Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Srangarharavali
Front matter
RĀJASTHĀNA PURĀTANA GRANTHAMĀLĀ
Published by the Government of Rajasthan
A Series devoted to the Publication of Sanskrit, Prakrit, Apabhramsa,
old Rajasthani-Gujarati and Old Hindi works pertaining to
India in general and Rajasthan in particular.
General Editor
Acharya JINA VIJAYA MUNI, Puratattvacharya
Honorary Member of the German Oriental Society, Bhandarkar Oriental
Research Institute, Poona and Gujarat Sahitya Sabha, Ahmedabad,
Honarary Director, Rajasthan Oriental Research Institute.
No. 15
ŚRNGĀRAHĀRĀVALĪ
of
SHRI HARSHA
Edited by
Prof. Dr. PRIYABALA SHAH
M A Ph.D. (Bombay), D Litt (Paris)
(Head of the Department of Ancient Indian Culture :
Ramanand Arts College, Ahmedabad )
Rajasthan Oriental Research Institute
Jaipur
1956
श्रीहर्षविरचिता शृङ्गारहारावली सम्पादिका डॉ. प्रियबाला शाह. एम्. ए पीएच्. डी. (बंबई), डि, लिट् (पेरिस) (प्राध्यापिका, रामानन्द आई कॉलेज, अहमदाबाद ) - प्रकाशक :- राजस्थान-राज्याज्ञानुसार संचालक-राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर ( Rajasthan Oriental Research Institute ) जयपुर (राजस्थान) प्रकाशक सचालक - राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर, जयपुर, के आदेशानुसार - गोपालनारायण बोहरा । मुद्रक- जयन्ति दलाल, वसत प्रिण्टींग प्रेस, घीकांटा रोड, अहमदाबाद, और मुकुन्द के. शास्त्री, इला प्रिण्टरी (वल्लभ मुद्रणालय) पानकोर नाका, अहमदावाद ।
प्रधान संपादकीय वक्तव्य राजस्थान एवं गुजरात, मालवा आदि प्रदेशोंमें प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थोंके विखरे हुए एवं जीर्णशीर्ण दशामें जो संग्रह प्राप्त होते हैं उनमें संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश एवं प्राचीन राजस्थानी-गुजराती भापामें रचित छोटी वडी ऐसी सैंकडों ही साहित्यिक कृतियां उपलब्ध होती हैं जो अभी तक प्रायः अज्ञात और अप्रसिद्ध हैं। विद्वानोंका लक्ष्य प्रायः अभीतक उन्हीं सुप्रसिद्ध और सुज्ञात ग्रन्थोंके अन्वेषण एवं संशोधनकी तरफ रहा है जो यत्रतत्र यथेष्ट परिमाणमे उपलब्ध होते हैं। ग्रन्थोंके संपादन और प्रकाशन के विषयमें भी प्रायः यही प्रथा चली आ रही है। सुप्रसिद्ध और सुज्ञात ग्रन्थोंके सिवा छोटी छोटी एवं प्रकीर्ण रचनाओंके विषयमें विद्वानोंका विशेष लक्ष्य नहीं जाता है और इसलिये अभी तक ऐसी रचनाओंके संपादन-प्रकाशनका मुख्य प्रयत्न प्रायः नहींसा हुआ है। हमारे प्राचीन इतिहास एवं सांस्कृतिक सामग्रीकी दृष्टिसे इन फुटकर रचनाओं में जो ज्ञातव्य छिपे पडे हैं उनकी तरफ हमारा लक्ष्य बिल्कुल नहीं गया है-ऐसा कहा जाय तो कोई अत्युक्तिको वात नहीं होगी। राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्द्रिका कार्य प्रारंभ करते समय, हमारा मुख्य लक्ष्य इस प्रकारके प्रकीर्ण साहित्यका अन्वेपण, संग्रह, संरक्षण, सशोधन एवं प्रकाशन आदि करनेका रहा है और तदनुसार, राजस्थान पुरातन ग्रन्थ- माला द्वारा ऐसी अनेकानेक साहित्यिक रचनाओंको, सुयोग्य विद्वानों द्वारा शोधित-संपादित कराकर प्रकाशमें रखनेका आयोजन हमने किया है। संस्कृत और प्राकृत भापामे रचित मुक्तक-प्रकीर्णक पद्योंके फुटकर संग्रहोंके नाम पद्यावलि, मुक्कावलि, हारावलि, मणिमाला, रत्नमाला, पुष्पमाला आदि रूपमें प्रसिद्ध हैं। कुछ कृतियां पद्योंकी संख्याके अनुसार भी प्रसिद्ध हैं-जैसे पांच पांच पद्योंका संग्रह पंचक, आठ आठ पद्योंका संग्रह अष्टक, १० पद्योंका संग्रह दशक, इस तरह षोडशक १६ पद्योंका, २० पद्यात्मक रचना विंशतिका, २४ पद्यात्मक कृति चतुर्विशतिका, २५ पद्योंकी पंचविंशतिका, ३० की त्रिंशिका, ३२ की द्वात्रिंशिका, ५० पोंके संग्रहवाली रचना पंचाशिका या पंचाशक, ७० पद्योंकी समूहात्मक रचना सप्ततिका एवं सौ पद्योंके संग्रह 'शतको आदि नामसे उल्लिखित किये जाते हैं। राजस्थान पुरातन ग्रन्थमालाके १५ वे पुष्पके रूपमें पाठकोंके हाथमें जो ग्रन्थ उपस्थित है वह शृंगारहारावलि भी इसी प्रकारकी एक मुक्तक -पद्योंकी संग्रहरूप संस्कृत रचना है। संस्कृतके मिन भिन्न छन्दोंमें, रचे हुए १०१ पद्योंके [ in - इस छोटेसे संग्रहको कर्त्ताने शृंगारहारावलि नामसे अभिहित किया है जिससे इसका विषय भी स्पष्ट ही सूचित हो जाता है। कविने समय समय पर स्फुरित अपनी कल्पनाके अनुसार शृंगाररससे संवन्धित जो मुक्तक पद्य बनाये होंगे उनमेसे चुने हुए १०१ पद्योंके संकलन रूपमें यह हारावलि प्रथित की गई है। इस प्रकारके शृंगाररसविषयक १०० पद्योंका समुच्चय महाकवि भर्तृहरिका बनाया हुआ शृंगारशतकनामक संस्कृत साहित्यका एक उत्कृष्ट मुक्तकसंग्रह सुप्रसिद्ध ही है और इसी तरहका महाकवि अमरुकका बनाया हुआ १०० पद्योंका संचयरूप अमरुकशतक नामका सुन्दर काव्यसंग्रह भी सुविश्रुत है । ऐसी ही एक अन्य और उत्तम रचना नागकविकी है जिसे नागशतक था भावशतक भी कहते हैं । कहने का तात्पर्य है कि इस प्रकारके मुक्तक-पद्योंके संकलन-स्वरूप अनेकानेक साहित्यिक प्रवन्ध उपलब्ध होते हैं जिनमेंसे ऊपर्यु- ल्लिखित जैसे कुछ एक ही प्रवन्ध अभी तक प्रकाशमें आये हैं। गुजरात विद्यासभा, अहमदावादके प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थसंग्रहमें राजस्थान एवं गुजरातसे प्राप्त सी कई प्राचीन लिखित पोथियां जीर्ण-शीर्ण एवं उपेक्षित दशामें उपलब्ध हैं जिनकी तरफ सहसा विद्वानोंका लक्ष्य आकृष्ट नहीं हो पाता। डॉ. प्रियवाला शाहको रिसर्च स्कॉलरके रूपमें जब इस संग्रहका निरीक्षण करनेका सुयोग मिला तो इनका लक्ष्य इन पोथियोंकी तरफ गया और इनने इनमेंसे प्रस्तुत शृंगारहारावलि, कृष्णगीति, नृत्तसंग्रह, रत्नकोश आदि जैसी कई फुटकर परन्तु साहित्यकी दृष्टिसे महत्त्वकी रचनाओं के विषयमें अपने प्रधान अध्यापक प्रो. रसिकलाल परीखसे जिक्र किया। प्रो. परीखने इन रचनाओंका अध्ययन और प्रतिलिपि आदि करने की प्रेरणा की और प्रसंगवश मुझे इससे सूचित किया। प्रतिलिपि और मूल लिखित पोथियोंका अवलोकन करने पर मुझे ये रचनाएं राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा प्रकाशित करने योग्य मालूम दी। अतः मैंने सुश्री प्रियवालाको इनका संपादन करनेकी प्रेरणा की जिसके फलस्वरूप यह शृंगारहारावलि अव विद्वानोंके सम्मुख उपस्थित हो रही है। डॉ. प्रियवाला शाह सस्कृत साहित्यके विविध अंगोंके अध्ययन एवं अन्वेषणमें विशेष रुचि रखती है। इनने बंबई-युनिवर्सिटीकी एम्. ए. की परीक्षा भारतीय प्राचीन इतिहास और सस्कृतिके विषयको ले कर पास की और पीएच्. डी. की डिग्रीके लिये विष्णुधर्मोत्तरपुराणान्तर्गत ललितकला- विषयक प्रकरणों का परीक्षणात्मक संपादन कर उस पर विवेचनात्मक बृहत् निबन्ध (थिसिस) लिख कर, उक्त युनिवर्सिटीको उपस्थित किया जिसके परिणामस्वरूप इनको युनिवर्सिटीने डॉक्टरेटकी पदवी प्रदान की। प्रस्तुत शृंगारहारावलिका संपादन कार्य समाप्त होने पर था तभी इनने अपने विशेष अध्ययनके लिये फ्रान्सको पेरिस युनिवर्सिटीमें प्रविष्ट हो कर, वहांके संस्कृतम प्राध्यापक प्रो. रेनॉ और दुपाँ आदिके मार्गदर्शनमें सूर्यपूजा एवं कृष्णगीति और
in ]
नृत्तसंग्रह नामक प्रवन्धोंके आधार पर प्रस्थापित भारतीय संगीत और नृत्य
आदि विपयों पर विस्तृत निबन्ध लिख कर पेरिसकी शोरवॉन युनिवर्सिटीसे
डी लिट् की उच्चतम पद्वी प्राप्त की। डॉ. प्रियवालाकी अध्ययन विषयक
इस प्रकारकी सुयोग्यताके लिये यहां पर मै अपना हार्दिक अभिनन्दन प्रकट
करना चाहता हूं।
वस्तुतः प्रस्तुत ग्रन्थमालाके प्रारंभसे ही मुझे गुजरात विद्यासभाके अंगमूत
प्रो. श्री रसिकलाल परीख, डॉ श्री हरिप्रसाद शास्त्री, डॉ. श्री जितेन्द्र जेटली,
डॉ. सुश्री प्रियवाला शाह, अध्यापक श्री के. का. शास्त्री आदि मेरे प्रिय
विद्वन्मित्रमंडलका विविध ग्रन्थों के संपादन और प्रकाशन आदि कार्यों में अभीष्ट
सहयोग प्राप्त होता रहा है । अतः इसके लिये मैं अपना सविशेष हार्दिक
कृतज्ञभाव प्रकट करना चाहता हूं।
अनेकान्त विहार
मुनि जिनविजय
अहमदाबाद
सम्मान्य सचालक
आपाढशुक्ल ११. वि. स २०१३
( १८-७-५६)
राजस्थान पुरातत्त्वान्वेषण मन्दिर
ज य पुर
PREFACE OF THE GENERAL EDITOR There are still hundreds of old manuscripts big and small in Sanskrit, Prakrit, Apabhramśa and old Rājasthāni-Gujarāti lying scattered over Rajasthāna, Gujarāta, Mālawā and other regions of our country. Many of these are still unknown and unpublished. Up till now scholars have generally devoted themselves to works which are comparatively bulky, well known and available in great number. The same outlook prevails also amongst publishers of oriental series, But in addition to those big and well-known works, there are many small ones on a variety of subjects which have not attracted the attention that they deserve. In fact, no major attempt has been made to edit and publish these small works on important subjects. It would be no exaggeration to say that these works which contain important material for the history and culture of our country and which embody not a negligible part of our ancient learning have been mostly neglected, probably because they are in small manuscripts and rare to find. It has been our endeavour from the very inception of Rājasthāna Oriental Research Institute to search for, collect and preserve mss of such small works on various subjects and also to edit and publish them. Accordingly we have arranged for critical editions of such works at the hands of competent scholars and their publication in the Rājasthāna Puratana Granthamala The collections of Sanskrit and Prakrit detached verses are known by such names as Padyāvali, Muktāyali, Hārāyali, Manimālā, Ratnamālā, Puspamālā etc Some of these collections are also named according to the number of verses collected, e.g a collection of five, Pancaka; of eight, Aştaka, of ten, Daśaka, so also a collection of sixteen would be called şodaśaka, of twenty, Vimsatikā, of twenty four, Caturvimśatıkā, of twenty-five, Pañcayımſatıkā, of thirty, Trimśıkā, of thirty-two, Dyātrimśıkā; of fifty, Pañcāśaka or Pancāśikā, of seventy, Saptatikā, and so a collection of hundred would be called a Sataka Śrogārahārāvalī,' which we are placing in the hands of scholars as the fifteenth number of the Rājasthāna Granthmālā, is a work of this type - a collection of 101 Muktakas or detached verses The subjectmatter of this work is shown by the very title given by the author to this collection of his of 101 verses in different metres The author seem to have made this necklace of one hundred and one pearl - like verses Muktakas-by selecting the best out of the love-lyrics that he may have composed at different times iva ] There are in Sanskrit Literature many similar collections of hundred erotic verses of other authors also The two most well-known are the Śrngāra Sataka of Bhartrhari and the Amaru Sataka of the poet Amaru. There is also the Bhāvašataka or Nāgaśataka of the poet Nāga. This Śrngärahārāvali is one such work, The Gujarat Vidya Sabha of Ahmedabad has a valuable library of mass collected from Rajasthāna and Gujarat - which has not attracted the attention that it deserves When Dr. Priyabala Shah was working as a research scholar in the B J. Institute of Gujarat Vidya Sabha, she examined a number of these mss She found amongst them some small but interesting works Prof Parikh, the Director of the Institute, suggested to ber that she might study and edit these. She selected Śrngārahārāvali along with Krsnagīti, Nóttasamgraha and Ratnakośa My friend Prof. Parikh spoke to me about these new and unpublished works I was also shown the press-copies of these On going through them I felt that they deserved to be included in the Rājasthāna Purātana-Granth-mālā I suggested that Dr Priyabala might edit them for this series She acceded to my request Hence these publications in the Rājasthāna Purātana- Granthamālā Dr Priyabala Shah has interest in many fields of Sanskrit research She took her M A. degree in Ancient Indian Culture from the Bombay University. She got her PhD degree in Sanskrit from the same University on a thesis on a critical edition of the third kända of Visnudharmottara Purana with an elaborate introduction on the fine arts as practised in ancient India After finishing her work on Śrogārahārāvalſ, she went to Paris and worked in the University of Sorbonne under the guidance of Prof Renou and Prof Dupont She got her D Litt ( très honorable ) from the University of Paris on her thesis on the Iconography of San as well as on Krşnagiti and Nrttasamgraha I take this opportunity to congratulate lier on her brilliant academic attainments. In the making of this series, I received from the start, enthusiastic co-operation from my scholar-friends of Gujarat Vidya Sabha, particularly Prof Rasiklal Parikh, Dr Hariprasad Shastri, Dr Jitendra Jetly, Dr. Priyabala Shah and Pandit K K Shastri I express my sincere thanks to them Anckarit Vihar Muni Jınavijaya Hon Durcctor, Rajasthan Onental Research Institute, JAIPUR Ahmedabad 18-7-56
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मानकरयतामलमान और अक्षरी करतोलाभिहानि नहाता हात
पोलमडलले पचावला की सानालियालगतिमदगन्त र मायाला
नसोपमिथुन-पान मा नाराबाजी
रस्यजगात जगजलोटरसायना पे अकोलागी चतःजार करना
गहितिदुर्लनरतलमानि पागलजार जनता जताया
होऽहयोशाआध्यचदन्यनिर्गनायजानी रोमेजताततरी हो
खनिहरन्न सुश्तजामधारी वहनाबावनगजराना स्टरसातगार
शास्वासस्वायसर इंश्यमन्तवत् वा भरया रात्रीचे तत्रागारमा
।
घर-पतिघरासानेघदनु उर्षितत्राप्यो विलसन्योर्ग मशिना विलमजोर
मागीमा सुरक्षेविघात सधाकामुकाममायद्यझिाराजा चरम
लोरेगारलेशवाली।तिश्रीजाधिरचिताशार हरवलीसमाजलासब१५)
माघरध्वदिपकनिषिक्ष्विदिविषारसुतलस्तीधरएको
टीमाकुमाराप्रनवनवलिनाचबुवानयत्यन्चालविलयत्पश्चलकमलशालोक मालोकायंत्राचारसंत
एझरितिजनमनालसादयंत्याना गर्दा स्वएशियोवडनगरभवाया हिवारत १ ॥ भो यथाशके
मता परिभ्रममिकथनेवर धावा बहसावलीगsingविस्तारुमशिद्धाना भल्यासोसविविशति
बछरावास्यवोधनाचा यषष्ट्रमिन्द्रोमरवान मुरलेसनमारमा
Introduction i I Oritical Notice of the Manuscript The text edited in the present work is based upon a single Ms, in the possession of Gujarat Vidyasabha, Ahmedabad Ms. No 3601 Name-Sțngarahārāvali Author-Śrīharşa Material-Paper Script-Devanagari Extent of the Ms.-13 folios Size of leaves-9x3 inches Area of writing-7.5x2.25 inches Number of lines_9 lines per page, rarely 8 lines Letters-31 to 33 in each line Writing-fairly uniform and legible Age-1733 Samvat (i. e. 1676 A D. Friday 9th June ) Begins-14GE FIFT 7. 11 कामः कौसुमकार्मुक करतले कृत्वाधिकं कामिनः । Ends-इति श्रीश्रीहर्षविरचिता शृंगारहारावली समाप्ता । सव. १७३३ आषाढ वदि ८ शुक लिखित द्विवेदि विद्याघरसुत लक्ष्मीधरेण । oft I I After the colophon, there are two more ślokas in a different band ( see p. 16 ). 1 II The work ? I undertook to edit this work, even though there was only one Ms. of it, because of the name of Sriharşa and the poetic quality of the work. If, , however, the manuscript was, not on the whole correct, I would have been compelled to give up the attempt. As will be seen from the text, I have in all made nearly 150 emendations. These are made because the actual readings of the Ms. cases metrically deficient (eg ślo ala for art slo: 55 TAHOE for FSCHUT, ślo 57 faring og for fagniese toe, Slo. 73 are in some vil for ta), in some, grammatically incorrect le g ślo. 34 za CART, slo 63 alzat, ślo. 65 gaat ) and in some, did not yield any sense or the sense was not as would be required by the context (e. g ślo 7 FARIERE, slo. 8 Fattirar, slo 34 qua anth #, and, ślo 30 pmfálgicælle) In making these emendations, it is not possible to exclude altogether the subjective test of propriety It has been, however, controlled by metre and grammar in emending the readings, I have mainly relied upon the objective consideration of the confusions and mistakes which are likely to arise by the similarity of letters ( like a and a, Hand 8, and 2,9 and y etc) One cannot say how far these emendations represent the author's text until more mss of the work are discovered. and Tas 7, and 1 III The Author a name Sriharsa is wellknown in Sankrit literature Several persons who might have lived centuries apart "have borne this name. In fact we know, at least two great Harşas . one the emperor Harşa of Kanouj ( 6th cent A D ) and the other Sriharsa ( 12th cent A D.) a great poet and Vedantist,--the author of Naisadhiyacarita and Khandana-kbandakhadya Scholars have discovered several other Harsası also. Our problem is to find out whether our author'is to be identified with onc of the known Harşas or whether he is a new find At the outset I must say that I have not been able to find any decisine evidence which would help one to decide the question. The only thing, therefore, that I could do was to compare SȚngārahārāyali with, on one side, the works attributed to Harşa of Kanouj, and on the other, with the Naişadhiyacárita of the Vedantıst poet Sriharşa Here also I.must say that this comparative study has not given mc any definite clues Yet if one is allowed to express one's inclination based upon such a comparative study, one might say that it is more likely that the author of Naişadhiya might have composed this work in his earlier years to emalate works like the Amaruśataka, What goes against this hypothesis is the fact that Sriharsa has not 1. There aro as many 25 five different individuals, possessing the same appelation Share ko to Sanskrit literature (1) younger brother of the author of the Ki aprodina, (2) the author of the Varsadbaleria, (3) a king of Kashmir to set 710ct qacer, Somrades a 1 role the Kathasaritsagara, (4) the father of Muñja and the mind-lates of kib. Ehoja of Dharia (5) the king of Sthane yara See PIX Irtrcdccion carda of Sri Harsa edited by Karmarkar (Second edition, 1923) vii e mentioned Sšngārahårāvali in the references to his works made at the end of the several cantos of Naisadhiya This absence of reference, however, may be explained on the assumption that he might have not regarded this work, presumably of his earlier years, as sufficiently important to .stand with his major' works - It is wellknown that Sriharşa' uses many unusual words - in his Mahākāvya. Some of these are sanskritised forms of Deśya words, g the use of the word gou in the sense of saffron( Nais viii, $0) Now we find that, this word has been used in this work also (ślo. No. 59 ). In addition, the use of the word ofteforær in ślo. 12 is to be specially noted As I have explained in the notes It is a Sanskritised form of the desya word uit it or furet This common tendency of using the Sanskritised forms of the desya words; by itself, is in no way conclusive, yet if we take this fact along with the other fact that Sriharsa and not Harsa is the proper name of the authors of Naisadhiya and Sšngārahārāvalī, we, may be permitted the guess that both of them might refer to the same person. This is not good logic, but not so , bad as to exclude a guess Whoever may be this Harsa, he seems to be a person very familiar with the regions of Gujarat and Rājasthāna, as is evident from ślo, 12 (Tilly71), ślo. 46. (Frat), ślo. 73 (HFG), ślo. 73 (qardarma) The reference to surfa in ślo 30 can be explained as something conventional because it is a sort of कविसमय The two gratt verses at the end of the Ms, describing in one the beautiful Nagara women of Vadanagara and in the other the surpassing beauty of its cowherdesses, clearly indicate that the copy of this Ms was made at Vadanagara Sriharşa, the author of Naisadhiya, had a great vogue in Gujarat and its oldest commentaries were written solely in Gujarat.' So if Syngārahārāyali is the work of the author of Naişadbiya it would be no surprise if its only known Ms. was copied at Vadanagara However, as I said above, the evidence is in no way conclusive and the question of the identity of the author of Sšngāra-bārāvali remains an unsettled problem. t f IV Age- The Age of this work is undoubtedly earlier than this ms 1. e, 1733 Samvat (1. e 1677 AD) If it is a work of the author of Naisadhiya its date would be, that of Sri Harsa (12th cent. A D) Beyond this we connot say anything further about the age of Śğngāra-hārāyali See Literary Circle of Mahāmātya Vastupala-B J Sandesara (Chap 5 pages I 5 1-5 VI I take this opportunity of expressing my sincere thanks to revcred Acharya Śrı Jinavijayajı, the Honorary Director, of Rajasthan Puratattva Mandır, Jaipur, who is known for the encouragement he gives to young students in the field of research. I am greatly indebted to him for not only accepting this work for publication in Rajasthan Puratattva Series but for helping me in learning the craft of editing Sanskrit texts I am also indebted to Prof. K. V. Abhyankar, Honarary Professor of Sanskrit, B. J. Institute of Learning and Rescarch, Ahmcdabad, one of my teachers who guided me in my thesis and taught me how to use Mss. for editing a work. The Sansknt commentary in the notes is the work of the wellknown Vaiyākarana Pandit Satyadeva Miśra of the Brahmachari Sanskrit Pathaśāla-Ahmedabad, I am much indebted to him for this co-operation I had the good fortune of discussing the various emendations with Pt, Sukhalalji and Sri. K, K. Shastree. Lastly, I must not forget to thank Prof. R. C. Parikh, Director of the B. J Institute of Learning and Research, Ahmedabad, for the valuable assistance that I have received from him in connection with this work. I am alone, however, responsible for the short-comings of this my first work Helpful criticism will be thankfully received Ahmedabad Priyabua Shah 1-7-1952 छन्दोनुक्रमणिका अनुष्टुप् Slo s 6, 7, 16, 36, 37, 50, 51, 66, 67, 68, 82, 83, 91 अनुष्टुप् गायत्रः ॥२३॥ चतुष्पादिन्यनुवर्तते । गायत्रैरष्टाक्षरैः पादैश्चतुष्पाच्छन्दः मनुष्टुएसंब भवति । [ पृ० ६२] उपजाति Slo.s.-74, 76. भाधन्तावुपजातयः ॥ २३ ॥ माधन्ताविति अनन्तरोक्तापिन्द्रवनोपेन्द्रवज्रयो. पादावार। [पृ० २९१] वंशस्थेन्द्रवंशापादयोरपि सङ्करादुपजात्यो भवन्ति । [पृ० २९४ ]. ru - . पृथ्वी S'10. s. 19, 32, 55, 63. पृथ्वी जसो जसो यलो ग वसुनवको- ।।..१७ ॥ अष्टभिनयभिच यतिः [पृ० ३३८] न स 17 मालिनी Slo.s 34, 59. मालिनी नौ म्यौ य् ॥ १४ ॥ अष्टभि' सप्तभिश्च यति । [पृ० ३३४ ] मन्दाकान्ता-Slo s. 33, 40, 41, 54. मन्दाक्रान्ता म्भौ नतो त्गौ गा समुद्र स्वराः ॥ १९॥ थतपु. षट्स सप्तसु च यतिः । [ पृ. ३४१] वसन्ततिलका Slos_3, 10, 11, 12, 13, 54, 57, 60, 85, 86, 87. बसन्ततिलका त्भौ नौ गौ ॥ ८ ॥ [ पृ० ३२९ वंशस्थ-Slo.s 23, 24, 25. पंशस्था ज्तो ज़ौ ॥ ३४ ॥ [ पृ०.३०३ ] शार्दूलविक्रीडित-Sto.s 1, 2, 4, 5, 8, 9, 14, 15, 17, 20, 26, 27, 28, 29, 30, 31, 35, 38, 39, 42 43, 44, 45, 46, 47, 48, 49, 52, 53, 61, 65, 73, 76, 77, 79, 80, 88, 90, 92, 93, 94, 95 97, 98, 99, 100, 101. शार्दूलविक्रीडितं मसौ जसो तो गादित्यऋषयः ॥ २२ ॥ द्वादशभिः सप्तभिश्च यतिः ॥ [पृ० ३४५ ] .
x] (- शिखरिणी-Slo.s 64, 70, 715 78. शिखरिणी यमौ नमो भलो गृनुरुद्रा - ॥ २० ॥ षट्स्ले कादशसु च यतिः । पृ०, ३४२ ] ETETT - S’los 56, 62, 72, 75, 84 and two s'lokas of the footnote. बग्घरा मौ भनौ यौ ये घि सप्तका. ॥ २५ ॥ सप्तसु सप्तसु सप्तसु च यति. [पृ ३५० ] स्वागता-Slo s. 81 स्वागता ! भगौ ग् ॥ २९॥ [ पृ० २९९ ] हरिणी-Slo.s-- 18, 21, 22, 69, 89. हरिणी नसौ म्गै स्लो गृतुसमुद्र-ऋषयः ॥ १६ ॥ षभिश्चतुर्भि सप्तभिश्च यति. [ पृ० ३३७ ] - - From पिङ्गलच्छन्दःसूत्रम् प्रथमसंस्करणम्-१९२८ (कलिकातामहानगा मुद्रितम् ) " शुद्धिपत्रक स . - pago slo. M २ इवाम्बुलौल्यात् ।। प्रेमनिलीनता After the readings .३ Footnote ट . धृता या 6 & Pootnote ८ ४६ ब -अनिता नेत्यतनो पनविचित्य read as ; a इवाम्बु लोल्यात् प्रेमणि लीनता 3a Ms. प्रेमनिभेतका घृताया '9 -जनिती नेत्यंतनो पुनर्विचिन्त्य हमियं कुसुम संलग्नाही वेणी रश्मिः संतत नयोरजन पक्षचन्द्रा 1 १० - -हमिय, ५ १०, ६० ६२ १ कुसुम संलग्नागी वेणीरश्मिः संतत मयोजन चक्रचन्द्रा ५० ७६ r १३ १३- . घ
श्रीहर्ष-विरचिता
शृङ्गा र हा रा व ली।
श्रीमकरध्वजाय नमः ।
२
कामः कौसुमकार्मुकं करतले कृत्वाधिकं कामिनः
कान्ताकान्तकपोलमण्डलतले पत्रावलीकर्मणि ।
युञ्जानो विजयी जगन्ति मदयन् रत्यानुयातोऽनिशं
'सौहार्दान्मधुमत्यजन् हि भवतां सौख्याय भूयाद् भुवि ॥ १
षष्ठो जैत्रशरः स्मरस्य जगतां जेतुं जगद्युद्धतो
व्यस्ते सायकपञ्चके विषयिणां चेतः शरव्यं हरन् ।
स्वर्गादप्यतिदुर्लभं करतलप्राप्तश्रियं पार्थिव
शर्मप्रेम तनोतु भूरि भवतां कान्ताकटाक्षोऽक्षयम् ।।
[ वसन्तकालवर्णनम् ]
आधूय चन्दनवनीमलयावनीनां
स्थैर्य भजन्नतितरां कुसुमद्रुमेषु ।
ग्लानि हरन् सुरतजां मधुरो वधूनां
वातः प्रगेऽतरलयत् सरसीतरङ्गान्॥
का शाखी सखि यस्य पुष्पमभवत् पुष्पायुधस्यायुधं
छिन्ने ता चिरान्निरायुधदशां धत्ते स चित्तेशयः ।
इत्थं सा सुभग त्वदीयविरहे कन्दर्पसंतापिता
वाला बालसखीजनेन सहिता क्रीडावने भ्राम्यति ॥
कान्ते त्वन्मुखचन्द्रमा अभिनवो दन्तावली चन्द्रिका
प्रत्यादिष्टमहावियोगतिमिरः कौरङ्गनेत्राङ्कितः ।
आश्लिष्यन् कुचचक्रवाकमिथुनं पूर्णेऽपि यस्मिन् मिथम्-
तुङ्गायेत मदेन नेत्रनलिनानन्दं वितन्वन् मुदा ॥ ५
1 Ms सौहार्दामधु. 2 Ms जगदुद्धतो. 3 Ms °वनि' 4 Ms यन्
४
शृङ्गारहारावली [ श्लो. ६-१२ ६ चिद्रावयति संपूर्णो मानिनीमुखचन्द्रमाः । दन्तचन्द्रिकया नूनं वियोगविभवं तमः ।। स्तनौ 'स्तनान्तरन्यस्तौ मुखं सुमुखि सन्मुखम् । ममोत्सङ्गे तवैवास्तु सुश्रोणि श्रोणिमेखला ॥ ७ 'कुञ्चत्कोकनदश्रियोनयनयोः प्रक्षालयन्ती जलैर- 'वक्षोजन्मकिशोरको पितृगृहं गच्छन्त्यपानेन तु । मन्दावर्तितकन्धरा प्रियतम संवीक्ष्य गुर्वन्तिकाद्- अन्तर्वाप्पनिरुद्धकण्ठकुहरं कान्ता चिरं रोदिति ।। ८ S .. कान्ता किं कुरुते, रतेषु रमते कामाक्षया हे सखे, साकं केन रतं, त्वया, ऽहमिह न, व तत्समीपेऽनिशम् । साहारेषु मनोवलेपवसनेपिच्छां हि हित्वा सखी सनीडा भवतो रतैरविरतैरन्तःस्थितैर्वर्तते ॥ सौवर्णनू पुररणञ्चरणारविन्दा श्रोणीभरालसगतिगशावनेत्रा । पीनस्तनी सकलचन्द्रमुखी तनोति तन्वी न कस्य हृदि मोहमहो महान्तम् ।। अद्याहमालि तलिने सहिता निपष्णा वार्तासु तस्य निरता सरलाशयत्वात् । कान्तेन कामतरलेन भुजोपपीडम् आलिङ्गथ मां किमपि तेन कृतं न जाने ।। ११ १० तोयान्तरुल्ललितमीनयुगाभिरूप- नीरङ्गिकान्तरचरन्नयनं प्रियायाः। पास्यामि पार्वणसुधाकरचारुवक्त्रं शीतं सुगन्धि मरुपान्थ इवाम्बुलौल्यात् ।। १२ - 1 Ms स्तन्यमनिहन्य'. 2 Ms°लां. 3 Ms किञ्चित. 4 Ms 'रता.
- मलो. १३-१९] शृङ्गारहारावली स्वेनैव या वरकुचद्वितयेन नूनं संवयं सम्यगपि मे हृदयं दयालुः । वेगातिदुःसहविदारणदारुणेभ्यः सा पश्यति प्रियतमा मम मार्गणेभ्यः ॥ १३ रात्रौ यत्सखि कौतुकं समभवचित्रं तदाकर्ण्यतां कान्तेनाद्य समागतेन शयनासीना समालिङ्गिता'। एतस्मिन् समये रसान्तरमसावासाद्य चेतोहरं कान्तो मन्मयतामुपागमदहं जाता "ततस्तन्मयी ॥ शय्यायां स्मररागमागतवतोः संपन्नयोरावयोः वार्तालिङ्गनचुम्बनानि बहुधाऽभूस्ततोऽनन्तरम् । प्राप्ते प्रेमनिलीनतां सखि परां तन्मन्मयत्वादहो तद्योग्यं तदहं चकार करणं मद्योग्यमेव प्रियः ॥ १५ आक्रान्तहृदयेनाहं सखे सर्वाङ्गसनिना। प्रियेण रतनाथेन मोहितेनाद्य मोहिता ।। युग्मं कुण्डलयोललौ ललितयोर्लीलामदो दोलया चापत्यान्मधुरं चकार 'रशना रावं नितम्बस्थले । कामिन्याः करकङ्कणैनिकणितं कामाहवस्योत्सवे दृष्ट्वा कान्तपराजयं चरणयोलग्नौ चिरं न पुरौ ।। १७ प्रणतिनिरतः कान्तः कस्मात् त्वयाद्य न वीक्षितः - प्रियसखि कृतो व्यर्थाभाषः किमेष सखीजनः । इयमपि गता पूर्णप्राया पृथुर्हि निशीथिनी कथय कठिने कीदृक् कोपरतवैष हदि स्थितः ॥ १८ विसर्जय सुदुर्जनं गणय सज्जनं मानसे कृतार्थय सखि प्रियं प्रकुरु तत्र मा विप्रियम् । रमस्व पतिसंगता विरम मानतः सांप्रतं भजस्व मुदमद्भुतां, कलुषतां द्रुतं संत्यज । १९. 1 Ms ता. 2 Ms °स्ततस्त. 3 Ms भूय. 4 Ms 'नां. 5 Ms 'नध, 6 Ms °लया. 7 Ms रसनां. 8 Ms गता पुण्यप्राथाप्रथु. 9 Ms "मुदभू.
२ [ श्लो. शृङ्गारहारायली २०-२५ आगम्याङ्गणभूमिकां कथमपि प्रायो वियोगातुरा मार्ग वीक्ष्य विलोचनोत्पलगलल्लोलोदका प्रेयसी । नाद्याप्येष समागतः सखि पुनः 'शून्यं कथं मन्दिरं यास्यामीत्यभिधाय मोहमगमत् तावत् समेतः प्रियः ॥ २० त्यज कठिनतामेतामाशु प्रयच्छ शुभां गिरं सफलय ममावन्धं मुग्धे विलोकनलीलया। चरणशरणं दासीभावं बतानुगृहाण माम् अहह विषमो मानग्रन्थिस्तवाद्य मयीदृशः ।। . २१ करुणमनसा प्युक्तं मुक्तं विलोचनजं जलं शिरसि विधृतं भूयः पत्युश्चिरं चरणद्वयम् । मुखि परिहता ब्रीडा क्रीडासखीपु मया मनाक् तदपि हृदये नासीत् तस्य प्रियस्य दयोदयः ।। २२ इयं परित्रस्तकुरङ्गालोचना घनस्तनी चारुमुखेन्दुमण्डला । नितम्बिनी मत्तगजेन्द्रगामिनी कृशोदरी मोहकरी च कामिनी ।। २३ तवैष वोन्दुरखण्डमण्डलः तनोति कान्ति नयनाभिरामकीम् । प्रिये कुचौ कुङ्कुमपङ्कपिञ्जरौ सुवर्णपङ्केरुहकोरकाकृती ॥ २४ इति प्रिये भापिणि पाणिजैर्मुहुः स्तनाननं संस्पृशति प्रमोहिते । विलोक्य तां मन्मथकेलिलालसां ययौ सहासोऽथ सखी सखीजनः ।। (युग्मम्) २५ Is शून्ये कर्थ मन्दिरे. 2 Ms 'मनया.
लो. २६-३१] शृङ्गारहारावली निर्गत्यावसथादहं सखि पहिस्तिष्ठामि यावत् क्षणाद् आयातः 'पुरतः कुतोऽपि ददृशे तावन्मया वल्लभः । मातः किं करवाणि पाणिकमले धृत्वा शठो मां हसन् नीत्वा तत्र जगाम यत्र न जनो जानाति वै कश्चन ॥ २६ वालायाः शनकैविलासशयनादुत्यापयन्त्याः पुनः वस्त्रान्ते व नु यास्यसीति रभसादुत्का धृता या मया सस्मेरं सकलं सलज्जपुलकं वक्रीकृतभूलतं यत् पीतं मुखमुन्नमय्य विदुपां नो तद्रािं गोचरे ॥ २७ अङ्गेऽसङ्गिनि चन्दने न तु कियानेवावलेपो धृतः कण्ठे मौक्तिकगुण्ठितेन गुणवान् हारोऽपि नारोपितः । संगृह्याञ्जनमञ्जिते न नयने रम्ये तया कान्तया कान्ति किं कथयामि तद्वपुपि यां कामोऽपि नो विन्दति ।। २८ पान्थप्राणहरं प्रसनविलसच्चूतद्रुमाणां वने श्रुत्वा कोकिलया कृतं विरहिणी रावं निशीथे मुहुः । मूर्छामाप पुनर्विवुध्य मनसा पत्युः स्मरन्ती ततो मुञ्चन्ती नयनाम्बुपूरमरुदत् पान्थप्रिया सस्वरम् ॥ २९ [ वसन्तान्तकालवर्णनम् ] कर्णाटीकुर्च कोटिकेलिक्लिसल्लीलालसाः कोमलाः' कासारप्रसरत्तरङ्गततिषु क्रीडाकरा मारुताः। मल्लीजालविलासलालनकला लोला वसन्तात्यये वान्ति प्रातरनासभरपरस्त्रीखेदविच्छेदकाः ।। ३० [ ग्रीष्मकालवर्णनम् ] धारायन्त्रतुषारसारकणिकानिर्वारितोष्मोदयं श्रीखण्डागुरुधूपवासरुचिरं हय सचन्द्रोदयम् । शय्या पुष्पमयी च चन्दनरसः कर्पूरकस्तूरिका' वासः स्वच्छमकञ्चुका प्रियतमा ग्रीष्मे सुखस्यास्पदम् ॥ ३१ 1 Ms पुस्त, 2 Ms न्त्या. 3 Ms °वाविलेपो 4 Ms 'तोन. 5 Ms 'कुट, 6 Ms °लसा. 7 Hs °मला. 8 Ms करा. 6 Ms °कस्तुरिका. .
[ श्लो. ३२-३८ शृङ्गारहारावली इदं तु किमु नीरज, भवति तद्धि पद्धेरुहं किमेप रजनीकरो, ननु स लाञ्छनेनाद्धितः। अथेति मधुराधरं चलविलोचनं सस्मितं विभाव्य दयितामुखं हृदि दधे मुदं बल्लभः ॥ ३२ ३३ मन्दं मन्दं निभृतचरणं 'पृष्ठतोऽन्येत्य तस्याः स्निग्धः सायं करतलयुगेनाक्षिणी मीलयित्वा' । चुम्वत्येवं विपुलपुलकं गल्लयोरुल्लसन्त्याः वक्त्रं कामादधरमधुरं प्राणनाथः प्रियायाः ॥ सुतनु मनसि मानं माऽनयानङ्गकेली 'दयिततममपि स्वं मानयालिङ्गनायैः । इति निगदितपत्यो मानतो नालपन्ती कठिनकुचतटे सा नेत्रनीरं मुमोच ॥ आशेयं सखि मे रणद्धि हृदयं कान्तागमस्यानिशं धार्यन्तेऽपि मया कथंचिदसवस्तत्संगमाकामया। जल्पन्ती पथिकाइनेति सहसा श्रुत्वा स्वरं प्रेयसः सत्रीडा समुदेव साश्रुनयना सा सस्वरा सस्मरा ।। ३५ मत्तद्विरदभूपाललीलागतिरसालसा । आयाति वाला लोलाक्षी मदालिङ्गनलालसा ।। अनङ्गसरसैरङ्गैः सङ्गं संगम्य कान्तया । तनोमि रतपाण्डित्यं विलीना निलये सखि ॥ ३६ ३ રૂ૭ भृयोभिर्दिवसैरयं प्रियतमो देशान्तरादागतो विद्वानप्युचितं तनोति जडतामालापमग्नो जनः । इत्यालोच्य विलासलोलनयना कामाकुला कामिनी कान्ते चब सखीजने निशि तनौ दीये दृशं संदधे॥ ३८ 1 Ms प्र. 2 Ms 'भेत्य. 3 Ms मिलयित्वा. 4 Ms दयत तमसि मं स्वं. 5 Ms सस्मरा. 6 Ms विलीनिलये.
प्रलो. ३९-४५ ] शृङ्गारहारावली गच्छामीति समुत्थितो निवसतेः कान्तः समालम्बितो' विश्रब्धं परिरब्ध एव हि मया यातस्ततो निघृणः । यावन्मातरहं विलासशयने सुप्तास्मि चिन्तातुरा तावत् तेन शनैः समेत्य हसता वक्त्रे चिरं चुम्बिता ॥ ३९ स्निग्धं मुग्धे रचय नयन विभ्रमालोकदक्ष वक्त्रे वाणी रचय सरले कोमलालापरम्याम् । अङ्ग रङ्गत्सुललितमथो भावय प्राणनाथे भूयो भूयो भवं तदनुगा त्वं मिथः संकथासु ॥ ४० कीदृक् कोपो मनसि वसति प्रेमहारी तवायं पत्यौ नने विरमति न यश्चाटुवाचां विधिज्ञे । एभिः कृत्यै रसुजनजनं पूर्णकामं कृथा मा होत्कर्ष गमय सुजनं, तं पति स्वीकुरुष्व ॥ ४१ गङ्गेयं हरिणाक्षि हारलतिकाक्रान्तस्तनोच्चैस्तटा कालिन्दी किल कोमला विलसति त्वन्नील रोमावली । चक्रोक्त्या च सरस्वती सुललिता सङ्गश्च मध्ये मिथः एतास्तीर्थमुपागतास्त्वयि परं सेव्या त्वमेवासि मे ॥ ४२ वक्षोजाचलयातिनी च विमला मुक्तालता जाह्नवी रोमाली ललिता कलिन्दतनया प्रो प्रयातेव ते । मध्ये संगतयोस्तव प्रियतमे सौम्यं तयोः संगम संप्राप्तं मनसोऽभिलाषमखिलं सेवे सकामो ह्यहम् ।। ४३ मातर्मे न परा शरीरपटिमा वका मम भ्रूलता चेतो भीतिपरायणं मम चले स्थाने न मे लोचने । निर्यातौ हृदि गोलकावतितरां गुर्वी नितम्बस्थली मध्यं क्वापि गतं ममापि चरणौ मन्दां गति संश्रितौ ॥ ४४ धैर्य धेहि निरंतरं स्वहृदये बाले भयं मा कृथाः स्त्रीणामीदृगपाटवं किल चयःसंधौ समुत्पद्यते । तन्त्रज्ञो गदलक्षलक्षणविधौ दक्षो निदाने तथा वैद्यस्ते दयितः कलासु कुशलस्तस्मै तनुं दर्शय॥ युग्मम् ४५ 1 Ms लिंब. 2 Ms रस. 3 Ms °न्मील. 4 Ms °था.
शृङ्गारहारावली [प्लो. ४६-५२ [ग्रीमान्तकालवर्णनम] वहि प्रोपितमतकाइदि भृशं मन्दोऽपि संदीपयन अङ्गग्लानिमनगरङ्गाजनिता संभोगिनीनां हरन् । सुस्पर्शश्च वने नयन् परिणति जम्बूतरूणां फलं व्युद्धप्रौढकदम्बपुप्पसुरभिग्रीष्मान्तवातो ववौ ।। [ वर्षाकादवर्णनम ] पान्थानुत्कलिकाकुलानतितरामुत्माहयन् पद्धती कान्तासंगमरागिणां धृतिमतामङ्गे स्मरं जीवयन् । 'जातीकोरकजालमाशु दलयन्नावाति वर्षागमे मेघोन्मुक्तपृपत्सुसिक्तवसुधागन्धं वहन् मारुतः ॥ ४७ धन्यः कोऽपि "पुमानलं जलधरे धीरं मृदङ्गोप वानं कुर्वति गर्वितालिनिवहे गानं परं गायति । वध्वा सार्धमगारजालमतुलं संश्रित्य कामालसः सानन्दं तडिदङ्गनागणकृतं नृत्यं समुदीक्षते ॥ ४८ तत्रैव त्वरितं ब्रजेति स मम प्राणाधिनाथो यतः त्यक्तं जीवितमेतया प्रियमपि प्रायो वियोगे तव । त्रैलोक्ये त्वति रूपमीदशमिदं भूयोऽपि नो लभ्यते प्राणास्तांन परित्यजन्ति सुभग 'त्वद्ध्यानलग्ना अपि।। ४९ पतद्गच्छन्निरालम्वान् रक्षासूनातिनः समम् । निवेद्य मद्य वो भर्तुः प्राणनाथमिहानय ।। ५० नीरं नीरघरानीकेऽनेकधारं निरस्यति । निजनाथानता नारी नेत्रनीरजनिर्गतम् ॥ ५१ दोलत्कुण्डलचञ्चलांशुललितैरालोकिताशामुखः कुर्वन् कङ्कणमेखलाकलकलव्याजेन 'धीरध्वनिम् । धर्मान्ते जलबिन्दुसुन्दरतरस्तापापनोदाय मे शक्तोऽयं सुपयोधरस्तव घनश्चतःप्रमोदं नयेत् ॥ ५२ 1 Ms जाता. 2 Ms मुमानलं. -3 AIs 'हीक्ष्यते. 4 Ms त्विति. 5 Ms सुभगन्वध्यान, 8 Ms माधवो. 9 is धीरदध्वनिम्. : . 6 Ms Tă 7 AIs 'लमत्र.
५३ - ग्लो. ५३-५८] शृङ्गारहारावली उत्तुङ्गावति'पीवरावतितरां पीनौ सुतीक्ष्णाननौ वक्षोजन्म शिलोच्चयो सखि परं कान्तः कृशाङ्गो मम । कुर्यां यद्यपरि प्रयाति मरुता नेत्थंतनो विद्यते' तस्यैव प्रतिपालनप्रवणया रात्रिमया नीयते ॥ पीत्वा ममाधररसं दयितो नितान्त तृष्णातुरो मनसि यत् प्रमदं प्रपेदे । मत्तः स तेन सखि मां परिरभ्य वश्यां मुक्तांशुकां तदुचितं च समाचचार ॥ इयं 'जलदमण्डली 'मलिनतां नमः प्रापयेद् गृहेऽतिमदनातुरा प्रथमयौवना कामिनी । अहं तु पथि 'निष्ठितः कुसुमवाणवाणार्दितः परं विरहनिघृणः' कथमहो विधाता विधिः ॥ ५५ [शरत्कालवर्णनम् ] सुस्पर्शाः शालिगोपीविकटकुचतटाभोगयोगाभिरामाः प्रोन्मीलत्सप्तपर्णप्रसवपरिमलप्राप्तसौभाग्यभोग्याः। केदारोदारिवारिप्रसृमरकुमुदान्दोलन प्रौढलीलाः पान्थस्त्रीणामनिष्टाः प्रियरतसुखदाः शारदा वान्ति वाताः॥ ५६ त्वद्वक्त्रशारदनिशाकर एष कान्ते कान्तांशुजृम्भितविलोचनकरवोऽपि । "उन्माद्य मामतनु मोहयते निकामं कुर्यादतो मम मनो मदनाधिरूढम् ।। ५७ निःश्वासा"नामधरमधुरत्वं च धत्से कपोले संमृज्यन्ते रुचिररचनाः पाणिना यत्र वल्ल्यः । पत्युक्यिं श्रुतमपि न ते त्वन्मनस्ताप हर्तुर्- जातावेतौ सजडहृदये मन्युमानौ प्रिये तौ॥, ५८ 1 Ms ° उत्तंगावती'. 2 Ms °लिलो. 3 Ms 'ध्यते. 4 Ms जलमण्डली. 5 Ms °लिनितां. 6 Ms °धि. 7 Ms °निधृ. 8 Ms शाली. 9 Ms °लनापौ' 10 Ms 'निशाक ए. 11 Ms उन्मां मां तनु. 12- Ms °मम. 13 Ms हाता. 11 शृङ्गारहारावली [ श्लो. ५९-६४ परिमलमिलितालिमालतीपुष्पमाला सुरभिघुसृणमिश्रं चन्दनालेपनं च । तुहिनकिरणरश्मिश्चञ्चला चापि दोला शरदि सुखविभृत्यै कामिनी कामलोला । ५९ आदौ बभूव कलहः प्रणयेन कश्चित् कालः पराङ्मुखतया शयने प्रयातः। पत्युमुखं सखि मयैक्षि पुनर्विचिन्त्य तेनातिमात्रमवरे ऽहमिय' गृहीता ।। ६० कोदण्डीयति मार्गणीयति लसल्लोलं कृपाणीयति प्रत्यञ्चीयति चेषुधायति तथा सोल्लास पाशीयति । भ्रूवल्ली नयनं च वेणिचटुला हारावली नासिका कामिन्याः पुरुपेषु सुन्दरतरं तत्कर्णपालीयुगम् ।। ६१ चक्वेन्दुश्छत्र मीपतिस्मतमपि कुसुम भूलता चापमासीद् नेत्रद्वन्द्वं शरीघाः श्रवणपरिलसत्कुण्डले दीपमाला । वक्षोजी हेमकुम्भौ जघनपरिसरे भीरु सिंहासने ते वाल्यं जित्वातिचक्रे वपुषि हृदिभुवा यौवनस्याभिषेकः ॥ ६२ हिया विनमितानना मदविलोकलोलेक्षणा 'निगूढविहितस्मिता सपुलका नवोढा वधूः । सखीजनमनीदृशं किमपि भावमात्रिभ्रती चकार मदनातुरं रजनिवृत्तसंपृच्छकम् ॥ ६३ दधत् कान्ति रम्यामलकविगलन्माल्यमलस स्मरक्रीडाजन्यश्रमजलपृपन्मिश्र'तिलकम् । रतान्ते संमीलन्नयनकमलं चारु दयितः पपौ कान्तावक्त्रं सुचिरमिति तृष्णातरलितः।। ६४ 1 Ms हमीय. 2 Ms गृहीता. 3 Ms ° तल्लोल. 4 Ms पासी 5 Ms 'न्यात्पु. 6 Ms °मिष. 7 Ms निगृह. 8 Ms °वीभ्रती. 9 Ms °श्रि. .
ग्लो. ६५-७१ ] शृङ्गारहारावली कान्ते, वल्लभ, यामि, याहि, भवतो मार्गे शिवं' वर्तताम् आयाहि त्वरितो गृहं पुनरपि स्वं पान्थ देशान्तरात् । अस्माकं भवितव्यतेति विहितेत्युक्त्वा सनिःश्वासया रूद्धो लोचनवारिहारिकुचया प्राणेश्वरः प्रस्थितः ।। ६५ अहो स्नेहमहो रूपमहो कान्तिमहो रतिम् । अहो लीलामहो वाणी कदा तस्या लभेमहि ।। ६६ *अपूर्वः कोऽपि रूपस्य योषितां महिमा महान् । मोहन्ते योगिनो येन नेत्रगोचरवर्तिना ॥ ६७ लावण्यसलिलापूरा विलासलहरीयुता। चललोचनमीनेयं वाला कामतरङ्गिणी ॥ ६८ ६९ चरणपतितां सलग्नाङ्गी भवत्यनुरागिणी गतघृण कथं मुग्धामेतां भवानवमन्यते । इति निगदितस्तत्सख्या तु प्रियः प्रणयान्वितो विविधकरणैर्मानं मुक्त्वा प्रियां समरञ्जयत् ।। स्थो वामाक्षीय चपलनयने यस्य तुरगी कशा वेणीरश्मिः सरलतरला हारलतिका। नितम्बो यच्चक्रं कुचयुगवरूथो हरति मे "तमारूढ"श्चेतः कुसुमविशिखः सारथिरसौ ॥ ७० विलासावासान्तः कितवचरितेन प्रणयिना सुखेनासीनायाः सुसखि शयने सायकमये । कराक्रान्तौ कृत्वा कथमपि कुचौ मेऽतिकठिनौ हठेनाश्लिष्टायाः परिशिथिलतां नीविरभजत् ।। ७१ 1 Ms शवं. 2 Ms प्राणेश्वरं. 3 Ms °ति, 4 Ms अपूर्व. 5 Ms °मिनेयं. 6 Ms सलग्ना'. 7 Ms °से. 8 Ms निगदितं. 9 Ms करुणै. 10 Ms लतला. 11 Ms 'तदा. 12 Ms ° ढो. .
शृङ्गारहारावली [ श्लो. ७२-७७ [ हेमन्तकालवर्णनम् ] कन्ददेशजाग्रद्विविधसुरतविकान्तदन्तक्षतोष्ठ'- 'व्यावल्लत्कान्तिराजत्सु ललितललनासीत्कृतापीतवेगा। हेमन्ते वान्ति वाता विरहितवनितावक्त्रसोष्माभिनिर्यन्- निःश्वासा. वारिधाराधरणवहुलतामुष्णतामुद्वहन्तः ।। ७२ प्रौढा पीनपयोधरोस्कलशा माञ्जिष्ठरागांशुका सौम्या वृत्तनितम्बचक्रचतुरा पर्यभूमिस्थिता । अन्तः सभृतभासुरस्मरबृहद्भानुमनोहारिणी हेमन्ते हिमहारिणी सुखरता नृणां हसन्ती प्रिया ॥ ७३. शीतर्तुभीतस्तव संगमेन मनःस्थितेनैव न सान्त्वयामि । कदाक्योरेव विधिविधाता शय्योसने सन्नतगात्रयोगम् ॥ ऊरुभ्यां गाढमूरू मदनमदभवद्वाष्प भावोत्तराभ्यां पीनोत्तुङ्ग स्तनेन "प्रमुदितवदना वक्षसालिङ्गय वक्षः । सोत्कण्ठं कण्ठदेशे निजभुजेलतयां लीलयारुह्य- दोलां हेमन्तौ स्वभर्तुनिशि च सुकृतिनी कापि शेते गृहान्तः।। ७५ ७४ मुग्धां नाथ वृथा प्रतारयसि रे किं मां वृथा भाषसे: 'नेपास्मीति मया विना भव सखीमान्यो जनो मान्यताम् । मामैवं “वद दुर्वचः पिशुनया कान्ते कया पाठिता - वर्तन्ते त्वयि संतत प्रियतमे प्राणा इमे मामकाः॥ ७६ शय्यायां शयिता समीक्ष्य दयितां बाष्पाम्बुपूर्णेक्षणां पप्रच्छागतसाध्वसः कुत इदं कान्तस्तदालीजनम् । अन्यस्त्रीगमनात् तवेति कथिते तासां प्रतीत्यै पुरः संस्पन्त "मुहुर्मुहुः प्रियतमावोजलिङ्गद्वयम् ।।- 1 Ms °क्षितोष्ठ'. 2 Ms °वलत्का . 3 Ms ° राजसु. 4 Ms °वेगा: 5 Ms °भिनि'. 6 Ms ° कलिशा. 7 Ms °संभूत . 8 Ms शांतयामि. 9 Ms °वतवा. 10 Ms 'त्तङ्ग. 11 Ms °न मुदित. 12 Ms हेमन्तों. 13 Ms नेपास्मिती. 14 Ms चद. 15 Ms संतत. 16 Ms पुरुः 17 Ms मुहुर्मुहु. 16 ७७ -4 - प्रलो. ७८-८५] शृङ्गारहारावली अचिन्त्यापि स्नेहं करकलितमाक्षिप्य वसनं प्रयाते हन्नाथे सविनयमनादृत्य वचनम् । ततः 'सख्याऽ लक्ष्य प्रियतममयोच्चैःस्वरमहो पटान्तेनावृत्य स्वमुखमनया तत्र रुदितम् ।। ७८ इन्दुः सुन्दरि मन्दरश्मिरधुना जातो विभाता' निशा कान्तानां कटुरारटीति विकटः कान्ते पटुः कुकुटः। हीनस्नेहरसेन रुक्षदशया दीपोऽपि मन्दायते मानं मानिनि मुञ्च वल्लभमिमं कामोत्सवै रञ्जय ॥ ७९ याणेनामृदुना दुनोति मदनो मन्दोऽपि मां त्वत्कृते दीनेऽस्मिन् नववल्लभे कुरु दयामिन्दीवराक्षि प्रिये । अङ्गैः संगमरङ्गभङ्गिचतुरैरानन्दितालिजनैस्- तल्पोत्सङ्गविकल्पजल्पनपरं मानेन चालिङ्गय ॥ त्वां नता स्मर कृताञ्जलिरेषा मा विमानय मनोरम काम । आगते तु दयिते भवदाज्ञां धारयामि सरसा शिरसाऽहम् ।। ८१ दुकूले प्रतिकूल मे हारो हा रोचते न मे। मेखला मे खला जाता.हंसक हिंसकं सखी । ८२ मुक्ता "मुक्तालता कण्ठे कान्ते कान्ते समागते । अञ्जनेनाजिते' सख्या नेत्रे नेत्रधृतिः "कृता॥ मुक्ता मुक्तालतेयं कुचकलशरुचा कण्ठदेशे सुदेशे वासो वासोचितं स्वं परिहितमनया चारु विम्बे नितम्बे । नक्तं भुक्तं विभुक्तं विपुलनयनयोञ्जनं रञ्जनं वै भर्ता धर्ता विहर्ता सुरतविलसितै रमिजतोऽ" जितश्च ॥८४ बचा दृढ "रशनया प्रणयप्रकोपा नीत्वा निवासभवनं विहितागसं माम् । कान्ता विलोचनजलप्लुतचक्रचन्द्रा कर्णोत्पलेन सविलासमसौ जघान ॥ ८५ 1 Ms सक्ष्यालक्ष 2 Ms विभातो. 3 Ms कुर्कट. 5 Ms हुतोतिमृदुनो 6 Ms राहो. 7 Ms हंस किं. 8 Ms मुक्त'.9 Ms°ने नोजने. 10 Ms कृता.. 11 Ms 'तोर. 12 Ms रसनया. 13 Ms ° भुवनं. . ८३ 4 Ms रजय..
१४ शृङ्गारहारावली [ श्लो. ८६-९२ ८६ ८७ आलिङ्गितानि नवपल्लबकोमलानि वाला बलादपि 'मयातिमनोहराणि । अङ्गान्यनगललितानि किमात्मनैव संकोचयत्यनिभृतानि मदालसानि ।। [शिशिरकालवर्णनम् ] किञ्चिद् द्रुमान् मुकुरयस्तरसा रसालान् हेमन्त कान्तमदनं मदयन् जनेषु । 'लीलायितेन मलयाचलमल्लमालाद् आवाति मारुत इतः किल "शैशिरोऽयम् ॥ एतस्मिन् "शिशिरे विधी विमुखिते यासां प्रियः प्रोपितः पत्युः संगमसंभवं सुखमहो यासां च नो जायते । मानिन्यो धृतभूरिमानविभवास्तोपं न या लेभिरे तासां किं न मनोभवः सखि मनः सीमन्तिनीनां दहेत् ।। ८८ [वसन्तसमागम. ] प्रियतम न ते युक्तं गन्तुं वसन्तसमागमे मुकुरिततरावङ्कस्थां मां विहाय मनोगताम् । कलकलवान् रात्रौ कृत्वा सकोकिलया 'रुतान् भवति चलिते संप्रत्येषा न जीवितुमुत्सहे ।। ८९ वासावासविलासवासित मतिः प्रेमप्रसन्नां प्रियाम् आलिङ्गन दयितो दृढोष्मलकुचां शीतं च नो 'विन्दते । चेतःसंपरिवर्तमानदयितासंदीप्यमानोल्लसत्" "संसर्पद्विरहाग्नितापितवपुः पान्थोऽपि नो जग्मिवान् ॥९० प्राणेश्वरे समायाते नाणा मे पुनरागताः" । सखीदं कौतुकं पश्य मृताहं जीविता पुनः ।। निर्यात दयिते गृहादपि सखि प्राणैर्गुता पृष्ठतः "प्राग्ग्रामे पुनरागतास्मि "भवनं कुर्वेऽस्य सेवां ततः। स्वप्नेषु प्रतिरात्रिजातसुरतैश्वेतोविमोहात्मकै- स्तत्रापि 'प्रणयातिरेकललित:" प्राणेश्वरो रञ्जितः॥ ९२ 1 Ms 'यानि. 2 Ms °मंत'.3 Ms 'यते'.4 Ms शिशरो'.5 Ms शशिरे, 6Ms. ° मंतनी 7 Ms कृतान. 8 Ms. °वासित.. 9 Ms विंदत. 10 Ms °लसत्. 11 Ms संसl. 12 Ms °गता. 13 Ms प्राग्राम.. 14 Ms भुवनं. 15 Ms 'यति'. 16 Ms ° ते:: 11 13 o ४ प्रलो. ९३-९९] शृङ्गारहारावली तन्वीय तरलेक्षणा मम मनः पञ्चेषुणा हन्यते वक्षोजावियमुन्नतौ' प्रबहते खिन्नं ममेदं मनः । मध्येऽसौ सुकशा "ममाढमतिप्राप्नोति भङ्गं मनो लावण्याम्बुपरिप्लुतेयमवला शून्य मदीयं मनः॥, ९३ 'यत्रादौ कलमेखलाकलकलः प्रादुर्बभूवातुल- स्तत्रैवाथ तदेव तू पुररणत्काररततः शुश्रुवे । तन्मन्ये पुरुषायितं प्रमदया वामायितं कामिना पश्चाचित्ररतावसानसमये ताभ्यां स्वभावे स्थितम् ।। आनन्दं हृदि धेहि कड्णमथो संघेहि पाणिद्वये 'सद्वासः परिधेहि हारमुरसि त्वं पादयोनू पुरम् । सामोदानि निधेहि मूनि कुसुमान्यक्ष्णोश्च 'कालाञ्जन मुग्धे साधु विधेहि मङ्गलमथायाते निजप्रेयसि ॥ ९५ समागतः पूर्णमनोरथासि तवैव कान्तः परिपूर्णकामः । आगच्छ वाले कुरु मङ्गलानि गौरी प्रसन्नैव तवाद्य नूनम् ।। ९६ सानन्दा भव सादरा भव भव प्रीता सकामा भव साहारा भव भूपिता भव भव प्राणेश्वरे 'प्रेयसी । आयातेन रमस्व वासभवने "वाह्याच्च देशान्तराद् नानामोहनपण्डितेन सहिता कान्तेन कामोत्सवैः ।। ९७ चिन्तां मुञ्च, भजस्व ''मानिनि धृति, मोहे मनो मा कृथाः "द्वित्ररेव हि "वासरः "प्रियतमप्रत्यागमस्यावधिः । इत्येवं प्रतिबोधयेत् प्रियसखी यावत् प्रियां सादरं तावत् "कान्त उपागतोऽङ्गणभुवि प्रीणाति वाक्यामृत ॥९८ आरूढोऽतिसमुन्नतस्तनमयं सिंहासनं योषितां तद्वक्त्रेन्दुधृतातपत्ररुचिरस्तद्भूलताकार्मुकः । तद्वेणीविलसत्कृपाणफलकः शृङ्गारिणां पूजित- स्तल्लोलेक्षणमार्गणो विजयते श्रीनन्दनः श्रीमताम् ।। 1 Ms. मन्न तौ. 2 Ms मम'. 3 Ms यात्रादोकल'. 4 Ms 5Ms सेवेद्वि. 6 Ms'द्वासा. 7 Ms कालीजनं. 8 Ms प्राणेश्वर, 9 Ms प्रेयसि -10 Ms बाह्मव. 11 Ms मानिनी. 12 Ms द्वित्रि. 13 Ms. वासरे 14 Ms प्रियतमः, 15 Ms कान्तमुपा. 16 Ms भूवि. , . वाप्य.
. शृङ्गारहारावली [ श्लो. १००-१०१ सौजन्ये निरताः खलेषु विरता "विद्वद्गुणग्राहिणो लोके विश्रुतकीर्तयो गुणभृतो ये केऽपि शृङ्गारिणः । विभ्राणा करिकुम्भतुङ्गकठिनी पीनाबुरोली सदा तेषां वामविलोचना गुणवती भोगाय भूयाद् भुवि ।। १०० उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्मविवरां सानन्दमुत्कर्पितां' प्राप्योच्चविलसत्सुवर्णिगुणिनी खेलन्मनोभूमणिम् । श्री हपः सुहृदां विभूषणकृते सद्वाक्यमुक्ताफलै- 'रग्रथ्नाद् द्विजराजरोचिरमलां शृङ्गारहारावलीम् ॥ १०१ इति श्रीहर्षविरचिता शृङ्गारहारावली समाप्ता । ★. 1 Ms विद्वद्गुणा ग्राहिणी. 2 Ms कठिना. 3 Ms' सूक्ष्म्य. विवरा. 4 Ms 'त:. 5 Ms श्रीहर्ष. 6. Ms सुहृद. 7 Ms यदग्रन्थद्विज. 8 Ms प्ता सं. १७३३ आषाढ वदि ८ शुक्रे लिखिनं द्विवेदिविद्याधरसुतलक्ष्मीधरेण ॥ (पुष्पिकानन्तरं 'लोकद्वयीयमधिका समुपलभ्यते ) पूर्णाम्भ कुम्भभारा. प्रजवनचलिताश्चुचुकं चालयन्त्य- श्चील संवेलयन्त्यश्चलकमलशो लोकमालोकयन्त्य । अंकारयझराणां ज्ञटिति जनमन खेदमुत्पादयन्त्यो नागर्य स्वर्णगौर्यो वडनगरभवा यान्ति गेहं सरस्त । भो पान्य प्रान्तचेता. परिभ्रमसि कथं नैव दृष्टा कदाचिद वत्सोवाली मृगाक्षी जगति सुविदिता रूपराशिं दधाना । यस्याः सौन्दर्यराशि विधिरतिचतुरां वीक्ष्य चक्रे घृताची यदूपं द्रष्टुमिन्द्रो मखशतसुकृतकसहस्रं दधार ॥ 1 Ms चञ्चुक. 2 Ms पान्थ :. 3 Ms चेता.
श्लोकपक्ति-अनुक्रमणिका [ Figures, indicate the numbers of verses ] अग्रथ्नाद् द्विजराजरोचि ११ ८७ ८० ५ ३४ ६९ ३८ २५ રૂર ७९ ७७ अङ्गालानिमनगरङ्ग अङ्गान्यनङ्गललितानि अङ्गे संगिनि अङ्गै संगमरभकि अङ्ग रङ्गत्सुललितमथो अचिन्त्यापि स्नेह अञ्जनेनाञ्जिते अथेति मधुराधरं अधाहमालि तलिने अनङ्गसरसरङ्ग अन्तर्वाष्पनिरुद्ध अन्त संभृतभासुर अन्यस्त्रीगमनात् तवेति अपूर्व कोऽपि रूपस्य अस्माकं भवितव्यतेति अहह विषमो मानग्रन्थि अहो लीलामहो वाणी अहो स्नेहमहो रूपमहो अहं तु पथि निष्ठित आक्रान्तहृदयेना आगच्छ बाले कुरु आगते तु दयिते आगम्याङ्गणभूमिका आदौ बभूव कलह आधृय चन्दनवनी आनन्दं हृदि धेहि आयाति बाला लोलाक्षी आयातेन रमस्व आयातः पुरत कुतोऽपि आयाहि त्वरितो गृहं आरूढोऽतिसमुन्नत १०१ आलिङ्गन दयितो ४६ आलिङ्गितानि नवपल्लव ८६ आलिङ्गन्य मां किमपि २८ आवाति मारुत इत आशेयं सखि मे आश्लिष्यत् कुचचक्र ७८ इति निगदितपत्यौ ८३ इति निगदितस्तत्सख्या ३२ इत्थ सा सुभग ११ इत्यालोच्य विलास ३७ इत्येवं प्रतिबोधयेत् ८ इति प्रिये भाषिणि ७३ इदं नु किमु नीरज इन्दु. सुन्दरि मन्दरश्मि ६७ इयमपि गता पूर्णप्राया ६५ इयं जलदमण्डली २१ इयं परित्रस्तकुरङ्ग ६६ उत्तुङ्गावतिपीवरा उन्माद्य मामतनु ५५ उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्म १६ ऊरूभ्यां गाढमूल ९६ एतस्मिन् शिशिरे ८१ एतस्मिन् समये पतास्तीर्थमुपागता ६० एभि कृत्यैरसुजन कठिनकुचतटे ९५ कण्ठे मौक्तिकगुण्ठितेन ३६ कर्णाटीकुचकोटि ९७ कर्णोत्पलेन सविलास २६ कथय कठिने कीहक ६५ कदावयोरेव विधि ९९ कन्दर्पादेशजाग्रद्विविध २३ ५३ ५७ १०१ - ८८ २० ર ४१ ३ ३० १८ ७४ ૭૨ १८ ३९ ६९ ७० ३ १ ६९ ४७ ९० श कराक्रान्तौ कृत्वा करुणमनसाप्युक्तं मुक्तं कलकलरवान् रात्री कशा वेणीरश्मि. कान्ताकान्तकपोल कान्ता किं कुरुते कान्तानां कटुरारटीति कान्ताविलोचन कान्तांशुजम्भित कान्तासंगमरागिणां कान्ति किं कथयामि कान्ते कामतरलेन कान्ते चैव सखीजने कान्ते त्वन्मुखचन्द्रमा कान्तेनाद्य समागतेन कान्ते वल्लभ यामि कान्तो मन्मयता कामिन्या. करकङ्कणे कामिन्या पुरुषेषु काम कौसुमकार्मुक कालिन्दी कील काल पराङ्मुखतया कासारप्रसरत्तरङ्गततिषु किश्चिद द्रुमान किमेष रजनीकरो कीहक कोपो मनसि कुञ्चत्कोकनदश्रियो कुर्यादतां मम कुर्या यशुपरि प्रयाति कुर्वन् कङ्कणमेखला कृतार्थय सखि प्रिय कृशोदरी मोहकरी केदारोदारिवारि कोदण्डीयति मागणीयति क' शास्वी सखि गड्नेय हरिणाक्षि ७१ गच्छामीति समुत्थितो ૨૨ गतघृण कथं मुग्धामेतां ८९ - गृहेऽतिमदनातुरा ग्लानि हरन् सुरतजा घनस्तनी चारुमुखे २३ ९ घमांन्ते जलविन्दु ७९ चकार मदनातुरं ६३ ८५ चरणपतितां संलमाङ्गी २७ चरणशरणं दासीभावं २१ चललोचनमीनेयं ६८ २८ चापल्यान्मधुरं चकार १७ ११ चिन्तां मुश्च भजस्व ३८ चील संवेलयन्त्य (Footnote p. 16) १ ५ चुम्वत्येवं विपुलपुलकं ३३ १४ चेतो भीतिपरायणं २४ ६५ चेतः संपरिवर्तमान १४ छिन्ने तत्र चिरान्नि १७ जल्पन्ती पथिकाङ्गनेति ६१ जातावेतौ सजडहृदये १ जातीकोरकजालमाशु ४२ झकाझंकाराणां (Footnote p. 16) १ ६० ततः सख्याऽलक्ष्य ३० तत्रापि प्रणयाति ९२ तत्रैव त्वरितं ४९ ३२ तत्रैवाथ तदेव नूपुर ९४ ४१ तदपि हृदये नासीत् ૨૨ ८ तद्योग्यं तदहं चकार ५७ तद्वक्वेन्दुधृतातपत्र ९९ ५३ तहेणीविलसत्कृपाणफलकः ९९ ५२ तनोति कान्ति ૨૪ १९ तनोमि रतपाण्डित्यं ३७ २३ तन्त्रज्ञो गदलक्ष ५६ तन्मन्ये पुरुषायित ६१ तन्वी न कस्य तन्वीय तरलेक्षणा ९३ ર तमासढश्चत २७ ७८ ८७ ७० ५१ '२३ ७० ७८ तवैष बनेन्दुरखण्ड ૨ निजनाथानता नारी तल्पोत्सङ्गविकल्प नितम्बिनी मत्तगजेन्द्र तल्लोलेक्षणमार्गणो ९९ नितम्बो यच्चक्र तस्यैव प्रतिपालन ५३ निर्याते दयिते ९२ तावत् तेन शनै. ३९ निर्यातौ हृदि गोलका तासां किं न मनोभवः ८८ निवेद्यमद्य वो भर्तुः तुङ्गायैत मदेन ५ निश्वासानामधर तुहिनकिरणरश्मि ५९ नि श्वासा वारिधारा ७२ तृष्णातुरो मनसि नीत्वा तत्र जगाम २६ तेनातिमात्रमधरे ६० नीत्वा निवासभवन तेषां वामविलोचना १०० नीरनिकान्तरचरन्न १२ तोयान्तरल्ललित ૧૨ नीरं नीरधरानीके त्यक्त जीवितमेतया ४९ नेत्रद्वन्द्व शरीघा દર त्यज कठिनतामेतामाशु २१ नैषास्मीति मया विना ७६ त्वद्वक्त्रशारद ५७ पटान्तेनावृत्य स्वमुख त्वां नता स्मर ८१ पतद्गच्छन्निरालम्बान् प्रलोक्ये त्वतिरूप ४९ पत्युर्मुख सखि दधत कान्ति रम्या ६४ पत्यु संगमसंभवं दन्तचन्द्रिकया नून ६ पत्युक्यिं श्रुतमपि दयिततममपि स्वं ३४ पत्यौ नने विरमति ४१ द्विघेरेव हि वासरैः ९८ पप्रच्छागतसाध्वस दीनेऽस्मिन् नववल्लभे पपो कान्तावक्त्र दुकूले प्रतिकूलं मे ૮ર परिमलमिलिता ५९ दौलत्कृण्डलचञ्चलांशु ५२ परं विरहनिघृण. दृष्ट्वा कान्तपराजय १७ पश्चाच्चित्ररतावसान धन्यः कोऽपि पान्थ प्राणहरं प्रसून २९ धार्यन्तेऽपि मया ३५ पान्थानुत्कलिका धारायन्त्रतुषारसार ३१ पान्थस्त्रीणामनिष्टा ५६ धैर्य धेहि निरन्तरं ४५ पास्यामि पार्वणसुधाकर ध्वानं कुर्वति पीत्वा ममाधररसं नक्तं भुक्तं विभुक्तं पीनस्तनी सकल नागर्य्य स्वर्णगौर्यो (Footnote p 16) १ पीनोत्तुङ्गस्तनेन नावाप्येष समागत. २० पूर्णाम्भ कुम्भभारा (Footnote. p.16)२ नानामोहनपण्डितेन ९७ प्रणतिनिरत. कान्त निगूढविहितस्मिता ६३ प्रत्यञ्चीयति चेषुधायति ६१ निर्गत्यावसथादह २६ प्रत्यादिष्टमहावियोग ८८ ४८ ४८ २० ७८ ४७ ४ प्रयाते हन्नाथे मातम न परा प्राग्ग्रामे पुनरागतास्मि ९२ मानिन्यो धृतभूरिमान ८८ प्राणास्तां न १९ मानं मानिनि मुश्च ७९ प्राणेश्वरे समायाते ९१ मामैवं वद दुर्वच. ७६. प्राप्ते प्रेमणि लीनतां १५ मार्ग वीक्ष्य विलोचनो २० प्राप्योच्चविलसत्सुवर्णि १०१ मुकुरिततरावङ्कस्थां ८९ प्रियतम न ते युक्तं ८९ मुक्ता मुक्तलता ८३ प्रियसखि कृतो १८ मुक्ता मुक्तलतेयं ८१ प्रिये कुचौ कुक्कम २४ मुक्तांशुकां तदुचितं प्रियेण रतनाथेन १६ मुग्धां नाथ वृथा ७६ प्रोन्मीलत्सप्तपर्ण ५६ मुग्धे साधु विधेहि प्रौढा पीनपयोधरोरु ७३ मुञ्चन्ती नयनाम्बु २९ वद्ध्वा दृढं रशनया ८५ मूर्छामाप पुनर्विवुध्य २९ वाणेना मृदुना दुनोति मेखला मे खला ૮૨ वाला वलादपि ८६ मेघोन्मुक्तपृषत्सु वाला बालसखीजनेन मोह्यन्ते योगिनो येन वालाया. शनकै- २७ यत् पीतं मुख २७ वाल्यं जित्वातिचके ६२ यत्रादौ कलमेखला ९४ विभ्राणा करिकुम्भतुङ्ग १०० यद्रूपं द्रष्टुमिन्द्रो (Footnote p. 16)२ भजस्व मुदमद्भुतां १९ ययौ सहायोऽथ २५ भर्ता धर्ता विहर्ता ८४ यस्या. सौन्दर्यराशि (Footnote p.16)२ भवति चलिते ८९ यावन्मातरह ३९ भृयोभिर्दिवसैरयं ३८ यास्यामीत्यभिधाय २० भूयो भूयो भव युग्मं कुण्डलयोललो भूवल्ली नयन ६१ युञ्जानो विजयी भो पान्थ भ्रान्तचेता. (Footnote p.16)२ रतान्ते समीलन्नयन ६४ मत्तहिरदभूपाललीला ३६ रथो वामाक्षीयं मत्तः स तेन रमस्व पतिसंगता १९ मध्येऽसौ सुकृशा ९३ रात्रौ यत्सखि कौतुकं मध्ये संगतयोस्तव ४३ रुद्धो लोचनवारि मध्य क्वापि गतं 22 रोमाली ललिता ४३ मन्दावर्तितकन्धरा ८ लावण्यसलिलापूरा ६८ मन्द मन्दं निभृत ३३ लावण्याम्बुपरिप्लुतेय ९३ ममोत्सङ्गे तवैवास्तु लीलायितेन मलया मल्लीजालविलासलालन ३० लोके विश्रुतकीर्तयो मात. किं करवाणि २६ वक्त्रं कामादधरमधुरं ३३ १० १७ ar ७० ७ २१ ७७ १५ ४० ૨૨ ७४ १२ ४८ २७ १०१ २९ १० श्रुत्वा कोकिलया कृतं ५३ श्रोणीभरालसगति ४३ षष्ठो जैत्रशर ९३ सखि परिहृता ब्रीडा ૨ ૨૨ सदास. परिधेहि वक्वेन्दुच्छत्रमीष ६२ शय्यायां शयितां वक्त्रे वाणी रचय शय्यायां स्मररागमागत वक्त्रोक्त्या च सरस्वती શર शरदि सुखविभृत्य वर्तन्ते त्वयि संतत ७६ शिरसि विधृतं भूय. वत्सोवाली मृगाक्षी (Footnote p.16)२ शीतर्तुभीतस्तव वध्वा सार्धमगार शीतं सुगन्धि मरुपान्थ वहिं प्रोषितभर्तृका ४६ श्रीखण्डागुरुधूपवास यखान्ते क्व नु श्रीहर्ष सुहृदां वक्षोजन्मकिशोरको वक्षोजन्मशिलोच्चयो वक्षोजा चलयातिनी वक्षोजावियमुन्नतौ यक्षोजौ हेमकुम्भी ६२ सखीद कौतुक वातः प्रगेऽतरलयत् ३ सखीजनमनीशं वान्ति प्रातरनङ्गसङ्गर ३० वार्तालिङ्गनचुम्बनानि सफलय ममाबन्ध चार्तासु तस्य निरता ११ वास स्वच्छमकञ्चुका घासावासविलास चासो वासोचितं साक केन रत विद्वानप्युचितं विद्रावयति संपूर्णो सानन्दं तडिदङ्गना विभाव्य दयितामुख सानन्दा भथ सादरा विलासावासान्त' विलोक्य तां मन्मथ विविधकरणैर्मानं मुक्त्वा विश्रब्धं परिरब्ध विसर्जय सुदुर्जनं गणय १९ स्निग्ध सायं करतल वेगातिदु.सहविदारण वैद्यस्ते दयित व्यस्ते सायकपञ्चके च्यावल्लत्कान्ति च्यूढप्रौढकदम्बपुष्प शक्तोऽयं सुपयोधरस्तव शर्मप्रेम तनोतु ३१ सौजन्ये निरता सलेष शय्या पुष्पमयी २१ ९६ WWWW ९ समागतः पूर्णमनोरथासि ३१ सव्रोडा भवतो ९० सस्मेरं सकल २७ ९ ३८, सब्रीडा समुदेव १८ ६ ९७ १३१ ३२ ७१ सा पश्यति प्रियतमा २५ सामोदानि निधेहि ६९ साहारा भव भूषिता ३९ साहारेषु मनोऽवलेप ९७ ९ ७१ ४५ ५९ २४ १३ सुखेनासीनाया. सुतनु मनसि मान २ सुरभिघुमणमिश्र ७२ सुवर्णपङ्केरुह ४६ सुस्पर्शश्च वने नयन ५२ सुस्पर्शा शालिगोपी २ सोत्कण्टं कण्ठदेशे ४६ ५६ ૨૨ . २. १३ ३. सौम्या वृत्तनितम्ब मौवर्णनूपुररण-. सौहाद्दन्मिधुमत्यजन संकोचयत्यनिभूतानि संगृह्याञ्जनमञ्जितेन संप्राप्तं मनसो संमृज्यन्तं रुचिररचनाः संवर्गा सम्यगपि संसर्पद्विरहाग्नि संस्पश्येत मुहर्मुहुः स्तनाननं संस्पृशति स्तनो स्तनान्तरन्यस्तो स्मरक्रीडाजन्य स्वप्नेषु प्रतिरात्रि ७३ स्वर्गादप्यतिर्दुलभ १० स्निग्धं मुग्धे रचय १ स्त्रीणामीगपाटवं ८६ स्वेनैव या वरकुच २८ स्थैर्य भजन्तति ४३ हठेनाश्लिष्टायाः ५८ होत्कर्ष गमय हीनस्नेहरसेन रुक्षदशया ९० हेमन्तकान्तमदनं २२, हेमन्तौ स्वभर्तुनिशि हेमन्ते वान्ति वाता ६४ हेमन्ते हिमहारिणी ९२ हिया विनमितानना ७१ ४१ ७२. १ ८७- ७७ ૭૨ ७३ ६३ - " कर्तरि क्तः, NOTES श्लो. १. अन्वयः-विजयी कामः कौसुमकार्मुकं करतले कृत्वा, कान्ताकान्तकपोल- मण्डलतले पत्रावलीकर्मणि कामिनोऽधिकं युञ्जानो, रत्यानिशमनुयातः, जगन्ति मदयन् , सौहार्दान्मधुमत्यजन् हि, भुवि भवतां सौख्याय भूयात् । . विजयोऽस्यास्तीति विजयी । अत इनिठनौ " । काम्यतेऽनेन पुसि संज्ञायां घः, काम.। कुसुमस्येदम् कौसुमम् "तस्येदम्" सूत्रेणाण । कर्मणे प्रभवति, इति कार्मुकम्- 'कर्मण उकञ्" सूत्रेण उकञ् प्रत्ययः आदिवृद्धिश्च । युङ्क्ते इति युञ्जान:-"लट: शतृशानचौ." इति शानच । करस्य तलं तस्मिन् करतले । कृधातोः क्त्वा प्रत्यय "समानकर्तृकयो पूर्वकाले क्त्वा"। कान्तौ च तौ कपोलौ च कान्तकपोलौ, कान्ताया कान्तकपोलौ, तयोर्मण्डले (मण्डलौ वा)। मण्डयतीति मण्डलम् । वृषादित्वात् कलच । तयोस्तलं, तस्मिन् पत्राणामावली, तस्या कर्म, तस्मिन्, कामोऽस्त्यस्येति कामी, तस्य कामिनः । अनुयात इत्यत्र गत्यर्थाकर्मक०" सू.। मदयतीति मदयन् शतृ० । शोभनं हृदयं यस्य स. सुहृत् , तस्य सुहच्छ- ब्दस्य सप्तम्यर्थे भवाथै "तत्र भव'' इति सूत्रेणाण । अनुशतिकादित्वादुभय- पदस्य वृद्धि । सुहृदि भवं सौहार्द, तस्मात् सौहार्दात् । अथवा इदमर्थेऽणू । त्यजतीति त्यजन्, न त्यजन् अत्यजन, शतृ । सुखस्य भाव. कर्म वा सौख्यम् , व्यञ्-तस्मै सौख्याय. भवतां भूयात् । पत्रावली (पत्रभङ्ग.) पत्राणां पत्राकृतीनामावली श्रेणी राजिर्वा । 'काम पञ्चशर स्मर' इत्यमरः । The reading matery of the Ms. has been emended by दन्मिधु. ° The sense requires पञ्चमी. The omission of 'न' from न्म must be due to the carelessness of the scribe. This is a #ge or benedictory verse According to दण्डिन, a ' begins with ' आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम्' (का द, प. १, श्लो. १४.). This, however, holds good about all literary works. In this connection the following sentence is generally quoted from the महाभाष्य of पतञ्जलि-" मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गला- न्ता च शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाण्यायुष्मत्पुरुषाणि च भवन्ति अध्येतारश्च -'प्रवक्तारो भवन्ति । Dr, A, B. Dhruva in his Notes on FITETCHErt discusses this topic in some detail which, being very instructive, I quote below: . महाकाव्य re + an connect “Much intellectual energy has been spent in Brahmanical books of Logic (thier and Fut) on demonstrating the necessity of SETETUT and on determining the nianner in which it acts towards fulfilling its purpose. The duty of performing a मङ्गलाचरण 1s based upon frerer (practice of the good and respectable) which itself presupposes, say the US, a vedic commandment. As regards its modus operandi, while some hold that it brings undertaking to a successful completion, removing obstacles if any (समाप्ति or निर्विघ्नसमाप्ति), others think that its function is simply to counteract the bad luck which causes obstacles (Faenza), the completion itself depending upon other natural or supernatural causes Then, again, while some the मङ्गल with the completion (समाप्ति) through the removal of obstacles (विघ्नध्वंसस्तु मङ्गलस्य द्वारम् ), others believe that a kind of religious merit (अपूर्व) is created by the age, which removes the obstacles and producesthe completion (अपूर्वद्वारैव मङ्गलस्य समाप्तिहेतुता). The scholhasts were not unaware of such incomplete works in Indian literature as बाण's कादम्बरी despite a मङ्गलाचरण, and complete works without a #FOTO. Consequently, they have endeavoured to explain the breach in the causal law by the hypothesis of AGOTETTU done in a previous life (HFAAT GE), and also of comparative qua tities and qualities of the AFSTETTU and the evil Å. . Yet, the trend of their belief in the efficacy of HESTETTU would seem to be in the drrection of rationalism. For the whole subject, see. #5€ in mea farata fur etc even “The religious belief in the necessity of propitiating gods before commencing any serious piece of work-even the day's routine-is natural, and so we find that in the vedic ritual, the main sacrifice was often preceded by a small introductory offering made to the gods ( cf. “ Stora SUÀ TIT TË FATE ITUATETETTHTA. " ). Similarly, as recorded the भरत नाट्यशास्त्र, a tediously long religious cereniony was performed on the stage, before commencing a dramatic representation. The ceremony which was originally mixed doing (Farfet) and speaking ( afara ) came, in course of time, to be cut down to the latter, thus, the recitation of The 112 २५ remained the sole survivor of the old elaborate ceremonies of the perce. Thus the AFUTETTU in all literery works is mostly verbal.-- स्तुतिनमस्कारादिषु मगलव्यवहारः शिष्टानाम्...अत एव दुरितनाशकमपि गङ्गास्नानावि न मङ्गलम् । Tat. Ci Such a मङ्लाचरण generally takes one of the three following forms : (i) आशी: Benediction or Prayer, (i) नमस्क्रिया Salutation, and (iii) वस्तुनिर्देश Description, the last being supposed to be accomplished even by a bare reference to the name of a god, or the use of a word which means 'a god’as, for example, the word daar in the first line of कालिदास's कुमारसंभव-अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज ।' ( Vide स्याद्वादमअरी, Notes pp 1-20 ) श्लो. २ स्मरस्य सायकपश्च के व्यस्ते (जगत्युद्यतः ) जगधुदतः जगतां 'जेतुं पष्ठो जैत्रशरः कान्ताकशक्षः विषयिणां शरव्यं चेतो हान् भवतां स्वर्गादप्यति- दुर्लभ करतले प्राप्तथि पारिवम् अक्षयशर्मप्रेम भूरि तनोतु । स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मरः, स्मृ आध्याने पचाय, स्मरस्तस्य स्मरस्य । व्युपलदस्ते क्तप्रत्ययो व्यस्ततस्मिन् व्यस्ते, सायकानां पञ्चके तस्मिन् साय - पञ्चके इत्यन स्वार्थिक-क-प्रत्यय । गच्छ नीति जग तस्मिा जगति उपर जायु- द्वतो वा। पण्णां पूरण. पठ: "तस्य पूरगे डर," "षक ते ग्यवतु थु" इति थुक, षष्ठः। जयतीति जेता, तृचि गुगे जेत राख्दा प्रज्ञादि वारम् वृद्धिः। जैत्रचालो , शरश्च जैत्रशरः। शरवे हिलाय हित शरण्यम्, उगवादिभ्यो यत् । हरतीते हरन् , शप्रत्यय । विग्या एगम् सन्तीति विषयिग नेपाम् दुखेन लभ्यते इति दुर्लभम् , खल् प्रत्यय । अति अत्यन्त दुलेभमतिदुर्लभम् । पृथिव्या इदम् पार्थिवम् , इदमर्थेऽण् । कान्तायाः कटाक्षः। करस्य तलम् करतलं तस्मिन करतले । प्राप्ता श्रीयेस्य तत् प्राप्तश्रिकम् । नास्ति भयो यस्य नदायम्। शर्मयुक्त प्रेम शर्मप्रेम, मध्यमपदस्य लोप । भूरि तनोतु ।। कामः पञ्चशरः स्परः। विटप भुवनं जगन् । विपदी विषयासते। चित्त तु चेतो हृदयम् । संवर्तः प्रलय. कल्पः क्षयं.। इत्यमरः । Compare the following sets for the names of the five arrows of स्मर i. e. कामदेवः मन्दोऽयं मलयानिलः किसलय चूतहमाणां नये माद्यकोकिलकूजित विचकिलामोड पुराणं मधु । वाणानित्युपदीकरोति सुरभि पञ्चेव पञ्चेषवे यूनामिन्द्रियपञ्चकस्य युगपत् संमोहसंपादिन ॥९॥ (सुभाषितरत्नभाण्डागार, Page 384 ) . . १ ૨૮ . यहावियोगतिमिरः कौरङ्गनेत्राङ्कितः यस्मिन् . (वसन्त पूर्णोऽपि) (चन्द्रः) मिथः कुचक्रवाकमिथुनं मुदा आश्लिप्यन् सदेन नेत्रनलिनानन्दं वितन्वन् तुझायेत (यस्मिन् पूर्णऽपि ) । चन्द्रोऽस्त्यस्या अत इनिठनों" "ठम्येक " टापि इत्वे । तंत्र मुखमिति त्वन्मुखम्, त्वन्मुखमेव च द्रमाः। दानानामावली-दन्तावत्येव चन्द्रिका। महांश्चासौ वियोगश्च महाभियोग । दन्तापली चन्द्रिकया प्रत्यादिष्टे महाषियोगति- मिरं येन स. दन्ताधलीचन्द्रिकाप्रत्यादिष्टमहाभियोगतिमिर । कुरङ्गस्मे कौरने, कौरङ्गे च ते नेत्रे ताभ्यामङ्कित । इमर्थे अतर्भावितण्यर्थेऽण् भवति । कुवावेव चक्रवाको तयोमिथुनम् । आश्लिष्यतीति थाश्लिष्यन्ते वितनोतीति वितन्वते शतप्रत्ययः। तुङ्ग इव आचरति इति विग्रहे 'कतु. का सलोपश्च" इति सूत्रेण क्पडि दीर्घ आत्मनेपदे विध्यर्थे लिडि तुगायेत । नेने पत्र नलिने तयोरानन्दस्तम् ॥ (रूपकम् ) आननं लपनं मुखम् -इत्यमरः । हिमांशुश्चन्द्रमाश्चन्द्र इत्यमर । चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना- इत्यमरः। रदना दशना दन्ता इत्यमरः। कोफश्वमश्चक्रवाक इत्यमर । कुरङ्गो हरिण इत्यमरः। तमिझं तिमिरं तम इत्यमर । नलिन कमलमित्यमरः । . श्लो. ६. संपूर्णो मानिनीमुखचन्द्रमा हन्त चन्द्रिकया नूनं वियोगविभवं तमो विद्रावयति । (रूपकम् , उत्प्रेक्षा च)। संपूर्यते स्मेति संपूर्णः, पूरी आप्यायने कर्तरि कर्मणि वाक्त । मानोऽस्त्यस्या प्रतिमानिनी, "अत इनिठनौ” इनि डीपि मानिनी, मानिन्या. मुखम् मानिनीमुखम्, मानिनीमुखमेव चन्द्रमाः। दन्त एव चन्द्रिका तया दन्तचन्द्रिकया। चन्द्रोऽम्त्यस्याः इति विग्रहे “अत इनिठनो ठस्येक " टापि चन्द्रिका। वियोजनं वियोग. व्युपसर्गात् युज्धानार्घ गुणे कल्वे च पियोग । वियोगाद्विभवो ( उत्पत्ति ) यम्य तत्। व्युपसर्गात् द्रुगतो इत्यस्माहातोणिचि वृद्धाबावादेशे च लटि तिपि शपि गुणे अयादेशे च कृते विद्रावयति । संपूर्ण सकल पूर्ण इत्यमर । प्रमदा मानिनी कान्ता-इन्यमर ! रदना दशना दन्ता इत्यमर.। अविभवा. पुंलि इत्यमर । श्लो ७. (है) सुमुखि, (तब) स्तनौ (मम) स्तनान्तरन्यस्तो (तब) मुखं मम सम्मुग्वम् (अम्नु) । (हे) सुश्रोणि, मेखला ममोत्सङ्गेऽस्तु । शोभनं मुग्नं यस्या सासुमुखी-"म्वाङ्गान्धोपसर्जनादसंयोगे पधात्" इति कीपि सुमुखी, तत्सम्बुद्धौ सुमुखि। अन्यौ स्तनौ स्तनान्तरे, तयोर्यस्तो स्तनान्तरन्यस्तो।
२९ सम् संगतं मुखं सम्मुखम् । शोभना श्रोणी यस्याः सा सुश्रोणी, तत्सम्बु दौ सुयोणि। श्रोण सघाते इत्यस्मात्-धातोः " सर्वधातुभ्य इन्” इतीनि प्रत्यये डोपि श्रोणी, श्रोण्या. मेखला श्रोणि मेखला डोर प्रत्ययो विकल्पेन भवति-तेन श्रोणी श्रोणिः इन्युभयमपि रूप भवति । की प्रत्यविपक्षे श्रोणिमेखला । उत्सजनमुत्सङ्ग, भावे घन, तस्मिन् उत्सङ्गे । अस्धाते.लोटि प्रथमपुरुरैकवचने अन्तु इति रूपम् । अन्तं राति इति अन्तरम् , रा दाने इति धातो. "तोऽनुपसर्गे क" इति कप्रत्ययः । स्तनौ कुचो-इत्यमरः। कटि' श्रोणि ककुद्मनी इत्य परः। स्त्रोकटयां मेखला काची सप्तकी रशना तथा-इत्यमर । स्तनौ स्तनान्तरन्यस्तौ-The reading of the M5 स्तन्यसूनिहन्य' makes no sense hence the emendation. si FURAJECTE—The reading of the Ms. is grammatically inappropriate. श्लो. ८, कुञ्चत्कोकनदश्रियोनयनयोनलैसोजन्मकिशोरको (कोरको ) पक्षालयन्ती पितृगृहं गच्छन्ती मन्दावर्तितकन्धरा कान्ता गुर्वन्तिकाद् (गुर्वन्तिक- मागत्य ) अपानेन तु प्रियतमं संवीक्ष्य अन्तर्वाष्पनिरुद्धकण्ठकुहरं ( यथा स्यात्तथा) चिरं रोदिति ।। कुञ्चती च ते कोकनदे च कुञ्चत्कोकनदे तयोः श्रियो-श्रीरिव श्रीर्ययोस्मयो कुञ्चत्कोकनदशियो.। कुञ्च कौटिल्ये, धातूनामनेकार्थत्वात्कुञ्चदित्यस्य संकुचिते- त्यर्थः । कोकान् , चक्रवाफान् नदति इति विग्रहे मूलविभुजादित्वात्क , नादयती- त्यर्थ । अन्त विमण्यर्थोऽयं प्रयोगः। नयनं च नयनं च नयने तयोनएनयो। वक्षसि (सो) जन्म ययोस्नो वक्षोजन्मानौ, तावेव किशोरको कोरकायित्यर्थः । मले, जलन्तीति जलानि, जल अपवारणे पचाद्यच् तेजलैः । प्रक्षालयतोति प्रक्षा- लयम्ती, प्रोपसर्गात् क्षलघातो शतृप्रत्यये डोपि नुपगमे च कृते प्रक्षालयन्ती। पितुहं पितृगृहम्। गच्छन्ती गच्छनीति गच्छन्ती शतृ प्रत्ययो भवति कीपि नुमागमे चौक्तरूपस्य सिद्धि । गृणाति धान्यादिकमिति गृहम्, गेहे कः" सूत्रेण फप्रत्यये सप्रसारणे च कृते गृहमिति । मन्दम् आवर्तिता कग्धरा (यस्याः) सा मादावतिराकन्धरा। कं, शिरसो क धरा ( प्रीयां कन्धरा मना)। कम्यते स्मेति कास्ता, कमे. कः दीर्धे-" अनुनासिकस्य ". टापि कान्ता । . गिरति अज्ञानम् , गृणाप्ति वा उपदेशमिति गुरुस्तस्य अन्तिकं गुर्वन्तिकम् , तस्मात् गुर्घन्तिकात्। अत्र 'ल्यब्लोपे कर्मण्यधिकरणे च" इति वार्तिकेन पञ्चमी भवति, गुस्तिकादित्यस्य गुर्घत्तिकमागत्येत्यर्थः । अनिशयेन प्रियः प्रियतमस्तम् । “अति- शायने तमविष्ठनो०" इति तम। अपाजेन कटाक्षेण संध्युपसर्गादीक्षदशने क्त्वाल्यपि प्रहधातोः यया घरा ३० ! to संवीक्ष्य। अन्तर्वारपेण निरुद्धकण्ठकहरं यथा स्यात्तया चिरं रोदिति-रुदो लटि मिपि — रुदादिम्यः सार्वधातुके" इति इटि गुणे रोदिति । (उपमा) रक्तोत्पल कोकनम् इत्यमरः । कमला श्रीहरिप्रिया संपत्तिः श्रीश्च लक्ष्मीश्च इत्यमरः । दृगक्षि चक्षुर्नयनमिति धनञ्जयः। सलिलं कमलं जलम् , उरो वासं च वक्षय इत्यमरः । गृह गेहोदवसितम् इत्यमरः । श्रीवायां कन्धरा मता इत्यमर । कटाक्षोऽपाङ्गदर्शने ॥ The young wife going to her father's house sees her dear husband in the presence of the elders so she is not able to give expression to the grief freely. So even though weeping for a long time, she has to smother her cry in her throat. कुश्चत् - yields more appropriate sense than किञ्चित् . वक्षोनन्मकिशोरकौ-It is difficult connect 'किशोरता grammatically with the rest of the sentence. The emended reading though grammatically proper is not quite satisfactory श्लो. ९. हे सखे, कामाक्षया कान्ता किं कुरुते, रतेषु रमते । केन सार्क रतं, त्वया (साकम् ), अहम् इद, न त्वमनिशं तत्समीपे, सव्रीडा सा सखी, हि, आहा- रेषु मनोवलेपबसनेचिन्छां हित्वा अन्तःस्थितैर्भवतोरविरत रतै(मत्रीडा वर्तते ।। कामोऽक्षयो यस्याः सा कामाक्षया, क्षयतीति क्षयः, क्षि क्षये-अच् । नास्ति क्षयो यस्य सोऽक्षयः। कम्यते स्मेति कान्ता, कमे क्त दीधै टापि । रमणानि रनानि ल्युट् तेपुरतेषु। केन साकमित्यत्र “सहयुक्तेऽप्रधाने" इति मूत्रेण तृतीया। रमणं रतम् (क) अस्मिन् इति इह । "इमोह" सूत्रेण इदम्शब्दात् प्रत्ययः। “इदम इश" सूत्रेण इदम इशादेश । तस्या. समीपम् तत्समीपम् , तस्मिन् तत्समीपे । अनिशम् (सततम् संततम् बञ्)। आहरणमाहारः घन्, बहुवचने आहारास्तेषु आहारेपु। मनः अवले- पाच वसनानि च अवलेपवसनानि तेपु इच्छां हिन्वा, पेर्भावे शो यगभावश्च निपात्यते इच्छा इत्यस्य निपातनासिद्धिर्भवति । हाधातो त्याप्रत्ययः, आकारस्येत्वे ओहा त्यागे इत्यस्मात् धातो फ्त्वाप्रत्यय , "जहातेश्च क्त्वि" सूमेण आकारस्येत्वे हित्वा। अन्तः स्थितानीति अन्तःस्थितानि तैरग्तःस्थितैः। न विरतान्यविरतानि तैरविरते.1 विरमणानि विरतानि । बीडया सह (धर्तते) इति विग्रहे "तेन सहेति तुल्ययोगे" सूत्रेण समासे “वोपसर्जनस्ये"ति सूत्रेण सहस्य सादेशे सव्रीडा। बीड लज्जायाम् “गुरोश्च हलः" इत्यप्रत्यये टापि ब्रीडा । फामोऽमिलापस्तषश्च इत्यमरः। प्रमदा मानिनी कान्ता इत्यमरः । रमणे निधुवनं रतं भैथुनम् इत्यमरः। समीपमभ्यर्णमन्तिकम् इत्यमरः। अनिशं सततं संततमित्यमर,। आलिः सखी धयस्या इत्यमरः । स्वान्तं हुन्मानस मनः, घेलं वसनमंशुकमित्यमरः । इच्छा काङ्क्षा स्पृहा इत्यमरः। मन्दाक्ष हीरूपा क्रीडा इत्यमरः ॥ This is a dialogue between a lover and a friend of the beloved The lover asks about his beloved to her friend. She answers that she is enjoying amorous sports. This naturally irritates the lover, who asks with whom she plays. The friend answers that she plays with him as he is constantly with her. In fact she is so much engrossed in him that she forgetting her food, dress and decoration constantly wears a bashfull expression on account of her feeling of shame for her engrossment. श्लो. १०. सौवर्णनूपुररणचरणारविन्दा श्रोणीभरालसगतिर्मुगशावनेत्रा पीनस्तनी सकलचन्द्रमुखी तन्वी कस्य हृदि, अहो, महान्तं मोहं न तनोति ॥ सुवर्णस्येमे सौवर्ण, सौवर्णे च ते नूपुरे सौवर्णनूपुरे, ताभ्याम् रणन्ती चरणे एव अरविन्दे चरणारविन्दे यस्याः सा सौवर्णनूपुररणच्चरणारविन्दा । श्रोण्याः भरः श्रोणोभरस्तेनालसा गतिर्यस्याः सा श्रोणीभरालसगतिः। मृगस्य शावः मृगशावस्तस्य नेत्रे इच नेत्रे यस्या सा मृगशावनेत्रा। पीनी स्तनौ यस्याः सा पीनस्तनी । सकलश्चासौ चन्द्रश्च सकलचन्द्रस्तद्वन्मुख यस्था. सा सकलचन्द्रमुखी, चन्दतीति चन्द्रः । (उपमा) सौवर्ण इत्यत्र " तस्येदम्" सूत्रेण इदमर्थेऽण् प्रत्ययो भवति। नुवि पुरति पुर अग्रगमने धातो " इगुपधशाप्रीकिरक इति क्प्रत्यय । श्रोण संघाते इति धातोः “ सर्वधातुभ्य इन्” इति इन्प्रत्यये डीपि च कृते श्रोणीगमनं गतिः स्त्रियां क्तिन् । मृग्यते व्याधैरिति मृगः, मृग अन्वेषणे धातोर्घञ् प्रत्ययो भवति-अवन्तत्वाद् गुणाभाव । शव्यते इति शावः, शव गतौ धातो. "अकर्तरि च कारके सज्ञाया"मिति घम् वृद्धिश्च। नीयतेऽनेन दाम्नी० इति सूत्रेण प्रन्प्रत्यये नेत्रपदस्य सिद्धिः। पीनस्तनी इत्यत्र स्वानाच्चोप- सर्जनादसंयोगोपधा"दिति सूत्रेण डीपि। सकलचन्द्रमुखीत्यत्रापि उक्तसूत्रेणैव कीयप्रत्ययो भवति । चन्दतीति चन्द्रः, चदि आह्वाइने धातोः " स्फायितञ्चि सूत्रेण रक्प्रत्ययो भवति । प्यायते स्म इति विग्रहे ओप्यायो वृद्धो गत्यर्थाकर्मके"ति क्तप्रत्यय "ओदितधे"ति नत्यम्, प्यायः पीति प्यादेशः। तनुशब्दात् “वोतो. गुणवचना"दिति सूत्रेण जीपि यणि तन्वीति भवति । अरं शीघ्र विदतीति विग्रह “गवादिषु विन्दे" इति वार्तिकेन श शेमुचादीना"मित्यनेन नुम् । अरविन्दम् ॥ (उपमा) स्वर्ण सुवर्ण कनकमित्यमर । मजीरो नूपुरोऽस्त्रियाम् इत्यमर । पदांनिश्च- अरविन्दमहोत्पलम् इत्यमरः । कटि. श्रोणि: कमती-इत्यमरः। मृग. हरिणः कुरङ्ग इत्यमरः । लोचन नयनं नेत्रमित्य- इति धातोः रणोऽस्त्रियाम् इत्यमरः ।
३२ शावक. मर। पोत पाकोऽर्भको डिम्म पृथुक शिशुः इत्यमरः। पीनस्थूलपीवरेत्यादि स्तनो कुचौ-इत्यमर । मूर्छा तु कश्मलं मोह इत्यमरः ॥ भलो. ११. (हे) आलि, अद्याहम् कामतरलेन कान्तेन सहिता तलिने निषण्णा सरलाशयत्वानस्य वार्ता निरता मां अनोपपीडमालिङ्गय तेन किमपि कृतं न जाने ( अथवा तेन कृत किमपि न जाने)। आलयति भूषयति आडपसर्गान् अल भूषणे “ अप इ." आलि हीपि आली तत्सम्बुद्धौ हे आणि यास्मिन् अहनि इत्यर्थे “ सद्यः परुत्" इति सूत्रेण अद्येन्यस्य सिद्धिर्भवति । कामेन तरल कामतरलम्तेन कान्तले यत्र " सहयुकेऽप्रधाने " रति सूण तृतीया भवति । तल्यते वा इति विग्रहे " तलिपुलिभ्यामिनन् ” इत्यनेन सूत्रेण इनन् प्रत्ययो भवति तलिनम् तस्मिन् तलिने । निपीदति स्मेति निसद् “गत्यर्था- कर्मके तिक्तप्रत्यये “ रहाभ्यां निष्ठानो न पूर्वस्य च दश्च" इति सूत्रेण तकारस्य "देकारस्य च नकारे पत्वे ष्टुत्वे निषण्ण., स्ली निषण्णा। आडुपसर्गात् शीत धातोरन् “परच्" थाशयः । सरलपचासौ आशयञ्च, तस्य भाव सरलाशयत्वं तस्मात् अथवा, सरल आशयो यस्या सा सरलाशया तस्या भावम्तस्मात् । वृत्तिर्लोकवृत्तम् तदस्यस्याम् इति विग्रहे “वृत्तेश्चे"ति चार्तिकेन ण वृद्विश्च टापि। वातानिरता संलग्ना-। भुजोपपीडं भुजाभ्यां भुजयोयाँ उपपीङय इन्ययें सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्ष" इति सूत्रेण णमुलि कृते सिद्वि । मालिङ्गयेति ल्यबन्तप्रयोगः । कृतमिन्यत्र कर्मणि क्त । साने इति आत्मनेपदे लटि उत्तमपुरुषैकवचने रूपम् ॥ आलिः सखी वयस्यो इत्यमरः। कामः पञ्चशरः स्मर । दयितः कान्तः प्रियः । वार्ता प्रवृत्तिवृत्तान्त इत्यमर । तलिनम् शय्या तल्यते शयनार्थ गम्य- तेऽत्र । निपण्णा उपविष्टा । तरलेन चञ्चलेन ॥ तलिन - means a couch. श्लो. १२. तोयान्तरुल्ललितमीनयुगामिरूपनीरनिकान्तरचरन्नयनम् शीतं सुगन्धि पार्वण सुधाकरचारु प्रियायाः वक्त्रं लोल्यान् पास्यामि, अम्बु मरुपान्य इव ( पास्यामि ) ( उपमा) ॥ तोयस्यान्त तोणत, भीनयोयुगं मीनयुगम् तोयान्तरुल्ललितं च तत् मीन- युगं च तोयान्तरल्ललितमीनयुगम् , तद्वदभिरूप नीरहिकाया अन्तरं नीरङ्गि- कान्तरम् , तस्मिन् चरतीति नीरनिकान्तरचरन्नयनम्, तोयान्तरल्ललितमीन- युगाभिरूपं च तत् नीरनिकान्तरचरन्नम्न यस्मिन् तत् । शोभनो गन्धो यस्मिन् तर सुगन्धि । पशि भर पार्वण, तष भव " इति सूत्रेण भवार्थेऽण् धृद्धिश्च । सुधायुना. करा यस्य स सुधाकर., पार्वगश्चासौ सुधाकरश्च पार्वण- ३३ - - - सुधाकरस्तद्वयारु इति पार्वणसुधाकरचारु । पन्थानं नित्यं गच्छतीति पान्थ , मरोः पान्य मरुपान्यः-पथिन्शब्दात् “ पन्थो ण नित्यम्” इति सूत्रेण णप्रत्यये पथ पन्थ " इति सूत्रेण पथिन्शास्य पन्थादेशः वृद्धिप्रच, पान्थः । नीयते- ऽनेनेति नयनम्, ल्युट्प्रत्ययः । चरतीति चरन् शत्रन्तः । श्येङ् गतौ भावे क्त संप्र- सारणादिकायें च कृते शीतम् । सुगन्धि-इत्यत्र-सुगन्धशदात् “ गन्धस्येदुत्पूतिसु- सुरभि" इति सूत्रेण इत्वे कृते सुगन्धिपदस्य सिद्धिः। म्रियन्तेऽस्मि भूता- नीति मरुः । " भृमृशी" इत्युणादिसूत्रेण उप्रत्ययो भवति । उच्यतेऽनेनेति विप्रहे व परिभाषणे धातो. “ गुथ्वीपचिवधिः" इति सूत्रेण प्रत्यये वक्त्रमिति सिद्धि. ॥ समानौ मरुधन्वानौ-इत्यमरः । अम्भोऽर्णस्तोयपानीयनीरक्षीराम्बुशंवरम् इत्यमरः । मीनो बैसारिणोऽण्डजः इत्यमर । सुधाकरप्रचन्द्र इत्यमरः ।। नीरनिका-This word is not to be found in Sanskrit lexicons or modern Sanskrit dictionaries It is a sanskritized form of the पेश्य word णोरङ्गी or गिरणी meaning शिरोऽवगुण्ठनम् -(See देशीनाममाला P. 31. sl 81, see also गुठो-निरजो 1 sl.-90, page 118, 'B. S. Serles ). This peculiarity of Sanskritzing of Desi words is a characteristic of श्रीदर्ष, the author of नैषधीयचरित. Another interesting point is the reference to AF8 It is tempting to infer that the author belongs to the Northern India, probably the region round about Marwar and northern Gujarat. The simile also reminds one of a woman of the same region where women have the custom of what is known as thor veiling, the face in such a way that it' lives room for all the coquetry that the eyes of a loving woman are capable of. · The eyes of the beloved moving inside the veil are compared to- a pair of fishes moving under the water. Incidentally this simile suggests that the veil was as transparent as the surface of water. If we refer some of the Rajput paintings we can find Illustrations of this aspect. The arder or the eagerness with which the lover kisses her beloved is suggested by the simile of a thirsty traveller in the desert of Marwar drinking eagerly the cool and the fragrant water of a reservoir growing lotuses. - - - - श्लो. १३. दयालुः या मम मियतमा स्वेनैव वरकृचद्वितयेन नूनं वेगाति- दुःसहविदारणदारुणेभ्यः मार्गणेभ्यः मे हृदयं संवयं सा (माम्) पश्यति । दयते इति दयालु , दयधातोः, “ स्पृहिगृहिपतिदपि०" सूत्रेण आलुचप्रत्ययः। अतिशयेन प्रिया प्रियतमा 'अतिशायने तमविष्ठनौ” इति सूत्रण तमपप्रन्ययो भवति। घरीच तो कुचौ च वरकुची तयोद्वितयं वरकुत्रद्वितयं तेन वरकुचड़ितयेन । द्विश- ब्दात् “संख्याया अयगवे तयप् प्रत्यय । वेजनं वेगो घञ् तेन वेगेनातिदुःसहारच ते विदारणाश्च ते दारुणाश्च तेभ्यः वेगातिदु सहविदारणदारुणेभ्यः । वर्मणा सनयति इति संवर्मयति तस्मातु नामधातो. क्त्वा ल्यपि संवर्येति रूपम् । व्युपसर्गात् धातोणिचि तस्माद् भावे ल्युट् । दारयति चित्तम् इति विग्रहे दृ भये धातो. “ कृवि- दारिभ्य उनन्” इति उनन्प्रत्यये दारुणपदस्य सिद्धि । मृग अन्वेपणे अदन्तः तस्मात् प्रयासश्रन्यो युच् अथवा मार्ग अन्वेपणे ल्युट्" मार्गणम् । । उत्प्रेक्षा) ॥ कलस्थमार्गणशरा इत्यमरः। मार्गणे याचनेऽन्येपे मार्गणस्तु शरेऽथिनि इति हैमः । ल्यायालु कारुणिक, कुघौस्तनौ, चितं तु चेतो हृदयमि- त्यमरः । वेग प्रवाहजवयोरपि इत्यमरः । दारुणं भीपण भीममित्यमर ॥ श्लो. १४. (हे) सखि, रात्री यचित्रं कौतुकं समभवत्तदाकर्म्यताम् । अथ समागतेन कान्तेन शयनासीना(अहम् ) समालिङ्गिता-एतस्मिन् समये असौ कान्तः चेतोहरं रसान्तरमासाथ मन्मयतानुपागमत् ततोऽहं तन्मयी जाता। राति सुखम् इतिरात्रिस्तस्याम् रात्रौ । राधातो " राशदिभ्यां त्रि" रात्रिः। कर्ण करोत्याचष्टे वा कर्णयति, आइपूर्वात् तस्मात् कर्मणि लोटि प्रथमपुरुषैकवचने याकर्ण्यतामिति । अत्रास्मिन् अइनि इत्यर्थे सब परुतः" इति सूत्रेण अधेति सिद्धिः। सम्-आपसर्गाभ्यां गमधातो. “गत्यर्थे "ति सूत्रेण कर्तरि तमलोप: समागतस्तेन । शयने आसीना शयनासीना । शय्यतेऽत्रेति विग्रहे शीङ् स्वप्ने भावे ल्युट शयनम् । आस्ते-इति आसीना आस्धातो शानच् 'ईदास"इति सूत्रेणा- कारस्येत्वे स्त्रोत्वविवक्षायां टापि आसीना। चेतसो हरः चेतोहर । अन्यो रसो रसा- न्तरम् । सम्-आपसर्गाभ्यां लिगि (लिङ्ग) धातोः क्तप्रत्यये इडागमे स्त्रीत्वे टापि समालिङ्गिता। आसायेति ल्यवन्त प्रयोग प्राप्येत्यर्थ । मन्मयस्य भावो मन्म- यता ताम् “ तस्य भावस्त्वतलौ" इति तल् मत्प्रचुरः" इति मन्मयोऽत्र प्राचुर्याथै अस्मद्शब्दात् मयट् “प्रत्ययोत्तरपदयोश्चे"त्यनेनास्मच्छब्दस्य मदादेशे-अनुना- सिके मन्मयताम् । उप-आङ्-उपसर्गाभ्यां गमधातो ङि प्रथमपुरुयैकवचने-उपागम- दिति । तस्मादिति तत', तदशब्दात् “पञ्चम्यास्त सिल् "इति तसिल अत्वे पररूपे तत । तन्मयीत्यत्रापि प्राचुयार्थे मयट् स्त्रीत्वविवक्षायां टित्वात् डीपि, अनुनासिके. तन्मयी। मातेति कान्त । . - ३६ ऑलिः सखी वयस्या इत्यमरः । निशा निशीथिनी रात्रिरित्यमरः । कौतू- हलं कौतुकं च कुतुकं च कुतूहलमित्यमर । कान्तः प्रियः दयितः धव इत्यमरः । श्लो. १५. सखि, शय्यायां स्मररागमागतवतोः संपन्नयोरावयोः वार्ता- लिङ्गनचुम्बनानि बहुधाऽभूष॑स्ततोऽनन्तरं तन्मन्मयत्वात् अहो-परा प्रेमनिलीनता माप्ता, तद्योग्यं (यद्वस्तु) तदहं चकार मद्योग्यमेव करणं प्रियः (चकार)। स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मरस्तस्य रागस्तम् । आगत इत्यत्र आङपर्सात् गमे. कर्तरि के मलोपश्च, आगतशब्दात् मतुई मस्य व षष्ठो-द्विवचने आगतवतोः वार्ता च आलिजनं च चुम्बन च वार्तालिमनचुम्बनानि । बहुशब्दात् प्रकारार्थे धाप्रत्यय । भूधातो ङि प्रथमपुरुषबहुवचने अभूवन् इति रूपम् । अभूवन् तत इत्यत्र “नच्छव्यप्रशान्० इति सूत्रेण नकारस्य रुत्वे अनुनासिके रेफस्य विसर्गे तस्य सत्वे अभूवस्तत । तस्मादिति तत तदशब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल" अत्वे पररूपे तत इति रूपम् । तस्य मन्मय. तम्मन्मय इत्यत्र प्राचुर्यार्थ मय मत्प्रचुरे इति मन्मयः । "प्रत्ययोत्तरपदयोश्च"इति सूत्रेण अस्मच्छब्दस्य मदादेश तन्मन्मयस्य भावस्तन्मन्मयत्वम् । भावार्थत्वप्रत्यय. । अहो इति विस्मये- आश्चर्य। निलीनस्य भाव निलीनता भावे, तल् प्रत्ययः। प्रेमिण निलीनता प्रेमनिली- नता । प्राप्तेत्यत्र “गत्यर्थ"ति काटापि प्राप्ता। तस्य योग्यं तद्योग्यं । युज्यते इति योग्यम् “ऋहलोय॑त् ' अथवा योगाय प्रभवति “योगाद्यच्चे "ति यत्-चकारे- त्यत्रं परोक्षे लिट् भवति-अंत्र तु प्रत्यक्षत्वात् लिट् कथम् इत्यत्रं "अत्यन्तपिनवे- लिट् वक्तव्य ' इति बलेन चकारेत्यस्य प्रयोगो भवितुमर्हति । चित्तविक्षेपांदिनी पारोक्ष्यम् । मम योग्यमिति मद्योग्यम् । क्रियते यत् तत् करणम् भावे ल्युट् (कर्मणि) बाहुलकात्। 'भूस्ततो-The reading in the Ms 1s भूय., but that leaves a sentence without a verb, hence the amendation. प्रेमणि लीनता- cerfect "निलिनतां into प्रेमणि लीनतां Add in the footnote after 3 Ms प्रेमनिलिनता This reading makes no sense. So it has been, amended into प्रेमणि लीनतां । श्लो. १६. (हे) सखि, सर्वाङ्गसङ्गिना आक्रान्तहृदयेन मोहितेन प्रियेण रतनाथेन अद्याहं मोहिता। अनन्तीति अगानि, अगि गतौ पचाद्य, सर्वाणि च तान्यहानि सर्वाङ्गाणि । सजनम् सहा षञ्ज सने भावे घञ् सर्वाङ्गाणां सम सर्वाङ्गलाः सर्वानसमोऽस्त्यस्य सर्वाङ्गसही अत इतिठनौ "तेन सर्वाङ्गम जिना। आङपर्सात् क्रमे क्त दीघश्च आक्रान्तम् । आक्रान्तं हृदय येन स तेन आक्रान्तहृदयेन। रमण रतम्, रतस्य नाथा रतनाथस्तेन । अत्रास्मिन् अहंनि इत्यथै " सद्य परुत्" सूत्रेण अधेत्यस्य सिद्धिर्भवति । मुह वैचित्यै-णिजन्तात् अप्रत्यय इडागर्मश्चं मोहितः, स्त्रीत्वधिव- क्षायाम् टापि मोहिना । " अत इनिठनौ " श्लो. (१७) कामाहवस्योत्सवे कान्तपराजयं दृष्ट्वा कामिन्याः ललितयोः कुण्डलयोरदोयुग्मं दोलया लीला ललौ, (कायिन्याः) रशना नितम्बस्थले चापल्या- न्मधुरं रवं चकार, (कामिन्याः) करकङ्कणैनिकणितं (कामिन्याः) नूपुरो चरणयोः चिरं लग्नौ ॥१६॥ काम्यतेऽनेनेति काम. “पुसि संज्ञायां घः”। आह्वानम् आहवः आदुपसर्गात् द्वेञ् स्पर्धायाम् ' आडियु द्धे० '' इत्या, संप्रसारणं च । कामस्याहव कामाहव स्तस्य। कान्तस्य पराजयस्तं पराजयम् -पराजयः जि अभिभवे परच इत्यच् । भूयान् कामोऽस्त्यस्याः कामिनी तस्या कामिन्या " इनिः डीप् । नितम्बस्य स्थल नितम्बस्थलं तस्मिन् । रशतीति रशना, रश शब्दे "बहुलमन्यत्रापि " इति युच् अनादेशे टापि रशना। चपलस्य भावः कर्म वा चा- पल्यम्, चपलशब्दात् गुणवचनब्राह्मणादिभ्य प्यञ् वृद्धिश्च चापल्यं तस्मात् । रवणं रावः, भावे घम् तं रावम् । कृधातो परोक्षे लिट् प्रथमपुरुपक- वचनम् । दृश् धातो क्त्वाप्रत्यये पत्वे ष्टुत्वे च कृते दृष्ट्वेति । करयोः कङ्कणानि करकङ्कणानि तैः करकङ्कणै । क शुभं कणन्ति इति कङ्कणानि, कणशब्दे अन् । निकम् क्तान्ते क्तप्रत्यय इडागमश्च । लगि धातोः “शुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नेति०' सूत्रेण निपाननात् लग्नेति द्विवचने लग्नौ । लाधातो परोक्षे लिट् प्रथमपुरुषकवचने ललौ। संग्रामाभ्यागमाहवा इत्यमरः। रणे भा. पराजयः, मह उद्धव उत्सव इत्यमरः। कामिनी यामलोचना, कुण्डल कर्णवेष्टनम्। कङ्कणं फरभूपणम् । कुण्डलयोः ..Compare with विभ्रचलकुण्डलं (अमरुशतक slo. 3). 'मदोदोलया -The reading of the Ms 1s मदोलया In this reading one sylbable was wanting. So 'दो' is added श्लो. (१८) हे पियमखि, प्रणतिनिरतः कान्तः अद्य त्वया कस्मान्न वीक्षितः, एप सखीजना व्यर्थाभापः (स्वया) किं कृतः, पृथुरियमपि हि निशीथिनी पूर्णमाया गता, कठिने तक हृदि एषः कोड कोपः स्थितः (इति) कथय (त्वमिति शेष): । प्रिया चासो सखो प्रियसखी तत्सम्बुद्धौ प्रियसखि । प्रणतो निरतः प्रणति- निरतस्तस्मिन् । व्युपसर्गात् ईश दर्शने कमणि क्तप्रत्यये दीर्घ च वीक्षित इति । आमापणमामापः घन्, व्यर्थ आमापो यस्य सो व्याभाय । एप चासौ सखीजनश्च एप सखोजनः। निशीथोऽस्त्यस्याम् इनि डिपि निशीथिनी । गमे क्तः मलोप टापि गता। कीहर-"इदकिमोरीश् को." सूत्रेण हर परे किम् शब्दस्य की-आदेश। स्थाधातोः "गत्यर्थाकर्मके "ति सूत्रेण क्तप्रत्ययो भवति कर्तरि “द्यतिस्थति- भास्थामित्ति किति" इति सूत्रेण आभापस्येत्वे स्थित. । कुप्यते इति कुप् प्रकोपे ३७ - सजन । कृत वा सम् च भावे घञ् कोपः । प्रकृष्ट नमनम् प्रणतिः। कथय कथ लोटि मध्यमपुरुषैकवचनम् । धातो भावे क्तिन् । प्रणतिः प्रणाम । दयितः प्रियः कान्तः इत्यमरः । गता पूर्णप्राया-The reading of the Ms. पुण्यप्रायां makes no sense, hence the amendation. The विसर्ग in गताः 1s not required. श्लो. १९. हे सखि, सुदुर्जनं विसर्जय, मानसे सज्जनं गणय, प्रियं कृतार्थय, तत्र (प्रिये ) विप्रियं कुरु, सांप्रत विरम, पतिसंगता (त्यम्) रमस्व, अद्भुतां मुदं भजस्व, कलुषतां द्रुतं संत्यज ॥ दुष्टश्चासौ जनश्च दुर्जनः, सुतराम् दुर्जनः, सुदुर्जनस्तम् । संश्चासौ जनश्चः निष्पादितः प्राप्तो अर्थः प्रयोजनं येन सः कृतार्थः, कृतार्थ करोत्याचष्टे वा प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे णिच् ( कृतार्थयति ), तस्य लोटि मध्यमपुरुषेकषचने कृतार्थय । तस्मिन् विप्रियं विरुद्धं प्रीणातीति। विप्रियस्तम् । प्रति पतयोः समाहारद्वन्द्वः, संप्रति- शब्दात् प्रशायण वृद्धिः गणे पाठान्मान्तत्वम्। मानादिति मानत पञ्चम्यास्त- सिल्" । व्युपसर्गाद्रमधातो विरम-रूपम्। पत्या संगता। कलुषस्य भाव' कलुषता ताम् । पातीति पति, पातेडति टिलोपश्च पतिः । दुष्टः दुर्बलः अधमः । महाकुलकुलीनार्यसभ्यसजनसाधवः । सांप्रतम् अधुना इदानीम् । श्लो २०. वियोगातुरां विलोचनोत्पलगलल्लोलोदका प्रेयसी प्रायः कथमपि आङ्गणभूमिकामागम्य मार्ग वोक्ष्य, (हे) सखि, अद्याप्येपः (प्रियः) न समागतः, पुनः शून्य मन्दिरं कथं यास्यामि इत्यभिधाय मोहमगमत् तावत् प्रियः समेतः ॥२०॥ वियोजनं वियोगःभावे घञ् । आतुतोति इति आतुरा आकुपमर्गात् तु' त्वरणे धातो "इगुपधाप्रीकिर. क" इति क कित्वाद् गुणाभाव , स्त्रीत्वे टापि आतुरा, वियोगेन आतुरा वियोगातुरा। लोलानि च तान्युदकानि लोलोदकानि । विलोचने उत्पले इत्र विलोचमोत्पले ताभ्यां गलन्ति लोलोदकानि यस्या मा, गलन्ति च तानि लोलोदकानि गलल्लोलोदकानि, विलोचनोत्पलाभ्यां गलल्लोलोदकानि यस्या. सा। आङ्गणेत्यत्र अगि गतौ "करणाधिकरणयोश्च' इतिल्युट्नम् पृषोदरादित्वात् णस्वद् अङ्गणम् अङ्गणस्य भूमिका ताम् । भवन्ति भूनान्यस्यामिति भूमि , भूधातोः भुवः कित्” इति सूत्रेण मि., भूमिरेव भूमिका, स्वाथै कप्रत्यय । आपसर्गात् गम्चातो क्वाल्पपि च ‘वा ल्यपि" सूत्र न्य विकलापले मकारलोपाभावे आग- म्येति। अगमत्-गन् धातो डि प्रथमपुरुधैकवचना-रूपम् । व्युपनत् ईश्न - - ३८ धातोः क्वाल्यपि दो, वीक्ष्येति । समागत कर्तरि क्तप्रत्ययः। अभिधाय अभ्युपसर्गात् धाधातो क्त्वाल्यपि। समेत सम्-आङ्-उपसर्गाभ्याम् धातोः कर्तरि अप्रत्यये कृते गुणे समेत इति भवति । उपमा। लोचने नयने नेत्रे, रक्तोत्पलं कोकनक्षम्, उत्पलं कमलम् । आनं (अङ्गणं) रत्वराजिरे इत्यमरः। शून्यं कथं मन्दिरं-The reading of the Ms is शून्ये कथं मन्दिरे. These words go with the verb TTECTTH So accusative is required This verse depicts start whose lover just comes after she has swooned, यायधं-affection. श्लो. २१. हे मुग्धे, (त्वम्) हतां कठिनतामाशु त्यन, (आशु) शुषां गिरं (मद्य) प्रयच्छ, (हे मुग्धे), विलोकनलीलया(लं) ममावन्धं सफलय, (तव) चरणशरणं दासीभावं पतं मामनुगृहाण, अहह तवाय ईदृशः विषमो मान- ग्रन्धिः मयि (वर्तते इत्यर्थः) ।। -- हलश्च" कठिनस्य भावः कठिनता "तस्य भावस्त्वतलौ," इति सूत्रेण तन्प्रत्ययः “तलन्तं स्त्रियाम्" ताम् कठिनताम् । लेलायनं लीला लेला दीप्तौ कण्ड्वादिः भिदाद्यद- प्रत्ययः पृषोदरादित्वात् लीलेत्यस्य सिद्धिः । विलोक्यते इति विलोकनम्, भावे ल्युट् विलोकनस्य लीला विलोकनलीला तया । आवध्यते अनेनं इति विग्रहे वन्ध वन्धने घातो: .. इति घञ् आवन्धस्तम् । फलेन सह (वर्तते ) सफल, सफलं करोत्याचले वेति विग्रहे “प्रातिपदिकाद्धात्वर्थ " णिचि धर्तमानकाले सफलयति तस्येव लोटि मध्यमपुरुषैकवचने सफलयेति रूपम्। (तव) चरणयोः शरणं यस्य स तम् । अथवा चरणौ शरणं यस्य से तम् । भवनं भावः भावे घञ् वृद्धिश्च । दास्यते दीयते भूतिमूल्यादिक यस्मै सी दास, दासस्य स्त्री दासी “पुंयोगांदाख्यायाम् " इति ङीप् । दास्याः भायो यस्मिन् स तम् दासीभावम् । ग्रन्यते इति अन्थि “सार्वधातुभ्य इन् " अधिकौटिल्ये, मानस्य ग्रन्थि मानप्रन्थिः । इदमुपपदात् दृशधातो. 'त्यदादिपु दृशोऽनालोचने- कञ्च" इति सूत्रेण कश्प्रत्यय । प्रोपसर्गात् दाणधातोलोटि मध्यमपुरुषस्यैकवचने प्रयच्छति । अनूपसर्गात् गृहयातोलोटि मध्यमपुरुपैकवचने अनुगृहोणेति । कठिनं क्रूर कठोरं निष्ठुरं दृढमित्यमरः। सत्वरं चपलं तूर्णमविलभिवत- माशु चेत्यमर । ब्राह्मी तु भारती भाषा गीर्वार वाणी सरस्वती । हेलालीलेत्यभी- भावाः क्रिया. शृङ्गारभावना इत्यमरः । मानचित्तसमुन्नतिरित्यमरः ।
३९ सप्तम्यां -- श्लो. २२. (हे) सखि, करुणमनसाप्युक्तं भूयो विलोचनजं जलं मुक्तं, (भूयः) पत्युश्चरणद्वयं चिरं शिरसि विधृतं, क्रीडासखीषु मया ब्रीडा परिहता, तदपि तस्य पियस्य हृदये मनाक दयोदयः नासीत् । पातीति पतिः पातेडति' पतिस्तस्य पत्युः। चरणयोईय चरणद्वयम् । करुणा- युक्तः च तन्मनश्च करुणमनस्तेन करुणमनसा । विलोचनयो जातम् लनेई." विलोचनजम्, अथवा विलोचनाभ्याम् जातम् “अन्येष्वपि दृश्यते स्त्रेण जनेर्डप्रत्ययो भवति। मुक्तम्-मुच्धातो कर्मणि क्तप्रत्यय । विधृतम्- व्युपसर्गात् धृधातो कर्मणि क्तप्रत्यय । पर्युपसर्गात् हृधातो क्तप्रत्यय कर्मणि परिहृतः, स्त्रीत्वविवक्षायां टापि परिहता। वच. कर्मणि क्त संप्रसारणम् कुत्वं च उक्तम् । दयाया उदय दयोदय.। क्रीडासु सख्यस्तासु क्रीडासखीषु । आसीत्- अस्धातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचने रूपम् । समुच्चयो विशेषोक्तिस्तथा सकरः । कारुण्यं करुणा घृणा । करुणा तु कृपायां स्यात् इति हैमः । क्रीडा लीला। वल्लभो दयित पतिः। द्रवकेलिपारिहासाः क्रीडा खेला च नर्म च । इत्यमर । श्लो. २३. परित्रस्तकुरङ्गलोचना घनस्तनी चारुमुखेन्दुमण्डला नितम्बिनी मत्तगजेन्द्रगामिनी कृशोदरी मोहकरी च इयं कामिनी ( अस्ति ।) परित्रस्तश्चासौ कुरङ्गश्च परित्रस्तकुरङ्गस्तस्य लोचने इव लोचने यस्याः सा। घनौस्तनौ यस्या सा। चारु च तन्मुखच चारुमुख, चारुमुखमेव इन्दु. चारुमुखेन्दु, इन्दोर्णमुलम् इन्दुमण्डलम् चारुमुखेन्दुमण्डलं यस्याः सा। नितम्बौस्तोऽस्या नितम्बिनी। नितम्वशब्दात् “ अत इनिठनौ ' सूत्रेण इनि प्रत्यये डीपि । गम्धातोः "सुष्यजातो णिनिस्ताच्छील्ये, णिनि. प्रत्यये वृद्धौ डीपि गामिनी । गजानामिन्द्र गजेन्द्रः, मत्तश्चासौ गजेन्द्रः मत्तगजेन्द्रस्तद्वद्न्तु शीलमस्या, सा। कृशमुदरं यस्याः सा। मोहं कर्तुं शीलमस्या सा मोहकरी। भूयान् कामोऽस्त्यस्या, सा कामिनी । पयुपसर्गात् त्रसी उद्वेगे धातो. “ गत्यर्थाकमके "ति सूत्रेण कर्तरि क्तप्रत्ययः । परित्रस्त । अस्यति स्मेति प्रस्त । ईदित्वादनिट् निष्ठः । “ स्वागाञ्चोपसर्जनाद- सयोगोपधात्" इति डीपि कृते घनस्तनीभवति । कुन धातोः “कृञो हेतुता- च्छील्यानुलोम्ये " इति सूत्रेण टप्रत्यये टित्वात् डीपिः मोहकरी । कामिनी इति अत. इनिठनौ' सूत्रेण इनिः प्रत्ययः ङीपि च रूपम् । उपमा रूपकं तयोः ससृष्टिः प्रस्त. भीत । पचान्नितम्ब स्त्रीकट्यां । मतगजो गजो नाग., इत्यमरः । श्लो. २४. हे प्रिये, अखण्डमण्डलस्तवैष वक्त्रेन्दु' नयनाभिरामिकी कान्ति तनोति, कुङ्कुमपङ्कपिअरौ तवैतौ कुचौ सुवर्णपङ्केतहकोरकाकृती (स्तः) ॥२॥ . ।
अखण्डं मण्डलं यस्य सः । वक्त्रमेवेन्दुः वनदु । नयनयोराभिरामिको नयनाभिरामिको ताम् । कुङ्कुमस्य पङ्कस्तेन पिञ्जरौ कुङ्कुमपङ्कपिअरौ । पके रोहति इति पक्रेरुहम् । सुवर्णस्य पकेहं तस्य कोरकस्तद्वदाकृतिर्य- योस्तौ सुवर्णपक्रेरुहकोरकाकृती पके रोहत इति पकेरुहे, सुवर्णस्य पङ्केरुहे तयो कोरको तद्वदाकृती अथवा ययोस्तौ सुवर्णपदकेरुहे कोरकाकृती । (अभि- रामे भवा ) अभिरामशब्दात् कि आभिरामकी, आदिवृद्धौ डोपि च कृते आभिरामकी ताम् । पक्रेरुहम्, ठस्येक । पक्रे रुह इत्यत्र रह धातो "इगुपध०' सूत्रेण कप्रत्यय . तत्पुरुपे कृति" सत्रेण सप्तम्या अलुक् । उच्यतेऽनेन इति विग्रहे वच् परिभाषणे धातो वक्त्रम् “गुवीपचिवचि" सू रोण त्रप्रत्ययः कुत्वं च । इन्दतीति इन्दु, इदि परमैश्वर्ये इन्दधातो " उणादयो बहुलम्” इति सूत्रेण नुप्रत्यये इन्दु । रूपकम् उपमा च तयो समृष्टिः। कलिका कोरकः पुमान्। समग्रं सकलं पूर्णमखण्डमित्यमरः । बिम्बोऽस्त्री मण्डल त्रिषु । इन्दु कुमुवान्धवः । शोभाकान्ति युतिश्छवि , इत्यमराः। काश्मीर कुङ्कमेऽपि स्यात्-मेदिनी। सुवर्ण-etc -having the shape of golden lotus buds. Compare अमरुशतक Slo. 27. श्लो. २५, इति भाषिणि पिये पाणिजैर्मुहुः स्तनाननं संस्पृशति (सति ) प्रमोहिते (सति) प्रिये-अथ मन्मथकेलिलालसां तां सखों विलोक्य सहसा सखीजनः (तां) ययौ । पाणौ (पाण्यो' ) जाता पाणिजास्तै "सप्तम्यां जनेर्ड" इति उप्रत्यय टिलोपश्च-अथवा पाणिभ्यां जाताः इत्यत्र अन्येष्वपि दृश्यते" सूत्रेण डप्रत्ययः, पाणिजास्तैः पाणिजे । भाग्धातोणिनिप्रत्यये सप्तम्येकवचने भाषिणि, भाषते इति भापी तस्मिन् भापिणि । स्तनयोराननं स्तनाननम् । आनन्त्यनेन अन प्राणने करणे ल्युट् । संस्पृशति, इति संस्पृशत् शतृ मस्मिन् संस्पृशति । प्रकण मोहित प्रमोहितस्तस्मिन् प्रोपसर्गान्मुह वैचित्र्ये धातो क्तप्रत्यय इडागमो गुणश्च भवति, प्रमोदितस्तस्मिन् प्रमोहिते । मन्मथस्य केलि मन्मथके लिस्तस्याम् लालसा यस्या सा ताम् । केलनम् केलि किल क्रीडायाम् “ सार्वधातुभ्यः " गुणे केलि ।समानं ख्यायते जनै इति सखी ताम् “ सख्यशिश्चेति भाषायाम् ' ङो । व्युपसर्गात् लोक दर्शने क्त्वाल्यपि विलोक्येति रूपम् भवति । हासेन सह सहास: । सखी चासौ जनश्च सखीजनः । या प्रापणे लिए परोक्षकाले प्रथमपुरुषैकवचने रूपम् । श्लो. २६. (हे) सखि, अहमावसथात् वहिनिर्गत्य यावत् क्षणात् (क्षणं) तिष्ठामि तावत्कुनोऽप्यायातो वल्लभः पुरतः मया ददृशे । (हे) मातः, किं करवाणि । हसन् शठः पाणिकमळे धृत्वा मां नीत्वा तत्र जगाम यत्र कश्चन वै जनो न जानाति ।। .
४१ " अत्यन्ता- पाणी एव कमले पाणिकमले। आवसन्ति-आगत्य वसन्ति अस्मिन् इति विग्रहे आङपसर्गात् वसधातोरथच् प्रत्यय आवसथम् तस्मात् आवसथात् । अत्र अपादाने पञ्चमी भवति। निरुपसर्गात् गम्धातोः षत्वाल्यपि मकारस्य लोपे "हस्वस्य पिति कृति तुम्” इति सूत्रेण तुकि कृते निर्गत्यपदस्य सिद्धिर्भवति । कस्मादिति कुतः । किम्शब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल्' इति सूत्रेण तसिल्प्रत्यये कृते कुतिहो " सूत्रेण किमः कुआदेशे कुत इति रूपं भवति । आङपसर्गात् याधातोः गत्याकर्मके "ति सूत्रेण कर्तरि कप्रत्यये कृते आयात इति प्रयोगो भवति । पुरति अग्रे गच्छतीति विग्रहे पुरधातो “याहुलकात् " अतसुच् कृते पुरत इति रूपं भवति । दृश्धातोः कर्मणि लिट् ददृशे इति रूपम् । ददृशे इत्यत्र पह्नवे लिड् वक्तव्य" इति वार्तिकेन लिट् भवति अन्यथा परोक्षकाले लिट्लकारो भवति, अत्र परोक्षत्वाभावात् लिट्लकारो न स्यात्, चित्तविक्षेपादिनात्र पारोक्ष्य संभवति अतो लिट् भवितुमर्हति । हसतीति हसन् इति शत्रन्तप्रयोग । धृत्वा नीत्वा पते क्त्वान्तौ । तस्मिन् इति तत्र यस्मिन् इति यत्र इत्युभयत्र सप्तम्या- खल्” इति सूत्रेण अल् प्रत्ययो भवति ॥ आवसथं गृहम् । वल्लभो दयितः पतिरित्यमरः । निकृतस्त्वनृजुः शठ इत्यमरः । पञ्चशाखः शयः पाणिः। सहस्रपत्रं कमलं शतपत्रं कुशेशयमित्यमरः ॥ पुरुत' of the Ms. yields no sense, hence the emendation पुरतः । श्लो. २७, शनकै (शनैः) विलासशयनात् (माम् उत्थापयन्त्याः बालायाः पुनः वस्त्रान्ते (वस्त्रान्त) धृत्वा क नु यास्यसीति रभसादुक्त्वा धृतायाः (बालायाः) मया सस्मेरं सळज्जपुलकं वक्रीकृतभूलतं सकलं मुखमुभमय्य यत्पीतं तद्विदुषां गिरां गोचरे नो॥ शनैरित्यस्याव्ययत्वात् “ अव्ययसर्वनाम्नामक प्राक् टे.” इत्यनेन अकचि शनकैरिति रूपम् । विलसने विलास, भावे घञ् विलासशयनं तस्मात् विलास- शयनात् । उत्थापयतीति उत्थापयन्ती, उदुपसर्गात् स्थाधातोणिचि पुकि पूर्वसव- र्णादिकार्ये कृते उत्थापि-तस्मात् शतृप्रत्यये शबादिकार्ये कृते नुमि-"उगितश्च"ति कीपि उत्थापयन्ती तस्याः उत्थापयन्त्या । वस्त्रस्य अन्तम् वखान्तम् , तस्मिन् वस्त्रान्ते । कस्मिन् इति क, किम्शब्दात् “किमोऽत्" सूत्रेण अत्प्रत्यये कृते "काति" सूत्रेण किम कादेशे क्वेति रूप सिद्धम् । वच् धातोः क्वाप्रत्यये संप्रसारणादिकार्य कृते उक्त्वेति रूपम् । धृधातो क्तप्रत्यये कृते कित्वाद् गुणाभावे स्त्रीत्वविवक्षायाम् टापि धृता तस्या धृताया । स्मेरेण सह (वर्तते) इति सस्मेरम्। लजया सह (वर्तते) इति विग्रहे तेन सहेति तुल्ययोगे" इतिसूत्रेण समासे "चोपसर्जनस्ये"ति सूत्रेण सहस्य सादेशे सलज्जमिति सिद्धम् । पुलका. सन्ति अस्मिन् इति पुलकम् , सलज्जं च पुलकं चेति सलजपुलकम् । न वक्रा अवक्रा, अवका वक्रा संपद्यमानेति वक्रीकृता, भूरेव लता भूलता, वक्रीकृता भूलता - . ६ यस्मिन् तत् वक्रीकृतभूलतम् च्व्यन्तप्रयोगः। पाधातोः कर्मणि क्तप्रत्यये कृते "धुमास्थे"ति सूत्रेणेत्वे पीतम् रूपम् । उदुपसर्गान्नमधातोणिचि क्त्वाल्यपि च कृते “ल्यपि लघुपूर्वाद् "इति सूत्रेण णेरयादेश अनुनासिके च कृते उन्नमय्येति रूपं सिद्धम् ॥ रूपकम् ॥ शनकैः शनैः । स्त्रीणां विलासविव्वोकविभ्रमा ललित तथेत्यमरः । स्यान्निद्रा शयनं स्वाप इत्यमरः ॥ तद् न विदुषां गिरां गोचरे-Beyond the capacity of the speech of even the learned. + ortit means anxious or longing for; frat however would be a better reading. Compare अमरुशतक slo. 88-यत्पतिं सुतनोर्मया मुखमिदं वक्तुं न तत् पार्यते। श्लो. २८. तया कान्तया चन्दने सङ्गिनि अङ्गे तु कियानेवावलेपो न धृतः, मौक्तिकगुण्ठितो, हि गुणवान् हारोऽपि कण्ठे नारोपितः, अञ्जन संगृह्य रम्ये नयने नाभिते, तद्वपुषि कान्ति किं कथयामि यां कामोऽपि नो विन्दति ।। चन्दयति इति चदि आलादने णिजन्तः तस्मात् ल्युणिलोप चन्दनम् तस्मिन् चन्दने । सञ्जनं सङ्ग भावे घ, सङ्गोऽस्त्यस्येति सङ्गी, न सगी असगी, तस्मिन् असङ्गिनि-"अत इनिठनौ” इति इनि'। अङ्गतीति अङ्गम् अगि गतौ पचाद्यच् । तस्मिन् अङ्गे। कियान् एव इत्यत्र पवशब्दोऽप्यर्थकः, यथा शंखः पाण्डुरेव। किम्परि- माणमस्येति विग्रहे "किमिदम्भ्यां वो” इति सूत्रेण किम्शब्दात् वतुप्प्रत्यय स्यात् वस्य च घादेश' "इदकिमोरीश्की" सूत्रेण किम' क्वादेशः, "आयनेयीनीयिय इति सूत्रेण घस्येयादेशे कियत् नुमि दीर्घादिकार्ये कृते कियान् इति रूपम्। भवलेपनमवलेप. भावे घञ् धृत कर्मणि धृतः। मुच्यते स्म मुचे क्त. कुत्वम् स्त्रीत्वे टापि मुक्ता, मुक्तव मौक्तिकम् “विनयादिभ्यष्ठक् ठस्येक." आदिवृद्धिश्च मौक्तिकम् , मौक्तिकेन गुण्ठित मौक्तिकगुण्ठित , गुठि वेष्टने कर्मणि क्तः इडागमश्च । गुणोऽस्त्यस्येति गुणवान् मतुए। हरणं हार घञ्। आरोपितः आकुपसर्गात् रुपधातो णिचि कृते प्रत्यय इडागमश्च । अञ्जू धातोर्म्युटि अञ्जनम् । समुप- सर्गात् ग्रहधातो क्वा तस्य ल्यबादेश संप्रसारण च संगृह्य । रम्धातो "पोरदुप- धात्" सूत्रेण यत् रम्यम् द्विवचने रम्ये। अले क्त इडागमश्च । तस्या. वपुः नहपुः तस्मिन् तहपुपि। काम्यतेऽनेनेति काम पुंसि संज्ञायां घ. । विद्धातु तुदादि "शेमुचादीनाम्" नुमि विन्दति ॥ विभावना ॥ मौक्तिकगुण्ठित-covered with pearls T- - ४३ Compare Gujarati Tun which means making a necklace not merely by putting the thread in the hole but in addition tying each pearl with the thread of gold or of silver or of any kind. This form is derived from the root . I think that yfusa is a Sanskritised form of arreġ though it is usually derived from गुठि वेष्टने. हारो नारोपित -Compare हारो नारोपितः कण्ठे मया विश्लेषभीरुणा। इदानीमन्तरे जाताः पर्वताः सरितो दुमाः ॥ See (सुभाषितरत्नभाण्डागार Page 297, slo. 1; ed. 1911. निर्णय- सागर प्रेस). The editor refers it to वाल्मीकि. श्लो. २९. विरहिणी पान्धमिया निशीथे प्रमनविलसच्चूतpमाणां बने पान्थपाणहरं कोकिलया कृतं रावं मुहुः श्रुत्य मूर्छामाप, पुनर्विबुध्य मनसा पत्युः स्मरन्ती ततः नयनाम्बुपूरं मुञ्चन्ती सस्वरमरुदत् ।। व्युपसर्गात् रहू त्यागे धातोः “पुंसि संज्ञायां घ. प्रायेण" इति सूत्रेण घप्रत्यये कृते विरह', विरहोस्या अस्तीति विरहिणी "अत इनिठनौ" इति इनिः स्त्रीत्वे डीपि णत्वे विरहिणीरूपम्। पन्थानं नित्यं गच्छतीति पान्थ । पथिन्शब्दस्य पन्थादेशः वृद्धिश्च । पान्थस्य प्रिया पान्थप्रिया। निशेरतेऽस्मिन् इति विग्रहे शीधातो निशीथगोपीथावगथा" इति सूत्रेण थक्प्रत्ययः, निशीथस्तस्मिन् निशीथे। चूतानां द्रुमाशूतद्रुमाः, प्रसूनैर्विलसन्तश्च ते चूतद्रुमा. तेषाम् । हरतीति हरः पचायच्" प्राणानां हर प्राणहरः, पान्थस्य प्राणहरः पान्थप्राणहरस्तम् । कोकते कोक आदाने लच् प्रत्यये इत्वे च कृते गुणे कोकिलपदस्य सिद्धिः कोकिलत्व- जातिविशिष्टा स्त्री कोकिला तया कोकिलया। कृतमित्यत्र कर्मणि क्तप्रत्ययः । रवर्ण राव भावे घञ् तम् रावम् । श्रुधातो क्त्वाप्रत्यये श्रुत्वेति। मूर्छनम् मूर्छा गुरोश्च हल" इति सूत्रेण अप्रत्यय टापि मूर्छा ताम् भूर्णीम् । आफ्धातोः परोक्षे लिटि प्रथमपुरुषैकवचने आप इति रूपम् । व्युपसर्गात् बुध्धातो क्त्वाल्यपि विवुध्येति रूपम् । पातीति पति. पातेर्डतिः, 'डित्वात् टिलोप पतिस्तस्य पत्यु ॥ पत्युः स्मरन्तीत्यत्र कर्मण. शेषत्वविवक्षायाम् पतिशब्दात्षष्ठी विभक्तिर्भवति । "कर्मादीनामपि ' सम्वन्धमात्रविवक्षायां पष्ठयेव" इति नियमात् स्मृधातोः शतप्रत्यये शवादिकार्ये कृते नुमि “उगितश्चेति" डीपि स्मरन्ती। तस्मादिति तत , तदशब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल्" सूत्रेण तसिल्प्रत्यये अत्वे पररूपे च तत इति। नयनयोरम्बूनि तेषां पूरः तं नयनाम्बुपूरम्,। मुच्धातोः शतृप्रत्यये नुमागमादिकार्ये कृते ङीपि च कृते मुञ्चन्ती। स्वरेण सह सस्वरम् यथा स्यात्तथा । अरुदत्॥ पत्युः स्मरन्ती- Compare मेघदूत- भर्तुः स्मरसि...
, श्लो. ३०. वसन्तात्यये (प्रातः) कर्णाटीकुचकोटिकेलिविलसल्लीलालसाः कासारप्रसरत्तरगततिषु क्रीडाकराः मल्लीजालविलासलालनकलाः अनङ्ग- सजरपरस्त्रीखेदविच्छेदकाः लोला: मारुताः प्रातान्ति मातःकाले बान्ति ।। वसन्तस्यात्ययः वसन्तात्यय । कर्णाट्याः कुचौतयो.कोटिस्तयो केलिस्तस्मिन् विलसन्तश्च ते लीलालसा' लीलया (लीलाभिः) अलसा' कर्णाटीकुचकोटिकेलि- विलसल्लीलालसा । कासारे प्रसरन्त कासारप्रसरन्तश्च ते तरङ्गास्तेषां ततयः तासु क्रीडां कर्तुं शीलं येषां ते क्रीडाकराः मल्ल्याः (मल्लीनां वा) जालानि तेपु विलासा- स्तेषु लालनकलाः लालनस्य कलाः मल्लीजालविलासलालनकलाः। नात्यग- मस्येत्यनङ्गः, अनङ्गस्य संगर. अनङ्गसङ्गर तस्मिन् परा अनङ्गसगरपरा, तत्परा चासौ स्त्री तस्या खेदस्तस्य विच्छेदकाः। कोटयति कोट्यते वा, कुट कौटिल्ये "अच इकोटिः। तन्धातो क्तिन्प्रत्यये तति , बहुवचने ततय । संगरणम् संगीर्य- ते वा गृशन्दे “ऋदोरप्" "पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण" । क्रीडाकरा इत्यत्र “कृञो हेतु" सूत्रेण टप्रत्यय , विच्छेदका इति एबुलन्त प्रयोगः ॥ अलङ्कारः परिकरः ॥ कुचौ स्तनौ । कासार. सरसीसर. ॥ मल्लीजाल-the more current form is मल्लिका-Jasminum used both for the plant and the flower. श्लो. ३१. ग्रीष्मे धारायन्त्रतुषारसारकणिकानि रितोष्मोदयम् श्रीखण्डागुरुधुपवांसरुचिरं सचन्द्रोदयम् इर्म्यम् पुष्पमयी च शय्या चन्दनरसः कर्पूरकस्तूरिका, स्वच्छं वास: अकञ्चुका प्रियतमा सुखस्यास्पदम् ॥ असते रसान्, ग्रसु अदने मक्प्रत्ययः, धातोीभाव पुगागमश्च तस्मिन् ग्रीप्मे । धारायाः यन्त्रं तस्य तुपारस्तस्य सारस्तस्य कणिकास्ताभिर्निवारितः ग्रीमो- दयो यत्र (यस्मिन् ) तन्। धूपस्य वास. धूपवास । श्रीखण्डश्च अगरु च धूपवासश्च श्रीखण्डागुरुधूपवासास्तै रुचिरं यत् तत् । चन्द्रेण सह सचन्द्रः, सचन्द्र उदयो यस्मिन् तत् सचन्द्रोदयम् । नास्ति कञ्चुको यस्याः सा अकञ्चुका। अतिशयेन प्रिया प्रियतमा। पुष्पप्रचुरा पुष्पमयी, प्राचुर्यार्थे मयट्, "टिड्ढाणम्” इति डीपि पुष्पमयी। शय्यते अस्याम् शोधातोः संज्ञायाम् “समजनिषद् " सूत्रेण क्यपि "अयङ्यि" सूत्रेण अयङ्, शय्या, स्त्रीत्वात् टापि । चन्दनस्य रस । कर्पूर- युक्ता कस्तूरिका कर्पूरकस्तूरिका। कसति गन्धोऽस्या इति विग्रहे, कस गतौ खादित्वात् ऊरप्रत्यय , पृषोदरादित्वात् कस्तूरी, तस्मात् स्वार्थ क "केऽण इति इस्वे टापि कस्तूरिका ॥ तुल्ययोगिता दीपकम् ॥ Compare the following two verses of ऋतुसंहार, सर्गः १, श्लोः २ &३ .
४५ निशाः शशाङ्कक्षतनीलराजय क्वचिद्विचित्रं जलयन्त्रमन्दिरम् । मणिप्रकारा' सरसं च चन्दनं शुचौ प्रिये यान्ति जनस्थ सेव्यताम् ॥ सुवासितं हऱ्यातलं मनोहरं प्रियामुखोच्छ्वासविकम्पितं मधु । सुतन्त्रिगीतं मदनस्य दीपनं शुचौ निशीथेऽनुभवन्ति कामिनः ॥ श्रीरण्ड:-Sandal or sandal tree. श्लो. ३२. इदं नु (दयितायाः) (मुखम् ) किमु नीरज (कमलम् ) (पङ्कजम् )। तद्धि (कमलम् ) (पङ्कजम् ) पङ्केरुहम् भवति । किमेष रजनीकरः। ननु सः ( रजनीकरः) लान्छनेनाङ्कितः । अथ मधुराधरं चलविलोचनं मस्मितं दयितामुखम्, इति विभाव्य वल्लभः हृदि मुदं दधे ।। नीरे जातं नीरजम् “सप्रभ्यां जनेर्ड "। पड्के रोहति इति विग्रहे, रुह प्रादुर्भाव इगुपधे" ति कः प्रत्ययः, तत्पुरुषे कृति बहुलम्" सूत्रेण सप्तम्या अलुक्, कित्वात् गुणाभावे पडूरुहम्। रजनी करोतीति विग्रहे ‘कृतो हेतु०" सूत्रेण ट- प्रत्यय , गुणे रपरे रजनीकर । लाञ्छ्यतेऽनेनेति ल्युट लाञ्छनम् तेन लाञ्छनेन । मधुरोऽधरो यस्मिन् तत् मधुराधरम्। चले विलोचने यस्मिन् तत् । स्मितेन सह सस्मितम् , स्मिङ् ईषद्धसने भावे क्तः। दयितायाः मुखम् दयितामुखम् । व्युपसर्गात् भू णिचि विभावि इत्यस्मात् क्त्वाल्यपि णिलोपे विभाव्येति रूपम् । धाधातो परोक्षे लिट् दधे ॥ निश्चयान्तसन्देह ॥ श्लो. ३३ स्निग्धः ( वत्सलः) प्राणनाथः सायं (सन्ध्याकाले) मन्द मन्दं (यथा स्यात्तथा) निभृतचरणं (यथा स्यात्तथा) तस्याः पृष्ठतोऽभ्येत्य (तस्याः) अक्षिणी करतलयुगलेन मीलयित्वा कामात् उल्लसन्त्याः प्रियायाः गल्लयोः विपुलपुलकमधरमधुरं वक्त्रम् (कामात् ) एवं चुम्बति ।। निभृतौ चरणौ यस्मिन् कर्मणि (यथा स्यात्तथा) तत् निभृतचरणम् । पृष्ठ- शब्दात् “पञ्चम्यास्तसिल्" पृष्ठतः। स्निह्यति स्मेति विग्रहे स्निह प्रीतो अकर्म- कत्वात् “गत्यर्थाकर्मके' ति क्त स्निग्ध । करतलस्य युगलम् तेन । भील संकोचे णिजन्तात् क्त्वाप्रत्यये इडागमे गुणे अयादेशे च मीलयित्वेति रूपम्। उल्लस- सीति उलसन्ती शतप्रत्यये ङीबादिकार्ये कृते उल्लसन्ती तस्याः। विपुलः पुलको यस्मिन् तत् विपुलपुलकम् । अधरेण मधुरम् अधरमधुरम्। अभ्याङ् इति युपसर्गात् इण्धातो क्त्वाल्यपि “ हूस्वस्य पिति कृति तुक्” इति तुकि यणि गुणे च अभ्येत्य। उच्यतेऽनेन वच परिभाषणे-“गुधृवीपचिवचि०" इति सूत्रेण अप्रत्ययो भवति कत्वं च वक्त्रम् । चुम्वति ।। स्निग्धो वत्सलः इत्यमर । वक्त्रास्ये वदनमित्यमर ॥ Compare अमरुशतक slo. 19-पश्चादुपेत्यादरात्.... , ४६ श्लो. ३४.(हे) सुतनु, अनङ्गकेलो मनसि मान मा आनय, स्वं दयितत-. मपि आलिङ्गनायेः मानय, इति निगदति पत्यौ मानतो नालपन्ती सा कठिन- कुचतटे नेत्रनीरं मुमोच॥ सुष्टु शोभना तनूर्यस्याः सा तत्सम्बुद्धौ सुतनु । नास्त्यद्गमस्येति अनङ्ग तस्य केलिस्तस्मिन् । दय्यते स्मेति दयित दयधातो.तप्रत्ययः । अतिशयेन दयित. (प्रिय )दयिततमः, अतिशायने “तमविष्ठनो०” इति सूत्रेण तमा, तम् दयिततमम् । आलिङ्गनानि आधानि येषु तानि आलिङ्गनाद्यानि (भोगरूपाणि वस्तूनि आलिङ्गनाये (संभोगरूपवस्तुभिः)। निगदतीति निगदन् तस्मिन् निगदति शत्रन्त- प्रयोगः । कुचयोस्तटम् कुचतटम्, कठिनं च तत् कुचतटम् च कठिनकुचतटम् तस्मिन् । नेत्रयो. नीरम नेत्रनीरम् । मुमोच मुचेलिटि मुमोचेति प्रयोगः । इति निगदितपत्यौ इति पाठे तु-इति निगदितं येन स इतिनिगदितः, इति निगदितश्चासौ पति इतिनिगदितपतिस्तस्मिन् इतिनिगदितपतौ इत्यनिष्टरूपापत्ति स्यात्, अर्थात् इतिनिगदितपत्यौ इति रूपं न स्यात्, “पति. समास एवे "ति नियमात् पति- शब्दस्य समासे एव घिसना भवति-घिसंज्ञाभावे पत्यौ रूपं स्यात् घिसंज्ञायां तु पतौ इति रूपं भवति । इतिनिगदितपत्यौ इत्यत्र समासत्वात् घिसंज्ञा भवत्येव । आहुपसर्गात् लपधातोः शतृप्रत्यये नुमादिकार्ये कृते ङीपि बालपन्तीरूपं भवति ॥ The reading of the Ms. Is दयत तमसि मं स्वः this does not give satisfactory sense, hence the emendation दयिततममपि स्वं . श्ली. ३५. (हे) सखि, कान्तागमस्येयमाशा अन्शिं मे हृदयं रुणद्धि, तत्सङ्गमाकाङ्क्षया मयापि कथंचिदसवः धार्यन्ते इति जल्पन्ती सा पथिकाङ्गना महमा प्रेयसः स्वरं श्रुत्वा सब्रीडा समुदेव साश्रुनयना सस्वरा सस्मरा(जाता )। आगमनमागम , कान्तस्यागम' कान्तागमस्तस्य कान्तागमस्य । अनिशम् (अहर्निशम्)। संगमनं संगम " " इति "सूत्रेण" अप्प्रत्ययो भवति, तस्य संगमस्तसंगमस्तस्य आकाङ्क्षा तत्संगमाकासा, तया तत्संगमाकाया। आङप- सर्गात् काक्षिधातो. “गुरोश्च हल" इति सूत्रेण अप्रत्यये इदित्वान्नुमि अनुस्वारे परसवर्णे च कृते टापि आकासा तया। णिजन्तात् वृधातो कर्मणि प्रत्यये धार्यन्ते इति रूप भवति । अल्पधातो शतृप्रत्यये कृते शवादिकायें कृते नुमागमे च कृते दीपि प्रत्यये जल्पन्ती इति प्रयोगो भवति । प्रशस्तान्यगानि अस्या इति विग्रहे अङ्गशब्दात् "अगात्कल्याणे” इति सूत्रेण नप्रत्यये कृते टापि अगनेति रूपम् । बीडया सह (वर्तते) इति विग्रहे “तेन सहेति तुल्ययोगे" सूत्रेण "समासे वोपसर्जन- स्य" इति सूत्रण सहस्य सादेशे सबीडा। मुदया सह समुदा। इव पूर्ववत् । अश्रुणा सह वर्तते इति साचणी, साश्रुणी नयने यस्या सा साधुनयना | स्वरेण (रे.) सहिता सस्वरा। स्मरेण सह सस्मरा ॥ उपमा ॥
४७ या श्लो. ३६. मत्तद्विरदभूपाललीलागतिरसालसा (मदालसा) मदालिग नलालसा लोलाक्षी वाला आयाति॥ द्वौ रदौ येषां ते द्विरदा, मत्ताश्च ते द्विरदास्तेषां भूपालस्तस्य लीला- गतिरिव गतिर्यस्या. सा मत्तद्विरदभूपाललीलागति । रसेन अलसा सा रसालसा (अथवा मदेन अलसा या सा) (अथवा मतद्विरदभूपालस्य लीलागतो (त्याः) रसस्तेन अलसा या सा)। मदालिङ्गने लालसा यस्या. सा मदालिगनलालसा। लोलाक्षी लोले अक्षिणी यस्या सा लोलाक्षी। माद्यतीति मत्त, मदी हर्षे “गत्यर्थाकर्मके" ति त. मत्तः। गमनं गतिः स्त्रियां क्तिन् । लोलाक्षिशब्दात् बहुव्रीहौ “ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षन्” इति षच् अनुवन्धलोपे षित्वात् डीब लोलाक्षी ॥ उपमा ॥ श्लो. ३७ सखि, निलये विलीनः (अहम् ) कान्तया सङ्गं संगम्य अनङ्ग- सरसैरङ्गैः रतपाण्डित्यं तनोमि ।। विशेषेण लीनः विलीनः, लीधातो. क्तप्रत्ययः, “आदितश्चे" ति सूत्रेण निष्ठा तकारस्य नकार.। रसै' सहितानि सरसानि। अनङ्गस्तेन (हेतुना) अथवा तद्वत्सरसानि तैः अनङ्गसरसै । रमणं रतम्, रतस्य पाण्डित्यम् रत- पाण्डित्यम् “ नपुंसके भावे क्तः", समुपसर्गात् गम्धातोः क्त्वाप्रत्यये तस्य ल्यबादेशे कृते "वा ल्यपि" सूत्रस्य विकल्पपक्षे संगम्येति रूपम्। सदसद्विवे- किनी बुद्धिः पण्डा, पण्डा साता अस्येति विग्रहे तदस्य संजातं "तारकादिभ्य इतम्" पण्डितस्तस्य भाव. कर्म वेति विग्रहे “ वर्णदृढादिभ्य ज्यञ्चे" ति सूत्रेण व्यञ्प्रत्यये वृद्धिश्च पाण्डित्यम् । श्लो. ३८. भूयोभिर्दिवसः देशान्तरादागतोऽयं मियतमः उचितं विद्वानपि जड़तास् तनोति (अथवा विद्वानपि जडतां तनोति इति उचितम् नोचितमित्यर्थ इति काकुः)। आलापमग्नो जनः ( सखीजनः परदुःखानमिज्ञत्वात् आलापमग्न इत्यर्थः। इत्यालोच्य विलासलोलनयना कामाकुला कामिनी निशि कान्ते सखीजने चैव तनौ दीपे दृशं संदधे ।। अन्यो देशो देशान्तरं तस्मात् । अतिशयेन प्रियः प्रियतमः। वेत्तीति विद्वान् । जडस्य भावो जडता ताम् । आलापे मग्न आलापमग्नः। विलसनं विलासः, विला- सेन लोले नयने यस्याः सा विलासलोलनयना। कामेन आकुला कामाकुला । देशान्तरादित्यत्रापादाने पञ्चमी। आगत इत्यत्र" गत्यर्थे" ति कर्तरिक । विद्वान् इत्यत्र विदधातो वसुनुमादिकार्ये कृते विद्वान् । प्रियतम इति तमवन्त । जडतेति तलन्त. प्रयोगः। आलपनमालाप इति घनन्तः प्रयोग । मग्नः मगि नुमि अचि मग्नः। आलोच्येति ल्यवन्तः। विलास इति घअन्त' । संघे इति परोक्षे लिट् ॥ विशेपोक्ति काकुश्च, उपमा ! - । .
૮ रूपम् । निर्गता तनोति जडतामालापमग्नो जन' etc Compare अमरुशतक slo 77. आयाते दयिते मनोरथशतैर्नीत्वा कथंचिदिनं वैदग्ध्यापगमाजडे परिजने दीघा कथां कुर्वति । दृष्टास्मीत्यभिधाय सत्वरपदं व्याधूय चीनांशुकं तन्वङ्गन्या रतिकातरेण मनसा नीत प्रदीप शमम् ॥ श्लो. ३९. (अहम् गच्छामीति (उक्त्वा) निवसतेः समुत्थितः कान्तः मया समालम्वितः विश्रब्धं (यथा स्यात्तथा) परिरब्ध एव हि (कान्तः) ततो निघणः ( हे )मात: यावदहं चिन्तातुरा विलासशयने सुप्तास्मि तावत् हसना तेन शनैः समेत्य चक्त्रे चिरं चुम्बिता (अहम्) ।। न्युपसर्गात् वस्धातोशितप्प्रत्यये कृते शवादिकार्ये कृते निवसतिः तस्याः निवसते । समुत् इति ट्युपसर्गात् स्थाधातो “गत्यर्थाकर्मक्रे ति सूत्रेण कप्रत्यये "दयति स्यति" सूत्रेणेत्वे पूर्वसर्वणादिकार्ये कृते समुत्थित इति रूपम् । समालम्बित इति कान्तप्रयोग । तस्मादिति तत. पञ्चम्यास्तसिल्प्रत्यये कृते अत्वे पररूपे च कृते तत इति घृणा यस्य (यस्मात्) स निघृण । यात इति तान्त- प्रयोग । चिन्तनं चिन्ता चिति स्मृत्याम् "चिन्ति पूजि०" सूत्रेण अङि टावि चिन्ता चिन्तया आतुरा चिन्तातुग । विलसन विलास भावे घञ्, विलासस्य शयनं विलास- शयन तस्मिन् विलासशयने । शी स्वप्ने भावे ल्युट् शयनम् । सुप्तेति कान्त- प्रयोगः। समाङपसर्गात् इण्धातोःक्त्वाल्यपि तुकि गुणे समेत्येति स्पम् । श्रन्भुधानोः क्तप्रत्यये नलोपे तकारस्य धकारे जश्त्वे विश्रब्धम् इति । पर्युपसर्गात् रमे. तप्रत्यये तकारस्य धकारे जश्त्वे परिरब्धः। हसतीति हसन् तेन हसता शत्रन्त- प्रयोगः॥ Compare अमरुशतक slo. 82 श्लो. ८०. (हे ) मुग्धे, विभ्रमालोकदर्श स्निग्धं नयनं रचय, (हे) सरले (वक्त्रे) कोमलालापरम्यां वाणी रचय, अथ रङ्गतमुललितमङ्गम् प्राणनाथे भावय, त्वं मिथः संकथास भूयो भूयो तदनुगा भव ।। विगतो भ्रमो यस्मात् यस्य वेति सविभ्रमः, आलोकनमालोक (घन्) विभ्रमश्चासावालोकश्च इति विभ्रमालोकस्तस्मिन् दक्षम् विभ्रमालोकदक्षम् । नीयतेऽनेनेति नयनम् ल्युट्प्रत्ययो भवति । आलपनमालापः भावे घञ्। कोमल- श्वासावालापश्च तेन रम्या ताम् कोमलालापरम्याम् । स्निह प्रीती इत्यस्मात् क्त- प्रत्यये स्निग्धमिति रूपम् । उच्यतेऽनेनेति विग्रहे बधातोः "गुधृवीपचिवचि" सूत्रेण अप्रत्यये कुत्वे च वक्त्रम् तस्मिन् वक्त्रे। रगिधातो रगति इति विग्रहे शहप्रत्यये रङ्गत् इति रूपम्, रङ्गत् च तत्सुललितम् च रङ्गसुललितम् । भावग्रे. त्यत्र भूधातोः णिजन्तात् लोटि मध्यमपुरुषैकवचने रूपम् । अनु पश्चाद् गच्छती- ति अनुगा, तस्य अनुगा तदनुगा, अनूपसर्गात् गम्धातोः “अन्येभ्योऽपि०" सूत्रेण डप्रत्यये टिलोपे टापि अनुगेति रूपं सिद्धम् ॥ श्लो. ४१. (हे ) विधिजे, प्रेमदारी कीहक भयकोपः तव मनसि वसति यः (कोषः) चाटुवाचां विधिजे नम्र पत्यौ न निरमति, एभिः कृत्यैरसुजनजनं पूर्ण- काम मा कृथाः, सुननं हर्षोत्कर्ष गमय (मापय), तं पति स्वीकुरुष्व ।। विधिं जानातीति विधिज्ञा, व्युपसर्गात् ज्ञाधातोः ' इगुपधज्ञाप्रीकिर कः इति सूत्रेण कप्रत्यये आकारस्य लोपे स्त्रीत्वविवक्षायां टापि तत्सम्बुद्धौ विधिने । (विधिज्ञ इति पतिविशेषणे विधि जानातीति विधिशस्तस्मिन् विधिज्ञे । ) प्रेम हतु शीलमस्येति अथवा प्रेम हरतीति प्रेमहारी, हृधातोणिनिः वृद्धि, दीर्घाटिकार्ये कृते प्रेमहारी पदस्य सिद्धिर्भवति । चाटवश्च ताः वाचश्च तासां चाटुवाचाम् । विरमतीत्यत्र " व्याङ्परिभ्यो रम” इत्यनेन परस्मैपदं भवति । न सुजनोऽसुजनः, अमुजनश्चासौ जनश्च असुजनजनस्तम् । कमनं काम', पूर्ण कामो यस्य सः पूर्णकामस्तं पूर्णकामम् । कृधातोरात्मनेपदे लुङि मध्यमपुरुषैक वचने माड्योगे "न माड्योगे” इत्यनेन अडागमाभावे मा कृथा इति रूपम् । शोभनो जनः सुजन. । उत्कर्षणमुत्कर्प, कृषेर्घ गुणश्च। हर्षस्य उत्कर्ष हर्षो- स्कर्पस्तं हर्षोत्कर्षम् । गम्धातोर्णिजन्तात् लोटि मध्यमपुरुषैकवचने गमय इति रूपम् । स्वीकुरुष्व लोटि मध्यमपुरुषस्यैकवचनस्य रूपम् । विशेषोक्ति ॥ कृत्यैरसजनजन-makes no sense; hence amendation कृत्यैर 'असुजनजनं श्लो. ४२. (हे) इरिणाक्षि, आक्लान्तस्तना इयं हारलतिका उच्चैस्तटा गङ्गा कमला त्वन्नीलरोमावली किल कालिन्दी विलसति, वक्रोक्त्या च सुललिता सरस्वतो (निलसति)। मध्ये मिधः सङ्गश्च, एताः (नधः) त्वयि तीर्थम् (तीर्थभावम) उपागताः (तस्मात् ) त्वमेव परं सेव्याऽसि ॥ हरिणस्य अक्षिणी इव अक्षिणी यस्या सा हरिणाक्षी तत्सम्वुद्धौ हे हरि- णाक्षि-हरिणाक्षीशब्दात् "बहुब्रीहौ सक्थ्यक्ष्णो स्वाहात् पच्” इति सूत्रेण पप्रत्यये षित्वात् डीपि हरिणाक्षी। आक्लान्तौ स्तनौ यया सी आक्लान्तस्तना। उच्चस्तटौ यस्या सा उच्चैस्तटा गङ्गा । हारस्य लतिका हारलतिका। नीला चासौ रोमावली, च नीलरोमावली, तव नील रोमावलीति त्वन्नीलरोमावली । कलिन्द- स्येयं कालिन्दी-इदमर्थऽण आदिवृद्धि की च भवति । वक्रा चासौ उक्तिश्च, वचधातो परिभापणे क्तिन् प्रत्यये संप्रसारणादिकार्य कृते उक्तिरिति रूपं भवति, तया वक्रोक्त्या। सरोऽस्त्यस्या इति विद्महे मतुपप्रत्यये मकारस्य वकारे कृते डोपि च कृते सरस्वतीपदस्य सिद्धिर्भवति । सुष्टु ललिता सुललिता सरस्वती ! सञ्जन सङ्गः भावे घञ् । तीर्यतेऽनेनेति विग्रहे वृधातो पातृ०” उणादिसूत्रेण थक प्रत्यये ईत्वे रपरत्वे च तीर्थम् । सेवितुमर्हा सेव्या पेव सेवायां धातो "अहे कृत्यतृचश्च" सूत्रेण ण्यति स्त्रीत्वविवक्षायां टापि सन्वे सेव्येति पदं सिद्धयति । गम्यते प्राप्यते मोक्षार्थिभिर्या सा गङ्गा, गम्धातो'गम्ययोः" सूत्रेण गन्प्रत्यय , तत स्त्रोत्वे टापि गङ्गा । उपमा रूपकं काव्यलिङ्गम ॥' In this verse the author compares the pearlnecklace to the Ganges, the darkısh hair on the body is compared to Yamunā, while the Speech is called Sarasvati All the three constitute in the Nayika, a tirtha, so she becomes सेव्या The same simile is repeated in S’lo 43 श्लो. ४३ (हे) पियतमे, (ते) वक्षोजाचलयातिनी विमला मुक्तालता जाह्नवी ते ललिता रोमाली कलिन्दतनया च पोय प्रयानेच तव मध्ये संगतयो- म्तयोः(नद्योः) सौम्य सङ्गमम् (अथच) संपाप्तं मनसोऽखिलममिलापं च सकामो ह्यहं सेवे (अथवा) सौम्ये तयोः संगमे संप्राप्तं मनसोऽखिलममिलापं सेवे ॥ अतिशयेन प्रिया प्रियतमा तत्सम्वुद्धी प्रियतमे, ' अतिशायने तमविष्ठनो' सूत्रेण तमम् । वक्षसि जातो वक्षोजौ “सप्तम्यां जनेर्ड वक्षोजावेवाचलौ, तत्र यातिनी वक्षोजाचलयातिनी, याधातो. “ नपुंसके भावे क्त." तस्मात् कान्तात् अत इनिठनौ-'इनि. डीप च यातिनी। विगतं मलं यस्या, विगतो मलो यस्याः सा विमला, मल धारणे अच् । मुक्तैव लता मुक्तालता (मुक्तावली)। जह्वोर- पत्यं स्त्री जाह्नवी अपत्याऽर्थेऽण वृद्धिगुणौ-अवादेशे डीपि च कृते जाह्नवी | रोम्णा- माली रोमाली, आ अलति अल्यते वा “सर्वधातुभ्य इन्” कृदिकारात् डी वा। कलिन्दस्य तनया कलिन्दतनया। प्रकर्षणोय प्रोवं, प्रयाता इव, प्रयाति स्मेति प्रयाता, कर्तरि क्त । सोम इव सौम्यः, “शाखादिभ्यो य" ततः "प्रज्ञायण" वृद्धिश्च, सौम्यस्तम्। संगमनं सगमस्तम् । ग्रहवृद इत्यए। संगतयोरित्यत्र कर्तरि क्तः। सम् प्रेति द्वयुपसर्गात् आफ्धातो क्तप्रत्यय । अभिलपणम् अभिलाष , लप कान्तौ घञ् तम् । पेड़ सेवने परोक्षे लिट् सेवे । रूपकम् उत्प्रेक्षा च ॥ सौम्यो वुधे मनोने स्यादनुग्रे-इत्यमर । श्लो. ४४. (हे ) मातः, मे (मम) परः शरीरपटिमा न ( नास्तीत्यर्थः ). भूलता न वक्रा, मम भीतिपरायणं (चेतः) अस्ति, मे (मम) लोचने चले स्थाने, न हृदि गोलको स्तनौ निर्याती, मम नितम्वस्थली अतिगुवौं जाता, (मम) मध्यं कापि गतम, मम चरणावपि मन्द गति संश्रितो । - मम माति गर्भोऽस्यां, मा माने “नप्तृनेष्ट" इति उणादिसूत्रेण तृप्रत्यय , मात- प्रथमैकवचने माता तत्सम्बुद्धौ मात । पटोर्भावः पटिमा “पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा इति सूत्रेणेमनिच् टिलोपे दीधैं पटिमा। शरीरस्य पटिमा शरीरपटिमा। भूरे- व लता धूलता। वञ्चतीति (वचु गतौ) “स्फायितश्चि० " सूत्रेण रक् स्त्रीत्वे टापि वक्रा। भीति क्तिन्प्रत्ययान्त , भीते परायणं, भीतिपरायणम् भीतियुक्त- मत्यर्थः । लोच्यते-आभ्याम् ल्युट् लोचने (लोच्लू दर्शने)। निरुपसर्गात् याते क्त (कर्तरि ) द्विवचने निर्यातौ। नितम्बस्य स्थली नितम्वस्थली। गुरुशब्दात् "वोतो गुणवचनात्" सूत्रेण डीए यणि गुर्वो। किम् शब्दात् किमोऽत्" इत्यत् 'क्काति" सूत्रेण किम् शब्दस्य क्वादेशः। गम्धातोः क्तिन् गतिस्तां गतिम् मलोपश्च । गतम् क्तान्तप्रयोगः । समुपसर्गात् श्रिधातो. क्तः, संश्रितौ ॥ श्लो ४५.(हे) वाले, स्वहृदये निरन्तरं धैर्य धेहि, (बाले) भयं मा कृथाः किल (निश्चयेन) वयःसंधौ स्त्रीणामीहगपाटवं किल समुत्पद्यते, तन्त्रज्ञः गद- लक्षलक्षणविधी, नथा निदाने दक्षः, (तथा) कलासु कुशलः ते (तब) दयितो वैद्य- स्तस्मै तनुं दर्शय ॥ स्वस्य हृदयं स्वहृदयं तस्मिन् स्वहृदये । निर्गतमन्तरात् अथवा निर्गतमन्तर- मस्मिन् इति निरन्तरम् । दधाति धीयते वा इति विग्रहे धाधातोः “ सुसूधाञ्- 'घुमास्थे 'ति ईत्वम्। धीर इति धीरस्य भावः कर्म वेति प्यञ् धैर्यम् । धाधातोलोटि मध्यमपुरुषैकवचने "ध्वसोरेद्धौ” इति सूत्रेण पत्वे अभ्यासलोपे च धेहि रूपम् । कृधातोरात्मनेपदे लुङि मध्यमपुरुषैकवचने मा योगेऽडागमाभावे सिचो लुकि मा कृथा । तन्त्रं जानातीति तन्त्रज्ञ "इगुपधे' ति क आकारस्य लोप तन्त्रज्ञः। वयस सन्धि' वय सन्धिस्तस्मिन् वय सन्धौ । वयते घय गतौ वेति वा वी गत्यादौ असुन् प्रत्यय वयः। संधानम् सन्धि' धान सर्गे धो किर्" इति किप्रत्यय सन्धि । स्त्यायन्ति गर्भा आसु इति स्त्रियस्तासां स्त्रीणाम् , स्त्यायतेर्डट् टिलोप यलोप टित्वात् ङीप् । पटोर्भाव कर्म वेति विग्रहे पटुशब्दात् इगन्ताच्च लघुपूर्वात्" इत्यण् वृद्धौ गुणे च पाटवम् , न पाटवम- पाटवम् । पद्गतौ दिवादि । समुद् इति युपसर्गात् पद् धातो श्यनि समुत्पद्यते । गदस्य लक्षं (लक्षसंख्याकम् ), लक्ष्यते इति लक्षम् घञ् गदलक्षम् । तस्य लक्ष- णम् , लक्षयतीति ल्युट् लक्षणम् तस्य विधिस्तस्मिन् विधीयतेऽनेनेति विधि, उपसर्ग घोः कि." इति किप्रत्यय. ॥ लक्षं व्याजशरव्ययो संख्यायामपि इत्यमर । A dialogue between an innocent young woman describing the signs of youth as if they were the symptoms of some disease, reassured by an elderly woman that these things happen when one passes from childhood to youth-and that her lover would be the proper physician to cure the trouble गृधिभ्य. क्रन् उप- ५२ श्लो. ४६. प्रोषितमतकाहृदि वह्नि भृशं सन्दीपयन् संभोनिगीनामनग- रङ्गाजनितामनग्लानि हरन बने जम्बूतरूणां फलं परिणति नयन् सुस्पर्शः युद्ध- प्रौढकदम्बपुष्पसुरभिश्च ग्रीष्मान्तवातो ववौ ॥ .4 प्रोपित. भर्ता यस्या' सा प्रोषितभर्तृका तस्या हृद तस्मिन् , प्रोयित- भतृशब्दात् विभृतीति भर्ता भृ तृच् " न दयूतश्चे"ति का टापि प्रोपितभर्तृका (अथवा प्रोषिता. भारः यासां तास्तासां हृदि)। संदीपयन समुपसर्गात् दीपेर्णि- चि शतप्रत्यय । संभोक्तुं शीलं यासां ता संभोगिन्यस्तासां संभोगिनीनां "सुप्य- जातौ णिनिस्ताच्छील्ये” इति णिनि । अनङ्गस्य रस्तेन जनिता ताम्-रज्यत्यस्मिन् इति रङ्ग । “अकर्तरि चे"ति सूत्रेण घञ् कुत्वं च । जनितेति तृजन्त । हरतीति हरन् । अगतीति अङ्गम् । नयतीति नयन् अगस्य ग्लानिस्ताम् । जम्वूनां तरवः जम्बूतरव तेपां जम्बूतरूणाम् । तरन्त्यनेनेति विग्रहे 'भृमृशील्" इत्युप्रत्यय , तरव । शोभनो स्पशो यस्य स सुस्पर्श' | ब्यूढाश्च प्रौढाश्च ते कदम्बाश्च ब्यूढमौढकदम्बा , ब्यूढपोढ- कदम्बानां पुष्पाणि तेषां सुरभिर्यस्मिन् स । ग्रीष्मान्तस्य वात । ग्रसतेरस्मान मप्रत्यय धातोीभावः पुगागमश्च । जंवूतरूणां etc The ripen of Jambu fruits at the end of summer and in the beginning of monsoon a significant feature of the Season in Gujarat "लो. ४७. वर्षागमे पद्धतौ उत्कलिकाकुलान् पान्थानतितरामुत्साहयन् कान्तासंगमरागिणां धृतिमतामङ्गे स्परं जीवयन् जातीकोरकजालमाशु दलयन् मेघोन्मुक्तपत्सु सिक्तवसुधागन्धं वहन् मारुतो वाति || वर्षणमस्त्यासु इति विग्रहे अर्श आदित्वादचि टापि वर्षा । आगमन- मागम. आडपसर्गात् गम्धातो “ग्रहवृदृ " सूत्रेण अप्प्रत्ययो भवति । वर्षाणा- मागम वागमस्तस्मिन् वांगमे। पादाभ्यां हन्यते-इति विग्रहे क्तिन्प्रत्यये हिमकापिहतिपु चे "ति पद्भावे पूर्वसवणे च कृते पद्धतिः तस्यां पद्धतौ । उत्कलिकाभिराकुला उत्कलिकाकुलास्तान् । पन्थानं नित्यं गच्छन्तीति पान्थास्तान् पान्थान् । उत्साहयतीति उत्साहयन् इति शत्रन्तप्रयोगः। रञ्जनं राग रज्यतेऽ- नेनेति वा राग रङ्ग् धातोः भावे करणे वा घञ् नलोपो वृद्धिश्च । संगमनं संगम "ग्रहवृद" सूत्रेण अप्प्रत्ययो भवति। कान्तानां संगम कान्तासंगम- स्तस्मिन् रागिणस्तेयां कान्तासंगमरागिणाम्रागा सन्ति येपाम् ते रागिण , रागिण इत्यत्र रागशब्दात् अत इनिठनौ" इति सूत्रण इनिप्रत्ययः। धरणं धृतिः तिन्प्रत्यये धृति एपाम् अस्तीति धृतिमन्तस्तेषाम् धृतिमताम् । जीवय:
५३ तीति जीवयन् । जातीनां कोरका तेषां जालम् । दलयतीति दलयन् । मेघैरुन्मु- क्तानि पृषन्ति तै सुसिक्ता वसुधा मेघोन्मुक्तपत्सुसिक्तवसुधा तस्या गन्धस्तम् वहतीति वहन् । स्वभावोक्तिः ॥ refa (f) = atafa - (lit.) foot-stroke, a way, a path Fife or जाती-(f.) The reading of the Ms जाता is obviously a scribe's error for जाती Jasminum grandiflorum Compare Gujarati जाई लो. ४८. कामालसः कोऽपि धन्यः पुमान धीरं मृदङ्गोपमम् अलं ध्वानं जलधरे कुर्वति गर्वितालिनिवहे परं गानं गायति (सति) वध्वा सार्धमतुलम- गारजालं संश्रित्य तडिदङ्गनागणकृत नृत्यं मानन्द समुट्ठोक्षते ॥ कामेन अलस. कामालस । धनाय हित इति विग्रहे धनशब्दात् यत्प्र- त्यये धन्य इति । पुनातीति पुमान् । मृदङ्गस्य उपमा यस्य स मृदङ्गोपमस्तम्। ध्वननं ध्वान इति घन्त , तं ध्वानम् । करोतीति कुर्वन् तस्मिन् कुर्वति । जलस्य (जलानां वा) धर जलधरस्त स्मित् जलधरे। गर्विताश्च ते अलयश्च तेषां निवहस्तस्मिन् । गीयते यत् तद् गानं गै ल्युट् आत्वे गानम् । गायतीति गायन तस्मिन् गायति । वध्वा इत्यत्र सहयुक्ते प्रधाने” इति सूत्रेण तृतीया भवति । न विद्यते तुला यस्य तदतुलम् । अगारस्य जालम् अगारजालम् । समुपसर्गात् श्रिधातो क्त्वाल्यपि संश्रित्येति । तडितः एव अङ्गनास्तासां गणः तडिदगनागण- स्तेन कृतम् । प्रशस्तानि अगानि आसामिति अगना अङ्गारल्याणे" इति न- प्रत्यय टापि अङ्गाना। आनन्देन सह सानन्दम् । समुद्रीक्षते इति न्युपसर्गात् ईश्धातो वर्तमानकाले समुदीक्षते रूपम् । रूपकम् ॥ मुमान - of the Ms. is clearly a scribe's error, अगार (n)-rarely m. House-apartment जाल a latice window अगारजालं-a latice window of a house This verse discribes charmingly the advent of the inonsoon as observed by two lovers from the latice window of their house. The metaphor of music and dance is beautifully worked out श्लो. ४९. (हे) सुभग, यतः(यत्र) स मम प्राणाधिनाथः तत्रैव त्वरित व्रज । तव वियोगे प्रियमपि जीवितं माय एतया त्यक्तम् । त्रैलोक्ये ईदृशमिद- मतिरूपं भूयोऽपि नो लभ्यते इति (हेतोः) त्वद्ध्यानलग्ना अपि प्राणाः तां न परित्यजन्ति ॥ यत इत्यत्र सार्वविभक्तिकतसिल् इतराभ्योऽपि दृश्यते " इति सूत्र- सामर्थ्याद यत्रेत्यर्थे तसिल् । त्वरते स्मेति विग्रहे जित्वरा संभ्रमे त्वर इति “ त्यदादिपुर धातो 'गत्याकर्मक०" इति क्तप्रत्यय, 'रुप्यमन्वरे" ति सूत्रेण इडागमे त्वरित- मिति शीघ्रमित्यर्थः । ब्रजधातोलोटि मध्यमपुरुषकवचने बजेति रूपम् । वियोजनं वियोगः तस्मिन् वियोगे । जीवधातो: क्तप्रत्यय इडागमश्चेति जीवितम् । त्यञ्धातोः क्तप्रत्ययः कुत्वञ्च त्यतम् । त्रयो लोकाः इति विग्रहे चतुर्वर्णादीनां स्वार्थ उपख्यानम्” इति वार्तिकेन प्यञ् प्रत्ययः, आदिवृद्धिश्च त्रैलोक्यम् , तस्मिन् त्रैलोक्ये । इदम् उपपदाद् दृश्धातोः इति सूत्रेण कञ्प्रत्यये कृते इदंकिमोरीएकी" सूत्रेण इदम्शब्दस्य ईशादेशे शकारस्येन्सनायाम् ईदृशमिति । अतिकान्तं स्पम् अतिरूपम् लभ्यते इति कर्मणि रूपम् । तब ध्यानमिति त्वयानं, त्वयाने लग्नाः न्वयानलग्ना. प्राणाः तां स्त्रियं न परित्यजन्ति ॥ यतः = यस्मिन् The reading of the Ms. Frafa does not yield good sense श्लो. ५०. पतद्गच्छन्निरालम्बान् आर्तिनोऽमृन् समम् (दृतम्) रक्ष, अग्र ( त्वया इदं वस्तु ) वो (युप्माकं ) मर्तुः( भत्रे ) निवेद्यम् । प्राणनाथमिहानय । " पतन्तीति पतन्त., गच्छन्तीति गच्छन्त., निर्गत. आलम्बो येषां ते निरा- लम्बा , पतन्तश्च (ते) गच्छन्तश्च (ते निरालम्वाश्च (ते) पतद्गच्छन्निरालम्वास्तान् । अस्यन्ते अस्यन्ति वा असु श्रेपणे ‘स्व॒स्निहि०" इत्युप्रन्ययः, असवस्तान् असून । आहुपसर्गात् ऋधातोः क्तप्रत्यये अनुवन्धलोपे आ ऋत इत्यत्र " उपसर्गा- दृति घातौ” इति वृद्धौ रपरे अतिशब्दात् इनिप्रत्यये आतिन् तस्य द्वितीयावहु- वचने आर्तिन | असून् समं दृतं वा रक्ष । न्युपसर्गाद्विधातोः, ऋहलोय॑त् मूत्रेण ग्यति निवेद्यम् निवेदितुमर्हम् । त्वया इदं वस्तु वो भर्तु युष्माकं भत्रे, विभर्ति भरतीति भर्ता तस्य भर्तु भृ तृन भर्ता, अस्मिन् इति । इह इदम्शब्दात् इदमो हः” सूत्रेण हप्रत्ययः । TOE -- The whole compound qualities speed HTTTT-The reading of the Ms. makes no sense श्लो ५१, नीरथरानीके निजनाथानता नारी नेत्रनीरज़निर्गतम् अनेक- धार नोरं निरस्यति (दूरीकरोति) ।। नीराणां धरः नीरधरस्तस्यानीकस्तस्मिन् । अननम् अनीक. अन गतौ अन प्राणने वा। अनीकादकश्च” इति वार्तिकेन साधुः । निजनाथे आनता निज. नाथानता आहुपसगात् नमे कर्तरि क्तो मलोपश्च स्त्रीत्वविवक्षायां टाए आनतेति । नरस्य नुर्वा जानिरिति विग्रहे "नृनरयोवृद्धिश्वे" ति वर्तिकेन डोर वृद्धिश्च नारी, . अथवा नुर्नरस्य वा धर्म आचारोऽस्याः नृनराभ्यां च वा” इति वार्तिकेन अञ् वृद्धि: डीए नारी । नीरे जाते नीरजे 'सप्तस्यां जनेर्डः" । नेत्रे एव नीरजे नेत्रनीरजे। नेत्रनीरजाभ्यां निर्गतं नेत्रनीरजनिर्गतम् । अनेको धारो यस्य तत् , धार्यते इति धार धृधातोः णिजन्तात् घञ् अथवा धाराया इदम् धारम् , इदमर्थेऽण, अनेकं धारं यस्य तत् नीयते इति नीरम् “स्फायि०" इत्युणादि- सूत्रेण रकं नीरम् । दिवादि असु क्षेपणे निरुपसर्गात् अस् धातोः वर्तमानकाले निरस्यति दूरीकरोतीत्यर्थः ।। जलधरासारवर्पणम् इति हैमः । अनीकोऽस्त्री रणे सैन्ये इति मेदिनी ॥ श्लो. ५२ धर्मान्ते दोलत्कुण्डल चश्चलांशुललितैः (लसितैः) आलोकिता- शामुखः (प्रकाशिताशामुख इत्यर्थः) कणमेखलाकलकलव्याजेन धीरक्षनि कुर्वन् जलबिन्दुसुन्दरतरः (स्त्रीपक्षे धर्मजलबिन्दुः) तापापनोदाय शक्तोऽयं सुपयोधरः तव ( त्वद्र्पधनः ) घनः मे चेतः प्रमोदं नयेत् ।। जिघर्त्यगमनेन इति विग्रहे घृ क्षरणदीपयो घृधातो “ धर्म" सूत्रेण धर्म- इति निपातितः, धर्मस्यान्तःधर्मान्तस्तस्मिन् । कुण्डते कुण्ड्यते वेति विग्रहे वृषादि- त्वात् कलच् कुण्डलम् द्विवचने | दोला इव आचरतीति दोलति, दोलन्ती च ते कुण्डले दोलत्कुण्डले, ते एव चञ्चलांशूनी, तयोर्ललितानि तै: (लसितानि तैलेसितै- रित्यर्थः) । आशायाः मुखम् आशामुखम् ( अथवा आशानां मुखानि आशा- मुखानि) आलोकितानि प्रकाशितानि आशामुखानि येन सः आलोकिताशामुखः । कं शुभं कणति कणशब्दे अच् मखी गति लातीति मेखला पृषोदरादित्वात् साधु कङ्कणे च मेखला च कङ्कणमेखला: तासां कलकल तस्य व्याजस्तेन । धीरश्चासौ ध्वनिश्च धीरध्वनिस्तम्। करोतीति कुर्वन् । अतिशयेन सुन्दर: सुन्दरतरः । जलानां विन्दवस्तैः सुन्दरतरः। पयसां धरः पयोधरः शोभनश्चासौ पयोधरश्च सुपयोधरः । अपनुतीति अपनोदः पचाद्यच् तापस्यापनोदस्तस्मै । तव धन इत्यत्र ‘राहो शिर” इतिवत् अभेदे षष्ठी । अपह्नुति रूपकं समासोक्तिश्च ॥ . घनः सुपयोधरः-There is a pun on घन सुपयोधरः। + . श्लो. ५३. (हे) सखि, उत्तुङ्गापतिपीवरावतितरां पीनौ सुतीक्ष्णाननौं वक्षोजन्मशिलोच्चयो (स्तनौ स्तः) परं कृशाङ्गे मम कान्तः (तम् कान्तम् ) यदि उपरि (स्तनयोरुपरि ) कुर्या ( तदा मरुता हेतुना) प्रयाति (दूरोभवति ), इत्थं तनौ न विद्यते (स कान्तः) तस्यैव (कान्तस्यैव) प्रतिपालनप्रवणया मया रात्रिीयते ।।
उद् ऊर्च तुङ्गो उत्तुड्डौ उदुपसर्गात् तुजि हिंसायाम् धातोः उत्तुञ्जयेते इति विग्रहे घनं कुत्वं च उन्झौ । प्यायेते इति विग्रहे प्यैधातो 'छित्वर०" इति सूत्रेण निपातौ । पीवरी अतिशयितौ पीवरौं अतिपीचरौ । अतितराम् (अत्यन्तम् ) प्यायेते स्मेति विग्रहे ओप्यायी वृद्धौ धातोः “गत्यर्थाकर्मके "ति सूत्रेण क्तप्रत्यय. ' ओदितश्च" इति नत्वम् , प्यायः पीति पीनौ । सुतेजयत इति विग्रहे तिजे"दीर्घश्चे" ति सूत्रेण स्नक्प्रत्यये सुतीक्ष्णे इति, सुतीक्ष्णे आनने ययोस्तौ सुतीक्ष्णाननौ । वक्षसि जन्म ( वक्षसो वा जन्म ) ययोस्तौ चक्षोजन्मानौ । शिलानामुच्चयो शिलोच्चयो, वक्षोजन्मानावेव शिलोच्चयो वक्षोजन्मशिलोच्चयो । कृशमङ्गं यस्य सः कृशाङ्गः। तं कान्तं यदि स्तनयोरुपरि कुर्या तदा तत्र स्थातुं न श- क्नोति । अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्थम् “इंदमस्थमु०" । तनोति तन्यते वेति तनुः भृमृशि०” सूत्रेण उप्रत्ययः तनुस्तस्याम् तनौ । प्रवन्ते गच्छन्ति सुखार्थ जना-अत्रेति विग्रहे घुङ् गतौ धातो ल्युट अनादेशश्चः स्त्रीत्वविवक्षायां टापि प्रवणा तया प्रवणया। प्रत्युपसर्गात्पाल्धातोर्युट् प्रतिपालनम्, प्रतिपालने प्रवणा तत्परा प्रतिपालनप्रवणा तया । नीधातो कर्मणि प्रत्यये नीयते इति रूपस्य सिद्धिः । रूपकम् ॥ The reading of the Ms Threat is obviously a scribe's error. Similarly also utzut in the second line विद्यते-The reading of the Ms विध्यते can also be made to yield the some sense face seems better नेत्थ तनो should be read as नेत्थ तनौ तन् धातो . श्लो. ५४. (हे) सखि. कृष्णातुरो दयितः ममाधररसं नितान्तं पीत्वा मनसि यत् प्रमदं प्रपेदे तेन (प्रमदेन ) (कारणेन ) मत्तः सः मुक्तांशुकां वश्यां मां परिरभ्य तदुचितं च समाचचार । तृष्णया (तृष्णाभिर्वा) आतुर तृष्णातुर , तर्पणम् तृष्णा मितृप् पिपासायाम् , तृष्धातो ' तृपिशुपिरसिभ्य. कित्" इति न स्त्रीत्वात् टाप्- तृष्णा । आप- सर्गात् तुर त्वरणे धातो "इगुपधे'ति कः आतुर । दय्यते स्मेति दयित दय्धातोः क्तप्रत्यय' इडागमश्च । अधरस्य रस. अधररसस्तम् । पाधातोः “धुमास्थे" ति ईत्वे पीत्वा । प्रकृप्टो मदः प्रमदः प्रोपसर्गात् मदीधातो: 'प्रमदसंमदो ह" इति सूत्रेण अ-प्रत्ययः प्रमदस्तम् । प्रपदेलिटि प्रपेदे । अंशुभिः काशते इति अंशुकम् कौर दीप्तौ 'अन्येभ्योऽपि डः' मुक्तमंशुकं यस्याः सा मुक्तांशुका ताम् । वशमधीनत्वं गता इति वश्या तां वश्याम् । वशंगत इति यत् स्त्रीत्वे टाए वश्या ताम् । पर्युपसर्गात् रम्धातोः क्त्वाल्यपि परिरभ्येति रूपम् । समाचचार-समाङिति व्युपसर्गात् चरधातोः लिटि प्रथमपुरुषैकवचने रूपम । वचधातो. कितन्प्रत्ययः उचितं युक्तम् , तस्योचितं नदुचितम् ॥
मलिनस्य भावः ५७ श्लो. ५५. इयं जलदमण्डली नभः मलिनतां प्रापयेत , प्रथमयौवनाऽति- मदनातुरा कामिनी गृहे (वर्तते), अहं तु कुसुमवाणवाणादितः पथि निष्ठितः, पर विरहनिघृणः विधिः अहो कथं विधाता ।। जलं ददातीति जलदः, “आतोऽनुपसर्गे कः" जलोपपदात् दाधातोः कप्रत्ययः आकारस्य लोपः। मडि भूषायाम् मण्डयति भूषयति, मण्डली, मण्डधातोः कलच् प्रत्यय. मण्डलम् , मण्डलमस्त्यस्या इति-गौरादित्वात् डीब् मण्डली। तस्य भावस्त्वतलौ" इति तल्, मलिनता ताम्। प्रोपसर्गात् आएधातोः णिजन्तात् विध्यर्थे लिङ् प्रथमपुरुपैकचने रूपम् । यूनो भावः इति विग्रहे “हायनान्तयुवादिभ्योऽण् वृद्धिश्च यौवना अन्" इत्यनेन प्रकृतिभावः, प्रथमं यौवनं यस्याः सा प्रथमयौवना। अतिशयितश्चासौ मदनश्च अतिमदनस्तेन आतुरा अतिमदनातुरा। गृह्णाति धान्यादिकमिति गृहम् तस्मिन् गृहे, ग्रहधातोः गेहे क"-सूत्रेण कप्रत्ययः संप्रसारणं च। वणनम् बाण वणशब्दे घञ्, कुसुमं वाणोऽस्येति कुसुमवाण , वणशब्दं स्वार्थण्यन्त पचाद्यच्, कामः । कुसुमवाणस्य बाणाः कुसुमबाणवाणास्तैरर्दित । विरहविपये विरहे निर्गता घृणा (दया) यस्य (यस्माद्वा) सः विरहनिघृण.। न्युपसर्गात् स्थाधातो कर्तरि क्तप्रत्यय. इत्वे 'दयतिस्थति०' सूत्रेण इत्वे उपसर्गादिति पत्वष्टुत्वे निष्ठित ॥ विधाता लुट्ल- कारस्य रूपं विधास्यतीत्यर्थे । विधा-किः विधिः ॥ काव्यलिङ्गम् ।। श्लो. ५६. सुस्पर्शः शालिगोपी (प्वी) विकचकुचतटाभोगयोगाभिरामाः मोन्मीलत्सप्तपर्णप्रसवपरिमलप्राप्तसौभाग्यभोग्याः केदारोद्दारिवारिमसमरकुमु. दान्दोलनप्रौढलीलाः पान्थस्त्रीणामनिष्ठाः पियरतसुखदाः शारदा वाताःवान्ति ॥ शोभनः स्पों येषां ते सुस्पर्शा: (घनन्तः) शालीनां गोप्य. (गोव्यः) तासां- विकटाश्च ते कुचतटाश्चस्तेषामाभोगा (घअन्तः) तेषां योगा (घप्रत्ययान्तः) तैरभिरामाश्च ये-(मनोहरा इत्यर्थ)। प्रोन्मीलन्ति काण्डे काण्डे, सप्तपर्णानि येषां (येषु वा) ते, तेषां प्रसवाः (“ऋदोरप्") तेषां परिमला । मल्यन्ते कर्मणि घञ् तै प्राप्त सौभाग्यं येषां ते, तेन (हेतुना) भोग्याश्च ये। केदाराणामुद्दारीणि च तानि वारीणि च तेषु प्रसृमराणि च तानि कुमुदानि च, तेषामान्दोलनानि तेषु प्रौढा लीलाः येषां ते। पन्थानं नित्यं गच्छन्तीति पान्थाः, पथिन्–शब्दात् '" पन्थो ण नित्यम्" इति णप्रत्ययः इति सूत्रेण पथिन्-शब्दस्य पन्थादेशः वृद्धिश्च । पान्थानां स्त्रियः, पान्थस्त्रियस्तासा पाथस्त्रीणाम् । न इष्टा अनिष्टाः, कर्मणि क्त । रमणानि रतानि भावे क्त , प्रियाणां रतानि प्रियरतानि तेषु। सुखं ददतीति सुखदाः " आतोऽनुपसर्गे कः" इति कप्रत्यय । शरदि भवा इति विग्रहे इति सूत्रेणाण वृद्धिश्च शारदा । वाता: वान्ति। गोपायन्तीति गोपा, पचायच्, गोपानां स्त्रिय गोप्य, गोपायन्तीति गोप्यः, गुपधातोः तृचि डोपि गोज्य ॥ स्वभावोक्तिः ॥ पथ पन्थ - " तत्र भव ८ शारदा. वाता:-the autumnal winds. ५ श्लो. ५७. (हे) कान्ते, कान्तांशुजृम्भितविलोचनकैरवोऽपि एषः त्व- द्वक्त्रशारदनिशाफरः मामतनून्माद्य निकामं मोहयते, अतो मम मनो मदना- घिल्लं कुर्यात् ॥ कम्यते स्मेति विग्रहे कमु कान्तौ धातोः णिडभावे क्तप्रत्ययो दीर्घश्च कान्तः, स्त्रीत्वविवक्षायां टापि कान्ता, तत्सम्बुद्धी कान्ते । कान्तोश्च ते अंशवश्च तैर्नृम्भितानि विलोचनानि एव कैरवाणि येन सः। तव वक्त्रम् इति त्वद्वक्त्रम् । उच्यतेऽनेनेति वक्त्रम् , वचे. प्रत्यये वक्त्रम् । शरदि भवः शारदः, तत्र भवः” इति सूत्रेण भवार्थेऽण् वृद्धिश्च शारदः । निशायाः करः निशाकर', शारदश्चासौ निशाकरश्च शारदनिशाकर । त्वद्वक्त्रमेव शारद निशाकरः त्वद्वक्त्रशारदनिशाकर । तन्यते- तनु विस्तारे धातोः "तनिचरि० इत्युणादिसूत्रेण उप्रत्यये तनु । काये त्वचि स्त्री स्यात् त्रिष्वल्पे विरले कशे-इति विश्वमेदिन्यौ। न तनु अतनु । उदुपसर्गाद् मदी- धातोणिचि णिजन्तात् क्त्वाल्यपि उन्मायेति रूपम्। मदयतीति मदनः घटादि ल्युद, मदने (मदन विपये) अधिस्ढम् अध्युपसर्गात् रहे: कर्तरि क्तः। निकामम् अत्यन्तम् । मुहेणिजन्ताद् धर्तमाने लट् मोहयते ॥ रूपकम् ॥ Filmiy-the moon as well as the lustre of the beloved. श्लो. ५८. (हे) प्रिये, निश्वासेन त्वधरमधुरं त्वं कपोले धत्से यत्र (ते कपोले) रुचिररचनाः वल्ल्यः पाणिना संमृज्यन्ते (दीक्रियन्ते) पत्युक्यिं श्रुतमपि तत् (वाक्यं ) त्वन्मनस्तापहन्तु न) ते (तव ) सजडहृदये एतौ मन्युमानी जाती ।। निश्वसनं निश्वास घ, तेन निश्वासेन । अधरस्य मधुरत्वमधरमधुरत्वम् , मधुरस्य भाव. मधुरत्वम् "तस्य भावस्त्वतलौ" इति त्वप्रत्यय । रुचिराच ताः रचनाश्च, रच् प्रतियत्ने चुरादि “ण्यासग्रन्थो युच" इति युचि "युचौरनाको इति अनादेशे टापि बहुवचने रुचिररचना । वल्ल धोतो "सर्वधातुभ्य इन्" इति सूत्रेण इन् बहुवचने वल्ल्य.। शुधातो क्तप्रत्ययः श्रुतम् । तब मनस्त्वन्मनस्त्वन्म- नस तापहन्तृ त्वन्मनस्तापहन्त-तपनं ताप' घञ्, हन्तीति हन्तु, तापस्य हन्त । जडेन सह सजड, सजडं च तद् हृदयं च सजडहृदयं तस्मिन् , अथवा सजडं हृदय यस्यां सा सजडहृदया तत्सम्बुद्धौ। मन्युश्च मानश्च मन्युमानौ। घाघातो. वर्तमानकाले मध्यमपुरुषकवचने आत्मनेपदे धत्से इति रूपम् ॥ पल्ल्यः-see the note on पत्रावलि of slo i.
५१ श्लो. ९, परिमलमिलितालिर्मालतीपुष्पमाला, मुरभिसृणमिश्र चन्दनालेपनं, तुहिनकिरणरश्मिश्चञ्चला चापि दोला कामलोला (च) कामिनी शरदि सुखविभूत्यै (भवतीत्यर्थः) ।। परिमलेन मिलिताः परिमलमिलिता', परिमलमिलिताः अलयो यस्यां सा परिमलमिलितालि', अल भूषणे "सर्वधातुभ्य इन्” अलिः। मां लक्ष्मी लतति (वेष्टयति) लत्धातोः मूलविभुजादित्वात् कः गौरादित्वात् ङीप् मालती। मालत्या पुष्पाणि तेषां माला मालतीपुष्पमाला, मां लक्ष्मों लातीति माला लाधातो. कप्रत्यय स्त्रीत्वात् टाए माला। सुरभीणि च तानि घुसणानि च तैः मिश्रम् , घुण्यते स्तूयते घुष्धातो. बाहुलकात् ऋणक् प्रत्ययः । ल्युडन्त. पृषोदरा- दित्वात् साधुः। चन्दनैरालेपनं चन्दनालेपनं, चन्दयति चदि आह्लादने ण्यन्तात् ल्युट् चन्दनम् । तुहिना किरणाः यस्य सः तुहिनकिरणस्तस्य रश्मि तुहिनकिरण- रश्मि । कीर्य्यन्ते विक्षिप्यन्ते रश्मय अस्मात् इति किरणाः 'कृष०" इत्युणादिसूत्रेण क । चम्चु गतौ घन्, चञ्चं लाति इति विग्रहे कप्रत्ययः टापि चञ्चला। दोल- यतीति दोला दुल उत्क्षेपे पचायच'' टाप् दोला। काम्यतेऽनेनेति काम पुंसि संशायां घः" इति घः, तेन कामेन लोला कामलोला । सुखस्य (सुखानां वा) विभूतिस्तस्यै, व्युपसर्गात् भूधातोः खियां क्तिन् ॥ दीपकं स्वभावोक्तिश्च ॥ घुसण-saffron : This is a word of · rare occurance. It is used by Kashmiri poets. See विल्हण's विक्रमाङ्कदेवचरितम् , XI-1. श्रीहर्ष the author of नैषधीय० who is fond of using rare words also uses this word. See नैषधीय० VIII-80. See also for unusual words, the vocabulary of sites given by Handuqiui. श्लो. ६०. (हे) सखि, आदौ प्रणयेन कलहो बभूव, शयने पराङ्मुख- तया कश्चित्काल प्रयातः, पुनर्विचिन्त्य पत्युर्मुखं मयैलि, तेन (पत्या) इदमदम् अतिमात्रमधरे गृहीता॥ समान ल्यायते जनैरिति सखी तत्सम्बुद्धौ सखि। आदीयते (प्रथम) -गृह्यते इति आदि. आकुपसर्गात् दाधातो. " उपसगै घोः किः" इति सूत्रेण कि- प्रत्ययः आकारलोपश्च आदिरित्यस्य सिद्धिः, तस्मिन् आदौ । प्रणयनं.प्रणयः णीन प्रापणे धातोः एरन् तेन प्रणयेन। कलस्य हननम् कलहः, अन्येभ्योऽपि उप्रत्यय कलहः । बभूवेति परोक्षकालस्य रूपम् । पराञ्चति अनभिमुखो अवतीति विग्रहे, अञ्च गतिपूजनयो' धातोः क्विनि प्रत्यये नलोपादिकार्ये कृते.पराक इति प्रयोगो भवति, पराक् मुखमस्येति पराङ्मुखस्तस्य भाषः, भाषा) तल् स्त्रीत्वे च परामुखतया। शय्यते अत्र इति शयनम् , अधिकरणे ल्युट् ६० प्रत्ययः, तस्मिन् शयने। प्रोपसर्गात् याधातो "गत्यर्थ "ति कतरिक्त प्रयातः। व्युपसर्गात् चिन्तधातोः क्त्वाल्यपि च कृते विचिन्त्येति स्पं भवति । ईक्ष दर्शने धातोः कर्मणि लुङि क्षीति रूपम्। मात्रा (स्तोकम) तामति- क्रान्तम् गोस्त्रियोरुपसर्जनस्ये "ति ह्रस्वे अतिमात्रम्। गृहधातोः कर्मणि तप्रत्यये संप्रसारणे इडागमे दीर्धे टापि च ते गृहीतेति रूपम् ।। हमिय should be corrected as हमियं The reading of the Ms हमीय is obviously an error. Compare अमरु० slo. 23. श्लो. ६१. पुरुषेषु (विषयेषु) कामिन्याः भ्रूवल्लीकोदण्डीयति, (कामिन्याः) नयनं च मार्गणीयति, (कामिन्याः) वेणिचटुला लमल्लोलं (यथा स्यात्तथा) कृपाणीयति, (कामिन्याः) द्वारावली प्रत्यञ्चीयति च, (कामिन्याः) नासिका इषुधीयति, तथा सुन्दरतरं तत्कर्णपालीयुगं सोल्लासपाशीयति ॥ पुरन्ति पुर अग्रगमने धातो. पुर कुपन् प्रत्यये-अनुवन्धलोपे च कृते पुरुषास्तेषु पुरुषेषु। भूयान् कामोऽस्त्यस्या इति कामिनी-" अत इनिठनों इति सूत्रेण इनिप्रत्यये डीपि च कृते कामिनी, तस्या कामिन्या । भूरेव वल्ली भ्रवल्ली-भ्रूवल्ली आत्मानं कोदण्डमिव आचरति इति विग्रहे “ उपमानादाचारे इति सूत्रेण आचारेऽर्थे क्यचि कृते “ क्यचि चे" ति सूत्रेणाकारस्य इत्वे च कृते कोदण्डीयतीति रूपस्य सिद्धि.। नीयतेऽनेनेति नयनम् ल्युट प्रत्यय । मार्गणमिव आचरतीति विग्रहे आचारेऽर्थे श्यचि इत्वे च कृते मार्गणीयति । चटुश्चासौ वेणिश्च इति विग्रहे राजदन्तादित्वात् वेणिशब्दस्य पूर्वनिपातः, अथवा पृपोदरादित्वात्पूर्वनिपातः, अथवा चटुला विद्युद् वेणिरेव चटुला वेणि चटुला-लसन्ती चासौ लोला चेति लसल्लोलं यथा स्यात्तथा। कृपाणमिव आचरतीति विग्रहे क्यचि प्रत्यये कृपाणीयति। हारस्यावली हारावली-हियते मनोऽनेनेति हार । प्रत्यञ्चामिव आचरतीति विग्रहे क्यचि प्रत्यञ्चीयति । नासिका इषवो धीयन्तेऽत्रेति विग्रहे “कर्मण्यधिकरणे चे" ति सूनेण धाधातो. किप्रत्यये पुधि-पदस्य सिद्धिर्भवति, इपुधिमिवाचारतीति विग्रहे क्यचि कृते इषुधीयति इति पदस्य सिद्धि'। अतिशयेन सुन्दरमिति सुन्दरतरम्। तस्या कर्णपात्यो- युगं तत्कर्णपालीयुगम् । पाझ्यते पाश घम् । उल्लसनमुल्लासः घम्, उल्लासेन सह (वर्तते) इति सोल्लासः, सोल्लासश्चासौ पाशश्च सोल्लासपाशः, सोल्लासपाशमिय आचरतीति विग्रहे क्यचि सोल्लासपाशीयतीति रूपस्य सिद्धिर्भवति ॥ उपमारूपके॥
श्लो. ६२. (हे) भीरु, ते वक्त्रेन्दुच्छत्रम् आसीत्, ईस्मितमपि कुसुमम् आसीत् , (ते) भूलता चापम् आसीत , (ते) नेत्रद्वन्दं शरौघाः (आसन् ), श्रवण परिलसत्कुण्डले दीपमाला (आसीत् ), (तव) वक्षोजौ हेमकुम्भौ (आस्ताम् ). (ते) जघनपरिसरे सिहासने (आस्ताम् ), हृदिभुवा (ते) वपुषि बाल्यं जित्वा यौवनस्याभिषेक अतिचक्रे ।। . विमेतीति भीरूः, "ऊडत" इति ऊन दीर्घे भीरूस्तत्सम्बुद्धौ भीरु । भियः कुक्लुकनौ क्रु भीरुः। इन्दतीति इन्दुः, वक्त्रमेवेन्दुः, वक्त्रेन्दुरेव च्छत्रम् । भूरेव लता भूलता। नीयेते आभ्याम् इति नेत्रे, नेत्रयोर्द्वन्द्वम् (युगलम् )। शराणामीघाः शरौघाः। परिलसन्ती च ते कुण्डले च परिलसत्कुण्डले, श्रवणयोः परिलसत्कुण्डले श्रवणपरिलसत्कुण्डले, कुण्डते वृषादित्वात् कलच् कुण्डलम् । मां (लक्ष्मीम् ) लातीति माला, दीपानां माला दीपमाला। वक्षसि जातौ वक्षोजौ सप्तम्यां जनेर्डः।" हेम्न. कुम्भौ हेमकुम्भौ । जघनयोः परिसरे जधनपरिसरे, परितः सरतः अत्रेति परिसरे। सिंहचिह्निते आसने सिंहासने, मध्यमपदस्य लोपः। हृदि भवतीति हृदिभूस्तेन हृदिभुवा, कर्तरि क्किए “हलदन्तात्सप्तम्या : संक्षायाम्" इत्यनेन सप्तम्या अलुक् । बालस्य भावः बाल्यम् , ब्राह्मणादित्वात् प्यम् । यूनो भाव इति विग्रहे हायनान्तयुवादिभ्योऽण् वृद्धिश्च अन्" इत्यनेन सूत्रेण प्रकृतिभावः यौवनम् तस्य यौवनस्य। जिधातोः क्त्वाप्रत्यय जित्वा कि- त्वात् गुणाभाव:। अभिसिञ्चनमभिषेक • अभ्युपसर्गात् सिच्धातोर्भावे घञ् गुणे षत्वे कुत्वे च अभिषेकः। अत्युपसर्गात् कृधातोः कर्मणि लिट् प्रथमपुरुषैक- 'वयने अतिचक्रे ॥ रूपकम् ॥ Correct कुमुम into कुसुम श्लो. ६३. हिया विनमितानना मदविलोकलोलेक्षणा निगृहविहित- स्मिता सपुलका किमप्यनीदृशम् (अनिर्वचनीयम्) भावमाविभ्रती नवोढा वधूः रजनिवृत्तसंपृच्छकं सखीजनं मदनातुरं चकार ।। (हिया) विनमितमाननं यस्याः (यया) सा विनमितानना। मदेन विलोकः मदविलोकः, मदविलोकेन लोले ईक्षणे यस्याः सा मदविलोकलोलेक्षणा, विलोक्यते इति विलोकः भावे घञ्। निगूढं यथा स्यात्तथा, विहितं (कृतं) स्मितं यया सा निगूढविहितस्मिता। पुलकेन सह (वर्तते ) इति सपुलका। नवोढा चासौ वधूश्च नवोढावधूः। निगृह्यते स्मेति विग्रहे न्युपसर्गात् गुधातो क्तप्रत्यये ढत्वादिकार्ये च कृते निगूढपदस्य सिद्धिः । व्युपसर्गात् धाधातोः क्तप्रत्यये धातेहिः स्त्रेण धास्थाने हादेशे विहितमित्यस्य सिद्धिः। स्मिधातोः क्तप्रत्यये 'सितमिति रूपम। नेदृशम् अनीदृशम् (अनिर्वचनीयमित्यर्थ )| आचिभर्तीति- ६२ आविभ्रती, आहुपसर्गात् भृधातोः शतप्रत्यये द्वित्वादिकार्ये कृते “नाभ्यस्ता- च्छतु" रिति सूत्रेण नुनिषेधे डीपि कृते-आविभ्रती । संपृच्छतीति संपृच्छकः, रजन्याः वृत्तं रजनिवृत्तम् , रजनिवृत्तस्य संपृच्छकः रजनिवृत्तसंपृच्छकस्नम् । मदनेन आतुरः मदनातुरस्तं मदनातुरम् । वृत्यते स्मेति विगृहे वृत्धातोः क्तप्रत्यये वृत्तमिति । चकारेति फुधातोः परोक्षकालस्य रूपम् ॥ अनीदृशं भावं-अलौकिकं भावम् । प्रलो. ६४. दयितः तृष्णातरलितः सन स्तान्ते रम्यां कान्ति दधत्- इति (एवम्) अलकविगलन्माल्यमलसम् स्मरक्रीडाजन्यश्रमजलपृष- मिश्रतिलकं संमीलन्नयनकमल चारुकान्तावक्त्रं मृचिरं पपौ (सुचि यथा स्यात्तथा)॥ दृप्यते स्मेति दयितः प्रत्ययः । तरलमस्य संजातमिति विग्रहे इतचप्रत्यये तरलित इति रूपम् । तृणया तरलित: तृप्णातरलितः। रमणं रतम् रतस्यान्तः रतान्तस्तस्मिन् रतान्ते । रम्यते इति रमा। "पोरदुपधा" दिति यत्प्रत्यये स्त्रीत्वे टापि रम्या ताम् रम्याम् । द्धाति इति दधन् । मालायै हितं माल्यम् । अलकेभ्यः विगलन् माल्यं यस्मिन् तत् अलकविगलन्माल्यम् । स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मर. स्मरस्य क्रीडा स्मरक्रीडा, क्रीडनम् क्रीडा क्रीडधातोः"गुरोश्च हल" इति सूत्रेण अप्रत्ययःस्त्रीत्वात् टापू क्रीडा, श्रमस्य जलं श्रमजलम् स्मरक्रीडया जन्यं श्रमजल स्मरक्रीडाजन्यथमजलं, तस्य स्मरक्रीडाजन्यश्रमजलस्य। पृपन्ति तैमिश्रः तिलको यस्मिन् तत् । लसतीति लसः पचायच्, न विद्यते लसः कान्तिर्यस्मिन् तत् अलसम्। नयने एव कमले नयनकमले, संमीलन्ती नयनकमले यस्मिन् तत् समीलन्नयन- कमलम्। कान्ताया वक्त्रं कान्तावक्त्रम् । चरति चित्ते इति चारु, चर्घातोः उण् प्रत्ययः वृद्धिश्च । पातेलिट् पपौ ॥ रूपकम् ॥ श्लो. ६५. (है) कान्ते यामि, (हे) वल्लभ याहि, भवतो मागें शिवं वर्तताम् , (हे) पान्थ देशान्तरात् पुनरपि स्वं गृहं त्वरितमायाहि, अस्माकमिति भवितव्यता (त्वया) विहिता (कृता) इत्युक्त्वा सनिःश्वासया लोचनवारिहारि- कुचया प्रस्थितः प्राणेश्वरो रुद्धः ।। अन्यो देशो देशान्तरम् तस्मात् देशान्तरात् , अपादाने पञ्चमी। पन्थानं नित्यं गच्छतीति पान्थस्तत्सम्बुद्धौ, ‘पन्थो ण नित्यम्” इति ण: "पथ. पन्थ" इति पथिन् शब्दस्य पन्थादेश.1 नि:श्वासेन सह (वर्तते)या सा सनिःश्वासा, तया सनिःश्वा- सया। लोयनयोः वारीणि तैः हारिणौ कुचौं यस्या सा लोचनवारिहारिकुचा तया लोचनवारिहारिकुचया । ईशितुं शीलमस्येति ईश्वरः, इश्धातोः स्थेश- भासपिसकसो वरच्” इति सूत्रेण वरच् प्रत्ययः, ईश्वर , प्राणानामीश्वर प्राणेश्वरः ।
६३ te भूधातोः भविष्यत्काले भावे " शक्याहप्रेज्यानुज्ञाप्राप्तकालाथै चे "ति तव्यप्रत्ययेन भवितव्यम्, भवितव्यस्य भावः भवितव्यता तस्य भावस्त्वतलौ इति तल् । वृत्धातोलोटि प्रथमपुरुषैकवचने वर्ततामिति रूपम् । प्रोपसर्गात् स्थाधातोः गत्याकर्मके "ति सूत्रेण कतरिक्तप्रत्यये "स्येतिस्थति" इति सूत्रेण आका- रस्येत्वे प्रस्थित इति रूपम् । रुधूधातोः कर्मणि क्तः रुद्धः । त्वरते स्मेति विग्रहे त्वर धातो “गत्यर्थाकर्मके" ति कर्तरि क्तः, इडागमे त्वरितम् ॥ शिवं-the reading of the Ms. शवं 1s not bad Seeing a coffin while going out is regarded as a good sigui in some part of the country, specially in Gujarat, but the emendation is made because -शिघ is more conventional, eg शिवास्ते पन्थानः सन्तु । Compare अमरु० slo. 62:- तन्व्या बाप्पजलौघकल्पितनदीपूरेण रुद्धः प्रियः ॥ श्लो. ६६ अहो तस्याः स्नेहम् , अहो (तस्या) रूपम् , अहो (तस्याः) पान्तिम् , अहो (तस्याः) रतिम् , अहो (तस्याः) लीलाम् , अहो (तस्याः) वाणी कदा लभेमहि ॥ स्नेहनम् स्नेहः ष्णिह प्रीतौ घञ् सत्वे गुणे स्नेहस्तम् स्नेहम् । अहो इति विस्मये-आश्चर्य-अव्ययम् । रोपयति (विमोहयति) इति विग्रहे रुपु विमोहने धातोः पचाद्यच् दीर्घ, यद्वा रूप रूपकरणे अच् रूपम् । कम् धातो णिङभावपक्षे तिन् अनुनासिकस्येति दीर्घ कान्तिस्ता कान्तिम् । रम्यते अनया इति रमे तिन् मकारस्य लोपे रतिस्ताम् रतिम् । लीलादीप्तौ ' भिदाधङ्" यहा अप्रत्ययात् इत्यप्रत्ययः-पृषोदरादित्वात् साधुः लीला ताम् लीलाम् । वाणीत्यत्र कृदि. कारात्" इत्यनेन डीप वाणी तां वाणीम् , वणशब्दे वण्यते इति वाणिः ईञ्प्रत्ययः डी वाणी तां वाणीम् । कस्मिन् काले इति कदा, किम् शब्दात् “ सर्वैकान्य- किंयत्तदः काले दा" इति सूत्रेण दाप्रत्यय । किम्शब्दस्य-" किमः कः" सूत्रेण कादेश. कदा। लभधातोरात्मनेपदे विध्याद्यर्थे लिङि उत्तमपुरुषवहुवचने लमेमहि इति रूपम् ॥ उदात्तालंकारः ॥ श्लो. ६७. योषितां रूपस्य अपूर्वः (अनिर्वचनीयः) कोऽपि महान, महिमा (अस्ति), नेत्रगोचरवर्तिना येन (रूपेण) योगिनो मोहन्ते ।। युष्यन्ते योपन्ति वेति विग्रहे युष्धातोः इतिप्रत्यये गुणे योपित इति तासां योषिताम् । रोपयति (विमोहयति) इति विग्रहे रुपु धातो अच्प्रत्यये 'अन्येषामपी." ति दीर्धे रूपमिति तस्य रूपस्य। मह्यते (पूज्यते ) इति महान् , महतो भाव इत्यर्षे 4.
महत्शब्दात् "पृथ्वादिभ्य इमनिज्वे " ति सूत्रेण इमनिच ततः टेरित्यनेन टि- लोपे महिमा (माहात्म्यम् )। नीयेते आभ्यामिति नेत्रे, नीघातो. प्रत्ययः, नेत्रयोः गोचरं नेत्रगोचरं, नेत्रगोचरं वर्तते इति नेत्रगोचरवर्ती, तेन नेत्रगोचरवर्तिना। योजनानि योगाः भावे घञ्, योगाः सन्ति एपामिति योगिनः । मुद्देणिजन्ता- कर्मणि प्रत्यये वर्तमानकाले प्रथमपुरुपस्य बहुवचनम्-मोहन्ते ॥ श्लो. ६८. लावण्यसलिलापूरा विलासलहरीयुता चललोचनमीना कामतरङ्गिणी-इयं वाला ( अस्तीत्यर्थः ) ।। लवणा त्विट सैव (लवणैव ) चतुर्वर्णादित्वात् स्वार्थे प्यञ् वृद्धिश्च लावण्यम् (सौन्दर्य विशेषः), लावण्यमेव सलिलम्-अथवा लावण्यान्येव सलिलानि लावण्य- सलिलानि, तानि आपूरयतीति विग्रहे पचाद्यच् स्त्रीत्वविवक्षायां टापि लावण्य- सलिलापूरा। विलसनानि विलासाः भावे घञ्, विलासा पव लहर्य विलासलहर्यः विलासलहरीभिर्युता विलासलहरीयुता । लोच्येते आभ्यामिति लोचने, लोच्लू दर्शने ल्युट्, चले च ते लोचने च चललोचने, चललोचने एव मीनौ यत्र सा चललोचनमीना । तरतीति तरङ्गः तरते: “तरत्यादिभ्यश्चे'ति अनन् प्रत्यये गुणे रपरे तरङ्गः, तरङ्गोऽस्त्यस्या इति .विग्रहे “ अत इनिठनौ' इति सूत्रेण इनिप्रत्यये झीपि णत्वे च कृते तरगिणी, काम पव तरङ्गिणी कामतरङ्गिणी। इयं वाला-(अस्तीति ) ॥ समस्तवस्तुविषयकं रूपकम् ॥ This is a complete 9, in which the young woman is compared to a river of love Her beauty is water and her विलास is set and her moving eyes are the fish. श्लो. ६९. (हे) गतघृण, चरणपतितां संलग्नहीं भवत्यनुरागिणीम् एतां मुग्धां भवान् कथमवमन्यते इति (एवम् ) तत्सख्या निगदितः प्रणयान्वितः प्रियस्तु मान मुक्त्वा विविधकरणः (विविधोपायैः) प्रियां समरञ्जयत् ।। गता घृणा (दया) यस्य स गतघृणस्तत्सम्बुद्धौ गतघृण । चरणयो पतिता चरणपतिता ताम्। संलग्नान्यगानि यस्या सा सलग्नाझी- अगगात्रक- ण्ठेभ्यो वक्तव्य" मिति वार्तिकेन डीपि संलग्नागी ताम् संलग्नाङ्गीम् । अनुर- ज्यतेऽनेनेति अनुरागः, रसधातो: अकर्तरि च कारके संज्ञाया"मिति घञ् नलोपे कुत्वे वृद्धौ अनुरागः, अथवा अनुरसनमनुराग भावे घन-अनुरागोऽ- स्त्यस्या इति विग्रहे अत इनिठना" विति सूत्रेण इनिप्रत्यये डीपि णत्वे च कृते अनुरागिणी ताम् । भवति भवद्विपये अनुरागिणीम् । तस्या. सखी तत्सखी तया तत्सख्या। न्यगादीति निगदितः, न्युपसर्गात् गद्धातोः कर्मणि क्तप्रत्यये इडागमे च निगदिन इति रूपम् । प्रणनयम् प्रणयः, नीधातोः 'एरच्” इति सूत्रेण अच्प्रत्यये गुणे अयादेशे णत्वे च कृते प्रणय इति रूपम् , प्रणयेनान्वित प्रणयान्वित । प्रीणा- ६५ तीति प्रियः “ इगुपधज्ञाप्रीकिरः क" इति सूत्रेण कप्रत्ययः। मुचे क्त्वा मुक्त्वा । विविधानि च तानि करणानि च विविधकरणानि, तै. विविधिकरण । प्रीणाति या सा प्रिया तां प्रियाम् " इगुपधे "ति के स्त्रीत्वे टापि प्रिया । समुपसर्गात् र धातो णिजन्तात् लङि प्रथमपुरुपैकवचने समरञ्जयत् ॥ Correct सलग्ना into संलग्ना. - श्लो. ७०. इयं वामाक्षी ( यस्य) रथः, चपलनयने (यस्य ) तुरगौ, वेणी ( यस्य ) कशा, सरलतरला हारलतिका (यस्य) रश्मिः, नितम्बो ( यस्य ) यच्चक्रं, ( यस्य ) कुचयुगवरूथ। तमारूढो असौ कुसुमविशिखा सारथिः मे (मम) चेतो हरति ॥ चामे अक्षिणी यस्या मावामाक्षी। नीयेते आभ्यामिति नयने-चपलेच ते नयने च चपलनयने । हारमध्यगो मणिः। तरल , सरलः (निर्मल ) तरल विद्यते अस्यामिति सरलतरला-अथवा-सरतीति सरल सृ गतौ धातोरलच्प्रत्यय , सरलश्च तरलं च सरलतरले ते विद्येते अस्यामिति सरलतरला। हियते मनोऽनेनेति हारः। लतति (वेष्टयतीति) लता, लतैव लतिका, स्वार्थे का हार एवलतिका। हारलतिका। यस्य चक्रं यश्चक्रम् । कुचयोर्युगं कुचयुगम् , कुचयुगमेव वरूथः (रथगुप्तिः), आवरणम् , बियते रथोऽनेनेति विग्रहे “वृञ्भ्यामूथन् ” इति उणादिसूत्रेण ऊथन्प्रत्यये वरूथपदस्य सिद्धिः। वरूथं चर्म वेश्मनोरिति कोशः। रम्यतेऽत्रे- ति रथः, रम्धातो' "हनिकुषिणीऋमिकाशिभ्य” इति सूत्रेण क्थन्प्रत्यये रथपदस्य सिद्धिः। तुरेण त्वरया गच्छत इति विग्रहे “अन्येभ्योऽपि" इति सूत्रेण उप्रत्यये टिलोपे तुरगौ। आङपसर्गात् रुहे ढत्वादिकार्ये कृते आरूढ इति रूपम्। कुसुमान्येव विशिखा यस्य सः कुसुमविशिखः। सरत्यश्वान् इति विग्रहे-सृगतौ धातोः सतॆणिच्चे "ति सूत्रेण घथिन् प्रत्यये सारथि । (सरति-इत्यस्य सारयतीत्यर्थ अन्तर्भावितण्यर्थ) (अथवा सरथस्यापत्यं सारथिः) ॥ रूपकम् ॥ Here the young lady is compared to a chariot. Separate वेणी and रश्मि. Her braid of hair is the wheap, while hier necklace is the - reins. - वरूथ (N.) Protection, shield etc वरूथ also, (M,) a sort of wooden ledge or guard fastened Tound a chariot as a defence against collision.
६६ श्लो. ७१. (हे)मुसखि, विलासावासान्तः कितवचरितेन प्रणयिना सायक- मये शयने सुखेनासीनायाः मेऽतिकठिनौ कुचौ-कथमपि कराक्रान्ती कृत्वा हठेन आश्लिष्टायाः (मे) मम नोविः परिशिथिलताम् अभजत् ।। शोभना चासौ सखी च सुसखी तत्सम्बुद्धौ सुसखि । कितव (कितवयुक्त) चरितं यस्य सः, तेन कितवचरितेन, चर भावे त चरितम्। प्रणयनं प्रणयः परच्" इत्य, प्रणयोऽस्त्यस्येति विग्रहे “यत इनिठनी" इति इनिः प्रणयी, तेन प्रणयिना। आवसन्ति अत्र इति विग्रहे भाडपसर्गात् वसूधातो. अधिकरणे घञ् वृद्धिश्च आवासः, विलसनं विलास भावे घन्, विलासस्य आवास. विलासावास., विलासावासस्यान्त (मध्ये) विलासावासान्तः। सायकस्य प्राचु- ये सायकमयं, तस्मिन् सायकमये। शय्यतेऽत्र इति शयनं, तस्मिन् शयने । आस्ते इति आसीना आसू धातो शानच्, अनुवन्धलोपे "ईदासः" सूत्रेण आकारस्येत्वे स्त्रीत्वविवक्षायां टापि-आसीना, तस्या आसीनाया | अति (अत्यन्तम् ) कठिनो अतिकठिनौ। कराभ्यामानान्तौ । आग्लिप्यति स्मेति विग्रहे आडपसर्गात् लिम् धातो. कर्मणि क्तप्रत्यये कृते स्त्रीत्वविवक्षायां टापि आश्लिष्टा, तस्याः आश्लिष्टायाः। परिशिथिलस्य भावः परिशिथिलता ताम् । भज् धातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचने अभजत् ।। सायकमये-the bed consisting of reeds of which the arrows are made. सायक-शर । शर-a sort of reed or grass used for arrows श्लो. ७२. हेमन्ते, कन्दर्पादेशजाग्रद्विविधसुरतविकान्तदन्तक्षतोष्ठ- व्यावल्लकान्तिराजत्सुललितललनासीत्कृतापीतवेगाःविरहितवनितावक्त्रसोष्मा- भिनिर्यनिःश्वासावारिधाराधरणवहुलताम्-अप्मताम् ऊद्वहन्तः वाताः वान्ति ।। कन्दर्पस्यादेश' कन्दादेश तेन तस्मिन् वा । जाग्रतश्च ते विविधसुरतविदश्च फन्दादेशजानद्विविधसुरतविदश्च ते कान्ताश्च, तेषां दन्ताः, तै क्षतावोष्ठो, तत्र व्यावल्लन्त्यश्च ता कान्तयश्च ताभि , राजन्त्यश्च ताः सुललितललनाश्च तासां सीत्कृतानि, तैरापीतो वेगो येषां ते विरहिताश्च ता वनिताश्च तासां वक्त्राणि, तैस्तेषां वा सोप्माणस्तेभ्यो अभिनिर्यन्त्यश्च ता निश्वासावारिधाराश्च तापां धरणानि, तेषां बहुलता यस्यां सा ताम् । ऊप्मणो भाव ऊप्मता ताम् । उद्वह- न्तीति उद्वहन्त वाताः वान्ति । कम् (कुत्लायाम् ), कुत्सितो दोऽस्येति कन्दर्प, यद्वा-कं सुखम् , तत्र तेन दृप्यतीति कन्दर्पः पचाद्यच्। आदेशनमादेशः, भावे, घञ्। जाग्रतीति जाग्रतः जागृधातो शतृप्रत्ययः, जक्षित्यादयः पट्" इति अभ्यस्तसंज्ञा, नाम्यस्ताच्छतु"रिति नुनिषेधः। रमणानि रतानि भावे क्तः, ' +- ६७ शोभनानि रतानि सुरतानि तानि विदन्तीति विविधसुरतविदः। सीत्कृत- मित्यत्र भावे क्तप्रत्ययः ।।" श्लो. ७३. प्रौदा-पीनपयोधरोरुकलशा मान्जिष्टरागांशुका सौम्यावृत्त- नितम्वचक्रचतुरा पर्यंङ्कभूमिस्थिता अन्तःसंभृतभासुरम्मरबृहद्भानुमैनोहारिणी सुखरता हसन्ती प्रिया हेमन्ते नृणां हिमहारिणी (अस्ति)। धरत इति धरौ, पयसां धरौ पयोधरौ पवाद्यच् । पीनौ च तो पयोधरौ च पीनपयोधरौ, तावेवोरुकलशौ, यस्याः सा पीनपयोधरोरुफलशा। मञ्जि- छाया अयम् माञ्जिष्ठः, मासिष्ठो रागो यस्य तद् माजिष्ठरागम्, माञ्जिष्ठरागमंशुक यस्याः सा माशिष्ठरागांशुका । सोम इवेति विग्रहे “शाखादिभ्यो य" इति य- प्रत्ययः, ततः-"प्रज्ञाद्यण्" सौम्य इति । नितम्व एव चक्र नितम्वचक्रम्, सौम्य- मावृत्तं नितम्बचक्रमिति सौम्यावृत्तनितम्वचक्रम्, तेन चतुरा या सा सौम्यावृत्त- नितम्वचक्रचतुरा । पर्यङ्कस्य भूमिः पर्यभूमिः, पर्यवभूमौ स्थिता-इति पर्यभूमि- स्थिता । भातीति भानुः "दामाभ्यां नुः" इति नुप्रत्ययः वृहच्चासौ भानुश्चः वृहद्भानुः, स्मरयत्युत्कण्ठयतीति स्मरः, स्मर एव वृहद्भानुः स्मरवृहद्भानुः । भासते इति- भासुरः “भञ्जभासभिदो घुरच्" इति भासूधातो घुरच प्रत्ययः, भासुरश्चासौ स्मरवृहद्भानुश्च भासुरस्मरवृहद्भानुः । अन्तसंभृत. भासुरस्मरवृहद्भानुर्यस्याः सा अन्त संभृतभासुरस्मरबृहद्भानुः । मनो हर्तुं शीलं यस्याः सा मनोहारिणी। हरतीति होरिणी, हिमस्य-हारिणी हिमहारिणी ( अथवा हिमं हर्तु शीलमस्याः इति हिमहारिणी)। सुख-सुखकरं रतं यस्याः सा सुखरता (रमणं रतम्)॥ परिसंख्या काव्यलिई च ॥ माजिष्ठरागांशुका-dressed in cloth dyed with madder. This type of dress is favourite to the women of Gujarat, Mewar and Marwar. श्लो. ७४, शीतर्तुभीतः (अहम्) मनःस्थिते व तब सङ्गमेन (मनः) न सान्त्वयामि ( अथवा न सान्त्वयामि इति तु न किन्तु सान्त्वयाम्येव), विधिः कदा शय्यासने आवयोरेव (आवयोरपि) सन्नतगात्रयोगं विधाता (विधा- स्यतीति) ॥ शीतश्चासौ ऋतुश्च' शीतर्तुस्तेन भीत', भीत इत्यत्र “गत्यर्थे "ति कर्तरि क्तप्रत्यय । मनसि स्थित मनःस्थितस्तेन मनःस्थितेन, स्थाधातो “गत्यर्थे "ति कर्तरि क्त, “द्यतिस्यति०" इति सूत्रेण आकारस्येत्वे स्थित इति रूपम् । सङ्गमनं सङ्गमस्तेन सङ्गमेन, सङ्गम इत्यत्र समुपसर्गाद् गम्धातो “ग्रहवृदृ०" सूत्रेण अय् प्रत्यय सङ्गमः । कस्मिन् काले इति कदा, किम्शब्दात् दाप्रत्यये किमः कादेशे कदा। .
६८ विधत्ते इति विधिः, “उपसर्गे घोः कि"रिति सूत्रेण बाहुलकात्कर्तरि किप्रत्ययः आकारलोपश्च विधिः। शय्यतेऽत्र इति शय्या, शोधातोः संज्ञायां “समज०" इति क्यूप् " अयइ क्यपि" सूत्रेण अयङ्टाप् शय्या, शय्या एव आसनं शय्यासनम्, तस्मिन् शय्यासने। सन्नते च ते गात्रे च सन्नतगात्रे, तयोर्योगः सन्नतगात्रयोग- स्तम् । विधाता युपसर्गाद् धाधातो दलकारस्थ तृतीयपुरुपस्यैकवचनम्, विधास्यतीत्यर्थः । काकु: रूपकं च ॥ श्लो. ७५. हेमन्तौ निशिप्रमुदितवदना सुऋतिनी कापि (स्त्री) मदन- मदभवद्वाप्पभावोत्तराभ्याम् अरुभ्याम् अल्गाढम् (आलिङ्गन्य) पीनोत्तुङ्गस्तनेन वक्षसा वक्षः (आलिङ्गय) निजभुजलतया सोत्कण्ठं (यथा स्यात्तथा ) कण्ठदेश- मालिङ्गय लीलया दोलामारुह्य स्वमतुः गृहान्तः शेते ।। हेमन्तश्चासौ ऋतुश्चः हेमन्ततुस्तस्मिन् । प्रमुदितं वदनं यस्याः सा प्रमुदितवदना। सुष्टु कृतम् सुकृतं, सुकृत रुपमस्या इति सुकृतिनी,इनि प्रत्ययाङ्गीय च । मदयतीति मदनः ल्युट, मदनस्य मदः मदनमदस्तेन भवन्तो बाप(धर्म)भावोत्तरों (याप्पोदयाधिक्ये ) ययोस्तो, मदनमद्भवद्वाप्पभावोत्तरौ ताभ्याम् । पीनौ च तुगौं च पीनोतुह्री, पीनोलगो स्तनौ यस्मिन् तत् पीनोमुझस्तनम्, तेन । निज- श्वासी भुजश्चः निजमुजा, भुज्यतेऽनेनेति भुज."भुजन्युजो" इति निपातनात् साधु.। निजमुल एच लता, लतति वेष्टयतीति लता तया निजभुजलतया । उत्कण्ठनमुत्कण्ठा गुरोश्च हल" इत्यप्रत्ययः टापि उत्कण्ठया सह वर्तते इति सोत्कण्ठम् । कण्ठस्य देशः कण्ठदेशस्तम् । गृहस्य अन्त. 'गृहान्तस्तस्मिन् । स्वस्या. भर्ता स्वमर्ता तस्य स्वभर्तु । यथासंख्यं रूपकं च ॥ Herein-the reading of the Ms. is not good for metre. Similary स्तनेनमुद्रितवदनो-(metrically bad ). The reading of the Ms. हेमन्तों is obviously a clarical error. श्लो. ७६ (हे) नाय, मुग्धां किं वृया प्रतारयसि (रे मां किं वृथा भापसे), नैवास्मि (एपात्री यथा तबाहम् नामीति भावः) इति मया विना (त्वम) सखी भव, (भवता) मान्यो जनो मान्यताम् (हे)कान्ते, मावं तस्य दुर्वचः (वच) बद, कया पिशुनया पाटिया (त्वम्); (हे ) प्रियतमे, मामका इमे प्राणाः सयि सन्ततं वर्तन्ते ।। नायनि ईश्वरी भवतीति नाथः । अप्रत्ययस्तत्वबुद्धौ नाथ । मुह्यतीति मुग्पा, गुद्धातो: “ गत्याकर्म के"ति कर्तरि ताहकारस्य धकार तकारस्य धकार ८ ए मुग्धा, ताम् मुग्धाम् । प्रोपसर्गात् णिजन्तात् तृधातोः लटि मध्यमपुरुषैक- चने प्रतारयसीति रूपम् । मयेत्यत्र विनायोगे तृतीया भवति । मान् पूजायाम् पातोः कर्मणि लोटि प्रथमपुरुपैकवचने मान्यतामिति रूपम् (पूज्यतामित्यर्थः।) दधातोर्लोटि मध्यमपुरुषैकवचने चदेति रूपम् । पठेर्णिजन्तात् कर्मणि क्त डागमो णिलोपश्च टापि पाठितेति रूपम् । मम इमे मामकाः। प्रीणातीति प्रिया अतिशयेन प्रिया प्रियतमा तत्सम्बुद्धौ । संततमित्यस्य "समो वा०" इति वार्तिक- विकल्पपक्षे सिद्धिर्भवति। दुष्टं वच. दुखकर वयः अथवा दुर्वच दुर्निन्दितं वचः॥ Correct the misprint संतत into संततं. श्लो. ७७. वाष्पाम्बुपूर्णक्षणां शय्यायां शयितां दयितां समीक्ष्य आगतसाध्वसः कान्तः कुत इदम् इति तदालीजनं पप्रच्छ-तव अन्यस्त्रीगमनात् इति कथिते तासां पुरः प्रतीत्यै प्रियतमावक्षोजलिङ्गद्वयं मुहुर्मुहुः संस्पश्यैत ।। बाष्पाणामम्वूनि (वाष्पाण्येव अम्बूनि) तैः पूर्णे ईक्षणे यस्या' सा ताम् । शय्यतेऽत्रेति विग्रहे शीङ् धातो क्यपि “अयल् क्यपि" सूत्रेण अयङादेशे टापि शय्या तस्यां शय्यायाम् । शीङ् धातोः क्तप्रत्यये “निष्ठा शीङ्" सूत्रेण कित्वाभावे इटि गुणे अयादेशे टापि शयिता ताम् शयिताम्। समुपसर्गात् ईक्षधातो: क्त्वाल्यपि समीक्ष्या। आगतं साध्वसं यस्य स आगतसाध्वसः। कस्मात् इति कुतः, किमशब्दात् तसिल् “कुति हो " सूत्रेण किमः क्वादेश , कुतः। आली चा- सौ जनश्च आलीजनः, तस्या आलीजन. तदालीजनस्तम् । प्रच्छेलिट् पप्रच्छ। अन्याश्च ता स्त्रियश्च अन्यस्त्रियस्तासां गमनम् अन्यस्त्रीगमनं तस्मात् । प्रत्यु- पसर्गात् इण धातो क्तिन्प्रत्यये दीधैं प्रतीतिस्तस्यै प्रतीत्यै । वक्षसि जा वक्षोजौ सप्तम्यां “जनेर्ड," प्रियतमाया वक्षोजी तयोलिङ्गम् (चिह्नम् ) तस्य - यम् प्रियतमावशोजलिङ्गद्वयम् । समुपसर्गात् स्पृशधातोणिचि कर्मणि विध्या- द्यर्थे लिहि संस्पश्येत ॥ संस्पयेत 1s not quite clear. श्लो. ७८. अपि (अतीत्यर्थे) स्नेहमचिन्त्य (अविचार्य) करकलितं वसनमाक्षिप्य सविनयं वचनमनाहत्य हुनाथे भयाते (सति) ततः सखी मियतममालक्ष्य (आलक्ष्य-लक्षीकृत्य) भियतममुद्दिश्य अथानया पटान्तेन स्वमुख- मावृत्य तत्रोच्चैः स्वरं रुदितम् अहो-इत्याश्चर्य अथवा अहो आश्चर्यजनकम् रुदितम् ॥ स्नेहनं स्नेहः घञ् । चिति स्मृत्याम् चिन्ते. त्याल्यपि चिन्त्यम्, न चिन्त्यम् अचिन्त्य, अत्र पूर्व समास' पश्चात्, क्त्वाल्यप् अथवा समासात्पूर्वमपि-तबुद्धा- - ।
७० हूस्वस्य - वारोप्य क्त्वाल्या भवितुमर्हति। करेण कलितं करकलितम् (करसंबद्धम् )। आक्षिप्य दूरीकृत्य कले कर्मणि क्त इडागमश्च । आडपसर्गात् क्षिपधातो क्त्वाल्यपि आक्षिप्येति रूपम्। आडपसर्गात् दृधातो फ्त्वाल्यपि पितिकृति तुक् ' सूत्रेण तुकि आइत्येति रूपम् । न आइत्य अनादृत्य । विनयेन सह (वर्तते ) इति सविनयम् । उच्यतेऽनेनेति वचनम्, वर्भावः ल्युट्, सविनयं वचनमनादृत्य । हृदयस्य नाथ हृन्नाथस्तस्मिन् । प्रोपसर्गाद् याते. क्तप्रत्यय कर्तरि प्रयाति स्म प्रयातस्तस्मिन् प्रयाते। अतिशयेन प्रिय प्रियतमस्तम् । आडपसर्गाद् लक्षधातो क्त्वाल्यपि। पटस्य अन्तम् (अन्तः) पटान्तस्तेन पटान्तेन । आङपसर्गात् वृधातो क्त्वाल्यपि तुकि आवृत्य। रुद् धातोः क्तप्रत्ययो भावे इडागमे रुदितम् ॥ सक्ष्यालक्ष-the reading of the Ms is meaningless. प्रियतममलक्ष्य -not seeing her lover who went away because she did not listen to her entreties. -पटान्तेनावृत्य स्वमुखे-Covering her face with the hem of her garment. This probably means that she drew down the saree from her head to cover the face. If this is so it indicates the, familiarity of the poet with women covering their heads with sarees This is a habit common among the women of Mewar, Marwar and Gujarat श्लो ७९. (हे) सुन्दरि, इन्दुः अधुना मन्दरश्मिः जातः, निशा विभाता, अथवा निशि विभातः इन्दुः अधुना मन्दरश्मिर्जातः, (३) कान्ते, -विकटः (विशालः) पटुः कुक्कुटः कान्तानां कटु रिटीति, हीनस्नेहरसेन (हेतुना) रुक्षदशया दीपोऽपि मन्दायते, (हे) मानिनि मानं मुश्च, इमं वल्लभ कामोत्सवैः रञ्जय ॥ सुन्दशब्दात् गौरादित्वात् स्त्रीत्वविवक्षायां डीप् तत्सम्बुद्धौ सुन्दरि। इन्दतीति इन्दु । अस्मिन् काले इति अधुना इदम्शब्दात् अधुनाप्रत्ययो भवति, इदम इशादेशे अधुनेति रूपम् । मन्दा रश्मयो यस्य स मन्दरश्मिः । जात इति कान्त- प्रयोगः। कर्तरि व्युपसर्गात् भाधातो क्तप्रत्ययः स्त्रीत्वात् टापि विभाता। विशब्दात् “संप्रोदश्च कटच इति कटच् विकटः विशालः। पाटयतीति पटुः पट् गतौ णिजन्तात् “ कलिपाटी" ति सूत्रेण उप्रत्ययः पटादेशश्च पटुः दक्षः। को पृथिव्याः कुट. कुक्कुटः पृषोदरादित्वात् सिद्धिर्भवति। कान्तानां कृते कटु, कटतीति कटु । पुनः पुनः अतिशयेन रटतीति रारटयते, रारटयते इति रारटीति। स्नेहनं स्नेह स्नेहस्य रसः स्नेहरसः, हीनश्चासौ स्नेहरसश्च हीनस्नेहरसस्तेन । रुक्षा चासौ दशा च रुक्षदशा तया । मन्द इवाचरतीति विग्रहे “कर्तुः क्यङ्" सूत्रेण ७१ क्यलि दीर्घ मन्दायते। दीप्यतेऽनेन यद्वा दीपयतीति घञ् कप्रत्ययः । मानोऽस्त्यस्याः इति मानिनी, इनिप्रत्ययः ङीप् च तत्सम्बुद्धौ मानिनि। कामस्योत्सवाः कामो- त्सवास्तैः। दृश्यते इति दशा भिदाद्यङ् टापि दशा। मुञ्चति मुचधातोलोटि मध्यम- पुरुषैकवचने रूपम् । रज्जय-णिजन्तात् रअधातोलोटि रूपम् ॥ Farurat of the Ms. is obviously a clarical error. कुर्कट: of the Ms. is a clarical error. It should be कुर्कुटः। but more current word is कुक्कुटः । स्नेह going with दीप means oil, and दशा means wick. श्लो. ८०. (हे) इन्दीवराति, मन्दोऽपि मदनः अमृदुना बाणेन त्वत्कृते. मां दुनोति, (हे) प्रिये दिनेऽस्मिन् नववल्लभे दयां कुरु, संगमरङ्गभङ्गिचतुरै- रानन्दितालिजनैरङ्गैः 'तल्पोत्सङ्गविकल्पजल्पनपरं (यथा स्यात्तथा) मानेन चालित्य ॥ 1 , इन्दीवरे इव अक्षिणी यस्या सा तत्सम्बुद्धौं इन्दीवराक्षि। मन्दते इति मन्दः अच् । भदयतीति मदनः ल्युट । न मृदुरमृदुस्तेन । तव कृते इति त्वत्कृते। दीयते स्म ( दीङ्क्षये) “गत्यर्थाकर्मके" ति कर्तरि का तकारस्य नकारः ओदित- त्वात् दीनस्तस्मिन् दीने। नवश्वासौ वल्लभश्च नववल्लभस्तस्मिन् । संगमनं सङ्गमः "गृहवृदृ" इत्यप, सङ्गमस्य रङ्गः सगमरणस्तस्य भनि भङ्गस्य करणम् तत्करोति तदाचष्टे वा इति णिजन्तात् " अच इ." सूत्रेण इ: भङ्गिः विच्छित्तिः, चतुराणि तै: संगमरङ्गभङ्गिचतुरैः। आनन्दिता. आलीजनाः यैस्तानि आनन्दि- तालीजनानि तैरानन्दितालीजनैः। अङ्ग ‘अगि गतौ पचाद्यच् । तल्पते अस्मिन् तल प्रतिष्ठायाम् उणादित्वात् “खष्पशिल्प' सूत्रेण तल्पेत्यस्य सिद्धि । उत्सअनमुत्सङ्गः घन्, तल्पस्योत्सङ्गः तल्पोत्सङ्गः तत्र विकल्पं च तद् जल्पनं च तत्परं (प्रधान) यथा स्यात्तथा । मानेन च । आलिङ्गय आडपसर्गात् णिजन्तात् लिगि सङ्गे लोटि मध्यमपुरुषैकवचने रूपम् ॥ उपमा ॥ हुतो ति मृदुना of the Ms gives no sense, hence दुनोति मदनो. श्लो. ८१. (हे) स्मर, कृताञ्जलिरेषा (अहम् ) त्वां नता; (हे) मनोरम काम (मां) मा विमानय; दयिते आगते तु सरसाहम् भवदाज्ञां शिरसा धारयामि।। कृतोऽञ्जलिर्यया सा कृताञ्जलिः, अज्यतेऽनेन अञ्जू धाताः अलिप्रत्ययः अञ्ज- लिः। काम्यतेऽनेनेति विग्रहे "पुंसि संज्ञायां घ" ध-प्रत्यय काम' । मनो रमयतीति मनोरमः, मनोरमश्वासौ कामश्च मनोरमकामस्तत्सम्वुद्धौ मनोरमकाम। व्युपसर्गात् चुरादि णिजन्तात् मानधातोलोटि मध्यमपुरुषैकवचने विमानयेति रूपम्।
Gર आगच्छति स्मेति विग्रहे “गत्यर्थाकर्मके " ति क्तप्रत्यये आगतः। रसेन सह (वर्तते) इति सरसा। भवतः आक्षा भवदाना ताम् ॥ श्लो. ८२. (हे) सखि, ये (मम) दुकूले प्रतिकूले, हा (इति खेदे) मे (मह्यम्) हारो न रोचते, मे (मम) मेखला खला जाता, हंसकं हिंसकम् (हंसको हिंसक इति शुद्धः पाठः)॥ दुष्टं कृलति कूल आवरणे “ इगुपधेति कप्रत्ययः दुकृलमित्यस्य पृषोदरा- दित्वात् सिद्धिः, द्विवचने दुकूले। हियते मनोऽनेनेति हारः घञ्। मेखं गति लातीति विग्रहे “ आतोऽनुपसर्गे क” इति कप्रत्यय । पृपोदरादित्वात् मेखले- त्यस्य सिद्धिर्भवति स्त्रीत्वे टाए। खलतीति खला-खल संचये पचायच् स्त्रीत्व- विवक्षायां टाप् । हंस इव कायति "अन्येभ्योऽपि वा” इति उप्रत्यय: टिलोपः, अथवा हंस इवेति विग्रहे “इवेति प्रतिकृती" सूत्रेण कन् हंसकः। हिन- स्तीति हिंसक', हिंसक इति “निन्दहिस' सूत्रेण वुन्, तस्याकादेशे हिंसक इति रूपस्य सिद्धिर्भवति॥ 'हिंसकः पादकटकः' इत्यमरः । राहो of the Ms. is a clarical error, so हंसकं. प्रतिकूले would be a better reading instead of प्रतिकुलं । हंसकः or är an ornament for the feet or the ankles said to be formed like goose's foot Compare शिशुपालवध Vil 23, मदनरसमहौषपूर्णनाभीहृदपरिवाहितरोमराजयस्ताः । सरित इव सविभ्रमप्रयातप्रणदितहंसलभूपणा विरेजुः ।। प्रलो. ८३. कान्ते, कान्ते समागते (कान्ते मनोहरे कान्ते समागते) सख्या मुत्तालता कण्ठे (मम कण्ठे) मुक्ता, अअनेन अभिते नेत्रे (मम नेत्रे) नेत्रधृतिः कृता ।। मुक्ता पव लता मुक्तालता। समानुपसर्गात् गम्धातो: “गत्यर्थाकर्मके" ति सूत्रेण कर्तरि क्तप्रत्यये समागत इत्यत्र मलोपः, तस्मिन् समागते । कण्शब्दे कणतीति कण्ठः "कणेष्ठ" इति ठप्रत्यय. तस्मिन् । मुच्यते स्मेति, विग्रहे निष्ठा क- प्रत्यये स्त्रीत्वे टापि कुत्वे मुक्का। अज्यतेऽनेनेति विग्रहे अजू धातोः ल्युट् अनादेशे अञ्जनम्, तेन अञ्जनेन । अञ्जधातोः क्तप्रत्यये इडागमे द्विवचने अञ्जिते। नीयेते आभ्यामिति नेत्रे। “दाम्नी" सूत्रेण पक्षे ट्रन नेत्रे, नेत्राम्यां ध्रियते-इद्धि नेत्र- धृतिः स्त्रियां क्तिन् अथवा नीयतेऽनेनेति नेत्रम् तस्मिन् नेत्रे-नेत्राभ्यां धृतिर्यस्या. सा नेत्रधृतिः। कृधातोः क्रियते स्मेति विग्रहे कर्मणि क्तः टापि कृता ॥ रूपकम् ॥
७३ In harmony with कण्ठे कान्ते कान्ते in the next line नेत्रे नेत्रे धृतिः कृता would be more appropriate reading. धृति-Joy or content, was put on the eye i. e. her eyes expressed happiness श्लो. ८४. अनया कुचकलशरुचा इयं मुक्तालता सुदेशे कण्ठदेशे मुक्ता, ( अनया ) चारुविम्बे नितम्बे वासोचित स्वं वासः परिहित, नक्तं भुक्तं, विपुल- नयनयोरञ्जनैः अअनं 0 विमुक्त, धर्ता विहर्ता भर्ता सुरतविलसितैः अअितो रजितश्च ॥ कुचावेव कलशौ कुचकलशौ तयो रुक, रोचते इति रुक् विप्, तया कुचकलशरुचा । मुक्तैव लता मुक्तालता । शोभनो देशो, दिशतीति देश पचा धन्, यस्य स सुदेशस्तस्मिन् । चारु विम्बो यस्य स चारुविम्वस्तस्मिन् चारुबिम्बे । वसन्त्यति वास वसेर्घ अधिकरणे, वासस्य उचितं वासो. चितम् । विपुले च ते नयने च विपुलनयने तयो विपुलनयनयो , नीयते आभ्यामिति विग्रहे ल्युट् नयने । व्युपसर्गात् मुच धातो. क्तप्रत्यय कुत्वं च विमुक्तम् । भुजे क्तप्रत्यये कुत्वे भुक्तम् । नक्तं रात्रौ। धरतीति धर्ता, विहरतीति विहर्ता तृच, बिभर्तीति भर्ता । रमणानि रतानि नपुंसके आवे क्त , शोभनानि, रतानि सुरतानि, सुरतानां विलसितानि सुरतविलसितानि तै । अञ्जे. क्तप्रत्यय इडागमश्च अञ्जितः। रञ्जे क्तप्रत्यय इडागमश्च रञ्जित । अथवा अरंजित अत्यन्त जित । ॥ रूपकम् ॥ Correct the missprint नयनयोञ्जनं,-रञ्जनम्, अरंजितश्च thoroughly conquered श्लो. ८५. विलोचनजलप्लुतवक्त्रचन्दा असौ कान्ता प्रणयप्रकोपात् रशनया दृढं बद्ध्वा विहितागसं मां निवास भवनं नीन्वा कर्णोत्पलेन सविलास जघान ।। विलोच्येते आभ्यामिति विलोचने लोचू दर्शने ल्युट्, विलोचनयोजलानि विलोचनजलानि ते प्लुतं व्याप्तम् । वक्त्रमेव चन्द्रो यस्या सा, उच्यतेऽनेनेति वक्त्रम्, वचे अप्रत्ययः कुत्व च । चन्दतीति चन्द्र , चदि आहलादने रक्- प्रत्यय चन्द्र । प्रणयनं प्रणय "एरच्" इत्यच । प्रकोपनं प्रकोप भावे घञ् । प्रणयस्य प्रकोप प्रणयप्रकोपस्तस्मात् । रशतीति रशना, रशशब्दे बहुलमन्यत्रापी- त्यनेन युच अनादेशे रशना टापि । दृढ' स्थूलवलयो"रिति निपातनात् दृढ- मिति सिद्धयति तत् क्रियाविशेषणम् । बन्धातो क्वाप्रत्यये बवेति रूपम् । विहितम् आगो येन स विहितागास्तम् । निवसन्त्यनेति निवास. अधिकरणे घ, निवासस्य भवनम् । कर्णयोरुत्पलं कर्णोत्पल तेन कर्णोत्पलेन । विलामेन सह सविलास (यथा स्यात्तथा)। जघान हन्धातो परोक्षे लिट् प्रथमपुरुषै- कवचनम् ॥ रूपकम् ॥
near to Compare अमरशतक ss. 9. चक्रचन्द्रा-gives some sense but 18 IS inot satisfactory The reading should be amended into Farsi because as said in the preface 7 and 3, F and 3 are orthographically very one another. श्लो. ८६. मया बलादपि आलिशितानि नयपल्लवकोमलानि अतिमनो- हराणि अनङ्गललितानि अनिभृतानि मदालसानि अङ्गानि बाला झिमात्मनैव संकोचयति ।। बलति बलने वा वल्यत वा पचाद्यच' अथवा "पुंसि संज्ञायां वः" वलं तस्मात् बलात् । आलिङ्गनानि आलिङ्गितानि । नवानि च तानि पल्लवानि च नवपल्लवानि, तद्वन्कोमलानि नवपल्लवकोमलानि । अति ( अत्यन्तम) मनो हरन्तीति अति- मनोहराणि हरतरतुद्यमनेऽन् इत्यच्यत्यय. । अनङ्गवत् वा ललितानि अनगललितानि । न निभृतानि-विनीतानि) अनिभृतानि (क्तान्तप्रयोग.)। मदेन अलनानि मदालसानि । अतति तान् तान् पर्यायान् गच्छति आत्मा नेन आत्मना आकुपसर्गात् अतधातो. मनिन्, आत्मा । समुपसर्गात् णिजन्तात्कुचे. वर्तमानकाले संकोचयति प्रयोगः ॥ उपमा ॥ श्लो. ८७, तरसा रसालान् द्रुमान् किञ्चिन्मुकुरयन् हेमन्तकान्तमदन जनेषु मदयन् (अथवा हेमन्तम् अन्तमदन) जनेषु मदयन् जनयन् ( उत्पादयन् ) लीला- यितेन (हेतुना) मलयाचलमल्लमालात् इतः किल शैशिरोऽयं मास्त आवाति ।। तरन्यनेनेति विग्रहे तृधातो असुन प्रत्यये गुणे तरन तेन तरता । रसेना. लन्तीति लालास्तान रसालान्-अल भृषणादौ)। दुव. शाखा एर्षा मन्तीतिमा- स्तान् द्रुमान घद्रुभ्याम् इति मत्प्रत्यय. मुकुरं करोतीति विग्रहे प्रातिपदिकाद धात्वर्थे णिच मुकुरयति, मुकुरयतीति मुकुरयन् शतृप्रत्ययः । मदयतीति मदन. ल्युत्, अन्तश्चासौ मदनश्च अन्तमदन., हेमन्तकस्य अन्तमदन. हेमन्तकान्तमदनः ( अथवा हेमन्तस्यायं हेमन्त इदमर्थेऽणू हेमन्तम् )। जायन्ते इति जनाः, जनधातोरच, तेषु जनेयु । मदयतीति मदयन् शतृप्रत्यय. । लीला इव आचरतीति विद्महे “ कर्तु. क्यङ्सलोपश्चे"ति सूत्रेण क्यहि लीलायते, तस्मा. नामधातो. भावे क्तप्रत्यय इडागर्म अलोपे च कृते लीलायितं तेन हैतुना । न चलीति अचल पचाद्यच, मलयश्वासी अचलश्च मलयाचल ,मल्लते इति मल्ल पचायच, मळयाचल एव मल्लः मलयाचलमल्लः, माति मानहेतुर्भवतीति विग्रहे माधातो रणप्रत्यये पृषोदरादित्वात् रस्य लवे मालं क्षेत्रम् । मल्लस्य माल मलयाचलमल्लमालं, तस्मात् मलयाचलमल्लमालात् (अथवा मल् च तत् मालं च मल्लमालं, मल्याचलस्य मल्लमालं तस्मात् । अस्मादिति अथवा सप्तम्यर्थे तसिल, अस्मिन् इति इत. । शिशिरस्यायं शशिर इदमर्थेऽण आदिदृन्दिन । नियन्तेऽनेनेति मरुन, मरदेव मारुत "प्रज्ञादिभ्यश्चे"ति. स्त्राधेऽण वृद्धि। आइपसात वा गतिगन्धनयोः लटि आधाति । उपमा ।। मलयाचल- इत ।
हेमन्तमंतमदनं- The reading of the Ms is हेमन्तमंतमदनं. As it stands, it is difficult to interpret it according to grammar either we change it to हैमन्तमंतमदनं or हेमन्तक + अन्तमदनम्. Even then it is difficult to understand the propriety of the word 388. It is possible that the reading might have been हैमन्तकान्तमदनं nieaning the charming cupid of Hemanta Ha-The original reading inight be Afe meaning Jasmine If we take her as a des’ya word, one of its meaning is saffron colouied. See Des’ınamamālā (VI 145. Bombay, S Series ) In both the cases however it is difficult to understand their propriety in relation to मलयाचल It may It may be that is here might be for a which means either name of a district lying west and southwest of Bengal or merely tableland of मलयाचल. श्लो. ८८. (हे) सखि, एतस्मिन् शिशिरे विधौ विमुखिते यासां प्रियः प्रोषितः, पत्युः सङ्गमसंभवं सुखमहो यासां च नो जायते, धृतभूरिमानविभवाः याः मानिन्यस्तोपं न लेभिरे तासां सीमन्तिनीनां मनः मनोभवः किं न दहेत् ॥ विधीयतेऽनेन अथवा विधत्ते इति विधिस्तस्मिन् विधौ, व्युपसर्गात् धाधातो “ उपसगै घो कि"रिति सूत्रेण किप्रत्यय आकारलोपश्च विधिः । विरुद्धमलनु- कूलं मुखं विमुखं तस्मात् (विमुखशब्दात् ) "तारकादिभ्य. इतच्" । विरुद्ध- मननुकूलं मुख संजातमस्येति विमुखितस्तस्मिन् । प्रोष्यते स्मेति प्रोषित प्रोपस- र्गात वसधातो कर्मणि क्तप्रत्यय अथवा प्रवसति स्मेति विग्रहे कर्तरि क्त " गत्यर्थे ति सूत्रेण । सगमनं संगम , “ग्रहवृह ग्रहवृह" इत्यप, संगात्संभयो यस्य तत् सङ्गमसंभवम् । भूरिमाना एव विभवा भूरिमानविभवा धृताः भूरिमानविभवा यामि ता धृतभूरिमानविभवा । माना सन्ति आसामिति मानिन्य , " अत इनिठनौ” इति इनि छीप् च । सीमन्ता सन्ति आसामिति सीमन्तिन्य इनि डीप् च तासाम् । मनसो भव उत्पत्तिर्यस्य अथवा मनसि भवति इति मनोभव पचाद्यच् । श्लो. ८९. (हे) प्रियतम, मुकुरिततरौ वसन्तसमागमे मनोगतामङ्कस्थां मां विहाय ते (तव) गन्तुं न युक्तम्, अथ रात्रौ कोकिलया कृतान् कलकलरवान् श्रुत्वा सम्प्रति भवति चलिते (सति) एषा जीवितुं नोत्सहे ।। मुकुरा (कोरका ) संजाता अस्येति विग्रहे तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतन्" इति सूत्रेण इतच्प्रत्यय , मुकुरिता तरवो येन स मुकुरिततरु- स्तस्मिन् मुकुरिततरौ । वसन्त्यत्र मदनोत्सवा इति विग्रहे “तृभूवहिवसि " सूत्रेण झच्प्रत्यय । वसन्त, समागमनं समागम "ग्रहवृह" इत्यप्, वसन्तस्य समागम प्रत्यय - ७६ वास आवास वातावासः तस्य वमन्तसमागमस्तस्मिन् । मनसि गता मनोगता ताम् । अड्के तिष्ठनीति अङ्कस्था क्विा ताम् । गम्धातो तुमुन्प्रत्यय गन्तुम् । कलकलाश्च ते रवाश्च कलकलरवा नान् । श्रुधातो त्क्वाप्रत्यय श्रुत्वा । कृधातो. कर्मणि क्तप्रत्यय. कृतान् । भातीति भवान् “भातेडवतु." तस्मिन् । चलधातो. क्तप्रत्यय. इडागम. चलितस्तस्मिन् चलिते । जीवधातो तुमुन्प्रत्यये इडागमे च कृतं जीवितम् । उदुपसर्गात् सह- धातोलटि उत्तमपुरुषैकवचने उत्सहे ॥ काव्यलिङ्गम् ॥ कृतान्-The reading of the Ms. does not grammatically fit properly. श्लो. ९०. वासावासविलासवासितमतिः दयितः होष्मलकुचो प्रेमप्रसन्नां प्रियाम् आलिङ्गन शीतं च नो विन्दते, चेतःमपरिवर्तमानदयितासंदीप्यमानोल्लसत्- संसर्पद्विरहाग्नितापितवपुः पान्थोऽपि नो जग्मिवान् ।। वसन्त्यति अधिकरणे वञ् । आवसनमावास. भावे घञ् । वाले (वासस्यावास ) तस्मिन् वा विलासस्तेन वासिता मतिर्यस्य स । वास्यते स्मेति वास उपसेवायाम् क्त- प्रत्यय इडागमश्च वासित इति । दृढी ऊष्मलो कुची यस्या सा ताम् (ढौ च- कम्मलौ च दृढोस्मलो ढोष्मलौ कुचौ यस्याः सा ताम्)। प्रेमणि प्रसन्ना प्रेमप्रसन्ना ताम् । आलिङ्गतीति आलिङ्गन् । नो इतिनिषेधार्थकोऽव्ययः । विदधातुस्तुदादिः, वर्तमानकाले आत्मनेपदे प्रथमपुरुषैकवचनम् "शेमुचादीना"मिति नुम् । संपरि- वर्तते इति संपरिवर्तमाना चेतसि संपरिवर्तमाना चेत.संपरिवर्तमाना, सा चासो दयिता च । संदीप्यते इति संदीप्यमान. शानच । उल्लसतीति उल्लसन शत। संसर्प- तीति संसर्पन् । विरहस्याग्नि विरहाग्नि., चेत.संपरिवर्तमानदयितया संदीप्य- मानश्चासौ उल्लसन चासौ संसर्पन चासो विरहाग्निश्च, चेत संपरिवर्तमान- दयितासंदीप्यमानोल्लसंसर्पद्विरहाग्निस्तेन । तापित इति तपेर्णिजन्तात त । तापितं वपुर्यस्य सः। चेत संपरिवर्तमानदयितासंदीप्यमानोल्लसत्तंसर्परिद्वहाग्नि- तापितवपु । जग्मिवान् इति क्वसुप्रत्ययान्त . गमे. क्वसु इडागमे द्वित्व उपधालो- पादिकायें कृते जग्मिवान् इति रूपम् ॥ काव्यलिङ्गम् ॥ STEETE-bed-chamber. श्लो. ९१. (हे) सखि, प्राणेश्वरे समायाते मे प्राणाः पुनरागताः । इदं कौतुकं पश्य, मृताहं पुनः जीविता ।। प्राणन्त्येभिरिति विग्रहे अन प्राणने धातो "हलञ्चे"ति घञ् प्राणा , ईशितुं शीलमत्येति ईश्वर "स्थेशमासपिसकसो बरच इति वरच, प्राणानामीश्वर प्राणेश्वरस्तस्मिन् । समायाति स्मेति समायात. समादुपसर्गात् यातेः "गर्त्यथा- कर्मक"ति कर्तरिक्त. समायातस्तस्मिन् । आगच्छन्ति स्मेति आगताः "गत्यर्थे"ति करि क्तः । कुन कायतीति कैशब्दे " आतोऽनुपसर्गे क" इति कप्रत्यये ( उपपद- समासे) इस्वे च कृते 'प्रज्ञाद्यण"वृद्धि. कौतुकम् । मृता जीविता-एतौ क्तान्तौ। 1 ७७ श्लो. ९२. (हे) सखि, गृहात् दयिते निर्यातेऽपि प्राणैः (चित्तैः सह पृष्ठतः गता पुनः प्राग्ग्रामे भवनमागतास्मि ततोऽस्य सेवां कुर्वे । स्वप्नेषु चेतोविमोह त्मकैः प्रणयातिरेकललितैः प्रतिरात्रिजातसुरतैः तत्रापि प्राणेश्वरो रञ्जितः (निर्यात ऽपीत्यत्रापिशब्द एवार्थकः)॥ गृह्णाति धान्यादिकमिति गृहम् तस्मात् गृहात् । दय्यते स्मेति विग्रह क्तप्रत्ये दयितस्तस्मिन् । निर्याति स्मेति निर्यातस्त स्मिन् निर्यातेस्त 'गत्यर्थाकर्मके' ति कर्तरि क्तप्रत्यय । प्राणैरित्यत्र सहाथै तृतीया । पृष्ठशब्दात् तसिल पृष्ठत आद्यादिभ्य उपसंख्यान"मिति नियमात् “ पञ्चम्यास्तसिल" । प्राक् चास ग्रामश्च प्राग्ग्रामस्तस्मिन् । भवन्त्यत्र इति भवनम् तस्मिन् । तस्मादिति तत तद शब्दात् पञ्चम्यास्तसिल । स्वप्नेषु-इति स्वपेनन् प्रत्यय । चेतसो विमोहात्मकानि चेतोविमोहात्मकानि ते । प्रणयनं प्रणय , अतिरेचनानि अतिरेका अत्युप सर्गात रिचधातो भावे घ,प्रणयस्यातिरेकास्तैललितानि तै प्रणयातिरेकललित शोभनानि रतानि सुरतानि । जातानि च तानि सुरतानि च जातसुरतानि । रात्रि रात्रि प्रति-इति प्रतिरात्रि, प्रतिरात्रि जातसुरतानि इति प्रतिराप्रिजातसुरतानि ते । तस्मिन् इति तत्र सप्तम्यास्त्रल् । प्राणानामीश्वर. प्राणेश्वर । रछे क्त. रञ्जित. ॥ काव्यलिङ्गम् ॥ श्लो. ९३. इयं तन्वी तरलेक्षणा, मम मनः पञ्चेषुणा हन्यते, इयम् उन्नर वक्षौजी प्रबहते, ममेदं मनः खिन्नम्, असौ मध्ये सुकृशा, ममादृढमति (अथ ममादृढम् इति हेतोः) मनोमङ्गं प्रामोति, इयमवला लावण्याम्बुपरिप्लुता, मदी मनः शून्यम् ॥ तनुशब्दात् “वोतो गुणवचना"दिति ङीपि यणि लन्वी । ईक्ष्यते आभ्यार इति ईक्षधातोयुट ईक्षणे, तरले ईक्षणे यस्याः सा तरलेक्षणा । पञ्च इषवो यस स पञ्चेषुस्तेन पञ्चषुणा । ईष्यते एभिरिति विग्रहे-“ ईषे किश्च" सूत्रेण उप्रत्यय " आदेरिच्च इषव । हन्यते इति हन् कर्मणि क्तप्रत्यये यति आत्मनेपदे हन्यते इति रूपम् । उन्नमत' स्मेति उदुपसर्गात् नम्धात गत्यर्थाकर्मके "ति मलोप वक्षसि जातो वक्षोज " सप्तम्यां जनेर्ड खिदे. तकारदकारयोनकार खिन्नम् शोभना सुतरां कृशा सुकृशा दृढ स्थूलवलयो ” सूत्रेण आहढमिति निपात नम् । लवणात्विट्र सैव चतुर्वर्णादित्वात् स्वार्थे व्यञ् लावण्यम्, लावण्यान्ये अम्बूनि लावण्याम्बूनि, परिप्लुता (व्याप्ता ) लावण्याम्बुपरिप्लुता । शु हितम् इति विग्रहे "शुने. संप्रसारणम् वा च दीर्घ." इति यत् । ममेदं मदी वृद्धाच्छ." इयादेश. ॥ असगति. रूपकं च ॥ पश्चेषु-See the notes on Slo. 2. -- उन्नती। । ते ७८ श्लो. ९४. अथ यत्रादौ अतुलः कलमेखलाकलकलः प्रादुर्बभूव ततः तत्रैव तदेव नू पुररणत्कारः शुश्रुवे, तत् (तस्मात् ) प्रमदया पुरुषायितं, कामिना वामायितं मन्ये, पश्चाचित्ररतावसानसमये ताभ्यां स्वभावे स्थितम् ।। आ प्रथम दीयते गृह्यते इति आदि आडुपसर्गात दाधातो किप्रत्यय. । कला चासो मेखला च कलमेखला तस्या कलकल कलमेखलाकलकल । नास्ति तुला (उपमा ) यस्य स अतुलः। तस्मादिति तत तसिल् । तदा तदो दा च "सूत्रेण दाप्रत्ययः । नृपुरस्य रणत्कार. नूपुररणत्कार । श्रधातो कर्मणि लिटि शुश्रुवे । प्रकृष्टो मदो यस्या सा प्रमदा-अथवा प्रमदी हर्षोऽस्त्यस्या इति विग्रह “ अझ आदिभ्य” अच. खोत्वात् टापि प्रमदा या ! पुरुष इचाचरति इति विग्रहे क्यङ्- दीचे पुरुषायते, तस्माद्भावे क इडागमश्च पुरुषायितम् । वामा इवाचरतीति- विग्रहे " कर्तुः क्य"सूत्रेण क्यडि दी वामायते तस्मान्नामधातो " नपुंसक भावे ." सूत्रेण क्तप्रत्यय इडागमञ्च वामायितम् । रमण रतम् तद चित्रं च रतं च चित्ररतम्, तस्यावसानं तस्य समय तस्मिन् । स्थितमित्यत्र नपुंसक भावे त स्थितम यतिस्यती" इत्वे स्थितम् ॥ उपमा उत्प्रेक्षा च ॥ श्लो. ९५. (हे) मुग्धे, त्वं हृदि आनन्द धेहि, अथ पाणिद्वये कङ्कणं संधेहि, सद्बासः परिधेहि, उरसि हारं परिधेहि, पादयोनू पुरं (परिधेहि),सामोदानि कुसुमानि मूर्ध्नि निधेहि, अक्ष्णोश्च कालाअन (निधेहि ), अथ निजप्रेयसि आयाते मङ्गल साधु विधेहि ।। आनन्द इति धजन्तः प्रयोग (अथवा अर्श आदित्वात् अत्र) [ धाधातो. लोटि मध्यमपुरुषैकवचने धेहि रूपम् । पाण्योईयं पाणिहयं तस्मिन् । समुपसर्गात् धाधातोर्लोटि संधेहिरूपम् । कं शुभं कणतीति कङ्कणं, कणशब्दे अच । वस्यते (आच्छाद्यते) अनेनेति वास., बस अच्छादने " वसेर्णित्" इति सूत्रेण असुन्प्रत्यय वृद्धिश्च वास । हियते ( मनो )ऽनेनेति हार, हृधातो. घ वृद्धिश्च हारस्तं हारम । नृपुरम् -नुवि पुरति पुरमग्रगमने क कित्वाद्गुणा- भावः । आमोदेन सहितानि सामोदानि। कालं च तदानं च, अज्यतेऽनेन इति अननम् करणे ल्युट् । निजश्चाती प्रेयान च अथवा निजस्य प्रेयान्, तस्मिन् । आयाति स्मेति आयातस्तस्मिन् आयाते, आडुपसर्गात् याते. क्त.। मगि सर्पणे मङ्गति मङ्गन्यते वा, मङ्गरलच मङ्गलम ॥ श्लो. ९६. (हे ) बाले, (त्व) पूर्णमनोरथासि, (यतः) तवैव कान्तः परिपूर्णकामः समागतः,(हे बाले), आगच्छ, मङ्गलानि कुरु,तवाद्य गौरी प्रसन्ना एच ।। पूर्यते स्मेति पूरी आप्यायने कर्तरि कर्मणि वा क्त पूर्ण । मन एव रथोत्र मनोरथ इव वा मनोरथ , पूर्ण मनोरथो यस्या. सा पूर्णमनोरथा, कामनं कान्ती य, परिपूर्णः कामो यस्य स. परिपूर्णकाम. । प्रासादत - काम कम ७९ : इति प्रसधातो " गत्यर्थाकमके"ति कर्तरि क्तप्रत्यय "रदास्यामि"ति सूत्रेण तकारदकारयोनकारे कृते स्त्रीत्वात् टापि, प्रसन्ना । अत्र अस्मिन् अहनि इति सद्य परुत्" सूत्रेण, अच इति शब्द. साधुः । गौर वर्णः अस्त्यस्या इति गौरादित्वात् ङीव गौरी ॥ गौरी प्रसन्ना-Here obviously is a reference to गौरीव्रत which young women observe to propitiateh so that they may get good husbands or their married life may be happy. श्लो. ९७. प्राणेश्वरे ( त्वं ) सानन्दा भव, सादरा भव, प्रीता भव, सकामा भव, साहारा भव, भूषिता भव, (प्राणेश्वरे त्व) प्रेयसो भव, बाह्याच्च देशान्तराद्वास- भवने आयातेन नानामोहनपण्डितेन कान्तेन सहिता कामोत्सवैः रमस्व यासमवने कामोन्सवः रमस्त्र) । ईशितुं शीलमस्येति ईश्वरः "स्थेशभासपिसकसो बरच " सरेण वरच । आनन्देन सह मानन्दा, तेन सहेति "तुल्ययोगे समासे वोपसर्जनस्ये"ति सहस्य सादेशे सानन्दा । आदरेण सह सादरा । प्रीयते स्मेति प्रीझोणने क्तप्रत्यय स्त्रीत्व- विवक्षायां टापू प्रीता । कामेन सह सकामा। आहारेण सह साहारा । भूष्यते स्मेति- भूषधातो क्त टाप इडागमश्च भूषिता । अतिशयेन प्रिया प्रेयसी । अन्यो देशो देशान्तरं तस्मात् । आयाति स्मेति आयाते: " गत्यर्थाकर्मके"ति क्तप्रत्यय , आयात तेन आयातेन, मुह्यतेऽनेनेति मुहेयुटि गुणे मोहनम् (सुरतम्) । नाना च तद मोहनं च नानामोहनं तस्मिन् पण्डितस्तेन ॥ श्लो. ९८. (हे) मानिनि, चिन्तां मुञ्च, धृति भजस्व, मोहे मनो मा कृथाः, द्विरेन हि वासरैः प्रियतमप्रत्यागमस्यावधिः इत्येवं यावत् प्रियसखी सादरं प्रतियो- धयेत् अङ्गणभुवि उपागतः कान्तः वाक्यामृतैः प्रियां प्रीणाति ॥ मानोऽस्त्यस्या इति मानिनी तत्सम्बुद्धौ मानिनि इनित्प्रययो डीप् च । चिन्तन चिन्ता चिति स्मृत्याम् चितिपूजि" सूत्रेण अङ टाप् चिन्ता ताम् । धरणं धृति. "स्त्रियां क्तिन्" ताम् । मोहनम् मोह मुह वैचित्र्ये घन तस्मिन् । कृ लुडि मध्यमपुरुषैकवचने आत्मनेपदे माङयोगे अडागमाभावे सिचोलुकि कृथा । प्रियतमस्य प्रत्यागमस्तस्यावधि, अवधानम् अवधि " उपसर्ग धो. कि"गिति किप्रत्यय । अविद्यमान मृतं मरणमत्रेत्यमृतम् । प्रिया चासौ सखी प्रियसखी। आद- रेण सह सादरम् । द्वौ वा त्रयो वेति द्विवास्तै "संख्ययाऽव्ययासन्न" इत्यादिना। "समासे बहुव्रीही संख्येये' इति डचि टिलोपे बहुवचने हिवास्तैर्हिः । वासयन्ति वसतेय॑न्तात् “ अर्तिकमिभ्रमि सूत्रेण रप्रत्यवे वासरास्तै वासरे । अगत्यत्र करणाधिकरणयोश्चे"ति ल्युट अङ्गन, पृषोदरादित्वात् अङ्गणं, अङ्गण- स्य भू. अङ्गणभू तस्याम् । वाक्यान्येव अमृतानि ते. ॥ रूपकम् ॥
. The reading of the Ms द्वित्रिरेव हि वासरे is grammatically indefensable hence the amendation. श्लो. ९९. योपितामतिसमुन्नतस्तनमयं सिंहासनमारूढः तद्वक्वेन्दुधृतातपत्र- रुचिरस्तद्भूलताकार्मुकः तद्वेणीविलसत्कृपाणफलकस्तल्लोलेक्षणमार्गणः शृङ्गारिणां पूजितः श्रीमतां श्रीनन्दनो विजयते॥ योपन्तीति योषितस्तानां योषिताम्, युषूधातो. "हमरुहियुषिभ्य." सूत्रेण इतिप्रत्ययः योपित । अतिसमुन्नतौ च स्तनौ च तची प्राचुर्य यस्मिन् अतिसमु- न्नतस्तनमयम् तत्प्रकृतिवचने मयद । सिंहचिद्वितमासनं सिंहासनं मध्यमा पदस्य लोप । आइपसर्गात् रुदधातो कर्तरि क्त ढत्वादिकायें कृते आरूढ इति । वक्त्रमेव इन्दु. बक्वेन्दु , तस्या वक्त्रेन्दु. तहक्वेन्दुस्तेन धृतमातपत्रम्, आतपात् त्रायते इति आतपत्र, तद्वक्वेन्दुधृतातपत्ररुचिर । तस्या भूरेबलता तदभ्रूलता, जैव कार्मुक यस्य स. तदभ्रूटताकार्मुक , कर्मणे प्रभवति इति कार्मुकम् । विलसन चासो कृपाणफलकच विलसत्कृपाणफलक । तस्या वेणी तवेणी, तद्वेण्येव विलल- त्कृपाणफलको यस्य स. तद्वेणीविलसत्कृपाणफलक । लोले च ते ईक्षणे च लोलेक्षणे, तस्याः लोलेक्षणे तल्लोलेक्षणे, तल्लोलेक्षणे एव मार्गणौ यस्य सः तल्लोलेक्षणमार्गण. । शृङ्गं प्राधान्यमियति कर्मण्यण, शृङ्गारा, शृङ्गारा सन्ति एषामिति शृङ्गारिणः अत इनिठनौ” इति इनि , तेषां शृङ्गारिणाम् । पूजा संजाता अस्येति पूजितः " तारकादिस्य इतन्” अथवा पूजधातो क्तप्रत्यये इडागमे च पूजितः । श्रिय. सन्ति एषामिति श्रीमन्तस्तेषां श्रीमताम् । नन्दयतीति नन्दन , श्रीयुक्तो नन्दनः श्रीनन्दन. (अथवा श्रिया नन्दयतीति श्रीनन्दन.)। विजयते इत्यत्र " विपरा- भ्यां जे"रित्यनेन आत्मनेपदं भवति ॥ रूपकम् ॥ This s'loka describes the supreme power of starent. The word श्रीनन्दन would mean the son of श्री i. e. लक्ष्मी i. e. प्रद्युम्न incarnation of god of love, श्रीनन्दन-It appears to me that there is a reference to some person bearing that name but it is difficult to trace the identity of this person. श्लो. १००. सौजन्ये निरताः खलेषु विरताः विद्वद्गुणग्राहिणः लोके विश्रुत- कीर्तयो गुणभृतो ये केपि शृङ्गारिणः तेषां करिकुम्भतुङ्गकठिनौ पीनाचुरोजौ विभ्राणा गुणवती बामविलोचना भुवि सदा भोगाय भूयात् ।। सुष्टु शोभनो जनः सुजनस्तस्य भावः कर्म वा सौजन्यं ष्यम्, तस्मिन् सोजन्ये । निशेषेण रता. निरता व्युपसर्गात रमेः क्तप्रत्ययः, 1 विरम्यन्ते स्मेति विरता. (निवृत्ता इत्यर्थः) - विदुषां गुणा. विहदगुणास्तान गृहणन्तीति विद्वदगुण- ग्राहिण नन्दिग्रही'ति णिनि । विश्रुता कीर्तयो येषां ते विश्रुतकीर्तयः । विभ्र.
OM २ । । तीति 'भृतः, गुणानां भृतः गुणभृतः । तुझौ च कठिनौ च तुङ्गकठिनौ, करिणः कुम्भौ करिकुम्भौ, करिकुम्भौ इव तुङ्गकठिनौ करिकुम्भतुङ्गकठिनौ । विभृते इति विभ्राणा “लटः शतृशानचों" इति शानम् । गुणाः सन्ति अस्या इति गुणवती ङीप् । “तदस्यास्त्यस्मि"निति मतुप् "मादुपधायाश्च" सूत्रेण मस्य वः । घामे विलोचने यस्याः सा वामविलोचना । सर्वस्मिन् काले इति सदा “सर्वैकान्यकियत्तदः काले दा" सूत्रेण सर्वशब्दात् दाप्रत्ययः, “सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां" सूत्रेण सर्व- शब्दस्य समावो भवति, सदा सर्वदा । भोजनं भोगः भुजुधातोर्घञ् “चजोः कु"रिति-कुत्वे भोगस्तस्मै भोगाय । भवतु-भूधातोलोटि प्रथमपुरुषैकवचने भवतुं । विलोच्यते आभ्यामिति विलोचने लोच दर्शने ल्युट् ॥ उपमा ॥ This is a benedictory s'loka. In the first two lines, the qualities of a man of culture and a beau of ancient India are described श्लो.'१०१. श्रीहर्षः उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्मविवरां पाप्योच्चैविलसत्सवर्णि- गुणिनी खेलन्मनोभूमणि द्विजराजरोचिरमलाम् उत्कर्षितां शङ्गारहारावली सुहृदां विभूषणकृते सद्वाक्यमुक्ताफलैः : सानन्दम् अग्रथनात् ॥ श्रीयुक्तो हर्षः । उन्मीलन्ती चासौ मतिश्च उन्मीलन्मतिः, उन्मीलन्मतिरेव यन्त्रम्' उन्मीलन्मतियन्त्रम् , तेन कृतं सूक्ष्म विवरं यस्यां सा ताम् । प्राप्यते प्राप्या, प्रोपसर्गात् आप्लृधातोः "ऋहालोयत्" सूत्रेण ण्यत् टापि प्राप्या। सुष्टु शोभनो वर्णोऽस्त्यस्यामिति विग्रहे “अत इनिठनौ” सूत्रेण इनिः डीप च सुर्वणिनी । गुणाः सन्त्यस्यामिति इन् त्ययो डीप गुणिनी, सुवर्णिनी चासौ गुणिनी च सुवर्णि-गुणिनी, प्राप्या उच्चविलसन्ती सुचर्णिगुणिनीति प्राप्योच्चैविलसत्सुवर्णिगु- णिनी ताम् । मनसः मनसि वा भवतीति मनोभूः, भूधातोः क्विए । खेलतीति खेलन् शतृप्रत्ययः, खेलन् चासौ मनोभूश्च खेलन्मनोभूः, खेलन्मनोभूरेव मणिः यस्यां सा, खेलन्मनोभूमणिस्ताम् । द्विजराजस्य रोचिः (चन्द्रस्य रोचिः) द्विजराजरोचि- स्तद्वदमला या सा द्विजराजरोचिरमला तां द्विजराजरोचिरमलाम् । नास्ति मला मलं वा अस्यामिति अमला । उत्कर्षणमुत्कर्षः भावे घञ् , उत्कर्षः संजातोऽस्यामिति विग्रहे “तदस्य संजातं तारकादिभ्य इतच्” टापि उत्कर्षिता ताम् । शृङ्गं प्राधान्य- मियर्तीति विग्रहे कर्मण्यण शृङ्गारः, शृङ्गारस्य (शृङ्गाररसस्य) हारावली शृङ्गार- हारावली ताम् । ह्रियन्ते मनांसि एभिरिति हाराः घम्, करणे घञ् । शोभनानि हृदयानि येषां ते सुहृदस्तेषां सुहृदाम् । विभूषणाय इति विभूषणकृते । उच्यन्ते यानि तानि वाक्यानि, समीचीनानि वाक्यानि सद्वाक्यानि, सद्वाक्यान्येव मुक्ताफलानि तैः सद्वाक्यमुक्ताफलैः। मुक्ताफलमिव (अथवा मुक्तैव फलमिव) । आनन्देन सह इति सानन्दम् । अग्रथनात् ग्रन्थधातुस्तस्मालछि अग्रथनात् ॥ रूपकम् उपमा च ॥ It is difficult to settle satisfactorily the text of this last and historically important verse I had to make rather very bold , - - X X Х X X changes in the readings of the Ms. I, therefore, give below the text according to the Ms. for comparison and consideration of scholars. उन्मीलन्मतियन्त्रसूक्ष्म्यविवरा सानन्दमुत्कर्षितः प्राप्योच्चैविलसत्सुवणिंगुणिनीं खेलन्मनोभूमणिम् । श्रीहर्ष सुहृदं विभूषणकृते सद्वाक्यमुक्ताफलैः यद्ग्रेन्यद्विजराजरोचिरमलां शृङ्गारहारावलीम् ॥ This s'loka gives the name of the work as well as that of the author. Here the simile is that of a pearl necklace; just as a hole in a pearl is made by piercing it with a fine instrument, similarly in this case, it is Janitoriaus ie blossoming imagination The other aspect of the simile is obvious. At the end of the Ms, we find two s'lokas in the ETETET metre The first s'loka describes the Nagara women of Vadanagar carrying home water-jars from the lake (which still exists and is known by the name of Thut ). In this s'loka two words deserve notice-1) go which is a sanskritized form of the des'ya word gaat meaning stert i e. a garland for the head (see an ATHATGT iit 16 B S Series ), (2) fes-not given in Sanskrit lexicons, appears to be a des'ya word Hemacandra gives the word farozites in the sense of 3 wet Sir Monier-Williams gives front and get (f)= Erfar meaning the hem of an under garment The meaning here may be a wet under garment The other meanings of asure that would be appropriate in this context are (i) a necklace of four pearl strings, (ii) a crest ( ZET) It is difficult to say exactly what is intended here In the second s'loka, a milkmaid is described as surpassing in beauty, the divine damsel qatzīt. In this s'loka the word aretaret is to be noted To understand the meaning of this word we have to compare the following Prakrit word-वच्छवाल or वच्छवाली meaning गोप or गोपी-a cowherdess (पाइअ-सहमहण्णवो, page 917). Compare also the following des'ya word atat 119:-a cowherd ( from aceitar] (FT. vii 41-B. S Series ) *
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