Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Hindi Ratnakar

Kumar,shyam Sundar · 2011/04

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हिन्दी-रत्नाकर
(हाई स्कूल कनामा म निमित्त)
लेखक
वैदिक धर्म विशारद
श्यामसुन्दर गुप्त, हिन्दी भूपण,
माहित्य प्रभाकर, एफ०, PO , ९० टी० सी०
सीनिअर हिन्दी टीचर,
"डी० ए० वी० हाई स्कूल, अजमेर ।
,
,
श्रागरा
लक्ष्मीनारायण अग्रवाल
पुस्तक विक्रेता
१६३८

लक्ष्मीनारायण अप्रवाल बुक्सेलर
हॉस्पिाल गड घागरा।
रापारमन अग्रवाल
मोडी प्रेम नमकमण्डी,

भूमिका अाजकल साहित्य क्षेत्र में क्रमश उन्नति होती जा रही है। अतएव पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त विद्यार्थियों को अपनी विशेष योग्यता करने के लिए अपठित पुस्तकों का पढना अयन्तावश्यक है क्योंकि बिना अपठित पुस्तकों के विशेष योग्यता प्राप्त हो ही नहीं सकती। यदि शिक्षा विभाग की अच्छी पुस्तक स्वीकार करने की कृपा रही तो भविष्य में और भी अधिक उन्नति होती दिरालाई देगी। किन्तु खेद है कि स्कूलों में हिन्दी भापा की शिक्षा फी समुचित व्यवस्था न होने से इस कार्य में सफलता देर मे हो रही है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में पढ़ाई की कसौटी प्राय लिखित परीक्षा है । भापा व रचना कला का पूर्ण ज्ञान न होने से-विपय की जानकारी होनेपर भी-विद्यार्थी अपने स्फुट भाव "परीक्षकों को व्यज्जित नहीं कर सकते । इसका एक कारण हो सकता है कि उनको अपठित विषयानुकूल पुस्तकों के पढने का अवकाश ही नहीं मिला। एक तो अपठित हिन्दी रचना सम्बन्धी पुस्तकों का अभाव है फिर दो एक ह भी तो वह केवल 'लकीर की फकीर' हैं। किसी में प्रश्नों की जटिलता हे तो किसी में अनुच्छेद रचना की क्लिष्टता है । ऐसी पुस्तकों में विद्यार्थियों को शब्दक अर्थ ही टटोलने में घटों लग जाते हैं। इन सब बातों फो दृष्टिगत करते हुए प्रस्तुत पुस्तक 'अपठित हिन्दी-रलाकर' का निर्माण किया है। इस पुस्तक में परीक्षाओं में हिन्दी के दोनों परीक्षा पत्र के सम्बन्ध म श्राने वाली सभी आवश्यक पातों को भली प्रकार मममाया गया है तथा पुस्तक का राचक बनाने का प्रयत्न किया गया है। पुस्तक में जा विशेषताएँ हैं उनका उल्लेख नीचे दिया गया है। पुस्तक की विशेपताएँ १-इम पुरता म जितन लेखकों के नमूने दिये गये हैं हिन्दी ससार में प्राय' वे मभी मान्य योग श्रद्धा भाजन है। प्रारम्भ में दो गयान्शों के लबक राजा शिवमसात 'सितारे हिन्द" और भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र घर्तमान हिन्दी के जन्मदाता और पोपर हैं। इनके अतिरिक्त प्रतापनारायण मित्र, बालकृष्ण भट्ट, प० महागीरप्रसाद द्विवेदी, ५० पद्मसिंह शर्मा, प० रामचन्द्र शुञ्ज, श्री वियोगीहरि, गयरहादुर घायू श्यामसुन्दर दास, बी० ए०, बानू पदुमलाल-पुनालाल बख्शी, महामहोपाध्याय रायबहादुर गौरीशकर हरीचद अोमा, पाबू रामचन्द्र टन्डन, एम० ए० एल एल० पी०, प० हरिशकर शर्मा 'विग्न' और श्री वासुदेवशरण अग्रवाल, एम० ए०, एल एल. वी० आदि सुप्रसिद्ध लेखकों की गद्यान्शो का ममावेश है। -~-अनुच्छेना को मापा प्रौद, गम्भीर, सुवोध और ललित है। ३-पुस्तक में तीन अध्याय है। पहला अध्याय में वो

कक्षा के लिए दूसरे अध्याय में १० वीं कक्षा के लिए. गद्यान्श
और तृतीय अध्याय में मुहाविरे, कहावतों का प्रयोग, अंग्रेजी
गद्यान्श तथा सुन्दर उपयोगी एक निबन्ध और राजपूताना
तथा यू०पी० परीक्षाओं के प्रश्न पत्र उहत किए गये हैं।
४-प्रत्येक गयान्श के नीचे प्रश्न दिए गये हैं। प्रश्नों को
चार भागों में विभक्त किया गया है।
वे इस प्रकार है
अभ्यास के लिए, रचना के लिए, व्याकरण के लिए और
विषय सम्बन्धी प्रश्न | इनका विस्तृत वर्णन आगे किया
जायेगा।
५-परीक्षाओं से सम्बन्ध रसनेवाली उपयोगी पातों को
यथोचित स्पष्ट रीति से समझाया गया है।
६-कठिन शब्द, मुहाविरे तथा कहारतों को प्रयोग करके
भली प्रकार दिग्दर्शन कराया गया है।
७--पुस्तक में ४५ अभ्यास हैं जिनमें २० नवीं कक्षा को
और २५ दसवीं कक्षा के निमित्त हैं।
-प्रत्येक कक्षा के अभ्यासों के अन्त में जटिल शब्दार्थ
और टिप्पणियाँ दी गई है।
६-इसका टाइप और कागज भी अच्छा है।
प्रश्नो की विशेपता
प्रत्येक अभ्यास के प्रश्नों के सम्बन्ध में छात्रों को एक बात
स्पष्ट समझ लेनी चाहिए । अग्रेजी के प्रश्न Explain

-
-
-
४ )
(समझाकर अर्थ लिखो) और Paraphrase (पदानुवाद फरो)
में अन्तर स्पष्ट है। दोनों शब्द पर्यायवाची नहीं है। छान इन्हें
पर्यायवाची शब्द समझते हैं। एक उदाहरण देकर इम इनका
अन्तर स्पष्ट कर देना चाहते हैं
(1) Explun the underlined in the following.
(2) Paraphrase
जापान आजकल वेग से उन्नति के शिखर
पर चढता चला जा रहा है।
(1) Explanation
उक वाक्य में अलकारिक भाषा का प्रयोग है। शिखर एक
ऊँची चोटी को कहते हैं। अलकारिक भाषा में उन्नति करने
को ऊँचा अथा शिखर पर चढना कहते हैं। इसी प्रकार
अवनति करने को नीचे गिरना कहत हैं । लेखक का उद्देश्य
यह है कि जापान वर्तमान काल में बड़ी शीघ्रता के साथ
उन्नति करता जा रहा है।
(2) Paraphrase-शीघ्रता से उन्नति कर रहा है।
द्वितीय उदाहरण की विलक्षणता यह है कि जितना भाग
रेखाक्ति हो उसी के स्थान में यदि पदानुवाद किया हुआ
वाक्याश अक्षित कर दिया जाय तो अर्थ की तथा वाक्य की दृष्टि
में वह यहाँ उपयुक्त हो जाय ।
इसी प्रकार प्रश्नों में कहीं पद तथा पद समूहों की व्यारया
अर्थ, विशद, अर्थ, श्राशय, साराश, भावार्थ, सक्षेपार्थ, सरलार्थ,
तात्पर्याय और स्पष्टीकरण आदि पूछा गया है। इन सब में

कुछ-न-कुछ अन्तर अवश्य होता है। इन सब बातों को नीचे के उदाहरण से स्पष्ट किये देते हैं ताकि छात्रों को उक्त बातों का मली प्रकार अनुभव हो जाय । इसके अतिरिक्त इसी उदाहरण के साथ ही साथ यह भी स्पष्ट किये देते हैं कि अभ्यास फी गय में से अभ्यास के लिए तथा विपय-सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर छानों को किस प्रकार देना चाहिए। परन्तु इससे पहले उक्त बातों का उल्नेव कर देना आवश्यक है। याच्यार्थ समझ कर उसका अर्थ अपने शब्दों में सक्षेप रीति से कह देना तात्पर्यार्थ है, यही अभिप्राय है, यही श्राशय है, वही अर्थ है, रही स्पष्टीकरण है, वही सारान्श है। इन सम में शब्दों की और कम, परन्तु भाव की ओर अधिक, ध्यान देना पड़ता , उपमा, रूपक आदि अलकारों का भार दो एक शब्दों के द्वारा प्रकट किया जा सकता है, कोई बात जो वाच्यार्थ में प्रकट नहीं होती, इन अर्थों में प्रकट फरदी जाती है। अतएव एक अश में तो ऐसे अर्थ वाच्यार्थ से छोटे हो जाते हैं, परन्तु दूसरे अश में वढ जाते हैं। सरलार्थ और सक्षेपार्थ में शब्दों की कमी पर ध्यान रक्सा । जाता है , इन में भाव सर होने चाहिएँ परन्तु शब्दों का अधिक विस्तार न हो । अन्य बातें तात्पर्यार्थ के समान होती हैं। मावार्थ जानने के लिए और भी गहरे शब्दों में जाना पड़ता है,इसमें देखा जाता है कि लेखक के मन में क्या क्या घातें थी, उसने किस आन्तरिक बात को इन शब्दों के द्वारा प्रकट करना चाहा है। भावार्य प्राय बहुत थोड़े शब्दों में प्रकट किया जाता है।

ध्यारया में बहुत कुछ लिखना पड़ता है। शब्दार्थ, तात्पर्य्यार्थ
भावार्थ, सब
व्याख्या में शामिल हैं, आवश्यकतानुसा
उदाहरण भी देने चाहिएँ, उपमा थादि थलकारों का पूर
विवरण देना चाहिए, मार्क के शब्दों का विवरण भी देर
चाहिए। इस प्रकार भलीभाँति समझाने के लिए जो कुछ भी
आवश्यक हो उसका समावेश 'ध्यारूपा में होता है। इस से
उक्त भातों का भली भाँति अनुभव हो सकता है। यहाँ पर केवल
हम यह बतला दना अभीष्ट समझते हैं कि श्रभ्यास की गद्य में
से अभ्यास के लिए तथा विषय सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर
छात्रों को किस प्रकार देना चाहिए। ये सब नीचे के उदाहरण
से स्पष्ट हो जायगा। जैसे
-
उदाहरण-विवाह का दिन उपस्थित होने पर राजकुमार
सुन्दर और बहुमूल्य घस्न पोर आभूपण पहन कर, वशिष्ठादि
अपियों सहित, विवाह मण्डप में पहुँचे । राजकन्याएँ भी
अनेक प्रकार के बहुमूल्य कपड़े और गहने पहन फर, जनक के
साथ वहाँ आई । महर्षि वशिष्ठ ने वेदी बना कर, उस पर
अग्नि स्थापन किया और उसके प्रज्वलित होने पर वे 'आहुती
देने लगे। तब राजा जनक लज्ज्ञानवमुग्नी मीता को श्रीराम के
सामने और अग्नि के समीप खड़ी करके कहने लगे-"राम ।
यह सीता इमारी दुहिता है। यह तुम्हारी सहधर्मिणी हुई। तुम
इसका पाणिग्रहण करो, तुम्हारा मगल हो यह महाभागा
पतिव्रता हो और छाया की तरह तुम्हारे पीछे रहे।"

अभ्यास के लिए प्रश्न
१-राजकुमार किस तैयारी के माथ विवाह-समा मण्डप में
.
पहुँचे?
२- वशिष्ठ ने उस समय क्या किया ?
३-राजा जनक ने निजदुहिता को प्रागे कर श्रीराम से
क्या कहा?
उत्तर
१--राजकुमार सुन्दर और बहुमूल्य वस्त्र तथा गहने पहन
कर, पशिष्टादि प्रापियों के साथ विवाह-समय मण्डप
में पहुचे।
२-महर्षि वशिष्ठ ने वेदी बनाकर, उस पर अग्नि रखी
और उसके जलने पर वे आहुती देने लगे।
३--राजा जनक सीताजा को आगे सडा करके श्रीराम से
कहते हैं-"राम | यह सीता हमारी पुत्री है। यह
तुम्हारी महधर्मिणी हुई। तुम इसका पाणिग्रहण करो,
तुम्हारा कल्याण हो यह महाभागा हो ओर छाया की
तरह तुम्हारे पीछे-पीछे रहे ।
विपय सम्बन्धी प्रश्न
१-श्रीरामचन्द्रजी अपने पिता को छोड़ कर विश्वामित्र के
साथ क्यों सीता-स्सयम्बर में गये ?
में राजा जनक ने क्या प्रग्ग ठाना
5

-
उत्तर
१-विश्वामित्र की यज्ञ को राक्षस विध्वश किया करते थे।
अतएव मुनि इसी कारण से अयोध्यापुरी गये और
राजा दशरथ से श्रीरामचन्द्रजी तथा लक्ष्मण को माँग
फर अपने साथ ले आये। इसलिए श्रीरामचन्द्रजी
अपने पिता दशरथ को छोड कर मुनि विश्वामित्र के
साथ सोना-स्वयम्बर में गये थे।
२-राजा जनक के यहां शिवजी का एक धनुष था। एक
दिन मीवा अपने घर को लीप रही थी उसने उस
धनुप को एक ही हाथ से उठा कर दूसरी जगह रस
दिया। इस पर राजा जनक ने यह प्रण ठाना था कि
जो क्षत्री, वीर राजा इस धनुष को तोड़ देगा। उसी
के साथ सीवाजी का विवाह कर दिया जायेगा।
प्रस्तुत पुस्तक के लिखने में मैं तभी पूर्णरूप से सफलता
समगा जब कि इससे विद्यार्थियों का कुछ लाभ होगा।
अतण्व मैं श्राशा करता हूँ कि यह पुस्तक अत्यन्त लाभकारी
सिद्ध होगी।

अपठित गद्यांश)
हिन्दी-रत्नाकर
प्रथम अध्याय
(१)
बहरिश्चन्द्र ने कहा-शैव्या अब में तुम्हें नहर
त जाने के लिये नहीं कहूँगा । मैंने पृथिवी-दान
कर के तुमको पाया है। मैं इतने दिनों तक
भोग विलास में तुझको लालसा का खिलौना ममझता था।
किन्तु आज दीनता के बीच तुम्हारी गम्भीर पवित्र मूर्ति
wa

[ २ ]
देखकर मुझे हिम्मत हुई है। देवि । मैं देखता हूँ कि तुम
ममता की मूर्ति सी अमङ्गल दूर करने के लिये स्नेह का हाथ
फैलाये हो।
-
अभ्यास के लिए
१-हरिश्चद ने पृथ्वी दान कैसे किया था? 'उसे करके शैम्या
के पाने से क्या तात्पर्य है?
२-ममता किसे कहते हैं?
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का सोपार्थ सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-रेखाकित पदों की व्याख्या करो।
-हिम्मत' के उपर एक लेस लिखो जो २० पंक्तियों के
लगभग हो।
५-पृथिवी का तत्सम् स्वरूप लियो।
व्याकरण के लिए
--पुष्पादित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-शैव्या, कहूँगा, देखकर, और ममता शब्दों का पद परिचय करो।
विषय-सम्बन्धी
१- हरिश्चन्द्र सम्पत्ति-समय में रानी के प्रति क्या भाव रखते ये
और विपत्तिकाल में उन्होंने क्या भाव रक्खा?
२-राजा हरिश्चन्द्र की कथा का संक्षेप में उल्लेख करो।
सहायक शन्दा-
शदार्थ नहर = पीहर, मौके यहाँ । भोग विलास विषयभोग ।
खालसा-इच्छा।
--

(0)
सावित्री प्रापियों की बालिकाओं के साथ आश्रम में बाकर
मत्रो से तपावन देव आने की बात कह रही थी, इतने में
सत्यवान ने वहाँ श्राकर विनय पूर्वक कहा-"हम लोगगृहत्यागी
सन्यासी हैं। राज-परिवार के स्वागत-योग्य कोई वस्तु हम
लोगों के पास नहीं है। यहाँ तक कि अन्न जल भी राजोचित
नहीं। वो भी हम लोगों का जुटाया हुआ और देवता पर
चढ़ाया हुआ, जगली फल-मूल प्रहण कीजिये" । मत्री आदि ने
ऋपि-कमार की सरलता और दीनता पर प्रसन्न होकर
उस प्रसाद को ग्रहण किया और अपने को धन्य माना।
--
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-अपनी निरभिमानता मकट करने के लिये सरयवासावित्री
के प्रति क्या क्या कहा? स्पष्ट करो।
२-यह प्रमग कहाँ का है। इसको विस्तार-पूर्वक वर्णन करो।
३-उक्त गद्याश का शीर्षक क्या हो सकता है?
रचना के लिए
--उक्त गद्य का सरलार्थ अपनी बोली में स्पष्ट करो।
२-रेपाकित पदों की विस्तृत व्याख्या करो।
३-'दीनता' पर एक सरित लेख लिखो।
५-सरलता, राजोचित, प्रसाद, धन्य-को वाक्यों में प्रयोग करो
.
-

[ ४ ]
व्याकरण के लिए
1~-पुप्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-भाकर, अटोया हुना, दीवा-का पदान्वय करो।
विपय-सम्बन्धी
१-देवता पर चदाइ पस्तु' का एक नाम बतायो।
२- सावित्री और सत्यवान पर सरित टिप्पणी दी।
सहायक शब्द:
शब्दार्थ-राजोधित = राजा के योग्य । जुगया दुधाइकहा
किया था।
-
"भय के पीछे ब्रह्मराक्षस पड़ा हुआ है। यह लोकोक्ति
सत्य है । यदि तुम वीमारी से डरोगे तो तुम्हें बीमारी अवश्यमेव
हो जायगी, यदि तुम दरिद्रता से टरोगे तो दरिद्रता हाथ धोकर
तुम्हारे पीछे पडेगी। यदि तुम मृत्यु से भय करोगे, तो समझ
लो कि यमदूत क श्राने में कुछ भी निलम्र नहीं है। इसी से
कहते हैं कि, तुम अपना भला चाहते हो तो किसी मे भय
मत ग्यायो । अभय होने का उत्तम उपाय श्रात्मज्ञान है।
यानी में कौन हूँ, मेरा मत्य स्वरूप क्या है, यह जानना उत्तम
उपाय है । सस्कृत कवियों ने चिन्ता को चिता से अधिक भयकर
बवाया है, क्योंकि चिता तो मृतक का जलाती है, परन्तु
चिन्ता जीवित को ही जलाया करती है।

[ ५ ] प्रश्न अभ्याम के लिए १-अमय होने का उत्तम उपाय क्या है ? २--संस्कृत कवियों ने चिन्ता और चिता के सम्बन्ध में क्या रचना के लिए १-उक्त गद्य का सरलार्य अपनी भाषा में स्पष्ट करो। २-रेखाकित पदों का स्पष्टीकरण करो। ३-'चिन्ता' के ऊपर एक लेख लिखो। ४-'हाथ धोकर पीछे पढ़ना' का क्या भाव है ? उदाहरण देकर स्पष्ट करो। व्याकरण के लिए १-पुष्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिसो। २-रोगे, पड़ेगी, मृतक, की शब्द निरुक्ति करो। विपय सम्बन्धी १-अपना स्वास्थ्य, श्री-वृद्धि, जीवन, इन सबको ठीक रखने के क्या क्या उपाय हैं? २-चिता और पिता की तुलना करो। ३-दरिद्रता धुरी है इसकी सोदाहरण पुष्टि करो। सहायकशब्द:- शब्दार्थ- -ग्रह्मराक्षस = भूत विशेष, योनि विशेष | प्रात्मज्ञान- मह्म विषयक ज्ञान । मृतक = मरा हुमा, लाश ।

द
।
(४)
जिस समय सीताजी रामचन्द्रजी के साथ जनवासे में पहुँची
उस समय वे अपने स्वामी का प्रथम दर्शन करके मन में,
अत्यन्त प्रसन हुई । स्वामी के मुम्यचन्द्र को देखते ही उनका
मुखकुमुद प्रफुल्लित हो उठा । गमचन्द्रजी का दर्शन करके
सीताजी को ऐसा मालूम हुआ कि ये नवयौवनावस्था में अभी
पदार्पण कर रहे हैं। रामचन्द्रजी के शरीर से दिव्यसौन्दर्य का
रस टपका पडता था। उनका प्रत्येक अङ्ग उपाङ्ग सुदृढ सम्प
और अनुपम शक्ति का आधारस्तम्भ था। उनकी सुन्दर भृकुटियाँ
मानमिक तेन और सच्चरित्रता का प्रत्यक्ष प्रमाण दे रही थीं।
उनके कमल नेन से प्रतिमा प्रदीप्त हो रही थी और उनके मुख
पर एक विशेष प्रकार की ज्योति घमर रही थी।
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-सीता पर रामचन्दजी के प्रयम-र्शन का क्या प्रमार पड़ा?
२-उन्होंने रामचन्द्र में क्या सौन्दय पाया ? क्या झलक देखी?
किस रस का अनुभव किया स्पष्ट सममानो।
३-उनकी अङ्ग प्रमा का रस्लेस करो।
रचना के लिए
१-उच गय का निष्कर्ष सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-रेसाहित पदों की विशद् व्याख्या करो।

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[E ]
--
हे कौरववर्ग ! हम चार-चार विलाप करते हैं, तथापि
हमारे मूर्स पुन युद्ध करने की इच्छा नहीं छोड़ते। बेटा दुर्योधन'
क्या समझ कर तुम सारी पृथ्वी पर अधिकार करने को धुरी
अभिलाषा रखते हो। उसकी अपेक्षा उचित यह है कि पाण्डवों
को राज्य का जो अश मिलना चाहिये उसे देकर सुग्ध पूर्वक
अपना राज्य क्रो। पाण्डव लोग पड़े धर्मात्मा हैं। उनकी बात में,
उनकी शर्त में अन्यायका लेश भी नहीं है। उन्होंने जो प्रस्ताव
किया है, वह बहुत ही उचित है।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१- उक्त गद्य का प्रसग पतायो । इसमें कौन किसे समझा रहा है?
२-राज्य को हड़प जाने की अभिलाया कैसी थी?
३-पाएडवों के कुछ गुणों का उल्लेस करो।
रचना के लिए
-
१-उक्त गांश का निष्कर्ष अपनी बोली में स्पष्ट करो।
२-रेखाकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-अन्याय के ऊपर एक लेस लिखो।
"-'दुर्योधन के अपर सक्षिस रिप्पणी दो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिसो।
२-अभिलाषा, पात, लेश, वह-का पद परिचय करो!

[]
विषय सम्बन्धी
-महाभारत युद्ध का क्या फल हुआ? स्पष्ट वर्णन करो।
२-पांदयों और कौरवों की तुलना करते हुए अपने विचार
प्रकट करो।
सहायरूशब्द :-
शब्दार्थ-मूर्य पुत्र = अज्ञानी पुत्र । अन्याय =न्याययहिभूत,
अविचार । प्रस्ताव-विषय, प्रसन्न ।
-
भले ही कोई नीरम नास को चूसे, पानी से घी या धूल
से तेल निकाले, अथवा अाकाश-वाटिका से सुमन-सचय करे
हमें कोई आपत्ति नहीं । हम गँगर लोग तो अपनी सीधी सादी
बुद्धि को उच्च सिद्धान्तों में न उलझा कर, साहित्य माधुरी के
आस्वादी बनना चाहते हैं। भले ही हमें 'ओल्ड फूल' या खूमट
की उपाधि से भूपित करे-हम अपने सिद्धान्त से टस से मस
होने के नहीं। किससे कहें और क्या कहे ' हमलोगो को जितना
आनन्द इस साहित्य माधुरी में मिलता है, उतना इस लोक में तो
क्या, उस लोक में भी न मिलता होगा, यह अत्युक्ति नहीं,
सिद्धान्त है। उस लोक का आनन्द इसी माधुरी द्वारा ही तो
प्रत्यक्ष होता है । उस पार की छटा इसी माधुरी-नौका पर धारूढ
होने दृष्टिगोचर होती है।

[१०]
-
प्रसन
भ्यास के लिए
---उस गध में किन असम्भय बातों का सम्भव होना पतलाया
गया है?
२-हम उस लोक का धान द किसके द्वारा प्रत्यक्ष होता है?
३-उक्त गाश का उपयुक्त शीपक क्या हो सकता है?
चना के लिए
-उक्त गप का निकर सरल भाषा में किस करो।
२-रेशाकित परें की व्याख्या करो।
३-'टस से मस होना', 'भूपित', 'पास', 'ष्टिगोचर'-को
वाक्यों में प्रयोग करो।
४-'साहित्य' पर ण्य सचित लेख लिखो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाकित शब्दों के सविग्रहसमास लिसा ।
२-भले ही, कोई, क्या, उतना, मिलता होगा-की शब्द निरुक्ति
करो।
३-चरितम वाक्य का वाक्य विश्लेषण करो।
विषय-सम्बन्धी
१-'साहित्य' किसे कहते हैं ? स्पष्ट विवेचन करो।
२-उत गद्यांश में रिस अलझार की छटा का दिग्दर्शन हो
रहा है-बतायो।
सहायक शब्द :-
शन्दाथ-~-नीरस = सूखा। मुमन = फूल । टस से मस होने के
नहीं तनिक भी नहीं दिगने के । अत्युक्ति - असम्भव कयन । पास्ट
-सवार ।
।

साहित्य में उपयोगितावाद का सिद्धान्त मानने से भाव प्रधान हो जाता है और भाषा गौण । लोकप्रिय वही हो सकता है जो सभी लोगा के लिए बोधगम्य हो । साहित्य का क्षेत्र दो ही चार विद्वानों का विहारस्थल नहीं रह जाता। उसमें सर्वसाधारण को प्रवेश करने की भी अनुमति रहती है। सबसे बड़ी बात यह है कि जो साहित्य माधुरी, ज्ञान के उच्च शिमर पर बैठ कर अनन्त में बिहार किया करते है, उन्हें पृथ्वी पर आकर अपनी विद्या का परिचय देना पड़ता है। अतएव साहित्यभापा देववाणी नहीं होगी मनुप्यवाणी होगी। जो लोग अनन्त की स्पष्ट छाया का दर्शन कर अपनी कृति को छायात्मक बना डालते हैं, उन्हें अपने काव्य का कुहासा दूर करना पडेगा। प्रश्न अभ्यास के लिए १-साहित्य में उपयोगितावाद का सिद्धात मानने से क्या हो जाता हे? २-किन लोगों को अपने काव्य का कुहासा दूर करना पड़ता है। ३-उक्त गद्य का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है? रचना के लिए १-उक्त गद्य का निष्कर्ष सरल भाषा में स्पष्ट करो। २-रेखाकित पदा का स्पष्टीकरण करो।

. - [१] ३-'विद्या के उपर एक लेख लिसो जो कि ३० पक्षियों के खगमग दो। ४-देवाणी और मनुष्य-वाणी पर सहित टिप्पणी दो। व्याकरण के लिए १-पुप्पोक्ति शब्दों का विग्रह करो और समास भी बतायो। २-क्षेत्र, शाम, याकर, दूर का पद परिचय करो। ३-द्वितीय वाक्य का वाक्य विग्रह करो। ४.-~-ठक्त गयाश में से कुछ विभक्तियाँ छोटी। विषय सम्बन्धी १-काम्य किस कहते है। --'घायारम' का क्या तात्पर्य है ? स्पष्ट विवेचन करो। सहायकगब्द:- शब्दार्थ-उपयोगितावाद-पल साधनता विवाद, अनुसज्य सम्भापण । गौण - प्रधान ! वोधगाम्य-ज्ञानमाय । अनन्त- अाकाश । देववाणी: सस्कृत भाषा । अनन्त - भगवान् विष्णु । महासा- कुहरा।

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[ १४ 1
३-'इतिहास' पर कलेसलिसोको २५ पत्तियों के लगभग हो।
४-यापमान, जारी के शुद्ध हिन्दी शब्द लिसो।
५-धार्मिक, क्रमश , कालचम, धात प्रतिघात को वाक्यों में
प्रयोग को।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शब्दों में सविग्रह समास लिखो।
२-मुख्य, उन, अभी होता रहा है का पदान्धय करो।
३-अन्तिम याक्य का चाक्य पृथक्करण करो।
विपय सम्बन्धी
१--युग किसे कहते हैं? यह कितन हैं?
२-इलैएड की पाजी मेट' का विनेचन करते
समझानो।
सहायकशब्द:-
शब्दार्थ-आदिम स्थानों पर पूर्व के राथा ग्रादि के स्थानों पर।
संघर्पण से युद्ध से, मेल मिलाप से | घात प्रतिघात = चोट पर चोट ।
स्पष्ट
दूमरी विद्याधरी-"हाँ तुझ से क्या कहें और तुझे इतना
भी ज्ञान नहीं है कि हिन्दु-साम्राज्य-सूर्य इसी रणभूमि-
अस्ताचल में डूबा है। चौहान कुल भूपण पृथ्वीराज का
युद्ध में सरशान्त हुया है।

[ १५ ]
-
पहली विद्या०-"विहारिणी । भला कह तो, यह वीर
कैसे गिराया गया ? क्या उसके हाथ म लोहे की कमान
नहीं थी? क्या उमका साहस क्षीण हो गया था ?
आश्चर्य । जिम पृथ्वीराज के भुजबल से अनेक बार यवन
समूह पराजित हुआ है, उसका यह परिणाम है "
दूसरी विद्याधरी-"विलासिनी । यदि भाई का भाई
शत्रु न हा-यदि शैलवासिनी सरिता ह. शृङ्ग को न तोडे
तो भला दूसरा क्या
सकता है "
कर
५० विद्या०-"क्या किसी भारतवासी का ही यह
काम है।"
दू० विद्या०-"हाँ, पृथ्वीराज के श्वसुर जयचन्द का "
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-दूसरी विद्याधरी से पृथ्वीराज का रणभूमि में मरा सुनकर
पहली विद्याधरी क्या शका करती है ? स्पष्ट बतलायो।
२-पहली विद्याधरी की शका का किस प्रकार समाधान होता है?
३-उक्त गद्य का उपयुक्त शीपक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
१--उक्त गद्य का साराश सरल भाषा में स्पष्ट करो।
-रेखाकित पदों की विस्तृत व्यारया करो।
३.-'साहस' के ऊपर एक लेख लिखो।

-
५- भुभवल, पराजिन, भाई का माइका पाक्यों में प्रयोग करके
स्पष्ट करो।
व्याकरण के लिए
१-पुप्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-शात, कैसे, आश्चर्य, दूसरा, यह-पद-परिचय करो।
३-"क्या किसी यह काम है" वाक्य का पाक्य
विश्लेषण करो।
विपय सम्बन्धी
१--पृथ्वीराज सम्बन्धी ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करो।
२---जयच द पृथ्वीराज का शत्रु क्यों हो गया था। इसके शत्रु होने
का क्या प्रभाव पड़ा स्पष्ट समझायो।
३-उक्त गद्य किस अलकार में है ? स्पष्ट समझायो।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-हिन्दू-साम्राज्य-सूर्य इसी 'ट्या है - हिन्दू साम्राज्य
सूय इसी युदस्यलरूपी अस्ताचल पर्वत पर डूबा है अर्थात महाराज
पृथ्वीरान इसी रणभूमि में मारे गये है। सवस्वान्त = सपनाश, सत्या
नाश, सर्वशाति थथवा मरण। यवन - मुसलमान । शैलवासिनी -
पर्वतनिवासिनी । सरिता नदी | शृक्ष - घोग।
.

[ १७ ]
(१०)
जयचन्द-"बोलो मत, में एक यार फिर उसी गजेन्द्र
पर चढकर प्रायश्चित करूंगा, जिस मदान्ध पर चढ़ कर
मैं भी मदान्ध हो गया था । हो, सैनप, एक घात कहना
मैं भूल गया था । कन्नौज निवासियों से कह देना कि
तुम्हारे पापी राजा ने, जिनकी तुम लोगों ने बहुत सी
आज्ञायें मानी हैं, एक अन्तिम प्रार्थना यह की है कि
यदि हो सके, तो शाहबुद्दीन का वध करके उसकी
रकधारा से दो एक अन्जुली, जयचन्द के नाम पर देना,
क्योंकि पापियों को नरक में यही पीने को मिलता है।
बस, जामो
( सैनप या प्रस्थान, जयचन्द्र का गजारोहण और
गगा में धंसना)
जयचन्द-यस, महाशय ठहरो । (आकाश की ओर
देखकर) देवि । एक तो में नहीं कर सका, पर दूसरा
तो मेरे वश में है, वह प्रायश्चित करता हूँ । देश द्रोह के
लिए आत्मबध । हाँ फिर इससे बढ़कर दूसरा स्थान
कहाँ है १ पतित पावनी, प्रणाम [कूद पडता है ।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-जयचद ने अपने सैनप से कन्नौज निवासियों के लिए क्या
कहला भेजा था?
-
.

-
[ १० ]
२-उक्त गधाश का उपयुक्त प्रसा क्या है ?
३-जयचन्द किस काय के करने के लिए उतारू हो रहा है।
रचना के लिए
१-उपयुक्त का निष्कर्ष सरल भाषा में समझायो।
२-रेसाक्त्ति पद-समूहों की याख्या करो।
३-'गगाजी के उपर एक लेख लिखो।
४-मदा ध, रक्तधारा, प्रायश्चित, यात्मबध-को वाक्यों में
प्रयाग करो।
५-यात, म, नरक, दूसरा-के तरसम स्वरूप यतलायी।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शब्दों का विग्रह करो और समाम भी यसलामी।
२-जेन, चीज, मस्थान, प्रणाम, कूद पड़ता है-का पदान्वय
करो।
३-उस गोश म स सर्वनाम शब्दों को छाँटी।
४-गजेद, मदाय, गनारोहण, महाशयका सधि विच्छेद
करो।
विषय-सम्बन्धी
१-महाराज जयध द का सक्षेप मे चरित्र चित्रण करो।
२-- लेखक की नाट्यशैली और भाषा प्रयोग पर अपने विचार प्रकट
करो।
३-शहायुहीन गौरी' पर सक्षिप्त रिप्पणी दो।
सहायक शब्द
शम्दार्य-हायुद्दीन मुहम्मदगारी । गनारोहण -हाथी पर
सवार होकर । प्रायश्रित पाप नाश करन याल कर्म। प्रारमवध -
प्रामघाव, स्वाध ! पतित पावनी- श्री गगाजी से भाय।

[ १८ ]
(११)
जुए की पद्धति विश्व व्यापक है। सुधरे तथा असभ्य
सभी देशों में जुश्रा खेला जाता है । जुए का कन से
श्रीगणेश हुश्रा, यह ठीक ठीक नहीं मालूम किया जा
सका । परन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इस
प्रथा के प्रारम्भ होने के समय लोगों को मनोवृत्ति यह
थी कि "चलो, जो कुछ हमारे पास है, उसे उडा
दिया जाय ।" यह भावना हम आजकल भी सभी देशों
के जुआरियों में पाते हैं । परन्तु भिन्न भिन्न देशों में जुत्र
सेलने की रीति और साधन अवश्य भिन्न भिन्न है।
एवीसिनिया में जुआ पैसों आदि की सम्पत्ति से नहीं खेला जाता
है । जब वहाँ के जुआरी पूरे जोश में श्रा जाते हैं तब
वे अपनी धर्म पत्नियों को भी दाँव पर लगाने में नहीं
चूकते । कितने ही ऐसे देश है, जहाँ इसके द्वारा पारस्परिक बैर
बदला लेने की
प्रथा है । अल्मीनिया में भी इसका
प्रचलन है । एशिया और अफ्रीका के अनेक प्रदेशो में
साहस को ठोक परीक्षा जुए से ही की
जाती है।
का
मनुष्य के
प्रश्न
अभ्यास के लिये
१-भिन्न भिन्न देशो के जुआ खेलने की रीति और साधन वणन
करो।

.
[ २० ]
२-सुश्रा की मया का प्रारम्भ किस मनोवृत्ति से होगा स्यामाविक
है, स्पष्ट यतलानो।
रचना के लिए
१-उगध का सरपार्थ सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-धीगणेश, जोश मे या जाते हैं, पारस्परिक, परीपा-को
पाक्यों में प्रयोग करो।
३-'ए' के ऊपर एक लेख लिखो।
४---रेखांकित को सविस्तार समायो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२--अवश्य, परन्तु, पैर, परी का पदव्याख्या करो।
३--अनेक का यहुवचन क्या होता है ?
४- मनोवृत्ति और पारस्परिक की संधियाँ यतज्ञायो और उनके
नियम भी पतलामो।
विषय-सम्बन्धी
१-क्या हमारे देश में मी पहिले से जुए की प्रथा धनी थाती है?
सोदाहरण पुष्टि करो।
२-क्या जुए के ही कारण महाभारत युद्ध हुया था? सष्ट-व्याख्या
-
करो।
सहायक शब्द :-
शब्दार्थ-पद्धति = परिपाटी | श्रीगणेश हुआ- प्रारम्भ हुआ।
मनोवृत्ति -मन की इच्छा धर्मपरिनयों-सियों। पारस्परिक वापस
का।श्या है -रिवाज है। प्रचलन-प्रचार, प्यापकता।

परग्रहा है
। सूरदास
तुलसीदास ने अपने फाव्य में सांसारिक प्रेम को
थल्पाविश्राप स्थान दिया है ।
सूरदास ने फ्राण और
गोपियों में सासारिफ प्रेम कराफर मलम तोड दी है।
तुलसीदास को सदा यह ध्यान रहता है कि हमारे राम
. एफ पार कृष्ण को अवतार
मानफर उन्हें मनुष्य या दिया है, उनसे मनुष्य का सा
धर्ताव कराया है। कृष्ण और राधा, कृष्ण और रुक्तिणी
के प्रेम के बारे में कोई कुछ नहीं फर सकता पर अन्य
गोपियों का प्रेम सांसारिक सदाचार की सीमा को उल्लघन
फर गया है। हम कह चुके हैं कि सदाचार भक्तिमार्ग
का एक प्रधान लक्षण है, तो सूरदास के व्यतिक्रम का
फारण क्या है ? स्वय उन्होंने दो बातें कही है-
-एक तो
यह कि गोपियों वास्तव में मुनियों की अवतार थीं जो परब्रह्म
से रमण करना चाहती थीं, दूसरी यह कि अप्सराओं की
अवतार थीं जो कृष्णावतार के समय ब्रह्मा के आदेश से,
भूलोक में आई थी।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१--सूर का सांसारिक प्रेम की ओर क्यों अधिक मुकाव था?
स्पष्ट उल्लेस करो।
२-सूर का प्रेम सदाचार की सीमा का उल्लंघन करता
क्या कारण है ?

-
२२ ]
३-सूर ने गोपिकाओं धौर श्रीकृष्ण के इस प्रेम सम्बथ के क्या
कारण बतलाये हैं।
रचना के लिए
२-उक्त ग का सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-रेखाकित पद-समूहों का अर्थ समझा कर लिरो।
३-'प्रेम' के ऊपर एक लेख थकित करो जो लगभग २५
पत्तियों के हो।
---'सूर और तुलसी के उपासना भेद के कारण भी दोनों कवियों
के मेम की अभिव्यक्ति में अन्तर पा गया है। इसका
सष्टीकरण करो।
१-सूर थोर तुलसी की तुलना करते हुए अपने विचार प्रकट करो।
व्याकरण के लिए
१-पुप्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-~-सदा, प्रेम, अवतार, वास्तव, श्राइ थी-का पदान्वय करो।
३-प्रथमवाक्य का वाक्य पृथक्करण करो।
४-'कोई' का तत्सम स्वरूप क्या है ? 'कोई' के प्रयोग की विवेचना
कीजिए।
विपय सम्बन्धी
१--तुलसी और सूर की समता और विषमता दिसलामी।
२--तुलसी और सूर की कविता पर सचित टिप्पणी करो।
३--तुजसी यड़ा है या सूर? सोदाहरणपुष्टि करो।
सहायकशब्द:-
शनार्थ -काव्य में - कविता में। अल्पातिअल्प = सूक्ष्म से भी
सूक्ष्म, योडे से भी थोडा । व्यतिक्रम = विपर्म, विलोम । परमहा
परमात्मा, पुरुपोत्तम । रमण करना चाहती थी-मोग विलास करना
चाहती थीं। भाद्देश आज्ञा । मूजोक ससार ।
-

[ २३ ]
फोई दिन था कि हम कुछ थे, युछ नहीं, घहुत
कुछ थे । देवता हमारा मुँह जोते थे, स्वर्ग में हमारी
घूम थी और धरती हमारे 'उधरने से उधरती थी । हम
श्राममान में उडते, ममुद्र को मानते, जगलों को गगाजते
और पहाडों को हिला दते थे । दुनिया में हमारे नाम
लेया थे, देश-देश में हमारी धाक थी, दिशा हमारी
जोति से जगमगाती थी और असमान के तारे हमें और
फाड़ फाड़ कर देखते थे । हम अन्धकार में उजाला करते
थे, पन्द आँसों को पोलते थे, सोतों को जगाते थे और
उक्ले काठ को भी हराभरा बना देते थे। सूरमापन हम
पर निछावर होता था, दिलेरी हमारे बॉट पडी थी,
महादुरी हमारा दम भरती थी, और प्रेम ही हमारा
वाना था, हम घेजान में जान डालते थे, घिगडों को
बनाते थे, और भूलों को राह पर लाते थे । आज हमारे
घरों में फूट पॉर तोड़ कर बैठी हे । चैर अकड़ा हुआ
सडा है, अनवन की बन आई है, और रगडे झगड़े
गुलछरें उड़ा रहे हैं। हमसे लम्बी लम्बी बातें सुनलो,
लम्बी डगे भरने की कहानियाँ पहलवा लो, लेकिन लम्बी
तान कर सोना ही हमको पसन्द है । माँस होते हमें
सूझता नहीं, हाथ होते हम बेहाथ है, पॉव होते वे पॉव,
चल बसी, विचारों का दिवाला निकल गया,
समझ

[ २४ ]
आस पर श्रोस पड गई, मगर कान पर जूं तक नहीं
रेंगती । लोग कॉटों में फूल चुनते हैं, हम काँटों में उलझ
उलम मरते हैं आबरू उतर गई, पत पानी चला गया,
बड़ाई धूल में मिल गई । मगर हम धूल फॉकने में ही
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-हम भारतवासियों की वर्तमान दशा कैसी है? स्पष्ट
उत्तर दो।
२-दुनिया में हमारे नाम लेवा थे? इसको सममाण सिद्ध करो।
३-प्रतीतकाल में भारतवासी कैसे थे? सतर्क उत्तर दो।
रचना के लिए
१-उक्त गोश का सरलार्थ अपनी भाषा में समझानी।
२-रेखाकित पदों का अर्थ स्पष्टरूप से सरल भाषा में स्पष्ट करो।
३-'पूट' अथरा 'बड़ाई के ऊपर एक लेख लियो।
४-धरता, पासमान, काठ, घर, पास-के तत्सम स्वरूप लिस्रो ।
५-"मुँह जोहना", "सूरमापन हमपर निछावर होता था,
"बहादुरी हमारा दम भरती थी, 'नोस
'जू कान
रंगना", "धूल में मिलना"-इनको अपने वाक्यों में प्रयोग
पड़ना",
करो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शब्दों का पद परिचय करो।
२-रगड़े झगडे, उल्लम-उलझ, और हराभरा-के सविग्रह समास
लिखो।

[ २५ ]
३-मयम वाक्य का पृथक् करण करो।
विषय-सम्बन्धी
१---"देवसा हमारा मुँह जोहते थे, स्वर्ग में हमारी धूम थी।
इसकी सोदाहरणपुष्टि करो।
-"सूरमापन हम पर निछावर होता था। इसको किसी प्रसिद्ध
भारतवासी योधा पर घटित करो।
३-फूट ने मारतवासियों को क्या हानि पहुँचाई है ? सतर्क
उत्तर से पुष्टि करो।
सहायक शब्द :-
शब्दार्थ-मुँह जोहते थे = दर्शन करते थे, मुँह देखने की पाट
देखते थे। अनयन = पूट, भैरभाव । गुलहरें उड़ा रहे हैं = मौज कर रहे हैं।
धूल में मिल गई = नष्ट हो गई। लम्बी तानकर सोना = गहरी नींद से
सोना।
।

[ ६ ]
"
फर
-
राणा-विराजजी, श्राप मुझे व्यर्थ बड़ाई देते हैं,
मैं वो निमित्त मान था । जो ये सय राजपूत और भील
सरदारगरण सहायता न करते तो मैं अफेला क्या
सकता था ? अहा माला महाराज मानसिंह ने तृणवत
अपना शरीर दे दिया और मुझे बचाया, महाराज साडेराय,
राजा रामसिंह ऐसे वीर पुरुषों ने मेरे लिये क्या-क्या न
किया । हाय
। मैं अब इनके लिये क्या कर सकता हूँ?
बड़े कविराज जी ने अपने देश की जैमी सेश की और
जिस भौति प्राण दिया कौन नहीं जानता ? जब तक
पृथ्वी रहेगी, इन लोगा का नाम स्वतरां में मेवाड के
इतिहास में अक्षित रहेगा । प्यारे चेतक ने पशु होकर
मेरा जैसा उपकार किया उसस में भी उऋण नहीं हो
सकता । मनियर, जहाँ चेतक का शरीर गिरा है वह एक
उत्तम समाधि बनवाई जाय और उसके सम्मानार्थ मेला
लगा करे । मैं स्वय वहाँ चला करूँगा । ( कविराज से)
कविराजजी, आप एक पर्वाना लिखिए कि जय तर मेरे
और भामाशा के वश में कोई रहे, मरी का पद भामाशा
के यशज को ही दिया जाय । अाज में इन्हें प्रथम श्रेणी
क सरदारों में स्थान देकर मदक पट ताजीम, पैर में सोने
का लगर, पाग पर मॉमा आदि यावत् प्रतिष्ठा बख्शता
हूँ, जो इनकी सेवा के आगे सर्वथा तुच्छ हे।

-
प्रश्न
थभ्यास के लिये
१-राणा ने 'चेतक' के प्रति क्या कहा है ?
२-नाया कविराज से भामाशा के विषय में क्या कहते हैं?
स्पष्ट पतलायो।
३--आयामी ने किन किन यत्तियों की सराहना की है । और क्यो ।
सतक उत्सर से पुष्टि करो।
रचना के लिए
१-उक्त का मार सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२--रेखांकित पद समूहों का स्पष्टीकरण करो।
३-उपकार' के ऊपर एक लेख चकित करो।
-पर्वाना, तालीम, वरनाता–के शुद्ध हिंदी शब्द यतायो ।
व्याकरण के लिए
१--पुष्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिसो ।
--व्यर्थ, प्यारे, प्रतिवर्ष दिया जाय, पद की शब्द निरति फरो।
३-"प्यारे घेतक ने नहीं हो सकता-याक्य विश्लेपण करो।
विषय-सम्बन्धी
१-राणामताप के सम्बन्ध में ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करो।
२-राया ने भामाशा की क्यों इतनी प्रासा की-स्पष्ट
समझायो।
३-मानसिंह, रामसिंह और भामाशा पर सहित टिप्पणी करो।
8-उक्त गद्य के लेखक की भापा पर अपने विचार प्रकट करो।
सहायक शब्द :-
शब्दाथ-अङ्कित रहेगा- लिसा रहेगा। चेतक - राणा प्रताप के
घोड़े का नाम है । ताजीम = राज पारी में होने वाला एक प्रकार का
समान । यावत = जितनी । यस्शता हूँ - देता हूँ । लँगर=कड़ा ।
मामा = एक प्रकार मा पार

। इसलिये
[२८]
(१५)
मरमद नाम का एक मशहूर सूफी था
यह औरगजेब का क्रोध भाजन हुआ । औरगजेय को
श्राज्ञा से मकार मुसलमानों की एक कमेटी सरमद का
न्याय करने को बैठो। चार्ज लगाया गया कि वह नगा
। अगर अमल में औरगजेन का यही मतलब
था तो नागे पैरागीय पहले कल होने चाहिएँ थे, लेकिन
ऐसा नहीं हुआ।
सरमद का बड़ा भारी और मुख्य
अपराध तो यह था कि वह दारा का मिन था । दारा के
मरने पर भी औरगजेय डरता था कि कहीं सरमद अपनी
कूबत से कुछ बला न गिराये। औरगजेब को पता नहीं था
कि सन्तों के लिये न कोई मित्र है न कोई शत्रु,
तृण समान जानने वाले महात्मा को औरगजेब की सत्तनत
और शान की क्या परवा थी? अधम औरगजेब के अन्यायी
न्यायकारियों ने फकीर को प्रारणदएड की थाज्ञा दी। लेकिन
जो इन लोगों के लिये पड़ी भारी चीज़ थी वह मरमद के }
लिये महल दिल्लगी थी। जा दिन-रात प्रीतम के प्रेम में
मतवाला रहता था वह कितने दिन तक उसका वियोग सह
सकता था?
ससार को
थभ्यास के लिए
१-परमद कौन था।

-- २-औरंगजेब की मक्कार मुसलमानों की कमेटी ने सरमद के प्रति क्यों दोप लगाया? ३---अन्यायी न्यायकारियों ने फकीर को क्या दण्ड दिया था ? ४--नागे और वैरागियों में क्या अन्तर है ? सना के लिए १-उक्त गद्यांश का निष्कप केवल चार पत्तियों में अङ्कित करो। २-रेखाकित पद-समूहों का स्पष्टीकरण करो। ३-'प्रेम' अथवा 'न्याय' पर एक लेख लिखो। ४.-मक्कार, कमेटी, फूबत, बला, सल्तनत, परवा, दिल्लगी के शुद्ध हिन्दी शब्द बतायो। ५-अधम, न्याय, प्रेम, वियोग, शत्रु के विलोम शब्द बतायो। व्याकरण के लिए १---पुष्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो। २-इसको, यही, डरता था, लेकिन, कितने-का पद परिचय - करो। . ३-"श्रधम औरङ्गजेब के श्राज्ञा दी वाक्य का वाक्य पृथक्करण करो। विपय-सम्बन्धी १-उक्त गद्य की शैली पर अपने विचार प्रकट करो। २-औरगजेब, दारा, सरमद-पर टिप्पणी करो। ३---औरगजेब का चरित्र चित्रण करो। सहायक शब्द :- शब्दार्थ-नोध-भाजन - क्रोध का पान । चार्ज = कसूर, दोष । नागे = वह साधू जो गृहस्थी नहीं होते नागे कहलाते हैं । कूवत:बल, शक्ति । बला= श्राफत, कष्ट । प्राणदएड = पांसी। प्रीतम = प्यारे, यहाँ तात्पर्य भगवान् से है। वियोग - जुदाई। 1

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[ ३१ ]
करण, प्रकृति की विविध चेष्टा और देव, इन सर के
सयोग से कम होता है और इन सय की योजना करने
वाला ईश्वर ही तुम्हें कर्म म नियोजित करता है।
इमलिये इमी परमेश्वर का केरल पालन करना तुम्हारा
धर्म है।
प्रदन
अभ्यास के लिए
१-भक्ति-माग का प्रयतफ कौन था?
२-भगवद्गीता की क्या विशेषता है ?
३-भगवद्गीता किन यातों को नहीं पतलाती ? स्पष्ट उलेख
करो।
-
रचना के लिए
1--उत्त गद्य का भाव सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-रेखाकित पद समूहा की विशद् व्याख्या करो।
३-'भगवान की भक्ति' पर एक लेख लियो ।
४--अवलयन, नियत्रण, परायण, समाधान,
योजना-को
अपने चाक्यों में प्रयोग करो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाङ्कित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-नई, गीता, छोड़ कर, विविध, तुम्हारा का शब्दान्वय करो।

श्रीमद्भगवद्गीता ने ही पहले पहल स्त्रियों और शूद्रों
5 मोक्षाधिकार का विधान किया है और सबके लिये
क्ति मार्ग का द्वार खोल दिया है। यों तो मसार में
कोइ यस्तु नई नहीं है, पर भक्ति-मार्ग के प्रवर्तक श्रीकृष्ण ही
ए हैं और प्रान इम मार्ग का जितना अयनयन होता है,
उतना और किमी मार्ग का नहीं । यह मार्ग सब के
ये सुगम भी है । भगवद्गीता की यह एक विशेषता
है। दूसरी विशेषता प्रवृत्ति और निवृत्ति का नियत्रण है।
भगवद्गीता यह नहीं बतलाती म ईश्वर को भूलकर या
ईश्वर के नाम पर ससार के सब सुख लूटते रहो और
यह भी नहा बतलाती पि ससार को छोड कर जगल में
चले जानो । गीता यह तलाती है कि कर्म छोड़ने मे
नहीं छूटता, फर्म करना ही पड़ता है। कर्म मातत्य का
अबाधित नियम बतला पर श्रीकृष्ण फल-त्याग पूर्वक कर्म
करने का उपदेश देते हैं । निवृत्ति परायण लोगा को इस
प्रकार कर्ममार्ग म
प्रवृत्त करक श्रीकृष्ण ने समाज रक्षा
की व्यवस्था की। फलाशा छोड कर कार्ड कैसे कर सकता
है? इस शका का श्रीकृष्ण ने पूर्ण समाधान किया है।
फलाशा छोड पर धर्म करो, फल तुम्हारे हाथ में नहीं
ई, कर्म को तुम वाले नहीं करते-अधिष्ठान, फर्ता,

[ ३३ ]
(१७)
साराश वह अपने काल का पूर्ण प्रतिनिधि था ।
साथ ही इसके वह अपने काल को पहचान सकता था।
उसे मालूम था कि इस कार्य में लोग मेरा साथ दंगे
और उनका उपयोग करना मेरा कर्तव्य है। उसे आन्तरिक
स्फूर्ति हो गई थी कि परमेश्वर ने मुझे इसी कार्य के
लिए भेजा है। उसे विश्वास हो गया था कि ईश्वर मुके
सफलता दगा। शिवाजी का व्यक्तित्व समझने के लिये हम
अपने से एक प्रश्न कर सकते हैं।
उस परिस्थिति में
रहने वाले लासा लोग थे, पर शिवाजी ही को क्यों
स्वराज्य स्थापना की स्फूर्ति हुई ? मारटिन लूथर के समय
पोप के घृणित कृत्या को देखने और समझने वाले
लासों थे, पर चिटेनवर्ग के चर्च पर लेन लिस कर
चिपकाने की स्फूर्ति और हिम्मत इमी महापुरुप को क्यों
हुई ? इस प्रश्न के उत्तर में यदि आप कुछ कह सकते
हैं, तो यही कहेंगे कि परिस्थिति का महत्त्व तो है ही, पर
इसका उपयोग करने का महत्व व्यक्ति को है। यही उत्तर
शिवाजी के लिए भी उपयुक्त है। उसके समय में सतनता की
पुकार पैदा हो गई थी। पर लोक शक्ति बिखरी हुई थी,
और मराठे लोग आपस में ही मार काट किया करते थे।
३

-
[ ३२ ]
३-अतिम वाक्य का पाक्य विग्रह करो।
४- सुगम, परायण, शूद्ध-से भाववाचक संज्ञाएँ बनायो।
विषय सम्बन्धी
१-श्रीकृष्ण ने गीता किस समय पर थोर क्यों रची ?
२--गीता का हिन्दू-समाज में क्या स्थान है ?
३-श्रीकृष्य पर संपिप्त टिप्पणी करो।
-
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-प्रवृत्ति = कार्य में लगने की इच्छा । निवृत्ति = बन्धन
मुक्ति, विश्राम । नियन्त्रण है -बंधा हुआ है, नियमित है। अधिष्टान
= श्राधार या देश जिसका कार्य पर प्रभाव पड़ता है। कत्तों = करने
वाला । करण जिसके द्वारा किया जाय । देव-भाग्य । योजना=
मिलाप । नियोजित=नियुक्त, सयोजित ।

[ ३५ ]
%
3D
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-परिस्थिति = देशमाल की दशा | णि हस्यों को
निदनीय कार्यों को। कति = सेजी, जोश । महस्य = गौरव !
उपयुक्त ठीक । स्वत अता-स्वाधीनता, प्रामादी ।
।
।
रानस्थान ने किमी समय यौधेय और मालवगणों
को शरण दी थी । पजार प्रदेश के समान ही महाभूमि
भी अनेकगण राज्या की जननी रही है। उनके श्रक
और लाञ्छनी से चिहित मद्राएँ श्रान भी पाई जाती हैं।
यहाँ की मन्यमिका नगरी फिमी समय शिवि जनपद की
राजधानी थी । उसमें सकर्पण और वासुदेव के देवधाम
थे । इसी रानस्थान में विराट नगर था, जहाँ पाण्डु एल
के धशतन्तु को अविच्छिन्न रखने वाली देवी उत्तरा
का जन्म हुधा था । यही दक्षिण में महाकवि माघ की
जन्मभूमि श्रीमाल गरी है। राजस्थान के क्षनियों के
छत्तीम पुलों का पृथक् पृथक् विस्तार वर्णन
असम्भव ही है । पद्मिनी और दुर्गावती की जन्मभूमि
को प्रार्य सन्तान थप भी श्रद्धा के साथ प्रणाम करती
है। भक्ति स्रोतस्निी मीराबाई का स्मरण करके भारतीय
महिलाओं के मुसमडल आज भी प्रसन्नता से जगमगा
उठते हैं। श्रद्धा की साक्षात् मूर्ति मीरों क अध्यात्म अनुभव
घड़े मूल्यवान हैं।
प्राय

[ ३४ ]
शिवानी ने इस निसरी हुई शक्ति को एकत्र किया और
स्वतन्त्रता को जो ध्वनि यहाँ-वहाँ सुनाई देती थी उम
उसने इसका मूल मन्त्र बना दिया ।
अभ्याम के लिए
1-शिवाजा का व्यक्तिरस समझने के लिए हम अपने से क्या
प्रश्न कर सकते हैं?
२-शिवानी को क्या प्रान्तरिक स्फूति हो गई थी ! सप्ट
समझानो।
1-शिवाजी ने अपने कर्तव्य का क्या पालन किया १ सतर्क
चर्णन करो।
है-उक्त गद्य का उपयुक्त शीपक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
२--उत गद्य का निष्कर्ष मरल भापा में समझायो।
२-साकित पदों की व्याख्या करो।
३-'स्वतन्त्रता' के ऊपर एक शेख लिखो।
४. स्वतन्त्रता, धृणित, पूर्ण-के दिलोमशब्द लिखो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाक्ति शब्दों के सविग्रह समास लिखा।
२-प्रथम वाक्य का वाक्य विश्लेपण करो।
३-साथ, लाखों, महत्व, किया करते थ,उसका--पद परिचय करो।
विषय-सम्बन्धी-
१-यदि शिवाजी उस समय न होता तो भाजकल मारत की क्या
दशा होती? स्पष्ट उल्लेख करो।
२--शिवाजी की ऐतिहासिक घटना का वर्णन करो।
-
-

[ ३७ ]
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ---लाइनों-दोपों। यश तन्तु = वश की टोरी । अवि-
छिन अटूट, लगातार | भक्तिस्रोतस्विनी जिसके हृदय में भक्ति प्रकट
होती है । मुस-मण्डल = मुंह।
भक्ति स्त्रोतस्विनी मीराबाई उठते हैं भारतवर्ष की रहन
पाली स्त्रियाँ मीराबाई के पवित्र गुणों को जो उनके हृदय में ईश्वर के
प्रति थे, प्रकट करके अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक अपने को गौरवास्पद मानती हैं।
(१६)
द्रौपदी ने मन ही मन कहा-कठोर उपालम्भ द्वारा
राजा युधिष्ठिर को उत्तेजित करने के लिए वह मौका
बहुत अच्छा है। उसने सोचा कि ऐसे उपालम्भ को
सुनकर युधिष्ठिर को अवश्य ही क्रोध आ जायगा और
वे दुर्योधन आदि शत्रुओं से उनके द्वारा किये गये
अपकारों का बदला लेने के लिए अवश्य ही तैयार हो
जायेंगे। वह बोली-"महाराज, आप राजा हैं। आप
नीतिज्ञ हैं । आप विद्वान् हैं।
श्राप
समझदार हैं।
मैं तो एक अज्ञ, दूसरे स्त्री हूँ । यदि मैं आपके सामने
कोई हित की भी बात कहूँ , तो मेरा ऐसा कहना भी
अनुचित ही समझा जायगा । सम्भव है, उसे श्राप
अपनी निन्दा तिरस्कार सममें अतएव इस विषय में
मुझे कुछ भी न बोलना चाहिए था । परन्तु क्या करूँ,

1
-
-
भदन
अभ्यास के लिए
१-उपरा की जन्मभूमि कहाँ है ? स्पष्ट बतलायो ।
२-महाकवि माघ कहाँ पैदा हुए।
५-किसके अध्यात्म अनुमय पदे भूल्यवान है।
रपना लिए
१-उक्त गद्य का निष्कर्ष सरलभाषा में स्पष्ट करो।
२-रेखांकित पद-समूहों का स्पष्टीकरण करो।
३-जमभूमि' अथवा 'श्रद्धा' पर एक सपिस लेख लिखो।
४--राजा शिपि, उत्सरा, महाकधिमाघ, मोरामाई पर टिप्पणी दो।
५-जननी, जमभूमि, प्रसन्नता, श्रदा, स्मरण-फे विलोम शब्द
बतलायी।
व्याकरण के लिए
१-पुप्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिपी।
२--अतिम वाक्य का पाक्य विग्रह करो।
३-'अनेक' का बहुवचन क्या है ?
----देवधाम, असम्मक, प्रसन्नता, श्रद्धा, सासातको शब्द
निरक्ति करो।
विषय सम्बन्धी
१-ठारा कौन थी? इसका कुछ वर्णन करो।
२~-पमिनी और दुर्गावती के सम्बन्ध की ऐतिहासिक घटनाओं
का उल्लेख करो
३---मीराबाई की कविता के सम्बन्ध में मुम्हारी क्या राय है?
स्पष्ट बतलायी
-
।

[ ३६ ]
व्याकरण के लिए
१-पुप्पांकित रन्दों के सचिमह ममास सतायो।
२-धन्तिम वाक्य का पाक्य पृथक् करण करो।
विद्वान् तिरस्कार, दुमक्ष
प्रार्थना का-पद परिचय
करो।
विपय मम्बन्धी
-द्रोपदी का चीर हरण किमने क्यिा ? उस पर सषित
टिप्पणी दो।
द्रौपदी, युधिष्ठिर और दुर्योधन का मपिस पणन करो।
३-उक्त गद्यारा की शती की विशेषना पर अपने विचार प्रकट
करो।
-
सहायक शब्द
शब्दार्थ -उपालम्भ = उलाहना। अपकार % निरादर । नीतिज्ञ%
नय कोचिद । प्रमूख । तिरस्कार - अपमान। यस्यहरय सादी
का सींचा जाना, चीरहरण । केशाकर्षण = यालों का सोचना । विडम्बना
=अपमान | आमा कर अपराध पर रष्टिपात न करें।
-

[
३८ ]
बिना बोले मुझ से रहा ही नहीं जाता । शत्रुओं ने
वस्त्रहरण और केशाकर्षण श्रादि के रूप में मेरा
जो विडम्नना की है, उसकी याद आते ही मुझे
दु मह दु स होता है । वही दुःस मुझे बोलने के लिए
प्रेरणा कर रहा है । अतएव मेरी प्रार्थना है कि श्राप
मुझे इम उपालम्भ के लिए क्षमा करें।"
अभ्यास के लिए
१-द्रौपदी ने मन ही मन क्या सोचा? स्पष्ट बतलायो ।
२-द्रौपदी ने अपने लिए तथा युधिष्ठिर के लिए क्या विशेपर
प्रयोग किये हैं।
३-युधिष्ठिर से द्रौपदी किस प्रकार उपालम्भ करती है। स्पा
उल्लेख करो।
४-उक्त गद्य का वर्णन किम समय का है?
रचना के लिए
२-उक्त गद्य का निष्कर्ष अपनी बोली में अमित करो।
२-रेवाकित पदों की विस्तृत व्याख्या करो।
३--'आमा' के ऊपर एक लेख लिखो।
४-'मनही मन', 'निदा या तिरस्कार', 'विडम्वना'---को अपने
वाक्यों में प्रयोग करो।
-अच्मा, राजा. स्त्री निन्दास-केविलोमशाद बतलायो।
-

[ ४१ ]
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-राजा की धासें खुलने पर क्या दिखलाई दिया?
२-सस्य ने राजा से क्या कहा ?
३-सत्य के कह चुकने पर क्या घटना प्रदशित हुई ?
४-उक्त गद्याश का उपयुक्त शीपक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का सार सरल भाषा में स्पष्ट करो।
-
२-रेसाकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३.-'अभिमान' पर एक लेख लिखो।
४-ऊँची, काम, विजली, पृथिवी, सपना-के तत्पम् स्वरूप
लिम्बो।
,
-
५-आँख उठाई, 'अभिमान की पगड़ी बाँधना' 'टुकड़ा टुकड़ा
होना', 'श्रअढ़ाकर' 'श्रीधे मुँह था पडना' 'सपना सपना
हो जाना'-को अपने वाक्यों में प्रयोग करो।
व्याकरण के लिए
१-"उस अहकार की प्रापडी"-वाक्य का वाक्य
विग्रह करो।
२-पुष्पाक्ति शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
३-पगड़ी, इसी, इतना, एक, चिल्लाया--का पदपरिचय
करो।

(२०)
राजा ने जो आँख उठाई, वो क्या देखता हे कि
वहाँ उस बड़ी ऊँची वेदी पर उसी की मूर्ति पत्थर की
गडी हुई रक्सी हे और अमिमान को पगड़ी बाँधे हुए है।
सत्य ने कहा कि "मूर्स, तूने जो काम किए केवल अपनी
प्रतिष्ठा के लिये। इसी प्रतिष्ठा के प्राप्त होने की तेरी भावना
रही है। और इसी प्रतिष्ठा के लिए तूने अपनी आप पूजा
की । रे मूर्स, सकल-जगत्स्वामी घट घट अन्तर्यामी क्या
ऐसे मन रूपी मन्दिरों म भी अपना सिंहासन बिछने देवा
है, जो अभिमान और प्रतिष्ठा प्राप्ति को इच्छा इत्यादि
से भरा पड़ा हे ? यह तो उसकी बिजली पड़ने के योग्य
है।। मत्य का इतना कहना था कि सारी पृथिवी इक
धारगी काँप उठी, मानों उसी दम टुकड़ा टुकड़ा हुश्रा
चाहती थी, प्राकाश में ऐसा शद हुश्रा कि जैसे प्रलय
काल का मेघ गरजा । मन्दिर की दीवारें चारों ओर मे
अड़बड़ा कर गिर पड़ीं, मानों उस पापी राजा को दवा
ही लेना चाहती थी। उस अहकार की मूत्ति पर एक
एसी पिजली गिरी कि वह धरती पर पौधे मुँह श्रा
पड़ी। 'बाहि माम, त्राहि माम , मैं इबा' कहके भोज जो
चिल्लाया, ता ऑम्ब उसकी खुल गई और सपना सपना
हो गया।

दूसरा अध्याय

-
[ ४२ ]
विषय सम्बन्धी
१-राजा भोत्र पर एक सक्षित टिप्पणी दी।
२-~-उक्त गध की शैली पर अपन विचार प्रकट करो।
३-उपर्युक्त गद्य में किन किन अलकारी की झलक धागई है?
स्पष्ट सममायो।
सहायक शब्द :-
शब्दार्थ-दो उँची घेदी पर उच्चामन पर। मूति - प्रतिमा ।
थमिमान की पगड़ी-अभिमान का साफा । सकल जगत् स्वामी
परमेश्वर से भाव है। घट घट श्रतर्यामी सन्यापी । गौरव = बड़ाई।
विजली पदने योग्य है - वजपात होना चाहिये । प्रलयकाल = करपान्त ।
मेघ - धादल । प्राहिमाम्मुझे बचायो। सपना
हो गया।
-
गया-स्वप्न

प Ja 1 राम- अपठित गद्यान्श कक्षा १० ० के लिए (१) अगद-स्वामी। वह देखिये, दोनों मुनि फुमार आ रहे हैं। क्रोध से उनका शरीर लाल हो रहा है। भगवन् । जान पडता है, इन वीर बालकों से युद्ध करना ही पड़ेगा। -(आप ही आप) युद्ध क्या होगा, किस लिए होगा, किस दम पर होगा । सीते । मेरे शरीर में तुम शक्ति थी। तुम्हारे बिना में शक्तिहीन हूँ। वीर बालकों ने पल मे चन्द्रकेतु, शनुन, लक्ष्मण, भरत सरीसे वीरों के दाँत सट्टे कर दिये। अब राम की बाहों में क्या चल है कि इनसे युद्ध करें। हाय राक्षसों के सहारक राम की तलवार जिस दिन एक तपस्वी पर चली, उसी दिन सारी शक्ति का अन्त हो गया । (अङ्गद से) अङ्गद । नहीं, हो सकता। मुनि बालकों को परास्त करने से क्या लाभ होगा? यदि अश्वमेघ के घोड़े को लेकर ही इन्हें शान्ति है तो

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[ ४५ ]
(२)
पञ्चवटी एक स्थान है । उसके समीप ही गोदावरी
की स्वच्छधारा प्रवाहित हो रही है। वृक्ष और लताएँ
मानो गृह पर आये अनिधि के समान श्री रामचन्द्र जी
का पुष्पों से स्वागत कर रही है। रग विरगे पति समुहछ
अपने शब्दों से मानों सीता के पतिव्रत धर्म का यशोगान
कर रहे हैं । यहाँ के अकडे हुए वृक्ष माना इस यात को यह
रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रतिज्ञा पर इसी प्रकार
सर्यदा अटल रहते हैं। ऐसे सुन्दर और भावश वन को देखकर
रामचन्द्रजी अत्यन्त
प्रसन्न हुए ।
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-पघवटी को देखकर श्री रामच द्रजी क्यों प्रसन्न हुए?
२-वृक्षलता मं, पति-यूजित, वृक्ष की ऐट प्रकद, इन सबसे
लेखक ने क्या-क्या भाव निकाले हैं?
३-पशवटी की प्राकृतिक शोभा का उल्लेख करो।
४-उक्त गय के लिए एक भावपूर्ण शीर्षक यतायो।
रचना के लिए
१-उक्त गध का निष्कर्ष अपनी योली में सममायो।
२-रेखाक्ति पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-पञ्चवटी की प्राकृतिक शोभा पर एक संक्षिप्त लेस लिखो।

[ ४४ ]
-
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-~-प्रशद ने राम से क्या कहा था?
२-अङ्गद की वार्ता सुनकर राम ने क्या उत्तर दिया !
३-~~उक्त गद्याश का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
१-उत गद्य का अर्थ केवल तीन पत्तियों में अक्षित करो।
२-रोकिन पदा को स्पष्ट करो।
३---'लाल होना', 'दौत कर देना', 'सहारक'-को निज
निर्मित वाक्या में प्रयोग करो।
४-'अश्वमेध' पर एक सतिप्त लेस लिखो।
व्याकरण के लिए
१--पुप्पापित श दो का पदान्वय करो।
-'मुनि कुमार' और 'अश्वमेध' के सविग्रह समास लिखो।
अलकृत प्रश्न
१-राम ने सीते । सम्बोधन करके क्यों पश्चाताप किया?
२-राम न क्या यात सोच कर अगद से कहा कि मुनि-बालकों
को परास्त करने में लाभ नहीं?
सहायक शब्द:--
शब्गर्थ-मुनि-कुमार = यहाँ तात्पर्य लव और कुश से है। दाँत
स कर दिये = अपने पराक्रम से शत्रु को नीचा दिखा दिया।
धाधों में = भुजाधों में | परास्त करने से हराने से। अश्वमेध -
यह यज्ञ जिपर्म दिग्विजय करने के लिए घोड़ा छोड़ा जाता है।
यह एक साल उपरात कर पा जाता है, तब इसका यज्ञ
में बलिदान किया जाता है।

[ ४५ ]
पञ्चवटी एक स्थान है । उसके समीप ही गोदावरी
की स्वच्छधारा प्रवाहित हो रही है। वृक्ष और लताएँ
मानो गृह पर आये अतिथि के समान श्री रामचन्द्र जी
का पुष्पों से स्वागत कर रही हैं। रङ्ग विरगे पति समूह
अपने शब्दों से मानो सीता के पतिव्रत धर्म का यशोगान
कर रहे हैं। वहाँ के अकडे हुए वृक्ष मानों इस बात को कह
रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रतिज्ञा पर इसी प्रकार
सर्वदा अटल रहते हैं। ऐसे सुन्दर और भावज्ञ वन को देखकर
रामचन्द्रजी अत्यन्त प्रसन्न हुए ।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-पचवटी को देखकर श्री रामचन्द्रजी क्यों प्रसव हूए ?
२-वृक्षलता में, पति-कूजित, वृक्षा की ऐंठ प्रका, इन सबसे
लेखक ने क्या-क्या भाव निकाले हैं।
३--पञ्चवटी की प्राकृतिक शोभा का उल्लेस करो।
४-उक्त गद्य के लिए एक भावपूर्ण शीर्षक बतायो ।
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का निष्कर्ष अपनी बोली में समझायो।
२-रेसाकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-पञ्चवटी की प्राकृतिक शोभा पर एक सक्षिप्त लेख लिखो।
-

-
.
[ ४६ ]
-रमणीय', 'रंग विरगे', 'भायज्ञ'को निजनिर्मित वाक्यों
में प्रयोग करो।
व्याकरण क लिए
१-पुष्पाकित शद के सविग्रह समास लिसो।
-रमणीय', 'अकड़े', 'भावज्ञ'
'--का पद परिचय करो।
घलकृत प्रश्न
१-श्री रामचन्द्र पञ्चवटी पर किम समय और क्यों ठहरे थे !
२-पचरटी सम्बधी कोई घटना यदि स्मरण हो तो वर्णित
करो।
३---उक्त गद्य में किम अलकार की प्रधानता है? क्यों, स्पष्ट
समझायो ।
सहायक शब्दाः-
शन्दार्थ-प्रवाहित हो रही है यह रही है। अतिथि = पाहुने ।
भावज्ञभावशाता, मर्मज्ञ ।
उपयुक्त गद्याश में उत्प्रेक्षा अलकार है।

[ ४७ ]
जनक के कहने और विश्वामित्र की श्राज्ञा से
श्रीरामचन्द्रजी ने सहज ही में उस धनुष को उठा लिया,
जिसके हिलाने में भी पृथ्वी के सभी वीर हार मान चुके थे
और फिर जर श्रीरामचन्द्रजी उसे मुकाकर ज्योंही उमकी
प्रत्यञ्चा चढाने लगे त्यों हो वह कडकड़ाकर तडाके के साथ
चौच से दो टूक हा गया। धनुप भग होते ही राजा जनक
तथा रनिवास की सन रानिया को बड़ा आनन्द हुआ,
क्योंकि जब से श्रीरामचन्द्र जी जनकपुर में आए थे, तब
से उन्हें देखकर सनी की यही लालमा हुई थी कि किसी
प्रकार श्रीजानकी जी का विवाह श्रीरामचन्द्र जी के साथ हो ।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-रामचन्द्रजी ने धनुष को किस प्रकार तोदा ?
२-अयोध्यापुरी के नर नारियों पर धनुष मन का क्या प्रभाव
३-मिथिला के नर नारी उस समय क्या चाह रहे थे?
४-धनुष को पहिल क्सि किम ने तोड़ना चाहा था ?
रचना के लिए
१-उक्त गध का निष्कप केवल तीन पत्तियों में अङ्कित करो।
२-रेखांकित शब्दों की व्याख्या करो।
Shi

[ ४८ ]
३-'जनक', 'विश्वामित्र', 'श्रीरामचन्द्र जी'-पर सरूप में
टिप्पणी दो।
-'सीताजी के स्वयबर पर एक लेस लिखो जो लगमग २०
पतियों का हो।
-
व्याकरण के लिए
१-पुप्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
-'धनुप', 'प्रत्यञ्चा', 'कदकड़ाकर', 'टूक',
'लालसा' शब्दों
का पदान्वय करो।
विशेप प्रश्न
५-राजा जनक ने धनुष यज्ञ मयों किया था ?
--श्रीरामचन्द्रजी विश्वामित्र के साथ जनकपुर क्यों गये थे।
महायक शब्द:-
शार्थ -प्रत्यच्चा = धनुष की डोरी। भग होते ही टूटते ही।
लालसा-इच्छा।

४६ ]
नेपोलियन पचपन में बहुत
दुर्वल था घोर
बाल-समामों में बहुधा उस नीचा देसना पड़ता था ।
लेकिन पढने लिखने में बहुत तेज था । गणित से उसे
विशप प्रेम था । बड़े वडे विजेताओं के चरित्र पढ़ने
की भी उसे रुचि थी । वह उनकी लड़ाइयों के नकाशे
खींचता और सोचता कि ए दिन में भी इसी भाँति
ससार को जीत कर थपना नाम अमर करूँगा । वहा
एक विद्यालय में प्रविष्ट प्रा । फास में जन राज्यों
ज्वाला, धधकी, तन यह दुर्नल, माँरला, एक हरी
का युवक मेना में लेफटिनेन्ट था । फासीसियों न
राजा को मार डाला और यूरोप के समस्त
धारियों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करदी
-
प्रन
अभ्यास के लिए
१-नेपोलियन बचपन में कैसा था ?
-नेपोलियन को क्सि किप्त से प्रेम
-नेपोलियन की क्या भावना थी?
४-यह कहाँ का रहने वाला था!
तब पास सी क्या दशा थी
ह
सेना का लेपटिनेंट था

--
रचना के लिए
१---उस गद्य का शार्पक बतलायो ?
२-उपर्युक्त गवारा का सरलाध अपनी बोली में वणित करो।
३-- रेखांकित पदों को स्पष्ट करो।
'नीचा देसना पड़ा', 'अपना नाम अमर करना'को
अपने वाक्यों में प्रयोग करा।
व्याकरण के लिए
१-पाकित शब्दों क सनिग्रह समाय बतायो।
२-'यचपन', 'विशप', 'युवक-इन शब्दों की शब्द निरुक्ति
करो।
शेप प्रश्न
१-नेपोलियन सेना में इनना शाघ्र क्योंकर लफटिनेन्ट हुधा ?
.
‘क शब्द
विधा-विजेतायो - विजय प्राप्त पुरगों, विजयी योद्धाओं।
हुभा, भया+यालय ) मदर्मा, सज । प्रविष्ट हुआ दाखिल
पलट तिला राज्य क्रान्ति - विपत्व, राज्य में उनट

{ ५१ ]
अवकाशाभाव के बारे में हम कह सस्ते हैं, कि किमी
व्यक्ति को यदि मिमी विशेष काय के करने की उत्कट
इच्छा हो, तो उसके लिए अवकाश अवश्य ही मिल
जायगा । जब कुछ व्यसनी लोगों को दिनभर कठिन
परिश्रम करके रात्रि में ताश या शतरच खेलने का अवकाश
मिल जाता है, तब कोई कारण नहा कि एक चिट्ठी
लिखने या कुछ सागीत सीसन या प्राणायाम करने या
कोई धार्मिक या साहित्यिक पुस्तक के पढने का अवकाश
न मिल सके। प्रावश्यकता है उत्कृट इन्छा भार मन
लगन की। सत्सगतिछ का फल ही यह है कि उपादेय
विषयों में सदिच्छा पैदा हो जाय । श्रत विद्यार्थी लोग
तथा अन्य जन इस बात का निश्चय प्रोर दृढ-सकल्प
कर लें, कि वे अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी
व्यर्थ न सोयेंगे, और यदि घे अधिक से अधिक ज्ञान
(पम्तकस्थ तथा व्यावहारिक) प्राप्त कर लेंगे, तो बिना
किसी कठिनता के उनका मनोरथ मिद्ध हो जायगा।
.
--
प्रहन
अभ्यास के लिए
१-विमी पिगेप काय को करने के लिए सक्षरुप को आवश्यकता

[ २ ] २-मरमगति का क्या फल है? ३-विद्यार्थियों का मनोरथ क्यों पर सिद्ध हो जाता है ? ५-उक्त गद्याश का भावपूर्ण शीपक क्या हो सकता है ? रचना के लिए १-उक्त गद्य का निष्कर्ष अपनी भाषा में अश्ति करो। २-रेसाक्ति पदों की विस्तृत व्याख्या करो। ३-'उरकट', 'प्राणायाम' 'सदिच्छा' 'मनारय'---हा शब्दों को अपने पाक्यों में प्रयोग करो। ४--'सरसंगति' पर एक लेन्च लिखो। व्याकरण के लिए १-गुप्पादित शब्दों के समास लिखो और विमह भी करो। २-न्यक्ति', 'अवश्य', 'श्रत', 'व्यर्थ' 'यिना'-इन शब्दों का पदावय पर। विशेष प्रश्न- १-'प्राणायाम' किसे कहते हैं। २-ताश और शतरज के खेलों में क्या अन्तर है ? महायरु शब्द:- शदार्थ-अवकाशाभाव = समय को क्मा, अवसर न मिलना । उस्कट = तीय, अधिक । यसनी लोगों को अभ्यासी पुरुषों की । प्राणायाम = योगाग विशेष, रेचक, पूरक और कुम्भक नायक प्राणों का दमन करने का उपाय । उपादेय - उत्तम, प्रहण योग्य । ४६ सङ्कल्प = पक्का विचार, द प्रए । मनोरथ % इच्छा, वासना । .

[ ५३ 3
स्कूल में हमने भी माग भूगोल और स्वगोल पढ
डाला है। पर नर्क और चैकुण्ठ का पता यहीं नहा
पाया । किंतु भय और तालच का छोड द तो बुरे
कामों से घृणा श्रोर सत्कर्मो 8 स रुचि न रस कर भी
तो अनिष्ट ही करेंगे । ऐमी बातें मोचन से गास्वामी
तुलसीदास जी का 'गा-गोचर जहँ लगि मन जाई, सा
सर माया जानेहु भाई,' शोर श्री सूरदाम जी का 'माया
मोहिती मनहरन' कहना प्रत्यक्ष तथा सया जान पड़ता है।
फिर हम नहीं जानते कि धोखे को लाग क्यों बुरा
सममो हे ? धोसा साने वाला मूर्स और धोखा देने
वाला ठग क्यों कहलाता है ? जब सन कुछ धोगा ही
धोसा है, और धोसे से अलग
रहना ईश्वर की भी
सामर्थ्य में दूर है, तथा धोसे ही के कारण समार का
चर्सा पिन्न पिन चला जाता है नहीं ता टिचर विचर होने लगे,
वरच रही न जाय ता फिर इस शब्द का स्मरण का श्रवण
फरते हो आपकी नार मोदछ त्यों-सकुड़ जाती हैं. इसके
उत्तर में हम तो यही कहेंगे कि साधारणत जो धोसा साता
है वह अपना कुछ न कुछ गॅमा बैठता है और जो धोखा देता है
उसमी एक न एक दिन फलई सुले बिना नहा रहती है,
और हानि महना वा प्रतिष्ठा सोनी दोनों बातें बुरी हैं, जो
बहुधा इसके सम्बन्ध में हो ही जाया करती हैं।

। ५४ ] - प्रश्न अभ्यास के लिये १-~-पाखे को लोग क्यों युरा समस्त है ? २-नो मनुष्य धोखा खाता है उसका क्या हाल होता है? ३--जो मनुष्य धोखा देता है उसका क्या दशा हो जाती है ! ४--क्या यह सच है कि धोखे के हा कारण ममार का काम चल रहा है? यह श्यि प्रकार-सष्ट पतायो । रचना के लिए १--उक्त गद्य का निष्कर्ष अपनी योली में वणित करो। २- ग्वाक्ति पत्रों का स्पष्टीकरण करो। ३-~-'माया मोहिना,' 'टिचर द्विचर,' 'नाक-भीर मदना, कलई खुलना-इनको अपन वाक्यों में प्रयोग करो तथा अर्थ भी सष्ट करो। ४-'घोडे के ऊपर एक सचित लेख लिखो। व्याकरण के लिए - १-पुष्पाकित शरदों के सविमा समाम लिखो। २--'भय' 'वरच,' 'प्रतिष्ठा,' 'बहुघा' हुन गब्दों की शब्द निरुक्ति करो। - विशेष प्रश्न - ५-'धोखे से अलग रहना इश्वर की मी सामथ्य मे दूर है इसका योगहरण सिद्ध करो। २-क्या कोई महान् पुरस घोसे में आया हो ? उमका उल्ले करो। सहायकवाद :- शाय-खगोल अाकाश मण्डल | अथवा = और । अनिष्ट == दुरा, हानि । प्रत्यक्ष साहात् । ।

[ ५५ ]
राजा नल की अद्भुत रूप राशि, गुणावलि, पल,
प्रभुत्व, दानशीलन आदि सुनकर विदर्भ देश के राजा
भीम की कला दमयन्ती उस पर आसक्त हो गइ । उसने
अपने मन में यह प्रतिज्ञा की कि यदि मै किसी क साथ
विवाह करूँगी तो नल ही के माथ करूँगी । उधर एक
हम से दमयन्ती के रूपलारण्य की प्रशसा सुनकर नल
भी उम पर मोहित हो गया । हँस न दूतत्व किया और
दमयन्ती रे पास जाकर उसके नल विषयक अनुराग को
और भी बढ़ा दिया । उसन दमयन्ती से यह भी वायदा
किया कि उपाय
भर मैं तुम दोनों का विवाह करा
दूंगा । हँस के चले जाने पर दमयन्ती दिन रात नल
का चिंतन करने लगी । वह बहुत कृश हो गई,
साना पीना बहुत कुछ छूट गया , दुनियाँ की और सभी
बातों से उमकी विरक्ति हो गई । वियोग विषयक कवि-
समय सिद्ध प्रापदाओं ने एक मात्र उसी का सहारा
ले लिया । ससार में योग हो जाने पर वियोग की
घटना होती है। पर श्रीहर्ष की सृष्टि में नल से योग
होने के पहले ही दमयन्ती पर वियोग विपत्ति के बादल
फट पड़े । उसे उन्माद सा हो गया । वह विलाप करने
और श्राकाश पाताल के कुलाचे मिलाने लगी । एक गत

d ६ H [ ६ ] को जो उम पाइश स्लायोश्च से पूर्ण, शिशिर धपा, । शातर हिवाई दिये तो उममा दुध दूना हो गया । उसन चन्द्रमा का यही निन्ना का । पर गहु के लिए कहा -"घडा वहादुर है , पडा परम दुन्य कातर है, पापी चन्द्रमा को सा नाता है। परोपकारनता हो ता राहु जैसा हो रियाग विधुराश्रा को पचाने को बेचाग बड़ी " इस प्रकार जय व्हत मुनते उसका स्मर-ताप-नामर मन पहत है गया तर वह अपना बराती हुइ मखा माली- चेष्टा करता -- ? . अभ्यास क लिए १-दमय ती नल के उपर प्रासक्त क्या हुई और उसने अपने मन में क्या प्रतिज्ञा का? २--निल दमय ती के ऊपर क्यार मोहित दुपा ३-हंस ने क्या दूतय किया ? इसके चले जाने पर दमयता का क्या दशा हुई ४---मयनी ने राहु के लिए क्या कहा? रचना के लिए 1-उक्त गध का सरलाथ अपनी योली में प्रकट करो। २-रेखांकित पदों का सष्टीकरण करो। ३-नल और दमयन्ती पर मक्षिप्त टिप्पणी दो।

-
[ ५५ ]
५.-'आमत होना', 'मारित होता', 'माकाश पाताल के बुलान
मिलाना-दनको धपने यापयों में प्रयोग करो।
५--'पद्रमा उपर पर लप लियो पो १५ पत्तियों का हो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शदों के सविग्रह ममार लियो ।
२-'प्रमुख', 'उघर', 'यहादुर' 'परम', 'T-1 रादों का
पदान्वय परो।
३-"सके चले करने लगी।-इस याश्य का या
पृथक्-करण परो।
.
विशेष प्रश्न
१-दमयन्ती ने चन्द्रमा की क्यों निदा की?
२---राहु घ द्रमा का क्यों धैरी है ? इस कथा का उलेख करो।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-रूपलाययय = स्वरूप की मुदरता । अनुराग = प्रेम ।
कृश = दुबली-पतली । विरक्ति हो गई = ससार से वैराग्य होगया । उमाद
=पागलपा । पोदश सोलह । शीतकर पदमा । वियोग विधुरात्रों
को = वियोग से सताये हुओं को । चेष्टा = प्रयरन, उद्योग । स्मर ताप =
कामदेव की अग्नि अर्थात् कामदेव का सताना ।

[ ५८ ]
कि जिन्हें मुन
यूरप के लोगों में बात करने का हुनर है। "आर्ट ऑफ
कनवरसेशन" यहाँ तक बढा है कि स्पीच और लेख दोनों
इसे नहीं पाते । इमरी पूर्ण शोभा काव्यकला प्रवीण
विद्व मण्डली में है। स चतुराइ क प्रसग छेडे जात हैं
कान का अत्यन्त
सुख मिलता है।
सुहृद् गोष्ठी इसी का नाम है। सुहद् गोष्ठी की बातचीत
की यह तारीफ है कि बात रन वालो की लियाकत
अथना पण्डिनाइ का अभिमान या कपट कहीं एक बात
में न प्रकट हो वरन मम रसाभास पैदा करने वाले
सभों के उरकते हुए चतुर मयाने अपनी बातचीत को
अनम रसते है। वह हमारे आधुनिक शुष्फ पण्डिता
की बातचीत म निसे शास्त्रार्थ करते हैं, कभी प्रावेगा
ही नहीं। मुर्ग और बटेर की लड़ाइयों की झपटा झपटी
के समान उनकी नीरम कॉव कॉर मे मरस सलाप की
तो चर्चा हो चलाना व्यर्थ है, वरन् कपट और एक
दूसरे को अपने पांडित्य के प्रकाश स वाद मे परास्त
सघर्ष श्रादि रसाभास की सामग्री वहाँ
यहुतायत के साथ श्रापको मिलेगी। घण्टे भर तक कॉन
कॉव करते रहेंगे तो कुछ न होगा । बडी बडी पनी
और कारखाने श्रादि बड़े से बड़े काम इमी तरह पहले
करने का

[५]
दो धार दिली दोस्तों की बातचीत में ही शुरू किए गए।
उपरांत यहतं यदते यहाँ वा पई कि हजागें मनुष्यों की
उनसे जीयिमा पलने लगी और साल में ला दी
बामदनी होने लगी। पचीस पर्पस ऊपर गला की
पातचीत अवश्य ही कुछ न कुछ सारगभित होगी, अभय
और दूरदेशी में शाली न होगा और पचोम से नीचे
की बातचीत में यद्यपि अनुभव, दूरदर्शिता और गौरय
नहीं पाया जाना पर इसमें इस प्रकार का ऐसा मिलनहलान
और ताजगी रहती है जिसकी मिठाम उससे दस गुना
चढी चढ़ी है।
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-सुहृद गोधी किस कहते हैं ? इसकी यातचीत की धया
तारीफ है।
२--"पार्ट थीप कनररमेशन किसे कहते है। यह कहाँ के
बोगों में पाया जाता है?
३-पोस वर्ष के अपर और पचास से नीचे वाला की यातचीत
कैसी होती है? स्पष्ट समझायो ।
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है?
२-उपयुक्त गद्य का निष्कर्ष पाँच पत्तियों में अंकित करो।
३-रेखाकित पदों का सष्टीकरण करो।
पर एक सक्षिप्त लेख लिखो।
-

[५]
सुप मिलता है।
यूरप क लोगों में बात करन का हुनर है। "प्रार्ट ऑफ
कलयम्सशन यहाँ तक बढा है कि स्पीच और लय माना
इसे नहीं पाते । इमको पूर्ण शाभा काव्यकला प्रवीण
विद्वन्मएडली में है। प्रम चतुराई : प्रसग रहे ज्ञात है
कि जिन्हे सुन कान का
सुहद् गोष्टी इसी का नाम है। मुहृद गोष्ठी की बातचीत
की यह तारीफ है कि बात 7 वालों की लियाक्त
अथवा पण्डिनाइ का अभिमान या स्पट कहीं एक बात
में न प्रकट हो वरन कम रमाभास पैदा करने वाले
सभा के वरक्त हुए चतुर सयान अपनी चानचीत को
अक्रम रसते हैं। वह हमारे आधुनिक शुष्क परिहता
की बातचात म निसे शास्त्रार्थ करते हैं, कभी आवेगा
ही नहीं। मुर्ग और टेर का लड़ाइया की झपटा झपटी
क समान उनसी नीरम काँव काँव में सरस सलाप की
वो चर्चा ही चलाना व्यर्थ है, वरन् वपट और एक
दूसरे को अपने पांडित्य के प्रकाश से वाद में परास्त
सघर्ष श्रादि रसाभास की सामग्री वहाँ
बहुतायत के माय श्रापसे मिलेगी। घण्टे भर तक कॉर
कॉव करते रहेंगे ता क्छ न होगा। बड़ी बड़ी पनी
और कारखाने आदि बड़े से वहे काम इसी तरह पहले
करने का

दो चार मिली दोस्तों की बातचीत से ही शुरू किए गए।
उपरात बढते चढते यहाँ सब घद कि हजागें मनुष्यों की
जनस जीविका चलने लगी और माल में लास पी
आमदनी होने लगी । पचीस वर्ष का अपर वाला की
पातचीत अवश्य ही कुछ न कुछ मारगभित होगी, अनुभव
और दूरदेशी में साली 7 होगी और पचास से नीचे
को यातचीत मे यद्यपि अनुभव, दुरदर्शिता थोर गौरव
नहीं पाया जाता पर इसमें इस प्रकार या ऐमा दिलबहलाव
और ताजगी रहती है जिसकी मिठास उससे दम गुना
चढी पदी है।
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-सुहद-गोष्टी किसे कहते हैं ? इसकी यातचीत की क्या
तारीफ है।
२.-"शार्ट चौफ कनजरमेशन किसे कहते है यह कहाँ के
लोगों में पाया जाता है ?
३-पथौम वर्ष के ऊपर और पचीस से नीचे घाला की यातचीत
कैसी होती है ? सष्ट समझायो ।
रणना के लिए
१-उक्त गद्य का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है ?
२-उपर्युक्त गद्य का निष्कप पाँच पक्तियों में अकित करो।
३.-रेखाकित पर्दो का स्पष्टीकरण करो।
-'यातचीत' पर एक सतिप्त लेस लिखो।

[ ६० ]
व्यारण के लिए
१-पाकिन शब्दों के मविप्रह ममाम लियो।
२-नीरम, चतुर, मयाने विशेषणों से माववाचक मंशाएँ
बनायो।
३-धतुराई, बहुवायन, अनुभर, दसगुना का पर-परिचय करो।
४-उक्त गद्य में मे बतमान काल की मिया धुनो।
विषय सम्बन्धी
१-'मुर्ग और बटेर की लड़ाइयों की झपटा मपरी के ममान से'
लेखक का क्या प्राशय है? स्पष्ट बतलाओ।
२-पाच और लेस्य किसे कहते है ! प्रत्यक को व्यापया करो।
३-उक्त गद्य की पालोचना करते हुए अपने विचार प्रस्ट करो
कि यह गध की शैली कैसी है
-
-
सहायक शब्द:-
शनार्थ
F-रसाभाम= रङ्ग में मग । मारगर्मित सारयुक्त, अर्थ
सयुक्तः । दिल बहलाव- मनोरजन । अनुभव = शान । दूरदेशी.
विवेकपूर्ण । दूरदर्शिता=विवेकना । सलाप बातचीत, सम्भाषण ।
ताजगी नवीनता।

[ ६१ ]
नारगी रस में जाफरानी बसती चूटी छान कर शिवशम्भु
शर्मा बटिया पर पड़े मौजो का आनन्द ले रहे थे।
सयाली घोडों की बागें ढाली कर दी थी। वह मनमानी जकर्वे
भर रहा था। हाथ पाँव को भी स्वाधीनता दी गई थी।
घे सटिया के तूल अरज की सीमा उल्लघन करके इधर उधर
निकल गये थे । कुछ देर इसी प्रकार शर्माजी का शरीर
सटिया पर था और खयाल दूसरी दुनिया में। अचानक
एक मुरीली गाने की आवाज ने चौंका दिया। कन रसिया
शिरशम्मु खटिया पर उठ बैठे। कान लगा कर सुनन
लगे। कानों में यह मधुर गीत बार बार अमृत ढालने
लगा । "चलो चलो श्राज खेलें होली, कन्हैया घर "
फमरे से निकल कर बरामदे में खड़े हुए । मालूम हुआ कि
पहोस में किसी अमीर के यहाँ गाने बजाने की महफिल
हो रही है कोई सुरीली लय से उक्त होली गा रहा है ।
साथ ही देसा, बादल घिरे हुए हैं, बिजली चमक रही
है, रिमझिम झडी लगी हुई है। वसन्त में सावन देखकर
अकल जरा चक्कर में पड़ी। विचारने लगे कि गाने वाले
को मलार गाना चाहिये था, न कि होली । माथ ही
खयाल आया कि फागुन सुदी है, वसन्त के विकास का
समय है, वह होली क्यों न गावे । इसमें तो गाने वाले
,
..

निर्मल वायु
का नहीं, निधि को भूल है जिमने वसन्त में सावन बना
दिया है। कहा तो चाँदनी छिटकी होती,
बहती, कोयल की कूम सुनाई देती, कहाँ भादा की सी
अंधियारी है, वर्षा को झड़ी लगी हुई है। | कैसा
नातु रिपर्यय है।
थाह
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१--शिवशम्भु शर्मा विम नशे में मस्त थे?
२. शर्मा जी के कान में क्या सुनाई पड़ा? उन्होंने उसकी
शका कैमे समाधान की, स्पष्ट बतलायो ।
३-'होली' किसे कहते हैं ? यह किस अवसर पर गाइ जानी है ?
रचना क लिए
१-उक्त गद्याश का सक्षेपाथ सरल भाषा में लियो ।
२-पुष्पाकित पदों की विशद् व्याख्या करो।
३--'वसन्त प्रश्तु' पर एक लेख लियो।
५-नाफ्रानी, खयाली, दुनियाँ, बिजली के शुद्ध हिन्दी शब्द
-
बनायो।
५-चौंका दिया, उत्लधन, अफल, रा चक्कर में पद,
विधि की भूल तथा निर्मल वायु को वाक्यों में प्रयोग करो।
व्याकरण के लिए
{---पुष्पाकिन शदी ये सविग्रह समास लिखो।

[ ६३ ]
२-प्रथम वाक्य का वाक्य विश्लेषण करो।
३-खदिया, खयाल, विधि, अँधियारी का पदान्ध्य करो ।
विशेष प्रश्न
,
१-भाग के नशे में मनुष्य को क्या दशा हो जाती है, श्रापकी
सम्मति में नशा वरना कैसा है?
२-दपाकाल की प्राकृतिक शोभा का वर्णन करो।
३.-'होली' फागुन के ही मास में क्या गाते है ? व्यारया करो।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ--जाफरानी = केशरिया रंग की। शिवशम्भु के नाम से
इहोंने भारत मिल में कई चिट्ठियों छपाई थीं जिनका समह शिवशम्भु
के चिट्ठ में किया गया है । बाग लगाम । जकद = छलाँग ।
तूल श्ररज- लम्बाई चौड़ाई । कन रसिया= सुनने के रसिक । विपय्यय
-उलट-पलटा

L
1
१
(१०)
उता महाशय वक्रता दन को उठ पड़े हुए है ।
अपनी पण्डिताड दिसान के लिये सब शास्त्रों की बात
घोडी बहुत कहनी चाहिए । पर शास्त्र का जानना तो
अलग रहा, उन्हें किमी शास्त्र का पना भी उलटने का
सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ ।
इधर उधर स सुनकर दो
एक शास्त्रों और शास्त्रकारों का नाम भर जान लिया
है। कहने को तो खडे हुए हैं, पर पहें क्या ?
अब लगे चिन्ता के समुद्र में डूबने उत्तराने और
मुँह पर रूमाल दिए ग्याँसते चूसते इधर उधर ताकने ।
दो चार बूंद पानी भी उनके मुखमडल पर मलक्ने
लगा। जो मुख कमल® पहल उत्साह सूर्य की किरणों से
खिल उठा था, अब ग्लानि और सकोच का पाला पहने
से मुरमाने लगा । उनकी ऐमी दशा देस हदय दया से
ग्मद थाया । उस समय मैं निना बुलाए, उनकी महायता
के लिये ला सडा हुआ, और मैंन उनके कानों में चुपके
से कहा-"महाशय कुछ परवा नहीं, आपकी मदद के
लिये मैं हूँ । अापके जी म जा प्राव प्रारम्भ कीलिए ,
फिर तो में सन कुछ नियाह लूँगा ।" मेरे दाढम बंधाने
पर बेचारे वक्ताजी के जी में जी आया । उनका मन फिर
ज्यों का त्या हरा भरा हो उठा । थोड़ी देर के लिये जो
.
-

[ ६५ ]
उनके मुसहे के ग्राफाश-महल में पिता पिता का पादल
देख पड़ा था, वह मेरे दादस के मकोरे से एक मारगी
फट गया, और उत्साह का सूर्य फिर निकल पाया ।
घर लगे ये यों वक्तृता माड़ने-"महाशयो, मनु इत्यादि
धर्मशास्तकार, व्यास इत्यादि पुराणकार, फपिल इत्यादि
दर्शनकारों ने फर्मयाद, पुनर्जन्मयाद इत्यादि जिन जिन
दार्शनिक तत्त्व-रत्ना का भारत के महार में भरा है,
उन्हें देखकर मैक्ममूलर इत्यादि पाश्चात्य पण्डित लोग
बड़े अचम्मे में श्राफर चुप हो
जाते हैं । इत्यादि,
इत्यादि ।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-या महाशय की शास्त्रों के प्रति योग्यता का चयन करो।
२-शास्त्र और पुराण किसे कहते हैं।
३.-मैक्समूलर के विषय में क्या जानते हो!
रचना के लिए
-
.
२-उक्त गद्य का सारांश अपनी बोली में लिखो।
२-रेखांकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-'चिन्ता' के ऊपर एक लेख लिखो।
४-'हृदय दया से उमड़ पाई', 'जी मैं जी पाया', 'हरा भरा
हो उठा' से क्या भाव समझते हो? वाक्यों में प्रयोग
करो।
५

[ .४ ]
वक्ता महाशय वकृता दने को उठ खड़े हुए
अपनी पण्डिताई दिसान के लिये मन शारा की
थोडी बहुत कहनी चाहिए | पर शास्त्र का जानना
अलग रहा, उन्हें क्सिी शास्त्र का पन्ना भी उलटने
सौभाग्य नहीं प्राप्त हुआ।
इधर उधर मे सुनकर
एक शास्त्रों और शास्त्रकारों का नाम भर जान हि
फहन को तो खडे हुए हैं, पर कहें क्या
अब लगे चिन्ता क ममुद्र में डूबने उतराने
मुँह पर रूमाल दिए साँसते झूमते, इधर-उधर ताक
दो-चार चूंद पानी भी उनके मुखमडल पर मन
लगा। जो मुख कमल, पहले उत्साह सूर्य की किरण
खिल उठा था, अब ग्लानि और सकोच का पालाप
से मुरमान लगा । उनकी ऐसी दशा देख हृदय दया
उमड पाया । उस ममय में बिना बुलाए, उनकी महा
के लिये जा पडा हुआ , और मैंन उनके कानों में च
से कहा-"महाशय कुछ परवा नहीं, आपकी मदद
लिये मैं हूँ । आपके जी मे जो आव प्रारम्भ कीनि
फिर सा मैं मन कुछ निघाइ लूँगा ।" मेरे ढाढम बैं:
पर बेचारे वक्तानी के जी में जो धाया । उनश मन
ज्या का त्यो हरा भरा हो उठा । थोड़ी देर के लिये

[ ६७ ]
हे लक्ष्मण
मधुर वाक्य से स्नेह-युक्त सुप्रीन के
वाणी विशारद सचिष हनूमान से भापण कर, यह ज्ञात
हुधा कि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के न जानने वाले
इम प्रकार का भाषण नहीं कर सकते अर्थात ये
वे शास्त्रज्ञ जान पड़ते है। निश्चय ही इन्होंने व्याकरण
का अच्छा अध्ययन किया है। कारण यह है कि इन्होंने
इतना अधिक बोलन पर भी एक अशुद्धि नहीं की। मुस
में, नेत्रों में और भ्रू-भाग में तथा अन्य किसी भी
अवयव में इनके कहीं भी दोप नहीं दिखाई पड़ा ।
सूचमरीति से स्पष्ट-स्पष्ट , अस्सलित, श्रुति-मधुर , न तो
बहुत धीरे धीरे और न बहुत जोर जोर से अर्थात्
मध्यम स्वर में उन्होंने भापण किया है । मुसस्कृत,
नियमयुक्त, अद्भुत प्रकार से प्रिय तथा हृदय को हर्पित
करने वाली वाणी इनके मुख से उच्चरित हुई है।
प्रश्न
श्रभ्यास के लिये
१-हनूमान से भापण करके क्या ज्ञात हो गया ? स्पष्ट उल्लेख
करो।
२- हनुमानजी का व्याकरण ज्ञान किस प्रकार ज्ञात हुश्रा ?
स्पष्ट समझायो।
३--सुग्रीव कौन था?

]
-
५-'मनु, “याम', 'कपिल' पर मंदिप्त टिप्पणी दो।
व्याकरण के लिए
-पुपाकित शदों के सविग्रह समास लिखो।
२-परिखताई मुंह, दो-, का--पदान्वय करो।
३-प्रथम वाक्य का वाक्य पृथक्करण करो।
विपय सम्बन्धी
1---उक्त गद्यारा का भाषा की शैली पर पालोचना करते हुए
अपनी सम्मति प्रकट करो।
२-उपयुक्त गद्य में कौन अलकार, कहाँ पर पाया है ? स्पष्ट
समझायो।
-
लगा
सहायक शब्द
शब्दार्थ-उता = व्याख्यान देने वाला। दो चार दें
=उनके चेहरे पर दो चार पसीने की वूद भी भागई । ग्लानि - घृणा ।
सकोच = लज्जा । ढाढम = धैर्य । वक्तृता = व्याख्यान । महार=
वज्ञाना, कोप । पाश्चात्य = पच्छिम के पूरा के । कर्मवाद = कर्म
सम्भाषण, क्रिया-कम की यातचीत । पुनर्ज मवाद = दूसरे जम की
-
वातचीत ।

हे लक्ष्मण
[ ६७ ]
(११)
मधुर वाक्य' से स्नेह-युक्त सुग्रीव के
वाणी विशारद सचिव हनूमान से भाषण कर, यह ज्ञात
हुना कि ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के न जानने वाले
इम प्रकार का भापण नहीं कर सकते अर्थात ये
वेद शास्त्रज्ञ जान पड़ते हैं। निश्चय ही इन्होंने व्याकरण
का अच्छा अध्ययन किया है। कारण यह है कि इन्होंने
इतना अधिक बोलने पर भी एक अशुद्धि नहीं की। मुस
मे, नेत्रा मे और भ्रू भाग में तथा अन्य किसी भी
अवयव में इनके कहीं भी दोष नहीं दिसाई पडा ।
सूक्ष्मरीति से स्पष्ट-स्पधछ, अस्सलित, श्रुति मधुर, न वो
बहुत धीरे धीरे और न यहुत जोर जोर से अर्थात्
मध्यम स्वर में उन्होंने भाषण किया है । सुसस्कृत,
नियमयुक्त, अद्भुत प्रकार से प्रिय तथा हृदय को हर्पित
करने वाली वाणी इनके मुख से उच्चरित हुई है।
1
प्रश्न
अभ्यास के लिये
१-हनुमान से भाषण करके क्या ज्ञात हो गया ? स्पष्ट उल्लेस
करो।
२-हनुमानजी का व्याकरण ज्ञान किस प्रकार ज्ञात हुआ ?
स्पष्ट समझायो।
३-सुप्रीव कौन था ?

-
[ ६८ ]
रचना के लिए
१-उक्त गद्याश का निष्कर्ष सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-रेखांकित शरद समूहों की विशद् घ्याख्या करो।
३-'च्याकरण' पर एक सतिप्त लेख लिखो।
४.-अम्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और हनुमान पर टिप्पणी दो।
व्याकरण के लिए
१-युप्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-उक्त गद्य में से विमत्तियाँ चुनो।
३-निश्चय, जोर-जोर, अशुद्धि, जान पड़ते हैं,-
-पद परिचय
विपय-सम्बन्धी
१-उक्त गद्य का प्रसँग क्या है?
२- वेद और शास्त्र कितने है ? पृथक्-पृथक् पतज्ञायो ।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-याणी विशारद = बोलने में चतुर, चतुरपक्ता । अध्ययन
किया है = पढ़ा है । म भाग में भौंहों में । अवयव टुकड़े, अङ्ग प्रति
अमभापण = व्याख्यान । उधरित हुई = निकली है, कही है।

का
मारतत्त्व
[ ६६ ]
(१२)
मनुष्य-जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है । सुख शान्ति
के
साथ परमानन्द परमात्मा को प्राप्त करना, और इसे
साधने वाला सबसे बड़ा कर्म है -सयम शील ब्रह्मचर्य ।
बस इसी उद्देश्य की प्राप्ति और इसी कम के करने के
लिए वैदिक काल से प्रयत्न होता था रहा है। मनुष्य-जाति
के विविधि मत-मतान्तरों के धर्म ग्रन्थो
भी यही है
। ससार में सब धर्मों के ऋषि-मुनियों ने
भी अपने जीवन में इसके लिये प्रयल किया है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य, क्षणिक और कृत्रिम सुस नहीं
जो कि विपयोपभोग से मिलता है वह तो पशुओं-नहीं,
नहीं-राक्षसों का उद्देश्य और कर्म है। वास्तव में
मनुष्य के गुण-सत्यनिष्ठा, शील, बल, विद्या, सदाचरण,
परोपकार, साहस, तेज, उत्साह, धैर्य, जीव-दया, विश्व प्रेमछ,
भ्रातृ भाव तथा सत्सुधार आदि हैं । कायरता, प, दम्भ, असत्य,
कलह, निन्दा, विवाद, हठ, अपकार, अन्याय, रुग्णता,
भय, इन्द्रिय-लालुपता, असहिष्णुता तथा क्रोध आदि तो
दुर्गुण ही कहे जॉयगे। गुणो के द्वारा ही सत्कर्म करके
सदुद्देश्य की सिद्धि हो सकती है । दुर्गुणों के वशीभूत होने
से वो दुष्कर्म और पतन होता है। ब्रह्मचर्य के पालन में
में स्थायी सुख और सद्गुण वास करते हैं। विषय भोग

[ ७० ]
तो क्षणिक आनन्द (जिसका फल दुख होता है) और
दुर्गुणो का घर है। एक अमृत-फल है तो दूसरा विप फल ।
रहले के चसने का परिणाम "जीवना और दूसरे का
'मरण' है। पहला स्वर्ग और दूसरा नरक भेजने वाला है।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१--मनुष्य-जीवन का उद्देश्य क्या है ? स्पष्ट समझाओ ।
२-मनुष्य-जीवन के उद्देश्य तक पहुँचने के लिए फिर पमा
उद्योग करना चाहिए?
३-सदुद्देश्य की सिदि किस प्रकार हो सकती है?
४-उक्त गद्य का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है?
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का निष्कर्ष पाँच पंक्तियों में श्रहित करो।
२-रेसाकित शब्दों तथा पदों की विशद् व्याख्या करो।
३.-'परोपकार' पर एक लेख लिखो जो कि २५ पंक्तियों
"-मत-मतान्तरों, विश्वप्रेम, इन्द्रिय-लोलुपता, असहिष्णुता,
वशीभूत-का क्या तात्पर्य है तया वाक्यों में प्रयोग करो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शब्दों के सविमह समास लिखो।

,
M
[ ७१ ]
२-परमाद, परमात्मा, सदुदश्य, दुर्गुणों, सदाचार की सधियाँ
तोड़ो तथा यह भी पतलायो कि यह किन किन नियमों
से मन्धियों हुई है।
३-विविध, पणता, मिलता है, घर, द्वारा की शन्द निरुक्ति
परो।
४-'ससार में सब धर्मों प्रया किया है। वाक्य का
पृथक्करण करो।
५--'पतन होता है' क्रिया का क्या नथ है? इसकी पर्याय
वाची दो क्रियाएँ और बतायो ।
विपय सम्बन्धी
१-ब्रह्मचर्य पालन करना मनुष्य के लिए क्यों श्रावश्यक है ?
-'ब्रह्मचर्य बल का नजाना है। इसकी सोदाहरण पुष्टि करो।
५-विमी दो महान् पुरुषा पर जिहोंने कि ब्रह्मचर्य धम पालन
किया हो, टिप्पणी दो।
४ --क्या गृहस्थी मनुष्य भी ब्रह्मचर्य से रह सकता है ? इस
पर अपने विचार प्रकट करो।
५-ब्रह्मचर्य किसे कहते है ? स्पष्ट व्याख्या करो।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-वैदिक्काल = घेदों का समय, प्राचीन समय । क्षणिक
= थोड़े समय का, अल्पकाल । कृत्रिम पनावटी। सत्यनिष्टा = सत्य
तत्परता, सस्य विश्वास । द्वेष= बैर । दम्भ-पासंद। रुग्णता-
धीमारी, स्वस्थता । इन्द्रिय लोलुपता= इन्द्रियलोभी, कामी । कलह =
लड़ाइ । अपकार = निरादर, बुराई ।
-
-

[ २ ]
हमेशा इस बात की कोशिश करते रहो कि तुम अपने
को लोगों में वैसा ही जाहिर करो जैसा तुम वास्तव में
भीतर से हो । नौजवानों में नुमाइश का पाना उमर का
तकाजा और उनकी नई नई उमगा का एक अह समझा
जाता है, पर उनका न आना बहुत बड़ा सौभाग्य
समझना चाहिये । जाहिरदारी या नुमाइश को दूर रख
कर जो उमगें उठती हैं, वे नौजवानों के भविष्य जीवन
में महोपकारी हो उसको महापुरुपछ (Great man
बना देने में सहकारी होती हैं । इस प्रकार की उमगों
से वह धीरे धीरे चुपचाप अपने महत्व को थालीशान
इमारत लगातार बनाता जाता है । कुँवार-कार्तिक में जो
शरत् कालीन बादल उठते हैं, वे जितना गरजते
हैं, उतना घरमते नहीं । पर बरसात में जो बादल आते
हैं, वे इतना गरजते नहीं, पर घरस के वसथा को सब
ओर मे जलमग्न फर देते हैं। वैसा ही ओछे छिछोरेश
तड़क भड़क बहुत दिखलाते हैं, पर करतूत बहुत कम उनमें
देखी जाती है । किन्तु जा गुरुता-सम्पन्न होते हैं, धे
मुख से कुछ नहीं कहते , बल्कि करके दिखला देते हैं।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
ए-कौनसी उमगे नौजवानों को महापुरुष बना देने में सहकारी है ?

[ ७३ ]
२-परमात में बादल क्या करतूत दिखाते हैं।
३--उक्त गद्य का उपयुक शीर्षक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
१-रेखाकित पद-समूहों का स्पष्टीकरण करो।
२-उपर्युक्त गद्यारा का निफर्ष अपनी चोली में समझायो ।
३-हमेशा, कोशिश, जाहिर, नौजवानों और उमर के शुद्ध हिन्दी
शब्द बनायो।
४-'बरसात' पर एक लेग्य लिखो जो २ पृष्ठ के हो।
५-'जितना गरजने हैं, उतना बरसते नहीं, लोकोक्ति का प्राशय
वाक्य में प्रयोग करके दिखलायो।
६-योछे और विछोरे में क्या थन्तर है ? सोदाहरण स्पष्ट करो ।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
२-वास्तव, बादल, देखी जाती है, करसूत, वे-का पदान्वय
करो।
३-'महोपकारी' में सन्धि विच्छेद करो तथा ऐसे ही पाँच उदाहरण
और दीजिए।
४-निम्नलिखित वाक्यों में व्याकरण की क्या त्रुटियाँ है, स्पष्ट
समझायो ।
(अ) देखी, बादल बरसात में बड़ी जोर से गरजती है।

[७४ ]
(ब) नौजवानों में नुमाइश की पानी उमर की ताजा
और उसकी नई नई उमंगों का एक शह समझा
लाती है।
(स) फॅचार कार्तिक में जो शरत्कालीन यादल उठती हैं
वह अधिक बरसते नहीं।
विषय-सम्बन्धी
१-'मौनवानों की नई-नई उमगों का कोई उदाहरण देकर
दिग्दर्शन करायो।
-किसी 'महापुरुष' पर टिप्पणी करो।
सहायक गन्दा--
शब्दाथ-नवजवानों में नुमायरा : नायुवकों में जपानी पाना ।
महत्व - गोरव । शरत्कालीन शरदऋतु । यसुधा - पृथ्वी । करतूत =
काम । गुप्ता सम्पन्न - बड़प्पन से युक्त ।

[ ७५ ]
।
यदि ध्यानपूर्वक देसा जाय तो इस प्रकार के सैकड़ों
हज़ारों महापुरुष मिलेंगे, जिन्होंने केवल अपने अध्यवसाय, और
दृढ़निश्चय आत्मविश्वास के भरोसे ही ससार में असम्भव
समझी जाने वाली सैकड़ों हजारों बातो को सम्भव कर
दिसलाया और इस प्रकार सिद्ध कर दिया कि दृढ़ निश्चय
और आत्मविश्वास के सामने ससार में कोई बात
असम्भव नहीं है । कोई ऐसा आविष्कारक, कोई ऐसा
धर्म प्रवर्तक, कोई ऐसा धीर, फोई ऐसा महापुरुष नहीं
हुआ, जिसमे दृढ निश्चय और आत्मविश्वास न हो ।
मच तो यह है कि बिना इन दोनो बातों के मनुष्य में
महत्व था ही नहीं सकता । वह किसी प्रकार वडा बन
ही नहीं सकता । यही बातें ऐसी हैं, जो अन्त में मनुष्य
को पूर्ण सफल और विजयी बनाकर छोडती हैं ।
वास्तविक बात यह है कि महत्ता तो ईश्वर स्वय ही
हम में भर देता है, पर उसपर उचित ध्यान नहीं देते और
जबरदस्ती अपने आप में अयोग्यता का और तुच्छता
आदि का श्रारोपण करके अयोग्य और तुच्छ बन जाते हैं।
परन्तु यदि हम अपने विचारों को कुछ और प्रशस्त करें,
अपनी दृष्टि कुछ और विस्तृत करें तो अनायास ही हम
उन गुणों में 'प्रलकृत से हो सकते हैं, जो किसी वीर

[ ७६ ]
या महापुरुष में पाये जाते हैं। यदि हम नीचे की ओर
देखना छोड़कर ऊपर की ओर देसना प्रारम्भ करें तो
अवश्य ही उस स्थान पर पहुँच सकते हैं, जहाँ महत्ता
के मिवा और कुछ है ही नहीं ।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-किन बातों के न होने से मनुष्य में महत्व नहीं पा सकता।
स्पष्ट पुष्टि करो।
२-मनुष्य क्सिी वीर या महापुरुष के समान गुण किस प्रकार
प्राप्त कर सकता है?
३-उक्त गध का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
५-उपर्युक्त गधाश का निष्कर्ष सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-पाकित पर्दो की विस्तृत याख्या कर।
३-'धात्मविश्वास' पर एक सक्षेप लेस लिसो।
४-~-हजारी, नीचे, दोनों के शुद्ध हि दी शब्द बनायो ।
५-असम्भव को सम्भव कर दिखाना' का क्या तात्पर्य है ?
वाक्य में प्रयोग करके समझायो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाकित शब्दों के राविग्रह समास लिखो।
२-मनुष्य, सफल, तुच्छ, वीर--से भाववाचक संज्ञाएँ बनाओ।
३-'वह किसी प्रकार पड़ा वन ही नहीं सकता' पाक्य विग्रह
करो।

[
-
७७ ]
विषय-सम्बन्धी
१-किसी भारमविश्वासी वीर पुरप पर घटित करके सिद्ध करो
कि यह असम्भव बातों को भी सम्भव करके दिखला देता है।
२-किसी धर्म प्रवर्तक व्यक्ति पर सशिप्त टिप्पणी करो।
सहायकशब्द:-
शब्दार्थ -अध्यवसाय लगातार परिश्रम । प्राविष्कारक-नई
चीज ईजाद करने वाला । धर्मप्रवर्तक = धर्म चलाने वाला। अयोग्यता-
नालायढी । तुच्छता = नीचता । अारोप करके = कल्पना करके, रख
कर । प्रशस्त = सुन्दर, अति श्रेष्ठ । अनायास= अचानक । अलकृत =
विभूपित ।

[ ७८ ]
-
महा विद्यानुरागी ज्ञान प्राप्ति का साधन इसलिये करेगा
जिसमें वह अपना तथा दूमरो का हित सायन कर सके।
उसका मुरय उद्देश्य उा शक्तियों की प्रद्धि और परिष्कृति
का साधन होना चाहिए जो उसे प्राप्त हैं। और उस
साधन का मुरय फल यह प्रानन्द होना चाहिए जो ज्ञान
द्वारा प्राप्त होता है। ऐसे व्यक्ति को पढ़ने का लाभ में
और क्या अतलाऊँ ? प्रसिद्ध अंगरेज विद्वान् बेफन का
उपदेश है-"हमें पडन महन करने के लिये, विश्वास और
स्वीकार करने के लिये, तरह तरह की बात करने के लिये,
नहीं पढना चाहिए। आगे चलकर उसने पठन, वार्तालाप
और लेसन का भेद ममझाया है, कि पठा से पूर्णता और
वार्तालाप से तत्परता और लेपन से यथार्थता आती है।
इमी से वह कहता है-"यदि कोई मनुष्य थोडा लिखे तोसमझना
चाहिए कि उसे धारणा की श्रावश्यकता है यदि थोडा वार्तालाप
करे तो समझना चाहिए कि उसमे उपस्थित बुद्धि का अभाव है,
और यदि थोडा पढे तो समझना चाहिए कि उसे चतुराई
और समझ की आवश्यकता है । यातचीत और लिसना
दोनों बहुत प्रयोजनीय हैं। बातचीत व्यवहार कुशल पुरुषों
के लिए प्राय पुस्तक का काम देती है । पर विद्यानुरागी
के लिए पदना एक बड़ा भारी मत्र है जिसके प्रभाव से

[ ७६ ]
चिर-काल का सचित मान भएडार उसके सामने खुरा पड़ता
है, वह सर फाल के पुरुषों का समकालीन हो जाता है,
ओर सय जातियों के विचारों या आगार बन जाता है
सैकड़ों पीदियों के प्रयत्न का फल उसके हाथ में आ जाता
है। यह प्रत्यक्ष है कि मनुष्यों के कर्मों की व्यवस्था ज्ञान
से प्राप्त होती है, और शान वही श्रेष्ठ है जो अनेक
विषयों से सम्बन्ध रखता है। ऐसे जान का द्वार अध्ययन है।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१ सघा विद्यानुरागी ज्ञान प्राप्ति का साधन क्यों करता है?
स्पष्ट यतलायो।
२-अंगरेजा विद्वान् घेकन का क्या उपदेश है ?
३-उत्तगद्यांश का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है?
रचना के लिए
१--उक्त गद्य का सरलार्थ सरल भाषा में स्पष्ट करो।
२-साकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-'वार्तालाप' पर एक लेख लिखो जो २ पृष्ठ का हो
४-तत्परता, प्रभाव, प्रयोननीय, सचित, व्यवस्था को वाक्यों
म प्रयोग करके अर्थ सष्ट क्रो।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
--

[
-
८० ]
२- प्रथम वाक्य का वाक्य विश्लेषण करो।
३-यथार्थता, प्रभाव, बन जाता है, प्ररयर, यहीको शब्द -
निक्ति करो।
विषय सम्बन्धी
१-मनुष्य के लिए अध्ययन करना क्यों आवश्यक है। स्पष्ट
व्याख्या करो।
२-क्या मनुष्य के लिए यातचीत और लिखना आवश्यक
है? वह क्यों ? स्पष्टतया समझायो ।
सहायक शब्द :-
शब्दार्थ-विद्यानुरागी विद्याम्यसनी । उद्देश्य -लए । परिकृति
= परिमार्जन | व्यक्ति प्राणी । सहन-मदन-वाद विवाद । धार्ता
लाप = बातचीत । तत्परता = परायणता। यथार्थता वास्तविकता ।
धारणा स्मरण। प्रयोजनीय = प्रावश्यक । व्यवहार कुशल उद्योग
निपुण । प्रागार घर । समकालीन :- उसी समय का रहने पाला ।
सैकड़ों पीढ़ियों
फ्ल-चिरप्रयास की सिद्धि । प्रत्य-सप्ट।

[१] -- भोज की पेशानी पर पसीना हो पाया, उसने आँसें नोची करलों, उस से जवाब कुछ न बन पडा । तीसरे पेड़ की बारी आई। सत्य का हाथ लगते ही उनकी भी वही हालत हुई। राजा अत्यन्त लज्जित हुआ । सत्य ने कहा कि "मूर्ख। ये तेरे तप के फल कदापि नहीं, इनको तो इस पेड पर तेरे अहकार ने लगा रहा था । यह कौमा प्रत व तीर्थ यात्रा है जो तूने निरहकार केवल ईश्वर की भक्ति और जीवों की दया से की हो ? तू ने यह तप केवल इसी वास्ते किया कि जिस में तू अपने तई औरों से अच्छा और बढ कर विचारे । ऐसे ही तप पर गोबर- गनेस तू स्वर्ग मिलने की उम्मेद रखता है। पर यह ते बतला कि मन्दिर के उन मुडेरों पर ये जानवर से क्य दिखलाई देते हैं, कैसे सुन्दर और पारे मालूम होते हैं पर तो उनके पन्ने के हैं और गर्दन झीरोजे की, दुम सारे किस्म के जवाहिरात जड दिये हैं।" राजा के जी घमण्ड की चिडिया ने फिर फुरीफुरी ली । मानों बुम हुए, दिए की तरह यह जगमगा उठा । जल्दी से उस जवाब दिया कि "हे सत्य, यह तो कुछ तू मन्दिर क मुंडेरों पर देखता है मेरे मध्यावदन का प्रभाव है । मैं जो गता जाग जाग कर और माथा रगडते रगडते इ. ६

ने
[ २ ]
मन्दिर की देहली को घिस कर ईश्वर की स्तुति-वेदना
और विनती प्रार्थना की है ये ही श्रम चिड़ियों की तरह
पख फैला कर आमश को जाती हैं माना ईश्वर के पास पहुँच
कर अब मुझे स्वर्ग का गजा बनाती है । मत्य
कहा कि “राजा, दीनबन्धु* क्रुणागर
श्रीजगन्नाथ
जगदीश्वर अपने भक्तों की विनती मदा सुनता रहता है।
और जो मनुष्य शुद्ध हृदय और निष्कपट होकर नम्रता
और श्रद्धा के साथ अपने दुष्कर्मों का पाश्चात्ताप अथवा
उनके क्षमा होने का टुक भी निवेदन करता है, वह उसका
निवेदन उमी दम सूर्य-चाँद® को बेवकर पार हो जाता है,
फिर क्या कारण कि ये सब अवतक मन्दिर के मुंडेरे पर
बैठे रहे ? श्रा चल देखें तो नही, हम लोगों के पास
जाने पर थाश को उड़ जाते हैं या उसी जगह पर
परकटे कबूतरों की तरह फडफडाया करते हैं ।
प्रग्न
अभ्यास के लिए
१--तीसरे पेड़ को फलों से लदा हुआ देख सत्य ने राजा से क्या
-
२---मन्दिर के मुढेरों पर जो जानवर से दिखाई दे रहे थे। उनके
विषय में राजा ने सस्य से क्या कहा?
३-मुंढेरों के जानवरों के सम्बन्ध में राजा की यात का सत्य
ने किस प्रकार समथन किया। स्पष्ट बतलायो।
५---उक्त गध का शीर्षक क्या हो सकता है?
ܝܕ

[ ८३ ]
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का निष्कर्ष पक्तियों में स्पष्ट करो।
२-रेखाकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-'अहकार' के ऊपर एक लेख लिखिए।
४-पाखें, तई, दिये, मन्दिर, गनेस-के तत्सम स्वरूप लिखो।
५-वमा की चिड़िया, माथा रगहते रगड़ते, गोबर गोस का
तात्पर्य वाक्यों में प्रयोग करके समझायो ।
व्याकरण के लिए
१-पुष्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिसो।
२-निरहकार, जगनाथ, जगदीश्वर-का सधि विच्छेद करो
तथा यह भी बतलायो कि यह किन किन नियमों से सन्धियाँ
३-पश्चात्ताप, पहुँच कर, और, सही का पद् परिचय करो।
४-"राजा के जो में 'फुरफुरी ली' वाक्य फा पाक्य
विग्रह करो।
विपय सम्बन्धी
१-राजा भोज पर सरित टिप्पणी
२-उपर्युक्त गद्यशैलीपर पालोचना करते हुए अपने विचार प्रकट करो।
सहायकशब्द् :-
शब्दार्थ-पेशानीपर =मस्तक पर । अहकार-घम रिकार
घमएदरहित । गोबर-गनेश = नितान्त अपदार्थ। घमड की चिड़िया
फुरफुरीली: ग्रहकार फिर बढ़ पाया । सभ्याबन्धन का फल है
-सभ्योपासना का फल है । जगन्नाथ : ससार का स्वामी ।
पश्चाताप सोच । श्रद्धा - विश्वास, भक्ति । दुष्कर्म-बुरे काम । दुक -
थोदी । सूर्यचाँद को भेदकर सूर्य महल और च द्रमन्डल को पार करके ।

[४]
(१७)
"महाराज ! प्रियतमा द्रौपदी ने बहुत ठीक कहा है।
उसे सचमुच ही क्षत्रिय-कुल का बड़ा अभिमान है।
अतएव उसे ऐसा कहना ही चाहिये था । जो कुछ उसने
कहा, बिना विचार किये ही नहीं कहा , सूप सोच विचार
कर जैमी युक्ति-युक्त, जैसी सुन्दर और जैसी हितोपदेश
पूर्ण बातें उसने कहीं वैसी वाचस्पति वृहस्पति से भी न
कहत बनती। मैं तो यही कहूँगा कि उसका कथन सर्वथा
प्राय है । "द्रौपदी यद्यपि स्नी है, तथापि उसके भाषण स
यही सूचित होता है कि वह नीति शास्त्र के तत्वा से
अच्छी तरह परिचित है । अतएव उसका कथन मेरी
सम्मति में सर्वथा मानने योग्य है । द्रौपदी ने यद्यपि
बहुत ही थोड़े शब्दों में अपना अभिप्राय प्रकट किया है,
तथापि उसका भाषण स्वल्प होकर भी
बहुत
गुणकारी
मालूम होता है । उसे में तो रामबाण औषधि के सरश
समझता हूँ। औषधि जिस तरह परिणाम मे सुख देने
वाली होती है, वैसे ही द्रौपदी का भाषण भी परिणाम में
सुख देने वाला है। औषधि जैसे उत्तम गुणों से युक्त होती है,
द्रौपदी का भापण वैसे ही गम्भीर अर्थो से युक्त है ।
औषधि जैसे कडवी होती है, अतएर जैसे वह अच्छी
नहा लगती, द्रौपदी का मापण भी वैसे ही पराक्रमहीनो

। [ ८५ ] के लिए लाभदायक है । वह उन्हें अच्छा लगने योग्य नहीं, क्योंकि वह युद्ध के लिए उत्तेजना देनेवाले पाक्यों से लबालब भरा हुआ है । औषधि जैसे थोड़ी होती है, द्रौपदी का भाषण वैसे ही थोडा है। औषधि में जैसे आरोग्य और शक्तिवर्द्धन आदि भोक गुण होते हैं, द्रौपदी के भाषण में भी वैसे ही शत्रु नाशक और राज-लाम आदि अनेक गुण हैं । अतएव उसका कहना सर्वथा ग्रहण करने योग्य है। प्रश्न अभ्यास के लिए १-द्रौपदी के भाषण की किस प्रकार प्ररासा की है, स्पष्ट सममानो। २-भाषण की प्रशंसा का समर्थन किस प्रकार किया गया है। ३-~-द्रोपदी के भाषण में कौन-कौन से गुण पाये जाते हैं । ४-उक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है ? रचना के लिए १-उत गद्यांश का सोपार्थ लिखो। २-रेखाक्ति पदों की विशद् व्याख्या करो । ३-'युद्ध' पर एक लेप लियो जो २५ पक्तियों का हो । ४-सोच विचारकर, लवालय भरा हुआ, ग्रहण करने योग्य- को वाक्यों में प्रयोग करो।

- [ ८६ ] ५-उत्तम और अच्छा में क्या यन्तर है? सोदाहरण समझानी। व्याकरण के लिए १-पुष्पाकित शब्दों के सविग्रह समास लिसो। २-प्रथम वाक्य का वाक्य पृथक्करण करो। ३-उक्त गद्य में से भव्यय शब्दों को धुनो तथा पदान्वय करो। विषय सम्बन्धी १- द्रौपदी कौन थी ? टिप्पणी करो। २- द्रौपदी ने यह भापण किस समय दिया होगा ? स्पष्ट समझायो। ३-उत गद्य में किस अलकार की प्रधानता है ? स्पष्ट करो। सहायक शब्द:- शब्गर्थ-प्रियतमा = प्राणाधिका । पग्नियकुल अभिमान = राजवश का पूर्ण गौरव है। प्राय - ग्रहण करने योग्य । स्वल्प- योदा। गम्भीर अर्थ से युक्त -प्रय गौरव समन्वित । पमहीन- निर्यल। नोट -उक्त गद्य में उपमा अलकार है।

--
(१)
सत्यनारायण की जीवनी करुण रस का एक दुसान्त
महानाटक है। जिस प्रतिकूल परिस्थिति में उन्हे जीवन
बिताना पड़ा और फिर जिम प्रकार उन्हें 'अनचाहत को
सग' के हाथों तग श्राफर समय से पहले ही ससार से
कूच करन के लिए विवश होना पड़ा, उसका हाल पढ सुन
कर किमी भी सहृदय को उनकी भाग्यहीनता पर दुस
और समवेदना हो सकती है। पर एक बात में सैकडों से
वह बड़े ही सौभाग्यशाली सिद्ध हुए । गहन अन्धकार में
भटकते को दीपक दीख गया, अपार सागर मे थके हुए
पछी को मस्तूल मिल गया, सत्यनारायण को मरने के
बाद ही सही, 'चुपकी दाद देने वाला' एक 'भारतीय हृदय
मुर्दा हड्डियों मे जान डालने वाला-यश शरीर पर दया
दिखाने वाला-एक 'मसीहा' मिल गया, जिसके कारण
सत्यनारायण की स्वर्गीय सतप्त श्रात्मा अपने सांसारिक
जीवन की समस्त दु सदायी दुर्घटनाओं को भूलकर सन्तोष
की साँस ले सकती है, और अन्याय परलोकवासी हिन्दी
के वे अभागे कवि, लेखक, जिनका नाम भी यह कृतघ्न
और स्वार्थी ससार भुल गया, सत्यनारायण की इस खुश
नसीबी पर रश्क कर सकते हैं, इस सौभाग्यशालिता को

-
[स]
स्पृहा की दृष्टि से देख सकते हैं। यही नहीं, हिन्दी के
अनेक जीवित लेखक और करि भी, यदि उन्हे यह
विश्वास हो जाय कि मुर्दो को जिन्दा करने वाला
कोई
ऐसा 'मसीहा' हम भी मिल जायगा तो, सुखपूर्वक इस
ससार से सदा के लिए निदा हाने को उस लेडी की तरह
तैयार हो जायें, जिसने श्रागरे के 'ताज' को देख कर
अपने पति द्वारा यह पूछा जाने पर कि 'कहो इस अद्भुद
इमारत के विषय में तुम्हारी क्या राय है ?' उत्तर दिया
था कि 'मैं इसके सिवा कुछ नहीं कह सकती कि यदि
श्राप मेरी कबर पर ऐसा स्मारक बनाव तो मैं भान ही
मरन को तैयार हूँ।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-पत्यनारायण को जीवनी क्या है?
२-यागरे के 'ताज' को देखकर लेडी ने अपने पति से क्या उत्त
दिया?
३-टर गद्य का शीर्षक क्या हो सकता है?
४-'मसीहा' किसे कहते है ?
रचना के लिए
१-उक्त गय का सरलार्थ अपनी बोली में स्पष्ट करो।
२-रेखांक्ति पदों का स्पष्टीकरण करो।
३.-'सतोप' के ऊपर एक सतित लेख लिखो।
४-~हाथों, पधी, सौम के तत्सम स्वरूप लियो ।
५-मसार से कूच करने के लिए विवश होना, मुर्दो को निन्-
करने वाला, सदा के लिए विदा होनाका तात्पर्य वाक्यों
प्रयोग करके समझायो।
-

।
-
[ ]
व्याकरण के लिए
१-प्रथम पाक्य का शाक्य विश्लेषण करो।
२ाहन, समस्त, विश्वास, तरज-को शद निरुक्ति करो।
३-पुप्पांकित शब्दों के सविग्रह समास लिखो।
४--निमाकित वाक्यों में प्याकरण दोप यतलायो-
(अ) मोहन म्याना पाती है और सोइन ।
(घ) सत्यनारायण पढ़ी श्रेष्ठ कवि थी।
(स) इसका कविता बड़ा सुन्दर है।
विषय सम्बन्धी
-सत्यनारायण पर टिप्पणी करो।
२-'नाटक' किसे कहते है ? स्पष्ट व्याख्या करो।
३-रस किसे कहते हैं, यह कितने होते हैं ? करण रस को उदा-
हरण देकर स्पष्ट समझानो।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ-प्रतिकूल परिस्थिति = विरल वातावरण । समय से
पहिले विवश होना पड़ा = उनकी अकाल मृत्यु होगई । सहदय %
कोमल हृदय । भाग्य हीनताहत माग्यता । समवेदना सहानुभूति ।
सौभाग्यशाली = भाग्यवान् । गहन = घोर । चुपकी सद देने वाला -
शान्तिपूर्वक प्रसशा करने वाला | मसीहा - वैद्य। सतप्त पारमा दुखित
प्राण । सन्तोष सकती है-बड़े मानन्द से रह सकती है । धन्यान्य
दूसरे । कृतघ्न = नीच | खुश नशीयी पर रश्क करते है - सौभाग्य
पर दूसरे ईष्यों करते हैं। मुर्दो को मिल जायगा - कोई हमारा
भी जीवन धरिन लिख देगा! स्मारक-यादगार ।

[ ६० ]
(१६)
एडीसन ने जो श्राविष्कार किये ये प्राय सभी विचित्र
हैं, देखकर बुद्धि चकरा जाती है । सीनेमा को ही ली
जिए इम म जो चलती फिरती तस्वीरें दिखाई देती है,
उनका फोटो यन्त्र इन्हीं क विशाल मस्तिष्क की उपज है।
एडीसन ने ऐसा कैमरा बनाया है, जिसके द्वारा सैकिएड
में पचास साठ चिन लिये जा मकते हैं। अगर वह उस
यन्त्र को न बनाते, तो आज चिन पट पर लोगों को चर
चित्र न दिखाई देते । सिनेमा मनोरजन की हो सामग्री
नहा है, उससे किसी देश जाति के प्राचार व्यवहार, यहाँ
की शासन नीति तथा मनुष्यों की विविध मानसिक 'प्रव
स्थाओं का हाल भी जाना जा सकता है। कितनी ही
ऐसी विचित्र क्रियाओं का चर चिों द्वारा प्रत्यक्ष होता
है, जिनका अन्य प्रकार देख सकना असम्भव नहीं तो
फट-सम्भय अवश्य है । परन्तु एडीसन की कृपा से ये
मब कार्य सरल होगये और जगह जगह दर्शकों के मनो
रजन तथा उपदेश के लिए सिनेमा गृहों की स्थापना होने
लगी। सिनेमा के वर चित्र बनाने में एडीसन का ही
कैमरा काम में लाया जाता है, और उसी से ली हुई
चलती फिरती तस्वीरें देखने के लिए सिनेमा हाऊसों में
दर्शकों की भीड़ लगी रहती है ।
--

[१ با -- . - प्रश्न अभ्यास के लिए १-एडीसन ने कैमरा कैसा निर्माण किया है। स्पष्ट बतलायो। २-सिनेमा से क्या क्या बातें ज्ञात होती हैं ? ३-सिनेमा में क्या दिखलाया जाता है ? रचना के लिए १-उक्त गद्य का निष्कप सरल भाषा में स्पष्ट करो। २-रेखांकित पदों का स्पष्टीकरण करो। ३---'सिनेमा' के ऊपर एक लेख लिखो जो तीन पृष्ठ के लगभग हो। ४बुद्धि चकरा जाती है, मनोरजन, प्रत्यक्ष, प्राचार व्यवहार को वाक्यों में प्रयोग करो। व्याकरण के लिए १-प्रथम वाक्य का याक्य पृथक् करण बरो। २-विचित्र, सामग्री, कृपा, लाया जाता है, मीद का पदान्वय करो। ३-निम्नलिखित कर्तृ प्रधान वाक्यों के कर्म प्रधान वाक्य बनायो- (थ) मोहन खाना साता है। (ब) दर्जी कपड़ा सीता है। (स) रमेश पुस्तक पढ़ता है। विपय मम्बन्धी 1-एडीसन कौन था । सक्षिप्त टिप्पणी करो। २-'सिनेमा के देखने के लिए क्यों जाते हैं ? स्पष्ट समझायो। सहायक शब्द: शब्दार्थ-याविष्कार = नई नई खोज । उपग पैदा, उत्पन्न । पर चित्र = चलने वाली तसवीरें । मनोरजन =दिलबहलाव । दर्शक: देखने वाले। आचार व्यवहार-चरिय रीति । A

[१०]
कर
एडीसन ने जो आविष्कार किये थे प्राय सभी
हैं, देखकर बुद्धि चकरा जाती है । मीनेमा को ही
जिए इम में जो चलती फिरती तस्वीरें दिखाई देर
उना फोटा यन्त्र इन्हीं के विशाल मस्तिष्क की उपजा
एडीसन ने ऐमा कैमरा बनाया है, जिसके द्वारा से
में पचास साठ चित्र लिये जा मरते हैं। अगर वह
यन्त्र को न बनाते, तो आज चित्र पट पर लोगों की
चित्र न दिम्बाई देत । सिनेमा मनोरजन की हो .
नहीं है, उससे किसी देश नाति के प्राचार व्यवहार,
को शासन नीति तथा मनुष्यों की विविध मानसिक
स्थाओं का हाल भी जाना जा
सकता है। कितन
ऐसी विचित्र क्रियाओं का चर चित्रों द्वारा प्रत्यक्ष
है, जिनका अन्य प्रकार दस सफ्ना अमम्भर नही
कष्ट-सम्भव अवश्य है । परन्तु एडीसन की कृपा
सन कार्य सरल होगये और जगह जगह दर्शकों के
रजन तथा उपदेश क लिए सिनेमा गृहों को स्थापना
लगी। सिनेमा के घर चित्र बनाने में एडीसन
कैमरा काम में लाय
जाता है, और उसी से ली
चलती फिरती तस्वीरें देखने के लिए सिनेमा हाऊस
दर्शकों की भीड़ लगी रहती है।

t
[ ६३ ]
मथुरा और कन्नौज प्रभृति स्थानों से भी अनन्त धन-राशि
त
गया। यदि भारत की तत्कालीन सम्पति की जानकारी
करनी हो तो उत्तर और दक्षिण भारत के उस समय के थने
हुए सैकडों भव्य मन्दिरों को देखना चाहिये, जिनके कलश
मूर्तियाँ या स्तम्भ सोने, चाँदी अथवा रत्नों से जटित थे।
प्रश्न
थभ्यास के लिए
१--भारतवर्ष की श्रार्थिक स्थिति का वर्णन करो।
-प्लिनी ने भारतवर्ष को क्या कहा है ?
३-भारतवप में किन किन वस्तुओं की सानें थी ?
रचना के लिए
१-उक्त गद्य को सक्षेप में स्पट करो।
२-रेखाकित पदों तथा शब्दों का सष्टीकरण करो।
३-व्यापार अथवा कृशि पर एक लेख लिखो जो लगभग २५
पक्तियों के हो।
.
४- सोना, दिन, अठगुना, सकिल के तस्सम स्वरूप बतलायो ।
व्याकरण के लिए
१--पुप्पाक्ति शब्दों के सविग्रह ममास लिखो।
२-प्रथम वाक्य या वाक्य विश्लेषण करो।
.३-सम्पत्ति, मथुरा, मॅहगी, बाहर, यने हुये~का पदा यय करो।
--का पुस्लिग क्या होता है।
M

(२०)
भारतवर्ष कृषि, व्यापार, व्यवमाय और श्रमूल्य खानों
के कारण बहुत समृद्ध था। उस समय साने पीने की चिन्ता
अधिर नहीं थी । नागरिक जीवन से भी मालूम होता है
कि प्राचीन भारतीय सम्पन्न और समृद्ध थे । व्यापार में
निर्यात
बहुत अधिक होने के कारण भारत की सम्पत्ति
दिन दिन बढ़ती जाती थी। भारतवर्ष में हीरे, नीलम, मोती
थौर पन्नों की भी कमी नहीं थी। प्रसिद्ध कोहनूर हीरा भी
भारत में उस समय विद्यमान् था। लिनी ने भारतवर्ष को
हीरे, मोती श्रादि कीमती पत्थरों की जननी और मरिणयों का
उत्पादक कहा है । वस्तुत भारतवर्ष
मूगे और भाँति भाँति के अन्य रनों के लिए प्रसिद्ध है। सोना
भी यहाँ बहुत मात्रा में था। लोहा, ताया, और सीसा भी
बहुतायत से निकलता था। अधिकांश चाँदी बाहर से आती
थी, इमलिये महगी रहती थी। प्रारम्भ में मोने का मूल्य
घाँदी से अठगुना था जो हमारे निर्दिष्ट काल के अन्त में
बढता हुश्रा सोलह गुना तक पहुँच गया। यइ समृद्धि हमारे
समय के अन्तिम काल तक विद्यमान थी। सोमनाथ के
मन्रि में सोने और चाँदी की अनेक ग्लजटिव मूर्तियाँ थीं ।
पास ही २०० मन सोने की सॉफल थी, जिसके घन्टे बंधे
होते थे। महमूद गजनवी उसी मन्दिर से एक करोड़ रुपयों
से अधिक मूल्य की सम्पत्ति लूट में ले गया था। इमी तरह
हीरे, लाल, मोती,

[५ ]
(०१)
इङ्गलिस्तान म रहकर श्रीमती ने अपने समय का
बहुत अच्छा उपयोग किया। विद्या लाम क प्रविरक्ति थापने यहाँ
के कई बड़े-यहे माहित्य मेपियां से परिचय प्राप्त किया।
उस छोटी अवस्था म भी अपने पर विचारों के कारण
तथा व्यक्तिगत प्रभाव द्वारा आपने यहाँ के यदुत से लोगों
के हृदय में स्थान प्राप्त कर लिया । इनलिस्ताा म रहते
समय धापने इटली की भी सैर की, इटली के उपर
आप जो जान से मोहित हो गई। उसके विषय में अपने
विचारों का प्रकट करते हुए जो पत्र आपने मिस्टर आर्थर
साइमन्स के पास भेजे थे, उनसे इस बात का पता चलता
है कि आप पर इटली का कितना बड़ा प्रमार पड़ा था।
श्रीमती सरोजिनी के ये पत्र अत्यन्त उत्कृष्ट तथा सुन्दर
अरेजी क नमूने हैं। इनम प्रान्य की झलक भी स्पप्ट है।
भारत में लौटने के तीसरे ही महीने सरोजिनी न १६ वर्ष
की अवस्था में, अपने प्रणय पात्र श्री गोविन्द राजलु
नायडू से विवाह कर लिया । यद्यपि इस विषय में भारत
भर में नाना प्रकार की टिप्पणियां हुई, तथापि मरोजिनी
ने अपने स्वतत्र विचारों को कर्मरूप में परिणत करके
दिखला दिया। सरोजिनी का वैवाहिक जीवन बड़ा सुखमय
रहा है । आपके चार सन्तान भी हैं। श्रीमतीजी को कविता
-

[ ]
चिपय सम्बन्धी
१--सोमनाथ के मन्दिर की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करो।
२-मथुरा और फौज की ऐतिहासिक घटनाओं पर टिप्पणी
करो।
३-सोना अथवा चादी की प्रात्मकया वर्णन करो।
सहायकाब्द:-
शब्दार्थ-नागरिक जीवन = शहर का जीवन । सम्पम और समुद्र
ये धनवान् थे। नियात = जो माल दूसरे देशों को जावे । जननी-
माता । उत्पादक = पैदा करने वाला । प्रमृति = अादि । श्रन त
धनराशि अत्यात अधिक धन | भव्य सुदर | स्तम्भ सम्मे

[ ६७ ]
४-'मोहित हो गई' क्रिया का क्या तात्पर्य है ? इसकी और
पर्यायवाची क्रियाएँ पतायो ।
५-मिस्टर का स्त्रीलिंग और बहुत का बहुवचन क्या होता है ?
विषय सम्बन्धी
१-श्रीमती सरोजिनी नायडू के किस विषय में भारत में नाना
प्रकार की टिप्पणियाँ हुइ १ स्पष्ट उल्लेख करो।
२-श्रीमती सरोजिनी नायडू ने कहाँ-कहाँ की सैर की और क्यों ?
३-श्रीमती की कविता मे क्या झलक पाई जाती है ?
सहायक शब्द:
शब्दार्थ-परिणतः
I= बदलना । वैवाहिक = विवाह-सम्बन्धी ।
अनुशीलन अध्ययन । अवकाश = छुट्टी, फुरसत ।
"
10

तट पर
3A
[८]
(२२)
भक्ति मे अधीर हो एक दिन वहाँ पहुँच हो तो गया।
गरमी के दिन थे। सूर्य भगवान् तिविज रेया को स्कानु
रञ्जित करने में व्यग्र थे। वृक्षा की छाया, सज्जनों की
मैरी के ममान, पल पल पर बढ़ती ही जाती थी। सन्ध्या
गगन की ललित लालिमा कवि कल्पना को प्रागादालिंगन
दे रही थी। गोधूलि मी सुनील आकाश पाण्डुवर्ण हो
गया था । निदाघ ताप प्रब बहुत कम था। अस्तु उस
स्थान की क्षेत्र सीमा पर में पहुँचा। जिस पवित्र नदी के
नर श्रेष्ठ का आश्रम अवस्थित है उसमें,
धुपादित्य की प्रचण्डता के कारण, जल की एक क्षीण
रेखा दूसरे पार रिसाइ देती थी। दूर तक बालू ही बालू
नजर आ रही थी। वृक्ष झुलस स गये थे। सूखी पत्तियाँ
झड झड़ कर जहाँ तहाँ बिछ गई थीं। कपास के पेड घड़े
सुहावने जान पहते थे। बीच में एक खपरैल भवन था
और उसके आस पास कई छोटी-छोटी कुटियाँ । सादे
रहन सहन के कुछ परिश्रमी व्यक्ति और क्रीड़ा निरत
थालक-बालिकाओं को उस स्वतन्त्रता-सन्न के आँगन में
देख कर मैं पुलक्ति और प्रफुल्लित हो गया । आश्रम में
बडो स्वच्छता और पवित्रता थी। उस तीर्थ भूमि पर पैर
रखते ही एक प्रकार की दिव्य शान्ति का अनुभव होने लगा।
-
म

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-
[ १०० ]
विषय सम्बन्धी
१-गमों की ऋतु में वृक्षों की क्या दशा हो जाती है?
स्पष्ट उल्लेख करो।
२-गर्मी की दोपहरी का पूर्ण वणन करो।
।
सहायकशब्द :-
शब्दार्थ-हितिज रेखा वह लकीर जहाँ जमीन और आसमान
मिलते हैं। रक्तानुरक्षित = लाल रंग से अच्छी तरह रंगी ।
भगादालिंगन दे रही थी कस कर गले मिल रही थी। पाएदुवर्ण :
पीले रंग का। निदाघ तेज-धूप की गमी । ऐन-सीमा:-जमीन
की हद । नर श्रेष्ठ = महापुरुष । आश्रम = मठ। अवस्थित है = पना
हुआ है। कृपादिस्य - सूर्य । प्रधएडता- तेजी। प्रीदा निरत खेल
में लगे हुए । स्वतन्त्रता सदन के आँगन - स्वातग्य रूपी घरके ोगन
अर्थात् उस साबरमती तट के आश्रम में । पुलकित: रोमाचित ।
तीर्थभूमि- पवित्र जमीन दिव्य :- अनोखी ।
F

[ १०१ ]
(२३)
साहित्य के दो भेद किये जा सकते हैं, एक काव्य
और दूसरा विज्ञान । काव्य की कल्पना का साम्राज्य
है और विज्ञान में तर्क का । काव्य कभी भी तर्क का
सामना नहीं कर सकता । उपन्यास और नाटक काव्य के
अन्तर्गत हैं और इतिहास विज्ञान में सम्मिलित किया जा
सकता है । काव्य का कार्य क्षेत्र अन्तर्जगत् है और विज्ञान
उपादान बहिर्जगत् है । हम लोगो को प्राय सत्य का रूप
बाह्य जगत् में ही परिमित होता है। अन्तर्जगत् की
घटनाओं में वे सहसा सत्य का स्वरूप नहीं देख सकते ।
पत्थर के लगने से फल का गिरना सत्य है। उसको सभी
मान लेंगे, परन्तु किसी अलक्षित कारण विशेष से
मनुष्य के अध पतन में सत्य का दर्शन कर लेना समी
के लिए साध्य नहीं है। विज्ञान के आविष्कारों की
सत्यता में किसी को सन्देह नहीं हो सकता , परन्तु जब
कवि अपनी कल्पना द्वारा अन्तर्जगत् का गूढ रहस्य समझने
लगता है, तर कुछ लोग सदिग्ध चित्त हो सकते हैं। कितने ही
लोग ऐसे हैं जो कल्पना को सत्य का विरोध समझते हैं ।
प्रश्न
अभ्याम के लिए
१-साहित्य के कितने भेद किए जा सकते हैं?
२---उपन्यास और इतिहास किस कोटि में सम्मिलित किये

-
[ १०० ]
विश्य सम्बन्धी
१-गर्मी की ऋतु में वृक्षों की क्या दशा हो जाती है।
स्पष्ट उल्लेख करो
२-~-गर्मी की दोपहरी का पूर्ण वणन करो।
1
सहायरुशब्द:-
शब्दार्थ-हितिज रेखा-वह लकीर जहाँ जमीन और पासमान
मिलते हैं। रक्तानुरक्षित= लाल रंग से अच्छी तरह रंगी।
प्रगाढ़ालिंगन दे रही थी =क्स कर गले मिल रही थी । पाएदुवर्ण =
पीले रंग का। निदाघ तेज धूप की गर्मी । ग्र-सीमा = जमीन
की हद । नर श्रेष्ठ महापुरुष । पाश्रम मठ । अवस्थित है - धना
हुधा है । वृषादित्य - सूर्य । प्रचण्डता = तेजी। प्रीड़ा निरत-खेल
में लगे हुए । स्वतन्त्रता-सदन के आँगन में - स्वातन्य रूपी धरके आँगन
अर्थात् उस सावरमती तट के आश्रम में । पुलकित - रोमाचित ।
तीर्थभूमि-पवित्र जमीन दिम्य = अनोखी ।
-
faci

[ १०३ ]
-
(२४ )
यह कैसा पित्र सींचा है, भाई । यह ता किसी मानिनी
नायिका का चिन जान पड़ता है। कोप भवन खूप बनाया
है । स्फटिक शिला पर एक मैली सी सेज बिछी है
मानिनी उसी पर करवट लिये पड़ी है। सारा शरीर धूलि
धूसरित है। केश खुले हुए हैं। श्रन पर एक भी भूपण
नहीं, सरके सब इधर उधर पड़े हैं। एक सहेली आपको
पग्वा मलती है और दूसरी हाथ पकडे मना रही है।
पतिदेव पैर पलोट रहे हैं। पर श्रीमती मानिनी देवी उस
बेचारे की ओर देखती तक नही । चित्र कौशल तो तेरा
वास्तव में, प्रशसनीय है, पर है यह सब घृणित और
विषाक्त । इस चित्राकरण का तुझे पुरस्कार दिया जाय !
पारितोपिक पाने क पहिल अपनो कलुपित लेसनी तोड कर
फेंक दे, गन्दे रग उडेल दे, निर्जीवछ उँगलियाँ काट डाल।
तुझे कुछ खींचना ही है तो ऐसा चित्र सींच । सब से
पहल एक शुभ्र मन्दिर बना । देस उसके चारों ओर
अग्निदेव प्रसर बालाएँ उगल रहे हों। मन्दिर में एक
प्रलयकारिणी महाशक्ति प्रतिष्ठित हो। उसके ज्वलन्त नेनों
से वह्निशिसा निकल रही हो । अट्टहास की मुद्रा हो ।
दोनों में बिजली सी कौंधती हो । हृदय पर लाल फूलों
का हार पडा हो । साड़ी भी लाल ही हो। सारा शरीर

२-
[ १०२ ]
३--कवि को भतर्जगत् का गुढ रहस्य समझने में कुछ लोगों की
क्या धारणा हो जाती है। पेष्ट समझायो।
रचना के लिए
१-उक्त गद्यांश का निष्कर्ष अपनी बोली मे भाकित करो।
-रेखांकित पदों का स्पष्टीकरण करो।
३-कार्य क्षेत्र, अध पतन, प्राविष्कारों, सदिग्ध चित को वाषयों
प्रयोग करो।
४-'विज्ञान' के ऊपर एक लेख लिखो जो २५ पक्तियों का हो।
५-उपन्यास थोर नाटक पर टिप्पणी करो।
व्याकरण के लिए
२-'हमलोग प्राय होता है' वाक्य का वाक्य-विश्लेषण करो।
२-सामना, सत्य, अपनी, देस समते, ऐसे का-पद परिचय करो।
३-निम्नलिखित कर्तृ प्रधान वाक्यों से कर्म प्रधान बनाओ
(4) कवि कविता करता है।
(ब) इतिहास में धरनाओं का समावेश हर समय मिलता है।
(स) नाटक में पात्रों के अभिनय को देख मनको प्रसन्न करते हैं।
विषय-सम्बन्धी
१--नाटक किसे कहते हैं। इसके के भेद हैं ? स्पष्ट उल्लेख करो।
सहायक शब्द :-
शब्दार्थ-प्रवर्गत प्रदर। काव्य का कार्यक्षेत्र बहिर्जगत
है = काय में विशेष कर भाव वांछनीय है इसलिए वह तो हृदय गत
धस्तु है । अपादान - जिम कार्य से कारण की उत्पत्ति हो उसे अपादान
कारक कहते हैं। अलरितन दिखलाई देने वाला।

[ १०५ ]
२-मेली, सहेली, लाल, वेग, दिया जायगा-का पदाचय
३-कराल, प्रघण्ट, प्रवर, निव-से भाववाचक सज्ञाएँ
बनायो।
---पुषाकित शब्दों के सविसह समास लिखो।
-
विषय-सम्बन्धी
१--मानिनी मायिका किसे कहते हैं? सलमण सममायो।
-कोप मरन' क्यों निर्माण किया जाता है ? इस से क्या
%3D
३-मन्दिर की रचना किस प्रकार होनी चाहिए ?
४-सोदाहरया सिद्ध करो कि "ईश्वर ही सथा चित्रकार है।
सहायक शब्द:-
शब्दार्थ माननी = मान से भरी हुई। स्फटिक - सगमरमर ।
पैर पलोट रहे हैं पर दया रहे है । प्रसर ज्वालाएँ = तेज भाग
की ज्वाक्षाएँ अथात् भयङ्कर थग्नि की लपटें । मनयकारिणी
प्रलय करने याली । ज्वलत जलते हुए। यद्विशिखा -- भाग की
लपटें । घट्टहाम = जोर की हसी । विजली सी कौंधती हो- बिजली
सी घमकतो हो । लथपथ हो गया हो-खून में सन गया हो, खून में
सराबोर हो गया हो । रक्त रजित खून से सनी हुई। कृपाण एक
प्रकार का शस्त्र । प्रखएट - यहुत बड़ा, पूर्ण । सानाज्य= राज्य ।
शीर्षस्थानीय-पहले नम्बर का पुरस्कार पारितोषिक ।

M
[ १०४ ]
रुधिर से लथपथ हो । केश पैरों तक लहरा रहे हों। एक
हाथ अनाथ भक्तों के मस्तक पर हो और दूसरे हाथ मे
हा रक्त रञ्जित कराल कृपाण । मन्दिर में अखण्ड तेज और
प्रचण्ड पराक्रम का साम्राज्य हो । चित्रकार । क्या ऐसा
चित्र न सींच सकेगा ? यदि हों, तो इसका पुरस्कार भी
तुझे शीर्षस्थानीय दिया जायगा।
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-उत गद्यमें चित्र किस का खींचा गया है? उसका
स्पष्ट उल्लेख करो।
२-चितेरे को चित्रांकण का पुरस्कार मिलने से पूर्व क्या
करना चाहिए?
३-उपर्युक्त गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक क्या हो सकता है ?
रचना के लिए
१-उक्त गद्य का निष्कर्ष अपनी बोली में स्पष्ट करो।
२-रेखांकित पदों का सष्टीकरण करो।
३-'पुरस्कार' पर एक सशित लेख लिखो।
५-धून धूसरित, लय पथ, रक्त-रञ्जिन, बिजली-सी कौंधती
-का प्रयोग वाक्यों में समझायो
५-'कृपाण की प्रारम कहानी लिखो।
व्याकरण के लिए
१-'सबसे पहिले मन्दिर बना' का वाक्य विग्रह करो।
।
-
-

[ १०७ ]
-
प्रश्न
अभ्यास के लिए
१-~-सरदपतों की क्या पर मनुष्यों को प्रिय क्षगती है और क्यों?
२- साहित्य किसे कहते है।
३-उक्त गपारा का उपयुक्त शीपंपया हो सकता है?
रचना के लिए
१-उपर्युक्त गद्य का निकर्ष परम भाषा में स्पष्ट करो।
२-रेखांकित प्रशों का स्पष्टीकरण करा।
३- साहित्य के उपर लेख लिया।
४-तेजहीन, मुललिस, मन्दहासिनी, मयरममरीको वारयों में
प्रयोग करो।
५-परनचन्द, मुंह, नल, हापो के सरसम् स्वरूप लिसो।
व्याकरण के लिए
१-पारित शन्दों में समाों का विग्रह करो और उनके नाम
भी पतलायो।
२- यहाई, सकल, परसाते, दुलारे, विधिग्र-की शम्द निरुक्ति
-
करो।
३म्नांकित पाक्यों में व्याकरण दोप बतलायो।
(अ) जंगल में मोर नाची, किसने देखी।
(म) पल का मुगन्धित बहुत अच्छी हैं।
(स) लुहारिन भागे भाता है और ये यौवा लाती है।

कल
[ १०६ ]
(२५)
सरद्पूनों के ममुदित पूरनचन्द की दिटकी जुहा
सकल मनभाई के भी मुँह मसिमल, पूननीय , अलौकिक
पदनसचन्द्रिका की चमक के आगे ते नहीन, मलीन श्री-
कलङ्कित कर दरमातो, लनाती सरस सुधा धौली अलौकिक
सुप्रभा फैलाती अशेष मोह जडता प्रगाढ़ समतोम मटकात
मुकाती निजभक्त जनमन वान्छित वराभय मुक्ति मुचि
सुचारु चारों मुक्त हाथों स मुक्ति लुटाली, सकल
आलाप फलकलित सुलपित सुरीली मीड गमक झनकार
सुतार तार सुरमाम अभिराम लसित बीन प्रवीन पुस्तक
लित मखमल से समधिक सकामल अति सुन्दर सुविमर
प्रवाल से लाल लाल
करपल्लव सुहाती विवि
विद्याविज्ञान मुभ सौरभ सरमावे किसे फुले सुमनप्रया
हास बासव से अनायास सुगन्धित मित वसन लमन सोह
सुप्रभा विकसाती सुविमल मानसबिहारी मुक्ताहारी नारक्षी
विचार सुचतुर फरिकोविद् राज राजहिय सिंहास
निवासना मन्दहासिनी त्रिलोक प्रकासिनी सरस्वती,
के प्रति दुलारे प्राणों से प्यारे पुनों की अनुपम अनो-
अतुल बलवाली परमप्रभावशाली सुजनमनमोहिनी नवरमभरी
सरम सुसद विचित्र वचन रचना का नाम साहित्य है
लाल
माव

If you ENGLISH PIECES FROM PAPERS, U P BOARD 1931-1937 1931 नीचे दिये गद्य सड का अनुवाद कीजिये- from the best land of the river you gaze at once up on the very heart of the old city, as it lies duided be fore you by the waters of the noble streim und nt once you are ia are that Baghdad has indeed fallen from her ancient splendour A bridge of boats spans the current You can distinguish suaming across a strange crowd of horse meu and foot passengers and beasts of burden laden als fruits and vegetables of all kinds watch attentively you will see the dart form of some Arab Seikhs or bedouin of the desert emerge for a les moments distinct from the crowd and then disappear behind a camel moving slonly along under bales of goods pulled high on its back 1932 इसका हिन्दी में अनुवाद कीजिये- They had just reached the centure of the valley when there was heard, at some distance on the left the sound They hurriedly formed in order of battle ind prepared to meet the attack of the enemy who suddenly appeared from all sides One third of the little band was either wounded or slain and the rest surrender ed as no hope of safety rem uned Few histories can produce more various instances of cruelty than those which the French and the Italians at the time exercised upon each other On this occasion the victors put all the prisoners to death in the most cruel mapper of a bugle سمی 1 [ १०८ ] अषय सम्बन्धी १-उक्त गद्य की शैली की समालोचना करो। २-उपर्युक्त गद्य मे किस अलकार की घटा का दिग्दर्शन हो रहा ? सोदाहरण सष्ट समझायो । सहायक शब्द :- शब्दार्थ-अहाई = चाँदनी । अलौकिक = अद्भुत, सर्वसुन्दर । लीन-मैली । कलङ्कित कर = दूषित कर । सुधा = अमृत । धौली - वेन, उज्वल । तमतोम = अधिकार का ढेर अर्थात् धना अधकार । नुक्त = साली । सुरग्राम = वैकुण्ठ, स्वर्गलोक । प्रवाल = मूंगा । सौरभ - सुगधि । हाम-हँसी । पासव-इन्द्र । अनायास - अचानक । वीर दूध । धसन - स्त्र । सुजन मन मोहिनी सज्जनों के मन को प्रासक्त करने वाली। नन रस मरी = नौ रनों से सम्पन्न (Zर, हास्य, कल्ण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त)। साहित्य =जो हित महित हो और त्रिकाल में एक रस रहने वाला है उसीको साहित्य कह सकते हैं।

[ १११ ] that you can do Close your eyes gently and belos your nose If the spech does not come out, bathe your eyes with clean iter 1936 नीचे लिखे गय सड का हिन्दी म अनुवाद कीजिये-- Bharata entreated Rama to return to Ayodhya and 1scend the throne My dear brother, sud Bharata my heart aches to see you sondering here It is all the work of cruel Kuchezi I am ashamed to call her my mother Pray come back and tahe up the kingdom which is yours by birth and shich you are the filtest to rule Rama nould not more an inch from his fathers word The aged monarchs word he said to Bharata 'binds both you and me althe He owed a debt to Kazheyı ind herem he has only repard « How can we disobey fuis commands and leave his debt unpaid 1937 हिन्दी में अनुवाद कीजिये- Padmini was the role of Ran? Ratan Singh hing of Mewar descendant of the famous Sisodia clan who boast of a purer descent than any other Rajputs The story is that she was the daughter of a Rajput hing of Ceylon whose name is now forgotten Ratan Singh had heard stories of her great beauty from travellers and traders who came from that country to Mewar and he longed incessantly to gain the hand of this princess It is said that he went upon the quest of this beauty in the garb of a beggar and son her after many hardships uyla

[ 20 ]
1933
हिन्दी में अनुवाद कीनिये-
British boys spend so much of their time in play that
many people think they would do more good to them
selves and their country if they de oted much more of
their time to study and work But the foundation of
success in life and of all that makes a good and 1 valoa
ble citizen is character and there is no better school for
the formation of character than the play ground
1934
अपनी हिन्दी में नीचे के अंग्रेजी गद्य पड का अनुवाद
कीजिये-
The greatness and beauty of London can be realized
and appreciated by a new comer only when the days are
bright and shining One must remember that London
is the centre of the coinmerce of the world as well as
the capital of the great British Empire These are the
two features which give London the peculiar and un
paralleled charm. A great many open places and huge
congested palatial buildings exist side by side
1935
नीचे के अंग्रेजी गद्य यह का हिन्दी में अनुवाद कीजिये--
While you read, take care that you do not face the
light. Let the light fall on your book over your left
shoulder The light after sunset is about the poorest
light you can have for reading You will save your eyes
if you never read in the twilight. Do not look at the son
or at a bright gas or electric lamp If you get some
thing in your eyes do not rub it. That is the worst thing

[ 318 ] that You can do Close your cyes gently and below your nose If the speck does not come out, bathe your eyes with clean water 1936 नीचे लिये गा मड का हिन्दी में अनुवाद कीजिये- Bharita entreated Rama to return to Ayodhya and ascend the throne My dear brother, said Bharata my heart aches to see you andering here It is all the work of cruel Kukes. I am ashamed to call her my mother Pray come back and take up the kingdom which is yours by birth and which you are the fittest to rule Rama svould not move an inch from his fathers word The aged monarch s t ord, he said to Bharata, 'bınds both you and me alike He owed a debt to Kaikey, and herein he has only repaid it Hon can we disobey his commands and leave his debt unpaid ? 1937 हिन्दी में अनुवाद कीजिये- Padmia was the wife of Ranı Ratan Singh hing of Mewar a descendant of the famous Sisodia clan who boast of a purer descent than any other Rajputs The story is that she was the daughter of a Rajput hing of Ceylon whose name is now forgotten Ratan Singh had heard stones of her great beauty from travellers and traders who came from that country to Menar and he Jonged incessantly to gain the hand of this princess It is said that he went upon the quest of this beauty in the garb of a beggar and won her after many hardships + [ ११२ ] ENGLISH PIECES FROM PAPERS, RAJPUTANA BOARD 1931-1936 d 1931 इसका हिन्दी में भाषान्तर कीजिये- General Baker and the British Officers with him were perfectly aware of tne danger of the expedition but they determined to do their best The force was tahen down the coast by ship to Trinitat, the port nearest Tohar The troops landed and marched to wards that town but on the way they were attacked by the tribesman of Osman Digna The undiscip. lined troops of Bal er broke directly they were attached Their British Oficers fought gallantly, but rany of them were killed the rest cut their way through the enemy and succeeded in reaching Trinhitat The greater portion of the Egyptians were massacred almost without resistance the rest fled to Trinitat hotly pursued by the enemy 1932 नीचे लिसे उदाहरण का हिन्दी में भापान्तर कीजिए- Although his whole strength consisted but of 2600 men he did not hesitate to give battle and advanced against their position They were posted on 1 high bank rising from the dry bed of a river The position was about 1,200 yards long with dense woods on either fand enableing them to skeep our ranks with their musi etry fire as we advanced Eighteen guns were placed in advance of the line In front of the sood on our right was 2 wall having one opening halla ay [ 883 ) between the tivo mies, behind thus mit »ts a large force of the enemy, who had prepared to rush out and fall upon our rerr is passed 1933 नीचे दिए हुए उदाहरण का मरल हिन्दी में भापान्तर कौनिए- Sir Robert Sale 19 uithi i brigade on the May dorn from Cabut shen the nexs overtook him of the nsing in that toun He 134 at once attached by the tribesmen but lought 128 was down to lellainbid, and determined to establish humsell there The prospect was a gloomy opt. He was far an ay from succour or support, the walls of the town nere in runs, and in many places sere not more than two feet high their circumlerenci a mile and a quarter, TV18 too greut to be properly defended by so small 1 force. Nevertheless for the months the little force maintained itself sallying out and attaching the enemy whenever they approached and driving in cattle At Inst, níter 1 five months siege the girison boldly marched out, attached the festeging army in their camp, completely routed them and captured all their cannon 1934 नीचे लिसे उदाहरण का भापान्तर सरल हिन्दी में फीजिए- Light hours after the battle had been concluded the army kvas again on the march, and the next day the cavalry arrived 16 Mirpur, the capital or Sher [ ११४ ] Mohammad The chiel had already left the town Terms were then offered to him if he would surrender, but this he refused to do, and an irregular narfare continued for some time until all resistance was crushed out after which Sindh was annexed to British Indir 1935 सरल हिन्दी में भापान्तर कीनिए- Once out bunting Jahangir espied a lion lyong asleep among the bushes He called for a mushet and supporting the barrel of it on the shoulder of one of his noblemen tool careful aim and shot the lion The lion being wounded rushed furiously at the emperor but the nobleman who has 7 Rajput stepped in front of Jahangir and wrestled with the ammal esen put ting his arm through the lions jats and thus saved the emperor until his courtiers could come up and hill the beast 1936 हिन्दी में अनुनाद कीजिए- British boys spend so much of their time in play that many people think they would do more good to themselves and their country aſ they des oted much more of their time to study and work But the foundation of success in life and of all that makes a good and valuable citizen is character and there is school or college for the formation of charactor than their playing fields no better [ 24 ] USEFUL UNSEEN ENGLISH PASSAGES निम्नलिखित फा हिन्दी में अनुवाद करो Why are the nines of Sita Savitri and Damayantı so sacred and commonplace in every household and the cause of inspiration? What are the qualities that made them so great? They had no stupidity quirrel some ness, idleness, timidity and so on Damayant had no terror of death though she 178 separated from the hus bund It was spiritual understanding and intellectual development that made them great When women lost their self reverence degeneration came in Degeneration-अधोगति । निम्नलिखित का हिन्दी में अनुवाद फरो- The special message of life for India to day was the message of unity No longer divided by anything save a difference of mere linguage no longer divided by any real or any blasting difference of aspiration no longer divided by anything through lach of that one thing that mal es and intellectual and spiritual meeting ground that is a common education, one realised that it as the same cry which she heard on all hands and that was that they wanted to serve their mother country and achieve something Message--सन्देश | Intellectual-मानसिक। निम्नलिसित का हिन्दी में अनुवाद करो- A group of young men hare the world before them hare eir backs upon personil gain personal joy nd Acognition and made themselves into

-
[११८ ]
HINDI UNSEEN PIECES FROM PAPERS UP
BOARD 1931-1937
1931
नीचे लिय वाक्य-ममूह कामार अपना मापा में निलिए
'प्रकृति मर ग्नविगीन है। इसकी गति की महायता
करना फत्यागकर और उसका प्रतिगध करना हानिकर
होना है। इसलिए मनुष्य मात्र कायम य है कि मदेव अभ्युदय
और उनति पर तार लगाये रहे । मस्तिष्क-विज्ञान कमिद्धान्त
सफलता और थानन्ददान मूचर हैं। उन्हें एक प्रकार का
मन्य ममझ लीजिए । उनकी मिद्धि ममान ही के हाथ में है।
यह फाय किमी एक व्यक्ति का नहीं है। अकेल बैठकर किसी
व्यक्ति समाइ यहा काम न श्राज तक हुश्रा है, न होगा। जब
श्रा है नय सहकारिता मे ही हुआ है। समार की शोचनीय
और हदय विदारक अवस्था पुकार पुकार र कह रही है कि
श्रय भी चेता, पृथा ममय नष्ट न करो । सहकारिता मे ही
उप्रति पर मयागे, अन्यथा नहीं । ससार की सांप्रतिक स्थिति से
यह भी मात होता है कि यथार्थ मानुषिक शक्तियों किस सीमा
तक क्षीण हो गई हैं और कौन कौन से दुर्गुण मनुष्य में प्रा गये
हैं। प्राकृतिक नियमों से अनुसार शिक्षा प्राप्त करके यदि हम
लोग सफलता के रहस्यों का कार्य में परिणत करन लगे तो सारी
दुरवस्था दूर हो जाय।
नयाभ्यासी पवियों को सद्य फविता के चार में पड़कर
पथभ्रष्ट न होना चाहिए । पहिले कपिता-सम्बन्धी प्रन्यों का
1932

अभ्याम करें प्राचीन उत्तम काव्यों का निरन्तर अनुशीलन करें, किमी सांव म परामर्श लेन रहें, अपनी रचना को बार बार समालोचक दृष्टि से देखते रहें, उसमे पावश्यकतानुसार काट बॉट और परिवर्तन करते रहे। इस प्रकार सात अभ्याम से जय कविता में चमत्कार चारुता और बधसौष्ठय प्रा जाय तब इस घसाड़े में उतरें । कवि-सम्मेलन कविता की एक प्रदर्शिनी है, प्रदर्शिनी में शिल्पकला के सर्वोत्कृष्ट नमूने ही रक्से जाते हैं, निकृष्ट और भद्दे माल का कोई आँस उठाकर देखता भी नहीं। (१) उपर्युक्त पाक्य समूह का सार अपनी भाषा में लिखिये। (0) रेसाचित वाक्यांशों के भार स्पष्ट कीजिए। 1933 भारतेन्दुजी के जीवन का उद्देश्य अपन देश की उन्नति के मार्ग को साफ-सुथरा और लम्या चौडा बनाना था। उन्होंने इसके कॉटी और ककड़ों को दूर किया, उसके दोनों ओर सुन्दर सुन्दर क्यारियाँ धनाकर उनमे मनोरम फल-फूलों के वृक्ष लगाये । इस प्रकार उसे ऐसा सुरम्य बना दिया कि भारतवासी उसपर आनन्दपूर्वक चलकर अपनी उन्नति के इष्ट स्थान पर पहुँच सकें । यद्यपि भारतेन्दुजी अपो लगाये हुए वृक्षों को फ्ल फूलों से लदा न देस सके, फिर भी हमको यह फहने में किसी प्रकार का सफोच नहीं होता है कि वे अपने जीवन के । सफल हुए । हिन्दी भाषा और साहित्य की .

.
1
[ १२० ]
जो उन्नति आज देश पड़ रही है उसके मूल कारण भारतेन्दुजी
है और उन्हे ही इस उन्नति क बीज को अरोपित करने का
श्रेय प्राप्त है।
(१) भारतेन्दुजी के जीग्न का क्या उद्देश्य था ? इस उद्देश्य
में वे किस प्रकार मफल हुए
(0) रेखाचित राक्याशों के भाव स्पष्ट कीजिये ।
1934
नालदा का महाविहार एक आदर्श विद्यालय था। भारती
शिक्षा के उच्च श्रादर्श उसमें वर्तमान थे । कोलाहलपूर
ससार से दूर, निर्मल जलाशयो और सुविस्तृत श्रान काननों में
सुशोभित, शीत एप सात्विक तपोवन में, इसकी स्थापना हुई थी
'तपोवन और तपोमय जीवन'-यही इसकी महत्ता का रहर
था। आगरे के जगत्प्रसिद्ध 'ताजमहल' पर कवियों ने अनू
उक्तियों कही हैं, पर नालन्दा के भन्न-किन्तु दिव्य विहारी श्री
सधारामोंपर उनका हदय नहीं पसीजा। नालन्दा तपस्वीमहात्मा
के यश सौरभ से सुरभित है। इसमें हत्तत्री को मत करने ।
पर्याप्त सामग्री है। इस तीर्थ भूमि का प्रत्येक रेणु कण भारती
सभ्यता एवं साकृति का दर्पण है।
(१) नालन्दा महाविहार की महत्ता का क्या रहस्य था
इसके सँडहरों का दर्शक के हृदय पर कैसा प्रभाव पड़ता है
(0) लेखक की कवियों से क्या शिकायत है ?
(३) रेसाडित वाक्यांशों के भाव स्पष्ट कीजिए।

[ १२१ ]
1935
दूसरी बात जो इस सम्बन्ध में विचार करने की है वह यह
है कि किसी भापा के ज्ञानमात्र को शिक्षा नहीं कह सकते।
शिक्षा से तात्पर्य मस्तिष्क के विकास का है जो भिन्न भिन्न विषयो
के मनन के होता है। अंग्रेजी भाषा से ज्ञान की आवश्यकता को
तो हम मानने के लिए पूर्ण उनात हैं पर हमारी समझ मे
यह नहीं आता कि इस बात की क्या आवश्यकता है कि हम
भारत के मस्तिष्क विकास के लिए भी एक विदेशी भाषा का
आश्रय ग्रहण करें।
(क) रेग्वाङ्कित वाक्याशों के भाव स्पष्ट कीजिए।
(ख) विदेशी भाषा द्वारा भिन्न भिन्न विषयों की शिक्षा देने
स क्या कठिनाई होती है ? सक्षेप में बतलाइये।
(ग) अंग्रेजी भाषा के ज्ञान से भारतवासियो को क्या लाभ
पहुँचा है ?
१-मनुष्य प्रगतिशील है। स्वस्थ मनुष्य और स्वतन्त्र
जातियाँ उन्नति और विकास की पराकाष्ठा तक पहुँचने की
कोशिश करती हैं। मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ भिन्न भिन्न
रूपों में प्रगट होती हैं। हर एक धर्म का मानने वाला अपने धर्म
को सार्वभौम धर्म कहता है। इसका कारण यह है कि सब
धर्म वाले परमात्मा सर्वव्यापक, अप्रतिहत शक्ति में विश्वास
रखते हैं। इस विश्वास के कारण समझते हैं कि एक शासक,
1936
ne

HINDI UNSEEN PIECES FROM PAPERS
RAJPUTANA BOARD
1931-1935
1931
तुलसीदाम के राम चरित-मानस में काव्य और संगीत का
अपूर्व सयोग है। सगीत केवल राग-रागनी के भीतर ही
आवद्ध नहीं है। उसकी व्याकुलता किसी भी ढाँचे में नहीं
दाली जा सकती है। उनक इस काव्य में मानन चरित्र के
व्यक्तिगत विकास के साथ ही साथ, पानी के ऊपर तेल की
तरह, भक्ति रस का स्रोत अलग से रहना जाता है। तुलसीदास
की यह अभिनव रचना उनके हृदयस्थित थानन्द का ही
उद्गार है। उन्होंने यह प्रन्थ "स्वान्त सुसाया ही लिखा है।
यही कारण है कि हम 'प्राज विज्ञ और अनभिज्ञ सभी
व्यक्तियों पर सम्भाव से उसका प्रभाव देख पाते हैं। यदि
यह रचना श्रानन्दस्थित न होकर लोगा में भक्ति के प्रचार
के भाव से लिखी गई होती, तो हम इसका यह श्रानन्द
कदापि न देख पाते।
(क) राम चरित मानस की लोक प्रियता का लेखक ने क्या
मुख्य कारण बतलाया है ? स्पष्टरीति से समझाइये ।
(ब) ऊपर के यवतरण में रेखाकित पर का भाव
लिखिये।
1932
पुस्तकों के हम सब बड़े ऋणी है। ये अध्यापक
हमको बिना दण्ड लकुट प्रहार के बिना कुटिल शब्द कहे

-
[ १२५ ]
या घोध किए और यिा द्रव्य लिए हुप ही शिक्षा दे
मकत हैं। यदि आप इनके मविक्ट जाइय सा ये सोते न
मिलेंगे। यदि आप पिनाम हैं और इनमे प्रश्न करते हैं
वो ये आपसे पुछ परोत न रफरेंगे, योर भाप इनके
रूप को यथार्थ न मममिये ता मुनभुनायेंग रहा, यदि
श्राप अशानी हैं सो घे यापपो मूर्यता पर हमेंगे नहीं ।
इससे बुद्धि तथा ज्ञान से पूर्ण पुस्तकालय इम लोफ की
समरत सम्पत्ति में बहुमूल्य है । और किसी स्पृहणीय
वस्तु की तुलना उममे नहीं की जा सकती । सच तो यह
है जो कोई मत्य, आन्द, धर्म व विज्ञान का जानना चाहता
है तो उसे निश्चय पुस्तकों से प्रेम करना चाहिए ।
(फ) ऊपर फे अवतरण में रेखांकित स्थलों का भाव स्पष्ट
कीजिये।
तुलना किससे
(ख) ऊपर के यवतरण में पुस्तको
की गई है और किसे श्रेष्ठ बतलाया है ?
1933
श्रय तो विद्वाना का भी ध्यान मातृ भाषा को पार
और भी अधिकता से श्रारर्पित होने लगा। उन लोगों का
जिन्होंने अन्य साहित्या में अगणित रनों के ढेर देख डाले थे,
उस समय के मातृभापा के साहित्य मे सन्तोप न हो सका।
प्रत अन दिनों दिन हिन्दी के विविध अगों की पूर्ति की जाने
लगी, क्योंकि इस ससार में मनुष्य को उसका सात्विक

[ १८ ]
1933
२ पड़े की प्रात्म कहानी ।
२-गर्मी की छुट्टियों के कार्यक्रम के सम्बन्ध म पिता
को पत्रा
३-गुरु भक्ति।
1934
१-अपने निकटतम सम्बन्धी की मृत्यु पर अपने हृदय
के भाव ।
२--एक ७० वर्ष के बूढे की श्राकृति का विनोदपूर्ण वर्णन ।
1935
१-पुस्तकों के अध्ययन का आनन्द ।
२--किसी दरिद्र भिक्षुक की आत्म कहानी।
३-जीवन में अहिंसा का महत्व ।
1936
१–भारत में कारी के कारण और उनके दूर करने
के उपाय ।
२-जहाँ सुमति तह सम्पति नाना।
३- मनोरजन के आधुनिक साधन ।
.
1937
१-कवि सम्मेलन।
0-वर्षा ऋतु ।
३-विद्यालय का यार्षिकोत्सव ।

[]
SUBJECTS TOR ESSAYS RAJPUTANA
FROM PAPER
.
1931
(पापी-नीपन से शानद ।
(1) सदाचार
(३) खेल-कूद से लाभ।
1932
(१) मितव्ययिता।
(२)पिसी याना पापर्णन ।
(३) पुरतफालय में लाभ।
1933
(१) मपरित्रता,
1) वीरता ही मनुष्य का भूपण है,
(३) पिसी रमणीक स्थान का पर्णन ।
1934
(१) विद्यार्थी जीवन के यानन्द ।
(२) बाप बरोघर तप नहीं, मॅठ परोपर पाप' ।
(३) भारतीय इतिहास पायोई प्रसिद्ध पुरुष ।
1935
(१) विज्ञान पे चमत्कार ।
(२) धन का सदुपयोग।
(३) 'सगति ही गुन उपने सगति ही गुन जाय ।
1936
(१) विद्यार्थी जीयन।
(२) शिक्षा में खेलों का स्थान |
(३) साँच बरोबर तप नहीं, अँठ घरोयर पाप ।

[ १३२ ]
जिस समय वह सेनापतित्व कर रहा हो उस समय पिता को भी
उसकी बाशा माननी चाहिए।
आज्ञा पालन में मनोवृत्तियों पर पूरा-पूरा नियन्त्रण रखना
चाहिए। कभी कभी पैशाचिकत्ति के स्वामी, अध्यापक, पति और
पदाधिकारी, विना विचार किये अपनो पाव को ठीक कराने के
लिए थाज्ञाएँ प्रदान करते हैं, उस समय मनोवृत्तियों से एक युद्ध
लडना पड़ता है। उस समय प्राज्ञा-पालन और उल्लघन
प्रवृत्ति में सहर्ष चल पड़ता है। उस समय मनोवृतियों को पूरे
समय तक अधिकार में रखना चाहिए । ऐसी परिस्थिति में
मरण जीवन का प्रश्न श्राजाता है, किन्तु प्रत्येक परिस्थिति में
शान्ति और सुख केवल थाज्ञा पालन ही में मिलता है ।
आज्ञा पालन में थात्म पालन में प्रारम सयम रखना ही सर्वश्रेष्ठ
गुण है । जो लोग दूमर्रा की आज्ञा में अपने को नहीं
रस सकते, वे अपनी प्रवल वासना और उत्कट अभिलापात्रओं
पर भी विजय प्राप्त नहीं कर सक्ते । आज्ञा पालन सुस और
शान्ति को लाता है । वासना और मनोवृत्तियों को सयत
बनाता है। समाज और व्यक्तियों में स्नेह और प्रेम का
सञ्चार करता है । सङ्घ शक्ति को सरल बनाता है। जिन
जातियों और समाजा में आज्ञा पालन की प्रवृत्तियों नहीं थे
उच्छृद्धल और असभ्य कही जाती हैं। जिस सेना, परिवार
और समाज के व्यक्ति अपने सेना नायक, स्वामी और अध्यक्ष
का कहना नहीं मानता उसमें कोई नियम या व्यवस्था नहीं रहती।
जिन राष्ट्रों में अथवा समाजों में 'हमी चुनी दीगरे नेस्त' वाले
।

राष्ट्र और [ १३३ ] बहुसख्यक नेता बनने के अभिलाषा रखते हैं। वे समानें प्राय नष्ट हो जाती हैं । जनता को अपना अध्यक्ष और नेता एक ही मानना पड़ेगा। उसकी प्राक्षा का पालन करना पड़ेगा, तभी वे राष्ट्र और समाज पनपेंगे और ससार के सङ्घर्ष के क्षेत्र में अपने अस्तित्व को स्थिर रख सकने में सफल होंगे। जिन परिवारों में पड़ों की आज्ञा पालन फरने को प्रवृत्ति है उन्हीं परिवारों में मुख और शान्ति का साम्राज्य देखने में आता है । याज्ञा पालन भी अभ्यास से होता है। प्रत्येक अवसर पर अपने को प्राज्ञा पाला के सून में बैंधे रखना चाहिए । अशिक्षित धौर असभ्य जातियों में दुरामह और हठ अधिक देसे जाते हैं, किन्तु सभ्य और सुसस्कृत जातियाँ आज्ञा पालन ही से अपने सुशिक्षित होने का परिचय देती है। जो व्यक्ति स्वय आज्ञा पालन नहीं कर सकता, वह दूसरों से भी आशा पालन कराने में समर्थ नहीं हो सकता है। आज्ञा पालन में छोटा बन जो नीचा बनता है, वही पीछे ऊँचा पद पाता है। प्राय सभी पाशा पालाही से मिपाही के पद से अध्यक्ष के पद तक पहुँचते हैं। सभ्य देश ही आज्ञा पालक व्यक्ति पैदा करने में समर्थ हो सकते हैं। भगवान । भारतियों के दुराग्रह और हठ को छुड़ा उन्हें कर्मनिष्ठ बना। इस ससार में परशुराम को फौन नहीं जानता ? जिन्दगी अपने पिता जमदग्नि के कहने से अपनी माता रेगुफा का सिर फाट डाला ! एफ सरह अनुचित कार्य था परन्तु श्राशा पालन

1
-
[ १३४ ]
के सून में बंधकर परशुराम ने ऐसा आदर्श दिखाया जिसके
कि कारण वह ससार में प्रसिद्ध हुए। हालाकि जमदग्नि के
और भी पुन थे परन्तु वह आज्ञाकारी न थे । उनसे भी
उन्होंने रेणुका के सिर काटने की फही थी परन्तु उनम से
कोई भी इस कार्य के करने को तैयार न हुआ । अन्त में
परशुराम ने ही पिता की आज्ञा से अपनी माता का सिर काटा।
प्राज्ञा पालन का उदाहरण इससे क्या ऊचा हो सकता है।
जैसा कि तुलसीदास ने कहा भी है
'परशुराम पितु आज्ञा रासी,
मारी मातुलोक सब साखी' ।
क्या श्री रामचन्द्र जी को सुख प्रिय न था ? अवश्य था,
परन्तु वह बड़े आज्ञा पालक थे। इनका स्वभाव भी आदर्श
था । जब यह अपने पिता के मुख से प्रथम यह सुनवे
कि कल मेरे लिए राज-गद्दी होगी तो इनको इसका तनिक
भी हर्प न हुआ और फिर सहसा दूसरे दिन अपने लिए १४
साल का वनवास होना सुनते हैं तो तनिक भी रंज न हुआ।
इन्होंने अपने माता पिता दोनो ही की आज्ञा का पालन किया ।
पिता इनके सोच में स्वर्गलोक सिधार गये । श्रीरामचन्द्र जी
बनवामी हुए और पिता को श्राज्ञा पालन करने ही से आज
वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं।
भीष्मपितामह को कौन नहीं जानता ? यह पिवा की
इच्छा जानकर उसके औचित्यनौचित्य का विचार किये

[ १३५ ] बिना ही थाजन्म विवाह न करने की प्रतिज्ञा कर बैठे। इसीके प्रताप से यह महाभारत युद्ध में सबसे प्रसिद्ध हुए। यह सब आज्ञा पालन की ही महिमा है। वीर बभ्रुवाहन अर्जुन का ही पुत्र था परन्तु क्या हुया कि इसने अपनी माता अलूपी के कहने से अपने ही पिता को खय अपने ही हाथो से युद्धस्थल में मूर्छित कर गिराया । इसम बभ्रु वाइन का क्या दोष ? वह तो आज्ञाकारी था। उसने प्रथम अपने पिता का स्वागत किया तब अर्जुन ने उससे स्वय खुल्लमखुल्ला यह शब्द कहे कि तू मेरा पुत्र नहीं है । यदि तू मेरा पुन होता तो मेरा स्वागत युद्ध करके करता। यह बात अलूपी को जो कि बभ्रुवाहन के साथ गई थी बहुत बुरी लगी। उसने कहा कि बेटा देवो तेरे बाप ने हमको दोप लगाया है इसका फल तुम अवश्य दो । बस फिर क्या था ? वह अपनी माता के वचन तथा पिता की घातें सुनकर युद्ध के लिए सज गया और अपने बाहु नल से अर्जुन को युद्ध में मूर्छित कर दिया अन्त मे नागकन्या ने इसे सचेत किया। तत्पश्चात् अर्जुन ने बभ्रुवाहन को अपने गले लगाया । बभ्रुवाहन अपने पिता के आशीर्वाद से ही बड़ा चीर योद्धा हुआ जिसने महाभारत युद्ध में अपार रयाति पैदा को। यह सब आज्ञा पालन का ही प्रताप है । आज्ञा पालन के ज्वलन्त उदाहरणो ही से आर्य-जाति अपना गौरव रख सकी है। आज्ञा-पालन करने में औचित्यानौचित्य का प्रश्न ही नहीं बनता। प्रथम तो बड़ों से यह श्राशा ही न करनी चाहिए

-
[ १३६ ]
कि वे कभी अनुचित प्रस्तार करेंगे, और यदि कदाचित
अनुचित प्रस्ताव हो रस दें तो इसका दोष श्राज्ञा देने वाले के
सिर है न कि श्राज्ञा पालन करने वाले के ऊपर । किन्तु कुछ
आज्ञा और प्रस्ताव धर्म और सदाचार के सर्वथा विपरीत
होते हैं, उनका मानना ठीक नहीं, इसमें मेवक उसके अनौचित्य
को अपने प्राज्ञा देने वाले को जता दे।
पुलिस और फोज में श्रोचित्यानौचित्य का विचार किये
निना ही आज्ञा पालन में लग जाना कर्तव्य है। उचित अनुचित
फा विचार कमांडर ही करेगा, सिपाही का काम थाना पालन
में जुट जाना है। यही सिद्धान्त आक्षा पालन का सच्या
स्वरूप है।
श्रानापालन ही के कारण ब्रिटिश, जर्मन श्रादि बड़े बड़े देश
श्राज ससार में प्रभावशाली हो रहे हैं। यह देश पाना पालन
के हो सूत्र में भली प्रकार बधे हुए हैं । इसीके प्रताप से ही
समस्त ससार में गौरवशाली गिने जाते हैं । यह सब अाना पालन
की महिमा है। इमलिए समार में प्रत्येक मनुष्य का आना-पालन
करना ही मुख्य धर्म है।

[ १३७ ]
IDIOMS AND PROVERBS FROM PAPERS U P.
(1931-360
घड़क खुलना
विष का घूट पीना
बात जल्दी लगना
छटपटाना
बाबा श्रादम का समय
अपने मुँह मियाँ मिठू बनना
दूज का चाँद
जान के लाले पड़ना
बुत बन जाना
हाथ के तोते उड़ना
पानी पानी हो जाना
माथे पर बल न आने देना
ईंट का जवाब पत्थर से देना
गेहूँ के साथ घुन का पिसना
पो
बारह होना
IDIOMS AND PROVERBS FROM PAPERS
RAJPUTANA
(1931-35)
1931
नाक का बाल होना , पीठ में धूल लगना, गाते गाते विवाह
हो जाना, आँखें चार होना, बिना पेंदी का लोटा।

[ १४० ]
अदरक का स्वाद'। यह तो मूर्स मण्डली है यह मेरी कर
फादर जानते हैं।
अर्थ सहित कुछ मुहाविरे तथा कहावत
मुँह अपना सा लेपर रह जाना-निराश होना ।
मुँह उतर जाना-उदास होना।
मुँह काला करना-अपराध लगना ।
मुंह के कौवे उड़ जाना-उदास होना, व्याकुल होना ।
मुँह देख कर यात करना-खुशामद करना ।
मुँह देख रहना-आश्चर्य होना।
मुँह देखे की प्रीति-बाहरी प्रेम ।
मुँह पर गर्म होना-सामने क्रोध करना ।
मुँह बन्द करना-बोलने न देना।
मुँह में पानी पाना-अधिक चाह होना।
मुँह से फूल झडना -पाशीर्वाद देना, प्रसन्न होना।
नाक काटना-थनादर करना ।
नाक कटी होना-अपना मान सोना ।
नाक का बाल-अत्यन्त मुख्य ।
नाक चढाना-बुद्ध होना।
नाक रसना-प्रतिष्ठा रखना।
नाक सिकोड़ना-अप्रसन्न होना।
नाम करना-प्रसिद्ध होना।
-

. [ १४१ ] पफ दो लकड़ो मे मो हॉप-मले बुरे सपशे साथ एफ सा पाय फरना। फरती घाक यी, पाव लाप की-माग पुदना पारों पढ़ी-बड़ी। फरती 7 परतून, लदने का मौजूद-पिना यात मगदा करना। पालो पटा हरापनी और धौग परसनहार-दिग्गयटी चौर सत्य में अन्तर है। पल फालीय देर पहाय धाजफा लिया देगी माय गुजर गया उसे जाने दो। न्याय ता पो से नहीं जायजी में म्याय तो अच्छी सोच फै हसा मोती धुगें, के लगन ही स्वाय ना तो लगन ही मर जाय मर जाय। गालो धनिया क्या करे, इस फोठो के धान उसमें धरै- फरने वाला फ्भी येठा नहीं रहता। खरपूजे को देख कर परजा रंग बदलता है--देया देखी शौक होना। गधा गिरे पहाड़ से और मुर्गी के टूटे फान-असम्भव यात। गैर का सिर पसेरी यरायर :-दूसरे की परवा नहीं। गाल बाला जीते और माल वाला हारे-महुत शोर मचा पर अपनी चला लोगे। ओछे के पास बैठ कर अपनी भी पति जाय-नीच के साथ मत रहो। श्रीलाती का पानी मगरे पर नहीं चढ़ता--असम्भय बात नहीं होती। -- ।

[ १४० ] कर्म हीन सेती करै यैल मरै कि सूखा परेअभागे के जरूर दुम होता है। कमाई का सूटा और खाली रहै ?-कोई न कोई आ६ मरता है। कहे तो माँ मारी जाय न कहें तो थाप को कुत्ता खाय- तरह मुश्किल । कहै सेत की सुनै सलियान की-अन्धाधुन्ध काम करना कहने से पुम्हार गधा पर नहीं चढता-मूर्य कहने से ना मानता। काम प्यारा कि चाम-सुन्दरता नहीं, काम देखा जाता है। वक्त गया पर कहावत रह गई ई-यात बनी रहती है। नोट-बहुघा देखा गया है कि विद्यार्थीगण बिना अ समझे हुए ही कितने ही ऐसे अनर्थ प्रयोग कर देते हैं जिनः कि कोई सार्थक तात्पर्य नहीं होता वे सबके सब निरर्थक होते हैं ऐसे प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं प्रयोग करने के लिए सबसे प्रथम अर्थ की जानकारी प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है। अतएव हमारा विद्यार्थियों से अनुरोध है कि वह विना अर्थ की जानकारी के प्रयोग कदापि न करें चाहे शब्द हो पाई मुहाविरे हों और चाहे कहावतें हों । इसी हेतु हमने उपर्युक्त श्रादर्श के लिए कुछ मुहाविर तथा कहावतें अर्थ सहित दे दी हैं ताकि विद्यार्थी उनसे पर्याप्त ज्ञान प्राप्त कर सकें । इनके विशेष ज्ञान के लिए 'लोकोक्ति कौमढी नामक पुस्तक से

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Hindi Ratnakar

Author
Kumar,shyam Sundar
Title
Hindi Ratnakar
File name
Hindi Ratnakar
Text
OCR done
Citation
1938
Published
2011/04
Publisher
Agra,lakshami Agrawal Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
154
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552284
Barcode
4990010033031.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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