक एवं मानसिक दोनों को यथार्थ रूप से स्वीकार करते हैं ये तवादो कहलाते हैं इन में न्याय एवं वैशेषिक दर्शन प्रधान २-प्रमाण मीमांसा-इसमें ज्ञान की विशद विवेचना की जाती है जिसमें ज्ञान का स्वरूप, सीमा, प्रमाणिकता आदि पर विशेषत ध्यान दिया जाता है । इस प्रामाणमीमांसा का उत्तम प्रतिपादन मीमांसा शास्त्र में है। ३–तर्कशास्त्र इसमें व्याप्ति के अाधार पर शास्त्र की विशदविवेचना की जाती है इसका दूसरा नाम कल्पनात्मकदर्शन या न्यायदर्शन है ४- कर्तव्यशास्त्र-इस शास्त्र में कर्तव्य प्रधान रूप से वणित हैं इसके नैराश्यवाद एवं आशावाद दो सिद्धान्त प्रधान हैं जिनका कि सांख्य एवं योग में उत्तम निरूपण है। ५-सौन्दर्यमीमांसा-इस शास्त्र में सौन्दर्य, तज्जनितसुग्वदुःग्वोत्पत्ति सौन्दर्य का कला में परिवर्तन, चित्र एवं चित्रणीय वस्तु का सम्बन्ध, संगीतादि का विवचन, विस्तततया होता है । वस्तुत: यह सौन्दर्य मीमांसा साहित्य, संगीत एवं कला तीन प्रधान शास्त्रों में विभक्त हो जाती है । मानव सौन्दर्योपासना द्वारा ही मानव माना जाता है, अन्यथा वह पशु है । कहा भी है 'साहित्य संगीत कला विहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः । ६-मनोविज्ञान- इसमें मस्तिष्कसम्बन्धी विषयों का या मानसिक क्रियायों का अध्ययन किया जाता है । इसके भी शिक्षा मनो. विज्ञान, बालमनोविज्ञान एवं पशुमनोविज्ञान इत्यादि अनेकभेद हैं। ७ श्रायुर्वेद-इसमें हिताहित एवं सुख दुःखादि की दृष्टि से उपयुक्त एवं अन्य विषयों का आयु के साथ सम्बन्ध स्थापित किया जाता है, तब समस्त विषय श्रायुर्वेद के अन्तर्गत आते हैं। चाककार ने स्पष्ट कहा है कि "हिता हितं सुखं दुःखमायुः तस्यहिताहितम् । मानञ्च तच्च यच्चोक्तमायुर्वेद: स उच्यते ॥ "श्रतः इसी श्राधार (ग ) पर चरस्कार की 'यदिहारित उदन्यत्रयन हास्ति नतत्क्वचिद्' घोषणा वास्तविकता प्रदर्शित करती है । अथर्ववेद में भी अज्ञात औषधियों के रसगुण वीर्यादि जानकर अपनाने के लिये स्पष्ट निर्देश किया है। वस्तुत: वेद के मन्त्र भाग में बिस्म' शब्द श्रौपलाक्षणिक है जिससे कि समस्त ज्ञात विषयों को अभिव्यक्ति होती है याश्चाहं वेद वोलेधे याश्च पश्यामि चक्षुषा अज्ञाता जानीमश्च या यासुविद्म च संभतम् ॥ अथर्ववेदः आयुर्वेद के इस महत्वशाली दर्शन को समस्त आयुर्वेद की परीक्षाओं में प्रधानता दी जाती रही है । आज भी आयुर्वेद समाज में श्रायुर्वेद के दर्शन वेत्ता का ही सम्मान है । भारतीय चिकित्सा. परिषद् के पाठ्य व्रम में भी, जहां हाईस्कूल उत्तीर्ण छात्र भी प्रविष्ट होते हैं, एक स्वतन्त्र विषय का रूप दिया गया है। किन्तु हाईस्कूल उत्तीर्ण छात्रों के लिये यह विषय नवीनता के कारण कठिन हो जाता है। दूसरे यह भी कठिनाई है कि हिन्दी में श्रीमान् पं० रामरक्षपाठक के पदार्थ विज्ञान के अतिरिक्त कोई दूसरी उत्तम पुस्तक अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है जो कि विद्याथियों के लिये उपयोगी हो । मैंने इस पुस्तक को इसी आधार पर निर्मित किया है कि जिससे B.I.M.S. के छात्रों की कठिनाइयां दूर हो जायें । यद्यपि यह सत्य है कि पुस्तक अतिसंक्षिप्त सूत्र रूप से सगठित होने के कारण अध्यापन की दृष्टि से कठिन है, तथापि विद्यार्थियों के लिये अध्ययन की दृष्टि से उत्तम है। इस पुस्तक में सांख्यकारिका तर्क संग्रह, मुक्तावली का मगल्वाद एवं ईश्वरवाद का समूल हिन्दी में भावात्मक कथानक के रूप में चित्रण किया है जिससे कि विद्यार्थी सरलता से हृदयङगम कर सके। मैंने इस ग्रन्थ की रचना के समय उत्तर प्रदेश के इन्टरमीजिएट के तर्क शास्त्र के छात्रों का भी विचार रक्खा है, जिनके लिये भारतीय तर्कशास्त्र का उल्लेख मात्र हो जाता है किन्तु उचित पुस्तक न होने से विषय का समावेश नहीं हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है । प्राश है कि पाश्चात्य तशास्त्र जो कि वस्तुत: भारतीय दृष्टि से Lummenitalam winnamoradamomeran ww PM mymAM MommaravinaamannmmelanawanSamma kurtianmommastraEna , , (घ ) किसी प्रकार उपयोगी नहीं है उसके स्थान पर शीघ्र ही भारतीय दर्शन स्थान प्राप्त करेंगे एवं आधुनिक तर्कशास्त्र के पाठ्यक्रम में भी भारतीय दर्शन के विषयों का उल्ने व होगा जिससे कि भारतीय संस्कृत। भारतीय साहित्य एवं भारतीय दर्शन का उत्तम प्रचारहोवेगा। आजकल ग्रन्थ लेखक के लिये यह श्रावश्यक है कि वह एक ग्रन्थों की सूची प्रस्तुत करे जिससे कि उसकी विद्वत्ता की अभिव्यक्ति हो, जिसे कि मैं पूर्णतया निरर्थक समझता हूँ । दूसरा कार्य सहायक एवं आधारभूत ग्रन्थों के जावित लेखकों को धन्यवाद वितरण करना होता है, जो कि श्रावश्यक एवं भारतीय सभ्यतानुकून है, वस्तुतः विषय के प्रथम लेखक को ही ग्रन्थ निर्माण का श्रेय होता है बाद के लेखक केवल अनुकरण मात्र करते हैं। यद्यपि हिन्दी साहित्य में उच्चकोटि के दर्शन को पुस्तकों का अभाव है तथापि भारतीय दर्शन' ले० श्रीवलदेव उपाध्याय एवं पदार्थ विज्ञान, ले० रामरक्षपाठक दो उत्तम ग्रन्थ मुझे देखने को मिले हैं जिनका कि भाव भी मैंने ग्रहण किया है अत: उपर्यक्त लेखकों को धन्यवाद वितरण करना कर्तव्य समझता हूँ। परम श्रद्धव पूज्यबन्धु पं० गणेशदत्त सारस्वत, प्रादर. णीय प्राचार्य प्रवर, पं० विश्वनाथ द्विवेदी एवं पं० शिवदत्त शुक्ल एवं. बन्धुवर पं० गिरिजादयालु शुक्ल का आभारी हूँ जिन्होंने मुझे प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्षतया इस कार्य में प्रेरित किया । ग्रन्थ में प्रेस कार्य को अनभिज्ञता के कारण एवं प्रस के अधिका रियों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होते हुये भी समुचित निरीक्षणता की कठिनाइयों के कारण मुद्रण सम्बन्धी अनेक त्रुटियाँ हो गयी हैं। जिनके लिये मैं पाठकों से क्षमा प्रार्थी हूँ और विश्वास करता हूँ कि आगामी संस्करण में इन समस्त त्रुटियों का निराकरण कर दूंगा । इस समय इस प्रतिलिपि को ही आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ । श्राशा है श्राप इसको ग्रहण कर उचित सम्मति प्रदान करते हुर कृतार्थ करेंगे। सोधी टोला, लखनऊ १.१५५ त्र्यम्बकनाथ शर्मा, इतिशम् मैं " श्रीगणेशायनमः सांख्यकारिका ७ दु:खत्रया भिघाताजिज्ञासा तदपघातके हेतौ। दृष्टे साऽपार्था चेन्नै कान्तात्यन्ततो ऽभावात् ॥१॥ “स्वतन्त्रमव्ययंधाम सारस्वतमुपास्महे" भारतीय दर्शन, जो समस्त भूतल पर अपना आधिपत्य स्थापित किये हुआ है, श्रास्तिक तथा नास्तिक भेदों द्वारा दो भागों में विभक्त होता है। वेद को प्रमाण माननेवाले आस्तिक दर्शन तथा वेद को प्रमाण रूप से न मानने वाले नास्तिक दर्शन कहलाते हैं। न्याय- वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्वमीमांसा-उत्तरमीमांसा षट आस्तिक दर्शन तीन द्वन्द्वों में सीमित होते हैं । नास्तिक दर्शन में चार्वाक, बौद्ध, जैन पाशुपत, माहेश्वर श्रादि अनेकानेक महत्व पूर्ण दर्शन हैं | दर्शनशास्त्र सर्गादि उत्पत्ति से सन्ति तक की समस्त वस्तु स्थिति पर प्रकाश डालते हैं तथा मानवीय दु:खों के प्रान्त करने का मार्ग प्रदर्शनकर परम सुखदायक मोक्ष प्राप्ति के साधनों को भी अभिव्यक्त करते हैं। सांख्यदार्शनिक अाध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं अधिदैविक दुःखत्रय के नाश का एक मात्र उपाय सांख्यशास्त्र को हो मानते हैं। वे वात पित्तादि जनित एवं काम क्रोधादि जनित आध्यात्मिक, व्याघ्र चौरादिनित आधिभौतिक तथा दाह शोत यक्ष राक्षस विनायक ग्रहाद्यावेश निवन्धी आधिदैविक दु:खों के वर्तमान प्रसिद्ध उपायों को अन्यथा सिद्ध मानते हैं। उनका कथन है कि आध्यात्मिक दुःख के रसायनादि औषधि एवं मनोज्ञ स्त्री पान भोजन, आधिभौतिक के नीतिशास्त्राभ्यास निर्वाध स्थानादि सेवन, एवं आधिदैविक के मन्त्रादि निश्चित तथा स्थायी उपाय नहीं है।

ii [सां० का० दृष्टवदानुश्रविक: स ह्यविशुद्धिक्ष यातिशययुक्तः । तद्विपरीत: श्रेयान् व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥२॥ मूल प्रकृतरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृति न विकृतिः पुरुषः ॥३॥ दृष्टमनुमानमाप्तवचनं च सप्रमाण सिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाण मिष्ट प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि ||४|| इन्हीं अनिश्चित एवं अस्थायी उपायों के समान वेदविहित कर्मकाण डान्नगा ज्योतिष्टोमादि यज्ञ अाते हैं, जिनके द्वारा पुण्य को वृद्धि होकर स्वर्गादि इष्ट की सिद्धि होती है, किन्तु यज्ञ द्वारा संचित पुण्य के क्रमश: क्षय होने से पुन: दुःख की प्राप्ति होजाती है, अत: दुःखत्रय का. सफल, निश्चित एवं स्थायी उपाय ब्यक्त, अव्यक्त एवं ज्ञ का विशेष ज्ञान, प्राप्ति ही है । ब्यक्त पद से सोलह विकार, अव्यक्त पद से अष्टप्रकृति एवं ज्ञ पद से उदासीन पुरुष का ग्रहण होता है । सांख्या चायों ने सृष्टि में केवल २५ तत्व तथा किसी ने (पुरातन) २४ तत्व तथा अाधुनिक सांख्यों ने २६ तत्व माने हैं, जिससे कि समस्त सृष्टि की उत्पत्ति हुई । उत्पादक को प्रकृति एवं उत्पाद्य को विकार माना जाता है । समस्त सृष्टि के प्रधान उत्गदक को मूल प्रकृति कहते हैं । मूल प्रकृति से महान् . महान् से अहंकार, अहंकार से एकादश इन्द्रियां तथा प:च तन्मात्रायें, पञ्च बन्मात्र'ों से पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति होती है । महान् , अहंकार एवं पञ्च तन्मात्रायें उत्पाद्य होते हुए भी उत्पादक है अतः इन सात को प्रकृति विकृति दोनों रूप में मानते हैं ; एकादश इन्द्रियाँ तथा पञ्चमहाभूत किसी के उत्पादक नहीं हैं, केवल उत्पाद्य है, अत: इन्हें विकार ही कहते हैं । उदासीन पुरुष या ज्ञ न तो उत्पादक है, न उत्पाद्य, अतः इसे प्रकृति विकृतिरहित कहते हैं । अतः सांख्य २४, २५ या २६ तत्वों को प्रकृति प्रकृतिविकृति. विकृति एवं अप्रकृ तेविकृति भेद में सीमित, करता । इन पदार्थो को वस्तु स्थिति सिद्ध करने के लिये वह प्रत्यक्ष अनु- मान एवं शब्द प्रमाण को साधन मानता है । . है पदार्थ मीमांसा प्रतिविषयाध्यवसाया दृष्टं त्रिविधमनुमानमाख्यातम् । तल्लिङ्गलिङ्गिएर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनं तु ॥५॥ सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् । तस्मादपि चासिद्ध परोक्षमाप्तागमात् सिद्धम् ॥६॥ अतिदूरात् सामोप्यादिन्द्रियघात न्मनोऽनवस्थानात् । सौम्याद्व्यवधानादभिभवात् समानाभिहाराच्च ॥७॥ सौम्यात् तदनुपलब्धि भावात् कार्यतस्तदुपलब्धेः । महदादि तच्च कार्य प्रकृतिसरूपं विरूपं च ॥८॥ असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसम्भवाभावात् । प्रत्येक विषय के तदिन्द्रय जनित बुद्धि व्यापार को प्रत्य न कहते हैं, लिङ्ग का देख कर लिङ्गो को सिद्धि या लिंगी को देखकर लिग की सिद्धि अनुमान, जो कि पूर्ववत्, शेपवत् एवं सामान्यतो दृष्ट भेद से तीन प्रकार की होती है । वेदादि मलक एवं प्राप्तजनांकन वाक्य शब्द प्रमाण कहलाता है। सामान्यतया इन्द्रिय ग्रहण योग्य उपस्थित वस्तु का ज्ञान प्रत्यक्ष द्वारा, अतीन्द्रिय एवं अनुपस्थित वस्तु को सिद्धि अनुमान द्वारा, तथा शेष विषय की सिदि शब्द प्रमाण द्वारा की जाती हैं । प्रत्यक्ष प्रमाण में अतिदूर, अतिसामीप्य, इन्द्रियघात, अस्थिरमन, अतिसूक्ष्मता, ब्यवधान अभिभव एवं समानामिहार वाधक माने जाते हैं। प्रकृति या अव्यक्त केवल कल्पित या अभावस्वरूप नहीं कहा जा सकता, वह अतिसूक्ष्म है, अतिसूक्ष्मता के कारण प्रत्यक्ष नहीं होता, प्रकृति के महदादि कार्यों का, एवं तज्जनित क्रियाओं का साक्षात्कार होता है जो कि कुछ प्रकृति के समान धर्मवाले एवं कुछ प्रकृति के विरुद्ध धर्मवाले होते हैं, जिनकी कि सिद्धि अनुमान द्वारा या सत्कार्यवाद द्वारा की जाती विना सत् या कारण के सत्तात्मक कार्योत्पत्ति भी नहीं होसकती, अन्यथा असद्वाद मानने पर किसी भी वस्तु की उत्पत्ति किसी वस्तु से की जासकती है।

iv [सां. का. शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत् कार्यम् ||६|| हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिङ्गम् । सावयव परतन्त्रं व्यक्त विपरीतमव्यक्तम् ॥१०॥ त्रिगुणमविवेकि विश्य: सामान्यमचेतनं प्रसवधाम । व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथा च पुमान् ||११|| अत: असतस्तु कारण शून्य होती है तथा सद् वस्तु की उत्पत्ति में उपादान ग्रह ए किया जाता है । उपादान भी प्रति उपादेय का भिन्न भिन्न होता है। कर्ता भी शक्ति समन्वित होता है, और जब अन्य समस्त कारणों की भी उपस्थिति होतो है, तब सद् रूपी कार्य उत्पन्न होता है, जिसे सत्कार्यवाद कहते हैं यहाँ पर कारण में शक्ति की विशेषता स्वीकार करने पर सर्वसम्भव दोष नहीं पाता। यहाँ शङ्का यह है कि कारण में मत् मानने की जा कि कारण व्यापार के पहिले कल्पना की जाता है, यावश्यकता हो न रह जायगी। किन्तु इसका उत्तर यह है कि कारण में शक्ति विशेष कल्पना करने से जिस कारण से कार्य होगा उसी में सीमित रहेगी। यदि सर्वत्र स्वीकार की जाय तो समस्त कार्योत्पत्ति होने लगेगी, अतः जब कार्यों में कारण की शक्ति का सम्बन्ध मानना आवश्यक है तो सत्कार्य वाद मानना ही पड़ेगा, एवम् कार्यकारण अभेद होने से कारण सर्वदा सद्रूप होने से कार्य भी सत् रूप ही हो सकता है, असद् नहीं, अतः महान् अहे कारादि से अव्यक्त प्रकृति की सिद्धि सत्कार्य वाद द्वारा की जाती है । क्योंकि महान् तथा अहंकार हेतुम न् , अनित्य व्याप्त, सक्रिय, अनेक, श्राश्रित, चिन्हस्वरूप, त्रिगुणात्मक, पराधीन स्वरूप होते हैं। अतः उन्हें व्यक्त भी कहते हैं। मूल प्रकृति इन धमो से भिन्न तथा अव्यक्त स्वरूप मानी गई है। किन्तु प्रश्न यहाँ पर यह है, प्रकृति को हेतुमान् क्यों नहीं माना जाता है अत: इसका उत्तर यह है कि प्रकृति को हेतुमान् अनित्य आदि मानने पर अनवस्था दोष की प्राप्ति के अतिरिक्त कोई अन्य फल नहीं है।

। पदाथ मीमांसा ] प्रोत्यप्रीतिविपादात्मका: प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः । अन्योन्याभिभवाश्रय जननमिथुनबत्तयश्च गुणाः ।।१२।। सत्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चल ञ्च रजः । गुरु बरणकमेव तमः प्रदीपवन्चार्थतो वृत्तिः ॥१३॥ अविवेश्यादि: सिद्धस्वैगुण्यात् तद्विपर्ययाभावात् । कारणगुणात्मकत्वात् कार्यस्याव्यक्तमपि सिद्धम् ॥१४॥ भेदानी परिमाणात् समन्वयात् शक्तितः प्रवृत्तश्च । व्यक्त और अव्यक्त का साधर्म्य गुण्य अविवेकिता, अचेतन प्रसव- धर्भि, म ना गया है, किन्तु पुरुष निर्गुण, विवेकी, अविषय, असाधारण, चेतन तथा अप्रसवधर्मि है । त्रैगुण्य शब्द से सत्व, रज एवं तम का ग्रहण होता है । सत्व सुखात्मक, रज दुःखात्मक एवं तम मोहात्मक होता है प्रकाश प्रवृत्ति एवं नियमन क्रमश: इनके कार्य हैं । वस्तुतः प्रत्येक कार्य में तीनों गुण एक साथ प्रवृत्त होते हैं, किन्तु एक दोष प्राधान्य से सत्व रज एवं तम प्राधान्य कहलाते हैं वस्तुतः यह परस्पर अन्योऽन्या- भिभव, अन्योsऽन्याश्रय, अन्योन्यजनक अन्योन्यमिथुन, अन्योन्यवृत्ति माने गये हैं। इसी को पुन स्पष्ट करने के लिये प्रदीपवत् कार्य क्षमता स्वीकार की है । लघुता चञ्चलता और गुरुता भी सत्व रज-तम मे मानी गई है । धैगुण्ययुक्त वस्तु अविवेकी होती है; जहाँ पर त्रैगुण्य नहीं होता वह विवेकी होता है । क्योंकि कारणानुकूल ही कार्य सिद्ध हो चुका प्रश्न यह उपस्थित है कि महदादि द्वारा अनुमान कर लेने पर भी मूल प्रकृति का प्रत्यक्ष नहीं होता, अतः महान् श्रादि को ही कारण मानने में क्या आपत्ति है। सत्तात्मक वस्तु यद्यपि उसकी अनुपलब्धि भी हो जैसे पाषाण में गन्ध, तथापि उसे स्वीकार करना ही यथार्थ होता है। यदि यह कहा जाय कि महान् अहंकार आदि को ही प्रधान कारण मानना उचित है, निरर्थक महान् के कारण की कल्पना करनी ही अनुचित है, संगत नहीं होता ! महान् आदिक कार्य है क्योंकि यह व्यापक नहीं है । दूसरे सुख दुःख मोहादि से समानरूपतः संलग्न है। बह .. है कर सकता vi [स. का. कारण कार्य विभागादविभागाद्वैश्वरूप्यस्य ॥१५॥ कारणमस्त्यव्यक्तं प्रवर्तते त्रिगुणतः समुदयाच्च । परिणामतः सलिल वत् प्रतिप्रतिगुणाश्रयविशेषात् ॥१६॥ सङ्घातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात् । पुरुषोऽस्ति भोक्तभावात् कैवल्यार्थ प्रवृत्तश्च ॥१७॥ जन्ममरणकरणानां प्रतिनियमादयुगपत् प्रवृतश्च । तीसरे सामर्थ्यवान् पुरुप ही अपनी शक्ति के अनुकूल कार्य है। चौथे कार्यकारण में भेद मानना भी आवश्यक होता है। पाँचवें लयावस्था में सर्ग केवल एक रूप में ही लीन होता है, अत: महान् श्रादि से प्रकृति को भिन्न व्यापक मानना श्रावश्यक है । यह प्रकृति सत्वरज एवं तम गुणों के आधार पर असंख्य कार्योत्पत्ति करती है । जैसे वर्षा का जल जिस २ पाश्रय में जाता है, वहाँ वह उसी प्रकार के रूपों में परिवर्तित हो जाता है उदाहरणार्थ नारियल, नींबू, करेला प्रादिके रस । सुख दु:ख मोह जनक कार्य किसी अन्य के लिये होते हैं । दूसरे त्रिगुणात्मक द्रव्य का अभाव भी होता है जो कि केवल पुरुष में ही पाया जाता है । इस अचेतन शरीर में चेतनत्व प्रतिपादक कोई अन्य तत्व भी होता है जिसके द्वार चेतनता की उत्पत्ति होती है। व्यक्त एवं अव्यक्त के ज्ञान का कतो व्यक्त एवं अध्यक्त से भिन्न होता है वह साक्षी की भांति समस्त ज्ञान रखनेवाला होता है । इसी का मोज्ञ होता है इसी में मुमुक्षप्रवृत्ति पाई जाती है अतः “संघातपरार्थत्वाद् त्रिगुणादिविपर्ययाद् - अधिष्ठानाद् - भोक्तृभावात्. कैवल्यार्थ प्रवृत्तेः इत्यादि कारणों से पुरुष की सिद्धि निर्विवाद होती है। पुरुष अनेक हैं क्योंकि किसी का जन्म किसी का मरण भिन्न २ समय पर ही होता है। यदि एक पुरुष होता है तो समस्त पुरुषों का जन्म मरण साथ ही साथ होता, दूसरे सात्विक राजस एवं तामस भिन्न २ लक्ष्ण पुरुष में गोचर होते हैं । इसके अतिरिक्त पुरुषों में सुख दुःखादि भी पदार्थ मीमांसा ] vii पुरुषबहुत्वं सिद्ध त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥१८॥ तस्माच्च विपर्यासात् सिद्ध साक्षित्वमस्य पुरुषस्य । कवल्यं माध्यस्थ्यं द्रष्टवत्वमकत भावश्च ॥१६।। तस्मात् तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् । गुणकत त्वेऽपि तथा कर्तेव भवत्युदासीनः ॥२०॥ पुरुषस्यदशनाथ कैवल्यार्थ तथा प्रधानस्य । पवन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृत: सर्गः ॥२१॥ प्रकृतमहांस्ततोऽहङ्कारस्तस्माद्गणश्च षोडशकः । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पच्च भूतानि ॥२२॥ अध्यवमायो बुद्धिर्धों ज्ञानं विराग ऐश्वर्यम् । भिन्न २ प्रकार से ही उत्पन्न होता है। समस्त पुरुप सुखी या दुःखी नहीं होते अत: पुरुप असंख्य है, ऐसा ही सिद्ध होता है । त्रिगुणादि रहित पुरुष ही विवेकी, विवेकी ही साक्षी एवं त्रिगुणात्मकदु खातीत, उपकारापकारक्रियाशक्तिरहित. इच्छा द्वेषप्रयत्नादिशून्य माना गया है। प्रकृति पुरुष के संयोग होने पर चैतन्य स्वरूप भासित होती है, यद्यपि वह अचेतन ही है । उदासीन पुरुष भी प्रकृति के संयोग से सगुण तथा सक्रिय प्रतीत होता है, यद्यपि यह निर्गण एवं निष्क्रिय है। प्रकृतिपुरुषसंयोग दर्शन एवं मोक्षण के लिये होता है । प्रकृति अज्ञ है इसे ज्ञ पुरुप की आवश्यकता अपनी क्रियाओं के सम्पादनार्थ होती है। उसी प्रकार निष्क्रिय पुरुप को मोक्षार्थ क्रियाओं के उत्पादनाथ प्रकृति का संयोग करना पड़ता है क्योंकि यह स्वयं निष्क्रिय है। उदाहरण स्वरूप प्रकृति अज्ञ होने से अन्धी एवं पुरुष निष्क्रिय होने से लगड़ा है । पंगु एवं अन्ध का संयोग होजाने पर गमनागमन में सुगमता उत्पन्न हो जाती है। प्रकृति से बुद्धि, बुद्धि से अहंकार, अहंकार से एकादश इन्द्रियाँ एवं पञ्च तन्मात्राओं, पञ्च तन्मात्राों से पञ्च महाभूतों की उत्पत्ति होती है । बुद्धि का लक्षण 'अध्यवसन' है अर्थात् 'मुझे यह करना चाहिये' ऐसा निश्चय कर कार्यरत होना अध्यवसन कहलाता है । - viii [ सां० का. सात्विकमेतद्र पं तामसमेतद्विपर्यस्तम् ॥२३॥ अभिमानोऽहङ्कारस्तस्माद् द्विविधः प्रवर्तते सर्ग: ऐन्द्रिय एकादशकस्तन्मात्रापञ्चकश्चैव ॥२४॥ सात्विक एकादशक: प्रवर्तते वैकृतादहङ्कारात् । भूतादेस्तन्मात्र: स तामसस्तै जसादुभयम् ||२५|| बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरमनत्वगाख्यानि । वाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यकर्मेन्द्रियाण्याहुः ।।२६।। उभयात्मकमत्र मनः सङ्कल्पकमिन्द्रियं च साधर्म्यात् । गुण परिणामविशेषान्नानात्वं वाह्यभेदाश्च ॥२७|| रूपादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्तिः। वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥२८॥ स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैपा भवत्यसामान्या। अध्यवसन ही बुद्धितत्व का विशेष धर्म होने से इतर व्यावर्तक लक्षण माना जाता है । बुद्धि में अाठ गुण पाये जाते हैं जिन्हें धर्म-ज्ञान-विराग- ऐश्वर्य चार सात्विक, एवं अधर्म अज्ञान अवैराग्य-अनैश्वयं चार तामस गण कहलाते हैं । “मैं ही समर्थ हूँ" "मैं ही यह कर सकता हूँ" इस प्रकार का अभिमान ही अहंकार कहलाता है। यह अहंकार सात्विक, राजस एवं तामस भेद से तीन प्रकार का होता है। राजससहाययुक्त सात्विक अहंकार से एकादश इन्द्रियों तथा राजससहाययुक्त तामस अहंकार से पञ्च तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है । चक्षु-श्रोत्र-प्राण-रसन एवं स्पर्शनेन्द्रिय पञ्च ज्ञानेन्द्रिय हैं, वाक-पाणि-पाद-गुदा एवं, शिश्न पञ्च कर्मेन्द्रिय हैं। मन ज्ञानेन्द्रिय एवं कर्मेन्द्रिय उभशात्मक है, इस प्रकार ११ इन्द्रियाँ होती हैं । मन का लक्षण 'संकल्प विकल्प' माना गया है जोकि मन का कार्य भी है। ज्ञानेन्द्रियों का कार्य शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध का ग्रहण करना है तथा कर्मेन्द्रियों का कार्य वचन, आदान, विहरण, उत्सर्ग एवं अानन्द करना है । बुद्धि अहंकार एवं मन के क्रमशः अध्यवसाय-अभिमान एव संकल्प जो लक्षण किये जा चुके हैं, वे ही उनके असामान्य व्यापार भी माने गये हैं।

पदार्थ मीमांसा ] ix सामान्यकरणवृत्ति प्राणाद्या वायवः पञ्च ॥२६|| युगपच्चतुष्टयस्य हि वृत्तिः क्रमशश्च तस्यानिर्दिष्टा । दृष्टे तथाप्यदृष्टे त्रयस्य तत्पूर्षिका बृत्तिः ।।३०॥ स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकुतहेतुका बृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतुर्न केनचित् कार्यते करणम् ॥३१॥ करणं त्रयोदशविधं तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्य च तस्य दशधाऽऽहार्य धार्य प्राश्यं च ॥३सा अन्त:करणं त्रिविधं दशधा वाम त्रयस्य विषयाख्यम् । साम्प्रतकालं बाह्य त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम् ॥३३॥ बुद्धीन्द्रियाणि तेषां पञ्च विशेषाविशेषविषयाणि । हैं 1 प्राण, अपान. समान, उदान एवं व्यान जो शरीरस्थ पञ्च वायु हैं वह इन तीन अन्तःकरणों की साधारण व्यापार रूप में ग्रहण होती यह व्यापार बाह्य न्द्रियों से उत्पन्न होकर मन अहंकार एवं बुद्धि में क्रमश: उत्पन्न होता है। किन्तु प्रत्यक्ष ज्ञान में कभी २ चारो कारणों की क्रिया एक साथ भी उत्पन्न होती है जैसे अन्धकार में विद्य प्रकाश होने पर समीपस्थ सिंह को देख कर भाग खड़े होना । नेत्रों के आगे मच्छड़ आदि आने पर नेत्र का एकाएक स्वत: बन्द होजाना आदि । यह करण अपने विषय का प्रतिपादन परस्परापेक्ष ही करते हैं। पुरुषार्थ ही करणों की कार्य संलग्नता में कारण है, कोई दूसरा अन्य कारण नहीं है । करण अन्तः एवं बाह्य भेद से द्विविध माने गये हैं। महान् अहंकार एवं मन तीन अन्त:करण हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियां बाह्य करण मानी गई हैं जो कि संख्या में दस हैं। इन त्रयोदश करणों में बाहरण कार्य कर्मेन्द्रियों का, धारण कार्य महान् अहंकार एवं मन का, तथा प्रकाश कार्य बुद्धीन्द्रियों का व्यापार माना गया है। वायकरण केवल वर्तमान कालिक ज्ञान ही प्राप्त करते हैं, किन्तु श्राभ्यन्तर करण (भूत भविष्य एवं वर्तमान) त्रैकालिक शान प्राप्त करते हैं । बाह्यकरणों में पञ्च ज्ञानेन्द्रियों के विरोग एवं । ।

X [ सां० का० वाग्भवति शब्दविषया शेषाणि तु पञ्चविपयाणि ॥३४॥ सान्तःकरणा बुद्धिः सर्व विषयमवगाहते यस्मात् । तस्मात् त्रिविधं करणं द्वारि द्वाराणि शेषाणि ॥३५॥ एते प्रदापकल्पाः परस्पर विलक्षणा गुणविशेगः । कृरनं पुरुषस्यार्थ प्रकाश्य बुद्वौ प्रयच्छन्त ।।३६।। सर्व प्रत्युपभोगं तस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः । सैव च मिशिनष्टि पुन: प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम् ॥३७॥ तन्मात्रापविशेषास्तेभ्य भूतानि पञ्च प नभ्यः । एते स्मृता विशेषा: शान्ता घोराश्च मूढाश्च ॥३८॥ सूक्ष्मा मातापितृजा: सह प्रभूतस्त्रिधा विशेषाः स्युः । सूक्ष्माम्तेषां नियता मातापित ना निवर्तन्ते ॥३॥ अविशेष दो प्रकार के विषय माने गये हैं, विशेष पद से पञ्च भूतों का ग्रहण होता है जिसका कि साधारण पुरुष अनुभव करता है तथा अविशेष पद से पञ्चतन्मात्राों का ग्रहण होता है जिनका कि योगीजन ही प्रत्यक्ष कर सकते हैं । मन अहंकारयुक्तबुद्धि समस्त विषयों का ज्ञान करने में समर्थ है अत: त्रिविध अन्तःकरण का प्रधान करण तथा १० बाह यकरणों को सामान्य करण मानते हैं : इन त्रिविध अन्त:करणों में भी बुद्धि ही उत्तम है, जो कि वस्तुतः पुरुष के समस्त अर्थ को प्रकाशित करती है, बुद्धि ही भोगों का साधन है, विवेक ज्ञान का कारण है, एवं मोक्ष का श्राधार है। पञ्चतन्मात्राओं में भोग क्षमता शान्तत्वादि गुण नहीं रहते, अतः इन्हें विशेषसंज्ञा दी है। किन्तु इन पञ्चतन्मात्राओं से उत्पन्न पञ्चमहाभूत विशेष एव सत्व प्राधान्य होने से शान्त, सुखात्मक एवं लघु, रजोगुण प्राधान्य होने से घोर एवं दु:खकर, एवं तमोगुण प्राधान्य होने से मोहात्मक एवं गुरु गुण वाले होते हैं। यह विशेषपञ्चमहाभूत सूदम मातापितृज एवं प्रभूत भेद से तीन प्रकार के होते हैं। सूक्ष्मविशेष पञ्चमहाभूत नित्य है, लिंग शरीर में मुक्तिकाल तक रहते हैं । माता पितृज तथा प्रभूत अनित्य है।

xi पदार्थ मीमांसा ] पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदा दिसूक्ष्मपर्यन्तम् । संसरति निरुपभोग भावैरविवासितं लिङ्गम् ॥४०॥ चित्रं यथाश्रयमते स्थाएवादिभ्यो विना यथा छाया । तद्वद्विना विशेषैस्तिष्ठति न निराश्रयं लिङ्गम् ॥४१|| पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनमित्तिकप्रसङ्ग न । प्रकृतेर्विभुत्वयं गानटवद्व्यवतिष्ठते लिङ्गम् ॥४६॥ सांसिद्धिकाश्च भावा: प्राकृतिका वैकृतिकाश्च धर्माद्याः । दृष्टाः करणायिण: कार्याश्रवणश्च कललीद्याः ॥४३॥ धर्मेण गमन र्ध्व गमनमधस्ताद् भवत्यधमण् । सूक्ष्म शरीर महान् यह कार मन एवं दस इन्द्रियों के साथ २ सूक्ष्म पञ्चमहाभूतों से निर्मित होता है, इस प्रकार श्रष्टादश तत्वों से निर्मित सूक्ष्म पुरुष माना जाता है, जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न होता है, जिसकी गति अव्याहत है, जो प्रत्येक आत्मा के साथ अलग २ सम्बन्ध करता है, पिना स्यून शरीर के भोग करने में असमर्थ, धर्मादि अष्ट भावों से संबन्वित है। त्रयोदश करण विना विशेष पञ्चमहाभूतों के नहीं रह सकते जैसे बिना पाश्रय के चित्र, विना स्तम्भादि के छाया नहीं रह सकती अतः पञ्च सूक्ष्म पञ्चमहाभूतों की सत्ता मानना आवश्यक है। यह सूक्ष्म शरीर धर्मादि निमित्त और धर्मादि निमित्तजन्य स्थूल देह के संयोग से नट के समान अनेकानेक रूप धारण करता है अनेकरूपधारण ता में ही पुरुष का परम लक्ष्य निहित है। यह अनेक रूपता प्रभुता से प्राप्त हो जाती है। धर्मादि भाव प्राकृतिक एवं वैकृतिक दो प्रकार के होते हैं, जो कि सांसिद्धिक है । प्राकृतिक भाव सनकादि में जिन्हें जन्म से ही सद्ज्ञान की उपस्थिति थी, माने जाते हैं । वैकृतिक भाव सर्वसाधारण जीवों में माने जाते हैं जिनके आधार पर जीवों का जन्म एवं मरण स्थिर है। धर्म से उर्ध्वगति देवादि योनि की प्राप्ति, अधर्म से अधोगमन पशु पक्षि योनि की प्राप्ति, ज्ञान से मुक्ति, श्रज्ञान से बंधन, वैराग्य से ।

xii [स० का ज्ञानेन चापवर्गो विपर्ययादिष्यते बन्धः ॥४४॥ वैराग्यात् प्रकृतिलय: संसारो भवति राजसाद्रागात् । ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात् तद्विपर्यासः ॥४५॥ एष प्रत्ययसर्गो विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्धयाख्यः । गुणवैषम्यविमर्दात् तस्य च भेदास्तु पञ्चाशत् ।।४६|| पञ्च विपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिस्तु करणवैकल्यात् । अष्टाविशतिभेदा तुष्टि वधाऽष्टधा सिद्धिः ॥४७॥ भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधो महामोहः । तामिस्रोऽष्टादशधा तथा भवत्यन्धतामिस्रः ।।४८|| एकादशे न्द्रयवधा: सह बुद्धिबधैरशक्तिरुद्दिष्टा । सप्तदशधा च बुद्ध विपर्ययात् तुष्टिसिद्धीनाम् ।।४।। आध्यात्मिक्यश्चतस्र: प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः । बाह्या विषयो परमात् पञ्च नव तुष्टयोऽभिमताः ॥१०॥ प्रकृति का लय, अवैराग्य से रागद्वषादि जनित प्रकृति संसरण, ऐश्वर्य से कामनासिद्धि तथा अनैश्यर्य से कामनाओं का हनन होता है। यह धर्मादिजनितसर्ग बुद्धितत्व को सृष्टि बौद्धि कसर्ग या प्रत्ययसर्ग कहलाता है । इस प्रत्ययसग को विपर्यय-अशक्ति-तुष्टि एवं. सिद्धि चार भागो में सीमित करते है । विपर्यय के तम-मोह-महामोह तामिस्र एवं अन्धतामिस पाच भेद है । इस विपर्यय के पञ्च भेदों के पुनः भेद होते हैं जैसे तम के पाठ, मोह के पाठ , महामोह के दस, तामिस्र के अद्यारह एवं अन्ध तामिस्र के भी अठारह भेद हो जाते है इस प्रकार ६२ भेद होते हैं । अराक्ति के ११ बुद्धिवध के साथ २ एकादश इन्द्रियों का कार्याभाव, एवं नौ तुष्टि तथा पाठसिद्धियों के विपर्यय जो संख्या में सत्रह होते हैं अत: २८ भेद माने जाते है तुष्टिं प्रकृति उपादान काल एवं भाग्य नाम की चार श्राध्यात्मिकी होती तथा पाचों विषयों से वैराग्य होने से पाच प्रकार की वाह्य तुष्टि होती है, जो मिलाकर नौ प्रकार की हो जाती है। ।

पदार्थ मीमांसा] xiii ऊहः शब्दोऽध्ययन दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तः। दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्ध: पूर्वोऽङ्क शस्त्रिविधः ॥५१॥ न विना भ वैलिङ्गन विना लिङ्गन भावनिवृत्तिः । लिङ्गाख्यो भावाख्यस्तस्माद् द्विविधः प्रवर्तते सर्गः ॥५२॥ अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्यानश्च पञ्चधा भवति । मानुष्यश्चै कावधः समासतो भौतकः सर्गः ॥५३॥ ऊर्ध सत्वविशालस्तमःविशालश्च मूलतः सर्गः मध्ये रजोविशालो ब्रह्मा दिस्तम्बपर्यन्तः ।।५४|| तत्र जरामरणकृतं दुःखं प्राप्नोति चेतनः पुरुषः । सिद्धियाँ--ऊह शब्द, अध्ययन, आध्यात्मिकदु:खविधात, श्राधिदैविकदु- :ख विघात आधिभौतिकदुःखविघात, सुहृतप्राप्ति, एवं दान पाठ सिद्धि मानो गई है ( तारतारसुतारप्रमोदमुदितमोदमानरम्यकसदामुदिताख्या: सिद्धयः)। इस सिद्धि की सिद्धि में विपर्यय, अशक्ति एवं तुष्टि तीन वाधक या अंकुशस्वरूप माने गये हैं । इस धर्माधर्मादि के बिना भौतिक सर्ग की प्राप्ति नहीं, और बिना भौतिक सर्ग के धर्माधर्मादि अष्टभावों की उत्पत्ति नहीं होती अतः लिङ्गाख्य और भावाख्य दो प्रकार की सृष्टि मानी ज ती है । यह भौतिकसर्ग ब्राह्म, प्राजापत्य, ऐन्द्र, गन्धर्व, याक्ष, राक्षस. एवं पैशाच अष्टदेवयोनि, पशु, पक्षि, सरीसृप, कीट, एवं स्थावर पाँच प्रकार की तिर्यग्योनि एवं मनुष्य योनि, संक्षेप. तया भौतिक सर्ग माना जाता है । अष्ट दैवयोनियों में सत्वगुण प्रधान रूप से रहता है और इनका स्थान भूलोक से ऊर्ध्वभाग में है । पञ्च तिर्यग्योनियों में तमोगण की प्रधानता मिलती है अत: इनका स्थान भूलोक से नीचे है। मध्यस्थान भूलोक में मनुष्य निवास करते है जिनमें रजोगुण की प्राधान्यता पाई जाती है । यह समस्त सृष्टियां दु:खदायक है, जब यह ज्ञान वस्तुतः उत्पन्न हो जाता है उस समय वैराग्योत्पत्ति होती है क्योंकि जरामरणा दिजन्य दुःख चेतन पुरुष को ही प्राप्त होता है अथवा जब तक प्रकृति से मुक्ति नहीं होती तब तक दु:स्व.स्वाभा- विकतया पुरुष को प्राप्त रहता ही है 'परिणामतापसंस्कारदुःखेर्गणवृत्ति- ना - xiv [ सां. का. लिङ्गस्या विनिवृत्त स्तस्माद् दु:खं स्वभावेन ॥५५|| इत्येष प्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः प्रतिपुरुषविमोक्षार्थ स्वार्थ इव परार्थ श्रारम्भः ।।५.६।। वत्सविवृद्धि निमित्त क्षीरस्य यथा प्रवृत्तिरज्ञस्य । पुरुषविमोक्षनिमित्त तथा प्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥५७॥ औत्सुक्यनिवृत्यर्थ यया क्रियासु प्रवर्तते लोकः । पुरुषस्य विमोक्षार्थ प्रवर्तते तद्वदव्यक्तम् ॥५८|| रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा नत्यात् । पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृतिः ॥५६॥ नानाविधैरुपायैरुपकारिण्यनुपकारिणः पुंसः । गुणवत्यगुणस्य सतस्तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥६०॥ प्रकृतेः सुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीति मे मतिर्भवति । या दृष्टाऽस्मीति पुनर्न दर्शनमुपैति पुरुषस्य ।।६१|| विरोधाच्चसर्वमेवदुःखं विवेकिनः' । वस्तुत: प्रकृतिजन्य महदादि से पञ्च महाभूतों तक का समस्त कार्य- कलाप जब पुरुष को मुक्त करने के लिये अपने कार्य की भांति ही पुरुष के निमित्त कार्य करने लगता है, तब पुरुष मोक्षावस्था में पहुँचता हैं । यद्यपि महदादि जड़ है तथापि उनमं स्तन्य की भांति किया उत्पन्न होती है। स्तन्य भी जड़ है, किन्तु उसमें वत्सोत्पत्ति के पश्चाद् इस रक्षा के निमित्त क्रिया होती है जिससे कि वत्स का जीवन वद्ध नादि क्रियाए होती हैं । यह प्रकृति अपनी उत्सुकता को दूर करने के लिये, पुरुष को मुक्ति करने के लिये सक्रिय होती है जैसे कि पुरुष समूह अपनी कौतूहलता दूर करने के लिये अनेक कार्यों को करता है। यह प्रकृति पुरुष की आत्मा को प्रकाशित कर, जैसे वेश्या रङ्गमंच पर अपनी समस्त नृत्य क्रियाओं को दिखा देने के पश्चाद् विरत होती है, तद्वत् सम्बन्ध भंग करती है। प्रकृति अनेक उपायों से पुरुष का उपकार ही करती है। वह गुणवती है अतः निगुण पुरुष से किसी प्रकार के प्रत्युपकार की आकांक्षा नहीं करती । प्रकृति अत्यधिक सुकुमार है जो . ।

XV . पदार्थ मीमांसा ] तस्मान्न बध्यते नापि मुच्यते नापि संसरति कश्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः ।।६२।। रूपैः सप्तभिरेव तु वनात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः । मैव च पुरुषार्थ प्रति विमोचयत्येकरूपेण ।।६३।। एवं तत्वाभ्यासान्ना स्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्ध केवल मुत्पद्यते ज्ञानम् ।।६४।। तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् । प्रकृतिं पश्यति पुरुषः प्रेक्षकवदवस्थित: स्वस्थः ॥६५|| दृष्टा मयेत्युपेक्षक एको दृष्टाऽहमित्युपरमत्यन्या । सति संयोगेऽपि तयोः प्रयोजनं नास्ति सर्गस्य ।।६६।। कि एक बार पुरुष के साक्षात्कार कर लेने पर पुनः सम्मुख नहीं पाती। अात्मा स्वाभाविक सुख दु:खादि रहित है अतः श्रात्मा का बंधन संसरगा एवं म.क्षण नहीं होता । यह अष्टरुपा प्रकृति में या वस्तुतः प्रकृति के प्रथमपरिणाम बुद्ध में ही बन्धनादिक होते है जिनका कि भास अात्मा में प्रतीत होता है अतः भ्रमवश अात्मा में बन्धन, मोक्षण आदि का व्यवहार होता है । पुरुपयुक्त प्रकृति अपनी यात्मा को अपने धर्म-वैराग्य ऐश्वर्य अधर्म-अज्ञान-अवैराग्य-अनैश्वर्य सप्तरुपों से बन्धन करती है और केवल ज्ञान से अपनी श्रात्मा का मोक्षण करती है। पञ्चविशति तत्वों के पुन: २ चिन्तन से मैं कर्ता नहीं हूँ' 'मेरा कोई सम्बन्धी नहीं है' 'मैं, यह अहंकारयुक्त ज्ञान-वास्तविक नहीं है। 'मैं किसी क्रिया यादि का आधार नहीं हूँ' इस प्रकार का जब पूर्ण ज्ञान संशयादि रहित रूप में उत्पन्न होता हैं तब यह कैवल्य ज्ञान कहलाता है । इस कैवल्त ज्ञान से दृष्टा पुरुप अर्थवश सप्तरूपोरहित, प्रपञ्चादि- शून्य प्रकृति को दृष्टिगोचर कर लेता है अतः प्रकृति के प्रत्यक्ष भूतकर लेने पर पुरुष प्रकृति से और प्रकृति पुरुष से स्वतन्त्र होती है। यद्यपि प्रकृति पुरुष संयोग नित्य है तथापि प्रकृति दर्शन के पश्चाद् पुनः सर्ग का प्रयोजन नहीं रहता ।

xvi [सां. का० सम्यग्शानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ । तिष्ठति संस्कारवशाच्चभ्रमिवद्धृतशरीरः ।।६७।। प्राप्ते शरीर मेदे चरितार्थत्वात् प्रधान विनिवृत्तौ । ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥६८|| पुरुषार्थ ज्ञानमिदं गुह्य परमर्पिणा समाख्यातम् । स्थित्युत्पत्तिप्रलयाश्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ।।६६।। एतत् पवित्रमग्रयं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ । बासुरिरपि पञ्चशिखाय तेन च बहुधा कृतं तन्त्रम् ।।७०) शिष्यपरम्परयाऽऽगतमीश्वरकृष्णेन चंतदार्याभिः संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग विज्ञाय सिद्धान्तम् ।।७१।। सप्तत्यां किल येऽर्थास्तेऽर्थाः कृत्स्नस्य षष्ठितन्त्रस्य आख्यायिकाविरहिताः परवादविवर्जिताश्चापि ॥७२॥ इस कैवल्प ज्ञान के पश्चाद् यद्यपि जीव कुछ धर्मादिनिमित्त कार्य करता है, जो कार्य केवल पूर्व संस्कार के वश ही होता है, जिनका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता । वस्तुत: सद्ज्ञान द्वारा धर्माधर्मादि भावों का लय हो जाता है केवल चलाये हुये चक्र के समान शरीर भी कुछ क्रियायें अवश्य करता है जिनका कि कोई प्रयोजन नहीं है । कैवल्य ज्ञानी पुरुष को शरीर निर्माण के पश्चात एवं प्रकृति प्रपञ्च से रहित होने पर ऐकान्तिक तथा प्रात्यन्तिक दो प्रकार की मुक्ति प्राप्ति होती हैं। * इतिशम् * .. श्रीदुर्गायै नमः तर्कसंग्रहः निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम् । बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसंग्रहः । द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाभावाः सप्तैव पदार्थाः। द्रव्याणि पृथि व्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि नवैव । रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापार माणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्वस्नेहशब्दबुद्धिसुग्वदुःखे- च्छाद पप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराश्चतुर्विशतिर्गुणा: । उत्क्षेपणापक्षेपणाक वनप्रसारणगमनानि पञ्चकर्माणि । परमपरं चेति द्विविधं सामान्यम् । नित्यद्रव्यवृत्तयो विशेषास्त्वनन्ता. एव । समवायवेक एव । अभावश्च- तुर्विधः प्रागभावःप्रध्वंसाभावोऽत्यन्ताभावोऽन्योन्याभावश्चेति । तत्र गन्ध वती पृथिवी। सा द्विविधा नित्याऽनित्या च । नित्यापरमाणुरूपा ।अनित्या कार्यरूपा। पुनस्त्रिविधा, शरीरेन्द्रियविषयभेदात्, शरीरमस्मदादीनाम् । "विश्वेश्वरी तामखिलांनमामि" द्रव्य गण कर्म सामान्य विशेष समवाय एवं प्रभाव सात पदार्थ हैं। द्रव्य पदार्थ से पृथ्वो जल तेज वायु आकाश काल दिशा प्रात्मा एवं मन का ग्रहण होता है । गुणपदार्थ में शब्द स्पर्श रूप रस गंध संख्या परिमाण पृथकत्व संयोगविभाग परत्वअपरत्वगरुत्व द्रवत्व स्नेह बुद्धि सुख दुःव इच्छा द्वष प्रयत्न धर्म अधर्म एवं संस्कार २४ गुणों का समावेश है। कर्म के उत्क्षेपण अपक्षेपण अाकुञ्चन प्रसारण एवं गमन पाँच भेद हैं । सामान्य पर एवं अपर भेद से दो प्रकार का है । नित्य द्रव्यों में वृत्तिवाला विशेष के अनन्त भेद हैं। नित्यतायुक्त अनेक पदार्थों में रहनेवाला समवाय सम्बन्ध एक है । अभाव प्रागभाव प्रध्वंसाभाव अत्यन्ताभाव एवं अन्योन्याभाव भेद से चार प्रकार का माना गया है । जिस पदार्थ में गन्ध समवाय सम्बन्ध से हो उसे पृथ्वी, शीतलस्पर्श हो जल, उष्णस्पर्श हो तेज, रूप का अभाव होते हुए अनु ब्णा, शीतस्पर्श हो वायु, कहते हैं। यह चारो द्रव्य नित्य एवं अनित्य भेट माने गए । xviii [ तर्कसंग्रहः इन्द्रियं गन्धग्राहकं घ्राणं नासामचर्ति विषेधो मृत्पाषाणादिः । शीतस्पर्श- बत्यप्रापः। ता द्विविधाः नित्या अनित्याश्च । नित्या परमाणु रूपाः, अनित्या कार्यरूपाः, पुनस्त्रिविधा:शरोरेन्द्रियविषयभेदात् । शरीरं वरुणलोके, इन्द्रिय रसग्राहक रसनं जिह्वायवर्ति, विषयः सरित्समुद्रादि । उष्णस्पर्शवत्तेजः। तच्च द्विविधंनित्यमनित्यञ्च, नित्यं परमाणुरूपम्। अनित्यं कार्यरूपम्। पुनस्त्रिविधं शरीरेंन्द्रियविषयभेदात् शरीरमादित्यलोके । इन्द्रिय रूंपग्राहक चक्षुःकृष्ण 'ताराप्रवर्ति । विषयश्चतुर्विधः, भौमदिव्यौदर्याकरजभेदात् । भौमं वह्नया- दिकम् । अबिन्धन दिव्यं विद्यु दादि । भुक्तस्य परिणाम हेतुरौद्र्यम् । प्राकरजं सुवर्णादि । रूपरहितस्पर्शवान् वायुः । स द्विविधः नित्योऽनित्य- श्च । नित्यः परमाणुरूपः । अनित्यः कार्यरूपः, पुनस्त्रिविधः शरीरेन्द्रि- यविषयभेदात् शरीरं वायुलोके । इन्द्रियं स्पर्शग्राहकं त्वक सर्वशरिवर्ति, विषयो वृक्षादिकम्पनहेतुः । शरीरान्तः सञ्चारी वायु: प्राणः, स एको- से दो प्रकार के है । नित्यः परमाणुरूप में एवं अनित्य कार्य रूप में माने जाते है। इन चारो द्रव्यों के अनित्यरूप के शरीर इन्द्रिय एवं विषय तीन भेद पुनः होते है । पार्थिव शरीर मनुष्यों का है। पार्थिव इन्द्रिय मनुष्यों में घ्राणेन्द्रिय है, जो कि नासाग्र स्थित गन्ध का ग्रहण करती है, विषय मृत्तिका पाषाण आदि हैं । जलीय शरार वरुणलोक में पाया जाता हैं इन्द्रिय जिह्वा के अग्रभाग में स्थित रसग्राहक रसने न्द्रिय है और विषय नदीनदसमुद्रादि माने गए हैं। तेजसशरीर सूर्यलोक में पाया जाता है । इन्दिय नेत्र के कृष्णताराग्रवर्ति रूपमा हक चक्ष रिन्द्रिय है । तैजसविषय भौम दिव्य औदर्य एवं आकरज भेद से पुनः चार भागों में विभक्त करते हैं। काष्ठादिजदित अग्नि भौम है । आकाशीय विद्य तादि दिव्य तेज हैं । औदर्य तेज जठराग्नि है। पाक. रज सुवर्णादि धातु जनित कान्ति है। वायवीय शरीर पिशाचादि का वायु लोक में पाया जाता है । इन्द्रिय त्वक है जो कि समस्त शरीर मैं स्थित स्पर्श ग्राहक है । वृक्षादिकों को कम्पित करने वाली वायु विषय है । यह विषयात्मकवायु शरीर के अन्दर स्थान एवंकार्य भेद से प्राण अपान समान उदान एवं व्यान नामो से व्यवहत होती है। समवाय - 1 । -- - । पदार्थ मीमांसा] xix ऽप्युपाधिभेदात् प्राणापानादि संज्ञा, लभते । शब्दगुणकमाकाशम् तच्चैकं. विभु नित्यञ्च । अतीतादिव्यवहारहेतु; कालः । सचैको विभुनित्यश्च । प्राच्या दिव्यवहारहेतुर्दिक। साचै का नित्या, विभ्वी च । ज्ञानाधिकरण- मात्मा स द्विविधः परमात्मा जीवात्मा चेति । तत्र ईश्वरः सर्वशः परमात्म एक एव । जीवात्मा प्रतिशरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च । सुखाद्य पलब्धिा, साधनमिन्द्रियं मनः तच्च प्रत्यात्म नियतत्वादनन्तं परमाणुरूपं नित्य- ञ्च । चक्षुर्मात्रग्राह्यो गुणो रूपं तच्च शुक्लनीलपीतरक्त हरितकपिश- चित्रभेदात्सप्तविधं, पृथ्वीजलतेजोवृत्ति । तत्र पृथिव्यां सप्तविधम् । अभास्वरशुरलं जले भास्त्ररशुक्लं तेजसि । रसनानाशो गुणो रसः । स. च मधुराम्ललवण कटुकषायतिक्तभेदात् घडविधः । पृथिवीजलवृत्तिः पृथिव्यां षड्विधः । जले मधुर एव। प्राणग्राह्यो गुणो गन्धः । स द्विविधः । सुरभिरसुरभिश्च । पृथ्वीमात्रवृत्तिः । त्वगिन्द्रियमात्रग्राह्यो सम्बन्ध से शब्दगुण का अाश्रय आकाश है जो कि एक विभु एवं नित्य माना गया है । भूतभविष्यादि के व्यवहार का कारण काल हैं. यह भी एक विभु एवं नित्य है । पूर्वपश्चिम आदि के ज्ञान का कारण दिशा, है, जो कि एक नित्य एवं विभु गुणवाली है। ज्ञानसमवायसम्बन्ध से. जिस अधिकरण में रहता है उसे श्रात्मा कहते हैं। इसके जीवात्मा तथा परमात्मा नामक दो भेद हैं। समस्त वेता साचात् परमेश्वर ही परमात्मा, हैं। जीवात्मा यद्यपि प्रतिशरीर में भिन्न २ प्रतीत होता है तथापि वह विभु एवं नित्य है । सुख दु:खके उपलब्धि ज्ञान की साधनभूत इन्द्रिय ही मन है। वह प्रत्येक जीवात्मा में स्थित होने से अनन्त परमाणुरूप एवं नित्य माना गया है। चचुरिन्द्रिय द्वारा जिस गुण का ग्रहण होता है, उसे, रूप कहते है यह श्वेत नील पीत रक्त हरित भरा एव चितकारा भेद से सात प्रकार का होता है । पृथ्वी जल एवं तेज में पाया जाता है। पृथ्वी में सातो वर्ण जल में केवल प्रभास्वर शुक्ल एवं तेज में भास्वर शुक्ल है। रसनेन्द्रिय द्वारा ग्राह्य गुण रस कहलाता है । यह मधुर अम्ल बनण कटु कषाय एवं तिक्त भेद से के प्रकार का होता है । रस पृथ्वी एवं जल में पाया जाता है पृथ्वी में, ६ प्रकार के रस तथा जल में केवल ।

XX [ तर्कसंग्रहः गुण: स्पर्शः । स च त्रिविधः शीतोष्णानुष्णाशीतभेदात् । पृथिव्यप्तेजो वायुवृत्तिः । तत्र शीतो जले, उष्णस्तेजसि । अनुष्णाशीतः पृथिवीवा- मोः। रूपादिचतुष्टयं पृथिव्यां पाकजमनित्यं च । अन्यत्रापाकज नित्यनित्यम्च । नित्यगतं नित्यम् । अनित्यगतमनित्यम् । एकत्वादि- व्यवहाराऽसाधारणहेतु: संख्या । सा नवद्रव्यवृत्तिः । एकत्वादिपरार्धप- यन्ता एकत्वं नित्यमनित्यञ्च । नित्यगतं नित्यम्, अनित्यगतमनित्यम् । द्वित्वादिकं तु सवत्रानित्यमेव | मानव्यवहारासाधारणकारणं परिमाणम् । नवद्रव्यवृत्ति । तच्चतुर्विधम्, अणुमहद्दीर्घ ह्रस्वं चेति । पृथग्व्यवहारा- साधारण कारणं पृथक्त्वम् । सर्वद्रव्यबृत्तिः । संयुक्तव्यवहारासाधारणो हेतु: संयोगः, नवव्यवृत्तिः । संयोगनाशको गुणोविभागः नवद्रव्यवृत्तिः । परापरव्यवहारासाधारणे कारणे परत्वापरत्वे । ते द्विविधे दिक्कृते मधुर रस पाया जाता है । घ्राणेन्द्रिय द्वारा गृहीत गुण गन्ध कहलाता है। यह सुगन्ध एवं दुर्गन्ध भेद से दो प्रकार का होता हैं। केवल पृथ्वी में रहता है । त्वगिन्द्रिय द्वारा ग्राह्य गुण स्पर्श कहलाता है। यह शीत उष्ण एवं अनुष्णाशीत भेद से तीन प्रकार का होता है। पृथ्वी नल तेज एव वायु में यह पाया जाता है । जल में शीत तेज में उठण और पृथ्वी एवं वायु में अनुष्णा शीत स्पर्श रहता है। रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श पृथ्वी में पाक क्रिया द्वारा उत्पन्न होते हैं तो अनित्य है। नल तेज एवं वायु में पाक क्रिया उत्पन्न नहीं होती। येह नित्यद्रव्य में नित्य एव अनित्य द्रव्य में अनित्य माने जाते है । एकत्व श्रादि व्यवहार का असाधारण कारण संख्या है। यह नवों द्रव्यों में रहती है। एक से परार्धातक गणना होती है , एक संख्या नित्य- द्रव्यों में निस्य एवं अनित्य द्रब्यों में अनित्य मानी गई है दो, तीन आदि सर्वत्र अनित्य है। मान के व्यवहार का असाधारण कारण परिमाण कहलाता है यह परिमाण नवों द्रव्यों में रहता है । अण महद् दीर्घ एवं ह्रस्व भेद से चार प्रकार का माना गया है। भिन्नता के द्योतन के असाधारण कारण को पृथकत्व कहते हैं । यह समस्त द्रव्यों में पाया जाता है। परस्पर मिलन सम्बन्धी 'व्यापार के असाधारण कारण को संयोग कहते हैं।

पदार्थ मीमांसा ] xxi कालकृते च दूरस्थे दिक्कृतं परत्वं । समीपस्थे दिक्कृतमपरत्वम् । कनि- प्ठे कालकृतमपरत्वम् । श्राद्यपतनासमवायिकारण गुरुत्वम् । पृथिवी जलवृत्ति । श्राद्यम्यन्दनासमवायिकारणं द्रवत्वम् । पृथिव्यप्तेजोवृत्तिः । तद्विविधम् । सांसिद्धिकनैमित्तिकञ्च, तत्र सांसिद्धिकं जले । नैमित्तिकं पृथिवीतेजसोः । पृथिव्यामग्निसंयोगजं द्रवत्वम् तेजसि सुवर्णादौ । चूर्णा- दिपिण्डीभावहेतुर्गुण: स्नेहः । जलमात्रवृत्तिः । श्रोत्रग्राह्यो गुणः शब्दः । श्राकाशमात्रवृत्तिः । स द्विविधः । ध्वन्यात्मको वर्णात्मकश्च । तत्र ध्व. न्यात्मको भेर्यादौ । वर्णात्मक: संस्कृतभाषारूपः । सर्वव्यवहार हेतुबुद्धि नवो द्रव्यों में रहता है ।पयोग साक्षात्संयोग एवं संयोगजन्म संयोग भेद से दो प्रकार का होता है । संयोग के नाशक गुण को विभाग कहते हैं । यह विभाग नवों द्रव्यों में पाया जाता है। यह भी कर्मज एवं विभागज भेद से दो प्रकार का माना गया है । दूर एवं समीप के व्यवहार का असाधारण कारण परत्व तथा अपरत्व माना गया है। यह दैशिक एवं कालिक सम्बन्ध से दो प्रकार का माना गया है । दिशा जनित दूरस्थ दैशिक परत्व एवं समीपता दैशिक अपरत्व है। आयु की अधिकता कालिकेपरत्व है एवं श्रायु की न्यूनता कालिक अपरत्व है। श्राद्य पतन का जो असमवायिकारण. वह गुरुत्व गुण कहलाता है । यह पृथ्वी एवं नल में पाया- आता है । श्राद्य स्यन्दन के असमवायिकारण, को द्रवत्व कहते हैं । यह पृथ्वी जल एवं तेज में रहता है । सांसिद्धिक एवं नैमित्तिक भेद से दो प्रकार का होता है। सांसिद्धिक द्रवत्व केवल जल में पाया जाता है। नैमित्तिक द्रवत्व पृथ्वी और तेज में रहता है जोकि अग्नि संयोग से पार्थिव द्रव्यों में एवं तेजस सुवर्णादि में प्राप्त होता है। पार्थिव चूर्ण के पिण्डीभाव का असाधारण कारण जो गुण, उसे स्नेह कहते हैं। यह केवल जल में रहता है। श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा गृहीत गुण शब्द कहलाता है। केवल आकाश में रहता है। वन्यात्मक एवं वर्णात्मक भेद से दो प्रकार का होता है। ध्वन्यात्मकं शन्द नगाड़ा ढोलक श्रादि में एवं वर्णात्मक 'भाषा में उत्पन्न होता है। समस्त व्यवहार के ज्ञान का जो असाधारण गुण ।

-- - -- xxii ... तर्कसंग्रहः ज्ञासा द्विविधा स्मृतिरनुभश्चेति । संस्कारमात्रजन्य ज्ञान स्मृतिः । तभिन्नं ज्ञानमनुभव: स द्विविश्वो यथार्थोऽयथार्थश्च । तदति वृत्प्रकार- कोऽनुभवों यथार्थः यथा सुवणे. सुवर्णमितिज्ञानम् । सैव प्रमा' इत्यु- च्यते । तदभाववति तत्प्रकारकोऽनुभवोऽयथार्थः । यथा शुक्लो हदं रजत, मितिज्ञानम् । यर्थ र्यानुभवश्चतुर्विधः प्रत्यक्षानुमित्युपमितिशान्दभेदात्। तत्करणमपि चतुर्विधं प्रत्यक्षानुमानापमानशब्दभेदात् । व्यापारव- दसाधारण कारणं करणम् । अनन्यथासिद्धःकार्यनियतपूर्ववृत्तिकारणम् । कार्य प्रार्गभावप्रतियोगि । कारणं त्रिविधं समवाय्यसमवायिनिमित्तभेदात् । यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणम् यथा तन्तव: पटस्य । पट- उसे बुद्धि कहते हैं । यह स्मृति एवं अनुभव भेद से दो प्रकार की है। केवल संस्कार से उत्पन्न शान स्मृति है । स्मृति से भिन्न शान अनुभव, हैं। अनुमव भी यथार्थ एवं अयथार्थ भेद से दो प्रकार का होता है। वस्तुये, जो जिस प्रकार की है, उसी प्रकार का., ज्ञान, या अनुभव यथार्थानुभव है जैसे सुघर्स में सुवर्णः का. ज्ञान । यथार्थ ज्ञान को ही प्रमा कहते हैं। वस्तु का अभाव होते हुए भी, उसी वस्तु का अनुभव करना यथार्थ ज्ञान कहलाता है जैसे दीप्ति शुक्ति में रजत का शान । मामफ या मिथ्या ज्ञान ही अयथार्थानुभव या अपमा है। यथार्थानुभव प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति एवं शान्दशान भेद से चार प्रकार का माना गया है। इन चारों प्रकारों के ज्ञान के करण प्रत्यद, अनुमान, उपमान एवं शब्द, चार ही माने गये हैं। क्रिया संलग्न असाधारण कारण को करण कहते हैं। अन्यथा सिद्धरहित कार्य में नियतपूर्ववृत्ति कारण कहलाता है। प्रागभाव के प्रति योगी को कार्य, कहते हैं अर्थात् उत्पत्तिमद् कार्य होता है। कारण समवायि, असम: वायि और निमित्त भेद से तीन प्रकार का है। समवाय सम्बन्ध से कार्योत्पत्ति के कारण को समवायि कारण कहते हैं। जैसे- तन्द्र वस्त्र, के एवं वस्त्र अपने रूप का समवाथि कारण है। कार्य अथवा कारण में, एकार्थ में समवाय सम्बन्ध से सम्बन्धित जो कारण उसे असम- वायि कारण कहते हैं जैसे तन्तुसंयोग पटः का असमवापि कारण - .. - . .. -- .

xxiii . प्रकारतारहित शान निर्विकल्पक है जैसे 'यह कुछ है।' प्रकारता या पदार्थ मीमांसा ] श्च स्वगतरूपादेः । कार्येण कारणेन वा सबकस्मिन्नथे समवेतत्वे सद्धि कारणमसमायिकारणम् । यथा तन्तुसंयोग:पठस्य । वन्तुरूपं पटरूप: स्थे । तदुभयभिन्न कारणं निभिसकारणम । यथातुरीवेमादिकं पटस्य । यदेतत् त्रिविध कारणमध्ये 'यद साधारण कारण तदेव करणम् । तत्र प्रत्यक्षज्ञानकरणं प्रत्यक्षम्, इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं. प्रत्यक्षम् । तद् द्विविध निर्विकल्पक सविकल्पकम् । तत्र निष्प्रकारकं ज्ञानं निर्विकल्पकम् यथेदं किञ्चित् सप्रकारकंशानं सविकल्पकम्, यथा डिल्याऽयं, ब्राह्मणोऽयं, श्यामोऽयमिति । प्रत्यक्षज्ञानहेतुरिन्द्रियार्थसन्निकर्ष: पड विधः। (१) संयोगः । (२) संयुक्तसमेवाया। (३) संयुक्तसमवेतसमधाय: () समवायः (५) समवेतसमवाय: (६) विशेषणविशेष्यमावश्चेति । (१) चतुषा घट- प्रत्यक्षजनने संयोगः सलिकर्षः । (२).घटरूपप्रत्यक्षजनने संयुक्त समवायः सन्निकर्षः । चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपस्य समायात् । (३)रूपत्वसामान्यप्रत्या दूसरे तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण है। समवायि एवं असमवायि से भिन्न जो कारण उस निमित्त कारण कहते हैं । जैसे वस्त्र बुनने के साधन तुरीबेमादि । वस्तुतः इन तीनों कारणों में जो मुख्य कारण उसे ही करण कहते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान के कारण को भी प्रत्यक्ष कहते हैं। प्रत्यक्ष ज्ञान इन्द्रिय विषय के सन्निकर्ष द्वारा उत्पन्न होता है जोकि निर्विकल्पक एवं सविकल्पक दो प्रकार का होता है। - विशेषतायुक्त शान सविकल्पक है जैसे 'यह ब्राह्मण है, यह श्याम है। इत्यादि । सन्निकर्ष लौकिक एवं अलौकिक भेद से दो प्रकार के होते हैं । किकसन्निकर्ष संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेत समवाय, सम- वाय, समवेतसमवाय, एव विशेषणविशेष्यभाव भेद से षट प्रकार का माना गया है। चक्ष रिन्द्रय से घट पट मठ आदि का सत्तात्मक प्रत्यक्ष संयोग सन्निकर्ष से होता है। घट के रूप प्रत्यक्ष में संयुक्ततमाय सन्निकर्ष होता है क्योंकि नक्ष रिन्द्रिय का घट से संयोग सम्बन्ध होने पर समवाय सम्बन्ध से स्थित घट में घटरूप का प्रत्यक्ष समवाथ अम्बन्ध से होता है। रूपत्व के प्रत्यक्ष में संयुक्त समवेत' समवाय xxiv [ तर्कसंग्रहः संयुक्तसमवेतसमवायः सन्निकर्षः । चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपम् समवेतं तत्र रूपत्वस्य समवायात् । (४) श्रोत्रण शब्दसाक्षात्कारे समवायः सन्निकर्षः। कर्णविवरवाकाशस्य श्रोत्रत्वात् । शब्दस्याकाशगुणत्वात् गुणगुणिनोश्च समवायात् । (५) शब्दत्वसाक्षात्कारे समवेतसमवायः सन्निकर्षः श्रोत्र- समवेते. शब्दे शब्दत्वसमवायात् । (६) अभावप्रत्यक्षे विशेषणविशेष्यभावः सन्निकर्षः। एवं सन्निकर्षषटकजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम् । तत्करणमिन्द्रियम् । तस्मादिन्द्रियं प्रत्यक्षं प्रमाणम् इति सिद्धम् । अनुमितिकरणमनुमा- नम् । परामर्शजन्यं ज्ञान मनुमितिः । व्याप्तिविशिष्ट पक्षधर्मताज्ञानं परा- मर्श: -यथा वहिव्याप्पधूमवानयं पर्वतः, इति . ज्ञानं परामशे- स्तजन्यं पर्वतो वह्निमान् इति ज्ञानमनुमितिः । यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र सन्निकर्ष होता है। यहां पर भी घट का प्रत्यक्ष संयोग से, घट रूप का प्रत्यक्ष संयुक्तसमवाय से, एवं घट रूप की जाति या प्रकार आदि भी समवाय सम्बन्ध से ग्रहण होता है। श्रोत्र न्द्रि यद्वारा शब्द का प्रत्यत्त समवाय सम्बन्ध से होता है क्योंकि आकाशीय श्रोत्र न्द्रिय द्वारा अाकाशीय गुण शब्द का ग्रहण होता है अतः गुण एवं गुणी का सर्वदा समवाय सम्बन्ध ही ही माना गया है । शब्दत्व के प्रत्यक्ष में समवेत समवाय सन्निकर्ष होता है क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द से समवाय सम्बन्ध एवं शब्द का अपनी प्रकारतादि से समवाय सम्बन्ध है । अभाव के प्रत्यक्ष में विशेषणविशेष्यभावसन्निकर्ष होता है जैसे 'यह घटशून्य पृथ्वी है' यहाँ पर प्रभाव का विशेषण द्वारा उल्लेखकर शेिषसम्बन्ध से कल्पनान्तर्गतप्रत्यक्ष करते हैं अतः प्रत्यक्ष का लक्षण, यह भी है कि 'सन्निकर्षज ज्ञान ही प्रत्यक्ष है। सन्निकर्षज ज्ञान का कारण इन्द्रियां है । इन्द्रियों से प्रत्यक्ष प्रमाण है।' अनुमिति के करण को अनुमान कहते है । परामर्श से उत्पन्न ज्ञान अनु म त है। न्याप्तिविशिष्टगुणयुक्त पक्षधर्मत ज्ञान को परामर्श कहते है जैसे वह्नि का ब्याप्य धूम वाला यह पर्वत है, इस प्रकार के ज्ञान को परामर्श तथा परामर्शजन्य ज्ञान 'पर्वत अग्निवाला है को अनुमिति कहते है । जहां जहां धूम है वहाँ २ अग्नि हैं इस प्रकार के XXV पदार्थ मीमांसा ] वह्निः इति साहचर्यनियमो व्याप्तिः । व्याप्यस्य पर्वता देवृत्तित्वं पक्षध- मता । अनुमानं द्विविधम् स्वाथ परार्थ चा तत्र स्वार्थ स्वानुमितिहेतुः तथाहिस्वयमेव भूयो भूयो दर्शनेन यत्र यत्र धूमः तत्र तत्राग्निः इति महानसादौ व्याप्तिं गृहीत्वा पर्वतसमीपं गत्वा तद्गते चाग्नौ सदहानः पर्वते धूमं पश्यन् व्याप्तिं स्मरति यत्र धूमस्तत्राग्निरिति । तदन्तरं वह्नि- व्याप्यधूमवानयं पर्वत इति ज्ञानमुत्पद्यते । अयमेव लिङ्गपरामर्श इत्यु- च्यते तस्मात्पर्वतो वह्निमान् इति ज्ञानमनुमितिरुत्पद्यते । तदेतत्स्वार्थानु मानम् यत्तु स्वयं धूमादग्निमनुमाय परप्रतिपत्यर्थ पञ्चावयववाक्यं प्रयुङते तत्परार्थानुमानम् । यथा 'पर्वतो अग्निमान्' धूमवत्वात् यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् यथा महानसम् तथा चायम् तस्मात्तथा इति । अनेन प्रतिपादिताल्लिङ्गात्परोऽप्यग्निं प्रतिपद्यते । प्रतिज्ञा हेतूदाहरणोपनयनि- गमनानि पञ्चावयवा: ‘पर्वतो वह्निमान्' इति प्रतिज्ञा । धूमवत्वात् इति नियम पूर्वक साहचर्यज्ञान को व्याप्ति कहते हैं । व्याप्य पदार्थो का प्राश्रय में रहना पक्षधर्मता कहलाता है। यह अनुमान स्वार्थ एवं परार्थ भेद से दो प्रकार का होता है । स्वार्थानुमान अपनी अनुमिति का साधन है, जैसे किसी पुरुष को जहाँ २ धूम होता है वहां २ अग्नि होती है इस पूर्वानुभूतिव्याप्ति ज्ञान के स्मरण व्यापार से न्यप्ति ज्ञान के पश्चाद् वह्निका व्याप्य धूम, तद्वान् यह पर्वत है, ऐसा ज्ञान उत्पन्न होता है। इसी को लिङ्ग परामर्श भी कहते है। इस लिङ्ग परामर्श से उत्पन्न ज्ञान पर्वत अग्निवाला है अनुमिति कहलाता है। यही स्वार्था- नुमान है। जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे को समझाने के लिये पञ्चा- वयव वाक्य का उपयोग करता है, तव उसे परार्थानुमान कहते है जैसे पर्वत अग्निवाला है, धूमयुक्त होने से, जो २ धूम वाला होता हैं वह र मग्नि वाला भी होता है, जैसे रसोई घर, वैसा ही यह है अत: तैसा ही है । इस प्रकार से प्रतिपादन करने पर दूसरे को भी अनुमान द्वारा अग्नि ज्ञान हो जाता है। प्रतिज्ञा हेतु उदाहरण उपनय निगमन यह पञ्चावयववाक्य है । पर्वत अग्नियुक्त है यह प्रतिशा है। धूम युक्त होने से यह हेतु है जो २ धूम्गना है नहअग्निवाला भी है जैसे । xxvi [तर्कसंग्रहः हेतुः । यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् यथा महानसम् इत्युदाहरणम् तथाचायम् इत्युपनयः तस्मात्तथा इति निगमनम् ॥ स्वार्थानुमितिपरा र्थानुमित्योलिङ्गपरामर्श एव करणम् । तस्माल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् । लिङ्ग त्रिविधं अन्वयव्यतिरेकि- केवलान्वयि केवलव्यतिरेकि चेति । अन्वयेन व्यतिरेकेण च व्याप्तिमदन्वयव्यतिरेकि । यथा वह्नौ साध्ये धूमवत्वम् । यत्र धूम: तत्राग्निः यथा महानसम् इत्यन्वयव्याप्तिः । यत्र वाहर्नास्ति तत्र धूमोपि नास्ति यथा हृदः इति व्यतिरेकव्या प्तिः । अन्वयमात्रव्याप्तिकं केवलान्वयि । यथा-घटोऽभिधेयः प्रमेयत्वा- त्पटवत् । अत्र प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोव्यतिरेकव्याप्तिर्नास्ति सर्वस्य प्रमेय. स्वादभिधेयत्वाच्च । व्यतिरेकमात्रव्याप्तिकं केवलव्यतिरेकि यथा- पृथिवीतरेभ्यो भिद्यते गन्धवत्वात् । यदितरेभ्यो न भिद्यते न तद्न्धवत् यथा जलम् । नचेयं तथा । तस्मान्न तथेति । अत्र यद्गन्धवत्तदितरेभ्यो रसोईघर यह उदाहरण है। वैसा ही यह है उपनय है । तैसा ही है यह निगमन है । वस्तुतः स्वार्थानुमिति एवं परार्थानुमिति का मुख्य करण लिङ्गपरामर्श है अत: लिङ्गपरामर्श को ही अनुमान कहते है । अन्वयव्यतिरेकि, केवलान्वयि, केवलव्यतिरेकि भेदसे तीन प्रकार का लिङ्गपरामर्श होता है। जिसमें अन्वय एवं व्यतिरेकि दोनो प्रकार की व्याप्ति होती है उसे अन्वयव्य तरेकि कहते है जैसे धूम से वह्नि का साधन 'जहां धूम है वहां पानि है' इस प्रकार अन्वयव्याप्ति का ग्रहण होता है। व्यतिरेक व्याप्ति जैसे जहां अग्नि नहीं होती वहां धूम भी नही होता जैसे नदी तालाब आदि। जिसमें केवल अन्वय द्वारा व्याप्ति मिलती है उसे केवलान्वयि कहते है। जैसे घना अभिधेय है प्रमेय होने से जो २ प्रमेय है वह २ अभिधेय भी है अतः अभिधेय एवं प्रमेय समस्त पदार्थों में मिलता है अतः यहाँ पर व्यतिरेकव्याप्ति नहीं मानी जाती। केवल व्यतिरेक व्याप्ति द्वारा ग्राह्य ज्ञान केवल व्यतिरेकि कहलाता नैसे पृथ्वी जला दि से भिन्न है, गन्धगुण के कारण जो अन्य द्रव्यों से भिन्न नहीं है उसमें गन्ध भी नहीं है जैसे जल । पृथ्वी वैसी नहीं है। गन्धशत्य नहीं है। यह गन्भवाली ही है। यहां पर जो गन्धवाला । है पदार्थ मीमांसा] xxvii भिन्नम् इत्यन्वयदृष्टान्तो नास्ति पृथिवीमात्रस्य पक्षत्वात् । सन्दिग्ध- साध्यवान् पक्षः यथा धूमवत्वे सति हेतौ पर्वतः । निश्चतसाध्यवन् सपक्षः यथा तत्रैव महानसम् । निश्चितसाध्याभाववान् विपक्षः यथा तत्रैव महाह्रदः। सव्यभिचारविरुद्धसत्प्रतिपक्षाऽसिद्धबाधिताः पञ्च हेत्वाभासाः। सव्यभिचारोऽनैकान्तिकः स त्रिविधः साधारणासाधारणानुपसंहारिभे- दात् । (१) साध्याभावववृत्तिः साधारणोऽनै कान्तिकः । यथा 'पर्वतोऽ ग्निमान् प्रमेयत्वात्' इति प्रमेयत्वस्य अग्न्यभाववति हृदे विद्यमानत्वात् । (२) सर्वसपनविपक्षव्यावृत्त: पक्षमात्रवृत्तिरसाधारण: यथा 'शब्दो नित्यः' शब्दत्वात् इति। शब्दत्वं सर्वेभ्यो नित्येभ्योऽनित्येभ्यो व्यावृत्तं शब्दमात्र वृत्तिः। (३) अन्वयव्ययिरे कदृष्टान्तरहितोऽनुपसंहारी यथासर्वमनित्यं प्रमे- यत्वात् इति अत्र सर्वस्यापि पक्षत्वाद् दृष्टान्तो नास्ति ॥ साध्याभावव्या वह अन्य पदार्थों से भिन्न भी है इसका अन्वय दृष्टान्त नहीं है क्योकि समस्त पृथ्वी का ग्रहण हो जाने से तथा पृथ्वी से भिन्न पदार्थो में गन्धाभाव होने से दृष्टान्त ही नहीं मिल सकता । संदिग्ध साध्य की सिद्धि हेतु द्वारा जिस आश्रय में की जाती है उसे पक्ष कहते है। साध्य के निश्चित श्राश्रय को सपन कहते है । साध्य के निश्चित अभावयुक्त आश्रय को विपक्ष कहते है । सव्यभिचार, विरुद्ध, सत्प्रतिपक्ष, प्रसिद्ध एवं वाधित पांच प्रकार का हेत्वाभास माना गया है। अनिश्चित हेतु को सव्यभिचार माना गया है । यह साधारण, असाधारण एवं अनुपसंहारि भेद से तीन प्रकार का है जो हेतु पक्ष में रहते हुए सपक्ष एवं विपक्ष में भी रहे उसे साधारण अनैकान्तिक हेत्वाभास कहते है जैसे पर्वत अग्निवाल है प्रमेयगुण होने से । यहां पर हेतु प्रमेयत्व है प्रमेयत्व नदी नद श्रादि में सर्वत्र है जहां अग्नि नहीं है। समस्त सपक्ष विपक्ष शून्य केवल पक्ष में रहने वाला अनिश्चित हेतु असाधारण है जैसे शब्द नित्य है शब्दत्व धर्म होने से' । शब्दत्व किसी भी नित्य या अनित्य पदार्थ में नहीं पाया जाता । यह केवल शब्द में ही रहता है । अन्वय व्यतिरेक दृष्टान्त रहित अनिश्चित हेतु अनुपसंहारी कहलाता है समस्त पदार्थ अनित्य है प्रमेय होने से यहां पर समस्त पदार्थों का ग्रहण हो जाने से ।

। xxviii [ तर्कसंग्रहः प्तोहेतुर्विरुद्धः । यथा-शब्दो नित्यः कृतकत्वात् इति । कृतकत्वं हि नित्यत्वाभावेनानित्यत्वेन ब्याप्तम् । साभ्याभावसाधकं हेत्वन्तरं यस्य म सत्प्रतिपक्षः । यथा-शब्दो नित्यः श्रावणात्वाक्छन्दत्ववत्, शब्दो नित्य: कार्यत्वात् घटवत् । असिद्धस्त्रिविधः श्राश्रयासिद्धः, स्वरूप सिद्धो व्या- प्यत्वासिद्धश्चेति । (१) आश्रयासिद्धो-यथा-गगनारविन्दंसुरभि अरविन्द- त्वाद् सरोजारविन्दवत् । अत्रगगनार विन्दमाश्रयः सच नास्त्येव । स्वरूपा- सिद्धो यथा शब्दो गुण: चाक्षुषत्वात् रूपवत् । अत्र चाक्षुषत्वं शब्देनास्ति शब्दस्य श्रावणत्वात् । सोपाधिको हेतुाप्यत्वासिद्धः । साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वंमुपाधिः। साध्यसमानाधिकरणात्यन्ताभावप्रति- योगित्वं साध्यव्यापकत्वम् । साधनवन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं साधना व्यापकत्वम्, पर्वतो धूमवान् वह्निमत्वात् इत्यत्र श्रादेंन्धनसंयोग उपाधिः, दृष्टान्त हा नहीं है । साध्य के अभाव के व्याप्य हेतु को विरुद्ध कहते है जैसे शब्द नित्य है क्योकि यह उत्पन्न होता है । वस्तुतः जो उत्पन्न होता है वह नित्यतारहित अनित्य कार्य रूप होता है। जिसके साध्य के अभाव का साधन अन्य हेतु द्वारा भी हो उसे सत्प्रतिपक्ष कहते है जैसे शब्द नित्य है श्रोत्रन्द्रिय द्वारा ग्राह्य होने से शब्दत्ववत् ऐसा कहने पर शब्द अनित्य है कार्य होने से घट वत् इत्यादि । माश्रयासिद्ध, स्वरूपासिद्ध व्याप्यत्वासिद्ध भेद से प्रसिद्ध तीन प्रकार का है । आश्रयासिद्ध का उदाहरण 'गगन कमल सुगन्धित है, कमल होने से तालाब के कमल तुल्य' । यहां पर 'आकाश का कमल जो आश्रय ग्रहण है वह हो निराधार है । स्वरुपा सिद्ध का उदाहरण 'शब्द गुण है चाक्ष स होने से रूप के समान यहाँ पर शब्द में चाक्षुष- त्व नहीं है क्योकि यह श्रोत्रन्दिय द्वारा ग्राहय है । उपाधियुक्त हेतु व्याप्यत्वा सिद्ध कहलाता है । साध्य का व्याप्य होते हुए साधान का श्रव्यापक होना उपाधि कहलाता है। साध्य के अधिकरण में रहने बाला जो अभाव, उसका अप्रति योगी, साध्य व्यापकत्व माना गया है। हेतु के अधिकरण में रहने वाला जो अत्यन्ताभाव, उसका प्रति. योगी होना साधना व्यापकत्व है पर्वत में धूम है अग्नि होने से, यहां प्रानॆन्धनसंयोग उपाधि है। जहां २ धूम हैं वहां २ आर्दैन्धन संयोग है . यह माध्यव्यापकता है। जहां केवल अग्नि है वहाँ सर्वत्र श्रादें.

पत्र २ धूमः पदार्थ मीमांसा xxix तत्रानॆन्धनसंयोग इति साध्यव्यापकता। यत्र वह्निस्तत्रा।न्धन संयोगो नास्ति अयोगोलके श्राद्रेन्धनसयोगाभावादिति साधनाव्यापकता। एवं साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापकत्वात् श्राद्धैन्धनसंयोग उपाधिः । सोपाधिकत्वात् अग्निमत्वं व्याप्यत्वासिद्धम् । यस्यसाध्याभावः प्रमाणा- न्तरेण निश्चितः स बाधितः यथा-वह्निरनुष्णो द्रब्यत्वादिति । अत्रानु म्णत्वं साध्यम् । तदभाव उष्णत्वं स्पार्शनप्रत्यक्षेण गृह्यते इति वाधितत्वम् । उपमितिकरणमुपमानम् । संज्ञा शिसम्पन्धज्ञानमुपमितिः, तत्करणं सादृश्यज्ञानम् । अतिदेशवाक्यार्थस्मरणमवान्तरव्यापारः । तथाहि गव. यर्शन्दवाच्यमजानन् कुतश्चिदारण्यकपुरुषात् 'गोसदृशो गवयः' इति श्रुत्वा वनं गता वाक्यार्थ स्मरन् गोसदृशपिण्डं पश्यति, तदनन्तरं 'सौ' गवयशब्दवाच्य इत्युपमितिरुत्पद्यते । प्राप्तवाक्यं शब्दः । प्राप्तस्तु यथा र्यवक्ता । वाक्यं पदसमूहः यथा गामानयेति । शक्तं पदम् । अस्मात्पदाद- न्धन संयोग नहीं है क्योंकि तप्त अयोगोलक में अग्नि है किन्तु पार्ने न्धन संयोग नही है साधनव्यापकता है। इस प्रकार साध्य का व्यापक होते हुए साधन का अब्यापक होना श्राद्रेन्धनसंयोग उपाधि माना गया है । उपाधियुक्त वह्नि की सिद्धि ब्याप्यत्वा सिद्धि कहलाती हैं। जिसके साध्य का अभाव किसी अन्य प्रमाण द्वारा निश्चित हो उसे बाधित हेत्वाभास कहते हैं। जैसे द्रव्य होने से श्रग्नि उठाण नहीं है, यहां पर अनुष्णता साध्य है। किन्तु तत्प्रति योग उष्णता का स्पार्शन- प्रत्यक्ष होता है अत: यह बाधित है। उपमिति के करण को उपमान कहते है। संज्ञा एवं संज्ञी के सम्बन्ध ज्ञान को उपमिति कहते है जिसका कि करण सादृश्य ज्ञान है। इसमें अतिदेश वाक्यार्थ का स्मरण श्रवान्तर ब्यापार है । जैसे गवय पदार्थ अनभिज्ञ कोई पुरुष किसी भारण्यक मनुष्य से गौ के समान गवय होती है' ऐसा वे.वल सुनकर किसी समय बन जाता है और वहाँ वह गौ के समान एक नबीन पशु को देखकर 'गौ के समान गवय होती है। इस वाक्य को स्मरण कर निश्चय के साथ यह गवय है ऐसा ज्ञान करता है, इसे उप मिति कहते है। प्राप्त वाक्य शब्द प्रमाण है । यथार्थ वक्ता को प्राप्त कहते है ।

Xxx [तर्कसंग्रहः यमर्थो बोधव्य इतीश्वरेच्छासंकेतः शक्तिः। श्राकांक्षा योग्यता सन्निधिश्च वाक्याथ ज्ञाने हेतु: । पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्व- माकांक्षा । अर्थाव धो योग्यता । पदानामविलम्बेनोच्चारणं संनिधिः । श्राकांक्षादिरहितं वाक्यमप्रमाणम् । यथा-गौरश्वः पुरुषो हस्तीति न प्रमाणं आकांक्षा विरहात् । वहिना सिंचेत् इति न प्रमाणं योग्यता विरहात् । प्रहरे प्रहरेऽसहोच्चारितानि 'गामानय' इत्यादि पदानि न प्रमाणं सान्निध्याभावत् । वाक्यं द्विविधं वैदिकं लौकिकञ्च । वैदिकमीश्वरोक्त- त्वात्सर्वमेव प्रमाणम् । लौकिकं त्वाप्तोक्त प्रमाणम् । अन्यदप्रमाणम् । वाक्यार्थज्ञानं शाब्दज्ञानं तत्करणं शब्दः । अयथार्थानुभव स्त्रिविधः संशय- विपर्ययतभेदात् एकत्मिन् धर्मिणि विरुद्धन नाधर्मवैशिष्टयावगाहिज्ञानं संशयः । यथा-स्थाणुर्गपुरुषो वेति । मिथ्याज्ञान विपर्ययः जैसे गौ लामो इस प्रकार के पद समूह को वाक्य कहते है। शक्ति समन्धित शब्द पद है । इस पद से इस अर्थ का बोध करना चाहिये इस प्रकार ईश्वरेच्छा ही शक्ति है । वाक्य के अर्थ ज्ञान में श्राकांक्षा, योग्यता एवं सन्निधि को हेतु माना गया है । पद का पदान्तर ब्यतिरेक द्वारा प्रयुक्त अन्वय का अननुभावकत्व ही आकाक्षा है । अर्थ का बाधन होना योग्यता है । पदो का अविलम्ब उच्चारण सन्निधि है। आकांक्षा रहित वाक्य अप्रमाण है जैसे गो, अश्व, पुरुष हस्ति इत्यादि क्योंकि इनमें परस्पर आकांक्षा का अभाव है । 'पाग से सीचों' यह प्रमाणित नहीं है योग्यता के अभाव के कारण । बहुत देर देर पर अलग २ 'उच्चारित गौ-ला प्रो' इत्यादि वाक्य प्रमाण नहीं है सान्निध्य के अभाव के कारण । यह वाक्य वैदिक एवं लौकिक भेद से दो प्रकार का है वैदिक वाक्य ईश्वरोक्त होने में पूर्णत: प्रमाणित है । लौकिक वाक्य प्राप्त द्वारा प्रमाणित है । शेष वाक्य प्रमाणिक नही है। वाक्य के अर्थ ज्ञान को शाब्द ज्ञान तथा शान्द ज्ञान का असाधारण कारण शब्द माना जाता है । संशय विपर्यय एवं तर्क भेद से अयथार्थानुभव तीन प्रकार का है एक ही वस्तु में अनेक परस्पर विरुद्ध वस्तुओं के जाने को संशय कहते है जैसे यह स्थाणू है कि पुरुष इत्यादि । मिथ्या ज्ञान को विपर्यय कहते । । पदार्थ मीमांसा] xxxi यथा-शुक्ताविदं रजतमिति । व्याप्यारपेण व्यापकारोपस्तर्क; । यथा यदि वह्निर्न स्यात्तर्हि धूमोपि न स्यादिति । स्मृतिरपि द्विविधा यथार्था- ऽयथार्था च प्रमाजन्या यथार्था अप्रमाजन्माऽयथार्या । सर्वेषामनुकूलवेद- नीयं सुखम् । प्रतिकूलवेदनीयं दुःखम् । इच्छा कामः । क्रोधो द्वेषः । कृतिः प्रयत्नः। विहित कर्मजन्यो धर्मः निषिद्ध कर्मजन्यस्त्वधर्मः । बुद्धया दयोऽष्टावात्ममात्रविशेषागणाः। बुद्धीच्छाप्रयत्ना द्विविधाः नित्या: अनि- त्याश्च । नित्या ईश्वरस्य । अनित्या जीवस्य । संस्कारस्त्रि विधः वेगो भावना स्थितिस्थापकश्चेति । वंग: पृथिव्यादि चतुष्टयमनोवृत्तिः । अनु भवजन्यास्म तिहेतुर्भावना श्रात्ममात्रवृत्तिः । अन्यथाकृतस्य पुनस्तदवस्था त्पादक: स्थितिस्थापक: कटादिपथिवीवृत्तिः । चलनात्मकं कर्म । ऊर्ध्व- देशसंयोगहेतुरुत्क्षेपणम् । अघोदेशसंयोगहेतुर पक्षेपणम् । शरीरसन्निक- ष्टसंयोग हेतुराकुञ्चनम् । विपकृष्ट संयोगहेतु: प्रसारणम् । अन्यत्सर्व है जैसे शुक्ति में रजत का ज्ञान । ब्याप्य की सत्ता से ब्यापक की सत्ता मानना तर्क कहलाता है जैसे यदि बहिन नहीं है तो धूम भी नहीं है स्मृतिज्ञान भी यथार्थ एवं अयथार्थ भेद से दो प्रकार का है । प्रमाजन्य स्मति यथार्थ एघ अपमाजन्यस्मृति अयथार्थ कहलाती है। समस्त जीवों के अनुकूल अभिधेयानुभव सुख है और प्रतिकूल अभिधेयानु भव दु:ख । कामना ही इच्छा है। द्वष क्रोध है. उद्योग हो प्रयत्न है। वेदादि विहित कम करन। धम है एवं वेदादे विरुद्ध अनुनित कार्य करना अधर्म है। बुद्धि इच्छा प्रयत्नादि अष्टगुण अात्माके ही प्रधान गण है । बुद्धि इच्छा प्रयत्न नित्य एवं अनित्य भेद से दो २ प्रकार के होते हैं। ईश्वर में यह नित्य तथा जीव में अनित्य हैं। संस्कार वेग, भावना एवं स्थित स्थापक भेद से तीन प्रकार का होता है । वेग पृथ्वोजल तेज वायु एवं मन में रहता । अनुमवद्वारा उत्पन्न स्मृति का कारण भावना है जो कि केवल आत्मा में रहती है । स्वरूपपरिवर्तन करने पर पुनः अपनेपूर्वा. वस्था में आना स्थिति स्थापक कहलाता है यह गुण पार्थिव पदार्थो में पाया ज ता है। गले ही कर्म है । ऊपर की ओर गति उत्त पण निम्न गति अपक्ष पण, शरीर सन्निकृष्ट संकोच श्राकुञ्चन,शरीर का विस्तार प्रसारण, तथा अन्य समस्त गतियाँ गमन शब्द से गृहीत होती है। यह है है .

Xxxii तिर्कसंग्रहः गमनम् । पृयिव्यादिचतुष्टयमनोमात्रवृत्ति। नित्यमेकमनेकानुगतं सामान्य द्रयगुणकर्मवृत्ति। तद्विविधं परापरभेदात, परं सत्ता अपरं द्रश्यत्वादि । नित्यद्रव्यवृत्तयो व्यावर्तका विशेषा; । नित्यसमबन्धः समवायः, अयुत- सिद्धवृत्तिः ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ । यथा अवयवावयबिनी, गुणगुणिनी, क्रियाक्रियावन्तौ जातिव्यक्ती विशेषनित्य- द्रव्ये चेति । अनादि: सान्तः प्राग्भावः । उत्पतेः पूर्व कार्य स्य । सादिर- नन्तः प्रध्वंसः। उत्पत्यनन्तरं कार्यस्य । त्रैकालिकसंसग वच्छिन्न प्रति. योगिताकोऽत्यन्ताभावः । यथा भूतले घटो नास्ति इति । तादात्म्यसम्ब- न्धावच्छिन्न प्रतियोगिता कोऽभावोऽन्योन्याभावः । यथा---'घटः पटोन' इति ।सर्वेषामेव पदार्थानां यथायथमुक्तेष्वेवान्तर्भावात्सप्तव पदार्था इति सिद्धम् । गति पृथ्वी जल तेज वायु एव मन में रहती है । नित्यता के साथ अनेक पदार्थों में समवेतत्व सामान्य माना जाता है । यह द्रव्य गुण एवं कर्म में रहता है। पर एवं अपर भेद से दो प्रकार का है। पर सामान्य का उदाहरण सत्ताजाति एवं अपर सामान्य का उदाहरण द्रव्यत्व गुणत्व आदि है। द्रव्यों में नित्य रहने वाले व्यावतंक विशेष कहलाते है। नित्य सम्बन्ध को समवाय कहते हैं । यह अयुत सिद्धपदार्थों में रहता है दो पदार्थ जब एक दूसरे के आश्रित हो तो उसे अयुत सिद्ध कहते है जैसे अवयव अवयवी, गुण एवं गुणो क्रिया-क्रियावान् , जातिव्यक्ति पशिष एवं नित्यद्रव्य प्रतियोगीज्ञानके अधीनशानका विषयप्रभाव है। मादि रहित अन्तयुक्त प्रागभाव कहलाता है। जैसे कार्योत्पत्ति के पूर्व कार्या भाव प्रागभाव है । जो श्रादियुक्त अन्तरहित हों बह प्रध्वंसा भाव होता है जैसे कार्योत्पति के पश्चात् कार्यनाश भूत। भविष्य एवं वर्त- मानकान में व्यापकता से प्रतियोगीज्ञानाधीनशान विषय अत्यन्ता भाव है जैसे भूतल में घट नहीं हैं ।तादात्म्यसम्बन्धयुक्त प्रतियोगिताक अभाव अन्योऽन्याभाव है 'घड़ा कपड़ा नही है । गौतममुनिके प्रमा- गप्रमेयादि सोलहपदार्थो इन सात पदाथों में समन्वित हो जाते हैं प्रतः सात ही पदार्थ है ।

श्री अमरनाथायनमः मुक्तावलीकृतमंगलवादः नूतन जलधररुचये गोपवधूटोदुकूलचौराय । तस्मै कृष्णायनम: संसारमहीरुहस्यवीजाय ॥ चूडामणीकृतविधुर्वलयीकृतवासुकिः । भवोभवतुभव्याय लीलाताण्डवपण्डितः॥ निजनिर्मितकारिकावलीमतिसंक्षिप्तचिरन्तनोक्तिभिः विशदीकरवाणि कौतुकान्ननुरजीवदयावशंवदः ॥ सद्व्यागुणगुम्फिता सुकृतिनां सत्कर्मणांज्ञापिका । सत्सामान्यविशेषनित्यमिलिताभावप्रकर्षोज्ज्वला ॥ विष्णोर्वक्षसि विश्वनाथकृतनासिद्धान्त मुक्तावली । विन्यस्ता मनसोमुदं वितनुतां सद्युक्ति रेषाचिरम् ॥ विघ्नविधातायतं मंगलं शिष्यशिक्षायै निवध्नाति, नूतनेत्यादि । ननुमंगलं न विघ्नध्वंसं प्रति न वा समाप्तिं प्रति कारणं विनापि मंगलं नास्तिकादीनांग्रन्थे निर्विघ्नपरिसमाप्तिदर्शनादितिचेन्न । अविगीत- शिष्ट चारविषयत्वेन मंगलस्यसफलत्वेसिद्ध तत्र च फलजिज्ञासायां उमापतिं मञ्जुलनीलकण्ठं महानटं नूतन चन्द्रचूडम् । भूति पदं भूतपतिं भवेशं ज्ञानप्रदं त्र्यम्बकमीशमीडे आस्तिक गुरु जन सर्वदा अन्य के प्रारम्भ में ईश्वरादि अभीष्ट देवताओं को विघ्नोंको दूर करने के हेतु स्मरण करते हैं तथा इस देव स्मरण को, जिसे मंगला चरण कहते हैं, शिष्यों के शिक्षार्थ अन्य के साथ सम्बद्ध भी कर देते हैं जिससे कि वह भी ऐसा करें। किन्तु, मंगलाचरण न तो विघ्नध्वंस करने में कारण है और न ग्रन्थ की समाप्ति का ही कारण है क्योंकि विना मङ्गल के भी नास्तिक श्रादि विद्वानों को ग्रन्थों में निर्विघ्न पूर्णता प्राप्त होती है, ऐसा कहना अनु. चित है। मंगल प्राप्त विद्वज्जनों द्वारा प्रयुक्त होने से फलवाला है। अविगोत शिष्ट गण निरर्थक कार्य कभी भी नहीं करतें अतः फल विचार करते समय उपस्थितफल ग्रन्थविषयक विध्नध्वंस एवं ग्रन्थ की ॥

xxxiv [ मंगलवाद सम्भवति दृष्टफलकत्वे अदृष्टफलकल्पना या अन्याय्यत्वाद् उपस्थितत्वा. च्च समाप्तिरेव हि फलं कल्प्यते । इत्थञ्च यत्र मंगलं न दृश्यते तत्रापि जन्मान्तरीयंतत्कल्प्यते । यत्र च सत्यपि मंगले समाप्ति न दृश्यते तत्र बलवत्तरो विघ्नो विघ्नप्राचुर्य वा बोध्यं, प्रचुरस्यैवास्य बलवत्तरविधननिरा. करणकारणत्वं, विघ्नध्वंसस्तु मंगलस्यद्वार मित्याहु: प्राञ्च: । नव्यास्तु मंगलस्य विघ्नध्वंस एव फलं समाप्तिस्तु बुद्धिपतिभादि कारणकलापात् । न च स्वत: सिद्ध विघ्नविरहवता कतस्यमङ्गलस्य निष्फलत्वापत्तिरितिवा. च्यम् । इष्टापत्त:, विघ्नशंकया तदाचरणात् । तथैव शिष्टाचारात् । न च तस्य निष्फलत्वे तद्वोधकवेदाप्रामाण्यापत्तिरिति वाच्यम्. सति विघ्ने तन्नाशस्यैव वेद वोधितत्वाद् । समाप्ति ही प्रस्तुत होती है । यदि यहां पर उपस्थित दृष्टफल ( विध्न घंस या ग्रन्थ समाप्ति ) से भिन्न अदृष्ट फल स्वर्गादि की कल्पना की जाय तो अनुचित एवं अप्रासंगिक है अत: ग्रन्थ की समाप्ति ही फल मानते हैं । इस प्रकार मंगल का फल ग्रन्थ समाप्ति स्वीकार कर लेने पर जिन२ ग्रन्थों में मङ्गलाचरण नहीं दिखाई देता उनमें भी जन्मान्तरीय मङ्गला- चरण की कल्पना करते हैं, और जहां पर मङ्गलाचरण होते हुए भी ग्रन्थ की समाप्ति नहीं होती, वहां पर बलवत्तर विघ्न या विघ्नों की अधिकता की उपस्थिति होती है। बलिष्ठ मंगल ही बलिष्ठ विध्न ध्वस का नाशक होता है अत: बलिष्ठ या प्रचुर मङ्गलाचरण में ही कार्यकारण भाव निहित हैं। प्राचीन नैयायिक मङ्गलाचरण से विघ्न ध्वंस होकर ग्रन्थ की समाप्ति रूपी फल मानते हैं। नवीन नैयायिक विघ्नध्वंस ही फल मानते हैं। ग्रन्थ की समाप्ति में योग्यता प्रतिभा विघ्नध्वंस आदिकारणसमुदाय की उपस्थिति होना आवश्यक प्रश्न यह है कि जब पूर्वजन्मीय मङ्गल को भी कारणता है तो विघ्न शून्य एवं पूर्वजन्म में मंगलाचरण किये हुए व्यक्ति द्वारा जब इस जन्म में पुनः मंगल किया जायगा तो उसमें निष्फलता लगेगी। नष्फल कर्म करने का वेदादि में निषेध किया है। किन्तु आस्तिक इस प्रकार के समस्त कार्यों को अभीष्ट स्वीकार करता है, क्योंकि यह है XXXV पदार्थ मीमांसा ] अतएव पाप भ्रमेण कृतस्य प्रायश्चित्तस्यनिष्फलत्वे न तद्वोधकवेदाप्रामाण्यम । मङ्गलन्तु विघ्नध्वंसविशेषे कारणं, विघ्न ध्वंस विशेषेच विनायकस्तर पाठादि । क्वचिच्च विघ्नात्यन्ताभाव एव समाप्तिसाधनं प्रतिवन्धकसंसर्गाभावस्यैव कार्यजनकत्वाद् इत्थञ्च नास्तिकादीनां ग्रन्येषु जन्मान्तरीयमङ्गलजन्यदुरितध्वंस:, स्वतःसिद्ध विघ्नात्यन्ताभावो वास्तीति न व्यभिचार इत्याहुः । . कार्य विघ्नों की शंका में सार्थक है। ऐसा ही शिष्टजनों का उपदेश एवं आचरण मिलता है । नास्तिक पुन: कहता है कि यदि विघ्नशंका में मंगलाचरण करना आपके तर्क के आधार पर स्वीकार भी कर लिया जाय, तो भी विघ्न विरहवान् पुरुष द्वारा मंगलाचरण करने पर भुति में "विघ्नध्वंस कामो मङ्गलमाचरेत् ' अप्रामाण्य दोष उपस्थित होगा। पर आस्तिकों का कथन यह है कि विघ्नसमानाधिकरया मङ्गल में विघ्न ध्वंसजनकत्व श्रति प्रतिपाद्य है अत: विघ्नों की उप- स्थिति में ही मंगल में विघ्नधंसजनकत्व सार्थक है अतएव पाप भ्रमसे प्रायश्चित करने पर जो कि वस्तुतः निष्फल है, "पापी प्रायश्चित्तमा- चरेत् " इत्यादि वेद वाक्यों में निष्फलता दोष नहीं लगता है। 'सर्वे विघ्नाः शमं यान्ति गणेशस्तवपाठतः' इस अति से यह स्पष्ट है कि विघ्नध्वंस के प्रति गणेशस्तुति को कारण माना है ऐसी अवस्था में मंगल को विघ्नध्वंस के प्रति कारण मानने पर ति में अप्रामाण्य अथवा अन्यथासिद्ध दोष उपस्थित होगा अतः इस आपत्ति का उत्तर यह है कि विघ्नध्वंस विशेष के प्रति मंगल को तथा विघ्नध्वंस विशेष के प्रति ही गणेश स्तुति को कारण ता है इसी प्रकार 'स्वस्तिनः इन्द्रो वृद्धश्रवाः' इत्यादि स्वस्तिवाचनान्तर्गत मन्त्रों को विघ्नविशेषध्वंस में कारणता सिद्ध है। कहीं २ ग्रन्थों की समाप्ति विघ्नों के अत्यन्ताभाव के कारण विना मंगल किये हुए हो जाती है क्योंकि बाधक विघ्नों का प्रभाव होता है इस प्रकार नास्तिकों के ग्रन्थों में कहीं पर जन्मान्तरीय मंगल द्वारा विघ्नों का नाश, या विघ्नों का अत्यन्ताभाव ही स्वतः ग्रन्थ की समाप्ति में कारण होने से व्यभिचार दोष नहीं लगता।

xxxvi [ ईश्वरसिद्धिः संसारेति-पंसार एव महोरुहो वृक्षः तस्यवीजाय । एतेन ईश्वरे प्रमाणमपि दर्शितं भवति । तथाहि यथा-घटादि कार्य कतृ जन्यं तथा क्षित्यंकुरादिकमपि । न च तत्कतत्व मस्मदादीनां संभवतीत्यतस्तत्कर्त : त्वेनेश्वर सिद्धिः । न च शरीराजन्यत्वेन कत जन्यत्व साधकेन सत्प्रति- पक्ष इतिवाच्यम् , अप्रयोजकत्वाद् । ममतु कर्त त्वेन कार्यत्वेन कार्यकारण भाव एव.अनुकूलस्तर्कः। 'द्यावा भूमी जनयन्देव एकः' 'विश्वस्यकर्ता भुवनस्यगोप्ना' इत्यादय अागमाप्यनुसंधे याः। मंगलाचरण में ग्रन्थकर्ता ने 'संसारमहरुहस्यबीजाय' इस पद का द्योतन कर ईश्वर को सृष्टि का निमित्त कारण मानकर ईश्वर की सत्ता में भी प्रामाण्य माना है। नास्तिक ईश्वर को नहीं मानता अतः उसके मत में ईश्वर के लिये नमस्कारादि कार्य निरर्थक एवं अनुचित हैं। उसका तर्क यह है कि ईश्वर का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्वर अरूप द्रव्य होने के कारण प्रत्यक्ष का विषय ही नहीं है। मानसप्रत्यक्ष भी सम्भव नहीं है क्योंकि विजातीय यात्ममनः संयोग के ज्ञानार्थ किसी हेतु का होना आवश्यक है जिसका कि ईश्वर में अभाव है । अनुमान भी लिङ्गाभाव के कारण नहीं किया जासकता तथा उपमान प्रमाण भी सादृश्य ज्ञान के अभाव के कारण चरितार्थ नहीं है 'द्यावाभूमी जनयन्देव एकः' इत्यादि श्रुति वाक्यों द्वारा भी ईश्वर में प्रामाण्य स्थापित नहीं किया जा सकता क्योंकि अत्यादि में ईश्वरोक्त होने से ही प्रामाण्य माना गया है। आस्तिक इन शंकाओं का निराकरण कार्य कतत्व हेतु द्वारा अनुमान से ईश्वर सिद्धिकर करता है। क्षित्य कुरा. दिकं सकत के कार्यत्वाद् घटवत् इस प्रकार से अनुमान का स्वरूप उपस्थित होने पर ईश्वर की सिद्धि अनुमान द्वारा हो जाती है । सम- स्त पृथ्वी या विशिष्ट पृथ्वी किसका कर्ता ईश्वर है , इस शंका को करने के लिये क्षिति के साथ अंकुरादि शब्द संयुक्त किया गया है जिससे कि किसी व्यक्ति विशेषादि का ग्रहण नहीं किया जा सकता। अत: जो भी कर्ता है वही ईश्वर है अतः ईश्वर सिद्धि हो जाती है नास्तिक हेतु को अन्यथासिद्ध करने के लिये तथा ईश्वर की सत्ता । पदाथ मीमांसा ] xxxvii अस्वीकारार्थ दूसरे प्रकार से अनुमान करता है । उसका कथन है कि 'क्षित्यंकुरादिकं कर्त जन्यत्वाभाववत् शरीराजन्यत्वाद गगनादिवत् 'अत: सत्प्रतिपक्ष दोष ईश्वर की सिद्धि में है। किन्तु आस्तिकों का कथन है कि 'शरीराजन्यत्वं कृत्यजन्यत्वव्यभिचारि न वा' इत्याकारक व्यभि- चारिश का निवृत्यर्थ कोई तर्क हेतु में नहीं है अतः इस प्रकार का अनु- मान अप्रयोजक होने से सामर्थ्यशून्य है । सामर्थ्यशून्यता के कारण सत्प्र तिपक्ष दोष नहीं लगता है। समान शक्त हेतुओं में होने पर ही सत्प्रति- पक्ष दोष लगता है। हम कार्य कर्तत्व सम्बन्ध द्वारा कार्य कारण भावा नुकूल ही तर्क करते हैं अतः अनुमान द्वारा निर्विवाद ईश्वर की सिद्धि होती है। अनुमान द्वारा ईश्वर की सिद्धि हो जाने पर ईश्वरोक्त वेद में भी प्रामाण्य आजाता है अतः श्रुति द्वारा भी 'द्यावा भूमी जनयन् देव एक:' •विश्वस्य कर्ता भुवनस्यगोप्ता' इत्यादि वाक्यों द्वारा भी ईश्वर की सिद्धि होती है। कार्यायोजनधत्यादेः पदात्प्रत्ययतः श्रुतेः । वाक्यात्संख्याविशेषाश्च साध्यो विश्वाजदव्ययः । इत्यत्र काया नुमानं चोपलक्षणम् । सर्गाद्यकालीन द्वयणुक प्रयोजक कर्म प्रयत्नजन्यं कर्मत्वाद् । गुरुत्ववतां पतनाभाव: पतनप्रतिवन्धक- प्रयत्नप्रयुक्तः धृतित्वाद् पक्षिपतनाभाववत् । ब्रह्माण्डनाशः प्रयत्नजन्यः नाशत्वाद् घटनाशवत् । घटादिव्यवहारः स्वतन्त्रपुरुषप्रयोज्य: व्यवहार त्वाद् श्राधुनिककल्पितलिप्यादिवत् । वेदजन्यप्रमा वक्तयथार्थ वाक्या- यज्ञानजन्या शाब्द प्रमात्वात् चैत्रवाक्यजन्यप्रमावत् । वेदः असंसारि पुरुषप्रणीतः वेदत्वात् वेद: पौरुषेयः वाक्यत्वाद् यन्नैवं तन वयथा काव्य मिति व्यतिरेकदृष्टान्त:भारतवत् । द्वयणुकपरिमाणजनिकासंख्या अपेक्षा बुद्धिजन्या एकत्वान्यसंख्यात्वादित्यनुमानान्तराण्यपि साक्षात् परं. परया वा ईश्वर साधकानि वोध्यानीति । दिनकरी १ प्रत्यक्ष का अर्थ विराजत गाङ्ग पवित्रनीरं जटे जटाया: नवनूतनाकृतिम् । शिवान्वितं मञ्जुलवामभागं वृषाधिरूढंतमहं नमामि ॥ सर्वा गुरूञ्चापिमहानुभावान् विद्याप्रभोद्दीप्तदिगन्तरालान् । प्रणम्य चित्त न समाहितेन पदार्थमीमांसनमातनोमि ।। विषय-सूची प्रथमोल्लास विषय पृष्ठ विषय पृष्ट ज्ञान भावना स्मृति एवं अनुभव शाब्दीभावना २१ प्रमाण श्रा भावना भ्रान्ति २ विधिमीमांसा प्रमाण के मेद ३ श्रुति प्रत्यक्ष लिङ्ग २२ ६ वाक्य २२ प्रत्यक्ष का लक्षण ६ प्रकरण २२ सन्निकर्ष संदंश २२ लौकिक एवं अलौकिक स्थान २२ सन्निकर्ष ८६ समाख्या २२ प्रत्यक्षत्व का नियामक १२ । प्रयागविधि अनुमानप्रमाण १२ अतिक्रम अनुमान के भेद अथक्रम पञ्चावयववाक्य १५ पाठक्रम २३ व्याप्ति स्थानक्रम अन्वय, व्यतिरेक १६ मख्यक्रम व्यभिचारग्रह १६ प्रबत्तिकम २४ तर्क १६ अधिकारविधि २४ हेतु १७ मन्त्रमीमांसा २४ उपमान १७, १८ नियमविधि २४ शब्दप्रमाण १८, १९, २० परिसंख्याविषि २४ पृष्ठ विषय पृष्ठ २७ २८ २८ २५ ऐतिहय २५ चष्टा २६ २६ ( २ ) विषय नामधेयमीमांसा २५ अभाव निषेधमीमांसा २५ सम्भव अर्थवादमीमांसा अर्थापत्ति दृष्टार्था पत्ति २५ स्मति श्रुतार्थापत्ति २६ प्रमाणों का फल द्वितीयाल्लास शास्त्र ३१ , सव्यभिचार आचार्य परीक्षा जिज्ञासा शिष्यपरीक्षा ३२ व्यवसाय सम्भाषा ३३ अनुयोज्य सन्धायसम्भाषा ३४ अननुयोज्य निगृह यसम्भाषा ३४ अनुयोग परिषद ३५, ३६, ३७, ३८ प्रत्यनुयोग बाद ३६ वाक्यदोष जलप वितण्डा ३१ विरुद्धवाक्य प्रतिज्ञा ४३ ४३ ४३ स्थापना प्रतिष्ठापना ३६ वाक्यप्रशंसा ३६ / द्रल ४० अहेतु ४० तोत काल ४६ उपालम्भ ४६ ४१ परिहार उत्तर दूपण और दूषणाभास सिद्धान्त सर्वतन्त्र सिद्धान्त प्रतितन्त्र सिद्धान्त श्रधिकरण अभ्युपगम संशय प्रयोजन ५० ४१ प्रतिज्ञा हानि ४२/ अभ्यनुज्ञा ४२ / हेत्वन्तर ४२ / अर्थान्तर ४२ / निग्रहस्थान ४३ वादकथा ५१ ५१ पृष्ठ विषय प्रकरण पृष्ठ विषय ५३ / अभिदेश ५३ अपवर्ग कारण " करण कार्य योनि कार्य " कार्य फल ५८ वाक्यशेष विपर्यय प्रसंग एकान्त अनेकान्त ५४ अनुमत विधान अनागतावेक्षण अतिक्रान्तावेक्षण व्याख्यान " " ५६ " " ५५ स्वसंज्ञा ५६ अनुबन्ध देश काल प्रवृत्ति उपाय तन्त्र युक्ति अधिकरण योग हेत्वर्थ उद्दश निर्देश उपदेश अपदेश प्रदेश , " ६० " निर्वचन निदर्शन ५६ नियोग समुच्चय विकल्प उहय " , " ट ६८ दर्शन पद शक्ति लक्षणा व्यञ्जना पदार्थ ततीयोल्लास ६१ | अभाव ६१,६२ शक्ति ६२ सादृश्य ६६ ६३ पदार्थों का साधर्म्य वैधर्म्य ६४ अन्यथा सिद्ध ६५ द्रव्यों का साधर्म्य एवं वैधh ७३ "ओं, वेद ब्रह्मणेनमः” पदार्थ मीमांसा fulltkal । प्रमाण विज्ञानीय प्रथम उल्लास ज्ञान संसार में अद्वितीय तत्व है । ज्ञान मे ही भवबन्धन से मुक्ति होती है । ज्ञान को वेद या ब्रह्मरूप से दार्शनिकों ने अङ्गीकार किया है। वेदादि में "ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः” एवं दर्शनकारों ने भी “तत्वज्ञानान्नि:- श्रेयसाधिगम:” “व्यक्ताव्यक्तशविज्ञानात्” इत्यादि स्पष्ट शब्दों द्वारा ज्ञान को प्राधान्य प्रदान किया है । आयुर्वेदशास्त्र ज्ञानमूलक ही है । सांख्य- कारिकाकार ने प्रकृति, विकृति एवं पुरुषका ज्ञान ही (आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक ) दुःख-त्रय निवृत्यर्थ एकमात्र कारण माना है, जो कि अायुर्वेदशास्त्र का परम लक्ष्य है। यह ज्ञान अात्मा में ग्राश्रित होने से 'यात्माश्रित' कहलाता है। इसके स्मृति तथा अनुभव दो भेद होते है। म्मृति तथा अनुभव-संस्कार मात्र से उत्पन्न ज्ञान स्मृति है, जैसे किसी वस्तु का प्रथम अनुभव प्राप्त हुया हो और उसका भावनारख्य संस्कार कालान्तर में भी विद्यमान हो, ऐसी अवस्था में तत्सदृश, तद्विपरीत एवं तद्सहकारि वस्तु के पुन: दर्शन होने पर वह भावनाख्य संस्कार उस प्रथम अनुभूत वस्तु को पुन: उसी रूप में उपस्थित कर देता है, इस प्रकार स्मृतिजन्य ज्ञान उत्पन्न होता है। स्मृति से भिन्न ज्ञान अनुभव है । इसके यथार्थ ( प्रमा) और अयथार्थ (अप्रमा) १-दुःखत्रयाभि घाताजिज्ञासा तदपघातके हेतौ । दृष्टे साऽपार्था चेन्न कान्तात्यन्ततो भावात् ।। दृष्ट बदानुश्रविकः सह्मविशुद्धि-क्षयातिशययुनः ! तद्विपरीतः श्रेयान् ब्यक्ताध्यक्त विज्ञानात् ॥ सां० का० १, २, .

२ [पदार्थ मीमांसा दो भेद किये गये है। वस्तुत: किसी भी वस्तु के सत्य ज्ञान को ही यथार्थज्ञान ( प्रमा) कहते हैं । प्रकारान्तर से अनुभूति के प्रत्यक्षादिक भेद भी माने जाते हैं प्रमाण-प्रकर्षेण संशयादि व्यवच्छेदेन मीयते परिछिद्यते वस्तुतत्वं येन तत् प्रमाणम्' अर्थात् प्रमा के साधन का प्रमागा कहते है। इस प्रमाण में स्वत: तथा परत: दो प्रकार से प्रामाण्य माना जाता है मीमांसक स्वत:प्रामाण्यवाद और नैयायिक परत:प्रामाण्य अङ्गीकार करते है । स्वत:प्रामाण्यवाद में ज्ञान के साथ ही साथ उसकी प्रामाण- कता की सिद्धि स्वयं मानी जाती है । परतः प्रामाण्य वाद में ज्ञान के पश्चात्, उसके प्रामाण्य को युक्तियों द्वारा पुष्ट करना आवश्यक है । नैयायिको का कथन यह है कि यदि समस्त ज्ञान स्वत: प्रमाणभूत अङ्गी कार किया जाय तो संशय की कहीं पर सम्भावना भी नहीं हो सकती है । वस्तुत: ज्ञान में प्रामाण्य अनुभूति वस्तु के साथ, उसके तादात्म्य निठता में निहित माना गया है। क्योंकि ज्ञानोत्तर क्रमश: इच्छा और यत्न का प्रादुर्भाव होता है तथा यत्न की सफलता पर ज्ञान यथार्थ माना जाता है। अतएव ज्ञान के प्रमा होने में समर्थप्रवृत्तिजनकता' को प्रधानता प्रदान की गयी है । तत्वचिन्तामणिकार भी अनुमान द्वारा ही ज्ञान के प्रामाण्य को सिद्ध करने का निर्देश करते है, अत: न्याय दृष्टि द्वारा प्रामाण्य एवं अप्रामाण्य परत: सिद्ध ही माने गये है भ्रान्ति - कुछ विशेष परिस्थितियों में हम लोग सन्निकर्षजज्ञान की मिथ्याकल्पना कर लेते है। यह मिथ्याकल्पना कहीं पर स्वाभाविक एवं कहीं पर विवक्षाजनित होती है उदाहरणार्थ खड़ी वस्तु पड़ी हुई वस्तु से समान आयतनादि होने पर भी बड़ी प्रतीत होती है। इसी प्रकार उपभुक्त एवं विभक्त स्थान अनुपभुक्त एवं रिक्त की अपेक्षा बड़ा १-स्वार्थ व्यवसायात्मकं ज्ञामं प्रमाणम् । सम्यगर्थनिर्णयः प्रमाणम् । यथार्थानुभवः प्रमा, तत्साधनञ्च प्रमाणम् । उदयनाचार्यः । २-Truth & Novelty. ३-(Illusion) है प्रमाण विज्ञानीय] ३ मालुम पड़ता है। वस्तु के अन्तर के कारण भी कभी-कभी हमारी इन्द्रिया मिथ्या अनुभव करती हैं, इसका उत्तम उदाहरण 'मुलरल्येर भ्रम' है, जिसे कि याप बराबर की रेखा बनाकर तीर के चिन्ह समान एवं विपरीत दिशा में लगाकर, छोटा बड़ा स्वयं प्रतीत करेंगे। कभी २ एक ही वस्तु को अनेक प्रकार से दृष्टिगोचर कर, व्याख्या करते हैं। मति श्रम भी अप्रमा या प्रान्ति का एक अवयव है, जो कि काम-क्रोध- भयादिभावो से या वातादित्रिदापो से उत्पन्न होता है जिसका कि चरक में महाव्याधि के नाम से मुन्दर निदर्शन किया गया भ्रान्ति के बिपय में नैयायिकों का कथन है कि भ्रान्ति विषयीमूलक होती है, विषयमूलक नहीं होती, उदाहरणार्थ-मृगमरी- चिका में सूर्य की किरणों का सद्भाव विद्यमान है, स्पन्दनव्यापार भी यथार्थ होता है, अत: यहाँ पर अर्थ का व्यभिचार नहीं होता, किन्तु ज्ञान का व्यभिचार होता है। बौद्ध लोग मृगमरीचिका में उदक की कल्पना को सिद्ध करने के लिये असत्ख्यातिवाद मानते है और नैयायिक इस असत्रख्यातिवाद को अनुपयुक्त कहकर अन्यथाख्याति- वाद द्वारा सिद्ध करते है। वस्तुत: किसी वस्तु के गुणों का तद्गुणाति- रिक्त अन्यवस्तु में कल्पना करना अन्यथाख्यातिवाद कहलाता है जैसे इन्द्रिय दोष के कारण मरीचिका में उदक के धर्मों का स्मरण होता है । इस उदक धमों का मानसिक ज्ञान होने के पश्चाद् जहाँ जहाँ जल की पूर्वानुभूति हुई है वहाँ वहाँ के जल का अलौकिक प्रत्यक्ष होता है । इस अलौकिक प्रत्यक्ष द्वारा दृष्ट जल के गुणों का आरोप समीप- वर्ती मृगमरीचिका में अन्यथाख्याति से कर दिया जाता प्रमाणों के भेद-प्रमाणों की संख्या मानने में दार्शनिको में प्राय: मतान्तर है। चार्वाक केवल प्रत्यक्ष, वौद्ध और वैशेषिक प्रत्यक्ष तथा अनुमान, सांख्य प्रत्यक्ष अनुमान तथा शब्द, अनुमान उपमान और शब्द, प्रभाकर प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द और अर्थापत्ति, भाट्ट तथा वेदान्ती प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द है नैयायिक प्रत्यक्ष [ पदार्थ मीमांसा अर्थापत्ति और अभाव, तथा पौराणिक प्रत्यक्ष अनुमान उपमान शब्द अर्थापत्ति अभाव सम्भव और ऐतिह्य प्रमाणों को मानते है ये ही प्रमाण अष्टविधप्रमाणं कहलाते हैं। भगवान् पतञ्जलि ने उपर्युक्त प्रमाणों का स्थान-स्थान पर बहुत ही सुन्दर उल्लेख किया हैं यथा “द्विविधं खलु सर्व सच्चासच्च । तस्य चतुर्विधापरीक्षा प्राप्तोपदेश: प्रत्यक्ष मनुमानं युक्ति श्वेति ।" पुन: रोग विशेष विज्ञानीय अध्याय में कहा है कि “त्रिविधं खलु रोग विशेष विज्ञानं भवति, तद् यथा- उपदेश:--प्रत्यक्षम्- अनुमानम् ---चति। पुन: भिपजितीय अधाय में “द्विविधा तु खलु परीक्षा ज्ञानवतां प्रत्यक्षमनुमानञ्च। त्रिविधा वा सहोपदेशेन --- इति । इसके पश्चाद ऐतिम तथा प्रौपम्य का भी वर्णन मिलता है। वस्तुत: चरक में वैशेपिक तथा न्याय प्रादि दर्शनों की प्रधानता है विशेषतया वैशेषिक मतानुसार 'ज्ञानवतां प्रत्यक्षम्-अनुमानञ्च' तथा एक देशीय प्राचीन नयायिकों के अनुसार 'त्रिविधा वा सहोपदेशेन' प्रत्यक्ष अनुमान पोर शब्द का विस्तृत वर्णन किया है। सुश्रुत ने चार प्रमाणों का विधान किया है यथा--- "तस्याङ्गवरमाद्यंप्रत्यक्षागमानुमानोपमानेरविरुद्धमुन्यमानमुपधारय" यद्यपि सुश्रुत सांख्यदर्शनानुयायी है तथापि नव्यनैयायिको के उपमान प्रमाण का स्पष्ट निर्देश किया है। सम्भव है कि मुश्रुतकाल में नैयायिकों का प्रावल्य हो जिसके कारण चतुर्विध प्रमाण का निर्देश हो । पाश्चात्य १ --- प्रत्यक्षमेक चार्वाकाः कणाद सुगतौपुनः । अनुमानञ्चतञ्चाय सांख्या: शब्दञ्च ते अपि ॥ न्यायैक देशिनो प्येव मुपमानञ्च केचन | अर्थापत्या सहेतानि चत्वार्याह प्रभाकरः ॥ अभावषष्ठान्येतानि भाट्टा वेदान्तिनस्तथा । सम्भवैतिह्य युक्तानि तानि पौराणिका जगुः ॥ स० द० स० २-दृस्ट मनुमान माप्तवचनञ्च सर्व प्रमाण सिद्धत्वाद । त्रिविधं प्रमाण मिष्टं प्रमेय सिद्धिः प्रमाणाद्धि ।। स० का० ५ है प्रमाण विज्ञानीय] वैज्ञानिक इस प्रमाण मीमांसा को 'इपीस्टेमालोजी' नामक शास्त्र में मनन करते है । वह प्रधानत: प्रत्यक्ष तथा अनुमान को ही स्वीकार करते है। कचित् अति गौण रूप से शब्दप्रमाणं तथा उपमानसादृश्य प्रमाण का उल्लेख भी मिलता है सम्पूर्ण शास्त्रज्ञों ने निर्विवादतया प्रत्यर्त को स्वीकार किया है । चार्वाक प्रत्यक्षातिरिक्त अन्य किसी प्रमाण को नहीं मानता है । चार्वाक का कथन यह है कि “विषय और इन्द्रिय का संयोग होने पर जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उस प्रत्यक्ष कहते है" । पञ्च ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्षी कृतपदार्थ सत् । अस्पष्ट- अनास्वादित---अनाघ्रात अदृष्ट और अश्रुत पदार्थ असत् है और इस असत् पदार्थ की कल्पना करना अनुचित है अत: अनुमान प्रमाण मानना भी व्यर्थ है। दूसरे लिङ्ग को देखकर लिङ्गी की सिद्धि या लिङ्गी को देखकर लिङ्ग की सिद्धि '( तल्लिङ्ग लिङ्गि पूर्वकम् ) भी अनुमान है जैसे धूमरूप लिङ्ग से लिङ्गी वह्नि का अनुमान किया जाता है । यहाँ पर प्रश्न यह उपस्थित होता है से अदृष्ट वह्नि की सिद्धि में क्या प्रामाण्य है। यदि साहचर्य- नियम का ( यत्र यत्र धूम स्तत्र तत्र वह्निः) अाप प्रमाणित माने तो क्या यह सम्भव है कि जिन २ स्थानों में धूम तथा अग्नि विद्यमान हो उन सब का निरीक्षण किया जा सकता है ? इस प्रकार के असम्भवनीयव्याप्तिज्ञान को प्रमाण स्वरूप कैसे स्वीकार किया जा सकता है, अर्थात् विशिष्ट धूम का सम्बन्ध विशिष्ट अग्नि के साथ देखकर धूमवह्निसंयोग को सर्वत्र 9-( Epestemology ) २-( Perception ) ३-( Inference ) 8-( Verbal testimony ) ५-( Analogy ) ६–घोर आचरण वादी (Behaviowrist) बाटसन ने मानस विज्ञान में प्रत्यक्षीकरण को स्वीकार नहीं किया किन्तु उसकेस्थान पर "प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया," शब्द के प्रति प्रतिक्रिया गन्ध के प्रति प्रतिक्रिया (Response to light, Response to sound, Olfactory response) आदि रूप में स्वीकार किया है । कि दृष्ट धूम , ur [ पदार्थ मीमांसा कल्पना करना निराधार है। यदि व्याप्ति ज्ञान की कल्पना विशेष के स्थान पर सामान्य में ही की जाय तो सिद्धसाधनदो प्राप्त होता है जैसे 'सम्पूर्ण मनुष्य मरणशील है' इस वाक्य में यदि व्याप्ति मनुष्यता तथा मरणशीलता के साहचर्य पर मान ले तो नवीन अनुमान के लिये स्थान नहीं रहता क्योंकि मरणशीलता व्याप्तिसूचक वाक्य में प्रथमत: ही निप्पन्न हो जाती है। अनुमान की सिद्धि कार्यकारण भाव द्वारा सिद्ध करने पर भी चार्वाक स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह स्वभाववादी है प्रत्यक्ष का अर्थ- 'अक्षस्याक्षस्य प्रतिविषयं वृत्तिः प्रत्यक्षम' यहाँ पर अक्ष शब्द का अर्थ इन्द्रिय माना गया है । वैदिक, चार्वाक बौद्धादि दर्शन में भी यही अर्थ सम्मत है। केवल जैनदर्शन में अक्षपद से अात्मा का ग्रहण होता है अतएव उनके यहाँ 'इन्द्रियनिरपेक्ष आत्माश्रितज्ञान' प्रत्यक्ष पद से मुख्यत: ग्रहीत होता है। इन्द्रियाश्रित ज्ञान को परोक्ष या प्रत्यक्ष के गौण अर्थ में मानते है प्रत्यक्ष का लक्षण -दार्शनिकों ने प्रत्यक्ष के लक्षण 'इन्द्रिय जन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्' 'विशद: प्रत्यक्षम्' 'प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टम्' 'इन्द्रियार्थसन्निकपोत्पन्नज्ञानमव्यपदेश्यमब्यभिचारिव्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्' समान भावों को लेकर नाना प्रकार से किये हैं तथापि चरककार ने उत्कृष्ट लक्षण कहा है-- "यात्मेन्द्रिय मनोऽर्थानां सन्निकर्षात् प्रवर्तते । व्यक्ता तदात्वे या बुद्धि: प्रत्यक्ष सा निरुच्यते। इस प्रत्यक्ष के पुन: मानस प्रत्यक्ष तथा इन्द्रिय प्रत्यक्ष दो भेद माने है यथा' - प्रत्यक्षं नाम तद् यदात्मना 5 ---विशेषेनुगमाभावः सामान्ये सिद्ध साध्यता । अनुमापङ्कभङ्गऽस्मिं निमग्ना वाददन्तिनः ।। का० द. २ ---शिखिनश्चितयेत् को वा कोकिलान् कः प्रकूजयेत् । स्वभाव व्यतिरेकेण विद्यते नात्र कारणम् ॥ सु० शा० ड० अ०१ प्रत्यक्ष तु खलु रोगतत्वं बुभुत्समानः सर्वै रिन्द्रियैः सर्वा- निद्रियार्थानातुरशरीरगतान परीक्षतान्यत्र रसज्ञानात् च०बि० ४ प्रमाणीय विज्ञान] चेन्द्रियैश्च स्वयमुपलभ्यते। तत्रात्मप्रत्यक्षा: सुखदुःखेच्छाद्वैपादयः, शब्दा- दयस्त्विंन्द्रियप्रत्यक्षा: इति" । इस इन्द्रिय जन्य ज्ञान के निर्विकल्पक तथा सविकल्पक पुन: दो भेद होते है। जब दूरस्थ वस्तु का ज्ञान सर्व प्रथम होता है,उस समय उसकी सत्ता का केवल भान होता है जैसे स्थाणु तथा पुरुष का दूरस्थ चक्षुरिन्द्रिय जनितज्ञान । यह ज्ञान सामान्य बोधक होता है अर्थात् नाम जात्यादि कल्पना विरहित ज्ञान को निर्विकल्पक ज्ञान मानते है । जब वस्तु के स्वरूप जाति गुण क्रिया तथा संज्ञा का ज्ञान विशिष्ट रुपत: होता है, तब इसे सविकल्पक ज्ञान कहते हैं आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी प्रत्यक्ष के तीन अवयव दृश्यरूप कल्पनारूप एवं सम्बन्ध रूप माने हैं ये तीनों अवयव मिलकर प्राचीन दार्शनिकों के सन्निकर्ष में अन्तर्लीन हो जाते है। इन तीनों का प्रत्यक्ष से सम्बन्ध इस प्रकार है। यथा दृश्यरूप से विषय का ज्ञान होता है, कल्पनारूप में विपय से सम्बन्धित विषय का स्मरणादि किया जाता है, एवं सम्बन्धरूप में विषय का पूर्वसम्बन्धितस्मरणादि के साथ सहयोग किया जाता है अर्थात् वस्तु को कल्पना रूप में जब भी लाया जाता है तब उसे किसी अवस्था विशेष के साथ पूर्वगत प्रत्यक्षीकृत अवस्था में ही उपस्थित किया जाता है । निर्विकल्पर्क प्रत्यक्ष में हमें केवल वस्तु को सत्ता मात्र का ही भान होता है जैसे “रमा सितार बजा रही है" इस ज्ञान में निर्विकल्पक दृष्टि से सितार का नाद मात्र का ज्ञान निर्विकल्पक हो सकता है अतः पाश्चात्य वैज्ञानिकों के सम्मुख यह विवादग्रस्त विषय है कि ऐसा प्रत्यक्ष जीवन में सम्भवनीय है, या नहीं। सम्भवत: जीवन का सर्व प्रथम अनुभव ही निर्विकल्पक प्रत्यक्ष हो सकता है क्योंकि उस प्रत्यक्ष में पूर्वानुभवका पूर्ण रूप से अभाब हो सकता है। कुछ वैज्ञानिक इसमें भी विरोध प्रदर्शन कर, निर्विकल्पक प्रत्यक्ष को ज्यामिति के १. ( Indeterminate) २. ( Deteriminate) ३. ( Presentation) ४. ( Representation) ५. ( Relational Aspect) ६. (Sensation) -- [पदार्थ मीमांसा विन्दु की भाँति केवल काल्पनिक सत्य मानते हैं। प्रत्यक्षज्ञान प्रकारान्तर से भी लौकिक तथा अलौकिक दो भेद होते है। लौकिक- प्रत्यक्ष जिस इन्द्रिय द्वारा किया जाता है उसी इन्द्रिय की प्रधानता दी जाती है जैसे श्रावण -स्पार्शन- -चाक्षुष्ट---घ्राणज इत्यादि । चकरकार ने कहा है कि- "या यदिन्द्रिय माश्रित्य जन्तोर्बुद्धिः प्रवर्तते । याति सा तन निर्देशं मनसा च मनोभवा ।। भेदात्कार्येन्द्रियार्थानां बहवो वै बुद्धयः स्मृताः । यात्मेन्द्रिय मनोऽर्थाना मेकैक सन्निकर्षजाः॥ अमुल्यमुस्ठतलजस्तन्त्री वीणानबोद्भवः । दृष्ट: शब्दो यथा बुद्धि दृष्टी संयोगजा तथा ॥ वस्तुतः ६ इन्द्रियो द्वारा शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध मुखदुःखादिका ग्रहण होता है । इन गुणों का गुणी ( द्रव्य ) के साथ अभेद होने के कारण छहो इन्द्रियों को द्रव्य ग्राहक भी अधिकांश दार्शनिक मानते है। किन्तु नैयायिक वैशेषिक और मीमांसक चक्षु . त्वक--तथा मन को ही द्रव्य ग्राहक मानते है शेष इन्द्रियों को ( श्रोत्र रसन तथा घाणोन्द्रिय को ) गुण ग्राहक मानते है सन्निकप-यह लौकिक तथा अलौकिक भेद से दो प्रकार का होता है लौकिकसन्निकर्ष के संयोग----संयुक्तसमवाय-~संयुक्त समवेतसमवाय-~-समवाय-~-समवेतसमवाय-विशेषणविशेष्यभाव द्वारा १ -पाश्चात्य दार्शनिक प्रत्यक्ष ज्ञान की दो अवस्थायें मानते हैं प्रथम (Sensation) तथा द्वितीय ( Perception ) किन्तु भारतीय दार्शनिक लौकिक सन्निकर्षज ज्ञान को निर्विकल्पक तथा लौकिक एवं अलौकिक उभय सनिकर्षज ज्ञान को सविकल्पक साधारणतः स्वीकार करते है। २-विषयेन्द्रिय सम्बन्धो ब्यापारः सोऽपि षडविधः । दव्यग्रहस्तु संयोगारसंयुक्तसमवायत: ॥ ५६ । -- ६ जाता and प्रमाण विज्ञानीय] ६ भेद होते है। इन्द्रियों द्वारा द्रव्य के प्रत्यक्ष होने में संयोगसन्निकर्ष होता है यथा चक्षरिन्द्रिय और द्रव्य के असम्बन्धित होने पर ज्ञानोत्पत्ति नहीं हो सकती है। द्रव्य के गुण का प्रत्यक्ष जब इन्द्रियों द्वारा होता है तब संयुक्तसमवायसम्बन्धमाना जाता है। द्रव्य में गुण समवाय सम्बन्ध से रहता है और बिना द्रव्य प्रत्यक्ष हुये गुण का प्रत्यक्ष नहीं होता, अतः संयुक्तसमवायसम्बन्ध को कारणता दी गयी है । गुणत्व का प्रत्यक्ष संयुक्त- समवेतसमकायसम्बन्ध द्वारा होता है क्योंकि गुण में सामान्य आदिक समवाय सम्बन्ध से रहते हैं । शब्द का प्रत्या श्रोत्रन्द्रियो द्वारा समवाय सम्बन्ध से होता है क्योंकि श्रोत्रेन्द्रियरूप अाकाश मं शब्दगुण समवाय- सम्बन्ध से स्थित ही माना जाता है । गुण गुणी में सर्वदा समवाय सम्बन्ध से निहित रहता है। शब्दत्व के प्रत्यक्ष में समवेतसमवायसम्बन्ध चरि- तार्थ होता है क्योंकि शब्द तथा शब्दत्व में समवायसम्बन्ध ही माना । अभाव केप्रत्यक्ष में विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्ध की कल्पना करनी पड़ती है अलौकिकमन्निकर्ष .....यह अलौकिकसन्निकर्ष सामान्यलक्षण ज्ञान द्रव्येषु समवेतानां तत्समवायतः । तत्रापि समवेतानां शब्दस्य समवायतः ॥ ६० तद् वृत्तीनां समवेत समवायेन तु ग्रहः । प्रत्यक्ष समवायस्थ विशेषणतया भवेत् ॥ ६१ विशेषणतया तद्वदभावानां ग्रहो भवेत् । यदि स्यादुपलभ्येतेत्येवं यत्र प्रसज्यते ॥ ६२ ॥ मु० का० १-मीमांसक मोक्षाङ्गभूत एक प्रकार के प्रात्म ज्ञान के अस्तित्व की कल्पना करते है जो कि योगजन्य या अलौकिक ही होता है। वेदान्त में ईश्वर साक्षी चैतन्य अलौकिक प्रत्यक्ष के तुल्य वर्णित है। अलौकिक स्तु व्यापार स्त्रिविधः परिकीर्तितः। सामान्य लक्षणो ज्ञान लक्षणो योगजस्तथः ॥ मु० क० ६३ तथा [पदार्थ मीमांसा लक्षण और योगजसन्निकों द्वारा तीन प्रकार का है। १-महानसादि में अग्नि के साथ जो धूम का सम्बन्ध होता है, वह धूम व्यभिचारी है कि नहीं, इस शङ्का का समाधान कैसे हो सकता है क्योंकि सकल धूमों का चाक्षुष ज्ञान नहीं हो सकता, अतएव इस धूम में धूमत्व की सामान्यता प्रतिपादित कर सामान्यलक्षणसन्निकर्पद्वारा समस्त धूमों का प्रत्यक्ष करते है। २---- सुगन्धित पुष्पों के चाक्षप प्रत्यक्ष हो जाने उनके रमणीय रूपज्ञान के साथ गन्ध का भी चाक्षुप अनुभव होता है । इस प्रकार का चानप गन्ध ज्ञान ज्ञानलक्षणसन्निकर्ष द्वारा ही सम्भव होता है ३---योगजज्ञान युक्त तथा युञ्जान भेद से दो प्रकार का माना जाता है । युक्तयोगियों को योगाभ्यासजन्ययुक्तनामक अलौकिक सन्निकर्ष और मन इन दोनों से आकाश परमाण्वादि निखिल अतीन्द्रिय और अतीतादि विषयों का ज्ञान अनवरत होता है। युञ्जानयोगी को योगाभ्यास- जन्ययुञ्जाननामक अलौकिकसामर्थ्य, चिन्ता विशेष और मन इन तीनों से उक्त आकाशादि विषयों का ज्ञान होता है। सन्निकर्ष प्रकाश की उपस्थिति तथा उद्भ त रूप की सत्ता होने पर ही होता है अतएव नैया- पिको ने चाक्षप ज्ञान में आलोक और उद्भ तरूप दोनों को भी कारणता प्रदान की है। सांख्यमतावलम्बी निर्विकल्पकज्ञान का प्रत्यक्ष न कर, सवि. कल्पकज्ञान का ही प्रत्यक्ष करते है, अतएव वह अंतिदूर, अति १-योगजो द्विविधः प्रोक्तः युक्त युञ्जान भेदतः । युनस्य सर्वदा भामं चिन्ता सहकृतोऽपरः ॥ मु० ऋ० ६५ २-गृहणाति चक्षुः संयोगादालोकोद्भून रूपयोः । मु० का० ६६ ३---अतिदुरात्सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् । सौम्याद्व्यवधानाभिभवात्समानाभिहाराच्च ॥ सा० का०

..
प्रमाण विज्ञानीय]
सामीप्य, इन्द्रियघात,
मनोऽनवस्थान,
सौक्ष्म्य, व्यवधान अभिभव
और समानाभिहार को प्रत्यक्ष ज्ञान में बाधक मानते है
१-चरककार ने इन्द्रिय वाधक ज्ञान का विस्तृत विवेचन किया है।
प्रसंस्पर्शोऽति संस्पर्शी हीन संस्पर्श एवच ।
स्पृश्पानां संग्रहेणोक्तः स्पर्शनेन्द्रिय वाधकः ॥
यो भूत विषवाताना मकालेनागतश्चयः ।
स्नेह शीतोष्ण संस्पर्शी मिथ्या ज्ञानञ्च उच्यते ।
अत्युग्र शब्द श्रवणाच्छवणात् सर्वशो न च ।
शब्दानाञ्चाति हीनानां भवन्ति श्रवणाजड़ाः ॥
पुरुषोभीषण शस्ता प्रियव्यसनसूचकैः ।
शब्दैः : श्रवण संयोगो मिथ्यायोगः स उच्यते ॥
रूपाणां भास्वतां दृष्टि विनश्यतिहि दर्शनात् ।
दर्शनाञ्चति सूक्ष्माणां सर्वशश्चात्यदर्शनात् ॥
द्विष्ट भैरववीभत्स दूरातिक्क्रिप्ट दर्शनात् ।
तामासानाञ्च रूपाणां मिथ्या संयोग उच्यते ॥
अत्यादान मनादान मोक सात्म्यादिभिश्च यत् ।
रसानां विषमादान मल्पादानञ्च दूषणम् ॥
अति मृति तीक्ष्णानां गन्धानामुपसेवनम् ।
असेवमं सर्वशश्च घ्राणोन्द्रिय विनाशनम् ॥
पूति भूत विषद्विष्टा गन्धाये चाप्य नातवाः ।
तैगंधै ओण संयोगो मिथ्या योगः स उच्यते ।।
इत्यसात्म्याथ संयोगस्त्रिविधो दोषकोपणः ।
असात्म्यमिति तं विद्यात् यन याति सहारमताम् ॥च शा०प० ।

[पदार्थ मीमांसा वस्तुत: ज्ञान और स्वास्थ्य के लिये समयोग को ही श्रेष्ठ माना है। अतियोग, हीनयोग, मिथ्यायोग, अज्ञान और रोग के कारण होते हैं । प्रत्यक्षत्व का नियामक सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, बौद्ध, मीमांसक तथा श्रायुर्वेदादिदर्शन में सन्निकर्षजन्यत्व माना गया है। शाङ्कर वेदान्ती प्रमाणचैतन्य और विषयचैतन्य के अभेद को प्रत्यक्षत्व का नियामक स्वीकार करते है अनुमान प्रमागा - चार्वाकातिरिक्त सम्पूर्ण दार्शनिकों ने अनुमान प्रमाण स्वीकार किया है। बैशेषिक तथा कुछ नव्यं नैयायिक दो ही प्रमाण मानते है । कुछ वैशेषिको ने ( श्राचार्य हेमचन्द्र तथा सिद्धर्षि ) तीन प्रमाण भी माने है । रत्नाकर में वादिदेव ने भी द्वित्व तथा त्रित्व प्रमाणों का स्पष्टी करण किया है । जैन आचार्यों ने प्रमाणों का विभजन प्रत्यक्ष तथा परोक्ष नाम से किया है। परीक्ष के पुन: अनुमान प्रत्यभिज्ञान, स्मरण तर्क और आगम पाँच भेद किये है, अतएव अनु- मान प्रमाण जैन श्राचार्यों ने भी स्वीकार किया है अनुमान का अर्थ अंनुमान शब्द अनुमिति और अनुमितिकरण अर्थों में प्रयुक्त होता है । भाववाची होने पर अनुमिति तथा करणवाची होने पर अनुमितिकरण का वोध कराता है। वस्तुत: ज्ञानोत्तर जो ज्ञान होता है उसे अनुमान कहते है अर्थात् अनुमान ज्ञान के मूल में प्रत्यक्षज्ञान निहित होता है। प्रारम्भ में वैशेषिक और मीमांसक । १-- मिथ्यातिहीन योगेम्यो यो ब्याधि स्प जायते । शब्दादीनां सविज्ञ यो ब्याधिरैन्द्रियकोबुधैः ॥ वेदनानामशातानाम् इत्येते हेतवः स्मृताः । सुख हेतुर्मतस्त्वेकः समयोगः सुदुलभः ॥ च० शा० अ० १ २-शब्दोपमानयो मैव पृथक प्रामाण्य मिष्यते। अनुमान गतार्थत्वादिति वैशेषिकं मतम् ॥ मु० का० १४० ३-~-अनु पश्चाद् मीयते ज्ञायते परिच्छिद्यते वस्तु तत्वं येन तदनुमानम् ।

प्रमाण विज्ञानीय] १३ प्रत्यक्षतोदृष्ट तथा सामान्यतोदृष्ट दो भेद मानते थे, पश्चात् भगवान् पतञ्जलि ने पूर्ववत्, शेषवत् तथा सामान्यतोदृष्ट तीन भेद किये, जिसे कि सांख्य तथा नैयायिको ने भी इसी रूप में ग्रहण कर लिया। लिङ्ग तथा लिङ्गी मूलक व्याप्ति के दो प्रकार होने से भी दो भेद और मान लिये जाते है। अनुमान जब अपने लिये किया जाता है तब उसे स्वार्थानुमान, और जव किसी अन्य के लिये किया जाय तब उन परार्थानुमान भी कहत है । भगवान् चरककार ने अनुमान का लक्षण निम्न प्रकार से कहा है- "प्रत्यक्ष पूर्व त्रिविधं त्रिकालश्चानुमीयते । वह्विनिगूढो धूमेन भैथुनं गर्भदर्शनात् ।। एवं व्यवस्यन्ततोतं बीजात्फलमनागतम् । दृष्ट्वा वीजात्फलं जातमिहैव सदृशं बुधाः ॥ च. स्. अ. ११ उपाध्याय गङ्गेश ने “सम्यगविना भावेन परोक्षानुभवसाधन मनुमानम" सुन्दर तथा सरल लक्षण किया है । अनुमानक्रम--वस्तुत: अनुमान ज्ञान का क्रम यह है कि कोई १-तत्त द्विविधं प्रत्यक्षतोदृष्टसम्बन्धं सामान्यतोदृष्टसम्बन्धञ्च ॥ २-तत्तु द्विविध-दृष्टं सामान्यतोदृष्टञ्च । प्रशस्तपादभास्य, शावर भाष्य । ३---विविधमनुमान माग्ख्यातम् । सा० का. ४-- सिषा यषाशून्यासिद्धिर्यत्र न विद्यते । सपक्षस्तत्रवृत्तित्व ज्ञानादनुमितिर्भवेत ॥ मु० का० ७० साध्य के निश्चय करने की इच्छा 'सिषाधयिषा' कहलाती है इस सिषा यषा रहित सिद्धि के अभावात्मक श्राश्रय को पक्ष कहते है। इस पक्ष में वृत्तित्व ज्ञान द्वारा (व्याप्ति विशिष्ट हेतुशिघ्यावगाह ज्ञान- रूपीपरामर्श से ) अनुमान किया जाता है। अन्न भट्ट ने संदिग्ध साध्य के आश्रय को पक्ष माना है (संदिग्ध साध्यवान् पक्षः)। अन्न मह का कहना है कि यदि साध्य की सत्ता का ज्ञान हमें प्रथम ही से हो तो अनुमान की आवश्यकता ही न होगी। किन्तु नव्य नैयायिको का कहना - - [ पदार्थ मीमांसा घुरुप महानसादिस्थलो में धूम में वही का साहचर्यनियमरूपव्याप्ति ज्ञान (अधिनाभावसम्बन्ध) कर चुका है वही पुरुष किसी पर्वत में अविच्छिन्न धूमरेखा को देखता है तब उसे धूम वह्विव्याप्य है, इस प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता है । इसके पश्चाद् अग्निव्याप्यधूमवालापर्वत यह है इस प्रकार के परामर्श होने पर पर्वत अग्नि वाला है इस प्रकार के सम्यक ज्ञान को अनुमान कहते है । जिस वस्तु के पक्ष में सिद्धि की जाती है वह साध्य या व्यापक कहलाता है | जिसके द्वारा सिद्ध किया जाता है उसे साधन, हेतु, लिङ्ग, या व्याप्य कहते है जैसे— 'धूमों वह्निव्याप्य:' यहाँ पर धूम अग्नि का व्याप्य तथा अग्नि व्यापक है क्योंकि धूम सर्वत्र अग्नि में स्थित ही प्राप्त होगा किन्तु अग्नि तदितर स्थानों में भी प्राप्त होती है अतएव व्याप्य से व्यापक का अनुमान ही न्यायसंगत है, व्यापकद्वारा व्याप्य का अनुमान उचित नहीं है, तथापि सांख्यशास्त्र में व्यापकद्वारा व्याप्य के अनुमान करने का भी निर्देश किया गया है । अनुमानभेद -कारण की उत्पत्ति पर कार्य की कल्पना करना जैसे मेघों से परिपूर्ण श्राकाश मण्डल को देखकर दृष्टि का अनुमान पूर्ववत् कहलाता है । कार्य द्वारा कारण की कल्पना जैसे बद्धित नदी को देखकर वर्षा का अनुमान शेषवत् माना जाता है। कुछ प्राचार्य अन्वय मुख होनेवाले अनुमान को पूर्ववत् तथा व्यतिरेक मुख से प्रवृत्त होनेवाले ज्ञान को शेषवत् मानते है। परिशेषानुमान भी शेषवत् का उदाहरण है। सामान्यमात्रदर्शन सामान्यतोदृष्ट कहलाता है। यह उस स्थान पर होता है जहाँ वस्तुविशेष की सत्ता का अनुभव न होकर सामान्य रूप का परिचय हो जैसे इन्द्रियों की सत्ता का अनुमान इत्यादि । परार्थानुमान में पञ्चावयव वाक्य 'प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण,उपनय निगमन' से प्रवृत्त है कि पूर्व का ज्ञान अनुमान ज्ञान का वाधक नहीं होता यदि अनुमन्ता की साध्य-साधन की इच्छा तादृश ज्ञान सिद्धि में प्रवर्तित हो । १-तलिङ्ग लिङ्गि पूर्वकम् । सां० का० मान प्रमाण विज्ञानीय] १५ का न्यायमत से प्रयोग करना आवश्यक माना गया है। वेदांती तथा भीमांसक इन पञ्चावयववाम्यों में से यादि के तीन या अंत के तीन वाक्यों को ही पर्याप्त मानते है पंञ्चावयववाक्य-सिद्ध किये जानेवाले साध्य वस्तु का उल्लेख.. प्रतिज्ञो पद से होता है। अनुमान को सिद्ध करनेवाले कारणत्व का निर्देश ‘हेतु' पद से किया जाता है । हेतु और साध्य के नियतसाह- चर्य का निर्देश ‘उदाहरण' वा 'दृष्टान्त' पद से होता है। व्याप्ति विशिष्ट पक्ष का वोध 'उपनय' द्वारा किया जाता है। तदनन्तर अनु- के द्वारा प्रतिज्ञा की सिद्धि की जाती है, वह 'निगमन' कहलाता है । जैसे' पर्वत अग्नि युक्त है यह प्रतिज्ञा है । धूम की उपस्थिति होने से, यह हेतु है । जो जो धूम युक्त होता है, सों सों अग्नि युक्त भी होता है, यह उदाहरण है । तैसा. यह है, यह 'उपनय' है। तिससे यह ऐसा ही है, यह निगमन है। व्यापिक-अनुमानप्रमाण में व्याप्ति का स्थान सर्वोत्कृष्ट है । हेतु १-वात्स्यायन ने पञ्चावयववाक्यातिरिक्त, जिज्ञासा, संशय, शक्यप्राप्ति, प्रयोजन, संशयब्युदास, पाच वाक्यो को अधिक मानने वाले मैया- यिको का उल्लेख भी किया है। भाष्यकार के मत में ये अनुमान के लिये अनुपयोगी है किन्तु सिद्धि में सहायक हो सकते हैं। २-प्रतिज्ञानाम साध्यवचमं यथा नित्यः पुरुषः । ३-हेतुर्नामोपलब्धिकरणं तत्प्रत्यक्षमनुमानमैतिह्यमौपम्यमित्येभिहेंनुभिर्य दुपलम्यते तत्तत्वम् । च० वि० ०८ ४- दृष्टान्तो नाम स यत्र मूर्ख विदुषां बुद्धिसाम्यं तेनैव यो वयं वर्णयतीति यथाग्निरुष्णो द्रवमुदकं स्थिरा पृथ्वी श्रादित्यः प्रकाशकः इति यथा आदित्यः प्रकाशकः तथा सांख्यं ज्ञानं प्रकाशकमिति । च०वि०प्र० ५--पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वाद्, योयो धूमवान् ससोऽग्निवान् यथा महानसम् तथा चायं तस्मात्तथेति । तर्क संग्रह ॥ ६-हेतुसाध्ययोरनौपाधिको नियतः सम्बन्धो व्याप्तिः । व्यभिचारादर्शन सति सहचारदर्शनेन गृह्यते ब्याप्तिः । च० वि ० अ. - , [ पदार्थ मीमांसा तथा साध्य के नियतसाहचर्यसम्बन्ध को व्याप्ति कहते हैं। उदाहरणार्थ 'जहाँ-जहाँ धूम है वहाँ-वहाँ वह्निः है' इस साहचर्य नियम की सत्ता सर्वत्रैव विद्यमान है अतएव धूम तथा वह्वि की व्याप्ति न्यायसंगत मानी गयी है । प्राचीनदार्शनिक अविनाभावसम्बन्धद्वारा व्याप्ति मानते थे । यह व्याप्ति धूम द्वारा वह्नि में स्थापित को ज.तो है, किन्तु वह्नि द्वारा धूम में सिद्ध नहीं हो सकती। क्योंकि सर्वत्र वह्नि में धूम की प्राप्ति नहीं होतो जैसे ततगोलक, विद्युदादि । यह धूम पार्टेन्धन संयोग से उत्पन्न होता है । इस पाईन्धन संयोग को उपाधि कहते हैं । अतएव हेतु और साध्य के अनौपाधिक नियत सम्बन्ध को व्याप्ति कहते हैं इस व्याप्तितत्व का यथार्थपरीक्षण अन्वय, व्यतिरेक, व्यभिचारग्रह उपाधिनिरास, तर्क और सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति द्वारा करते है अन्वय-एक वस्तु की सत्ता होने पर दूसरे की सत्ता । ( तत्सत्वे तत्सत्ता ) अन्वय है, जैसे वह्नि की सत्ता होने पर धूम को सत्ता व्यति- रेक-एक वस्तु के अभाव होने पर दूसरी वस्तु का अभाव ( तदभावे तदभावः ) व्यतिरेक है जैसे वह्नि के अभाव में धूम का अभाव । व्यभिचारग्रह---अन्वय तथा व्यतिरेक के द पत होने पर अति व्याप्ति अव्याप्ति तथा असम्भव दोपत्रय उत्पन्न होते हैं इसे ही व्यभि- चारग्रह कहते हैं। ग्रान्वन संयोग यादि उपाधि माने गये हैं तर्क-इसका उल्लेख जैनप्रक्रिया में प्रगणरूप से, किन्तु अन्य दर्शन कारो ने इसे 'विचारात्मक ज्ञान का व्यापारस्वरूप माना है। तर्क पर्याय ऊह है ! इसका अर्थ प्रमाणानुकूलमनोव्यापार मात्र । यह व्याप्तिज्ञान में वाधक होनेवाली अप्रयोजकत्व शङ्का को निरस्त करनेवाला, व्याप्यारोपपूर्वक व्यापकका अारोपस्वरूप आहार्यज्ञान मात्र माना गया है । यह व्यभिचारशङ्का को हटाकर व्याप्तिनिर्णय में सहकारी १-व्याप्यारोपेण व्यापकारोपस्तर्कः । अन भट्ट । अविज्ञाततत्वेऽर्थे कारणोप पत्तितस्तत्वज्ञानार्थमूहस्तकः । गौ० ० स० । कार्यकारण भाविमूलस्तर्कः, तर्कभाषा । अनुमाम नाम खलु तर्को युक्त्यपेक्षः, यथोक्तम्-अग्नि जरणशक्तया वलं व्यायाम शनया श्रेत्रादीनि शब्द ग्रहणेनेति । च०वि० । का दूसरा है प्रमाण विज्ञानीय] या उपयोगी हो सकता है । वस्तुत: प्राचीन समय से ही दर्शनों में तर्क का स्थान प्रमाण कोटि में नहीं पाता है । चरककार ने इसे वैज्ञानिकता से परीक्षणविधि विशेष कहा है। प्राचीन नैयायिकों ने इसके ११ भेद तथा नव्य नैयायिकों ने ( अात्माश्रय, अन्योऽयाश्रय, चक्रक, अनवस्था, तदन्यबाधितार्थप्रसङ्ग) पाँच भेद किये हैं हेतु-हेतु द्वारा हो अनुमान को सिद्ध होती है । हेतु में जब पक्ष में रहना, सपक्ष में रहना, विपक्ष में न रहना, साध्य से विपरीतार्थ सिद्धि के लिये अन्य हेतु का अभाव ( असत् प्रतिपक्षत्व ), प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा वाधित न होना, यह पाँच गुण विद्यमान होते हैं तब उसे सद् हेतु कहते हैं । जब इनमें किसी में त्रुटि होती है तब उसे असद् हेतु या हेत्वाभास कहते हैं। यह भी सव्यभिचार (अनैकान्तिक), विरुद्ध, प्रकरण- सम ( सत्प्रतिपक्ष ), साध्यसम (असिद्ध ), कालातीत ( बाधित ), भेदों से पाँच प्रकार के माने गये हैं। उपमान--उपमानप्रमाण के विषय में बहुत ही मतमतान्तर है। चार्वाक उपमान का अस्तित्व ही नहीं मानता है । वैशेपिक अनुमाना- १-''तृप्लवनतरणयोः" इतिधात्वथकृतेतय॑न्तेप्रतिपाद्यन्तेसत्यासत्यौ- येनतत्तकम् । "अविज्ञातेतत्वेऽर्थे कारणोपपत्तितस्तत्व-ज्ञानार्थ मूहस्तर्कः" २-जलकर्षणवीज संयोगाक्छस्यसंभवः । युक्तिः षड्धातुसंयोगाद् गर्भाणं सम्भवस्तथा ॥ मथ्यमन्थनमन्वानसंयोगादग्निसम्भवः । युक्ति युक्ताचतुस्पादसम्पदव्याधिनिवर्हणी ॥ बुद्धिः पश्यति या भावान् बहुकारणयोगजान् । युनिस्त्रिकालासाज्ञ या त्रिवर्गः साध्यतेयया । एषा परीक्षानास्त्यन्या यया सर्वपरीक्ष्यते । परीक्ष्यंसदसई व तथा चास्तिपुनर्भवः ॥ चरक ३-अनैकान्तो विरुद्धश्चाप्यसिद्ध प्रतिपक्षितः । कालात्ययापदिष्टश्च हेत्वाभासास्तुपञ्चधा । प्रायः साधारणस्तुस्यादसाधारणकोऽपरः । तथैवानुपसंहारी त्रिधामैकान्तिको भवेत् ।। का० ७१७ ७२ .. ।

. १८ [पदार्थ मीमांसा न्तर्गत मानते हैं । सांख्यवाले उपमान को शब्द तथा प्रत्यक्ष की अांशिक- स्थितिस्वरूप स्वीकार करते हैं। जैनदर्शन उपमान को प्रत्यभिज्ञा "इन्द्रिय- जन्य ज्ञान और स्मरण के बाद एक संकलनात्मक विजातीयमानसज्ञान पैदा होता है जिसे प्रत्यभिज्ञा कहते हैं" मानता है, जो कि परोक्षज्ञानान्तर्गत है। मीमांसक तथा वेदान्ती उपमान प्रमाण को मानते हैं, तथापि उनकी कल्पना नैयायिकों से भिन्न है । नैयायिकों ने उपमान में प्रामाण्य, बहुत मुन्दरता के साथ प्रतिपादित किया है, जैसे- प्रथम अनुभूतपदार्थ के साथ सादृश्यधारण करनेवाले नूतनपदार्थ का जब ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे उपमान कहते हैं, जैसे कि “गो के समान ही नीलगाय होती है" इस वाक्य के श्रवणानन्तर जंगल में जानेवाला पुरुष जब गौ के समान अन्य पशु को देखता है तब उसे नीलगाय का ज्ञान हो जाता है । चरक- कार ने भी अन्यवस्तु के सादृश्यद्वारा अन्यवस्तु के बोध को उपमान कहा है शब्दप्रमाण-इस प्रमाण में भी दो मत है । चार्वाक, बौद्ध, जैन आदि नास्तिक दर्शनकार शब्दप्रमाण को प्रत्यक्ष तथा अनुमानातिरिक्त नहीं मानते । न्याय, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा, तथा उत्तरमीमांसा के प्रकाण्डविद्वानो ने प्रत्यक्ष तथा अनुमानातिरिक्त शब्दप्रमाण को भी स्वीकार किया है। श्रास्तिक दर्शनों में वेदप्रामाण्यवादी न्यायवैशेषिक दर्शनकारो ने वेद का प्रामाण्य ईश्वरमूलक मानकर, वेद का प्रामाण्य परत: स्थापित किया है। मीमांसको ने अनीश्वर वादी होने के कारण वेदप्रामाण्य स्वप्त: मान लिया है। वस्तुत: अपरोक्षार्थक शब्द का ज्ञान श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष के अन्तर्गत आजाता है, जिसमें कि किसी को १-भासर्वज्ञ नामक मैयायिकोंने इसे पृथक न मानकर शम्दान्तर्गत माना है अतएव कुछ मैयायिक भी इसे पृथक प्रमाण नहीं मानते हैं। २-ौपम्यनाम तद्यदन्येनान्यास्यसादृश्यमधिकृत्यप्रकाशनम् यथा दण्डेनदण्डकस्य, धनुषाधनुःस्तम्भस्य, इस्वासिनारोग्यदस्येति । च. वि. अ.

है । प्रमाग विज्ञानीय ] विप्रतिपत्ति नहीं है किन्तु परोक्षार्थक शब्द का समर्थन प्रत्यक्ष में समा- वेश नहीं हो सकता है । इस परोक्षार्थक शब्द का प्रामाण्य शब्द प्रमाण द्वारा स्वतन्त्रतया स्वीकार किया गया है। वैशेषिकादि प्राचार्य इस परोक्षार्थकशब्द का प्रामाण्य अनुमान द्वारा ही मानते हैं । वस्तुत: शब्द- प्रमाण को वही पर चरितार्थता प्राप्त है, जहाँ पर, प्रत्यक्ष तथा अनुमान द्वारा ज्ञानप्राप्ति न हो सके, अर्थात् यज्ञादिक तथा स्वर्गादिक की सिद्धि प्रत्यक्ष तथा अनुमान प्रमाण द्वारा नहीं हो सकती है, अतएव इसे सिद्धि करने के हेतु शब्दप्रमाण को मानना पड़ता है। श्रनपाद ने भी वेदों में प्रामाण्य शब्दप्रमाण द्वारा ही प्रतिपादित किया है । दृष्टान्त में उनका कहना यह है कि वंद के एक अंश मन्त्रायुर्वेद आदि यथार्थ होने से प्रमाण है, वैसे शेष अंश भी ऋषि प्रणीत होने के कारण प्रमाण स्वरूप । चरक न्याय तथा सांख्य में शब्द प्रमाण का लक्षण एक ही प्रकार से किया गया है अर्थात् याप्तो द्वारा उपदेशित वाक्य प्रमाण है । यथार्थ वक्ता ही प्राप्तमाना जाता है। वस्तुत: प्राप्त वाक्य में पदज्ञान के उपरान्त शक्ति-जानजन्य पदार्थोपस्थिति द्वारा शब्दयोधरूप फल प्राप्त होता है जिसे शब्दप्रमाण कहते हैं अर्थात् शब्द वोध के प्रति पदज्ञान करण, पदार्थ- ज्ञान व्यापार, पदौरअर्थ इन दोनों में शक्ति रूप जो विशेषसम्बन्ध, १-सामान्यतस्तु दृष्टादतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् । तस्मादपि चासिद्धं परोक्षमाप्तागमात् सिद्धम् ॥ सां० का० २-मन्त्रायुर्वेद प्रामाण्याञ्च तत्प्रामारयं, आप्तप्रामाण्यात् । अ० भा० ३-रजस्तमोभ्यां निर्मुक्तास्तपो ज्ञान वलेन ये । येषां त्रैकालममलं ज्ञानमव्याहतं सदा ।। आप्ताशिस्टा विबुद्धास्ते तेषां वाक्यमसंशयम् । सत्यं वक्ष्यन्ति ते कस्मा नीरजस्तमसोमृपा ॥ चरक० प्राप्तोपदेशःशब्दः। त० स० । प्राप्त वाक्यानां प्रमाणम् -च. तत्रोपदेशो नामाप्तवचनम् । प्राप्ताहरिवतर्क स्मृतिविभागविदो [पदार्थ मीमांसा इसका ज्ञान सहकारी कारण है, इनसे शाब्दबोधरूपफल प्राप्त होता है, जिसे कि शब्दप्रमाण कहते हैं। मीमांसको ने प्राप्तवाक्य ( पौरू- षेय ) तथाश्रुतिमूलक * ( अपौरूषेय ) भेद से वाक्यों को दो प्रकार का माना है इसके पुन: सिद्धार्थक तथा विधायक वाक्य द्वारा दो भेद होत पदार्थ की सत्ता प्रदर्शित करनेवाले वाक्य को सिद्धार्थकवाक्य तथा यज्ञादिक अनुष्ठान के प्रेरक वाक्य को विधायकवाक्य कहते हैं। हैं भावना-* इस वैदिक वाक्य के विवेचनार्थ भावना का प्राश्रय लेते हैं यथा “यजेत स्वर्ग काम:" यहाँ पर यजेत में दो अंश माने जाते हैं एक यजि धातु दूसरा तिङ प्रत्यय । तिङ प्रत्यय के भी दो भाग होत हैं एक आख्यातार्थ दूसरा लिङ त्व । श्राख्यातार्थ दसों लकारो का बोध कराता है तथा लिङ त्व से लिङ लकार का ग्रहण होता है भावना लक्षण "भवितुर्भवनानुकुलो भावयितुर्व्यापार विशेषः” अर्थात् उत्पद्यमान वस्तु की उत्पत्ति के अनुकुल, या उत्पादक का व्यापारविशेष अर्थ किया जाता है । वस्तुत: वेद के शब्दों को सुनकर क्रियानुष्ठानार्थ प्रेरणा उत्पन्न होती है, जिसे कि भावना कहते हैं । जर्मनी दार्शनिक कैण्ट ने भी भावना को शुद्ध प्रेरणा ( कैटे गारिकल इम्परेटिव ) के रूप में माना है । इसके शाब्दी तथा प्रार्थी द्वारा दो भेद होते हैं , १ - निस्त्रीत्युपतापदर्शिनः । तेषामेवंगुणयोगद् यद्वचनं तत् प्रमाणम् इति-च०वि० अ०४ पदज्ञामं तु करणं द्वारं तत्र पदार्थधीः । शाब्दबोधः फलंतत्र शक्ति धी: सहकारिणी-मु० का० -मीमांसक ईश्वर को नहीं मानते किन्तु धर्म को प्राधान्य रूप से स्वीकार करते हैं, अतएव धर्म का प्रतिपादन करनेवाला वेद अपौ- रुषेय तथा नित्य है। इन वैदिकवाक्यों में विशेष प्रकार की प्रेरणा संनिहित रहती है जिसे कि भावना कहते हैं। २ प्रमाण विज्ञानीय] शादीभावना-पुरुष -पुरुप के प्रवृत्यनुकृल प्रेरकका व्यापारविशेष शाब्दी भावना ( तत्र पुरुषप्रवृत्यनुकूलभावयितुर्व्यापार विशेष: शाब्दीभावना ) कहलाता है। इसका विधान लिङ और कहीं २ पर लेट द्वारा किया जाता है लौकिक वाक्य में ब्यापारविशेष पुरुपनिष्ठ अभिप्रायविशेष माना जाता है । वैदिकवाक्य में पुरुषाभाव होने से लिड़ादिशब्द निष्ठ माना जाता है, इसे ही शाब्दीभावना कहते हैं। यह शाब्दी भावना साध्य, साधन, इतिकर्तब्यता द्वारा तीन भागों में पूर्ण होती है । प्रार्थी भावना-प्रयोजनेच्छाद्वारा उत्पन्नक्रिया का विषयब्यापार हो श्रार्थी भावना (प्रयोजनेच्छाजनितक्रियाविषय ब्यापार प्रार्थी भावना ) कहलाता है। यह पायात ग्रंश से समन्वित होती है जो कि पाख्यात अंश, दसोलकारो में सामान्यव्यापारवाचि गुणवाला है। यह भी साध्य, साधन, इतिकर्तव्यतारूप अंशत्रय युक्त मानी जाती है । विधिमीमांमा-समस्त वेद के विषय को विधि, मन्त्र, नामधेय निषेध और अर्थवाद, इन पाँच भागों में विभक्त करते हैं। अज्ञात अर्थ के ज्ञापकवेदभाग को विधिवाक्य ( तत्राज्ञातार्थ ज्ञापको वेदभागोविधि: यथा स्वर्गकामोयजेत ) कहते हैं । येह विधिवाक्य उत्पत्तिविधि, विनियोगविधि, अधिकार विधि और प्रयोगविधि द्वारा चार भागों में विभक्त होते है । कर्म के स्वरूप मात्र को बताने वाली विधि उत्पत्ति विधि ( कर्मस्वरूपमात्रबोधको विधिः यथा अग्नि होत्रं जुहोतीति ) होती है। अङ्गप्रधान अनुष्ठानों के सम्बन्ध वोधक विधिको विनियोग विधि ( अङ्गप्रधानसंबन्धबोधकोंविधि: यथादध्ना जुहोतीत ) कहते हैं । इस विनियोगविधि के सहकारीभूत श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान और समाख्या ६ प्रमाण माने गये हैं। श्रुति-प्रमाणान्तर निरपेक्ष शब्द श्रुति कहलाता है यह विधात्री, अभिधात्री, विनियोक्त्री भेद से तीन प्रकार होते हैं। विधात्री लिङ लेट द्वारा उत्पन्न होती है। ब्रीह्यादि द्वारा अभिधात्री का वोध होता है Auranavr -~- [ पदार्थ मीमांमा और विनियोक्त्रीश्रुति-विभक्तिरूपा, एकाभिधानरूपा, एकपदरूपा,द्वारा पुन: तीन भागो में विभक्त होती है लिङ्ग-शब्द सामर्थ्य को लिङ्ग कहते हैं 'सामर्थ्य सर्वशब्दानां लिङ्ग मित्यभिधीयते” यथा वहिंदेव सदनं दामि-इति । वाक्य-शेष-शेषि वाचकपदो का एक साथ उच्चारण वाक्य कह- लाता है ( समभिब्याहारो वाक्यम् – यथा-यस्प पर्णमयी जुहूर्भवति न स पाप श्लोकं श्टणोतीति)। प्रकरण-उपकार्या कांक्षा तथा उपकारका कांक्षा प्रकरण कहलाता । यथा “समिधो यजति" यहाँ पर 'क्यों' इस प्रकार की उपकार्याकांक्ष रहती है । “दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्ग भावयेद्" इस प्रकार के ज्ञानोत्तर यह प्रश्न होता है कि 'कैस' इसे उपकारकाकांक्षा कहते हैं । यह प्रकरण- प्रधान तथा गौङ भेद से महाप्रकरण तथा अवान्तरप्रकरण में विभक्त होता है। संदंश-महाप्रकरण में विधीयमानअङ्ग यदि दूसरे स्थान पर विधायक होतो उसे संदंश कहते हैं ( परप्रकरणस्थानामङ्गे श्रुत्यादिभि त्रिभिः । ज्ञाते पुनश्च तैरेव संदंशेन तदिष्यते )। म्थान--देशसामान्य ही स्थान या क्रम कहलाता है। इसके पाठ सादेश्य तथा अनुष्ठानसादेश्य दो भाग किये जाते हैं । पाठसादेश्य के यथासंख्यपाठ और संनिधिपाठ नामक दो भेद होते हैं। यथा संख्य का उदाहरण --- "ऐन्द्राग्नमेकादशकपालं निर्वपेत्" "वैश्वानरं द्वादशकापलं- निर्वपेत् इति । संनिधिपाठ का उदाहरण 'वैश्वदेवी सांग्रहणी निवपेद् ग्रामकाम:" यहाँ पर कामेष्टियाग के समीप अामन होम का विधान है । अनुष्ठानसादेश्य का उदाहरण कुशकण्डि का इत्यादि है । समाख्या--यौगिकशब्द को समास्या कहते हैं। यह वैदिकी ( होतृचमस ) और लौकिकी (आध्वर्यव ) दो प्रकार की होती है यह पड प्रमाण क्रमश: पूर्व-पूर्व वली या उत्तरोत्तर न्यून बली हो जाते - प्रमाण विज्ञानीय ] । इन पड प्रमाणों से निर्णीत विनियोगविधि के सिद्धरूप और क्रियारूप दो प्रकार हो जाते हैं। प्रयोगविधि प्रयोग के भावो को शीघ्र वोधकरानेवाली विधि को प्रयोगविधि कहते हैं, अथवा अङ्गों के पूर्वापररूपी क्रमसूचक विधि को प्रयोग विधि कहते हैं । क्रम का अर्थ यहाँ पर विस्तारविशेष से है, या पौर्वापर्यरूपसम्बन्धविशेष समझना चाहिये । यदि क्रम निर्देश न होतो किस कार्य के बाद क्या करना चाहिये, और क्या नहीं करना चाहिये, इसका ज्ञान नहीं हो सकता है । इस प्रयोग विधि में भी श्रुतिक्रम, अर्थक्रम, पाठक्रम, स्थानक्रम, मुख्यक्रम, प्रवृत्तिकम, पड् प्रमाण माने गये हैं। श्रुतिक्रम क्रमयुक्तवचन ही श्रुतिक्रम कहलाता है। यह केवल क्रमपर तथा विशिष्ट पदार्थपर भेद से दो प्रकार का होता है। केवल क्रमपर का उदाहरण “वेदं कृत्वा वेदि करोति” है। विशिष्ट पदार्थ पर का उदाहरण “वपटकर्त: प्रथमभक्ष” दिया गया है। अथक्रम-प्रयोजन के अधीन होकर जो क्रम निश्चित किया जाता है उसे अर्थक्रम कहते हैं जैसे 'अग्नि होत्रं जुहोति' 'यबागू पचति' यहाँ पर अग्निहोतृ में प्रथम यवागू का पाक किया जाता है तदनन्तर यवागू द्वारा हवन किया जाता है । पाठक्रम- पदार्थवोधकवाक्यक्रम को पाठक्रम कहते हैं यह मन्त्र पाठ तथा ब्राह्मणपाठ भेद से दो प्रकार का होता है। यज्ञादिमे प्रथम मन्त्रपाठ ही होता है क्योंकि मन्त्रभाग ब्राह्मणभाग से बलवान् दूसरे मन्त्रभाग अन्तरङ्ग माना जाता है जबकि ब्राह्मण भाग वहिरङ्ग की सत्ता रखता है, इसके अतिरिक्त यागादि में मन्त्रभाग के अभाव में ही प्राय: ब्राह्यणभाग गृहीत किया जाता है स्थानक्रम-उपस्थिति को स्थान कहते हैं अर्थात् जब कोई अनु- ष्ठान किया जाता है उस समय के प्रथम अनुष्ठानोत्तर जो क्रम प्राप्त होता है उसे स्थानक्रम कहते हैं। वस्तुत: उपस्थितिविशेष द्वारा जो : ।

है [ पदार्थ मीमांसा अनुष्ठान का पौर्वापर है वही स्थान क्रम कहलाता है जैसे “वाश्विन ग्रह कृत्वानिवृतायूपंपरिधीय ग्राग्नेयंसबनीयं पशुमुपाकरोति" इति । मुख्यक्रम-प्रधानपौर्वापर द्वारा जो अङ्गों का क्रम होता है उसे मुख्य क्रम कहते हैं प्रवृत्तिक्रम-एक साथ उपस्थित बहुत से प्रधानवाक्यों पर अङ्गों की उपस्थिति के विचार के साथ द्वितीयादि पदार्थो की क्रिया रोककर प्रथमपदार्थ का अनुष्ठान याद्यक्रम या प्रवृत्तिक्रम कहलाता अधिकार विधि-कर्म जन्य फल को भोक्त त्वविधि को अधिकार विधि कहते हैं 'यजेत स्वर्गकाम:' "अहरहःसन्ध्यामुपासीत" । मन्त्रमीमांसा-प्रयोग के समवेत अर्थ का स्मारक मन्त्र होता है। नियम बिधि के अाश्रय द्वारा मन्त्रो से स्मरणीयज्ञान होता है। इस प्रकार अर्थ के स्मारक होने से अर्थवत्व प्रधान मानते है । इसमें भी नियमविधि और परिसंख्याविधि का ज्ञान अनिवार्य है नियमविधि-नाना साधनो द्वारा साधित क्रिया में एक साधन प्राप्त होने पर अप्राप्त दूसरे साधन को पहुँचानेवाली विध नियमविधि कहलाती है। कहा भी है "विधिरत्यन्तमप्राप्तौनियम: पाक्षिके सति । तत्रचान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्येति गीयते” । अर्थात् पक्ष में प्रमाणान्तर से अप्राप्त विधि की प्रापकविधि नियमविधि कहलाती है जैसे ब्रीहीनवहन्ति' । परिसंख्याविधि-दो विधियों के एक साथ प्राप्त होने पर एक विधि की व्यावृत्तिपरकविधि परिसंख्याबिधि कहलाती है जैसे 'पञ्च पञ्च नखा भक्ष्या: यहाँ पर पञ्चनखभक्षण रागत: ही प्राप्त है, अतएव इस वाक्य से अपञ्चनखभक्षण की ब्यावृत्ति हो जाती है । इस परि- संख्याविधि में श्रुतिहानि, अश्रुत कल्पना, और प्राप्तवाध तीन दोष होते हैं "श्रुतार्थस्यपरित्यागात्- अश्रुतार्थ प्रकल्पनम् । प्राप्तस्य वाधादित्येवं परिसंख्या त्रिदूषणा इति ।

प्रमाण विज्ञानीय २५ अर्था रत्ति --जिसके द्वारा अर्थ की उपपत्ति न हो सके उसे अर्थापत्ति कहते हैं अर्थात् किसी अर्थ ज्ञान का अर्थान्तर बिना किये अनुपपत्ति देखकर अर्थ की उपपत्ति के लिये जो अर्थान्तर की कल्पना की जाती है उस अर्थापत्ति कहते हैं जैसे पीनो देवदत्तः दिवा न भुङ्क्ते' यहां पर पीनता बिना भोजन के सम्भव नहीं है अतएव देव- दत्त रात्रि में भोजन करता है यह सिद्ध होता है। इस अर्थापत्ति के दो भेद माने जाते हैं, प्रथम दृष्टार्थापत्ति तथा द्वितीय श्रतार्थापत्ति । दृष्टार्थापत्ति -देखी हुई वस्तु की सिद्धि के लिये अर्थान्तर की कल्पना दृष्टार्थापत्ति कहलाती है जैसे यह स्थून पुरुष दिन में नहीं खाता । नामधेयमीमांम्मा-विजातीय अर्थ का व्यावर्तक, विधेयार्थ का निश्चायक शब्द नामधेय कहलाता है जैसे 'उद्भिदा यजेत पशु काम:' उद्भिद् पद से उद्भद् नाम यागविशेष का विधान होता है निषेध मोमांमा - पुरुष के निवर्तक वाक्य को निषेध वाक्य कहते हैं जैसे “न कलजं भक्षयेद्" । अर्थवद मीमांमा-पाशस्त्यनिन्दान्यतरपरवाक्य अर्थवाद कह- लाता है। इससे लक्षणा द्वारा निष्प्रयोजन विधेयनिषेध्य वाक्यों की प्रशंसा या निन्दा कर स्वार्थ प्रतिपादन किया जाता है। इस अर्थवाद के विधिशेष और निषेधशेष दो भेद होते हैं विधि शेष का उदाहरण 'वायव्यं श्वेतमा लभेत भूति काम:' तथा निषेध शेष का उदाहरण 'बर्हिषि रजतं न देयम्' है । इस अर्थ पाद के गुणवाद, अनुवाद, भूता- र्थवाद तीन भेद किये जाते हैं "विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवाद स्त्रिधा मतः” । गुणवाद का 'अादित्यो यूपः' अनुवाद का 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' तथा भूताथवाद का 'यथा इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' इत्यादि उदाहरण दिये गये हैं। १-यदकीर्तितमर्थादापद्यते साऽर्थापत्तिः । यथा प्रोदनं भोक्ष्ये इत्युक्तेऽर्थादापन्न भवति–नायं पिपासुर्यवागूमिति । सु० अ० ६५ [ पदार्थ मीमांसा श्र तार्थापत्ति-वस्तु के यथार्थ ज्ञान के लिये अन्य शब्द की जब कल्पना करनी पड़ती है तब उस श्रुताापत्तिकहते हैं जसे 'पिधेहि' कहने पर द्वार शब्द को कल्पना करना आवश्यक है। चरककारने इसका लक्षण सरलता के साथ प्रदर्शित किया है यथा “अर्थ प्राप्ति म यत्रै केनार्थनोक्तेनापरस्यार्थस्थानुक्तस्य सिद्धिः । यथा नायं सन्तर्पण साध्योव्याधिः इत्युक्त भवत्यथप्राप्ति रपतर्पण साध्योऽयमिति । नानेन दिवा भोक्तव्य मित्युक्ते भवत्यर्थ प्रापि निशि भोक्तव्य मिति" | च० । मुश्रुतकार ने भी कहा है “यद कीर्तितमर्यादापद्यते सार्थापत्ति. रिति । अर्थापत्ति के अर्थ का प्रकाशन श्रुति या श्राक्षेप द्वारा होता है। श्रुति अर्थ अभिधा द्वारा हाता है किन्तु आक्षेप व्यङ्गय ध्वनि द्वारा होता है । व्यङ्गय ध्वनि स्तुत, स्तोत्र, समासोक्ति, अपह्ल ति, पर्या- योक्ति और समाख्या भेद से ६ प्रकार की मानी गयी है । अर्थापत्ति के ज्ञानोत्तर प्रश्न यह है कि क्या स्तुतस्तोत्रादि अलंकारों के साथ अर्थापत्ति प्रमाण मानी जा सकती है । यदि अलंकारविरहित केवल दृष्टार्थापत्ति और श्रु तार्थापत्ति को हा प्रमाण माना जाय तो भा संशयात्मक ही है ( अयोपत्तिरप्रमाणमनैकान्तिकत्वात् गौ० सू . )। वात्स्यायन का कहना है कि "मेघों की अनुपस्थिति में वर्षा नहीं होती" ऐसा कहने पर मेघों की उपस्थिति में वर्षा होती है यह अर्था- पत्ति से सिद्ध होता है, किन्तु मेघों की उपस्थिति में भी वर्षा का अभाव प्राप्त होता है अतएव अनैकान्तिक होने से यह प्रमाण नहीं हो सकता। दूसरे अर्थापत्ति प्रतिषेधात्मक है । प्रतिषेधमात्र अनि- श्चयात्मक तथा अनैकान्तिक होता है । इसलिये प्रतिषेधात्मक वस्तु प्रमाणरूप से स्वीकार नहीं की जा सकती। इसके अर्थ यह नहीं हैं कि अर्थापत्ति के सद्भाव में विरोध है । अर्थापत्ति को तद्र प में मानकर अनुमानान्तर्गत स्वीकार करते हैं। मीमांसाकार इसे अनु- से पृथक् प्रमाणरूप से मानते हैं। । । मान प्रमाण विज्ञानीय २७ . अभाव-मीमांसकों का कहना है कि भावपदार्थों की उपलब्धि के साधकभूत जिस प्रकार प्रत्यक्षादि प्रमाण माने गये हैं उसी प्रकार भावेतर पदार्थ के लिए किसी अन्य प्रमाण की भी आवश्यकता है, उसे अभाव या अनुपलब्धि प्रमाण कहते हैं। इसका ज्ञान भावात्मक' पदार्थ का ग्रहण करने वाली इन्द्रियों से नहीं हो सकता, क्योंकि यह असत्तात्मक है अतएव इस श्रभाव प्रमाण का भाट्ट, तथा अद्वतवेदान्तियों ने माना है। नयाथिकों का कहना यह है कि यदि साधनभूत इन्द्रियों से इसका ज्ञान नहीं हो सकता है तो इस अभाव का किसी अन्य प्रकार से बांध भी नहीं हो सकता । वस्तुत: अभाव स्वयं प्रमाण नहीं है, इसका समावेश : त्यक्ष तथा अनुमान में हो जाता है जैसे "इस विकसित कली में गन्ध नहीं है।" इस गन्धाभाव का ज्ञान घ्राणेन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष प्रमाण से ही होता है, क्योंकि यह सर्वजनीन न्याय है कि जो इन्द्रिय जिस वस्तु को ग्रहण करती है वही इन्द्रिय उस वस्तु के अभाव को भी व्यक्त करती है। दूसरे अनुपलब्धि द्वारा पदार्थ के अभाव का बोध नहीं किया जा सकता । अन्यथा रात्रि के अन्धकार में तिरोहित सद्वस्तुओं का भी अभाव सिद्ध हो जायगा, जो कि प्रमाणात्मक न होकर मिथ्या- स्वरूप होगा । यदि इसका सुधार 'योग्यानुपलब्धि' किया जाय तब योग्य पद द्वारा किसका ग्रहण किया गया है, यह प्रश्न उपस्थित होगा। यदि योग्य पद से उपलब्धि के समग्र साधनों की उपस्थिति में, जो अनुपलब्धि, वह अभाव है , ऐसा माना जाय , उस समय, ऐसी अवस्था में प्रत्यक्ष के समग्र साधनों की आवश्यकता होगी, अतएव प्रत्यक्षातिरिक्त किसी प्रकार की कल्पना अनुचित है। इसके अतिरिक्त प्रमेय का विषय अभाव नहीं हो सकता क्योंकि भूत - १-पदार्थो द्विविधः सच्चासच्च । च० सू० २-येनेन्द्रियेण यद्वस्तु गृह्यते तेनेन्द्रियेण तस्याभावोऽपि गृह्यते। मु.

[ पदार्थ मीमांसा अभूत का तथा अभूत' भूत का विरोधी माना गया है । २सम्भवप्रमाण-पौराणि कों ने सम्भव तथा ऐतिह्य प्रमाणों को भी माना है । सहकारदर्शनाधीन ज्ञानस्वरूप सम्भव का लक्षण किया गया है जैसे यह पात्र १ सेर दुग्ध का है या मन भर के पात्र में सेर दुग्ध पाता है। चरककार ने 'सम्भवो नाम यो यत: सम्भवति स तस्य सम्भवः । यथा पडधातवो हि गर्भस्य, व्याधेरहितम, हितमा. रोग्यस्येति " सम्भव का उल्लेख किया है किन्तु पृथक प्रमाणरूप से न मानकर अनुमान के अन्तर्गत हो स्वीकार किया है। जल्पकल्प- तरुकार गंगाधर जी ने इस श्लोक की विवेचना करते हुए कहा है कि “घडधातवो हि गर्भस्य' इसका अभिप्राय यह है कि अात्मा तथा पञ्चमहाभूतों के संयोग के बिना गर्भ की सम्भावना नहीं की जा सकती है अर्थात् गर्भरूप समुदाय को देखकर उपादान स्वरूप पष्ठ धातुओं का अनुमान किया जाता है । इसी प्रकार रोगी को देखकर यह अनुमान होता है कि इसने अहित सेवन किया है क्योंकि बिना अहित के रोग उत्पन्न नहीं हो सकता । स्वस्थपुरुप को देखकर भी इसी प्रकार अनुमान होता है कि यह हित पदार्थों का सेवन करता ऐतिह्य ... 'ऐसा लोग कहते हैं। ( इति होचुद्धा: ) इसे ऐतिह्य कहते हैं । ऐतिह्य में प्रवक्ता के ज्ञान का अभाव रहता है किन्तु कहावत की परम्परा प्रचलित मिलती है जैसे 'इस जंगल में यक्ष रहता है । यहाँ पर प्रवक्ता के ज्ञानाभाव के कारण संशय की ही प्रधानता रहती है । संशयात्मक ज्ञान प्रमाणस्वरूप नहीं माना जा सकता है । वक्ता के शान हो जाने पर प्राप्तवाक्याभिभूत होकर शब्द प्रमाणान्तगत हो १-कार्य कार्यान्तरस्यविरोधि, अभूतं भूतस्य, भूतमभूतस्य । २–सम्भवोनाम सहचारदर्शनाधीनंज्ञानम् । ३ -ऐतिह्य नाम प्राप्तोपदेशो वेदादि: च० ।

२६ प्रमाण विज्ञानीय] जाता है । अतएव ऐतिह्य शब्दातिरिक्त प्रमाण नहीं माना जा सकता है । चरककार ने भी ऐतिह्य प्रमाण को शब्द प्रमागा ही माना है क्योंकि लक्षण करते समय प्राप्तोपदेश (लौकिक ) और वेद ( अलौ. किक ) का स्पष्ट उल्लेख कर दिया है चेष्टा---शारीरिक संकेतों द्वारा भी ज्ञन प्राप्त होता है किन्तु चष्टाश्रित ज्ञान अनुमानान्तर्गत ही या जाता है इसे पृथक प्रमाण नहीं मानते हैं। स्मृति-अात्मा और मन के संयोग विशेष से उद्बोधित संस्कार द्वारा जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसे स्मृति' कहते हैं । इस स्मृति को जैनदर्शनकार परोक्ष में समाविष्ट कर स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं और अन्य दार्शनिक इसे प्रमाण स्वरूप नहीं अंगीकार करते हैं। वैदिक- काल में भी अति धर्मनूलक तथा प्रमाणस्वरूप मानी गयी है और मन्वादि स्मृतिरूप धर्मशास्त्र को श्रुतिमूलकता द्वारा प्रामाण्य हैं, स्वतन्त्र नहीं । अर्थात् स्मृतिज्ञान स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है, वह अपने कारणभूत अनुभव के प्रामाण्य पर निर्भर है, अतएव स्मृतिगृहीत- ग्राही मानी गयी है । कुछ प्राचार्य लोकव्यवहार के अनुपयुक्त तथा अनुभवसापेक्ष भी करते हैं। वस्तुत: स्मृति को प्रमाणस्वरूप न माननेवाले भी इसे अप्रमाण या मिथ्याज्ञान नहीं कहते, किन्तु अनु- भवसापेक्ष, गृहीतग्राही, लोकव्यवहारातीत कहकर स्वतन्त्रप्रमाणरूप से स्वीकार नहीं करते। । १ - प्रात्ममन: संयोग विशेषात्संस्काराच्च स्मृति: । 2-पारतन्त्र्यात् स्वतोनैषां प्रमाणत्वावधारणा । अप्रामाण्यविकल्पस्तु द्रढिम्नैव विहन्यते ।। पूर्वविज्ञानविषयं विज्ञानं स्मृति रुच्यते। पूर्वज्ञानाद्विना तस्या प्रामाण्यं नावधार्यते ॥

। [ पदार्थ मीमांसा प्रमाणों का फल-आध्यात्मिक दृष्टि से सम्यक-ज्ञान या अविद्यानाश फल माना गया है। न्याय या वैशेषिक के प्राचार्यों ने वस्तुविषयक अधिगम को भी लौकिक दृष्टि से स्वीकार किया है प्रमाण के फल पर विचार करते समय, फल और प्रमाण का पारस्परिक सम्बन्ध और दूसरे स्वरूप पर विचार किया जाता है। न्यायवैशेषिक और मीमांसक श्रादि फल को प्रमाण से भिन्न मानते हैं । बौद्धदर्शन अभिन्न तथा जैनदर्शन भिन्नाभिन्न मानते हैं। स्वरूप के विषय में प्रायः एक मत है कि-इन्द्रियव्यापार के बाद होने वाले सन्निकर्ष से लेकर हानोपादानोपेक्षाबुद्धि तक के क्रमिक फलों की परम्परा को फल कहते हुए भी उस परम्परा से पूर्व फल को उत्तर फल की अपेक्षा से प्रमाण भी कहते हैं, अर्थात् इन्द्रिय प्रमाण हैं, फल नहीं हो सकती और हानोपादानोपेक्षाबुद्धि अन्तिम फल फल ही हो सकता है, प्रमाण नहीं, किन्तु बीच के सन्निकर्ष, निर्विकल्पक तथा सविकल्पक ज्ञान, तीनों पूर्व प्रमाण की अपेक्षा से फल और उत्तर फल की अपेक्षा से प्रमाण हो सकते हैं।

सम्भाषाविज्ञानीय द्वितीयोल्लास शास्त्र-विद्वानों द्वारा सर्व प्रथम शास्त्र' की परीक्षा करनी चाहिए । जो शास्त्र जनोपयोगी होता है, उसी का अध्ययन, तथा अध्यापन सार्थक तथा लाभप्रद है। शास्त्र परीक्षा के उपरान्त श्राचा. यदि निर्मित तद्तद्विषयक ग्रन्थों का निरीक्षण करना चाहिए, क्योंकि कुछ ग्रन्थ प्रामाणिक रूप से प्रकरण उदाहरणादि से युक्त होते हैं, और कुछ ग्रन्थ केवल प्रपञ्चात्मक तथा क्लिष्ट होते हैं जो कि साधारण पण्डितों के लिए दुर्बोध हैं प्राचार्य परीक्षा- आचार्य का परीक्षण२ करना प्राचीन समय में प्राय: अनिवार्य था क्योंकि उस समय कोई परीक्षायें इत्यादि न थीं, १--बुद्धिमानात्मनः कार्य गुरुलाघवं कर्मफलमनुबन्धं देशकालौ च विदि. त्वा युक्तिदर्शनाद् भिषग्वुभूषुः शास्त्रमेवादितः परीक्षेत । विविधानि- हि शास्त्राणि भिषजां प्रचरन्ति लोके, तत्र यन्मन्येत सुमहद्य- शस्वि-धीर पुरुषासेवितमर्थ बहुलमाप्तजन-पूजित त्रिविध शिष्य बुद्धि हितमपगत पुनरुक्तदोषमार्ष सुप्रणीत सूत्र भाष्य संग्रहक्रम स्वाधारमनवपतितशब्दमकष्टशब्दं पुष्कलाभिधानं क्रमागतार्थमर्थ- तत्व विनिश्चय प्रधानं संगतार्थमसंकुल प्रकरणमाशु प्रबोधक लक्षणवञ्चोदाहरणवच, तदभिप्रपद्यत शास्त्रम् । शास्त्रंह्य व विध- ममल इवादिस्तमोविधूय प्रकाशयति सर्वम् ।च. वि. अ. १ २ -- ततोऽनन्तरमाचार्य परीक्षेत तद्यथा-पर्यवदातश्रुतं परिदृष्टि- कर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्न प्रकृतिज्ञ प्रतिपत्तिशमुपस्कृतविद्यमनहंकृतमनसूयकमकोपन क्लेश शमं शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थञ्चेति, एवं गुणोह्या चार्यः सुक्षेत्रमार्तवो मेत्र इव शस्य गुणैः सुशिष्यमाशु वैद्य गुणैः -' ૨૨ [ पदार्थ मीमांसा तथा केवल एक गुरु से ही सम्पर्क होता था। श्राधुनिक समय में विद्यालयों द्वारा विद्यार्थियों का एक स्तर निश्चित हो जाता है । अत- एव सरकार ने उचित उपाधियों को भिन्न भिन्न विद्यार्थियों के लिए सम्मानित कर दिया है । जिससे कि गुरुओं की परीक्षा की आवश्य- कता शेष नहीं रही है । इसके अतिरिक्त गुरु जनों की परीक्षा विद्या- र्थियों से न हाकर अधिकारियों द्वारा होती है। शिष्य परीक्षा-विद्यार्थियों के प्रवेश के लिए भी भिन्न भिन्न विषयों में भिन्न भिन्न परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना निश्चित कर दिया सम्पादयति । तमुपसृत्यारि राधयिषुरु पचरेदग्निवच्च देववच्च राजवच्च पितवञ्च भर्तृवचाऽप्रमतः। १-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यानामन्यतममन्वयवयः शीलशौर्यशौचाऽचार वि- नयशक्तिवलमेधातिस्मृति मतिप्रतिपत्तियुक्तं तनुजिहबोष्ठदन्ताऽ. प्रसन्नचित्त पाकचेष्ट क्लेशसहं च भिषक शिष्यमुपनयेत् । सु० सू० अ०२ २-अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमेवादित: परीक्षेत-तद्यथा-प्रशान्त- मार्यप्रकृतिकमक्षुद्र कर्माणमृजुचतुमुख नासावंशंतनुरक्तविशदजिहव. मविकृतदन्तौष्ठममिन्मि[धृतमन्तमलं कृतंमेधाविनं वितर्कस्मात- सम्पन्नमुदारसत्वं तद्विद्यकुल जमथवातद्विद्यवृत्त तत्वाऽभिनिवेशिनम- व्यंगमव्यापन्नेन्द्रियंनिभृतमनुद्धतमर्थतत्वभावक मव्यसनिनमकोपन- शील शौचाचारानुराग दाक्ष्यदाक्षिण्योपपन्नमध्ययनाऽभिकामार्थ विज्ञाने कर्मदर्शने चानन्य कायमलुब्धमनलस सर्वभूत हेतैषिण- माचार्य सर्वानुशिष्टिप्रतिपत्ति कर मनुरक्तमेवंगुणसमुदित मध्याप्य- माहुः । च०वि० अ०८ (शास्त्रीय शिष्य शिक्षण विधि का हवनादि चरक विमान अध्याय ८ में या सुश्रुत सूत्र अध्याय दूसरे में देखना चाहिये वस्तुतः यह विधि कर्मकाण्ड परक है।) ग्रमजुवक्राऽक्षिनासं सम्भाषा विज्ञानीय] ३३ गया है तथापि जिन विषयों में विद्यार्थी अधिक संख्या में प्रविष्ट होना चाहते हैं तथा स्थान सीमित होते हैं वहाँ पर तुलनात्मक परीक्षा करके विद्यार्थियों को कम कर देते हैं। दूसरे गुरुजन भी विद्यार्थियों की प्रवेश परीक्षा में सीमित अधिकार रखते हैं । अतएव वह किसको पढ़ाना चाहिए और किसको नहीं इस पर शास्त्रीय विचार नहीं कर सकते हैं। सम्भाषा-खण्डन मण्डन रूप चर्चा के अर्थ में सम्भाषा' शब्द वैद्यक शास्त्र में प्रयुक्त हुआ है। नैयायिकों ने सन्भाषा के स्थान में कथा शब्द को ही ग्रहण किया है। आयुर्वेद दर्शन में सम्भाषा के पुनः सन्धायः सम्भाषा और विगृह्म सम्भाषा दो भेद किये हैं. किन्तु उत्तरवर्ती नैयायिकों ने सम्भाषा के बाद, जल्प और वितण्डा तीन भेद किये हैं । वर.त: सन्धाय सम्भाषा और वाद एक ही है, क्योंकि दोनों के अधिकारी और तत्व का यथार्थ निर्णय रूपी फल आदि समान हैं, केवल नाम से पार्थक्य प्रतीत होता है। विगृध सम्भाषा में जल्प और वितण्डा दोनों का समावेश होता है, अथवा चरककार ने विग्रन सम्भाषा के जल्प और वितण्डा दो भेद माने हैं । विगृह्य कथन शब्द का न्याय सूत्रकार ने जल्प और १-भिषक भिषजासह सम्भाषेत । तद्विद्यसम्भाषा हि ज्ञानाऽभियोग- संहर्षकारी भवति, वैशारामपि चाभिनिवर्तयति, वचनशक्तिमपि चाधत्त, यशश्चाऽभिदीपयति पूर्वश्रुते च सन्देहवतः पुनः श्रवणात् संशयमपकर्षति, अते च संदेहवतो भूयोऽध्यवसायमभिनिवर्तयति अश्रुतमपि कञ्चिदर्थ श्रोत्रविषयमापादयति । यचाचार्य: शिष्याय शुश्रूषवे क्रमेणोपदिशतिगुह्याऽभिमतमर्थजातमतत: परस्परेणसहजल्पपिण्डेन विजिगीषुराह संहर्षात् . तस्मात्तद्विद्य सम्भाषामभिप्रशंसन्तिकुशलाः । च०वि० अ०८ २ द्विविधातु खलु तदिद्य सम्भाषा भवतिः। सन्धाय. सम्भाषा विगृह्य सम्भाषाचेति । च०वि०००। प्रसन्न:

"१ ३४ [ पदार्थ मीमांसा वितण्डा के अर्थ में ही उल्लेख किया है। सन्धाय सम्भाषा के अधि- कारी का विशेषण "नानुसूयक" महत्व का है जिसे कि आयुर्वेद तथा न्याय दर्शन दोनों में स्वीकार किया गया है। मन्धाय सम्भाषा- इसके दूसरे पर्याय तत्ववुभुत्सुकथा, अनु- लोम' सम्भाषा और वाद माने गये हैं। इस विधि में तत्व के निर्ण- यार्थ स्पष्टतया मतों का समन्वय कर यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है। तथा वादी और प्रतिवादी, जय और पराजय से भयभीत नहीं होते हैं। अतएव इस विधि में ज्ञान, विज्ञान, वचन, प्रतिवचन, शक्ति युक्त क्रोध, मात्सर्यादिरहित नम्र तथा प्रियवादी पुरुषों के साथ संयुक्त रूप से विचार विमर्श होता है । यह स्पष्ट तथा विश्वास जनक होना चाहिये। विगृह्य सम्भाषा3-इसमें अधिकारी प्रधानत: जयेच्च्छु होने के कारण छलबल गण निष्पन्न होता है। वह जल्प तथा वितण्डा का आश्रय लेकर वादी तथा परिषद् पर अपना गौरव प्रदर्शित करता अपना गौरव स्थापित करने के पूर्व प्रतिवादी तथा सभासदस्यों की ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसम्पन्नेनाकोपेन नाऽनुप स्कृतविदेन ना नुसूयकेनानुनेयेनानुनयकोविदेन क्लेशक्षमेण प्रिय सम्भाषणेन च सह सन्धाय सम्भाषा विधीयते । च०वि०अ० ८ । २ तथाविधेन सह कथयन् विश्रब्धः पृच्छते चास्मै वि-ब्धाय विशदमर्थ ब्र यात् , न च निग्रह भयादुद्विजेत निगृह्य चैनं न हृष्येत् , न च परेषु विकत्थेत, न च मोहादेकान्तग्राही स्यात् , न चाविदितमर्थमनुवर्णयेत् । तत्र चाऽबहिता स्यात् इत्यनुलोम सम्भाषा विधिः । च०वि०प०८। अत ऊर्ध्वमितरेण सह विगृह्य सम्भाषेत श्रेयसा योगमात्मनः पश्यन् । प्रागेब च जल्पाज्जल्पान्तरं परावरान्तरं परिपद्विशेषांश्च सम्यक परीक्षेत । सम्यक परीक्षाहि बुद्धिमतां कार्यप्रवृत्ति- निवृत्तिकालौ च शंसति तस्मात् परीक्षामभिप्रशंसन्ति कुशलाः है , १ ३ - - सम्भाषा विज्ञानीय] ३५ परीक्षा कर लेनी चाहिये। प्रतिवादी या जल्पक में श्रुत, विज्ञान, धारण, प्रतिभ' और वचनशक्ति आदि गुण श्रेष्ठता के सूचक होते हैं । क्रोध, धृष्ठता का अभाव, भीरुता और सावधानतादिराहित्य अध. मता के परिचायक हैं। यह प्रतिवादी या जल्पक उत्तम, सम, तथा अधम तीन प्रकार के माने गये हैं परिषद्-यह सभा का पर्याय है । विद्वत्परिषद् ' तथा मूर्व परि- पद् भेद मे यह दो प्रकार की मानी गई है। इन दोनों प्रकारों की परिषदों के पुन: कारण भेद से सुहृत्परिषद् उदासीन परिषद् और प्रतिनिविष्ट परिषद तीन भेद होते हैं विद्वत् या मूर्खप्रतिनिविष्ट परिषत् में जल्प नहीं करना चाहिये मूढ़, सुहृत्परिषद् या उदासीन परिषद् में विद्वद्विरोधी पंडित के साथ जल्प करना चाहिये। जल्प करते समय विस्तृत सूत्रों से आवद्धित वाक्य बोले । मुस्कुरा मुस्कुरा कर पुन: पुन: हँसे। मुखाकृतियों द्वारा परीक्षमाणस्तु खलु परावरान्तरम् इमाजल्पक गुणाञछ यस्कराञ्च- दोषवतश्च परीक्षेत सम्यक । तद्यथा-श्रु तं विज्ञानं धारणं प्रतिभानं वचनशक्तिभिति एतान् गुणाज श्रेयस्करानाहुः। इमान् पुनर्दोष- तद्यथा-कोपनत्वमवैशारद्य भीरुत्वमधारणत्वमनवहितत्व- मिति । एतान् द्वयानपि गुणान् गुरुलाघवतः परस्यचैवात्मनश्च तालयेत् ॥ तत्रत्रिविधः परः सम्पद्यते-+वर: प्रत्यवरः समो वा गुणविनिक्षेपतः नत्वेव कास्न्येन । च. वि अ.८। परिषञ्च खलु द्विविधा । ज्ञानवती मूढ़परिषच्च । सैव द्विविधासती त्रिविधा पुनरनेन कारणविभागेन सुहृत्परिषद् उदासीनपरिषद् प्रतिनिविष्टपरिषच्च । तत्र प्रतिनिविष्टायां मूढ़ायां वा न कथञ्चित् केनचित् सह जल्पो विधीयते । मूढ़ायान्तु सुहृत्परिषदि उदासीनायां ज्ञान विज्ञानभन्तरेणाऽप्यदीप्तयशसा महाजनद्विष्टेन सह जल्पो विधीयते। वतः, । वा [ पदार्थ मीमांसा जल्पक में मूर्खता प्रदर्शन करने का चेष्टा करें । जहाँ तक सम्भव हो, जल्पक को बोलने का अवकाश न दें। पतिबादी के कठिन शब्दों का बोध न होने पर उससे कहे कि अब तुम अपनी प्रतिज्ञा से क्यों च्युत होते हो । यदि वह पुनः स्पष्टीकरण करना चाहे तो उसे अवकाश ही न दें जहाँ तक हो अपने से वृद्ध के साथ इस प्रकार की जल्प न करें प्रत्यवर तथा समान योग्यता वालों से मित्र सभा में जल्पान करना चाहिये। सावधाना, श्रवणज्ञान विज्ञान, उपधारण, तथा वचन शक्तियुक्त उदासीन परिषद्' में जल्प करना हो तो प्रतिवादी के गुण तथा दोषों को ज्ञात करे। जिस विषय में प्रतिवादी योग्य हो उस विषय में अपनी तद्विद्य न च सह कथयता अावद्धदीर्घ-सूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथयितव्यम् । अतिहृष्ट मुहुमुहुरुपहसता परं निरूपयता च परिषदमाकारै वतश्वास्य वाक्यावकाशो न देयः। कष्टशब्दं च ब्रुवन् वक्तव्यो नोच्यत इति । अथवा पुनहींनाते प्रतिज्ञा इति पुनश्चाहयमानः प्रतिवक्तव्यः । परिसंवत्सर भवान् शिक्षतां तावत् । अथवा पर्याप्तमेतावत्त सकृदेवहि परिक्षेपकं निहितं निहितमाहुरिति नास्य योग: कर्तव्यः कथञ्चिदप्येवं श्रेयसा सह विगृह्म वक्तव्यम् इत्याहुरेके । नत्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः । च. वि. अ.८। १-प्रत्यवरेण तु सह समानाऽभि मतेनवा विगृह्य जल्पतासुहृत्परिषदि कथयितव्यम् । अथवाप्युदासीनपरिषदि-अनवधानश्रवणशान विज्ञानोपधारणवचनशक्तिसम्पन्नायां कथयता चावहितेन परस्य साद्गुण्यदोषक्ल मवेक्षितव्यम् । समवेक्ष्य च यत्रैनं श्रेष्ठ मन्येत नास्य तत्र जरूपं योजयेत् अनाविष्कृतमयोगं च कुर्वन् । यत्र त्वेन मवरं मन्येत तत्रैवैनमाशु निगृहणीयात् । तत्र नु खस्वि- मे प्रत्यवराणामाशु निग्रहे भवन्ति उपायाः ।

सम्भाषा विज्ञानीय] अल्पशता किसी भी प्रकार व्यक्त न कर प्रकरण का परिवर्तन करे। प्रकरण में जहाँ पर न्यूनता मिले वहीं पर पराजित कर दे । पराजित करने के लिये निम्न उपायों का अवलम्बन करें। श्रुतिहीन पुरुष को एक दीर्घ सूत्र पाठ से, विज्ञान हीन को कठिन शब्दों तथा वाक्यों के प्रयोग से, वाक्य धारणा हीन के साथ कठिन सूत्रों से श्रावद्धित दीर्घ वाक्यों से प्रतिभाहीन के साथ अनेकार्थवाची भ्रामक शब्दों का पुन: पुनः प्रयोग करके, वचन शक्तिहीन के साथ उसके वाक्यों का बीम- बीच में खण्डन करके, धृष्टता रहित को लजित करके, क्रोधी को बहुत श्रमित कर के, भीरु को भयादि के द्वारा, असावधान को नियमों में फँसा कर जीते। विगृह्य सम्भाषा में यथाशक्ति युक्ति युक्त कहें और युक्ति युक्त को माने । कभी कभी इस विवाद से उग्र द्रोह भी उत्पन्न होता है जिसका कि परिणाम भयावह होता है । अतएव विद्वानों ने जल्प और वितण्डा के दुरुपयोग का निषेध किया है । तद्यथा श्रुतिहीनं महता सूत्रपाठेनाऽभिभवेत् , विज्ञानहीनं पुन: कष्टशब्देन वाक्येन, वाक्यधारणाहीनमाविद्धदीर्घसंकुलैर्वाक्य दण्डकैः प्रतिभाहीनं पुनर्वचनेनानेकविधेनानेकार्थवाचिना. वचन शक्तिहीनमोक्तस्य वाक्यस्याक्षेपेण, अविशारदमपत्रणेन. कोपनमायासनेन भीरु वित्रासनेन, अनवहितं नियमनेन, इत्येवमे- तैरुपायैरवरमभिभवेत् । च. वि. अ. - | विगृह्य कथयेत्युक्तया युक्त च न निवारयन् । बिगृह्य भाषा तीव्र हि केषांचिद्रोहमावत् ११ नाकार्य मस्तिक्रुद्धस्य नावाच्य मपि विद्यते । कुशला नाऽभिनन्दन्ति कलह समितौ सताम् ॥२॥ एवं प्रवृत्तेतुबादे प्रागेववादात् तावदिदं कर्तुं यतेत । सन्धाय परि. षदाऽयनभूतमात्मनः प्रकरण मादेशयितव्यम् । यद्वापरस्य भूशं ।

Br [ पदार्थ मीमांसा किन्तु यदि इस प्रकार का जल्प निश्चय ही हो जाय तो जल्प के पूर्व सभासदों से मिले तथा इस प्रकार का विषय स्थापित कराने की चेष्टा करे जिसे कि स्वयं बहुत अच्छी प्रकार जानता हो और प्रतिवादी के लिये क्लिष्ट हो. पूछने पर भी यह कहे कि विषय का निर्णय सभा के द्वारा समय पर होना उत्तम होगा। वाद के नियमों को भी अपने पक्ष में कराये। वाद के लिये निम्न विषयों का ज्ञान अत्या- वश्यक है - जैसे –वाद, द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतु, दृष्टान्त, उपनय, निगमन, उत्तर, सिद्धान्त, शन्द, प्रत्यक्ष, अनुमान, ऐतिह्य, औपम्य, संशय, प्रयोजन सव्यभिचार, जिज्ञासा. व्यवसाय, अर्थप्राप्ति, सम्भव, अनुयोज्य, अननु- योज्य, अनुयोग, प्रत्यनुयोग, वाक्यदोष, वाक्यप्रशंसा, छल, अहेतु, अतीताकाल, उपालम्भ, परिहार, प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तर, अर्थान्तर, निग्रहस्थान, इति । दुर्गस्यात् । पक्षमथवा परस्य भृशं विमुखमानयेत् । परिषदि चोपसंहितायाम् अशक्यमस्माभिर्वक्तुमिति तूष्णीमासीदेव च ते परिषद्यथेष्टं यथायोग्यं यथाऽभिप्रायं वादंवादमर्यादाश्च स्थापयि- ध्यतीत्युक्त्वा । तत्रेदं वादमर्यादा लक्षणं भवति इदं वाच्यम्, इदमवाच्यमेवं सति पराजितो भवतीति । इमानि खलु पदानि भिषग वाद मार्ग ज्ञानार्थ मधिगम्यानि भवन्ति तद्यथा-वादः, द्रव्यम्, गुणा:, कर्म, सामा- न्यम्, विशेषः, समवाय:, प्रतिज्ञा, स्थापना, प्रतिष्ठापना, हेतु:, उपनयः, निगमनम्, उत्तरम्, दृष्टान्तः. सिद्धान्तः शब्दः, प्रत्यक्षम्, अनुमानम्, श्रौपम्यम्, ऐतिह्य, संशयः, प्रयोजनम्, सव्यभिचारम्, जिज्ञासा, व्यवसायः, अर्थप्राप्तिः. सम्भवः, अनुयोज्यम्, अनु- योग:, प्रत्यनुयोगः, वाक्यदोष:, वाक्यप्रशंसा, छलम्, अहेतुः, अतीताकालम्, उपालम्भः, परिहारः, प्रतिज्ञाहानिः, अभ्यनुज्ञा, हेत्वन्तरम्, अर्थान्तरम्, निग्रहस्थानमिति । ..

३६ . संभाषा विज्ञानीय] वाद-प्रतिद्वन्द्वी विजिगीषुता से शास्त्र पूर्वक जो कथन आदि करते हैं वह वाद कहलाता है। विजिगीषुता पद द्वारा यह स्पष्ट है कि विगृह्य सम्भाषा के अर्थ में ही पुन: वाद शब्द प्रयुक्त हुअा है जैनाचार्य वाद को सन्धाय सम्भाषा मानते हैं तथा जल्प और वितण्डा को आभास कहते हैं। विगृह्य सम्भाषान्तर्गत वाद को पुनः जल्प और वितण्डा नामक दो भेदों में विभक्त करते हैं। जल्पवित डा-सपक्ष वचन पूर्वक कथन को जल्प' कहते हैं और खण्डनात्मक निरपेक्ष शब्द को वितण्डा कहते हैं। अर्थात् प्रति- वादी के मत को दूषित कर अपने पक्ष की सिद्धि जल्प कहलाता है। तथा प्रतिवादी के पक्ष को केवल दूषित करना और अपना कोई पक्ष न बताना, वितण्डा माना गया है। प्रतिज्ञा- साध्य वचन का कथन प्रतिज्ञा कहलाता है, जैसे-- पुरुष नित्य है. स्थापना-प्रतिज्ञा की सिद्धि हेतु-दृष्टान्त उपनय और निगमन १-तत्रवादो नाम म यत् परः परेण सह शास्त्रपूर्वकं विगृह्य कथयति प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ: मिद्धान्ताऽविरुद्धः पञ्चायवोपपन्न: पक्ष- प्रतिपक्षपरिग्रहो वाद: ( गौतम. ! स च द्विविधः संग्रहेण जल्पो- वितण्डा च । च. वि. अ.८। १-तत्र पक्षाऽश्रितयोर्वचनं जल्पः, जल्पविपर्ययोवितण्डा । च.वि.अ.- प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ: सिद्धान्ताऽविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्न: पक्ष. प्रतिपक्षपरिग्रहश्छलजाति नग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्प इति । २ . सप्रतिपक्ष स्थापनाहीनो वितण्डेति, गौतमः । वितण्डा नाम पर- पक्षदोपवचनमात्रमेव । च. । ३–प्रतिज्ञा नाम साध्यवचनं यथा नित्यः पुरुष इति । चरकः । साध्य- निर्देशः प्रतिज्ञति । गौतम । - द्वारा जो की जाती है, उसे स्थापना' कहते हैं प्रतिष्ठापना-प्रतिवादी द्वारा हेतु-दृष्टान्त-उपनय और निगमनों से जो पतिज्ञा के विपरीत अर्थ की स्थापना होती है , उसे प्रतिष्ठा- पना कहते हैं। उत्तर - शास्त्रार्थ के समय वादी के हेतुओं का खण्डन करना उत्तर कहलाता है। अन्य दर्शनकारों ने उत्तर के स्थान में उपालम्भ प्रतिषेध, दूषण, खण्डन श्रादि शब्दों को पर्याय रूप में अङ्गीकार किया है। आयुर्वेद तथा अन्य दर्शनकारों ने इस उत्तर को दोषाभास को दूर करने में सहायक माना है । अतएव उत्तर द्वारा वादी तथा प्रतिवादी स्थापना तथा प्रतिष्ठापना आदि स्थलों में उद्भावित दोषों को दूर करते हैं । ब्राह्मण दर्शनकार ( श्रायुर्वेद न्याय दर्शनादि ) जाति-छल श्रादि रूप से असदुत्तर के प्रयोगों का भी मण्डन करते हैं। यहां पर "तस्य" पद द्वारा श्राक्षेप पूर्वक प्रश्न (पूर्वपक्ष) का ग्रहण है । अर्थात् पूर्व पक्ष के उत्तर को निर्णय भी कहते हैं r-स्थापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया हेतु दृष्टान्तोपनयनागमनैः स्था- पना । पूर्वहिलोके प्रतिज्ञा, पश्चात् स्थापना, किंयप्रतिज्ञातं स्था- पयिष्यति । यथा नित्यः पुरुषः, अकृतकवत्वाद्, आकशवद् यथा चाकृतमाकाशं तथा पुरुषः । तस्मानित्यः इति चरकः । १-प्रतिष्ठापना नाम तस्या एव प्रतिज्ञाया:प्रतिविपरीतार्थस्थापना यथा अनित्यः पुरुषः ऐन्द्रियकत्वाद, घटवद्, घट ऐन्द्रियकः सचाऽनित्य- स्तथा चाऽयम् । तस्मादनित्य इति । तस्योत्तरं निर्णयः यथा शरीरं प्रपीड्य पश्चादधोगत्वा वसा-मेदो- मञ्जानुविद्ध मूत्रं विस्सृजति वातः एवमसाध्यावातजाः इति । तयाच्चोक्तम्-कृत्स्नं शरीरं निप्पीड्य मेदो मज्जावसा युतः । अधः प्रकुप्यते वायुस्तेनाऽसाध्यास्तु वातजाः । सू. उ. प्र.६५॥

संभाषा विज्ञानीय ]] किन्तु जैनदार्शनिक असदुत्तर के प्रयोगों का भी निषेध करते हैं । ब्राह्म- णपरम्परा से स्पष्टनिर्देश है कि तत्व रक्षा के लिये समय २ पर जाति- छलादि के प्रयोगों की आवश्यकता उत्पन्न हाती है। उस समय जातिछल द्वारा असदुत्तर' देना चाहिये। किन्तु तत्व रक्षा से अन्यत्र केवल ख्याति मान श्रादिक भौतिक उद्देश्यों से प्रयोग नहीं करना चाहिये। दूपण और दूषणाभाम-पञ्चावयव वाक्यों में वास्तविक दोषों का उद्घाटन दूषण कहलाता है, और निर्दोष पञ्चावयववाक्य में मिथ्या दोषों का यारांप दूषणाभास कहलाता सिद्धान्न-परीक्षकों द्वारा बहुविधिपरीक्षित तथा हेत्वादिकों से साधित निर्णय को सिद्धान्त कहते हैं । इसके सर्वतन्त्रसिद्धान्त, प्रति- तन्त्रसिद्धान्त, अधिकरणसिद्धान्त तथा अभ्युपगमसिद्धान्त नामक चार भेद होते हैं। मर्वतन्त्रमिद्धान्त - यह सम्पूर्ण तन्त्रों में समान रूपतः प्रसिद्धि १-उत्तरं नाम साधोपदिष्टेवा हेतौ,वैधर्म्यवचनं, वैधयोपदिष्टेवा हेतो साधर्म्यवचनम् यथा हेतुसधर्माणोविकारा:, शीतकस्यहिव्याधेहेतुसा- धर्म्यवचनम्, हिमशिशिरवातसंस्पर्शा इति त्रु वतः परोव यात्, हेतुवि. धर्माणा विकाराः । यथा शरीराऽवयवानां दाहोण्यकोथ प्रपचने हेतु वैधर्म्य हिमशिशिरवात संस्पर्शा इति । एतत् सविपर्ययमुत्तरम् । २-सिद्धान्तो नाम स य: परीक्षकैर्वहुविध परीक्ष्य हेतुभिः साधयित्वा स्थाप्यते निर्णयः । स चतुर्विधः-सर्वतन्त्रसिद्धान्तः प्रतितन्त्रसिद्धा. न्तः अधिकरणसिद्धान्तः अभ्युपगमसिद्धान्तः इति (चरकः) विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थाऽवधारणं निर्णयः । तन्त्राऽधिकरणाऽभ्युपगम संस्थितिः सिद्धान्तः ( इति गौतमः )। २-तस्मिन् तस्मिन् सर्वस्मिन् तन्त्रे प्रसिद्धम् ( चरक ) सर्वतन्त्रावि- रुद्धस्तन्त्रेऽधिकृतोऽर्थः सर्वतन्त्रसिद्धान्त इति गौतमः । :

૪૨ [ पदार्थ मीमांसा प्राप्त करता है-जैसे रोग के कारण होते हैं, रोग होता हैं, तथा साध्य व्याधियों की चिकित्सा भी है। प्रतितन्त्रामिद्धान्त'-भिन्न भिन्न तन्त्रों में भिन्न २ प्रकार से जो सिद्धान्त माना जाता है, उसे प्रतितन्त्र सिद्धान्त कहते हैं। जैसे कोई तन्त्र, पाँच इन्द्रियाँ तथा कोई दश इन्द्रियाँ मानता है। अधिकरणमिद्धान्त'-किसी अधिकरण के उपस्थित हो जाने पर उसके द्वारा सिद्ध अन्य अधिकरण भो उपस्थित हो जाय, उसे अधिकरण सिद्धान्त कहते हैं "जैसे निस्पृह होने से मुक्तपुरुष कर्मानुवन्धी कार्य नहीं करता" इस वाक्य द्वारा बोध होने पर यह भी सिद्ध होता है कि कर्म फल, मोक्ष, प्रेत्यादि भाव भी होते हैं। अभ्युपगम सिद्धान्त -असिद्ध, अपरीक्षित, अनुपदिष्ट, अहेतुक अर्थ को वाद के समय जो मान लिया जाता है उसे अभ्युपगम सिद्धान्त कहते हैं, जैसे द्रव्य को नित्य याअनित्य, वादार्थ स्वीकृत करना । संशय–सन्दिग्ध अर्थ में निश्चयात्मक ज्ञान का अभाव संशय कहलाता है, जैसे दूरस्थस्थाणु तथा पुरुष ज्ञान में अनिश्चितता। १-प्रतितन्त्रसिद्धान्तो नाम तस्मिंस्तस्मिन्नैकैकस्मिन् तन्त्रे तत्तत् प्रसि- द्धम् ( चरक) समानतन्त्रसिद्धः परतन्त्रसिद्धः प्रतितन्त्रसिद्ध, इति गौतमः । २-अधिकरणसिद्धान्तो नाम स यस्मिन्नधिकरणे प्रस्तूयमाने सिद्धान्य- न्यान्यपि अधिकरणानि भवन्ति (इति चरकः) यत् सिद्धावन्य प्रक- रण सिद्धिः सोऽधिकरण सिद्धान्त, इति गौतमः ३-अभ्युपगमसिद्धान्तो नाम स समर्थमसिद्धमपरीक्षितमनुपदिष्टमहेतु- कंवा वादकालेऽभ्युपगच्छन्ति भिषजः इति चरकः । अपरीक्षिताभ्यु- पगमात तद्विशेष परीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः इति गौतमः । ४-संशयो नाम संदिग्धेष्वर्थेष्वनिश्चयः यथा किमकाल्मृत्युरस्ति च । - -- संभाषा विज्ञानीय] प्रयोजन-जिस अर्थ को प्रारम्भ में लेकर प्रवर्तित हुआ जाता है उसे प्रयोजन कहते हैं, जैसे यदि अकाल मृत्यु होती है तो मैं सात्म्य तथा आयुष्य पदार्थों द्वारा अपनी रक्षा करूंगा। सव्यभिचार-अनेकान्त वचनों को सव्यभिचार कहते हैं , जैसे शब्द आत्मा के समान नित्य है, क्योंकि इसका स्पर्श नहीं होता, यहाँ पर हेतु व्यभिचरित है, क्योंकि अणु नित्य होता हुश्रा भी स्पर्श गुणवाला है तथा बुद्धि स्पर्शरहित होती हुई भी अनित्य है। जिज्ञासा3-परीक्षा या जानने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं जैसे औषधि ग्रहण के पश्चात् औषधि के गुण धर्म व्यक्त होने के लिए कुछ समय की प्रतीक्षा कर फल जानते हैं। व्यवसाय-निश्चयात्मक ज्ञान को व्यवसाय कहते हैं जैसे यह वातिक ब्य धि है, इसकी औषधि यही है । उभयहेतुदर्शनं संशयः यथा तलहृदयाभिघात: प्राणहरः पाणिपाद- च्छेदनमप्राणहरमिति (सू०अ० ६५) । समानेकधर्मोपपत्तेर्वि पतिपतेरुप नमध्यनुपलध्ययवस्थातञ्च, शेषापेक्षोविमर्शः संशय इति गौतमः । १-प्रयोजनन्नाम यदर्थमारभ्यन्ते श्रारम्भाः (च०वि०८) यदर्थमधिकृ- त्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनमिति गौतमः । २-सव्यभिचारन्माम यद् व्यभिचरणं यथा भवेदिदमौषधंतस्मिन्ब्याधौ यौगिक मथवा नेति अनैकान्तिक: सव्यभिचारः इति गौतमः । ३-जिज्ञासा नाम परीक्षा यथा भेषजपरीक्षोत्तरकालमुपदेक्ष्यते ( च.) ४-व्यवसायो नाम निश्चय: यथा वातिकएवायंव्याधिरिदमेवात्रभेषजञ्च । सर्वत्र यदव धारणेनोच्यते स एकान्तः यथा त्रिवद्विरेचयति मदन फलं वामयति (सु०१० ६५) अथवा निश्चितवचनं निर्वचनं यथा आयुर्विद्यते अस्मिन्ननेन वा आयुर्विन्दतीति-श्रायुर्वेदः । सु उ.प्र. ६५ । वि- [ पदार्थ मीमांसा अनुयोज्य' वाक्य दोष युक्त वाक्य को अनुयोज्य कहते हैं, वस्तुत: विशेषगृहीत अर्थ का वाक्य में स्फूट न होना अनुयोज्य कह- लाता है, जैसे यह व्याधि संशोधनसाध्य है, ऐसा कहने पर यह प्रश्न उठता है, कि संशोधन से वमन और विरेचन में किसका ग्रहण किया जाय इस वाक्य दोष के न्यूनादिक भेद होते हैं। अननुयोज्य'-न्यूनादिदोषरहित विशेषवचन युक्तवाक्य अननु- योज्य कहलाता है जैसे यह व्याधि वमन साध्य है। अनुयोग-नैय्यायिक, वैशेषिक तथा आयुर्वेदज्ञ अपने २ विषय के संपूर्ण तंत्र में, तंत्र के एक देश में, वा प्रश्न के अश में. जब परस्पर प्रश्न करते हैं उसे अनुयोग कहते हैं, जैसे पुरुष नित्य है ऐसा कहने पर यह पूछना कि इसमें क्या हेतु है। प्रत्यनुयोग' – अनुयोगात्मक प्रश्न होने पर इस प्रश्न में प्रश्न करना प्रत्यनुयौग कहलाता हैं जैसे इस अनुयोग का क्या अर्थ है । वाक्यदोष इस वाक्य दोष के न्यून, अधिक, अनथक, अपा- १- अनुयोज्यन्नामयद्वाक्यं वाक्यदोषयुक्तं तदनुयोज्यमित्युच्यते । सा- मान्यव्याहृतेष्वर्थेषुवा विशेषग्रहणार्थतद्वाक्य मनुयोज्यम् । यथा संशो- धनसाध्योऽयंव्याधिरित्युक्तेः किं वमनसाध्योऽयं किं विरेचन साध्य इत्यनुयुज्यते (च०वि०८) २-अननुयोज्यन्नाम अतो विपर्ययेण यथाऽयमसाध्य इति (च०वि०८) ३-अनुयोगो नाम स यत् तद्विद्यानां तद्विद्यरेवसार्ध तंत्रे तंत्रैकदेशेवा प्रश्नः प्रश्नैकदेशो वा ज्ञान विज्ञानवचनप्रतिवचनपरीक्षार्थमादिश्यते अथवा नित्यः पुरुष इतिपतिज्ञातेपरोयत्को हेतुरित्याह सोऽनुयोगः । प्रत्यनुयोगो नाम अनुयोगस्यानुयोगः यथा अस्यानुयोगस्य पुनः को हेतुरिति । ५-वाक्यदोषं नाम यथा खलुवस्मिन्नर्थेन्यूनमधिकमनर्थकमपार्थक वि.

संभाषा विज्ञानीय ] र्थक और विरुद्ध पाँच भेद होते हैं। हेतु-उदाहरण-उपनय निगमन तथा प्रतिज्ञा यह वाक्य के पञ्चावयव माने जाते हैं। इनमें से किसी की कमी हो तो न्यून वाक्य कहलाता है । अथवा कई हेतुओं के संयुक्त रूप से साधनीय वस्तु को केवल किसी एक हेतु द्वारा सिद्ध करना भी न्यून दोष माना जाताहै। एक शब्द के स्थान पर अनेक शब्दों का प्रयोग आधिक्य दोष माना जाता है, जैसे 'आयुर्वेद' के स्थान पर वार्हस्पत्य, अोशनस, गौतम, आदि नामों का उल्लेख । अथवा विषय का पुनः पुनः प्रतिपादन ( पुनरुक्ति) श्राधिक्य दोष माना जाता है। श्रर्थपुनरुक्ति तथा शब्दपुनरुक्ति इसके दो भेद होते हैं । अर्थपुनरुक्ति का उदाहरण जैसे भेषज, औषध, साधन इत्यादि । शब्द पुनरुक्ति जैसे भेषज भेषज । अनर्थक वाक्य से अर्थ शून्य पञ्चवर्ग के समान केवल अक्षर के स्थान मात्र का बोध होता है जैसे मद् लद् तुद् इत्यादि । अर्थवान् शब्द परस्पर अन्वय रहित होकर अर्थ अभिव्यक्त करने में असमर्थ होते हैं , ऐसे वाक्य को अपार्थक वाक्य कहते हैं, जैसे तक्र, चक्र, वंश, रक्त, निशा कराः । वस्तुतः अनुयोज्य के लक्षण में वाक्य दोष ही प्रधान है । अत: जो वाक्य दोष है वही अनुयोज्य है । । रुद्धञ्च । न तानि विना प्रकृतोऽर्थः प्रणश्येत् । प्रतिज्ञा हेतूदाहरणा- पनयनिगमनानामन्यतमेनाऽपिन्यूनं न्यूनंभवति । यद्वाबहू पदिष्ट हेतु कमेकेन हेतुना साध्यते तच्चन्यूनम् । अधिकन्नाम न्यून विपरी- तम् । यद्वाऽयुर्वेदे भाष्यमणेवार्हस्पत्यमोशनसमन्यद्वायत् किञ्चिद- प्रतिसम्बद्धार्थमुच्यते । यद्वाप्रतिसम्बद्धार्थमपिद्विरमिधीयते । तत्पुनरु- क्तत्वादविकम् । तच्च पुनरुक्तं द्विविधम् अर्थपुनरुक्तं शब्द पुनरु- क्तचेति । तत्रार्थपुनरुक्तंभेषजमौषधसाधनमिति । शब्दपुनरुक्तञ्च भेषजंभेषजमिति । अनर्थकन्नाम यद्वचनमक्षरग्राममात्रमेव स्यात् पञ्च वर्गवन्न चार्थतो गृह्यते । अपार्थकन्नाम यदर्थवच्च परस्परेण अस. युज्यमानार्थकम् यथा तक्रचक्रवंशरक्तनिशाकराः इति (च.)। ।

[पदार्थ मीमांसा विरुद्धवाक्य-इसके दृष्टान्तविरुद्ध सिद्धान्तविरुद्ध और समय- विरुद्ध' तीन भेद होते हैं । दृष्टान्त में विपरीत गुण धर्मवाली वस्तु का निवर्शन दृष्टान्त विरुद्ध होता है जैसे उष्णवन्हि जल के समान है। सिद्धान्तों के विपरीत साधन भूत वाक्य सिद्धान्तविरुद्ध माना जाता है, जसे सर्वतंत्रविरुद्ध ब्यावियों का निदान नहीं है। प्रतितंत्रतिद्वान्त विरुद्ध 'सात इन्द्रियां होती हैं। अधिकरण सिद्धान्त विरुद्ध योगी जन श्रानु- वन्धिक कर्म करते हैं । अभ्युपगम सिद्धान्त विरुद्ध कार्य द्रव्य-प्रधान' है। समयविरुद्ध भी तीन प्रकार का माना गाया है जैसे आयुर्वेदिकसमय, याज्ञिकसमय, मोक्षशास्त्रिकसमय । आयुर्वेदिक समय में चुतुष्पाद भेषज प्रधान मानी गई है। याज्ञिक समय में पशुओं को वलि का विशेष विधान है। मोक्ष शास्त्रि क समय में प्राणियों में अहिंसात्मक प्रवत्ति ही श्रेयस्कर मानी है। इन तीन कालों में तीनों काल के विधान के विपरीत जब कुछ कहा जाय उसे विपरीत वाक्य कहते हैं : वाक्य-प्रशंसा-न्यून, अधिक, अनर्थक, अपार्थक तथा विरुद्ध, वाक्य दोष से मुक्त, और पदार्थों में परस्पर अभिव्यक्तियुक्त, अनन- योज्य वाक्य ही प्रशंसा के योग्य माना जाता है । अननुयोज्यवाक्य दोष -विरुद्धन्नामयत् दृष्टान्तसिद्धान्त समयविरुद्धम् तत्र पूर्व दृष्टान्तसि- द्धान्ता वुक्तौ । समयः पुनस्त्रिधाभवति यथायुर्वेदिकसमयोयाज्ञिक- समयो मोक्षशास्त्रिकसमय इति, तत्रायुर्वेदिकसमय श्चतुष्पादं भेषजमिति । याज्ञिकसमयः बालभ्यायजमानपशव इति । मोक्षशा- स्त्रिक समयःसर्वभूतेष्वहिंसेति । तत्रस्वसमयविपरीतमुच्यमानं विरुद्ध भवतीतिवाक्य दोषाः २-वाक्यप्रशंसा नाम यथाखल्वस्मिन्नर्थे त्वन्यूनमनधिकमर्थवदनपा- र्थकमविरुद्धमधिमतपदार्थञ्चेति यत्तद्वाक्य मननुयोज्यमिति प्रश- : । स्यते ।

४७ संसाषा विज्ञानीय] शून्य होता है अतः उत्तम माना गया है, किन्तु वह क्लिष्टता के कारण दुर्योध भी हो सकता है, इसलिए अननुयोज्य अभिव्यक्सियुक्त वाक्य प्रशंसमीय है। छल-वक्रतायुक्त अर्थाभास तथा अनर्थकवाग्जाल को छल' कहते हैं। इसके वाक छल और सामान्य छल दो भेद हैं । वाक में अर्थाभास ( भेद ) करना वाक छल है, जैसे किसी पुरुष द्वारा 'बाप- नवतन्त्र वैद्य है' ऐसा कहने पर उत्तर देना कि मैं नवतंत्रज्ञ नहीं एकतंत्रज्ञ ही । वादी द्वारा पुनः नवसंख्याक तंत्र का निषेधकर नवशब्द का नवीन अर्थ करने पर भी प्रतिवादी का यह कहना कि मैं सैकड़ों पर अभ्यास कर चुका हूँ, मेरे लिए शास्त्र नवीन नहीं है इत्यादि । साधारण निर्णय स्वरूप ज्ञान में भी वक्रोक्ति करना सामान्य छल माना जाता है, जैसे औषधि से रोग शांत होता है' वादी के इस प्रकार कहने पर प्रतिवादी कहे कि औषवि सद्रप है. अत: आप के मत से सद् से सद् की शांति होती है, तो यह बताइये कि क्या सद्रप कास से सद्र प क्षय की शांति होती है। यह छल विगृह्य संभाषा का ही रूप है जैनदानिकों ने इसे हेय माना है किन्तु आस्तिक दर्शनों में धर्म रक्षणार्थ इसका उप पादन किया गया है १-छलन्नामपरिशठमर्थाभासमनथकं वाग्वस्तुमात्रमेव तद्विधिम वाकछलं सामान्यछलञ्च । तत्रवाकछलन्नाम यथाकश्चित् ब्रयान्नवतंत्रोऽयम्- भिषक ब्रूयात् 'नाए नवतंत्र: एक तंत्रे ऽहमिति' परो ब्र यात् नाहं ब्रवीमिनवतंत्राणितवेति, अपितुनवाभ्यस्तम् ते तंत्रमितिभिषक ब्र यात्नमयानवाभ्यस्सं तंत्रम्-अनेकधाभ्यस्तम्तंत्रमिति वाक छलम् । सामान्यछलन्नामयथा व्याधिप्रशमनाय, औषधमित्युक्ते, परोब यात् सत् सत् प्रशमनायेति, किन्नुभवानाह सद्रोग: सदौषधम् यदि च सत् सत् प्रशमनायभवतितत्र सत्कास: सत्त्य: सत्सामान्यात् कास: तेक्ष्यप्रशमनायभविष्यतीति एतत् सामान्यछलम् ।

४८ - [पदार्थ मीमांसा अहेतु'-इसके प्रकरणसम संशयसम वय॑सम तीन भेद होते हैं । जिस हेतु द्वारा प्रकरण पर विचार होता हो वह यदि निर्णयार्थ ही प्रकाशित करे उसे प्रकरण सम अहेतु कहते हैं। जैसे शरीर से भिन्न आत्मा होने से नित्य है, यहाँ पर शरीर भिन्नत्व द्वारा आत्मा की सिद्धि कर पुनः पक्ष में स्थापित शरीर भिन्नत्व हेतु से प्रात्मा में नित्यत्व प्रति पादन करना अहेतु है । जो संशय का हेतु हो, वही संशयच्छेदन का हेतु हो, ऐसे हेतु को संशयसम अहेतु कहते हैं जैसे 'यह आयुर्वेद के कुछ अंश को जानता है' आयुर्वेद के कुछ अंश जानने से वैद्य तथा अवैद्य, दोनों का हेतु है । वर्ण्य से अविशिष्ट हेतु वर्ण्य सम कहा जाता जैसे स्पर्शाऽभावयुक्त शब्द के समान बुद्धि भी अनित्य है । यहाँ पर शब्द और बुद्धि दोनों को वर्णात्मक समान रूप से ग्रहण किया है अतएव यह वर्ण्य सम अहेतु हो जाता है । १-अहेतुर्नाम प्रकरणसमः संशयसमोवयंसमः इति । तत्र प्रकरण समोनामाऽहेतुः। यथान्यः शरीरादात्मातस्यानित्यः । शरीरह्यनित्य मतो विधर्मिणाचान्न भवितव्यमित्येषचा हेतु । नहि य एवपक्ष: सएव हेतुरिति । संशयसमोनामाऽहेतु: पुनर्य एव संशयहेतुः सएव संशयच्छेदहेतुः । यथाऽयमायुर्वेदैक देशमाहकिन्वयं चिकित्सक: स्यान्नवेतिसंशये परो ब्रूयाद् यस्मादयमायुर्वेदैकदेशमाह तस्माञ्चिकि सकोऽयमिति न च संशयच्छेद हेतु विशेषयति । एषचाहेतुर्नहि य एव सशयहेतु: स एव संशयच्छेद हेतु भवति । सवयेसमोनामा हेतु: यो हेतुर्वर्ण्यः विशिष्टाः यदाकश्चिद् ब यादस्पर्शत्वाद् वुद्धि रनित्या शब्दवदिति । तत्र वयः शब्दो बुद्धिरपिवर या तदुभयवर यविशिष्टत्वाद्वर्ण्यसमोऽप्यहेतुः । गौतमेन तु सब्यभिचार विरु- द्धप्रकरणसमसाध्यसमा तीत काल पञ्चविधो हेत्वाभास उक्तः । तेषां सब्यभिचारविरुद्वयोः हेतुदोषत्ववदन्यत्र च दोषत्वादहेतुमात्र दोषत्वा भावाच्च पृथिगिहोक्तिः । यस्मात् प्रकरणं चिन्ता सनिर्णया र्थमपदिष्टः प्रकरणसम इति गौतमः । सामान्य दृष्टान्तयोरैन्द्रिय :

४६ संभाषा विज्ञानीय ] अतीतकाल-पूर्व के कथन योग्य विषय पश्चात् प्रतिपादित हो, उस समय अतीत काल' कहा जाता है, जैस वादी या प्रतिवादी निग्रह प्राप्त कर चुका हो, किन्तु उस समय यह निग्रह विना व्यक्त किये, प्रका- रान्तर में वाद प्रारम्भ हो जाने पर, यदि कोई भी इस निग्रह को व्यक्त करना चाहे तो वह अतीत काल होने से निग्रह वचन नही माना जाता। श्रायुर्वेद दर्शन में यह स्वतन्त्र दोष है किन्तु भगवान् गौतम ने इसे हेत्वाभास माना हैं। उपालम्भ-हेत्वादि में (प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय, निग- मन) दोषों को निकालना उपालम्भ २ कहलाता है जैसे अहेतु तथा हे. त्वाभास । वस्तुतः उपालम्भ के बहुत से भेद हैं। जैसे प्रकरणसम, संशयसम, वर्ण्यसम, अवर्यसम, उत्कर्षमम अपकर्षसम, विकल्पसम, साध्यसम, साधर्म्यसम, वैधर्म्यसम, प्राप्तसम, अप्राप्तिसम, प्रसङ्गसम प्रतिदृष्टान्तसम, अनुत्पत्तिसम, अहेतुसम, अर्थापत्तिसम, अविशेष सम, उपपत्तिसम उपलब्धिमम, अनुपलब्धिसम, नित्यसम, अनित्य सम, कार्यसम इति। कत्वे समाने नित्या नित्य साधर्म्यात् संशय सम इति । साध्यदृष्टा- न्तयारिन्द्रियकत्वे समाने नित्यानित्य साधर्म्यात् संशयसम इति । साध्य दृष्टान्तयोः साधाद्वर्यसम इति । वस्तुतस्तु त्रयोऽहेतव एव हेतुमात्रदोषत्वाद् हेत्वाभासा इध्यन्ते । एम्यस्त्वपरे दोषा न हेतुमात्रस्येति । १-अतीतकालन्नामयत् पूर्ववाच्यं तत् पश्चादुच्यते, तत्कालातीतत्वाद- ग्राह्य भवतीति । परं वा निग्रहप्राप्तमनिगृह्य परिगृह्यपक्षान्तरितं पश्चान्निगृहीतेतत् तस्यातीतकालत्वानिग्रहवचनमसमर्थ भवतीति । गौतमेन हैत्वाभासेषु कालात्ययापदिष्ट: कालातीत:' इत्युक्तम् । २-उपालम्भोनामहेतोर्दोषवचनम् । यथापूर्वमहेतवो हेत्वाभासाव्याख्याताः ।

, [ पदार्थ मीमांसा परिहार-हेत्वादि में दोषों का निरास करना परिहार' कहलाता हैं । जैसे शरीरस्थित आत्मा में जीव लिङ्ग मिलते हैं, तदतिरिक्त जीव- लिङ्ग नहीं मिलते । इससे प्रात्मा शरीर से भिन्न है तथा नित्य है उपालम्भ के जो प्रकरणसम श्रादि भेद माने गये हैं, वही भेद इसके भी हैं। गौतम ने उपालम्भ और परिहार का जाति शब्द से ग्रहण किया हैं प्रतिज्ञाहानि-किसी प्रश्नात्मक शब्द से प्रथम गृहीत प्रतिज्ञा को छोड़कर दूसरी प्रतिज्ञा करना प्रतिज्ञाहानि' कहलाता है । जेसे प्रथम पुरुष में नित्यता प्रतिपादन करने पर प्रतिवादी द्वारा हेतु पूछने पर अनित्य मानने लगना । इसके प्रतिज्ञाहानि, प्रतिज्ञान्तर, प्रतिज्ञाविरोध और प्रतिज्ञासंन्यास चार रूप माने गये हैं अभ्यनुज्ञा-वादी के पक्ष में प्रतिवादी द्वारा किसी विशेष दोष के आरोपित करने पर वादी अपने पक्ष से विना दोषों को किये प्रति- वादी के पक्ष में भी वही दोष स्थापित कर दें तो उसे अभ्यनुज्ञा या मतानुज्ञा कहते हैं। १-परिहारोनामतस्यैवदोषवचनस्यपरिहरणम् । यथानित्यात्मनिशरोरस्थे जीवलिङ्गान्युपलभ्यन्तेतस्याऽपगमान्नोपलभ्यन्ते तस्मादन्य: शरारा- दात्मा नित्यश्च । च.वि.अ.८। गौतमेनोपालम्भपहिहारौजातिश- ब्देनोक्तौ। तत्रपरिहारश्चोत्तरविशेषः । साधयंवैधाभ्यां प्रत्यव- स्थानं जातिरिति । २-प्रतिज्ञाहानि नाम सा प्राक प्रतिगृहीतां प्रतिज्ञां पर्यनुयुक्तो यत् परित्यजति । यथा प्राक प्रतिज्ञां कृत्वा नित्यः पुरुष इति पर्यनुयुक्त- स्त्वाह अनित्य इति । च.वि. ८ । प्रतिदृष्टान्तवर्माऽभ्यनुज्ञा स्व- दृष्टान्ते प्रतिज्ञा हानिरिति । प्रतिज्ञातार्थप्रतिषेधेधर्मविकल्पात् तद- र्थनिर्देश: प्रतिज्ञान्तरमिति । प्रतिज्ञा हेत्वो विरोधः प्रतिज्ञा विरोधः । क्षप्रतिषेधे प्रतिज्ञतार्थापनयनं प्रतिज्ञा सन्यास इति गौतमः । ३–अभ्यनुज्ञानामसा य इष्टानिष्टाऽभ्युपगम: च.वि. अ.८। स्वपक्षदाषाऽभ्युपगमात् परपक्षदोष प्रसङ्गोमतानुज्ञा । गौतमः । - ५१ संभाषा विज्ञानीय ] हेत्वन्तर-प्रकृतिहेतु के प्रदर्शनावसर में जो विकृति हेतुओं की स्थापना की जाती है उन्हें हेत्वन्तर' कहते है । भगवान् गौतम ने स्पष्ट कहा है कि जब प्रकृति हेतु अपनी पूर्ण सामर्थ्य से वस्तु का बंध कराने में बाधित होता है , उस समय अन्य हेतुओं की आकाँक्षा होती है , उसे हेत्वन्तर कहते हैं र-किसी एक वाच्यार्थ में दूसरा अर्थ उत्पन्न करना अर्थान्तर कहलाता है । गौतम जी के मत से प्रकृत अर्थ से असम्बद्ध अर्थकोद्योतित करना अथान्तर है । जैसे ज्वर के लछणों द्वारा प्रमेह के लक्षणों का अर्थ निकालना । निग्रह स्थान-पराजय की प्राप्ति को निग्रह 3 स्थान कहते हैं । इसके विप्रतिपत्ति और अप्रतिपस्ति दो भेद होते । कुत्सित या विप- रीत प्रतिपत्ति को विपतिपत्ति कहते हैं. जैसे विषय के प्रारम्भ में मूक हो जाना । प्रतिपदी से हेत्वादि में दोष प्रदर्शन होने पर उन दोषों का निरा करण न करना अप्रतिपत्ति कहलाता है । वस्तुतः इस विप्रतिपत्ति १- हेत्वन्तरन्नाम प्रकृति हेतौवक्तव्ये यद् विकृति हेतुमाह । च.वि.अ. अविशेषोक्तहेतौ प्रतिषिद्ध विशेषमिच्छतो हेत्वन्तरमिति । गौतमः । २-अर्थान्तरन्नाम एकस्मिन् वक्तव्ये परं यदाह । यथा घर लक्षणे वाच्ये प्रमेह लक्षण माह । च.वि.अ. प्रकृतादादः तिसम्बद्धार्थमर्थान्तरम् निगृहस्थानमिति गौतम: ३ -निग्रहस्थाननामपराजयप्राप्तिः, तच्चविरुक्तस्य वाक्यस्याविज्ञानं परिषदिविज्ञानवत्याम् यद्वाननुयोज्यस्याऽनुयोगोऽनुयोज्यस्य चान नुयागः । प्रतिज्ञाहानिरम्यनुज्ञा कालातीतवचनमहेतुन्यूनमधिकं व्यर्थ मनर्थकं पुनरुक्तं विरुद्ध हेत्वन्तरमर्थान्तरं निग्रहस्थानमिति च.वि.अ. ८ । परिषत्प्रतिवादिम्यां त्रिरभिहितमप्यविज्ञात वि. ज्ञातार्थमिति गौतमः।

५२ [ पदार्थ मीमांसा और अप्रति-पत्ति द्वारा निग्रह स्थान के २२ भेद हो जाते है जैसे १. प्रतिज्ञाहानि २. प्रतिज्ञान्तर ३. प्रतिज्ञा विरोध ४. प्रतिज्ञासंन्यास ५. हेत्वन्तर ६. अर्थान्तर ७. निरर्थक ८. अविज्ञातार्थ ६. अपार्थक १०. श्रप्राप्त काल ११. अज्ञान १२. अधिक १३. पुनरुक्त १४. अ. ननुभाषण १५. अज्ञान १६. अप्रतिभा १७. विक्षेप १८. मतानुज्ञा १६. पर्यनुयोज्योपेक्षण २०. निरनुयोज्यानुयोग २१. अपसिद्धान्त २२. हेत्वाभास । इन भेदों में-अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, पर्यनुयज्योपेक्षण, अप्रतपत्ति के भेद माने गये हैं, शेष विप्रतिपत्ति के भेद हैं। वाद कथा-वैद्यों के आयुर्वेद में ही वाद कथा का प्राश्रय लेना चाहिये । अन्यशास्त्रों में तद् तद् विषयक विज्ञ अधिकारी माने गये हैं इस वाद कथा में सम्पूर्ण अधिकरणों की उपपत्ति तथा वाक्य और प्रतिवाक्यों की मीमांसा की जाती है। अतएव प्रकृतिविरुद्ध, शास्त्रविरुद्ध परीक्षाशून्य, साधकरहित, अाकुल और ज्ञापकरहित वाक्यों का प्रयोग न करे। हेतुयुक्त, प्रशस्त, बुद्धिबद्धक, निग्रह वाक्यों का प्रयोग करना उत्तम हैं। १-वादस्तु खलु भिषजां वर्तमानावतेतायुर्वेद एवनान्यत्र । तत्राहि वाक्य प्रतिवाक्यविस्ताराः केवलाश्चोपपत्तय: सर्वाधिकरणे पुच । ता: सर्वाः सम्यगवेक्ष्य सर्व वाक्यं ब्र यान्नाप्रकृतिकमशास्त्रमपरीक्षतमसा धकमाकुलमज्ञापकंवा । सर्वञ्च हेतुमद् ब्र याद तुमन्ताह्यकलुषाः । सर्व एव वादविग्रहाश्चिकित्सिते कारणभूताः । प्रशस्तबुद्धि बद्धक त्वाद् सारम्भासद्धि ह्यावहत्यनुपहताबुद्धिः । इमानिखलुकानिचि. दिह प्रकरणानि भिपजां ज्ञानर्थमुपदेक्ष्यामः । ज्ञानपूर्वकं कर्मणां समारम्भं प्रशंसन्ति कुशलाः । ज्ञात्वाहि कारण-करण-कार्ययोनि- कार्य-कार्य फलानुबन्ध देशकाल प्रवृत्युपायान् सम्यगभिनिवर्त. मान: कार्याभिनिवृत्ताविष्टफलानुबन्ध कायमभिनिवर्तयत्यनति महता यत्नेनकर्ता। ।

संभाषा विज्ञानीय ] ५३ प्रकरण-वस्तुत: कारण, करण, कार्ययोनि, कार्य, कायफल, अनु बन्ध, देश, काल, प्रवृत्ति तथा उपाय को जानकर शीघ्र सिद्धि होती हैं । कारण-जिसके द्वारा कार्य का सम्पादन होता है उसे कारण। कहते हैं। कारक और प्रयोजक भी इसके पर्याय है । यह कार्य आत्म जनित, इच्छा जनित तथा शरीर जनित होते हैं , जिन्हें क्रमश: इच्छा, कृति और चेष्टा कहते हैं । करण-कार्य की सिद्धि में कर्ता का जो प्रधान सा ता है उसे करण २ करते है। कार्ययोनि-जो विकृति प्राप्त कर कार्यत्व रूप में परिणत हो उसे कार्य योनि कहते हैं। जैसे मृत्तिका द्वारा घट निर्मित होने पर मृत्तिका कार्य योनि कहलाती है। कार्यकर्ता जिसकी सिद्धि के लिये प्रवर्तित होता है उसे कार्य कहते हैं। काय फल-जिस प्रयोजन के निमित्त कार्य सम्पादित होता है उसे कार्य फल५ कहते हैं । अनुबन्ध-कार्य सिद्ध हो जाने के उपरान्त कार्य निमित्तक शुभा शुभ भाव जो कर्ता को प्राप्त होते हैं उसे अनुवन्ध कहते हैं । १-तत्र कारणं नाम तद् यः करोति स एव हेतुः स कर्ता अात्मजन्या भेवदिच्छा इच्छाजन्या भवेत् कृतिः । कृति जन्या भवेत् चेष्टा चेष्टा जन्यं भवेत् फलम् ॥ १॥ इति २-करणं पुनस्तद्यदुपकरणायोपकल्प्यतेक :कार्याऽभिनिवृत्तौ प्रयत- मानस्य । ३-कार्ययोनिस्तु सा या विक्रियमाणा कार्यत्वमेवा पद्यते । ४-कार्यन्तुः तद् यस्याभिनिवृत्ति कर्ताभिसन्धाय प्रवर्तते । ५–कार्यफलं पुनस्तद् यत् प्रयोजन कार्याभिनिवृत्तिरिष्यते । वि.. ६--अनुवन्धस्तु कर्तारमवश्य मनुवध्नाति । कार्यादुतरकालं कार्यनिमित्तः शुभोवाप्यशुभोभावः। ।

[ पदार्थ मीमांसा - देश-जिस स्थान में कार्य किया जाय उसे देश' कहते हैं। काल-परिणाम को काल कहते हैं प्रवृत्ति-कार्य के निमिन जो चेष्टा की जाती है उसे प्रवृत्त कहते हैं। क्रिया, कम, यत्न और कार्य समारम्भ प्रवृत्ति के पर्याय हैं उपाष-कार्य-कार्यफल तथा अनुबन्ध के अतिरिक्त कारणादि कों के समीचीनत्व तथा विधान को उपाय कहते हैं। उपाय द्वारा ही कार्य सिद्धि होता हैं। कार्य सम्पादनोत्तर पाय की आवश्यकता नहीं रह जाती तथा कार्योत्पत्ति के समय कार्यो भाव होता है । कार्योत्तर फल तथा अनुबन्ध की प्राप्ति होती है। अतएव कार्य, कार्य-फल तथा अनु. वन्ध के अतिरिक्त अन्य कारणादिकों के विधान को उपाय कहते हैं। इस प्रकार कारणादि दश प्रकरण माने गये हैं। तन्त्र युक्ति--सुश्रुतकार ने ३ : तन्त्र युक्तियों का निर्देश किया है जिनका कि प्रयोजन, वाक्य योजन और अर्थ योजन माना गया है । १-देशस्त्वधिष्ठानम् । २-काल: पुन: परिणाम: ३–प्रवृत्तिस्तु खलुचेष्टाकार्यार्थासैवक्रिया कर्म यत्नः कार्यसमारम्भश्च । -उपायाः पुनः कारणादीनां सौष्ठवमभिसन्धानञ्च सम्यक कार्य कार्य फलानुवन्धोपायवानां कार्याणाममिभिर्वर्तक इत्यतो-अभ्युपाय: कृतेनोपापार्थोऽस्तिनच विद्यते तदात्वे कृताच्चोत्तर कालं फल फला च्चानुवन्ध इतिव्याख्यातं दशविधम् । अग्रे परीक्ष्यं ततोऽनन्तर कार्यार्थी प्रवृत्तिरिष्टा तस्माद् भिषक कार्यचिकीर्षु : प्राक कार्य समा रम्भात् परोक्षया केवलं परीक्ष्यं परीक्ष्यार्थकर्म समारम्भेत कर्तुम् । ५-अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किंप्रयोजनम् ? उच्यते-वाक्ययोजनमर्थ- योजनञ्च । भवन्ति चात्र श्लोकाः। ४- ..

- . संभाषा विज्ञानीय ] किन्हीं किन्हीं श्राचार्यों ने ३६ तथा ४० संख्या में भी मानी है इनकी अधिकरण', योग, पदार्थ, हेत्वर्थ, उद्दश्य", निर्देश, उपदेश, अपदेशः प्रदेश, अतिदेश'', अपवर्ज'", वाक्यशेष, अर्थापत्ति ३ विपर्यय'४, प्रसङ्ग'५, एकान्त १६. अनेकान्त'', पूर्वपक्षा, निर्णय' ९ अनुमत. विधान, अनागताऽवेक्षण २२, अतिक्रान्तावेक्षण 3, संशय २४, व्याख्यान २५, स्वसंज्ञा२६, निवचन२७ निदर्शन२८, ग२९, विकल्प3., समुच्चय ३१, ऊह्य ३ २ भेदों द्वारा ३२ संख्या होता अधिकरण--जिस अर्थ को लक्ष्य कर दूसरे अर्थ भी अभिव्यक्त हो उसे अधिकरण' कहते हैं। जैसे रस प्रकरण में रस तथा दोषप्रकरण में दोष । २योग-जिसके द्वारा विपर्यय तथा सन्निकृष्ट और विप्रकृष्ट पदों का एकीकरण किया जाय उसे योग कहते हैं हेत्वर्थ-किसी प्रतिपादित विषय से अप्रतिपादित विषय का असदादि प्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम् । स्ववाक्य सिद्धिरपिच क्रियतेतन्त्रयुक्तितः ।। व्यक्तानोक्तास्तु ये ह्यर्था वीनायेचाप्यनिर्मलाः । लेशोक्तायेचकैचित्स्युस्तेषां चापि प्रसाधनम् । यथाम्बुजवनस्याकः प्रदीपोवेश्मनो यथा । प्रबोधस्यप्रकाशार्थ तथातन्त्रस्ययुक्तयः ।। १-तत्र यमर्थ मधिकृत्योच्यते तदधिकरणं यथा रसं दोषंवा २-येन वाक्यंयुज्यते सयोगः, यथा- तैलंपिवेच्चामतवल्लि निम्ब हिंसाभयावृक्षक पिप्पलीभिः । सिद्ध बलाभ्यां च सदेवदारु हिताय नित्यंगलगण्ड रोगे ॥ १ ॥ इत्यत्र तैलं सिद्ध पिवेदिति प्रथम वक्तव्ये तृतीय पादे सिद्धमिति प्रयुक्तम्, एवं दूरस्थानामपिपदानामेकीकरणं योगः । सु.उ.अ.६५ . ३–यदन्यदुक्तमन्यार्थ साधकंभवति स हेत्वर्थः । यथा मृत्पिण्डोऽभि- - । ५६ [ पदार्थ मीमांसा साधन होवे उसे हेत्वर्थ कहते हैं या प्रतिपादित हेतु उभयार्थसाधक हो तो भी हेत्वर्थ माना जाता है । जैसे जल द्वारा मृत्पिण्ड क्लिन्न होता है, उसी प्रकार माष दुग्धादि से व्रण क्लिन्न होता है । यहाँ पर वाह्य मृत्पिण्ड दृष्टान्त द्वारा, श्राध्यन्तर व्रण में साम्यता स्थापित की है। उद्देश-संक्षिप्त कथन उद्देश' कहलाता है जैसे शल्य । निर्देश-वस्तु के विस्तृत वर्णन को निर्देश २ कहते हैं। जैसे शल्य शारीर तथा आगन्तुक भेद से दो प्रकार का होता है इत्यादि । उपदेश-इस प्रकार करना चाहिये, इसे उपदेश कहते हैं, जैसे रात्रि में जागरणन करो तथा दिन में शयन मत करो । उपदेश प्रायिक होता है जैसे ग्रीष्म काल में दिवा स्वप्न, तथा कफ प्रकृति वाले पुरुष को रात्रिजागरण का भी विधान है। नियोग अपयिक है जेसे पथ्य ही भोजन करना चाहिये । ये ही उपदेश और नियोग में अन्तर है । अपदेश-विशेष कारण से कार्य के प्रति हेतु के कथन को अपदेश कहते हैं । जैसे मधुर द्रव्य श्रेष्मा का अभिवर्धन करता है । प्रदेश-अतिक्रान्त विषय द्वारा प्रकृत अर्थ के साधन को प्रदेश५ कहते हैं। जैसे इसके द्वारा देवदत्त का शल्य निकला था, यही यज्ञदत्त का भी निकालेगा। प्रक्लिद्यते तथा माषदुग्ध प्रभृतिभिवण: प्रक्लिद्यते इति । १-समासवचनमुद्देश: यथा शल्यमिति । २- विस्तरवचनं निर्देश: यया शारीरमागन्तुकञ्चेति । ३-एवमित्युपदेश:यथा 'तथा नजागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नचवजयेदिति । ४-अनेन कारणेनेत्पपदेश:-यथापदिश्यते मधुरःश्लेष्माणमभिवर्धयतीति । ५-प्रकृष्वातिकान्तेन साधनं प्रदेशः यथादेवदत्तस्याने नशल्य मुद्ध तं तथायशदत्तस्याय मुद्धरिष्यतीति ।

है संभाषा विज्ञानीय] भतिदेश-अन्यस्थान में विहितविधि को अन्य स्थान में प्रयोग के लिये जो उपदेश होता है उसे अतिदेश' कहते हैं। जैसे हेमन्त ऋतु की विधि साधारणतया शिशिर में भी करनी चाहिये। अपवर्ग-व्यापक विषय में से गुणक्रियादि द्वारा व्याप्य विषय को पृथक करना अपवर्ग: कहलाता । ज से विषापसृष्ट अस्वेद्य है, किन्तु कीटविष को छोड़कर । वाक्यशेष -जिस अनुक्तपद से वाक्य समाप्त हो जाता है उसे वाक्य 3 शेष कहते हैं। जैसे शिर, पाणिपाद, पार्श्व, पृष्ठ, उदर, इसके उल्लेख करने पर पुरुष का ग्रहण न होने पर भी पुरुष का बोध होता है। विपर्यय-जो विहित हो उसके विपरीत विपर्यय होता जैसे कृश अल्पप्राण और भीरु दुश्चिकित्स्य है । ऐसा कहने पर शक्ति- शाली पुरुष चिकित्स्य है, यहाँ पर विपरीत अर्थ का ग्रहण होता है । अर्थापत्ति से अविपरीत अर्थ का ही ग्रहण होता प्रसंग-प्रकरण के अन्तर युक्त अर्थ से सम होने पर, या प्रकरण के अन्तर पुन: पुन: उक्त होने से प्रसंग कहलाता है । जैसे पञ्च है है । १-इतरत्र विहितस्य विधेरितरत्र प्रयोगायोपदेशोऽतिदेशः। ययाएषएव- विधिः कार्य:शिशिरे समुदाहृतः । सु.उ.अ. ६५ २-अभिव्याप्याऽपकर्षणमपवर्गः । यथा-अस्वेद्या विषोपसृष्टाः, अन्यत्र कीटविषादिति । सु उ.अ. ६५ ३--येन पदेनानुक्त नवाक्यं समाप्येत स वाक्य शेषः । यथा शिर: पाणि पादपार्श्वप्रष्ठोदरोरसामित्युक्त पुरुषग्रहणंविनाऽपि गम्यतेपुरुषस्येति ४-यद् यत्राऽभिहितं तस्यप्रतिलोम्यं विपर्ययः । यथा-कृशाल्पप्राण भी- रवो दुश्चिकित्स्या इत्युक्ते विपरीतं गृह्यते दृढ़ादयः सुचिकित्स्या । सु. ५ - प्रकरणान्तरेणसमापनप्रसंगः । यद्वाप्रकरणान्तरितोयोऽर्थोऽसकृदुक्त: समाप्यते स प्रसंगः । यथा पञ्चमहाभूतशारीरिसमवायः पुरुषः। तस्मि- [ पदार्थ मीमांसा महाभूतों के समवाय से पुरुप होता है , इसी में क्रिया होती है, और ये हो अधिष्ठान है, ऐसा वेदोत्पत्ति अध्याय में कहकर पुन : उल्लेख करना 'पञ्चभूत शरीरि समवायः पुरुषः इति सखल्वेष कर्मपुरुपश्चिकित्साऽधिकृतः इति। . एकान्त-अविकल्प या नियमपूर्वक जिसका विधान किया जाय, उसे एकान्त' कहते हैं, जैसे त्रिवृद् विरेचन कारक, एवं मदन फल वमनकारक हैं। अनेकान्त-किसी वस्तु को एक स्थान पर प्रधान कह कर, दूसरा जगह उसी विषय में दूसरे को प्रधान कहना अनेकान्तः कहलाता है, जैसे द्रव्य को प्रधानता प्रदान कर, रसगुण आदि को भी प्रधानतया स्वीकार करना । अनुमत----अन्य प्राचार्यों के मत का किसी प्रकार विरोध न करना अनुमत 3 कहलाता है, जैसे “सप्तरस हैं।" इस कथन का खण्डन न करने से यह सिद्ध हो जाता है कि हम भी सप्तरस स्वीकार करते हैं विधान - प्रकरण के आनु पूर्वी कथन को विधान कहते हैं । क्रिया सोऽधिष्ठानमिति । वेदोत्पत्तावमिधाय भूतचिन्तायां पुन- रुक्तं येनाभिहितं पञ्चभूतशारोरिसमवायः पुरुषः इति सखल्वेष पुरुषश्चिकित्साऽधिकृतः इति । सु.उ.अ ६५ १ -यदवधारणेनोच्यते स एकान्तः । यथा त्रिवृद्विरेचयति मदन- फलं वामयतीति । सु.उ.अ. ६५ २-क्वचिद् तथा क्वचिदन्यथेति सोऽनेकान्तः यथा केचिदाचार्या त्रु वते द्रब्यं प्रधानं केचिद्र स, केचिद्वीर्य, केचिद्विपाकमिति । सु. ३-परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम् । यथान्यो व यात् सप्तरसा इति । तच्चा प्रतिषेधादनुमन्येत कथञ्चिदिति । सु.उ.अ. ६५ ४-प्रकरणानुपूर्व्याऽभिहितं विधानम् । यथासक्थिमर्माण्येकादश प्रक- रणानुपूर्व्याऽभिहितानि । सु.उ.अ. ६५ ५६ संभाषा विज्ञानीय ] चन्द्रनन्दन ने परिपाटी से अर्थ कथन को विधान माना है, जैसे सक्थिमर्म ११ हैं, जिन्हें प्रकरण में क्रमश: वर्णित किया है। अनागतावेक्षण- भविष्य में इसको कहेंगे' इसे अनागतावेक्षण' कहते हैं जैसे कि सूत्र स्थान में किसी विषय का उल्लेख कर, यह कहना कि इसका विस्तृत वर्णन चिकित्सा स्थान में होगा । अतिक्रान्तावेक्षण-प्रथम निर्दिष्ट का पुन: उल्लेख करना श्रतिक्रान्तावेक्षण कहलाता है जैसे चिकित्सा स्थान पर किसी विषय के सम्बन्ध में यह कहना कि 'इसका उल्लेख सूत्र स्थान में हो चुका व्याख्यान-शास्त्र में किसीविषय का अतिशयवर्णन व्याख्यान 3 कहलाता है । जैसे सुश्रुत ने/२५ तत्व के पुरुष का विस्तृतविवेचन किया है । स्वसंज्ञा-अपने शास्त्र में प्रसिद्धि द्वारा अर्थ को बोधित करने में समर्थ, किन्तु अन्य शास्त्रों में भिन्नार्थक हो, उसे स्वसंज्ञा४ कहते हैं जैसे आयुर्वेद में मिथुन शब्द से 'घृत एवं मधु' का ग्रहण होता है किन्तु अन्यत्र यह भिन्न २ अर्थो में प्रयुक्त होता है निर्वचन-निश्चित वचन को निर्वचन कहते हैं जैसे कि जिस है।' - १-एवं वक्ष्यतीत्यनागतावेक्षणम् । यथा श्लोक स्थाने ब्र यात् चिकि- त्सितेषु वक्ष्यामीति । सु.उ.अ. ६५ २-यत्पूर्वमुक्त तदतिक्रान्तावेक्षणम् । यथा चिकित्सितेषु व यात्- सूत्रस्थाने यदीरितमिति । सु.उ.अ. ६५ ३-तन्त्रेऽतिशयोपवर्णनं व्याख्यानम् । यथा-इह पञ्चविंशतिकः पुरुषो व्याख्यायते, अन्ये स्वायुर्वेदतन्त्रेषु भूतादिप्रभुत्यारम्भचिन्ता । सु. ४-अन्यशास्त्रासामान्या स्वसंज्ञा । यथामिथुनमिति मधुसपिषोहणं, लोकप्रसिद्धमुदाहरणम्वा । सु.उ.अ. ६५ ५-निश्चितवचनं निर्वचनम् । यथा-आयुर्विद्यतेऽस्मिन्ननेन वा श्रायुविन्दतीत्यायुर्वेदः । सु.उ.अ. ६५ ६० । [पदार्थ मीमांसा शास्त्र में अायु प्रधान हो उसे आयुर्वेद कहते हैं निदर्शन- दृष्टान्त द्वारा वाक्य में कोई वस्तु अभिव्यक्त की जाय उसे निदर्शन' कहते हैं। जैसे वायुयुक्त अग्नि कोष्ठ में वृद्धि प्राप्त करती है उसी प्रकार वातपित्तकफ से दूषित व्रण होता है । नियोग- ऐसा ही करो', इसे नियोग कहते हैं। जैसे पथ्य ही भोजन करो। समुच्चय-दो समान विषयों का एक में समन्वय करना समुच्चय 3 कहलाता है, जैसे मांसवर्ग में एणादिक तथा लावादिक दोनों प्रधान हैं विकल्प-'यह है कि, यह' इस प्रकार के ज्ञान को विकल्प कहते हैं जैसे यह रसौदन है या सघृतयवागू। उह्य-जो साक्षात् बुद्धिगम्य हो उसे उह्य" कहते हैं। जैसे कही हुई अन्नपान विधि में चतुर्विधि अन्नपान ( भक्ष्यभोज्यलेह्यपेय ) का निर्देश होने पर, तथा द्विविध का तथा द्विविध का पूर्णज्ञा न होने से यह तर्कणा होती है कि द्विविध ही प्रसिद्ध हैं और इसी में चतुर्विध का समन्वय होता है क्योंकि घनता की दृष्टि से भक्ष्य एवं भोज्य, तथा द्रवता के कारण लेह्य एवं पेय समान हैं। १-दृष्टान्तव्यक्तिनिदर्शनम् । यथा-अग्निर्वायुनासहितः कोष्ठे वृद्धि गच्छति तथा वातपित्तकफ दुष्टो व्रणइति । सु.उ.अ. ६५ २~इदमेव कर्तव्यनिति नियोगः । यथा पथ्यमेव भोक्तव्यमिति । सु. ३-इदं चेदं चेति समुच्चयः । यथा मांसवर्गे एणहरिणादयो लावातित्तिरि शारङ्गाश्च प्रधानानीति । सु.उ.अ. ६५ ४-इदं वेदं वेति विकल्पः । यथा रसौदन: सघृतायवागू र्वा । सु. ५-यदनिर्दिष्टं बुद्धयाऽवगम्यते तदुह्यम् । यथाभिहितमन्नपानविधौ चतुर्विध चान्नमुपदिश्यते भक्ष्यं भोज्यं लेह्य पेयमिति, एवं चतुर्विधे वक्तब्ये द्विविधमभिहितम्; इदमत्रोह्यम--अन्नपाने विशिष्टयो हणे कृते चतुर्णाभपि ग्रहणं भवतीति ; चतुविधिश्चाहारः प्रविरल: प्रायेण द्विविध एव, अतोद्वित्वं प्रसिद्धमिति किञ्चन्यदन्नेनभक्ष्य मवरुद्ध घनसाधात् पेयेनलेह्य द्रवसाधादिति । सु.उ.अ. ६५ ।

पदार्थ विज्ञानीय तृतीयोल्लास भ्रमोत्पादक भगवान् की भावात्मक सृष्टि में माया के विज्ञानार्थ अनेकानेक शास्त्र निर्मित हुए, जिनमें कि दर्शन शास्त्र विशेषतः उल्लेखनीय है । दर्शनशास्त्र आस्तिक तथा नास्तिक दो भागों में विभक्त है । अास्तिक दर्शन के पुन: न्याय वैशेषिक, सांख्य-योग, पूर्व मीमांसा उत्तर मीमांसा घट भेद होते हुए भी, तीन द्वन्द्वों में सीमित होते हैं । नास्तिक दर्शनों में चार्वाक, बौद्ध, जैन, पाशुपत, नकुलीश, पूर्णप्रज्ञ, रामनुज, रसेश्वर, पाणिन, शैव, प्रत्यभिज्ञा इत्यादि अनेकानेक भेद पाये जाते हैं। दर्शनशब्द' का अर्थ चाक्ष पज्ञान में होता है, किन्तु शास्त्रपरक दर्शनशब्द का अर्थ करणान्वित "दृष्यते अनेन" किया जाता है । दर्शनशास्त्र से ही भावाभावमयी त्रिगुणात्मिका सृष्टि की उत्पत्ति-स्थिति-लय का यथार्थ ज्ञान होता है, यथार्थज्ञान २ से मोक्ष होता है, जो कि मानव जीवन का परमसुख हैं । आयुर्वेदशास्त्र हिताहित सुखदुः खादि की वस्तुस्थिति के साथ इसका उद्देश्य ऐहिलौकिक एवं पारलौकिक दु:खों के निवृत्त यर्थ उपायों को प्रस्तुत करना है, अतः आयुर्वेद में स्थूल या सूक्ष्म रूप से समस्त दर्शनों के सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है । दर्शनकारों ने अखण्ड ब्रह्माण्ड को पदार्थमय या तत्वमय माना है, जो कि श्रायुर्वेदज्ञों को भी इष्ट है । यह पदार्थ शब्द पद और अर्थ दो शब्दों का संयुक्त रूप है अतः पदार्थ ज्ञान के लिये पद एवं अर्थ के ज्ञान का होना आवश्यक है। वैयाकरणों ने पद शब्द की परिभाषा १-त्यदादिषु दृशोऽनालोचनेकञ्च । पा० सू० २-ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः । श्र तिः ३- यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचिद् । च० । प्रादुर्भूत हुआ, तथा ७ ६२ [ पदार्थ मीमांसा 'सुप्तिडन्तं पदम्' तथा नेयायिकों ने 'शक्तं पदम्' की है। वस्तुत: शब्द एक विशिष्ट सम्बन्ध द्वारा अर्थ का प्रतिपादन करता है इस सम्बन्ध को शक्ति या अमिधा कहते हैं । वैयाकरण, साहित्यिक तथा मीमांसक इस शक्ति को भी पदार्थ मानते हैं, किन्तु नैयायिक पदार्थान्तर न मानकर इसे इच्छा नामक गुण में ही कल्पित करते हैं। कुछ नैयायिक इस शक्ति को ईश्वरेच्छा कहते तथा आधुनिक नामों में भी ईश्वरेच्छा की सत्ता को अभिव्यक्त करते हैं। नैयायिकों ने इसके योग, रूढ़, योगरूढ़ एवं यौगिकरूढ़ चार भेद माने हैं, जब कि साहित्यिक केवल तीन भेद ही मानते हैं। वेह योगरूढ़ एवं यौगिकरूढ़ में विशेष भेद स्वीकार नहीं करते। १-यौगिक-यह अपनी अवयव शक्ति द्वारा वोध करता है जैसे पाचक । २-रूढ़-यह अवयव शक्ति से निरपेक्ष होकर समुदाय शक्ति द्वारा अर्थ वोधक है जैसे मण्डप, डित्थ, कपित्थ इत्यादि । ३–योगरूढ़-यह अवयव शक्ति और समुदाय शक्ति के संयुक्त रूप से वोध कराने में समर्थ होता है जैसे पङ्कज । -यौगिकरूढ़-यह अपनी अवयव शक्ति और समुदायशक्ति दोनों से पृथक् २ बोध करा सकता है जैसे उदभिद् । अन्य प्राचार्य शक्ति या अमिधा के भेदो को स्वीकार नहीं करते । उनका कहना है कि सम्पूर्ण शब्द अखण्ड और रूढ़ि है, उनका समासान्तातविभाग तथा तिन्त, कृदन्त ओर तद्धितान्त प्रकृति तथा प्रत्यय का विभाग काल्पनिक पद में शक्ति का वोध व्याकरण, उपमान, कोष, श्राप्तवाक्य व्यवहार, वाक्यशेष, विवृति और सिद्धपदसान्निध्य से प्राप्त होता है। १-शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोषातवाक्याद् ब्यवहारतश्च । वाक्यस्य शेषाद्विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यत: सिद्ध पदस्य वृद्धाः ।मु०॥ । हैं ur । पदार्थ विज्ञानीय ] इस प्रकार अभिधा या शक्ति द्वारा प्रदिपादित अर्थ वाच्य या अभिधेय और शब्द को वाचक कहते हैं । वाचक शब्द में संकेत कुछ श्राचार्य ब्यक्तिगत तथा कुछ प्राचार्य जातिगत मानते हैं। व्यक्तिगत मानने वाले द्रव्य (ज ति) गुण कर्म और संज्ञा' में (गौ-शुक्ल-चल-डित्थ) सकेत की प्रबृत्ति मानते हैं । जातिगत माननेवाले भी जाति के वस्तुधर्म तथा वक्त यदृच्छा सन्निवेशित दो भेद करते हैं । वस्तुधर्म सिद्ध एवं साध्य में विभक्त कर पुन: सिद्ध के प्राण पद और विशेषाधान हेतु दो भाग कर देते हैं अत: प्राणपद, विशेषाधानहेतु, साध्य और वक्त यदृच्छा सन्निवेशित चार भेद हो जाते हैं। प्राणपद जातिवाचक, विशेषाधान- हेतु गुणवाचक, साध्य क्रियावाचक और वक्तयदृच्छासन्निवेशित संज्ञावाचक है । जाति में संकेत माननेवालों का कथन है कि "गौ केवल स्वरूप से गौ नहीं होती, और न वह गौ से भिन्न होती है, किन्तु जाति के सम्बन्ध से ही गौ गौ होती है २” नैयायिक जाति में ब्यभिचार तथा व्यक्ति में अानन्त्य दोष दिखाकर शब्द में ही विशिष्ट शक्ति मानते हैं। अन्य आचार्य अपाहरूप ( अतव्यावृत्तिरूप ) भी मानते हैं। लक्षणा-अभिधावृत्ति से -प्रतिपादित अर्थ के अचरितार्थ होने पर, रूढ़ि या प्रयोजन से जो अन्य अर्थ जिस सम्बन्ध द्वारा करते हैं, उसे लक्षणा3 कहते हैं जैसे गंगा में गांव है, मुखचन्द्र है, धृत जीवन है। इस लक्षणा के रूढ़ि और प्रयोजन दो कारणों के १ - गौः शुक्लश्चलोडित्थः' इत्यादौ चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः महाभाष्यकारः । २-नहि गौ, स्वरूपेण गौ: नाप्यगौ: गोत्वाभि संबन्धात्त गौः ।का० प्र०। ३-मुख्यार्थवाधे तद्योगे रूढ़ितोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणारोपित क्रिया ।। काव्य प्रकाश [पदार्थ मीमांसा कारण निरूढा एवं प्रयोजनवती दो भेद हो जाते हैं । निरूढ़ा के गौड़ी निरूढ़ लक्षणा एवं शुद्धा निरूढलक्षणा पुनः दो भेद होते हैं । सादृश्य सम्बन्ध से गौड़ी (जैसे अनुकूल) एवं सादृश्येतर सम्बन्ध से शुदा ( जैसे नीला घड़ा ) मानी जातो है । प्रयोजनवती गौड़ी सारोपा एवं साध्थवसाना भेदों द्वारा पुनः दो भागों में विभक्त होती है। सारोपा में विषय और विषयो दोनों का पृथक तया निर्देश होता है जैसे चन्द्रमुख । साध्यावसाना में सादृश्य सम्बन्ध द्वारा विषय और विषयो में से किसी एक के निर्दिष्ट होने पर दूसरे का भी वोधकर लिया जाता है जैसे स्त्रियों के समूह को चन्द्रमा की पंक्ति द्वारा वर्णित करना । प्रयोजनवती शुद्धालक्षणा के जहत्त्वार्था, अजहत्स्वार्था, सारोपा एवं साध्यवसाना चार भेद किये जाते हैं जैसे गंगा में घर, कुन्त प्रवेश, गौ वाहीक, घृत जीवन इत्यादि । प्रयोजनवती लक्षणा व्यंग्या- त्मक होती है अतएव गूढ एवं अगूढ़ व्यंग्य द्वारा छै के बारह भेद होते हैं। इस प्रकार १२ प्रयोजनवती एवं २ निरूढा मिलाकर १४ भेद माने गये हैं। साहित्य दर्पणकार ने ८० भेद माने हैं। लक्षणावृत्ति द्वारा जिस अर्थ का प्रतिपादन होता है, उस अर्थ को लक्ष्य तथा शब्द को लक्षक कहते हैं।। व्यञ्जना-अभिधा अदि के विरत हो जाने के पश्चात् जो दूसरा अर्थ, शब्द या अर्थ में से अभिव्यक्त होता है वह व्यञ्जना कहलाता है । यह ब्यञ्जना वृत्ति अभिधा तथा लक्षणा वृत्ति से भिन्न, स्वतंत्र ज्ञान कराती है जैसे 'सूर्यात्त हो गया, यह वाक्य मजदूर मालिक से कहे तो छुट्टी का समय हो गया, यह अर्थ होता है । यदि गुरु शिष्य से कहे तो संध्या वन्दनादि के समय का वोध होता है। यदि पति की मरणासन्न अवस्था में स्त्री से कहा जाय तो पति की मृत्यु का सूचक होता है । इस व्यञ्जना द्वारा ज्ञानोत्पति में वक्ता, श्रोता, वाच्यार्थ, विशिष्टज्ञान, प्रतिभा और प्रकरण आदि सहकारी हैं । इस ध्वनि के १०४०४ भेद किये गये हैं किन्तु आवश्यक भेद प्रधान और अप्रधान स्वरूप है पदार्थ विज्ञानीय] ६५ दो ही माने गये हैं । प्रधान को ध्वनि' तथा अपधान को गुणी भूत व्यंग्य कहते हैं । व्यजना वृत्ति से प्रतिपादित शब्द व्यजक या ध्वनि कहलाता है एवं अर्थ को व्यंग्य, या ध्वनि भी कहते हैं। नैयायिक पञ्जना को अनुनानान्तर्गत मानते हैं तथा कुछ अन्य प्राचार्य ध्वनि को अभाव तथा भाक्त भी कहते हैं । वस्तुतः अनुमान में हेतु अदुष्ट होता है और दूषित हेतु द्वारा व्यभिचार उत्पन्न होता है किन्तु ध्वनि में हेतु के दूषित या प्रदूषित होने से कोई भेद नहीं होता । अभाव- ध्वनि को मानने में प्रतिव्याप्ति एवं भाक्त मानने पर अव्याप्ति लगती है। पदार्थ-पद के अर्थ को पदार्थ कहते हैं, अर्थात् वाचक, लाक्षणिक या व्यजक शब्दों द्वारा उत्पन्न विषय पदार्थ कहलाता वस्तुत: प्रत्यक्षानुमानादि प्रमाणों द्वारा जो भी वस्तु का ज्ञान प्राप्त होता है उसे पदार्थ कहते हैं जैसे स्थावर सृष्टि में घट पट मठादि, तथा जङ्गम सृष्टि में पशु पक्षि मनुष्यादि, स्वीकार किये गये हैं । जगत् के इन अपरिमित पदार्थों को प्राचीन महर्षियों ने एवं नवोन वैज्ञानिकों ने वर्गीकरण द्वारा विभजन किया है जिससे कि सुगमता से ज्ञानोपार्जन हो सके । वेदान्ती अात्म तथा अनात्म प्रथम दो भेदकर, श्रात्म के ब्रह्म और जीव तथा अनात्म के कारण, सूक्ष्म एवं स्थूल भेद करते हैं सांख्य के प्राचार्य व्यक्त, अव्यक्त एवं ज्ञ तीन तत्वों में समस्त संसार का समावेश कर, इन तीन तत्वों के २४, २५ या २६ भेद कर लेते हैं। १-यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थों । व्यक्तः काव्य विशेष: सध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥ ध्वन्यालोक प्रतीयमानं पुनरन्य देव बस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम् । यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्त विभाति लावण्य मिवाङ्गनासु ॥ ध्व लो. २-योऽर्थोऽभिहितः सूत्रे पदे वा स एव पदार्थः । पदस्य पदयोः पदानां वार्थ: पदार्थः, अपरिमिताश्चपदार्थाः। सु० उ० अ० ६५ । अभिधेयत्वं पदार्थ सामान्य लक्षणम् । “प्रमिति विषया पदार्था:" सप्तपदार्थी । ३-व्यक्ताव्यक्तशविज्ञानात् । सा० का० । , ।

६६ [ पदार्थ मीमांसा प्राचीन नैयायिक १६ पदार्थ तथा नवीन नैयायिक सात पदार्थ ही मानते हैं वैशेषिक ६ पदार्थ ही स्वीकार करते हैं। चरककार ने भी ६ पदार्थो के वर्गीकरण को प्राथमिकता प्रदान करी है एवं अन्य वर्गी- करणों का भी यथास्थान प्रदर्शन किया है यह ६ पदार्थ सामान्य, विशेष, द्रव्य गुण कर्म एवं समवाय हैं जो कि वैशेषिक दार्शनिकों ने भी अङ्गीकार किये हैं। चरककार ने पुन: तिस्रैषणीय अध्याय में 'द्विविध मेव खलु सर्व सच्चा सच्च' इस वाक्य द्वारा सत् पद से भाव तथा असत् पद से अभाव का उल्लेख किया है जैसा कि प्राचीन नैयायिक वर्णन करते थे। गौतम जी के 'प्रमाणप्रमेयसंशय प्रयोजन- सिद्धान्तदृष्टान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छल जातिनि- ग्रहस्थानानां तत्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः' इन षोडश पदार्थों का वर्णन विमानस्थान के अन्तिम अध्याय में किया है । सांख्योक्त २४ तत्वों का उल्लेख शारीरस्थान में कतिधापुरुषीय अध्याय में है । यद्यपिचरककार ने सम्पूर्ण दार्शनिकों के वर्गीकरणों का उल्लेख किया है तथापि उन्हें वैशेषिकोक्त घट पदार्थ जन्य वर्गीकरण ही इष्ट है । सांख्योक्त २४ तत्वों का समन्वय इन्ही ६ पदार्थों में हो जाता है जैसे मूलप्रकृति सम्बन्धविशेष या शक्तिरूप, महान् बुद्धिनामक गुण, अहंकार इच्छाहषात्मकमनोव्यापार, पञ्चतन्मात्रायें तत्तत्भूतान्तर्गत परमाणुरूपतत्तद्रव्य, मन द्रव्य, इन्द्रियाँ भी तत्तद्र्व्यान्तर्गत, शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध गुण, पुरुष श्रात्मरूपद्रब्य, अतः २५ तत्व ६ तत्वों में ही सीमितहो जाते हैं। गौतमोक्त १६ पदार्थो भी ६ पदार्थों में अन्वित होते हैं जैसे प्रमाण के इन्द्रियादिविषयों का द्रब्य में एवं १-सामान्यञ्च विशेषञ्च गुणान्द्रब्याणि कर्म च । समवायञ्च तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्त विधिमास्थिताः । च. सू. अ. १ 'धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्य वैधाभ्यां तत्वज्ञानान्निःश्रेयसम्'। वै. द. ११४ २-ततश्च धातुभेदेन चतुर्विशतिकः स्मृतः मनो दशेन्द्रियाण्यर्थाः प्रकृतिश्चाष्ट धातुकी। च. श. अ. १ ।

पदार्थ विज्ञानीय ] ६७ व्याप्ति ज्ञानादि का गुण में, अतः प्रमाण द्रव्य एवं गुण दोनों में संयुक्त रूप से श्रन्वित होता है । प्रमेय पद से श्रात्मा शरीर इन्द्रिय बुद्धि मन अर्थ तथा दोषों का बोध होता है । आत्मा, शरीर, इन्द्रिय और मन द्रव्यों में तथा बुद्धि, मन अर्थ और दोष गुण में, संशय गुण में, प्रयोजन इच्छा तथा विषयरूप होने से गुणद्रब्य में, दृष्टान्त का विषया नुसार द्रब्यगुणादि में, अवयव एवं तर्क का गुण में, निर्णय, वादजल्प वितण्डा का गुण में, हेत्वाभास का द्रव्य में, छल और जाति का गुण में, निग्रहस्थानों का द्रब्यादि में अन्तर्भाव होता है। निग्रहस्थानों में से प्रतिज्ञा, प्रतिज्ञासंन्यास, अननुभाषण, अज्ञान, अप्रतिभा, विक्षेप, पर्यनु- योज्योपेक्षण अभावात्मक होने से तत्तद्पदार्थों के अभाव रूप स्वीकार किये जाते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक भी सष्टि के चेतन एवं अचेतन दो विभागकर चेतन के जीव एवं वनस्पति शास्त्र, तथा अचेतन के भौतिक एवं रसशास्त्र नामक विभेद करते हैं। अभाव चरककार तथा वैशेषिक दार्शनिकों ने पदाथों के परिगणन में अभाव का उल्लेख नहीं किया । कुछ आचार्यों ने इसे पदार्थ रूप से ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया। गौतम ने भी अपने १६ पदार्थों में अभाव का उल्लेख नहीं किया । तथापि अभाव की सत्ता सभी मानते हैं। कुछ प्राचार्य इसे पृथक्त्व, संयोग एवं विभाग नामक गुणों में समन्वित करते हैं । कुछ अधिकरणात्मक, ज्ञानात्मक या कालात्मक मानने के लिये सम्मति देते हैं। वस्तुतः श्रभाव की स्वतन्त्र कल्पना ही उचित है क्योंकि वह प्रत्यक्षतया पृथक त्व, संयोग एवं विभाग से भिन्न है। श्रधिकरण स्वरूप अभाव की कल्पना करने पर सर्वत्र अधिकरण (आधार ) लुप्त होजायगा, दूसरे श्राधाराधेयभाव नष्ट हो जायगा। इसके अतिरिक्त जिस इन्द्रिय से जिस भौतिकगुण का प्रत्यक्ष किया जाता है, उसी इन्द्रिय से भौतिक गुण के श्रभाव का भी प्रत्यक्ष होता है' यह सर्वतन्त्र सिद्धान्त भी अचरितार्थ हो जायगा । यदि ज्ञान विशेष एवं कालविशेष स्वरूप माना जाय तो इनका अत्यन्ताभाव . उस ६८ [ पदार्थ मीमांसा होने से ज्ञान ही न होगा अतः अभाव को सप्तम पदार्थ मान लेना ही उचित है। उदयनाचार्य ने 'धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यवि- शेषसमवायानां पदार्थानां तत्वज्ञानान्निःश्रेयसम्' इस महर्षिकणाद के सूत्र की व्याख्या करते समय स्पष्ट कहा है कि अभाव का पृथक वर्णन इस लिये नहीं किया गया कि उसका वर्णन प्रत्येक भाव पदार्थ के निरूपण में स्वयं हो जाता है, तुच्छता की दृष्टि से उपेक्षा नहीं की गई है। महर्षिकणाद एवं पतञ्जलि आदि ने अन्यस्थलों पर अभाव का स्पष्ट उल्लेख भी किया है जैसे 'क्रियागुणव्यपदेशाभावात् प्रागसत्। 'पदार्थो द्विविध: सच्चा सच्च' इत्यादि । शक्तिः एवं साहश्य उपमानचिन्तामणिकार ने शक्ति एवं सादृश्य को भी पदार्थ मानने के लिए शंका प्रस्तुत की है। उनका कथन है कि मणिमन्त्र औषधि आदि में एक प्रकार की विशिष्टता रहती है, जिससे कि वह कार्य संपादन करते हैं, उसे शक्ति नामक अतिरिक्त पदार्थ मानना श्राव. श्यक है । इसका प्रत्यक्षानुभव ज्वलित अग्नि में चन्द्रकान्त मणिसंयोग करने पर दाहाभाव से तथा इस प्रकार दाहाभाव में सूर्यकान्त मणि- संयोग करने पर पुन: दाहकता की प्रतीति प्रादि से किया जा सकता है। यह विशेषता द्रव्य गुणकर्म से भिन्न है क्योंकि गुण में रहती है। उत्पत्ति एवं नाश युक्त होने से सामान्य विशेष एवं समवाय स्वरूप नहीं हो सकती। भावात्मक होने से अभाव में भी समावेश नहीं की जा सकती नैयायिकों का कथन है कि हम वाधक या साधक विषयों का हेतु में समावेश करते हैं अतः चन्द्रकान्तमण्यभावविशिष्टवह्नि या सूर्य कान्तमणियुक्त वह्नि को ही दाहकता के प्रति कारण मानते हैं। इसी प्रकार मन्त्र-अोषधि. तप आदि वाधक कारणों का हेतु में समावेश हो जाने पर नवीन पदार्थ की कल्पना नहीं करनी पड़ती जिससे कि नवीन पदार्थ के प्राग- भाव प्रध्वंसाभाव आदि का अनन्त कोटि कल्पना से मुक्ति मिल जाती १-अभावस्तु स्वरूपवानपि पृथक नोद्दिष्टः प्रतियोगि निरूपणाधीन निरूपणत्वाद् न तु तुच्छत्वाद् । उ० ।

है पदार्थ विज्ञानीय ] ६६ । वस्तुतः शक्ति की सत्ता को देखते हुए नैयायिकों को भी अन्य दार्शनिकों के समान इसे पदार्थातिरिक्त स्वीकार करना ही उत्तम है । यद्यपि यह सत्य है कि बिना शक्तिमाने सम्बन्धविशेषों की कल्पना से काय चलजाता है, तथापि इन सम्बन्धविशेषों का क्षेत्र भी अपरिमित है । इसके अतिरिक्त पद द्वारा पदार्थज्ञान, मणिग्रहमन्त्रोषधि आदि का प्रभाव श्रादि प्रत्यक्ष ज्ञान की अवहेलना अनुचित है । वस्तुतःअाधु- निक वैज्ञानिक कार्य संचालन की क्षमता को भी शक्ति कहते हैं तथा उसके स्थितिजशक्ति, गांतजशक्ति, वाष्पशक्ति अादि अनेक रूप मानते हैं। ताप प्रकाश विद्य त् शब्द चुम्बक आदि समस्त शक्ति स्वरूप ही माने जाते हैं। क्योंकि यह समस्त आकार एवं भ र शून्य है साहश्य 'उसका मुख चन्द्रमा के समान है। इस प्रकार के उपमानोपमेय भाव को स्थापित करने वाला पदार्थ सादृश्य है। यह सादृश्य सामान्य में रहने के कारण ६ भाव पदार्थों से भिन्न है क्योंकि कोई भी भाव पदार्थ सामान्य में नहीं रहता जैसे गोजातिनित्य है वैसे ही मनुष्य जाति भी नित्य है। भावात्मक होने से प्रभाव भी नहीं हो सकता श्रतः सादृश्य को भी अतिरिक्त पदार्थ मानना चाहिये । वस्तुत: सादृश्य अतिरिक्त पदार्थ नहीं है। इसकी विवेचना इस प्रकार है कि उससे भिन्न.होता हुआ उस में रहने वाला धर्म' सादृश्य है । जैसे कि 'चन्द्रमुख यहां पर चन्द्रमा से भिन्न जो मुख, वह चन्द्रमा के आह्लादकत्वादि गुणों के समान गुण वाला है, यह अर्थ ध्वनित होता है । नवीन श्राचार्य सादृश्य को भी अतिरिक्त मानते हैं एवं उद हरण यह देते हैं कि 'घट रूप वाला है पर चन्द्रमा के समान है। इत्यादि नाना प्रकार के सामान्य ज्ञान का वोधक सादृश्य ही हो सकता है। कुछ लोग अधिकरण को भी पदार्थ मानने में अपनी सम्मति व्यक्त करते हैं। उनका कथन है कि जिस प्रकार पात्र में घृत है उसी प्रकार घृत में पात्र है यह भी सिद्ध होगा, यदि अधिकरण को पदार्थ न माना जायगा।

। है एवं कर्म [ पदार्थ मीमांसा पदार्थों का साधर्म्य एवं वैधर्म्य पदार्थों के पारस्परिक सम्बन्ध साधर्म्य एवं वैधयं द्वारा ही ज्ञात होते हैं। समान धर्म वाले पदार्थ सधर्मा तथा विरुद्ध धर्मवाले विधर्मा कहेजाते हैं। सधर्मा एवं विधर्मा के भावसम्बन्ध से साधर्म्य एवं वैध- > शब्द का निर्माण होता है। समस्त पदाथों में ज्ञेयत्व, वाच्यत्व एवं प्रमेयत्व साधर्म्य है । द्रव्य गुण कर्म सामान्य एवं विशेष में अनेकत्व एवं समवायित्व साधर्म्य है । समवाय सम्बन्ध द्रव्यगुण कर्म में अनुयोगी रूप में तथा सामान्य एवं विशेष में प्रतियोगी स्वरूप में रहता द्रव्यगुण सत्तात्मक है। द्रव्य से अतिरिक्त पदार्थों में गुणशल्य. त्व एवं क्रियाशून्यत्व रहता है । नैयायिक गुण में गुण नहीं मानते अतः गुण कर्म को द्रव्य के आश्रित मानते हैं । सामान्य विशेष सम- बाय एवं अभाव में सामान्यशून्यत्व मानते हैं। पारिमाण्डल्यभिन्न में कारणत्व माना जाता है। पारिमाण्डल्य से अणुपरिमाण का ग्रहण होता है। यदि अणुपरिमाण को कारण माना जाय तो अणुपरिमाण जनित द्वणुक एवं त्रसरेणु का प्रत्यक्ष नहीं होगा क्योंकि अणुपरिमाण अतीन्द्रिय एवं सूक्ष्मादियुक्त है अतः इससे उत्पन्न त्रसरेणु आदि में उक्त गुण की प्रधानता हो जायगी जिससे कि वह अतीन्द्रियतर एवं अतीन्द्रियतम तथा सक्ष्मतर-तमादि गुणों के कारण अप्रत्यक्ष का विषय हो जायगा।अन्यथासिद्धरहित, नियतपूर्ववर्ति हेतु को कारण कहते हैं। कारण का धर्म कारणता है । यह कारण 'समवायि, असमवायि एवं निमित्त भेद से तीन प्रकार का है । समवायसम्बन्ध द्वारा सम्बन्धित अन्यथा १- सप्तानामपि साधर्म्य ज्ञ यत्वादिकमुच्यते । द्रव्यादय: पञ्चभावा अनेके समवायिनः. सत्तावन्तस्त्रयस्त्वाद्या गुणादि निगुण क्रियः । सामान्य परिहीनास्तु सर्वे जात्यादयो मताः। पारिमाण्डल्यभिन्नानां कारणत्वमुदाहृतम् । मु. का. १३ से १५ २-अन्यथा सिद्धशून्यस्य नियतापूर्ववर्तिता । कारणत्वं भवेत्तस्य त्रैविध्य परिकीतितम् । म, का. १५ ॥

७१ पदार्थ विज्ञानीय सिद्धशून्य नियत पूर्ववर्ति हेतु समत्रायिकारण' है । समवायिकारण सदृश जो अन्यहेतु उसे असमवायिकारण कहते हैं। नैयायिक असमवायि कारण के नाश से कार्यनाश मानते हैं अतः तुरीतन्तु संयोग को वस्त्र के प्रति असमवाधिकारण नहीं मानते, इसी प्रकार अभिघात और स्पर्श के प्रति वेग और संयोग असमवायिकारण एवं ज्ञानादि इच्छा एवं प्रवृत्ति के प्रति असमवायि कारण भी नहीं स्वीकार करते हैं। उप- युक्त दोषों के निराकरणार्थ विशिष्ट २ स्थलों में तत्तद् संयोगभिन्नत्व का समावेशकर शुद्ध असमवायि का लक्षण करते हैं या तत्तद् भिन्नत्व पद जैसे पट के असमवायिकारण के लक्षण में तुरीतन्तुसंयोगभिन्न- त्व का निवेश करना पड़ता है। यह असमवायिकारणकार्यैकार्थ प्रत्यासत्ति एवं कारणैकार्थप्रत्यासत्ति भेद से दो प्रकार का है। इनके उदाहरण क्रमशः कपाल द्वय संयोग (अर्थात् अवयवी के प्रति अवयवों का संयोग) असमवायिकारण है जैसे घट के रूप के प्रति कपाल द्वय संयोग (अर्थात् अवयवी के प्रति अवयवों का संयोग) असमवायि कारण है, एवं घटरूप के प्रति कपाल द्वय रूप । वस्तुतः कार्यैकार्थप्रत्यासत्ति में समवाय सम्बन्ध से, तथा कारणैकार्थप्रत्यासत्ति में स्वसमवायि सम- वेतत्व सम्बन्ध से वृत्ति युक्त असमवायि कारण होता है। समवायि तथा असमवायि कारणों से भिन्न कारण निमित्त कारण कहलाता है। अन्यथा सिद्ध-जैसा कि शब्द द्वारा अर्थ अभिव्यक्त होता है, इस प्रकार के हेतु को कारण नहीं मानाजाता जैसे कि घटनिर्माण में मृत्तिका लाने वाला गर्दभ आदि । यह अन्यथा सिद्ध पांच प्रकार से विभक्त किये जासकते हैं १-कार्य के प्रति कारण का धर्म अन्यथा सिद्ध है जैसे घटके प्रति दण्ड १-समवायिकारणत्वं शेयमथाप्य समवायि हेतुत्वम् । एवं न्यायन यस्ततीय मुक्त निमित्त हेतुत्वम् । यत्समवेतकायं भवति जयं त समवायि जनकं तत् । तत्रासन्न जनकं द्वितीयमाभ्यां परं तृतीयं स्यात् । मु.का. १७, १८ १-येन सह पूर्वभाव: कारण मादाय वा यस्य ७२ पदार्थ मीमांसा त्व ।यहां पर घट के प्रति दण्ड की कारणता है, दण्ड धर्म में नहीं है । २-कार्य के प्रति जिसे स्वतन्त्रतया अन्वय व्यतिरेक न हो, कारण के ग्रहण होने के पश्चाद् हो, अन्यथासिद्ध' है जैसे दण्ड का स्वरूप । ३–जो दूसरे के प्रति पूर्ववृत्तिताज्ञान के पश्चाद् ही कार्य के प्रति पूर्व वृत्तिता स्थापित करे, वह भी अन्यथा सिद्ध है जैसे घट के प्रति प्राकाश। ४-जिस कार्यजनक के प्रति पूर्ववृत्तिता का ज्ञान होकर ही जिसमें जिस कार्य के प्रति पूर्ववृत्तिता का ज्ञान हो वह उस कार्य के प्रति अन्यथासिद्ध होता है जैसे घट के प्रति कुलाल का पिता । ५-जिसको कारण मानने में लाघवता न हो (अतिरिक्तनियतपूर्ववर्ति) अन्यथा सिद्ध है जैसे घट के प्रति गदहा इसी पञ्चमलक्षण में उपयुक्त चारो लक्षण भी श्राजाते हैं समवायिकरण द्रव्यर में वृत्तिवाला है तथा असमवायिकारण गुण एवं कर्म में रहता है । अर्थात् असमवाथिकारण गुणकर्मातिरिक्त शेष द्रव्यों का वैधर्म्य है । पृथ्व्यादि पञ्चभूतों के पञ्चपरमाणु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन नित्य द्रव्य है । नित्य द्रव्यों से भिन्न द्रव्यों को श्राश्रय की आवश्यकता है अतः अनित्य द्रव्यों का साधर्म्य १-अन्यं प्रति पूर्वभावे ज्ञाते यत्पूर्व भाव विज्ञानम् जनकं प्रति पूर्ववृत्तिता मपरिज्ञाय न यस्य गृह्यते अतिरिक्तमथापियद्भवेन्नियतावश्यक पूर्वभाविनः । एते पञ्चान्यथा सिद्धा दण्डत्वादिकमादिमम घटादौदण्डरूपादि द्वितीयमपिदर्शितम् तृतीयन्तु भवेद् ब्योम कुलालजनकोऽपरः पंच्चमोरासमादिः स्यादेतेस्वावश्यकस्त्वतौ ॥मु.का.१६ से २२ तक २-समवायि कारणत्वं द्रव्यस्यैवेति विज्ञ यम् । -गुणकर्ममात्रवृत्ति यमथाप्यसमवापिहेतुत्वम् । ४-अन्यत्रनित्यद्रव्येभ्य आश्रितत्वमिहोच्यते । मु. का. २३ एवं २४ . दाथ विज्ञानीय ] आश्रितत्व है । पृथिव्यादि नवों द्रव्यों का माधर्म्य द्रव्यत्व एवं गुणवत्व है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु और मन का साधम्यं परत्व मूर्तत्व क्रियावत्व और बेगवत्व है । मूर्तत्व का अभिप्राय अपकृष्ट पारमाण (महत्परि- माण से भिन्न परिमाण) से है। काल, आकाश, अात्मा और दिशा का परममइत्परिमाण साधर्म्य है । मर्वगतत्व एवं सर्वमूर्ति संयोगित्व भी इनमें पाया जाता है । पृथ्वी जल तेज वायु एवं अाकाश भूत कह नाते हैं अत: इन पांचों में भूतत्व रहता है । पृथ्वी, जल, तेज एवं वायु में स्पर्शवत्व, द्रव्यारम्भक प्रवृत्ति एवं द्रव्यसमवायिकारणता भी मानी जाती है । अाकाश और जीवात्मा में अव्याप्यवृत्तिविशेषगुणवत्व तथा क्षणिकविशेषगणवत्त माना जाता है । आकाश का विशेषगुण शब्द है, यह जिस समय एक स्थान पर उत्पन्न होता है, उसी समय दूसरे स्थान पर अभाववाला है अत: अाकाश में व्याप्यवृत्तिविशेषगुणवत्व रहता है। ज्ञान भी आत्मामें अव्याप्यवृत्ति ही माना गयः है। वस्तुतः तीसरे क्षण में नष्ट होने वाले का नाम क्षणिक है । योग्यभि के विशेष गुण का नाश अपने उत्पन्न होने के पश्चाद् उत्पन्न होने वाले गुणों के द्वारा होने के कारण प्रथम शब्द का नाश द्वितीयशब्द से होता है, अत: आत्मा में जब ज्ञान सुख दुःख इच्छा द्वष प्रयत्न की शरीर. सम्बन्ध से उत्पत्ति होती है उसी समय घटादिसम्बन्ध द्वारा ज्ञानादि का अभाव भी रहता है । अत: ज्ञानादि भी अव्याप्यवृत्तिसिद्ध होते हैं। योग्यविभुविशेषगुण से शब्दादि एवं अयोग्य विभुविशेषगुण से धर्म अधर्म एवं संस्कार का ग्रहण होता है। ज्ञानादिक दो ही क्षण स्थायो अतः क्षणिक विशेषगुणवत्व भी क्षित्यादीनां नवानांतु द्रव्यत्वं गुणयोगिता । क्षितिजेलं तथा तेज:पवनोमन एव च परापरत्व मूर्तत्व क्रिया वेगाश्रया अमी। कालखात्मदिशां सर्वगतत्वं परमं महत् । क्षित्यादि पञ्चभूतानि चत्वारि स्पर्शवन्ति हि। द्र न्यारम्भश्चतुषु स्यादथाकाशशरीरिणाम् । श्रव्याप्यवृत्तिः क्षणिको विशेष गण इष्यते ।

७४ [पदाथ मीमासा आत्मा का साधम्य है । अपेक्षा बुद्धि तीन क्षण तक रहती है जैसे एक एक दो, यहां पर तृतीय क्षण में ज्ञान होता है अत: चतुःक्षणवृत्ति जन्यावृत्ति जातिगत विशेषगुण अर्थ करते हैं । कोई भी जन्यज्ञान चार क्षणस्थायी नहीं है अत: अतिव्याप्ति दोष नहीं लगता। पृथ्वी जल एवं तंज में रूपवत्व, द्रवत्ववत्व, एवं प्रत्यक्षविषयत्व साधर्म्य माना गया है । यहां पर यह शंका है कि चक्ष रादि में, भर्जन कपालस्थित अग्नि में और ऊष्मा में रूप है इसमें क्या प्रमाण है। इस का उत्तर यह है कि तेजस्व हेतु से इन सब में भी रूप की सिद्धि हो जाती है। वायु द्वारा पानीत पृथ्वी जल एवं तेज में भी पृथिवीत्व, जनत्व एवं तेजस्व हेतुओं द्वार। रूप की सिद्धि होती है। जल में द्रवत्व सांसर्गिक एवं तेज में नैमित्तिक द्रवत्व है । पृथ्वी एवं जल में गुरुत्व तथा रसत्व सांसगिक है। श्रात्मा, पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं अाकाश में विशेष गुण रहते हैं। पदार्थ एवं द्रव्यों के जो साधर्म वर्णित किये गये हैं तदतिरिक्त पदाथों का वैधर्म्य है । वायु में स्पर्श संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, रूपद्रवत्व प्रत्यक्षयोगिनः प्रथमास्त्रयः । गुरुणी द्व रसवती तयो नैमित्तिको द्रवः । आत्मनो भूतवर्गाश्च विशेष गुण्योगिनः । यदुक्तं यस्य साधर्म्य वैधर्म्यमितरस्यतत् । स्पर्शादयोऽष्टौ वेगाख्य: संस्कारो मरुतो गुणाः स्पर्शाद्यष्टौ रूपवेगौ द्रवत्वं तेजसो गुणाः । स्पर्शादय ऽष्टौ वेगश्च गरुत्वन द्रवत्व कम रूपं रसस्तथा स्नेही वारिणर ते चतुर्दश स्नेह हीना गन्धयुताः क्षितावेते चतुर्दश बुद्धया दषट कं संख्यादि पञ्चकं भावना तथा धर्माधमौ गुणा हयेते ह यात्मनः स्युश्चतुर्दश संख्यादिपञ्चक काल दिशो: शब्दश्च ते च खे संख्य'दय: पञ्चबुद्धि रिच्छायत्नोऽपिचेश्वरे परापरत्वे संख्याद्याः पञ्च वेगश्चमानसे । मु. का. २६-३४ । पदार्थ विज्ञानीय ] विभाग, परत्व तथा वेग नवगुण माने गये हैं । तेज में उपयुक्त नवगुण के साथ २ रूप एवं नैमित्तिक द्रवत्व भी पाया जाता है। तेजके एकादश गुणों के साथ गुरुत्व, रस एवं स्नेह १४ गुण जल में रहते हैं । स्नेहाति- रिक्त पृथ्वी में जल के समस्त गण रहते हैं । स्नेह के स्थान पर गन्ध है अत: पृथ्वी में भी १४ गुण पाये जाते हैं । बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष प्रयत्न संख्या परिमाण पृथकत्व संयोगविभाग भावना धर्म और अधर्म १४ गुण जीवात्मा में आभित हैं । आकाश में संख्या परिमाण पृथक्त्व संयोग विभाग और शन्द गण माने गये हैं। काल एवं दिशा में संख्या परिमाण पृथकत्व संयोग एवं विभाग केवल पाँच गुण हैं। मन में संख्या परिमाण पृथकत्व संयोग विभाग पर अपर एवं वेग आठ गुण पाये जाते हैं। ईश्वरात्मा में भी संख्या परिमाण पृथकत्व संयोग विभाग बुद्धि इच्छ। एवं यत्न नामक गुणों की उपस्थिति मानी गयी है। ग्रन्थकतु: परिचयः" सिंहासनस्थाष्टभुजी सुवर्णा सर्वोपविध्वंसनदत्तचित्ता । श्री चयडका मे कुलदेवतास्ति तस्यै नमोवंशसमृद्धिदात्र्ये ।। विश्वेश्वरी पूज्यमदीयमाता सारस्वतो दाउदयालु तातः । भ्रातास्ति विश्वम्भरनाथशर्मा लक्ष्म्यायुतो यस्य सुवामभागः ॥ दुर्गास्ति पितृव्यवधूर्मदीया काशोस्थिता सा मम वन्दनीया । स्वसा मदोया विदुषी प्रभा सा यां बैजनाथः समलंकरोति ।। ममाभिधात्र्यम्बकनाथ शर्मा लीलाख्यशक्तिः सुविभाति वामे । सूनू गरौ मे च रमेशनाथो महेशनाथो हृदये चकास्तः ।। निर्धारिना राष्ट पतेः सुवद्य: गुरुर्मदीयो जगतीप्रसिद्धः । लोकेऽद्वितीय: विदुषां गुरु: स श्री सत्यनारायण नामधेयः ।। गुरुर्द्वितीयोऽपि वरोवरेण्य: काशीस्थितो मे हृदयेऽधिवासी। प्रख्यात राजेश्वरदत्त शास्त्री यस्यानुकम्पा प्रददाति शक्तिम् । श्रीदत्तात्र य-अनन्त: कुलकर्णीति विख्यातः । स गुरु र्भाग्यविधेय श्रायुर्वेदस्य सर्गस्य ।। इतिशम् 0 .. 125205 गा

लाल बहादुर
शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, पुस्तकालय
Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration Library
मसूरी
MUSSOORIE
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برہم 16.41 ratica fatto ACC. No........ वर्गसं. पुस्तक सं. Class No........ Book No........... लेखक 7F, 747747 Author. शीर्षक The TT - To: - * Title.. .... Sams 181:41 LIBRARY Stuf LAL BAHADUR SHASTRI National Academy of Administration MUSSOORIE 125205 Accession No. 1. Books are issued for 15 days only but may have to be recalled earlier if urgently required. 2. An over-due charge of 25 Paise per day por volume will be charged. 3. Books may be renewed on request, at the discretion of the Librarian. 4. Periodicals, Rare and Reference books may not be issued and may be consulted only in the Library. 6. Books lost, defaced or injured in any way shall have to be replaced or its double price shall be paid by the borrower. Help to keep this book fresh, clean & moving

Padarthamimansa Vol-i (1955)

Author
Sharma Pandit Ayambkanath.
Title
Padarthamimansa Vol-i (1955)
File name
Padarthamimansa Vol-i (1955)
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2010/02/15
Publisher
Banarsi Das Mehrotra.
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Lbs National Academy Of Administration
DLI number
424352
Barcode
99999990793593.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
J1jXDxi56Tu
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