Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Srianantanathcharitraduddhritam Poojashtakam

Nimichadra · 2010/01

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श्रीश्रुतनानअमीधारा सीरीज नंबर ५
विश्वहितयोधिदायक श्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः
सुगृहीतनामधेय श्रीमन्नेमिचंद्रसूरीश्वरगुम्फितं
श्रीअनन्तनाथचरित्रादुद्धृतं पूजाप्टकम्
संपादक
HA
आचार्य विजयक्षमाभद्रसूरिः
प्रकाशक
शाह रायचंद गुलाबचंद मु० अच्छारी, पोष्ट मिलाड (गुजरात)
निक्रम मंवत् १९९०
पीरमं. २४३३
इमयी मन १९४०

Published by Shah Rayahand Culabohnnel, Acolhari Station Bhilad, B. B.E. C. L. By. Printod hy Ramaluandın Yosu Shalgo, at tiho Nirnaya Sngne Tro99, 26-28, Kolblunt. Stroot, Bombay. प्राप्तिस्थानम्-आचार्य श्रीविजयदानसूरीधर जैनमन्तगाला गोपीपुरा-गु० सुरत. पोज पेकिंग खर्च चार आन PRA कुमुम- श्रीश्रुतज्ञानअमीधारा ग्रन्थाङ्क नं. ५ श्रीमन्नेमिचन्द्रसूरीन्द्रगुम्फितं जाय श्रीअनन्तनाथचरित्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् । शेखरकथा Sureneut J Mantr पानाच्या विश्वहितबोधिदायकश्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः । जयइ जुगाइजिणिंदो परिविलसिरसमवसरणचउरुवो। वागरिउं पिर मुहदाणसीलतवभावणाधम्मे ॥ १ ॥ सो जयइ जिणोणंतो देसणदसणंसुणो सया जस्स । केवलरविकिरणा इव तममवर्णिता विमंति ॥ २॥ सिरिवद्धमाण- सामि नमामि कणयाभदेहदित्तीए । कुणमाणं पिव भुवणं सधंपिय अत्तणो तुद्धं ॥ ३॥ सम्मत्तनिमलत्तं किरियाय जीप होइ तं कहह । जह निमंपि हु पहु सिद्धिसायं तं करेमि अहं ॥ ४ तो आह तिजयनाहो नरिंद निसुणेमु तस्स निघलया । जायइ जिणपूयाए भत्तीए तिसंज्ञविहियाए ॥ ५॥ जिणपूया पावहरी जिणपुया जायए भवंतकरी । जिण- पूया सघाणवि कहाणमणीण भंडारो ॥ ६ ॥ अवहरइ दरिदत्तं पणामए तिजयलच्छिविच्छई। जिणपूया कीरंती पणा- सए सबदुरियाई ॥ ७॥ कुसुमक्खयफलजलधुवदीवनेवञवामनिम्माया। पूया जिणेसराणं सा अट्टविहा विणिदिहा ॥ ८॥ वरपरिमलेहिं कुसुमेहिं पूयए जो जिणे सबहुमाणं । पूयापत्तं जायइ निगप्पसाया गुरुगवि सो॥ ९ ॥ जो जिणपयपउमपुरो पूयत्यं खिवइ अक्खए सिप्पं । सासयसोखे मोस्सम्मि अक्सओ होर सो पत्तो ॥ १०॥ एके- णावि फलेणं जिणरत्नो जो उवायणं कुणइ । ता तप्पसायओ लहइ सो धुवं सबसिद्धिसिरिं ॥ ११॥ पत्तगएण जिणिदं unded៥ដើuឱual अनन्त מתנה

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कुसुम-
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पूजायां
श्रीअनन्त-
नाथचारि-
बादुदुतं
पूजाष्टकम्
शेखरकथा
॥१॥
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जो सच्छस्साउसीयलजलेण । पूय सो तेणेवय पक्खालइ नियगलं नियमा ॥ १२ ॥ जो धणसार अगर 4 दर
जिणअंगधूवणनिमित्तं । सो घणसारो जायए अगुरू धणो वि जस्रा पुरो ॥ १३ ॥ जो मंगलप्पईवेण पूयए सामिसा-
लजिणनंद। सो दीवसिहा उज्जलगुती सग्गसिरिं रम ॥ १४ ॥ जे निरवज्ज भोज नेवले जिणवरस जच्छति ।
भोलूण ते गडणवजाईल(भ)वसुशार सिवं जंति ॥१५॥ जो सुरुवासेहिं जिणेसरस्स पूपर पायसयवत्तं । सो सुहवासं
मि सया सिवालए सासगो वसइ॥ १६ ॥ एयाओ अपि कुणा जो सया भत्तिनिभरो भयो । सो अढकम्ममुफो
संपजश'. सासणो सियो ॥ १७॥ सघाहिघि असमत्थो एकापवि पूगए जर जिणं जो । ता सोवि गावसुद्धीप
पावए सिविसंबंध ॥ १८ ॥ एयाउ राय कहिगाउ तुब्भ पूयाउ एग जिणुत्तम्मि । भणर निवो पणयपाहू सीमंतयरइय-
करफोसो ॥ १९॥ जयनाए साहसु मई महंतकोलाउलगणस्स । दिलुते अट्ठाणवि पूयाणिणि कयपसाया
॥ २० ॥ जंपए जिणेसरो सुणसु राय कयअप्पमत्तमणवित्ती । संपर साहिज्जते दिहते अह पूयासु ॥ २१॥ इए
दुग्गदेव दुग्गयपडाय धानरग दैतेयक्खा । साहससार अकिंचण रणसूर धणीवहा पुरिसा ॥ २२ ॥ होउं कमेण गो-
फापूगकरणेण गरुयरायाणो । सिरिकसुमसेएरक्खयकित्तिफैलसारजलसारा ॥ २३॥ सिरिधूवसुंदरो तह भुवणपई-
वो पईवसिहवत्तो । मुँवणप्पमोयगो गंधबंधुरो सिवपुरि पता ॥ २४ ॥ कुलयं । कुसुमेहिं जेण पूश्य जिणेसरं पाविया
महारिधी । तं कुसुमसेहरकाएं कहिजमाणं निसामेह ॥ २५ ॥ पुरमत्थि स्फुरियमहापहाविरायंतरयणपायारं ।
रयणप्पायारं नाम गुरुविमाणं सुरपुरं च ॥ २६॥ रयणीसु जत्थ ससिरयणसालागलंतसलिलेण । भवणाई
नीरयाई भवंति मुणिगाणसाई व ॥२७॥ तत्थस्थि हथिहयरहजोहोहपसाहियाहियसमूहो । विलसिररयणाभरणो
रयणाभरणोत्ति नरनाहो ॥ २८ ॥ आयलियासिपडिफलियतरणिकिरणावलीकलियकामो। पयडपयावप्पसरोध जो
ETERMER
॥१॥

कुमुम. पूजायाँ कृसुम- शेखरकपा रणे रीण दुनिरिक्खो ॥ ३९ ॥ सबंतेउरतरुणीपहुत्तपयवीपउहिया जाया । तस्मत्वि इत्यिमंघरगइगमणा रयण- मालत्ति ॥ ३० ॥ चित्तव चित्तवासा अमुकपासा सकीयछाय । निययापयध सया जा दुम्मोया मणायपि ॥ ३१ ॥ ताणत्थि तारतारुनललियलायन्नपुनसगी । अंगीकयसयलफला कन्ना रयणावली नामा ॥ ३२ ॥ पीयाण मुराए इव दिहाएवि जीए होइ उम्माओ । तरुणाण विवेईणवि अविवेईणं तु का गणणा ॥ ३३ ॥ मा जत्य जत्य कीला- करणकए जाइ रूवविनियरई ॥ गच्छंति तत्य तत्यय परबमा सेवयच नरा ॥ ३४ ॥ कझ्यावि मयंकमुही महीजुया सा सुहासणासीणा। सियछत्तचलिरचमरालंकरिया निग्गया नगग ॥ ३५ ॥ पत्ता य मत्तमहुयरनामे सिसिर- हुमम्मि आरामे । दट्टण मयणभवणं उत्तिना जा बिमइ तत्य ॥ ३६॥ ना निया रंगमंउवगवकपमहामणद्वियं पर । रायकुमारं मयणं व निग्गयं भवणगम्भाओ ॥ ३७॥ करकलियफेलिकमलं नियत्वनियंत्रिणीजगियमयणं । मुमि- णिद्धमुद्धदीहच्छिजोण्हधवलीयग्गनहं ।। ३८ ॥ तं पेन्छि मयच्छी चिंता को एम दीमइ महापा । अगभुयत्न धरो सिंगारी चारुतारुनो ।। ३९ ॥ नणं पक्खोपिय एमो धन्मो इमाउ संजायं । मन्ना अणिनिमत्तं महमत्ति निरंतरायसुहं ॥ ४० ॥ पुबमवुप्पन्नमहापुंन्ना रायेण तीग फलिया । तूलिच अंगसंगं इमम्म जा पाविही वाला ॥११॥ सचिय जयप्पवित्ता विलसन्तमुवन्नरयणरमणीया । जा मुहियव लहिही करगदणमिमन्म मुहयाम ॥ ४२ ॥ समिय- उत्तमगमणा विभमरहिए सुपत्तरसजाए । रमिही इमस्म जा माणसे नया रायहंसित्र ॥ ४३ ।। इस चिंनंती जाया- समसझससेयकंपकलियंगी । पक्वलियपया पविसइ अविइण्हं तं पलोयंती ॥ १४ ॥ वरदाणपरपि मनं मुत्तुमिमा नियइ अन्नमइनेहा । इय चिंतिय कुविएणव कामेण सरेहिं पहया ना ॥ १५ ॥ मयणेण नदिनी घिर- सरलसिणिद्धवंधुरच्छीहिं । सबविया असरिसरुवहरियहियगण कुमरेण ॥ ४६॥ एयाए. अहो रुवं मोहइ मणमवि N । ETTETTER कुसुम- पूजायां श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धतं पूजाष्टकम् शेखरकथा ॥२॥ पसंतमोहाण । गुरु रायायत्ताणं मह सरिसाणं तु का वत्ता ॥४७॥ सोचिय गुरुरायधरो सोशिय सरसो इमाए बालाए । सधंगसंगम जो लिहिही घुसिणगरागोध ॥ ४८ ॥ सो चेव चारुवन्नो पवित्तगुरुमुत्तसियगुणमहग्यो । एयाए मयच्छीए हियए हारोब जो वसिही ।। ४९ ॥ इए चिंतंतो संतो मयणायत्तो ठिओ कुमारोचि । सूरचरिओवि कायरनरनियर- निवरिसणं जाओ ॥ ५० ॥ धवलइ कुमर बाला नियच्छिजोण्हाए सोवि रायसुयं । पशुवयरंति सिग्छ गरुया रइओव- यारम्मि ॥५१॥ तं पेच्छरी कुमारी पत्ता पासंचि कामपडिमाए । सविणयपणामपुवं पूर्व काउं समारद्धा ॥ ५२ ॥ परिपूर्यती मयणं पुणो पुणो पेच्छिरी कुमरवयणं । दसइ मयणस्सव तं दइयमिमं देहि मज्झत्ति ॥ ५३॥ पूयाए जाइ मयणे तदिही निवसुएणुरायेण । रूवंतरंव द९ पइक्खणं कामकुमराण ।। ५४ ॥ पुच्छइय मयणियं नाम नियसहिं को वयंसि एस जुवा । तीए कुमारथइयावहाउ नाऊण कहियं से ॥ ५५ ॥ सहि सुणसु कुसुमसुंदरनयरे निययप्पयावजिय- तरणी । कुसुमावयंसयनिवो भन्जा कुसुमस्सिरी तस्स ॥ ५६ ॥ पउरगुणपउरनयरं ताण सुओ कुसुमसेहरो नाम । संयलकलाकलियतणू नियजोषणरमणिमणहरणो ॥ ५७ ॥ भत्तस्स विणीयस्सवि नीइपरस्सावि तस्स नरवइणा । केणावि कारणेणं पराभवो विरइओ दूरं ॥ ५८॥ तं अवमाणं काऊण माणसे अद्धरत्तसमयम्मि । परिमियपरिवार- जुओ चलिओ देसंतरे कुमरो ॥ ५९ ॥ इह पत्तो विन्नातो तुह जणएणं अणिच्छमाणोवि । गंतुं पयोणीए रिद्धीए पवेसिओ एत्थ ॥ ६०॥ संमाणिऊण भणितो मा गच्छसु वच्छ अच्छसु इहेव । जं मज्झ तुज्झ जणओ मित्तो अचंतगोरबो ॥६१॥ ठाउमणिच्छंतोवि हु निवोवरोहा इहडिओ स इमो । अणभिमयं पि न गरुया दक्खिन्नपरा परिहरंति ॥६२॥ तं सोउं रायसुया चिंतइ जुत्तो इममि अणुराओ। नवरं एसो रत्तो नो वा संपइ न याणामि ॥६३॥ कुमरेणुत्तो थइयावहो अरे मंतियं किमेयाए । तेणुत्तं निवकन्नासहीए तुह पुच्छियं परियं ॥ ६४ ॥ कुमरनिरिक्खणलुद्धा निबत्तियकामपडिम- टाटा UEUE ॥२॥ D । asna PETER مشرال कुसुम पूजायां शेखरकथा पूयावि । तभवणपेच्छणछला महई वेलं ठिया बाला ॥ ६५ ॥ वारं वारं चलसुत्ति सोविदल्लीहिं विनविनंती । पक्च- लियकमं तं पेच्छिरी गया जाणमारुहिउं ॥ ६६ ॥ गच्छंती कुमरेणं पलोइया सोवि तीए समविओ । अणुरते जंताई धरिउं को तरइ नेत्ताई ॥ ६७ ॥ नयणपहमइफताए तीए अरई कुमारमणुपत्ता । लहइगिय अवयासं कइयावि अणिह- भन्नावि ।। ६८ ॥ रंमंपि तबिओए उजाणं पिश्वणंव दुक्सारं । कलयंतो कुमरो तुरियं तुरयमारुहिय संचलिओ ॥ ६९ ॥ नयरपउलिं पविट्ठो सुणइ समाउलियलोयहलवोलं । नियइ य गुरुतरुघरपुरमालारूढ़ मभवलोयं ॥ ७० ॥ किमिमंति कयवियको पेच्छइ सुन्नासणं गयाहिवई । पाडतं पासाए मारतं तुरय-नर-करहे ।। ७१ ॥ चरणागरिसिच- संकलसरेण नियडयखडक्खडाए य । गलगजिएण य जणं जो जाणावन्तो व धावेइ ॥ ७२ ॥ मा महमारपना भूमी मुच्छिजउत्ति कलिउं व । सिंचंतो गुरुफुकारसिफरासारसलिलेण ॥ ७३ ॥ चलकन्नवालचालियससहरसिय- चारुचमरजुयलेण । जो वीयइ दंतसुहासणद्वियं रायलच्छि छ । ७४ ॥ इहूँ मुहासणद्वियनिवतणयं धाविओ करि तो । सा झपाए समुत्तिन्ना नियडेणत्ये थिरो को वा ।। ७५ ॥ पीणपओहरगुरुतरनियंत्रभरमंथरक.मगईए । नासिउमतरती सा गहिया करिणा कुरंगच्छी ।। ७६ ॥ दूरुक्खित्ताए पवणापसारिओ तीए कुंनल कलायो । समयगय- कडतडुडीणभमरनियरोव रेहेइ ॥ ७७ ॥ वियसियसिरीसकुसुमोहसमहियाफासलालसेणं व । गाई गएण निय- करदंडेणालिंगिया वाला ॥ ७८ ॥ करिणा हरिणंफमुही मुमुही विहिया विहाइ गयणयले । नियकुंभतत्वणाण व पीणत्तं दुटुकामेण ।। ७९ ॥ मा मह भएण एसा मुच्छिाउ इय विभाविऊण करी । तं नीयइद्य चलकनवालजुयताल- घंटेहिं ॥ ८० ॥ तं दुहुँ रायसुओ झडित्ति मुत्तुं तुरंगमं वेगा। उद्धाइओ गयं पइ हफ्तो कामसरेण ।। ८१ ।। रे रे' दुट्ठ गयाम मोतुं नारिं वलेसु मह समुहं । जइ सत्तमत्यि इय सुयकुमरालावा भणइ कुमरी ॥ ८२ ॥ मह कीडिय- Venue UCUeena Urdu कुसुम- पूजाया श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुन्दुतं पूजाटकम् शेखरकथा N ॥३॥ कप्पाए कजे भुवणोक्यारकरणखमं । नररयण मा विणाससु अत्ताणं करिकयंताओ ॥ ८३ ॥ सुर्यकुमरीविनवणो सो जंपइ तंपि भुवर्णगन्मम्मि । वससि तओ रक्खिस्सं चइउं पाणेवि तं नियमा ॥ ८४ ॥ मह करगयावि चाटूणि करेइ कुमरस इय विभावेउं । कुविएण व करिणा सा खित्ता दूरं गयणमग्गे ॥८५॥ विजाहरिं व गयणे गच्छंतिं तं पलोइरो कुमरो । जाओ पमत्तचित्तो तो संगहियो गइंदेण ॥ ८६ ॥ मिलसु नियवल्लहाए तुमंपि इय चिंति व कुविएण । करिणा कुमरो वि नहे खित्तो तीए पडतीए ॥८७॥ मरिही एसा एहहहूरा रयनिवडियत्ति कलिऊण । परिसत्ता करुणाए नेहेण व तेण सा गाढं ॥८८॥ आलिंगियाए तीए पडइ अहो निवसुओ निराहारो । थीफासलालसाणं अहोगईए न संदेहो॥८९॥ एत्थंतरंमि वेगागएण नहयरनरेण एफेण । तढुगमवि अवलंडिय नरनयणागोयरे नीयं ॥९०॥ तो पलवंतो लोगो अतरंतो लग्गिउं खयरमग्गे । गंतूण कहइ रन्नो कुमारकुमरीणमवहरणं ॥ ९१ ॥ तं सोउ आउलितो चलिती राया निरिक्खणे ताणं । पेरियतरलतुरंगो परियडइ पुरस्स चउपासं ॥ ९२ ॥ अप्पत्ततप्पउत्ती दुरयरमहिं पलोइउं वलिओ । रुयइ रुयावि- यलोगो सहमागंतुं गुरुसरेण ॥९३॥ हा वच्छे हा वच्छे हहा अतुच्छे हहा विणयदच्छे(क्खे)। हा सुकुमाले बाले अवहरिया केण तं कहसु ॥९४॥ हे देव निहतो तं वालं पुत्तं तया हरेऊण । कंन्नपि अवहरंतो खयंमि खारं खिवसि खुद्द ॥१५॥हा मह सहा वि सुनातुह विरहे कुसुमसेहरकुमार। एरिसदुह(द)सणत्थं पवसंतोतं मए धरिओ॥९६॥ अंतेउरपउरजणेणं रीइणी तह तया तहिं रुन्नं । जह नयणजलासारो वित्थरितो वरिसयालोब ॥९७॥ एवं पलवंताणं ताणं तइए दिणे तरणिउदये। खयरविमाणगणेणं पत्तो कुमरीजुतो कुमरो ॥ ९८ ॥ पणतो य महीवइणो सखेयरो निवसुयावि तं नमइ । आपुच्छिय कुसलाई ताई निविट्ठाई निवपुरतो॥ ९९ ॥ रायाह कुमर साहसु हरणागमणाण निययवुत्तंतं । तो तं कुमराणाए कहि लग्गोखयरचकी ॥१००॥ देवत्थि दियवरम्मि व वेयड्डे गुरुगिरिम्मि मणिभवणं । नयरं रहनेउरचकवाल नामं मणभि- । ॥३॥ תבורכו UCLE पूजायां कुसुम- शेखरकथा रामं ॥ १॥ तं परिपालइ विजाहराहिवो नयणवेग अभिहाणो । गहियधयभरसिरिकिरिणवेगमयरिंदअंगरुहो ॥२॥ दाहिणनंदीसरगरुयवेगवलिएण तेण सगवियं । अन्नोनं परिसत्तं पडन्तमित्यीपुरिसजुयलं ॥ ३॥ अगंतरूवरमणीरमणं पइ रइयबुद्धिणा तेण । तहुगमवि अवहरि नीयं सेले विसालग्गे॥ ४॥ तो थंभणीप विजाप थंभिउ पुरिसमाह रमणि सो। म अणुरत्तं भत्तं भत्तारं सुभु मन्नेसु॥५॥ तीउत्तं तं सुपुरिस भागा मह नियसहोयरसरिच्छो । ता उभयभवविरुवं तुमए नो किपि वत्तई ॥ ६ ॥ अवरं च न सायत्ता अहं जतो जणायदिनिया कन्ना । चीवाहिजर सेच्छा जुत्ता न भवारि- साणंपि ॥ ७ ॥ तुम्हारिलावि उत्तमकुलुन्भवा जइ मुयंति मजायं । ता बंधव अकुलीणाण पावकारीण का पत्ता ॥ ८॥ किं नियपियासरीराउ मह सरीरम्मि समहियं किंपि । दिदं जं भाय तुमं संपइ जंपसि अवत्त ॥ ९॥ वित्यरर जरा परिंगलइ जोवणं जाइ जीवियपि । किं नाम सासयं तुह देहे जमकजसजोसि ॥ ११० ।। मुत्तंतपुरीमवसायासे दुग्गंधमलविलीणमि । मह देहे किं सारं जं रायरसे तुहुफारिसो ॥ ११ ॥ एत्यंतरंमि चउनाणनायनिगपुत्तपाववृत्तंतो। तबोहत्थं सिरिकिरणवेगसूरी तहिं पत्तो ॥ १२ ॥ तेणुत्तं भो सावय किं तुझ कुलामो इमो जमिमं । पारद्धं तुमए निदणिजमुत्तमनराण जतो ॥ १३ ॥ लजिजइ जेण जणे मइलिजर निगकुलफामो जेण । कंठद्विपावि जीर कुणंति न कयाइ तं सुयणा ॥ १४ ॥ किं पुत्त पिइपियामहपमुहेहिं वयं कयं हवइ जेसि । ते इव निम्मजाया तुम व पावप्पिया हुंति ॥१५॥ अवरं च इमा भइणी सहोयरा तुह मुणेमि नाणेण । रयणप्पायाराहिवरयणाभरणभूवश्णो ॥ १६ ॥ तं अंगरुहो जेठो एसावि सुया कणिहिया तस्स । वच्छ मए तं हरिओ निवभवणा मासमेत्तवओ।। १७ ।। कुमरीवयणविरते चित्त पिइसिक्खणेण संवेगो । लग्गो खेयरवइणो पासियवत्यम्मि रंगोत्र ॥ १८॥ तो तेण पाय- जुयले लग्गेऊणं समाविया भइणी । उत्यंभिउं कुमारं पणमिय सूरीण विनत्तं ॥ १९ ॥ पहु मोहमहाचे अविवेयजले

.
कुसुम-
पूजायां
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
बादुद्भुतं
पूजाष्टकम्
शेखरकथा
॥४॥
EEEEEEEEEEEEEEEE
निमजिरो तुमए । नियवयणवरचाए उधारिओ ई दयानिहिणा ॥ १२० ॥ परिभोगो श्यराएवि पररमणीए पयच्छए
नरयं । किं पुण नियभरणीय आजम्मं पूगणिजाए ॥ २१ ॥ ता पतु कंनाए समं नियरज अप्पिऊण जणयस्स । संगहि-
रासघविरई तुद चरणाराहो कोई ॥ २२ ॥ पायघं तुम्भेहि रहनेउरचकवालनयरम्मि । श्य जंपिय गुरु कुमरी
कुमरजुओ सो गो सपुरे ॥ २३ ॥ दुगगवि सम्माणे वत्थाहरणेहिं खयरबलफलिओ । इह पत्तो तुम्ह सुतो सोई
श्य साहियं तुम्हः ॥२४॥ ता ताय अहं जाओ दुप्पुत्तो तुम्ह जं मए दिनं । नियविरहेणं कुमरीहरणेण य दारुणं
दुक्खं ॥ २५ ॥ श्य जपतो भणितो निवेण मा पुत्त खेयमुबासु । दोसो न अम्ह दोहवि किं तु श्मं दुकयकम्मफलं
॥ २६ ॥ पुषभवे तवचरणं कयं मप किं तु संतरायं तं । जंतुए सरिसो पुत्तो जातो हरिओ य मिलिओ य ॥ २७ ॥
जागं कशाहरणं कनाहरणंव परमपालाणं । जस्सप्पभावतो मे सुचिरेणवि पुत्त मिलिगो तं ॥ २८ ॥ श्य जंपिऊण
गाढ़ जणपणालिंगितो सुतो तयणु । जणणीप नओ तीयनि अवलंडिय चुंविओ भाले ॥ २९ ॥ खेयरवश्णा वुत्तो जणतो
तं गिह वाय मह रज । परिवजियसावज पधज पुण अहं काहं ॥ १३० ॥ तं भणइ पिया परिणयवयस्स मज्झवि य
जुज्जए दिक्खा । काई नाई विरई शर्णिहपि तप समं जाय ॥ ३१ ॥ दोण्हपि सम्मएणं कुमरि परिणाविऊण कुमरस्स ।
दिन्नं तं रजं तो पत्ता सधेवि वेयग्नु ॥ ३२ ॥ तत्थवि अहिसिंचिय कुसुमसेहरं खयररायरजम्मि । खेयरनरनाहिं
गहिया दिक्खा गुरुसयासे ॥ ३३ ॥ पणमित्तु कुसुमसेहराया पुच्छइ गुरुं कहा भयवं । मह पुषजस्मसुकयं जं जाओ है
खयरनकी ॥ ३४ ॥ आ६ पहू आयनसु रयणवईए पुरीप तं राय । कम्मयरो आसि अईवदुग्गओ दुग्गदेवोत्ति ॥३५॥
कश्यावि नाणनिउणामिछाणसूरीहिं भवपरिसाए । साहिप्पंतं निसुयं जिगिदपूयट्ठगं तेण ॥३६॥ तहाहि ॥ फलकुसुमक्ख-
यजलधूवदीवनेवजवासनिम्माया । कीरए एसा अट्ठप्पयारपूया जिणिदाण ॥ ३५ ॥ सधाओवि असत्तो काउ सयवत्तपमु-
॥४॥

- कुसुम. पूजायां शेखरकथा nan וולוזין בתבן ACCUSATIONER हसुमणेहिं । पूयइ जो जिणचंदे सो सामी हवइ सुमणाण ॥ ३८ ॥ माणुसभवेवि नूणं जिणपूया पुनपगरिसपभावा । अंगपि कुसुमपरिमलमुग्गिरइ सयावि सत्ताण ॥ ३९ ॥ किं बहुणा भोत्तूणं असुरनरामरपहुत्तरिद्धीतो। सिद्धिं पि धुवं पावइ पाणी जिणनाहपूयाए ॥१४०॥ इय आयनिय वावन्नदेवउलियाजुयम्मि पत्तो सो । कीरविहाराभिहजिणहरम्मि मणिकणयघडियम्मि ॥ ४१ ।। जाईसरेण जं कीरपक्खिणा भणिय पुत्तजयसेणं । कारवियं नायजियधणेण बहुमाण- सारेण ॥४२॥ जं चउदिसिपडिविवियपाडलकलियाहिं भमिरभमराहिं । नियध भावरिउणो कोवारुणनयणनिय- रेण ॥४३॥ आभाइ निरन्भनिसिप्पडिविवियतारतारयप्पयरं । जं भत्तिनिम्भरामरविरइयसियकुसुमवरिसं व ॥४४॥ तम्मिं पविसिय नायजिएण दवेण गहिय कुसुमाई । आणंदपुलइयतणू पूयइ सो रिसहजिणनाहं ॥ ४५ ॥ तप्पुनप- भावेणं रिद्धिं भोत्तुं भवम्मि तम्मि ततो। जातो तं खयरवई इय कहियं राय तुह चरियं ।। ४६ ॥ तं सोउं जाईसरणनाणविनायपुत्वभवचरिओ । रायाह जह पहूहिं कहियं दिलु मएवि तहा ॥ ४७ ।। तो रयणाभरणमुणी भणइ मुर्णिदं कहेह मह भयवं । किं सुयसुयाण विरहो बहुथोवदिणाणि जाओ मे ॥४८॥ आह पहू आरामियपुत्तो कणकिन्न- नामगामम्मि । आसी अंड(व?)यनामो कीरसुओ गोविओ तेण ॥४९॥ तो तं अनियंतं कीरजुयलमगंतदुक्खियं जायं करुणं कूयइ असूणि मुयइ मुच्छियएणुकलं ।। १५० ।। जणएणुत्तं पुत्तय मुंचसु तणयं सुयाणमिहिपि । मा पुत्तविउत्ताणं इमाणमचाहियं होही ॥ ५१ ॥ तो तेणमइकंतेसु नवमुहुत्तेसु सुयसुओ मुफो । तो संजातो तोसो कीरीकलियरस कीरस्स ॥ ५२ ॥ समयंतरंमि कम्मिवि अवहरिया सारसीसुया तेण । तो तजणणिं दुहियं दहुँ सहसत्ति सा मुफा ॥ ५३ ॥ कइयावि मासखमणे आरामे तंमि संतियं साहुं । निचंपि पजुवासइ भत्तिन्भरनिभरो संतो॥५४॥ भोयणकरणनिविटेण तेण तत्येव मासपारणए । पडिलाहितो मुणी सो सद्धासहियेण परमनं ॥ ५५ ॥ तप्पुनपभावा सो अमरो होउं तुम कुसुम- पूजायां श्रीअनन्त- नाथनरि- प्रादुडतं पूजाष्टकम् शेखरकशा ॥५॥ नियो जातो। फीरजुण्ण वि भमि भवम्गि सगुवजि(अ) सुकगं ॥५६॥ कीरो जामोई किरणवेगखयराहियो सुई वितु मे।किरणावलिचिकना जागा नवरं अयुत्तोह ॥५७॥ जाग(?)पण हरिगा सारसिया तीए सरतडे जणणी । बाणेण लोइएणं विद्या खवगेण रागविया ॥५८॥ पंचपरमेष्ठिगतो दिनो से रोण तगणु सा सग्गे । अगरत्तसिरि भोतु संजातो तुए श्मो पुत्तो॥ ५९॥ नायलच लिएण गप दिछो सपिएण गासमेत्तवणो । फीरहरणुत्थपावोवगण तुष्ए सो गए हरिओ ॥१६०॥ परिवो पुरातेण नयणवेगोति तगणु करानामो । समयंगि तस्स र दाउ दिक्खा गार गहिया ॥६१॥ नंदी. सरवलिपणं एरिगा तुह कनया तो तेण । अंजयभवसगुवजियसारसिगाहरणपाववसा ॥ ३२ ॥ जहारसमडियादि अहारसवच्छराणि सुगविरहो । जागो ता दियसतिगं सुगार सह अप्पपावेण ॥ ६३ ।। ता सुमुणि कोउउपाइयं पि इस युक्खदारागं पायं । रागहोसवसायं तं पुण वियरए भवोहाई ॥६४॥श्य कहियं तुद परिगं तो रागरिसीवि जाइसर- णेण । तं नाउमाह एवं जाह पटु तुब्भेहि कहिरांति ॥ ६५ ॥ नवदिक्खिगगुणिजुत्तं नमिण गुरुं नियो करवि दिवसे । मोतुं खेयररणरयणप्पायारमणुपतो ॥६६॥ नीईए तत्थ पालर र गुंजर पिया सह गोप । निशंपि कुणश तित्थप्पभावणं पूगइ जिणिदे ॥६७॥ डिप्पवेसिएणं कश्यापि तु जणयमंतिणा राया। नगि वित्रत्तो देव तुह पिया गिणितही दिक्ख ॥६८॥ रजारिहोति केणइ हणिजिाही एस शग विभावे । पिउणावगाणिोतं न चेव पहुरागदोसेदि॥६९॥ तातुम्हे पिउरजस्सि- रिमागंतुं अलंकरह पहुणो । कारणफयावमाणणनिसप खेमो न जुसोज ॥१७० ॥ तं निसुणिऊण राम्माणिऊण तं तेण संजुओ राया। तत्थ गो पयपणो पिउणा आलिंगिओ गाढं ॥ ७१ ॥ संभासिय ससिणेई. निवेसिमो नियपष्ट तो रशा । गीयत्थगुरुसयासे रिटीए फयं वयग्गहणं ॥७२॥ पालई सो रजातिगं नरखेयररायरइयपयसेवो। नंदीसराश्ठाणेसु , 'संगाशी तुद नरपर अहारसपरछराणि सुगविरहो' इति पागनतारम् । ॥५॥ --- - अक्षत. पूजायां कीर्तिकथा - जाइ सासयजिणे नमिउं ।। ७३ ॥ उव जिऊण रजेसु तिसुवि लछि पभूयकालं सो । रयणावलीमुग कुसुमपरिमलं नाम ठवियं पए ॥७॥ गुरुनयणवेगपासे घेत्तुं दिक्खं कलत्तकलिएण । उत्पन्न केवलेणं पत्तं गोस्सम्मि नरवणा ॥७॥ कुसुमेहि जहा रइया पूया एएण भूमिनाहेण । परमाणंदसुहत्यं फजा अनेण वि तहेव ।। ७६ ॥ -** कुमुमपूजा- जज एसो हु कुसुमपूवाफलम्नि लिरिकुनुमसेरो कहिओ । आयपूगाए रहं भागहितिस्म निगह ॥ ७७॥5॥ मसिणियघुसिणरसेणव अरुणारुणरयणभवणकिरणेहिं । रंजंती दिसिवयणाई कित्तिकलिया पुरी अस्थि ।।७८॥ मणि- कुट्टिमसंकेताहिं जीए निसि गिहिणीउ मुद्धातो। विलयाओ वेविनंति मोत्तियाई ति तारा ॥ ७९ ॥ ससहरजो- ण्हाभरसरिसकित्तिपन्भारभरियभुवणययलो । निम्मलफित्ती नामेण नरवई विलसाए तत्य ।।१८०॥ वामारणेोणं श्य- रेणुब्भामियासिजणिएण । फरएणव विइएणं धरिएण रणनि जो सहइ ।। ८१॥ पट्टमहादेशीपयपटुत्तमुहर तस्स मिय- सीला । लीलायमाणदेहा कित्तिसिरीनामिया दइया ।।८२॥ अगन्मुयत्सरुवं जीए रूवं पलोउं दूरं । अरग परिग्गलिया रई वि सह तरुणलोएण ॥८३॥ तीए समत्यि गुमअस्थिसत्यपविउन्नअत्यरित्यारो। पुत्तो अक्खयकित्ती नामेणं फम्म- णावि सया ॥ ८४ ॥ तेयस्सी दित्तिपहुध ईसरसिरसेहरो ससदरोगा । पसमरसियमई साया मुसागुम जो साहर ॥ ८५॥ निम्मलकलाकलावं परिकलयंतस्स तस्स पुणरुत्तं । जति दिणाई निरंतरपिउपयसेनापमतरस ॥ ८६ ॥ सहितो कयार समवयसिंगारियरायउत्तमित्तेहिं । आरुहिय तुरंगं तुरयवाहियालीप संपत्तो ।।८७|| पुनमामिगरिकाहि (1) वाहिय तुरगं निवारि मित्ते । दाऊण कसाघार्य सो मुफो तेग वेगेण ॥ ८८ ॥ विरगगुमनरवेओ हो गतो जार दुरदेनन्नि । मित्तेहिं ततो तुरया कुमरपहे पेरिया तुरियं ।।८९॥ महमग्गम्मि महीप इंति रमे नो नइत्ति फलिव । सहसनि ममुष्प. इतो कुमरतुरंगो नह्यलेण॥ १९० ॥ गुरुपवगनयणमगजवनपणा वेगेग जाइ गगगयले । सुगरतुरजो रवेणं जे पिय PTT - SuresInclustrellcluencide मायामासान। +4 श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्भुत पूजाष्टकम् अक्षत- पूजायाँ अक्षत- कीर्तिकथा ॥६॥ रविरहतुरंगे ॥११॥ उग्गीवाणं मं पेच्छिराण पीडा भडाण भवहित्ति । परिभाविउं व तुरओ तन्नयणागोयरे पत्तो. ॥९२॥ रायंगरहे हरिए हियहियतो इव समग्गपरिवारो । कायबविमूढमई पत्तो रायंतियं झत्ति ॥ ९३ ॥ साहइ कुमारहरणं तं सोउं मुच्छिओ महीनाहो । तधेलमेव जाओ निशेहो चत्तपाणोच ।।.९४ ॥ चंदण रसछडासेयवससमुवलद्धचेयणसहावो । रुयइ सकरुणं पागयनरोव अंतेउरेण जुतो ॥ ९५ ॥ हा हा कुमार हा भुवणसार हा रइयरम्मसिंगार हा विहलिय- अन्भुद्धार हा हहां समरदुबार ॥ ९६ ॥ हा जाय जाय हा विहियनाय हा धरियरायमजाय । हा हा पररमणीभाय हा हहा भुवणविक्खाय ॥ ९७ ॥ को उच्छंगे धरिऊण मह काम कुमर कोमलकरहिं । संवाहतो काही आणंदमहूसवुफरिसं ॥ ९८ ॥ कुंडलसरलुत्तरियाकंकणकेऊरमणिमयाभरणे । रंजिज्जतो दाही दाणे को वंदिविंदाण ॥ ९९ ॥ इय पलवंते संतेउरे निवेमंतिणा विमलमइणा । कुमरनिरिक्षणकजे तुरयाणीयं समाइह ॥ २०० ॥ तंपि दुवालसजोयणमाणम्मि महियले परिन्भमि । नवरं कुमारवत्तामेतंपि न तेण संपत्तं ॥ १॥ तइयम्मि दिणे पसरंतसोयसंभारनिन्भरे नयरे । कुमरो खयरविमाणाऊरिय गयणंगणो पत्तो ॥ २ ॥ नयणेहिं समं हरिसं वियासयंतो नरिंदलोयाण | पणओ जणणीजणयाण तेहिं आलिंगिओ गाद ॥३॥ तो चेडीचफजुया कुमरगुरूणं नया कुमरवहुया । आसिहिं ताण तुट्ठा सुद्धते संठिया गंतुं ॥ ४ ॥ जंपइ जणओ तुमए दिन्नो कि अम्ह पुत्त दुःखभरो । सो भणइ सुहृदुहाणं दाया देवो चेव अहं ॥ ५ ॥ रायाह सुहदुहाणं जं अणुभूयं तएवहरिएण । तं साहसुत्ति तो कुमरसुमरिओ आगओ अमरो ॥ ६॥ तं दुहुँ मणिकुंडलकिरीडकेयूरकंकणाहरणं । विम्हियमणो नि(वो)पूई ऊण तस्सासणं देइ ॥ ७॥ तत्थुव- विसिउं सो कुमरपेरिओ कहइ हरिणवुत्तंतं । पायालंमि पुरी अस्थि चमरचंचत्ति मणिभवणा ॥८॥ जीए सामारुण- सियमणिभवणपहाहिं संवलिज्जन्ता । अमरा भमन्ति मयणाहिघुसिणचंदणविलित्तव ॥ ९॥ तथावट्ठियजोषणसुरंगणा- रा Leuan न ॥६॥ - TUE Jan- अक्षत- पूजायां अक्षत- कीतिकथा Ucuen गणविलासदुल्ललिओ।धुवंतचारुचमरो चमरो नामेण अमरवई ॥२१०॥ निवसंति तत्य रवितेयचंदतेयाभिहा अमर- कुमरा । रविचंदा इव भमिग हरंति तेएण तिमिराई ॥ ११॥ निहालस्माइसरीरलिंगनिच्छाइयचवणसम्भावो । जंपइ रवितेओ मित्त चवणसमओ इमो मज्झ ॥१२॥ ता में पत्तनरत्तं पडियोहेजसु तुम अवसरम्मि । इय जपिउं चुओ सो सुमरियजिणगुरुचरणकमलो ॥ १३॥ नवरम्मि धरासारे मणिमंदिररइयधरणिसिंगारे । जाओ राया सिरिरयणसुंदरो नाम रम्मंगो ॥ १४ ॥ विलसंतरूवजोवणअभग्गसोहग्गसंगयंगीहिं । दइयाहिं समं विमए उवमुंजतो गमइ कालं ॥ १५ ॥ कइयावि चंदतेएण मित्तदेवेण तस्स रयणीए । कहिओ सुरभवरइओ नरत्तपडिबोवुत्तंतो ।। १६ ।। तं सोड जाईसरणनाणनयणेण दिट्ठपुब्बभवो। जंपइ राया तुमए पडिवनं पालियं किंतु ॥ १७ ॥ पहु जोबगं नवं मणहरा सिरी असमसुयरा वि सया । रत्ताओ कंताओ भत्ता मित्ता अपुत्तो हं ॥ १८ ॥ ता अन्न वि असमत्यो अप्पहियं काउमाह अमरो वि । परमत्यविमूढमईण राय इय उत्तराई जओ ॥ १९ ॥ रोयजराजोयविणस्सिरस्स तरुणियण- मणहरस्सावि । का राय सारया जोवणस्स मोत्तुं तवचरणं ।। २२० ॥ चोरानलजलगयग्गहाइवहुविहअवायसझाए । धम्मट्ठाणवयमंतरेण न सिरीए अस्थि गुणो ॥ २१ ॥ सरिसवसमसोक्सकरा सुरगिरिगुरुदुक्खदाइणो दूरं । अज्ञा- सत्तीए तणुक्खयं न कि दिति निव विसया ॥ २२ ।। अंतो निन्नेहाणं पवंचरयणाहिं रंजियजणाणं । किं सारं कंताणं मरणंताणत्यहेऊणं ।। २३ ॥ परदइयादवग्गहविरइयमेत्ती कुसुद्धहिययाण । किं वन्नेसि नरेसर सकनसजाण मित्ताण ॥२४॥ परिपालिया वि परिपाढिया वि अप्पियधणावि निव नूणं । पुत्ता न परित्ताणं कुणंति नरए पडताणं ।। २५ ॥ भववासलालसाणं हवंति आलंवणाई एयाई। अणुसरियसीहवित्तीण न उण आसन्नसिद्धीण ॥ २६ ॥ विरजोवणाहिं अणुराइणीहिं पयईए सुरहिगंधाहिं । विसए देवीहिं समं भोत्तूण चिरं न जइ तित्तो ॥ २७ ॥ ता गलिरजोवणाओ CLCUCU Uuenens अनन्त०२ an UEUEUEUEN BEER श्रीअनन्त- नाथचारि- अक्षत- पूजाया अक्षत- कीर्तिकथा बादुगु पूजाष्टकम् ॥७॥ फिनिगरागाणो बुरद्विगंधागो । नारीगो असुरभरिगाणो निलसिरो किमिए तिप्पिहिसि ॥ २८ ॥ वसि सगग्गसुह- बत्शुपरिगलग्गारसुरक्षिसुरलोए । वसिगरस असुगन्भे न विराजो तुह हहा मोहो ॥ २९॥ निगपउिवण्णे निरिणो जागोई राय तुदहियं कदि । वा फुणसु जगप्पहिगं गा गज्जसु मूड भवतवे ॥२३०॥ सुगउवसगरसमयवरिससम- अगरदेसणो रागा। सिरविरप्रयकरफोसो संविग्गगणो भणय गगरं ॥ ३१ ॥ पटु तुगए भगएणव महमोहमहाविसं हरेऊण । उप्पाश्शो पयोहो उवगारपराएला गुरुणो (पाठांतर भवे गुरुणो)॥३२॥ ता रहि गिहिस्सं दिक्खं परिणापि- संतुहियमेग । पाउं रजमि परस्स मित्त वा शाणसु तांति ॥ ३३ ॥ एवंति भणिय अमरो पत्तो नयरीए पमरनंचाए। गरविणोगपगतो रागवरं सरए दसमविणे ॥ ३४ ॥ अक्खयकित्तिकुमारं हरिऊणं रयणसुंदरनिवस्स । अप्पसु शति इय मणिय पेसिपणुचरगमरं सो ॥ ३५ ॥ इरा पजिवजिग नयरीए फित्तिकलियाए शत्ति संपत्तो। फुमरे तुरंगनियं पापाहतं पुरीप बाहिं ॥३६॥ विहिरागगरेण निवसुगइगरूवं तंगि निवसुमो चडिभो । तो गंतु दुरपहे गगणेण गणो हो सहसा ।। ३७ ॥ गरुयगिरिसरियनयराई गगणगग्गेण मागतेण । अगरतुरएण नेरी सशविथो उज्जजो इंतो ॥३८॥ तं रहुं सो नहो गोतुमणवलंबणं नरिंदसुरां । अप्पगि निणसंते परोवणारी हनए विरलो ॥३९॥ निवउ रायंगरुहो रगण गगणंगणा निराहारो। सहाण महाणं गरुणाणनि हो वा पक्षणं ॥२४०॥अवडिऊण धरिओ निवपुत्तो वानरीए निवसंतो। सुहपुनपरिणईग जंतो जीवो श नरयाि ।। ४१ ॥ कोमलकिसलयनिचये निवेसितं जलासया सलिलं । घेत्तूण पत्तपुउप धोगर दासिव तपरणे ॥ ४२ ॥ खजारकयलिफलदाडिमाश भोयविरा पाश्मो सलिलं । तीम गिउदलरा सभ्थरण सोनियो तगणु ॥४३॥ उल्लगपूगप्फलनागवेशिदलदावपद्धगिरिजुनं । आणितु तीए दिनं संबोलं गुंजश कुमारो॥४४॥ उवविसिय सम्मुदी सा करकराकरालीदलेण कुमरतणुं । बीयंती अवलोयश रायसुगं FREE A NA ॥७॥ WaLLa FREE अक्षत- पूजायां कीर्तिकथा साणुरायच्छी ॥ ४५ ॥ भंजइ अविरयमंगं समुबहती समुनरोमंचं । परिकंपिरंगजट्ठी सज्झसासेयमुबहइ ॥ ४६॥ दट्ठण वानरी विलसियं तयं सबमेव निवपुत्तो। असरिसविम्हयपरवसमणवित्ती चिंतिउं लग्गो ॥४७॥ एहहदूरयरा निवडिरं न मं वानरी जइ धरती। ता नूण विवजंतो अहं विभिन्न हिसंहाणो ॥ ४८॥ आसणपयसोहणभोयणाई तंबोलदाणपज्जतं । अणुरत्तपियाए इव इमीए मह सागयं विहियं ॥ ४९ ॥ एयं तु महच्छरियं उमिमा मं साणुराय- नयणेहिं । मयणवियारविनडिया नियइ तिरिच्छीवि तरुणिव ॥ २५० ॥ तह वानराण जाई सया चला होइ विजुल- इयत्व । एसा उ थिरप्पयई दूरं लक्खिज्जइ महिब ॥५१॥ ता निच्छयमेयाए वानरित्तम्मि कारणं किंपि । इय चिंतिय निवपुत्तो सप्पणयं तं पयंपेइ ॥ ५२ ॥ मह पाणे दाऊणं उपचारपरंपरा क्या तुमए । ता तुह साहामई कं करेमि मह कहसु उवयारं ॥ ५३॥ रायसुओवि हु उवयारकरणपवणोवि तुह तिरिन्छीए । क्रिमहं काई दिन्ना ता नियपाणावि तुम्भ मए ॥ ५४॥ तो कामवियारेहिं विनडिजंतीए तीए कुमरपुरो। गहिऊण गवलसंडं लिहिया गाहा महीए इमा ॥५५॥ मह दाहिणं वियारिय ऊरु कड्डित्तु मूलियं नाह । नामेण कित्तिमालं मं निवकन्नं विवाहेमु ॥५६॥ वाइऊण ऊरू वियारिया निवसुएण छुरियाए। कड्डिय मूलि यद्वा वणम्मि संरोहिणीमूली ॥ ५७ ॥ तो सा जाया रयणीयराणणा तय हरिणसमनयणी। कंचणगोरी घणपीवरत्थणी नववया रमणी ॥५८ ॥ दद्दण तमच्छरियं उच्छलियअतुच्छकोउओ कुमरो। भणइ मयच्छि असद्धेयमत्तणो कहसु वुत्ततं ॥ ५९॥ सा आह नाद निसुणसु अस्थि जहत्थे पुरे धरासारे । सिरिरयणसुंदरनिवो तस्स अपुत्तस्स पुत्ती ई ॥ २६० ॥ नामेण कित्तिमाला फीलंती सह सहीहिं भवणग्गे। खयराहमेण हरिऊणमेत्य एफेण आणीया ॥ ६१॥ भणिया य मह महातेसयरचफिस्स भारिया भवसु । अविरुद्धमिणं जं कनया तुमं हमवि तुह रत्तो ॥ ६२ ॥ इय भोगत्यं अभत्विया पहुं सामदाण- तं PATANSENGE Tanecuen ueuenादा

।
गा
श्रीअनन्त-
नाथचारि-
त्रादुन्हतं
पूजाष्टकम्
॥८॥
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अक्षत-
पूजायां
अक्षत-
कीर्तिकथा
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दंडेहिं । जीवियनिरवस्खाए वमनियो सो गए दूरं ॥ ६३ ॥ तो तेण वियारिय ऊरुयाए खिविऊण गूलियं विहिया ।
वानरिया ई संरोहिणीए वणमपिय रोहवियं ॥ ६४ ॥ गंतूण नियहाणे समेश निषि पत्थिर भणइ । जइ मं मन्नसि
पश्यं वा सासु गवलवनेहिं ॥ ६५ ॥ श्य कुतस्स गयं दिणनवगं सामिसाल खयरस्स । अजंतु सुकयकम्मेण
आगया मज्श इह तुम्भे ॥ ६६ ॥ उप्पाश्यपेम्मणि दादी गह तुम्ह दंसणं दुक्खं । जं सो खेयरराया मायावी बुजओ
एही ॥ ६७ ॥ बटुं मह गहिल मा फाही किंपि तुम्ह सो णत्थं । ता परिसद तरुगुम्मे आगंतुं जाव सो जाए ॥६८॥
आ६ नरनाइपुत्तो वहारिहो इयरदधनोरोवि । माणुसचोरस्स' पुणो लुणामि सीसं सहत्येण ॥ ६९ ॥ कि होश वराएणं
तेण न बीहेमि ई जमस्सावि । श्य जपते कुमरे पत्तो सहसत्ति खयरोवि ॥२७॥ पिच्छेउं नियरूतं कुमार कुमरंपि तीए
नियडठिय । कोवकयभीगभिउडी अवयर' पयंपिरो एवं ॥ ७१ ॥ रे दुह को तुम मह पियाए पासे समागतो फहसु ।
कुमरेणुत्तं रे रमणिचोर कह तुर पिया एसा ॥ ७२ ॥ तेणुत्तं एसा जए महप्पिया तह कहेगि खग्गेणं । इय भणिरो
करवालं कल्लेउं धावियो खयरो ॥ ७३ ॥ हुंकारंतो कुमरोवि उहितो उक्खिवित्तु असिघेणुं । दोनिवि दट्ठोठा भिउडि-
उभडा जाव जुझंति ॥७४॥ ता अणुचरामरेणं कहियो कुमरावहारवुत्तंतो। रिउदसण-नियनासणपजतो चंदतेयस्स
॥७५॥ नूणमणवलंबो निवडिऊण रायंगतो मओ होही । इय सविसाओ पत्तो कुमरसमीवे सुरो सहसा ॥७६॥
दखूण
कुमरमारणसजियघायं तयं खयरखेडं । बद्धो अमरेण अदिहमोरबंधेहिं सो झत्ति ॥ ७७ ॥ संमाणिऊण(निव)नंदणस्स
अवहरणकारणं कहिउँ । भणितो खयरो जीवसि जइ होसि कुमारभिगो तं ॥ ७८ ॥ मरिसि धुवमन्नहा तं सोउं सो
भणइ देहि मे पाणे । पहु तुह आणं काहं तो सो मुफो सुरवरेण ॥ ७९ ॥ अमरं कुमरं कुमरिं च पणगिउं खामिउंच
तेणुत्तं । पलह जह' रजमप्पिय कुमरस्स' भवामि भिलो ह ॥ २८०॥ तो सघाणि वि सुरकयविमाणमारुहिय शत्ति
TRE
॥८॥

अक्षत- पूजायाँ अक्षत- कीर्तिकथा पत्ताणि । वेयड्डत्तरसेडीए गयणवल्लहपुरे ताणि ॥८१।। उववेसिउं सहाए कुमरं खयराहिवेण रज्जसिरी । उवणीया भणिरेणं तं सामी सेवगो हं ते ॥ ८२ ॥ कुमरेणुत्तं विलससु नियलच्छि ज मएवि तुह दिन्ना । नवरं मए समाणं अणुहवमाणो सिणेहभरं ॥८३॥ तं सोउं खयरिंदेण हिहियएण पूइडं अमरं । कुमरकुमरीण रइओ सम्माणो नियसिरिसरिसो॥८४|| तो अमरो कुमरीकुमरखेयराहिववलेहिं संजुत्तो । चलिओ पत्तो य धरासारे नयरे गुरुरएण ॥ ८५॥ कुमरी अवहरण- ससोयलोयपिहियावणं तमिक्खतो । पत्तो विसन्नसिंगारहीणनिवलोयमत्याणं ।। ८६ ।। दुहुँ अमरं कुमरीए संगयं नट्ठसोयसंतावो। राया पूइय अमरं आलिंगइ कन्नयं हिहो ॥ ८७ ॥ काउं कुमारखयरेसराण सम्माणममरमुल्लवइ । मित्त सुयावुत्तंतं हरणागमणाण मह कहसु ।। ८८ ॥ तो अमरेण समग्गं कन्नाकुमराण हरणवुत्तंतं । कहिउं भणिओ राया परिणावसु कनयं कुमरं ।।८९।। ठविउं रजम्मि इमं अप्पहियं कुणसु गहियपबनो । इय भणिए जा चिंतइ विवाह- सामग्गियं राया ॥ २९० ॥ ता अमरेण ससचीए झत्ति मणिथंभयावलीकलिओ । वीवाहमंडवो पंचवन्नधयमालिओ विहिओ ।। ९१ ॥ रइया य हट्टसोहा समंतओ देवदूसविसरेण । किंबहुणा निवचिंतियममरेण कयं समग्गंपि ।। ९२ ।। गुरुरिद्धीए कुमरी दिन्ना कुमरस्स तेण परिणीया । करमोयणम्मि दिन्नं रजं सत्तंगमवि तस्स ।। ९३ ।। एभ्यंतरंमि उजाण- पालओ दंडिसूइओ पत्तो । पल्लवओ नामेण नमिउं विन्नवइ नरनाहं ॥ ९४ ॥ देवुजाणे कलकोइलाभिहे केवली समो- सरिओ । सोऊण तइ वियरइ राया पीइप्पयाणं से ॥ ९५ ॥ गुरुरिद्धीए सुरखेयरिंदनवनिवइपरिगओ तुरियं । पत्तो उन्नाणे नमिय केवलि तत्य उवविहो ॥ ९६ ॥ दद्दण केवलिं नवनिवई मुच्छाए महियले पडिओ । सिसिरकिरिया- समुवलद्धचेयणो पुच्छिओ रना ।। ९७ ॥ किं राय मुच्छिओ तं सो जंपइ केवलिं पलोएडं । मह जाइसरणसंसूयगा इमा आगया मुच्छा ।।९८॥ दिवो नियपुत्वभवो हुँतो कासीभिहाण देसे हं। दुग्गयपडागनामो आजम्मदरिदिओ विप्पो॥९९।। या CUCIUCU2U अक्षत- पूजायां श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्वतं पूजाष्टकम् अक्षत- कीर्तिकथा ॥९॥ देसेसु परियडंतो कयाइ उववासतिगसुसियदेहो । पत्तो मज्झण्हे कणयसालपुर-तिलयउजाणे ॥ ३०० ।। द₹ण तत्थ नवसालितंदुले निफितए वणिए । आह अहं पहसंतो तिलंघणो देह ता कि पि ॥ १॥ तो तेहिं सालितंदुलपसइदुगं गुरुदयाए दिन्नं से। तं घेत्तूण पविट्ठो उजाणभंतरे जाव ॥ २॥ ता नियइ केवलिमुणिं जिणपूयफलं जणाण साईतं । जो कुणइ जिणसट्ठवि पूया तो लहर सो सिद्धिं ॥ ३ ॥ ताओ फलजलनेवजदीवधूवक्खएहिं परमेहिं । वासेहिं कुसुमेहि य भणियाओ समयसन्थेसु ॥ ४ ॥ सवाओ वि असत्तो तं कुणइ जिणस्स अक्खएहिंवि जो। भोचु सयल- सिरीओ सो अक्खयसोक्खमवि लहइ ॥ ५ ॥ तं सोउं सो चिंतइ न पुवजम्मे मए कओ धम्मो । तेण न संपन्जइ मे भमिरस्स वि भेक्खमेत्तंपि ।। ६ ॥ ता जिणपूयं सालीए फाउमज्जेमि सुकयसंभारं । जं भिक्खाभमणेणवि भविही मह छुहपरित्ताणं ॥ ७ ॥ इय चिंतिय भत्तीए नमिय मुर्णि भणइ कहह कत्थ जिणो । पूएमि जहा तो सावएण सो जिणारे नीओ ॥ ८॥ जंकणयमयं मणिकिरणकिन्नवणराइविलसिरउवंतं । कंचणगिरिव कप्पङमावलीवेढियं सहइ ॥ ९॥ तमि पविट्ठो पेच्छइ पसंतरूवं जिणेसरं रिसहं । आणदअंसुजलकलियलोयणो भत्तिकंटइओ ॥ ३१०॥ मणि- मयकुटिममिलमाणभालमभिनमिय सामिणो तेण । अक्खयढोयणपूया विहिया बहुमाणसारेण ॥ ११ ॥ दळूण तस्स भत्ति नियगेहे सावएण से दिन्नं । निद्भुण्हभोयणं तदिणाउ सो सुत्थिो जातो ॥ १२ ॥ तो कालगतो समभावसंगतो निवसुतो हमुप्पन्नो । दगुण केवलिमिमं जाईसरणं समुप्पन्नं ॥ १३ ॥ निन्भग्गस्सवि मज्झं रिद्धी सुगुरुवएसनायाए । जिणपूयाए कयाए जाया इय साहियं तुम्ह ॥ १४ ॥ तं सोउं संजाओ जणस्स जिणपूयणम्मि बहुमाणो। रायावि सावरोहो दिक्खं गिण्हइ गुरुसयासे ॥ १५ ॥ पणमिय गुरुणो नवदिक्खिए य संभासिऊण नवनिवई । खेयरवई च अमरो गओ सठाणम्मि कयकिच्चो ॥१६।। नवदिक्खियमुणिजुयकेवलिफमे नमिय नहरिंदजुतो। पत्तो पासाए तत्थ सुस्थय om בכובדבן PUCU फलपूजायाँ कथा रइय रजस्स ॥ १७ ॥ खेयरविमाणसेणाए तुम्ह चरणंतियं समणुपत्तो । नमिय निविट्ठो पुट्ठो नियहरणं कहसु वच्छत्ति ॥ १८ ॥ तो एय सुमरिओ चंदतेयअमरो समागतो सो हं । कहितो य हरणहेऊ जुत्तं तुम्हंपि हियकरणं ॥ १९ ॥ तं सोउं नरनाहो पइ भो अमर सुयणसिररयणं । निफित्तमोवयारी तमेव जो एवमुवइससि ॥३२०॥ नियमेण वयं काहं रज दाउं सुयस्स इहिपि । इय जंपिरे नरिंदे सहसत्ति तिरोहितो अमरो ।। २१॥ तो रना नवनिवई अणिन्छ. माणोवि ठाविओ रजे । गीयत्थगुरुसयासे सयं तु अंगीकया दिक्खा ॥ २२ ॥ कइयावि हु सम्माणिय विमजिओ राइणा खयरचकी । कजेसु ममाएसो देउत्ति पयंपिय गओ सो ॥ २३ ॥ पइदियपि पवुड्डप्पयावपन्भारदुस्सहो दूरं रिउमंडलाई राया परितावइ गिम्हतरणिध ।। २४ ॥ कइयावि हु वेयड्ढे विलसइ विजाहरिंदवाहरिओ । कइयावि धरा- सारे रजसिरि चिंतए गतुं ॥२५॥ पयडइ नीइं पालइ पयाउ पूयइ जिणे गुरुं नमइ । साहइ देसे एवं वचंति निवस्स दिवसाइं ॥ २६ ॥ कालेण कित्तिमालादेवीए उदारकित्तिनाम सुओ। जातो संगहियकलो विवाहितो रायकनाओ ॥ २७॥ तं रजे अहिसिंचिय गिण्हइ सपिओ वयं जणयपासे । कयतवचरणो उत्पन्नकेवलो सिद्धिमणुपत्तो ॥२८॥ जह अक्खएहिं विहिया जिणिंदपूया इमेण नरवइणा। सिद्धिसुहकंखिणा तह कला अण्णेणवि नरेण ॥२९॥ अक्षतपूजा १३ 95555भणिो अक्सयकित्ती अक्रायपूगाए संपयं तुम्मे । फलपूयाए निसामह फलनारं वागरिजंतं ॥ ३३० ॥5॥ विफुरिय-भूरिकरदुरवलोयमणिमंदिरावलिकलियं । सूरोहकयावास व अत्थि सूरप्पहं नयरं ॥ ३१ ॥ अन्नोन्न- मिलियमणिगिहकर किन्ननहम्मि पक्खिणो नूणं । वित्थारियजालंमिव न मि पविसंति वंधभया ॥ ३२॥ सारयर- विकरपसरियपयावसंतावियाहिओ तत्थ । अत्थि प्पयावसारो नामेण निवो रणवसणी ॥ ३३ ॥ सवंगचंग- नियरूवगवनिजिणियअच्छराविसरा । तरसत्थि हस्थिकुंभत्थलथणी जयसिरी जाया ॥ ३४ ॥ तन्नयणन्भमरगणं DO UCUe फलपूजायां श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् ॥१०॥ आणंदइ सुमणपत्तभरपरमो। फलसारो नामेणं दुमोब दूमन्नतो कुमरो ॥ ३५॥ कइयावि सहासीणे निवंमि कुमराइरायमंतिजुए। झणहणिरकिंकणिगणं विमाणमेग समणुपत्तं ॥ ३६ ॥ तम्मज्झाउ पसरंतमणिमयाभरणकिरण- दुनिरिक्खो । रविरहरयणाओ रविव खेयरो झत्ति नीहरिओ ॥ ३७॥ पडिहारकयपवेसस्स तस्स संमाणपुवमवणिवई । खयराहिराय साहसु आगमणत्थंति जंपेइ ॥३८॥ सो आह ससहरसिओ वेयड्डो नाम वामदेवोव । गंगासिधुपरिगतो अस्थि गिरी गरुयनयरसिओ ॥ ३९ ॥ नयनायरगुणनिजियसमग्गपुरपत्तवेजयंतिव । तत्थत्थि वेजयंती नयरी मणीभवणकमणीया ॥ ३४०॥ गोरीपन्नत्तीपमुहसिद्धविजापभावदुज्जेओ। विजाहरराया तत्थ अस्थि सिंगारसारोत्ति ॥४१॥ निम्मलनहकयसोहा पवित्तसम्भावभासियदिसोहा । तारावलिब जाया जाया तारावली तस्स ॥ ४२ ॥ तीसे असेसभुवणेफभूसणं रूवरेहविजियरई । जाया मणुनकन्ना सिंगारतरंगिणी नाम ॥४३॥ सद्धिं सुहवण्णेणं कलाकलावण तारतारुण्णं । जायं तीसे सिगारगारबुग्गारपरिकलियं ॥ ४४ ॥ कइयावि सा सहीयणसहिया मणिमत्तवारणासीणा । गयणे जंतं चारणमुर्णिदमिक्खिय गया गुच्छं ॥ ४५ ॥ चंदणरसच्छडासेयसिसिरकिरिओवलद्धचेयन्ना । संसुसही- हिं सा पुन्छिया तुमं मुच्छिया किमिह ॥ ४६॥ आयन्नहत्ति जंपिय सा मुच्छाकारणं कहइ तासिं । संसारसरूवंपिव अस्थि अरन्नं अदिद्वंतं ॥ ४७॥ गुरुभूरिसाहिसाहासहस्सअंतरियअंतरिक्खंमि । सावयभीउब जहिं पक्खिवइ करे न सूरोवि ॥ ४८ ॥ पेच्छिज्जंतकुरंगं दरिदगामीण देवहरयं व । जं विगयरायचित्तं विरायए केवलिकुलं व । ४९ ॥ तरुणो घ विलसिरवओ विसालतो सरसकमलनियरो ब। तत्थप्पसरियसालो अस्थि वडो पुरनिवेसोब ॥ ३५० ॥ बालायवदलनिम्मावियं व सबंगपिगपहरोमं । अचंतचंचलं जं तरुणीअणुरायरइयं व ॥ ५१ ॥ धरमाण- मरुणवयणं मसिणियघणघुसिणरसविम्मिस्सं व । वानरजुयलं परिवसइ पायवे तम्मि घणनेहं ॥ ५२ ॥ जुयलं ॥ Pu ॥१०॥ JLUCL SZE जी फलपूजायां फलसार- कथा कइयावि करहखरवसहसगडसेरहसहस्स-संजुत्तो। संपत्तो सत्याहो नामेण धणावहो तत्थ ॥ ५३ ।। आवासिओ य वडविडवितडकए गड्डुरे गहीरम्मि । गुणिणीविमाणयाइसु जहजोग्गं सेसलोगोवि ॥ ५४॥ एत्थंतरंमि तवतेयभासुरो रइयउत्तरासंगो । गिम्हतरणिध चारणसमणमुणिंदो हयतमोहो ॥ ५५॥ अंगीकयविरइरतो अनिरुद्धसुओ अविग्गहो सययं । जयजणमणकयवासो सोहंतो कामदेवोध ॥५६॥ गयणंगणेण पत्तो तत्तो सत्याहिवो सबहुमाणं । तं नमिय निसीयावइ पट्टम्मि निसीयइ सयंपि ।। ५७॥ दटुं तं नवजोधणमन्भुयरूवं भणेइ सत्थाहो । किं पहु तुह वेरग्गं जं लहुएणवि वयं गहियं ॥ ५८ ॥ आह पहू सत्याहिव आयन्नसु अस्थि उड्डलोगम्मि । वहुपुन्नपावणिजो सोहम्मो नाम सुरलोओ ॥ ५९॥ जम्मि बहुरविकरदुरवलोयमणिमयविमाणहयतिमिरे । लजंतोष न पविसइ कायरपुरिसोध सूरोवि ॥ ३६० ॥ पुनप्पयरिसवसही निरुवमरूवो असीमइत्सरिओ। तं परिपालइ सको कयरिउगणमाणसधसको ॥६१ ॥ तस्सत्थि परममित्तो समस्सिरीओ समाणसिगारो । नामेण सरीरेणय विक्खाओ अमियतेओत्ति ॥ ६२ ॥ विलसिरतणुकंतिमई कंतिमई नाम सहयरी तस्स । दइयवियोगं सा विसयलालसा न सहइ खणंपि ॥ ६३ ॥ भणइय म मोत्तुं तं मा गच्छसु सामि सकपासम्मि । जंतुह विरहुफरिसो दूरं विहुरइ सरीरं मे ॥ ६४॥ पत्तमहाणंदा इव अमयदह- संगसुहियदेहत्व । तुहसंगसंगया सामिसाल हं होमि नियमेण ॥६५॥ इय तबयणस्सवणा नियदेहाओ वि नियधणाओ वि । अन्भहियं तं मन्नइ दुइयं सो जीवियाओवि ॥ ६६ ॥ सुरलोयसभवासमविसयस्सासंगसत्तचित्तस्स । अन्नाओचिय गच्छइ कालो से चत्तधम्मस्स ॥६७॥ समयतरंमि महई वेलं ठाउं सुरिदपासम्मि । जा गच्छइ ता पेच्छइ न भारियं निय- विमाणमि ॥६८॥ कत्थ गया मे कंता कंतिमई इय विभाविउं जाव । तबिरहविहुरिओ तं नाणेण पलोइउं लग्गो ॥६९॥ ता अंवरसिहरगिरिंदसंदवणदक्खमंडवतलम्मि । विसयासत्तं अवरामरेण सद्धिं तमिक्खेइ ॥ ३७० ॥ गुरुरोसावेगा Teena andel फलपूजायां कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- जादुणूत पूजाष्टकम् ॥११॥ र सनेतपदभरपिसंगिगग्गनहो । सगरमणनितिं निसद्धगुरुतेउलेसोष ॥७१॥ तो ताण मारणत्थं फाउं वेगं गतो गिरिसिरे सो । नहाई दुर्ग लोनिवि को ठार पुरो तुजगरिउणो ॥ ७२ ॥ न दुगेपि वेरग्गवासणावासियो विचिंतेश ॥ पेच्छ भाई लवितो विवेयकलिगोवि पावाए ॥ ७३ ॥ तुपचिरहविटुरिगाई ठाउं हामि नो निमेसंमि । ताण भणियाण जागं अवसाणं एरिसगिगीए ॥ ७४ ॥ घिनी घिरत्शु इत्थीण ताण जाहिँ विगोहिया संता । गश्रागतष निवेश्णोवि गुडतणं जति ॥ ७५ ॥ जिणगवणजम्गविक्साकेवलनिघाणपधपूगणशो । सुकगं समज्जियं नो गए पियामोहमूढेण ॥ ७६ ॥ जाण कए पाणापि तु राणगणणाग सगा गणिज्जति । तासिं गं सरूवं ता धिजी धी सिणेहस्स ॥ ७७ ॥ पेप्पति स्वजोषणविजानिनाणनाणदविणेहिं । नो पावप्पगईतो ता भिजी थीसिणेहस्स ॥ ७८ ॥ विस्सासिऊण वाईति पासनित्तीए गए सगं गूढं । अप्पति पुण न अप्पं ता धिनी थीसिणेहस्स ॥ ७९ ॥ वगंतु खगं विसगा पजातं गज्ज्ञ सबभजाहिं। जो हं गणप्पवसो विउवणं एनगणुपत्तो॥३८०॥ वेरग्गसंगमोगि हुन सपविरश्वगस्स जोग्गोई। वा इह लोगसुहस्सव गुणो परलोगसोक्खस्स ॥ ८१॥ ता ए भजादुगरिगसुगरणशं करेमि किंपि आई। जं दटुं परलोए उप्पजार गज्श परियोहो ॥ ८२ ॥ एग निंतिऊण तेणागरेण विष्फुरिगकिरणरगणेहिं । रोहणगिरिसिहरंपिव रुंवं जिणगंदिरं रश्यं ॥८३॥ गीगत्थसूरिमज्य(हत्या)प्पद्विशं तत्य कारियं तेण । सिरिरिसहनाहबिंब जाणंव भवनबुतरणे ॥ ८४ ॥ ता समेण सयं तत्थ गढदिवसा ऊसवो विहिओ । श्य अणुविण जिणपूगणसजिरासुको चुभो अगरो॥ ८५ ॥ उप्पनो वेयडे दाहिणसेणीप अयलनागाए । नगरीप विजयप्पहरायपिगाए जयाए सुतो ॥ ८६ ॥ विजुप्पहोति पिज्जाविगक्षणो मित्तगंउलीकालिगो । पलिगो नहेण कश्यानि फीलिउं तं गिरि पत्तो ॥ ८७ ॥ दद्गुण जिणहरं जायजाइसरणो पयास सु(स?)हीण । कुगरो जमरते नियपियाकुसीलत्तवेरग्गं ॥ ८८ ॥ निंवर दुस्सीलाओ LEIELCE FREE ॥ ११ ॥ नि फलपूजायां फलसार- कथा महिलाओ कहइ धम्मसबस्सं । भणइय भवं जायं जमजमिह कीलिउं पत्ता ॥ ८९ ॥ भजा दुरियस्सरणकारण- विरइयं जिणाययणं । जायइ जेण विराया भवंतरे सबविरई मे ।। ३९० ॥ ता गिण्हिय मामन्नं निस्मामन्नं तवं चरि- स्सामि । ता मित्ता खमियत्वं जं तुम्ह मए कयमजुत्तं ॥ ९१ ।। तो संविग्गा ते विति तुम्ह मग्गं वयंपि अणुसरिमो। तो सवे मा(मो)यावियजणया दिक्खं पवनंति ॥९२॥ कयवालकालबंभवयावि संजायबहुसुया सधे । ता गुरुणा विपनुहो ठवितो जोगोत्ति सूरिपए ॥ ९३ ॥ सो सवत्थवि भचे पडिबोहंतो विहारमायरइ । अजं पुण नंदीमरजिणदिवे वंदिउ चलिओ॥ ५४ ॥ इह पत्तो सत्याहिव तुमए वेरग्गकारणं जमहं । पुट्ठो तं तुह कहियं तं सोउं भणइ सत्याहो ॥ ९५ ॥ पेच्छंति मयच्छीणं पहु सबेवि हु पभूयविलियाई । नवरं कस्सवि जायइ न पडिबोहो जहा तुन्ह ।। ९६ ॥ एयाउच्चिय भवसंभवसुहसबस्समेव मूढाण । रायरहियाण दूरं दुक्खपयं न उणमन्नयरं ॥ ९७ ॥ नूणं पहु वहुकल्लाणठाणमत्ताणमेत्थ मन्नामि । रनेवि जेण पत्ता तुम्भे ता कहह मुहहेउं ॥ ९८ ॥ आह पहु भववासो आवासो तिक्खदुक्खलक्खाण । ता पत्तं मणुयत्तं मा हारह करह अप्पहियं ॥ ९९ ॥ तं पुण सु-देवगुरुधम्मतत्तजोएश जायए नियमा । ता रागहोसअदूसियंमि देवे मई कुणह ॥ ४०० ॥ आराहह निग्गंथं अणीहयं धम्मियं मुसीलगुनं । जम्मि चराचरजीवाण रक्खणं कुणह तं धम्मं ॥ १ ॥ जं वीयरायदोसेहिं दंसियं मुणह तं सया तत्तं। जं चत्तारि वि चउगइहराई एयाइं भवाण ॥ २ ॥ जइ वि हु गुरुप्पमाया गिहिणो न कुणंति सबगिहिवन्मं । तहवि हु जिणपूया तेहिं अट्टहा भवहरी कुना ॥ ३ ॥ तहाहि । जलघुवदीवनेवजकुमुमफलवासअक्खयसहावा । पूया अदृपयारा कीरइ भवेहिं अरिहाण ॥ ४ ॥ इय जइवि बहुविहा सा तहवि हु सुमहुरमुत्तमफलेहिं । अंबयविनउराईहि विरश्या वियरइ सुहाई ॥५॥ सुनरामरत्तसिवसुहफलाई भत्तीए विरइया नूणं ॥ फलपूयकराण वियरए जेणिमं भणियं ॥ ६ ॥ गागागा Arrantuententire ii भीअनन्त- নগনই- গান पूजाष्टकम् ॥ १२॥ पषि फल पुरणो जो उप जिणसा परगमतीए । स्सा फरति अनरसं नरस सगलाज पिपिसार ॥७॥ फलपूजागां सो सत्यपई भतिगरपणगगुरुकगंबराहो । अंगीकार सगामि जिणगाभिग्गई विण ॥८॥ साहागण साहा फलसार- गएण प्रग देसणं सुणेमण । भणिया भजा पण सुकरो धम्मो प्रगो गम् ॥ ९॥ जेणे फलाहारो पिहिणा अम्हाण कथा निम्भिको पागं । संविजय सुरसफला मह रशे मूरितरुणोगि ॥४१०॥ नूर्ण न किंषि सुकगं फगगरहेहिं भयंतरमि पिए। जागाई रोण पोषि वि निविगतेरिजाईए ॥११॥ पतो लिए नियमावणदोससंजागपाग(क)पोसाण । जहाणं उप्पती कत्थई भनिही न गाणागो ॥ १२ ॥ सा सुलाफलेहिं पर पूरातु निणं भवजन तरिगो। साहामई पगंपर रुणाद प्रगं पताह पउणम्हि ॥ १३ ॥ एतरगि गणिणो गुरुणा सस्थाहिलो नगं जागो । अंगरसिहरगिरिभ्गि जिणिद- पगयंदणनिमितं ॥ १४ ॥ तो माह सत्यवाहो पर सो तिगपहे गिरी फहाद । गण गुरू एसोगिग पासण्णो गगणगगसिंगो ॥ १५ ॥ सत्यादिवो पगंपर भाईपि पर सत्य जागमिस्सागि । तो संगठिगा गुरुणो सपरिगणो सत्यवाहोनि ॥ १६ ॥ उत्तरिय गाणो दुर्ग सुगगरि सूरिणोणुगग्गेण । ग तरफरिहरिणसगरसंगरजए रो ॥ १७॥ संगाशे तरणिभगा पिंडीमोल सगरो रोहिं । अंबरसिहरो नामेण सागलो सो गिरी विहो ॥१८॥ सागलसिहरानिलगलतगालदल अंतरशसिरभाऊ । जो नवपणो ईसिप्पुरंतराठिसजुतो सहए ॥ १९ ॥ तरिग सीगर- निवडिरवियरणनीरसिमरसगृहनि(नहनाप(?) । भारूका गुरुसत्याधि(ग)वागरा(र)म्गणारागे ॥ ४२०॥ सरसग्गे पिंगमणिप्पहाणिसंगिगसगग्गविसिग । रनिराहारगणय निर्गति उदयसेलम्मि जिणभपणं ॥ २१॥ रगणीसुज पिराग ॥१२॥ पतिषिबिग भूरितारगप्पगरं । गोवरगुतागालगनिरागसिंगारगंगंग ॥ २२ ॥ पेच्छति राय उपसंतकंतगति जिणेस Shil रिसहं । जहजोग्ग पहाणपणथपणे काउं निवटा(पिटा?) ॥२३॥ पण निणवरं गागराई पधुगाणजागपुलगाई।गाणं- 10 क Ual - फलपूजायां फलसार- कथा दवसपवत्तंसुपन्ननयणाई पणमन्ति ॥ २४ ॥ तो तेहिं पफगंवरअंवयनारंगवीजपूरेहिं । कयलीफलदक्खादाडिमेहिं गंतुं जिणिंदपुरो ॥ २५ ॥ पसरियभत्तिभरुभिजमाणरोमंचअंचियंगेहिं । रइय वलिं मुकं बीजपूरयं सामिकर- कमले ॥ २६ ॥ जुयलं ॥ तत्तो अन्तो उल्लसियअसमआणंदमंदिरच्छीणि । भूपुट्ठभालबटुं नमंति तिहुयणपहुं ताई ॥ २७ ॥ तो भत्तीए गुरूणं नमिउं जपंति निययभासाए । पहु तुम्ह पसाएणं अम्हेहिं समजिओ धम्मो ॥२८॥ भणइ गुरू धम्माओ नन्नं भुवणे वि अस्थि सारतरं । ता तिरियावि हु तुम्भे धन्नाई जेसिमिय बुद्धी ॥ २९ ॥ इय अणुसासिय वानरजुयलं आपुच्छिऊण सत्याहं । नमिय जिणं अन्नत्तो गयणेणं विहरिया गुरुणो ॥ ४३० ॥ उत्तारेउं सत्याहो गओ जहाभिमयदेसमसढमई । पावित्तु आउयंतं वानरजुयलंपि कइयावि ॥ ३१ ॥ मज्झिम- परिणामजियनरत्तभावाहमेत्य वेयड्ढे । उप्पन्ना सो कत्थइ मझ पिओ तं न याणामि ॥ ३२ ॥ जह पुवजम्मसद्धम्म- दायगो एस चारणमुर्णिदो। जं दटुं संजायमह जाइसरणनाणमिणं ॥ ३३ ॥ मोतुं परभवदइयं सद्धम्मुच्छाहयं पवंग मे । न नरंतरपरिणयणे मणो मणोरहमवि करेइ ॥ ३४ ॥ तं सोऊण सहीहिं सर्वपि हु साहियं खयरपहुणो । तेणवि वाहरिय सुयं वुत्तं जुत्तं इमं पुत्ति ॥ ३५ ॥ किंतु न नजइ चउगइभवगहणे सो कहिंपि उप्पन्नो । ता मोत्तुमसग्गाहं अवरवरं (वर) सु तं वच्छे ॥३६॥ सा आह मज्झ अंगे लग्गइ सो सुहयरो अहव अग्गी । तं सोऊणं जणओ जाओ चिंताउरो दूरं ॥ ३७ ॥ एत्थंतरंमि सुयदुंदुहिस्सरो दारवालमवणिवई । किमिमंति पुच्छिओ सोवि तस्स तं मुणिय विनवइ ॥ ३८ ॥ पहु इण्हिचिय पत्तस्स सूरिणोणतनाणमुप्पन्नं । तो केवलिमहिममिणं कुणंति अमरा सबहु- माणं ॥ ३९ ॥ तं सोउं भत्तीए खयरवई कनयाजुओ सबलो। केवलिपासे पत्तो पणमिय तं देसणं सुणइ ॥ ४४०॥ आह पहू संसारो धुवं असारो विणस्सरा रिद्धी । खणरायिणीउ रमणीउ गंतुरं जीवियत्तंपि ।। ४१ ॥ इय देसणावसाणे अनन्त०३ STEाटा फलपूजायां फलसार कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्भुतं पूजाष्टकम् MA ॥१३॥ खयरिंदो नमिय केवलिं भणई । पहु मह सुयाभवंतरंपई कई कत्थ' उप्पनो ॥ ४२ ॥ तो कहइ विमलनाणी फलपूया- करणपत्तपुन्नभरों। मरि सो सूरप्पहपुररायपयावसारस्स ॥ ४३ ॥ पुत्तो जाओ फलसारनामओ अत्थि चारुता- रुन्नो । तं सोउं खयरवई पणयपर मंदिरे पत्तो॥४४॥ तो हं आलोचे सह भज्जासधमंडलीएहिं । तुभ सयासे पत्तो नियतणयाए वरनिमित्तं ॥४५॥ता राय भणसु नियपुत्तयं जहा मह सुयं विवाहेइ । तं सोउं नरनाहो पइ खेयरवई एवं ॥ ४६॥ पाविजाइ खयराहिव अणप्पपुन्नेहिं तुह समो सयणो । चिंतामणिसंजोगो जायइ कि मंदभग्गाण ॥४७॥ इयरंपि खयरकुमरि कलाणसिरिव को न ईहेइ । किं पुण भवंतररसरणजायनेहं तुहंगरुहं ॥ ४८ ।। एत्थंतरे कुमारो जाइसरणेण नायपुषभवो । जंपइ तह ताय तयं जह कहियमिमेण तुम्ह परो ॥ ४९ ॥ तं सोउं गुरुपरिओसपूरितो कुमरमाह नरनाहो । गंतुं खेगरफन्नं विवाहिउं वच्छ आगच्छ ॥ ४५० ॥ इय जंपिय सम्माणियखयरवरं वत्थभूसण- गणेण । पेसइ सह तेण सुयं राया नउरंगबलकलियं ॥ ५१ ॥ विजाहरिंदविजाबलेण पत्तो नहेण वेगवे। विहितो तस्स पवेसे महसवो खेपरजणेण ॥ ५२ ।। सधुत्तुमम्मि लग्गे घणाणुराया महाणुरायेण । परिणीया कुमरेणं सिंगारतरं- गिणी कुमरी ॥५३॥ गुरुगोरवप्पहिहो दिणदसगं तत्थ संठिो कुमरो। पच्छा ससुरमणुनविय आगओ नियपुरे सपिओ ॥५४ ॥ पिउणा पुरप्पवेसे सुयस्स असगो महूसवो विहिओ । जत्थाणठियं जणयं नमिय निविट्ठो तयाणाए ॥ ५५॥ नवरंगयनीरंगीअवगुंठियवयणपंकया वहुया । नयससुरा तस्सासीतुहा अंतेउरे पत्ता ॥ ५६ ॥ अत्थाणट्ठियं जणयं सेवइ गोराप्पओससमएसु । न गुयइ कयाइ कुमरो कलाण पुणरुत्तमब्भासं ॥ ५७ ॥ काउं कयाइ रज्जाहिसेयपरमूसवं कुमाररस । गहियघउ निको पत्तकेवलो मोक्खमणुपत्तो ॥ ५८ ॥ नवनिवईवि नएणं पालेइ पयाओ दंडए दुढे । मनइ महायणीए पूयइ पुज्जे खले चयइ ॥ ५९ ॥ पुवभवोवजियकयकम्मसंभारभावतो सधे । खोणीवइणो तं देवयंव ॥१३॥ DEUEEN का וכתבות תלתן जलपूजायां जलसार- कथा आराहयंति सया ।। ४६० ॥ एगायवत्तधरणीवइत्तसंपत्तउत्तमजसस्स । तस्सुप्पन्नो कइयावि पुत्तओ पट्टदेवीए ॥६१॥ विहिउं वद्धावणयं नाम कुमरस्स कित्तिसारोत्ति । दिन्नं रत्ना सम्माणिऊण निस्सेसपुरलोयं ॥ ६२ ॥ परिवड्ढिउमारद्धो कमेणमझावयाणमुवणीओ। समहीयकलो जातो समलंकियजोवणो कुमरो ।। ६३ ॥ परिणाविओ य उवणजोबणकम- णीयरायकुमरीओ। समयंमि तममिसिंचिय रजे राया गुरुविराया ॥६४ ॥ नाणधरसूरिपासे गहिउं दिक्खं तवं तविय तिक्खं । उप्पन्नणंतनाणो पत्तो सो सिद्धिसंबंध ॥ ६५ ॥ जह विहिया फलपूया फलसारेणं महामहीवइणा । अन्नेणवि सिवसुहमिच्छुणा तहाचेव कायबा ।। ६६ ।। -* फलपूजा- फफफफफलपूर्य अणुनरिउ फलसारो भूवई इमो भणिओ। इण्हि जलपूयाइ जलमारसह निसामेह ॥ ६७ ॥5॥ भूरिहिमनिम्मिओ इव पुंजियकापूरदलसमूहोछ । रुप्पयमओ विसालो वेयडो नाम अस्थि गिरी ॥ ६८ ।। रुप्पयमयम्मि तम्मि तमालकंकेल्लिकयलिसंडाइं । दिहारुणमरगयमणिसिहराई पिव विरायंति ॥ ६९ ॥ तम्मि य रहने उरचकवालनामं समत्थि गुरुनयरं । जम्मि तिमिराणभिन्नो लोओ मणिमहपहालोए ।।४७०॥ जत्य गुरुमुत्तियाओ हरिसहिययाओ सुपयचकातो। सउणासियसयवत्ता सईउ सरसी उवहसंति ॥ ७१ ॥ पणमंतखयरनिवइसिरपिंग- मणिप्पहापिसंगपओ । जलहरसारो नामेण तत्थ खेयरवई अस्थि ॥ ७२ ॥ नियदाणबुद्धिजियजलहरावली जलहरा- वलीनाम । तस्सस्थि हत्थिमंथरसंचारा सहयरी सारा ॥ ४३ ॥ तीए समस्थि जलरासिसिविणसूइयगहीरयावासो। जलसच्छप्पयईचिय कुमरो नामेण जलसारो ॥ ७४ ॥ मयणोब अतणुरूवो समग्गजणविहियहिययवासो जो कमलायरोव गुरुमित्तदंसणुल्लसियसुवियासो ।। ७५ ॥ उत्तमकुलावयंसो वयंसजणसंगतोवि रायसुतो। कीलाकए कया- इवि पत्तो सायरगयगिरम्मि ॥ ७६ ॥ वेलजलचलणविषुट्टफुट्टगुरुसुत्तिमोत्तियप्पयरो । सामे जम्मि दिणम्मिवि विभाइ Enjanuarantarrantelleranteraue בן לותרשותכר בורבר शासात श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् जलपूजायां जलसार. कथा ॥१४॥ तारयसमूहोष ॥ ७७ ॥ तम्मि समित्तो कुमरो आरामपरंपरं परिव्भमिरो । आयनइ पफाओ हफाओ मिडंतसुहडाण ॥७८॥ के नाम इमे जुझंति किवि (वा?) वेरस कारणमिमेसिं । पेच्छामो पुच्छामोत्ति जंपिरो सो गतो तत्थ ॥७९॥ तो तेण ज्झत्ति दिहा दोन्नि भडा दंतदद्वनियउट्ठा । कयभीमभिउडिभाला रोसारुणलोयणकराला ॥ ४८० ॥ समरारंभ- स्समवसगलंतपस्सेयबिंदुजालेण । रेणुप्पसमणकज्जे रणरंगं सिंचयंतध ॥ ८१।। जुयलं ॥ मा जुज्झह मा जुज्झह ता मह नियवेरकारणं कहह । इय कुमरवारियावि हु जुझंति समच्छरा दोवि ॥ ८२॥ परारंति (पेरंति ?) अवसरंति य घडंति विहडन्ति दिति करणाई । उम्मुफसीहनाया वग्गंतिय खग्गवग्गरा ॥ ८३ ॥ अन्नोनछलप्पहरप्पवंचअनायखग्ग- घाएहिं । दोण्हवि पडियाइं महीयलम्मि सहसत्ति सीसाइं ॥ ८४ ॥ ता तेसिं सीसाइं पमुफाहुंकारपेफाहफाहिं । अन्नोनं उच्छलिउं दंतेहिं डसंति अणुवेलं ॥ ८५ ॥ अवरोप्परासिदंडप्पहारजजरियअंगुवंगाई। जुझंति कबंधाइंवि अच्छरिय- कराई कुमरस्स ॥ ८६ ॥ कुमरेणुत्तं मित्ता सीसकवंधाण रणरसुफरिसं । पेच्छह अतुच्छअच्छरियकारयं रोसवसयाण ॥८७॥ ते विति देव सिविणेवि नेव जं तंपि एत्थ सञ्चवियं । इय जंपिराण पडियं धडदुगमवि पहरजजरियं ॥८८॥ सियदंतकोडितोडियअवरोप्परवयणगंडखंडाई । निहाई होउं तस्सीसाइपि पडियाई ।। ८९ ॥ तो ज्झत्ति पिंगकेसर- सडाकडारियसमग्गदिसियकं । तडिपुंजपिंजरीकयजयंव जायं सरहजुयलं ॥ ४९० ॥ उत्खित्तकरप्पमुकफारफुत्कारसि- रोसारो। वित्थारिजइ जेहिं दिणेवि तारयभरोध नहे ॥ ९१ ॥ अघोरगजियारवरोदत्तं पेच्छिउँ नरिंदसुओ। विम्हियहियओ जाओ भएण नट्ठा पुण वयस्सा ॥ ९२ ॥ तो भेरवभयजणयं सरहदुगंपि हु तिरोहियं सहसा । पेच्छइ य पुरो बहुसूरकिरणभरसमहियं तेयं ॥ ९३ ॥ तं पेच्छिय विम्दयतो चितइ कुमरो किमिंदयालमिमं । मइमोहधाउ- खोहाणमहव मह किंपि अन्नयरं ॥ ९४ ॥ इय चिंतंतो कुमरो जा थिरकयलोयणो तयं नियइ । ता तेयअंतरट्टियनर- A ॥१४॥ Delete reeneu DETE Malender जलपूजायाँ जलसार- कथा सरिस पेच्छए किंपि ॥ ९५ ॥ नयणाणिमिसत्तप्पमुहालिंगविनायअमरसभावं । रइयकरकमलकोसो तं नमिय पयंपइ कुमारो ॥ ९६ ॥ को पहु तुमं किमेवं भीसणरूवो ठिओ कहसु मज्झ । इय तेणुत्तो अमरो कुमरं पइ भणइ सुणसुत्ति ॥ ९७ ॥ अस्थि असमत्थसुहडं समत्थसुहडोहपत्तविजयंपि । जयसारं नाम पुरं विजयावहरायलंकरियं ॥ ९८॥ तत्थत्थि वित्तसियकरवियरणसंजणियजणमणपमोओ। सम्मयसहितो चंदोब चंदतेउत्ति अत्यवई ॥ ९९ ॥ चंदप्पहा- भिहाणा मणोहरा तस्स पिययमा अस्थि । चंदप्पहमइरा इव सरूवकयजणमणुम्माया ॥ ५०० ।। बहुधणवईवि दव- जगाय सो कुणइ भूरिववहारे । कयकिचेहिं वि महिओ जलही रयणस्थि अमरेहिं ।। ५०१॥ काउं कयाणयाई कयाई पउणाई पवहणे चडिओ। चलियो य मलयसिंघलकडाहकेसाइदीवेसु ॥२॥ गच्छइ पोओ दूरा नीरभरं मच्छए तरंगे य। फाडतो तासंतो मंजंतो भूरिवेगेण ।। ३ ॥ अणुकूलवायविहिमणवियंभणप्पेरियंव जलजाणं । थेवेहिवि दिवसेहिं वंछियदीवेसु संपत्तं ॥४॥ तत्थ मणवंछियत्तहियजायवहुलाहपत्तपरिओसो । गहिउं सदेसजोग्गे कयाणए तयणु वाहुडिओ ॥५॥ पवणप्पसराऊरिजमाणसियवडपयंडवेएण। थोवदिणेहिंवि पत्तो पोओ जलरासिमझम्मि ॥६॥ एत्यंतरे अकालियघणपडलेहिं समग्गनहमग्गो। जीवोब अकजन्भवपावेहिं कलुसिओ दूरं ॥ ७ ॥ नहदप्पणे समुद्दो संकेतो अह घणो जलहिसलिले । जणयंति विभमं दोवि सामला पेच्छिरनराण ।। ८ ॥ झपाए समुल्लसिरो सिंधुजले निवडिऊण तडिपुंजो। वडवानलोब रेहइ नहमंडलजंतजालोहो ।। ९ ।। अचंतथूलामलजलधारासारसलिलसंभारं । मुंचइ, मेहो मोयाविउंव जलहिं समजायं ॥५१०॥ सामघणाली गयणे सामुकलियावली समुदम्मि । गजंतीओ पसरंति दोवि गुरुगयघडाओब ॥ ११ ॥ नीतो होइ घणो जलभरेण उल्लसइ तेण य समुदो । दोनिवि मिलिणनिमित्ता परोप्परं संचरं- तिव ॥ १२ ॥ एवं अकालभवमेहमंडलाडंबरं पलोएउं । सबोवि पवहणजणो जातो कायवमूढमणो ।। १३ ॥ रोरसमी- PUCUCI -- neha UCUEIL ESTS श्रीअनन्त- नाथचारि- नादुखत पूजाष्टकम् जलपूजायां जलसार- कथा ॥१५॥ रुमालिगातोगिताणिगागणो शिगवडोनि । पाहणवशदिरागपिन परितो सए कूवखंभेण ॥ १४ ॥ गुरुकलोलारोहावरोह- आवत्तगतमगणारं । गणुभविऊण गभिडिग गिरिराडे विडियो पोगो ॥ १५ ॥ अंगीफयगुरुफटा तरिया केवि हु मयं व नीरनिहिं । भवरे उ गगुरुकता भवेश गग्गा समुदगि ॥१६॥ पपरणवईवि पधणविणासदसणविसायविव- संगी। मग्गो अगाहसलिले भवपासे को रागा सुतियो ॥ १७ ॥ तराणु जलगाणुसीए गराणागत्ताप निरायदश्योति । गालिंगितो जाठिगवरशुंग नियंति राभा ॥ १८॥ भाराष्ट्रिय सलिलामो भोगत्थं तीप गिरित नीयो । सुहपरिणईए जीवोय कहियो नरगमज्ञातो ॥ १९ ॥ सा तं दहुंन गो पिउत्ति भीगा गया जले शति । सावायपरठाणे को निडर नागपरगलो ॥५२० ॥ सेलतमसिलासीणो चिंतेई मज्य व पडिकूलो । एस एगविहिनिलायो पुजिगदुफयवसयस ॥ २१ ॥ ज अपराधणकणभरिगपि पवहणं विहामियं मे । गरणतषसणं सिंधुगज्जणाहगणि रांपतो ॥ २२ ॥ जं जस जसा जागा सुक्ष्गसुहवा तसं तगारोण । भेजगवलंबिणं सहिग जेणिगं भणियं ॥ २३ ॥ जंचिय विक्षिणा लिहितं तं निग परिणगश किं विगप्पेण । गग' जाणिऊण धीरा निहुरेविन कागरा हुंति ॥ २४ ॥ एवं विभावणागय- विसारावसजायगणअनठंभो। अवलो पत्तो रमणीय पक्षरापपरो ॥ २५ ॥ गुरुसिदरगुहादरनिरांबनिज्जारसया पेच्छन्तो । भरखंतो ग फलाएं करवगदिवसातत्य ठिो॥२६॥ किच्छेणगवरदिवसे तम्गिरिसिएरंगि दुग्गमे पाडियो। अवलोग भइबहलं वणसंड मेहखंउंव ॥ २७ ॥ अनिलतरलायो जतो निवसंतो नजप समनियरो। सुलोदयऽत्य- भवषणगडलाउ व करगनिउरुंनो ॥२८॥ ज गजाहिगकंगणगणिगगजिणभवणकिरणकपुरियं । कप्पामसंबंपिय सोदश भाभरणगणतं ॥ २९ ॥ संगो गाणंगणगयसिंगं जिणहरं सुवागयं । मेरुपिव' अनलोयश तलसंठियभदसालवणं ॥.५३९ ॥णाभार जस्सा सिहरे संकतानिलचला सियभयाली । सुरगिरिजिणण्याणपरत्तदुरजलपवहतिष ॥ ३१ ॥ ॥:१५॥

जलपूजायाँ जलसार- , कथा F तम्मि पविठ्ठो सो नियइ निरुवमं रिसहसामिणो विवं । उम्मीलियभत्तिवमुल्लसंतरोमंचकेचुइतो ॥ ३२ ॥ नमइ य तं भालतलग्गमिलियमहिमंडलो पहरिसेण । रइयकरजुयलकोसो नियइ य नाहं अणिमिमच्छो ॥ ३३ ॥ एत्थंतरम्मि एगो चारणसमणो नहेण संपत्तो । कयतिप्पयाहिणो रिसहसामियं श्रोउमाढत्तो ॥ ३४ ॥ तिहयणगुरुणो सिरिरिसहसामिणो नमियपायसयवत्तं। कयकरकोसो आणंदअंचिओ संथवं काहं ।। ३५॥ कणयच्छविणो अंसारलंत्रिणो कसिणकुंतला तुम्भ । मंदरगिरिणो पंडगतमालतरुणोब रेहेति ।। ३६ ॥ जे सामिसाल तुह पयलीणा दीणावि ते नरा दूरं । भवताववनियंगा विलसिरपउमालया हुंति ॥ ३७॥ मइसुयओहीमणपजवाणि तुह केवलम्मि मग्गाणि । तारवनक्खत्तग्गहससिणोच सहस्स- करतेए ॥ ३८॥ तं सामि समवसरणंमि सोहसे रइयरम्मचउरूवो । नारयतिरियनरामरचउगइजणवोपत्थं व ॥ ३९॥ रायाणं रंकाण य धम्मुवएसं तुमं समं दिससि । कि जयमुजोयंतो मेच्छकुलाई चयइ सूरो ।। ५४० ।। तुह मिलणे मह जाओ बहुमाणवसेण रम्मरोमंचो । घणसमयंमि कयंवस्स सबओ कुसुमनियरोध ॥ ४१ ॥ इय नीइचकसिरिनेमिचंदमुणि- नाहनमियपयपउम । जह जाया तुह सिद्धी तं तह मज्झवि पहु पयच्छ ।। ४२ ।। इय थोडं रिसहजिणं उबविट्ठो तयणु चंदतेओ से। पणमिय कयंजलिउडो उवविसिओ भणइ मुणिमेव ॥४३॥ भयवं नरत्तनियजम्मजीवियवाण बसणठाणाण । देवगुरुदंसणेणं मन्ने अजेव सहलत्तं ॥ ४४ ॥ ता पहु मह कहसु अवस्थममुचियं धम्ममह कहइ साहू । पूइज्जइ एस पहू अट्ठपगाराहिं पूयाहिं ॥ ४५ ॥ तहाहि । नेवजगंधअक्खयदीवयफलसलिलकुमुमध्येहिं । जिणपूया भत्तीप रइया वियरइ सिवसुहाई ।। ४६ ।। दूरे घणकयुम्भववासप्पमुहाउ सत्तपूयाओ। एकावि मुहा लन्भा जलपूया हरइ संसार ॥ ४७ ।। जओ । जलभरियपत्तमेत्तो संसारमहोयही फुडं तस्स । जो ठवइ जिणस्स पुरो सीयलजलपूरियं पत्तं ।। ४८ ॥ फलिहेण व सच्छेणं अमएणव साउणा जिणवरिंदं । सीएणं सिसिरेण व जलेण अचंति कयपुन्ना ॥४९॥ जेण जिणाउ न សិនបើជា Ten - DI בביתרון UE JCUCU दाना תכתבותכתב Jennetan श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्भुतं पूजाष्टकम् जलपूजायां जलसार- कथा ॥१६॥ अन्नं पूयापत्तं समस्थि तिजएवि । ता पूइऊणमेयं सहलं मणुयत्तणं कुणसु ॥ ५५० ॥ तं सोउं सो जंपई नमिऊण मुणिं निबद्धकरकोसो। भयवमणुग्गहिओ हं समयोचियधम्मकहणेण ॥ ५१ ॥ इय जंपिउं गओ गिरिनिज्झरणनिवायरुंद- कुंडम्मि । कयकमलपत्तपुडए गहिय जलं जिणहरं पत्तो ॥ ५२ ॥ दद्गुणं भुवणगुरुं सुमरियपुबिल्लनियसिरिप्फुरणो । चिंतइ तइया नाहो जिणनाहो मज्झ जइ हुँतो ॥५३॥ ता हं नियसिरिवित्थरसमवत्थगणेण (?) नूणमञ्चंतो। इहि एयावत्थो करेमि एयपि जलपूयं ॥ ५४॥ इय चिंतिय असमुल्लसियभत्तिपत्भारपुलइयसरीरो। पसरन्तभूरिआणंदअंसुदंतुरियपम्हच्छो ॥ ५५ ॥ मुंचइ पहुणो पुरतो जलपुडयं अत्तणो परिकलंतो। नरजम्मजीवियवाण सहलयं भुवणपणयस्स ॥ ५६ ॥ भणइ मुणी धन्नो तं पयडइ पुलओ तुहंतरं भत्ति । इंति न दुद्धे पीए उग्गारा आरनालस्स ॥ ५७ ॥ सिवलच्छि- पेच्छियाणं उच्छाहो होइ परिसोवम्मं । नहि सुकयसंगयाणं धम्मम्मि अणायरो होइ ।। ५८ ॥ तेणुत्तं भयवं मे भवंतरे वि हु भवेज तं चेव । देवगुरुधम्मतत्ताण देसओ विरइयपसाओ ॥ ५९॥ इय जंपिय तेण नओ गओ मुणी नहयलं अलं- करिउ । सोवि गुरुविरहविहुरो खणमेत्तमचेयणोध ठिओ ॥ ५६० ॥ नमिउ बहुमाणपुरस्सरं जिणं निग्गतो जिणाययणा । नियपुरगमणोवायं चिंतंतो गमइ दिणसेसं ॥ ६१ ॥ एत्थन्तरम्मि नहमग्गसंगिनग्गोहसाहिसिहरम्मि । अल्लीणा आगं- तूण पक्खिणो झत्ति भारुंडा ॥ ६२ ॥ ते माणुसभासाए नियवुत्तंते कहिंति पुत्ताणं । एफेण जंपियमहं जयसारपुराउ संपत्तो ॥ ६३ ॥ तप्पुरसमग्गवणिवग्गअग्गणीचंदतेयनामो जो । संभिन्नपवहणो सो मओ अपुत्तोत्ति जणवाओ॥६४॥ निसुओ निवेण तो से गहितो निलूडिऊण घरसारो । जे जोयंति असंतपि ते न किं संतमिह छिदं ।। ६५ ॥ गुत्तपि धणं कहियं कयत्थणाकंपिराए कंताए । अप्पंमि व णस्संते कजं किं सयणदविणेहिं ॥६६॥ एवं आरामियजणक- हिजमाणं मए सुयं वच्छा। इय भारुंडपयंपियसवणा सो चिंतइ ससोओ ॥ ६७ ॥ पेच्छ जहा मह लच्छी पसरंत. Leverent PUCUZUCCULLUEL ॥१६॥ PCUCU UCLCUC PAPUCUCL UCICUC जलपूजायां जलसार- कथा सुवन्नतारसारावि । सिंग्यपि खयं पत्ता गिम्हसमुन्भूयरयणिध ॥ ६८ ॥ अत्थजणदुम्बुद्धी दिना दिवेण मज्झ रटेण किं देइ करचवेडं कयाइ कुविओ विहिविलासो ॥६९ ॥ किविणाण चकवट्टी जाओहं सबहा जओ न मए । बवओ विरइओ सुपत्ततित्थेसु धणिणावि ।। ५७० ॥ किं सायरतरणधणनगं विणा मझमासि न वहंतं । जं मे गया सिरी जीवियंपि संदेहमणुपत्तं ॥ ७१ ॥ पत्तावि पलइच्चिय अपुन्नवंताण निच्छियं लच्छी । किमभग्गगिहल्लीणा होइ थिरा कामदुहघेणू ॥ ७२ ॥ सुकुमालतणू पेन्मेकमंदिरं विमलसीलकलियंगी । कह सहिही मह कन्ता कयत्थणं रायभडज- णियं ।। ७३ ।। नूणं न मए रम्मो धम्मो विहिओ भवंमि पुबिल्ले । जमहं विडंबणाडंबरं इमं इह भवे पत्तो ।। ७४ ॥ तत्थ गमणुस्सुतोवि हु गच्छामि कह उवायहीणोहं । कहमकमचंकमणो पंगू वंछियपुरं जाइ ।। ७५ ।। जइ जामि तत्य लच्छि ता निवघत्थंपि नूण वालेमि । गुरुविसवेगविलुत्तंपि चेयणं मंतवाइव ॥ ७६ ॥ इय तस्स धणविणासासुहि- यस्स निसा छिया पहरसेसा । पुत्ताण गमणठाणाणि कहिय गच्छंति भारुडा ॥ ७७ ॥ जो चलिओ तनयरे पाप सो तस्स दढयरं लग्गो। उड्डीणो मारंडो मणनयणजवेण जाइ नहे ॥ ७८ ॥ नवरं सो विहिविलसियवसेण विच्छुट्टि- ऊण तप्पाया । पडिओ समुदसलिले विमुहविही कुणइ नो किं वा ॥ ७९ ॥ मज्जतेणं तेणं जिणगुरुचरणाण सुमरियं सहसा। तस्साणुभावओ मरिउमञ्चुए सो सुरो जाओ ॥ ५८० ।। कालेण चारणस्समणतग्गुरू तंमि चेव कप्पम्मि । जातो सुरो तहा पुत्वभवभवो ताण नेहोवि ॥ ८१ ॥ नाऊणं नियचवणं तेणुत्तो गुरुसुरो सुही एवं । पत्ते मणुयत्ते में पडिवोहेजसु तुमं मित्त ॥ ८२ ॥ पडिवन्नं तेण तयं तो सो चविऊणमेत्य वेयड्डे । सयरिंदसुओ जाओ चलिओ य पकीलिउं एत्थ ॥ ८३ ॥ एत्यंतरे मए सुरसुहसंगविमोहओ बहुदिणेहिं । सरिया पुवभवहुगपडियोहभत्थणा तुज्झ ॥ ८४ ।। तो भडधडसिररणसरहरूवप(पभईय)विरइयं पच्छा । नियसाहावियरूवं तुह विभमकारणे कुमर ॥ ८५ ॥ माया- TEMETERNET rele

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
जादुद्भुतं
पूजाष्टकम्
जलपूजायां
जलसार
कथा
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॥१७॥
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ता वच्छ अपत्यंपिव नराण रजपि होइ असुहाय । गिम्हनईनीरंपिव शिजइ अणुदिवसमवि आउं ॥ ८६ ॥ नरनय-
णाणिगिसत्तंन जोधणं नो कयाइ ठाइ थिरं । कलुराराहावाउ सया बहुलनिसाओव मयच्छीओ ॥ ८७ ॥ कि वहुणा
सपि हु विणस्सरं भवसमुन्भवं वत्थु । सारयघणोध सोयामणिध जलवुधुतोहोर ॥ ८८ ॥ ता वीयरायदेवं पडि-
वजसु तं सरायमुज्झित्ता । पाविय वंछियफलयं कप्पतरूं सरइ को निंबे ॥ ८९ ॥ निग्गंथेमि गुरुमि गुरुबुद्धिं कुणसु मा
पुण सगंथे । पतम्मि सुयणसंगे मग्गा कि कोइ खलगोहि ॥ ५९० ॥ मुत्तुमतत्ते अंगीकरेसु जीवाश्याई तत्ताई।
को गुंजाओ गिहाइ चइऊण महग्घरयणनिहिं ॥ ९१ ॥ पडिबोहि तुगमहं जाओ निरिणो नियम्मि पतिवन्ने । तं
सुणिय जाइसरणेण नियभवे पेच्छिग कुमारो ॥ ९२ ॥ जंपर पणामपुधं पडिवंनं पालियं तप सामि । तं मोतुं नन्नो
तिहुयणेवि परमोववयारी मे ॥ ९३ ॥ इणि गिहधम्गमहं काहमरात्तोम्हि राधविरईए । किं गगगुहगयससं का
काउं तर कलहो ॥ ९४ ॥ इय तेणुत्ते तियसे राहसत्ति तिरोहिए गतो तेओ। अभंतरिए तरणिमि दुरवलोओ
पयावोध ॥ ९५ ॥ संपत्तमित्तजुत्तो पत्तो नगरे गुरुफमे नगिउं । गिण्हर गिहराधम्म कलाणे को पमायपरो ।।९६॥
रंकेण व रयणनिही वरविजो वाहिणध रांपत्तो। सळूमो तेणं सो कयकिवं कलइ आपाणं ।। ९७ ॥ उम्गत्तजोधणुद्दाम-
कागकमणीयकायकंतीणो । नहयरनियंविणीओ पुत्तो परिणाविओ पिउणा ।। ९८ ॥ तं अहिसिंचिय' रजे पधज गिण्हए
खयरराया । इहलोश्यपारलोयसुहको उज्जाया गरुया ॥९९॥ जलसारखगरचफी परचकफमणरुयमणुफारिसो । पाल
परारतपहो नियरजसिरिं सुरिंदोध ॥ ६०० ॥ लीलाप परिचलिरम्मि जम्मि माणिकामयविमाणेहिं । गयणयलगलंकिन
रायावि किंकिणिकलरवेहिं ।। १ ।। वंदर गुरुणो पूयर जिणेसरे कुणर संघबहुमाणं । जिणजचाउ पवत्ताइ मंदरनंदी-
RESS
॥१७॥

ज धूपपूजायां धूपसुंदर- কথা 1 सराईसु ॥ २ ॥ इय सद्धम्मं रजस्सिरिं च परिपालिऊण वहुकालं । नामेण रयणसारं कुमरं रजे ठवेऊण ॥ ३ ॥ नियजणयचरणमूले दिक्खं गहिऊण कयतवचरणो। पावियकेवलनाणो पिउणा सह सिद्धिमणुपत्तो ॥ ४ ॥ विहिया जह जलपूया सिवसुहहेऊ इमस्स संजाया। तह जायइ खन्नस्सवि भत्तीए तीए ता जयह ॥ ५ ॥ जलपूजा अझ भणिओ जलपूयाए जलसारो संपयं पयंपेमि । निव धूवमुंदरकहं आयनह धूवपूयाए ॥ ६॥55555 अस्थि स्फुरियमहानीलमणिसिलासालफलिहकविसीसं । सिरकुसुमियवणपरिवेढियंव नयरं महासालं ॥ ७ ॥ पडिमंदिरमणिमित्तिप्पडिविवियतरणिभासुरत्तेण । जं पेच्छिउंपि तीरइ न तस्स कत्तोरिपरिभूई ॥ ८॥ थिरमइपया- वजियगुरुअहिमयरो जलनिहिब गंभीरो । चंदोब पवित्तकरो राया नयसुंदरोत्थि तहिं ॥ ९ ॥ वहुसंखमंडलग्गप्पहार- परजयपवित्तयाकलिओ । जो एकमंडलग्गप्पहारपरजयपवित्तोवि ।। ६१० ॥ तस्संतेउरतरुणीपहुत्तपयमस्सिया पिया अस्थि । नामेण कम्मणावि हु विजयवई सीलकुलभवणं ॥ ११ ॥ डझंतागुरुनवधूवसुंदरो धूवसुंदरो नाम । तीएत्थि हस्थिमंथरगई रईसोवमसरीरो ॥ १२ ॥ समराइओ सुसाहुब समणधम्मोव जो सुहयमुत्ती। सफमलच्छि- विलासो गयकरवाहो महुमहोब ॥ १३ ॥ कुमरो कयाइ आरुहिय खंधरं गुरुकरेणुरायस्स । छत्ततिरोहियतरणी तरुणी- करचलिरसियचमरो ॥१४॥ पुरओ पयट्टहयघट्टचडियनियमित्तपत्ति(पंति ?)संजुत्तो । पविसिय सहाए पणमिय पिउणो पुरओ समुवविट्ठो ॥ १५ ॥ एत्यंतरम्मि रणवीरराइणो दारवालविन्नत्तो । दूतो दुयं नरिंदं नमिउं विनविउमारद्धो ॥ १६ ॥ पहु पिहुपयावपावयपुलुङपरिपंथिसत्यसलहेण । गयनयरपहुरणवीरेण पैसिओ तुह सयासे हं ॥ १७ ॥ मह पहुणा तुह आणा पट्टविया जह पयच्छ पइवरिसं । मह करमह न पयच्छसि धरियधणू होसु ता समुहो ॥१८॥ असरिससामत्थेणवि तेण तुमं नीइपुत्वयं भणिओ। को महुरोसहसज्झे रोए कडुओसहं देइ ॥१९॥ ना हरिही रज्जपि हु १ an । श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्भुत पूजाष्टकम् धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा ॥१८॥ בתכתבותכתבובבהכתבותכוכבתבר जइ' न धरसि तस्स सासणं सीसे । हरिणाहिवम्मि हरिणावमाणणा नणु अणत्थाय ॥ ६२०॥ कहियं हियं तुह मए तं कुणसु नरिंद जं मणोमिमयं । सप्पुरिसपयडियंपिहु गिण्हंति हियं न देवया ॥ २१ ॥ छन्नोवि रायरोसो दूउत्तस्स- वणओ ठिओ पयडो। किं उट्ठहिओ अग्गी जालिज्जतो न पज्जलई ॥ २२ ॥ भिडिघडणा निवइणो समंपि विसमत्त- मुवगयं भालं । धिज्जाइयस्स वत्थंवमंदपवमाणतरलणओ ॥ २३ ॥ भणियं निवेण रे दूय तुह पहू मह करं गहितु- कामो। अयं तु नियकरेणं रणे गहिस्सं सिरं तस्स ॥ २४ ॥ तं पेसिय तुह पिहुणा विरोहिओ हं धुवं सनासाय । निहायत्तमइंदप्पडिवोहो कि सुहं देइ ॥ २५ ॥ आणसु तं नियनाहं नाहं जं से सहिस्समवराहं । साहूणं सिंगारो अविणयसहणे न निवईणं ॥ २६ ॥ दूएणुत्तं निव नियघरडिओ जह वहेसि भडवायं । तह जइ समरुच्छंगेवि ता तुमं चेव वीरवई ॥ २७ ॥रायाह जाहि आणेहि नियनिवं दूय देससीमाए । जह रणनिहसो दसइ पोरुसकणयुभवं वन्नं ॥ २८ ॥ इय जंपिय सम्माणिय विसजितो राइणा गतो दूतो। अचंत्तं कुवियावि हु उज्झति नरेसरा न नय ॥ २९ ॥ ताडाविया निवइणा रणभेरी भीरुभूरिभयजणणी । तो नयनिवेण कुमरेण पत्थिया समरगमणाणा ॥ ६३०॥ नाऊण निबंधममञ्चमंडलीजंपिएण दिन्ना से । रणगमणाणा तो सो चलिओ चउरंगवलकलिओ ॥ ३१ ॥ गुरुगयघडासु तुरयावलीसु रणझणिरकिकिणिरहेसु । रायाणो सामंता मंडलिया चडिय संचलिया ॥ ३२ ॥ परिकलयंता बहुआउहाई आओहणाय जोहोहा । कुमरं परिचारंता जंति पहे समरनिवडिया ॥ ३३ ॥ विरइयवहुप्पयाणयसयलंघियनिययदे- ससीमाए। पत्तो कुमरो रिउनरवईवि सवलो सदेसंते ॥ ३४ ॥ उवभुत्तसपहुगरुयप्पसायनिकयकयुजमा सुडा । अभिडिया असमुच्छलियमच्छरुच्छाहसंजुत्ता ॥ ३५ ॥ हरिकरिरहचडिएहिं हयगयसंदणठिया पडिक्खलिया। पय- ॥१८॥ פתלתכך कध धूपपूजायाँ धूपसुंदर- कथा चारिणो वि रुद्धा समच्छरं पायचारीहिं ॥ ३६ ॥ वावल्लसेल्लभल्लयमल्लीनारायसरपहारेहिं । मिजंता गुरुगयघडभड- तुरया जन्ति जमगेहं ॥ ३७॥ अन्नोन्नं दंतेहिं तोडंति सिराई मुकहकाई। निप्पसरअसिप्पहरे वियरंति य वग्गिर- धडाइं ॥ ३८ ॥ नवरंगमेहडंवरसियछत्तेहिं मही जहिं सहइ । रतुप्पलइंदीवरपुंडरियकयोवहारब ॥ ३९ ॥ खग्गाय- गयकुंभग्गनिग्गयाउ पडन्तमुत्ताओ । रेहन्ति खग्गपाणीयगलिरगुरुविंदुणोध जहिं ॥६४०॥ असिघायुच्छलियठियं गयस्स जस्सन्तिगे मुहं करिणो । सो सहइ तेण दुकरोब सचउकुंभोब दुमुहोब ॥४१॥ एयारिसे रउद्दे रणम्मि रणवीरराय- कुमरेहिं । पारद्धं पहरेउं परोप्परं करडिचडिएहिं ॥ ४२ ॥ लल्लकमुक्ककाछलप्पहारेहिं दोवि पहरंति । भिदंति य अन्नोन्नं दंतप्पहरेहिं करिणोवि ॥ ४३ ॥ रिउकरिणा कुमरकरी निवाडितो दसणपहरजजरिओ। पडिओ कुमरो गहिओ य वेरिकरिणा करग्गेण ॥४४॥ उच्छालिओ य गयणे निवडन्ते निवसुए रिउनिवेण । धरिओ खग्गो उद्धं (हेहूँ?) जह भिन्नइ निवडिरो कुमरो ॥ ४५ ॥ निवडतेणं तेणं रिउखग्गं वंचिउं तओ झत्ति । पयघाएणं पट्टीए पहणिलं पाडि- ओ वेरी ॥ ४६॥ पडिओ सो करिपुरओ कोवमयंघेण तयणु तेणावि । दिनो पाओ सीसे दलियकवालो मओ राया ॥४७॥ दुटुं वेरिविणासं असुरामरखेयरेहिं परिमुक्का । कुमरसिरम्मि निवडिया अलिउलमुहला कुसुमवुट्ठी ॥४८॥ अहियंमि हए गहिया कुमरेणमनायगा सिरी सयला । "को वा कुणइ पमायं लाहे अचम्भुयत्थस्स" ॥४९॥ मोतुं निय- पहुपुत्तं रिउसामंता कुमारमणुसरिया । “लज्जति जियंताणवि सवे विरलच्चिय मयाणं" || ६५०॥ तो झत्ति समरवीरो रिउपुत्तो कुमरमस्सिओ सरणं । “समयाणुवत्तणं सइ नीई किं पुण इय अवाए" ॥५१॥ कुमरेणावि विइन्नो तप्पिट्टीए निओ अभयहत्थो । "इयरम्मि वि निरणुसया कि पुण सरणागए गरुया" ॥५२॥ काराविय नियआणं दिन्नं तस्सेव तज्ञणयरनं । "असमाणञ्चिय निचं कोवपसाया महंताण" ॥ ५३ ॥ तेणवि सिंगारसिरिभइणि परिणाविओ नरिंद- अनन्त०४ eue श्रीअनन्त- नाथचरि- बादुद्भुतं पूजाष्टकम् धूपपूजायां धूपसुदर- कथा ॥ १९॥ सुओ। "पशुवयरियो नो कालविलंब कुणइ गरुओ" ॥ ५४ ॥ चलिओ सदेससमुहो रायंगरुहो जयजियजसोहो । "सिद्ध कब्जे को वा वसइ सयनो विएसम्मि"॥५५॥ कुमरेण समं नवनरवईवि चलिओ सकीयबलकलिओ। "नियप- हुपयसेवशिय मूलं लच्छीए न पमाओ" ॥५६॥ आगच्छंतो कुमरो पत्तो वियडाडईए एकाए । हिंतालतालतालीतमाल- वडसालकलियाए ॥ ५७॥ जा उत्तमसोहंजणविसालअक्खा मणोहरपवाला । पाडलअहरा पधयपओहरा सहइ रमणिय ॥ ५८ ॥ विलसंतसरलचित्ता गुरुहयमाराय साहुसेणिय । भधावलिध संजायपत्तबोही असोया जा ॥ ५९ ॥ मझमि तीए वणसंडवेढियं गयणलग्गगुरुसिहरं । सप्पायारंपि भयावहारयं नियइ जिणभवणं ॥ ६०॥ रेहन्तख्वदारं नरिंद- मिव पत्तमूलरेहं जं । संपूरियसुयणासं लसिरामलसारसहियं च ॥६१॥ सधत्तो अनिलचला कंकेल्लितमालसाहिणो जस । जिणरायभयुन्भन्ता रागहोसघ कंपंति ॥ ६२ ॥ दद्दूण देवमंदिरमावासइ तत्थ निवसुओ सबलो। तम्मि पविहोशिय शत्ति मुच्छिओ पेच्छिऊण जिणं ॥ ६३॥ सिसिरकिरियाविरयणा संपावियचेयणो ठिओ सत्थो। आपुच्छिओ य मुच्छाए कारणं मंतिवग्गेण ॥ ६४ ॥ जंप कुमरो मह देवदसणा जाइसरणमुप्पनं । सचवियं तेण भवहुगमाय- नह तयं तुन्भे ॥ ६५ ॥ पत्तरहराइयंमि सरेव आरामरम्मगामंमि । साहससारो नामेण आसि एगो तुरयचोरो ॥६६॥ गंतूण दूरदेसे अत्थत्थी हरइ गुरुरयतुरंगे । विकिणइ य दूरतरे "का वा लुद्धाण मजाया" ॥ ६७ ॥ नियमो- गमि निझुंज दविणं वियरइ य दीणवंदीणं । "मोत्तूण चागभोगे ननं लच्छिफलं अहवा" ॥ ६८॥ कश्यावि कडीतड- बद्धखग्गघेणू तुरंगहरणत्थं । पत्तो सुवासनामे गामे 'दिणपच्छिमे जामे ॥ ६९ ॥ मणपवणजवे विलसन्तलक्षणे तेयतरलयाकलिए । पेच्छइ अतुच्छदुबादलाई चरमाणप तुरए ॥ ६७० ॥ तो सो चिन्तइ एयाण मज्झओ जइ हरामि एकापि । दालिहस्साजमं ता देमि जलंजलिं नूणं ॥७१॥ इय-चिंतियप्पओसे लग्गो मग्गंमि सो तुरंगाण । "जो जकाजे ॥१९॥ ।

CUe Lene Teu धूपपूजार्या धूपसुंदर- पत्तो स पमायं कुणइ किं तम्मि" ॥७२॥ गामाहिवस्स गेहे गया हया सूरतेयनामस्स । दारेविय सो रहिओ "परघर- माविसइ को सहसा" ॥७३॥ पविसन्तगोउलुच्छलियरयभरादिस्सदेहजही सो।तम्मि पविट्ठो "अप्पं न चोरजारा पया- सन्ति" ॥७४|| मं पेच्छिही महीए कोवित्ति विचिन्तिउं वडे चडिओ। "जह होइ अप्परक्सा दक्खा तह संपयटुंति" ॥ ७५ ॥ वडसंठिएण दिट्ठी पक्खित्ता तेण गेहमज्झम्मि । दिट्ठा य दीवउज्जोयपयडिया अंगणा एगा ॥ ७६ ॥ हरि- णिदखाममज्झा हरिणकमुहीय हरिणसमनयणी । विद्दुमअहरा पीवरपओहरा कणयवनधरा ॥७॥ तं पेच्छिऊणमस्साव- हारओ चिंतए कयत्यो सो । नियरूवसिरी अहरीकयस्सिरी जस्सिमा भजा ॥ ७८ ॥ एत्यंतरम्मि दुद्धासु सयलसुरहीसु सेरहीसुं च । बढेसु तुरंगेसुं जणप्पयारे ठिए विरले ॥ ७९ ॥ परिपालन्ते, अस्सावहारिपुरिसम्मि हयहरणसमयं । मंद मंदं गेहाओ निग्गया सा मयंकमुही॥६८०॥ तं दुटुं संचरिओ सोझत्ति वरंडओवरिमसाहं । आगच्छंति तो नियइ वडतले दारमगेण ॥८॥ संपत्ता वडतलवियडअयडतडनियहविडभडसयासे । तीए अवलोइओसो नववयदिढदेहसंठाणो।। ८२॥ मयणाहिमांसलामोयमणहरो रइयरम्मसिंगारो। परिपीडियतूणीरो करकलियपयंडकोदंडो ॥ ८३ ॥ दह्रण तयं उफां- ठियाए तकंठठवियवाहाए । आलिंगिऊण भणियं किं सुहय तुहेत्तिया वेला ॥ ८४ ॥ सो जपइ सुयणु जणप्पयारपस ठिओम्हि पालन्तो। "अहवेरिसकजरओ पयडइ कि कोवि अत्ताणं" ||८५॥ तुह मोहमोहियमई मयच्छि अहमागतो गुरुरएण । "लीलावईविलासावहियमणाणं कुओ थिरया" ॥८६॥ गयगमणि तुह कजे मुत्तुं कंतं सिरिं च इह पत्तो "अहवा तं सबस्सं जंमि मणो निबुइं वहइ" ॥ ८७ ॥ सा आह कहं तुमए नाओ अपयासिओ वि संकेओ। तेणुत्तं विवाहरि आयन्नसु तुझ साहेमि ॥ ८८ ॥ गुरुरयतुरयं आरुहिय आगतोहमिह अप्पकनेण । सथविओ तुमएवि हु वियसियकुवलयदलच्छीए ॥८९॥ यकीलणच्छलेणं मयच्छि तं पेच्छिया मए सुइरं। "तुह रुवस्स न तित्ती पत्ता जरि NEnilententenueueuehren UJI CUCURELE UEn धूपपूजार्या धूपसुंदर- कथा। श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्भुत पूजाष्टकम् ॥२०॥ एणव जलस्स" ॥ ६९०॥ असमरिसणेहसबस्सरसवसुप्फुल्लनयणकमलेहिं । अवलोइओ तए वि हु अहमणिमिसविन्भम- धराए ॥ ९१ ॥ नाओ तुहाणुराओ भए तए वि हु ममाणुराओवि । "नयणेहिंचिय नजइ अहवा हिययडिओ भावो" ॥ ९२ ॥ एत्थंतरम्मि तुमए धम्मिल्ला छोडिऊण कुसुमाइं। खित्ताइं इह पएसे अमिलाणाई पि तवेलं ॥ ९३ ।। मं पेच्छिरीए उबेल्लिऊण केसेहि विरश्या वेणी । आमीलिय नयणाई मं पेच्छिय तं गया सगिहं ॥ ९४ ॥ नाओ मएवि भावो जह मह दिन्नो इमाए संकेओ। कहमन्नह अमिलाणाई एत्थ कुसुमाई खित्ताई ॥ ९५ ॥ केसेहिं निसितमंमि तह नयणनिमीलणेण सुत्तजणे । अहमाहूओत्ति वियड्ढयाए नायं मए जेण ॥ ९६ ॥ "वंकमणियाई कत्तो कत्तो अद्धच्छि- पेच्छियाई च । अससियपि मुणिजइ छइलजणसंकुले गामे" ॥९७॥ ता रंभोरु तुहत्थे एत्थ अहं आगओ तुह विओगा। पजालियजलणजालाजलिरंगो इव दिणं गमि ॥ ९८॥ सा जंपइ चउजामोवि सामि मह वासरो सहसजामो । तुह विरहविहुरयुम्मायजायतावाय संजाओ ॥९९॥ अमयमओ पिय तं जंतुह मिलणे मे गओ विरहतावो। "किं सिसिर- किरणजोण्डाजोगो धम्मं न पसमेइ" ॥७०० ॥ इय रम्मपेम्मसबस्समुबहतेहिं तेहिं तत्थेव । रइया रयकीला उल्लसंत- मयमयणमत्तेहिं ॥ १ ॥ तविरश्यरयविनाणविरयणा हरियहिययवावारा । सा आह कुणसु तह नाह जह सया होइ णे जोगो ॥२॥ फुट्टइ हिययं दज्झइ सरीरयं जाइ जीवियबंपि । मह तुह विरहे ताहमवि सहं तए आगमिस्सामि ॥३॥ तन्नेहमोहिओ सो जंपइ ता चलसु तयणु तीउत्तं । गहिउँ निययाभरणं इण्हिपि समागमिस्सासि ॥४॥ ता अप्प्सु नियच्छुरियं जह पेडं दारिउं तमाणेमि । जायइ खडक्खडा तालयस्स उग्घाडणे जेण ॥५॥ तेणावि खग्गधेणू समाप्पिया गहिय तं गया सावि । नवरं महईवेलाए आगया तस्स पासंमि ॥ ६॥ कूवयकंठनिविट्ठस्स ज्झत्ति तीए समप्पिया छुरिया । "सिद्ध कब्जे को वा परवत्थु धरइ सकरम्मि" ॥ ७॥ सह अप्पणा इमपि हु पहु दिनं तुह समग्गमाभरणं । इय IPL CUe Len ॥२०॥ neur CucuCU S धूपपूजायाँ धूपसुंदर- कथा जंपिरी तमप्पइ "क्रिमदेयं वा सिणेहस्स" ||संगोवियं समग्गं तेणवि तं वंघिऊण परिहाणे। "इयरंपि सुग्गहीयं कुणति दक्खा किमु न दुवं" ॥ ९ ॥ भणियं च तीए पिययम तुह कजे मारिऊण दइयंपि । इह पत्तत्ति पयासइ पयईतुच्छत्त- मित्यीणं ॥ ७१० ॥ तं सोउं सो सुहडो जंपइ एयं तए कयमजुत्तं । जं सो हओ "न गरुया पावपवत्तावि निकरुणा" ॥ ११ ॥ पररमणीपरिभोगो एक वीयं तु तीए अवहरणं । तइयं धणावहारो तुरियमविणासिनरहणणं ॥ १२ ॥ जइ हं नागच्छंतो ता हुँतं एकमवि न पावं मे । आगंतुं चत्तारिवि पावाई मए कयाई पिए ॥ १३ ॥ एकेकंपि समत्थं दाणे नेरइयदारुणदुहस्स । चउपावभरकतो कहिं हयासो गमिस्समहं ।। १४ ॥ नंदंतु नरा तेचिय चिरं न चिंतावि जाण संजाया । पररमणिविसयविसया सीलालंकारकलियाण ॥ १५ ॥ हा हा हयविहिविहिओहमिह महापावमंदिरं तुमए । कहमन्नह मं पत्ता एवंविहपावरिंछोली ॥ १६ ॥ गन्भाउ किं न गलिओ वालो मिलिओ न कि विडालीए । जमहम- कजपरंपरपत्तं जाओ अणजमई ॥ १७ ॥ एवं वेरग्गवसा वागरमाणं निसामिय तयं सा। चिंतइ नूण विरत्तो एसो एरिससमुल्लावा ॥ १८ ॥ ता मह सवत्तिपुत्ताण गोससमयंमि साहिही नूणं । ते मं कयत्थिऊणं दुम्मरणेणं हणिस्संति ॥१९॥ ता कि इमिणा मह रक्खिएण नियवेरिणत्ति चिंतेइ । "खणरायविरायन्तं पायं पयई महिलियाण" ॥ ७२०॥ पहु मह खमसुत्ति पयंपिऊण खामणमिसेण तप्पाए । उप्पाडिऊण अयडे झडत्ति सुहडं खिवइ पावा ॥ २१ ।। तिवाणु- राय(इ)णीविय संज्झव विराइणी दुयं जाया। "खणरायविरायत्ते महिलाणहवा किमच्छरियं" ॥२२॥ दळूण भडं अयडे पक्खित्तं हयहरो विचिंतेइ । "घिद्धी घिरत्यु इत्थीण णत्यसत्येकमूलाण" ॥२३॥ उम्मीलिओ वि दूरं इमंमि सुहडे इमाए अणुरातो । सहसच्चिय पणट्ठो पवणाहयसरयजलओच ॥ २४ ॥ जस्संग अप्पिजिइ दिजइ दुद्देयसबपि । सो वि हु एवं हम्मइ. "अहो महेलाण मूढत्तं ॥ २५ ॥ पंचविहं विसयसुहं उवभुत्तं जेण सह सिणेहेण । तवेलं विय सोवि हु श्रीअनन्त- नाथचरि- धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा पूजाष्टकम् ॥ २१॥ खित्तो पायाए कूवंमि ॥२६ ।। वद्गुण फूडकवडाइं नूण महिलाण पुधरायाणो। गुचं तणंव ताओ झत्ति तवचरणमकरिंसु ॥२७॥ पवगिद्य चलसहावा महिला लूयब जणियसंतावा । उप्पाइयवसणसया कुविंदसालय पडिहाइ ॥२८॥ सुंदरवन्ना आमोयमणहरा सुहरसाय भुजंती । महिला किंपागफलावलिध उप्पायइ अणत्थं ॥ २९ ॥ सूरोवि कयस्थिजाइ खंडिजाइ सघयावि रायावि । राहुसिरीण इव महिलयाप कलसस्सहावाए । ७३०॥ अंतोहंतुम्मीलियपकामरसपूरिया परिन्भमरी। गयणं व कुलं मालइ महिला नवमेहमालद्य ।। ३१ । दुहन्ता कुडिलगई परमपियविवजिया सुरविहूणा । करस न भय- मुप्पायव नियंविणी सप्पिणीव सया ॥ ३२ ॥ कज्जम्मि जाण कीरइ धणजाणं चोरियार काऊण । ताणेरिसं सरुवं ता "पजत्तं ममित्थीहि" ॥ ३३ ॥ असरिसवेरग्गविभावणावसुलसियगुरुतरविवेप । अस्सावहारपुरिसे एवं परिभावयंतम्मि ॥३४॥ पविसिय गिहमि गहिऊण हलकुसि पगिहे खणइ खत्तं । "किमकज्ज वा वजियमजायाणं महिलियाण" ॥३५॥ गंतु मज्झे पाहावए जह थाह धाह धाहन्ति । पविसिय चोरेणं ठकुरो हओ नीयमाभरणं ॥ ३६ ॥ तं सोऊणं सहसा ससंभमा साउहा सपाइया । ठफुरपुत्ता परिवेढयन्ति गिहमुग्गहफरवा ॥ ३७॥ तुरयकुडिप्पमुहाई ठाणाई नियंति केवि दीवकरा । अन्ने उ अंनिसंति य चोरपयं पयइनिउणनरा ॥३८॥ दद्गुण गिहावेढं हयावहारी विचिंतय एवं । मह संक- उमावडियं छुहिस्सं सा कई इण्ठि ॥ ३९ ॥ न तरेमि विणिग्गंतुं भडपडलावेढियाओ भवणाओ। दुफम्मभरावरिओ नरयहाणाउ जीवोध ॥७४०॥ जइ देमि गिहा बाहिं निग्गयसाहाए झत्ति संपमहं । ता वियडे अयडम्मि पडामि सुहडो- द्य निन्भन्तं ॥ ४१ ॥ नूणं मह हयहरणप्पवेसभवपावपटलविउविस्स । इह मरणेणं फुसुमं फलं तु होही नरयपडणं ॥ ४२ ॥ मं दटुमिमे गोसे चोरोत्ति विचिन्तिउं हणिस्सन्ति । ता तमतिरोहिओ वडठिओवि अप्पं पयासेमि ॥ ४३ ॥ इय चिन्तिय तेणुत्ता ते तुम्हाणं कहेमि सद्यपि । वुत्तंतं मं पच्छा मुंचेजहवा हणेज्जाहः ॥ ४४ ॥ तं सोउं तेहुत्तं इहि- ॥२१॥ FUELEUEUE 222CUPLC Deleternना धूपपूजायां धूपसुदर- कथा ओवि हु कहेसु तो तेण । कहिओ आमूलाओ नियओ तीए य वुत्ततो ॥ ४५ ॥ भणियं च जइ न पत्तियह मज्झ ता नियह कूवयस्संतो। सुहडं धणुतूणीराभरणजुयं संपयं चेव ॥ ४६ ।। तं सोउं पक्खित्तो तेहिं वरत्ताए दीवओ कूवे । सञ्चविओ य तरंतो जहकहियगुणो मओ सुहडो ॥४७॥ कुवाओ तमायड्डिय गहिऊणाभरणमुल्झियं मडयं । "निन्नीवेण वि कनं जेण तयं धिप्पए नन्न" ॥ ४८ ॥ एयविरहं न सत्ता सहिउंति विचिंतिउंच पुत्तेहिं । लहुमायावि हु बद्धा सद्धिं मडएण कुविएहिं ।। ४९ ॥ तंपि विणिग्गहणिजो चोरोत्ति पयंपिओ हयहरो वि । “पावन्ति चोरजारा जइ वा किं कत्थई पूयं ॥ ७५० ॥ नवरं तुमए सबंपि साहियं तेण तं विमुक्कोसि । “उबयारओ सदोसोवि मुचए जेणिमा नीई" ॥५१॥ मडयं चडावियं सूलियाए निद्धाडिया य लहुजणणी। "रोसो न मयरिउम्मिवि गच्छइ किं पुण नियंतंमि" ॥५२॥ धरिऊण सबहुमाणं दिणत्तिगं अस्सहरयपुरिसंपि । पिउमयकिचं काउं सम्माणे विसजन्ति ॥ ५३ ॥ अप्पं संपड़ जायंव जममुहा निग्गयंव मन्नतो। वचंतो नियगामे पत्तो सो इह अरंनंमि ॥ ५४॥ पेच्छइ उस्सग्गठियं मुणिमेगं मुत्तिमंतमिव धम्मं । पञ्चक्खं पसमंपिव संकेयंपिव मुणिगुणाण ॥ ५५ ॥ धुप्पन्नविराओ अवलोइय सो मुर्णि ठिओ हेट्ठो(हिट्ठो!)।दारिदभरकतो नरोव संपत्तरयणनिही॥५६॥ तो तंपणमइ तथलणकमलमिलमाणभालफलओ सो। सहलत्तं कलयंतो सजम्मजीवियनरत्ताणं ॥५७ ॥ आवद्धपाणिपउमो पुरओ उवविसिय जंपए एवं । रने अमाणुसे पहु किं तवह तवंति मह कहह ॥ ५८ ॥ पारियकाउस्सग्गो उवविसिउं तस्स साहए साहु । खेयरमुणी महायस अहमिह आयाविडं पत्तो ॥ ५९॥ जेणमिह तिरियविरइयकयत्यणा हणइ मन्झ दुकम्मं । वेजोवइहपरमोसह व रोयं समग्गपि ॥७६०॥ तेणुत्तं पहु मह कहह कंपि धम्मं गिहत्यजणजोगं । "तीरइ निबाहेउं जो सो उक्खिप्पए भारो" ।। ६१ ।। आह मुणी गिहिणोवि हु जायइ धम्मो जिणिदपूयाए । सा होइ अट्ठभेया अट्ठमयट्ठाणनिम्महणी ।। ६२ ।। नेवनधूवदीवयअक्खय- रा הכותבתכתבת LETTE श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् धूपपूजाया धूपसुंदर- कथा ॥ २२॥ फलसलिलवांसकुसुमेहिं । पूर्यति जे जिणं ते पुज्जा तिजयेस्स वि हवन्ति ॥ ६३ ।। फीरंति एफेफावि हरइ गुरुरोगसो- गदोगथे। किं पुण सधाओ वि हु विरइज्जंतीउ भत्तीए ॥ ६४ ॥ सवाओवि असत्तो काउं जइ कुणइ धूवपूर्यपि । ता धूवेण समं सो धुवं नियं दहइ दुकम्मं ॥ ६५ ॥ डझंतधूवमवधूमधूविओ इव सुर्यधसबंगो । जायइ भवंतरेवि हु जीवो उक्खिवियजिणधूवो ॥६६॥ तं सोउं सो जंपइ पहु नूणमहं कयत्थजणपढमो। भरणंतवसणविणिग्गएण तं जेण संपत्तो ॥ ६७ ॥ इय भणिय पणमिय मुणी लग्गो सो निययगाममग्गमि । गच्छंतो संपत्तो गामे सिरिसारनामंमि ॥ ६८ ॥ तमि तवणीयकलसं नहग्गलग्गं जिणालयं नियइ । सिंगग्गसंगिनवतरणिमंडलं उदयसेलंच ।। ६९ ॥ तं दटुं सो चिंतइ दिणदुगसंबलयदविणकीएण । धूवेण जिणं पूइय पुन्नप्पसरं समजेमि ॥ ७७०॥ इय परिभाविय' गहिउँ कप्पूरागरुवि- मिस्सियं धूवं । पत्तो जिणालए पेच्छिउं जिणं हरिसिओ दूरं ॥ ७१ ॥ उल्लसिरमणो संदंतलोयणो वित्थरन्तरोमंचो। पसरंतभत्तिभावो धूवं उक्खिवइ जगगुरुणो ॥ ७२ ॥ तयणु मणुयत्तनियजम्मजीवियवाण सहलयं कलिउं । वारं वारं भूमिलियभालमभिनमइ जिणनाहं ॥ ७३ ॥ संचलिओ नियगामे पत्तो य तहिं पमुफअन्नाओ । तम्मि वि भवम्मि रिद्धी जाया से धम्ममाहप्पा ॥ ७४ ॥ संपत्तआउअंतो जातो अमरो सणंकुमारे से । नायं च धूवपूयाए अत्तणो तेणममरत्तं ॥ ७५ ॥ परिभावइ य जहाहं करेमि जिणमंदिरं जमिक्खेउं । जायइ भवंतरे मे बोहित्ति विचिंतिउं तेण ॥ ७६ ॥ रइयं जुगाइजिणजुयमुत्तुंगं जिणहरं कणयकलसं । दुहृदमयाभिहसुरो आइट्ठो तस्स रक्खत्थं ॥७७ ॥ जिणंचवण- जम्मदिक्खाकेवलनिवाणगमणदिवसेसु । समगममरेसरेणं भत्तीए महूसवे कुणइ ॥ ७८ ॥ इय समुवज्जियसुकओ भुत्तुं सुरलोयसंभवसुहाई। चविय तओ इह जाओ एसो हं तुम्ह पञ्चक्खो ॥ ७९ ॥ ता एयं जिणमंदिरमवलोइय सुमरिया मए जाई । जह जिणधूवुक्खेवो जाओ कल्लाणहेऊ मे ॥७८०॥ तं सोऊणं मंडलियमंतिणो बिति जयइ जिण- CLC12 Enemen ॥ २२॥ KUCUPUCCI BUCU2Ucuz IEL धूपपूजायां धूपसुंदर- कथा धम्मो । अप्पस्स वि जस्स कयस्स हुंति महईओ रिद्धीओ ।। ८१ ॥ तयणु कुमारेण रिसहस्स सामिणो भत्तिपुलय- कलिएण । पणमिय विहिओ अट्ठाहियामहो गरुयरिद्धीए ॥८२॥ तो चउरंगेचमूचयसंचाराऊरियक्खमावीढो। अभंलिह- धवलहरे संपत्तो नियपुरे कुमरो॥ ८३ ॥ असियसियद्धयोहे निम्मियमंचाइमंचकयसोहे । पविसइ पुरम्मि कुमरो विल- सिरसिंगारजियअमरो ॥ ८४ ॥ गंतुं सहाए पणओ पिउणो पयसयदलं तओ तेण । आलिगिऊण कुसलप्पउत्तिमापु- च्छिओ पुत्तो ॥ ८५ ॥ सो आह ताय मह तुह पसायसुहियस्स सबया कुसलं । इय जंपिय उवणीया पिउपुरओ तेण सत्तुसिरी ॥ ८६ ॥ पणओ सत्तुसुओवि हु तस्स को राइणावि सम्माणो । “पणयम्मि वच्छलचिय पहुणो सत्तुम्मिवि निएब" ॥८७॥ पणयाए वहुयाए भव पुत्तवइत्ति जंपियं रना । "भणइ परे वि हियं चिय गरओ कि माणुसे न निए" ॥ ८८ ॥ कइवयदिणावसाणे रजम्मि निवेसिओ सुओ रना । पुत्तं मुत्तुं ननस्स होइ सबस्ससामित्तं ॥ ८९ ॥ सुवि- हियसूरिसयासे गहिया दिक्खा निवेण रिद्धीए । “इहलोइयं जहा तह परभवकज्जंपि कुणइ गुरू" ॥७९०॥ चरिय तवं उप्पाडिय केवलनाणं निवो सिवं पत्तो। "किमसमं वा दुकरतवस्स भावेण विहियस्स" ॥९१॥ नवनिवईवि नयपरो पयाउ पालइ अभिदवइ दुहे। वंदइ गुरुणो पूयइ जिणेसरे मन्नए मित्ते ॥ ९२ ॥ साहम्मियवच्छल्लं कुणइ पयट्टावए अमारीओ। किं बहुणा तित्थसमुन्नईकरं कुणइ सबंपि ॥ ९३ ॥ तप्पुन्नपगरिसागरिसियत्व आगंतुमवणिवइणो तं । सेवंति सबदेसुब्भवावि गुरुभचिराएण ॥ ९४ ॥ तेणावलोइओ जो मन्नइ सो अप्पगममयसित्तं व ! आभासिओ पुणो तिहुयणेकरजाहिसित्तंव ॥ ९५ ॥ एवं वहुकालं पालिऊणमकलंकरजमवणिवई । कुमरं पयावसारामिहं ठवेऊण रज्जमि ॥ ९६ ।। निग्गंथगुरुसमीवे दिक्खं घेत्तुं कयुग्गतवचरणो । उप्पन्नविमलनाणो संपत्तो मोक्खमक्खेवा ।। ९७ ॥ जह TELE श्रीअनन्त- नाथचरि- दीपक- पूजायां सुवन- प्रदीपकथा पूजाष्टकम् ॥ २३॥ धूवुभवपूया जाया एयरस मोक्खसोक्खकए । तह अन्नस्सवि जायइ ता भवा तीए उनमह ॥९८॥ * धूपपूजा Ke फक एसो हु धूवपूयाए साहिओ धूवसुंदरो इहिं । भुवणप्पईवनिवई दीक्यपूयाए निसुणेह ॥ ९९ ॥ उल्लसियरायसिरिकरणसुंदरं ललियविलयपरिकलियं । अस्थि सरग्गामजुयं गीयंपिव भुवणविजयपुरं ॥ ८००॥ कलहसियरायभवणं कलहसियविरायमाणसुयणं । कलहरियरहियसलिलं कलहरियउत्तप्पहीणजणं ॥ १ ॥ पूरिय पउरपयासो सबुत्तमनिद्धपत्तआहारो। दीवोब महीनाहो कुलप्पईवोत्ति तत्थथि ॥ २॥ सरहोवि विउलवच्छो विदीहबाहोवि विलसिरगओवि । सारंगोवि न तिरिओ उत्तमपुरिसोचिय सया जो ॥३॥ गोरीवि अमीमपिया सायरतणयावि अजडसयणसिया । तस्सत्थि धारिणिपिया सईवि जाणिंदपियभोया ॥४॥ तीए समत्थि परिपंथि- हत्थिकुलदलणकेसरिकिसोरो । भुवणप्पईवनामो कुमरो गिरिसोब गुरुकित्ती ॥५॥ अप्पवउदयजुत्तो अब्भ- सिअकलोय वीयचंदोष । जो नवरति(वि)व पुबाभासी जयजणसुहकरो य॥ ६॥ समवयवेसालंकारसारसामंतमंति- पुत्तेहि । सद्धिं बंधुरकीलं कुबतो गमइ कालं सो॥७॥ कइयावि कसिणअहमिनिसीहसमयंमि जग्गए जाव । तो आयन्नइ आउज्जतालगीयस्सरं कुमरो॥ ८॥ तस्सरमणुसरमाणो दिहिं पक्खिवइ मुकपल्लंको । नियइ दुवालसभुयं पेच्छणयपरं नरं तिसिरं ॥ ९ ॥ दोहिं करेहिं पडहं दोहिं मुइंगं च दोहि तालाओ । वीणं दोहिं वंसं च दोहिं हत्थेहि वायंतं ॥ ८१० ॥ नट्टवसुबेल्लिरभुयकरजुयविन्नाससंचरं तत्थ । घणमणिकुंडलमंडियमहिलाएकाणणसणाहं ॥११॥ वीएण मणोमयरायवासणावसविमुक्काफुक्केण । रमणीमुहेण वंसं वायंतेणं विलसमाणं ॥ १२ ॥ महुरसरगाममुच्छणाजणियसवणजुयसोक्खं । उग्गायतं गीयं मज्झट्ठियपुरिसवयणेण ॥ १३ ॥ 'कुलयं ॥ इय अच्च- भुयअविठ्ठपुवपेच्छणयपेच्छणुत्तालो । वंचित्तु पमत्ते अंगरक्खभडचेडपमुहनरे ॥ १४॥ नवमेहडंबरवरपावरणालक्खि- Menा CUCU LEL तइएण ॥ २३ ॥ SUCUCUELE na...DE UCUCUC दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकया - a यंगसंठाणो । करयलकयकरवालो वासहरा निग्गओ कुमरो ॥ १५ ॥ 'जुयलं' ॥ तं पेच्छंतो गच्छइ उच्छलियअनुच्छको- उउक्करिसो। चिन्तइ य अहो एयं भुवणंतवहिभवं किंपि ॥ १६॥ जं कुञ्चकलियमेगं नरस्स मुहमित्थियाण पुण दोन्नि । गेवेजयमणिकुंडलभालट्ठियतिलयकलियाई ॥ १७॥ सुवंति इह भविस्सासत्येसु दुसाणणत्तिमुंडादो । नवरं ते पुरिसञ्चिय एसो नरनारिरूवो उ॥ १८॥ इय चिंतंतो पत्तो रायंगरुहो वि तस्समीवमि । सोवि हु पच्छाहुत्तं गच्छइ करणक्कमच्छउमा ॥ १९॥ थोवप्पसरप्पउरावसरणकरणकमे कुणंतेण । तेणाहियहियहियओ दूरं नीओ नरिंदसुओ ॥ ८२० ॥ तहसिय अवरावरविन्नाणालोयवियलियविवेओ। न मुणइ नयरं दूरे न गणइ मग्गसमलवंपि ॥ २१ ॥ एत्थंतरम्मि सहसा सो नट्टवरो सरुवमुज्झेउं । उक्खायनिसायअसी जमोब जाओ भडो कुद्धो ॥ २२ ॥ जंपइ रे दुट्ठाहम कुमार तं सरसु देवयं इहं । मा भणसु पमत्तो हं विणासिओ केणइ छलेण ॥ २३ ॥ तं निसुणिउँ कुमारो चिन्तइ सुरअसुरनहयरन्नयरो। कोवि इमो मह वेरी छलेण जेणाणिओहमिह ॥ २४॥ वीसासिऊणमेवं जो जायइ घायगो न मोत्तवो । हतबोचिय भन्नइ सो नूणं नीइसत्थेसु ॥ २५ ॥ इय चिन्तिय आयड्डियखग्गो तं हकए निवसु- ओवि । निक्करिओ इयरोवि हु रूसइ किं खत्तिओ नेव" ॥ २६ ॥ दोनिवि वग्गणकरणकमभमणुभामियासिदुद्धरिसा। निप्पसरप्पहरपरा जुज्झति समच्छरुकरिसा ॥२७॥ दंसे सिरघायं मोतुं पाएसु दिति मुनईओ (१)। निविसिय उच्छ- लियावसरिउंच दोन्नि वियवंति ॥ २८ ॥ नेगोवि जयं पावइ दोण्हवि सत्यत्समप्पवीणत्ता । न समिजति य ज ते निचं चिय विजयसत्थसमा ॥ २९ ॥ अन्नोन्नखग्गसंघट्टभग्गवारंगखुडियअसिफलया । करकयतिक्खग्गखग्गघेणुणो ते पुणो मिडिया ॥ ८३० ॥ मुक्कासिघेणुघायं वंचइ करणकमेण कुमरो से । रोसेण कुमरछुरियापहारलक्खं हरइ सोवि ॥ ३१ ॥ अवरोप्परवामकरप्पहारपडियासिघेणुणो दोवि । जुझंति निजुज्झेणं केसरगहवाहुबंधेहिं ॥ ३२ ॥ निदयकेस- प UCUCCIO UCCUPUCC

uil
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुनृतं
पूजाष्टकम्
दीपक-
पूजा
भुवन-
पदीपकथा
॥२४॥
ग्गामानुगंधफरणागजजारिगदेहा । निवसति दयति यति पष्ठि गुणरपि गिन्ति ॥ ३३ ॥ निहुरकुमारपागप्पाहारग-
पछग(थ)लताउिको सुइयो । परिणो भसन्ति पुम्गन्तनेतणो शूगिवहगि ॥ ३४॥तो रा गजुग उपरि वाउं निगपरायुगं
भरियोसो। तुं भराए छुरिगं जा तस्स सिरं लुण एगरो॥ २५ ॥ ता तेण नमो अरिगाणं गाई पंचपरमेठी।
रारिगा असाररांसारसागरुतारणतरिध ॥ ३६ ॥ तं शो हा हा हा साइम्गिरागारणे गहापावं । फाऊण नूण नरए
अप्पयंतो तुझो ॥३७॥ इस जंपिरेण खागिग गुणो साहसत्ति निवपण भयो । “अरनिगाणवि करुणा जाग जर वा
पुलीणाण" ॥३८॥ यो नित नररगणं एसोजगणेण गारणपरोवि । गुणो रीमि मा "गुरुण गणणान रिउफीडे॥३९॥
दोश न सिरगि सिंगं जाएगाणं पसगाण गगराण । किंतु अकजो फो यो गुणिजति पढेगा" ॥८४०॥ पण जीनियर
पाउं विशं सगग्गगनि गग्गं । जागर रजाईणं जं जीवंताणगुनजोगो ॥४१॥ शुगणगिवि उवगारो न पाणदाणाणो सग-
हिशो गल्लि । पणुगगरिउगसप्तेहिं निणइनिज सो जेण ॥ ४२ ।। पितु उवगारं गंनए पुरिसो गिरिंदगरुरागरं ।
निणावर खलप्पगई पुरिसो उपसारलासंगि ॥ ४३ ॥ ता भाराययो एस गार देवराप गुगुरुप । जणउप जाव जीवं
परोयगारप्पसारागणी ॥ ४४ ॥ श्य निन्तिग उठेउं पणगिग तं पागपउगजुगलग्गो । जंपर गा अपराएं. खगरा गहा-
रास करापसाणो ॥ ४५ ॥ जशन तुगं गुंगतो संपर गं गुरिरारगण झुंतो। ता गंसगिडगिडाइमाण भक्खं छाताण
॥४६॥शदिवं निरा सरणं जागरणं तंगि गज्ज्ञा नशोनि । जगईन एशो तुगए फरुणारसपूरियगणेण ॥ ४७ ॥ बटुं
सं खागतं जपए एगरो जो गाहासत । तुगम विवेश्णानि किगिगगवेरेवि पारखं ॥४८॥ जो जिणगए थिरगणो
सुगरण गरणगि पंचपरनिहिं । तस्सेयारिसनिग्षिणफम्गं जाग जादो पोज ॥४९॥ जय गा कहणिजागिणं सुपुरिस
उपपिरिय फासु ता एस्था । माय जकाणिज ता अच्छउ हियएच्छिग एणतु ॥ ८५०॥ यो गण जरा राणया पाणादि
॥२४॥

PALI दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा - हु तस्स किं न कहणिज । इय जंपिय उवविसिउं सो कहइ निविट्टामरस्म ॥ ५१ ॥ गुरुनयपत्तछाओ घणकसिणगुनार- सारसरलक्यो । सुयणोध भरहखेत्ते चेयड्डो नाम अस्थि गिरी ॥ ५२ ॥ तम्मि 'फुरनमणिगणरहनेउरचकवालरमणि- यणं । रयणमयं अस्थि पुरं रहनेउरचकवालंति ॥ ५३ ।। दरियरिवारवारणगणकुंमवियारणेकाखरनहरो। तं परि- पालइ सिरिरयणसेहरो नहयरादिवई ।। ५४ ॥ तस्मास्थि समुद्धंतकंतकंताहिवत्तअहिसित्ता । हारस्सिरित्र हारस्सिरी पिया वित्तमुत्तगुणा || ५५ ।। अन्नोन्नरम्मपेम्माणुवंधवद्धतमणपमोयाण । पंचविठविसयसत्ताण ताण कालो अइफामह ॥ ५६ ॥ कश्यावि हु रयणविमाणसेणिसिंगारियंवरो चलिओ। नंदीसरंमि सिद्धप्पडिमानमणाय सयरिंदो ।। ५७ ॥ दाहिणिदिसिगयणेणं गच्छंतो नियइ सम्मुहमबीए । मणिमंदिरपुरबाहिं निगच्छंतं जणसमूह ॥ ५८॥ तस्संतोनिल- तरलद्धयालिझणहणिरकिंकिणिगणाए। सिवियाए समारूढ़ अवलोय तरुणनररयणं ।। ५९ ॥ दिनं किवणवणीमग- जायगदीगंधदुत्थलोयाण । वंछाविच्छेयकर दाणे मणिकणयरित्याइं ॥ ८६० ॥ अवलोयंतं पुरतो लउडारसरासय सपेच्छणए । उवहिज्जतं जय जीव तं चिरं इय जणासीदि ॥ ६१ ॥ दाहिणपासमहासणनिविट्ठजणएण संमुवयणेण । समलंझियमप्पंतेण दाणकानम्मि कणयाई ।। ६२ ।। वामहाणपरिहियगरिहविहरनिविद्वजणणीए । कयलवणुत्तारणयं सोयंसुयतंबिरच्छीए ।। ६३ ॥ वजंतढकढुकाभेरीभकारभरियभुवणयलं । रम्मारामुलाणमि गुरुयरिद्धीप संपत्तं ॥ ६४ ॥ । कुलयं ॥ को एस किं करिस्सइ इद इय बुद्धीए नहयरवई वि । तत्थुत्तिन्नो कंचणकमलगयं केवलिं नियइ ।। ६५ ।। पालियसमग्गसत्तं विरइयछज्जीवकायरक्खंपि । सोमंपि मित्तरूवं सुरयपुरं बंभयारिपि ।। ६६ ।। दवण केवलिं नहयरे- सरो भत्तिनिभरो नमइ । “धम्मत्थं पवित्तीओ जइ वा धम्मीण होन्ति सया" ॥६७॥ सिवियाग समुत्तिन्नो पणयपहू माइपिअणुनावो । परिहरियालंकारो संवेगुलसियरोमंचो ॥ ६८॥ सो विजाहरवणो अवलोयंतस्स भत्तिमरिय- अनन्त०५ 蜀 Jeel श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृतं पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ २५॥ मणो । समयविहिणा मुणिदेण दिक्खिओं विहिय सिरलोय ॥ ६९ ॥ गणासेवणसिक्खोकहणते नहयरेंसरों नमिउं । पुच्छइ कि वेरग्ग जमिमों मुणिनाह पवंइओ ॥ ८७० ॥ आह पहू आयन्नसु खयंराहिव अत्थि एत्थ नयरम्मि । असं- मप्पयावसारो पयावसारोत्ति नरनाहो ॥७१॥ अवरं च एत्थ निवसंति दोनि दुन्नयपराओ महिलाओ । एकाए पवं- चमई नाम वीयाए पुण कुमई ॥ ७२ ॥ भज्जावईण विहडियपेम्माण कुणंति पेम्मसंधाणं । अचंतसुघडियाणवि तं विहडावंति अन्नेसि ॥ ७३ ॥ उच्चाडणविटेसणथंभयवसियरणमारणाईसु । पावकिरियासु सययं वटुंति पमोयपुंनाउ ।। ७४ ॥ कइयावि दोवि दुन्नयजायत्थारूढगरुयगवाओ । रिउसेणाओव सजियसराओ विवणीए मिलियाओ ॥ ७५ ॥ अन्नोन्ननिण्हवुप्पंनमंतुवसविहियगुरुविवायाणं । ताण सयासे मिलिओ बहुओ लोगो कुतूहलओ ॥ ७६ ॥ महफाडियं न सफो वि संद्धेउ तरइ इइ कुमइभणिये । इयराह तहा सीवेमि जह न से होइ संधीवि ॥ ७७ ॥ इय विवयंतीओ जण ताओ नीयातो मंतिसंनिज्झे । विनायवइयरेणं तेणवि नरवइसमीवंमि ॥ ७८ ॥ नाऊण तप्पइन्नं राया विम्हिअमणो पयंपेइ । कुणह इममिफवारं एयत्थे तुम्हमभउत्ति ॥ ७९ ॥ कुमई जंपइ दिणपंचगस्स मज्झमि फोडिइस्सामि । सीवि- स्सामि तमियराह पहु अहोरत्तमज्झवि ॥८८०॥ इय विरइयप्पइन्नाओ ताओ नमिउं निवं दुयं दोवि । कयजणअच्छरि- याओ पत्ताओ नियनियगिहेसु ।।८१॥ कुमईए चिंति एत्थ अस्थि सुप(व)सुरित्थवित्थारो। नामेण अत्थसारो गरिठ्ठ- सिट्ठी सरलदिडी ॥ ८२ ॥ नाययरो बहुलाहो वि कित्तिसारोत्ति अस्थि तस्स सुओ। उज्जलमाणसमुत्तिअपत्तसंतावले- सोवि ॥ ८३ ॥ नवजुवणुल्लणाए अभग्गसोहागसंगयंगीए । कतिमइए पियाए सह विलसइ सो सया सुहिओ ॥८४॥ नवरं कंतिमईए सरूवसिंगारगरुयगवाए । आलवियाए वि अहं न नया संभासियाचिय नो ॥ ८५ ॥ ता तप्पइणो कीएवि कुरंगनयणीए सह विहिय घडणं । साहेमि निवस्स जहा तीए महंत दुहं होइ ॥ ८६ ॥ तप्पश्णो पुण अयसो בהם ॥ २५॥ CLCLCULULL JEEEE Queue Jeel दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा संतोसो मझ निवइणो दविणं । "अहव कयावन्नाणं अणत्थउप्पायणं सस्सं" ।। ८७ ॥ ता एत्य धणिधणेसरतणया तरुणी धणावली नामा। असई सयंपि ता तम्घडणं सह तेण काहामि ॥ ८८ ॥ इय चिंतिय तबेलं पत्ता सा कित्ति- सारसन्नेज्झे । काऊण तमेगंते जंपए महुरक्खरगिराए ॥ ८९ ॥ सुहय तुमं पइ जंपेमि किंपि मा कुणसु पत्यणं विहलं । सो जंपइ ता संपइ साहसु सा भणइ निसुणेसु ॥ ८९० ॥ इह अस्थि धणेसरसेहिणो सुया कमलकोमलोरुजुया । नियरूवनिजियरई नामेण धणावली वाला ॥ ९१ ॥ नियभवणमत्तवारणगयाए तीए कयाइ सञ्चविओ। आगछन्तो तं रम्मरूवजियरइवइविलासो ॥ ९२ ॥ सिंगारसस्ससमवयवयस्ससंदोहसोहियउवंतो। उत्तमउत्तुंगतुरंगवग्गणक्खणिय- मणवित्ती ।। ९३ ।। अनिलंदोलणविलसिरसिहिपिच्छच्छत्तजायछायहो । हेलाए कीलयंतो जंपाउंपाहिं यरयणं ॥९४॥ चलसरलधवललीलालसलोयणजुयलवहलजोण्हाए। परमामयवुटिंपिव विकिरंतो समहरं तुरए ॥ ९५ ॥ सियसोणसाम- मणिमयभूसणसयभूरिकिरणनियरेहिं । रयणाभरणेहिं पिव अलंकरंतो तुरंगपि ॥ ९६ ॥ दखूण तुमं उम्मीलमाणनव- नेहनिद्धनयणेहिं । आदिहिपहं अवलोइओ बहुं तीए अवियण्हं ।। ९७ ॥ सोहग्गरयणरोहण संमोहणमयणवाणसम तुमए । दिहिपहाइकते वियंमिओ तीए विरहमरो ॥ ९८ ॥ चिंतंमि तुम चित्ते तुहागिई तुज्झ नाममालवणे । सिविणे समागमो ते सा वाला तम्मई जाया ॥ ९९ ॥ विरहानलजालावलिजलिरसरीराए तीए पारद्धो । संसुवयंसीहिं सयं सययं सिसिरोवयारभरो ॥ ९०० ॥ सतडकारं हारे तणुतावेणं फुडंति' मुत्ताओ। सिमिसिमिय सुसन्तिच्चिय नवकुव- लयनालमालाओ ॥ १॥ चणचंदणागुरुरसछडाउ छंकारपुबगं तीसे । तचंगसंगमेणं लग्गंतीओ वि परिसुसंति ॥ २॥ गोसावयस्सायस्संदिसाहिसेणिव मुयइ अंसूणि। भंजइ देहं जिंभाउओ भयइ परिभमइ एमेव ॥ ३ ॥ एवमवत्या सा १ हयरयणं रंपझंपाहिं पाठांतर. २ स मणहरतुरए पाठांतर. यादा UCU

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श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धत
पूजाष्टकम्
दीपक-
पूजायां
भुवन-
प्रदीपकथा
॥२६॥
तस्सहीहिं मह दसिया तो तीए । तं साहियं समग्गपि तो अहं एत्य संपत्ता ॥४॥ ता सुझय तुज्य संगम-
आसशिय धरइ जीवियं तीए । अवहीरियाए तुमए मरणनिय जेणिमं भणियं ॥ ५॥ "दूरगरदेसपरिसंठियरस पिरा-
संगमं वहतस्स । आसाबंधोशिय माणुसस्स परिरक्लए जीयं" ॥ ६ ॥ता मह उवरोहेणं अहवा तज्जीवियषकरुणाए ।
तं सरसु एकवारं दक्खिनदयाभो जं गरुए ॥७॥श्य जपंती दंतग्गधरियपंचंगुलं नमिय तस्स । तसरणमिलिय-
भाला ठिया निरं चिंता तओ सो॥ ८॥ अकलंक मज्म फुलं सावि पुणो पोटराइणी बाला । एसा वि विणयपणया
किं काउं जुज्जए ता मे ॥ ९॥ एगस्थ अकजभयं अन्नत्तो मरइ सा मए मुफा । पासद्गेवि वलग्गा उगरुयगंठिप
मझ मणं ॥ ९१० ॥ जे होगधं तं होउ ताणुरत्ताए विरहाविहुराए । काई समीहियमई इय चिंते तमो तेण ॥११॥
बजे मजायं मयलेउं निम्मलं जसप्पसरं । मोतुं कुलाहिमाणं अणुसरिऊणं फुसीलतं ॥ १२ ॥ चश्मणं सशरियं
अंगीकाऊण नरयगइगमणं । उज्झेउं सम्म भणियं ज भणसि तं काई ॥ १३ ॥ तं सोउं तीउत्तं एसो विहिओ महा-
पसाओ मे । इय जंपिऊण पत्ता पासंमि धणावलीए सा ॥ १४ ॥ तं पारियो काउं पयंपए सुयणु सुणसु वयणं में
सा आह अंब जं किंपि जंपियवं तयं भणसु ॥ १५ ॥ तीयुत्तमत्थि अस्थिसस्थपविश्नअस्थिवित्थारो। नामेण
कित्तिसारो पुत्तो वणिअत्थसारस्स ।। १६ ।। स्वेण मगणमुत्ति कंतीए कलावई मईए गुरुं । स सिंगारेणं जो
जिणइ धणेण धणयंपि ॥ १७ ॥ तेण तुमं समविया नियमंदिरमत्तवारणासीणा । लीलालोयणलोयणजोण्हाभरपूरिय-
दियंता ॥ १८ ॥ दिवाएवि सुयणु तए मयणसरप्पयरपहरजजरिओ। भवणम्मि कहकहमवि संपत्तो सो अणुप्पासो
॥ १९ ॥ तं विरहज्जरविहुरं दहा जलदावि जलणजालय । संतार्षिति ससिकरा खयरंगारष तस्स तणुं ॥ ९२० ॥
एमेव हसइ बालोब नियइ सुनं पिसायगहिउद । नया गायइ पलवश मइरामयमत्तगुत्तिष ॥२१॥ सधप्पणा पराय-
HEREFREEEEEEEEEE
॥२६॥

दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा त्तमाणसो दंसिओ वयस्सेण । मह कहिऊणं तुह दंसणाणुरायाओ वियलत्तं ॥ २२॥ तो तं संठावेउं तुह पासे हं समा- गया सुन्। ता नररयणस्स तुम समीहियं कुणसु पसिऊण ॥ २३ ॥ तं सोउं सा असई नियमणऊम्मीलमाण- म्माया । जंपइ तुहोवरोहा अंव अकज्जपि हु करिस्सं ॥ २४ ॥ तो तीए जंपियं पुबगोउरद्दारदेसदेवउले । आगंतुं मिलियवं निसाए पहरस्स तस्स तए ॥ २५ ॥ एवं निसुय तदुत्तीए तीए गंतूण कित्तिसारते । नीओ देवउले सो धणा- वलीविय समणुपत्ता ॥ २६ ॥ कुमईए जंपियं इह पविसिय मज्झम्मि रमह सच्छंदं । लोयागमणालोयणपरा दुवारे- हमच्छिस्सं ॥ २७ ॥ तो मज्झपविहेसुं तेसुकंठाविसंठुलंगेसु । तीए कहियं आरक्खियस्स गंतूण तं ज्झत्ति ॥ २८ ॥ तो संनद्धधणुद्धरअसिखेडयकरभडेहिं चउपासं। परिवेढिय देवउलं स आह गोसे धरिस्समिमे ॥ २९ ॥ नो निग्ग- मप्पवेसा कस्सइ देया इहत्ति भणिय भडे । गंतूण मंतिनिवईण कहिय तबइयरं सुत्तो ॥ ९३० ॥ दणं सेहिसुओ देवउलं घडियभडढावेढं । उन्भूयभूरिभयवेविरंगजट्ठी विचिंतेइ ॥ ३१ ॥ पेच्छ जहा मज्झ महावसणमिणं दुस्सहं समणुपत्तं । जीवियमरणसरूवे संदेहे जेण पडिओहं ॥ ३२ ॥ "पुबिल्लभवसमुभवपावप्प भारभावओ- वसं । सुनयाणपि अवाया इंति न किं कयअनीईणं" ॥ ३३ ॥ गोसे बंधे में नेही आरक्खिओ विवणिवीहिं । जणयाइजणसमक्खं विडंविही विविहवियणाहिं ॥ ३४ ॥ तुच्छतरविसयलालसमणस्स मह केत्तियं इमं दुक्खं । पररमणिरमणपावा गरए तमणंतसो होही ॥ ३५ ॥ न कयाइ कओ अनओ मए न अनईहिं सह पसंगोवि । एयं चिय गोत्तक्खयहेऊ पढमं कयमकन्नं ॥ ३६ ।। अप्पविणासाय महापावुल्लासाय अयसपसराय । खलओकरिसाय मए एयं दुबिलसियं विहियं ॥ ३७॥ मरणं दारिदं वा विएसवासो व सयणविरहो वा । हुतु वरं एयाई मा पुण एसो कुलकलंको ॥ ३८ ॥ न कुणति जे परिक्खिय कनं ते दुक्खमंदिरं हुंति । पहसिज्जति जणेणं मइलिज्नंतिय अकित्तीए श्रीअनन्त- नाथचरि- बावुद्धतं पूजाटकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ २७॥ ॥ ३९ ॥ पचिंधियतमणुयत्तारियक्खेतेसु सुकुलजम्माई। रायपि में निरत्थयमकजकरगुंजमा जायं ॥ ९४० ॥न को धम्मो न गुणा रामजिया सजिया न सियकित्ती। चित्तालिहियनरस्स व मणुयत्तं मह मुहा जायं ॥ ४१ ॥ मावालकालओ नंभयारिणो जे कयधया जाया। ते पुनपयं न वयं विसहि विडंबिया इय जे ॥ ४२ ॥ जय देवगुरु- पसाया एयवसणाउ 'कछवि छुहिस्सं । गिहिस्सं ता नियमेण राधविरश्चयं सुत्यं ।। ४३ ॥ एवं गहाणुभावो चिंतह सद्धम्मगग्गमणुपत्तो। दूरं धणावलीवि य पकंपए भउभयुभता ।। ४४ ॥ पत्तोय पवंचमई पहरिराउपारिसिया कहर कुमई । श्य फाडिगं मण्यं संधसु जर संघिउ तरसि ॥ ४५ ॥ श्य भणिय गयाग तीए सेहिणो कहर सा तमागंतु । तो सो गुयतधसणो खणं भया निलो जाओ ॥ ४६॥ तियराोध निनिमेसो निभरनिहोध नट्ठमणविती । कयमोणो सज्शाणो जायगुच्छोष निणेठो ॥ ४७ ॥ कि कायद्यविमूढं तं पहुं जंपण पवंचगई । कि सेहि गरिहगई विनहबुछिप लक्खियसि ॥४८॥ किं कायरोध कंपरीि रणरसियभडोध धीरिगं धरसु । केत्तियमेतं कर्ज इमं कुसग्गीयनुद्धीण ॥ ४९ ॥ जइ, वि कुमईए कहिए विहिओ रायेण भउदढावेढो । तुह तणओ मरणंतघसणं पत्तो जरवि शर्णित ॥ ९५०॥ तहवि हु तमा जइसन जहा दधक्खओ लहसइ न जसो । न विणराव तुह तणओ जणाणुराओ न जाह जाइ ।। ५१॥ नवरं नियवहुयं गह अप्पसु तं देवमंदिरे खिविउं । जह वंचिय समईप सुहढे कगि तं असई ॥ ५२ ॥ गोसे वाह- रिय निवो जंपड़ जइ किपि ता भणेज तुगं । सपिओवि मह सुओ पटु निसाप रुसि कहिपि गओ ॥ ५३ ॥ एवंति भणिय बहुयं सिंगारिय से समप्पाप सेही । नियराम्गयमहिलाओ मेला गंतु रागेहे सा ॥५४ ।। वजिरवद्धावणयच्छंद- पणततरुणपरियरिया । अयसंकलसंदाणियकमकंतिमईग संजुत्ता ॥ ५५ ॥ सह गियमंजुस्सरतूरिपहिं गायंतकागिणी- कलिया। चलिया मंद मंदं पत्ता य कमेण देवउले ॥५६॥ सवणासन्ने ठाउं कित्ती(कति)गरं जंपर पवंचगई । अन्तो गंतु ॥२७॥ FE दीपक- पूजायां तर भुवन- प्रदीपकथा F तुमए असईवेसो नियसियवो ॥ ५७ ॥ ठायचं पइपासे होइ अणत्यो जहा न से गोसे । अप्पियनियनेवत्यं मह पासे पेसियवा सा ॥ ५८ ॥ इज जंपिऊण चलिया खलिया य भडेहिं इय भणंतेहिं । लभइ न इह पवेसो रायाएसो जतो एसो ॥ ५९॥ एत्थ पविट्ठो चिट्ठइ रुद्धो असईजुतो नरो कोई । ता पूइज्जह गोसे देवयमिहि पुणो वलह ॥ ९६० ॥ तो तेसि पवंचमई वियरइ सवेसि कुसुमतंवोले । “दूरे इयरे थड्डा वि हुंति दाणेणमणुकूला" ॥ ६१ ॥ पुन्नं मह दुहियाए उवजाइयमेथ तो इमा पत्ता । "अवरावि पूयणिज्जा देवी सप्पञ्चया किन्नो" ॥६२॥ अज इमाए तइजो उववासो आसि जं इमं वणियं । ता तुम्भे करुणाए एक्कमिमं चिय पवेसेह ॥६३॥ जइ अन्ज इमा अञ्चइ न देवयं ता न मुंजए नूणं । ता मुत्तुमिमं एयाए जीवियत्वं पयच्छेह ॥६४॥ एत्य ठिआ वि अम्हे भत्तिं देवीए गीयनदे॒हिं । पयडिस्सामो पसि ता कुणह इमंति तीउत्तं ॥६५॥ तो ते दक्खिन्नदयाहिं पेरिया विति भइणि तं चेव । एका गंतुं पूइत्तु देवयं झत्ति निग्गच्छ ॥६६॥ तं सोउं कंतिमई पूयापडलं करे कलेऊण । देवउलम्मि पविट्ठा ठिया अणुट्ठिय जहुदिहें ॥६७|| नाचणगाणवग्गाण ताण रमणीण पासमणुपत्ता । कंतिमईनेवत्थप्पच्छाइयतणुलया असई ॥ ६८॥ वजिरवद्धावणया वलिंउ पत्ता पोलिदे सम्मि । स्वय-अद्धं दाउं विसजिया तूरिया तुरियं ॥६९॥ पहसंतीउ पविट्ठा पुट्ठाओ पउलिरक्खयभडेहिं । किं नो वजइ तूरं पढइ इमं तो पवंचमई ॥९७०॥ अट्ठह तेत्तउं वनइ जेत्तउं पोलिहि वारु । अंइरुद्धो वि न रुन्भइ सहुँ परिणिए भत्तारु ॥७१॥ रायसमीवंगीकयपुन्नपइन्ना अईव सा तुट्ठा । “थोवावि कन्जसिद्धी तोसकए किं पुण न बहुया" ॥७२॥ पुरम- ज्झमागयाओ विसज्जए सा सहीओ सबाओ । "सिद्धप्पओयणाणं किं कजं जणसमूहेण" ॥७३॥ वद्धाविऊण सेहिं गंतूण निए गिहमि सुत्ता सा । “निचिंताणं निदा जायइ जइवा किमच्छरियं" ॥७४|| सूरुग्गुमसमयम्मि वि संनझंतम्मि तम्मि १ (पाठांतर-अइ इटेवि न लज्मइ सहुपरणिए भत्तारु ॥ ॥) IEना ueuent श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुन्द्धत पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ २८॥ भडविंदे । सपिओवि कित्तिसारो निग्गतुं ते पयंपेक्ष ।। ७५ ॥ किं तुन्भे सन्नाह पिउणा अवमाणिओ गहिय भज्ज । छ वसिय निसिविराम जाव विपसम्मि वमिस्सं ॥७६॥ वा शह पविट्ठभेत्तोवि वेदिओ कहह को विणासो मे । ते वेंति निवा- मचे पुन्छसु जे तं धरावेंति ॥७७॥ तेणुत्तं मह ताणवि तणओ न भओ जओ विसुद्धोई । “किं काहि भयो वि हु विज्जो नीरोयदेहाम()" ||७८॥ इय भणिरे सेहिसुप आरक्खियमंतिणो समणुपत्ता । दलूण सेहिपुत्तं सकल विन्हिया दोषि ॥ ७९ ॥ सुहडाण व तेसि पि हु कहियं सपि कित्तिसारेण । रायसयासे नीओ भजाजुत्तो वि सो तेहिं ॥ ९८०॥ रायउले निजतं तणयं नाउं समागओ सेट्ठी । "इयरेवि सायरचिय सुयणा किं पुण न नियपुत्ते" ॥८१॥ सुयसेहिसुय- निवतियनयणा पत्ता दुयं पवंचमई । “का संका सक्खं रायवयणपत्ताभयाणहवा" |८२|| असमाणपवंचमइमईए विजि- यत्ति नागया कुमई । “तत्थ न जन्ति सयन्ना पराजओ जायए जत्थ" ॥ ८३ ॥ गंतूणत्थाणत्थं सधेवि निवं नमित्तु उवचिट्ठा । "विणयप्पणई सस्सा सधस्थवि किं न नमणिजे" ॥८४॥ मंतिसयासा सोउं भणइ निवो कित्तिसार कि एयं । सो आह जह पर गुणइ तह इमं किं अलीपण ।। ८५ ॥ "सयमेव देव विसयाहिलासिणो पाणिणो सया तम्मि । पुण परोवएसो घयाहुई सा हुयासम्मि" ॥ ८६ ॥ इय जंपिय कुमइविप्पयारणुप्पनरायरसपमुहं । कहियं रनो "भन्नइ पमाणभूमीए नो अलिय" ॥८७॥ जेण रारीरेण कयं सहउ तयं देव निग्गहदुहाई। "देए पच्छावि रिणे सर दो दिजर न कि तं" ॥ ८८ ॥ आह निवो मा वीहसु जमेकावारं इमाण महिलाणं । अभओ मए विश्नो फाडणसंधाणकोउयो ॥ ८९ ॥ नामाणुसारिणिभिय' कुमईए मई महा अणत्थयरी । "अहवा परिपज्जलिरो दहणो दहणोशिय जत्यो" ॥९९०॥ पेच्छ पवंचमईए भज पक्खिविय कड्डिया असई । नो विनायं केणइ "बुद्धीए अगोयरो नत्थि" ॥९१॥ सेहिसुय नो कयाइवि विस्ससियचं तए कुमहिलाण । जं संपर विस्ससियस आगओ आसि तुह मधु ॥ ९२ ॥ विनवइ कित्ति- ॥२८॥ הברבורבר LEUCUE दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा सारो देवपसाएण जीवियबस्स । पत्तस्स चरिय चरणं भवहरणं सहलयं काहं ॥ ९३ ॥ जइ नो देवो देतो पाणे मह नूण ता अहं इण्हि । उभयभवसंभवाणवि चुकतो चेव सोक्खाण ॥ ९४ ॥ रायाह वच्छ कस्सइ कयाइ भववासमहि- वसंतस्स । दुकम्मेण अवाया हवंति ता मा समुबियसु ॥ ९५ ॥ मा कुणसु वयकिलेसं धम्मो संतस्स होइ गिहिणोवि । "को नाम कुणइ कहूं सइ कजे सोक्खसज्झम्मि" ॥ ९६ ॥ सो भणइ सामि एवं विडंवणा होइ जाण कजम्मि । मह होउ तेहिं विसएहिं वयमहं संपइ गहिस्सं ॥ ९७ ॥ जंपइ सेट्ठी वुझवह देव एसेव जं सुओ मज्झ । करहपडियं व भंडयमिमं विणा फुडइ हिययं मे ॥९८॥ पुत्तेणुत्तं जइ अन्ज पहु तए हं विणासिओ हुन्तो। हुंता केत्तियमेत्ता ता पुत्ता मज्झ जणयस्स ॥ ९९ ॥ जणया जणणीउ पियाउ पुत्तया वंधुणो य संसारे । मुक्का भूरिभवेसुंता मोहो कहह को तेसु ॥१०००॥ "परमत्येणं न कयावि वल्लहो अस्थि कोइ कस्सावि । सोयइ सबोवि जणो नियकन्नं चेव सीयंत" ॥१॥ ता अहमवि नियकज्जप्पसाहणे उजओ इयाणिपि । ता मा भवह भवंतो सबे धम्मंतरायपरा ॥२॥ गहिऊण वयं अनं मुंजिस्सं अन्नहा महाणसणं । तो नायनिवघेणं निवेण मोयाविओ सेट्ठी ॥ ३॥ जणणीवि तत्थ पत्ता पुत्तेण कमे नमित्तु विणयपरं । पाएसु लग्गिऊणं वलावि मोयाविया अप्पं ॥४॥ सम्माणिउं विसन्नइ वत्थाईहिं सपियं सुयं सेहि। राया पवंचमइयपि भणिय नायुज्जया होज ॥ ५॥ कुमइंपि भणइ वाहरिय मा पुणो इय करेज अन्नायं । पुणरुत्तं न खम्मिस्सं ति भणिय तं पि हु विसज्जेइ ॥ ६॥ हाणाइसबसिंगारसुंदरो सिवियमारुहिय पत्तो । इह एसो सेहिसुओ। पवइओ तुज्झ पचक्खं ॥ ७ ॥ खयराहिराय वेरग्गकारणं पुच्छियं जमेयस्स । तं कहियं "ता मोतुं कुसंगमायरह गुणि- संग ॥ ८॥ पायं विणस्सइचिय पत्तकुसंगो जणो सुवित्तोवि । उयरगओ असुइत्ते जुज्जइ परमोवि आहारो॥९॥ सगुणमि गुणाहाणं पावइ पत्तो जणो अजन्तोवि । रमणिनयणे कलुसंपि कजलं सोहमुबहइ ॥ १०१०॥ कायबो בובת म

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुन्दृतं
पूजाष्टकम्
दीपक-
पूजायां
भुवन-
प्रदीपकथा
॥२९॥
LCLELUEUELEMEUeLen
गुणिसंगो तम्हा पुरिसेण उज्झिय कुसंगं । पत्ते सिणिद्धदुद्धे मुद्धोवि किमविलं पियइ" ॥ ११ ॥ खेयरवई पयंपइ पहु
सिद्धिवहूवरो इमो होही। जो एकम्मिवि एवं पडिबुद्धो आवयाए भवे ॥ १२ ॥ पहु अम्हेवि हु पुन्नेकमंदिरं जेहिं
थावरे तित्थे। चलिएहिं जंगमं तित्थमुत्तमं तमिह संपत्तो ॥ १३ ॥ एत्थंतरे करेणुक्खंधगओ छत्तअन्तरियतरणी ।
राया चउरंगवलो पत्तो केवलिकमे नमः ॥ १४ ॥ वंदिय सेसे मुणिणो सलाहिउँ पणमित्रं च नवसाहुं । उवविठ्ठो
तो वंदइ तस्संतेउरमवि समग्गं ॥ १५ ॥ तम्मझे निवकन्ना नियरूवजियामरी कणयवन्ना । पत्ता मत्तामरहस्थिमंथ.
रफमकयागमणा ॥ १६ ॥ लीलाचलच्छिविच्छोहखोहियासेसतरुणनरनियरा । दीवपहानामेणं सारसुहासारसियहासा
॥ १७ ॥ दट्टण केवलिं सा हच्छं मुच्छं गया मयंकमुही । सीओवयारसंपत्तचेयणा पुच्छिया पिउणा ॥ १८ ॥ किं
वच्छे मुच्छागमणकारणं तुह पयंपए साचि । पुच्छसु गुरुणो इय भणिय केवलिं नमिय उवविट्ठा ॥ १९ ॥ कयकर-
कोसो नमिऊण केवलि पुच्छए निवो भयवं । किमु मुच्छिया मह सुया भणइ पहू निसुणसु नरिंद ॥ १०२० ॥
सरसाहिट्ठियपहियं सरसाहियसत्तुसुहडसंदोहं । सरसाहिलसियवासं पुरमत्थि विसालसालंति ॥ २१ ॥ रविउदया-
रद्धदिणंतमुफणिभवणकयकुकम्मेण । पत्तारसआहारो अकिंचणो तत्थ अत्थि नरो॥ २२ ॥ निम्मंसमुही नित्तेय-
कालदुबलकरालकाया से । मुत्तिमइचामुंडव भारिया आसि विगयासा ॥ २३ ॥ खंडणरंधणपीसणजलवहणगिह-
प्पमजणाईहिं । परधरपत्तकुभोयणकयहिई गमइ दियहे सा ॥ २४ ॥ सिसिरे सहति सीयाई गेम्हसमयंमि तिघर-
वितावं । मलकलयकुचेलाई दोनिवि मुणिमंडलाइं व ॥ २५ ।। जुन्नकुडीरयछायणजे कइयावि दोवि मत्थं ।
भमिराई गुरुअरने नियंति आयावयंतं मं ॥ २६ ॥ भणिया अकिंचणेणं भजा नमिमो इमस्स पयपउमं । जेणजेमो
अम्हे अब्भुत्तम-पुन्नपन्भारं ॥ २७ ॥ तो दोन्नि वि भत्तिवसप्पसरियरोमंचअंचियंगाणि । भूमियलमिलियभालयलमणहरं
॥ २९॥

दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा मज्झ पणमन्ति ॥ २८ ॥ दुहुँ विसुद्धभावं तेसि मए तयणु उवविसेऊण । उवविट्ठाणं दिन्नो दोण्हवि सद्धम्मउवएसो ॥ २९ ॥ आयन्नह भो तुम्भे पंचिंदियजाइपमुहसामग्गिं । पावेउं नायबाई देवगुरुधम्मतत्ताई ॥ १०३० ॥ रागदो- साईहिं दोसेहिं अदूसियं मुणह देवं । निगंथं गीयत्यं तत्तरयं जाणह गुरुपि ॥ ३१ ॥ जइगिहिभेएहि दुहा बुझह धम्म जिणेहिं पन्नत्तं । पढमं दसप्पयारं वारसभेयं पुणो वीयं ।। ३२ ॥ जीवाजीवा पुन्नं पावासवसंवरो य निन्जरणा। वंधो मोक्खो य इमं आयन्नह तत्तनवगपि ॥ ३३ ॥ देवगुरुधम्मतत्तत्थसदहाणेण होइ सम्मत्तं । मूलं सबुत्तममो- क्खकप्परुक्खस्स इममेव ॥ ३४ ।। फलसलिलधूवदीवयअक्खयनेवजगंधकुसुमेहिं । पूयइ सम्मदिट्ठी इय जिणमहहिंवि पूयाहिं ॥३५॥ सवाउ वि अतरन्तो पईवपूयं करेइ जइ भयो । ता सा एक्कावि हरेइ तस्स पावाई भणियं च ॥ ३६॥ "जो देइ दीवयं जिणवरस्स पुरओ पराए भत्तीए । तेणेव तस्स डझइ पावपयंगो न संदेहो" ॥३७॥ मणुयत्तं संपत्तं मा नेह मुहा करेह सद्धम्मं । तुम्हाण हियं कहियं जुत्तमिम चिय गुरूणहवा ॥ ३८ ॥ जपंति दोवि नियजोग्गयाणुमाणेण तुम्हमाएसं । काहामो भयवं जं सुकएणम्हेहिं तं पत्तो ॥ ३९ ॥ इय जंपिय भत्तीए मं नमिङ दुव्भभारए गहि। दोन्निवि गयाई गेहे भगभावेण वटुंत्ति ॥ १०४० ॥ नयरप्पहाणजिणदत्तसेद्विणो मंदिरंम्मि कम्माई । कुर्वताणं ताणं दोण्हवि दीवूसवो पत्तो ॥४१॥ दाऊण सेट्ठिणा सालिपूयघयपमुहमेवमुत्ताई। सगिहे भुंजह जह जाइ तुम्ह वरिसोवि सोक्खेण ॥ ४२ ॥ ते विति अम्ह दंससु जिणेसरं सेहि जेण तस्स पुरो। काऊण घएणं दीवयं वयं सुकय- मजेमो ॥ ४३ ॥ दृण धम्मबुद्धिं जातो तेसिं कयायरो सेट्ठी । "गरुयाई परंमिवि पक्खवाइणो किन्न धम्मपरे" ॥ ४४ ॥ इहिपि चलह इय भणिय तेहिं सह जिणहरम्मि संचलितो। “अवरंपि पत्थियं कुणइ सज्जणो किं न पुण धम्म" ॥ ४५ ॥ तिन्निवि पत्ताइं नियंति रुंदजिणमंदिरं गयणलग्गं । भूयतरुपत्तपंतित्तियतोरणसियदुवारगं ॥ ४६ ॥ जनकप श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्भुत पूजाष्टकम् दीपक- पूजायाँ भुवन- प्रदीपकथा ॥३०॥ अनिलचलिरद्धयावलिकिंकिणिगणघणरणज्शणारावो। घग्घरयखलहलस्सरगिस्सो गुएरइ नई जत्थ ॥ ४७ ॥ मणि- जणियदेवउलियामंडलविष्फुरियकिरणनिउरुबो । रोहिणगिरिध रेहा जणपुन्नागरिसिभोध जहि ॥४८॥ केवलनाणा- लोओष जत्थ लंबंतमोतिओजोओ। फलिहमऊहसमूहो भघविवेओ विव' विहाई ॥ ४९ ॥ उशिरकप्पूरागरुपरिमल- मांसलियसुमणसामोशो । वित्थरइ जत्थ दूरं धम्मियजणपुन्नपसरोध ॥ १०५० ॥ सेट्ठी तेहिं समेो पविसंतो तम्मि नियर अजियजिणं । जय जय जयत्ति भणइ य सीमंतयसंगिफरकोसो ॥५१॥ उवसंतकंतरूवं तेसिं तं दसए अजियदेवं । बहिरंगअंतरंगारिवग्गनिग्गहणपत्तजसं ॥ ५२ ॥ एसो समग्गसग्गापवग्गसुहसंगदायगो दूरं । ता एवं पूएउं अप्पहियं कुणह श्य भणइ ॥ ५३ ॥ तं सोउं ताई मणप्फुरंतगुरुभत्तिभरधरंगाई। पसरियपरिओसवसुल्लसंतरो- मंचनिचिया ॥ ५४ ॥ उल्लसियअमंदाणंदजायथोरंसुपूरियच्छीणि । परिकलयंताई सजम्मजीवियधाण सहलन्तं ॥५५॥ सुरहियएणं काऊण दीवए ताई दोन्नि वि मुयंति । जिणपुरो पणगन्ति य पहुं महीमिलियभालाई ॥ ५६ ॥ कुलयं ।। तयणन्तरं पयाहिणपुरस्सरं नमिय रइयकरकोसो । सेहि अजियजिणिदं भत्तिभरो थोउमारतो ॥ ५७ ॥ "जस्सानमंति सिरिसोणमणिपहापयडभत्तिरायध । अमरेसरा थुणिस्सामि तं पहुं अजियनाहमहं ॥ ५८ ॥ मणवयणनयणहत्था धन्नाणं सुहा अजिय तुज्श । सुमरणथवणालोयणपूयणकज्जेसु जे सज्जा ॥ ५९॥ वइसाहसेयतेरसितिहीप तं चत्तविजय- वासोवि । पहु विजयोयरवासं अलंकरंतो कुणसि चोजं ॥ १०६० ॥ जायं तिजगुजोयं तं माहसियट्ठमीनिसीहम्मि । दह्रण ससंको लजिओघ तबेलमत्थमिओ ॥ ६१ ॥ चइय तए चललच्छि वयं कयं माहसेयनवमीए । इयरोवि अस्थिराए न रजए किं पुण तिनाणी ॥ ६२ ॥ पोसे सियाएफारसीए जेउं चलहपहचंद(?) । लोयालोयपयासं संजाय- मणतनाणं ते ॥ ६३ ॥ चेत्तसियपंचमीए तं सिद्धिवहूए संगमलीणो। इयरंपि मोहिउमलं रमणी किं केवलविरायं WERE ॥३०॥ ज टाटा साUिele दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ ६४ ॥ इय जायपंचकल्लाणमवि पहुं थुणिय चत्तकल्लाणं । मन्नेमिचंदपहुनय भवसायरतिन्नमत्ताणं ॥ ६५ ॥ सेहिस्स पक्खवाओ जिणिंदभत्तीए तेसु संजाओ। "अहवायरो गुरूणं सगुणे विगुणे पुण उवेहा" ॥६६॥ पुणरुत्तं पणयजिणो अकिंचणो सेट्ठिणा सभजोवि । नेउ नियभवणे दिन्नबहुघओ पेसिओ सगिहे ॥ ६७ ॥ तम्मिवि भवम्मि जिणभत्ति- भावओऽकिंचणो धणी जाओ। "अहव न तं कल्लाणं जिणपूयाए न जं होई" ॥६८॥ कइयावि आउअंते मज्झिमपरि- णामओ मरिय जातो। भुवणप्पईवनामो पुत्तो निवकुलपईवस्स ॥ ६९॥ तेणेवय भावेणं तन्भज्जा मरिउमेत्य उप्पन्ना। एसेवय तुह तणया जिणदीवयपूयपुन्नेण ॥ १०७० ॥ इह पत्ता में पेच्छिय जाईसरणेण मुच्छिया एसा । निव पुच्छियं तए जं तं मुच्छाकारणं कहियं ॥ ७१ ॥ नमिय गुरुं भणइ सुया रिद्धी पहु तुह पसायओ एसा । मह सपियस्सवि जाया "किंवा न हवइ गुरुपसाया" ॥७२॥ सोऊण कुमरिचरियं जिणपूयाकयमई जणो सबो । रायाइओ गुरूणं नमिय नियट्ठाणमणुपत्तो ॥ ७३ ॥ नयकेवलिकमो नहयरेसरो मणिविमाणविदेण । नंदीसरंमि पत्तो वलिओयऽभिवंदिय जिणंदे ॥ ७४ ॥ नवरं रायसुयादसणाइअणुरायभरपरायत्तो । निवपासे संपत्तो पणयपरो पत्थए कंनं ॥ ७५ ॥ रायाह नहयरेसर जुत्तमिणं किंतु पुच्छिमो कनं । “जावज्जीवियकज्जे काउं जुत्तो न उवरोहो" ॥७६॥ तो वाहरिया पत्ता निवं- तियं रइयरम्मसिंगारा । बाला लीलालससरललोयणुल्लासलसिरमुही ॥ ७७ ॥ काउं पसायमाइसह ताय इय भणइ पिउकमे नमिउं । तो से सायरखयरिंदपत्थणं साहए राया ॥७८॥ सा आह ताय लग्गइ अंगे सोहग्गसंगओ सो मे पुवभवुभवभत्ता अग्गी वा इह भवे ननो ॥ ७९ ॥ नायसुयाअणुबंधो सम्माणिय नयरं विसज्जेइ। सोवि गतो वेयड्ढे "निकनं किं विएसेण" ॥१०८०॥ चिंतइ नहयरनाहो हिययगया दूमए मयच्छी मां। विरहजरजलणजालाजलि- रंगं न(त)हभल्लिव ॥ ८१॥ सा मं न मन्नइञ्चिय गउमसत्तो न तं विणाहमवि । ता हरणमेव जुत्तं महनिवतणयाए :חלחלחל Leuceden अनन्त०६ श्रीअनन्त- নাখণবি- वादुमूर्त पूजाष्टकम् 10 ॥ ३१॥ इक्षिणि ॥ ८२ ।। जाहला निगाहरणेण राइ गरे संगि गाइन सा होती । तारा पछंन निगगि पुरा भितिउ जाति दीपक- ॥ ८३ ॥ गोषिग निसि निग्गंगुनगणो शुगरवारामवर्णते । गारणगईए अहगा "एनीलपराण किगफज" ॥ ८४ ॥ Hn पूजायां तिशिरतुनासशुगएकातणुलयारसपेच्छणगच्छउगा। पगिहाणीगो तेणं गरोणुग्गाडिय पणोलि ॥ ८५ ॥ तो राहा भुवन- रांजासो गहलो भागविगारिरिंगो। साहितरोयं रहगम्गि रणभरे सो जितो तुगए ॥ ८६ ॥ जे रात्गप्पसिला प्रदीपकथा जे' या नीरामगाणो कुसिला । निगरोण पसंतिपिय ते पुरिराा पायपाराहगा" ॥ ८७ ॥ता शुगर गो आई निगदगाए हणणारिदोपि जो तुगए । गुफोति गए फहियो तुझ पुरणो निगगनुतंगो ॥८८ ॥ इय गाा खगराजो सुगंधा पुग- रेणानि नारारणेण । सानिग रागनियं सिनिणगरिष्ट ततं ।। ८९ ॥ भणिगं पा सगर तुगम जार कहिलो तह गएवि पुषभयो । विठो जाश्रारणेण रागणुरा खेगरो भणश ॥ १०९० ॥ सा पलगु तुगं गुप्पूण गंविरहगनि जागि राहाणे। इन जंपिग तगणुष्ठिग नाहगरनाहो गणो रापुरे ॥ ९१ ॥ परिमानिरागमन प्पियाधुरायपशकरणस्रा । उग्गीलिगो गातो गणुराजो रागरणगररा ॥ ९२ ॥ पिता गिग भशा जेसि निगवलाइहिं तुलाण । विपिइपिलासे गुहुरागेतगिया जति विपरााई ॥ ९३ ॥ जह जाए गाजणे गणो तह ना तणूवि पणन्ती । ता नूण न दुतं भिग करराइ परिहविदुरन्तं ।। ९४ ॥ नूणं जागरणाओ निराठीण गरं सगेइ जप निरा। जादूश्या महासंजोगं कुण राहसति ॥ ९५॥ पागुणालियाउ गणे नगणे अलालगनगा जागा। पाहो वो वजहमलामो तरा चिन्ताए ॥ ९६ ॥ वनिरहविणोयणारखागाफीलफिरिगररा । गच्छन्ति पारारा निरहियरस एगरस्रा किन्छेण ॥ ९७ ॥ ॥३१॥ एशंतरंगि गतो गरिपिउपेरिणो गहागंती। अत्थाणां निवाई नगि निशता विणएण ॥ ९८ ॥ पर गणिगंदिर- गयर पयावसारोति नरवई अलि । बीयपाहागलरोहा पीवपलागिहागा तरा ॥ ९९ ॥ पसा यालिपारां गाईसरणेण Mil दीपक पूजायां भुवन- प्रदीपकथा मुच्छिया वाला । निवपुच्छिएण कहिओ केवलिणा तीए पुवभवो ॥ ११००॥ इय भणिय तेण सबं सवित्थर साहियं नरिंदस्स । ता जा पुत्वभवुन्भवपिए कुमारेणुरत्ता सा ॥१॥ भणियं च खयरवइणा विवाहिउँ पत्थियावि न तीए । पडिवनं तवयणं कुमरं पइ जायरायाए ॥२॥ तुह तणयअलाहविओयदाहदझंतगणवणा वाला । लहइ न सुहलवमवि जलिरजलणजालोलिकलियव ॥३॥ धाईए इव अरईए असुहत्थीए वयंसियाएव । दासीहिं व संगहिया कामुक्कलि- याहिं सा दूरं ॥४॥ ता पहु पेससु कुमरं परिणयणकए कुरंगनयणीए । जह होइ जीवियं से "गुरूण दुहिए न जमुवेहा" ॥ ५॥ रायाह सा सइच्चिय जा पुवभवप्पियम्मि अणुरत्ता । सिविणेवि ज सईणं रमइ मणो नन्नरमणम्मि ॥ ६॥ इय भणिय समाइट्ठो कुमरो वीवाहिउं नरिंदसुयं । वच्छागच्छसु तो सो नमिय निवाणं सिरे धरइ ॥ ७ ॥ सम्माणिऊण मंतिं संवाहिय नियसुओ समंतेण । चउरंगचमूचको पट्टविओ हिट्ठहियएण ॥ ८॥ अणवरयकयपयाणो सो मणिमंदिरपुरंमि संपत्तो। "ठाणं चलिरो मंदोवि पावए किं न सिग्यगई" ॥९॥ पट्टओय(पत्तोय)वत्थकयहट्टसोहगुरुमंचतो- रणधयम्मि । रायंगरुहो रना रिद्धीए पवेसिओ नयरे ।। १११० ॥ आवासिओ समप्पियपासाए कणयकलसकमणीए । नरवइकारावियभोयणाइगुरुगोरवमहग्यो ॥ ११ ॥ लग्गदिणे हयगयठियसामंतावेढिओ गयारूढो । छत्तद्धयचामरचय- रायालंकारकमणीओ ॥ १२ ॥ वजिरजयआउज्जो पत्तो वीवाहमंदिरदुवारे । रइयायारो पविसिय उवविठ्ठो कंनयापासे ॥ १३ ॥ इ8 से तीए करं करेण गहिउं पयाहिणियजलणो । उवविसिय रायकुमरेहिं तयणु सम्माणिओ लोओ ॥१४॥ तो नियकलत्तकलिओ चलिओ चडिउं करेणुरायम्मि । रिद्धीए नियावासे पत्तो कीलइ सह पियाए ॥ १५ ॥ ससुरय- सम्माणुम्मीलमाणतोसो दिणाण दसगं सो। तत्थच्छिय नमिय निवं सकलत्तो नियपुरे पत्तो॥ १६ ॥ रत्ना रिद्धीए पुरे सहट्टसोहे पवेसितो कुमरो । नवपरिणीयं पुत्तं मोत्तुं को गोरवहाणं ॥ १७ ॥ पणओ पिउणो पयसयदलम्मि כתבה 1212M या UÇUCUEL 0 श्रीअनन्त- नाथचारि- त्रादुद्भुतं पूजाष्टकम् दीपक- पूजायां भुवन- प्रदीपकथा ॥ ३२॥ सापिगोवि परासीसो । नगि जणणि पलिभो सुचतेगिय ठिगा वाया ॥ १८॥ पिगुपयसेवास तरस तस्स कुगररस जति दिवसा । तं अमिसिंचाइ राया रणे रिटीए कगायि॥ १९ ॥ गीगत्थगुरुसगासे परामणो फगतवो पाहयपापो। उत्पन्ननिगलनाणो रागरिसी सिवपुरं पत्तो ॥११२०॥ नवरागा निरवज पालश रज पगासए नी । ताडर पर गशश महागणं अजए जसं सो ॥ २१ ॥ वंदर गुरुणो पूगर जिणेसरे संघमशए निगं । कारपए पिभूईप राम्जत्तातो जिणि- दाणं ॥ २२ ॥ य वर्णते फाले फसाय दीवयपहार उप्पनो । पुत्तो उत्तगलक्खणगणलंछियहत्थपायतलो ॥ २३ ॥ निरइयवखावणो रयणपश्वोत्ति कुणर पुत्तस्स । नागं संमाणे सहाजणं नरवई दिहो ॥ २४ ॥ नरिसाई पंच पालितु पाढिभो तराणु जोषणं पत्तो। वीवाहियो ग उम्गत्तजोषणागो निवसुगालो ॥ २५ ॥ रागयंतरम्गि कम्मिनि रागा रगणीए सुरियपाहरम्मि । जागरमाणो सजग्गमग्गमणुनिंति लग्गो ॥२६॥ दीवयमेतारवि में पूरााए जसरिसा सिरी जाया । सुषुमाउ वि वडवीगातो जायए नएलिहो साही ॥ २७ ॥ थोवावि धम्मकिरिगा भावेण फया गहाफला होई । लमुयावि दीवयसिधा उज्जोयइ मरुयमवि गेई ॥२८॥ जे पुण कुवति वर्ग से सिद्रियहूवरा धुवं दुन्ति । "अप- भुगफलाणे गप्पायचे पमाणो फो" ॥ २९ ॥ ता दाउं रजसिरि पभायसगए वयं गहिस्सागि । श्य नितिग सुहलग्गे रजे अहिसिंवश कुमारं ॥११३०॥ आरुहिय रयणसिविगं दितो दाणाई वजिराउजो । सूरीण चरणसारागिहाण पासे समणुपत्तो ॥ ३१ ॥ सफलत्तो कश्वयरायसंगतो तेहिं दिक्खितो राया। जातो य साहसिक्खानियक्तणो तक्खणे दक्खो ॥ ३२ ॥ उतिहमहमासंततवनिसेस हियद्विसंहाणो । पडिवोहियभवो जायकेवलो मोक्खमणुपत्तो ॥ ३३ ॥ दीवयपूया शुवणप्पईवरन्नो जहा गहाफलया । जागा तह अन्नस्सवि संपजार तीए ता जयए ॥ ३४ ॥ श्री दीपपूजा ka 5555 शुगणप्पईगराया पीनगपूयाए साहिलो तुम्ह । भुगणणगोगगनिनं निसुणह नेगजपूगाए ॥ ३५ ॥ 555 ESSES ॥३२॥ Lit:

E सबुत्तमेकरायं समत्यि बहुलसिररायरयणंपि । भुवणतिलयाभिहपुरं कुरंगसमनयणरमणियणं ॥ ३६ ॥ जम्मि नैवेद्य- मणिभवणपरंपरापहापहयरयणितिमिरम्मि । वासहरडझिरागरुधूमो उप्पायइ निसं व ॥ ३७ ॥ परमहिओ सुहयगतो सचंदहासो दुहावि सवत्थ । भुवणाणंदो नामेण नरवई अस्थि तत्थ थिरो॥३८॥ तस्सत्थि सबसुद्धंतसारपयसंडिया सलीलगई । कमलमुही भुवणसिरित्ति रायहंसिव पियभन्जा ॥ ३९ ॥ तीए मणं आणंदइ पुत्तो भुवणप्पमोयओ दूरं । 'भुवणप्पमोयओ नाम कामसमरूवरम्मतणू ॥ ११४० ॥ सद्धम्मसरुच्छेइयकुकम्मपरपत्तकेवलसिरीओ। अणुसरि कथा असासयसुहो जइब जो सहइ समरसिओ ।। ४१ ॥ कइया वि सो करेणुक्खंधगतो छत्तअंतरिअतरणी । तरुणीकरसं- चालिअसिअचामरविअन्जमाणतणु ॥ ४२ ॥ नाणाजाणढ़ियामत्तमंडलामंडलीयकयवेढो। चलिओ कुमरो आराममुत्तम पेच्छिउं सवलो ॥ ४३ ॥ भूरिकर्विजलकलिअं दुहावि जं ठि(वि)उसपामरकुलव ।. सहइ सुवन्नासणसंगयं सया राय- भवणं च ॥ ४४ ॥ पत्तो य तम्मि पविसइ तालीहिं तालसालतलकलिउं । कुवलीकयलीलवलीलवंगनारंगचंगम्मि ॥ ४५ ॥ अवरावररमणीयारामपरंपरपरिन्भमणखिन्ने । मुत्तुं गयमल्लीणो अंबयवणदक्खमंडवए ॥ ४६॥ अवयसा- हागयवजकिरणभरकिन्नकणयदंडमि । दोलापल्लंके तूलियाए आरुहिय उवविट्ठो ॥ ४७ ॥ पारकधणुद्धरकुंतकरनरा कुमरपिट्ठिमणुसरिया। पुरओ उवविठ्ठा मंडलीयसामंतमंतिसुया ॥४८॥ पडुपडहमंजुमद्दलआलवणीवेणुसहसंमिस्सं । पारद्धं गाएर चरियं कुमरस्स रमणीहिं ॥ ४९ ॥ कुमरो वि मणोगयरायवासणावसअलद्धलक्खत्थो। ईसिप्पकं- पिरसिरो वीणं वायइ नियकरहिं ॥ ११५० ॥ एत्यंतरंमि गयणाओ मणिमयाभरणभूसियसरीरो । अवयरिउं संपत्तो कुमरपुरो किंनरीनियरो॥५१॥ तम्मझाओ उत्तमरूवाए किंनरीए एकाए। नमिय सविणयं पेच्छण- यपेच्छमन्भत्थिओ कुमरो॥ ५२ ॥ संपत्ताएसाए महापसाओत्ति जंपिउं तीए । पारद्धं पेच्छणयं कुमरपुरो परियण- म) E

-
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धतं
।
नैवेद्य-
पूजायां
भुवन-
प्रमोदक-
कथा
पूजाष्टकम्
॥३३॥
जुयाए ॥ ५३ ॥ वज्जतवेणुवीणासरणुविरेण दिधराएण। हुंफियकंपियकुरलियमुद्दियकागलियरवेण ॥ ५४ ॥ गुंज-
तमदलुद्दामपतुटुकाणुसरियतालरवं । गाएउं पार, कुमारचरियं मिउसरेण ॥ ५५ ॥ तबेउमुवतं तम्मज्झा किंनरीए
पवराए । मणिमयरसणारणशणिरकणयर्किकिणिकलावाए ॥ ५६ ॥ पसरावसरणभमिभमुहभंगकरणफमंगहारेहिं । नचाइ
सा करविनामवसपसप्पंतनगणेहिं ॥ ५७ ॥ निन्मच्छियमिउकलकंठकूश्यं रायमालवेऊण । नशंती सा गायइ कुमरगुणे
चंदकरधवले ॥ ५८ ॥ तन्नदृगीयदिनावहाणिया कुमरपमुहसबसहा । जाया तदेकादिही अचलंगी चित्तलिहियघ ॥५९॥
पसरतीए पसरति उच्छलतीए उच्छलंति समं । तीए जणनयणाई सययं सेवयकुलाइं व ॥ ११६० ॥ अवहियहियओ
जाओ रायसुओ तीए गीयनडेटिं। दाउमणो नियहारं तमच्छिसन्नाए वाहरइ ॥ ६१ ॥ तो सा चलिया रणझणिर-
किंकिणी किंवि कंपमाणथणी । नवनेहरसभरालसनयणेहिं पलोइरी कुमरं ॥ ६२॥ सो वि हु नियहथेहिं थणस्थले
जाव ठावए हारं । ता तीए शत्ति आलिंगिऊण नीओ नहयलेण ॥ ६३ ॥ सहसशिय सेसोवि हु तिरोहितो किंनरीजणो
सयलो । कुमरंगरक्खसंरंभभवभयुभंतनयणोध ॥६४॥ जावारोवियधणुहा धणुखरा तमणुपक्खिवंति सरे । जावुन्छलंति
तं पइ फारफा खग्गवग्गकरा ॥६५॥ तीए ता रायसुओ नरनयणअगोयरे नहे नीओ। जाओ य गयच्छाओ परिवारो
कुमरहरणम्मि ॥ ६६ ॥ गंतुं सहाए कहियं रन्नो मित्तेहिं कुमरअवहरणं । तं सोउं सो जातो मुच्छाए अचेयणो सपिओ
॥ ६७ ॥ सिसिरकिरियासमुवलखचेयणो रुयइ दुइभरणांतो । पागयनरोध सह पिययमाए सुयविरहविहुराए ॥ ६८ ॥
हा सूरकुमर हा धवलचमरवीश्यसरीर हा धीर । वुड्डावत्थं मुत्तूण मं गओ कत्थ तं कहसु ॥ ६९ ॥ हा कुंददसण हा
विगयवसण हा ईसिहसणपरिलसण। हा कोमलकेस हहा सुवेस' हा रंजियसदेस ॥ ११७०॥ हा जणयभत्त हा
सारसत्त हा नायदेवगुरुतत्त । हा पुरिसरयण हा गरिमगयण हा अगियसमवयण ॥ ७१ ॥ को जाय तुमं गुत्तुं पहाय-
הבובותבובבו
॥३३॥

Jencा वाटा नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा समएवि मे कमे नमिही। को वा रयणाभरणे दाही वंदीण परितुहो॥ ७२ ॥ सिंगारसुंदरंगो अस्फालितो करेण को कुंभं । आणंदिस्सइ पउरे करेणुकीलारसं पत्तो ॥ ७३ ॥ मंडलियमंतिसामंतमित्तदासंगरक्खपडिहारा। कुमरावहार- गुरुसोयसल्लिया तत्थ कंदति ॥७४ ॥ एत्यंतरंमि अत्थाणकणयथंभाउ रयणपुत्तलिया। उत्तरिया मणिमंजीरमंजुझंकार- रमणीया ॥७५॥ लीलाए चंकमती पत्ता रायंतियं भणइ एवं । आयन्नसु निव सुयहरणकारणं चयसु सोयभरं ॥७६॥ दहूण सालिहंजियपुत्तलियं विम्हिओ सपरिवारो । भणइ निवो भद्दासणमलंकिउं कहसु मह देवि ॥ ७७ ॥ तो सालिहं- जिया सा उवविठ्ठा तम्मि आसणे अहवा । "कीरइ अन्नस्स वि विणयपत्थियं किं न नरवइणो" ॥७८॥ अञ्चतविम्हिय- मणो सपरियणो सो निसामिउं लग्गो। कलकंठविलसिरसरा रंनो सा साहिउं लग्गा ॥ ७९ ॥ वहुसामो वि सुतारो सुपत्तनयसुंदरोवि नयरहिओ। अचलो विसत्वयावि हु वेयड्ढो अस्थि गिरिराया ॥ ११८० ॥ तत्थत्यिभूरिभूमिगभ- वणेहिं एकभूमिगविमाणं । सग्गपि निजिणंतं रहनेउरचकवालपुरं ॥८१॥ नियतणुतेयविणिज्जियकणयपहो तत्थ अस्थि कणयपहो। खयरवई बहुविज्जावलदुल्ललिओ ललियदेहो ॥ ८२ ॥ चाईकयकणयसिरि कणयसिरीनाम अस्थि से कंता । देवगुरूणं पणया पणयावज्जियसयलसयणा ॥ ८३ ॥ सोहग्गेणं गोरि रुवेण रई सई पहुत्तेण । अणुकुवंती कन्ना समस्थि से भुवणलच्छित्ति ॥ ८४ ॥ उवणजोबणजुत्ता विलसिरलायंनपुंनगत्तावि । असईदासीसहियावि च्छेय- निस्सेससहियावि ॥ ८५ ॥ कयउन्भडंगभोगा विनट्ठनिस्सेसरोगसोगावि । विनाणगुणवियड्डावि थीकलाविसयपोढावि ॥८६॥ जणयजणणीवयंसीदासीहिं सया भणिजमाणावि । ण कुणइ मणयंपि मणो पुरिसं पइ वीयमोहत्व ।। ८७ ॥ कुलयं । सिंगारियपि पुरिसं दणं कुट्ठियंव नियदिहिं । मउलिज्जतिं वालइ उवेयवसेण सहसत्ति ॥ ८८ ॥ चित्तट्ठियं पि. रुहत्व नरं परंमुही होई । सिविणयसच्चवियंपि हुन नियइ पुरिसं ससुरयंव ॥ ८९ ॥ पावकहं व निवारइ कहिज- ।

भीअनन्त- नाथचरि- जादुनृतं पूजाष्टकम् नैवेद्य- पूजायाँ भुवन- प्रमोदक- कथा ॥३४॥ माणि पि पुरिसचरियकाई । कजेवि नरं नालवइ विहियगोवज्झमिव बाला ॥ ११९० ॥ एवंरूवं दुहियं दट्टण विचिंतए खयरराया। कस्सेसा दायघा मए नरसिणी कन्ना ॥ ९१ ॥ देसिज्जए इमाए जो जो सो सो वरो न पडिहाइ । आहारोष अरोयगरोगपंतस्स सधस्स ॥ ९२ ॥ देववसा जइ जागइ सीलभंसो इमाए ता होइ । गोत्तम्मि गुरुकलंको पावमिमाए अकित्ती मे ॥ ९३ ॥श्य चिन्तासंतत्तो वुत्तो कन्ताए नरवई एवं । मा तम्मसु पिय पुच्छसु वरमइसय- नाणिणमिमीए ॥ ९४ ॥ बहुमन्नियपियवयणो तणयं गहिउँ गओ विदेहं सो। माणिकपुरारामे द₹णं केवलिं नगइ ॥ ९५ ॥ उवविसिऊणं सोऊण देसणं पत्तअन्तरो नमिउं । पुच्छ। किं मह दुहिया पहु पुरिसधेसिणी जाया ॥ ९६ ॥ तो भणइ विमलनाणी आयनसु राय कारणमिमीए । जेणेसा संजाया विदेसपरा पुरिसविसए ॥ ९७ ॥ सालीणजणा- वासे रइरुवकुलंगणे जणियसोहो । हसियसरोवसरोहे सालिपुरामिहपुरे रम्मे ॥ ९८ ॥ अस्थि नयजियबहुधणदाण- कयस्थी कयस्थिसंघाओ। सालिप्पियाभिहाणो धणिप्पहाणो धणी विणई ॥ ९९ ॥ जुयलं ॥ अवरोवि खत्तिओ तत्थ अस्थि रणसूरनामो चाई । नवरं तणुविवो "नो पायं चाइम्मि वसइ सिरी" ॥ १२०० ॥ जओ-चाइयणकरपरं- परंपरियत्तणजायगरुयखेयध । अत्था किविणघरत्था सस्थावत्था सुयंतिध ॥ १॥ तस्सोभयहावि पिया विणयवई नय- परा सुसीला य । ईसीसि साहिमाणा "अहव न दोसं विणा कोई" ॥ २ ॥ भत्ता पियमणुवत्तइ पियावि पइणोणुवत्तए चित्तं । वद्धइ दोण्हवि पणो “जइवा नेहो नयड्डाण" ॥ ३ ॥ सालिप्पियस्स कज्जाई साहए सो वि देइ दवणं से । "न निओ वि कुणइ कजं मुहियाए किं पुननजणो"॥४॥ जं किंपि लहइ कत्थइ समप्पए आणि पियाए सो। "पाणावि जम्मि देया तत्थ अदेयं किमवि नत्थि" ॥५॥ सालिप्पिएण कश्यावि पेसिओ सो वहूए आणयणे । चलिओ संदण- पुरनयरम्मग्गमणुसरिय संनद्धो॥६॥ पत्तो अडईए वहुमयसत्ताए वि अमयसत्ताए । जीए सचित्तकाया अमाणसंगावि गाटा EUEIL '॥ ३४॥ - Enem בכתבה CUe नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा J तिरियोहा ॥ ७ ॥ तीए सो नियइ वडाइवियडविडवीहिसंकडिल्लाए । खरतरणिनिहियनयणं आयावंतं मुणिं एगं ॥८॥ दिवो य तेण उप्पाडियासिरोहो भडो तममिहणिउं । जंतो भित्तीए इव खलिओ मुणिओग्गहमहीए ॥ ९ ॥ उग्गहमइक्क- मेउं अतरंतो चउदिसिं परिभमिरो। दितोब भत्तिजुत्तो पयाहिणाओ सुसाहुस्स ॥ १२१० ॥रे मुंड तुंडभंग काउं तं निच्छएण मारिस्सं । इय जंपिरो मुणिं पणमिउं च पडिओ अहोवयणो ॥ ११॥ पडियं झडत्ति खग्गं मुकंव करेण दूरतरयम्मि । मुणिमारणअज्झवसायजायगुरुपावभीएण ॥ १२ ॥ पच्छाहुत्तं वलियं बाहुजुयं साहुवहनिवित्तव । गंतु- मणीहंता इव पत्ता पाया सिरे तस्स ॥ १३ ॥ जातो गीवाभंगो रुहिरं नीहरइ तस्स वयणातो । अहवा जं चिंतिज्जइ परस्स तं अत्तणो एइ ॥ १४ ॥ उद्धट्ठियंमि खग्गे उच्छलिओ सो तयग्गमारूढो । परिभमइ गुरुरएणं वंसारूढो नड- नरोव ॥ १५ ॥ एत्यंतरे अणमा विजुब नहाओ झत्ति अवईना । एका अमरी पिंजरियदिसिमुहा देहदित्तीए ॥१६॥ कुंडलकिरीडकेऊरकडयहारोहसोहधरदेहा । तिपयाहिणिउ नमिउं च सा ठिया साहुणो पुरओ ॥१७॥ दट्ठण तमच्छरियं रणसूरो मुणिसमीवमल्लीणो । पणमिय कयंजलिउडो उवविट्ठो समुचियट्ठाणे ॥ १८॥ एत्थंतरे निसंनो उस्सग्गं पारिऊण साहूवि । भणियं च देवयाए पुणरुत्तं पणमिऊणमिमं ॥ १९ ॥ पहु अहमिमाए अडईए सामिणी इह समागयेण तए । नूणं कया पवित्ता असमप्पसमेकरसिएणं ॥ १२२० ॥ एसो हु पञ्चणीओ पावप्पा कोइ तुम्ह हणणत्थं । इंतो एवं- विहिओ मए अदिस्साए खलिऊण ॥ २१ ॥ भणइ मुणी कयकरुणा देवि इमं मुयसु जाव नो मरई । उवसग्गगहण- कज्जे आगच्छामो वयं जमिह ॥ २२ ॥ साहूणमलंकारो खंतिच्चिय देवि नो पुणो कोवो । उवसग्गपरे नूणं तीए विसओ जओ भणियं ॥ २३ ॥ ज खमसि दोसवंते सो तुह खंतीए होइ अवयासो। अह न खमसि को तुह अविसयाए खंतीए वावारो ॥ २४ ॥ मुत्तुं मुणिमन्जायं को थोपि जइ जई कुणइ । ता सुयतवाइ सर्व निरत्थयं तस्स जेणुत्तं ॥ २५ ॥ ELen . בתכתבתכתבותכן eleneTELEVEL

नैवेद्य-
पूजायां
भुवन-
प्रमोदक-
कथा
श्रीअनन्त-पढउ सुयं धरउ वयं फुणउ तवं परउ घंभचेराए । तहवि तयं सद्यपिट निरत्थयं कोववरायरा ॥ २६ ॥ अम्हाण देवि
नाथचरि-यं वयसपस रिजंगि कुविवि । आपोसाश फुर्णते लाहोति विभावणं जेण ॥ २७ ॥ आगोसाणणमारणधम्मभंसाण-
Pol
बादुद्भुतं वालसुलभाण । लाभ मभए धीरो जाहोत्तराणं अभावग्मि ॥ २८ ॥ अम्हाण गोरखपुरपत्थियाणमेपण फाउगारछ ।
पूजाटकम्
साहेजगो एसो उवयारी गुंच पा एयं ॥ २९ ।। सोऊण सादेसणमसगप्पसमागयप्पवइसरिसं । रंजियहियगा देवी
पयंपिउ एवगारदा ॥ १२३० ॥धशोसि तुगं मुणिरयण तिमतवतेयलविजुत्तोति । काउं खगनिमगवयारपि मित्तं व
॥३५॥
मोइंतो ॥३१॥ एवं पसंसिय गुणि अविद्वगंधाउ तं भउंगु । धम्मगइ संजाया देवी साहसति गुणिवयणा ॥३२॥
सोवि भडो पयलग्गो अवराई खामए नियं गुणिणो । “पूरंपि पाणदाया पुजो अपरोनि उवगारी" ॥३३॥ भणइ य तह
सोमेवि समविए फलुसिगं मणो मज्या । अगरकरे वि विहे कमलं संकुयश जमजोरगं ॥ ३४ ॥ मारणपरे रिउ-
म्मिवि तुइ पटु हियर पवष्टियो पसमो । वाहकरेवि निदाघे सीयं चिय होश हिमसेले ॥ ३५ ॥ ता गज्या देहि विक्खं
पावाओ इमाओ ननहा मोक्खो। "वेरग्गे जंन कयं नूणं तं पारं पच्छा" ॥३६॥तो से विज्ञा दिक्खा गुणिणा देवीए
अप्पिो वेसो । धम्गुज्जयम्मि जइवा मूलं गोक्खस्रा साहेनं ॥ ३७ ।। नवदिफ्राियं परांसिय सहाणे देवया गया
शत्ति । वहूण तमच्छरियं भणश गुणि नमिय रणसूरो ॥ ३८ ॥ दुपारविक्षा ते गामसत्तरस कापरा गिहिधम्म ।
"विजयन जो बुद्धं रोइंगि रसाहिप अहवा" ॥ ३९ ॥ भणइ गुणी गगरायं देवं आयरसु उनिहाय सरायं । गुत्तूण
कामधेणुं किं गिण्डर गदहिं कोवि ॥१२४०॥ नाणालोप गुरुणो गिणासु रविणोध जयपवित्तफरे । परिधरिऊण एगुरुणो
वहलनिसीध समबटुले ॥४१॥ अंगीकरेसु धम्म सोक्सकर दुइयरं पश्य पावं । गुत्तुमजरमरमगयं को गशुकरं गरं
गिलइ ॥ ४२ ॥ कप्पयुमंव वंछियफलयं आयरसु उत्तमं तत् । किंपागं पिय रांगोदकारयं मा पुण अत्तं ॥ ४३ ॥
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॥ ३५॥

Encuen नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा चत्तारिवि एयाई सुदेवगुरुधम्मतत्तरूवाई । नारयतिरियनरामरगईउ चउरो अवहरन्ति ॥४४॥ एयं पवयणसारं काउ- मसत्तो समग्गमवि भयो । एकंचिय जिणपूर्य कुणंति भवा जिणिंदाण ॥ ४५ ॥ सबाओ वि य सत्तो काउं नेवजपूयमे- कंपि । कुवंतो दुकम्मं पाणी पडिहणइ सबंपि ॥ ४६॥ भुज्जइ जंवा तंवा रविउदयत्थमणमझयारम्मि । दिजइ जिणस्स ता भो कयाइ थोपि पुनकए ॥४७॥ पाविजइ परलोए अणंतमप्पंपि इहभवे दिन्नं । धन्नं ववियं थोपि फलइ तं नूण बहुगुणियं ॥४८॥ नियविहवसमुचिएहिं महुराहारेहिं मोयगाईहिं । जिणमञ्चन्ता सासयतित्तिं पावन्ति भणियं च ॥४९॥ "खणतित्तिएण लन्भइ नेवजेणं जमक्खया तित्ती । तं सासयसिवसुहतित्तिं तित्थनाहस्स माहप्पं" ।। १२५० ॥ ता जइ सासयसिवसुहतित्तिं वंछसि अहो महासत्त । ता कुणसु देवपूर्य दाउं भत्तीए नेवजं ॥५१॥ सो आह अज पत्ता चिंता- मणिकामघेणुकप्पदुमा । रंनम्मिवि जं जायं मह पहु तुहदसणममोहं ॥५२॥ ता इहपरलोयहियं कहियं तुम्भेहिं जं तयं काहं । को नाम सिरिमुर्विति पहणइ पायप्पहारेण ॥५३॥ इय जंपिय नमिय मुणिं चलिओ संदणपुरम्मि संपत्तो । मोया- विय सालिप्पियवहुयं गहिउं तयं वलिओ ॥ ५४॥ गुरुवेयवाहणेहिं थेवदिणेहिं पि नियपुरे पत्तो । पणमित्तु मोयगा सासुयाए वहुयाए उवणीया ॥५५॥ तीए वि सयणभवणेसु पेसिया समुचियकमेणं ते। अहवा उचियायरणं कुलंगणाणं कुलायारो ॥५६॥ बहुदक्खेलानालियरक्खंडकप्पूरमिस्सिओ एगो । दिन्नो रणसूरस्सावि मोयगो माणयपमाणो ॥१७॥ वंधुरगंध तं गिहिऊण लग्गो सगेहमग्गे सो । अंतो रमंतसद्धम्मपरिणई चिंतए एवं ॥ ५८ ॥ एएण भक्खिएणं जाव- जीवं न होहिही तित्ती । जाव मुहे ता सुरसो एसो पोट्टंगतो असुई ॥ ५९॥ ता इमिणा सुरसेणं भक्खण करेमि देवनेवघ्नं । ज मह पच्छा दुलहो एवंविह उत्तमाहारो॥१२६०॥ इय चिंतिऊण वलिउं चलिओ मग्गे जिणिदभवणस्स "अहव पमातो काउं किं जुजइ धम्मकम्मम्मि" ॥ ६१ ॥ गच्छंतो संपत्तो जिणालयं नियइ सुरविमाणंव । अनिलचलद्धयnanny FY

-10
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
त्रादुद्धत
पूजाष्टकम्
नैवेद्य-
पूजायाँ
भुवन-
प्रमोदक-
कथा
॥३६॥
रणझाणिरकिंकिणीनियररमणीयं ॥ ६२ ॥ जम्मि जिणसम्मुहानिलचालियबलिनिहियसेयकुसुगाई । पूएउंव जिणिदं जंताई
जवेण सोहंति ॥ ६३ ॥ पुप्फोवहारचुंबणपरा बहुचंचरीयचफाई। जम्मि जिणवंदयतुट्टकम्मनियलाईव सहन्ति
॥ ६४॥ तम्मि पविठो पेच्छए पसंतकतं जिणेसरं रिसह। जय जय जय तिजयपत्ति जंपिरो नमइ भत्तीए
॥ ६५ ॥ चित्तभंतरसगुल्लसंतबहुमाणजायरोमंचो। आणंदवसपवित्तं सुविसरजलधोयगंडयलो ॥६६॥ तं पाव-
मोयगं मोगगं सयं मुयइ सागिकरकमले । सहलत्तं कलयंतो सजम्मजीवियनरत्ताणं ॥६७ ॥ पुणरवि पणमित्तु पढे
खोणीमंडलमिलन्तभालयलं । पत्तो निययावासे सो उफठियपियापासे ॥ ६८ ॥ अन्नोन मिलियाणं ताणुप्पनो महासु-
हुफरिसो। "अवरे वि निए गिलिए होश सुई किं न कंताए" ॥ ६९ ॥ कश्या वि तस्स कंता वुत्ता सालिप्पियष्पिय-
गमाए। किं स्वरसो सो तुह पियस्स जो मोयगो विन्नो ॥ १२७० ॥ तं सोउं सा चिंतश् किं मह न पिएण दिन-
मद्धपि । “जइवा न वलहेवि हु लोहपराणं हवइ नेहो" ॥ ७१ ॥ नियघरजुत्ताजुत्ता वत्ता ननस्स साहिउँ जुत्ता । इय
चिंतिय तीउत्तं अजंतं तम्मि रसवत्ता ॥ ७२ ॥ धणरहियाणवि गेहे लोओ पेसइ जमुत्तमं वत्थु । किं पुण ससुरकु-
लम्मि वि सेसओ तम्मिवि धणड्ढे ॥ ७३ ॥ इय जंपिय नियगेहे पत्ता पियविसयजायअवमाणा। विप्फुरियफारअरई
उवविठ्ठा दूरमुधिग्गा ॥ ७४ ॥ वामकरक्खित्तमुही सरलस्सासा अलद्धलक्खत्थी । पियगयअणप्पकुवियप्पकप्पणुप्पन्न-
संतावा ॥७५॥ चिंतइ पिएणमविभइय मज्झ न कयाइ अत्तणा भुत्तं । अजं तु सुयमिमं "नो दीसइ किं जीवमाणेहिं"
॥ ७६ ॥ तं चिय निवससि महमाणसंमि न तरामि तं विणा ठाउं । इय मायावयणेहिं अहमप्पवसा कया तेण ॥७७॥
धुत्तपउत्तीहिं नरा एवं रमणीओ वेलवेऊण । निम्मल्लमालियाउव कयकजा ज्झत्ति उज्झति ॥ ७८ ॥ मंदमईओ अविवेइ-
णीओ तुच्छाओ अपढियसुयाओ । वरईओ विप्पयारिय' विडा विडंबंति विलयाओ ॥ ७९ ॥ जेत्तियमेत्ता विजा हुंति
॥३६॥

dau Celene WA नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- कथा पवंधावि तेत्तिया नूणं । तो पुरिसेहिं सवसयाओ सुद्धमहिलाओ कीरंति ॥ १२८०॥ दुबिलसियाई काउं कुवियपियाए तमुत्तरं दिति । नियसच्छयाए सवा(सच्चा) इमेत्ति मंनंति तो ताओ ॥ ८१ ॥ इय चिंतावसअचंतजायवरविसयविस- यविदेसा। तं चेव गरुयवेरग्गकारणं धरइ हिययंमि ॥ ८२ ॥ पइविदेसवसाएवि तीए मुकं न विनयकरणिज । "लंघंति न रुहाओवि कुलवहुयाओ कुलायारं" ॥ ८३॥ तेणेवय वेरग्गेण भत्तुणो मोइऊणमत्ताणं । पडिवन्ना बालतवं नवरं न मुयइ पिएणुसयं ॥ ८४ ॥ रणसूरो पुण सरलस्सहावओ सरइ नियगुरुकमणे । दीणाइयाण दाणाई देइ न करेइ अन्नायं ।। ८५ ।। एवं मज्झिमपरिणामवससमजियनराउ निवरिद्धी । मरिऊण भुवणतिलयाभिहपुरनिवनंदणो जाओ ८६ ॥ तन्मजावि तवजियविजाहररिद्धिभोयसंभारा । मरिय सुया तुह जाया रहनेउरचकवालपुरे ॥ ८७ ॥ पुबिल(ल)भवम्मि मया पुरिसबेसेण संजुया जमिमा । इह जम्मेवि तमुबहइ तुह सुया निव नरबेसं ॥ ८८॥ भणियं केवलिणा नहयरिंद तुह कंनयाए पुरिसम्मि । विदेसकारणमिमं पयासियं पुच्छमाणस्स ॥ ८९॥ तं सोउं जाईस- रणनाणविन्नायनियभवा भणइ । पहु तं तहेव सचं तुन्भेहिं जहा समक्खायं ॥ १२९० ॥ तो सो ससुओ नयकेवली गओ नियपुरे खयरराया। जाया य निट्ठियप्पा नियामिमाणे भुवणलच्छी ॥ ९१ ॥ चिंतइ महाणुभावेण तेण तइया न विरइयमजुत्तं । जं मोयगेण विहिया पूया देवाहिदेवस्स ॥ ९२॥ तइया दइए सरले वि दुबियप्पं पकप्पमाणीए महिलाण मए पयडीकयं धुवं तुच्छपयइत्तं ॥ ९३ ॥ जइ हं तं पुच्छंती ता सो तइयावि मह पयासंतो। जं पुच्छिएण तेणं कयाइ वट्ठोत्तरं न कयं ॥ ९४ ॥ इय चिंतती जाया पियम्मि पोढाणुराइणी बाला। नियदुबिलसियसुमरणउविं- विरफुरियरणरणया ।। ९५ ॥ चत्तो रत्तोवि पिओ भवम्मि पुवे इमाए कुवियप्पा । इय चिंतिय कुविएणव कामेण सरेहिं पहया सा ॥ ९६ ॥ दाहो वाहो कंपो हियए नयणेसु देहजट्ठीए । तवेलंचिय तीए संजाया सत्तिया भावा ॥ ९७ ॥ CUCUZL मनन्त०७ UCU2u

CUCU21
श्रीअनन्त-
नाथचरि-
बादुद्भुतं
पूजाष्टकम्
नैवेद्य-
पूजायां
भुवन-
प्रमोदक-
कथा
॥ ३७॥
अरईसूयगसिकारवसविणिक्खंतरत्तदंतपहं । हिययंमि अमायन्तं उबमइ पियाणुरायं व ॥ ९८ ॥ असुहपसरप्पकंपिर-
करजुयनहसुत्तिकंतिपसरेण । धवलंती चंदणरसपंकेणव ताविलं देहं ॥ ९९ ॥ इय पसरियनियपियविरहतावदावग्गि-
दज्झमाणतणू । उज्वेयावेयवसा बाला कह दसं पत्ता ॥ १३०० ॥ गरुयागुणयपुरस्सरपुच्छंतसहीण साहिओ तीए ।
पुवप्पियम्मि भुवणप्पमोयगे निवसुए नेहो ॥ १॥ भणई य जइ तमहं पुवभवपियं हे सहीओ न लहेमि । देमि धुवं
ता जलणस्स आहुई नियसरीरेण ।। २ ।। नहयरनाहस्स सहीहिं साहिओ तीए निवसुए राओ। तो से तोसो जाओ
सुयाए कुमराणुरत्ताए ॥ ३ ॥ जंपइ पन्नत्तिं देवयं निवो देवि आणसु कुमारं । अचाहियं न जायइ जा महजीवियस-
मसुयाए ॥ ४ ॥ तो इह देवी पत्ता पत्ते कुमरम्मि रम्ममुजाणं । काऊण किंनरीपेच्छणच्छलं तीए हरिओ सो ॥५॥
नेउं रहनेउरचकवालनयरम्मि नयरिंदस्स । सो उवणीओ तीए सह कुमरीए पमोएण ॥ ६॥ कयगोरवेण कुमरस्स
राइणा कहिय कंनयाचरियं । भणियं पुत्वभवपियं परिणसु तं वच्छ मह दुहियं ॥७॥ तं सोउं जाईसरणनायनियपुव-
जम्मवुत्तंतो । जंपइ तए जमुत्तं काहं सर्वपि तं किंतु ॥ ८॥ हरिए मए ममंबापिऊण जायं भविस्सइ दुहंतं । जेण न
होहिंति पहूणि ताणि नियपाणधरणस्स ।। ९ ।। तयणु नहयरनिवेणं कुमारकुसलप्पउत्तिकहणकए। तुम्हतियम्मि पंन-
त्तिदेवया पेसिया एत्थ ॥ १३१० ॥ एयं समहिट्ठिय सालिभंजियं कणयथंभयग्गाओ। अवयरिय मए कहिओ तुह
सुयअवहरणवुत्तंतो ॥ ११ ॥ इय भणिऊणुच्छलिउं सहाणे सालिहंजिया पत्ता । अत्थाणजणो सबोवि विम्हिओ नरव-
इप्पमुहो ॥ १२॥ जंपति सबसामंतमंतिणो देव पेच्छ अच्छरियं । जं जंपति सजीवारमणीओव रयणपडिमाओ
॥ १३ ॥ देवोच्चिय पुन्नपयं जस्स सयं खेयरी ठिया वहुया । किं कामदुहा घेणू अभद्दनरगेहमल्लियइ ॥ १४ ॥ एवं
जपंताणं ताणं सो वासरो वइकंतो। माणियसुहनिदाणं झडित्ति रयणिवि अवसरिया ॥ १५ ॥ काऊण दिणयरोदय-
।
मायालयाच्या
UEDET
॥३७॥

EL नैवेद्य- पूजायां भुवन- प्रमोदक- करणि रइयरम्मसिंगारो। उवविसइ सहाए निवो नमंतसामंतमन्तियणो ॥ १६॥ एत्यंतरे निलचलइयावलीरण- झणन्तकिंकिणियं । मणिकिरणभरियभुवणं विमाणविंदं समणुपत्तं ॥ १७ ॥ गयणंगणमुक्कविमाणचक्का नीहरिय नहरय- निवेहिं । अणुगम्मतो सालयभुयलग्गो आगओ कुमरो ॥ १८॥ अत्याणसन्निविट्ठ जणयं पणमइ महिमिलियमउली । तेणावि गाढमालिंगिऊणमापुच्छिओ कुसलं ॥ १९ ॥ पुणरुत्तं पणमिय भणइ ताय कुसलं तुहप्पसाएण । कयजणणिपय- प्पणई उवविठ्ठो पिउपयासन्ने ॥ १३२० ॥ सह नहयराहिवइणा रंना काऊणमुचियपडिवत्तिं । उववेसिओ निए सो मणिमयसीहासणद्धम्मि ॥२१॥ सेसावि खयरपहुणो पणमिय दिन्नासणेसु उवविठ्ठा । पणयाए वहुआए भव पुत्तवइत्ति भणइ निवो ॥ २२ ॥ तो सा पणमित्तु कुमारमायरं वामपासमुवविट्ठा । सुयहरणाविणयं खमसु राय इय भणइ खय- रवई ॥ २३ ॥ जइ न हरावेतो हं तणयं ता सुया मरंती मे । विहिओ मए अनाओ इमो सुयाजीवणनिमित्तं ॥२४॥ रायाह एस अनओ न होइ खयरिंद नणु इमा नीई। "समयाणुवत्तणं बहुगुणं च जं सो नरिंदनओ" ॥२५॥ खयरा- हिव वहुसुहमिच्छिरेहिं कहँ सहिज्जए थोवं । किमणंतसिवसुहत्थे कडं न कुणंति मुणिवसहा ॥ २६॥ विणओचिय एसो अविणओवि अहियं नरिंद तुह मन्ने । कन्ना तए विइन्ना ज मह भूगोयरसुयस्स ॥ २७ ॥ इय जंपिय सम्माणो तस्स कतो राइणा खयरपहुणो । परिवारजुयस्स जहा सविम्हओ सो हिओ दूरं ॥ २८ ॥ एवं नरवरसम्माणकरणसंजा- यसमहियसिणेहा । ठाऊणं दिवसदुगं सहाणे खेयरा पत्ता ॥ २९ ॥ नवकंतासंजुत्तो विविहविणोएहिं कीलइ कुमारो उवविसइ य अत्थाणे पिउपासे उभयसंझंपि ।। १३३० ।। कइयावि परभवोचियसुकज्जकरणुजएण नरवइणा ।गुरुरिद्धि- वित्थरेणं कुमरो अहिासंचिओ रजे ॥ ३१ ॥ तो मोहमल्लनामस्स सूरिणो पायपउममणुसरिउं । गहिया दिक्खा रंना तविय तवं सो सिवं पत्तो ॥ ३२ ॥ नवनिवई वि नएणं पालेइ पयं विणिग्गहइ दुढे । समुवनइ विमलजसं कुणइ य पाया UCUe ना वासपूजाया गन्धवन्धुर- कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् ॥३८॥ सद्धम्मकिरियाओ ॥ ३३ ॥ कझ्यावि रणझणमाणकिंकिणीगणविमाणमारुहिउं । गंतुं मंदरनंदीसरेसु गासयजिणे थुणइ ॥ ३४ ॥ सुइसिविणसूझ्यसुयं कइयावि पसविया भुवणलच्छी । भुवणाभरणोति कयं नामं सम्माणिय जणं से ॥ ३५ ॥ बालत्तमइपंतो गाहियबावत्तरीकलो कुमरो । अचभुयरूवातो विवाहितो रायकन्नातो ॥ ३६॥ समयं- तरम्मि रजे भुवणाभरणं निवेसिउं राया। विहियवओ वरनाणी होउं पत्तो महाणंदं ॥३७॥ नेवजेणं पूया जहा कया राइणा इमेण तहा । सासयसिवसुहकजे कज्जा अवरेणवि जणेण ॥ ३८॥ 8 ॥ नैवेद्यपूजा 18- मक भुवणप्पमोयगनिवो कहिओ नेवाजपूयमभिसरिउं । इहि तु वासपूयाए गंधबंधुरकहं भणिमो ॥ ३९ ॥ रम्मारामसरोवरपुक्खरिणिविरायमाणचउपासं । वसुहासारं नयरं समत्थि वित्थिन्नपायारं ॥ १३४० ॥ नहस- निहफालिहगयणलग्गजिणहरसिरग्गमग्गठिओ। खणमे लक्खिजइ जम्मि रखी रयणकलसोब ॥ ४१ ॥ रयणियर- किरणसियकित्तिबंधुरो कित्तिबंधुरो नाम । फुरियप्पयावपसरो पयावइ अस्थि तत्थ पुरे॥ ४२ ॥ धरणिधररइयसेवो जो विजयाणंदकारओ दूरं । अहिजाइकयविणासो चिरायए गरुडपक्खिध ॥ ४३॥ सवुत्तमपत्ताहियच्छायापरमालिया सुहप्पसवा । लइयत्व कित्तिलइया समस्थि रन्नो महादेवी ॥४४॥ तीएत्थि तणुत्थसुगंधबंधुरो गंधबंधुरो नाम । कुमरो अमरोवमरूवरम्मयारमणिमणहरणो ।॥ ४५ ॥ सुकया सियवन्नघरं सिरंव उचहइ जो नियसरीरं । परमहसिय- गुणजुत्तं मुहमिव रयणाभरणजायं ॥ ४६॥ नरनाहमंडलेसरसामंतमहन्तमंतिपुत्तेहिं । सययं सेविनंतो कालं अइवाहइ कुमारो ॥४७॥ कइयावि नियप्पासायचंदसालागवक्खमल्लीणो। विविहविणोयक्खित्तो जा चिट्ठइ सह वयस्सेहिं॥४८॥ ताव सहसत्ति एगो फीरो नियपक्खनीलकन्तीए । हरियालीकलियंपिव नहं कुणंतो समणुपत्तो॥४९॥ । ॥३८॥ הבהבהבהבה UCUZUCUC nadi ever Ele CL वासपूजायां गन्धवन्धुर कथा अच्छरियं जणयन्तो जणस्स कुमरक्कमे नमेउं सो । महुरगिरं पयडक्खरमेवं विन्नविउमारद्धो॥१३५०॥ आरामाहिय- वासो रायसुओ रत्तवयणविन्नासो । तुममिव कुमर अहंपि हु तेणाहं तं समल्ीणो ॥५१॥ ता आयन्नसु कनेणमागतो जेण विनवेमि तयं । निकजाओ पवित्तीओ इंति जइवा न सउणाण ॥ ५२ ॥' तं सोऊण पयंपइ कुमरो कीराहिराय उवविसिउं । रयणासणम्मि साहसु तो सो उवविसिय साहेइ ॥ ५३ ॥ अत्थिरयाहियतुरयं अत्थिरयाहियसुवन्न- वरदाणं । अत्थिरयाहियजणं उदयाणंदाभिहं नयरं ॥ ५४ ॥ तम्मि नमिरनरेसरसिरसोणमणिप्पहापिसंगपओ । उदि- यप्पयावराया समस्थि वित्थरियजसपसरो ॥ ५५ ॥ सच्छप्पयई कालुस्सहारिणी सारसोहसंजुत्ता। उदयावलिब उदयावली पिया अत्थि नरवइणो ॥ ५६ ॥ विलसंतविमलसंखाकयसयवत्तालिचकसंखोहा । उदयस्सिरित्ति उदय- स्सिरिव तीए समस्थि सुया ॥ ५७ ॥ सरलसहावा नियनासियव सिहणस्सिरिब सुपवित्ता । दूरं रत्तं अहरं व धरइ जा वयणविन्नासं ॥५८ ॥ निरुवमरूवं कमणीयजोवणं तं समग्गसोहग्गं । अवलोइउ जुवाणा वहंति दूरं मणुम्मायं ॥ ५९॥ दट्ठण तट्ठहरिणच्छिपेच्छियं तीए नीइनिउणा वि । मुणिणोवि अणप्पवसा हवन्ति किं निविवेयातो ॥ १३६०॥ कइयावि सा सहीयणसहिया सिंगारगारवग्यविया । आरुहिय कणयमणिमयसुहासणं चलिरसियचमरा ॥ ६१ ॥ मुत्तावचूलविलसंतछत्तअंतरियतरणिकरपसरा । सहयारसारमुजाणमागया कीलिडं वाला ॥ ६२॥ परि- पक्कफुट्टदाडिमवीयावलिनिद्धन्तपंतीहिं । हसइब जं नरेसरसुयासमागमणतोसेण ॥ ६३ ॥ विलसंतकुसुमलइयासिय- कलियाचकवालकलियं जं । कुमरीसंगवसुल्लसियपुलयपन्भारभरियंव ॥ ६४ ॥ अवयवणकयलीहरदक्खामंडवमणोमि- राममि । तंमि पविठ्ठा बहुकुसुमपरिमलव्भमिरभमरंमि ॥ ६५ ॥ पेच्छइ अतुच्छअच्छरियकारयं नरमुहं मऊरं सा । विलसिरसुतारचंदयविरायमाणं नहयलंच ॥ ६६ ॥ मुचावलइयमरगयकुंडलकरच्छुरियनिम्मलकवोलं। चंदणमयणा- LEMEen FuuuuN - SUEL UEUEU العلا श्रीअनन्त- नाथचरि- त्रादुद्धृत पूजाष्टकम् वासपूजायां गन्धवन्धुर- कथा ॥३९॥ हीरेहरइयवहुभंगिपत्व ॥ ६७ ॥ भमरउलकालकुंतलधम्मिल्लुल्लसियसियकुसुममालं । सामचउहसिनिसिदिस्सविमलरय- णीयरकलंव ॥ ६८ ॥ दहूं कुमरिं नियचरणचारसंचाररणिरघग्घरिओ । गंतूण संमुहो भणइ कुमरि तुह सागयं एत्थ ॥ ६९ ॥ एहि इहं च वणंतो कयलीहरए सदक्खमंडवए । उवविसि आयन्नसु जं किंपि अहं तुह कहेमि ॥ १३७०॥ तं अवलोइय अचम्भुएफहे सहीउ सा भणइ । कोऊहलमवलोयह जमिमो दीसइ नरमऊरो ॥ ७१ ॥ तह वाहरइ सविणयं मं किंपि हु मज्झ कहिउमिच्छन्तो । ता तं आयन्नेमो उववसिउ साहए जमिमो ॥७२॥ जंपति ताउ सामिणि तुम्हाऽऽणचिय पमाणमम्हाण । कज्जेसु समग्गेसु वि किं पुण एवंविहच्छरिए ॥ ७३ ॥ तं सोउं मुफसुहासणावि कुमरी सुहासणे ठाइ । उवविट्ठासु सहीसुं कहिउं लग्गो नरमऊरो ॥ ७४ ॥ अत्थि गरिहसुरहाविसिट्टवसुहावयंससंकासं । वसुहावयंसयं नाम नयरमइरम्मरमणियणं ॥ ७५ ॥ रयणावयंसयनिवो तं पालइ जो रणागपि रिउं । अस्सत्थ- मुभयहाविहु मुंचइ अस्सत्थमवि सदओ ॥७६॥ तत्थ निवमाणणिज्जो पुज्जो पउराण पउरगुणभवणं । दीहरदिट्ठी सेट्ठी निवसइ नयवद्धणो नाम ॥ ७७ ॥ तस्सत्थि भाइपुत्तो सुरूववंतो धणावहो नाम । उवरयजणउत्ति करेइ तस्स गुरुगोरवं सेट्ठी ॥ ७८ ॥ मुत्तूण नियंगरुहे वियरइ वत्थाइ तस्स परमं से । अहव "गुरुयासयाणं अप्पपरवियारणा नस्थि" ॥ ७९ ॥ परिणाविओ य उम्मीलमाणनवजोवणाभिरामतणुं । धणसेविसुयं नामेण धणवई सीलकुलभवणं ॥ १३८० ॥ कइयावि हु असुहोदयवसओ सो सेहिमाह मह ताय । वियरसु घरस्सिरीए अद्धं भिन्नो भविस्समहं ॥ ८१ ॥ तं सोऊण पयंपइ सेट्ठी किं वच्छ एवमुल्लवसि । तं मोर्चे को अंनो घरस्सिरीसामिओ कहसु ॥ ८२ ॥ अचम्भुयभोयअमाणदाणकन्जे धणवयं कुणसु । अणुकूलंमि मए वच्छ तुज्झ को नाम पडिकूलो ॥ ८३ ।। अवरं च तमेगागी पडिवालसु जाव पुत्तउप्पत्तिं । नूणं जं न मुणेमो वियंभियं विहिविलासस्स ।। ८४ ॥ इय जंपिओवि न मुयइ UEL ॥३९॥ כתבות Ter ដែe.cE and Ena 12cucu वासपूजायां गन्धबन्धुर- कथा कुग्गाहं तयणु ससुरयस्सावि । न कुणइ भणियमजोग्गाणहवा कत्तो गुणाहाणं ॥ ८५ ॥ तो एगते कंताए जंपिओ नाह एव किं भणसि । मा पेच्छसु अच्छीहिं हियएण सुदीहमिक्खेसु ॥८६॥ निचितं संपन्नइ सबंपि ठियाण गुरुसमीवंमि । लवर्णपि सचिंताए भविही भिन्नहियाण पुणो ॥ ८७ ॥ कस्सइ पुन्नेण इमा लच्छी उल्लसइ नजइ न एयं । ता का नाम कुबुद्धी तुम्हाणं भवह जं भिन्ना ।। ८८ ॥ इय तीउत्तो जंपइ तुच्छमई तं न पेच्छसि किमेयं । अहमेगागी एयं गरुयकुडुवं सिरी जाइ ।। ८९ ॥ इय जंपिय सेहिसयासओ सिरिं विभइडं ठिओ भिन्नो। कारावियं च गरुयं तिभूमियं तेण धवलहरं ॥ १३९० ॥ पारद्धो ववहरिउं जलथलमग्गेसु भूरिदविणे स। बुड्डिनिमित्तं दितो दुवं पहुयाइवी न लेइ ॥ ९१ ॥ तुरयारूढो माऊरछत्तअंतरियतरणिसंतावो । हिंडइ वणिउत्तबूहावेढिओ रम्मासिंगारो ॥ ९२ ॥ नो सयणाण न मित्ताण नेव लिंगीण जायगाणवि नो । वियरइ कस्सइ किंपि हु दिति दइयपि वारेइ ॥ ९३ ॥ कूडव- वहारेहिं हत्थं चिय वच्छ गच्छिही लच्छी । इय सेहिपउत्तो भणइ ताय सगिहं विचिंतेसु ॥ ९४ ॥ गहियधणाओ लोगोवि किंपि से देइ सेहिलजाए । “दूरे गुरूण आणा तेसिं लज्जावि सिरिजणणी" ॥ ९५॥ देव(ब)वसेणं कालकमेण पंचत्तमुवगओ सेही । पच्छा सो निस्संको अहियअरे कुणइ ववहारे ॥९६॥ अह तस्स असुहवसओ सिरी समग्गावि नासिउं लग्गा । मग्गिजंतो लोगो दुवयणे देइ नो दवं ॥९७॥ देसंतरेसु वि ठिया वणिउत्ता जायभूरिधणलाहा । दिहावि लोहिउमलं लच्छी किं नो सहत्थगया ॥ ९८॥ सो निक्खिणिही नूर्ण दाहइ न कयाइ मं सुपत्ताण। इय भीयव सिरी भिन्नपवहणा सायरे मग्गा ॥ ९९ ॥ देइ न कणंपि कस्सइ एसो बहुधन्नसंगहपरोवि । इय भाविअ कुविएणव दृड्डा जलणेण कोट्ठारा ॥ १४०० ॥ नवि जाओ नयभोगो किमस्स ता निरुवयारिदविणेण । इय चिंतिऊणव तयं नीय खत्तण चोरेहि ॥ १॥ इंगालचिय जाया धणे निहाणीकए कुकम्मवसा । अवरदविणजणासा कुओ करत्ये विणcrcn uan כתבובת Enाबा वासपूजायाँ गन्धवन्धुर- कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- जादुद्धृतं पूजाष्टकम् ॥४०॥ स्सन्ते ॥२॥ सयमवि दिन्नं न लहइ जणाओ कत्तो कलंतरधणं सो। "उयरहियतणयासा का अंगुलिलग्गसुयमरणे" ॥३॥ मग्गियजणनीयाइं न मग्गमाणोवि लहइ रित्थाई । नियवत्थुपि न लब्भइ जत्थ कहिं तत्थ परवत्थु ॥४॥ ससुरेणावि विइन्नं बहुवाराओ धणं तयंपि गयं । "पत्तावि सिरी झिज्जइ नूणमकल्लाणकलियाण" ॥ ५ ॥ किं बहुणा संजायं दवं सर्वपि से कहासेसं । तो दुटुं सीयंत कंतं कंता विहियविणया ॥ ६ ॥ उल्लवइ दइय तइया न कयं कस्सावि जंपियं तुमए । जइवा दुइवाभिहयाण होइ एवंविहकुबुद्धी ॥ ७ ॥ इय जंपिऊण तीए ववहारकए समप्पियं पइणो । निययाभरणं अहवा "पइभत्ता होइ कुलकंता" ॥८॥ तंपि हु करवि हु दिवसेहिं पेसियं तेण पुवधणमग्गे। अहवा जं जं खिप्पइ हुयासणो दहइ तं तंपि ॥ ९ ॥ पच्छारच्छाइंवि विकिऊण भुत्ताई तेण सवाई। आयविहूणे वित्ते वइज्जमाणे कुओ रिद्धी ॥ १४१० ॥ घरहट्टोवरि गहिऊण कंचणे भक्खियमि तेसिपि । मुको अहव अभग्गाण जाइ पिउदिन्न- मवि रजं ॥ ११ ॥ जासं देयं दुवं न तेसि पासाउ लहइ अवरत्थ । गंतुं तो तत्थेवय निवसइ अचंतदोगच्चो ॥ १२ ॥ जो वसिओ धवलहरे विचित्तचित्ते तिभूमिए सययं । सो वसइ ताव जलसीयधूमिओ जलकुडीरम्मि ॥ १३ ॥ जो मंदपवणपरितरलसिफिरिच्छायमस्सिओ भमिओ। विकयकजे सो भमइ कहहारकयच्छाओ ॥ १४॥ जो संसुत्तो दोलाचलंतपल्लंकतूलियासु सया। सो सुयइ दमसत्थरयमुवगओ बाहुउवहाणो ॥ १५ ॥ पडिजदरंवरेहिं सिंगारो जेण सबया विहिओ । बहुछिद्दडंडियाइं परिहइ सो मलिणवत्थाई ॥ १६ ॥ जो गरुयतुरंगसुहासणेसु आरुहिय सबया भमिओ । परियडइ फुडणखंजंतपयजुत्तो सोणुवाहणओ ॥ १७ ॥ नवरं इस्सरियम्मिव दारिदेवि हु पिया न तं मुयइ । "उदयक्खएसु दइए समचित्ताओ सईउ सया" ॥१८॥ अइसुहिओ होउं सो अचंत दुहभरं समणुहवइ । पाविय संपुन्न- सिरी किं खंडिजइ नय मयंको ॥ १९ ॥ समयंतरम्मि कम्मिवि वीवाहे सेहिपुत्तकन्नाए। पारद्धे नयरजणो निमंतिओ ॥४०॥ בהכח lement En Cu2u वासपूजायां गन्धवन्धुर- कथा भोयणनिमित्तं ।। १४२० ॥ सो चिंतइ अन्ज निमंतणं इहागच्छिही अओ मज्झ। वत्तणकजे जुज्जइ खडाइआह- रणगमणं नो ॥ २१ ॥ गेहेच्चिय अच्छिस्सं जमिह निमंतयनरो खडप्फुडिही । इय चितंतो तत्थ टिओ दिणप्पहर- जुयलं जा ॥ २२ ॥ मज्झंदिणेवि जाए जा को वि न से निमंतओ पत्तो। ता परिभावइ एवं नाहं नाओ गिहठि- ओत्ति ॥ २३ ॥ ता जामि तत्थ सयमवि नियघरगमणम्मि मज्झ का लज्जा। अगयस्स पुणो सयणा लहु रुसित्संति जा जीवं ॥ २४ ॥ इय कहियं कन्ताए सा जंपइ नाह मोहमूढोसि । धणिणो सहोयरेणवि दरिहिणा किं न लजन्ति ॥ २५॥ नाह कुचेलोत्ति दरिदिओत्ति ववहारकरणअखमोत्ति । न निमंतिओ धुवं कुणसु नियमणे मा तुमं भर्ति ॥ २६ ॥ न कयाइ मज्झ भणियं तए कयं कुणसु संपर्यपि तुमं! जं पडिहाइ मणे तं जइ जंपिय सा ठिया मोणे ॥ २७ ॥ इय संगयंपि भणिरि अवगंनिय तं गओ स वीवाहे । "अहव हियाहियविसये कुओ विवेओ जडमईणं" ॥ २८ ॥ अन्मुक्खणभदासणउववेसणपायसोहणप्पमुहं । विरइज्जतिं पेच्छइ पडिवत्ति ईसरजणस्स ॥ २९ ॥ तंबो- लकरे विरइयविलेवणे पत्तपट्टउयवत्थे । भुत्तुत्तरे पलोयइ निग्गच्छन्ते धणड्डनरे ॥३०॥ अभुक्खणपि न लहइ आस- णपयसोयणाइ कत्तो सो। तो तंवकडाहिजलेणभुक्खिय धोयए पाए ॥ ३१ ॥ उवविठ्ठो पडिवालइ आमंतणमत्तणो निरिक्खइ य । वाहरिय गोरवेणं भोइनंतं परजणंपि ॥ ३२॥ विहिय अदिस्सीकरणेब तम्मि दिडिपि न खिवए कोवि । दूरे चिट्ठउ पक्कं न वंजणप्पमुहभोज से ॥ ३३ ॥ तस्स तह संठियस्सवि दिणमद्धप्पहरसेसयं जायं । भोजत्थे निवसन्ति पेच्छइ पज्जतपतिं सो ॥ ३४ ॥ चिंतइ य किं अवन्ना इमाणमहवाउलत्तमचंतं । ज मह नियडा भोयणकब्जे नीया न चेव अहं ॥ ३५ ॥ ता जामि सममिमेहिं मुंजामि निए गिहमि का लज्जा । एवं परिभावन्तो पत्तो नर- पंतिमझमि ॥ ३६॥ दोपासलंदभदासणोवविठ्ठाण ईसरनराणं । मज्झे उवविठ्ठो गहियभायणो विहरे नीए ॥ ३७॥ UCUEIL UCU2102

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
वासपूजायां
गन्धबन्धुर-
कथा
पूजाष्टकम्
॥४१॥
पित्तलपडिग्गहहियगुरुपरियलजुयलमिलणअंतरियं । भूमिगयभायणं से नयणाणमगोयरं जायं ॥ ३८॥ खजूरद-
क्खदाडिमअंबयखारफसफराईयं । दिन्नं अनाण न दायगेण से भायणं दिहं ॥ ३९ ॥ तह सालिसूवसालणयसप्पि-
पफनपेयपमुहाण । किंपिन क्खित्तं अहिस्सभूमितलमुफथाले से ॥ १४४० ॥ दळूण दहिविमिस्सं भुंजतो फुरियगरुय-
अवमाणो । सिररझ्यभायणो तेसिमग्गओ नचिरो पढइ ॥४१॥ हे दारित्र्य नमस्तुभ्यं सिद्धोऽहं त्वत्प्रसादतः । जग-
त्पश्यामि येनाहं न मां पश्यति कश्चन" ॥४२॥ एए मह जणयसहोयरस्स' पुत्तत्ति भायरो मज्झ ।भाउजायाउ इमाउ
भाइणिज्जा इमे सधे ॥ ४३ ॥ जह मंततंतविजाइएहिं सिद्धा हवन्ति अहिस्सा। जाणह तहा ममंपि हु नूणं दारिद-
सिद्धोति ॥ ४४ ॥ जइ होमि न सिद्धोई ता दिहो कि निएहिं वि इमेहिं। सयणेहिं सहिंवि भोयणकरणोवविहोवि
॥ ४५ ॥ सोनं सुहिभावं सयणन्तं परिचयं च दक्खिनं । कुणइ धणड्डेण समं दरिदिणा नेव सधजणो ॥ ४६ ॥
जे भोयणवत्थाइयवहारे काउमक्खमा नूणं । जह मह तह अन्नाणवि न कीरए कावि पडिवत्ती ॥४७॥ सुद्धा जाई
सवुत्तमं कुलं निम्मला कलाओवि । धणरहियाण न किंचिवि सयावि जेणेरिसं भणियं ॥४८॥ "जाई कुलं कलाओ
तिनिवि पविसंतु कंदरे विवरे । अत्थोचिय परिवड्डउ जेण गुणा पायडा हुंति" ।। ४९ ॥ केणावि कारणेणं न इमेहि
पलोइतो श्य भणंतो । नीहरिउ सो अवमाणदूमिओ नियगिहं पत्तो॥१४५०॥ पिय मइ वारतीएवि न हिओ ता एत्ति-
यस्स जोग्गो तं । इय जपिरीए भज्जाए भोइओ सीयरबाइ॥ ५१॥ दारिदेणं दूर दूमिजंतरस तस्स वञ्चन्ति । दिवसा
विसायवसयस्स अन्नया सो गओ रने ॥५२॥ पेच्छइ य तरुछायाए संनिविटे मुणीसरे संते। सिद्धंतसुंदरक्खे
दक्खे सिक्खाए साहूण ॥ ५३ ॥ जे समयग्गंथा इव सहति आयारवाणसमवाया। विनाया धम्मकहापण्हवायरण-
परमाया ॥५४॥ धणनाससयणपरिहवदुस्सहदोगधदूमियगणो सो। ते दळूण सुहोदयवसओ तेसि गतो पासं ॥५५॥
।
॥४१॥

Enenant Eueueen Je मादाद वासपूजायां गन्धबन्धुर कथा भत्तिभरनिम्मरंगो पणमिय' पयकमलमिलियभालयलो। उवविठ्ठो जंपइ पहु गिहिजोग्गं कहह मह धम्मं ॥५६॥ आह पहू आयन्नसु नारयतेरिच्छनरसुरविभेया। भवइ भवो चउभेओ दुहमेवय चउसुवि गईसु ॥ ५७ ॥ पाणि- वह पमुहमहापावा निवडंति पाणिणोणेगे। नरएसु तेसु वि सहति वेयणं विरसमारसिरा ॥ ५८ ॥ तिरियनरभवंतरिया पुणरुत्तणुभूयसबनरयदुहा । बहुसो वि तिरिच्छंते सहन्ति समुवज्जिऊण दुहं ॥ ५९ ॥ सासयविरोहवहवाहदो- हमंसासिमारणाईणि । असुहाई समणुहविऊण केवि अजंति मणुयत्तं ॥१४६०॥ तम्मि वि धम्मविरहिया दीणा दारिद- दुहभरकता । विहलीहूयमणोरहमाला परिभवपयं हुंति ॥ ६१ ॥ देवावि परप्पेसत्तदुसहईसाविसायवियलंगा। अत्ता- णामकयसुकयं निंदता दुहमणुहवंति ॥ ६२ ॥ एवं पावंति सुहं न गइचउकेवि धम्मपरिहीणा । धणवजियब विवणीए नियमणोभिमयवरवत्थु ॥ ६३ ॥ ता धम्मोच्चिय कज्जो दुविहो सो साहुगिहिविभेएहिं । पढमे दुसेव भेया भेया वीयम्मि बारस उ ॥ ६४ ॥ संमत्तजुया दोनिवि दिति सिवं तंपि मुणसु संमत्तं । गयरायदेव-निग्गंथसुगुरु-नवतत्तस- दहणा ।। ६५ ॥ एगयरंपि' असत्तो धंमं काउं करेइ भावेणं । अट्ठप्पयारपूयं जिणाण जं सा वि सिवजणणी ॥६६॥ नेवजकुसुमअक्खयदीवयफलसालिधूववासेहिं । इय अट्ठविहा पूया कया निर्णिदाण भवहरणी ॥ ६७ ॥ अट्ठवि काउ- मसत्तो सत्तो जइ कुणइ वासपूर्यपि । तित्थेसरस्स ता जाइ तस्स पावं जओ भणियं ॥ ६८॥ घणसारहरिणनाही- सुयंधवरवासखेयपूयमिसा । जिणपवणसंगमेणव पावरयं दूरमुड्डेइ ॥ ६९ ॥ ता धम्मसील पत्तं मणुयत्तं मा मुहा तुमं नेसु । समुवजसु वासेहिंवि पूइत्तु जिणं परमपुन्नं ॥ १४७० ॥ इय सोउं सो सद्धम्मदेसणं सूरिणो नमिय भणइ । पहु मह महापसाओ कओ इमं साहिउँ धम्मं ॥ ७१॥ नूण निरीहा तुम्भे परोवयारेकबद्धवावारा। ज मह दरिद्दियस्सवि एवं धर्म समाइसह ॥ ७२॥ इय जंपिय पणयगुरु गहियतणाई गओ. गिहे नियए । कहिओ य-भारियाए.पूया 卐

श्रीअनन्त-
नाथचरि-
গান্তর
पूजाष्टकम्
वासपूजायां
गन्धवन्धुर
कथा
॥४२॥
सवणयुरांतो ॥ ७३ ॥ तीउरागहम्मफलं पिग तुन सा कुणशु ना गग्गं । नेण न गवंतरेलि निलंगणा परिसीमोश
॥ ७४ ॥ रोणुरागिणं फाई जउं गंपिगावणगि गणो। तेण भारगगुरेणं गहिया रातगा पासा ॥ ७५ ॥ रातो
हिगगगन्तरनिरागिणोदागगतिपन्भारो। जिणमंदिरंमि पलिगो रगणगए तग्गि पो य॥७६ ॥ राच्छप्फालिएपी-
दरनिठपरारिया सिगपठागा । जगि सुरेविपि राजा रानिमहगं गगणगंगा ॥७७ ॥ पंगेनिगालवणेसु जरा
परिसंति रयणकरयंडा। रागहोरावणारगणगुफनिणरायवाणप ॥ ७८॥ तो सो पहिचिसो तरिग पविष्टो विशिष्ठ-
जिणभयणे । ज्वरान्सफन्तरूपं अवलोया उसहजिणनाई॥ ७९ ॥ तो निष्णुरंतबटुगाणपरारवसपुलयकलिगतणुजष्टी ।
जाणवणंसुजलगरपणालिगयगणवच्छयलो ॥१४८०॥ उलसियगणो निगरान्तलोयणो पुणए सुरहियारोहिं । पूर्ण पाणो
गिगजम्गराहलयं गमगाणो सो॥ ८१ ॥ जसरिराणामुगाणपो पुणरुतं भूगितलगिलिगमालो । पणगिय पलोश्य घिरं
जिणेसरं मागतो सगिहे ॥ ८२ ॥ कहिगं पियाए वासेहि जिणवरो गृहणोति तो सानि । बंधा अणुपगपुशं पसंरा-
गाणी गं अष्टं ॥ ८३ ॥ कश्यापि योनि निययाउअंतगणुसरिय गरिय जागाई। अगररोणं आरणकप्पे गुररायरारि-
साई ॥ ८४ ॥ एगवीसराागराइं भुखं सुरलोयललिछपिच्छएं । सिद्धाययणजिणगणकरणजिगसुकरासंगारा ॥ ८५ ॥
गविग तो वसुहासारपट्टणे कित्तिवंधुरनिवस्स । जाणो धणावहसुरो गुप्तो पसगाणगुणजुतो ॥ ८६ ॥ धणवा-
अगरोपि पुणो उदयाणंदे पुरम्गि उप्पना । उदियप्पयावरतो कसा उदयस्सिरी नाग ॥ ८७ ॥ हुँतो ई पुषभये तुद
जण गरिय बारसमकप्पे । पापीराराायराऊ संजाओ भासुरो अगरो ॥ ८८ ॥ सं जोवणगणुपत्ता पत्ता कीलाकए
जाणे । पुषविदेहा पलिओ वंपिय जंगमजिणिंदे ॥ ८९॥ मह दिहिपहे पता उल्लसिको पुषभवभवो हो ।
गाया य ओहिणा पुधभवसुया तं तो शनि ॥१४९०॥ कयनरमजररूवेण पत्थ उपवेसिउं गा एगरि । तुद पुषभवा
॥४२॥

חבוב TrenEL वासपूजायां गन्धवन्धुर- कथा दोन्निवि कहिया नियभवदुगेण समं ॥ ९१ ॥ तं सोउं कुमरी जाइसरणसञ्चवियपुवभवचरिया। सिरिगंधवंधुरम्मि अणुरत्ता पुवभवदइए ॥ ९२ ॥ तो झत्ति नरमऊरो चलकुंडलहारकंठकयसोहो । जाओ अमरो वहुरविपयावप- व्भारदुनिरिक्खो ॥ ९३ ॥ तो सा कयप्पणामा पूयइ तं सुरहिपरमवत्थूहिं । "इयरम्मि वि कुलबाला विणयवई किन्न जणयंमि" ॥ ९४ ॥ जंपइ य ताय तुमए जह कहियं तह मएवि सञ्चवियं । पुवभवहुगचरियं सिविणे दिवसाणुभूयं व ॥९५॥ ता तुमए मह कहिओ जो पुत्वभवुभवो पिओ कुमरो । इण्हिपि तं वरिस्सं "सईओ न नरंतरमईओ" ॥९॥ आह सुरो रिद्धीकरी पूया अणुमोइयावि तुह जाया। फलइ वहुं थेवंपिहु वीयं ववियं सुभूमीए ॥ ९७ ॥ तो दिट्ठपञ्चया तं करेज धम्मुज्जमं सया वच्छे । "निच्छइए कल्लाणे न पमाओ जुज्जए जइवा" ॥ ९८ ॥ एवं धम्मुवएसं दाउं सहसा तिरोहिओ तियसो । कुमरी वि गंधबंधुरकुमरे रत्ता गया सगिहे ॥ ९९ ॥ न मुणइ छुहं न पावइ निदं न वियाणए तिसं वाला । जलणज्जालाजलियंव विरहविहुरा वहइ देहं ॥१५००। मन्नइ वीयंव सा चित्तसालियं मुम्मुरंपिव मुणालं। आभरणं दुम्मरणंव पावपूरं व कप्पूरं ॥१॥ एवमवत्थं कुमार दटूण सहीओ तीए नरवइणो । साहिति पुबभवभवद्- इए रत्ता तुह सुयत्ति ॥ २॥ नाऊण निवेणवि सहिमुहेण दुहियाए पुत्वभवदइयं । कन्नपि जाणिउं पियविओयसहणा- सहं दूरं ॥ ३ ॥ तवेलंचिय मंडलियमंतिसामंतधाइसंजुत्ता । बलकलिया पट्टविया सयंवरा कन्नया तुज्झ ॥४॥ तीए अहं सत्थकहाकवविणोएसु सबया सचिवो। तो तं मोयावेठं तं वद्धाविउमिहं पत्तो ॥५॥ चउपंचदिवसमज्झे सावि हु तुह पुवभवपिया एही। इय विनविउ कुमरं कीरो मोणं समल्लीणो ॥६॥ तं सोउं जाईसरणनायनियपुबभवदुगो कुमरो। कुमरिं पड़ जायदढाणुरायवसपरवसो जाओ ॥ ७ ॥ चिंतइ तइया दइया निचंपि हियं पयंपमाणीवि । न मए तिणंव गणिया अहो अहंकारमूढेण ॥ ८ ॥ दुईत्तोवि दरिहोवि दुम्मुहोवि हु सईए तीए अहं । ईसरसेहिसुयाएवि अनन्त०८ PLE Cucu दपत वासपूजायां गन्धनन्धुर- कथा श्रीअनन्त- नाथचरि- जादुदृतं पूजाप्टकम् ॥४३॥ पुवभवे नेव परिहरिओ ॥९॥ ताहमावि पुवभवभवकतं मोत्तुं न काहमन्नपियं । रंजिज्जइ इहभविएवि किं न परभवभवे- रत्ते ॥ १५१० ॥ इय परिभाविय विजावण? नियमुहियाउ कीरस्सा । निक्खिवइ चरणजुयले कंठमि पुणो रयणकडयं ॥ ११ ॥ भणइय कीर तुम उभयहावि सउणो कहेसि कल्लाणं । नहि निग्गुणाण एवंरूवपवित्ती हवइ नियमा॥ १२ ॥ ता तं गंतुं कुमरीए कहसु कीरेस इय मह पइन्नं । तीए जहा संपजइ मह विसए मणसमाहाणं ॥ १३ ॥ आएसोत्ति भणित्ता तयणु सुओ उड्डिऊण संपत्तो । कुमरीपासे सोऊण तं ठिया सावि संतुहा ॥१४॥ कुमरवयंसेहिं इमं सबंपि हु साहियं नरिदस्स । तं सोउं तेणुत्तं किमजुत्तमिमम्मि कल्लाणे ॥१५॥ जं गुरुयरायकुमरी सयंवरा एइ गुरुनिवसुयस्स । इहभवभवावि किं पुण भवन्तरुप्पत्तअणुराया ॥१६॥ इय जंपिय कारविया पुरसोहा राइणा पहिढेण । मोत्तुं वीवाहमहं गिहीण परमूसवो नन्नो॥१७॥ पञ्चोणीए तीए पेसइ सामन्तमंतिमंडलिए। "गोरवमियरेवि गुरू विरयइ किं नोणुरायपरे" ॥ १८ ॥ आवासदाणसम्माणकरणसमुहपसागयं तीसे । विहियमियरोवि अतिहि पुज्जो कि पुण नरिंदसुया ॥ १९ ॥ उत्तमलग्गे कुमरो कुमरिं वीवाहिओ नरिंदेण । कुलवुड्डिकरे कजे किं कोइ पमायमायरइ ॥ १५२०॥ तीए सह विसय सोक्खं माणइ कुणइ य सुधम्मकम्मं सो । इहलोइयपरलोइयकज्जेसु समुज्जया गरुया ॥ २१॥ समयंतरम्मि कम्मिवि कुमरं रजमि ठविय नरनाहो । कयपवज्जो संजायकेवलो मोक्खमणुपत्तो ॥ २२ ॥ नवनिवई नीईए पालइ रज्जं अभि- दवइ दुढे । सिट्टे पूयइ मन्नइ महायणं गुणिगुणे थुणइ ॥ २३ ॥ एवं निरवजसरजकज्जकरणुज्जयस्स नरवइणो । जंति दिणाई दिणमणिकरभरसरिसप्पयावस्स ॥ २४ ॥ जाओ कयाइ देवीए तीए सुहलक्खणो सुओ तस्स । काउं वद्धावणयं नामं गुणवंधुरोत्ति कयं ॥ २५ ॥ लालिज्जतो धाईहिं वद्धिओ जाव पंचवरिसाइं । परिपाढिओ य अज्झा- वएहिं सबाउ वि कलाओ॥२६॥ पत्तो य जोवणं तरुणकामिणी नयणमणहरं रंना । परिणाविओ नरिंदाण रम्मरुवाओ IELENEn CUCURL CUEL ॥४३॥ בתכתבת ICE वासपूजायां गन्धबन्धुर- कथा कन्नाओ ॥ २७ ॥ दुटुं तं रज्जमहाभरधरणसमत्थमुत्तमे लग्गे । अहिसिंचइ नियरज्जे राया रिद्धिप्पवंधेग ॥ २८ ॥ काराविऊण जिणइंदमंदिराई गिरिंदरुंदाई । सूरीहिं पइहाविय मणिमयतित्थेसरे तेसु ॥ २९ ॥ सिद्धंतपोत्थयाई लिहा- विउं पूइडं च सिरिसंघ । घोसाविउ अमारिं मोयाविय सवगुत्तिनरे ॥१५३०॥ आरुहिय रयणसिवियं दितो दाणाई दीणदुत्थाण । गुरुरिद्धीए गंतूण सुगुरुपासंमि पवइओ ।। ३१ ॥ अहिंगयसुयसन्भावा पाउन्भूयप्पभूयसंवेगो। निम्मू- लुम्मूलियघाइकम्मवसपत्तनवनाणो ॥ ३२ ॥ महुरस्सरसदेसणपडिवोहियभूरिसबसंघाओ। संपत्तो सो सासयसोक्ख- समिद्धीए सिद्धीए ॥ ३३ ॥ एयस्स वासपूया जह जाया सिद्धिसोक्खसंजणणी । तह अन्नस्सवि जायइ जइयत्वं ता सया तीए॥३४॥ ॥ वासपूजा ॥ ॥ इय तिहुयणसामिअणन्तनाहकहियम्मि अट्ठपूयफले। बहुमाणपसअकलिओ कयंवपरिमल- महीनाहो ॥ ३५ ॥ ॥ इति श्रीअनंतनाथचरित्रगतपूजाष्टककथानकानि । समाप्तोयं ग्रन्यः ॥ श्रीरस्तु ॥ शुभं भवतु ॥ ॥ श्रीः ।। याशं पुस्तकं वीक्ष्य तादृशं लिखितं मया ।। हीनाधिक्यैः स्वरैर्वऎरस्माकं दूषणं नहि ॥ १॥ धम्मधरुद्धरणमहावराहजिणचंदसुरिसिस्साण । सिरिअम्मएवसूरीण पायपंकयपरेणेह ॥ १॥ सिरिविजयसेणगणहर- कणिट्ठजसदेवसूरिजेहेहि । सिरिनेमिचंदसूरीहिं भवलोओवएसट्ठा ॥ २ ॥ सयमेव कयाउ अणंतसामिजिणरायचारु- चरियाउ । पूयट्ठगमुद्धरियं तं नंदउ तिहुयणं जा उ ॥ ३ ॥ पञ्चक्खरगणणाए सिलोगमाणेणमेत्थ जायाइं। पूयहगम्मि सयरीसमहियअट्ठारससयाइं ॥४॥छ ॥ ग्रंथानं १८७० ॥ छ ॥ श्रीः ॥ श्रीः ॥ ॥ * ।। femen CUENC निवेदनम् श्रीजनन्त- नाथचारि- गादुगृतं पूजाष्टकम् - संपादकीय निवेदन - अनंत काणकारी श्री अनसनामा प्रसादिक भतिसुन्दर कपागोस गुम भी पूगाधा पाएको कारकमलों में समर्पण करते अति भानंष होता है, इस परिषफी प्रेस कापी संगर १९९४ में सूरत में ही सैगार हो चुकी थी, परंतु प्रकाशित करने का सौभाग्य तो इस वर्ष पंन्यासागर श्री सुमति विजयजी गणिवर्गानिकी प्रेरणा द्वारा इन गुहस्थोने प्राप्त किया है, ॥४४॥ गुफाम जलधारी कोपरली वापी २०० शाह रायनंद गुलापनंद दलाजी जेताजी ॥ धनराज खीमनंद रायचंद घरखनंद छगनलार प्रेमचंद कस्तुरचंद धनाजी मगनीराम रामसुख घरखनंद बालाजी गुनीलाल जसरूपजी , ज्वरनंद प्रेमनंद शाह केसरीचंद परागजी १२० १०० ५१ ५१ सदायक नाग शाह धनजी ज्वेरभार वापी नगीननंद धूवाजी " रायचंद मागजी " पूनमचंद वीरनंद २५ शिहार पापक और व्याख्या इस गंधरनसे सलाम अच्छारी वापी उठा इति शम् -- ५० ५० ॥४४॥ वेगाम कोपरली आ. विजयक्षमाभद्रसूरि मोरी मेशा (गारपा) शक्षगस्तीगारी. १९९७ ५० ALI Cens

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Author
Nimichadra
Title
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File name
Srianantanathcharitraduddhritam Poojashtakam
Text
OCR done
Citation
1928
Published
2010/01
Publisher
Vijay Kshama Bhadra Suri
Language
Sanskrit
Pages
92
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Keywords
Jain Dharma and Philosophy
DLI number
322138
Barcode
99999990244982.00
Scanning centre
Banasthali University
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