Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shrimad-bhagvad-geeta Part-3
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4 " श्रीमद्भगवडीता शाङ्करभाष्यं उपक्रमणिका यनारायण परोऽध्यकाण्डमव्यक्तसम्भवम् । अण्डस्यान्तरित्वमेनोकाःसप्त हीमाचमेदिनी ॥१॥ मभगवान सवेदनगत्तस्यचस्थिति चिकिपुरीच्यादीनग्रेसृष्ट्वा प्रजापतीनमत्तिलक्षगंधग्राहयामासवेदोक्नंततोऽन्यांच सनकमनन्दनादीनुत्माद्य भाषा अनुवाद इस संसारमे यह सब किसीको इच्छा रहती है कि दुख दूर होय और निरन्तर सुख मिलै परन्तु उसकी कोई उपार्य विनानाने बजतेरे लोग अनेक अनेक यतन करि शेद पुराण निहारि हारिवैठे और अपने मनकै मनोरथको नः पहुंचे तब परम दयालु भगवान वासुदेव यीकृष्णजीने उसकी एक अति उत्तमः उपायरुप गीताशास्त्र महाभारतके वीच यर्जुनको उपदेश किया जिसमे नाना निठा और ज्ञाननिष्ठाका कारणरूप जो कर्म निष्ठा अर्थात् कर्मयो द्वारा जानकी प्राप्ति होती है यही दोनो निछा मे प्रवृत्त कहे,कहता हुना जा गीताशास्त्र तिसका तात्पर्य कहने के लिये भगवान भाष्यकार शंकराचार्य सकल इतिहास पुराणों के साथ गीताकी एकवाक्यता अर्थात् किसीसे विरोध नहीं है. यह जानाने हुये ग्रन्धके प्रारम्भमे -अन्तर्यामी परमेश्वर का प्रतिपादक कड़े कहनेयाला एक पुराणका लोक मङ्गलाचरण किया है उसका अर्थ यह है कि जो अव्यज्ञानाम मायर जगत्को मक्कति तिसमे गगट सकल. स्थायर जमकी शरीर समूहमे अधि ठित कहो टिके जो सकल नीय तिनके आश्रयभूत अन्तर्यामी नारायण हैं और उसी मायासे अंडाकार यह ब्रह्मांड प्रगट भया है कि जिस ब्रह्मांड के भीतर सकल V श्रीमद्भगवडीता। निष्टत्तिधमेनानबैराग्यलक्षसंग्राहयामास । विविधोहियेदोक्तोधर्मःप्रत्तिलच्चन्यो नित्तिलक्षणञ्च। तत्रैकोजगतःस्थितिकारणमापिनांसाक्षाढस्य दयानन्येवसहर्यः सधर्मा प्राह्मणाद्यैवर्तिभिरामिभिःश्रेयार्थिभिरनुछोयमानोदीर्पणकालेन अनुष्ठा कामोद्भवाडोयमानविवेकविज्ञानहेतुकेनाधणाभिभूयमाने धर्मेमवईमानेचाधर्म जगतःस्थितिपरिपालयियुःसञ्चादिक नारायणाख्यो। विष्णु मस्यबह्मणो, ब्राह्मणत्वखरक्षणार्थं देवक्यांवसुदेवादंशेनकृष्ण किलसम्बभूवनायगवसहिरक्षन रक्षितःस्याइदिकोध तदधीनत्वाइर्णयमभेटाना। सचभगवान ज्ञानेश्वर्यशक्षिय लवीर्यतेजोभि.सदासम्पन्न स्त्रिगुणात्मिकांवैष्णवीखांसायां मूलमतिवशीकृत्याजोऽ व्ययोमतानामोधरोनित्यशुद्धबुद्धमुलाखभावोपिसन्समाययादेहवानिवजातइबलोका नुग्रहं कुर्थनलक्ष्यतेसमयोजनामावोपि भूतानुजिक्षयावैदिकहिधर्म हयमार्जुनाययो कमोहमहोदधौनिमग्नायोपटिदेश ‘गुराधा गृहीतोऽनुष्ठीयमानधर्मःप्रक्षयं M भाषा अनुवाद लोक और समुद्र समेत यह सातहीम वसुन्धरा नो पृथिवी सोधरी भई है॥ १॥ सोई नारायण जगतको सिर्जन कर इस सृष्टि के पालन करने के लिये मरीचि अदि आदि दश प्रजापतियोंको पहले उत्पन्न किया और उनको वेदविहित प्रति लक्षण धर्म की शिक्षा दिया फेर सनकादिकों को उपजाय उनको जान वैराग्य निति लनग धर्मका उपदेश किया। नो बैटिया कहे वेदविहित धर्म दो प्रकारका है पहला जगतको सिति करनेवाला जिसको प्रति लक्षण करते है दुसरा मतिया देवहार निवृत्ति लक्षण है जिसको बालय आदि चारो वर चौ चागे प्राथमी अपने कल्यालके अर्थ अनछान अर्थात् धारण यारते है। नगतने लोगों की कामनावशते विवेकज्ञानके नामक अधर्मकीदि भई तो जगते की सित कहे पालनकी चा करिके यही अादि कत्ती नारावर बारा बालके आधीन वेदविहित धर्मको रक्षाके निमित्त देवकी के गर्भ मे वसुदेवसे अंश रूप धाप मगर भये सोई भगवान सदा ज्ञान ऐश्वर्य शक्ति पल वीर्य तेजसे सम्पन्न कहे युक्त अपनी यैपानी विगुणमयी मायाको अपने वश करके और आप मुक्तरूप माया के द्वारा उत्पन्न भये ऐसे देपपडेये अपने किसी प्रयोजनके विना भी लोगों तस्या थाङ्करभाष्यं उपक्रमणिका । ३ गमिष्यतीति। तंधम्मभगवतायथोपदिष्टंवेदव्यासःसर्व नोभगवान् गीताख्यैः सप्तभिः झोकशतैगप्रनिववन्ध । तदिदंगीताशास्त्रसमस्तवेदार्थसारसंग्रहभूतंदुर्खिन्नेवार्थ तदर्थीविष्करणायानेकैटितपदपदार्यवाक्यापन्यायमयत्यन्त विरुद्धानेकार्यत्वेनलौकि कैद्यमाएमपखयाहविवेकतीर्थनिरणार्थसंक्षेमतोविवरणकरिष्यामि । खगीताशाखस्वसंक्षमत. प्रयोजनपरंनिःथेयसंसहेतुकस्यसंसारस्यात्यन्तोपरमलवणं तञ्च सर्वकार्मसन्त्रासपूर्वकादात्मज्ञाननिछारूपाइर्माद्भवतितधेममेवगीतार्थ धर्ममुद्दि श्यभगवतैवोक्तंसहि सुपर्याप्तोत्राण. पदवेदनंइत्यनुगीतासुकिञ्चान्यटपितवैको नवधर्मोनचाधीनचैवहिशुभाशुभी । य सादेकासनेलीनस्तुष्णीकिञ्चिदचिन्त यन् । जानसन्यासलक्षमितिच । इहामिचान्तेउत्तमर्जुनायसर्बधमान्परित्यज्य मामेकं शरणंबजेति। अभ्युदयार्थोपिय प्रवृत्तिलक्षणोधर्मोवर्णाश्रमांद्योद्दिश्यविहि त सचदेवादिखानमाप्तिहेतुरपिसईवरार्पणवुड्यानुष्ठीयमानसत्वशु दयेभवतिफला भिसन्धिवनित शुद्धसत्त्वस्यचन्नाननिष्ठायोग्यता प्राप्तिद्वारेणनानोत्पत्तिहेतुत्वेन भाषा अनुवाद पर अनुग्रह प्रकाश करिके प्रगटे जिसमे इस धर्मको सबलोग जानिकरि ग्रहण कारें क्योंकि वडोके याचरण किये हुये धर्मको सवलोग ग्रहण करेगे यह विचारि श्रीकृष्ण जी ने संग्राम के बीच शोकसागरमे निमग्न कहे ड्वे हुये अर्जुनसे वेदोक्त प्रति नित्ति दोना प्रकारके धर्म उपदेश किया था सोई भगवत् का कहा जा उपदेश सात से लोकमे सर्पन भगवान वेदव्यासजी ने यह गीता निवन्ध किया अयोन बनाया सकल वेदोके अर्थ का सारसंग्रह खरूप इस गीता का तात्म र्यार्थ लोगो को अति दुर्नय कहे जानवे योग नहीं है इसी मे बहुतोने यद्यपि इस गीताका अर्थ प्रकाश किया तौ गी साधारण लोग उसका उलटा भाव अर्घ ग्रहण करलेते है यह जानि के ययावत कहे ठीक ठीक अर्थ निर्धारण कारने के लिये हम संक्षेप मे विवरण करने मे प्रष्टत्त भये है दुसरूम इस संसारसे उपरतिरूम जो निर्माण कहे मक्ति सोड् गीताशास्त्रका प्रयोजन है परन्तु सर्वकर्म परित्याग पूर्वक ज्ञाननिष्ठारूम नित्ति धर्मके अनुष्ठान करने से वह प्रयोजन सिद्ध होता है अनुगीता आदि ग्रन्योमे भगवान् अाप यही सकल ४ थीमद्भगवद्गीता। चनिःथेयसहेतुत्वममिप्रतिपद्यतेलयाचेममर्थमभिसन्धायवध्यतिब्रह्मण्याधायकशि यतचित्ताजितेन्द्रियाः। योगिनःकर्मकन्तिसङ्गत्यवागमशुद्धये इति। हम दिप्रका रंधर्म नि यसप्रयोजनपरमार्थतत्वञ्चवासुदेवाख्य परब्रह्माभिधेयभूतं विशेपवोऽभि व्यञ्जयन्विशिष्टप्रयोजनसम्बन्धाभिधेयवहीताशाखयतस्तदर्थावनानेनसमस्तमुरुपार्य सिद्विरतस्तविवरणेयत्न क्रियतेमया अबच धृतराष्ट्र उवरच धर्मक्षेत्र इत्यादि। भाषा अनुवाद अभिप्राय प्रमाणरूप प्रगट देसाया है और जो वर्ण प्राथमके विषयमे जगतका स्थिति साधन कहे सहायक कर्मनिष्ठारूप प्रत्तिलक्षण धर्म इसमे कही कहीं कहा है वह यद्यपि देवादिलोक प्राप्तिका हेत है पर तौभी ईस्वरार्पण बुद्धि से किया हुया चित्तशुद्धि के साथ ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताको द्वारा निर्धारा मुक्तिका साधनहोना यह बात इसी ग्रन्यसे पीछू कही जायगी इसी भांति निर्वाणमुक्तिका कारणरूप दो प्रकारका धर्म और वासुदेव जो परवमपरमारथ तत्त्व मोई विशेष रूपसे प्रगट करते विशेष प्रयोजन अभिधेव श्री सम्बन्धविशिष्ट इस गीताशास्त्र के अर्थ जानसे सव पुरुषार्थ सिद्ध होते है इसलिये इसका तात्मय करनेको मै यत्न करताहं इस विषयमे धतराष्ट्र ने कहा कि हे सञ्जय इत्यादि । इति शारभाप्य' उपक्रमरिका ॥
श्रीमद्भगवद्वीता प्रथम अध्याय . । तराष्ट्रउवाच। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेवेसमयेतायुयुत्सवः । मामकाःपाण्डवाश्चैव किमकुर्वतसञ्चय ॥१॥ सञ्चयउवाच । दृष्ट्वातुपाण्डवानीकंव्यूढं दुर्योधनस्तदा । भाषा अनुवाद नेवहीन धतराष्ट्र युद्धमे संदेह करते हुये प्रशंसा वाक्यसे धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्रका विशेषण देकर अात्महितकारी सञ्जयसे पूछा कि हे सञ्जय धर्मक्षेत्र धर्मभूमि जो कुरुक्षेत्र वही मेरे पुत्र दुर्योधन याटिक और पाण्डु के पुख युधिष्ठिरादि सब युद्ध की इच्छा करिके इकट्ठे हो क्या करतेहै इससे यह पाया कि धतराष्ट्र के पूर्व पुरुषों मे कोई कुरुनाम राजा थे जिनका यह कुरुक्षेत्र धर्म स्थान है यहां धर्म बुद्धि होय संग्राम छोड मेल कर के राज्यका विभाग तो न कर देंयगे यह भीतरी अभिप्राय है और रणभूमि मे सैन्यदल टेखि सशंकित कहे उरे से कौन है क्या धीरवीर भीममितामह के माथ मेरी प्रवल मेना को देखि गतुवोंको भय भई है या हिंसा को भय दोनो मानि संग्राम से निवृत्त हो जायंगे यह तराष्ट्र सञ्जय से पूछते है पाण्डवा यह सम्बोधन दे कर बनाया कि मेरे भाई पाण्डु रोगी थे और उन को संग रूम रि मैथुन करत हुये ऋपिने शाम भी दिया था कि नव तुम स्त्रीसंग करोगे तर्त मर्जावगे तो फेर युधिष्ठिरादि मेरे भाई के पुत्र कैसे हो सकते है इस से ये जारज है और राज्य के लिये लडने को आये कुरुक्षेत्र से यह इन का सोलह बाना अन्याय है और मामका कहने से झलकाया कि मेरे पुत्र जो कुरुक्षेत्र गये सो अपने क्डों के स्थान पर गये कुछ अन्याय नहीं किया पर उन का आवना पराई जगह अन्याय है॥१॥ तव सञ्जयने एतराष्ट्र से कहा कि २ है श्रीमद्भगवडीता। आचार्यमुपसायराजावचनमब्रवीत् ॥२॥ पश्यैतायाण्ड पुत्राणामाचार्य महतींनमू 'व्यढांपर्दयुत्तोएनवशिष्वेणधीमता ॥ ३॥ अबरामहेष्वासामीमार्जुनसमायुधि ॥ युयुधानोविराटश्चद्रपदञ्चमहारथः ॥ ४ ॥ पृष्टकेतुश्चेकितानःकापिराजयवीर्य वान् । मजित् कुन्तिभोजश्चसैव्यश्नरपुङ्गवः ॥ ५॥ युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौ जावीर्यवान् । सौभद्रोद्रौपदेयाश्चसर्वएवमहारथाः ॥ ६ ॥ अचाकन्तु विथि भापा अनुवाद राजा पांडुपुत्र युधिष्ठिरादिका सैन्यदल व्यूडाकार रचना रचित युद्ध के लिये तयार सडा देखि आप के पुत्र राजा दुर्योधन द्रोणाचार्य के निकट जाय कर बच्यमाण यह बात कही है इस से यह जानाया कि भय औ शंका तुमारे ही पुत्र को भई है कि घवडाय के गुरु के निकट दौड गये ॥ २॥ सोई दुर्योधन की सब बातें समय नव श्लोकसे कहते है कि हे प्राचार्य देखियेतो यह युधिष्ठिरका मैन्यदल जिस को आपका शिग्य द्रुपद का पुत्र वुद्धिनिधान पृष्टद्युम्न ने रचा है सो महात्मा प्राय के सामने बडे विस्तारमे युद्ध करने को तयार निडर खड़ा है इस से यह पाया कि जिस मे द्रोणाचार्य क्रोध करें॥ ३ ॥ और इस सेना के वीच युद्ध करने मे भीम अर्जुन के समान धनुर्धारी महावली और और कितने योहा है तिन के नाम दुर्योधन द्रोणाचार्य से कहते है कि युयुधान जो सात्यकी और राजा विराट महारथी द्रुपद राजा॥ ४॥ और एकेतु चेकितान राजा औ वलवान काशीराज औ पुरुजितराजा कुन्तिभोज पौ सैव्य ये सब राजा नरयेष्ठ औ बलवान है॥५॥ पराक्रमी युधामन्यु नाम राना और बलवान उत्तमौजा नाम एक राजा और मुभद्राके मुख अभिमन्यु यौ द्रौपदी के गर्भसे युधि छिरादि पांचजनेसे उत्पन्न प्रतिन्दिादि पांचभाई ये सब महारयी वीर है महा रथीका लक्षण जो अस्त्रशस्त्रमे निपुण हो दश हजार धनीरो योहों के साथ अकेला युद्ध कार सके उसी को महारथी कहते है और असंख्य योद्धों के साथ युद्ध करने में जो समर्थ उसे अतिरथी शाल मे कहते है और एक योद्धा के साथ गो युद्ध-करे मोरयी है उस मे भी कम अईरथी कहायते है॥६॥जो वल. शव सेनादल देखि डरे से वोलते हो तो मेल क्यों न करलो लडाई से क्या फल प्रथम अध्याय.। टायेतानियोहिजोत्तम । ' नायकाममसैन्यस्यसंज्ञार्थ तान्भधीमिते ॥ ७॥ भवान् भीमश्चकारीचसमयसमितिन्जयः । अश्वत्यमाविकर्णद्यसौमदत्तियद्रथ. ॥८॥ अन्ये चवहन शूरामदर्य त्यतानीपिताः। नानाशस्त्र प्रहरणा.सर्वे युद्धविशारदाः ॥६॥ अपव्याप्तं वदस्माकंबल भीभाभिरचितं । यर्याप्तनिवदमेतेषांवलंभीमाभिरचितं ॥१०॥ अयनेपुचसई युययाभागमवसिता.। भोगनेवाभिरक्षन्तुभवन्त सर्वएवहि ॥ ११ ॥ भाषा अनुवाद है ऐसा द्रोणाचार्य न कहै इस शहा मे दुर्योधन कहता है कि मेरे पक्ष मे नो नायक कहे सेनापति है वे सब आप से निपे नही है तौभी उन के नाम आप को स्मरण कराने के लिये कहता ॥ ७॥ साई ये दो लोक से कहते है कि सग्रामविजयी धाम औ भीष्मपितामह कर्ण समाचार्य अन्वयमा विकर्ण यौ सोम दत्त का पुत्र भरिथवा औ जयद्रथ ये सब पीर अपनी अोर है तौ फेर डर किस बात का है यह नाशय नानो ॥८॥ अव कहते है कि और भी धीर वीर जो मेरे अर्थ पाए परित्याग करने की नियय करि राखे है और नाना प्रकार के शस्त्र चलावनेवाले तथा युद्धविद्यामे विशारद कहे अति निपुणवे सब लोगमी श्राम को कृपा से इधर तयार है। इस के अनन्तर दुय्योधन ने ना कहा सोई धृतराष्ट्र से सञ्जय कहते है कि ऐसे ऐसे शूर वीरां से भरी पूरी और भीष्म पितामह से रचित हो के भी हमारी सेना अपय्यास कहे पाण्डव को सेना के साथ युद्ध करनेमे असमर्थ सो जानी जाती है और विपक्ष पाशहवा का अपूर्ण दल बालसी भीमसेन से राक्षत पय्याप्त अथात् समरमे समर्थ सो देस पडे है। दूसरा अर्थ दुर्योधन अपने हृदयकी निडरता प्रकाश करते हुये द्रोणाचार्यसे कहते है कि हमारा ग्यारह अक्षौहिणी सैन्य दल महात्मा बुद्धिमान भीमपितामह जिस को हरतरह से रक्षा करते है निसन्देह शबुवा का परामद करने का समर्थ है और इन विचारो की एकतो सात अक्षौहिणी माव थाडी सेना दूसरे चपलबुद्धि महा गवार भीमसेन से परिपालित है कहो इनारा सामना क्या करेगा पराभव करना अर्थात् नितना तो बडी दूर है॥ १०॥ इस से भव तुम सब लोगों को यही करना उचित है कि शत्रु के सैन्यदल के भीतर प्रवेश करने का क्रम से सके श्रीमद्भगवतहीता। तस्य संबनयनहर्ष करुष्टद्धःपितामहः । सिंहनादंविनद्योःशखंदभौमतापवान्॥१२॥ ततःशहाश्चर्यचपणवानकगोमुखाः । सहसैवाम्यहन्यन्तसशब्दस्तमुलोभमत् ॥१३॥ ततःश्वेतैईयैर्युक्तमहतिस्पन्दनेस्थितौ । माधवःमाण्डवथैवदिव्योगहीपदामतः ॥१४॥ पाञ्चजन्यं हृषीकेशोदेवदत्तंधनञ्जयः । पौण्डदध्मौमहा यह भीमकाटकोदरः ॥ १५॥ अनन्तविजयराजा कुन्तीपुत्लोयुधिष्ठिरः। नअल सहदेवश्चमुधोपमणिपु ध्यकौ ॥ १६ ॥ काश्यञ्चपरमेष्यासा:शिखण्डोचमहारथः । एष्टद्युम्नोविराटशसान्य भापा अनुवाद घलग अलग हो अपनी अपनी रणभूमि पर खडे हो कर भीमजी की सब कोई रक्षा करो निस मे और कोई शत्रु को और का योधा पीछू से इनको न मारने की अभिप्राय यह है कि भीमहीं के वल से हमारा जीवन है॥ ११ ॥ सव तो ऐसी ऐसी राजा दुर्योधन की सनमान और अपनपौ की याते' सुनि भीषणीने जो किया सो कहते है कि दुर्योधन के सन्तुष्ट होने के कारण कुरवंश राध पितामह उछल के आगे वटि सिंहनाद करि के शव को वडे धुधुकार शब्द में बजाया॥१२॥ भीम पितामह की युद्ध मे ऐसी उत्साह देखि सकल सेना के सरदार लोग जिस भांति युद्ध उत्सव मे प्रष्टत्त भये सोई कहते है कि तदनन्तर गद् भेरी कहे तूर ही पण्य जो सदा अनक जो नगारा गोमुख वाद्य विशेष तत्काल एक बारगी जो सभोने वजाया तो वह शब्द एक बडा अाश्चर्यभूत भयानक धूधकार भया कि टधिवी दहल उठी ॥ १३ ॥ तिस के वादि पाण्डवों को मेना में युद्ध की तयारी पांच झोक से कहते है कि इधर तो कंस से श्वेत घरण चार हय संयुक्त सूर्य के समान प्रकाशमान रप पर सवार बीक्षण यौ अर्जुन ने भी अति उत्तम दोनो गड धुकारे कि तीन लोक हिल उठे ॥१४॥ अब किसने कौन शह बनाया से कहते है कि पाञ्चजन्य नामक सङ्ग बीभगवान ने और अर्जुनने देवदत्त नाम राड्ड वज्ञाया फेर भीमकर्मा भीमसेनने भयानक पौड नामक महाशयनाया ॥ १५॥ तिस के अनन्तर अनन्तविजय नाम भट्ट कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बनाया और सुघोप नाम शङ्ग नकुलने चौ मणिपुष्प नाम सहदेवने वजाया ॥ १६ ॥ और धनुर्धारी काशीराज थिएण्डी पी सृष्टद्युम्न ॥
प्रथम अध्यायः। ww ॥ किच्चापराक्षितः ॥१७॥ द्रुपदोद्रोपदे याञ्च सर्व माथिवीपते। सौभद्रद्यमहावाहुः महान्दमोटघकष्टयक ॥१८॥ सघोपोधार्तराष्ट्राणांहदयानिव्यदारयत्। नभर पृथिवीञ्चैवतुमुलोऽभ्यनुनादयन् ॥१८॥ अवयवरिख तान्दृष्ट्वाधाराष्ट्रान्कमिध्वजः । प्रष्टत्तेश स्त्रमंपातेधनुरुद्यग्यपा एडयः । हृषीके गंतदावाक्यमिदमाइमहीपते ॥२०॥ घर्जुन उवाच । सेनयारुभयोमप्यरथं स्थापयमेच्यत ॥२१॥ यावदे तानिरीयोई कामानवस्थितान् । कैर्मयासहयोद्धव्यमस्मिन्रणसमुद्यमे ॥२२॥ योग्यमानानवेजेई मएतेऽवसमागता धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्यु प्रियचिकीर्पयः ॥ २३॥ सञ्जय उवाच ॥ भाषा अनुवाद नया विराट राजा और युद्ध में अपराजित जो सात्यकी ॥ १७ ॥ और प्रद राजा तथा द्रौपटी के पांच पुत्र प्रतिनिन्दादि और सुमदा के पुत्र महावाज अभिमन्युजी हे पृथ्वीनाथ एतराष्ट्र ये भव के सव भिन्न भिन्न ध्यान करने लगे ॥१८॥ यही उन सवा की शायनिने तुमारे पुत्र दुर्योधन और उन से पक्षपातियों के हृदयों को विदीर्थ कर दिया और वह ध्वनि प्रतिध्वनिरूप से धाकाश औ थिवीतल मे व्याप्त हो छाय रही॥१८॥ उस समय मे अर्जुनने श्रीयाणजी को जो जनाया मा चार लोक मे मन्जय धृतराष्ट्र के निकाट मगट करते है कि हे महाराज एतराष्ट्र इस प्रकारकी शङ्ग ध्वनि होने पर भी तुमारे भगवान से यह बात कही॥ २०॥ चीक्षा से अर्जुन इतनी ही वात कहो कि पुथ लोगों की उत्साह युद्ध मे देख कर कपिधन गर्नुनने धनुप चढाय उस काल हे अच्चत देशना दलके बीच मेरे रथलो पडा करी ॥ २१ ॥ जो कहा कि क्या तमासगीर हो कि सडे हो देखोगे तुम तो श्राप योद्धा लडनेवाले हो इससे सेना के मध्य रथ किस लिये खडा किया जायगा इस बात पर कहते है कि उतनी देर रय उडाकरा कि जबतक इम देखें कि युद्धको कामना करि खुडी भई सेना के बीच फिम के साथ लसना हमै उचित है ॥ २२॥ दर्बुडि दुर्योधन का मनोरथ सिद्ध पारने के अर्थ जो राजा लोग इस युद्ध भूमि पर अाय इाले भये है उन को नय तक हम देखें तबला रय दानो मेना के मध्य मे स्थापन करो॥ २३ ॥ तिम के वाद क्या भया मो कहते हवे सञ्जय बोले कि हे महाराज तराष्ट्र अर्जुन की ७ . श्रीमद्भगवद्गीता। एवमुक्तोहषीकेशोगुडाके रोनभारत सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थायित्वारथोत्तमं ॥ २६ ॥ भोगदोरममत सोपानमहीक्षितो। उवाचपार्थपश्यैतानसमवेतन्कुिरूनिति ॥ २५॥ तबामग्यस्थितान्पार्थ पहनपितामहान् । प्राचार्यान्मातुलान्धान पुत्रान्पोचान्सीस्तथा। श्वशुरासुहृदचैवसेनयोरुभयोरपि ॥ २६ ॥ तान् समीक्ष्यसकौन्तेय सर्वान्वन्धनवस्थितान् । रुपयापरयाविष्टशविपीदनिदमत्रयोत् ॥२७॥ वर्जुन उवाच । दृष्ट्वेमानखानान्कृष्णयुयुत्सन्समवस्थितान्। सीदनि ममगानारिमञ्च परिशुष्यति ॥ २८॥ वेपथुश्चशरीरेमेरोमहर्षश्चजायते । गाण्डीवर सतेहन्नात्त्वक्चैवपरिदयते॥ २८॥ नचमनोम्यवस्थातुंम्मतीवचमे भाषा अनुवाद यह प्रार्थना सुनिके श्रीवाष्ण दानो सेनाके वीचमे उस उत्तम रथ को ले नाय कर राडा किया ॥२४॥ परिभीम द्रोण औ और और राजावाके सामने रथको खडा फरिके घीभगवानने कहा कि युद्ध करनेके हेतु एकही हुयी यह सागवंशीयों की सेनाको देखो और जिनके साथ युद्ध अनुचित मानि तुमारा मन मलीन भया है इनके साथ युद्ध करना ही पड़ेगा क्यो कि संग्राममे अस्वधारी राजों के सामने से हटना चवी के योग्य काम नही है ॥ २५॥ तहां खडे हुये चचा दादा आचार्य मामा भाई भतीजे पाते नाती मिव बन्धु ससुर सुहटो को दोना तरफ अर्जन ने देसा ॥ २६॥ तो सो अन्तीपुत्र अर्जुन उन सब बंधुवो को लड़ने के लिये सग्राम मे बडे देखि परम कृपा से यह अति कातर स्वभाव हो विपाद करते भये यह वचन बोले ॥ २७॥ उस समय अजन ने जो कहा मो संजय कहते है कि हेराजा तव अर्जुन कपासे बोले कि हे श्रीकृष्ण युद्ध की इच्छा करि संग्राम भूमिमे पडे हुये इन स्वजन बंधुवोको टेखि मेरे साथ मावदीले होगये और सारी शरीरमे पसीना पसीना हो पाया मग्य की सूखता जाता है ॥ २८॥ और देह कामती रोपापडे होहो उठते हाथमे गाडी धन्वा भी गिगपडता है संगिकी माल जली सी जाती हे॥२८॥ और मेरे अब उडे होनेकी सामर्थ्य भी नहीं रही मेरा मन धमता है और निमित्त असगुन भी उलटे पुलटे देखताईबाई आंख और हाथ भी फापरते है॥३०॥ इससे मै अपना अब कल्यान नहीं देखता प्रथम अध्याय। मनः । निमित्तानिचपश्यामिविपरीतानिकेशव ॥ ३०॥ नचथेयानुपस्यामिहत्वा सजनमाहवे। नकांचेविजयकृष्णनचराज्यं सुमानिच॥३१॥ किनाराच्यभ गोविन्दकिंभागोंवितेनवा। येषामर्थकांक्षितंनोराज्य भागाःसुखानिच ॥ ३२ ॥ तमेऽवस्थितायुद्धेमाणांस्य वाधनानिच। आचार्याः पितरपुत्रास्तथैवचपितामहा ॥३३॥ मातुलाःगुरा.पौचाःण्याला सम्बन्धिनम्तथा । एतान्नहन्तुमिच्छामि मतापिमधुसूदन ॥३४॥ अपि लोक्यराज्यस्सहेत किन्नुमहीरते। निहत्यधात राष्ट्रान्नाकाप्रीतिःसाजनार्दन ॥ ३५॥ पायमेवाथ येदसान्त्वैतादाततायिनः । तस्माना वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सवान्धवान् । वजनंहिकथंहत्वासुखिनःस्वाम भापा अनुवाद कि वजन बंधु वो का संग्राम मे मारके हे कृषा नहीं चहिये इमै विनय और नराज्य और सुख की भी इच्छा इमै नहीं है॥३१॥ देखो ज्या कर ना हमै राज्य लेकर हे गोविन्द और भोगसे भी मुझे क्या काम है और जीने से भी हमै क्या प्रयोजन है कि जिनके वास्ते हम राज्य भोगौर सुरु की आकांक्षा करते है बेई पांडव प्राणवन छोड के मेरे सामने. संग्राम मे खडे है और प्राचार्य पिट पितामह पुव पौव येई सकल देख पडे है ॥ ३२ ॥३॥ जो कहो कि कथा करिके चाहो तुम इहे छोडो पर ये सव मंग्राम मे श्रव तुमको मारे हीगे विनमारे किसी तरह न छोडेगे इससे तुम इन सयको संहार करिके राज्य भोग क्योन करो तो हे मधुसूदन ये लोग चाहें इमैं मारे' ये भी मामा नाती पोते भतीजे ससुरे संबंधी इन को हम मारने की इच्छा 'यही करते है ॥ ३४ ॥ जिन को इम तीन लोक की राज्य संपदा के वास्ते भी मारने की इच्छा नहीं रखते तो हे जनाईन केवल पृथिवी भर की राज्य के हेत दुर्योधन आदि की नाश करि के हमारी क्यानोति अर्थात् कौन वडा कार्य सिद्ध होगा तात्पर्य यह कि कुटुम्ब को नाश करि हमकर संसार का कोई मुख नही है॥३५॥ जो कहो कि परमे धागलगावे या विष पिलाय मारे अथवा वध करने को खड्ग उठावे अोर धन हरन करे या भूमि छीनले और स्त्रीहरिले ये छवो याततायी कहायते हैं इनके मारने मे दोष नहीं है असा शास्त्र अर्थात् नीतिमे लिखा है परन्तु मारते श्रीमद्भगवद्गीता f द्वितीय अध्यायः । सञ्जय उवाच । तन्तथाकपयाविष्टम अपूर्णाकुलेक्षणं। विपीदन्तमिदंयाक्य मुवाचमधुसूटनः ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच। कुतस्वाकम्मलमिदंविषमेसम्मस्थि तम्। अनायं जुष्टमवयंमकीर्तिकरमर्जुन ॥२॥ मालोज्यगच्छकौन्तेयनवर त्वय्यपपद्यते। । क्षुद्रंहृदयदौर्बल्यंत्यत्वोत्तिष्ठमरन्तम ॥ ३ ॥ अर्जुन उभाच । भाषा अनुवाद यहिंसा परम धर्म है इस से मिक्षाकरि निर्वाह करना ही इमै उचित है ऐसी ये सब अर्जुन की वा” सञ्जय के मुख से मुनि और युद्ध से विमुख अर्जुनको नानि अपने पुत्र का अचल राज्य मानि मन प्रसन्न खस्स हृदय पृतराष्ट्र को देखि फरि सञ्जय पृतराष्ट्र की उस दुष्ट आमा को दूर करते हुये यह वचन बोले कि हे राजन इस प्रकार उपायुक्त अयुधारा पूर्ण लोचन विपाद करते हुये अर्जुन से दुःखमोचन श्रीभगवान महाविद्या जो जान तिससे अयोध करते हुये यह वचन कहते भये सो सनो॥ १॥ अर्जुनको कातर देखि यर वचन श्रीकृष्ण वोले कि हे अर्जुन ऐसे असमय मे लडाई के बीच रख कायर फरकपूत गान्त विज्ञीन मनुष्यों के योग्य जो लोया मे दुर्य श करने वाला है नौ अस्सी कहे जिसमे सर्ग जाय और नरक मिले ऐसा कासरा अर्थात् मोह बर्जुन इस नाससे भूतणमे प्रसिद्ध धीरवीर तुम ऐसे पुरुप को चाय कर प्राप्त मया यर वडाही आचरज है। फेर भी भगवान अर्जुन से कहते है कि ड़े परन्तप शत्रु संहार करनेवाले अर्जुन से कौन्तेय कुमीपुच अब तुम यीरभावको शेड इस हीच पाहे नपुंसको भावको न म । द्वितीय अध्यायः । कथमीममहसंख्येद्रोणञ्चमधुसूदन। इपुमिःप्रतियोत्स्यामिपूजाविरिसूदन ॥ ४॥ गुरूनंहवाहिमहानुभावानश्रेयोभो भैच्यमशीइलोके । हत्वार्थकामांस्तु गुरुनिहेवमुन्नीयमोगाधिरप्रदिग्धान् ॥ ५॥ नचैतद्विद्मःकतरन्नोगरीयोयहा भाषा अनुवाद गही यह तुमारे योग्य नहीं है इस आचरण के करने मे तुमारी शोभा नगतमे कुछ नहीं होगी इससे इस क्षुद्र कहे तुच्छ हृदय की दुर्वलता कहे कादरपन को छोड कर हमारे कहने से उठो और धीरज धरि सम के अनुसार कार्य करो कुन्तियुत्त सम्बोधन देने से जनया कि भाटखभाव कन्या को होता है पुचको तो पिटखभावही उचित है और परन्तप कहने से सोचाया कि उठ कर शवोंको मारलो तुम अनेक बार संग्राममे जय माय चुके हो क्यों घवडाते हौ॥ ३॥ इस प्रकार भगवतसे प्रबोध कराये भी गये अर्जुन तौ भी शोकग्रस्त महा व्याकुल अपने मनका मनोरथ प्रकाश करते हुये कृष्ण गभवान से फेरि कहने लगे कि हे मधु सूदन पूजा करनेके योग्य जो भीमपितामह और द्रोणाचार्य तिनसे संग्राम में हम वाणोसे कैसे युद्ध करें या उनको मारें कि जिनको साथ हम पचनसे भी संग्राम करने की पात नही कर सकते है तो हे अरिसूदन कहे अतुनाशन साक्षात् युद्ध कैसे कर इहा शबुनाशन कहनेसे अभिप्राय यह कि यत्न कहे उपायमे शत्रु नाश करने वाले हो॥४॥ फेर भी अर्जुन कहते है कि यद्यपि युद्ध करना रानों का धर्म है तो भी लोभसे जीविका ही के अर्थ वे लोग युद्ध मे अनर्थ रूम पाप करते है और बो कहो कि इन लोगों को विना मारे तुमारी देहयावा कहे जीवनत्ति भोजन ,वस्त्र भी न चलेगा तो निर्वाह कहो संसार से कैसे होगा इस बात पर अर्जुन कहते है कि जिस लिये महानुभाय महात्मा गुरु लोगो को न मार के भीपमांग साना भी मेरेजान लोक परलोकमे थेय कहे अति उत्तम कल्याण रूम है और नहीं गुरू आदि बडे लोगों को नारिके उनको लोइसे लपेटे भये भोग हम घाइते है क्यों कि जो आप यह कहो कि रपलोक मै जो होगा सो होगा किसने देखा है अब जो उपस्थित है सो पारो तो कहते है कि केपल परलोक ही मे दुग्ण नहीं है यहां भी दुर्यश औ सन्ताप रूप दुरा शेता ही है और जो कहो कि रहे थीमद्भगवडीता। नयेमयदिवानोजयेयुः। ' यानेवहत्वानजिजीविपामस्तेवस्थिताःप्रमुखधार्तराष्ट्राः । ६॥ कार्पण्यदोपोपहतखभाव:एच्छामित्वाधर्मसंमूरचेताः। यश यास्यानिधि संहितन्मेशियस्तेहंसाधिमांवोप्रमन्नस् ॥ ७॥ नहिमपयामिममापनुद्याद्यच्छो कमुच्छोपमिन्द्रियारां । अवाप्यभूमावसपत्नमृदंराज्यं सुराणामपिचाधिपत्यं ॥८॥ भाषा अनुवाद परलोक यहां लोकमै तो सुख मिलेगातो हे श्रीकृष्ण तुच्छ अल्प सुखके हेतु सुक्ति और वर्गलोकमे यश असी वडी वस्तु कौन मूर्ख छोडेगा॥५॥ और नो कदाचित पम धर्म अङ्गीकार करै तौभी तो हमारी जय या पराजय क्या होयगी यह भी तो हम नहीं जानते है कि दोनो मे क्या होगा सोई कहते है कि होय हमी रणमै उनको जय करलें नया वेई सवहमे नीतै परन्तु हमारी नीत होने से भी विचार कर देखो कि वह हमारी हारही है क्यों कि जिनको नाश करिके हम फेरि और संसार मे प्राणधारण करना नहीं चहते हैं सोई एतराष्ट्र के पुत्व सर इकडे इथे रणभूमिमे हमारे सामने युद्ध के अर्थ खडे है ॥६॥ इन कुटुम्बके लोगों का वध करिके हम अपने प्राण कैसे करि राखेंगे इस चिन्ता को कार्मण्य कहते और दोप जो कुलक्षय कत पापई यही दोनो वातोंसे हमारी शुरता नष्ट होगई अर्थात् चली गई इस से अव धर्मके विचार मे भी हमारी बुद्धि खष्ट हो गई है कि संग्राम छोड भिक्षान्नसे भोजन करना चाबिय को उचित कि अनुचित है इस संदेह से व्याकुल होय हम अव अामही से पूछते है कि जिस मे हमारा अत्यन्त परम वाल्याए होय सो आमापा करिके इमसे कहो क्यों कि हम आपके शिष्य औ शर वागत है हमै अव यौर कुछ नही सूझे है शरणागतपर दया करना आम भैसे महात्मोको उचित है ॥७॥ जोकहो कि तुमहीं आप अपने मनसे विचार करके नो करने योग्य होय सो करो न क्यो तिसपर कहते है कि इन्द्रियोंकी चैतन्य शक्षिका नाश करनेवाला जो यह शोक हमै प्राय के प्राप्त भयाहै सो किसीभी उपायसे दूर होगा यह हम किसीभी भांतिसेनही देखते है और यद्यपि हम निष्काएटक टधिवी भरका राज्य करें या देवाधियत्य कहे स्वर्गका राज्य इन्द्रपटभी माप्त करें अधीत् पावे तौमी इसशोकसागरके पार जानेकी कोई उमायइमनहीं देखते हैं ॥८॥ इस द्वितीय अध्यायः । संञ्जय उवाच । एवमुक्त्वाहपीकेशंगुडाकेशःपरन्तमः । नयो त्यतिगोवि न्दमुंत्वातष्णबभूव ॥६॥ तमुवाच हपीकेश महसन्निवभारत। मेनयोरुभयोर्मध्ये विपीदन्तमिदं वचः ॥१०॥ श्रीभगवानुवाच ॥ अमोच्यानन्यशोचस्त्व प्रचावादांच भाषा अनुवाद प्रकारकी बातें भगवानसे कहके अर्जुनने फेर क्याकिया सो सञ्जय एतराष्ट्रसे कहते है कि निद्राविजयी शत्रुनाशन धनञ्जय अर्जुननेभगवानसे कहा कि हेगोबिन्द हम युद्ध न करेंगे नो होय सो होय यह कहकर रयके उपर मौन होय बैठ रहे ॥६॥ तिस के अनन्तर क्या भया सो संजय कहते है कि दोनो सेना के बीच मे विषाद को माप्त भये अर्जुन को सम्वोधन करि भगवान इंसते हुये वक्ष्यमाण ये वचन कहने लगे हे भारत एतराष्ट्र मुनो ॥१०॥ यह ग्रन्थ प्रथम अध्याय के प्रथम झोक से ले कर और द्वितीय अध्यायके दशवें श्लोक तक जो तीन वाक्य है तिन के मध्य मे प्रथम अध्याय के दूसरे लोक से ले के द्वितीय अध्याय के नवये लोक पर्यन्त की वाक्य व्याख्या करने के योग्य है क्यो कि उस मे प्राणियों के सांसारिक दुख का कारणभूत जो शोक मोहादि रूप दोप तिसकी उत्पत्ति का हेतु रूपअहङ्कार की कारगखरूप अविद्या वर्णन की गई है और राज्य प्रादि ममता रूप मान्ति ज्ञान निमित्तक स्नेह देखाया औ उस के वियोग से उत्पन्न स्नेह मोह भी देखाया है अर्जुन अपना क्षत्रिय का जो धर्म युद्ध करना तिसमे यापही प्रस्न हो के भी जिस थोक मोर के द्वारा विवेक ज्ञानसे रहित हो कर युद्ध से विरक्त और परधर्भ भिक्षा मे प्रयक्त भये ये ठीक है शोक मोहयुक्त प्राणीमान बहुधा स्वधर्म छोड परधर्म अङ्गीकार कर लेते हैं और जो सधर्म मे प्रवृत्त है वे भी फल की कामना से अह कार पूर्वक प्रवृत्त होते है। इस कारण धर्म अधर्म की प्रबलता के हेतु मे उत्तम अधम जोनियोमे जन्म और सुख दुःख अादि प्राप्ति रूप यह संसार किसी प्रकार छूटता नही इस से शोक मोह ये दोनो संसार होने के कारण है केवल संन्यास पूर्वक श्रात्मज्ञान निठाके विना शोकमोह के निवारणकी और कोई उपाय न देखि भंगवान वासुदेव लोकके उपर अनुग्रह करते हुये अर्जुनको उपलक्षण करि इम गीताशास्त्र मे सोई ज्ञाननिष्ठा का उपदेश करते है। इसविषयमे कोई करते थीमद्भगवतगीता। भामा अनुवाद हैं कि सर्व कर्म परित्याग करि के केवल ग्रामज्ञानसे मुक्ति नहीं होती है परन्तु श्रुति स्मृति विहित कर्मनिष्ठा के सहित ओतत्वज्ञाननिछा है उस से कैवल्यमुक्ति प्राप्ति होती है इस मे प्रमाण इसी गीताके दूसरे अध्यायमे ३३ ४७ आदि श्लोकों से कहा है और युद्ध आदि कर्म भी क्षत्री को अधर्म नहीं है बलु उस के न करने से दोय है यह भी इसी द्वितीय अध्याय के ३३ लोक मे निश्चय करिके कहा है। तो उपर की उक्त अभिप्राय अत्यन्त असत् है कि जिस हेतु जाननिष्ठा औ कर्म निठा दोनो पृथक पृथक कहा है अर्थात् इसी हितीय अध्याय के ११ लोक से ले कर ३१ लोक तक नो परमार्थ तत्त्व निरूपण किया गया है तहिषयक बुद्धि का नाम साख्य बुद्धि और सोई बुद्धि युक्त ज्ञानी भी सांख्य कहावते है और इस सांख्य बुद्धि उत्पन्न होनेके पई देहादि व्यतिरित कहे भिन्न जो नात्या उसको कटव अादि की अपेक्षा करि के धर्म अधर्म विचार पूर्व क जो मोन का साधन रूम योग निरूपण अर्थात् कहा गया है सहिषयक बुद्धि का नाम योगवुद्धि है सोई युधियुक्त कर्मी पुरुष का भी नाम योगी है इस प्रकार से दोनो निष्ठा दिखाई है उन के बीच सांख्य नाम जाननिठा औ योग रूम कर्मनिठा ये दोनो भो आगे पृथक पृथक कड़ी नायंगी इसीसे सांख्य बुद्धि का याश्रय ज्ञाननिष्ठा औ योगबुद्धिका श्राश्रय कर्मनिष्ठा ये दोनो निष्ठा एक कालमे एक पुरुष करके अनुष्ठान करीजायं यह किसी प्रकारसे सम्भव नहीं होता है यही शतपथ माहाणमे कहा है कि यो जान औ कर्म समुच्चय अभिप्रेत हो तो ये सव विभाग वचन और किसी प्रकार सम्भव नहीं है। और इस प्रकार से अर्जुनकी प्रश्न भी ठीक नही होती है क्यों कि जान यो कर्म एक कालमे एक पुरुष को नितान्त असम्भव है यह पूर्व न कहने से अर्जुन किस प्रकार कर्मसे जानको श्रेष्ठ जानि भगवानसे मिथ्या आक्षेप करेंगे और सर्व उपदेश मे जान ौ कर्म इन दोनो के मध्यमे जो श्रेय हो सो हमको कपाकर कहो इस प्रकार एका विषयक अन्न हों या कहो किस तरह सम्भव है जो भगवतके उक्त वचनों का अर्थ न समझके अर्जुन ऐसी मन किये हों वो भी अर्जुनसे भगवानके ऐसे प्रतिवचन सम्भव नहीं होते है चानी का खधर्म जो युद्ध रूप स्मृतिविहित कर्म तिसके सहित ज्ञान सम्पादन करना भी विहित नही है। क्योकि सो होने से द्वितीय अध्यायः । १६ भापसे। गतासूनगतासंचनानुशोचन्तिपण्डिताः ॥ ११॥ नत्वेवाइं नातुनासन भाषा अनुवाद यीकृष्णके प्रति अर्जुनका इस प्रकारका अनुयोग करना कभी समाव होता नहीं इसीसे गीताशास्त्र में लेशमात्र भी श्रौत या स्मार्त कर्म के सहित ज्ञान सम्पादन का प्रतिपादन करने को कोई भी समर्थ न होंयगे। अन्नान किम्वा राग आदि दोप वशते कर्ममे प्रत्त मनुष्य को यन्न दान तम आदि के द्वारा सत्व शुद्धि पूर्वक पर मार्थ तत्त्वज्ञान होनेसे परलोक संग्रहके अर्थ नो फेरिभी कर्ममे प्रवृत्ति होय तो उस कर्मको कर्म नहीं कहते है मुतरां तिसके सहित ज्ञान का सम्पादन नहीं होता है जैसे भगवान श्रीकृष्ण के सकल धर्म समुचित नहीं और जैसे काय कर्ममें कामना न रहने से फेरि और बड़ काय्य कर्म नहीं हो सकता है जिस हेव उस मे फलाभिसन्धि कहे फल की इच्छा नहीं है तो फेरि जो जनक आदि राना कर्म के द्वारा मुक्त हुये थे यह ग्रन्थों में वर्णन किया है सो केवल लोक संग्रह के अर्थ मात्र अथात् सब कर्म का परित्याग होने से भी गुण यौ गुणी जान वशते कर्म आभास के साथ उन की मुक्ति भई थी अर्थात् कर्म के त्याग मे अधिकार होने से भी कर्म त्याग न करि के उस के सहित निर्वाण पद प्राप्त किया और जो कहो कि जनकादि राजा पूर्व मे तत्त्वज्ञानो नहीं थे तो भी ज्ञान के साधन भत सकल कर्म ईश्वर को समर्पण करने से उनको सत्य शुद्धि अथवा ज्ञान की उत्पत्ति भई थी भगवानने इस गीता शास्ल मे यही प्रतिपादन करि के पीछे सोई प्रकार शुद्ध सत्वगुण मनुष्य की जाननिष्ठा निरूपण किया है इस 'से केवल तत्वज्ञानसे नो मुक्ति होती है और उसमे जो कर्मके सहयताकी अपेक्षा न करे यही इस गीता शास्त्र का निश्चित अर्थ है यह अर्थ आगे प्रकरण पाय के देसाया जायगा इस प्रकार गीता शास्त्रका तात्पर्य अर्थ निर्णय किया गया है परन्तु अब धर्ममे व्यग्र मिथ्या धमविशिष्ट कहे युक्त महत् शोक सागरमे वे हुये अर्जुन को प्रात्म ज्ञान के विना उद्धार होने की और कोई उपाय न देखि करके भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रति तत्त्वज्ञान का उपदेश करते है। प्रथम प्राध्याय के २८ लोक से लेकर तुम नो कुटुम्बके मनोका शोक करते हो सो वे सब तुमारे श्रीमद्भगवद्गीता। त्वनेमेजनाधिपाः। नचैवनभविष्यास सर्वेषयमत परं ॥ १२ ॥ देहिनोऽस्मिन्- यथादेहेकौमारंयौवनंजरा। तथादेहान्तरप्राप्तिर्षीरस्ताबनमुह्यति ॥ १३ ॥ भाषा अनुवाद शोचनेके योग्य नहीं है और द्वितीय अध्यायके लोकसे लेके हमसे प्रबोध कराये अर्थात् समझाये गये भी तुमजो पण्डितमानी के समान ये वचन उच्चारण करते अर्थात् कहते हो कि मोम पितामहो को संग्राममे हम कैसे मारै' इससे यह प्रती ति होती है कि तुम यथार्थ पण्डित नहीं हो जिस हेतु बुद्धिमान पण्डित मोहै वे गतप्राण अगतप्राण अर्थात् मरे यौ जीवते को नहीं शोचते है कि बन्धु विहीन हम कैसे जिगे ।११॥ भीम सादिके प्रति जो शोच करना अनुचित है इसमे श्रीम गवान कारण कहते हैं कि देखो हम परमेश्वर हमारा शरीर धारण कराना केवल लीला के अर्थ है इससे इस देह के होने जाने वशते हम कभू पर्वमे नही रहे थे यह सम्भव नहीं होता जिस हेतु हम अनादि और हमारे अंशते उत्पन्न तुम और ये सब राजा लोग भी कभी नहीं रहे थे यह भी सम्भव नहीं है इससे हम जैसे पहले थे तैसे अव भी है फेरि आगे भी हम सब होयगे इससे यात्म खरूप देह के जन्म औ मरणका खभाव हो है तो फिरि वजन विनाश कहो शोक का विपय कैसे है नहीं हो सकता है ॥ १२॥ वो कहो कि तुम ईश्वर तुमारा जन्म औ विनाश न होना सम्भव है परन्तु हम लोग जीव है इससे हमारा जन्म मरण प्रसिद्धहै इस विषयमे भगवान कहते है कि देखो देहाभिमानी जीवको इस स्थूल शरीर मे जैसे कौमार यौवन ौ रडा अवस्था प्राप्त होती है परन्तु जीप खरूप को नहीं होती है और यही सव अवस्थो के मध्यमे पूर्व अवस्थाके वीत गये ओर और अवस्था प्राप्त भये पर भी संसार वगते सोई हम है यह शान रहता है तैसे ही जीयको भी स्थूल देह केनाश होने पर लिद्र शरीर के द्वारा देहान्तर प्राप्ति होनेसे भी अात्माका नाश नहीं होता है देखो तुर्तके भये हुये वालकको पर्य देहके संस्कार वयते जन्म होतेही मात्र दूध पीनेमे प्रवृत्ति देख पड़ती है इसीसे स्थूल देह के जन्म नाश भयेपर धीर पुरुष मूढ नहीं होते अर्थात् अात्माका जन्म मरण अनीकार नहीं करते है ॥१३॥ औरजो कहो कि हम भीष्म प्रादिके प्रति द्वितीय अध्यायः। मावास्यास्तु कौन्तेयशीतोष्णासुखदुःखदाः। आगमामायिनोऽनित्यास्तास्तितिक्षस मारव ॥१४॥ यहिनव्यथयन्त्येते पुरुषपुरुपर्षभ। समापसुखंधीरंसोऽन्टतत्वाय कल्पाते ॥ १५ ॥ नासतोविद्यतेभावोनाभावो विद्यते सतः । उभयोरपिदृष्टोन्त स्वनयोस्तत्वदर्शिभि. ॥ १६ ॥ अविनाशितुतहिडियेनसर्वमिदंततं । विनाशम भाषा अनुवाद शोक नहीं करते है परन्त उनके वियोग मे हमै दुःख करना ही होगा इस लिये हम अपनेको शोचते हैं इसवात पर कहतेहै कि सकल वस्तु जिसकेद्वारा परिमाण की जांय ऐसी जो सव इन्द्रिय वृत्ति कहे संयोग और उनके द्वारा नो विपयों का स्पर्श होना यही भीत उणादि के द्वारा सुख दुख देता है किन्तु वे शीतादिक सब अनित्य है इससे उनको धीरज धरके सहो जैसे जल अग्नि धर्म धादि संयोग से कालखभाव वशते शीत उष्ण होनेसे सुख दुख है तैसे इष्ट औ अनिष्ट प्राप्त होने से भी सुख दुख होता ही है परन्तु वह अनित्य और मिथ्या है इससे तुमको उनका सहना उचित है तुम ऐसे धीर वीर पुरुप को उन मे हर्ष विषाद करना अति अयोग्य और व्या है ॥ १४ ॥ जिस हेतु कोई उपाय अवलंबन परिशीत उष्ण का बारन करने से कष्टकरि उनका सहना ही उचित है क्योंकि उसमे उडा पाल है यही कहते है कि हे पुरुपयेष्ठ अर्जन जिन धीर पुरुषों को सुख दुख समान भाय है अर्थात् शीत उष्ण मे लोग वोध नहीं होता सोई विक्षेप रहित पुरुप धर्म यौ जानके द्वारा मोक्ष प्राप्ति के अधिकारी है॥ १५॥ और जो कहो कि तौभी यति टु.सह शीत उष्ण उनको हम कैसे कर सहै और नो वडा केश करिके 'किसी तरहसे सहै तो कदाचित इस यात्माका नाश हो सकता है यह गला करि कहते है कि विचार से तो वे सब सहे जाय सकते है देसो जैसे अति तच्छ औ अनात्मधर्म अर्थात् शरीरके धर्म जो शीत उष्ण प्रदति हैं उनका आत्मासे कुछ संबंध नहीं है और सत् खभाव जो यात्मा उसका कभू भी विनाश नही होता है यथार्थ दर्शी तत्त्वज्ञानी पुरुप इसी प्रकार से सत असत इन दोनो पदार्थ को निर्णय किया है इससे विवेक ज्ञानके द्वारा शीत उष्ण आदि तुम सा करो धवडाते कान्हेलिये हो ॥ १६॥ अविनाशी सत वस्तु का स्वरूप सामान्य से वर्णन करिके फेरि विशेष २२ थीमद्भगवद्गीता। व्ययस्यास्यनकश्चित्कर्तमहति ॥ १७॥ अन्तवन्तदमेदेहानित्यस्योताारीरिणः । अनाशिनोममेयस्थवरमायुध्यस्वभारत ॥१८॥ यएनं वेत्तिहन्तारंपञ्चैनमन्यते हतम् । उभौतौनविजानीतोनायंहन्तिनहन्यते ॥१६॥ नजायतेमियतेवाकदाचिन्ना यंभूत्वाभवितावानभूयः । अनोनित्यःभाश्वतोऽयंपुरागोनहन्यतेहन्यमानेशरीरे भाषा अनुवाद रूपसे कहते है कि जो इस अनित्य देहमे साक्षीरूप सवठौर व्याप्त होकर रक्षा है वही आत्मा को तुम अविनाशी जानो जिस हेतु उसके विनाश करने को किसी की सामर्थ्य नहीं है॥१७॥ अव उत्पत्ति विनाश धर्म विशिष्ट देहादिकी अनित्यता देखापते है कि नित्य अर्यात सदा एक रुपसे खित और इसीसे अविनाशी यो अपरिमेय कहे जान जोग नहीं ऐसा नो देही कहे अात्मा है और सुख दुख आदि धर्मविशिष्ट नश्वर अर्थत् विनाश होनेवाली यह देह है ऐसा तत्त्वज्ञानी कहते है इसीसे जानो कि जो वरूपसे आत्मामा पिनाश तथा सुख दुख अादिका संबंध नहीं है तो मोइजनित शोक को परित्याग करिके युद्ध मे तुम प्रयत्न होउ और अपना क्षतीका परमधर्म गो युद्ध सो कभून छोडो छोडना नहीं चाहिये॥ १८॥ भगवान की इन सब बातों से महात्मा भीम पितामहादिक के मृत्यु हेतुक बो अर्जुन को दुख भोक अाय के प्राप्त भया था सो सब दूर मया और अब कटुम के वध करनेवाले हम है यह दुख जो प्रथम अध्यायके ३४ लोकमे कहा है सो उस टुखके उत्पन्न होने मे कोई हेतु नहीं है यह प्रतीति भगवान करावते है कि यह त्रागा न किसीसे मरता और न किसीको मारता है फेर जो कोई इस को हन्ता जानता और इस को इत मानता है वे दोनो भी कुछ नहीं जानते है ॥ १६॥ यात्माका नाश नहीं है यह वात पडभाव, विक्रिया कहे विकारका प्रभाव कधन के द्वारा भगवानदृढ करते हैं कि अात्मा का जन्म होता नहीं अर्थात् उसका समरूप विकार नहीं है और कभी मरता भी नहीं अर्थात् विनाश रूप विकार उसका नहीं है पारं अात्मा उत्पन्न होके विद्यमान है यहभी नही अर्थात् वक्त मान रूप पिकार नही है जो जन्म धरैहै सोई वर्तमान भी होता यह तो अज तथा पूर्व से सदासर्वदा विराजमान है इसका फेरि जन्म लेकर विद्यमान होना ३ द्वितीय अध्यायः । २०॥ वेदाविनाशिनंनित्यंयएनमनमव्ययं । कथंसपुरुषःमार्थकंघातयतिहन्तिक । r - भाषा अनुवाद कहां यह अतिही असम्भव है और यह नित्य सदा एकरूप अर्थात् इसका रहि रूम विकार नहीं है और यह शाखत अर्थात् क्षयरहित है और पुराण अर्थात् इसका परिणाम नहीं है परिणाम कहते बदलने को अर्थात् रूपान्तर होने को 'वात्मा पुरातन होके भी देह के साथ नयासा होता दीखे है देखो शरीर संयोग में परिणत होके भी रूपान्तर को प्राप्त नहीं होता है ज्योंका त्योंही रहता और भी कहते कि पहले नही था अव भया और वढता है यह कुछ वात भी आत्मा मे नहीं है इस अर्थमे भी वुद्धिरूप विकार रहित होता है इस विषयमे अज नौनित्य ये दोनो शब्दोंके रहनेसे और कुछ कहनेकर प्रयोजन नहीं है इसीप्रकार प्रात्मा का जन्म विद्यमानता बुद्धि परिणाम अपनय कहे घटना विनाश ये छ विकारो का अभाव सांख्य शास्त्रमे निर्णय किया है अब जो वाकी रहा सो कहते है कि शरीर हत होनेसे भी आत्मा हत नही होता जिस हेतु वह अविनायी है ॥२०॥ पूर्ण लोकमै यात्माको पडविकार रहित कहा है इससे आत्मा हनन क्रिया को भारना तिसका कती कहे करने वाला नही है यह वात अच्छी प्रकार से सिद्ध भई सोई भगवान कहते है कि जो कोई इस आत्माको घटने वढने से रहित तथा जन्म हीन छौ अविनाशी जानते है हे अर्जुन वे किस वास्ते किसी को मारेगे कारण यह कि प्रात्मा जो अविनाशी उसके वध की उपाय कोई नही है और चाप मेरणा करि और किसी से किसी को भी किरा लिये घात करावे गा इस कहने से बीकाजी को यह अभिमाय जानी गई कि भीम आदिके वध मे प्रयो पाक कड़े मेरक रूप दोप इमै कभी न दीजो अर्थात तुमारे कहने से यह काम हमने किया है ऐसी कभी कहियो नही॥ २१॥ जो कहो कि अात्मा अविनापी भी होय पर तो भी उस की इस खूल' का नाश देख कर हम शोच करते है तो देखो जैसे मनुष्य जीर्ण कहे पुराने वदत्र परित्याग फड़े उतार कर और नये कपडे धारण करते अर्थात् पहिरते है तैसे ही बारमा पूर्व प्राचीन भरीर कहे देह को छोड कर और नूतन कहे नई देह ग्रहण करता है इस से कर्म के अनु २४ थीसद्भगवद्गीता ॥२१॥ वासांसिनीनियथाविहायनवानियहातिनरोऽपराणि । तथाशरीराणि विहायवीर्णन्यन्यानिसंयातिनवानिदेही ॥ २२ ॥ नै छिन्दन्तिशस्त्राणिनैनंद इति पावकः। नचैनलेदयन्त्यायोनशोषयतिमारुतः ॥ २३॥ अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम लेद्योऽशोप्यएवच । नित्यःसर्वगतःस्थापुरचलोऽयंसनातनः ॥३४ ॥ अव्यक्तोऽयम चिन्त्योऽयमविकार्थोऽयमुच्यते। तस्मादेवविदित्वैननानुशोचितुमर्हसि ॥ २५॥ अथ भाषा अनुवाद सार देहका अवश्य होनहार जो जन्म श्री नाश तिस मे शोच करना तुम जैसों परिहत को उचित नहीं है ॥२२॥ अव २१ लोकमे कहा जो अात्माके वध के साधनका अभाव कहे निरुपाय अर्थात किसी प्रकार से शामा का वध नहीं हो सकता है यह देखाय करि अब अात्मा अविनाशी है इस वातको रद करते हैं कि सकल घस्त्र यस्त्र इस थात्मा को छेदन नहीं कर सकते और अग्नि भी इसे को दग्ध करने को समर्थ नहीं है जल इस को आई कहे गीला नहीं करि 'सकता और वायु भी इस को सुखाय नही सकती है क्योंकि यह अवयव कहे अंश रहित हैं और इन सब की सामर्थ्य अवयव सहित मे है अर्थात् भौनिक कहे पञ्चभूत निर्मित वस्तुमे है ॥२३॥ इसका कारण यह कि धारमा अस्वशस्व से छिन्नभिन्न कि या अागसे दग्ध और अलसे श्रा और वायुसे सूपभी नही सकता है इसी से आत्मा नित्य यौ अविनाशी तथा सर्व विद्यमान है और स्थिर स्वभाव अचल अनादिहै ॥२४॥ और यह आत्मा अव्यक्त अर्थात् चक्षुरादि कर्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है यह बात भी कहचुके हैं और अचिन्य अर्थात् मनकोमी अगग्य कहे ध्यान से बाहर हैं और अविकारी अर्थात् जन्मनाश अथवा छोटा बड़ा नया पुराना होना। अथवा किसी रूपने बदलना भी नहीं इसका से ही तत्त्वज्ञानी लोग कहते हैं इससे जन्म नाश शून्य कहे रहित आत्माके खरूप को अच्छी तरह से जान चम, कर तुम इस झूठे भोक संताप को परित्याग करो ॥ २५॥ और विचार करि देखी नबकि श्रात्माके दाम तथा नाय का अभाव है तो फेरि आत्मा के अर्थ शोक करना किसी प्रकार उचित नहीं है यह बात निर्धार करके ठहराई गई है अव जो देह के जन्म छौ नाशसे धात्मा का जन्म नाश है कदाचित जैसा की द्वितीय अध्यायः। २५ चैनं नित्यजातनित्यवामन्यसेटतं। तथापित्वमहावाहोनेवं शोषितुमईसि ॥२६॥ जातसहिधुलोस्टन्युर्धर्वजन्मस्तस्यच । तस्मादपरिहार्थेऽर्थे नत्वंगोचितुमईसि ॥२॥ अव्यशादोनिभूतानियतमध्यानिभारत । अव्यक्तनिधानान्ये वतनकापरिदेवनः ।। भाषा अनुवाद कार करि मानो तौमी तुमको शोच करना अनुचित है यह कहते हैं कि पुण्यत्री पाम तथा तिन के फल सुखं दुख औ जन्म नाश इन सव का आत्मा के साथ सम्बन्ध रहने से यद्यपि देहके जन्म होनेसे अात्मा का जन्म और देहके नायसे यात्मा का नाम है इस रीतिसे उसके जन्मनाश को नित्य मानो पर तौभी नन्म नाश अवश्य भावी अर्थात् निश्चय होने वाला ही है फोरिभी उसके अर्थ तम को शोचना क्या योग्य है नहीं है ॥ २६॥ काहेसे शोचना योग्य नहीं है इसका हेतु कहते हैं कि निमलिये जो वस्तु जन्म ग्रहण करती है उसके प्रारब्ध कर्म के क्षय होनेसे निश्चय उसकी मृत्यु अर्थात् नाशझोताहै असेही मरेकामी पूर्व देहलत कर्मवशते फेर अवश्यही जन्म होताहै इसोसे एवंभूत अनिवार्य कहे अमेट अवश्यम्भावी कहे होने वाले नन्म औ मरणके विषयमे तुमको शोच करना तुमको किसीतरह योग्य होतानहीं क्योंकि तम विद्वान कहे पण्डित हौउ पण्डितका अर्थ यह है कि सत अ सत्की विवेकिनी वाहे विचार करनेवालीयुद्विकोपगहाकहते है सो निसके होयसो पण्डित है आत्मामे भिन्नजो कुछ है सो असत्जानो सत एक आत्माहीं है ॥२७॥ और जो कहो कि देहादि का स्वभाव जो जन्म मरण अादि तपाधिक आत्माका जन्म मरण विचारि करि हम गोचते है तोमी शोच करना तुमको न चाहिये इस पर भगवान कहते है कि अव्यतादि अर्थात् अव्यक्त कहे प्राणियों की उत्पत्ति का मूल कारण जो प्राति माया सो प्राणियोकी उत्पत्ति के पूर्व कारणरूपसे सब नीवों की अपने भीतर लीन कार के अध्यन कहे अप्रकट रहती है और व्यक्त मध्य अर्थात् जन्म मरणको मध्यमे सकल माणी वर्तमान अवस्था मे विरानमान रहते है चौर अव्यक्त निधन अर्थात् अन्त मे खकारण जो माया तिसमे सव प्राणी लीन हो के रहते है इस से हे यर्जुन से रहनेवाले प्राणियोंको मृत्युसे किनीतर शोच करना न चाहिये जैसे नगे इये मनुष्य को रूम से देखी भई वस्तु के अर्थ शोका । 1 श्रीमद्भगवतहोता। २८॥ अाश्चर्यवत् पश्यतिकनिदेनमाश्चर्यक्इटतितथैवचान्यः। अाश्चर्यवच्चैनमन्यः टणोतिश्रुत्वाप्येनंवेदनचैवकश्चित् ॥ १०॥ देहीनित्यमदयोऽयं देहेसईयभारत ! तत्मात्माणिभूतानिनत्वंशोचितुमर्हसि ॥ ३०॥ वधर्म मनिचावेक्ष्यनविकम्पितुम भाषा अनुवाद फरना अयोग्य है तैसे यह भी जानो ॥ २८॥ तो मोरि वडे विद्वान लोग लो शोक करते चले आते है सो केवल आत्मा विपयक अज्ञानता ही से होता इस अभिमाय मे आत्मा की दुर्जेयता कहे ज्ञान कठिनता का निरूपण करते है कि कोई तो शास्त्र आलोचना करिके इस आत्मा को जानि वूझके भी आश्चर्य ऐसा नानते अर्थात् सर्वगत नित्य ज्ञान औ बानन्दवरूप आत्मा के अलौयित्व हेतु से असम्भव जो इन्द्रजालिक कौतुक तिस के समान देखि आश्चर्य से धवडाय कर विस्मययक्त होते है और कोई आश्चर्य केनाई कहते कोई आश्चर्य के तुल्य सुनते और कोई आत्मज्ञानरूप विपरीत कहे उलटीभावनासे अभिभूत होके इस आत्मर का तत्त्व सुनि के भी जानि सकते नहीं अर्थात् बहुत देखि सुनि के भी अच्छी तरह से आत्मा का जानना अति कठिन है ॥ २६॥ इस प्रकार अात्मा का दुर्वि नेय स्वभाव अर्थात् वडे कष्टसे भी उसका जानना कठिन है यह संक्षेप से उपदेश करि के अव गोक न करना इस विषयमे कहते है कि जैसे सब प्राणियोंको नम्बर कहे नाश होनेवाली देह मे वर्तमान यह देही कहे प्रात्या सो देह नाश होने से भी नष्ट नही होता है क्यो कि आत्मा निन्य औ अवध्य है इसी से भूत जो माणी निन की देह नाश के अर्थ तुम को शोक करना उचित नही है ॥ 30॥ मधम अध्याय के २६ लोकमे अर्जुन ने कहा है कि हमारी शरीर कांपती यौ रोवां सडे होते वया हायसे धनुष वारा गिरे पडते है सो यहभी तुमको अयोग्य असम्भव है। जिस हेतु स्वधर्म जो संग्राम विस मे प्रवृत्त हो के फेरि भीनमितामह यादि के इनन करने से अविनाशी ग्रात्मा का विनाश मानि तमारा डरना औ कांपना यह किसे सिद्ध होता नही और ३१ नोकमे कहा है कि ये अपने जनाको नाश कर के हम य कहे कल्यान नही देखते उस बात पर भगवान कहते है कि धर्म युक्त जो न्याय युद्ध तिस की अपेक्षा गीत् उससे पदि कर वियोको और कौन कल्याण द्वितीय अध्यायः। हैसि। धादियुद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्वविययनविद्यते ॥ ३१॥ यदृच्छ्याचोपपन्नं खर्गहारनपाटतं। सुखिनःचनिया.पार्थलभन्तेयुद्धमीयं ॥ ३२॥ अथचे त्वमिम धम्यसंग्रामनकरिष्यसि । ततःस्वधमकीर्तिचहित्वापापमवासि ॥ ३३॥ अकी भापा अनुवाद करनेवाला कर्म है अर्थात् कोई भी नहीं है॥३१॥ और जो कहो कि गुरु धादि अनेक प्राणियों की हिंसायुद्दमे होयगी यौ शास्त्रमें अहिंसा परमधर्म कहा है इससे बुद्ध करना अति अनुचित है इसपर श्रीकृष्ण कहते कि जैसे वेद विहित जो यन्नमे हिंसा सो हिंसा नहीं है तैसे ही शास्त्रसम्मत जो क्षत्री का परम धर्म युद्ध तिसमै हिंसा यो पापको कल्पना वृथा करते हो और परम श्रेयरूम महाफल प्रामसे श्राप 'प्राय तुम को उपस्थित कहे प्राप्त भया है इस से अव तुम किस कारण कम्पमान होते हो सोइ यह दृढकरके कहतेहै कि हे अर्जुन वे मांगे वेयतन किये धाम से प्राप्त परमय कहे कल्याण साधन युद्ध जिससे परम कल्याण सिद्ध होय ऐसा युद्ध प्रति भाग्यवान क्ष वी लोग पायते हैं क्योंकि इस से खर्गका द्वार वेरोंक टोंक खुला रहता है अथवा जो इस प्रकार का युद्ध पावें सोई सुखी है इस लोक से प्रथम अध्याय का छत्तीसयां लोक कहा गया कि किस तरह अात्मीयजनों को नाश करि सुखी होयगे इसी बात का भगवानने उत्तर दिया है ॥ ३२॥ और जो या व धर्म रूप संग्राम न करोगे तो केवल फल प्राप्ति न होगी यही नहीं है और उनटा प्रत्यवाय कहे अधर्म भी होगा सोई दोष कहते हैं कि जो तुम इस धर्म जनक उपस्थित कहे प्राप्त भये युद्ध करने मे प्रत्त न होउगे तो तुम अपने धर्म यौ कीतिके त्याग करनेसे अवश्य पाम के भागी होउगे इसमे कुछ सन्देश नहीं है ॥३३॥ और जो कहो कि स्वधर्म औ कीर्ति जाय हम हिंसा न करेंगे तो यह न करने से केवल स्वधर्म ौ कोर्ति ही का त्याग नही हैं और भी है सो करते हैं कि युद्ध छोडने से लोग तुमाग अयश कहेंगे और वह अयश चिरकाल कहे बहुत दिनो तक संसार मे रहेगा और तुम क्षत्रियों के बीच युद्ध करने में प्रसिद्ध पौर हो देशो जो जिसवातमे ग्यात कहे नामीहे और लोग उसको प्रतिष्ठित वडा करि जानते मानते है तो फोरि उसका उसी वातमे अयश यह मरनेसे भी अधिक २८ थीमहगवडीता। तिचापिभूतानिक यम्यन्तितेऽव्ययो। सम्भावितस्यन्नाकीर्तिममरणादतिरिचते। ३४॥ भयाणादुमरमसन्तत्वांमहारथाः। येषाञ्चत्वंबहुमतोभूत्वायास्यति लाघवं ॥ ३५॥ अवाच्यवादाचवहन्यदिष्यन्तितवाहिताः। निन्दालतवसामर्थ्य ततोदुःखतरनुकिं ॥ ३६॥ हतोवामाश्वसिखनिलावाभोच्यसेमहीं। नरमादु, भाषा अनुवाद हैं और सब पाप भी दोयों का दादा है इस को अच्छी तरह विचार कर देखो। ३४ ॥ भगवान कहते हैं कि अर्जुन तुम को अव युद्ध करना ही उचित है क्यों कि तुम तो यह जानते हो कि प्राणियों के उपर सपा करि हम संग्राम शेडते पर महारथी वीर तुम को भयसे युद्ध विमुख यानेंगे जो तुम को पुर्व कहे पहिले सकाल गुण सम्पन्न कहे युक्ता जानते थे वे लोग अब तुम को कारण आदिक योहों के भय से युद्ध विमुख मानेगे देयो निन दुर्योधन आदिकों को तुम बहुमत कहे मान्य रहे उनके निकट अब तुम कैसे लघु कहे हलके होउगें तो इस सीके डर से युद्ध करना तमको अवश्य हैं ॥ ३५॥ इस से अब तुम युद्ध से निरत्त न होउ और नो कहो कि भीम तथा द्रोण यादिका वध वडा काष्ट है तो देखो तुमारे शत्रु गण तुमारी सामर्थ्यकी निन्दा करते हुये तुमारे प्रति अनेक अनेक अयोग्य दुर्वचन कोगे तो इस से और दुस कौन है' यह कष्ट से भी महा कष्ट है ॥ ३६, तो युद्धकरि गुरुवादिके वधसे निन्दारोगी अौ संग्राम छोडनेसे शवु निन्दा करेंगे इस दुविधा चिन्ता के उपर कहते है और दूसरे अध्याय के छठये झोक मे नो अर्जुन ने कहा कि इन को हम मा या येई हमै जय करि लेंय इसका भी उत्तर थोकण करते हैं कि जय करेंगे या पराजय पावेगे इसकी निश्चय करिके व तुम उठो जो कहो कि इस देव आधीन जयपराजयका क्या निश्चयहै तो इस युद्धमे नो तुमारी मृत्यु होयगी तो स्वर्गवास पावोगे और जो शनुयों को जीतोगे तो धियी का राज्य पो भोग करोगे तिससे हे कौन्तेय अर्जुन युद्ध करने की निश्चय करिके उठो तुमारेतो दोनोहाथ लडुआ ॥३७॥ जो कदाचित बन्धुपधहे तक पापही की निश्यकरि रारोहवरमके डरमे युद्दमे निययकरिके नही उठि सकते हो और कहोतो सहद मियोके बीयन और मरपनिमित्तका मुख यो दुखकी समता याहते है .
द्वितीय अध्यायः । २६ तिष्ठकौन्लेययुद्धायकृतनिश्चयः ॥ ३७॥ सुखदुःखेसमेकत्वालाभालाभौजयाजयो। ततोयुद्दाययुज्यसनैवंपाममवाप्ससि ॥ ३८ ॥ एपा तेऽभिहितासांख्येवुद्दियोगे विमांग्टगु । । वुद्ध्यायुत्तोययामार्थकम्र्मवन्धप्रहायसि ॥ ३६॥ नेहाभिकमनाशो भाषा अनुवाद कि प्रथम सुख औ दुख तथा लाभ औ हानि नय पराजय इनकोसमान जानिकरि श्री प्रीति विरोध को भी त्याग करि के तत्र युद्ध मे प्रत्त होउ इस प्रकार से युद्ध करने से पाप न प्राप्त होयगा अर्थात् न लगेगा ॥ ३८॥ पूर्व कथित जो ज्ञान योग उस को कहि करि अब उस का साधन जो कर्मयोग सो कहते हैं कि वस्तु औ तत्व को प्रकाश करनेवाला सांख्य नामक तत्त्वज्ञान तुम मे कहा गया अर्थात् तत्त्वज्ञान के विपयमे जो बुद्धि सो मैने तुमको कहा इससे जो तुमारे मनमे तन्त्र जानका बोध न भयाहोय तो फिरि चित्तसुद्धि के द्वारा तत्वज्ञान उत्पन्नहोनेकेअर्थ अव यह कर्मयोग अर्थात् कर्मयोग के विषय की बुद्धि हम कहते है तो सावधान हो कर सुनोकि हे अर्जुन जिस हेतुसे ईश्वरार्पित कर्मको द्वारा चित्त की शुद्धि हो कर ईभर के प्रसाद से प्रत्यक्ष ज्ञान को प्राप्त करि अर्थात् पाय करि इस वन्धन से अना यास अर्थात सहजमे रुटि जाउगे ॥३६॥ और जो कहो कि जैसे खेती औ वनिज वैपार अादि कर्मों मे कदाचित् काहे कभू कभू विमो की याङ्गल्य कहे बहुतायत से फल के हानि की भी सम्भावना है अर्थात् निष्फल परियम भी होता है और मन्त्र अनुठान कहे जप यज्ञ आदिक मे भी विघ्न अथवा अन्न विकल होने से प्रत्यवाय कहे दोप औ कर्म निष्फल होता है तैसे जो यह कर्म जो विमो के मारे पूरा न हो उठे तो कैसे कर्मवन्ध की हानि कहे नाश होगा और उलटे दोप लगने का डर है इसवारते भगवान कहते हैं कि यह निष्काम कर्मयोग का धारमा करने में जो पूरा न भी हो उठे तो भी निष्काम कर्म निस्कल होता नही और इसमे दोष पाम भी नहीं लगता है जिस हेतु ईश्वर को उद्देश्य करि अर्थात् ईश्वर के अर्थ किये कर्म मे विन्न होते ही नहीं और ईश्वराराधन के अर्थ इस धर्म के थोडे याचरण से भी बडे भयानक संसार से रक्षा होती है अर्थात् ईश्वरार्पित कर्म रक्षा करता है इस से यह कार्यकर्म की तरह कुछ अविफल होने से भी Manm श्रीमद्भगवद्गीता। स्तिप्रत्ययायोनविद्यते। खत्यमप्यस्यधर्सस्यनायतेमहतोमवात् ॥ १० ॥ व्यवधा यात्मिकावुद्धिरे केह कुरुनन्दन। बहुशाखाधनन्तायुद्धयोऽव्यवसायिनां ॥ ११ ॥ यामिमांपुस्मितांवाचंप्रवदन्त्य विपश्चितः । बेदवादरतामार्थनान्यदस्तीतिवादिन, ।। भाषा अनुवाद नियाल नहीं होता है तात्पर्य यह कि ईश्वरार्थ कर्म करने से जो दोप न लगे और महत् फल है तो साक्षात् ईश्वर की यात्रा करने और या काइना ॥४॥ जो कहो कि कणाद यादि अाचर्यो के मत मे ज्ञान कर्म उमासना रूप अनेक प्रकार की बुद्धि कही हैं और आम जहां जानयोग रूम शो कर्मसम दोही प्रकार बुद्धि के कहा मो कैसे सम्भव होय इस अभिमाय पर उक्त इन दोनों के भी विम रीत कन्हे उलटा भिन्न प्रकार कहते है कि हे कुरुनन्दन अर्जुन यह ईश्वर धारा धन रूम कभयोगमे व्यवसायात्मिका बुद्धि अर्थात् मङ्गक्तिके द्वारा अवश्य ही उद्दार होगा ऐसी निश्चयात्मिका कहे निश्चयरूम बुद्धि की निष्ठा एक ही हैं और अव्यव सायी अर्थात् अाराधन के बहिर्मुस कामी कहे सकाम कर्म करनेवालो की अनन्त वासना से अनेक प्रकार की बुद्धि होती है और उस मे भी कर्मका फल चौर अश्व मेध राजसूय आदि यज्ञ का अा दिग्विजय की भाति गुए काला यादि नाना प्रकार बहुत शाखा प्रशाखा विशिष्ट वुद्धि उत्पन्न होती है परन्तु भगवत् धारा धन के अर्थ नित्यकर्म या नैमित्तिक कर्म छाछ श्रग विकल कड़े अधूरा भी होने से नष्ट नहीं जाता हैं यथासाध्य कहे जितना या जैसा अपने से हो सके उतना और वैसाही करो यही उस धर्म की विधि है ईश्वरामित वार्म विम दोप को शान्त कौर देता इस से उस के करने मे कदाचित वैगुण नही होती अर्थात् उस को विगुण नहीं कह सकते है और काम्यकर्म तैसा नही है इस से दोनो के बीच बडा अन्तर है सो एक बुद्धि हो के रहो दुविधा मन से दूर करो ॥४१॥ जो कहो कि सांस्ययोग रूप पुदि एक ही प्रमाणभूत है तो फेरि यही सब के चित्त मे क्यो नही खिर होती अर्थात् जो सकाम मनुष्य हैं वे भी ये कट रूप सकल कामना त्याग कारि भगवति ही में मुक्त होयगे ऐसी निचयरूप बुद्धि काहे से नहीं करते है जिस पर कहते हैं कि विपलता कहे इन्दरून की तरह द्वितीय अध्यायः । ४२॥ कमात्मानःसर्गपखनन्मकर्मफलमदा । क्रियाविशेषवलांभोगैश्वर्यगति मति ॥४३॥ भोगैश्वर्यप्रसक्तानांतयापहतचेतसां। व्यवसायात्मिकाबुद्धिासमा भाषा अनुवाद अति सुन्दर यह जो उत्तम खर्ग आदि फल सुनावनेवाली श्रुति कहे जो वेदवाक्य है जिस को कामी कहे सकाम मनुष्य सव कहते है सोई खर्ग आदि फल श्रुति रुप वेदवाक्य से विचार शन्य मनुष्यों को अर्थात् उस पर विश्वास करनेवालों को भगवद्भक्ति से निश्चय मुक्त होंयगे ऐसी बुद्धि उत्पन्न कभी नहीं होती है इस लोक के आगेवाले तीन लोकोके साथ इस लोक की अन्वय है जो कहो कि वे मनुष्य ऐसे काहे लिये कहते है तो उनका सिद्धान्त भगवान कहते है कि जिस लिये वे सब लोग अति मह औ अज्ञानी है उन के अन्नानमे अब हेतु कहते है कि वेदके वीच मे जो सव वाक्य है सो केवल प्रशंसा परक है अर्थात् चतुर्मास या नीयों को अक्षय खर्गमाल होता है और यन्नके शेप मे सोमलता पी करि अमर होते है इत्यादि जो पलास पुष्प के समान पुष्मित वेदवाक्य है अर्थात् निर्गन्ध फूल के तुल्य इनी वेदवाक्यो से कास्य कर्ममे वेलोग निरत है इससे कहते है कि यह वेदोक्त खर्ग आदि फल को छोड कर यौर ईश्वरतत्त्व प्राप्त करने योग्य वस्तु कुछ नहीं है इसी मतको वेलोग कहते है ॥४२॥ अतएय कामात्मा कहे कर्मबुद्धि वर्गादि फल प्राप्तिरूप कामना ही है परम पुरुषार्थ जिन के मत मे ऐमे जो मूट है तेई जन्म कर्म तथा खर्ग फल देनेवाली जो दवाब सब है और भोग ऐश्वर्य माप्त होने के अर्घ साधनभूत जो वेदोक्त कहे वेदविहित अनेक अनेक नियों की आधिक्य कहे बहुतायत है निन से मूढजन ऐसे बचन बोलते है अर्थात् जन्म ही है कर्म का फल तिंस के देनेवाली पाक्यों को कहते है॥४३॥ भोग औ ऐश्वर्य से आसक्त तथा जमर लिखी विषलता के तुल्य सुन्दर वेदवाक्य से अाशष्ट कहे बैंचा गया चित्त निन का उनकी समाधि अर्थात् वित्तकी एकाग्रतारूप परमेश्वर ने जो एक निठा तिसमे निश्चयात्मिकायुद्धि. होती नहीं इससे कर्मरूप जो बुद्धि उस मे कई खरूप अहङ्कार अर्थात् हम कर्ता है इस वासना के मारे उन विचारोंको रेसी एकनिष्ठा निश्चयात्मिका बुद्धि प्रापसे भाप उत्पन्न कैसे होय यह भगवानने कहा है
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श्रीमद्भगवद्गीता।
धौनविधीयते ।। 88॥
बैगुण्यविषयावेदानिस्वेगुण्योभवार्जुन । निईन्ट्रोनित्यस
सोनिर्योगक्षेमात्मवान् ॥ ४५ ॥ यावानर्थ उमानेसर्वतःसंप्स तौटके। तावान्
सर्वधुवेदेषुबाह्मणस्यविजानतः ॥१६॥ कर्मण्येवाधिकारस्तेमाफलेषुकदाचन ।
भाषा अनुवाद
॥ ४ ४ ॥ खर्ग आदि फल को परम फल नहीं है तो फेरि वेदों ने किस लिये
वर्ग आदि फल के साधन नाना प्रकार के कर्मों का विधान किया है तो कहते
है कि सकाम अधिकारी जनो के अर्थ वेद कर्मफल का प्रतिपादन अर्थात कहते
है परन्तु तुम निष्काम होउ निष्काम होने की उपाय यह है कि निईन्टू अर्थात्
सुख दुःख शीत उष्ण हानि लाभ जन्म मरण यादि से रहित होउ अर्थात् ये सव
सहो जो कहो कि कैसे इनको सहै तो कहते है कि धैर्य अवलम्बन करि के सहो
और अमाप्त वस्तु को प्राप्ति करने की इच्छा मो योग है औ प्राप्त भई वस्तु की
रक्षा करना जो क्षेम है इन दूनो को परित्याग करि के सावधान होउ क्यों कि
सुख टुख मे आसक्त औ अप्राप्त वस्तु की इच्छा प्राप्त का रक्षण इस मे व्याकुलचित
असावधान नो है यह निष्काम कैसे हो सकेगा बैगुण्य जो विगुणात्मक संभार सो
है विषय कहे कथनीय जिनको ऐसे तो वेद है पर तम निस्वैगुण्य कहे सांसारिक
भाव सुख दुःखादि से रहित होउ ॥ ४५ ॥ जो कहो कि वेदो कर्म गौ तहत
कामनाके फल सकल त्याग करिके निप्याम ईश्वरारधनके अर्थ जो व्यवसायामिका
बुद्धि सो कवुद्धि है इस शङ्का को निवारण करते हुये भगवान कहते है कि
जिस से जल पान किया जाय सो उदयान अर्थात् वावडी कुत्रा ताल तिन में जो
अल्प नल हो तो सब काम साधने के अर्थ अर्थात् मान मान आदि करने के वासे
तहां तहां भमण करिके सब काम सिद्ध होयंगे परन्तु संल तोदक कहे एक महा
कुण्ड जिस मे अगाध जल भरा है उस एक ही से सव निर्वाह हो सकते हैं
तैसे ही वेटोक्त जो कर्म के फल सो सब भगवतियुता ब्रह्मपरायण पुरुष की भक्ति
की से मिलते हैं देखो ये वर्ग प्रादि सम्पूर्ण तुच्छ मुस ब्रह्मानन्द के भीतर की
अन्तरभूत है इस बह्मानन्द को कणामाब आनन्द को प्राप्त हो के सर्व प्राणी जीते
रसते हैं यह थुगिमे कहाहै इससे निययात्मिका जो बुद्धि सोई सुबुदिहै॥४६॥
द्वितीय अध्यायः । माकर्मफलहेतुर्भूर्मातेस गोस्वकर्मणि ॥४७॥ योगस्थाकुरुकर्माणिसत्यवाधिन भनय। सिद्यसियोःसमोभूत्वासमत्वंयोगउच्यते ॥४८॥ दूरेणयपरकर्मयुद्धियोगा । भाषा अनुवाद 'जो ऐसा कइतेहो कि समस्त कर्म का फल परमेश्वरकी धाराधना करने हीसे होगा तो हम भगवतका अाराधन ह्रीं सब छोडकर करें और कर्म करनेसे क्या प्रयोजन है इस शङ्काको निवारण करते हुये सिद्धान्त कहते है कि तत्वज्ञानके अर्थी जो तुम सो तुमको कर्ममान करने का अधिकार है और वन्धन का हेतुभूत कर्म के फलकी अभिलापा करिके ये अनेक प्रकार की कामना करने में कभी तुमारा अधिकार नहीं है जो कहोकि कर्म करनेसे उसका फल अवश्य होहीगा जैसे कि ग्राहार करनेसे दृप्ति होती ही है इसपर कहते हैं कि सो होय पर उसका पुण्य पाप नही लगता है जैसे अज्ञान वालक जो नीचका अन्न खाय तो उसका धर्म न जाय क्योंकि धर्म नाश के अर्य नहीं खाया सो तुम फल के अर्थ कर्म मे महत्त न होउ निष्काम कर्म करो जो कर्मफल की दृष्णासे कर्म करोगे तो कर्मफल प्राप्तिके हेतु होउगे लव फल की इच्छामे कर्म मे मनुष्य प्रत्त होता है तव फल नौ जन्म दोनोका हेतु हो जाताहै नीच ऊंच योनिमे ननमिजनमिके फल भोगता है और जो कर्मफल को न चाहे तो दुग्मुरूप कर्म करने से क्या प्रयोजन है ऐसी मतिमी तुमको मति होय अर्थात् न करनेमे भी रुचि न होय तात्पर्य यह कि सकाम कर्म न करो निष्काम तो अवश्यही करो॥४७॥ तो फिरि क्या करना चाहिये सो कहते हैं कि हे धनञ्चय अर्जुन योग कहे ईश्वर से जो एक निष्ठा उसी मे स्थित होयके कर्म करो और हमी इसके कर्ता है ऐसे अभिमान को त्याग करिके केवल ईथरार्पण बुद्धि से कर्म करो अर्थात् निष्काम कर्मका फलरूम तत्वज्ञान की प्राप्ति अमाप्तिमे समता पूर्वक कहे समचित्त होय केवल ईवर्षिण नानिकै कर्मअनुष्ठान करो जिसहेतु ऐसी ही समना को साधनोग योग कहते है क्योंकि इसी से चित्त स्थिर होता है यह सुबोधिनीका अर्थ है। ईश्वरार्पण शब्दका भाव अर्य यह है कि हम अपने हृदय मे टिके हुये अन्तर्यामी रूप परमेवर के याधीन हैं यही अन्त मी इमारी वासना के अनुसार शुभ अशुभ जिस कर्म मे हमको लगावते उसी .
थीमद्भगवद्गीता। धनञ्जय। बुद्दोशरणमन्विच्छवमणाःफलहेतवः ॥४६॥ बुद्धियुक्तोजहातीहउभेसु कन्टुष्कृते। तस्मात्योगाययुज्य खयोग कर्म सुकोशलं ॥ ५० ॥ कर्मजंबुद्धियमा हिमालयबामनौपिणः। जन्म वन्धविनिर्मुतापदंगच्छन्त्यनामयं ॥ ११ ॥ यदाते . भाषा अनुवाद को हम उनकी प्रेरणा से करते है ऐसे विचारकर किये हुये सब कर्मों को भग वत अर्पण कहते है सोई पञ्चदशी मे कहा है कि बानामिधर्मनचमेप्रत्तिर्जाना स्यधर्मनचमैनिक्तिः । त्वयाहृषीकेशहदिरियतेनयधानियुक्तोस्मितधाकरोमि ॥४८ जितने काग्य कर्म है सब को निकृष्ट कहे नकारे कहते हैं बरसायात्मिका बुद्धि के द्वारा किये जो कर्मयोग उनका नाम बुद्धियोग और वह ज्ञान साधन का उपाय है निष्काम बुद्धियोग की अपेक्षा सव काथ्यकर्म अत्यन्त अमट जो याय्य कर्म ऐसा तुच्छ ठहरे तो हे धनञ्जय बुद्धिशब्द वाच्य कहे ज्ञान तिसको आश्रय करि निष्काम कर्मयोगसम भक्तियोगका अनुष्ठान करो चिन्तनीय पालनकरनेवाले ईश्वर ही को बुद्धिका आश्रय करो कर्मफलके अभिलापी जो नर है सो कपण औ दोन हैं युतिमे भी यही कहा है कि हे गार्गि ईस अक्षर खरूप ब्रह्माको न नानि जो संसार मे लोकान्तरगामी होते हैं घेई क्षमण अर्थात् निष्ट है इस से पुद्धि काहे ज्ञान उसमे आयय लेउ ॥ ४६॥ पूर्व नो कहा कि मुख दुख अादि से समान बुद्धि होकर खधर्म को करै तो बुद्धियोगयुक्त होने से क्या होता है सोई बुद्धियोग भी बेछता कहते हैं कि सुकत जो पुण्य खर्ग चादि का देनहार औ दु कतजो माप नरकवासकी प्राप्ति पारनेका साधन इनदोनोको बुद्धियोगयुक्ता पुरुष इसी जन्म मे भगवत् की कमामे परित्याग करते है जिसमे हे अर्जुन तुम बुद्धियोग रूप निष्काम कर्म करो जिससे योग कर्मके बीच मे कौशल कहे चातुर्य है अर्थात् सकल कर्म बन्धन होने के कारण हैं तो भी ईश्वर की आराधना से मुति माप्ति करना चातुर्य है इसी को योग कहते सो बुद्धियोगयुक्ता नम होउ ॥५०॥ सुख दुख आदिमे समता युक्त भी भये और सुक्षत दुचत कर्म के फालको परित्याग किये भी अर्थात् नि.काम कर्म किये से भी फेरि मोक्ष कैसे होगी इस शङ्कामर कर्मको मोक्षको साधनता है यह कहते कि कर्म के माल की अभिलाप छोड करिके केवल द्वितीय अध्यायः । मोहकलिलंबुद्धियतितरिष्यति । तदांगन्तासिनिर्वेदंथोतव्यस्थथुतस्यच ॥५२॥ श्रुतिविप्रतिमन्नातेयदावासतिनिश्चला । “समाधावचलावुद्धिस्तदायोगमवासि ॥ ५३॥ अर्बुनउवाच । स्थितमन्जस्यकाभापासमाधिस्वस्यकेशव स्थितधी किंम भाषेतकिमासीतषनेतकिं ॥५४॥ थीभगवानुवाच । प्रहजातियदाकामान्सधान् . भापा अनुवाद ईश्वराराधनार्थ कर्म करते हुये बुद्धिमान मनुष्य नानी होके जन्मरूप बन्धन में सृष्टि करि सकल उपद्रव से रहित जो विष्णुपद जिसको मोक्ष कहते तिस को सह जमे पावते हैं । ५१॥ जो कहोकि कव हम उस विष्णुपदको पावेंगेतो दोसोकसे कहते हैं कि मोह नो देहादिक मे यात्मबुद्धि अर्थात् अात्माखरूप जो कुछ है सो देह है जैसा जो दृढ़ विश्वास सोई दुरगाह अन्नान गहन बन है सो जव इस पर्व कथितरूम, परमेश्वर की आराधना करने से भगवत की कपासे तमारी बुद्धि देह अभिमानरूप मोहमय अगम्य कानन काहे वनके पार अच्छीतरह से होगी अर्थात् देहाभिमान छूटेगा तव विष्णुपदरूप मुक्ति प्राप्ति होगी और जो अर्थ सुना चाहते हो और सुनिचुके हौ तिस सव अर्थ मे वैराग्य उत्पन्न होगी अर्थात् वह सब तुच्छ कहे किसी कामका नहीं यह नानि सकोगे फोरि और उस वातको न छोगे ॥ ५२ ॥ इसी प्रकार लौकिक कहे लोक की वार्ता में वैदिक कहे वेद की बात अनेक प्रकार की श्रवण करते करते पूर्व से विक्षिप्त कहे ममित जो तुभारीबुद्धि सो जव समाधि मे स्थिर होगी अर्थात् अच्छीतरह लगाया जाय चित जिसमे सोसमाधि कहे परमेश्वर तिसईश्वरमे और औरविपयोंको छोडि अभ्यास करते, करते निपुण होय जय अचल रूपसे स्थिर होगी तव तुम योगका फल जो बन्य ज्ञान सोपावोगे ॥५३॥ पूर्व झोक से कहा लो अात्मतत्त्वज्ञानी का लक्षण उस के लानने की इच्छा करि अर्जुन पूछते हैं कि हे केशव अनायासलव्य समाधि मे स्थित जो नियल बुद्धि स्थित अन्न पुरुप उसका क्या लक्षण है अर्थात् कैसे उसको चाने तात्पर्य यह है कि कैसे लक्षण होने से किस आचरण से स्थिरंगजं होता हैं सोई मरते हैं कि ज्ञानी कैसे बोलते बैठते और कैसे चलते फिरते रहते हैं ॥५४॥ श्रीभगवान बोले कि हे अर्जुन सुनों जिनको साधक लोग ज्ञान सांधन के निमित्त श्रीमद्भगवद्गीता। पार्थमनोगतान्। अात्मन्ये वात्मनातुष्टःस्थितमजस्तदोच्यते ॥ ५५ ॥ दुखेष्वनुद्धि ग्नमनाःसुखेषुविगतस्पृह। वीतरागभयक्रोधास्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥५६॥ यः सर्ववानभिस्नेहस्तत्तत्माप्यशुभाशुभं । नाभिनतिनद्वेष्टितस्थप्रज्ञाप्रतिष्ठिता॥५७ यदासंहरतेचायंकर्मोऽङ्गानीवसर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तसमजामतिष्ठिता। भाषा अनुवाद यानपूर्वक साधना करते हैं वेई सिइके साभाषिक कहे खभाषसिद्ध लक्षण है इस से अब सिद्दके लजण कहने के अनन्तर जानके साधन अध्याय की समाप्ति पर्यन्त काहते हैं तिनमेसे अधम दो लोकसे पहिली अन्न का उत्तर करते कि हे अर्जुन मुनिजन मनोगत सकल कामना सब अच्छीतरह से त्याग करते है कि अपने परम पानन्दप आत्मा से जो रमै सो अात्माराम अर्थात् श्राप आपने यात्म मुख मे सन्तुष्ट होते हैं तिससे जय क्षुद्र विषय अभिलापको छोडते है तब उसी लक्षण मुनिनन स्थितप्रज्ञ कहे जाते है ॥५५॥ अव लक्षरा कहने के बहानेसे जिज्ञासू अर्जुन को और जो करना चहिये सो उपदेश करते है कि जिनका मन दुख पड़ने से उदिन अर्थात् धवडाय नही और सकल सुखको स्पृहा कहे इच्छा न करें सुख टुप में समान रहै सो धीतराग अर्थात् विषय प्रीति रहित एवं भय ना कोधशून्य सितम काहे स्थिरपुदि मुनि यातायते है । अर्जुन ने पूछाया कि तत्वज्ञानी किस प्रकार से बात कहते है उस अन्न का उत्तर भगवान कहते है कि समस्त पुत्र मित्र धन धाम आदिक मे जिस को स्नेह कहे प्रीति नही है और शुभ प्राप्ति होने से सुपी श्री अशुभ लाभ होने से दुसित भी न होय है अर्थात् स्तुति औ निन्दा मे राग द्वेष कहे प्रीति पिरोध हीन है केवल उदास के समान अर्थात् उदासीन ऐसे हो पात करते है उनी की प्रज्ञा प्रतिष्ठित है येई खिरवुद्धि मुनि है ॥ ५७॥ जिजास्तू को और क्या करना योग्य है सो सूचन करायते करते है कि और पूर्व कथित योगी जय इन्द्रियार्थ जो नानामकारके विषय तिन से सर्व इन्द्रियों को बनायास कहे सनम लौटा अर्यात फेरलेय इसमे दृष्टान्त कहते हैं कि जैसे कर्म कहे बछुआ अपने मुख कर चरण अनायास समेटि लेता है सेही योगी विषयों से इन्द्रियों को नव बटोर ले सकै तब उस ज्ञानी की बुद्धि सिर है।
द्वितीय अध्यायः। ५८॥ विपाविनियतन्ते निराहारसदेहिनः । रसवनं रसोप्यस्यपरंडष्ट्वानिव ॥ ५८ ॥ यततोपिकौन्तेयपुरुपस्यविपश्चितः। इन्द्रियाचिप्रमाधोनिहर न्तिप्रसभमनः ॥६॥ तानिसर्वाणिसंयम्ययुक्तासीतमत्परः। वोहियस्येन्द्रि याणितस्य प्रज्ञाप्रतिष्ठिता ॥६॥ ध्यायतोविषयान्पुंसःसगस्तेपूमजायते। सद्भात भाषा अनुवाद ५८॥ जो कहो कि इन्द्रियों की विषय मे अप्रवृत्ति होना यह स्थित मज का लक्षण न हो सकेगा क्यो कि जड अातुर औ उपवास करनेवाले मनुष्यों की इन्द्री भी विषय मे नहीं मत्त होती है तो इनसे औ ज्ञानी से फेरि क्या विशेष कहे अन्तर है इन को भी स्थिरबुद्धि मुनि कहना उचित है तिस पर कहते हैं कि हा आहार न करने से निराहार पुरुप को यद्यपि विषयों का इन्द्रिय द्वारा ज्ञान नहीं होता सत्य है पर तो भी उसकी विपयों से अभिलापा नहीं जाती अर्थात विपय की वासना मन मे बनी रहती है और स्थित मन्न पुरुष के परमात्म दर्शन हेतु से विपय की लालसा निवृत्तहोजाती अर्थात अच्छी तरहसे अभिलाप सहित विषयवासना नाशहोतीहै और जड आतुर नैसे विषयों के अजहै तैसे आत्मा को भी नहीं जानते तो वे स्थिर बुद्धि कैसे हो सकते है और रस कहे राग जो प्रीति सो स्थित मन पुरुप को श्राप से श्राप नित्त होती है ॥५६॥ इन्द्रियों का संयम किये विना अर्थात् विषयों से रोकने के विना स्थित मन्ना कहे परमात्मा मे अचल बुद्धि होती नही इस से प्रथम साधन की अवस्था मे इन्द्रीयों को खाधीन करने के अर्थ वडा यत्न करना चाहिये यह कहते है कि हे कौन्तेय कुन्तीनन्दन 'अर्जुन मोक्ष के हेतु प्रयत्न करते हुये विवेकी विचारवान ज्ञानी पुरष के भी मनको ये मयल प्रमाथी कहे क्षोभ करनेवाली इन्दी हरण कर लेती हैं। ६ ॥ इन्द्रियों को साधीन करना यह कहि करि फेरि क्या करना उचित है सो कहते है कि तो सब इन्द्रीयों का संयम करिके यता योगी मेरे मे तत्पर हो रहे अर्थात् मात्मामै निहाकरिके बैठ रहे यह कहि कर ज्ञानी कैसे खिति करते इस प्रश्नका उत्तर दिया अर्थात् जिसके इन्ट्रीयगण वश है उस को प्रना कहे बुद्धि प्रतिठित वर्षात् स्थिर है।६१॥ पायइन्द्रिय कहे बाहर की इन्द्रियों के वय न रहने " -- श्रीमद्भगवद्गीता। संबायतेकामाकामावक्रोधोऽभिनायते ॥६२ कोषागवतिसम्मोह सम्मोहात स्मृतिविभूमः। स्मृतिभंगाइदिनायोबुद्धिनाशात्मणश्यति ॥६३ रागद्देषविसु नौस्तुविषयांनीन्द्रयैश्चरन् । यात्मवधेियात्माप्रसादमधिगच्छति ॥६॥ मापा अनुवाद भै जो दोप सो देखाय अब अवशीभूत जो मन तिस का दोष देखावते हैं कि बुद्धि के द्वारा रूपादिक वियों को ध्यान करते हुये: पुरुष का मन उन विषयों में शासक्त होता अर्थात् विपय सङ्ग होता है और सङ्ग से अधिक अधिक कामना उत्पन्न होती हैं मेरि जो कामना किसी प्रकार से नष्ट होय तो मोध मंगट होता है अर्थात् काम से क्रोध प्रगट होय है॥६२ ॥ और शोध मोह का हेतु है इस को बंद करते हैं कि क्रोध से अर्थात् , उस के द्वारा मोह होता है अर्थात् ‘कान अकान का.विचार नहीं रहता फेरि संमोह होने से, शास्त्र -ौ. प्राचार्य तथा गुरु का दिया जो उपदेश कहे शिक्षा अर्थ सो विचलित अर्थात् भूल जाय है और स्मृति मंस होने से कहे उपदेश भूल जाने से बुद्धि की.चेतनाशक्ति चली जाती है अर्थात् बुद्धि नष्ट होती है बुद्धिनाश होने से जड़ के समान होय' फेरि वा. मनुष्य मुर्दे को तुल्य हो कर नट हो जाता है।६३॥: जो कहो कि चिरकालसे विषयमे निमग्न स्वभाव कहे विषय मे अासक्त इन्द्रिगण का विषय से. रोकना जो असाथ अति कठिन हैं तो मूर्वउक्त दोष निवारण कैसे हो सकेगा इस मेखित प्रज्ञा होनामी असम्भव कहे अति दुर्घट है, इस गङ्गा, पर कहते हैं कि राग कहे प्रीति औ वेप नो विरोध तिनसे रहित होके अर्थात् इनको छोड़ के यौ अभिमान त्याग करिके सव इन्द्रिकों के द्वारा विषयों का भोग करने से भी शान्ति प्राप्ति होती है तो राग द्वेष रहित कैसे होय सो कहते हैं कि मन के आधीन काहे वशीभूत सवै इन्द्रिय हैं और इन्द्रिय बशकारी मन को नो मनुस्य 'अपने वश कर राखे है उसके फेरि और राग हेपादिक रहते नहीं इस कहने सें अर्जुन की चौथी प्रश्न जो है कि स्थितमन्न कैसे गमन करै है उस का उत्तर दिया कि साधीन इन्द्रियगण राखि कै विषयों में गमन करै अर्थात् इन्दोजित की विपय गोग करैनिस हेवघालय इन्द्रिय द्वारा विषय मोग करता हुत्रा प्रायो द्वितीय अध्यायः । ३६ प्रसादेसर्वदुःखानाहानिरस्योपनायते । 'प्रसन्नचेतसोह्यावुद्धिःपर्यवतिष्ठते । ६५॥ नारिजवुहिरयुक्तस्सनचायुक्तस्थभावनां । नचाभावयतःशान्तिरशान्तस्यक्तः सुखं ॥ ६६ ।। इन्द्रियाहिचरतांयग्मनोऽनुविधीयते। तदस्यहरतिप्रसावायु नावमिवाम्मसि ॥ ६७ ॥ तखाद्यस्यमहावाहोनिगृहीतानिशर्वशः । इन्द्रियाणी , - 'भाषा अनुवाद सुखी रहता है । ६४ । इस प्रकार शान्ति प्राप्त होने पर फिरि क्या होता है सो कहते है कि गान्ति लाभ होने से सब दुख नाश हो जाते हैं. फेरि इस शाक्त चित्त पुरुपके सुन्दर युद्धि स्थिर होती है । ६५ ॥ इन्द्रियों का निग्रह कहे कापूरखना जो स्थितन्त्र पुरुष का साधन सो विपरीत कहे उलटी रीतिसे कहते हैं कि अवशीकृत इन्द्रिय मनुष्य के शास्त्र औ.ग्राचार्य के उपदेश से आत्मज्ञान होने के योग्य वुद्धि उत्पन्न नहीं होती है तो स्थित प्रन होना दूरवात है वहां भावना का अर्थ ध्यान है सो ध्यान के द्वारा दुद्धि यात्मामे प्रतिष्ठित कहे स्थित होती है परन्तु नो इन्द्रियगंण वश न करि सके उस को यह ध्यान कहां है इसीसे 'वई आत्माके ध्यानका अनधिकारी है तो फिरि उसको शान्ति नहीं होती अर्यात यात्माने चित्तयुक्ता नहीं होता और अंशान्त पुरुष को सुख कहे परम आनन्द कहां से हो सके गा ॥६६॥ इन्द्री वश किये विना तत्त्वज्ञान नहीं होता इसका कारण कहते हैं कि अवशीकत इन्द्रिय विपयाधीन भोगी पुरुपकी इन्द्रियों के बीच पाव एक इन्द्री के साथ मन धावता है अर्थात् उसके आधीन हो विपय मर चला तो फिर वह मन पुरुष की वृद्धि हरि के उस को विषय मे वेक्षिा करता है तक सब इन्द्री कछु हा प्रज्ञा को हरण करती है तो और क्या कहै फेरि वायु से 'नलगे नांव को इधर उधर नचावती है तैसे ही यह मन इन्द्रियों के साथ विक्षिप्त सो जहां तहां मारामारामभता फिरता इस पुरुष को खराव करता है ॥६॥ इन्द्रियोंका संयम करना स्थिरप्रन पुरुप का साधन ौ यही उसका लक्षण है यह नो प्रर्थ करि चके सोई अप फेरि कहते हैं कि हे महाबाहो अर्जुन जो इन सब इन्द्रियों को विषयों से शान्त राखिसकै उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है गहावाज सम्बोधन देनेसे यह जनाया कि तुम वैरियों के निग्रह करने में समर्थ हो इससे श्रीमहगवद्गीता न्द्रियार्थम्यस्त स्यमनाप्रतिष्ठिता॥ ८॥ यानियासर्वभूनानांतसांजागतिसंयमी। यस्यांनातिमूतानिसानिशापश्यवोमुनेः ॥ ६ ॥ आपूर्यमायमचलप्रतिष्ठसमुद्र भाषा अनुवाद अवश्य इन्द्रियोंको वश करि सकोगे क्योंकि ये इन्द्री पुरुषकी परम शत्रु हैं शत्रुको जय करने विना वडी हानि है यह इसका भावार्थ है ॥६८॥ जो सन्देह करो कि निद्रागत कहे सोये हुये मनुष्य के समान देखना सुनना बोलना चलना या अरस परस करना आदि इन्द्रियों के व्यापारसे रहित कहे इन्द्रीनित तो कोइभी पुरुष इस संसारमे नहीं देख पडता है तो स्थित प्रजका लक्षण जो कहा सो असम्भव अर्थात् कोईभी स्थिर बुद्धि नहीं हैं इस पर थीभगवान कहते है कि अज्ञानरूप अन्धकार से वाटत्त कहे घेरेजये साल मनुष्योंको धात्मनिहा कहे पात्मज्ञान तत्वज्ञानरूम विपयमे दर्शन श्रादि कोई व्यापार न रहने से जन्तुवों की जो निशा कहे रवि अर्थात दर्शनादि व्यापार शून्य अवस्था है तद्रूप अात्मनिठा कहे तत्त्वज्ञान अवस्था रावि है जिसमे विषयी विचारों को कुछ नहीं सूझता है सोये हुये पुरुप के समान थिथिल पडे है कोई इन्द्रीभी कुछ काममे नहीं पातीहै यही अात्मनिष्ठासप निशा तुम सब जीवोंकी जानो इससे संयमी कहे इन्द्रीजित जागते है अर्थात् तत्व जानका अनुभव करते चौख ख रूपको देखते धानन्द पावते है और जो विषय निछा कहे विषयों का ज्ञान जिस मे सय माणो जागते अर्थात विपयी जन विपयों मे वोधयुता होय दर्शनादि व्यापार करते हुये सन की भैंसी संपदा में मगन है सोइ अवस्था मुनि जो तत्वज्ञानी है उन को रात्रि तुम्न्य है अर्थात् इस विषय मोह रूप रातिमे उन को कुछ नहीं सूझता है सोये हुये नर के समान अचेत * अर्थात् ब्रह्मा मे दृष्टि है और विषयों को देखते नहीं सोई कहा कि जो निया सव भूत कहे प्राणियों की है उस मे मुनि जन जागते और जो ज्ञानियों की राति उस में प्राणी सय नागते है से उलूअापक्षी और चमगादुर छन्द आदि जीव और जीवोकी जो राति वह इनका दिन है अपना सब व्यापार उसमे करते सुसीसे रात भर घूमते हैं तैमेही जानोnen जो कहो कि विषयमे दृष्टि विना भये फेरि वे ज्ञानी विषय भोग कैसे करते है इस प्राश्य मे भगवान कहते हैं कि म द्वितीय अध्यायः। मापःप्रविशन्तियत्। यहत्कामायंप्रविशन्तिसमशान्तिमाशोतिनकामकामी । विहायकामान्य सर्वान्पुमांश्चरतिनिस्पृहः । निर्ममोनिरहङ्कार.स शान्तिमधिगच्छति ॥ ७१॥ एपाब्राह्मास्थिति.मार्थनैनामाप्ययिसुहाति। खित्वा स्थामन्तकालेऽपिवयनिर्वाणमच्छति ॥७२॥ इति श्रीभगवडीतायांसांख्ययोगो नामद्वितीयोऽध्याय ॥२॥ ७०॥ Arrary भाया अनुवाद जैसे नट नदी नारोंके जल प्रवाह के जोर मे अचल समुद्र मे जाय प्रवेश करते पर समुद्र को इच्छा नही है तैसेही विषय सब अदृष्ट कहे पूर्व कर्मके अनुसार इस संसारमे भोगच्छा हीन मुनिके अन्तःकरणमे अटके जोरसे कर्म के द्वारा विषय प्रवेश करते है परन्तु तिनके द्वारा ही विषय भोग करते हुये भी वे कैवल्य मुक्ति 'पावते है और कामके कामी भोग कामना शील कहे विषय समाव वे नहीं होते है ॥७॥ जव जैसी व्यवस्था है तो जो प्राप्त विषय को त्याग करते या अनादरसे ग्रहण करते है और अमाप्तमे इच्छा रहित कहे विसीकी अभिलापा नही रखते इससे उनके अहङ्कार नहीं है इसी से भोग अभोग साधनमे ममता नेहशून्य हो कर अात्मामे दृष्टि राखि अदृष्ट वशते विषयोका भोग करते है और कही भौजाय पर शान्ति को प्राप्त होते है अर्थात् जो सब कामना छोडि वेपरवाह अई ममता हीन पुष्प भोग करै या कही नाय पर शान्ति तो पावते ही है ॥ ७१ ॥ पूर्वकी कही हुई ज्ञाननिछाको प्रसशा करिके कहते है कि हे अर्जुन उता ब्रह्मज्ञान को निष्ठा जैसी है इससे भगवतके आराधनसे शुद्धचित्त पुरुष यह अनिता पाय करि और संसार सागरमे नट नही हाता है देखो मरती वार भी एक क्षण भर जो मनिडामे मन स्थिर करते वे वाले लोन होते है तो वालपनसे या बहुत दिनोसे इस ब्रह्मनिष्ठा की अभ्यास मे इसमे मन स्थिर करि अन्त मे मुक्ति मिलेगी इसमें फिरि कुछ सन्देश वाकी है सा हे पार्थ यह वाही स्थिति है इसको प्राप्त होय फोरि मोह नही पावते अन्त काल मे भी इस से जगभर मन थिर करिके मनुष्य निश्चय वन निधारापट पायते है।।७२॥ इति श्रीजगन्नाथसुलाविरचिताया मनभावनीटीकायां श्रीकृष्णानुनसंवादे सांख्यथागो नाम द्वितीयोऽध्याय ॥२॥ ॥ " श्रीमद्भगवद्वीता टतीय अध्यायः । अर्जुन उवाच । ज्यायसोचेत्कर्मयस्तेमतावुद्धिर्जनार्दन ततलिंकमणिधोरेमो नियोजयसिकेशव ॥१॥ व्यामिशेववाकोगवुईिमोहयसीवमे । तदेकवनिचित्ययेन भाषा अनुवाद गीताशास्त्रमे प्रथम प्रति औ निष्टत्ति को हेवरूप सांख्य तथा योग ये दो प्रकार को बुद्धि देखावते हुये श्रीजगदीश्वरने यशोच्यानन्यशोचस्व इत्यादि लोक से पहिले मुक्तिसाधन के विषयमे देह ौ आमाका भेद कहा तिसके.अनन्तर एमा तेऽभिहिता सांख्ये इत्यादि लोकके द्वारा निष्काम कर्म करने को कहा परन्तु तिससे कौन पन मुख्य कहे श्रेष्ठ प्रौ कौन गौण कहे साधारण है, यह कुछ भाव कहे भगवत की अभिप्राय न जानी गई और तिसके बीचमे ज्ञानी, पुरुष को कर्य रहित होना तथा इन्द्री वश करना औ निरहकार रहना कहिकर एपा माझी स्थितिः मार्थ इस लोकामे प्रसंशा पूर्वक भगवतकी कहावत से तत्त्वज्ञान औ निष्काम कर्मयोगरूप भक्तियोग इन दोनोके मध्यमे जान ही की येष्ठता. भगवान को अभिमत है यह जानिकर अर्जुन कहते हैं कि हे केशवानो निष्काम कर्य योगरूप भक्तियोग की अपेक्षा शीघ. मुक्ति का देनहार तत्त्वज्ञान ही श्रेष्ठ याम को अभिमत है तो परिकितवास्ते तस्माद्यध्यख तन्मात्तिष्ठ ये बातें कहि कहि कर हे जनाईन घोर हिंसा रूप कामे हमै महत करते हो जनाईन संबोधन देनेमे यह पाया कि जन कहे भक्तजन जो मैतिस को अर्दन कहे,पीड़ा देने वाले काहेको होते हौ ग्रह अर्जुन का तात्पर्य है ॥ ९ ॥ हे अनधनिःपाप अर्जुन मैयाइ वात पर्व कहि. चुका हूं. तो जो नोक्ष के थेत रूप ज्ञान तथा कर्म ये दोनो, हतीय अध्याय । योऽहमाप्नुयां ॥ २॥ श्रीभगवानुवाच । लोकेऽचिद्विविधानिठापुरामोतामया भापा अनुवाद निठा मै एक पृथक कहे अलग अलग जो कहे होता या अभी जो तुमसे कहा इसी मे पृथक करि कहा होता तो अलवत्ता दोनो के बीच नो उचित हो सो निश्चय कर कहो यह तुमारा कहना ठीक था परन्तु मै ने तो ऐसा नही कहा केनल दोनो ही पक्ष मे एक बह्मनिष्ठा ही को कहा यों कि गौण और मुख्यफल दायक ये कर्मयोग यौ जानयोगसे भिन्न भिन्न ऐसी एक ज्ञाननिष्ठा ही मैंने कहा सो भी अधिकारी के मेद से कि जैसा अधिकारी हो वैसा याचरण करे और दोनो निछा का अधिकारी एकही पुरुष कैसे होगा जो तुम करते हो कि दोनो मे एक निश्चय कर कहो सो शुद्ध अन्त करण यो अशुद्ध अन्त करणहोने से अधि कारी दो प्रकार के है इससे दो मत कहे गये है सोई दो प्रकार बनानिष्ठा जो मोक्षप्राप्तिकी उपाय सो पूर्व अध्यायमे मैने स्पष्ट करके कहा है यब उक्त दोनो मलका निर्णय करते है कि साख्य कहे शुद्ध अन्तःकरण ज्ञानमार्गमे प्रारूढ पुरुष को ज्ञान परिपाक रूप कारण से ज्ञानयोगके द्वारा प्रात्मा की निश्चय करनेवाली ध्यान आदि निष्ठा और धादियुद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते इत्याटि सोको मे भगवान कर्म को प्रधान कहा है इसी शशापर अर्जुन कहते है कि काही तो कर्म की प्रशंसा और कही जान की वडाई करते हुये श्राप की सन्देह के उत्पन्न करनेवाली इन वातो से मेरी बुद्धिको मोइसा करते हुये यह आम क्या कहते हो यद्यपि परम करुणामय जो पाप तिन के मोह कहां है तो भी चान्ति से हमको मोह की ऐसी बाते ममझ पडतो है सो जान यो कर्म दोनो के बोच मे नो कल्याणकारी होय वही एक मज्ञ निमय करके हमको कहो अथवा नो हमारा कल्याण म युद्ध क महीमे निश्चय किये हो तो इसी को निर्धार करिके ठीका कड़ो ॥ २॥ अर्जुन की प्रत्र के अनुरूप उत्तर करते हुये थीभगवान कहते है कि इस लोकमे मास्त्र के अर्थ अनुसार चलनेवाले आझए चनी वैश्य इन तीनि बोके अर्थ दो प्रकार की निष्ठा पूर्वी अर्थात् मष्टि के प्रधमही उन का श्रेयसाधन कहे मुक्तिका देनकार वेदार्थ सम्प्रटाय प्रगट करतेहुयेमैने इस रूपसे भ्रमपरता कही श्रीमद्भगवद्गीता। नध। ज्ञानयोगेनसांग्यानाकर्मयोगेनयोगिनां ॥ ३ ॥, नकर्मणामनारम्भान्नैष्क यमुरुपोऽभुते। नचसंन्यसनादेवसिदिसमधिगच्छति ॥४॥ नहिचित्क्षरामपि जाततिष्टत्यकर्मकृत्। कार्य्य तेह्यवश कर्मसर्व प्रकतिजैगुणै. ॥५॥ कमेन्द्रियाणि भाषा अनुवाद है। यथा तानिसर्गाणिसंयम्ययुक्तासीतमत्परः इस झोक से और जो ज्ञानमार्ग में नहीं प्राप्त है उन लोगो को चित्तशुद्धि के द्वारा ज्ञानमार्ग पर बारुद होने के अर्थ उस की उपाय रूप कर्मयोग के अधिकारियो को कर्मयोग से निष्ठा अर्थात् बह्मपरता कही गई है यथा धर्मादि युद्धाच्योन्यत् चवियस्य न विद्यते इत्यादि लोकोंसे कहा है अतएव चित्तशुद्धि अशुदि दो अवस्था भेदसे दोम कार महापरता कथित भई है पर तौ भी तुम मे प्रकाश करि कहे खुलासासे मैने कह दिया है कि एपा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धियोगेत्विमा टणु इस श्लोकसे फिरि भो तुम सन्देह करते हो ॥ ३॥ इस से यह पाया कि सम्पूर्ण चित्तशुद्धि के द्वारा नम तक जान उत्पन्न न होय तब तक वर्ण कहे जाति औ आयम कहे ब्रह्मचर्य गाईस्था वान प्रस्थ संन्यास इन मे विहित जो जो कर्म सो सब करना उचित है नहीं तो चित्त शुद्धि के विना ज्ञान कैसे होस के गा यही भगवान कहते है कि कर्म किये बिना पुरुप नैष्कर्य जो ववज्ञान सो नही पावते है जो कहो कि संन्यासी फेरि सर्वकर्म परित्याग करि बच्चजान कैसे पावते है और वेद की श्रुति कहती है कि संन्यास धारण करने ही से मुक्ति मिलती है फेरि कम करने से क्या प्रयोजन है इस गदापर कहते है कि सो नही क्यों कि निष्काम कर्म कारि चित्तशुद्धि किये बिना जान का अभाव हैं श्री ज्ञान के विना मुशिमाप्ति नही होती यह निश्चय है कुछ संन्यास हो लेनेसे पुरुष सिद्दिकी नही पाय जाता है ॥ ४ ॥ कर्म संन्यास इसका यह मर्थ है कि सर्व कर्म मे मक्ति रहित होगा माल न कि एकाएक सव को का त्याग करना और शरीर रहते कर्म का त्याग भी असाध्य है सोई कहते है कदाचित कहे किसी अवसामेभी या ज्ञानी और क्या अज्ञानी चसमा भी मान मिक वाचिक काायक कर्म किये विना रन नहीं सकता है पारण यह कि प्रति खभाव तिस के मभाव से राग हेप कहे मोति विरोध चादि गुणो मे सत्र तृतीय अध्यायः। ४५ संयम्ययासेमनसासारन् ।। इन्द्रियार्थान् विमहात्माभिध्याचारःसउच्यते ॥६॥ यस्विन्द्रियायिमनसानियस्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तःस विशिष्यते ॥७॥ नियतंजरुकत्वकर्मज्यायोह्यकर्मणः। शरीरयावापिचतेनप्रसिधेदक भणः ॥८॥ यन्नार्थात् कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयकर्मवन्धनः। तदर्थ कर्मकौनेयमुक्तसङ्गः समाचार ॥६॥ सहयजामजाःसवापुरोवाचप्रजापतिः। अनेनप्रसविष्यध्वमैप . भापा अनुवाद मनुष्य परतन्त, कहे परसग हो कर्म करते ही हैं॥५॥ इसी से अजान कर्म त्यागी की निन्दा करते हैं कि वो आत्मखरूप को स्थिर न करि के पाक पाणि पाद आदि कर्म इन्द्रियों को वशीभूत अर्थात् कावू करि भगवत के ध्यान के बहाने से मन की अशुद्धता के कारण से इन्द्रीयगण का अर्थरूप विपयों का स्मरण मनसे करता है सोई मूढ मिष्याचारी अर्थात् नास्तिक कहावता है॥ ६॥ अव इस के विपरीत कहे उल्टा कहते अर्थात् कर्मकारी पुरुष को येष्ठ कहते है कि जो फल की अभिलाप रहित मनुष्य चक्षु थोब घाण यादि भान इन्द्रियों को मन के द्वारा वशीभूत करि के अर्थात् ईश्वर मे तत्पर होय सकल कर्म मे अपने को अन्त योमी भगवानके आधीन मानिके कर्मरूप योग प्रारम्भ करते है वेई फलामिलाप रहित चित्तशहिके द्वारा ज्ञानवान होते है और की दोप रहित हो मुक्तिलाभ करते है ॥ ७॥ निस हेतु प्रेसी व्यवस्था है इस से तुम कर्म करौ सोई कहते हैं कि नियत काहे नित्य कर्म संध्या उपासन अादि कर्म अनुछान करो निलिये कर्म न करने में कर्म करना हो भला है नहीं तो सब कर्म शेडने से एकवारगी कर्ममन्य बचेननकी भांति रहनेसे तमारीशरीरयावामी कैसे करनिवहेगी अर्थात् नचलेगी॥८॥ सांग्स्य मतवाले कहते हैं कि वन्धनके कारणभूत कर्म है इससे सम्पूर्ण कर्म न करनाही भलाहै उसी को निर्णय करके भगवानकाते है कि यज्ञ शब्दका अर्थ विष्णु है यह युतियोंमे कहाहै सो यत्तरुप जो विष्णु भगवान तिनके धाराधनार्थ जो कर्म तिस को. छाडिकरिके और कर्म अलवता लोगों को संसार बन्धन करते है परन्तु ईश्वर अाराधन रूप कर्म तैसे नहीं है इससे विष्णु ।प्रीत्यर्थ निष्काममानस होय मद वार्म अच्छी तरहसे करो का डर है । ८॥ प्रक्षा ३ सव ४६ श्रीमद्भगवडीता। 4 वोऽस्विष्टकामधुक् ॥१०॥ देवान्भावयतानेनतेदेवाभावयन्तुवः। परस्परंभावर न्तःश्रेयःपरमवामाघ ॥११॥ इष्टान्भोगान्विोदेवादास्यन्तेयसभाषिताः । तैर्ट तानप्रदायेग्योयोभु नेतेनएक्सः ॥१२॥ यनशिष्टाशिनःसन्तोमुच्यन्तेसई किल्खियैः। भुञ्जतेतेत्वघंयामायेपचन्त्यात्मकारणात् ॥१३॥ अन्नासवन्तिभूतानिपर्यन्यादन्न भाषा अनुवाद की वाक्यसेभी कर्म की कर्तव्यता ही थेष्ठ ग्रावती है सोई चारि लोकसे कहते है कि यजके साथ सहयन अर्थात् यजो अधिकारी माहाण आदि सब प्रजा को सृष्टिको चादिमे उत्पन्न करने के वादि प्रमाने यही बात कही थी कि इसी यन के द्वारा तुमारी बुद्धि होय इहां प्रसव शब्द का अर्थ बुद्धि है अर्थात् उत्तर२ बुद्धि होती जाय कारण यह कि यन्न तुमारी इष्ट कामना की दाता है इस जगह यन शब्द नित्य कर्म का उपलक्षण है अर्थात् यज्ञ कहने से नित्य कर्म भी सव धावते हैं और इहां काम्य कर्म की प्रशंसा करना असहत भी है तौभी सामायिक कोई फर्म नकरनेसे काम्य कर्म करना ही उत्तम है इसी से कहा कि उसमे कोई दोप नही है ॥ १०॥ यज्ञ इष्टकामना की दाता कैसे होगी सो कहते हैं इसी यज्ञके द्वारा तुम सब देवतावो को घृत पाहुति देकर बढायो और वे देवता सव भी तुमारी वृद्धि कर अर्थात् जल वरसाय यन्न उपजाय तुमको सन्तुष्ट तरह तुमारा दोनो का परस्सर काहे एकासे एकका अभीष्ट अर्थ सिद्ध होय ॥११॥ इस को अच्छी तरह विचार करिके कहते हैं कि कर्म नकरनेमे दोष होता है देखो यज्ञ मे सन्तुष्ट देवता जल दृष्टि कारि के तुम सबके अर्थ अन्न आदि नाना प्रकार के भोग देयंगे तो जो पञ्च यज्ञ के द्वारा देवदत्त अन्नादि वस्तु उनको न देकर श्रापही भोग करि लेय सो चोर औं कृतघ्न है यह तुम ज्ञानो॥ १३ ॥ इस हेतु से यच करने वाले मनुष्य श्रेष्ठ हैं और जो देव अतिघि अग्नि गोग्रास पलि खदेय ये पञ्चयन नही करते केवल अपने वास्ते पावा करके खाते है वेई लोभी पायाचारीहै सोईभगवान कहते है कि जो.देवादिको को देकर श्राप भोजन करते है उनको पजसूनाका पाम नही लगताहै खूना वाहे इत्या स्वान गृहसों के घरमे रोज रोज हत्या होनेकी पाच नगइहै घर मारते चुल्हेमे धाग वारते कर दूमी 1 हतीय अध्यायः । सम्भवः । • यज्ञाद्भवतिपर्यन्योयन कर्मसमुद्भवः ॥१४॥ कर्मब्रह्माद्भवविदिब्रह्मा तरसमुह । तस्मात्सर्वगतंबनित्यंयन्नेप्रतिष्ठितं ॥ १५॥ एवंप्रवर्तितंचक्र नानुपर्तयतीहयः। घायुरिन्द्रियारामोमोघंमार्थसनीपति ॥ १६॥ यस्वात्मर भाषा अनुवाद अलके पावसे और उसलमे कूटते तथा चवी पीसते समय अनेकजीवहिंसा होती हैं सो पाप पञ्चयन न करनेवाले को लगते हैं और वे स्वर्गवास नहींमावते ॥१३॥ संसार, चक्रमे प्रयत्तहोनेका हेतु नो कर्म सो कर्तव्य है यह तीन लोकते कहते है कि अन्नहीं उदर मे जायकर रसरूप हो शुक्र काहे वीन औ शोणित कहे रूधिर होता है जिससे भूत कहे प्राणी उत्पन्न होते हैं और सो अन्न मेघ बरसने से होता है और मेघ यजधूम से होते और वह यन्न फोरि यन्न करने वालों के व्यापारसे पूरी होती है यही बात युति कहती हैं कि अग्निमे दी हुई याहुति सूर्य लोकमे रहती इसीडेव सूर्य से दृष्टि होती औ दृष्टि से अन्न होता फेरि उस अन्नसे सव प्रजा जन्मलेती हैं॥ १४ ॥ चैसे अपूर्व हेतुत्रों से कर्न को श्रेष्ठता औ याप्यता किसलिये कहा ो कर्म क्या वस्तु है सोई विवरन करते हैं कि यन्न कारो पुरुपों का व्यापाररूप जो कर्म सो अक्षा कहे वेदसे उत्पन्न भया है यौ जहा जो वेद सो अक्षर जो परब्रह्म शिससे प्रगटभ या यह तम नानो और श्रुतिनेभी कहा है कि परब्रह्म की निःश्वास से ऋक् बजुर और सामवेद प्रगटे हैं इससे सर्वव्यापो परमहा सर्वदा यजमे प्रतीत है अर्थात् यन्नरूप उपाय से ब्रमप्राप्ति होती है जैसे उद्योग करने से लक्ष्मीका लाभ होता है है इससे मन्त्र और अर्षके द्वारा सब मनुष्योंमे माप्त अनादि कालसे सितमो वेद वा सो तात्पर्य के द्वारा प्रतिष्ठित है इससे यज्ञादि कर्म अवश्य कर्तव्य है ॥ १५ ॥ निस हेतु ईथर की प्रेरणासे मनुष्य सकल पुरुषार्थ सिद्ध होनेके अर्थ इस संसार चकमे बाय उन कर्मरूप चक्रमे प्रत्त है इससे कर्म न करने से मनुष्य जन्म ही व्यर्थ है यह कहते हैं कि ईश्वर को पाना रूपवेदसे मुरुच रान कर्म मे महत्त होते तिससे मेघ और नेवसे अन्न अन्नसे मासी और प्राणियों से फेरि काम की प्रवृत्ति होती यही चक्र है अतएवजो ईश्वर साधन का नहीं करते कोयल इन्द्रियों अथवा जगतम मूल कर्म श्रीमद्भगवडीता। तिरेवस्थादात्मसप्तश्चमानवः। अात्मन्येवचसन्तुष्टस्तसकार्यन विद्यते ॥ १७ ॥ नैव तसक्वतेनार्थोनाक्षतेनेहकञ्चन । नचास्यसर्थभूतेषुकञ्चिदर्थव्यपाश्रयः ॥१८॥ तस्मा दसतःसततंकार्यकर्मसमाचर। असतोद्याचरन्कर्मपरमानोतिपूरुषः ॥ १८ ॥ भाषा अनुवाद से विषय भोग मात्र करते उनका वृथा नीवन है ॥ १६॥ कर्मणामनारमा दित्यादि लोकसे अजानो पुरुपके अन्तःकरण शुद्धिके हेतु कर्म योग कहि करअर जानी को कम न करना दो लेकसे कहते हैं कि जिसकी यात्मा मे रति कहे प्रीति भी आत्म आनन्दमे मगन तथा प्रात्मासे जोसन्तुष्ट है और भोगादिसे रहित है जैसे जो तत्त्वज्ञानी उनको कोई कर्म भी करना नहीं है ॥ १७ ॥ जो तत्य ज्ञानीकहे यात्मज्ञानी पुरुप हैं उसको कोईभी कर्मकरना जरूरनहीं सोई कहते है कि न ज्ञानी को कर्म करने से पुन्य है और कर्म न करने से प्रत्यवाय कहे पाप भी नहीं है व्योंकि ज्ञानी तो निरहङ्कार है इस से उस को किसी कर्म का विधि नौ निषेध नहीं है वह सब से अलग है जो कहो कि थुति कहती है कि देवतोंकी इच्छा नही है कि मनुष्य ब्रह्म को जानै यौ ग्रह्मज्ञानी हो मोक्षको पावै तो निञ्चय है कि मोज होने मे देवता विन करेंगे इसवास्ते विम वारण के अर्थ देवतोंकी सेवारूप कर्म जरूर ही करना पड़ेगा इसपर भगवानकहतेहै कि मला से लेकर और स्थावरपर्यन्त किसीकी सहायता ज्ञानीको टरकार नहीं है क्योंकि भानमार्ग मे विम का अभाव है यह श्रुति से कहि चुके हैं इस से आत्मदर्शी को गाणीमान की प्राश्रय फहे अवलम्ब लेने का कुछ काम नहीं है॥१८॥ दूम से हे घर्जुन ज्ञानी पुरुपही को कर्म कर्तव्य नही है और दूसरे मनुष्यको तो कर्मकरना ही उचित है सोनम कर्म करो यही कहते है कि तस्मात् कहे तिस मे असत हो कर्तव्यकर्म निरन्तर समाचर कहे करो अशक्त हो पुरुष कर्म करते हुयेपर को मुक्ति उस को प्राप्त होते है अर्थात् फल कामना रहित होकर अवश्य कर्म को नित्य नैमित्तिक है सो सब करो निसहेतु धागक्ति रहित कर्मकारी मनुष्य परम जो मुक्ति उस को चित्तशुद्धि के हारा मावता है। नित्यकर्म संध्यावन्दनादिक है और नैमित्तिक लो निमित्त पाय कर किये जाय जैसे पुव जन्म मे जातकर्मादिक ४८ द्वितीय अध्यायः। कर्मवाहसंसिहिमास्थिताजनकादयः । लोकसंग्रहमेवापिसंपश्यन् कर्तुमईसि ॥ २०॥ यद्यदाचरतिथेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः। सयत्प्रमाणेकुरुतेलोकस्तदनुवर्तते ममेपार्थास्तिकर्तव्यविपुलोकेपुकिञ्चन । नानवाप्तमवाप्तव्यंपतएवच कर्मणि ॥ २२ ॥ यदिध्यहंनवयं जातुकर्मण्यतन्द्रितः। ममवार्मानुवर्ततेमनुष्या. पार्थसर्वशः ॥२३॥ उत्मीदेयरिमेलोकानकयोकर्मचेदई। सङ्करस्यचक स्या भापा अनुवाद किये जाते है इससे यहाजनाया कि तुमको युद्धकी नैमित्तिक कर्मकरना आवश्यक ॥१६॥ अव इस विषय मे ज्ञानियों के आचरणको प्रमाण देते है कि देखो परम जानी जनक राना मर्म के आचरण करने मे शुद्धमाप हो कर अच्छी तरह ज्ञान को प्राप्त भये थे और जो तुम सम्पूर्ण ज्ञानी अपने को जानो तौभी कर्म करना ही थेय कहे कल्याण है यह कहते है कि सव मनुष्यों को धर्म में प्रकृति के अर्थ अर्थात् हमारे कर्म करने से सब लोग कर्म करेगे नही तो जानी का व्यवहार देसि अज्ञानी भी लोग व्यवहार छोडि वैठेगे इस हेतु लोक की रक्षा के अर्थ कर्म करना अवश्य प्रयोजन है यह विचारि बाम करना योग्य है सो तुम भूल के भी वार्म न त्याग करना ॥२०॥ और तुमारे कर्म करने से सब लोगों की कर्म मे रुचि होयगी यह भगवान कहते है कि श्रेष्ठ कहे वडे लोग निवृत्ति या प्रति कर्म जो प्रमाण मानते और करते है सोई साधारण मनुष्य भी आचरण करते है अर्थात् उन के अनुसार सय व्यवहार के अनुगामी होते है ॥ २१ ॥ भगवान अपने को दृष्टान्त दे कर कहते है कि हे प्रार्य अर्जुन देखो लोक्य मे भी हम को कर्तव्य कर्म कुछ नही है तो भी हम कर्म कतै ही रहते है और हम को त्रिभुवन मे भी अलभ्य तथा किसी वस्तु मे अभिलाप नहीं है ॥ २२॥ तौ फिरि जो हम कर्म न करे तो कर्म न करने से जो लोगो की हानि होयगी सोई देखावते कि जो सावधान हो कर्म मे हम कभी न वर्तमान, होय तो सव लोग इमारी की गह लेय अर्थात् हमारी नाई कर्मों को न करै॥ २३ ॥ करनेमे जो होगा सो कहते है कि जो हम कर्म न करें तो धर्म लोम हो जाय भी धर्म लोम से प्रजा नष्ट होयगी और वेम द हो राह छोड को जिस के मन इस विषय मे ५० श्रीमद्भगवडीता। मुमहन्यामिमा:मनाः ॥२४॥ सक्ताःकर्मण्यविहांसोयथाकुर्वन्तिमारत। कुर्था हिवांस्तथासक्तचिकीर्षुर्लोकसंग्रहं ॥ २५॥ नबुद्धिभेदंजनयेदज्ञानाकर्म सकिना । योजयेत्सर्वकर्माणिविहान्युक्ती समाचरन् ॥ २६॥ प्रकते क्रियमाणानिराणैःकर्मा णिसर्वशः। अकारविमूढात्माकर्ताहमितिमन्यते ॥ २७॥ तत्त्ववित्तुमहावाहो भापा अनुवाद मानै सोई कर तो संसार मे दुराचार से वर्णशङ्कर नन्गे फेरि इस अनुचित के कामी हमी उहरे अपनी प्रजा प्रापही नष्ट किया यही होगा ॥ २४॥ इस वास्ते आत्मज्ञानी को भी लोगों पर कमा करि शिक्षा देने के अर्थ कर्म करना चाहिये इसी को कहते है कि हे भारत अर्जुन कर्म मे यासत हो कर जैसे अज्ञानी लोग कर्म करते है तैसे लोगों के उपदेश की इच्छा करिके विद्वान कहे शानीभी कम करे तो धर्म की मार्ग बनी रहेगी ॥ २५ ॥ तो फेरि सब को तत्व भानहीका उपदेश करना चाहिये जो ऐसा कहो सो नहीं यह कहते है कि अन्न जो कर्म मे भासता है तिन को यात्म उपदेश दे कर बुद्धि का भेद उत्पन्न कभी न करै अर्थात् कर्म से उन को न छुडावै वक्त उन से और भी कर्म करावै तो फेर उन से किस तरह कर्म करावै सो कहते है कि श्राम सावधान हो कर्म का प्राचरण करता उन से करवा वै नही तो उनकी बुद्धि चल विचल करावने से फेरि कार्म में उन की श्रद्धा चली जायगी और जो ज्ञान की भी उमत्ति न भई तो उन की दोनो राइ नष्ट भई विचारे अन्नानी उधर के भी न भये और धरसेमी गये यही होगा ॥२६॥ गो को कि इस प्रकार जो ज्ञानी कर्म करै नो अज्ञानी श्री ज्ञानीके बीच क्या विशेष कहे अन्तर रहा इसो अभिमाय पर दो लोकसे देानो का अन्तर देखापते हैं कि देखो मूढलोग प्रकृति जो माया से इन्द्रियों के द्वारा को सब कर्म करती है उन कर्मों को हम करते है ऐसा मानि लेते है तो मानि लेने का कारण यह है कि अहङ्कार से इन्द्रियों में प्रात्मा का अभ्यास अर्थात् इन्द्रियों को आत्मा नानि कर इन की बुद्धि मूढ हो गई है ॥ २७॥ और ज्ञानी ऐसा नहीं मानते है सोई करते कि तत्वज्ञानी तो हम इन्द्रियरूम नहीं हैं ऐसे विचार करि इन्द्रियों से प्रात्मा को बुदा मानते है और हमारे कोई भी कर्म दृतीय अध्यायः। तेऽपिकर्मभिः॥ ३१॥ यत्वेतदम्यसूयन्तोनानुतिष्ठन्तिमेमत। सर्वज्ञानविमूढां ताविहिनष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ सदृशष्टतेयस्याःमानवानपि । प्रकृति यान्तिभूतानिनिग्रहःकिंकरिष्यति ॥ ३३ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्वार्थेरागडेपौव्यवस्थि भाषा अनुवाद सो कहते है कि जो लोग इस तरह कर्म न करै ते विचार रहित है और कर्म वथा बझज्ञानमे मष्टविवेक नानी मोह कहते है कि जो इस मेरे मत की निन्दा करते हुये इस मत में नहीं प्रवृत्त होते है उन को सकल ज्ञान के भूटात्मा कहे नष्टवुद्धि जानो॥ ३२॥ जो कहो कि तौ फेरि महा फल के अर्थ इन्द्रियों को निग्रह करऔर कामनाको त्यागि के सभी लोग क्यों नहीं इस तरह खधर्म का अनुष्ठान करते है तो इसपर कहते है कि पर्व कर्मके संस्कारके अधीन जो खभाव तिसके अनुसार गुण दोष के चानवान भी चेष्टा करते है तो फेर अध विचारे जो खभाव तिस के अनुरूप चेष्टा करते इस मे और क्या कहना है जब कि खभाव वलवान है तव कि और इन्द्रियनिग्रह कोई फेर कर सक है तो खभाव के अनुरूप चलनाहों पडता है॥ ३३॥ नो बलवान खमाही के अनुसार कर्म में सवकी प्रवृत्ति है तो यह कर्म करना भी यह न करना जो शाल विधि यौनिषेध करता सो व्यर्थ है इस शङ्का पर कहते है कि इन्द्रियस्य इन्द्रियख दुइबार कहने से हरएक इन्द्रियको अपनी अपनी विपयके अनुकूल वस्तुमे मीति यो प्रतिकूल विषयमे वैरति कहे पिरततारूप रागद्देपादि अवश्य होगा सो इसीसे रागद्दे पके अनुरूप कर्ममे प्रवृत्ति होना यह यद्यपि सव को खभाव सिद्ध है पर तौभी राग इपके वशीभत होना न चाहिये यही यात्रोंमे नियम कर राखा है क्योंकि मुमुक्षु पुरुष के वेई विघ्नकारी नौ विपक्ष है तात्पर्य यह कि विषयों के स्मरण के द्वारा रागद्देप प्रगट करवाय वह खभाव घसावधान पुरुषों को अपने वलसे अति जोर धारा प्रवाह की नाई अनर्थमे प्रवृत्त करायता है परन्तु शास्त्रती उस अनर्थ प्रवृत्ति के पहिले ही विषयों मे रागद्देष का प्रतिवन्धक रूम कहे रोकनेवाला जो भगवत आराधन तिसमे प्रवृत्ति करावते है इससे देखो कि मवाहमे परने के पी ही नौका प्राप्त पुरुप के समान उस अनर्थ से शास्त्र द्वारा मनुष्य वचिनाते है ५२. श्रीमद्भगवतगीता। गुणकर्मविभागयो। गुणागुणेषुवर्तन्ते इतिमत्वानसज्जते ॥ २८॥ प्रशतेर्गुणसं मढ़ासज्यन्तेगुणकर्मसु । तानसतनविदोमन्दानरूत्त विन्तरिचालयेत् ॥ २८ मधिसाणिकर्माणिसंन्यसाध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममोभूत्वायुध्यवरिगतज्वरः ॥३०॥ येमेमतमिदंनित्यम तिष्ठन्तिमानवाः । यद्धावन्तोऽनसूयन्तोमुच्यन्ते भाषा अनुवाद + . नहीं हैं ऐसे विचारसे कमीसे अपने को पृयक मानते हैं अर्यात् इस प्रकार इन्द्री. यौ कर्म से एधक बुद्धि हो कर जो तत्त्व वस्तु सो जानते हैं हे अर्जुन वे और फेरि वार्म मे शासक नहीं होते अर्थात् हम कर्म करते हैं यह विचार नहीं करते इस का हेतु यह कि माया के द्वारा सब इन्द्री विषयों में प्रति है हम सब से अलग है यह उन का जाना है॥ २८॥ सो कहते हैं कि प्रकृति जो माया तिस के गुण जो सन्त्व रज तम तिन से सम्यक मूढ़ कहे मोह को मात नो जन हैं तेई लोग गुणों के कर्म मे अर्थात् सात्त्विक राजस तामस त्रिगुण कर्म में आसक्त होय कर्म का सङ्ग करते हैं तिन असम्पूर्ण ज्ञानी मन्दमति मनुष्यों को उस कर्म के आनन्द से मगन मन कर्म करने से कृष्णवित कहे सम्पूर्ण नानी सेन चलावे अर्थात् उन को कर्म रहित न करै ॥ २८ ॥', सो देखो तत्त्वज्ञानी को भी कर्म करना उचित है फोरि भगवान कहते हैं कि तुम तो अभी ऐसे कुछ तत्व जानी भये भी नहीं हो इस से अछी तरह कर्म करो' कर्म करने में तो उमारा अधिकार ही है वह भगयान कहते हैं कि यात्मा मे चित्त देके सब बाम्मी हमारे में अर्पण करके अर्थात् हम अन्तर्यामी भगवान के प्राधीन होय कर्म करते हैं और यह हमारा काम है हम करते हैं इस विचार औ फल की आश को छोड़ कर तथा शोक दूर करि के तुम ये घट के युद्ध करो यह बीकाने कहा ॥ ३०॥ इस प्रकार कर्म करने मे उपकार करते हैं कि जो इस हमारे मतमे घडायुक्त होय और अमया रहित अर्थात् निन्दा न करि के कि दुखदाई. कर्ममे इमको महत करते अर्थात् लगावते है जैसो दोप दृष्टि न करके जो कोई यामेरामत अङ्गीकार करके करेगा सो कर्म के द्वारा क्रम क्रम जानी की तर कर्मसे मुक्त होय पर होयगा ॥ ३१॥ अव इसके विपरीत आचरण में जो दोष तृतीय अध्यायः । तौ। यो वशमागतोयसपरिप्रन्धिनौ॥३४॥ श्रेयान्वध विगुणःपर धर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनथे यःपरधर्मोभयावहः ॥ ३५ ॥ अर्जुन उवाच । अथकेनप्रयुक्तरेऽयंमामञ्चरतिपूरुषः । अनिच्छन्नपिवार्णेयकलादिवनियोजितः ॥३६॥ श्रीभगवानुवाच । काभएपक्रोधएपरजोगुणसमुद्भवः। महायनोमहामाभाविद्ये भाषा अनुवाद इससे साभाविक प्राप्त कर्म त्याग करके धर्म प्रवृत्त होना अवश्य कर्त्तव्य है तात्पर्य मे यह कि तुम समाव प्राप्त करुणा को छोड़ि अव युद्ध करो॥ ३४॥ स्वाभाविक प्रवृत्ति त्याग करि धर्ममे प्रवृत्त होना अवश्य कर्त्तव्य हैं किन्तु निज धर्म दु.सदा यक युद्ध रूपके करने के असमर्थ औ परधर्म शुभ करनेवाला अहिंसारूम ये दोनो भी धर्म पक्षमे समान हैं तो इन दोनोके मध्यम पर धर्म ही मे प्रवृत्त होने की इच्छा करते हुये अर्जुनके प्रति भगवान कहते है कि सागोमाग सम्पूर्ण किये हुये परधर्म की अपेक्षा अङ्ग हीन होने से भी खधर्म व कहे सुन्दर है अर्थात् खधर्म युद्ध अादि मे प्रवृत्त पुरुष का मरण भी थेय कहे येष्ठ लाभ है क्यों कि उस से खर्गादि प्राप्त होता है मयन्तु परधर्म मयदायक अर्थात् निषिद्ध है इस से नरक प्राप्ति का कारण होता है सोई कहा कि खधमे निधनं श्रेयः परधर्मो भया बहः ॥ ३५॥ तयोर्न वशमागच्छत् इस श्लोकसे कहा कि राग द्वेष के वश न होना मोरि विरोध हेतुक युद्ध को खधर्म कहि कर याज्ञा देते हैं इस पर अर्जुन कहते हैं कि वृष्णि वंश मे अवतीर्ण हे वार्ष्णेय हे कृष्ण अनर्थरूप पाप करने में इच्छा न रहतेभी किसीकी प्रेरणासे यह पुरुप पाम आचरण करता है काम, क्रोधको विचार वलसे रोंक के भी मनुष्यकी पापकर्म करने मे फेरि प्रवृत्ति देख पड़ती है इससे यह जानि पड़े है कि कोई उसका भ लभूत कारण होगा जो वलकरके करवायता है इस सम्भावना पर सन्देह करते हुये अर्जुन ने प्रश्न किया है॥३६॥ अर्जुन ने जो पूछा कि इच्छा विना भी किसी की प्रेरणा से पुरुष पापाचार में प्रवृत्त होता है इसोका उत्तर भगवान करते हैं कि सय को अपने वशं करनेवाला औ नाणियों का परम शत्रु सकल अनर्थ प्राप्तिकारी यह काम नो कामना सोई किसी कारण से प्रतिहत भया अर्थात कामना को सिद्ध न भई तो 18 ५४ श्रीमद्भगवद्गीता। नमिहवैरिणं ॥३७॥ धूसेनानियतेवह्निर्यधादर्शोमलेनछ । वयोवेनाहतोगर्भस्तथाते नेदमाटतं॥३८॥ यावृतंचानमेतेनज्ञानिनोनित्यवोरणा । कामरूपेणफौन्तेयटुम्यूरे थानलेनच ॥ ३६॥ इन्द्रियाणिमनोधुद्धिरस्वाधिष्ठानमुच्यते। एतैविमोहयत्वेष . भाषा अनुवाद वही काम बदल कर रजोगुण से है जन्म जिस का ऐसा क्रोध रूप होय पुरुप को अहंकार के वश कराय रजोगुण की सेवा मे डाल देता है वह क्रोध फेरि महागन है अर्थात् महत भोजन है जिस का सो ऐसा महामाम्मा कहे पाय रूप परम शत्रु है यह तुम नानो तात्पर्य यह है कि काम ही जीवों को प्रेरणा देता है परन्त सतोरण की दृधि होने से रजोगुण की क्षय होती है फेरि रजोगुण का कार्य काम कहे कामना का नम्म नहीं होता है सो इस मोचमार्ग के वैरी काम रूप शव को पूर्व कथित उपाय से नाश करना ही उचित है देखो कामना के अनुरूम भोग मिलने से भी उन का भोग चिरकाल करते भी सन्तोष नहीं होता है इसी से कहा कि भहदशन कहे वडा खानेवाला जो काम सो भोग करनेसे भी पुर्ण नहीं होता है ॥३७॥ अव विशेष रूपसे कामकी शत्रुता देसायते हुये कहते है कि जैसे धूम से आग ौ मल से दर्पण उखा जो झिल्ली चमडा तिस से गर्भ श्रान कहे लपेटे है तैसे ही काम जो कामना तिस से यह जान भी भारत कहे घेरा मया है ॥ ३८॥ फेरिभी कामका वैरित्व प्रकाश करते है कि विवेक ज्ञान सद काम से आहत होता है यद्यपि अज्ञानी मनुष्य को यह काम भोग समय में सुख का हेतु है पर तो भी शेप से वैरभाव प्रगट करता है इसी से ज्ञानी लोगों को भोगकान में भी अनर्थ हो नानि पडता है क्यो कि यह काम दुख का कारण है कौन्तेय अर्जुन देखो यह काम अनेक दिन विषयभोग करते भी सन्तोष नही पावता टिन दिन और और इच्छा पटती ही जाती है जैसे आग इन्धन पाय अधिक अधिक रहती है और सन्तुष्ट नही होती है और जो कदाचित विषयभोग न मिना अवा असायंसे भोग ही न कर सके तो शोक सन्ताम होता है इस से आपिरमे तो दुख छोड सुखका लेश भी नहीं है ॥ ३८ ॥ अब कामके रहनेकी भगा और इस के नय करने की उपाय दो झोक से करते हैं कि विषयों का
तृतीय अध्यायः ।
५५
भानमारत्यदेहिन॥४०॥ तस्मात्त्वमिन्द्रियान्यादौनियम्यभरतर्षभ। पाप्मानंप्रजाहि
ह्येनंज्ञानविघ्नाननाशनं ॥४१॥ इन्द्रियाणिपराण्याहुरिन्द्रियेभ्यःमरंमनः । मनसस्तु
परावुर्बुिद्धेर्गःपरतस्तुसः ॥४२॥ एवं वुद्धेःपरंवुड्डासंस्तथ्यात्मानमात्मना । जहिशयम
हावाहोकामरूपंदुरासदं ॥४३॥ इति कर्मयोगोनामटतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
भाषा अनुवाद
इन्द्रियों के द्वारा भोग होता है और मन से सङ्कल्प रूम विषयवासना मानसिक
कर्म तथा बुद्धि से निश्चय होना अर्थात् यह काम अवश्य करेंगे इन सब बातों से
जाना गया कि मन बुद्धि औ इन्द्री ये कामना के आधार स्थान है अर्थात् उत्पत्ति
औ रहनेकी जगह है सोई काम विवेक जानको आच्छादन कहे घेरि कर देही
नो आत्मा उस को मोह युक्त कर देता है। ४. ॥ तिस कारण से मोह होने
के प्रथम ही ये सब इन्द्री औ मन तथा बुद्धि को नियग्य कहे कावू करके या रोक
कर इस पापरूम काम को हे भरतर्षभ अर्जुन अच्छी तरह नाश करो अथवा
त्याग करो क्यों कि यह काम आत्मज्ञान और शास्त्रोक्त जो विज्ञान तिन दोनी
का नाशक है ॥४१॥ अव निस मे मनुष्य चित्त को सावधान करि आत्मा मे
लगाय इन्द्रियोंको वश करने सकै सोई आत्माका खरूप देहादिसे भिन्न देखावते हैं
कि देह ग्रादि वाह्य कहे वाहरके स्थूल पदाथों से इन्द्री सूक्ष्म और पर है अर्थात्
येष्ठ है और इन्द्रियों से भी सङ्कल्पात्मक मन इन्द्रियों को विषयों में प्रति करा
वनेवाला पर है अधीत् सूहा औ श्रेष्ठ है अथवा इन्द्रियों से भिन्न जानो और
मन की अपेक्षा नियय शक्तिरूप बुद्धि थेठ है या भिन्न है क्यों कि मन के सङ्कल्प
को यह बुद्धि रोंक सकती है और जो बुद्धि से भी परे अर्थात् वेध पिम्बा पृथक्
और सांक्षी रूप हो सव के अन्तर मे टिका है सो आत्मा है तिस को यह दुष्ट
काम मोहयुक्त करता है ॥ ४२ ॥ अव कहते हैं कि विषय ौ इन्द्रियों से काम
आदि विकारयुक्त बुद्धि ही होती है और आत्मा निर्विकार बुद्धि का साक्षीरूम
और उस से पृथक् है इस से बाला को ठ जानि और ऐसी निश्चयरूप बुद्धि से
मन को निश्छल कर के हे महावाहो दुख का दरवाजा निवारण करने के योग्य
सद कामरूपी दृष्ट दुर्जेय शव को जीतो॥१३॥ इति द्वतीयोऽध्यायः ॥ ३॥
श्रीमद्भगवद्रीता . में चतुर्थ अध्यायः । थीभगवानुवाच। इमविवखतेयोगंमोक्तवाहमव्ययं । विवखान्मनयेमा हमनु रिवाकवेऽब्रवीत् ॥१॥ एवंपरम्पराप्राप्तमिमंराजर्पयोविदुः। सकालेनेहमहता योगोनटःपरन्तप ॥२॥ सएवायंमयातेऽद्ययोगःमोक्तःपुरातनः। भक्तोऽसिसे nawwww W un v~~~~- भाषा अनुवाद थीकष्ण भगवान आप ही अपना धाविर्भाव कहे प्रगट होना और तिरोभाव कहे परमधाम का जाना तिस के प्रकाश करनेके निमित्त सामवेदके अन्तर्गत जो मा प्रतिपादक तत्त्वमसि महावाक्य है तिसके तत्पद औ त्वम्पदके विचार करने के अर्थ कर्मयोग की प्रशंसा करते गीताशास्त्र की अभिप्राय नो प्रवृत्ति निवृत्ति लक्षण ज्ञानयोग ौ कर्मयोग सो दो अथाय से कहि चुके यह मानते हुये अव वंशके कथन से उस कर्मयोग की स्तुति करते है कि यही कर्मयोग मैने पूर्वकाल मै सूर्य के प्रति से कहा था और सूर्यने अपने पुत्र थाइ देव मनु से कहा यौ मनुने फेरि अपने पुत्र इक्ष्वाकु राजा से कहा था ऐसेही परम्परा वह कर्मयोग चला आता था ॥ १॥ इसी प्रकार इस कर्मयोग को परम्परा प्राप्त कहे एक से दूसरा दूसरे से तीसरा ऐसे राजपि लोग नानते चले आतेथे पर अब हे परन्तप शनुतापन अर्जुन वह कर्मयोग बहुत काल पाय कर नष्ट हो गया है॥२॥ सोई कर्मयोग यो परम्परा सम्प्रदाय से संसार मे न रहा तिस को अव फोरि हमने तुम से कहा क्योकि तुम हमारे भक्त और मिव भी हो नहीं तो मैने फेर और किसी से इस को नहीं कहा और न कोई मेरा भक्त शेड इस के कहने के योग्य है॥३॥ जय चतुर्थ अध्यायः। सखाचेतिरहस्सं तदुत्तमं ॥३॥ अर्जुन उवाच । अपरंभवतोजन्मपरंजन्मविव खतः। कथमेतद्दिमानीयांत्वमादौमोक्तवानिति ॥४॥ थीभगवानुवाच । वहनि मेव्यतीतानिजमानिनवचार्जुन। तान्यहवेट्सर्वाणिनत्ववेत्वपरन्तम ॥ ५॥ अजोड मिसन्नव्ययात्माभूतानामीश्वरोऽपिसन् । महर्तिखामधिष्ठायसम्भवाभ्यात्ममायया ॥६॥ भाषा अनुवाद भगवानने ऐसे कहा कि प्रथम हमने सूर्य से यही कर्मयोग कहा था तव तो अर्जुन सन्देह युक्त होय पूछा कि हे महाराज अपर कहे इस समय मे तो आप का जम्म भया है और पर कहे पूर्व काल मे विवखान को सूर्य तिन का जन्म भया था इस से नवीन जो अाम सो प्राचीन सूर्यके प्रति कर्मयोग जो कहा यह हम किसतरहसे जाने कि तुम ने सूर्य से प्रथम काहा घा यह हमै असम्भवसा नानि पड़े है। दूसरा अर्थ या अपर कहे और भी पूर्वकालमे श्रापका जन्म भयाथा कि सूर्यही का पर कहे इस समयमे कोई जन्म और भयाहै नहीं तो यह आम का कहना असंभव' हैं तो हम कैसे जाने कि तुमने सूर्य से योग प्रथम कहा है ॥४॥ तब तो बीभगवान वोले कि हे अर्जुन हां मैने और जन्म मे उपदेश किया था सन्देह न करो हमारे और हमारे भी बहुत जन्म होय वीते हैं पर उन सव को हम जानते हैं और तुम नहीं जानते हो क्यों कि हमारी ज्ञान शक्ति बनी रहती है तुम अविद्या कहे अन्नान से प्राप्त कहे घेरे भये हौ॥ ५॥ जो कहो कि अनादि जो तुम तुमारा जन्म कैसे और अविनाशी हो तुम तुमारा पुनर्जन्म ही वा कैसे सम्भव होय जो कहते हो कि बहुत जन्म हमारे व्यतीत भये हैं और फिर भी तुम ईश्वर तुमारे पुन्य औ पाप दोनोभी नहीं तौ फेरि जीवकी नाई तुमारा जन्म कैसे सम्भव हो सकै तिस पर कहते हैं कि हां यह वात तो ठीक है पर हम जन्म रहित और अविनाशी खभाव होके भी तथा ईश्वर अर्थात् कर्म के वश नहीं भी है पर तो भी अपनी माया के द्वारा ख इच्छा से प्रगट होते हैं और जो कहो कि तो भी पन्न ज्ञानइन्द्री औ पञ्च कर्मइन्द्री पञ्च प्राण और एक अन्तःकरण ये सोरह कलारूप लिङ्ग शरीर के बिना किस तरह जन्म होना सम्भवै है इस पर भगवान कहते हैं कि हम अपनी शुद्धसत्त्वात्मक महातिको स्वीकारकरिके अतिजाज्वल्यमान १
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श्रीमद्भगवद्गीता।
यदायदाहिधर्मस्यग्लानिर्भवतिभारत। अभ्युत्थानमधर्मसतदात्मानंसजायई ।
७॥ परित्राणायसाधूनांविनाशायचटुष्कृतां । धर्मसंस्थापनार्थायसन्नवामियुगे
युगे॥८॥ जन्म कर्मचमेटिव्यमेवंयोवेत्तित्वतः। त्यहादेईपुनर्जन्मनैतिमाम
तिसोर्चन ॥६॥
वीतरागभयक्रोधामन्मयामामुपायिताः । वहवोजानतप
भाषा अनुवाद
सत्त्वमूर्तिसे खेच्छाधीन अवतार लेते है ॥ ६॥ तो अपनी इच्छासे कब थाप जम्म
ग्रहण करते हो इस अपेक्षा पर भगवान कहते है कि हे भारत भरतवंशो अर्जुन
जब लव धर्मकी ग्लानी अर्थात् हानि होती है और अधर्म का अभ्यु त्यान कहे
रद्धि होती तव तव हम शरीर धारण करते है ॥ ७॥ जो कहो कि धैसे समय
मे आप लो शरीर धारणकर अवतरते हो तो कहते है कि साधु कहे खधर्मके
करनेवाले लोग उनकी रक्षा और दु.कत कहे अधर्मो पामी जनों के नाशके हेतु
मैं जन्म लेता इंदूस से यह आया कि धर्म का स्थापन सौ साधु का रक्षण दुष्टोका
वध करिके धर्मकी द्धि करने को सोई सोई समय मे से शरीर ग्रहण करता है
वही कहा कि समावामि युगे युगे जो कोई शङ्का करे कि दुष्ट नाश करनेसे भग
वानको निर्दयता आवती है तो प्रैसा कभी कहना नहीं देसो माता पिता गुरु ये
जो पुत्त्र शिष्यको शिक्षा के लिये ताड़न करते है तो क्या निर्दई है वैसे ही ईश्वर
गुण दोप नियमके अर्थ दण्ड देते है किन्तु शत्रुता से नहीं ॥८॥ अव अपने जन्म
फर्म जाननेका फल कहते है कि हमारे खेच्छा से टिव्य कहे अलौकिक पाचर्यरूम
जो जो जन्म औ कर्म केवल लोकाके मनुग्रहार्थ है सिन के तय पूर्वक जाननेसे
लोग देह अभिमान छाडि फेरि संसारमे जन्म ग्रहण नहीं करते हैं वत्नु हमारे ही
को प्राप्त होते अर्थात् आवागमन से रहित होते है ॥ ६ ॥ जो कहो कि ईश्वरके
जन्म कर्म बानने ही से फैमे ईश्वर प्राप्त होय है इस पर कहते हैं कि शुद्ध
संतोगुण से अवतार ले हमारी जो परम दयालुता के कर्म तिन के मानने में मतो
गुएके द्वारा मत्त्व इंद्धि होती है फेरि वे लोग संसार से विगतन्नेह औ गत क्रोध
निर्भय होय मेरे आथित मद्रूप अर्थात् मत्वभाव बहुतेरे ज्ञान सम्पन्न परम
पविय हो मद्भाव को प्राप्त भये अर्थात् मेरे सरूम मे लीन हो गये है ॥१०॥
चतुर्थ अध्यायः। सापूतामद्भावमागताः ॥ १०॥ येयथामांप्रपद्यन्तेतोस्तथैवभजाम्यई। मभवान वर्तन्तेमनुष्याःपार्थसर्वशः॥११॥ कांक्षन्त कर्मणांसिदियजन्तद्देवताः । क्षिप्रं हिमानुपेलोकेसिद्धिर्मवतिकर्मजा ॥ १२॥ चातुर्वण्यमयासृष्टंगुणकर्मविभागणः । भापा अनुवाद तो तुमारे भी क्या विपरीत भाव कहे खपर बुद्धि है जिस हेतु शरणागत को कृयाकरि आत्मस्वभाव देते और दूसरे को नहीं देते हो इस का सिद्धान्त कहते है कि हेपार्थ अर्जुन जो मनुष्य जब जिस प्रकार अर्थात् सकाम या निःकाम रूप हमको भजते सेवते है उनको वैसे ही फलमदान करिके मैभी अनुग्रह करता ई. और कामना करके जो लोंग इन्द्र आदि देवतों का भजन पूजन करते है उनका अनादर या त्याग हम नहीं करते है कारण यह कि जिस किसी की पूजा करै वह मेरी ही पूजा होती है क्यों कि सर्व रूपमय मैहों ई सो हे पार्थ मेरी ही राह मे सव मनुष्य वर्तमान है पर नैसी जिसकी भावना तैसा तिस को फल मिलता है इस से सकाम लोगों को कर्मानुसार फल लाभ देखाया और निःकाम पुरुप तो मेरा रूप ही है ॥११॥ जो असा कहो कि तौ फेरि मोचही के वास्ते सब लोग भगवत का अाराधन क्यों नहीं करते है इसपर कहते है कि मनुष्य लोकके वजतेरे लोग कर्मफल वी अभिलापा करि इन्द्र यादि देवतों की सेवा करते और साक्षात् इमारी सेवा नहीं करते है क्यों कि कर्मसे फल शीध्र प्राप्त होता और मेरी साक्षात् सेवासे जान का मालरूप को मुक्ति सो दुःपाप है बड़े कठिनसे चिरकालमे मिलती है ॥ १२ ॥ और जो कहो कि चारो वर्ण के का भी तुमहीं हो और अनेक प्रकारके कर्म भी वेद के द्वारा तुहीने कहा है फेरि उही कर्मों के करनेवाले बाह्मण आदि वर्णो को उक्तम श्रौ अधम कर्ममी तुमने कहा है तो इस सब के करने औ कहने वाले एक तुम ठहरे फेरि किसी की प्रवृत्ति और किसी की निष्काम मे जो होती है तो कहो वैषम्य दोप कहे विपम खभाव तमारा क्यों नहीं है इन बातों से अलवते तुमको पचयात दोष हो सकता है इसके उपर भगवान कहते है कि चातुर्य माहे सतोगुण प्रधान जो ब्राह्मण उनके कर्मा शम दम उमरति तितिक्षा समाधान यहा हैं और सत्य रन सकाम कर्म श्रीमद्भगवद्गीता। तस्यका रमपिमांविद्यकर्तारमव्ययं ॥ १३॥ नमांकर्माणिलिम्पन्तिनमेकर्मफले स्पृहा । इतिमायोऽभिजानातिकर्मभिसयध्यते ॥ १४ ॥ एवंज्ञानातकर्मपूर्व रपिसुमुक्षुभिः। कुरुकम्मैवतस्मात्त्यपूर्वैःपूर्वतरकृतं ॥ १५॥ किंकर्मकिमकर्मेति कवयोऽप्यवमोहिता। तत्तेकर्म प्रवच्यामियजज्ञात्वामोदय सेऽशुमात् ॥ १६॥ भाषा अनुवाद प्रधान जी नवी उनको कर्म भूमि रना प्रजामालन युद्ध आदिक हैं' और रजोराण सतोगुण प्रधान जो वैश्य तिन के कर्म व्यापार खेती आदिक है और तमोगुण प्रधान सूटू का कम इन तीनो वर्ण की सेवा रूप है सो यह वात ठीक है पर जौ भी हम इनके की है तौभी अकाही जानो क्योकि हम अव्यय हमारी आसक्ति इन कर्मोमे नही है ॥१३॥ वही कर्म की आसक्ति देखलाते हुये भगवान कहते है कि देखो विश्वसर्जन आदि कर्म हमको नहीं लगते और न कर्मफल की इच्छा हमे रहती है क्योकि इम निरहङ्कार कर्म करते है और पूर्ण काम है इससे कोई विषयके थयण दर्शनादि से हमारी भोगमे इच्छा नही होती तो ये कर्म हमै कैसे घासता कर सकें और तुम को क्या कहें देखो जो मनुष्य हम को कर्म मे निर्लिप्त जानते है वे भी कर्मवन्धमे नही पडते कारण यह है कि जो हमारे निर्लेपताके हेतु अग अहंकार औ निस्पृहत्व है सो उन जान कार पुरुप के भी शिथिल होते कहे नाम मात्र को रहनाते है और कुछ काम देखने योग्य नही रहते है ॥१४॥ अय पैसे चारि श्लोषासे प्रसङ्ग प्राप्त ईश्वर के वैषम्य दोष को दूर करते हुये पूर्व कथित कर्मयोग को विस्तार करि कहते है कि अहङ्कार रहित किया हुआ कर्म ज्ञानशा वाधक नहीं होता है यह जानि करि के पूर्व कालके मुमुच जन जनक श्रादिकों ने किया या इससे तुमभी अभी इस प्रथम अवस्थामे कर्म करो अब जानयवखा प्राप्त होगी श्रामही सब कर्म छूट नायगे अभी छोडनेसे सतोगुण की शद्धि होना अति दुर्घट हैं देखो और और युगमे भी लोगोने प्रथम कर्मको किया है यह कर्म युग युगान्तरसे किया चला पाता है ॥ १५ ॥ और देसो तस्यज्ञानी में साथ विचार करके कर्म करना चाहिये केवल भेडियावसंतकी नाई लोकपरम्परा प्राप्त देखकर करना अनुचितही जानो यह कहते है कि देखो कोन कर्म कर्तव्य चतुर्थ अध्यायः । कर्मणोद्यपिवोहव्यंवोद्धव्यविकर्मणः । अकर्मणश्वोद्धव्यंगहनाकर्मयोगनिः॥ १७॥ कर्मण्वकर्मय पश्येदकर्मणिचकर्मयः । सवुद्धिमान्मनुष्यपुसयुक्त छत्न भाषा अनुवाद और कौन अकर्तव्य है इस कर्म अकर्म के विचार में कवि कहे वडे बडे पण्डित भी मोहित होजाते पता नहीं लगता है इससे जिस कर्मके करने से इस अराभ संसार से मुक्त होउगे सो और अकर्म जो अकरणीय कर्म ये दोनो हम तुमसे कहते है सो सावधान हो सुनो निसको नानि करिके अशुभ संसार से छूट मुक्त हो नावगे ॥ १६ ॥ जो कहो कि मन वचन देह के व्यापार ही तो कर्म है और देहादि व्यापार का अभाव ही अकर्म है यही तो लोकमे प्रसिद्ध है फेरि जो आप ने कहा कि पण्डित लोग भी कर्म अकर्म के विपय मे मोह को प्राप्त होते है सो कैसे इस बात पर कहते है कि कर्म तो शास्त्रविहित व्यापार का तत्व जानि करके कर्तव्य है कोवल लोक व्यवहार देखि अवश्य कर्तव्यकर्म नहीं और अकर्म तो संन्यास आश्चम अङ्गीकार करि शास्त्र की रीतसे कर्म का त्याग करना पर तत्व ज्ञानवान हो कर उचित है और विकर्म जो निषिद्ध कर्म उसका भी तत्त्य नानना भावश्यक है क्योकि सव कर्मोकी गतिका ज्ञान होना कठिन है सोई कहाकि कर्म की गति गहन कहे वडी कठिन सहज से जानने नोग नही है ॥१७॥ जो कहा कि कर्मकी गति गहन काहे जानवे जोग नही है और कहा कि कर्म अकर्म निपिद्ध कर्म का तत्व जानिकर कर्म को करै सोई कर्मगति की कठिनाई देखावते हुये भगवान वह तत्व कहते है कि जिस के यथार्थ ज्ञानमें पण्डितभी मोहित होते औ जिस के ज्ञानसे इस संसार से छूट जाते है उस को मै कहताज तुम सुनो यह प्रतिज्ञा जो करी थी सो अब कहते है कि भगवत अाराधन रूम कर्म जब कि किसी तरह जान होने मे वाधा नहीं करता तो वह क्या कर्म है उस को थकर्म ही अर्थात् कर्म संन्यास ही जो देखते है सोई कहा कि कर्मण्य कर्म य पश्येत् और शास्त्र विहित कर्म न करने से दोप होता है फेरि वही न करना ज्ञान का प्रतिबन्धक कहे वाधा का हेतु होता है इस से शास्त्रोक्ता कर्म को न करना हो जो अकर्म उसी को कर्तव्य को देखते है वेई लोग कर्मकारी पुरुषों के थीमद्भगवद्गीता। कर्मवत ॥१८॥ यस्यससमारम्मा.कामसङ्कल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्मा पंतमाज पण्डितंयुधाः ॥ १६ ॥ त्यवाकर्मफलासइंनित्यानिरत्ययः । कर्म M भापा अनुवाद मध्यमे बुद्धिमान है उह्री की प्रसंगा करते है कि जैसे ही कर्म अनुष्ठान करते जो ज्ञानयोग को प्राप्त होते सोई योगी पुरुप है और उनको भगवत अाराधन रूम कर्म के अन्तर्भूत कहे अगभूत समस्त कर्म करना श्राय गया है वही कहा कि स युक्ता यत्न कर्म यात् । इससे यह आया कि ज्ञानमार्ग मे जाने की इच्छा जिस को है उस को कर्मयोगअवस्था मे कम करना उचित है सोई ३ अध्यायके ४ लीक मे कहा कि न कर्मणामनारमान्नैष्काचे पुरयो अते और सम्पूर्ण ज्ञान होने से फेरि कर्म का कुछ आवश्यक नहीं है सोई ३ अध्याय के १७ लोकमे कहा कि यत्त्वात्मरतिरेवखादामटतय मानव इति ये दोनो वाते इस लोक से अच्छी तरह कही गई और जो कर्मेन्द्रियारि संयग्य यह '३ अध्याय के ८ लोक से कहा इन्द्रियो से यात्मा भिन्न है तथा कोई काम नहीं की है ऐसे जानि दृढ समाधि में जो रहते हैं और अनायास कहे वे मांगे प्राप्त भये अन्न को भोजन कर लेते वे सकल कर्म करते भी योगी है और उन को विकर्म ौ निषिद्ध कर्म गमांस भोजनादि दोष भी नहीं है' खो कि उस उस वस्तु का आग्रह नही है परन्तु अज्ञानी को आग्रह ौ उस मे रुचि है तो वेशक गमास खाने से दोप है इस से निपि कर्म पर तत्व कहा यही तत्व जानि लय कर्मों में प्रवृत्त होना मैं ने कहा है सो जानो ॥ १८ ॥ गव काय. पश्येत् इस सोकसे श्रुति का तात्पर्य जो कहा सोई पांच स्रोक से स्पष्ट करके करते हैं कि जिस के सव समारम्भ कहे कर्म कामसंकल्प वर्जित अर्थात् कामना रहित उसी की बुध कहे बुद्धिमान लोग पण्डिय कहते हैं जिससे कर्म अनुहान के द्वारा शुद्धचित होने से प्रगट जये ज्ञान अग्निसे सकल कर्म दग्ध हो जाते है मोरि वामवन उसको नही होता है और मानारूढ अवस्था मे कामका अर्थ कर्म फल और उसके अर्थ यह कर्म हम को करना उचित है परन्तु ज्ञान प्रारूंक। पुरुप इन दोनो से भी रहित है सोई कहा कि जिस के सव समारम्भ कामना N चतुर्थ अध्यायः । ण्यभिप्रत्तोऽपिनैवकिञ्चित्करोतिसः ॥ २० ॥ निराधीयतचित्तात्मात्यासर्व परिग्रहः । शारीर केवलंकर्मकुर्वन्नामोतिकिल्विपं ॥२१॥ यहच्छालामसन्तु घोहन्द्रातीतोविमत्तरः। समःसिद्धावसिौचचत्वापिननिवध्यते ॥ २२॥ गत भाषा अनुवाद रहित हो सो पण्डित है ॥ १६ । और सर्व कर्म तथा कर्म के फल मे अाशक्ति छोड कर नित्य अानन्दरूम आत्मा के सन्तुष्ट मनुष्य अप्राप्त वस्तु की चेष्टा श्री प्राप्त का पालन इन दोनो से दूर है इसी से वे कोई कर्ममे प्रवृत्त होयं पर उनका वह कर्म कर्म नही है अर्थात् उसके सब कर्म अकर्मता को प्राप्त है सोइ कहते है कि कर्मके पाल औ संग जो धासहितिसे छोडि नित्य यात्मसुख से हल वेपरवाह नो कर्ममे प्रष्टत्तभी है पर वह कुछ भी नहीं करता है यह जानो ॥२०॥ विक्षम कारी कर्मही को तो शास्त्र वन्धनका हेतु कहते है और आपने तो कर्मको प्रसंशा करि जनकादिक को दृष्टान्त देखाय प्रथम अवस्थामे अधिकार श्री ज्ञानप्राप्त भये भी निरहदार कर्म करने से अदोप कहा इसमे सर्वथा कर्म करना प्राप्त होता है इस सन्देह पर भगवान कहते है कि जो सर्व कामना परित्याग करि निष्कामहो तथा मन इन्द्री शरीर अपने वशीभूत रासि सकल विषयसे निटत्त है और शरीर निर्वाह मात्र के अर्थ कर्तृत्व अभिमान रहित होय कर्मों को करते हुये भी वे मनुष्य कर्मचन्धको नही प्राप्त होते है अर्थात् कर्मनित फिलिप जो पाप सो नहीं लगता है सोई कहा कि निराशीर्यत चितात्मा त्यक्त सर्व परिग्रहः ॥२१॥ और यदृच्चा लाभ सन्तुष्ट काहे मागे विना श्रापसेआप प्राप्त जो यथालाभ तिसमें जो सन्तुष्ट है अर्थात् उत्तम अधम अधिक अल्प लाभमे हर्प विपाद रहित हैं और शीत उष्ण हानि लाभ सुख दुःख वैर प्रीति आदि द्वन्दुभाव रहित है तथा सिद्धि असिद्धि मे समभाय है वे पुरुप कर्म करते भी संसार गति को नहीं प्राप्त होते अर्थात् कर्म बन्धनमे नही पडते हैं सोई कहा कि यदृच्छा लाभ सन्तुष्टो इन्ट्रातीतो विमत्सर इति ॥२२॥ चौर भी कहते हैं कि गतसंगस कहे जिसका देव गेह यौ विषय से संग कहे यासक्ति चली गई है औ काम क्रोध से मुक्त कहे छुट गया है और चित्त जागरूप परमझ मे स्थित है ऐसे गुणो से चुत मनुष्य के वन रक्षार्थ ६४ श्रीमद्भगवद्गीता। सङ्गखमुक्तास्वज्ञानावस्थितचेतसः । वज्ञायाचरतःकर्मसमग्नप्रक्लिीयते ॥२३॥ महामणबह्महविर्षमाग्नौवह्मणाहुतम्। बझैवतेनगन्तव्यंब्रह्मकर्मसमाधिना । दैवमेवापरेयचंयोगिनःपर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरेयान यजेनैदोग भाषा अनुवाद किम्बा लोकशिक्षार्थ या शरीर यावार्थ अथवा भगवदाराधनार्थ किये हुये सम्पूर्ण कर्म वासना समेत विलीन हो जाते हैं ॥२३॥ जो यह शङ्का करो कि धर्मशास्त्र तो वेदका अर्थही है और तिसमे लिखते हैं कि नामुक्त क्षीयते कर्म अर्थात् विना भोग किये कर्म क्षीण नही होता कर्म का फल भोगना ही पड़ता है तो इस पर पाहते है कि सम्पूर्ण किया औ कारक तथा फल रूप को कुछ द्वैत है सो सब मला मात्र कहे ब्रह्म छोड और कुछ नहीं है ऐसे ज्ञानवान ब्रह्मज्ञानी अमरूम पुरुष के यावत कर्म विलीन हो जाते है इस मे कुछ सन्देह नहीं सोई उप निपद में कहा है कि ब्रह्मविदो ब्रह्मैव सर्व क्रिया कारक फलजातं भवति । सोई कहते है कि ब्रह्म के अर्थ और ब्रह्म ही हवि तथा ब्रह्म रूम अग्नि से मझ ही ने दिया है इस प्रकार जो जानता है अर्थात् होम अनि थुवा हवि की क्रिया पूरा अादि सय सामग्री और जिस को दिया जाय यह सब जो है भो यह व्यतिरेक धौर नहीं है ब्रह्मकर्स से है समाधि कहे चिन्तति जिस की सो अवश्य ब्रह्म को प्राप्त होता है जैसे इन कर्मों की कर्म में गिनती नहीं तैसे ही भगवत आराधन कर्म की भी कर्म मे गणना नहीं है ऐसे कर्म भो हैं सो अकर्म ही है फेरि इन का फल भोगना कहां है और नो फल है तो ब्रह्मा या भगवत प्राप्ति रूप ही है और दूसरा नहीं ॥ २४ ॥ पूर्वोक्त प्रकार यजरूप से सर्वत्र सम्पादित कहे प्रसिद्ध कर के कहा जो अझदर्शन रूप ज्ञान सो सकल यजों का हेव कहे उसी के बारते सव यत्नों की जाती है अतएव शेड है इसी से अव इस ज्ञान की प्रशंसा कर के अधिकारी के भेद से ज्ञान के उत्पत्ति की उयाय रूप सब यनों को ८ लोक से कहते है कि बजतेरे कर्मयोगी लोग, ममबुद्धि रहिस हो इन्द्र वरुण प्राटि देवतों को यज्ञ करि के वडी यवा से पूजते हैं और कितने ज्ञान योगी नारूप अग्नि मे ब्रह्मयज रूप उपाय से यज पाटि - चतुर्थ अध्यायः। नुवति ॥ २५॥ श्रोबादीनीन्द्रियाण्यन्येसंयमाग्निषुनुवति। शब्दादीविषया नन्यन्द्रियाग्निपुनसति ॥ २६॥ सर्वाणीन्द्रियकर्माणिप्राणकर्माणिचापरे। या त्मसंयमयोगाम्नानुद्धतिज्ञानदीपिते ॥ २७॥ द्रव्ययनास्तपोयनायोगयजास्तथा परे। खाध्यायनानयन्त्राययतयःसंशितव्रताः ॥ २८॥ अपानेनुहतिप्राणप्राणेऽ । भाषा अनुवाद सकल कर्म रूम ब्रह्म मे ब्रह्मार्पण विधि से अर्पण कहे सब कर्म लीन करते है सोई ब्रह्मयज है ॥२५॥ ऐसे ही कितने ब्रह्मचारी लोग इन्द्रियों का संयम जो विपयों से रोकना सोई अग्निरूप है जिस मे श्रोव घाण जिह्वा त्वक चक्षु इन जान इन्द्रियों को होम करते अर्थात् इन्द्रियों को अन्तर्मुख कर के संयम से रहते है और कितने गृहस्य नव इन्द्रिय रूम अग्नि मे हवि रूम नो विषय कहे रूप रस गन्ध सर्श शब्द सो होम करते है विषय भोग समय मे भी अनायत हो के अग्निरूप इन्द्रियोंमे रूप रस अादि विषयरूप रत होम करते है कहे दग्ध करते. निरहङ्कार हो कर फल रहित होते है ॥ २६॥ और वहुतेक ध्यानी पुरुप योवादि ज्ञान इन्द्रियों के श्रवण धादि कर्म तथा वाक् धादि कर्म इन्द्रियों के कार्य वचन आदि और माण अपान उदान व्यान समान नाग कर्म ककल देवदत्त धनञ्चय ये शरीर की दश वायुओं के कर्म नो वहिर्गमनादि है सो सय आत्म संयम योग अग्नि मे होम करते है अर्थात ध्यान के द्वारा चित्त की एकाग्रता रूम ज्ञान से दीपित योग अग्नि मे होमते कहे लीन करते हैं अर्थात् धेय फहे ध्यान के विषय को ध्यान के द्वारा प्रज्वलित ज्ञानदीप को प्रकाश मे वही धेय कहे ध्यानयोग्य ब्रह्म को अच्छी तरह जान कर और उसी मे मन को संयम कहे युक्त करि के सकल कर्म को दूर कर देते है ॥२७॥ और लोक मे कितने पुरुप द्रव्य दान हीं को परम यज्ञ जानि द्रव्य दानरूप यन्न करते और बहुतेक मनुष्य कृच्छ्र चान्द्रायण तथा बादश वार्पिक व्रत आदिक मे चिन लगाय तमरुप यन्त्र करते है फेरि कितने जन योगशालोतामेतीधौतीभस्त्रा श्री प्राणायाम आदि योग करके चित्तरत्ति के वोधरूप योग यज्ञ मे तत्पर है और वह तैरे वेद शारख के अध्ययन मनन को खकर्म जानि तदर्थ जान ही को सर्वस्व मानि स्वाध्याय श्रीमद्भगवद्गीता। पानंतथापरे। प्राणापानगतीगताप्राणायामपरायणाः ॥२८॥ अपरेनियता हारा:माणान्माणेपुजुह्वति । सवैयेतेयजविदोयनपवितकल्माः ॥३०॥ वायु को पूरक माणायाम के बैंचि को भाषा अनुवाद ज्ञानरूप यन्न करते है.परन्तु नो इन्द्रीजित औ बत मे तत्पर है तेई ये सव यन्नी कर सकते हैं ॥२८॥ और कितने हठ योगाभ्यासी मनुष्य अपान वायु मे माग कर होम करते हैं अर्थात् परक समै मे प्राण अपान एक कर देते है और कोई कुम्भक प्राणायामसे प्राण अपान वायु आई अधोगमन रोंक कर रेचक काल मे अपान वायु को मापवायु में बैंचि ले कर होम कहे लोन कर देते है ऐसे ही पूरक कुम्भक रेचक के द्वारा प्राथायाम मे तत्पर रहते है और कोई कोई लोग आहार घटाय इन्द्री मिथिल कर के सोई सोई इन्द्रियत्तिका लय रूप होम करते हैं अथवा पूरक रेचक दोनो श्वासा बन्द भार हंस औ सोहं इस को अनुलोम विलोम कहे उलट पुलट रूम अजपा मन्त्र के द्वारा तत्वमसि महावाक्य से कथित जो तत्मद औ त्वं पद तिन के अर्थ के चनुसार मम जोर की एकता अर्थात् सो मा इम हैं और हम सो मचा है ऐसी भावना करते है और कोई प्राणायामही को यन्न कहते अर्थात् उदर के दो भाग अन्नसे पूर्ण करि यौ एफा भाग पानीसे पूर्ण करि और वायुके संचारार्थ चतुर्थ भाग खाली राति शास्त्र विधि के अनुसार परिमित अहारी जन कुमाक के द्वारा प्राण अपान की गतिरोध करि माण दमनशील हो सव इन्द्रियों को माण वायु मे होमकरते है अर्थात् कुम्भक से सव माण एक हो जाते और इन्द्रीयगण लय को प्राप्त होता है ॥ २८ ॥ एही पूर्वोक्त वारा प्रकार के यज्ञकारीयों को प्राप्य फाल भगवान कहते है कि ऐसी यनुरूप क्रिया जिन की जानी है और इन यत्नों से जिन के पाप चय हो गये है और यन्त्र समाप्त करके पीछे शास्त्रविहित अमृतरूप अन्न भोजन करते है फेर तत्त्वज्ञान के द्वारा नित्य सत्य ब्रह्म को प्राप्त होते हैं सो कहा कि ये सब यजवित् यज्ञ से नष्ट कामय कहे निःयाय होय यजशिष्ट असतभोगी सना तन मन को जाते कहे प्राप्त होते है ॥ ३ ॥ अव यज्ञ न करने मे टोप करते है कि देखो या न करनेवालों को यह अल्प सुरा जो मनुष्य लोक सोई नहीं चतुर्थ अध्यायः। यज्ञशिष्टारतभुजोयान्तिब्रह्मसनातनं । नायलोकोऽस्त्वयजयकुतोऽन्यः कुरुसत्तमः ॥ ॥ ३१॥ एवंबविधायन्नावितताब्रह्मणोमुखे। कर्मनान्विद्धितान्सर्वानवंन्ना त्वाविमोग्यसे ॥ ३२ ॥ येयान्द्रव्यमयाद्यन्नाज्ञानयन्तःपरन्तप । सर्वकर्माखि लेपार्थतानेपरिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ तद्विद्धिप्रणिपातेनपरिप्रश्नसेवया। उपदे भाषा अनुवाद मिलता है तो परलोक सुख फेरि कहा प्राप्त होना है इस से यन्त्र को नियम करना चाहिये हे कुरुसत्तम ॥ यह कैमुतिक न्यायसे देखाया है ॥ ३१॥ ज्ञान यन की प्रशंसा करने के अर्थ अव सव यजों की चर्चा करि न्यून अधिक तारतम्य देखावते हुये कहते है कि नाना प्रकार की यनी वेदरूप मुख से प्रत्यक्ष विहित है पर तैी भी मन वचन शरीर के कर्म से उत्पन्न जो यज है सकल यात्मखरूम सर्श से रहित जानो अर्थात् उन से आत्मज्ञान नहीं होता क्यों कि आत्मा कर्मों का अगोचर कहे कर्मसे प्राप्य नहीं है इस से तुम ज्ञाननिष्ठ होय संसार से सत्ता होउगे यह जानो ॥ ३२॥ अव ज्ञान यज्ञ की येष्ठता कहते है कि जिस लिये प्रारम व्यापार रहित जो द्रव्यमय देवता के अर्थ यन्न है तिस से ज्ञान यज्ञ ही श्रेष्ठ जानो और यद्यपि ज्ञान यज्ञ मानसिक व्यापार के आधीन है तथापि यात्मा का स्वरूप जो ज्ञान सो केवल मन का परिणाम अर्थात् ब्रह्मरूप होना भाव है और जान कुछ मानस व्यापार से प्रगट नहीं है और ज्ञान की श्रेष्ठता मे हेतु यह है कि फलके सहित सई कर्म तत्वज्ञान के अन्तर्भूत है क्योंकि लोगों के किये हुये सत्कर्म ज्ञान के अनुगामी कहे साथ होते है यह वेद मे कहा है सोई इस लोक से कहा कि श्रेष्ठ है व्ययन से ज्ञानयज हे परन्तम और सब कर्म हे पार्य अर्जुन ज्ञान मे परिसमाप्त कहे लीन होते है इसी से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है॥३३॥ जो कहो कि भला जिस जान की ऐसी प्रशंसा करते हो सो किस प्रकार से प्राप्त होय तो ज्ञान के साधन.कहे उपाय कहते हैं कि ज्ञानी पुरंपों के निकट नाय नमता से प्रणाम कर मन करे कि किस कारण से इमको यह संसार भया और कैसे निटत शेगा और गुरु की सेवा शुयुपा करने से तुम को सो तत्त्वज्ञान मिलेगा और जानी जो पावन तथा तत्त्वदर्थी जो हैं वे तुम को उपदेश दे पार 'थीमद्भगवद्गीता। AII पानतथापरे। प्राणपानगतीरुवाप्राणायामपरायणाः ॥२६॥ अपरेनियता हारा प्राणान्प्राणेघुजुद्धति। सर्वेऽप्येतेयनविदोयनक्षयितफल्ममाः ॥ ३० ॥ भाषा अनुवाद ज्ञानरूप बन करते है.परन्तु जो इन्द्रीजित औ बत से तत्पर है तेई ये सव यनी कर सकते हैं ॥ २८॥ और कितने हठ योगाभ्यासी मनुष्य अपान वायु मे माण वायु को पूरक प्राणायाम के द्वारा बैंचि कर होम करते हैं अर्थात् पुरक समै मे प्राण अपान एक कर देते है और कोई कुम्भक प्राणायामसे प्राण अपान वायु को ऊर्द्ध अधोगमन रोंक कर रेचक काल मे अपान वायु को प्राणवायु मे अँचि ले कर होम कहे लोन कर देते है ऐसे ही पूरक कुम्भक रेचक के द्वारा प्राणायाम मे. तत्पर रहते है और कोई कोई लोग आहार घटाय इन्द्री शिथिल कर के सोई सोई इन्द्रियत्तिका लय रूप होम करते है अथवा मूरक रेचक देानो श्वासा बन्द कर हंस यो सोहं इस को अनुलोम विलोम कहे उलट पुलट रूम अजपा मन्त्र के द्वारा तत्त्वमसि महावाक्य से कपित जो तत्पद छौ त्वं पद तिन के धर्थ के अनुसार मम जीव की एकता अर्थात् सो ब्रह्म इम हैं और हम सो बम है ऐसी भावना करते है और कोई प्राणायामहीं को यज्ञ कहते अर्थात् उदरके दो भाग अन्नसे पूर्ण करि यो एक भाग पानीसे पूर्ण करि और वायुके संचारार्थ चतुर्ष भाग खाली राखि शास्तविधि के अनुसार परिमित अहारो नन कुम्भक के द्वारा माण अमान की गतिरोध करि माण दमनशील हो सव इन्द्रियों को प्राण वायु में होमकरते है अर्थात् कुम्भक से सव प्राण एक हो जाते और इन्द्रीयगण लय को प्राप्त होता है ॥ २८ ॥ एही पूर्वोक्त वारा प्रकार के यज्ञकारीयों को प्राप्य फाल भगवान कहते है कि ऐसी यजरूप क्रिया जिन की जानी है और इन यत्नों से जिन के पात्र, चय हो गये है और यज्ञ समाप्त करके पीछे शास्त्रविहित अन्तरूप अन्न भोजन करते है और तत्त्वज्ञान के द्वारा नित्य सत्य ब्रह्म को माप्त होते है सो कहा कि ये सब यज्ञवित् यज से नष्ट पाल्मप कहे निःपाप होय यजशिष्ट अन्तभोगी समा तन बम को नाते कहे प्राप्त होते है॥३०॥ अव यज न करने मे दोष करते हैं कि देखो यन्न न करनेवालों को यह अल्प सुख वो महष्य लोक सोई नहीं - चतुर्थ अध्यायः । यजमिष्टारतभुजोयान्तिब्रह्मासनातनं । नायंलोकोऽस्य यजयकुतोऽन्यः कुरुसत्तमः । ॥ ३१ ॥ एवंवविघायजावितताब्रह्मणोमुसे। कर्मजाविद्धितान्सर्वानेवंद्धा त्वाविमोच्यमे ॥३३॥ येयान्द्रव्यमवाद्यन्नाज्ञानयनःपरन्तप । सर्वकर्माखि लंमार्थनानेपरिसमाप्यते ॥ ३३ ॥ तविधिप्रणिपातेनपरिप्रश्नेनसेवया। उपदे भाषा अनुवाद मिलता है तो परलोक सुख फोरि कहां प्राप्त होना है इस से यन्त्र को निभयसे करना चाहिये हे कुरुसत्तम ॥ यह कैमुतिक न्यायसे देखाया है ॥ ३१॥ ज्ञान यज की प्रशंसा करने को अर्थ अब सव यज्ञों की चर्चा करि न्यून अधिक तारतस्य देखावते हुये कहते है कि नाना प्रकार की यजी वेदरूप सुख से प्रत्यक्ष विहित हैं पर तैी भी मन वचन शरीर के कर्म से उत्पन्न जो यज्ञ हैं सकल यात्मस्वरूप स्पर्श से रहित नानो अर्थात् उन से यात्मज्ञान नहीं होता क्यों कि आत्मा को का अगोचर कहे कर्मसे प्राप्य नहीं है इस से तुम ज्ञाननिष्ठ होय संसार से सत्ता होउगे यह जानो ॥ ३२॥ अव ज्ञान यज्ञ की थेछता कहते है कि जिस लिये आत्म व्यापार रहित जो द्रव्यमय देयता के अर्थ यज्ञ है तिस से ज्ञान यज्ञ ही येष्ठ नानो और यद्यपि ज्ञान यज्ञ मानसिक व्यापार के आधीन है तथापि आत्मा का स्वरूप जो ज्ञान सो केवल मन का परिणाम अर्थात् ब्रह्मरूप होना भाव है और ज्ञान कुछ मानस व्यापार से प्रगट नहीं है और ज्ञान की श्रेष्ठता मे हेतु यह है कि फलके सहित सर्व कर्म तत्वज्ञान के अन्तर्भूत हैं क्योंकि लोगों के किये जये सत्कर्म ज्ञान के अनुगामी कहे साथ होते है वह वेद मे कहा है सोई इस लोक से कहा कि श्रेष्ठ है व्ययन से ज्ञानयन हे परन्तप और सब कर्म हे पार्य अर्जुन ज्ञान मे परिसमाप्त कहे लीन होते है इसी से जानयन श्रेष्ठ है। ३३ ।। जो कहो कि भला निस ज्ञान की ऐसी प्रशंसा करते हो तो किस प्रकार से प्राप्त होय तो ज्ञान के साधन कहे उपाय कहते हैं कि ज्ञानी पुरुषों के निकट नाय नमता से प्रणाम कर मन करै कि किस कारण से हमको यह संसार भया और कैसे नियत होगा और गुरू की सेवा शुथुपा करने से तुम को सो तत्त्वज्ञान मिलेगा और ज्ञानी वो शास्त्रज तथा तच्चदर्थी वो है वे तुम को उपदेश दे वार 1 थीमद्भगवद्गीता। च्यन्तितेजानंजनिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ ३४ ॥ यज्ञात्वानपुनर्मोहमेवंयास्ससिपाण्डव । येनभूतान्य शेषेण क्ष्यस्यात्मन्य योमयि ॥ ३५॥ थपिचेदसिपापियामयःपापच त्तमः। सवेज्ञानजवेनैवजिसन्तरिष्यसि ॥ ३६॥ यथेधांसिसमिद्दोऽनिर्भमा सात्कुरुतेर्जुन। जानाग्निंसर्वकर्माणिभस्मसात् करतेतथा ॥ ३७॥ नहिज्ञानेन भाषा अनुवाद तत्त्वज्ञान सम्पन्न कर देयंगे सोई कहते हैं कि दण्डवत तथा प्रश्न औ सेवा करनेसे तत्वदर्शी ज्ञानी लोग तुम को ज्ञान उपदेश करैगे और जैसे वन्ध औ मोक्ष तथा जान औ अज्ञान क्या वस्तु है सो कहेगे॥३४॥ अव साढे ३लोकसे तत्वज्ञानका फल कहते है कि तत्त्वज्ञान होने से फेरि और वन्धुवध निमित्त ऐसे मोह को न प्राप्त होउगे कारण यह कि ज्ञान सम्पति होनेसे अपने अज्ञानवशते प्रगट जो मिता पुव भाई वन्धु तिनको अपने अात्मासे भिन्न न देखोगे और साक्षात् परमात्मारूप हमसे और अपने यात्मा मे अभेद देखोगे सोई कहते कि जिसज्ञान को आनि के हे पाण्ड्य फेरि ऐसे मोह को न पावोगे और जिस मे सम्पूर्ण प्राणियो को अपने और मेरे मे देखोगे सो तत्त्वज्ञान महात्मों से मिलेगा ॥ ३५ ॥ और जो सब पापी मनुष्यो से भी तुम अधिक मामी होउ तौ भी पापरूप समुद्र को जान राम नौकाके द्वारा अनायास उतरि नावगे तात्पर्य यह है कि जो तुमने कहा था कि पायमेवाथयेदस्मान् अर्थात् कुटुम्ब के मारने से हमै पडाही माम होगा और बन्धुवधरूम जिन कहे टु स सागर के पार कैसे जायंगे सो यह अज्ञान से तुमारी भूल सहज उपाय आत्म ज्ञान से छूट जायगी ऐसे कहि कर थीभगवान ने जान का माहात्म कहा ॥ ३६॥ जो पूर्व लोक मे कहा कि ज्ञान नौका से पाप समुद्र को उतरि जाउगे सो ठीक है पर पाय तो बना रहा इस सन्देह पर दृष्टान्त दे कर कहते है कि हे अर्जुन जैसे प्रचलित अग्नि काष्ठ समूह को भस्म कर देती है तैसे ही जानअग्नि भी प्रारब्ध कर्म को छोड और सम्पूर्ण सञ्चित आगामी कर्मों को नाश करती है इस मे कुछ सन्देह न करो॥३७॥ तिस का कारण यह है कि संसारमे तप दान मत यन्न आदिके वीच ज्ञानके समान कोईभी चित्तशुद्ध नही करते है तो फोरि सव मनुष्य क्यो नहीं जान ही का अभ्यास करते wwwwwwww wome- चतुर्थ अध्यायः । सदृशंपवित्रमिहविद्यते। तत्स्वयंयोगसंसिद्धःकालेनात्मनिविन्दति ॥ ३८॥ यहा वान्लभतेजानंतत्पर संयतेन्द्रिय. ! ज्ञानंलग्यापरंशान्तिमचिरेणोधिगच्छति॥३६ अनयाथद्दधानश्वसंशयात्माविनश्यति । नायलोकऽस्तिनपरोनमुखसंशयात्मनः ॥४० भाषा अनुवाद इस पर डेढ लोक से कहते हैं कि बहुत काल कर्मयोग करने से शचित्त होय सहन में लोग आत्मा का तत्त्वज्ञान लाभ करते है परन्तु निष्काम कर्मयोग रूम 'नो भक्ति तिसके विना तत्त्वज्ञान नहीं होता हैं सोई कहा कि न हि जानेन सहर्श ॥ ३८॥ और भी कहते है कि श्रद्धावान् कहे प्राचार्य तथा गुरू के उपदेश ने विश्वास कारि आस्तीक बुद्धि हो तत्पर कहे एक उसी उपदेशमे दत्तचित्त हो और इन्द्रियों को वश राखि कर वह तत्त्वज्ञान लाभ करैं है इसी से ज्ञान लाभ के पहिले श्रद्धापूर्वक चित्तशुद्धि के अर्थ निष्काम कर्म रूप भक्तियोग करना उचित है और ज्ञान होने पर ज्ञानी को फेरि अन्य कोई कर्म करना नहीं है सोई कहते है कि तत्त्वज्ञानी ज्ञानलाभ के अनन्तर अचिरात् कहे अल्म काल मे झाट पट मोच पावते है इस मे सन्देह नहीं है ॥ ३८ ॥ तत्त्वज्ञान के अधिकारी को कहि करि अव अनधिकारी जो अज्ञानी तिसका लक्षण कहते है कि एक तो शास्त्र सो गुरू तथा आचार्यका उपदेश कभी सुना नही और जी दैवात् सनाभी तो समझा नहीं और जो कुछ किसी तरह समझाभी तो उस मे यद्धा अर्थात् विन्यास न भई और जो किसी के कहने सुनने से विश्वास भी आई तो यह अर्थ कहे प्रयोजन हमारा सिद्ध होय कि न होय इस संशय मे पड गये ऐसे लक्षणों से भरे पूरे जो अलक्षणी अज्ञानी लोग है उनका मनलव कमी नही होता अर्थात् अपने मनोरघ से चष्टे होते है उनी को नष्ट प्राणी कहते है परन्तु उपर कहे जो अज्ञानी भी थवाहीन तथा संशयग्रस्य इन तीन पुरुपोंके मध्य मे संशययुक्तचित्त मनुष्य बची तरह चवने मनोरबसे भ्रष्ट होता है क्योंकि उसको हरकामी हर बातमे संदेह लगी रहती है या धन उपार्जन क्या विवाह क्या दान धर्म ग्यां अपना सुख खाना पहिराना लेना देना आदि सव कामो मे संशय के मारे क्षणभरभी सुख नहीं ह 'फोरि नारोंको देखि हम कुछ नहीं करते यह चिन्ता जुटी शिरपर चढी रहती
थीमद्भगवद्गीता।
योगसंन्यस्त कर्मागंज्ञानसंच्छिनसंशयं । आत्मवन्तंनकर्माणिनिवन्तिधनञ्जय ।
॥४१॥ तस्मादज्ञानस भूतंहृत्संज्ञानासिनात्मन । चित्त्यैनंसंश्यंयोगमा ति
छोत्तिष्ठभारत ॥१२॥
इति थोभगवडीतायां ज्ञानयोगनाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
भाषा अनुवाद
है तो फेरि संशयके कारण धर्म न होनेसे खौदिभी नहीं मिलता और संसार में
तो धन नाश की सन्देह कर सासारिक मुससे हाथ धोयही वैठे है तो उनके लोक
परलोक के दोनो सुर चले गये केवल चिन्ता के चिता मे बैठे धीरे धीरे जरि
जरायके माटीमे मिल गये मूर्खतासे टया जन्म चला गया कुछभी न वन पडा सोई
कहा कि अजवाबद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति इति इस से संशय छोडो ॥४०॥
दूसरे औ तीसरे अध्याय मे कहा जो कर्मनिष्ठा न जाननिष्ठा सोई दो लोक से
कहते है कि जिसने भगवत आराधनरूप सब कर्म अन्तर्यामी भगवान को अर्पित
किया है पैसा मनुष्य अपने कर्मफल से कभी यद्द नही होता और हम कोई कर्म
नही करते प्रैसे वोध मे जिस के देह गेह मे आत्मबुद्विरूप संशय नष्ट हो गई है।
पैसे पुरुष के लोक शिक्षार्थ भिक्षा मर्यटन आदि स्वभावसिद्ध कर्म कभी भी ज्ञानके
अतिवन्धक नहीं होते हैं सोई कहा कि योग नो भगवदाराधन कर्मतिसमें दिया
है वार्मोको संन्यास जिसने और जानसे अच्छी तरह दूर किया है संदेहकोजिसने
अमे ग्रामखरूप पुरुषको हे धनञ्चय अर्जुन कर्मवन्धन नहीं कर सकते हैं ॥४१॥
जब कि भगवदर्पणरूप निष्काम कर्मयोग और ज्ञानयोग ऐसा है तो हे भारत
गर्जुन गात्मविषयक अपने अज्ञानसे उत्पन्न औ अन्त करण मे टिके जो थोक
मोह आदि सव संगय उन को देश यात्मा का विवेक कहे विचाररूप ज्ञानखड्ग
से काटि कर वेपटक तुम उठो औ" कर्मयोग का अनुष्ठान करो और उपस्थित
जो युद्ध सो करो श्रीमाने भारत इस सम्बोधन से यह जनाया कि तन्नो
का सधर्म है और तुम थेट भरत वंशमे उत्पन्न हो। श्रीधरस्वामी कहते हैं।
कि पुरुषों को अवस्था भेदसे कर्ममय औ ज्ञानमय ये दो प्रकार की निछा जिसने
कहा ऐसे संशय निवारण भगवान श्रीकृष्णयो मैं प्रणन करता ॥ १३॥ इति
जगन्नाय सुनाविरचितायो मनभावनीठीकाया चतुधीध्यायः ॥ ४॥
श्रीमद्भगवद्वीता मञ्च अध्यायः अर्जुनउवाच ॥ · संन्यासंकर्मणांकृष्णपुनर्योगंञ्चशंससि। तचा थएतयोरे तन्मवहिसुनिश्चित ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच ॥ संन्यासकीयोगश्चनियसकराबु . भाषा अनुवादः कर्मयोग ौ संन्यासयोगमे अर्जुनकी संशय निवारण करिके अवाजतेन्द्रियोंकी मोच परता.श्रीभगवान श्रीमद्भगवद्गीताके पंचये अध्यायमे.कहेंगे अन्नानसे उत्पन्न भई, जो संशय तिस को ज्ञानखड्ग से छेदन करिके निष्काम कर्मयोग करो यह जो भगवान ने पुनार कर्म करने को कहा तो पूर्वापर कहे अागू पीछू जो कर्मत्याग यौ कर्म पारने को भगवतकी आज्ञा विस को विचारते हुये अजून कहते हैं कि हे कृष्ण ३ अध्याय के १७ लोक मे जो आपने कहा कि यस्त्वात्म रतिरेव स्यात् और ४ अध्याय के ३३ श्लोकादि मे कहा कि सर्व कर्याखिलं पार्थ ज्ञानं परिसमाप्यते यह तत्वन्नानी को सर्व कर्म का त्यागरूप सन्यास ही कहा, और.४ अध्याय के ४२ लोक मे तस्मादज्ञानसम्भूतं इत्यादि ज्ञानरूप असि से “संशय छेदन करिके उठो और युद्ध करो यह कहि फेरि, कर्मयोग . की देते है परन्तु ये दोनो परस्पर विरुद्ध है अर्थात् कर्म का करना और छोड़ना यह एकमुरुप को एकही कालमे असम्भव है सो हे कृष्ण संन्यास अथवा कर्मयोग इन दोनो मे जो करने से इम हतार्य होयं सो एक प्रकार निश्य निर्धार कारके काहो और कभी संन्यास कभू कमीयोग कहि कहिहमै सन्देहमे वार वार न डारो ॥ १॥ अर्जुन को इस प्रश्नका उत्तर थीभगवान कहते हैं कि हे अनून इम वेदान्ती . धान्जा थीमद्भगवद्गीता। winna भौ। तयोस्तुकर्मसंन्यासात्कर्मयोगोविशिम्यते ॥ २॥ ज्ञेयःसनित्य संन्यासीवा नद्दष्टिनकाशति । निईन्ट्रोहिमहावाहोसुखवधात्प्रमुच्यते ॥ ३॥ सांख्ययोगौ भाषा अनुवाद तत्त्वज्ञानी के प्रति कर्मयोग करना नहीं कहते है क्यों कि तत्वज्ञानी को कर्म त्याग के उपदेश से विरोध पडेगा परन्तु देह आदि मे प्रात्मअभिमानी तुम को जो बन्धुवध निमित्तक शोक मोह से उत्पन्न मंशय तिस को स्थूल शरीर में आत्मा का विवेक रूम खड्ग से छेदन के अनन्तर तत्वज्ञान उत्पन्न होने की उपाय रुम जो निष्काम कर्मयोग सोई अनुष्ठान करने को कहा है देखो नि.काम कर्म करने से चित्तशुद्ध होके तत्वज्ञान उत्पन्न होने पर ज्ञान के परिपाका ज्ञान निया का अङ्ग भूत कर्मके त्याग को मैने कहा है परन्तु ज्ञानमार्ग में बारूढ पुरुष को कर्मका त्याग और अनारुढ मुरुष को भगवदाराधन नि'काम कर्मयोग कहा सोई कहते है कि संन्यास औ कर्मयोग ये दोनो नि.येयस मुक्ति के करने वाले है परन्तु दोनो के बीच संन्यास से कर्मयोग ही अधिक है जिस हेतु कर्म योग से ज्ञान प्राप्त होके तव संन्यास अर्थात् कर्मका त्याग है श्रीर पहिले होनही ॥२॥ तो संन्यास से कर्मयोग को विशेष कहा सोई अव कर्म योग की प्रशंसा करते हुये कहते है कि जो कर्म करता हुया भी न किसीसे वैर करता और न कुछ चाहता है तथा सुख दुख हानि लाभ इन्द्रभावसे रहित ह सोई नित्य संन्यासी है और संसार वन्धन से छट जाता है अथवा संन्यासी के ऐसे अाचरण करता हुआ जो राग देप रहित कर्म करता है सो नित्य संन्यासी कहे सिचय संन्यासी और संन्यासी तो संन्यासी ही है क्यो कि कर्म संन्यास येष्ठ है दहा एक संन्यासी पन्थपर है ॥३॥ जिस हेतु संन्यास औ कर्मयोग दोनो प्रधान अरूम अवस्था भेदमे पाये जाते है इस से इस मे कौन श्रेष्ठ ऐसा पछना अज्ञानी को तो उचित हो सकता है पर जानी को तो नही यही कहते है कि ज्ञाननिष्ठा जो सांख्य ौ उसी का अंगरूम संन्यास तथा संन्यास से लक्षित कर्मयोगभी संन्यास है इन दोनो का फल एक ही है तो भी दोनो मिन्न हैं यह केवल अज्ञानी कहते है यौ पण्डित ऐसा नहीं कहते है देखो इनमे से एक पक्ष का आश्रय लेने - पञ्चम अध्यायः । पृथग्वालामवदन्तिनपण्डिताः। एकमप्यास्थितःसम्यगुभयोर्मिन्दतेफलं ॥ ४॥ यत् 'सांख्यैःप्राप्यतेस्यानंतद्योगैरपिगम्यते। एक सांख्ययोगञ्चयःपश्यतिसपश्यति ॥५॥ संन्यासस्तुम हावाहोदुःखमातुमयोगतः। योगयुक्तोमुनिब्रह्मनचिरेणाधिग भाषा अनुवाद वाना पुरुष दोनो के फल को प्राप्त होता है जैसे लोग निःकाम कर्म करते "शुद्ध चित्त होय तत्त्वज्ञान प्राप्तिके द्वारा उस दोनो का पाल जो कैवल्य सो लाम करते हैं ऐसेही सव कर्म त्यागरूप संन्यासधारी लोग भी पूर्वकृत कर्मयोगकी परम्परा रूम जो कैवल्य सो पावते है तो अलवत्ता दोनो का फल-प्टथक् नहीं है। सोई कहा कि सांव्य श्री योग को वालक कहे प्रजनन भिन्न कहते और पण्डित नहीं कहते है एकमे भी अच्छी तरह से स्थित होके फल दोनो का भी पावता है इससे दोनो एक हैं ॥ ४ ॥ सांस्य औ योग दोनोमे एकके सम्यक् अनुष्ठान करनेसे दोनो का फल किस तरह पावता है इस गङ्गा पर सांख्य औ योगका एक पालत्व मकाश करते हुये भगवान कहते है कि सांख्य कहे ज्ञाननिष्ठ संन्यासी जो मोच पद मावते है सोई पद योग शब्द वाच्य कर्मयोगीभी जानके द्वारा प्राप्त होते है इसमे एकही पाल के हेतुरूप संन्यास ौ योगको जो एकरूप देखते है तेई मम्यक् दी हैं सोई कहा कि जो पद सांख्य लोग पावते सोई योग पुरुपोंको भी मिलता है और सांख्य योग को जो एक देखते सो देखते है बाकी सूरदास बने बैठे है या जो कोई पिरले ऐसे देखते हैं सब नही ऐसे देखते हैं ॥ ५॥ जो ऐसा है कि योगी लोगों को भी शेपमे संन्यास ही मे ज्ञाननिष्ठा हो तो औ ज्ञान के द्वारा मोचमद पायते तो फेर संन्यास मे कर्मयोग को अधिक क्यों पीछे कहा उचित है कि प्रघमहीं से संन्यास करे इस संशय युक्त गर्नुन के प्रति भगवान कहते हैं कि प्रथम कर्मयोगके किये विना हे महावाहो अर्जुन संन्यासका अभ्यास करना अति कठिन औ दुसका मूल है क्योंकि चित्तशुद्ध भये विना जान होना असम्भव है परन्तु कर्मके अनुठान करनेवाले मुनि लोग चित्तशुद्धि के द्वारा संन्यासी होय अर्यात् कर्म छोड कर अचिरात कहे शीघही ब्रह्ममद को प्राप्त होते है याने ग्रह रूप हो जाते है इससे चित्तशुद्धिके पहले निष्काम कर्म करना ही संन्याससे नेष्ठ होता है ॥६॥ थीमद्भगवद्गीता। छति॥ ६॥ योगयुक्तोविशुद्यात्माविजितात्माजितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्माकुर्वन्न पिनलियते ॥ ७॥ नैवकिञ्चित्करोमीतियुक्तोमन्येततत्त्ववित् । पश्यन्टरवन्स शन्जिघन्नन्नन्गछन्खपन्चसन् ॥ ८॥ प्रलपविस्जन्गृहन्नुन्मिपनिमिपन्नपि । भाषा अनुवाद जो ऐसा कहो कि कर्मके अनुदान से चित्तशुद्धि सम्मति पर म्परा प्रणाली क्रमसे ब्रह्मज्ञान होने के अनन्तर इस ज्ञानीका पूर्वलत कर्म प्रति वन्धक क्यों न होय इस आशङ्का पर कहते है कि जो पुरुष योगयुक्त अर्धात् निष्काम कर्मयोग रूप मति अनुष्ठान करता है और जिसने चित्त तथा इन्द्रिय गण अपने वशीभूत कर रासा है और जो अपने आत्मा को शरीर धारी दशरे प्राणियों के आत्मा से भिन्न बुद्धि न करके सर्वभूत मे टिका नो चेतनरूप आत्मा निसको अहैत कहे एकरूप विचार कर देखते है इसीसे वेलोग शुद्धचित्त भिक्षा के अर्थ अथवा स्वभाव अाधीन शौच भिक्षा आदि जो सव कर्मों को करते हुये भी उन कर्मो मे लिप्त नहीं होते न कर्म उनको लगते है॥७॥ और जो ऐसी शङ्का करो कि कर्म अनुष्ठान करके भी उसमें लिए कहे अाशत न होना यह अत्यन्त असम्भव है लिप्त होहीगा इस पर दो श्लोक से कहते हैं कि कर्तृत्व अभि मान रहित होना असम्भव नहीं है क्योंकि निष्काम कर्मयोगरूप भक्ति अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य क्रम से तत्त्वज्ञानी होयके दर्शन आदि इन्द्रिय व्यापार करते भी इन्द्रिय सव अपना अपना काम करती है और हम कुछ भी नहीं करते ऐसी बुद्धि उनकी निश्चय वनी रहती है यथा दर्शन अवण पर्श घाण भोजन थे ज्ञान इन्द्रियों के व्यापार और गमन वचन विसृजन कहे विष्ठा मूबत्याग जो कर्म इन्द्रीयों के काम और ग्रहण जो कर का व्यापार औ खमन् बुदिव्यापार निद्रा होना वनन् प्राणवायु व्यापार और उन्मेष निमेष कहे पलक लभना खुलना जो कूर्म वायु से होता है यह सब इन्द्रिय अादिका कर्म है और हम दृष्टा साक्षी रूप है यह कुछ कर्म हम नहीं करते ऐसे ही ज्ञानी पुरुप इन कर्मोमे अभिमान शून्य लिन नहीं जोते है सोई कहा दो शोक से कि इन्द्रियाशीन्द्रिहार्थेषु वर्तते इति धारयन् यहां आठ नव दोनो श्लोक का अर्थ एकही साथ है॥६॥ और जो मनुष्य तक पञ्चम अध्यायः। ७५ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेपुवतन्तइतिधारयन् ॥ ६॥ ब्रह्मण्याधायकर्माणिसत्यत्वाक रोतियः। लियतेनसमापनपद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥ कायेनमनसावुद्याकेवले रिन्द्रियैरपि योगिनाकर्मकुर्वन्तिसनंत्यत्वात्मशुद्धये ॥ ११॥ युक्ताकर्मफलत्य वाशान्तिमानोतिनैष्ठिकीं। अयुक्तःकामकारेणफलेभक्तोनिवध्यते ॥ १२॥ सर्च भाषा अनुवाद हम कर्म करते है ऐसा अभिमान रखते हैं तेई कर्ममे लिप्त होते औ उही को कर्मवन्ध होता है फेरि चित्तकी अशुद्धता मे उनको संन्यास भी दुर्घट है इस से उनको सब तरह शङ्कट है जो ऐसी शङ्का करो तो यह उत्तर सुनो कि अन्त यौमी ईश्वर की प्रेरणा से हम सब कर्म करते है ऐसे विचार करि सकल कर्म ईयर मे समर्पण करके नौ कर्म कालमे आशक्ति रहित कर्म करते है तो उनको कर्म प्रतिवन्धक नहीं होते और वे कर्म में लिप्त नहीं है जैसे पद्मपन जलमे निर न्तर रहते भी जलसे अलग है सोई कहा कि बह्ममे कर्म अर्पण करि सङ्ग कहे पाशक्ति छोडि जो कर्म करै है सो पाप से नहीं लिप्त होता जैमे कमलका पत्ता जलमे रहिके भी जलसे भिन्न है॥१०॥ निष्काम कर्मवन्धक नहीं है इस कहने के बाद अब उत्तम मनुष्यों को कर्म के द्वारा मुक्ति दिखावते हैं कि शरीरसे क्षानादि मनमे ध्यानादि औ बुद्धिसे तत्व निययादि तथा कर्म मे श्राशक्ति रहित औ फला मिलाप शून्य होकर इन्द्रियो के द्वारा यषण कीर्तन चिन्तन आदि चित्तशुद्धि के अर्थ कर्मानुष्ठाई योगीजन कम करते है सोई कहा कि काय मन बुद्धिसे अात्म शुद्धिके हेतु सा छोडि योगीजन कम करते हैं ॥११॥ नो ऐसी गङ्गा करो कि वही एक कर्मसे कोई तो मुक्ता यौ किसोको बन्ध यह कैसी व्यवस्था है तो इसका निवारण करते है कि योगी कम कारी पुरुप ईयरमे एक निष्ठ हो कर्म फल को त्यागि कर्म अनुष्ठान करिके अत्यन्त शान्ति खरूम जो मुक्ति तिसको प्राप्त होते हैं. परन्तु अयुक्त कहे कामना विशिष्ट कर्म वहिर्मुख लोग काम्यकर्म से अवश्य ही बस होते है युक्ती कहे ईश्वरार्थ कर्म करने वाले ॥१॥ इन सब मानों से अशुद्ध चित्त मनुष्य को संन्यास की अपेक्षा निष्काम कर्म करना ही श्रेय है यह विस्तार पूर्वक कहि कर अव शुद्धचित्त पुरुष को संन्यास ही श्रेष्ठ है थीमहगवडीता। फार्माणिमनसासंन्य सास्तेसुखंवशी। नवद्वारेपुरेदेडोनवर्षन्न कारयन् ॥ १३ ॥ नकर्तृत्वं न कर्माणिलोकस्यजतिमभुः। नकम्मे फलसंयोगस्वभावस्तुमवर्तते ॥१४॥ नादोकस्यचित्पानचैवमुक्तविभुः । अज्ञानेनातंजानतेनसुद्धन्तिजन्तवः॥ १,५॥ भाषा अनुवाद कहते हैं कि जितचित्त विवेकयुक्त बुद्धि के द्वारा विशेष कारक सर्व कर्म छाडि कर जैसे मुखमे रहते तैसे जाननिष्ठ यक्त होके भी सुखमे रहते हैं जो.कहो कि कहां रहते तो कहते हैं कि नवदार पुर जो अहङ्कार शून्य शरीर तिसमें आत्म. खरूप से स्थित रहते हैं और अहङ्कारके अभावसे आम शारीरक कर्म नहीं करते और ममताके अभाव से दूसरे से भी कोई काम नहीं कराते है. यह शुद्ध औ अशुद्धचित्त मनुष्यो का भेद भगवान ने कहा ॥ १३ ॥ ईश्वर जिस को इस लोकसे येष्ठ लोक को लेजाने की इच्छा करते हैं उससे सत्काम करावते और जिसे अधो लोक लेजाने की इच्छा करते उससे कुकर्म करवापते हैं यह युतिमे कहा है तो परमेश्वर की प्रेरणासे पराधीन जो मनुष्य सो कैसे ३ कर्मत्याग करने शकै एक तो यह दूसरे जो परमेश्वरहीकी प्रेरणासे शुभ अशुभ कर्ममे लोग मत्त होते हैं तो ईश्वरभी विपम दृष्टि में निर्दय हैं फेरि कर्मोका करवावनेवाला भी वही है तो उसकोभी पुन्य पाप सम्बन्ध होय न क्यों जो यह शङ्का करो तो इस का सिद्धान्त लोकसे कहते हैं कि प्रभु जो ईश्वर सो मनुष्योंको कार्टत्व अथवा सृजन नहीं किया किन्तु मनुष्यों को पूर्व कर्म, संस्कार रूप जो अज्ञान सोई कर्ट त्वादिमे प्रष्टत करै है इसीसे अपनी अनादि अविद्या से कामनाके वश होय प्रति युक्त पुरुप को ईश्वर भी कर्ममे नियुक्त करते हैं और ईश्वर कुछ आपसे उसको प्रष्टत्ति नहीं देते हैं.सोई कहा कि कर्तृत्व यो कर्म तथा फलयोग प्रभुने नहीं किया. लीग सब खभाव अर्थात् माया से प्रत्त हैं ॥ १४ ॥. जिस हेव भगवान न कुछ करते और न किसी से कुछ करवायते हैं वे तो विभु कहे व्यापक तथा पूर्ण हैं इससे भक्त अभक्त किसी के पुन्य या पामके भागी नहीं है. परन्तु परमेश्वर की अचिन्त्य जो माया सोई पूर्व कर्म के अनुसार उच. नीच कर्म में लोगों को प्रवृत्ति देती और अज्ञान से जान यावृत्त कहे घेरा है तिससे सव मोहित होते कम काम पञ्चम अध्यायः । ज्ञानेनतवदनानंयेानाशिवमात्मनः । तेपामादित्यवदनानंमकाशयतित परं ॥ १६ ॥ तदुत्यस्तदात्मानस्तन्निधास्तत्परायणः । गच्छन्त्य पुनरात्रिं जाननिधूतकल्मपा.॥ १७॥ विद्याविनयसम्पन्नेब्राह्मणेगविहस्तिनि। शनिचैव श्वपाकेचपण्डिताःसमदर्शिनः ॥१८॥ इहैवतैर्जित.खोयेपांसाध्यस्थितमनः । भाषा अनुवाद है जो कहो कि पूर्ण काम को फेरि भक्तों पर अनुग्रह ौ अभक्तों का निग्रह क्यों कर धर्ट है तो कहते है कि परमेश्वर का निग्रह रूप दण्ड अनुग्रह है अर्थात् दण्ड होने से पापीका पाप दूर होजायगा ऐसे दण्डरूप अनुग्रह का न नानना जो अज्ञान सोइ परमेश्वर विषयक ज्ञान को भारत करता है तो फेरि जीव मोहित होय अपने अन्नान से परमेश्वर में विषम दृष्टिका आरोप करते है ॥१५॥ और ज्ञान से जिन का अज्ञान नाश हो गया है ऐसे ज्ञानी पुरुषों को पर जो भगवत् खरूप सो प्रकाशमान है जैसे सूर्य के प्रकाशसे अन्धाकार दूर हो वस्तु सव प्रकाशित होती हैं। लोग केवल अपने मोह से ईश्वर मे मोह कल्पना करते है ॥ १६॥ भैसे जो परमेश्वर तिनके उपासकों को प्राप्त जो फल होता है सो कहते है कि भगवत की भक्ति से अवश्य ही संसार सागर को उत्तर भायं गे ऐसी जिन के निश्चयरूप बुद्धि है और तैसे ही भगवद्भक्ति में सम्पन्न नौ तत्पर है और परमेश्वर ही जिन के परम अवलम्ब है सोई जन ईश्वर के प्रसाद से निःपाम होय मुक्तिपद पाय आवागमन से रहित होते है। सोइ कहा कि ईश्वर मे बुद्धि भी ईश्वर मे अात्मा औ ईश्वर मे निष्ठा तथा ईश्वर मे परायण पुरुप जान मे नि त कल्प अपुनरागमन पद मोक्ष को प्राप्त होते है ॥ १७॥ तो ये तत्वज्ञानी जो मुक्तिलाम करते कैसे होते है सोइ कहते है कि विपम वस्तुने सम ज्ञान अर्थात् सकल वस्तुमे भझरूप देखते हैं जैसे कि विद्या अौ बिनय से युक्त बाह्मण औ गऊ हाथी कुत्ता तथा चाण्डाल इन सबमे पण्डित कहे ज्ञानी समदर्शी होते है अर्थात् सबमे त्रामा रूप ईबर को एकरूप देखते हैं ॥ १८ ॥ यह सुनि जों सन्देह होय कि विपम मे सम दृष्टि मनुष्य पण्डिा कैसे औ गौतम ने कडा कि विषम मे सम पूजन औ सम भे विषम पूजन करने वाले लोक पर लोक थीमद्भगवडीता। निर्दोषंहिसमंवयतनाद्गह्माणितेस्थिताः ॥ १८ ॥ नप्रहृष्यप्रियं प्राप्यनोविजेत् प्राथचा प्रियं । स्थिरबुद्धिरसंमुढोब्रह्मविद्ह्मपस्थितः॥२०॥ वायस्पर्शवसतात्माविन्द न्यात्मनियत्सुखं। सब्रह्मयोगयुक्तात्मासुखमक्षयमनुते ॥ २१॥ यहिसंस्पर्शजा भोगाटुःखयोनयएवते । आद्यन्तवन्त.कौन्तेयनतेपुरमतेबुधः ॥ २२॥ शनोतीहैव भाषा अनुवाद मे नष्ट होते हैं इस सङ्का को निवारण करते हुये कहते हैं कि जिन का मन समभाव मे स्थित है उनोने इहाई खर्ग जय करलिया है क्यों कि सर्वच समान रूप निर्दोष ब्रह्म परिपूर्ण होरहा है ऐसा जो जानते ते ब्रह्म मे स्थित कहे ब्रह्म रूप निर्दोप और गौतम की बात जान अवस्था के पहिले की है॥ १६॥ अह्मभाव प्राप्त पुरुष का लक्षण कहते है कि बाजानी होके जो बन मे स्थित है वै कोई मिय वस्तु पाय के हर्षित नहीं होते है और अमिय माप्त होने से भी विषाद नही करते है क्यों कि वै लोग खिर बुद्धि यौ मोह रहित है॥२०॥ मोह निवृत्त माव होने से बुद्धि स्थिर होती इस का हेतु कहते हैं कि वाद्य इन्द्रियों के विपय मै अनाशत चित्त पुरुप अपने अन्तःकरण मे विधेम रहित शान्तियुत्ता जो सात्त्विक सुख सो अनुभव करते और वही पुरुप शान्तिसुख प्राप्त हो के बह्मयोग युता आत्मा कहे समाधियो द्वारा परमात्माके साथ एकता की प्राप्ति रूम जो अक्षय सुख सो भी लाभ करते है ॥ २१॥ प्रिय जो पियभोग तिन के निरत्त होने से फेरि मुक्ति पुरुषार्थ अर्थात् परम प्रिय कैसे है इस संशय पर कहते है कि जो स्पर्श आदि विषय और उन विषयों से प्रगट जो सुख सो भोग समय से स्पर्द्धा कहे और का अधिक सुख देपि इच्छा की दृद्ध औ बायुर्दा ही भर हैं और भोग पीछे कुछ नहीं है साली चिन्ता मात्र करते है इन सब हेतुवों से केवल दुख के कारण है और उन का अादि अन्त भी है इस से हे कौन्तेय विवेकी लोक उस विषयसुख भोग में नही रमित होते हैं ॥ २२॥ इस से मुक्ति ही परम पुरुषार्थ है और काम क्रोध से उत्पन्न जो क्षोभ मोई मुक्ति का प्रति पक्ष है अतएव उसके वेगको जो सहि सकै सो मुक्तिभागी होयगा यही कहते हैं कि शरीर रहते अथवा शरीर सामय रहते हुये ओ काम क्रोध के वेग को पञ्चम अध्यायः। ७६ यःसीढुंमाक्शरीरविमोक्षणात्। कामक्रोधोगवेगंसयुक्तःससुखीनरः॥ २३ ॥ होऽन्तःसुसोऽन्तरारामस्तथान्तर्योतिरेवथः ॥ सयोगीब्रह्मनिर्वाणब्रह्मभूतोऽधिग छति ॥ २४॥ लभन्तेब्रह्मनिर्वाणम्पयःक्षीणकल्मपाः। छिन्नवैधायतात्मानःसर्च भूतहितेरताः ॥ २५॥ कामक्रोधविमुक्तानांयतीनांयतचेतसा ॥ अभितोबह्मनि ऑवर्ततेविदितात्मनां ॥२६॥ स्पनिकृत्वावहिर्वाह्याचक्षुचैवान्तरेयो । भाषा अनुवाद सहि लेने सकै सोई नर युक्त कहे धात्मरूप और सुखी है ॥ २३ ॥ और केवल काम क्रोध का वेग जीतने हीं से मुक्त नहीं होय है और भी कहते है कि जो अपने अन्तरात्मा में सुखी यो विषयभोग से सुखी नहीं है और जो पुरुप शात्मा राम हो के अात्माही मे विहार करता श्री वाहर के व्यापारसे विरत तथा अन्तर प्रकाश है अथवा आत्माही मे दृष्टि औ नृत्य गीत अादि विषयों मे दृष्टि नहीं रखता है सोई योगी दूह कहे जीवते ही ब्रह्मरूप ग्रहा मे लीन होता है॥२४॥ मुक्ति का हेतु जो ज्ञान तिस की साधन उपाय प्रकारान्तर कहे दूसरी तरह से कहते हैं कि ऋपि कहे सम्यक् दी संन्यासी लोग जो यन्न धादि नित्य नैमित्तिक कर्म करि क्षीण कल्मष कहे निष्पाप होके श्रवण आदि से ज्ञान के द्वारा छिन्न वैध कहे संशय रहित हो गये है और जिन का चित्त औ इन्द्रियगण वशीभत है औ प्राणियों के हितकारी दयालुखभाव अर्थात् हिंसा रहित है वेई ब्रसमे लयरूम मोक्ष पावते है ॥ २५॥ और काम क्रोध से विमुक्त ज्ञानी जन संन्यासी यतचित्त लोग विदित है आत्मा निनको ते नीवित औरत दोनो अवस्थामे मुक्त है ऐसा नही कि देहान्त मे वे मुक्ति पावेगे किन्तु वे जीवते भी ब्रह्मा के साथ एक रूम होय जीवन्मुक्ता ऐसे प्रसिद्ध होते हैं ॥ २६ ॥ इसी अथाय के २४ लोक से कहा कि योगी मोक्ष पावै हैं सोई फेरि संक्षेप से कहते हैं कि शब्द स्पर्थ यादि पशिविपयो को बाहर करिके और चक्षु कहे दृष्टिको मोहके मध्य मे राखि माण अपान वायुको सम करि के कुम्भक प्राणायाम करै धूमध्य मे दृष्टि इस लिये कहा कि नैन वन्द करने से निद्रावश हो मन लय कहे लीन हो जाता और खुले रहने से मन विषयों पर धावता है अधखुले रखने से भू के वोच निकटही दृष्टि रहती
थीमद्भगवद्दीता।
प्राणापानौसमौकत्वानासाय्वन्तरचारिणौ ॥ २७॥ यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोच
परायणः । विगतेच्छाभयक्रोधोय सदामुक्तए वसः ॥ २८ ॥ भोक्तारंयज्ञतम सांस
लोकमहेश्वरं । सुहृदंसर्वमतानांज्ञात्वामाशान्तिमच्छति ॥ २६ ॥ इति श्रीमग
बबीता सूपनिषत्सु संन्यासयोगनाम मञ्चमोऽध्याय ॥ ५ ॥
भाषा अनुवाद
है औ दोनो वायु सम करि नासिका रन्धु से सञ्चार करती हैं जिस मे प्राणवायु
वाहर औ अपान भीतर सञ्चार न कर इसवास्ते कुम्भक प्राणायाम योग करें।
२७॥ और इसी उपाय से जिस की इन्द्रीय श्री मन बुद्धि आदि वशीभत है
यौ मुक्ति प्राप्ति के योग्य है और जिसने इच्छा भय क्रोध को दूर किया है असे
गुणों से सदा युक्ता मो मुनि सो जीवनकाल मे भी मुक्त अर्थात् वह कर्मरहित
जीन्मुक्त है ॥२८॥ जो कहो कि इन्द्रीय माव वा करने से कैसे मुक्त होय
तिस पर कहते कि हा मुक्ति जान हों के द्वारा होती है देखो हमारे भक्तों में
समर्पित यन्त्र औ तप के अया चित्तरूप भोक्ता धौ प्रतिपालक सर्व लोक में श्रेष्ठ
ईम्बर सव से निरपेक्ष अन्तर्यामी रूम हम को जानि कै योगी लोग मेरी अनुग्रह
से शान्ति कहे मोक्ष पावते हैं ॥ २६॥ थीधर खामी कहते कि जो अर्जुन की
कर्मयोग औ ज्ञानयोग को पृथक् शङ्का निवारि कै जिसने क्रम से दोनो को एक
कहा है सोई जगत गुरु श्रीकृष्ण को हम प्रणाम करते हैं। इति जगन्नाथ सल
विरचितायामनभायनीटीकायां पञ्चमोध्याय ॥५॥
श्रीमद्भगवडीता . पठसअध्यायः। थीभगवानुवाच । अनाथितःकर्मपालंकाथ्यकर्मकर कर्मकरोतियः । ससंन्यासीचयोगीच भापा अनुवाद श्रीधरखामी छठये अध्यायके ग्रारम्भमे वर्णन करते है कि मनुष्यों को चित्त शुद्ध होने से भी ध्यान के विना केवल संन्यास मावसे मुक्ति नहीं मिलती है इसी हेतुसे थीभगवान छठवें अध्यायमे ध्यानयोगको विस्तार करि कहते हैं कि पञ्चम अध्यायके अन्तभागमे संक्षेप से कहा गया जो ध्यागयोग सोइ विस्तार करने को छठवें अध्यायका प्रारम्भ अर्थात् सर्व कर्माणि मनसा मंन्यस्यास्ते सुसं वशी इस ५ अध्यायके १३ लोक से सर्व कर्म त्याग पूर्वक जागनिठा की प्रशंसा करने से और कर्म अनुष्ठान सोशकारी है इससे हठात् कर्म त्याग की अवस्था के विना भी कर्म का त्याग मनुष्यों के मनमे होय उठे है सो तिसके निवारन के अर्थ कर्म छोडने से कर्म करना श्रेष्ठ है यह कहि कर्म योगकी वडाई करते हुये भगवान कहते है कि ॥ अनायित हे कर्म फलको आयादा रहित होय कर सब कर्म अवश्य ही कर्तव्य है इस विचार से जो विहित कर्म का अनुष्ठान करै सोह संन्यासी यौ सोई योगी नहीं तो निरग्नि कहे गग्निसाध्य यज्ञादि कर्म त्यागी औ अक्रिय अर्थात् वेअग्नि के कर्म कुंगा ताल बावडी खनन तथा दानादि कर्म त्यागी होके लोक थमने को योगी समझेगे किन्तु ऐसा नही है तात्पर्य यह कि मालही का त्याग उचित कर्म का त्याग नही अर्थात् उपर लिखे सब कर्म विष्णुप्रीत्यर्थ करना ही चाहिये सोइ कहा अनाथितः कर्मफलं कार्य कर्म करो म vavwa ८२ श्रीमद्भगवदीता। ननिरग्निर्नचाक्रियः ॥१॥ यंसन्यासमितिप्राहुर्योगंतविधिपाण्डय। नमसंन्य स्तसंकल्पोयोगीभवतिकश्चन ॥२॥ बारुरुक्षोर्मुनेर्योगकर्मकारणमुत्यते। योगा रुढस्यतयशमःकारणसुच्यते ॥ ३॥ यदाहिनेन्द्रियार्थपुनकर्मसनुपजते । सई सङ्कल्पसंन्यासीयोगारूढस्तदोच्यते ॥ ४॥ उहरेदात्मनात्माननात्मानमवसादयेत् । भाषा अनुवाद तियः ॥ १॥ यह सुनि अर्जुन ने पुछा कि हे कृष्ण किस कारण से वै मनुष्य योगी औ संन्यासी नही है इस पर कर्म योगको संन्यास प्रतिपादन करते हुये कहते है कि हे पाण्डव अर्जुन संन्यास मान ही को नो सप युतियोने श्रेष्ठ कहा है सोइ फल संन्यास रूप कर्म को भी नानो जो कहो कि कैसे जाने तो कहते है कि इति गब्द से कहे जो हेत सो योग मे भी है सोइ डेढ लोक से कहते है कि कर्म निछ या ज्ञान निष्ठ जो होय पर फल की इच्छा त्याग विना योगी नही इससे फल कामना मे जिसका चित्त विक्षिप्त नहीं सोई योगी औ संन्यासी है सोइ कहा ना सन्यस्त कइल्यो योगी भवति कयन ॥२॥ तौ फेरि 'जावत् जीवन कहे जिन्दगीभर कर्मयोग ही करना चाहिये जो ऐसी शङ्का कर तो कर्मयोग की अवधि कहते है कि ज्ञानयोग मे धारूढ होने की इच्छा करने वाले पुरुष को उस राहके चढने में कम ही कारण रूप कहा है क्यों कि निष्काम कर्म चित्तशुद्धि करता है और ज्ञानयोग प्रारूढ कहे ज्ञानी को शाम कहे विक्षेपकारी कर्म सकल का त्यागही उचित जिसलिये त्याग ज्ञान परि पाक का कारण रूप कहा है ॥३॥ जो मूंछो कि वह जानयोग आरूढ पुरुष जिसको विक्षेपकारी कर्म का त्याग कहा गया कैमा होता है तो कहते हैं कि नव इन्द्रियो के भोग जो विषय तिनमे और भोग के साधन भत कर्मी मे आशक्त न होय और कर्म संकल्प को छोडि सकै तब उस को जोगारुढ कहते है ॥४॥ देखो विपयों मे ईछा नित्ति होने से मोक्ष यौ विषयो मे आशक्ति से बन्च होता है यह विचारि रागडेपादि स्वभाव से रहित होना उचित सोई करते है कि विवेक युक्त यापही अपने आत्माको बुद्धि के द्वारा संसार में उतार करेगा और अधोगति को न ले जायगा जिस हेव कामनासे निहत्त नो अात्मा कहे मन सोई पष्ठ अध्यायः। आत्मैवयात्मनोवन्धुरात्मैवरिपुरात्मनः ॥ ५॥ बंधुरात्मात्मनस्तस्य येनैवात्मात्मना नितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वेवतात्मैवशनुवत् ॥ ६॥ जितात्मनःप्रशान्तसपरमा त्मासमाहितः। - शीतोष्णसुसदुःखेपत्तथाभानावमानयोः ॥ ७॥ ज्ञानविज्ञानट तात्माकूटस्थोविनितेन्द्रियः । युक्तइत्युच्यतेयोगीसमलोष्वाश्म काञ्चनः ॥ ८॥ मुह wwner भाषा अनुवाद अपना बन्धुरूप उपकारी है और कामनामे आशक्ता जो मन सो शत्रुरूप अपकारी है तो अपना शामिन यापही है ॥ ५॥ अव अात्मा ही तो किसी मनुष्यका वन्धु औ किसीका रिपु है इस अपेक्षा पर कहते है जिसने अपने आमाको जीता अर्थात् विज्ञानमय अामा कर्तृक कार्य कारण मिलित रूम जो आत्मा स्थूल खच्या शरीरादि वशीभूत होती है सोई विज्ञानमय जीव अपना बन्धु है और अनात्मा कहे शरीरादि अवशीकृत जो है मोई आप अपना शत्रु तुल्य है॥६॥ जितात्मा पुरुष को जो अपने आत्मामे वन्धुता है सो खुलासा करिके करते हैं कि जिसने अात्मा जो शरीर आदि तिश को नीता अर्थात् अपने आधीन किया है केवल वह प्रीति विरोध आदिसे रहित मनुष्य का मन शीत उपण सुख दुःख अादिमे समाहित कहे सावधान रहता है अर्थात् वही आत्मानिष्ठ है अथवा उसी का हृदय परमात्मा में समाहित अर्थात् विक्षेप रहित निश्चल होता किसी का और समाहित नहीं हो सकता है॥७॥ योग आरूढ पुरुष के लक्षण औ श्रेष्ठता कहते हैं कि ज्ञान कहे सास्त्रसे अथवा गुरूके उपदेश से यो होय और विज्ञान नो अनुभव सिद्ध अर्थात् हम सोई ब्रह्म है यह प्रत्यक्ष ज्ञान दून दोनो से निसका आत्मा करें चित्त सन्तुष्ट है और जिस ने इन्द्रियगण को जीता है तथा ढेला पत्यर सोना ये जिसको समान अर्थात् लेने छोडने की बुद्धि जिसे नही ऐसा जो निरपेक्ष निर्विकार कूटस्य कहे अचल के तुल्य निश्चल पुरुष सोई युक्त योगो कहे योगारुढ है ॥ ८॥ और शत्रु मित्र आदि मे नो समदर्शी मनुष्य सो योगो से भी अधिक है यह कहते है कि सहद कहे स्वभाव से हित कारी औ मिव जो स्नेह वशते उपकारी औ अरि कहे घातक जो शत्रु औ उदासीन अर्थात् उप कार अपकार दे।नो से अलग निरपेक्ष नो औ मध्यस्य कहे पक्षमात विना दोनो म ८४ थीमद्भगवडीता। निवार्युदासीनमध्यसद्देप्यवंधपु । साधुष्पपिचपामेषुसमवुद्धिविशिष्यते ॥ ॥ गे गीयुजीतसतमात्मानंर हसिस्थितः। एकाकीयतचितात्मानिरागीरपरिग्रहः ॥१०॥ शुचौदेशेप्रतिष्ठाप्यस्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितनातिनीचंचेलाशिनकुयोज ॥ ११॥ तवैका मन कृत्वायतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यामनेयज्याद्योगमा त्मविशुद्धये ॥ १२॥ समंकायधिरोग्रीबंधारयन्नचलस्थिरः संमेच्यनासिकाग्रंखें भाषा अनुवाद 'ओर हितकारी औ इंप अर्थात् निःप्रयोजन शनु जो अकारण क्रोधी औ बन्धु निनसे कुछ सम्बन्ध है औ साधु कहे सुशील सुन्दर आँचरण जिनका है तथा पाप जो दुराचारी इन सब के विपेणिस की बुद्धि समान कहे मोति विरोध रहित है सो विशिष्ट कहे योगो से अधिक है ॥६॥ योगी के लक्षण कहिकर अब उसका अक्षरूप बो योग सो इस लोक से ले कर इसी अध्याय के स योगी परमेामतः इस ३२ लोक तक कहते हैं कि योग प्रारूढ पुरुष सङ्गति हाथ जिस के अन्त करण औ शरीर वशीभूत है सो निराकांच सर्व परिग्रह रहित 'एकान्तक मे अकेला सावधान वैठि कर अपने अात्मा कहे मन को निरन्तर भगवत के मनन मे युक्त करै ॥ १०॥ उसी योगका आसन औ नियम नादि दिखावते हुये दो शोक से कहते है कि पवित्र स्थानमे अपने आसन पर बैठने के अनन्तर योग अभ्यास करै बासन कैसा चाहिये कि जो अचल औ न बहुत उचान अनि नीचा होय और चेल कहे वरल धजिन व्याघ्रचर्म अर्थात् नीचे कुश तव चर्म उमर वस्त्र ऐसा आसन करै ॥ ११॥ और जिस का चित्त यौ 'इन्ट्रिय निष्क्रिय कड़े व्यापार रहित है सो मन की शान्ति कहे शुद्धि के अर्थ उक्त धासन पर बैठने के बाद मन को एकाग्र पिझम रहित कर को योग अभ्यास अव चित्त को एकाग्रता के उपयोगी जो देह धारणादि सो दा. शोक से कहते हैं कि 'काय कहे शरीर का मध्यभाग औ शिर ग्रीवां अर्थात् मूल । आधार से ले कर मस्तक पर्यन्त शरीर अति यत्न से सीधी रागि के नौ नियम कर धारणा के बाद अपनी नाशिका के अग्रभाग मे धई उनीलन मृर्वक दोनो दृष्टि लगाय समाहित सावधान होय और दिशों मे दृष्टि न देय ॥ १३ ॥ - करै॥१२॥ निस पठ अध्यायः। ८५ दिशश्शानवलोकयन् ॥ १३ ॥ प्रशान्तात्माविगतभी मचारिखतेस्थित.। मनासंय स्यमञ्चित्तोयुक्यासीतमत्परः ॥ १४ ॥ युञ्चन्नेवंसदात्मानयोगीनियतमानस.। शान्तिनिर्वायपरममित्संस्खामधिगच्छति ॥ १५ ॥ नात्यनतस्तुयोगोऽस्सिनचैकान्तम नन्नतः । नचातिखभयोलस्थजाग्रतोनैवचार्जून ॥ १६॥ युक्ताहारविहारसयुक्तचेष्ट स्थकर्मसु । युक्तखभाववोधस्सयोगाभवनिदुःखहा ॥ १७॥ यदाविनियतचित्तमात्म ॥ भाषा अनुवाद का चित्त प्रशान्त और जो निर्भय श्री ब्रह्मचर्य व्रत मे स्थित हो के अपने मन को सब तरफ से खींच मेरे मे लगाया है और निसको महीं परम पुरुषार्थरूम कहें इष्ट देव हो जैसा मत्मपरायण पुरुष उक्त मत योग में समाहित रहता है ॥ १४ ॥ अव योगाभ्यास करने का फल कहते है कि पूर्वोक्त प्रकार से सदा आत्मा मे मन को युक्त करते करते नियत कहे निरुद्ध है मानस अर्थात् चित्त जिस का सोई शान्ति कहे संसार नित्ति को प्राप्त होता है वह शान्ति कि खरूम है सो कहते है कि जिस से परम निर्वाण प्राप्त होय है सोईशान्ति यौ मत्संस्था कहे मेरे रूपमे अवस्थिति सो भी उसके मिले है॥ १५॥ योगा व्यासो को आहार शयन आदि का नियम कहते है कि हे अर्जुन अत्यन्त अधिक आहारी और अत्यन्त निराहारी इन दोनो को भी योग जो समाधि सो नहीं हो सकती है और अतिनिद्रा करनेवाला तथा निद्रात्यागी इन को भी समाधि नही होती है ॥ १६॥ तो फेरि कैसे पुरुष को समाधि हो सकती है इस अपेक्षा पर कहते हैं कि नियमरूप आहार औ विहार है जिसका तथा कर्मों मे परिमित चेष्टा कहे व्यापार है जिसका और यथा उचित है सोवना जागना निस का उसी को योग कहे समाधि होती है और दुख दूर करती है ॥ १७॥ कौन समय मे योगसम्पन्न अर्थात् समाधिसिद्ध होगा सो कहते है कि नव पुरुष का चित्त एकाग्र कहे अच्छी तरह सब ओर से रुककर अर्थात् वाह्य कहे बाहर के सकल विपयों को छोड कर केवल अात्मा मे निश्चल रूप से लगै अर्थात् अपने आत्मा मे स्थिति करै और सब मनोरथ की इच्छा न रहे अर्थात् देखी सुनी जो सासारिक विषय तिन की कामना मै पहा काहे टष्णा न उठे तय वह योगसिड़ ২২ ८६ श्रीमद्भगरहोता। न्येवावतिष्ठते। निप्पृह सर्वकामेग्योयुनाइत्युच्यतेतढा ॥१८॥ यथादी पोनिवातस्यो नेगलेसोपमामाता । योगिनायतचित्तस्ययञ्चतोयोगमासन ॥ १८ ॥ ययोमरमते चित्तनिरुईयागसेक्या । यचैवात्ममानपश्यन्नात्मनितुष्यति ॥ ३०॥ सुसमात्यन्ति भापा अनुवाद कहे युक्त समाहित कहा जाता है सोई कहा कि यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवाव तिठते इति ॥ १८॥ प्रात्माकाराकारितरूप अवस्थित चित्त कहे आत्मरूपता को प्राप्त जो चिन्त तिस का दृष्टान्त कहते है कि जैसे निर्यात स्थान मे दीपशिखा हलचल नही होती सोई उपमा कहे दृष्टान्त जागो यह किस का दृष्टान्त है जो पूछी तो कहते है कि यात्मविषयक योगाभ्यासी योगी पुरुष णिस का चित वशी भूत है उसी का चित्त निर्वात खान स्थित दीपशिसा को समान आत्मा मे स्थिर है यहा चित्त शब्द का अर्थ अन्त करण है सो अन्त करण वृत्ति भेद से चारि प्रकार का है सङ्कल्पात्मक कहे सङ्कल्परूप अन्त करण की दृत्ति कहे खभाव को मन कहते है और निश्चयात्मक अन्त करण की दृत्ति को बुद्धि कहते और अनु सन्धान कहे किसी वस्तु के जानने के लिये तदस्तुरूप हो रहना अनुसन्धानात्मक यन्त धारण रत्ति को चित्त कहते है और अभिमान युक्त अन्त करण अहङ्कार कहा जाता है ॥१६॥ यत्संन्यासमिति प्राजोगं तदिद्धि पाण्डव इसी अध्यायके 'इस दूसरे लोकसे योगही को फर्म कहा है और नात्यत्रतस्तुयोगोस्ति इस सोलहें लोक से योगशब्द से समाधि कहा तो इसमे सुख्य योग किस को कहै इस अपेक्षा खरूम तथा लक्षण प्राम से समाधि ही मुख्य है यह साढे तीनि लोक में कहते है कि जिस अवस्था में योगाभ्यास से निराइ बहे एकाग्रचित्त होता है और जिस अवस्खा मे श्राप श्राम अपने स्वरूप को देखते हुये सन्तुष्ट होता है ऐसी जो समाधि कड़े चित्तत्ति की एकाग्रता सोई योग है वही पात च्छर सूत्र कहा कि योगचित्तत्तिनिरोध ॥ २० ॥ अात्मसन्तोप का हेतु करते है कि जिस अवस्था विशेष भे योगीजन कोई निरतिशय कहे अत्यन्त नित्य सुन रूम का अनुभव करते है जो कहो कि उस अवखा में तो विषय समन्ध का अभाव है तो सुस का समर कैसे होय तिस पर कहते हैं कि विपय इन्द्रिय मे फल 12 पष्ठ अध्यायः । कंयत्तदुनिग्राधमतोन्द्रियं । वेत्तियवनचैवायंस्थितश्चलतितत्त्वतः ॥ २१॥ यंलध्वा चापरलाभमन्यतेनाधिकंततः। यस्मिखितोनदु.खेनगुरुणापिविचाल्यते ॥ २२ ॥ तविद्यादःखसंयोगवियोगयोगसंन्नितं। सनिश्चयेनयोक्तव्योयोगोनिर्विणचेतसा ॥ २३॥ संकल्पप्रभवान्कामास्वत्वासधीनशेषतः । मनसैवेन्द्रियग्रामविनियम्य समन्ततः॥ २४ शनैशनैरुपरभेदुद्ध्याष्टतिगृहीतया । आत्मसंख्मन कत्वा नकिञ्चिदपिचिन्तयेत् ॥ २५॥ यतोयतोनिचलतिमनश्चचलमस्थिर। ततस्ततो ॥ भापा अनुवाद सम्बन्ध से रहित जो केवल आत्माकाररूप बुद्धि से ग्रहण के योग्य है इसी से उस मे स्थित होय योगी आत्मरूप से विचलित नहीं होते है॥२१॥ उसी का अचलत्य प्रतिपादन करते है कि यात्मानन्द मुख जो अात्मखरूप लाभ लक्षित कहे पाच करि और लाभ फेरि उस से अधिक नहीं गनते और जिस मे स्थित होय वडे वडे शीत उष्ण आदि दुस से भी टुखो नहीं होते अर्थात् वडे दुख भी उस का कुछ नहीं कर सकते है ॥ २२॥ ऐसी दुखसंयोग के अभाव अवस्था विशेष को योग संन्ना नानो दुखशब्द से विषयसुख नो है उन को ग्रहण करते है अर्थात् जिस अवस्था मे दुस का लेशमात्र भी नहीं है सोई अवस्था योग है इस से थिरचित्त होव कर निश्चय से योग अभ्यास करना अवश्य ही कर्तव्य है निर्वेट शब्द का अर्थ तो यन करने मे शैषिल्य है सोई कहा कि यनिर्विन्नचित्त होय अर्थात् शैथिल्य छोडि यत्न पूर्वक अभ्यास करै ॥ २३ ॥ सझल्प से प्रभव कहै प्रगट जो योग के प्रतिकूल कहे विरोधी वाधकरूप सकल कामना उन को पासना समेत त्याग करि के विषयों के दोप देखता हुश्या पुरुष मनके द्वारा सव धावमान इन्द्रियों को सव ओर से दमन करि के योगाभ्यास करै अथवा सर्वत्र धावती हुई इन्द्रियों को मन हीं से गेंक कर योग करै॥ २४ ॥ और नो मन पूर्व जन्म कृत कर्म के संस्कार से चलविचल होय तो भी धारणा जो धैर्य रूप बुद्धि शक्ति तिस मे स्थिर करै यह कहते है कि धारण से वशीभूत जो बुद्धि तिस से मन को यात्मा मै अच्छी तरह स्थापन करि के उपरम करै अर्थात् फोरि न कुछ चिन्तन करै परन्तु यह भी सनसनै. कहे धीरे धीरे धैर्यवती बुद्धि के द्वारा कम से हैं सो मेरे में, यो देखता है तो उस को हम अद्द नहीं और हम को वह भी "श्रीमद्भगवद्गीता । नियंग्यैतदात्मन्ये यवर्शनयेत् ॥ २६॥ प्रशान्तमनसंघ नयोगिनमुरमुत्तमं । उप तिथान्तरजसंघलभूतमकल्मषः ॥ ३७॥ युञ्जन्नेव सदात्मानयोगीरिगतकल्प सुखेननमसंसर्गमत्यन्तसुखमयुते॥२८॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानिवात्मनिः ईक्षतेयोगयुक्तात्मासर्वत्रसमदर्शनः ॥ २६॥ योममिश्यनिसर्च वसईञ्चमयिमभ्य ति। तस्याहंनमणश्यामिसचमेनप्रणश्यति ॥ ३०॥: सर्वभूतखितंयोमाभजत्येक भाषा अनुवादः मन को आत्मामे थिर करे और सहसा कहे जलंदी न करे ॥२५॥ मिरि भी को रजोगुणं वाते मन विचलित होय तो फेरि फेरि उस को अपने वश करना यह कहते हैं कि स्वभावही से चञ्चल मन धारणाको इच्छा करतेभी जो चञ्चल होय तो जिस जिस विषय में गमन करै उसी उसी विषय से सैघि करिबात्मा ही मे थिर करै ॥ २६ ॥ इस प्रकार मन श्री इन्द्री के वशकारी पुरुष को रजोगुण की क्षय होने से परे योग सुख प्राप्त होता है सोई करते है कि पूर्वोक्त रीति से जिसका रजोगुण नाश भया औ अच्छीतरह मन भी शान्त भयो है सोई माम रहित प्रक्षीण-मोह तथा ब्रममाव को प्राप्त योगी उत्तम समाधि सुख को अना याश पावता है। २७॥ अव योगीजन की कतार्थता कहते हैं कि इसी प्रकार सर्बदा मन वशीभूत फारी पुरुष जिसका सम्पूर्ण पाप दूर भया है. सोई: योगी अनायास ब्रह्मसंसर्थ अर्थात् अविद्या निवृत्तिकारी जो प्रत्याच बझज्ञान सर्वोत्तम सुख सो पावते अर्थात् जीवन्मुक्त होते हैं ॥ २८॥ बङ्गा साक्षात्कार रूप अप रोक्ष ज्ञान कैसा होता.सो देखावते हैं कि योग युक्तामा पुरुष ब्रह्म से ले खापर पर्यन्त मे समंदी सर्वभूत कहे प्राणी मात्र मे अपने को देखता चौर यायतं जीवों को भी अपने में देखता है अर्थात् अविद्यालत देहादि भेद दूर होय मह्ममय जानवान सर्वत्र समदर्गी होता है ॥२८॥ अव पूर्वोत्री ज्ञानी को गो फल होगा हैं कि साक्षात् परमे वर जो मैतिस को यावदस्तु भाव सब मे और संकल यो कुछ 1" . . अदृश्य नही अर्थात् इम प्रत्यक्ष होय समादृष्टि से उस पर अनुग्रह करते है।३०। एवम्भूत पुरुष विधि कहे कर्म के आधीन नहीं हैं कि सई भूत में वर्तमान पष्ठ अध्यायः॥ श्वमास्थितः। सर्बथावर्तमानोऽपिसयोगीमयिवर्तते ॥३१॥ अत्मौपप्येनसर्यवस मंपश्यतियोऽर्जुन। सुखंवायदिवादुःखसयोगीपरमोमतः ॥ ३२ ॥ अर्जुनउवाच । योऽयंयोगस्वयाप्रोतासाम्येनमधुसूदन । एतस्याईनपश्यामिचक्षलवास्थिति स्थिरां॥ ३३॥ चञ्चलंहिमनःकृष्णममाथिक्लदृढं । तस्याहंनिग्रहंमन्येवायोरिव मुटुष्कर॥ ३४॥ श्रीभगवानुवाच । असंशयंमहावाहोमनोनिग्रहंचलं । अन्या भापा अनुवाद जो मै तिस को एक बुद्धि कहे एक मोहिं छोड और बुद्धि नहीं है जिस के सो मेरे ही को आश्रय करि भनता है तो योगी तत्वज्ञानी सकल कर्म परि त्याग करि के सर्वथा वर्तमान कहे जीवित दशा मे भी मेरे मे माप्त है अर्थात् सायुज्य गति को प्राप्त है ॥ ३१ ॥ और ऐसे योगीजनों के बीच में जीवो पर अनुग्रह करनेवाला श्रेष्ठ है सो कहते है कि हे अर्जुन जो अपनी उपमा कहे और सब मे भी अपने समान सुख या दुख तथा प्रिय अप्रिय देखता है और सव को सुखकी इच्छा करता टुप नही देख सकता है सोई योगी श्रेष्ठ है॥ ३२ ॥ ऐसे योग के लक्षण भगवान से सुनि करि असम्भव जानि अर्जुन कहते है कि मनकी लय छौ विक्षेप शक्ति दूर करि केवल आत्माने जो अवस्थान कहे सम माव से मन का थिर हो रहना रूम योग आप ने कहा सो हे मधु सूदन मन की चञ्चलतई के हेतु हमको इस योग की दीर्घ काल अवस्थिति कहे बिर रहना देस पडता नहीं है ॥ ३३ ॥ और वही चञ्चलता को विस्तार करि कहते है कि हे कृष्ण यह मन खभाव ही से चन्चल औ प्रमाथी अर्थात् देह इन्द्रियों को विक्षिप्तकारी और वलवान कहे विचार से इसका जीतना असाध्य है तथा दृढ काहे विषयवासना से वह इस मन को विपयों से भिन्न करना अति दुष्कर कठिन है इस से जैसे आकाश मे वायु को नियल करना कठिन वैसे इस मन का भी निग्रह कहे थिर करना हम को अति असाध्य बोध होता है॥ ३४ ॥ अर्जुन की कही मन की अचलता अगीकार करि भगवान उस के निग्रह करने की उपाय कहते है कि हे महावाहो हा मन की चञ्चलता रोंकना कठिन यह जो तुम वाहते हो सो निःसन्देह ठीक है पर तो भी ह कौन्तेय अभ्यास के द्वारा ॥
थीमद्भगवद्गीता। सेनतकौन्तेयवैराग्येणचरायते ॥ ३५॥ असंयतात्मनायोगोदुप्पाप्यइतिमेमतिः । वश्यात्मनात्यतताशक्योऽवानुमुपायतः ॥ ३६॥ अर्जुनउवाच । कपति श्रद्धयोथे नोयोगाञ्चल निमानसः। अमाप्ययोगसंसिदिकागतिकृष्णागच्छति ॥ ३७॥ कश्चि नोभयविनष्टविनाम्ममिवपश्यति। अप्रतिष्ठोमहाबाहोविमटोबह्मण पथि ॥३८॥ ॥ भाषा अनुवाद मन परमात्माकार एत्ति मे विषयों की वैराग्य वशते निग्रहीत हो सके है अभ्यास से लय और वैराग्य से विक्षेप ये देानी दूर होय यह मन निरत्त होव परमात्मा कारता पाय कर विर होता है क्यो कि योगशास्त्र में कहा है कि वृत्तिशून्य मन की ब्रह्माकाराकारित रूपसिति होती है उसी को निर्विकल्पकसमाधि करते है॥ ३५॥ और संयतयात्मा को योगप्राप्ति सुलभ है यह कहते हैं कि उक्त रीति से अभ्यास औ वैराग्य के द्वारा जिस का चित्त वश नहीं है उस को यह योग टु पाप है और जिस का चित्त वशीभूत है और जो पूर्व कथित उपाय से यत्न करता है वह मेरे मन से योग प्राप्त हो सकता है ॥ ३६॥ अस्यास वैराग्य के अभाव से या और कोई प्रकार उपाय से जिसको तत्वज्ञान न भया ऐसा मनुष्य कौन फल पाय सकता है यौ किस गती को जाता है यह मन्त्र अर्जुन करते हैं कि हे कृष्ण जो मथम कमट रहित थहा युक्त होय योग में प्रवृत्त भया परन्तु तिस पीछे यत्न न किया अर्थात् अय्यास मै शिथिल कहे दोला रहा और जिसका मन विषय में मग्न रहा कहे विषय से विराग न भया ऐसा मनुष्य योग संसिद्धि जो ज्ञानरूप फल तिसको न प्राप्त होके किस रुप गति को पाय सकता है अर्थात् कौन गति को जाता है ॥ ३७॥ पूर्वोक्त प्रत्र को अभिमाय विस्तार से अर्जुन कहते है कि नतो निष्काम कर्म करि ईश्वर को समर्पण किया और न कास्य कर्म ही का अनुष्ठान किया तो स्वर्गादि फल से भी रहित हो रहा और योग पी असम्पन्नता कहे अपूर्णता से मोच भी न मिली तो फेरि हे महा पाहो बाइ अप्रतिष्ठित कहे प्रतिष्ठा रहित मनुष्य दोनो घोर से मष्ट होय छिना मेघ के समान क्या नष्ट तो नहीं होता है जैसे मेघदल से भिन्न भया मेध और मेव को न प्राप्त होय के अन्तरीक्ष ही मे विलाय लाय है ॥ ३८॥ जिस से आम Sha पष्ठ अध्यायः। ६१ एतन्मेसंशयंकृष्णछेतमहस्यशेषतः। त्वदन्य संश्यसास्यछेत्तानह्युपपद्यते ॥ ३८ ॥ श्रीभगवानुवान। पार्थ नैवेहनामुनविनाशस्तस्यै विद्यते। नहिकल्याणकत्कचि हर्गतिंतातगच्छति ॥ ४०॥ प्राप्यपुण्यकृतालोकानुमित्वाशाश्वतोःसमाः। शुचीनां थीमतांगेहेयोगमष्टोऽभिजायते ॥४१॥ अथवायोगिनामैयालेभवतिधीमता । एत विदुर्लभतरलोकेजन्यदीदृशं ॥ ४२ ॥ तवतंबुद्धिसंयोगलभतेपौ दैहिकं । यत भापा अनुवाद 1. - सर्बज हो इस से श्राप को छोड़ और कोई इस हमारी संशय का दूर करने वाला नहीं है अर्जुन यही कहते है कि हे कृष्ण मेरी इस सन्देह को आप ही छेदन करने के योग्य हो और शाम के विना दूसरा इस सन्देह का निष्पत्ति कर्ता नही है सो इस सन्देहको कृपा कर मेरे मनसे दूर करो॥३६॥ अर्जुन की इस मन का उत्तर श्रीमगवान साढ़े चारि झोक से कहते है कि हे पार्थ उस यधूरे योगाभ्यासी को योगमष्ट होने से यह लोक नाश कहे इस लोक मे पातक और परलोक मे नरक माप्ति ये दानो भी नही होय है जिस हेतु किसी कल्याण कृत कहे शुभ प्राचरण करनेवाला पुरुष तात कहे हे भाई अर्जुन दुर्गति को नहीं प्राप्त होता है तात शब्द से लोक रीति देखावते भये भगवान ने लेह पर्यक अर्जुन को सम्बोधन करि के कहा है ॥ ४० ॥ तो फेरि वे योगमष्ट लोग किस गति को जाते हैं इस अपेक्षा पर कहते है जिस खर्ग आदि लोक को अश्वमेध आदिक यन्न करि के मनुष्य जाते है पुन्यकर्मकारी योगधष्ट पुरुप भी उसी उत्तम दोक मे जाय कर बजत बरस तक वहां वसि सुस भोग करि के फेरि सत् कर्मकारी धनी लोगों के घर मे श्राय जन्म ग्रहण करते है ॥४१॥ थोडे दिन योगाभ्यास करि के योग से मष्ट भये हुये पुरुष की गति कहि चुके थप बहुत काल अभ्यास कर के बष्ट हुये योगी की गति कहते हैं कि अथवा सत्पात्र धनियों के घरं जन्मलेने से और जो दरिद्र बुद्धिमान योगाभ्यासियों को कुल मे जन्म ग्रहण है सो उत्तम है ऐसा जन्म लोक मे अति दुर्लभ है सो चिरकाल योगाभ्यासी योगबष्ट होय ऐसे ही घर मे उत्पन्न होते है ॥४२॥ सोई जन्म ग्रहण के वादि क्या होता है यह डेढ झोक से कहते है कि हे कुरु १२ थीमवगवद्गीता। तेचततोभूयःसंसिद्धौकरुनन्दन ॥४३॥ पूर्वाग्यासेनतेनैवक्रियतेह्यवशोऽमिसः । जिज्ञासुरपियोगस्यशब्दममातिवर्तते ॥ ४४॥ प्रयत्नात् यतमानस्तुयोगीसंगहकि लिपः। अनेकनन्मसंसिइसतोयातिपरांगति ॥ ४५॥ तपखिस्योऽधिकोयोगी ज्ञानीग्योऽपिमतोऽधिकः । कर्मियश्चाधिकोयोगीतस्माद्योगीभवार्जुन ॥ ४६॥ भाषा अनुवाद नन्दन तेई दानो प्रकार के योग बष्ट लोग जन्म धारण करिके भी पूर्व देह के अभ्यास से ब्रह्म विषयक बुद्धि संयोग युक्त होते है और फेरि भी मोच की सिद्धि के लिये अधिक यत्न करते है॥४३॥ वह पूर्व देह का बुद्धि संस्कार कैसा है और उस का कारण यह है कि सोई पूर्व देह की अभ्यास से अवश अर्थात् जो कोई कारण या विघ्न वलते इच्छा न भी होय तो भी मोक्ष सिद्धि के अर्थ पूर्व संस्कार के जोर से अवश की नाई यत्न करते है अर्थात् विषयो से विमुख हो महानिरत होते है। और इस तरह पूर्व अभ्यास के कारण से मुक्ति को अर्थ यत्रकारी मनुष्य जिस क्रम से मुक्त होते है सो कै मुक्तिक न्याय से डेढ झोक के द्वारा कहते है कि जिज्ञासू कहे योग खरूप जानने की इच्छा करने वाला कुछ केवल योग ही को नहीं माप्त होता किन्तु योगमसिद्ध मनुष्य माम पगते योगमट होय भी शब्द ब्रह्म जो वेद तिस को अति वर्तन करता अर्थात् वेदोक्त फल की अपेक्षा अधिक फल को प्राप्त होय के फेरि मुक्त होता है। इतना ही नहीं इससे भी अधिक इस को कै मुतिकन्याय कहते है॥४४॥ जिस हे मन्द यत्न कारी योगी ठगति प्राप्त होते है तो उत्तरोत्तर योग में अधिक यत्न करते वै योग से निःपाप होय अनेक जन्म संचित योग से संसिद्ध अर्थात् सम्यक ज्ञानी होय श्रेष्ठ गति पावेंगे इस मे और कुछ कहना या सन्देह वा की है। सोई कहा कि अच्छी इरह से यत्न करता योगी तो संशुद्द किलिप नि.माप अनेक जन्म से सम्यक सिद्ध होय फेरि परमगति को याता है॥४५॥ जिस कारण ऐसा है कि कच्छचान्द्रा यण यादि तपमे निरत औ शास्त्रसे जो ज्ञानी इनसे भी योगी अधिक है तथा यज्ञ कुवा ताल वागदान कर्मकारी नो कर्मी पुरुषतिससे भी अधिक है हमारे मत- में योगी इससे हे अजून योगी होउ ॥ ४६॥ योगियों के मध्य अर्थात् यम नियम .
'पिठ अध्यायः ।
योगीनामपिसापांमहतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान्भजतेयोमांसमेयुक्ततमोमतः ।
४७॥ इति थीभगवद्गीतायां योगशास्त्रनाम पठोऽध्यायः ॥ ६॥
भाषा अनुवाद
मरायण लाँगों के बीच मे मेरा भक्त हो श्रेष्ठ है यह कहते हैं कि मैं जो परमेश्वर
सो महत अर्थात् मेरे मे मन लगय थद्धा से जो हम को मनै है मेरे मत मे सोई
श्रेष्ठ इस से अर्जुन: तुम मेरे भक्त होउ। श्रीधर खामी प्रभु को प्रणाम करते हैं
कि परमानन्द भक्त सेविंत लक्ष्मीपति की मै वन्दना करता हूं जिसने भक्तियोग
'शिरोमणि रूप यात्मयोग उपदेश किया है॥४७॥ इति जगान्नाय सुल विरचित
मनभावनी टीकायां योगशास्त्रनाम पठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
श्रीमद्भगवद्वीता सप्तम अध्यायः 1 श्रीभगवानुवाच। मव्यासक्त मनाःमार्थयोंगयुजन्मदाययः संध्यं समग्रं मायथाज्ञास्यत्तितच्छृणु ॥१॥ जानतेऽहंसविज्ञानमिदं यच्यास्यशेपतः। यता खानेहमयोऽन्य ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥३॥ मनुष्याणांसहसेषुकश्चिद्यततिसिद्धये। भाषा अनुवाद अब इस अध्याय मै भजनीय ईश्वर का खरूप कहते हैं कि जो पूर्व अध्याय के अन्त में कहा कि मदात्मक होय जो मेरी भजन कर है सो उत्तम है इस पर जो कहो कि सो भगवान कैसे हैं जिन की भक्ति करना चाहिये इस अभिप्राय पर अपने खरूप का निरूपण करने के अर्थ श्रीलण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन मेरेमे निसका मन लगा है और मैहीं है। अवलम्ब जिसके ऐसा अनन्य शरणागत' भक्त होय, योगाभ्यास करनेके अनन्तर संभय रहित समग्र कहे विभूति बल ऐश्वर्यः सहित मेरे रूपको जैसे जानिसकैगा सोई मेरे वचन तुम मन दे थवण करो॥१॥ अब भगवान जी आप कहते हैं उसी की प्रशंसा करते हैं कि विज्ञान जो अनुभव और ज्ञान जो शाखसे मेरे विषयमे होता है ये दोनो मै हमारे मति कहंगा जो जानि के मुक्तिमार्ग:मे भारुड़ पुरुष को और फेरि कुछ जानना बाकी नहीं रहता है इसी से वे ऋथारय' होते हैं ॥ २॥ इमारी भक्ति बिना हम जानने सकै यह अति दुर्लभ है सोई कहते हैं कि असंख्य जीवों के मध्य में मनुष्य छोखि और किसी को मोक्ष के विषय में प्रवृत्ति नहीं होती है और हजार मनुष्य के वीच कोई एक पुन्य के प्रभाव से आत्मज्ञान के हेतु यत्न करता है ऐसे ही.यान .
सप्तम अध्यायः। ६५ यततामपिसिद्धानांकचिन्मांवेतितत्वतः ॥ ४॥ भूमिरापोऽनलोवायुःखमनोबुद्धिरे बच। अहङ्कारतीयमभिन्नाप्रकतिरटधा॥ ४॥ अपरेयमितस्वन्यांमतिवि विमेऽपरां। जीवभूमिहावाहोययेदंधार्यतेजगत् ॥ ५॥ एतद्योनीनिभूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहंकृत्स्यनगतःप्रभवःप्रलयस्तथा ॥६॥ मत्तापरतरनान्य भाषा अनुवाद कारी हजार के मध्य कोई एक अति उत्तम पुन्य वशते अपने को जानि शक है और ऐसे आत्मज्ञानी हजार के बीच मे कोई एक मेरी कमा से परमात्मा स्वरूप मुझे यथार्थ रूप मे जान है सोई अति कठिन ज्ञान हम तुम से कहेगे ॥ ३ ॥ इन बातोंसे श्रोता अर्जुनको उत्साहयुत्ता करके अव प्रति जो माया तिस के द्वारा सृष्टि आदि का कर्तृत्व जो अङ्गीकार किया है ईश्वरल उस का निरूपण उत्तन अधम भेद क्रम से दो लोकके द्वारा कर्त है कि भूमि आदि शब्दो पञ्चभूत और मन शब्द से मन का कारण रूप अहङ्कार तथा बुद्धि का कारण महत् तत्व औ अहङ्कारको कारणभूत जो अविद्या कहे अज्ञान इस प्रकार से मेरी प्रकृति माया पाठ प्रकारकी है अथवा पंचमतसे 'रूपादि पंच मावा और अहङ्कार से कार्यरूम इन्द्रीय औ मन बुद्धि ये आठ प्रकार जानो यद्यपि इहां चौविश भेदों को इन पाठ के अन्तर्भूत करिके मायाके आठ ही प्रकार कहाहै तो भी जो तेरहवां क्षेवाध्याय 'तहां प्राति के चौविश ही तत्त्वरूम विभाग कहेगे॥ ४ ॥ अपर कहे पाठ प्रकार निकट प्राति कहि कै अव पर कहे उत्कृष्ट प्रकृति को कहते है कि हे महाबाहो या पूर्व कही जो अष्ट प्रकार की प्रकृति सो अपर कहे निकृष्ट है क्योंकि वह जड़ औ उत्तम प्रकृति के अधीन है किन्तु और पर कहे उत्कृष्ट मेरि प्रकृति व्यवहारिक नीवखरूम इस महति से भिन्न जानो जो इस नगत् को धारण करती है अर्थात् इस के उत्कृष्टता मे कारण यह है कि क्षेवनरूप वही चैतन्य शक्ति कर्तृक खकर्मके द्वारा यह संसार स्थित है ॥५॥ 'मलति के पर औ अमर ये दो भेद देखाय के अव प्रकृति के द्वारा सृष्टि आदि के आप ही कारण है सो कारणत्व कहते है कि हे धनञ्जय क्षेत्र कहे शरीर औ क्षेवन कहे जीव यह जो दो प्रकार की प्रकृति है योनि कहे कारण जिन का 1 ६६. श्रीमद्भगवदोता। किञ्चिदस्तिधनञ्चयः। मथिसर्वमिदंगोतंसूत्रेमणिगणाइव ॥ ७॥ रसोऽहमपस कौन्तेयप्रभाऽस्निगशिसूर्ययोः। प्रणव सर्व वेदेपुशब्दःखेपौरुषनृषु ॥.८..., पुग्यो गन्धःधिव्याञ्चतेनचास्मिविभावसौ । - जीवनं सर्वभूतेपुतपञ्चास्मितमविपुः ॥ वीजमांसर्वभूतानांविडिपार्थसनातनं । बुद्धिबुद्धिमतामस्मितेजस्तेजखिनामहं ॥१० - भापा अनुवाद ऐसे स्थावर जङ्गम यावत भूत. इसी कारण से उत्पन्न है यह जानो.. और विशेष यही है कि जड़रूप निकृष्ट प्रकति देहरूप अनेक रूप पावती है. और मेरा अंश जो चैतन्य सो भोक्तारूपं शरीर में प्रवेश कर के अपने कर्म के अनुसार अनेक देह धारण करता रहता है और यह प्रकृति हमी से उत्पन्न है इस कारण से सम्पूर्ण जगत के प्रभव कहे उत्पन्न करनेवाले नौ मलय कहे संहारकर्ता भी हम हीं है.॥६॥ सो हे धनञ्जय इसीसे हमसे भिन्न और कोई भी जगत की सृष्टि औ संसार का श्रेष्ठ स्वतन्त्र कारण नहीं है और स्थिति के ही हेतः हम हैं यह कहते हैं कि मेरे ही मे समस्त जगत ग्रथित है जैसे सूत मे मणिगण रहते यो कमड़े मे सूत, ओत प्रोत रहते हैं॥ ७॥; इस लीक में ले पार पांच लोक तक जगत की स्थिति का कारण विस्तार करि कहते हैं कि हे. कुन्तीपुत्र अर्जुन, जल मे रस रूमौ चन्द्र सूर्य मे प्रकाशरूप और वेद मे मूलभूत प्रणव, ओंकाररूम में ही हं तथा आकाशमे शब्दरूप श्रौ.पुरुपोंभे पौरुष कहे उद्यमरूप भी मै ही यह जानो ॥८॥. और पवित्र गन्धरूप माला एघिवी.मे, और तेजरूम, अग्नि मे तथा जीवनरूप सर्व भूत कहे प्राणियोंभे, औ तपखियोंमे तमरूप मैहीं है अर्थात् मेरी की विभूषि, है॥६॥ और हे पार्थ सावर जङ्गमः जो कुछ भूतमात्र है. उस का सनातन कहे उत्तरोत्तर समस्त कार्य मे अनुग़त कई प्राप्त अनाशी बीजरूम हमें जानो अर्थात् समान जातीय कार्य उत्पादन सामर्थ्य रूप जो कारण सो भी मेरी ही विभूति जानो परन्तु सामान्य वीज जैसे अंकुर होने पर नष्ट होते हैं. से मेरा विभूतिरूम वीन नाश नहीं होता. इसी से सनातन है और बुद्धिमानो की बुद्धि कान्हे विवेकशकि मैहीं हो चौर तेजस्थियों में तेज कहे प्रगल्भता प्रलापरूप भी महीं यह जानो ॥१०॥ और काम राग विवर्जित अर्थात् काम कहे अमान A सप्तम अध्यायः। वलंवलवतांचाहंकामरागविवर्जितं। धर्माविरुडोभूतेपुकामोऽसिमभरतर्षभ ॥११॥ येचैवसात्विवाभावाराजसातामसाधये। मत्तएवेतितान्वितिनलईतेपुतेमयि ॥ १२॥ विभिर्गुणमयैर्मावैरेभिःसर्वमिदंजगत् । मोहितनाभिजानातिमामेभ्यः परमव्ययं ॥ १३ ॥ दैवी पागुणमयीमममायादुरत्यया। मामेवयेमपद्यन्तेमाया भाषा अनुवाद विषय मे अमिलाप खरूप जो रजोगुण का कार्य इच्छा और राग कहे अभि लपित अर्थ मायके उस से भी अधिक के अर्थ नो चित्त का अनुराग कहे तमो गुण का कार्य टप्णारूप इच्छा है इन दोनो को छोडि और यावत वलवानो का बल भी मैहौं अर्थात् सात्विक खधर्मानुछान की सामर्थ मै हं और हे भरतर्षभ भरत वंश मे थेष्ठ अर्जून धर्म अविरुद्ध अर्थात् सभार्या मे पुबमाव उत्पन्न के अर्थ उपयोगी नो काम भोग सो भी मैहीं इधर्म अविरुद्ध कहने से बध आदि काम का निषेध आया ॥ ११॥ और जो सात्त्विक भाव अर्थात् शम दम आदि और राजस भाव कहे हर्ष गर्व धादि यौ तामस भाव जो शोक मोहादि ये सब प्राणी मात्र को स्वकर्म वशते जन्मे है सो मेरे से उत्पन्न जानो जिस हेतु वै मेरी माया के तीन गुणों के कार्य है किन्तु तो भी उनमे हम वर्तते नहीं अर्थात् जीव के समान गुणों के अधीन होते नहीं वलु ये गुण मेरे अधीन होय मेरे में रहते है सोई कहा कि वे मेरे में है और मै उनमे नहीं यह हो जैसे संसारी मेरे अधीन है यह नानो ॥ १२॥ जो कहो कि ऐसे परमेश्वर को किस कारण से लोग नहीं जानते है इस पर कहते है कि पूर्वान यहो तीनि प्रकार काम लोम आदि गुण विकार खभाव वशते अविवेकाता को प्राप्त प्राणी मोहित होय हम को नही जानते हैं और ग्राम कैसे है इस अपेक्षा से कहते है कि हम ये तीन भाव से पर कहे संस्पर्श रहित और इन सव भावो के नियन्ता इसीसे अव्यय कहे निर्विकार मै ह॥ १३॥ जो कहो कि तुम को फेरि कौन जानने शक इस पर कहते हैं कि दैवी कहे अद्भुत औ सत्व यादिगुणविकारात्मक मेरी शक्ति जो दुस्तर माया है इस को जो अव्यभिचारिणी भक्तिसे हमै मनै सोई हामारी माया के पार होके हम को जानि पकै है ॥ १४॥ तौ फेरि सव मनुस्य तुमको २० श्रीमद्भगवद्गीता। भेतांपरन्तिते ॥ १४ ॥ नांदुष्कृतिनोमूढाःप्रपद्यन्तेनराधमाः । माययापहृतमा नापासुरंभावमाथिताः ॥ १५॥ चतुर्विधाभजन्तेमांजना मुक्ततिनोऽर्जुन । श्री तौजिज्ञासुरार्थीजानीचभरतर्षभ ॥ १६ ॥ तेषांजानीनित्ययुक्तएकमक्तिविभि प्यते। मियोऽहितानिनोऽत्यर्थमहंसचममप्रियः ॥ १७॥ उदाराःसर्व एवैतेन्ना भापा अनुवाद काहे नहीं भजते है जो यह कहो तो उत्तर मुनो कि मनुष्यों के मध्य मे ना अधम है तेई मेरी भजन नहीं करते है कारण यह कि वे लोग पामपरायण औ मायासे अपहृतञान अर्थात् शास्त्र या प्राचार्य के द्वारा ज्ञान होनेसे भी पै उनको निरस्त कहे निरादर करता है और सोरहें अध्याय मे चौथे श्लोका से कहेगे जो अासुर भाव उस को प्राप्त होय मेरी भक्ति नहीं करते है ॥ १५॥ सत्कर्मकारी मनुष्य ही मेरी भजन करते है और वै भी पुण्यके न्यून अघि वशते चार प्रकार के हैं मोई कहते है कि हे अर्जुन जो पूर्व जन्म अवधि पुन्यवान है तेई हम को भजते है चारि प्रकार के भक्त ये है प्रथम भातुर कहे रोगग्रस्त दूसरा जिज्ञासु कहे आत्मज्ञान की इच्छा है जि सै तीसरा अर्थार्थी अर्थात् लोक या परलोक का भोग साधन का अर्थाकांची चौथा ज्ञानी है पर ये चारो पूर्व पुण्य के प्रभाव होने से भजते है नहीं तो और और देवतों की भक्ति कर अपना काम निकारलेते पर यह काम नहीं है ॥ १६ ॥ परन्तु इनके मध्य मे जानी भात श्रेष्ठ है सोई कहते है कि ज्ञानी पुरुष नित्ययुना अर्थात् सर्वदाही मेरे मे निछ रहता है और केवल हमारा ही एक भत्ता और ज्ञानी को शरीर आदि मे वह बुद्धि का अभाव रहने से मनको विशेष शक्ति के प्रभाव से नित्य युतात्व उस को है और इस ज्ञानी को हम अत्यन्त प्रिय है और वह सी हम को अति प्रिय है इन कारणों से जानी भक्त उत्तम है॥ १७॥ तो क्या वाकी तीनि प्रकार के भक्त संसार गति को प्राप्त होते है ऐसी शङ्का को वारवार निषेध करि कहते है कि नहीं नहीं भतभी उदार कहे महान है अर्थात् मोक्षणावने के योग्य है परन्तु मेरी यह अभिप्राय कि जानी मक्त मेरा ही स्वरूप है जिस हेत बह मदेकचित्त है इससे सर्वोत्तम गतिरूप हमको ही आयय करके और कोई फल की इच्छा नहीं रख सप्तम अध्यायः। नीत्वात्मैवमैमतं। आखितःसहियुक्तात्मामामेवानुत्तमांगतिं ॥१८॥ वहनांजन्मना मन्तेनानवान्माप्रपद्यते। वासुदेवःसर्वमितिसमहात्मासुदुर्लभः ॥१६॥ कामैस्सैस्सै हृतनाना प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः । नियममास्थायप्रकृत्यानियताःखया ॥ २० ॥ योयोयांयांतनु भन्नाःश्रद्धयार्चितमिच्छति । तसतसाचलाथद्धांतामेबविदधाग्यह ॥ २१॥ सतयाथइयायुक्ततसावाधनमीहते। लभतेचतताकामान्मयैवविहि ताहितान् ॥ २२॥ अन्तवत्तुफलंतेपांतनवत्यल्पमेधसां। देवान्देवयजोयान्ति भाषा अनुवाद ता है ॥ १८॥ ऐसे भक्ता अति दुर्लभ यह कहते हैं कि अनेक जन्मसे कुछ कुछ पुण्य संचित कहे इकट्ठी होने से शेप जन्ममे तत्त्वज्ञानी होयकर यह जो चरा चरात्मक कहे स्थावर नगम रूप ब्रह्माण्ड सो सम्पूर्ण एक वासुदेव माव है इस प्रकार सर्वत्र आत्म दृष्टि के द्वारा हमको भजता है अमरिछिन्न कहे अवाधित दृष्टिसे ऐसा महात्मा जानी दुर्लभ है ॥१६॥ सतो गुणी कामना करिकै जो मनुष्य परमेन्चर ही को भनते है तो कामना प्राप्त होय क्रम से मुक्त होते हैं परन्तु रजोगुण तमोगुण का आलम्बन कर के कामना के वश होय और २ देवतों का उपासन करते है तेई संसार गतिको पावते है इस लोकसे चौथे लोक तक कच ते है कि जो पुव कलब धन शत्रुनाश आदि मनोरथ से हतयुति होय भूत प्रेत पिशाच यक्ष छुद्र कहे नीच देवतो को पूजते है वे नियम उपास पलिदान अङ्गी कार करिके अपनी कामना की वासना के वश होय मकृत्या कहे स्वभावही से उन देवतो की सेवा करते है॥ २० ॥ भक्तो के बीच जो जो भक्त मेरी मूर्ति विशेष को याने जिस मूर्ति को अर्थात् देवता रूपको यहासे पूजनेमे प्रवृत्त होते है उसी उसी भक्त की भावना के अनुसार वह उन की इच्छा अन्तर्यामी रूम से मैं पूरी कर्ताहौ अर्थात् सोई मूर्ति धारण कर उनका दूष्ट सिद्ध करता है ॥२१॥ सो भेरा भक्त उस अपनी यहा से उसी देव की पूजा करता है.और बामनों को पाता है पर वे कामना मैही देता इंगयों कि मै सर्व देवमय हौ और देवता अब कहते है कि यद्यपि देवता मेरी ही मूर्ति है और उनकी पूनाभी मेरी ही पूना है तथा कर्म फलदाता भी हम ही हैं पर तौमी मेरे आधीन हैं ॥ २२॥ - श्रीमद्भगवद्गीता। मजतायान्तिमामपि ॥ २३ ॥ अव्यक्तंव्यक्तिमापन्नंमन्यन्तेमामबुद्धयः । परंभायम नन्तो व्ययमनुत्तम ॥ २४ ॥ नाहंप्रकाशःस मायासमाहतः । मढ़ों ऽयं नाभिजानातिलोकोमामजमव्ययं ॥२५॥ वेदाईसमतीतानिवर्तमानानिचार्जुन । भविष्यानिचभूतानिमान्तुवेदनंकञ्चन ॥ २६ ॥ इच्छाद्देपस मुत्येनहन्दू मोहेनमा भाषा अनुवाद अल्प बुड़ियों को अन्तवन्त कहे विनाशी फल होता अर्थात् खर्ग आदि सांसारिक सुख कुछ. दिनके लिये होता है क्यों कि साक्षात् मेरी उपासना नहीं किया है, और जो निस देवता को आर) है.सो उसी को प्राप्त होता और मेरे भक्त जन्म नाश रहित हो करके मेरे 'ही को प्राप्त होते हैं ॥ २३॥ और जो ऐसी शङ्का करो कि ध्यान पूंना यादि प्रयत्न तो समान है और फल में वैपग्य कहे बड़ा अन्तर है तौ फेरि सर्व देवतों को त्यागकरि तम ही को क्योंन सय भनें इस पर कहते हैं कि अल्प बुद्धि मनुष्य प्रपञ्च रहित हम को मत्स्य कूर्म खम ठहराते इसका कारण यह है कि वे लोग मेरे येष्ठ रूम को नहीं जानते हैं. सोई रूप प्रकाशित करते हैं कि जो अव्यय कहे नाश रहित और जिससे और उत्तम नहीं हैं परन्तु संसारको रक्षाके अर्थ लीलासे उत्पन्न विशुद्ध सत्त्व प्रधान जो मै तिसको कर्मसे उत्पन्न भौतिक कंहे प्रञ्चभूतमय देहधारी और देवता की नाई मानिक हमारे प्रति अधिक आंदर नहीं करते हैं बलु शीघ्र फलदाता और देवतोंको भालते हैं वेई ‘अन्तवन्त फल पावते हैं ॥ २४ ॥ मूढ़ लोगों के प्रज्ञान मे कारण कहते हैं कि उन लोगों के सामने हम प्रगट नहीं होते परन्तु अपने भक्तों सामने प्रगटे होते. हैं क्यों कि मूढ़ लोग मेरी योगमाया से भारत है तो फेरि कहो कैसे अव्यय सरूप को जानि शकै ॥ २५॥ मेरे सर्वोत्तम स्वरूपको अज्ञानी लोग नहीं जानते यह जो पूर्व में कहा साई सं खरू को उत्तमता यौ अनाहत ज्ञान रूपसे देखावते हुये औरों की धजानता कहते हैं कि जिस हेतु हे अर्जुन इम भायाके यांचय है इसमे भूतकाल वर्तमान कार औ भविष्य तकाल इन तीनों काल के पत्तों चराचर संव हम जानते है क्यों कि माया अपने आश्रय को मोह नहीं कर सकती हैं परन्तु मेरो माया से मोहित कोई भी मैं नहीं जानिश 3:49 सप्तम अध्यायः। रत। सर्वभूतानिसम्मोहंसर्गेयान्तिपरन्तप ॥२७॥ येषामन्त मंजना नांपुण्यकम्र्मणां । तेइन्ट्रमोहनिर्मुक्ताभजन्तेमाह बताः ॥ २८॥ जरामरणमोक्षा यमामाथित्ययतन्तिये। तेव्रह्मातद्विदुःकतनमध्यात्मकर्मचाखिलं ॥२८ . साधि भताधिदेवमांसाधियन्नञ्चयेविदुः । मयाण कालेपिचमांतेविटुर्युक्तचेतसः॥३०॥ इति .. . भापा अनुवाद हैं माया अपने प्रायय के अधीन तथा औरोको मोहती हैं यह प्रसिद्ध है॥ २६ ॥ माया से मोहित जीवों को परमेश्वर विषयक ज्ञान का अभाव जो कहा सोई अज्ञान की दृढ़ता मे कारण कहते हैं कि हे भारत सृष्टि कहे स्थूल देह धारण होने से जो देश के अनुकूल विषय मे इच्छा और उस देह के प्रतिकुल में जो इप और उन दोनो इच्छा यो क्षेप से उत्पन्न जो सुख दुख आदि तिससे भया जो विवेक का नाश इस से प्राणी मोह को प्राप्त है अर्थात् हम सुखी हम दुखी ऐसी निश्चय रखते हैं इसी से ये अज्ञानी हम को नहीं भजते हैं ॥२७॥ . ती फेरि कोई कोई नो तुमारी भनन करते है इस शङ्का मे कहते हैं कि ना पुण्य कर्म आचरण घोल है उन के सर्व प्रतिवन्धक खरूप सव पाम नष्ट हो गये हैं मैं लोग सुख दुख आदि इन्द्र से मुक्ता औ एकाग्रचित्त हाय हम को भजते है ॥२८॥ और ऐसे जो मेरे भक्ता जन तेई जानने जोग वस्तु को अच्छीतरह जानि के कतार्थ होते.हैं यह कहते हैं कि जरा भरण निवारणार्थ मेरी आश्रय ले. जो मनुष्य यह करते हैं वेई परमहा को जानि शक हैं और सम्पूर्ण अध्यात्म विद्या जानै है अधोत् अध्यात्मज्ञान से प्राप्तव्य सोई देहादि से भिन्न शुद्ध आत्मा को भी जानते हैं और तत्त्वज्ञान के साधनरूप कर्म भी नानि थकते हैं ॥ २८ ॥ और ऐसे मेरे भक्तों को योग से मष्ट होने की शङ्कन नहीं है यह इस लोक से कहते हैं कि अधिभूत. अधिदैव अधियन्न सहित जो हम को जानते हैं बेई भदासक्त चित्त मरंण समय में भी हम को नानि शक हैं उस वेला भी व्याकुल होय जो हम को नहीं भूलते है इससे मेरे भक्त को योगभ्रष्ट होने का डर नहीं है। थींधरखामी अध्याय भरका अर्थ कहते हैं कि कृष्णके मनही या ज्ञानलाभ करते यही विज्ञानयोग नामक सप्तम अध्याय भगवान ने प्रकाशित किया है॥ ३० ॥ २७ श्रीमनगवीता अष्टम अध्यायः । अजनउवाच। किन्तब्रह्मकिमध्यात्मकिंकर्मपुरुपोत्तम। अधिभूतञ्चकिमी तमधिदैवंकिमुच्यते ॥१॥ अधियन्न कर्थकोऽत्र देहेत्तिान्मधुसूदन । प्रयाणका लेचकन्नेयोऽसिनियतात्ममि ॥२॥ श्रीमगवानुवाच । अक्षरंपरमंबाखभावोऽ भाषा अनुवाद सप्तम अध्याय मे जो संक्षेप से कहा कि भगवद्धजन मे एक चित्त भक्तजन ब्रह्म फर्म औ अधिभत अादि सात पदार्थ जानि सके है सोई सप्तम अथाय में नो कहा ब्रह्मकर्मादि तिस को भगवान अष्टम अध्याय मे प्रकाशरूप से कहेगे सो यह कि सतये अध्याय के अन्तमे प्रसङ्गवशते भगवान ने कहा जो ब्रह्म औ अध्यात्म सात पदार्थ तिनके जानेछुक अर्जुन दो लोक से प्रश्न करते है कि हे पुरुषोत्तम ग्राम ने कहा जो मम सो किस रूप का है और अध्यात्म ही वा किस प्रकार का जाने) तथा कर्म ही वा क्या है और अधिभूत या अधिदैव किस को कहते है यह प्रश्न अर्जुनने किया ॥ १॥ और शरीर के द्वारा जो यज्ञादि कर्म किये जाय हैं उन का अधियन कहे अधिष्ठाता और कर्म फालदाता कौन है अब अधि यज्ञ का खरूप पूछि करके उस का अधिष्ठान भूत वस्तु पूछते है कि हे मधुसूदन यह अधियन्न पुरुष इस देह मे किस प्रकार से स्थित हो के अनादि कर्मों का नियोग कहे.अवधारण अथात् प्रमत्त चौर यन फल प्रदान करते हैं और अन्तकाल में संयतचित पुरुप तुमको किस उमाय से जानते है। यहां यन्न शब्द मे सब कर्मों का ग्रहण है यह बानो ॥ २ ॥ श्रीकृष्ण भगवान इस शोक से ले कर तीन लोक के द्वारा अर्जुन की प्रत्येक प्रश्न का सिद्धान्तरूम उत्तर ॥
अष्टम अध्यायः । ध्यात्ममुच्यते। भूतमायोड़करोविसर्ग कर्ममंन्नितः ॥ ३॥ अधिभूतक्षरोमावः पुरुषाधिदैवतं । अधियज्ञोऽहमेवाबदेहेदे हामताम्बर ॥ ४ ॥ अन्तकालेचमा भाषा अनुवाद कहते है कि न चरति गच्छति इति अक्षरं अर्थात् निस का गमन औ आगमन नही है सोई अक्षर ब्रह्म है जो कहो कि जीव चैतन्यमी अचर होय न काहे तो कहते है कि नहीं देखो जो परम अक्षर कहे जगत का मूल कारण है सोई ब्रह्म जानो क्यों कि श्रुति मे भी कहा है कि हे गार्गि वेद इसी ब्रह्माण्ड ही को सोई अह्म कहते है यह वात प्रसिद्ध है और उसी ब्रह्म का अंश जो जीव रूम होने से नाम स्वभाव और देह आदि अङ्गीकार करिके भोक्ता रूप से वर्तमान है वह जीवही अध्यात्म कहा है और भूत कहे जरायज आदिकों की उत्पत्ति और उगब शब्द का यह अर्थ है कि सूर्य से वर्षा वर्षा से अन्न औ अन्न से क्रम से मना इन उत्तमरूम जो दृधि सो भूतो का भाव और उनवकारी नो विसर्ग अर्थात सर्व कर्म का उपलक्षरूप देवतो को उद्देश करि द्रव्य त्यागरूप जो यन्न सोई कर्म है ॥३॥ और घर कहे विनश्वर जो देह यादि सोमाणी मात्रको अधिकार कर के स्थिति करै है इससे अधिभूत कहावै है और पुरुष कहते है सूर्य मण्डलवर्ती विराटको जो अपने अंशरूम समस्त देनतोके अधिपति है वेई अधिदैव है अधिदैव कहते अधिष्ठात्री देवताको यह युतिमे कहा है कि सोइ विराट पुरुष प्रथम शरीरधारी | सकल भूतोंके आदि कर्ता औ ब्रह्माके भी पूर्व वर्तमान थे और इस शरीरमे अन्त र्यामी रूप से वर्तमान हम को अधियन कहे यन्न की अधिष्ठात्री देवता तथा कर्म फलदाता नानो इस से अधियन्न किसरूप खिति करते इस प्रश्न का उत्तर मया क्यों कि यही अन्तर्यामी की असन यादि गुण के द्वारा जीवके साथ भिन्नता पूर्वक देह के वीच वर्तमानता लोक मे प्रसिद्ध है सो थुति भी कहती है कि मित्रता भावसे एक स्थानमे रहने वाले जो जीव औ अन्तर्यामी रूप ये दोनो सुन्दर मच युक्त पक्षी शरीररूम एक दृक्ष पर स्थिति किये है तिनके मध्य एक फल भोगी यौ दूसरा साक्षी माव कहे देखनेवाला है और हे देहम्मनावर नरश्रेष्ठ अर्जुन इस सम्बोधन से यह जनाया कि तुमभी अपनी प्रवृत्ति रूप कर्मो की अन्वय व्यतिरे १०३ श्रीमद्भगवद्गीता। भैवस्मरन्मुक्वाकलेवर। ययातिसमझायातिनास्त्यत्र संशयः ॥ ५ ॥ ययापि स्मरन्मावत्यजत्यन्तेकलेवर। तमेवैतिकौन्तेयस दातद्भावमावितः ॥॥ तस्मात सर्वेषुकालेयुमामनुस्मरयुष्यच । मध्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यससंशयः ॥ ७॥ पम्या भाषा अनुवाद - व कानुरूप अर्थात् परस्पर सम्बन्ध और मिन्नरूपसिद्धि प्रसिद्धि में वही अन्तर्यामीके अधीन हौ तौ सुतरां अन्वयव्यतिरेक के द्वारा इस अन्तर्यामी को तुम आप जानवे योग्य हौं ॥४॥ और तम अन्तकाल मे कैसे जाने जाते ही इस विषय मे अन्त समय ज्ञानकी उपाय यौ उसका फल देखावते. है कि उक्त जो अन्तर्यामी स्वरूप पो परमेश्वर मै सो मेरे की स्मरण पर्वक देह त्याग करके जो प्रष्ट रूप से धर्चिरादि कहे सूर्य मण्डल में होय के उत्तरायण राहसे गमन करते मेरे खरूप को प्राप्त होते हैं इसमे संशय नहीं है मेरा स्मरण ही 49 की उपाय है औ मेरे रूपता की माहिती फल है॥५॥ अन्तकाल मे १५ स्मरण करके मेरी प्राप्तिही केवल होय यही नहीं सोई कहते है कि हे कुन्तीपुब अर्जुन अन्तकाल मे जो कोई निस देवता का या और किसी विषय का ध्यान करके देश छोडै है सो उसी को प्राप्त होता जिसका ध्यान किया है देखो सईदा जिसका चिन्तन करते रहो तो अन्तकाल मे भी अन्तःकरण मे उसीका संस्कार रहता है और नयी अयूर्य वस्तुका स्मरण होना भी कठिन है ॥६॥ पूर्व वासनाही जिसलिये मरण काल के सारण मे हेतु है और अन्त समय माणीको अपूर्व वस्तुका स्मरण असंभव है इसमे हे धर्जुन सर्वदा हमको चिन्तन करो परन्तु मेरा चिन्तन भी चित्तशुद्ध विना दुर्लभ है सो तुम चिचराधि के अर्थ युद्धखप वधर्मका अनुष्ठान करो और तमारा संकल्पात्मकमन तथा व्यवसायात्मिका बुद्धि मेरे में अमित भई है इससे अनायास हम को प्राप्त होउगे इसमें संशय नही है॥ ७ ॥ “चौर स्मरण मे परम कारण अभ्यास को देखावते हुये कहते है कि अभ्यास कहे समान जातीय को प्रतीतिका प्रवाह नो धारारूम वह योग है अर्थात् उपाय है उससे एकान होय जिसकी बुद्धि अन्य विषय मे न जाय ऐसा मनुष्य उस बुद्धि के द्वारा प्रकाश रूप परमेशर को निरन्तर चिन्तन करिके हे मार्थ उस परमेवर, अष्टम अध्यायः। १०५ सयोगयुक्तनचेतसाऽनान्यगामिना। परमपुरुपंदिव्यंयातिमार्थानुचिन्तयन् ॥ ८॥ कार्तिपुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुस्मरेद्य'। सर्वस्यधातरमचिन्त्यरूपमा दित्यवर्णतमसःपतस्तात् ॥ ६॥ प्रयाणकालेमनसाऽचलेनमत्यायुक्तोयोगवलेनचैव । मुवोर्मध्ये प्राणमावेश्यसम्यक्सतंपरपुरुषमुपैतिदिव्यं ॥ १० ॥ यदक्षरवेदविदो बदन्तिवियन्तियद्यतयोवीतरागा.। यदिच्छन्तोब्रह्मचर्यचरन्ति तत्तेपदं संग्रहेण भाषा अनुवाद को प्राप्त होता है॥८॥ फेरि मी चिन्तनीय पुरुष का खरूप दो झोकसे कहते है कि कवि कहे सर्वन्न सकल वियों के निर्माण कर्ता पुराण कहे अनादि सिद्ध अनुशासिता कहे समस्त जगतके नियन्ता और अणोरणीयांस कई सूहा से भी सन्म आकाश काल दिशोंसे भी सूक्ष्म औ सबके धाता कहे पोपण कर्ता अपरि मित महिमा से अचिन्त्य रूप अर्थात् मलयुक्त मनवुद्धि के अगोचर कहे अदृश्य औ श्रादित्य वर्णा तथा तम नो प्रकृति माया तिससे पर ऐसे मेरे रूप को नो स्मरण करै है॥६॥ प्रपञ्ज सहिता मकति को भिन्न करिकै जो स्थित है ऐमे पुरुषको भक्तियुक्त जो पुरुप विक्षेप रहित निश्चल मन से आसन्न कहे अन्तकाल मे धारा वाहिक चित्तवृत्ति से स्मरण करै है उस के स्मरण विपयक मन की स्थिरता का कारण यही है कि सम्पूर्ण योग वलसे शूपुनामार्गक्रमसे उसकी प्राणवायु मध्य मे भविष्ट होती है ऐसा पुरुष परमात्मारूप प्रकाशात्मक पुस्य को प्राप्त होता है १०॥ तिस प्रकाश पुरुप की प्राप्ति का हेतु अभ्यास योग की अपेक्षा प्रणव अभ्यास को अन्तरग कहे श्रेष्ठ साधन कहने की इच्छा रखते हुये भगवान उसके कहने की प्रतिज्ञा करते है कि हे गार्गि यही अक्षरखरूप परब्रह्म की शिक्षाक्रम से सूर्य श्री चन्द्रम मे नियुक्त होय स्थिति करते है वह श्रुति के कहने से वेदवित लोग जिस को अक्षर कहते है और जिस के राग आदि दोष गत भये है ऐसा यती कहे यत्नकारी पुरुष जिसमे प्रवेश करते और जिसके जानने अर्थ गुरुकुलमे वास करि ब्रह्मचर्य करते हैं सोई अनपट तुमको संक्षेपसे कहताहं तुम सुनो ॥११॥ ब्रह्मपद प्राप्तिको अङ्क समेत उपाय दो योक से कहते है कि इन्द्रियों को प्रत्याह रण पूर्व क अर्थात् चक्षु आदि मे वाम रूपादि विषयों का ग्रहण छोडि मन को श्रीमद्भगवद्गीता . प्रवक्ष्ये ॥११॥ सर्वद्वाराणिसंयम्यमनोहदिनिरुध्य च । भूर्भाधायात्मन-माणमास्थितो योगधारणां॥ १२॥ श्रोमित्येकाक्षरंवलव्याहरन्मामनुस्मरन् । .य.प्रायातित जन्देहं सयातियरमांगतिं ॥ १३॥ अनन्यचेता सततंयोमांसरतिनित्यशः । तस्या हंसुलमापार्थनित्ययुक्तस्ययोगिनः॥ १४ ॥ मामुपेत्यपुनर्जन्मदुःखालयमशाश्वतं । नाप्नुवन्तिमहात्मानःसंसिद्धिपरमागताः ॥ १५॥ आब्रह्मभुवनाल्लोका पुनरावर्ति . भाषा अनुवाद हृदय मे रोध कर के अर्थात् विषय का स्मरण त्याग करत भाह के मध्य कुटी देश से वायु के स्थापन करने के धनन्तर योग का धारणरूप को धैर्य उस का अवलम्बन कर के ॥ १२॥ भोकाराख्य एक जो अक्षर सो वहा का वाचक अथवा ब्रह्मा गतीक कहे प्रतिमा के समान इन दोनो हेतु से ब्रह्म है ऐसे प्रणव कहे अोकार के उच्चारण पूर्वक तबाच्यरूप हम को स्मरण करि देश त्याग करते जो मनुष्य अचिरादि मार्ग अर्थात् चन्द्र सूर्य मार्ग से गमन करते है तेई सर्वोत्तम मेरी गति को पावते है ॥ १३॥ ऐसे हो अन्त काल मे धारणा जाम से नित्य अभ्यासकारो पुरुप को मेरी प्राप्ति होती है और को नहीं एतावता पूर्व वचन ही को मरण करावते है कि हे भार्थ निस मनुष्य का चित्त भगवत को छोडि और, मे नही असता है ऐसा अन्यचित्त होय जो निरन्तर या प्रति दिन हम को सरण, करै है उसी समाहित युरुप को हम अनायास मिलते है और, को नही प्राप्त होते है यह जानो ॥ १४॥ जो तुम स्वमता की ऐसे अनायास मिलते हो तो फेरि उस का क्या होता है इस शङ्का पर कहते है कि पूर्वोक्त महात्मा लोग मेरी भक्ति से मेरे को प्राप्त होय कर दुस का भवन ौ अनित्य जो जन्म तिस को फेरि नहीं प्राश होते है क्यों कि ये परमासह को प्राप्त भये अर्थात् जीवनात होय जन्म मरण संसारदुःरासे छूटि जाते है ॥१५॥ इस तरह और और लोकमेभी उन भक्तोंको पुनर्जन्म का अभाव देसाय कर धपुनर यावृत्ति निरिण करते है, कि हे अर्जुन ब्रह्मा के लोक पर्यन्त प्राप्त हो के भी मामी पुनार संसारगामी होते है क्यों कि अमलोक का भी एक दिन नाश होता है और माम मुक्ति जो कहा है सो किसी घिरले को उमासना के द्वारा ब्रह्मलोक अष्टम अध्यायः। परन्तु हे कौन्तेय नोऽर्जुन। मामुपेत्यतकौन्तेयपुनर्जन्मनविद्यते ॥ १६ ॥ सहसयुगपर्यन्तमहयद्र झणोविदुः । रावियुगसहसान्तांतेहोरावविदोननाः ॥ १७॥ अव्यहाद्यतयः सांप्रभवन्त्यहरागमे। राश्यागमेप्रलीयन्ते तवैवाव्यक्तसंनके ॥ १८॥ भूतग्रामः सएवायंभृत्वाभूत्वाप्रलीयते। रायागमेऽवश मार्थप्रभवत्यहरागमे ॥ १६ ॥ परत मापा अनुवाद मे नाव नान प्राप्त होय ब्रह्मा के साथ मुक्ति मिलती है मद्रप को प्राप्त मेरे मन का पुनर्जन्म तो नहीं होता है ॥ १६ ॥ और जो कहो कि तपती दानी विगतराग श्री क्षमाशील लोग बैलोक्यके उपर गोकरहित स्थानको प्रस्थान करि वास करते है इस पुराण के वचन से महर्लोक आदि लोको की और लोकसे उत्तमता मालूम होती है परन्तु विनाश तो सव लोकोंका है इस पबमें सय की अपष्टता ही है हो विशेष यही है कि वे लोक बहुत दिन तक स्थिर रहते है और ब्रह्माकी अपने वाँसे सो वर्षकी आयुर्दा है यौ वैलोक्य अर्थात् सर्ग मर्य पाताल ये बच्मा के प्रति दिनमें उत्पन्न और प्रति रावि मे प्रलय होते है ब्रह्माका एक दिन मनुष्य के इनार चतुर्युगके बरावर का होता है और उतनीही रानिये और मनुष्य का एक वर्ष देवतो कर राति दिन है इस हिसाब से देवतों के यार हजार वर्ष मे चारि युग होते है जो यह नानते सोई सर्वत्र है और जो चन्द्र सूर्य की गतिको राति दिन जाते वे कुछ नही जाते है॥ १७॥ निससे कालगति के पराधीन सब लोक है इस से पुनरावृत्ति होती है सोई कहते है कि कार्यरूप भगत के अव्यक्त कहे सूक्ष्मरूप का कारण खरूप ही को प्रकृति कहते है उसी कारणरूम प्रशति से ब्रह्मा के दिन मे चराचर सकल उत्पन्न होते और रानि धाने से फेरि उसी प्रकृति मे लय पाते है॥ १८॥ अव विषयों से वैराग्य होने के अर्थ सृष्टि औ लय का प्रवाइ देखावते हैं कि हे पार्थ चराचर प्राणो मात्र पूर्व ने ये ते अवश कर्म के आधीन वारम्बार होते औ नाते है जय ब्रह्मा का दिन भया तव प्रगटे जव राति पाई तो फेरि प्रकृति मे लीन हो गये ऐसे ही हेरफेर लगा रहता है ॥ १६॥ सकाल लोक की अनित्यता दिखाय कर अव दो झोक से परमेश्वर का नित्यत्व विस्तार करि कहते है कि मोई चराचर की कारणरूम श्रीमद्भगवद्दीता। स्मात्तुभावोन्योव्यज्ञोव्यक्तात्सनातनः। यःससर्वेषुभूतेपुनश्यत्सुनविनश्यति ॥ २० ॥ अव्यहोऽक्षरइत्युत्तास्तमाजापरमांगतिं । यमायननिवर्तन्तेतद्धामपरममम ॥ २१ पुरुषःसपर पार्थमत्यालथ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानिभूतानियेनसर्वमिदंततं ॥२२॥ यवकालेवनात्तिमात्तिज्वैवयोगिनः। प्रयातायान्तितंकालंवच्यामिमरतर्षम भाषा अनुवाद प्रकृति पर अर्थात् उस का भी कारण सरूम औ उस मे भिन्न चक्षु आदि का अगोचर भाव जो अनादि पुरुप सो यावत् कार्य कारणरूम मत मात्न का नाश होने से भी नष्ट नहीं होते हैं। २०॥ अव परमेश्वर के अविनाशित्व में प्रमाण दाय कर कहते है कि जो भावरूम इन्द्रिय अगोचर प्रवेश नाश शून्य अक्षर स्वरूप परमेश्वर निस से इस विश्व का उद्भव है औ श्रुति सब जिस को अक्षर कहती है कि पुरुषांन्न किञ्चित्पर साकाष्ठा परागतिः जो सव के पर और जिस से पर कोई नहीं ऐसे युति जिस को उत्कृष्ट गति कहती हैं और जिस को प्राय कर फोरि संसार गति नहीं होती बहो मेरा स्वरूप है इस से मै ही परम गति हो यह जानो ॥ २१॥ इस परमेश्वर की प्राप्ति मे भक्ति ही सव मे बढि के परम उपायरूप है इस को कहते हैं कि सोई परम पुरुप मै अनन्त भक्ति वर्धात जिस भक्ति मे मै छोडि और कोई भी चिन्तनीय नहीं है ऐसी एकान्त भक्ति से मै मिलता हूं और अव प्राप्तव्य पुरुष की श्रेष्ठता कहते हैं कि जिस, पुरुषमे ये भूत सकल स्थित हैं और जो कारण रूप से समस्त जगत मे व्याप रहा है सोई मै ई॥ २२ ॥ इस प्रकार से भगवत उपासक परम पद प्राप्त हो के फेरि संसारगतिमे नहीं आवते हैं यह तीनि लोक से कहा अब कौन मार्ग में गमन करिके फेरि धावते और कौन मार्गगामी फेरि नही धावते है यहा प्रकाश रूप से कहते है कि हे अर्जुन योगी जन जिस काल मे गमन करि भापते और निस मे गमन करि नहीं प्रावते सो काल तुम से कइंगा यद्यपि देह त्याग मे उत्तरायण काल थैठ औ दक्षिणायन निकृष्ट है तो भी व्याससूब से कहा है कि भगवत भक्त दक्षिणायन से उत्तम गति को जाते है यहा योगी कहे की नौ काल से तदभिमानिनी देवताको लेते है ॥२३॥ और जिस मार्गसे प्रयाण करिके अष्टस अध्याया। १०६ ॥ २३ ॥ अग्नियॊतिरहःशुलःयण्मामाउत्तरायणं । तवमयातागच्छन्तिनमब्रह्म विदोजनाः ॥ २४ ॥ घूमोराविस्तयाकृष्णापण्मासादक्षिणायनं। तबचान्द्रमसे ज्योतिर्योगीप्राप्यनिवर्तते ॥ २५॥ सलकष्णगती तेजगतःशाश्वतेमते । यायात्यनात्तिमन्ययाऽवर्ततेपुनः ॥ २६॥ नैतेस्तीपार्थजनान्योगीसुध्यतिकशन । भाषा अनुवाद फेरि नहीं संसारगतिको प्राप्त होते है सोई मार्ग कहते हैं कि अर्चि अभिमानिनी अर्थात् अग्नि या ज्योतिरूम और अह कहे दिन औ शक्लपक्ष तथा उत्तरायण जो मास है और संवत्सर इन सव की अभिमानिनी देवता दहा लेते है यथा मधम ज्योति मे प्रवेश करि पोरि दिन मे दिन से पक्ष मे पक्ष से उत्तरायण छमाही में उससे संवत्सर मे सम्बत्मर से देवलोक मे प्राप्त होय फेरि भगवत उपासक ब्रह्मच होय साक्षात् ब्रह्मखरूप होते है निष्काम कर्मकारी इस गति से चाते है ॥२४॥ और जिस राह से गमन करि फेरि संसार मे प्रावते सो कहते है कि प्रथम धूम मे प्राप्त होय फेरि धूम से रावि मे रानि से कृष्णपक्ष मे कृष्णपक्ष से दक्षिणायन छ मास मे तव मिटलोक मे उस से फेरि चन्द्रजोति से प्राप्त होय योगी फोरि निवृत्त होते है इहां भी धूमादि शब्दो से तदभिमानिनी देवता लेते हैं कामना करि कर्मकारीयों की यह गति है कि कर्मफल भोग करि फेरि संसार होता ॥ २५॥ येई शुक्ल कृष्णा दो गती जगत मे सनातन से चली पावती हैं इन मे निष्काम कर्माकारी ज्ञानी शुक्ल कहे प्रकाश मार्ग से गमत कर के मुक्त होते और नाना मनोरथ कार के यन्नाट कर्मकारी मनुष्य करण कहे अन्धेरी धूम मार्ग से गमन कर कर्मफल भोग के अनन्तर पारि संसार मे पाय जन्म ग्रहण करते है ॥ २६॥ इन दोनो उत्ता मार्ग के ज्ञान से जो फल सो दिखावते हुये भक्तियोग कहते हैं कि हे पार्थ मोक्ष औ संसार को देनेवाली इन दोनो मार्ग को नानि कर कोई योगी पुरुप सासारिक मोह को नही पावता अर्थात् सुख सममि खर्ग धादि फल की कामना नही करता वल कि परमेश्वर ही मे निंडा करता है इस से हे अर्जन तुम मेरे भक्तियोग मे युक्त होय के रहो॥ २७॥ अध्याय का अर्थ स्वरूप पाठ प्रमका चर्थ निर्णय औ पलके सहित कहते है कि वेदोमे अध्ययन के ॥ २८
११०
थीमद्भगवद्गीता।
तस्मात्सर्वेयुकालेषुयोगयुक्तोमवार्जुन ॥ २७॥ वेदेषुयनेषुतपसुचैवदाने यत्पुण्य
फलंप्रदिष्टं। अस्येतितत्सर्वमिदंविदित्वायोगीपरंस्थानमुपैतिचाद्यं ॥२८॥ इति
थीभगवद्गीतायां तारकमह्मयोगोनाम अष्टमोऽध्यायः॥८॥
भाषा अनुवाद
द्वारा और यनो मे अनुष्ठान द्वारा श्री तमस्यों में शरीर शोपण द्वारा औ सर्व
दान मे मत्लाव के अर्मण से जो उत्तम पुण्यफल सव शास्त्री ने कहा है उस फल
को उल्लवन कोर के योगी येष्ठ योगरूम ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं अर्थात् परम पद
मावते हैं।२८॥ इति नगन्नायसनाविरचित मनभावनी टीकायां तारकमा
योगनाम अष्टमोऽध्यायः ॥८॥
श्रीमद्भगवद्वीता नवम अध्यायः । थीभगवानुवाच। इदन्तुतेरायतमप्रवक्ष्याम्यनस्यवे। जानविन्नानसहित यन्नात्वामोक्ष्यसेशुभात् ॥ १ ॥ राजविद्याराजगुह्यं पविवमिदमुत्तमं। प्रत्य भाषा अनुवाद केवल भक्ति ही के द्वारासे परमेश्वर पाये जाते अर्थात् ईश्वरका तत्वज्ञान होना भक्ति के विना कोई उपाय से सुलभ नहीं है यही अष्टम अध्याय मे स्थिर किया है सोइ ईश्वरका अद्भुत ऐश्वर्य यौ अपनी भक्तिकी सर्व श्रेष्ठमहिमा अब नवयंअध्याय मे विस्तार से भगवान प्रापअपने मुखसे कहते है कि जिस से परमेश्वर जाने नाय सोइ विज्ञान कहे उपासना तिस के सहित ईश्वरविषयक जो यह जान गुद्यतम अर्थात् शास्त्रोक्त धर्मज्ञान गुय कहे गोपनीय है और उस की अपेक्षा देहादि से भिन्न नो आत्मज्ञान सो गुह्यतर कहे अधिकगोपनीयहै फेरि अात्मनान गुह्यतम है अत्यन्त गोपनीय है सो अस्या रहित अर्थात् वार वार अपना महात्म उपदेश करते हुये मेरे मै दोप दृष्टि राहत तुम हो इस से मै अय दया करि तुम से कहूंगा कि जिस को नानि करि इस अशुभ रूप संसारयन्धन से छूटि नापगे॥१॥ अव अर्जुन की इच्छा वढावने के हेतु जो ज्ञान कहेगे उस की प्रशंसा करते है कि यह जो जान सो सकल विद्यों का राजा और गोपनीय नो कुछ है उन का भी राजा अर्थात् सब से श्रेष्ठ है और यह अत्यन्त पावन तथा उत्तम है और ज्ञानियों को प्रत्यक्षावगम कहे निस का वोधसुलभ है और धर्य कहे धर्म से भिन्न नहीं अर्थात् वेदपिहित सर्व धर्म का फल खरूप है और सुसुख कहे अना यास साधन किया जाय सके है और निस हेतु अक्षय फल है इस से अव्यय श्रीमद्भगवद्गीता । ... क्षायगमंधण्यसुसुखकर्तुमव्ययं ॥२॥ अथधानापुरुषाधर्मस्यास्यपरन्तप । प्राप्यमांनिवर्तन्तेटत्युसंसारवमनि ॥३॥.. मयाततमिदंसबंजगदमतमतिना तत्खानिसबभनानिनचाहतेष्यवखितः ॥४॥ नचमत्स्यानिभूतानिपश्य मेयोग मैश्वरं। भूतभन्नचभूतस्योममात्माभूतभावनः ॥ ५ ॥ ॥ ५ ॥ यथाकाशसितोनित्यं वाय भाषा अनुवाद अर्थात् नाश रहित है॥२॥ नो इस ज्ञान से ऐसा सुख सुलभ है तो फेरि कौन ऐसा अभागी है जो संसारी होगा इस मग पर कहते हैं कि यही भक्ति सहित जानसरूम धर्म को न करि के दूसरी उपाय से मेरी प्राप्ति के लिये नो लोग यत्न करते हैं वे मनुष्य हम' को न पाय के स्टत्यु युक्त संसार में बार बार पाते और जाते रहते हैं ॥३॥ इस प्रकारसे अक्सर माप्त नो जानकाण्ड तिसके योता अर्जुन को उत्सायुक्त करि के सोइ ज्ञान दो शोक से करते हैं कि निस का खरूप अव्यक्त कहे इन्द्रियों का अगोचर ऐसा कारणसरूम जो मैं सो मेरे में सम्पूर्ण जगत व्याप्त है क्यों कि श्रुति कहती हैं कि सोइ ब्रह्म संसार सृष्टि करि के उसके बीच जीवखरूप होय प्रविष्ट है इसकारणसे चराचरात्मक भूतमात्र कारण रूप मेरे ही में स्थित हैं परन्तु ऐसा भी है तो भी खकार्य घटादि में मत्तिका के उल्य मैं भूतों में नहीं है जिस हेतु मै आकाश के समान सगरहित अर्थात् सबसे अलग है।॥४॥ और देखो कि हम सबसे अलग, इस हेतु स्थावर जङ्गम संवत हमारे में नहीं खित हैं और जो शङ्का करो कि पीछे बमने अपना सर्वव्यापित श्री संघ के आयय यह कहा है तो कहते हैं कि हमारी अघट घटनारूप चातुरी देखोकि मेरी योगमायाके विभवयलमे यहवात दूझने के अयोग्य है पर मेरा कहना तोकिसीअंशमे विरुद्ध नहीं है और प्राचार्य लोग बीभूतभावन पालनकती हमको कहते हैं तो भी हमारा उत्कृष्ट रूम भतभावन नहीं है जैसे तीवगण, देहधारण यौ पालन करते हुये अहसार से देह के साथ मिलत हैं जैसे निरङ्कार हेट से भतों का लालन पालन करते हुये भी हम उन में टथक हैं यही मेरा ऐमर्थ अन मिल वस्त भी आधार अाधेय अर्थात् रहने शी जगह नौ रने थाली वस्तु होसक है यह दृष्टान्त देखायकर कहते हैं कि अाकाशके बिना पन्न ।
। नवम अध्यायः। प्रक सर्वगोमहान्। तथासर्षाणिभूनानिमत्स्सानीत्युपधारय ॥ ६॥ सर्वभूतानिकौ न्यप्रतियान्तिमामिकां। कल्पक्षयेपुनस्तानिकल्यादीविक्षाध्यई।७॥ तिखामवष्टम्यविसृजामिपुन.पुनः । भूतग्राममिमंत्स्नमवयंप्रकृतेर्वशात् ॥ ८॥ न चमांवानिकम्माणिनियन्तिधनञ्जय । उदासीनवदासीनमसक्तंतेपुकर्मसु॥८॥ मयाव्यक्षेणप्रकृतिःसूयतेसचराचरं । हेतुनानेनकौन्तेयनगदिपरिवर्तते ॥१०॥ अय ॥ भाषा अनुवाद रहने का असम्भवहै इससे आकाथ मे स्थित नो वायु सो सर्वगत औ महान होके भी आकाश के साथ मिलने की कोई उपाय न रहनेसे जैसे आकाश के साथ नहीं मिलती है तैसेही भूत मेरेमे रहते हुयेभी अलग जानो अर्थात् जैसे अाधाररूप आकाश मे रहि कर वायु निर्लिप्त है तैसे भूतोके रहते हुये भी आधार सरूम बम निर्लिप्त है ॥ ६॥ . इस से असगरूप ईश्वर को योगमाया से चराचर की स्थिति ईश्वर में कही गई अव सोई योगमाया से सृष्टि श्री पालन के भी हेतु ईश्वर है यह कहते है कि प्रलय के समय मे सकल भूत सत्व रज तम गुणमयी मेरी प्रकृति मे लीन होते मोरि सृष्टि के समय स्थूल सूक्ष्म नानारूप भूतों को मै सिर्जन करता हूं हे कौन्तेय अर्जुन ॥७॥ जो कहो कि तुम अस निर्विकार सो कैसे सृष्टि करते ही इस अमेचा पर कहते है कि मैं अपने वाधीन मकति को अंगीकार करि माचीन कर्मों के स्वभाव वश भये पराधीन कर्म के वशीभूत भूत सकलको फेरि नानारूप सिर्जन करता रहता ई॥८॥ और जो कहो कि इस प्रकार नाना प्रकार कर्मकारी जो तुम हो तो तुमारा जीव के समान पन्धन क्यों न होय तो कहते है कि वे कर्म हमको वन्ध नहीं कर शकते क्यों कि कर्ममे नो अासक्ति सोइ बन्धन का कारण हैं और हम मरण काम है इस से यह आसक्ति इम को नही है हम तो उदासीन के समान बर्चमान है वैसे ही उदासीन के समान कर्म करते हुये तुम को भी ये कर्म न लगेंगे॥६॥ सोह कहते है कि अधिष्ठाता कारण स्वरुप मेरे बल से यह प्रकति चराचर विश्व को वार वार उत्पन्न करती है तात्पर्य यह कि मेरी सानिध्य कहे सामीप्य से प्रति सृष्टि करने को समर्थ होती है इस से हम को कर्तृय यी उदासीनत्व दोनो ३ श्रीमद्भगवहीवा। जानन्तिमामूटामानुपीन्तनुमाथितं । । परंभावमनानन्तोममभूतमहेश्वरं ॥ १९ ॥ मोघाशामोधकर्माणोमोघज्ञानावियतन। राक्षसीमासुरीवमतिमोहनीधि ताः ॥१२॥ महात्मानस्तुमापार्यदैवीप्रकृतिमाथिता । भजन्त्यनन्यमनसोज्ञात्वामता 'दिमव्ययं ॥१३॥ सततंकीर्तयन्तोमांवतन्तश्चदृढव्रता । नमस्सन्तयमांमत्यानित्ययु भाषा अनुवाद असङ्कत नहीं है क्यो कि माया हमारी सहाय के विना असमर्थ है॥१०॥ और जो कहो कि तुम ऐसे जो परमेश्वर तो तुमको कोई कोर सादर नही क्यो करते है तो दो लोकसे कहते है कि सर्व भूत के ईश्वर जो हम सो हमारा परमतत्व जो लोग नही जानते तेई मखं हमारा निरादर करते है इस मे कारण यह है कि हम विशुद्ध सत्त्वरूप होय के भी अपने भनो की इच्छा वशते मनुष्य के नाई शरीर धारणा करते और तैसेही कर्मभी करते है इससे लोग अपने समान हम को मानते है ॥११॥ और जो मनुष्य हम से भिन्न और देवतो से कि शीघ्र फल देयंगे ऐसी निष्फल पाशा करते है और हमसे विमुख होय जो फल के हेतु कर्म करें है और जिनके शास्त्र में जो ज्ञान सो नाना कुतर्क युक्ता है वेई सकल विचेतस कहे विक्षिप्त चित्त लोग अनर्थ के हेतु हिंसादि तामस कर्म तथा काम अभिमान से भरी पूरी जो राजसी बुद्धि तिस के अाधित होय इस को न जानि हमारा निरादर करते है॥१२॥ तो फेरि तुमारी आराधना कौन करते है जो यह पूछो। तो कहते है कि कामादिक मे जिन का चित्त अवश नही ऐसे जो महात्मा लोग वे देवी महाशि के आश्रित होते है इसी से हम को छोडि चौर में जिन का मन रमित नही है ते मनुष्य हम को समस्त भूतके धादि कहे जगत के कारण नित्य खरूप जानि के भक्ति पर्वक आराधन करते है ॥ १३॥ अव भक्तो के भजन का प्रकार दो झोकसे कहते है कि सर्वदा स्तोत्र औ मन्त्र से कोई मेरा कीर्तन करते हुये मेरी उपासना करते है और कोई दृढ नियम करके ऐश्वर्य औ ज्ञानमे यत्न करते हुये मेरे उपासक होते है और कोई भक्तिपूर्वक प्रगत होय मेरा मेवन करते है ऐसे नित्य युक्ता कहे सावधान मेरेमे तत्पर होय मेरे भक्त मुझे सेवते हैं। । २४॥ यौर चराचर मात्र थीफष्ण है जैसा जो यात्मदर्शन सोई ज्ञान औ सोई नवम अध्यायः। ११५ काउपासते ॥१४॥ ज्ञानयजेनचाप्यन्ये यनन्तोमामुपासते। एकत्वेनष्टथक्वेनवहुधा विश्वतोमुखं ॥१५॥ अहंकारयन्न खधाहमहमोप, । मन्त्रोहममेवाज्यमहमग्नि रहंतं ॥१६॥ पितामहस्थजगतोमाताधातापितामहः । वेद्यमविनमोङ्कारक्षमाम यजुरेवच॥१७॥ गतिर्भर्तामभु.साक्षीनिवास शरणंसुहृत् । प्रभव मलयःस्थानिधानं वीनमव्ययं ॥१८॥ तपाम्यहमहंथनिगृहाय्युत्सृनामिच । यसतचैवटत्युश्चसदस । ३ याज्य भापा अनुवाद यन्न है इस प्रकार जान यत्न से कितने इम को मूजते हैं देखो कोइ अभेद भाव से और कोई हम भगवान के दास इस भेद भाव से उपासना करते है और कोई हम को ममा रुद्र आदि रूप समझ कर के सेवते है॥ १५ ॥ अव अपनी सर्व रूपता चारि लोक से कहते है कि मैही क्रतु कहे वेदोन अग्निष्टोम आदि यन्त्र और यत्र कहे धर्म शास्त्रोक्त जो पञ्च यन्न वलि वैश्व देवादि औ खधा कहे श्राद्ध और औषध अर्थात् फल होनेसे जो पकि जांय इससे अन्नभी आय गये और मन्त्र यौ कई घृत आदि औ अग्नि कहे यज्ञाग्नि और होम यह नो कुछ सो सय हम ही है ॥१६॥ और इस जगत के पिता माता तथा धाता कहे कर्मफलदाता यौपितामह तथा वेद्य कहे जेयवस्तु औ वविन कहे शुद्ध करनेवाले यौ मोकार तथा ऋक यजुर साम अधर्व वेद यह समस्त भैही हौं ॥ १७॥ और मही गति कई माथ कर्माफल रूप यौ भत्ती कहे पोषणकर्ता श्री प्रभु नियामक तथा साक्षो शुभ अशुभ के दृष्टा औ निवास कहे भोगस्थान तथा शरण कहे रक्षक एवं महत् कहे हेतु रहित हितकारी प्रभव अर्थात् जगतके उत्पन्नकर्ता प्रलय कहे संज्ञा स्थान कहे विश्व के धाधार और निधान कहे लय स्थान एवं वीन कहे कारण औ अव्यय कहे अविनाशी मैहों हौं ॥१८॥ और ग्रीष्मकालमे सूर्यरूप मैहीं समतको ताप देता हौ सौ वर्षाकालमे जल वृष्टि भी इमी करते है छौ तथा कोई समय नल किरणो से खींचते और कभी फेरि जल को छोडते भी हमी है यौ अखत कहे जीवन मृत्यु कहे मरण औ सत कहे पृथिवी आदि पांच स्थूल पदार्थ यौ असत कहे सूक्ष्म वस्तु रूपादि पंच माना भी हे अर्जुन इम हीं को जानो इसी से लोग नाना रूम इमारी उपासना करते है॥ १८ ॥ मढ़ मेरा अनादर करने औ है 1 थीमद्भगवद्गीता। शाहमर्जुन ॥१६॥ वैविद्यामांसोमपा पुतपापायरिट्वावर्गतिप्रायनों । तेपुण्य मासाद्यसुरेन्द्रलोकमंत्रन्तिदिव्यादिविदेवभोगान् ॥२०॥ तेभुक्ताखंगल लोकविशा. खंक्षीणेपुण्यमयलोकविशन्ति । एवंबंयोधर्ममनप्रपन्नागतागतंकामकामालभन्ते २१॥ अनन्याचिन्तयन्तोमायेजना पर्युपासते। पॉनित्याभियुक्तानांयोगक्षेमवता स्यहं ॥२२॥"येऽस्यन्यदेवताभक्तायनन्तेयईयान्विताः। तेऽपिमामेवकौन्तेयेया भाषा अनुवाद महात्मा मेरी भनन करते ऐसे पूर्व में भी अभक्त के लक्षण कहि के अव मूहों का जन्म मृत्य रूप संसार प्रवाह दुनिवार है यह दो नोक से कहते हैं कि जो मनुष्य ऋक् 'यजुः साम वेद पढ़ते वै वैविद्य अर्थात् वेदोक्त कम परायणं यन्न के द्वारा सर्व रूप नो नै सो मेरी ही पूजा करि के और सोमलता का रस पीकर पूतपाप होय खेच्छा से वर्ग लोक को जाते हैं और पुण्य फलरूप वर्ग प्राप्त होय वहां के उत्तम देवभोग्य वस्तुयों का भोग है ॥ २० ॥ 'फेरि वेई स्वर्ग कामी मनुष्य अपना इष्ट विपुल वर्गसुख भोग करि के जब पुण्य क्षीण भई सप फेरि मयं लोक मे थापते हैं धाय कै फेरि वहीं वेदवयी विहित धर्म कर्म चरि के भोग कामनाकारी लोग गमनागमन भाव लाम किया करते हैं अर्थात् कभी नीचे आते यौ कमी उपर जाते रहते है ॥२१॥ और हमारे भतान मेरी पा ही से कृतार्थ होते यह कहते हैं कि जिन के हमै छोड़ि और कोई मन कामना नहीं है तेई अनन्य भक्त हमारी सेवा करते हैं नित्यामियुक्त सर्वदा एक मेरे में है मन जिन का उन को योगचेम अर्थात् योग जो धन आदि लाम और क्षेम जो प्राप्त वस्तुको रक्ष सो मै करता ई अथवा निर्माण जो मुक्ति यद्यपि वे नहीं चाहते पर मै उन को अपनी इच्छा से देता हौं ॥ २२॥ जो कहा कि विचार में तो सर्व देवरूम तुमको छोड़ि और देवता कौन है देखो संवरूप जो तमारे हैं तो इन्द्रादि के पजक लोग भी हमारे ही उमासक हैं, फेरि क्या कारण है जो के विचारे उपर नीचे गमनागमन किया करते हैं इस पर कहते हैं कि हाँ अथवा युक्त जो इन्द्रादि देवतों की अाराधना करते हैं सो मत्य हमारी मेवा है परन्त वै प्रविधि से अर्थात् मोक्षकी.देनहार विधि को छोड़ि कर पूजन करते हैं. इसीसे tebrath+47+ नवम अध्यायः। धिपूर्वकं ॥२३॥ अहंहिसर्वयन्नानांभोक्ताचप्रभुरेवच । नतमाममिनामन्ति तत्वेना तश्चावन्तिते ॥२४॥यान्तिदेवप्रतादेवापिढन्यान्तिपिटनता। भूतानियान्तिभूते ज्यायान्तिमदद्यानिनोऽपिमा ॥२५॥ पबंपुष्पंफलंतोयंयोमेमत्याप्रयच्छति । तदई भत्त्युपहृतमन्नामिप्रयात्मनः ॥२६॥ यत्करोपियवासियज्जुहोषिददासियत् । यत्त पससिकौन्तेयतत्कुरुषमदर्पणा २७॥ शुभाशुभफलैरेवमोच्योकर्मवन्धनैः । संन्या भूत भापा अनुवाद पुनः पुनः संसारको पावते हैं ॥२३॥ पूर्व कथित वाक्यको विस्तारसे कहते है कि देवता खरूप यन्नफल भोक्ता महीं हों और प्रभु कहे यन्त्रफल दाताभी मै ही इं पर इस तरहसे वे देवपनक लोग यधावत कहे ठीक नहीं मानते है इसीसे फेरि संसारगति को आयते है और सर्व देव मे हम को अन्तर्यामीरूम देसि जो मेरा अर्चन करते वे पुनः संसारगतिको नहीं पाते हैं ॥२४॥ अव वही उक्त वाक्यका. प्रतिमादन करते है कि नो देवव्रत कहे इन्द्रादि देव उपासक है वे देवलोक को जाते थौ पिट उपासना करनेवाले पिटलोक को जाते तथा भूत सेवाकारी अन्त गोनि पावते है और जो मेरो पूजा करें हैं सो मद्याजी अक्षय परमानन्द स्वरूप हमको ही प्राप्त होय है ॥२५॥ अव स्वमन को अक्षय फलत्व यौ खभक्ति का सुलभत्व देखावते हैं जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पत्र पुष्प फल नल भाव भी हमै देय है वह विमलचित्त भक्तजन की प्रीति से दिया हुया पुमादि मैं अति प्रसन्न होय ग्रहण करता हूं इस का भाव यह है कि और देव के समान बडो पूजा सामग्री हमै न चाहिये हम केवल भाव भक्ति से प्रसन्न होते है॥२६॥ निस लिये मै भाव भक्ति से भक्त पर प्रसन्न होता है इस से हे कौन्तेय कुन्तीपुव जो कुछ कर्म करो या पाहार करो या यन करो या टान करो या तप करो सो सव मदर्पण अर्थात् मेरे को समर्पण करो तो वह सब अक्षय फल होगा और. दोप किसी तरह से न लगेगा॥ २७ ॥ इस प्रकार आचरण करने से जो फल होगा सो सनो कि उक्त प्रकार से कम सकल भगवत समर्पण करनेसे कर्मवन्धन अर्थात् कर्मजनित इष्ट अनिष्ट फलप्राप्ति से बचि रहोगे और मेरे मे समर्पित जो वार्म संन्यासयोग उसी से युक्तचित्त हो *- ।
थीमद्भगरहीता। सयोगयुक्तात्माविमुक्तोमामुपैश्यसि ॥२८॥ समोऽहं सर्वभूतेषुन देण्योऽस्तिनप्रियः ।। येभनन्ति तमांमत्यामयितेतेषुचाम्यहं ॥२६॥ अपिचेत्सुदुराचारोशनतेमामनन्द भाक् । साधुरेवसमन्तव्यःसम्यग्वासितोहिसः॥३०॥ चिप्रभवतिधर्मात्माशश्वका , १ भाषा अनुवाद के बम हम को नि.सन्देह प्राप्त होउगे ॥२८॥ भला नो भलों को इस भांति मुक्त करते हो औ अभक्तो को नहीं तो क्या तुमारे भी प्रीति विरोध कत वैषज्य कहे विषम स्वभाव है इसके उपर अपने उस भाव का अभाव कहते है कि सकल भूत मे हम समान रूप से वर्तमान है इसीसे हमारे न कोई प्रिय और न अप्रिय और जो हमारी भक्ति करता है सो हमारे मे वर्तमान और मैं भी उस पर अनुग्रह करता रहता ई इस का भावार्थ यह है कि जैसे अग्नि के सेवन करने वाले का अन्धकार और शीत आदि टु सका निवारणकारी अग्निमे विषम स्वभाव नही है और जैसे कल्परक्ष अपने सेवक को सकल पदार्थ देता है तो इन को प्रिय अप्रिय कोई नहीं परन्तु फल जो है सो भक्त ही को है इस से भक्ति ही की महिमा यह सब तुम जानो ॥२६॥ और अपनी भक्ति का अपूर्व अचिन्त्य मभाव देसावते है कि अत्यन्त दुराचार कहे और और टेखावता भी वासुदेव ही है इस रूप एक बुद्धि होय यद्यमि औरों की भक्ति न कर के केवल परमेश्वर खरूम मही को भजे है तो भी सो साधु श्री श्रेष्ठ है क्यो कि मेरे मे उत्तम निश्चय तो उसने किया है॥ ३०॥ ऐसा मनुष्य किस प्रकार उत्तम है इरा शङ्का पर कहते है कि अत्यन्त दुराचारी भी हमारी ही भक्ति कर के खधर्मचित्त होय है अर्थात् चित्त की तरज निहत्त होय परमेचर मे निष्ठा अवश्य पावता है और तुरी धर्मात्मा होता और शान्ति को प्राप्त होता है पर इस बात को कुतर्क कर्कशवादी लोग न मानेंगे इस गड़ा से व्याकुल अर्जुन को भगवान उत्साह देते है कि हे कौन्तेय नगारा वजाय विवादकारी लोगो की सभा मे नाय हाथ उठाय तुम नि शङ्ख हो यह प्रतिज्ञा करो कि परमेश्वर के, भक्त अति दुराचार होने से भी नष्ट नहीं होते बलु हतार्थ होते है ऐसी प्रतिज्ञा करने पर तुमारी जय और ये नष्ट कुतर्क होय तुम को गुरू कर के मानेगे सो तुम यह नानो कि मेरे भाका नवम अध्यायः। तिनिगच्छनि ॥ कौन्तेयमतिजानीहिनमेभता मण्यस्यति ॥३१॥ मांहिपार्थव्यपाथि त्ययेऽपिस्युःपापयोनयः । स्त्रियोदेयास्तथासदाऽपियान्तिपरांगतिं ॥३२॥ किंपुन मीणा.पुण्यामतारानर्पयस्तथा ॥ अनित्यमसुखलोकमिमंप्राप्यममखमां ॥३३॥ मन्मनाभयमनोमानीमांनमस्कुरु । मामेवैष्यसियुवीवमात्मानंमत्परायण' ॥३४॥ इति थीभगवद्गीतायां योगशाचे श्रीकष्णार्जुनसंवादेरानराधनाम नयमोध्यायः ॥८॥ भाषा अनुवाद नाय नहीं है॥३१॥ अत्यन्ताचार मष्टोको भी नो मेरी भक्ति प्रविन करती है इसमे क्या याथर्य है क्योकि देखो मेरी भक्ति अधिकारीयों को भी संसारसे मुक्त करती है तो दुराचाराकी मुक्तिमे क्या सन्देह है सोई कहते हैं कि कोई निकष्ट नना चाण्डाल पाटि क्यों न होय और स्त्री क्यों न होय स्त्री मे भी वेश्या कोन होय वेश्या ही को वैश्या कहते सार्थ मे अण प्रत्यय नानो जो कोई वैश्या का अर्थ । वणिक जाति पर लगाते उन की मुल कितनी पडी है कि वेद ब्रह्म के अधिकारी तथा संध्या उपासना कर्म के अधिकारी तथा यन्नउपवीतधारी विवाति शन्द से मसिद्ध वैश्य जो अनधिकारी हैं तो तो बामण क्षत्री मी तैसे ही है मनभावता । अर्थ करो वेद शास्त्र क्या करना है ॥ ३२ ॥ नव कि मेरी भक्ति अनधिकारीयो को मुक्ति देती तो फेरि माहाण कहे ब्राह्मण धादि तीनो वर्ण गो बाह्मण क्षवी वैश्य पवित्र यौ मेरे भक्त उन की मुक्ति मे या सन्देह है तिस मे भी राजर्षि अर्थात् राजवंश क्षत्रिय राना लोग जो दशदिग्पालो के अंश मे प्रगट है उन को क्या कहना है सो तुम राजवंश हो इस अनित्य संसार सुख को त्याग करि के या लोक कहे नर देह पाय हम को भगो॥ ३३ ॥ भनन प्रकार दिसावतेहये कहते है कि मेरे में निस का मन है ऐसे तुम मन्मना होउ और मेरे ही भक्त होउ श्रौ मेरो ही पूजा करो और मै ही को प्रणाम करो इसी प्रकार से मत्सरा यण हो के धात्मा नो मन तिस को मेरे मे योग कहे लगाय के परम आनन्दरूम मेरे सरूम को माप्त होउगे इस नये अध्याय मे अपनी भक्ति का अजुन प्रभाव राजयोग भाम भगवान ने प्रकाश किया हैं। ३४॥ इति श्रीनगन्नाथ शुकुल विरचित मनभावनी टीकायां योगशास्त्रे राजगुह्ययोग नाम नवमोध्याय ॥ ६॥ ।
श्रीमद्भगवद्वीता A दशम अध्यायः। थीभगवानुवाच । भूयएवमहावाकोटणुमेपरमवचः। योऽहंग्रीयमाणायवस्था मिहितकाम्यया ॥१॥ नमेविदासुरगणा प्रभवनमहर्षयः। अहमादिर्हिदेवानां महोणाञ्चसर्वशः ॥२॥ योमामनमनादिवत्तिलोकमहेन्चरं। असंभूढसमय ; भाषा अनुवाद सप्तम अध्याय से ले कर नवम अध्याय पर्यन्त भगवानने धापनी विभूति औ सर्वव ईश्वर बुद्धि होना तथा ग्राम यामना परमेश्वरत्व धौ यन्न आदि सकल वस्तु मैहीं ई और अपनो अनन्य भक्ति परम भक्त अर्जुन से संक्षेप रूप कहा अव दशम 'अध्याय मे वही अपनी विभूतियो को विस्तार करि कहते हुये खभक्ति की अवश्य कर्तव्यता श्रीभगवान कहते है कि हे महावाहो अर्जुन तम फेरि हमारे वचन सुनो परमात्मा विषयक मेरे वचन यन्त ऐसे थवण करिके अति प्रसन्न प्रीतियुक्त जो तुम सो तुमारी इच्छा के अनुसार तुमारे हित वचन मै फहना ई तुम थयण करो॥१॥ कही हुई वात का यो पुनर्वार कहना तिसमे हेतु यह कि मेरा तत्स जानना अति कठिन है सोई कहते है कि जन्म रहित होके भी जो विभतियों के द्वारा मेरा भाविभीव कहे प्रगट होना भो देवता ौ गु मम्मति महर्षि मी नही जानते है क्योकि देवता नौ महर्षियों के उत्पन्न करने वाले तथा बुद्धि के प्रति देनहार यादि भूत कारणरूम इम है इसी से हमारी कपा विना हम को कोई जानने नहीं सकता है ॥२॥ अव आत्मज्ञान का फल कहते है कि सब के कारख रूप हेतु और जिसका कोई कारण नहीं है ऐसे अनादि औ जन्म रहित सकल लोक के महेश्वर नो मै सो मुम जो कोई माने है तो मनुष्यों के मध्य में वही दशम अध्यायः। १२१ घुसर्वपापैःप्रमुच्यते ॥३॥ बुद्धिानमसंमोहनमासत्यंदम शमः । सुखदुःसंभयो भावोभयचाभयमेवच ॥४॥ अहिंसासमतावष्टितपोदानंययोऽयशः। भवन्तिभा वाभतानांमत्तएवष्टथग्विधा ॥५॥ महर्षयःसप्तपर्वचत्वारोमनवस्तथा। महावामा नसाजातायेपालोकइमा मजाः ॥६॥ एतांविभूतियोगञ्चममयोवेत्तितत्त्वतः । सोऽवि कल्पेनयोगेनयुज्यतेनावसंशयः ॥७॥ अहंसर्वस्यममवोमत्त सर्वप्रवर्तते। इतिम त्वामजन्मोवुधाभावसमन्विताः ॥८॥ मच्चित्तामङ्गतप्राणाबोधयन्त.परसरं। कथ भापा अनुवाद अच्छीतरह मोह रहित होके समस्त पापोंसे छूटि जाय हैं ॥३॥ अव तीन लोक से अपनी लोकमहेगरता प्रकाश करते हैं कि बुद्धि कहे सार असार वसु विचार की चातुरी श्री ज्ञान तथा असंमोह श्री क्षमा सत्य वचन चौर दम कहे वाहर की. इन्द्रियोंका दमन औ शम कहे मनाका निग्रा औ सुख दुख नन्म नाश औ भय श्वमय ये सब हम से होते हैं ॥४॥ और अहिंसा थमता कहे प्रीति विरोध का अभाव औ वष्टि कहे वे मांगे यथा लाभ सन्तोप औ तमस्सा जो १७ अध्याय में कहेगे और दान कहे खधर्म से उपार्जित धन सत्याल को देना और यश अयश ये नाना प्रकार के भाव सब हम ही से उत्पन्न होते है॥५॥ और भगु आदि सप्त महर्षि येई पुराणों मे सात ब्राह्मण करके प्रसिद्ध है और इन के भी पूर्व सन कादि चारि ब्राह्मण और स्वायम्भू श्रादि चौदह मनु इन सव मे मेरा प्रभाव है और ये सकल हिरण्यगर्भ नो मै सो मेरी इच्छा से प्रगटे है येई सात पियों से पुत्त्र पौत्र शिष्य मशिष्य क्रमसे मनारूप ब्राह्मणादि वर्ण सकल जन्मे है॥६॥ अव यह सब उता विभूति कहे अपनी सम्पत्ति के तत्त्वज्ञान का फल कहते है कि येई मगु आदि हमारी विभूति यो ऐश्वर्यरूप योग है यहजो मनुष्य यथार्थ से जाने है सो संशय रहित सर्वज्ञ सम्यक दर्शन होय है॥७॥ अव विभूति औ योग नाननेसे जिस प्रकार सम्यक्तान प्राप्ति होती है सोई चारि लोकसे देखावते है कि मैड़ी समस्त नगत का प्रभव अर्थात् भगु आदि मनु आदि रूम विभूति के द्वारा उत्पत्ति फा हेतु हो और हमी से वुद्धि यौ जान सकल उत्मन्न होते यही नानिय विवेकी लोग प्रीतियुक्त होय इमारी भजन करते है ॥८॥ प्रोतिपर्वक मजन का स्वरूम १२२ थीमहगवडीता। यन्तश्चमानित्यं तुष्यन्तिचरमन्तिच ॥६॥ तेषां सततर्युक्तानभिजतांभीतिपूर्वकं। द दामिबुद्धियोगंतंयेनमामुपयान्तिते ॥ १०॥ तेषामेवानुकम्मार्यमहमत्तानजतमः । नाशयस्यात्मभावस्थोन्ञानदीपेनभाखता॥१॥ अर्ज नउवाच॥ परमझमरंधाम परिवं परमंभवान् । पुरुपंशाश्वतं द्व्यिमादिदेवमविभु ॥१२॥ पाहुस्त्वान्टषयः सर्वेदेवर्षि रदस्त्या। असितदेवलोव्यास खयञ्चैवववीपिमे ॥१३॥ सर्वमेतदृतम , भाषा अनुवाद कहते है कि जिसका चित्त मेरे ही मे निरत है सो मच्चित्त और जिसको प्राण कहे सकल इन्द्रिय अथवा जीवन मेरे में अर्पित है ऐसे मङ्गत प्राण विवेकी जन हमको युक्ति यौ थुति प्रमाण से जानते है और सर्वदा परस्पर भेरी ही चर्चा करते हुये सदा सन्तुष्ट मन मेरे गुण गान मे रममाण पूर्णकाम इस असार संसार के बञ्जाल से मुक्ति पारते है ॥६॥ ऐसे ही भनों को हम ज्ञान प्रदान करते है सोई कहते है कि एवम्भूत मेरे मे सदा औसत चित्त प्रीतिपूर्वक भननकारी भक्तलोगों को मैं सोई बुद्धिरुप योग काहे उपाय देता ई और उस उमाय से वे मेरे भक्त मुझ अनायास प्राप्त होते हैं ॥१०॥ बुझियोग दे करके उन अपने भक्तों का फेरि अविद्याकत संसार नाश करता ई' अव यह कहते है कि उन मर अनुग्रह करने ही के अर्थ उन के अज्ञान से उत्पन्न जो संसार अन्ध कार तिसको नाश करताहूं जो कहो कि किस स्थानमे वैठि के और कौन प्रकारमें सो अन्धकार अाप दूर करते हो तो कहते हैं कि आत्मभाव कहे पुहित्ति मे अब स्थान करके प्रकाशमान तत्त्वज्ञानस्वरूप दीपके द्वारा अज्ञान अन्धकार दूर करता है।॥११॥ संक्षेपरूपसे कही गई जो विभूति उसको विस्तार से जानने की इच्छा करिके अब अर्जुन भगवानकी स्तुति करते हुये सात लोकसे कहते है कि श्राप पर अह्म यो परमधाम कहे प्राथय औ पवित हो इस कारण यह कि नित्य कहे सदा वर्तमान,पुरुप खयं प्रकाश आदि देव धौ जन्म शून्य सर्वव्यापी तमको पि कहते है॥१२॥ कौन ऐसा कहते है तो इस पर कहते कि भगु अादि ऋपि सकल और देवर्षि नारदः अमित पि देवल यासदेव ये सब कहते और आप भी साक्षात् हम से कहते हौ १३॥ इससे अब आपके ऐश्वर्य मे असम्भावना बुद्ध 24TAARAMus:
नवम अध्यायः। न्ये पन्मबिदसिकेशव। नहितेभगवन्व्यक्ति विदुर्देवानदानवाः ॥१४॥ खयमेवात्म नात्मानंयेत्यत्वंपुरुषोत्तम। भूतभावनभूतेशदेवदेवनगत्पते ॥१५॥ अनुमईस्यशेषे पदिव्याह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोफानिमास्वंब्यायतिष्ठसि ॥१६॥ कथं विद्यामईयोगिस्वांसदापरिचिन्तयन् । केयुकेपुचभावचिन्त्योसिभगवन्मया ॥१७॥ भाषा अनुवाद निष्टत्त हो गई यह कहते है कि हे केशव अाप नो कहते हो कि सवरूप हम है सो मैने सत्य करि माना और जो आपने कहा कि सकल देवता हम को नहीं. मानते वह भी यथार्य करके मैने जाना है सोई अर्जुन कहते है कि हे भगवान भक्तों नौ देवतों पर अनुग्रहके अर्थ जो हमारे अवतार यह देवता नहीं नानते है और दानव भी यह नहीं जानते कि हमारे निग्रह के लिये भगवान का शरीर धारण भया है॥१४॥ , तो इसका फलित अर्थ क्या है इस आकांक्षापर कहतें है कि हे पुरुषोत्तम भापही अपने को जानते हो और कोई बमको नहीं जाने है यह अति अादरसे वारपार सम्बोधन दे कर कहते है कि हे भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते इन सव सम्बोधनो से श्रीकृष्ण का पुरुषोत्तमत्व साधन किया है॥१॥ जिस हेनतमारा तत्व औ अभिव्यक्ति तमको छोडिकै देवादि भी नहीं मानते इस गे तुमारी नो अद्भुत विभूति सो तुमारे ही कहने योग्य है कि जिन विभतियो से तुम सकल लोक मे व्याप रहे हो सो अपनी उन दिव्य विभूतियों को क्षमा करि के कहो नो मेरे मन का सन्देह जाय ॥१६॥ इस से अर्जुन अपने कहने का प्रयोजन देख्लाय कर मार्थना करते हैं कि हे योगिन थोकृष्ण मै तुम को किस्तरह तुमारी विभूति भेदके द्वारा निरन्तर भावना करिके नानने सकौगा और भिन्न भिन्न विभूति मे चिन्तनीय तुम कौन कौन पदार्थ मे मेरी भावना के योग्य हो अर्थात् किस किस वस्तु मे तुमैं हम मानें ॥ १७॥ चित्त की वृत्ति वद्धि मुंख होने पर भी उस समै तुमारी विभूतियों के द्वारा जिस प्रकार तुमारा चिन्तन होय असी उमाय विस्तार से कहो यह अर्जुन पूछते हैं कि तुमारा सर्व जल और सर्वशक्तिमत्व आदि खरूप जो योग का चैश्चर्य और सम्पूर्ण विभूति जो है सो सप हे बनाईन विसार से पुनार कहो क्यों कि आपके अम्मत खरूम १३४ 'थीमद्भगवद्गींना विस्तरेणात्मनायोंगविभूतिचजनार्दन । भूयःकथयटप्तिहिटखतोनासिमटतं । १८॥ श्रीभगवानुवाच ।। हन्ततेकथयिष्यामिदिव्याद्यात्मविभूतयः । प्राधान्यतः कुछग्रेष्ठनास्त्यन्तोविस्तरस्यमे ॥ १६ ॥ अइमात्मागुहाकेसभनाशयस्थितः। अहमादिश्चमध्यञ्चभूतानामन्तएव । २०॥ यादित्यानामहविष्णु योनिधारवि रंगमान्। मरीचिमकतामसिनक्षयाणामहं पायी ॥२१॥ वेदानांसामवेदोऽथि देवानामस्मिवासवः। इन्द्रियाणांमनास्मिभतानामनिचेतना:॥ २२॥ कट्टा णांघरचास्मिवित्तशोयचरचसा वसूनामावकचास्मि मेरुःशिखरिणामह २३ M भाषा अनुवाद बचम ययण करते हुये भी मेरा मन सुप्त नही होता है ॥१८॥ अव अर्जुन ने |सो 'प्रार्थना किया तव भगवान कहते हैं कि है कुरुश्रेष्ठ अर्जुन मेरी जो दिव्य विभती है.सो तुमको अच्छी प्रकार से कहंगा और विस्तार से करने को तो मेरी विभूतियों का अन्त नहीं है इस में प्रधान प्रधान जो है सो सव कहागा १६॥ अव प्रथम ईन्चर खरूप कहते हैं कि हे गुड़ाकेप वितनिद्र अर्जुन परमात्मारूप मैं तावत मूतमान के अन्तःकरण मे सर्वनव अादि गुण से नियन्ता रुम स्थित हैं। और यादि मध्य यन्त कहे सर्व भूतों के सृष्टि स्थिति संहार का म्हेत मी मैहीं है। यह जानो। गुडाका निद्रा को कहते हैं अथवा गुडा कहे एडचियाले धुंधुरारे हैं केश जिस के सो गुड़ाकेश है ॥२०॥ चव इस लोकसे ले 'फर ध्याय समाप्ति पर्यत चपनी विभूतियों को कहते हैं कि वार अदितिके पुको में विष्णु नाम धादित्य मैई और प्रकाशरूमों के मध्य सर्वत्र व्यापी रविरूप मैनौं और सप्त देवतों के बीच मरीचि नामक इम्म जानो और नक्षत्रगण मे चन्द्रमा भी महीं को मानो ॥२१॥ और वेदों में साम वेद देवतों मे इन्द्र और इन्द्रियों के मध्य में मन प्रधान इन्द्री मैहौं तथा भूत कहे प्राणियों के विशेष चेतना जो मान शक्ति सो मैहीं हौं ॥ २२॥ और एकादश रुद्रो मे शङ्कर यौ यक्ष राक्षसों में कुवेर मै हो, वसुवों के बीच में अग्नि नौ पर्वतों मे मुमेरु जानो।२३॥ और अर्जुन पुरोहितों में मुख्य गृहस्पति हम हैं और सेनापतियों में स्वामकात्तिक हैं और सरसा कहे घिर जलाशयों के मध्य समुद्र-हम को मानो २४ और ॥
दशम अध्यायः १२५ पुरोधसाच सयमांविहिपार्थष्टहस्पति। सेनानीनामहस्कन्दःसरसाममिसांगर ॥२.४... महर्षीयाभूगरहंगिरामस्मेरकमक्षरं । यज्ञानांजपयज्ञोमिखावराणां हिमालयः ॥ २५॥ अश्वत्यः सर्वदृचाणांदेवोणाचनारदः । गन्धर्वाणचिवरथः सिद्धानांकमिलोमुनिः ॥२६॥ , उच्च अवसमवानांविधिमामटतोहवं । एरावतं. गजेन्द्राणानराणाञ्चनराधिपं ॥ २७॥ आयुधानामहवन'ननामस्मिकामधुक् । प्रअनचास्मिकन्दर्पःसर्माणामस्मिवासुकिः ॥२८॥ अनन्तश्चास्मिनागानांवरुणोया दिसामई। पितृणांमयंमाचामियमःसंयमतामाई ॥ २८ ॥ : प्रहाचानिदैत्या 'नांकालःकलयतामह। मगाणाञ्चगेन्द्रोहंवैनतेयचपक्षिणां ॥ ३० ॥ - पंचनाम बतामस्मिरामाशस्त्रभुतामह। झपाामकरयास्मिसोतसामस्मिजावी ॥३॥ M भाषा अनुवाद महर्शियों में गु मै हौं और अक्षर तथा पद प्रात्मक वाक्यके वीच ओंकार अक्षर मीमै हौ औ यज्ञोमे हिंसाः रहित हेतुसे जमरूपं यन्न मै हौ स्थावरोमे हिमालय भी हमहीं हैं।॥ २५ ॥ और दक्ष जातियों मे अश्वत्य कहे पीयर यौ देव पियो' नारद मैं हौ औ गन्धर्वगणों मे चिनरथ ओ सिद्ध कहे अाजन्म से परमार्थ ताज्य ज्ञानियों मे कपिल मुंनि मै हौं ॥२६॥ अश्व कहे घोडों मे उच्चैःश्रवा नौ गजेन्द्र में अरावत तथा मनुष्यों मे नरपति राजा मी मैहीं हौं ॥२७॥ और वायुधों में वन औ धेनु सकलमे कामधेनु यो प्रजा उत्पत्तिकारी जो कन्दर्प सो मैही हौ तथा समी मे वासुकी भी हमै जानो विपधारियों की सर्प संज्ञा है ॥२८॥ नागों मे अनन्त शेष नाग और जल जीवों में वरुण राजा मै हौ औ पितरों मे अर्यमा तयां दण्डकारियों से यमराज हमै जानो। नाग श्री सर्प मे यह भेदः है कि विप रहित को नाग कहते हैं ॥२६॥ दैत्यो मे प्रसाद मै हौ और वश करनेवालों में संख्या में काल मै हो मग जाति मे मगेन्द्र कहे सिंह मै तया पक्षियों में गरुड में हो॥३॥ और पवित्र तथा वेगवानों मे पवन कहे वायु यौ शलधारियों मे राम दशरथ के पुत्र हम को जानो तथा मछलियों मे मकर नाम मत्स्य मै हौं और सोत कहे गवाहरूप नदियोंमे नांडवी गङ्गामी मैहों हौं ॥३१॥ सर्ग: कहे भाका शादि पदाथों में आकाश ज़ों आदि मध्य अन्तमे सदा शर्त्तमान सो मै हौं अथवा ৩২ १२६ थीमद्भगवडीता। सगीपामादिरन्तश्चमध्य ञ्चैवाइमर्जन, अध्यात्मविद्याविद्यानांवादःप्रवदतामह ।। २२. अक्षराणामकारोऽस्मिन्द्र सामासिकस्खच अहमेवाक्षःकालोधाताई विश्वतोमुसः॥ ३३.३...म्रत्युःसर्व इरचाहमुझवञ्चभविष्यतां । कीर्तिः यीचिनारी गांसातिभधाधुतिःचमाः ॥३४॥. रहमामतघासाम्नांगायबीच्छन्दसाम। : मासा नांमार्गशीर्पोहरतनांकुसुमाकरः ॥ ३५॥ ५,ातंछलयताममितेजतेजखिनामहं । जयोऽस्यिव्यवसायोसिसत्वसत्त्ववतामहं ॥ ३६॥ष्णोनांवासुदेवोऽसिपाण्डवा नधिनञ्जयः। मुनीनामप्यहव्यासःकवीनामुशनाकथिः ॥ ३७॥ दण्डोमयताम स्मिनीतिरस्मिजिगीपतां । मौनचैवासिागुयानांचानंज्ञानवतामई ॥ ३८॥ यच्चा भाषा अनुवाद हष्टि से अादि मध्य अन्त मै हू तथा हे अर्जुन विद्यों में अध्यात्म विद्या औ प्रवाद करने वालों के वीच वादरूप में हौं जिससे सिद्धान्त, मक्ष थिर होता है॥३२॥ और अक्षरों के मध्य मे,अकार, अक्षर मै ई और समासों के वि उभय पद: मधान हन्दू समास और अक्षय प्रवाहरूप काल जो सो हम हैं और पाल प्रदान करनेपालों में विश्वतो सुख कहे सर्व फल विधान कर्ता मै हौं ॥ ३३ ॥ संहार कारियों के मध्य मे सर्व संहारकारी त्युरूप हम को जानो और होनेवाली वस्तुवों मे उद्भव पदार्य हम है. और स्त्रियों में सप्तनारी कहे कीर्ति थी वाणी स्मति मेधा पति क्षमा ये रूप मेरेहीं हैं ॥३४॥ : चोर.साम वेद मे मन्त्र मानणं गद्य पंद्य भूत युतियों के मध्य मे इत्तलाम लाम हम को जानो जिस से इन्द्र गाये जाते हैं और छंद वन्धयुक्त मन्त्रोके मध्य गायबी हम हैं और मास काहे महिनोंमे: मार्गशीर्ष वाहे अगहन मास हम हैं औ कतुवों मे पसन्त ऋतु में हो ॥३५॥ छल वस्तुवों मे चूत कहे जुत्रा.मैहीं और तेजखियों मे तेज जो प्रताप सो मैं तथा जय और व्यवसाय कहे उद्यमभी मै और सतोगुणी जिनने हैं उन ने सतोगुण हम हैं ॥३६॥ और दृष्णि वंशियोंमे वासुदेव कृपा हम है जो तुमको उपदेश करते हैं और माण्डवों में अर्जुन नो तुम सो मै हूँ औ मुनियों में व्यासदेव तथा करियों में उसना कहे शुक्र हम हैं ॥३७॥ दम करनेवालो मे दण्डरुप इम तथा जीतने वालोंकी नीति रीति इमै भानो गुह्य पदार्थोंमे मौन जो सो हम और मानवानों दशम अध्यायः। मिसर्वभूतानांवीनंतदहमर्जुन। नतसिविनायत्सान्मयाभूतंचराचरं ॥ ३८ ॥ नान्तोऽस्तिममदिव्यानाविमतीनापरन्तप । एंपतूद्देशतःमोक्तीविभूतेर्षिस्तरोमया ॥४०॥ यद्यविभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्रनितमेववा। तत्तदेवावगच्छत्वममतेनोंशसम्म वः॥४१॥ अथवावहुनतेनकिंज्ञातेनतवार्जुन। विष्टभ्याइमिदंछत्तमेकांशेन थितीनगत् ॥४२॥ इति श्रीभगवगीतायां विभूतियोगोनाम दथमोऽध्यायः ॥१०॥ भाषा अनुवाद ज्ञानरूप भी हमी है ॥३८॥ और यायत नीवांमे नो बीन सो हे अर्जुन हम है और जो मेरे विना है सो कुछनही है अर्थात् घराचर मेरे विना कुछ वाकी नहीं है ॥३८॥ जिस हेत हे परन्तप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है इससे सम्पूर्ण कही नहीं गाय सकती है पर इतनी जो कहा सो उद्देशकहे संक्षेप से मैने लक्षित कराया है॥४०॥ यह सुनिके अधिक थवमाकांक्षी अर्जुनसे भगगान संक्षेपरूप अपनी सर्वरूपता कहै कि ऐश्वर्ययुक्त अथवा वलयुक्त वा प्रभावयुक्त तथा विद्या बुद्धिरूप गुणयुक्त है सो मेरे अंग औ प्रभावसे है यह जानो अर्थात् उसमे मेरा विशेष अंश है ॥४१॥ अथवा हे अर्जुन इस सब बसेडे से तुमको का प्रयोजन है सकल वस्तु मे हमको देखो यह कहते है कि यावत पदार्य में मैं व्यामरहा यह जगत मेरा रूप है मोहि छोडि यौर कुछ मावभी नही है॥४२॥ इति श्रीनगन्नाथ शुकुल विरचित मनभावनी टीकायां योगशाले विभूतियोग नाम दशमोध्याय ॥ १० ॥ जो पल्लुमात श्रीमद्धगवडीता एकादश अध्यायः। धर्नु नउवाच ॥ महदनुग्रहायपरमगुयमध्यात्मन्नित। यत्वयोवमसेन मोहोऽयंपिंगतोमम ॥१॥ भवाप्ययोहिमतानाथुपौषिसरधोमया। त्वतःकमल पंवाचमाहात्म्यममिचाव्यये । एवमेवद्ययात्यत्वमात्मानमरमेश्वर। इष्टमि भाषा अनुवाद थीभगवान कृष्णचन्द्र अति कृपाकरिके अपनीविभूतिका विभव जव कहा व सो सुनि के दर्शनेच्छु अर्जुन को विष्टस्याहमिदंकृत्स्नमेकांशेनस्थितोनगदित्यादि.झोक से मंगवान ने विश्वात्मक परमेश्वर सरूप प्रसङ्ग वशते देखाया तो अर्जुन भगवटुक्त पूर्व यचनों की प्रशंसा करते हुये अब.एकादश अध्याय के प्रारम्भ मे चारि झोक से कहते हैं कि अशोच्यानन्वशोचस्वमित्यादि दूसरे अध्याय के, ग्यारहे लोक से लेकर छठवें अध्याय तया मेरे शोक नित्तिके अर्थ परमात्मनिष्ठ अति गोपनीय: यात्म औ अनात्म विचार के विषय जो वचन अापने कहा उन से हम हन्ता औ ये गनुगणे हमारे मारने योग्य असी नो मेरी मम सो नष्ट हो गई क्यों कि आत्मा को कार्टव यादि कुछ नहीं है यह आपने कहा सो ठीक.ही है॥ १ ॥ और भूतों की सृष्टि तथा प्रलय भी. आप ही से होतो यह भी मैने विस्तार से सुना और हे कमलमनाक्ष श्रीक्षण प्राप का अव्यय कहे अक्षय माहात्म्य भी आम से सुना इस से अव जीप सफल आप के अधीन है यह जाना और अहं कत्ती मोका इत्यादि रूम मेरा मोह सम्पूर्ण दूर हो गया:॥ २ ॥ और जो बाप ने सप्तम अध्याय में कहा कि भूत सृष्टि तथा प्रलय आदि कार्यों का कारण मै हैं और दशम अध्याय के अन्त मे कहा कि विष्टस्याइमिदंशन मेकांशेन स्थितो नगदिति -- .
एकादश अध्यायः । १२९ छामितरूपमैश्वरपुरुषोत्तम ॥३॥. मन्यसेयदित क्यंमयाधुमितिमभो। योगे श्वरमतोमेवंदर्शयात्मानमव्ययं ॥४॥ थीभगवानुवाच॥ पश्यमेपार्थरूपाणिशतशो ऽयसहस्रशः। नानाविधानिदिव्यानिनानावणीकृतीनिच ॥५॥ पश्यादित्यान्वकून् रुदानचिनोमरुतस्तथा। वहन्यदृष्टपूर्वाणिपस्याश्चर्याणिमारत ॥ ६॥ इहैकख जगत्कृत्स्नं पस्याद्यसचराचर। भमदेहगुड़ाकेशयचान्यद्रष्टुमिचासि ॥ ७॥ भापा अनुवाद और अब भी जो रूप आप अपना कहते हो यह सब ऐसा ही है इसमे हमै कुछ सन्देह नहीं है तो मी हे पुरुषोत्तम जान ऐश्वर्य वल वीर्य यौ तेन से सम्पन्न कहे युक्त तुमारे रूप को अति आश्चर्य से मै देखने की इच्छा करता ई॥३॥ चौर भेरी इच्छा देखनेकीहै इस हेतु आपको अपना रूम देखावना अव उचित है यह कुछ बड़ी बात नहीं है परन्तु हे योगेश्वर जो वह अामका ईन्वरखरूप हमारे देखने, योग्य होय और हम देख सके तो हे प्रभो यही अव्ययखरूप अपना हमै कपारि दिखायो यह अर्जुनने भगवानसे कहा ॥४॥ जब ऐसी प्रार्थना अर्जुनने किया तव भगवान श्रीकृष्ण अपने रूपके देखावने का मनोरथ कर के अर्जुन को 'सावधान होउ यह कहि करिके चारि लोकमे कहते है कि हे पार्थ अर्जुन अपरिमित नाना प्रकार के अलौकिक मेरेरूम अव तुम देखो और वर्ण कहे शुला सण आदि प्राकृति कहे कर चरण असव यथायोग मेरा दिव्यरूम नानावर्ण प्राकृतिका नोसोम देखो जो देखा चाहते हो॥५॥ अव सोई आम कहते है कि हे भारत सर आदित्य यौ वसुगरा रुद्रगण तथा अश्विनीकुमार औं मरुतगण ये सकल देवता को मेरी देह मे देखो और हे अर्जुन जो मेरा रूप न तुमने न और किसीने कभी देखा है ऐसा अद्भुत मेरारूप अब देखो॥६॥ और इस बल्लाण्ड के बीच हर एक स्थानों मे ममण करते हुये नो सुर्य चन्द्र ग्रह नक्षत्रादि समस्त चराचर निन को "कोटि वर्षमे भी कोई नही देखि सके है सो सव स्थावर नाम समेत सम्पर्ण जगत इस मेरी शरीर मे अवयव कहे अङ्ग रूप देसो और गुड़ाकेश अर्जुन जगत का आश्रय गौ संसार की अवस्था तथा नय मराजय आदि जो कुछ और देखा चाहो सो सब मेरि रूम मे देसो॥ ७॥ और जो अर्जुन ने कहा कि वह रूम मेरे । " ५७ . श्रीमद्भगवद्गीता। मतमाशक्यसेद्रष्टुमनेनैवख चक्षुपा। दिव्यंददामितेचक्षु पश्य मेयोगमैचरं ॥८॥ संभ यउवाच। एवमुक्षाततोराजन्महायोगेश्वरोहरि । दर्शयामासमार्थायपरमरू पमैश्वर ॥६॥ अनेकवतान यनमनेका तदर्शनं। अनेकटिव्याभरणंटिव्यानेकोद्य तायुधं ॥१०॥ दिव्यमाल्याम्बरधरंदिव्यगन्धानुलेपनं। सर्वाचर्यमयदेवमनन्तषि त्वतोमुसं ॥११॥ दिविसूर्यसहस्त्रस्यभवेद्यगपस्थिता। यदिभा,सदृशीसाखामा सस्त समहात्मन ॥१२॥ तबैक स्पंजगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्य देवदेव स्य शरीरेपाण्डवस्तदा ॥१३॥ तत.सविस्मयाविष्टोहृष्टामाधनञ्जय । प्रएपशिर भामा अनुवाद देखने जोग्य होय तो देखावो इस पर कहते है कि हे अर्जुन इन अपने चर्म चक्षु कहे चमडे की आखो से हमारे उस रूप को न देख सको गे इस से हम तुम को अलौकिक दिव्य ज्ञानचक्षु देते है उनसे वह मेरा ईचर रूम अधटन घटना समर्थ का दर्शन करो॥८॥ इस प्रकार से कह कर भगयानने वन को अपना विराट रूप देखाया तो वह रूप देखि अर्जुन श्रीकृष्ण को जैसा जाना यौ देखा सोई छ लोक से राजा धृतराष्ट्र के प्रति सञ्जय कहते है कि हे राजन् धृतराष्ट्र महात्मा थीछष्ण योगेश्वर ने अर्जुन से ये सब बातें कह करके अपना ऐश्वर्यविशिष्ट परम खरूप अर्जुनको दर्शन कराया ॥ ६ ॥ अव किस प्रकार का वह रूम है सो कहते है कि अनेक है वन कहे मुस यी नेत तथा अनेक अनेका है अद्भुत वस्तुपो का दर्शन जिस मे और अनेक दिव्य आभरण औ दिव्य प्रायुध धारण है जिस में ऐसा रूप भगवान ने अर्जुन को देयाया ॥ १० ॥ और टिव्य माल्य कहे पुष्प औ दिव्य अखर कहे वस्त्र तथा दिव्य गन्ध लेपन है जिस रूप मे और नाना यार्य युक्ता तथा अनन्त अपरिचिन्न यो सर्वन है मुख जिस में सो रूप देखाया ॥ ११॥ और उस रूप को निरूपम प्रमा प्रकाश करते है कि आकाश मे जो एक बाल सहन सूर्य के उदय की प्रभा हो उठे तो कदाचित उन महात्मा की कान्ति के कोई अंश की उपमा होय तो होय नही तो उस रूम की उपमा कोइ नही है॥१२॥ तिस में वादि क्या मया सो कहते है कि उस समय अर्जुन को नाना प्रकार शरीर में अनेक भागमे सित समस्त जगतको ---- एकादश अध्यायः। सादेयंकृताञ्जलिरभापत॥१४॥ अर्जुनउवाच ॥ पश्यामिदेवांस्तवदेवदैहेसवींस्तथा भूतविशेषसंधान्। ब्रह्माणमीशंकमलासनखम्पीयसर्यानुरगांश्चदिव्यान् ॥१५॥ अनेकवाटरवचनेबंपश्यामित्वासर्वतोऽनन्तरूपं । नान्तं नमध्यं नपुनस्तबादि पश्या मिविश्वेश्वर विश्वरूप ॥१६॥ किरीटिनंगदिनंचविणवतेजोराशिंसर्वतोदीप्तिमन्तं । पश्यामित्वादुनिरीक्ष्यसमग्ताहीमानलार्फातिमप्रमेयं ॥१७॥ त्वमक्षरंपरमवेदि तव्यत्वमस्यविश्वस्यमरंनिधानं । त्वमव्यय शाश्वतधर्मगोतासनातनस्त्वंपुरुपोमतोमे ॥१८॥ यनाटिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तवाइंगगिसूर्यनेवं । पम्यामित्वादीप्तड + भाषा अनुवाद श्रीवाष्ण एक अपनी शरीर मे एक बारगी देसाया ॥ १३ ॥ तव तो अर्जुन वह आश्चर्य रूप भगवान का रूप देखि अतिशय कौतुकयुक्ता होय आनन्द से पुलकित भये और मस्तक झंकाय प्रणाम करि हाथजोडि यह वचन बोलते भये ॥१४॥ अय सञ्जय सबह झोकमे यर्जुनके कहे जये वचनों को कहते है कि हे कृष्ण आपकी शरीरमेश्रादित्य औ यावत्मतसमूह अर्थात् जरायुज मनुष्य पशु घऔर अण्डन पक्षी सर्प आदि औ स्वेदन जं श्रां मच्छड प्रति तथा उबिज लता वृक्ष आदि ये सव देखता हो और हे देव सकल देवता औ नामि कमल मे ब्रह्मा बैठे तथा ईश महा देव घोर दिव्यपि पशिष्ट यादि यी उरग तचक.यादिकोंकोमी देखता हूं और पझासनस्थ ब्रह्मा किसमकार देसपडते सो कहते है कि पृथिवी रूम नामि से उठा जो कमल सकप सुमेरुगिरि तिस पर बैठे हुये ब्रह्माको देखों है।॥१५॥ और अनेक वाहु अनेक उदर अनेक मुस अनेक नेव तुनको सर्चब मैं देखताई परन्तु हे विश्वरूप तुमारा आदि मध्यअन्त मावही नहीं टेसता इ॥१६॥ और मुकुट गदा चक्र युक्त तथा तेजःपुञ्ज सईन प्रकाशमान अति दुनिरीक्ष्य चई ओर प्रदीप्त अनल अर्क के समान तमको मैं देखता हूं॥१७॥ जिस हेतु तुमारा ऐश्वर्य ऐसा अचिन्त्य है इससे तुम अक्षर परजला मुमुक्षुलोगोको नाननेयोग्य और तुम इस विश्व के निधान काहे परम श्राश्रयमत हो इससे तुम निल्ल नौ नित्य धर्मके पालक औं अनादि पुरुप मेरेमतमे हो॥१८॥ और अनादिमध्यअन्त वाहे उत्पत्तिस्थिति लय रहित औ अनन्त प्रभाव तथा अनन्त बाज ौ चन्द्र सूर्य है नेन जिसके ऐसे १३२ थीमद्भगवद्गीता। ताथवखतेजसाविश्वमिदंतपन्त र द्यावाष्टथिष्योरिदमन्तरहिव्यात दिशचसर्वाः। दृष्ट्वागतरूपमिदंतवोग्रलोकवयंमव्यघितमहात्मन् ॥२०॥ अमी खासुरसंधाविशन्ति केचिशीता प्राञ्जलयोगृणन्ति । वस्तीत्युवामहर्षिसिद्धसंघावी चन्तेवांस्तुतिभिःपुष्कलाभिः ॥२१॥ रुद्रादित्यावसवोयेचसाध्याविशेऽग्विनौमरुत्यो पाच । गन्धर्व यच्चामरसिद्धसंघावीचन्तेत्यांविस्मिताश्चैवसर्वे ॥३२॥ रुपम इत्ते बहुबक्रनेत्रं महायाहोवहुवाहरुपादं । बहूदरवहुदंष्ट्वाकरालदृष्ट्वालोका मव्यथि सपाहे ॥२२॥ नमोसृशंदीप्तमनेकवर्णव्यात्ताननंदीप्तविशालनेले । . दृष्ट्वाहित्वांप व्यथितान्तरात्मातिनविन्दामिशमञ्चविष्णो ॥२४॥ दंष्ट्राकरालानिचतेमुखानि भाषा अनुवाद तुम को हम देखते हैं और अग्नि जिस के मुख में जाज्वल्यमान है ऐमें आम अपने तेज से इस विश्वभर को सन्तप्त करते हुये तुम को मैं देखा है। ॥ १६ और हे महात्मन् वर्ग औ प्रथिवी तथा अन्तरिक्ष और संकल. दिशा एक आर्म व्याप्त हैं सो यह उग्र रूप धाप का देखि के त्रैलोक्य अति भय खाता है ॥ २ ॥ और ये सम्पूर्ण देवता भयमाय तुमारे शरणागत हैं और कोई अति भीत होय दूर खड़े करजोड़े जय जय रक्ष रक्ष पुकार मुकार प्रार्थना करते हैं और महर्पि तथा मिहसंघ तुम को देखते स्वस्ति वचन उंचारते हुये सम्पर्ष स्तति से स्तति करते हैं ॥ २१॥ और रुद्रगणं आदित्यगण वसुगण औ साध्यगण देवगण तथा विशे टेवा अश्विनीकुमार श्रौ मरुतगण पिटगण उष्ण द्रव्य मान करनेवाले मिढगण धर्म शारत्र धौ शुति मे ऐसे कहा कि मिटगण तब तक मौन भोजन करते जब तक अन्न उष्णं है और यावत् पिट उद्देश करिके दिये जये अन्न का गुण वर्णन रूप मधु वातादि वैदिक मन्त्र पाठ समाप्त न होय तावत् पितर अन्न खाते हैं और गन्धर्वगण यक्षगण और विरोचन प्रभृति असुरगण नौ सिइंगणये सकल' विमय युनाहोकेतुमकोबड़े एकटकदेखते हैं ॥२२॥ और हेम हावाहो यह महान् तुमारा रूप.जिसमे बहुत सुख नेव वाहु उस पाद उदर हैं और जो बहुतेरे कड़े. मंडे) दांतों से अति कराल कहे भयानकार इस को देखने सकल लोक व्यथायुक्त है और भी अतिमीडित है। ॥२३॥ और मैहीं केवल डरता है यह नहीं ऐसा यहरूप एकादश अध्यायः। नकालानलसन्निमानि। दिशोनजानेनलभेचशर्मप्रसीददेवेशजगन्निवास ॥२५॥ अमीचवीतराष्ट्रस्यपुत्चा:सर्वसहैवानिमालसंधैः। भीमद्रोण.सूतपुत्चस्तथासौस हाखादीयैरपियोधमुग्यैः ॥२६॥ पवाणिते त्वरमायापिन्तिदंष्ट्वाकरालानिभयान कानि॥ बेचिदिलग्नादशनान्तरेपुसंदृश्यन्तेचूर्णितैरत्तमांगः ॥२७॥ यथानदीनां वहवोऽम्बवेगा.शमुद्रमेवाभिमुखाद्यन्ति । तवातवामीनरलोकवीराविन्तिवला भाषा अनुवाद अाकाश को मरस करनेवाला अर्थात् अन्यव्यापी तेज युक्त नाना वर्ण विशिष्ट विस्तार को प्राप्त भौ जलजलाते है विशाल कहे वडे बडे नेत्र निस के ऐसे तुम को अवलोकन करि के हे विष्णो हमारा अन्तरात्मा व्यघायुक्त है और मैं इस रूम को देखते हुये शान्ति तथा धीरज किसी तरह नही घर सकता ॥ २४॥ और हे देवेश तुमारा मुख देखि कर डर के मारे हमै दिशा भूलि गई और सुख शान्ति पावते नहीं हे जगन्निवास अव प्रसन्न होउ अब कैसा मुख देसि कर डर भया सो करते कि बडे बडे कराल दांतो से भयानक जो प्रलयाग्नि के समान है॥२५॥ और जो कहा कि अन्यत् जो मावो पराजय है सो भी इस मेरी शरीर मे देखो मोई देसि अब अर्जुन पांच झोक से कहते है कि जयद्रथ प्रभृति रामगण समेत ये धतराष्ट्र के पुत दुर्योधनादि तमारे मुख मै प्रवेश करते है और मीम द्रोण थो सूतपुन कर्स ये भी तुमारे मुष मे प्रवेश करते है और यही सब नहीं प्रवेश करते है बलु प्रतियोधा अर्थात् हमारे पक्ष के भी शिखण्डी धृपद्युभ प्रभृति को के समेत वे सवप्रवेश करते है॥ २६ ॥ और ये दुर्योधनादिक धावते हुये तुमारे विकट दन्तो से कराल सुस ने प्रवेश करते है और जिनके बीच कोई कोई थोडा मस्तक चूर्ण जये तुमारे दातो को मध्य सन्धिमे लपटे से देस पडते है॥ २७॥ अब उनके प्रवेश विषय मे दृष्टान्त कहते है कि जैसे अनेक गनेक मार्ग से नटियो के धारा प्रवाह समुद्र के अभिमुरा धाये भये जायकर समुद्र मे प्रवेश करने है तैमेही ये नरलोक के वीर सकल नाज्वल्यमान तुमारे मुसमे पैठते जाते है॥ २८ ॥ वे वश खंप प्रवेश मे नदी का दृष्टान्त कहिकर अव वुद्धिपईक प्रवेश करने में ७g -- १३४ श्रीमद्भगवडीता। यमितोवलन्ति ॥२८॥ यथाप्रदीतज्वलनंमतहाविशन्तिनाशायसम्यगाः। ते थैवनाशायविशन्तिलोकास्तवायियकारिसमावेगाः ॥२६॥ लेनियसेग्रसमानःसम नसाम्लोकान्समग्रान्वदनैचलगि। तेजो भरापूर्यजगत्समभास स्तवीग्राःमतपन्ति विष्णो ॥३०॥ श्राख्याहिमेकोभयानुग्ररूपोनमोऽस्तुतेदेववरप्रसीद। विनातुमि च्छामिभवन्तमायनहिप्रजानामितव प्रति ॥३१॥ श्रीभगवानुवाच। कालोस्मि लोकजयकृत्पनोजोकान्समाह तुमिहारत्तः । तेमित्वानभविष्य नासर्वे येऽवस्थि ता.प्रत्यनीकेपुयोधाः ॥३२॥ तस्मात्त्वमुत्तिष्ठयशोलमखजिवाशाभक्षराज्यं सम्ट भापा अनुवाद दृष्टान्त कहते है कि जैसे वडे वेग यो उत्साह से पतङ्ग जो पांसी ते सव नाशके निमित्त दोष शिखा मे जाय नाय गिरते औ मरते है तैसे हो अति वेगमे ये सब वीर मनुष्य नाग के अर्थ तमारे मुख मे आय आय कर प्रवेश करते है ॥ २६ ॥ और प्रवेश के अनन्तर फेरि क्या होता तो कहते है कि तुम भी अति भयानक जिला लहलहाते हुये मानो लोय लील पेको रसना मसारी के अपने तेज से समय जगत को सन्तप्त करते भये उन सव वीरो को ग्रास कई मक्षण करने की इच्छा करते हो॥ ३०॥ हे महाराज जिससे तुमारा ऐसा उग्ररूप है इसमे भारको हर सो को और हम तुमको प्रणम करते है हे देय श्रेष्ठ तुम मेरे पर अय प्रसन्न होउ और अादि पुरुप जो तुम सो तुमको मैं जाना चाहता और एवंभूत जो तम तुमारी प्रति कहे वार्ता कुछ भी हम नही जान शकते है ॥३१॥ इस प्रकार अर्जुन से प्रार्थना किये गये थीभगवान तीनि लोक से कहते है कि भै सकल लोकका क्षय करनेवाला कालरूप है। और प्राणियोंगो संहार करनेकी इच्छा करि इस लोक मे प्रयत्त कहे प्रगट भया हौं सो एक तुमको छोडि और पोई एस से न बचेगे अर्थात् मति मेना से जो भीम दोर नादियोहा है। सबके सब मरेंगे॥ ३२ ॥ जिस हेतु ऐसा होनहार है ईस से तुम युद्ध के अर्थ उठो और देवता से भी अनय जो भीम द्रोग आदि वीर सो अर्जुन से पराजित भये इन यश को नाम करो और शवों का विनाश करि कै सार्ग, राज्य भोग करो और ये गोतमारे है शत्रु तिन को युद्ध के पर्व भी काल रूप ने यद्यमित T एकादश अध्यायः । इं। मतेनिहताःपूर्व मेवनिमित्तमायभवसव्यसाचिन् ॥ ३३ ॥ द्रोणाञ्चमीम वनयप्रथञ्चकतथान्यान पयोधवीरान्। मयाहतांस्त्वजहिमाथिठायुध्यखजेता सिरसपत्नान् ॥३४॥ सञ्जयउवाच । एतच्छ्रत्वावचनं के शवख कृताञ्जलिर्वेपमा नःकिरीटी। नमस्कृत्यभूयएवाहकृष्णसगढ़दमोतभीतःमयम्य ॥३५॥ अर्जुन उवा च। स्यानेहमीकेशातन प्रकीयानगत्महृष्यत्यनुरव्यतेच। रक्षासिमीतानिदियो द्रवन्ति सर्वनमस्यन्तिचसिद्धसंधा॥३६॥ कमायतेननमेरमहात्मनगरीयसेब्रह्म भाषा अनुवाद करि राखा है तो भी हे सव्यसाचिन् अर्जुन तुम निमित्त मात्र होउ सव्यसाची उसको कहते 'नो वाये हाथ से युद्धादि कार्य करि शक है ॥३॥ और जो भूर्व में अर्जुन ने शंका किया कि हम इन को बीतेगे या येई हम को मारने यह हम नही जानते है उसका वारण करते हुये कहते है कि निनसे तुमको शङ्का भई ची वे सब मुझसे हत भयेहै वो द्रोय भीम जयद्रय कर्ष तथा और और जो वीर उन सवको तम जय करो और उनसे रत्तीभर न डरो तुम अवश्य ही नीतोगे ॥३४॥ तिसके दादि नो भया सो संजय धृतराष्ट्र से कहते है कि ये श्रीकृष्ण के बचन सुनि करि काम्पमान कालेदर किरीटी अर्जुन हर्प औ भय केभारेगदगदकण्ठ अतिरउसे डरे जैसे ज्ञापनों हथीकृष्णको प्रणाम करके वक्यमाण कहे यागेकहेंगे जो पात कइते भये ॥ ३५ ॥ अब इस लोक से अर्जुन कहते है कि हे हपीकेश जिस हेतु तुम ऐसे अद्भुत प्रभाव से युक्त श्री भक्तवत्सल हो इससे तुमारा माहात्म संकीर्तन करने से केवल हमोजे नो हर्ष पाया सो नहीं किन्तु यहाण्ड भर अति हर्षित औ प्रीतियुक्ता है यह उचत है और इस बह्माण्डमे तो सब सज्जन प्रसन्न प्रो राक्षस सकल डर के मारे दग दिशामे भागे फिरते है और योग तप मन्त्र आदि के द्वारा सिहगए तुम को प्रणाम करते है यह कुछ अाश्चर्य नहीं है ॥३६॥ और सबके इप सो प्रणाम करने मे अवहेतु कहते हैं कि हे महामन् हे अनन्त हे'जगन्निवास थीलष्ण क्योंन ये सब मगाम करेंगे कि नो तुम बमाकेभी यदि कती कहे जनक और हो योर सत् कहे व्यक्त प्रगट नो नगर श्री असत जो अव्यक्त प्रकते माया इन दोनोसे पर अर्थात् मूल कारण रूप अक्षर कहे अविनाशी बोझ सो गुरु यीमद्भगवडीताः गोऽयादिक। अनन्तदेवेशजगन्निवासवमंचरंसदसत्तत्परंवत ३७॥ त्वमा दिदेवापुरुषःपुराणस्त्वमसविश्वस्यपरनिधान । वेत्तासिवेद्यञ्चपरवधामत्वयातंतं. विश्वमनन्तरूम ॥ ३८॥ वायुर्वमोनिवरणःशंथाङ्का प्रजापतिस्त्वं प्रमितामहरा नमोनमस्तेऽस्तुसहसष्टत्वःपुनञ्चभूयोपिनमोनमस्ते॥३६॥ तम पुरस्तादयष्ठत मोऽस्तुतेसर्वतएवसर्व । अनन्तविर्वामितविक्रमत्त्वंसर्वसमाभोपिततोसिसर्वः ॥४॥ R भाषा अनुवादः भी तुम हौ तौ नवधा भक्ति द्वारा जो सब तुम को प्रणाम करते हैं सो उचित है। और संपूर्ण देवतों के अादि भूत जो अनादिपुरुष तुम सो इस विश्वके परनिधान लयसान औं विश्व के नाता यौ नो कुछ जानने के योग्य वस्तु है सो तुम और परम धाम नो विष्णुपद सो भी तुम है। इससे हे अनन्तरूप कृष्ण तुम इस विश्वमे व्याप्त है। इन सात हेतुवों के द्वारा भी तुमही नमस्कार योग्य हो ॥३७॥३८॥ जिस हेतु तुम सर्व देवरूप है। इससे तुम सबके नमस्कार योग्य हो असे बचनोंसे भगवान् की स्तुति करिके अब अर्जुन थाप प्रणाम करते है कि वायु यम अग्नि वरुणं चन्द्र प्रजापति ब्रह्मा औं प्रपितामहं ब्रह्मा के भी गनक जो तुम सो मेरे सहस सहस.प्रणाम तुमको है. फेरि फेरि भी सहम संहस्त्र प्रणाम हैं ॥ ३६॥ भक्ति औ बरा तया आदर को अधिकाई में भगवत. को नमस्कार करने से टंति.न.पाय के पुनार और भी. प्रणाम करते हैं कि हे सर्यात्मन् 'तुमारे सन्मुख ना पृष्टभाग मे प्रणाम करताई और तमारे संव और भी मेरी नमस्कार पहुंचे और भगवान की सर्वात्मकता सिद्ध करने की आकांक्षा पर कहते हैं कि जिस की अनन्त सामर्थ आ अपरिमित पराक्रम एवंमत जो तुम विश्व के भीतर वाहर सम्यक्ष व्याप्त है। जैसे सुवर्ण नानारुम से भषणों में व्याप्त है ना त्तिका घट आदि मावों में जैसे व्याप्त है. तैसे विश्वमे आम व्याप रहें है।॥ ४.०॥.. अब दो लोकके द्वारा भगवान से अर्जुन अपनी अपराध क्षमा करावते हैं कि हे कृष्ण हे यादव हे सखे ऐसे बचनों से यामको अपना सखा भानि,जो हठसे मैने तमारी यह महिमा नजानिके अथवा भल या, प्रणय को अति प्रोति से कहा सो मेरी ननजान की असावधान एकादश अध्यायः। सखेतिमत्वानसभयतांहेशहेयादवहेसपेति। धजानतामहिमानंतवेदमयाम भादात्मणयेनवापि ॥४१॥ यच्चाव हासार्थमसत्क तोसिविहारशय्यासनभोननेषु । एकोऽथवाप्यच्युततत्समचतक्षामयेत्वामहमममेयं ॥४२॥ पितासिलोकस्यचराचर स्यत्वमस्यपूज्यश्चगुरुगरीयन् । नत्वत्समोस्यम्यधिकःकुतोऽन्योलोकक्येऽप्यप्रतिमप्र भाव ॥४३॥ तस्मात्मणस्यमणिधायकायंमसादयेत्वामहमीशमीा। पितेवपुत्त्रख सखेवसख्युप्रियाप्रियायाईमिदेवसोढुं ॥४४॥ अदृष्टपूर्वहपितोऽस्मिदृष्ट्वामयेनचा भाषा अनुवाद अपराध चूक आप क्षमा करो॥४१॥ और हे अच्युत विहार शयन भोजन क्रीडा आदि मे अधया सखागण रहित निर्जन स्थान मे वहां हम और तुम को शेड और कोई न था भैसी जगह मै अथवा परिहास करने वाले मित्रों के बीच मै जो हमने हसने के लिये तिरस्कार आपका किया है सो सब अचिन्त्य प्रभाव यापसे हम क्षमा करवावते है ॥ ४२ ॥ अव भगवत् का अचिन्त्य प्रभाव कहते है कि हे अप्रतिम प्रभाव नहीं है प्रतिमा कहे उममा ऐसा निरूपम प्रभाव है जिसका सो तुम इस चराचरात्मक लोक के पिता को उत्पत्ति करनेवाले पूजनीय तथा गुरु के भी गुरु है। इस हेतु परमेश्वर जो तुम तुमारे समान का विलोको मे कोई नही है तो अधिक फेर धौर कहां होय सकैहै यह धर्नुननेकहा ॥४२॥ इसमे हे ईश स्वामिन् सुति के योग्य ईश्वर जो आप तिन को मै गरीर से दंडकी नाई अष्टाद्ग प्रणाम करिके प्रसन्न करावताई कि जैसे पुनकी अपराध शापा करि के पिता साह लेता और मिव की अपराध मित मन मे नही धरता तथा पत्नी की अपराध पति भी प्रीति से सह्य करता है तैसे ही हे देव पिता औ मिन तथा स्वामी रूप आप भी मेरी अनजान वालक समान मोतिपान सेवक की अपराध क्षमा कीजिये ॥ ४ ४ । इस प्रकार से जमा करायके अय अर्जुन दो लोक के द्वारा मगवान से प्रार्थना करते है कि हे देव श्रीकृष्ण अष्टपूर्व यह श्रापका रूप देखि के मै अति प्रसन्न भया है। परन्नु भय के मारै मेरा मन थिर नहीहै इससे हे देवेश जगत के निवास व मे रेपर प्रसन्न होउ और कही पूर्वरूप देखायो यह प्रार्थना करता ई॥४५॥ अव सोई पूर्वरूप कहते है कि हे सहस श्रीमद्भगवडीता। व्यथितंमनमे। तदेवभेदर्शयदेवरूपंप्रसीददेवेशजगन्निवास ॥ ४५ ॥ किरीटिनंग दिनचक्रहस्तमिच्छामित्वांद्रष्टुमहं तथैव । तेनैवरूपेणचतुर्भुजेनस हसवाहोमववित्र मत्त ॥ ४६॥ श्रीभगवानुवाच । मयान सन्नेनतवार्जुनेदंरूमपरदर्शितमामयोग। तेजोमयविश्वमनन्तमायन्मे त्वदन्ये ननदृष्टपूर्व ॥४७॥ नवेदयताध्ययनैर्नदानैर्नच क्रियामिनतमोभिरुग्रैः। एवंरूपःशक्योऽहंनृलेकेदृष्टुत्वदन्ये नकुरुमवीर ॥४८॥ मातव्यथामाचविमूढभावोदृष्टारूयंघोरमीयमेदं। व्यतभी प्रीतमना पुनस्वं तदे भापा अनुवाद वाहो हे विश्वमूर्त सोई किरीट मुकुट दिये गदा श्रौ चक्र हाथ मे लिये आपको देखनेकी इच्छा करता है। इससे अव आप इस विश्वरूपको संहार वारिके वैसाही चतुर्भुजरूप सरूम धारण करो॥४६॥ भगवान श्रीकृष्ण जव ऐसे प्रार्थना किये गये तव अर्जुन को समझाते हुये तीनि लोक से यह कहने लगे कि है अर्जुन तुम भय काहे लिये करते हो मैने अति प्रसन्न होय अपनी योगमाया की सामर्थ्य से यह अपना अपूर्व उत्तम रूप तुम को कृपा करि के देखाया है और इस तेज मय विश्वात्मक आदि अन्त रहित मेरे रूप को तुमारे समान भक्त के विना किसी और भक्तने कभी भी नहीं देखा है ॥४७॥ और यह अति दुर्लभ दर्शन पाय के तम अव कतार्थ भयेही सोई कहते है कि न वेद अध्ययन से न यज्ञ अध्ययन कहे यविद्या जो कल्पसूल आदि कर्मकाण्ड के अर्थ संग्रह किये ग्रन्थ तिन से अर्थात् न यज्ञविद्याध्ययन से और न दान से न अग्निहोत्र आदि क्रियो से न चान्द्रायण आदि उग्र कठिन तपस्यो के द्वारा वह मेरा रूप नरलोक मे देखने के शक्य है सो हे करुणवीर अर्जुन तुम को छोडि और कोई नही नृलोक मे इस रूप को देख शका है सो तुम मेरे अनुग्रह से इस मेरे रूप का दर्शन कर अपने को कतार्थ भये जानो॥४८॥ जो असा धोर भयानकरूप देखि तुमको लाश होता है तो जिस मे तुम मेरा रूप देखि व्यथा ौ मूढता न होय इस से अब तुम विगतभम प्रसन्न चित्त होय फेरि इमाग सोई वह पूर्वरूप जो देसा चाहते हो सो देखो ॥४८॥ ऐसे वचन कहि कर भगवानने अर्जुन की यही पूर्वरूप अपना देखाया या सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते है कि महात्मा वासुदेव श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को मोई एकादश अध्याय. । १३६ वमेरूपमिदंप्रपश्य ॥४६॥ सञ्चयउवाच । इत्यर्जुनंवासुदेवस्तथोक्त्वाखक रूपंदर्य थामासभूय । अाश्वासयामासचमीतमै भूत्वापुनःसौय्यवपुर्महात्मा ॥५०॥ अर्जुन उवाच। दृष्ट्वेदमानुपंरूपंतवसौम्यंजना ईन। इदानीमस्मिसंकृत्त सचेता प्रकृति गत. ॥५१॥ श्रीभगवानुवाच । सुदुर्दमिदंरूपंदृष्टवानसियन्मम । देवाशप्यस्यरू पस्सनित्यदर्शनकाक्षिणः ॥५२॥ नाहंवेदैनतपसानदानेननचेज्यया। शक्यएवंवि धोदृष्टुंदृष्टवानसियन्मम ॥५३॥ भावनन्य योशक्योअहमेवंविधोर्जुन। चातुंद्र टुञ्चतत्त्वेनमवेष्टुञ्चपरन्तप ॥५४॥ मत्कर्मकृन्मत्परमोमझनःसङ्गवर्नित। निव र सर्वभूतेषुय:समामेनिपाण्डवं ॥५५॥ इतिविश्वरूपदर्शनोनामैकादर्शाध्यायः ॥१५॥ भाषा अनुवाद चतुर्म न किरीटधारी अपना शान्तखरूप फेरि देखाया और उरे भये अर्जुन को आवास दिया ॥५०॥ तिसके अनन्तर निर्भय होय अर्जुन ने कहा कि हे जनार्दन तुमारा यह शान्त मनुष्य खरूप देखि मै अव प्रसन्नचित्त औ सावधान मयों हो ॥५१॥ तिसके वादि भगवान अपनी कमा की दुर्लभता देखावते हैं कि नो हेय हमारा विश्वरूप खरूप तुम ने देखा इसका दर्शन अति दुर्लभ है देखो देवतागणे भी इस रूम के दर्शन की इच्छा सर्वदा करते है परन्तु इसका दर्शन नहीं पावते है ॥५२॥ उस अपने रूम के दुर्लभ दर्शन मे कारण कहते है कि तुम ने जो रूम मेरा देखा वह वेद अध्ययन औ तपा या दान यन्त्र के द्वारा किसी की देखने की सामर्थ नहीं है॥५३॥ तो फेरि कौन उपाय से श्राप दर्शन दें शकते हो ओ यह कहो तो कहते है कि अर्जुन अनन्य कहें भदेकचित्त भक्ति की के द्वारा ऐसे विश्वरूम से हम प्रगट हो सकते हैं और वह भला भी इमै नानि शक है और है परनाम अर्जुन शास्त्र से प्रत्यक्ष श्री तदात्म रूप प्रवेश अर्थात् उस रूम मे लीन हम कराय शकते हैं और कोई भी उपाय नहीं है।॥५४॥ अव शास्त्र के अर्थ का सारांश परम रइस कहते हैं कि हे माण्डव मानार्म कत कहें मेरी प्रीति के अर्थ जो कर्म करै है और मत्परम कहे महीं हैं। परमं प्रयोजन जिसको और मन कहे मेरे पाथिन या पुर्व स्त्री धन मे याशक्ति हीन और भूत कई प्राणी मात्र में बैर रहित नो है सोई इमको प्राप्त होता है।। ५॥
श्रीमद्भगवद्वीता द्वादश अध्यायः अर्जुन उवाच। “एवंसततंयुक्तायेभक्तास्त्वांपर्युपासते। येचाप्यक्षयमव्यक्ततेषांके योगवित्तमा॥ २॥ श्रीभगवानुवाच । मय्यावश्यमनोयेमानित्ययुक्तांउपासते। यापरयोपेतास्ते मेयुक्ततमामताः ॥२॥ येत्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तंपर्युपासते भाषा-अनुवाद एकादश अध्यायके अन्तिम लोक से और नवम अध्याय के एकतिस झोकादि से मी संगण भगवद्भक्ती ही को थेष्ठ कहा और तेषां जानी निन्य'युक्त एका भक्ति विशिष्यते इत्यादि सप्तम अध्यायके सत्र लोक से और सर्व ज्ञान, सवेनैव जिन सन्तरिष्यसि इत्यादि चतुर्थ अध्याय के छत्तिस लोकादि से भी जानी ही को श्रेष्ठ कहा है सो सगुण निर्गुण उपासना मे कौन उपासना श्रेय है अर्थात् जो मला सर्वन विश्वरूम सर्वशक्तिमान रूप तुम को ध्यान करता है सो कि वो अव्यक्ता श्री निर्विशेष अविनाशी बम की उपासना करता है सो दोनो के मध्य मे कौन अतिशय योगवित् अर्धात थेष्ठ है यह अर्जुन भगवान से पूछते भये ॥१॥ तिन दोनो के बीच मे सगुण उपासना सुख साध्य है इस हेतु से भगवान सगुण उपासक भक्त को बेष्ठ कहते हुये उत्तर देते हैं कि सर्वज्ञत्त्व आदिगुण विशिष्ट परमेश्वर खरूम मेरे मे मन को एकाग्रं करिके श्रद्धापूर्वक मत्नीत्यर्थ कर्म अनु छान करने में मेरेमे निष्ठ कहे युक्त होय जो हमारी आराधना करता सोई हमारे मन से युक्ततम कहे अति श्रेष्ठ है सो तुम तत्प्रीत्यर्थ कर्म करो ॥२२. और अचर अचाका लक्षण सरूप कहते हैं कि प्रा अनिर्देश अर्थात् यह है ऐसा है. इस कहने के अयोग्य है क्यों कि अव्यक्त कई रूपादि राहत है और हादश अध्यायः। वगचिन्त्यञ्चकूरस्थमचलंध्रुवं ॥३॥ सन्नियस्येन्द्रियग्रामसर्थवसमबुद्धयः । तेमाभु वन्तिमामेवसवभूतहितेरता' ॥४॥ ले गोऽधिकतरस्तेपामव्यक्ताशक्तचेतसां । अध्य काहिगतिर्दुःखंदे हवतिरवाप्यते ॥ ५॥ येतसर्वाणिकर्माणिमयिसंन्यस्यमत्पराः । अनन्येनैवयोगेनमाध्यायगाउपासते ॥६॥ तेपामहंसमुद्धमित्युसंसारसागरात् । भाषा अनुवाद सर्व व्यापी तथा निराकार हेतु से अचिन्त्य श्री कूटस्थ अर्थात् कट गो माया प्रपञ्च ब्रह्माण्ड तिसका अधिष्ठान कहे अाथय रूप स्थित है और अचल व्यापार रहित तथा ध्रुव कहे अचल नित्य हानि दृद्धि भून्य है तीन चार के झोक का अर्थ एक साथ है ॥३॥ ना निर्गुण के उपासकों को क्लेश अधिक है तो फेरि क्या निर्गुण के उतासक थेठ नहीं है इस शंकापर दो लोक से कहते कि जो समदो जन इन्द्रियगणको अपने वशीभूत करके अक्षर कहे अविनाशी बमका ध्यान करते है सो सकल भूतों के हितकारी निर्गुण उपासक मनुष्य भी हमको प्राप्त होते है॥ ४॥ जो निर्गुण उपासक भी तुम को प्राप्त होते है तो सगुणोपासक युक्त कहे श्रेष्ठ जो आपने कहा सो कैसे संभव होय है इस शंका को निवारण करते हुये तीनि लोक से लोश हेतुक विशेप कहते हैं कि अव्यक्त निर्विशेप अक्षर ब्रह्म मे जित्तका चित्त आशक भया उस को अधिक लश होय है क्यों कि अव्यक्ती बम विषयक जो निष्ठा सो देहाभिमानो मनुष्य को अति दुख से प्राप्त होती है कारण यह कि स्थल शरीर मे आत्म बुद्धि विशिष्ट मनुष्यों के मन को अन्तर्मुख वृत्तिका प्रत्यक कहे हर एक चैतन्य से निमग्न होना सर्वथा दुष्कर है॥५॥ परन्तु मेरे भक्त मेरो कृपा से अनायास सिद्ध होते है यह दुई श्लोक के द्वारा कहते है कि जो मनुष्य परमेश्वर खरूप मेरेको सफल कर्म अर्मयपूर्वक • मत्परायण कहे अनन्य भावसे मेरेमे तत्पर होय है ते मेरा ध्यान उपासना करते है अनन्य भाव कहे नहीं है अन्य वस्तु भे भाव प्रीति जिस मे सो अनन्य भाव है ॥६॥ इस प्रकारसे जिनोने मेरेमे चित्त लगाया है उनका हे पार्थ तत्काल इस स्रत्युयुक्त संसार सागर से उद्दारकरनेवाला में है। अर्थात् एकाग्रचित्त भक्तजनों को मै संसार टुखसे उद्धारकर्ता इ॥७॥ इससे संकल्प विकल्पात्मक भनको १४३ श्रीमद्भगवद्गीता। भवामिनचिरात्मार्थमय्यावेशितचेतसां॥७॥ मय्येवमनबाधत्खमयिबुद्दिनिवेशय । नियसिथसिमय्येववतजवनसंगयः ॥८॥ अचित्तंसमाघातुंनगमोसिमयिस्थिरं। अग्यासयोगेनततोमामिच्छाप्तुं धनंजय ॥६॥ अस्यासेऽप्यसमर्थोसिमकर्ममरमोमव । मदर्थमपिकर्माणिकुर्वसिद्धिमवाप्स्यसि ॥१०॥ अथैतदप्यशक्तोऽसिकत्तु भद्योगमा चितः । सर्वकर्मफलत्यागंततःकुरुयतात्मवान् ॥११॥ श्रेयोहिन्नानमभ्यासाचा भाषा अनुवाद मेरे मे थिर करो और व्यवसायात्मिका बुद्धिको भी मेरे मे लगावो तो देहके अत्तमे मेरी कृपा से तत्त्व प्रान को प्राप्त होय परमात्मा रूप मेरेमे स्थिति कहे वास करोगे इसमे कुछ संशय नहीं है सोई अति कहती है कि सगुण उपासक को देहान्त होनेपर यह उपास्य देव परब्रह्ममन्त्र उपदेश करिके अपरोक्ष कहे साक्षात करदेय है॥८॥ और सगुण उपासना मे अशल: पुरुष को सुगम उपाय कहते हैं कि जो चित्तको मेरे मे घिर करने न शक तो हे धनञ्जय अर्जुन विषय मे विक्षिप्त चित्त को विषयों से पुनः पुनः फेरि कर मेरे सारण की प्रयास से हमै माप्त होने की यत्न करै । और नो अस्याम करने में समर्थ न होउ तो मत्प्रीत्यर्थ एकादशी उपवास मत पूजा अौ नाम का कीर्तन आदि कर्म यो धर्म है उनमें तत्पर होउ क्यों कि मत्पीत्यर्थ कर्म करने से भी नलिको प्राप्त होउ गे ॥१०॥ और इस भगवर्ममे भी असमर्थ पुरुष को दूसरी उमाय कहते है कि जो मत्मीत्यर्थ कर्म भी न करि शकै नो एक मेरी शरण होय यो चित्त वशीभूत करिके यावत् कर्मफलका परित्याग कर इस का तात्पर्य यह है कि अन्तर्यामी रूप ईनर की मेरणा से हमैं कर्म कर्तव्य है और इन कर्मों का दृष्ट अदृष्ट फल परमेश्वर के आधीनं है ऐसा भार मेरेमें अारोप करि फल की इच्छा त्याग पूर्वक कर्म करने से भी मेरी कृपा से शतार्य होउगे ॥११॥ और उक्त माल त्याग की प्रसंशा करते है कि सगुण की उपासना मे सय्यक जान रहित जो अग्यास तिससे वुक्ति सहित उपदेय पूर्वक यह सगुण उपासना का अङ्ग भूत जो परोक्षज्ञान सो श्रेष्ठ है और उस ज्ञानसे मी ध्यान अधिक है और तिससे भी कर्मपालका त्याग शेष है क्यों कि कर्म ौ कर्मपाल मे प्राशक्ति निवृत्त होने पर मेरी अनुग्रह से थोघ्र संसार की द्वादश अध्यायः॥ । नाद्यानं विशिष्यते। ध्यानाकर्मफलत्यागस्यागाच्छान्तिरनन्तरं ॥१२॥ अद्देष्टा सर्वभतानांमैवःकरुणएवच । निर्ममोनिरहङ्कारःसमदुःखसुखक्षमी ॥१३॥ सन्तु ए.सततंयोगीयतात्मादृढनिश्चयः। मर्पितमनोबुद्धिोमवक्तासमेप्रियः॥ १४ ॥ यस्मान्नोदिनतेलोकोलोकानोहिजतेचयः। हामर्षभयोवेगैर्मुक्तोय.सचमेप्रियः ॥१५॥ अनपेचाशुचिर्दवउदासीनगतव्यथः। सर्वारम्भमरित्यागीयोमदनःसमे प्रियः ॥१६॥ योनहष्यतिनदेष्टिनशोचतिनकांक्षति । शुभाशुभपरित्यागीमति d भाषा अनुवाद शान्ति होय है ॥१२॥ अव पर्व उक्त भक्त के ऊपर शीघ्र मगवतकी कृपा होनेका हेड रूप सकल धर्म बोट सोक से कहते है कि साधारण से सव नीवों के साथ निर्वैर और सबका मिव तथा दयावान अर्थात् समान से मैत्री औ होनपर कृपा कारी और ममता विहीन अहङ्कारशून्य ौ कमालुता से दूसरे का सुख दुख देखि अपने सुख दुसके समान जो नान है ऐसे अपने सुख दुखमेभी समवुद्धि श्रो चनाशील पर मेरी शीघ्र प्रसन्नता होती है॥ १३॥ और हानि लाभ मे प्रसन्न चित्त तथा अप्रमत्त वशीभूत स्वभाव औ सतविषय मे दृढ निश्चय और मेरे में अर्मण किया है मन बुद्धि जिसने असा जो मेरा भक्त सो हमै अतिही प्रिय है ॥१४॥ और जिस पुरुपसे लोग भयको हारा उद्देग कहे चित्तक्षोम नही पावते और जिस को लोगों से उद्देग नहीं होता है और जो इष्ट होने से प्रसन्न औ अनिष्ट होनेसे अप्रसन्न तथा आमपं कहे दूसरे की लाभ न देखि शकना ये सव जिसके नहीं है और भय उद्देगसे मुक्त जो मेरा भक्त सो मोहि परम प्रिय है ॥१५॥ और जिस को अनायास प्राप्त धनकी भी इच्छा नहीं और भीतर वाहर शुचि कहे परिव है औ दक्ष कहे बालस्य रहित तथा पक्षपात वर्जित औ गतव्यथ कहे आधिव्याधि शून्य और सर्व प्रारम्भ कहे उद्यम का त्यागी असा नो सो मक्त मेरा प्रीय है आधि मन की चिन्ता है और व्याधि रोग को कहते है ॥ १६ ॥ और जो प्रिय वस्तु पाय के सन्तुष्ट छौ अप्रिय पायक असन्तुष्ट न होय और इष्ट के नाश होने पर भी गोचता नहीं और किसी अमाप्त वस्तु की आकांचाभी निसके मनसे नही है और शुभ अशुभ कहे पुण्य माप का भी त्यागी सहे त्याग का अधिकारी है ऐसा भक्ति ॥
१४४ श्रीमद्भगवद्गीता। मान्यःसमेप्रियः ॥१७॥ समःशौचमिवेचतयामानापमानयोः। शीतोष्णसुख दुःखेपुसमासङ्गविवर्जितः॥१८॥ तुल्यनिन्दास्तुतिमौनीसन्तुष्टोयेनकेनचित् । अ निकेतःखिरमतिर्मतिमान्भेमियोनरः ॥१६॥ येतधर्मामतमिदंयथोक्तंपर्युपासते। श्रद्दधानामत्परमाभक्तास्तेऽतीवमेप्रियाः ॥२०॥ इति थीभगवडीतायां सूम निपत्धुमक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ भाषा अनुवाद युक्ता मनुष्य हमै प्रिय होता है ॥१॥ और शव मित्र दोनोके प्रति समान कहे प्रीति विरोध रहित और मान अपमान मे भी हर्प विषाद रहित है और शीत उष्ण सुख दुरामे एकरूप है तथा सङ्गवर्जित कहे विपयोंमे प्राशक्ति रहित पुरुष जो है॥ १८॥ और निन्दा स्तुति निसको तुल्य हैं और जो मौनी कहे विरुद्ध 'वचन तथा वकवाद रहित होय नो कुछ यथा लामसे सन्तुष्ट है तथा अनिकेत कई निवासस्थान शून्य और स्थिरमति अर्थात् वशीभूतचित्त है जिनके ऐसे गुणयुक्त नर. मेरे को परम प्रिय है॥ १८॥ यही सव पूर्वात धर्म अटत कहे मुक्ति रूप है। इनको यथोक्तरूप से जो यदायुक्त उपासना करते है और मत्परता कहे मही हो परम परायण जिन को चैसे मेरे भला मुझे अतिशय प्रिय होते है ॥ २० ॥ इति नगन्नाथ सुलाविरचित मनमापनो मापा टीकायां हादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ . .
श्रीमद्भगवगीता बयोदश अध्यायः थीभगवानुवाच। इदंशरीरंकौन्तेयवमित्यभिधीयते। एतद्योवेत्तिसंप्राज चेनजइतितविद ॥ १॥ वन्नञ्चापिमापिद्विसर्वक्षेत्रेषुभारत। क्षेबान्न यो भाषा अनुवाद अब इस तेरहे अध्याय मे तत्त्व ज्ञान वर्णन किया जाता है कि हे पार्थ अर्जुन मत्युगुक संसार सागर से सगुण उपासक अपने भत्तो को मै उद्दार करता हूं इत्यादि हादश अध्याय के सप्तम लोक मे भगवत अङ्गीकत जो संसारोद्धरण सो जहाज्ञान के विना असंभव है इस हेतु तत्त्वज्ञान उपदेश करने के अर्थ भगवान यह प्रकृति पुरुष विवेक अध्यायका प्रारम्भ करते है कि जो प्रकृति पुरुष विवेक सप्तम अध्याय के मञ्चन श्लोक मे परा अपरा प्रकृति दय रूप कहा है जिस प्रकृतिके द्वारा अविवेक वशते यह चेतन का अंश जीव भावको प्राप्त होय संसारी होता है और जिस प्रकृति इयके द्वारा जीवके उपभोगार्य परमेश्वर भी सृष्टि आदि कर्म मे प्रत्त होते है चेन पदवाच्य परसर भिन्नखरूम इय प्रकृति को सरूप से निरूपण करने के लिये भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि हे कोन्तेय क्षेव औ वन दोनो के विचार कारी लोग इस भोगायतन भोगसाधन शरीर को क्षेत्र कहते है क्यो कि यह शरीर संमार शस्त्र के अंकुर होने की भूमि है और जो इस शरीर को जानता अर्थात् हम हमारा यह विचारता है उस को क्षेत्र ओ क्षेत्रज्ञ विवेकी जन क्षेवन कहते है जिस हेतु क्षेवन किसान के समान इस देह रूप क्षेत्र का फल भोग करता है॥ १॥ क्षेवनका व्यावहारिक स्वरूप कहा अब पारमार्थिक असंसारिसरूम कहते है कि हे भारत अर्जुन सोई ७१ १४६ थीमद्भगवडीता। जीनंयत्तनजानंमतमम ॥२॥ तत्क्षेवंयच्चयाक्चदिकारियतश्चयत् । सचयो यत्मभावञ्चतत्समासेनमेण्टणु ॥३॥ ऋषिभिर्वजधागीतं छन्दोभिर्विविधैःपृथक् । व भाषा अनुवाद क्षेवन संसारी जो जीव तिसै यावत् क्षेत्र का आधार रूम हम को जानो क्यों कि साम वेदके तत्त्वमसि महावाक्य का लक्ष्य अर्थचिदंशकर के मेरेही रूपका प्रतिपादन किया है और क्षेत्र यथा क्षेवन इन दोनो का जो पृथक रूम ज्ञान सोई मेरे मतसे मुक्तिका हेतु है और सब ज्ञान प्रतिवन्धके कारण है तथादि सोई कर्म नो बन्धका देत न होय और सोई विद्या जो मुक्तिकी हे होय वाकी कर्म-सब परिश्चमके हेतु और विद्या सकल शिल्पनैपुण्य मात्र अर्थात् कारीगरीकी चातुरी है यह जानो ॥ २॥ यद्यपि यहा चोविस प्रकार की प्रकृति को क्षेत्र कहते है तौभी देहरूप परिणाम कहे रूपान्तर प्राप्ति को प्राप्त भई वही प्रकृति-मे अहंरूप अविवेक हेतु से सोई प्रकृति के विबेक के अर्थ इस गरीर को क्षेत्रमात कहा उसीके विस्तार की इच्छा से प्रतिज्ञा करते है कि मेरा किया हुआ जो उत्ता खरूप जड दृश्य प्रादि स्वभाव और याहम इच्छादि धर्मयुक्त और जैसे इन्द्रियादि विकार से युक्त और जैसे प्रकृतिपुरुष के संयोग से जन्मै, योर जिस प्रकार सावर नाम भेद से नानारूप होय सोई नो क्षेत्र खरूम से जो है अोर अचिन्य ऐश्वर्य के द्वारा जो जो प्रभाव से सम्पन्न होय है सो सब संक्षेप से हमसे थवश करो यह भगवान अर्जुन से कहा ॥३॥ किसके कहे विस्तार वचनका यह संक्षेप है तो इसपर कहते है कि जो पशिष्टा दिकोने योग शास्त्र मे ध्यान धारणदिका विषय रूम पर मेयरका विराटरूप नाना प्रकार से निरूपण किया है और वो वशिटादिको ने नित्यनैमित्तिया काथ्यकर्म आदि विविध प्रकार से वेटको हारा भिन्न भिन्न अनेक पूजनीय देवतारूप से प्रगट किया है और मासूम बचात निससे ब्रह्मका निरूपण होता है तात्पर्य यह कि जिससे समस्त भूत जन्मते है इत्यादि तटस्थ लक्षणरूम उपनिषद वाक्य जो बहन व भोर जिसके द्वारा बन का साक्षात्कार ज्ञान किया जाता है एता वमा सरूप लक्षण अर्थात् सोई ना सत्य है ऐसा जान पोर आनन्दरूप इत्यादि
प्रयोदश अध्यायः।
१४७
असूनपदैश्वेवहेवमद्भिर्विनिचितैः ॥ ४ ॥ महाभूतान्यहङ्कारोबुदिरयतमेवच ।
इन्द्रियाण्दिकञ्चपञ्चचेन्द्रियगोचराः ॥५॥ इच्छाइप सुखंदुखसंघानचेतनाति:
एतत्क्षेवंसमासेनसविकारमुदाहृतं ॥ ६ ॥ अमानित्वमदभित्वमहिंसाचान्तिरार्ज
भापा अनुवाद
श्रुतियोने हेतु युक्त पद कहा अर्थात् हे सोम्य इस सृष्टिके पूर्व यह जगत् सत माद
था असत से सत कैसे जन्म है जो इस हृदय आकाशमे बानन्दरूप आत्मा न होता
तो अमान औ प्राण वायु की चेष्टा कौन करता दूससे यह प्रात्माही मागियों को
अानन्द युक्त करै है दून सव थुति विशिष्ट ब्रह्म सूबादिकों से कहा है सोई संक्षेमें
से सुनो अथवा नित्यनैमित्तिक प्रायश्चित्त उपासनारूप साधन चतुष्टय से सम्पन्न,
होनेके अनन्तर ब्रह्म जिज्ञासा कर इत्यादि वेदव्यास प्रणीत को ब्रह्मास्त्र कहते
है परमेश्वर के ईक्षिटत्व हेतु से प्रकृति को नगत का कारण नहीं काहि शकते
है और सब युतिया मे अात्मा को आनन्दमय कहा है इससे ये आनन्दमय हैं
इत्यादि युक्तियों से निचित है अर्थ निन सूत्रों का सोई कहा हेतु मनिर्विनि
थिते. ॥ ४॥ घऔर क्षेत्र स्वरूप दो लोक से कहते है कि महाभत कहे चिति
गण अन्नि वायु भाकाश और इनका कारपरूप अहङ्कार और विज्ञानात्मिका
बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्व और अव्यक कहे मूल प्रति और पांच ज्ञान इन्द्री तथा
एक सङ्कल्पविकल्पात्मक मन और मांच इन्द्रिय गोचर करे शब्द आदि तन्माना
विशेषरूप से दिन्द्रिय ग्राम विषय येई क्षेत्र सरूम पौविस तत्व कई है ॥ ५ ॥
और इच्छा देय सुख दुख यो संवात कहे शरीर ौ चेतना कहे जानात्मक
अन्तःकरण की दृत्ति नो बुद्धि नौ धैर्य ये सव दृस्य हैं इससे ये अात्माके धर्म नहीं
है अतःकरण ही के धर्म है तो शरीर धर्मही इनको कहा चाहिये सोबत
में कहा है कि कामना संकल्प संशय यहा अथवा धैय अधैर्य लज्जा युधि मय ये
सब अन्तःकरपके व्यापार है इस वचन से यही अध्यायके तीसरे झोकमे जो काहा
धर्म सो देखाया है और इन्द्रिय आदि विकार सहित क्षेत्र को मेने संक्षेपरूम
अव उता क्षेत्र से दृषक जो नेय कहे जानवे योग जतिस
को विस्ताररूप वर्णन की इच्छा करि क्षेवन के ज्ञान होने के साधन पांच लोक
तुमसे कहा ॥६॥
१४८ श्रीमद्भगवद्गीता। वं। प्राचार्योपासनसोचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥ इन्द्रियार्थेषुवैराग्यमन रएंवच ।, जन्मत्युनराव्याधिदुःखदोपानुदर्शनं ८ अभक्तिरनभिष्वङ्गापुत्वदा रगृहादिपु। नित्यञ्चसमचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥६॥ भयिचानन्ययोगेनभ तिरव्यभिचारिणी। विविक्तादेशमेवित्वमरतिर्ननसंसदि ॥१०॥ अध्यात्मन्नान नित्यत्वंतत्वज्ञानार्थदर्शनं । एतज्ज्ञानमितिमोतमन्नानं यदनोऽन्यथा ॥११॥ ज्ञेयं . भाषा अनुवाद से करते है कि अमानिल अदम्मित्व अहिंसा कहे मान कपद परमोडा राहित्य औक्षान्ति कहे क्षमा यौ ग्राव जो सीधामन औ. प्राचार्योपासन जो गुरु सेवन और गौच कहे वाय अन्तर शुद्धियो माव शुइसे अन्त शुद्धि जानो और स्थैर्य कहे सत् मार्ग मे प्रयत्ति औ उसी एक मे तत्परता तथा ग्रामविनिग्रह कई परीर संयम ॥७॥ और इन्वियार्य जो रूम आदि विषय तिनसे राम्य श्रौ धनहसारता तथा जन्म स्टत्यु जरा व्याधि दुख दोप इनको बार बार देखना' चाहिये ॥ ८॥ और पुत्र दारा धन आदिमे श्राशक्ति कहे प्रीतित्याग और पुवादि मे सुख दुख देखि जो मै सुखी अथवा दुखी हं ऐसा मानिलेना अभिष्य है तिसका त्याग और इष्ट औ अनिष्ट दोनो की प्राप्तिमे सर्वदा समचित्त को चित्तकी एक रूपता अर्थात् सावधान चित्त रहना ॥८॥ ौर परमेश्वररूप मेरे मे अनन्य योग अर्थात सर्वत्र आत्मदृष्टि से अव्यभिचारिणी एकान्त भक्ति और विविक्त कहे शुद्ध अथवा चित्त प्रसन्नकारी जो निर्जन देश वहां की वास यो संसारी व्यवहारी दुष्ट मनुष्यों को सभामे अरुचि ॥१०॥ और आत्मा को अधि कार करि के वर्तमान जो ज्ञान तिस मे नित्यभाव अर्थात् तत्त्वमसि महावाक्य के तत्पद औ त्वं पद के अर्थ पर विश्वास और तत्वज्ञान का फल जो मुक्ति किसी को थेष्ठ रूप से बालोचन करना इस मे अमानित्त्व अभिनय आदि नो वीस कहे गये सोई ज्ञान के साधन सरूम है यह पशिहादिकोने कहा है और इन बीसौ के विपरीत जो मान दम्भ हिंसा आदिवीस है तेई जानके विरोधी है औ अन्नान के खरूम जानो इस से वे सदा पर्जनीय है ।। ११ । और इस सम साधन से जिस को जानना होता है तिस को छ श्योक से करते है कि जो जानवे जोग है वयोदय अध्याय.। यत्तत्मवक्ष्यानियज्ञात्वास तमनुते। अनादिमत्परं ब्रह्मनसत्तन्नासदुच्यते ॥१॥ सर्वत मारिमादलत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखं । सर्वतःथुतिमलोकेसर्वमान्य तिष्ठति ॥ १३॥ सन्द्रियगुणाभासंसर्वेन्द्रियविवर्जित। असक्तसर्वस्टच्चैवनिर्गणंगुणभोक्तच भाषा अनुवाद सोई मैह वह कइंगा परन्तु अमीयोता के अादर सिद्ध होने के लिये वही ज्ञान का फल देखावते है कि मैं जो ज्ञान की बात कइंगा सो जानि के लोग मुक्ति पावते है चोर सो ज्ञेय पदार्थ क्या है इस पर कहते है कि वर अनादि यो पर कहे निरतिशय ब्रह्मरूप यही जेय बझ न सत् न असत् अर्थात् सत असत् शब्द से नहीं कहा जाता तात्पर्य यह कि सत कहे जो विधि मुख से प्रमाण का विषय औ असत् कहे जो निध का विषय सोई सत् असत् कहावता है यह तो ब्रह्म अविषय हेतु अर्थात् विषय न होनेसे उन दोनो से भिन्न ही है ॥१२॥ और जो ऐसा कहो कि ब्रह्म सत् असत् से भिन्न है तो यह चराचरात्मक ब्रह्माण्ड ब्रह्म है इत्यादि श्रुति से विरुद्ध होय है यह शङ्का करिके इस ब्रह्म की नाना प्रकार शक्ति औ ज्ञानक्रिया वलक्रिया आदि खभावसिद्ध नाना मतके द्वारा युतियोसे कहा जाय है इस तरह बमकी सर्वात्मता दिखाय अब पाच लोकसे कहते है कि सर्वन इस्त पाट चक्षु मन्तक मुख जिस के है सो सर्वबही श्रवण इन्द्रीयसे युक्त होय सब लोक की व्याप्त हो के स्थित है अर्थात् यावत् माणीयोमे वर्तमान कर चरण पाटि उपा थियो से व्यवहार करै है॥१३॥ और चक्षु आदि इन्द्रियों के गुणवरूप अर्थात् रूपादि विषय मे तिस तिस आकार से वही प्रकाशमान है अथवा इन्द्रिय और गुण कहे इन्द्रियो के विषय रूमादि समस्त में सोई प्रकाश करता इस से सर्व इन्द्री गुण अाभास खरूम है और सम्पूर्ण इन्द्रीयो से रहित है सोई थुति कहती हैं कि सोई जो ब्रह्म सो हस्त रहित हो के भी ग्रहण करते औ पाद विना भी वेगवान तथा चक्षुहीन दृष्टा श्री कर्ण विहीन योता और इन सकल विषय को वे जानते है पर उनको कोई भी नही जानता है वही परमात्मा को वेद सब यादि पुरुप औ पर्ण तथा सर्वव्यापी कहते है और वे असक्त कहे सत्त्वादि गुण रहित औ गुण के भोक्ता अर्थात् सत्तादि गुण समूह के प्रतिपालक है यह भगवान अर्जुन १५० श्रीमनगवडीता। ॥१४॥ वहिरन्तश्च भूतानामचरंचरमेवच । सूक्ष्मत्वात्तविन्नेयंदरखंचान्तिकेर तत् ॥ १५ ॥ अविभक्तञ्चमूतेषुविभक्त मवसितं। भूतभर्टचतज्ञयंगसिष्णुप्रभ विष्णु व ॥१६॥ ज्योतिपामपित ज्योति स्तनस परमुच्यते। ज्ञानंन्नेयं ज्ञानगम्यं भापा अनुवाद मे कहा ॥ १४ ॥ और जैसे सुवरी के कार्य कडा कनन कुण्डल आदि भाभूषणो मे सोना कारण रूप मे भीतर पाहर वर्तमान है और जैसे जल तर मे भी जल छोड़ि और नहीं है तथा आकाश जैसे सकल वस्त के वहिरन्तर वर्तमान है तैसे ही ब्रह्म के कार्य स्वरूम चराचर अादि भूत समूहसे अन्तर वाहिरभी सोई ब्रह्महीं वर्तमान है क्यों कि तायत कार्य के कारण सोई है परन्तु ऐसे हो के भी रूमादि विहोन हेतु से यह इतने और ऐसे कर स्पष्टरूम जानवे योग्य नहीं है और यही बम अनानियों को लक्ष योजनके समान दूर है क्योकि पिकार सहित जो प्रकृति, तिस मे पर है और ज्ञानियों को अपरोक्ष रूप से नित्य निकट है खुच्यता के कारण अज्ञानियों को अविज्ञेय और वेदशास्त्र मार्ग से चलनेवाले नानियों को विज्ञेय है अर्थात् जानिये योग्य है इस को भी आकाश के नाई नानो॥ १५ ॥ और इस अध्याय के वारहे लोक से कहा जो ज्ञेयपदवाच्य ब्रह्ममताख्य सो स्थावर जगम समूध मे अविभक्त अर्थात् कारण रूम से अभिन्न चौर कार्य रूप से समुद्र फेन के समान भिन्न वर्तमान थे और समस्त भूतों के भत्तो अर्थात् स्थिति कालमे प्रतिमालक औ गलय मे संहारक तथा सृष्टि काल से स्वयं श्राप नाना कार्यरूम से प्रगट होते है ॥ १६॥ ओर सो ब्रह्म जोन रूप जो सूर्य चन्द्र तारागरा पिद्यत चौ अग्नि इन सव का जोति कहे प्रकाशक है जिस से ये सब प्रकाशमान है और ये सर जिस ब्रह्म को नहीं प्रकाश पारि गकते है ऐसे मल से यह समस्त जगत प्रकाशित है यह अति कहती है इसी से तुम जो अज्ञान तिस से पर है अर्थात् मन्नान का लेग भरे वहां नहीं है यादित्य वर्गस्तमसः परस्तात् इस युतिने कहा है और सोई ब्रह्म बुद्धित्ति ने ज्ञान रूप प्रगट है ओर सोई रूपादि आकार रूप से नेय कहे जान योग्य है और जानगय अर्थात् पूर्वोक्त अभानित्व आदि लक्षरा जान के साधनो से साथ है क्योंकि प्राणी माम के हृदय में निवत्ता अन्त योदश अध्यायः। १५१ हटिसर्वसविष्ठितं ॥१७॥. इतिचे तथाज्ञानंजेयञ्चोकसमासतः । महतएतद्वि जायमझावयोपपद्यते ॥१८॥ प्रतिपुरुपञ्चैवविद्यरादीउमापि। विकारांश गुणांचैननिदिमकतिसन्मवान् ॥१८॥ कार्यकारगकर्तृत्वेहेतु प्रकृतिरुच्यते । पुरुपः सुखद् खानांभोक्तत्वेहेतुरुच्यते ॥२०॥ पुरुप प्रकृति खोहि तोप्रकृतिजान गवान् । भाषा अनुवाद र्यामी चेतन रूप से स्थित है ॥ १७ ॥ अव अधिकारी श्री फल सहित कहा नो क्षेदादि उस का तात्पर्य कहते है कि इस अध्याय के पंचये लोक से लेकर और सबहें तक गेय सरूप जो वशिष्ठादि ऋषियों ने विस्तारसे कहा है सो सवारी ने संक्षेप से कहा सो मेरे भक्त यह जानि करि के ब्रह्मता की प्राप्ति होने के योग्य होते है अर्थात् मेरे भावको पावते है ॥ १८॥ क्षेत्र खरूप औ जो जड अदृश्य आदि है अौ स्वभाव श्री जैसा इच्छादि धर्मविशिष्ट सो सय पूर्व ही विस्तार रूप से कह चुके अव पूर्व अङ्गीकृत यही क्षेत्र जैसे इन्द्रिय अादि विकार से युक्ता और जैसे प्रति पुरुष संयोग से प्रगट होय है और जिस प्रकार स्थावर जङ्गम प्रादि भेद से भिन्न भिन्न खरूप होय है और सोई क्षेत्र नो स्वरूप श्री जैसे भाविशिष्ट है सो सब प्रकृति पुरुष को संसार हेतव कहने के द्वारा पांच लोक विस्तार रूप कहते है कि सोई प्रकृति श्री पुरुष दोनो अनादि है जो इन का और काररा ढुंढोगे तो अनवस्था दोप पडेगा अर्यात् उपका कारण विसका कारण ऐसे ठिकाना न लगेगा इससे सोई प्रधति पुरुष को अनादि जानो तो ईश्वर की शक्ति प्रकृति भी अनाटि है ओर ईश्वर का अंगभूत पुरुप भी अनादि है और देह इन्द्रिय अादि रिकार तथा गुणरूम परिणामको प्राप्त नो सुख दुख मोह त्रादि सो सब प्रकृति से होते है यह जानो परमेश्वर यो तदीय कहे उनको शनियोंको अना दित्य भाष्यकार श्रीगङ्कराचार्य ने विस्तार से कहा है इस से इहो यन्य वढने के डरसे मैने नहीं कहा देव इन्द्री सुरा दुख सब प्रकृति ही वो, कार्य है ॥ १६ ॥ भगवान श्रीगुण सकल विकार के प्रकृति से उत्पन्न है यह देखाय इस अव पुरुप को संसार होनेका हेतु इस सोकसे देखारते है कि कार्य तो शरीर और कारण नो सुख दुख के साधन खरूप कहे करनेवाली इन्द्री सव और इन्द्रीयों को कटल थीमगरहीता। रणंगुणसगोस्ससदमद्योनिजन्मस्तु ॥२१॥ उपदष्टानुमन्ताचभाभोक्तामहेश्वरः । परमात्मेतिचायुक्तोदेहेस्मिन्पुरुपःपरः ॥२२॥ यएवं वेत्तिपुरुषप्रकृर्तिञ्च गुणैःसह। भाषा अनुवाद कहे तीन तौन रूम हो जाना इस सब को कारएभूत प्रकृति है यह कपिल आदि ऋषियोने कहा है और पुरुष जो जीव सो शरीर इन्द्रीय आदि कृत सुख दुःख सव का कारण खरूम कहा है तात्पर्य यह कि यद्यपि अचेतन महति आप.मे कुछ नही कर सकती और विकारी पुरुष को भी मोक्तत्व कहे भोग करना यह अस भव है तौभी करीत्व शब्द का अर्थ यह है कि क्रिया करना अचेतन प्रकृतिको भी चैतन्यरूप जीव के अदृष्टवाते सम्भव है जैसे अचेतन हो के भी अग्निज्वाला का आ गैमन औ वायुका तिर्जक कहे तिळ गमन और वञ्चोको जैसे दूध रक्षण करै है तैसेहो पुरुपकी सान्निध्य कहे अवलम्बनसे प्रकृति को कर्ट त्व है और भोतृत्व, जो सुप दुख का ज्ञान सो चेतन का धर्म है इस से मशति सनिधान कहे माया की निकटता को प्राप्त होय पुरुष को भी भोत्तात्व कहा है॥ २०॥ जो कहो कि श्वविकारी नौ जन्म रहित जो आत्मा तिस को भोक्तृत्त्व कहे भोगना कैसे सम्भव होय है कि निस हेतु सोई पुरुष प्रतिस्प अर्थात् प्रकृति का कार्य जो गरीर तिस मे तदात्मरूप होय वास करै है इस हेतु उस शरीर से प्रगट जो मुख दुख शादि तिन को भूल से भोग करै है जैसे मनुष्य कोई वस्तु या द्रव्य माय अपनी कर मानि लेय फेरि उसके जानेसे दुखी होय है कहो यहा दुख का कारण अभिमान छोड और क्या है और सत जो देव मनुष्य जोनि यो असत् जो पशु पक्षी आदि जोनि तिन में जो इस पुरुप का जीव रूप जन्म है सो गुण कहे शुभ अशुभ कर्म कारी इन्ट्रीगण तिन के सङ्ग से होय रे सही ऊंची नीची देह धारण मे कारण रूप है यह जानो ॥२१॥ उक्त रीति से मकति जो माया तिस के अविवेक वशते जीव को अहं कर्त्ता अहं भोला इत्यादि कलित मात्र संसार है पर विचार खरूप से तो इस नीव को संसार नही है इसी आशा पर अव पुरुष का सरूम, कहते है कि इस प्रकृति का कार्य रूप जो शरीर तिस से वर्तमान हो के भी जीव मकृषि से भिन्न कहे प्रकृति के गुणों से युक्त नही है उनसे अलग है क्योंकि ईश्वर बयोदश अध्याय.। सर्वथावर्त मानोऽपिनसभयोऽभिजायते ॥२३॥ ध्यानेनात्मनिपायन्तिकदिदात्मान मात्मना। अन्ये साख्यनयोगेनकर्मयोगेन चापरे॥२४॥ अन्यत्वेवम जानतः युवा भापा अनुवाद अंश जीव उपद्रष्टा अधीत् मित्ररूपसे सभीप मे रस कर देखनेवाला साक्षीमाय है और अनुमन्ता अर्थात् समीप सम्बन्धसे अनुग्राहक कहे अनुमोदन को मान नेवाला है सोह युति कहती है कि एक स्वयं प्रकाशरूम जो परमात्मा सोभत मात्रमे निगूढ भावसे स्थित है और सर्थयामो तावत् प्रापीका अन्तर्यामी है और मकलकर्मका नियन्ता श्री भतमानका अधिष्ठान रूप बोर द्रष्टा यौ सौमत भूतोका चैतन्यकारी यो अहितोय तथा गुणोंसे अतीत कहे अलगहै और यह पुरुष इश्वर सम्बन्ध रूपमे मा कहे पोपनकारी प्रतिपालक है और महेश्वर कहे ब्रह्मा दिको का मी अधिति अर्थात स्वामी सोई श्रुति है कि यह पुरुष सवका ईयर और सर्वभूतका अधिपति तथा भतमान का प्रतिपालक है ॥ २२ ॥ ऐसी जो प्रकृति या पुरुप निनके विवेक के ज्ञानवान मनुष्यों की प्रशंसा करते है कि जो लोग ऐसे उपद्रष्टारूप पुरुषका जानते है तथा प्रकृतिको यो प्रकृतिके गुणरूम परिणामको प्राप्त कहे रूपान्तर को प्राप्त सुखदुख सहित को जान सकै है वेद मनुष्य संसार से रहते सम्पूर्ण विधिको उल्लंघन करके भो पुनर्जन्म नहर नहो करते मुक्तहो होते है यह जानो॥२३॥ ऐसी जो प्रकृति तिस से भिन्न नो चात्मा तिसके ज्ञान होनेके विषयमे अनेक अनेक कल्पनारूप साधन दो लोकसे कहते है कि कोई तो ध्यान कहे यात्माकाराकारित ज्ञानरूप धारावाहिक अन्त करण की त्तिसे इसी शरीरमे मनके द्वारा आत्माका दर्शन करते है और कोई सांख्य अर्थात् प्रकृति पुरुपका भेद आलोकनके द्वारा आत्माको देखते है कोइ यम नियम अासन माणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधिरूप अष्टाग योगके क्रम से जानते है और कितने एक नि काम कर्मरूप भक्तियोग अनुष्ठान करके शुद्ध सतोगुण "होय तत्वज्ञान के द्वारा आत्मा को देखते रहते है यद्यमि ध्यानादि यथा योग्य माम से एकही है तो भी तौनर निठा के भेद से भिन्न नाना मत कहा है॥२४॥ और अव अति मन्द अधिकारियों के निस्तार को उपाय कहते है कि सांख्ययोग --- । १५४ श्रीमद्भगवडीता। न्येभ्यउपासते ।। तेऽपिचातितरत्येवमृत्युंथुतिपरायणाः ॥२५॥ यावत्संजायते किञ्चमात्त्य स्थावरजर्म। क्षेत्रक्षेतजसंयोगात्तदिदिभरतर्षभ ॥२६॥ मम सर्वेषु भूतेषुतिष्ठन्तपरमेश्वरं। बिनस्यत्सविनश्यन्तयःमखतिसपश्यति ॥२७॥ समंप श्यन्हिसर्ववसमस्थितमीवरं। नहिनस्यात्मनात्मानंततोयातिपरांगतिं ॥२८॥ प्र भापा अनुवाद आदि मार्ग से चैसे उमद्रष्टारूप आत्माको साक्षात्कार करने मे यर्थात् देखने मे जो अन्न है परन्तु और किसी प्राचार्य का उपदेश यवरा कार के ध्यानमावे करते है वेउ यद्धापूर्वक उपदेश श्रवण मे तत्पर होय क्रम से शत्युयुत संसार में अवण्य सह हो जाते है सोई अर्जुन तुम यहनानो ॥२५॥ अब बतीय चतुर्घ पञ्चम अध्याय मे कर्म योग विस्तार से कहा और छठये अठये अध्याय में ध्यानयोग का विस्तार कहा और सांख्य के द्वारा भिन्न किया हुया नो अात्मा सोई ध्यान आदिका विपय है इस हेतु सांख्य ही को अध्याय समाप्ति पर्यन्त विस्तार करि के भगवान, कहते है कि हे भरतर्पम अर्जुन जो कुछ स्थावर जंगम आदि वस्तु उत्पन्न है सो सब क्षेत्र क्षेत्रन दोनोके योगगेहै अर्थात् अविवेकशत नो आत्माका अध्यास अर्थात् संयोगहै तिस हेतुसे उत्पनामानहै यह निश्चयकरं नानो॥२६॥अधिवेक से संसार उत्प त्ति कहिकर अव संसारकी निवृत्तिके अर्घ प्रकृतिसे भिन्न स्वरूप जो अात्मा उसका. शोभन दर्शन कहते है यि खावर जंगमात्मक सर्व भूतमे निर्विशेष कन्धेसमान सत् रूप सम भावसे खायी परमात्माकीजो मनुष्य देखते है और भूतोके विनाशमे या मानो अविनाशीरूप जोदेखते है तेई शोमनरूम देखते है और कोई भीनहीं ॥२७॥. और उस शोभन दर्शन होने का कारण क्या है इस पर कहते है कि सोई गोभन देखने वाला मनुष्य यावत् भूतमान मे सम्यक प्रकार से अक्षर खरूप अवस्थित, परमात्मा का दर्शन करि के आप अपने को नष्ट नहीं कर्ता अर्थात् सचिदानन्द, अात्मा स्वरूप को अविद्या अन्नान से आवरण करि के नाश नहीं करता है तिम, से श्रेष्ठगति मुक्तिरूप को प्राप्त होता है और जो इस पूर्वोक्तिरूप से नही देखता है गो शरीर ही फो श्रात्मा फरिके देखनेवाला शरीरके सहित चमन को अवख की.नष्ट कत्ती है सोई युति कहती है कि जो उक्त मकार से आत्महा होता है, . -- १ वयोदश अध्यायः । १५५ कृत्यैवचकमागिक्रियमाणानिसर्वगः । य.पश्यतितथात्मानमकर्तारंसपश्यति ॥२६॥ यथाभतष्टथगभावमेकस्थमनुपश्यति। अतएवचविस्तारंबह्मासम्पद्यतेतदा ॥३०॥ अनादित्वानिर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपिकौन्तेयनकरतिनलिप्यते भापा अनुवाद सोई मरगके अनन्तर प्रकाश शून्य अन्धकार से प्राटत नो स्थान तांहा कोनाता है ॥२८॥ जो कहो कि शुम अशुभ कर्म के कर्तृत्व हेत से वैषम्य देख पडती है फेरि आत्माका समत्व कैमे है इस पर कहते हैं कि नो देह इन्द्रिय आकार मे रूपान्तर को प्राप्त प्रजाति के द्वारा नाना प्रकार क्रियमाण कर्म होते हैं जैसे यो मनुष्य देखें है और अपने को अकता देसै है अर्थात् स्सूल शरीर मे अहं बुद्धि में अात्मा कर्ता होता है और स्वरूप से उसको कर्टव नही है जैसे जो मनुष्य दिखै है सो सम्यक देखे है सोई कहा है कि य पश्यतिसमश्यति इति ॥२६॥ अव प्रकृति के सकल कार्यभूत भौतिन को कारण स्वरूप प्रकृति मादा इस भेद के अभाव हेतुसे मनुष्य भूतगत भेदनित यात्माका भेद नही देखें है ऐसे मनुष्योंको माभाव प्राप्ति कहते है कि नव स्थावर नाम भूतका पृथक भाव कहे भेद को प्रैसे देखते है कि एक यही परमेश्वर को शक्तिरूप प्रकृति से सृष्टि स्थिति प्रलय काल मे भूतों की उत्पत्ति पालन नाश निरन्तर देखते है और तत्तत्काल में प्रकृतिस्वरूप मान देखते भूतों के अभेददी लोग परिपूर्ण खरूप ब्रह्म हों है ॥३०॥और वो कहो कि पर्वोक्तरूप आमाके भेदका अभाव होने से भी संसारावस्या मे देह सञ्चन्त से जो कर्म और उही कर्मोका फलरूप जो मुखदुख धादि तिनके द्वारा वैपथ्य भावतो नही दूरहो सकैहै इसमे वैसे त्रासाका सय्यक दर्शन कैसे संभव 'होय इस शापर कहते है कि जिसकी उत्पत्ति होती उसका अवश्य आदि है और जो गुणयुक्त वस्तु है उसीको गुपके नाग होनेसे रूपान्तर प्राप्ति रूप विकार भी होता है किन्तु जिस हेतु यह जीव परमात्मा औ अनादि तथा निर्गुण हेतु से अध्यय अर्थात् अधिकारी है इस से हे कौन्तेय शरीर में रहिके भी कोई कर्म नहीं कर्ता और कर्मफल मे भी लिप्त नही शेता अर्थात् इसको कोई कर्म नही लगते है॥ ३१॥ अब आत्माके कर्म न करने और कर्मफल मे लिप्सन १५४ थीमतगवड़ीता। न्येभ्यउपासते।। तेऽपिचातितरन्ये नमृत्यंश्रुतिपरायणा ॥२५॥ यावत्संजायते किञ्चित्मस्थावरजाम। क्षेबक्षेवनसंयोगातहिदिभरतर्षभ ॥२६॥ समसर्वेषु भूतेषुतिष्ठन्तपरमेश्वरं। विनस्यत्सविनश्यन्तंय पखतिसपश्यति ॥२७॥ समंम श्यन्हिसर्ववसमस्थितमीवरं। नहिनस्त्यात्मनात्मानंततोयातिपरांगति ॥२८॥ अ भापा अनुवाद आदि मार्ग से पैसे उपद्रष्टारूप आत्माको साक्षात्कार करने से घर्थात् देखने में जो अन्न है परन्तु और किसी प्राचार्य का उपदेश श्रवण कर के ध्यानमाव करते है तेउ बद्दापूर्वक उपदेश यवरा मे तत्पर होव क्रम से स्टत्युयुत संसार से अवण्य सत्ता हो जाते हैं सोई अर्जुन तुम यहनानो ॥२५॥ अव हतीय चतुर्थ पञ्चम अध्याय मे कर्म योग विस्तार से कहा और छठये अठये अध्याय में ध्यानयोग का विस्तार कहा और साख्यो हारा भिन्न किया हुचा जो आत्मा सोई ध्यान आदिका विषय है इस हेतु साख्य ही को अध्याय समाप्ति पर्यन्त विस्तार करि के भगवान कहते है कि हे भरतर्षभ अर्जुन नो कुछ खावरजंगम अादि वस्तु उत्पन्न है सो; सब क्षेत चेलच दोनोके योगमे है अर्थात् अविवेककृत नो यात्माका अध्यास अर्थात् संयाग तिस हेतुसे उत्पन्नमात्दै यह निययकर जानो॥२६॥यविवेक से संसार उत्प त्ति कहिकर अब संसारको नित्तिके अर्थ प्रतिमे भिन्न खरूप जो अात्मा उसका शोभन दर्शन कहते है कि स्थावर जंगमात्मक सर्व भूतमे निर्विशेष कहेसमान सत् रूप सम भापसे स्थायी परमात्मा कीजो मनुष्य देखते है और भूतोके विनाशमे या मामो अविनाशीरूप जोदेखतेहै तेई मोम नरूप देखते है और कोई भीनही ॥२७॥ और उस शोभन दर्शन होने का कारण क्या है इस पर करते है कि सोई शोभन देखने वाला मनुष्य यावत् भूतमाल मे सम्यक प्रकार से अक्षर खरूप अवस्थित परमात्मा का दर्शन कर के आप अपने को नष्ट नही कर्ता अर्थात् सचिदानन्द, आत्मा स्वरूप को अविद्या अन्नान से आवरण करि के नाश नहीं करता है तिस से उगति मुक्तिरूप को माप्त होता है और जो इस पूर्वोक्तरूप से नही देखता है सो शरीर ही को अात्मा करिके देखनेवाला शरीरके सहित अपने को अवश्य ही नष्ट कर्ता है सोई श्रुति कहती है कि जो उक्त मकार से अात्मना होता है वयोदश अध्यायः । १५५ कृत्यैवचकमारिक्रियमाणानिसर्वशः । यःपश्यतितयात्मानमक रसपश्यति ॥२६॥ यथाभूतष्टथग्भावमेक स्थमनुपश्यति। अतएवचविस्तारंबासम्पद्यतेतदा ॥ ३० ॥ अनादित्वागिणुपत्वात् परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपिकौन्तेयनकरतिनलियते भाषा अनुवाद सोई मरके अनन्तर प्रकाशं शून्य अन्धकार से भारत नो स्थान तांहा को जाता है ॥२८॥ जो कहो कि शुभ अशुभ कर्म के कर्तृत्व हेतु से वैपग्य देख पड़ती है फेरि अात्माका समत्व कैसे है इस पर कहते हैं कि जो देह इन्द्रिय आकार में रूपान्तर को प्राप्त प्रकृति के द्वारा नाना प्रकार क्रियमाण कर्म होते है जैसे जो मनुष्य देखे है और अपने को अकता देख है अर्थात् स्थूल शरीर मे अहं बुद्धि से आत्मा का होता है और खरूप से उसको कर्तृत्व नहीं है जैसे जो मनुष्य देखे है सो सम्यक देखे है सोई कहा है कि यः पश्यतिसपश्यति इति ॥२८॥ श्रय प्रशति के सकल कार्यभूत यो तिन को कारण खरूम प्रकृति भाव इस भेद के अभाव हेडसे मनुष्य भूतगत भेदनित आत्माका भेद नही देखें हैं ऐसे मनुष्योंकी बह्मभाव प्राप्ति कहते हैं कि जब स्थावर नाम भूतका पृथक भाव कहें भेद को पैसे देखते है कि एक यही परमेश्वर को शक्तिरूप प्रकृति से सृष्टि सिति प्रलय काल मै भूतों की उत्पत्ति पालन नाश निरन्तर देखते हैं और तत्तत्वाल मे प्रकतिखरूप मान देखते भूतों के अभेददर्शी लोग परिपूर्ण खरूप ब्रह्म ही है ॥३०॥और जो कहो कि पूर्वोक्तरूम आत्माके भेदका अभाव होने सेमी संसारावस्या मे देह सम्बन्ध से जो कर्म और उही कर्मों का फलरूप जो सुखदुख प्रादि तिनके द्वारा वैपप्प भावतो नही दूरहो सकैहै इसमे वैसे आत्माका सम्यक दर्शन कैसे संभव होय इस शापर कहते है कि जिसकी उत्पत्ति होती उसका अवश्य धादि है और जो गुणयुक्त यस्तु है उसीको गुपके नाश होनेसे रूमान्तर प्राप्ति रूप विकार भी होता है किन्तु जिस हेतु यह नीव परमात्मा औ अनादि तथा निर्गुण हेतु से अव्यय पर्यात् अविकारी है इस से हे कौन्तेय शरीर में रश्केि भी कोई कर्म नहीं कर्ता और कर्मफल मे भी लिप्त नहीं होना अर्थात् इसको कोई कर्म नहीं लगते हैं ॥ ३९॥ अव आमाके कर्म न करने और कर्मफल मे लिप्तान
थीमद्भगबहीता।
॥३॥ यथासांगतंसौचाादाकाशंनोपलिप्यते। सर्वनावस्थितोदेहेतयात्मानोपति
प्यते ॥ ३२॥ यथाप्रकाश्यत्येकः कृतसं लोकमिमरविः । क्षेत्रक्षेदीतथाकत्यंत्र
कागतिभारत ॥३३॥ क्षेत्रक्षेबन्नयोरेवनन्तरंज्ञानचक्षुषा । मतमत्तिमोक्षम
येविदुर्यान्तितेपरम् ॥३४॥ इतिप्रकतिपुरुषविवेकयोगोनामयोदशोऽध्यायः ॥१३॥
भाषा अनुवाद
होने मे दृष्टान्त देते हुये हेव कहते हैं कि जैसे सूक्ष्मता के हेतमे सर्व गत
अाकाश पङ्क धादिमे रहते भी असंग हेतुसे पङ्क अादि उसको नहीं लगते
वर्थात् पङ्क से वह लिप्त नहीं होता है तैसें ही यावत उत्तम मध्यम औ अधम
शरीरों मे रहिके भी आत्मालिप्त नहीं होता है अर्थात् शरीरसंबंधी पख पाय
अादिसे युक्त नहीं होता है ॥ ३२॥ . असंग हेतु से परमात्मा की निलेमता आका
एके दृष्टान्त से दिखाया अव प्रकाशक होके भी जो प्रकाश्य वस्तुवोंके धर्म से
प्रात्मा युक्त नहीं है यह सूर्यके दृष्टान्तसे कहते हैं कि हे भारत अर्जुन एक
यही सूर्य जैसे समस्त लोकको प्रकाश करते हैं परन्तु प्रकाश्य वस्तु के गुणदोपसे
लिप्त नहीं होते ऐसे ही क्षेत्री जो आत्मा सो क्षेत्र कहे शरीर आदि सबको
प्रकाश करते भी देहादि के गुण दोप.से लिप्त नहीं होता है यह तम हमारी
वात सत्य करके मानो हे भारत अर्जुन ॥३३॥. अव अध्यायके अर्थ का उपसंहार
करते हैं कि इस प्रकार से उक्त जो क्षेत्र औ क्षेवज तिन दानो का भेद जो.
मनुष्य विवेकज्ञानरूप चक्षु के द्वारा देखते हैं और यही पूर्व कहो हुई जो
मशति तिससे मोक्ष अर्थात् मुक्तिका उपायरूप ध्यान धारण आदि जो जानते हैं.
तेई पुरुप परमपद को जाते हैं ॥ ३४ ॥ इति श्रीजगन्नाथ मुकुल बिरचित
मनभावनी टीकायां प्रयोदशोऽध्याय ॥१३॥
श्रीमद्भगवगीता चतुर्दश अध्यायः । थीभगवानुवाच। परंभूयःप्रवच्यामिञानिनांज्ञानमुत्तमं । यद्ञात्वामुनयःस परासिद्धिमितोगताः ॥१॥ इदंज्ञानमुपाश्रित्यममसाधर्म्यमागताः । सर्गऽपि भाषा अनुवाद तेरमें अध्याय के छवीसवें श्लोक मे जो कहा कि महति औ पुरुप के संयोग से संसार की उत्पत्ति होती है ऐसी निरीश्वरवादी साख्य मत के अवलम्बियों की निश्चय के अनुसार संसार को खाधीनता नही है किन्तु ईश्वर की इच्छा के क्रम ही से सो होय है यह कहते हुये भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति पुरुष की स्वाधीनता के निवारणपूर्वक सत्त्व आदि गुणोके संग से संसार की विचिवता होती है और तेरहे अध्याय के एकशये लोक मे कहा जो सत्त्वादि गुण से संसार की चितता सो अव चौदहें अध्यायमे विस्तारमे भगवान कहते है और जो अव कहेगे उसकी प्रशंसा दो लोक मे कहते है कि परम जो परमार्थ निष्ठ जिसके द्वारा जाना जाय ऐसा नो ज्ञान उपदेश सो फेरि तुमसे कहूंगा सो ज्ञान किस प्रकार का है इस अपेजा पर कहते है कि यह ज्ञान मोक्ष का हेतु है इससे तम यो कर्म आदि विषयक सकल जानों के बीच यह उत्तम है जिस को जानि के मुनिलोग स्कूल सूक्ष्म शरीर बन्धनसे छुष्टि श्रेष्ठ सिद्धिरूम मुक्ति को प्राप्त भये है इससे ज्ञानीयों का यह उत्तम जान है यहतुम जानो ॥१॥और यही ज्ञान अर्थात् जान का साधन जो अब तुम से कहंगा तिस का अनुष्ठान करिके कहे अाथय ले के सारूप्य मुक्ति को प्राप्त सकल मुनिजन सर्ग कहे ब्रह्मादिक की उत्पत्ति होने से भी उत्पन्न नही होते है और प्रलय काल मे भी प्रलय के दुख को नही भोगते है अर्थात् पुनरा 8.
१५८ श्रीमद्भगवडीता। नोपनायन्तेप्रलयेनव्यन्तिच ॥२॥ ममयो नर्महद्रह्मतस्मिन्ग दधाम्यहं। सम्भ वासभतानाततोभवतिभारत ॥३॥ सर्वयोनिपुकौन्तेयमूर्तय सन्भवन्तियाः। ता सांत्रझमहद्योनिरहवीजप्रद.पिता॥४॥ सत्वरजस्तमइतिगुणा प्रकृतिसम्भवाः । भाषा अनुवाद गमन से रहित हो जाते है॥२॥ उसी ज्ञानसाधन की प्रशंसा करि कै थोता अर्जुन को श्रवण की अभिलाप वढाय परमेश्वर के आधीन जो प्रकृति औ पुरुष ये दोनो सकल भूतमान की उत्पत्ति के कारण हैं परन्तु स्वाधीन प्रकृति पुरुष को कारणत्व नही है यही तात्पर्य अव कहते है कि प्रकृति देश औ काल से अपरि छिन्न अर्थात् सवसे भिन्न महत कहे अनन्त समस्त कार्य की हेतुरूप ब्रह्म है सो यही महत ब्रह्म नाम जो प्रकृति सो परमेश्वर खरूप हमारी जोनि है अर्थात् गर्भधारण का स्थान है सो इसी प्रकृति मे मै गर्भ कहे जरात के विस्तार का हेत चिदाभास कहे चेतन अंश वीजरूप को स्थापन करता है और प्रलयकाल में हमारे ही मे लीन होय है और अविद्या से उत्पन्न जो काम्यकर्म तिनके संस्कार से युक्त क्षेत्रज यात्मा को सृष्टिकाल मे भोग्य जो क्षेव कहे नाना प्रकार देह तिन मे सम्यक प्रकार से योग करता है और वही गर्भ आधानसे ब्रह्मा आदि समस्त भूतकी उत्पत्ति होती है हे भरत अर्जुन तुमचचण करो॥३॥केवल सृष्टिकाल ही में प्रकाति पुरुपके द्वारा भूतो का जन्म होता है जैसा न जानो परनु सदा सर्वदा प्रकृति पुरुष से प्रगट होते रहते यही कहते है कि हे कौन्तेय अर्जुन जितने मनुष्य प्रा योनि स्थावर ज हम रूप खरूप उत्पन्न होते है उन को निरन्तर 'बढावनेवाली प्रकृतिही योनि है अर्थात् माता है और बीन प्रदाता पितारूम गर्भाधान कर्ता पुरुपसरूप मै ही हो ॥ ४॥ परमेश्वराधीन प्रकृति पुरुषके द्वारा प्राणियों की उत्पत्ति निरूपण करि कै अव प्रकृति के संयोग से पुरुष की संसार अवसा इस लोक मे ले कर चारि रोक पर्यन्त नाम से विस्तार कर कहते है कि हे महावाहो अर्जुन सत्त्व रज औ तम ये तीन गुणो की समान अवस्था रखनेवाली जो प्रकृति तिस से जिस की उत्पत्ति है उस मे गुणो के धर्म श्राव होंगे देखो प्रकृति से गुणो के अनुसार भिन्नभिन्न प्रगट होय प्रकृति के चतुर्दश अध्यायः । १५६ निवन्तिमहावाहोदेहेदेहिनमव्ययं ॥५॥ तव सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयं । सुखसंगेनवनातिनामसंगेनचानव ॥६॥ रमोरागात्मविद्विष्णासंगसमुह । तन्निवनातिकोन्तयकर्मसंगेनदेहिनं ॥७॥ तमरत्व ज्ञानजंविद्विमोहनं सर्वदेहिनां । प्रमादालस्यनिद्रामिस्तन्निवभातिभारत ॥८॥ स त्वंसुखेसञ्जयतिरज.कर्मणिभारत । भाषा अनुवाद कार्यरूप शरीर मे अहंयुद्धि युक्त स्थित देही खरूप चिदंश अात्मा जो सचमुच अव्यय निर्विकार रूप है उसको भी गुण अच्छीतरह बद्ध करते है अर्थात् अपने कार्य सुख दुख मोह आदि से युक्त कर देते है ॥५॥ तिन गुणों के बीच मे सतो गुण का सरूप और उसके बन्धकत्व की प्रकार कहते है कि सतोगुण निर्मलता के हेतु से फटिक के समान प्रकाशक कहे दीप्तियुक्त और अनामय अर्थात् निरू पद्य शान्त सरूप है इसीसे हे अनघनिष्पाप अर्जुन शान्त स्वरूप सतोगुण अपने कार्यरूप सुख में नो याशक्ति के द्वारा बन्ध करता है और प्रकाशक है इस हेतु से अपने कार्यरूप ज्ञान मे जो प्राशक्ति उस मे भी वह करता है अर्थात् हम सुखी हम ज्ञानी इत्यादि मन के सकल कर्म को तिस अभिमानी क्षेत्रतरूम आत्मा मे सम्पर्णरूप से योग कर देता है अनघ पद से जानाया कि गीता का अधिकारी पुण्यात्मा है ॥६॥ अव रजोगुण का खरूप और वन्धकत्व कहते है कि हे कौन्तेय अर्जुन रजोगुण को रागात्मक कहे अनुराग खरूप नानो इसमे टष्णा नो अमाप्त वस्तु मे अभिलाप औ संग कहे प्राप्त विपय मे नो सम्पूर्ण श्राशक्ति इन दोनो का रजोगुण से उद्धव होता है सोई रजोगुण देही जीवको दृष्ट नौ अदृष्ट अर्थ कर्मों की आशक्ति मे निश्चय वन्ध करते है क्योंकि तृष्णा औ संग के द्वारा समस्त कर्म में प्राशक्ति होती है॥७॥ अव तमोगुण का खरूप और पन्धवात्व कहते है कि तमोगुण अन्नान से प्रगट है अर्थात् आवरण शक्ति प्रधान मङ्गति के अंश से प्रगट जानो इस से हे भारत अर्जुन यावत जीव का मोहकारी अर्थात् नम उत्पन्न करै है तो कयौन यह तमोगुण ममाद आलस्य औ निद्रा आदि दोय जीव को करेगा ॥८॥ सत्व आदि तीनो गुणों के खकार्य करने मे सामर्थ्य को प्राधिया कहते है कि हे भारत अर्जुन सतोगुण सुसमे युक्त करता है अर्थात् यद्यमि विषयसुख ईपी श्रीमद्भगवद्गीता। ज्ञानमावृत्यततम प्रमादेसञ्जयत्युत ॥६॥ रजस्तमचाभिमूयसत्त्वंभवतिभारत । रज सत्त्वतमश्चैवतम सत्त्वरजस्तया ॥१०॥ सर्वदारेषुदे हेऽस्मिन्प्रकाशउपजायते। जानंयदातदाविद्यादिवृद्धसत्त्वमित्युत ॥११॥ लोभमवृत्तिरारम्भ कर्मणामशमास्स भाषा अनुवाद असूया जोग से प्रगट सुख दुख शोक आदि का कारण खरूप है तो भी नीव को सुख ही की ओर उन्मुख करता है और रजोगुण सुख आदिका कारण होके भी सर्व कर्मो मे युक्त करता है और तमोगुण महात्मों के संग से उत्पन्नन्नान को आप रण करि के असावधान कर देय है अर्थात् महात्मों के उत्तम उपदेश को नहीं समझने देय है और आलस्य आदि से अच्छोतरह यक्त कर देता है ॥६॥ अवा सत्वादि तीनो गुणों के प्रवृत्त होने की रीति कहते हैं कि रजोगुण तमोगुण को, तिरस्कार कहे पराभव करिके सतोगुण प्रगट होय है अर्थात् जीव के अदृष्टवाते सत्व जन्म है और अपने कार्य सुख आदि मे जीव को युक्त करै है असे ही सत्त्व औ तमोगुण का परामव करि रजोगुण जन्मै है और अपने कार्य रणा आदि मे युक्त करता है वैसे ही सत्य रज को पराभव करि के तमोगुण प्रगट होय है और अपने कार्य प्रमाद आलस्य मे युक्त करि देता है॥ १० ॥ अव विशेष से बढे हुये सत्व आदि तीनो गुण के लक्षण कहे चिह्न तीन लोक से कहते है कि इस भोगा यतन कहे भोग भाण्ड शरीर मे थोत्र आदि समस्त द्वारा मे जिस समय शब्द अादि जान सरूम उत्पन्न होता है उस समय प्रकाशरूप चिह्न के द्वारा सतोगुण को विशेष वढाहुआ नानो और सुखादि चिह्नसे भी सत्यकी वृद्धि जानो तात्पर्य यह कि इन्द्रियो के द्वारा जो ज्ञान होता सो सतोगुण ही से होय है॥११॥ और हे भरतर्षम अर्जुन लोम कहे वहुत धन रहते और पैदा होते भी धन को वार वार दिकरने की लापलाप अमिलाप और प्रवृत्ति कहे सदा ही व्यापार मे मन दिये रहना और प्रारम्भ अर्थात कर्मों का प्रारम्भ घर वगीचा प्राभूषणादि वनाने मे उद्यम और अशम कहे मै यह कर्म करि के फेरि वह कर्म करूगा या लो नानासझल्पसे मनका असत्तोप और स्पृहा कहे उत्तमचधम वस्तुदेखने ही से निस तरहहोय लेनेकीइच्छा ये सब चितरजोगुण के क्ढनेसे होते हैं अर्थात् इन चतुर्दश अध्यायः। हा। रजस्येतानिजायन्तेवि भरतर्षभ ॥१२॥ अप्रकाशोऽप्रवृत्तिप्रमादोमाह' एवच। तमसेतानिजायन्तेविवृद्धे कुरुनन्दन ॥१३॥ यदासत्वेप्रवृद्धेनुप्रलयंयातिदेह भत। तदोत्तमविदांलोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥१४॥ रजसिप्रलयंगत्वाकर्मसहिषु जायते । तयामलीन समसिमढयोनिपुनायते ॥१५॥ कर्मणःसकतस्याःसात्वि कनिर्मलंफलं। रजसस्त कलंदुःखम ज्ञानंतमसाफलं ॥१६॥ सत्वात्संजायतेनानं रअसोनीमएवच । प्रमादमोहौतम सोमवतोऽज्ञानमेवच ॥ १७॥ नवगच्छन्तिस भापा अनुवाद लक्षणो से रजो गुण की दृद्धि जानो हे अर्जुन यह श्रीकृष्ण ने कहा ॥१२॥ और अंप्रकाश कहे विचारका नाश और अमवृत्ति कहे निष्द्यम और प्रमाद कहे हर काम हर बात मे वेखबर और मोह कहे मिथ्या अभिनिवेश अर्थात् दुचितई या झूठे कारखाने मे मन देना ये सव चिह्न तमोगुणसे होते है नौ इनि लक्षणों से तम तमोगुण को वृद्धि जानो ॥१३॥ अव मरराकालमे विशेषसेवईमान सत्त्व आदि गुणो का फल विशेष रूप दो झोकसे कहते है कि नो सतोगुरा की वृद्धि के समय मे. देहधारी नीवशरीरको छोडैतो हिरण्यगर्भ आदिकी उपासना करनेवाले मनुष्यों के प्रकाशमय सुख उपभोग करने के जो स्थान है उन स्थान विशेषों को प्राप्त होय है ॥ १४॥ अोर रगोगुरा की वृद्धि के समय मे मृत्यु प्राप्त होने से कर्म मे आशक्त मनुष्य लोक मे जन्म होता है और तमोगण के वृद्धि काल मे देह छूटने से पशु पची आदि भूढ जोनि मे जन्म पाये है ॥ १५ ॥ अव सत्त्व प्राटि गुणमय के अनु खर कर्मों के द्वारा विचित्र फान प्राप्ति में गुणों को हेतु कहते है कि कपिल आदि पि सुकात कहे सात्विक कर्म का मान सत्त्वप्रधान प्रकाशमय सुखफल कहते हैं और राजस कर्म का फल दुःख कहते है और तामस कर्म का फल अज्ञान अर्यात मूढता को कहते है किन्तु सात्त्विकादि कर्मका खरूप भगवान श्रीकण आठारहें अध्याय के तेईसलोक आदि से ले कर क है गे ॥१६॥ अब पूर्वोत्ता सत्वादि गणकेशल खरूप सुख प्रादि का हेतु कहते है कि सतोगुण मे ज्ञान उत्पन्न होता है इस से साविक फर्मका प्रकाश जो सुखसोई होता है और रजोगुण से लोम जन्मे है इस | मे लोभ पूर्वक सईकमे का दुख ही फग्न होता है पो तमोगुण से प्रमाद मोह 89 श्रीमद्भगवद्गीता। त्वासामध्येतितिराजसा । जघन्य गुरवृत्तिस्थाअधोगच्छनिताममा. ॥१८॥ नान्यं गुणे व कतारंपदारटानु यति। गुण्य चपरवेत्तिम दामोऽधिगच्छति । १८॥ गुणानैतान तो यतीन्देहीदे हसमुद्भवान् । नन्म स्टन्युजराद् विमुक्तोऽस्टत मनुते ॥२०॥ अर्जुन उवाच। कैल स्त्रिीनगुणानेतानतीतोमवत्तिप्रभो। किमा साषा अनुवाद तथा अज्ञान मगठे है इससे अबान जंडता वही न होना उचत है॥१७॥ अब सबोगुण प्रादि आचरणशोले ये पल भेद कहते है कि सत्व य कहे सतोगुरा मगात पुरुपो को उई लोग प्राप्त होते अर्थात् सत्व के प्रताप से पुण्य की प्राधिक्य होतीहै उत्तरोत्तर कहे अग्गे धागे सो गुनी अानन्द खरूप होते हुये मनुष्य लोक गन्धई गोक मिनोक देवलोक सत्यलोक पर्यन्त प्राप्त होते है और रजोगुए प्रधान मनुष्य लोभनात मध्यलोकमे रहा है चात् मनुष्यलोकसेनमे है और जवन्यकहे निकृष्टजो तमोगुरी मनुष्यलागतमाद मोइसेमरेपरेहै उनकीअधोगतोहोहोती है अर्यात् तमोगुए उनको कमाकर के अन्वतमनर को पहुंचायदेताहै ॥१८॥ पूर्वोक्त प्रकार प्रकृति केगुए संगसे संसारको बाहुल्य कहे वळता कहिके अब प्रतिसे पुरुषका विवेक करनेही से मोक्ष होती है यह देखापते है किजिस काल मे द्रष्टा जीव विवेकी होके बुद्धि प्राटि रूप को प्राप्त होय सत्व आदि गणे को छोड दूसरे किसी को कती नहीं देखता वल् कि गुपही सव कर्म करते है यही देखता है और सत्व आदि गणे से पर कहे भिन्न खरूप सोई गुणादि को का साक्षी श्राम अपने को जब जानै तब से जीव महानको प्राप्त होय अनी ब्रह्मपद पाये ॥१८॥ निस के अनन्तर सत्व आदि गुण सात सम्पूर्ण अनर्थ निरत्त होने की से जो हातार्थ होता है कहते है कि सत्या प्रकार से जिसका देहादि रूम मे उद्भव अर्थात् देह कम परिणाम को प्राप्त हैं सोई देह समुद्भव कहावै है इस से देही जो जीवात्मा सो देह रूप परिणाम को प्राप्त येई सत्व दि तीन गुणों के अतिमानरा करने से परहै अर्थात गुरयास जन्म मरण नरा व्याधि दुख आदिसे अच्छी मकार मुक्त होय अस्त जो परम पानन्द रोलाम करता है॥२०॥ जीय यह शुग बय से यतिधान्त कहे अलग होने से मुक्ति पावता है या भगवान . चतुर्दश अध्यायः । चार:कचंचतांस्त्रीन गुणानतिवर्तते ॥२१॥ श्रीमगवानुवाच। - प्रकाशमवृत्तिञ्च मोइमेवचमा गड़व । नहेटिसंप्रवृत्तानिननिवृत्तानिकांक्षति ॥२२॥" उदासीनचंदा भाषा अनुवाद श्रीक्षण के मुख से अकरा कारिके गुणतोरा मनुष्य के लक्षण और उन मनुष्यों का आचरण श्री गुणे के अतिक्रम को उपाय सम्यक प्रकार से जानने की इच्छा करिके अर्जुन भगवान से कहते हैं कि हे प्रमो देशी जो 'गोव सो किस प्रकार आपसे उत्पन्न लचर के द्वारा गुणातीत होत्र यह लक्षच पूछा और किमाचार कहे डस के चाचरर बसे होते अधीन किस प्रकार के व्यवहार में वर्तमान रहता है और किस उपाय से इन गुणे को अतिक्रमरा करि के स्थिर होय है सो सब कमा करि कहिके जो मेरी सन्देह दुर जाय ॥२१॥ सित प्रजवं. का भाषा यह टूसरे अध्याय के चौविस पचीस लोक यादि से यही बात अर्जुन ने पूछा भी था और उसका उत्तर भी भगवान दे चुके हैं तो भी फोरि विशेष रूप से जान ने की इच्छासे अर्जुन पूछते हैं यह विचार करि के भगवान दूसरे प्रकार से उनका लक्षण आदि इस लोकसे लेकार छः लोकसे कहते हैं और उनके बीच ईस एक झोक के द्वारा उनके लक्षण जनावते हैं कि सत्व आदि गुरो को उपलक्ष्य कारि के कहा जो प्रकाश अर्थात् सर्भ दारेषु देहेल्मिन् वह इम अध्याय के एका दश लोया से कहा जो सतोगुण का कार्य और प्रवृत्ति जो रजोगुण का कार्य तथा मो हादि जो तमो गण का कार्य ये समस्त कार्य यथाक्रम से आप मे प्रत्त होने पर दुःख विचारकरि के नो पुरुप देप हेतु से धौ नित्ति होने से सुख जानि इच्छा न करे सोई गुणातीत मनुष्य है यह जानो ॥ २२ ॥ उक्त रूप अनायास बोधसे गव्य-जो गुणातीत के लक्षण सो कहि कर गणातीतं का आपरए कैसा है इस दूसरे प्रश्न का उत्तर तीन लोक से कहते हैं कि उदासीन के समान सादी रुप चित होके सत्व आदि गुण के कार्य सुख दुःख अादि से जो.मनुमा अघि चलित है. अर्थात् अपने द्रष्टा स्वरूप से चुत न होय को वनु सलादि गुग अपने अपने काम में वर्तमान है. इन से हम में डाछ भी सम्बन्ध नहीं हैं ऐसे विवेक ज्ञानसे जो पुरुष चुपचाय मौन होय सित. रहे और इस वातसे शिनलित न होय थीमनगवडीता। सीनोगुनोनविचाल्यते । गुणावर्तन्तइत्येपं योऽवशिष्ठतिने ते ॥२३॥ समाखमः खासखासमलाष्टाश्मकाञ्चनः ।' 'तुल्यप्रियाप्रियाधीरस्तुल्य निन्दात्मसन्तुतिः ॥२४॥ मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यामिवारिपक्षयोः। सबीरभरित्यागीगुणातीतःसउच्च ते॥ २५॥ माञ्चयोऽव्यभिचारेणभक्तियोगेनसेयते। सगुणन्समतीव्यैतान्त्रम भूयाय कल्पने ॥२६॥ प्रमणोहिप्रतिठाहममतस्याव्ययस्यच । शाश्वतस्यचधर्मास्य सुखस्सैकान्तिकस्यच ॥२७॥ इति गुरावयविभागयोगोनाम चतुर्दशोध्यायः ॥१३॥ भाषा अनुवाद सो गुणातीत है ॥ २३॥ और जो मनुष्य सुख दुख मे समान और भाटी पावर सोना आदि भी जिस के निकट समान हैं और सुख दुख के हेतु खरूपं प्रिय अप्रिय विषय में जिस को बुद्धि तुल्य है ओर धीर धीमान जो हैं नया अपनी सुति पो निन्दा में भी तल्य बुद्धि हैं ॥ २४ ॥ और जो मनुष्य मान अपमान में एकभाव और मित्र' शत्न पक्ष में समबु.व तथा जो दृष्ट अदृष्ट संपरी अर्थ के | उद्यमको त्याग करने में समर्थ है ऐसे याचरण से युक्त पुरुषको गुणातीत कहते हैं यह जानो ॥ २५॥ किस प्रकार सत्वादि गुणों को अतिक्रम करिके पर्तमान रहैं इस प्रश्न का उत्तर करते हैं कि परमेश्वर खरूप हमारी ही सेवा अव्यभिचारिणी ऐकान्तिक भक्ति के द्वारा जो मनुपा करता है. सोई मनुपा गुण बय को अच्छीतरह से अतिक्रम करिके मुक्त प्राप्ति के योग्य होता है॥ २६ ॥ अब पूर्वोतं भगशत के मोक्ष प्राप्ति के विषय मे हेतु कहते हैं कि जिस हेत बम को प्रतिष्ठा का प्रतिमा सो मैं हूं अर्थात्. घनीभूत प्रकाश मान जैसे सूर्य मण्डल त प हम धनीभूत ब्रह्म हैं और नित्यमुक्त अव्यय के और अंमत जो मुक्ति तिस के भी प्रतिमा हम हैं और शुद्ध सत्य मुक्ति के साधन वरूप सनातन धर्म के मी प्रतिमा मुक्ति हम हैं और परमानन्द सुख के भी मर्ति में जाना इस से मेरे सेवक जनको मद्भाव रूप ब्रह्मत्व प्राप्ति की अवश्य सम्भावना है जिसः के आश्रय हेव में असा जोसन के समान प्रतीयमान यह.संसार तिससे हमारे भक्त अनायास ही तर जाते हैं यही चौदहें अध्याय में मंगवानने कहा है । इति श्रीजगन्नाथ मुकुल विरचित मनभावनी टीकायों चतुर्दशोऽध्यायः॥ २४ श्रीमद्भगवडीता पञ्चदश अध्यायः । थीभगवानुवाच । ऊदमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहरव्यय छन्दासियस्य पनि भापा अनुवाद बैराग्य के विना ज्ञान औ भक्ति दुर्लभ है इस लिये पंद्रहें अध्याय से भगवान श्रीकृष्णा वैराग्य सहित ज्ञान का उपदेश अर्जुन को दिया है और पूर्व चौदहे' अध्याय के अन्तमे जो कहा कि मांच योऽव्यभिचारेण भक्ति योगेन सेवते इत्यादि छविस लोकादि से कि एकान्त भक्ति से परमेश्वरका भननकारी मनुपा भगवत की कृमामे जान लाभके द्वारा मुक्त होता है सो विराग रहित पुरुप को एकांत भक्ति अथवा ज्ञान होता ही नहीं इसी हेत से बैराग्य कथन पूर्वक ज्ञान उपदेश करने के मनोरथ से प्रथम डेढ लोक करिके संसारखरूपको वृक्ष रूम रूपक अलङ्कार से वर्णन करते हुये भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि उर्धमल कहे उत्तम अर्थात् क्षर अक्षर से भी उकृष्ट जो पुरुपोत्तम परमेश्वर सो संसार | के मूल कारण है इसी से संसार उर्धमूल है और अधाशाख कहे परमेश्वर झी अमेचा अधः अर्थात् कार्यरूप उमाधि युक्त हिरण्यगर्म धादि जो संसार की शाखा खरूप है सोई संसार को अधःशास कहा है और यह संसार विनन्धर हेतुसे परदिन प्रभात लों रहेगा ऐसी विश्वास के योग्य नहीं है इसी से अश्वस्य कहा और अठये अध्यायके उनीसवें लोककी उक्त अभिप्राय से या संसार प्रलय के अनन्तर पुनः पुनः कहे वार वार उत्पन्न होता है तो होना जाना इस हेर फेर लगे रहने से धरावाहिक वृत्तिरुप इस संसारका विच्छेद नहीं है अर्थात् सदाही बना रहता है इससे अव्यय श्री अनादि भी है और ऐसे ही चुतियो ने भी कहा 82 १६६ श्रीमद्भगवद्गीता। यस्तंवेदसवेदवित् ॥१॥ अधचोइश्चमस्तास्तस्य शाखागुणप्रवाविषयप्रवालाः । श्रय ~~ Namadnawwarnwr स भापा अनुवाद है और छन्द कहे वेद सकल इस संसार वृक्ष के मन है अर्थात् धर्म अधर्मकर प्रतिपादन करतेसे छायाके तुल्य है और कर्मफल के हेतु संसार वृक्षके अायिन जीव समह है यह कहते हुये वेद पत्र समान है जो मनुष्य ऐसे करके संसार अश्वत्थरूम को जानते है सोई वेदके अर्थयित् है तात्पर्य यह कि प्रपंचरूप संसार वृक्ष के मल परमेन्चर और परमेश्वर के अंश खरूप जो बझाटिक सो सब शासा समान है सोई वृक्ष विनम्वर औ प्रवाहरूपसे नित्य भी है और वेद विहित कर्मोके द्वारा संसार वृक्षकी सेवा करना भी कहा है इतनाही वेदों का निश्चित अर्थ है इससे इस वृक्षके ज्ञानीमुरुप को वेदवित् कहनाचाहिये ॥१॥ और कार्यरूप उपाधि विशिष्ट हिरण्यगर्भ आदि जो सकल जीव सोइ शाखारूम पूर्व लोक में कहा है तिन के मध्य मे जो अकर्म कारी अर्थात् कुसित कर्म करते है तेइ अधः अर्थात् पगुआदि योनिमे जाते है और जो सत् कर्म करते है वे उर्ध कहे देव योनि मे प्राप्त होय है येई संसार वृक्ष के शाखा रूम सत्त्व प्रादि गुणों की वृत्तिसे जल सेचन के सनान यथा योग वढते है और शाखाके अग्रतुल्य इन्द्रिय यौ इन्द्रियों के विषय जो रूप रस आदि सोई प्रधान अर्थात् पन तुल्य हैं और अधोभाग मे अर्ध भागमे धौ समस्त मूलमे परमेश्वर ही मुख्यमूल है और तहोगवासनारूप अवान्तर वासना सब अवान्नर मूल हैं और अवान्तर वासना के कार्य करते है कि कर्म मात्र ही सकल वासना के अनुबन्ध अर्थार उत्तर भावी कहे होन हार सोइ वासना समस्त मनुष्य लोक मे कर्म अनुवन्धी होती है अर्थात् अई अधो लोकमे मुक्त जो नाना प्रकार के भोग सोइ सोई भोग वासनाके द्वारा ही कर्म क्षय होने से मनुष्य लोक को प्राप्त लोगों को सोइ सोर वासना अनुरूप सकल कर्मोमे प्रवृत्ति होती है और जिस हेतु मनुष्य लोक ही में कर्म का अधिकार है और कोई लोक मे नहीं है इससे मनुष्य लोकही में वासनारूप मल को कर्मका अनुपन्दी कहाहै अय शोच यह है कि क्षणभद सकल साधन मनुष्य देह पायके न झुछ कर गो इन भूलको भी भूलगये हाय किसीको पञ्चदश अध्यायः । चमूलान्यनुसन्त तानिकर्मानुबन्धीनिमनुष्यलोके ॥ २॥ नरूपमस्येहतथोपलग्यतेना तोनचादिर्न चसंप्रतिष्ठा। अश्वत्यमेनंसुनिरूदमूलमसशस्त्रेण दृढेनछित्वा ॥ ३ ॥ ततःपदंतत्परिमार्गितव्यंयस्मिनगताननिवर्त्तन्तिभूयः । तमेवचायपुगपंप्रपद्येयतः प्रत्तिा प्रस्तापुराणी ॥ ४॥ निर्मानमोहाजितसङ्गदोप.अध्यात्मनित्याविनिरन्तका माः। इंढ विमुक्तासुखदुःखसं जैर्ग छन्य मूढाःपदमव्ययंतत् ॥५॥ न तहासयते भाषा अनुवाद - देखके या किसीके उपदेशमै बाख अन्धे और कान बहिरे ही रह गये ॥ २ इस संसार में वर्तमान नो प्राणी है वे संसार वृक्षका अईमूल यादि भेद नहीं जानते है और अत्यन्त वडेपन के हेत से इसका अन्तभी नहीं जाना नाय है तथा अनादि हेतुमे आदि भी नहीं कोई जानि गकै है और स्थिति अर्थात् यह संसार किस तरह स्थित नौ कैसा है सो भी खबर किसी को नहीं है इससे यह संसार रच दुच्छेद्य कहे इसका काटना बढ़ा कठिन है और अनर्थकारी है इसी हेतु इस संसार को दृढ नैराग्य रूप शरवसे छेदन करके तत्वन्नान की यत्न करना चाहिये यह डेढ झोकसे कहते है कि यह अश्वत्यरूप दृढमूल संसार को अह ममता त्यागरूप दृढ अस्त्रखरूप सम्यक् विचार से छेदन अर्थात् पृथक करके ॥३॥ तदनन्तर संसारके मूल कारण स्वरूप तत्पदसे कहेजये जिस ईवरपदको अन्वेषण करना अर्थात् ढूंढना उचित है सोपद कैसाई इस अपेक्षामर कहते है कि जहां नायकर फेर और संसार आवर्तन कहे यात्रा गमन होता नहीं और अब भगवतमद ढूंढने की रीति कहते है कि जिससे इस पुराने संसार की प्रति भई है उसी आदि पुरुष के शरणगत होते है इसीतरह एकान्त भक्ति के द्वारा उसमदको ढूंढे ॥४॥ सोई परमेश्वर की प्राप्ति के विषय से दूसरी उ पाय देखावते हुये कहते है कि जिन मनुष्यों के भान अहंकार यौ मिथ्या वस्तुमे रुचि नहीं है अर्थात् मानादि दूर हो गये है और जिन के भुत्त इस्त्री धन आदि से आशक्ति रूप दोष निरत्त भये है और जिन को आत्मज्ञान मे भली प्रकार से निष्ठाई और निनकी वासना अच्छीतरह निवृत्त हो गई और सुख टुसके हेतु रूप भीत उष्ण हानि लाम आदि इन्द्रमे अच्छीतर छुट गये है ऐसे जो निवृत्त को मात . १६८ श्रीमद्भगवगीता सूर्योनामाङ्कनपावकः। यद्गत्वाननिवर्तन्तेतद्वामपरममम ॥६॥ ममैशोजीव, लोकेजीवभूतःसनातनः । मनःपठानीन्द्रियाणिप्रतिस्थानिकर्षीत ॥२॥ शरीर यंट्वानोतियुच्चाप्यंक्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानिसंयातिवायुर्गन्धानिर्वाशयात् ॥ ८॥ थोवक्षनःस्पर्शनचरसनंघाणमेवच । अधिष्ठायमनश्वार्य विषयानुमसेवते ॥ उ. ' भाषा अनुवाद अविद्य कहे ज्ञानीजन हैं तेई अव्ययरूप को प्राप्त होते हैं ॥५॥ अव उसी अव्यय पद को विशेषरूप से कहते हैं कि उस पद को सूर्य चन्द्र अग्नि भी प्रकाश नहीं कर शकते हैं और योगीजन जिस मद होय फेरि संसार में यावर्तन, कहे गमनागमन नहीं करते हैं सोई धाम कहे तेनरूप हमारा खरूप है जहां सूर्यादि की गति नहीं तहां दुख इन्, जड़ता का कौन प्रसर है ॥ नो हो कि तमारे धाम को प्राप्त, होय फेरि संसार नहीं होता सो सत्य है. सकल जीव,सत. संरूप सम्पन्न होके द्वैत दृष्टि नहीं करते हैं और सुषुप्ति समय मे, हम ब्रह्म भाव को माप्त होते हैं असे श्रुति विधान करैं हैं और प्रलयकाल में भी सब जीव तिस धाम को प्राप्त होते हैं तो फेरि संसारी और किस का नाम है इस आशङ्का, पर पांच लोक से संसारी खरूप देखावते हैं कि हमारा अंश नीव अविद्या में सुपप्ति तथा प्रलय के समय प्रकृति मे लीन होके रहते हैं और मन समेत इन्द्रिय दून यो करे मेरे ही संभ साजन जीयभात संसार के जपसोगार्थ फेर की मनुष्यलोक मे बँचे है. यहां यह जानना चाहिये कि इन्द्रिय शब्द से ज्ञान कर्म इन्द्रिय पत्र प्राण लेते हैं इसीसे संसारी होते हैं ॥ ७॥ .और सोई इन्द्रियों को आक पण करिके जीव क्या करते हैं जो यह शङ्का करो तो सुनो कि जब ईश्वर नाम देह आदि का सामि वरूप व्यावहारिक जीव. कर्मवशते दूसरी शरीर को प्राप्त होते हैं अथवा जब शरीरको छोड़िके गमन करते हैं तव पूर्व शरीरमे इन्द्रियादि कों ग्रहण करि के ही गमन करें हैं. इस मे दृष्टान्त यह कि जैसे वायु मालों के सानसे सुगन्धरुप, सूक्ष्म अंश परमाणु ग्रहण करके गमन करे है वैसे ही यमी ग्रहण करता है, सो आनो १८, इन्द्रियों के समाचार कह के अब जिस लिये जन इन्द्रियों को ग्रहण करिकै नीव गमन करते हैं:सो कहते हैं कि ये जीव योब चक्षु ॥
पञ्चदश अध्यायः। कामन्तस्थितंवापिभुञ्जानंवागुणान्वितं । विमुढानानुपरन्तिपश्यन्तिन्नानचक्षुषः । १०॥ यतन्तोयोगिनयनपश्यन्त्यात्मन्यबस्थित। यतन्तोऽयकृतात्मानोनै पश्यन्त्य चेतसः॥११॥ यदादित्वगतंतेजोजगदासयतेऽखिल । यच्चन्द्रमसियच्चानौतत्तेजोवि दिमामकं ॥१२॥ गामाविस्यचभूतानिधारयाम्यहमोजसा। पुष्णामिचौषधीःस ःिसोमभूत्वारसात्मकः ॥१३॥ अहंवैश्वानरोभूत्वाप्राणिनांदेहमास्थितः। माणा भापा अनुवाद स्पर्श जिला और घाण ये वाय इन्द्रिय और अन्त करण को आयय कारि के शब्द आदि विषयों को उपभोग करै है॥६॥ जो कहो कि ऐसे आत्मा को कार्य कारण समूह से भिन्न रूप सव कोई क्यों नहीं देखते इस पर कहते है कि देहान्तरगामी अथवा उसी देह मे खित या विषयभोगी किम्वा इन्द्रियादि से युक्त जीव को विशेष मुदबुद्धि लोग सब नही देखते है परन्तु ज्ञानही जिसके चक्षु है ऐसे विवेकी मनुष्य ही देखते है ॥१०॥ और यह आत्मा दुर्विज्ञेय है क्यो कि विवेकियों के बीच भी कोई देखते और कोई नहीं देख सकते है सोई कहते है कि ध्यान यादि के द्वारा बनकारी योगीजन अपनी शरीर मे इस आत्मा को पृथक रूप से देखते हैं और शास्त्र अभ्यास मे यत्न करके भो तात्मा अर्थात् अशुद्ध चित्त मन्दमति लोग इस आत्मा को नहीं देखते है ॥ ११॥ इससे न सदासयते सूर्य इत्यादि इसी अध्याय के सप्तम आदि लोक के द्वारा परमेश्वर का नो परम धाम सो कहा गया है और तहाम प्राप्त जोवोको अपुनरवार श्रावृत्ति कही गई है और तद्विषयक संमारी के अभाव आशङ्कामर देह से भिन्न संसारी खरूप को भी देखाया है अब सोई परमेश्वर सम्बन्धीरुप इहां से लेकर चार लोक से अनन्त शक्ति क्रम से निरूपण करते है कि सूर्यादि मे स्थित अनेक प्रकार तेज जो विश्व को प्रकाश करै है ऐसे ही चन्द्र में स्थित जो तेज अखिल संसार को प्रकाश करते हैं तेसे ही अग्निस्य तेज बह्मा एड् दीप्त कर है सो सव तेज हमारा ही है. यह जानो ॥१२॥ और पृथिवी को अपने वलके द्वारा स्थित करके मै चरा चरात्मक.सकरत भतों को धारण करता हूं और अम् तात्मक चन्द्र सरूप होके वृक्ष आदि सम्पूर्ण शस्य को भी वढावता ह ॥१३॥ और मैं ही यैश्वानर नाम श्रीमद्भगवद्गीता। मानसमायुक्तःपचामय्यन्नं चतुधिं ॥१४॥ 'सई स्थचाहहृदिसन्निविष्टोमत्तःस्मृतिर्मा नममोहनञ्च । वेदैश्वसरहमेयवेद्योवेदान्तवेदविदेयवाहं ॥१५॥ हाविमोपुर पौलोकेशरञ्चाक्षरएवच । चरःसर्वाणिभूतानिकूटस्थोऽक्षरउच्यते ॥१६॥ उत्त भाषा अनुवाद बठराग्नि स्वरूप होके प्राणियों की शरीर के मध्य मे प्रवेश कर के प्राण अमान वायु के साथ होय जीवों का मुक्त जो भोच्च भज्य लेय चोपा चतुर्विध अन्न तिस को परिपाक करता ईभक्ष्य वह है जो दानों से पीसकर पाया जाय दाल भात चीन वगैरः और भोज्य नो निह्वा के इसारे से निगला जाय खीर हलुत्रा आदि लेय वह है द्रवरूप प्रासादन पूर्वक पान किया जाय सहत दुग्ध आदि बोक कहे जो चूंस कर घूट लिया जाय ऊख वगैरः को जानो॥ १४ ॥ और मैती यावत् प्राणी के हृदय मे अन्तर्यामीरूप से प्रवेश करता हूं इसी से सव प्राणीयों को पूर्वक्षत अर्थ विषय का स्मरण होता है और इन्द्रियो के संयोगसे जो रूपादि विषयों का ज्ञान सो हमी से होता है और अपोहन कहे स्मरण औ विपयों का जान इन दोनो का प्रभाव भी हम से ही होय है और वेदो मे कहे हुये तीन तौन देवता रूम भी हमीहै और वेदान्तकृत अर्थात् शिष्य मशिपा रूमसे सम्प्रदाय के प्रवर्तक कहे नानदाता गुरुखरूमभी मैहों है। यो वेदार्थवित् भी मैहीहं ॥१५॥ अब तधाम परमं मम यह जो इस अध्याय के सप्तम श्लोक मे कहा अपना सर्वोत्त मत्व सो तीन लोक से देखावते है कि जो घर में अक्षर खरूप दुई पुरुप लोक मे प्रसिद्ध है,इन का विशेष यह है कि ब्रह्मा आदि स्थावर पर्यना को देहधारी तिन का नाम क्षर पुरुप क्योंकि अविवेकियों को सूल शरीर मे पुरुपत्व प्रसिद्ध है और कहे शिलाराशि पर्वत के समान देह नाश भये भी निर्विकाररूपसे स्थिति करै ऐसा जो चैतन्य सरूम भोता है क्योंकि देसो विवेकी ननोके विचारसे सोई अक्षर पुरुष है ॥१६॥ जिस हेतु चर श्रौ अक्षर दोनो पुरुप लक्षित मये हैं इस से जो उत्तम पुरुष सो इन दोनी से भिन्न है उस की विलक्षणता कहते हैं कि सो परमात्मा सरूम है यह श्रुतियों मे कहाँ है और आत्मा अचेतनरूम घर रो तथा परमात्मा अक्षररूप भोक्ता से भी भिन्न है अब उनका परमात्मात्य देखावते . कूटस्थ
पञ्चदश अध्यायः।
Mamw--
मापुरुषस्व न्यः परमात्मत्युदाहृतः । योलोकनयमाविग्यविभतीव्ययईश्वरः ॥ १७ ॥
यसमात्नरमतीतोऽहमक्षरादपिचोत्तमः । अतोऽस्मिलोकेवेदेचप्रथितःपुरुषोत्तमः
११८॥ योमामेवममम्मूढोजानातिपुरुपोत्तमं । ससर्वविदजतिमांसर्वभावेनभा
रत ॥१८॥ इतिगुह्यतमंशास्त्रमिदमुक्तमयाऽनघ । एतदुधाबुद्धिमानस्यातकतह
त्यचभारत ॥२०॥ इति भगवहीतायां पुरुषोत्तमयोगोनाम पञ्चदशोध्यायः ॥१५॥
भापा अनुवाद
हैं कि सो ईश्वर पदवाच्य नियन्ता यी अव्यय कहे निर्विकार स्वरूप हो के भी
अलोच्य के हृदयमे प्रवेश करिके प्राणीमात्रका प्रतिपालन करते है॥१७॥ एवम्भूत
पुरुपोत्तमत्व अपना नाम कहने से देखावते हैं कि जिस हेतु हम घर जो नड स
मूह तिनको अतिक्रमण करते हुये और नियन्तारूप चेतन जो अचर उससे भी
उत्तम है इस से सकल लोक और वेद मे हम पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध है सोई
श्रुति कहती हैं कि सोई नो पुरुषोत्तम वे धारमा यौ वैलेोक्यके वश करनेवाले और
नीन लोक के ईश्वर सबके शासनकती है यह भगवानने अर्जुनसे कहा ॥१८॥ ऐसे
ईयर का जानने द्वारा ज्ञानी पुरुप के ज्ञान का फल कहते है कि हे भारत
अर्जुन इस तरह पूर्वोक्त निश्चित प्रकार से असंमूट कहे निश्चितमति को के जो
पुरुपोत्तम खरूप हम को जानि शकै है सोइ मनुपा सय्यक प्रकार से हम यो
भने है तिस के अनन्तर सर्वज होता है यह नानो ॥१८॥ अब अध्याय के अर्थ
का उपसंहार करते है कि हे अनघ निमाप अर्जुन यह संक्षेपसे अति रहस्य ख
रूम जो सम्पूर्ण शास्त्रोंका सारांश सो मैने कहा केवल बोश लोकयुक्त एक अध्याय
छोड़ के इससे जो को होय यह मेरी की हुई पाक्य को पोध करिके बुद्धिमान
कहावता श्री ज्ञानी होके चरितार्थ कृतार्थ होता है तो हे भरतवंशी,अर्जुन तम
जो चरितार्थ होउगे इसमे क्या और कुछ कहनाहै। सर्ववपरिपूर्ण परमात्मारूप
यीकृष्णांणी संसार रक्ष को मिन्न करके पुरुषोत्तमयोग नाम पंद्रहें इस अध्याय
में अपना परमपद अर्जुनको उमदेश किया है ॥२०॥ इति मञ्चदशोध्यायः ॥१५॥
श्रीमद्भगवद्गीता षोड़श, अध्यायः ।.. थीभगवानुवाच । अमयंसत्त्वसंशुद्विानयोगव्यस्थितिः । दानंदमश्चयनथना ध्यायस्तपश्चार्ज ॥१॥ अहिंसासत्यमक्रोधल्यांगःशान्तिरपैशुनं दयाभूतेष्वलो भाषा अनुवादः अब इस. सोलहें अध्यायका तात्पर्य कहते हैं कि यासुरी सम्पत् त्याग करके देवी सम्पत् आयय. लेनेवाले मनुष्य मुक्त होते हैं इसकी निर्णयकरने के अर्थः इस अध्याय मे उसका विस्तार करते हैं कि हे अर्जुन सकल शास्त्र के अनुरूप मेरे कहे हुये इस वृत्तान्त के नानने से लोग सम्यक ज्ञानी औ शतार्थ होते हैं यह भगवानने पन्द्रहें अध्यायके अन्त मे कहा है तो कौन मनुष्य वह तत्व समझ सकते हैं और कौन, नहीं इस. अपेक्षापर तत्व ज्ञानके अधिकारी, औ अनधिकारी. की निर्णय करने के लिये सोरहें अध्याय का प्रारम्भ होता हैं क्यों कि जिसमे जिसका अधिकार है वह उसीसे पूरा मरताहै इससे अब तत्व के अधिकारी पुरुष का. गुण स्वरूप सम्पूर्ण दैवी संपत को इस लोकसे लेकर तीन लोकसे कहते हैं कि अभय यौ सत्त्व संगुद्धि-कहे बुद्धिको प्रसन्नता औजानयोग, नो यात्मज्ञान की उपा यमे व्यवस्थिति कहे परिनिंछा औ दान कहे अपने भोजन की वस्तु अन्न आदिका भी यथा उचित देना तथा दम अर्थात् वाह्य इन्द्रियों का संयमकरना और यन्त्र को यथाविधि से दर्श पौर्णमास आदि याग करना और साध्याय कहे ब्रह्म यज और तप जो सबकें, अध्यायके चौदहें लोक मे करेंगे देव द्विज गुरू पण्डित जानी का पुजन तथा शौच, सीधापन कोमलताई ब्रह्मचर्य अहिंसा इनको शरीर तम करने है. सो और वार्यव को सीधा स्वभाव ॥ १ ॥..और अहिंसा कहे परपीड़ा 4 पोड़श अध्यायः । १७३ लुप्तमार्दवंतीर चापलं ॥२॥ तेजःक्षमाधतिःशौचमद्रोहोनातिमानिता। भवन्ति सम्पदंदैवीमभिजातस्यभारत ॥३॥ दम्भोदोऽभिमानयक्रोधःमारपत्रमेयच। अ जानं चामिनातस्ययार्यसम्पदभासुरीं ॥४॥ देवीसम्पविमोक्षायनियन्धायासुरीमता। भाषा अनुवाद का त्याग औ सत्य अर्थात् देसामुना ज्यों का त्यों कहना ौ अक्रोध कहे कोई मारै या कुवाच्य कहै तो भी चित्त मोघवय न होने देना तथा त्याग कहे प्रिय अप्रिय मे उदासीनता और शान्ति अर्थात् विपयों से चित्तकी निवृत्ति यो चपै शून्य को परनिन्दा वर्जन पीठ पीछे निन्दा वारनेको पैशून्य कहते है और दीन दरिद्र पर दया तथा श्लोग्नुपत्य कहे निर्लोभता यो मार्दय नो कोमलता चौसी काहे कुकर्म करने मे लोकलना तथा अचामल अर्थात् यथा बोलना या रथा कुछ फरना चञ्चलताई जो सो ये सव न होय ॥२॥ और तेन कहे ढिठाई और क्षमा यौ ति दाहे शागि राधा दुसमै धीरज रसना औ शौच धार याहिर भीतर शुद्ध না স্বী আৰু চি সিকিানা নিজানিয়া কষ্ট অলীলান যা का अभाव येई अभय अादि यो रवीग प्रकार की देवी सन्यत् है सो उसी को होती हैं जिसको कल्याण भावो है अर्थात् धागे भला होनहार है॥३॥ अब बासुरी सम्पत् वाहते है कि दाम कहे लोगों के सामने अपनी धार्मिकता प्रकाश के हेड मन भावते काल्पित धयों को बना देसलाना और दर्द कहें धन उपार्जन तथा विद्या अादि मे चित को उत्साह कहे उंचाई और अभिमान कह अपने हरतरहके महाप से दूसरे को कुछ न समभाना और क्रोध तथा मारुष्य जो कठोरता निठुरता और अजान कहे अविवेक ये बासुरीको आसुर राक्षसों की सो सम्मत् इन मे रुचि निनको होती है वै असुर राक्षस हैं ॥४॥ अब इन दोनों सम्पदों के काज अकाज देखावते हुये कहते है कि दैवी मम्मद से युक्त मनुष्य ही मेरे कहे हुये तत्वज्ञान के अधिकारी है और जो मनुष्य आसुरी सम्पद से वक्त है ते सदाही संसारी होते है अब ये वचन भगवान के प्रवरा करके मैं तत्त्वज्ञान का अधिकारी हौं कि नहीं इस सन्देह मे व्यग्रचित्त अर्जुग को सम भापते हुये भगवान कहते है कि हे परन्तम तुम योच न करो क्यों कि 88 १७४ श्रीमद्भगवदीता। माशुचःसम्पदंदैवीमभिजातो.सपाण्डव ॥५॥ दौभृतसगालोकेऽस्मिन्दैवासुरएवच देवोविस्तारशःमोलासुरंपार्थमेश्टणु ॥६॥ प्रतिञ्चनित्तिचजनानविदुरासुराग नशौचनामिचांचारोनसत्यतेषुन्द्यिते॥७॥ असत्यमप्रतिष्ठन्तेजगदाहरनीचर भापा अनुवाद दैवी सम्पद के अभिमुख जनो हो और दैवी संम्पद संयुक्त हौ यह तुमारे पाच रणों से प्रसिद्ध है ॥५॥ आसुरी सम्पद अच्छी प्रकार से वर्जन करना ही कर्तव्य कामहै इससे आसुरी सम्पदको विस्तार करिके कहते हैं कि जो दो प्रकार की भूतों की सृष्टि है सौ मेरे मुख से श्रवण करो इस नगह असुर राक्षस सम्बन्धी दोनो मनति की एकता कारके देव प्रतिके साथ दुईमत कहा है इससे नवयें ध ध्यायको वारहें झोकमे बासुरीं राक्षसी चैव इत्यादि विविध प्रकृति के साथ विरोध नहीं है हे अर्जुन इस लोकमे देव औ असुर सम्पद से युक्त जो दो प्रकार भूतों की सृष्टि तिसके मध्यमे देवो सम्पद युक्त सृष्टि मैने पूर्व ही विस्तार रूपसे कहा है अब आसुरी सम्मद से युक्ता सो सष्टि जो हमसे सुनो ॥६॥ यासुरी सम्पद इस श्लोक से लेकर वारह लोक तक दया करिके निरूपण करते हैं कि असुर सभापयाले मनुष्य सकल धर्म मे प्रष्टत्ति औं अधर्म से नित्ति कैसी होती है सो जानते ही नहीं इसी से इन लोगों में शौच आचार औ सत्यता का लेश मान भी नहीं रहता है यह तुम जानो ॥ ७॥ वेदविहित जो धर्म अधर्म तिस में प्रति को असुर स्वभाव मनुष्य क्यों नहीं जानते और धर्मा अधर्म को 'अङ्गीकार न करने से सांसारिक सुख औ दुःख अादि होना किस प्रकारसे निरूपण किया जाय और शौच तथा आचार आदि मे ईश्वर की पाजाही को वा कैसे लखन करते हैं और ईवर को न मानि के जगत की उत्पत्ति किससे कहते है सोई कहते हैं कि लो वेद पुराण इतिहास को प्रमाण नहीं मानते और कहते हैं कि मुनि औ भांड़ तथा राक्षस येइ तीनो ने बेद को बनाया है और जिन की धर्म अधर्म की प्रतिधा अर्थात् व्यवस्था नहीं है तेइ अप्रतिष्ठ कहे नास्तिक लोग अपनी पूर्वोक्त आका को पुट करने के कारण इस जगत को अमविष्ट कहते हैं अर्थात यह जगत की विचिवता खभावसिह माव कहते हैं और जिनके मत मे इस जगत का स्यापक www.rrmanawrror पोड़श अध्यायः । १७५ अपरस्परसम्भूतंकिमन्यत्कामहेतुकं ॥८॥ एतादृष्टिमवष्टयनष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवत्युग्रकर्माणाक्षयायजगतोऽहिताः ॥६॥ काममाथित्यदूप्यूरंदमामानमदान्विताः मोहाहीत्वासङ्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशचित्रताः ॥१०॥ चिन्तामपरिमेयाञ्चमलयान्तामु भाषा अनुवाद ईश्वर नहीं है इस से यह संसार अनीश्वर है ऐसे नास्तीक लोग अपनी यात का मक्ष करके जगत को अनीश्वर कहते हैं जो पूछो कि तौँ फेरि वे लोग इस जगत की उत्पत्ति किस से मानते है इस पर उनकी कहावत कहते है कि अपरसर कहे पर अपर से भिन्न जो स्त्री पुरुप इन दोनो के संयोग से संसार की उत्पत्ति होती है इसका और कोई कारण नहीं है यह नगत काम हेतुका अर्थात् रखी पुरुप इन दोनो का जो काम सोइ धारा प्रवाह क्रम से इस संसार का कारण खरूप चला आवता है नास्तीक लोग ऐसे ही कहते है॥८॥ देखो निरीश्वर बादीयों की दृष्टि कहे तजवीन और कल्पना से कल्पित वातो ौ उनके दर्शन कहे मतग्रन्थों का अाययण करके मलिनचित्त अल्पबुद्धि अर्थात् नो देखें सुनै उसी पर तुर्त विचार विद्यासकरिके मनुया निनको हिंसाही करना मात्र काम है वे शत्रुखरूप हो के संसार के नाश के हेतु प्रगट होते है ॥ ६ ॥ और जो कामना भोगादि करने से भी कभी पूरी नहीं होती ऐसी कामना को अवलम्बन करके दम पापण्ड से युक्त होय क्षुद्र देवता भूत प्रेत आदि की आराधना मे प्रटत्त होते हैं सोइ कहते है कि असतग्राइ ग्रहण अर्थात् इस मन्त्र के द्वारा इस देवता की आराधना से बहुत धन प्राप्त होगा ऐसा दुराग्रह मोहवशते जो मनुष्य अङ्गीकार कर लेते है और अल्पबुड़ियों के अशुचि कहे मद्य मांस आदि युक्तवत नियम होते है तेई मनुष्य इन निपिङ कमोमे प्रष्टत्तहोते है॥१०॥ और प्रलय कहे मरण काल पर्यन्त है जिसका अन्त ऐसी जो अपरिमेय चिन्ता अर्थात् कितनी है इसका ठिकाना नहीं विस के अथित कहे चिन्तापरायण मनुष्य निनको काम भोग करनाही परमप्रयोजन है और काममोग छोडके दूसरा और कोई परमपुरुषार्थ नहीं है इतनीहीकिये है निश्चय बोलोग ते कुकर्मकेद्वारा धन सञ्चय करने की इच्छा करते है इस झोकपी मर श्लोक के साथ अन्वय होती श्रीमद्भगवद्गीता। पाश्रिताः। कामोपमोगपरमाएतावदितिनिश्चिता' ॥ ११॥ आशापाशशतवद्धा' कामक्रोधपरायणाः। ईहन्तेकामभोगार्थमन्यायेनार्थसयान् ॥ १.२ ॥ इदमद्य मयालब्धमिदंमाप्सेमनोरयं । इदमस्तीदमपिमेभविष्यतिगुनधनं ॥१३॥ अमौ थाहत.शवहनिष्येचापरानपि। ईश्वरोऽहमहंभोगीसिद्धोऽहंवलवानसुखी॥१४ ॥ अाग्योऽभिजनवानसिकोऽन्योऽस्तिसदृशोमया । यच्येदास्यामिमोदिप्यइत्यज्ञानवि भाषा अनुवाद वृहस्पति का सूत्र प्रमाण देते है कामरवैक पुरुषार्थ इति इसका अर्थ यह है कि चैतन्यविशिष्ट जो काम उसी को पुरुष पद से कहते है॥ ११॥ इसी से आशा सैकडो रसीयो से धन्धे इधर उधर बैंचे नाते हुये लोग काम क्रोध के धाश्रय खरूपभूत काम उपभोग के अर्थ अन्याय कहे चोरी लवारी दगावानी उगी वटपारी से धन वटोर ने की इच्छा करते है इसी से वह धन कुकर्म छोड सुकर्म मे नहीं लगे है देखो अज्ञानी बाप अपने हाथ गले मे सैकडो मासी लगाय सेते है॥ १२॥ अब ऐसे लोगो के मनोरथ कहि कर उन को नरक प्राप्ति सा रत्ता इस लोक से लेकर चार लोक से कहते हैं कि इसी अज्ञान से विशेष मोहको प्राप्त होके नरक मे पडते हैं देखो उनको रुची औ मनोरथ ये है कि आज हम को यह लाभ मई और यह मनभावती प्यारी वस्तु परे कहे आगे पायेंगे और यह धन हमारे है हमारा है और फेर भी तजवीज लगाये है कि यह धन भी हमारा होता है परन्तु यह नही शोचते कि हम किस के हवाले होयंगे और किस गति को नायंगे ॥ १३॥ और इस शत्रुको हम भार डालेगे औ इसको मार लिया है और हम जो चाहै सो करे हम कत्ती और हम भोगी है हम सिद्ध है जो कुछ करनाथा कर चुके हैं हम बलवान हम सुखी है इन सब बातों का स्मरण तो क्षण भर भी नही भूलते पर काल बलवान की सुध को तो एक बार्गी ही भूल गये है कि वह क्या करेगा ॥ १४ ॥ और हमधनी हैं हम अभिजनवान् अर्थात् कुलीन तथा यन्नदान आदि जो कभी किया तो समझते हैं कि हमारी वरावर और किसीने नही किया लोगो में हम कभी प्रतिष्ठा पावेगे अर्थात् प्रशंसा होगी और जोकोई हमारी स्तुतिकरेगा उसको गम 4 पोडश अध्याय.। मोहिताः ॥ १५॥ अनेकचित्तविभान्तामोहजालसमारताः । प्रसता कामभोगेषु मन्तिनरकेशुधौ ॥ १६॥ आत्मसम्भावितास्तब्धाधनमानमदान्विताः । यजन्तेना मयब्रेस्तेदंभेनाविधिपूर्वकं ॥ १७ ॥ अहङ्कारंवलंदपंकामंत्रोधचसंश्रिताः। मा '-. - भाषा अनुवाद धन वस्ल आदि देयंगे और उसपर हमप्रसन्न होंयगे इस प्रकार के मनुष्य अज्ञान से विमोहित मिथ्या अभिनिवेशको प्राप्त कहे कठे मनोरथो मे ड्वे हुये है ॥१५॥ ऐसे मनुष्य जिस प्रकार का फल पावते है सो सुनो कि अनेक चित्त कहे मनकी लापों अमिलापों मे मत नोचित्त तिससे विक्षेप को प्राप्त ये लोग सोई साइ मोह मय जाल से घेरेइये अर्थात् सूतके जालसे व मत्स्य के समान वन्धे है और काम मोग मे आसक्त होके अशुविजोक्लेशयुक्त नरक तिसमै अापही से पड़ते हैं ॥१६॥ यत्न करिके औरों से इम बडी प्रतिष्ठा पावें ऐसे जो उनके मनोरथ जो पीछे। मंद्रहें श्लोक मे कहा है वह अभिलाप केवल दंभ अहंकार आदि प्रधान है सतोगुण प्रधान नहीं है इस अभिप्राय पर दो झोक से कहते है कि आम अपने मनसे सम्भावित कहे महात्मा बने है पर कोई साथ उनकी प्रविष्ठा नही करते है इसीसे वे शुष्क अर्थात् अनम खभाव कहे कठोरचित्त मनुष्य धनादि से जो मान औ अहङ्कार तिससे युक्त होके यन्नदान यादि का तो के वल नाम भाद्र ही है पर करते है इस वास्ते कि फलाना आटमी वडा पूजा करने वाला यौ दानी है ऐसे नाम प्रसिद्ध होय इस वासना से यज्ञ दान करते है वह यज्ञ दान करना कैसा है सो कहते है कि वे साली अपनी अपनी ख्याति लाम अर्थात् नाम के लिये शेड और कुछ श्रद्धा से नहीं करते है तो अविधि पूर्वक चज दान जैसे है यह भी तैसे ही निप्पल है यह जानो ॥१७॥ अव अविधि पूर्वकात्त्वको प्रकाश करते है कि अभ्यसूयक कहें निन्दा करनेवाले मनुष्ष अर्थात् मगवान कहते है कि मेरे प्रघके अवलम्बो पुरुपो के गुणो मे देोप लगाने द्वारे मनुष्य अहङ्कार यल औ प्रगल्भता जो ढीठापन तथा काम और क्रोध का बायय कर अर्थात् दश होय अपनी देह यो परको देह मे चेतन ज्ञानरूप से टिका जो मई सो सम्पूर्ण रूपमे मेरे प्रति द्रोहकारी यन्न आदिकर्म करते है परन्तु मारे 80 श्रीमद्भगवद्गीता। मात्मपरदेहेषुप्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥१८॥ तानईहिपत क्रूरान्संसारपुनराधमान् । क्षिमास्यजसमशुभानासुरीवेवयोनिपु॥१६॥ आसुरीयोनिमापन्नामूराजन्मनिअन्न नि। माममाप्यैवकौन्तेयततोयान्त्यधमांगति ॥२०॥ विविधनरकस्सेदवारनाशनमारमः नः । कामामोधस्तथालेभिस्तस्मादेतत्वयंत्यजेत् ॥२१॥ एतैर्विमुक्त कौन्तेयतमाद्वारे स्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनःयस्ततोयातिपरागतिं ॥२२॥ यःशास्त्रविधिमुत्सृज्य भाषा अनुवाद टम्मके यज्ञादिमे थाके विना अपनेको वृथा लेश देते हैं और पशु आदिकों को भी अविधिपूर्वक नाइक हिंसा करने से चैतन्य जीवका द्रोहमान ही फल उत्पन्न होय है और तो कुछ हाथलगता नहीं इसीसे ये मनुष्य मेरेसाथ द्रोह करनेवाले मेरे शत्नु तुल्य है इससे इन हत्यारों को जो फल मिलेगा वह तुम जानिलो ॥१८. और उनका आसुरी खभाव कमी नाता नहीं यह दो शोक से कहते हैं, कि हमसे देष करने वाले क्रूरखरूप नराधमोंको मै जन्म मृत्युकी मार्गखरूप संसार मे आसुरी कहे अति क्रूर व्याघ्र सर्प आदि दुष्ट योनि मे हमेसा फेंका करता इं अर्थात् उनको वही निषिद्ध योनि मिला करती है' ॥१८॥ और एव कहने से इस लोक मे यह कहा गया कि हे कौन्तेय अर्जुन बहुत सन्म आसुरी योनि मे प्राप्त जो मटजन उनको मेरी प्राप्ति की शङ्का कहां है यकि मेरी प्राप्तिकी उयाय जो सतमार्ग उसको मी न मायके असुरादि योनि से भी अधम जो कृमि कीटादि गति तिस दुर्गतिको वे जाते है ॥२०॥ पूर्व कहे हुये सर बासुरी दोपोयो मध्यमे सकल दोप के कारणखरूप जो तीनि दोप तिन को सदाही त्याग करना योग्य हैं सोइ कहते हैं कि काम मोघ औ लोभ ये तीन दोप नरक को हार सरूप हैं तो क्योन नीच योनि प्राप्ति कारक होंय इसी से मुमुक्षु कहे मुक्ति की इच्छा रखने वाले इन तीनो दोपोंको सवतरह से त्याग करें है ये अनर्थ के मूल है औ देखो कैसे दुख दाई है ॥ २१॥ अव इन तीन दोषों के त्याग करने मे विशेष फल कहते हैं कि हे कौन्तेय अर्जुन तम कहे नरक के हार रूप काम यादि तीन दोष से अच्छी तरह मुक्त पुरुप अपने कल्याण के साधन खरूप तप योग आदि आचरण करते है और तिस के अनन्तर मुक्ति पावते. H
सप्तदश अध्यायः।
१७६
वर्ततेकामचारतः। नसमिडिमवाप्नोतिनसुखंनपरांगति ॥ २३॥ तस्माच्छास्त्र
प्रमाणन्तेका-कार्यव्यवखितौ। ज्ञात्वाशास्त्रविधानोक्तंकीकतमिहाई सि ॥२४॥
इति देवासुरसहिभागयोगोनाम पोडपोऽध्यायः ॥ १६ ॥
VA
RA
भाषा अनुवाद
हैं ॥ २२॥ कामादि त्याग करना भी खधर्म याचरण के विना नहीं हो सके
यही कहते हैं कि शास्त्र औ विधि कहे वेद विहित धर्म त्याग करके वो
मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करते हैं वे सिद्धि कहे तत्व ज्ञान को
नहीं पावते हैं और उपशम अर्थात् मान्तिरूप सुख भी नहीं पाते और न
उत्तम गति जो मुक्ति तिसको पावते हैं॥२३॥ अव तात्पर्य कहते हैं कि यह कान
श्री यह अकाल इसकी व्यवस्था कहे निर्णय भे तुमको शास्त्र औ वेट स्मृति कहे
धर्म शास्त्र मुराण प्रमाण स्वरूप है इस से शास्त्र की विधिमे कहे जो की तिन्को
जानि कर इस कर्म अधिकारमे वर्तमान तुम अपने अधिकार के अनुरूप कर्म
करने को योग्य होउ जिस हेतु सत्य शुद्धि औ सय्यक ज्ञान औ मुक्ति के विषय
मे भी कर्मही मूल कहे कारण स्वरूप है॥२४॥ इति वीजगहाथ सनविर
चित मनभावनी भापारीकायां पोडश अध्याय ॥ १६ ॥
श्रीमद्भगवहीताः सप्तदंश अध्यायः। अर्जुन उवाच । - येशास्तविधिज्ययजन्तेयं यान्विताः । तेषांनिधातका साष्णसवमाहोरजस्तमः ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच । विविधाभवतिथदादेहिनां sir भापार अनुवाद तत्वज्ञान के अधिकारी होने मे जो सात्त्विकी श्रद्धा है सोई मुख्य कारण है पूर्व की कहा है इससे अव सत्र अध्यायमें भगवान श्रद्धा के तीनिभेद कहेंगे और जो सोरमें अध्याय मे यः शास्त्रविधिमुत्सृज्यवर्ततेकामचारतः इस तेईसवें श्लोक में कहा कि वेद शास्त्र की विधि छोड़ि अपनी इच्छा के अनुसार कर्म करनेवाले को, तत्वज्ञान नहीं होता है तो विधि त्याग करि श्रद्धा से कर्म में वर्तमान जनो को, तनवज्ञान का अधिकार है कि नहीं यही ज्ञान होने की इच्छा से अर्जुन कहते हैं कि जो मनुपा बेदशास्त्र की विधि को दुख समझकर अथवा बालस्य से त्याग करि के केवल लोकाचार के अनुसार श्रद्धायुक्त होय यज दान आदि कर्म करते है उसकी निष्ठा कहे स्थिति कैसी होती है इसी को पूछते है कि हे उष्ण उनकी नो देव पूजा अथयो यज्ञ आदि कर्म हैं सो सात्त्विक राजसी किंवा तामसी हैं जैसो तीन प्रकार की शङ्का होती हैं जो ये पूर्वोक्त कर्मकारी लोग सतोगुणों होयं तो सात्विक हे में तत्वज्ञान मे. उनका अधिकार हो सके है. और जो 'सतोगुणयुक्त न होय तो नहीं हो सकता है यह पूछने का तात्पर्य है ॥ ६ ॥ इस का उत्तर भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह जो वेदशास्त्र के क्रम मगवदर्चन करनेवालोंकी सात्विकी अदा एकही प्रकार की है पर हा लोकाचार अनुसार कर्म अनुष्ठान करनेवालोंकी जो श्रद्धा सोई सात्विकी राजसी नामसी में ++Karkshetradai सप्तदश अध्यायः। १८१ साखभावमा । सात्त्विकीराज़सीचैवतामसीचेतितांश्टणु ॥२॥ सत्वानुरूपासर्वस्य थहामवतिभारत । यडामयोऽयंपुरुपोयोयच्छ्रद्धःसएवसः ॥३॥ यजन्तेसात्त्विकादेया न्यक्षरक्षांसिराजसाः । प्रेतान्भूतगणांश्चान्येयजन्तेतामसाजनाः ॥ ४ ॥ अशास्त्र भापा अनुवाद तीन प्रकार की होती है तिसका कारण यह है कि खभाव कहे पूर्व कर्म के संस्कारवयते उत्पन्न जो अद्धा उसको खभावजा कहते है इससे खभाव को अन्यथा करने मे निश्चित समर्थ जो शास्त्रोक्त विवेकज्ञान सो लोकाचार कर्म करनेवालों को नहीं है इसमे शुद्ध पूर्व खभाव के क्रमसे उत्पन्न नो थहा सो तीन प्रकार की होती है सो तीन भेद हम से सुनो परन्तु भगवत अर्चन विषयक सात्विकी अदा जो एकही प्रकार है सो भी व्यवसायात्मिकावुद्धिरे केह कुरुनन्दन इस दूसरे अध्याय के एकतालीशये शोक मे कही गई है यह बानो ॥२॥ पूर्वपक्ष करते है कि हां थहा सात्विकी है क्योंकि थीभगवानने एकादशस्कन्धके पचीशये अध्याय के द्वितीय लोक से सल कार्यरूम ही भगवान उद्दर के प्रति निर्देश किया अयीत् दिखाया है कि शम दम तितिक्षा जान तप सत्य दया स्मृति तष्टि त्याग अनिच्छा यक्षा लज्जा अौ आत्मनिवृति कहे अात्मसुख ये सव वृत्तो सतोगुण ही की है इस से यहा तीन प्रकार की कैसे कहते है नो ऐसा कहो तो सुनो कि ज्ञा सत्य कहते हो पर तथापि रजोगुग ौ तमोगुण के संयोग से सत्वगुण की तीन प्रकारता हेढक सात्विक अवा भी नो तीन प्रकार होती है सोई कहते है कि जो पूर्व सात्विक खभाव घा सो उसके संस्कार से फेर भी सात्विक सहायुक्त होता है और जोरशोगुरा प्रकार णणे रजोगुण खभाव होता और तमोगुण वालों की तमोगुणी थदा होती अर्थात् तामसयुत्ता होता है इस कारण लोकाचार कर्म कारी ऐसे सात्विक रानस तामस वरूप तीन प्रकार यहाका निर्देशमान कहे देखाया है परन्तु जो लोग शान्यज्ञान से प्रगट विवेकज्ञान से युक्त है तिनका समाव सर्बोनन होने के बारले एकही प्रकारको यदा होती है.इतना ही इस प्रस रण का तात्पर्य है ॥३॥ सोलिमा बाटि जो गुणभेद उसीको कार्य भेदसे विस्तार करमाने कि सात्विक खभावके जन सन्वशति लोग देवनोंको मुनते है ऐसे -- १८२ श्रीमद्भगवद्गीता। विहितधोरंतप्यन्तेयेतपोजनाः। दम्भाहकारसंयुक्ता:कामरागवलान्विताः ॥ ५॥ कर्पयन्तःशरीरस्थंभूतग्राममचेतसः। माञ्चैवान्तःशरीरखंतान्विद्यासुरनिश्चयान् ६॥ आहारस्वपिसर्वसविविधोभवतिप्रियः । यजस्तपस्तपादानंतेषांभेदमिम ।। श्टणु ॥ ७॥ आयु सत्त्ववलारोग्य सुखप्रीतिविवईनाः। रस्साःस्निग्धाःस्थिराह भापा अनुवाद हीराजसखभाव रजः प्रकृति देवता यक्ष राक्षसादिकों को पूजते औ तामसी तम गुणी भूतमेतों को पूजते हैं ॥४॥ और रानस तामस के मध्य मे भी जो विशेष सो फेर दोसोकसे कहते हैं कि शास्त्र को विना जाने भी पूर्व संस्कार बल से कोई कोइ उत्तम पुरुष सात्विक स्वभाव होते हैं कोई मध्यम जन रागस खभाव होते और कोई अधम लोग तामस स्वभाव होते हैं और जो अत्यन्त मन्दभाग्य लोग अन्धपरम्परा मे पापण्डियों के सङ्ग से पापण्ड आचार के अनुवर्ती होके शास्त्र विधान से भिन्न लोक मयङ्कररूप तपस्या करते हैं तिनके विषय मे हेतु खरूम दन्म नौ अहङ्कार से संयुक्त तथा काम कहे अभिलाप औ राग कहे अभिलषित लस्तु मे चित्तरञ्जन के अनुरूप नो अधिक श्राशक्ति और बल कहे विषयों का अाग्रह इस सब से युक्त होके। इस झोकका अर्थ दूसरे लोक के साथ पूरा होता ह॥ ५॥ शरीरस्य कहे शरीर के कारणरूप देह मे वर्तमान जो प्रथिवी अप तेज वायु याफारा पंच भूत तिनको वृथा उपास करने से दुर्वल करके नौ अन्त यामीरूप देहके वीच टिके हुये मेरे को भी लवन कर दुखदाइ होय जो अपि वेकी लोग तपस्या करते हैं तिनको आसुर निश्चय कहे अति क्रूरथुद्धि जानो तात्पर्य यह कि मेरी अान्ना नवन करना ही मुझे दुर देना हैं॥६॥ और पाहा, रादि भेद से भी सात्विकादि गुण देखावने के मनोरथ से इस लोक से लेकर बयोटश लोक पर्यन्त कहते है कि सकल मनुष्यों का आहार यो अन्न आदि मी यथायोग्य तीन प्रकार से मिय लगता है और यज्ञ तपस्या तथा दान आदि भी तीन प्रकार के होते है.सो सव भेद सुनो कि राजस तामस माहारो यन दानादि परित्याग करके सतोगुण की वृद्धि के निमित्त सात्त्विक आहार ौ यज धादि के विषय मे जो यत्न करना कर्तव्य है यह :भगवान कहते हैं ॥ ७॥ अब पूर्वोत्र सप्तदश अध्यायः॥ द्याचाहारा सात्त्विकप्रियाः १.८॥ कटम्बलवरात्युप्पातीक्ष्णरुचविदाहिनः । या हाराराजसस्थेष्टादुःसयोकामयप्रदाः ॥६॥ यातयाभंगतरसंपूतिपयुपितञ्चयत् । उच्छिष्टमपिचर्चामेध्यं भोजनंतामसप्रियं ॥ १०॥ अफलायातिभिर्यनोविधिदिटोयद क्यते। यष्टव्यमेवेतिमन:समाधायससाविकः॥ ११॥ भिसन्धायतफलंदार्थ - भाषा अनुवाद भाविकादि श्राहार के तीन प्रकार भेद तीन लोक से कहते हैं कि आयु कहे जीवन सत्य कहे उत्साह वल कहे शक्ति औ धारोग्य औ मुख कहे चित्त की प्रस नता मोति कहे अभिरुचि इस से यह पाया कि आयु सत्य आदि के बढावनेवाले और रस्य कहे रसयुक्त और स्निग्ध कहे चिकने तयुक्ता श्री स्थिर कहे रसांशके द्वारा चिरकाल देह मे रहनेवाले और हृद्य कहे देखतेमाय भोजन की इच्छाहोय ऐसे सुन्दर स्वरूप आहार भक्ष्य भोज्य आदि सात्त्विकरूम सात्त्विक खभाव पुरुष' को प्रिय होते है ॥८॥ और अति कठु नींव आदि औ अति यन्त श्री अति लवण औ अति उष्ण कहे गरम ौ अति तीक्षण भरिचादि औ अति रूक्ष औ अति उग्र सरसो आदि ये सब राजस खभाव मनुपा को प्रिय होते है परन्तु ये सब वस्तु दुख कहे भोजन समय मे हृदय को सन्ताप आदि और शोक कहे भोजन के अनन्तर अप्रसन्नता और भाभय कहे रोग ये सब खानेवाले को देते हैं क्यों कि ये सब दुख शोकमय है ॥६॥ . और नो अन्न यातयाम कहे जिसको एक पहर बीत गया और ठंडा हो गया और गतरस कहे जिसका रस सूख गया सीठीसा रह गया यौ पूति कहे दुर्गन्धयुक्त जो है और पर्जुपिन कहे वासी अन्न धौ उच्छिष्ट कहे दूसरे का जूठा और अमेध्य कहे अपवित्र अभक्ष्य मांस आदि ऐसे आहार नामस खभाव मनुस्यों को प्रिय लगते हैं ॥१०॥ और यन भी तीन प्रकार की है तिनके बीच मे सात्त्विक नो यन्न सो तीन लोक से कहते हैं कि जो पुरुष फल की आकांक्षा रहित अवश्य कर्तव्य है यह जानि यज्ञ करते सो यन्न सात्विक कहा वती है, और वे मनुश्य किस कारण से यज्ञ अनुष्ठान करते इस पर कहते है कि यनकर्म करनाही चाहिये औरकोई फलके अर्थ कर्तव्य नहीं है ऐसा विचारि मन को एकाग्र करके यज्ञकरते हैं ॥११॥ राजस यज्ञकहते हैं कि हे भरतयेष्ठ अर्जुन १८४ थीमद्भगवद्गीता। मपिचैवयत् । इज्यतेभरतश्रेष्ठतं यनविद्धिराजसं ॥ १२ ॥ विधिहीनमसृष्टानमन हीनमक्षिणं । 'यहाविरहितंयचंतामसंपरिचक्षते ॥ १३ ॥ देवद्विजगुरु प्रान पूजनं शौचमाजवं । ब्रह्मचर्यमहिंसाचशारीरंतमउच्यते ॥ १४ ॥ अनुगकरवा क्य सत्यप्रियहितञ्चयत्। खाध्यायायसनंचैववाङ्मयंतपउच्यते॥१५॥ मनाम सांदसौम्यत्वमौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपोमानसमुच्यते ॥ १६॥ यदयोपरयातप्तंतपस्तत्रिविधनरः। अफलाकांचिभिर्युक्त सात्त्विकंपरिचचते ॥१७॥ भाषा अनुवाद फलको कामनापूर्वक अपने महत्वको जनावने के अर्थजो यनकी ईजाय सो यज जानो ॥१२॥ अव तामस यज्ञ कहते है कि विधि हीन यौ असृष्टान्न को सो यज के अर्थ अन्न प्राह्मण क्षत्रिय वैश्य से नहीं मिला होय सो अन्न औ मन्त्र हीन औ दक्षिणा दान रहित होय तथा थहा पर्मित को हुई यन्त्र को तामस यन कहते हैं ॥ १३॥ तपस्या भी सात्त्विकादि भेद देखावने के मानस में प्रथम परीरादि के भेद क्रम से, विविध है सो तीन लोक से कहते हैं कि मान कहें गुरुजन से भिन्न और और तत्त्वज्ञानी औं बाह्मण तथा गुरुजन की पना और शौच चादि क्रिया इन सब को शिष्ट पुरुष शरीर सम्पादित तपस्या कहते हैं ॥१४ और वचन सम्बन्धी तपस्या कहते हैं कि कोई मनुष्य जिनसे भय न होय ऐसे अनुग. कर वचन और सत्य तथा थोता को मिय लगें और परिणाम कहे यंत फो सुखदाई और वेद अभ्यास करनेवाले वचनों को भी वाक्य तपस्या कहते हैं ॥ १५॥ अव मानसिक तपस्या कहते हैं कि भन. की निर्मलता और सौम्यत्व कहे अक्रूरता और मौन काहे मुनिधर्म जो मनन करना यात्म.विनिग्रा कहे विष पोंमे इन्द्रियोंको निग्रह जो रोकना और भावसंशुद्धि कहे व्यवहारमे निष्कपट रहना ये सब मानसिक तपस्याखरूप कहेनाते हैं ॥ १६ ॥शरीर वचन मनके द्वारा तीन प्रकार. तपसा देखाया सोई तीन प्रकार तप को सालिकादि गुम भेद में भी तीन प्रकार है, सो तीन झोक से करते है कि जो उत्कृष्ट थहा में फल कामनारक्षित यौ एकाग्रचित्त होय मनुष्य लोग.विविध प्रकार कर्म करते तिनको परिहत लोग सात्विक कहते हैं । १७ । रानस कहते हैं कि जो सत्कार सप्तदश अध्यायः। १८५. सत्कारमानपूजार्थ तपोदम्भेनचैक्यत् । क्रियतेतदिइयोनाराजसंचलमधुवं ॥१८॥ मदग्राहेणात्मनोयत्पीडयाक्रियतेतपः। परस्योत्सादनार्थवांतत्तामसमुदाहृवं ॥ १८॥ दातव्यमितियहानंदीयतेऽनुपकारिणे । देशेकाले चपावेचतदानंसायिक मानं ॥२०॥ यत्तुमन्युमकारार्थफलमुद्दिश्ययापुनः। दीयतेचपरितिष्टतदानराज संस्मृतं ॥२९॥ अदेशकालेयदानमपावेभ्यश्चदीयते । असत्कृतमवन्नातंतत्तामसमु . - भाषा अनुवाद अर्थात् यह पुरुष साधु औ यह तपखी ऐसे प्रतिष्ठावचनो मे जो पूजा यौ मान कहे उन को देख उठ खड़े होना औ प्रणाम करना आदि जो दैहिक पूजा और पूना कहे अर्थ लामादि इन सब के निमित्त श्री अपने महत्व के प्रकाश के अर्थको की नाय अथवा जो अनित्य और क्षणिक रूप है उसी को इस लोक मे शिष्ट लोग राजस कहते हैं ॥ १८॥ तामस तपस्या कहते हैं कि अविवेक से कुचष्टा कर भरीर को लोश देय किम्बा और किसीके विनाश था दुख के अर्थ अभिचार खरूंम् को तपस्या तिसको मरिहतजन तामस तपस्या कहते हैं ॥ १६ ॥ पर्व कथित अङ्गी कत दान के विषय मे भी सात्विकादि तीन प्रकार कहते हैं कि दान करना ही चाहिये ऐसी निश्चय से जो दान और उस से प्रत्युपकार न होय अर्थात् अपना उपकार न चाहै न वह पुरुष उपकारके जोग्यहोय निसको दानदेय और कुरुक्षेत्र काशी प्रयाग तीर्थ स्थान से तथा ग्रहण संक्रान्ति पर्व आदिक में और वेद शास्त्रयुक्त ब्राह्मणों को अथवा यह मान सकल आप दो मे दाता की रक्षा करै एवंभूत पाता कहे पात्र को जो दान दिया जाय उसी को पण्डित जन सात्विक दान कहते हैं ॥ २०॥ राजस दान कहते हैं कि ममय के अनुसार यह मेरा प्रत्युपकार करेगा इस हेतु से अथवा वर्ग फलभोग के अर्थ चित्तक्लेशयुक्त देते समय कष्ट होय अर्थातऐसा जो दान तिसको शिष्टलोग राजस कहते हैं ॥२१॥ अब तामस दान करते हैं कि अदेश क हे अपवित्र स्थान में अकाल कहे अथौ पादि समय मे और अमात्र कहे. चोर लवार नाचने नकल करनेवालों को जो दोन अथवा देश काल विद्यावान के रहते भी असन्त कहे पाद प्रछालन चादि सत्कार रहित यथया अनादर से नो दान सुपाव को भी दिया गाय तिस.
antar १८६ श्रीमद्भगवद्गीता। दाहृतं ॥२२ ओतत्मदितिनिर्देशोवह्मणस्त्रिविधःस्माः । जाह्मणासनवेदाचव जाञ्चविहिता पुरा ॥२३॥ तस्मादोमित्युदाहृत्यय दानतपःक्रिया.। प्रवर्तन्ते विधानोला.सततबहावादिना ॥२४॥ तदित्यन भिसन्धावफलंयनतम क्रियाः। दा भाषा अनुवाद को शिष्ट लोग तामस दान कहते है॥२२॥ जो कहो कि ऐसा विचार करने से प्राय सव यन्न ौ तपस्या तथा दान आदि रानस ौ तामस मात्र ही होते है इस कारण यन्न श्रादि कर्म मे यत्न करना था है इस शङ्का पर पूर्वोक्त यन्न दान अादि वहुधा राजस तामस होने से भी सात्त्विकत्व प्रतिपादन की उपाय देखाय कर कहते है कि ओं तत् सत् ये जो तीन शब्द सो परमात्मा के नाम के अनुरूप निर्दिष्ट है इन के मध्य मे अकार उकार ौ मकार का स्वरूप जो ओंकार सो ब्रह्म है यह श्रुतियो मे प्रसिद्ध है सो ओं शब्द ब्रह्म ही का नाम है और जगत्कारण हेतु से ज्ञानियों को अपरोक्ष है तत् भी बन और परमार्थ श्री विद्यमानत्व औ साधुत्व औ प्रसस्तत्वादि प्रयुक्त और हे सौम्म इस जगत की सृष्टि के पूर्व सत्खरूप मे था ऐसे युतियों के कहने से सत् शब्द भी ब्रह्मही का नाम है और यह विविध नाम कहने से निको भी उत्कृष्ट करने को नाम समर्थ है इस अभिप्राय से प्रत्तंशा करते है कि विधाता ने सृष्टिके प्रथम इस परमात्मा के लिविध नाम का उद्देश कर के बाहर धौ वेद औ यजका निर्माण किया अघया जो परमात्मा का यह तीन प्रकार निर्देश है सोई परमात्मा माह्मण अति पवित्र को सृष्ट किया इससे बों तत् सत् यह वाहना अति प्रसस्त कहे उत्तम है ॥ २३॥ अव ओंकारादि शब्दों को मसलता देखायने के मनोरथ से रोकार का प्रसस्तत्व कहते है कि जिस हेव परमात्मा का निर्देश इसी रूम से प्रसस्त है इस से श्री मात्र उच्चारण पूर्वक वेदादि बात यज्ञ दान यौ तपस्या आदि शास्त्रोक्त क्रिया सकल यथावत् संपर्ण न होने से अर्थात् हीन होने से भी अच्छी तरह गुण संपन्न सर्वात पूर्ण होती है ॥२४॥ दुसरे नाम को प्रतथा करते है इस पल मे पूर्वोक्त ओं शब्द के साथ तत्पद का सम्बन्ध है राद्ध वित्त मुमुक्षु पुरुषो की अकृत फल रूप कामना ब रूम यन आदि क्रिया ने पोडश अध्याय.। १८७ . नक्रियानिविधा क्रियन्तेमोनकांक्षिभिः ॥२५॥ सद्भावेसाधुमावेचसदित्येतत्प्रयुज्य ते । प्रसस्तेकर्मणितथासच्छब्दमार्थयुज्यते ॥२६॥. यजेतपसिदानेचस्थिति सदिति चोच्यते। कर्मचैववर्थीयंसदित्येवाभिधीयते॥२७॥ अथवयाहुदत्तंतमस्तकत वयत् । असदित्युच्यतेपार्थनचतत्प्रेत्यनोइह ॥२८॥ इति सप्तदशोध्यायः ॥१७॥ भापा अनुवाद ॥ तत् शब्द उच्चारण पूर्वक की जाती हैं इसी से चित्तशुद्धि के द्वारा फल सङ्कल्प त्याग पूर्वक मुमुक्षुत्व हेतु से तत् शब्द का निर्देश करना भी प्रसस्त है ॥ २५ ॥ सत् शब्द प्रसस्त है यह दो श्लोक से कहते है कि सत् भाव कहे अस्तित्व और साधुभाव कहे साधुत्व इन दोनो अर्थ को मत् शब्द कहता है और हे अर्जुन प्रसस्त कहे मागलिक विवाहादि कर्म मे भी यह सत् कर्म इन विषयों मे सत् शब्द का प्रयोग योग्य है और मनलादि अर्थ को भी कहता है ॥ २६॥ और यज तम दान मे जो स्थिति कहे इन का तात्पर्य जानि कर अवस्थान है उसको भी विद्वान जन सत् कहते है श्री परमात्मा के अर्थ अथवा यन्त्र तम दान के अर्थ लो कर्म किये जायें वे भी सत् कहे जाते है जो ये यन्त्र दान तम आदि का परमात्मा की सेवा के अर्थ जो कर्म सब असात्विक किम्बा विगुण अङ्गहीन भी होयं पर यापूर्वक किये होंय और ब्रह्मा के नाम जो ओं तत् सत् इनसे युक्त किये शोर्य तो सगुण सात्विक होते है॥ २७॥ अव मनुपा श्रद्धा पूर्वक कर्म मे प्रहा होय इस लिये अश्रद्धा कृत कर्म की निन्दा करते है कि अयहा से होम तम दान यौ पूजा आदि कर्म जो किये जाते है उनको ज्ञानी श्रौशिष्ट कहे भलेलोग असत् 'मान कहते हैं क्यो कि अङ्ग विकल होने से इन कर्मों का फल परलोक मे भी नहीं होता है और अयश करनेवाले हैं इस से इह लोक में भी कुछ फल नहीं है तो शरीर का सोश औ धन की सरावी करने से भी क्या फल है अयश् तो न करके भी करके भी मिले होगा जो इस फल की इच्छा होय तो ॥२८॥ इति जगन्नाथ मुकुल विरचित मनभावनी टीकायां सप्तदशोध्याय ॥१७॥ ॥
श्रीमद्भगवद्गीता अष्टादश अध्यायः .. अर्जुन उवाच। 'संन्यासयमहावाहोतयमिच्छामिवेदित। त्यांगपंचहीकेयष्ट rinn भाषा अनुवाद 'अव प्रथम समग्र अष्टादश अध्याय का तात्पर्य: संक्षेप से श्रीधर खामी करते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण ने समग्र गीताशास्त्र का जो संग्रह अर्थः सोई परमार्थ है. यह निर्णय, करने के अर्थ अठार अध्याय मे संन्यास औ त्याग भिन्न भिन्न करके स्पष्ट रूप से कहा है और सर्व कर्माणि मनसा, संन्यस्यास्ते सुख भी यह ५.. अध्याय का १३ लोक औ शुभाशुभ फलैरेवं मोक्ष्य से कर्मबन्धनैः संन्यास योगयुक्तरमा पिमुलोमामुपैयसि यह अध्याय का २८ श्लोक औं त्यत्वाकर्मफला संगनिन्यस्तोनिराययः यह ४ अध्याय का ३० लोक औ सर्वकर्मफलत्याग ततः अरुयतात्मवान् यह १२. अध्याय का ११ लोक इन सब झोकों से और और अध्याय मे भी तीन तौन लोकों से फल. मात्र त्याग करके निष्काम समस्त कर्म, करने का उपदेश दिया है परन्तु परम करुणामय सर्वज जो भगवान श्रीकृष्ण सो परस्पर विरुद्ध वचन कभी भी उपदेश न करेंगे.इसी से कर्मों के त्यागकरने के विषयमै जिस प्रकार से विरोध न पडे सोई जानने की इच्छा करि अर्जुन कहते है कि हे हृषीकेश अर्थात् इन्द्रियों के नियामक प्रवर्तक- और है केगिनिषूदन केशी नाम दैत्य बजलीला के समय अव रुस धरके या तो भगवान उसके, मुंख मे अपना हाथ डाल ककरी के समान चोर, डाल के डाल दियाथा सोई कहा कि हे महावाहो श्रीकृष्ण संन्यास औ 'त्याग शब्द का तल अर्थ मै भित भिन्न करके जाना चहं हौं सो दया करके मुझसे कहिये ॥१॥ इस अर्जुन की पत्र अष्टादश अध्यायः । १८८ थक् केशिनिसूदन ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच। काग्यानांफर्मणान्यासंसंन्यासंकयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागंप्रात्याविचक्षणाः ॥२॥ त्याज्यं दोपवदित्वे केकर्ममार्म phone . भाषा अनुवाद के उत्तर में भगवान कहते है कि देखो पुत्त्र की कामना करि के पुवष्टि यज्ञ कर और खर्ग की कामना करि अश्वमेध यज करै तथा और और कामना करि जो जो कर्म विहित है ऐसे जो कायकर्म तिन सय के परित्याग करने को ही पण्डित लोग संन्यास जानते है अर्थात् फाल सहित सकल कर्म के त्याग को संन्यास ज्ञान करते है और जितने कम अकर्म कहे कुसित कर्म औ नित्य नैमित्तिक कर्मो के फलमात्र त्याग को विचक्षण कहे निपुण लोग त्याग कहते है पर विचार मे तो कर्म त्याग करनेको तो त्याग नहीं करते है फल त्याग बलु त्याग हो सकै है क्यों कि बहुतेरे कर्म ऐसे है कि जिनका शरीर रहते त्याग नहीं हो सकता है तो शास्त्रोक्त कर्म नित्यनैमित्तिक उमासना अादि जिन से बुद्धि की शुद्धि औ ज्ञान की योग्यता होती उनका त्याग लोकविरुद संसार व्यवस्था मे अनुचित है परन्तु जिसको तत्व ज्ञान नहीं भया है उसको कर्मफल के त्याग करने ही को त्याग नानो यौर निसको तत्वज्ञान है उसीको समन्त कर्म का संन्यास हो सके है और उचित भी है यह भगवानने अर्जुनसे कहा ॥२॥ मतान्तर कहे अन्यमतको निषेध करते हुये उक्त विषय को दृढ करने की इच्छा से मतभेद देखाते है कि हिंसादि कर्म दोपयुक्त औ अनर्थहेत से बन्धस्वरूप है इस लिये सब कर्म का त्याग करना उचित यह सांख्य मतवाले विवेकी लोग मामि स्यात्सर्वभूतानि इस वचन से कहते है और अग्नीपोमीयं पशुमालमेत् इस श्रुति में अनिष्टोम यज्ञ मे पशुहिंसा को वन क्रिया का अनावधान किया है और सकल कर्मों के करने में जीवहिंसा ज्ञान अज्ञानपूर्वक होती है इसमे कर्ममाव का त्याग कहा है और कर्मकाण्डी मीमासा मतवाले अग्नीपोमीयं पशुमालभेत् इस विधि केवलसे कहते है कि यज्ञकर्ममे हिंसा हिंसा नही है करनी चाहिये और यन छोडकर हिंसा करने से पुरुष को पाप होता है इस अभि प्राय पर भगवान कहते है कि कोई बुद्धिमान तो कहते कि दोपवत कहे दोपयुक्त L १६० श्रीमद्भगवद्गीता। नीपिणः । यजदानतप.कर्मनत्याज्यमितिचापरे ॥३॥ निश्चयंट एमेतवत्यागेभर तसत्तम। त्यागोहिपुरुषव्या विविध संप्रकीर्तित ॥४॥ ज्यं कार्य मेवतत्। यजदानंतपञ्चैवपावनानिमनीपिणं ॥५॥ एतान्यपितुकर्माणि संगत्य क्वापालानिच। कर्तव्यानीतिमेपार्थनिश्चितंमतमुत्तमं ॥ ६॥ नियतसतसं यन्नदानतम कर्मनत्या JA 1 भापा अनुवाद कर्मत्याग करना चाहिये और कोई यज्ञ दान तम कर्मका त्याग नही कहते हैं क्यो कि विधिकृत हिंसा से दोप नही होता है परन्तु अहिंसातो परम धर्म है ॥३॥ इन प्रकार से अन्य मत कहि कर घर अपने मत कहने की इच्छा से भगवान कहते है कि हे भरतसम्भव भरतवंशी अर्जुन इस पूर्वोक्त परस्परविरुद्ध मत के विषय मे निश्चयरूप जो मेरे वचन सो सुनो और त्याग की लोकमे प्रमिह है तो उसके विषयमे और क्या सुनेगे ऐसा अनादर न करना यहीकहते हैं कि हे पुरुष व्याघ्र कहे पुरुपयेष्ठ अर्जुन त्याग पदार्थ वडा कठिन दुर्बोध है जिसहेतु इसकाम्य कर्मका त्याग तत्वदर्शी लोगों ने अच्छीतरह से विचार करके तामसञ्चादि भेद से विविध कहे तीन प्रकार का कहा है सो त्यागविषयक तीन प्रकार इसी अध्यायके इस सतये लोक से कहेगे कि नियतसतसंन्यास इति ॥४॥ अव प्रथमअपने निश्चित वचनको दो श्लोकमे कहतेहै कि यजटान नौ तपरूपकर्मत्याग करनेके योग नहीं है वरन अवश्यहो कर्तव्य है क्योकि ये बन्न दान तप पूजन आदि सत्कर्म विवेकी पुरुषों यो पावन करते हैं अर्थात् चित्त के शुद्धि कारनेवाले है॥५॥ जिस प्रकार से किये गिये हुये ये कर्म विवेसी जनोके चत्त को शुद्ध करते है सोई प्रकार से इन कर्मोका अनुहार देखावते ये कहते है कि हे पार्थ अर्जुन सा काले कर्ट नाभिनिवेश अर्यात् हम कर्ता इस कर्म को मारते है इस अहंकार को छोडकर केवल ईश्वर के आधीन रूप से कर्म का अनुहान करना उचित है और कामना को मी त्याग कर के जो कर्मका करना है यही हमारा निश्चित अभितम सिद्धान्त है इसी से बह कर्म उत्तम है यह भगवानने अर्जुन से कहा है। अब इस लोकसे देखावते है नि सकाल काम्यदार्मोको कन्नकत्व है अर्थात् कामना करि किये हुये कर्म बन्धन करते है इस हेतु गे उनका त्याग करना ही कर्तव्य में पाल की अष्टादश अध्यायः । .. न्यास कर्मणोनोममद्यते। मोहात्तस्यपरित्यागस्तामसापरिकीर्तितः ॥ ७॥ मित्ये वयत्कर्मकायल भयात्यजेत् । सात्वाराजसंत्यागंनैवत्यागफलं लभेत् ॥ ८॥ कार्यमित्येवयत्कर्मनियतंक्रियतेऽर्जुन । सहंत्यत्वाफलज्जैवसत्यागःसात्तिकोमतः ॥६॥ नहेयकुशलकमकुथलेनानुपनते । त्यागसत्त्वसमाविष्टोमेधावच्छिन्नसंशयः ॥१०॥ भाषा अनुवाद परन्तु नियतकहे नित्य कर्मोका त्यागकरना योग्यनहींहै क्योंकिनित्यकर्म सत्वगुद्धि केद्वारा मोजके साधनखरूपाहै इससे यद्यपि कर्मका परित्याग करना ठीक है तो भी नित्यकर्म का स्वाग मोह मावहीसे होता अर्थात् तामस है क्यों कि मोह तमो गुण से होता है इस से उस त्याग को शिष्ट लोगों ने तामस ही कहा है॥७॥ राजस त्यागको कहते हैं कि जो मनुष्य यात्मज्ञान के विना केवल कर्म करना दुस "भान है यह विचारि के और शरीर के लोय के भय से नित्यकर्मको त्याग करता है सो त्याग राजस है क्यों कि दुःख रजोगुण का धर्म है इसी से राजस त्याग कारी रजो गुणी पुरुप को जानमे निष्ठा जो त्याग का फल सो कभू भी नहीं है॥८॥ अव सायिकरूप त्याग कहते हैं कि हे अर्जुन कर्म सव. कर्तव्य है ऐसे विचार से नियत कहे अवग्य कर्तव्य रूप विहित कर्मों को कार्टत्व अनि निवेश कहे अहंदि यो फल की कामना रहित जो त्याग करना सो सालिस त्याग है॥६॥ एवम्भूत सात्विक त्याग मे प्रकृष्ट निष्ठायुक्त पुरुष के लक्षण कहते है कि सतोगुण मे सात्विकत्यागी पुरुष अकुशल कहे दुखदायी अधीत् 'शिशिर कहे जाडे मे मातःस्नान आदि कर्म से हेप नहीं करते और ऊशन को ग्रीन काल के मध्यान स्नान दानादि कर्मा में प्रीति नहीं रखते है इसका कारण यह है कि वे लोग खिर बुद्धि, अर्थात् विवेक से अन्यकृत पराभय अनादर आदि महा दुसु भी महते है और स्वर्गादि सुख को भी त्याग करते है फोर जो क्षणिक कहे क्षण माब रहनेवाला है यह निश्चय जानते है। औजिस का दैहिक सुख दुख के अहरा औ त्याग की इच्छा रूप भो निया ज्ञान सो जिसका नष्ट हो गया है वही छिन्न संशय को कहो कि पूर्वोक्त कर्मों के फल त्यागसे कर्मों ही का त्याग करना ही श्रेष्ठ क्यों -- - - - D पुरुप , १८२ थीससगबगीता। महिदेहमताशरत्यक्त कर्मोण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागीसत्यागीत्यभिधीयते॥१॥ अनिष्टमिष्टमिथञ्चविविधकर्मणःफलं । भवत्यत्यागिनांप्रेत्यनतुसंन्यासिनांकचित्॥१२॥ पञ्चेमानिमहावाहोकारणानिनिवोधमे सोख्यकतान्प्रोक्तानिसिइयेसर्वकर्मणा १३॥ भापा अनुवाद न होय जिस हेतु विक्षेप करनेवाले कर्म दूर होने से अविक्षेप क्रम से ज्ञाननिहा रूप नो मुख सो सम्पन्न होयगा इस पर कहते है कि देह अभिमानयुक्त मनुष्य तावत् सर्व कर्मों का सम्पूर्ण त्याग नहीं कर सकते है इस मे प्रमाण तीसरे अध्याय के पञ्चयें श्लोक आदि से कहा है कि न कश्चित् क्षणमपिनावतिष्ठत्यकर्म' कृत् इति इससे जो सकल कर्म का अनुष्ठान करके भी फलमे त्यागो है वेई पुरुष प्रधान त्यागी है ॥ ११॥ अव पूर्वोक्त त्यागका फल कहते है कि अनिष्ट कहे नरक औ इष्ट कहे देवत्व तथा मिथ कहे मनुष्यत्व येई पाप पुण्य मिले हुये, फर्मों के फल है सो काम्य कर्म करने वालों को देहान्त होने पर प्राप्त होते है को कि सकाम मनुष्यों को पाप पुण्य नौ दोनोसे मिले हुये विविध कर्म सम्भव होते परन्तु ये कर्म संन्यासी पुरुष को किसी तरह सम्भव नहीं होते और संन्यासी इस प्रसङ्गमे कर्मफलका त्यागीही लिया जाता है यही प्रमाण सुनो कि अनाधित। धर्मफलं कायं कर्मकरोति य स संन्यासी च योगी च इति ६ अध्याय के प्रथम लोक से लेकर कहा है और कर्मफलंत्यागी पुरुपको सब जगह संन्यासी कहा इस से वह फल त्यागी सात्त्विक मनुष्य को पाप के असम्भव हेतु से और मैंगनत को अर्पण करने से पुण्यफलके भी त्याग होने से त्रिविध जो कर्मफल वे किसी प्रकार से भी नहीं होते है ॥ १२ ॥ जो कहो कि कर्मी पुराप को कर्मफल क्यों ने कोयंगे इस राष्ट्रपर सङ्गत्यागी विहान मनुष्यको जो कर्मवन्ध नही होते यह सिद्ध भरने की इच्छासे यहा से पांच सोको द्वारा कहते है कि हे महावाहो कौकी निमत्तिमे ये पांचकारण मेरे वचनमे तुम जानो और अपने कार्टवरूप अभिमान को निर्यात के अर्थ इन कारणो को अवश्य ही जानना चाहिये कि इस प्रकार पर मात्मा सम्यक् रूप से प्रसिद्ध अर्थात् ज्ञान का विषय होता है इस अर्थ का सूचन करनेवाला जो साख्य भावार्थ यह कि तत्वज्ञान मे प्रकार्शमान आत्मबोध ही को, -- -
अष्टादश अध्यायः।
अधिष्ठानंतथाकर्ताकररावष्टधन्विधं । विविधायष्टथकाचेष्टादैववैवावपञ्चमं ॥१४॥
शरीरवाङ्मनोभिर्यकर्मप्रारमतेनरः । न्याय्यवाविपरीतंबापञ्चैतेतस्थहेतवः ॥१५॥
तवैवसतिकारमात्मानं केवलन्तुयः । पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्नमपश्यतिदुर्मति ॥१६॥
भाषा अनुवाद
सांख्य कहते है और ऐसे कर्मों का अन्त कहे समाप्ति इसी मे है इस अर्थका
सूचक नो कृतान्त अर्थात् सांस्य कृतान्त कहे वेदान्त सिद्धान्त मे अथवा इसमे
सब तय गने गये है इस अर्थ का सूचक सांख्य और इस तरह से किया है अन्त
अर्थात् सकल निर्णय है इस मे इस अर्थ का सूचक नो कृतान्त पद इन दोनो
पदार्थ को सांख्य कहते है सोइ सांख्यने ये पांचो कारण अच्छी प्रकार से कहा
है इस से तम इसको सम्यक् प्रकार से जानो॥१३॥ सोई सर्वकर्म संपत्तिके
विषय मे कारण कहते है कि अधिठान कहे शरीर औ की कहे चित
यौ अड़ की गन्यि रूप अहङ्कार और भिन्न भिन्न अनेक प्रकार करण स्वरूम'
चक्षु अादि इन्ट्रीय और विविध कहे कार्य मे या खरूप से भिन्न भिन्न
चेष्टा अर्थात् प्राण अपानादि वायु के व्यापार समूह और अब कहे अधिष्ठान
शरीर आदि सव के मध्य मे पञ्चम वरूप दैव अन्तर्यामी सर्वनियन्ता अथवा
चक्षु आदि इन्द्रियों के अनुकूलकारी सूर्य आदि देवता जानो इहां चित्तका
अर्थ जान है ॥ १४॥ इही पांचों को सर्व कर्म मे कारणत्व कहते है।
कि इन्ही पांचो के कारण से प्रारम्भ किये जाते जो कर्म सकल विनको शरीरादि
मे अन्तर्गत कहे मानिके इस लोक मे कहा है कि जिस हेतु कर्ममाव नो भारी
रिक श्रौपाचनिक तथा मानसिक होते है यह प्रसिद्ध है औ झोक का अर्थ यह
है कि शरीर वचन औ मन के द्वारा सव मनुष्य जो कोई धर्म या अधर्म करते है
मोई सकल कर्मके कारण है येई अधिष्ठान कहे शरीर आदि पांच कर्मों के हेतु
तो इससे फेरि क्या होता है इस अपेक्षा पर कहते है कि उन कर्मों को
देत जो अधिष्ठानादि मांचमाव है और कोई हेतु नही है सो होनेसेमी शास्त्र औ
आचार्य के उपदेशसे नहीं गोधी गई बुद्धि इस कारणमे जो दुर्मति मनुष्य उपाध
रक्षित असरूम आत्माको कर्ताररूम देखते है इस से ये दुर्मति मनुष्य
हैं ॥१५॥
१.९४, श्रीमद्भगवझीता। यस्सनाकतोभावोवुद्दियस्यन लिप्यते। हत्वापिसमाल्लोकान्नहन्तिननिवध्यते १७ ज्ञानज्ञेयंपरिजाताविविधाकर्मचोदना। . करणंकर्मकतैतिविविध:कर्मसंग्रहः । , . भाषा अनुवाद दर्शी नहीं हैं॥१६॥. जिस को कर्य लेप नहीं है ऐसा सुमति कौन है इस अपेक्षा से कहते हैं कि मैने यह कर्म किया. और मै कर्ता हूं ऐसी वासना निस्के नहीं है अथवा शरीर यौ इन्द्रीमाव को कर्तृत्त्व देखने से अहंकार सभाव रूम कर्टव का भी लेश निसको नहीं. हैं इस हेतु से जिसकी बुद्धि, इष्टः अनिः विचार से सकल कर्म मे ,आसक्ता नहीं होती है ऐसा जो देहादि से मिन्न, सम आत्मादी पुरुप प्राणियों को लोक दृष्टि से हनन करके मी, सवी अभिन्न रूप आत्मदृष्टि हेतु से किसीका भी. हनन नहीं करता है और कर्मफल से विन्धको नहीं पावता है सन्वद्धि के द्वारा अपरोक्ष कहें प्रत्यन जान उत्पन्न हे तसे निष्काम कर्मके द्वारा उसको. वन्धनकी शङ्का और वाकी क्या है यह अध्यायः के १० लोक मे कह चुके हैं कि जो कर्म फल. की आयक्ति छोड़: भगवदर्पण पूर्वक कर्मका अनुष्ठान करते हैं ते मनुष्य जलके बीच वर्तमान ममत्र के समान पुण्य पाप समस्त कर्म से अलग रहते लिन नहीं होते. हैं.॥१७॥ - कर्म में अभिनिवेश जो इच्छा औ आशक्ति कहे तनमन से लगे रहना इन दोनो से रहित पुरुप हनन करके भी, हनन नहीं करते यौ बंधन को प्राप्त होते इस पूर्वोत वाक्यमाव के कहने के लिये कर्म की विधि है औ: कर्म. शेव: कहे कल्याण कर है और कर्मफल आदि सबको निगुणात्मकत्व हेतुः से गुणातीत जो अात्मा तिसको इस कर्मविधि आदिके साथ कुछ सम्बन्ध नहीं: है. इस कहने की अभिप्राय से कर्म विधि ौ कर्म य कहते हैं कि जान कहे यही.इष्ट का साधन है ऐसा जो वोध औ जेय या हे इष्ट के साधन खरूप जो कर्म और परिज्ञाता कहें ऐसे नानका प्राथय भूत जो मनुपा.यही विविध कर्मविधि कहे प्रेरणा है अर्थात् इसी प्रेरणा से लोग कर्म मे प्रत्त होते हैं लोकार्य यह है कि कर्मविषयक जो विधि सो उतारख्या विगुणात्मक ज्ञान आदि को अवलम्बन करके प्रत्त होती है यह दूसरे अध्यायके. ४५ श्लोक में कहा है कि - -- .
अष्टादश अध्यायः। १८५ १८॥ ज्ञानकर्मचक चविधैवगुणभेदतः। प्रोचतेगुणसंख्यानेयथावच्छृणुतान्यपि ॥ १८॥ सर्वभूतेषुयेनै कमावमव्ययमीक्ष्यते। अविभक्तविभक्तपुतज्ञानविचिसा विकं ॥२०॥ पृथक्वेनतुयज्ञानंनानाभावान्टथग्विधान् । वेत्तिसर्वेषुभूतेषुतना नंविहिरानसं ॥ २१॥ यत्तुकत्नवदेकस्मिन्कार्येसक्तमइतकं। अतत्यार्थवदलप भापा अनुवाद हे अर्जुन विगुणात्मक सकाम अधिकारीके सम्बन्धमे फल सम्बन्ध वेद मे कहा है और करण कहे साधन बो कर्मकहे कत्तीको अत्यन्त इच्छा की अधिक ईमे किया जाय नो व्यापार और कर्ता कहे कियाका करने हारा और सब कर्म सम्पूर्ण कुप से इसी मे गृहीत होते है इस वर्थ के सूचन करनेवाले पदको कर्मसंग्रर कहते हैं करण कर्म कर्त्तारूप तीन कारक ये क्रियाके आथय और सम्प्रदान प्रमादान यो अधिकरण ये तीन केवल परस्पर आक्रमण से क्रिया के प्रवर्तक हैं साचात् क्रियाके धाथय खरूप नहीं हैं इसीसे पूर्वोक्त तीन करणोको क्रेया के श्राश्रय खरूप कहा है॥ १८॥ अब क्रिया कारक भी फल को गुणात्मता से सत्व रन तम कृत विविध भेद कहा चाहते है इस अपेक्षा मर कहते हैं कि इसीमे गुण कार्य भेदसे सम्पूर्ण मतिपादन करके कहते हैं इस अर्थका चन करनेवाला संख्यान कहे सांख्य गाव तिस मे सासिक आदि गुणभेद क्रमसे था कार्य के द्वारा जान यो कर्म तथा कर्त्ता ये प्रत्यक विविध खरूम की ये हैं सोई मै यथावत् कहता हूं तिन को भी तुम श्रयण करो ॥१६॥ लोक से लेकर तीन लोक मे इस जानका सात्त्विक श्रादि भेद से तीन प्रकार कहते है कि ब्रह्मादि स्थावर पर्यन्त परस्पर भिन्न भिन्न सकल वस्तु मे प्राप्त एक निर्विकार खरूप अव्यय परमात्मतत्त्व का जिस ज्ञान से बालोचन किया लाय उस ज्ञानको साविक ज्ञान तुम जानो ॥२०॥ इस लोक मे राजस ज्ञान कहते है भूत' कहे देहधारीमाव मे नाना भाव अर्थात् सव की शरीर मे क्षेवन आत्मा ध्या ध्या सुपी दुखी रूप से भिन्न भिन्न भी जाना जाय जिस भान से सो जान राजस जानो ॥२१॥ तामसज्ञान कहते हैं कि एक कार्य मे अर्थात् स्थूल शरीर मे अथवा प्रतिमा आदि मे सक्ती कहे शरीर हो आत्मा यौ प्रतिमा ही ईश्वर है १८६ थीमद्भगवद्गीता। स्वतत्तामसमुदाहृतं ॥२२॥ नियतंसगरहितमरागद्वेषतःकृतं। अफलप्रेम्सुना कर्मयत्तत्सायिकमुच्यते ॥२३॥ यत्तुकामे सुनाकर्मसाहङ्कारेणापुनः । क्रिय तेवहुलायासंतद्राजसमुदाहृतं ॥२४॥ अनुवंधंक्षयंहिंसामनमेच्यचपौरुषं। मो हादारण्यकर्मयत्तत्तामसमुच्यते ॥२५॥ मुक्तासङ्गोऽनहंवोदीत्य साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्धयोनिर्विकारक सात्त्विकउच्यते ॥ २६॥ रागीकर्मफलप्रेम्सुर्खयो भाषा अनुवाद ऐसे निश्चय से युक्त और अहेतुक कहे युक्तिविरुद्द श्री परमार्थ अवलम्बन रहित जो ज्ञान उक्त कारणों से अल्प विषय अल्प फल हेतु से तुच्छ है उस ज्ञान को शिष्टजनो ने तामसरूम निरूपण किया है॥ २२ ॥ 'अव इक्ष लोक से ले तीन लोक के द्वारा सकल कर्म को विविध कहते हैं कि 'फलमाप्ति की इच्छा करते है ऐसे जो फल के लोमी अनो से किये जाते है उन से भिन्नरूप निष्काम कर्म के अनुष्ठान करने वालों से नियत कहे लिस्वरूप से विहित नौ अभिनिवेश आयक्ति शून्य नो कर्म किये जायं और जो पुव आदि के प्रीत्यर्थ अथवा शत्रु पर क्रोध क्रम से किये न होय ऐसे कर्म साविक है॥२३॥ और कर्मफन प्राप्ति का इच्छुक अथवा अहङ्कारी कहे जो अपने समान और को नहीं मानता है ऐसे अहङ्कारयुक्त मनुष्य से किये गये अथवा जो कर्म अति लोशयुक्त होंय उन्ही को शिष्टजन राजस खरूप कहते है ॥ २४ ॥ अब तामस कर्म कहते है कि पश्चात् वन्धक ऐसे अनुवन्ध कहे पथात्भावीशुभ अशुभ और धनव्यय तथा अपनी सामर्थ्य न विचारिके केवल भोर से नो कर्म आरम्भ किये जाय वेई तामस कर्म है ॥ २५॥ इस लोक से ले तीन लोक से कर्मको सव को विविध करके कहते है कि कर्म अनुष्ठाई पुरुष कर्टव अभिनिवेश बुद्धिरहित और गळवचन रहित नौ धैर्य उत्साहजो उद्यम इन दोनों के द्वारा युक्त समस्त कर्म मे सिद्धि असिद्धि को अपेक्षा हर्प विषाद सन्य होय ऐसे कर्ता पुरुषों की सात्विक खभाव कहते है ॥ २६॥ और पुत्र प्रादि के नेहयुक्त श्री कर्मफल का कामी और परधन का अभिलायो ौ निर्दय खभाव शौच रहित औ हानि लाम मे शोक हर्षयुक्त कर्मकारी मनुष्य रामस खरूप कहे रजो अष्टादश अध्यायः। सात्मकोराचिः। इपंशोकान्वित कत्तरार्जास परिकीर्तितः ॥२७॥ ययुक्त मा बत.स्तुभाश ठोनै प्कृतिकोऽलसः। विपादीदीर्घसूत्रीचकत्तीतामसउच्यते ॥२८॥ बुद्धेर्मेद्धृतेश्चैवगुणतस्विविवंग्टणु। प्रोच्चमानमशेषेणष्टथक्वेनधनञ्जय ॥ २६ ॥ प्रष्टत्तिञ्चनिटत्तिञ्चकार्याकार्येभयामये। वन्धमोक्षञ्चयावेत्तिबुदि.सामार्थसाचि की ॥ ३०॥ ययाधर्ममधर्मञ्चकार्यञ्चाकार्यमेवच । अयथावत्प्रनानातिबुद्धि सामार्थराजसी ॥ ३१॥ अधर्म धर्ममितियामन्यतेतमसावृता। सर्वार्थान्वी भाषा अनुवाद गुणी है ॥२७॥ और अयुक्त कहे असावधान यो प्राकृत कहे विवेक रहित यो स्तब्ध अनम सभाव औ शठ कहे कर्मचोर यौ नैष्कृतिक कहे परका अपमान करनेवाला तथा बालसी औ विपाद या सदा गोगी श्री दर्घसूची कोहे जो कर्म तुर्त करने का होय उसे महीनो तकटालै प्रैसे मनुष्य तामसकत्ती कापते है श्रमे ही काकी वैविध्य से ज्ञाताभी तीन प्रकारके है और कर्म की वैविध्यसे नेयमात को वैविध्य कहा औ बुद्धि विविध कहने से कारण भी तीन प्रकार के है ॥ २८ ॥ अब युद्धि नौ ति कहे धैर्य की नैविध्य कहनेकी प्रतिज्ञा करते है कि हे धनञ्जय अर्जुन युद्धि के यो धैर्यके सत्व आदि गुण क्रमसे तीन भेद नो है उन को मै भिन्न भिन्न कहता हूं तम सावधान होय सुनो ॥२८॥ अब इस लोक से ने तीन लोकसे बुद्धि की वैविध्य कहते है कि धर्म मे प्रति यो अधर्म से नियुक्ति यो देय काल के अनुसार जो कर्त्तव्य श्री अकर्त्तव्यकर्म औ काज अकाज जानि अर्थ अनर्थ ज्ञान तथा वही कैसे धो मोच ही वा कैसे हातो इस विचार से भय अमय ये सब बुद्धि "कहे अन्तःकरण जानि शक है ऐसो बुद्धि सात्विको है इस जगह बुद्धि के द्वारा पुरुष सवशानता है यह कहनेको थे परवह रीतिशेड इमीतरह परका कारण को पत्तो करके कहा है ॥३०॥ अोर हे पार्य अर्जुन जिस बुद्धि से धर्म अभी काज काज अयथावत् कई ठीक ठीक नजाना जाय जिससे सो बुद्धि राजसी है। और तमोगुणसे आटत कहे घेरी जो बुद्धि अधर्म को भी जानि धर्मके सकर विषय को पिमरीत को उलटा जानै ऐसो विपरीत ग्रहण करनेवाली बुद्धि तामसी है यहां भी करणता बुद्धि की उचित थी पर क रूप से कहा ई अका धर्म .
श्रीमद्भगवडीता। परीताचवद्धि सामार्थतामसी ॥३२॥ धृत्याययाधारयतेमनःप्राणोन्ट्रियक्रिया । योगेनाव्यभिचारिण्याधृति.सापार्थसात्त्विकी॥ ३३ ॥ ययाधर्मकामार्थान्धृत्याधा ग्यतेऽर्जुन। मसङ्गेनफलाकाक्षीधृतिःसामार्थराजसी ॥ ३४॥ ययाखभयंशोक विषादमदमेवच । नविमुञ्चतिदुर्मेधाधुति.सातामसीमता ॥ ३५ ॥ सुखंविदानी विविधश्टणुमेमरतर्षभ। अभ्यासाद्रमतेयवदुःखान्तञ्चनिगच्छति ॥ ३६॥ तदने विपमिवपरिणामेऽमृतोपमं। तमुखसात्विकंमोक्तमात्मधुट्विप्रसादनं ॥ ३७॥ Admin ar भाषा अनुवाद अन्त करण की दृत्ति वुद्धि यौ निश्चय तथा इच्छा द्वेष आदि रूप अन्त करण की त्ति बहुत रहते भी धर्म अधर्म ौ भय अभय की साधनरूप बुद्धि को प्रधान किया है और सब उपलक्षणरूपसे विविध कहे गये हैं ॥३२॥ अब इस शोक को अवधिकर तीन लोकसे प्रतिको वैविध्य कहते हैं कि हे अर्जुन योग को चित की एकाग्रता से और और विषय का धारण न करके नोधैर्य से मन औ प्राय तथा सव इन्द्रियो की सकल क्रिया की हुई जायं वही पति सतोगुणी है। ३३॥ अब रामसी धति कहते है कि हे अर्जुन तिससे भिन्न जाति कि निस से धर्म वर्ष यौ काम सब येठरूप से धारण किये जाय परित्यक्त न होय और उन के सदम से धर्मादि के फल की आकांक्षी भी होय ऐसी ऐति का नाम रानसी है ॥ ३४ ॥ धव तामसीधति कहते है कि हे अर्जुन जिस मनुष्य को दुर्मेधा कहे अविवेकिनी नीच बुद्धि है और वह दुर्वृद्धि मनुष्य जिस ति कहे धैर्य से निद्रा श्री भय शोक तथा विपाद कहे दुस/यौ मद इनको देही शेडता है वह ति तामसी है ॥३५॥ अव सुग्प भी तीन प्रकार का है यह मतिना साधे लोक से कहते है कि हे मरत बंशी अर्जुन अब सिविध सुख भी हम मि सुनो कि जो पुरुप नित्य अभ्यास के रेतु मे सुखभोग करता है और विषयी लोगों के समान विपय वासना से अति इठ धर करके सुसरया नहीं करता औ सीनि को नहीं प्राप्त होता है धैसा जो मुख भोगी पुरुष सो हटाए जाने पन्तको प्राप्त होता अर्थात् दुःखमे रुट जाता ॥३६॥ ओर वह सुख कैसा है इस पर कहते हैं कि जो मुख अग्रे कहे प्रथम विषके तह हैं औ अन्त को अमृत समान होता है वह सुख सावक है और प्राला तथा अष्टादश अध्यायः। १८६ विषयेन्ट्रियसंयोगाद्यत्तद्ग्रेऽस्तोपमं । परिणामेविपमिक्तत्सुखंराजसंस्मृतं ॥३८॥ पदग्रेचानुवन्धेचसखंमोहनमात्मनः। निद्रालसम्मादोत्थं तत्तामसमुदाहृतं ॥३६॥ नतदस्तिष्टथिव्यांपादिविदेवेपुवापुनः । । सत्त्वप्रतिजैर्मुज्ञयदेभिःस्थापिभिर्गुणैः । ४.॥ याह्मणचवियविमांसद्राणाञ्चपरन्तप । कर्माणिप्रविभक्कानिखभावप्रभवे भाषा अनुवाद बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न है अर्थात् मलरूप रजोगुण तिनको तमोराण सतो गुण दूर करै है तव वह सुख प्रगटै है ॥ ३७॥ अव राजस सुख कहते है कि 'विपय वासना सहित इन्द्रियों के संयोग से जो प्रिय सद्गम श्रादि सुख होता है और पहले तो असत तुल्य लगता है औ अन्त को दुख दाई हेतु से विप समान होता,सोई सय राजस है॥ ३८॥ तामस सुख कहते है कि अग्रे कहे पहिले और अनुबंध कहे पीछे भी जो सुख मोहकारी विशेष से निद्रा श्री बालस्य तथा प्रमाद कई चित्त की असावधानी श्री भन की जडवा से जो सुख होय है सोई तामस सुख है ॥३॥ अब जो पूर्व अध्यायों में कहीं नहीं कहा सो इस लोक से ले तीन लोक से कहते है कि इन सतोगुण धादि मति के गुणों से मुक्त अर्थात छूटा हुआ सत्व धादि कहे प्राणीमाव नहीं है अथया और कोई वस्तु क्या पृथिवी मे मनुष्य श्रादि क्या खर्ग मे देवता यादिमे भी कोई नहीं है ॥४०॥ जो समस्त क्रिया औ कारक कहे क्रियों के साधन तथा फल आदि औ प्राणीमान सब मी विगुणात्मक कहे विगुणमय भये है तो इन लोगों की मुक्ति कैसे बढ़ कहे होय सके है इस शङ्का निवारण के अर्थ अपने अपने अधिकार अनुसार कर्म अनु 'छान के द्वारा मगवत आराधन से भई हुई भगवत को कपा माप्ति से प्रगट नो तत्त्वज्ञान तिसके द्वारा ही जो मुक्ति होयगी यह शो सय गीता का सारसंग्रह है सो देसावनेका मानसकरके इसाकमे ले अध्यायसमाप्ति पर्यन्त प्रकारान्तरकडे दूसरी रीत कहने का प्रारम्भ करते है कि हे परन्तर शत्रुनाशक अर्जुन ब्राह्मण जानिय वैश्य यो शूद्र इन के कर्म प्रविमला काहे महष्ट रूप से भिन्न भिन्न विहित हैं और. द्विज पद से शास्त्र में बाह्मण वादि तीन वर्ण कहे जाते है इस से यूद को अलग करके कहा है सोई लक्षण करते है कि समाइ कहे सनोग्य २०० श्रीमद्भगवडीता। गुणैः॥४१॥ शमोदमस्तपःशौचंक्षान्तिरार्जवमेवच । ज्ञानं विनानमास्तिक्यंबना कर्मसमावनं ॥ ४२ ॥ गौर्यतेजोधृतिर्दात्ययुद्धेचायपलायनं । दानमीश्वरभाव बक्षवकर्मसभावनं ॥ ४३॥ कपिगोरक्ष्यवाणिज्य वैश्वकर्मखभावन। परिचर्या भाषा अनुवाद वादि जिनसे सवका प्रभव कहे उत्पत्ति है उन्हीके अनुसार ब्राह्मण प्रादिके कर्म पृथक पृथक विहित है अथवा स्वभाव कहे पूर्व जन्मका संस्कार उसके अनुसार जो माह्मण आदि की गुणकम से कर्मों मे मत्ति है विशेष यह कि बाह्मण सतोगुण प्रधान है श्री क्षविय कुछ सतोगुण सहित रजोगुण प्रधान है और बैग्य कुछ सतोगुण तमोगुण ले कर रजोगुण प्रधान है और शुद्ध कुछ रजोगुण युक्त समोगुण प्रधान है यह जानो ॥ ४१॥ तो वे खाभाविक कौन कर्म हैं सोई कहते है कि शम कहे चित्त की शान्ति यौ दम कहे वाद्य इन्द्रियों की शान्ति यौ तम जो १७ अध्याय के १४ श्लोक मे शरीर की तपस्या कहा है तथा शौच अर्थात् बाहर भीतर की राति औ क्षान्ति कहे क्षमा पार्नव कहे.सोधामन चौ ज्ञान कहे शास्त्र के अर्थ का वोध और विज्ञान कहे अनुभव तथा आस्तिक्य कहे परलोक है ऐसी निश्चय रूप वुद्धि ये सव ब्राह्मणों के स्वभाव सिद्ध कर्म हैं सो जानो॥ ४२ ॥ अव क्षविय के खभायज नो कर्म उनको कहते है कि शौर्य कहे पराक्रम औ तेन कहे ढीठापन ति कहे धैर्य औ दाक्ष्य कहे निपुणता और संग्राम आन पड़ने से पीठिदे न भागना तथा दान कहे उदारता यौ ईश्वर भाव अर्थात् विषय सम्बन्धी नियम अादि करने की शक्ति ये सव क्षत्रियों के खभाव ही से उत्पन्न कर्म है ॥ ४२ ॥ अव वैश्य के समावज कहे स्वभाव सिद्ध कर्म कहते है कि कपी कई खेती औ गो रक्षा सो दो प्रकार की है एक तो गउका रक्षण दूसरा अपने साथितका पालन करना औ वाणिज्य ब्यापार परी दना वेचना तथा बाह्मण देवता मे यद्धा रखना ये सव वैश्यवंश के सामाविक कर्म है अव रुद्र का कर्म सुनो कि इन तीनो वर्ण की सेवारूप व्यापार शूद्रका सभा कर्म है शूद्र को सेवा छोड और कर्म नहीं है ॥ ४४ ॥ ब्राह्मण धादि वर्षों के इन भव कर्मो को ज्ञान का हेतुत्व कहते हैं कि अपने अपने अधिकार वज Pati यहादश अध्यायः । २०१ त्मकं कर्मसूद स्यापिस्वभाव । ४४॥ खेरखे कर्मण्य मिरतःमंसिलिभतेनरः । 'स्व कर्मनिरतःसिदिय पाविन्दन्तितच्छृणु॥ ४५ ॥ यतःप्रवृत्तिर्भूतानांयेनसर्वमिदंततं । वकर्मणातमध्येचसिद्धिविन्दतिमानवः ॥ ४६॥ ययान्वधर्माविगुणःपरधर्मात्म्य नुष्ठितात्। खभावनियतंकमकुर्वन्नाप्नोतिकिल्लिपं ॥४७॥ सहकर्मकौन्तेय भापा अनुवाद के अनुसार विहित कर्म मे निरत कहे निष्ठा से लगे हुये मनुष्य संसिद्ध कहे ज्ञान की योग्यता लाभ करते है और कर्म के द्वारा ज्ञान प्राप्ति की प्रकार इत्त श्लोक के आधे से ले डेढ लोक मे कहते है कि अपने कर्म मे सब तरह निष्ठायुक्ता पुरुप जिस प्रकार से तत्त्वज्ञान लाभ करते है सो प्रकार तुम यवरा करो॥४५॥ अब कर्म से ज्ञान प्राप्ति का प्रकार कहते हैं कि अन्तर्यामी रूप जो परमेश्वर कि जिस से प्राणी मात चेष्टा करते है और कारण खरूप जो ईश्वर कि जिस ईश्वर से यह समस्त जगत व्याप्त है उस ईश्वर को समस्त कर्म के द्वारा अध्यच्च कहे पूजन करके मनुष्य सम्पूर्ण ज्ञान की योग्यता रूम सिद्धि को प्राप्त होते है ॥ ४६॥ धौर पूर्व लोक मे कहा जो स्वकर्मणा तमभ्यर्च उसी खकर्म विशेषण वचन का फल कहते है कि खानुछित कहे अच्छीतरह से किये हुये पराये के धर्म की अपेक्षा से सधर्म को अपना धर्म विगुण अर्थात् अगहीन मी श्रेय कहे अति उत्तम है इस हेतु वन्धुवध अादि से युक्त भी क्षवो का धर्म जो युद्ध तिस से भिक्षाटन खरूप पर धर्म श्रेष्ठ नही है और पूर्वोक्त स्वभाव क्रम से नियत कहे नियम खरूप शास्त्रोक्त खधर्म का अनुष्ठान यर्ता हुया कोई भी पुरुप फिलिप जो पाप तिस को नही प्राप्त होता है सो अर्जुन म किस विचार के बखेडे मे पडे हो अपने कामको देखो इस चिता णे अछ माल नहीं है ॥४७॥ परन्तु सधर्म मे जो सांख्यमत के अनुसार हिंसा को दोप रूम जानि के औ अहिंसा हेतु से परधर्म श्रेष्ठ जो विचार करो तो परधर्म के अचरण मे भी दोप है इस अभिप्राय पर कहते है कि हे कौन्तेय अजुन मनुष्यों को सहन कहे स्वभावसिद्ध औ शास्त्रविहित जो स्वधर्म सो दोषयता होने से भी त्याग करने योग्य नहीं है क्योंकि समस्त प्रारम्भ अर्थात् दृष्ट अष्ट २०२ श्रीमद्भगवदगीता। सदोपमपिनत्यजेत् । सर्वारम्भाहिदोपेणधूमेनाग्निरिवावृता ॥४८॥ बुद्धि सत्रजितात्माविगतस्पृहः । नै कार्यसिदि परमांसंन्यासेनाधिगच्छति ॥ १८॥ सिद्धिप्राप्तोयथाब्रह्म तथानोतिनिवोधमे। समासेनैवकौन्तेयनिष्ठाजीनसयामरा॥ ॥५०॥ बुद्ध्याविशुद्धयायुक्तोटत्यात्मानं नियम्यच । शब्दादिविषयांस्यकारागद्वेषौ भापा अनुवाद कर्ममात्र सव दोपयुक्त है तो जैसे स्वाभाविक धूम मे आटत अग्निको दोपयुक्त रहते भी लोग धूम रूप दोष परित्याग करके केवल अन्धकार औ शीत वारण के अर्थ सेवन करते है तैसे ही स्वकर्म भी दोष अंश को छोडके गुण यंश भाव सत्त्वबुद्धि के अर्थ सेवन करने योग्य है सोई कहा कि हे अर्जुन सहज कहे साभा विक दोपयुक्ता भी अपना कर्म छोडना न चाहिये क्यों कि सब आरम्भ कहे कर्म सदोष है जैसे धूम दोष से युक्त अग्नि को कौन छोड देय है ॥४८॥ जो कहो कि दोप अंश छोडि के गुण मात्र ही ग्रहण करि के कर्म किस प्रकार किये जाय सकेंगे इस अपेक्षा पर कहते है कि जिन की बुद्धि असा कहे आशक्ति रहित है और जितात्मा अर्थात् जो निरहद्वार है और जिनकी इच्छा कन के फल मे दृर होगई है ऐसे पुरुष सङ्ग जो श्राशक्लिो फल इन दोनो को भी छोड़कर इस अध्याय के नवम सोसमे कहे अनुसार वाशक्ति यो फल त्यागरूम संन्यासके द्वारा परम नैष्कर्म्य सिद्धि बाहे सर्व कर्म नित्तिरूप जो सत्वशुद्धि सो मावते हैं ॥४८॥ पूर्वोता ऐसे परमहंम पुरुप को ज्ञाननिष्ठाके क्रम से प्रभाव की प्राप्ति का प्रकार इस लोक मे ले साठि के लोक तक कहते हैं कि हे कौन्तेय अर्जुन नैध्यर्यसिद्धि यो माय कर के ज्ञान विषयक प्रकृष्टनिठा के जैसे पुरुष ब्रह्म को प्राप्त सोते है सो, प्रकार संक्षेप में श्रवण करो अर्थात् जान की जो श्रेष्ठ निष्ठा है सो सुनो ॥५॥ मोई कहते है कि उक्त मकार क्रमसे मूर्वोक्त विशुखरूप सात्त्विक बुद्धियुक्त पुरुम साविकी पृति से घात्मा कहे इस बुद्धि को नियन्य कहे निश्चय करको शब्द आदि सई विपय का त्याग करनेके अनन्तर और विषयमयुक्त राग देपको भी दूर करके मलमावको माप्तहोतेहै इसझोकसे ले तीन लोकका अर्थ एकसाथ होताहै ॥५१॥ विधिक सेवी कहे पवित्र देशवासी चौर लयासी काहे परिमित बाझारकारी होय अष्टादश अध्यायः । २०३ ब्युदस्य च ॥५१॥ विवितासेवीलधामीयतवाङ्कायमानसः। ध्यानयोगपरोनित्यंवरा म्यं समुपाथितः ॥५२॥ अहङ्कारंवलंदर्मकामक्रोधंपरिग्रह। विमुच्चनिर्ममाया तोबह्मभूयायकल्पते ॥५३॥ ब्रह्मभूतःप्रसन्धात्मानगोचतिनकांवति । समःसर्वेषु भूतेषुमन तिलभतेपरां॥ ५४॥ भत्तयामामभिजानातियावान्यश्चासिातत्त्वतः । ततोमांतत्त्वतोनात्वाविशतेतदनन्तरं ॥५५॥ सर्वकर्माण्यपिसदाकुर्वाणोमद्यमाययः भाषा अनुवाद और इन उपायों से यत वाक काय मानस अर्थात् वचन देह और मन को वश करके सदा ध्यान क्रम से नो योग कहे अविद्या अन्नान निवृत्तिरूप ब्रह्म साक्षात् फार तिसभे तत्पर होय अपने ध्यान के अविच्छेद के लिये सम्पूर्ण रूप से वारवार दृढ वैराग्य का प्राथय लेकर ॥५२॥ और अहङ्कार औ वल कहे निंद्यवस्तु की इच्छा औ दर्म कहे योगवल से आकाश गमनरूप आदि मायाम प्रति और प्रार ववशते अप्राप्य वस्तु मे जो काम क्रोध का रोकना और अदृष्टवशते हठात् प्राप्त वस्तु मे भी ममता रहित होके शान्ति को प्राप्त पुरुप ब्रह्मा के साथ समता अर्थात् अहंवम ऐसा अचलरूप अवस्थान करने के योग्य है ॥५३॥ अहं प्रा ऐसी निय रूप अवस्थिति का फल कहते है कि ब्रह्मभूत कहे ब्रह्मभाव को प्राप्त प्रसन्न चित्त पुरुप देह धादिमे अभिमान के अभावसे नष्ट जो संसारीविपय तिनका शोच नहीं करते है चोर अप्राप्त विषय की भी बाकांक्षा नहीं करते इसी से रागद्देषादिशात विक्षेप के अभाव से मूतमाव मे समभावयुक्त होने के अनन्तर सकल प्राणीयों मे मद्भावरूप जो मेरी उत्तमभक्ति तिसको प्राप्त होते है ॥५४॥ तिसके अनन्तर वही उत्तम मासिके द्वारा हम को यथार्थ रूमसे जानते है और मैं कैसा हं इस अपेक्षा पर कहते है कि जिस रूप से हम सर्वव्यामी औ धनचिदानन्दखरूप हैं तैसा हम को जानते है और तिस के अनन्तर हम को ऐसे यथार्थ रूप से जानि के फेरे के उपर कहे शान्त होने पर हमारे ही मे प्रवेश करते अर्थात् परमा गन्दरलप होते है ॥५५॥ अपने अधिकार के अनुसार कर्मके क्रमसे भगवत की अाराधना हेतु से कहा जो मुक्ति का प्रकार सो करते है कि नित्य औ नैमितिक डाये सर्व कर्मका निरन्तर अनुठानकारी और मह व्यापायय कई जिस उस ज्ञान है ग २०४ श्रीमद्भगवहीता। मत्प्रसादादवानोतिशावतंपदमव्ययं ॥५६॥ घेतसासर्चकर्माणिमतिसंन्यास मत्परः। बुद्दियोगमुमाथित्यमच्चित्त सततमव ॥५७॥ मञ्चित्त सर्वदुर्गारिमत्प्रसादात्तरिय सिं। अथचेवमहङ्कारान्नयोप्यसिविनक्ष्यसि ॥५८॥ यदद्वारमाथित्यनयोत् स्थतिमन्यसे। मिथ्यैवव्यवसायस्तेप्रकृतिस्वांनियोक्ष्यति ॥५६॥ स्वभावजेनकौन्ते भाषा अनुवाद ॥ के मै ही आश्रयणीय है। और स्वर्ग आदि फल आश्रयणीय नहीं है ऐसे पुरुष मेरी अनुग्रह से साखत अर्थात् अनादि औ अव्यय कहे नित्य नो सर्व श्रेष्ठ बह्मपद तिसको प्राप्त होते है ॥ ५६ ॥ जिस हेतु नित्य आदि कर्म के अनुठान से ब्रह्म प्राप्ति होती है इस से सर्व कर्म बुद्धि के द्वारा हम को समर्पण कर के मत्सर कहे मही है। परम प्रार्थनीय प्राप्य परम पुरुषार्घ सर्व खरूप जिस के अथवा व्यवसायात्मिका बुद्धि के कर्मयोग को आश्रय कर के सतत कहे कर्म अनुदान काल मे भी भगतचित्तपुरुप प्रमाणिं ब्रह्महवि.ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतं इस ४ अध्यायके २४ लोक से कहे जये ज्ञानके द्वारा मेरे मे चित्त समर्पित होता है सो हे अर्जुन तुम बुद्धियोग से तद्रूप समचित्त होउ ॥ ५७॥ और समचित्त होने से जो होगा सो सुनो तात्पर्य यह कि सगतचित्त हो के मेरी कमा से तावत दुर्ग अर्थात् दुस्तर सांसारिक दुख समूह से तरि नावगे और इस के विपरीत पाच रण मे दोष कहते है फि और जो इस प्रकार कहने पर भी तुम अपने अहंकार अर्थात् हम वडे ज्ञानी इस अभिमानसे हमारे कहने पर कान न करोगे तो पुरुप सो उचित औ हित करनेवाला जो धर्म तिस से मष्ट होउगे अर्थात् बिनष्ट हो जावगे नौ दुर्गति भी भोगना पडेगा ॥५८॥ और नो याहो कि अच्छा हम धर्म, से धष्ट होय परन्तु तो भी भाई और वन्धुवों के साथ युद्ध न करेंगे तिस पर कहते है कि मेरी कहीं सब बातो को अनादर पूर्वक यह द्वारके भरोसे को कहो कि मै युद्ध न करूंगा ऐसी जो तुम मनमे निश्चय करते शै तो तुमारा यह निश्चय करना साधीनता के अभाव हेतुसे अर्थात् वम स्वाधीन नही हो इससे यह बात मिथ्या कहे झूठमूठहै सोई करतेहै कि जो तुमारीप्रथाति कई क्षबीको रजोगुण को अधिकाई सो मुम को अवश्य ही युद्धमे प्रयत्न करेगी अन्त को झप मारोगे औ अष्टादश अध्यायः। २०५ यनिवड श्वेनकर्मणा। कनेच्छसियमोहात्करिष्यस्यवशोऽपितत् ॥६०॥ ईश्वरः सर्वभूतानांहद्देशेऽर्जुनतिष्ठति। मामयन्सर्वभूतानियन्वारूढानिमायया ॥६१॥ तमेवधरगंगच्चसमावेनभारत । तत्मतादात्परांशान्ति स्थानमाप्स्यसिशाश्वतं ।। भाषा अनुवाद लडोगे और इस पीटने के पीटने से केवल जगत मे दुर्यथ छोड और कुछ हाथ, लागना नहीहै यह नानो ॥५६॥ और हे कौन्तेय कुन्तीनन्दन गर्नुन समाव कहे जो पूर्व कर्मका संस्कार जिससे रजोगुण विशिष्ट क्षत्री के जामा को प्राप्त हो और शूरता आदिगुण कर्म से निवद्ध कहे वशीभत तुम मोहके मारे जो इस चयमे युद्ध कर्म करनेकी इच्छा नहीं करते हो पर इसके बाद अवश होय यही कर्म अवखही करोगे इसमे भी भाठ न मानो ॥६०॥ इससे पिच्छिले दोनोश्लोकगे सांख्य आदि मतानुसारी मनुप्योकी प्रकृतिपारतंय कहे खभावाधीनता कही गई अब दो लोक से निज कहे अपना नत कहते है कि हे अर्जुन सकाण भूतों के हृदय मे नियामक रुपसे चन्तयामी ईश्वरस्थिति कहते है तो किस प्रकार से टिके है इस प्राकांना पर कहते है कि भतमान को माया जो अपनी शक्ति तिस के जोर से नमरा को उपस्थिति समस्त कर्मोमे प्रष्टत्त करावते भये सनमे टिके है जैसे कठपुतली को सूब धार वाजीगर लोग लोगों के सामने नचावैहै अथवा यन्ल कहे शरीरारुढ कहे जीव को मरा करायते स्थिति करते है इस पर श्वेताश्वतर उपनिपद के मन्त्र का प्रमाण देते है कि एक खयं प्रकाश जो परमात्मा सो भूतो मे निगूढभाव से स्थित में सर्वव्यापी सब का अमा-मी श्रौ कर्मों का नियन्ता श्री भूतों का आधार रूप औ ट्रष्टा देखनेवाला श्री भूतमाव को चेतनकारी अद्वितीय औ गुणातीत है और अन्तर्यामी नो बुद्धि मे स्थिति करके बुद्धि का नियम करै है और जिसको बद्धि नहीं जानती और बुद्धि ही जिसकी उपाधिहै सोई तुमारेभी आत्मा यौ अन्ना यामी तथा कैवल्यखरूप है ॥६१॥ जप कि ईश्वर ही सर्वभूतमान का प्रेरक है और से की प्रेरणासे सफल कर्म प्राणी करते है तो फेरि अयना पुरुषार्थ करना वृथा है इस अभिप्राय से कहते है कि जिस हेतुसे जीवमात्र परमेश्वर के पशोभत है इससे हे भारत अर्जुन तुम अहहार को मरित्याग करके सम्यक प्रकार से श्रीमद्भगवडीता। ६२॥ इतितेतानमाख्यातं गुह्यागुह्यतरंमया ।विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छासितथाकर। ॥३३॥ सर्वगुह्यतमभूयःश्टणुमेपरमंवचः। दृष्टोऽसिमेदृहमितिततोवच्यामितेति तं॥६॥ मन्मनाभवमहत्तोमद्याजीमांनमस्कुरु। मामेवैश्यसिसत्यंतेप्रतिमानेनि भाषा अनुवाद ईश्वर की शरण ग्रहणकरो तदनन्तर तिनकी कृपासे मरा कहे उत्तम शान्ति औ परमेश्वरसम्बन्धीनित्य जो स्थान सो पाओगे यह भगवाने अर्जुनसे कहा १६२१ अब समस्त भगवद्गीता का अर्थ कहे तात्पर्य कहते हैं कि इस प्रकार से मैं ने दया कर के तम को ज्ञान उपदेश दिया और सो ज्ञान कैसा है इस अपेक्षा से करते है कि गुध कहे गोपन करने योग्य तथा मन्त्रयोग आदिसे भी जो ज्ञान गुच्चतर अति रहस्य है सोई मैंने कहा इससे तुम गोताशास्त्रको पहिले अच्छीतरह पालो चन कर के फर तुमारी जैसी इच्छा होय तैसा करो भावार्थ यह कि इस गीता के अर्थ को विचार करने से अवश्य ही तुमारा मोह नित्त हो जायगा यह भग वानने कहा ॥ ६३॥ अति गूढ अर्थ से युक्त जो गीताशास्त्र तिसकी सम्यक आलोचना करने को असमर्थ जो अर्जुन तिनसे अनुग्रह करके भगवान श्राप ही' गीताका सारसंग्रारूप अर्थ करि इस लोकसे ले तीन लोकके द्वारा कहते है कि उस सव गोपनीयसेभी अति गुह्यतम जो हमारे वचन सो यद्यमि प्रसङ्ग प्रसङ्गमर कहे भी गये है पर तो भी फेर कहता ई सो तुम सुनो और वारवार कहने में हेतुकहते है कि तुम हमारे दृह कहे अत्यन्त प्रिय हो इसीसे तुमारीप्रीत औहित के अर्थ फेरभी कहंगा अथवा मेरी पाक्य को तुमने दृढ प्रमाण करके जाना और माना इससे तुम हमै अतिप्रिय हो तो फेरि तुमारोहितको नो वचन है सो कजना ॥६४ ॥ अव समस्तहितोंसे बढके परमहित क्या है इस शापर कहनेको अङ्गीकार किये हुये गीतार्थ सारको कहते है कि नन्मना कहे मचित्त होउ और मेरही भक्त कहे चाथित होउ नौ मतयानी कहे मेरेकी पूजनकारी होउ और मीको नमस्कार करो इस प्रकार से वर्तमान रहने पर मेरी अनुग्रहसे प्राप्त तत्वज्ञानके द्वारा जो हम को माप्त होटगे इस मे कुछ संशय न करो क्योंकि म हमारे मियमाम हो सो इसपर तमको सत्यप्रत्यय कहे मतीति जिसने होय इससे हम तुम * श्रष्टादश अध्यायः। २०७ बोसिमे ॥६५॥ सर्वधर्मान्मरित्यज्यमामेकंभरणंमज । यिष्याविनाशुवः ॥६६॥ इदन्तेनातपस्वायनामनायकदाचन । नचाशुश्रूपवेवार्च नचमायोऽव्यसूयति ॥६॥ यमपरमंगुच्छमदतष्षभिधास्यति। भक्तिमयिपरा कृत्वामीमेवैष्यत्यसंशयः ॥६८॥ नचतस्मान्मनस्येषुकश्चिन्मे प्रियकृत्तम.। भवितान - भापा अनुवाद को प्रतिज्ञा करके कहते है ॥६५॥ पूर्व कही रायतम बात से भी जो गुह्य करे गोपनीय सो कहते है कि हमारी भक्तिही से सकल सिद्धि होती है इस प्रकार दृढ विश्वास करिके विधि कहे प्रारब्ध श्री वेद शास्त्र के विधान का भरोसा छोडि एक हमारी ही शरण लेउ अर्थात् मेरे कहे पर विश्वास करो तो ऐसे हमारी शरणागत रूप मे वर्तमान तुमारे कर्मयोग से जो फेरि और माम होयगे ऐसा शोच न करना क्योंकि एक मेरे शरण में प्राप्त तमको मै यावत पाप से उड्वार श्री मुक्त करूंगा इस से शोक दूर करो और अपना काम देखो ६६ इस प्रकार से श्रीभगवतगीता का तत्त्व अर्थ उपदेश करके अब गीता की संप्रदाय रूप प्रवर्तन करने मे अर्थात् दूसरे को उपदेश देने मे नियम कहते है कि हे अर्जुन इस गीताके अर्थ तत्व को तुम अतमस्त कहे खधर्म अनुष्ठान रहित मनुष्य से न कहना और न कभी अमक्त कहे ईश्वर गुरु तथा ब्राह्मण की भक्ति विहीन को कहना और अशुश्रूषु अर्थात् प्राह्मण गुरु तथा ईश्वर की शुश्रूषा सेवा को नहीं करता अथवा गीता श्रवण करने की निसको अनिच्छा होय ऐसे मनुष्यों को भी कभी न कहियो और नो परमेश्वर खरूप हमारे मे मनुष्य वुद्धि लाय कर दोप धारोप करता हुआ निन्दा करै उसको भी तुमकभी न कहना यह तुम से हम प्रत्युमकार चाहते है॥६७ ॥ पूर्व कहे हुये सब दपो से वर्जित भक्ताननों को गीतार्थ के उपदेश करनेवाले पुरुपका फल कहते है कि जो यह परम गुच्छ गीतार्थ का उपदेश मेरे भक्तको करेगा सो मनुष्य मेरी पर कहे उत्तम भक्तिका अधिकारी होयगा और तदनन्तरसो मनुष्य सर्व संशयसे रहित होय हमको प्राप्त होयगा यह जानो R६८ तिसमे हे अर्जुन उपदेश करने श्री संप्रदाय चलानेवाले मनुपों के मध्य मे मेरा मक्क गीता का उपदेशकारी जो है उसके समान और २०८ श्रीमद्भगवद्गीता। चमेतस्मादन्यःप्रियतरोमवि ॥६॥ अध्येप्यतेच यइर्मधसम्बादमावयोः । ज्ञानय जेनतेनाहमिटास्यामि तमेमतिः ॥७॥ बदावाननसूयश्चमणुयादपियोनरः। 'सोऽपिमुक्तःशुभान्लोकान्माप्नुयात्पुण्यकर्मणां ॥७१॥ कञ्चिदेतऋतंपार्थत्वयैका ग्रेशचेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोह मनष्टस्तेधनञ्जय ॥७२॥ अर्जुनउवाच । नष्टो भापा अनुवाद कोई भी नही मेरा अत्यन्त परितोष करनेवाला है और न होगा और घिवी मे उससे अधिक प्रिय हमारे और कोई नही है न होगा॥ह ॥ अव गीता "पाठ करने का फल कहते है कि जो मनुष्य हमारा औ तुमारा यह धर्मयुक्त संवाद नियम से पाठ करैगा सो पुरुप समस्त यज्ञों मे थेष्ट ज्ञानयन से हमारा पूजन किया यह मेरी निश्चित वुद्धिहै भावार्थ वह कि जो अर्थ न बानिकेभी जपके समान गीता पढेतो उसके थोता हम उस पर प्रसन्न होते है ज्ञान अज्ञान किसी तरह से हमको स्मरण करे पर हम उसके निकट अवश्य जायंगे जैसे अजामिल यौ व्याध आदिको के निकट हम गये है॥७० ॥ अव गीता अरण करने का फल कहते है कि जो कोई अदा कहे विश्वास युक्त होय केवल गीता पाठ श्रवण करें "और अनसूय कहे यह मनुष्य क्यो जोरसे चिलाय के पढता है अथवा अशुद्ध निकले तो इसे टोकै ऐसे दोय न देसै ऐसे मनुष्य तावत सफल पाम से मुक्त "होय अश्वमेध यन्न आदि कर्म करनेवाले नो लोक पावते है ये भी उसी लोक को प्राप्त होंय गे और जो अर्थयुक्त अति प्रीति पूर्वक यवरा करें तो वे जीवनन्मुक्त है औ अन्तको साक्षात् ब्रह्मखरूम होयंगे इसमे कुछ सन्देह वाकोनही है॥७१॥ जो सम्यक प्रकार वोध तुमको न भया हो तो हम फेरे भी तुमको उपदेश करेंगे इस प्राशय से पूछते है कि हे पार्घ अर्जुन कहो तो मैने जो कहा सो सब एकाग्र चित्त होय तुमने सुना और हे धनञ्जय संमोह को तत्वज्ञान के विषय में अज्ञान जनित तुमारी विपरीत बुद्धि नट भई कि नहीं अर्थात् मेरे पचनो में अज्ञान 'दूर गया कि नहीं यह भगवान ने पूछा ॥ ७२ ॥ तब तो भगपरा की पाणी से परम कृतार्थ होय अर्जुन कहते है कि हे अच्युत योकृष्ण प्रामकी शापो से अष मेरा आत्मज्ञान के विषय मे मोह नष्ट होगया और स्मृति जो जान सो माया सो . अष्टादश अध्यायः। २०१६ मोह स्मृतिर्लयात्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽमिगतसन्देहःकरिष्येवचनंतच ॥७३॥ सञ्जयउवाच । इत्यहवासुदेवखमार्थस्य चमहात्मनः। सम्बादमिममोपमद्तं लोमहर्पणम् ॥७४॥ व्यासप्रसादास्कृतवानिमंगुह्यमहंपरं। योगयोगेवरात्क यात्माक्षात्कथयतःवयं ॥७५॥ राजन्संस्मृत्यसंस्मृत्यसम्बादमिममद्भुत। केशवा र्जुनयो.पुण्यहप्यामिचमुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ तच्चसंस्मृत्यसंस्मृत्यरूपमत्यस तहरेः। विस्मयोमेमहानरानन्हप्याभिचपुन.पुनः ॥७७॥ यवयोगेश्वरो कृष्णायनपार्योध भापा अनुवाद धात्मखरूपके अनुसन्धानमे स्थिति भई अर्थात् अात्मखरूपका ज्ञान मेरेको प्रकाश भया और धर्म के विषयमे संदेह मेरेचित्तसे चली गई ऐसा नो मैहं सो अब आप की थाना प्रतिपालन करूगा और युद्ध करने के लिये तयार खडा हलो पाना होय सो अव करूं' यह अर्जुन ने भगवान कहा ॥ ७३ ॥ सोई श्रीकृष्ण अर्जुन का संवाद राजा धृतराष्ट्र से सञ्जय कहते है कि महात्मा वासुदेव थौ अर्जुन का यह अद्भुत संवाद रोंका सडे करनेवाला मैने जो सुना सो यामको कह सुनाया है।७४ ॥ अव सञ्जय यह वृत्तान्त अपने श्रवण करने का समाचार करते है कि भगवान व्यासदेव ने हम को दिव्य चक्षु नौ कर्ण दिया है कि उन्की कृपासे परम योगरूम नो परम गुहा अर्जुन के प्रति साक्षात् योगमाया के ईश्वर थीकष्णने आम अपने मुखसे कहा सो मैने श्रवण किया और आपके प्रति भी मैने कहा ॥७५॥ सो हे महाराज तराष्ट्र यह परमपवित्न केशव श्री अर्जुनका अद्भुत संवाद स्मरणकरके मै वारवार हर्पितहोताई अथवा वारवार मेरे रोम खडे होते है॥७६ औ तत् शब्द से भगवान के विश्वरूप का निर्देश करते अर्थात् करते है कि हे महाराज धृतराष्ट्र हरि श्रीकृष्ण के उस अद्भुत विश्वरूपका स्मरण करि करिके समयो अत्यन्त विस्मय होती है अर्थात् अाश्चर्य होता है और बारबार रोमांच होता है । ७७ ॥ इससे है महाराज अब तुम अपने पुत्रों के राज्य लाभ को शंका भी परित्याग करो इस आशय पर कहते है कि जिसके मन मे योगे चर थीमण वर्तमान है और वहां गाण्डीव धनुर्द्वारी अर्जुन नयार है तहाई थी का राजलक्षी श्री विजय तथा भूत्ति कहे उत्तर उत्तर भिदि कई बढ़ती औ IM श्रीमद्भगवद्गीता। नुर्धर । तवत्रीविजयोमूतिर्धवानीसिम्मतिर्मम ॥७८॥ इतिअष्टादशोध्यायः ॥१८॥ भाषा अनुवाद नीति जो न्याय सोसव निश्चयकरके है ऐसो मेरी मति है इससे अब तुम पुवोंको साथ ले थोकष्ण की शरण जाय के ो पांडवों को अपना सर्वख दे प्रसन्न करावते हुये अपने पुत्रों की प्राण रक्षामान करो यह सञ्चयने एतराष्ट्रको कहा समझाय के ॥७८॥ इति जगन्नाथ कुलविरचित मनभावनीटीकायां अष्टादशोऽध्याय ॥१८॥ F अति पावनि है अनपावन की नित पनि गावन मे मन दीले तनि दावन माप परावन जो वैतापनशावनहजियलीने भवरोग दुरावनि ज्ञान वढावनि मुक्ति उपावनि प्रतिदिन पीने कामिनके मन भामिनिज्यों मनभावनित्यों मनभावनि कीने ज्ञानरत्नाकरयन्वे यन्त्रिता समाप्ताचेयं श्रीमद्भगवडीता ॥ सम्बत् १६२४ वैशाख कृष्ण ३ ॥ अथ अङ्गन्यास करन्यासौ डोंधीगणेशायनमः अस्सथीभगवद्गीतामालामन्त्रस्य यीभगवान् वेदव्यास पिरनुष्टुपचन्दायीकृष्णः परमात्मादेवता अशोच्यामन्पशोचस्वंमजावादांचभापस इतिवीजम् सर्वधर्मान्परित्यज्यमामेकंशररांबजे तिशक्तिः अहवासर्व पापेभ्योमोच्य यिष्यामिमाशुचतिकीलक नैनंच्छिन्दन्तिशस्त्रागिनैनंदहतियावया इत्यंगुष्ठास्यांनमः नचैनलोदयन्त्यापोनशोपयतिमारत इतितर्जनीभ्यांनम' अच्छेदोयमदायोयमले द्योगोप्य एषचेतिमध्यमाभ्यां नमः नित्यःसर्वगतःसाणुरचलोयंसनातनइत्यनामिका ध्यानमःपश्यमेपाथरूमाणिशतशोयसहस्रशइतिकनिष्ठिकाम्यांनमः नानाविधानि दिव्यानिगागावर्णाकृतीनिचेतिकरतलकरपृष्ठाभ्यांनमः इतिकरन्यासः नैनौछिन्द तिशबागीतिहृदयायनमः नचैनलोदयन्त्यापतिशिरमेखाहा अच्छायमदायो यमितिथिसायैवपट् नित्यःसर्वगत.खाणुरितिकवचाय पश्यमेपार्थरूपाणीविनेत्र [२११] जयायघोषट् नानाविधानिदिव्यानीत्यस्वायफट् श्रीकृष्णप्रोत्यर्थे जपेविनियोगः इति षडगन्यासः अथध्यानम् डोपार्यायप्रतियोधितांमगवतानारायणेनस्यं व्यामेवग्न थितांपुराणमुनिनामध्येमहाभारते अतामतवर्षिणी भगवतीमष्टादशाध्यायिनी भंवत्वांमनसादधामिभगवगीतेमवद्दपिणीम् १ नमोस्तुतेव्यासविधालवुद्धेमुल्लारवि दायतपननेव येनत्वयाभारततैलपूर्णः प्रज्यालितोज्ञानमयप्रदीपः २ प्रपन्नपारिजा नाय तोलवैकपाणये नान सद्रायकृष्णाय गीतामतदुहेनमः३सोपनिषदोगावोदों धागोपालनन्दनः पार्थोवत्सःसुधीर्मोक्ता दुग्ध गीताम्यतमहत्यसुदेवसुतं देवंकंसचा परमर्दनं देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्देजगद्गुरुम् ५भीमद्रोणतयाजयद्र्धजलागान्धा रनीलोत्पला शल्य ग्राहवतीरूपेणबहिनीकर्णेनवेलाकुला अत्यामविकर्णधोरमकरा दुर्योधनातिनी सोत्तीसलपाराहवैः कुरुनदीकैवर्त्तका केशवः ६ पारायंवयः सरोजममलंगीतार्थगन्धोत्कट नानाख्यानककेशररिकपासपोधनायोधित लोके सब्जनपट पदैरइरहःपेमीयमानंसुदा भयाद्वारतपङ्कनकलिमलप्रवंसिनःयेयसे ७ मूकंकरोतिवाचालंपड्लड्वेयतेगिरियकमातमहंवन्देपरमानन्दमाधवं यंत्रमावर गेन्द्ररामरुतःसुत्वन्तिदिव्यैस्तवैर्वेदैःसाङ्गपदक्रमोमनिषदैर्गायन्तियंसामगाःध्यामा परिसततङ्गतेनमसापश्यन्तियंयोगिनो यस्यान्तन्नविदुःसुरासुरगणादेवायतम्झनमः श्रीभगवगीतामाहात्म्यं । श्रीगणेशायनमः ऋषिरुवाच गीतायाश्चैवमाहात्मायथावत्स तमेवद पुराणमुनि नाप्रोक्तंव्यासेनमुनिनोदितम् १ सूतउवाच पृष्टंभवशिपिभिर्यदिगोप्यं पुरातनम् शक्यते केनवैवक्तुगीतामाहात्म्यमुत्तमम् २ कृष्णोज़ानातिसम्यक्किञ्चित्कुन्तीसुतः पालम् व्यासोवाव्यासपुत्रोवायाचबलोयमैथिल. ३ अन्ये यवरातःश्रुत्वालेशंसंकीर्त यन्ति च तस्मात्किञ्चिवदाम्यत्रव्यासस्थास्यान्मयाथु तम् ४ सर्वोपनिषदोगावोदोग्धा गोपालनन्दनः पार्षावत्मसुधीर्भोक्तादुग्वंगीताऽस्ट तमात् ५ सारथ्यमर्जुनस्यादौकई नगीताम्हतंददौ लोकवयोपकारायतसौ कृष्णाबानेनमा ६ संसारसागरंधोरतत मि छातियोनर गीतानायंसमासाद्यमारंयातिसुखेनम. ७ गीताज्ञानंयुतनैक्स दैवा यासयोगा. मोक्षमिच्छतिमूटात्मायातिवालकहाखताम् ८ येण्टणन्तिपठन्त्येवगी ताशास्त्रमर्निशम् नतेबमानुपान्जेयादेवरूपानसंशयः ६ गीतान्नानेनसम्बोधन + E:२१४] कृत्वालभतेमुक्तिमुत्तमा ६.३ गीतेत्युच्चार संयुक्रोग्विर्यमाणोगतिलभेत् यद्यत्कर्मच सर्वत्रगीतापाठप्रकोर्तिमन ६४ ' तत्तत् कर्मचनिर्दोपभूत्वापूर्णत्वमाश्यात पिढ्नु हिश्यया या गीतापाठं करोतिवै ६५ सन्तुष्टामितरंस्तस्यनिरयाधान्तिखर्गति गी तापाठेनसन्तुष्टी:पितरःयादतर्पिताः ६६ पिलोकप्रयान्त्येवपुताशीर्शदतत्पराः गीतापुस्तकदीनंचधेनुपु समन्वितम ६० कृत्वाचतहिदेसम्यक्त्तार्योनार्यतेजनः पुस्तकहेमसंयुक्तगीतायाःशुधमानसः ६८ दत्वाविप्रायविटुपेजायतेनपुनर्भवः' शत पुस्तकदानञ्चगीतायाःप्रकरोतियः ६८. सयातिवमसदनंपुनराइविदुर्लभम् गी तादानप्रभावेणंसप्तकल्पावधिसमाः ७० विष्णुलोकभवाभोतिविष्णुनासहमोदते स व्यक् यत्त्वाचगीताई'पुस्तकेयःप्रदापयेत् ७१ तसैनीतोहिमगवान्ददातिमनसे भितं देहमानुपमाथित्यचातुर्वण्य भारत ७२ नम्हणोतिनपटतिगीतामम्मतरुपि गी.इस्तानावामतप्राप्तंकष्टातफेडसमन्नते ७३ पीत्वागीतासतलोकेलधामोक्षं सुसीभवेत् , जनै संसारटुःखातैर्गौशान्तानचथैः युतम् ७४ समाप्तममलेश्वगताते सदहरेः गीतामाथित्यमा योभभु बोलनकादयः ७५ निघृतकल्मपालोकेगता रोपरमपदं गीतासुनविशेपोस्तिजनेचावचेपुच-७६ जानेष्वेवसमग्रेषुसमाना खरूपिणी योभिसूयतिगीतांचयानिन्दावाकरोतिच ७७ समेतिनरकंघोरयावदा भूतसंस अहङ्कारेणमूहात्मागीतार्थ नैवमन्यते ७८ कुम्भीपाकेषुपच्यवयायत्कल्प नयोभवेत् गीतार्थ वाच्यमानयोनंग्टणोतिसमीपतः ७८ वशूकरभवांयोनिमनेकां सोधिगच्छति चौर्य कृत्वाचगीताया पुस्तकंयासमानयेत् ८० नतनौचफतं किञ्चि त्मठनाच्चस्थाभवेत् यःयुखानैवगीतार्थ मोदतेपरमार्थतः ८१ नैवानोतिफलंलोके प्रमादाजस्थायमः गीतांयत्वाहिरण्यंञ्चपटांयरप्रवेटनं २ निवेदयेञ्चतहकोमीत येपरमात्मनः वाचकं पूजयेत्याद्रव्यवस्वाद्य पस्करैः ८३ अनेकषधामीत्यातुभ्य गांभगवान्हरि. माहात्यमेतद्गीताया:कृष्ण गोनीपुरातन ८३ गीतान्तेपठतेयस्तु यथोशफलभाग्भवेत् गीताया उंनंकृत्वामाहान्य'नेवयः पठेत् ८५ ट्यापाटफलंनस्य शुमएवउदाहृतः एतत्माहाल्यसंयुझंगीतापाठंकरोतियः ८६ अद्दयावाहणोत्येव दुर्नभांगतिभानुयात् श्रुत्वापठित्वागीयांचमाहात्मंय.श्टणोतिच ८७ तस्यपुण्यफ लोकेभवेद्वैमनसे सितम् एपंचात्तामकुर्वीतगीतापाठमनुत्तमम् ८८ इति थीभगवडीतामाहारमा चीकृष्नाऽर्जुनायोक्त समाप्तम् Ph [अ०१६ ० १२] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता ११०७ येषां अयमेव परम पुरुपायों यः कामोपभोग: पारत्रिक तु सुखं नास्त्येवेत्येवं निश्चितात्मानः एतत्काया- विरिकरय भोक्तुरभावात् । तथाच बार्हस्पत्ये सूने "चैतन्यविशिष्टः कायः पुरुषः। काम एवैकः पुरुषार्थ: • इति ॥११॥ ५० टी०-किं च-चिन्तामिति । प्रत्यो मरणमेवान्तः पर्यवसानं यस्याचा परिमातुमशक्यां चिन्ता गनोरथसंतविमुपाश्रिताः कामा विषयास्तपागुपयोग एव परमास्यन्तिकं प्राप्यं येषां ते एतावान्पुरुषार्थ इति फुवनिश्चयाः । श्रुतिरपि--"स यावदप्येतेषामेकैफ न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्यो फररनता" इति । भाष्यम्-तस्य पुरुषस्य, उ इति निर्धारणे, अकस्मता सकलप्राप्तिराहित्यम् । तस्य कस्य? य एषां पूर्वो. कानां विषयाणां मध्ये यावदेकैकं विषयं न प्रामोवि सावदहमचरन एवेति मन्यतेऽहमप्राप्तसकलार्थ एवेति मन्यते ॥ ११॥ रा०दी-किच-कामेति । प्रलयान्वा मरणान्ताम् । अपरिमेयां परिमातुगशस्यां चिन्तामुपाश्रिताः फामोपभोगपरमा: काम्यमानवस्त्वनुभष एवं परमो येषां ते विषयभोगैकरताः एतावदैदिकमेव फलं नान्य- दामुष्मिकमस्तीति निश्चयवन्तः ॥ ११ ॥ आशापाशशतैर्वद्धाः कामक्रोधपरायणाः ॥ ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥ १२ ॥ त० टी०-अत एव-आझेति । आशा एव पाशास्तेषां शनैर्वद्धाः इतस्तत आकृष्यमाणाः काम- क्रोधपरायणाः कामक्रोधमात्रपरमाश्रया आमुरा भवन्तीत्यर्थः । एतावता असुराणां लक्षणमुक्तमिदानीं तत्प्रवृत्तिमाइ-ईहन्त इति । कामभोगार्थमन्यापेन चौर्यप्राणिवधादिनाऽर्थसंचयान् प्रति ईहन्ते चेटन्ते ॥ १२॥ म. टी.-त ईदृशा असुरा:-आशेति । अशक्यौपायाविषया अनवगतोपायार्थविपया वा प्रार्थना आशास्ता एव पाशा इव बन्धनहेतुत्वात् पाशास्तेषां शत; समूहद्धा इव श्रेयसः प्रच्याव्येतरतत आकृप्य नीयमानाः कामक्रोधौ परमयनमाश्रयो येषां वे कामक्रोधपरायणाः स्त्रीव्यतिकरामिलापपरानिष्टामिलायाभ्यां सदा परिगृहीता इति यावत् । ईइन्ते कंतु चेन्ते कामभोगार्थ न तु धर्मार्थमन्यायेन परस्वहरणादिना अर्थसंचयान धनराशीन् संचयानिति बहुवचनेन धनप्राप्तावपि तत्तृष्णानुवृत्तेविषयप्राप्तिवर्धमानतृष्णात्वरूपो लोभो दर्शितः ।। १२॥ शंटी-किच-आशति । आशापाशशर्वचा: आशा अप्राप्ताभिलापास्वा एव पाशा बन्धनरन्न. यस्तेषां शतद्धाः । कामक्रोधपरायणाः आसुराः कामभोगार्थ कामानां नगादिविषयाणां भोगार्थमेव न तु दाना नापि धर्मार्थ च । किं तु विषयानुभवायैव अन्यायेन शास्त्रविरुद्धेन मार्गेण कपटवञ्चनादिरूपेणार्थ- संचयान संपाद्यानीहन्ते कुर्वन्तीत्यर्थः ॥ १२ ॥ श्री०टी०-अत एव च-आशेति । आशा एव पाशारवेषां शतानि द्धाः इतस्तत आकृष्यमाणाः काम- शोधौ परमयनमाश्रयो येषां ते कामभोगार्थमन्यायेन चौर्यादिनाऽनि संघयाराशीनीहन्ते इच्छन्ति ॥१२॥ स० टी०-असक्योपायविपया भाशास्वा एर बन्धकाः ॥ पाशारयेयं शद्धाः श्रेयसः प्रच्युता जड़ाः॥१॥ साभिलापपरानिष्ठाभिलाषाभ्यां सदाऽऽवृत्ताः ॥ चेष्टन्ते कामभोगार्थ, धर्मार्थ न कथंचन ॥२॥ कर्तु ते वित्तराशीच परस्वहरणादिना ॥ ३ ॥ १२॥ भा० टी०-आसुरानेव पुनर्विशिनष्ठि-आशेति । आशा अशक्योपायार्थविपया अनवरातापायावि. पया वा प्रार्थनास्ता,एव वन्धनहेतुत्वात् पाशा; । आशापाशानां शद्धा एव सन्तः श्रेयसः प्रच्याव्ये.
श्रीमजगवद्गीता [अ० १६ श्लो० १२] तस्तव आकृप्यमाणा: कामक्रोधपरायणाः कामक्रोधौ परमयनं आश्रयो येषां ते कामभोगार्थ काम- भोगप्रयोजनाय न तु धर्मार्थमन्यायेन परस्वापहरणादिनार्थसंचयानर्थप्रचयान् हन्ते चेष्टन्ते ॥ १२ ॥ प० टी०-किं च-आशापाशशतैरिति । आशा एव पाशा वन्धनरनवस्तेपां शतानि वैद्धाः । तदु- - क्तम्-' आशा नाम मनुष्यत्व काचिदाश्चर्यशृङ्खला । यया बद्धाः प्रधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पङ्गुवत् । इति । तथा कामक्रोधौ परमयनं गतिर्येषां ते कामभोगार्थ विषयभोगार्थगन्यायेन द्यूतचौर्यादिनाऽर्थसंचयान् द्रव्यसंग्रहानीहन्तेऽपेक्षन्ते ॥१२॥ रा० टी०-आशेति । आशा एव पाशास्तेषां शतैर्वद्धा: कामकोषा एव परं अयंनमेषां ते कामको- धपरायणाः । कामभोगाथै काम्यविषयानुभवाथै अन्यायेन चौर्यादिनाऽर्थसंचयान्द्रव्यसमूहानीहन्ते वाञ्छन्ति ॥ १२ ॥ इदमद्य मया लव्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।। इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥ त० टी०-तेपामर्थसृष्णां तन्मनोरथकथनेन विणोति-इदमयेति । इदं धनक्षेत्रादिकं मया बुद्धिवलसामर्थ्यवता स्वसामर्थेनैव लब्धं न देवादिना, इदं च धनं मनोरयं मनोऽभिलपितं स्वपौ- रुपेण प्राप्स्ये । इदं धनं स्वसामर्थ्यसंचितं मम गृहेऽस्ति । इदमपि मदुपायसाध्यं पुनर्भविष्यति ॥१३॥. म० टी०-तेपामीदृशी धनतृष्णानुवर्ति मनोराज्यकथनेन विवृणोति-इदमिति । इदं धनं अद्य इदा. नीमनेनोपायेन मया लब्धम् , इदं तदन्यत मनोरथं मनस्तुष्टिकर शीघ्रमेव प्राप्स्ये, इदं पुरैव संचितं मम गृहे- ऽस्ति, इदमपि बहुतरं भविष्यत्यागामिनि संवत्सरे पुनर्धनम् । एवं धनतृष्णाकुलाः पतन्ति नरकेऽशुचावित्य- मिमेणान्वयः ।। १३॥ शं०टी०-अन्यायेनार्थसंपादनपराणामासुराणां हृदये संकल्पप्रकारमाह-इदमितित्रिभिः। स्पष्टार्थः॥१३॥ श्री० टी०-तेषां मनोराज्यं कथयसरकप्रातिमाह-इदमधेति चतुर्भिः । प्राप्स्ये प्राप्स्यामि मनोरथं मनसः प्रियम् । शेपं स्पष्टम् । एषां च त्रयाणां श्लोकानामित्यज्ञानविमोहिताः सन्तो। नरके पतन्तीति चतुर्थेनान्वयः ॥ १३ ॥ स० टी०-ईदृशी धनतृष्णानुगृत्ति तेषां कुचेतसाम् ॥ विकृणोति मनोराज्यस्यनेन हरिः स्वयम् ॥१॥ इदं भनं मयाऽनेनोपायेनातं च संप्रति ॥ मनस्तुष्टिकरं चान्यत्प्राप्म्ये शीघमिदं पुरा ॥ २ ॥ संचित मे गृहे चास्ति बहुवित्तमिदं पुनः ॥ भविष्यत्येव सुखदं ममागामिनि वासरे ॥३॥ एवं तृष्णाकुला मूढा चैतरण्यादिकेऽशुचौ ॥ पतन्ति नरके पोरे नाकलं नि:मृतिस्वतः ॥ ४ ॥ १३ ॥ भा० टी०-विवेकविरोधिनामासुराणामभिप्रायमाह-इदमिति । इदं द्रव्यं गोहिरण्याद्यद्य इदानी गया लब्यमिदगन्यत् मनोरथ मनस्तुष्टिकरं प्राप्स्ये प्राप्स्यामि, इदमस्ति पुरैव संचितम् , इदमपि मे पुन- भनमागामिनि संवत्सरे भविष्यति वेनाई धनी विख्यातो भविष्यामि ॥ १३ ॥ ५० टी०-अथान्यायेनाप्यर्धलाभे केपलं मनोराज्यमेव कुर्वन्तीत्याइ-इदमिति चतुर्भिः । मनोरथ मनसः मियशेष प्राप्ये प्राप्स्यामि । शेप स्पष्टम् । एषां ग्रयाणां शोकानामित्यज्ञानविमोदिता: पवन्ति नरफेऽनुपाविति चतुगान्वयः ॥ १३ ॥ रा०टी०-चिन्ताकारं दर्शयवि-इदमित्यादिना त्रयेण । इदं धनम् अद्य गया लब्धम् । ३६ मनोरथं प्रारमे प्राप्स्यामि । भनम् अस्ति, समपि धनं मे पुनर्भविष्यति ॥ १३ ॥ .
4-
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[अ० १६.१४] तत्त्वप्रकाशिकाधष्टटीकोपेता
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
त० टी०-किं च-असाविति । असौ मदीप्युदुर्जयः शत्रः सर्वसामर्थ्यवता मया इतः । एवम-
परानपि शत्रूनहं शूरो इनिप्यामि । दुर्वला हि देवादिकं समाश्रयन्ते नाहं तथा, यत ईश्वरोऽहम् ।
स्वाधीनोऽहमितरेषां नियन्ताऽस्मि । अहं भोगी स्वत एव. प्रामसर्वभोगः । सिद्धोऽहं पुत्रमित्रभृत्या-
दिमिराजानुवर्तिभिः स्वतोऽपि बलवान् मुखी सर्वव्याधिरहितः ॥१४॥
म०टी०-एवं लोभप्रपञ्च्य तदभिमायकथनैनैव देपा क्रोधं प्रपञ्चयति-असाविति । असो देवदचनामा
मया हतः शनुरविदुर्जयः, अव इदानीमनायासेन हनिष्ये च हनियामी अपरान् सर्वानपि शत्रुन्, न कोऽपि
मत्सकाशाजीविष्यतीत्यपेरर्थः । चकारान केवलं हनिष्यामि तान् कि तु वेपा दारधनादिकमपि ग्रहीष्या-
मीत्यभिप्राय: । कुतस्तवैतादृशं सामयं त्वत्तुल्याना त्वदधिकानां वा शत्रूणा संभवादित्यत आइ-ईश्वरोऽहं न
फेवलं मानुपो येन मत्तुल्योऽधिको वा कश्चित् स्यात् । किमेते करिष्यन्ति वराकाः सर्वथा नास्ति मत्तुल्यः
कश्चिदित्यनेनाभिप्रायेण ईश्वरत्वं विवृणोति-यस्मादुई भोगी समोंगोपकरणैरुपेत: सिद्धोऽई पुत्रभृत्यादि-
भिः सहाय: संपन्नः स्वतोऽपि वलवान योजस्त्री सुसी सर्वथा नीरोगः ॥ १४ ॥
शं० टी०-किच-असाविति । ईश्वरो विद्याधनादिभि. समयः सिद्धः पुत्रः पौत्रैः पशुभिर्धनधान्यः
संपत्रः कृतकृत्य: । शिष्टं स्पष्टम् ॥ १४ ॥
श्री०टी०-किंच-असाविति । सिद्धः कृतकृत्यः । स्पष्टमन्यत् ॥ १४ ॥
स० टी०-एवं प्रपञ्च्य वत्तृष्णां तदभिप्रायकीर्वनात् ।। संप्तपञ्चयति क्रोधं तेषा श्रीहरिरव्ययः
॥ १ ॥ गयाऽसौ देवदचारुगो हवः शत्रुः सुदुर्जयः ॥ हनिष्याम्यपरान्सनिय शनून्सुसेन च ॥ २ ॥
अपेरथस्तु मच्छत्रुः संध को जीवने क्षमः ॥ न केवलं हनिष्यामि किंतु वेपा धनादिकम् ।। ३ ।। गृही-
प्यामीत्यभिप्रायश्चकारादन्न गम्यते ।। कुतस्तवास्ति सामर्थ्यमीदशं हि यवोऽपरे ॥ ४॥ यत्तुल्या अ.
धिकाः किं न शनवस्वत्र चोच्यते ॥ न केवलं मनुष्योऽस्मि येन तुल्योऽधिकोऽथ या ॥ ५॥ कम्निस्या-
दत एते किं करिष्यन्ति वराककाः ॥ सर्वथा नास्ति मत्तुल्यः कश्चिदनेश्वरोऽस्म्यहम् ॥ २ ॥ विवृणोतीच.
रस्त्रं च तदभिप्रायतो हरिः ॥ यतोऽई भोगसामग्रीयुतः सिद्धोऽहमित्यतः ॥ ७ ॥ पुनभृत्यादिभिर्युक्तः
स्वतोऽपि बलवानहम् ।। सर्वथाई च नौरोगोऽत्यन्तपुण्यरतो युतः ॥८॥ १४ ॥
भा० टी०-ययोक्के मदभिप्राये प्रतिवन्धः शरवि न संभवतीत्याह-असाविति । असा देवदत्तो दुर्जयः
शत्रुर्मया हुतः हनिष्ये चापरानन्यान् वराकान् । ननु तपस्विना, सत्त्वे कथं सर्वपा पराभवे त सामयमि-
स्याशङ्कप किमते करिष्यन्ति तपस्विनो यतः सर्वथापि मतुल्यो नास्तीत्याह-ईश्वरोऽहम् । ऐश्वर्यातिरेक-
मेव प्रकटयति-भोगी सर्वभौगोपारणवानहं सिद्धोऽई पुत्रादिभिः संपन्न बलवान न केवलं मानुपपलपान
सुखो चाहमेव ॥ १४ ॥
५० टी०-किच-असाविति । असो वर्वमानः शत्रुर्मया हतोऽपरान् भविष्यतोऽपि शत्रून् हनिष्ये।
सिद्धार्थः कुतार्थ: 1 वदुक्तम्- मृपा मनोस्थश्रेणीमाधुर्यान्मोहितो दिवा ! रानौ स्वानं मुसं भुखमरी
जयति जीवितम् । इति ॥ १४ ॥
रा० टी०-भसाविति । असौ शर्मया हव: अपरानन्यानपि शवून इनिध्ये च । अहमीश्वरः परगे-
वरः भोगी ऐहिक्यमुटिएकभोगसंपन्नः सिद्धः नक य. ग्लान् समर्थः ॥ १॥
श्रीमद्भगवद्गीता [[अ० १६ श्लो० १५]
आब्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति शशाघे. मया ॥
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५॥
त. टी-किं च-आद्य इति । आब्यो धनधान्यसंपन्नः, अभिजनवानुत्तमकुले प्रसूतोऽहमे-
वास्मि । अतः कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया, न कोऽपीत्यर्थः । ननु केचिद्यज्ञदानादिना कीर्तिमन्तो
दृश्यन्ते श्रूयन्ते च तत्सादृश्यं स्यादत आह-पक्ष्य इति । यक्षपिशाचादीन् यक्ष्ये । दास्यामि स्ताव-
केभ्यो नटादिभ्यः । अतो यज्ञेन दानेनाप्यहमेव सर्वेषां कीर्तिमभिभूयोत्कृष्टो भविष्यामीत्यर्थः । ततश्थ
मोदिप्ये हर्ष प्राप्स्यामि सखीजनैः सह । इत्येवमायज्ञानेन विमोहिता विविध मोहं वृथा मनोरथरच-
नात्मकं भ्रमं प्रापिताः पतन्ति नरकेऽशुचारित्युत्तरेणान्वयः ॥ १५ ॥
म०टी०-ननु धनेन कुलेन वा कश्चित्यत्तुल्य: स्यादित्यत आह-आढय इति । आढयो धनी अभिजनवान्
पुलीनोऽप्यहमेवास्मि । अतः कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया न कोऽपीत्यर्थः । यागेन दानेन वा कश्चित्तुल्यः
स्थादित्यत आइ-यध्ये यागेनाप्यन्यानभिभविष्यामि, दास्यामि धनं स्तावकेभ्यो नटादिभ्यश्च । वतश्च
मोदिप्ये मोदं हर्षे लप्स्ये नक्यादिभिः सहेत्येवमज्ञानेनाविवेकेन चिमोहिता. विविधं मोहं भ्रमपरं-
परी प्रापिताः ॥ १५ ॥.
शं० टी०-किं च-आढय इति । आत्यो बहुधनसंपन: अभिजनवाननूचान: यक्ष्ये प्रतिष्ठार्थ धनार्थे
जीवना) वा यागं करिष्यामि दास्यामि स्वारकेभ्यो नटविटादिम्यो न तु श्रोत्रियेभ्यो वन्धुभ्यश्च मोदिप्ये
दत्वा भुक्त्वा संतोपं प्राप्स्यामीत्येवमज्ञानविमोहिता. सदसद्विवेकामावोऽज्ञानं तेन विविध मोहिताः
मोहं प्राप्ताः ॥१५॥
श्री०टी०-किंच-आढय इति । आल्यो धनादिसंपन्नः ।अभिजनवान् कुलीनः । यक्ष्ये यागाद्यनुष्ठा.
नेनापि दीक्षिवान्तरेभ्य. सकाशान्महती प्रविष्ठा प्राप्स्यामिदास्यामि स्वारकेभ्यः। मोदिप्ये हर्षे प्राप्स्यामी-
स्येवमक्षानेन विमोहिताः मिथ्याभिनिवेशं प्रापिताः ॥ १५ ॥
स०टी०-कश्चिद्धनेन किं न स्यात्वत्तुल्योऽन कुलेन वा ।। इत्याह धनी यस्मादहमेव न मत्सम.॥१॥
कुलोनोम्यहमेवारिम न कश्चिमसमोऽपरः ॥ यागेन वाऽध दानेन न कोऽप्यस्तीह मत्समः ।। २ ॥ अ-
न्यानभिभविप्यामि यागेनाई वधापरान् ।। दानेन स्तावकेभ्योऽहं धनं दास्यामि पुष्कलम् ॥ ३ ॥
हर्षे लपये वतोऽहं वे नर्वस्यादिभिरेव च ॥ इत्येस्मविवेकेन प्रापिता बहुविभ्रमम् ॥ ४ ॥१५॥
भा० टी-पुनरप्यासुराणामभिप्राय वर्णयवि-आन्य इति । आंढपो धनेन । अभिजनवान सप्तपुरुष
श्रोत्रियत्वादिसंपोऽगरिम, तस्मान्मया धनाढयेन फुलीनेन सदृशस्तुल्योऽन्यः कोऽस्ति ?न कोऽपीत्यर्थः ।
पियागानाभ्या तत्फलेन धान्येभ्योऽधिको भविष्यामीत्याह-यक्षे यागेनाप्यन्यानभिभविष्यामि । दास्या-
मिनटस्तावकादिभ्यो। मोदिप्ये से पाविशयं यागदानफलं प्रापयामि । दानादिना पापरानभिभविष्यामी-
स्येवममानेत विमोहिता. विविध मोदिताः अविवेमभावमापनास्तथा वैदेपामभिमायोऽसाधीयान् कदापि
गोपादेय इति भावः ॥ १५ ॥
१० टी०-प-भादय इति । आन्यो धनसमृद्धः, अभिजनवान् कुलीन, मया सदृशः कोऽस्ति
योऽपि नारीत्यर्थः । अयासामध्येऽपि व्यर्थमनोरयानाइ यत्ये इति । यक्ष्ये यागं करिष्ये, दास्यामि
नुटाभागनिदान परिप्ये, एवं लोगोचर करणेग मोदिप्ये दर्षे प्रापरयामीत्यमानेन विमोदिवा मिध्याभिनि-
प्रापिः ॥१९॥
1 - , [अ० १६ सो० १६ ] तत्त्वप्रकाशिकाघाटीकोपेवा रा० टी०-आइयेति । आन्य: धनादिसंपन्नः अभिजनवान्कुलीनोऽस्मि ! मया सदशोऽन्यः कोऽस्ति? न . कोऽपि । वक्ष्ये यागादिधर्माननुष्ठास्यामि । भूरिदक्षिणान्नादि दास्यामि । मोदिध्ये संतोपं प्राध्स्यामि इत्येवं. रूपेणाज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥ अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।। प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१६॥ ताटील-एवं किं फलं मामुवन्तीत्पपेक्षायामाह-अनेकेति । सर्वकर्मफलमदात्रीश्वरसाहा- य्यमृते स्वस्यैव सामर्थ्यमवकल्प्यतत्कुमित्धं कुर्यामिदमनुभूयामित्यनेकचित्तविभ्रान्ता अनेकेषु विष- येषु चित्तं तेन विभ्रान्ता विक्षिप्ता एवं मोहरूपेण जालेन समाहताः सूत्रमयेन जालेनासता मत्स्या इव कामभोगेषु प्रसक्ता अभिनिविष्टाः सन्तोऽशुचौ विणमूत्रश्लेष्मादिपूर्ण गैरवादौ नरके पतन्ति ॥ १६ ॥ म०टी०-अनेकैति । उक्तप्रकारैरनेकश्चित्तैस्तत्तदुप्पसंकल्पविविधं भ्रान्ताः, यतो मोहजालसमावृताः मोहो हिताहितवस्तुविवेकासामध्य तदेव बालमावरणात्मकत्वेन बन्धहेतुत्वात, तेन सम्यगावाः सर्वतो वेष्टिनाः मत्स्या इव सूत्रमयेन जालेन परवशीकृता इत्यर्थः । अत एव स्वानिष्टसाधनेष्वपि कामभोगेषु प्रसक्ताः सर्वथा तदेकपराः प्रतिक्षणमुपचीयमानकल्मपाः पतन्ति नरके वैतरण्यादी अशुचौ विष्मूबो- मादिपूणे ॥ १६ ॥ शं००-एवं कामसंकल्पैविविधभावापनानां कामपरराणां तत्प्रवृत्तेः फलमाह-अनेकेति । अनेक- चित्तविभ्रान्ताः इदमद्य मया लम्धमित्येवंरूपैरनेकविधेश्चित्तविकारविभ्रान्ता विविधं भ्रान्ताः, मोहमालसमा- वृताः मोहः सदसद्विवेकाभावः स एव जालं मत्स्यानामिवावरणात्मको नाशकश्च तेन सम्यगावृतास्तिरो- हितविवेकास्तत एव कामभोगेषु विपयसेवायामेव प्रसत्ताः प्रकर्षण सत्राः परनिष्ठितान् फचित्स्वधर्मे वत एवाशुचौ श्लेष्मपूयहूदादिरूपत्वादशुद्धे नरके रोरवादौ पतन्ति ॥ १६ ॥ श्री० टी०-एवंभूता यत्प्राप्नुवन्ति इच्छृणु-अनेकेति । अनेकेषु मनोरथेषु प्रवृत्तं चित्तमनेकचित्त सेन विभ्रान्ता विक्षिप्ताः । तेनैव मोहमयेन जालेन समावृता: मत्स्या इव सूत्रमयेन जालेन यन्त्रिताः । एवं कामभोगेषु प्रमका: अभिनिविधः सन्तोऽशुची कसले नरके प्रतन्ति ॥ १६ स०टी०-तत्चदुष्टैंकसंकल्पैरनेकैः मागुदीरितः ॥ कामिनो विविध प्रान्ता मोहजालेन वेष्टिताः ॥१॥ हिताहिताविकात्यावरणेनाविवेष्टिताः ॥ मत्स्या देव हि सौत्रेण जालेन विवशोमताः ॥ २ ॥ स्वानिए- साधनेष्वेव कामभोगेपु तत्पराः ।। प्रतिक्षणं वर्धमानकल्मपा नरफेशुचौ ॥ ३ ॥ पतन्ति श्रेष्मविष्णूवपूर्ण वैतरणीमुखे ॥ ४ ॥१६॥ भा० टी०-एवमभिप्रायवन्तः आसुराः भृत्याहत्यविवेकहीना: कस्मिलोके गच्छन्तीत्याकाहायामाह-- अनेकेति । अनेकचित्तविभ्रान्ताः उक्कप्रकारेरनेकैश्चित्तदुष्टसंकल्पैविधाता विविध भ्रान्ताः मोहना- लसमावृताः कार्याकार्यहिताहितसारासारइयोपादेयाविवेको मोहः, स एव जालमिवावरणात्मकत्वात् तेन सम्यगावृताः पक्षिण इव सूत्रमयेन जालेन बन्धनं गताः, प्रसका; कामभोगेषु कामानां विषयाणामुपभोगेषु प्रकर्षेण सक्ता आसक्तिं गताः तवैव निपगा: एतादृशाः सन्तस्वेनोपचीयमानफल्मपा अमुची विभूया. दिपूर्ण वैतरण्यादिरूपे नरके पतन्ति ॥१६॥ •.५० टी०-किं च-अनेकेति । अनेकेषु व्यर्थमनोरथेषु प्रवृत्ध चित्तमनेकचित्तं वेन विशेषतो भ्रान्ता- र वेपामुद्धार: कदापि नास्तीत्याह-मोहजालसमावृता इति । यया सूत्रमयजालान्तः प्रविष्टानां मत्स्यानाम- 1 श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १६ श्लो०१७] 'निर्गमस्तथा मोहजालसमावृताना कामभोगेपु प्रकर्पण सक्ता अशुचौ कल्मपरूपे नरके पतन्ति । अतदुक्तं भवति-"तुल्या व्यवहांतः सर्वा स्वप्नजागृदवस्थयो । एकस्यावसरेऽन्यस्य यन्मिथ्यात्वं प्रतीयते" इति वैत- ध्योपनिषदुक्तम् । श्रुतिमि स्वाप्नव्यवहारदृष्टान्तेन जागृद्व्यवहारस्यापि मिथ्यात्वं दर्शितमासीदिदानी तस्य स्वरूपेणैव मिथ्यात्वं मनोरथरूपत्वेन भगवता विस्तरेण प्रकटीकृतम् । तत्र मनोरयो द्वेधा संभावितो- ऽसंभावितश्च, तर दैनंदिनानपानादिविषयभोगमनोरथ संभावित.। सोऽपिदैवाधीनत्वात्साक्षिकः।असंभावि. तस्तु राज्यप्राप्त्यादिसकलभोगैमनोरञ्जनम् । एवमस्य मिथ्याभूतत्वं जानन्वोऽपि मनोरथपरंपरामानन्वन्ति तेषामुद्धार. कदापि नास्तीत्यर्थः । तदुक्त टिप्पणिकासु-स्वानं सुखं दु खमसत्यमेव स्थापि तस्यानुभवस्त- दानीम् । तथैव शुक्को रजतस्य मिथ्या मनोरथोत्यं तु विनाऽनुभूतिम् ॥ १ ॥ सर्वतस्तनुभृतामसिलोऽपि स्यान्मनोरथमयो व्यवहार । युक्तितस्त्वनुभवादनुवेलं तन्मृपात्वमुदितं गुनिवर्य. ॥ २॥ इति । तदुक्क विष्णुपुराणे सौभर्याख्याने-मनोरथाना न समातिरस्ति वर्षायुरप्यथवापि लौ । पूर्णेषु पूर्णेषु पुनर्नवा- जामुत्पत्तय. सन्ति मनोरथानाम् ॥ १॥ पम्याङ्गता यौवनतश्च जाता दारेश्च संयोगमिताः प्रसूताः । दृष्टाः सुतास्तत्तन्यप्रसूतिं द्रष्टुं पुनर्वाञ्छति मेऽन्तरात्मा ॥ २ ॥ यजीवतो नैव मनोरथानामन्तोऽस्ति विज्ञातगिर्द मयाद्य । मनोरथासक्तिपरस्य चित्तं न जायते वै परमार्थसंगति ॥३॥' इति ॥ १६ ॥ रा० टी०-एवं चिन्ताप्रकारमुक्त्वा वेपा फलमाह-अनेकति । अनेकचिन्तायुक्तमनसा विशेषभ्रान्ति. मन्त. पुत्रमित्रादिविषयमोहाख्यजालेन समावृताः विषयभोगेष्ववितरामासक्ताः सन्तः अशुचौ नरके पतन्ति ॥ १६ ॥ आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ॥ यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ।। १७॥ त०टी०-यक्ष्य इत्यादिना यस्तेपां यज्ञदानाधभिमान उक्तः सोऽपि केवलं धर्मध्वजित्वाय : न तु शास्त्रविधिविपय इत्याह-आत्मसंभाविता इति । आत्मनैव संभाविताः आत्मनैवात्मानं श्रेष्ठं मन्यमाना अत एव स्तव्या अनम्राः। तत्र हेतुः-धनमानमदान्विताः । धनेन मानो गर्वः मद- बौद्धर्पस्ताभ्यामन्विताः सन्तस्ते नामयज्ञैर्याज्ञिका दीक्षिता इति यष्तृत्वख्यापनाय ये यज्ञास्ते नामयज्ञाः, अथवा नाययज्ञैर्नाममारयज्ञैर्यज्ञाभासैर्यजन्ते । कथं? दम्भेन, न तु सात्त्विकश्रद्धया । अविधिपूर्वकं विधि- हीनं यथा भवति तथेत्यर्थः ॥ १७॥ म० टी०-ननु नेपामपि केपाचिद्वैदिके कर्मणि यागदानादौ प्रवृत्तिदर्शनादयुक्तं नरके पतनमिति नेत्याह-आत्मेति । सर्वगुणविशिष्टा वयमित्यात्मनैव संभाविता पूज्यता प्रापिता न तु साधुभिः कश्चित् । स्वधा अनम्रा. । यतो धनमानमुदान्विता धननिमित्तो यो मान आत्मनि पूज्यत्वातिशयाध्यासः तन्निमि- चश्व यो मद. परस्मिन् गुर्वादावन्यपूज्यत्वाभिमानस्ताभ्यामन्वितास्ते नामयज्ञैर्नाममानैर्यझेन तात्विकीक्षिता. सोमयाजीत्यादिनाममात्रसंपादकैर्वा यज्ञैरविधिपूर्वकं विहिवाङ्गेविकर्तव्यतारहितैर्दम्भेन धर्मध्वजितया न तु श्रद्धया यजन्ते । अतस्तत्फलभाजो न भवन्तीत्यर्थ. ॥ १७॥ शं० टी०-ननु वैपामपि ब्राह्मणत्वेन श्रुताध्ययनाध्यापनसंभवाद्वेदोक्तकर्मानुष्ठानसंभवाच कथमेतेपा पेदिकानाम्शुचिनरकपात इत्याराहाया-न । " श्रद्धयानि समिध्यवे " इति " यो वा एतदक्षरं गाय- विदियाजीमहोके जुहोति । इत्यादिश्रुत्युक्तलक्षणाभावाचरविधिना क्रियमाणयःयक्षाभासैनेश्वर. प्रयते नियमोडल प्रवृत्त यत्तेपामासुराणा नरकपापणमेव सिद्धमिति प्रतिपादयति-आत्मेति द्वाभ्याम् । धनमा. .
[अ० १६ श्लोक १८] सत्वरकाशिकायष्टटीकोपेता जमदान्विता: मानो गर्वः मदो मत्तता धनोत्कर्षसमुत्पनी मानमदो वाभ्यां समन्विवास्तव एवात्मसंभाविता आत्मना स्वेनैव न तु कचिदपि शिष्टेः समाविताः बहुकृतास्वत एव स्वच्या उद्धताः नम्रताशून्यास्ते आसुरा नामयज्ञनाना यज्ञैर्नतु वैदिकक्रियया लक्षणेन वा किंवाभासयज्ञैरविधिपूर्वक नियतकालमन्त्रहोमत्तिग्विव- जिंतं दम्भेन स्वमहत्त्वप्रसिद्धय यजन्ते नवीश्वरप्रीतिसिद्धथै ॥ १७ ॥ श्री०टी०-यक्ष्य इति च यस्तेषां मनोरथ उक्तः स केवलं दम्भाहंकारादिप्रधान एव न तु सात्त्विक इत्यभिप्रायेणाह-आत्मसंभाविता इति द्वाभ्याम् । आत्मनैव संभाविताः पूज्यतां नीता; न तु सा- धुभिः कश्चित् । अत एव स्तब्धा अनम्राः । धनेन यो मानो मदश्च ताभ्यामन्विताः सन्तस्ते नाममात्रेण ये यज्ञास्ते नामयज्ञाः। यद्वा दीक्षित: सोमयाजीत्येवमादिनाममात्रप्रसिद्धये ये यज्ञास्तैर्यजन्ते । कथम् ? दुम्भेन न तु श्रद्धया, अविधिपूर्वकं च यथा भवति तथा 11 १७ ॥ स० टी०-तेषामपि हि केषांचिद्वैदिक शुभकर्मणि ।। प्रवृत्तिांगदानादौ दृश्यतेऽतो न सांप्रतम् १।। नरके पतनं तेपामित्याशङ्कयाह तत्र च ॥ सर्वंगुणैर्विशिष्टाः स्मो वयमित्यात्मनैव ते ॥२॥ पूज्यवां प्रापिना मूढेन तु कैश्चित्सुसाधुभिः । अनम्रा धनहेतुर्यों मानरतद्धेतुको मदः ॥ ३ ॥ वेनान्विता मखै. र्नाममात्रैरुक्ताङ्गवर्जितः ॥ धर्मध्वजितया मुढा यजन्ते श्रद्धया न तु ॥ ४ ॥ अतो न फलभाजस्ते यागे- रविधिपूर्वकैः ।। किं तु संसृतिभाजस्ते क्रूराः क्रूरविचेष्टिताः ॥ ५ ॥ १७ ॥ भा० टी०-तनु तेषामपि केयांचिद्वदिककर्माण यागादी प्रवृत्तिदर्शनात् कथं सर्वेषां वैतरण्यादौ पतनमिति चेत्तत्राह-आत्गसंभाविताः सर्वगुणविशिष्टा वयमित्यात्मनैवात्मनि संभाविताः पूज्यतां गताः न तु साधुभिः । स्तव्याः अप्रणवात्मानोऽननाः धनमानमदान्विताः धननिमित्तो मानो मदश्च ताभ्यां धनमानमदाभ्याम अन्विताः। इदं भाज्यमुपलक्षणं धनमाननिमित्तो यो मदस्तेनान्वित इत्यस्यापि नामयज्ञेनाममात्रैर्यज्ञस्ते यज- न्ते, यतो दम्भेन धर्मध्वजिवयाऽविधिपूर्वकं विहिवारुविकर्तव्यतापूर्वकं यथा न भवति तथेत्यर्थः ॥ १७॥ ५० टी०-आत्मेति। आत्मना स्वेनैव संभाविताः यूज्यंती नीता नान्यैः कैश्चित् । तावतेव स्तब्धा अनम्राः धनमानाभ्यां मदो गर्वस्तेनान्विताः सन्तो दम्भेन यर्यजन्ते न पामार्थबुद्धया । तथापि यज्ञफलं प्राप्स्य- न्त्येवेति चेत्तत्राह-अविधिपूर्वकमिति । द्रव्यपात्राद्यशुद्धिरविधिस्तत्पूर्वक कर्म फलाय न भवतीत्यर्थः ।।१७॥ रा० टी०-यागादि कुर्वता कथं नरके पाव इत्यत आह-आत्मेति । आत्मनैव स्वेनैव संभाविताः बगुगता: वयं पूज्या इति मन्यमाना इति यावत् । अत एव स्वव्याः ,अनम्राः धननिमित्तगर्वदर्पाभ्याम् उपेतास्ते अविधिपूर्वकं दम्भेन स्वमहित्वप्रदर्शननिमित्तेन यज्ञज्योतिष्ठोपादिभिर्यजन्ते नाए । न कृतार्थ- बुद्धचा अतो नरकमासिस्वेपामिति भावः ।। १७॥ अहङ्कारं बलं दर्प काम क्रोधं च संश्रिताः॥ मामात्मपरदेहेषु प्रदिपन्तोऽभ्यसूयकाः ।। १८॥ तक टी-अविधिपूर्वकत्वं (च) स्वभाववैपरीत्यादित्याह-अकारमिति । अनात्मनि पाश्च भौतिक आत्मत्वाभिमानोऽहङ्कारस्तं संश्रिताः । वलं परपीडाकरणसामथ्र्य, दर्प दो नाम स्वस्य पूज्यत्वातिशयबुया पानादरस्त, कामं स्पादिभोगासक्ति, प्रो स्परसंज्ञपजननरूपमन्तर्जल- नमेतान् दोपान् संश्रिताः मामीश्वरमात्मपरदेहेषु तत्तद्बुद्धिसाक्षितया वर्तमानं प्रतिपन्तों मच्छासना. तिक्रमः प्रदे॒पस्तं कुर्वन्तः अभ्यसूयकाः सन्मार्गवर्तिनां सतां गुणेषु दोपारोपकाः ॥८॥ म० टी-यक्ष्य दास्यामीत्यादिमङ्कल्पेन दम्भाहकारादिप्रधानेन प्रवृत्तानामातुराणां वहिरङ्गसावन.
१११४ - श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १६ श्लो०१८] मपि यागदानादिकं कर्म न सिध्यति, अन्तरङ्गसाधनं तु ज्ञानवैराग्यभगवद्भजनादि तेपो दूरापास्तमैवे- त्याह-अहंकारमिति । अहमभिमानरूपो योऽहङ्कारः स सर्वसाधारणः। एतस्त्वारोपितैगैरात्मनो महत्त्वा- भिमानमहंकार तथा वलं परपरिभवनिमित्तं शरीरगतसामर्थ्यविशेष दपै परावधीरणारूपं गुरुनृपाद्यति- क्रमकारणं चित्तदोपविशेष काममिष्टविपयामिलापं क्रोधमनिष्टविषयद्वेष, चकारात्परगुणासहिष्णुत्वरूपं मा- सर्यम् । एवमन्यांश्च महतो दोपान् संश्रिताः । एतादृशा अपि पनितास्तव भक्त्या पूताः सन्तो नरके न पतिप्यन्तीति चेन्नेत्याह-मामीश्वरं भगवन्तं आत्मपरदेहेषु आत्मनां तेपामासुराणां परेषां च तत्पुत्र- भार्यादीनां देहेपु प्रेमास्पदेषु तत्तद्गुद्धिकर्मसाक्षितया सन्तमतिप्रेमास्पदमपि दुर्दैवपरिपाकात् प्रदिपन्तः ईश्वरस्य मम शासनं श्रुतिस्मृतिरूप तदुक्तार्थानुष्ठानपराङ्मुखतया तदतिवर्तनं मे प्रद्वेपस्तं कुर्वन्तः । नृपाद्या ज्ञालनमेव हि सत्मद्वेप इति प्रसिद्धं लोके । ननु गुर्वादयः कथं तानानुशासति नत्राह-अभ्यसूयका: गुवा- दीनां वैदिकमार्गस्थानां कारुण्यादिगुणेषु प्रतारणादिदोपारोपका: । अतस्ते सर्वसाधनशून्या नरक एवं पतन्तीत्यर्थः । मामात्मपरदेहेप्वित्यस्यापरा व्याख्या-स्वदेहे परदेहेषु च चिदंशेन स्थितं मां प्रतिपन्तो यजन्ते दम्भयज्ञेषु श्रद्धायाः अभावादीक्षादिनात्मनो वृथैव पीडा भवति । तथा पश्वादीनामप्यविधिना हिंसया पैतन्यद्रोहमानमवशिष्यत इति । अपरा व्याख्या-आत्मदेहे जीवानाविष्टे भगवल्लीलाविरहे वासुदेवादिसमाख्ये मनुष्यत्वादिनमान्मां प्रद्विपन्तः । तथा परदेहेषु भक्तदेहेषु प्रहादादिसमाख्येषु सर्व- दाऽऽविर्भूतं मां प्रद्विपन्त इति योजना । उक्तं हि नवमे- अवजानन्ति मां मूढा मानुपी तनुमानितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ मौघाशा मोपकर्माणो मोघलाना विचेतसः । राक्षसीमासुरी चैव प्रकृति मोहनी श्रिताः ॥' इति । 'अव्यक्त व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । इति चान्यत्र । तथा च भजनीये द्वेपान भक्त्या पूर्तता तेषां संभवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ सं० टीc-किं च-अहंकारमिति । अहमेव कुलशीलसंपन्नः सर्वशास्त्रपारगः सर्वज्ञो धमिधः सर्वोत्तम इति येन स्वमुस्कृष्टं मन्यते सोऽसावहंकारस्तं वलं कामरागज दर्प दृप्ततां काम क्रोधं चकारान्मोहलो- भपारुप्यादिबुद्धिदोपान् संधिवा आत्मपरदेहेषु परदेहे आत्मदेहेषु च मामात्मानं प्रत्यालक्षणं द्विपन्त- ममान्तर्यामित्वमननीमय मां द्विपन्न: यद्वा आत्मनो मम देहादिव्यतिरिक्तत्वं नित्यत्वं चैतन्यमानत्वमझर्तृ. त्वमभोक्तृत्वं चानझीमत्य प्राण द्विपन्तः तव एवाभ्यसूयका आत्मनो देहव्यतिरिक्तत्वनित्यत्वैकत्वपूर्ण- त्वाविनियत्ववादिना सत्पुरुषाणां गुणेपु दोपारोपका: लोके य आसुरा बौद्धाचाराः प्रभवन्ति ।। १८ ।। श्री०टी०-अविधिपूर्वकत्वमेव प्रपश्चयति-अहंकारमिति ।. अहंकारादिसंश्रिताः सन्तः आत्मपर- देहेषु स्वदेहेषु परदेहेषु च चिदंशेन स्थितं मां प्रद्विपन्तो यजन्ते । दम्भयतेपु श्रद्धाया अभावात् आत्मनो वृथा पीडा भवति । तथा पश्चादीनामपि अविधिना हिंसायां चैतन्यद्रोहमात्रमेवावशिष्यत इति प्रद्विपन्त इत्युक्तम् । अभ्यसूयकाः सन्मार्गतिनां गुणेषु दोपारोपकाः ॥ १८ ॥ स. टी.-यक्ष्य इत्यादिसंकल्पैः प्रवृत्तानां विकर्मणि ॥ नास्ति रागादिभीशुद्धिहेतुः किं पुनरीश्वरे॥१॥ रतिवैराग्ययाधादि नास्तीत्याइ जगत्पतिः ॥ आरोपितगुणैः स्वस्य महत्त्वाभिमविं श्रिताः ॥ २॥ बलं शरीरसामय पराभिभवकारणम् ॥ परावधारणारूपं दर्षे गुर्वाद्यतिकमम् ॥ ३ ॥ फाममिष्टामिलापं च । मो, द्वेषमनिष्टके ।। पीश्वर्यासहिष्णुत्वं मात्सर्य चात्तथा परान् ॥ ४ ॥ संश्रिता महतो दोपानरकादि. . भयावहान ॥ ईशा अपि भत्त्या पता: सन्ता न नारकीम् ॥ ५ ॥ यातनां वे गमिप्यन्तीत्याशयाह रमापतिः ॥ मां श्रीनारायण वेपामामुराणां वपुप्यपि ॥ ६ ॥ परेपां चैव तत्पुत्रमार्यादीनां मुरागिणाम् ।। प्रेमारपदेगु देहेषु वतद्धीकर्मसाधिगम् ॥ ७ ॥ परप्रेमाराई श्रीमद्भगमन्वमोक्षजम् गा दुर्दैवपरिपाकाते विप्रहरी - [अ० १६ श्लो० १९] वश्वप्रकाशिकायष्टीकोपेवा प्रद्विपन्तोऽभ्यसूयकाः ॥ ८ ॥ ममानुशासनावदस्मृतिरूपापरामुसाः ।। श्रुतिस्मृती ममैवाने वे उहत्वप प्रवर्तते ॥९॥ आनाभली मग द्वपीत्यादिरमृत्या तधेरितम् ।। अत: श्रुत्यर्थमुख्यं प्रद्वेपो मम नापरः॥१०॥ ननु गुदियः गिटाः कथं तान्नानुशासवि ॥ इत्यत्राहाभ्यसूयां ते कुर्वन्तः सजनेष्वपि ॥ ११ ॥ वेदमार्ग स्थिताना ते कारुण्यादिगुणेप्यति ॥ प्रतारणादिदोपाणामारोपणस्वभावकाः ॥ १२ ॥ स्वदेहे परदेहेपु चिदंशेन स्थितं हि माम् ॥ प्रद्विपन्वो यजन्ते वे दम्भयशेपु दिसया ॥ १३॥ पश्वादेरयथाशास्त्र साक्षाविदहकारिणः ।। वृथा दीक्षादिना पीडां सइन्त्यर्थोऽस्तु बोचरे ॥ १४ ॥ यद्वात्महे भगवतीला- ॥ वासुदेवसमास्येऽस्मिन् मनुष्यत्वादिविभ्रमात् ॥ १५ ॥ द्विपन्तः परदेहेषु भकदेहेषु मां हरिम् ॥ प्रहादादिसमास्येषु सदाविर्भूदमित्यपि ॥ १६ ॥ १८ ॥ भा० टी०-न फेवलं दम्भेनाविधिपूर्वकं यजन्त इत्येतावदेवापि तु-अहंकारमिति । अहंकारं विद्यमा- नैरविद्यमानश्च गुणैरात्मन्यध्यारोपितरात्मनो विशिष्टत्वाभिमानमविद्यारयं कटतम सर्वदोषाणां सर्वानर्थ- प्रवृधीनां च मूलं तथा वलं पराभिभवनिमित्तं शरीरादिसामथ्र्य कामरागान्विवं द धर्मातिकमहेतुमन्त:- फरणानयं दोपविशेष कामं रुयादिविषयं क्रोधमनिष्टविषयं चादेवानन्यांश्च मात्सर्यादीन् महतो दोपान् संश्रिताः । च न केवलमहंकारादीनेव संश्रिताः किं तु तदाश्रयणेन मामीश्वरमात्मपरदेहेषु स्वदेहे परदेहेषु च तद्बुद्धिक साक्षिणं मां प्रद्विपन्तः श्रुतिस्मृतिरूपमच्छासनाविवर्तित्वं वदुतार्थानुष्ठानपराङ्मुसत्वं मद्देपस्तं कुर्वन्तः दम्भेनाविधिपूर्वकं यजनं स्वदेहपीडनमहंकारादिकं मदवज्ञानं च श्रुतिस्मृतिप्रतिपिद्धं समा- शिवा मदाज्ञातिवर्तिन इत्यर्थः । ननु सत्कर्मस्थानामनुवृत्ति किमिति न फुर्वन्धीति चेत्तत्राह-तेपां गुणेप्नभ्य- सूयकाः समासरा दोपाविष्करणशीलाः ॥ १८ ॥ ५० टी०-वदेव प्रपञ्चति-अहंकारमिति । अहङ्कारादीन् संश्रिवा आत्मपरदेहेपु चिदंशत्वेनावस्थित मां द्विषन्तोऽविधिपूर्वकं यजन्तो मृपैव स्वदेहं छेशयन्ति । पञ्चादिहिंसायां च परदेहमत एवोभययोनिमेव द्विपन्वोऽभ्यसूयकाः सन्मार्गवर्तिनां गुणदोषारोपकाः ॥ १८ ॥ रा० टी०-सर्वकर्मकारयिवारं सर्वान्तर्यामिणं त्वां कुवो न यजन्त ' इत्यत आह अहंकारमिति । अहंकारादिसंश्रिवाः सन्तः आत्मदेहे परदेहेषु च नियामकतया स्थितं मां प्रद्विपन्तः । यदि ईश्वरः कार- यितास्ति वहींदानीमकुर्वाणं मां कारयतु कुणिं च विघातयतु इत्येवं भगवदपलापरूपप्रद्वेष कुर्वन्तः । अभ्यसूयकाः निर्दोपे दोपान्वदन्तः । गुणपूर्णे गुणहीनतां वदन्तः यजन्तु इत्यनुपजते ॥ १८ ॥ तानहं दिपतः करान् संसारेषु नराधमान ॥ क्षिपाम्यजसमशुभानासुरीवेव योनिषु ॥ १९ ॥ तटी-एचमामुराणां प्रवृत्ति स्वभावं चोक्त्वेदानी तेषां नित्यसंमृतिरूपामधोगति फलमाह- तानिति द्वाभ्याम् । तान् मां साधूंश्च द्विपतः क्रूरानत्युग्रस्वभावान् संसारेषु जन्ममरणादिमागेपु तत्राप्यासुरीष्वेव योनिषु अजस्रं निरन्तरं क्षिपामि । तत्स्वभावानुगुणमुत्तरोत्तरं क्रूखुद्धिमेव तेपां. वर्धयामीत्यर्थः ॥ १९॥ म०टी०-तेपात्वत्कृपया कदाचिनिस्तार: स्यादिति नेत्याह-तानिति। वान सन्मार्गप्रतिपक्षभूतान् द्विषतः साधून मा च क्रूरान् हिंसापरान् असो नराधमान् अविनिन्दितान् अजस्रं सन्ततमशुभान अशुभकर्मका- रिणः अहं सर्वकर्मफलदातेश्वरः संसारेष्वेव नरकसंसरणमार्गेपु क्षिपामि पातयामि । नरकगताच आमुरीप्वेव अतिरासु व्याघ्रसपादियोनिपु तत्तत्कर्मवासनानुसारेण क्षिपामीत्यनुपज्यते । एतादृशेषु द्रोहिपु नास्ति ममे.
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१११६
श्रीमद्भगवद्गीता
[अ० १६ ऋ० १९]
श्वरस्य कृपेत्यर्थः । तथा च श्रुति:-"अथ[य इह]कपुयपरणा: अभ्याशो ह यत्ते कपयां योनिमापद्येरन् श्वयोनि
वा शूकरयोनि वा चण्डालयोनि वा इति । कपूयचरणाः कुत्सितकर्माणः अभ्याशो ह शीघ्रमेव कपूयां
कुत्सिता योनिमापद्यन्त इति श्रुतेरर्थः । अत एव पूर्वपूर्वकर्मानुसारित्वान्नेश्वरस्य वैपन्यं नैपुण्यं वा ।
वथा च पारमा सूत्रम् 'वैपन्य घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथा हि दर्शयति' इति । एवं च पापकर्माण्येव तेषां
कारयति भगवान् तेषु तद्वीजसत्वात् । कारुणिकस्वेऽपि तानि न नाशयति तन्नाशकपुण्योपचयाभावात् ।
पुण्योपचयं न कारयति तेपामयोग्यत्वात् । न हीश्वरः पापाणेषु यवागुरान् करोति । ईश्वरत्वादयोग्यस्यापि
योग्यतां संपादयितुं शक्नोतीति चेत्, शक्कोत्येव सत्यसंकल्पत्वात् , यदि संकल्पयेत्। न तु संकल्पयति आज्ञा-
लादिपु स्वभक्तद्रोहिपु दुरात्मस्वप्रसन्नत्वात् । अव एव श्रूयते ' एप उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यगुन्नि-
नीपते, एप उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीप' इति । येषु प्रसादकारणमस्त्याज्ञापालनादि तेषु
प्रसीदति । येषु तु तद्वैपरीत्यं तेपुन प्रसीदति सति कारणे कार्य कारणाभावे कार्याभाव इति किगत्र वैपन्यम्!
' परात्तु तच्छ्रुतेः' इति न्यायाच । अन्ततो गत्वा किंचिद्वैपम्यापादने महामायत्वाददोपः ॥ १९ ॥
शं० टी०-किंच-तानिति । मां द्विपतः स्वदेहपरदेहेपु मामात्मानं द्विपतस्तत एव रान क्रूरकर्मणो दया-
सत्यशौचाचारशून्यानशुभानमङ्गलाचारनिरतानत एव नराधमान् वानासुरान्निरुक्तासुरसंपद्विशिष्टान् जनान्
तत्कृतदुष्कर्मभिः संसारेपु संसारमार्गेपु। यद्वा संनियन्ते भुज्यन्त इति संसारा जननमरणादिसेदास्तेष्वनु-
भाव्येषु सत्सु तदनुभूत्यै आसुरीष्वेवातिकूरासु शुनकसूकरसर्पव्याघ्रादियोनिषु क्षिपामि तत्कर्मानुरूपामेव
शुनकादियोनिमजलं पुनः पुनः प्रापयाम्यहमीश्वरो मदाज्ञाच्छेदिनी जनानित्यर्थः ।। १९ ॥
श्री० टी०-तेषां च कदाचिदप्यासुरस्वभावप्रच्युतिर्न भवतीत्याह-तानिति द्वाभ्याम् । वानई मां द्विपतः
फरान्संसारेपु जन्ममृत्युमार्गेषु तत्रापि आसुरीष्वेव अतिक्रूरासु व्याघ्रादियोनिषु अजस्रमनवरतं क्षिपामि,
पां पापकर्मणां तादृशं फलं ददामीत्यर्थः ॥ १९॥
स० टी०-तेषां त्वत्कृपया जातु निस्तारः स्यादिति चेत् ॥ मैवं सन्मार्गशत्रूस्तान्मां साधून्दूिपतः
शठान् ॥ १॥ हिंस्रान्सुनिन्दिताचारानित्यं चाशुभकारिणः ॥ अहं सर्वेश्वरः कर्मफलदाता यथायथम्
॥ २ ॥ संसारेपु सदा दुःखमार्गेपु नरकेपु च ॥ पावयामि ततस्तांश्च व्यावसादियोनिषु ॥ ३ ॥ क्रूरा-
स्वन्यासुरीप्वेव तत्तत्कर्मानुसारतः ॥ एतादृशेषु दुष्टेषु माकपा नास्ति कहिंचित् ।। ४ ॥१९॥
भा० टी०-उक्तविशेषणवताभासुराणा गतिमाह-तानिति । तान्सन्मार्गप्रतिपक्षमूतान् साधुद्वेषिणो.
द्विपन्तब्ध माँ ऋरान् व्याघ्रादिकूरजन्तुतुल्यान् अजस्रं सततम् अशुभानशुभकर्म कारिणोऽतो नराधमानरेप्व.
तिनिकृष्टानहं धर्माधर्मफलप्रदाता परमेश्वरोऽधर्मदोपवत्वात्संसारेषु नरकसंसरणमार्गेषु आसुरीवेव क्रूरकर्म-
प्रायासु सिंहव्याघ्रादियोनिपु क्षिपामि संसारेऽस्मिलोके. इपयः परमर्मभेदकत्वात् संसारेपर: ते च ते
नराधमाश्चेति विपहंस्तु फलशून्यकुकल्पनालम्यवादाचायः परित्यक्तः ॥ १२ ॥
५० टी०-तेपां कदाचिदप्यामुरयोनिप्रच्युतिर्न भवतीत्याह-तानिति द्वाभ्याम् । वान् मां द्विपतः
फ़्रान् नराधमान् मनुष्ययोनिप्वप्यधमान् संसारेषु जन्ममृत्युमार्गेपु तत्राप्यासुरीपु योनिषु व्याघ्रसर्पधि-
फादिहिनयोनिवजसं निरन्तरं क्षिपामि ॥ १९ ॥
रा०टी०-नरके पतन्वीत्येवावदेव न तेषां फलं किंतु किंचित्कालं संसारमनुभूय पश्चान्नित्यनरकमपि
मयैव प्राप्नुवन्तीत्याइ-तानिति द्वाभ्याम् । वान्प्रवृति चेत्यादिनोक्तान्द्विपतः जगन् अव एवाशुभानरा-
धमान्संसारेषु वाणासुरयोनियु, अनसं पुनः पुन: क्षिपामि स्थापयागि ॥ १९ ॥
[अ० १६ ० २.] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोयेता आसुरी योनिमापन्ना मृदा जन्मनि जन्मनि ॥ मामप्राप्यैव कौन्तेय ! ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥ २० ॥ त० टी०-ततस्ते-आसुरीमिति । मूढा विवेकशून्या मच्छासनविपरीताचरणाश्रयां योनिमा- पन्नाः जन्मनि जन्मनि पुनः पुनस्तमोबहुलास्वेव जायमाना मां सर्वधरं सर्वकर्मफलमदातारममाप्येव गुरुशासोपदेशाभावेन अस्ति परमेश्वरो भगवान्चासुदेवः सर्वाराध्य इति ज्ञानपपाप्यैव ततो मद्विषया- ज्ञानादधमां श्वशूकरादियोनिरूपां गतिं फलं यान्ति प्रामपन्ति ॥ २०॥ म० टी०-ननु तेपामपि क्रमेण बहूना जन्मनामन्ते श्रेयो भविष्यति ? नेत्याह-आसुरीमिति । ये कदाचिदासुरी योनिमापनावे जन्मनि जन्मनि प्रतिजन्म मूढास्तमोबहुलत्वेनाविवेकिनस्वतस्तस्मादपि यान्त्यधमा गति निकृष्टतमां गतिम् । मामप्राप्येवि न मत्प्रातो काचिदाशङ्काप्यस्ति, अतो मदुपदिष्टं वेदमार्ग- मप्राप्येत्यर्थः । एवकारस्तियवस्थावरादिपु वेदमार्गमासिस्वरूपायोग्यवां दर्शयति । तेनात्यन्ततमोबहुलत्वेन वेदमार्गप्राप्तिस्वरूपायोग्या भूत्वा पूर्वपूर्वनिकृष्टयोनितो निकृष्टवमामधमा योनिमुत्तरोचरं गच्छन्तीत्यर्थः । हे कौन्तेयेति निजसंवन्धकयनेन त्वमिवो निस्तीर्ण इति सूचयति । यस्मादेकदा आसुरी योनिमापनानामुत्त- रोत्तरं निकृष्टतरनिकृष्टतमयोनिलाभो न तु वत्प्रतीकारसामर्थ्यमत्यन्ततमोवदुयत्वात् , तस्माद्यावन्मनुष्यदेह- लामोऽस्वि तावन्महताऽपि प्रयलेनासुर्याः संपदः परमकटतमायाः परिहाराय त्वरयैव यथाशक्ति देवी संपदनुष्ठेया श्रेयोथिभिरन्यथा निर्यगादिदेहप्राप्तौ साधनानुष्ठानायोग्यत्वांन्न कदापि निस्तारोऽस्तीति महत् संकटमापद्येवेति समुदायार्थः । वदुक्कम् । इहैव नरकच्यावेचिकित्सां न करोति यः । गत्वा निरोप, स्थान सरुजः किं करिष्यति । इति ॥ २० ॥ शं० टी०-ननु शुनकादियोनिषु प्रवेशितानामपि देपा बहुजन्मनामन्ते मोशः स्यादेवेत्याशङ्कायां न, इमानि शुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति । जायस्न म्रियस्त्रेति श्रवणाद्वेदविरुद्धाचारनिरताना पा- पिष्ठानां तेपा पुनःपुनर्जननमरणे विना न कदाचिदपि मत्प्रातिरस्तीत्याह-आसुरीमिति । अनेकचित्त- विभ्रान्ताः कामभोगप्रसका अशुचिनता मूढाः स्वकीयदोपातिशयादेव जन्मनि जन्मनि प्रविजन्माया- सुरीमेव योनिमापन्नाः सन्तो मागप्राप्य-अन मामिति मच्छब्देन स्वप्राप्तिसाधनं लक्ष्यते-मा मत्प्राति- योग्यं मानव देहमप्राप्यैव वतोऽप्यासुरयोन्यपेक्षयाऽधमा निमा वृक्षशपाणादिरूपा वा पैशाची वा गति गम्यत इति गतिस्तनुं यान्ति । न तु तामेव पुनः शुनकादियोनिमपि प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । प्रवृत्ति प.निवृति चजना न विदुरित्यारभ्य ततो यान्त्यधमा गतिमित्यन्तेन ग्रन्थेन रजस्वमोदोपपितान्तरङ्गाणामासुराणा या संपत्तस्याः फलमधोध.पतनं विना न कदाचिदपि श्रेय प्राप्तियस्मानारित तस्माद्बुद्धिमान् सदा सदसद्विवेकी पुरुषः पुरु- पत्वसिद्धेः साफल्याय स्वयं विवेकभ्रंशहेतोयोनिप्राप्ते पूर्वमेनासुरसंपत्तेणियो भूत्वा.सदा सदसद्विवकरैरा- ग्याभ्या परमपुरुषार्थाय येतेवेति सूचितं भवति । तेनासुरसंपदन्धायैव न कचिन्मोक्षायेति सिद्धम् ॥२०॥ श्री०टी०-किंच-आसुरीमिति । ते च मामप्राप्यवेत्येवकारेण मत्प्रातिशक्षा कुवस्तेपा मप्राप्त्युपाय सन्मार्गमप्यप्राप्य ततोऽप्यधमा कृमिकीटादियोनि गति यान्तीयुक्तम् । शेपं स्पष्टम् ॥ २० ॥ स०टी०-बहूना जन्मनामन्ते ह्यासुराणा क्रमादपि ॥ नास्ति श्रेयोऽचिनिन्यत्वादित्याह भगवान्स्व- यम् ॥ १ ॥ ये तु ज्ञात्वाऽऽसुरी योनिमापन्ना प्रतिजन्म वे ॥ मूढास्तमस आधिक्यादविवेकिन एव च ॥२॥ तस्मादप्यधमा योनि मामप्राप्येव यान्ति वे ॥ अतो मदुपदिष्टं ते वेदमार्ग मनागपि ॥३॥ अप्राप्य नैव मदतीवधिकार प्रयान्त्यपि ॥ वस्मायावन्न्देहेन संन्यस्तावदेव हि ॥ ४ ॥ परिहत्या- श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १६ हो० २१] मुरीं दुष्टां संपदं नरकावहाम् ॥ महतापि प्रयत्नेन देवी संपदमाश्रितः ॥ ५॥ भगवन्तं भजेत्प्राज्ञो यावन्मृत्युन चापतेत् ॥ तहते न कदाप्यस्ति निस्तारः संसृतेरिति ॥ ६ ॥ सूचितं हरिणा साक्षा- त्तदुक्तं च स्मृतावपि ॥ इहैव नरकव्याधेश्चिकित्सां न करोति यः ॥ ७ ॥ गत्वा निरौपचं स्थान सरुजः किं करिष्यति ॥८॥२०॥ भा० टी०-ननु तेषामपि क्रमेण यहूना जन्मनामन्ते श्रेयो भविष्यति ?-नेत्याह-आसुरीमिति । मूढा अविवेकिनो जन्मनि जन्मनि प्रतिजन्मासुरी योनिमापन्ना: प्राप्ता मामीश्वरमप्राप्यवानासायैव मत्प्राप्तिशङ्काया अप्यभावात् । मच्छिष्टसाधुमार्गप्राप्तिमप्राप्येत्येवकारेण सूचिंतम् । तत आसुर्या योनितोऽप्यधमा निकृष्टां गति यान्ति तेषां श्रेयः कदापि न भविष्यनीति भावः । कौन्तेयेविसंबोधयन् त्वं तु मपितृष्वसपुत्रत्वान्मां प्राप्यासुर्यादियोनिपु गन्तुमयोग्योऽसीति मा शुच इति द्योतयति । यस्मादासुरीसंपदनपरंपरारूपा सर्व पुरुषार्थपरिपन्थिनी तस्मादैवानुग्रहात् मानुपी योनिमापन्नैः सर्वथैवेयं परिहरणीयेति समुदायार्थः ॥ २० ॥ प० टी०-अथासुरयोनिसंस्कारवशान्नीचनीचतरयोनिपूत्पद्यन्ते इत्याह-आसुरीमिति । आसुरी योनि- मापन्नाः प्राप्ता जन्मजन्मनि मूढा ज्ञानलवशून्या भवन्ति । अतो मामप्राप्याधमां गतिं यान्ति । श्रुतिरपी- शावास्योपनिपल्सु-" आसुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः। तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चारम- हनो जनाः ॥ इति । भाष्यम्-ये लोका आसुर्या नाम असुराणामंशभूता आसुर्यास्ते अन्धेन तमसा निधि. उतराज्ञानेन वृता आच्छन्नाः सन्ति । अथ ते के ? ये आत्महन आत्मघावका: पश्वादिहिंसारतास्ते प्रेत्य देहं त्यक्त्वा वान् पूर्वोक्तान् लोकानभिगच्छन्ति, यतः पुननिस्तारो नास्तीत्यर्थः ॥ २० ॥ रा० टी०-आमुरीमिति । ततो मूढाः सामसस्वभावाः जन्मनि जन्मनि अनेकजन्मसु आसुरी योनि- मापन्नाः मामप्राप्येवाधमा नित्यूनरकलक्षणा गतिं यान्ति ॥ २० ॥ त्रिविधं नरकस्येदं दारं नाशनमात्मनः ।। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत् ॥ २१ ॥ त० टी० एवमुक्तः सर्व आसुरभावः । इदानी सर्वानर्थस्यामुरीसंपदश्च मूलं यत्परिहारेण सर्वा- नर्थः परिहतो भवति, तत्रिविधं परित्यागार्थमाह-त्रिविधमिति । त्रिविधं त्रिप्रकारं नरकस्य नर- कमाप्तौ इदं द्वारमस्ति । किंभूतं ? आत्मनो नाशनं यद्वारं प्रविशन्नेव पुरुपो नश्यति सर्वपुरुषार्थर- हितो भवति । कि तत्रिकं ? कामः क्रोधस्तथा लोभ इति । यस्मादात्मनो नाशनं नरकस्य द्वारं तस्मा- देतत्कामादिमयं त्यजेत् यत्नतः परिवर्जयेत् ॥ २१ ॥ म०टी०-नन्वासुरी संपदनन्तभेदयवी कथं पुरुषायुपेणापि परिहर्तुं शक्यतेत्याशङ्कय ता संक्षिप्याह-- विविधमिति । इदं विविधं त्रिप्रकारं नरकस्य प्राप्तौ द्वारं साधनं सर्वस्या आसुरीयाः संपदो मूलभूतं आत्मनो नाशनं सर्वपुरुपायोग्यतासंपादनेनात्यन्वाधमयोनिप्रापकम् ? किं तदित्यत आह-कामः क्रोध- स्त्या लोभ इति । प्राग्व्याख्यातम् । यस्मात्तत्रयमेव सर्वानर्थगूलं तस्मादेतवयं त्यजेत् । एतप्रयत्यागेनेव सर्वाप्यामुरी संपत्त्यका भवति । एतयत्यागश्च उत्पन्नस्य विवेकेन कार्यप्रतिवन्धः । वसः परं चानुत्पत्ति- रिति दृष्टव्यम् ॥ २१॥ शं० टी०-प्रतिपादितायात्वासुरसंपचे सर्वस्वमव पर्यवसितमेतपितये परित्यके प्रधानमनिनहण- न्यायेनाऽऽसुरी संपत्सर्वापि परित्यक्ता स्याचतो मुमुक्षौरवश्यमेतत्रितयं त्यक्तव्यम् । एतत्त्यक्त्वा स्वधर्मेण अयासापनमनुतिष्ठतः पुंस, परमपुरुषार्थः सिध्यतीवि प्रतिपादयति-निविधमिति द्वाभ्याम् । नरलेनो
.
[अ० १६ श्ले० २२] तत्त्वप्रकाशिकायष्टदीकोपेता
स्कृष्टजन्मवतां नराणां निरतिशयमकं दुःखं यत्र तन्नरकं शुनकसूकरादिनीचयोनिः नरकमिति शकन्ध्वादिक
रूपं तस्य नरकस्य. श्वादिनिकृष्टयोनिरूपस्य प्राप्ते: कामः क्रोधो लोभ. इति त्रिविधं विप्रकारकमेव द्वार
प्रवेशमा नैवैतादृशं द्वारमन्यदस्तीत्यर्थः । ननु कामादीनां नीचयोनिमासिद्वारत्वमस्तु स्त: का जो हानि- .
रित्याशङ्कायामाह-नाशनमिति । जन्मान्तरानेककृवपुण्यातिशयान्मनुप्यत्वपुरुषत्वनाक्षणत्ववेदायधीतिमत्व-
विवकिवलक्षणं मोक्षसोधान्तमारूढस्यात्मनः स्वस्पाधिकारिणो मुमुक्षोः कामादित्रयमेतत्पुरुषार्थस्य नाशक
भवति धर्माधर्मकर्तव्याकर्तव्यार्थानर्थवन्धमोक्षविवेकविज्ञानं नाशयतीत्यर्थः । नहि कामाकुलस्य क्रोधाविष्ट-
स्य वा लोभनमस्तस्य वा धर्माधर्मादेविवेकविज्ञानं भवति तद्भावे पुरुषो विनश्यत्येव । मनुष्यत्वाद्युत्कृष्टमो-
क्षसाधनसंपत्त्या मोक्षसीधान्तमारूदोऽपि प्रमादेन तालारूढ इस कामादिभिरधः पातितः सन् निःशेष विन.
श्यति ।नायुधात्पतिवस्य स्वरूपनाशं विना किंचिच्छेषं सिध्यत्यत एवोच्यते नाशनमात्मन इति । यस्मादेवं
कामादीनां प्रमावस्तरमान्मुमुक्षुर्विवेकसंपन्नस्तत्स्वभावं ज्ञात्या स्वाविनाशाय चण्डालमिव कामं कृष्णसर्प-
मिव को, मलभिर से चैतत्रयं दूरतस्त्यजेन तेषां गोचरो भवेदित्यर्थः ॥ २१ ॥
श्री०टी०-उक्तानामासुरनोपाणां मध्ये सकलदोपमूलभूवं दोपत्रयं सर्वथा वर्जनीयमित्याह-त्रिविध.
मिति । काम: कोधो लोमश्वेवीदं प्रिविधं नरकस्य द्वारम् । अत एवात्मनो नाशनं नीचयोनिप्रापकम् ।
तस्मादेतनयं सर्वागना त्यजेत् ॥ २१ ॥
स. टी-तनु वर्षशतेनापि परिहतु न चासुरी ॥ शक्यतेऽनन्तभेदाब्येत्याशङ्कयाह समासतः ॥ १ ॥
साधनं नरकप्राप्तौ त्रिप्रकारमिदं शृणु । आसुर्याः संपदो मूलं पुरुषार्थकघातकम् ॥ २ ॥ यस्मादेतत्रयं
सर्वानर्थमूलमुदीरितम् ॥ तस्मादेतत्रयत्यागात्त्यक्ता सर्वासुरी भवेत् ॥ ३ ॥ उत्पनस्य त्रयस्यास्य विवे-
फेन विरगिवः ।। कायस्य प्रतिवन्धो हि त्यागोऽनुत्पत्तिरेव च ॥ ४ ॥ २१ ॥
भा० टी०-नत्वनन्तभेदक्तीयमासुरी संपत्पुरुषायुपेणापि परिहर्तुमशस्वेत्याशङ्कय सर्व आसुरसंपढ़े.
दोऽनन्तोऽपि यस्मिन्नन्धर्भवति यत्परिहारेण परिहृतश्च भवति तत्सर्वानर्थमूलभूतं दर्शयति-त्रिविषमिति ।
त्रिविधं त्रिप्रकारमिदं नरकस्य नरकप्राप्तौ द्वारमात्मनो नाशनं यद्वारं प्रविशन्नेवात्मा नश्यति न
करमैचित्पुरुषाय योग्यो भवति । किं तत् ? काम, क्रोधस्तथा लोभः इति त्रिविधं नरकस्य द्वार नाशनं-
मात्मनस्तस्मादेतत्कामादित्रयं श्रेयोर्थी त्यजेत् ॥ २१॥'
५० टी०-अथोक्तानामसुरदोषाणां मध्ये सकलदोपमूलभूतं दोपत्रयं सर्वथा वर्जनीयमित्याह-विविध-
मिति । इदं प्रोच्यमानं नरकस्य निरयप्राप्तेदार त्रिविधमस्ति । तत्किम् ? कामः क्रोधस्तथा लोभः । तत्र
कामनया विषयीक्रियतेऽसौ कामोऽमिलापः तस्य प्रयत्नादप्राप्ती क्रोधमातौ च प्राणाप्यधिकयत्नेन संर-
क्षणं लोभः, एतत्त्रयम्। किंभूतम् ? अत्मनो नाशनमधमयोनिप्रापकं तस्मात्सर्वप्रयत्नेनैतत्रयं त्यजेत् ॥२१॥
रा० टी०-उक्तेपु पुमर्थविरोधिषु प्रवानदोपत्रयमवश्यं त्याज्यमित्याह-त्रिविधमिति कामः क्रोधः लोभ
इति इदं त्रिविधं नरकद्वारं नरकसाधनम् । अत एव आत्मनो नाशनमनप्रापकम् । तस्मादेतत्रयं त्यजेत् ।
ततश्च कारणाभावानरकायामप्रातिरिति भावः ॥२१॥
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय ! तमोरास्त्रिभिर्नरः॥
आचस्त्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥ २२ ।।
त० टी०-तत्त्यागमेव श्रेयोहेतुत्वेन स्तौति-एतैरिति । एतैः कामक्रोधलोभैस्तमोतारैस्तामि-
सान्धवामिनादिनरकस्य द्वारभूतैत्रिभिर्विमुक्तो विशेपतो मुक्तो नर आत्मनः श्रेयो मोतसाधन-
माचरति मद्भतिज्ञानोपाये यतते । ततो ज्ञानभक्तिपरिपाकात्परां गतिं परमफलं मामेव याति ॥२२॥
११२० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १९ो० २१] म० टी०-एतनयं त्यजयः किं स्यादिवि ववाह-एतैरिति । एतैः काममोपलोभेनिभिस्लमोद्वारेनरक- साधनैर्विमुक्तो विरहितः पुरुष आचरत्यात्मनः श्रेयो यद्धिवं वेदगोभित हे कौन्तेय, पूर्वहि कागादिनविनद्धा श्रेयो नाचरति येन पुरुषार्थः सिध्येत् । अश्रेयश्चाचरति येन निरयपात: स्यात् । अधुना तत्प्रवियत्परक्षितः सत्रयो नाचरति श्रेयश्चाचरति । नव ऐहिक सुसमनुभूय सम्यग्धीद्वारा यावि परां गति मोक्षम् ॥२२॥ शं० टी०-एवं कामादीनामधर्मप्रगृत्तिहेतुक्या नरकद्वारत्वं मुमुक्षुत्याज्यत्वं च प्रतिपाय पैवेषिमुकः श्रेय.साधननिष्ठो भूत्वा श्रेयः प्राप्नोतीत्याह-एतैरिति । नरो मुमुसुरधिकारी प्रामणादिविद्वान् तमो. द्वारेः तमसो नरफस्य द्वारेद्वारभूवैषिभिरेतेः कामक्रोधलोभैविमुचो विशिष्य निर्मुकः सन्नागनः स्वस्य श्रेयःसाधनं स्वाधिकारानुरूपं स्वाश्रमोचित धर्म वैदिकं वा श्रवणादिकं पा यदाऽऽचरति सम्यगनुतिष्ठति तवस्तेनैवानुष्ठानेन चिचशुद्धिद्वारा समुत्पन्नात्मज्ञानेन परागविं विदेहमुक्ति याति गच्छत्तीत्यर्थः ॥ २२ ॥ श्री० टी०-त्यागे च विशिष्टफलमाह-एतैरिति । तमसो नरकस्य द्वारभूतैरेवैषिभिः कामादिभिर्वि- मुक्तो नरः आत्मनः श्रेय साधनं तपोयोगादिकर्माचरति । ततश्च मोक्षं प्राप्नोति ॥ २२ ॥ स० टी०-किं स्यादेतत्रयत्यागात्पुंस एवच्छणु स्फुटम् ॥ एतैः कामादिभिपिविभिनरक साधनेः ॥१॥ पुमान्विरहितः श्रेयो यद्धितं वेदघोधितम् ॥ आचरत्यात्मनः सम्यग्धीद्वारैति परां गतिम् ॥२ ॥ कागा- दिपतिवद्धः प्राक् श्रेयो नाचरति स्वयम् ।। अश्रेयस्त्वाचरत्येव येन स्यानिरये स्थितिः ॥ ३॥ कामादि. शून्यः पुरुपो नाश्रेयश्चरति ह्ययम् ॥ श्रेयः सम्यकरत्येव दतो यावि परां गतिम् ॥ ४ ॥ २२ ॥ भा० टी०-एतेविमुक्तो लौकिकमुसोपयोगपूर्विका परां गति यातीत्याह-एतैरिति । एतैः कामादि- भिनिभिस्तमसो नरकस्य दुःखमोहात्मकस्य द्वारे: श्रेयःप्रवृतिप्रतिवन्धविमुक्तो नर आत्मनः श्रेय साधन मदाराधनादिकमाचरत्यनुविष्ठति । तवस्तदाचरणात् लौकिकमुखं भुक्त्वा परां गतिं मोक्षमपि यानि गच्छति । यः कामादिभिर्विमुफः स एव नरः सार्थकनरजन्मा च इतरे पशवो निरर्थकनरजन्मानधेवि सूच. यितुं नर इत्युक्तम् । त्वं तु कामादिविनिर्मुकायाः फुन्त्याः पुनत्वाचैविमुक्तः सन् लौकिक सुसं भुक्त्वा परां गतिं गन्तुं योग्योऽसीवि द्योतयन्नाह-कौन्तेयेति ॥ २२ ॥ ५० टी०-त्यागे च विशिष्टफलमाह-एतैरिति । तमसो नरकस्य द्वारभूतैरेतविमिः कामादिभिर्मुक्तो नर आत्मनः श्रेय.साधनं तपोयोगाद्याचरति । बकः परी शान्ति याति ॥ २२ ॥ रा० टी०-न केवलं कामादित्यागेन नरकाप्राप्तिः परमपुमर्थप्राप्तिधास्तीत्याह-एतैरिति । तमोद्वारेन- रकहेतुभिस्त्रिभिरेते: कामक्रोधलोभेर्विमुत्तो नरः भात्मनः श्रेयः पुमर्थसाधनमाचरति । ततः परां गति मोक्षं याति ॥ २२ ॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।। .न स सिद्धिमवाप्नोति न सुख न परां गतिम् ॥ २३ ॥ त० टी०-उक्तस्य सर्वस्यामुरभावस्य कामादेत्रिविधस्य नरकद्वारस्य च परिवर्जनं थेयआच- रणं च विधिनिषेधरूपशास्त्रज्ञानाधानमिति वक्तुं तदनादरेणाचरणं सर्वश्रेयोवाधकमित्याह-पः शास्त्रविधिमिति । यच्छब्देन शास्त्रीयकार्यानुष्ठानाधिकारी सामान्यो गृह्यते । जीवानां हितं शास्ति बोधयतीति शास्त्रं वेदस्तदुपजीविस्मृतिपुराणेतिहासादि तत्संबन्धी विधिरित्युपलक्षणं निपे- धस्य । तथा चैवं कुर्यादेवं न कुर्यादिति कर्तव्याकर्तव्यविषयो लिङ्गादिशब्दस्तमुत्सृज्योपेक्ष्य काम- कारतः स्वेच्छया यो वर्तते गुणकार्येषु प्रवर्तते स सिद्धि साधनसिद्धि कर्माद्युपायं कुर्वन्नपि नामोति । सिद्धयभावे न सुखमैहिकामुष्मिकं किमपि प्रामोति, न परां गति मुक्ति पामोति ।। २३ ।।
[अ० १६ श्लो० २३] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता म० टी०-यस्मादश्रेयोनाचरणस्य श्रेयआचरणस्य च शास्त्रमेव निमित्तं तयोः शास्बैकगम्यत्वात् वस्मात् यः शाखेति। शिष्यतेऽनुशिष्यतेऽपूर्वोऽथों बोध्यतेऽनेनेति शास्त्रं वेदः तदुपजीविस्मृतिपुराणादि च तत्संबन्धी विधिलिंडादिशब्दः कुर्यान्न कुर्यादित्येवं प्रवर्तनानिवर्तनात्मकः कर्तव्याकर्तव्यज्ञानहेतुविधिनि- पेयाख्यस्तं शास्त्रविधि विधिनिषेधाविरिकमपि ब्रह्मप्रतिपादकं शास्त्रमस्तीति सूचयितुं विधिशब्दः । उत्सृज्य अश्रद्धया परित्यज्य कामकारत: स्वेच्छामात्रेण वर्तते विहितमपि नाचरति निपिद्धमप्याचरति यः स सिद्धि पुरुषार्थप्राप्तियोग्यतामन्तःकरणशुद्धिं कर्माणि कुर्वन्नपि नाप्नोति न सुखमैहिक, नापि पर प्रकृष्टां गतिं स्वर्ग मोक्षं वा ॥ २३ ॥ शं० टी०-एवं दम्भदतिमानाद्यासुरसंपचिमतां वेदशास्त्रविधिमुलकप तदुक्तधर्माधर्मानुदस्य तत्फलप्रदा- वारं चापीश्वरमनादृत्य यथेष्टं कामोपभोगेपु परस्त्रहरणादौ च प्रवृत्तानां पापिष्ठानां पुनरारोहवर्जितमधः- पतनं प्रतिपाद्य स्वाज्ञानुहङ्गनाय पुनरपि य एवमेव प्रवर्तते सोऽप्यधोलोकमेव गच्छति, न मुक्तिवाती स्वप्ने- ऽपि विन्दतत्युिक्तमेवाथै द्रढयति-य इति । य: श्रुताध्ययनसंपन्नो ब्राह्मणादिरधिकारी शास्त्रविधि विधीयते अपूर्वोऽर्थो वोध्यतेऽनेनेति विधि: " अग्नीपोमीयं पशुमालभेत", "न कलजं भक्षयेत्" इत्येवं कर्तव्याकर्तव्यार्थ- प्रकाशकं शास्त्रविधि चोदनाविधि निपेवं चोत्सृज्याविचार्य शास्त्रविधिमुपेक्ष्येत्यर्थः।कामकारत: कामनया यथेच्छे पर्वते शास्त्रनियममुल्लच्य स्वेच्छानुरूपं श्रद्धाविधुरं कर्मानुष्ठानं यः करोतीत्यर्थः । स कामायत्तप्रवृचिः पुरुषः सिद्धिमविधिना कृतत्वात्तैः कर्मभिश्चित्तशुद्धि नाप्नोति । विध्युक्तस्यैव कर्मणः फलावश्यंभावित्वनियमात्तत एव स्वर्गीयं च सुसं न नाप्रोति । कर्मणां मुक्तिसाधनत्वाभावात्पर गति मोक्षं चापि नाप्नोति । यथेच्छमविधिना कर्म कुर्वाणः स्वर्गापवर्गोभयभ्रष्टो भवतीत्यर्थः ॥ २३ ॥ श्री०टी०-कामादित्यागश्च स्वधर्माचरणं विना न भवतीत्याह-य इति । शास्त्रविधि वेदविहितं धर्म- मुत्सृज्य य: कामकारतो यथेच्छं वर्तते, स सिद्धिं तत्त्वज्ञानं न प्राप्नोति, न च सुसमुपशम, न च परां गति मुक्ति प्राप्नोति ॥ २३ ॥ स० टी०-शिष्यते वोध्यतेऽनेनापूर्वार्थ इति शास्त्रकम् ॥ वेदस्तदुपजीव्येतस्मृत्याद्यपि तदेव च ॥१॥ तत्संवन्धिविधि यस्तु परित्यज्याविनास्तिकः ॥ स्वेच्छामात्रेण विहितं न करोति निपिद्धकृत् ॥२॥ स सिद्धिं चेतसः शुद्धिं पुमर्थप्राप्तियोग्यताम् ॥ नाप्नोति नैहिक सौख्यं न स्वर्ग नापवर्गकम् ॥ ३ ॥ २३ ॥ भा० टी०-आसुर्या: संपदः परिवर्जनस्य श्रेयआचरणस्य च किं कारणमित्यपेक्षायामुभयं शास्त्राप्रमा- णाच्छक्यं कर्तुं नान्यथाऽत उभयोः शास्त्रं कारणमिति बोधयितुं शास्त्रविधित्यागेऽनर्थमाह-य इति । शिष्यतेऽनुशिष्यवे वोध्यतेऽनेनाज्ञातोऽर्थ इति शास्त्रं वेदस्तदुपजीविस्मृतीतिहासपुराणादि च तस्य विधि: कुर्यान्न कुर्यादिति कर्तव्याकर्तव्यज्ञानकारणं शाखसंवन्धिविधिनिषेधाख्यस्वं यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य विहाय कामकारतः स्वेच्छानुसारेण वर्तते कामस्य करणं कामकारस्तस्माद्धेतोः शासविधिमुत्सृज्येवि वा संवन्धः। संसिद्धिं पुरुषार्थयोग्यतां चित्तशुद्धयादिलक्षणां नावाप्नोति नास्मिन्लोके सुसं नापि परां प्रष्ट गति स्वर्ग मोक्षं चाप्नोति ॥ २३ ॥ ५० टी०-कामादित्यागश्च स्वधर्माचरणं विना न भवतीत्याह-य इति । शावविधि वेदधर्ममुत्सृज्य यः कामकारत: स्वेच्छाचरणेन वर्तते स सिचिं तत्त्वज्ञानं न प्राप्नोति न सुसं तत्वज्ञानस्य फलरूपमान- सुखं वफलरूपां परा गर्ति मोक्षं न प्रानोति ॥ २३ ॥ रा० टी०-श्रेप:साधनानुष्ठाने अङ्गान्तरं विधातुं नदकरणे वाधकं तावदाह-य. इति । यः शाखोक- .
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १६ भो० २४] विधानमुत्सृज्य कामकारत, स्वेच्छामात्रेण यन पचित्प्रवर्तते स सिद्धिं पुमर्योपाय नावाप्नोति । सुखमैदिक परा गति मोक्षं वा नाप्नोति ॥ २३ ॥ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ॥ ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ २४ ॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिपत्सु देवासुरसंपद्विभागयोगो नाम पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ त० टी०-फलितार्थमाह-तस्मादिति । यस्माच्छास्त्राननीकारिणां न किमपि फलं भवति, तस्मात् कार्याकार्यव्यवस्थिती इदमित्यं वा कार्यमिदमित्यं वा न कार्यमित्यस्यां व्यवस्थाया ते तव दैवीप्रकृतिकस्य शाखं वेदस्तदुपवृंहणस्मृतिपुराणेतिहासादिक प्रमाण निधायकम् । अतः शास्त्रविधा- नोक्तं विहित प्रतिपिद्धं च धर्ममधर्म च ज्ञात्वा इह कर्माधिकारे नरलोके स्ववर्णाश्रमोचितमेव युद्धादिक कर्म कर्तुं त्वमर्हसि ॥ २४ ॥ आमुरी संपदं हित्वा कामायः कारणैः सह । शास्त्रोक्तमेव कर्तव्यमित्यादिष्टं हि षोडशे ॥१॥ इति श्रीभगवदगीताटीकाया तत्त्वप्रकाशिकायां पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ म. टी०-यस्मादेव-तस्मादिति ।. यस्माच्छास्त्रविमुखतया कामाधीनप्रवृत्तिहिकपारनिकसर्व- पुरुषार्थायोग्यस्तस्मात्ते तव श्रेयोऽधिन कार्याकार्यव्यवस्थितौ कि का फिमकार्यमितिविषये शावं वेदतदुपजीविस्मृतिपुराणादिकमेव प्रमाणं बोधकं नान्यत् स्वोत्प्रेक्षाबुद्धवास्यादीयभिप्राय. । एवं चेह कर्माधिकारभूमौ शास्त्रविधानेम कुर्यान्न कुर्यादित्येवं प्रवर्तनानिवर्तनारूपेण वैदिकलिङ्गादिपदेनोक्तं कर्म विहितं प्रतिपिद्ध च ज्ञात्वा निषिद्धं वर्जयन् विहितं क्षनियस्य युद्धादि कर्म व कर्तुमर्हसि सत्वशुद्धिपर्यन्त- मित्यर्थः । तदेवमस्मिन्नध्याये सर्वस्या आसुर्या. संपदो मूलभूतान् सर्वाश्रेय प्रापकान् सर्वश्रेय.प्रति. बन्धकान्महादोपान कामबोधलोभानपहाय श्रेयोऽर्थिना श्रद्दधानवया शास्त्रप्रवणेन तदुपदिष्टार्थानुष्ठानपरण भवितव्यमिति संपवयविभागप्रदर्शनमुखेन निर्धारितम् ॥ २४ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यविश्वेश्वरसरस्वतीपादशिष्यत्रीमधुसूदनसरस्वतीविरचिताया श्रीभगवद्गीतागूढार्थदीपिकाया देवासुरसंपद्विभागयोगो नाम पोडशोऽध्याय ॥१६॥ शं० टी-शास्त्रविधिनैव कर्मणा कर्वव्यत्व निर्धारयन्नध्यायमुपसहरति-तस्मादिति । यस्मादशात्री- याणा कामैकनियन्धनाना कर्मणा फलाभावो निश्चितस्तस्मात्ते मुमुक्षो कार्याकार्यव्यवस्थिती कर्तव्याकर्त- व्यार्थयोर्व्यवस्थापने इदमेवमनेन कर्तव्यमिदं तु न कर्तव्यमित्येवमनुष्ठेयाननुष्ठेयार्थनिर्णये श्रुतिस्मृतिलक्षण- मेव शास्त्रं प्रमाण तत्तदर्थप्रमापकं देशकालमन्त्रतन्त्रदेवताद्रव्यविगादिज्ञानस्य हेयद्रव्यज्ञानस्य च कारण- मित्यर्थ । यत एव तत. कर्मभूमौ कर्माधिकारी देवसंपत्त्या परित्यक्तकामादिदोपस्त्वमधीतविदितवेदवेदार्थ सन् शास्त्राविधानोक्त शास्त्रविधिदृष्टमेव कम ज्ञात्वा ममेद शास्त्रीय कर्म कर्तव्यमिति शाखतो विज्ञायैव 'स्वीयं कर्म कर्तुमईसि नान्यथा कर्मफलवैगुण्यापत्तरित्यनेन स्पवर्णाश्रमोचित कर्म शास्त्रेण विज्ञाय मुमु- भुणा कर्तव्यमिति सिद्धम् ।। २४ ॥ इति श्रीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यश्रीमदानन्दात्मसरस्वतीशिष्यश्रीशकरानन्द- सरस्वतीकृतो गीतातापर्यवोधिन्या पोडशोऽध्याय ॥ १६ ॥ - 7 [म. १६ मो० २४] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता ११२३ श्री० टी०-फलितमाह-तस्मादिति । इदं कार्यमिदमकार्यमित्यस्यां व्यवस्थाया वे वव शास्त्र श्रुति- स्मृतिपुराणादिकमेव प्रमाणम् । अत: शास्त्रविधानोक्तं कर्म ज्ञात्वा इह कर्माधिकारे वर्तमानो यथाधिकार कर्म कर्तुमईसि, तन्मूलत्वात्सत्त्वशुद्धिसम्यग्ज्ञानमुक्तीनामित्यर्थः ॥ २४ ॥ देवदेवयसंपत्तिसंविभागेन पोडशे ।। तत्त्वज्ञानेऽधिकारस्तु सात्त्विकस्येति दर्शितम् ।। १ ।। इति श्रीसुबोधिन्या टीकायां श्रीधरस्वामिविरचितायां देवासरसंपद्विभागयोगों नाम पोडशोऽध्यायः ॥ १६॥ स. टी०-यस्माच्छास्त्रवाहिभूतः कामाधीनप्रवृत्तिभाक् ॥ नैहिकानुष्मिकश्रेयोयोन्यस्तस्मात्तवाधुना' ॥१॥ कि कार्य किमकार्य चेत्यन शास्त्रं हि बोधकम् ॥ श्रुतिस्मृतिपुराणादिप्रमाणं नात्मकल्पना ॥२॥ इहाधिकारभूमो त्वं ज्ञात्वा शास्त्रविधानतः ॥ कुर्यान कुर्यादित्येवं निषिद्धं विहितं तथा ॥ ३ ॥ निषिद्धं वर्जयन्कर्म विहितं क्षत्रियस्य यत् ॥ युद्धादिशुद्धिपर्यन्त कर्तुं योग्योऽसि सर्वदा ॥ १ ॥ वदेवम्- स्मिन्नध्याये आसुर्याः संपदोऽप्ययम् ।। मूलभूतात्रीन्कामादीस्त्यक्त्वा देवी समाश्रयेत् ॥ ५ ॥ तेनापवर्ग- सिद्धिः स्यान्नान्यथा चेत्युदाहृतम् ॥ ६ ॥२६॥ देवी संपद्विमोक्षं जनयति सुधियामासुरी दुःसहेतु- सुर्यास्त्यागहेतुर्हरिचरणरविनान्यथाऽतोऽम्यनन्यः ॥ स्वान्ते प्रेम्णैव कृष्णं स्मर भन सततं स्यात्मभूतं महेशं मुक्तिस्तेनैव सिद्धा भवति हरिवों मानमत्रानवद्यम् ।। १ ।। यद्यस्त्यपेक्षा तव वसंपदि विभेपि चेदासुरसंपदस्तदा ।। समाश्रय त्वं वसुदेवनन्दने रति मनि भ्रान्तिमपोह्या सर्वतः ॥२॥ इति भावप्रकाशे श्रीसदानन्दविदा कृते । दैवासुरविभागोऽयं पोडशः पूर्णता गतः ॥ टीकाश्लोकसंख्या || १६८ ॥ आदितष्टीकालोकसंख्या ॥ ५४३१ ॥ भा० टी०-यस्माच्छास्त्रविधिमुत्सृज्य कामचारत: प्रवृत्ताना पुरुषार्थहानिरनवातिश्च तस्माते देवी संपदमभिजातस्य तव कार्याकार्यव्यवस्थितौ कर्तव्याकर्तव्यव्यवस्थाया शास्त्रं प्रमाणं ज्ञानसाधनमतः शास्त्रेण विधानं कुर्यादित्येवंलक्षणं शास्त्रविधानं तेनोक्तं स्वस्य क्षत्रियस्य यत्कर्म चदिह कर्माधिकारभूमी कर्तुमर्हसि योग्योऽसि । इदं कर्तव्यभिदं नेति शासनं वेदाज्ञारूपं शानं तदतिक्रमे प्रायश्चिचं विधानम्। शास्त्रं च विधान च वाभ्यामुक्तमिति तक्तविधानपदार्थस्य शास्यतेऽनेनेति व्युत्पत्त्या शास्त्रपदार्थेऽन्तर्भावमभिप्रेत्याचार्थेनोक्तम् । तदनेन पोडशाध्यायेन संपवयं निरूपयवा सर्वस्या' आसुर्या. संपदो मूलभूतान् सर्वानर्थप्रापकान् सर्वार्थ- प्रतिनन्धकान् महादोषान् कामादीन् जीन्परित्यज्य तत्परिवर्जनं श्रेयआचरणकारणं शास्त्रविभ्युलचनं च विहाय अयोर्थिना अइधानतया शास्रोपदिष्वार्थानुष्ठानपरेण भवितव्यमिति दर्शयता असुर्याः परिवर्जनेन देच्या उपादानेन च लभ्यमखण्डं मोक्षास्य ब्रह्म प्रकाशितम् ॥ २४ ॥ इति श्रीम-परमहंसपरिव्राजकाचार्यवालस्वामिश्रीपादशिष्यदुत्तवंशावतंसरामकुमारसूनधनप- तिविदुपा विरचिताया गीताभाष्योत्कर्षदीपिकाया पोडशोऽध्यायः ॥१॥ प० टी०-फलितमर्थमाह-तस्मादिति । इदं कार्यमित्यस्या व्यवस्थाया वे तव श्रुतिस्मृतिरूपं शासना- च्छात्रं प्रमाण नान्यत् । अत. शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि सन्मूलकत्यासत्त्वशुद्धिपूर्वक तत्त्वज्ञानं ते भविष्यतीत्यर्थ. ।। २४ ॥ .
११२४ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७.१] अधाध्यापतापर्यम् । देवी संपद्विमुक्त्यै शमदमसमताझान्तिवैराग्यरूपा कामक्रोधाभिमानानतफपटमयी पासुरी बन्धहेतुः । उत्पत्तिदेवसंपद्यनुजनुरुदिता मामझाना जनाना त्वं मा भैपी. किरीटिनिति मधुरिपुमा पोडशे प्रोक्तमासीत् ॥ १॥ इति श्रीमदैवतपण्डितसूर्यविरचिताया भगवद्गीताटीकाया परमार्थप्रपाया देवासुरसंपत्तिविवेको नाम पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ रा० टी०-युत शास्त्रविष्यतिकमे संसिद्धिसुसाधभाव इति शङ्का निरस्य नलान्तरं विधत्ते-त -तस्मा- दिति । यस्मादिदं कार्यमिदमकार्यमिति व्यवस्थाया ते वय विवेफिन. शाखं प्रमाणं वदतिकमे च दोप. तस्मादिहरोके शाखविधानो फर्म कर्तुमईसि इति ॥ २४ ।। इति श्रीमद्भगवद्गीतार्थसंप्रहे राधमेन्द्रयतिकते पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ अब सप्तदशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच-ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ॥ तेषां निष्टातु का कृष्ण ! सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥ १ ॥ त० टी०-पूर्वाध्याये तत्त्वज्ञानाधिकारार्थ मुमुक्षुणा सवैकनिष्ठेन भाव्यमित्येतदर्थ हेयोपादेय- योदेवासुरसंपदोविभागमुक्त्वा तयोर्टयोपादेयज्ञानासाधारणं कारणं शास्त्रमेवोपादेयं, तदुक्तमेव कार्य तद्विरुद्धं निषिद्ध चाधमगतिदं नाचरणीयमित्यन्ते निणीतम् । इदानीं सात्विकश्रद्धयाऽनुष्ठितस्यैव श्रेयो. हेतुत्वं राजसतामसश्रद्धयाऽनुष्ठितस्यासुरत्वात्संसारहेतुत्वमिति श्रद्धाऽऽहारयज्ञतपोदानादेखैविध्यदर्श- नाय सप्तदशाध्याय आरभ्यते । तत्र ये शाखविधि कुतश्चित्कारणाद्विहाय शिष्टाचारमात्रेण निपिद्ध- त्यागपूर्वकं श्रद्धया यज्ञादि कर्मानुतिष्ठन्ति तेगु शाखविध्युपेक्षालक्षणस्यामुरधर्मस्य श्रद्धापूर्वकानुष्ठान- लक्षणस्य देवधर्मस्य च दर्शनात् किं तेऽसुरेष्वन्तर्मवन्ति देवेषु वेत्येककोटि निश्चेतुमशयनुवंस्तनिर्ण- यभुत्सरर्जुन उवाच-ये शास्त्रविधिमिति। ये केचिच्छावविधिमज्ञानादुत्सृज्य श्रद्धयान्विताः सन्तो यजाते देवताराधनादौ प्रवर्तन्ते । अन ये शास्त्रविधिमुत्सृज्येत्यनेन ये दुःखबुद्धया आलस्यावा शाखविधिमुत्सृज्य शास्त्रज्ञाने श्रममकृत्वा केवलं शिष्टाचारपरंपरावशेन श्रद्धयान्विताः सन्तो देवता- राधनादौ प्रवर्वमाना गृह्यन्ते, न तु ये शास्त्रं सम्पर ज्ञात्वा युद्धिपूर्वकं तमनादृत्य यथेष्टाचारेण वर्तमाना गृह्यन्ते । कुतः १ श्रद्धयान्वितत्वविशेषणात् । आस्तिक्यबुद्धिहि श्रद्धेत्युच्यते । सा च यथेष्टाचारिणां ज संभवति । तस्माये शास्त्रविधिमुत्सृज्येत्यन पूर्वोक्ता ज्ञेया । तेपा का निष्ठा स्थितिः ? हे कृष्णेति सामान्यतः पृष्ट्वा किंशब्देन प्रश्नस्थं विशेष स्वयमेव व्यनक्ति-सत्त्वमाहो रजस्तम इति । उक्त- . प्रकारेण देवपूजादौ ये प्रवृत्तास्तेपा सत्त्वादिषु का निष्ठा आश्रयः? सत्त्वं-ते सचाश्रयाः आहोखित् रजोनिष्ठा रजसि संश्रितास्तमःसंश्रिता वा इति विवेचनीयमिति भावः ॥१॥ म०टी०-द्विविधा. कर्मानुष्ठातारो भवन्ति । केचिच्छास्त्रविधि ज्ञात्वाऽप्यश्रद्धया तमुत्सृज्य कामकार- मात्रेण यत्किचिनुतिष्ठन्ति ते सईपुरुपायोग्यत्वादसुरा । केचित्तु शास्त्रविधि ज्ञात्वा श्रद्धधानवया तदनु- . ।
।
[अ० १७ श्लो० १] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता
११२५
सारेणैव निपिद्धं वर्जयन्तो विहितमनुतिष्ठन्ति ते सर्वपुरुषार्थयोग्यत्वाद्देवा इति पूर्वाध्यायान् सिद्धम् । ये तु
शास्त्रीय विधिमालस्यादिवशादुपेक्ष्य श्रद्दधानतयैव वृद्धव्यवहारमात्रेण निपिद्धं वर्जयन्तो विहितगनुतिष्ठन्ति
वे शास्त्रीयविध्युपेक्षालक्षणेनासुरसाधयेण श्रद्धापूर्वकानुष्ठानलक्षणेन च देवसाधम्र्येणान्विताः किमसुरेष-
न्तर्भवन्तु किं वा देवेष्वित्युभयधर्मदर्शनादेककोटिनिश्चायकादर्शनाच संदिहानोऽर्जुन उवाच-ये इति ।
ये पूर्वाध्याय न निर्गीवा: न देववच्छास्त्रानुसारिण, किं तु शास्त्रविधि श्रुतिस्मृतिचोदनामुत्सृज्य आलस्यादि-
शादनादृत्य नासुरवदश्रद्दधाना: किं तु वृद्धव्यवहारानुसारेण यद्धयान्विता यजन्ते देवपूजादिकं कुर्वन्ति
तेपा तु शास्त्रविध्युपेक्षा श्रद्धाम्या पूर्वनिश्चितदेवासुरविलक्षणाना निष्ठा का कीदशी तेषा शास्त्रविध्यनपेक्षा
श्रद्धापूर्विका च सा यजनादिक्रियाव्यवस्थितिः हे कृष्ण भकाधकर्षण, कि सत्त्वं सात्त्विकी । तथा सति
सात्विकत्वात्ते देवाः आहो इति पक्षान्तरे। कि रजस्तम: राजसी तामसी चवथा सवि राजसतामसत्वा-
सुरास्ते । सत्वमित्येका कोटि., रजस्तमइत्यपरा कोटिगितिविभागज्ञापनायाहोशब्द. ॥ १ ॥
शं० टी-एवं दैवासुरसंपद्विभागं तस्वरूपं तत्फलं चासुराणा ज्ञानानधिकारित्वबोधनायासुरसंपत्ति-
मता कामसंकल्पगुणकर्माणि च फलं च विशिष्य प्रतिपाद्य ममुशोः शास्त्रज्ञानेनैव कर्म कर्तव्यमिति
निख्याधुना शाखार्थानभिज्ञानामपि शास्त्रीयमेव कर्म कामकारं विना श्रद्धया कुर्वतामपि मुमुक्षूणा
सात्त्विकेम्वेवाहारयज्ञतपोदानादिषु प्रतिष्ठिताना ज्ञानाधिकारः शमदमादिपकसंपत्या प्राप्तज्ञानेन मो-
क्षाधिकारश्च युज्यत इति योधयितुं सप्तदशाध्याय आरभ्यते । तत्रादौ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्येति तस्मा-
च्छालं प्रमाणं व इति शास्त्रविधि ज्ञात्वापि तमुत्सृज्य कामकारेण य. प्रवर्तते स आसुररतस्य न चित्त-
शुद्धिर्न च ज्ञानं नापि तत्फलं च विध्यतीति श्रुत्वा शास्त्रार्थमजानता कामकारं विनव श्रद्धया कर्माणि
कुर्वता पुरुषाणा देवी वाऽऽसुरी वा का वा संपत्ति का गतिस्तेषामिति जिज्ञासुरर्जुन उवाच-य इति । ये
सामान्याः पुरुषाः शास्त्रविधि श्रुतिस्मृतिलक्षण शास्त्रं वद्विधि विधानं औवस्मातसूनाध्ययनतदर्थपरिज्ञा-
नाभावादनुष्ठानविधिमुत्सृज्याविज्ञाय श्रद्धया वृद्धव्यवहारसदर्शनसमुत्पन्नयाऽऽस्तिक्यबुद्धया विनैव कामकार
पदिकेषु नियतेषु कर्मस्वत्यन्वविश्वासेनान्त्रिताः सन्तो दिकन कर्मणा देवान् यजन्वे शास्त्रार्थ-
मज्ञात्वाऽपि श्रद्धया भक्त्या च श्रोत स्मात व कर्म ये कुर्वन्तीत्यर्थः । तेपा श्रद्धया कर्मणि वैदिक
प्रत्चाना पुरुपाणा निष्ठा स्थितिः का किंलक्षणा ? सत्त्वमाहो रजस्तम. इति कारणेन काय गृह्यते ।
तुशब्दः पूर्वव्यावृत्त्यर्थ, । सेपा तु निष्ठा वृत्तिः सात्त्विकी वा उन राजसी कि वामसी वा कथ्यता-
मिति । अत्र सत्त्वशब्देन देवसंपत्ति; रजस्तम.शब्देनासुरसंपत्तिर्विवक्षित देवासुरसंपत्तेरधिकारविचारे
प्रकान्तत्वाचेपा संपदेवी चाप्युत आसुरी वेवि प्रश्नार्थ, । ननु य शास्त्रविधिमुत्सृज्येत्यनेनेन वचन शाखवि.
धिमुत्सृज्य य. प्रवर्तते स आसुर इत्येतेपामप्यासुरत्वमुक्तमेव, पुनस्तेपा निष्ठा तु का कृष्णेत्यर्जुनस्य प्रश्नो-
ऽनुपपन्न एपेवि घेत्सत्यम् । यद्यपि शस्त्रविध्युत्सर्जनमुभयर सममेव पामेतेपाच, तथापि श्रद्धान्वितत्यविशे-
पणविशिष्टत्वात्तेपामतेपा च विशेपो विद्यते । कामकारत इति तन कामकारत्वविशेषणविशेपोपपत्तेश्व शाख-
विधिमुत्सृज्येति शात्या शाबोलशानदोपविशपाय पामेवेपा च भेदो निधन एमागनु शास्त्रविध्युत्सर्जनमत्रापि
घ विद्यत एवेति चेन शास्त्रविध्युत्सर्जनपदेनात्र शास्त्रार्थापरिक्षानं विरक्षित न तु सात्या विध्युटानम् ।
ननु तहि शास्त्रार्थानभिज्ञाना मूढाना फवं वदिके कर्मणि प्रगृत्तिरितिदुच्यते-पदाचरति श्रेष्ठस्तत.
देवेतरो जन इतिन्यायेन ज्ञानवृद्धप्रवृत्तिसंदर्शनेन मृदानामपि श्रद्धावता सद्बुद्धीना वैदिकमी-
तिरुपपद्यते यतिभ्यो वेष नमामु सत्सु यालाना नमनमिया यथा वस्तेपामेवेपा प विशेषगभेदाडेदः
सिध्यति, सत एवार्जुनेन पृष्टं पा निष्ठा तु का कृष्णेयवो न काचिदम्यवानुपाति. ॥१॥
. श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ श्लो..] श्री०टी०--उत्ताधिकारहेतूनां श्रद्धा मुख्या तु सात्त्विकी ।। इति सप्तदशे गौणश्रद्धाभेदखियोच्यते ॥ १ ॥ पूर्वाध्यायान्ते । यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य पर्वते कामकारवः । न स सिद्धिमवाप्नोति ' इत्योग शास्त्रोक्तविभिमुत्सृज्य कामकारेण पर्वमानस्य शानेऽधिकारो नास्तीत्युकम् । वन शास्त्रविधिमुत्सृज्य फाम- कारं विना श्रद्धया वर्तमानाना किमधिकारोऽरित नास्ति येवि घुभुत्सया अर्जुन उवाच-य इति । अन च शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते इत्यनेन शास्त्रार्थ बुद्धा तमुहय पर्वमाना न गृह्यन्ते पेषां श्रद्धया यजमानुप- पत्तेः । आस्तिस्यबुद्धिहिं श्रद्धा । न चासो शास्त्रज्ञानवतां शास्त्रविरुद्धेऽर्थे संभवति । तानेवाधिकृत्य त्रिविधा , भवति श्रद्धा, यजन्ते सात्त्विका देवानित्यााचरानुपपत्तेश्च । अवो नीर शास्त्राविधिनो गृह्यन्ते । अपि तु छेशयुद्धया आलस्यादा शास्त्रार्थाने प्रयत्नमहत्या केवलमाचारपरंपरावशेन श्रद्धया फधिदेवताराच. नादौ प्रवर्तमाना गृह्यन्ते । अतोऽयमर्थ:-ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य दुःसयुद्धपा आलस्याद्वा अनादृत्य केवल- माचारप्रामाण्येन श्रद्धयान्विताः सन्तो यजन्वे देपां तु का निष्ठा का स्थिति: क आश्रयः । वामेव विशे- पेण पृच्छति-कि सत्त्वम् आहो किंवा रजः अथवा दम इति । तेषां तारशी देवपूजादिप्रचिः किं सत्त्व. संश्रिता रज.संश्रिता वा तम:संश्रिता वेत्यर्थः । श्रद्धाया: सात्त्विकरवात छेशबुद्धया आटस्येन च शास्त्रा. नादरस्य च राजसतामसत्त्वावधा संदेहः । यदि सत्त्वभावसंश्रितास्ताहि तेपामपि सात्त्विकत्वाद्ययोक्तारम- झानेऽधिकार: स्यात् , अन्यथा नेति प्रश्नतात्पर्यायः ॥ १॥ स० टी०-स्वयज्योतिब्रह्म श्रुतिशिखरगीवं निरवधि जगद्धामद्वित प्रकृतिपुरुषान्तर्गतमजम् ॥ महेशा- धाराध्यं अजयुवतिभिः स्वाद्यममृत महः श्रीकृष्णाख्यं सुसनिधिमहं नौमि सततम् ॥ १ ॥ विविधाः कर्मकारी भवन्ति पुरुषा भुवि । केचिच्छानविधि ज्ञात्वा श्रद्धाहीना विहाय वम् ॥ २ ॥ कामकारेण यत्किचिदनुतिष्ठन्ति तेऽसुराः ।। केचिच्छानविधि ज्ञात्या श्रधानतयोचमाः ॥ ३ ॥ निपिद्धं वर्जयन्ती येऽनुविष्टन्ति यथाविधि ॥ ते पुरुषार्थयोग्यत्वाद्देषा इत्यपि योधितम् ॥ ४ ॥ आलस्यादिवशाये तूपेक्ष्य शास्त्रविधि स्वयम् ।। श्रद्दधानतया वृद्धव्यवहारेकदर्शनात् ॥ ५ ॥ निपिद्धं वर्जयन्तश्च कुर्वन्ति विहितं सदा । शास्त्रीयोपेक्षणात्ते किं प्रविष्टा असुरेषु वा ।। ६ ॥ श्रयानवया किं वा देवोध्विति वितर्कयन् ।। अर्जुनः संदिहानः सन्नुवाच श्रीहरि प्रति ॥ ७ ॥ श्रुतिस्मृतिविधि त्यक्त्वा य आलस्यादिना जनाः ॥ देवपूजादिकं वृद्धव्यवहारानुसारतः ॥ ८ ॥ श्रयानवया नित्यं कुर्वन्यानन्दसागर ॥ देवासुरविभिन्ना. ना पां निष्ठाऽस्ति कीदृशी ॥ २ ॥ किं सात्त्विकी वेदनिष्ठा राजसी वाथ तामसी ॥ १०॥ १ ॥ भा० टी०-गीताभाप्यप्रकाशेन जगदुद्धारको परौ । वन्दे परस्परात्मानौ देवी श्रीकृष्णशंकरो॥ यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य · तस्माच्छात्रं प्रमाणं ते । इविभगवद्वाक्यात् ये शास्त्रविधि परित्यज्य कामकारत: प्र- तास्ते नास्तिका: असुराः, ये तु शाखविधिमनुरुध्य विहितानुष्ठानाय प्रतिपिद्धप्रहाणाय च श्रधानतया प्रवृत्तास्ते आस्तिका. सुरा इति ज्ञात्वा श्रद्धावता शाखानभिज्ञाना निष्ठा जिज्ञासुरर्जुन उवाच-ये इति । ये केचिदसुराणा देवानां च विशेषगैरविशेपिताः शास्त्रविधि श्रुतिस्मृत्यादिशात्रविधानमुत्सृज्यालस्यादिना. ऽपश्यन्तो वृद्धव्यवहारादेव श्रद्धया आस्तिक्यबुद्धयाऽन्विताः संयुक्ताः सन्त: देवादीन्यजन्ति पूजयन्ति । तु किचिच्छाम्रविधिमुपलभमाना एवाश्रद्दधानतया तमुत्सृज्यायथाविधि देवादन्पूिजयन्ति तेऽत्र न गृह्यन्ते श्रद्धयान्विता इति विशेषणात् । तेपामेवभूताना निष्ठा तु का किं सत्त्वमवस्थानं श्रद्धायाः सा. त्विकत्वात् ? आहो रजः किं वा तमः केशबुद्धया आलस्येन च शाबादर्शनस्य राजसतामसत्वात् ? एत- दुकं भवति-या तेपा देवादिदिपया पूजा सा किं सात्विकी आहोस्विद्राजस्युन तामसीति 'कृषिभूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः। वयोरेक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते।।' इति निरुक्तिमभित्य सर्वत्र सत्तास्फू- .
[अ० १७ नो. २] तत्त्वप्रकाशिकादष्टटीकोपेता
“११२७
त्यादिना स्थितस्य परमात्मनस्तव किंचिदम्यविदिवं न भवतीति सूचयन्संवोधयति-कृष्णोति । मम संशया-
पकपणेति वा संवोवनार्थः ॥१॥
५० टी०-पूर्वाध्यायान्ते ' य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य । इत्यादिना शास्त्रविधिमुलध्य प्रवृत्तस्य सिद्धिर्ना
स्तीत्युक्तं, तदेव पृच्छन्नर्जुन आह-ये शास्त्रविधिमिति । ये शास्त्रविधि विधिनिषेधात्मकमुखध्य दुःखबुद्धया-
ऽऽळस्याद्वाऽनादृत्य केवलं लौकिकाचारपरंपरया श्रद्धा विना यजन्ते वेपां का निष्ठा क आश्रयः सत्त्वमाहो.
विद्रजस्तमो वा । ' यजन्ते सात्विका देवान् । इत्यादिवत् फलोपघानं नैव वेति प्रभार्थः ॥ १॥ .
राटी०-चतुर्दशाभ्याये नान्यं गुणेभ्य: कारमित्यादिना सर्वोऽपि परिणामो गुणकृत इति सामा-
न्यत उक्तस्यान सत्वादिगुणकृताना श्रद्धानामाहारस्य तपःप्रमृतिकर्मणा च सदसद्रूपाणा भेदोक्त्या प्रप-
श्वनं क्रियते । पूर्वत्र शास्त्रविधानोक्तं ज्ञास्या कर्म कार्यमित्युक्ते लब्धावसरोऽर्जुनः शास्त्रविध्यज्ञानिनां का
स्थितिरिति पृच्छति-य इति । ये जनाः शास्त्रविषिमुत्सृज्य अज्ञात्वा अद्धयान्विनाः श्रद्धामात्रेण यजन्ते
तेपा निष्ठा तु स्थितिस्तु का कीरशी । तामेव विविच्याह-सत्त्वमित्यादिना । किं सात्त्विकी राजसी ता-
मसी वा स्थितिरित्यर्थः । ते किं सात्विका राजसास्तामसा वेति यावत् ।। १ ।।
श्रीभगवानुवाच-त्रिविधा भवति श्रद्धा- देहिनां सा स्वभावजा ।।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥
त० टी०-एवं पृष्टोऽर्जुनसंदेहमपनिनीषुस्तावच्छासवानवतां तदनुकूलाचाराणामनेकजन्मानुष्ठि-
ताकाम्पकर्मणां सात्त्विकानां तु श्रद्धा मोक्षोपयोगिनी भगवदाराधनविपयिकैकधैव भवति । शास्त्र-
ज्ञानहीनानां मोक्षमार्गेऽनधिकृतानां सकामानां जीवानां गुणत्रयविभागेन श्रद्धात्रयविभागं श्रीभ.
गवानुवाच-त्रिविधेति । देहिनां परमार्थज्ञानहीनानां प्रवृत्तिमात्रनिष्ठानां मनुष्याणां सर्वेषां
श्रद्धा सात्त्विकी राजसी तामसी चेति त्रिविघा भवति । त्रैविध्ये हेतुः-सा स्वभावजेति।
स्वभावः स्वकीयप्राचीनकर्मानुगुणो रुचिविशेषस्तस्माजाता स्वभावजा । जीवस्य यत्र रुचि विशेष-
स्तत्र श्रद्धा जायते । श्रद्धा नामायं ममेष्टं साधयेदिति विश्वासः, विश्वासपूर्विकैव साधने प्रवृत्तिर्भवति ।
रुचिश्रद्धाप्रयत्नानां निमित्तभूता अन्तःकरणरजकाः सत्त्वादयो गुणाः कार्यकगम्या अतस्विविधा
भवति । तामिमां त्रिविधां श्रद्धां वक्ष्यमाणां शृणु ॥२॥
म०टी०-ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य अद्धया यजन्ते ते श्रद्धाभेदाद्भिद्यन्ते । तत्र ये सात्त्विक्या श्रद्धयान्वि-
तास्ते देवाः शास्त्रोक्तसाधनेऽधिक्रियन्ते वस्फलेन च युज्यन्ते । ये तु राजस्सा वामस्या च भद्रयान्वितारते.
ऽसुरा न शास्त्रीयसाधनेऽधिक्रियन्ते न वा वस्फलेन युज्यन्त इति विवेकनार्जुनस्य संदेहमपनिनीपुः श्रद्धाभेद
श्रीभगवानुवाच-त्रिविधेति । यया श्रद्धयान्वित्ता: शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते सा देहिना स्वभावजा, जन्मा-
तस्कृतो धर्माधर्मादिशुभाशुभसंस्कार इदानीतनजन्मारम्भक: स्वभाव: ] स विविधः सात्त्विको राजसस्ता-
मसचेति । तेन जनिता श्रद्धा त्रिविधा भवति सात्विको राजसी. तामझी च, कारणानुरूपत्वाकार्यस्य,
या वारल्थे जन्मनि शास्त्रसंस्कारमानजा विदुपा सा कारणैकरूपत्वादेकरूपा सात्त्विक्येव, न राजसी
वामसी चेति प्रथमचकारार्थ: । शास्त्रनिरपेक्षा तु माणिमानसाधारणी स्वभावजा । सैव स्वभाववैविध्या-
विविधत्येवकारार्थ । उकविधानयसमुच्चयार्थश्वरमञ्चकार. । यत, प्राग्भवीयवासनारयस्वभावासाभिभावक
शास्त्रीय विवेकविज्ञानमनाइनशास्त्राणा देहिना नास्ति अतस्वेपा स्वभावयशाविधा भवन्धी ना श्रद्धां गणु ।
श्रुत्या च देवासुरभाव स्वयमेवावधारयेत्यर्थः ॥ २॥
श्रीमनगवद्गीता
[अ० १७०२]
शं० टी०कारणे ज्ञाते कार्य वोधयितुं शक्यं न त्वज्ञावे सत्यत: कारणश्रद्धाभेदज्ञापनेन निष्ठाभेदं
बोधयितुं श्रीभगवानुवाच-त्रिविधेति । देहिनां प्राणिनां श्रद्धा सात्विको राजसी च तामसी चेति त्रिवि-
धैव त्रिप्रकारा निधैव भिन्ना भवतीत्यर्थः । श्रद्धायात्रैविध्यसिद्धो कारणमाह-स्वभावजेवि । 'आयुः कर्म
च वित्तं च विद्या निधनमेव च । पश्यैतानि विलिख्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः' इत्यनेन प्राम्भवीय पुण्या-
पुण्यादिसंस्कारः स्वभावः स्वेन सह भवतीति स्वभावस्तस्माजाला स्वभावजा । यद्वा स्वभावः सत्त्वरजस्त.
मोगुणारिमका प्रकृतिस्तस्माजाता स्वभावजा तत एव सत्त्वादिगुणभेदाच्छूद्धाया अपि सात्त्विकी राजसी
तामसी चेति भेद उपपदात इत्यर्थः । यत्प्रधानक्रियायां वर्तमानानां देहिनां नि त्वं पृच्छसि तां श्रद्धां
भयोच्यमानां शृणु, श्रद्धासभूतिप्रकारं शृष्वित्यर्थः ॥ २ ॥
श्री०टी०-अप्रोचरं श्रीभगवानुवाच-त्रिविधेति । अयमर्थः-शाबतत्त्वज्ञानतः प्रवर्वमानानां परमेश्वर-
पुजाविपया साविकी एकविधैव श्रद्धा! लोकाचारमात्रेण तु प्रवर्तमानानां देहिनां या श्रद्धा सा तु सावि-
की राजसी तामसी चेति त्रिविधा भवति । वत्र हेतुः स्वभावजा । स्वभाव: पूर्वकर्मसंस्कारस्तस्माजाता
स्वभावजा । स्वभावमन्यथा कर्तुं समर्थ हि शास्त्रोक्तं विवेकज्ञानं तत्तु तेषां नास्ति । अतः केवलं पूर्वस्वभावेनैव
भवतीति श्रद्धा त्रिविधा भवति तामिमां त्रिविधा श्रद्धां शृणु । तदुक्तम्-व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरु-
नन्दन इत्यादिना ॥२॥
स० टी०-सात्त्विक्या श्रद्धया युक्ता देवाः शास्रोतसाधने ।। अधिक्रियन्ते युज्यन्ते तत्फलेन च
साधकाः ॥ १ ॥राजस्या ये तु तामस्या श्रद्धया संयुताश्च ते || नाधिक्रियन्ते शास्त्रीये युज्यन्ते
वत्फलेन न ॥२॥ इत्येवं हि विवेकेन खभक्तस्यार्जुनस्य च ॥ संदेहोच्छित्तये श्रद्धाभेदं श्रीश
उवाच ह ॥३॥ शास्त्रोक्तपिधिमुत्सृज्य यजन्ते अद्धया यया ॥ जन्मान्तरीयधर्मादिसंस्कारो यो.
अधुनावने ॥ ४ ॥ जन्मन्यारम्भकः सोऽयं स्वभावविविधो नृणाम् ॥ सात्त्विको राजसश्चैव तामसवेति
सेन सा ॥ ५॥ त्रिविनोत्पादिना श्रद्धा सात्त्विक्यादिभिदावती ॥ श्रद्धा व वं शृणु श्रुत्वा स्वयमे-
वावधारय ॥ ६ ॥ देवासुरस्वभावेन सा यथा भवति त्रिधा ॥ ७॥२॥
भा० टी०-प्रभानुरूपमुत्तरं श्रीभगवानुवाच-त्रिविधेति । त्रिविधा विप्रकारा श्रद्धा भवति, ययाऽन्वि.
तानां निष्ठां त्वं पृच्छसि सा देहिनां देवतां जीवानां स्वभावजा जनावरकृतधर्माधर्मादिसंस्कारो मरण-
कालेऽभिव्यक्तः स्वभाव उच्यते । तस्मानावा जीवात विविधात स्वभावात् जानत्वात् अद्धा त्रिविधा भवती-
त्यर्थः । या तु अस्वभावजा असूनामभावोऽस्वभावः मरणमित्यर्थः । तस्मिन्समीपे सति जाता मरणसमये
व्यस्थानां समस्तानां वा गुणानामुद्भवे जन्मान्तरे तत्संस्कारवशात् तत्तद्गुणाधिक एव भवतीति व्यवस्था-
कारणमितीतरेषां व्याख्या । सा तु ' मुसमस्तीति वक्तव्यम् ' इतिन्यायविजृम्भितत्वादुपेक्ष्या । श्रद्धाया-
विष्यमाह-सात्त्विकी सत्वनिवृत्ता देवादिपूजाविषया, राजसी रजोनिवृत्ता यक्षरक्षःपूजाविपया, तामसी
मोनिवृत्त प्रेतपिशाचादिपुजाविषया । एवं त्रिविधां तां श्रद्धां मयोच्यमानो शृणु ॥२॥
प० टी०-ननु शास्त्रविधेहहहनं शास्त्रार्थमबुद्ध्वा बुद्ध्वा वा १ नाद्यो यजनासंभवान्नापरः श्रद्धानुत्प-
तेरास्वियबुद्धिर्हि श्रा, न चासो शास्त्रज्ञानवतां शास्त्रविरुद्ध संभवतीति पर्यालोच्य भगवानाह-त्रिवि-
धेति । देहिनां मनुष्याणां स्वभावजा श्रद्धा त्रिविधा भवति । प्राचीनसंस्कार स्वभावस्तस्माजाता स्वभा-
वजा स्वभावमन्यथाकर्तुं समर्थ शास्त्रोत्थज्ञानं उत्तु नेपा नात्यवः केवलं सत्वरजस्तमःप्रधानप्राचीनसं.
स्कारेण श्रद्धा त्रिविघातां शृणु ॥२॥
- [अ०१७ नहलो ३] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपता रा० टी०-ते निविधा अपि सन्तीतिभावेन प्राक् यागातया यष्टविशेषणत्वेनोक्तश्रद्धां सात्त्वि. कत्त्वादिना विभज्य तदाश्रयेण तेषां सात्त्विकत्वादिस्वरूपमाह-त्रिविधेति द्वाभ्याम् । श्रद्धा आस्तिक्य- निष्ठा स्वभाव वेत्यन्वयः । मनोवृत्तिश्रद्धाव्यावृत्तये स्वभाव वेत्युक्तम् । तां त्रिविधां शृणु श्रुत्वा तत्र निष्ठा कुर्वित्यर्थः । तदन्वितैः क्रियमाणयजनप्रकारं वित्यर्थः ॥ २ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत !॥ श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छूद्धः स एव सः॥३॥ तकदी-सत्त्वानुरूपेति । सत्त्वमन्तःकरणं तदनुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति । सच्चादिगुण- रजितान्तःकरणभेदाच्छ्रद्धाभेदः। यद्यप्यन्तःकरणस्य सात्त्विकाहंकारकार्यत्वात् सात्विकत्वमेव, तथाऽपि तदाप्यायकानपानादेः सात्त्विकादित्रैविध्यात्रिविधं भवति । तथा च प्राचीनकर्मनिमित्तकत्वाजन्मत एव केषां चित्सत्त्वगुणभधानं, केपांचिद्रनामधानं, केपांचित्तमाप्रधान, सत्त्वमन्तःकरणं देवयक्षरक्षसां क्रमेण भवति । मनुष्याणां तु प्रायेण व्यामिश्र, केपांचिदेकैकगुणमधानं सत्त्वं भवति । एवं च सर्वस्य पुरुषस्य सत्त्वानुरूपान्तःकरणरूपा श्रद्धा भवति । हे भारत ! सत्त्वप्रधानस्य साचिकी, रजःप्रधानस्य राजसी, तमामधानस्य तामसीति विवेकः । फलितमाह-श्रद्धामयोऽयं पुरुष इति । अयं मोक्षानधिकारी संसारी पुरुषः श्रद्धामयः श्रद्धामधानः । प्राधान्ये मयद खीमय इतिवत् । तस्माद्यो यच्छ्रद्धः स एव सः, यः • पुरुषो यादृश्या श्रद्धया युक्तः स एव सः । साविक्यादिश्रद्धया युक्तः साचिकादिरूप एव पुरुषो भवति । एवं श्रद्धयैव निष्ठापि दर्शिता । एतेन तेषां निष्ठा तु का कृष्णेति प्रश्नस्योचरमुक्तम् । सत्वादिनिष्ठानां फलं तु 'उर्व गच्छन्ति सवस्था मध्ये तिष्ठन्ति रानसाः । जघन्यगुणत्तिस्था अधो गच्छन्ति वामसाः' इति चतुर्दशे उक्तम् ॥ ३॥ म०टी०-प्राग्भवीयान्तःकरणगतवासनारूपनिमित्तकारणवैचित्र्येण श्रद्धावैचित्र्यमुक्त्वा तदुपादान- कारणान्त.करणवैचियेणापि तत्रैविध्यमाह-सत्येति । सत्त्वं प्रकाशशीलवात्सत्त्वप्रधानत्रिगुणापश्ची- कृतपञ्चमहाभूतारब्धमन्तःकरणम् । वय कचिदुद्रिक्तसत्त्वमेव यथा देवानां, कचिद्रनसाभिभूतसत्वं यथा यक्षादीनां, कचिद्रजसाभिभूतसत्त्वं यथा प्रेतभूतादीनां, मनुष्याणातु प्रायेण व्याभिश्रमेव। तच्च शास्त्रीयविवे- कज्ञानेनोद्भूतसत्त्वं रजस्तमसी अभिभूय क्रियते । शास्त्रीयविवेकविज्ञानशून्यस्य तु सर्वस्य ' प्राणिजातस्य सत्वानुरूपा श्रद्धा सत्त्वचिच्याविचित्रा भवति, सत्वप्रधानेऽन्तःकरणे सात्विकी, रजःप्रधाने तस्मिन् राजसी, तम.प्रधाने तु तस्मिस्वामसीति ।हे भारत महाकुलप्रसूत ज्ञाननिरवेवि वा शुद्धसात्विक द्योतयति । यत्त्वया पृष्टं वेषां निष्ठा केति तोत्तरं शृणु-अयं शास्रीयज्ञानशून्यः कर्माधिकृतः पुरुषः त्रिगुणान्त.करण- सपिण्डितः श्रद्धामयः प्राचुर्येणास्मिन् श्रद्धा प्रसुतेति वत्प्रस्तुतवचने मयट, अन्नमयो यज्ञ इतिवत् । अतो यो यच्छ्रद्धः या सात्त्विकी राजसी तामसी वा श्रद्धा यस्य स एव श्रद्धानुरूप एवं स सात्त्विको राज- सस्तामसो वा । श्रद्धव निष्ठा व्याख्यातेत्यभिप्रायः ॥ ३॥ शं० टी०-तदाह-सत्त्वेति। सत्त्वानुरूपा सत्त्वमिति रजस्तमसोरुपलक्षणम् । सत्त्वरजस्तमोगुणानामनु- रूपा गुणत्रयभेदानुवृत्चा सर्वस्य प्राणिजातस्य श्रद्धा भवति पुण्यापुण्यकर्मवशादन्त फरणविजृम्भितसत्वादि- गुणभेदमाश्रित्येव पुरुषाणा श्रदा भवति न तु पुरुपमेदमाथित्येत्यर्थः । ननु सत्त्वादिगणानुगुण्येन प्राणिनां श्रद्धा भवतु प्रकृते किमायावमित्याकाहायामाइ-श्रद्धामय इति। अयमिति दृष्टव्यवहारो गृह्यते । अयं प्रत्यक्ष: व्यवहारविषयः पुरुप. अद्धामयः अपिम्वे पुरुपे श्रद्धामाचुर्येण टश्यवे, वोऽयं श्रद्धामयः श्रद्धा. में - - त्रिविध इत्यर्थ । यथा (वं भरतशोद्भक्त्यात् भारतस्तथेति संबोधनाशयः ॥३॥ श्रीमजगवद्गीता [अ० १७ मो० ३] प्रधानत्वाच्छ्रवामय इत्युच्यत इत्यर्थः । ननु पुरुपत्य श्रद्धामयत्वे सिद्धेऽपि का निष्ठेत्युः किमुत्तमित्या- कालायामाह-य इति । योऽधिकारी पुरुषः स्वधर्मनिष्ठो यच्छ्रद्धः यद्गुणसंभावितश्रद्धावान् भवति स पुरुषः स एव तद्गुण एव भवति । सत्वगुणसंभावित श्रद्धावान् सात्त्विकः रजोगुणसंभावितश्रद्धावान् राजसस्तमो- गुणसंभावितश्रद्धावान् वामसो भवतीत्यर्थः । यद्यपि श्रद्धा सत्त्वस्यैव धर्मो न तु रजस्वमसोत्तयापि उयो: प्राधान्ये सत्यपि वन सत्वस्योपसर्जनत्वसंभवाचद्धरस्वपि उद्धर्माभास श्रद्धाभासिकी संभवत्यत श्वोच्यवे यो .यच्छ्रद्ध. स एव स इति । एतेन सत्त्वरजस्तमोगुणसंभावित श्रद्धावता तेपा निष्ठा क्रमासात्त्विकी' राजसी तामसी चेत्युत्तरं सूचितं भवति । वत: सिद्धं सात्त्विकानां देवी सपद्राजसतामसाना सासुरी संपदिति ॥ ३॥ श्री०टी०-ननु च श्रद्धा सात्त्विस्येव सत्त्वकार्यत्वेन त्वयैव भगवा उद्ववं प्रति निर्दिष्टत्वात् । यथोक्तम् । शमो दमस्तितिक्षेज्या सप, सत्यं दया स्मृति । तुष्टिस्त्यागोऽस्पृहा श्रद्धा होर्दया नितिधृतिः । इत्येता, सत्वस्य वृत्तय इति । अतः कथं, तस्यास्वैविध्यमुच्यते ? सत्यम् , तथाऽपि रजस्तमोयुक्तपुरुपानय. खेन रजस्तमोमिनत्वेन सत्त्वस्य त्रैविध्यात श्रद्धाया अपि विध्यं घटत इत्याह-सखानुरूपेति। सत्त्वानुरूपा सत्त्वतारतम्यानुसारिणी सर्वस्य विवेकिनोऽविवेकिनो वा लोकस्य श्रद्धा भवति । तस्मादयं पुरुप. लौकिक: श्रद्धामय श्रद्धाविकार. त्रिविषया श्रद्धया विक्रियत इत्यर्थः । तदेवाह यो यच्छूद्ध , यादृशी श्रद्धा यस्य स एव स , सादृश्या श्रद्धया युक्त एव सः। य: पूर्व सत्त्वोत्कर्षेण सात्त्विकश्रद्धया युक्तः पुरुप. स पुनस्ता- दृश, स्वसंस्कारेण सात्विकद्धया थुक्त एव भवति । यस्तु रजस उत्कण राजसप्रद्धायुक्त. स पुनस्वादश' एव भवति । यस्तु तमस उत्कर्षेण तामसनद्धया युक्त, स पुनस्तादृश एव भवति इति लोकाचारमा- त्रेण प्रवर्तमानेज्वेवं सात्विकराजसतामसश्रद्धाव्यवस्था । शास्रजनितविवेकज्ञानयुकाना तु स्वभावविजयेन सात्त्विक्यकैव अद्धेति प्रकरणार्थ. ॥३॥ स० टी०-प्राग्भवीयमनोनिप्रवासनाना विचित्रता |निमित्तमस्ति श्रदाया वैचित्र्ये चेत्युदीरितम्॥१॥ इदानीं तदुपादानमनोवैचित्र्यतोऽपि च ॥ श्रद्धावैचित्र्यमाहेशो महामायानियामक ॥२॥ सत्त्वं प्रकाशली- लवादन्त करणमुच्यते ।। कचिदुद्रिक्तसत्त्वं तद्यथास्ति निदिवौकसाम् ।। ३ ।। पचिद्रनोऽभिभूतं तद्यक्षा- दीना मनो यथा ॥ कचित्तमोऽभिभूतं तद्यथा प्रेतादिदेहिनाम् ।। ४ ।। मनुष्याणा तु तत्सत्त्वं व्यामिश्रं प्रायशो भवेत् ॥ उच्च शास्त्रीयबोधेनोजूतसत्वं रजस्तम. ॥ ५॥ क्रियते चाभिभूषव तच्छून्यस्य तु तच्छृणु ॥ सर्वश्य प्राणिजातस्य श्रद्धा सत्त्वानुसारिणी ॥ ६ ॥ सत्वमधाने मनसि सात्त्विकी पूर्वपुण्यजा ॥ रज प्रधाने तस्मिन्सा राजसी पूर्वकर्मजा ।। ७ ।। वम.प्रधाने तस्मिन्ता तामसीति विघा स्मृता ॥ का निष्ठेति व्या पृष्टं यत्तत्रोत्तरमुच्यते ॥ ८ ॥ शास्त्रीयज्ञानशून्योऽयं कर्मण्यधिकृत. पुमान् ॥ श्रद्धागयोऽस्य निष्ठापि व्याख्याता श्रद्धयैव हि ॥ २॥ या यस्य सात्त्विकी श्रद्धा राजसी वाऽथ तामसी । श्रद्धानुरूप एवास्ति स पुमानिति निर्णय ॥ १० ॥ ३ ॥ • भा० टी०-प्राचीनकर्मोद्बोधिवा त्रिविधा वासना स्वभावशब्दिता त्रिविधायाः श्रद्धाया. निमित्तमित्यु- तम् । इदानीं तस्या उपादानानुरूपत्वेन त्रैविय ज्ञापयन् तन्मयस्य पुरुषस्य विध्यं ज्ञापयति-सत्वानु- रूपेति । सर्वस्य प्राणिजातस्य सत्त्वानुरूपा सात्त्विकादिसंस्कारोपेतान्तःकरणानुरूपा त्रिविधसस्कारोपेत- चित्तोपादाना श्रद्धा त्रिविधा भवतीत्यर्थ । श्रद्धामय: श्रद्धाप्रायोऽयं पुरुषो जीव, । कथं ? यो यच्छ्रद्ध यस्य जीवस्य य श्रद्धा स यद्धः स एव स श्रद्धानुरूप एव स. जीव, । श्रद्धायात्रैविध्याचन्मयो जीवोऽपि . .
. - म. १७ श्लोक ४] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेवा १९३१ १० टी०–तामेवाह-सत्वानुरूपेति । सर्वस्य प्राणिनः श्रद्धा सत्त्वानुरूपा विशिष्टसंस्कारोपस्कृतान्त:- करणानुरूपा वक्तव्या, यव आस्तिक्यबुद्धिः सत्त्वमन्तरेण नोत्पद्यते । तथा सति गुणप्राधान्यवशात्रिविधा भवति । एवमयं पुरुषः संसारी श्रद्धामयत्रिविधया श्रद्धया विविक्त इति । तदाह-यो यच्छ्रद्धः यादृशी श्रद्धा यस्यासौ यच्छुद्धस्तादृश्या श्रद्धया युक्तः स एव सः ॥ ३ ॥ रा० टी०-अस्तु श्रद्धा त्रिविधा । तेषां का निष्ठेतिप्रभस्य किमुत्चरमित्यत आह-यो यच्छ्रद्धः स एवं स इति । यो यजमानः सात्त्विक पद्धः स सात्त्विकः।यो राजसश्रद्धः स राजसः। यस्तामसनद्धः स तामल इत्यर्थः । कुव एवमित्यतस्तदुपपादनायोफ सत्त्वेति । सर्वस्य जन्तोः श्रद्धा सत्त्वानुरूपा जीवस्वरूपानुरूपा भवति 'सत्त्वं जीवः पचित्रोक्तः इत्यादिवचनात् । श्रद्धायाः जीवस्वरूपानुरूपत्वात्तया तत्स्वरूपं ज्ञेय- मित्यर्थः । श्रद्धायाः जीवानुरूपत्वमेव कुत इत्यत उक्कं श्रद्धेति । अयं पुरुषो जीवः अद्धामयः । वादा- म्यार्थे मय-श्रद्धास्वरूप इत्यर्थः ॥ ३ ॥. यजन्ते सात्त्विका देवान यक्षरक्षांसि राजसाः ।। प्रेताच भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥ ४ ॥ त० टी०-तदेवं श्रद्धया निष्ठा ज्ञेया । श्रद्धा तु साचिकादिभेदभिन्ना देवादिपूजालि न कार्येण लक्ष्येत्याह-यजन्त इति । साचिकाः सत्त्वाचुरा जनाः समानशीलानेव देवान् यजन्ते, तेषां देवाराधनविपया श्रद्धा सांस्विकीवि ज्ञेया । राजसा रजःप्रचुस ,जना समानशीलानेव यक्षर- . सांसि यजन्ते, वेषां राजसी श्रद्धा भवति । अन्ये तामसा जनाः समानशीलांस्तामसानेव मेतान् भूतगणांश्च यजन्ते, वेषां तामसी श्रद्धा भवतीत्यर्थः ॥ ४ ॥ म०टी०-श्रद्धा ज्ञाता सती निष्ठां ज्ञापयिष्यति । केनोपायेन सा ज्ञायवामित्यपेक्षिते देवपूजादिकार्य- लिनेनानुमेयेत्याह-यजन्त इति । जनाः शास्त्रीयविवेकहीना: ये स्वाभाविक्या श्रद्धया देवान् वसुरुद्रादीन् सात्त्विकान् यजन्ते तेऽन्ये सात्त्विका ज्ञेयाः । ये च यक्षान् कुवेरादीन् रक्षांसि च राक्षसान् नितिप्रभू- तीन राजसान् यजन्ते तेऽन्ये राजसा ज्ञेयाः । ये च प्रेतान् विप्रादयः स्वधर्मात्यच्युता देहपावादू वायवीयं देहमापन्ना: उल्कामुसकटपूतनादिसंज्ञाः प्रेता भवन्तीति मनूकान पिशाचविशेषान् या, भूतगणांश्च सप्तमातृ. कादीश्च तामसान् ये यजन्ते तेऽन्ये तामसा क्षेयाः। अन्य इति पदं त्रिष्वपि वैलक्षण्यद्योतनाय संवध्यते ॥४॥ शं०टी०-एवं सत्वरजस्तमःसंभावितश्नद्धावता पुरुपाणां सात्विकी रानसी वामसी च प्रकृतिरिति सूचयित्वा वेषां प्रकृत्यनुरूपाणि कर्माण्याह कर्मणा लिनेन तेषां स्वभावो ज्ञातव्य इति सूचयितुम् यजन्त इति । सात्विकाः श्रोत्रिया देवसंपचिमन्नो देवानगन्यादीन् पैदिकेन कर्मणा यजन्ते सात्त्विस्या अद्वया । तदन्ये राजसास्वामसाश्चासुरसंपत्तिमन्तो राजस्या तामस्या च अद्वया यक्षरक्षांसि पिशाचान् भूतगणाश्च यजन्ते ॥४॥ श्री० टी०-सात्त्विकादिभेदमेव कार्यभेदेन प्रपश्चयति-यजन्त• इति । सात्त्विका जनाः सवप्रा तीन् देवानेव यजन्ते पूजयन्ति । राजसास्तु रजःप्रकवीन्यक्षान् राक्षसाच यजन्ते । एतेभ्योऽन्ये तु विलक्षणास्तामसा जनास्तामसानेव प्रेतान् भूतगणाश्च यजन्वे । सत्त्वादिप्रकृतीनां यत्तदेवतानां नु'पूजा- चिभिस्तत्तत्पूजकाना सात्त्विकत्कादि ज्ञातव्यमित्यर्थः ॥ १ ॥ स० टी०-श्रद्धा ज्ञाता सती निष्ठां ज्ञापयिन्यति साऽपि तु ॥ ज्ञायां कथमित्युक्तेऽनुमैया कार्य. लिङ्गः ॥ १ ॥ शास्त्रीयज्ञानहीना ये स्वाभाविक्या क्या युताः ॥ अया सारिवकान्देवान्यजन्वे - श्रीमागवदीवा [अ० १७ श्लो० ५-६] रुद्रमुख्यकात् ॥ २॥ ते जनाः साविका ज्ञेया ये तु यक्षांश्व राक्षसान् ॥ यजन्ते राजसास्तेऽन्ये ज्ञातव्या राजसा जनाः ॥ ३ ॥ प्रेतान्पिशाचोदान्ये मातृकादीच नामसान् ॥ यजन्ते भूतसंपास्ते ज्ञातव्या- स्तामसा जनाः ॥ ४॥ ५ ॥ भा० टी०-एवं श्रद्धायावैविध्येन पुरुषाणा विध्य निरूप्य यथोकानां पुरुपाणां सत्त्वादिनिष्ठा कथं ज्ञातुं शक्येत्याकालापत्तये देवादिपूनारूपकार्येण लिन साऽनुगेयेत्याशयेनाद-यजन्त इति । साचिका: सात्त्विक श्रद्धामया, सत्त्वनिष्ठाः देवान्चस्वादीन सात्त्विकान्यजन्वे पूजयन्ति ।राजसाः कुवेरनितिप्रमुखान् यक्षरक्षासि राजसान्यजन्ते । अन्ये तामसा जनाः प्रेतान् । विवादयः स्वधर्माप्रच्युता देहपातादूय वायवीय देहरापन्ना उल्कामुखझटपूतनादिसंज्ञाः प्रेता भवन्तीति मनृतान् पिशाचविशेषान् वा भूतगणाश्च सत- मातृकादींश्च तामसान्यजन्ते । एवं पुजाविध्येन जीवानां निष्ठात्रैविध्यं ज्ञातव्यमित्यर्थः ॥ ४ ॥ प० टी०-यजन्ते सात्त्विका देवानिति । सष्टम् ॥ ४ ॥ रा० टी०-यो यच्छूद इत्यत्र सात्त्विकादिनद्धः साधिकादिरित्युक्तम् । चत्र साविकद्धादिः किंकर्म- वानिति जिज्ञासायां ना शृष्विति मतिज्ञातमाह-यजन्त इति । सात्त्विकाः साविश्रद्धावन्तः शास्त्रवि- धानमजानन्तोऽपि साविश्रद्धामावान्विता जना इति यावत् , देवान् यजन्ते । राजसा राजसश्रद्धावन्तः शास्त्रविधानमजानन्त इति सर्वत्र शेयं, यक्षरक्षासि यजन्वे । तामसारतामसयद्धावन्त: प्रेतादीन् यजन्ते । यद्यपि यागविधिपु ऐन्द्रं दधीत्यादिपु इन्द्रादिदेवता एवोद्देश्यतया श्रुताः इवि राजसादिरपि तत्र श्रुतदेवतो- देशेनैव यजनं करोति । तथापि तरिष्टम् । यक्षराक्षसाः दीनत्वादेवनामानो प्रझेन्द्रादिसनामकाः गृहन्तीति स्मृत्या तत्तन्नामकयक्षादीनामेव तत्तयज्ञभोक्तत्वाधक्षरक्षासि यजन्न इत्यायुक्तमिति ज्ञेयम् । अत्र देवया- जिना विष्णुभक्त्यादिमत्वान्मोक्ष एव फलम् । राजसाना तु स्वर्गप्रतिनिधित्वेन कल्पितः साकल्पिकः स्वर्गः । तामसाना तु शिवपरिवारभूतादित्वप्राप्ति. फलं ज्ञेयम् । 'मोक्ष: सांकल्पिकः स्वगो भूवादित्वं फलं कमात्' इति स्मृतेः ॥ ४ ॥ अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः॥ दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागवलान्विताः॥५॥ कर्पयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान विद्धयासुरनिश्चयान ।। ६ ।। त० टी०-ननु शास्त्रविधिमुपेक्ष्य श्रद्धया यजतां श्रद्धात्रैविध्येन सात्विकादित्रैविध्यमुक्त, तथा- ऽपि तेषां शास्त्रोपेक्षणादेवत्वं न भवति या शास्त्रविधिमुत्सृप वर्तते कामकारतः' इत्यादिना सर्व- पुरुषार्थहीनत्वकयनरत् । नाप्यमरत्वं तेषु दैवसाधर्मस्य तपोयज्ञादेर्दर्शनात् । तस्मात्कस्तपां निश्चय इति चेत्तत्राह-अशास्त्रविहितमिति द्वाभ्याम् । अशास्त्रविहितं शास्त्रेण वेदेन तदनुकूलेन स्मृतिपुराणादिना च यन्न विहितमन एव घोरं माणिपीडाकरं तपो ये जनास्तप्यन्ते, उपलक्षणमिदं यज्ञादेः । तथाऽतिघोरं यज्ञ च ये कुर्वन्ति कथंभूता दम्भाहवारसंयुक्ता दम्भी धार्मिकत्वख्यापनम् , अहङ्कार आत्मनः श्रेष्ठधाभिमानस्ताभ्यां संयुक्ताः, कामरागवलान्विताः कामो विपयाभिलापा, राग- स्तदभिनिवेशः, वलं तत्माप्त्यर्थ प्रयत्नाग्रहस्तैरान्विताः सन्तः शरीरस्थमुपादानतया शरीरे स्थितं भूतग्राम पृथिव्यादिभूतसमूहं कर्पयन्ती, वृधैवोपवासादिभिः कृशं कुर्वन्तः, अचेतसो विवेकहीना अन्तःशरीरस्थं मा च मदंगभूतं जीवं चैव कर्षयन्तोऽधमगतिमापणेन दुःखी कुर्वन्तस्तथोयज्ञादि कुर्वन्ति । ते आमुर- ~ [अ०१७ श्लो० ५-६] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टीकोपेता निश्चयास्तानासुरनिश्चयान् परिहारार्थ विदि । अमुरा हि मच्छासनमुल्लङ्घन्ध यथेष्टाचारिणः मदाज्ञा- विपरीताचारित्वात्तेषां सुखलवसंभावनाऽपि नास्ति, प्रत्युत्ताजनदुःखे नरके पतन्ति । असक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचावित्युक्तत्वात् ॥ ५॥ ६ ॥ म०टी०-एक्मनाहतशासाणां सत्त्वादिनिष्ठा कार्यतो निर्णीता । तत्र केचिद्राजसतामसा अपि प्राम्भ- वीयपुण्यपरिपाकात्सात्त्विका भूत्वा शास्त्रीयसाधनेऽधिक्रियन्ते । ये तु दुराग्रहेण दुर्दैवपरिपाकप्राप्तदुर्जन- सादिदोपेण च राजसतामसतां न मुञ्चन्दि वे शास्त्रीयमार्गादृष्टी असन्मार्गानुसरणेनेह लोके परत्र च दुःखभागिन एवेत्याह द्वाभ्याम्-अशास्त्रविहितमिति । अशास्त्रविहितं शास्त्रेण चेदेन प्रत्यक्षेणानुमितेन वा न विहितम्-अशास्त्रेण युद्धाद्यागमेन वोधिचं वा-धोरं परस्यात्मनः पीडाकर सपस्तप्तशिलारोहणादि तप्यन्ते कुर्वन्ति ये जनाः, दम्भो धार्मिकत्वख्यापनम् , अहंकारोऽहमेव श्रेष्ठ इति दुरभिमानः ताभ्यां सम्यग्युक्ताः, योगस्य सम्यक्त्वमनायासेन वियोगजननासामर्थ्य, कामे काम्यमानविपये यो रागस्तनिमित्तं पलमत्युम- दुःखसहनसामर्थ्य तेनान्विताः) कामो विषयेऽभिलापः, रागः सदा तदभिनिविष्टत्वरूपोऽभिष्वङ्गा, वलमव. श्यमिदं साधयिष्यामीत्याग्रहः, तरन्विता इति या । अव एव वलवत् दुःखदर्शनेऽप्यनिवर्तमाना: कर्शयन्तः कुशीकुर्वन्तो वृयोपवासादिना शरीरस्थं भूतप्रास देहेन्द्रियसंघाताकारेण परिणतं पृथिव्यादिभूतसमुदायम- चेतसो विवेकशून्या: मां चान्द शरीरस्थं भोक्तरूपेण स्थित भोग्यस्य शरीरस्य कशीकरणेन कृशीकुर्वन्त एव मामन्तर्यामित्वेन शरीरान्त:स्थितं बुद्धितगृत्तिसाक्षीभूतमीश्वरमाज्ञालनेन कर्पयन्त इति वा । वाहिकसर्व भोगविमुखान् परत्र चाधमगतिभागिनः सर्वपुरुषार्थभ्रष्टानासुरनिशान आसुरो विपर्यासरूपो वेदार्थ. विरोधिनिश्चयो येषां वान् मनुष्यत्वेन प्रतीयमानानप्यसुरकार्यकारित्वादसुरान्विद्धि जानीहि परिहरणाय । निश्चयस्यासुरत्वात्तापूर्षिकाणां सर्वासामन्त:करणवृचीनामासुरत्वम् । असुरवजातिरहितानां च मनुष्याणां कर्मणैवासुरत्वाचानसुरान्विद्धीति साक्षानोतमिति च दृष्टव्यम् ।। ५ ॥ ६ ॥ श० टी०-राजसानां तामसानां चासुरमेव धर्मे प्रतिपादयति-अशास्त्रेति द्वाभ्याम् । दम्भो मन्त्रतन्त्र. वेपमापादियाह्यपरिकराटोपः, अहंकारः कुलशीलविद्यानमादिभिरुस्कृष्टोऽहमित्यन्तःकरणादोपस्ताभ्यां संयु- काः, कामरागपलान्विता:-कामाः ऐहिकामुष्मिकभोग्यपदार्थाः, रागस्वेपामुपभोगेच्छा, पलमिच्छावेगस्तैः सभ्यगन्वितास्तत एवाचेतसोऽविवेकिनो ये मूढाः शरीरस्य स्थूलशरीर उदरे. चान्यत्र विद्यमानं भूतमामं स्थूलसूक्ष्मरूपप्राणिसमुदायम् । यद्वा प्राणेन्द्रियप्रामं कर्पयन्तोऽन्नरसाभावेन शोषयन्तो मां चैवान्तःशरी- रस्थमन्तःशरीरं बुद्धिः तत्र सर्वप्रकाशकतया विद्यमानं मां चापि प्रत्यग्रूपं कर्शयन्तो मनोवृद्धीन्द्रियाणामु. पवासकृतातिश्रान्त्या प्रवृत्युपरमे सत्यात्मचैतन्यस्य स्फुरणं न भवति । तदभाप एवास्य प्रत्यगात्मनः कशी- करणं तत्कुर्वन्तः सन्तो ये जनाः अशास्त्रविहितम् न अशास्त्रविहितं अशास्त्रविहितं धोई पीडाफर तपस्व. प्यन्ते उपवासत्रतादिना कायशोपणं कामरावलानुरूपया श्रद्धया ये कुर्वन्तीत्यर्थः । तानासुरनिधयान आसुराणां निश्चयो येषां वानासुरनिश्चयान विद्धि दुःकरवानामुपन् विजानीहीत्यर्थः। एतेनाभातश्रद्धापन राजसानां तामसानां चायव संपादति सूचितम् । वेन सात्त्विज्ञानां दैव्येव संपदिति सिद्धम् ॥ ५॥६॥ श्री०टी०-राजसवामसेषु पुनर्विशेपान्तरमाह-अशास्त्रविहितमितिद्वाभ्याम् । शास्त्रविधिमजानन्तोऽपि कचित्प्राचीनपुण्यसंस्कारेणोत्तमाः सात्त्विका व भवन्ति । केचित्तु मध्यमा राजा भवन्ति । अवमास्तु तामसा भवन्ति । ये पुनरत्यन्त • मन्दभाग्या: गतानुगत्या पारसण्डसद्धेन चवदाचारानुवर्तिनः सन्त अशामविहितं घोरं भूतभयंकर उपस्तप्यन्ते फुर्वन्दि । उन हेतवः-दम्भाईचाराभ्यां संयुक्ताः । तया कामो. ऽभिलाप:, राग: आसक्तिः, यलमामदः । एतैरन्यिवाः सन्तः दानामुरनिश्चयान विद्धीत्युत्तरेणान्वयः ॥५॥ 1
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श्रीमनगवद्गीता
[अ० १७ सो०६-]
किंच-कपाश)यन्त इति । शरीरस्थं प्रारम्भकत्वेन देहे स्थित भूतानां पृथिव्यादीना प्राम समूई कप (1)
यन्त: वृधवोपवासादिभिः कृशं कुर्वन्तोऽचेतसोऽविवेकिनः मां च अन्तर्यामितया अन्त:शरीरस्थं देहमध्ये
स्थितं मदाझालनेनैव कप(श)यन्तः सन्त एवं ये तपश्चरन्ति दानासुरनिश्चयानासुरोऽतिको निश्चयो येषा
तान् विद्धि ॥६॥
स० टी०-इत्यनारवशाखाणा निष्टोक्ता निविधा नृणाम् ॥ केचित्पुण्यवशात्सन्ति सात्त्विकाः
शास्त्रतत्परः ॥ १॥ दुराग्रहेण ये स्वयं दुर्दैवपरिपाकतः ॥ दुष्टसनादिदोपेण न मुञ्चन्त्यामुरी मत्रिम्
॥१॥ ते शास्त्रीयाध्वनो भ्रष्टा असन्मार्गानुसारतः ॥ इहामुत्र च दु.खेकमान एवेति कन्यते ॥ ३ ॥
यन्न युत्या न वा स्मृत्या विहित वप आसुरम् ॥ यद्वा शाण बुद्धपादिप्रणीवेनैव वोधितम् ॥ १ ॥
घोर स्वस्य परस्यापि कुर्वन्त्यत्यन्तदु सदम् ॥ आमनो धार्मिकत्वस्य ख्यापनं दम्भ ईरितः ॥ ५ ॥ श्रेष्ठी-
इहमेपमित्येवमहंकारो दुरामहः ॥ ताभ्यामत्यन्तसंयुक्ता यो रागः काम्यगोपरे ॥ ६ ॥ वनिमिचं बलं
दुःसं सोढुं सामर्थ्यमित्यपि ॥ विपयामिलापः कामो रामोऽभिष्वङ्ग उच्यते ॥ ७ ॥ साधयिष्याम्यवश्यं
घेत्यामहो बलमुच्यते ॥ तैर्युता बलवहु.सदर्शनेऽत्यनितिन ॥ ८ ॥ ५ ॥ पृथ्व्यादिभूतसंघ ये
देहस्थमविवेकिनः ॥ कृपीकुर्वन्त आत्मानं मा चैवान्तःशरीरगम् ॥ १ ॥ अन्तर्यामितया भोस्तृ-
भावेन साक्षिभावतः ॥ मदानालङ्कने ते मा द्विपन्तो नराधमा. ॥ २॥ वान्पुमर्थात्परिग्रष्टानिहामुनाप-
भागिनः ।। आसुरोऽतिविपर्यासो विरुद्धत्वेन च ध्रुवेः ॥३॥ निधयो दुधियां येषां वान्मनुप्यत्वरूपतः ।।
प्रतीयमानानासुर्या कान्तान्विद्धपासुरान्छटाम् ॥ ४॥ सर्वथा देय एवासी दुष्ट आसुरनिश्चयः । श्रेषो.
थिभिर्विपश्चिनिटरित्येवमाशयः ॥५॥६॥
भा० टी०एवं कार्यतो निताना सत्वादिनिष्ठाता मध्ये देवपूजादिवत्परस्य सत्त्वनियस्य दोलभ्यं
रजस्तमीनिष्ठाना बाहुल्यं च ज्ञापयितुमाह-अशाखेति । अशास्त्रविहित श्रुतिस्मृत्यादिरूपेण शास्त्रेण
विहितं न भवति तत् शालं न भवतीत्यशावं तेन, बुद्धाद्यागमेन वोधितमिति वा । घोरं प्राणिनामात्मनः
श्व पीडाकरं तपो ये जनास्तप्यन्ते निर्वतयन्ति । जनान्विशिनष्टि-दम्भाहकारसंयुक्ता: दम्भो धर्मध्वजित्वम् ,
अहंकारोऽहमेव सर्वोत्तम इति दुरभिमानस्ताभ्यां सम्यग्युक्ताः । कामरागपलान्विता:-कामों विषयामिलाप',
कामस्य कारणीभूतो विपयाभिचनात्मको रागः, कामरामा-या कृतं धलं विषयसंपादनोत्साहस्वनान्विताः,
कामरागवलैरन्विता इति वा ॥ ५॥ रजोनिष्ठान् प्राधान्येन प्रदर्य तमोनिष्ठान् प्राधान्येन विशिनाधि-
कर्शयन्त इति । शरीरस्थं भूतप्रामं करणसमुदायरूपेण परिणतं कर्शयन्त: कुशीकुर्वन्तः यतोऽचेतसोऽविय-
फिनो मुढामा चैव तत्कर्मधुद्धिसाक्षिभूतमन्त शरीरस्थं कर्शयतो सदनुशासनातिक्रमणं कुर्वन्तो भोक्तरूपे-
गान्त.शरीरस्थम् । भाग्यस्य शरीरस्य कर्शणेन कुशीकुर्वन्त इति तु भोग्यस्य कशीकरणेनापि निरवयवस्य
भोक्त, वास्तवं कार्य न संभवतीत्यभिप्रेत्याचा: नोक्तम्'। य एलंविधारतान् आसुरो निधयो भेषा
ते आसुरनिश्चया: सान्परिहरणार्थ चिद्धि विज्ञानीहीति करुणानिधिभगवानुपदिशति ॥ ६॥
• ५० टी०--अथाविहितं कर्म दर्शयति-अशाखविहितमिति द्वाभ्याम् । शास्त्रेणाविहितमननुझातं घोरं
भयावह श्मशाने नग्नत्वेनानुष्ठीयमानं घोरसाधनादि ये जनास्तपस्तप्यन्तेऽनुतिष्ठन्ति । दम्भो धर्मध्वनि-
त्वम् , अहंकारो गरताभ्या संयुका. । कामोऽमिलापो, राग आसक्तिलमामहस्तैरन्त्रितास्तानासुरनिश्चया-
विद्धीत्युत्तरेणान्वयः ॥ ५॥ तदुदाहरति कर्मयन्त इदि । शरीरस्थं शीरान्तर्गतं भन्यादिभूतमाम प्राणा-
चारोपवासादिभि. कर्शयन्त, कृशं कुर्वन्तः । च पर मामन्तर्यामिलेन स्थित दु.ससाक्षिणं कुर्वन्तोऽत एकाचे.'
वसरे देवाप्पमित्यजानन्तस्तानामुनिश्चयानासुरोऽतिकरो निश्चयो येपा ते वथाविधान् विद्धि ॥ ६ ॥
[अ० १७ श्लो०७] वत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता रा०दी-न केवलं तामसानां भूतादित्वं तम:प्राप्तिरपीत्याह-अशास्त्रेत्यादि द्वाभ्याम् । ये जनाः शानादन्येन दुरागमादिना विहितं घोरं महाकष्टरूपं वपः दम्भाहकारसंयुक्ताः कामरागवलान्विताः इच्छासक्त्याग्रहयुक्ताः सन्तस्तप्यन्ते कुर्वन्ति ॥ ५ ॥ किंच-कर्शयन्त इति । शरीरस्थं भूतग्राम लक्ष्म्यादिदेवतासमुदायं मां चान्वनियामकत्येन शरीरस्थं कर्शयन्तो ( कशत्वेना )ल्पगुणत्वेन पश्यन्तो- ऽचेतसोऽविवेकिनः । तानासुरनिश्चयानसुरसंवन्धिनिश्चयान्विद्धि जानीहि । ते दैत्यरक्षःपिशाचा इत्यर्थः । तमःप्राप्तियोग्या इति भावः ॥६॥ आहारस्वर्षि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः॥ यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥७॥ तटी-एवं परिहार्यपामुरत्वं प्रदर्य साचिकानामुपादानार्थ राजसतामसानां परिहारार्ध यज्ञतपोदानानां गुणतस्वैविध्यं पलं तावत् सात्त्विकादियज्ञादेरन्तःकरणनिमित्तत्वादन्तःकरणस्य शुद्धस्तु "अन्नमयं हि सोम्य ! मनः आहाशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः" इति श्रुत्या आहारशुद्धिमूलत्वनि- श्ययादाहारस्य गुणतस्वैविध्यं पातुं प्रतिजानीते-आहारस्त्वपीति । न केवलं श्रद्धैव देहिनां त्रिविधा भवति । किंतु सर्वस्य जनस्य यस्तु आहारः प्रियो भवति, सोऽपि विविध एव । सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वेन स्वस्वप्रकृत्यनुसारात्रिविधेप्वेवैकतमः प्रियः, नतु चतुर्थः कश्चिदित्यर्थः । तपा यज्ञास्तथा तपो दानं च विविधं भवति । तेपामाहारादीनां भेदमिमं वक्ष्यमाणं शृणु ॥ ७ ॥ म०टी०-ये सास्विकास्ते देवा ये तु राजसास्तामसाश्च ते विपर्यस्तत्वादसुरा इति स्थिते सात्वि.. कानामादानाय राजसतामसानां हानाय चाहारयज्ञवपोदानानां वैविध्यमाह-आहार इति । न केवलं अद्धैव त्रिविधा, आहारोऽपि सर्वस्य प्रियस्त्रिविध एव भवति सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वेन चतुर्ध्या विधायाः असंभवात् । यथा दृधार्थ: आहारस्त्रिविषस्तथा यज्ञतपोदानान्यदृष्टार्थान्यपि त्रिविधानि । “यझं व्याख्या- स्यामो द्रव्य देवतात्याग." इवि कल्पकारेदेवतोदेशेन द्रव्यत्यागो यज्ञ इति निरुकः । स च यजतिना जुहोति- नाच चोदितत्वेन यागो होमश्चेति द्विविधः-उचिष्ठद्धोमा वषट्कार प्रयोगान्दा याज्यापुरोनुवाक्यावन्तो यजतयः, उपविष्टहोमा: स्वाहाकारप्रयोगान्ता याज्यापुरोनुवाक्यारहिता: जुहोतय इति कल्पकाराख्यातो यज्ञ-. शब्देनोक्तः । तपः कायेन्द्रियशोपणं कच्छ्चान्द्रायणादि। दानं परस्वत्वापतिफलकः स्वस्वत्वत्यागः । तेपामाहा- रयज्ञसपोदानाना साविकराजसतामसभेदं मया व्याख्यायमानमिमं शृणु ॥ ७ ॥ शं०टी०-एवं श्रद्धाभेदेन देवादियजनभेदेन शास्त्रीयाशास्त्रीयकर्मानुष्ठानेन च सात्त्विका राजसास्तामसा ज्ञातव्या इति सूचयित्वाऽधुना त्वाहारेण योन तपसा दानेन च ते ज्ञातव्या इति सूचयितुमाहाग्यज्ञतपो- दानादीना सत्त्वादिगुणभेदेन त्रैविध्यं प्रतिपादयति सात्त्विकमुमुक्षुभिः । सात्त्विका एवाहारादयश्चित्तशुद्धये कर्तव्या नवितर इति ज्ञापयितुं च--आहारस्त्विति । स्पष्टोऽर्थः ॥ ७ ॥ श्री०टी०-आहारादिभेदादपि सात्त्विकादिभेदं दर्शयितुमाह-आहारस्त्वित्यादिवयोदशभिः । सर्व स्थापि जनस्य य आहारोऽन्नादिः स तु यथायथं त्रिविधः प्रियो भवति । तथा यज्ञतपोदानानि च निवि- धानि भवन्ति । वेपा च वक्ष्यमाणमिमं भेदं शृणु । पत्तश्च राजसतामसाहारयज्ञादिपरित्यागेन सात्त्विका- हारयज्ञादिसेवया सत्त्ववृद्धौ यत्नः कर्तव्य इत्येतदर्थ कथ्यते ॥ ७ ॥ स० टी०-ये सात्त्विकारते देवाः स्यू राजसास्वामसास्तु ये ।। तेऽसुराः सर्वथा त्याच्या ग्राहा देवास्तु सायिकाः ॥ १॥ इत्याहारतपोयज्ञदानविष्यमुच्यते . ॥ विविधोक्ता यथा अदा थाहाविधानाति श्रीमनगवद्गीता [अ०१७ सौ. (-१०] ॥२॥ सर्वस्य प्राणिनो भोकः प्रियो गमतपस्वया ॥ देवतोदेशतो द्रव्यत्यागो याग उदाहृतः ॥३॥ तपश्चान्द्रायणायुक्तं शरीरेन्द्रियशोपणम् ॥ दानं स्वस्वत्वत्यागोऽन्यस्वत्वापादनमीरितम् ॥४॥ तेषां चतुर्गों भेदं त्वं मोच्यमानं मया शृणु ॥ ५॥ ६ ॥ भा० टक-वत्तदाहारेषु प्रीत्यतिरेकेण सात्त्विकत्वादिकं यज्ञादीनामपि सत्वादिगुणभेदेन विविधत्वं च बुला सास्त्रिका आहारादयो ग्राह्या: राजस्तामसाश्च परिवा इति योधयितुमारभते-आहार इत्या- दिना ! आहियते इत्याहारो भक्ष्यादिरूपः । सर्वस्य सात्त्विकादिभेदभिन्नस्य प्राणिजातस्य भोक्तुराहारोऽपि विविधविपकारः प्रियः इटो भवति, तथा यज्ञनिविधः तथा दानम् । तेपामाहारादीनामिमं वक्ष्यमा भेदं शृणु ।।७।। प० टी०-अथ सात्त्विकादीनामाहारादिभेदमाह-आहार इत्पादितस्त्रयोदशभिः । सर्वस्यापि जनस्य य आहारोऽनादिः स तु यथायथं त्रिविधः प्रियो भवति । तथा यज्ञतपोदानानि च विविधानि भवन्ति । सेपा वक्ष्यमाणमिमं भेदं त्रिविधं शृणु ॥ ७ ॥ रा०टी०-श्रद्धाभेदात्सात्त्विकादिभेदः वत्तीयसदसकमविवेकेन सात्त्विकादिस्वरूपविवेक उक्तः । आहारादिभेदेनापि तेषां विवेक प्रतिज्ञापूर्वमाह-आहारस्त्वित्यादिसप्तभिः । सर्वस्येति सात्त्विकादिजन- स्येत्यर्थ, । यज्ञस्तपादान तथा प्रिविमित्यर्थः । देषामिति आहारादीनामित्यर्थ: ।। ७॥ आयुःसत्त्ववलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥ कटुम्ललवणारयुष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।। आहारा राजसस्थेष्टा दुःखशोकामयमदाः ॥९॥ यातयामं गतरसं प्रति पर्युपितं च यत् ॥ उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजन तामसप्रियम् ॥ १०॥ त० टी०-तत्र तावदाहारभेदानाद त्रिभिः श्लोकः-आयुरिति । आयुरादिवर्धना आहाराः साविकानां पिया भवन्ति । तत्रायश्चिरजीवन, सत्त्वमन्तःकरणं गुणो वा तस्य कार्यं ज्ञानं सत्व- शब्देनोच्यते सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्' इतिवचनात् । वलं स्वधर्मानुष्ठानसामर्थ्यम्, आरोग्यं रोगरा- हित्य, मुखं चित्तप्रसादः, प्रीतिरभिरुचिस्तेषां विवर्धना विवृद्धिकराः । ते च रस्या मधुररसोपेताः स्निग्धाः स्नेहयुक्ताः, स्थिराः शरीरे रसाशेन चिरकालस्यायिनः, हृया हृदयद्रमाः, एवंविधा आ- हारा भक्ष्यभोज्यादिरूपाः सात्त्विकामिया भवन्ति । तथा-कटिति । अतिशब्दः कट्वादिषु सप्तस्वपि रोजनीयः । तथा चातिकनिम्बादित, अत्यम्ला, अतिलवणः, अत्युष्णा, अतितीक्ष्णो मरी- च्यादिः, अतिरूतः स्नेहवर्जितः कड्कोद्रवादिः, अतिविदाहिनः कण्ठोदरदाहकरा:-एवंभूता आहारा राजसस्य ः प्रिया भवन्ति । ते च दुःखं तात्कालिकतापा, शोकः पश्चाशाविदौ- मनस्यम्, आमयो रोगः, एतान् प्रददतीति दुःखशोकामयमदाः । तथा यातयाममिति ! यातयाम् वहुकालास्थितं, गतरसं निर्गतस्वाभाविकरसं, पूति दुर्गन्धच्यात, पर्युपित राज्यन्तरितत्वेन रसान्तराविष्टम् , उच्छिष्ट गुरुतत्सदृशेभ्योऽयेणं भुक्तावशिष्टम् , अमेध्यं यजेश्वरानहमशुचि, एवंविध V । [अ० १७ श्लो० (-१.] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकापेवा तमोमयं भोजनं तामसस्य पुरुषस्य मियं भवति । पुनरपि तमसो विद्धिकरम् । तस्माच्छ्रे- यस्कामे राजसं तामसं च हित्वा सत्त्वद्धये सात्त्विकाहार एवं सेवनीय इति भावः ॥ ८-१०॥ म०टी०-आहारयज्ञवपोदानानां भेदः पञ्चदशभिर्व्याख्यायते । तबाहारभेदनिभिः-आयुरिति । आयु- श्विरजीवन, सत्त्वं चित्तधैर्य बलवति दुखेऽपिनिर्विकारत्वापादक, वलं शरीरसामर्थ्य स्वोचित कार्ये श्रमाभा- कायोजकम् ,आरोग्यं व्याध्यभावः, सुखं भोजनानन्तराबाद, तृतिः शीतिभोजनकालेऽनभिरुचिराहित्यमिच्छौ- स्कट्यं तेषां विवर्धनाः विशेपेण वृद्धिहेतवः, रस्याः आस्वाद्याः मधुररसप्रधाना:, स्निग्धाः सहजैनागन्तुकेन वा नेहेन युक्ताः, स्थिरा: ग्साद्यशेन शरीरे चिरकालस्थायिना, हृद्याः हृदयंगमा: दुर्गन्धाशुचित्वादिदृष्टादृष्टदोप- शुन्याः, आहाराश्वयंचोप्यलेह्यपेयाः, सात्त्विकानां प्रिया:-एतलिङ्गे सात्त्विका ज्ञेया: सात्विकत्वमभिलपद्भिश्वेत आदेया इत्यर्थः ।।८।। कविति । अतिशब्दः कट्वादिषु सप्तस्वपि योजनीयः । कटुस्तिक्तः कटुरसस्य तीक्ष्णशब्दे नोत्तत्वात् । तत्रातिकटुर्निम्पादिः, अत्यन्लोऽतिलवणोऽत्युष्णश्व प्रसिद्धः । अतितीक्ष्णो मरीचादिः, अतिरक्षा स्नेहशून्यः कङ्गुकोद्रवादिः, अतिविदाही संतापको राजिकादिः, दुखं तात्कालिका पीडां, शोके पश्चाबावि- दौमनस्यम् , आमयं रोगं च धातुवैषम्यद्वारा प्रदतीति तथाभिधा आहारा राजसस्येष्ठाः । एतैर्लिङ्गे राजसा । ज्ञेयाः सात्त्विकैश्चैत उपेक्षणीया इत्यर्थः ॥ ९॥ यातेति । यातयाममपके निर्यिस्य गतरसपदेनोक्त्यादिति भाष्यम् । गतसं विरसता प्राप्त शुष्क, यातयाम पक्कं सत्बहरादिव्यवहितमोदनादिशैत्यं प्राप्तं, गतरसमुद्धृत- सारं मथितदुग्धादीत्यन्ये, पूति दुर्गन्ध, पर्युपितं पकं सदाव्यन्तरितम्। चेन तत्कालोन्मादकरं धत्तूरादि समुच्ची- यते । यतिप्रसिद्धं दुष्टत्वेन उच्छिष्टं भुक्तावशिष्टम् , अमेध्यमयज्ञामशुचिमांसादि । अपि चेति वैद्यकशास्त्रो- क्तमपथ्यं समुच्चीयते । एतादृशं योजनं भोज्यं तत्तामसस्य प्रियं सात्त्विकैरतिदूरादुपेक्षणीयमित्यर्थः । एताह- शभोजनस्य दुःखशोकामयप्रदत्वमतिप्रसिद्धमिति कण्ठतो नोक्तम् । अत्र च कमेण रस्यादिवर्गः सात्त्विकः, कटवादिवों राजसः, यातयामादिवर्गस्तामस इत्युक्तमाहारवर्गत्रयम् । तत्र सात्त्विकवर्गविरोधित्वमित्तरवर्गद्वये द्रष्टव्यम् । तथा प्रतिकटुत्वादिकरस्यत्वविरोधि तादशस्यानास्वायत्वात् । रूक्षत्वे स्निग्धत्वविरोधि। तीक्ष्णत्व- विदाहिने धातुपोषणविरोधित्वास्थिरत्वविरोधिनि । अत्युष्णत्वादिकं हृगत्वविरोधि । आमयप्रदत्वमायु:सत्त्वव. लारोग्यविरोधि । दु.खशोकप्रदवं सुखप्रीतिविरोधि । एवं सात्विकवर्गविरोषित्वं राजसवर्गे स्पष्टम् । तथा ताम- सवर्गेऽपि गतरसत्वयातयामत्यपर्युपितत्वानि यथासंभवं रस्यत्वनिम्भवस्थिरत्वंविरोधीनि । पूतित्वोच्छिष्टरवा- मेध्यत्वानि हृद्यत्वविरोधीनि । आयु.सत्त्वादिविरोधित्वं तु स्पष्टमेव । राजसवर्गे दृष्टविरोधमात्र, तामसवर्ग तु दृष्टादृष्टविरोध इत्यतिशयः॥ १० ॥ शं० दी-आयुरिति । आयुपो ज्योगजीवनस्य सत्त्वस्यान्त:करणस्य तत्स्फूर्तेलस्य देहेन्द्रियशके. गरोग्यस्य रोगानुदयस्य सुखस्य संतोपस्य प्रीतेश्चक्षुष्पीतेर्विवर्धना: वर्धकाः रस्याः रसोपेता मधुरा: स्निग्धाः स्नेहयुक्ताः स्थिरा सारवत्तराः हृद्या मनोरमा आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥ ८॥ कद्विति । अनिशब्दः कट्वादिभिः प्रत्येक संबध्यते। अतिकटुरवितिक्तो निम्बादिः कटुकस्तिक्तशब्देनोच्यते अत्यम्लोऽतिलवणा- ऽत्युष्णः अतितीक्ष्णो बृहन्मरीचिः रूक्षो निःस्नेहा प्रियवादिः, विदाही सर्पपादिः, सद्योदुःपपदा: पश्चा- च्छोकरोगप्रदा आहारा राजसस्येष्ठाः ।। ९ ।। यातेति । यातयामं मन्दुपकं, गवरसम् अतिपयम् , पूति दुर्गन्धि, पर्युषितं पुरावनं, उच्छियं भोजनशेष, अमेभ्यमयज्ञशेषं, भोजनं तामसप्रियम् ॥ १०॥ श्री०टी०-तबाहारस्वैविध्यमाह-आयुरितित्रिभिः । आयुर्जीवितम् , · सत्त्वमुत्साहः, यतं शक्तिः; आरोग्यं रोगराहित्य, सुखं चित्तप्रसादः, प्रीविरभिरुचिः, आयुरादीना. पिवर्धना , विशेषण वृद्धिकरास्ते .
११४० A . श्रीमनगवद्गीता [अ० १७ श्लो० १२] म०टी०-इदानी क्रमप्राप्तं त्रिविधं यज्ञमाह-अफलेति त्रिभिः । अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्य. पशुबन्धज्योतिष्टोमादिर्यज्ञो द्विविध:-काम्यो नित्यश्च । फलसंयोगेन चोदित: सर्वाङ्गोपसंहारेणैव मुख्यकल्पे. नानुष्ठेयः काम्य: । फलसंयोगं विना जीवनादिनिमिचसंयोगेन चोदितः सांझोपसंहारासंभवे प्रतिनि- ध्याद्युपादानेनागुख्यकल्पेनाप्यनुष्ठेयो नित्यः । तत्र सर्वाङ्गोपसंहारासंभवेऽपि प्रितिनिधिमुपादायावश्यं यष्ट- व्यमेव प्रत्यवायपरिहारायावश्यकजीवनादिनिमिचेन चोदितत्वादिति मनः समाधाय निश्चित्य अफला- कादिभिरन्तःकरणशुद्धचर्यितया काम्यप्रयोगविमुखैर्विधिदृष्टो यथाशाखं निश्चितो यो यज्ञ इज्यतेऽनुष्ठीयवे स यथाशास्त्रमन्त.करणशुद्धयर्थमनुष्ठीयमानो नित्यप्रयोगः सात्त्विको ज्ञेयः ॥ ११ ॥ शं० टी०--अफलेति । यष्टव्यमेवानेन ममेश्वरप्रीतिलक्षणः पुरुषार्थः सिध्यतीति मनः समाधाय मनसो नैश्चल्यमापाद्य श्रद्धाभक्तिभ्यामफलाकाविभिनिष्कामैः श्रोत्रियेस्तन्त्रमन्त्रार्थवेदिभिर्विधिदृष्टो विध्युतनियमो- पेतो यो यज्ञ इज्यते स सात्त्विको यज्ञ इत्यर्थः ॥ ११ ॥ श्री०टी०-यज्ञोऽपि त्रिवियः, तत्र सात्त्विकं यज्ञमाह-अफलाकातिभिरितित्रिभिः । फलाकाहार- हितैः पुरुविधिना दृष्टः आवश्यकतया विहितो यो यज्ञ इज्यो अनुष्ठीयते स सात्विको यज्ञः । कथमिज्यते यष्टव्यमेवेति यज्ञानुष्ठानमेव कार्य नान्यत्फलं साधनीयमित्येवं मनः समाधाय एकाग्रं करवेत्यर्थः ॥११॥ स० टी०-निविधं यज्ञमाहेश: क्रमप्राप्तमिहाधुना ।। अनुष्ठेयो द्विधा यज्ञ: कान्यो नित्यश्च तत्र तु॥१॥ नित्यो यष्टव्यमेवेति प्रत्यवायजिहासया ॥ मनो निश्चित्य शुद्धयर्थतया काम्यपराङ्मुखैः ॥ २ ॥ यज्ञो. ऽनुष्ठीयते प्राज्ञनिश्चितो यो यथाविधि ॥ विज्ञेयः सात्त्विको यज्ञोऽनुष्ठितो धीविशुद्धये ॥ ३ ॥ ११ ॥ भा० टी-एपमाहारत्रैविध्यं विभज्य क्रमप्राप्तं यज्ञत्रैविध्यं विभजन्नादावुपादेयं सात्त्विकं यज्ञमाह- अफलेति । अफलाकादिभिः फलाकाद्धावर्जितैरग्निष्टोमादिः विधिदष्टः शास्त्रचोदनादृष्टो यो यज्ञो यष्टव्य- मेव यज्ञस्वरूपनिवर्तनमेव कर्तव्यमित्ति बुद्धया मन: समाधाय नानेन पुरुषार्थो मम कर्तव्य इति निश्चित्ये- ज्यते निर्वयते स सात्त्विको यज्ञ उच्यते । स एव श्रेयोधिभिरुपादेय इत्यर्थः ॥ ११ ॥ ५० टी०-अब यज्ञोऽपि विविधस्तत्र सोपाधिकं यज्ञमाह-अफलाकाइदिभिरिति त्रिभिः । 'कुर्व- नेवेह कर्माणि' इत्यादिविधिना यष्टव्यमेवेति इष्टो यज्ञः फलाकाडारहितैः पुरुपैर्मनः समाधाय शुद्धं कृत्वा य इज्यतेऽनुष्ठीयते स सात्त्विकः ।। ११ ॥ रा० टी०-याभेदेन सात्त्विकादिभेदमाह-अफलेति । फलाकाहारहितों यज्ञो विधिदृष्टो विधिज्ञान. पूर्वक: यष्टव्यमेवेवि मनः समाधाय इज्यो अनुष्ठीयते स सात्विक इत्यर्थः ॥ ११ ॥ अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।। इज्यते भरतश्रेष्ठ ! तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥ त० टी०-राजसयज्ञमाह-अभिसंधायेति । फलमभिसंधाय इदं मम स्पादित्युद्दिश्य तु पदि- ज्यते यननं क्रियते, दम्भार्य धार्मिकत्वख्यापनार्थमपीत्यपिशब्दायशोऽर्थः, यस्तं यनं राजसं विद्धि।।१२।। म०टी०-अभिसंघापेति । सलं काम्यं स्वर्गादि अभिसंधाय गदिश्य न त्वन्तःकरणशुद्धिम् । तुर्नित्य- प्रयोगलक्षण्यसूचनार्थ । दम्भो लोके धार्मिकत्वख्यापन वद्यमपि पैवेति विकल्पसमुचयाभ्यां विभ्य- सूचनार्थम् । पारलौकिकं फलमभिसंभायेवादम्भार्थत्वेऽपि पारलौकिकपटानभिसंथानेऽपि दम्भार्थमेवेति विकल्पेन दो पक्षों ! पारलौफिरफलामध्येइलौफिकदम्भाधमपीति समुचयेनेकः पक्षः । एवं दृष्टादृष्टफलाभिसं- पिनान्तःकरणशुद्धिमनुरिश्य यदिज्यते यथाशाचं यो यसोऽनुष्ठीयते । यी राजसं विद्धि हानाय । हे भाववि योग्यतमूपनम् ।। १३ ॥
[अ० १७ श्लो० १३ ] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता शं० टी०-अभिसंधायेति । स्वर्गादिफलाथै वा दम्भार्थ वा क्रियमाणो यज्ञो राजस इत्यर्थः ॥ १२ ॥ श्री०टी०-राजसं यज्ञमाह-अभिसंधायेति । फलमभिसंधाय उद्दिश्य तु यदिज्यते यज्ञः क्रियते दम्भाथै च महत्त्वख्यापनार्थ तं यज्ञं राजसं विद्धि ॥ १२ ॥ स० टी०-स्वादिफलमुद्दिश्य लोके दम्भार्थमेव वा ॥ चित्तशुद्धिमनुद्दिश्य दृष्टादृष्टफलेप्सुना ॥ १ ॥ यश्वानुष्ठीयते शास्त्रात्तं यज्ञं विद्धि राजसम् ।। हानाय भरतश्रेष्ठ, योग्योऽसि त्वं तु सात्त्विकम् ॥२॥ काम्यो मुमुक्षुभिहेयः सर्वथेत्याशयो होः ॥ ३ ॥ १२ ॥ भा० टी०-राजसं यज्ञं ज्ञापयति-अभीति । अभिसंधाय तु फलं स्वर्गादिफलमुद्दिश्य दम्भार्थमपि चैव इह धार्मिकत्वख्यापनार्थं च यत् इज्यते यद्यजनं क्रियते, वे यज्ञ राजसं रजसा निवृत्तं परिहरणार्थ विद्धि जानीहि । भरतश्रेष्ठेति संवोधयन राजसयज्ञे तव योग्यता नास्तीति सूचयति ॥ १२ ॥ ५० टी०-राजसं यज्ञमाद-अभिसंधायेति । फलमभिसंधायोदिश्य दम्भाथै महत्त्वख्यापनार्थं य इज्यते तं राजसं यज्ञ विद्धि ॥ १२ ॥ रा० टी०-अभीति । फलमभिसंधाय मे भूयादिति कामयमान एव अपि दम्भार्थमेव आत्ममहत्त्व- प्रदर्शनार्थमेव यदिज्यते तं यज्ञं राजसं विद्धि ॥ १२ ॥ विधिहीनमसृष्टान्न मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ।। १३ ॥ त०टी०-तामसं यज्ञमाइ-विधिहीनमिति । शास्त्रोक्तद्रव्यसंस्कारहीनमसृष्टान्नं पात्रेभ्यो न प्रतिपादितमन्नं यस्मिन् साङ्गमान ? (स्तं साङ्गमन्त्र) हीनमदक्षिणं यथोनदक्षिणाहीनं श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते कथयन्ति ॥ १३ ॥ म०टी०-विधीति । यथाशास्त्रयोधितविपरीवग, अन्नदानहीनं स्वरतो वर्णतश्च मन्त्रहीन, यथोक्रुदक्षिणा- होनम्, ऋत्विन्द्वेषादिना श्रद्धारहितं वामसं यज्ञं परिचक्षते शिष्टाः। विधिहीनत्वायेके कविशेषणः पञ्चविधः सर्वविशेषणसमुचयेन चेकविध इति पद् । द्वित्रिचतुर्विशेषणसमुच्चयेन च बहवो भेदास्तामसयज्ञस्य शेयाः । राजसे यज्ञेऽन्तःकरणशुद्धधभावेऽपि फलोत्पादकमपूर्वमस्ति यथाशाघमनुष्ठानात् । तामसे यथाशास्त्रानुष्ठानान किमप्यपूर्वमस्तीत्यतिशयः ॥ १३ ॥ शं०टी०-विधिहीनमिति । स्पष्टोऽर्थः ॥ १३ ॥ श्री०टी०-तामसं यज्ञमाह-विधिहीनमिति । विधिहीन शाखोक्तविधिशून्यम् , असृष्टान्नं पाह्मणा- दिभ्यो न सृष्टं न निष्पादितमन्नं यस्मिस्तम्, मन्त्रहीन, यथोक्तदक्षिणारहितं च श्रद्धाशून्यं यह सामसं परिचक्षते कथयन्ति शिष्टाः ॥ १३ ॥ स.टी-विधिहीनं यथाशास्त्राययोधितविपर्ययम् ॥ अन्नदानविहीनं च स्वरतो वर्णतस्तथा ॥१॥ मन्त्रहीनं यथाशाखदक्षिणाहीनमधरम् ।। आस्तिक्यचुद्धिशून्य ते वामसं कथयन्ति वै ।। २ ।। अयं पञ्च विधी यज्ञस्त्याज्यः श्रेयोऽर्थिभिः सदा ॥ यथाशास्त्रमनुष्ठानाद्राजसेऽस्ति फलं मनाम् ॥ ३ ॥ वामसे त्वयथाशास्त्रानुष्ठानान्न फलं मनाक् ॥ ४ ॥ १३ ॥ भा० टी०-एवं फलाभिसंधिपूर्वकमनुष्ठीयमानत्वात् चित्तशुद्धयजनकत्वेऽपि यथाशास्त्रमनुष्ठीयमान. त्वात् स्वर्गादिफलोत्पादक लोके धार्मिकत्वख्याविकरं च राजसयज्ञमुक्त्वा, दृष्टादृष्टफल्शून्यमयथाशवमनु- घीयमानं सर्वथा हेयं तामसं यज्ञमाह-विधीति । विविहीनं यथाचोदितविपरीतं शास्त्रोक्तविधितो विर्यये- [अ० १७ श्लो० १५] तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता स० टी०-क्रमप्राप्तस्य तपसवैविध्यं प्राइ मापतिः ॥ देवा ब्रह्माहरीशाद्या द्विजाश्च ब्राह्मणा वराः ॥ १ ॥ आचार्यमुख्या गुरवः प्राज्ञा वेद्विदो बुधाः ॥ तेषां प्रणामशुश्रूपाद्यागमोक्तं हि पूजनम् ॥ २ ॥ शरोरशोधनं शौच मजलाभ्यां तथाऽऽजवम् ॥ यथाशास्त्रं प्रवृत्यादौ चक्रत्वाभाव उच्यते ॥ ३ ॥ निषि- द्धमैथुनामावो ब्रह्मचर्यमहिंसनम् ॥ प्राणिनां पीढनाभावः शारीरं तप उच्यते ॥ ४ ॥ शरीरमुख्यैः कविः सायं तत्पञ्चहेतुभिः ।। न केवलं शरीरेण कृतं शारीरमुच्यते ॥ ९ ॥ यतो वक्ष्यति भगवान् पञ्चेते तस्य हेतवः ॥ ६ ॥ १४ ॥ भा० दी०–एवं हानादानार्थं यज्ञविध्यं विभज्य तपसः सात्विकादिभावं निरूपयितुं सर्वस्य तस्य विविध स्वरूपं प्रथममाह-देवेति त्रिभिः । देवा; ब्रह्मविष्णुशिवायः, द्विजाः पूज्यत्वात् द्विजोत्तमाः, गुरवः पित्रा- चार्यादयः, प्राशाः पण्डिताः विदितवेद्या:-तेषां प्रणाममुश्रूपादिना पूजनं, शौचं मुनलाभ्यां शरीरशोधनं, आर्जवम् अजुत्वं विहितनिषिद्धयोरेकरूपप्रवृत्तिनिवृत्तित्वं, ब्रह्मचर्य प्रतिषिद्धमैथुनासमाचरणं, अहिंसा प्राणि- नामपीडनम् । चकारोऽस्तेयादिसमुच्चयार्थः । शरीरनिर्वत्यै शारीरे शरीरप्रधानैः सबैरेव कादिभिः साध्यं शारीरं तप उच्यते। अधिष्ठान तथा कर्ता करंणं च पृथग्विधम् । विविधाश्च पृथक्केष्टा देवं चैवात्र पञ्चमम्।। शरीरवाङ्मयनोभिर्यत्कर्मप्रारमते नरः।न्याय्य वा विपरीत वा पञ्चैते तस्य हेतवः' इति वक्ष्यमाणत्वात् १४ १० टी०-अथ कायवाङ्मनोविभागेन तपस्वैविध्यमाह-देवदिनेति । प्राज्ञा गुठव्यतिरिक्ता अन्येऽपि तत्त्वविदः । देवब्राह्मणादिपूजनशौचादिकं च शारीरं शरीरनिर्वयं तप उच्यते ॥ १४ ॥ रा० टी०-प्राक्प्रतिज्ञातं तपोमेदेन सात्त्विकादिभेदं दर्शचितुं शारीरादिमेदेन तत्रैविध्यं तावदाह- देवेति । देवादिपूजनं यथायोग्यं ध्येयम् । शौचं वाह्याभ्यन्तररूपम् । ब्रह्मचर्यमूवरेतस्वम् । शारीर , शरीरसंबन्धि ॥१४॥ ।
[अ० १७ श्लो० १६] . श्रीमद्भगवद्गीता १११४ विशिष्टं स्वाध्यायस्याभ्यसनमात्तिरपि वप एवेत्यर्थः । वाङ्मयं तदपि वाचा नियमानत्वाद्वाङ्मयं वप उच्यते । चकारात् स्तोत्रपाठादिरपि वाङ्मयं तप एव भवतीत्यर्थः ॥ १५ ॥ श्री० टी०-वाचिकं तप आह-अनुद्वेगेति । उद्वेगं भयं न करोतीत्यनुढेगकरं वाक्यं सत्यं च श्रोतः प्रियं च हितं च परिणामे सुखकर, स्वाध्यायाभ्यसनं वेदाभ्यासश्च वाङ्मयं वाचा निर्वत्यै तपः ॥१५॥ 'स० टी०-न कस्यचिदुःखकरं मानमूलमवाधितम् ॥ श्रोतुस्तत्कालसुखदं परिणामे सुखावहम् ।। १॥ अनुद्वेगकरत्वादिविशेषणचतुष्टयम् ।। समुचित्यैव यद्वाक्यं नैकेनापि विवर्जितम् ॥ २ ॥ यथा भी वत्स शान्तस्त्वं भव स्वाध्यायमाचर ॥ योग तथाऽनुतिष्ठ त्वं निःश्रयस्ते भविष्यति ॥३॥ ययाविध्यागमा- भ्यासो वाङ्मयं तप उच्यते ॥ ४ ॥ १९ ॥ भा० टी०-शारीरं तप उक्त्वा वाक्प्रधानः कादिभिः साध्यं तदाह-अन्विति । अनुद्वेगकरमिति कस्याप्युद्वेगकरं दुःखजनकं न भवतीति तत्, सत्यं यथादृष्टार्थप्रतिपादकं, प्रियं दृष्टार्थे उच्चारणकाले श्रोतः श्रुतिसुखं, हितमदृष्टार्थे परिणामपथ्यन् । विशेषणधर्माणामनुद्वेगकरत्वादीनां विशेष्येण वाक्येन समुचितानां परस्परसमुच्चयद्योतनार्थश्चकारः । सत्यप्रियहितानुद्वेगकरत्वानामन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिर्वा हीनवारहितं सत्य- त्वादिविशेषणचतुष्टयेन विशिष्टं वाक्यं, यथा-शान्तो भव वत्स, स्वाध्यायं योग चानुतिष्ठ, तथा ते श्रेयो भविष्यतीति स्वाध्यायाभ्यसनं चैव प्राङ्मुखत्वं पवित्रपाणित्वमित्यादिविधानमनतिक्रम्य स्वाध्यायत्यावर्तन च वाङ्मयं वाक् प्राचुर्येण प्रस्तुताऽस्मिन्निति वाङ्मयं वाक्प्रधानमित्यर्थः ॥ १५ ॥ ५० टी०-अथ वाङ्मयं तप आह-अनुदेगकरमिति । परस्योद्वेगजनक न भवति तथाविधं वाक्यं, सत्यं यथार्थमापणम् । तदपि दुःखपर्यवसायि न भवतीत्याह-प्रियमिति । प्रियं च तद्धितं च-प्रियं सुश्राव्य, परिणामे हितं च । तथा च सूनुः-'सत्यं ब्रूयाप्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम्' इति । स्वाध्यायाभ्यसन स्वशाखाध्ययनाम्यासः । एतद्वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५॥ रा० टी०-अन्विति । अनुद्वेगकरं परस्यातको यथा न भवति तादृश्यं वाक्यम् , सत्यं यथार्थवा- क्यमिति सर्वत्रान्वेति । प्रियं श्रवणसमये पुनः पुनः श्रवणेच्छाकरम् । हितं कालान्तरे सुखकरं च । स्वाध्यायाभ्यसनं च यत्तदिति शेषः । वाङ्मयं वागात्मकं तपः ॥ १५ ॥ मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ॥ भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ त० टी०-मानसं तप आह-मनाप्रसाद् इति । मनामसादः कामक्रोधादित्यागेन मनसः स्वच्छता, सौम्यत्वं मुखादिप्रसादहेतुरन्तस्तुष्टिः, मौनं घ्याऽऽळापवर्जनम् , आत्मविनिग्रहः मनसो. सत्महत्तेरवष्टम्भनं, भावसंशुद्धिः भावस्य हृदयस्य संशुद्धिर्विपयभोगवासनारूपमालिन्याभावः, इत्ये- तन्मानसं तप उच्यते ॥ १६॥ म०टी०-मन इति । मनसः प्रतावः स्वच्छता विषयचिन्ताव्याकुलत्वराहित्य, सौम्यत्वं सौमनस्य सर्वलोकहितैपित्वं प्रतिपिद्धाचिन्तनं च, मौनं मुनिभाव एकाप्रतयाऽऽत्मचिन्तनं निदिध्यासनाख्यम् । वाक्स- यमहेतुर्मन.संयमो मौसमिति भाग्यम् । आत्मविनिग्रह: आत्मनो मनसो विशेषेण सर्ववृत्तिनिप्रहो नि- रोधः समाधिरसंप्रज्ञादः । भावस्य हृदयस्य शुद्धिः कामक्रोधलोमादिमलनिवृत्तिः पुनरशुद्धपुत्पादराहित्येन सम्यक्त्वेन विशिष्टा सा भावशुद्धिः । परैः सह व्यवहारकाले मायाराहित्यं सेति भाष्यम् । इत्येतदेवंप्रकार तपो मानसमुच्यते ।। १६ ॥ .
[म. १७ श्लो० १७] तत्वप्रकाशिकापटटीकोपेता शं० टी०-मन इति । मनःप्रसादः मनसो विषयेग्यो विश्लिष्याविकारात्मनैकत्रावस्थान प्रसादः । सौम्यत्वं उपकारिण्यपकारिण्यपीटेऽप्यनिष्टे च पक्षपातरहितत्वेन मनसोऽवस्थानं सौम्यत्वमक्रूरता वा। मौनं मुनेर्भावो मौनं सगुणस्य वा निर्गुणस्य वाप्यनुसंधानपरत्वं मौनं, ध्यानपरायण एव मुनिस्ताव एव मौनं न तु वाङ्मात्रनिरोधः । अन्यथा पश्वादीनामपि तद्वत्तापत्तेः । आत्मविनिग्रह आत्मनो मनसो विनि- ग्रहो विषयेषु प्रवृतिनिरोधनं, भावसंशुद्धिः भाव्यतेऽर्थोऽनेनेति भावोऽन्तःकरणं वस्य रागद्वेषाविदोषसंम्ले- पामावापादनं भावसंशुद्धिरित्येतत् सर्वे मन एकसाध्यत्वान्मानसं तप उच्यते महर्षिभिरित्यर्थः ॥ १६ ॥ श्री. टी०-मानसं तप आह-मनःप्रसाद इदि | मनसः प्रसादः स्वस्थता, सौम्यत्वमकरता, मौनं मुनेर्भावः मननमित्यर्थः । आत्मनो मनसो विनिग्रहः विषयेभ्यः प्रत्याहारः, भावसंशुद्धिर्व्यवहारे मायारा- हित्यम्-इत्येतन्मानसं तपः ॥ १६ ॥ स.टी.-मनःस्वच्छत्वमक्षोम्यं सर्वलोकहितैपिवा ॥ निदिध्यासनमैकाम्यं समाधी चित्तनिप्रहः ॥१॥ कामादिमलसंशान्त्या मायाराहित्यमाशिशोः ।। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥२॥१६॥ भा० टी०-एवं वाक्प्रधानं तप उक्त्वा मन:प्रधानं तदाह-मन इति । मनःप्रसादो मनसः शान्तिः, स्वच्छतापादन चिन्ताव्याकुलत्वादिहीनतासंपादनमिति यावत् । सौम्यत्वं सुखादिप्रसादकार्यगम्यं सौमनस्य, मौनं वाक्संयमस्य मनसः संयमपूर्वकत्वात् वाविषयो मनसः संयमो मौनं, सर्वतः सामान्यरूपो मनो- निरोध आत्मविनिग्रह इति विशेषः । ननु मुने वो मौनमेकाग्रतया आत्मचिन्तन निदिध्यासनाल्यमिति मौनशब्दार्थः आचार्यैः कुतो न दर्शित इति चेत्त्वदुक्तमुनिभावस्य राजसत्वाद्यभावेन राजसतामसतपो- भ्यामस्याग्रहणापत्तेरिति गृहाण i भावसंतुद्धिः परैर्व्यवहारकालेऽमायावित्त्वम् । यत्तुं भावस्य हृदयस्य शुद्धि कामक्रोधलोभादिमलनिवृत्तिः, पुनरशुद्धपुत्पादाहित्येन सम्यक्त्वेन विशिष्टा सा भावसंशुद्धिरिति तन्नोपा. देयमाचारनुक्तत्वात् । राजसे तामसे च तपस्येतादृशभावसंशुद्धरसंभवाच्च । इत्येतत्तपो मानसं मनसा प्रधानेन निवर्त्यमुच्यते ॥ १६ ॥ १० टी०-अथ मानसं तप आह-मन इति । मनःप्रसादो मनसः स्वास्थ्यम्, सौम्यत्वमक्रूरता, मौनं मुने वो मननमित्यर्थः । आत्मविनिमहो विषयेभ्यः प्रत्याहारः, भावसंशुद्धिर्व्यवहारे मायाराहि- त्यमेतन्मानसं तपः । श्रुतिरपि “ तमेतं वेदानुवचनेन विचिदिपन्ति ब्रह्मपण तपसा श्रद्धया यज्ञेनाना- शकेन " इति । भाष्यम्-तमेतमात्मानं वेदानुवचनेनोपनिषद्विभागेन विविदिपन्ति वेदितुं ज्ञातुमिच्छन्ति । वथा ब्रह्मचर्येण शारीरेण तपसा अनाऽस्तिक्यबुद्धया, यज्ञेन सात्विकेन अत एवानाशकेन नश्वरफला- भिसंधिरहितेन ॥ १६ ॥ रा० टी०-मन इति । मन:प्रसादः विषयेष्वप्रयासेन प्रवृत्तिः, सौम्यत्वमौर्यम्, मौनं मनन- शीलत्वम्, मात्मविनिग्रहः आत्मनि परमात्मनि मनसो विशिष्यावस्थानम्, भावे आशये संशुद्धिः नानाकामराहित्यम् । इत्येतन्मानसं तपः उच्यते ॥ १६ ।। श्रद्धया परया तप्प तपस्तत्रिविधं नरैः ।। अफलाकाक्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥ तटी-तदेवं शारीरादिभेदेनोक्तस्य त्रिविधस्यापि तपसः सात्त्विकादिभेदेन वैविध्यमाह- इयेति । परया प्रकृष्टया श्रद्धया आस्तिक्यबुद्धया तत्मकृतं त्रिविधं शरीवाझनोभिरित्युक्तम् , अफला. कादिभिः फलाकोहारहितैः, युक्तैः समाहितैनरैर्यत्पस्तप्तमनुष्ठितंतत्सात्त्विकं परिघसते कथयन्ति ॥१७॥ "
श्रीमद्भगवद्गीता
[अ० १७ शो० १८]
म०टी०-शारीरवाचिकमानसभेदेन त्रिविधस्योक्तस्य तपसः सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यमिदानी दर्श-
यति-श्रद्धयेति त्रिभिः । तत्पूर्वोक्तं त्रिविधं शारीरं वाचिक मानसं च तपः श्रद्धया आस्तिक्यबुद्धया परया
प्रकृष्टया अप्रामाण्यशङ्काकलङ्कशून्यया फलामिसंधिशून्यैर्युक्तैः समाहितैः सिद्धयसिद्धयोनिर्विकारैर्नरैर-
धिकारिभिस्तप्तमनुष्ठितं सात्त्विकं परिचक्षते शिष्टाः ॥ १७॥
शं० टी०-उक्तस्यैव तपसखिविधस्य सत्त्वादिगुणभेदेन त्रैविध्यमाह-श्रद्धयेति । युरेकाप्रचित्तैः
परमेश्वरभक्तियुक्तैरत एवाफलाकादिभिर्नरः परया श्रद्धया तप्तं वत्रिप्रकारकं तपः सात्त्विकं सत्त्वगुणसं.
माविताविश्रद्धया निष्पादितत्वात्सात्त्विकमिति परिचक्षते कथयन्तीत्यर्थः ॥ १७ ॥
श्री० टी०-तदेवं शरीरवाङ्मनोभिर्निवत्यै त्रिविधं तपो दर्शितं, तस्य विविधस्यापि तपसः सात्त्विका-
दिभेदेन वैविध्यमाह-श्रद्धयेतित्रिभिः । त्रिविधमपि तप: परया श्रेष्ठ्या श्रद्धया फलाकालाशून्यैर्यु-
कैरेकाप्रचित्तनरस्तप्तं तत्सात्त्विकं कथयन्ति ॥ १७ ॥
स० टी०-शारीरादिकभेदेन प्रोक्तस्य त्रिविधस्य च ।। वपस: प्रोच्यते भूयस्वैविध्यं सात्त्विकादिना
॥१॥ सात्त्विके पुरुपे त्रेधा पूर्वाकं तप उच्यते ॥ राजसे तामसे यस्मात्तत्रैविध्यं न संभवेत् ॥ २॥
अतः सात्त्विकपुंस्युक्तं तपस्तत्रिविधं वचः ॥ राजसे तामसे प्रोक्तं तद्विरुद्धं सदा यतः ॥ ३॥ तत्पूर्वोक्तं
तपः सम्यक् श्रद्धयाऽस्तिक्यरूपया ॥ बुद्धया प्रकृष्टयाऽऽशाशून्यया शास्त्रगोचरे ॥ ४ ॥ फलाभिसंधिर-
हिवैः शुद्धचित्तैः समाहितैः ॥ अनुष्ठित मुनिश्रेष्ठाः सात्विकं कथयन्ति तत् ॥ ५ ॥ १७ ॥
भा० टी०-ययोः कायिकादिभेदेन त्रिविधं वपस्तप्तं सात्त्विकादिभेदेन कथं त्रिविधं भवतीत्याकाङ्-
क्षायां वर्भविष्यं प्रदर्शयन्नादौ सात्त्विकं तदाह-श्रद्धयति । तत्पूर्वोक्तं कायिकवाचिकमानसभेदेन त्रिविधं
श्रद्धया आस्विक्यबुद्धया परयोत्कृष्टया भक्तियुक्तया अफलाकादिभिः फल्पकाडावर्जितैर्युक्तः समाहितः
सिद्धपसिद्धपोनिर्विकारर्नरैनुशतृभिः वतमनुष्ठिवं सात्त्विकं परिचक्षते शिष्टाः कथयन्ति ॥ १७॥
५० टी०-अथ ‘सात्त्विकादिभेदेन पुनस्पैविध्यमाह-श्रद्धयेति वधिविधं शरीरवाङ्मनोविभागेन
कथितं तपोऽफलाका िभिस्तथा युक्तैरकायान्त करणैनरस्तप्तमनुप्तितं तत्सात्त्विक परिचक्षते ॥ १७ ॥
रा० टी०-इदानी सात्त्विकादितपोभेदेन सात्त्विकादिजीवभेदं प्रतिज्ञापूर्वमाह-श्रद्धयेत्यादिभित्रिभिः।
नरस्वतं कृवं तपः यत् वत्रिविधमित्यर्थः । तत्कथमित्यत आह-अफलेति । युक्तैर्भगवदर्पणादियोगयुक्तः
वतै तप इत्यनुपज्यते ॥ १७ ॥
· · सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ॥
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८॥
त० टी०-राजसं तप आह-सत्कारेति । सत्कारः साधुकार:-साधुरयं तपस्वी श्रेष्ठ इत्यादि
वामशंसा, मानः प्रत्युत्थानाभिवादनादिपूजाद्रव्योपायनादीत्येतदर्थ सत्कारमानपूनार्थ दम्भेन च
हेतुना यचपः क्रियते तदिह राजसमत एव चलमपायि तयाऽप्पधुवं किंचित्कालस्थायि, न याव-
जीवमित्यर्थः ।। १८ ॥
म०टी०-सत्कारैरिति । सत्कारः साधुरयं तपस्वी ब्राह्मण इत्येवमविवेकिमिः क्रियमाणा स्तुतिः,
मानः प्रत्युत्थानाभिवादनादिः, पूजा पादप्रक्षालनार्चनधनदानादिः, उदयदम्भेनैव च केवलं धर्मध्वजित्ले-
मेव पन त्वास्तिक्यल्पा यतपः क्रियते नद्रानसं मोठं शिटः, इह आस्मिन्नेव लो फलदं न पारलौ-
फिक पलमत्यसकालस्थायिफ्टम् , अध्रुवं फ्ठजनकतानियमशून्यम् ॥ १८ ॥
अ० १७० १९]
तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता
० टी०-सत्कारेति । सत्कारमानपूजार्थे सत्कारार्थ मानार्थ पूजार्थे च सत्कारः साधुरयं विद्वान्
ग्राह्मण इति स्तुत्यर्थ, मानो वहुमानस्त्वभ्युत्थानादिस्वत्प्रयोजनार्थं, पूजा गन्धपुष्पदक्षिणाभिः स्वपूजा तदर्थे
घ दम्भेन वेषभायादिप्रकाशनेन दाम्मिकैर्यत्तपः क्रियते तत्सम इहास्मिन् लोके एव फलप्रदं भवति, तच्चा-
ध्रुवं देहमानोपयोगित्वादध्रुवम् तत्रापि चलं तात्कालिकफलं क्षणिकमेवलक्षणं यत्तपस्तद्राजसामिति महर्षिभिः
प्रोक्तमित्यर्थः ॥१८॥
श्री० टी०-राजसं तप आह-सकार इति । सत्कारः साधुकारः साधुरयमिति तापस इत्यादिवा-
कपूजा, मानः प्रत्युत्थानाभिवादनादिदैहिकी पूजा, पूजाऽर्थलाभादिः-एतदर्थे दम्भेन च यत्तपः क्रियते अव
एव चलमनियतमध्रुवं च क्षणिकं यदेवंभूतं तपस्तदिह राजसं प्रोक्तम् ॥ १८॥
स० टी०--तपस्वी ब्राह्मण: साधुरयमित्यविवकिमिः ॥ क्रियमाणा स्तुतिः प्रोक्तः स सत्कारस्तदाप्तये
।। १ ।। प्रत्युत्यानप्रणामादिमानः पूजार्चनादिकम् ॥ तदर्थे धार्मिकत्वादिख्यापनेनैव यत्तपः ॥२॥
क्रियते राजसं प्रोक्तं तदवेव फलप्रदम् ।। अत्यल्पकालस्थायित्वाचलं तद्वपभिचारि च ॥ ३ ॥ १८ ॥
भा० टी०- सात्त्विकं तप उदाहृत्य राजसं वदुदाहरति-सत्कार इति । सत्कारः साधुरयं तपस्वीत्येवंस्तु-
विरूप: साधुकार, मानो माननं प्रत्युत्थानाभिवादनादि, पूना पादप्रक्षालनार्चनानधनाद्यर्पणादि, तदर्थे
दम्भेन चैव नास्तिस्येन केवलधर्मध्वजिवेन यत्तपः क्रियते तदिहास्मिन्नेव लोके सत्कारादिफलपदं राजसं
प्रो कथितम् । चलं क्षणिकफलमध्रुवम् अनियत्फलं यद्वा चलं कादाचितफलं दाम्भिकोऽयमित्यपरिज्ञान-
काले कस्मिंश्चित्सत्कारादिफलप्रदं न तु सर्वदेति यावत् । अत एवाध्रुवं सत्कारादिप्राप्तिपर्यन्त स्थायि न
तु सदैवेत्यर्थः ॥ १८॥
५० टी०-सत्कार इति । सत्कार: साधुरयं तापस इति, मानः प्रत्युत्थानाभिवन्दनादिस्तदर्थम् ।
दम्भेन प्रसिद्धन यत्कृतम् । चलमनित्यफलम्, अध्रुवं क्षणिकं तद्राजसं वपः॥ १८ ॥
रा० टी०-सत्कार इति । सत्कारो मनसा आदरः, मानो वाचा प्रशंसा, पूजा अर्चनम् , एतदर्थ-
दम्भेन च आत्मनो महत्त्वप्रदर्शनार्थ वा यत्तपः क्रियते वत्तप इहलोके राजसं प्रोकम् । चलं पातभयेन चल-
नहेतुः । अध्रुवं क्षयिष्णु ॥ १८ ॥
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।
पस्स्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहृतम् ।। १९ ।।
त० टी०-तामसमाइ-मूढग्राहेणेति । मूढा अविवेकिनस्तेषां ग्राहेण वृथाऽभिनिवेशेन आत्मनः
स्वस्य पीडया यत्तपः क्रियते, पास्योत्सादनार्यमुच्छेदनार्थ वा क्रियते, तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
म. दी०-मूदेवि । मूढनाहेण अविवेकाविशयकवेन दुरामहेण आत्मनो देहेन्द्रियसंपावस्य पीच्या
यत्क्षप, क्रियते परस्योत्सादनार्थ वा अन्यस्य विनाशार्थमभिचाररूपं या तत्तामसमुदाहृतं शिष्टः ॥ १९ ॥
शं० टी०-मूदग्राहेणेति । मूढमाहेण अर्धानर्थस्वरूपानभिशो मूढस्वत्य पाहत्यमेव बुद्धिमानित्यनि-
निवेशों मूढमाहस्तेनात्यन्तमूदपुरपा स्वस्य पीडया कायझेशेन यदुर्फ त्रिविधं वप, क्रियते फायझेशमात्रैक
प्रयोजनम् । अथवा परस्योत्सादनार्थमाभिचारिकक्रियया शत्रुविनाशार्थ वा यतपेखि वचपरतामसं घम:
सभावितश्रद्धानिष्पादितत्वाचामसमिति मुनिभिरुदाद्वमित्यर्थः ॥ १९ ॥
श्री०टी०-वाम ठप आइ-मूदेति । मूढमाहेणापिकतेन दुरामहेगात्मन: पीडया यत्तपः प्रिय
पास्योत्साहना वाऽन्यस्य विनाशार्थमभिधाररूप तशामसमुदाइवं प्रथितम् ॥ १९॥
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ लो० २०] सी०-मौढ्याहुराग्रहेणैव देहाद्यत्यन्तपीडया ॥ यत्तपः क्रियतेऽन्यस्य विनाशायाभिचारिकम् ॥१॥ वत्तपस्वामसं शिष्टेः प्रोक्तं हेयं मुमुक्षुभिः ॥ २॥ १९॥. भा० टी०-एवं राजसं तप उक्त्वा नामसं तदाह-मूढति । मूढमाहेण अविवेकनिश्चयेन यद्येते तप- श्वरन्ति तहमप्येतत्तपसोऽधिकं करिष्यामीत्येवमादिरूपेणात्मनः पीडया परस्योत्सादनार्थ वा एतादृशोऽयं कायिकवाचिकमानसतपोयुक्तोऽतोऽस्याज्ञापालनेनास्मदीयं कार्य सर्व सेत्स्यतीति बुद्धिं राजादीनामुत्पाद्य परस्य शत्रोनाशार्थ वा यत्तपः क्रियते ततामसमुदाहृतं शिष्टेः ॥ १९ ॥ १० टी०-मूढगाहेणेति । मूढत्वे सति माह आग्रहस्तेन, आत्मनः शरीरस्योपवासादिपीडया, पर- स्योत्सादनं जारणमारणोचाटनाद्याभिचारिकम् , तत्तामसम् ॥ १९ ॥ रा० टी०-मूदति । मृढपाहेणाविवेकदुराग्रहण आत्मनः पीडया परस्य शोरुत्सादनार्थे वा यत्तपः क्रियते तत्तामसम् ॥ १९ ॥ दातव्यमिति यहानं दीयतेऽनुपकारिणे ।। देशे काले व पात्रे च तहानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ।। त० टी०-इदानी प्रतिज्ञातेषु यज्ञादिप्ववशिष्टस्य दानस्य गुणतस्वैविध्यमाह त्रिभिः-दातव्य- मिति । दातव्यमित्येव निश्चयेन न तु फलोद्देशेन यद्दानं दीयते, अनुपकारिणे प्रत्युपकाराक। अयं मम प्रत्युपकारं करिष्यतीत्युद्देशातिपयायेत्यर्थः । देशे माथुरपुष्करकुरुक्षेत्रगङ्गादिक्षेत्रे, काले कार्तिक- सहोमाघमासादौ, पात्रे च शमदमतितिक्षादियुक्ताय श्रोत्रियाय तदानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥ म०टी०-इदानी क्रमप्राप्तस्य दानस्य त्रैविध्यं दर्शयति त्रिभिः-दातव्यमिति । दातव्यमेव शास्त्रचो- दनावशादित्येवं निश्चयेन न तु-फलाभिसंथिना यदानं तुलापुरुषादि दीयते अनुपकारिणे प्रत्युपकाराजनकाय, देशे पुण्ये कुरुक्षेत्रादौ, काले च पुण्ये सूर्योपरागादी, पात्रे चेति चतुर्थ्यर्थे सप्तमी पात्रायेत्यर्थः । कीदशा- • यानुपकारिणे दीयते पानाय च विद्यातपोयुकाय । ( पातीति पाता रक्षकस्तस्मै) पात्रे रक्षकायेति वा । विद्या- तपोभ्यामात्मनो दातुश्च पालनक्षम एव प्रतिगृहीयादिति शास्त्रात् । तदेवभूतं दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥२०॥ शं० टी०-दानस्य त्रैविध्यमाह-दातव्यमितित्रिभिः । स्पष्टोऽर्थः ॥२०॥ श्री० टी०-पूर्व प्रतिज्ञातमेव दानस्य त्रैविध्यमाह-दातव्यमिति । दातव्यमित्येवंनिश्चयेन यहान दीयवे अनुपकारिणे प्रत्युपकारासमर्थाय देशे कुरुक्षेत्रादौ काले ग्रहणादौ । पाने चेति देशकालादिसाहचर्या- त्सातमी प्रयुक्ता । पात्रभूवार तप:श्रुतादिसंपन्नाय ब्राह्मणायेत्यर्थः । यद्वा पात्र इति चतुयॆवैपा पाने (इति तृजन्तं ) रक्षकायेत्यर्थः । स हि सर्वरमावापद्गणादातारं पातीति । यदेवंभूतं दानं तत्सात्त्विकम् ॥ २० ॥ स० टी०-क्रमप्राप्तस्य द नस्य चैविध्यं दर्शयत्यजः ॥ दातव्यमेव शास्त्रोकमित्येवं निश्चयेन वै ॥१॥ न तु फलाभिलापेण यत्तुलापुरुषादिकम् ॥ प्रत्युपकारशून्याय कुरुक्षेत्रादिपायने ॥ २ ॥ देशे सूर्योपरागा- दो काळे पुण्येऽहि पर्वणि ॥ विद्यातपोभ्या युक्ताय पानाय च यथाविधि ॥ ३ ।। दीयते श्रद्धया भक्त्या विष्णुप्रीत्यर्थमेव यत् ॥ तदेवं सात्त्विकं दानं प्रोकं सम्यक्फलप्रदम् ॥ ४॥२०॥ भा० टी०-एवं तपवैविध्यं विभग्य क्रमप्राप्तं दानवैविध्य विभजन्नादौ सात्त्विकं दानमुदाहरचि-दात- व्यमिति । दावन्यमित्येवं मनः कृत्वा यहानं देयवस्तु दीयतेऽनुपकारिणे प्रत्युपकारासमायापि निरपेक्ष दीयवे पुण्य देशे कुरुक्षेनादो काले संक्रान्त्यादौ पात्रे च यदानं समर्पणं पडङ्गविद्वेदपारगे इत्यादौ तदानं सा. विकं स्मृतम् । तथाच प्रथमदानशब्दः कर्मव्युत्पत्या देयवस्तुपरः । चकारानुकष्टस्तु भावव्युत्पस्या समर्पण- । - [भ० १७ श्लो० २२] वत्स्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता परः । तेन यो देयगव्यवाची द्वितीयान्तस्तत्संयोगात्संप्रदाने चतुर्थ्यपेक्षा । द्वितीयस्तु त्यागवाची प्रथमान्तः । तेन तत्र पात्रभूते पुंसि न चतुर्थ्यपेक्षा । 'कर्मणा यमभिप्रेति स संप्रदानम्' इति पारिभापित्याः संज्ञाया: अत्र कर्मविभक्त्यभावेनाप्रवृत्तः । एतेन । पात्र चेति चतुर्थ्यर्थे सप्तमी । कीदृशायानुपकारिणे दीयते पात्राय च विद्यातपोयुक्ताय ! पात्रे रक्षकायेति वा । विद्यातपोभ्यामात्मनो दातुश्च पालनक्षम एव प्रतिगृह्णीयादिति शासात् । इति कल्पनं व्यर्थमेवेति बोध्यम् ॥ २०॥ १० टी०-अथ त्रिविधं दानमाह-दातव्यमिति त्रिभिः । अवश्यं दातव्यमेवेति नियमेन यहीयते- ऽनुपकारिणे प्रत्युपकारासमाय, काले ग्रहणादौ, देशे फुरुक्षेत्रादौ, पात्रे पडणवेदपारगे । अत्र सातम्या चतुर्थी शेया । तप.श्रुतादिसंपन्नाय ब्राह्मणायेत्यर्थः । यदेवंभूतं दानं तत्सात्त्विकम् ॥ २० ॥ रा० टी०-प्राकप्रतिज्ञातदानभेदेन सात्त्विकादिभेदमाह-दातव्यमित्यादित्रिभिः । दातव्यमित्यास्ति- क्यबुद्धधा दानं कर्मणि स्युट् । दातव्यं वस्तु पुण्यदेशे पुण्यकालेऽनुपकारिणे उपकारमनपेक्ष्य सत्पात्रे च पात्राय दीयते इति यत् वदानं सात्विकम् ।।.२० ।। यत्तु प्रत्युपकारार्थ फलमुदिश्य वा पुनः ॥ दीयते च परिक्लिष्टं तदाजसमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ त० टी०-राजसदानमाह-यत्त्विति । तुशब्दः पूर्वोक्तान्निष्कृष्टत्वद्योतनार्थः । प्रत्युपकारार्थ ममायमुपकरिष्यतीत्येवमर्थ, फलमैहिकामप्लिकं वा पुनरुद्दिश्य यदीयते परिशिष्टं च एतावद्व्यं मया कथं देयमिति चित्ते परिक्लेशयुक्तं यथा भवति तथा तहानं राजसमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ म०टी०-यत्त्विति । प्रत्युपकारार्थ कालान्तरे मामयमुपकरिष्यतीत्येवं दृष्टार्थ फलं का स्वर्गादिकमु- दिदय यत्पुननि सात्त्विकविलक्षणं दीयते, परिविष्टं च कथमेतावद्वपयितमिति पश्चात्तापयुक्तं यथा भव- त्येवं च यद्दीयते सहानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥ शं० टी०-पदिति । परिलिष्टं लोभातिशयेनान्त,करणलेशसंयुकं यत्तदानं राजसम् ॥ २१ ॥ श्री०टी०-राजसं दानमाह-यत्त्विति । कालान्तरेऽयं मां प्रत्युपकारं करिष्यतीत्येवमर्थम् , फलं वा स्वर्गादिकमुहिश्य यत्पुनर्दानं दयिते, परिक्लिष्टं चित्तलेशयुकं यथा भवत्येवंभूतं तदानं राजसमुदाहवं कथितम् ॥ २१ ॥ स० टी०-कालान्तरे हि विप्रोऽयं मामित्युपकरिष्यति ।। इत्येवं दीयते यद्वा स्वर्गादिश्य यत्युनः ॥ १ ॥ पश्चात्तापयुतं दानं तच्छिटै राजसं स्मृतम् ॥ २ ॥ २१ ॥ भा० टी०-साविक दानमुक्त्वा राजसं तदाह-यत्त्विति । यत्तु प्रत्युपकारार्थे कालान्तरे त्वयं मा प्रत्यु- पकरिष्यतीत्येवं दृष्टार्थे फळमुश्यिास्य दानत्यादृष्टस्वर्गादिफलं मे भविष्यतीति तद्वोदिश्य पुनीयते परिकिष्ट खेदसंयुक्तं कथमेतावव्ययितमिति पश्चात्तापयुक्तं यथा स्यादित्येवं च तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २१ ॥ प० टी०-राजसमाह-यत्त्विति । कालान्वरेणायमपि मां प्रत्युपकरिष्यतीवि स्वर्गादिलोकमुदिश्य वा! परिचिट क्लेशयुकं वा यहीयते वद्राजर्स दानम् ॥ २१॥ रा०दीयत्त्विति । परिलिष्टम् अन्यायाणितं द्रव्यम् ॥ २१॥ अदेशकाले यदानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ त० टी०-तामसदानमाह-अदेश इति । अत्रादेशकाले इत्यनेन पुग्यत्वविशिष्टदेशकालपोः .
C श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ श्लो० २३] पर्युदासोऽभिमेतः, न केवलयोः, असंभवात् । तथा चादेशे म्लेच्छामेध्यादिसंसप्टेऽशुद्धे इत्यर्थः । अकाले संक्रान्तिद्वादशीदर्शव्यतीपातादिपुण्यकालरहिते, अपात्रेभ्यश्च नटनर्तकमूर्खकर्षकादिभ्यः कथंचिदेश- कालादौ प्राप्तेऽपि असत्कृतं पादप्रक्षालनादिसत्काररहितम् , अवज्ञातं तिरस्कारवचनपूर्वकं यदानं दीयते तत्तामसमुदाहृतमुक्तम् ॥ २२ ॥ म०टी०-अदेशेति । अदेशे स्वतो वा दुर्जनसंसर्गाद्वा पापहेतावशुचिस्थाने, अझाले पुण्यहेतुत्वेनाप्रसिद्ध यस्मिन् कस्मिंश्चित, अशौचकाले वा, अपात्रेभ्यश्च विद्यातपोरहितेभ्यो नटविटादिभ्यः यदानं दीयते देशकाल- पानसंपत्तावपि असत्कृतं प्रियमापणपादप्रक्षालनपूजादिसत्कारशून्यमवज्ञावं पात्रपरिभवयुक्तं च तहानं तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ शं० टी०-अदेशेति । असत्कृतमयंपाद्यादिभिरनर्चितमवज्ञातमवमानप्रयुक्तं दानं यचत्तामसमिति मुनिभिरुदाहृतम् ॥ २२ ॥ श्री०टी०-तामसं दानमाह-अदेशेति । अदेशे अशुचिम्थाने, अकाले अशौचसमये अपात्रेभ्यो विट- नटनर्तकादिभ्यो यदानं दीयते देशकालपात्रसंपत्तावपि असत्कृतं पादप्रक्षालनादिसत्कारशून्यम्, अवज्ञा तिरस्कारयुक्तम् । एवंभूतं दानं तामसमुदाहृतम् ।। २२ ॥ स० टी०-स्वतो वा दुष्टसंसर्गादशुचिस्थान एव हि ॥ अशौचकालेऽपात्रेभ्यो नटादिभ्यः प्रदीयते ॥१॥ देशकालादिसंपत्तावपि सूहकारवर्जितम् ॥ पात्रेववज्ञया युक्तं तहानं तामसं स्मृतम् ॥२॥ २२॥ भा० टी०-राजसं दानमुक्त्वा वामसं तदुदाहरति-अदेशेति । अदेशकालेऽपुण्यदेशे म्लेच्छाशुच्या. दिसंकीर्णे, अकाले अपुण्यहेतुत्वेन प्रख्यातऽशौचकाले संक्रान्त्यादिविशेषरहिते वा, अपात्रेभ्यश्च मूर्खनट- तस्करादिभ्यो देशादिसंपत्तावपि प्रियवचनपादप्रक्षालनपूजादिसत्काररहितमवज्ञातं पात्रपरिभवयुक्तं च यदानं दीयते तदानं तामसमुदाहृतम् ।। २२ ॥ ५० टी०-तामस माह-अदेशकालेति । अदेशेऽशुचिस्थले, अकाले सूतकादावपात्रेभ्यो विटनदादिभ्यो यहीयते । असत्कृतं सत्काररहितम् । अवज्ञातं पादप्रक्षालनादिरहितम् । तत्तामसम् ॥ २२ ॥ रा०टी०-अदेशेति । अदेशकाल इतिद्वन्द्वकवद्भाव: । अशुचिदेशकालयोः असत्कृतं नमस्कारादिस- स्काररहितम् , अवज्ञात अवज्ञाकरणयुक्तं यथा तथा अपात्रेभ्यः यहीयते तत्तामसमित्यर्थः ॥ २२ ॥ ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः॥ बाह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥ त० टी०-तदेवमाहारयज्ञादीनि मुमुक्षुभिः साचिकान्युपादेयानि राजसतामसानि हेयानीत्येतदर्थ तेषां वैविध्यमुक्तम् । तर सात्त्विकाहारेण शुद्धसत्वानां सात्त्विकयज्ञादिप्वधिकृवानामनुष्ठातृणामनुष्ठेयेषु साचिकेप्यपि यनतपोदानेषु देशकालद्रव्यमन्त्रक्रियादिकिंचिदङ्गवैगुण्येन प्रत्यवायापत्यादृष्टानुत्पत्ती तनप्पल्यं स्यादिति तद्वैगुण्यपरिहाराय परमफारुणिको भगवानगपूरणत्वेन तत्साद्गुण्यकारणं परब्रह्म- वाचकशब्दोचारणमुपदिशाति-ॐ तत्सदितीति । ॐ तत्सदित्येवंरूपो ब्रह्मणः परमात्मनः पुरु- पोत्तमस्य निर्देशः, निदिश्यते मतिपाद्यतेऽनेनेति निर्देशमतिपादकः शन्दो नामेत्यर्थः, विविघस्त्रिप्रकार: स्मृतः वेदवेदान्तपिद्भिर्महर्षि भिमनामतया निर्दिष्ट इत्यर्थः। "ओमिति ॐ ब्रह्म" "तब्रह्म ॐ सब्रह्म "ओमित्यनेनवासरेण पर पुरुषमभिध्यायीत " इत्यादिश्रुतिभिः “एकाक्षरं पं. ब्रह्म प्राणायामः परं तपः । प्रणवाद्यास्तथा वेदाः प्रणो पर्यास्थिताः " ॥ "मित्येकासरं ब्रह्म च्याहरन्" इत्यादि- [अ० १७ श्लो० २३] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता स्मृतिभिश्च ओंकारो ब्रह्मनामतया निर्दिष्टः । " तत्त्वमसि, नदेवतं तदु सत्यमाहुः, तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम् ॥ इत्यादिश्रुतिभिः, " यत्तत्पदमनुत्तमं तब्रह्म परमं धाम" इत्यादिस्मृतिमिश्च तच्छब्दस्य ब्रह्मनामतया निर्देशः स्मृतः । “सदेव सोम्येदमन आसीत्सन्मूलाः सोम्येपाः सर्वाः प्रजाः सत्प्रतिष्ठा इत्यादिश्रुत्या 'सदसद क्षरमक्षरम्' इत्यादिस्मृत्या च सच्छन्दो ब्रह्मनामतया निर्दिष्टः । साद्गुण्यहेतुत्वे- नैनं ब्रह्मनिर्देशं स्तौति तेन त्रिविधेन ब्रह्मणो निर्देशन ब्राह्मणा वैदिकास्वर्णिका वेदाश्च यज्ञाच कर्तृकरणकर्मरूपाः पुरा पूर्व सृष्टयादौ मदात्मकेन प्रजापतिना विहिताः, प्रवर्तिताः चैगुण्यपरिहारेण साद्गुण्यपूर्णाकृता इत्यर्थः । तस्मान्महाप्रभावोऽयं परमात्मनिर्देशो यज्ञादिवैगुण्यपरिहाराय नियततया स्मर्तव्य इति भावः ॥ २३ ॥ म०टी०-तदेवमाहारयशवतोदानानां विष्यकथनेन सात्त्विकानि तान्यायानि राजसतामसानि तु परिहर्वव्यानीत्युक्तम् । बाहारस्य दृष्टार्थत्वेन नास्त्यङ्ग्वैगुण्येन पुण्ये फलाभावशङ्का । यशतपोदानाना त्वदृष्टा. थानामङ्गवैगुण्यादपूर्वानुत्पत्चौ फलाभावः स्यादिति सात्त्विकानामपि तेपामानर्थक्यं प्राप्त प्रमादबहुलत्वादनु- घातृणाम् । अतस्तद्वैगुण्यपरिहाराय ओतत्सदिति भगवन्नामोच्चारणरूपं सामान्यप्रायश्चित्तं परमकारुणिक- तयोपदिशति भगवान्-अमिति । ओं तत्सदित्यवरूपो ब्रह्मणः परमात्मनो निर्देशः निर्दिश्यतेऽनेनेति निर्देशः प्रतिपादफशब्दः नामेति यावत् । त्रिविधः तिस्रो विधा अवयवा यस्य स त्रिविधः स्मृतः वेदान्त- विनिः । एकवचनाम्यवयवमेकं नाम प्रणवक्ते । यस्मात्पूर्वमहर्षिभिरयं ब्रह्मणो निर्देशः स्मृतस्तस्मादिदानीत- नैरपि स्मर्तव्य इति विधिरत्र कलप्यते । वषट्कर्तुः प्रथमभक्ष इत्यादिष्विव वचनानि त्वपूर्ववत्वादिति न्यायात् । यज्ञदानतप.क्रियासंयोगाचास्य तवैगुण्यमेव फलं नष्टाश्वदग्घरयवत् परस्पराकाहुया कल्प्यते । प्रमादारकुर्ववा कर्म प्रच्यवेवाध्वरेषु यत् । स्मरणादेव वद्विष्णोः संपूर्ण स्यादिति श्रुतिः' इति स्मृतेः, तथैव शिष्टाचाराच्च । ब्रह्मणो निर्देश: स्तूयते कर्मवैगुण्यपरिहारसामर्थ्यकथनाय-ब्राह्मणा इति त्रैवर्णिकोपलक्ष- णम् । ब्राह्मणाद्याः कर्तारः वेदाः करणानि यज्ञाः कर्माणि तेन ब्रह्मणो निर्देशन करणभूतेन पुरा विहिताः प्रजापविना तस्माद्यज्ञादिसृष्टिहेतुत्वेन तद्वैगुण्यपरिहारसमों महाप्रभावोऽयं निर्देश इत्यर्थः ॥ २३ ॥ शं०टी०-ननु देशकालपात्रद्रव्यमन्त्रतन्त्रादिस्वरूपं ज्ञात्वा यथाशास्त्रं वैदिक कर्म श्रद्धामतिविनयः कर्तुं न शक्यते । तेन सर्वस्यापि वैदिकस्य कर्मणो वैगुण्यमेव प्रसज्यते । तत्र कथमित्याकादायाम् “ विद्वान् पजते" इतिश्रवणादेशकालादिस्वरूपज्ञेन विदुपैव सर्व कर्म विज्ञाय श्रद्धया कर्तव्यम्, तथापि यज्ञदानतपोत्र- वादीनामतत्त्वज्ञेन क्रियमाणानामश्रद्धया वा भ्रमप्रमादादिना वा कचित्तन्त्रमन्त्रस्वरवर्णादिलोपेन वा वैगुण्ये प्रामे सदित्युक्त्या सर्व सगुणं सफलं च भवतीति बोधयितुमयमुपदेशः क्रियते ओमिति । "ओमिति ब्रह्म" इति तत्वमसि इति "सदेव सोन्य" इति च अवणात् । ओमिति तदिति सदिति च परस्य ब्रह्मणो निर्देश:-निर्दिश्यते वस्त्वनेनेति निर्देशो नाम, विविधत्रिपकारः स्मृवों वेदान्तनिहिरहालकादिमिः । तत्सदित्येतानि त्रीणि ब्रह्मणो नामान्युक्तानीत्यर्थः । एवं नामनिर्देशं कृत्वा नान्ना महत्त्वमाह-ब्राह्मणा इति । पुरा सर्गादौ तेनोन नामत्रितयेन ब्राह्मणा ऋगाइयो वेदा: श्रौतस्माश्चि सर्वे यज्ञा विहिता निर्मितास्तभ्यः समुत्पन्ना इत्यर्थः । एतेन पावनानां वेदादीना जनिहेतुत्वाचेपा प्रयाणामपि नाना पवित्रत्व- स्येयत्ता नास्तीति सूचितम् । ततस्तदुचारणं सर्वपापप्रायश्चित्तममिवि सिद्धम् ।। २५ ॥ श्री०टी०-ननु चैवं विचार्यमाणे सर्वमपि यज्ञनपोदानादि राजसतामसप्रायमेवेवि व्यर्थो यज्ञादि. प्रयास इत्याशय, तथाविधस्यापि सात्त्विकत्वापादनप्रकारं दर्शयितुमाह-अमिति । अतसदित्येवं निविधो ग्रह्मणः परमात्मनो निर्देशो नामव्यपदेशः स्मृतः शिष्टैः । न तावत "मिति ग्रह्म" .
. श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ श्लो० २३] इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धरोमिति ग्रह्मणो नाम जगत्कारणत्वेनातिप्रसिद्धत्वात अविदुषां परोक्षत्वाञ्च तच्छब्दोऽपि ब्रह्मणो नाम। परमार्थसत्त्वसाधुत्वप्रशस्तत्वादिमिः सच्छब्दो ब्रह्मणो नाम । ("सदेव सोम्येदमम आसीत्" इत्यादिश्रुतेः 1) अयं त्रिविधोऽपि नामनिर्देशो विगुणमपि सगुणीकर्तुं समर्थ इत्याशयेन स्तौति-तेन त्रिविधेन ग्रहाणो निर्देशेन ब्राह्मणाश्च वेदाश्च यज्ञाश्च पूर्व सृष्टयादौ विहिताः विधात्रा निर्मिता: सगुणी- कुता वा । यद्वा यस्यायं त्रिविधो निर्देशरतेन परमात्मना ब्राह्मणादयः पवित्रतमाः सृष्टाः। तस्मात्तस्यायं त्रि- विधी निर्देशोऽतिप्रशस्त इत्यर्थः ॥ २३ ॥ स० टी०-एवमाहारमुख्यानां विध्यकथनेन च ॥ प्राह्याणि सात्त्विकान्येव त्यान्यान्यन्यानि सर्वथा ॥१॥ इत्युक्तं तत्र भोज्यस्य दृष्टार्थत्वेन केवलम् ।। अवैगुण्यतो नास्ति फलाभावादिशङ्कनम् ॥ २ ॥ अदृष्टार्थस्य यज्ञादेरङ्गवैगुण्यतो भवेत् ।। अपूर्वस्याप्यनुत्पत्तौ फलाभावेन कर्मिणाम् ॥ ३ ॥ सात्विकाना- मपि होपामानर्थक्यं समागतम् ।। प्रमादबहुलत्वाचानुष्ठातॄणामतो हरिः ।। ५ ।। वैगुण्यपरिहारार्थमों तत्स- दिति च त्रिधा ॥ कीर्तनं भगवन्नानः प्रायश्चित्ततयाऽधुना ॥५॥ अतिकारुणिकत्वेन साक्षादुपदिश- त्यजः ॥ ओं तत्सदितिरूपोऽयं ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ६ ॥ नामनिर्देश आत्मश्चिन्तितस्त्रिविधः श्रुतौ ॥ यस्मादेवमवः सर्वेः स्मर्तव्यमधुनावनैः ॥ ७ ॥ प्रमादारकुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत् ॥ स्मरणादेव तद्विष्णोः संपूर्ण स्यादिवि श्रुतिः ॥ ८ ॥ स्तूयते ग्रह्मनिर्देश: कर्मवैगुण्यनाशकृत् ।। त्रिधा निर्देशतो विष्णोः कर्तारो ग्राह्मणादयः ॥ ९ ॥ वेदाः सृष्टाः साधनाख्या यज्ञाः कर्मात्मकाः पुरा ॥ तस्माद्यज्ञादिस्- ऐश्न हेतुत्वेन हरेरयम् ॥ १० ॥ निर्देशः कर्मवैगुण्यपरिहारक्षमोऽस्त्यपि ॥ ११ ॥ २३ ॥ भा० टी०-एवमाहारादीनां सात्त्विकानामाक्षानाय हानाय च राजसतामसानां तेषां त्रैविध्यमुक्तम् । इदानी विहितानां यज्ञादिकर्मणां प्रमादावश्यंभावात् तत्प्रयुक्त वैगुण्ये कथं परिहार: स्यादित्याकालायां तेषां साद्गुण्यकरणाय करुणानिधिर्भगवान् प्रायश्चित्त मुपदिशति-ॐतत्सदिति । एष निर्देश: निर्दिश्यतेऽनेनेति निर्देशो ग्रहाणविविधो नामनिर्देशः। 3. मिति प्रमत्त्वमसि सदेव सोम्य" इत्यादिवेदान्तेषु ब्रह्मविद्धिः स्मृतश्चिन्तितः । यज्ञादिसाद्गुण्यसिद्धपर्थमवश्यमिदं प्रायश्चित्तमनुष्टेयमिति बोधनाय निर्देश स्वोति- प्राह्मणा: कर्तारो द्विजाः वेदाः करणानि यज्ञोः कर्माणि पुरा पूर्व प्रजापतिना तेन निर्देशेन विहिता नि- मिता: ।तथा च कळदीनां त्रयाणामपि कारणभूवस्वादस्य वैगुण्यनिवारकत्वं युक्तमेवेवि भावः ॥ २३ ॥ १० टी०-ननु चैवं विचार्यमाणे सर्वमपि यज्ञतपोदानादि राजसं तामसं वा विगुणत्वात्कृतमपि व्य- र्थत्वमापयेतेत्याशक्य तस्य विगुणस्यापि संगुणत्वोपपादनप्रकार दर्शयितुमाह-अमिति । ब्रह्मणः परमात्मनो निर्देशो नामव्यपदेशस्त्रिविधः स्मृतः । स कः? ॐतत्सदिति । एवं तेन त्रिविधेन ब्रह्मणा यज्ञ- फर्मकारस्तथा वेदा विधिगार्गप्रवर्तकास्तथा यज्ञाः कर्मरूपाः पुरा पूर्वसृष्टपादौ विहिता निर्मिताः । तत्र मिति ब्रह्मणो नास । तदुक्कं छान्दोग्योपनिपत्सु-".अयं सलु य उद्गीथः स प्रणवो य: प्रणव: स उद्गीय:"-तथा "मित्येकाक्षरमुपासीतोम् " इति । तदुक्तम् । नोद्गीथेन समं किंचिच्छोधकं जगति स्मृतम्। र विनाम्नायवर्गोऽपि स्वकार्ये म प्रवर्तते । इति । तथा सर्वानुक्रमकारः शाकलोऽपि प्रजापविरोकारः सर्वदेवत्यः पारमेष्ठयो ग्रामो देव आध्यात्मिकः' इति ! भाष्यम्-प्रजापतिर्देवता अमिति शब्दः सर्वदे- वतास्वभिधायकत्वेन 'सर्वदेवत्यः परमोत्कृष्टस्थाने विष्टनीति पारमेष्ठयो अन्नदेवत्य आध्यात्मिक शरीरनित्यगात्मनोऽभिधायको वेति। क्या प्रामणेऽप्यानातम् “तानि शुक्राण्यभ्यतपत्तेभ्योऽभित: नेभ्यनगो वर्णा अजायन्ताकार उकारो मकार इति तानेकधा समभरन् तदेवदोम " इति । भाष्यम्- वदेव शुक्र साझ 'इत्यादिश्रुतेः । शुक्राणि शबउप्रशाणि हिरण्यगादीन्यभितोऽवपन् वपश्चः - - [अ० १७ श्लो० २४ ] तस्वप्रकाशिकाद्यष्टीकोपेता तेभ्योऽभितस्वप्तेभ्यस्तपः कुणिभ्यः सकाशाद ये वर्णा अजायन्तेति स्पष्टम् । तथा च मिति नामनिर्देशन 'वेदा विहिताः, तदित्यनेन ब्राह्मणाः, सदित्यनेन यज्ञाः ॥ २३ ॥ रा० टी०-अफलाकाद्धिभिरित्यादिना पूर्व यस्तयोदानानां सात्त्विकत्वादिहेतवोऽसाधारणधर्मा उताः। साधारणांस्तु वक्तुमनेककर्तृकचरितानुवादरूपपुराकल्याख्यार्थवादमाह-अमित्यादिना ] निर्दिश्यते अनेनेति “निर्देशो नाम प्राण: त्रिविधः स्मृतः । ॐ प्रविष्टमाश्रितम् इति यावत् । जगद्यन्न परे इति वा । ईश्वरो वा जगति प्रोतः प्रविष्ट इति वा व्युत्पत्या मिति नाम हरेः । अवरक्षणकान्तिगतिप्रवेशत्याद्यर्थस्यावतेष्टि- लोपश्चेतिसूत्रेण मन्प्रत्ययः । तस्य टिलोपे ज्वरस्वरेत्यूठि सार्वधातुक इति गुणे च अमिति रूपसिद्धेः । गुणस्ततत्त्वाद्वा तदित्यस्य परोक्षवाचित्लादह्मणश्च वेदेकवेद्यतया परोक्षत्वात्तदिति नाम । निदोपसर्वशुभगुण- पूर्णत्वात्सदिति नामेति ज्ञेयम् । तेन ब्राह्मणा ग्रामणादयः पुरा सृष्टिकाले विहिताः सृष्टाः । वेदानां विधानं नाम अभिव्यकिर्तेया ॥ २३ ॥ तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ॥ प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४ ॥ त० टी०-एवं ब्राह्मणाग्रुत्तमसृष्टौ तच्छ्योहेतृतया समुदितस्य त्रिविधस्य ब्रह्मनान्नः समन्वय उक्तः । इदानीमभीष्टसिद्धयर्थ कार्येषु त्रयाणामोङ्कारायवयवानां समन्वयमकार उच्यते । तत्रादावों- कारस्यान्वयमाह-तस्मादिति । यस्मादयं सर्ववेदादिभूतः परवलवाचकस्तस्मादोमित्युदाहृत्योचार्य ब्रह्मवादिनां त्रैवर्णिकानामोंकारोबारणानन्तरं विधानोक्ता विधिना दर्शिता यज्ञदानतपाक्रियाः सततं सर्वदा मवर्तन्ते मकण दोपाभावेन संपद्यन्ते ॥२४॥ म०टी०-इदानीमकारोकारमकारव्याख्यानेन तत्समुदायोङ्कारव्याख्यानवदोङ्कारतच्छन्दसच्छब्दव्या- ख्यानेन तत्समुदायरूपं ब्रह्मणो निर्देशं स्तुत्यतिशयाय व्याख्यातुमारमते चतुर्भिः। तत्र प्रथममोङ्कार व्यायष्टे-तस्मादिति । यस्मात् “ अमिति ब्रह्म " इत्यादिपु श्रुतियोमिति ब्रह्मणो नाम प्रसिद्ध तस्मा- दोमित्युदाहृत्य ओङ्कारोचारणानन्तरं विधानोक्ताः विधिशास्त्रबोधिता ब्रह्मवादिना वेवादिना यज्ञदानवप:- क्रियाः सतवं प्रवर्तन्ते प्रकृष्टतया वैगुण्यराहित्येन वर्तन्ते । यस्यैकावयवोधारणादप्यवैगुण्यं किं पुनस्तस्य सर्वस्योचारणादिति स्तुत्यतिशयः ॥ २४ ॥ शं० टी-इसमेवार्थ प्रतिपादयन्नादौ प्रणवस्य विनियोगमाह-तस्मादिति । यस्मादेतनामनिवयं ब्रह्म- वाचकत्येन वेदादिजनकत्वेन च पवित्रतममिति म तस्मादोमित्युदाहृत्य कर्मारम्भे तदन्ते चोङ्कारमुक्षार्य ब्रह्मवादिनां ब्रह्म वेदास्वदर्थे च वेदितुं शोलमेपामस्ति ते प्रद्मवादिनो वेदवेदार्थपारगा ब्राह्मणास्तेषा ब्रह्मवा- दिनां विधानोक्ताः विध्युक्ता यज्ञदानतप:क्रियाः सर्वाः कचिदश्रद्धादिनाङ्कवैकल्येऽज्याद्यन्तयोरोमित्युञ्चा- रणेन सततं यथोक्तलक्षणैः संपूर्ण यथा तथा प्रवर्तन्ते प्रकर्षेण वर्तन्ते प्रवर्तन्ते । प्रकृष्टाः साक्षाः सात्त्विका भवन्तीत्यर्थः ॥ २४ ॥ श्री०टी०-इदानी प्रत्येकाकारादीना प्राशस्त्यं दर्शयिभ्यन्नोङ्करस्य तावदाह-तस्मादिति । यस्मा. देव ब्रह्मणो निर्देशस्तस्मादोमित्युदाहृत्य उचार्य कृता वेवादिनां यज्ञाद्याः शास्रोतुरः क्रियाः सवतं सर्वदा अष्ट्वैकल्येऽपि प्रकर्षण वर्तन्ते सगुणा भवन्तीत्यर्थः ॥ २४॥ स. टा०-अयोङ्कारादिनामास्य श्रीमद्भगवतो हरेः ॥ व्याख्यातुं वेदनिविनिर्देशस्तुवये पुनः ॥१॥ आरभतेऽत्र भगवानोमित्यादौ क्त्यनः ॥ भोमिवि ब्रह्मणो नाम प्रसिद्धं यह भागमे ॥ २॥ वस्मादा- .
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ श्लो० २९] मित्युदाहृत्य विधिशास्त्रेण वोधिताः ॥ प्रकृष्टत्वेन वर्तन्ते यज्ञदानतपःक्रियाः ॥ ३ ॥ अङ्गवैगुण्यराहित्या- सततं वेदवादिनाम् ॥ यस्यैकाक्यवोच्चार्यमाणे वैगुण्यसंक्षयः ॥ ४ ॥ किं पुनस्तस्य सर्वस्योचारणादिति संस्तुतिः ॥ ५ ॥ अहो हरेर्नाम महत्फलं श्रुतौ श्रुतं सदोंकार इति स्मृतं हृदि । पुनाति यज्ञादिकृतं झल- क्षणं लुनाति पापौघमुदीरणात्सकृत् ।। ६ ॥ २४ ॥ भा० टी०--तस्मादिति । यस्मादों वत्सदिति ब्रह्मणो निर्देशो यस्माच्च ब्राह्मणादीना कारणे तस्मादो- मित्युदाहृत्योचार्य ब्रह्मवादिनां वेदवादिना यज्ञदानतपःक्रिया: विधानोक्ता; शास्त्रचोदिताः सततं सर्वदा प्रवर्तन्ते ॥ २४ ॥ प० टी०-यज्ञोपक्रान्तमर्थमाह-तस्मादिति । यस्मादेवं ब्रह्मणो निर्देशस्तस्मात्कारणादोमित्युदाहृत्योचार्य वेदविधानोक्तब्रह्मवादिना मोक्षार्थिनी यज्ञदानवपसा क्रियाः सततं निरन्तरं प्रवर्तन्ते ॥ २४ ॥ रा० टी०-तस्मादिति । तस्मादोमित्यस्य भगवन्नामत्वात् मित्युदाहृत्य कारमुच्चार्य ब्रह्मवादिना सततं यज्ञादिक्रिया: विधानोक्ताः विध्युक्ताः प्रवर्तन्ते । एतेनोक्तोंकारार्थधीपूर्वकं अमित्युच्चार्य ब्राह्मणे. सह विध्युक्तदिशाऽनुष्ठानं यज्ञादेः सात्त्विकत्वे हेतुरुको भवति ॥ २४ ॥ तदित्यनभिसंधाय फलं यज्ञतपःक्रियाः॥ दानक्रियाश्च विविधाः कियन्ते मोक्षकातिभिः ।। २५ ॥ त० टी०-एवं फलानुसंहितकर्मणामोंकारोचारणपूर्वकं साफल्यमुक्तमिदानीं निष्कामाणां मुमुक्षू- णां यज्ञादिषु तदितिशब्दान्वयमाइ-तदिति । पूर्वोक्तं श्रुत्मादिसिद्धं ब्रह्मणो नाम उदाहृत्येति • पूर्वश्लोकादाहत्य योजनीय, तदुच्चार्य फलमनभिसंधाय फलाकाहां विहाय मोक्षकाविभिदान्वितैर्यज़दा- नतपःक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते, केवलं तच्छन्दनिर्दिष्टपरमात्मोद्देशेन निर्वयन्ते इत्यर्थः ॥ २५ ॥ म. टी-द्वितीयं तच्छदं व्याचष्टे-तदिति वत्त्वमसीत्यादिश्रुतिप्रसिद्धम् । तदिति ब्रह्मणो नामोदा. हृत्य फलमनभिसंधायान्त,करणशुद्धयर्थं यज्ञतप क्रिया दानक्रियाञ्च विविधा मोक्षकाविभि. क्रियन्वे तस्मादतिप्रशस्तमेतत् ॥ २५ ॥ शं० टी०-एवमोंकारस्य कर्मसाद्गुण्यसंपादने विनियोगमुक्त्वा नत्पदस्य विनियोगमाह-तदितीति । उदा. हृत्येति पदं पूर्वोक्तमनुवर्तते । मोक्षकादिभिमोक्षककामैः। एतेन पूर्वोक्ताना कामित्वं सूचितम् । मुमुक्षुभिाह्मणेः फलं कर्मजन्यमनभिसंधाय संकल्पाननपेक्ष्य चेश्वरार्पणबुद्ध्या चित्तशुद्धये कारम्भादौ तदिति पदमुदाहृत्य समुचार्य यशदानतप क्रियाः श्रोतादयो यज्ञक्रिया', शारीरादयस्तप.क्रियाः, कन्यागवादिभेदेन विविधा दान- क्रियाश्च क्रियन्ते । श्रद्धाद्यनलोपे सति तत्पदप्रयोगेन सगुणाः क्रियन्त इत्यर्थः ।। २५ ॥ श्री० टी०-किंच द्विवीयं नाम प्रस्तावि-तदिति । वदित्युदाहृत्येति पूर्वस्यानुपङ्गः । वदित्युदाहृत्य शुद्धचित्तमोक्षकादिमि. पुरुषै. फलाभिसंधिमकृत्वा यज्ञाद्याः क्रियाः क्रियन्वे अवश्चित्तशोधनद्वारेण फलसंक. स्पत्याजनेन मुमुक्षुत्वसंपादकत्वात्तच्छन्दनिर्देश. प्रशस्त इत्यर्थः ॥ २५ ॥ स० टी०-वदिति ब्रह्मणो नाम प्रसिद्ध तत्त्वमादिके ॥ वेदवाक्ये समुच्चार्यानभिसंधाय तत्फलम् ॥ १॥ अन्त करणशुष्पर्य यज्ञदानवप कियाः ।। क्रियन्ते मोक्षमिच्छनि प्रशस्ततममेव वत् ॥२॥ श्रुतौ तदित्येव मुकुन्दनाम तत्परोक्षरीला परिवर्णित परम् ।। मुमुक्षुभियेय मनन्यचेतसा तथैव वेद्यं भवमु- कये घिया ॥३॥ २५ ॥' भा० टी०-ओमितिनानो विनियोगमुम्वा वदित्यस्य विनियोगमाइ-तदिति । फलमनभिसंधाय [अ० १७ श्लो. २६ ] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेना मोक्षकादिभिः मुमुक्षुभिः यज्ञपतःक्रिया दानक्रियाश्च विविधाः क्षेत्रहिरण्यप्रदानादिलक्षणाः ददिति ब्रह्मा- भिधानमुच्चार्य क्रियन्ते निर्वयन्ते ॥ २९ ॥ १० टी०-अथ द्वितीयनामनिर्देश स्तौति-तदिति । तदित्युदाहृत्येति पूर्वस्यानुपनः । नामनिर्देशमुच्चार्य चित्तशुद्धपये प्रवृत्तमक्षिकादिभिः फलमनभिसंधाय यज्ञवपःक्रियास्तथा दानक्रियाश्च क्रियन्ते ।। २५ ।। रा०टी०-किंच-तदिति । तत्परोक्षं फलं स्वर्गाधनभिसंधाय मम स्यादित्यनिच्छन् । तथा तत् वेदे- फगम्यतया परोक्षभूवं प्रम अभिसंधाय ममापदं स्यादितीच्छन्यज्ञोऽग्निहोत्रादि तपः क्रिया: प्रागुक्तशारी- रादितपोरूपक्रिया: दानक्रियाश्च विविधाः मोक्षकाद्धिभिः क्रियन्त इत्युक्त्या वेदैकवेद्यतया तसदोक्तब्रह्मो- देशेनेवरफलानुदेशेन च क्रियमाणवरूपधर्मान्वरमपि यज्ञादेः सात्त्विकत्वादिहेतुरत्तो भवति । तदिति ब्रह्मोद्दिश्य यज्ञादेः करणाच ब्रह्मणस्तदिति नानेवि चोकं भवति ॥ २५ ॥ सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत् प्रयुज्यते ॥ प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छन्दः पार्थ युज्यते ॥ २६ ॥ त० टी०-इदानी सच्छब्दान्वयप्रकारमाह-सद्भाव इति द्वाभ्याम् । सद्भाचे वस्तुनोऽविद्य- मानताशडाच्यात्तिः सद्भावस्तस्मिन्, तथा साधुभावे च असट्टत्तत्वशङ्कायां सत्तत्वख्यापन साधुभावस्तस्मिन्, सदित्येतत् श्रुतिस्मृतिसिद्धं ब्रह्मणो वाचकं पदं लोकवेदयोः प्रयुज्यते शिष्टैः । तथा प्रशस्ते माङ्गलिके विवाहोत्संपादौ कर्मणि सदिदं कर्मति सच्छब्दो हे पार्थ प्रयुज्यते इत्यर्थः ॥२६|| म० टी०-तृतीयं सच्छब्दं ध्याचष्टे द्वाभ्याम्-सद्भाव इति । “सदेव सोम्येदमा आसीत्" इत्यादि श्रुतिप्रसिद्धं सदित्येतद् ब्रह्मणो नाम समावे अविद्यमानत्वशङ्कायां विद्यमानत्वे साधुभावे च असा- धुत्वशङ्कायां साधुत्वे च प्रयुज्यते शिष्टः । तस्माद्वैगुण्यपरिहारेण यज्ञादेः साधुत्वं तत्फलस्य च विद्यमानत्वं कर्तुं क्षममेतदित्यर्थः । तथा सझावसाधुमाक्योरिव प्रशस्ते अप्रतिवन्धन आशुसुखजनके माङ्गलिके कर्माणि विवाहादौ सच्छब्दो हे पार्थ युज्यते प्रयुज्यते । तस्मादप्रतिवन्धेनाशु फलमनकत्वं वैगुण्यपरिहारेण यज्ञादेः समर्थतन्नामेति प्रशस्ततरमेतदित्यर्थः ॥ २६॥ शं० टी०-एबमोन्तच्छन्दयोविनियोगमुक्त्वाऽय सच्छब्दस्य विनियोगमाह-सद्भाव इति द्वाभ्याम् । सद्भावे विद्यमानस्य वस्तुनोऽस्तित्वं सद्भावस्वस्मिन् सद्भावे देवचाय पुत्रोऽस्तीत्येतस्मिन्नर्थे पण्डितैः सदि- त्येतत्पदं प्रयुज्यते । यद्वा सतो ब्रह्मणो मावः सद्भावम्वस्मिन् सर्वस्य ब्रह्मभावे विवक्षिते सदिदमिति सच्छब्दः प्रयुज्यते । साधुभावे च सद्वृत्तता साधुभावस्तस्मिन् विवक्षिवे सापोः साधुभाव संधिः सन्नयमि- ति सच्छन्दः प्रयुज्यते । तथाच कर्मणः प्रशस्तत्वे विवक्षिते सदिदं कर्मेति सच्छन्दः प्रयुज्यत इत्यर्थः ॥२६॥ श्री० टी०-सच्छब्दस्य प्राशस्त्यमाह-सद्भाव इति द्वाभ्याम् । सहावे अस्तित्वे देवदत्तस्य पुरादि- कमस्तीत्यस्मिन्नर्थे साधुभावे च साधुत्वे देवदत्तस्य पुत्रादि श्रेष्ठमित्यस्मिन्नर्थे सदिस्यतत्पदं प्रयुज्यते । प्रशस्ते मालिके विवाहादिकमणि च सदिदं कर्मेति सच्छन्दो युज्यते प्रयुज्यते संगच्छत इति वा ॥ २६ ॥ स. टी-सदेवेति श्रुतौ नाम सदिति ब्रह्मणो हरे, ॥ तदसत्यत्वशङ्कायां सद्भावे सत्प्रयुज्यते • ॥ १ ॥ तथा साधुत्वशङ्कायां साधुभावे प्रयुज्यते ।। वैगुण्यपरिहारेण यज्ञादेः साधुता क्षमम् ॥ २ ॥ प्रकर्तुं तत्फलस्यापि विद्यमानत्वमेव सत् ॥ प्रशस्तै च विवाहादौ सच्छच्दोऽतः अंयुज्यते ॥ ३ ॥ सर्व- मङ्गलहेतुत्वाधतो माइलिफेऽखिले ॥ तस्मादप्रतिबन्धेन सुखहेतुवयाऽसकृत् ॥ ४ ॥ उचार्यमाणमायत्ते फलं सन्नाम तद्धरेः ॥ अहो श्रीमद्धरेनमिमहिमायं निरङ्कुशः [1५।। सदेव सौम्येदमितिश्रुतौ श्रुतं विना हरि नैव विकारनामनी ॥ सदित्युदीयैव हरि सुधीभजेदसत्सु सचापदमध्वरादिषु ॥ ६ ॥ २६ ।। 4 ११५६ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ श्लो० २७] भा० टी०-तृतीयनानो विनियोगमाह द्वाभ्याम्-सदिति । सतः सद्भावे यथाऽविद्यमानस्य पुत्रस्य जन्म तथा साधुभावेऽसद्वृत्तस्यासाघोः सद्वृत्तिता साधुभावस्वस्मिन्साधुभावे च सदित्येतत् ब्रह्मणो- ऽभिधानं प्रयुज्यतेऽभिधीयते । तथा प्रशस्ते कर्मणि विवाहादौ च सच्छब्दः प्रयुज्यते । पृथापुत्रे त्वयि पार्थशब्दो यथेति सूचयन्नाह-पार्थेति ॥ २६ ॥ प० टी०-अथ सच्छन्दस्य प्राशस्त्यमाह-सद्भाव इति । सद्भावेऽस्तित्वे देवदत्तस्य पुत्रादिकमस्तीत्ये- तस्मिन्नर्थे साधुभावे च साधुत्वे देवदत्तस्य पुत्रादि श्रेष्ठमित्येतस्मिन्नर्थे सदित्येतत्पदं प्रयुज्यते । तथा प्रशस्ते विवाहादिमाङ्गलिके कृत्ये सच्छन्दो युज्यते ॥ २६ ॥ रा. टी--किंच । साधुगुणोपेततया सच्छब्दार्यभगवज्ञानपूर्वकतयाऽनुष्ठानमपि सात्त्विकत्वहेतु- धर्मान्तरं यज्ञादेरितिभावेन सच्छब्दार्थमाह-सद्भाव इति । सद्भावे असत: सत्तारूपप्रजननार्थे साधुभावे साधुत्वे । प्रशस्ते कर्मणि शुभकर्मणि चेत्यर्थः ॥ २६ ॥ यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ॥ कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥ त० टी०-तस्मात्-यज्ञ इति । यज्ञे यज्ञकर्मणि या स्थितिः तपसि च या स्थितिने च या स्थितिर्निष्ठा सा सदित्युच्यते । सदसतोर्विनिर्णयं . संगृह्माह-कर्म चैवेति । यस्य चैतन्नामत्रयं स.पर- ब्रह्मभूतो भगवानेवार्थः प्रयोजनमुद्देश्यो यस्य तत् तदर्थीयं कर्म पूजोपहारजन्मोत्सवाद्यतया तुल- सीपुष्पाद्यपचयतदवरोपणमन्दिरनिर्माणमार्जनोपळेपनचित्रकरणविविधन्यजनपाककरणगीतवाद्यनृत्य- प्रदक्षिणप्रणामादिसर्व सदित्येवाभिधीयते, सतः परमात्मनः प्राप्तिहेतुत्वात् । अभावधारणद्वयं तत्रैक- मयोगव्यवच्छेदार्थकम् । द्वितीयमन्ययोगव्यवच्छेदार्थक, तदर्थीयं कर्म सन्नेति न अपितु सदेव । तदर्थीयव्यतिरिक्तं कर्म सन्नेत्यर्थः । " यधेह कर्मचितो लोकः क्षीयते एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते ॥ इति श्रुत्या " विद्या मां सोमपाः पूतपापा" इत्युपक्रम्य " क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति एवं त्रयीधर्ममनुमपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते " इत्यादिना भगवता स्वयमपि देवादिभक्तानां स्वर्गादिफलकर्मणां क्षयिष्णुत्वाभिधानात् । भगवदर्थस्य कर्मणस्तु 'मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन सिद्धि- मवाप्स्यसि । सर्वकर्माण्यपि सदा , कुर्वाणो मद्यपाश्रयः । मत्मसादवानोपि शाश्वतं पदमव्ययम् इत्यादिना शाश्वताव्ययफलत्वप्रतिपादनात् । तदेवं भगवदीयं . यज्ञदानतपआयन्यदपि सर्व कर्म परमात्माभिधानत्रयप्रयोगपूर्वकं सात्त्विकश्रद्धयाऽनुष्ठितं श्रेयस्करं भवतीति सिद्धम् ॥ २७ ॥ म०टी०-यज्ञ इति । यो तपसि दाने च या स्थितिस्वसरतयाऽवस्थितिनिष्ठा सापि सदित्युच्यवे विदुतिः । फर्म चैव तदर्थीय वेषु यज्ञदानसपोरूपेवर्धेषु भवे तदनुकूलमेव च कर्म । अथवा यस्य ब्रह्मणो नामेदं प्रस्तुतं वदेवार्थो विषयो यस्य तदर्थे शुद्धनझनानं तदनुकूलं कर्म तदर्थीय, भगवदर्पणयुद्धया क्रिय- मागं कर्म वा तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयतेन तस्मात्सदिति नाम कर्मवैगुण्यापनोदनसमर्थं प्रशस्तवरम्। यस्यकै. कोऽवयवोऽप्येतादशः किं वक्तव्यं तत् समुदायस्योंवत्सदिति निर्देशस्य माहात्म्यमिति संपिण्डितार्थ ॥२७॥ शं० टी०-किंच-एव इति । यझे श्रोतादो उपसि शारीपदो दाने च कन्यादानादौ या स्थिति- स्वस्थान सा च विनिः सदित्युच्यते । यज्ञादीनामश्रद्धादिदोषोपपत्तौ साधुत्वसिद्धये सच्छब्दः प्रयुज्यत इत्यर्थः । तदीयम्-अत्र वच्च्देन लोकशास्त्रप्रसिद्धः परमेश्वरो गृह्यते । तदर्थीयं परमेश्वरार्थकं फर्म च पता:यमिति पाठ + .
[अ० १७ सौ. २८] उत्त्वप्रकाशिकापटटीकोपेता सदित्येवाभिधीयते । अश्रद्धादिदोपप्रातौ यज्ञादीनां साद्गुण्याय ॐ तत्सदिति ब्रह्मणो नामवयं प्रयुज्यत इत्यु- क्त्या सात्त्विस्या श्रद्धयैव मुमुक्षुभिर्यशदानादि कर्म नियमेन फर्तव्यमिति पर्यवसितं नान्ययेत्यर्थः 11 २७ ।। श्री०टी०-किंच-यज्ञ इति । यज्ञादिपु च या स्थितिस्तात्पर्येणावस्यानं वदपि सदित्युच्यते । यस्य चेदं नामवयं स एव परमात्मा अर्थ: फलं यस्य उत्तदर्थं कर्म पूजोपहारगृहागणपरिमार्जनोपलेपरङ्गमालिका दिक्रिया तसिद्धये यदन्यत्कर्म क्रियते उद्यानशालिक्षेत्रधनार्जनादिविषयं वत्कर्म वदीयम् । वचातिव्यवहि- तमपि सदित्येवाभिधीयते । यस्मादेवमतिप्रशस्तमेतन्नामायं तस्मादेवत्सर्वकर्मसाद्गुण्याथै कीर्तयेदिवि वात्म- यीर्थः । अन्त्र पार्थवादानुपपत्त्या विधि: कल्प्यते 'विधेयं स्तूयते वस्तु' इति न्यायात् । अपरे तु प्रवर्तन्ते विधानोका; क्रियन्ते मोक्षकादिभिरित्यादिवर्तमानोपदेशः समिधो यजतीत्यादिवद्विधिवया परिणमनीय इत्याहुः । तत्तु सहावे साधुभावे चेत्यादिपु प्राप्तार्थत्वान्न संगच्छत इति पूर्वोक्तकमेण विधिकल्पनेव ज्यायसी ।। २७॥ स०टी०-यज्ञे तपसि दाने च या निष्ठा तत्परामिका । सा सदित्युच्यतेऽभिस्तेष्वर्थेषु मखादिषु ॥ १॥ भवन्तदनुकूलं च कर्म सघाभिधीयते ॥ अथया यस्य नामेदं ब्रह्मणः प्रस्तुतं परम् ॥ २॥नदयों विषयो यस्य प्राज्ञानस्य वत्तथा ॥ ग्रझार्पणधिया कर्म क्रियमाणं विशुद्धये ॥ ३ ॥ तदीयं सदित्येवं प्रशस्तमभिधीयते ॥ यस्यैकैकोऽप्यवयवः प्रशस्वी हीरशो मतः ॥ ४ ॥ किं पुनस्तस्य सर्वस्व वाच्यं माहात्म्यमतम् ॥ ५ ॥ यज्ञादो समुदीरणाजगवतो नामोन्तदित्यादिकं साद्गुण्यं कुरुते यदङ्गविकलं ध्येयं सदोपासकैः । सेयं वेदविदो रहस्यमखिलं नामार्थतो यत्परं तच्छीछष्णमहोभिधं मम मवौ भूयाद्वचः स्वार्थतः ॥ ६॥ २७ ॥ भा० री०-यज्ञ इति । यज्ञे यज्ञकर्मणि या स्थितिस्तथा तपसि या स्थितिः दाने च या स्थिति: सा च विद्वद्भिः सदित्युच्यते । तदर्थीयं यशदानतपोर्थीयम् अथवा यस्याभिधानत्रयं प्रकृतं वदीयमीश्वरार्थीय- मित्येतत्सदित्येवाभिधीयते । तदेतद्यक्षतपआदि कर्म असात्विकं विगुणमभक्तिपूर्वकमपि ब्रह्मणोऽभिधानत्र- येण सात्विक सगुणं सभक्तिक संपादितं भवत्यतोऽवश्यमा तत्सदिति ब्रह्मयोऽभिधानत्रयमुदाहृत्य यज्ञादि प्रवर्तनीयमिति प्रकरणार्थः ॥ २७ ॥ १० टी०-किच-यन्न इति । यज्ञे दपसि दाने च स्थितिस्तात्पर्यगावस्थानं तदपि सदित्युच्यते । यस्य चेदं नामन्त्रयं स एव परमात्मेत्यर्थः । तथा तदीयं यज्ञदानतपोनिमित्तं पूजोपहारगृहाङ्गणपरिमार्ज- नोपलेपनध्वजपताकादि दोधानक्षेत्रधनार्जनादि यत्कर्म क्रियते तदपि सदित्येवाभिधीयते । यस्मादेवमवि- प्रशस्त नामत्रयं तस्मादेतत्सर्वकर्मसाद्गुण्यार्थ कीर्तयेदिति तात्पर्यार्थः । नायमर्थवादः, किंतु ब्रह्मणो नामनिर्देशस्यातिप्राशस्त्याद्विधिरेव कल्प्यते ॥ २७ ॥ रा०1०-भगवनिष्ठापूर्वकत्वमपि कर्मण: सात्त्विकत्वहेतुभूतं धर्मान्तरमितिभावेन निहापि सच्छ. दार्थ इत्याह-यज्ञ इति । स्थिविनिष्ठा । भगवानेभिरवश्यं फलं प्रयच्छतीतिवुद्धिरिति यावत् । किंच भग- यद्विषयतयाऽनुष्ठानमपि धर्मान्तरमिति मावेनाह-कर्मेति । तदर्थोऽयं सच्छब्दार्थभगवदर्थोऽयम् ॥ २७ २७॥ अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्ततं कृतं असदित्युच्यते पार्थ न च तत्मेत्य नो इह ॥२०॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ . । यत् ॥ ३ . . श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७ श्लो० २८] त० टी०-तदेतत्सर्व श्रद्धयैवानुष्ठेयमिति दृढयितुमश्रद्धया कृतस्य नैप्फल्यं वदन्नध्यायमुपसं- हरति-अश्रद्धयेति । अश्रद्धया होमदानतपाकृतं यशान्यदपि लौकिकं वैदिकं कर्म कृतं तत्सर्व- मसदित्युच्यते । हे पार्थ तदश्रद्धया कृतं न प्रेत्य परलोकेऽपूर्वाजनकत्वात् नो इह लोके यशसुखकर नं भवति, सद्भिनिन्दितत्वात् “ श्रद्धापूतं वदान्यस्य हतमश्रद्धयेतरत्" इति स्मृतेः । वस्माद्राज- सतामसमासुरं कर्म विहाय सात्त्विकथद्धयैव सर्व कर्म भगवत्मीत्यर्थमनुष्ठितमन्तःकरणशोधनहेतृतया ज्ञानभक्तिद्वारेण मोक्षहेतुर्भवतीतीह दर्शितम् ॥ २८ ॥ इति श्रीभगवद्गीताटीकायां तत्वप्रकाशिकायां सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ म०टी०-थद्यालस्यादिना शास्त्रीय विधिमुत्सृज्य अधानतयैव वृद्धव्यवहारमात्रेण यज्ञतपोदानादि कुर्वता प्रमादाद्वैगुण्ये प्राप्ते ॐ तत्सदिति ब्रह्मनिर्देशेन तत्परिहारस्त श्रद्दधानतया शास्त्रीय विधिमु- सृज्य कामकारेण यत्किंचिद्यज्ञादि कुर्वतामसुराणामपि तेनैव वैगुण्यपरिहार. स्यादिति कृतं श्रद्धया सात्त्विकत्वहेतुभूतयेत्यत आह-अश्रद्धयेति । अश्रद्धया यद्भुतं हवनं कृतमनौ दत्तं यत् ब्राह्मणेभ्यः यच. पस्ततं यच्चान्यत्कर्म कृतं स्तुतिनमस्कारादि तत्सर्वमश्रद्धया कृतमसत् असाध्वित्युच्यते । अन ओतत्सदिति निर्देशेन न तस्य साधुभावः शक्यते कर्तुं सर्वथा तदयोग्यत्वाच्छिलाया इवायुरः, तत्कस्मादसदित्युच्यते शृणु हे पार्थ ! चो हेतो । यस्माचदश्रद्धाकृतं न प्रेत्य परलोके फलति चिगुणत्वेनापूजिनकत्वात्, नो इह नापीह लोके यशः साधुभिर्निन्दितत्वात्, अव ऐहिकामुष्मिकफलविकलत्वादश्रद्धाकृतस्य सात्त्विक्या श्रद्धयैव सात्त्विकं यज्ञादि कुर्यादन्त.करणशुद्धये, तादृशस्यैव श्रद्धापूर्वकस्य सात्त्विकस्य यज्ञादेवाद्वैगुण्यशङ्कायो ब्रह्मणो नामनिर्देशेन साद्गुष्यं संपादनीयमिति परमार्थः । श्रद्धापूर्वकमसात्त्विकमपि यज्ञादि विगुणं ब्रह्मणो नामनिर्देशेन सात्त्विकं सगुणं च संपादिवं भवतीति भाष्यम् । तदेवमस्मिन्नध्याये आलस्यादिनाऽनाटतशा. खाणा श्रद्धापूर्वकं वृद्धन्यवहारमात्रेण प्रवर्तमानाना शास्त्रानादरेणासुरसाधम्र्येण श्रद्धापूर्वकानुष्ठानेन च देवसाधम्र्येण किमसुरा अमी देवा वेत्यर्जुनसंशयाविपयाणा राजसवामसश्रद्धापूर्वकं राजसतामसयज्ञादिका- रिणोऽसुरा: शास्त्रीयज्ञानसाधनानधिकारिण. सात्त्विकश्रद्धापूर्वक सात्त्विकयज्ञादिकारिणस्तु देवाः शास्त्री. यज्ञानसाधनाधिकारिण इति श्रद्धानैविध्यप्रदर्शनमुखेनाहारादिवैविध्यप्रदर्शनेन भगवता निर्णयः कृत इति सिद्धम् ॥ २८ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीविश्वेश्वरसरस्वतीपादशिष्यमधुसूदनसरस्वतीविरचिताया श्रीभ- गवदगीतागृढार्थदीपिकायां श्रद्धात्रयविभागयोगविवरणं नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ शं० टी०-श्रद्धाविधुरस्य कर्मणो निष्फलत्वमाह-अश्रद्धयेति । अश्रद्धया श्रौते स्माते च कर्मणि यदग्नौ हुतं यदन्नोदकादिकं ब्राह्मणेभ्यो दच यच्छारीरादिलक्षण तपस्वप्तं यदन्यत् स्तोत्रमन्त्रजपादिक फर्म कृतं भवति तत्सर्वमसन्निष्पलमेव भवति । तदेव विस्पष्टयति-नचेति । शरीरादिबहुप्रयासेन कृतं भक्तिनद्धाविधुरं यत्सर्व कर्म प्रेत्य परलोकसुखाय न भवति नो इह ऐहिकसुखाय च न भवति, श्रद्धा धुर्यान्मन्त्रादिलोपाच, उत्तम देवा अपि नानुमन्यन्वे नैव च शिष्टा अप्यतः श्रद्धाशून्यं कर्म निष्फल. मेवेत्यर्थ । नन्वश्रद्धया देयमिति विधिग्लादश्रद्धया कवमपि कर्म दानादिफलवदेव स्यादिति पेत्सत्यं, यद्यप्पनद्धया देयमिति श्रूयते वथापि " फेवलायो भवति केवलादी " इति केवलादिनो महापापिटनम- स्वप्राप्तो पनिवृत्तये लश्रद्धया देयमिति दयया श्रुत्योच्यते न तु विधीयडे । यविश्व ब्रह्मचारी च विद्यार्थी गुरुपोपकः । अध्वग. क्षीणतिश्च' इत्यादिषु भिक्षुकेप्चन्येपु वा दोपवत्सु सत्सु न तेषु श्रोत्रियस्य श्रद्धा जायते । क्यापि गृहस्थैकशरणाना तेपा गत्यन्तराभावादश्रद्धयापि प दातव्यमेवेत्युर्यते। 'अश्रद्धया देयं - -- . [अ० १७ श्लो. २८] वत्स्वप्रकाशिकायष्टदीकोपेता हिया देयम्' इति । यथा मावरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । वर्षन्ते गृहिणं उद्वदाश्रित्येतर आश्रमा' इति न्यायेन । सर्वामिणा गृहस्यैकशरणत्वादानमेव गृहस्थस्येवि गृहिणो दानकरधानत्वस्मरणाच्च यथाकयं- चिदर्थिभ्यो श्रद्धया वा हिया वा भिया चाऽवश्यं दातव्यमिति दानस्यावश्यकरणीयस्वं सूच्यते अश्रद्धया देयमित्यादिना । वलो नायं विधिः । अन्यथा 'अश्रद्धया देयम् 'श्रद्धयामि. समिध्यवे अद्धया हूयते हविः' श्रद्धा कामस्य मातराम् । इति सर्वस्यापि कर्मणः श्रद्धाप्नधानत्वविधिवयध्यप्रसङ्गात् । तस्माच्छ्रोत स्मात चकर्म सर्व श्रद्धयेव कर्तव्यमिति सिद्धम् ॥ २८ ॥ इतिश्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमदानन्दात्मसरस्वती शिष्यश्रीशंकरानन्द- सरस्वतीकृतौ गीतातात्पर्यवोधिन्या सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ श्री० टी०-इदानी सर्वकर्मसु श्रद्धयैव प्रवृत्त्यर्थमश्रद्धाकृतं सर्वं निन्दति-अश्रद्धयेति । अश्रद्धया हुवं हवनं, दत्त दान, बतं निवदितं तपः । यथान्यदपि कृतं कर्म तत्सर्वासादित्युच्यते। यतस्तत्प्रेस लोका- न्तरे न फलति विगुणत्वानो इह न चारिगेलोके फलति अयशस्करत्वात् ।। २८ ।। रजस्तमोमयीं त्यक्त्वा श्रद्धा सत्त्वमयी श्रितः ॥ तत्त्वज्ञानेऽधिकारी स्वादिति सप्तदशे स्थितम् ॥१॥ इति सुबोधिन्या टीकाया श्रीधरस्वामिविरचिताया श्रद्धात्रयविभाग- योगविवरणं नाम सप्तदशोऽध्याय. ॥ १७॥ स० टी०-एवं यज्ञादिकं कर्म विगुणं ह्यापि सात्त्विकम् ।। सच्छ्रद्धापूर्वकं ब्रह्मनामजयप्रयोगत. ॥ १ ॥ सद्गुणं भवतीत्येवं हरिणा समुदीरितम् ॥ इदानीं श्रद्धया हीन सर्व यागादि निष्फलम् ॥ २ ॥ भवतीत्सव एवादौ श्रीमद्भगवता स्वयम् । प्रधानत्वेन सच्छ्रद्धा यज्ञदानादिकर्मसु ॥ ३ ॥ स्तूयते निन्द्यते सबै श्रद्धाहीनं मखादिकम् ॥ यत्कृतं हवनं बही दत्तं पात्रेभ्य एव यत् ॥ ४ ॥अनुष्ठितं तपो यच कृतं स्तुत्या- दि कर्म यत् ॥ अश्रद्धया च तत्सर्वमसाध्वित्युच्यते कृवम् ॥ ५ ॥ तदश्रद्धाकृतं यस्मानामुत्रेह फलत्यपि ।। अवैगुण्यतोऽपूर्वाजनकल्लेन हेतुना ॥३॥ नापीहास्ति यशो लोके निन्दितत्वाच साधुमि. ॥ अतो मुमुक्षभिः श्रद्धा संपाद्या सात्त्विकी तया ॥ ७ ॥ यज्ञादिकर्म कर्वव्यं चित्तशुद्धयात्मलब्धये ॥ ८॥ २८ ॥ श्रद्धाविश्यमादी सकलमखत्योदानसागुण्यहेतो. रोन्तत्सन्नाम चोक्तं श्रुतिविततफलं ब्रह्मविद्यातिहेतु ।। श्रद्धाहीनं विनिन्द्यं सकलमपि कृतं येन संप्रोक्तमित्यं तं श्रीकृष्णं गुरूणामपि परमगुरु भूरिभावैनतोऽस्मि ॥ १ ॥ रजस्तमोदु खनिदानमारात्यक्त्वा समाश्रित्य गुणं विशुद्धम् ।। हरेः पदाम्भोजयुगं सदैव ध्यात्वैव मोक्षो भवपाशवन्धात् ॥ २॥ वाप्यसामर्थ्यवता जनाना यज्ञादि साद्गुण्यकरं हि विष्णोः॥ नामत्रय दोषगणापहं तत्प्रोक्त मुमुक्षु सततं भजेत ॥३॥ अनादिनिर्णीतमिद मतं यत्सर्वेषु यज्ञादिपु नाम विष्णोः ।। प्रधानमस्तीत्यत एवदेव स्मृत्वा विमुच्येत विकल्पगालात् ॥ ४ ॥ इति भावप्रकाशे श्रीसदानन्दविदा कृते । श्रद्धांविष्यवोधोऽयं पूर्ति ससंदेशो गतः ॥ टीकाश्लोकसंख्या ॥ १३९ ॥ आदितष्टीकाश्लोकसंख्या ॥ भा० टी०- सर्वत्रास्तिक्यलक्षणाया. श्रद्धाया: प्रधानतया सवै वथैव संपाद्यते यस्मामादय द्ध- ४६७०॥
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १७लो० २८] या हुतं हव्यहवनं कृतं दत्तं च ब्राह्मणेभ्यो यत्तपस्ततं यच्चान्यत्कर्म स्तुतिनमस्कारादि कृतं तत्सर्वमसदि- त्युच्यते सत्प्राप्तिमार्गादास्तिक्यलक्षणाद्वाह्यत्वात् असत्त्वमेव प्रतिपादयति । न च तद्बह्वायासमपि प्रेत्य मृत्वा फलाय नापीह यशोरूपफलाय साधुमिनिन्दितत्वात्।हुतमित्युक्त्या विहिते कर्मणि श्रद्धावानाधिकारी प्रतिषिद्धे तु श्रद्धारहितोऽपीति बोधितम् । एतेन निषेधलाहिनो नास्तिकस्य प्रत्यवायाभावप्रसङ्गो निरस्तः । ननु यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति" इति श्रुत्या श्रद्धया कृतं वीर्यवत्तरं चेत् अद्धारहितमपि वायवदित्यर्थात् वोधितमिति कथं भगवता प्रोक्तमसदित्युच्यत इति । नैप दोपः । यतः श्रुतिस्थ- श्रद्धापदं भक्तिरूपश्रद्धापरं स्मृतिस्थं तु विश्वासात्मकश्रद्धापरम् । एवं च नास्तिक्ययुद्धया कृतं सर्व निर- र्थकमेवातो नास्तिक्यं श्रेयोर्थिभिः सर्वथैव हेयमिति भाव. । पृथापुत्रस्य तब तु कदापि तन्नोचिमिति सूचयन्संबोधयति-पार्थेति ॥ २८ ॥ उदनेन सनदशाध्यायेन श्रद्धादित्रैविध्यं निरूपयता शाखानभिज्ञानामपि सात्त्विक श्रद्धावता राजस- तामसाहारादिपरिवर्जनेन सात्त्विकाहारादिसेवया सत्त्वैकशरणाना प्राप्तमपि यज्ञादिवैगुण्यं ब्रह्मनामनिर्देशे- न परिहरता परिशुद्धबुद्धीना श्रवणादिना ब्रह्मात्मसाक्षात्कारों भवतीति प्रदर्शितम् ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यवालस्वामीश्रीपादशिण्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुपा विरचिताया गीताभाप्योत्कर्षदीपिकाया सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ ५० टी०-अथाश्रद्धाकृत सर्व निन्दति-अश्रद्धयेति । असावेऽश्रद्धया हुतं होमः, दत्तं दान, तप्तं निर्ववितं तपः यच्चान्यदपि पूर्वोक्तवत्कृतं तत्सर्वमसदित्युच्यते । यतः प्रेत्य लोकान्तरे न फलमिति विगुण- त्वात् । नेह चास्मिन लोके फलति अयशस्करत्वात् । तस्मादजस्तम.प्रधाना श्रद्धा त्यक्त्वा सत्वमयी श्रद्धा अयेदिस्यध्यायतात्पर्यम् ।। २८ ।। अथाध्यायतात्पर्यम् । प्राक्सस्कारानुरूपं विधिविधुरधिय. श्रद्धया सयजन्वे दानाहारक्रियायेत्रिविधगुणवशात्तत्फलं लभन्ते। तद्वैगुण्यं निहन्तुं प्रभववि वदोंवत्सदेपा त्रिवर्णी वेन ब्रह्मार्पणं स्यादिमिति दशमे सप्तयुक्त निरुक्तम् ।।१।। इति श्रीमद्देवज्ञपण्डितसूर्यविरचिताया भगवद्गीवाटीकाया परमार्थप्रपाया श्रद्धाविवेको नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ रा० टी०-यज्ञादे. सात्त्विकत्वहेतुभूतधर्मानुतत्वा वदन्यथात्वेऽपि हेतुभूतधर्मानाह-अश्रद्धयति । भगवच्छ्रद्धाऽभावेनेत्यर्थः । हुतमित्यादौ शास्त्रानुसारेणेति योज्यम् । भगवछ्रद्धा विना शास्त्रानुसारेणानु- हितमपि यद्धोमादिकं तदसदेवोच्यते । तप्रेत्य न च, इह च नो । ऐहिकामुमिकपुमर्थप्रदं नेत्यर्थः । अतो भगवच्छ्रद्धाभक्त्यादिपूर्वकमेवानुष्ठितहोमादीनि इहामुत्रफलपदानीवि श्रद्धव प्रयोजिकेति सेव त्रिविधा भवति श्रद्धेत्यादिना प्राधान्येनोनिवि भाव. । वस्तुवस्तु श्रद्धाऽभावे शास्त्रानुसारित्वमेव नेवि ज्ञेयम्॥२८॥ इति श्रीगीतासंग्रहे राघवेन्द्रयविश्वे सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ।। । - [अ० १८० १] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता अथ अष्टादशोऽध्यायः। अर्जुन उवाच-संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिपूदन ॥१॥ तदी-अभेदानीमलसानामल्पबुद्धीनां मुमुक्षुगायेकेनैवाध्यायेन सम्परज्ञातेन सर्वगीताध्या- यार्थागतये सर्वगीतार्थ संक्षिप्य वक्तुमयमध्याय आरभ्यते । तत्र पूर्वाध्यायान्ते " कर्म चैव तदीयं सदित्येवाभिधीयते" इत्यनेन परनामार्थस्यैव कर्मणः सत्त्वमुक्त; तेन कर्मफलस्पैव त्यागो न तु कर्मण इति सूचितम्, 'सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्' इत्यनेन द्वादोऽध्यायेऽपि कर्मफलस्यैव त्याग उक्तः । पञ्चमे तु 'सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते मुखं वशी' इत्पने कर्मसंन्यास उक्तः । एवं सर्वकर्मसंन्यास फलमानत्यागेन कर्मानुष्ठानं च परस्परविरुदं मुमुक्षपे सर्पको भक्तवत्सलो भगवान्कथमुपदिशेत् । तस्मात्संन्यासत्यागयोः स्वरूपैयं भेदो वेति संदेहेन तयोस्तच बुभुत्सयाऽर्जुन उवाच-संन्यासस्येति । महाबाहो केशिनिपूदनेति संयोधनाभ्यां शत्रुसंहारा महान्तौ वाहू यस्य स तथा । दुर्जपमहामुरस्य केशिनः संहारकस्त्वं भक्तस्य ममापि शत्रूनाशयिष्यसीति सूचितम् । हे हपीके शेत्यनेन सन्द्रिपेश ममान्तःसर्वसंशयनिवारणक्षपेदानीमिमं (मे) संशयं छिन्धी- त्याइ-संन्यासस्य । संन्यासशब्दार्थस्य तत्त्वं स्वरूपंयाथात्म्यं वेदितुमिच्छामि । त्यागस्य च तत्त्वं स्वरूपयाथात्म्यं पृथग्वेदितुमिच्छामि । अत्र 'वेदान्तविज्ञानमुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्ध- सत्वाः । ते ब्रह्मलोके तु परान्तकाले परामृतात् परिमुच्यन्ति सर्वे । 'न कर्मणा न मजया न धनेन त्यागेनैकेनामृतत्वमानशुः' इत्यादिश्रुतिः संन्यासस्त्यागच मोक्षसाधनतया विहितः । तथा “ सर्व- कर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी" । "सर्वकर्मफलत्यागं वतः कुरु यतात्मवान्" इति पूर्व भवता- ऽपि द्वौ विहितौ । किमेती संन्यासत्यागशब्दौ भिन्नार्यों ? उतैका ? यदि भिन्ना तर्हि पृथक्त्वेन वक्तव्यौ । यद्येकाओं तहि तदवान्तरभेदनिमित्तं वक्तव्यम् । यथाऽहमसंदिग्ध तत्स्वरूपं जानीयां तथा विविच्य बृहीत्यभिमायः ॥ १॥ प० टी०-पूर्वाध्याये श्रद्धाविध्येनाऽऽहारयज्ञतपोदानविध्येन च कर्मिणां त्रैविध्यमुक्तं सात्त्विका नामादानाय राजसतामसानां च हानाय । इदानी तुसंन्यासविष्यकथनेन संन्यासिनामपि वैविध्यं वक्तव्यम् । यत्र तत्त्ववोधानन्तरं यः फलभूतः सर्वकर्मसंन्यास: स चतुर्दशेऽध्याये गुणातीतत्वेन व्याख्या- तत्वान्न सात्त्विकराजसवामसभेदमइति । योऽपि तत्त्ववोधात्प्राक् तदर्थं सर्वकर्मसंन्यासस्तत्त्वयुमुत्सया वेदान्तवाक्यविचाराय भवति सोऽपि "गुण्यविषया वेदा निम्नैगुण्यो भवार्जुन " इत्यादिना निर्गुणत्वेन व्याख्यात. । यस्त्वनुत्पन्नतत्वोधानामनुत्पन्नतत्त्वबुभुत्सूनाच कर्मसंन्यास: "ससंन्यासी च योगी २" इत्या- दिना गौणो व्याख्यावस्तस्य विध्यसंभवात्तद्विशेष बुमुत्सुः अर्जुन उवाच-संन्यासस्यति । अविदुषामनुः पनात विविदिपाणा च कर्माधिकृतानामेव किंचित्कर्मपरिग्रहेण किंचित्कर्मपरित्यागो यः स त्याशिगुणयोगात संन्यासशब्देनोच्यते । एतादृशस्यान्त,करणशुद्धयर्थमविद्वत्कर्माधिकारिककस्य संन्यासस्य केनचिद्रूपेण कर्म- त्यागस्य तत्त्वं स्वरूपं पृथक् सात्त्विकराजसतामसभेदेन वेदितुमिच्छामि । त्यागस्य च तत्त्वं वेदितुमिच्छामि । किं संन्यासत्यापशब्दो घटपटशब्दाविव भिन्नजातीयायौँ किं वा प्राझणपरिमाजमशब्दाविवेकजातीया । यद्याद्यस्तहि त्यागस्य तत्त्व संन्यासात्पृथक् वेदितुमिच्छामि । यदि द्वितीयस्ववान्चरोपाधिभेदमानं वक- श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ ..] व्यम् । एकव्याख्यानेनवोभयं व्याख्यातं भविष्यति । महावाहो केशिनिपूदनति संवोधनाम्या बाह्योपदव- निवारणस्वरूपयोग्यताफलोपधाने प्रदर्शिते । हृषीकेशेत्यन्तरुपद्रवनिवारणसामर्थ्यमिति भेदः । अत्यनुरा- गात्संबोधनत्रयम् । अत्रार्जुनस्य द्वौ प्रश्नो कर्माधिकारिकर्तृकत्वेन पूर्वोक्तयज्ञादिसाधम्र्येण संन्यासशब्द- प्रतिपाद्यत्वेन च गुणातीतसंन्यासद्वयसाधण वैगुण्यसंभवासंभवाभ्या संशयः प्रथमस्य प्रश्नस्य बीजम् । द्वितीयस्य तु संन्यासत्यागशब्दयोः पर्यायत्वात् कर्मफलत्यागरूपेण च वैलक्षण्योक्तेः संशयः बीजम् ॥१॥ शं० टी०-सात्त्विक्या श्रद्धया समन्वितस्य सात्त्विकर्यज्ञतपोदानादिभिः परिशुद्धात्मन एव ब्राह्मणादे नाधिकार इति सूचयितुं श्रद्धया यज्ञतपोदानादीनां हेयत्वोपादेयत्वविज्ञानाय तेपा सात्त्विकत्वा- दिभेदं च विभज्य सम्यग्दर्शयित्वाऽधुनात्यागसंन्यासशब्दयोरेकार्यत्वं काम्यनिपिद्धयोरेव त्याज्यत्वं नित्याना तु यज्ञदानादीनां मियमेन कर्तव्यत्वं त्यागस्य सात्त्विकत्वादिभेदं नैष्कर्म्यसिद्धिलक्षणज्ञानस्य कर्मणश्च कर्तुश्च बुद्धधृतेश्च सुखस्य च सात्त्विकत्वं राजसत्वं तामसत्वं च ब्राह्मणादीना कर्माणि च : प्रसन्नान्त.. करणस्य ज्ञानं तद्वती यतेनिनिष्ठां च परमात्मस्वरूपवेदनप्रकार ब्रह्मप्राप्तिं चैवमादिकं सर्वस्य गीताशास्त्रस्य सर्वोपनिपदा चार्थ सबै संगृहँकत्र प्रतिपादयितुमष्टादशाध्याय आरभ्यते । वत्रादौ 'माये सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा इति, ये तु सर्वाणि कर्माणि माय संन्यस्य मत्पराः, इति, 'संन्यासयोगयुक्तात्मा' इति च 'त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्' इति, 'सर्वकर्मफलत्यागम्' इति च तत्र तत्र कर्मसंन्यासकर्मफलत्यागौ प्रतिपा- दितौ । फर्मफलत्यागेन कर्मानुष्ठानं कर्मसंन्यासं चोक्तं स्मृत्वा एकस्मिन्नेवाश्रमे नयोरनुष्ठानानुपपत्ति मन्यमानस्तदनुष्ठानप्रकारं ज्ञातुमिच्छुरर्जुन उवाच- -संन्यासस्येति । संन्यासस्य संन्यास शब्दार्थस्य सा- गस्य त्यागशब्दार्थस्य च, च: समुच्चयार्थः । पृथग्विभज्य तत्त्व याथायें मिश्चितमर्थं त्वत्तो वेदितुमिच्छामि । मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्येति, योगसन्यस्तकर्माणमिति, सर्वकर्मफलत्यागमिति च तत्र तत्र त्वयोक्तयोः संन्यासत्यागशब्दयोः प्रत्येकमर्थविशेष विज्ञातुमिच्छामि । हे केशिनिपूदन केशिनामानं दैत्यं निपूदितया- निति हे केशिनिपूदनेविसंघुद्धिः । गृहमेधिविषये यथा ब्रह्मचर्यशब्दस्य यथा वाऽहिंसाशब्दस्य चार्थविशेपस्तथा संन्यासशब्दस्य त्यागशब्दस्य चार्थविशेषो वक्तव्य इत्यर्थ. ॥१॥ श्री० टी०-न्यासत्यागविभागेन सर्वगीवार्थसंग्रहम् ॥ सष्टमष्टादशे प्राह परमार्थविनिर्णये ॥ १ ॥ अत्र च सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । संन्यासयोगयुक्तात्मा ' इत्यादिपु कर्म- 'संन्यास उपदिष्टः, तथा · त्यक्त्वा फर्मफलासझं नित्यतृतो निराश्रयः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ।।' इत्यादिषु च फलमानत्यागेन कर्मानुष्ठानमुपदिष्टम् । न च परस्पर विरुद्ध सर्वज्ञः परमका- रुणिको भगवानुपदिशेत् । अतः कर्मसंन्यासस्य तदनुष्ठानस्य चाविरोधप्रकारं भुत्सुरर्जुन उवाच-संन्या- सस्पेति । भो हृषीकेदा सर्वेन्द्रियनियामक हे केशिनिपूवन केशिनानो हि महतो हयातेदत्यस्य युद्धे मुस ज्यादाय भक्षयितुमागच्छतोऽत्यन्तं व्याते मुसे वामबाहुं प्रवेश्य तरक्षणमेव विश्रद्धेन तेनेव, बाहुना फर्कटिकाफलवत्तं विदार्य निपूदितवान् । अत एव हे महाबाहो इति संबोधनम् । संन्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथग्विवेकेन वेवितुमिच्यामि ॥४॥ स० टी०-असण्डानन्दाधि निगमशिरसा भावविषयं मुनीन्द्रराराध्यं परमपदमीशानमालम् ।। विशु- द्वमा सहमत्या सपदि सुजनै. प्राप्यममृत मुकुन्दं वन्देऽहं भ्रमतिमिरविध्वंसिपरणम् ॥ १॥ शरण्यं मुस्वार्थ सनकमुरासदिदि धूत महायोगेशानं सुरनरजगद्धेतुममलम् ॥ चिदानन्दाकार सम्लरससारं हरिपदं सदा स्मारं स्मारं भवनलपिपारं सुटलये ॥ २॥ प्राविक्षिप्तवया प्रोकं विस्तरेण यतस्ततः ॥ शास्त्रार्यमुपसंहृत्याधुना सक्षेपतोऽखिलम् ॥ ३ ॥ अनायासेन योभार्थमभिधातुमुपमः ॥ गीताशास्त्रस्य .
भा० टी०- [२० १८ श्लोक १] तत्वप्रकाशिकाघाटटीकोपेता सर्वस्याध्यायेऽस्मिन्नर्थसंग्रहः ॥ ४ ॥ वेदार्थस्य च सर्वस्य वतन्योऽस्वीत्यतोऽर्जुनः ॥ श्रद्धाविभ्यतः पूर्वा- ध्याये यज्ञादिकर्मणाम् ।। ५ ।। त्रैविध्यमुक्तमाकये संन्यासेऽप्यस्ति संभवः ।। त्रविध्यस्यति जिज्ञासुरु- वाच श्रीहरि प्रति ॥ ६ ॥ कर्माधिकारिणामेव किंचित्कर्मपरिप्रहात् ॥ किंचित्कर्मपरित्यागस्त्यागाशगु- गयोगतः ॥ ७ ॥ संन्यासशदतः प्रोक्तस्तस्य चित्तविशुद्धये ॥ अविद्वत्त॒कस्यापि संन्यासस्य यथार्थतः 11८1 पृथक्त्वरूपमिच्छामि वेदितुं गुणभेदतः ॥ स्यागस्यापि स्वरूपं च सम्यगिच्छामि वेदितुम् ॥९॥ संन्यासत्यागशब्दो किं भिन्नार्थो वैकवाचको ।। आद्यश्चेत्तर्हि संन्यासातत्त्वं त्यागस्य पृथक •॥१०॥ इच्छामि योद्धमन्यश्चेदेकेनोभयनिर्णयम् ॥ द्वाभ्या संवोधनाभ्यां च वाह्योपद्रववारणे ॥११॥ सामर्थ्य दर्शयित्वान्तर्गतदोपनिवारणे ।। हृषीकेशेति सामर्थ भक्तानामिति दर्शिवम् ॥ २२ ॥ हरायत्य- नुरागाद्वा ज्ञेय संवोधनत्रयम् ॥ १३ ॥ १ ॥ -नम: समाय सोमाय मसााय मखारये ॥ कृष्णायाकृष्णरूपाय विष्णवे शंभवे नमः ॥ १ ॥ पूर्वाध्यायैर्विस्तरेणेतस्ततो विक्षिप्ततयो कमर्थमुपनिषत्सु चेतस्ततो विस्तृतमथै सुखप्रतिपत्तये उपसंहृत्य वक्तुमयमध्याय आरभ्यते । अतीताध्यायेक्तस्य सर्ववेदार्थस्यास्मिन्नध्यायेऽवगम्यमानत्वात् । अर्जुनस्तु संन्यासत्यागशब्दार्थयोरेव विशेष बुभुत्सुरुवाच-संन्यासस्येति । संन्यासस्य संन्यासशब्दार्थस्य त्यागस्य च त्यागशब्दार्थस्य च पृथगन्योन्यविभागतस्तत्वं याथाम्यं वेदितुं ज्ञातुमिच्छामि । हे महावाहो इति संवोधयन् तव याहुतो जातः क्षत्रियः महावाहुभिरिसरैर्वाह्वादिसाध्ये कर्मण्यधिकृतरक्षश्च कृतस्य सं- न्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथग्वैदितुमिच्छामीति ध्वनयति । सर्वेन्द्रियनियन्तुरन्तयामिणः सर्वक्षस्य मद- भिप्रायानुसारेणैतत् कथनं सुकरमिति द्यावयन्नाह हृषीकेशेति । स्वजनसुखार्थे केश्यादिदुष्टनिपूनस्य तव स्वभक्तस्य ममाप्यज्ञाननिषदनं युक्तमेवेति सूचयन्संयोधयति-केशिनिपूति ॥ १ ॥ ५० टी०-अन्तर्यामिस्वरूपेण गुरुणा येन दर्शितम् । निजस्वरूपं तं वन्दे गोविन्दमजमद्वयम् ।। १ ।। पूर्व पश्चिमाध्याये । सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य' इति तथा ' संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्को मामुपैष्यसि । इत्यादिवाक्यैः कर्मसंन्यासः प्रशंसितोऽनन्तरं सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुर्वित्यादिना फलमानत्यागेन कर्मानु- छानमुपदिष्टम् । तत्परस्परविरुद्धमिति संदेहे तयोस्तत्त्वं जिज्ञासुरर्जुन: पुन: पृच्छति स्म-संन्यासस्येति । भो हपीकेश सन्द्रियेश स्वामिन् संन्यासस्य फलत्यागस्य च तत्त्वं रहस्यं पृथग्वेदितुं पृथक्प्रकारेण ज्ञातुमिच्छामि । केशिनानो हयाश्तेदै त्यस्य युद्धे वर्वमानवामवाहुप्रसारप्रवेशनेन से निपूदितवान् नाशित- धानत एव महानाहो इति संवुद्धिः । केश्यादिमहादैत्यदारणसमर्थस्य तवास्मत्संदेहापाकरणे कियाना- यास इत्यर्थः ॥ १॥ रा० टी०-पूर्वाध्यायेषु सर्वेषु 'गुण्यविपया वेदा' इत्यादिना यत्पुमर्थहेतुज्ञानसाधनं विप्रकीर्णतयोक्तं तदिह मन्दाना बुद्धपारोहाय संक्षिप्य निरूप्यते । तथा चतुर्दशाध्यायोक्त निगुणकार्य चोच्यते । संन्या- सश्चैव योगश्चेत्यादिना पञ्चमादौ संन्यासस्य त्यागाच्छान्तिरनन्तरमिति द्वादशे त्यागस्य च पुमर्थहेतुत्वमु- कम् । तयोः स्वरूपनिर्णयाय पृच्छति-संन्यासस्येति । हे हृषीकेश संपन्द्रियस्वामिन् । फेशिनामकासुर मर्दन । संन्यासस्य त्यागस्य च पृथक् तत्त्वं स्वरूपं वेदितुं ज्ञातुमिच्छामि । द्वयोरपि शब्दयोरापावतोऽयम्य- प्रतीतेरिति भावः ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच-काम्यांनां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः॥ . सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥ , - . ११६४ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० २.] तटी-अर्थतयोः स्वरूपैक्यं यथा स्यात्तथा वक्तुं तावदस्मिन्विपये मतान्तराणि दर्शयन् श्रीभगवानुवाच-काम्यानामिति । “स्वर्गकामो यजेत । पुत्रकामो यजेत । वायव्यं चेत- मालमेत भूतिकामः " इत्यादिभिर्वात्यैः सकाममधिकृत्य चिहितानां पशुयागपुत्रेष्टयादीनां कर्मणां न्यासं त्यागमनुष्ठानं संन्यासं संन्यासशब्दार्थ कवयः केचित्पण्डिता विदुर्जानन्ति । तथाऽऽह मनु:- "मोक्षार्थी न प्रवर्तेत वत्र काम्यनिपिद्धयोः । नित्यनैमित्तिके कुर्यात्मत्यवायजिहासया । " इति नित्यनैमित्तिकानामनुष्ठीयमानानां सर्वेषां कर्मणां फलत्यागं त्यागशब्दार्थ पाहुविचक्षणा विवेकिनः । फलत्यागेनापि त्यागशब्दस्य मुख्यार्थत्वात् । ननु " अहरहः सन्ध्यामुपासीत । यावज्जीवमग्निहोत्रं जुहोति " इत्यादिषु फलश्रवणाभावायेषां फलमेव नास्ति कथं तत्यागवचनमिति चेन्न " धर्मेण पापमपनुदति । कर्मणा पितृलोकः" इत्यादिश्रुतिषु श्रवणात तत्त्यागस्य संभवात् । किंच “ अवि. द्यया मृत्यु तीत्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते " इति श्रुतौ अविद्याशब्दनिर्दिष्टस्ववर्णाश्रमोचितकर्मणो मृत्यु- शब्दनिर्दिष्टममादतरणोपायत्वरूपफलस्यापि सत्त्वात् । " स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नरः" इति भवता वक्ष्यमाणत्वाच । तदत्यागे दोपाभावात् । काम्यकर्मणां तु " गतागतं कामकामा लभन्ते " इति संसरणहेतुत्वाभिधानान मृत्युतरणोपायसिद्धिहेतृत्वसंभावनाऽपीत्यलं विस्तरेण ॥२॥ म०टी०-तत्रान्तिमस्य सूचीकटाइन्यायेन निराकरणायोत्तरम्-काम्यानामिति । काम्याना फलका- मनया चोदितानामन्त,करणशुद्धाचनुपयुक्ताना कर्मणामिष्टिपशुसोमादीना न्यासं त्यागं संन्यासं विदुर्जा- नन्ति कवयः सूक्ष्मदर्शिन. केचित् । 'मेतं वेदानुवंचनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति यज्ञेन दानेन वपसाऽनाश- केन ' इति वाक्येन वेदानुवचनशब्दोपलक्षितस्य ब्रह्मचारिधर्मस्य यज्ञदानशब्दाभ्यामुपलक्षितस्य गृहस्थ- धर्मस्य तपोऽनाशकशब्दाभ्यामुपलक्षितस्य वानप्रस्थधर्मस्य नित्यस्य नित्येहितेन पापक्षयेण द्वारेणात्मज्ञा- नार्थत्वं बोध्यते । न च विनियोगवैयध्यै 'ज्ञानमुत्पद्यते पुंसा क्षयात्पापस्य कर्मण.' इत्यनेनैव लब्धत्वा- दिति वाच्यम् । विनियोगाभावे हि सत्यपि नित्यकर्मानुष्ठाने ज्ञानं स्याद्वा न वा स्यात् , सति तु विनियोगे ज्ञानमवश्यं भवेदेवेति नियमार्थत्वात् । तस्मानित्यकर्मणामेव वेदने विविदिपाया वा विनियोगात् सत्त्वशु- द्धिविविदिपोत्पत्तिपूर्वकवेदनार्थिना नित्यान्येव कर्माणि भगवदर्पणबुद्धयाऽनुष्ठेयानि । काम्यानि तु सर्वाणि सफलानि परित्याज्यानात्येकं मतम् । अपरं मतं सर्वकर्मफलत्याग प्राहुस्त्याग विचक्षणा., सर्वेपा काम्या- ना च प्रतिप्रदोतफलत्यागं सत्त्वशुद्धपर्थितया विविदिपासंयोगेनानुष्ठानं विचक्षणा विचारकुशलास्त्यागं प्रानुः । 'सादिरो यूपो भवति' 'सादिरं वीर्यकामस्य न्यूपं करोति' इत्यत्र यकस्य खादिरत्वस्य ऋतुप्रकरण- पाठात् फलसंयोगाच क्रत्वर्थत्वं पुरुषार्थत्वं च प्रमाणभेदात् यथाऽग्निहोनेष्टिपशुसोमाना सर्वेषामपि शतप. थपठिताना चोत्पतिविधिसिद्धाना तत्तत्फलसंयोग प्रत्येकवाक्येन विविदिपासयोगश्च यज्ञादिवास्येन क्रियत इत्युपपन्नम् "एकस्य तुभयत्वे संयोगपृथक्त्वम्' इति न्यायात् । गदुक्तं सक्षेपशारीरफे-यझेनेत्यादिवाक्यं शतप- विहित कर्मन्दं गृहीत्वा स्वोत्पत्त्याम्नानसिद्धं पुरुपविविदिपामानसाध्ये युनक्ति ।। इति । तस्मात्काम्यान्यपि फलाभिसंथिममत्वाऽन्तःकरणशुद्धये कर्वव्यानि । न ह्यग्निहोत्रादिकर्मणा स्वत. काम्यत्वनित्यत्वरूपो विशेपो- ऽस्ति । पुरुषाभिप्रायभेदश्वस्तु विशेष फलाभिसन्धित्यागे कुवस्त्यः । नित्यकर्मगा च प्रातिस्विफलसद्भावम् 'अनिष्टमिष्टं मिश्रं च विविध कर्मण. फलम् । इत्यत्र वक्ष्यति । नित्यानामेव विविदिपासयोगेन काम्याना कर्मणा फलेन सह स्वरूपतोऽपि परित्यागः पूर्वार्धस्यार्थ. । कान्याना .नित्याना प संयोगपृथात्वेन विविदिपासंयोगवदर्य स्वरूपतोऽनुष्ठानेऽपि प्रातिस्विफफ्लाभिसंधिमापरित्याग इत्युत्तरार्धस्यार्थ. । वदेवदा- दुर्दिकरते.- वेदानुवचनादीनामे साम्यमानजन्मने । उमेतमिति वास्येन नित्याना वक्ष्यते विधि. ॥ यद्वा - [अ० १८ श्लो० २] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेवा विविदिपार्थत्यं सर्वेपामपि कर्मणाम् । तमेवमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः' इति । तदेवं सफल काम्य- फर्मत्यागः संन्यासशब्दार्थः । सर्वेपामपि कर्मणां फलामिसंधित्यागस्त्यागशददार्थ इवि न घटपटशब्दयोरिख संन्यासत्यागशब्दयोनिजातीयार्थत्वं कि त्वन्तःकरणसुद्धधर्थकर्मानुष्ठाने फलाभिसंधित्याग इत्येक एवार्थ उभयोरिवि निर्णीच एक. प्रश्नोऽर्जुनस्य ॥२॥ शं० टी०-एतादृशमर्जुनप्रक्षतात्पर्य विज्ञाय "संन्यासयोगाद्यतय इति" " त्यागेनैके अमृतत्वम् । इति श्रवणात् मयेदं संन्यस्तं त्यक्तमिति संन्यासत्यागशब्दयोलोंके वेदे च विसर्ग एक एवार्यो न त्वर्थान्तर- मस्ति, वथापि गृहिविपये तयोर केचिदन्यथा वर्णयन्ति वेषां मवमिमं वक्ष्यामि शृण्विति श्रीभगवानुवाच-' काम्यानामिति । पुत्रकामो यजेत, स्वर्गकामो यजेत, पशुकामो यजेतेति एवं कामोपवन्धेन विहितानां काम्यानां ज्योतिष्टोमादिकर्मणां न्यासं परित्यागमेव गृहस्थस्य संन्यासमिति केचित्कयो विद्वांसो विदु. आनन्ति । काम्यकर्मपरित्याग एव मुमुक्षोगहिणः संन्यासं इति वदन्तीत्यर्थः । केचित्पदं सर्वनान्येति । केचिद्विचक्षणाः पण्डिताः सर्वकर्मफलत्यागं सर्वेषा काम्यानामफाम्याना नित्यनैमित्तिकानां च कर्मणा फलत्यागं फलमात्रस्य परित्यागं त्यागं संन्यास प्राहुः । कामेन वाऽकामेन वा विपिना कर्तव्यत्वेन प्राप्तानि वैदिकानि कर्माण्यनुष्टायेश्वरार्पणबुद्धधा वस्फलपरित्याग एवं गृहिणोऽधिकृवस्य संन्यासो न तु कर्मत्याग इति केचिद्वदन्तीत्यर्थः । ननु य: पशुकाम: स्यात्स एतं प्राजापत्यमर्ज तूवरमालभेत स वा एतस्मै प्रजा पशून् प्रअनयति" इति काम्यफर्मणां यथा फलं यूयते, न तथा “ अहरहा संध्यामुपासीव । सायं प्रातर- ग्निहोत्रं जुहोति । अहरहर्यजमानः स्वयमेवाग्निहोत्रं जुहोवि " इत्यादिपु नित्याना कर्मणां फलं श्रूयते । कय- मविद्यमानस्य फलस्य त्याग उपपद्यते ब्रह्मचारिणो भार्यात्यागवदिति चेन 'कर्मणा पितृलोको' इति धर्मेण पापमपनुदति । इति 'सर्व पते पुण्यलोका भवन्ति' इति 'अग्नीन्हुत्वा विधानेन यत्पुण्यं फलमाप्नुयात्' इति नित्यानामपि फलश्रवणात् । 'अनिष्टमिष्टं मित्रं च इति भगवतापि नित्यानां फलमुच्यते, ततोऽस्त्येव नित्या- नामपि फलमन्यथा फलस्यागविधानायोगाचस्मायुतमेवोकं 'सर्वकर्मफलत्याग पाहुस्त्याग विचक्षणा, इति । वत: सिद्धं गृहिणां कर्मफलत्याग एव त्यागः संन्यासो न तु सर्वकर्मत्याग इति ॥ २ ॥ श्री०टी०-तत्रोचरं श्रीभगवानुवाच काम्पानामिति । " पुत्रकामो यजेत । स्वर्गकामो यजेत । इत्येवमादिकामोपबन्धेन विहिवानां काम्याना कर्मणां न्यासं परित्यागं संन्यासं कवयो विदु:--सम्यक्फलैः सह सर्वकर्मणामपि न्यासं संन्यासं पण्डिवा विदुः जानन्तीत्यर्थः । सर्वेपा काम्याना नित्यनैमित्तिकानां च कर्मणां फलमात्रत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा निपुणाः न तु स्वरूपतः कर्मत्यागन् । ननु नित्यनैमित्ति- कानां फलावणादविद्यमानस्य कथं त्यागः स्यात् ? नहि बन्ध्यायाः पुत्रत्यागः संभवति । उच्यते, यद्यपि स्वर्गकामः पशुकाम इत्यादिवत् " अहरह: संध्यामुपासीत । यावत्रीवमग्निहोत्रं सहोवि " इत्यादिषु फलविशेपो न श्रूयते तथाप्यपुरुषार्थे व्यापार प्रेक्षावन्तं प्रवर्वयितुमशक्नुवन् विधिविश्वजिता यजेतेत्या- दिष्विर सामान्यतः किमपि फलमाक्षिपत्येव । नचावीवगुरुमवश्रद्धया स्वसिद्धिरेवं विधेः प्रयोजन- मिति मन्तव्यं, पुरुषप्रवृत्त्यनुपपचेर्दुष्परिहत्त्वात् । श्रूयते च नित्यादिष्वपि फलम् " सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ॥ इति " कर्मणा पितृलोक: " इति ॥ धर्मेण पापमपनुदति " इत्येवमादिपु, तस्माद्युक्तमुकम् 'सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुरत्यागं विचक्षणा.' इति । ननु फलत्यागेन पुनरपि निष्फलेषु कर्मस्वरवृत्तिरेव स्यात्तन्न सर्वेषामपि कर्मणा संयोगपृथक्त्वेन विविदिषार्थवया विनियोगात् । वाच श्रुति:-" वमेवमा. स्मानं वेदानुक्चनेन ब्राह्मणा विविदिपन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन । इति । अत. प्रतिपदोक्त सबै फलं वन्धकत्वेन त्यक्त्वा विविदिपार्थं सर्वकर्मानुष्ठानं पटत एष । विविदिपा च नित्यानित्यवस्तुविवेफेन 4 । . योमजगवद्गीता [अ० १८ शो०२] निवृत्तदेहाभिमानतया बुद्धेः प्रत्यक्प्रवणता । तावत्पर्यन्तं च सत्वशुद्धयर्थे ज्ञानाविरुद्धं यथोचितमाव. श्यकं कर्म कुर्वतस्तत्फलत्याग एव कर्मत्यागो नाम न स्वरूपेण । क्याच श्रुतिः "कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजी- विपेच्छतं समाः" इति । ततः परं तु सर्वकर्मनिवृत्तिः स्वत एव भवति । तदुक्तं नैष्कर्म्यसिद्धौ- प्रत्यक्प्रवा णतां बुद्धः कर्माण्युत्पाद्य शुद्धितः । कृतार्थान्यस्तमायान्ति प्रावृडन्ते घना इव ॥' इति । उक्तं च भगवता 'यस्त्वात्मरतिरेव स्थादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव व संतुएस्तस्य कार्य न विद्यते ॥' इति । वसिष्ठेन चौकम् न कर्माणि त्यजेद्योगी कर्मभिात्यज्यते हासौ । कर्मणो मूलभूतस्य संकल्पस्यैव नाशतः 11' इति । ज्ञाननिष्ठाविक्षेपकत्वमालक्ष्य त्यजेता । तदुक्तं भगवता भागवते- तावत्कर्माणि कुर्वीत न निविद्येत यावता । मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥ ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मजक्तो वाऽनपेक्षकः । सलिङ्गानाश्रमांस्त्यवत्वा चरेदविधिगोचरः ॥' इत्यादि । अलमतिप्रसङ्गेन प्रकृतमनुसरामः ॥२॥ स० टी०-सूचीकाहनीत्यादौ वत्रान्त्यस्योत्तरं हरिः॥ उवाच शृणु काम्याना चोदिताना फलेप्सया ॥१॥ शुद्धावनुपयुक्तानां पशुसोमादिरूपिणाम् ।। त्यागं जानन्ति संन्यास कवयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥२॥ अन्ये. ऽनुष्टीयमानानां सर्वेषामेव कर्मणाम् ॥ धीशुद्धयर्थं फलत्यागं प्राहुस्त्यागं विदा वराः ।। ३ ।। संयोगस्य पृथक्त्वेन सर्वेषामपि कर्मणाम् ॥ तमेतमितिवाक्येन युभुत्साया नियोगतः ॥ ४ ॥ वेदानुवचनादीनामका- स्यज्ञानजन्मने ॥ तमेतमितिवाक्येन नित्याना वक्ष्यते विधिः ॥ ५ ॥ यदा विविदिपार्थत्व सर्वेषामपि कर्मणाम् ॥ तमेतमितिवाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः ॥ ६ ।। इत्युक्तं वार्तिके तस्मादेवं सिद्धं विभागशः ॥ काम्यकर्मपरित्यागः संन्यास इति शुदितः ॥ ७ ॥'फलाभिसंधिसंत्यागरत्यागशब्दार्थको मतः ॥धीशुद्ध-य- र्थमनुष्ठाने कर्मणा फलवर्जनम् ॥ ८ ॥ भयोरेक एवार्थः संन्यासत्यागश्दयोः ॥९॥२॥ भा०टी०-एवं पृष्टो ज्ञावार्जुनाभिप्रायः सर्वेष्वध्यायेपु वत्र तत्र निर्दिष्टौ संन्यासत्यागशब्दौ न विविक्ता- धाविन्यतः प्रश्नौचित्यं मत्वा निर्णचाय श्रीभगवानुवाच काम्यानामिति । काम्यानां स्वर्गादिकामनाप्रयुक्ता- नामश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं परित्यागं संन्यासं संन्यासशब्दार्थमनुष्ठेयत्वेन प्राप्तानामनुष्ठानं कवयः पण्डिताः केचिद्विदुः विजानन्ति । नित्यनैमित्तिकानामनुष्टीयमानानां सर्वकर्मणामात्मसंवन्धितया प्राप्तस्य. फलस्य परित्यागः सर्वकर्मफलत्याग: वं त्यागं त्यागशब्दार्थ विचक्षणाः निपुणाः पण्डिताः कथयन्ति । ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलाभावात् वध्यापुत्रस्य साग इव तेपा फलत्यागासंभवात् उक्तस्त्यागश- दार्थो न युक्त इति चेदुच्यते-यद्यपि स्वर्गकाम: पशुकाम इत्यादिवत्संध्यामुपासीत यावजीवममिहोत्र जुदोतीत्यादिषु फलविशेपो न श्रूयते वयाप्यपुरुषार्थे च्यापारे प्रेक्षामन्तं प्रवर्षयितुमशक्नुवन् विधिविश्वजि- न्यायेन फिमपि फलमाक्षिपत्येव । श्रूयवे च नित्यादिपु फलम् "सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति । कर्मणा पितृ- लोकः । धर्मेण पापमपनुदति " इत्येवमादिषु ! वक्ष्यति च भगवान् अनिष्टामिष्टं मिश्रं च त्रिविधं फर्मणः फटम् । भक्त्यत्यागिना प्रेत्य न तु संन्यासिनां फचित्इति । तस्मायुक्तमुक्तं 'सर्वकर्मफलत्याग प्राहुस्त्यागं विचक्षणा' इति । नवमपि निष्फलेषु कर्मस्वप्रकृतिरेव प्रातेदि वाच्यं, सपामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्येन - " वमेतमात्मानं वेदानुवचनेन प्राह्मणा विविदिपन्ति यझेन दानेन वपसाऽनाशकेन " इतिश्रुत्या विविदि- पावया विनियोगात् । तदुक्कं सुरेश्वराचार्यः । वेदानुवचनादीनामेश्याम्यज्ञानजन्मने । वमेतमितिवाक्येने नित्याना वक्ष्यवे विधिः । यद्वा विविदिपार्थत्वं सर्वेषामपि कर्मणाम् । वमेदमितिवाक्येन संयोगस्य पृथक्त्यत: इवि । तथाच चतुर्थाध्यापस्थं पारमर्पसूत्र 'एकस्य तूमपत्वे संयोगपृथक्त्वम् । इति । 'सादिरो पो भवति । सादिरं वीर्यकामस्य यूपं मुबीत । इत्यस्य सादिरत्वस्योभयत्वे प्रत्वत्वपुरपार्थस्वरुषोभया. गले वचनद्वयेन प्रतुशेपत्वपळशेपत्वसंयोगभेदावगमान नित्यानित्यसंयोगविरोधः । वया सपा ।
" [अ० १८ लो० ३] वत्वप्रकाशिकायष्टीकोपेवा कर्मणां स्वोत्पत्तिविधिसिद्धानां प्रत्येकं वास्येन तत्तत्फलसंयोगः तमेतामतिवाक्येन विविदिपासंयोगश्च सिध्यद इति ॥ २ ॥ प० टी०-एतत्मनोत्तरं भगवानाह-काम्पानामिति । काम्यानोष्टसाधनानि ज्योतिष्टोमादीनि तेपां सम्यक फलैः सह न्यासः परित्यागस्वं कवयः पण्डिवाः संन्यासं विदुर्जानन्ति । तथा काम्यातिरिक्तानां सर्वपा कर्मणां नित्यनैमित्तिकानामवान्तरफलत्याग विचक्षणाः कुशलारत्यागं प्राहुः । अत्रैतदुक्तं भवति । नित्यान्यकरणे प्रत्यवायसाधनानि संध्यावन्दनादीनि । नैमित्तिकानि पुत्र जन्माउनुबन्धीनि जातेप्या- दीनि । प्रायश्चित्वानि. पापक्षयसाधनानि चान्द्रायणादीनि । उपासनानि सगुणब्रह्माविषयमानसव्यापा- ररूपाणि शाण्डिल्यविद्यादीनि । एतेषां नित्यादीनां वुद्धिशुद्धिः परमप्रयोजनम् , उपासनानां तु तदैका. प्रयम् "विविदिपन्ति यज्ञेन" इत्यादिश्रुतेः 'तपसा कल्मयं हन्ति' इत्यादिस्मवेध । नित्यनैमित्तिकयोपास• नानां चावान्तरफलं पितृलोकसत्यलोकप्राप्ति: "कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकाना श्रेष्ठः" इति श्रुतेः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुः ॥ २ ॥ रा०टी०-अवाप्यस्ति विवक्षाभेदेन भेदं इतिभावनोत्तरमाह-काम्यानामिति । वैकल्पिककाम्याना. ज्योतिष्टोमादीनां स्वादिफलानिच्छया विशेषणत्यागेन काम्यानां कर्मणां त्यागं नियतकाम्यानां कारी- र्यादीनां स्वरूपाकरणेन त्यागं संन्यास ज्ञानिनो विदुः जानन्ति । विचक्षणाः कुशलाः सर्वकर्मणां भाव- प्रीत्यन्यफलत्यागं त्यागशब्दार्थमाहुरित्यर्थः ॥ २ ॥ त्याज्यं दोपवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ॥ यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥३॥ त० टी०-पुनर्मतान्तरमाह-त्याज्यमिति । एके मनीपिणः सांख्याचार्या दोपक्न हिंसादोप- बरवेन बन्धकमिति हेतोः सर्व यज्ञादिकं कर्म मुमुक्षुणा त्याज्यमिति पाहुः । तत्र यज्ञदानतपाकर्म न त्याज्यमिति चापरे पण्डिताः कर्मनिष्ठाः माहुः ॥ ३॥ मटी०-अधुना द्वितीयप्रनप्रतिवचनाय संन्यासत्यागशब्दार्थस्य त्रैविध्यं निरूपयितुं तत्र विप्रतिपत्ति- माइ-त्याज्यमिति । सर्व कर्म बन्धहेतुत्वात् दोपयत् दुष्टम् । अतः कर्माधिमतरपि कर्म त्याज्यमेवेत्ये के मनीषिणः प्राहुः । यद्वा दोपयत् दोष इस यथा दोपो रागादिस्त्यज्यते तद्वत्कर्म त्याज्यमनुत्पन्नोधैरनुत्प- नविविदिपः कर्माधिकारिभिरपीत्येकः पक्षः । अत्र द्वितीयः पक्षः कर्माधिकारिभिरन्त करणशुद्धिद्वारा विवि- दिपोत्पत्यर्थ यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे मनीषिणः प्राहुः ॥ ३॥ शंटी-एवं संन्यासत्यागयोरयकत्वेऽपि मतभेदेन काग्यफर्मत्यागस्य सर्वकर्मफलत्यागस्य संन्या- सशब्दार्थत्वं प्रतिपाद्य पुनरपि त्यागशब्दस्य मतान्तरेणान्तरं वर्णयति-त्याज्यमिति । एके फेचन मनीषिणो विद्वांसः दोपवदोपो दृपणं निपेधलक्षणमस्यास्त्रीति दोपवदोपयुकं न कल भक्षयेत् । न सुरां पिवेत् ! इत्यादिशामप्रतिपिद्धं दुर्गवेोनेश्व प्रापर्क कल जभक्षणादिलक्षणं पातकं यत्तत्कर्म त्याज्यं स्यकव्यमिति प्राहुः। दोपवतर्मणस्त्याग एव त्यागो न तु काम्यानां नापि कर्मफलस्य च त्यागशब्दावस्वेपा दुर्गतिदुर्योनिप्रापकत्वाभावात्फलाभावे प्रेक्षापप्रवृत्त्यसंभवाच "यत्कर्म कुरुते तदतिपद्यते" इत्यादिश्रुति- विरोवप्रसङ्गाच । "यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेविवव्यानि इत्यदुष्कर्मणां वैदिकानां कर्तव्यत्वभवणाच । तस्मादोपत्रकर्मत्याग एव त्यागः संन्यास इति केचिद्वदन्तीत्यर्थः । यद्वा मनापिणः प्रतिक्रिविधिलक्षण- मात्मानमसङ्गचिट्टपं मन्तुं शीलं येपामस्ति ते मनीपिग: केचि पण्डिताः माख्या:-दोपपत् ॥ न हिंस्यास- श्रीमझगवद्गीता [अ० १८ श्लो. ३] र्वा भूतानि" इति प्राणिमात्रस्य हिंसानिषेधके श्रुतिवचने जापति सति 'ब्राह्मणो न हन्तव्यः' इति निषेधो बुद्धि- पूर्वकहिंसाया दोषाधिकत्ववोधनार्थ एव भवति, न तु बुद्धिपूर्विका भूतहिंसा दोपहेतुर्न कर्तव्येत्येवमयों भवति । तथात्वे त्वबुद्धिपूर्विकाया हिंसाया दोषाभावप्रसङ्गाद्विशेषविध्यनर्थत्वप्रसङ्गाच । ततो दोपाधिकत्वबोधकत्वमेव विशेपविधेरम्युपगन्तव्यम् । तेनानीपोमीयपशुहिंसायामपि बुद्धिपूर्वकत्वाद्दोपाधिकत्वमेव भवति । उभयत्रापि बुद्धिपूर्वकत्वाविशेपात्तर्बानीपोमीयं पशुमालभेतेतिविधेयर्थत्वमेव स्यादिति चेन्न । प्रकारान्तरेणार्थवत्तासिद्धेः । रागतः प्राप्तामिपसेवाया अग्नीपोमीययजनंव्याजेनावकाशनदानपरत्वाद्विधिः सार्थ एव भवति । यथा रागतः प्राप्तव्यधायस्य धर्मप्रजासंपत्त्यर्थ खियमुद्हेदित्येपविधिः कङ्गितया स्त्रीपरिग्रहविधानव्याजेनावकाशं प्रय- च्छन्नर्थवान् भवति तद्वत् । यत एवमतः 'सर्वारम्भा हिं दोपेण धूमेनाग्निरिवावृताः' इति न्यायेन सर्वमपि कर्म द्रव्यसाध्यत्वेन हिंसाप्रधानत्वादोपवदेव भवति। दोपवत्त्वेन बन्धकत्वाच्छौवें स्मात च वैदिक कर्म सर्वमपि त्याग्यमेवेवि सर्वकर्मत्यागमेव त्यागं प्राहुरित्यर्थः । ननु विहिताकरणे प्रत्यवायः स्यादिति चेन । दोपवत्क- मानुष्ठाने ततोऽधिकतरः प्रत्यवायः स्यादित्याहुः । ततः कलाभक्षणक्रियावत्सर्वस्यापि कर्मणो दोपवत्त्वेन तत्त्यागो न दोपायेति च ते मन्यन्त इत्यभिप्रायः। एवं सांख्यमतभेदेनत्यागशब्दस्यार्थभेदमुक्त्वा मीमांसकम- तभेदेनाप्यर्थभेदं सूचयितुमाह-यज्ञेति । " अकृत्वा वैदिकं नित्यं प्रत्यवायी भवेन्नरः" इति " याव- जीवमग्निहोत्रं जुहोति । इति “ कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत५ समाः" इति " सत्यं वद धर्म घर" इति "सत्यान्न प्रमदितव्यं धर्मान प्रमदितव्यम्" इत्यादिश्रुतिभिः : औतं चापि तथा स्मार्तं कर्मा- लम्ब्य वसेद्विजः। द्विहीनः पतत्येव हालम्बरहितान्धवत् ॥ इत्यादिस्मृतिभिश्च वैदिककर्मणो नित्यस्यावश्य- करणीयत्वविधानादकरणे प्रत्यवायविधानाच्च ब्राह्मणस्य यज्ञदानतप: यज्ञो दानं तप इत्येवंलक्षणं वैदिकं - कर्म न त्याज्यं न कदापि च स्यकव्यं, किंतु निरुक्तश्रुतिस्मृतिवलाद्यावजीवं कर्तव्यमेव ' एकाई जपही- नस्तु संध्याहीनो दिनत्रयम् । द्वादशाहमनग्निश्च शूद्र एव न संशयः ।। ज्यहं संध्याविरहितो द्वादशाई निरनिकः । चतुर्वेदधरो विप्रः शूद्र एष न संशयः ।। तस्मान्न लक्ष्येत्संध्यां सायं प्रात: समाहितः । उत्स- दयति यो मोहात्स याति नरकं ध्रुवम् । इति । संन्यापदमौपासनाग्निहोत्रादेरुपलक्षणम् “ वीरहा वा एप देवानां योऽनिमुद्रासयते " इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्योऽप्यग्निहोत्रादे; फर्मणः परित्यागे प्रत्ययायाधिक्य- श्रवणादाह्मणादीनां यशदानाविक वैदिकं कर्म नित्यं नियमेन कर्वव्यमेव । ननु द्रव्यसाध्यस्य यज्ञदानादेः कर्मणो हिंसावत्वेन दोपववादोपवतः कर्मणः कथमनुष्ठानमुपपद्यत इति चेदुच्यते-ग्राह्मणो न हन्तव्यः' इत्येतद्वचनं क्रोधतः प्राप्तं ग्रामणवधं दोषाधिकत्वं वदनिषेधयति, नतु धुद्धिपूर्वकहिंसामाने सर्वत्र दोपा. विकत्वं योधयति, विशेषविधैः स्वविधेयमात्र विपयत्वात् । ब्राह्मणान सर्वान् भोजयदेवदत्त न भोजयेदित्यत्र निधस्य स्वविधेयमाविषयत्वदर्शनात्ततोऽग्नीपोमीयपशुहिंसादौ दोषाधिकत्वं बोधयितुं न शक्नोति स्वविध. यमात्रोपक्षीणवाहिशेपस्य । नापि न हिस्यात्सर्वा भूतानि इत्ययं निषेधोऽपि यागीयपशुहिंसायां सामान्यतो- ऽपि दोपमासयितुं फल्पते सामान्यको विशेपत्य क्लीयस्त्वात् । अन्नं न प्रतिगृहीयात् प्राणैः कण्ठग. पि' इत्येतनिषेधापेक्षया 'यापये छोवियस्यानम्' इत्येतस्य पिधेलीयस्त्वावगमात् । बामणान् सर्वान्वारय, देवदत्तं भोजयेत्या विशेषस्य बलीयस्त्वदर्शनाच सामान्यस्य तृगगुल्मच्छेदादी सावकाशत्वाच । 'सावकाश- निरवकाशयोनिरयकासंघलीयः' इति निरवकाशस्य बलीयस्त्वस्मरणाचा तवो यागीयपशुहिंसाया: सामान्यतो विशेषतच दोपगन्धः संपादयितुं न शक्यते । चि 'मधुप च यज्ञे च पिश्ये देवे च फर्मणि । अप्रेय पश्यो दिस्या नान्यप्रेत्यत्रयीनमः' इपि अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र वा यः' इति नाभ्यो यज्ञादिभ्यो। ऽन्यय भूतान्यदिशानिवि भूहिंसानिपेधस्य यागीयव्यतिरिफहिंसाविषयत्वश्रवणानिषेधाज्याते: 'या- [अ० १८० ३] तत्वप्रकाशिकायष्टीकोना चयेच्छोनियस्वान्नं तदभावे जलं पियेत् । इविविध्युताया: श्रोत्रियान्नादनक्रियाया निर्दुष्टत्वं पारमत्वं च यथा, तया चागीयपशुहिंसाया अपि विघ्युक्ताया निर्दवं पावनत्वं चावगम्यते । तथैव श्रूयते "धर्मेण पाप. मपनुदति । तस्मादम परमं वदन्ति । वपसा कल्मषं हन्ति । ग्रामणा विविदिपन्ति यक्षेन दानेन तपसा' इति । तस्मादादणादेर्यज्ञदानादिलक्षणं नित्यं वैदिकं फर्मावश्यकमनुष्ठातव्यमेव न कदा पित्याज्यम् किंतु 'न तु काम्यं समाचरेत् । न कलत्वं भक्षयेत् । इत्यादिवचनाकाम्यं निषिद्धं चैवयमेव त्याग्यमिति काम्यनिपि. खत्याग एव त्यागो न तु कर्मफलत्यागस्त्याग इत्यपरे केचन मनीपिणो वैदिकशिरोमणयो मीमासका: प्राहु- रित्यर्थः । ननु 'संन्यासस्य मदालाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् इत्यर्जुनकृतप्रभस्य विषयो मुरयसन्यासो वा उच गौणसंन्यासो वा । आये स विद्वत्संन्यासो वा त्रिविविदिपासन्यासो वा । नाद्यः विद्वत्संन्यासस्य निरुपरिकल्पासंभवाचामसः परिकीर्तिव इति वक्ष्यमाणतामसादिभेदानुपपश्चासति विदुपः कर्मणि कर्तव्ये वत्संन्यासस्य विकल्या; स्युः नासति । तस्य कार्य न विद्यते॥ इति "नैवास्ति किंचिकतन्यम्" इति विदुपः सर्वफर्माभावश्रवणात् । ज्ञानयोगेन सास्यानामिति ब्रह्मविदा यतीना ज्ञाननिष्ठापरत्वविधानाच नास्ति विक- ल्पावकाशः । ननु यावजीवमग्निहोत्रं जुहोतीत्यादिविधिवलाद्विदुपोऽपि कर्म कर्वव्यमेवेति चेन्न, विधेमिथ्या- स्वोपपत्तेः। मायामात्रमिदं द्वैतम्' इति द्वैतस्य सर्वस्य मायामात्रत्वेन मिथ्याले सिद्धे तदन्त.पाविनः कर्मवि. धेरपि मुक्तिरजतवन्मिथ्यात्वेन वलासंभवात् स्वसिध्यात्वदशिन प्रति नियोक्तृत्वायोगात् । नहि मिथ्याभूत रजतं स्वतत्त्ववेदिनं पुरुषमादानादौ प्रवर्तयितुं शमोति । तद्वन्मिध्याभूतः कर्मविधिरपि विद्वास न प्रवर्तयितुं शलोवीत्यर्थः । न द्विवीयः । सर्वतो विरकस्य विदुपः कर्मणा साध्यमपश्यतः काम्पफर्मपरित्यागेन वा कर्मफलत्यागेन वा कर्मानुष्ठानानुपपचे. । चिचशुद्धय कर्म कर्तव्यमेवेति चेन्न । सर्ववो विरक्त्यतिरिक्तचित्तशु- द्वषन्तराभावात् । विधिवलादीश्वरप्रीत्यै कर्म कर्वव्यमेवेवि चेन्न यदहरेव विरजेचदहरेव प्रमजेत्' इति त्याग- विधेस्ततोऽपि प्रबलत्वात् । तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्वियेत यावता । मकथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न आयते ॥ जिज्ञासायां संप्रवृतो नाद्रिय कर्मचोदनाम् । इतीश्वरेणैव जिज्ञासोविध्युपेक्षाविधानात् । रेण पवर कति मुगुक्षोविरकस्य फर्मनिन्दापूर्वकं प्रवणपरत्वविधानाच । ' भामन्यमीन समारोप्य माह्मण. प्रमजेहान् ' इति विविदिपोः सर्वकर्मसंन्यासस्मरणाचतो विविदिपोरपि कर्मसंबन्धासंभवेन निरुक्तविक- रुपानामवकाश: संभवति । ततो गौण एव संन्यासो गहिनिष्ठः प्रभस्य विपयो, न तु मुख्य इति सिद्धम् । जिज्ञासिनो गौण एव सन्यास इत्यत्र प्रमाणं पूर्वोगावावचनान्येवेदि योद्धन्यम् ॥ ३ ॥ श्री. टी-अविदुप, फलत्यागमावमेव त्यागशब्दार्थो न कर्मत्याग इत्येतदेव मतान्तरनिरासेन दृढी- कर्तुं मतभेदं दर्शयति-त्याज्यमिति । दोपवद्धिसादिदोपवत्केवलं वन्षकमिति हेतोः सर्वमपि कर्म त्याज्यमि- स्येके साया: प्राहुर्मनीपिण इति । अस्यायं भावः न हिंस्यात्सर्वा भूतानीति निषेध. पुरुषस्यानहेतुहिंसेत्याह । "अग्नीपोमायं पशुमालभेत" इत्यादिप्राकरणिको विधिस्तु हिंसाया: ऋतूपकारकत्वमाह ।.अतो भिन्नविषयत्वेन सामान्यविशेषन्यायागोचरत्नाद्वाध्यापकता नास्ति । द्रव्यसाध्येषु च सर्वेष्वपि कर्मसु हिंसादे संभवात्सर्वमपि फर्म त्याज्यमेवेति । तदुक्तम् 'दृष्टवदानुअविकः स पविशुद्धिक्षयाविशययुक्त.' इति । अस्यार्थ.-उपायो ज्यो विष्टोमादिः सोऽपि दृष्टोपाययत् , गुरुपाठादनु भूयत इस्यनुश्रवो वेदस्तद्रोपित । तत्राविशुद्धिहिसा तया क्षयो विनाशः । अग्निहोत्रज्योतिष्टोमादिजन्यस्वर्गपु तारतम्यं च वर्तते । परोत्कर्षस्तु सर्वान सुखीकरोति । अपरे तु मीमासका यज्ञादिक कर्म न त्याज्यमिति प्राहु । अयं भाव. कवापि सतीय हिंसा पुरुपेणेव कर्वव्या। सा थान्योदेशेनापि कृता पुरुपत्य प्रत्यवायहेतुरेव । यथाहि विधिविधेयस्य वदुद्देशेनानुष्ठानं विधत्ते प्रयल- क्षणत्वाच्छेपत्त्वस्य न वे निधो निषेधस्य वादग्रंमपेशवे प्रातिमात्रापेक्षितत्वात् । अन्यथा । ज्ञानप्रमादा- । । .
श्रीमद्भगवदीता
[अ० १८ श्लोक ३]
दिकृते दोपाभावप्रसङ्गात् । तदेवं समानविषयत्वेन सामान्यशास्रस्य विशेपेण बाधान्नास्ति दोषवत्त्वमतो
नित्यं यज्ञादिकर्म न त्याज्यमिति । अनेन विधिनिषेधयोः समानवलता वार्यते सामान्यविशेपन्यायं संपा.
दयितुम् ॥ ३॥
स० टी०-अथ द्वितीयप्रश्नस्य परिहाराय केशवः ॥ संन्यासत्यागयोस्तत्त्वं वक्तुं त्रैविध्यमेव हि ॥ १॥
विप्रतिपत्तिमाहादौ त्याज्यमित्यादिना स्फुटम् ।। वन्धहेतुतया सर्व कर्म दुष्टमतो बुधैः ॥ २ ॥ त्याज्यमेके
बुधाः प्राहुः कर्मण्यधिकृतैरपि ॥ इत्येक मतमत्रोक्तं द्वितीयं प्राह केशवः ॥ ३॥ कर्माधिकारिभिः पुंभि-
धीशुद्धया योधलब्धये ॥ यज्ञदानवप.कर्म न त्यायमिति चापरे ॥ ॥ ३ ॥
मा० टी०-काम्यानि वयित्वा नित्यनैमित्तिकानि फलाभिसंधि विना कर्तव्यानीत्युक्तं पक्षं प्रति-
पक्षनिरासेन द्रढयितुं विप्रतिपत्तिमाह-त्याज्यमिति । दोपोऽस्यास्तीति दोपवत् बन्धहेतुत्वात् सर्वमेव
कर्म त्याज्यं त्यक्तव्यं दोषो रागादिर्यथा त्यज्यते तद्वत्त्याज्यमिति वा । एके मनीषिणो बुद्धिमन्तः पण्डिताः
सांख्यदृष्टिमाश्रिता अधिकृतैः कर्मिभिरपि सर्व कर्म त्याज्यमिति प्राहुः कथयन्ति । ननु अधिकृतानां
कर्मिणों कर्मत्यागं प्रत्यवायजनकं कथं प्राहुरिति चेत् , हिंसांदियुक्तकर्मत्याग तेपामपि प्रत्यवायाभावं तद्-
नुष्ठाने परं प्रत्यवायं चाभिप्रत्येति गृहाण । परे मीमांसकदृष्टिमाश्रिता यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यम् 'अग्नीपो.
मीय पशुमालभेत' इत्यादिविपिनोधितहिंसातिरिक्तहिंसानिपेधे 'न हिस्यात्सर्वा भूतानि इतिवास्यस्य सार्थक्या-
द्विधियोधित कर्म न प्रत्यवायावहं प्रत्युत विहितत्याग एव प्रत्यवायावह इत्यतः सर्व कर्म न त्यतव्यमिति
प्राहुः । अधिकृवान् कर्मिण एवापेक्ष्यते विकल्पा: न तु ज्ञाननिष्ठान् त्यक्तसर्वपरिग्रहान् । ज्ञानयोगेन सांख्यानां
निष्ठा मया प्रोक्तति कर्माधिकारविनिर्मुक्तान् संन्यासिनोऽपेक्ष्य । ननु फर्मयोगेन योगिनामित्यधिकृताः
फर्म कुर्वन्तः पूर्व विभक्तनिष्ठा अपि इह शास्रोपसंहारप्रकरणे यथा विचार्यन्ते तथा सांख्या अपि ज्ञान-
निष्ठा विचार्यन्ताम् । एवं च संन्यासिनोऽक्ष्य न त्वेते विकल्पा इत्युक्तमनुपपन्नमिति चेन्न । गुणाना कर्म-"नेव
किंचित्करोमि” इति कर्माण्यात्मन्यपश्यन्त इच्छादीनि च क्षेत्रवर्मत्वेनैव पश्यन्तो नियतं कर्म मोहापरित्य-
जन्ति कायझेशदुःखभयाद्वा कर्मपरित्यजन्तीति वक्तुमशस्यत्वेन तेषां मोहदुःसनिमित्तत्यागानुपपत्तेः,
'सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुसं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न, कारयन्' इत्यादिभिस्तत्त्वविदा
संन्यासप्रकारस्योफत्वाच । ननूदाहृतवचने मनसेत्युक्तत्वात न कायिकादीनां संन्यासः । सर्वकर्माणीति वि.
शेपितत्वात् सर्वेपामिति चेन्न, मानसानामेव सर्वेपामिति तदर्थात् । कायादिव्यापाराणां कारणानि पर्न-
यित्वाऽन्यानि सर्वाणि कर्माणि मनसा संन्यस्येति तदर्थो ग्राह्य इति चेन, उक्तफल्सनया नैव कुर्वन्न
फारयन्नितिथिोपणानर्थक्यप्रसङ्गमात् । ननु सर्वकर्मसंन्यासोऽयं मरिष्यतो भगवतोक्तो न जीवतः इति चेन्न,
नवद्वारे परे देही आस्व इति विशेषणानुपपके । तस्मादुदाहृतवचनादिभिस्तत्वविदः संन्यासप्रकारस्योक.
वात् चेपां मोहादिनिमित्तत्यागानुपपचेश्च कर्मिणामनात्मझानां कर्मफलत्यागस्तुत्यर्थं ये कर्मण्यविकता
अनात्मविदो येषां च मोहात्काय रेशभयाच त्याग: संभवति त एव तामसारत्यागिनो राजसाश्चेति निन्द्यन्ते
'मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मिप्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ तुल्यनिन्दास्तु,
दिमांनी संतुनो येन केनचित् । अनिमेवः स्थिरमनिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ।।' इत्यादिना चतुर्दशद्वादशादी
परमार्थसन्यासिनो विरोपितत्यान, शानस्य या परा निष्ठेवि वक्ष्यमाणत्वाचः। ज्ञाननिष्ठाः संन्यासिनो नेह,
विक्षिा किंववस्यविदः संन्यासिनस्तामसवायपेश्या सात्त्विकत्येभ गुणेन स्लूयन्ते । न च नहि
देहभृता सस्य त्यम् कर्माण्योपतः' इति हेतुयचनेन मुरय एवायं संन्यास इति भ्रमितव्य त्यागाच्छान्ति.
रनन्तरमिनियन हेतुवचनस्तुत्ययंत्वादिति संक्षेपः ॥ ३ ॥
[अ० १८ लो० ४] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपता १९७१ प० टी० अथास्मिन्नर्थे मतान्तरमुपन्यस्यति-त्याज्यामिति । यो हिसादिदोपवत्कर्म बन्धकं भवतीति त्याज्यामित्येके मनीपिण: सांख्या वदन्ति । स्थाऽपरे मीमांसका “ अमीपोमीयं पशुमालभेत " इत्यादिश्रुति. बलाद्यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यगिति वदन्ति ॥ ३॥ रा० टी०-सर्वकर्मफलत्यागमिति स्वोक्तत्यागस्वरूपावधारणाय मातीतिर्की विद्वन्मतविप्रतिपत्तिमुद्धा- वयति-त्याज्यमिति ! एके मनीषिणो ज्ञानिनः दोपवत् बन्धकत्यदोषयुक्तं काम्यकर्म त्याज्यम् अकार्य- माहुः । अपरे च मनीषिणः यज्ञादि ने त्याज्यमिति प्राहुः । तपः कृच्छ्चान्द्रायणादिकर्म यज्ञाङ्गानि । यता नित्यनैमित्तिकानि । मनीपिण इतिविशेषणात्प्राचीनपक्षेऽपि फलत्याग एवाभिमतो न स्वरूपत्यागः । अवोन गतयोविरोधः ॥३॥ निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम !॥ त्यागो हि पुरुषव्याघ्र ! त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥४॥ त० टी०-एवं मतान्तराण्युक्त्वा त्यागविपयं निर्णयमाह-निश्चयमिति । तत्रैवं वादिविप्रतिपन्ने त्यागे निश्चयं सर्वाविरुद्धपक्षं मे मत्तः शृणु । हे भरतसत्तम! नहि त्यागः सर्वैरवगन्तुं शस्यः । हे पुरुपव्यान ! हि यस्मात्यागविविधस्तामसादिभेदेन संपर्कीर्तितस्तत्त्वविद्भिर्विवैकेन कथित इत्यर्थः ॥४॥ म०टी०-एवं विप्रतिपचा निश्चयमाह-निधयमिति । वत्र त्वया पृष्टे कर्माधिकारिकर्तृके संन्यास- त्यागशब्दाभ्यां प्रतिपादिवे त्यागे फलाभिसंधिपूर्वकर्मत्यागे मे मम वचनान्निश्चयं पूर्वाचार्यैः कृतं शृणु हे भरतसत्तम । किं वत्र दुयमस्तीत्यत आह-हे पुरुषव्याघ्र पुरुषश्रेष्ठ हि यस्मात् त्यागः कर्माधिकारिकर्तृक: फलाभिसंधिपूर्वककर्मत्यागः त्रिविधस्विकारतामसादिभेदेन संप्रकीर्तितः । अथवा विशिष्टाभावरूपरत्यागो विशेपणाभावाद्विशेष्याभावादुमयाभावाच्च निविधः संप्रकीर्तित । तथाहि फलामिसंधिपूर्वककर्मत्यागः सत्यपि कर्मणि फलाभिसंधित्यागादेकः । सत्यपि फलाभिसंधौ कर्मत्यागाहितीयः । फलाभिसंधः कर्मणश्च त्यागा- तृवीयः । तत्र प्रथम: सात्त्विक आदेय: । द्वितीयस्तु हेयो द्विविधः-दुःखबुद्धया कृतो राजसः, विपासन कृतस्वामसः । एतावान् फर्माधिकारिफर्तृकस्त्यारोऽर्जुनस्य प्रश्नविपयः । तृतीयस्तु कर्माधिकारिफको नैर्मु- ण्यरूपो नार्जुनप्रश्नविषयः । सोऽपि साधनफलभेदेन द्विविधः । तत्र सात्त्विकेन फलाभिसंधित्यागपूर्वक- कर्मानुष्ठानरूपेण त्यागेन शुद्धान्तःकरणस्योत्पन्नविविदिपस्यात्मज्ञानसाधनश्रवणाख्यवेदान्तविचाराय फला- भिसंधिरहितस्यान्तःकरणशुद्धौ सत्या तत्साधनस्य कर्मो वैतुष्ये जात इवावहननस्य परित्यागः । स एकः साधनभूदो विविदिषासंन्यास उच्यते । तमो नैष्कर्यसिद्धि परमामिति वक्ष्यति । द्वितीयस्तु जन्मान्तरकृ. तसाधनाभ्यासपरियाकादस्मिजन्मन्यादानेवोत्पन्नात्मबोधस्य वकृत्यस्य स्वत एव फलाभिसंधैः कर्मणाश्च परित्यागः फलभूत: । स विद्वत्संन्यास इत्युच्यो । स तु यस्त्वात्मरतिरेव स्यादित्यादिशोकाभ्यां प्राग्व्या- ख्यातः । स्थितप्रज्ञलक्षणादिभिश्च यहुधा पश्चितः । यस्मादेवं त्यागस्य तत्त्वं दुर्शयं त्वया चौक्त तत्व पेदि- तुमिच्छामीति, अतो मम सर्वज्ञस्य वचनाद्विद्धोत्यभिप्रायः । संवोधन्द्धयेन कुलनिमित्तोत्कर्षः पौरुपनिमिः तोकपश्च योग्यतातिशयसूचनायोक्तः ॥ ४ ॥ ०टी०-त्यागगुणेन मुख्यसंन्याससादृश्यसंभवाहिणः काम्यकर्मत्याग एव संन्यास इति, सर्वकर्मा फलत्याग एव संन्यास इति, दोपवस्फर्मत्याग एव संन्यास इति, काम्यनिपिद्धकर्मपरित्याग एव संन्यास इति त्यागशब्दार्थ संन्यास पण्डिवाः स्वस्वमवानुसारेण बहुधा वर्णयन्ति । इत्येवं मतभेदेन त्यागशव्यस्याभ प्रतिपाद्य स्वाभिमतमधे वक्तं स्वमतसिद्धस्य त्यास्याधिकारिभेदेन वैविध्यमाह-नियमिति । उकरीत्या श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ ग्लो०४] च बहुधा विकल्पिते तत्र तस्मिन् त्वत्प्रनविपयभूते त्यागे त्यागशब्दार्थे संन्यासे मे निश्चयं मया निश्चित- मर्थ मचः शृणु । श्रुतार्थप्रवृत्तिसिद्धये श्रोतारं स्तौति-हे भरतसत्तम हे पुरुपव्यालेति । हि यस्मात्कारणा- त्यागं पण्डिता अपि बहुधा वर्णयन्ति तस्मात्यागो बुद्धिमतामपि दुर्विज्ञेयः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुर्वियत्र नित्याना नैमित्तिकानां च सर्वेषां कर्मणा फलमात्रपरित्याग एवं यथा विवक्षितस्तथा मथि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य योगसंन्यस्तकर्माणमित्यादावपि कर्मसंन्यासपदस्य कर्मफलल्गाग एवार्थो विव- क्षिवो भवति, न तु कर्मसंन्यास: कर्माधिकारे कर्मसंन्यासविधानायोगात् । य उकलक्षणस्त्यागः स एवं त्रिविधस्तामसादिभेदेन त्रिप्रकार इति मुनिभिः संप्रकीर्तितो भवति तं मयोच्यमानं शृण्वित्यर्थः ॥ ४ ॥ श्री० टी०-एवं मतभेदमुपन्यस्य स्वमतं कथयितुमाह-निश्चयमिति । तत्रैवं विप्रतिपन्ने त्यागे निश्चयं मे वचनाच्छृणु । त्यागस्य लोकप्रसिद्धत्वास्किमत्र श्रोतव्यमिति माऽवमंस्था इत्याह-हे पुरुषव्यान पुरुपश्रेष्ठ, त्यागोऽयं दुर्बोधः । हि यस्मादयं कर्मत्यागस्तत्त्वविद्भिस्तामसादिभेदेन त्रिविधः सम्यग्विवेकेन प्रकीर्तितः । वैविध्यं च नियतस्य तु संन्यासः कर्मण.' इत्यादिना वक्ष्यति ।। ५ ।। स० टी०-तत्र त्यागे स्वया पृष्टे कर्माधिकृतकर्तृके ॥ संन्यासत्यागशब्दाभ्यागृपिभिः प्रतिपादिवे ॥१॥ निश्चयं मदचोभिस्त्वं पूर्वाचार्यैः कृतं शृणु ॥ कर्माधिकारिणो यस्मात्त्याग: सफलकर्मणः ॥ २ ॥ ताम- सादिकभेदेन त्रि.प्रकार उदाहृतः ।। फलाभिसंधिसत्यागो विद्यमानेऽपि कर्मणि ॥ ३ ॥ सात्त्विकोऽयं परित्याग उपादेयो मुमुक्षुभिः ॥ फलाभिसंधौ सत्येव कर्मत्यागस्तु राजस. ॥ ४ ॥ अज्ञानतो द्वयो- ख प्रमादादिभिरेव यः ॥ त्यागः फलाभिसंधैथ कर्मणश्च स तामसः ॥ ६॥ हेयत्वेन मवावेतो त्यागौ राजसतामसौ ॥ मुख्यो यः कर्मसंन्यासो निबैगुण्यः स नेह वै ॥६॥ अर्जुनप्रश्नविषयो न वा तस्य विवेचनम् ।। यतस्त्यागस्य दुर्वाधं तत्त्वं तस्मान्ममेशितुः ॥ ७ ॥ वाक्याद्विद्धोत्यभिप्रायः संवोधन द्वयेन तु || कुलौत्कप्यांत्वकीत्काद्योग्यत्वं सूच्यतेऽर्जुने ॥ ८ ॥ ४ ॥ भा० टी०-एवं मतभेदेन संन्यासत्यागशब्दार्थयोस्तत्तं पृथशुक्त्वा स्वाभिमतं तयोरक्यं दर्शयितुमाह- निश्चयमिति । तत्र त्यागे त्यागसंन्यासविकस्से मे मम वचनान्निश्वयं शृण्ववधारय । त्यागसंन्यासवाच्यो योऽर्थः स एक एवेत्यभिप्रेत्या-त्यागत्रिविधः विप्रकारः तामसादिप्रकारैः संप्रकीर्तितः सम्यकशास्त्रेषु कथितो हि यस्मात्यागसंन्यासशब्दवाच्योऽर्थोऽधिकृतस्य कर्मिणोऽनात्मज्ञस्य तामसादिभेदेन त्रिविधा शालेषु संप्रकीर्तितः सर्वशास्त्रज्ञादीश्वरादन्येन वक्तुमशक्यः तस्मादन्न दुर्विज्ञानेऽर्थे परमार्थशास्त्रार्थविषय- मैश्वरं निश्चयमध्यवसायं शृणु । भरतानां क्षत्रियवराणा मध्ये सत्त्म साधुतमेति संवोधयन् क्षत्रियवरैः कर्व- न्ये त्यागे संन्यासे घ मयोच्यमानं निश्चयं विवि ध्वनयति । न केवलं क्षत्रियवरैरेव कर्तव्ये त्याग संन्यासशब्दाथै निश्चयो मयोच्यतेऽपि तु पुरुषश्रेष्ठैरन्यैरपि कर्माधिकवैरज्ञः कर्तव्ये तस्मिन्निति ध्वनयन संबोधयति-पुरुपच्याप्रेति ॥ ४ ॥ ५० टी०-एवं मतभेदमुपन्यस्य स्वमतं कययितुमाइ-निश्चयमिति । नवं विप्रविपन्ने त्यागे मे वचः नान्निश्वयं शृणु । हि यस्मात् कारणाझो पुरुषव्याघ्र पुरुषार्थसाधनशील हीति निश्चयेन त्यागसिविधा संप्रकीर्तितस्वामसादिभेदेन सम्यक्प्रकारेणामे निरूपितोऽस्ति ॥ ४ ॥ रा० टी०-अविरोधप्रकार प्रतिज्ञापूर्वमुपपादयति-निययमिति । तत्र विप्रतिपन्ने त्यागे विपये निश्चित म में सकाशात् शणु श्रुत्या निष्ठा पुरु । त्यागो हि फलत्याग, । कर्मणि ममवात्यागः । भगवति कर्तृ- (वानुसंधानपूर्व स्वस्य कर्तृत्वाभिमानत्याग इवि विविध. संप्रकीवित इत्येके । यक्ष्यमाणसात्त्विकादि- . भेदेनेत्यन्ये तय.
[अ० १८ ० ५]. तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोयता 'यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥५॥ त० टी०-कोऽसौ निश्चय इत्यत आह-यज्ञदानेतिद्वाभ्याम् । यज्ञदानतप इति वैदिकं कर्म मुमुक्षुणा न त्याज्यम्, अपि तु कार्य कर्तव्यमेव तत् । यज्ञो दानं सपथैव मनीषिणां मननशीला- नामनभिहितफलानां पावनानि मनःशुद्धिकराणि ॥ ५ ॥ मटी-कोऽसौ निश्चयो विप्रतिपचिकोटिभूतयोः पक्षयोतिीय. पक्ष इत्याह-यज्ञ इति द्वाभ्याम् । चो हेवौ । यस्मात् यज्ञदानतपासि मनीषिणामझवफलाभिसंधीना पावनानि ज्ञानप्रतिवन्धकपाश्मलक्षाल- नेन ज्ञानोत्पचियोग्यतारूपपुण्यगुणाधानेन च शोधकानि । अकृतफलाभिसंधीनामेव यज्ञदानतपास्येव शोधकानि भवन्त्येव । उपाधिशुद्धथैवोपहितशुद्धिरनाभिप्रेता । तस्मादन्तःकरणशुद्धयर्थिभिः कर्माधिकृतेर्यज्ञो- दानं तप इवि यत् फलाभिसंधिरहितं कर्म उन त्याज्यं किंतु कार्यमेव वत् । अत्याज्यत्वेन कार्यत्वे लबथे- उज्यत्यादराथै पुनः कार्यमेवेत्युक्तम् । यस्मात्कार्ये कर्तव्यतया शास्त्रविहितं तस्मान त्याज्यमेवेति वा ॥९॥ शं० टी०-यत्मविज्ञातं मे निश्चयं शुण्विति तं स्वनिश्चयं प्रतिपादयति-योति द्वाभ्याम् । यज्ञः श्रोतः स्मार्तश्य, दानं पानेष्वर्थसमर्पण, तपः स्वाध्याय, नयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति । अध्यय- नस्य धर्मस्कन्धत्वेन गृहिधर्मस्वश्रवणात् 'तपो हि स्वाध्याय.' इति स्वाध्यायस्य वपस्त्वश्रवणाचप.शब्देनाध्य- यनमुच्यते । एवं यज्ञदानतपोलक्षणं त्रिविधं नित्यं वैदिक कर्म मुमुक्षोहिणो विरक्तस्य न त्याज्यं न कदा- चित्त्यक्तव्यं किंतु नित्यत्वात्पुरुपायहेतुत्यादकरणे प्रत्यवायाच यशोऽध्ययन दानमिति । "अहरहः संध्या- मुपासीव । उदिते सूर्ये प्रावर्जुहोविं" इत्यादिश्रुत्युक्तं कर्म नित्यं मुमुक्षोः कार्य श्रद्धाभक्तिभ्या नियमेन कर्त- ज्यमित्यर्थः । उक्त कर्मणि प्रवृत्तिसिद्धये फलाह-यज्ञ इति । मनीषिणामधीतविदितवेदवेदार्थाना सदसद्धि- वेकववा मुमुक्षूणा परमेश्वरार्पणबुद्धया कवानि यज्ञो दानं तपः । चकारोऽन यज्ञदानादीनामुक्तानामनुकाना औवाना स्मााना च कर्मणा समुच्चयार्थः । एवकारो यज्ञदानादेर्वेदिकस्यैव कर्मणो वर्णाश्रमिणा विहि- तस्य पावनत्वनिर्धारणार्थः । यज्ञदानतपोलक्षणानि श्रीवानि स्मार्तान्येव कर्माणि पावनान्युपाचसर्वदुरित. क्षयकराणि सत्त्वशोधकानि तद्वारा ज्ञानस्य तत्फलस्य च कारणानीत्यर्थः ॥५॥ श्री०टी०-प्रथमं वावनिश्चयमाह-यज्ञदानेति द्वाभ्याम् । मनीपिर्णा विकिना पावनानि चित्तशु. द्विकराणि ॥ ५॥ स० टी०-कश्वासौ निश्चयस्ता द्वारयामाह रमापतिः) फलाभिसंधिहीनाना यज्ञदानसपासि हि ॥१॥ शोधकान्यात्मविज्ञानप्रतिवन्धमलक्षयात् ॥ तस्माधिचविशुद्धयात्मविज्ञानायाधिकारिभिः ॥ २ ॥ फलाभिसं- धिहीनं यत्कर्म त्याज्यं न बुधैः ॥ यस्माद्यज्ञादिक कर्म कर्तव्यत्वेन चौदितम् ॥ ३ ॥ तस्मान्न त्याज्यमेवेति किंतु कार्य प्रयत्नतः ॥ ४॥९॥ भा० टी०-प्रतिशातं निश्चयं प्रदर्शयन् तत्र हेतुमाह-यज्ञ इति । यज्ञो दानं वप इत्येवप्रिविधं कर्म न त्याज्यं न स्यकव्यम् । व्यतिरेकेणोकमर्थमन्येन द्रढयति । कार्यमेव तत् त्रिविध कर्म करणीयमेव । चोहे: तौ । यस्माद्यज्ञदानतपास्येव पावनानि विशुद्धिकराणि, पावनान्येवेति या । मनीषिणा कुशलाना फलामिसं. धिरहिवानाम् ।। ५॥ १. टी-वत्रादौ त्यागस्य स्वरूपं दर्शयति-यज्ञदानतप इति द्वाभ्याम् । यज्ञदानतपोरूपं कर्म न त्याज्यं किं तु सत्कार्यमेव । कुत.? यज्ञो दानं वपश्च मनीषिणा ज्ञानवता कर्ते पावनानि चिचशोधकानि ॥५॥ * यो दान तप कम-ति मधुसूदनीटीगासमत पाठ । --- . श्रीमद्भगवद्गीता • [४० १८ श्लो०६] रा० टी०-निश्चयं दृष्विति प्रतिज्ञावमाह-क्षेति । द्वन्दैननावः । कुतः कार्यमित्यत आह-यज्ञ इति । पावनानि पावित्र्यकरणानि अवन्धकालीतियाइन् । यद्वा मनीषिणा ज्ञानिां सुलानानन्दादिशयक- राणि । अतः सर्वैरपि वर्गानमोचितकर्माणि कार्याष्येवेति । यतीनामपि ज्ञानयज्ञविद्याभयदानाचर्या- दिवपासि च सन्त्येव । स्त्रीशद्रादीनामपि विष्णुनासाव्ययनरुषो यज्ञः सत्यवचनमुपवासादि तपश्चात्त्ये. वेति भावः ॥६॥ एतान्यपि तु कर्माणि सक्षं त्यक्त्वा फलानि च कर्तव्यानीति मे पार्थ! निश्चितं मतमुत्तमम् ॥६॥ त० टी०-ननु " मोत्यसे कर्मन्यनैः " इति कर्मणां वन्धनत्याभिधानात्यमेषां पावनस्वामिन- त्यत आह-एतानीति । यानि यादीनि कर्माणि पायनान्युत्तानि एतान्यपि सङ्कमहमेवं करिष्या- मीत्यभिनिवर्स त्यत्वा, फलानि च ममैतफलप्साधनानीति फलोदेशं विशय केवलमीवराज्ञापालना- त्यतया कर्तव्यानि हे पार्थ, इति मे म निश्तिमुत्तमं श्रेष्ठ मतम् ॥६ " + - [अ० १८०० वत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १९७६ भ्यो मवेभ्य उत्कृष्टतमं प्रत्यवायरहितत्वेन नरकाद्यनिनिवृत्तिहेतुत्वातस्त्वांगमागमश्वेशनिवर्तकत्वाश्चित्तशुद्धि- द्वाराऽभीटमुक्तिहेतुत्वाच तेभ्यः श्रेष्ठतममित्यर्थः ॥ ६ ॥ श्री०टी०-येन प्रकारेण कृतान्येतानि पावनानि भवन्ति तं प्रकार दर्शयन्नाह-एतानीति । यानि यज्ञादिकमाणि मया पावनानीत्युक्तम्, एतान्येव कर्तव्यानि । कथम् ? सझं कर्तृत्वाभिनिवेशं त्यक्त्या केव- लमीश्वराराधनतया कर्तव्यानीति फलानि च त्यक्त्वा कर्वव्यानीवि च निश्चितं मे मम मतम् । अत एवोत्तमम् ॥ ६॥ स० दी०-धीशोधनेऽस्ति सामध्ये यदि यज्ञादिकर्मणाम् ।। शोधकान्येव तर्हि स्युः कृतान्यपि फले- सुना ॥ १ ॥ कृवं फलाभिसंध्येकत्यागेनेत्येव चेच्यु ।। धर्मस्वाभाव्यतः शुद्धिः काम्यानामपि संभवेत् ॥ २॥ वयापि कामिना सा तत्फलभोगोपयोगिनी !! शानोपयोगिनी नास्ति तदुक्तं वार्तिके स्फुटम् ॥ ३॥ काम्येऽपि शुद्धिरस्त्येव भोगसिद्ध्यर्थमेव सा ॥ विङ्कराहादिदेहेन नहँन्द्रं भुज्यते फलम् ॥ ४ ॥ ज्ञानो. पयोगिनों शुद्धिमादधत्यन यानि तु ।। यज्ञादीन्येव कर्माणि बन्धकान्यपि कामिनाम् ॥ ५॥ मुमुक्षुभिः परित्यज्य कर्तृत्वाभिमति वथा ॥ अभिसंधीयमानानि त्यक्त्वा कर्मफलानि च ॥ ६ ॥ कर्तव्यानि धियः मुद्धय इति मे निश्चितं मतम् । अत एव हि हे पार्थ न त्याज्यानि मुमुक्षुभिः ॥७॥ कर्माधिकारिभिधारः कर्माणीत्युत्तमं मतम् ॥८॥६॥ भा० दी०-प्रतिज्ञातमर्थमुपसंहरवि-एतानीति । एतानि यज्ञदानतपांसि ससङ्गस्य फलार्थिनो बन्ध- हेतवोऽपि कर्माणि मुमुक्षुभिः सझं कतत्वाभिनिवेशं फलानि च सक्त्वा परित्यज्य चित्तशुद्धपर्य कर्तव्या- नीत्येतनिश्चिवं मम परमेश्वरस्य वासुदेवस्य, मतम् । यो ममेदं निश्चितमव उधर्म सर्वोत्कृष्टम् । उत्तमत्वा- न्मम निश्चितमिति वा । स्वया तु मत्संबन्धिना मदीयं निश्चितं मतमेवोपादेयमिति सूचनाय संवो- धनं पार्थेति । यत्तु अपिशब्द एवंशब्दार्थ इति भाष्यविरुद्धमन्ये वर्णयन्ति नादर्तव्य, सति संभवे स्वार्थत्यागस्यान्याय्यत्वात् ॥६॥ ५० टी० केन प्रकारेण कृतानि पावनानि भवन्तीस्याह-एतानीति । एतानि यज्ञदानतपोरूपाणि कर्माणि सझं त्यक्त्वा फलानि चैहिकामुग्मिकाणि त्यक्त्वा केवलमीश्वरार्पणवया कर्वव्यानीति मे मतं निशि. बमसंदिग्धम् । उत्तमत्वादेतदेवादरणीयमित्यर्थः ॥६॥ रा० टी०-यज्ञादि न त्याज्यं कार्यमेव तदित्युक्तपयुक्तं, त्याज्यं कर्मेत्युक्तमनीषिमतविरोधादिस्यतः समादित्यागरूपविशेषणत्याग एव तेमामभिमनः । न स्वरूपत्याग इविभावेग यहादेः करणप्रसारमाह- एतानीति । प्रागुक्तयज्ञादिरूपकर्माणि ममताभिमानरूपस्नेहास्पसहं त्यस्त्वा स्वादिफ्लानि च त्यात्या कर्तव्यानि इति निधिवं मे उत्तमं मतम् ॥ ६॥ नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥ ७ ॥ तकदी'त्यागो हि पुरुपच्याप्र! विविधः संमकीर्तितः । इत्युक्तं वैविध्यमेव दर्शयति- नियतस्येति । काम्यस्य कर्मणो पन्धहेतुत्वेन दोपचावात्याग उपपद्यते । नियतस्प तु नित्यकर्तन्य- तया विहितस्य महायज्ञादेस्तु कर्मणः सन्यासस्त्यागो नोपपयते । अन्तःकरणशुदिहेतुत्वेन मुमुपादे- यत्वात् । एवं मोहात कर्तव्याकर्वव्यापिकात् तस्य नित्यस्य परित्यागस्त्यमसः परिकीर्तितः । "मा. दमोही तमसो भक्तोऽज्ञानमेव च" इति तमोजन्यमोहहेनुत्तेन नामप्तत्वमित्यर्थः ॥ ७ ॥ । .
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो०७] मटी-तदेवं "यज्ञदानवपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे" इति स्वपक्षः स्थापितः । इदानीम् "त्याज्यं दोपवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीपिणः' इति परपक्षस्य पूर्वोकत्यागत्रैविध्यव्याख्यानेन निराकरणमारभते-नियत. स्येति । काम्यस्य कर्मणोऽन्त करणशुद्धिहेतुत्वाभावेन वन्धहेतुत्वेन च दोपवत्वाद बन्धनिवृत्तिहेतुबोधार्थिना क्रियमाणत्याग उपपद्यत एव । नियतस्य तु नित्यस्य कर्मणः शुद्धिहेतुत्वेनादोपस्य संन्यासत्यागो मुमुक्षु- णाऽन्तःकरणशुद्धधर्थिना नोपपद्यते, शास्रयुक्तिभ्यां तस्यान्त:करणशुद्धयर्थमवश्यानुष्ठेयत्वात् । तथा चोकं प्राक्-'आरुरुक्षोर्मुनयोंग कर्म कारणमुच्यते" इति । ननु दोपवत्त्वं काम्यस्येव नित्यस्यापि दर्शपूर्णमास- ज्योतिष्टोमादेाहिपश्वादिहिंसामिश्रितत्वेन साख्यैरभिहितम् । न च "श्रीहीनवहन्ति । अग्नीषोमीयं पशुमाल. भवे' इत्यादिविशेषविधिगोचरत्वात् ऋत्वहिंसाया "न हिंस्यात् सर्वा भूतानि" इति सामान्यनिषेधस्य तदि- वरपरत्वमिति, सांप्रतं भिन्नविषयत्वेन विधिनिषेधयोरवावेनैव समावेशसंभवात् । निषेधेन हि पुरुषस्थानर्थ- हेतुहिसेत्यभिहित न त्वक्रत्वर्था सेति । विधिना व ऋत्वर्था सेत्यभिहितं न वनर्थहेतुर्नेति । तथा च मतूपकारकत्वपुरुपानर्थहेतुत्वयोरेकत्र संभवात् त्वर्थापि हिंसा निपिझैवेति हिंसायुक्तं दर्शपूर्णमासज्योतिष्टो- मादि सर्वे दुष्टमेव । विहितस्यापि निपिद्धत्वं निपिद्धस्यापि च विहितत्वं श्येनादिवदुपपन्नमेव । यथा हि "श्येनेनाभिचरन्यजेत" इत्याद्यभिचारविधिना विहितोऽपि श्येनादिर्न हिंस्यात्सर्वाभूतानीति निषेधविषयत्वाद- नर्थहेतुरेव । वदोपसहिष्णोरेव च रागद्वेपादिवशीकृतस्य तत्राधिकारः । एवं ज्योतिष्टोमादावपि । तथा चोक महाभारते-'जपस्तु सर्वधर्मभ्यः परमो धर्म उच्यते । अहिंसया हि भूतानां जपयज्ञः प्रवर्तते । इति । मनु- नापि - जप्येनैव तु संसिध्येद्वारको नात्र संशयः । कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मत्रो ब्राह्मण उच्यते ।। ' इति वता मैत्रीमहिसां प्रशंसता हिंसाया दुष्टत्वमेव प्रतिपादितम् । अन्त:करणशुद्धिश्चदशेन गायत्रीजपादिना सुतरामुपपत्स्यत इवि हिंसादिदोपदुष्टं ज्योतिष्टोमादि नित्यं कर्म दोपासहिष्णुना श्येनादिकमिव कर्मा- धिकारिणापि त्यायमिति प्राप्त वूम:-न क्रत्वर्था हिंसाऽनर्थहेतुः, विधिपृष्टे निपेधानवकाशात् । तथाहि विधिना पलवदिच्छाविपयसाधनतावोधरूपां प्रवर्तनां पुर्वताऽनर्थसाधने तद्नुपपत्तेः स्वविषयस्य प्रवर्त- नागोचरस्यानसाधनत्वाभावोऽन्यांदाक्षिप्यते । तेन विधिविपयस्य नानर्थहेतुत्वं युज्यते । न हि कत्व- त्वं साक्षाद्विम्यर्थः, येन विरोधो न स्यात, किंतु प्रवर्तनैव । प्रवर्तनाकर्मभूवा तु पुरुषप्रवृत्ति: पुरुषार्थ- भेव पिपपीयुर्वकी पचित् ऋतुमपि पुरुषाघापनत्वेन पुरुषार्थनावमापनं विपीकरोतीत्यन्यत् । पुरुष. प्रवृत्तिश्च वलवदिच्छोपधानदुशायां जायमाना न भाव्यस्यार्थहेतुवामाक्षिपति न वाऽनर्थहेतुतां प्रविक्षिपति। किंतु यथाप्राप्तमेवावलम्बवे, बलवदिन्छाविपये स्वत एवं प्रवृत्ते: स्वर्गादौ विध्यनपेक्षणात् । अत एव विहित- श्येनफलस्यापि शत्रुवधरूपस्याभिचारस्यानर्थहेतुत्वमुपपद्यत एव, फलस्य विधिजन्यप्रवृत्चिविषयत्वाभावात् । विधिजन्यप्रवृत्तिविषयं तु धात्वर्थरूपं करणं प्रवर्तनाऽवलम्वते । सा चानर्थहेतुं न विषयीकरोतीति विशे. पविधिवाधित सामान्यनिषेधवास्यं रागद्वेपादिमूलानत्वर्थलौकिकहिंसाविषयम् । वेन श्येनानीपोमीयो पन्यादुपपन्नमदुष्टत्वं ज्योतिष्टोमादेः । विधिस्पृष्टस्यापि निषेधविपयत्वे पोशिमहणत्याप्यनर्थहेतुत्वापत्तिर्नाति- रात्रे पोडशिनं गृहातीति निषेधात् । तस्मान्न किचिदेवदिति भाटै दर्शनम् । प्राभाकरं तु दर्शनं फळसाधने संगत एव प्रचिसिद्धेनं नियोगस्य प्रवर्तकत्वम् । वेन श्येनस्य रागजन्यप्रवृत्तिविषयत्वेन विधेरोदासीन्यान वस्यानहेतुत्वं विधिना प्रविक्षिप्यते । अग्नीपोनीयहिंसायां तु मत्वभूतायां फलसाधनत्यामापेन रागा- भाषाद्विविरेव प्रवर्तकः स प स्वविषयस्यामहेतुवा प्रतिक्षिपतीति प्रधानभूता हिसान) (भावेत) जनयति न भारवि हिंसानियत्वेन ज्योतिष्टोमादेर्दुष्टत्वमिति सममेव । एतारन्माने तुविशेष:-"चौदनालक्षणोऽयों धर्म इत्यार्थपदच्यावयत्वेनाधर्मत्वं श्येनादेः प्रामारमते । भाट्टमव तु श्येनकस्याभिचारस्यानर्थहेतुत्याध- [अ० १८ लो० ७] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता मत्व, श्येनस्य तु विहितस्य समीहितसाधनस्य धर्मत्वमेव । अर्थपदव्यावर्त्यत्वं तु कलमभक्षणादेनिषिद्धस्यैवेति फलतोऽनर्थहेतुत्वेन (तु) शिष्टानां श्येनादौ न धर्मत्वेन व्यवहारः । तदुक्तम् 'फलवोऽपि च यत्कर्म नान- थेनानुवष्यते । केवलप्रीतिहेतुत्वात्तधर्म इति कथ्यते इति । वार्किकाणां तु दर्शनं ऋविसाध्यत्वमर्थहेतुत्वम- न हेतुत्वं चेवि त्रयं विध्यर्थः । तत्र पहिसायां साक्षानिपेधाभावात्प्रायश्चिचानुपदेशाच्च कविसाध्य- स्वार्थहेतुत्ववदनांहेतुत्वमपि विधिना बोध्यव इवि न वस्या अनहेतुत्वम् । श्येनादेस्वभिचारस्य साक्षादेव निषेधात्यायश्चित्तोपदेशाधानहेतुत्वावगमात्तावन्मावं तत्र विधिना न बोध्यत इत्युपपन्नं, श्येनामीपोमीययो- वैलक्षण्यम् । औपनिषदेस्तु भाट्टमेव दर्शनं व्यवहारे प्रायेणावलम्वितम् । तथा च भगवदादरायणप्रणीवं सूत्रम्- अशुद्धमिति चेन शब्दात् ' इति । ज्योतिष्टोमादिकर्म अग्नोपोमीयहिंसादिमिश्रिवत्वेन दुष्टमिति चेत्, न। “अग्नीपोमीयं पशुमालभेत" इत्यादिविधिशब्दादित्यक्षराधः । जपप्रशंसापरं तु वाक्यं न त्वहिंसाया अधर्मस्वबोधक, तस्य वातात्पर्यात् । तथाच सांख्यानां विहिते निषिद्धत्वज्ञानमनयहितावनर्थहेतुत्वज्ञानं, धर्मे चाधर्मत्वज्ञानमनुष्टेये चाननुष्ठेयत्वज्ञानं विपर्यासरूपो मोहः । तस्मान्मोहानित्यस्य कर्मणो यः परि- त्यागः स वामस: परिकीर्तितः । मोहो हि नमः ॥ ७॥ शं०टी०-"निश्चयं शृणु मे वत्र' इत्युपक्रान्त स्वसिद्धान्तमुक्ताऽधुना मुमुक्षीरविरतत्य कर्मसंन्यास निषेधयन् "त्रिविधः संप्रकीर्तितः" इत्युक्तं त्यागस्य त्रैविध्यं प्रतिपादयति-नियतस्येति । नियतस्य श्रुति स्मृतिविहितस्य संध्योपासनाग्निहोत्रादेः कर्मणः संन्यास: काम्यकर्मवपरित्यागो मुमुक्षोरशुद्धचिचस्य नोप- .पद्यते, नित्यस्य कर्मणः सत्त्वशोधकत्वादकरणे प्रत्यवायाचाज्ञस्य कर्मसंन्यासो न कर्तव्य इत्यर्थः । कर्मणस्तत्त्वमविज्ञायापावदृष्टया दोप इति त्यागोऽविवेकेन कृतश्चेत्कथमित्यत आह-मोहादिति । कत्या- कृत्यज्ञानामावो मोहोऽविवेकस्तस्मान्मोहात्तस्य नियतस्य स्वानुष्ठानजन्यचित्तशुद्धिद्वारा मोक्षहेतुत्वेनोपादे- यस्य नित्यस्य कर्मणः परित्यागस्तामसस्तमोगुणकार्यत्वाचामस इति सद्भिः परिकीर्तितः । वमोगुणादेव मोदो वैचित्यमनिष्टादिकर्मफलाशानं वत्मादेवोपादेयमपि नित्यं कर्म त्यजति, त्यक्त्वाऽकारणदोषनं फळं नरकं च प्राप्नोतीत्यर्थः । एवेनाशस्यानिर्विष्णस्य च कर्मत्यागो न कर्धन्य इति सूचितं भवति ॥ ७ ॥ श्री० टी०-प्रतिज्ञावं त्यागस्य विध्यमिदानी दर्शयति-नियवस्येति त्रिभिः । काम्यस्य फर्मणो बन्धकत्वात् सेन्यासो युक्तः । नियतस्य तु नित्यस्य पुनः कर्मणः संन्यासस्न्यागो नोपपद्यते सत्त्वशुद्धिद्वारा मोक्षहेतुत्वात् । अतस्तस्य परित्यागः उपादेयेऽपि त्याज्यमित्येवंलक्षणान्मोहादेव भवेत् । स प मोहस्य तामसत्वात्तामस: परिकीर्तितः ॥ ७॥ स० टी०-तदेवं कर्म न त्याज्यं स्वात्मनः स्थापित मतम् त्याज्यं दोपवदित्यादिपरपक्षनिराकृतम् . ॥१॥ कर्तुमारभते त्यागत्रैविध्यमघुना हरिः ॥ काम्यस्य चोपवत्त्वात्स्यात्त्यागः शुद्धपर्थिनां नृणाम् ॥ २ ॥ नित्यस्य कर्मणः शुद्धिहेतुत्वेनानघस्य तु ॥ वित्तशुद्धपर्थिनस्त्यागो मुमुक्षानीपपरावे॥३॥ धीमुद्धपै शाख- युक्तिभ्यामनुष्यं मुमुक्षुणा ॥ काम्यस्येवास्य नित्यस्य दोपवत्त्वं न संभवेत् ।। ४॥ पावनत्वापरिज्ञाना. त्यागो नित्यस्य कर्मणः ॥ अवश्यमेव कर्तव्यं यचन्नित्यमितीयते ॥ ५ ॥ अज्ञानाचत्परित्यागस्तामम: परिकीतिः ॥६॥७॥ भा० टी०-स्वाध्यवसायमुक्त्या त्यागस्य वैविध्यं दर्शयितुमारभते-नियतस्येवि । नियतस्य नित्यस्य तु कर्मणः मुमुक्षोरनस्याधिनस्य संन्यासः परित्यागो नोपपद्यते भोपपनो भवति नियतवश्यकर्तव्य त्यज्य पेवि विप्रतिपिद्धत्वात् । मोहात् पावनत्यापरिमानाचस्प नियतस्यावश्यकम्यवया विदितस्य परित्यागस्वामसः परिकीर्तितः । मोइश्य वास्तन्निमित्तालादित्यर्थ: 11 ।
श्रीमनगवद्गीता [अ० १८ श्लो०] ५० टी०-अध त्यागविन्यमाह-नियतस्येति । काम्यस्य कर्मणो वन्धकत्वात्तत्संन्यासो युक्तः, निय. तस्य नित्यस्य तु कर्मणः संन्यासस्त्यागो नोपपद्यते न युज्यते सत्त्वशुद्धिद्वारा मोक्षहेतुत्वात् । मोहादज्ञाना- त्तस्य नित्यस्य कर्मणो यस्त्यागः स तामसः परिकीर्तितः ॥ ७॥ रा० टी०-स्वरूपत्यागो नेत्येतदुपपादयन् त्यागो हि विविध इत्युक्तं प्रपञ्चयति-नियतस्य विति ।। वर्णाश्रमोचितस्य तु कर्मणः संन्यासरत्यागों नोपपद्यते युक्तो न भवति, 'स्वयज्ञादीन्परित्यज्य निरयं या- त्यसंशयम् । इति पाझे प्रत्यवायस्मरणात् । स्वरूपत्याग एव त्यागशब्दार्थो न सङ्गफलयोख्याग इति मिध्याज्ञानाख्यमोहात्तस्य यज्ञादिकर्मणः परित्यागः तामसः परिकीर्तितः ॥७॥ दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥ ८॥ त० टी०-राजसं त्यागमाह-दुःखमिति । कर्मफले वैराग्याभावात् केवलमनुष्ठाने दुःखमिति मत्वा यत्कर्म कायक्लेशभयात् त्यजेत् स त्यागकर्ता एतादृशं राजसं त्यागं कृत्वा नैव स्यागफलं लभेत । यथावस्थितवस्तुज्ञानं शास्त्रीयत्यागफलं न प्रामुयादित्यर्थः ॥ ८॥ म०टी०- पूर्वोक्तमोहाभावेऽपि-दुःखमिति । दुःखमिति अनुपजातान्तःकरणशुद्धिवया कर्माधिकृतोऽपि दुःसमेवेदमिति मत्वा कायकेशभयान्नित्यं कर्म त्यजेविति यत् स त्यागो राजसः । दु.ख हि रजः । अतः स मोहरहितोऽपि राजसः पुरुपस्तादृशं राजसं त्यागं कृत्वा नैव त्यागफलं सात्त्विकत्यागस्य फलं ज्ञाननि-' छालक्षणं नैव लभेत् लभेत ॥ ८॥ शं० दी०-राजसत्यागस्य लक्षणं फलं चाह-दुःखमिति । यथोक्तनियमेन यन्नित्यं कर्तव्यं तत्कर्म श्रमसान्यत्वाःसं दु.सात्मममायाससाध्यमित्येवं निश्चित्यालसत्वदोषेण कर्मणः कर्वव्यत्वं विजानन्नपि यः कायझेशभयाहेहेन्द्रियादिकेशो भवत्यस्यानुष्ठानेनेति भयात्त्यजेत्यजति, स पुरुषो देहानुगतरागविशिष्ट- स्वाद्वाजसं रजोदूषितबुद्धिदोपादागवं राजसं त्यागं कर्मसंन्यासं कृत्वापि त्यागफलं त्यागस्य कर्मसंन्यासस्य फलं चिचशुद्धि वन्यज्ञानं वत्फलं मोक्षं च न लभेत् न लभते । किंतु स्ववञ्चनात्मकस्य राजसत्याग्रस्या- नुरूपं विहिताकरणप्रत्यवायतः प्राप्तं फलं नरकमेप प्रतिपद्यत इत्यर्थः । एतेन 'न सुखाल्लभ्यते सुखम् । इविन्यायेन स्वधर्मानुष्ठानठेशसहिष्णोरेव पुरुषार्थः सिध्यतीवि सूचितम् ॥ ८ ॥ श्री० टी०-राजसं त्यागमाह-दुःखमिति । यः कर्ताऽऽत्मनोधं विना केवलं दु खमित्येवं ज्ञात्वा शरी. रायातभयान्नित्यं कर्म त्यजेदिति यवादशस्त्यागो राजसः, दुःखात्य राजसत्वात् । अवस्वं राजसं त्यागं त्या राजस: पुरुषस्त्यागस्य फलं माननिष्ठालक्षणं नैव लभन इत्यर्थः ॥ ८॥ स० ०-चिचद्धि विना यस्तु कर्मण्यधिकृत. पुमान् ॥ दु.समित्येव देहादावविरागिवया जड १.१ ॥ मत्वा फर्म त्यजेत्कापाठेशोत्याऽऽगमोदितम् ॥ पूर्वोक्तमोशून्योऽपि राजसः स च पूरुपः ॥ २ ॥ वादशं राजसं त्या कृत्यात्मशानयोग्यताम् ॥ चित्तशुद्धपा न चाप्रोति सात्विकत्यागनं फलम् ॥ ३ ॥ प्रत्युव त्यागतोऽवश्यं एतव्यत्यैव कर्मणः ॥ प्रत्यवति तो मृदः संसर्वि नरकं ब्रजेत् ॥ ४ ॥ अतो मुमुभिनित्यं न त्याज्यं भीषिशोधकम् ॥ किं तु कार्य स्वर्मवि श्रीहरेरयमाशयः ॥ ५॥८॥ भा०टी०-एवं वामगत्यागप्रसारमुस्त्या राजसं तमाह-दुःसमिति । मोहामानेऽपि दुःसमेवि मत्त्वा परम शायदेशभयान शरीर.सभयात् त्योत्-पदित्यन्ययं या, यस्त्योदित्यर्थः । स राजस रजोनिचं .
- . [म. १८ श्लो०९] बत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १९७९ त्यागं कृत्या त्यागस्य ज्ञानपूर्वकस्य सर्वकर्मत्यागस्य फलं मोक्षारयं नैव लभेत् । पवकारेणैतादृशत्यागवता मोक्षाशापि न कर्तव्येति सूचयति ॥ ८ ॥ ५० टी०-राजसं त्यागमह-दुःखमिति । अब कर्ता कर्म दुःसं दु:ससाध्यमिति मत्वा कायरेशभ. यावस्त्यजेत् स राजसं त्यागं कृत्वा ज्ञानविनिष्ठालक्षणं त्यागफलं नैव लभेत् ॥ ८॥ रा० टी०-दुःखमिति । दुःखं प्रतिकूलवेदनीयरूपदु.सकरणमित्येव कायझेशभयाच कर्म त्यजेदिति यत्स राजसत्यागः । तं राजसत्यागं कृत्वा त्यागफलं भगवत्प्रीतिरूपं नैव लभेत् ॥८॥ कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन'! ॥ सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥९॥ त० टी०-सात्त्विकं त्यागमाह-कार्यमिति । कार्य कर्तव्यमेवेति बुद्धया नियतमवश्यकर्तव्यतया विहितं नित्यनैमित्तिक कर्म सझं स्वकर्तृत्वाभिविवेशं फलं चैव त्यक्त्वा यत्क्रियते स त्यागः सात्विको मतः । भगवदाराधनरूपतया सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानोत्पादक इत्यर्थः ॥९॥ म. टी-कर्मत्यागस्तामसो राजसश्च हेयो दर्शितः । कीदृशः पुनरुपादेयः सात्त्विकस्त्याग इत्युच्यते- कार्यमिति । विध्युहेशे फलाश्रवणेऽपि कार्य कर्तव्यमेवेवि बुद्धा नियतं नित्यं कर्म सङ्गं कर्तृत्वाभिनिवेश फलं च त्यक्त्वैव यत् क्रियतेऽन्तःकरणशुद्धिपर्यन्तं स त्यागः साविकः सत्त्वनिर्वृत्तो मत आदेयत्वेन संमतः शिष्टानाम् । ननु नित्याना फलमेव नास्ति कथं फलं त्यक्त्वेत्युक्तम् । उच्यते-अरमादेव भगवद्वचनान्नित्यानां फलमस्तीति गम्यते, निष्फलस्यानुष्ठानासंभवात् । तथा चाऽऽपस्वम्य:-'तद्यथाऽऽने फलाथै निमिते छाया- गन्धावनृत्पद्यते एवं धर्म चर्यमाणमर्था अनू-पद्यन्ते' इत्यानुषङ्गिकं फलं नित्याना दर्शयति । अफरणे प्रत्य. वायस्मृतिश्च नित्याना प्रत्यवायपरिहारं फलं दर्शयति · धर्मेण पापमपनुदति । तस्माद्धर्म परमं वदन्ति', 'येन केन च यजेतापि वा दर्विहोमेनानुपहतमना एव भवति', 'तदाहुदेवयानी श्रेयानात्मयाजीत्यात्मया- जीति ह ब्रूयात् । स ह वा आत्मयाजी यो वेदेदं मेऽनेनाझं संस्क्रियत इदं मेऽनेनामुपधीयते' इत्यादिश्रुत- यश्च ज्ञानप्रतिवन्धकपापक्षयलक्षणं झानयोग्यतारूपपुण्योत्पत्तिलक्षणं चात्मसंस्कारं नित्यानां कर्मणा फलं दर्शयन्ति । तदभिसन्धि व्यक्त्वा तान्यनुष्ठेयानीत्यर्थः । यदुक्कं त्यागसंन्यासशब्दो घटपटशब्दाविव न भिन्नजातीयार्यो, किंतु फलाभिसंधिपूर्वककर्मत्याग एव वयोरर्थ इति तन विस्मर्तव्यम् । वत्र सत्यपि फलाभिसंघो मोहाद्वा कायझेशभयाद्वा यः कर्मत्यागः स विशेष्याभावकृतो विशिष्टाभावस्तामसत्वेन राज- सत्वेन च निन्दितः । यस्तु सत्यपि कर्मणि फलाभिसंधित्यागः स विशेषणाभावतो' विशिष्टाभावः सा. त्विकत्वेन स्तूयत इति विशेष्याभावझते विशेषणाभावकले व विशिष्टाभावत्वस्य समानत्वान्न पूर्वापरवि- रोधः । उभयाभावकृतस्तु निर्गुणत्वान्न त्रिविक्षमध्ये गणनीय इति चावाचाम । एतेन "त्यागो हि पुरुपव्याघ्र विविधः संप्रफीवितः" इति प्रतिज्ञाय कर्मत्यागलक्षणे द्वे विधे दर्शयित्वा प्रतिज्ञाननुरूपां कर्मानुष्ठानलक्षणा तृतीयां विधा दर्शयतो भगवतः प्रकटमकौशलमापवितम् । न हि भवधि त्रयो ब्राह्मणा भोजयितव्याः द्वौ कठकौण्डिन्यौ तृतीयः क्षत्रिय इति तद्वदिति परास्तम् । तिसृणामपि विधाना विशिष्टाभावरूपेण त्यागसामान्ये. नेकजातीयतया प्राग्व्याख्यातत्वात् । तस्माजगवदकौशलोदावनमेव महदकोशलमिति द्रष्टव्यम् ।। ९॥ शं०टी०-फलम विवक्षन् सात्त्विकत्यागमाह-कार्यमिति । विध्युङहनभीत्या मुमुक्षया च कार्य ममेदमवश्यं कर्तव्यमित्येव । कर्तव्यतायुद्धर्विकल्पान्वरनिषेधार्थ एवकारः । मयेदं कर्मेश्वरप्रीत्यै करणीय- मेवेति दृढनिश्चयवना मुमुक्षुणा नियतं विघ्युक्तं यन्नित्यं तत्कर्म, सनं कर्तृत्वाभिनिवेशं काम वा फलं च ।
. - श्रीमद्भगवद्गीता [म. १८ लो० १] पः समुखयायः। यद्यपि " स्वर्गकामः पशुकामः" इविवन्नित्यस्य कर्मणः फलं न श्रूयते, तथापि फलाभावे "अहरहः संध्यामुपासीत" इत्यादिकर्मविधेरुन्मतवाय इवानक्यं स्याचतो यत्किचित्फलं कल्पनीयमुपात्तदुरि- वक्षयलक्षणम् । वादृशफलं च फल कामनांपत्यक्त्वा परित्यज्येत्यर्थः । ननु फलानपेक्षायां सत्यां पुंसः प्र- तिरेव न स्यादिति चेन्न । साघोविध्युहननीत्यैव प्रवृत्तिसंभवात्, 'अविस्मृतिभ्यां मुजनो नियम्यते' इतिस्मृतेः । वैऽधै दन्वधायने ते मुसशुद्धिवद्विना फलकामनया कर्मणि झते कर्तु: "आपः शुन्धन्तु मैनसः" "पापेभ्यो रक्षन्ताम्" इत्यादिमन्त्रक्रियाशफिनलेन सत्त्वशुद्धिरचणं फलमर्यात्स्वयमेव सिध्यति । वस्फलं मोक्षया अतस्तन कामसंकल्पादि न कर्वन्यं, किंतु सर फलं पत्यक्त्या एवं नित्यं यत्कर्म कुरुते स त्यागः सात्त्विकः सत्त्वगुगनिष्पन्नत्वात्सात्त्विक इति मतः सतामिष्टस्वेनाभिमतः, कर्मफलभ्रंशाभावात्प्रत्यवायफवा- नर्थाभावाय पूर्वोकत्यागदयापेक्षया सात्त्विकर्मफलत्यागः श्रेष्ठ इत्यर्थः ॥९॥ श्री० टी०-सात्त्विकं त्यागमाह-कार्यमिति । कार्यमित्येवं युद्धा नियधमवश्यकव्यत्या विहित फर्मसहं फलं च त्यक्त्वा क्रियत इति यत् स वादशस्त्यागः सात्त्विको मनः ।।९।। स० टी०-तामसो राजसो हेय: फर्मत्यागश्च दर्शितः ।। कहिश. पुनरादेयः सात्त्विकस्त्याग उच्यते ॥ १ ॥ अवश्यं कायमेवेति युद्धपा शास्त्रविधवशात् ॥ कर्तृत्वाभिनिवेशाख्यं सनं त्यक्त्वा फलं आधा ॥२॥ नित्यं नैमिचिकं कर्म क्रियते सत्त्वशुद्धये ॥ आदेयत्वेन शिष्टाना स सागः सात्विको मतः ॥३॥ ननु नास्त्येव नित्याना फलं त्यक्त्वेवि वत्कथम् ।। उक्तमिसन च चूमः श्रीमनगवतो हरेः ॥४॥ वाक्यादेव फलं वेपामस्तीत्येवं हि गन्यते ॥ यतो न निष्फलस्यास्ति बुद्धिपूर्वमनुष्ठिविः ॥ ५ ॥ कर्मणा पितृलोकः स्यादित्यादिश्रुतिवाक्यतः ।। अवश्यं फलमस्त्येवानुनिष्पादि च कर्मणाम् ॥ ६ ॥ नित्यानामन- नुष्ठाने प्रत्यवायस्मृतिस्तथा ॥ प्रत्यवायक्षयं तेपा फलं स्वं दर्शयत्यतः ।। ७ ।। धर्मेण पापमित्यादिश्रुवयो दर्शयन्त्यपि ॥ साक्षात्फलं धियंः शुद्धिनित्यानामानुपगिकम् ॥८॥ पितृलोकादिसंप्राप्तिः प्रत्यवायक्षयस्तथा ।। मोहादा केशभीत्या का फलासते च सत्यपि ॥ ९॥ नित्यकर्मपरित्यागः क्रियते योऽविपशिवा ॥ स त्यागस्तामसत्वेन राजसत्वेन निन्दितः ॥१०॥ फलाभिसंघिसंत्यागो यस्तु कर्मणि सत्यपि ॥ स्तूयवे सात्त्विकत्वेन स त्यागः सत्त्वशोधकः ॥ ११ ॥ ९॥ भा० टी०-एवं राजसत्याप्रकारमुक्त्वा सात्त्विकं उमाह-कार्यमिति । सझं कर्तृत्वाभिनिवेशं फलं च त्यक्त्वा विहाय कार्य कर्तव्यमित्येव नियतं नित्यं यत्कर्म क्रियते, स त्यागः सात्त्विको मतः । ननु नित्याना विध्युद्देशे फलाश्रवणात् तेषां फलं त्यक्त्वेवि कथमुक्तमिति चेत्, नित्यानां कर्मणा फलवत्त्वे भगवद्वयनं प्रमाण- मिति गृहाण । अन्यथा भगवद्वचनमानर्थक स्यात् । यद्वा विधिना कृवस्य कर्मण आनर्थक्ये विभ्यानर्थक्य. प्रसङ्गात् श्रोतफलाभावेऽपि कर्माधिकृतो सो नित्यं कर्मकृतमात्मसंस्कार प्रत्यवायपरिहारं च फलं कर्तुः करोतीति कल्पयति वामपि कल्पनां निवारयति भगवान्-फलं त्यक्त्वेति । अयमेव त्यागश्चित्तशुद्धिहेतुरिति सूचनार्थमर्जुनेवि संवोधनम् । ननु कर्मपरित्यागस्त्रिविधो मत इति त्यागस्य त्रैविध्यं प्रस्तुत्य सङ्गफलत्या- गस्प तृतीयत्वेन कथनमयुक्तम् । यश त्यो प्राहाणा आगदास्तत्र सपइहवेदविदो द्वौ क्षत्रियस्तृवीय इति वद्वदिति चेन्नैप दोषः । कर्मसंन्यासस्य सद्गफलत्यागस्य च त्यागसामान्येन राजसतामसत्वेन कर्मत्यागनि- न्या सङ्गफलत्यागस्य तृतीयत्वेन प्रदर्शनस्य सात्त्विकत्वेन स्तुत्यर्थत्वादित्येयमाचार्य, प्रतिज्ञातं त्यागौ- विध्यं त्रिभिः श्लोकः प्रदर्शितम् । केचित्तु विशिष्टाभावरूपत्यागो विशेषगाभावाद्विशेष्याभावादुमयाभावाच त्रिविधः संप्रकीर्तित । तथाहि फूलाभिसंधिपूर्वकर्मत्यागः सत्यपि कर्मणि फलाभिसंधित्यागादेकः । सत्यपि फलाभिसंधौ कर्मत्यागात् द्वितीयः । फलाभिसंधेः कर्मणश्च त्यागातृतीय. । तत्र प्रथम, सात्विक आदेय. । । ।
। . [अ० १८ श्लो. १०] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेवा वेनात्रय विधित्सितः । द्वितीयस्तु दु सयुद्ध्या कृतो राजसः । विपर्यासेन कृवस्तामस: । इपि राजसताम- सभेदेन द्विविधोऽप्यत्रैव हेयत्वेन निन्दितः । तृतीयस्तु विदुपा कर्मानधिकारिणा विनिदिपुणा च कर्ते योग्यो द्विविधः । वत्राद्यः स्थितप्रज्ञलक्षणादौ प्राग्व्याख्यातः । द्वितीयस्तु " सिद्धि परमाम्" इत्यत्र वक्ष्यंत इवि वर्णयन्ति । अस्मिन् पक्षे एकस्मिन्द्रयोरन्दा फत्वा तृतीयः प्रदेशान्तरे प्रक्षिप्त इति प्रतिज्ञाया अनिहिी भगवती गहदकौशलसापादको द्रव्यः ॥ ९ ॥ ५० टी०-सात्त्विकं त्यागमाह-कार्यामिति । कार्यमवश्यकतव्यत्वेन प्राप्तमित्येव मत्वा नियतं नित्यं कर्म सङ्गं फलं च त्यक्त्वा यत्कियते स त्यागः सात्विको मतः । तदुक्तं भवति । वेदबोधितस्य कर्मणः प्रयोजनद्वयं दर्शितमस्ति स्वर्गादीष्टप्राप्तिः संसाराद्यनर्थपरिहारश्च । तवेष्टप्राप्तिीनस्य बडिशामिपप्राप्तिरिय दु.सगात्सुसेनावस्थानमेवानपरिहारः । तथाचोभयोमध्येऽवश्यकत्वेन किमनुष्टेयमिति विचारेऽनर्थपरिहार एवानुमातुं श्रेयानिति भगवतो हार्दम् ॥९॥ रा० टी०- कार्यमिति । कार्यमवश्यं कर्तव्यमन्यथा प्रत्यायादितिग्रुद्धया सझं मदीयमिति स्नेहं स्वर्गा- विफलं च त्यक्त्वैर नियतं वर्णाश्रमोचित कर्म यत् क्रियते स त्यागः कर्मानुष्ठानसहितः सात्विको मतः ॥९॥ न देष्टयकुशलं कर्म कुशले नानुपज्जते ।। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥ त०टी०--तदेवं साचिकत्यागेनोत्पन्नज्ञानस्य मुमुक्षोर्वर्तनाकारमाह-न देष्टीति । सत्त्वसमा- विष्टो यदा सत्त्वेनात्मानात्मनिवेकज्ञानहेतुना समाविष्टो व्याप्त अत एव मेगावी मेधा तत्वावधारणल- क्षणा बुद्धिस्तद्वान् नत एव छिन्नसंशयः, देहात्मयाधात्म्यनिश्चयेन छिनसंदेहः । एवंभूतो यः सात्त्वि- कत्यागी स अकुशलं शरीरदुःखायहं शिशिरे प्रातःस्नानमेकादश्युपवासजागरणादिकं कर्म न द्वेष्टि पतिकूलबुद्धया न त्यजति ! कुशले सर्वजनसामान्यप्रियत्वेनाभिमते ग्रीष्मेऽसकृत्स्नाननलक्रीडादिवा स्वापारामादनादौ नानुपज्जते प्रीत्यतिशयं न करोति । परिणामे सुखापादकं महदपि दुःखं सहते । संसारफलकं महदपि सुखं नेच्छतीत्यर्थः ॥ १० ॥ म०टी०-सात्विकस्य त्यागस्याऽऽदानाय सत्त्वशुद्धिद्वारेण ज्ञाननिष्ठा फलमाह- ह-नेति । यस्त्यागी सा. स्विकेन त्यागेन युक्तः पूर्वोक्तेन प्रकारेण कर्तृत्वाभिनिवेशं फलामिसधिं च त्यत्त्वाऽन्त,करणशुद्धयर्थ वि. हितकानुष्ठायी स यदा सत्त्वसमाविष्टः सत्वेनामानात्मविवेकज्ञानहेतुना चित्तगतेनातिशयेन सम्यग्ज्ञान- । प्रतिवन्धकरजस्तमोमलराहित्येनासमन्तात् कलाव्यभिचारेणाविष्टो क्यातो भवति भगवदर्पितनित्यकर्मानुष्ठा- नात पापमलापकर्पलक्षणेन ज्ञानोत्सत्तियोग्यतारूपपुण्यगुणाधानलक्षणेन च संस्कारेण संस्कृतमन्त करणं यदा भवतीत्यर्थः । तदा मेधावी शमदमसर्वकोपरमगुरूपसदनादिसामवायिकाइयुफेन मनननिदिध्यास. नारयफलोपकार्यमायुक्तेन च श्रवणास्यवेदान्तवाक्यविचारेण परिनिष्पन्नं वेदान्तमहावाक्यारम निरस्त- समस्ताप्रामाण्याशई चिदन्याविषयकमई ब्रह्मास्मीति ब्रह्मात्मैक्यज्ञानमेव मेधा, तया नित्यं युफो मेधावी स्थितप्रज्ञो भवति, तदा छिन्नसंशयः अहं नहास्मीति विद्यारूपया मेधया तदविद्योच्छेदे तकार्य. संशयविपर्ययशून्यो भवति, तदा च क्षीणकर्मवात न द्वेष्टयकुशलं कर्माशोभनं काम्य निपिद्ध वा कर्मन प्रतिकूलत्या गन्यते, कुशले शोभने नित्ये कर्मणि नानुपवते न प्रीति करोति कर्तृत्वाद्यभिमानरहितत्वेन' कृतकृत्यत्वात् । तथा च श्रुति.-' भिद्यते हृदयमन्धिश्चिन्यते सर्वसंशयाः । श्रीयन्ते चास्य कमीणि सस्मि- दृष्टे पराघरे । इति । यस्मादेवं सात्त्विकस्य त्यागस्य फलं तस्मान्मइवाऽपि प्रयत्नेन'स एवो. पादेय इत्यर्थः ॥ १० ॥ . * १९८२ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ प्रो०१० शं० टी०-एवं तामसादित्यागत्रयस्वरूपं प्रतिपाद्य बहुजन्मस्वीश्वरार्पणवुद्धपा फलाभिसंधिरदिवनया सात्विकत्यागनिष्ठया सम्यगनुष्ठितैर्यज्ञदानादिकमभिः सम्यक्संस्कृतत्वेन विशुद्धान्तःकरणस्य शमदमा- दिसत्त्वगुणसंपन्नस्य सात्त्विकत्यागेनान्तःकरणपरिपाकसिद्धेः फलमाह-न देष्टीति । सात्विकत्यागनिष्ठया भवत्याऽनेकजन्मभिः समाराधितपरमेश्वरप्रसादसंपन्नस्त्यागी सात्त्विकत्यागनिष्ठः पुरुषः सत्यसमाविष्टः सत्त्वं रजस्तमत्वत्कार्यविनिर्मुक्त आत्मानात्मस्वरूपनिर्धारणसमर्थोऽन्तःकरणपरिपाकविशेषत्वेन समाविष्टः सम्यग्विशिष्टः स एव मेधावी ब्रह्मविद्गुरोः सझदुपदेशमात्रेण ग्रीवाहमिति संप्राप्तात्मतत्त्वविज्ञानस्तत एक छिन्नसंशयः छिन्नः स्वस्य कूटस्थासङ्गचिदात्मत्यविज्ञानेन विच्छिन्नः संशयः संचितागामिवर्तमानकर्मभिर्मम लेपोऽस्ति वा न वा, कर्तृत्वभोक्तृत्वादिलक्षणः संसार आत्मनो वाऽनात्मनो वा, मोक्षकारणं योगो वाप्यु- पास्तिर्वा कर्म वा ज्ञानं वा तनिष्ठा वा, मोक्षः सालोक्यादि निर्विशेषात्मनावस्थानलक्षणो या ऽन्यो वा, इत्येवमादिर्यस्य स छिन्नसंशयः उत एवाकुशलं न लभ्यः शुशलं नि:श्रेयसं येत तदकुशलं शरीरारम्भकत्येनेदं संसारलक्षणं वन्धकमिति काम्यं कर्म च नरकहेतुत्वेनेदं दुःसकारणमिति निपिद्धमपि किमनेनेति न द्वेष्टि द्वेषोऽप्रीतिस्तामत्र न करोति । वमःकृतमोहाभावादिदं दुष्टं बन्धकं न कर्त- व्यमिति बुद्धिं न करोतीत्यर्थः । कुशले कुशलसाधने यज्ञदानादौ कर्मणि नित्ये मोक्षकारणमिति नानुपजवे। अनुपङ्गः प्रीतिस्तां न करोतीति मुक्तस्य मोक्षेच्छाऽसंभवे साधनापेक्षाभावात्तत्र कर्तव्यत्यबुद्धि न करोति, कितु ' दोपबुद्धघोभयातीतो निषेधान्न निवर्तते । गुणबुद्धपा च विहितं न करोति यथार्भकः' इति न्यायेन कुशलमफुशलं च कर्म सर्व संन्यस्य ब्रह्मात्मना विष्ठवीत्यर्थः । एतेन सर्वकर्मफलकामनात्यागपूर्वकमीश्वरा- पणबुद्धया सम्यगनुष्ठितरेव यज्ञदानादिभिः सत्वशुद्धिः । शुद्धसत्वस्यैव सम्यग्ज्ञानं ब्रह्मास्मैकत्वविपयकम. प्रतिबद्धं सम्यग्ज्ञानवत एव संशयादिविच्छित्तिः सर्वकर्मसंन्यासः सनिष्ठा च सिध्यतीति योधितं भवति । ततो ज्ञानकर्मणोः साध्यसाधनभाव इति सिद्धम् । यत्सर्वस्यापि गीवाशास्त्रस्य सर्वस्यापि च वेदस्य तात्पर्य उच्चाप्याविष्कृतं भवत्तीति चेदिवन्यमित्यर्थः ॥ १० ॥ श्री०टी०-एवंभूतसात्त्विकत्यागपरिनिष्ठितस्य लक्षणमाह-न द्वेष्टीति । सत्त्वसमाविष्टः सत्येन सं. व्याप्तः सात्त्विकत्यागी अकुशलं दुःखावह शिशिरे प्रातःस्नानादिकं कर्म न द्वेष्टि । कुशले च सुखकरे कर्मणि निदाघे माध्याहस्नानादौ नानुपजते प्रीति न करोति । तत्र हेतुः-मेधावी स्थिरबुद्धिः । यत्र परपरिभवादि महदपि दुःखं सहते स्वर्गादिसुखं च त्यज्यते नत्र कियदेतत्तात्कालिक सुखं दुःखं चेत्येवमनुसंधानवानि- त्यर्थः । अत एव च्छिन्नः संशयो मिथ्यावानं दैहिकसुखदुःखयोरुपादित्सापरिजिहीपलिक्षणं यस्य सः॥१०॥ : स० टी०-सात्विकस्त्याग आदेयः सत्त्वशुद्धपात्मलब्धये ॥ इत्युक्तं वत्फलं ज्ञाननिष्ठामाहाधुना हरिः ॥ १ ॥ यस्त्यागी सात्त्विकेनैव त्यागेन युत उच्चमः ॥ त्यक्त्वा फलाभिसंधि च कर्तृत्वाभिनिवेशनम् ॥ २ ॥धीशुद्धय विहितं कर्म कुर्वन्भगवदर्पणम् ।। तत्प्रसादाप्तधीशुद्धिस्तया प्राध्याधिकारिताम् ॥३॥ सत्त्वेन तत्त्वविज्ञानहेतुभूतेन संयुतः ।। वैराग्यसद्विवेकादियोग्यतापूर्वकेण च ॥ ४ ॥ असंदिग्धावि- पूर्यस्तवेदान्वक्षसां सदा ॥ विचारेण सुनिष्पन्नाई ब्रह्मास्मीति या मतिः ॥ ५॥ सा मेधा यस्तया नित्यं, -युक्तो मेधाव्युदारधीः ॥ मेधावित्त्वेन संछिन्नः संशयो यस्य मोहजः ॥ ६ ॥ स्वारमावस्थाममेवास्ति पर मोक्षकसाधनम् ।। नैवान्यत्किचिदित्येवं निश्चयेन प्रमात्मना ॥ ७ ॥ तदेव क्षीणकर्मत्वाकाम्यक यशो- ' भनम् ॥ प्रतिकूलतया नायं मन्यते स्वात्मनि स्थितः ॥ ८॥ कुशले शोभने नित्ये न करोति रति .मुधीः ।। छतकृत्यतया तृप्तरत्यक्तकर्तृत्वधीर्यतः ॥ ९॥ भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ॥ श्रीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ १० ॥ त्यागस्य सात्त्विकस्यास्ति यस्मादेवं फलं ततः ॥ महताऽपि प्रयत्नेन स आदेयो मुमुक्षुणा ॥ ११ ॥१०॥ . .
[अ० १८१०] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपता भा० टी-एवं सात्त्विकं स्यागमुक्त्वा योऽधिकृतः सङ्गं फलाभिसंधि च त्यक्त्वा कर्म करोति तादृश- कर्मानुप्तानेन संस्कृतात्मा सन् जन्मादिविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियमात्मानमात्मत्वेन संबुद्धः सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नासीनो नैष्कयलक्षणां ज्ञाननिष्ठां प्राप्नोतीत्येवत्पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजन- माह-न देतीति । यस्त्यागी पूर्वोक्तसङ्गफलत्यागवान नित्यकर्मानुष्ठायो यदा सत्त्वसमाविष्टः सङ्गं फलाभिसंधि च त्यक्त्वा कर्मानुधानत: सङ्गफलाम्यामकलुपीक्रियमाणं नित्यैश्च कर्मभिः संस्क्रियमाणं विशुद्ध समुदुद्धस- 'स्वमारमानात्मविवेकविज्ञानहेत्वन्त:करणं सत्त्वमत्र ग्राहां, तेन समाविष्टः संव्याप्तः संयुक्त इति यावत् । अत , एव मेधावी ब्रह्मात्मज्ञानलक्षणा प्रज्ञा मेधा तद्वान् मेधावी । मेधावित्वादेव ब्रह्मात्मस्वरूपावस्थानमेव पर निःश्रेयससाधनं नान्यत् किंचिदित्येव निश्चयेन छिन्नोऽविद्याकृतः संशयो यस्य स रिछन्नसंशय: । तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय" । "भिद्यते हृदयग्रन्धिप्रियन्ते सर्वसंशया: क्षीयन्ते चा. स्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे " इति श्रुते: स तदा अकुशलमशोभनं काम्यं निषिद्धं च कर्म न द्वेष्टि काम्या- दिकर्मशरीरारम्भादिद्वारेण संसारकारणमत: किमनेनेत्येवं द्वेपं न करोति । कुशले चिचशुद्धपादिद्वारा मोक्ष- हेतुत्वात् शोभने नित्ये कर्मणि नानुपनवे सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तितन्निहेतुत्वेन मोक्षकारणमतोऽनेन मदीयं प्रयोजन सेत्स्यतीत्यनुपङ्गमासक्ति प्रीति न करोतीत्यर्थः । एवंभूतसात्त्विकपरित्यागनिष्ठस्य लक्षणमाह- सत्त्वसमाविष्टः-सात्त्विकत्यागी अकुशलं दुःखावहं शिशिरे प्रात.स्नानादि कर्म न द्वेष्टि कुशले च सुखकरे कर्मणि निदाघे मध्याहतानादी नानुपनवे प्रीति न करोति । तत्र हेतुः-मेधावी स्थिरबुद्धिः। यत्र परपरिभ- वादिमह दुःखमपि सह्यते स्वर्गादिसुरां च त्यज्यते तत्र कियदेतत्कालिक सुखं दुःसं चैवमनुसंधानवान् इत्यर्थः । अत एव छिन्नः संशयो मिश्याज्ञानं देहिकमुखदुःसयोरुपादित्सापरिजिहीपलक्षणं यस्य स इत्यपरे । इचरे तु स तु त्यागी सात्त्विकत्यागकर्ता । तुशब्दस्तामसराजसत्यागकर्तृतो विशेपयोतकः । अकुशलगविवेकिन मोक्षकथानभिज्ञ देहाभिमानिनम् । अत एवान्तःकरणशुद्धिप्रयोजककर्माचरणासहिष्णु • किमर्थ वा एतत्कर्माचरसि किंवा पुनदारादिनिर्वाहकृत्कर्म त्यजत्येिवमादि जल्पन्तं न द्वेष्टि धिक् त्वां परतो गच्छेत्येवमादिचेष्ठाभावात द्वेष न करोचीत्यर्थः । तथा कर्मकुशले नित्यनैमित्तिककर्माचरणकुशले तन्मात्रासात्कलत्यागवति स्वसमाने नानुपज्जते । ददाति प्रतिगृहाति गुह्यमाख्याति पृच्छति । भुके भोजयते चैव षड्डिधं प्रीविलक्षणम् । इत्युक्तमनुषङ्गं न करोति । ननु तस्योभयविधलिङ्गदर्शनात् संशय एवं किं न स्यादित्यत उक्तम्-छिनसंशयः संशयरहितः । तत्रैव हेतुमाइ-मेधावीति । स्वीकरणनिश्चयधारणा- वान् । कुतोऽयं निश्चयस्तस्येत्यत उफन्-असमाविष्ट इति । असमे क्षयिफलान्तरासदशे निरविशयानन्दरूपे फले आविष्टो लिप्सावान् अत ईदगलक्षणो योगी त्यागी ज्ञेय इति भाव इति वर्णयन्ति । एवममुख्यं सा- त्विकं त्यागमुक्त्वा मुख्यं तमाह-न द्वेष्टि सत्वेन सम्यगाविष्टो व्यातस्त्यागी मुख्यः सात्विकत्यागी संन्यासीत्यर्थः । अकुशलमसुखप्रदं कर्म विपर्वणस्तानचतुर्गुणशौचभिक्षाटनादिप्रयासरूपं न द्वेष्टि । कुशले मिष्ठान्नभक्षणादौ नानुपचते प्रीति न करोति । यद्वा कर्भकुशले सेवादिकर्मकुशले शिष्यादौ नानुपनवे तमाकुशलं वा न द्वेष्टि । एतेन रागद्वेषशून्यत्वमस्य दर्शिवम् । वदपि कुन इत्यपेक्षायामाइ-मेधावीति । अहापोहा- शलतया नित्यानित्यवस्तुविवेचनादौ प्रज्ञावान् । अनेन मोदाचात्य परित्याग इत्युक्ताचामसात्यायन च्याति। मेधावित्वादेव छिन्नसंशयः। किं कर्माप्येवमुफिसाधनानि उत संन्यास एवेतिसंशयरहितः । अनेन कार्य. मित्येवेत्युक्तादमुख्यसात्त्विकत्यागात् व्यावृत्तिरेव । त्यागीत्यनेन यज्ञो दानमित्युत्पादस्यागात् पूर्थिन काये- त्युक्ताद्वाजसात्यागात् व्यावृत्चिरित्यन्ये । आचार्योफव्याख्यानापेक्षयोदातव्याख्यानरयेऽप्यविक खार. स्यं चिन्त्यम् ॥ १०॥ . ।
- श्रीमनगवद्गीता [अ० १८० ११] १० टी०-अथैवंभूतसात्त्विकरयागपरिनिष्ठितस्य लक्षणमाद-न दृष्टीति । त्यतरजस्तमः सत्वेन समाविष्टः प्रविष्ट एवंविधरत्याग्यकुशलं देहपीडाकरं कर्म न द्वेष्टि पतबकार्यमिति न मनुवे । तथा कुशले. निदाघे मध्याहानानवदेहसुपावहे कर्मणि नैव सजते, एतत्मुसकरमिति प्रीति न कुरुते । अनेन काय. शभयात्त्यजेदित्यादिवद्रजोगहित्यं दर्शितम् । यतो मेवाची बुद्धिमान् देहिकमुरादुरगे अमन्यमानोऽव पर मन्मतावलम्बनेन छिन्नसंशयः ॥१०॥ रा० टी०-सात्त्विकत्यागिनो विशेषणान्याह-न द्वेष्टीति । अकुशलं तात्कालिकमुसदं न किं तु कायछे' शदुःखदं कर्म न द्वेष्टि । कुशले पूर्जितपुण्यफले मानुपजते नेच्छति । सत्त्यसमाविष्टः सम्यक्सत्त्य. गुणेन व्याप्त: मेधावी भगवत्तत्त्वज्ञानी उिन्नसंशयः परापरतत्त्वविपये भगरधर्मानुष्ठाने या संदेहहीनः त्यागी भगवति सर्वधर्मसमर्पणपास सात्त्विकत्यागीत्यर्थः ॥ १० ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेपतः ।। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ त० टी०-ननु सत्यसमाविष्टः कुशलाकुशलयोः कर्मणोर्यदि प्रीतिद्वेषी न करोति, तर्हि किमर्थ तदनुष्ठानं फलाभावात् । फलाभिसंधिमाऽनुष्ठितस्य च वन्धकत्वमसकदुक्तमेव । तस्मान्मुमुक्षुणा सर्व- मेष कर्म त्याज्यमित्याशङ्कयाह-न हीति । देई विभीति देहभृत् तेन देहभृता उत्पन्नज्ञानेनानु- त्पन्नज्ञानेन वा कर्माण्यशेषतस्त्यक्तुं नैव शयानि । देहनिर्वाहहेतूनां भोजनाच्छादनाधर्थककर्मणाम- वर्जनीयत्वात् । तस्माद्यस्तु कर्मफलत्यागी कर्मफलानपेक्षी स त्यागीत्यभिधीयते निरूप्यते ॥ ११ ॥ म. टी-तदेवमात्मज्ञानवत: सर्वकर्मत्याग: संभाव्यते कर्मप्रवृत्तिहेत्वो रागद्वेपयोरभागादित्युक्तम् । संप्र. त्यस्य कर्मत्यागासंभवे हेतुरुच्यते-नहीति । मनुष्योऽहं प्राह्मणोऽई गृहस्थोऽहमित्याद्यभिमानेनानाधितेन देई. कर्माधिकारहेतुवर्णाश्रमादिरूपं कर्तृमोक्तृत्वाद्याश्रयं स्थूलसूक्ष्मशरीरेन्द्रियसंघात विमति अनाद्यविद्यावा, सनावशाद्वयवहारयोग्यत्वेन कल्पितमसत्यमपि सत्यतया स्पभिन्नमपि स्वाभिन्नतया पश्यन् धारयति पोप. यति चेति देभृदयाधिवकर्माधिकारहेतुदेहाभिमानस्तेन विवेकशानशून्येन देहभृता कर्मप्रवृधिहेतुरागद्वेष- पोकल्येन सततं कर्मसु प्रवर्तमानेन कर्माण्यशेषतः निःशेपेण त्यक्तुं हि यस्मान्न शम्यं न शम्या- कारणसामय्या कार्यत्यागस्याशक्यत्वात् । तस्मात् यस्त्वज्ञोऽधिकारी सत्त्वशुद्धप क. माणि कुर्वन्नपि भगवदनुकम्पया तत्फलत्यागी । तुशब्दरतस्य दुर्लमत्वद्योतनार्थः । स त्यागीत्यभिधीयते गोण्या वृत्त्या स्तुत्यर्थगत्याग्यपि सन् । अशेषकर्मसंन्यासस्तु परमार्थदर्शिनेव देहभृता शस्यते कर्तुमिति स एव मुख्यया वृत्त्या त्यागीत्यभिप्रायः ।। ११ ।। शं० टी०-इदानी नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानेष्वधिकृतो • देहात्मयुद्धिः पुरुषस्तस्याशेषकर्मपरित्याग. स्याशस्यत्वात्कर्मफलत्यागेन कर्मानुष्ठान एकाधिकारो न तु कर्मत्याग इति प्रतिपादयति-न होति । हि यस्मात्कारगादेहभृता देहमयमेवाहमिति स्वात्मना विभीति देहभृत् देहात्मवुद्धिरज्ञ एवं कर्माधिकारी नत्वात्मज्ञस्तस्य कूटस्थमेवात्मानं सर्वदृश्यविलक्षणं पश्यतो विदुपो देहात्मत्वयुद्धपसंभवात्कर्माधिकारानु- पपत्तेरई कति कर्तृत्वाभिमानिनः। एवं देहायबुद्धेः कर्मण्यधिकारस्ततो देहभृताऽनात्मज्ञेन अशेषतोऽशेपा- णि नित्यनैमित्तिककाम्यप्रतिषिद्धान्यन्यान्यपि च काणि युक्तुं संन्यसितुं न शक्यं तस्याकत्मिज्ञानामा. वात् । यस्स्वकस्मिज्ञानवान् भवति तस्यैवाशेपकर्मसंन्यास उपपद्यते न लन्यस्य । तस्मादयस्त्वनात्मनः कर्म- श्यधिकृतः सन् कर्मफलत्यागी भवति स एव त्यागी सर्वकर्मसंन्यासी निष्काम इत्यभिधीयते । सर्वेषामपि नि सत्या . श्रीमउगवदगोवा [अ० १८ लो० १२] तामिमानेन देहं वर्णाश्रमाश्रयम् ॥ कर्तृत्वाद्याश्रयं स्थूलसूक्ष्मसंपातमाहात् ॥ ३ ॥ विभत्यनादविद्यादि. वशादात्मतया स च ॥ देहभृचेन फर्माणि फर्मण्येवाधिकारिणा ॥ ४ ॥ विवेकज्ञानशून्येन रागद्वेपरवा सदा । त्यक्तुं नि.शेपतो यस्मान्न शक्यानि कथंचन ॥५॥ सत्यां कारणसामन्यां कार्यत्यागोऽतिदुष्करः । तस्मादशोऽधिकारी यः पुर्वकर्माणि शुद्धये ॥६॥ फलाभिसंधिसत्यागी तुशब्देनातिदुर्लभः ।। स त्यागीत्युच्यते गोण्या वृत्या मुरयस्तु तस्यचित् ॥ ७ ॥ ईश्वरानुप्रात्कर्मफलत्यागितया मुभीः ॥ युज्यते तत्ववोन नान्यथेत्याशयो हरेः॥ ८॥ ११ ॥ भा० टी०-तदेवं सात्त्विकत्यागवतः शुद्धचित्तस्य सर्वकर्मत्यागे मुख्पसंन्यासेऽधिकार प्रदर्याधिय- वस्य देहाभिमानित्वेन देहभृतोऽतस्यायाधितात्मकस्यविज्ञानवयाई कवि निश्चितबुद्धेरशेपकर्मपरित्याग. स्याशक्यत्वात् फर्मफलत्यागेन विहितकर्मानुष्ठाने एवाधिकारो न त्याग इत्येतमर्थ दर्शयितुमाह-नहीति । हि यस्मादेहभृता देई स्यात्मत्येन विभति धारयतीति देहभृत् देहाभिमानवान् वेनाक्षेनाशेषतः नि:शेपेण सर्वाणि कर्माणि त्यक्तुं संन्यसितुं न शम्यते । तस्माद्यरत्वज्ञो देहवधिकृतो विहिचानि कर्माणि कुन् तरफलत्यागी कर्मफलाभिसंधिमानसंन्यासी स त्यागीत्यभिधीयते । कपि सन् त्यागीति स्तुत्यभिप्रायेणो- तम् । तथाच परमार्थदर्शिना देहाभिमानशून्येनाशेपकर्मसंन्यास. शम्यवे कर्तुमिति भावः ॥ ११ ॥ ५० टी०-तदेवाह-न हीति । देहभृता देहाभिमानयता दैहिकव्यवहाराय फरपरणव्यापार फुर्वता. ऽशेपतः कर्माणि त्यक्तुं न हि शक्यम् । कायछेशश्यात्कथं त्यक्तुं शक्यत इत्यर्थः । न हि कश्चित्क्षणम- पीति पूर्वमेवोकम् ॥ ११ ॥ रा० टी०-पूर्व कर्तव्यानीति मे पात्यत्र सङ्गफलत्याग एवं त्यागशब्दार्थ इति स्वसिद्धान्तो निर्णीतः । अधुना त्यायं दोपवदिविपक्षस्य वीजखण्डनाय सर्वकर्मपरित्यागो वा विहितकर्मत्यागो या न त्यागश- ब्दार्थः । येन त्याज्यं दोपवदित्यस्य सर्वकर्मत्यागोऽर्थ इत्युच्यत इतिभावेनाह-न हीति । अशेषतः कर्माणि । त्यक्तुं न शक्यम् 'नहि कश्चिरक्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्' इत्युक्तेः । नापि विहिताशेषत्यागः 'स्वयज्ञादीप. रित्यज्य निरयं यान्ति । इविप्रत्यवायस्मरणादिति भावः । हि यस्मादशक्यं तस्माद्यस्तु कर्मफलत्यागी स एव त्यागीत्यभिधीयते । अतस्त्याज्यमिति पक्षस्यापि फलत्याग एवार्थ इति भावः ॥ ११ ॥ अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।। भवत्यत्यागिनां प्रेत्यान तु संन्यासिनां कचित् ॥ १२ ॥ त० टी०-ननु यथा देहपुष्टयुदेशाभावेनापि कृतस्य दधिदुग्धमिष्टान्नादिभोजनस्य पुष्टिफलत्य- दर्शनात तथा विधिनानुष्ठितकर्मणामिह फलोदेशाभावेऽपि मेत्पेष्टानिष्टं फलं स्यादेवातो मोक्षविरो- धित्वान्मुमुक्षुणा हेयमेव सर्व कर्मेति चेत् तताह-अनिष्टमिति । अनिष्टं नरकतिर्यगादिप्राप्तिफलम् , इष्टं दिव्यभोगप्राप्तिलक्षणं, मिश्रमिष्टानिष्टं मनुष्यसंवन्धिपुत्रपचन्नादीति त्रिविधं कर्मणः शुभाशुभस्य 'फलमत्यागिनां फलत्यागरहितामामेव प्रेत्य देहत्यागादूर्ध्व देहान्तरे भवति । न तु संन्यासिनां सम्यक् त्यक्तफलानां कचिदपि मोक्षविरोधिफलं भवति । एवं च साचिकानां पापाचारासंभवान्नानिष्टो. त्पत्तिः । मुकवानां तु भगवत्यर्पितत्त्वान्न तझोगोत्पचिरत एव मिश्रमपि न भवति । तस्मानोक्त- शङ्काऽवकाशः॥१२॥ मटी०-ननु देहभृत: परमात्मज्ञानशून्यस्य कर्मिणोऽपि कर्मफलाभिसंधियागित्वेन गौणसंन्यासिनः परमात्मज्ञानवतो देहाभिमानरहितस्य सर्वकर्मत्यागिनो मुख्यसंन्यासिनश्च क. फले विशेपो यदलाभेन गौण- ।
. [अ० १८० १२] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १८७ त्वमेकस्य याभेन च मुख्यत्वमन्यस्य, कर्मफलत्यागित्वं तु द्वयोरपि तुल्यमित्यन्यो विशेपो वाच्यः । उच्यते-- अनिष्टमिति। अत्यागिनां कर्मफलत्यागित्वेऽपि कर्मानुष्ठायनामज्ञाना गौणसंन्यासिनां प्रेत्य विविदियापर्यन्त- सत्यशुद्धः प्रागेव मृताना पूर्वकृतस्य कर्मण: फलं शरीरग्रहणं भवति मायामयं फल्गुतया लयमदर्शनं गच्छतीति निरः । कर्मण इति जात्यभिप्रायमेकवचनं, एकस्य त्रिविषफलत्यानुपपत्तेः । तब फलं कर्मणस्त्रिविधत्वात् त्रिविधं पापस्यानिष्टं प्रतिकूलवेदनीय नारकतिर्यगादिलक्षणं, पुण्यस्य इष्टमनुकूलवेदनीयं देवादिलक्षणं, मित्रस्य तु पापपुण्ययुगलस्य मिश्रमिष्टानिष्टसंयुक्तं मानुष्यलक्षणमित्येवं विविधमित्यनुवादो हेयत्वार्थः । एवं गौणसन्यासिनां शरीरपातादूर्ध्व शरीरान्तरप्रहणमावश्यामित्युक्त्वा मुख्यसंन्यासिनो परमात्मसाक्षात्का- रेणाविद्यावत्कार्यनिवृत्तौ विदहकैवल्यमेवेत्याह-नतु संन्यासिनां कचित् । परमात्मशानववा मुख्यसंन्यासिना परमहंसपरिप्राजकानां प्रेत्य कर्मण: फलं शरीरग्रहणमनिष्टमिष्टं मित्रं च कचिद्देशे काले वा न भवत्येवेत्यव. धारणार्थस्तुशब्दः, ज्ञानेनाज्ञानस्योच्छेदे तत्कार्याणां कर्मणामुच्छिन्नत्वात् । तथा च श्रुति:-'भिद्यते हृदयम. थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशया: । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि वस्मिन्दष्टे परावरे' इति । पारम च सूनम्-'तद- धिगम उत्तरपूर्वाधयोरलेपविनाशौ तद्व्यपदेशात् ' इति परमात्मज्ञानादशेषकर्मक्षयं दर्शयति । तेन गौणसंन्या- सिना पुनः संसारः मुख्यसंन्यासिनां तु मोक्ष इति फले विशेष उक्तः । अत्र कश्चिदाह 'अनाश्रितः कर्मफलं कार्ये कर्म करोति यः ।स संन्यासी च' इत्यादौ कर्मफलत्यागिषु संन्यासिशब्दप्रयोगात् कर्मिण एवान फल. स्यागसाम्यात् सन्यासिशब्देन गृह्यन्ते । तेषां च सात्त्विकानां नित्यकर्मानुष्ठानेन निपिद्धकर्माननुष्ठानेन च पापासंभवान्नानिष्ट फलं संभवति नापीट काम्याननुष्ठानात , ईश्वरार्पणेम फलस्य त्यक्तत्वाच । अत एव मिनमपि नेति त्रिविधर्मफलासंभवः । अत एवोक्तम् 'मोक्षार्थी न प्रवर्तेत वर काम्यनिषिद्धयोः । नित्यनैमि- त्तिके कुर्यात्प्रत्यवायजिहासया' इति । स वकन्यः शब्दस्यार्थस्य च मर्यादा न निग्धारि भवतेति । तथाहि- "गौणमुख्ययोर्मुख्य कार्यसंप्रत्ययः" इति शब्दमर्यादा । यथा “अमावास्यायामपराहे पिण्डपितृयज्ञेन चर. न्ति" इत्यन्न अमावास्याशब्द काले मुख्यः । तत्कालोपन्ने कर्मणि च गौणः 'य एवं विद्वानमावास्यायां यजते। इत्यादौ । तत्रामावास्यायामिति कर्मग्रहणे पितृयज्ञस्य तदङ्गत्वान्न फलं कल्पनीयमिति विधेाधवमिति पूर्व- पक्षितं कात्यायनेन-"अङ्गं या समभिव्याहारात" इति 1 गौणार्थस्य मुख्यार्थोपस्थितिपूर्वकस्वान्मुख्यार्थस्य चेहा- वाधादमावास्याशब्देन काल एवं गृह्यते । फलकल्पनागौरवं तृत्तरकालीनं प्रमाणवत्त्वाङ्गीकार्यमिति सिद्धा. न्तितं जैमिनिना-"पितृयज्ञः स्वकालत्वादनङ्गं स्यात्" इति । एवं स्थिते संन्यासिशब्दस्य सर्वकर्मत्यागिनि मुख्यत्वात् कर्मिणि च फलत्यागसाम्येन गौणत्वामुख्यार्थस्य चेहावाधात्तस्यैव संन्यासिशब्देन ग्रहण- मिति शब्दमर्यादया सिद्धम् । सत्यां कारणसामघ्या कार्योत्पाद इति चार्थमर्यादा । तथाहि ईश्वरार्पणेन स्यक्तफर्मफलस्यापि सत्त्वशुद्धधर्थ नित्यानि कर्माण्यनुतिष्ठनोऽन्तराले मृतस्य प्रागनिवैः कर्मभिविविध शरीरप्रहणं केन आर्यते 'यो वा एनदक्षर गाविदित्वाऽरमालोकायुति स कृपणः' इति श्रुतेः । अन्ततः सत्त्वशुद्धि फलज्ञानोत्पत्त्यर्थ तदधिकारिशरीरमपि वस्त्यावश्यकमेव । अत एव विविदिपासंन्यासिनः अवणा- दिकं फुर्वतोऽन्तराले मृतस्य योगनशब्दवाच्यस्य 'शुचीना श्रीमता गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते' इत्याविन्य मानाधिकारिशरीरप्राप्तिरवश्यं भाविनाति नितिं पठे, यत्र सर्वकर्मत्यागिनोऽप्यज्ञस्य शरीरग्रहणमा. श्यक, तत्र कि वक्तव्यमस्य कर्मिण इति । तस्मादशत्यावश्यं शरीरपणमित्यर्थमयादया सिद्धं पराकान्त चैकाविकपक्षनिराकरणे सूरिभिः । तस्माद्यथोक्तं भगवत्पूज्यपादभाष्यकृतं व्याख्यानमेव व्यायः। सदयमत्र निष्कर्ष:-अकभोक्तपरमानन्दाद्वितीयसत्यस्वप्रकाशनझामसाक्षात्कारेण निर्विकल्पेन वेदान्तवाक्यजन्येन विचारनिश्चिवप्रामाण्येन सर्वप्रकारामामाण्यशङ्काशून्येन ब्रह्मात्मज्ञानेनारमाशाननिवृत्तौ त कार्यकत्वाभिमा- ।
. - १९८८ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० १२] नरहित: परमार्थसंन्यासी सर्वकर्माच्छेदाच्छुद्धः केरल: सन्नाविद्याकदिनिमिचं पुनः शरीरमईणमनुभवति, सर्वभ्रमाणां कारणोच्छेदेनोच्छेदात् । यस्त्वविद्यावान् कर्तृत्वाभिमानी देहभृत् स त्रिविधः रागादिदोपप्रात्र- ल्यात् काम्यनिपिद्धादियथेष्टकर्मानुयायी मोक्षशास्त्रानधिकार्येकः। अपरस्तु यः प्राक् झवसुझतवशात् किंचि- प्रक्षागरागादिदोष: सर्वाणि कर्माणि त्यक्तुमशक्नुवनिषिद्धानि कान्यानि च परित्यज्य नित्यानि नैमित्तिकानि च फर्माणि फलाभिसंधित्यागेन सत्वशुद्धपर्थमनुतिष्ठन् गौणसंन्यासी मोक्षशास्त्राधिकारी विवीयः सः। ततो नि- त्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानेनान्तःकरणशुद्धया समुपजातविविदिपः अागादिना वेदन, मोक्षसाधनं संपिपाद- यिपुः सर्वाणि कर्माणि विधित; परित्यज्य ब्रह्मनिष्ठं गुरुमुपसर्पति विविदिपासंन्यासिसमारूयस्तृतीयः । वाद्यस्य संसारितं सर्वप्रसिद्धम्। द्वितीयस्य त्वनिष्टमित्यादिना व्याख्यातम् । तृतीयस्य तु 'अयति: श्रद्ध- योपेतः इति प्रभमुलाप्य निवि पष्ठे । अज्ञस्य संसारित्वं ध्रुवं कारणसामध्या: सत्त्वात् । तत्तु कस्यचि- अज्ञानाननुगुणं कस्यचिज्ज्ञानानुगुणमिति विशेषः । विज्ञस्य तु संसारकारणाभावात् स्वत एव कैवल्यमिति दो पदार्थों सूत्रितावस्मिन् लोके ।। १२॥ शं० टी०-एवं तामसादित्यागवतामापाततोऽकर्मिणामपि कमित्वं सात्त्विकत्यागिनस्त्वमित्वं च प्रतिपाद्य कर्मिणां कर्मफलमकर्मिणां तदभावं च प्रतिपादयति-अनिष्टमिति । अनिष्टं पापकर्मफलं नाफ- त्वं निर्यक्त्वं वा, पुण्यकर्मफलमिष्टं देवत्वं, मिश्रमुभयमित्रफलं मनुष्यत्वं च " पुण्येन पुण्यलोक नयति" इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धं त्रिविधं विप्रकारकमपि' कर्मफलमत्यागिनां कर्मवत्फलत्यागमफुर्वतां तामसादित्यागिनां प्रेत्य मरणादूर्व भवत्येव । वाचा त्यागेऽपि क्रिययों कर्मणां त्यागाभावात्कृतातt कर्मणां फलावश्यंभावित्वाश विविध कर्मफलमत्यागिनां भवत्येव न तु संन्यासिनी, कर्मफळत्यागसंजातसत्त्वशुद्धिसंभावितात्मज्ञानेन संन्यस्ता कुशलादिसर्वकर्मणां यतीनां कचिस्किंचिदपि संचितस्यागामिनो वाऽन्यस्य वा पुण्यापुण्यलक्षणस्य कर्मणो ज्ञानाग्निनिर्दग्धस्वरूपस्य फलं न भववि । ' सति कुड्ये चित्रकर्म । इतिन्यायेन स्वस्यैव सत्वाभाचे फलदानासंभवादकर्मिणां विदुषां विदेहमुक्तिरेवेति सिद्धम् ॥ १२ ॥ श्री० टी०-एवंभूतस्य कर्मफलत्यागस्य फळमाह-अनिष्टमिति । अनिष्ट नारकिन, इष्टं देवत्व, मिश्र मनुष्यत्व, एवं त्रिविधं पापस्य पुण्यस्य चोभयमिश्रस्य च कर्मणो यत्फलं प्रसिद्धं तत्सर्वमत्यागिना सका- मानामेव प्रेत्य परत्र भवति तेषां त्रिविधकर्मसंभवात् । न तु संन्यासिनां फचिदपि भवति । संन्या- सिशब्देनात्र फलत्यागसाम्यात्मकृताः कर्मफलत्यागिनोऽपि गृह्यन्ते । अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः । स संन्यासी च योगी च' इत्येवमादौ च कर्मफलल्यागिषु संन्यासिशब्दप्रयोगदर्शनात् । तेपी सात्त्विकानां पापासंभवात् ईश्वराणेन च पुण्यफलस्य त्यतत्वात् त्रिविधमपि कर्मफलं न भवतीत्यर्थः ।।१२।। स० टी०-ननु कर्मफलत्यागितया देाभिमानिनः ।। गौणसंन्यासिनो ज्ञानशून्यस्यापि च कर्मिणः ॥ १ ॥ देहाभिमानशून्यस्य मुख्यसंन्यासिनस्तथा ॥ त्यागित्वमुभयत्रापि तुल्यमस्तीति गम्यते ॥ २ ॥ तयोः फले विशेष: को यदलाभेन गौणता ॥ एकस्यान्यस्य यल्लामें मुख्यत्ममिति चेच्छृणु ॥ ३ ॥ कर्मा- नुष्ठायिनां कर्मफलत्यागितयाऽसि च ॥ गौणसंन्यासिनां चित्तशुद्धेः प्रागेव कालतः ॥ ४ ॥ मृवानां प्राकृतस्यास्ति शरीरप्रहणं फलम् ।। मायिकं फल्गुभावेनादर्शनं लयमेति यत् ॥ ५ ॥ एकत्वं कर्मणश्चेति जात्यभिप्रायतः स्मृतम् ॥ अन्यथा त्रिविधं तस्यात्कथमेकस्य कर्मणः ॥ ६॥ कर्मणनिविधत्वाचत्रिविधं फलमारितम् ॥ पापस्यानिष्टमात्रं च विर्यगादिकलक्षणम् ॥ ७ ॥ देवादिलक्षणं चेष्टं पुण्यस्य फलमीरि. वम् ॥ मित्रस्य पापपुण्यात्मयुगलस्य नृलक्षणम् ॥ ८ ॥ इष्टानिष्टयुतं प्रोक्तं फलं हेयतयाऽखिलम् ॥ गोगसंन्यासिनामेवं देवपाताइनन्तरम् ॥ ९ ॥ देहान्तरस्य ग्रहणमावश्यकमितीरितम् ॥ मुख्यसंन्या. । .
[अ० १८ मो० १२] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेवा सिनां ब्रह्मसाक्षात्कारेण तद्विदाम् ॥ १० ॥ अविद्यादिनिवृत्तौ स्यात्कैवल्यात्मानिर्वृतिः ॥ न देहाहणं तेपो कचिकालेऽथवा दिशि ॥ ११ ॥ अनिष्टमिष्टं मित्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ॥ ज्ञानेनाज्ञानबाधे हि तत्कार्याणां च कर्मणाम् ॥ १२ ॥ उच्छिन्नत्वात्पुनर्देहग्रहणं संभवेत्कथम् ॥ श्रीयन्ते चास्य कर्माणीत्येवं श्रुत्याऽप्युदीरितम् ॥ १३ ॥ गौणसंन्यासिनां वेन संसारो हरिणेरितः ।। मुख्यसंन्यासिनो मोक्षो विशेषो- ऽयं फले तयोः ॥ १४ ॥ अयमवास्ति निष्कर्षः पूर्वोक्तस्य विवेचनात् ॥ नित्यशुद्धपरानन्दप्रत्यगद्वैतवा स्तुनः ।। १५ ।। साक्षात्कारेण वेदान्तवाक्यजन्येन भास्वता ।। सुनिश्चितप्रमावेन तत्त्वज्ञानेन सर्वथा ॥ १६ ॥ अज्ञानध्वान्तवाधे तत्कार्यकर्तृत्ववाधनात् ।। य: परमार्थसंन्यासिकर्मोंच्छेदात्स निर्मलः ॥ १७ ॥ नाविद्याकामकादिनिमित्तं त्रिविधं फलम् ।। शरीरमहणं भूयोऽनुभवत्येव सर्वथा ॥ १८ ॥ कारणोच्छे- तः सर्वभ्रमाणां विनिवृत्तितः ॥ यस्त्वज्ञो देहभृत्सोऽयं त्रिविधो भवति क्षितौ ॥ १९ ॥ रागादिदोप- प्रावल्यायथेष्टाचारसंमुखः ॥ कर्म काम्यनिपिद्धादि समाचरति मूढधीः ॥ २० ॥ एकोऽयं मोक्षशाने यो- ऽनधिकार्यविपामरः ॥ अपरः प्राकृतिः पुण्यैः किंचिरक्षीणमलः पुमान् ॥ २१ ॥ त्यक्त्या काम्यं निषिद्धं च नित्यं नैमित्तिकं शुभम् ॥ फलाभिसंघिसंत्यागात्सत्त्वशुद्धयर्थमाचरन् ॥ २२॥ स चायं गौणसन्यासी मोक्षशास्त्रेऽधिकारवान् ।। अन्यो धीशुद्धिमासाद्य श्रवणादिपरायणः ॥ २३ ॥ विवेकी प्रमविन्मार्ग प्रव- तोऽयं तृतीयकः । तत्रायस्य महानर्थभानत्वं प्रत्यक्षमेव हि ॥ २४ ॥ द्वितीयस्याप्यनिष्टादिफलं तनि- विध स्मृतम् ॥ तृतीयस्य पुरा पठेऽध्याये संनिर्णयः कृतः ॥ २५ ॥ द्वितीयस्यापि सत्कर्मतारतम्यागते. रपि ॥ तारतम्यं स्मृतो वेदे निर्णीतं च मनीपिभिः ॥ २६ ॥ संसारित्वं ध्रुवं देहायभिमानिनि पूरुपे ।। अविद्याकामकर्मादिसामन्याः संभवादिति ॥ २७ ॥ सा च संसारिताज्ञानानुगुणा कस्यचिद्भवेत् ॥ कस्यचिन तथेत्येवं विशेपस्तन शोधितः ॥ २८ ॥ तत्त्वज्ञस्य तु संसारकारणामावतः स्वतः ॥ सिद्धं कैवल्यमेवास्वीत्यत्रार्थो सूचितावुभौ ॥ २९ ॥ वावकर्मफलं नृणामविरतं संसारवारां निधाविधानिष्टविमि- अजन्मनिबिडं भ्रान्त्या कुलानां भवेत् ।। यावत्सन्ननचञ्चरीकानवहस्वाये रसैकास्पदे श्रीमकृष्णपदाम्बुजेन मनसो वृत्ती रता पट्पदी ॥ ३० ॥ १२ ॥ भा० टी०-अमुख्यसंन्यासापेक्षया मुख्यसंन्यासस्य विशिष्टं प्रयोजनं किमित्याकाहायामाह-अनिष्टं- मिति । अनिष्टं नरकतिर्यगादिलक्षणं, इष्ट देवादिलक्षणम् , मिश्रमिष्टानिष्टसंयुक्त मनुष्यलक्षणं चैवं त्रिविध त्रिप्रकार कर्मणो धर्माधर्मलक्षणस्य फलं वाह्यानेककारकव्यापारनिष्पन्नत्वादनेकम् , अविद्याकृतत्वात् मिथ्या- भूतमिन्द्रजालमायोपमं महामोहकरं प्रत्यगात्मोपसीव फल्गुतया लयमदर्शनं गच्छत्तीति फलशब्दनिर्व- चनात् । तदेवं निविध फलमत्यागिनामज्ञानां कर्मिणामपरमार्थसंन्यासिनां प्रेत्य शरीरपावापूर्व भवति । फलाभिसंधिरहितानां कर्मणां देहपातादूर्व संचितादिकर्मानुरोधिफलस्यावश्यंभावादिति भावः । संन्या- सिनां तु परमार्थसंन्यासिनो परमहंसपरिमाजकानां केवलज्ञाननिष्ठानामुन्मूलिताविद्यादिसंसारखीजाना क चिद्देशे काले वा यथोक्तं फलं न भवति । अतः परमार्थतत्त्वविदः क्रियाकारकफलानामात्मन्यविद्याभ्यारोपित- वदर्शिन एवाशेपकर्मसंन्यासित्वं संभवति, न त्वज्ञस्याधिष्ठानादीनि क्रियाकर्तृणि कारकाण्यात्मत्वेन पश्य: तोऽशेषकर्मसंन्यासित्वमिति भावः । यत्त्वपरे एवंभूतस्य कर्मफलत्यागस्य फलगाह-अनिष्टादिरूपं त्रिविध फलमत्यागिनां सकामानामेव प्रेत्य परन भवति तेषां त्रिविधकर्मसंभवात्, न तु संन्यासिनां कचिदपि भवति । संन्यासिशब्देनात्र फरत्यागसाम्यात् प्रकृताः कर्मफलल्यागिनो 'गृह्यन्वें । अनाश्रितः कर्मफलं फार्य कर्म करोति यः । स सन्यासी च योगी च' इत्येवमादौ च फलत्यागिपु, संन्यासिशब्दप्रयोगदर्शनात् । वेषां सात्त्विकानां पापासंभवात् ईश्वरार्पणेन च पुण्यफलस्य त्यतत्वात विविधमपि कर्म फलं न भववी- F - . " , श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्रो० १३] त्यर्थ इति वर्णयन्ति ! तन्नोपादेयं संन्यासिशब्दस्य परमार्थसंन्यासिनि सर्वकर्मत्यागिनि मुख्यत्वात् क. मिणि च फलत्यागसाम्येन गौणत्वात् मुख्यार्थस्य हावाधात्तस्यैव संन्यासिशब्देन ग्रहणसंभवे गौण- प्रहणस्य गौणमुख्ययोर्मुख्य कार्यसंप्रत्ययः इति शब्दमर्यादाऽपरिज्ञानविजम्भितत्वात । सत्यां कारण- सामन्यां कार्योत्पाद इत्यर्थ मर्यादाऽज्ञानमूलकत्वाच ईश्वरार्पणेन त्यक्तकर्मफलस्यापि सत्त्वशुद्धयर्थं नित्यानि कर्माण्यनुतिष्ठतोऽन्तराले मृतस्य प्रागर्जिवकर्मरूपकारणसामन्या विविधशरीररूपकार्योत्पाद आवश्यक एवेति दिक् ॥ १२ ॥ ५० टी०-एवंभूतस्य कर्मफलत्यागस्य फलमाह-अनिष्टमिति । अनिष्टं नारफित्वम्, इष्टं देवत्वम्, मिश्र मनुष्यत्वम् । एवं त्रिविधं पापस्य पुण्यस्य मित्रस्य च फर्मणो यत्फलं प्रसिद्ध तत्सर्वमत्यागिना सकामाना- मेव प्रेत्य परत भवति, तेपा विविधकर्मसंभवात् । न तु संन्यासिना कचिदपि भवति । संन्यास. शब्देनात्र फलत्यागिनो गृह्यन्ते 'अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः । इत्येवमादौ फलत्यागिषु संन्यासिप्रयोगदर्शनात् ॥ १२ ।। रा० टी०-अत्यागिनिन्दापूर्व त्यागिनं स्तौति-अनिएमिति । अनिष्टं नरकादि, इष्ट काम्यकर्मिणामि- च्छाविषयीभूतं स्वर्गादि, मिश्रमिष्टानिष्टमेलनरूपं मानुपादि, कर्मणत्रिविध फलमत्यागिना फर्मफल. मत्यजता प्रेत्य मृत्वा देहानिर्गत्य स्थितानां भवति । संन्यासिनां तु अनियतकाम्याना फलत्यागिना निय- ताना स्वरूपत्यागिना वचिदपि इह वा परत्र वा नास्ति । इष्टानिष्टादिरूपं कर्मणः फलमित्यनुपङ्गः । अत्र त्यागिनामितियक्तव्ये संन्यासिनामित्युक्ति. त्यागिनो हि परार्थ कारीयर्यादिनियतकाम्यं कुर्वन्ति, संन्यासि- नस्तु तदपि नेत्येतावन्तं त्यागि यो विशेपं सूचयितुं, फलेच्छामावेन तेपु त्यागित्वस्यापि सत्यत्वात् । नरिवति । तुशब्देन त्यागिना ज्ञानभक्त्यादिद्वारा अपरोक्षतो मुक्तावानन्दातिशयफलं भवतीति सूच्यते । उपपादितमेतत् . त्यागाच्छान्तिरनन्तरमित्यन द्वादशेऽध्याये भाष्यादौ ॥ १२ ॥ पञ्चैतानि महावाहो कारणानि निबोध मे ॥ सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥ १३ ॥ त० टी०-त्रिविधं कर्मफलं सकामानामेव भवति, नतु त्यागिनामित्युक्तम् । तत्र विवेकाविवेकमयु- क्तयोः कर्मण्यहङ्कारानहङ्कारयोरेव हेतुत्वप्रदर्शनाप कर्मसामान्य प्रति कारणपञ्चकं प्रतिजानाति- पञ्चैतानीति । हे महाबाहो । एतानि वक्ष्यमाप्पानि पञ्च कारणानि कर्मनिवर्तकानि मे मत्तो निवोध जानीहि । कर्मण्यहड्डारनिवृत्तये विवेकार्थ मुमुक्षुणाऽवश्यं ज्ञातव्यांनीति प्रशसति । सांख्ये सम्यक् ख्यायन्ते निरूप्यन्ते विविच्यन्ते तत्त्वान्यस्मिमिति सांख्यं तस्मिन् । कथंभूते कृतान्ते वन्धमोक्षहेतुतया हेयोपादेयविभागेन कृतोऽन्तः कर्माकर्मनिर्णयो यस्मिन् वत्कृतान्तं सांख्यशास्त्रं तस्मिन् । यद्वा सम्यक् ख्यायन्ते निरूप्यन्ते ज्ञातव्या जीवेश्वरमायादिपदार्था यस्मिन् वत्सांख्य, कृतोऽन्तो वन्धमोक्षसाध• नादिनिर्णयो यस्मिन् तत्कृतान्तं तस्मिन् साख्ये कृतान्ते वेदान्तशाखे सर्वकर्मणां सिद्धये वन्धकत्वा- भावेन यथावचत्वज्ञानोत्पत्तये प्रोक्तानि प्रकर्षेण संशयाभावेनोक्तानि ।। १३ ।। म०टी०-तात्मज्ञानरहितस्य संसारित्वे हेतु: कर्मत्यागासंभव उक्त. 'नहि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्मा- व्यशेपत. इति । तत्राज्ञस्य कर्मत्यागासंभवे को हेतु.१ कर्महेतावधिष्टानादिपञ्चके वादात्म्याभिमान इतीममर्थ चतुर्भि: लोकैः प्रपञ्चयति । तत्र प्रथमेनाधिष्टानादीनि पञ्च वेदान्तप्रमाणमूलानि हेयत्वार्थमवश्यं ज्ञातव्यानी- पत्रेमानीत्यपि पाउ । ।
[अ० १८ श्लोक १३] तत्त्वप्रकाशिकायष्टदीकोपेता न्याह-पञ्चति । इमानि वक्ष्यमाणानि पञ्च सर्वकर्मणां सिद्धये निष्पत्तये कारणानि निवर्तकानि हे महाबाहो, मे मम परमाप्तस्य सर्वज्ञस्य च वचनान्निबोध बोर्बु सावधानो भव । न हत्यन्तदुर्मानान्येतान्यनवहितचेतसा शक्यन्ते ज्ञातुमिति चेत:समाधानविधानेन तानि स्तौति । महावाहुत्नेन च सत्पुरुष एव शक्तो ज्ञातुमिति सूचयति स्तुत्यर्थमेव । किमतान्यप्रमाणकान्येव तव वचनाज्ञेयानि? नेत्याह-सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि निरति- शयपुरुषार्थप्रात्यर्थं सर्वानर्थनिवृत्यर्थं च ज्ञातव्यानि । जीव:, ब्रह्म, वयोरक्य, तद्वोधोपयोगिनश्च श्रवणा- दयः पदार्था: संख्यायन्ते व्युत्पाद्यन्तेऽस्मिन्निति साख्यं वेदान्तशालं, तस्मिन्नात्मवस्तुमात्रप्रतिपादके किमर्थ- मनात्मभूतान्यवस्तूनि लोकसिद्धानि च कर्मकारणानि पञ्च प्रतिपाद्यन्त इयतः शाखविशेषणं कृतान्त इति । कृतमिति कर्माच्यते, तस्यान्तः परिसमाप्तिस्तत्त्वज्ञानोत्पत्त्या यत्र तस्मिन् कृतान्ते शाखे प्रोक्तानि प्रसिद्धान्येव लोकेऽनात्मभूतान्येवात्मतया मिध्याज्ञानारोपेण गृहीतान्यात्मतत्त्वज्ञानेन वाधसिद्धये हेयत्वेनो- कानि । यदा झन्यधर्म एव कर्मात्मन्यविद्ययाऽभ्यारोपितमित्युच्यते तदा सुद्धात्मज्ञानेन वाधाकर्मणो: ऽन्त; कृतो भवति । अत आत्मनः कमसिंबन्धप्रतिपादुनायानात्मभूतान्येव पञ्च कर्मकारणानि वेदान्तशास्त्रे मायाकल्पिवान्यनूदितानीति नाद्वैतात्ममानतात्पर्य हानिस्तेषां तदङ्गत्वेनैवेतरत्र प्रतिपादनात् । इहापि च सर्वकर्मान्तत्वं ज्ञानस्य प्रतिपादितम् 'सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते' इति । तस्माज्ज्ञानशास्त्रस्य कर्मा- न्तत्वमुपपन्नम् ॥ १३ ॥ शं० टी०-ननु विदुपामपि संन्यासिनामकमित्वं न भवति । शिण्यादीनां तत्त्वोपदेशेन हितोपदेशेन वा पुण्यक्रियासमवाचथाऽहारादिषु कचिद्दुष्टान्नभक्षणेन वा संचारादिपु प्राणिपोडया वान्यथा वा पापक्रियासं. भवाय चकियाफलमिष्टानिष्टादिलक्षणं स्यादेवेति चेत्सत्यम् । महान्दो ब्रह्मविदो जीवन्मुक्ता शिष्येभ्योऽन्ये- भ्यश्च वा साधुभ्यो ब्रह्मतत्त्वमुपदिशन्ति हितं च सेपां कचिदाहारादिषु दुष्टानसेवा च संभवति, श्रमप्रमादा. दिना कचित्प्राणिपीडा च । तथापि निरन्तरनानिष्ठासंपन्नसम्यग्ज्ञानेन निष्कलं निष्क्रियं नित्यकूटस्था- सङ्गचिद्रूपमेव परं प्रमाहमियमेवेति स्वात्मना साक्षात्कृतवता सदा तात्मनैव तिष्ठतामधिष्ठानादिभ्यः किया- कर्तृकारकादिभ्यो भिन्नमेवात्मानमकर्तारमभोकारमाकाशवदक्कियं परिपूर्णमेप सर्वदा पश्यतां परमहंसपरि. प्राजकाना स्वतो भिन्नरेवाधिष्ठानादिभिः क्रियमाणपुण्यपापादिक्रियालेशसंनन्यासंभवाचानिमित्तकेष्टानिष्टफलं कल्पयितुं न शक्यते इति बोधयितुमादौ, कर्मनिप्पत्तेः कारणान्याइ-पञ्चैतानीति द्वाभ्याम् । सांख्ये सम्यक् स्यायते निरुच्यते आत्मानात्मनोस्तत्त्वं प्रकाश्यतेऽनेनेति साख्यं वेदान्तशालं, तस्मिन् साख्ये फवान्ते 'निष्कलं निष्क्रियम्' इति, 'उपशान्तोऽयमात्मा' इति, शिवं शान्तम्' इति, 'वाभाविकी झानरलकिया च' इति, 'नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन कारयन्' इति, 'नित्यः सर्वगतः स्थाणु.' इति, प्रत्यर च कर्माणि इति, प्रकृतेः क्रियमाणानि' इति, स्वभावस्तु प्रवर्वते' इत्येवं गतः स्पष्टीकृत आत्मानारमनोरन्तस्तत्त्वनिश्चयो यत्र तत्कृतान्तम् । यद्वा फियत इति कृवं विहितप्रविपिद्धादिलक्षणं कर्म, वस्यान्तः समातिन न पां धमधि त्यज धर्ममध घ' इत्यादिशशस्त्रेण, बलवान्तम् । यद्वा कृचस्य कर्मगो वैदिकस्य नित्यनैमिचि. कादेः संन्यस्य श्रवणं कुर्यादित्यन्तः समातियच्छ्पणनिमित्त वत्कृतान्वं वस्मिन् वान्वे सर्वसमा तिकारणे साख्ये वेदान्ते सर्वकर्मणा सिद्धये यावन्ति कर्माणि चलनात्मकानि वेप स कर्मगो' निष्पत्तये कियामानस्य सिद्धपे इत्यर्थः । एतानि वक्ष्यमाणानि पधारणानि नोक्तान क्रियाभूतिकार- विधिः पिभिः कथितानि वक्ष्यामि । मे मम ययनान्निबोध अधिष्ठानादिस्वहां क्रियानितिकारमानो. ऽस्तत्वं च पण्डितानामपि दुर्विज्ञेयं मशेच्यमाद नितरा युधय । हिनितिकारमसामनोमयुद्धा कर्मणस्वावस्वनिश्चयेनात्मनि कर्तत्तभ्रम परित्यजेत्यर्थः ॥ १३॥ .
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० १३ ] श्री०टी०-ननु कर्म फुर्वत: फर्मफलं कथं न भवेदित्याशब्दप समत्यागिनो निरहंकारस्य ,सतः कर्म.. फलेन लेपो नास्तीत्युपपादयितुमाह-पञ्चेमानीति पञ्चभिः । सर्वकर्मणां सिद्धये निष्पत्ये इमानि वक्ष्यमा- णानि पञ्च कारणानि मे वचनान्निबोध जानीहि । आत्मनः कर्तृवाभिमाननिवृत्त्यर्थमपश्यमेवानि झाव- व्यानीत्येवं तेपा स्तुत्यर्थमाह-सांख्य इति। सम्यक् ख्याय झायवे परमात्माऽनेनेवि सायं तत्त्वज्ञानं सस्मिन, कृतं कर्म तस्यान्तः समाप्तिरस्मिन्निति स्वान्तस्तस्गिन्वेदान्तसिद्धान्त इत्यर्थः । यदा संख्यायन्ते गण्यन्ते तत्त्वानि यस्मिन्निवि साख्यं, कृत: अन्तो निर्णयो यस्मिन्निति कृतान्तं सारपशास्त्रमेव तस्मिन्प्रोक्तानि । अवः सम्पनियोधेत्यर्थः ॥ १३ ॥ स० टी०-तत्रात्मज्ञानशून्यस्य संसारित्वेऽस्ति कारणम् ॥ प्रोकं स्वकर्मणा त्यागासंभयो हरिणा स्वयम् ॥ १ ॥न हि वेहवेत्योदानीं तस्यैव देहिनः ॥ उच्यते फर्मणां त्यागासंभवे संसृती तथा ॥ २॥ वादात्म्याध्यासको हेतुरधिष्ठानादिपञ्चके । इमं प्रपश्चयत्यथै श्लोकैश्चतुभिरश्वः ॥ ३ ॥ इमानि वक्ष्यमाणानि पश्च निर्वतकानि च ॥ सर्वेपा कर्मणा व निष्पत्त्यर्थे महाभुज ॥ ४ ॥ ममेश्वरस्य वचना- द्वोढुं भव समाहितः ॥ समाधानं विना ज्ञातुं न शक्यं त इमान्यपि ॥ ५॥ सर्वानर्थनिवृत्त्यर्थं सातव्यानि प्रमाणत. ॥ जीव ब्रह्म तयोरेक्यं वद्विज्ञानोपयोगिनः ॥ ६ ॥ श्रयणाद्या: पदार्थाश्च व्युत्पाद्यन्तेऽत्र शास्त्रके ॥ तत्साख्यं नाम वेदान्वशासं तस्मिन्छसक्षये ॥ ७ ॥ कृतमित्युच्यते कर्म वस्यान्तस्तत्त्ववोधतः ।। स बोधो जायते येन स कृवान्तोऽस्ति न च ॥ ८॥ प्रोक्तान्यनात्मभूतानि भ्रान्त्यात्मत्वेन लौफिके. ॥ गृहीतान्यात्मबोधेन वाधसिद्धपर्थमेव हि ॥ ९ ॥ यतो हेयवयोक्तानि ज्ञातव्यानीत्यतो पिया ॥ अन्यधर्मो- ऽस्ति कमैतन्मायया प्रत्यगात्मनि ॥ १० ॥ आरोपितमतो बोधार्मणोऽन्तः कृती भवेत् ।। अत एवात्मनः फर्मासंबन्धज्ञानसिद्धये ॥ ११ ॥ अविद्यारोपिता एव देतवः पश्यं कर्मणाम् ।। अनूदिलारसे वेदान्तशाने अद्वैतबोध ॥ १२ ॥ अद्वैतमानतात्पर्यहानिनवात्यतो यतः ॥ तदात्वेन पाच प्रतिपादनमागमे ॥ १३ ॥ फलवत्संनिधौ यत्तत्तद्गमफल श्रुतम् ॥ इवि न्यायेन चैतेपामङ्गत्यं ब्रह्मयोधने ।।१७॥१३॥ भा०टी०-एवं परमार्थसंन्यासिना त्रिविधर्मफलाभावमुक्त्वा परमार्थसंन्यासाधिकारकारणस्यात्मन्य- फर्तृत्वज्ञानस्यावश्यकता बोधयितुमाह-पञ्चैतानीत्यादिना । एतानि वक्ष्यमाणानि कारणानि निवर्तकानि निवोध मद्वचनाजानीहि । ज्ञात्वा च महावाहुसाध्ये कायिके युद्धे कर्मणि कर्तृत्वाभिमानं परित्यजेति झवनयन्संबोधयति महावाहो इति । वेपामवश्यज्ञातव्यताज्ञापनाय तानि स्वौति-सांख्य इति । त्वंपदार्थ.' आत्मा तत्पदार्थो अझ तयोरेक्यधीः तदुपयोगिनश्च शमदमादयो ज्ञातव्याः पदार्थाः संख्यायन्ते व्युत्पाद्यन्ते यस्मिन् वेदान्तशाने तत्साख्यम् । साख्यं विशिनष्टि-कृतान्ते । कुतस्य कर्मणोऽन्तः परिसमाप्तिर्यत्र तस्मिन्क- तान्ते यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः । सबै कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते' इत्यात्मज्ञाने जाते सर्वकर्माणा निवृत्तेर्दर्शितत्वात् आत्मज्ञानार्थफस्य साख्य- स्यापि कृतान्तत्वं, तस्मिन्प्रोक्तानि सर्वेपा कर्मणा सिद्धये निष्पत्त्यर्थ कथितानीत्यर्थः । संख्या मोचकं ज्ञान तसंवन्धिनि तन्ननके साख्येऽमतान्तेऽकतो वेदोऽपौरुपेयत्वात् वस्यान्ते वेदान्ते इत्यर्थस्तु प्रश्लेष विन- वार्थसंभवमभिप्रेत्याचा प्रदर्शित. । यत्तु संख्यायन्ते गण्यन्वे तत्त्वान्यस्मिन्निति साख्यं, कृतोऽन्तो निर्णयो यस्मित्रिति कृतान्त साख्यशास्रमेव तस्मिन्नित्यपरे वर्णयन्ति तन्नोपादेयम् । साख्यशाखे अधिष्ठानादीना कारणत्वेनानुक्त वात् । मिना भोक्तार आगान इति प्रविपादकस्य साख्यशास्त्रस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वशून्य एक एवात्मेति स्वसिद्धान्तविरुद्धस्य खोक्नेऽ प्रमाणत्वेनोपन्यासायोगाच ।। १३ ।। प० टी०-ननु भुजिक्रिया कुर्ववस्तृप्तिर्भवतीत्यनुभवे का कुत. फलं कथं न भवेदित्याशङ्कय सङ्गत्या- 4 .
मना [अ० १८ श्लो०१४]. वत्वरकाशिकायष्टटीफोपेता गिनो निरहंकारस्य सतः कर्मलोपो नास्तीत्युपपादयितुमाह-पश्चमानीति । सर्वकर्मणां सिद्धये निष्पत्तये इमानि वक्ष्यमाणानि पञ्च कारणानि मे मचः सकाशानियोध जानीहि । आत्मनः कर्तृत्वाभिमाननिवृत्त्य- थमेतानि ज्ञातव्यानीत्येवं तेषां स्तुत्यर्थमाह-सांख्य इति । किंभूतानि ? सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि । संख्या- यन्वे परिगण्यन्ते तत्वानि यस्मित्रिवि सांख्य, कृन्तानः सिद्धान्तः, तस्मिन् वेदान्तसिद्धान्वे इत्यर्थः ॥१३॥ रा०टी०-काम्यानामित्यत्रोक्तदिशा वैकल्पिककाम्यानां फलत्यागः, नियतकाम्यानां स्वरूपत्यागः, ननु संन्यासिनामित्यत्रोक्तदिशा परार्थमपि नियतकाम्यानामननुष्ठानमित्येतावन्मानं न संन्यासदाददार्थः, किंतु कणि कर्तृत्वाभिमानत्यागोऽपीति यतुं कर्मकारणानि प्रतिज्ञापूर्वमाह-पश्चेत्पादिविभिः । एतानि वक्ष्यमाणानि कारणानि कर्मकारणानि मे सकाशात् निबोध बुध्यस्व । सांस्ये वान्ते सिद्धान्ते कपिला- ल्यविष्णुकृतसांख्यनामफशाने सर्वकर्मसिद्धयर्थं प्रोक्तानि । श्रोतृविश्वासायैतदुक्तिः ॥ १३ ॥ अधिष्ठान तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।। विविधाश्च पृथक्केष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥ १४ ॥ त दी-तान्येवाह-अधिष्ठानमित्यादिचतुर्भिः। अधिष्ठानमपिष्टीयते भोक्तृतया पुरुषेणा- स्मिन्नित्यधिष्ठानं पञ्चमहाभूतसङ्घातरूपं शरीरं, तथा को जीवपुरुषक्षेत्रज्ञादिशब्दाभिषेयं आत्मा, तस्य कर्तृत्वं भोक्तृत्वं ज्ञातृत्वं च शास्त्रसिद्धम् " मुन उत्क्रामन्मीलित इवानम्पियन्नास्ते " इतिश्रुतौ मनस उत्क्रान्त्यनन्तरमपि कर्तृत्वाभिधानात् “ कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् " इति सूत्राच । तथा पष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कति " इत्यत्रापि । तथा भोकृत्वमपि " तयोरन्यः पिप्पलं खाइति । " उत्तामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्" इत्यादिशास्त्रसिद्धम् । अत्र केचित्कर्ताऽचिज्जड्य- न्धिरकार इति वदन्ति, तदुदाहृतनावविरोधादुपेक्षणीयम् । पृथग्विधमनेकमकारं करणं वाक्षाण्यादि- पञ्चेन्द्रिय, विविधाश्च पृथक्केष्टाःप्राणापानादयो वायुव्यापाराः। दैवं चैवात्र पश्चमम् । अत्र कारणसमुदापे पञ्चमं देवं देवानामप्यन्तर्यामी परमात्मा कर्मनिष्पत्ती प्रधानहेतुरित्यर्थः । " सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टः । ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति " इत्युक्तवक्ष्यमाणत्वात् । “ परात्तु तच्छुतेः" इति सूत्रकारनिर्णयाच ॥ १४॥ म०टी०-प्रमाणमूलानि कर्मकारणानि पञ्चात्मनो कर्तृत्वसिद्धयर्थं हेयत्वेन शावव्यानीत्युक्ते कानि तानीत्यपेक्षायों तत्स्वरूपमाह द्वितीयेन-अधिष्टानमिति । इच्छाद्वेषसुखदु:खचेतनाद्यभिव्यकेराश्रयोऽधिष्ठानं शरीरम्। तथा कर्ता यथाधिष्ठानमनात्मा भौतिकं मायाकल्पित स्वाप्नगृहरथादिवत्, तथा कर्ताऽई करोमीत्याद्य- मिमानवान् ज्ञानशक्तिप्रधानापश्चीकृतपञ्चमहाभूतकार्योऽहङ्कारोऽन्तःकरणं बुद्धिर्विज्ञानमित्यादिपर्यायशब्दवा- च्यस्वादाम्याध्यासेनात्मनि कर्तृत्वादिधर्माध्यारोपहेतुरनामा भौतिको मायाकरिपतश्चेवि तथा शब्दार्थः । स्थूल- शरीरस्य लोकायनिकरात्मलेन परिगृहीतस्याप्यन्यैः परीक्षकरनात्मत्वेन निश्चयात्तदृष्टान्वेन वार्षिकादिमि- रात्मत्वेन परिगृहीतस्य कर्तुरम्यनात्मत्वनिश्चयः सुकर इत्यर्थः । करणं च श्रोत्रादि शब्दाद्युपलब्धिसाधनम् । घः शब्दस्तयेत्यनुकीयः । पृथग्विधं नानाप्रकारं पञ्च ज्ञानेद्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि मनो घुद्धिश्चेति द्वादश- संख्यम् । करणवर्गे मनो बुद्धिश्चेति वृचिविशेषौ । वृत्तिमांस्त्वहंकारः कतैष । चिदाभायस्तु सर्वत्रवाविशिष्टः । विविधा नानाप्रकाराः पञ्चधा दशधा वा प्रसिद्धाः। पशब्दस्तथेत्यनुरूपार्थः 1 पृथक् असंकीर्णाः, चेष्ट्रवाः क्रिया- रूपाः क्रियाशक्तिप्रधानापञ्चीकृतपञ्चमहाभूतकार्याः क्रियाप्राधान्येन वायवीयत्वेन व्यपदिश्यमानाः, प्राणा. पानन्यानोदानसमाना: नागकूर्मसकलदेवदत्तधन यायाश्च वदन्त ता एव । अन च सुपुप्तावन्तःकरणस्य 1 श्रीमशगवद्गीवा [अ० १८ श्लो०१४] फर्तुर्लयेऽपि प्राणव्यापारदर्शना दव्यपदेशाधान्त:करणादत्यन्तभिन्न एव प्राण इति केचित् । क्रियाशक्ति. ज्ञानशक्तिमदेकमेव जीवत्वोपाधिभूतमपचीकृतपञ्चमहाभूतकार्य क्रियाशकिप्राधान्येन प्राण इति ज्ञानशक्ति प्राधान्येन चान्तःकरणमिति व्यपदिश्यत इत्याभियुकाः । 'स ईशा चके करिमञ्चमुलान्ते उत्कान्तो भविष्यामि कस्मिन्या प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठारयामीति स प्राणमसृजत' इति श्रुतावुत्कान्त्याापाधित्वं प्रागस्यो. कम् । तथा 'सधीः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिकामति मृत्यो रूपाणि ध्यायतीव लेलायतीव' इत्यादिश्रुतायु- कात्याद्युपाधित्वं युद्धेरुक्तम् । स्वतन्त्रोपाधिभेदे च जीवभेदप्रसाः तस्मात् बुद्धिप्राणयोरेकलेनेवोला- न्त्याशुपाधित्वं युक्तं भेदव्यपदेशश्च शक्तिभेदात् । सुषुप्तौ च बनिसकिभागलयेऽपि क्रियाशकिभाग- दर्शनमेकत्वेऽपि न विरुद्धमनुभवसिद्धत्वात् । दृष्टिसृष्टिनये सर्वलयेऽपि प्राणव्यापारयच्छरीरस्य सुपुप्तोऽय- मित्येवंरूपेण परैः कल्पितत्वाच । वस्मादुभयथापि व्यपदेशभेद उपपन्नः । देवं च अनुप्राहकदेवताजावम् । पशब्दस्तथेत्यनुकर्पणार्थः । अत्र कारणवर्गे पश्वा पञ्चसंख्यापूरणम् । एवशब्दस्तधाशब्देन संव-यमानो- नात्मत्वभौक्तिकत्वकल्पितत्वायवधारणार्थ: पञ्चानामपि । तर शरीरस्य कर्तृकरणफ्रियाधिष्ठानस्य देवता पृथिवी । “यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वा प्राणश्चक्षुरादित्यं दिशः श्रोनं मनश्चन्द्रं पृथिवी शारिम्' इति श्रुतौ वागाद्यधिष्ठाव्यग्न्यादिभिः सह शरीगधिष्ठातृत्वेन पृथिवीपाठात् । कर्तुरईकारस्या. धिष्ठात्री देवता । रुद्रः पुराणादिप्रसिद्धः । करणानां चाधिष्ठाभ्यो देवताः सुप्रसिद्धाः । श्रोतवचारसना घाणानां दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विनः । वारूपाणिपादपायपस्थानां वहीन्द्रोपेन्द्रमित्रप्रजापतयः ।मनोबुद्धपोश्चन्द्र बृहस्पती इति । पञ्चप्राणानां क्रियारूपाणां सद्योगाववामदेवाघोरवत्पुरुपेशानाः पुराणप्रसिद्धाः । भाप्ये देवमादित्यादि चक्षुराद्यनुमाइकमित्यधिष्ठानादिदेवतानामप्युपलक्षणम् ।। १४ ॥ शं० टी०-तानि कानीत्याकादायामाह-अधिष्ठानमिति । अधिष्ठानं सुखदुःसमागायतनं करणानामा- श्रयो वा शरीरम् । तथाशब्दश्वार्थ:-फचर्चा च-कर्वा भोकाहमिति सर्वत्राहमानीसाभासाकारो विशानामा। पृथग्विधं वाह्याभ्यन्तरभेदेन द्विधा विभकं करणं ज्ञानेन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि मनोबुद्धिश्चेति द्वादशविधं करणं च, पृथक् दशधा भिन्ना चोर्वादिगतिभेदेन विविधा नानाप्रकारा चेष्टा वायुचेष्टाविशेपा: प्राणादयो नागाद- यश्च दश। अत्रैतेषु क्रियानिष्पत्तिकारणत्वेन प्रोक्तप्वधिष्ठानादिपु चतुर्यु चकारस्स्वर्थः । एवकारोऽतिरिक्तव्या- च्छेदार्थः । पञ्चमं तु देवमेव योत्रादीन्द्रियप्रवर्तकं, दिग्वानाकर्कादिलक्षणं सर्वकर्मसिद्धिकारणं देवमेव नान्य- दस्तीत्यथः । यद्यपि पञ्चैतानीति पञ्चत्वसंख्ययैव कारणान्तराभावः सिध्यति, तथापि पुनरेवकारः पुरुपस्य मयेदं क्रियत इति दुष्टेऽन्यदुष्टेऽपि च कर्मणि कर्तृवभ्रमापनोदनार्थः । नन्वदृष्टेश्वरादीनामपि क्रियासिद्धिका- रणस्वसंभवात्पञ्चैतानीति पञ्चसंख्यावधारणाभ्यामतिरेकव्यवच्छेदोऽनुपपन्न एवेति चेत्सत्यम् । 'घलादेवेन नीयते' इति, "एप एव साधु कर्म कारयति" इति श्रवणादस्त्येवादृष्टेश्वरादेरपि कारणत्वं, तथापि-यो दिक्षु तिष्ठन् दिग्भ्योऽन्तरः" इतीश्वरस्य दिगादीनानन्तर्यामित्वश्रवणात्तदन्तस्थतया सेवेव दिगाद्यधिदेवतेष्वन्त- भावः । काश्रयत्वादृदृष्टस्य कर्तर्यन्तर्भावस्ततो न काचिदनुदपत्तिरतोऽधिष्ठानादीनामेव पञ्चाना सर्वकर्म- निष्पत्तिकारणत्वमिति सिद्धम् ॥१४॥ श्री०टी०-तान्येवाह-अधिष्ठानमिति । अधिष्ठानं शरीरं, कर्ता चिजडग्रन्धिरहंकारः, पृथग्विधमने- कप्रकारं करणं चक्षुःश्रोत्रादि, विविधाश्च कार्यत. स्वरूपश्च पृथग्भूताश्चेष्टाः प्राणापानादीना व्यापाराः । अत्र चैतेष्वेव पञ्चमं देवं च कारणं, चक्षुराद्यनुग्राहकमादित्यादिसर्वप्रेरकोऽन्तर्यामी वा ॥ १४ ॥ स० टी०-कानि तानीत्यपेक्षाया वत्स्वरूपमिहोच्यते ॥ इच्छाद्वेषाद्यभिव्यक्तरधिष्ठानं शरीरकम् ॥१॥ दृष्टान्तार्थस्तथाशब्दो विज्ञेयोऽत्र मनीषिभिः ॥ यथाधिष्ठानमध्यस्तं शरीरं भौतिक जडम ॥२ ।। ८ [अ० १८ श्लो. १५] तत्त्वप्रकाशिकाधष्टटीकोपेता १९९६ तथैवाहं करोमीति कहिंकार आमनि ॥ कल्पितो मायया सूक्ष्मभूतकार्यतया जडः ॥ ३॥ यथा स्थूलशरीरस्य चार्वाकैरात्मताधिया | गृहीवस्यापि वेदरनात्मत्वेन निश्चयात् ॥ ४ ॥ तदृष्टान्तेन कर्तुश्च तार्किकैरात्मताधिया ॥ गृहीतस्याप्यनात्मत्वनिश्चयः सुकरो भवेत् ॥ ५ ॥ श्रोत्रादिकरणं चैव शब्दादिज्ञानसाधनम् ॥' दशेन्द्रियमनोबुद्धिरूपेणास्ति पृथग्विधम् ॥ ६ ॥ वृत्तिभेदे मनोबुद्धी अहंकारस्तु वृत्तिमान् ॥ क्रियाशक्तिप्रधानाश्च प्राणा नानाविधा; क्रिया: 11 ७ ॥ दशधा पञ्चधा वापि प्राणापानादिरूपतः ॥ असंकीर्णाः कियारूपा भौतिकाः कल्पिता: परे ॥ ८॥ अनुग्राहकमर्कादि दैवं चक्षुर्मुखस्य च ॥ अन कारणवरें तत्पश्चसंख्यामपूरकम् ॥ ९॥ तथेत्यनुकर्प- णार्थश्वशब्दोऽस्ति स्थलत्रये ॥ तेनाध्यस्तत्वमेतेपां भौतिकत्वमनात्मनाम् ॥ १० ॥ प्रत्यगात्मन्यसङ्गेऽस्मि. पञ्चानामीश्वरो जगौ ॥ ११ ॥ १४ ॥ भा० टी०-कानि तानीत्यपेक्षायामाह-अधिष्ठानामिति । अधिष्टानं इच्छाद्वेपसुखदुःखज्ञानादीनामभिव्य- क्राश्रयो देहः, तथा कर्ता उपाधिलक्षणो युद्धथायुपाध्यनुविधायी तद्धर्मानात्मनि पश्यन्नुपहित उपाधिप्रधानो भोक्ता, करणं च श्रोत्रादिशब्दादुरलब्धये पृथग्विधं नानाप्रकार ज्ञानेन्द्रियाणि पश्च कर्मेन्द्रियाणि पश्च मनो बुद्धिश्चेति द्वादशसख्यम्। विविधाश्च पृथक्वेष्टाः वायवीयाः प्राणापानायाः। अत्र चतुर्पु देवमेव पञ्चमं चक्षुराद्य- नुमाइकमादित्यादिदैवम् सर्वप्रेरकोन्तयामीति त्यात्मनः कर्तृत्वव्यावृत्तये परमात्मनः कर्तृत्वप्रतिपादनमयुक्त- मित्यभिप्रेत्याचा प्रदर्शितम् ।।.१४ ॥ १० टी०-तान्याह-अधिष्ठानमिति । अधिष्ठानं शरीरं, कर्ता जडग्रन्थिरहंकारः, पृथग्विधं बहुविधं करणं चक्षुरादि, विविधा अनेकप्रकाराश्चेष्टा प्राणापानादिज्यापाराः । एतेष्वेव पञ्चमं देवं चक्षुरादीनामदेिवं सूर्यादिसर्वप्रेरकोऽन्तर्यामी वा ॥ १४ ॥ रा०टी०-प्रतिज्ञातमाह मिति । अधिष्ठानं देहभूम्यादिः, फर्वा विष्णुः, पृथग्विधं करणम् इन्द्रियसुनुवादि । विविधा नानाप्रकारा पृथक् परस्परभिन्ना, चेष्टा हस्वादिक्रिया व्यानरूपमानसक्रिया घ प्रधानहोमादिक्रियाहेतुभूता कारकाश्रिवा वान्तरक्रिया चेत्यर्थः । देवमदृष्टं अत्र कमविपये पञ्चम कारणम् । यद्वा कर्तृपदेन पराधीनका जीवः । देवपदेन विष्णुः । कर्मणां कादिकारकपटुसाध्यत्वेऽपि इड कीपादानादेरनुक्तिः, असार्वत्रिकत्वात्तस्योत ज्ञेयम् ॥ १४ ॥ शरीरवाइमनोभिर्यकर्म प्रारभते नरः ॥ न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥ १५ ॥ तक टी-इमान्पैव सर्वकर्महेतब इत्याह-वारीरेति । शरीवामनोभित्रिभिरेर्यकर्म नरः प्रारभते निर्वतपति न्याय्यं शास्त्रविहितं धम्, विपरीतं वा शाखनिपिद्धं वा । न्याय्यविपरीतयोमध्ये प्राणापानाद्यन्यत्सर्वमन्तर्भवति । तस्य सर्वविधस्य कर्मणः पञ्चैते योक्ता हेतवः कारणानि भवन्ति ।। १५ ॥ म०टी०-स्वरूपमुक्त्वा वेषां पञ्चानां कहेतुत्वमाह तृतीयेन-चरीरेति । शरीरं वाचिकं मान- सिकं पाविधिप्रतिपेधलक्षणं त्रिविधं कर्म वर्मशास्रषु प्रसिद्धम् । अक्षपादेन पोक्तम् 'प्रचिर्वाग्यु- द्विशरीरारम्भः' इति । बुद्धिर्मन: । अत: प्राधान्याभिप्रायेणोच्यते शरीरेण वाचा मनसा वा यत्कर्म प्रारभते नियति नरः मनुष्याधिकारित्वाच्छाबस्य । कीदृशं कर्म ? न्याय्यं वा शास्त्रीय धर्म, विपरीया अशास्त्रीयमधर्म यचं निमिपितयेष्टिवादि जीवनहेतुरन्या विहितप्रतिषिद्धसमं वरस पूर्वतयाधर्मयोरेर - श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८० १६] भुक्तमागवं गतमिति • दुष्टमदुष्टं कर्म कृतमिति वाऽवश्रवणादिः सन् य आत्मानं तचकर्मणां कारमेव पश्यति मन्यत इत्यर्थः । स एवं निष्क्रिय एवात्मन्यकरि स्खे कूटस्यासचिद्रूपे कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यन्यधर्मा- रोपयिता पुरुपः स्वयमतबुद्धिनित्यनिरन्वरश्रवणमननादिसंस्कारैः सुसंकता निष्क्रियो नित्यशु- घुद्धमुक्तस्वभावोऽयमात्माईपदार्थ इत्येवमाकारेण सम्यविषयोझवात्मतत्त्वा बुद्धिर्यस्य स कृतवुद्धिः प्रबुद्धात्मतत्त्वस्तद्विपरीतस्त्वकृत्युद्धिय । वधा कृतश्रवणोऽपि सन्यङ्नापरोक्षीकवात्मस्वरूपस्वस्य भावो. ऽहतबुद्धित्वं तस्मादेव दुर्मतिरविद्याकार्यत्वेन दुष्टे देहेन्द्रियादावेवाहमिति मतिर्यस्य स दुर्मतिः । यद्वा रजस्तगोवासनामिकयाऽविद्यया दूपिता मविर्यस्य स दुर्मधिः पशुदिहात्मबुद्धिस्य भवति, यतोऽनात्मान- मेवाधिष्ठानादिकं सक्रियमात्मनं पश्यत्यहं कती भोका गच्छाम्यागच्छामि कुर्व भुत इति । यथाभ्रेपु धावस्त्र- धावन्तं चन्द्रं धावन्तं पश्यति, यथा नावि गच्छन्त्यामगच्छन्वं वरं गच्छन्वं पश्यति मूढस्तवमक्रिय बुद्धापि सक्रियमेव पश्यति यथा, तयायमात्मानमारमेव श्रुत्वा मत्वा च पुनरपि फर्तारं भोत्तारमेव पश्यत्यतः स आत्मतत्त्वम् निष्फलं निष्क्रिय शान्वर' इति, 'नित्यं शुद्धं युद्धं गुकं सत्यं सूक्ष्मं परिपूर्णमद्वयं सदानन्दचिन्मात्रम्' इति, 'नित्यः सर्पगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः' इविश्रुतिस्मृत्याचार्ययोधित न पश्यति न विज्ञानातीत्यर्थः । नन्वयं पुरुष आत्मानमकतरिमेव कारं पश्यतीति यदुक्तं तदनुपपन्नमेव, सर्वप्रमाण- विरोधादह करोमीत्यहंभावस्य कर्तधर्मस्य प्रत्यक्षत्वात् । नत्वयं देहधर्मःमृतदेहस्याहंभावाभावाद्गमनादिक्रिया- भावाच । देहचेष्टा सर्वाप्यात्मकतका सत्यात्मन्युपलभ्यमानत्वात्सति वायो वृक्षचेष्टायविति सर्वस्यापि कर्मण आत्मकर्तृकत्वमेवानुमीयते ।" स एव मायापरिमोहितात्मा शरीरमास्थाय करोति सर्वम् ॥ इति श्रूयवे च । ततः कर्तृत्वमात्मधर्म एवेति चेत्सत्यं, कर्तृत्वमात्मनः श्रूयते मृतदेहस्य चतन्न दृश्यते। तथापि श्रुतियुक्तिभि- विचार्यमाणे निरवयवस्य व्योमवदविक्रियस्यात्मनश्चलनक्रियाऽसंभवात्कर्तृत्व न सिध्यति सुपुप्तावात्मनः कर्तृ- त्याभावस्य सर्वप्रत्यक्षत्वात् । ननु सुपुप्तावात्मोपलम्भाभावाचदसत्वे वत्कर्तृत्वाभावो युक्त एवेति चेन्न । 'सु. खमहमस्याप्सं न किंचिदवेदिपम् । इति सुपुप्तावात्मसद्धावस्य प्रत्यभिज्ञायमानत्वाचदसत्त्वासिद्धः। 'स्वनम- हमद्राक्षम्' इति स्वस्य स्वप्नदर्शनवत्सुषुप्तिसुखस्यानुभूयमानत्वात्स्वप्न इव सुपुप्तावात्माऽस्त्येवाहपदार्थस्तदसत्त्वे मुपुस्तितत्सुखज्ञानाभावप्रसङ्गात् । सुपुस्तितत्सुयज्ञातु: स्वस्य सझावोऽभ्युपगन्तव्यस्तत्र सत्यात्मसद्भावेऽन्या- रमनः कर्तृत्वं न दृश्यते । ननु सुपुतावप्यात्मनः सुरामस्वाप्सगिवि स्वापक्रियाकर्तृत्वगस्त्येवेवि चेन निरवयस्य क्रियानुपपत्तौ तिष्ठत्यास्त इत्यत्र यथा तथा स्वपिवीति व्यपदेशमात्रमेव नान पुरुपव्यापारः संभववि करणा- भावानिरवयवत्वाचात्मनः । किंच " स्वमपीसो भवति" इति श्रवणाचत्रात्मा स्वस्य निरुपाधिकस्वरूपप्रार्ति प्रकाशयत्यस्वाप्समिति न तु बुद्धयादिवत्स्वपिति "असुप्तः सुप्तानभिचाकशीति । एष सुतेपु जगति" इति च श्रुतेः। यत एवमत: कर्तृत्वमन्यधर्मः। एव न त्वात्मधर्म: 'निष्कलं निष्क्रियम्' इति, नायं हन्ति न हन्यते इति, 'अनन्तश्चारमा विश्वरूपो ह्यकर्ता इति, 'वृक्ष इव स्तब्ध.' इति, नित्यः सर्वगतः स्थाणुः' इत्यादिश्रुतिस्मृतिशवमा- रमनः कर्तत्वाभावमेव बोधयति । न किंचिदात्मा चेष्टते निरवयवत्वात्परिपूर्णत्वादित्यादियुक्तयश्चाक्रियत्वमेव साधयन्ति । नहिं कस्य धर्म: कर्तृलमिति चेदुच्यते-पुनरपि सता मुमुक्षूणामात्मनि कर्तुत्वभ्रमविच्छित्त्यै जान- स्वप्नयोहे चान्यत्राहममेत्यभिमानवतो विज्ञानात्मन एव साभासस्य कर्तृत्व भोक्तृत्वं च जायत्स्वप्नयोः खल्बह- ममेत्यभिमानी विज्ञाना-मा सर्वाणि कर्माणि करोति, उभयत्रापि तस्यैव कर्तृत्वं विद्वत्प्रत्यक्षं मुपुप्तौ तदभावा- स्कर्तृत्वधर्मपतीत्यभावस्ततोऽन्वयव्यतिरेकाभ्या विज्ञानात्मन एव कर्तृत्वं यस्मादिदमहं करोमीत्यभिमानेन सामान्य विशेषं च कर्म करोति । तथाच श्रुति:-"विज्ञानं यहं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च" इति, 'मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुपः ' इति सर्वप्रमागैर्विज्ञानालगन एव कर्तृत्वावधारणान त्वामा फर्ता भोति सिद्धम् ।
अ० १८ श्लोक १६] तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १९९९ शरीरमास्थाय करोति सर्वमित्यत्र मायापरिमोहितात्मेति लिनान्माययाऽन्यदिव “स एप आत्मा" इति, ध्या- यतीव लेलायतीव" इति च श्रवणागजारूढे राजनि राजाय गच्छत्तीति गमनक्रियाकर्तृत्वं यथाऽऽरोपितं, तथा माययाऽविद्यया मूढेरात्मन्यारोपितं कर्म करोतीवत्यनुवदान करोति समितिश्रुतिः, नतु सत्यमिति छूते, तत्सत्यत्वे संसारिवादात्मनो मोक्षामावप्रसास्ववचनव्याघातप्रसङ्गाच । यत्तः स्वयमेव मोक्षं वक्ति 'विमुक्तश्च विमुच्यते' इति । तस्मादात्मनो न कर्तृत्वमिति व्यवस्थितम् । ननु 'तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु' इति तुशब्दयोगात्केवलशब्दस्वारस्याचात्मनः केवलस्य तु कर्तृत्वाभावेऽप्युपाधिविशिष्टस्य कर्तृत्वमस्त्येवेति चेद्धवानत्र प्रष्टव्यः । आत्मन उपाधिवैशिष्ट्यसिद्धेः संवन्धः संयोग उच्यते उत समवायो वा ? आये संयोगः सर्वत उच्यते, किमकदेशेन वा? न द्वितीयः, निरवयवस्य देशकल्पनायोगात् । नायः, परिच्छिन्नस्योपाधे पूर्णेन सह सर्वकः संयोगायोगानिरक्यवसावयवयोः संयोगासंभवाच । सत्यपि सर्वतः संयोगसंवन्ये त्वात्म- नोऽपि जडत्वं जगदान्व्यं च स्यात् । न द्वितीयः, समवायसमवायिनोईयोः संवन्धसिद्धौ समवायान्वरा- पेक्षायामनवस्थाप्रसङ्गात्तयोरयुतसिद्धत्वाभावाच न समवायः सिध्यति । "कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही' इत्यात्मनो देहित्वश्रवणादुभयोदेंहदेहिनोरवयवावयविभावसंभवादस्त्येवायुतसिद्धत्वमिति चेन्न । यत्राऽवयवी नत्राऽवयव इविवद्यत्रामा क्य देह इति व्यायभावाद्युतसिद्धत्वाऽसिद्धेः । तर्हि देहीति कथमिति चेदविद्याशाया- मध्याससंबन्धनात्मनो देहित्यसंभवादेहील्युक्तिराभ्यासिकी, न तु वास्तवी । संयोगसमवाययोर- न्यवरसंवन्धानीकारेऽपि विशेषणनाशाद्विशिष्टस्यापि नाश इविन्यायेनोपाधिनाशादात्मनोऽपि नाशप्रसमा. दस्य नित्यत्वप्रतिपादकश्रुतिविरोधप्रसङ्गाच, संसारित्वमोक्षरहितत्वायनर्थवसमाच । "न तनाति किंचन । असलोः हयं पुरुष" इतिश्रवणादसङ्गस्य निरवयवस्यात्मनो निर्विशेषस्योपाधिना तद्धर्मेण तत्कर्मभिवा संवन्धः कल्पयितुं केनापि न शक्यते । तस्मादात्मन: क्रिया वा क्रियानयत्वं वा क्रियाविपयत्वं वा कचित्कदाचित्किंचिदपि न संभवति । व्रत एवोच्यते भगवताऽविद्यां तत्कार्यं च मोचयित्वा भत्तान रक्षितुमिच्छता सर्वज्ञेनात्मानं केवलं स्विति । तुशब्द आत्मन उपाधिभिन्नत्वदीकरणार्थ: । सावयवं सक्रिय. मुपाधि कर्तारं भोक्तारं च पश्यतु, न तु केवलं निष्कलं निष्क्रियमात्मानं प्रमादेनापि कर्तारं पश्येत् । निर- वयवस्यासङ्गस्यात्मनः क्रियानयत्वादेरसंभवाय एवंलक्षणमात्मवत्तं सद्गुरोर्मुहुः थुत्का माना चामानं पुण्यपापकियाकार भोकारं वा पश्यति स एव दुर्मतिरविवेकी न त्वजाविपाल इत्यर्थः ॥ १६ ॥ श्री०टी०-ततः किमत आइ-तत्रेति । तत्र सर्वस्मिन्कर्मणि एते पच हेतवः इत्येवं सति केवलं निरुपाधिकमसङ्गमात्मानं तु य: . कारं पश्यति शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामसंस्कृतयुद्धित्वादुर्मतिरसौ न्य पश्यति ॥ १६॥ सटी-एतेषामेव कर्तृत्व सर्वस्यापीह कर्मणः ॥ आत्मनो नास्ति कर्तृत्वमित्याह भगवान् हरिः 11 १ ॥ तत्र कर्मणि पूर्वोके सर्वस्मिन्पञ्चहेतुमिः । निर्वयमाने सति य आत्मानं सर्वसाक्षिणम् ॥ २ ॥ स्वप्रकाशपरानन्दमपाध्यं केवलं परम् ॥ उदासीनमकरिमद्वितीयमविक्रियम् ।। ३ ॥ वस्तुतोऽसानिन सन्त- मधिष्ठानादिकर्मण: 11 काहमिति चाभ्यासात्कारे हि क्रियाश्रयम् ।। ४ 11 पश्यत्यविद्यया रज्जु भुजन- मिव मूढधीः ।। महामोहातत्वेन पश्यन्नप्यन्यथामतिः॥५॥शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामसंशवमधि कुधीः । प्रचिवन्धकपापेन दुष्टा यस्य मतिः स च ॥ ६॥ न पश्यत्येव विधान्तो धन्यनत्यावभासवः ।। अवो. शुद्धमनस्कत्वादविप्रेम्पविरागवान् ॥ ७ ॥ मानायोग्यतया सन्तमझरिमविक्रियम् ॥ कवार विळिया- वन्द कल्पयन्मायया परम् ॥ ८ ॥ संतारी देहभृत्तमाविकारी कर्मकर्तृपु | बादाम्पाभ्यासतः फर्म प्रा. संसरत्ययः ॥ ९ ॥ एतेन वार्षिो यस्तु देहादियो विलक्षणम् ।। आत्मानं केलं युण्या फार * श्रीमनगवद्गीता [अ० १८ श्लो०१५] कार्यमिति न्याय्यविपरीतयोरेवान्तभूतम् । पञ्चैते यथोक्ता अधिष्ठानादयस्तस्य सर्वस्यैव कर्मणो हेतवः कारणानि ॥ १५ ॥ शं० टी०-उक्तमेवार्थ विस्पष्टयति-शरीरेति । नरो वाह्यदृष्ट्या कर्मकर्ता पुरुष: " शरीरवाङ्मनोभिः वत्कर्मणा करोति" इति श्रवणान्न शरीरपदेन बाग्व्यतिरिक्तानीन्द्रियाणि गृह्यन्ते । शरीरेणेन्द्रियैर्वाचा मनसा च बुद्धिपूर्व न्याय्यं शास्त्रीयं वा विपरीत प्रतिपिद्धं वा यकर्म प्रारभते करोति तस्य करणय- निर्वत्यस्य कर्मणः विहितस्य निपिद्धस्य बान्यस्य वा सर्वस्याप्येते अधिष्ठानादयः पञ्च हेवयः कारणानि भवन्ति । ननु सर्वस्यापि कर्मणः करणत्रयसाध्यत्वे सिद्धे सत्यधिष्टानादीनां कारणत्वोक्तियथैवेति चेत्सत्यं, विहितं प्रतिपिद्धं च यत्क्रियते पुरुपेण तत्सर्व करणत्रयेणैव सिध्यति, तथापि " यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति" इति न्यायेन युद्धिपूर्वकस्यैव कर्मणः करणायसाध्यत्वं नत्व- धुद्धिपूर्वकस्य क्षुतजृम्भणादेस्तत्राप्युच्छासनि.श्वासोन्मेपादेः स्वाभाविकक्रियात्वेन करणयसाध्यत्वासंभवा- कञकसाध्यायाः फलानुभूतिक्रियायास्तत्साध्यत्वायोगाच करणत्रयस्य चेष्टामात्रकारणत्वं न संभवति । तत एवोच्यते शरीरवाड्मनोभियत्कर्म प्रारभते नरः । तस्याप्येते पञ्च हेतवः' इति । तेन शरीरादीना पृथक्करण- स्वाभावात्तत्कृतकर्मणोऽप्येतान्येव कारणानीति सृचितं भवति । ततः पुरुपादृष्टानुरूपेण सर्वकर्मनिष्पादकत्वं पुण्यापुण्यकर्मफलानुभावकत्वमनुभवितृत्वं चाधिष्ठानादीनामेवेति सिद्धम् ॥ १५ ॥ - श्री० टी०-एतेषामेव सर्वकमहेतुत्वमाह-शरीरेति । यथोकैः पञ्चभिः प्रारभ्यमाणं कर्म विष्ववान्त. भर्भाव्यं शरीरवाङ्मनोभिरित्युक्तं शारीरस् । वाचिकं मानसं च त्रिविधं कर्मेति प्रसिद्धेः । शरीरादिभिर्यद्य. स्फर्म धय वाऽधर्म्य वा करोति नमस्तस्य सर्वस्य कर्मण एते पञ्च हेतवः ॥ १५ ॥ to-उक्त्वा स्वरूप पञ्चानामेतेपा कर्महेतुताम् ।। आहेदानी जगन्नाथो भगवान्करुणानिधिः ॥१॥ देहेन मनसा वाचा निर्वतयति कर्म यत् ॥ शास्त्रीयं वाप्यशाखीयं धर्माधर्मात्मकं नरः ॥ २ ॥ निमेपो- ..न्मेपचेष्टादिनिमित्वं जीवनेऽस्ति यत् धर्माधर्मफलत्वेनैवाऽन्त ते तयोर्द्वयोः ॥३॥ न्यग्यादा विपरीताद्वा भिन्नं कर्म न किंचन ॥ सर्वस्य कर्मणश्चैते यथोक्ताः पञ्च हेतवः ॥४॥ अधिष्ठानादयो नै यो भिन्नः फर्तास्ति कश्चन ।। एम्यो विलक्षण: साक्षी निष्क्रियो निर्विकल्पकः ॥ ५ ॥ कूटस्थः प्रत्यगात्मैव ज्ञेयो ब्रह्माद्वयात्मकः ॥ तेनैव सुमविवद्वानन्यथा दुर्मतिर्नरः ॥ ६ ॥ यदज्ञानाल्लोकोऽचलवपुपि कू. टस्थचिदौ भृपाईकस्मिीत्यपि वनुयुगाध्याससचिवात् ।। प्रकल्प्यानन्धौ भ्रमति सततं भ्रान्तिगहने विमुक्तो यज्ज्ञानाद्भवति सुमतिनामि तमजम् ॥ ७ ॥ १५ ॥ भा० टी०-पञ्चाना स्वरुपमुक्त्वा कर्महेतुत्वाह-शरीरेति । यत्कर्म न्याय्य वा धर्म्य शाखीय, वि. परीतं वाऽधर्म्यमशास्त्रीयम् । यश्चापि निमिषितचेष्टादिजीवनहेतुः, तदपि पूर्वकृतधर्मादेरेव कार्यामितिन्याय्यवि- परीतयोमहणेन प्राह्यम् । यन्याय्यादिकर्म शरीरखानोभिस्तिभिर्नरः प्रारभवे निर्वयति तस्य सर्वस्यैव कर्मणः पञ्चैते यथोक्ता आधष्ठानादयो हेतवः कारणानि । ननु पथैतानीत्यादिनाऽधिष्ठानातीनि सर्वकर्मणा निर्व- कान्युक्तानि, अत्र तु शरीरवाङ्मनोभिः कर्म प्रारभत इत्युक्तमतः पूर्वापरविरोध इति चेत्, नैप दोपः। शरी- राधारम्ये विविध कर्मणि पञ्चानामधिष्टानादीना हेतुत्वस्य विवक्षणात् । दर्शनश्रवणादि घ जीवनलक्षणं विविधकर्मण्येवान्तर्भवतीवि त्रिधव गशीकृतमुच्यते । ननु फलोपभोगकाले कारणान्तरापेक्षासंभवात्कथं पञ्चा- नामेवाधिष्ठानादीना वत्र हेतुत्वमिति चेत्, अपेक्षितस्य सर्वस्यापि कारणस्यैतेष्वेवान्तर्भावात्पञ्चानां हेतुत्वं न विरुभ्यते ॥ १५ ॥ प० टी०-एतेपामेव सर्वकर्महेतुत्वमाह-शरीरेति । नरः शरीरवाङ्मनोभिन्याय्यं धयं विपरीतमधर्म्य वा यत्कर्म प्रारभते तस्य हेतव उताः पञ्च ॥ १५ ॥ स०टी०- - 5 [अ० १८ लो० १६] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकापता १९९७ रा०टी०-तर्हि करणकारकं कुचो नोकमित्यतो वा कत्येतानि करणानीत्यतो वाह-शरीरेति । अत्र शरीरमनोवाचामेव करणकारकत्वेनोक्त्या कर्मापादानादीनि न सार्वत्रिकाणीति सूचितम् ॥ १५ ॥ तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।। पश्यत्यकृतबुद्धिवान स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥ ताटी-इदानीमधिष्ठानादिहेतुपञ्चकनिरूपणस्य प्रयोजनमाह-तत्रेति । तत्र एवं यथोक्के न्याय्ये विपरीते वा कर्मणि अधिष्ठानादिहेतुके निश्चिते सनि कस्मिंश्चिदपि कर्मणि कर्तारमात्मानं केवलमहमेव कर्तेति यः पश्यति जानाति, स अकृतबुद्धित्वात् अकृता शास्त्राचार्योपदेशसंस्कार- रहिता बुद्धिर्यस्य स तथाभूतत्वान्न पश्यति । यथाऽवस्थितात्मनः कर्तृत्वं परमेश्वरनिपम्पशरीन्द्रिया धीनमिति न पश्यति, अतो दुर्मतिः दुष्टाऽयधार्यग्राहिणी मतिर्यस्य स विपर्ययज्ञानासंसारे वध मामोतीत्यर्थः ॥ १६ ॥ म०टी०-इदानीमैतेपामेव कर्मकर्तृत्वादात्मनो न कर्तृत्वमित्यधिष्ठानादिनिरूपणफलमाह-तरेति । तत्र कर्मणि प्रागुक्के सर्वस्मिन् एवं सति अधिष्ठानादिपञ्चहेतुके सति तैनिर्वयंमान आत्मानं सर्वजडप्रपञ्चरय भासकं सत्तास्फूर्तिरूपं स्वप्रकाशपरमानन्दमपाध्यं केवलमसङ्गोदासीनमकर्तारमविक्रियमद्वितीयं तु एव परमा- र्थवः । अविद्यया त्यधिष्ठानादौ प्रतिविम्बितमादित्यमित्र नोये तज्ञासकमनन्यत्वेन परिकल्प्य तोयचलनेनादि- त्यश्चलतीतिवदधिष्ठानादिकर्मणोऽहमेव कर्वेति साक्षिणमपि सन्तं कर्तार कियाश्रयं यः पशयत्यविद्यया कल्प- यति रज्जुमिव भुजनं, स एवं पश्यन्नपि म पश्यत्यात्मानं तत्त्वेन स्वरूपाक्षानतत्वाभ्यासस्य । स ध्रान्त्या विपरीतमेन पश्यति न यथावत्यमित्या को हेतुरत आह-अकृउबुद्धिनात् । शास्त्राचार्योपदेश- न्यायरनुपजनिवविवेकयुद्धित्वात् । नहि रज्जुतत्त्वसाक्षात्कारामाचे भुनानमं कश्चन वाधते । एवं शास्त्राचार्योपदेशन्यायैः परिनिष्ठितेऽहमस्मि सत्यं ज्ञानमनन्तमकनभोक्तृपरमानन्दमनयस्थमदर्य प्रति साक्षात्कारेऽनुपजानिये फुतो मिथ्याज्ञानतत्कार्याधः ? एतादृशं साक्षात्कारमेव गुरुमुपसृत्य वेदान्तवाक्य- विचारेण कुतो न जनयतीत्यत आह-दुर्मतिः । दुष्टा विवेकप्रतिवन्धकपापेन मलिना मतिर्यस्य सः । अतो- ऽशुद्धबुद्धित्वान्नित्यानित्ययस्तुविवेकादिशून्यत्वेन तत्त्वज्ञानायोग्यत्वादकारमपि कार केरलमप्यफैर- लमात्मानमविद्यया कल्पयन्संसारी कर्माधिकारी देहमुदतवुद्धिः कर्मकर्तृपु तादात्म्याभिमानाकर्म- त्यागासमर्थ: सर्वदा जननमरणप्रवन्धेनानिष्टमिष्टं मिश्रं च कर्मफळमनुभवति । एवेन. यस्तार्किको देहादिव्यतिरिक्त आत्मानमेर फर्वारं केवलं पश्यति सोऽप्यतयुद्धित्वेन व्याख्यावः । अन्यस्त्याइ- आत्मा केवलो न कळ कित्यधिष्ठानादिभिः संहतः सन् परमार्थतः कत। । कारमात्मानं केलं पश्यन् दुर्मविरिति केवलशब्दप्रयोगादिति ! वन, 'परमार्थतः सर्वक्रियाशून्यस्यासनस्यान्मनोऽधिष्ठानादिभिः संहतत्वानुपपचे: । जलसूर्यकादिवत्तु आविद्यकेन संतत्वेन कर्तृत्वमा नादृशमेय, अभिष्ठानादीनामप्या- . विद्यकत्याच । केवलशब्दतु स्वभावसिद्धमात्मनोऽसनाद्वितीयरूपत्वमनु मदवि । कर्तवदर्शिको दुर्मतित्व हेतुल्येने सदोषः ॥ १६॥ ०टी०-'प्राय च कर्माणि विन्यायेन अभिष्ठानादिपश्चास्यैर प्राय क्रियामाप्रसारण सिद्ध फलितमाह-तत्रैवमिति । एमधिष्ठानादीनामेव पचानां सर्वकर्मनितम्वनिफ्टी सत्या या अता- माऽऽरमानात्मतत्यनिधारन्यः पुरुषस्वर प्राग्वैरेवाधिष्ठानादिभिः को विहिव निपिढे या फर्मण्यमेतस्य फागः कश्यकतारमेवात्मानं केवट खोकरसं निष्फलं निष्क्रिय निशि का पश्यनि, मया इनाई । । १६१ १२०० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० १७. पश्यतीतरः ॥ १० ॥ अमृतधीतया सोऽपि व्याख्यानोऽनात्मदर्यतः ॥ कर्तृत्वं कल्पिते सिद्धं देहादि- जडपञ्चके ॥ ११ ॥ प्रत्यगात्माऽक्रियः सिद्धो वाक्याजगवतो हरेः ।। १२ ।। सकलजडविकाराध्यासन- श्चिद्धनेऽच्छे कुमतिरकृतबुद्धिः कल्पयन्कर्तृभावम् ॥ भ्रमति भवजलाब्यौ तर्कविद्योऽप्युपेक्ष्यस्त्विति वदति हरियस्तं प्रपद्ये मुकुन्दम् ॥ १३ ॥ १६ ॥ भा० टी०-एपमधिष्ठानादीना सर्वकर्मणि हेतुत्वमुस्त्वाऽविदुष आत्मन्यकर्तरि कर्तृत्वदृष्टिमनुवदति-त. त्रेति । तत्रैवं सति एवं यथोक्कैः पञ्चभिः हेतुभिः सर्वस्मिन्कर्मणि निर्वत्र्ये सति केरलं शुद्धमसंहतमकारगा- स्मानमात्मनोऽनन्यत्वेन कल्पितेरधिष्ठानादिभिः क्रियमाणस्य कर्मणोऽहमेव कर्वेति कतीरं योऽझवबुद्धित्वात वेदान्ताचार्योपदेशन्यायैरसंकृतबुद्धित्वात् पश्यति अत: स दुर्मतिः नैव पश्यति । योऽपि देहातिरिकाम वादी तार्किकादिः केवलमकर्तारं शुद्धमात्मानं कर्तारं पश्यति, असावष्यकृतयुखित्वान पश्यति आत्मनः कर्मणो वा तत्त्वम् । अत: दुर्मति कुत्सिता विपरीता दुष्टाऽनसं जननमरणप्रातिहेतुभूता मतिरस्येति स पश्यन्नार्षि न पश्यति । यथा वैमिरिकोऽनेकचन्द्रं, यथा वान्येपु धावत्स्वेवासनस्थितमात्मानं धावन्तं पश्यति तथा- ऽधिष्ठानादिषु क्रियाकर्तृषु तद्गतं स्वात्मानमकर्तारं कर्तारं पश्वति स दुर्मतिरित्यर्थः ॥ १६ ॥ प० टी०-ततः किमत आह-तति । तत्र सर्वस्मिन् कर्मण्येते पञ्च हेतव इत्येवं सवि केवलं निरुपा• धिमसङ्गमात्मानं यः कर्तारं पश्यति स शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामकृतबुद्धित्वाहुर्मतिरसौ सम्यन पश्यति ॥१६॥ रा० टी०-ततश्च किमित्यत आह-तत्रैवं सतीति । तन कर्मणीश्वरादिपञ्चकस्यैवं करणत्वे सति जीवस्य स्वातन्त्र्याभावेन केवलं परप्रेरणा विना स्वतः क्रियाहीनमात्मानं कर्तारं स्वातन्त्र्येण कर्मकारं यस्तु पश्यति मन्यते सोऽझवबुद्धिरवात् श्रवणाद्यसंस्कृतद्धित्वाकुर्मतिः दुष्टबुद्धिः सन्न पश्यति, तत्त्वविन्न भवतीत्यर्थः ॥ १६ ॥ यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।। हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निवध्यते ।। १७ ।। तकरी-एवमनिनेकिन आत्मनः स्वतन्त्रकर्तृत्वज्ञातुरइत्वं दुर्मतित्वं च निरूप्य निरहंकारस सुबुद्धित्वेन कर्मलेपाभावं निरूपयति-यस्येति । यस्य शास्त्राचार्योपदेशसंस्कृतान्तःकरणस्य पुरुपस्य अहंकृतो भावोऽहं कर्तेत्येवंरूपो भावोऽभिप्रायो न भवति । परमेश्वराधीनदेहेन्द्रियनिमित्तकर्तृत्वनिश्च यात् । अत एव बुद्धिर्यस्य न लिप्यते, ममेदं कर्म मदीयमिष्टं साधयेदितीष्टसाधनत्वेन तत्राभिनिवेशं न करोति । स एवंभूनो विविक्तात्मस्वरूप इमॉल्लोकान् माणिनो हत्याऽपि न हन्ति, हननक्रियाऽऽथयो न भवति । यद्यप्येवंभूतस्य न हिसादिकर्म संभवति, तथापि कथंचित्स्यातर्हि अहं कर्तेति न मन्यते इत्यर्थः । तत एव न निवध्यते तत्कर्मफलानुभवाय तत्र तत्र न जायते इत्यर्थः ॥ १७ ॥ म०टी०-तदेवं चतुर्भि: लोकै: 'अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्यत्यागिनां प्रेत्या इति चरणम्यं व्याख्यातमिदानी 'न लु संन्यासिना कचित्' इति तुरीयं चरणमेकेन व्याचष्टे-यस्येति । यस्य पू. क्तिविपरीतस्य पुण्यैः कर्मभिः क्षपितेषु विवेकविरोधिपापेषु नित्यानित्यवस्तुविवेकादिसाधनचतुष्टयं प्राप्तवत: शास्त्राचायोपदेशन्यायजनिताकञभोक्तस्यप्रकाशपरमानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मसाक्षात्कारस्याज्ञाने सकार्ये वाधिवे न भवत्यहं कर्तेत्येवरूपो भावः प्रत्यय. । यस्य भाव: सद्भाव: अहंकृवोऽहमिति व्यपदेशाों न, अहंकारवाधेन शुद्धस्वरूपमात्रपरिशेपादिति वा 1 अहंकृतोऽइंफारस्य भावः तत्तादात्म्यं यस्य न विवेकेन बाधितत्वादिति वा । वाषितानुवृत्तावपि एत एव पञ्चाधिष्ठानादयो मायया मयि सर्वालगनि कल्पिता सर्वकर्मणां कारी - - । . [अ० १८ श्लो० १७ ] तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२०१ मया स्वप्रकाशचैतन्येनास न कल्पितसंवन्धेन प्रकाश्यमानाः, अहं तु न कर्ता किंतु कर्तृतद्वयापाराणां साक्षिभूत: मियाज्ञानशक्तिमदुपाधिस्यनिर्मुक्तः शुद्धः सर्वकार्यकारणासंबद्धः कूटस्थनित्यो निर्दयः सर्ववि. कारशून्यः 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः । साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च । अप्राणो ह्यमना: शुभ्रो अक्षरात्परतः परः । अज आत्मा महान्ध्रुवः सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः । निष्फलं निष्क्रिय शान्तं निरवयं निरसनम्' इत्यादिश्रुतिभ्यः, 'अविकार्योऽयमुच्यते 'प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥ तत्त्ववित्तु न सनते 'शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते । इत्यादिस्मृतिभ्यश्च । वस्भन्नाई कर्वेत्येवं परमार्थदृष्टेः युद्धिरन्त:करणं यस्य न लिप्यते नानु- शयिनी भवति, इदमहकार्यमेतत् फलं भोक्ष्य इत्यनुसंधानं कर्तृत्ववासनानिमित्त लेपोऽनुशयः । स च पुण्ये कर्मणि हर्परूप: पापे पश्चात्तापरूपः । ईदृशेन द्विविधेनापि लेपेन बुद्धिर्न युज्यते कर्तृत्वाभिमानवाधात् । तथा च ज्ञानिनं प्रकृत्य श्रुतिः- एतमु हैवैते न वरत इत्यतः पापमकरवमिइत्यतः कल्याणमकरवमित्युभे उ हैवैप एते तरति नैनं कृताकृते वपतः । तदेतदृचाभ्युक्तम् । एवं नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न वर्वते कर्मणा नो कनीयान् । तस्यैव स्यात् पदवित्तं विदित्य न लिप्यते कर्मणा पापकनेति' । पापफेनेति पुण्यस्याप्युल- क्षणम् । वर्धते कनीयानिति च पुण्यपापयोः परितोपपरिवापाभिप्रायम् । एवं यस नाईकुतो भावो वुद्धिर्यस्य न लिप्यते, स पूर्वोक्तदुर्मविविलक्षणः सुमतिः परमार्थदर्शी पश्यत्यकारमात्मानं केवलं; स कर्तृत्वाभिमाना• भावादनिष्ठादित्रिविधकर्मफलभागी न भवतीत्येतावति शाखार्थेऽहंकाराभावबुद्धिलेपाभावी स्तोतुमाह-हत्वा हिसित्वापि स इमॉल्लोकान्सर्वान् प्राणिनः न हन्ति हननक्रियायाः कर्ता न भवति अकर्तृस्वरूपसाक्षात्का- रात् । न निवध्यते नापि तत्काउँगाधर्मफलेन संवध्यते । अत्र नाहंकृतो भाव इत्यस्य फलं न हन्तीति । बुद्धिर्न लिप्यत इत्यस्य फलं न निवध्यत इति । अनेन च कर्मालेपप्रदर्शनेऽतिशयमात्रमुक्तं न तु सर्व- प्राणिहननं संभवति । हत्यापीति कर्तृत्वाभ्यनुज्ञा वाधिवकर्तृत्वदृष्टया लौफिक्या, न हन्तीति कर्तृत्वनिषेधः शास्त्रीयया परमार्थदृष्टयेति न विरोधः । शास्त्रादौ नायं हन्ति न हन्यते इति सर्वकर्मासंस्पर्शित्वमातान प्रतिज्ञाय न जायत इत्यादिहेतुवचनेन साधयित्वा वेदाविनाशिनमित्यादिना विदुपः सर्वकर्माधिकारनिवृत्तिः संक्षेपेगोका । मध्ये च वेन तेन प्रसङ्गेन प्रसारिता, इह शास्त्रार्थतावत्वप्रदर्शनायोपसंहृता-न हन्ति न निव- ध्यत इति । एवं चाविद्याकल्पितानामधिष्ठानाद्यनात्मकृवाना सर्वेषामपि कर्मणामात्मविद्यया समुच्छेदो- पपत्तेः परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादित्रिविधं कर्मफलं न भवतीत्युपपन्नम् । परमार्थसंन्यासश्चाकात्मसाक्षात्कार एव । जनकादीनामेतादृशसंन्यासित्वेऽपि वलवप्रारब्धकर्मवशात् वाधितानुवृत्त्या परपरिकल्पनया वा कर्म- दर्शनं न विरुद्धं परमहंसानामीहशानी भिक्षाटनादिवत् । अत एव ज्ञानफलभूतो विद्वत्संन्यास उच्यते । साधनभूवस्तु विविदिपासंन्यासोऽनेवंविधोऽपि प्रथममुत्तरकाले ज्ञानोत्पत्तावेवंविधो भवतीति वक्ष्यते ॥१७॥ शं० टी०-एपमनात्मकर्तृके कर्मण्यकर्तारमेवात्मानं मयेदं कृतमिति,यः कर्तारं पश्यति स शतवा श्रुत- श्रावितवेदान्तोऽप्यविदितात्मस्वरूपत्वेन दुर्मतिरिति प्रविपाद्य, यस्तु श्रुत्याचार्येश्वरप्रसादसंपन्नः सततश्रः वणमनननिदिध्यासादिसमुत्पन्नज्ञानेनात्मयाथात्म्यदर्शी विद्वाननात्मकतके दुष्टे शिष्टे वा कर्मण्यात्मानमक- रिमेव पश्यति स एव सुमतिः पण्डितोत्तमः शरीरयात्रादिलक्षणं वाऽन्यद्वा कर्म दुष्टमदुष्टं कृत्वापि स्वय- मकर्तेव भवति न किंचिदप्युपाधिकृतेन कर्मणा लिप्यत इत्याह-यस्येति । ब्रह्मविदाचार्यप्रसादपात्री. भूतस्य वैदिकैरेव कर्मभिः . सात्त्विकर्नहुजन्माराधितपरमेश्वरानुग्रहवतः शुद्धात्मनः श्रवणादिजन्य- ज्ञानेन 'क्षीरनीरवदात्मानात्मनोः स्वरूप झातृशेयलक्षणं सम्यग्विभज्य तात्मन्येवात्मभावमापद्य सदा तदात्मनेव विष्ठवो यस्य महात्मनो ब्रह्मवित्तमस्याभिष्ठानादिभिरेव स्वधैरविद्याका पिक्षित । - .
१२३ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० १७] प्रविपिद्धे वान्यस्मिन् वा कर्मणि क्रियमाणे सति भावः भाव्यते अहमिति गृह्यतेऽनेनेति भावोऽन्तःकरणं अझैवामिति स्वस्वरूप ब्रह्मण्येवाईभायमुपेत्य सदा तदात्मनैव वर्तमानोऽइमामको युतिविशेपो नाहंकवः कर्मफर्तर्युपायावहकरणमहंकृतं ब्रझाकारतामुत्सृज्य कर्मकारणाहमित्यवस्थानं न विद्यते यस्य भावस्य स नाईकृचः अधिष्ठानादिलक्षण उपाधिरेव स्वासनानुरूपेणेदं कर्म करोतीत्यई तूपावितकर्मणो- रुभयोः साक्षी तटस्थो निष्क्रिय एवास्मीति प्रमात्मनेव स्थितः सन् चिरकालं नित्यनिरन्तरसगाध्यभ्यासवले. नाहारादिकर्मकालेऽपि कर्यहंभावरहित इत्यर्थः । यथा यस्योकलक्षणस्य ब्रह्मविदो वुद्धिचिरूपा न लिप्यते मयेदं सुष्टु दुष्टं च कर्म कतमित्येवंभावनाववी न भववि धर्मशीलस्य बुद्धिर्मयायं धर्मः कृतोऽमयधर्मः कव इति तेन कर्मणा यथा लिप्यते धर्माधर्मसंस्कारवती भववि तथा मयेदं दुष्टमदुष्ट कृतमिति सामान्येन या विशेपेण वा तत्संस्कारवती न भवति प्रतिच्छायापत्स्वभिन्ने योपाधिना कृते कर्मण्यदं करोमि मयेदं कवमिति प्रत्ययो ब्रह्मविदुद्धनादेवि कर्तृतत्कर्मतादात्म्यसंबन्धाभावात् । येनाहमिदं करोमीति यत्कर्म कियवे उद्बुद्धरेव मयेदं कृतमिति ऋतत्यभावनालेपश्च सिध्यति नान्यस्य युद्धः, यथा स्नानमई करोमीति स्नानं कृतवतो देवदत्तस्य बुद्धेरेव मया स्नानं कृतमिति कृतत्वभावना पेन फर्भणा लेपश्च, न तु तटस्थयज्ञदत्तस्य युद्धे- रस्ति तद्वत् । नन्वननुरूपदृष्टान्तोपन्यासेनेदं विपरीतमुच्यते, ब्रह्मविदः स्वदेहे वत्कृते च कर्मण्यहमिति मयेदं कृतमिति च प्रत्ययो न जायते इति विदुपोऽपि स्वदेहे नावे सत्यहमिति गया सात- मिति च प्रत्ययो जायत एव विद्वच्छरीरयोः परस्परविभागाभावादिति चेन्न । तयोतिज्ञेयत्वलक्षणेन परस्पर- भिन्नस्वभावत्वादेकत्वानुपपत्तेः । सत्येकत्वे तथाविधः प्रत्ययः प्रसज्जेत । न हि देह एव विद्वान्नापि विद्वानेव हि देहो भवति । तयोर्शातशेयत्ववर्मेण पटवज्ञातवनिनस्वभावत्वाविभक्तश्वमेव युफ, नत्वेकत्वं प्रत्यक्षादि- प्रमाणविरोधात् । ततोऽधिधानादिलक्षणोपाधी वासनया तत्कमणि प्रवृत्चे सति तत्राहं कमीत्यहंप्रत्ययो नौदेति कर्तृतादात्म्याभावात् । तत एव मयेदं कृमिति तद्गुद्धेः कृतत्वभावना च तक्रियालेपश्च न संभवति । तव एवोच्यते 'यस्य नाहंकृतो भावो युद्धिर्यस्य न लिप्यते इति । यदुक्कमननुरूपदृष्टान्तोपन्यासेनेवि तन्न। विद्वच्छरीरयोतिज्ञेयत्वधर्मेण विलक्षणतया परस्परभिन्नत्वे सति शरीरे वत्झते च कर्मणि वद्भिन्नस्य विदु- परत्वमिति मयेदं कृतमिति प्रत्ययानुत्पत्ती युक्त एव दृष्टान्तः । एवं महाविदः स्वस्योपावितद्धर्मउत्कर्मसंव- न्धलेशाभावज्ञानमेवाप्रतिवद्धं नैष्कर्म्यसिद्धेः परमकारणमिति सूचयित्वा दादृशज्ञानसिद्धेः फलमाह- हत्वापीति । य एवमधिष्टानादिभिरेव पञ्चभिरनात्मकैदृश्यभूतैः क्रियमाणे कर्मणि चेष्टामाने वाऽहंकार- ममकारशून्यो भवति स विद्वानिमान् श्रीन लोकान् लोकस्थान् देवर्पिग्राह्मणादीन् सर्वप्राणिनो हत्वापि खह- स्तेन सर्वसंहारं कृत्वापि न हन्ति । न किंचिदपि हिनस्ति-स्वयं तद्वननक्रियायाः कर्ता न भवतीत्यर्थः । नन्विमतिविरुद्धमुच्यते ब्रह्मवित्स्वयं लोकत्रयं हत्वापि न हन्तीति, येन यत्कर्म क्रियते स तस्य कर्मणः कर्ता भवनव दृश्यते फुलालादिः । कथं ब्रह्मविस्वयं सर्वप्रपञ्चसंहारं कृत्वाप्यकतव भवतीति? किमन्यं प्रयो- जयति वा स्वयमेव न करोति वा? नादाः, अन्यप्रयोगेऽपि राज्ञ इवैतस्यापि हननक्रियासंभवात् । न द्विती- या, हत्वापोत्युक्तिविरोधप्रसङ्गात् । ततोऽस्त्येव हननक्रियाकर्तृत्वं विदुप इति चेत्सत्य, यो यत्कर्म करोति कारयति वा स तस्य कर्मणः साक्षात् क्रमेण वा कतैव भवति ।न तथा विद्वान् स्वान्यत्करणजातं प्रयोज- यति, नापि स्वयं च करोति, किं तु मेघस्थश्चन्द्रो मेघमणीव देहस्थो विद्वान देहेन्द्रियादिभिः कृते कर्मणि कर्वेव दृश्यते । सम्यग्बुद्धधा विचार्यमाणे मेघानामेव धावनक्रियाकर्तृत्वं, न तु चन्द्रस्य यथा, तथा देहेन्द्रियाद्यमि- मानिन एवं विज्ञानात्मनो हननक्रियाकर्तृत्व, नतु विदुषः। नहि कूटस्थासङ्गचिद्रूपेणैव तिष्ठतो विदुपस्त्वधिष्ठाना- दिभिः संयोग: समवायो वा संभावयितुं शक्यते, तदसंभवे तत्कर्तृके कर्मणि कर्तृत्वं च न संभवति । तत एको- * [अ० १८ लो० १७] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता च्यते परमेश्वरेण हत्वापिस इमाँल्लोकान्न हन्तीति। मूढदृष्टया चन्द्रवदहि.क्रियावानिव प्रतीयमानोऽपि वस्तुतो ब्रह्मविद्भभावापन्नत्वात् क्रियामात्रस्य तु कर्ता न भवति, तत एवाकर्तुह्मविदस्वकर्मफलसंनन्धं निषेधति न निवध्यत इति । यस्मानिष्क्रियग्रह्मभावापत्त्या ब्रह्मवित्तम उपाधिसंवन्धरहितत्वेन स्वयमुपाधिकृतस्य कर्मणः पुण्यस्य पापस्यान्यस्य वा कर्ता न भवति, तस्मादेव न नियध्यते तत्काउँग फलेन दुष्टेन वाप्यदुष्टेन च न संयुज्यते, कर्मणामन्यकर्तृकत्वात् । नैवान्यकर्तृककर्माण्यस्य लेपाय फलाय च भवति । नहि देवदत्तकृतेन कर्मणा यज्ञदत्तो लिप्यते वभ्यते वा, तद्वन्मयेदं कृत्तनित्यात्मन्यविद्ययाऽध्यरत पूर्वमिदानी वा न तदात्मनोऽवि. क्रियस्याकाशकल्पस्य लेपाय फलाय च भवति । नहि नीलं नभ इत्यज्ञैरारोपितेन नीलिन्ना नमो लिप्यते न नीलं च भवति । नापि चेदं जलमित्यध्यस्तजलेन महर्जलवान् भवत्याश्च । तद्वदारोपितेन कर्मणा दुष्टेना- प्यदुष्टेन वात्मा निरवयवयः फूटस्थः क्रियावान्न भवति, नापि च तत्फलवान् । यस्मादेवं तस्मादात्मन्येवात्म- वामापन्न आत्मविद्यतिः स्वस्याविक्रियात्मत्वदृष्ट्या मया कूटस्थेन पूर्व चाधुना च नैव किंचित्कृतमिति मुहुर्मुहुः स्वयाथाम्गविषयीकरणसमुत्पन्नविज्ञानवलात्संचितादिभ्यः सर्वेभ्यः कर्म यो विनिष्कम्य तत्फलेन जन्मादिना दुःखादिना च न किंचित् स्पृश्यंत इत्यर्थः । एतेन लोकत्रयस्थिताशेपप्राणिसंघातपाते कृते सत्यपि ब्रह्मविदस्तद्धननक्रिया च तत्कृतप्रत्यवायलेशश्च न संभवतीत्येवलक्षणो ब्रह्मज्ञानस्य महिमा महा- जुततरः संसारबन्धविच्छेदहेतुरिति ज्ञानस्य माहाम्यं स्वाभाविकमेव स्तूयते-हत्वापि स इमॉहोकान हन्ति ननिवष्यत इति । नतु नित्यनिरन्तरसमाधिनिष्ठानिर्दग्धसर्ववासनामन्यमहात्मनः स्वात्मारामस्य स्वानन्दामृ- तरसपायिनो नित्यतृप्तस्य सर्वात्मदर्शिनो विदुपः प्रवृत्तिरस्तीति सूच्यते । प्रवृत्तिहतोरविद्याकामादे: समाविना निर्मूलितत्वात् । किंतु परावरैकत्वविज्ञाननिर्दग्धद्वैतदर्शनस्य ब्रहाविद्यतेः कचिदारहारविहारादिलक्षणेन शरीरयात्रामात्रैकप्रयोजनेन कर्मणा दुष्टेन वाप्यदुष्टेन श्लेपो नास्तीत्युच्यते। तथैव श्रूयते 'तं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापफेन' इति, 'यथा पुष्करपलाश आपो न लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न लिप्यते' इति ॥ १७ ॥ श्री०टी०-करतहि सुमतिः यस्य कालेपो नास्तीत्युक्तमित्यपेक्षायामाह-यस्येति । अहमिति कृतोऽहं कर्तेत्येवंभूतो भावोऽभिप्रायो यस्य नास्ति । यद्वा अहंकृतोऽहंकारस्य भावः स्वभाव: कर्तृत्वाभिनिवेशो यस्य नास्ति शरीरादीनामेव कर्मकर्तृत्वालोचनादित्यर्थः । अत एव यस्य बुद्धिर्न लिप्यते इष्टानिष्टयुद्धया कर्मसु न सजते स एवंभूतो देहादिव्यतिरिक्तात्मदर्शी इमॉलोकान्सर्वानपि प्राणिनो लोकदृष्टया हत्वाऽपि विविक्तया खरष्टया न हन्ति । न च तस्फलैविध्यते वन्धं न प्राप्नोति । किं पुनः सत्त्वशुद्धिद्वाराऽपरोक्षज्ञानोत्पचिहे- तुभिः कर्मभिस्तस्य पन्धशद्वेत्यर्थः । तदुक्तम्-'ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन ' इति ॥ १७ ॥ स० टी०-तदेवं चतुर्भि: लोक!णसंन्यासिनां फलम् ॥ अनिष्टादित्रिपाद्योक्तं व्याख्यातं हेतुभिः सह ॥ १ ॥ इदानी तुर्यपादं तद्वयाचष्टे मुख्यतत्परम् ।। पूर्वोक्तविपरीतस्य यस्य ब्रह्मविदः सतः ॥ २॥ शास्राचार्योपदेशा-या संस्कृतात्मैक्यसन्मतेः ॥ स्वप्रकाशचिदानन्दाकर्वभोकात्मवेदिनः ॥ ३ ॥ सका याधितेऽज्ञाने नास्त्येवाईकवा मतिः ।। अहं कतैतिरूपो यः प्रत्ययस्वत्य नास्तिता ।। ४ । नास्त्यहंकारता- दात्म्यं यस्य शुद्धात्मदर्शिनः ॥ अधिष्ठानादयः पञ्च मायया मयि कल्पिता: ॥5॥ कर्तारः कर्मणां नाई कर्तोदातीनभावतः ॥ किं तु साक्षितया वेषां व्यापृरिवभासकः ॥ ६ ॥ इत्येवं यस्य शुद्धात्मम- तेनहिनिर्जडे ॥ यस्यान्त करणं बुद्धि वानुशयिनी फले ॥ ७॥ अकाममिदमनाई भोक्ष्य एतत्फलं विति ॥ कर्तृत्ववासनाहेतुलेंपो नानुशयात्मकः ॥ ८ ॥ स परमार्थदस्थिं पश्यन्नात्मानमक्रियम् ।। हिसि- श्रीमनगवद्गीता [अ० १८ १७] १२०४ त्वाप्यखिलॉल्लोकान्प्राणिनः कालधर्मिणः ॥ ९॥ हननक्रियायाः कर्ता न भवत्यनहंकृतिः । न चाधर्मफले- नासो संबध्यत उदारधीः ॥ १० ॥ अत्र नाहंकृतो भावो न हन्तीत्यस्ति तत्फलम् ॥ बुद्धिर्न लिप्यते त्वस्य न निवध्यत इत्यपि ॥ ११ ॥ अनेनातिशयोकेन फर्मालेपः प्रदर्शितः ॥ हत्वापीति तु लौकि- क्या दृष्टया वाधितयेरितम् ॥ १२ ॥ शास्त्रीयया न हन्तीति न विरोधो मनागपि ॥ एवं मायाकृतं सर्व बुद्धचा कर्तृमुसं जगत् ॥ १३ ॥ मुख्यसंन्यासिनां नास्ति निषिधं कर्मणः फलम् ।। स परमार्थसं. न्यासो ब्रह्मपोधो न चापरः ॥ १४ ॥ ब्रह्मात्मैक्ये परिज्ञाते नप्टेऽज्ञाने सकार्यके ॥ स्वतः सिद्धोऽस्ति संन्यास: सर्वेषामेव कर्मणाम् ॥ १५ ॥ संन्यासित्वेऽपि पूर्वेपा जनकादिमहीक्षिताम् ॥ प्रारब्धकर्मणा तेपा लोकदृष्ट्या क्रियावताम् ॥ १६ ॥ स्वदृष्टया न क्रिया काचिन्न कर्ता कर्म वा कचित् ॥ भिक्षा- टनादिकं कर्म यथा संन्यासिना धिया ।। १७ ।। वाधितं सन्न वन्धस्य कारणं सर्वथा भवेत् ॥ तथा तत्त्वविदा सर्व कर्म श्रौतं च लौकिकम् ॥ १८ ॥ गृहस्थानामपि स्वीयदृष्ट्या वाधितमेव सत् ॥ न बन्धक यतस्तेपा प्रत्यगात्मनि केवले ।। १९ ।। सदा स्थितिर्न देहादी जडवर्गे विनश्वरे ॥ अतो निरङ्कुशा तृप्तिः कृतकृत्यतया विदाम् ॥ २० ॥ यत्पादाम्बुजपट्दीमतिरियं त्यक्त्वाऽखिलाईकृति स्वात्मानन्दमृते न कुन विपये रन्तुं मनागीप्सति ।। यद्वोधामृतपूरपूरितधियं काचिस्क्रिया न स्पृशेत्तं श्रीकान्तमनर्थधामविधुरं नित्यं मुकुन्दं भजे ॥ २१ ॥१७॥ भा० टी०-क. पुनः सुमतिः यः सम्यक् पश्यतीत्यपेक्षायामाह-पस्यति । यस्य शास्त्राचार्योपदेश- न्यायसंस्कृतद्धित्वादहंकृतोऽहंकतेत्येवंलक्षणो भावो भावनाप्रत्यय. एवे एव पञ्चाधिष्ठानादयोऽविद्ययात्मनि कल्पिता: सर्वकर्मणा कारः, नाहम् , अहं तु तद्व्यापारीणांसानिमूतो 'अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः केवलोऽविक्रियश्च इत्येवं पश्यतोऽईछतो भावो नास्तीत्यर्थः बुद्धिर्यस्य न लिप्यते-बुद्धिरन्त.करणं यस्या- रमन उपाधिभूता न लिप्यतेऽहमका तेनाहं नरकं गमिष्यामीति वेशशालिनी न भवतीत्यर्थः । स सुमतिः कृतद्धिः सम्यग्द्रष्टा इमान् प्रत्यक्षादिनानुभूयमानान् लोकान्प्राणिनो हत्वापि न हन्ति हननक्रिया न करोति, फर्तृत्वाभिमानरहितत्वात् । न निवघ्यते-नापि तत्कार्येण हननक्रियाफलेन संवध्यते निर्लिप्तबुद्धित्वात् । भावः सद्भावः अहंकृतोऽहमिति व्यपदेशाहों न, अहंकारयाधेन शुद्धस्वरूपमात्रपरिशेपात् । अहंकृतोऽहंकारस्य भावस्तचादात्म्यं यस्य न विदेकेन वाधिवत्वादिति वैति केचित् । यस्य नाईकृत इति समानाधिकरणे पटवौ । सत्तश्य यस्य लिङ्गलक्षणस्योपाधैरहंकारामिमा वृत्तिमनुत्पादयतोऽहमध्यासान्यस्य भावः सत्ता । यद्वाहमहं. कृति करोतीत्यहंकृदन्तःकरणं यस्य संवन्धिनोऽइंकृतोऽन्तःकरणस्य न भावः न स्थिति , अहंकृतिशन्यं यस्या- न्त,करणमित्यर्थः । तथाहमा कृतोऽहमभ्यासमूलक इति यावत् । एवंविधो भावः पदार्थो ममेत्यध्यासरूपो यस्य लिलात्मनो नास्तीत्युभयविधाभ्यासशून्यावमुक्तं भवति । यस्य प्रमातुर्भावः प्रत्ययमानस्वरूप आत्मा ना- इंकत.-अहमिव कृतोऽहंकारतादात्म्यं प्रापितोऽहंकृतस्तथा न यस्य बुद्धिर्न लिप्यते आमभावेन रजिता न भवति, यस्य युद्धर्व्यतिरिक्तमात्मानं पश्यतो घुद्धिधर्माः कर्तृत्वादयो नात्मनि प्रतीयन्ते इति कात्मवादिता. किंकनिरास: । यस्य च आत्मधर्माश्चतन्यादयो बुद्धौ न संसृज्यन्ते इति युद्धिमेव चेतना वदतो यौद्धस्य, निरासः । चिचितोरन्योन्यस्मिन्नन्योन्यधर्माध्यासो यस्य नास्तीत्यर्थ इत्यन्ये । यस्य वुद्धिः शास्त्राचा- यसमाहिता लधारेवानिच्छिन्ना न लिप्यते विजातीयप्रत्ययलेपं न प्राप्नोति स पश्यतीति स विद्वानिति पूर्व शेकस्य पश्यतिपदानुपनेण योज्यम् । कथं पुनरयमेवंविध इति शेयमित्याशप चेष्टालिङ्गकमनुमानमाह- इत्यापीति । इन्धानुनाऽत्र क्युपाया लक्ष्यन्ते, अगस्थितानिवि पाध्याद्वियन्ते । सतश्च हिंसोपायभूतान्पा- पागप्रहरणादीनुपायान् हाऽवस्थितानिमान् लोकान् रपयं न हन्ति अहंममाभिमानशून्यत्यात् इत्यर्थः । ।
गमितमपि नान्यनिष्ठत्वमन्यस्य, यथा रजतवं न शुक्तिकाया, यथा तलमलिनानं बालेगामितमविषया
नाकाशस्य । क्याधिष्ठानादिविक्रियापि तेषामेव नात्मनस्तस्नादविक्रियस्यात्मनः केनचित्संइननं संहत्य वा
तत्वं संभवनीति केवलत्वमात्मनः स्वाभाविकं केवलशब्दोऽनुवति । नायं इन्ति न हन्यते इति प्रविज्ञाय
न जायत इत्यादिना हेतुवचनेनाविक्रियत्वनुक्त्वा वेदाविनाशिनमिति विदुपः कर्माधिकारनिवृत्ति प्रसादी
भिमानानुपपत्तावविद्याकृताशेपकर्मसंन्यासोपपत्ते. परमार्थसंन्यासिनामनिष्टादि विविध कर्मग. ।
संक्षेपत उक्त्वा तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा प्रसारित 'न हन्ति न निव-यते' इत्युपसंहरति । एवं सदि देहमस्या-
भवतीत्युपपनम् । वद्विपर्ययश्चेतरेपा भवतीत्येतचापरिहार्यमित्येप गीताशास्त्रस्यार्य उपसंदतः । स एषः वेदा
[अ० १८ श्लो०१७] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता।
अतश्य न निरभ्यते नास्य बन्यो जीवन्मुक्त्वादितीतरे । हत्वापि न हन्ति न निवभ्यत इति वाच्यतेचे
हेतुत्वेन प्रतीयमानस्य यस्येत्यादेः, एतत्फलभूतेन प्रतीयमानस्य हत्वापीत्यादेश्य पूर्वपरानुगुण्येन व्याख्यान
कृततवां सर्वज्ञानां मार्गप्रदर्शकानां भात्यकृतामुदाहृतयत्किचित्कल्पनाकरणेन न्यूनता नापादनीया । ननु
यद्यपि स्तुतिरियं तथापि इत्वापि न हन्तीति विप्रतिषिद्धमुच्यमानं कथमुपपद्यत इति चेत् देहाद्यात्मबुद्ध्या
इन्वाइमिति हि लोकेदश्यते, नाई कर्ता किं तु तद्व्यापारसाक्षी क्रियाज्ञानशक्तिमदुपाधिद्वयविनिर्मुकः शुद्धः
सन् कार्यकरणासंबद्धोऽद्वितीयोऽविक्रिय इत्येवं हि विद्वान्पश्यति लौकिकी पारमार्थिगी च दृष्टिमाश्रित्य, उदु-
भयमुपपद्यत एवेति गृहाण । तथाच य: केवलमात्मानमकर्तारं कर्तारं पश्यति स दुर्मतिः । यस्तु यथाभूतमा.
स्मानमकतारं पश्यति स सुमतिरिति द्वयोः संपिण्डिवार्थः । ननु आत्मानं केवलं तु यः इति केवलपदप्रयोगान्
अधिष्ठानादिविशिष्टः करोत्येव आत्मा । एवं विशिष्टस्य कर्तृत्वे सवि केवलमात्मानं य: कारं पश्यति स
दुर्मतिरिति चेन्न, श्रुतिस्मृत्यादिभिरामनोऽविक्रियस्वभावत्वप्रतिपादनात् । तथा च श्रुति, -4 असो
हायं पुरुषः। साक्षी घेता केवलो निर्गुणश्च । अप्राणो ह्यमना; शुद्धो ह्याक्षरात्परतः परः । अज आत्मा महान्
धुवः। निष्फलं निष्क्रियम् । ध्यायतीव लेलायतीव" इत्येवमाद्याः। स्मृतयश्च 'कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयात
इन्ति कम् । अविकार्योऽयमुच्यते । प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमि-
ति मन्यते ।। शरीरस्योऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते' इत्येवमाद्याः । न्यायाश्च न तावदात्मा स्वतो विशि.
यते निरवयवत्वादाफाशवत् , नापि परतोऽसङ्गस्याविकार्यस्य स्वतन्त्रस्य परतो विक्रियावत्तायोगान् ।
किंचात्मनो विक्रियात्त्वाभ्युपगमे तस्यं खनिष्ठाविक्रिया अधिष्टानादिनिष्ठा वा । नायः, श्रुत्यादिभिटत्य-
नोऽविक्रियत्वप्रतिपादनात् । न द्वितीयः, अन्यनिष्ठाविक्रियाऽन्यस्मिन्निति विप्रतिपिद्धत्वात् । अश्यिया
३
.
न
सारो निपुणमतिभिः पण्डिवैः विचार्य प्रतिपत्तच्य इति ॥ १७ ॥
॥ १२०६ श्रीमनगवीता [अ० १८ श्लो०१८] योध्यम् । अन्यस्य त्वपरोक्षिणोऽपि दोपदेवेति गृत्रहत्यादिनेन्द्रादेरपि ईपद्वन्धोपीपदहंकारकृत एवेत्या- कर एव व्यकम् । एवं कर्तृत्वाभिमान्यनभिमानिनोः सहेतुकं निन्दास्तुत्योरुक्त्या कर्मणि कर्तृत्वाभिमान- यागोऽपि संन्यासशब्दार्थ इत्युकं भवति ॥ १७ ॥ ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।। करणं कर्म कर्वेति निविधः कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ त० टी०-कर्मण्यभिमानरहितः कर्मभिस्तत्फलैथ न लिप्यते इत्युक्तं, सा निरभिमानता सत्त्व- गुणद्धया भवत्यतः सत्त्वस्योपादानाय सत्त्वादिगुणकृतं ज्ञानादिभेदं वक्तुं तावद कर्मविधेः कर्मणय वैविध्यमाह-ज्ञानमिति । तत्र ज्ञानं कर्मकर्तृविधिदेवताविषय, ज्ञेयं ज्ञातव्यं साझं कर्म, परिज्ञाता तस्य , कर्मणो बौद्धा, एवं त्रिविधा कर्मचोदना प्रवर्तनोपदेशादिशब्दाभिधेयः कर्मविधिरित्यर्थः । “ चोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाचिनः" इतिभट्टैरक्तत्वात् । चत्र ज्ञेयं कर्म त्रिविध-करणं कर्म फतेति । साधकतमं करणं वापाण्यादीन्द्रियं सुगादि , कर्म करीप्सिततमं कर्तुः क्रियया प्राप्यमाणं ज्योतिष्टोमादिकं, कर्ता क्रियानिर्वतकः स्वतन्ना, त्रिविधः कर्मसंग्रहः कर्म संगृह्यतेऽस्मिन्निति कर्म- संग्रहः करणकर्मकर्तेति त्रिविधो ज्ञेय इत्यर्थः ।। १८ ॥ म० टी०-पूर्वमधिष्टानादिपश्चकस्य क्रियाहेतुत्वेनात्मनः सर्वकर्मासंरपर्शित्वमुक्तम् । संप्रति तमेवा) ज्ञानज्ञेयादिप्रक्रियारचनया त्रैगुण्यमेव्याख्यया च विपरीतुमुपामते-ज्ञानमिति । झानं विषयप्रकाशक्रिया, ज्ञेयं तस्य कर्म, परिझाता तस्याश्रयो भोकान्तःकरणोपाधिपरिकल्पितः। एतेपो त्रयाणां संनिपावे हि हानोपादा- नादिसर्वकारम्भः स्यादत एतत् त्रयं सर्वेषां कर्मणां प्रवर्तकम् । तदेतदाह-त्रिविधा कर्मचोदनेति। चोदनेति प्रव- किमुच्यते । चोदनेति क्रियाया: प्रवर्तकं वचनमाहुरिति शायरे। चोदना चोपदेशश्च विधिश्वकार्थवाचिनः इति । भाट्टे च वचने क्रियाप्रवर्तकवचनत्वं यद्यपि चोदनापदशक्यतया प्रतीयते तथापि वचनस्वं विहाय प्रवर्तक- मात्रमिह लक्ष्यते ज्ञानादिपु वचनत्वाभावात् । एवं च प्रेरणीयत्वं प्रेरकत्वं चानात्मन एव नात्मन इत्यभि- प्राय: { तथा करणं साधकतमं बाह्य श्रोत्राद्यन्तस्थं बुद्धयादि । कर्म कर्तुरीप्सिततम क्रियया व्याप्यमानम् उत्पाद्यमाप्यं विकार्य संस्कार्य च । कर्ता च इतरकारकाप्रयोज्यत्वे सति सकलकारकाणां प्रयोक्ता क्रियाया निवर्तकश्चिदचिग्रन्थिरूप इति त्रिविधस्निप्रकारः, कर्म संगृह्यते समवैस्यत्रेति कर्मसंग्रहः कर्माश्रयः । चका- रादितिशब्दात् संप्रदानमपादानमधिकरणं च राशित्रयान्वर्भूतम् । एवं कारकपटकमेव त्रिविधं क्रियाया आश्रयो ननु फूटस्थ आत्मेत्यर्थः । कर्मप्रेरकस्य कनियस्य च कारकरूपत्वात्रैगुण्यात्मकत्वाचाकारकस्व- भावो गुणातीतश्वात्मा सर्वक्रमसिंस्पीत्यभिप्रायः । अथवा ज्ञान प्रेरणारूप लिडादिशब्दजन्य, ज्ञेयं तस्य ज्ञानस्य विषयत्वेन लिङादिशब्दस्वरूपं प्रेरकं, परिदाता तस्य ज्ञानस्याश्रयः गैरणीय इत्येवं त्रिविधा कर्म- चोदना कर्म क्रियापुरुपव्यापाररूपार्थी भावना, तद्विषया चोदना प्रेरणा विधिरूपा शाब्दी भावनेत्यर्थः । तथा करणं सेतिफलव्यताकं साधनं क्षत्वर्यः, कर्म भाव्य स्वर्गादिफलं, कर्ता फलकामनावान् पुरुषः क्रियाया, निर्वर्तक इत्येवं त्रिविधः कर्मसंग्रहः कर्मणः पुंध्यापाररूपस्यार्थभावनाया: संग्रहः संक्षेपः । तदेवमर्थ- भावनारूपपुंप्रयत्नस्य , विधेयस्याभावाच्छब्दभावनारूपो विधिर्न शुद्धमात्मानं गोचरयति कारकाश्रयत्वा- विधिविधेययोः । तदुक्तम् 'गुण्यविपया वेदा निगुण्यो भवार्जुन' इति । कारकाणा च त्रैगुण्यरूपत्व- मनन्तरमेव व्याख्यास्यत इत्यभिप्रायः । अत्र प्रसङ्गाद्विधिश्चिन्त्यते-प्रवृत्तिहेतुत्वेन प्रेरणा तावत्सर्व. लोकानुभवसिद्धा । राज्ञा प्रेरितो वालेन प्रेरितो ब्राह्मणेन प्रेरितोऽहमिति हि प्रवर्तमाना बकारो .
[अ० १८ श्लो. १८]] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टीकोपेता १२०७ भवन्ति । सा च प्रवर्वना प्रवर्तकराजादिनिष्ठा । तनोत्कृष्टस्य निकृष्टं प्रति प्रपतना आमा प्रेपणेति चोच्य- ते । निकृष्टस्योत्कृष्ट प्रति प्रवर्तना याच्याऽध्येपणेति चोच्यते । समस्य समं प्रत्युत्कर्षनिकपदासीन्येन प्रव. तनाऽनुज्ञाऽनुमविरिवि चोच्यते । ते चाज्ञादयो ज्ञानविशेषा इच्छाविशेपा वा चेतनवर्मा एवं लोके प्रसि. द्धाः । वेदे तु विधिनाऽहं प्रेरितः करोमीति व्यवहारो भवन्ति । तत्र स्वयमचेतनवादपीरुपेयत्वाच्च वैदि. कस्य विधेर्न चेतनधर्मेणाज्ञादिना प्रेरकता संभवति । अतः स्वधर्मेणैव साऽभ्युपगन्तव्या गत्यन्तरासंभवात् । स एव च धर्मवोदना प्रवर्तना प्रेरणा विधिरुपदेशः शब्दभावनेति चोच्यते । तत्र केचिदलौकिकमेव शब्दव्यापार कल्पयन्ति । अन्ये तु क्लतेनैवोपपत्तौ , नालौकिककल्पनां सहन्ते । प्रवर्तना हि प्रवृत्ति हेतुर्व्यापारः । विधिशब्दस्य चाख्यातत्वेन दशलकारसाधारणेनोपाधिना पुरुपप्रवृत्तिरूपार्थभावनां प्रति वाचकत्वं तज्ज्ञानहेतुत्वमिति यावत् । सा च ज्ञातवानुष्ठातुं शक्यत इति बद्धीहेतोरपि पादस्प वहेतुत्वं परंपरया भवत्येव । तत्र विधिशब्दस्य पुरुषप्रवृत्तिरूपभावनाज्ञानहेतुर्व्यापारस्वद्वाचकशन तिमत्तया विधिशब्दज्ञानम् । स एव च तस्य प्रवृत्तिहेतुव्यापार इति प्रवर्तनाभिधानीयकं लभते ज्ञानद्वारेणैव शब्दस्य प्रवृत्तिजनकत्वात् , ज्ञान जनकव्यापाराविरिक्तव्यापारकल्पने मानाभावात् । मानन- नकश्च व्यापारस्तस्य स्वज्ञानं, शक्तिज्ञानं, शक्तिविशिष्टस्वज्ञानं च। तबाद्ययोरन्यवरस्य शब्दभावनात्वम् । तृतीयस्य तु वत्र करणत्वमिति विवेकः । एवं स्थिते निष्कर्षः-विधिना स्वज्ञानं जन्यते पवनात्वेना. भिधीयतेऽपीति विधिज्ञानमेव शब्दभावना । तस्यां च पुरुषप्रवृत्तिरूपार्थभावनैव भान्यतयान्वेति । फरण. त्या व प्रवृत्तिवाचकशफिमद्विधिज्ञानमेव । भावनासाध्यस्यापि फलापाच्छन्ना भावनां प्रति करणत्वं फलकरणत्वादेव यागस्येव स्वर्गभावनां प्रति न विरुध्यते । तथा च पुरुषः स्वप्रवृत्ति भावयेत् । केनेत्यपेक्षायां पुरुषप्रवृत्तिवाचकशक्तिमत्तया ज्ञातेन विधिशब्देनेति करणांशपूरणम् । कयमित्या. कालायामर्थवादः स्तुत्वेतीतिकर्तव्यतांशपूरणम् । इयं गौः क्रय्येति लौकिक वियों बहुक्षीरा जीवद्वत्सा ख्यपत्या समांसमीनेत्यादिलौकिकार्थवादवत् ( समां समां प्रतिवर्ष प्रसूयते सा गौः) । नन्वास्यावलेन विधिशब्दादुपस्थिता पुरुषप्रवृत्ति व्यत्तयान्वेतु ! करणं तु कथमनुपस्थितमन्वेति ? उच्यते-विधिशब्दसार- च्छ्रवणेनोपस्थापितस्तस्य पुरुपप्रवृत्तिवाचकशक्तिरपि स्मरणेनोपस्थापिता । वदुभयवैशिष्ट्यं तन्निष्ठा शावता च मनसेति वाचकशक्तिमत्या ज्ञातो विधिशब्द उपस्थित एव । अनेन यच्छमनुयात्त-झावयेदिति प्रतिशब्द खाध्यायविधितात्पर्याच्छन्दातिरिक्तनोपस्थितमपि शाब्दयोधे भासत एव । यथा ज्योतिष्टोमादि नामधेयं यथा वा लिङ्गविनियोज्यो मन्त्रः । तदुक्तमाचार्यैरुद्भिदर्धिकरणे "अनुपस्थितविशेषणा विशिष्टेवुद्धिर्न भवतिन स्वनभिहितविशेषणा" इति । एवमर्थवादानामुपस्थितिः श्रोत्रेण । प्राशस्त्यस्य तु तैरेव लक्षगया तदुभयनिष्ठः ज्ञाततायास्तु मनसेत्यर्थवादेः प्रशस्तत्वेन ज्ञात्वेतीतिकर्तव्यताशान्वयोऽप्युपपन्न एव । ननु किं प्राशस्त्य ? न चावत् फलसाधनत्वं, तस्य यागेन भावयेत् स्वर्गमित्यर्थभावनान्वयवशेन विधिवाक्यादेव लब्धत्वात् । नान्यत्, प्रवृत्तावनुपयोगात् । उच्यते-बलवदनिष्टाननुबन्धित्वं प्राशस्त्यम् । तञ्च इष्टदेतावपि कलस्वभक्षणादावनिष्टहेतुत्वस्यापि दुर्शनात् । विहितश्येनफलस्य च शत्रुवधस्यानिष्टानुवन्धित दृष्टम् । अतो यावरसाधनस्य फलस्य चानिष्टाहेतुत्वं नोच्यते वावदिष्टहेतुस्वेन ज्ञातेऽपि तत्र पुरुषो प्रवर्तते । अत एवोक्तम् । फलतोऽपि च यत्कर्म नानर्थेनानुबध्यते । केवलप्रीतिहेतुत्वानद्धर्म इति कथ्यते । इति । अतः स्वतः फलतो वानर्थाननुवन्धिस्वरूपनाशस्त्यबोधनेनार्थवादा विधिशक्तिमुत्तम्भयन्ति । क उत्तम्भः । स्वत: फलदो वानर्थानुबन्धित्वशङ्कायाः प्रवृत्तिप्रतिवन्धिकाया विगमः । इदमेव च विधेः प्रवृत्तिजनने साहा- प्यमर्थवादेः क्रियत इति विधिर्थवादसाकाङ्क्षः । एवमर्थवादा अप्यभिधया गोण्या या कृत्या भूतमर्थे पदन्तो- नेप्टहेतुत्वज्ञानालभ्यते, - - । १२०८ श्रीमद्भगवद्गीयां [म. १८ श्रे०१८] ऽपि स्वाध्यायविव्यापादितप्रयोजनवत्त्वलाभाय विधिसाकाहाः । सोऽयं नष्टाश्वदग्धरणवत्संप्रयोगः । यथा- स्य दग्धस्य रथस्य जीवद्भिरश्वैरन्यस्य विद्यमानस्य रथस्याविद्यमानाश्वस्य संप्रयोगः परस्परस्यार्थवत्त्वाय तथार्थवादानां प्रयोजनांशो विधिना पूर्यते । विधेश्च शब्दभावनाया इतिकर्तव्यवांशोऽर्थवादेरिति । तदिद- मुभयोः श्रवणे पूर्णमेव वाक्यमेकस्य अवणे त्वन्यस्य कल्पनया पूरणीयम् । यथा 'वसन्ताय कपिल- लानालभेत' इति विधावर्थवादाशोऽश्रुवोऽपि कल्प्यते । 'प्रतितिष्ठन्ति हवा य एता रात्रीरुपयन्ति' इत्याद्यर्ध- वादे विध्यंशः । तथा च सूत्रम् - विधिना त्येकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः' इति । विधिना स्तुतिसाकाङ्क्षण प्रयोजनसाकाहाणामर्थवादानामफवाक्यत्वाद्विधीना विधेयानां स्तुत्ययेन स्तुतिप्रयोजनेन स्तुतिरूपेण प्रयोजनसाकाहण लाक्षणिकेनार्थेन वानर्थक्याभावादर्थवादा धर्मे प्रमाणानि स्युरिति वस्यार्थः । ननु 'य एव लौकिकाः शब्दास्त एव वैदिकास्व एव चामीपामाः' इति न्यायाविधिशदस्य लोके यत्र शक्तिर्गृहीता पेदेऽपि तदर्थकेनेव देन भवितव्यम् । लोके च प्रेपणादौ पुरुषधर्मवाचित्वं क्ल्स- मिति वेदे शब्दभावनाबाचित्वं कथमुपपद्यते । उच्यते-टोमवेदयोरैकरूप्यमेव । वथा हि-लोके प्रेपणादिक न वेन तेन रूपेण विधिपदवाच्यम् , अननुगमेल नानार्थत्वप्रसङ्गात् ।वद्धदेव भावनायाचित्वोपपत्तेश्च । किंतु प्रेपणाध्येपणानुज्ञास्वस्ति प्रवर्तनात्वमेकम् । तच शब्दव्यापारेऽपि तुल्यमिति तदेव लिमदिपदवाच्यम् । उन लैकिकशन्दे नास्त्येव । तर राजादीनामेव प्रवर्तकत्वात् । प्रवर्तकव्यापार एव हि (मेपणात्वेन इत्यादिना न विधिपदवाच्यं किंतु प्रवर्तनात्वेन वाच्यं ) प्रवर्तना प्रवर्तकत्वं च राजादेरिव वेदस्याप्यनुभवसिद्धम् । ननु वेदेऽपि प्रर्वतनावानीश्वरः कल्प्यालोके राजादिवत् । तदुक्कम् 'विधिरेव तावद्गर्भ इव श्रुतिकुमार्याःपुंयोगे मान' इति । न, वेदस्यापौरुषेयत्वात् । न हि वेदस्य कृर्ता पुरुपो लोके वे वा प्रसिद्धः। तत्कल्पने च वज्ञानप्रामा. ण्यापेक्षया वेदप्रमाण्ये निरपेक्षत्वेन स्थित स्वत:प्रामाण्यं भग्नं स्यात् । युद्धवाक्येऽपि प्रामाण्यप्रसङ्गाच्च। ईश्वर- वचनत्वे नेिऽपि वुद्धवाक्यं न प्रमाणं वेदवाक्यं तु प्रमाणमिति सुभगाभिक्षुकन्यायप्रङ्गः । महाजनानामु- भयसिद्धत्वाभावेन तत्परिमाहापरिग्रहाभ्यामपि विशेपानुपपत्तेः । ईश्वरप्रेरणाया लोकवेदसाधारणत्वेन लोकेऽपि राजादीनां प्रेरकत्वं न स्यात् । ईश्वरप्रेरणायां स्थितायामेव राजादिरप्यसाधारणतया प्रेरक इति चेत् , हन्त सा विष्ठतु न बा, किं लिहाध्यसाधारणः प्रेरको वेद एव राजादिस्थानीय इत्यागतं मागें । ईश्वरप्रेरणायाः साधा- रणाया असाधारणप्रेरणासहकारेणैव प्रवर्तकत्वात् । किंच ईश्वरप्रेरणाया सर्वोऽपि विहितं कुर्यादेव न तु कश्चिदपि लङ्घयेत्, निषिद्धेऽपि घेश्वरप्रेरणास्त्येव । अन्यथा न कोऽपि तत्र प्रवर्ततेति तदपि विहितं स्यात् । तथा चोक्तम् 'अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्ग वा श्वभ्रमेव वा ।।' इति । तस्माद्रा- जादिरिव वेदोऽपि स्वप्रवर्तनां ज्ञापयन्निच्छोपहारमुसेन प्रवर्तयतीति सिद्धं लोकवेदयोरैकरूप्यम् । पूर्वमीमा- सकाना स्वतन्नो वेदो ब्रह्ममीमासकानातु प्रथविवस्वत्परतन्त्रो वेद इति यद्यपि विशेपस्तथापि श्वसिततुल्य- स्वेन वेदस्यापौरुपेयत्वमुभयेषामपि समानम् । अत्र च प्रकृत्यनुकूलव्यापारवत्वं प्रवर्तनावं सखण्डोऽखण्डो वोपाधिस्तस्मिन् विधिपदशक्येऽपि तदाश्रयविशेषोपस्थितिर्गवादितुल्यैव । अनुकूलव्यापारत्वं वा शक्यं प्रवृत्त्य- शास्त्वाच्यातत्वेन शक्त्यन्तरलभ्य एव.। दण्डीयन संघन्धिान मतुवर्थे प्रत्यर्थदण्डांशवत् । फलसाधनतावोध एष प्रेरणा तामेव कुर्वन् प्रेरको विधिः । अतः फलसाधनतेव प्रेरणात्वेन विधिपदास्यति मण्डनाचार्याः । फल- साधनता चार्थभावनान्वयलभ्येत्युक्तं प्राक् । इममेव च पदं पार्थसारथिप्रभृतयः पण्डिताः प्रतिपन्नाः । औप- निपदानामपि केपाचिदिष्टसाधनतावादोऽनेनैव मतेनोपपादनीयः । इष्टसाधनवं स्वरूपेणैव लिडादिपदशक्यं न प्रेरणात्वेनेति तार्किकाः, वा । गौरवादन्यलम्यत्वादन्वयायोग्यत्वाच । इच्छाविषयसाधनत्वापेक्षया प्रवर्तना- त्यमविलघु इच्छातद्विपययोरप्रवेशात् । इच्छा ज्ञानस्यापि प्रवृत्तिज्ञानवत् प्रवृत्तिहेतुत्वापातात, वस्तुगत्या य है - [म. १८ श्ले. १८] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता ११२९९ इच्छाविपयस्तरसायनमिति शब्देन प्रतिपादयितुमशस्यत्वात् । साधनस्वमानस्यैव शस्यत्वे च तेनैव प्रत्यये.. नोपस्थापितया प्रवृत्त्या सह श्रुत्या तदन्वयसंभवे पदान्तरोपस्थापितस्वर्गण सह वाक्येन तदन्वयासंभ- वात् प्रवर्तनाव एव पर्यवसानं श्रुत्या वाक्यस्य बाधात् । प्रत्ययश्रुतेः पदश्रुतितोऽपि बलीयत्वेन पशुना यजेत्या प्रकृत्यर्थे पशु विहाय प्रत्ययार्थेन करणेनं सहेवैकत्वस्यान्वयादेकं करणं पशुरिति वचनव्यत्त्या मत्वङ्गत्वमेकत्वस्य स्थित किमु वक्तन्यं पदान्तरसमभिव्याहाररूपाद्वाक्याबलीयस्त्वमिति । वास्यान्वय- उभ्यत्वाच्च नेष्टसाधनत्वं पदार्थः । तथा हि प्रवर्तनाकर्मभृता फुपप्रवृत्तिरूपाभावना कि फेन कथ- मित्यंशत्रयवती विधिनालम्वत्वेन प्रतिपायत्त इत्युक्तं प्राक् । अपुरुषार्थकर्मिकायां च तस्या प्रवर्तनानु. पपत्तोकपदोपस्थापितमप्यपुरुषार्थ धात्वर्थे विहाय भिन्नपदोपात्तमन्यविशेषणमपि कमिपदसंबन्धन साध्य- 'वान्वययोग्यं स्वर्गमेव पुरुपाथै साभाव्यतयालम्बते । इच्छाविपस्यैव ऋतिविपयत्वनियमात् । स्वर्ग कामयवे स्वर्गकाम इति कर्मणि द्वितीयाया अन्तर्भूतत्वात् । रजतेरकर्मकत्वेन स्वामित्युक्तेऽनन्क्याच । अत एव यत्र कमिपदं न श्रूयते तत्रापि तत्कल्प्यते । यथा प्रतितिष्ठन्ति हवाय एका रात्रीरुपयन्वीत्यादौ प्रतिष्ठाकामा रानिस- प्रमुपेयुरित्यादि। एवं चलव्यभाव्याया वस्यासमानपदोपस्थापितोधात्वर्थ एव करणतयान्वति, भाव्याशस्य कमिविषयेणावरुद्धत्वात् । सुविभक्तियोग्ये वात्वर्थनामधेये ज्योतिष्टोमादौ तृतीयाश्रवणात् । यत्रापि नामवेये द्विचीया श्रूयते वत्रापि व्यत्ययानुशासनेन तृतीयाकल्पनात् । तदुक्तं महाभाष्यकारैरग्निहोत्रं जुहोतीति तृतीयार्थे द्वितीयेति । अत एव से प्रतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थ सह चूतस्तयोः प्रत्ययार्थः प्राधान्येन प्रकृत्यों गुणत्वेनेति प्रत्ययार्थभावना प्रति धात्वर्थस्य गुणत्वेम करणत्वमुक्तम् । आफ्यातं कियाप्रधानमिति वदनिर्निरुक्तका- रम्येतदेवोक्तम् । भावार्थाधिकरणे च तथैव स्थितम् । तेन सर्वत्र प्रत्ययार्थे प्रति धात्वर्थस्य करणत्वेनैवान्वय. नियम: । अत एव गुणविशिष्टधात्वर्थविधौ धात्वानुवादेन केवलगुणविधौ च मत्वर्थलक्षणा विधेविप्रकवि- पयत्वं च । यथा सोमेन यजेतेति विशिष्टविधौ सोमपता यागेनेति दना जुहोचीति गुणविधौ दधिमता होमेनेति । नामधेयान्वये तु सामानाधिकरण्योपपत्तेात्वर्थमात्र विधानाच न मत्वर्थलक्षणा न वा विधिवि- प्रकपः । तदेवं ज्योतिष्टोमेन यजेस स्वर्गकाम इत्याख्यातार्थो भावयेदिति किमित्याकाहायां कमिविपयं स्वर्गमिति विषिश्रुतेलीयस्त्वादाकाहाया उत्कटत्वाच । तथा च स्थितं पठाध्याये । तत: केनेत्यपेक्षिते यागे- नेति तृतीयान्तयदसमानाधिकरणत्वात् करणस्वेनैवान्वयनियमाय । किनान्नेत्यपेक्षिते ज्योतिष्टोमेनेति वन्नाम्नेत्यर्थः । शब्दादनुपस्थितोऽपि ज्योतिष्टोमशब्दो भासत एव शाब्दे वोधे श्रवणेनोपस्थापितस्तात्पर्यवशात् । नामधेयान्वये च न विभक्त्यों द्वारं नभिवाद्यर्थान्वय,इव । तेन मत्वर्यलक्षणामन्तरेणैव ज्योतिष्टोमशब्द- वतेत्यन्वयलाभः । तथाच कविप्रयोगः हिमालयो नाम, नगाधिराज.' इति, हिमालयनामवानित्यर्थः । एवमिह प्रमिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिवति' इत्यादानुगृहितसङ्गतिकैकपद्वति वाक्ये मधुकरादिपद स्वरूपेणैव भासते नामधेयवत् नार्थमुपस्थापयत्ति प्रागगृहीतसङ्गविकत्वात् । अव एव मधुकरंशब्दवाच्य इत्यपि लक्षणया नान्वयः शक्यज्ञानपूर्वकत्वासक्ष्यज्ञानस्य । सरूपतस्तु शब्दे भाते वाच्य- वाचकसंवन्ध, पश्चात्कल्प्यते संसर्गनिहायेति । तयं वाक्यार्थ:-ज्योतिष्टोननाम्ना यागेन वर्गमिष्टं भावयेदिति । कथमित्यपेक्षिते अतिलिङ्गवास्यमकरणस्थानसमाख्याभिः सामवायिकारादुपकारका प्राम- पूर्वेति विकृती प्रकृतिवदित्युपबन्धन नित्ये यथाशक्तीत्युपपन्धेन मुख्याला प्रतिनिधायापीति यावन्न्यायनभ्यं तत्परणम् । एवं च यागस्य स्वच्छिन्नभावनाकरणत्वेन स्वर्गकरणत्वं करणवेन च साक्षात्कर्तृव्यापारविषयत्वरूपं कृतिसाव्यत्वं श्रुत्याभ्या लम्यत इति तदुभयमपि न लिडादिपवाच्यम् , अप्राप्ते शास्त्रमवदिति न्यायात्। अनन्वयाच, इष्टसाधनमिति समासे गुणभूतमिष्टपदं स्वर्गकाम इति समासान्वरगुणभ- १२९० [भ श्रीमनगवदीवा भ० १८ श्लो० १८] वेन स्वर्णपदेन कथमन्वियात् इष्टस्वर्गसाधनमिति । नहि राजपुरुपो वीरपुत्र इत्यत्र वीरपदराजपदयोरन्वयो- ऽस्ति पदार्थः पदार्थेनान्वेति नतु पदार्थकदशेनेति न्यायात् । करणविभक्त्यन्तज्योतिष्टोमादिनामधेयानन्वयम् । सदादिदोपाश्चास्मिन् पक्षे द्रष्टव्याः । एतेनेष्टसावनत्वमनिष्टासाधनत्वं छतिसाध्यत्वमिति त्रयमपि विध्यर्थ इत्यपास्तम् । अतिगौरवादर्थवादानां सर्वथा वैयपित्तश्च । अत एव कविसाध्यत्वमा विध्यर्थ इत्यपि न भावनाकरणत्वेनार्थलभ्यत्वादित्युक्तेः । अलौकिको नियोगस्त्वलौकिकत्वादेव न विध्यर्थः । पराकान्त चात्र सूरिभिः। तस्मादनन्यलभ्या लघुभूता च मेरणैव लिडादिपदवाच्येति स्थितम् । प्रवर्तकं तु ज्ञानं वास्यार्थमर्या- दालभ्यमन्यदेव सर्वेषामपि वादिनाम् । आख्यातार्थ एव च विशेष्यतया मासवे न धात्वर्थो न नामार्थः स्वर्ग- कामो वेति चोक्तप्रायमेव । तेन च यागानुकूलकृतिमान् स्वर्गकाम इति तार्किकमतं पुरुपविशेष्यकवाक्यार्थ- ज्ञानमपास्तम् । संक्षेपेण मतं भामिदमत्रोपपादितम् । यद्वक्तव्यमिहान्यत्तद्नुसन्धेयमाकरात् ॥ १८ ॥ शं० टी०-एवं विहितप्रतिपिद्धादीनां कर्मणां सर्वेपामधिष्ठानादिपञ्चकैकनियंत्वं, तत्कृवे कर्मणि कर्तृ- स्वाभिमानिनो दुर्मतेः कर्मभिर्वद्धत्वं, कृतबुद्धेविदुपस्त्वकर्तुरतद्रहितत्वं च प्रतिपाद्याथ नियतलक्षणं निष्कर्म- त्वज्ञानमेवाप्रतिबद्धं कैवल्यसिद्धेः परमकारणमित्यारुरुक्षोमोक्षककामस्य तादृशज्ञानसिद्धेः कारणं सत्वशुद्धिस्वसिद्धेः कारणं तु कर्मेव सात्त्विकं तदेव कर्तव्यमिति बोधयितुं कर्मप्रवृत्तिहेतुं कर्माश्रयं च ज्ञानकर्मकबुद्धयादीनां सात्त्विकत्वराजसत्वादिभेदं च प्रतिपादयितुमुत्तरमन्य आरम्यते । यद्यपि सप्तदशे आहारादीना सात्त्विकादिभेदः प्रतिपादितस्वथापि तत्र श्रद्धादीनामेव पञ्चानां सात्त्विकादिभेदः प्रतिपा- दिवो न तु ज्ञानादीनाम् । तेषां सात्त्विकादिभेदे विज्ञाते हेयांश राजसं तामसं च त्यक्त्वा सात्विके ज्ञानादी प्रवृत्तस्य सत्त्वं शुष्यति । तेन ज्ञानं तत्फलं च सिध्यति । तदर्थमन चोदनायाः कर्माश्रयस्य च स्वरूपज्ञाना- दीना गुणभेदेन भेदं च प्रतिपादयति द्वाविंशत्या । ज्ञानकर्मणोः साध्यसाधनभावमेव सर्ववेदार्थ गीतार्थ च दृढीकर्तुम्-ज्ञानमिति । ज्ञानमिष्टानिष्टादिरूपं द्रव्यगुणकर्मादिपदार्थजातम् । ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं साधारणः सर्वपदार्थविषयको बोधः, ज्ञातव्यं द्रव्यगुणादिपदार्थजातं सर्वं ज्ञेयमित्युच्यते, परिज्ञाता ज्ञेयस्य ज्ञानस्य च ज्ञाता प्रमाता साभासो विज्ञानात्मा । इत्येवंप्रकारेण चोदना चोद्यते प्रवर्ततेऽनेनेति चोदना सामान्येन सर्वपदार्थानां हानोपादानाद्रिक्रियाहेतुत्रिविधा त्रिप्रकारा प्रमाणप्रमेयप्रमातृलक्षणस्य यस्य संनिधिमात्रेण हानादिकिया जायते सा चोदना त्रिविधेत्यर्थः । एवं प्रवृत्तेः कारणस्य त्रैविध्यमुक्त्वा कर्माश्रयस्यापि विध्यमाह-करणमिति । मियतेऽनेनेति करणं बाह्यमाभ्यन्तरं च । श्रौत्रादिवागादिबुद्धयादिद्वादशविधं कर्मेप्सिततमं कर्तुराप्तिक्रियाविषयभूतं यद्वस्तु द्वितीपान्तं तत्कर्मेत्यर्थः । कर्वा करणाना प्रयोक्ता न तु स्वयं तत्प्रयोज्यः स्वतन्त्रः कर्ता विज्ञानात्मा । एवं कर्मसंग्रहः कर्म सम्यग्गृह्यतेऽस्मिन्निति कर्मसंग्रहः क्रियाश्रयः करणादिस्त्रिविधिप्रकार इत्यर्थः । ननु संप्रदानादेः क्रियाश्रयत्वसंभवे कथं क्रियाश्रयस्य त्रैविध्यमिति चेन्न । संप्रदानादेः परंपरया विना साक्षास्क्रियाश्रयत्वासंभवात् । यथा कर्मणः साक्षाक्रियाश्रयत्वं न वथा संप्रदानादेः संभवति ततो युक्त क्रियाश्रयस्य त्रैविध्यमित्यर्थः ॥ १८ ॥ श्री० टी०-हत्वापि न हन्ति न निवध्यत इत्येतदेवोपपादयितुं कर्मचोदनायाः कर्माश्रयस्य च कर्म- फलादीनां च त्रिगुणात्मकत्वानिर्गुणस्यात्मनस्तत्संवन्धो नास्तीत्यभिप्रायेण कर्मचोदना कर्माश्रयं चाह- ज्ञानमिति । ज्ञानमिष्ट्रसाधनमेतदिति बोधः, ज्ञेयमिष्टसाधनं कर्म, परिज्ञाता एवंभूतज्ञानाश्रयः, एवं त्रिविधा कर्मचोदना चौद्यते प्रवर्त्यते अनयेति पोदना, ज्ञानादित्रितयं कर्मप्रवृचिहेतुरित्यर्थः । यद्वा चोद. नेति विधिरुच्यते । तदुक्तं भट्टर'चोदना चोपदेशश्च विधिबैकार्थवाचिनः' इति । ववश्वायमर्थः-उक्तलक्षणं त्रिगुणात्मक ज्ञानादित्रयमवलम्ब्य कर्मविधिः प्रवर्तत इति । तदुक्तम्- वैगुण्यविषया वेदाः' इति । तथाच . . ।
+ . [अ० १८ सो० १८] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२११ करणं साधकतम, कर्म च कर्तुरीप्सिततमम् । कर्ता क्रियानिवर्तकः । कर्म संगृह्यते अस्मिन्निवि कर्मसंग्रहः करणादित्रिविध कारक क्रियाश्रय इत्यर्थः । संप्रदानादिकारकत्रयं तु परंपरया क्रियानिर्वतकमेव केवलं न तु. साक्षात् क्रियाया आश्रयः । अतः करणादित्रितयमेव क्रियाश्रय इत्युक्तम् ॥ १८ ॥ स० टी--क्रियाहेतुतया प्रोक्तमधिष्ठानादिपञ्चकम् ॥ कर्मासंस्पर्शिता तद्वदात्मनस्तद्विदस्तथा ॥ १॥ प्रोच्येदानी तमेवाथै ज्ञानज्ञेयादिभेदतः ॥ त्रैगुण्यभेदाद्वपाख्यातुं समुपक्रमते हरिः ॥ २ ॥ वस्तुमान- क्रियाज्ञानं ज्ञेयं तस्यास्ति कर्म च ॥ तस्याश्रयः परिज्ञाता भोक्ता युद्धपाद्युपाधिकः ॥ ३ ॥ त्रयाणां संनिपावेन प्रारम्भः सर्वकर्मणाम् ॥अत एतत्रयं प्राह सर्वकर्मप्रवर्तकम् ॥४॥ चोदनेति झियायाश्च माहुरत्र प्रवर्तकम् ॥ चोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाधिनः ॥ ५॥ इत्येवं शावरे भाष्ये चोदनानिर्णयः कृतः ॥ एवं च प्रेरणीयत्वं प्रेरकत्वमनात्मनः ॥ ६ ॥ नात्मनश्चेत्यभिप्रायखिविधेत्युक्तितो हरेः ॥ याचं श्रोत्रादिकरणं तत्साधकतमं स्मृतम् ॥ ७ ॥ अन्तःस्थं तच घुद्धधादिकरणं द्विविधं स्मृतम् ।। क्रियया व्याप्यमानं यत्कर्तुरत्यन्त मीसितम् ॥ ८॥ तत्कर्मात्रोच्यते तयोत्पाद्याप्यादि चतुर्विधम् ॥ स्वतन्त्रः फारकैरन्यैरप्रयोज्यः स्वयं हि यः ॥ ९॥ समस्तकारकाणां च कर्ता स स्यात्प्रयोजकः ॥ निर्वतक: क्रियायाध चिचिन्थिरूपधृक् ।। १० । कर्म संगृह्यते चास्मिन्समवेतीति संग्रहः ॥ कर्माश्रयोऽस्ति विविधभार्थादिति प्रयोगतः ।। ११ ।। संप्रदानमपादानमाधारश्च त्रयं त्रिषु ॥ अन्तर्भूतमनेनो कारक- पदगा क्रिया ॥ १२ ॥ न त्वाम्भने क्रियातीते स कूदस्थो यतस्त्विति ॥ कर्माश्रयस्य कर्मानुप्रेरकस्य च सर्वतः ॥ १३ ॥ कारकात्मतया तद्वत्रैगुण्यात्मतया तया ॥ अकारकस्वभावोऽयं गुणातीतोऽक्रियोऽचलः ॥ १५ ॥ सर्वकर्माद्यसंस्पर्शीत्यभिप्रायों हरीविभोः ॥ १५ ॥ १८ ॥ भा० टी०-आत्मनः कर्तृत्वं फलसंबन्धित्वं च नास्तीत्युक्तं तदेवोपपादयितुं कर्मणां प्रवर्तकमाह-ज्ञा- नमिति । ज्ञायतेऽनेनेति करणव्युत्पत्त्याऽविशेषेण सर्वविषयं ज्ञानमात्रमुच्यते । तथा ज्ञेयमपि सामान्येनैव ज्ञातव्यं सर्वमुच्यते । तथा परिज्ञाताऽविद्याकल्पितोपाधिप्रधानो भोक्तेत्येवं विविधा कर्मचोदना कर्मणां, प्रवर्तकं त्रिविधमित्यर्थः । करणं क्रियतेऽनेनेति बाह्यं श्रोत्राद्याभ्यन्तरं बुद्ध्यादि, कर्मेप्सितवमं कर्तुः क्रियया न्याप्यमानम् । कर्ता स्वतन्त्रः, स्वातन्त्र्यं च कारकाप्रयोज्यस्य तत्प्रयोक्तृत्वम् । अविद्याकल्पितीपाविप्रधानो व्यापारयिता इति त्रिविधः कर्मसंग्रहः संगृह्यतेऽस्मिन्निति संग्रहः कर्मणत्रिपु समवेतत्वात् । अयं विविध कर्मसंग्रहः । ज्ञामादीनां हि त्रयाणा संनिपाते हानोपादानोपेक्षाप्रयोजनः सर्वकर्मारम्भो भवतीति ज्ञानादिरू- पा त्रिविधा कर्मचोदनोच्यते । ततश्च पञ्चभिरधिष्ठानादिभिरारब्धं वाङ्मनःकायाश्रयभेदेन विधा राशी- भूतं त्रिपु करणादिपु संगृह्यत इति करणादिरूपत्रिविधः फर्मसंग्रह उच्यते इति भावः । अत्र भाष्यस्यास्य सामान्यरूपत्वात् तदविरोधेन व्याख्यानान्तराण्यपि निर्दृष्टान्युपादेयानि ॥ १८ ॥ ५० टी०- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः' इत्यादि पूर्वोक्कमस्ति, तदेवोपपादयितुं कर्मचोदनायाः कर्माश्रयस्य च कर्मफलाना त्रिगुणात्मकत्वानिगुणस्यात्मनस्तत्संवन्धो नास्तीत्यभिप्रेत्याह- ज्ञानमिति । ज्ञानमिष्टसाधनमिति बोधः, शेयमिष्टसाधनं कर्म, परिज्ञाता एवंभूतज्ञानाश्रयः, । एवं त्रिविधी कर्मचोदना चौद्यते प्रवत्यतेऽनयेति चोदना ज्ञानादित्रय कर्मप्रवृत्चिहेतुरित्यर्थः । यद्वा चोदनोपदेशः। तदुक्तम्- चोदना चोपदेशश्च विधिश्चैकार्थवाचिनः' इति । ततश्वायमर्थ:-उक्तलक्षणं त्रिगुणात्मक ज्ञानादित्रयमवलम्व्य फर्मविधिः प्रवन्त इति ज्ञानं करणं साधकतम कर्म च कर्तुरभीप्सिततमम् । कर्ता च क्रियानिवर्तकः । कर्म संगृह्यतेऽस्मिन्निति कर्मसंग्रहः ॥ १८ ॥ - . . । U १२१२ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० १९] रा० टी०-तनु जीवस्य स्वतः कर्तृत्वाभावे यजेतेत्यादिविधीनां वैययं स्यात् जडेश्वरमुक्तानां तद- विषयत्वादित्यत आह-ज्ञानमिति । विधिश्चोदना प्रेरणोति पर्यायः । कर्मचोदना यजेतेत्यादि कर्मसु प्रेरणा ! ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञातेतीविशब्दो योज्यः । त्रिविधा ज्ञानादिरूपेण त्रिविधा । ज्ञानं विधिविषयं ज्ञेयं चेष्टाप्रयत्नांपप्रवृत्तिलक्षणमधिष्ठानादिलक्षणं पुरुषार्थलक्षणं च । परिज्ञाता तु सर्वज्ञसर्वप्रेरकेश्वर- संनिहितो जीवराशिः । तत्रितयनिमित्तं कर्म चोदना प्रवर्वत इति । 'दधित्रपुस प्रत्यक्षो ज्वर: इत्यादाविव निमित्तनिमिचिनोरभेदोपचारेण निमित्तत्रैविध्येन नैमित्तिकचोदनापि त्रिविधेत्युपचर्यते । यजेतेत्यादिश्रौत- स्मार्वविधौ सवि स्वप्रवृत्तिविषयप्रेरणाज्ञानं भवति । ततश्वेच्छाप्रयत्नरूपप्रवृचिरात्मसंनिहितेश्वरप्रेरणया | पुमर्थमुद्दिश्य कणि जीवस्य भवति । इति विधिज्ञानादेः कर्मचोदनायाश्च निमिचनिमित्तिभावो ध्येयः । न च स्वतः कर्तृत्वाभावात्पराधीनकजीवस्य विधिज्ञानद्वारा कथं प्रवृत्त्याद्यर्थे विधिविपयत्वमिति शङ्कयम् । । अपराधीनकर्तृत्वस्य विधिविषयतायां प्रयोजकत्वेन काप्यनुपलम्भेनान्वयव्यतिरेकाभ्यां पराधीनकर्तृशक्ति- कस्यैव विधिविपयत्वावश्यंभावात् । जडेश्वरमुक्तानां विध्यविषयत्वेन प्रमाणभूतविधेयायोगाच्च । पराधीनकर्तुरेव परिशेपरमाणेऽपि विधिविषयत्वस्यावश्यकत्वाचे । वस्मानीव विध्यविपयेभ्यो जडेश्वरमुक्तभ्यो व्यावृत्तस्य स्वसंवन्धितया विधिज्ञानस्य वजन्यायाः फलवत्साधनेच्छाया: साधनविषयकृतेश्चानुभवसिद्धत्वात् । वस्य च ज्ञानादेः न करते त्वदित्यादिश्रुतिभिरीश्वराधीनत्वेऽप्यस्वतन्त्रकर्तृत्वमात्रेण विधिविषयत्वं कर्मफल- भाक्त्वं च युक्म् । तदुक्तं गीतामाप्ये-अकर्तृत्वेपि विधिद्वारा ईश्वरप्रसादादिच्छोत्यत्त्योक्तकारणैः कर्म- द्वारा पुरुषार्थो भवतीति न प्रवृत्तिविधिवैयमिति । यद्वा देवं चैवेति पूर्वत्र देवपदेनेश्वरस्य कर्मसु प्रेरकत्व- मुकं, वोरणास्वरूपमुच्यते-ज्ञानमिति । कर्मचोदना कर्मसु जीवानामोश्वरप्रेरणा ज्ञानं शेयं परिज्ञातेति त्रिविया । ज्ञानज्ञेयपरिज्ञातूरूपनिविधभगवत्स्वरूपेत्यर्थः । विशेषवलाद्धर्मनिभावः । तस्येयं प्रेरणेत्यायुक्ति. व युछेति भावः । पूर्वोक्तपञ्चकर्मकारणानि संक्षिप्याह-करणमिति । करणम् इन्द्रियमुनुवादि । अधि- धानपदोकदेहादिकमदृष्टं च । कर्म हस्तादिचेष्टा कर्तृपदेन जीवेश्वरावुभावपि ग्राह्याविति त्रिविधः कर्मसंग्रहः कर्मकरणसंग्रहः पश्चकारणाना संक्षेप इति ॥ १८ ॥ ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।। प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥ १९॥ त० टी०-अयोपादेयसात्त्विकज्ञानकर्मकर्वस्वरूपज्ञापनाय तेषां सात्त्विकादिभेदं वक्तुं प्रतिजा- नीते-ज्ञानमिति । ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं सर्वकर्मविषय, कर्म कर्मानुष्ठेयं, कर्ता तस्यानुष्ठाता, करणा- धन्यत्कारकमवान्तर्भूतमिति सत्त्वादिगुण (भेद) तस्विधैव प्रोच्यते । क ? गुणसंख्याने-गुणाः सत्त्वा- दयः सम्यक् ख्यायन्वे स्वरूपतः कार्यनय यस्मिन्निति गुणसंख्यानं सांख्यशास्त्रं, तस्मिन् तान्यपि शानादीनि वस्यमाणानि यथावचट्टणु अवधारय ॥ १९ ॥ म०टी०-इदानी ज्ञानयज्ञातृरूपस्य करणफर्मकरूपस्य य निकद्वयस्य निगुणात्मकत्वं पकन्यमिधि उदुमय संक्षिप्य त्रिगुणात्मक प्रविजानीवे-वानमिति ।मानं प्राग्व्याख्यानम् । शेयमप्यत्रैवान्वर्भूतं शानोपा- पिकत्वाशेयस्वस्य । फर्म झिया विविधः कर्मसंग्रह इत्यत्रोकाधिकारात् फरणकर्मकारकयोस्त्रैवान्तावः कि. • योपाधिस्त्यात् कारकत्वस्य ! फ; क्रियावा: निक। चकारात् ज्ञावा.प । कर्तुः क्रियोपाधिकत्वेऽपि पृथक् गुम्यफधन मुनाफिभ्रमकल्पितात्मत्यनिवारणार्थम् । पेहि कर्नयात्मेति मन्यन्वे । गुणाः सत्वरजस्तमासि सम्पर कार्यभेदेन स्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंस्थान कापिलम् उस्मिन्, ज्ञानं क्रिया १ का -- 4. [अ० १८ लो० १९] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता १२१३ च गुणभेदतः सत्त्वरजस्तमोभेदेन विधैव प्रोच्यते । एवकारो विधान्तनिवारणार्थः । यद्यपि कापिलं झालं 'परमार्थप्रीकत्वविपये न प्रमाण, तथाप्यपरमार्थगुणगौणभेदनिरूपणे व्यावहारिक प्रामाण्यं भजत इति वक्ष्य- माणार्थस्तुत्यर्थे गुणसंख्याने प्रोच्यत इत्युक्तम् । तन्त्रान्तरेऽपि प्रसिद्धमिदं न केवलमस्मिन्नेव तन्त्र इति स्तुतिः । यथावत् यथाशास्त्रं शृणु श्रोतुं सावधानो भव वानि ज्ञानादीनि । अपिशब्दात्ततेंदजातानि च गुणभेदकृतानि। अन्न चैवमपोनरुक्यं द्रष्टव्यं चतुर्दशेऽध्याये तत्र सत्त्वं निर्मलत्यादित्यादिना गुणानां बन्धहेतुत्वप्रकारो निरू- पितो गुणातीतस्य जीवन्मुक्तत्वनिरूपणाय । सप्तदशे पुनः “यजन्ते सात्त्विका देवान्" इत्यादिना गुणकृत- विविधस्वभावनिरूपणेनाऽऽसुरं रजनमःस्वभावं परित्यज्य सात्त्विकाहारादिसेवया देवः सात्त्विका स्वभावः संपादनीय इत्युक्तम् । इह तु स्वभावतो गुणातीतस्यात्मनः क्रियाकारकफलसंवन्धो नास्तीति दर्शयितुं पां सर्वेषां त्रिगुणात्मकत्वमेव न रूपान्तरमस्ति येनात्मसंवन्धिता स्यादित्युच्यते इति विशेषः ॥ १९ ॥ शं० टी०-यद्विवक्षितं सत्त्वादिगुणभेदेन ज्ञानादीनां त्रैविष्यं तदेव विशदयति-ज्ञानमिति । गुण- संख्याने गुणाः सत्वादयस्वकार्याणि च सम्यक्स्यायन्ते प्रतिपाद्यन्ते यत्र तद्गुणसंख्यानं सांख्यशावं तस्मिन्गुणसंख्याने कापिले शास्त्रे । ज्ञानमुक्तलक्षणं पदार्थयोधः, फर्म च प्रतिस्मातादिलक्षणं, कर्ता कर्मनित- कश्चेत्येतत्रयं गुणभेदतः सत्त्वादिगुणभेदेन विधेव त्रिविधमेव भवति । ज्ञानादीनां सत्त्वादिगुणकृतनैविध्यव्य- तिरेकेण विधान्तराभावनिर्धारणार्थ एवकारः । चकारी समुच्चयायौँ । घटः पट इत्यादिज्ञानस्य तामसज्ञानं एवान्तर्भावात् । ज्ञायवेऽनेनेति शानं साधारणं सत्वादिगुणभेदात्साविकं राजसं तामसमिति विधव भवति । तथैव कर्मापि कापि त्रिथैव भवतीति कपिलादिभिः प्रोच्यत इत्यर्थः । यथावद्यथाशाखं सांख्यशाचे यथा प्रोकं तथा गुणभेदेन भिन्नानि ज्ञातादीन्यपि मया च वक्ष्यमाणाति शृणु, श्रुत्वा सारग्रहणेऽतितत्परो भवेत्यर्थः ॥ १९॥ श्री०टी०-ततः किमत आह-ज्ञानमिति । गुणाः सन्यकार्यभेदेन ख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंख्यानं सांख्यशास्त्र तस्मिन, ज्ञानं च कर्म च क्रिया कर्ता च प्रत्येकं सत्त्वादिगुणभेदेन विथैवोच्यते । वा- न्यपि झानादीनि वक्ष्यमाणानि यथावच्छृणु । त्रिधैवेत्येवकारो . गुणत्रयोपाधिव्यतिरेकेणात्मनः स्वतःकर्मादि- प्रतिषेधार्थ: । चतुर्दशेऽध्याये वन सत्त्वं निर्मलत्वादित्यादिना गुणानां बन्धकल्वप्रकारो निरूपितः । सप्तदशेऽध्याये यजन्ते सात्त्विका देवानित्यादिना गुणवत्रिविधस्वभावनिरूपणेन रजस्तम,स्वभाव परि- त्यज्य सात्त्विकाहारादिसेक्या सात्त्विकः स्वभावः संपादनीय इत्युक्तम् । इह तु क्रियाकारकफलादीनामात्म- संवन्धो नास्तीति दर्शयितुं सर्वेषां त्रिगुणात्मकत्वमुच्यत इति विशेपो ज्ञातव्यः ॥ १९ ॥ स० टी०-ज्ञानादिकनिकस्याथ करणादित्रिकस्य च ॥ वतव्यं त्रिगुणात्मत्वमित्युपक्रमते हरिः ॥१॥ ज्ञान प्रागेव व्याख्या क्षेयमन्तर्गत बिह ॥ ज्ञानोपाधिझवा यस्माज्ञेयत्वस्य वतस्तथा ॥२॥ कर्मशब्दा- किया साह्या चकारादुभयोरपि । अन्तर्भावः क्रियायां स्यात्करणस्य च कर्मणः ॥ ३॥ लियोपाधिकता यस्मात्कारकत्वस्य सर्वथा ॥ निर्वकक्रियायाश्च कर्ता ज्ञाता च पाचया ॥ १ ॥ गुणाः सत्वादयः स- म्यक् ख्यायन्तेऽस्मिन् हि कापिले ॥ शास्त्रे त्रिथैर भेदेन सत्त्वादेः प्रोच्यते यतः ॥ ५॥ यथाशास्त्रं शृणु श्रोतुं सावधानो भवेवि च ॥ यद्यपि कापिलं शास्त्र प्रौकत्वनिरूपणे ॥ ६॥ अप्रमाणं वयाप्पन गुणगौणनिरूपणे ॥ व्यावहारिकप्रामाण्यं भजते चेत्यदोपछत् ॥ ७॥ १९॥ भा० टी०-क्रियाकारकफलानामात्मसंपन्धो नास्ति इति दर्शयितुं वेपां सपा त्रिगुणात्मकत्वात् सत्य- रजतमोगुणभेदेन त्रैविध्यप्रतिपादनमारभ्यदे-ज्ञानमिति । कर्मशब्देन क्रिया माहा वश्यमाणानुरोधात् । ननु फतुरीप्सितम कर्मेति पारिभापिकं कर्मकारक, कर्ता च क्रियाणां निकः, गुणभेदतः सवादिगुग- - . १२१४ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० २०] भेदेन निधैव गुणसंख्याने प्रोच्यते। अवधारणं गुणव्यतिरेकेण विविधान्तरं ज्ञानादिषु नास्तीति निर्धारणार्थम् । गुणाः सत्त्वादयः सम्यकार्यभेदेन ख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्तेऽस्मिन्निति गुणसंख्यानं कापिलशास्त्रं यद्यपि पर- मार्थब्रह्मैकत्वाविषये विरुध्यते, तथापि तेषां कापिलानां गुणगौणव्यापारनिरूपणेऽभियुक्तत्वात् तच्छास्त्रमपि वक्ष्यमाणस्तुत्यर्थत्वेनोपादीयते । वक्ष्यमाणार्थस्य तत्रान्तरेऽपि प्रसिद्धिकथानं स्तुतिः । तानि ज्ञानादीनि अपि- शब्दात्त दजातानि च गुणभेदकृतानि शृणु वक्ष्यमाणेऽथें मन:समाधानं कुचित्यर्थः ।। १९ ॥ ५० टी०-ततः किमत आह-ज्ञानमिति । गुणा: सम्यकार्यभेदेन ख्यायन्ते प्रतिपाद्यन्ते यस्मिन्निति गुणसंख्यानं सांख्यशास्त्र तस्मिन् , ज्ञानं च कर्म च कर्ता च प्रत्येकं सत्वादिगुणभेदेन त्रिधैवोच्यते । तान्यपि ज्ञानादीनि वक्ष्यमाणानि यथावच्छृणु । त्रिधैवेत्येवकारेण गुणत्रयोपाधिव्यतिरेकेणात्मनः स्वत: कर्मादिप्रतिपेधार्थम् ॥ १९ ॥ रा० टी०-सात्त्विकज्ञानकर्मादेः मुक्तिहेतुत्वात्तदनुष्ठानाय सत्त्वाविगुणनिमित्ताज्ञानादिभेदान्प्रतिज्ञा- पूर्वमाह-ज्ञानमिति । सत्त्वादिगुणभेदतः ज्ञानादिकं प्रत्येकं त्रिविधम् । गुणसंख्याने गुणाः संख्यायन्ते यत्र तस्मिन्वैदिकसांख्यशास्ने प्रोच्यते । तान्यपि यथावद्यथास्थितं शृणु ॥ १९ ॥ सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीतते ॥ अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ २०॥ त० टी०-तत्र ज्ञानस्य सत्त्वादिगुणतस्वैविध्यमाह-सर्वभूतेष्विति निभिः । सर्वभूतेषु देव- मनुष्यपवादिपु जातिस्वभावतो विपकेषु परस्परं च्याटतेगु एकं ज्ञानेकपरूपत्वेन विशेषवर्जित भावमात्मवस्तु अविभक्तं देवमनुष्यादिवर्गाश्रमादिविभागरहितमव्ययं व्ययशीलेषु शरीरेषु व्ययरहितं परिणामशून्यं कूटस्थापित्यर्थः, अन्तर्यामिणं भगवन्तं वा कर्मानुष्ठानवेलायां येन ज्ञानेन पश्यति तज्ज्ञानं साचिकं विद्धि ॥ २० ॥ म.टी.-एवं ज्ञानस्य कर्मणः कर्तुश्च प्रत्येक त्रैविध्ये ज्ञातव्यत्वेन प्रतिज्ञाते प्रथमं ज्ञान- अविष्य निरूपयति त्रिभिः श्लोकैः । तत्राद्वैतवादिनां सात्विकं ज्ञानमाह-सर्वेष्विति । सर्वेषु भूतेषु अव्या- कृतहिरण्यगर्भविरासज्ञेषु वीसूक्ष्मस्थूलरूपेषु समष्टिव्यष्टयात्मकेपु । सर्ववित्यनेनैव निर्वाह भतेष्वित्य- नेन भवनधर्मकत्वमुच्यते । वनोत्पत्तिविनाशशीलेषु दृश्यवर्गेषु, विभक्तेषु परस्परज्यावृत्तेपु नानारसेषु अ- व्ययमुत्पत्तिविनाशादिसर्वविक्रियाशून्यमदृश्यमविभक्तमव्यावृत्तं सर्वत्रानुस्यूतमधिष्ठानतया बाधावधितया च एकमद्वितीय भावं परमार्थसत्तारूपं स्वप्रकाशानन्दमात्मानं येनान्तःकरणपरिणामभेदेन वेदान्तवाक्यवि. चारपरिनिप्पनेनेक्षते साक्षात्करोति तन्मिध्याप्रपञ्चवाधकमद्वैतात्मदर्शनं सात्विक सर्वसंसारोच्छित्तिकारणं ज्ञानं विद्धि । द्वैतदर्शनं तु राजसं वामसं च संसारकारणं न साविक्रमित्यभिप्रायः ॥ २० ॥ सं० टी०-तत्र ज्ञानस्य त्रैविध्यं प्रतिपादयन्नादौ बहुजन्मभिः सत्यवृत्त्या सर्वकर्मफलपरित्यागपूर्वकमी- श्वराणयुद्ध्या समनुष्ठितसाविककर्मसमुत्पादितं यच्छुद्धसत्त्वं सकृच्छ्रवणमात्रेण तत्त्वावधारणशक्तं तस्मा- दुत्पन्नस्यात्मकत्वदर्शनलक्षणस्य सात्त्विकज्ञानस्य लक्षणमाह-सर्वभूतेप्विति । विभक्तपु नामरूपजातिगुण- मियाविशेपैराविद्यकैः परस्परभिन्नेषु सर्वभूतेषु सर्पध्वन्यक्तादिस्थूलान्तेषु भूतेषु शरीरेपु स्थावरेषु जगमेषु च सर्वत्र पटमठादिष्वाकाशवदावभक्त निरवयवत्वान्निविशेपत्वाच विभागवर्जितमखण्डात्मना सर्वतः परिपूर्ण- .मत एकमेकरूपं सदीयधर्मकर्मादिभिरस्पृष्टमत्यन्त विशुद्ध चिदेकरसमव्ययं भूतेषु नश्यत्सु सत्सु स्वयमवि- नश्यन्तं भूतानामाविर्भावविरोभापागमनिर्गमादिषु स्वयमाविर्भावतिरोभावागमनिर्गमादिधर्मनिमुकमविक्रि यामनकरूपेण सर्वदा विष्वन्तं नित्यं शाश्वतमित्यर्थः । एवंलक्षणं भाव-नामरूपादिकं सर्व भाव्यते यत्र येन . - अ० १८ श्लो. २०] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टीकोपेता १२१५ ८ वा स भाव: प्रत्यगात्मा तं सच्चिदानन्देकरसमात्मानं खं येन शुद्धसत्त्वसंभावितेन " दिव्यो ह्यमूर्तः । पुरुष” इति, " अशरीरं शरीरेषु' इत्यादिश्रुतिवाक्यार्थश्रवणमात्रात्समुत्पन्नेन ज्ञानेनाखण्डाकारवृत्त्या कृतबुद्धिविद्वानीक्षते पश्यति सर्वमिदमहं च ब्रह्मैवेति, स्वं च सर्वं च ब्रह्मैवेति पश्यति तज्ज्ञानमद्वैतात्म- विषयकं द्वैतभ्रमविध्वंसक सात्त्विकं वहुजन्मार्जितपुण्यपुसपरिपाकसमुदितशुद्धसत्त्वसमुत्पन्नत्वात्सात्विकं विद्धि । तदेव विदेहमुक्तिकारणमिति विजानीहीत्यर्थः ॥ २० ॥ श्री दी-तत्र ज्ञानस्य सात्त्विकादिवैविध्यमाह-सर्वभूनेप्पिति त्रिभिः । सर्वेषु भूतेषु प्रमादिस्था- वरान्तेषु विभक्तपु परस्परं व्यायचेषु अविभक्तमनुस्यूवमेकमव्ययं निर्विकारं भावं परमात्मतत्त्वं येन : ज्ञानेनेक्षते आलोचयति तज्ज्ञानं सात्विकं विद्धि ॥ २० ॥ स. टी०-हेयोपादेयरूपेण पुराध्यायत्रये गुणाः ॥ निरूपिता इदानीमात्मनस्तरसङ्गिनः ॥१॥ गुणातीतस्य संबन्धः स्वाभाव्यानास्ति कारकैः ॥ इति तेषां गुणात्मत्वं पुनरन निरूप्यते ॥ २ ॥ ज्ञान- त्रैविध्यमेवादौ त्रिभिः सोकैरिहोच्यते ।। अद्वैतवादिना ज्ञानं सात्त्विकं हरिणेर्यते ॥ ३ ॥ आब्रह्मस्थावरा- न्तेषु सर्वभूतेष्वनेकधा ।। दृश्यवर्गेषु चान्योन्यव्यावृत्तेपु विनाशिपु ॥ ४ ॥ जन्मादिविक्रियाशून्यमव्या- वृत्तमदश्यकम् ।। अधिष्ठानवया बाधावधिमात्मानमक्षरम ॥५॥ स्वप्रकाशं परानन्दं येन ज्ञानेन पश्यति ॥ तन्मिध्यादृश्यवाधेन चिद्वैतात्मदर्शनम् ॥ ६॥ सात्विक सर्वसंसारोच्छित्तिहेतुमवेहि भोः॥ राजसं तामसं द्वैतदर्शनं अन्धकारणम् ॥ ७ ॥ हेयं ग्राह्यं तु सत्त्वोत्थं ज्ञानं मोक्ष कसाधनम् ॥८॥२०॥ भा० टी०-तत्र ज्ञानस्य वैविध्य विभजन्नादौ तस्य सात्त्विकत्वमाह-सर्वभूतेष्विति । सर्वभूतेष्व- व्यक्तादिस्थावरान्तेपु विभक्केषु देहाविभेदेन विभागवत्सु एकमद्वितीय, भावं परमार्थवस्तु सचिदानन्दरूप- म, अव्ययं स्वात्मना धर्मेण वा न व्यतीत्यव्ययं, कूटस्थं नित्यम्, विभक्त अप्रतिदेहं विभागशून्यं व्योमवनिरन्तरं, येन ज्ञानेनोपनिपरिसद्धान्तजन्येनाद्वैतवादी पश्यति तदद्वैतात्मदर्शनं सम्यक् ज्ञानं सात्त्विक विद्धि विजानीहि ॥ २० ॥ ५० टी०-अथ सात्त्विक ज्ञानमाह-सर्वभूतेष्विति । सर्पषु भूवेपु ग्रहादिस्थावरान्तेषु विभक्केषु नामरूपकर्मभिः परस्परं व्यावृत्तेष्वविभक्तमनुस्यूतं घटपटादिष्वाकाशमिवैकमद्वितीयमव्ययं निर्विकारं भावं सद्रूपं परमात्मतत्त्वं येनेक्षन मालोचयवि वज्ञानं सात्त्विकं विद्धि । सात्त्विकादिसंपादनमाहाररादिक पूर्वे प्रोकमेव । श्रुतिरपि शातपथी-" यद्वै वन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दष्टेविपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् । न तु नहितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्सश्येत्" इति । भाष्यम्-"अविनाशी वा भरे- ऽयमात्माऽनुच्छिविधा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति" इति पूर्वश्रुत्यात्मनोऽविनाशिव, वृचीनां च तदात्रययति. त्वमुक्तं सदेव द्रढयति । एवमात्मानं यद्वा प्रकारान्तरेणेन्द्रियादिना न पश्यति, किं स्यात्मनैवात्मानं पश्यति । अथ तथात्वेनात्मानं पश्यन्नप्यवत्पुरोपिदार्थबहूएव्यमित्याकारेण न पश्यति, हि यस्मात्कार- णादात्मद्रष्टुः पुरुषस्य दृष्टेर्विपरिलोपो न विद्यते । कुतः ? अविनाशित्वाद् । एकपदार्थशाने नष्टे सात पदार्थान्तरक्षानं भवति । प्रवेद्वितीयस्याभावादृष्टेविपरिलोपो विपर्यायो 'न संभवति । यतस्तरित्यय वस्माहितीय-तद्वितीयं नास्ति । यत्-तदात्मनः सकाशाद्विभक्तं यत्पश्येत्तस्मादारमातिरिक्त न किमपि पश्येदित्यर्थः ॥ २०॥ सटी प्रतिज्ञावं ज्ञानविष्यं तावदाह-सर्वेत्यादित्रयेण । विभनेषु परस्पर भिन्नेषु, वारतम्यो. पेतेषु च सर्वभूतेषु भवन्ति विद्यन्त इति भूतानि जीवाः प्रमत्यादिजवानि च । सर्वेषु भीवेषु जहेषु च तुदाधारकत्वेन वेभ्यो भिन्नत्वेनेवि सप्तम्यभिप्राय: । भावं सदा विद्यमान विष्णुमे प्रधान सर्वोत्तममिति . .
१२१६ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो०२१] यावत् । अविभक्तं सर्वत्र स्थितावपि अधिष्ठानभेदनिमित्तमेदहीनम् । "न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्ग सर्वत्र ही) इतिसूत्रोक्कदिशा सर्वत्र निर्दोपाशेपसद्गुणतया ऐक्येन स्थितमिति यावत् । अव्ययं स्वतोऽधिष्ठानव्ययेन च व्ययहीनम् । येन ज्ञानेनेक्षते विषयीकरोति तज्ज्ञानं सात्त्विकं विद्धि जानीहीति ॥ २० ॥ पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ॥ वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥ २१ ॥ त० टी०-राजसं ज्ञानमाह-पृथक्त्वेनेति । तुशब्दः पूर्वोक्तानिकृष्टत्वद्योतनार्थः । पृथक्त्वेन दृश्यमानेषु ब्राह्मणादिपूत्तमाधमतया प्रतीयमानेषु भूतेषु नानाभावाज्जीवात्मनः पृथग्विधान तत्तदेह- योगादुत्तमाधमान् सुखिदुःखिनः यज्ज्ञानं वेत्ति येन ज्ञानेन पुरुपो जानाति तज्ज्ञानं राजसं विद्धिा२१॥ म० टी०-पृथगिति । तुशब्दः प्रागुक्तसात्त्विकव्यतिरेकप्रदर्शनार्थः । पृथक्त्वेन भेदेन स्थितेषु सर्व- भूतेषु देहादिपु नानाभावान् प्रतिदेहमन्यानात्मनः पृथग्विधान् सुखदुःखित्वादिरूपेण परस्परविलक्षणान् येन ज्ञानेन वेत्तीति वक्तव्ये यज्ज्ञानं वेचीति करणे कर्तृत्वोपचारादेधासि पचन्तीतिवत् कर्तुरहंकारस्य तद्वृत्त्यभेदाद्वा, तज्ज्ञानं विद्धि राजसमिति पुनर्ज्ञानपदमात्मभेदज्ञानमनात्मभेदज्ञानं च परामृशति । तेनात्मना परस्पर भेदस्तेपामीश्वरानेदरवेभ्य ईश्वरादन्योन्यतश्चाचेतनवर्गस्य भेद इत्यनौपाधिकभेदपञ्चकज्ञानं कुता. किंकाणां राजसमेवेत्यभिप्रायः॥ २१ ॥ शं० टी० येनात्मनामनेकत्वं पश्यति तद्राजसमित्याह-पृथक्नेनेति । तुशब्द: पूर्वस्मादस्य वैलक्षण्य- वोधनार्थः । नानाविधमलिनवासनया विशिष्टः पुरुषः सर्वेषु भूतेपु.देवर्पिमनुष्यादिशरीरेपु पृथक्त्वेन प्रति- शरीर भिन्नत्वेन स्वभावत एव नानाभावाननेकान् क्षेत्रज्ञान् पृरिवधान् सुखदुःखादिभेदेन परस्परविलक्ष- णान् । अत्र ज्ञानस्य करणत्वमेव न तु कर्तृत्वं संभवति । तत: यद्येन ज्ञानेन वेत्ति पश्यति घटमठाविपु स्थि- वानामाकाशानामनेकत्वं तदीयवक्रत्वादिधर्मेर्वकत्वादिमत्त्वं यथा पश्यति तथा देवमनुष्यादिशरीरेषु स्वत एवं जीवात्मनामनेकत्वं जन्ममरणादिविकारविशिष्टत्वं मुखादिभाक्त्वं च येन विजानाति तज्ज्ञानमयथाग्राहक- त्वाद्राजसम् । यज्ञदानादिकर्मसंभावितरजोदोपविशिष्टान्तःकरणवृत्तित्वाच राजसं बन्धस्यैव कारणं न तु मुक्तरित्यर्थः ।। २१ ॥ श्री० टी०-राजसं ज्ञानमाह-पृथक्त्वेनेति ! पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं इत्यस्यैव विवरणं सर्वेषु भूतेषु देहेषु नानाभावान्वस्तुत एवानेकान् क्षेत्रज्ञान् पृथग्विधान् सुसी दुःखीत्यादिरूपेण विलक्षणान्येन ज्ञानेन पति तज्ज्ञानं राजसं विद्धि ॥ २१ ॥ स० टी-तुशब्दः सात्त्विकज्ञानादिनीदं हि राजसम् ॥ भेदेन सर्वभूतेषु स्थितेषु देहनामसु ॥१॥ प्रतिदेई विभिन्नाश्च प्रत्यगात्मान आन्तरान् ॥ मुखित्वादिकरूपेण परस्परविलक्षणान् ॥ २ ॥ येन ज्ञानेन जानाति वज्ञानं विद्धि राजसम् ।। ज्ञानं वेत्तीति करणे कर्तृत्वं घौपचारिकम् ।। ३ ।। यवैधासि पचन्तीति प्रयोगोऽस्ति तथैव तत् ॥ अन्योन्यमात्मना भेदस्वेपा भेदस्वथेश्वरात् ॥ ४ ॥ भेदो- चेतनवर्गस्य वेभ्य ईशात्तथा मिधः ॥ इत्यनोपाधिको भेदस्तार्किकाणां च पञ्चधा 11 ५ ॥ संमतो राज- सत्वेन वज्ञानं हेयमेव हि ॥ ६ ॥ २१ ॥ भा० टी०-एवमद्वैतादिना सात्त्विकमुपादेयमुक्त्वा तार्किकाणां उगाजसं हेयमाह-पृधात्वेनेति । नुभन्दः संसारोधिचिहेतुभूछत्पूर्वाषासात्त्विकात् ज्ञानात् तदुच्छित्यहेतुभूवस्य प्रत्युव दत्कारणस्य पैलक्षण्यद्योवनार्थ. । पृथक्त्वेन प्रतिशरीरमन्यत्वेन हेतुना पृथग्विधान भिन्नलक्षणान् नानाभावान् । [अ० १८ श्लो० २२] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता भिन्नात्मनः सर्वेषु भूतेषु यज्ज्ञानं वेत्ति जानाति । ज्ञानस्य कर्तत्वासंभवात् येन ज्ञानेन वेत्तीत्यर्थः । एवासि पचन्तीतिवत् करणे कतत्वोपचारादेवं प्रयोगः । तज्ज्ञानं राजसं रजोनिर्वृत्तं विद्धि । यत्पृथक्त्वेन स्थितेषु भूतष्विति तु दूरान्वयदोपणाच्याहारदोषेण च प्रस्तत्वादाचार्यैरुपेक्षितम् ॥ २१ ॥ प० टी०-राजसमाह-पृथक्त्वेनेति । सर्वेषु भूतेषु देहेषु नानाभावान् क्षेत्रज्ञानई सुरयई दुःखीत्या. दिप्रतीत्या वस्तुत एव पृथग्विधान् येन ज्ञानेन वेत्ति तदानसज्ञानं विद्धि ॥ २१ ॥ रा० टी०-पृथगिति । यज्ज्ञानं सर्वभूतेषु पृथक्वेन वेत्ति सर्वजीवजडानि अन्त दयुतत्वेन विषयोक- रोति इत्यस्यैव व्याख्या-नानेत्यादि । नानाभावान्नानाप्रकारभूतजीवजडरूपपदार्थान्पृथग्विधान्परस्परं भिन्नानीचोचतया स्थिताश्च वेत्ति विषयीकरोति । विष्णोरन्यत्र यथार्थमिति यावत् । उपलक्षणमेतत् । संदिग्धतया भगवत्स्वरूपविषयकं चातज्ज्ञानं राजसमित्यर्थः । तुशब्देन वायमों ग्राह्यः । तेनेश्वरादन्यत्र यथार्थज्ञानस्य सात्त्विकत्वात्कथं राजसत्त्वमिति निरस्तं वोध्यम् । ईश्वरविषये संशयरूपत्वस्याधिकस्यापि भावात् ॥ २१॥ यनु कृत्स्नवदेकस्मिन्कायें सक्तमहतुकर्म ॥ अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ।। २२ ।। त० दी०-तामसं ज्ञानमाह-यत्त्विति । तुशब्दस्तस्मादप्यतिनिकृष्टं द्योतयति । यज्ज्ञानमेक- स्सिन्कार्ये एकस्मिन्नान्यस्मिन् । क्षुद्रदेवताप्रेतभूतगणाचाराधनरूपे कर्मणि अतितुच्छेऽपि कृत्स्नफलवत्स- क्तमेतदेव मम सर्वाभीष्टपदमिति अहेतुके हेतुरहितं नियुक्तिकं यतोऽतत्वार्थवत् शास्त्रसिद्धतचाश- न्यम् , अत एवाल्पं च अल्पविषयत्वादल्पफलकं तज्ज्ञानं तामसमुदाहृतम् ।। २२ ।। म०टी०-यदिति । तुशब्दो राजसाहनत्ति । बहुपु भृतकार्येषु विद्यमाने वैकस्मिन् कार्ये भूतविकारे देहे प्रतिमादौ वा अहेतुकं हेतुरुपपत्तिस्तद्रहितमन्येपा भूतकार्याणामात्मत्वाभावे कथमेकस्य तादृशस्यात्मत्वमित्य- नुसंधानशून्यं, फल्नवत् परिपूर्णवत्सतम्-एतावानेवालमा ईश्वरो वा नात: परमस्तीत्यभिनिवेशेन लमम् । - यथा दिगम्बराणां सावयवो देहपरिमाण आत्मेति । यथा वा चार्वाकाणा देह एवात्मेति । एवं पापाणदार्या- दिमात्र ईश्वर इत्येकस्मिन् कार्ये सक्तम् । अहेतुकत्वादेवातत्त्वार्थवत्-न तत्त्वार्थालम्यनम् । अल्पं च नित्यत्व- विभुत्वाग्रहात । ईशं नित्यविभुदेहानिरिकामतद्वयतिरिक्वेश्वरप्राहितार्किकज्ञानविलक्षणमनित्यपरिच्छिन्न- देहायात्माभिमानरूपं चार्वाकादीना यज्ज्ञानं तत्तामसमुदाहृतं तामसानां प्राकृवजनानामीशज्ञान- दर्शिमिः ॥ २२ ॥ शं० टी०-तामसं ज्ञानत्वलक्षणमाह-यदिति । तुशब्दोऽस्य ज्ञानस्योभयविलक्षणत्वद्योतनार्थः । एक- स्मिन् कार्थे भूतकार्ये देहे प्रतिमादौ वा कालवत्परिपूर्णवत्सतमात्मा परमेश्वरश्च स्वयं स्वरूपेणैतावान् देह- परिमाणक एवात्मा प्रतिमापरिमाण एवेश्वरो नैतद्वयतिरिक्तोऽत्तीति निश्चययुक्तम् । यद्वा कृत्स्नवत् एष घट एप पट इति कृत्स्नपदार्थनिश्चयो यथा तथा कार्थे देहे पतिमादौ वा सक्तम् । एप देह एवात्माहमिति, एप पापागादिरेवेश्वर इति निश्चययुचमहेतुके देहस्यैवात्मत्वनिश्चये प्रतिमादेश्वेश्वरत्वनिर्धारणे च हेतुस्तदभावा. दहेतुकम् । ननु देह एवात्मा अहमर्थत्वादित्यादियुक्तिरस्त्येवेति चेत्र, स्वप्नमहमद्राक्षमित्यादौ व्यभिचारद- र्शनादेहदाहे त्वात्मदाप्रसङ्गार । न देहस्यात्मत्वसाधको हेतुरस्ति नापि प्रतिमादेरीपरत्वसाधको हेतुरस्ति । ननु प्रतिमायाकार ईश्वरः कामान् प्रयच्छति तत एप प्रतिमादिरेवेश्वरः काममदत्वादित्यादियुफ़िरस्त्येवेति चेन्न, अश्वत्यस्याप्यारोग्यप्रदत्यदर्शनाचनाविव्याप्तिः स्यात् । किंतु वत्र भत्त्याराधित: परमेश्वरः सर्वातस्तत्र * अहेतुकम्-पान्तरम् १२१८ 'श्रीमद्भगवद्गीता • [अ० १८ श्लो० २२ ] स्थितः सन्कामान् प्रयच्छति न तु प्रतिमादिस्तस्य नाशे ईश्वरस्यापि नाशप्रसङ्गात् । ततो देहप्रतिमादेरात्मेश्वर- त्वसाधकयुक्तिनास्ति । अत एवातत्त्वार्थवदवाधितार्थस्तत्त्वार्थः स यस्य ज्ञानस्य नास्ति तदतत्त्वार्थवदययार्थविप- यकमत एवात्पम्-अल्पविपयत्वेनाल्पफलत्वेन चाल्पं निकृष्टमित्यर्थः । यदेवलक्षणं ज्ञानं तत्तामसं वहुजन्म- भिस्वामसयज्ञदानादिकर्मानुष्ठानसंप्राप्ततमोगुणकार्यत्वात्तामसमिति कपिलादिभिरुदाहृतमुच्यत इत्यर्थः । जन्मानेकशतैः समनुष्ठितसात्त्विकयज्ञदानादिसत्कर्मपरिपाकसमुत्पन्नं सात्त्विकं ज्ञानं मोक्षायैव भवति, राजसं तु स्वर्गाद्यम्युदयाय निरुक्तलक्षणं, यमसं ज्ञानं तु केवलं मूढव्यवहारगोचरं जननमरणदुःखप्रवाहायव भवति, न तु स्वर्गाय नाप्यपवर्गायेति सूचितं भवति ॥ २२ ॥ श्री० टी०-वामसं ज्ञानमाह-यत्त्विति । एकस्मिन्कार्ये देहे प्रतिमादौ वा कृत्स्नवत्परिपूर्णवत्सक्तमेता-, वानेवात्मा ईश्वरो वेत्यभिनिवेशयुक्तम् , अहेतुकं निरूपपत्तिकम्, अतत्त्वार्थवत् परमार्थावलम्बनशून्यम् । अत एवाल्पं तुच्छमल्पविषयत्वादल्पफलत्वाञ्च । यदेवंभूतं ज्ञानं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ।। स० टी०-भूतकार्येषु बहुपु विद्यमानेष्वनेकधा ॥ एकस्मिन्भौतिके देहे प्रतिमादौ विकारके ॥१॥ अन्येषां भूतकार्याणामात्मत्वाभावतः कथम् ॥ एकस्य तादृशस्यात्मभाव इत्यविचारतः ॥ २ ॥ परिपूर्णव- दासकमेतावानीश्वरोऽल्पकः ।। आत्मा वावः परं नास्तीत्येवं चाभिनिवेशतः ॥ ३ ॥ दिगम्बरमते यद्वत्सा- वयवतया मतः ॥ आत्मा देहपरीमाणश्चार्वाकाणां यथा वपुः ॥ ४ ॥ एवं पापाणदादिमात्र ईशोऽपि संमनः । इत्येकमिंस्तदासक्तमहेतुकतयैव च ॥ ५ ॥ तत्त्वार्थालम्बनं नास्ति विभुत्वाद्यग्रहात्तथा ।। अल्पं चाल्पविषयत्वादत्यन्ताल्पफलत्वरः ॥ ६ ॥ एवं यन्नास्तिकादीनां ज्ञानं तत्तामसं धुधैः ॥ प्राकृतानां विमूदानां हेयत्वेन युदाहृतम् ।। ७ ।। २२ ॥ भा० टी०-राजसं ज्ञानमुदाहृत्य तामसं तदाह-यत्त्विति । तुशब्दो राजसाद्वैलक्षण्यद्योतनार्थः । यत्तु शानमेकस्मिन्कायें देहे वहिर्वा प्रतिमादौ फुरस्नवत् समस्तवत् परिपूर्णवत् एतावानेवात्मा ईश्वरो नाव: परमस्वीति । यथा चार्वाकादीनां शरीरानुवर्तिदेहपरिमाणो जीवः, ईश्वरो वा पापाणदादिमात्र इत्येव- मभिनिवेशयुक्तं यतोऽहेतुकमुपपत्तिशून्यमहेतुकल्यावृतत्त्वार्थवत् यथाभूतोऽर्थस्तत्यार्थः सोऽस्य शेयभूतोऽस्तीवि वत्त्वार्थवत् न तत्त्वार्थवदतत्त्वार्थवत्, वत एवाल्पं चाल्पविषयत्वादमफलस्वाद्वा पचामसाना प्राणिनामविवे- किनां परिदृश्यमानमीशं ज्ञानं हेयं तचामसमुदाहृवम् ॥ २२ ॥ ५० टी०-तामसमाह-यत्त्विति । एकस्मिन् कायें देहे प्रतिमादौ वा सकम् एतावानीश्वर एवेत्यभि- निवेशयुक्तम् । अहेतुकं निरुपपचिकम् , अतस्वार्थवत् परमार्थावलम्बनशून्यम् । अत एवाल्पं तुच्छम् । यदेवभूवं मार्ग वतामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ रा० टी०-पत्चिति । कार्यशब्दोऽत्र संसारिणं मुक्तत्वेन क्रियमाणत्वहेतुना जीवपरः । करनशब्दो प्रझपरो जगत्परश्च । अयमर्थः । एरस्मिन्कार्थे जीवे कृल्नवद्रह्मवत् यज्ज्ञानं सकम् । कोऽर्थः ब्रह्म यथा स्वात्मानं विषयीकरोति । क्या जीवं प्रति यज्ज्ञानं विषयीकरोतीत्यर्थः । जीवे ब्रह्माभेदपियकं यज्ञानं चामममिति यावत् । तया एकस्मिन्कार्ये जीवे कृत्स्नवत्राद्वंद्यशानं सक्कं प्रपञ्च यथा विषयीकरोति 'प्रपयोऽयमिति । तया जी यज्मानं विपयीकरोति जीपं जगदात्मकत्वेन विषयीकुर्वद्यज्ञानं वचामस- मिति यावत् । तया एकस्मिन्कायें जीवे फस्नवद्यज्ञानं सक्तम्-एकमेव जीवं फत्स्नजगदात्मकत्वेन यदि पोरोति । एकजीलितं जगदिति यज्ञान विषयीफरोतीति विधार्थः । किंच यग्ज्ञानमहेतु युधि- शून्यम्, अतत्त्वार्धवसत्यविषयकं सदसद्विलक्षणाद्यविद्यमानामास्कल्पनायुक्तमिति यावत् । अल्पं यहुला- शानयुक्त्येन धर्मपाल्पानसदृशं व यवधामसम् । अत्र प्रभवदिति जीव इति च वाच्ये कृत्सवदित्युक्तिः - - है . अ. १८ श्लोर २३] तत्वप्रकाशिनाद्यष्टटीकोपेवा जगतोऽपि प्रणाय । वेनाकार्यत्वादिकृत्स्नगुणपरिपूर्णत्वेन कृत्स्नपदोकानणा कार्यत्वादिना तधीनस्य जीवस्याभेदज्ञानं मिध्याज्ञानत्वात्कथं न नामसमिति तामसत्योपपादनायेति । कार्य इत्येव वाच्ये एक- स्मिनित्युक्तिः एकजीवमतस्य संग्रहायेति । अत्र यद्यप्ये कस्मिन्कार्यशब्दितै जीवे कृत्स्नवदकार्यत्वादिगुणप- रिपूर्णब्रह्मवजगद्वय यज्ञानं सक्तमित्यस्य पैकं जीवं ब्रह्मात्मकत्वेन जगदात्मकत्वेन च विपीकारि यज्ज्ञा- नमित्यर्थः । तादृशं च ज्ञानमहैतुकम् । अवत्त्वार्थमसं च भवत्येवेति पुनरहेतुकमित्याद्युतिः पुनरुक्तिरेव । वथाप्यहेतुफज्ञानादिनिवयं प्रत्येकमेकैकं तामसं, पूर्वोक्तमिथ्याज्ञानरूपविशेपणसहितमतितामसमिति वक्तुमिति ज्ञेयम् । यद्वा सामानाधिकरण्येन पदाना विशेषणविशेष्यभावः । एवं च कार्ये जीवे कृत्स्न. बजगद्वद्यत्सक्तम् । एकस्मिन्कार्ये जीवे कृत्स्नवद्रमवद्यत्सकं, यहेतुकं यथातत्त्वार्थकल्पनायुक्तं, यच्चाप, तानि सर्वाण्यपि पद्विधाऽज्ञानानि प्रत्येकं तामसानीति योजना । अतो न पुनरुक्तिशङ्कावकाश इति ।।२२।। नियतं सङ्गरहितमरागदेपतः कृतम् ।। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ त० टी०-एवं कर्मानुष्ठातु नांशेन गुणतस्वैविध्यं प्रदश्येदानी कर्मण एव गुणतस्वैविध्यमाह- नियतमिति । नियतं नित्यकर्तव्यतया विहितं, समरहितम्-सङ्गोऽहमस्य कर्ता फलभोक्तेत्यभि- निवेशस्तद्रहितम् , अरागद्वेपतः कृतं रागोऽनेन लोकपूजास्तुत्यादि प्राप्स्यामीति प्रीतिविशेषः, देपः शत्रुमरणाद्यनिष्टचिन्तनं, ताभ्यां न कृतमिति । अफलपेप्मुना स्त्रीपुत्रधनादिफलाभिलापरहितेन का यत्कृतं कर्म तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ म०टी०-तदेवमोपनिषदानामद्वैतात्मर्दन मात्त्विकमुपादेयं मुमुक्षुभि , द्वैतदर्शिनां तु नित्यविभुपरस्पर- विभिन्नात्मदर्शनं राजसम् , अनित्यपरिच्छिन्नात्मदर्शनं च तामसं हेयमुक्तम् । संप्रति त्रिविधं कर्मो- च्यते-नियतमिति । नियतं यावदझोपसंहारासमर्थानामपि फलावश्यंभावव्याप्तम् नित्यमिति यावत् । सङ्गोऽहमेव महायाज्ञिक इत्याद्यभिमानरूपोऽहङ्कारापरपर्यायो राजसो गर्वविशेषस्तेन शून्य सङ्गरहितम् । यावदज्ञानं तु कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रवर्तनोऽहङ्कारोऽनुवर्तत एव सात्त्विकस्यापि । तद्रहितस्य तु तत्त्वविदो न कर्मा- धिकार इत्युक्तमसकृत् । रागो राजसन्मानादिकमनेन लप्स्य इत्यभिप्रायः, द्वेप शत्रुमनेन पराजेप्य इत्य- भिप्रायस्ताभ्या न कृतमरागद्वेपत, कृतम् । अफळबैप्सुना फलाभिलापरहितेन की यत् कृतं कर्म यागदा-' नहोमादि तत् सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ शं० टी०-सत्त्वादिगुणभेदात्कर्मणवैविध्यं प्रतिपादयन्नादौ मुमुक्षूणामनुष्ठेयं सात्त्विकं कर्माह-नियत- मिति । नियत अविस्मृतिम्यामवश्यकव्यत्वेन विहितं यज्ञतपोदानलक्षणं सङ्गरहित-सङ्ग. कर्तृत्वाभिनिवे- शोऽहंकारस्तच्छून्यमनहंकारम् ,अरागद्वेपत. सुखसाध्यत्वे तत्फलसाधनत्वे वा कर्मणि राग. दु.खसाध्यत्वं दु.. खफलसाधनत्वे वा कर्मणि द्वेपश्च जायते रागश्च द्वेपश्च रागद्वेषो न रागद्वेषौ यस्येष्टानिष्टयोः कर्मणोः समवुद्धेरसावरागद्वेषः । तृतीया तसिः। तेनारागद्वेपेण सात्त्विकेनाफलपेप्सुना निष्कामेण कर्वा कृतं यत्तत्कर्म सात्त्विकं सत्त्वशुद्धिकारणमिति महर्षिभि. नोच्यते ॥ २३ ॥ श्री० टी०-इदानी त्रिविधं कर्माह-नियतमितित्रिभिः । नियवं नित्यतया विहितं, सगरहितमभिः निवेशशून्यं, अरागद्वेपत. पुत्रादिप्रीत्या वा शत्रुद्वेषेण वा यत्कृतं न मववि फलं प्राप्तुमिच्छत्तीति फल- प्रेप्सुस्वाद्विलक्षणेन निष्कामेण कळ यकृतं कर्म तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ स. टी०-अद्वैतदर्शिना ज्ञानमुपादेयमुदीरितम् ॥ तार्किकाणा तथा हेयं भेदज्ञानमनयंदम् ॥ १॥ । .
१२२० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ लो० २४ ] तामसं दुष्टमत्यन्तं हेयं संसृतिकारणम् ।। इत्युक्तं त्रिविधं कर्म प्रोच्यते हरिणाऽधुन। ॥ २ ॥ नित्यमाव- श्यक कर्म गर्वासक्तिविवर्जितम् ॥ अनेनाहमिदं लप्स्ये राग इत्याशयः स्मृतः ॥ ३ ॥ अनेनारि पराजेध्ये द्वेष इत्याशयस्तथा ।। ताभ्या न कृतमित्युक्तमरागद्वेपतः कृतम् ॥ ४ ॥ फलाभिलापशून्येन का कर्मेह यत्कृतम् ।। यागदानादिशाखीयं तत्सात्त्विकमुदाहृतम् ।। ५ ॥ २३ ॥ भा० टी०-एवं ज्ञानवैविध्यं विभज्य कर्मत्रविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विकं कर्मोदाहरति-नियतमिति । नियतं नित्यमवश्यकर्तव्यतया विहितं, सगरहितमासक्तिवर्जितमभिनिवेशशून्यम् , अरागद्वेषतः कृतं-रागो विषयप्रेप्सा कारणभूता रञ्जननामिका चिचवृत्तिः तत्प्रयुक्तेन द्वेपप्रयुक्तेन च कृतं रागद्वेपतः कृतं तद्विपरीत- मरागद्वेपतः कृतं फलं प्रेप्सतीति फलप्रेप्सुः फलतृष्णः तद्विपरीतेनाफलप्रेप्सुना का यत्कर्म कृतं तत्सास्ति- कमुच्यते । फल्गु च लीयते चेति फलं क्रियया प्राप्यमनात्मवस्तु वदन्यदफलमनागन्तुकं परिपूर्णमविनाशि आत्मतत्त्वं तत्प्रेप्सुना कृतं "विविदिपन्ति यज्ञेन" इति श्रुत्या आत्मलाभार्थ यज्ञादेविनियोगादित्यन्ये । आचार्यैस्तु कामेप्सुनेत्युत्तराननुरोधिष्लिष्टकल्पनामस्तोऽयं पक्ष इत्यभिप्रेत्योपेक्षिवः ॥ २३ ॥ ५० टी०-इदानी त्रिविधं कर्माह-नियतमितित्रिभिः । नियतं नित्यतया विहितं, सङ्गरहितमभिनिवे. शशून्यम् , अरागद्वेषतः कृतं पुत्रप्रीत्या तदभ्युदयार्थ शत्रुद्वेषात्तदपकर्षार्थ यन्न भवति । फलं प्राप्तुमिच्छतीति फलोप्सुः तद्विलक्षणेन कृतं कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥ २३ ॥ रा० टी०-प्राक् प्रतिज्ञातं गुणकृतकर्मवैविध्यमाह-नियतमित्यादि.त्रिभिः । हरेः सर्वोत्तमत्वज्ञानभ- तिपूर्वक तदर्पणबुच्या क्रियमाणस्वर्णाश्मोचित हि नियतमित्युच्यते । मयि सर्वाणीत्यादौ भगवत्सर्वोत्तम ' त्वज्ञानतद्भक्तिपूर्वकं वदर्पणबुद्धया कर्मकरणस्य विधानात् । ये मे मत इत्यादौ तस्यैवमुक्तिहेतुत्वोक्तः यत्करणे फलप्राति: यदकरणे च प्रत्यवायः तस्यैव नियतस्वात् , सङ्गरहित मदीयतास्नेहहीनं, कीरादौ रागा- दिहानतः अकीत्यादौ द्वेपत्यागत: कृतं फलप्राप्तीच्छाहीनेन कृतं यत्तत्कर्म सात्त्विकमुच्यत इत्यर्थः ॥ २३ ।। यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः॥ क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ।। २४ ॥ त० टी०-राजसं काह-यत्त्विति । यत्तु कामेप्मुना फलकामनायुक्तेन साहङ्कारेण च । वेति चार्थे । मत्समो याशिका ज्ञाता वा कोऽन्य इति गर्वयुक्तेन का यत्कर्म क्रियते पुनर्वहुलायासम्-उप- क्रमात्समाप्तिपर्यन्तमत्यायासावहं तद्राजसमुदाहृवं विवेचकैः ॥ २४ ॥ म०टी०- यदिति । तु. सात्त्विकाद्भिनत्ति । कामेप्सुना फलकांमेन का साहङ्कारेण प्रागुक्तसङ्गात्मकग- वयुक्तेन च । वाशब्दः समुच्चये । पुनरित्यनियतं यावत्कामनं कान्यावृत्तेः । बहुलायासं सर्वाङ्गोपसंहारेण शावहं यत्काम्यं कर्म क्रियते तद्राजसमुदाहृतम् । अत्र सर्विशेपणैः सात्विकसर्वविशेषणव्यतिरेको दर्शितः ॥२५॥ शं टी०-राजसं कर्माह-पत्चिति । तुशब्दो वैलक्षण्यार्थः । वा चार्थः । पुनरप्यर्थः । कामेप्सुना 'कान्यच हति काम: कर्मफलं तमातुमिच्छता कामेप्सुना साहंकारेणापि च अहमिदं कर्म करोमि फलायेत्य- भिनिवेशोऽहंकारस्तद्रहित: सात्त्विक पूर्वोत्तस्त्वयं राजसत्तेनापि च युक्तत्वात्साहकारोऽहमिदं करोमीत्य- भिमानादम्बरयुत्तस्तेन साइंकारेणापि च कर्ता बहुलायासं बाहुभ्यां नदीतरणे यया तथा बहुलो महाना- यासः अमो यस्मिन्कमण्याचमनादौ भवति नदालायासं यत्तु कर्म क्रियते तत्कर्म राजसं फलकामनया चाईकोरेणापि रज.कार्येण युक्तनाधिकारिणा क्रियमाणत्वाद्राजसं वकर्मेति मुनिमिरुदाहृतमित्यर्थः ॥२४॥ .
। [. १८ श्लो० २६ तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२२१ श्री०टी०-राजर्स कहि-यत्त्विति । यत्तु कर्म कामे सुना फल प्राप्तुमिच्छता साहंकारेण वा मत्सम; कोऽन्यः श्रोत्रियोऽस्तीत्येवं निरूढाहकारयुफेन च क्रियते, यच्च पुनर्बहुलायासमतिलेशयुक्तं तत्कर्म राजसमुदाहृतम् ।। २ ।। स०टी०-फलकामेन का यद्युक्तेन वा कृतम् || यावत्तकामना काम्यावृचानियतं पुनः ॥ १॥ सकलाझोपसंहारालेशदं काम्यमध्रुवम् ।। क्रियते कर्म यत्तत्तु राजसं सगुदाहृतम् ॥ २ ॥ सर्विशेषणैरत्र सास्विकाइर्शिता भिदा ॥ ३ ॥ २४ ॥ भा० टी०-सात्त्विक कोक्त्वा राजसं तदुदाहरवि-यत्त्विति । सात्त्विकाद्वैलक्षण्यद्योतकस्तुः । कामे- प्सुना फलेप्सुना साहकारेण वा पुन: मत्समः कोऽन्यः श्रोत्रियोऽस्तीत्येवमहकाराभिनिवेशेन । तत्त्वज्ञान- वतो निरहंकारस्य कर्मकर्तृत्वमपेक्ष्य साइंकारेणेति न भ्रमितव्यं, तस्य कर्मण्यनधिकृतत्वात् । किं तु मत्सदृशोऽन्यः श्रोत्रियो नास्तीत्यभिमानरहितोऽनात्मविदपि लोके निरहंकार इत्युच्यमानो यस्तमपेक्ष्य साहंकारेण वा पुनरित्युच्यते । वहुलायासं महता आयासेन छेशेन निर्वत्यै यत् कर्म क्रियते तद्वाजसमु- दाहृतम् ॥ २४ ॥ ५० टी०-राजसमाह-यचिति । कामे सुना फलप्राप्तिमिच्छता साहंकारेण मत्समः कोऽन्यः ओत्रि. योऽस्तीति निगू(?)ढाईकारेण की बहुलायासमतिलेश यया भवति तथा यत्कृतं तद्रानसम् ॥ २४ ॥ रा० टी०-पत्चिति । यत्तु कामेप्सुना फलप्राप्तीच्छावता कर्तृत्वाभिमानसहितेन च । पुनःशब्दा समु. नये । यहायासयुक्तं च क्रियते तत्कम राजसमुदाहृतम् ॥ २५ ॥ • अनुवन्ध क्षयं हिंसामवेक्ष्य च पौरुषम् ।। मोहादारभ्यते कर्म तेत्तामसमुदाहृतम् ।।.२५ ।। त० टी०-तामसकर्माह-अनुवन्धमिति । कृते कर्मण्यनु पश्चाद्वध्यतेऽनिच्छयाऽपि कर्मफल- भोगायापद्यते इत्यनुवन्धः दुःखविपादादिस्तं, क्षयं द्रव्यवळादिनाश:(?), हिंसां प्राणिपाडा, पौरुष स्वस्य कर्मनिवर्तनसामर्थ्य च अनवेक्ष्य अपलोच्य मोहात्सर्वकर्मसिद्धिहेतुपरमेश्वरायत्तत्वज्ञानाभावाद यत्कर्म औरभने तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २५ ॥ म० टी०-अनुवन्धमिति । अनुवन्धं पश्चाद्भाव्यशुभं, क्षयं शरीरसामर्थ्यस्य धनस्य सेनायाश्च नाश, हिंसां प्राणिपीटा, पौरुषमात्मसामयं च अनपेक्ष्य अपूर्यालोच्य मोहाकेवलाविवेकादेवारम्यते यत्कर्म, यथा दुर्योधनेन युद्धं, तत्तामसमुच्यते ॥१९॥ शं० टी०–तामसं कर्माह-अनुवन्धमिति । अनुवन्धः उत्तरमाव्यनर्थस्तत्कर्मणः फलभूतस्तमनुबन्ध पश्चानाव्यनथ, क्षयं यस्मिन्कर्मणि क्रियमाणे धनक्षयो वा बलक्षयो वा पुण्यक्षयो वा आयुःक्षयो वान्यस्य वा क्षयस्त क्षय, हिंसा प्राणिपीडा, कर्मनिवर्वाह स्वसामध्ये च पौरुपमेवं तत्सर्वमप्यनवेश्य बु- द्धिबलेनाविचार्य बालवनोहादविवेकायकारभ्यते इत्कर्म संमोहो विवाभावस्तमोगुणस्तेन कार्यत इति तामसमित्युच्यत इत्यर्थः ।। २५ ।। श्री० टी०-तामसं कर्माह-अनुवन्धमिति । अनुबध्यवे इत्यनुरन्यः पश्चानावि शुभाशुभम् , क्षयं विचव्ययं, हिंसा परपीडा च पौरुपं स्वसामर्थ्य वा अनवेक्ष्यं अपर्यालोच्य केवल मोहादेव यकारभ्यते . सत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥ १ अनपति पाठ.। २ यत्र तामसमुच्यत इति म. पार.1 ३ आरभत इति त. दी. पाठः।
१२२२ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लोक २६] स० टी०-पश्चाद्धाव्यशुभं देहसामर्थ्यस्य धनस्य च ॥ विनाशं प्राणिनां पीडामात्मसामर्थ्यमेव च '॥१॥ अपर्यालोच्य मोहाद्यत्केवलादविवेकतः ॥ आरभ्यते जडेः कर्म तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २ ॥ २५॥ भा० टी०-राजसं कोंदाहृत्य तामसं तदाह-अनुबन्धामिति । अनुवध्यत इत्यनुवन्धः पश्चाजावि वस्तु तं, क्षयं शक्त्यर्थादेनाश, हिंसां प्राणिपीडां च पौरुपं पुरुपकारमारब्धसमाप्तिसामर्थ्यमित्येतान्यनु- वन्धादीन्यनवेक्ष्यापर्यालोच्य मोहादविवेकाद्यत्कर्म प्रारभ्यते तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २५ ॥ १० टी०-तामसमाह-अनुवन्धमिति । अनुवध्यत इत्यनुवन्धस्तं भावि शुभाशुभं, क्षयं व्ययं, हिंसा स्वपरपीडन, पौरुपं स्वसामर्थ्य चानपेक्ष्याविगणय्य केवलं मोहादेव 'यत्कर्मारभ्यते तत्तामसम् ॥ २५ ॥ रा० टी०-अनुबन्धमिति । अनुबन्धं कर्मान्तरमेवानुवध्यमान, क्षयं नाश, हिंसां परपीडो च जनवेक्ष्य पौरुपमात्मनः कर्म सामध्ये चानवेक्ष्य भविमृश्य गोहाई कति मिथ्याज्ञानाद्यत्कारभ्यते तत्तामसमुच्यत इत्यर्थः ॥२५॥ मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।। सिद्धथसिद्धयोनिर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥ त० टी०-ज्ञेयेषु त्रिप्ववशिष्टं कर्म कर्तुस्पैविध्यमाह-मुक्तसङ्ग इति निभिः । मुक्तसद्गः फला- भिलापरहितः, अनचादी कर्तृत्वाभिमानरहितः, धृत्युत्साहसमन्वितः धृतिः कर्मारभ्य यावत्समाप्ति- दुःखादिमाप्तावनुद्वेगः, उत्साह उद्युक्तचिचत्वं ताभ्यां समन्वितः आरब्धस्य कर्मणः सिद्धयसिद्धचो- निर्षिकारोऽविकृतचित्तः । एवंभूतः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ २६ ॥ म०टी०-इदानी त्रिविध; कोंच्यते-मुक्तेति । मुक्तसङ्गरत्यक्तफलाभिसंधिः, अनहवादी कर्ताह- मिति वदनशीलो न भवति स्पगुणश्लाघाविहीनो वा, धृनिर्विघ्नायुपस्थिवावपि प्रारब्धापरित्यागहेतुरन्त:- करणवृत्चिविशेषः, धैर्यमुत्साह इदमहं करिष्याम्येवेविनिश्चयात्मिका बुद्धि तिहेतुभूता ताभ्यां संयुक्तः धृत्युत्साहसमन्वितः, फर्मणः क्रियमाणस्य फलस्य सिद्धावसिद्धौ च हर्षशोकाभ्यां हेतुभ्यां यो विकारो वदनविकासम्लानत्वादिस्वेन रहितः सिद्धयसिद्धयोनिर्विकारः केवलं शाखप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागेण, अत एवंभूतः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥ शं० टी०-गुणभेदेन कर्तृभेदं वदन्सात्विककरिगाह-मुक्तसङ्ग इति । मुक्तसङ्गः मुक्तो मनसा संत्यक्तः सङ्गः फलाभिसंधिलक्षणः कामो येन स मुक्कसनः निष्काम इत्यर्थः । अनहंवादी संकल्पेऽप्यह- मिदं करोति वदनशीलो न भवतीत्यनवादी। अनहंमानित्वेऽपीदमुपलक्षणम् । धृत्युत्साहसमन्वितः धृतिः अर्थव्ययदेहायासादौ धैर्यमुत्साहश्विकोपविगस्ताभ्यां सम्यगन्वितः । सिद्धपसिद्धयोरारब्धस्य कर्मणः सिद्धा. वसिद्धौ च निर्विकारः सम्यगीश्वरार्पितनियन्तृत्वादीश्वरेच्छति हर्षविपादशून्य इत्यर्थः । एवं सत्त्वगुणसं. पन्नो यः कर्वा कर्मणां स सात्त्विक इति ऋपिभिरुच्यत इत्यर्थः । एवंगुणविशिष्टत्वं सात्त्विकस्य लक्षणमिति सूचितं भवति ॥ २६ ॥ श्री०टी०-कारं त्रिविधमाह-मुक्तसग इति त्रिभिः । मुक्तसङ्गरत्यक्ताभिनिवेशः, अनवादी गों- जिरहितः, धृतिर्यम्, उत्साह उद्यमः वाम्या समन्वितः संयुक्तः, आरब्यस्य कर्मणः सिद्धावसिद्धौ च निर्षिकारो हर्पविषादशून्यः, एवंभूतः कर्वा सात्त्विक उच्यते ॥ २६ ॥ स० टी०-इदानी त्रिविधः कर्वा प्रोच्यते हरिणा त्रिभिः ॥ फलाभिसंधिशून्यो योऽहंकति मति विना ॥ १ ॥ सत्यपस्वगुणस्साघोऽनईवादीवि वेरितः ॥ विनाशुपस्थितौ सत्यां प्रारख्यात्यागारणम् ।
[अ० १८ लो. २७] तत्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता १२२३ ॥ २॥ चिचयत्तिविशेपो हि प्रतिधैर्य मितीर्यते ॥ अवश्यं साधयिष्यामीत्येवं धौनिश्चयामिका ॥३॥ धृतिकारणमुत्साहस्ताभ्यां संयुक्त उत्तमः ।। कर्मणः क्रियमाणस्य सिद्धयसिद्धयोः फलस्य यः॥ ४ ॥ विकारो हर्षशोकाभ्यां विकासाद्यात्मको मुखे ॥ तेन शून्यश्च शास्त्रेण प्रयुक्तो न तु गगवान् ॥ ५ ॥ एवंभूतो महाभाग्यः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ ६ ॥ २६ ॥ भा० टी०-अधुना कर्तृत्रविभ्यं विभजन्नादी सात्विक करिमाह-मुक्तेति । मुक्तसङ्गो मुक्तः परि- त्यतः सङ्गः फलाभिसंधिर्येन स अनहंवादी नाहं वदनशीलः फर्ताहमेताइशगुणसंपन्नः सर्वोत्तम इति वदनशीलो न भवति, धृतिविनाशुपस्थानेऽपि कायादेर्धारणं धैर्यमिति यावत् , उत्साह उदामस्ताम्यां सम्यग- न्वितः । कदापि कथमपि धृत्युत्साहरहितो न भवतीत्यर्थः । यसिद्धपोः क्रियमाणस्य कर्मणः फलसिद्धी तदसिद्धौ च निर्विकारः हर्पविषादशून्यः केवलं ज्ञानप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागादिना यः कर्ता स सा- त्विक उच्यते ॥ २६॥ ५०. टी०-अथ विविधं कर्तारमाह-मुक्तसङ्गइत्यादिनिभिः । मुक्तसशस्त्यक्ताभिनिवेशः, अनहं- वादी गईश्लाघारहितः, धृतिर्यमुत्साहोऽनुद्वेगस्ताभ्यां समन्वितः सिद्धावसिद्धौ निर्विकारो हर्पविषादरहितः एवंभूतः कर्ता साविकः ।। २६ ॥ रा० टी०--प्राक् प्रतिज्ञावं गुणकृतकत्रविध्यमाह-मुक्तेत्यादित्रिभिः । मुक्तसङ्गः फलस्नेहधोन: सर्वस्य भगवधीनत्वनिश्चयादेवाह कर्वेति न वदतीत्यनहवादी ! आत्मकर्तृत्वाभिमानहीन इति यावत् । धुतिः कर्मण्यवर्जनीयदुःखसनम्, उत्साहः कर्मकातरता वाभ्यां समन्वितः सिद्यसिद्धयोनिर्विकारः फलस्य सिद्धावसिद्धौ वा हपविपादहीनः स कर्ता सात्विक उच्यत इत्यर्थः ॥ २६ ॥ रागी कर्मफलप्रेप्सुलुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ २७ ॥ त० टी०-राजसकर्तारमाह-रागीति । रागोऽस्यास्तीति रागी इन्द्रियार्थेषु प्रीतिमान् , कर्मफ- लोप्मुः मकण कर्मफलाकाङ्क्षी, लुब्धः आवश्यकेऽपि द्रव्यव्ययं कर्तुमशक्तः प्रत्युत परस्वाभि- लापी, हिंसात्मकः परष्टत्तिहरणं हिंसा तदात्मकस्तत्स्वभावा, अशुचिः कर्मापेक्षितशौचवर्जितः कर्म- फललाभालाभयोईपशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ म०टी०-रागीति । रागी कामाद्याकुलचित्तः, अत एवं कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलाथी,लुब्धः परद्रव्याभिलापी धर्मार्थ स्वव्यत्यागासमर्थश्च, स्वाभिप्रायमकटनेन परवृचिच्छेदनं हिंसा तदात्मकत्वत्स्वभावः, स्वाभिमा- याप्रकटने तु नष्कृतिक इति भेदः, अशुचिः शाखोकशौचहीनः, सिद्धयसिद्धयोः कर्मफलस्य हर्षशोका- न्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥ शं० टी०-राजसकर्तारमाह-रागीति । रागी कर्मफलापेक्षत्वात्तत्साधनेषु कर्मसु रागोऽस्यास्तीति रागी । यद्वा रागो विषयभोगेच्छा सोऽस्यास्वीति रागी, तत एव कर्मफलप्रेप्सुः कर्मणां फलं पुत्रालय धनादिसंपत्ति स्वर्ग च प्राप्तुमिच्छुः, स्वेन्द्रियतर्पणशीलत्वाल्लुब्धः परस्वामिलापी देवपितृयज्ञादो धनत्या. गासहिष्णुर्वी लुब्धः, हिंसात्मकः परपीडनशीलः, अशुचिः शास्त्रोक्तशौचरहितः, कर्मयः सिद्धयसिद्धयोलामा- लाभयो हर्पशोकान्वितो यः कर्मणां कर्ता स राजसः उक्तलक्षण रजोगुणैर्विशिष्टत्वाद्राजस इति मुनिभिः परिकीर्तित इत्यर्थः । रागित्वादि राजसस्य लक्षणमिति सूचितं भवति ॥ २७ ॥ श्री० टी०-राजसं कर्तारमाह-रागीति । .रागी पुत्रादिप्रीविमान्कर्मफलप्रेप्सुः, कर्मफलकामी, लुब्धः .
* १२२४ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० २८] परखामिलापी, हिंसात्मको मारकस्वभावः, अशुचिर्विहितशौचशून्यः, लाभालाभयोहर्पशोकाभ्यामन्वितः, कर्ता राजसः परिकीदितः ॥ २७ ॥ स० ०-कामाद्याकुलचित्तो यः फलार्थी कर्मणः सदा ॥ परद्रव्याभिलापी स्वं तीर्थेऽपि त्यक्तुमक्षमः ॥ १ ॥ स्वाशयोद्घाटनेनान्यवृत्तिच्छेदनशीलवान् ॥ शास्रोक्तशौचरहितः सिद्धयसिद्धयोः फलस्य च ॥२॥ हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ ३ ॥ २७ ॥ भा० टी०-सात्त्विककर्तारमुदाहृत्य राजसं तमाह-रागीति । रागी रागवान् , कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफल- पशुस्वर्गाद्यर्थी, लुब्धः परद्रव्येपु संजाततृष्णः तीर्थादौ स्वद्रव्यापरित्यागी च, हिंसात्मकः वृचिच्छेदादिना परपीडाकरस्वमावः, अशुचिर्वाह्यान्तःशौचवर्जिनः, इष्टप्राप्तावनिष्टवियोगे च हर्ष: अनिष्टप्राप्ताविष्टवियोगे च शोकः ताभ्यां हर्षशोकाभ्यामन्वितो युक्तः तस्यैव कर्मणः संपत्तिविपत्त्योर्जाताभ्यां हर्पशोकाभ्यामन्वितः इति वा एवंविधो यः कर्ता स राजसः परिकीर्तितः ॥२७॥ प० टी०-राजसमाह-रागीति । रागी पुत्रादिपीतिमान, कर्मफलप्रेप्सुः कर्मफलकामी, लुब्धः स्वर्ग- सुसलम्पटः सन् हिंसात्मको हिंसायामात्मा मनो यस्याशुचिः शौचरहितः लाभालाभयोईपंशोकाभ्याम- न्वितः कर्ता राजसः ॥ २७ ॥ रा० टी०-रागीति । रागी कीयादिकामः। कर्मफलप्राप्तीच्छावान् । लुब्धः कर्मण्यपेक्षितद्रव्यव्यय- हीनः । हिंसात्मकः हिंसास्वभावः । अशुचिः द्रव्यादिषु शुद्धिहीनः । कार्यसिद्धयसिद्धयोः हर्पशोकान्वितः स का राजसः ॥२७॥ अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः॥ विपादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥ त० टी०-तामसं कर्तारमाह-अयुक्त इति । अयुक्तः अनवहिततया कर्मानुष्ठानायोग्यः, माकृतः कर्तव्यविवेकहीना, स्तब्ध आरब्धेऽपि कार्ये शिथिलः, शठा वञ्चनपरः, नैष्कृतिकः परवृत्ति- च्छेदनाभिप्रायेण धर्मादि प्रदर्य स्वार्थसाधका, अलसः आदइयोऽपि कर्मण्यनुवमर्शला, दीर्घसूत्री च एकद्विदिवसैन साध्यं यत्तन्मासेनापि न साधयति । एवंभूतो यः कर्ता स तामस उच्यते ॥२८॥ म०टी०-अयुक्त इति। अयुक्तः सर्वदा विपयापहृतचित्तत्वेन कर्तव्येवनवहितः, प्राकृतः शास्त्रासंस्कृतयु- द्विर्यालसमः, स्तब्धो गुरुदेवतादिष्वयनम्र, शठः परवञ्चनार्थमन्यया भाननयन्यथावादी, नैष्कृतिक: स्व- स्मिन्नुपकारित्वभ्रममुत्पाद्य परवृत्तिछेदनेन स्वार्थपरः, अलसः अवश्यकर्तव्येष्वप्यप्रवृत्तिशीलः, विपादी सत- वमसंतुष्टस्वभावत्वेनानुशोचनशीलः, दीर्घसूत्री 'निरन्तरशङ्कासहस्रकवलितान्तःकरणत्वेनाविमन्थरप्रवृत्तिर्यदय कर्तव्यं तन्मासेनापि करोति न वेत्येवंशीलश्च कर्वा तामस उच्यते ॥२८॥ ०.टी०-तामसकारमाह- अयुक्त इति । अयुक्तोऽस्थिरचित्तश्यञ्चल इत्यर्थः । प्राकृत: पामरः कार्याकार्यज्ञानविहीन इत्यर्थः । स्वब्योऽनम्रः महत्सु विनयशून्य इत्यर्थः । शठो गूढविप्रियकारी सर्ववश्यक इत्यर्थः । नैतिक निकृतिमनोवाफायैः परतिरस्करणं तत्प्रवणोऽनैतिकः परावमानीत्यर्थः । अलसो मन्दः कार्य ववश्यक व्यवपि प्रवृचिरहित: श्रद्धाशून्य इत्यर्थः । विपादी लिष्टचित्तः इष्टे वस्तुनि लब्धेऽपि । तृतिरहितत्वादीपदपि संतोपरहित इत्यर्थः । दीर्घसूनी प सद्यः कर्तव्यमपि कार्य पक्षेण मासेन वा यः १भसमाहितचेता-पा. लि..पु.।
- [अ० १८ श्लो० २९] तत्वप्रकाशिफाष्टटीकोपेता करोति स दीपसूत्री चिरकारीत्यर्थः । य एवंलक्षणः कसकर्ता स तामसस्तमोदोपेण जडधुद्धित्वाचामस इत्युच्यते । अयुक्तत्वादिकं तामसस्य लक्षणमिति सूचितं भवति ॥ २८ ॥ श्री० टी०-तामसं कर्तारमाह-अयुक्त इति । अयुकोऽनवहितः, प्रामवो विवेकशून्यः, स्तव्योऽनम्रः, शठः शक्तिगृहनकारी, नैष्कृतिकः परायमानी, अलसोऽनुद्यमशीलः, विपादी शोकशील;, यदद्य वा श्वो वा कार्य बन्मासेनापि न संपादयति यः स दीर्घसूत्री, एवंभूतः कर्ता तामसः उच्यते। कर्तविध्धेनेव ज्ञातुरपि वैविध्यमुकं भवति । कर्मविध्येन च ज्ञेयस्यापि त्रैविध्यमुझं 'वेदितव्यम् । युद्धेवैविध्येन करणस्यापि वैविध्यमुक्तं भविष्यति ॥ २८ ।। स० टी०-विषयाकृष्टचित्तत्वात्कर्तव्येष्वसमाहितः । शास्त्रासंस्कृतत्रुद्धित्वादालतुल्योऽतिपामरः ॥ १ ॥ अनमो गुरुदेवादी परवचनतत्परः । स्वस्मिन्नोत्कृष्ट्यमुत्पाद्य परवृत्चिविधायकः ॥ २ ॥ अपश्यमेव कर्त- न्येऽप्यमचिस्वभावकः ॥ सदा संतुष्टशीलत्वानुशोचनतत्परः ॥ ३ ॥ सदा शङ्कासहस्रेण प्रस्वचिचत- याऽलसः ॥ अतिमन्दप्रवृत्तिः श्वो वादकार्य करोति न 113 11 मासेनापि य एवं स्यात्कर्ता प्रोक्तः स तामसः ॥५॥२८॥ भा० टी०-एवं राजसं करिमुदाहृत्य वामसं वमाह-अयुक्त इति । अयुक्तो विषयेषु विक्षिप्तचित्तत्वा- दसमाहितः, प्राकृतोऽत्यन्तासंस्कृतघुद्धिर्वालिश:, स्तव्यः कस्मैचिहण्डवन्न नमति सर्वदाऽनम्रो मन्दस्वभावः, शठः शक्तिगूहनकारी मायावी, नैकृतिकः परविच्छेदनुपरः, अलस; कर्तव्येप्वप्रवृत्तिशीलः, विषादी सर्वदा खिन्नस्वभावः, दीर्ध सूत्रायितुं शीलमस्येति दीर्घसूत्री कर्तव्यानां दीर्घप्रसारणस्वभाव:-एवं क्रियमाणे सत्यनिष्टमिदं कथंचिदापयेत, यदा पुनरेवं क्रियते तदा त्वनिष्टमेव संभावनोपनीवमित्येवं शासहस्र- व्याप्तचिचत्वेनातिमन्थरप्रवृत्तिशीलः यदद्य श्वो का कर्तव्यं तन्मासेनापि न करोति एवंविधो यः कती स तामस उच्यते ॥२८॥ ५० टी०-तामसमाह-अयुक्त इति । अयुक्तो नियमरहितः, प्राकृतो विवेकशून्यः, स्वन्धोऽविनीता, शठो मायावी, नैष्कृतिकः पररन्धसूचका, अलसः किंचिन्न करोति, विपादी केशव्ययादिना पश्चातापी, सूचनात्सूत्र दीर्घ सूत्रं यस्मिन् देशकालाधनेकवियां सूचनां कृत्वाद्य श्वः परधः कर्तव्यमिति विलम्नयति स तामसः कर्ता ॥२८॥ रा० टी०-अयुक्त इति । अयुक्तः भगवदर्पणादियोगरहितः । प्रकृष्टो अकृतः प्राकृतः भगवद्भक्ति सामाप्रकष्टो न कृतो हि यः । स ाकृतः । इति स्मृतः । स्तब्धः आत्मसंभावनया काप्यनमः । शठः गूढद्वेपेण कर्मकारी । नैऋतिको नीचकर्मकृत् । प्राप्तकालेऽपि कर्मण्युदासीनोऽलस: । विषादी सर्वव्यापारो- परतिहेतुमनोदौल्यवान् , प्राप्तेऽपि कर्मझाले पश्चात्कुर्यामिति घ्यायन्या । परछवदोष दीर्घकालमतमप्यनु- चित्तं सूचयन्वा दीर्घसूत्री । स तामसः कर्तेत्यर्थः ॥ २८ ॥ बुद्धेर्मेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ॥ प्रोच्यमानमशेपेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ।। २९ ॥ त० टी०-एवमनुष्यस्य कर्मणो ज्ञानतः स्वरूपतः कर्तृतय गुणतविध्यमुक्तमिदानी सर्वच्यव- हारामाधारणकारणभूताया बुद्देश्तेश्च गुणतनैविध्यं वक्तुं प्रतिजानांते-बुद्धरिति । बुदिाध्यवसा- यरूपा या तस्या धृतेय उद्वेगहेतौ प्राप्तावपि चित्तचे स्थैर्य धृतिस्तस्याश्च सत्त्वादिगुणंतत्रिविधं भेदमोपेण निःशेपेण हे धनंजय ! पृथक्त्वेन मया प्रोच्यमानं यथावत्त्वं शृणु ॥ २९ ॥ . .
t १२२६ श्रीमनगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ३० म०टी०-तदेवं 'ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः' इति व्याख्यातम् । संप्रति धृत्युत्साहसम- न्वित इत्यत्र सूचितयोवुद्धिधृत्योपैविध्यं प्रविजानीते-बुद्धेरिति । युद्धेरध्यवसायादिवृत्तिमत्त्या धृतेश्च तद्वत्तेः सत्वादिगुणतस्विविधमेव भेदं मया त्वां प्रति त्यक्तालस्येन परमाप्तेन प्रोच्यमानमशेषेण निरवशेष पृथक्त्वेन हेयोपादेयविवेकेन शृणु श्रोतुं सावधानो भव । हे धनञ्जयेति दिग्विजये प्रसिद्ध महिमानं सूचयन प्रोत्सा- हयति । अत्रेदं चिन्त्यते-किमत्र बुद्धिशब्देन वृत्तिमात्रमभिप्रेतं किंवा वृत्तिमदन्तःकरणम् ? प्रथमे ज्ञान पृथङ्न वक्तव्यम् । द्वितीये कर्ता पृथन वक्तव्यः, वृत्तिमदन्तःकरणस्यैव कर्तृत्वात् । ज्ञानधृत्योः पृथक- थनवैय्यध्यै च । न चेच्छादिपरिसंख्याथै तत् । वृत्तिमदन्तःकरणविष्यकथनेन सर्वासामपि तद्वृत्तीनां त्रैवि- ध्यस्य विवक्षितत्वात् । उच्यते-अन्त:करणोपहितश्विदाभासः कर्ता । इह तूपहितानिष्कृष्य उपाधिमात्रं कर• गत्वेन विवक्षितं, सर्वत्र करणोपहितस्य कर्तृत्वात् । यद्यपि च " कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा- धृतिरधृतिहीं/भीरित्येतत्सर्वे मन एव" इति श्रुत्यनूदितानां सर्वासामपि वृत्तीनां वैविध्य विवक्षितं, तथापि धीधृत्योपैविध्यं पृथगुकं ज्ञानशक्तिक्रियाशक्त्युपलक्षणार्थ न तु परिसंख्यार्थमित्ति रहस्यम् ॥२९॥ शं० टी०-कर्तृवत्करणस्यापि त्रैविध्यं सूचयितुं बुद्धयादेवैविध्यं बोधयितुमाह-बुद्धेरिति । यया पदार्थतत्त्वमध्यवसाय कार्ये पुमान्प्रवर्तते तस्या बुद्धेः अन्तःकरणवृत्तिविशेषस्य धृतेश्च वृत्तिविशेषस्य । घकार: समुच्चयार्थः । एवकारोऽन्यव्यवच्छेदार्थः । पृथक्प्रत्येकं गुणतः सत्त्वादिगुणभेदेन त्रिविधं भेदमशे- पेण साकल्येन मयोच्यमानं शृणु । यद्यपि पूर्वं ज्ञानस्य त्रैविध्यं प्रतिपादितं, तथापि ज्ञानं वृत्तिसामान्य बुद्धिस्तु वृत्तिविशेषः धृतिरपि वृत्तिविशेष एव ततो न पुनरुक्तिप्रसङ्गः ॥ २९ ॥ श्री० टी०-इदानी बुद्धेधृतेश्चापि त्रैविध्यं प्रतिजानीते-बुद्धोरिति । स्पष्टोऽर्थः ॥ २९ ॥ स० टी०-ज्ञानं कर्म च कर्ता च तदेवं त्रयमीरितम् ॥ इदानी प्रतिजानीते वैविध्यं बुद्धि- धैर्ययोः ॥ १ ॥ बुद्धेश्यवसायादिवृत्तिमत्या धृतेस्तथा ॥ संत्त्वादिगुणतो भेदं त्रिविधं त्वा प्रति स्फुटम् ॥ २ ॥ प्रोन्यमानं मयाप्तेन हेयादेयविवेकतः ॥ सावधानो भव श्रोतुं साकल्येन धनञ्जय ॥ ३॥ बुद्धयुपाधिश्चिदाभासः कर्ता प्रोक्तः पुरात्र तु ॥ करणत्वेन निष्कष्योपाधिमात्रं विवक्षितम् ॥ ४ ॥ २९ ॥ भाव टी-एवं ज्ञानस्य धुद्धिवृत्तेः, फर्सपए; क्रियायाः, कर्तु: बुद्धपुपहितस्य च त्रैविध्यमुक्त्व पृत्तिमत्या बुद्धस्तद्वृतेश्च धृत्याख्यायास्पैविध्य वक्तुमारभते-बुद्धेरिति । बुद्धेर्वृत्तिमाया धृतेश्च तद्भुतेर्गुणत सत्त्वादिगुणतत्रिविधभेदं मया प्रोच्यमानं कथ्यमानमशेपेण नि.शेपतः पृथक्त्वेन हेयोपादेयाविवेकतः शृणु श्रोतुं सावधानो भव । दिग्विजये मानुपं देवं च प्रभूतं धनं यया बुद्धपा धृत्या च त्वं जितवानसि सा त्वयाऽन्यैश्च धनादिसमरतपुरुषार्थसिद्धये विजयहेतुभूता उपादेयेति वोधनाय मया प्रोच्यमानं बुद्धेधृतेश्च विविध भेदं शण्विति द्योतनाय संबोधयति-धनंजयेति ॥२९ ।। ५० टी०-अथ बुद्धधृतेन त्रैविध्यमाह-बुद्धेरिति । स्पष्टार्थम् ॥ २९ ॥ रा० टी०-एवं ज्ञानकर्मकर्तृणां गुणकृतं त्रैविध्यं निरूप्याधुना बुद्धेः धृतेश्च गुणतस्नैविध्यं प्रतिज्ञापूर माइ-युद्धरित्यादिभिः सप्तभिः । गुणतः सत्वादिगुणभेदतो निमित्तात्त्रिविधमेव बुद्धभेदं धृतेश्च भेर्दै पृथक्त्वेन मया प्रोच्यमानमशेपेण शृणु । श्रुत्वा निष्ठा कुरु ।। २९ ।। प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ॥ वन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ ! सात्त्विकी ॥ ३०॥ त०टी०-तत्र विविधयुद्धिमध्ये प्रथमं सात्त्विकी बुद्धिमाइ-प्रवृत्तिं चेति। प्रवृत्ति त्रिवर्गसाधनभूत
[अ० १८ ० ३०] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेवा
१९२७
धर्म, नित्ति मोक्षसाधनभूतं धर्ममथवा प्रवृत्तिः स्ववर्णाश्रमोचिते धर्मे, निवृत्तिः परोचिते धर्म कार्या-
कार्य इदमस्मिन् देशे काले च कार्य कर्तव्यमिदमस्मिन् देशे काले च न कर्तव्यमिति । भयाभये अस-
कार्ये प्रवृत्तिर्भयं, सत्कार्ये प्रवृत्रिमयं, वन्धं बन्धोपायं विषयाभिमुख्य, मोक्षं मोक्षोपायं विपयवैराग्यं,
च या वेत्ति हे पार्थ ! सा बुद्धिः साचिकी । बुद्धः करणत्वेन यया वेत्तीति वक्तव्ये तस्या वेदना-
साधारणहेतृत्वात् कर्तृविवक्षया साध्वसिः छिनत्तीतियत् या वेत्तीत्यविरुद्धम् ॥ ३० ॥
म०टी०-तब बुद्धेरैविध्यमाह त्रिभिः-मत्तिमिति । प्रवृत्ति कर्ममार्गे, निवृत्ति संन्यासमार्ग, कार्य
प्रवृत्तिमार्गे कर्मणों करणम् , अकार्य निवृत्तिमार्गे कर्मणामकरणं, भयं प्रवृत्तिमार्गे गर्भवासादिदुःखं, अभयं
निवृत्तिमार्गे तदभावं, यन्ध प्रवृत्तिमार्गे मिध्याज्ञानकृवं कर्तृत्वाद्यभिमान, मोक्षं निवृत्तिमागें तत्त्वज्ञानकृत-
मज्ञानतत्कार्याभावं च या वेत्ति करणे कर्तृत्वोपचारात् यया वेत्ति की बुद्धिः सा प्रमाणजनिवनिश्चयवती हे
पार्थ ! साविकी । वन्धमोक्षयोरन्ते कीर्तनात्तद्विपयमेव प्रवृत्त्यादि व्याख्यातम् ॥ ३० ॥
शं० टी०-सत्त्वयुद्धेर्लक्षणमाह-प्रवृत्तिमिति । प्रवृत्ति च श्रुतिस्मृतिम्यां विहितं धर्मे, निवृत्तिं ताभ्यां
निपिमधर्म च कार्याकार्य कार्य देशकालादेरीनुकूल्ये कर्वव्यं प्रातिकूल्ये त्यक्तव्यमकार्यम् । भयाभये
भयं भयकारणमनर्थम् , अभयं भयाभावकारणमनभावम् , पन्ध बन्धहेतुं मोक्षं मोक्षहेतुं च बुद्धेनिक-
र्तृत्वासंभवात्करणार्थता । यया बुद्धया पदार्थतत्त्वनिश्चयकारिण्या धर्मादिकं पुरुषोऽधिकारी विजानाति
सा बुद्धिः सात्त्विकी । यद्वा बन्धं मोक्षं चेत्यत्र वन्धमोक्षयोरेव प्रतिपाद्यत्वेन प्रवृत्त्यादिपदाना तद्विशेषणत्वे.
नात्वयो युक्तः, प्रवृत्ति-प्रवृत्तिः सत्त्वयुद्धः कारणभूतः कर्ममार्ग: यन्त्र प्रहत्तः शुद्धामा सन्मोक्षाय कल्पवे
तो प्रवृत्ति च, निवृत्ति च-निवृत्तिनिष्कर्मत्युमार्गः संन्यासो यत्र प्रवृत्तः संसारबन्धान्मुक्तो भवति तां निवृत्ति
च । चत्रयं समुच्चयार्थम् । कार्याकार्ये कार्यमारुरुक्षोः कर्मणि विपये काले काले यत्कर्तव्यं तत्कार्यम् ,
तथाऽमार्यमारूढस्य यदकर्तव्यं त्यक्तव्यं तदकार्य ते चोभे कार्याकार्ये । भयाभये यस्माद्विभेति तनयम-
ज्ञान संसारकारणं यस्मादमयं भयाभाव: सिध्यति तदभयं ज्ञानं मोक्षकारणं ते चोभै भयामये वन्धम-
ध्यासलक्षणमज्ञानकार्य मोक्षमध्यासाभावलक्षणं ज्ञानकार्ये च यया युद्धपा शुद्धात्मा विचक्षण एतत्सर्वं क्षौर-
नीरवद्विभज्य विजानावि अज्ञस्येदं साधनं वज्ञस्येदं साधनमारुरुक्षोरिदं कव्यमारूढस्येदं त्यकव्यमिद-
मज्ञानमिदं ज्ञानमयं धन्धोऽयं मोक्ष इति स्वाधिकारानुरूपेण साध्यसाचनभेदं .वन्धं मोक्षं च सम्यग्यया
वेत्ति पुरुषः सा घुद्धिः सात्त्विकी बहुजन्मसुकृतपरिपाकसमुत्पन्नशुद्धसत्त्वकार्यत्वात्सात्त्विकीवि बुधैरुच्यते
इत्यर्थः । एतेन सात्त्विक्येव बुद्धिर्मुमुक्षोः प्रयत्नेन संपादमीयेति सूचितं भवति ॥ ३० ॥
श्री० टी०-तत्र बुद्धेवेविष्यमाह-मत्तिं चेति त्रिभिः । प्रवृत्ति च धर्मे, निवृत्ति चाप यस्मिन् देशे
काले च यत्कार्यमकायै च भयाभये कार्याकार्यनिमित्तावानों कथं वन्धः कथं वा मोक्ष इवि या बुद्धिरन्तः-
करणं पति सा सात्त्विकी । यया पुमान वेत्तीति वक्तव्ये करणे कर्तृत्वोपचारः काष्ठानि पचन्तीतियन् ॥३०॥
स० टी०-तत्रादो भगवानाह कुद्धेस्त्रैविध्यमादरात् ।। प्रवृत्रि कर्भगार्ग च बन्धहेतुवया मतम् ।। १ ।।
निवृत्ति कर्मसंन्यासमार्ग मोकसाधनम् ॥ प्रवृत्तिमार्गे करणं कर्मणामधिकारिणः ॥ २ ॥ निवृत्तौ कर्मणा
त्यागः प्रवृत्तौ मयमामृतम् ॥ निवृत्तावभयं पन्धं प्रवृत्तौ भ्रान्तिजं नृणाम् ॥ ३॥ मोक्षं निवृत्तिमार्गे
धै तत्वज्ञानप्रसादजम् ॥ वेत्ति बुद्धिर्यथावद्या सात्विको सा मतिः स्मृतः ॥ ४ ॥. या वेत्तीत्यत्र करणे
फर्तृत्वमुपचारतः ॥ यया वेत्ति प्रमाणोत्ययुद्धपा कति चार्थतः ॥ ५ ॥ प्रवृत्तावरित कर्तव्यं विधिकिक-
रवा यतः ॥ तत्रास्ति भयमत्यन्त वन्धस्तत्र दृरो भवेत् ।। ६ ।। निवृत्तौ नास्ति कर्तव्यं विथ्यादरम्यभा-
वतः ।। अभयं तत्र शान्तस्य मोक्षः स्यादात्मनि स्थितिः ॥ ७ ॥३०॥
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्ले० ३१] भा० टी०-तत्र बुद्धेवैविध्य विभजन्नादौ सात्त्विको बुद्धिमुदाइरवि-प्रवृत्तिमिति । प्रवृत्तिं च निवृति च यस्मिन्वाक्ये वन्धमोक्षावुच्येते तस्मिन्नेव प्रवृत्तिनिवृत्त्योरुतत्वात् । कर्ममार्गस्य बन्धहेतुत्वात् निवृत्ति- मार्गस्य मोक्षहेतुत्वात् च प्रवृत्तिनिवृत्ती कर्मसंन्यासमार्गावित्यवगम्यते । वथाच प्रवृत्तिः प्रवर्तनं बन्धहेतुः कर्ममार्गः, निवृत्तिः संन्यासहेतुर्मोक्षमार्गः, प्रवृत्ति शास्त्रविहितविपया निवृत्तिं तत्प्रतिपिद्धविषयामित्यपि योध्यम् । कार्याका कर्तव्याकर्तव्ये देशकालाद्यपेक्षया दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणा करणाकरणे । विभेत्यस्मा- दिति भयं भयकारणं तद्विपरीतमभयमश्यकारणं भयं चाभयं च भयाभये । भयं दुःखमभयं सुखमिति तु सात्त्विक्या बुद्धेर्दु.सानुभवस्यायोग्यत्वं, भयं प्रवृत्तिमार्गे अभयं गिवृत्तिमार्गे इति विवक्षायामध्याहारदोष चाभिप्रेत्याचार्येन व्याख्यातम् । वन्धं सहेतुकं मोक्षं च सहेतुकं या वेचि सा वुद्धिः सात्त्विकी, करणे कर्तृ- त्वोपचारात्प्रथमा । सात्विक्या वुद्धया युक्तायाः पृथायाः पुनस्त्वमपि तथैव भवितुं योग्योऽसीति सूचनार्थ पार्थेति संबोधनम् ॥ ३० ॥ ५० टी०-वन प्रथमं बुद्धवैविध्यमाह-प्रवृत्तिं चेति त्रिभिः । शाखविहितविपया देशकालोचितां च धर्मे प्रवृत्ति निवृचिमधर्मे देशकालानुसारं वयोवृत्तानुसारं वा कार्यमकार्यमिवि अकार्ये भयं कार्येऽभयं पन्ध संसारबन्धं मोक्षमुद्धारप्रकारं च या वेचि सा बुद्धिः सात्त्विको ।। ३० ॥ रा० टी०-बुद्धेर्मेदमाह-प्रवृत्तिमित्यादित्रिभिः । प्रवृत्तिं संसारहेतुप्रवृत्तिहेतुं धर्म च । कार्याकार्य कर्तव्यमकर्तव्यं च । तन्निमित्तभयाभये वन्धमोक्षप्रकारं च या बुद्धित्ति सा सात्त्विकीत्यर्थः । कर्तृत्वोप. चाराद्या वेत्तीत्युक्तं । यया वेत्ति धुमानित्यर्थः ॥ ३० ॥ यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च ॥ अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ ! राजसी ॥ ३१ ॥ त० टी०-राजसी बुद्धिमाह-ययेति । यया पूर्वोक्तं धर्ममधर्म च कार्यमवश्यकर्तव्यमकार्यमुपे. क्षणीयं च देशकालादिपु यथावन्न जानाति हे पार्थ ! सा बुद्धिः राजसी ॥ ३१ ॥ म०टी०-ययेति । धर्म शास्त्रविहितं, अधर्म शास्त्रप्रतिपिद्धं, अदृष्टार्थमुभयं कार्य चाकाय च दृष्टार्थमुभ. यमययावदेष प्रजानाति ययावन्न जानाति, किं विदमित्वं न वेति चानव्यवसायं संशयं वा भजते यया बुद्धधा सा राजसी बुद्धिः । अत्र तृतीयानिर्देशादन्यत्रापि करणत्वं व्याख्येयम् ॥ ३१ ।। शं० टी०-राजसी बुद्धिमाह-ययेति । धर्म विहितमधर्म प्रतिषिद्धं च कार्य चाका-च देशकालादेरानु. फूल्ये प्रातिकूल्ये च कर्तव्याकर्तव्ये कर्मणि चकारादर्थानर्थानेतान्सनियथावयथार्थवद्यावदानिर्णयेनासा. फल्येन संदेहेन यया युद्धया प्रजानाति पुरुषः सा बुद्धिः राजसी रजोगुणसंपन्नत्वाद्राजसीत्युच्यते ॥३१॥ श्री०टी०-राजसी बुद्धिमाह-ययेति । अयथावत्संदेहास्पदुत्वेनेत्यर्थः । सप्टमन्यत् ॥ ११ ॥ स० टी०-शास्त्रेण विहिवं धर्म चाधर्म शास्त्रनिन्दितम् ।। दृष्टार्थे वाप्याथै करणाकरणे तथा ॥ १ ॥ यथावत्र विजानातीदमित्यं वा र वेति च ॥ अनिश्चयं संशयं वा यया बुद्धपा भजत्यसो ॥२॥ बुद्धिः सा राजसी यत्नाच्छोधनीया मुमुधुभिः ॥ ३ ॥३१॥ भा० टी०-सात्त्विकी बुद्धिमुस्त्या राजसी तामाह-ययेति । यया बुद्ध्या धर्म शाखचोदितम् अधर्मे च तटविपिद्धं कार्य घ कम्यमकार्यमेव चाकतन्यम् अयथावत् न यथाव प्रजानाति सर्वतो निर्णयन न प्रनानावि सा युद्धिः पार्थ, राजसी । पृयापुत्रस्य दव नेयं युक्तति संवोधनाशयः ।। ३१ ॥ प० टी०-राजसीमाह-पयेति । भयथावत् संदेहास्पदत्येनेत्यर्थः । सष्टमन्यत् ।। ३१ ।। - . , । [म.१८० ३२] तत्त्वरकाशिकायटीकोना १२२९ रा. टी०-ययेति । धर्मादिक यया युद्धया अयथावत्प्रजानाति नियमेन यथावन जानाति । किंचि. यात्किचियथावजानातीति यावत् । याथार्थ्यनियमहीना या बुद्धिः सा राजसीत्यर्थः ॥ ११ ॥ अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता॥ सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ! तामसी ॥३२॥ त० टी०-तामसी बुद्धिमाह-अधर्ममिति । या तमसाऽऽता तमोव्याता सती अधर्म धर्म, धर्म चाधर्ममिति मन्यते, सर्वार्थान् विपरीतांश्च मन्यते परतत्त्वमपरमपरतत्त्वं च परं पदं जीवं मुक्तं, मुक्त परमेश्वरं मायावच्छिन्नं परिच्छिन्नं प्रत्यगात्मानं विभुम् , अनन्तकल्याणगुणमीश्वरं निर्विशेष, वेदान्तवेद्यं प्रमाणाविषयं, सत्यं विश्वमसत्यं, स्वभावतो जगद्भिन्नाभिन्नं ब्रह्म केवलभिन्नमभिन्नं चेत्येवं सर्वान्पदार्थान् विपरीताविपर्ययेण मन्यते सा तामसीत्यर्थः ॥ ३२ ॥ म०टी०-अधर्ममिति । तमसा विशेषदर्शनविरोधिना दोषणावृता या बुद्धिरधर्म धर्ममिति मन्यते, अदृष्टार्थे सर्वत्र विपर्यस्यति । तथा सर्वार्थान् सर्वान् दृष्टप्रयोजनानपि शेयपदार्थान् विपरीवानेव मन्यते सा विपर्ययवती बुद्धिस्तामसी ॥ ३२॥ शं० टी०-वामी बुद्धिमाह-अधर्ममिति । धर्ममधमै कार्यमकार्यमर्थमनर्थं च यया तमसा तमोगुणेना- तयाऽस्पष्टप्रकाशया बुद्धधा सर्वार्थान् वैपरीत्येन मन्यते गृहाति पुरुषः सा तामसी बुद्धिरित्यर्थः ॥ ३२॥ स० टी०--तमसा दोपरूपेण मतियांच्छादिता सती ॥ अधर्म धर्ममित्येवं मन्यते विपरीतगा ॥१॥ विपर्यस्यति सर्वत्र विशेषादर्शनाद्यया ॥ दृष्टप्रयोजनान्सन्पिदार्थान्मन्यतेऽन्यथा ॥२॥ विपर्ययववी बुद्धिस्तामसी सात्यनर्थदा ।। ३ ।। १२ ।। श्री० टी०-वामी बुद्धिमाह-अधर्ममिति । विपरीतग्राहिणी बुद्धिवामसीत्यर्थः । बुद्धिरन्त:करणं पूर्वोक्तं , ज्ञानं तु तवृत्तिः, धृतिरपि तवृत्तिरेव । यद्वा अन्तःकरणस्य धर्मिणो बुद्धिरप्यध्यवसायल- क्षणात् वृत्तिरेव । इच्छाद्वैपादीनां उदृत्तीनां वहुत्वेऽपि धर्माधर्मभयाभयसाधनत्वेन प्राधान्यादेवासा वैविध्य- मुक्तम् । उपलक्षणं चैतदन्यासाम् ।। ३२ ।। भा० टी०-राजसी बुद्धिमुक्त्वा तामसी तामाह-अधर्ममिति । अधर्म प्रतिषिद्धं धर्म विहितमिति या मन्यते जानाति तमसाऽविवेकेनावृता वेष्टिता सती सर्वार्थानेव ज्ञेयपदार्थान् विपरीतांश्च विपरीवमेव विजा- नाति सा धुद्धिस्तामसी पार्थ ! तव नेयमुचितेति संषोधनाशयः ॥ ३२ ॥ ५० टी०-तामसीमाह-अधर्ममिति । या तमसाऽज्ञानेनावृता सत्यधर्ममेव धर्म पश्यवि यथा लक्षशो गोमक्षिकामारणेनकोऽश्वः सुखी स्यादिति मन्यते, यदा पाश्चत्येन परसंतुष्टिधर्म इति मन्यते, सर्वार्थान् पुत्र- मित्रादीन् विपरीतान् प्रतिकूलकर्तृन् पश्यति सा तामसी । अत्र बुद्धिरव्यवसायात्मिकान्तःकरणमृत्तिर्न तु निश्चयात्मिका यतः सैकविधा न विधा । तदुक्तम् ' व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन' इति । तर्हि कथमन्येपामिच्छाद्वेषादीनामनुदेश इति चेत्सत्यम् । धमभिर्मप्रवृत्ती बुद्धधुतेर्वा प्राधान्यमिति ज्ञेयम् ॥ ३२ ॥ रा० टी०-अधर्ममिति । या च बुद्धिरधर्म धर्ममिति मन्यते । नैतावन्मानं किंतु समसाऽवृता अज्ञाने नावृता सती सर्वार्थाविपरीतान येराकारैरा; वर्तन्ते ततो विपरीतैरसत्यत्वानीश्वरत्वापराधीनत्वक्षणिक स्वादिप्रकारैश्च मन्यते सा युद्धिस्तामसीत्यर्थः ॥ ३२ ॥ धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः॥ 'योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ! सात्त्विकी ॥ ३३॥ . - । .
श्रीमद्भगवद्गीता
[अ० १८ श्लो० ३३]
त० टी०-इदानीं धृतेवैविध्ये प्रथमां सात्त्विकी धृतिमाह-धृत्येति । अव्यभिचारिण्या नित्यस-
माध्यनुगतया यया धृत्या योगेन सात्त्विकविपये चित्चैकाग्र्येण मनसः प्राणस्येन्द्रियाणां च क्रियाश्चेष्टाः
पुमान् धारयते धृतिः सा पाथै ! सात्त्विकी ज्ञेयेत्यर्थः ॥ ३३ ॥
म०टी०-इदानी धृतेस्पैविध्यमाह-धृत्येति त्रिभिः । योगेन समाधिनाऽव्यभिचारिण्याऽविनाभूतया
समाधिव्यातया यया धृत्या प्रयत्नेन मनस: प्राणस्येन्द्रियाणां च क्रियाश्चेष्टा धारयते--उच्छास्त्रप्रवृत्तेर्निरु-
णद्धि, यस्यां सत्यामवश्यं समाधिर्भवति, यया च धार्यमाणा मनआदिक्रियाः शास्त्रमतिक्रम्य नार्थान्तरमव-
गाइन्ते धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
शं० टी०-धृवेरपि त्रैविध्यं वदन् सात्त्विकी धृतिमाह-धृत्येवि । योगेन ब्रह्मणि चित्तकाश्यलक्षणेन
समाधिना अव्यभिचारिण्या अविनाभूतया धृत्या धारणात्मिकया धीवृत्त्या यया मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः
मनसः प्राणानामिन्द्रियाणां चक्षुरादीना च क्रिया: या याश्चेष्टाः वहि:प्रवृत्तिरूपास्ताः सर्वा धारयते ब्रह्म-
निष्ठो धारयति नियच्छति ब्रह्मणि चित्तैकाग्रताया स्थिरायां सत्यां मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः सर्वाः स्वयमेव
स्थिरा भवन्ति, तेनैकाग्रताधारणाशक्तयोंगाव्यभिचारित्वं मन:प्राणेन्द्रियक्रियाधारकत्वं च सहैव सिध्यति,
अत एवोच्यते योगेनाव्यभिचारिण्या। यया धृत्या मन:प्राणेन्द्रियक्रिया धारयते सा धृतिर्धारणाशक्तिः
सात्त्विकी शुद्धसत्त्वगुणसंभूतत्वात्सात्त्विकीत्युच्यते मुनिभिरित्यर्थः । पुण्यकर्मपरिपाकवशासंप्रातशुद्धस-
स्वस्य पुरुपस्य ज्ञानं सात्त्विकं बुद्धिः सात्त्विकी धृतिरपि सात्त्विकी मनः प्राणेन्द्रियवृत्तयोऽपि सात्त्विक्य
एव भवन्ति । ज्ञानादीना सात्विकत्वं नाम वाह्यानालम्बनमेव ततो मुमुक्षोः सत्त्वशुद्धिरेव संपादनीयेति
सिद्धम् ।। ३३ ।।
श्री० टी०-इदानी धूतेपैविध्यमाह-धृत्येतित्रिभिः । योगेन चित्तैकाग्र्येण हेतुना व्यभिचारिण्या
विपयान्तरमधारयन्त्या यया धृत्या मनसः प्राणस्येन्द्रियाणां च क्रिया धारयते नियच्छति सा धृतिः
सात्विकी ।। ३३ ॥
स० टी०-धृतेरिदाना त्रैविध्यं प्राहेदारधियां गतिः ॥ समाधिना विनाभूतरूपया तत्र लग्नया ॥ १ ॥
यया धृत्या प्रयत्नेन प्राणस्य मनसः क्रियाः ।। इन्द्रियाणां तथा चेष्टा निरुणद्धि कुमार्गतः ॥ २॥ यस्य
सत्यामवश्यं हि समाधिजायते सताम् ॥ धार्यमाणा यया धृत्या मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः ॥ ३॥ नैव शास्त्र-
मतिक्रम्याऽवगाहन्वेऽन्यगोचरम् ॥ सा धृतिः सात्विकी पार्थ महत्पुण्यक्तां भवेत् ॥ ४॥ ३३ ॥
भा० टी०-एवं वृद्धेनैविध्यं विभज्य धृतेस्रविध्यं विभजन्नादौ सात्विकी धृतिमाह-धृत्येति ! धृत्या
यया योगेन समाधानेनाव्यभिचारिण्या नित्यसमाध्यनुगवया मनःप्राणेन्द्रियाणां क्रियाश्चेष्टा उच्छास्त्रमार्गप्र-
वृत्तीधरयोत-धृत्या हि धार्यमाणा उच्छासर्विपया न भवन्ति । एतदुक्तं भवति-उक्तक्रिया धार्थमाणा योगेन
ब्रह्मणि समाधानेकाम्येणाव्यभिचारिण्या धृत्या धारयतीत्येवंलक्षणा या घृत्तिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ।।
१० टी०-अथ धृवेक्षैविध्ये सात्विको धृतिमाह-भृत्येति । योगेन चित्तकाम्येण हेतुनाऽव्यभिचारिण्या
विषयान्तरमधारयन्त्या यया धृत्या मनस: प्राणानामिन्द्रियाणां च किया धारयते नियच्छति सा धृतिः
सात्विकी॥ ३३ ॥
रा० टी०-प्रतिज्ञावं ठेवैविध्यमाह-कृत्येत्यादिविभिः । अव्यभिचारिण्या विहितविषयया योगेन
भगवद्भछियोगेन युक्तयेति शेषः । यया धृया मनसः प्राणस्येन्द्रियाणा च क्रिया धारयते । सा धतिः सा-
सिकोत्यर्थः ॥ १३॥
[अ० १८० ३४-३९] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता यया तु धर्मकामार्थान धृत्या धारयतेऽर्जुन !|| प्रसङ्गेन फलाकाझी धृतिः सा पार्थ! राजसी ॥३४॥ त० टी०-राजसीमाइ-यया विति । फलाकाङ्की पुरुषः प्रसझेनात्मनः कर्तृत्वाभिनिवेशेन यया धृत्या धर्मकामार्थान् धर्म काममर्थं च धारयते प्राप्यतया धारयतेऽवधारयति न तु नविलक्षणं मोक्षाख्यं कदाचिदपि हे पार्थ ! सा धृती राजसी ॥ ३४॥ म० टी०-ययति । तुः सात्त्विक्या भिनत्ति । प्रसङ्गेन कर्तृत्वादभिनिवेशेन फलाकाली सन् यया धृत्या धर्ग काममथै च धारयते नित्यं कर्तव्यतयाऽक्यारयति न तु मोक्षं कदाचिदपि धृतिः सा पार्थ राजसी ।। ३४॥ शं० टी०-राजसी धृतिमाह-ययेति । तुशब्दोऽन्यव्यावृत्त्यर्थः । यया तु धृत्या पुरुषो धर्मकामार्थान् धर्ममधे कामं च प्राधान्येन धारयते धरति न विमुञ्चति प्रसङ्गेन धर्मादीनां प्रसको संपादनकाले फला- फासी भवति सा धर्मादीनां धात्री धृतिः राजझी ॥ ३४ ॥ श्री. टी-राजी धृतिमाह-यया स्विति । यया तु धृत्या धर्मार्थकामान प्राधान्येन धारयवे न मुञ्चति तत्प्रसङ्गेन फलाकाद्धी च भवति सा राजसी धृतिः ।। ३४ ।। सटी-कर्तृत्वाभिनिवेशेन कलाकाही च सन् यया ।। धर्मम क्या काम नित्य कार्यतया जनः ॥१॥धूसावधारयस्यच्छ न तु मोक्षं कदाचन ।। या धनी राजसी पार्थ संसारैकफलप्रदा ॥२॥३४॥ भा० टी०-सात्विको धृतिमुक्त्वा राजसी तामाह-ययेति । यया तु धृत्या धर्मार्थकामान् धारयते मनसि नित्यकर्तव्यत्तारूपान् अवधारयति. तु शुद्धब्रह्ममोक्षाख्यमिति वनयन्नाह हे अर्जुनेति । प्रसङ्गेन यस्य यस्य धर्मादारणप्रसस्तेन तेन प्रसङ्गेन फलाकाही प्रकर्षण सङ्गः कर्तृत्वाभिनिवेशस्तेनेति केचित् । प्रसङ्गेन धर्मादेः संवन्धेनेत्यन्ये । आचार्यस्तु प्रसिद्धार्थपरित्यागे विनिगमकविरममित्येवं न न्या. ख्यातम् । यः पुरुषः प्रसङ्गेन फलाकाही सन् यया धृत्या धर्मादीन्धारयते तस्य सा धृतिः हे पार्थ ! . राजसी ॥ ३॥ प० टी-राजसीमाह-ययति । यया धृत्या धर्मकामार्थान् प्राधान्येन धारयति न विमुश्चति तत्प्रसं- गेन च फलाकाद्री च भवति सा राजसी धृतिः ।। ३४ ।। रा० टी०-ययेति । यया धृत्या धर्मकामार्थान्धारयते । प्रसङ्गेन प्रकृष्टेन कर्मणि मदीयवास्नेहेन फलाहाडी धृतिः सा राजसीत्यर्थः ॥ ३४ ॥ यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ॥ न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ ! तामसी ॥ ३५ ।। त० टी०-तामसी धृतिमाह-ययेति । यया धृत्या स्वमं निदां भयं त्रासं शोकमिष्टवियोग- निमित्तदर्शन विपादं खेदं मदं विरुद्धविपयानुभवजन्यं हर्पम् एतान् दुर्मेधा दुष्टा निषिद्धार्थधारणा- वती मेघा बुद्धिर्यस्य स पुरुषो न विमुञ्चति सदा तवैव निष्ठां करोतीत्यर्थः । धृतिः सा पार्थ वामसौ भवतीति संबन्धः ।। ३५ ।।। मटील-ययेति । स्वप्नं निन्द्रा भयं आसं शोकमिष्टवियोगनिमित्वं संताप, विपादमिन्द्रियावसाद, मदमशास्त्रीयविपयसेवोन्मुरात्वं च यया न विमुञ्चत्यैव किंतु सदैव कर्तव्यतया मन्यते दुर्मेधाः विवेकासमर्थः, धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३१ ।। . १
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श्रीमद्भगवद्गीता
[अ० १८ ० ३६]
शं० टी०-तामती धतिमाह-पयेति । दुष्टा तमोदोपदृपिता मेधा बुद्धिर्यस्य स दुर्मेधाः दुर्भगः पुरुषः
यया वत्या स्वप्नं निद्रां भयं शोकं विपादं च मदमेव सदा धारयते न तु कचिदपि मुञ्चति सा निद्रादीनां
धात्री धतिस्तामसीत्युच्यते । सर्वव्यवहारहेतोवुद्धेस्वैविध्ये सिद्धे तहारभतानां ओबादिकरणानामपि सात्त्वि-
कत्वादिभेदसद्भावः सूचितः ॥ ३५ ॥
श्री० टी०-तामसी धृतिमाह-ययेति । दुष्टा अविवेकवहुला मेधा यस्य सः दुर्मेवाः पुरुषः यया प्रत्या
स्वप्नादीन्न विमुञ्चति पुनः पुनरावर्तयति ! स्वप्नोऽत्र निद्रा सा तिस्तामसी ॥ ३५ ॥
स० टी०-निद्रां त्रासं च संतापं स्वकीयेष्टवियोगजम् ॥ इन्द्रियाथवसादं च भोगासक्तिकर मदम् ।।१।।
न विमुञ्चति किं त्वेतत्कर्तयत्वेन मन्यते ॥ निर्विवेको यया धत्या सा धतिः पार्थ तामसी ॥ २ ॥ ३५ ॥
भा० टी०-राजसी भृति व्युत्पाद्य तामसी वां व्युत्पादयति-ययेति । दुर्मेधाः दुष्टा कुत्सिता मेधा
बुद्धिर्यस्य स दुर्बुद्धिर्यया त्या स्वप्नं निद्रां भयं त्रासं शोकं प्रियवियोगनिमित्तं संताप विषादं विषण्णता.
मिन्द्रियस्मिन्नता विपयसेवामात्मनो बहुमन्यमानो मत्त इव यो मदमेव च मनसि नित्यमेव कर्तव्यरूपवया
कुर्वन विमुञ्चति धारयत्येव सा धृतिः पार्थ ! तामसी ॥ ३९ ॥
१० टी०-वामसीमाह-यया स्वममिति । दुष्टाऽविवेकबहुला मेधा यस्यासौ दुर्मेधाः पुरुषो यया
धृत्या स्वप्नं स्वप्नस्थपदार्थदर्शनेन भविष्यं चिन्तयति वथा भयं शोक विपादं मदं च न विमुञ्चति स्थिरी-
करोति सा तामसी धतिः ॥ ३५ ॥
रा० टी०-ययेति । यो दुर्मेध: दुष्टयुद्धिः पुरुषः यया धृत्या स्वप्नमवीव निद्रां भयं शोकं दुःखं विषाद
मनोदौर्बल्यं मदं च स्वप्नायुपलक्षितं सर्व निषिद्धं भगवउपादि न विमुवति सा तामसीत्यर्थः ॥ ३५ ॥
सुखं त्विदानी त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ! ।।
अभ्यासादमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ।। ३६ ।।
ताटी-एवं ज्ञानकर्मकर्तपुद्धिघृतीनां त्रैविध्यं निरूपितमिदानी सर्वजीवाभिलपितस्य सुखस्य
गुणतजैविध्यं वक्तुं प्रतिजानीते-सुखं त्वित्यर्धेन । पूर्वोक्ता ज्ञानकर्मादयो यदर्यकास्तत्सुखं तु इदानी
में मम वचनानिविध शृणु, हेयोपादेयज्ञानार्थमवधारय । तन सात्विकं सुखमाह सार्धेन-अभ्यासा-
दिति । यत्र यस्मिन्मुखे अभ्यासाचिरकालावर्तनाद्रमते अवाधितां रति प्रामोति दुःखान्तं च निग-
च्छति, दुःखस्यान्तं च नितरां गच्छति न तु विषयमुख इव दुःखोदकं पामोति ॥ ३६ ॥
म. टी०-एवं क्रियाणां कारकाणा च गुणवस्नैविध्यमुक्त्वा ताक्लस्य मुखस्य त्रैविध्य प्रविजानीते
लोकान-मुखमिति । सात्त्विकं सुसमाहान च मे मम वचनात् शृणु हेयोपादेयविवेका व्यासङ्गान्त-
रनिवारणेन मनः स्थिरीकुरु । हे भरतर्षभेति योग्यता दर्शिता । चत्र समाधिसुखे अभ्यासादतिपरिचयात्
रमवे परितप्तो भवति नतु विपयमुस इव सद्य एव । यस्मिन् रममाणश्च दु:सस्य सर्वस्याप्यन्तमवसानं
नितरां गच्छवि नतु विषयसुख इवान्ते महह.सम् ॥ ३६ ।।
: टी०-एवं गुणभेदेन कर्तृणां करणाना कर्मयां घ ङ्कविष्यमुक्त्या कर्मफलस्य मुरास्यापि त्रैविध्यं
वदन सात्त्विस्मुसस्य स्वरूपमाह द्वाभ्याम्-सुखं विति । स्पष्टार्थः ।। ३६ ॥
श्री०टी०-मुसस्य वैविध्यं प्रतिजानीवे अर्धन-मुखमिति । स्पष्टार्थः । वन सात्त्विकं सुसमाह-
अभ्यासादिति सार्थेन । यन यस्मिन्मुखे अभ्यासादतिपरिचयाद्रमवे न तु विपयमुख इव सहसा रवि
प्राप्नोति, यस्मिन रममाणध दुग्यस्यान्नमरसानं नितरां गाउति प्राप्नोति ॥ ३६ ॥
. [अ० १८ लो० ३७] तत्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता स० टी०-क्रियाणां कारकाणां च गुणाप्रैविध्यमीरितम् ॥ त्रैविध्यं प्रतिजानीते तत्फलेऽप्यधुना सुखे ।। हेयादये विवेकाय वचनान्मे शृणु स्फुदम् ।। सुखं त्रिविधमत्यन्तं सावधानेन चेतसा ॥२॥ सार्धन सात्त्विकं प्राह सुरस्मानन्दवारिधिः ।। सावधानः सुखे यत्राभ्यासात्परिचयादतिम् ॥ ३ ॥ प्रपद्यते वथा यत्र रममाणोऽनुभूवितः ॥ सर्वदुःपोपशमनं नितरां गच्छति स्वयम् ॥ ४ ॥ ३१ ॥ भा० टी०-एवं क्रियाणां कारकाणां च गुणतत्रिविधो भेद उत्तः । अथेदानी फलस्य च सुखस्य त्रिविधं भेदं वक्तुमारभते-सुखमिति । सुसं तु इदानी त्रिविधं मे मम वचनाच्छृणु अवधारय । त्रिविध. स्यापि सुखस्य सामान्यलक्षणमाह-यासादात्तैर्यत्र सात्त्विकादिसुखे रमते यत्र रममाणश्च दुःखस्यान्त. मवसानं च निगच्छति निश्चयेन प्राप्नोति । भरतर्पमैति संबोधयन् सुखस्य त्रैविध्यं मम वचनाच्छुत्वा साविक सुखमनुभवितुं योग्योऽसीति सूचयति । तत्र सात्त्विकं सुबमाह-सार्धेन । यत्र यस्मिन्सुखेऽभ्यास- दतिपरिचयाद्रमते न तु विषयसुख इव सहसा रति प्रामोतीत्यपरे । भाष्यस्य समानतया न तद्विरोधः ॥३६॥ ५० टी०-अथ त्रिविधं सुसमाद-सुखमिति द्वाभ्याम् । इदानी विविध सुख मे मत्तः शृणु । तत्र सात्त्विक सुखमाह-अभ्यासादिति । यत्र यस्मिन् सुखेऽभ्यासानिरन्तरानुसंधानाद्रमते रममाणो. दुःखान्तं दुःखावसानं निगच्छति नितरां प्राप्नोति ॥ ३६ ॥ रा० टी० प्रतिज्ञापूर्व गुणतः सुखस्य त्रैविध्यमाह-मुखं त्विति । यत्र यस्मिन्सुखे चिरकालमभ्यासा पुन: पुन: रमते, दुःखान्त दुःखनाशं च नितरां गच्छति प्राप्नोति तत्सुखं त्रिविधमित्यर्थः । यद्वा पूर्वार्धमेव प्रविज्ञापरम् । उत्तरार्धग्-॥ ३६॥ यत्तदने विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७॥ त० टी०-तदेव विशिनष्टि-यंत्तदिति । यत्तकिमपि अग्रे वैराग्यासनयमनियमोपासज्ञानध्या- नाशुपासनारम्भे वहायाससाध्यत्वाद्विषमिवातिदुःखमिव भवति । परिणामे वैराग्यादिपूर्वकोपासनप- रिपाके अमृतोपममतिमियं भवति । यत आत्मबुद्धिमसादनम्-आत्मविपया बुद्धिरात्मबुद्धिस्तस्याः प्रसादो रजस्तमाकार्यकामलोभमोहत्यागेन स्वच्छतया निरतिशयानन्दरूपेऽवस्थानं ततो जावं सुखं सात्विकं मोक्तं तद्विद्वद्भिः ॥ ३७ ।। म०टी०- तदेव विवृणोति-यदिति । यत् अग्रे ज्ञानवैराग्यध्यानसमाध्यारम्भेऽयन्तायासनिर्वाह्यत्वाद्वि. पमिव द्वेषविपावहं भवति । परिणाम ज्ञानवैराग्यादिपरिपाके त्वमृतोपमं प्रीत्यतिशयास्पदं भवति । आत्म- विषया बुद्धिरात्मबुद्धिस्तस्याः प्रसादो निद्रालस्यादिराहित्येन स्वच्छतयाऽवस्थानं ततो जातमात्मबुद्धिप्रसा- दर्ज, नतु राजसमिव विपयेन्द्रियसंयोगजं, न वा सामसमिव निद्रालस्यादिजम् । ईदृशं यदनात्मबुद्धिनिवृ. स्यात्मबुद्धिप्रसादजं समाधिसुखं तत्सात्त्विक प्रोक्तं योगिभिः । अपर आह-अभ्यासादीवृत्तेर्यत्र रमने प्रीयते यत्र च दुःखावसानं प्राप्नोति तत्सुखम् । तच त्रिविधं गुणभेदेन। शुण्विति तत्पदाच्याहारेण पूर्णस्य श्लोकस्या- न्वयः। यत्तदन इत्यादिश्लोकेन तु सात्त्विकसुखलक्षणामिति । भाष्यकाराभिप्रायोऽप्येवम् ॥ ३७॥ शं० टी०-यदिति । यद्भाह्यं सुखं निरन्तरं नित्यप्राप्तमप्यग्रे स्वसिद्धेः पूर्व स्वसिद्धिसाधनस्य वि- पवत्स्वीकर्तु दुष्करत्वारस्वयमपि विपमित्र प्राप्तुमनुभवितुं चादाक्यमेव भवति, यतः स्वसाधनं सदसद्विधेको दुर्लभो मुमुक्षुत्वं ततो दुर्लभ वैराग्यं ततो दुर्लभं शमादिसंपचिस्ततो दुलभा संन्यासस्ततोऽप दुर्लभः श्रद्धकमूलः अवगादिस्ततो दुर्लभः मुक्तेरसाधारणकारणं तजन्यं ज्ञानमपरोक्ष्मतीव दुर्लभतरं वत्परिपाक- . . .
। श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ३७] हेतुः समाधिदुर्लभतमस्तत एव स्वसिद्धिसाधनस्य समाध्येकमूलस्य ज्ञानस्य प्राच्योदीच्या तीव्रमोक्षेच्छक- कारणैः सह दुष्प्रापत्वात्वयमपि तद्वदुष्प्रापं भोक्तुमशक्यं च भवतीत्यर्थः । नन्वेवं सति यतीनां मोक्षसु- खापेक्षावतां का गतिरित्यकाङ्खायामाह-परिणामेति । सगुरोश्वेश्वरस्यानुग्रहात्सिद्धस्य तत्प्राप्तिसाधनस्य ज्ञानस्य, नित्यनिरन्तरं समाधिना परिणामे परिपकरवे सिद्धे सत्यममृतोपमं भवति, यथा कालकूटापायेन प्राप्तममृतं देवानां जरामृत्युनिवर्तकं भवति, तथा करणदोपापायेन प्राप्तं तद्रामं सुखमपि यतीनां महात्मनां जन्म- मरणदुःखप्रवाहविध्वंसकत्वादमृततुल्यं परमानन्दकरं च भवति । ततो ब्रह्मविद्भिः परमहंसमोक्षसुखानुभूति कामैः साधनशुद्धिसिद्धावेव प्रयत्नः कर्तव्यो न तु साध्यसिद्धये, सापने सिद्धे साध्य स्वयमेव सिध्यति । यथा चक्षुःसौष्ठवे सिद्धे पूर्णचन्द्रदर्शनाहादः सिध्यति, तद्वद्यत्सुखमात्मबुद्धिप्रसादजं यया बुद्धया ज्ञानेना- स्मा सचिदानन्दैकलक्षणोऽयमहमस्मीति साक्षास्क्रियते, तस्या एव बुद्धेः. प्रसादश्चिरकालनित्यनिरन्तरसविक- ल्पकनिर्विकल्पकसमाध्यम्यासातिशयेन रजसो रजाकार्याणां च रागद्वेपलोभमोहदम्भदर्पहर्पविषादासूया- हंकरादीनां तमसश्च तम:कार्याणां संशयासंभावनाविपरीतभावनाजाडयालस्यप्रमादादीनां च सम्यग्भावप्रति- वन्धकानां नि:शेषनिवृत्त्या समुत्पन्नः शुद्धस्फटिकवणवद्वभासमानो यः स्वच्छत्वगुणः शुद्धसत्त्वाभिधान- स्तस्माज्जायते चालुपो दोपनिवृत्त्या पूर्णचन्द्रिकावगुद्धिवृत्तेः स्वयमेवाविर्भवतीत्यात्मबुद्धिप्रसादजमित्युच्यते ।' न तु विषयसुखवजायते, जन्यत्वे त्वनित्यत्वपरिच्छिन्नत्वसाविशयस्वादिदोपप्रसङ्गान्मुमुक्षूणामनाशास्यत्वो- पपत्तेश्च । ततश्चक्षुषो नैर्मल्यापत्त्या रूपवद्रुद्धिवृत्तेः शुद्धसत्त्वापरयाऽप्रयत्नेन स्वयमेव विषयीभवति, नित्य- सिद्धत्वात्स्वरूपसुखस्य । ननु ब्रह्मविदां ब्राझं सुखमतिछंशसाध्य, विपथसुखं त्वतिसुलभं सुखार्थिभिस्तदेवानुमो- तव्यमिति चेद्भवानत्र प्रष्टव्यः । किं वैपयिकं सुखं विपयधर्मो वा करणधर्मो वा कर्मधर्मो वा भोक्तृधर्मों वा देशधर्मो वा कालधर्मो वाऽप्यज्ञानधर्मो वा ज्ञानधर्मो वात्मधर्मो वा स्वयं व्यापाराभावस्वरूप वा दुःखा- भावस्वरूपं वेति ? नायः, विपयसन्निधाने पूर्वक्षण इवोत्तरक्षणे सुखादर्शनाद्वयजकाभावात् व्यङ्गया- नुदय इति चैन्न, दूरदृष्टत्वे पूर्वक्षणेऽपि सुखानुदयप्रसङ्गात्ताइगिष्टविपयासिद्धेश्च । न द्वितीयः, विषयव्य- वधाने सुखादर्शनात् । नापि तृतीयः, सुखस्य पुण्यकर्मकार्यत्वेन तद्धमत्वानुपपत्तेस्तथात्वे धन्युत्पत्त्युत्तरक्षण एव सुखोदयप्रसङ्गात् । न चतुर्थः, भोक्तुः सर्वदा विक्षेपदर्शनात् । नापि पञ्चमः, सुखार्थिनः स्वर्गगमना- भावप्रसङ्गास्वर्गस्थानामपि दुःखश्रवणाच । नापि पठः, शीतातपवत्सार्वत्रिकत्वप्रसङ्गात् । नाप्यज्ञाः यज्ञानधर्मः, वस्तुनो भोग्यत्वासाने सुसादर्शनात् । नापि ज्ञानधर्मः, वस्तुरम्यत्वज्ञानेऽपि विरक्तस्य सुखानुदयात् । सुखं फरणव्यापाराभावस्वरूपं न भवति स्वप्ने सुखादर्शनार करणव्यापारवति भोजनादौ सुखदर्शनाच्च । नापि च दुःखाभावस्वरूपं, दुःखाभाववति मृत्पिण्डेसुखादर्शनात् । अचेतनत्वात्तत्र वदभिव्यक्त्यभाव इति चेन्न, दुःपा. भाववत्यांबुद्धपस्फूर्ती मुखादर्शनाद्यदुक्तं मूढनमेन दुखाभावःसुखमिति बन्न सुखत्य भावत्वेनाभावरूपत्वानुप- पचे नैवैतेने पशुकल्पेन सौपुतिकसुखमनुभूतं निर्विषयमत एपोकं दुखाभावः सुखमिति । तर्हि सुखमात्मन एव धर्म इति चेन, सुसमात्मनः स्वरूपं न तु धर्मः, धर्मत्वे धर्मनाशादात्मनोऽपि नाशप्रसङ्गात् । ननु स्वरूपत्वेऽपि मुखस्य क्षणिकत्वात्स्वरूपभूतसुखनाशे स्वात्मनोऽपि नाश एवेवि चेन, "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः' इत्या. गनो नित्यत्वश्रवणात्तस्वरूपभूतसुखस्यापि नित्यत्वसिद्धेः । ननु सुखं यथात्मन: स्वरूपं तथा दुःखम. प्यात्मन एच स्वरूपं भवतु सुस्यहं दुःश्यहमिति सुपदुःसप्रत्यययोरेकविषयत्वदर्शनादिति चेन्न, मृगोऽस्मी. विवत् दुःल्यहमिविप्रत्ययस्य संमोहकार्यत्वेन मिध्यात्योपपचेः। न हि पुत्रे मृते मृतोऽहमस्मीति वक्तुमरणमस्ति गोदादारोर्पणं विना, नहुःख्यहमिति दुःसित्वप्रत्ययस्यात्मनि मोहादारोपितत्वान्निध्यात्वमेव । दुःखस्या. मन: स्वरूपस्ये मुपुतावुपलभ्येत सुसमहमस्वाप्समिवि सुखोपलब्धिवत्तदुपलम्भाभावात् दुःखमात्मनः स्व.
आत्मा [अ० १८ लो० ३८] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेवा १२६६ १२३५ रूपं न भवति । सुसमेवात्मस्वरूपं सुखस्यैवात्मस्वरूपत्वे सुसमहमत्वाप्समिति प्रत्यक्षं प्रमाणम् । आत्मा सुखस्वरूपः सुपुप्तौ सुखमात्रोपलम्भात्समाधिवदित्यनुमानं च । सचिदानन्दमात्रमेकरसं बुद्धसुखस्वरूप "सद्धनोऽयं चिद्धन आनन्दधनः" इति श्रुतिश्च । मुमुनुप्रयत्स्यन्यथानुपपतिप्रसूतार्थापत्तिरपि च प्रमाणम् । तहि दुःखं कस्य स्वरूपमिति चेदनात्मन एव स्वरूपमिति ब्रूमः, अनृतंजडदुःखात्मकत्वमनात्मनः सर्वप्रसिद्धः । अतोऽन्यदातमिति नाल्पे सुखमस्तीति । तदेतजर्ड मोहात्मकम् " अन्तवत्तुच्छम् " इत्यादिश्रु- तिप्रसिद्धेश्च । ननु सुसस्यात्मरूपत्वे सिद्ध विषयसुसमिति व्यपदेशः कथमिति चेदुच्यते । पुण्यकर्मवशात्पुरुषस्ये- टपदार्थसांनिध्ये सत्यन्तःकरणे सत्त्वम्प्रविभवति, वयानन्दस्वरूप आत्मा प्रतिविम्वति, प्रतिविम्बात्मानन्दस्फू. विरेव विपयसानिध्याद्विषयसुखमित्युच्यते । पुण्यतारतम्यात्सत्त्वतारतम्यं, सत्वतारतम्यात्प्रतिविम्वस्फूतेश्व तारतम्यं, वेन सुसस्यापि वरतमभावः । तत्र एव श्रूयते "एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति" इति । ततो विषयसुखमाभासिकं महान्तो ब्रह्मविदो नापेक्षन्ते पूर्णानन्दामृतरसपायिनः । नन्वात्मन आनन्दस्व- रूपत्वात्परिपूर्णत्वाच सदा सर्वत्र सर्वेपामयत्नतः सुखानुभूतिः स्वयमेव स्यादिति चेन्न, वृत्तिशुद्धिसापेक्षत्वादा- मस्वरूपोपलव्धेः। यद्राकाचन्द्रचन्द्रिकाया. परिपूर्णत्वेऽपि तद्दर्शनाहादश्चक्षु.सौष्ठवमपेक्षते, तद्वदात्मानन्दा- नुभूतिरपि बुद्धिप्रसादमपेक्षते । तत एवोच्यते भगवताप्यात्मवुद्धिप्रसादजमिति । एवमात्मवुद्धिप्रसादजं नित्यं निरन्तरं निरपेक्ष निरतिशयं निरवधिक यदा सुसं वत्सात्त्विकं सत्याविर्भूत्या आर्विभूतत्वात्सात्त्विमिति महर्पयो वदन्तीत्यर्थः ॥ ३७ ॥ श्री० टी०-कीदृशं तत्-यत्तेदिति । यत्तकिमपि अग्रे प्रथमं विषमिव मन,संयमाधीनत्या दुःखावह- मिष भवति, परिणामे त्वमृतसदृशम् । आत्मविपया बुद्धिरामबुद्धिस्तस्याः प्रसादेन रजस्तमोमलत्यागेन स्वच्छतयाऽवस्थानं ततो जातं यत्सुखं तत्सात्विकं प्रोक्तं योगिभिः ॥ ३७ ॥ स० टी०-तदेव विवृणोतीशः सुखं ब्रह्मप्रसादजम् ॥ ज्ञानवैराग्यसध्यानसमाभ्यारम्भ एव यत् ॥१॥ अत्यन्तायाससाध्यत्वाद्विपत्र पकद्भवेत् ॥ ज्ञानादिपरिपाके तु प्रविरतिशयास्पदम् ॥ २ ॥ निद्रालस्यादिरा- हित्याहुद्धिर्या स्वच्छता गता ॥ तस्या आत्मावलम्विन्याः प्रसादाजासमान्तरम् ॥ ३ ॥ तत्समाधिसुखं प्रोक्तं सात्त्विक योगवित्तमः ॥ ४ ॥ ३७॥ भा०टी०-सुखस्य त्रविश्यं विभजन्नादौ सात्त्विकं सुखमाह-यत्तदिति । यसुखमये पूर्व प्रथमस- निपाते ज्ञानवैराग्यध्यानसमाध्यारम्भेऽत्यन्तायासपूर्वकरवाद्विपमिव दु.खांरमकमिव भवति परिणाम ज्ञानादिपरिपाकेऽमृतोपमं तत्सुखं सात्विक प्रोफै विद्वद्भिः कथितम् । आत्मनो बुद्धिरात्मबुद्धिरात्मबुद्धेः प्रसादो मर्मल्यं सकार्यरजस्वमोमलत्यागेन सलिलपत्स्वच्छत्याऽवस्थानं ततो जातमात्मबुद्धिप्रसादजम् , आत्मविपया आत्मालम्वना बुद्धिर्वा आत्मबुद्धिस्तत्प्रसादा प्रकर्षाद्वा जातम् ॥ ३७ ॥ प० टी०-तथा-यदिति । यो प्रारम्भे मनःमत्यावृत्तिकरणेन विपमिव दुःखमिव लगति, परिणाम त्वमृतोपर्म परमानन्दसदृशं भवति, यञ्चारमवुद्धिप्रसादजमात्मविषया व्यवसायामिका बुद्धिस्तया यः प्रसादः प्रसन्नता सतो आतं तत्सात्विकं सुखम् ॥ ३७॥ रा० टी०-यचदिति श्लोकश्च सात्त्विकसुखोकिपर. 1 यत्प्रसिद्धं सुखमने पूर्व विषमिव आंयासमा- ध्यत्वात् । परिणाम विपाके अमृतसदृशम् । आत्मबुद्धिप्रसादजम्-आत्मनो विष्णोः प्रसादानुग्रहाजातं बुद्धेः प्रसादाच । बुद्धेः प्रसादो नाम स्वतो विषयेष्वप्रवृत्तिः, वतो जातं च यत्तत्सुखं सात्त्विकमित्यर्थः ॥ ३७॥ विपयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् || ' परिणामे विपमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८॥ .
श्रीमद्भगवद्गीता
[अ० १८ लो० ३९]
त०टी०-नसं सुखमाह-विषयेन्द्रियेति । विपयाणामिन्द्रियाणां च संयोगायत्तलोकप्रसिद्ध
स्त्रीमसङ्गादिजन्यं सुखमग्रेऽनुभवकाले अमृतोपमममृततुल्यं भवति, मनइन्द्रियादिसंयमल्लेशाभावात् ।
परिणाम विपमिव इहामुत्रापि दुःखजनकत्वात्तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८॥
म०टी०-विपयेति । विषयाणामिन्द्रियाणा च संयोगाजातं, न त्वात्मबुद्धिप्रसादात् यत्तद्यदतिप्रसिद्धं
सक्चन्दनवनितासङ्गादिमुखमने प्रथमारम्भे मन:संयमादिक्केशाभावादमृतोपमम् , परिणाम त्वैहिकपारत्रिकदुः
सावहत्वाद्विपमिव-तत्सुखं राजसं स्मृतम् ।। ३८ ॥
शं० टी०-राजसं सुसमाह-विपयेति । विषयेन्द्रियसंयोगाद्विपयाणामिन्द्रियाणा च संसर्गाजायमानं
यद्वैपयिफ सुसमग्रे पूर्व स्वानुभूविकाले स्वानुपेविनः पुरुपस्यामृतोपमं सुधाकस्सं सद्भूयो भूयो विवर्धत
इति न्यायेन स्वविषयकाण्येवाविद्याकामकर्माणि प्रवर्धयति, परिणामे स्वकार्यफलकाले स्वानुपक्तं पुरुष
विषमिव हन्ति 'स्वकार्येण योजयित्वा सकामभि यवे तत्र तत्र' इति न्यायेन नानायोनिपु पातयित्वा
मुहुर्मुहुर्मत्यु गमयतीत्यर्थः । यदेवलक्षणं वैषयिकं सुसं तद्राजसं रजोगुणेन कामेन संभावितत्वाद्राजसमिति
मुनिभिः स्मृतमुक्तमित्यर्थः ॥ ३८ ॥
श्री० टी०-राजसं सुखमाह-विपयेन्द्रियेति । विषयाणामिन्द्रियाणा च संयोगाद्यत्तत्प्रसिद्धं वीसङ्गा-
दिसुखममृतमुपमा यस्य तादृशं भवत्यप्रे प्रथम, परिणामे तु विषतुल्यं, इहामुत्र च दु:खहेतुत्वात् ।
उत्सुसं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥
स० टी०-विषयेन्द्रियसंवन्धायदत्यन्तप्रसिद्धिमत् ।। सक्चन्दनस्त्रीसङ्गादिसुखं स्यात्प्रथमे क्षणे ॥१॥
धीसंयमादिसंशाभावादमृतवन्नणाम् ।। परिणामे तु दुःखानामाकरस्पाद्विपोपमम् ॥ २ ॥ इहामुत्रातिसं-
स्कारजननद्वारतः सदा ॥ संमृतिश्रमदं तच्च सुखं राजसमीरितम् ॥ ३॥ ३८॥
भा० टी०-सात्त्विकं सुखमुदाहृत्य राजसं वदयुत्पादयति-विपयेति । यत्सुसं विषयेन्द्रियसंयोगात
जायतेऽप्रे प्रथमे क्षणेऽमृतोपमममृतसदृश, परिणामे तदुपभोगान्ते विपमिव बलवीर्यरसप्रज्ञादिहानिहेतुत्वा-
दधर्मतत्रनितनरकादिहेतुत्वाच विपतुल्यं-उत्सुसं हेयं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ।।
प०टी०-राजसमाह-विषयेति । यद्विपयेन्द्रियसंयोगादो प्रारम्भेऽमृतोपस, परिणामे विरसस्वाद्वि-
पोपमं मत्स्यप्रस्वडिशामिपमित्र वत्सुसं राजसम् ॥ ३८ ॥
रा०टी०-विपयेति । विपयेन्द्रियसंयोगाच्छन्दादिविषयाणां श्रोत्रादीन्द्रियाणा संयोगेनोत्सनविपयानु-
भवेन जायमानं यचत्प्रसिद्धं सुसमप्रे प्रथमममृतसदृशं विपाके विपमिव दुःसावहत्वात् । वस्सुसं
राजसमित्यर्थः ।। ३८ ॥
यदने चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ॥
निद्रालस्यप्रमादोत्यं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥
त० टी०-तामसं मुखमाह-पदम इति । यत्सुखमग्रेऽनुभवकाले अनुबन्धे परिणामे चात्मनो
मोहनं सरस्तुयाधात्म्पज्ञानभ्रंगकं भवति । तदेव दर्शयति-निद्रालस्यममादोत्थम् । निद्रालस्ये
प्रसिद, प्रमादः कर्तव्यानवधानं, तेभ्य उचिष्ठति उद्भवति तथाभूतं तचामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ।।
म०टी०-यदिति । अप्रे प्रयमारम्भे च अनुबन्धे परिणामे च यत्सुरमात्मनो मोहकरम् । निद्रालाये
प्रसिरे, प्रमाः पर्वम्याविधानमन्तरेण मनोराम्यमान् । येभ्य पवोचित्रवि न तु सारियमिप युति-
साज, न पा रानमिव विषयन्दूिपसंयोग, उनिहाटस्यप्रमादाय वामस मुसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥
] [अ० १८०४० तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२३७ शं० टी०-तामसं सुसमाइ-यदन इति । अग्रे स्वोत्पत्तिकाले चानुवन्धे च परिणामकालेऽवसाने- ऽप्यात्मनः सदसद्विवेकहेतोवुद्धेमोहनं मोहकारकं विवेकशक्तितिरोधायक, निद्रालस्यप्रमादोत्यं-निद्रा प्रसिद्धा, आलस्यं बुद्धिजाड्यं, प्रमादो बुद्धिपारवश्यमेतेभ्यः समुत्पन्नं यत्सुसं वत्तामसं तमोगुणनिष्पन्नत्वात्तासस. मिति भपिभिरुदाहृतमित्यर्थः ॥ ३९ ॥ श्री. टी-तामसं सुखमाह-यदिति । अप्रे प्रथमक्षणे अनुबन्धे च पश्चापि यत्सुसमात्मनो मोह- करम् । तदेवाह-निद्रा चालस्यं च प्रमादश्च कर्तव्याविधानराहित्येन मनोराज्यम्-एतेभ्य उत्तिष्ठति यत्सुखं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ स. टी-आद्यक्ष तथा पश्चात्परिणामेऽपि यत्सुसम् || अविवेककर स्वस्य निद्रादिभ्यः समुत्थि- तम् ॥ १॥ अत्यन्तानहेतुत्वात्तत्सुसं तामसं स्मृवम् ॥ २ ॥ ३९ ॥ भा० टी०-राजसं सुखमुक्त्वा तामसं तदुदाहरति-यदिति । यत्सुखममे च प्रथमे क्षणेऽनुवन्धे चाव- सानोत्तरकाले; चाभ्यां प्रथमक्षणादुत्तरावस्थासु अनुबन्धात्पूर्वावस्थासु चात्मनो मोहनं मोहकर निद्रालस्य- प्रमादेभ्यः समुत्तिष्ठवीति निद्रालस्यप्रमादोत्यं तत्सुसं हेयं तामसमुदाहृतम् ॥ ३९ ॥ ५० टी०-वामसमाह-यदय इति । अमे प्रथमे क्षणे अनुबध्यतेऽनेनेत्यतुबन्धः परिणामस्तस्मिन्नात्मनो. ऽन्तःकरणस्य मोहनं व्यामोहकम् । तस्यावस्थानियममाह-निद्रा, आलस्य, प्रमादोऽनवधानता । निद्रायां सुपुतिसुखं स्वामविषयभोगसुखं बालस्येऽङ्गविमर्दोद्भवं प्रमाद उन्मत्तावस्था-तत्रोत्पनं यत्सुसं तत्तामसमु- दाहृतम् , उदाहरणत्वेन निरूपितम् ॥ ३९ ॥ रा० टी०-पदिति । यत्सुसमग्रे चालुबन्धे च पश्चात् । विपाककाल इति यावत् । आत्मनः स्वस्य मोहन मोहकरं पारवश्यकृत् निद्रालस्यंप्रमादेरुत्थिवं उत्पन्नम् । भालस्यं शरीरमान्यम् । प्रमादः अधर्मे बुद्धिः । वत्सुखं वामसमित्यर्थः ।। ३९ ।। न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः॥ सत्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यानिभिर्गुणैः ॥ ४०॥ त० टी०-इदानीमुक्तं धैगुण्यप्रकरणमुपसंहरन्सर्वस्य माकृतस्य त्रैविध्यं संक्षिप्य दर्शयति- न तदस्तीति । प्रकृतिर्भगवतो मायाख्या शक्तिस्तत्संभवैरेभिः सत्त्वादिभिस्त्रिाभिर्गुणैर्मुक्त होने यत्सत्वं प्राणिजातं स्यात् तत् पृथिन्यां मनुष्यादिषु पुनर्दिवि स्वर्गे देवेषु वाऽन्येपु सुतलादिष्वपि नास्तीत्यर्थः ॥ ४०॥ म०टी०-इदानीमनुक्तमपि संगृहन् प्रकरणार्थमुपसंहरति • भगवान् नेति । सत्त्वरजस्तमसां, साम्या- ऽवस्था प्रकृतिस्ततो जाव॑पम्यावस्था प्राप्तः प्रकृतिजः, न तु साक्षाद्गुणाना प्रकृविजत्वमस्ति नद्रूपत्वात् । तस्माद्वेपन्यावस्थैव तदुत्पत्तिरुपचारात । अथवा प्रकृविर्माया तत्प्रभवैस्तत्कल्पितैः प्रकृति भिषिभिर्गुणैनन्य- नहेतुभिः सत्त्वादिभिर्मुक्तं हीनं सत्वं प्राणिजातमप्राणि वा यत् स्यात् तत्पुनः पृथिव्यां मनुष्यादिषु' दिवि देषेषु वा नास्ति, कापि गुणत्रयरहित मनात्मवस्तु नास्तीत्यर्थः ॥ १० ॥ शं. दीन-क्रियाकारकफलानां विभज्य निगुणात्मकत्वं प्रतिपाद्याविभागेत सबै रिगुणात्मकमेवेत्याह- न तदिति । पृथिव्या भूलोके वाशब्दात्पाताले दिवि स्वर्गे वा देवेषु ब्रह्मादिषु वा । पुनःशब्दो वार्थः। प्रकृ. तिजैः प्रकृतिसमुत्पन्नैरेभिरुचलक्षणविविधैर्गुणैः सत्त्वादिभिर्मुक्तं परित्यतामस्थं यस्याबद्भवेत्तत्सत्वं द्रव्यं प्राणि वा निलोक्या नास्ति त्रिगुणात्मकमायाकार्यत्वाजगत्सर्वमपि त्रिगुण रमकमेवेत्यर्थः ॥ १० ॥ १५६
1
।
श्रीमद्भगवद्गीता
[अ० १८ श्लो०४०
श्री० टी०-अनुक्तमपि संगृहन्प्रकणार्थमुपसंहरति-न तदस्तीति । एभिः प्रकृतिसंभवैः सत्त्वादिभिखि-
मिर्गुणैर्मुक्त हीनं सत्त्वं प्राणिजातमन्यद्वा यत्स्यात्तत्पृथिव्यां मनुष्यलोकादिपु दिवि देवेषु च कापि
नास्तीत्यर्थः ॥१०॥
स० टी०-अनुक्तमपि संगृहन्नथ प्रकृतमीश्वरः ॥ उपसंहरतीदानी गुणातीतो जगत्पतिः ॥ १॥
प्रकृतिर्येश्वरी माया तयैव परिकल्पितैः । सत्त्वादिभिर्गुणैरेभिखिभिवन्धनहेतुभिः ॥ २ ॥ हीनं सत्त्वं
प्राणिजातं स्यादप्राण्यथ वेह यत् ॥ मनुष्यादिषु भूमौ वा देवेषु त्रिदिवेऽथ वा ॥ ३ ॥ पाताले वाथ
कुत्रापि नास्त्येवेति विनिश्चितम् ।। गुणत्रयविहीनं हि नास्त्यनात्ममय जगत् ॥ ४ ॥ यतो मायाकृत
विश्वं त्रिगुणात्मकमेव हि ॥ ५॥१०॥
भा० टी०-क्रियाकारकफलानां प्रत्येक सात्त्विकादिभेदेन त्रैविध्यमुक्त्वा किंचिदेभिनिभिर्गुणैर्मुक्तमपि
भविष्यतीत्याकाडापनुत्तयेऽनुक्तमपि संगृहन् प्रकरणार्थमुपसंहरति-नेति । न तदस्ति पृथिव्यां वा मनु.
प्यादि सत्वं प्राणिजातमन्यद्वाऽप्राणिजातं स्थावरादि दिवि देवेषु वा पुनः प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः एभि.
खिभिर्गुणैः सत्त्वादिभिः मुक्तं परित्यक्तं यत्स्यात्तन्नास्तीत्यर्थः । अदिवीति परलोकवसादृश्यादब्राह्मण
इतिवत् । पातालादिपरमितीवरे । आचार्यस्तु तृतीयवाशब्दाभावात्पृथिवीविवरात्मकस्य पातालस्यापि पृथि-
वीशब्देन संग्रहसंभवात् प्रयोजनशून्यक्लिष्टकल्पनाया अयुक्तत्वाचैवं न व्याख्यातम् । तथाच क्रियाकारक-
फललक्षणः सर्वोऽपि संसारः सत्त्वरजस्तमोगुणात्मकोऽविद्यापरिकल्पितः समूलोऽनर्थः आत्मज्ञानेनाविद्यानि.
वृत्या निवर्तितव्य इति भावः ॥ १० ॥
५० टी०-अथानुक्तमपि संगृह्न प्रकरणार्थमुपसंहरति-त तदस्तीति । यदेभिः सत्त्वादिभित्रि-
भिर्गुणमुक्तं सत्त्वं प्राणिजातं तत्तादृशं पृथिव्यां मनुष्येषु नास्ति, दिवि देवेष्वपि नास्ति । यावच्छरीरजात
तावत्रिगुणात्मकमेवास्तीत्यर्थः ।। ४० ॥
रा० टी०-सर्पजीवानां गुणत्रयबद्धत्वेन त्रैविध्यमाह-न तदस्तीति । यत्सत्त्वं जीवजातं प्रकृतिजैरे-
भित्रिभिः सत्वादिगुणैर्मुक्तं स्यात् , तत्सत्त्वं पृथिव्यां दिवि देवेषु वा । पुनःशब्दः समुच्चये । नास्ति ।
मुक्तव्यावृत्त्यर्थं पृथिव्यामित्याद्युक्तिः । तत्रायं विवेकः सात्त्विकराजसतामसभेदेन जीवविविधाः । सात्त्विका-
दयोऽपि प्रत्येकं विविधाः । पितृगन्धर्वपूर्वकाः सात्त्विकतामसा: । मुनयः सात्विकराजसाः । देवाः सात्विक-
सात्विकाः । सात्विकसात्त्विकेष्वपि वृहस्पत्यादयः सात्विकसात्त्विकतामसाः।इन्द्रः सात्त्विकसात्विकराजसः।
ब्रह्मादिरुद्रावसानाः सात्त्विकसात्विकसात्त्विका: । वेष्वपि रुद्रः सात्त्विकसात्त्विकसात्त्विकतामसः । ब्रह्मा-
णीभारत्या वाहनाजस्यौ । प्रभवायू तु सात्त्विकसात्त्विकसात्विकसात्त्विकावेवेति । मध्यमोत्तमनरा
राजसा वेऽपि प्रत्येकं त्रिविधाः । तेषु विप्रादिपुल्कसान्ताः ये भागवता: ते राजससात्त्विकाः।
राजससात्त्विकेवदि विप्रा राजससात्त्विकसात्त्विकाः । क्षत्रियास्तु स्वल्परजोयुक्ततया राजसराज.
ससात्त्विकाः । वैश्यास्तु समसत्वरजोयुक्ततया राजसराजससात्त्विकाः। शुद्रास्तु तमसोऽल्पसत्त्वेन रजोधि-
केन युक्तवया तामसराजससायिका: । राजससात्विकसात्त्विकविप्रेष्वपि ये शुद्धसत्त्वात्मकास्ते परमहंसश-
दिताः शिवायज्ञोपवीतहीनाः एकदण्डिनः । किंचिद्जोयुक्तसत्त्ववन्तो हंसशब्दिताः यज्ञोपवीतवन्तः
एकदण्डिनः शिसाहीनाः। ततोऽधिकरजोयुक्तसत्त्ववन्तः निदण्डिनः । शिखायज्ञोपवीतवन्तो नामकरानि-
चराः • पदकसतमाः । ततोऽप्यधिकरजोयुक्तसत्त्ववन्तस्विदण्डिनः शिसायज्ञोपवीतवन्तो यावजी
पुरवाशनाः कुटीचमाः । सामसा अपि सात्त्विकादिभेदेन विविधाः । तत्र नराधमाः सात्विकतामसाः ।
देत्यभृत्या राजसतामसामहादेत्यास्तामसवामसा इति ॥ १० ॥
[अ०१८ ० ४१] तत्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता ब्राह्मणक्षत्रियविशां शुदाणां च परंतप!॥ कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणः ॥ ११ ॥ तटी-नदेवं श्रेयस्कामानां श्रेयसे ज्ञानकर्मकादीनां साविकोपादानायतरयोः परिहाराय साचिकादिविवेकज्ञापनपूर्वकं त्रिलोकवर्तिमाणिजातस्य बैगुण्यमेव मतिपादितमिदानीं सर्वस्य त्रिगु- णात्मकत्वे सति राजसतामसपारहारेण साविकज्ञानकर्मादिनिष्ठम्यापि अनित्यापायि सातिशयं स्वर्गा- विसंवन्धि सचन्दनारामविहारदिव्यविमानसोमपानाप्सरोविदारायेव फलं स्यान्न तु नित्यानपायिनि- रतिशयमुखरूपं मोक्षाख्यं फलं, तस्मात् कथं मोक्षो भवेदित्यपेक्षायां स्वस्ववर्णाश्रमाधिकारानुसारेण वेदविहितानि सात्त्विकानि कर्माण्येव परपुरुषाज्ञापालनबुद्धया फलकर्तृत्वाभावेनानुष्ठितानि तत्मसाद. जन्यज्ञानभक्तिद्वारेण भगवत्माप्तिलक्षणमोक्षफलकानि भवन्तीति प्रतिपादयितुं कर्माधिकारिणां ब्राह्म- णादीनां स्वभावानुगुणानि सत्त्वादिगुणभिन्नानि कर्माणि वृत्तिभिः सह विवक्तुं मतिजानीते-ब्राह्म- णेति । ब्राह्मणक्षत्रियविशामिति त्रयाणां समासकरणं द्विजत्वेन वेदाध्ययनयज्ञायधिकारज्ञापनार्थम् । शूदाणां चेति समासात्पृथकरणमेकनातितया वेदाध्ययनाघधिकारवाहिभूतत्वज्ञापनार्थम् । चेदाध्ययन स्योपनयनसंस्कारतन्त्रत्वाव "तं होपनिन्ये अधीहि भगव इति होपससाद" इति श्रुतेः । शूद्रस्य तु "न शुढे पातकं किंचिन्न च संस्कारमर्हति । शूद्रचतुर्थो वर्ण एकनातिः" इति तनिषेधात् । साक्षाद्वदाध्यननिषेधोऽपि “पा ह वा एतच्छमशानं यच्छूद्रस्तस्मान्छूद्रस्य समीपे नाध्येतव्यम् । अथास्य वेदमुपशृण्वतस्त्रपुजतुभ्यां श्रोत्रपूरणम्, उदाहरणे जिहाछेदः, धारणे शरीरभेदः" इति श्रुतिस्मृतिभ्यां शूद्रस्य वेदश्रवणनिषेधादध्ययननिषेधः सुतरां सिद्धः, अध्ययनस्य श्रवणपूर्वकत्वात् । हे परन्तप ब्राह्मणादीनां कर्माणि प्रकण विभक्तानि इतरेतरविभागेन स्थितानि । के स्वभावप्र- भवर्गुणैः । तथा हि बामणस्य स्वभावपभवो रजस्तमोऽमिभवेनोद्रिक्तः सत्त्वगुणः, क्षत्रियस्य स्वभाव- प्रभवस्तमासत्वाभिभवनोद्रिक्तो रजोगुणः, वैश्यस्य स्वभावप्रभवस्तमउपसर्जन उद्विक्तो रजोगुणः, शूद्रस्य स्वभावप्रभवस्तु रजउपसर्जन उद्विक्तस्तमोगुणः । एवमेतैः स्वभावप्रभवैर्गुणैश्वतुणी वर्णानां प्रविभक्तानि कर्माणि शास्त्रेषु प्रतिपादितानि मया वश्यमाणानि त्वमवधारयेत्यर्थः ॥ ४१ ॥ म०टी०-तदेवं सत्त्वरजस्तमोगुणात्मक क्रियाकारकफललक्षणः सर्वः संसारो मिथ्याज्ञानकल्पि- तोऽनर्थश्चतुर्दशाध्यायोक्त उपसंहृतः । पञ्चदशे च वृक्षरूपफकल्पनया तमुक्त्वा 'अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसशस्त्रेण दृढेन छित्वा । ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः । इत्यसङ्गशस्त्रेण विषयवैराग्येण तस्य छेदनं कृत्वा परमात्माऽन्वेष्टव्य इत्युक्तम् । वनं सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्ये त्रिगुणात्म- कस्य संसारवृक्षस्य कथं छेदोऽसङ्गशस्त्रस्यैवानुपपत्तेरित्याशङ्कायर्या स्वस्त्राधिकारविहितैर्वर्णाश्रमधमैः परि- तोष्यमाणात् परमेश्वरादसङ्गशस्त्रलाभ इति वदितुमेतावानेव सर्ववेदार्थः परमपुरुषार्थमिच्छनिरनुप्ठेय इवि च गीताशास्त्रार्थ उपसंहर्तव्य इत्येवमर्थमुत्तरं प्रकरणमारम्यते । क्त्रेदं, सूमम्-ब्राह्मणेति । त्रयाणा समा. सकरण द्विजत्वेन वेदाध्ययनादितुल्यधर्मस्वकथनार्थम् । शूद्राणामिति पृथकारणमेकजातित्वेन वेदानधि-' कारित्वज्ञापनार्थम् । तथा च वसिष्ठः- चत्वारो वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां त्रयो वर्णा द्विजातयो प्राझणक्षत्रियवैश्यानेपाम्----- मातुरप्रेऽधिजननं द्वितीयं मौजिनन्यने । अवास्य माता सावित्री पिता स्वाचार्य उच्यते । इति । तथा प्रतिविशिष्टं चातुर्वर्ण्य स्थानविशेषाच-" माह्मणोऽस्य मुखमासीवाहू राजन्यः कृतः । अरू तदस्य यद्वैश्यः पद्यां शूद्रो अजायत । इत्यपि निगमो भवति । - . - १२४० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ४१] गायच्या ब्राह्मणमसृजत, त्रिष्टुभा राजन्यं, जगत्या वैश्यं, न केनचिच्छन्दसा शूद्रमित्यसंस्कारो विज्ञा- यते इति । 'शूद्रश्चतुथों वर्ण एकजातिः' इति च गौतमः । हे परन्तप शत्रुतापन तेषां चतुर्णामपि वर्णानां कर्माणि प्रकण विभक्तानि इतरेतरविभागेन व्यवस्थिवानि । कैः ? स्वभावप्रभवैर्गुणे:, ब्राह्मण्या- दिस्वभावस्य प्रभवैहेतुभूतैर्गुणे सत्त्वादिभिः । तथाहि ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुण एव प्रभवः प्रशान्तत्वात् । क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रज: ईश्वरस्वभावत्वात् । वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रज: ईहास्वभावत्वात् । शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमः मुढस्वभावत्वात् । अथवा मायाख्या प्रकृतिः स्वभावः तत उपादानात् प्रभवो येषां तैः । प्राम्भवीयः संस्कारो वर्तमाने भवे स्वफलाभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः स्वभावः स निमिचत्वेन प्रभवो येषामिति वा । शास्त्रस्यापि पुरुपस्वभावसापेक्षत्वाच्छास्त्रेण प्रविभक्तान्यपि गुणैः प्रविभक्तानीत्यु- च्यन्ते । आख्यातानामर्थ बोधयतामधिकारिशक्तिः सहकारिणी' इति न्यायात् । तथा हि गौतमः-'द्विजा- तीनामध्ययनमिज्यादानं, ब्रह्मणस्याविका: प्रवचनयाजनप्रतिग्रहाः । पूर्वेपु नियमस्तु । राज्ञोऽधिकं रक्षणं सर्व- भूतानांन्यायदण्डत्वं, वैश्यत्याधिक कृपिवणिक्पाशुपाल्यं कुसीदं च। शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजाविस्तस्यापि सत्य- मक्रोधः शौचमाचमनार्थे पाणिपादप्रक्षालनमेवैके श्राद्धकर्म भृत्यभरणं स्वदारवृत्तिः परिचर्योत्तरेपाम्।। इति । अत्र साधारणा असाधारणाश्च धर्मा उक्ताः । पूर्वेपु अध्ययनेज्यादानेपु नियमः अवश्यकर्तव्यत्वं नतु प्रव- चनयाजनप्रतिग्रहेषु वृत्त्यर्थत्वादित्यर्थः । वणिक वाणिज्य, कुसीदं वृद्धथै धनप्रयोगः । उत्तरेषामिति श्रेष्ठानां द्विजातीनामित्यर्थः । वसिष्ठोऽपि 'षट्कर्माणि ग्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यज्ञो याजनं दानं प्रति.. प्रहन्धेति । त्रीणि राजन्यस्याध्ययनं यज्ञो दानं च शस्त्रेण च प्रजापालनं स्वधर्मस्वेन जीवेत् । एतान्येव श्रीणि वैश्यस्य कृपिवणिकपाशुपाल्यं कुसीदं च । वेषां परिचर्या शूद्रस्य इति । आपस्तम्योऽपि-'चत्वारो वर्णा याक्षणक्षभियवैश्यशूद्रास्तेषां पूर्वः पूर्वो जन्मत: श्रेयान् । स्वकर्म प्राह्मणस्याध्ययनमध्यापनं यज्ञो याजनं दानं प्रतिग्रहणं दायाद्यं शिलोब्छाद्यन्यच्चापरिगृहीतम् । एतान्येव क्षत्रियस्याध्यापनयाजनप्रतिग्रहणानीति परिदाय युद्धदण्डाधिकानि।क्षत्रियवत् वैश्यस्य दण्डयुद्धवर्जे कृषिगौरक्ष्यवाणिज्याधिकम् । परिचर्या शूद्रस्ये- तरेषां वर्णानाम्' इति । मनुरपि-'अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिप्रहं चैव ब्राह्मणानाम- फल्पयत् ।। प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । विपयेवप्रसक्तिं च क्षत्रियस्य समादिशत् ।। पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । पणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेपामेव वर्णानां शुश्रूपामनसूयया' इति । एवं चतुर्णामपि वर्णानां गुणभेदेन फर्माणि प्रविभक्तानि ॥ ११ ॥ शं० टी०-एवं सर्वस्यापि जगतो गुणत्रयात्मकत्वे सिद्धे गुणत्रयातिकमणं कृतवत एव मुकिरिवि गुणानत्येतुमिच्छोर्मुमुक्षोस्तदतिक्रमसिद्धेः परराकारणं ज्ञानं तत्सिद्वेः कारणं सत्त्वशुद्धिस्तत्कारणं तु कर्मैव सदेवावश्यं कर्तव्यमिति वैदिकानां कर्मणां सर्वेषां कर्तव्यतायां प्राप्तायां ब्राह्मणादीनां मुमुक्षुणां येषां येषां सत्वगुणानुरूपेण यानि यानि कर्माणि विभक्कानि भवन्ति वैरतस्तानि तान्येव कर्तव्यानि न वितराणीति पियमं दर्शयति ब्राह्मणेति । प्राह्मणाश्च क्षत्रियाध विशव नेपां ब्रामणक्षत्रियविशामित्यत्र जात्या विपमत्वेऽपि उपनयनाभ्ययनयजनादिकर्मभिराश्रमेण च समत्वाद्धर्गतः समानानां समासकरणम- विरुद्धम् । शूद्राणां चेति पृथकरणं जात्या धर्मेण क्रियया प विपमत्वान्न विरुद्धम् । एवं नेपां ब्राह्मणादीना शूद्राणां च नियमेन कर्तव्यानि कर्माणि स्वभावप्रभवैः स्वभावः प्रकृतिस्तत्प्रभवै गैः सत्त्वादिभिः प्रविभ- कानि प्रकर्षण विभकानि गुणवता गुणभेदेन कर्माण्यपि भिन्नानि गुणैरसंकीर्णत्वेन व्यवस्थापिचानि भवन्तीत्यर्थः 1 यद्वा स्वभावाभियः प्राह्मणसभावः केवलसत्त्वगुणप्रभवः, क्षत्रियस्वभायः सत्त्वमिश्रितरजः ।
प्रभवः, [अ० १८ नो. ४१] वत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२४१ वैश्यस्वभावः रजोमिश्रिततमःप्रभवः, शूद्रस्वभावः केवलवम प्रभवः, एवं सत्त्वादिगुणभेदेन वृत्त- गुणवतां ब्राह्मणादीना शूद्राणा च कर्वव्यानि कर्माण्यपि भिद्यन्त इत्यर्थः । यद्वा " ब्राह्मणोऽस्य मुखमा- सीत् " इतिश्रुत्युक्तप्रकारेण चत्वारो वर्णाः ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रास्तेषां पूर्वः पूर्वी जन्मतः श्रेयानितिन्या- यन च भव एव मावो जननं स्वः स्वकीयो भावः स्वभावः । यद्वा स्वेषा भावः स्वभाव. मुखवाहादिभ्यो अननं प्रभवः कारणं येपा तैः स्वभावप्रभवः स्वजन्मनिमित्तकैर्गुणैरुत्तमत्वमध्यमत्वनिकृष्टत्वाविनिकृष्टत्वैरु- पलक्षिवाना ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशुदाणा नियमेन कर्तव्यानि यानि कर्माणि तानि जन्मत उत्कृष्टत्वादिभेदेन विभकानि शास्त्रेण विभज्य विहितानीत्यर्थः ॥ ११॥ श्री० टी०-ननु च यद्येवं सर्वमपि क्रियाकारकफलादिकं प्राणिजातं च त्रिगुणात्मकमेव कथं तर्हि अस्य मोक्ष इत्यपेक्षाया वस्त्राधिकारविहितैः कर्मभिः परमेश्वराराधनात्तत्प्रसादलब्धज्ञानेनेत्येवं सर्वगी- तार्थसारं संगृह्य प्रदर्शयितुं प्रकणान्तरमारभवे-ब्राह्मणेत्यादि यावद्ध्यायसमाप्ति । हे परंप शत्रुता- पन ! ब्राहाणानां क्षत्रियाणां विशा च शूद्राणा च कर्माणि प्रविभक्कानि प्रकर्षेण विभागतो विहितानि । शूद्राणा समासात्पृथक्करणं द्विजत्वाभावेन वैलक्षण्यात् । विभागोपलक्षणमाह-स्वभावः सात्त्विकादि: प्रभ- वति प्रादुर्भवति येभ्यस्तै गैरुपलक्षणभूतैः । यद्वा स्वमाव: पूर्वजन्मसंस्कारस्तस्मात्प्रादुर्भूरित्यर्थः । तत्र सत्वप्रधाना ब्राह्मणाः, सत्त्वोपसर्जनरज.प्रधानाः क्षत्रिया:, तमउपसर्जनरज.प्रधाना वैश्याः, रजउपस- जनतम.प्रधानाः शूद्राः ॥ ११ ॥ स०टी०-तदेवं सर्वसंसारो मिथ्याज्ञानप्रकल्पितः ॥ गुणत्रयात्मकोऽनर्थः क्रियाकारकलक्षण. ॥१॥ उक्तश्चतुर्दशाध्याय पुनस्तत्रोपसंहृतः ॥ तथा पञ्चदशे वृक्षरूपकेणापि वर्णित: ।। २ ॥ शितेनासशस्त्रेण भोगवैराग्यरूपिणा ॥ तस्य संछेदनं. छत्वाऽन्वेष्टव्यं पदमीरितम् ॥ ३ ॥ सर्वस्य त्रिगुणात्मत्वे संसा- राख्यतरोः कथम् ॥ छेदोऽप्यसङ्गशस्त्रेण संभवेत्रिगुणात्मनः ।। ४ ।। असशस्त्रं वैराग्यं तस्याप्यनुपप- तितः । एवं प्राप्ते हरिः प्राह साधनं श्रुतिसंमतम् ॥ ५ ॥ स्वस्वाधिकारविहितधर्वनिमोदिः ।। परि- वोष्यमाणादीशाद्वैराग्यप्राप्तिरलसा ॥६॥ ततो वेदान्तवाक्योत्यसम्यग्धीजन्ममात्रतः ॥ सकार्याज्ञान- मावाध्य कृतकृत्योऽभिजायते ॥ ७ ॥ एतावान्सर्ववेदार्थोऽप्यनुष्ठेयो मुमुक्षुभिः ॥ तथैव गीताशाखा उपसंहारमहति ॥ ८॥ इत्येवमर्थमारम्भसंदर्भस्योचरस्य च ॥ त्रयाणा हि द्विजत्वेन स्वाध्यायाध्ययना- दिना ॥ ९ ॥ तुल्यधर्मबोधार्थे समासकरणं कृतम् ॥ शूद्राणामेकजातित्वात्स्वाध्यायानाधिकारिता ॥१०॥ अस्तीति ज्ञापनार्थाय यत्पृथक्करणं कृतम् ॥ तेपा चतुणों वर्णाना परस्परविभागतः ॥ ११ ॥ व्यवस्थि- तानि कर्माणि स्वभावप्रभवेर्गुणैः । तत्र सत्त्वगुणो विमस्वभावस्यास्ति कारणम् ॥ १२ ॥ प्रशान्तत्वात थाभूपस्वभावस्य रजोगुणः ॥ सत्त्वोपसर्जनो यस्मादीश्वरत्वं नृपे भवेत् ॥ १३ ॥ तमो गाणुरजो पेश्य- स्वभावस्यास्ति कारणम् ॥ तस्यापीहास्वभावदाद्रजोमुख्यत्वमस्त्यतः ॥ १४ ॥ रजो गौणतमः शूद्रस्वमा- वस्यास्ति कारणम् ॥ तस्य मूढस्वभावत्वादित्येवं गुणनिर्णयः ॥ १५॥ मायाख्या प्रतिद्वा स्वभावः सर्वग, स्मृतः ॥ तत एवास्युपादानायेषा प्रभव इत्यपि ॥ ११ ॥ प्राम्भवीयोऽपि संस्कारो वर्तमानभने- ऽथ वा ॥ स्वफलाभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः प्रभवः स च ॥ १७ ॥ स्वभाव. कारणं येपा विभयनि या गुणैः ॥ आगमेनैव कर्माणि प्रविभक्तानि यद्यपि ।। १८ ।। तथाप्यस्त्येव शास्त्रस्य पेक्षता ॥ १९ ॥ ४॥ भा० टी०-एवं क्रियादिलक्षणस्य संसारस्य त्रिगुणात्मपत्वप्रतिपादकेन चतुर्दशसप्तदशाण्यायोकोऽर्थ उपसंहृतः । पञ्चदशे चोर्ध्वमूलमध.शाखमित्यादिनाऽविद्यापरिकल्पितं संसारं वृक्षरूपेणाभिधाय असङ्ग तत्स्वभावाद्य- . - १२४२ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ४२] शनेण दृढेन छित्त्वा । ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गतान निवर्वन्ति भूयः' इत्युक्तम् । पूर्वोत्तराध्याये- पु च स्वस्वाधिकारविहिदैर्वर्णाश्रमधर्मेनिष्कामैरुपासनासमुञ्चित्तराराधितात्परमेश्वरालब्ध्वाऽसङ्गशस्त्रः आसुर्या राक्षस्या च संपदा विनिर्मुक्तः दैव्या त्या संपन्नः प्रत्यगभिन्न प्राविचारतत्परः संसारवृक्षमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्वा ब्रह्मज्ञानेन विमुच्यत इत्युक्तम् । तमिमं सर्व गीताशास्त्रार्थमुपसंहर्तु, एवावानेव सों वेदस्मृत्यर्थः पुरुपार्थमिच्छनिरनुष्ठेय इति बोधनाय ब्राह्मणेत्यादिप्रकरणमारभते-ब्राह्मणेति । ब्राह्मणाश्च क्षत्रियाश्च विशम्य ब्राह्मणक्षत्रियविशः तेषामुपनयनसंस्कारवत्त्वे सवि वेदाधिकारित्वं सममिति ब्राह्मणादित्रयाणां समासकरणं शूद्राणामुपनयनवर्जितत्वे सति वेदानधिकारित्वमभिप्रेत्य पृथक् निर्दिशति । शूद्राणां च कर्माणि शमदमादीनि प्रविभक्तानि इतरेतरविभागेन व्यवस्थितानि । करित्यपेक्षायामाह-स्वभावप्रभवैर्गुणैः । ईश्वरस्य त्रिगुणात्मिका प्रकृतिः स्वभावः सः प्रभवः कारणं येपा तैर्गुणैः । यदा स्वभावस्य प्रभवास्तस्तथा च ब्राह्मण- स्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणम् , तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्वोपसर्जनं रजः प्रभवः, वैश्यस्वभावस्य तमउपसर्जनं रजः प्रभवः, शूद्रस्वभावस्य रजउपसर्जनं तमः प्रभवः-शान्यैश्वर्येहामूढस्वभावदर्शनाचतुर्णाम् । अथवा जन्मान्तरकृतसस्कारः प्राणिना वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेनाभिव्यक्तः स्वभावः सः प्रभवो येपा तैः प्रकृत्युदोधिवर्गुणैः स्वकार्यानुरूप्येण ब्राह्मणादीना शमादीनि कर्माणि प्रविभक्कानि । शास्त्रेणापि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षयेव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि, न तु गुणानपेक्षयेति शाखविभ- तान्यपि तानि गुणविभक्तान्युच्यन्ते । क्षत्रियस्वभावजं शत्रुतापनरूपं कर्म त्यक्तुमशक्यमङ्गीकर्तुं योग्यो- इसीति सूचयति परंतपेतिसंवोधनेन ॥ ४१ ॥ ५० टी० यद्येवं प्राणिजातं त्रिगुणात्मकं वयस्य कथं मोक्ष इत्यपेक्षाया स्वस्वाधिकारविहितः कर्मभिः परमेश्वराराधनावाप्तज्ञानेन मोक्ष इति सकलगीतार्थं संगृह्य दर्शयितुं प्रकारान्तरमारभते-ब्राह्मणेति । हे परंवप शत्रुतापन, ब्राह्मणादीना चतुर्णी वर्णानां कर्माणि प्रविभक्कानि प्रकर्षेण विभागतो विहितानि। विभागो- पलक्षणमाह-स्वभावप्रभवेणुगरिति । स्वभावः सात्त्विकादिः प्रभवत्याविर्भवति येभ्यस्तैर्गुणैरुपलक्षणभूतः । यता स्वभावः पूर्वजन्मसंस्कारस्तस्मात्प्रादुर्भूतः । तत्र सत्त्वप्रधाना ब्राह्मणाः, सत्योपसर्जनरजःप्रधाना: क्षप्निया:;वमउपसर्जनरज:प्रधाना वैश्या:, रजउपसर्जनतमःप्रधानाः शूद्रा । तदुक्तम् । चातुवयं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः' इति ॥ ११ ॥ रा० टी०-इदानी ब्राह्मणाद्यधिकारिगुणकृतकर्माणि भिन्नानि सन्ठीत्याह-ब्राह्मणेति । त्रैवर्णिकाना- मिव द्विजन्मत्वं नेति द्योतनाय शूद्राणामिति पृथनिर्देशः । स्वभावप्रभवैः ब्राह्मणादितत्तत्स्वभावानुवन्धि भिः । सत्त्वादिगुणैः कर्माणि प्रविभक्तानि वानि मे शृष्विति भावः ॥ १ ॥ शमो दमस्तपः शौचं शान्तिरार्जवमेव च ।। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। ४२ ॥ त० टी०-तत्र ब्राह्मणानां स्वभावप्रभवाणि कर्माण्याह-शम इति । शमो वाहोन्द्रियसंयमा, दमो मनोनियमन, तपः शास्त्रीयव्रतोपरासनियमैः शरीरतापन, शौचं शास्त्रीयकर्मयोग्यतापादनं वाह्या- भ्यन्तरं, तत्र वाह्यं मृजलादिना, आभ्यन्तरं रागद्वेषशून्यत्वं, शान्तिर्वपकृतस्याप्यविकृतचित्तत्वम् , आर्जवं भावकौटिल्यराहित्यं शरीखाइमनोभिः समानाचरणमित्यर्थः, ज्ञानं परावरतत्त्वयाथात्म्यवोधा, विज्ञान परस्परविरुद्धानां वाफ्यानामविरोधेन महावाक्यार्थावबोधः, आस्तिक्यं वेदतदनुकूलस्मृतिपु- राणेविहासपञ्चरागायुक्तार्थस्य कत्लस्य सत्यतानिवपः-एतद्राह्मणस्य स्वभावजं कर्म ॥ ४२ ॥ . १मा कति पाया ।
1 [अ० १८ श्लो० ४२] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता म०टी०-तत्र ब्राह्मणस्य स्वाभाविकगुणकृतानि कर्माण्याह-शम इति । शमोऽन्त:करणोपरमः, दमो चाह्यकरणोपरमः प्रागुक्तः, तपः शारीरादिदेवद्विजगुरुप्राज्ञेत्यादावुक्तं, शौचमपि वाह्याभ्यन्तरभेदेन प्रागुकं, क्षान्ति: क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा मनसि विकारराहित्यं प्राग्व्याख्यातं, आर्जवमकौटिल्यं प्रागुक्तं, ज्ञानं साङ्गवेदतदर्थविषय, विज्ञानं कर्मकाण्डे यज्ञादिकर्मकौशल्यं ब्रह्मकाण्डे प्रमात्मैक्यानुभवः, आस्तिक्यं सात्त्विकी श्रद्धा प्रागुका । एतच्छमादिनवकं स्वभावजं सत्त्वगुणस्वभावकृतं ब्रह्मकर्म ब्राह्मणजाते: कर्म । यद्यपि चतुर्गामपि वर्णानां सात्त्विकावस्थायामेते धर्माः संभवन्ति तथापि वाहुल्येन ब्राह्मणे भवन्ति सत्त्वस्वभावत्वाचस्य । सत्लोद्रेकवशेन वन्यत्रापि कदाचिद्भवन्तीति शास्त्रान्तरे साधारणधर्म- क्योक्काः । तथा च विष्णु:-क्षमा सत्यं दमः शौचं दानमिन्द्रियसंयमः । अहिंसा गुरुशुश्रूपा वीर्थानुसरणं दया ॥ आर्जवं लोभशून्यत्वं देवब्राह्मणपूजनम् । अनभ्यसूया च तथा धर्मः सामान्य उच्यते ॥ इति । सामान्यश्चतुर्णामपि वर्णानां, तथा प्रायेण चतुर्णामप्याश्रमाणामित्यर्थः । वथा बृहस्पति:-' दया क्षमा- ऽनसूया च शौचानायासमङ्गलम् । अकार्पण्यमस्पृहत्वं सर्वसाधारणानि च ॥ परे वा वन्धुवर्ग वा मित्रे द्वेष्टरि वा सदा । आपन्ने रक्षितव्यं तु दयेपा परिकीर्तिता ॥ वाटे चाध्यात्मिके चैव दुःखे चोत्पादिते कचित् । न कुप्यति न वा हन्ति सा क्षमा परिकीर्तिता ॥ न गुणान् गुणिनो हन्ति स्तोति मन्दगुणा- नपि । नान्यदोपेषु रमते साऽनसूया प्रकीर्तिता ॥ अभक्ष्यपरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिर्गुणैः । स्वधर्मे च व्यवस्थानं शौचमेतत्प्रकीर्तितम् ॥ शरीरं पीड्यवे येन सुशुभेनापि कर्मणा । अत्यन्त्र वन कर्वव्यमनायासः स उच्यते ॥ प्रशस्ताचरणं नित्यमप्रशस्तविसर्जनम् । एवद्धि मलं प्रोक्तं मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।। स्तोकादपि प्रदातव्यमदीनेनान्तरत्मिन: । अहन्यहनि यत्किचिदकापण्यं हि तस्मृतम् ॥ यथोत्पन्नेन संतोपः कर्तव्यो पर्थवस्तुना। परस्याचिन्तयित्वाथै साऽस्पृहा परिकीर्विता ॥' इति। एत एवाटावात्मगुणत्वेन गौतमेन पठिता:- अथाष्टावात्मगुणाः दया सर्वभूतेषु क्षान्तिरनसूया शौचमनायासोमङ्गलमकार्पण्यमस्पृहा । इति । तथा महाभारते-'सत्वं दमस्तपः शौचं संतोपो ह्री: क्षमाऽऽर्जवम् । ज्ञानं शमो दयाध्यानमेप धर्मः सनावनः।। सत्यं भूतहित प्रोक्तं मनसो दमनं दमः । तपः स्वधर्मववित्वं शौचं संकरवर्जनम् ।। संतोपो विषयत्यागो होरकार्यनिवर्तनम् । क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुनमा समचित्तता ॥ ज्ञानं तत्त्वार्यसंबोध: शमश्चितप्रशान्तता। दया भूवहितपित्वं ध्यानं निषिपयं मनः ॥ इति । देवल:-"शौचं दानं वपः श्रद्धा गुरुसेवा क्षमा दया । विज्ञानं बिनयः सत्यमिति धर्मसमुच्चयः इति । वथा- प्रतोपवासनियमः शरीरोत्तापनं तपः । प्रत्ययो धर्मकार्येपु तथा श्रद्धेत्युदाहवा ।। नास्ति ह्यश्रद्दधानस्य कर्मकृत्यमपोजनम् । यत्पुनदिकीनां च लौकिकीनां च सर्वशः॥ धारणं सर्वविद्यानां विज्ञानमिति कीय॑वे । विनयं द्विविधं प्राहुः शश्वदमदशमाविति ॥ इति । शेष व्याख्या- वप्रायमिति वचनानि न लिसितानि । याज्ञवल्क्यः-'इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । अयं तु परमो धर्मों यद्योगनात्मदर्शनम् ॥' इति । इमं च सर्वा देवी संपत् प्राग्व्याख्यावा ग्रााणस्य स्वाभाविकी इतरेषा नमित्तिकीति न विरोधः ॥ १२ ॥ शं. टी-तेषां जातिनियमेन विभवानि वानि कर्माणि कानीत्या आह-शम इति । शरश्चिचरमो- परमः दृष्टादृष्टविपये सर्वत्र निःशेषभोगाशानित्तिः, दम इन्द्रियाणामुपरम: निपिद्धावप्रचिः, वैप: सप्तदशे प्रोकं शारीरादित्रिविधं तपः, शौचं याशाऽऽभ्यन्तरा प शुद्धिः, अन्तस्य परानस्य प त्यागेन वसस्य जितायाध शुद्धिः, प्रतिमहत्यागेन पाणिमुखिः, विहितप्रामचर्येण कच्छादित, रागद्वेपादिदोपत्या. गेन मनःशुद्धिः पिहितापरणेन क्रियाशुद्धिरिवि पोटा शोषन् । शान्तिः क्षमा निन्दाफासवादनादिवसका. वपि पित्तविकारानुदयः, आर्जवं सर्वदा करणत्रयस्यैकरूपत्वं, मान सम्माधीववेदशायाणां पदयाम्यार्य- 4 . . श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ४२] ज्ञानं, विज्ञानं त्वनुष्ठानानुष्ठापनक्षम निरङ्कुश शास्त्रार्थतत्त्वनिश्चयः, आस्तिक्यमास्तिकत्वमिदमवश्यं कर्त- व्यमनेनेश्वरः प्रीयत इति कर्मणि कर्मफले च श्रद्धा । चकारोऽनुक्तयोराचार्यवेदेश्वरेषु भयभक्त्योः समु- चयार्थः । एवकार एतदेव ब्राह्मणस्य मुमुक्षोः कर्तव्यं कर्मेत्यवधारणार्थः । स्वभावजं केवलसत्त्वप्रकृतितो मुखादुत्पत्तितो वा प्राप्तं ब्राझं ब्राह्मणजातेरई कर्तव्यं कमेंदं शास्त्रेण विहितमित्यर्थः । यद्यपि त्रैवर्णिकानां मुमुक्षणां सर्वेषां शमाद्यास्तिक्यान्तं कर्म मोक्षसावनत्वेन सममेव भवति तथापि केवलं सत्त्वप्रभवाना ब्राह्मणानां गुडस्य माधुर्यवन्निरुक्कं कर्म स्वाभाविकं नियतं च भवति तदितरेषां तु यत्नसाध्यमिति चोध- यितुं माझं कौत्युक्तम् । तेन ब्राह्मणानामेव सत्त्वाधिक्याच्छमादिसंपत्तिस्तदेकसाध्ये ज्ञाने तत्फले मोक्षे चाधिकारो न वितरेपामिति सूचितं भवति । ततो मोक्षस्य संनिकृष्टं प्राह्मणजन्म प्रातवद्भिः पण्डितैः क्षिप्रं मोक्षाय यतितव्यमिति सिद्धम् ॥ ४२ ॥ श्री० टी०-वत्र माह्मणस्य स्वाभाविकानि कर्माण्याह- शम इति । शमश्चित्तोपरमः, दसो वाथेन्द्रि- योपरमः, तपः पूर्वोक्तं शारीरादि, शौचं वाह्याभ्यन्तरं, क्षान्तिः क्षमा, आर्जवमवकता, ज्ञान शाखीयम्, विज्ञानमनुभवः, आस्तिक्यमस्ति परलोक इति निश्चय:-एतच्छमादि ब्राह्मणस्य स्वभावाजातं कर्म ॥४२॥ स. टी०-तत्र ब्राह्मणकर्माणि स्वाभाविकगुणेन वै ।। कृतान्याह कृपासिन्धुः सर्वकर्मफलप्रदः ॥ १॥ शमोऽन्त,करणे शान्तिर्वाह्यन्द्रियशमो दमः । तप.स्वधर्मवर्तित्वं प्रागुक्तं वा त्रिधा तपः ॥ २ ॥ वाह्याभ्य- न्तरभेदेन शौचं द्विविधमीरितम् ।। क्षान्तिद्वन्द्वसहिष्णुत्वमार्जवं समचित्तता ॥ ३ ॥ ज्ञानं स्यात्साङ्गधेदार्थ- विपयं सत्त्वभागजम् ॥ विज्ञानं कर्मकाण्डे स्यात्कौशलं यज्ञकर्मसु ॥४॥ ब्रह्मकाण्डेऽपि वेदान्वनिर्णये. ऽतिप्रगल्भता ॥ मानं वेदान्तविपयं प्रोक्तं चैव महर्षिभिः ॥ ५ ॥ यस्पुनर्वेदिकीनां च लौकिकीनां व सर्वशः ।। धारणं सर्वविद्याना विज्ञानमिति कीर्यते ॥६॥ इत्यर्थ ऋपिभिः प्रोक्तः कर्मप्रस्ताव एतयोः ।। आस्तिक्यं सात्त्विकी श्रद्धा ब्रह्मात्मैक्यादिदर्शने ॥ ७ ॥ एतच्छमादिनवकं शुद्धसत्त्वगुणोद्भवम् ॥ कर्म ब्राह्मणजातेस्तत्सत्त्वोद्रेकवशेन वै ॥८॥ चतुर्णामपि वर्णाना सत्वोद्रेकेण यद्यपि ।। संभवन्ति गुणा एते तथापि ब्राह्मणे त्वमी ॥ ९॥ शुद्धसत्वस्वभावत्वाद्वाहुल्येन भवन्ति ते ।। साधारणतयाप्युक्ता धर्मा एते यतो नृणाम् ॥१०॥ "क्षमा सत्यं दमः शौचं दानमिन्द्रियसंयमः ॥ अहिंसा गुरुशुश्रूपा शास्त्रानुसरणं दया ॥११॥ आर्जवं लोभशून्यत्वं देवब्राह्मणपूजनम् ।। अनभ्यसूया च वया धर्म: सामान्य उच्यते ॥ ॥१२॥ तयापि ग्राह्मणानां तु स्वभावात्संपदीरिता || आगन्तुकीतरेपा स्याद्विशेषोऽयं विचार्यताम् ।। १३ ॥ शम• दमनपादि ग्रझकर्माणुमानं न हि शरणमिहारिल ब्रह्मरन्धार्ममाता ।। मशरणशरणं श्रीकृष्ण एवास्तु नित्यं शरणमिह भवाव्यौ मन्नतो भ्रान्त्यगाधे ॥ १४॥ १२ ॥ भा० टी०-कानि पुनस्तानि कर्माणीत्यपेक्षायां वानि व्युत्पादयितुमादी ग्राह्मणस्य कर्माणि दर्शयति- शम इति । शमः अन्तःकरणोपरम , दमः वाह्यकरणोपरम, तप: यथोक्तं, शारीरादिशौचं याह्याभ्यन्तर- भेटेन प्राध्याख्यानम् । क्षमा क्षान्ति: आकुष्टस्य ताडितस्य का मनसि विकारराहित्यम्, आर्जवम् ऋजुलं, मानं शास्त्रीयम्-आत्मादिपदार्थज्ञान, विज्ञानं शास्त्रार्थस्यानुभवारूढतापादनं, आस्तिस्यमास्ति- करवभावः भागमोकार्थेषु अरधानता, ब्रह्मफर्म प्राणजातेः फर्म स्वभाव स्वभावप्रभवेन गुणेन सत्त्व. गुणेन प्रविभक्तमित्यर्थः ॥ ४२ ॥ १० टी०-दब ग्राझणस्य स्वाभाविकानि कर्माण्याद-शुमो दम इति । समश्चित्तोपरमा, दमधेन्द्रियो. परमः, वर्ष. पूर्वोठं शारीरादि, शौचं याह्याभ्यन्तरवः, शान्ति, क्षमा, आर्जवमयकता, शान शाखीयं, विज्ञानमनुभवः, आस्तिस्यमास्त परलोफ इति निश्चयः । एतद्राह्मणस्य स्वभावसिद्ध कर्म ॥ ४२ ॥ .
- [अ० १८ लो० ४३] तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२४५ रा०टी०-तत्र चतुर्वर्णकर्माणि क्रमात्रिभिराह-शम इत्यादिभिः । शमो भगवनिष्ठा । दम इन्द्रिय- निग्रहः । तपो ब्रह्मचर्यादि । शोचं वाह्याभ्यन्तरशुद्धिः । शान्तिः क्रोधानुत्पत्तिः । आर्जवं मनोवाकाय- कर्मणामवपरीत्यम् । ज्ञान सामान्यतः । विज्ञान विशेषतः । आस्तिक्यं धर्मादावस्त्यनेन प्रयोजनमिति भावना । एतत्सर्वं स्वभावजं सहजं माझं ब्राह्मणसंवन्धि कर्मेति ॥ ४२ ॥ शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाऽप्यपलायनम् ॥ दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ।। त० टी०-क्षत्रियस्य स्वभावज कर्माह-शौर्यमिति । शौर्य पराक्रमः महत्तरानपि रिपून् हन्तुं निःशङ्कतया प्रवर्तनस्वभावत्वमित्यर्थः । तेजः परैरनभिभवयोग्यत्वे सति पराभिभवनसामर्थ्य, धृतिः युद्धादिकर्मण्यारव्ये आपद्यपि अवसादशून्यत्वं, दाक्ष्यं सर्वक्रियासाधनचातुर्य, युद्ध चाप्यपलायन मरणे ज्ञातेऽपि परेभ्योऽपराङ्मुखत्वं, दानमर्थिभ्यस्ततदर्थत्यागः, ईश्वरभावः प्रजापालनार्थमुत्पथगा- मिनां नियमनसामर्थ्यम्, एतत् क्षात्रं क्षत्रियस्य स्वभावजं कर्म ॥ ४३ ॥ म० टी०-क्षत्रियस्य गुणस्वभावकृतानि कर्माण्याह-शौर्यमिति । शौर्य विक्रमो बलवत्तरानपि प्रहर्नु प्रवृत्तिः, तेजः प्रागम्यं परेरधर्पणीयत्वं, धृतिर्महत्यामपि विपदि देहेन्द्रियसंघावस्यानक्सादा, दाक्ष्य दक्षभावः सहसा प्रत्युत्पन्नेषु कार्येष्वव्यामोहेन प्रवृत्तिः, युद्धे चाप्यपलायनमपराङ्मुखीभावः, दानमसंकोचेन वित्तेपु स्वस्वत्वपरित्यागेन परस्वत्वापादानं, ईश्वरभाव: प्रजापालनार्थमीशिवव्येषु प्रभुशक्तिप्रकटीकरणं च । क्षत्रकर्म क्षत्रियजातेर्विहितं कर्म स्वभावजं सत्त्वोपसर्जनरजोगुणस्वभावजम् ।। ४३ ॥ शं० टी०-एवं ब्राझं कर्मोक्त्वा क्षात्रं कर्माह-शौर्यमिति । शूरस्य भावः शौर्य पराक्रमो वीराणामपि संहरणसामर्थ्य, तेजः प्रागल्भ्यं वलंवतामपि दुर्घर्पत्वं, धृतिविपदि चित्तस्य वैकल्यराहित्यं धैर्य, दाक्ष्य दक्षस्य भावो दाक्ष्य प्रातिकूल्यशतेऽपि स्वकार्यनिर्वाहसामर्थे च, युद्धे त्वपलायनं प्राणान्तेऽप्यपराङ्मुखत्वं, दान पानेभ्यो वित्तसमर्पणं, ईश्वरभाव ऐश्वर्य प्रभावातिशयेन सर्वनियन्तृत्वं धर्मेण प्रजापरिपालनमित्यर्थः । पकारोऽपिश्चोक्तसमुच्चयार्थः । शौर्याद्यैश्वर्यान्तं सर्वे कर्म स्वभाव सत्त्वमिश्ररजाप्रकृतितो वाह्वोरुत्पत्ति- वो वा प्राप्त क्षात्र क्षत्रियजातेरई कर्तव्यं शास्त्रेण विहितमित्यर्थः ॥ १३ ॥ श्री०टी०-क्षत्रियस्य स्वाभाविकानि कर्माण्याह-शौर्यमिति । शौर्य 'पराकमः, तेजः प्रागल्भ्यम्, धृतिर्य, दाक्ष्यं कौशलं, युद्धे चाप्यपलायनमपराङ्मुखता, दानमौदार्यम् , ईश्वरभावो नियमनशक्तिः, एत- क्षत्रियस्य स्वभावनं कर्म ।। १३ ॥ स० टी०-क्षत्रियस्य स्वभावोत्यकर्माण्याहाधुना हरिः ॥ शौर्य पराक्रमस्तेजः प्रागल्भ्यं चान्यदु.सहर ॥१॥ धृतिमहत्यां विपदि देहायनवसादनम् ।। उपस्थितेषु' कार्येषु दाक्ष्यं सम्यक्प्रचिती ॥ २ ॥ युद्धेऽपराड्मुखीभावो दानं पात्रेषु शास्त्रवः । असंकोचेन वित्तेपु स्वस्वत्वत्यागपूर्वकम् ॥ ३ ॥ पर- स्वत्वापादनं स्यादीश्वरे भावदर्शनम् ॥ प्रजारक्षार्थमैश्वर्यादीशिवव्येषु जन्तुषु ॥ ४ ॥ उद्घाटनं प्रभोः शः क्षत्रियस्य स्वभावजम् ॥ विहित क्षत्रियास्याया जाने कर्म गुणानुगम् ॥ ५॥ ४३ ॥ भा० टी०-ब्राह्मणस्य कर्मोदाढत्य क्षत्रियस्य वदाह-शौर्यमिति । शौर्य शूरस्य भावो विक्रमो बलवच. रानपि प्रहर्तुं प्रवृत्तिः, तेजः प्रागल्भ्यं परेरधर्षणीयत्वं, धृतिः धारणं यया धृत्यात्मिळया चित्तवृत्या सर्वाव- स्थासु देहेन्द्रियसंघातस्यानवसादो भवति । दक्षस्य भावो दाक्ष्य् सहसा प्रत्युपस्थितेषु कार्येषु अग्यामोदन योधकौशल्यं, युद्धे वाप्यपलायनं शत्रुम्योऽपराङ्मुखत्वं पकारात्पराङ्मुखस्याहननम् । दान देयेषु पस्तुपु ।
-- । १२४६ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो. १४ मुक्तहस्तता, ईश्वरभावश्च ईश्वरस्य भाव ईशितव्यान् प्रति प्रभुशक्तिप्रकटीकरणम् । अनुक्तसमुच्चयार्थश्वः ।क्षा क्षत्रियजातेविहित कर्म स्वभावजं स्वभावप्रभवेन सत्त्वोपसर्जनरजोगुणेन प्रविभक्तमित्यर्थः ॥ ४३ प० टी०-अब क्षस्त्रियाणामाह-शौर्यमिति । शौर्य पराक्रमः, तेजः प्रागल्भ्यम् , धृतिर्यम्, दाक्ष्य दक्षत्वं कौशलमित्यर्थः । युद्धेऽपलायनमपराङ्मुखता, दानमौदार्यम् , ईश्वरभावो नियामकत्वशक्तिरेतल्क्ष- स्त्रकर्म ॥ ४३॥ रा० टी०-शौर्यमिति । शौर्यमभीरुत्वं । तेजः शरीरगतवर्कोविशेषः । धृतिधैर्य । दाक्ष्यं पाटवं । युद्धे चाप्यपलायनं भीत्या युद्धादनिवर्तनम् । दानं गोभूतिलहिरण्यादेः पाने प्रतिपादनम् । ईश्वरभावो दण्ड- नादिकर्तृत्वम् । 'प्रसह्य विचाहरणं शारीरो दण्ड एव च । अशिष्टाना शासनं च तथैवार्थविनाशनम् । पप ईश्वरभावः स्यान्न कार्य क्षत्रियेतरैः' इति स्मृतेः । एतत्सर्व स्वभावजं क्षत्रियसंबन्धि कर्मेत्यर्थः । अन ब्राह्मणधर्माः शमादयोऽपि वेभ्य. किंचिदना क्षात्रधर्मेष्वपि पाह्याः । शमादेव मणकर्मतोक्तिस्तु क्षत्रि- यधर्माद्यपेक्षयाऽऽधिक्यविवक्षयैव । येपु चक्रवर्तिपु विप्रेभ्योऽधिकशमादयस्तेऽत्र न विवक्षिताः । किंतु तदन्य एवेति ज्ञेयम् । क्षत्रधर्मा अपि विप्रादिपु क्रमादूना ज्ञेयाः ॥ ४३ ॥ कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ॥ परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ १४ ॥ त० टी०-वैश्यशूद्रयोः कर्माह-कृषीति । कृपिरनोत्पादनार्थ भूमिकपणं, गोरक्षस्य भावो गौरक्ष्यं पशुपालनमित्यर्थः । वाणिज्यं वणिजः कर्म क्रयविक्रयळक्षणम्, अनेन कुसीदलक्षणं च ग्राह्यम्, एतद्वैश्यस्य स्वभावजं कर्म । परिचर्यात्मकं पूर्वोक्तवर्णनयाणां शुश्रूपात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् । एतैरेव त्रयाणां वर्णानां नित्यकर्तव्यतया वेदविद्भिर्मन्वादिभिर्विहितानि अन्यान्यध्य- यनयज्ञादीनि तान्यप्यनुष्ठेयतया गृह्यन्ते इति ज्ञेयम् । तनाध्ययनयज्ञदानानि त्रयाणां साधारणानि, ब्राह्मणस्याध्यापनादीनि त्रीण्यधिकानीति विवेकः । तथाऽऽह मनु:-" अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ।। प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । विपयेप्यासक्ति च क्षत्रियस्य समादिशत् ॥ पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च । वणिक्पयं कुसीदं च वैश्यस्य कृपिमेव च । एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् । एतेपामेव वर्णानां शुश्रू- पामनसूयया ॥” इति । शमदमादयस्तु ययपि सःपां मुमुक्षूणां साधारणास्तथाऽपि ब्राह्मणस्य सत्त्वो- द्विक्तस्वभावत्वादिलिप्योक्ताः । कदाचिदन्यत्रापि सचोदेकण्याचे भवन्तीवि शासादेव ज्ञायते । तथोक्तं विष्णुस्मृती-"क्षमा सत्यं दमा नौचं दानमिन्द्रियसंयमः । अहिंसा गुरुशुश्रूपा तीर्यानुसरण तथा ।। आजी लोभशुन्यत्वं देवब्राह्मणपूजनम् । अनभ्यसूया च तथा धर्मः सामान्य उच्यते" इति ॥४४॥ म.टी.-कृपीति । कृपिरलोपत्त्यर्थे भूमेविलेसन, गोरक्षस्य भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यं, पाणिज्य धणित: फर्म क्रयविन्यादिलक्षणं, पुसीदमप्यत्रान्वर्गमनीय, वैश्यकर्म वैश्यमातेः फर्म स्वभावज वमउरस- जनरजोगुणस्वभावजम् । परिचर्यात्मकं द्विनातिशुश्रूपात्मकं फर्म शूद्रस्यापि स्वभावजं रजउपसर्जनतमोगुण- - मभारजन्॥४४॥ j० टी०-३श्यमूद्रयोः फर्माह-छपीति । कपिः कर्पगं, गौरक्ष्यं गाः रक्षवीवि गोरक्षस्तस्य भावो गौ- रक्षण, पशुपारनं पाणिसं तिल, कर्म वाणिज्यं मयविक्रयललगमेवविविध कर्म स्वभाव रजोनिश्रवन,प्रक- । [अ० १८ लो० ४५] तत्त्वप्रकाशिकायटटीकोपेता वित ऊर्वोक्त्पत्तितो वा प्राप्त वैश्यं विशो जातेरह कर्तव्यं शास्त्रेण विहितमित्यर्थः । परिचर्यात्मकं त्रैवार्णिकानां शुश्रूपालक्षणं स्वभाव केवलतमःप्रकृतितः पद्भ्यां जन्मतो वा प्राप्तं शूद्रस्य कर्वव्यं कर्म 'शुश्रूपा शूद्रस्य' इति शास्त्रेणोक्तमित्यर्थः । ननु ब्राह्मणक्षत्रियविशां नियमेन कर्तव्यानि कर्माणि वक्ष्यामीत्युपक्रम्य शमो दम इति शौर्य तेज इति प्राकृत एव धर्म उपदिश्यते, न तु वैदिकं कर्म नियमेन कर्तव्यं येन फवेनेश्वरः प्रीयते । न हि शमशौर्यऋष्यादिकर्मणाऽनुष्ठितेनेश्वर: प्रीयते, कथमिदं विपरीत कोपदिश्यत इति चेत्सत्यं, शमा. दिकं शौर्यादिकं च कर्म संध्यादिवदनुष्ठेयं न भवति, नापीदमाश्चाप्रीत्ये च भवति, यथापि विशेष उच्यते, अहरहः संध्यामुपासीत । सायं प्रातरग्निहोनं जुहोति । यज्ञोऽध्ययनं दानम्' इति द्विजातीनामध्ययनामिज्या- दानमिति ब्राह्मणादीनां नियमेन नित्यं कर्तव्यं कर्म यथा शास्त्रेणेवोफ, तथा 'शमेन शान्ता: शिवमाचरन्ति । द्मन दान्ताः किल्विपमवधुन्धन्ति । तपसा किल्विषं हन्ति' इति । राज्ञोऽधिकं रक्षणं सर्वभूताना न्यायदण्ठत्वं विभृयात्संग्रामे संस्थानमनिवृत्तिश्चेति । कृषिवाणिज्ये च स्वयंकृते कुसीदं चेति । शूद्रश्चतुर्थो वर्ण एकजाति. स्तस्यापि सत्यमक्रोधः परिचर्या घेतरेपामित्येतान्यपि कर्माण्यनुष्टेयत्वेन शास्त्रेणैवोकानि भवन्ति । कि स्वयमन विशेष: ब्राह्मणादीनां संध्योपासनामिहोत्रादिरविभक्को वर्णाश्नमधर्मः । शमशौर्यध्यादिस्तु प्रत्येक विभक्तो जाविधर्मः । ततो जातिवर्णाश्रमनिमित्तको द्वावयेतो धर्मो नित्यौ श्रौतस्मातकर्मवप्रधानावेव भवतो न तु वयोरङ्गाङ्गिभावः सिध्यति । उभावपि शास्त्रेण नियतवान्मुमुक्षूणां नियमेनानुष्ठातच्यावेव । नैवान किं- चिद्विपरीतमस्ति गृहीतुं वोधयितुं वा । तो जातिधर्मे नियमेन वर्तमानैाह्मणादिभिः स्वस्थवर्णाश्रमाई कर्म वैदिकं नित्यमनुधातव्यं नान्यथा । कर्मणः प्रधानस्यैकदेशानुष्ठानेन साकल्यासंभवान्न तत्फलं सिध्यति । न हि श्रौतस्मातयोरन्यतरानुष्ठानेन संस्कारसाकल्यं सिध्यति तद्वत् । ततः स्वधर्मे शमादौ शौर्यादौ सदा वत. मानैरव ब्राह्मणक्षभियादिभिः संध्याग्रिहोत्रादि नित्यं कर्म नियमेन कर्तव्यमिति सिद्धम् ।। ४४ ।। श्री० टी०-वैश्यशूद्रयोः कर्माह-कपीति । कृषिः कर्पणं, गा: रक्षतीति गोरक्षस्वस्य मावो गौरक्ष्य पाशुपाल्यमित्यर्थः । माणिज्यं कयविक्रयादि, एतद्वैश्यस्य स्वभाव क्रमे । त्रैवर्णिकपरिचर्याम शूद्रस्यारे स्वभावजं कर्म ॥४४॥ स० टी०-भूमेविलेखनं सस्यनिष्पत्यथै कृषिः स्मृता ।। गौरक्ष्यं पाशुपाल्यं स्याद्वाणिज्यं कयविक्रयों ॥ १॥ वैश्यजातेरिदं कर्म गुणनिष्ठस्वभावजम् ॥ द्विजशुश्रूपणं कर्म शूद्रस्यापि स्वभाषजम् ॥ १॥ १४ ॥ भाटी-क्षात्रं कर्म व्युत्पाद्य वैश्यशूद्रयोस्तदर्शयति कृपिरिति । कृषिभूमविलेखनं, गां रक्षतीति गोरक्षः तस्य भावो गौरक्ष्यं पाशुपाल्यं, वाणिज्यं क्रयविक्रयादिलक्षणं वणिकर्म, ऋषिगौरक्ष्यवाणिज्य वैश्य- जातेः कर्म स्वभावज स्वभावप्रभवेन वमनपसननरजोगुणेन प्रविभक्तम् । परिचर्याम द्विमाविशुश्रूषा- स्वभावं कर्म शूद्रस्य शूद्रजावेरपि स्वभावजं स्वभावप्रभवेन एनउपसर्जनवमोगुणेन प्रविभकमित्यर्थः ॥४४॥ ५० टी०-अथ वैश्यशूद्रयोराह-कपीति कपिलाङ्गलादिभिर्भूमिकर्पणं, गा रक्षतीति गोरक्षस्तस्य भावो गौरक्ष्यं पशुपालनम् , वाणिज्यं क्रयविक्रयादि, एनदेश्यस्य । तथा त्रिवर्गस्य परिचर्यारम सेवनात्म शूद्रस्य ॥४४॥ रा० टी०-कृपिरिति । कृषिः कर्पमेन जीवनं, गयो पालने वाणिज्य वार्तया जीपनम्। अधिक्षनि- यादूना: शमादयोऽपि वैश्यकर्ममध्ये प्राह्या: । परिचर्यात्मकं त्रैवर्णिकसेवारूपम् । अनापि वेश्यादूनामादिक च ग्राह्यम् ॥४४॥ स्वे स्व कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तनाथ ॥१५॥ . .
। श्रीमद्भगवद्गीता [अ. १२५८ १८ श्लो० ४५] त. टी-एवं नियतस्वस्ववर्णाश्रमादिकर्मणः पुरुषार्थोपायत्वमित्याह-स्वे स्वे इति । स्व स्वे यथोदितवर्णाश्रमोशेन विहिते कर्मणि अभिरतः सम्यगनुष्ठानपर: नरो मनुष्यः संसिद्धिं सम्यग्ज्ञानयो- ग्यतां लभते । ननु तर्हि स्वकर्मनिरताः प्रायः सर्वेऽपि दृश्यन्ते, सम्यग्ज्ञानिनः कथं न भवन्ति ? भवन्ति चेत्कश्चिदपि संसारी न स्यादिति चेत्तत्राह-स्वकर्मणि निरतो नितरां रतः श्रद्धयाऽनुष्ठानं कुर्वन् यथा येन प्रकारेण सिद्धिं ज्ञाननिष्ठां विन्दति लभते तत्तत्सकार-शृणु ।। ४५ ॥ म०टी०-तदेवं वर्णानां स्वभावजा गौणाख्या धर्मा अभिहिताः । अन्येऽपि धर्माः शास्नेप्वानाताः । वदुक्तं भविष्यपुराणे- धर्मः श्रेयः समुद्दिष्टं श्रेयोऽभ्युदयलक्षणम् । स तु पञ्चविधः प्रोक्तो वेदमूलः सना- तनः ॥ वर्णधर्म: स्मृतत्त्वेक आश्रमाणामतः परम् । वर्णाश्रमस्तृतीयस्तु गौणो नैमित्तिकस्तथा । वर्णत्वमेकमा- श्रित्य यो धर्मः संप्रवर्तते । वर्णधर्मः स उक्तस्तु यथोपनयनं नृप ॥ यस्त्वाश्रमं समाश्रित्य अधिकार: प्रव- तते । स सल्वाश्रमधर्म: स्यादिक्षादण्डादिको यथा । वर्णविमाश्रमत्वं च योऽधिकृत्य प्रवर्तते । स वर्णाश्रमधर्मस्तु मौज्याद्या मेखला यथा ॥ यो गुणेन प्रवर्तेत गुणधर्मः स उच्यते । यथा मूर्धाभिषिक्तस्य प्रजानां परिपालनम् ॥ निमित्तमेकमाश्रित्य यो धर्मः संप्रवर्तते । नैमिचिकः स विज्ञेयः प्रायचित्तविधिया ।।' इति । अधिकारोऽत्र धर्मः । चतुर्विधं धर्ममाह हारीत:-' अथाश्रमिणां पृथग्धर्मो विशेषधर्मः समानधर्मः कुत्लधर्मश्च' इति । पृथगाश्रमानुष्ठानास्पृथग्धर्मों यथा चातुर्वर्ण्यधर्मः । स्वाश्रमविशेषानुष्ठानात विशेषधर्मो यथा नैष्ठिकयायावरानुज्ञायिकचातुराश्रन्यसिद्धानाम् । सर्वेषां यः समानो धर्मः, स समानधर्मो नैष्ठिकः फुलधर्म इति । नैष्ठिको ब्रह्मचारिविशेपः, यायावरो गृहस्थविशेषः, आनुज्ञायिको वानप्रस्थविशेषः, चातुराश्रम्यसिद्धो यतिविशेषः । सर्वेपामिति वर्णानामात्रमाणां च । तत्रयो यथा महाभारते- आनृशं- स्यमहिंसा चाप्रमादः संविभागिता । श्राद्धकर्माविणेयं च सत्यमझोघ एव च ।। स्वेषु दारेषु संतोप: शौचं नित्याऽनसूयचा । आत्मज्ञानं तितिक्षा च धर्मः साधारणो नृप' इति । सर्वाश्रमसाधारणस्तु प्रागुदाहृतः । निष्ठा संसारसमाप्तिस्तत्प्रयोजनो नैष्ठिकः । मोक्षहेत्वात्मज्ञानोत्पचिप्रतिबन्धकप्रत्यवाय- परिहाराय निकामकर्मानुष्ठानं कृत्स्नधर्म इत्यर्थः । आश्रमाश्च शास्त्रेषु चत्वार आनाताः । यथाह गौवमः-'तस्याश्रमविकल्पमेके बुवते ब्रह्मचारी गृहस्थो भिक्षुसानसः' इति । आपस्तम्ब:- चत्वार आश्र. मा: गाईस्थ्यमाचार्यकुलं मौनं वानप्रस्थमिति । तेषु सर्वेषु यथोपदेशमन्यमो वर्तमानः क्षेमं गच्छति। मवि । पसिष्ठः-'पस्वार आश्रमा ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थपरिव्राजकास्तेपां वेदमधीत्य वेदौ वेदान्वाऽविशी- भिक्षाचर्यो यमिच्छेत्तमावसेत् । इति । एवं तेषां पृथग्धर्मा अप्यानाताः । तथा फलमप्यज्ञानामाम्नावम् । यथाइ मनु:-'श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः । इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम् । इति । अनुचमं मुसमिति यथाप्राप्तवत्तत्फलोपलक्षणार्धम् । आपस्तम्ब.-'सर्ववर्णानां स्वधर्मानुष्ठाने परमपरिमितं सुखं तत: परित्तो कर्मफटशेपेण जाति रूपं वर्णे यल वृत्तं मेधी प्रज्ञा द्रव्याणि धर्मानुष्ठानमिति प्रतिपद्यन्ते' इति । गौतमः 'वर्गाआश्रमाच स्वधर्मनिष्ठा प्रेत्य कर्मफलमनुभूय दतः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायुःश्रुतत्व. पिचमुसमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्वे विश्वयो विपरीता नश्यन्ति । इति । अत्र शेपशब्देन भुक्कज्योतिष्टोमादि- करीतिरिकं चित्रादिकर्मानुशयशक्तिमुच्यते, नतु पूर्वकर्मण एकदेश इति स्थितम्-'तात्ययेऽनुशयवान्ट- स्मृतिभ्यां ययेवमनेवं पा इत्यत्र । भट्टरप्युफम-गोवमीयेऽपि तच्छेपस्तस्माधिनाद्यपेक्षया' इति । विषय सतपामिनो यथेष्टचेष्टा: 'विपरीता नरकादौ जन्म प्रतिपद्य विनश्यन्ति कृमिकीटादिभावेन सर्वपुरुपायेभ्यो प्रश्यन्व स्पर्षः । हारी:-'फाम्य फेविद्यादानेस्वपोभिउंब्या लोकान्पुनरायान्निजन्म ! कामेर्मुकाः सत्य- पाः मुरानास्वपोनिष्ठाधामयान्यान्ति लोकान् । इवि भन फामनासदसदावनिवन्धनः फलभेदो दर्शित .
[अ० १८ ० ४५] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता १२४९ भविष्यपुराणे-' फलं विनाप्यनुष्ठानं नित्यानामिष्यते फुटम् । कास्यानां स्वफलार्थ तु दोपघातार्थमेव तु ॥ नैमित्तिकानां करणे त्रिविधं कर्मणां फलम् । क्षयं केचिदुपात्तस्य दुरितस्य प्रचक्षते । अनुत्पत्ति वथा चान्ये प्रत्यवायस्य मन्वते । नित्या क्रियां तथा चान्ये अनुपङ्गफलं विदुः ॥' इति । अन्ये आपस्तम्बादयः- 'तद्यथा आने फलार्थे निमिते ' इत्यादिवचनैरानुपङ्गिकफलता नित्यकर्मणो विदुः। श्रुतिश्च 'त्रयो धर्मरकन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव । द्वितीयो ब्रह्मचर्याचार्यकुलवासी । तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचा. र्यकुलेऽवसादयन्' इति गृहस्थवानप्रस्थब्रह्मचारिण उक्त्वा ' सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति । इवि तेपामन्त:- करणशुद्यमावे मोक्षाभावमुक्त्वा शुद्धान्त:करणानामेपामेव परिव्राजकभावेन ज्ञाननिष्ठया मोक्षमाह- ब्रह्म. संस्थोऽमृतत्वमेति' इति । तदेवं स्थिते ब्रह्मचारी गृहस्थो वानप्रस्थो वा मुमुक्षुः फलाभिसंधित्यागेन भगवद्- र्पणबुद्धया-स्वे इति । खे खे तत्तद्वर्णाश्रमविहिते न तु खेच्छामात्रकते कर्मणि श्रुतिस्मृत्युदिते अभिरत: सम्यगनुष्ठानपर: संसिद्धिं देहेन्द्रियसंघातस्याशुद्धिक्षयेन सम्यग्ज्ञानोत्पत्तियोग्यतां लभते नरः वर्णाश्रमाभि- मानी मनुष्यः, मनुष्याविकरित्वात् कर्मकाण्डस्य । देवादीनां वर्णाश्रमाभिमानित्वाभावाद्युक्त एव तद्धर्भध्वन- धिकारः । वर्णाश्रमाभिगानानपेक्षे तूपासनादापधिकारस्तेपामप्यस्त्रीति साधितं देवताधिकरणे । ननु बन्धहेतूनां कर्मणां कथं मोक्षहेतुत्वम् ? उपायविशेपादित्याह-स्वकर्मनिरतः सिद्धिमुक्तलक्षणां यथा येन प्रकारेण विन्दवि तच्छृणु, श्रुत्वा तं प्रकारमधारयेत्यर्थः ॥ ४५ ॥ शं० टी०-एवं ब्राह्मणादीनां नियमेन कर्तव्यानि शमादीनि फर्माणि तदुपलझितानि । यज्ञो दानं तपः कर्म न त्याज्य कार्यमेव तत् । इति श्रौतानि स्मानि चौपदिश्य सत्वशुद्धपै तेपामीश्वरार्पणबुद्धया कर्तव्यत्वं योधयितुं प्रवृत्तिसिद्धये फलं प्ररोचयति-स्व इति । नरो ब्राह्मणादिममुधुरधिकारी पुरुषः स्वे वे शमो दम इत्यादिना विभज्य प्रदर्शिवे स्वकीये कर्मणि शमादौ श्रौतस्मार्वे चाभिरतो नियमेन परिनिष्ठितो यथाविधि समनुष्ठितसत्कर्मसंक्षालितप्रतीपसर्वपापपटलः सन् संसिद्धि सत्त्वशुद्धि सदुपदेशमात्रेणात्मतत्त्वा. वगत्याविर्भावयोग्यतालक्षणां विन्दति । ननु वहुभिर्नाह्मणादिभिरजलं फर्म क्रियते, न वेषां वत्कर्मानुष्ठानेन सत्त्वशुद्धिरुक्कलक्षणा दृश्यते, कथं कर्मण्यमिरतः सत्त्वशुद्धिं लभत इत्याकाडायाम् 'यो वा एतदक्षरं गाय- विदित्वा भरिमलोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति इवि न्यायेन पूर्वोक्त. शमाद्यभावेन कामसंकल्पाहकाराभिनिवेशेन च कर्माण्यनुविष्ठतः सत्त्वशुद्धिर्न सिध्यतीति योधयितुमाह- स्वकर्मवि । मुमुक्षु हाणादिक्तशमदमादिसंपन्नः स्वकर्मनिरतः स्वस्य श्रुविस्मृतिभ्यां विहिते वैदिक कर्मणि निरतो निष्ठित:, सिद्धिं सत्त्वशुद्धिं यया येन प्रकारेण विन्दवि प्रकारं शृणु श्रुत्या वयानुष्ठाने मनि कुर्वित्यर्थः ॥ ४५ ॥ श्री० टी०-एवंभूवस्य ब्राह्मणादिकर्मणो शानहेतुत्वमाह-स्खे स्व इति । स्वस्त्राधिकारविहिने कर्मणि अभिरतः परिनिष्ठितो नरः संसिद्धिं ज्ञानयोग्यता लभते । कर्मणां ज्ञानप्राप्तिप्रकारमाह-स्वकमविसान । स्वकर्मपरिनिछिता यया येन प्रकारेण तत्त्वज्ञानं लभवे वं प्रकारं शृणु ॥ ४५ ॥ स० टी०-नदेवं स्वस्ववर्णे यो विहित कर्म शास्त्रतः । अनुतिष्ठति . वस्यास्ति सम्यसिद्धिर्महात्मनः ॥१॥ अवान्तरफळं चैव स्वस्वकर्मानुतिष्ठताम् ॥ स्वर्गादि भवतीत्येवं पुराणे वैष्णवे स्मृतम् ॥ २॥ प्राजापत्यं ब्राह्मणाना स्मृतं स्थानं क्रियावदाम् !! स्थानमन्द्रं क्षत्रियाणां संग्रामेष्वनुपतिनाम् ॥ ३॥ वैश्यानां मारुतं स्यानं स्वधर्ममनुवर्तिनाम् ॥ गान्धर्व शुद्रजातीनां परिचर्यानुवर्तिनाम् ॥ ४ ॥ एवं धीशु-. यभावे वत्फलं धर्मानुसारिणाम् ॥ फलाभिसंधिसत्यागादीशार्पणपिया कृतम् ॥ ५॥ चिचगुद्धपात्मनो- धन मोरहेतुः स्वकर्म तत् ।। अतस्त्यक्त्वा फलासचिमीश्वरार्पणवेवसा ॥ ॥ कर्म कर्तव्यमित्याद सयं A श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ सो.४६] श्रीपरमेश्वरः । यथोक्तलक्षणे खे खे तत्तद्वणे तथाऽऽश्रमे ॥ ७॥ विहिते वैदिक स्मार्वे कर्मण्यभिरत: पुमान् ॥ यथाशास्त्रमनुष्ठानपरोऽहंकारवर्जितः ॥ ८॥ कर्मानुष्ठानतः सिद्धि चित्ताशुद्धिपरिक्षयात् ॥ विज्ञानोत्पत्तियोग्यत्वं लभतेऽविकृतो नरः ॥९॥ वर्णाश्रमाभिमानित्वान्मनुष्योऽत्राधिकारवान् ॥ न देवा- दिर्यतस्तेषां देवादीनां न चास्त्यसौ ॥ १० ॥ वर्णाश्रमाभिमानोऽतो नास्ति कर्माधिकारता ॥ वर्णाश्रमा- भिमानानपेक्षे ब्रह्मावबोधने ॥ ११ ॥ तेषामप्यधिकारोऽस्तीत्युक्तं शारीरके स्फुटम् ॥ नन्वेपां वन्धहेतूनां मोक्षकारणता कथम् ॥ १२ ॥ कर्मणामिति चेदित्यमुपायान्तरतः शृणु ॥ यथोक्तलक्षणां सिद्धिं येनोपा- येन विन्दति ॥ १३ ॥ तच्छृणु त्वं तमाकर्ण्य प्रकारमवधारय ॥ १४ ॥ ४५ ॥ भा० टी०-एतेपा जातिविहितानां कर्मणां सम्यगनुष्ठितानां मोक्षापेक्षामन्तरेण विहितत्वादेवानुष्ठाना- स्वर्गप्राप्तिः फलम् "सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति", "वणी आश्रमा स्वधर्मनिष्ठाः प्रेत्य कर्मफलमनुभूय. ततः शेपेण विशिष्टदेशजातिकुलरूपायु:श्रुतवृत्तवित्तसुखमेवसो जन्म प्रतिपान्ते", "यस्तु सम्यकरोत्येतं गृहस्थः परमं विधिम् । तद्वर्णवन्धमुक्तोऽसौ लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ॥ यस्त्वेता नियतं चर्या वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः । स दुहत्यग्निवदोपा जयेल्लोकांश्च शाश्वतान् ॥ मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितबुद्धियुक्तः । अनिन्धन ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोक श्रयते द्विजाति:।।" इत्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणेभ्यः । एतेपामेव मोक्षा- पेक्षया सम्यगनुष्ठितानां यत्फलं तद्वक्तुमारभते-स्वे स्व इति । खे स्वे यथोक्तभेदे कर्मण्यभिरतः तत्परोऽवि. कृतः पुरुपः संसिद्धिं स्वकर्मानुष्ठानाशुद्धिक्षये सति कार्यान्द्रयमनसां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां लभते प्राप्नोति । कथं लभते इसपेक्षायामाह-स्वकर्मनिरतः । यथा येन प्रकारेण सिद्धिमुक्तलक्षणां विन्दति लभते तत्तथा शृणु ॥ ४५ ॥ प० टी०-अथ ग्राहाणादिकर्मणो ज्ञानहेतुत्वमाह-खे स्वे कर्मणीति साधेन । खे स्वे वणचितकर्म- ण्यभिरतः श्रद्धया प्रवृत्त: सन्नरः संसिद्धिं लभते । स्वकर्मनिरतः पुरुषी यथा येन प्रकारेण सिद्धि प्राप्नोति तन्मया वक्ष्यमाणं शृणु ॥ ४५ ॥ रा० टी०-अस्त्वेवं ग्राह्मणादिकर्म प्रविभक्तं ततः किमित्यत आह-स्खे स्व इति । प्रागुक्तवाह्मणादि- स्वकीये कर्मण्यभिरतः स्वस्वकर्मणा भगवदाराधनं कुर्वन्नरः संसिद्धिं मुक्ति ज्ञानद्वारा लभते प्राप्नोति । एतदेव सम्यग्विशदयितुं प्रतिजानी-खकर्मेति । विन्दति लभते । तत्तं प्रकार शृणु इति ॥ ४५ ॥ यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥ स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥ १६ ॥ त० टी०-तमेवाह-यत इति । यतः सर्वज्ञात्सर्वशक्तेर्भगवतो हेतोभूतानां ब्रह्मादिकीटान्तानां प्राणिनां प्रवृत्तिरुत्पत्तिश्चेष्टा वा भवति, येनकेन सर्वमिदं जगत्ततं व्यासं, स्वकर्मणा स्वाभाविकेन वैदि. केन लौकिकेनापि तमम्पर्य फलकर्तृत्वसमर्पणेन पूजयित्वा मानवः तत्मसादात् सिद्धिं तत्वज्ञाननि. हालक्षणां विन्दति लंभते ॥ ४६॥ .म०टी०-यवो मायोपाधिकचैवन्यानन्दधनात्सर्वज्ञात्सर्वशक्तेरीश्वरादुपादानात् निमिचाच सर्वान्तर्यामिणः प्रवृविरुत्पत्तिर्मायामयी स्वामरथादीनामिव भूतानां भवनधर्मणामाकाशादीनां येन केन सद्रूषण स्फुरण. रूपेण च सर्वमिदं दृश्यजातं निप्वपि कालेपु व व्याप्तं स्वात्मन्येवान्त वितं कल्पितस्याधिष्ठानानति- रेफात् । तया च श्रुति: यतो वा इमानि भूतानि जायन्ये । येन जावानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंवि. शन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तनोति" इति । अत्र यव इति प्रकृती पञ्चमी । यतो येनेति चकत्वं विरक्षितम् । "आनन्दो प्रक्षेति व्यजानात् । लानन्दादपेन सल्पिमानि भूतानि जायन्वे ।" इति च तस्य निर्णयबाम्यम् । ।
[अ० १८ श्लो० ४६] वश्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता १२५१ 'मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्' इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च मायोपाधिलाम: ! "य: सर्वज्ञः सर्व- वित्" इत्यादिश्रुत्यन्तरात्सर्वज्ञत्वादिलाभः । एवं च यौव एवायमर्थो भगवता प्रकाशित: 'यतः प्रवृचिर्भूवानां येन सर्वमिदं ततम्' इति । तमन्तयामिणं भगवन्तं कर्मणा प्रतिवर्णाश्रमं विहितेनाभ्यर्च्य तोपयित्वा तत्प्रसादादैकात्म्यज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धिमन्त:करणशुद्धिं विन्दति मानवः । देवादिस्तूपासना- मात्रणेति भावः ।। ११ ॥ शं० टी०- ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः' इति ' कर्ता क्रियाणां स स बुज्यते क्रतुः । स एव तत्कर्मफलं च तस्य । सुगादि यत्साधनमप्यशेपम् । हरेन किंचिद्वयतिरिक्तमस्ति ।' इत्येवच्छ्रुतिस्मृत्युक्तरीत्या मुख्याधिकारिणो विदुपः कर्तृकर्मतत्साधनबुझुक्चरुपुरोडाशाग्न्यादिपु प्रारष्ट्याऽव्याहत्या कर्माण्यनुतिष्ठव इष्टानिष्टत्वमि- नामित्रत्वदुष्टादुष्टत्वादिविपमयुद्धिः क्रमेण विनश्यति । तन्नाशाद्रागद्वेपादिदोपा नश्यन्ति । वनाशादहममेत्यभि- माना दोपा नश्यन्ति । वेपो रजस्तमोदोपाणां सर्वेषां क्रमेण नि.शेपविनाशे सत्वं स्वयमेव प्रसीदतीति योध- यितुं सर्वस्य सगुणनामात्रत्वज्ञानवतः पण्डितस्य तथा उदाराधनमेव कुर्वतः सत्त्वशुद्धिः सिध्यतीत्याह-- यत इति । 'जन्माद्यस्य यता', 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्युक्तप्रकारेण गतो यस्मान्मायोपाधिका- ब्रह्मणः सकाशाद्भूतानामाकाशादीनां तत्कार्याणां च प्रवृत्तिरुत्पत्तित्सकाशाद्धदादिवद्यस्मादिदं सर्वे समुत्प- नमित्यर्थः । किंच येन कारणभूवेन ब्रह्मणा तत्कार्यमिदं जगत्सर्वे चवं व्याप्तं मृदा घटवहिरन्तम्य पूर्ण भवति । सर्वात्मक परमात्मानं नुक्सुवाग्निहोत्रमन्त्रतन्त्रादिपु सर्वत्र ब्रह्मदृष्टिभूत्वा मानवोऽधिकारी विद्वान स्वकर्मणा श्रौतस्मादिना सात्त्विकेनाभ्यर्च्य श्रद्धाभक्तिभ्या नियमेनेष्ट्वा सर्वत्र ब्रह्मदृष्टिं च कृत्वा सिद्धि सत्वशुद्धिलक्षणां विन्दति-सत्त्वशुद्धि तत्कलभूतां ज्ञानसिद्धिं च प्राप्नोतीत्यर्थः । यत: प्रवृत्तिर्येन सर्वमिति विशेषणद्वयं सर्वत्र ब्रह्मदृष्टिकर्तव्यतत्वोधनार्थमेवेत्यवगम्यते । अधिकारिणां मध्यमादिभेदे तु " यः सर्वेषु भूतेषु विष्टन्सर्वेभ्यो भूचेभ्योऽन्तरः" इत्यादिश्रुत्युक्तरीत्या यतो यस्माद्भूतानां ब्रह्मादिस्वम्यान्दानां प्र. तिधेष्टा सिध्यति-या सर्व प्रवर्तयतीत्यर्थः । सर्वं जगदिदं येन ततं व्याप्तं यः सर्वात्मक इत्यर्थः । तममी- न्द्रादित्यादिदेवतारूपेण वर्तमानं सर्वनियन्तारं परमेश्वरं स्वकर्मणाऽभ्यर्च्य श्रद्धाभक्तिभ्यामग्न्यादिदेवान्स- वान्परमेश्वरबुद्ध्या इट्वा तदनुग्रहेण मानवो मुमुक्षुरधिकारी प्राह्मणादिःसिद्धिं सत्त्वशुद्धिं वत्फलभूत ज्ञानसिद्धि चक्रमेण विन्दतीत्यर्थः ॥ ४६॥ श्री०टी०-तमेवाइ-यत इति । यतोऽन्वर्यामिणः परमेश्वराङ्तानां प्राणिनां प्रवृत्तिश्चेष्टा भवति, येन च कारणात्मना सर्वमिदं विश्वं तवं व्याप्तं, समीश्वरं स्वर्मणाऽभ्यर्च्य पूजयित्वा सिद्धिं ल- भते मनुष्यः ॥ ४६॥ स. टी०-गायोपाधिरुचैतन्यानन्दकपनरूपतः ॥ सर्वनात्सर्वशक्तेः श्रीपरमेश्वरतो यतः ॥ १ ॥ उपा- दानानिमिधाच सर्वान्तर्यामिणः सतः ।। मायामयी समुत्पत्तिर्भूताना जनिधर्मिणाम् ॥ २ ॥ खादीनां भौविधानां च कल्पितानां मृपात्मनाम् ।। सत्तास्फुरणरूपेण येन चैकेन सर्वथा ॥ ३ ॥ दृश्यजातमिदं सर्वे सदा व्याप्तमसगिना ॥ नाविरेकोऽस्त्यधिष्ठानाकल्पिवस्य मनागपि॥ १ ॥ यो वेत्यादिवाम्योतो दार्श- चोऽय इह फुटम् ।। वमन्तयामिणं विष्णु स्ववर्णाश्रमकर्मणा ॥ ५ ॥ वोपयित्वाऽऽत्मविज्ञानोत्पत्तियोग्यत्वे- लक्षणाम् ॥ तत्प्रसादाद्धि य: शुद्धिसिद्धि ना लभते नरः ॥ ६ ॥ वर्णाश्रमं यमविकृत्य धियो विशुद्ध धर्म: श्रुतौ विहित ईशसमर्चनान्यः ॥ देनेश्वरं यमधिकारिजनः समय॑ प्राप्नोति सिद्धिमनिशं . वमई प्रपये ॥५॥ ४६॥ भाल टी-वमेव प्रकार दर्शयति-यत इति । यतः यस्मात् जगननादन्तर्यामिणो भूवानी प्राणिना .
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ४७] प्रवृत्तिरुत्पत्तिश्चेष्टा वा स्यात्, येनश्वरण सर्वे कृत्रमिदं ततं व्याप्त कार्यस्य कारणसचातिरिक्तसचाकत्वा. भावात् । तं परमात्मानं स्वकर्मणा प्रतिवर्ण पूर्वोक्तन अभ्यर्च्य सम्यक् पूजयित्वा आराध्य मानवोऽधिकृ. तो मनुष्यः सिद्धि केवलज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणा विन्दति लभते ॥ ४६ ।। 4 टी०-यत इति । यतो यस्मादन्तर्यामिरूपाद्भूताना देहानां चेष्टा भवति । येन कारणात्मनेदं दृश्य- मानं सर्वे ततं विस्तारितं तमीश्वरं कर्मणा वर्णाश्रमोचितेनाभ्याराध्य मानवः सिद्धि विन्दति लभते । अस्मिन्नर्थे पूर्व वह्वयः श्रुतय उपन्यस्ता: सन्ति ।। ४६ ।। रा० टी०-यत इति । यतो यस्मा जगवतो भूतानां प्राणिनां प्रवृत्तिश्चेष्टा भवति । येन च भगवता इई सर्व चराचरात्मकं जगत्ततं व्याप्तं तं भगवन्तं स्वकर्मणा समभ्यर्च्य शमदमादिपूर्वक पूजयित्वा सिद्धिं मोक्षं विन्दति लभते मानवः मनुष्यो ब्राह्मणादिरित्यर्थः ॥ ४६ ॥ श्रेयान स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नामोति किल्विपम् ॥ ४७ ॥ त० टी०-यतः परमेश्वरारापनलक्षणधर्मस्य तत्मसादात सिद्धिहेतुत्वमतः सर्वजनस्य तथाविधः स्वधर्म एव श्रेयस्कर इत्याह-श्रेयानिति । स्वधर्मः स्वेनोपादातुं योग्यः परमात्माराधनरूपो धर्मः विगुणः किंचिदङ्गविहीनोऽपि स्वनुष्टितात्सम्यगनुष्ठितादपि परधर्मात् श्रेयान् प्रशस्यतरः । यतः स्वभा- पनियतं पूर्वोक्तस्वभावेन नियतं नियमेनोक्तं कर्म युद्धादिकं कुर्वपि किल्विपं न मामोति ॥ ४७ ॥ म० टी०-यतः स्वधर्म एव मनुष्याणा भगवत्प्रसादहेतुरतः-शानिति । परधर्मात्सम्यगनुष्ठितादपि श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वधर्मो विगुणोऽसम्यगनुष्ठितोऽपि । तस्मात् क्षलियेण सता त्वया स्वधर्मो युद्धादिरे- वानुष्ठेयो न परधर्मो भिक्षाटनादिरित्यभिप्राय: । ननु स्वधर्मोऽपि युद्धादिनन्धुवधादिप्रत्यवायहेतुत्वान्नानुष्ठेय इति नेत्याह-स्वभावनियतं पूर्वोकं शौर्य तेज इत्यादि स्वभावजं युद्धादि कर्म कुर्वन् किलिपं पापं वन्धुवधादि- निमित्तं न प्राप्नोति । तथा च प्राग्व्याख्यातं सुखदुःखे समे कृत्वत्यत्र विहितज्योतिष्टोमाङ्गपशुहिंसाया इव विहितयुद्धागवन्धुहिसाया अपि प्रत्यवायहेतुत्वाभावात् । तथा चोक्तमघस्तात् ॥ ४७ ॥ शं० टी०-ननु ब्राह्मणस्य भिक्षणे निमित्तमाचार्यो यज्ञो विवाह इति मुमुक्षोश्चित्तशुद्धि तत्फलं वाऽऽनु- मिच्छतो यज्ञादेः प्रतिमद्रव्यैकसाध्यत्वात्प्रतिप्रहस्यैव पापहेतुत्वात् प्रतिगृहीतद्रव्येण क्रियमाणयागापेक्षया प्राचारिवदमविगृह्य शुद्धवृत्याऽवस्थानमेव तस्य शोधक निष्पापकं च भवति । तथा हिंसाप्रधानत्वाद्युद्धस्य वत्साध्येन द्रव्येण क्रियमाणराजसूयादियागायनुष्ठानापेक्षया शुद्धिकामस्य क्षत्रियस्य प्रतिग्रहभीरुयाहाणव- छुद्धगृत्याऽवस्थानमेव शोधकं निष्पापं च भवतीत्याशङ्कायामा-श्रेयानिति । परधर्मात्परो जात्या वर्णन वाश्रमेण वा स्वस्मानिन्नः स्वविलक्षणस्वस्य धर्मादाचारात्स्वनुष्ठिवादगलोपराहित्येन सम्यगाचरितात् विगु- णोऽपि स्वलक्षणपोटकल्यहीनोऽपि दोपवानपि ग्राहमणस्य क्षत्रियस्य वाऽन्यस्य या स्वधर्म एव श्रेयान श्रेष्ठो निथेयसस्य साधनं भवति, न तु सम्पगनुष्ठितोऽपि परधर्मस्तस्याविहितत्वादित्यर्थः । तदेव विस्पष्टयति- स्वभावेति । प्रामणस्याधिकारः प्रवचनयाजनप्रतिप्रहाः । न दोपो हिंसायामाहवेऽन्यत्रेत्येवं स्वभावनियत स्वभावस्ततजातिस्तमुद्दिश्य नियत शास्त्रेण विहितं कर्म प्रतिमई उदुपार्जितद्रव्येण यागाद्यनुष्ठानं च ब्राह्मणः, .युद्धादिलक्षणं कर्म तदुपाजितद्रव्येण यागाद्यनुष्ठानं च क्षत्रियः कुन्किल्यिपं चित्तशुद्धिप्रतिनन्धकं नाप्नोति । स्वजातः स्ववर्णस्य स्वाश्रमस्य विहिदधर्मानुष्ठानेन पुरुषः पापी न भरतीत्यर्थः ॥ ४७ ॥ श्री०टी०-स्वकर्मणेतिविशेषणस्य फलमाह-श्रेयानिति । विगुणोऽपि स्वधर्मः सम्यगनुष्ठितादपि पर- . .
[अ० १८ लो०४८] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता धर्माच्छ्रेया प्ठः । न च बन्धुवधादियुक्तायुद्धादेः स्वधर्माद्भिक्षाटनादिपरधर्मः श्रेष्ठ इति मन्तव्यम्, यत; स्वभावेन पूर्वोक्केिन नियतं नियमेनोक्तं कर्म कुर्वन्किल्लिा नाप्नोति ॥ ४७ ॥ स० टी०-यत: स्वधर्म एवास्ति भगवत्तोपकारणम् ।। अहो वरेण्यः वो धोऽसम्यक्त्वेनाप्यनुष्ठितः ॥ १ ॥ परधर्मादविहितात्सम्यक्त्वेनाप्यनुष्ठितात् ॥ क्षत्नियेण सता वस्मात्स्वधर्मो भवताऽधुना ॥ २ ॥ संग्रामादिरनुष्ठेयो न तु भिक्षादिरन्यगः ॥ ननु युद्धं स्वधर्मोऽपि वन्धुर्हिसादिपापत् ॥ ३ ॥ कयं मया- ऽस्त्यनुष्ठेय इत्याशङ्कयाह भापतिः ॥ पूर्वोक्त शौर्यमुख्यं यत्क्षत्रियाय स्वभावजम् ॥४॥ युद्धादि फर्म कुर्वन पापं हिंसादिदोषजम् ॥ शास्त्रप्राप्ततचाऽऽमति वैधी हिंसा न पापदा ॥ ५ ॥ ज्योतिष्टोमाङ्गपश्वादिहि- साया इव शास्त्रतः । युद्धाङ्गबन्धुहिंसाया: प्रत्यवाये न हेतुता ॥६॥ १७ ॥ भा० टी०-यतः स्वकर्मणा परमात्मानमभ्यर्च्य सिद्धि लभते तस्मात्-श्रेयानिति । वो धर्मः स्वधर्मों विगुणोऽसम्यगनुष्ठितोऽपि परधर्मात्स्वनुष्ठितात्सम्यगनुष्ठितात् श्रेयाप्रशस्थवरः । ननु युद्धादिलक्षणे स्वधर्म कुर्वन्नपि हिंसानिमित्तं पापं प्राप्नोति, तसर्थ स्वधर्मः श्रेयानिति तत्राह-स्वभावनियतं कर्म । 'शौर्य जो धृतिर्वाश्य युद्धे चाप्यपलायनम्' इत्यादि कर्म स्वभावनं कुर्वन किलिपं नाप्नोति । यथा विपनः कृमि: विपकृतं दोपं न प्रतिपद्यते, तथाऽयमाधिकृतः पुरुषो दोपवदपि स्वभावनियवं कुर्वन् पापं नानोतीत्यर्थः । तदुकं 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधस्विनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परभो भयावहः इति । एवेन तर्हि दोषरहितमेव भिक्षाटनादि सर्वैरनुष्ठीयताम्, अतोन पापप्राध्याशङ्केति न शङ्कनीयम् । तर्हि पापप्रातिशङ्का परि- हर्तुमकर्मनिष्ठतेव सर्वः कुतो न संपाद्यत इति शङ्कापि ने कर्तव्या। नहि कश्चिक्षणमपि जातुनिष्ठत्यकर्मकृत् । 'नहि देहभृता शक्य त्यक्तुं कमाण्यशेषतः' इत्यनात्मनाकर्मनिष्ठतायाः संपादयितुमशक्यत्वात् ।। ४७ ॥ १० टी०-अथ स्वधर्म प्रशंसन्नाह-श्रेयानिति । सम्यगनुष्ठितादपि परधर्मात्सकाशादिगुणो लौकि. कदृष्टया गुणरहितोऽपि स्वधर्म: श्रेयान श्रेयस्करः । यथा हिंसाप्रधानत्वेन विंगुणोऽपि क्षात्रधर्मः परधर्मा- दाह्मणधर्मादुत्कृष्टादपि श्रेयान् । यतः स्वभावेन पूर्वोक्तेन स्वधर्मे नियतं नियमेनोक्त की कुर्वन् कित्ति पातन प्राप्नोति ॥१७॥ रा० टी०-स्वधर्मनिरतत्वमावश्यकमित्येतदुपपादयाति-श्रेयानिति । विगुणोऽङ्गहीनोऽपि स्वधर्मः सम्यानुष्ठितात्परधर्माच्छ्यान्पुमर्थसाधनम् । विगुणः कथं श्रेयानित्यत आह-स्वभावेति । फिलिप बैगु- ण्यकृतदोपं नाप्नोति । वैगुण्यशकथा स्वधर्मत्यागो न कार्य: ।। ४७ ॥ सहजं कर्म कौन्तेय ! सदोपमपि न त्यजेत् ॥ सारम्भा हि दोपेण धूमेनामिरिखावृताः॥ १८ ॥ त० टी०-ननु पदि कर्मणो ज्ञानोत्पत्तिरेवान्ततः फलं चेत्तहि हिंसादिदोपयुक्तं कर्म परित्यज्य शानाभ्यास एव यत्नः कर्तव्या, किमनेन रेयेन कर्मणेति चेतनाइ-सहजमिति । हे कौन्तेय ! सहज स्वभावविहित कर्म सदोपमपि न त्यजेत् । दि यस्माद सारम्भाः सबै परमेश्वराराधन- व्यतिरिक्ता आरम्भाः कर्मज्ञानयोगाद्युपाया दोपेगाहताः । कथम्? धूमेनानिरिख । यथा शीत- तमोनाशकोऽपि अमिरान्धनसंयोगजन्यथूमारतो न सम्यग्ज्वलति प्रकाशते च, तथा कर्मानुष्ठानमः न्तरेण सत्त्वशुद्धधभावेन यधार्थतत्वज्ञानं न स्यात् । असंभावनाविपरीतभावनादोपानिः । तस्सा- स्वभावविहितं कर्म फलकर्तृत्वत्यागेन यथाशक्ति अनुष्ठाय निर्मळेऽन्तःकरणे सति निखिलममा विहाय तत्त्वज्ञाननिष्ठा स्वयमेव संपद्येत । " अविद्यया मृत्यं तीली विद्ययाऽमृतमश्नुते " इति श्रुतेः । तस्मात्स्वाधिकारयोग्यकर्मणा परमात्मानमभ्यर्य ज्ञाननिहालक्षणां सिदि मामोतीति सिदम् ॥ven . - १५८ 4 । .१२५४ श्रीमद्भगवद्गीता [१० १८ लो० ४८] म०टी०-यस्मादेवं विहितहिंसादेन प्रत्यवायहेतुत्वं, परधर्मश्च भयावहः, सामान्यदोषेण च सर्वकर्माणि दु. शानि, तस्मादज्ञो वर्णाश्रमाभिमानी-सहजमिति । हे कौन्तेय! सहज स्वभावजं कर्म सदोषमपि विहितहिंसायु. क्तमपि ज्योतिष्टोमयुद्धादि न त्यजेवन्तःकरणशुद्धेः प्राग्भवानन्यो वाहनधनात्मज्ञ कश्चित्क्षणमपि कर्माण्यकृत्वा स्थातुं शक्नोति । न च परधर्माननुतिष्ठन्नपि दोपान्मुच्यते । सर्वारम्भाः स्वधर्माः परधर्माश्च स हि यस्मात् दोषेण त्रिगुणात्मकत्वेन सामान्येनावृताः व्याप्ताः सदोपा एव । तथा च प्राग्व्याख्यानम्-'परिणामतापसंस्का- रैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दु खमेव सर्व विवेकिन.' इति । तस्माद्गत्याऽनात्मज्ञः कर्माणि कुर्वन विपजकमिरिव विर्ष सहज कर्म युद्धादि त्रिगुणात्मकत्वेन सामान्येन वन्धुवधादिनिमित्तत्वेष विशेपेण च सदोपमपि न त्यत् सर्वकर्मत्यागासमर्थत्वात् । सर्वकर्मत्यागसमर्थस्तु शुद्धान्त:करणस्त्यजेदेवेत्यभिप्रायः ॥ १८ ॥ शं० टी०-ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य वा स्वधर्मस्यामिष्टोमादेयुद्धस्य च बहिदोपवत्प्रतीयमानत्वेऽपि विध्यु- तत्वेन निर्दुष्टत्वात्तदनुष्ठानं मुक्तय एव भवति, न तु बन्धायेति बोधयित्वा पुनरपि यागो वा संग्रामो हिंसाप्रधानत्वेन दोपवानेव भवतीति कथं कर्तुं शक्यत इत्याशङ्का सर्वथाऽपि न कर्तव्येत्युक्तमेवार्थ दृढ- यितुमाह-सहजमिति । सहज 'कर्मणा जायते द्विज. इतिन्यायन सहजन्मना द्वितीयेन जायत इति सहज जावितः प्राप्त, जाति वर्ण च निमित्तीकृत्य शास्त्रेण विहितं कर्म स्वधर्ममित्यर्थः । सदोपमप्युक्तरीत्या दोषयु- कमप्यारुरुक्षुमोक्षेच्छाह्मणादिर्न त्यजेन्न संन्यसेदित्यर्थः । ननु दोपवकर्मणोऽनुष्ठानानिर्दुष्टस्य परधर्मस्या- श्रयणं युक्तमेवेति चेद्भवाना प्रष्टव्यः-कर्तव्यस्य कर्मणस्त्यागः दुष्टत्वयुद्धया वा, किमसाधनत्वबुद्धया वा, किमसत्त्वयुद्धपा वा, परधर्मस्त्वदुष्टः स आश्रयणीय इति वा ? नाया, विहितस्य परित्यागे प्रत्यवायप्रस- नात् । न द्वितीयः, अविरतस्यासाधनत्ववुद्धयनुत्पत्तेः विरक्तस्य त्यक्तव्ये कर्मणि गुणदोपविचारासंभ- पाच । न तृतीयः, अनात्मनस्य कर्मतत्साधनफलेप्वसत्वबुद्ध्यनुसंत्तेः । नापि चतुर्थः, परधर्मस्यापि कर्म- वेन दोपवत्त्वाव्यभिचारादिति । कुटीचकस्याप्यविरकस्य शिसायज्ञोपवीतादिमत्वेन कर्मित्वातकर्मणोऽपि साधनसाध्यत्वेन दोपवत्त्वमेव निश्चित्य सवर्णाश्रमिभिः क्रियमाणं कर्म दोपवदेव " न हिस्यात्सर्वा भृ- वानि ॥ इतिश्रुत्या भूतहिंसाया निषिद्धत्वात्सर्वस्यापि कर्मणो वैदिकस्य फुशसमिदादिद्रव्यसाध्यत्वेन हिंसा. प्रधानत्वात् सर्ववर्णाश्रमिभिः क्रियमाणं कर्म सर्वमपि हिंसाप्रधानत्वेन दोपयुक्तमेव भवतीति सर्वस्यापि फर्मणो दोपवत्त्वं दर्शयितुमाद-सर्यारम्भाहीति । यद्वा ' काममय एवायं पुरुपः' इति, ' यद्यद्धि युरुते जन्तुस्तत्तकामस्य चेष्टितम् । इनि, 'रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णातङ्गसमुद्भवम् । तन्निवनाति कौन्तेय कर्म- सदन देहिनम् । इविन्गायेन कर्मणः सर्वस्यापि कामसंकल्पादिरजोगुणकार्यस्वेन दोपवत्त्वात्सर्वाण्यपि फर्माणि दोपवन्त्येवेत्युच्यन्ते-सर्वति । हि यस्मात्कारणात्सर्वारम्भा आरभ्यन्ते क्रियन्त इत्यारम्भाः सर्व- घर्णाश्रमिभिः क्रियमाणानि कर्माणि सर्वाण्यपि हिंसादोपेण रजोदोषेण वाऽमृता व्याता धूमेनामिरिव । यथा अग्ने स्वोत्पत्तौ धूमेन विना भावाभावस्तथा वैदिकस्य कर्मपोऽपि हिंसया कामेन वा विना भावाभावात्सर्वमपि कर्म दोपवदेव । यस्मादेवं तस्मात्परधर्मोऽपि दोपवानेव भवति । परधर्माचरणेन स्वाभाविक एको दोपः, सधर्मत्यागकतो द्वितीयञ्च, अविहिताचरणं नृतीयः, ईश्वराज्ञोलइनं चतुर्धश्वापतति । तस्मादारुरुक्षोरविरकस्य मक्षिकामस्य जाति वर्गमाश्रमं च निमित्तीकृत्य श्रुतिस्मृतिभ्यां विहिवं कर्म सदोपमपि सत्त्वशुद्धयेऽश्य फतव्यम् । स्वधर्माचरणेनैव शुद्धारमा प्रामणादिमुक्किं गच्छति । तथाच स्मृतिः- वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यातन्द्रितः । यदि कुर्वन्यधाशक्ति ग्रामोति परमां गतिम् । इवि । यत एवं ततो वर्णाश्रमिणा मुमुक्षूणा पन्धमुफये सधर्म एव कर्तव्य इति सिद्धम् ॥ १८ ॥ श्री० टी०-यदि पुनः सांस्यदृष्टया स्वभौ हिंसालय दोपं मत्वा परधर्म श्रेष्ठं गन्यसे, बर्हि सो. . . ।
हि [अ० १८ श्लो. ४९] वरवप्रकाशिकायष्टटीकोपेता पत्वं परधर्मेऽपि तुल्यमित्याशयेनाह-सहजमिति । सहज स्वभावविहितं कर्म सदोपमपि न त्यजेत् , यस्मात् सर्वेऽप्यारम्भा दृष्टादृष्टार्थानि सर्वाण्यपि कर्माणि दोपेण केनचिदावृता व्याप्ता एव, यथा सहजैन धूमेनाग्निरावृत्तस्तद्वत् । अतो यथाने मरूपं दोपमपाकृत्य प्रवाप एव तमाशीतादिनिवृत्तये सेव्यते, तथा कर्मणोऽपि दोषांशं विहाय गुणांश एव सत्त्वशुद्धये सेव्यत इत्यर्थः ॥ ४८ ॥ स० टी०-यतो विहिताहिंसादेः प्रत्यवाये न हेतुता ॥ भीतिदः परधर्मश्च सर्वे कर्म कलङ्कवत् ॥ १ ॥ वस्मादज्ञोऽधिकारी यो वर्णाश्रममतिः पुमान् ॥ स्वभावजं त्यजेन्नन कर्म दोपान्वितं ह्यपि ॥ २॥ ज्योति- टोमादिकं यद्वत्तथा युद्धादिकर्म च । अन्तःकरणशुद्धेः प्राग्भवान्वान्योऽथवा जनः ॥ ३॥ नान्यः कश्चित्क्षणं जातु विना कर्मेह तिष्ठति ॥ समुत्पन्नं यतः कर्म सर्वेषां जन्मना सह ॥ ४ ॥ न चान्यधर्मानुष्ठायी दोपान्मुच्यत आग्रही ॥ स्वधर्माः परधर्माश्च सर्वारम्भपदेरिताः ॥ ५ ॥ यस्मात्रैगुण्यदोपेण सामान्येना- वृचाः किल || विकारतापसंस्कारगुणवृत्तिविरोधतः ॥१॥ दुःखमेव जगत्सर्वे कर्मजन्यं विवेफिनः ॥ केवलं मूढवुद्धीनां सुखपदासते जगत् ॥ ७ ॥ तस्माद्गत्या नात्मज्ञः कुर्वन्कर्माणि शास्त्रतः ॥ तिष्ठेत्त्या- गासमर्थश्च यतोऽसौ सर्वकर्मणाम् ॥ ८ ॥ कर्मत्यागसमर्थस्तु शुद्धान्तःकरणः पुमान् ॥ स वेदान्तविचा- रार्थ सबै विक्षेपकं त्यजेत् ॥ ९ ॥ करोतु कर्माणि स मा करोतु वा मुकुन्दपादान्जरसपहः सुधीः ।। गृहे वने वा निवसन्ध्रमोज्झितो मुकुन्द एवास्ति स यो हि तद्रविः ॥१०॥४८॥ भा० टी०-सहजमिति । अत: सहज जन्मनैवोत्पन्नं स्वभावनं कर्म न त्यजेत् । कुन्तीपुत्रेण त्वया युद्धे अपलायनादि सहज कर्म न त्याज्यमिति संयोधनाशयः । दोषवत्सजमपि कर्म परित्यज्य निःपमन्य. दीयं कर्म कुतो नाश्रयणीयमित्याशङ्का दोपरहितस्य कर्मण एवाभावादित्याह-सारम्भाः । हि यस्मादरा- भ्यन्त इत्यारम्भाः सर्वकर्माणि त्रिगुणात्मकत्वात्सहनेन धूमेनामिरिवावृताः व्याप्ता: सदोपा इत्यर्थः । तथाच सहजस्य स्वधर्मास्यस्य कर्मणः परित्यागेन परधर्मानुष्ठानेऽपि सर्वकर्मणों दोपवत्वाद्दोपान्नैव मुच्यते, भयावहश्च परधर्मः । न च शक्यतेऽशेनाशेषतः कर्म त्यक्तुं यतस्तरमान त्यजेदित्यर्थः ॥ ८॥ प० टी०-तदेवाह-सहजमिति । भो कौन्तेय ! सहज स्वभावविहिवं कर्म सदोपमपि न त्यजेत् । हि यस्मात् कारणात सर्वारम्भा: सर्वकर्माणि दोपेण लौकिकेनावृता व्याता: सन्ति । अत्र दृष्टान्तमाह- धूमेनेति । यथा प्रकाशके होमाहे वामौ धूमलक्षणो दोपोऽस्ति, तथाप्यनि: ,"अनिमीले” इत्यादिश्रुतिभिः स्तूयमानः सेन्यत एव, तथैव ब्राह्मणादिधर्मेषु देन्यनिष्क्रियत्वगोपीढनाधिकार्यरूपा दोपाः सन्ति तथापि शाखविहितत्वात एवानुष्ठेया नान्य इत्यर्थः ॥ १८ ॥ रा० टी०-वैगुण्यदोपरय सर्वत्रावर्जनीयत्वादित्याह-सहजमिति । हि यस्मात्सर्वारम्भाः सर्वकर्माणि धूमेनापिरावृत इव दोपेणाता एव । ततः सोपमपि सहन कर्म न त्यजेदिति ॥ १८ ॥ असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।। नैष्कर्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥ १९ ॥ त. टी-तदेवं स्वकर्मणाऽऽराधितपरमपुरुषस्य तत्त्वज्ञाननिष्ठालक्षणा सिदिता । इदामी तस्या अपि यत्फलं स्याचनिर्दिशति-असक्तवुद्धिरिति । असक्ता सर्वनासक्तिशून्या बुद्धिर्यस्य सः, जितात्मा वशीकृतमनाः, यतो विगतस्पृहो विशेषेण गता दूरीभूता स्पृहा फलविपया इच्म यस्य स संन्याप्तेन " सनं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः साविको मतः " इत्युक्तलक्षणेन नेप्फम्यानेदि. कर्मनिटतिलक्षणां. परमां प्रकृष्टां पूर्वोक्तसिद्धाननिष्ठाया अपि फलभूता सकिष्टां श्रीभगवत्स्वरूप मालविग्रहविषयकयीगङ्गामवाइवदनवच्छिन्नस्मृतिसंतानरूपा परां भक्तिमधिगच्छति प्रामानि ।। ४।। .
- . १२५१ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ शो० ४९] म०टी०-कः पुनः सर्वकर्मत्यागसमर्थः ? यो नित्यानित्यवस्तुविवेकजेनेहामुत्रार्थभोगवैराग्येण शमदमा- दिसंपन्नः कर्मजां सिद्धिमशुद्धिपरिक्षयद्वारा मुमुक्षुः शुद्धब्रह्मात्मैक्यजिज्ञासां प्रातः सः स्वेष्टमोक्षहेतुब्रह्मा- स्मैक्यज्ञानसाधनवेदान्तवाक्यन्नवणादि कर्तुं सर्वविक्षेपनिवृत्त्या तछेपभूतं सर्वकर्मसंन्यासं श्रुतिस्मृति- विहितं कुर्यादेव ! " तस्मादेवंविच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्येत् " इति श्रुतेः 'सत्यानृते सुखःदुखे वेदानिमं लोकममुं च परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत्' इति स्मृतेश्च । उपरवस्त्य- कसर्वकर्मा भूत्वाऽऽत्मानं पश्येदात्मदर्शनाय वेदान्तवाक्यानि विचारयेदिति श्रुत्यर्थः । एतादृश एव "ब्रह्मसं. स्थोऽमृतत्वमेति" इति श्रुत्या धर्मस्कन्धत्रयविलक्षणत्वेन प्रतिपादितः परमहंसपरिव्राजकः परमहंसपरियाजक कृतकृत्यं गुरुमुपसृत्य वेदान्तवाक्यविचारसमर्थो यमुद्दिश्य 'अथाऽतो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादिचतुर्लक्षणमीमांसा भगवता पादरायणेन समारम्भि। कीदृशोऽसावित्याह-असक्तबुद्धिरिति सर्वत्र पुत्रदारादिपु सक्तिनिमित्वेष्वपि असक्तबुद्धिः अहमेपो मर्मत इत्यभिष्वङ्गरहिता बुद्धिर्यस्य सः । यतो जितात्मा विषयम्यः प्रत्याहृत्य वशीक- तान्तःकरणः । विपयरागे सति कथं प्रत्याहरणं तत्राह-विगतस्पृहः । देहजीवितभोगेप्वपि वान्छारहितः सर्वदृश्येषु दोपदर्शनेन नित्यबोधपरमानन्दरूपमोक्षगुणदर्शनेन च सर्वतो विरक्त इत्यर्थः । य एवं शुद्धान्त:- करण: स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः' इति वचनप्रतिपादितां कर्मजामपरां सिद्धिं ज्ञानसाधनवे- दान्तवाक्यविचाराधिकारलक्षणां ज्ञाननिष्ठायोग्यवां प्राप्तः स संन्यासेन शिखायज्ञोपवीतादिसहितसर्वकर्म- त्यागेन हेतुना तत्पूर्वकेन विचारेणेत्यर्थः । नैष्कर्म्यसिद्धिं निष्कर्म ब्रह्म तद्विषयं विचारपरिनिष्पन्न ज्ञानं नष्कम्यं तद्रूपां सिद्धि परमा फर्मगाया अपरमसिद्धेः फलभूतामधिगच्छति साधनपरिपाकेण प्राप्नोति । अथवा संन्यासेनेतीत्यंभूतलक्षणे तृतीया । सर्वकर्मसंन्यासरूपा नेकसिद्धिं ब्रह्मसाक्षात्कारयोग्यतां नैर्ग- ण्यलक्षणा सिद्धि परमा पूर्वस्या: सिद्धेः सात्त्विक्याः फलभूतामधिगच्यतीत्यर्थः ॥ ४९ ।। शं० टी०-ज्ञानकर्मणो: साध्यसाधनभावं सर्वशाखप्रसिद्ध बोधयितुमेवमारुरुक्षोमीक्षककामक्ष्य कर्तव्य- स्य कर्मणो दोपवत्त्वेऽपि चित्तशुद्धेरन्यासाथ्यत्वेनावश्यकरणीयत्वं, श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितत्वेन निर्दुष्टत्वं, श्रेयःसाधनत्वं, पेन सात्त्विकेन कर्मणा बहुजन्मभिः समाराधिवपरमेश्वरप्रसादाचित्तशुद्धिं च प्रतिपाद्य सा- विक्यैव बुद्धघा सात्विकेन च कर्मणा समाराधितपरमेश्वरप्रसादात्सम्यक्सत्त्वशुद्धि प्राप्तवतः सद्गुरोः सक- दुपदेशमात्रेण संप्राप्तात्मज्ञानस्यारूढस्य संन्यासयोगेन ब्रह्मप्राप्ति निर्दिशति-असक्तेति । असक्तबुद्धिः सर्वत्र विषयान्तरे कर्मान्तरे देशान्तरे लोकान्तरे देवतान्तरे च भोक्तुं कर्तुं स्थातुं प्राप्तुमुपासितुं च असता. ऽननुरका दत्तद्विपयैः संवन्धरहिता बुद्धिर्यस्य सोऽसंकबुद्धिः-सर्वदृश्यमिथ्यात्वं निश्चित्य सर्वत्र विषयमाने सम्पविरक्त इत्यर्थः । सर्वमिध्यात्वनिश्चयेन विषयाऽननुपक्तयुद्धित्वेऽपि चलचित्तस्य ज्ञाननिष्ठासंभवाद्विदुषो पश्यात्मत्वेन भाषचव्यमित्याह-जितात्मेति । जिवस्तीववैराग्येण श्रद्धापूर्वकचिरकालिकनित्यनिरन्तरसम- त्ययावृत्यभ्यासेन निर्जितो ब्रह्मण्येव स्थिरता गमित आत्मा मनो यस्य स जितात्मा वशीकृतचित्त इत्यर्थः । असक्तयुद्धिवे जितात्मत्वेऽपि च सिद्धे शरीरसौख्यापेक्षावतः परिग्रहवतश्च योगिनो ज्ञाननिष्ठा न सिध्य- त्यतस्तद्राहित्येन भवितव्यमित्याह-विगतस्पृह इति । देहात्परिप्रद्दाच विशिष्य गता विगता देहपरिप्रहक्षेम- विपया स्पृहाऽपेक्षा यस्य स विगवरह:-काले प्रारम्धप्रापितान्नभोजी कोपीनकन्यादण्डकुण्डिकामात्रधारी च भवेदित्यर्थः । एवमुक्कसानसंपन्नः सम्यग्विदितात्मतत्त्वस्तीवमुमुक्षुरारूढः संन्यासेन सति ब्रह्मणि स्वात्मना • विदिते नितरामास: संन्यास: समाधिनिरन्तरप्रझनिष्ठा सेन संन्यासेन निरन्तरज्ञाननिष्ठया । यद्वा, 'सत्यं शानमनन्तं ब्रह्म इत्युकटणं प्रवाहमिति स्वस्य ब्रह्माकारेण निवरामितरमावापतिराहित्येनावस्थान येन सिम्यवि स संन्यासः सन्याज्ञानमहमेशधरवाहमुरिष्टादहमेवेदं सर्पमित्येवंलक्षणं-देन संन्यासेन । .
१२५७ । अ० १८ लो० ४९] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेवा स्वयाथात्म्यविज्ञानेन नैष्कर्यसिद्धिं न यत्र कर्म तनिष्कर्म निष्क्रिय परं ब्रह्म “निकलं निष्क्रिय शान्तम् " इतिश्रुतेः । निष्कर्मणो भावो नैष्कर्म्य ब्रह्ममावस्तत्प्राप्तिनझसिद्धिनिर्विशेषब्रह्मात्मनाव- स्थितिलक्षणा तां नैष्क्रयसिद्धि परमां ब्रह्मभावापत्तेरुचमसिद्धयन्तरामावादनुत्तमां-सर्वा अप्य- णिमादिसिद्धयः सालोक्यादिसिद्धयो वा भेदप्रत्ययहेतुत्वेन मोहकतया पुरुपं संसारयन्ति । नैष्कर्म्य- सिद्धिस्तु स्वसिद्धिकारणेन सम्यग्दर्शनेन द्वैततस्प्रत्ययहेतुभूवाज्ञानधान्तविध्वंसनं कारयित्वा संसारा- द्विनिवयं ब्रह्मविद स्वाराज्यसाम्राज्यसुखे संस्थापयत्यवः परमत्वं युक्तं नैष्कर्यसिद्धेः । वामेतां नैष्क. यसिद्धि ब्रह्मविद्यतिः संन्यासेन निरन्तरब्रह्मनिष्ठासंभाविवसम्यग्दर्शनेनैवाधिगच्छति, नवन्येनेति सिद्धम् । यता नेप्कयसिद्धि नैष्कम्यै निर्विशेषमनभावस्वत्प्राप्तिष्कम्यसिद्धिस्ता संन्यासेन 'अहंकार वलं दर्पम्' इति वक्ष्यमाणलक्षणेनाहमादित्यागेनाधिगच्छति । यद्वा 'स्वकर्मणा तमभ्यय इतिन्यायेन मुमुक्षोः सात्त्विकस्य सात्त्विकैथुद्धिश्रद्धादिभिर्युक्तस्य सात्त्विकेनैव कर्मणा वैदिकेनानेकजन्मभिः समाराधिवपरमेश्वरानुमहात्स- मुपात्तसत्त्वशुद्धेस्वतः सकृदुपदेशमात्रेण संप्राप्तात्मतत्त्वविज्ञानस्य पण्डितस्य तु “ते ह म पुत्रैपणायाश्च " इत्युक्तप्रकारेण सर्वकर्मसंन्यास एवाधिकारो नं कथंचिदपि कर्मणीति बोधयितुमेवंलक्षणस्यैव संन्यासयोग्यत्व- मित्यधिकारिलक्षणानि वदन् परिपकान्तःकरणस्य नैष्कासीद्धि प्रतिपादयति-असक्तबुद्धिरिति। असक्तबुद्धिः सर्वत्र पुत्रमित्रकलनधनादिष्वसत्ता सचिौहादनुरक्तिस्तद्रहितत्वादसता रागममतादिदोपनिर्मुका बुद्धिर्य- स्य सोऽसकबुद्धिः सर्वत: सम्यग्विरक इत्यर्थः । वात्कालिकवैराग्ये सत्यप्यस्थिरात्मनः पश्चादागादयो वि- पयप्रवृत्तिस्त्रया पातित्यं च स्यादतस्तदभावेन भवितव्यमित्याह-जितात्मेति । जिवो निर्जिवस्तीमुमुक्षया मुहुर्मुहुर्विषयदोपसंदर्शनेन तदुदिततीववैराग्येण वेपु वन्धकवयुद्धया भयेन चासत्त्वज्ञानेन च सम्यग्विषय- वैमुख्यं गमित आत्मा मनो यस्य स जितारमा वशीकृतचित्त इत्यर्थः । तीनमोक्षेच्छादिभिर्जितात्मत्वे सिद्धेऽपि औपधवदशनमाचरेदित्युक्तलक्षणाभावे देहसौख्यापेक्षावतो ज्ञानतत्फलासंभवात्संन्यासे नाधिकारोऽतस्तद. भावेन भवितव्यमित्याह-विगतस्पृह इति । देहसौख्यात्परिपहसामीचीन्याद्विशिष्य गवा स्पृहा आशा यस्य स विगतस्पृहो देहभरणापेक्षारहित इत्यर्थः । एवलक्षणलक्षितः शुद्धात्मा सद्गुरुप्रसादाद्विशातात्मस्वरूपो मुमुक्षुर्विद्वान् नैष्कसिद्धिं श्रौतस्मादिसर्वकर्मभ्यो निर्गतो यः स निष्कर्मा तस्य भावो नष्क विहितप्रतिपिद्धादिसर्वकर्मसंवन्धराहित्येनावस्थान नैष्कम्य कर्मवद्विभ्योरविण्यत्वं तस्य प्राप्ति कम्पसि- द्विस्तां परमां परमपुरुषार्थस्य मोक्षस्य हेतुभूतज्ञाननिष्ठासाधनत्वात् परमां नैष्कर्म्यसिद्धि-संन्यासेन हि वि- हितानां कर्मणां ससाधनानां विधिना परित्यागः संन्यास:-वेन संन्यासाश्रमेण यतिधर्मेणैव गच्छति । न तु ब्रह्मचर्याश्रमेण, नापि गार्हस्थ्येन, नापि च वानप्रस्थ्येन नैकये सिध्यति । अतो ब्रह्मविदो नैष्कम्य संन्यासेनैव प्राप्तव्यमिति सिद्धम् ॥ ४९॥ श्री० टी०-ननु कथं कर्मणि क्रियमाणे दोषांशप्रहाणेन गुणांश एव संपत्स्यत्व इत्यपेक्षायामाह-अस- तेति । असक्ता सङ्गशून्या चुद्धिर्यस्य, जितात्मा निरहंकारः, विगतस्यहो विगता स्पृहा फलविषयेच्छा यस्मात्स:-एवंभूतेन 'स त्यागः सात्विको मवः' इत्येवं पूर्वोक्तन कसिक्तिवत्सलयोस्त्यागलक्षणेन संन्यासेन नैष्कर्म्यसिद्धिं सर्वकर्मनिवृचिलक्षणां सत्त्वगुद्धिमधिगच्छति । यद्यपि सङ्गालयोस्त्यागेन कर्मानुष्ठानमपि नैष्कर्म्यमेव कर्तृत्वाभिनिवेशाभावात् । तदुक्तम्-' नैव किंचित्कारोमति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । इत्यादिश्यो- कचतुष्टयेन । वधाप्यनेनोक्तलक्षणेन संन्यासेन परमां नैष्कर्म्यसिद्धिम् सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यारते मुसं. वशी इत्येवलक्षणां पारमहंस्यापरपर्यायां प्राप्नोति ॥ १९ ॥ सटी-यो विवेकादिसामघ्या संपनः सन् विशुदधी: ! सत्त्वामुक्षयद्वारा मुमुक्षः संयतेन्द्रियः 4 १२५० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५.] ॥ १ ॥ शुद्धनौक्यजिज्ञासा माधो वेदान्तसद्विराम् ॥ श्रवणाद्यादराकर्तुं निर्विक्षेपतया सदा ॥२॥ तच्छेपभूतं संन्यासं श्रुत्यादिविहितं चरेत् ॥ स कीदृशोऽस्ति जिज्ञासुरित्यत्राह जगद्गुरुः ॥ ३ ॥ सर्वत्र पुत्रदारादी ममेत्यासकारणे ॥ अहमेषां ममते चेत्यभिप्वङ्गविवर्जिता ॥ ४ ॥ धुद्धिर्यस्य यतस्तेन स्ववशे स्थापितं मनः॥ विषयेभ्योऽपि सर्वेभ्यः प्रत्याहृत्य विवेकतः ॥ ५ ॥ सति रागे कथं चेवः प्रत्याहरणमाचरेत् ॥ तत्राह सर्वदृश्येषु भोगजालेषु सर्वशः ॥ ६ ॥ दोपदृष्ट्या विरक्तः सजातो यो विगतस्पृहः ।। नित्यबोधपरानन्दरूपे मोक्षे च तत्परः ॥ ७ ॥ स एवं पुरुपश्रेष्ठ विचारकपरायणः ।। निष्कर्मब्रह्मतज्ज्ञानं नैष्कर्म्य तस्वरूपिणीम् ॥ ८॥ सिद्धि साधनसंपत्त्या प्रकृष्ठ फललक्षणाम् ॥ संन्यासेनैव तत्पूर्वविचारेणाधिगच्छति ।। ९॥ यदा संन्यासरू तां सिद्धिं नैर्गुण्यलक्षणाम् ॥ उत्कृष्टर पूर्वसास्वित्याः सिद्धेः फलस्वरूपिणीम् ॥ १० ॥ ब्रह्मात्मैक्यपरानन्दसाक्षात्कारैकयोग्यताम् ॥ प्रानो. तीत्यर्थ एवास्तु चेत्यंभाचे तृतीयया ॥ ११ ॥ ४९ ॥ मा० टी०-ज्ञाननिष्ठायोग्यचालक्षणायाः कर्मनायाः सिद्धेः फलभूतां ज्ञाननिष्ठालक्षणां नैष्कर्म्यसि- द्धिमाह-असक्तेति । सर्वत्र सक्किनिमितेषु पुत्रदारादिष्वसक्तबुद्धिरसता सङ्गरहिता बुद्धिान्त:करणं यस्य स यतो जितो वशीकृत आत्मान्तःकरणं यस्य स जितात्मा, अत एव विगता स्पृहा देहजीवनभोगेपु तृष्णा यस्मात्स य एवंभूत आत्मज्ञः स नेष्यसिद्धि-निर्गतानि कर्माणि यस्मात् निष्क्रियात्मसंयोधात् स नि- कर्मा तस्य भावो नैष्कम्य तच वसिद्धिश्च सा, नेकयस्य निष्क्रियात्मस्वरूपायस्थानलक्षणस्य सिद्धिनि- चिरिति वा, वा परमां कर्मजाया: सिद्धेः प्रकृष्टां सद्योमुत्यवस्थांनरूपा संन्यासेन सम्यग्दर्शनेन व.पू. वकेण या सर्वकर्मसंन्यासेनाधिगच्छति प्राप्नोति । तदुचम् । सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नाद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयम् ' इति ॥ ४९ ॥ ५० टी०-अथ स्वधर्माचरणेऽपि गुणदोपविवेकमाह-असक्तत्रुद्धिरिति । असक्ता सर्वत्र गृहादिषु मान्या घुद्धिर्यस्य, जितात्मा निरहंकारः, विगतस्पृहः कर्मफलानपेक्षः पुरुषः पूक्तिन कर्मासक्तिसात्विक- त्यागक्षणेन संन्यासेन नैष्कर्म्यसिद्धि सर्वकर्मनिवृत्तिलक्षणां सत्त्वशुद्धिमधिगच्छति ॥ ४२ ॥ रा० टी०-स्वफर्मनिरतः सिद्धि विन्दतीत्यत्रापेक्षितधर्मान्तराण्याह-असक्त इति । सर्वशब्दादिवि- पयेपु असम्युद्धित्वे हेतुर्जितात्मेति । यशीकृतमनस्कः पयिफसुसे क्षुद्रामुमिकसुसे चापगतेच्छः । परमां संपूर्णा नैष्कर्म्यसिद्धि काय मोक्षाय सिद्धिमुपायसिद्धि प्रारब्धान्यसर्वानिष्टकर्मनाशाख्यां सिद्धिं वा, संन्यासेन फाम्यकर्मत्यागेन सर्वकर्मणां भगवति समर्पणेन वाऽधिगच्छति प्राप्नोति ॥ ११ ॥ सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाऽऽप्नोति निबोध मे ।। समासेनैव कौन्तेय ! निष्ठा ज्ञानस्य या परा ।। ५० ॥ त० टी०-अधुना नेकपलसणा सिद्धिः, प्रेमलक्षणा भक्तिभगवत्माप्त्यन्तरङ्गहेतुरिति वक्तुं तस्याः प्राप्तिमकारमुपदिशति-सिन्डिमिति । ज्ञाननिष्ठाफलरूपां नैष्कर्मेसिद्धिमनारतध्याननिष्ठा- साणां परां भक्ति यथा येन प्रकारेण मातः सन् ब्रह्म मामोति तथा समासेन संक्षेपेण पक्ष्यमाणं माार में मचनानिपोष निश्पेन नानीहि । यथा सिदि मातो ब्रह्म प्रामोतीति प्रतिसाता ब्रह्ममा- प्यसाधारणोपापभूतां पराभक्ति विधिनष्टि-निष्ठा ज्ञानस्य या परेति । या मानोत्तरभाविनी परा भक्तिः सा शनस्य परा.निष्ठा उत्पावस्थितिः फलमिति यायन् । स्वरूपतो विषयतच निरतिश- पत्वान् शान्यग्रेसराणां सनकादिमहादादीनाम् । तथोक्तं श्रीभागरते भगवता स्वयमेर । " एताया• . .
मा० १८.५०] वश्वप्रकाशिकाराष्टटीकोपेता १२५९ न्योग आदियो मच्छिप्यः सनकादिभिः । सर्वतो मन आकृप्य मय्यद्धावेश्यते यथा" इति, "या प्रीति- रविकानां विषयेपनपायिनी । त्यामनुस्मरतः सा मे हृदपान्नापसप्त" इति वैष्णवे महादोक्तेया॥१०॥ म. टी-प्रागुफसाधनसंपन्नस्य सर्वकर्मसंन्यासिनो प्रमज्ञानोत्पत्ती साधनक्रममाह-सिद्धिमिति । स्वकर्मनेश्वरमाराध्य वत्प्रसादनां सर्वफर्मत्यागपर्यन्तां ज्ञानोत्पत्तियोग्यवारूपां सिद्धिमन्त फरणशुद्धि प्राप्तो यया मम प्राप्नोति येन प्रकारेण शुद्धमामानं साक्षात्करोति तथा तं प्रकार नियोध मे मद्वचनादवधारयानु- छातुम् । फिमतिविस्तरेण ? नेत्याइ-समासेन । संक्षेपेणेव न तु विस्तरेण हे कौन्तेय । तदुवधारणे कि स्यादित आह-निशा शानस्य या पर। ज्ञानस्य विचारपरिनिप्पनस्य निष्ठा परिसमाप्तिः यदनन्तरं साध. नान्तरं नानुष्ठेयमस्ति । परा श्रेष्ठा सर्वान्या वा साक्षान्मोक्षहेतुत्यात् । न सिद्धि प्राप्तस्य ब्रह्मप्राप्तिरूपां ज्ञाननिष्ठां परां संक्षेपेण नियोधेत्यर्थः ॥ ५० ॥ शं० टी०--ज्ञानकर्मणोः साम्यसाधनभावं सूचयितुं साविककर्मानुष्ठानसंभाविता सत्त्वगुद्धिरुका । तत: संप्राप्ततत्वविवेकज्ञानारुढस्य यवेपिदेहकैवल्यसिद्धिकरणस्य ज्ञानस्याप्रतिवद्धत्वसिद्धये नियमेन फ्रमेण कर्तव्यां माननिष्ठां सप्रकारां ज्ञानफलं च निरूपयितुमाह-सिद्धिमिति । सत्त्वशुद्धया सम्यग्विदिवात्म. तत्त्वो मुमुक्षुरारूढः संन्यासेन सिद्धि नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्तः सन् यथा येन प्रकारेण वत्तत्साधनानुष्ठानपूर्व कमाननिष्पासिद्धिक्रमेण परिपकज्ञानेन प्राप्नोति नझभावं गच्छति । विदुषो ग्रह्मातिनाम संशयासंभावना- विपरीवभावनादिविकल्पराहित्येन सम्यगपरोक्षीकवे स्वात्मनि नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसचिदानन्देकरसे निविशेपे. ऽद्वितीये परे प्रमाणीदमेवाहमिति आत्मत्मपुद्धिकरणमेव । यथाऽऽरोपिवदोपेण स्वमन्यथा गृहीत्वा देवदत्तस्त- नित्या देवदत्त एवाहमिवि स्वात्मनि स्वबुद्धिं करोषि । एवं स्वाज्ञानेन स्वं ब्रह्म विस्मृत्य गुरुप्रसादावाप्त- विज्ञानेन तन्निवृत्या स्वात्मनि ब्रह्मणि मधुद्धि करोति । तत्र स्वबुद्धिकरणमेव विदुपो ग्रह्मप्राप्तिनं तु धन- वत्प्राप्तिरुच्यते ।देशतः कालवः स्वरूपवश्य प्राप्तव्यस्य ब्रह्मणो व्यवधानाभावात् । 'अयमात्मा ब्रह्म' इविन्याये- नानुर्विदुपः स्वरूपत्वान्नित्याप्तस्य वस्तुनः पुनरातिफल्पनायोगात् । अतो विस्मृतकण्ठाभरणस्यावमर्शने. नास्तित्वावधारणं यथा प्राप्तिः, वयाऽज्ञानेनान्यथा गृहोवे स्वात्मनि ब्रह्मणि विचारजन्यज्ञानेन पुनः स्वभावावधारणमेवातिः । एवं ब्रह्मविद्यथा येन ब्रह्मनिष्ठासिद्धिप्रकारेण विशुद्धबुद्धया ब्रह्माप्नोति, तथा सं ज्ञाननिष्ठासिद्धिप्रकारं समासेन संक्षेपेणैव न तु विस्तरेण, विशुद्धयुद्धः सूक्ष्ममाहिणो बहुगाथानुपयोगात् , स्वल्पान्थेन प्रकारं मे निबोध नितरां बुद्धपस्व, बुद्धा वदनुष्ठानपरो भव । श्रुतेोधस्य च फलमनुष्ठान- मेव, अन्यथाऽऽपणवाविद्रुपदेशो निरर्थक इत्यर्थः । लखलु सम्याज्ञान विदेहमुक्तः परमकारणं, या परा निरतिशयपरिपाकलक्षणा निष्ठा परिसमाप्तिर्षिकारनिर्मुका निश्चला स्थितिः । कस्य निष्ठेत्यत आह- ज्ञानस्येति । न जायते म्रियते' इत्यारभ्य 'उत्तमः पुरुपस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।""प्रथितः पुरुषोत्तमः ।।' इत्यन्तेन निर्विशेषविपयफेण अन्येन यादृश .आत्मा निर्विशेषो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तखभाषः परः प्रत्यगे- करसोऽद्वितीयः सम्पविरूपितस्तद्विपयं ज्ञानं यादृशम् । यादृशज्ञानेनामेवेदं सर्वमिदं सर्वमहमिति ब्रह्मविद्यतिः सर्वात्मक दृश्यसंवन्धरहितं चिदेकरसमाकाशवत्परिपूर्णमद्वितीयमात्मानं पश्यति । तादृशज्ञान- सिद्ध्यै कार्या या परा निष्ठा सा येन प्रकारेण सिध्यति वं प्रकारं मत्तो निमोयेत्यर्थः । ननु मुमुक्षोरामा शानमेव न सिध्यति कुतस्तनिष्ठा परा सिध्येत् ? कथं ज्ञानस्यासिद्धिरिति चेदुच्यते । यदाकारं ज्ञेयं तदा- कारमेव भवति तज्ज्ञानम् । नरश्येज् यस्तज्ज्ञानं च नराकारमेव भवति, पशुश्चेत्पश्चाकोर, नान्यथा । निराका- रस्त्यात्मा, न ह्यात्मन आकारोऽस्ति । 'नसत्तन्नासदुच्यते' इति दृश्यत्वनिषेधात्सदसद्विलक्षणस्य वस्तुनोऽप्रसि- द्वत्वादनाकारत्वाच विषयत्वानुपपत्तेः आकारवत्ता त्वात्मनस्तदा सिध्येद्यद्यात्मायुष्मत्प्रत्ययार्थ: स्यात् । न ह्ययं २. ] - श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५० युष्मत्प्रत्ययार्थो भवति, “अस्थूलमानण्वस्वम्" इत्यात्मनः सर्वदृश्यलक्षण्यश्रवणात् । ननु "तं देवा ज्योतिषा ज्योतिः' इति, " अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योति" इत्यात्मनो ज्योति स्वरूपत्वं श्रूयते, कथमरूपत्वमिति चेन्न । 'अस्थूलम्' इति, यत्तद्रेश्यम्' इति रूपवद्रव्यत्वनिषेधे सत्यरूपिद्रव्यत्वापत्त्या जडत्वापत्तौ सत्यां श्रुत्या तनि- रस्यते-प्रकाशस्वरूप आत्मेति, न तु सूर्यादिवत् ज्योतिःस्वरूप आत्मेत्युच्यते । वथात्वे सत्यात्मनो भौतिक- त्वज्ञेयस्वजडत्वानित्यत्वादिदोपः प्रसज्येत । सूर्यादिवदप्रयत्नेन विषयत्वं च स्यात्, तदयुक्तम् "दिव्यो ह्यमूर्वः पुरुष" इत्यमुर्तत्वश्रवणात् । "नसंदृशे तिष्ठति रूपमस्य” इति आत्मनो निर्विषयत्वमेव श्रूयते । विषयभूचे हि वस्तुनि ज्ञानस्य तदात्मना परिणामो न त्वविषयभूते परिणामः संभवति । ननु "स आत्मा स विज्ञेयः" इत्यामा निर्विशेष: श्रूयते। श्रुताकारेण ज्ञानस्य परिणाम उपपद्यत एवेति चेन्न । 'एप वन्ध्यासुतो याति' इत्यादि श्रुवार्थाकारज्ञानप्रसशातादृशज्ञानस्य मनोराज्यवन्मिथ्यात्वोपपत्तेश्च । न हि श्रुतं श्रावितं वा, मनसा भावितं वा वस्तु तद्विषयकं ज्ञानं च सत्यं भवति, प्रमाणान्तरेण च बाध्यते । यत एवमत आत्मविषयकं ज्ञान- मेव न संभवति । तदसंभवे विदुपः कथं तनिष्ठा सिध्यतीति चेन । प्रत्यक्षादिप्रमाणगम्यत्वादात्मसत्तायास्त- ज्ज्ञानासंभवासिद्धेः । कुत्रचित्प्रत्यक्षं प्रमाणं कुत्रचिदनुमानं कुत्रचिच्छास्त्रं कुत्रचिदापत्तिः । आत्मविपये स्वेतत्सर्वं प्रमाणमेव भवति तदुच्यते-देहेन्द्रियादयोऽधिष्ठातमन्तः, स्वतो जडत्वे सति इष्टानिष्टप्रवृत्तिनिवृत्ति- मत्त्वात, यन्नैवं तन्नैवं यथा शकट, तदधिष्ठाताऽऽस्मा देहादिभ्यो भिन्नः नियामकत्वादथिकवदित्यायनुमानेन 'नान्त:प्रझं न बहिःप्रज्ञम्' इत्यादिशास्त्रेण चात्मावगन्तुं शक्यते पण्डितैः । यथा चायैकादशी शिवरात्रिरिति शास्त्रेणोक्तमगीकृत्योपोष्यते, तथा विदुषा 'नान्त.प्रतमित्यादिना प्रपञ्चोपशम शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा' इत्यन्वेन शास्त्रेण सकलहश्यसंयन्धं निषिध्यापित केवळमात्मतत्त्वं स्वात्मनाऽवगन्तव्यम्, उभयोः शास्त्रप्रतिपाद्यत्वाविशेषात् । ननु “नान्तःप्रज्ञम् ॥ इति श्रुत्युक्तार्थस्य निर्विशेषत्वेनोपलव्ध्यभावाद- च्यापुत्रवदसत्त्वमेवेति चेदेकाश्या अपि विशेषाकारादर्शनात्स्वरूपेण तत्तुल्यत्वादननुष्ठेयत्वप्रसङ्गात् । तत उभयोरपि शास्त्रैकगम्यत्वं तदुक्तत्वेनाभ्युपगम्यत्वं च सममेव । नन्वेकादशीवदात्मसद्भावः शाणाङ्गीक्रियत एवेति चेत्तर यथा निश्चयेन प्रवृत्तिस्तथा नाहं देहादिरिति निश्चयेनानात्मन्यहंभावं परित्यज्य ब्रह्मैवाह- मिति तूष्णी स्थीयता, न पुनर्विकल्यतामिदमेव प्रामाणिकस्य प्रमाणस्य च फलम् । नन्वरमाकं शास्र प्रमाणमेय, तथाप्यविपयत्वादात्मनस्वदनुभवाभावाप्रवृत्त्यभाव इति चेत्तहि एकादश्याः प्रत्यक्षत्वं तदनुभूत्या प्रवृत्तिरित्यज्ञतमत्व स्वीयं प्रकटितम् । पण्डिताना शुद्धबुद्धीनामेव मुमुक्षुणा मोक्षशास्त्रे वप्रतिपादितार्थे च विश्वासो दृढप्रत्ययः प्रवृत्तिश्च सहस्रकोटिजन्मार्जितपुण्यपुजपरिपाकवशादीशप्रसादादेव सिध्यति, नान्यथा युनिकोटिभिरशुद्धात्मनाम् । यदुक्म् ‘अविपयत्वादप्रसिद्धत्वाचात्मनस्तदनुभवाभावात्प्रवृत्त्यभावः' इति- अनोच्यते । न तावदयमात्मा स्वयमेकादशीवदेकान्तेनाविषयः, अस्मत्प्रत्ययार्थत्वेन नित्यापरोक्षत्वात्प्रकाश स्वरूपत्वात्सप्रकाशकत्वाप प्रत्यगात्मप्रसिद्धः । न ह्यामा यस्य कस्यचित्कदाचिदप्रसिद्धो भवति ज्ञातव्यः प्राप्तव्यो वा।सत्यप्रसिद्धत्वे आत्मनो लौकिको वैदिकश्च व्यवहारस्तव न सिध्येत् । सामात्मानमुद्दिश्यैवेष्टा. निष्टयोः प्रवृत्तिनिवृचिश्च दृश्यते, न वनात्मानं देहं प्राणं वा बुद्धिं वान्यं वा । मर्त्यः सल्वात्मसुखायैव देहस्यारोग्यमिच्छति, बुद्धः सौष्ठवमाहारस्योपशमं च प्राणनिरोधं योगं च करोति, भार्यामुबहते, देवान् यजते, हरि भजति । ततो देहादिविलक्षण आत्मा प्रसिद्ध एवारमत्प्रत्ययार्थः । न हि नाहमस्मीति कदाऽपि यस्य फस्यापि प्रत्ययोऽस्ति । स्वनमहमद्राक्षम्, सुखमदमस्वाप्सम्, अहं जागीत्यवस्थात्रयेऽपि सवैरहम- स्येवेत्यामसत्तायाः सदानुभूयमानत्वादात्मनो शेयत्वानुपपत्तेः सर्वदृश्यभिन्नत्वप्रसिद्धेश्च । न हि स्वमेक साक्षादनुभवतः पण्डितस्य स्वसुंचासिद्ध प्रमाणमपेक्ष्यते ।सपा प्रमाणाना प्रामाण्यं यत: सिद्धपति तं सर्व .
। [अ०१८ श्लो० ५०] सरवप्रकाशिकायष्टटीकोपेता प्रमाणप्रामाण्यसिद्विकारणं स्वप्रकाशमात्मानं किंतु प्रकाशयेत् । नयचेतनं घेतनं प्रकाशयति स्वसत्त्वं स्वस्यैव प्रत्यक्षम् । वकः प्रत्यक्षं प्रमाणम् । व्यवहारान्यथानुपपत्तिप्रसूतार्थापत्तिश्च प्रमाणम् । एवं प्रत्यक्षादिप्रमाणसि- द्धस्यात्मनो वक्ष्यापुत्रवदसत्त्वं दज्ञानस्य मनोराज्यवत्सगुणध्यानवन्मिच्याविषयत्वं प्रमाणान्तरयाध्यत्वं च संभावयितुं न शक्यते । तथास्वे तव त्वज्ञानस्य चाभावत्वप्रसमात्। ततो ज्ञातृत्वेनास्मत्प्रत्ययार्थत्वेन सर्वव्यवहा- रकारणत्वेन परमप्रेमास्पदत्वेन च प्रसिद्धत्वादात्मा नायमत्यन्वाविषयो भवति, किंतु स्वच्छत्वान्निर्मलत्वात्सू- क्ष्मत्वाच बुद्धिरात्मचैतन्यव्याप्त्या, सूर्यप्रकाशच्यात्या स्फटिकः सूर्यव्यथा, तथात्मवदवभासते।तादृशचिव्या- प्या मनआदिस्थूलान्तं सर्वमात्मवदवासते। तेन देहेन्द्रियप्राणमनोबुद्धयादिष्धनात्मस्वहमित्यासावुद्धिः सर्वेपी मनुष्योऽहं प्रामणो यतिरिति, द्रष्टा श्रोता काण: सोऽहमिति, क्षुधितः पिपासितोऽहमिति, कर्ता भोक्य- ऽई सुसी दुःखीत्येवमारोपितरनात्मतत्प्रत्ययः शैवालेजलमिव मेघपटलेश्चन्द्रवत्तिरोहिवतया विस्पष्टं न प्रका• शवे । शवधा श्रुत्वा मत्वाऽप्यनाद्यविद्यावासनया पण्डिता अपि यहिरन्तःपरिपूर्णमप्यात्मानमविसूक्ष्ग- मतीन्द्रियमनवगाह जडमारोपितमेव स्थूलमनात्मानमात्मत्वेन गृहन्ति, नत्वात्मानम् । ततोऽनाद्यविद्यारो. पितानामन्तयुद्धयादीनां यहिपटपटादीनां वलस्ययानां च "सर्पमिदमई प्रदौव" इति सर्वत्र प्रत्यादृप्या प्रक- विपपया निरास एव कर्तव्यः । संवतग्रह्मप्रत्ययावृत्त्या विपरीतप्रत्ययानां नि:शेपनियुचौ सत्यां, शैवाल. निवृत्ती स्वच्छं सुसकर जलमिव, मेघापाये पूर्ण आनन्दकरश्चन्द्र इव, स्वच्छः शान्तश्चिद्धन आनन्दघन आत्मा ज्ञानचक्षुपः सन्यग्विपयो भवति । यत एवं ततः आत्मावरकानात्मप्रत्ययनिरसन एव प्रयत्नः कर्वव्यस्तीवमुमुक्षया विदुपा, न स्वात्मा कीरश:? मिलक्षणः? कथं तिष्ठति? कुत्रास्ते? कथं प्राप्यः? इत्यात्मस- जाये तत्प्राप्तिवेदने च । तस्याहमर्थत्वेन स्वतः सिद्धत्वान्नित्यप्राप्तत्वाच । कालदिगादेनिराकारस्यापि च ज्ञानं शास्त्राचार्योपदेशाभ्या सिध्यति । अथैकादशीय प्राचीति । किमुत स्वस्वरूपत्वेन सिद्धस्यात्मनो ज्ञानं शास्त्राचार्योपदेशेन सिध्यतीति ? आत्मज्ञानेनैव हि स्वं च परं च विजानात्यहं ममेदमिति । यः स्वप्नमद्राक्षं, यः सुखमस्वास, सोऽहं जागर्मीत्यनुभूयमानस्य स्वस्य देहेन्द्रियादिभिन्नत्वं स्वप्ने सुपुप्तौ बुद्धधादि- भिन्नत्वं ज्ञातृत्वं च सर्वत्र ज्ञात्वाऽप्यात्मा करतज्ज्ञानं कथमिति वक्तुं पण्डितस्य न युक्तम् । यस्य प्रकाशेनेदं सर्व पहिरन्तर्विजानाति तज्ज्ञानं न सिध्यतीति वचनमवीव साहसम् | "एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञः" इति क्षेत्र क्षेत्रधर्मजातं च सर्वे यो विजानाति सोऽहमात्मत्यात्मज्ञानं यते: शुद्धात्मनः परमेश्वरप्रसादा- सुलभतममेव । यस्मादेवं तस्मादात्मा सुप्रसिद्धस्तज्ज्ञानमप्यात्मेश्वरप्रसादासुलभतममेवेति कृत्वा शुद्धात्मनो यतेः सद्गुरूपदेशात्संप्राप्तस्यैवात्मज्ञानस्यानात्मवासनाम्नाविपरीतप्रत्ययनिःशेपनिवृत्त्या अप्रतियद्धत्वसिद्धये मु. मुक्षोनिनिष्ठा संपादनीयेत्युच्यते भगवता-निष्ठा ज्ञानस्य या परेति । ननु मुमुक्षोनिनिष्ठा संपादनीयेत्युच्यते । ज्ञाननिष्ठा नाम ज्ञाने ज्ञानस्वरूपे ब्रह्मणि चित्तस्य नैश्चल्येन, स्थितिळ किं ज्ञानाभ्याससमाप्तिा ? नायः, चञ्चलत्वान्मनसो ब्रह्मणि स्थित्यसंभवात् । द्वितीये ज्ञानस्य ज्ञानहेतोर्वेदान्तशास्त्राभ्यासस्य परिसमाप्तिा उत ज्ञानस्य प्रत्ययावृत्तेः परिसमातिवा! नायः, केवलप्रन्थस्य शुष्कतर्फवदावृत्त्या क्लेशं विना प्रयोजनादर्शनात्। न द्वितीयः, तत्त्वमसीति तत्त्वंपदार्थशोधनपूर्वक वाक्यार्थश्रवणमात्रेणेवाहं ब्रह्मास्मीवि विदुपो ब्रह्मात्मप्रत्यये संपध. माने पुनः पुनस्तदावृत्तेः फलादर्शनात् । अहं ब्रह्मास्मीतिसंपन्नज्ञानस्यैव ब्रह्मात्मप्रत्ययस्य दााय पुनः चुन- रावृत्तिः कर्तव्येति चेन्न, पट्टाभिषेकेणैव संप्राप्तराजत्वस्य नृपतेः पुनः पुनः राजाऽहमित्यावृत्तिवच्छ्रुतियुक्तिभिः सम्यक्शोधितयोस्तत्त्वंपदार्थयोरेकत्वावबोधवाक्यार्थश्रवणमात्रेणाई ब्रह्मैवेति ब्रह्मात्मभावापन्नस्य यतेः पुनः पुनर्बलेवाहमिति प्रत्ययावृत्त्या पुनरुपाधिकृतपरिच्छित्ति विना फलान्तरदर्शनादराज्ञ आवृत्तिक्रियया राजत्व. मिव अब्रह्मणो ब्रह्मत्वमावृत्तिक्रियया कल्प्यं च स्यात् । घटोऽयमित्युपदेशनात्रेण घटविषयकं ज्ञानं झटिति, - १२१२. श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५०] यथा जायते, तथैव तत्त्वमसीत्युपदेशमात्रणाहं ब्रह्मेति ब्रह्मात्मत्वापादकं ज्ञानं शुद्धात्मनो जायते एव, नात्र पुनः पुन: प्रत्ययावृत्तिरपेक्ष्यते । नहि चक्षुःसैनिकर्षमात्रेण घटज्ञाने जाते घटोऽयं घटोऽयमिति तज्ज्ञानदायाय मुहुर्मुहुरावृत्तिरपेक्षिता भवति, प्रमाणप्रमेयसंवन्धमात्रकसाध्यत्वात्प्रमायाः, न वावृत्तिसाध्यत्वमस्ति, वस्तु- वन्त्रत्वाज्ज्ञानस्य, न पुरुषतन्त्रत्वम् । अतो ज्ञानाभ्यासो निष्प्रयोजन एवेति चेत्सत्यं, प्रमाणप्रमेयसंबन्ध- मात्रजन्यमेव ज्ञानं वस्तुतन्त्रं, न तु पुरुपतन्त्रं, नापि क्रियातन्त्रं; तथापि स्वोत्पत्ती प्रमाणसौष्ठवमपेक्षते । वास्तवमपि ज्ञानं सति प्रमाणसौष्ठवे समीचीनं जायते, नत्वसौष्ठवे । यथा चक्षुप: काचकामलादिदोपेण तैमिरिकत्वे चन्द्रानेकत्वज्ञानमवास्तवमेव जायते, वस्तुनो विस्पष्टत्वेऽसि । तस्यैव निरन्तरौपयसेवया तहोप. निवृत्त्या निर्मलत्वे सिद्धे वास्तवमेव चान्द्र ज्ञानं विस्पष्टं तदर्शनाहादश्च सिध्यति । तथैवानाद्यविद्यावासना- कृतैः सत्त्वरजस्तमोदोपैपिते सत्यन्त करणे समुत्पद्यमानरहमिदमद इत्याद्यनात्मप्रत्ययैर्व्यवधीयमानमा- स्मतत्त्वं न विस्पष्टं मावि । तस्यैवान्तःकरणस्य चिरकालनित्यनिरन्तरसमनुष्ठितसमाधियोगेन सजातीय- प्रत्ययावृत्तिलक्षणेन निरुक्तदोषाणां तत्कार्याणां च नि:शेपनिवृत्त्या केवलशुद्धसत्त्वभावापत्तो सर्वमिदमई च प्रदौवेत्यद्वैतात्मविज्ञानं सर्वदृश्यसंवन्धनिर्मुक्तमप्रतिवद्धं च जायते । ततो ज्ञानपरिपाकैकप्रयोजनत्वात्मत्य- यावृत्तः, सत्यामेव ज्ञानपरिपाकसिद्धौ, उक्तलक्षणं सम्यग्ज्ञानं कैवल्यपदावसानकमखण्डानन्दानुभावकं च सिध्यति । तथा च श्रुति:-"समाधिनि—तमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत्" इति, 'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः' इति, 'अभ्यासात्पकविज्ञानः कैवल्यं लभते नरः' इति घ, 'नास्ति ज्ञानात्परं किंचित्पवित्रं पापनाशनम् । तदभ्यासाहो नास्ति संसारोच्छेदकारणम् । इति । ज्ञानस्य परिपाको नाम चिरकालनित्यनिरन्तरसमभ्यस्यमानसजातीयप्रत्ययावृत्त्या सम्यग्ज्ञानोत्पत्तिप्र.. विवन्धकानो सत्त्वरजस्तमोगुणानां तत्कार्याणां चाहमिदमद इष्टमनिष्टमित्यादिविपरीतप्रत्ययानां रागद्वेष- मोहादिविकाराणां च निःशेपनिवृत्त्या समुत्पद्यमानोऽन्तःकरणस्य केवलशुद्धसत्त्वभाव एव प्रसादलक्षणः । यस्मिन्सति सर्वमिदमहं च प्रौवेति स्वस्मिन्सर्वत्र ब्रह्मत्वधीव्यवस्थापकं परावरकत्वविज्ञान विकल्पनिर्मुक्त गृचिव्यापारसमाप्तिलक्षणं संभवति । तदेवज्ञानं नित्यनिरन्तरसजातीयप्रत्ययावृत्त्येकाम्पं, नत्वयं घट इति पत्समदुपदेशमात्रगम्य, नापि राजत्वज्ञानवपट्टवन्धक्रियामात्रगम्यं च भवति । तत्र ज्ञेयस्य स्थूलत्वेन तज्ज्ञा- नस्यापि स्यूलत्वान्निष्प्रतियोगिकत्वालौकिकत्वाच्च प्रत्ययावृत्तिापेक्ष्यते । "सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यम्" इति, " दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टम् । गहाहितं गहरेष्ठं पुराणम्" इति श्रवणादव तु ज्ञेयं वस्तु परमसूक्ष्ममलौकिकं शैवाल. पटलैजलवविद्यातत्कास्तिरोहितं भवति । वतस्तमान, चक्षुः सूर्यालोकभिव, स्वविपयावरकवारणं सत्प्रत्य- यावृचिलक्षगमपेक्षवे। नैवेन प्रलभावः फल्पितो भवति । नाहं मनुष्य इत्यत्रात्मनो मनुष्यत्वमपोहते, नव- हमर्थत्वं करप्यते,नापि ब्रह्मभाषः फल्प्यवे।अमर्थत्वस्य स्वतःसिद्धत्वात् 'अयमात्मा ब्रह्म' इति, 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि इति ब्रह्मभावस्य श्रुतिस्मृतिप्रसिद्धत्वात् । सति तयोर्भने कथमद्वैत सिध्येत् ? "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म । नेहनानास्ति किंचन"एको रुद्रो न द्वितीयाय दस्थुः" इत्यादिश्रुतिभिरद्वैतमेव प्रतिपाद्यते । वतस्तयोर्घटा- काशमहामाशयोरिख ब्रह्मात्मनोरभिन्नत्वं स्वतःसिद्ध, न तु क्रियया कल्पयितुं शस्यम् । किं ध्यानादियासनया प्रतीयमानविपरीतप्रत्ययापनोदत्तमात्रमेव क्रियते ब्रह्मविदा स्वस्य पूर्णत्वज्ञानदायि । यथा स्थूलमगि रलज्ञानं स्वदायार्थ नित्यपरिशीलनमपेक्षते, यथा रविधिम्यज्ञानं स्थूलमपि सर्वेपामपरोक्ष- त्वाय चिरकाटनित्यनिरंतराभ्यासमपेक्षते, वधैव प्रमाभिन्नत्वज्ञानमतिसूक्ष्मं सप्रविपक्षं च फिमुत स्वस्या- प्रविपद्धवसिद्धये सत्यत्ययावृत्तिमपेशव दवि ? " तस्याभिध्यानाद्योजनातत्त्वभावात्" इति, "वस्याभिध्या. नात्तीयं देवभेदः' इति, "निपलं ध्यायमान!' इति, "च्यात्या मुनिर्गच्छत्ति भूवयोनिम्" इत्यादिश्रुति- तु सत्प्रत्ययया.
- [अ० १८ लो० ५.] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता भिरुत्पन्नात्मज्ञानस्याप्रतिवद्धत्वसिद्धये सजातीयप्रत्ययावृत्तिलक्षणः समाधिः कर्तव्यत्वेन श्राव्यते "तमेव' धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः" इति । यत एवमतः सात्म्यिसिद्धये द्वैतप्रत्ययापनोदकः सत्प्रत्ययाव- त्तिलक्षणो ज्ञानाभ्यासः कृतश्रवणस्य विदितात्मतत्वस्य मुमुझोर्यते: सहकारिसाधनेस्तद्बुद्धित्वादिभिरद्वे: तृत्वादिभिश्च वक्ष्यमाणैश्च संपन्नस्यावश्यं कर्तव्य इति पष्टाध्याये निरूपितमेवार्थ पुनढयितुमुच्यते भग. वता-निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निठा ज्ञानस्य या परा' इति । यदुक्तं ज्ञानहेतोवेदान्तशास्त्रस्यावृत्त्या शुष्कतर्कवत् छैश विना प्रयोजनामावादिति तन्न, वेदान्द्रावृत्त्येकलभ्यत्वादात्मज्ञानस्य तदावृत्तेः सफलत्वोपपत्तेः । न हि मुमुक्षोर्यतः स्तोत्रमन्त्रजपादिभिर्ज्ञान सिध्यति विनाऽजस्रवेदान्तविचा-' रेण । “ संन्यस्य श्रवणं कुर्यात् " इति, “ श्रोतव्यो मन्तव्यः" इत्युपनिषदमावर्तयेदिति निरन्तर- विचारस्यैव कर्तव्यत्वश्रवणात् । 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात् । इति, 'शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम् । इति, "आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया" इति, 'वत्त्यागी पवितो भवेत्' इति विचारस्य नियमेन करें- व्यत्वं तत्त्या प्रत्यवायश्च स्मयते । ततः प्रणवजपादिकमङ्गं कृत्वा विचारमङ्गिनं कृत्वा यावत्सम्य- गात्मविज्ञानं नोदेति तावदजस्रं वेदान्तावृत्त्यैव नियमेन भवितव्यं, तदेकप्रयोजनं स्यात्संन्यासस्य । यदा ज्ञानं विज्ञानं च सिध्यति तदाऽऽवृत्तिस्यकन्या । वधाच 'प्रन्धमभ्यस्य मेधावी ज्ञानविज्ञानतत्परः।' पलालमिव धान्यार्थी त्यजेद्रन्थमशेषतः' इत्यतो जिज्ञासोनिरन्तरावृत्तिः कर्तव्येति सिद्धम् । यदपि चोकं चञ्चलत्वान्मनसो ज्ञानस्वरूपे ब्रह्मणि स्थित्यसंभवादिति तन्न, तदेकसाध्यत्वादात्मयायाम्या वधृतेः । निश्चलबुद्धिवृत्तेः सम्यग्विषयभूतस्यैव मण्यादः स्वरूपावधारणा दृश्यते, न तु नश्चलवृत्ते. विपयभूतस्य । तद्वत्समाहितबुद्धया सन्यग्विपयीकृतस्यैव ब्रह्मणो याथात्म्यावधारणं तन्त्रात्मत्वयुखिकरणं तत्फलं च सिद्धयति, नान्यथा । अतो मनसः स्थैर्य समाधिना प्रयत्नेन संपादनीयं मुमुक्षोविज्ञाततत्वस्य यतेः 'समाहितो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्यति' 'सर्वमात्मानं पश्यति' इति समाहितबुद्धरेवात्मयाथात्म्यवेदनं तत्राम- स्ववुद्धिकरणं सात्म्यिदर्शनं च श्रूयते यतः, वत: केवलश्रुतिमात्रेण यतेरात्मन्येवात्मत्वसिद्धिः सात्म्यि- सिद्धिश्च न सिध्यति, ततस्तथैवैपा कृतश्रवणस्य ज्ञाननिष्ठोच्यते सर्वशेनेश्वरेण-निष्ठा ज्ञानस्येति ॥ ५० ॥ श्री० टी०-एवंभूतस्य परमहंसस्य ज्ञाननिष्ठया ब्रह्मभावप्रकारमाह-सिद्धि प्राप्त इतिपभिः । नैष्क- यसिद्धि प्राप्तः सन् यथा येन प्रकारेण ब्रह्म प्राप्नोति तथा तं प्रकार संक्षेपेणैव मे वचनान्निबोध ॥५०॥ स० टी०-पूर्वोक्तसाधनैः सः संपन्नस्य विवेकिनः ॥ मुमुक्षोझविज्ञानसाधनक्रम उच्यते ॥१॥ स्वकर्मणेशमाराध्य सिद्धिं तस्य प्रसादजाम् ।। चित्तशुति परिप्राप्तो विज्ञानोत्पत्तियोग्यताम् ॥२॥ ब्रह्म येन प्रकारेण प्रत्यगद्वयचिद्धनम् ।। साक्षात्करोति संशुद्धमात्मानं परमं सुखम् ॥ ३ ॥ मम वास्यात्प्रकार कर्तुं त्वमवधारय । संक्षेपेणैव कौन्तेय न तु विस्तरशः पुनः ॥ ४ ॥ तस्यावधारणे यत्स्यात्तच्छृणु त्वं समाहितः । निष्पन्नत्य विचारेण ज्ञानस्याशानघातिनः ॥ ५ ॥ निष्ठा परिसमाप्तियों प्राप्य कार्य न किंचन ॥ साक्षान्मोझेकहेतुत्वात्सर्वान्त्या या परा स्मृता ॥ ६ ॥ तां त्वं संक्षेपतः श्रुत्वा वपरो भव सर्वदा ॥ ७ ॥१०॥ भा० टी०-पूर्वोकेन स्वकर्मानुष्ठानेनेश्वराभ्यर्चनरूपेण जनिता केवलज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां सिद्धि प्राप्तस्योत्सन्नात्मविवेकविज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठा नैष्कर्म्यलक्षणा प्रमटा सिद्धियन क्रमेण भवति वं श्रावयितुमाइ-सिद्धिमिति ! सिदि स्वकर्मणेश्वरमभ्यय॑ तत्प्रसादा कायादीनां ज्ञाननिष्ठायोग्यवाऊ- क्षणां सिद्धि प्राप्तः यया येन प्रकारेण झाननिष्ठारूपेण ग्रा परमात्मानं प्राप्नोति क्या वं प्रसारं माननि. घाप्राप्तिका मे मम वचनानिनोध त्वं निश्चयेनामधारय । किं विस्तरेण? नेत्याइ-समासेनैव संझेपेणैव । यं । . 1 १२९४ - १२६४ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५१] प्रकारमाश्रित्य मातृगण न संवध्यते तन्नियोधेति द्योतनाथै कौन्तेयेति संवोधनम् । प्रतिज्ञाता ब्रह्मप्राप्ति- मिदंतया दर्शयितुमाह-निष्ठति । या ब्रह्मप्राप्तिानस्यात्मशानस्य परा निष्ठा परा परिसमाप्तिः 'अव्यक्तो- ऽयमचिन्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते' । क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत'। 'न जायते म्रियते वा । सदेव सौम्येदमप्रासीदेकमेवाद्वितीयम् ।। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। 'तत्त्वमसि' इत्यादिभगवद्वाक्यरुपनिपात्यै- श्वोक्तः 'फूटस्थत्वमसङ्गत्वम्' इत्यादिन्यायाच प्रदर्शितोय आत्मा तस्य ज्ञानं तु न साकारवस्तुविषयकज्ञानव• भवितुमर्हति, आत्मन आकारवत्वस्यानिश्वात् । "न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य । न चक्षुपा पश्यति कश्चिदे- नम्"। "अशब्दमस्पर्शमरूपम्" इत्यादिश्रुतेः । 'आदित्यवों भारूप: स्मयंज्योतिः' इत्यादिवाक्यानि तु द्रव्य- गुणाधाकारप्रतिषेधे आत्मनस्तमोरूपत्वे प्राप्ते तत्प्रतिपेधार्थोनि । नन्वेवं तर्हि कथं निराकारस्यात्मनो ज्ञानम्? यतो यतिपयं भवति यज्ज्ञानं तत्तदाकारम् । ज्ञानात्मनोश्चोभयोनिराकारत्वेन कथमात्मज्ञानस्य पौन पुन्येना- नुसंधानात्मिका भावना निष्ठेति चेदुच्यते-आत्मज्ञानमित्यात्मविषयं ज्ञानं न विधीयते, चैतन्यस्वरूपस्यात्मनः सुप्रसिद्धत्वेनाज्ञातत्वाभावात् । नहि यस्य चैतन्याभासता बुद्धयादिदेहान्ते आत्मत्वभ्रान्तिकारणं तस्याज्ञा- तत्वं शक्य वक्तुम् । तस्मान्नामरूपाद्यनात्माध्यारोपणनिवृत्तिरेव प्रयत्नेन कार्या, बाह्याकारभेदनिवृत्तेरेवात्मस्वरू- पावलम्बने कारणत्वात् । नात्मचैतन्यविज्ञानं तस्यात्यन्तप्रसिद्धत्वात् । नन्वत्यन्तप्रसिद्ध सुविज्ञेयमासन्नतम- मात्मभूतमप्यप्रसिद्ध दुर्विज्ञेयमतिदूरमन्यदिव ब्रह्म सर्वेषां कथं प्रतिभावीति चेत्, अविद्याकल्पितनामरूपवि. सेपाकारापहृतवुद्धित्वेनाविवेकित्वात्तेपामिति गृहाण । बाह्याकारनिवृत्तबुद्धीनां विवकिना तु लब्धगुर्वात्मप्र. सादाना नातःपरं सुप्रसिद्धं सुविज्ञेयं स्वासन्नमस्ति । तथा चोक्तम्-'प्रत्यक्षावगमं धये सुसुखं कर्तुमव्ययम्' इति । एतेन निराकारत्वादात्मवस्तु नो बुद्धिरुपैत्यतो दुःसाध्या सम्यक्ज्ञाननिष्ठेति केपांचित्पण्डितमन्या- नामुकिरपाता । गुरुसंप्रदायवतां श्रुतवेदान्ताना बहिविपयेण्वनासक्तशुद्धीना सम्यक्प्रमाणेषु कृतश्रमाणा चैवन्यात्मव्यतिरेकेण वस्त्वन्तरस्यानुपलव्धेलौफिकप्राह्यप्राहकद्वैतवस्तुनि सदुद्धरत्यन्तदुःसंपाद्यत्वात् । सदु- 'कम्-'यस्यां जाप्रतिभूतानि सा निशा पश्यतो मुने. इति । ज्ञानमप्यत्यन्तं प्रसिद्धभेव सुखादिवदभ्युपगन्तव्यम्। येपां निराकार ज्ञानमप्रत्यक्षं तेपामपि ज्ञानवशेनैव ज्ञेयावगतेदर्शनातू शेयवज्ञानस्य जिज्ञासानुपपत्तेश्च । वयाच ज्ञानस्य ज्ञातुश्चात्यन्तप्रसिद्धत्वादात्मज्ञाने यत्नो न कर्तव्यः किंत्वनात्मन्यात्मबुद्धिनिवृत्तावे. वेति संक्षेपः ॥ ५० ॥ प० टी०-एवंभूतस्य परमहंसत्य ज्ञाननिष्ठया प्रमभावनाप्रकारमाह-सिद्धिमिति पभिः । नैष्क- म्यसिद्धि प्राप्तः यथा येन प्रकारेण ब्रह्म प्राप्नोति स्था मे मत्तो नियोघ संक्षेपेण जानीहि, या वक्ष्यमा. णा ज्ञानस्य परा सर्वोत्कृष्टा निष्टा मर्यादा ॥ ५० ॥ रा० टी०-प्रतिज्ञापूर्व नैष्कर्म्यसिद्धिसाधनं विवृण्वस्तदनन्तरफलमाह-सिद्धिमिति । या नाय सिद्धिः ज्ञानस्य परिनिष्ठा ता नैष्कर्म्यसिद्धि येन प्रकारेण प्रवर्तमानः प्राप्तो भूत्वा अपरं ब्रह्म लक्ष्मीमाप्नोति तं प्रकार संक्षेपतो मे नियोध बुध्यस्व ॥ ५० ॥ बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ॥ शब्दादीन विषयांस्त्यक्त्वा रागद्धेपो व्युदस्य च ॥ ५१ ॥ त० टी०-प्रतिज्ञात प्राप्तिप्रकारमेवाह-युद्धोत्पादिपञ्चभिः । विशुद्धया यथावस्थितपराव- • रतत्वविपयया साचिस्या बुद्धया युक्तो धृत्या सात्त्विक्या आत्मानं मनो नियम्य अनात्मनःप्रत्याहार- णात्ममवणीकृत्य च शब्दादीन् विपयांस्त्यात्वा तत्संसर्ग विहाय तद्विपयौ रागद्वेषौ च व्युदस्य तत्रष्टा- निष्टबुद्धिमंछत्वेत्यर्थः । इत्यादीनाम् “ ब्रह्मभूयाय कल्पवे " इति तृतीयश्लोकेनान्वयः ॥ ११ ॥ - .
- [अ० १८ श्लो० ५१] तत्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता म०टी-सेयं ज्ञाननिष्ठा सप्रकारोच्यते-बुद्धयेति । विशुद्धया सर्वसंशयविपर्ययशून्यया बुद्धयाऽई ब्रहास्मीति वेदान्तवाक्यजन्यया चुद्धिवृत्त्या युक्तः सदा तदन्वितः धृत्या धैर्येणात्मानं शरीरेन्द्रियसंघात नियम्य उन्मार्गप्रवृत्तनिवार्यात्मप्रवणं कृत्वा । चशब्देन योगशास्त्रोक्तं सावनान्तरं समुच्चीयते । शब्दादीन् शब्दस्पर्शरूपरसगन्धान विपयान् भोगेन बन्धहेतून, सामर्थ्यात् ज्ञाननिष्ठार्थशरीरस्थितिमात्र प्रयोजनानुपयु. काननिषिद्धानपि त्यस्स्वा शरीरस्थितिमानार्थेषु च वेषु रागद्वैपो व्युदस्य परित्यज्य । चकारादन्यदपि ज्ञान- विक्षेपकं परित्यज्य । विवित्तसेवीत्यत्र स्यादित्यध्याहृतेन ब्रह्मभूयाम कल्पव इत्यनेन वान्वयः ॥ ११ ॥ शं० टी०-तत्तन्नियवसाधनानुष्ठानपूर्वक निष्ठा कुर्वतो ब्रह्मविदो ब्रह्मप्राप्तिमाह-युद्धयेतिविभिः। बुद्धिरध्य. वसायात्मिका । अध्यवसायस्तु "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म "अयमात्मा ब्रह्म" इविन्यायेन ब्रह्मणः सत्यज्ञानानन्द. रूपत्वनिश्चयः आत्मनोब्रह्माभिन्नत्वनिश्चयः । विकल्पो न हि वस्तुनि' इतिन्यायेन प्रत्यगमिन्ने परे ब्रह्मणि, मरौ जलयोनि नल्यवत्, देहादिसर्वदृश्यप्रपध्वस्य कल्पितत्वनिश्चयः। एवलक्षणाध्यवसायवती बुद्धिरन विवक्षिवा, खात्मनिब्रह्मण्यारोपितानात्मप्रत्ययनिरसने प्रवृत्चत्वाद्विदुपः। सा च विशुद्धा श्रुवियुकिभिनिश्चितार्थवया संशय- विपर्ययनिर्मुक्ता। तया विशुद्धया बुद्धया युक्तः सम्यगविनाभूतः सन् प्रमनिष्ठायां प्रवृत्तो प्रावित्तिक्या सा- स्विक्योफयाऽऽत्मानं चित्तं वहि:प्रवृचेनियम्य चित्तस्य बहिःप्रावण्यं निरुध्य, चकारात्प्राणेन्द्रियक्रियाः सर्वाः सम्यजियम्य शब्दादीन शब्दरपर्शरूपादीन् विपयान त्यक्त्वा, विपयानुसंधानमकृत्वेत्यर्थः । यद्यपि वहिर- न्तःकरणनिरोवे कृते सति विदुपः सतो विषयसंबन्धी व संभवति, तथाप्यवशात्प्राप्तानामभ्यनुसंधानं न करो- तीत्यर्थः । रागद्वेपो व्युदस्य च भिक्षाकालेऽपि प्रासेप्वर्येष्विष्टेषु रागमनिपु द्वेषं च व्युदस्य परित्यज्येत्यर्थः । यता व्युत्थानवशायां दृष्टेषु श्रोत्रियेपु हिवकारिषु साधुपु वा रागस्तद्विपरीवेषु द्वेपस्वावुभौ ब्युदस्य, चका- रात्समाधिविनकारणं मोहमालय जाड्यं प्रमादं च परित्यज्येत्यर्थः ॥ ११ ॥ श्री० टी०-तदेवाह-बुद्धयेति । उक्तेन प्रकारेण विशुद्धया पूर्वोक्तया सात्विस्या बुद्ध्या युक्तो धृत्या सात्त्विम्या आत्मानं कार्यकरणसंघातं तामेव बुद्धि नियम्य निश्चलां कृत्वा शब्दादीन्विपयांत्यक्त्वा वद्विपयो रागद्वेषां च ब्युदस्य बुद्धया विशुद्धया युक्तः । इत्यादीनां ब्रह्मभूयाय कल्पत इति नृवीयेनान्वयः ॥११॥ सादी-सप्रकारोच्यते सेयं ज्ञाननिष्ठा महाफला । वहाँवास्मीति वेदान्तवाक्यनिप्पन्नया धिया ॥१॥ सर्वसंदेहविभान्विशून्ययाऽतिविशुद्धया ॥ युक्तो धैर्येण देहादिसंघाचे विनियम्य च ॥२॥ निवार्योन्मार्गतो ब्रह्मतत्वेऽवस्थाप्य चिद्धने ।। ज्ञानविष्ठाविरुद्धांश्च त्यक्त्वा शब्दादिगोचरान् ॥ ३ ॥ शरीरस्थितिमात्रायें रागद्वेषी विहाय च ।। ज्ञानविक्षेप सर्व संत्यज्येवि चकारतः ॥ ४ ॥ ११ ॥ भा० टी०-माप्रातः ब्रह्मज्ञानस्य परस्याः निष्ठाया: तमारोपिताऽतद्धर्मनिवृत्चिद्वारा प्रमाणि परि- समाः सुसंपाद्यायाः प्रतिज्ञा कम दर्शयनि-युद्धयेति । बुद्धया व्यवसायात्मिकया । व्यवसाय प्रारम ज्ञानादेव मोक्षः स चावश्यं संपादनीय इति निश्चयः । विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः, धृत्या धैर्यणाल्मान कार्यकरणसंघातं नियम्य वशीकृत्य पटाध्यायादायुक्तानामनुकानां च साधनानां समुपयार्थ- प्रकारः । शब्दः आदिथेषां वान् शम्दादीविषयान् त्यस्त्वा सामच्छिरीरस्थितिमात्रान् केवलान्मुं- क्वा ततोऽधिकान सुसाधीस्त्यक्त्वेत्यर्थः । विषयमानत्यागे देहस्थित्यनुपपत्त्या ज्ञाननिष्ठावा असिद्धि- प्रसमात् । शरीरस्थित्यत्वेन प्राप्तेपु च रागद्वेषणे व्युदस्य परित्यज्य, चकारादन्यदापि ज्ञाननिमाविशेष. मात्सर्यादि परित्यज्य, विविकसेवी स्यादित्यव्याहृतेन ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यनेन वा संपन्धः ॥ ११ ॥ ५० टी०-तामेवाह-बुद्धयेति । एवंभूतः पुरुषो ममभूयाय कल्पत देवि नृवीयेनान्त्रयः । किंभूचो - श्रीमनगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५२] विशुद्धया व्यवसायामिकया बुद्ध्या युक्तो धृत्या सात्त्विकयाऽऽत्मानं बुद्धि नियम्य निश्चलां कृत्वा शब्दादीन विषयान् परगोष्ठीदर्शनादौत्यक्त्वा तद्विपयौ रागद्वेषो स्वस्तुविनिन्दाप्रयुक्तौ ध्युदस्य त्यक्त्या ॥ ११ ॥ रा० टी०-प्रतिज्ञावमाह-बुद्धयेति । विशुद्धया विपयेष्वसक्तया बुद्ध्या युक्तः । धृत्या धैर्येण स्तम्भन- शक्त्या आत्मानं मनो नियम्य विषयेभ्यो निवर्त्य च शब्दादीन् विपरित्यक्त्वा तदनुभवेच्छां विहायेति यावत् । यस्य यद्रागद्वेपो यो रागद्वेषौ तौ च स्यक्त्वा । व्युदस्येति पाठे न तु केशः ॥ ११ ॥ विविक्तसेवी लम्बाशी यतवाकायमानसः॥ ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ।। ५२ ॥ त० टी०-विविक्तसेची । एकान्तदेशसेवनशीला, लघ्वाशी शुद्धमितभोजी, यतवाक्कायमा- नसः वशीकृतशरीरेन्द्रियमनाः, ध्यानयोगपरो नित्यं अहरहः प्रतिसवनं ध्याननिरतः, तद्विरोधिपरि- हाराय वैराग्य समुपाश्रितः सम्यगुपाश्रितः सन् ।। ५२ ॥ म. टी-विविक्तेति । विविक्तं जनसंमर्दरहितं पवित्रं च यदरण्यगिरिगुहादि तत्सवितुं शीलं यस्य स चित्तैकाम्यसंपत्त्यर्थं तद्विक्षेपकारिरहित इत्यर्थः । लघ्वाशी लघु परिमितं हितं मेध्यं चाशितुं शीलं यस्य स, निद्रालस्यादि चिचलयकारिरहित इत्यर्थः । यतानि संयतानि वाकायमानसानि येन सः, यमनियमास- नादिसाधनसंपन्न इत्यर्थः । ध्यानयोगपरो नित्यं चित्तस्यात्माकारप्रत्ययावृत्तियांनं, आत्माकारप्रत्ययेन नितिकतापादन योगा, नित्यं सदैव तत्परस्तयोरेनुष्ठानपरों में तु मन्त्र जपतीर्थयात्रादिपर; कदा- चिदित्यर्थः । वैराग्यं दृष्टादृष्टविषयेषु स्पृहाविरोधि चित्तपरिणाम समुपाश्रितः सम्यनिश्चलत्वेन नित्यमाश्रितः ॥ १२॥ शं० टी०-किंच-विविक्तसेवीति । विविक्तसेवी विविक्तान् विजनानेव देशानरण्यनदीपुलिनगिरिक- न्दरगुहादीन चित्तप्रसादवदेकाप्रतासिद्धयर्थ सेवितुं शीलमस्यास्तीति विविक्तसेवी सर्वदा भवेनिदिध्या- सुर्यतिः । तथा लघ्वाशी च स्यालघु यथा तथाऽशितुं शीलमस्यास्तीति लघ्वाशी, लक्ष्वशनशीलस्यैव नैश्चल्येन समाधिनिष्ठासंभवात् । यद्वा लघु गुरुत्वरहितद्रव्यमश्नीयादिति लध्वाशी ! लघुपदं हितमितमेध्या- नामप्युपलक्षणं, तेन लघु हित-मितं मेध्यं चानमनीयानिदिध्यासुर्यतिरिति सिद्धम् । यतबाकायमानसश्च भवेत्-यतानि संयतानि सम्यक् निरुद्धानि पाह्यप्रवृत्तेः सम्यग्विमुखीकृतानि बाकायमानसानि येन स यवपाकायमानसः, विषयचिन्तनेन मन: स्थूलमेव भवति, न तु तनुत्वं गच्छति, वासना च प्रवर्धते, मनो- नाशाय बासनाक्षयाय क्रियमाणः समाधिगंजस्नानवनिष्फल एव भवति । ततः सदा विषयचिन्ताराहित्येन भवितव्यम् विथा वाक्प्रवृत्त्या त्वमहमिदमद इयादिविपरीतप्रत्यया न विनश्यन्ति द्वैतमेव प्रवर्धते, रोगिणो- उपध्येन रोगद्धिवत् । ततः सदा मौनेन भवितव्यम् । कायेन कर्मसु प्रवृत्त्या कर्तृतादात्म्यं कर्मवासना च। समा- धिकाले कायचलनेन मनसश्चेन्द्रियाणां च चलनं समाधिविनश्च भवति यतः, ततो बासनाक्षयाय मनोना- शाय च प्रवृत्तस्य यतेविषयाननुसंधानेन मानेन नैफम्र्येण च सर्वदा भवितव्यमित्युच्यते-यतवाकायमानस शनि 1 एतसिद्धये हेतुमाह-वैराग्यमिति । दृश्ये मिध्यात्वयुद्धपा तुच्यत्वबुद्धधा च भोक्तमनुसंधातुं च विषयेभ्यो विगतो निर्गदो राग इच्छा यस्य स विरागस्तस्य भावो वैराग्यं सर्वोच्छाराहित्यं नित्यमवि. छिन्नं समुपाभिवः सन् । एवं शुद्धबुद्धित्यादिसायनयुको प्रभाविद्यतिनित्यं निरन्तरम् । नित्यमिति विशेषणं देहलोदीपन्यायेनोभयन संवध्यदे। नित्यपदं निदिध्यासोरनुपानान्तराभावसूचनार्थम्। ततः सर्वदा ध्यानयो- गपर:-भ्यानं प योगच म्यानयोगी तत्र परो ध्यानयोगपर) प्रत्यगभिन्ने सचिदानन्देकरसे निर्षिशेपेऽद्वि- १२६७ [अ० १८० ५३] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता तीये परे ब्रह्मण्यधिष्ठाने आरोपितनामरूपादिविजातीयप्रत्ययतिरस्कारपूर्वकं वहिरन्तः सर्वत्र ब्रह्ममात्रकवि- पयाणां सत्प्रत्ययानां प्रत्यग्भावापन्नया वृत्त्या निरन्तरतैलधारावदविच्छिन्नया यत्प्रवाहीकरणं तयानम् । विजातीयप्रत्ययानन्तरितानां केवलसत्प्रत्ययानामेव चिरकालनित्यनिरन्तराभ्यासवशाविक्षेपकाणां वास- नानां संक्षये सति तनुतां गताया बुद्धिवृत्तेवमणि ब्रह्माकारेण निवातस्थलदीपवद्यो निश्चलीभावः स एव योगः, तयोर्ध्यानयोगयोरक्तलक्ष्योनित्यं परः सन् तद्ध्यानयोगनिष्ठासंपन्न एव यत्तिः परिपकज्ञानो भवतीत्यर्थः ।। ५२ ॥ श्री०टी०--किंच-विविक्तेति । विविक्तसेवी शुद्धदेशावस्थायी, लघ्याशी मितमोजी । एतैरुपायैर्यतवा- कायमानस: संयतवान्देहचित्तो भूत्वा निलं सर्वदा ध्यानेन यो योगो ब्रह्मसंस्पर्शस्तत्परः सन् ध्यानाद्यविच्छेदाथै पुनः पुनदृढं वैराग्यं सम्यगुपाश्रितो भूत्वा ॥ १२ ॥ स. टी०-विविक्तं जनसंदोहशून्यं गिरिगुहादिकम् ॥ पवित्र सेवितुं शीलं यस्य लघ्वशितं तया ॥१॥ यतानि यस्य वाकायमानसानि समन्ततः ॥ विक्षेपलयसामग्रीशून्यो युक्तो यमादिभिः ॥ २ ॥ ब्रह्मात्मन- त्ययावृत्तियांनं योगस्तथाऽऽत्मनि ॥ एकानाकरणं वृत्तेस्तयोरेव परः सदा ॥ ३॥ न तु मन्त्रजपादो यस्तत्परः सन्कदाचन ॥ दृष्टादृष्टेपु भोगेयु वैतृष्ण्यं नित्यमाश्रितः॥ ४ ॥ १२ ॥ भा० टी०-ततः-विविक्तेति । विविक्तदेशसेवी वनगिरिगुहानदीपुलिनादीन्विविक्तान जनसमुदाय. शून्यान् देशान्सेवितुं शीलमस्येति विविक्तदेशसेवी । एतादृशस्य चित्तं विक्षेपकामावादेकामं सत्प्रसन्नं भवति। निद्रादिदोपनिवन्धनचित्ताप्रसादनिवृत्यर्थमाह-लघाशी । हितमितमध्याशनशीलः । यतानि वशीकृतानि या- कायमानसानि यस्य स ज्ञाननिष्ठ यतयाक्कायमानसः । एवमुपरतसर्वकरणः सन् ध्यानयोगपर:-ध्यानमा- त्मस्वरूपचिन्तनं मनस आत्मस्वरूपविषय एकापीकरणं योगः, ध्यानयोगी परत्वेन कर्तव्यो यस्य स नित्यं सदैव ध्यानयोगपरः । मन्त्रजपप्रदक्षिणाप्रणामाद्यन्यकर्तव्याभावप्रदर्शनार्थ नित्यमहणम् । ध्यानयोगपरत्य- सिद्धयर्थमाह-वैराग्यं विरागभावं दृष्टादृष्टेष्टविषयेषु चैतृष्ण्यं समुपाश्रितः सम्यक् निश्चलत्वेन नित्यमे- वाश्रितः ॥ १२ ॥ प० टी०-किं च-विविक्तेति । विविक्तं विवेकहेतुभूतमेकान्तस्थलं सेवते, तथा लघ्वाशी सात्त्विकामि- वान्नभोजी । एवरुपायैर्यतवाकायमानसः संयतवान्देहचित्तो भूत्वा ध्यानेन वित्तकाध्येण वादाम्येन यो जीवब्रह्मयोगस्तत्परो भूत्वा पैराग्यं पुनर्विपयविक्षेपराहित्यं सम्यनैष्ठिकत्वेनोपाभिवः ॥ १२ ॥ रा०टी०-विविक्तेति । विविक्तसेवी जनसंमर्दहीनदेशवासी, लघ्वाहारवान् , यतवाफायमानस: सतिपय एव नियमितवागादिः, नित्यं ध्यानरूपोपायपरः, वैराग्यं समुपाश्रितः ।। ५२ ॥ अहंकारं बलं दर्प कामं को, परिग्रहम् ।। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥ त० टी०-अहंकारमिति । अहंकारमनात्मन्यात्माभिमान, बलमनात्मवस्तुविषयं देहेन्द्रिय सामर्थ्य, तनिमित्तं दर्य गर्ने, कामं मारब्धवशायदृच्छामाप्तेष्वपि विपयेषु स्वीकारेच्छा, तत्सतिबन्धके क्रोधं, परिनई वस्त्रानादेः सनई विमुच्य विशेषेण त्यक्त्वा निर्ममा देहसंबन्धित ममताशून्यः, अत एव शान्तः सर्वविक्षेपवर्जितः । एवंभूतो ध्याननिष्ठो ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मणो भागो बह्मभूयं तस्मै ब्रह्मभूयाय ब्रह्मपदोपास्पृष्टस्वभावतयाऽप्रस्थानाय कल्पते योग्यो भवति ॥५३॥ म० टी०-अहंकारमिति । अहंकारं महायुल्यसूत्रोऽहं महतां शिष्योऽतिविरोऽस्मि नासि द्विवीयो । क .
. १२१८ १२६८ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५३] मत्सम इत्यभिमान, यलमसदामहं न तु शारीरं वस्य स्वाभाविकत्वेन त्यक्तुमशक्यत्वात् । दपै हर्पजन्यं मदं धर्माविकमकारणम् हृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममतिकामति' इति स्मृतेः । कामं विषयाभिलापम् । 'वैराग्यं समुपा- थितः' इत्यनेनोकस्यापि कामत्यागस्य पुनर्वचनं यत्नाविक्यार्थम् । क्रोधं द्वेपम् । परिग्रहं शरीरधारणार्थम- स्पृहत्वेऽपि परोपनीतं वाह्योपकरणं विमुच्य त्यक्त्वा शिसायज्ञोपवीतादिकमपि, दण्डमकं कमण्डलु कौपीना- च्छादनं च शास्त्राभ्यनुज्ञातं स्वशरीरयात्रार्थमादाय परमहंसपरिवाजको भूत्वा निर्ममो देहजीवनमात्रेऽपि ममकाररहित: । अत एवाहंकारममकाराभावादपगतहर्षविपादत्वात् शान्तश्चित्तविक्षेपरहितो यतिनिसाधनप- रिपाकक्रमेण ब्रह्मभूयाय ब्रह्मसाक्षात्काराय कल्पते समर्थो भवति ॥ १३ ॥ ० टी०-एवं बहुकालं निरन्तरसमाधिनिष्ठामेव कुर्वतो ब्रह्मविद्यतेः समाध्यामिनिर्दग्धाशेपवासनानन्थेनिः- शेपनिवृत्तविपरीतभावस्य सम्यक्षरिपकविज्ञानसिद्धेः फलमाह-अहंकारमिति। चिरकालनित्यनिरन्तरसमनु- विसमाधिनिष्पन्नसम्यग्ज्ञानेन देहादिद्वतप्रपञ्चस्य स्वव्यतिरिकत्वाभासत्वात्सत्त्वधीपूर्वकमधिष्ठाने स्वात्मनि ब्रह्मणीदमेवाहमस्मीति स्वात्मना विदिते ब्रह्मण्येवात्मत्ववासनादाढदिनात्मनि देहादावहकारमहकरणमना- स्मन्यहमिति बुद्धि विमुञ्चति ब्रह्मविद्यतिः। नाज्ञवदात्मतत्त्वज्ञः सर्वाधिष्टानं नित्यं शुद्धं बुद्धं मुक्कं चिदेकरसं परिपूर्ण परं ब्रह्म स्वस्वरूपत्वेन विज्ञायारोपितमसत्तुच्छमहमित्यवलम्बते, किंतु प्रतिच्छायावदामासरूपेण प्रतीयमानेऽप्यस्मिन् देहेऽहंभावं परित्यजति । तत्रात्मत्वधीदेवोरज्ञानस्याधिष्ठानयाथात्म्यसंदर्शनेन विनष्ट- त्वात्ततः । कारणनाशात्कार्यनाशः ' इतिन्यायेन ब्रह्मवित्तत्राहंभावं न करोतीत्यर्थः । फिंच पलं स्व. महमिदमद इत्यारोक्तिपदार्थग्रहणकारणमविद्यावासनावं वृत्तिवेगलक्षणं विमुञ्चति । नित्यनिरन्तरसमाधि. निष्ठयाऽनाद्यविद्यावासनासंक्षये सति तस्कृतं पलं वेगलक्षणमन्तःकरणस्थ परित्यजति । पूर्व वासनानलादन्त- करणं परिपूर्णमपि ब्रह्मस्वरूपमतिक्रम्य यथा प्रपञ्चं गृहाति, तथा समाधिना वासनासंझयात् विशिष्य नाम- रूपादिमहणं न करोति, किंवाभासप्रपञ्चं त्यक्त्वा सर्वत्र प्रोव पश्यति । व्युत्थानाव्युत्थानयोः सर्वदा प्रमण्येव विष्ठवीत्यर्थः । एवेन विदुपस्त्यहमिवि भावेनेदमिविवासनाद्यभावः सूचितः । दर्प च-कृतार्थोऽहमिति ब्राह्मविदहमित्यभिनिवेशलक्षणोऽन्त,करणविकारो दर्परत घ विमुञ्चति, स्वकारणेऽज्ञानेहंकारे प समाधिना विनष्टे सति । 'कारणनाशात्कार्यनाशः' इतिन्यायेन स्वयमेव दो विनश्यतीत्यर्थः । वथैव कामं शोधं च विमुश्यति । संप्राप्तपदार्थभोगेच्छा काम:, स्यापकारिणं हन्तुमुद्योगः क्रोधः, वो परित्यजति । स्वकारणस्य रजसः समाधिना निर्मूलितत्याद्विनिर्मलान्त.करणतया सम्यगप्रतिवद्वात्मविज्ञानेन अहमेवेदं सर्वमिति सर्वात्मभावं प्राप्तस्याई भोछेदं भोग्यमिति, अयं हन्ताऽई इन्य इति विपरीवभावनाभावात्स्वमानत्वात्सर्वत्र रागद्वेपयोरनव- काशापची निमित्चापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय, इविन्यायेन कामनोधौ स्वयमेव विनाशं प्राप्तावित्यर्थः । वव एव परिमहं शरीररक्षणार्थत्वेन प्राप्तो य: परिप्रहः कौपीनकापायकन्यादिस्त चापि विमुञ्चति । एवम् अहंकार पलं दर्षे काम को परिमहं च यद्यदहिरन्तश्च विकल्पकारण तत्सर्व विमुच्य न दण्डं न कगण्डलु न शिखा न यज्ञोपवीतं नाच्छादनं परवि परमईस.' इत्युक्तरीत्या देहमानावशिष्टः परमहंसो भूत्वा । मनु शारिस्थितिदेवो: कापायकन्धादेः परित्यागे शीववातादिभिर्विकल्प एक संभवति, कथं निर्विकल्प प्रम- पिनुधमत्य परमदंसस्येत्यारापानाहादावईममेत्यभिमानव एय शीतादिकृतविक्षेपो, न तु निरभिमानस्ये- वि। बदसंभवे हेतुमाह-निर्मग इति । स्वकारणस्याइंकारस्य विनष्टत्वाग्नि शेषेण गतो निर्गतो देहे मन- भायो यस्य स निर्ममः परदेव इव स्वदेहे ममतारहित इयर्थः । " स्वरपुः गुणपमित्र दृश्यवे यतस्तापुरपत्र- रखमाइति अपनादमण्येवास्यत्वात्यययता महात्मना प्रअविदाऽनारमत्वेन त्यछे सबको शरीर त्यहंभावो ममभारंभ न मियावमिमिवाध्यात्सर्वपिफसरय । पिस्वभावाचदभाव इति सूचयितुमेव निर्मग ज्यु- -
[अ० १८ श्लो० ५३] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता
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कम् । यत एवं चिरकालनित्यनिरन्तरसमाधियोगनिधूंनाहंकारममकाराद्यविद्यावासनाप्रपञ्चो यो ब्रह्मविद्यतिः
स सर्वेभ्यो गुहाग्रन्थिम्यो विमुक्तो भवति।तत एव शान्तः निरिन्धनानिवदुपशान्तान्तःकरणसर्वविकारस्तत
एक प्रसन्नान्तःकरणतया संप्राप्तात्मयाथास्यविज्ञानो ब्रह्मभूयाय ब्रहामावाय-ब्रह्मभावो नाम सचिदानन्दै
फरसब्रह्मात्मनाऽवस्थानम्-तस्मै कल्पते ब्रह्माकारेण तिष्ठतीत्यर्थः । एतेनात्यन्तद्धया चिरकालं नित्यं
निरन्तरं समाधिनिष्ठामेकां नियमेन समनुतिष्टवस्तनिष्ठयाऽहमादिसर्ववासनामन्थिविच्छित्तिं सम्यक्कृतव-
तस्तद्विच्छित्त्या सम्यगात्मप्रसाद लब्धवतस्तक का संसिद्धात्मयाथाम्यविज्ञानेनाहमेवेदं सर्वमिति सर्वमा-
स्मानमेव पश्यतो ब्रह्मविदो ब्रह्मभाव; सिध्यतीति सूचितम् ॥ ५३॥
श्री०टी०-किंच-अहंकारमिति । ततश्च विरक्तोऽहमित्याद्यहंकार, वलं दुराग्रह, दर्प योगमलादुन्मार्ग-
प्रवृत्तिलक्षणं, प्रारब्धवशाव्याप्यमाणेष्वपि विषयेषु काम क्रोधं परिग्रहं च विमुच्य विशेषेण त्यक्त्वा वला-
दापन्नेषु निर्ममः सन् शान्तः परामुपशान्ति प्राप्तो ब्रह्मभूयाय ब्रह्माइमितिनैश्चत्यनावस्थानाय कल्पते
योग्यो भवति ॥ ५३॥
स० टी०-महाकुलप्रसूतोऽहं विरक्तोऽन्यो न मत्समः । इत्येवमभिमानं च वलमत्रासदामहम् ।। १।।
न शारीरं यतस्तस्य स्वाभाविकतया जनैः ॥ त्यागः कर्तुमशक्योऽस्ति द ह व दुर्मदम् ॥ २॥धर्मा-
विक्रमणे हेतुं वदुक्तं च स्मृती स्फुटम् ॥ हृष्टो दृप्यत्ति दृशः सन्नविकामति धर्मवः ॥ ३॥ कामं भोगाभि-
लापं च नोपं द्वेपं परिग्रहम् ।। बाह्योपकरणे सर्व यद्यविक्षेपकारणम् ॥ ४॥ परित्यज्याखिलानेवान देह-
धारणमानके ॥ ममत्वरहितः अन्तश्चित्तविक्षेपवर्जितः ॥५॥ ज्ञानसाधनसामग्रीपरिपाकक्रमेण च ॥
प्रभावाय यविराट् समों भवति स्वयम् ॥ ६ ॥ अहंकारादिपर्वं च सम्यग्वैराग्यवैभवात् ॥ तथा विवे-
कसामन्या वेदान्ताना विचारणात् ॥ ७॥ नैरन्वर्येण सत्सङ्गद्वाराऽभ्यासादिवैभवात् ॥ त्यक्तुं शक्यं भवे.
द्यस्मान्नान्यथाऽतो विवेकवान ॥८॥ भगवत्पदमालम्ब्य सतां सङ्गेन सर्वदा ॥ अभ्यसेब्रह्मवस्त्वैक्य
श्रीहरेरयमाशयः ॥ ९॥ १३ ॥
भा० टी०-किंच-अहंकारमिति । देहादिप्वईकरणमहकारस्तं देहे आत्मत्वाभिमानं, वलं कामरांगादिप्र.
युक्तं सामर्थ्य नेवर उरीरादिसामर्थं स्वाभाविकत्वेन तत्त्यागस्याशक्यत्वात् । दो हपनिन्तरमाची धर्मावि.
क्रमहेतुः 'हप्टो प्यति दृप्तो धर्ममतिकामति' इति स्मरणात् तं च, काममिच्छाम् । वैराग्यशब्देन लब्यस्यापि
कामत्यागस्य पुनर्वचनं तस्मिन्नधिकयत्नः कर्तव्य वि वोधनाय प्रकृष्टत्वख्यापनार्थम् ।इच्छितपदार्थालाभप्रयुक्त
कोच, परिग्रहमिन्द्रियमनोगतदोपत्यागेऽपि शरीरधारणप्रसङ्गेन धर्मानुष्ठाननिमिचेन वा प्राप्तं पाहपरिमहं घ
विमुच्य परित्यज्य परमहंसपरिवाजको भूत्वा देहजीवनमानेऽपि विगतमममावो निर्ममोऽत पव शान्तः उपरत:
सहवायासो यतिआननिष्ठो बाभूयाय ग्रामवनाय ब्रह्मणोऽनुसंधानपरिपाकपर्यन्वजाय साक्षात्काराय
कल्पते समथों भवति ।। ५३ ॥
५० टी०-अथ विक्षेपकारणोन्मूलनप्रकारमाह-अहंकारमिति । अहमेवाग्विरकोऽस्मीत्यइंकार, पलं
दुरामह, दर्प योगग्लादुन्मार्गप्रवृत्तिलक्षणं, प्रारम्भे(?)काम क्रोधं परिग्रहं च विमुच्य विशेषेण मुम्सा बला.
कारण प्राप्तेपु निर्ममो ममताशून्यः शान्तः परामुपशान्ति प्राप्त एवंदी योगी प्रमभूयाय प्रमाहमस्मीति
नैश्चल्येनावस्थानाय कल्पते योग्यो भवति ॥१३॥
रा० दी०-अहंकारमिति । अहंकारं स्वकर्तृत्वाभिमान, पलं ससमर्धवाभिमान, पं भीतिदेतो-
रष्टिम् , फार्म विषयाभिलाप , क्रोधं परिमहं च विमुच्य निर्ममः कर्मणि मंदीयवाथुद्धिहीनः, शान्त:
हेतुमिरप्यमुस्थितकोप; ब्रह्मभूयाय मक्षणि स्थितिप्रभूयं तरमै सर्वा मममनस्कत्वायत्ययः, फपी
समयों भवति ॥ १३ ॥
१२७० श्रीमद्भगवद्गीता [भ०१८ लो० ५४] ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काहति ॥ समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥ तक टी-इदानीं यस्य ब्रह्मभावयोग्यतोक्ता तस्य ब्रह्मभावप्राप्तस्य लक्षणं तत्फलं चाह-ब्रह्म- भूत इति । आविर्भूतानवच्छिन्नज्ञानधर्मात्मस्वरूपानुभूतिस्तत एव प्रसन्नात्मा बाह्यविषयनिरपेक्ष- प्रसादयुक्त आत्मा चित्तं यस्य स तथा। तत्र लिङ्गम्-न शोचति । किंचिनष्ट वस्तु न शोचति । न वा अप्राप्त किंचित् काति, आत्मानुभवसंतुष्टतया समलोष्टाश्मकाञ्चनदृष्टिरित्यर्थः । अत एव सर्वेषु भूतेषु समः स्वस्य स्तुतिपूजाकर्तृषु निन्दापकारकर्तृषु च मित्रारिभाववर्जितः । एवं ज्ञानसिद्धि प्राप्तो मद्भक्तिं लभते परां-मद्विपयां निरतिशयपीतिलक्षणां परामव्यभिचारिणी मत्साक्षात्कारासाधारणकार- णभूतां भक्तिं लभते । पराभक्तिलाभ एव ज्ञानस्य परा निष्टा फलमित्यर्थः । तथोक्तं श्रीभागवते- "आत्मारामाश्च मुनयो निग्रन्था अप्युरुक्रमे । कुर्वन्त्यहतुकी भक्तिमित्थंभूतगुणो हरिः । सनन्दना- दयो ये च ब्रह्मभावनया युताः" इति विष्णुपुराणोक्तबहाभावनावतां सनन्दनादीनामपि " हरिः शरणमित्येव नित्यं तेषां मुखे वचः" इति भागवतमाहात्म्ये अहर्निशभगवत्स्मरणस्य पराम- क्तिलक्षणस्य प्रतिपादनात् । एवं विशुद्धबुद्धयादियोगपूर्वकमशान्तस्य ब्रह्मभूतस्यापि पराभक्तिलाभक- थनेनोक्तसाधनमकियां विना सर्वभूतसमत्वलक्षणब्रह्मभावयोग्यता न भवति । उक्तब्रह्मभावं विना पराभक्तिर्न लभ्यते, तस्मात पराभूक्तेः क्षेत्रशस्वरूपयाथात्म्यज्ञानोत्तरभावित्वं निश्चीयते ॥ ५४॥ म० टी०-केन क्रमेण ब्रह्मभूयाय कल्पत इति तदाह-ब्रह्मेति । प्राभूतः अहं ब्रह्मास्मीतिदृढनि- श्वयवान् श्रवणमननाभ्यासात् प्रसन्नात्मा शुद्धचित्तः शमदमायभ्यासात् । अत एव न शोचति नष्टं न का- त्यप्राप्तम् । अत एव निमहानुप्रयोरनारम्भात् समः सर्वेषु भूतेषु आत्मौपम्येन सर्वत्र सुखं दुःखं च पश्य- तीत्यर्थः । एवंभूतो ज्ञाननिष्ठो यतिमद्भक्तिं मयि भगवति शुद्धे परमात्मनि भक्तिमुपासना मदाकारचित्तवृत्त्या- वृत्तिरूपां परिपकनिदिध्यासनाख्यां श्रवणमननाभ्यासफलभूवा लभते । परां श्रेष्ठामव्यवधानेन साक्षात्कार- फलाम् 'चतुर्विधा भजन्ते माम्' इत्यत्रोकस्य भक्तिचतुष्टयस्यान्त्यां ज्ञानलक्षणामिति वा ॥ ५४ ।। शं०टी०-एवं विशुद्धबुद्धित्वादिसहकारिसाधनसंपत्त्या समनुष्ठितध्यानयोगनिष्ठासमुत्पन्नसम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मभावं गतवतो महात्मनो जीवन्मुक्तस्य कृतार्थस्य यतेः स्थितिमाह श्लोकान-ब्रह्मभूत इति । निरुक्त- साधनसंपत्त्या समनुष्ठितसमाधिनिष्ठाविध्वस्वरजस्तस्स्तत्कार्यरागद्वेपाद्यहंकारममकाराद्यशेपमलवया प्रसन्नः केवलशुद्धसत्यभावापन्नः सर्वत्र ग्रामात्रमहणेन प्रशान्तो विपरीतप्रत्ययनिर्मुक्त आत्मान्तकःकरणं यस्य स प्रसन्नात्मा समाधिनिष्ठापरिपकविज्ञानः । तत एव दृश्यसंबन्धं परित्यज्य ब्रह्मभूतः-सद्धनं चिद्धनमान- न्दघनं यत्परं ब्रह्म एतदेवाहमिवि वझावं गतो जीवन्मुक्तो ब्रह्मवित्तमो न शोचति शोक न फरोति, शोकहेतोरनर्थस्याभावात् । लोके ये कंचनानमात्मनो दृष्ट्वा मूढः शोचति, शोचति । न हि सर्व स्वमेव पश्यतो विदुषः संभवत्यान्तरमनाय, यदृष्ट्वाऽयं शोचेत्-"द्वितीयादै भयं भरीवइति द्वैतस्यैव भयहेतुत्वं श्रूयते दृश्यचे च स्वव्यविरिकस्यैव भयकारणत्वं दु.सकारणत्वं च । वतः स्वयमेव सर्वत्र चिदेकरसं प्रशान्त वृरिक्षयादिवर्जिवमानन्दघनमद्वितीयं च पश्यतोऽनहेतो. रन्यस्यादर्शनादलविचमः शेकनिमिचाभावान्न शोचतीत्यर्थः । नन्वाभासरूपेण विदुपोऽप्युपा. घिरस्त्येव, द्वैफल्यवैगुण्ययोः शोकनिमिचयोः संभवात्कथं विद्वान शोचतीति चेन । देहे ममवाभावस्य . प्रतिपादितत्वारेहे छहममेत्यभिमावत एव तदैकल्यवैगुण्ययोः शोक. संभवति, किंतु प्रवाई न तु देह तभावान्नायं १२७१ [अ० १८ श्लो० ६४] वत्त्वप्रकाशिकायष्टदीकोपेवा इति निरभिमानस्य सर्वात्मन्येव वयोरविपये ब्रह्मण्यात्मभावापत्त्या तदात्मना निरूढवृत्तर्विदुपः प्रतिच्छा- यावदुपाघेरसत्त्वात्तन्निमित्तकः शोको न संभवति । तथा च श्रुतिः ॥ किमिच्छन्कस्य कामाय " इति, "मत्वा धीरो हर्पशोको जहावि " इति, "क: शोक एकत्वमनुपश्यतः" इति च । न काइति च निरुक्कल- क्षणो ब्रह्मविद्यपिन किंचिदर्थान्तरं कामयते । सर्वोह्यप्राप्तमर्थ कामयते, न तथास्य ब्रह्मविदः प्राप्तव्यमान्तर- मस्ति यत्कामयेत ममेदं भूयादिति। "अहमनमहमन्नमहमन्नममन्नादोऽहमन्नादोऽहमन्नाद" इति, 'अहं मनुरभवं सूर्यश्व इतिन्यायेन स्वस्यैव भोक्तभोग्यात्मनाऽवस्थितत्वात्स्वव्यतिरिक्तवस्त्वन्तराभावाच अहमेवेदं सर्वमिति सर्वात्मभावापत्त्या सर्वस्यापि वस्तुनः स्वात्मत्वेन प्राप्तत्याच कामनैव न संभवति, तत एव न का ति । "सोऽश्नुते सर्वान्कामान्सह ब्रह्मणा विपश्चिता" इति ब्रह्मभावापन्नस्य यते: सर्वकामाप्तिश्रवणावाप्तसर्वका- मस्य कामयितृत्वासंभवात्काम क्रोधमिति कामस्य परित्यक्तत्वाञ्च व्रतविकचित्किंचिदपि न काइती- त्यर्थः । ज्ञानस्य सम्यक्त्वसिद्धये विशुद्धबुद्धित्वादिसाधनसंपत्त्या ज्ञाननिष्ठां कुर्वतोऽतत्त्यागपूर्विका ब्रह्मप्राप्तिरेव सूचिता न तु निष्ठया संप्राप्तज्ञानस्वरूपम् । तेन वस्तुतत्त्वनिर्धारणप्रकारो निर्धारितवस्तुप्राप्तिब्ध जिज्ञासोर्विज्ञातव्यम्। तदेतत्सर्वे संक्षेपेण प्रतिपादयति साधुन-सम इति। विशुद्धबुद्धित्वादिभिस्तद्बुद्धित्वादिभिश्च ज्ञाननिष्ठासहकारिसाधनैः सम्यक्संपन्न: समदर्शनपरः सम्यग्ज्ञानसिद्धय ज्ञाननिष्ठायां प्रवृत्तो नमविधि: 'अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्। इति, सर्वभूतेषु येनकम्' इत्युक्तप्रकारेण भूतेप्वाकाशादिस्थूलान्तेषु भूत- कार्येषु च ब्रह्मादिस्तम्बान्तशरीरेषु सर्वेषु सर्वत्र परांज्ञाननिष्ठापरिपाकजन्यत्वासंशयविपर्ययादिदोपनिर्मुक- त्वादप्रतिवद्धत्वात्परमार्थबोधकत्वाञ्च परा प्रकृष्टा तां पर मनक्तिम्-विपराकारं भजति इति भतिज्ञानं निष्ठा- परिपाकजं मम सर्वभूतात्मभूवस्य निर्विशेषस्यापरिच्छिन्नस्य सर्वोपाधिविनिर्मुक्तस्य चिदेकरसस्य परस्य ब्रह्मणो भक्तिर्मद्भक्तिसां लभते । नित्यनिरन्तरसमाधिनिष्ठयान्तःकरणस्य शुद्धसत्त्वभावापत्तौ सर्वत्र मत्स्वरूपमा- ग्राहकमद्वैतविषयं ज्ञानं ब्रह्मविव्याप्नोतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ श्री०टी०-ब्रह्माहमित्येवं नैश्चल्येनावस्थानस्य फलमाइ-ब्रह्मभूत इति । ब्रह्मभूतो ब्रह्मण्यवस्थितः प्रस- नपित्तो नष्टं न शोचति न चाप्राप्तं काति देहायभिमानाभावात् । अत एव सर्वेष्वपि भूतेषु समः सन् रागद्वेपादिकृतविक्षेपाभावात् सर्वभूतेषु मद्भावनालक्षणां परां मनक्ति लभते ।। ५४ ॥ स० टी० येन क्रमेण ब्रह्मात्मभावयोग्यो भवेन्मुनिः ॥ तदाह ब्रह्मभूतश्च ब्रह्मास्मीति मुनिश्चितः ॥१॥ अवणादेः सदाभ्यासात्प्रसन्नात्मा विशुद्धधीः ।। शमाद्यभ्यासतो नष्टमिष्टं वस्तु न शोचति ॥२॥ नाप्राप्त कावि स्वस्यः सर्वभूतेषु यः समः ।। आत्मौपम्येन सर्वत्र सुखं दु.सं च पश्यति ॥ ३ ॥ ज्ञान- निष्ठः पुमानेवं मयि शुद्धे परात्मनि ॥ उपासनां महाकारधीवृत्या वृचिरूपिणीम् ॥ ४ ॥ श्रवणादेः सदाऽभ्यासफलभूतामनुचमाम् ॥ निदिध्यासनसंसिद्धां साक्षात्कारफलां पराम् ॥ ५ ॥ मद्भक्तिं लभते धीरश्चतुर्थी ज्ञानलक्षणाम् ॥ ६ ॥ १४ ॥ भा० टी०-ब्रह्मभूत इति । अनेन क्रमेण प्रमभूवः प्रमभवनसमर्थत्वात् अद्मभूतः प्रसन्नात्मा प्रसन्न फर्तृत्वादिविनिर्मुकः आविर्भूतानन्द आत्मा प्रत्यगात्मा यस्य स लब्धात्मप्रसादा न शोचवि किंचिदवैक- स्यमात्मनो वैगुण्यं चोद्दिश्य न शोचति न संतप्यते, न कानुदि अप्राप्तं वस्तु । ब्रह्मभूतस्य शोगकाइयो. स्नुपपनत्वाचस्य स्वभावोऽनूद्यवे न शोचति न काइतीति । न हायवीति वा पाठः । रमणीयं प्राप्य में प्रमोदते तस्य मिथ्यात्वेन निश्चयादित्यर्थः । सर्वेषु भूतेषु समः सुखं दुःसं वा. आत्मौपम्येन राममेव पश्यतीत्यर्थः । नत्वात्मसमदर्शनमिह प्रारं भक्त्या मामभिजानातीवि वस्य वक्ष्यमाणत्वात् । य एवंभूतः समद्विपया भकि आवो जिज्ञासुरार्थी ज्ञानी वा इत्योक्तां चतुर्थी शानलक्षणां 'तेपा हानी नित्ययुफ. एकभक्तिविशिष्यते' इत्युक्तां परामनुचमा लभते प्राप्नोति ॥ ११ ॥ . . .
१२७२ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो. १५] १० टी०-तथाविधत्वस्य फलमाह-ब्रह्मभूत इति । ब्रह्मण्यवस्थितः प्रसन्नचितः सन् न शोचति । न चापातं काहुति देहाभिमानाभावात् । अत एव सर्वेषु भूतेपु समो न केवलं तारतम्यवर्जितः, किं तु परामु. त्कृष्टां मद्भक्ति लभते सर्वभूतेषु मद्भावनया भजते ॥ १४ ॥ रा० टी०-ततः किमित्यत आह-ब्रह्मभूत इति । ब्रह्मणि स्थितमनस्कः लक्ष्मी प्राप्तः प्रसन्नात्मा स्वत एव विषयेष्वप्रवृत्तमना: न शोचति न काइति । सर्वेषु भूतेषु समः परां भक्तिं लभते ॥ ५ ॥ भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्वास्मि तत्त्वतः ॥ ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ।। ५५॥ त० टी०-ततश्च " भक्तिरेवैनं वर्धयति, भक्तिरेवैनं दर्शयति, भक्तिवशः पुरुपो भक्तिरेव भूयसी" इति श्रुत्युक्तं भक्तेर्भगवदर्शनासाधारणकारणत्वं तशीकरणत्वं चाह-भक्त्येति । ततस्तया भक्त्या यावान् यादृशगुणशक्तिविभूतिमानहं यश्च सचिदानन्दविग्रहः सर्वज्ञः सर्वकारणं सर्वान्तर्यामी देशकालवस्तुपरिच्छेदशून्यः सर्वव्यापकोऽपि सर्वदोपास्पृष्टः सकलचेतनाचेतनभिन्नाभिन्नस्वभावस्तं मां तत्त्वतः संशयविपर्ययराहित्येनाभिजानाति, साक्षादनुभवति । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं मयि विशते निरतिशयानन्दं मामनुभवन्निरतिशयानुरागेण सर्वदा मां परिचरनभिनिविष्टो मयि वर्तते, कदाचिन्मदृष्टयगोचरो न भवति । तद्भक्त्या वशीभूतोऽहमपि कदाचित्तदृष्टयगोचरो न भवामीत्यर्थः । 'यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति । तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति" इत्युक्तरीत्या सर्वदा मद्दर्शनपरिचर्यया मदविनाभावेन मय्येव वर्तते । न च मत्तः कदाचिद्वियुज्यते इति भावः ॥१६॥ म०टी०- 0-ततश्च भच्या निदिध्यासनात्मिकया ज्ञाननिष्ठया मातद्वितीयमात्मानमभिजानाति साक्षा- करोति । यावान् विभुनित्यश्चं यश्च परिपूर्णसत्यज्ञानानन्धनः सदा विध्वस्तसर्वोपाधिरखण्डेकरस एकस्ता- वन्तं चाभिजानाति । ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा अहमस्म्यखण्डानन्दाद्वितीयं ब्रह्मेति साक्षात्कृत्य विशते अज्ञानतत्कार्यनिवृत्तौ सर्वोपाधिशून्यतया मद्रूप एव भवति । तदनन्तरं पलवस्त्रारब्धकर्मभोगेन(ण) देहपाता- नन्तरं नतु ज्ञानानन्तरमेव । क्त्वाप्रत्ययेनेव तटाभे वदनन्तरमित्यस्य वैय्यापादात् । “वस्मात्तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्षेऽय संपत्स्ये " इति श्रुत्यर्थ एवात्र दर्शितो भगवा । यद्यपि ज्ञानेनाज्ञानं निवतितमेव दीपेनेव धमस्तस्य तद्विरोधिस्वभावत्वात , तथापि तदुपादेयमहकारदेहादि निरुपादानमेव यावत्प्रारब्धकर्म- भौगमनुवर्तते दृष्टत्वादेव । नहि दृष्टेऽनुपपन्नं नामा तार्किकैरपि हि समवायिकारणनाशाहव्यनाशमङ्गीकुर्वद्भि- निरुपादानं द्रव्यं क्षणमात्रं तिष्ठतीत्यङ्गीकृतम् । नित्यपरमाणुसमवेतद्वयणुकनाशे त्वसमवायिकारणनाशादेव द्रव्यनाशः । समवायिनिरूपितकारणनाशत्वमुभयोरनुगतमिति नाननुगमः । ये त्वसमवायिकारणनाशमेव सर्वन कार्यद्रव्यनाशकमिच्छन्ति वेपामाश्रयनाशस्थले क्षणक्यमनुपादान कार्य तिष्ठति । एवं च तत्रैव प्रवियन्धकसनिपाते पंहुकालावस्थिति: केन वार्यवे । प्रारब्यकर्मणश्च प्रतिवन्धरुत्वं श्रुतिसिद्धं, अन्तःकरणदेहा- एस्थित्यत्ययानुपपचिसिद्धं च । एवं. शिष्यसेवकाद्यदृष्टमपि तत्प्रतिबन्धकं तदभावमपेक्ष्य च पूर्वसिद्ध माज्ञाननाशस्तकार्यमन्तःकरणादिकं नाशयतीवि न पुनर्शनापेक्षा । वदुक्तम् ' तीर्थे श्वपचगदे वा नष्ट- स्मृविरपि परित्यजन्देहम् । ज्ञानसमकालमुक्तः कैवल्यं याति हतशोकः ॥ इति । न जानामीत्यादिप्रत्ययस्तु वस्य निवृत्तामानस्याप्यज्ञाननाशजनितादनुपादानात् साक्षादात्माश्रयादेवाज्ञानसंस्कारातत्त्वज्ञानसंस्कारनि- वादन्त:करणस्थित्यवधेरिति विवरणतः। अई ब्रह्मामीविचरमसाक्षात्कारानन्तरमई, प्रम न भवामि न जानामीत्यादिप्रत्ययो नास्त्वे५ । यदि परं पदं न जानामीत्यादिप्रत्ययः स्यात्तदुपपादनाय घेयं संस्कार. - - । .
१२७३ -- [अ० १८ रो० ५५] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता कल्पनेति नानुपपन्नम् । अज्ञानलेशपदेनाप्ययमेव संस्कारो विवक्षितः। नहि सावयवमज्ञानं, येन किंयन्नश्यति कियत्तिष्ठतीति वाच्यं, अनिर्वचनीयत्वात् । एकदेशाभ्युपगमे तु वन्निवृत्यथै पुनश्वरमं ज्ञानमपेक्षितमेव । तच्च मृतिकाले दुर्घटमिति तत्त्वज्ञानसंस्कारनाश्यवा तस्याभ्युपेया। ततश्च संस्कारपक्षान्न कोऽपि विशेष इति पूर्वोक्तव कल्पना श्रेयसी । ईशजीवन्मुक्ष्यपेक्षया च प्राग्भगवतोचम् ‘उपदेश्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्वत्त्व- दर्शिनः' इति, स्थितप्रज्ञलक्षणानि च व्याख्यातानि । तस्मात्साघूकं विशते तदनन्तरमिति ॥ ५५ ॥ शं० टी०- एवं चिरकालं नित्यनिरन्तरसमभ्यस्तज्ञानयोगेन विपरीतप्रत्ययहेतूनामनाद्यविद्यावासनानां वकार्याणां च विपरीतप्रत्ययानां निःशेषसंक्षये सति विकल्पं सर्व परित्यज्य सर्वत्र समदर्शनलक्षणं ज्ञानं प्राप्त- वतो ब्रह्मविद्यवेस्वज्ञानोत्पन्नं वस्तुतत्त्वनिश्चयं प्रतिपादयस्वादृविश्वयवतो ब्रह्मप्राप्तिं दर्शयति-भक्त्येति । भक्त्या पहिरन्तः सर्वत्र वस्तुमानावगाहिन्या निर्विकल्पया प्रत्यग्दृष्टया सम्यगधिष्ठानसंदर्शनजन्यज्ञानेन ब्रह्मविद्यतिते परं ब्रह्माभिनानात्यभितः सर्वत आभिमुख्येन विकल्पराहित्यं यथा तथा साक्षात्कृतस्य वस्तु- नस्तत्त्वं विनिचिनोति, सामान्यतो विशेषतश्चाधिगतस्य वस्तुनस्तत्त्वनिर्धारणं करोतीत्यर्थः । निर्धारणप्रकारमे. वाह-यावानिति । अन्यक्कमहदादितत्कार्योपाधियोगादहं यावान मायाकल्पितोपाधिभेदैरहं यादशोऽस्मि सम- प्टिस्थूलसूक्ष्मकारणोपाधिभिर्विराट् हिरण्यगर्भ ईश्वर इति, व्यष्टिस्थूलसूक्ष्मकारणोपाधिभिर्विश्वस्तजसः प्राज्ञ इति, गुणत्रयोपाधितो ब्रह्मा विष्णुरीश्वर इत्यवान्तरवृत्तिभिर्देवास्तिर्यञ्चो मनुष्या इत्युपाधिभेदमूपः प्रवीतोऽस्मी- त्यर्थः । स्वयमविकृतमेव सदधिष्ठानमारोपितनामरूपाण्यनुकरोति, यथा रज्जुरविकारिण्येवारोपितसर्पशिरः- पुच्छाद्याकारेण भाति ग्रहीतुर्ग्रहणदीपेण, मरुरेवारोपितंजलप्रवाहतरङ्गारिरूपेण प्रतीयते, वयाऽधिष्ठानभूतम- विक्रियमेव परं ब्रह्माप्यारोपितनामरूपाण्यनुकुर्वत्रानेव प्रतीयते । तथैव श्रूयते स्मयते च-"इन्द्रो मायाभिः पुरु- रूप ईयते । एकः सन बहुधा विचचाइ । एक एव हि भूतात्मा भूत भूते व्यवस्थितः । स एकधा भवति निधा भवति पञ्चधा सप्तधा भवति नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृत.' इति, 'बहुरूप इवाभावि मायया बहुरूपया। नित्यः सर्वगतोऽप्यात्मा कूटस्थो दोपवर्जितः ॥ एक: सन् भिद्यते भ्रान्त्या मायया न तु तत्त्वतः' इति । य एवं मायापरिकल्पितोपाधिविशेपैः परिच्छिन्न इस धीव कीव गुणीव प्रतीवः, स एवाई श्रुत्यनुगतयुक्त्या समाहितबुद्धया च परिशील्यमान उपाधिवद्धर्मतत्कर्मतगुणतद्विकाररहितोऽपरिच्छिन्नो नित्यो निर्विशेपो मुक्तो- पसृप्य एक एवाभियोऽस्मीत्याह-यश्वास्मि तत्त्वव इति । " अयात आदेशो, नेति नेति । यत्र नान्यत्पश्य- ति! यचद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रम् । अस्थूलमनम्बहूस्वमदीर्घम् " इत्यादिश्रुत्यनुकूलै विनेविवा- क्यारोपितनामरूपादेरपवादे क्रियमाणे तन्निषेधावधिभूतं युक्तिशतैरप्यनपोह्यमपवदितुरामभूवमहेयमनुपादेयं निविशेपं निराभासं निराधार निराकारं निरवद्यं निरचनं निष्कलं निष्क्रियं शान्तमनन्तमनाद्यन्वं नित्यशु- युद्धमुतस्यभावमरसण्डानन्दैकरसं परं तत्त्वं यदस्ति, ततः पारमार्थिकस्वरूपेण कालत्रयेऽपि प्रमाणान्तराया- धितसत्तावत्तया स्थितो नित्यः शाश्वतो योऽहमेफ एवाद्वितीयोऽस्मि सच्चिदानन्दैकलक्षणस्त मा परं ब्रह्माभि- जानाति "सर्वामा य हि सर्वे नैवोतोऽद्वयो ह्ययमात्मैकल एव । नायमोतो नानुनावाऽसङ्गत्वादविकारि- स्वादसत्वादन्यस्य। एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म । नेह नानास्ति किंचन। सर्व.यदयमात्मा भोकाभोग्यं प्रेरितारंच मत्वा सर्व प्रोक्तं विविध ब्रह्ममेवत् । ज्ञानं विशुद्धं विमलं विशोकमशेपतो भाति निरस्तसङ्गम्" इति । "इसर्व ग्रामात्रं ब्रह्मण्यारोपितत्वाच्छुक्तिरजववत्" इत्यादिश्रुतिस्मृतियुक्तिभिः समाहिवयुद्धया च सम्यपरिशील्य भ्रमकृवं विकल्प परित्यज्य सर्वमिदमहे च प्रवेत्यभिजानावि विनिचिनोतीत्यर्थः । श्रुवियुक्तिगुरूचिस्वाल, नुभव. पूर्वं यदनेकधा भातं तत्केवलमाविक्रिय निर्विशेषं परं प्रवेति सामान्यविशेपाभ्या सविसनिवि: कल्पकाम्यामवगतस्वरूपं वस्त्वेकमेव निर्विशेष नान्यदस्तीवि तत्वतः परमायस्वरूपेण चिन्माण मां पर , । १२७४ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५५] ग्रहौवं प्रत्यग्दृष्ट्या सर्वतः सम्यग्विषयीकृतं सदेकरसतया ज्ञात्वाऽवधार्य रज्जोः स्वरूपसंदर्शनेन यत्सात्मना भातं तद्रज्जुरेव केवलेति करगृहीताया रजोः कैवल्यमिव । 'ब्रौवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्मपश्चाब्रह्मा दक्षिणतश्चो- त्तरेण अधश्चोर्ध्व प्रसृतं ब्रह्मैवेद विश्वमिदं वरिष्ठम् । इत्येवं दृष्टया ज्ञाननिष्ठापरिपक्कया 'सर्वं ब्रह्मैव केव- लम् । इति ब्रह्मणः कैवल्यं निश्चित्य सर्वमिदमहं च ब्रझैवेति सर्वस्य च स्वस्य च ब्रह्ममात्रत्वं सम्यगनुभू- येत्यर्थः । ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' 'नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय' इत्युक्तरीत्या ज्ञानादेव मुक्तिनान्यथा इति श्रुत्यनुगत स्वनिश्चयमाह-तत इति । तदनन्तरं-यदेवं विज्ञानं वस्तु वत्त्वनिश्चयात्मकं निरूढमप्रतिबद्धं जायते--तदनन्तरमेव प्रवोधस्थूलदेहप्राप्त्योरिव ब्रह्मवेदनवत्प्राप्योख्तरालाभावात्सम्यग्ज्ञानोत्तरक्षण एव ग्रहानिष्ठो यतिस्ततस्तेनैव ब्रह्मात्मकत्वविज्ञानेन विशने, अहं ब्रह्मास्मीति स्वात्मना साक्षात्कृते निर्विशेपे चिदेकरसे परे ब्रह्मण्यानन्दात्मन्येतदेवाहमस्मीत्यहबुद्धिं प्रवेशयति । स्थूले स्वस्वरूपे निद्रयाऽन्यथाभावं गतः पुरुष: प्रवोधेन तन्निवृचौ सत्यां नत्रावुद्धिं यथा करोति तथा स्वाज्ञानेन विपरीतभावं गतो विद्वान् विवेकविज्ञानेन तनिवृचौ सत्यां स्वात्मन्येव ब्रह्मणि एतदेवाहमिति तत्रावुद्धिं करोति, न तु देवदत्तो गृह इव ब्रह्मणि प्रविशति, ब्रह्मणः परिपूर्णत्वानिरवयवत्वेन संकोचव्याकोचशून्यत्वादास्तुः स्वरूपत्वान्नि- त्याप्तत्वाच प्रवेश्यत्वायोगात् । न तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवलीयन्ते । ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति । ब्रह्म वेद प्रक्षैव भवति । तमेवं विद्वानमृत इह भवति" इति विदुष उत्क्रमणराहित्येन ब्रह्मात्मनाऽवस्थितस्येहैन ब्रह्मप्राप्तेः श्रूयमाणत्वाद्गन्तृत्वगन्तव्यगमनक्रिया न संभवन्ति, किंतु एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिल- यनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते ' इति शवगाददृश्यत्वादिलक्षणलक्षिते प्रत्यस्तमिताशेषविशेपे अजरेऽमृतेऽभये- ऽपूर्वेऽनपरेऽनन्तरेऽबाह्ये नित्यानन्दाखण्डैकरसेऽद्वितीये परे ब्रह्मण्यबुद्धिप्रतिष्ठापयति श्रुत्याचार्येश्वरात्मप्र- सादसंपत्त्या कृतार्थो ब्रह्मवित्तमो यतिः सविशेष परित्यज्य निर्विशेपब्रह्मात्मना सुखं तिष्ठतीत्ययः ॥१५॥ श्री० टी०-ततश्य-भक्त्या मामिति । वया च परया भात्या तत्त्ववो मामभिजानाति । कथंभूतम् ? यावान सर्वव्यापी यश्चास्मि सचिदानन्दघनस्तथाभूतम् । ततश्च मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं वस्य ज्ञानस्याप्युपरमे सति मां विशते परमानन्दरूपो भवतीत्यर्थः ॥ ५५ ॥ स० टी०-निदिध्यासनरूपिण्या भक्त्याऽऽस्मज्ञाननिष्ठया । मामद्वितीयमात्मानं सम्यक्साक्षात्करोति सः ॥ १॥ यावान्विभुश्च नित्यश्च यश्यानन्दपनोऽद्वयः ॥ सत्यज्ञानवपुः सर्वोपाधिशून्यः सदाऽमलः ॥२॥ अखण्डेकरसः मुद्धस्तावन्तं मां च तत्वतः ॥ अभिजानाति सर्वज्ञस्तवो मां स यथार्थतः ॥ ३ ॥ ज्ञात्वा- हमस्यरसण्डेकानन्दप्रोति सद्धिया || साक्षात्कृत्य निवृस्यात्मा ज्ञानस्य सकलस्य च ॥ ४ ॥ सर्वोपाधि- विनिर्मुको मद्रूपः केवलो भवेत् ॥ प्रारधर्मभोगेन देहपातादनन्वरम् ॥ ५ ॥ कैवल्याख्य परं धाम मामेव विशवे मुनिः । यद्यपि ज्ञानसंप्राप्तिसमये भगवद्वपुः ।। ६ ॥ धनी तथापि प्रारब्धाभासेन सद्पुः ॥ नराकारतया भाति व्यवहारेऽशदेवत् ॥ ७ ॥ प्रारब्धकर्मणि क्षीणे त्यक्त्वा मायामयं वपुः ॥ चिदानन्दपदे स्वात्मतत्त्वे तद्रूप एव सन् ॥ ८ ॥ विष्ठवीति हरेरेवं तात्पर्यमिह गम्यते ॥ यद्यपि ग्रझ- योनामान सर्व निवर्तितम् ॥ ९ ॥ दीपेनेव तमस्तस्य तद्विरोधिस्वभावतः ॥ वथापि तदुपादेयं देहादि- ग्रभवेदिनः ॥ १० ॥ निरुपादानमेवानुवर्ववे निजहर्मणा ।। दृष्टत्वादेव दृष्टे नानुपपन्नं मनागपि ॥ ११ ॥ वारिपि तोश्च विनाशात्समवायिनः । निरुपादानक द्रव्यं क्षणमात्रं हि विष्ठति ॥ १२ ॥ इत्येवं स्वीहवं दस्माकमपि संभवेत् ॥ तत्रापि कल्पनाऽनावितया योग्यः क्षयः फिल ॥ १३ ॥ शरीरादि- रियोरेपमिप्यतेऽवोऽन्यदोषता ।। यैरप्यमानलेशोऽत्र स्वीकृतस्तैरपि स्फुटम् ॥ १४ ॥ देहादिस्यितिसिद्धयर्थं निवाई कपन | आमासमात्रदेशादायहंकारोऽपि वासः ॥ १९॥ नहि वेन विना बसदेहादि- .
[अ० १८ लो० ५५ ] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता १२७६ स्थितिसंभवः । न वा तेनाप्यहंकाराभासेनात्मविदः क्षतिः ॥ १६ ॥ तदुक्कं जानकीनाथं राघवं प्रति सद्वचः ॥ वसिष्ठेनापि निर्वाणे पाषाणाख्यायिकास्थले ॥ १७ ॥ अहंभावं 'विना देहस्थितिस्वज्ञानयो- रिह ॥ आधेयस्य निराधारा न संस्थेहोपपद्यते ॥१८॥ अहंभावपिशाचोऽयमज्ञानशिशुना विना ।। अवि- द्यमान एवान्तःकल्पितस्तेन सुस्थितः ॥ १९ ॥ अज्ञानमपि नास्त्येव प्रेक्षितं यन्न लभ्यते ॥ विचारिणा दीपवता स्वरूपं तमसो यथा ॥ २० ॥ किल सत्यामविद्यायामज्ञतोदेति शाश्वती || बुद्धिमोहात्मिका यक्षी निर्देहेव यथा निशि ॥ २१ ॥ एवं स्थिते कुत: सर्गः कुतो विद्या कचाज्ञता ॥ ब्रह्म शान्तं घनं सर्व काहंकारादयः स्थिताः ॥ २२ ॥ अहंभावस्य संशान्तिरेपाऽसौ कथिता तव ॥ अहंभावः परिज्ञातः पिशाच इव शाम्यति ॥ २३ ॥ चित्राग्निदाहो विज्ञातो यथा दाह्येपु निष्फलः ॥ वधाहंभावसर्गादि ज्ञातं निष्फलतामियात् ॥ २४ ॥ एवं तत्त्वविदां दृष्टया नास्त्यहंकार एव च ॥ अतो नित्यविमुक्तः सन्मु- च्यवे संनिवर्तते ॥ २५ ॥ इत्येवं श्रीहरेभीवो गम्यते वेदवाक्यतः ॥ २६ ॥ ५५ ॥ भा० टी०-ततश्च-म ध-भक्त्येति । ज्ञानलक्षणया भक्त्या मामभिजानाति यावानहमुपाधिकृतविस्तारभेदो य. वारिम विध्वरतसर्वोपाधिभेव उत्तमः पुरुप आकाशवदसङ्गो निर्विकारस्त मामद्वैतचैतन्यमात्रैकरसमजमजरमभ- यमनिधनं भत्त्या तत्त्वतोऽभिजानाति, ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं मामेव विशवे प्राप्नोति । अत्र ज्ञान:- वेशक्रिये भिन्ने न विवक्षित, भेदोक्तिस्त्वौपचारिकी वोध्या। ब्रह्मप्राप्तिस्तु ज्ञानानातिरिच्यते, क्षेत्रकं चापि मां विद्धीति ब्रह्मात्मनोरभेदस्योक्तत्वात् । भत्त्या निदिध्यासनामिकया मामद्वितीयमात्मानमभिजानाति साक्षात्क- रोति। तदनन्तरं बलवत्प्रारब्धकर्मभोगेन देहपातानन्तरं नतु ज्ञानानन्तरमेव। क्त्वाप्रत्ययेनैव तल्लाभे तदनन्तर- मित्यस्य वैय्यापावादिति केचित् । इतरेतु विशत्यात्मनि स्वसिद्धयेऽनिर्वचनीयसंवन्धेनेवि विशत्सर्वानर्थमुल- मज्ञानं तस्मै तत्सविलासमुन्मूलयितुं ज्ञानाऽपरोक्षीकृत्य वदनन्तरम्-अन्तरं भेदस्वच्छून्यं शाश्वतं पदमव्ययमा- मोतीत्युत्तरन्कस्थानुपङ्गेन व्याख्येयमिति वदन्ति। वचत्ववो याथात्म्येन ज्ञात्वा साक्षात्कृत्य वक्षो व्याप्तः ब्रह्ममा गतो भवतीत्यर्थः । "प्रल वेद ग्रीव भवति" इति श्रुतेः । यद्वा तव इति कारणब्रह्मभावापचिः सार्वात्म्यरूपा प्रथममुक्ता । अनन्तरंकारणभावापचेरनुपदमेव तद्ब्रह्म तत्पदाभिषेयं शुद्धं ब्रह्म विशते दर्पणाद्यपाये प्रतिविम्यो विम्यमिव प्रविशवीत्यर्थ इत्यन्ये । तदेवद् व्याख्यानवयमपि सर्वज्ञेराचार्य: ध्यानयोगपरो नित्यमि- त्यत्र निदिध्यासनस्योक्तत्वात् , भकिं लभत इत्यस्य परामिविविशेपणस्य च वैव्ययं तच्छदेनाप्रस्तुतपरा. मर्शस्यानुपङ्गाभ्याहारादिछेशव्यातायाः कुकल्पनायाश्चानौचित्यमभिप्रेत्य सक्तत्वादुपेक्ष्यम् । तथाचायमः " आचार्यवान्पुरुषो वेद" इतिश्रुत्या शास्त्रानुसार्याचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिः, तस्य च परिपाके असंभाव- नादिमध्वंसे हेतुभूतमुपदेशस्यैव सहकारिकारणं वुद्धिविशुद्धत्वादि अमानित्वादिगणं चापेक्ष्य वस्मादेवोप- देशाजनितस्य क्षेत्रज्ञपरात्मकत्वज्ञानस्य कारफभेदबुद्धिनिवन्धतसर्वकर्मसंन्याससहितस्य स्वात्मानुभवरूपेण स्वात्मन्येव सर्वकल्पनारहिवस्य यवस्थानं सा दानस्य परा निष्ठेत्युच्यते । सेयं ज्ञाननिष्ठा आदिभक्तित्र. यापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिरित्युक्त्वा तया परया भक्त्या भगवन्वं तत्त्वतोऽभिजानाति, यदनन्दरमेश्वर-. क्षेत्रज्ञभेदबुद्धिरशेष ततो निवर्तते । क्त्वाप्रत्ययेनोक्तमानन्तर्यमव्यवहितं, न तु किंचिद्व्यवधानयुक्तमिति योध, नायानन्तरमित्युक्तमिति !! १५ ॥ ५० टी-ततश्च-भक्त्येति । तया सर्वात्मकत्वभावनरूपया भक्त्याऽई यावान् विश्वव्यापी यश्च पर. मानन्दस्वरूप एवंभूतं मामभित: स्थावरजद्गमेष्वनुवर्तमानं जानाति, वनय मां ववश्चित्संविद्रूपेण ज्ञात्वा तदनन्तरं तत्त्वज्ञानोपरमे मां विशते मदाकारो भवति ॥ ५५ ॥ रा० टी०-वतन्य किमित्यत आह-भक्त्येति । अहं यावान्देशकागुणैर्यापान्च्याप्तोऽस्मि । यध - .
२०६ श्रीमहगवद्गीता [अ० १८ ०६१ यन्नामा यद्रूपश्चास्मि । तादृशं मां प्रागुक्तया परमभक्त्या तत्त्वत: अभि स्वयोग्यतानुसारेण जानाति । तेनापि किमित्यत आह-तत इति । भक्तिवलात्तत्त्वतो मां ज्ञात्वा तदनन्तरं मां विशते मदनुप्रविष्टो भवति मुक्तो भवतीत्यर्थः ॥ १५ ॥ सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्यपाश्रयः॥ मत्ससादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥ त० टी०-एवं वर्णाश्रमोचितनियतकर्मणां फलकर्तृत्वाभिसंघानरहितानां नैष्कर्मसिद्धिप्राप्तिद्वारेण भगवत्माप्तिफलकत्वमुक्तम् । इदानीं नैष्कर्मसिद्ध्यभावे कर्मकर्तुः किं फलं स्वादित्यपेक्षायामाह-सर्व- कर्माणीति । सर्वकर्माणि वैदिकलौकिकानि विधिहीनान्यपि सदा कुर्वाणोऽनुतिष्ठन् मयपाश्रयः अहं सर्वेश्वर एव व्यपाश्रयः समाश्रयणीयो न त्वन्यो देवः फलं वा यस्य स मत्मसादात् शाश्वतमनादि. मव्ययं परिणामशून्यं नित्यं पदं मद्धाम मामोति ॥ ५६ ॥ म०टी०-ननु योऽनात्मज्ञोऽशुद्धान्तःकरणः सोऽन्तःकरणशुद्धिपर्यन्त सहज कर्म न त्यजेत् । यस्तु शुद्धान्तःकरणःस नैष्कर्म्यसिद्धि संन्यासेनाधिगच्छतात्युक्तम्।सन्यासश्च ब्राह्मणेनैव कर्तव्यो न क्षत्रियवैश्या- भ्यामिवि प्रागुक्तं भगवता 'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः' इत्यत्र । तत्र शुद्धान्त:करणेन क्षत्रिया- दिना किंफर्माण्यनुष्ठेयानि किंवा सर्वकर्मसंन्यास: कर्तव्यः? नाद्यः- आरुरुक्षोर्मुनेयोग कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥' इत्यादिना योगमन्तःकरणशुद्धिमारूढस्य कर्मानुष्ठाननिषेधात् । न द्वितीयः । 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः' इत्यादिना ब्राह्मणधर्मस्य सर्वकर्मसंन्यासस्य क्षत्रिया- दिकं प्रति निषेधात् । नच कर्मानुमानकर्मत्यागयोरन्यतरमन्तरेण तृषीय: प्रकारोऽस्ति । तस्मादुभयोरपि प्रति- पिद्धत्वेन गत्यन्तराभावेन चावश्यकर्वव्ये प्रतिषेधातिकमे कर्मत्याग एव श्रेयान् बन्धहेतुपरित्यागेन मोक्षसा- धनपोकल्यात्, न तु कर्माण्यनुष्टेयानि चित्तविक्षेपहेतुत्वेन मोक्षसापनशानप्रतिबन्धकवादित्यभिप्रायमर्जु- नस्यालक्ष्न्याह भगवान्-सर्वेति । यः पूर्वोक्तः कर्मभिः शुद्धान्तःकरणः सोऽवश्यं भगवदेकशरणः भगवदे- फशरणवापर्यन्वत्वात् अन्त:करणशुद्धेः । एतादृशश्चेत् ब्राह्मणः संन्यासप्रतिवन्धरहितः सर्वकर्माणि संन्यस्य- तु नाम । संसारविमोक्षस्तु तस्य भगादेकशरणस्य भगवत्प्रसादादेव । एतादृशश्वेत क्षवियादिः संन्यासान- धिकारी स करोतु नाम कर्माणि, किंतु मधपाश्रयः अहं भगवान वासुदेव एव व्यपाश्रयः शरणं यस्य स मदेशकरणो मय्यर्पितसर्वात्मभावः संन्यासानधिकारात् सर्वकर्माणि सर्वाणि कर्माणि वर्णाश्रमधर्मरूपाणि लौकिफानि प्रतिपिद्धानि का सदा फुर्वाणो मत्प्रसादान्ममेश्वरस्यानुप्रक्षात् अवाप्नोति हिरण्यगर्भवन्मद्विज्ञानो- त्पत्त्या शाश्वत नित्यं पदं वैष्णवमव्ययमपरिणामि । एतादृशो भगवदेकदारण: करोत्येव न प्रतिपिद्धानि कर्माणि, यदि कुचिथापि मत्प्रसादात्प्रत्यवायानुत्पत्त्या मद्विज्ञानेन मोक्षमाग्भवतीति भगवदेकशरणतास्तुत्यर्थ उचकर्माणि सर्पदा कुर्भागोऽमीत्यन्यते ॥ १६ ॥ शं०.टी.-स्वकर्मणा वमभ्यर्चेत्यारभ्य विशते तदनन्तरमित्यन्तन मन्येन मुमुक्षोरीश्वरार्पणबुड्या सम- सुष्ठितकर्मभिरेव सत्त्वादिः, शुद्धात्मन एव ज्ञानं, ज्ञानवत एवं मोक्ष इवि ज्ञानकर्मणोः साध्यसाधनभावं सशास्त्रप्रसिद्ध निर्धारयितुं कर्मभिधिचमुनि शुद्धात्मनो ज्ञानं तस्य फळं मोक्षं च कोण प्रविपायाधुना पाहरुमोहिणश्यास्तस्य च यतेश्वोभयोमेक्षिककामनयोर्नित्यं नियमेन कर्मच्यार्थनिर्णयायोत्तरप्रन्य आर. म्यो । यादो शानं गोपल पित्त्युद्धिं धिना न सिध्यति, पित्तगुद्धिश्च स्वकर्मभिरेवेश्वरार्पणवुद्धपा हवेनं तु फामनया, आरमोरीश्वरमीत्यै फर्भयावश्यं कर्जन्यमिति घोषयितुं मन्योत्यै कर्माणि कुणो " [अ० १८ लो० ५६] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीनोपेता १२७७ मत्प्रसादान्मुक्ति प्राप्नोतीत्याह-सर्वेति । मद्यपाश्रयः योऽहम् "अग्निर्मूर्धा चक्षुपी चन्द्रसूर्यो" इत्युक्तलक्षण: सर्वभूतः सर्वात्मकः परमेश्वरः स एव व्यपाश्रयो भवमुत्यै स्वकर्मभिरारीधनीयो यस्य स मद्यपाश्रयः स्वाराध्येपु देवेष्वान्यादिषु योगे यागीयेपु परुपुरोडाशनुगादिषु च सर्वत्र मनावनायुक्तो भूत्वा मुमुक्षुः सर्वकर्माणि सर्वाणि भौतानि स्मातानि च नित्यानि नैमित्तिकानि च कर्माणि विध्युक्तानि मत्प्रीत्यै श्रद्धया भक्त्या च कुर्वाणः सन् मप्रसादान्मम भक्त्याऽनेकजन्मसु समनुष्ठितकर्मभिः संतोपितस्य परमेश्वरस्य प्रसादोऽनुग्रहस्तस्मात्सत्त्वशुद्धिं ज्ञानं च लब्ध्वा अव्ययं वृद्धिक्षयुवर्जित न्यूनाधिकभाववर्जितं सदैकरूपं शाश्वतं नित्यं पदं मोक्षाख्यं प्राप्नोति कर्मभिः संतुष्टेश्वरानुग्रहान्मुक्ति विन्दवीत्यर्थः ॥ १६ ॥ श्री० टी०-स्वकर्मभिः परमेश्वराराधनादुक्तं मोक्षप्रकारमुपसंहरति-सर्वकर्माणीति । सर्वकर्माणि नित्य. नैमित्तिकानि काम्यानि च कर्माणि पूर्वोक्तकमेण सर्वदा कुर्वाणः सन् मद्यपाश्रयः अहमेव व्यपाश्रय आश्रय- णीयो न तु स्वर्गादिफलं यस्य सः मप्रसादाच्छाश्वतमनादि अव्ययं नित्यं सर्वोत्कृष्टं वैष्णवं पदं प्राप्नोति ॥५६॥ स० टी०-अज्ञो धीशुद्धिपर्यन्तं सहज कर्म न त्यजेत् ॥ शुद्धान्तःकरणो यस्तु नैष्कम्य सोऽधिग- च्छति ॥ १ ॥ संन्यासेनेति पूर्वोक्त संन्यासो ब्राह्मणेन वै ॥ कर्तव्यो नान्यवर्णेनेत्युक्तं भगवता पुरा ॥ २॥ कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ॥ चिचशुद्विमवस्वत्र किं कर्मकरणं वरम् ॥ ३॥ नृपादेय संन्यास इत्यत्राह जगत्पतिः ।। पूर्वोक्तः कर्मभिर्यस्तु शुद्धान्तःकरण: पुमान् ॥ ४ ॥ सोऽव- श्यं भगवत्कृष्णपादैकशरणो भवेत् ॥ श्रीमद्भगवतः पादसरोजे भक्तिरुचमा ॥ ५ ॥ चिचशुद्धेः फलं श्रेष्ठं वतो ज्ञानातिमुक्तता ।। ईदेशो ग्राह्मणश्वेत्स्यात्परवैराग्यसंयुतः ।। ६॥ स सर्व कर्म संन्यस्य भग- वच्छरणं ब्रजेत् ॥ तस्य संसारतो ,मोक्षः स्याद्भगवत्प्रसादतः ॥ ७ ॥ ईदृशः क्षत्रियादिश्वेत्संन्यासे- अधिकृतो न सः ।। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ८ ॥ इति ब्राह्मणधर्मस्य संन्यासस्य च कर्मणाम् ॥ क्षत्रियादि प्रति श्रीमद्विष्णुनैव निषेधवः ॥९॥ संन्यासानंधिकारात्स कुर्वाणः सन्सदेव च ॥ सर्वकर्माणि वर्णादिधर्मरूपाणि मत्परः ॥ १० ॥ भगवान्वासुदेवोऽहं कृष्ण एव व्यपाश्रयः । शरणं यस्य नित्यं स मदेकशरणो महान् ॥ ११ ॥ मय्येवार्पितसर्वात्मभावोऽसौ महनुमहात् ॥ हिरण्य- गर्भवत्सम्यङ्मद्विज्ञानजनेस्तवः ॥ १२ ॥ नित्यकूटस्थं स्वं ज्योति:पदं प्राप्नोति वैष्णवम् ।। १३ ॥१६॥ मा० टी०-एवं शुद्धान्तःकरणस्य संन्यासाधिकारिणो ब्रह्मप्राप्तिक्रममभिधायानात्मज्ञस्याशुद्धान्तःकर. णस्य संन्यासानधिकारिणो ब्रह्मप्राप्तिसाधनं भगवद्भक्तियोग वत्र तत्र प्रतिपादितं शास्रार्थोपसंहारप्रकरणे शास्त्रार्थनिश्चयदााय स्वीति-सर्वेति । सर्वाणि नित्यनैमित्तिकादीनि प्रतिपिद्धान्यपि सदा कुर्वाणोऽनु- विष्ठन्नपि मद्यपाअयोऽहं वासुदेव ईश्वरो व्यपाश्रय आश्रयणीयो यस्य स मद्यपाश्रयो मर्पितसर्वा. स्मभावः मत्प्रसादात् ममेश्वरस्य प्रसादात् शाश्व नित्यमव्ययमपक्षयशून्यं पदं वैष्णवमवाप्नोति । निपि द्वान्यप्याचरन् शाश्ववं पदमव्ययमवाप्नोतीसुक्त्या पापस्यापि मोक्षफलहेतुत्वं स्यादित्याशङ्कानिरासाय मद्यपाश्रयः मत्प्रसादादित्युक्तम् । वथाच येन भक्तियोगेन प्रसादिवाश्विरासर्वकर्माण्यनुतिष्ठतोऽपि वैष्णवपदनाप्तिस्वस्य माहात्म्यं कि वकव्यमिति भावः ।। ५६ ॥ ५० टी०-अय बुद्ध्या विशुद्धयेत्यायुक्तमोक्षप्रकारस्यातिप्रयाससाध्यत्वात्सुगम प्रकारमाइ-सर्वकर्मेति । सदा निरन्तर महापाश्रयः, अइमेवाअय आश्रयणीयो नतु स्वर्गादिफळ यस्य स सर्वकर्माणि नित्यनेमिः त्तिकादीनि फुर्वाणोऽपि सन् माप्रसादानित्यं सर्वोत्कृष्टं च पद स्थानमवाप्नोति । श्रुविरपि ऋक्संहितामु- " अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुपेभिः । यं कामये ये ठमुमं कृणोमि व ममाणं वर्षि तं सुमेधाम् ॥ इति । भाग्यम्-अहमेव स्वयमिदं ब्रह्मास्यं वस्तु वदामि, इदं प्रम स्वयमेवारीवि वदा.
. १२७८ श्रीमद्भगवद्गीता [१० १८ सो० ५७] भीत्यर्थः । देवेभिर्देवैरिन्द्रादिभिर्जुष्टं सेवितम् । उतापि मानुपेभिर्मनुष्यैः सेवितम् । अथ तदेव प्रकटयन्नाह- ईदृग्वस्त्वात्मकोऽहं स्वा मायामधिष्ठाय धृतमानुपवेपा(१)सती यं कामये यं पुरुष रक्षितुमहं वाञ्छामि वं पुरुषमुग्रं कृणोमि सर्वेभ्योऽभ्यधिक रुद्रं करोमि रुद्रपदवी प्रापयामि । तमेव ब्रह्माणं स्रष्टारं करोमि तमेव प्रापिमतीन्द्रियदष्टारं करोमि । तमेव सुमेधा शोभनाइं ज्ञानिनं करोमि ।। ५६ ॥ रा० टी०-पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्या शास्त्रार्थमुपसंहरति-सर्वेति । यद्वा यवः प्रवृत्तिर्भूतानामित्यत्र- स्वकर्मणा तमभ्ययेत्युक्तं, तत्र कर्मकरपं विशिष्य फलं व्यनक्ति-सर्वेति । मध्यपाश्रयः मय्येव समर्पय- नेव सर्वाणि विहितानि कर्माणि सदा कुर्वाणः मत्प्रसादाच्छाश्वतं पदमव्ययं मत्स्वरूपमवाप्नोति शाश्वतमव्य- यामिति कूटस्थतयाऽऽचन्तहीनमित्यर्थः । अत्र अपिशब्दो नैकमपि कर्म अतदाश्रयेण कार्यमि- त्यर्थसूचनाय ।। ५६ ॥ चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्य य मत्परः ।। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मचित्तः सततं भव ॥ ५७॥ त० टी०-तस्मात्पूर्वोक्तमकारेण वैराग्यादि क्तुं न शक्नोपि चेत्त्वमप्येवं कुर्वित्याह-चेतसेति । चेतसा मतन्नकर्तृत्वविचारेण सर्वाणि कर्माणि लौकिकानि वैदिकानि स्वभावप्राप्तानि च फलकर्व- वोद्देश्यदेवतासहितानि मयि संन्यस्य सम्पगमे पत्परः अहमेव परः प्राप्यः प्रापकश्च यस्य सः बुद्धि योग व्यवसायात्मिकयुद्धचा सर्वसंबन्धमुपाश्रित्य सर्वात्मना मामेव सर्वश्रेयोहेतुं श्रेयोरूपं च निश्चित्य सततं मचित्तो भन इत्येवमनुसंधानं कुरुप्वेत्यर्थः ॥ ६७ ।। म० टी०-यस्मान्मदेकशरणतामात्रं मोक्षसाधनं न फर्मानुष्ठान कर्मसंन्यासो वा तस्मात् क्षत्रियस्त्वम्- चेतसेति । चेतसा विवेकबुद्धया सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयीश्वरे संन्यस्य यत्करोपि यदनासि' इत्युक्त- न्यायेन समर्प्य मत्परः अहं भगवान् वासुदेव एष परः प्रियत्तमो यस्य स मत्परः सन बुद्धियोग पूर्वोक्तस- मत्वबुद्धिलक्षणं योगं बन्धवोरपि कर्मणो मोक्षहेतुत्वसंपादकमुपायित्य अनन्यशरणतया स्वीकृत्य मचित्तः मयि भगवति वासुदेव एव चित्तं यस्य न राजनि कामिन्यादौ वा स मचित्तः सततं भव ॥ १७ ॥ शं० टी०-तेपामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वतेत्युक्तो बुद्धे- रात्मवत्त्वप्रकाशनलक्षणो यो मत्प्रसादस्तेनैकलभ्यो मोक्षो यस्मात्तस्मात् मत्परो भवेत्याह-चेतसेति । कर्मणा संतुष्टेश्वरानुप्रहादेव मुक्तिरिति ज्ञानं चेनतेन चेतसा विवेकबुद्धधा स्वं मत्परः अहमेव परः परम- पुरुषार्थः प्राप्यं वस्त्विति बुद्धिर्यस्य स मत्परसनिमुमुक्षुः सन्नित्यर्थः । मप्रसादसिद्धये 'कता भोक्ता जना. दन.' इति न्यायेन सर्वकर्माणि श्रीवानि स्मातानि च सर्वाणि कर्माणि कृतानि मयि परमेश्वरे संन्यस्य कर्माणि काफलानि च महा समप्येत्यर्थः । बुद्धियोग पुय्येव योगः स्थितिस्तमुपाश्रित्य सततं मला जनपरो भूत्वेत्यर्थः । यद्वा 'भूतानि विष्णुर्भुवनानि विष्णु' इतिन्यायेन सर्वत्र परमेश्वरत्वबुद्धिधुद्धियोगरवं सवतमाश्रित्य । यद्वा 'न्यायाजिवधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रिय.' इति गृहिणोऽपि वेदान्तविचारस्य कर्त- व्यवस्मरणात्कर्माणि पुर्वन्सन् घुद्धियोग. सानसिद्धिहेतुः श्रवणमननादिस्तं बुद्धियोगमुपाश्रित्य सर्वदा वेदान्तार्थविचारपरो भूत्या सत मचित्तः मध्येव सर्वमये परमात्मनि चित्त्रं यस्य व मचिचः ज्ञानसिद्धपै चफलसिद्धप प सदा मच्चरणो भवेत्यर्थ. ॥१७॥ श्री०टी०-यस्मादेयं वस्मात्-चेतसेति । सर्वकर्माणि घेतसा मयि संन्यस्य समय मत्परः अहमेव १ अपाभिरपति पार. . .
[अ० १८ लो० ५८] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टीकोपेता १२७९ परः प्राप्यः पुरुषार्थों यस्य सः व्यवसायारिमकया बुद्धया योगमानित्य सवा कर्मानुष्ठानकालेऽपि 'ब्रह्मा- पणं ब्रह्मविः' इविन्यायेन मय्येव चित्तं यस्य सः तथाभूतो भव ॥ ५ ॥ स० टी०-यस्मान्मदेकशरणभावो मोक्षस्य साधनम् ।। न कर्मफरणं नापि कर्मसंन्यास एव वा ॥१॥ तस्माद्विवेकबुद्धया त्वं दृष्टादृष्टार्थकान्यपि ॥ सर्वकर्माणि मय्याधे वासुदेवे समयं च ॥२॥ यत्करोपि यदनासीत्युक्तन्यायेन मत्परः ॥ भगवान्वासुदेवोऽहं यस्य प्रियतमः परः ॥ ३ ॥ स मत्परस्त्वं पूर्वोक्तं समतावृद्धिलक्षणम् ॥ योगं धनन्यशरणतया स्वीकृत्य सर्वदा ॥ ४ ॥ वासुदेवे भगवति यत्य चित्तं मयीश्वरे ।। नान्यत्र राजनि हयादौ समञ्चित्त: सदा भव ॥ ५॥ हृत्से रूढमनाविलं रसपदं हासप्रका- शोज्ज्वलं कारुण्यादिगुणोघशैत्यशरणं शान्त्यान्वितं छायया ॥ अज्ञानार्कजवापधर्मशमनं सच्चातकैरपित ब्रह्मानन्दसुवर्षणोन्मुसमई कृष्णाख्यमेषं श्रये ॥ ६ ॥ ५५ ॥ भा० टी०-यतो भक्तियोगस्यैवं माहात्म्य तस्मान्म प्रसादाथै भवता मदाराधने प्रयतितव्यमित्याह- चेतसेति । चेतसा विवेकबुद्धया सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयि संन्यस्य 'यत्करोपि यदन्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् । यतपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् । इत्युक्तन्यायेन समर्प्य मत्परोऽहं वासुदेव एव परः प्रकृष्टः प्राप्यो यस्य न तु स्वर्गादिः स मत्परः सन् बुद्धियोगं समाहितबुद्धित्वं सिद्धयसिद्धिजन्याभ्यां हपं. विषादाम्यामक्षुभितबुद्धित्वमुपाश्रित्यानन्यशरणत्वेनाङ्गीकृत्य मचिचो मय्येव चित्तं यस्य स त्वं सततं सर्वदा मच्चित्तो भव ॥ १७ ॥ ५० टी०-यस्मादेवं वस्मात्त्वमपि तथा भवेत्याह-चेतसेति । चेतसा सह सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य समय मत्परः अहमेव परः परमो यस्य तथाविधः सततं भव ततश्च व्यवसायात्मिकवुद्धियोगमुपाश्रिस मचिच; मदाकारं चित्तं यस्य तथाविधो भवेत्यनेन विशते तदनन्तरमित्येव पर्यायेणोक्तमित्यर्थः ॥ ५७ ॥ रा० टी०-यदि भगवदाश्रयेण विहितकर्म कुर्वतो मुक्तिस्वहि त्रैविद्यस्यापि सा स्यात् । तस्यापि विहित. कर्मकरणभगवदर्पणयोः सत्त्वेन भगवदाश्रयत्वादित्यत आइ-चेतसेति । चैतसा सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः अहमेव परः सर्वोत्तम इति भावो यस्य स मत्परः भव । किंच घुद्धियोगं बुद्धयोग प्रत्याहारादिरूपमुपायमाश्रित्य मचित्त; मय्येव निरुद्धचित्तः सततं भवेत्युक्त्या विद्यस्यैवरूपत्वाभावान्न तस्य मुक्तिशङ्केति भावः ।। ५७ ।। मचित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।। अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनश्यसि ।। ५८ ॥ त० टी०-एवं मदुक्ता विश्वस्तो यत् प्राप्स्यसि तच्छृणु-मचित्त इति । उक्तमकारेण मचित्तः सन् सर्वकर्माणि कुर्वन्नपि सर्वाणि दुर्गाणि दुस्तराणि सांसारिकाणि दुःखानि मत्प्रसादादेव तरिष्यसि । विपक्षे दोपमाह-अथ चेदिति । यदि पुनस्त्वमहङ्कारादहमेव कर्तव्याकर्तव्यं सर्व नाना- मीत्सभिमानान्मदुक्तमेव वन श्रोप्यसि पुरुषार्थाश्यसे । यतः सर्वस्य हिताहितज्ञाता प्रशास्ता च मदन्यः कचिन विद्यते ॥१८॥ म०टी०--: किं स्यादिवि वदाह-मचित्त शत | मधिचस्त्वं सर्वदुर्गाणि दुरवराणि कामगोधासनि संसारदुःससाधनानि मप्रसादात् स्वव्यापारमन्तरेणैव तरिष्यसि अनायासेनैवातिक्रमिप्यसि । अय घेत यदि तु त्वं मदुक्के विश्वासमत्वाऽईकारात्पण्डियोऽहमिति गर्नान्न ग्रोप्यसि मयनाथै न करिष्यसि ततो विनहुपसि पुरुषार्यानटो भविष्यसि कामकारेण संन्यासाद्याचरन् ॥ ५८ ॥ ० टी०-वेदान्तार्थविचारपरत्वस्य स्वदेकशरणत्वस्य किं फलमिति चेदुच्यो शृणु-पचित्त इति ।
7 -- १२८० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ५८] मचित्तः सर्वदा ध्येयत्वेन सर्वत्र विषयत्वेन वाहमेव परमात्मा चित्ते यस्य सः । यद्वा सर्वात्मनि मय्येव चित्तं यस्य स मच्चिचः सदा सदेकचित्तः संस्त्वं मत्प्रसादान्मनुग्रहप्राप्तात्मविज्ञानात्सर्वदुर्गाणि सर्वाणि दुर्गाणि दु सेनातिगन्तुमशक्यानि दुर्गाणि दुस्वराण्यविद्याकामकर्माणि । यद्वा सत्त्वरजस्तमांसि सकार्याणि जन्मजरामृत्युदु खप्रवाहकारणानि तरिष्यसि, तानि ती| विदेहमुक्तिसुखं प्राप्त्यसीत्यर्थः । एतेनेश्वरार्थं कर्म कुर्वाण एव तरति न त्वकुर्वाण इति सूचितं भवति । ननु कर्मणा द्रव्यसाध्यत्वेन हिंसाप्रधानत्वा. त्साधूना हिंसाप्रभानकं कर्म कर्तुं न शक्यते, तत्रापि स्वजनवधलक्षणं युद्धं तु सुतरा कर्तुं न शक्यत एवेति साख्यगतमनुस्मृत्याहंकारेण स्वधर्मवैमुख्यं न कर्तव्यमिति मुमुक्षोः स्वधर्मप्रवृत्तिमेव दृढीकर्तुमाक्षेपपूर्वक स्वधर्मनिष्ठामेवार्जुनमङ्गीकारयति सार्धद्वयन-अथेति । अथशब्द पक्षान्तरारम्भार्थः । त्वमहंकाराच्छाखा- न्तरज्ञानताभिनिवेशाचेतसा सर्वकर्माणीत्युक्तं मद्वचनं न नोप्यसि चेद्विधिमुल्लङ्घय यदि कर्म न करिष्यसी त्यर्थः । ततो विनङ्यास विनाशमेष्यसि । अकृत्वा वैदिकं कर्म द्विजः पतनमृच्छति' इतिन्यायेन स्व- धर्मत्यागात्पातित्यं प्राप्स्यसि । विध्युल्वनमेको दोप , स्वधर्मत्यागो द्वितीयः, परधर्माश्रयस्तृतीयः, पुरुषार्थभ्रं- शाश्चतुर्थः, एवमनर्थपरंपरा स्यादित्यर्थ. ॥ १८ ॥ श्री० टी०-ततो यद्भविष्यति तच्छृणु-मचित्त इति । मचित्तः सन् मत्प्रसादात्सर्वाण्यपि दुर्गाणि दुस्त- राणि सासारिकाणि दु.खानि तरिष्यसि । विपक्षे दोपमाह-अध चेयदि पुनस्त्वमहंकाराज्ज्ञातृत्वाभिमाना- मदुतमेतन्न प्रोप्यसि तर्हि विनइपसि पुरुषार्थाद्रिश्यसि ।। १८ ॥ स० टी०-मचित्तस्त्वं हि सर्वाशि दुस्तराणि समुद्रवत् ॥ संसारदुःखदायीनि कामक्रोधादिकान्यपि ॥ १ ॥ मत्प्रसादात्सुखेनैव खन्यापार विना पि च ॥ अविक्रमिप्यसि प्रत्यग्नमज्ञानमुखेन च ॥ २ ॥ यदि तु त्वं मदुक्फेऽर्थे नि.संदिग्धेऽपि मोठ्यतः ॥ अविश्वासादहकारा पण्डिवोऽस्मीति गर्वतः ॥ ३॥ न श्रोष्यसि वचो मत्तः श्रुत्वाऽपि न करिष्यसि । विनवयसि तदा सम्यक्पुरुपार्थात्परिच्युत. ॥ ४ ॥ काम- कारेण यत्किंचित्कुर्वन्नाप्नोति शोभनम् ॥ ५ ॥ अज्ञानार्कसुतापितं भवमरौ घावन्तमर्थोज्झि तृष्णातृट्परि- तापितेन्द्रियगणं भोगाम्बुकामाकुलम् ॥ व्यर्थकोधमरुपतप्तसिकतादग्धागमाध्वाधिकं दीनं त्वा शरणागतं यदुपते मा मामुपेक्षस्व भो ॥ ६ ॥ १८ ॥ भा० टी०-तत: किमित्यपेक्षायामाह-मचिच इति । मच्चिचः सर्वदुर्गाणि संसारहेतुभूताज्ञानादीनि मप्रसादाचरिष्यसि आतिक्रमिप्यास । व्यतिरेके दोपमाह-अथ चेद्यदि मदुकमहंकारात् पण्डितेन मया स्व- बुद्धया यद्विचारितं तदेव सम्यक् इत्यभिमानान्न थोप्यसि न हष्यसि ववस्त्वं विनयसि विनाशं गमिष्यसि पुरुषार्थात भ्रष्टो भविष्यसि ॥ ५८ ॥ प० टी०-अतो यज्ञविष्यति वच्छृणु-मचिन इति । प्रागुक्तरीत्या मधिचस्त्वं मध्यसादात् सर्वदुर्गाणि आधिदैविकादीनि सर्वदु खानि दरिष्यसि । अथ विपक्षे देण्यमाइ-अथेति । अय चैद्यदि त्वमईकाराज मातृत्वाभिमानान्मदुक्त तन्न श्रोष्यसि, सहि विनमुसि पुरुषार्थादृश्यसे, अधमा योनि प्राप्स्यसि । अब भगवतो हार्दै तु-कुरुकुलदलने सेदं वेदोच्छेदे ह निर्वेदम् । यन्मनुषेऽधमजनुपे दत्से धनुपे विलासलिं यस्मादिति(१) ॥ १८ ॥ रा०टी०-भगवधिचस्य फलमाह-मचिच इति । मचिचो मय्येव निरुद्धमनसः । सर्वाणि दुर्गाणि दुरतराणि दुसेन वर्द यानि कष्टानि मप्रसादाचरिष्यसि । एवं स्वविदितवृत्या भावदाराधनस्य परधर्म- वायुद्धास्यस्वविहिवकर्म भगवयीत्यर्थमेवावश्यं कार्यमित्येतायता प्रान्धेन प्रतिपादितम् । वदकरणेऽनिष्ट- माइ-अय पेरिति । अर्थान्तरे मयाब्दः । अहं न योत्स्यामपियकारात् युभ्योति मदीयवचन व न [अ० १८ श्रो० ५९] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२८१ श्रोप्यसि चेत् श्रुत्वा न करोपि चेत् , विनड्डयसि पुरुषार्थहीनो भविष्यसि । मद्वचनाकरणे विनाशे इत्यभ्यु- पेत्योक्तम् ।। १८ ॥ यदहकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।। मिथ्यप व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥ त० टी०-किंचाई स्वतन्त्रो वन्धुवधार्थं त्वनियोगं कथं करिष्यामीति त्वया न मन्तव्यमित्याह- यदिति ! यद्यद्यहंकारमात्मनि स्वातन्त्र्गाभिमानमाश्रित्य मदुक्कमनास्त्य न योत्स्ये युद्धं न करिष्या- मीति मन्यसे व्यवस्यसे तप ते व्यवसायो मिथ्यैव स्यात् । यतः प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति प्रकृति- त्रिगुणमयी मन्त्रियम्या रजोगुणरूपेण परिणता सती रजःप्रधानक्षत्रियजाताबुद्भवं त्वां युद्धे मवर्त- यिष्यत्येवेत्यर्थः ॥ ५९॥ म०टी०-त्वं च-यदिति । अहङ्कारं धार्मिकोऽहं क्रूरं कर्म न करिष्यामीति मिथ्याभिमानमाश्रित्य न योत्स्ये युद्धं न करिष्यामीति मन्यसे यत् मिथ्या निष्फल एष व्यवसायो निश्चयस्ते, तव यस्मात्प्रकृतिः क्षत्र- जात्यारम्भको रजोगुणस्वभावस्त्वां नियोक्ष्यति प्रेरयिष्यति युद्धे ।। ५९ ।। शं० टी०-तथापि नाहं योत्स्य इति चेन्न तव संकल्पो व्यर्थ एव भविष्यति । स्वभावादपि कर्म कर्त- व्यमेव स्यादिति स्वयमपि सांख्यमवावष्टम्भेन कर्मणोऽवश्यकर्तव्यता प्रतिपादयति-यदिति । दोपवत्कर्म न कर्वव्यमेवेत्यहंकारमविवेककृतं पाण्डित्याभिमानमाश्रित्य "ये युध्यन्ते प्रधनेषु" इति वेदोकं धर्ममविज्ञाया- वैदिकमताप्रयेण न योत्स्य इति यदि मन्यसे, स एप ते तक व्यवसायोनिश्चयः शास्त्रविरुद्धो मिध्याकाश- गमनेच्छावन्निरर्थक एव भवति । कथं मे संकल्पो निरर्थक इत्यत आइ-प्रकृतिरिति । तेजःशौर्यधैर्यदक्ष- स्वाभिमानादिगुणोत्पत्तिहेतुः क्षत्रत्वयोनिः रजोगुणमयी प्रकृतिः क्षत्रियस्वभावरत्वामस्वतन्त्रमस्वाधीन नियोक्ष्यत्यधिक्षेपासहिष्णुत्वलक्षणं गुणमुत्पाद्य युद्धं कारयिष्यतीत्यर्थः ॥ १९॥ श्री०टी०-कामं विनहयामि, न तु बन्धुभिर्युद्धं करिष्यामीति चेत्तत्राह-यदिति । मदुतमनादृत्य केवलमहंकारमवलम्ब्य युद्धं न करिष्यामीति वं यन्मन्यसे अध्यवस्यसि, एप से व्यवसायो मिथ्यैव अल. तन्त्रत्वात्तव । तदेवाह-प्रतिस्त्वां रमोगुणरूपेण परिणवा सती नियोक्ष्यति युद्धे प्रवर्तयिष्यत्येव ।। १९ ॥ स० टी०-धार्मिकोऽहं न च ऊरं कर्म हिंसादिलक्षणम् ॥ करिष्यामोति मिध्याभिमानमाश्रित्य केव- लम् ॥ १॥ युद्धं नैव करिष्यामीत्येवं त्वं यदि गन्यसे । एप ते निश्चयो मिघ्या निष्फलः सर्वथा यतः ॥२॥ रजोगुणरवभावस्त्वां क्षत्रियत्वानिवन्धनः ॥ शत्यन्तयार्मिक करे प्रेरयिष्यति संगरे ॥ ३ ॥ अवो मिथ्याग्रहं त्यक्त्वा मद्वचः शरणं कुरु ॥ ४ ॥ ५९॥ भा० टी०-स्वतन्त्रोऽहं परोक्तं न करिष्यामीति त्वया न मन्तव्यं, परवन्धत्वात् ववेत्याशयेनाह- यदिति । यतत्त्वमहंकारं मिथ्याभिमानमाश्रित्य न योरये युद्धं न करिष्यामीति मन्यसे निधयं करोपि, पप ने व्यवसायोऽहं स्वतन्त्रोऽनर्थहेतुभूतं युद्धं न फरिप्यामीति निश्चयो मिध्यांध्रममूलको निष्फलः, यतः प्रकृतिः क्षत्रियस्वभावस्त्वां क्षत्रियं नियोक्ष्यति वलात्कारेण युद्धे प्रेरयिष्यति ॥ १९ ॥ ५० टी०-कामं विनझुपामि नतु पन्धुभिः संयोत्स्य इति चेदित्याह-यदिति । यद्यदि मदुशमनार- स केवलमहंफारमवसम्न्य युद्धं न फरिष्यामीति मन्यसे, वहींप व्यवसायधिचोदगो मिथ्या निरर्थक एप । यतः प्रकृविस्त्वां नियोक्ष्यति प्रवर्तयिष्यत्येव । वस्या अपि मदीनत्वादिति भावः ॥ ५९॥ रा० टी०-मदुकाकरणमशक्यं घ वपेत्याइ-यदिति । मिध्यैव गृथैव ये निश्चयः । गुतः ? प्रति. रिति । ईश्वरेच्छाला नियोश्यति प्रेरपति ॥ १९ ॥ ।
२० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ लो० ६०] स्वभावजेन कौन्तेय ! निवद्धः स्वेन कर्मणा ॥ कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ॥ ६॥ त० टी०-तदेवोपपादयति-स्वभावजेनेति । हे कौन्तेय ! यत्स्वधर्मभुवं युद्धाख्यं नियतं कर्म मोहात्कर्तु नेच्छसि-तत्स्वभावजेन स्वभावः पूर्वकर्मनिवन्धनसत्त्वादिगुणत्तिरूपः तस्माज्जातेन राज- सेन क्षत्रियत्वप्रयोजकेन पूर्वोक्तेन शौर्याख्येन स्वेन कर्मणा निवद्धो यन्त्रितः अवशोऽपि शत्रूणाम- वाच्यवादानसहमानस्त्वं स्वयमेव करिष्यसि ॥६०॥ म० टी०-प्रकृति विवृणोति-स्वभावनेति । स्वभावजेन पूर्वोक्तक्षत्रियस्वभावजैन शौर्यादिना स्वेनाना गन्तुकेन कर्मणा निवद्धो वशीकृतस्त्वं हे कौन्तेय! यद्वन्धुवधादिनिमित्वं युद्ध मोहात् स्वतन्त्रोऽहं यथेच्छ।' मि तथा संपादयिष्यामीति भ्रमात् कर्तुं नेच्छसि, तदवशोऽपि अनिच्छन्नपि स्वाभाविककर्मपरतन्त्रः पर. मेश्वरपरतन्त्रश्च करिष्यस्येव ॥ ६ ॥ शं० टी०-अहं करोमि नाहं करोमीति चाभिमानी वद्ध एव भवति, न तु मुक्तः, अमुक्तस्याशेषकर्म- स्यागासंभवात् । अत: स्वाभाविकैन कर्मणा निवद्धस्य तव कर्मत्यागः कर्तुं न शक्यते । यदविवेकात्त्यक्तुमिच्छति तदेव प्रतिवशो भूत्वा करिष्यसि । ततः प्रकृतिवद्धस्य प्राप्तं कर्म कर्तव्यमेवेत्याशयेनाह-स्वभावेति । जन्मान्तरीयपृण्यापुण्यकर्मसंस्कारो वर्तमानजन्मनि प्रवृत्तिनिवृत्चिसुखदुःखादिसिद्धिहेतुः स्वभाव इत्युच्यने प्रकृतिगुणविशेषः । तस्माजायत इति स्वभावजं तेन . स्वाभाविकेन स्पेन स्वकीयेन क्षात्रेण 'शौर्य तेजो- धृति.' इत्युक्तेन कर्मणा निवद्वः संसृष्टस्त्वं मोहायुद्धादेः स्वधर्मरवाज्ञानाद्यत्स्वजातित: प्राप्त कर्म कर्तु नेच्छनि ममेदं न कर्तव्यमिति त्यक्तुमिच्छसि, तदेव कर्म अवशः स्वप्रमोर्वशो भूत्वा करिष्यस्येवास्वतन्त्रत्वात कृत्या बलात्कारेण चोदितः सन्करोण्येव न तु त्यक्तुं शक्नोषि । तत' कर्तव्यत्वेन प्राप्त स्वीयं शास्त्रीय कर्म विदुपाऽवश्यं कर्तव्यमित्यर्थ. ॥१०॥ श्री० टी०-किंच-स्वभावजेनेति । स्वभावः क्षत्रियत्वे हेतुः पूर्वकर्मसंस्कारस्तस्माचातेन स्वकीय कर्मणा शौर्यादिना पूर्वोक्तेन निवौ यन्त्रितस्त्वं मोहायस्कर्म युद्धलक्षणं कर्तुं नेच्छास अवशोऽपि तत्कम करिप्यस्येव ॥१०॥ स० टी०-प्रकृति विवृोतीशः सर्वतोऽपि वलीयसीन् । यस्माच्छोर्यादिना स्वेन यथोक्तिनात्मकर्मा ॥१॥ वशीकृतस्त्वं कौन्तेय क्षत्रियत्वेकहेतुना ॥ ययुद्धं वन्धुहिंसादिनिमित्तमविवेकतः ॥२॥ स्वतन्त्री- ऽहं यथेच्छामि करिष्यामि तथेति च ॥ भ्रमान्नेच्छसि कर्तुं त्वमनिच्छन्नपि कर्म तत् ॥ ३ ॥ स्वभावपर- वन्त्रः सन्नीश्वराधीन एव च ॥ करिष्यस्येव तस्मात्त्वं मा काराग्रहं वृथा १४॥ त्यक्त्वाऽऽप्रहं कृष्णपदार- विन्दभक्ति पुरस्कृत्य सदा स्वकर्म । कुर्वजनी नैति पराभवं श्रीमुकुन्दधामेति न संशयोऽत्र ॥५॥६०॥ भा० टी०-प्रकृतिपारतन्ध्यं विशदयति-स्वभावजेनेति । स्वभावजेन शौर्यादिना यथोक्तेन स्वेन स्वकीयेन कर्मणा नियद्धः निश्चयेन वद्धः यन्मोहादविवेकाकर्तुं नेच्छसि, वदवशोऽपि परवश एव करि- प्यसि । यस्माथैवं वरमाकुन्तीपुत्रस्य क्षत्रियशिरोमणेररमत्संवन्धिनस्वर युद्धवैमुख्यं नोचितमिति सूचय- न्संबोधयति-हे कौन्वेयेति ॥ १० ॥ ५० टी०-किच-स्वभावनेनेति । स्वभाव, क्षत्रियत्वप्रापक, पूर्वकर्मसंस्कारस्तरमाजातेन स्वकीयन कर्मणा शौर्यादिना पूर्वोक्न निबद्धो नियन्त्रितः सन् यदि-मोहादित्युपलक्षणं-कर्म कर्तुं नेच्छसि तथाप्य- वश: सर कर्म करिष्यस्येव-शसंस्कारपरंपरापरिणत पायो मन प्राणिना कस्तस्य कति निरस्य । [अ० १८ लो० ११] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता १२८३ सहजा काऽन्यथा स्यानरः। दोर्गन्ध्यं लशुनादिकस्य सहज यत्नात्समुत्सारयन् सौरम्यं वितनोति का मुरभिता कर्पूरमुख्यस्य वा' इति । तदेवं सांख्यमीमांसकादिमतेन प्रकृतिपारेतन्व्यं स्वभावपारतन्ध्यं च निरूप्य युद्धानादरो निपिद्धः ॥ १० ॥ रा० टी०-ईश्वरेच्छाया जीवनियमे निमित्तत्वादिकं दर्शयन्नुकं विवृणोति-स्वभावजेनेति । स्वभाव: संस्कारस्तजातेन खेन कर्मणा निवद्धः । हे कौन्तेय यत्कर्म मोहाइन्धुस्नेहमोहात्कर्तु नेच्छसि, तत्का. यशोऽपि स्वानधीनोऽपि भगवदिच्छाधीनोऽपि सन्करिष्यसि ॥१०॥ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन ! तिष्ठति ।। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१ ॥ त० टी०-तदेवं सांख्यमतानुकूलं प्रकृतिपारतन्त्र्यं स्वभावाधीनं च कर्मकर्तृत्वमुक्तम् । इदानीम् अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा य आत्मनि तिष्ठनात्मानमन्तरो यमयति यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरम् एप ते आत्माऽन्तर्याम्यमृतः, एतदक्षरस्य प्रशासने गार्गि ! सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिठतः" इत्यादिश्रुतिनिीतं सर्वस्य प्राणिनः परमेश्वराधीनत्वमाह-ईश्वर इति । ईश्वरः सर्वचेत- नाचेतननियमनशीलो भगवान्वासुदेवः सर्वभूतानां हृद्देशे हे अर्जुन ! तिष्ठति । किं कुर्वन् ? सर्वभू- तानि मायया निजशक्त्या भ्रामयन् तत्तदनादिवीजभूतकर्मानुसारेण शुभाशुभकर्मसु प्रवर्तयन् । कथं- भूतानि? यन्वारूढानि प्रकृतिपरिणामदेहेन्द्रियरूपं यन्त्रमारूढान्यारोपितानि यथा दारुमययन्त्रमारूढानि कृतिमाणि पक्षिमृगादिभूतानि सूत्रबद्धानि सूत्रधारो लोके भ्रामयति तददित्यर्थः ॥ ६१ ॥ म० टी०-स्वभावाधीनतामुक्त्वेश्वरांधीनतां विवृणोति-ईश्वर इति । ईश्वर ईशनशीलो नारायणः सर्वान्तर्यामी ' यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी- मन्तरो यमयति । 'यञ्च किंचिजगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा । अन्तर्वहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः' इत्यादिश्रुतिसिद्धः सर्वभूतानां सर्वेषां प्राणिनां हृदेशेऽन्तःकरणे विष्ठति सर्वव्यापकोऽपि तत्राभि- व्यज्यते सप्तद्वीपाधिपनिरिव राम उत्तरकोसलेषु । हेऽर्जुन हे शुक्ल शुद्धान्त:करण, एतादृशमीश्वरं त्वं ज्ञातुं योग्योऽसीति द्योत्यते । किं कुर्वन्तिष्ठाति भ्रामयन् इतस्ततश्चालयन् सर्वभूतानि परतन्त्राणि मायया छद्मना यन्त्रारूढानीव सूत्रसंचारादियन्त्रमारूढानि दारुनिर्मितपुरुषादीन्यत्यन्तपरतन्त्राणि यथा मायावी भ्रामयति तदित्यर्थशेषः ॥ ६१ ॥ शं० टी०-प्रकृत्यधीनस्य स्वातन्त्र्याभावात् स्वाभाविकं कर्म त्यक्तुं न शक्यते। किंतु कर्वव्यमेवे- त्युक्त्वाऽधुनेश्वराधीनस्य कर्म त्यक्तुं न शक्य, तत्प्रेरणया प्राप्तं कर्म कर्तव्यमेवेति कर्मणोऽवश्यं कर्म- व्यत्वं बोधयितुमाइ-ईश्वर इति । ईश्वर: ईशनशीलः सर्वलोकनियन्ता परमेश्वरः सूनधारी यन्त्रारूढानि दारुमयप्रतिमा यथा तथा सर्वभूतानि ब्रह्मादिस्तम्यान्दानि वासनात्मिकया मायया विक्षेपशस्त्या प्राम यम् स्वस्वकर्मसु प्रवर्तयन् हृद्देशे हृदये बुद्धिगुहाया विष्ठति । यद्वा "एप एव साधु कर्म कारयति गम्" इति "य: सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन सर्वेभ्यो मूवेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीर यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति” इति श्रवणायन्तारूढानि यन्त्राणि शरीराणि देष्वात्मत्वाभिमानेना- धिष्ठितानि भूतानि प्राणिनो भ्रामयन् वसत्कर्ममु प्रवर्तयन् ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे विष्ठति, अवस्वप्रेर. णया प्राप्तं कर्म तत्परतन्त्रस्य त्यक्तुं न शक्यते । ततो यथा नियुक्तोऽस्मि वया करोमि । इति मुमुक्षोः कर्वध्यतया प्रातं कर्मावश्यं करणीयमित्यर्थः ।। ६१ ॥ .
२५ श्रीमनगवद्गीता [म. १८ श्लो० ६१] श्री०टी०-तरे श्लोकद्वयेन सांस्यादिमतेन प्रकृविपारवत्र्यं स्वभावपारवत्र्यं कर्मपारतन्त्र्यं चोक्तम् । इदानी स्वमतमाह-ईश्वर इतिद्वाभ्याम् । सर्वभूताना हृदयमध्ये ईश्वरोऽन्वर्यामी विष्ठवि । किं कुर्वन् ? सर्वाणि भूतानि मायया निजशक्त्या भ्रामयन् तत्तत्कर्ममु प्रवर्तयन् यया दारुयन्त्रमारूढानि कृतिमाणि भूतानि सूत्रधारो लोके भ्रामयति तद्वत् । यद्वा यन्त्राणि शरीराणि आरूढानि भूतानि देहाभिमानिनो जीवान् भ्रामयन्नित्यर्थः । तथाच श्वेताश्वतराणा मन्त्र:-" एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूता- न्तरात्मा ।कर्माध्यक्ष. सर्वभूवाविवासः स्पक्षी घेता केवलो निर्गुणध" इति। अन्दर्यामिनाझणं च य आत्मनि विष्ठन्नात्मानमन्तरो यमयति यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं एप से आत्माऽन्वर्याम्यमृतः" इत्यादि ॥११॥ स० टी०-स्वभावाधीनतामुक्त्वेश्वराधीनत्वमुच्यते ॥ हरिरीशनशीलो यो नाराणपदाभिधः ॥ १॥ सर्वान्तर्यामिता यस्य प्रसिद्धा बहुधा श्रुतौ ॥ विष्ठन्पृथिव्या यस्तस्या आन्तरो यं न वेद सा ॥ २ ॥ यस्य पृथ्वी शरीरं यस्तामन्वयमयत्यजः ॥ यय किंचिजगत्सर्व दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ॥ ३ ॥ अन्तर्बहिश्व वत्सधै व्याप्य नारायण: स्थितः । इत्यादिश्रुतिवाक्यानि सन्ति श्रीपरमेश्वरे ॥ ४ ॥ स सर्वव्यापको- ऽपीश. सर्वेषां प्राणिनां विभुः ॥ अन्त.करणदेशेऽविनिर्मले विष्ठतीत्यसौ ॥ ५ ॥ सार्वभौमो यथा रामो महाराजो रघूत्तमः ।। उत्तराकोसलाया वै विष्टवीति तयैव च ॥ ६ ॥ व्यापकोऽपि परेशानो हृद्यभिव्यज्यते विभुः ॥ शुद्धान्त,फरणत्वात्त्वमीदृशं परमेश्वरम् ॥ ७ ॥ ज्ञातुं योग्य इति स्पष्टं सूच्यतेऽर्जुन शब्दतः ।। किं कुर्वस्विटतीशान इत्यगाह स्वयं विभुः ॥ ८ ॥ भ्रामयश्वालयन्सर्वभूतानीश इतस्तत. ॥ दारनिर्मित. पुरुयादीन्यवशानि यथा नरः॥ १ ॥ यन्त्रारूढानि मायावी मस्तिष्ठतीवरः ।। मायया छद्मना तद्- सर्वभूतानि सर्वत. ॥ १० ॥ स यन्त्राधिष्ठिवानीव भ्रामयस्तिष्ठतीश्वरः ॥ यद्वा मायामय यन्तं शरी- रद्विवयं जडम् ॥ ११ ॥ बारुह्याभिमानेन प्राणिजातं हि विष्ठति । तत्सर्व भगवानीशो मायया भ्रामयन जगत् ॥ १२ ॥ तिष्ठतीवि' स्वतन्त्रः सनिलेपो निरुपद्रव. ॥ तदुक्तं सर्वविद्याना पारगैरपि योगिभि, ॥ १५ ॥ देहादिपवर यन्त्रं तदारोहोऽभिमानता ]] विहितप्रविपिद्धेषु प्रवृत्तिभ्रंमणं भवेत् ।। १ ।। अविद्याकामादिसाममी सकला जहा । जीवोऽप्यज्ञवया भ्रान्त्या परवन्त्री जडानुगः॥ १५ ॥न किंचित्कर्तुमस्त्यस्य सामर्थ्य च स्वतन्त्रतः ॥ अत. श्रीभगवानेवालुतशफिर्महेश्वरः ॥ १६ ॥ समस्त स्ववशे कृत्वा लोकं लोकेश्वरैः सह ।। मायया भ्रामयन्यामी तिष्ठति प्राणिना हदि॥१७॥समस्वानुपपचीना परिहाराय सर्वथा ॥ माययेति स्वयं प्रोकं श्रीमद्भगवत्यपि ॥ १८ ॥ हृदि गतममलाभादिलाभ सर्वलाभ रविशशिनयनाभं श्याममेघोज्ज्वलाभम् ॥ श्रुतिविपयरसाभं पद्मनाभं सुनाभं सकलमुनिनताभ नौमि कृष्णं रमाभम् ॥ १९ ॥ समस्तलोककर्तारं गोतारं सर्वदेहिनाम् ॥ सर्वविश्वनियन्तारं मुकुन्द हृदिगं अये ॥ २० ॥११॥ भाटी-स्वभावपारतन्ध्यमुक्त्वेदानीमन्तर्यामिपारनन्व्यमाह-ईश्वर इति । ईश्वरः ईशनशील ना- रायण, सर्वभूताना सर्वप्राणिना हृदेशे तिष्ठति, सर्वन स्थितोऽपि हृदयेऽभिव्यक्ततया विष्ठति । अहश्च कृष्णमहर्जुनं च " इतिश्रुतौ अर्जुनशब्दस्य शुक्लशब्दपर्यायतया प्रयोगदर्शनात शुशान्तरात्मस्वभावो विशु- द्वान्त करणोऽर्जुनरत संबोधयन्नर्जुनस्य तवाविवेकेन नियन्धन स्वस्वातन्त्र्याध्यारोपणं नोचितं, किंतु ईश्वर- प्रेरित, सर्वे करोमीति परिज्ञानमिति सूचयति । किं कुर्वन् तिष्ठवीत्याकाहायामाह-भ्रामयन भ्रमण कार- यन् सर्वभूतानि यन्त्रारुधानि यन्त्राण्यारुढान्यधिष्ठितानीव यथा मायावी दारुमत्पुरुषादीनि यन्त्रारूढानि मायया छद्मना भ्रामयस्तिष्ठति, तद्वदीश्वरो यन्त्रसहशशरीरारूढानि भूतानीत्यर्थः ॥ ६॥ पी०-इदानीं मयाऽआक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरमिति स्वमतमुद्दिश्य स्वाश्रयवर्तिवं वाह- ..
१२८५ - [अ० १८ श्लो० ६२] तत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता ईश्वर इति । मो अर्जुन ! सर्वभूतानां हृद्देशे ईश्वरोऽन्तर्यामित्वेन तिष्ठति । किं कुर्वन् ? सर्वभूतामि जीवान यन्त्राणि शरीराण्याखढान्यधिष्ठितानि मायया स्वशक्त्या भ्रामयन संनिधिमावेण व्यापारयन् , न तु स्वयमि- त्यर्थः । श्रुतिरपि कण्वशाखारण्यके 'यो वै स संवत्सरः प्रजापति: पोडशकलोऽयमेव स योऽयमेवैवित्पुरुषस्तस्य वित्तमेव पञ्चदश कला आत्मैवात्य पोडशी कला स वित्तेनैवाऽऽच पूर्यतेऽप च क्षीयते तदेवनभ्यं यद्यमात्मा प्रधिर्वित्तं तस्माद्यद्यपि सर्वज्यानि जीयत आत्मना चेजीवति प्रधिनाऽगादित्याहुः" इति। माण्यम्-य इति पूर्वोक्तः संवत्सरः कालरूप: पोडशकलः प्रजापतिरयमपि तन्निदिध्यासनात्तद्रूप एव । पूर्वोक एवंवित्पुरुषः सोऽपि पोडशकल: प्रजापतिस्तस्य वित्तं पञ्चपञ्चसूक्ष्मभूतेन्द्रियमाणात्मकं लिङ्गदेह ता एव पञ्चदशकला आत्मै- • वास्य पोडशी कला स प्रागुक्तेन वित्तेन पूर्यतेऽपक्षीयते च-प्रवृत्तिमार्गेण पूर्यते, निवृत्तिमार्गणापक्षीयते च उपरमं प्राप्नोति, तदा पोडशी कलाऽवशिष्ठा भवति । तत्र वदेतनभ्यं नाभौ भवं नाभ्यम् । अत्र छान्दस: प्रयोगो नभ्यमिति । यद्वा मध्यप्रदेशोपस्थितं स्थिरं वस्तु विवक्षितम् । तेन नभसि हृदयाकाशेऽवस्थित नभ्यम् । तत्किम् ? यदयमात्मा "अजस्य नाभावभ्येकमर्पितम् " इति श्रुतेः । अयमर्थः-यथा कुलालचक्रस्य मध्यछिद्रे स्थितः कीलकश्चक्रचलनेऽपि न चलति तदेव नभ्यं, तथा वित्तं प्राङ्गिपितलिङ्गदेई प्राधिः चक्रपरिधिवबाह्य- परिधिस्थानीयम् । तस्माद्वित्ताद्यद्यपि सर्वज्यानि सर्वस्वहानि जीयते प्राप्नोति, तथाप्यात्मना चेत्संपद्यते वदा जीवति जीवन्मुक्तो भवति । अथ प्रधिना शरीरेण चेसंपद्यते तदागाद् गमनागमनं करोति ॥ ११ ॥ रा० टी०-नन्वीश्वरेच्छायाः प्रवर्तकत्वे ईश्वरः प्रवर्तको नेतिशङ्कामीश्वरस्वरूपं दर्शयन्परिहरति-ईश्वर इति । ईश्वरः यन्त्रारूढानि यन्त्राणि शरीराणि तदारुढानि तत्रस्थानि भूतानि प्राणिनः मायया स्वरूप- भूतेच्छया भ्रामयन्नानाकर्मसु प्रवर्तयन्सर्वभूताना हृदेशे विष्ठति ॥ ६१ ॥ तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत !॥. तत्प्रसादात्परां शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ १२ ॥ त० टी०-नन्येवं चेत्तर्हि मायायास्तत्मयोजकस्य च नित्यत्वात्कस्यापि कदापि संसारनिट- तिर्न स्यात्कयं मोक्षाशेति चेत्तत्राह-तमेवेति । सर्वभूतानां भ्रामको मायाया अपि नियन्ता वात्स- ल्यकारुण्यसौहार्दादिगुणपारवश्येन त्वत्सारथ्यमङ्गीकृत्य त्वदितं चिकीर्षुस्त्वत्मशासिता, तमेव सर्व भावेन सर्वात्मना शरणं गच्छ, तदुक्तं सर्व निर्मायिकत्वेन कुरुष्व । हे भारतेति संवोधनेन भरत- वंश्येन त्वया सर्वशत्रुनिग्रहेण स्वकीर्तिख्यापनमुचितमिति सूचितम् । तस्मान्मदुक्तमकारेण युद्धाख्य स्वधर्म कुर्वन् तत्मसादात्तस्य ममानुग्रहाद परां शान्ति निःशेपाऽविद्यानिवृत्तिपूर्वकपरमानन्दरूपां भगवज्ञावापत्ति शाश्वतं प्रकृतिकालकर्मसंवन्धशून्यं नित्यकरसं स्थानं परमपदविष्णुपदादिशब्दा- भिधेयं धाम प्राप्स्यसि ॥१२॥ म० टी०-ईश्वरः सर्वभूतानि परतन्त्राणि प्रेरयति चेप्राप्त विधिप्रतिपेयशास्त्रस्य सर्वस्य पुरुषकारस्य चानर्यक्यमित्यवाह-तमेवेतितमेवेश्वरं शरणमाअयं संसारसमुद्रोत्तरणार्थे गच्छाऽऽअय सर्वभावेन सर्वात्मना मनसा वाचा कर्मणा च हे भारत ! तत्प्रसादाचस्यैवेश्वरस्यानुप्रहाचत्वज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तात् परा शान्ति सकार्याविद्यानिवृत्ति स्थानमद्वितीयस्वप्रकाशपरमानन्दरूपेणावस्थानं शाश्वतं नित्यं प्राप्स्यसि ।। ०टी०-आरुरुक्षौश्चित्तशुद्धथै कर्मैव कर्तव्यमिति निर्धारयितुमेवं नयेन मयेन च कर्मणः कर्तव्यत्व, मेव संपाद्याधुना तस्यैव मोकझामस्य तदेकशरणवया स्वकर्मणा तदाराधनं कुर्वतस्ताप्रसादाशानं मोक्ष सिध्यत्यवस्तीत्यै कर्म कुर्वन् वमेव शरणं याहीत्याह-तमेवेति । हे भारव! स्वकर्मणा वाराधनपरी . ॥
श्रीमनगवद्गीता [ १८ ० ६२] भूत्वा स्वं सर्वभावेन नारायण एवेदं सर्वमिति सर्वात्मभावः सर्वभावस्वेन सर्वभावेन सर्वत्र पर. मेश्वरत्वयुद्धपा सर्वात्मानं तमेव परमेश्वरं शरणं गच्छ संसारसागरे मतं मामुखर जगत्मभो' इति संसा-' रदु.खनिकृस्य तमेवाश्रय, वदेकशरणो भूत्वा वलसादाचस्यैवेश्वरस्य प्रसादानुमहात्समुत्पन्नात्मविज्ञानात्परा दृश्यालम्पनरहिवयात्प्रकृष्टो परमानन्दानुभूतिहेतुत्वाद्रा पर शान्ति पृत्युपरति सर्वत्र समष्टि का प्रामय. सि, शाश्वतं नित्यं सर्वदा चिदानन्दैकरसरूपेणाविक्रियात्मना तिष्ठवीति स्थानं स्वस्वरूपं फूटस्थासङ्गचिदा- स्मकं परं प्रक्ष प्राप्स्यसि, विदेहमुक्तिसुर गमिष्यसीत्यर्थः ।। १२॥ श्री० टी०-तमिति । यस्मादेवं सर्वे जीवाः परमेश्वरपरवन्यास्तस्मादहंकारं परित्यज्य सर्वभावेन सवस्मिना तमाश्वरमेव शरणं गच्छ । ततस्तस्यैव प्रसादास्परमामुपशान्ति स्यानं च पारमेश्वरं शाश्वत निस्य प्राप्स्यसि ॥ १२ ॥ स० टी०-ईश्वरः सर्वभूतानि परतन्त्राणि मायया । प्रेरयत्येव चे प्राप्तमानर्थक्यं श्रुतेः स्मृतः ॥ १॥ विष्यादिनविपादिन्याः पौरुपस्य तथैव च ॥ इत्यनाइ वमेवेश शरणं गच्छ सर्वथा ॥ २ ॥ संसारजलधे: पारोतरणार्थ तमाश्रय || मनसा फर्मणा वाचा सर्वभावेन भारत ॥ ३ ॥ वस्येश्वरस्य श्रीविष्णोः कल्याण- गुणवारिधेः ॥ अनुप्रदात्परब्रह्मज्ञानोत्पत्त्यवधेः पराम् ॥ ४ ॥ सकार्याशानयाधारयां शान्ति स्थान पर पदम् ।। स्वप्रकाशपरानन्दात्मनायस्थानमक्षरम् ॥ ५॥ नित्यकूटस्थपद्वैवं निर्मलं प्राप्यसि स्वयम् ।। अतो विध्यादिशास्त्रस्य पौरुषस्य प सर्वया ॥ १॥ इदमेव हि सास्यं यदीशशरणं प्रनेत् ।। न सातव्यात्कचिकिनित्प्राप्नोतीह फलं नरः ॥ ७ ॥ ईश्वरानुमहादेव सर्व सर्वस्य जायते ।। ईश्वरानुप्रहे तस्माद्यतिवव्यं मुमुक्षुभिः ॥ ८ ॥ यथा प्रसन्नो भगवान्पश्येदेनं . फटाक्षवः ॥ सर्ववेदेषु भाक्षेषु पुराणे भारते सया ॥९॥ सर्व विहाय कर्वव्यमिदमेव सुनिश्चितम् ॥ वासुदेवैकशरणः सर्व प्राप्नोति शोभनम् ॥१०॥ अतस्तमेव शरणं गच्छेत्याह रमापतिः ॥ ११॥ ईशत्वेन हरि भजस्व निगमप्रोकेन मार्गेण भो दासं तस्य समाश्रयस्व सुमनोभक्त्या भयेनादरात् ॥ सख्यं सौहृदमाश्रयस्व नहरेः प्रेम्णा गुरुत्वेन च स्वात्मान प्रकटीकरोति भजतामेवं स बुद्धौ हरिद ॥ १२ ॥ १२ ॥ भा० टी०-यस्मादीश्वर एष वचत्कर्मफलप्रदाता भामयवि तस्माचमेव ईश्वरं शरणमाश्रयं संसाराति- हरणार्थ सर्वभावेन सर्वात्मना मनसा वाचा फर्मणा च गच्छ आनय । हे भारतेवि संबोधयन् उत्तमवं. शोद्भवस्त्वं योग्योऽसीति द्योतयति । तत्प्रसादात्तस्य सम्यगाराधितस्येश्वरस्य प्रसादादनुमहात् परां प्रष्टा शान्तिमविद्योपशमरूपा सर्वानर्थनिवृत्तिस्थानं च मुक्तास्तिष्ठन्ति यस्मिनिति स्थानं मन विष्णोः परमं पद शाश्वतं सदैकरसमवाप्स्यसि ।। ६२ ।। प० टी-एवमन्वयव्यतिरेकाम्या प्रकृतस्तदनुरूपसंस्काराणां वा ईश्वराधीनत्वात्सर्वत्र स एव शरण. मिति ज्ञात्वा मदुक्तमनुसरेत्याइ-तमेवेति । तमेव मामीश्वरमन्तर्यामिणं सर्वमावेन सस्मिना शरणं व्रज । तत्प्रसादापरामुत्कृष्टा शान्ति निर्वृति शाश्वतं नित्यं स्थानं च प्राप्स्यसि । तदुक्तम्-'स्थूलं वपुः परिधिरा. न्वरमस्य सूक्ष्मं देवालयं तदिह देवगतिः परामा । तत्पूजनोपकरणान्यखिलेन्द्रियाणि कृत्वा तमेव शरणं प्रज जीव नान्यम् ॥ इति ।। १२॥ रा०टी०-यस्मादेवीश्वर एव स्वतन्त्रः श्रीवास्तदधीनास्तस्मादहकारमुत्सृज्य तमेवेश्वरं सर्वभावेन सर्वप्रकारेण शरणं गच्छ याहि । मा शरणं याहीति वक्तव्ये ईश्वरस्तिष्ठति वं शरणं याहीति परोक्षनिर्देश: कृष्णस्येवरत्वनिश्चयार्थत्वाभिप्रायेण 'निश्चयार्थः स तु ज्ञेयो यनादमेव परोक्षतः । उच्यते । इति . .
[अ० १८ लो० १३] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता स्मृतः । तत्प्रसादादीश्वरप्रसादात्परां शान्ति बुद्धभगवन्निष्ठता, शाश्वतं स्थानं वैकुण्ठादिलोकं प्राप्यसीति । 'वैण्कुठादिस्थानस्य शाश्वतत्वं च चित्प्रगत्यात्मकत्वात् ! 'श्रीरेव लोकरूपेण विष्णोस्तिष्ठति' इत्यादेः 11६२॥ इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ॥ विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ।। त० टी०-इदानी प्रसाद दर्शयितुमुपदेशमुपसंहरन्नुपदिष्टार्थ स्तौति-इतीति । इत्येवमुक्तपका- रेण ते तुभ्यं हितपिणा परमकारुणिकेन मया मुमुक्षुपादेयं ज्ञानमाख्यानमुपदिष्टम् । कथंभूतम् ! गुह्या- द्गुह्यवरं कर्मज्ञानभक्तियोगविषयमतिरहस्यमेतन्मदुपदिष्टं गीताशास्त्रमशेपेण विमृश्य पालोच्य तदनन्तरं स्वाधिकारानुरूपं यथेच्छसि तथा कुरु। कर्मज्ञानभक्तिषु यदेकं हितवरं मन्यसे तदेवानविष्ठेत्यर्थः॥३॥ म० दी.-सर्वगीतार्थमुपसंहरन्नाह-इतीति । इति अनेन प्रकारेण ते तुभ्यमत्यन्तप्रियाय ज्ञानमात्म- मात्रविषयमोक्षसाधनं गुह्याद्गुह्यतरं परमरहस्यादपि संन्यासान्तात् कर्मयोगाद्रहस्यतरं उफलभूतत्वात् आख्यात समन्तात् कथितं मया सर्वज्ञेन परमातैन । अतो विमृश्य पर्यालोच्य एतन्मयोपदिष्टं गीताशास्त्र मशेष सामस्त्येन सर्वेकवाक्यतया ज्ञात्वा स्वाधिकारानुरूपेण यथेच्छसि तथा कुरु, न लेतदविमृश्येव कामकारेण यत्किचिदित्यर्थः । अत्र चैतावदुक्तमू-अशुद्धान्त:करणस्य मुमुक्षीमोक्षसाधनज्ञानोत्पत्तियोग्य- ताप्रतिबन्धकपापक्षयाथै फलाभिसंधिपरित्यागेन भगवदर्पणबुद्धया वर्णाश्रमधर्मानुष्टानं, ततः शुद्धान्तःकरणस्य विविदिषोत्पत्ती गुरुमुपसत्य ज्ञानसाधनवेदान्तवाक्यविचाराय ब्राह्मणस्य सर्वकर्मसंन्यासः, ततो भगवदेकश- रणतया विविक्तदेशसेवादि ज्ञानसाधनाम्यासाच्छ्रवणमनननिदिध्यासनैरात्मसाक्षात्कारोत्पत्त्या मोक्ष इति । क्षत्रियादेस्तु संन्यासानधिकारिणो मुमुक्षेमन्तःकरणशुद्धपनन्तरमपि भावदाज्ञापालनाय लोकसंग्रहाय च यथाकथंचित्कर्माणि कुर्वन्तोऽपि भगवदेकशरणतया पूर्वजन्मकृतसंन्यासादिपरिपाकाद्वा हिरण्यगर्भन्या- येन वदनपेक्षणाद्वा भगवद्महमानेणेहेव तत्त्वज्ञानोत्पत्याप्रिमजन्मान प्रामणजन्मलाभेन संन्यासा- दिपूर्वकज्ञानोत्पत्त्या वा मोक्ष इति । एवं विचारित च नास्ति मोहावकाश इति भावः ॥ १३ ॥ ० टी०- स्वकर्मणा तमभ्यय सिद्धि विन्दति मानवः' इत्यारभ्य सिद्धि प्राप्तो यथा ग्रहा तथामोति निबोध मे। इसन्तेन कर्मभिः समाराधितेश्वरप्रसादाचिचशुद्धिस्ततो ज्ञानं तवो मोक्ष इत्युक्तमेवार्थे दृढीकर्तुं पुनः संक्षेपेणोपन्यस्वेदानीमुपान्तं शास्त्रमुपसंहरति-इतीति । 'नत्वेवाई जातु नासम्' इत्यारम्य 'स्यानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्' इत्येतदन्त ज्ञान ब्रह्मात्मैकत्वज्ञानोत्पचिकारणमेद्गीताशास्त्रं गुह्याद्गोपनीयान्मणिमन्त्रादे- रणिमादिसिद्धिदेवोरपि प्रयत्लेन संवरणीयत्वाद्गुह्यतरं परमरहस्यं ज्ञानशास्त्रं मुमुक्षवे शुद्धात्मने शरणं गता- य ने तुभ्यं मया सर्वज्ञेन परमकारुणिनावाप्तसर्वकामेनेश्वरेणाख्या ज्ञानतसिद्धिसाधनप्रकाशकं मोक्ष- शावं समप्रमुपदिष्टम् । ज्ञानस्य तत्साधनसंपवेश्च वोधकमेतद्गीवाशास्त्र पवाक्यप्रमाणनिपुलस्त्वमशेपेण सर्वमवमृश्य साधनं साध्य तसिद्धिप्रकार स्वाधिकारं च सम्यगालोच्य, सत्त्वशुद्धेरभावे साधने फर्मणि, वत्सनावे सत्यालविज्ञाननिष्ठायां च स्वस्य योग्यत्वं निश्चित्य यथेच्छसि यथा कर्तुमिच्छसि तथा कुरु तथा चस्व । स्वतृप्तिः धकारस्य स्वज्ञेयत्वासावुद्धेरप्रत्यक्षत्वाध स्वाधिकार स्वयमेव 'निश्विरय कर्मणि ज्ञाने वा यत्राधिकारस्तन विस्यर्थः ।। ६३ ॥ श्री०टी०-सर्वगीवार्थमुपसंहरमाह-इतीति । इति अनेन प्रकारेण वे तुम्यं सर्वक्षेन परमकारुणि- केन मया ज्ञानमाख्यातमुपदिष्टम् । कयंभूतम् ? गुह्यात् गोप्याद्रहस्यमन्त्रयोगादिशानादपि गुरसरम् ।। एतन्मयोपदिष्ट गीताशास्त्रमशेषतो विमृश्य पर्याटोच्य पश्चायथेच्छसि तया कुरु। एतस्मिन्पोलोपिवे सकि व मोहो निवर्विष्यत इति भावः ॥ ६३ , १२८८ श्रीमतगवद्गीता [अ० १८ लो०१४] स० टी०-इदानी सर्वगोवार्थमाहेदमुपसंहरन ॥ इत्यनेन प्रकारेण तुभ्यं प्रेमालाप प॥१॥ मानगात्मैश्यविपयं मोक्षसाधनमान्तरम् ॥ यदेवात्यन्तसोप्यादपि गोप्यतरं महत् ॥ २॥ कर्मसंन्यास- पर्यन्ताकर्मयोगादपीरितात् ॥ रहस्यवरगरतीदं वसलवामनुत्तमम् ॥ ३ ॥ सर्वशेने घरेणाप्तवमेनागा- हेतुना || आसमन्तान्मया साक्षात्काषितं परमेष्ठिना!! || एतन्मयोपदिष्टं त्वांगीवाशास्त्रमशेषतः ॥ पर्यालाच्य धिया शुद्धपा साकल्येन विकतः ॥ ५॥ एकवारयवया सात्वा स्वाधिकारानुरूपतः ।। श्रेयोमार्गे विनिश्चित्य यथेच्छसि क्या कुछ ॥ ६ ॥ एतदुकं भवत्यय गीताशास्त्रार्थसंग्रहे ।। नरस्याशुचि तस्य मुमुशोभिसाधनम् ॥ ७ ॥ कर्मयोगो यथाशास्त्र फलासङ्गरिवर्जितः ।। ईशार्पणधिया सम्यकतः सत्त्वविशुद्धिकृत् ॥ ८ ॥ ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य फर्मणः ।। कपाये कर्मभिः पफे ततो ज्ञान प्रवर्तते ॥ ९ ॥ इति स्मृत्या तथा श्रुत्या वमेवमिविवास्यतः ॥ निष्कामः कर्मयोगोऽसौ प्रथमं साधन मतम् ॥१०॥ ततः शुद्धधियः सम्यग्वैराग्यादियुतस्य प || सम्पग्विविदिपोत्पचावाचार्यमुपसृत्य च ॥११॥ ज्ञानसाभनवेदान्तगीविचाराय शास्त्रतः ॥ समस्तकर्मसंन्यासो प्राणस्य विधीयते ॥ १२ ॥ ततः कृष्णे- कशरणतया पूर्वोतसाधनैः ॥ अमानित्वादिभिनित्यं श्रवणादिपरस्य च ॥ १३ ॥ प्रक्षात्मक्यावयोपस्य साक्षात्कारस्य सन्मतः ॥ प्रादुर्भावन मोक्षोऽस्ति सिद्ध इत्येव निर्णयः ॥ १४ ॥ क्षत्रियादेस्तु संन्यासा- नधिकारितया तथा ॥ मुमुक्षोश्वेतसः शुद्धो जातायां तदनन्तरम् ॥ १५ ॥ ईशाशापालनार्थ प लोक. संग्रसिद्धये ॥ यथाकथंचित्कर्माणि कुर्वतोऽपि विरागिणः ॥ १६ ॥ कृष्णरुशरणत्वेन पूर्वजन्मशतादपि ।। संन्यासादेः परब्रह्मज्ञानं कृष्णप्रसादतः ॥ १७ ॥ जायवे वेन सिद्धः स्यान्मोक्षस्तस्येवि निर्णयः ।। एवं विचारित शास्त्रे पौर्वापर्यानुरोधतः ॥ १८ ॥ नास्ति मोहावकाशोऽणुमात्रमित्याशयो हरेः ॥ १९ ॥ सकलनिगमसारं मोक्षदानेऽत्युदारं भ्रमतिमिरविदारं संसृविद्रोः कुठारम् ।। दृढमतिसविवार ब्रह्मविद्यावि. हार निसिलगुणविचारं नौमि लक्ष्म्यैकदारम् ॥ २० ॥ १३ ॥ भा० टी०-शास्त्रमुपसंहर्तुमिच्छन्नाह-इतीति । इत्येतचे तुभ्यं ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं गीताशास्त्रं गुह्यस्त गोप्यात् गुह्यतरमतिशयेन गोप्य रहस्यं मया सर्वशेनाप्ततमेन शास्त्रयोनिना आख्या कधिवम् । एतद्य- थोक्तशास्त्रमशेपेण समस्तं विमृश्य विमर्शनमालोचनं कृत्वा यथेच्छसि तथा कुरु, नत्वेतत्साफल्येनावि. मृश्यैवेत्यर्थः ।। १३॥ ५० टी०-अथ सर्वगीतार्थमुपसंहरन्नाह-इतीति । इत्येवं प्रकारेण ते तुभ्यं मया करुणार्णवेन ज्ञान- मात्मविवेकरूपमाख्यातम् । किंभूतम् ? गुह्यान्मन्त्रादिरहस्यादपि गुहा गोप्यतमम् । एतदशेषेण पूर्वीपरवा. क्यानुसंधानपूर्वकं विमृश्य विचार्य यथेच्छसि मोक्षमार्गमपेक्षसे तथैवोक्तमुपायं कुरु ॥ १३ ॥ रा० टी-एवं भगवानर्जुनस्यातिगोप्यं तत्त्वमुपदिश्य तदनुवादपूर्व तूष्णी स्थिवमर्जुनमाक्षिपति- इतीति । गुह्याद्गुह्यतरमतिगोप्यमिति प्रागुफप्रकारेण ज्ञानं ज्ञेयं तुभ्यं मया आख्यातम् । एवदशेपेण विमृश्य विचार्य यथेच्छसि तथा कुर्वियाक्षेपः ॥ १३ ॥ सर्वगृह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः॥ इष्टोऽसि मे दृढमतिस्ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥ त० टी०-अतिगम्भीरस्य गीताशास्त्रस्याशेपेण विमर्शनलेशपरिहाराय स्वयमेव कृपया तत्सार मंगृह्य ग्राहपितुं दृढीकरोति-सूर्यगुह्यतममिति । पूर्व गुह्यतरमुक्तमिदानी तस्मादन्येभ्योऽपि गुह्य- तरेभ्यो 'गुह्यतममतिरहस्यं परमं प्रकृष्टं में वचः भूयस्तत्र तत्रोक्तमपि त्वदनुग्रहार्थे पुनर्वक्ष्यमाणं .. . . -- [अ० १८ श्लो. ६४] तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२८९ शृणु । नन्वतिरहस्यं कुतः कथयसि । तत्राह-यतस्त्वं मे ममेष्टः प्रियोऽसि दृढमतिविश्वासयुक्तस्ततस्ते हितं वक्ष्यामि ॥ ६४ ॥ म०टी०-अविगम्भीरस्य गीताशास्त्रस्याशेषत: पर्यालोचनक्लेशनिवृत्ये कृपया स्वयमेव वस्य सारं संक्षिप्य कथयति-सर्वति । पूर्व हि गुह्यात् कर्मयोगात गुह्यतरं ज्ञानमाख्यानम्, अधुना तु कर्मयोगात्तत्फलभू- तज्ञानाच सर्वस्मादतिशयेन गुह्यं रहस्यं गुह्यतमं परमं सर्वतः प्रकृष्टं मे मम वचो वाक्यं भूयः तत्र तत्रो- कमपि त्वदनुपहार्थे पुनर्वक्ष्यमाणं शृणु। न लाभपूजाख्यात्याद्यर्थं त्वां ब्रवीमि । किं तु इष्टः प्रियोसि मे मम दृढमतिशयेन इति यतस्ततस्तेनैवेष्टत्वेन वक्ष्यामि कथयिष्याम्यपृष्टोऽपि सन्नहं ते तव हितं परमं श्रेयः॥६॥ शं० टी०-एवमारुरुक्षोरारूढस्य च कर्तव्यांशं निर्धार्य ज्ञानतत्फलसिद्धेश्चित्तशुद्धिरेवासाधारण- कारणं, चित्तशुद्धौ सिद्धायां ज्ञानसिद्धिः सुलभतरा, तदभावे ज्ञानं ज्ञाननिष्ठा संन्यासच न फलति, साध- नदायेनेव भवितव्यमतश्चित्तशुद्धपै कर्मैवाकक्षोरीश्वरार्पणबुद्धया सम्यकर्तव्यमिति दृढतरमुपदेष्टुमुपदे- टव्यं स्तौवि मुमुक्षोः श्रद्धयाऽत्रैव प्रवृत्तिसिद्धये-सर्वति । सर्वाणि यानि गुह्यानि गोप्यान्यगिमादि- सिद्धिसाधनानि मन्त्रौषधादीनि वेभ्यो गोक्षमुखैकसाघनत्वेन गुह्यवरं ज्ञानवसिद्धेः कारणत्वादीवरैक- शरणत्वेन कर्माचरणं गुह्यतममत्यन्तरहस्यं तद्बोधकं मम वचनमपि सर्वगुह्यतममेव । किंच परमं परमपुर- पार्थसाधनत्वात्परममुस्कृष्टं मे मम वचो वचनं 'मत्कर्मपरमो भव' इति 'मत्कर्मझन्मत्परमः' इति तत्र तत्रोक्त- मपि भूयः पुनरपि दाढायोच्यमानं शृणु, श्रद्धया श्रुत्वा वत्सरो भवेत्यर्थः । नन्वस्य वचनस्य सर्वगुणव- मत्वे कथमुपदेश उपयुज्यत इत्यत भाह-इष्ट इति । यतः पितुः पुत्रवत् त्वं मदंशत्यान्मे गमेष्टः प्रियो- ऽसि ततस्तस्मादेव हेतोस्ते तब इत्येवं वक्ष्यमाणलक्षणं दृढं फलाव्यभिचारि पूर्वोक्तमपि दृढं यथा तथा हित हितसाधनं वक्ष्याम्युपदेश्यामि वित्यर्थः ।। ६४ ॥ श्री०टी०-अतिगम्भीरं गीताशास्त्रमशेषतः पर्यालोचयितुमशक्नुवतः कृपया स्वयमेव वस्य सारं संगृह्य कथयति-सर्वगुह्यतममितित्रिभिः । सर्वेभ्योऽपि गुह्येभ्यो गुह्यतमं मे वचः तत्र तत्रोक्तमपि भूयः पुनरपि वक्ष्यमाणं शृणु । पुनः पुन: कथने हेतुमाह-दृढमत्यन्वं मे मम त्वमिष्टः प्रियोऽसीवि मत्वा । तत एवंदेतो- स्ते हितं वक्ष्यामि । यद्वा त्वं ममेष्टोऽसि, मया वक्ष्यमाणं च दृढं सर्वप्रमाणोपेतमिति निश्चित्य ततस्ते वक्ष्यामीत्यर्थः। दृढमतिरिति केचित्पठन्ति ॥ १४ ॥ स० टी०-अविगम्मीरभावस्य गीताशास्त्रस्य सर्वतः ॥ पूर्वापरपरामर्शवुद्धिलेशनिवृत्तये ॥ १ ॥ पया स्वयमेवेशः सारं संक्षिप्य तस्य च ।। कथयत्यात्मसिद्धान्तं भगवान्करुणानिधिः ॥२॥ कर्मयो- गात्पुरागुह्याज्ज्ञानं गुह्यतरं स्मृतम् ॥ इदानी कर्मयोगाच्च तत्फलात्तत्त्ववोधतः ॥ ३ ॥ सर्वस्मादपि संगो- प्याद्रहस्यमतिदुर्लभम् ॥ प्रकृष्टं सर्ववो वाक्यं ममाप्तस्येश्वरस्य च ॥ ४ ॥ तत्र तत्रोक्तमप्येतत्सुनस्ते प्रीति- काम्यया ॥ वक्ष्यमाणं शृणु त्वं भोः किमर्थं के प्रवीम्यहम् ॥ ५ ॥ न लाभपूजाख्यात्यादिसिद्धये किंतु मे हरेः ॥ प्रियोऽस्यतिशयेनेति यस्मातेनैव हेतुना ॥ ६॥ कथयिष्याम्यपृष्टोऽपि श्रेयस्ते परमं ह्यहम् ॥ ७॥ भक्तिहरो प्रेमघनातिदुर्लभा न गुह्यसिद्धान्त इवापरं नृणाम् ॥ आश्रित्य तां मोक्षपदं करे। स्थित न तो विना श्रेय उपैति कश्चन ॥ ८॥१४॥ भा० टी०- अतिगम्भीरस्य गीताशास्त्रस्य पौर्वापर्येण विमर्शनद्वारा प्रतिपत्तुमसमर्थे प्रति स्वयमेव करुणानिधिः श्रीभगवान्यासुदेवस्तस्य सारं संगृह्य कथयति, वथा भूयोऽपि मयोच्यमान सर्वगुह्यतमं सर्व गुह्येभ्योऽत्यन्तरहस्यमुक्तमप्यसकृत् भूयः पुन: मे मम परमं प्रकृष्टं वचो नाक्य शृणु । यत्तु पूर्व गुह्मारकर्म- योगात् गुह्यतरं ज्ञानमाख्या तम्, अधुना तु कर्मयोगात् तरफलभूतज्ञानयोगांध सर्वस्मादतिशयेन गुह्यतममिति ।
१२९० श्रीमद्भगवद्गीता [4. १८०६१] तु नादर्तन्यम् । पूर्वस्मिन्रोके ज्ञानं करणव्युत्पत्त्या गोवाशाखपरमिति व्याल्यातत्वात् । 'इदं तु वे गुहातम प्रवक्ष्याम्यनसूयवे' इत्यादौ झामस्य गुह्यवमत्वामियानायाऽन ज्ञानादपि गुहारममन्यदित्यभिधानस्यानुचित स्वाध । किमर्थ पुनः पुनः श्रावयसीति चेत्, न भयानाप्यर्थकारणाद्वा वक्ष्यामि, किं तु दृढमान्यभिचारेणा- त्यन्त मे मम इष्टः प्रियोऽसि तत्तस्मात्कारणाद्वक्ष्यामि कथयिष्यामि ते तव हितं परं ज्ञानप्रातिसाधनं, तद्धि सर्वहिताना हिवतमम् ॥ १४ ॥ ५० टी०-अयोकप्रकारेणोपायं कर्तुमशक्तमर्जुनं प्रति परमकारुणिकः परमात्मा संक्षेपेण सर्वगीतार्थ- सारं वक्तुमुपक्रमवे-सर्वगुह्यतममिति निभिः । सर्वेभ्योऽपि परमं गुरतमं वक्ष्यमाणं मे वचः शृणु । न स्व. संगोपासीनस्य परमात्मनस्तव मयि कयमेवावान्ममतानुपन्य इत्याइ-इष्ट इति । यतस्त्वं इदमविदृढसंकल्प इति मे इष्टोऽभीष्टः संगतोऽसि ततस्तेन कारणेन वे हिवमुपकारं वक्ष्यामि ॥ १४ ॥ रा० टी०-तत्त्वसारमुपसंहृत्य साधनसारकथनमुपसंहर्तुं प्रविजानी-सर्वति । चतुर्दशादौ साधन- सारस्योक्त्वाय इत्युक्तम् । पुनरित्यर्थः । सर्वसाधनेषु गोप्यवमं मे परमं यः श्रृणु मे इष्टोऽसि । इद- मिति निश्चय. । ततस्ते हितं वक्ष्यामि उपसंहाररूपेण कथयिष्यामीत्यर्थः ॥१४॥ मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ॥ मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।। ६५ ।। त० टी०-नदेवाह-मन्मना भवेति । मयिं भगवति पुरुषोत्तमें चेतसः शुभाश्रये मनो यस्य स मन्मनास्तथा भव, पराभक्तिलक्षणं सर्वदा मद्धयानं कुर्वित्यर्थः। तत्साधनमाह-मद्भक्तो भवेति । मद्भक्ति कुर्वित्यर्थः । सा च भगवदर्थी क्रियैव । “ सुर विहिता शास्त्रे इरिमुद्दिश्य या क्रिया । सैव भक्तिरिति प्रोक्ता यया भक्तिः परा भवेत् ॥ इति वचनात् । तामेवोपदिशति-मधानीति द्रव्ययशास्तपोयज्ञा इत्यादिनोक्तः पञ्चपः अभिगमनोपादानेज्यास्वाध्याययोगः पञ्चकालोक्तमगज- नैर्वा मत्पूजनशीलो भवेत्यर्थः । तत्र द्रव्ययज्ञो विभवे सति सर्वसमृदिमदुपचारैर्मदाराधनं, नि- किचनानां यथाशक्ति पत्रपुप्पफलादिभिर्पयोपलब्धैरविनीत्या भगवदाराधनं, तपोयशश्व स्वधर्मक्षत्यि- पासाशीतोष्णादिसहन, योगयज्ञश्च यमनियमासनादिनियमपूर्वकसगर्भपाणायामश्वेतसो नयाभ्यासा, स्वाध्याययज्ञश्च यथाधिकारमुपनिपीतासहस्रनामादिस्तोत्रपाठरूपा, ज्ञानयज्ञश्च श्रुताधीतोपनिपढ़ी- तार्थस्य मननकयनरूपः । अथ कृतस्य यजनस्य वैगुण्यपरिहारार्थमाह-मा नमस्कुरु । मां सर्वेश्वर सर्वशक्ति वात्सल्पकारुण्यादिगुणार्णवं नियमेन नित्यमष्टाः प्रणमेत्यर्थः । एतत्साधनभक्तः फलमुक्तं विष्णुधर्मे " अश्वमेधसहस्राणां रहस्रं यः समाचरेत् । नासौ तत्फलमामोति मद्भक्त्या यदवाप्नुयात् " इति । एवं पञ्चविधमदाराधनेन निरन्तरध्याननिष्ठो भूत्वा मत्साक्षात्कारेण ब्रह्मद्रादिभिर्दुराराध्यं परमप्राप्यं परमानन्दधनं मामेवैष्यसि प्राप्स्यसि, एतत्सत्यं न प्रलम्भनमिति ते तुभ्य प्रतिजाने प्रतिज्ञां करोमि । यतस्त्वं मे मियोऽसि, प्रियस्य प्रलम्भन मनुचितमिति भावः । अत एव महाभारते ध्यानस्यैव परमश्रेयोहेतुत्वं श्रीव्यासेन निर्णीतम् " आलोडच सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः । इदमेकं सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदा" इति । मोक्षधमें मेधाविना- ऽपि तथैव निश्चितं " सोऽहं त्वहिंसः सत्यात्मा कामक्रोधविवर्जितः । जितेन्द्रियां शमी भूत्वा मृत्यु जेष्याम्यमय॑वत् । अन्तर्वहिथ यत् किंचिन्मनोव्यासङ्गकारणम् । तत्सर्व संपरित्यज्य ध्यानेऽभ्यस्ये. मनः सदी । मनसथेन्द्रियाणां च कृत्वैका समाधितः । तावत्स्यास्यामि नियतो यावत्संक्षयमागतम् । है [अ० १८ श्लो०६५] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेवा १२९१ विमुक्तविषयासर सन्निरुध्य मनो हृदि । यदा यात्युन्मनीमा तदा निर्वाणपृच्छति । कामक्रो- धभयेनेह तमसाऽतचेतसः । पिशुनाश्च कृतघ्नाथ नास्तिका भिनटत्तयः । एतन्मूढा न पश्यन्ति मोक्षद्वारमपाष्टतम् । अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । ध्यानयोगस्य माहात्म्यं कलां नाईन्ति पोडशीम् ।" इति । अत एवमुक्त सर्वगुह्यतमे त्वद्धिते परमे मद्वचसि त्वं सर्वात्मना श्रधानो यथो- तमनुतिष्ठेति भावः ॥६५॥ म० टी०-तदेवाह-यन्मना इति । मयि भगवति वासुदेवे मनो यस्य स मन्मनाः भव सदा मां चिन्तय । द्वेपेण कंसशिशुपालादिरसि तथाऽत आह-मनतः प्रेम्णा मय्यनुरक्तः, मद्विपयेणानुरागेण सदा मद्विषयं मनः कुर्षिति विधीयते । वद्विपयोऽनुराग एवं केन स्यादित्यत आह-मद्याजी गां यष्टुं पूजयितुं शीलं यस्य स सदा मत्पूजापरो भव । पूजोपकरणाभावे तु मां नमस्कुरु-कायेन वाचा मनसा च प्रह्री- भवनेनाराधय । इदं चार्चनं वन्दनं चान्येपामपि भागवतधर्माणामुपलक्षणम् । तथा चोक्तं श्रीभागवते श्रवण कीर्तनं विष्णोः स्मरण पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् । इवि पुंसाऽर्पिता विष्णौ भक्तिचन्नवलक्षणा । क्रियते भगवत्यद्धा वन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥' इति । एतच भक्तिरसायने व्याख्यातं विस्तरेण । एवं सदा भागवतधर्मानुष्ठानेन मय्यनुरागोत्पत्त्या मन्मनाः सन् मां भगवन्तं वासुदेवमेव एष्यसि प्राप्स्यसि वेदान्तवाक्यजनितेन मदोधेन । त्वं चान संशयं मा कापीः, सत्यं यथार्थ वे तुभ्यं प्रविजाने-सत्यामेव प्रतिज्ञा करोम्यस्मिन्नर्थे । यतः । प्रियोऽसि मे, प्रियस्य प्रतारणा नोचितेवेति भावः । सत्यन्ते प्रारब्धकर्मणामन्ते सात मामेष्यसीति वा । अनुवादापेक्षया विश्वासदा_प्रयोजनं प्रथम व्याख्यातमेव श्रेयः। अनेन यत्पूर्वमुकं यतः प्रचिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः' इति तद्वपात्यावं मच्छब्देनेश्वरत्वप्रकटनात् ॥६५॥ शं० टी०-वक्ष्यामीति यत्प्रतिज्ञातं तमेव गुह्यतमं भागववं कर्मयोग साङ्गमुपदिशति-मन्मना इति । मद्याजी मद्यअनशीलो भव, मन्मनाः मन्येव मनो यस्य स मन्मना मच्चित्तो भव, मद्कः मामेव भजतीति मद्रको महजनो भव, मां नमस्कुरु नमस्कारमपि मह्यमेव कुरु । यद्वा मद्याजी वेदोक्तरेव स्वकर्मभिरौपा. सनायश्वमेघान्तर्मामेव परमेश्वरं यष्टुमाराधयितुं शीलमस्यास्तीवि मद्याजी भव, स्वकर्मभिर्मामेव यज मत्प्री- वये सर्वाणि कर्माणि कुर्वित्यर्थः । पुत्रादिकामनयैव परमेश्वरस्याराधनं कृतवतः परमपुरुषार्थासंभवात्कामरा- हित्येन भवितव्यमित्याशयेनाह-मन्मना इति । मयि मोक्षस्वरूप एव मनो यस्य स मन्मना मोक्षककामो भव, न तु पुत्रकामः पशुकामो राष्ट्रकामः स्वर्गकामो मल्लोककामश्च भवेत्यर्थः । स्वकर्मभिः परमेश्वरमेवारा- धयतः ऋतुप्वग्नये स्वाहेत्यन्यादिषु देवतान्तरत्वयुद्धौ सत्यां परमेश्वरभक्तिर्विच्छिद्यते, ततः सर्वत्र मझुद्धिः कर्तव्येत्याशयेनाह-मद्भक्त इति । ब्रहा नारायण: शिवध नारायणः' इति तदेवानिस्तद्रायुस्वत्सूर्यस्तदु चन्द्रमाः' इति परमेश्वरस्यैव सर्वदेवतात्मकत्वश्रवणात्सर्वदेवतात्मकं मामेकमेव भजतीति मद्भक्तो भव-बहूया- दिषु सर्वत्र मदुद्धया सर्वात्मकं मामेकमेव भजेत्यर्थः । फलेषु कामत्यागेनारन्यादिप्वीश्वरत्वयुद्धपा च रागद्वेपादिदोषा न संभवन्ति । तयाप्यहं ब्राह्मणो याजी पण्डित इत्याघभिमानलक्षणं कालुप्यं चित्तप्रससि- प्रतिवन्धकं त्वस्ति तन्निवर्तयितुमाह-मामिति । ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति' 'वासुदेवः सर्वम् इति न्यायेन देहाभिमाननिवृत्तये सर्वभूतात्मकं मां सर्वत्र नमस्कुर ने तु: केवलदारुपापाणादिरूप. मित्यर्थः । एवं साधनसंपत्त्या स्वकर्मणा मदाराधनतस्परस्त्वं मत्प्रसादाञ्चित्तशुद्धिं प्राप्य संप्राप्तामतत्त्ववि- ज्ञानः सन् मामेव त्रिविधपरिच्छेदशून्यं सचिदानन्देकरसं परं प्रोष्यसि महावं प्राप्स्यसि । सत्यं प्रवीमि नात्र संदेहः कर्तव्यः । ते तवाहमस्मिन्नर्थे प्रविज्ञाने प्रमाणं करोमि, यस्मान्मे मम त्यमुत्तमभत्त्या प्रियोऽसि, . । १२९२ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ लो०६१] वस्मात्तव महावापत्तौ संशयो नास्तीति प्रतिज्ञा करोमीत्यर्थः । श्रद्धाभक्तिभ्यां स्वकर्मभिर्मदारधनमेव कुर्वाणो निरुक्तसाधनसंपन्नो मुमुक्षुः सत्त्वशुद्धिसंभावितात्मविज्ञानेन महावं याति, नास्त्यत्र संशय इति भगवति प्रतिज्ञां कृतवति सति कस्य प्राङ्गणस्य प्रामाणिकस्य योनिधीजशुद्धिमतो विश्वासो न स्यात् ? अव आरुरुक्षोमोक्षककामस्याकामनयेश्वरप्रीत्यै कमवावश्यं कर्वव्यमिति सिद्धम् ॥ १५ ॥ श्री० टी०-तदेवाह-मन्मना इति । मन्मना भव, मचित्तो भव, ममैव भक्तो भव !मद्याजी मद्यजनशीलो भव । मामेव नमस्कुरु । एवं वर्तमानस्ल मत्प्रसादालन्धशानेन मामेवैष्यसि प्राप्स्यसि । अत्र च संशयं मा कार्पः । त्वं हि मे प्रियोऽसि, अतः सत्यं यथा भवत्येवं तुभ्यमई प्रतिजाने प्रतिज्ञा करोमि ॥१९॥ स० टी०-तदेवाह कृपासिन्धुः स्वभक्तायार्जुनाय च ॥ वासुदेवे भगवति मयि यस्य मनः स च ॥१॥ सदा मां चिन्तयात्यर्थे मनतो भव सर्वदा ॥ प्रेम्णा मध्यनुरक्तः सन्मद्विपयं मनः कुरु ॥२॥ मामेव श्रीपतिं यष्टुं शीलं यस्य तथा भव ॥ मध्येवायनुरागेण मत्पूजातत्परो भव ॥ ३ ॥ पूजोपकरणा. भावे मामेव त्वं नमस्कुरु ॥ कायेन मनसा वाचा प्रहीभावेन मां भज ॥ ४ ॥ एवं च भगवद्धर्मानुष्ठा- नेन मयीश्वरे । अनुरागोद्भवेनैव भवेद्भागवतोत्तमः ॥५॥ एवं भागवतो भूत्वा भगवन्तं स मा हरिम् ।। प्राप्स्यसि श्रुतिगीर्जन्यवोधेनात्मानमद्वयम् ॥ ६ ॥ त्वमन्न संशयं दुष्टं मा कार्मिद्वचस्यतः ॥ सत्यामेव प्रतिज्ञा ने ह्यस्मिन्नर्थे करोम्यहम् ॥ ७ ॥ यतः प्रियोऽसि मे तस्मान्न प्रियस्य प्रतारणा ॥ उचिवातोऽवि. विश्वास मदुक्तेऽर्थे सदा कुरु ।। ८ ।। यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ॥ स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥ ९ ॥ इत्यत्रोचस्य यच्छन्दप्रतिपाद्यस्य पस्तुनः ॥ मच्छब्देनात्र कथनं कवं भगवता स्वयम् ॥ १० ।। स एव भगवान् कृष्णो वासुदेवाभिधो विभुः ॥ अच्यों ध्येयस्तथा ज्ञेयः शरण्य इति निश्चितम् ॥ ११ ॥ नावः परतरं किंचिच्छ्रेयःसाधनमिष्यते ॥ समस्तेपु च वेदेषु पुराणादिषु वा स्मृतौ ॥ १२ ॥६५॥ भा० टी०-किं वदित्यपेक्षायामाह-मन्मना इति । मन्मना मयि भगवति वासुदेवे मनो यस्य स मचित्तो भय-सर्वदा मामेव चिन्तय । मद्भको मच्छ्रवणकीर्तनादिमद्भजनो भव । मद्याजी मद्यजनशीलो भव । मां नमस्कुरु नमस्कारमपि मामेव कुरु । तत्रैवं वर्तमानो मयि वासुदेवे एव समर्पितसाध्यसाधनप्रयो- जनो मामेवैष्यसि भागमिष्यसि मदभेदज्ञान प्राप्स्यसि । अस्मिन्नर्थे सत्यं ते तव प्रतिजाने सत्यां प्रतिज्ञा करोमि, यतः प्रियोऽसि मे । तथा च मम भगवत: सत्यप्रतिज्ञत्वं युवा महरवश्यंभावि मत्प्राप्तिफलत्व- मतधार्य मच्छरणैकपरायणो भवेति वाक्यार्थः ॥ १५ ॥ १० टी०-सत्किमित्याह-मन्मना इति । यदान्तदृष्टिर्भवसि तदा मन्मना अहमेव मनसि यस्यासौ मन्मना न विषयान्तरम् । चित्तभित्तौ चित्रन्यस्तमिव मां कुर्वित्यर्थः । बाह्यदृष्टी भक्तो भव नवप्रकारभक्तिः युक्तो भव । कर्मणि क्रियमाणे मद्याजी मद्यजनशीलो भव । तत्र 'कर्माङ्गदेवतास्वन्तमित्वेन स्थित मामेव नमस्कुरु । अनेनोपायेन मामेवैष्यसि प्राप्स्यसीति न प्ररोचनामात्रं, किं तु सत्यं यथा तथा प्रति- जाने प्रतिज्ञा करोमि, यतस्त्वं मद्रूपत्वान्मे प्रियोऽसि परमप्रेमास्पदमसि ॥६५॥ रा०टी०-तदाह-मन्मना यतो मे प्रियोऽसि, अतो मन्मनस्त्वादिसाधनसारचतुष्टयेन मामे- वैध्यसि प्राप्स्यसि । ते सत्यं प्रविजाने अवश्यं मत्प्राप्तिर्भवतीति प्रतिज्ञां करोमि, नात्र संदेहः कार्य इति भावः ॥६५॥ सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रजं ॥ अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ।। .
[अ०१८..] तश्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२९३ त० टी०-एवं भगवदुपदिष्टे सर्वशास्त्रगुह्यतमसिद्धान्ते सर्वात्मना स्वानपभजने श्रधानमपि धर्मविन्मन्यादिमहपिविहितयज्ञदानतपःस्वाध्यायामिहोत्रमहायज्ञाद्यनुष्ठाने कर्तव्ये यथोक्तं केवलभगव- भजनं नोपपद्यत तत्परित्यागे च विहितधर्मत्यागनन्यपापापत्तिप्रसङ्गेन भजनभङ्गः स्यात् । किंव "यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीपिणाम् । एतान्यपि तु कर्माणि सझं त्यक्त्वा फलानि च कर्तव्यानीति मे पार्थ ! निश्चितं मतमुत्तमम् । पुनः " स्खे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः" इत्येवमादिवचनैस्तेपामवश्यकर्तव्यताया भगवता स्वयमपीह विहितत्वात् कथ तत्त्यागो युज्येत ? अ- त्यागे च भगवति मनोनिवेशनपूर्वक तदैकान्त्यभजन न स्यादन्यकर्मादौ प्रत्तत्वात् । एवं च किं हेयं किमुपादेयमित्यनिश्चयात् संदेहव्याकुलचित्तमर्जुनपालोच्य श्रीभगवान्यासुदेवस्तत्संदेहमपाकुर्वन् स्वस्य निरङ्कुशेश्वरत्वं च ख्यापयन् स्वशरणागतस्य सर्वपापक्षयकर्तृत्वेन स्वमपत्तिमेव दृढयति-सर्व- धर्मानिति । सर्वान् धर्मान्यज्ञदानवपोऽग्निहोत्रदर्शपौर्णमासादीनित्यनैमित्तिकान्साधनाङ्गफलसहिता- परित्यज्य एतैरेव मे श्रेयो भविष्यतीति तेष्वादरं विहाय तदनुष्ठानं कुर्वनकुर्वन्चा तत्करणाकरणयो- गुणदोषयुद्धिमकृत्वेत्यर्थः । मामेकं शरणं बज मां निखिळहेयगन्धशून्यं भगवन्तं ज्ञानशक्तिवलैपर्यते- जोवीर्यवात्सल्यकारुण्यदयाक्षमायनन्तकल्याणगुणार्णवं सर्वनियन्तारं सर्वफलप्रदातारं सचिदानन्दमू- तिमेकमतिशयसाम्यशून्यं ब्रह्मदेन्द्रादिवन्यं सर्वमुमुक्षुपास्यं शरणं शरण्यं प्राप्यं रक्षकं च विज्ञाय म. दानुकूल्यसंकल्पाद्याचरणाध्यवसायेन कर्मदेवादिनिरपेक्षाद्भगवदनुनादेवाह कुतार्यों भविष्यामीति विश्वासपूर्वक स्वस्य स्वतन्त्रकर्तृत्वाभिमानं विहाय स्वहिताहित सर्व मदधीनं निश्चित्य प्रेममक र्पण गङ्गाप्रवाहवदनवच्छिन्नचिन्तनेन',यपयस्वेत्यर्थः । न चैवं सर्वधर्मानादरेण मम पापसंवन्धः स्या- दिति शङ्कनीयमित्याह-अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामीति । अहं. स्वतन्त्रः सर्वेश्वरः स्वभ- क्तिमार्गसंरक्षणाय स्वीयाराधनधर्मप्रवर्तनाय स्वेच्छयैव भक्तानुग्रहाय यदुकुलेऽवतीर्णः मयि भक्त्य- विशयानित्यनैमित्तिककर्मानादरकारिणं मदेकशरणं त्वा सर्वपापेभ्योऽनेकजन्मस्वकृत्यकरणकृत्याकर- गजनितानि बहुपापानि इह च प्रायश्चित्ताधकरणास्ववर्णाश्रमोचितधर्मानादरणाच बन्धुवधादिनिमि- ताच जायमानानि प्राक्तनभविष्यद्वर्तमानानि पापानि तेभ्यः सर्वेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वसामर्थ्यादेव । अतो मा शुचः प्रायश्चित्ताकरणात्स्वधर्मानादराबन्धुवधाच यानि मे पापानि तानि कथं तरिष्यामीति शोक मा कृथाः । नचैवं " न कर्मणामनारम्भानैष्वयं पुरुषोऽश्नुते । नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते । मोहालस्य परित्यागस्वामसः परिकीर्तितः" इत्यादिस्वधर्माचरणावश्यकत्वातिपादक- स्ववचनविरोध इति वाच्यं, यथोक्तभक्तिहीनानां तदधिकारयोग्यतापादनाय तेषां नियतत्वेनाही. कार्यत्वात् । " तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विधिदिपन्ति योन दानेन तपसाऽनाशकेन " इति श्रुत्या तेपा विविदिपायामेवोपयोगस्य निर्णीतत्वाव जिज्ञासोत्पादनेन तेपामुपक्षीणत्वात् । तथोक्तं श्रीभागवतैकादशे " निवृत्तं कर्म सेवेत महत्तं मत्परस्त्यजेत् । जिज्ञासायां संप्रवृत्तो नाद्रियेत् कर्मचो. दनाम् । तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्वियेत यावता । मकथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन जायते ॥ इति । अन्यथा “न वेदयताध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुङ्गः । एवंरूपः शम्य अहं नृलोके द्रष्टुं स्वदन्येन कुरुमवीर ! ॥ नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न ज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मा यथा ॥ भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ! । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ।। मकर्म- कन्मत्परमो मतः सङ्गवर्जितः । निरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ।। ” इति पारमेश्वररूपदर्शनं पति यज्ञदानादीनामकिंचित्करत्वमभिधायानन्यभक्तरेव तद्वैतत्वकधनपूर्वक स्वकर्मकर्तुनिवरस्य स्वम.. .
१२९४ श्रीमद्भगवद्गीता [म. १८ ले०६६ तस्यैव स्वमाप्त्यभिधायकवाक्पटन्दविरोधः कथं न शङ्कयते युधैः । किंच "मियते हृदयग्रन्धि- छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दष्टे परायरे ॥ यदा चर्मवदाकाशं वेष्टमिप्यन्ति मानवाः । तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तं निगच्छति " इत्यन्वयव्यतिरेकवाक्याभ्यां निःशेषदुःखक. मेसंशयनिवृत्तिहेतुत्वेन परमात्मज्ञानस्यैव हेतुत्वाभिधानात्तस्य च पूर्वोक्तानन्यभक्तरेव हेतुत्वात् । "शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विशुः नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन यमेष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैप आत्मा तृणन्ने तर्नु स्वाम् । न स शक्यः मुरैष्टुं न चान्यैरपि सत्तम । यस्य प्रसादं कुरुते स वै तं द्रष्टुमर्हति " इति श्रुतिस्मृतिभ्यां भगवत्मसादस्यैव तदर्शनहेतुत्वात् । प्रसादविपयोऽपि तदनन्यभक्त एव । " नास्य भक्तात्मियतरो लोक कथन विद्यते । अहं भक्तपरा- धीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ! ।। साधुभिस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रियः । नाहमात्मानमाशासे मद्भक्तः साधुभिविना ॥ श्रियमात्यन्तिकी ब्रह्मन् येषां गतिरहं परा । न मे प्रियश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपः प्रियः ॥ तस्मै देयं ततो ग्रावं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥ इति महाभारतश्रीभागवतरेवाखण्डादिपूक्त- भगवद्वचनेभ्यः । तथा धर्मविदग्रसरेण याज्ञवल्क्येनाप्युक्तम् " इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्म णाम् । अयं तु परमो धर्मो यद्योगनात्मदर्शनम्" इत्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणादिवाक्यैर्भगवदनन्यभक्तिरेख परमो धर्म इति सिद्धम् । तस्माद्यथोक्तभक्तिहीनो मत्मपत्तिशून्यः यथेष्टाचारेण स्ववर्णाश्रमोचिवधर्म- स्यागी मदाताविरुद्धाचरणात् पतितः स्यात्। नतु मदनन्यशरणो मद्भक्त्यावशायज्ञादिकर्म कुर्वन्नुपेक्षको वा कदाऽपि (न) कथमपि पुरुषार्थदश्यते मदनुग्रहांत् । तथा मोक्षधर्मे 'नारायणीयाख्याने भगवदनन्य- शरणस्य प्रपत्त्यैव सर्वपापक्षयपूर्वक सर्वपुरुषार्थावाप्तिरभिहिता । तथाहि " अनेनैव प्रपनस्य भगवन्तं सनातनम् । तस्यानुवन्धाः प्राप्मानः सर्वे नश्यन्ति तत्क्षणात् ।। कृतान्यनेन सर्वाणि तपासि तपतां वर । सर्वतीर्थाः सर्वयज्ञाः संदानानि तत्क्षणात् ।। कृतान्यनेन मोतच तस्य हस्ते न संशयः। ययेन कामकामेन संसाध्यं साधनान्तरः ।। मुमुक्षुणा यत्सांख्येन योगेनापि च भक्तितः । प्राप्यते परम धाम यतो नावर्तते यतिः । तेन तेनाप्यते तत्तन्न्यासेनैव महामुने । परमात्मा च तेनैव साध्यते पुरुषोत्तमः । या वै साधनसंपचिः पुरुषार्थचतुष्टपे । तया विना तदामोति नरो नारायणाश्रयः इति पुण्डरीकाख्याने च " अश्वमेधशतैरिष्वा वाजपेयशतैरपि । नामुवन्ति च मुगति नारायणपराङ्मु- खाः । ये नृशंसा दुरात्मानः पापाचाररतास्वथा । तेऽपि यान्ति परं धाम नारायणपदाश्रयाः " इत्य- न्वयव्यतिरेकाभ्यां भगवदनन्यशरणानामेव परमपदमाप्त्यभिधानं, नतु केवलयज्ञादिकर्मिष्ठानामिति निर्णीतम् । अत्र नृशंसत्वादिविशेपणानि प्रपत्तिपूर्वकालानीति योध्यम् । तथोक्तं सात्वततन्त्रे " दुरा- चारोऽपि सर्वाशीः कृतघ्नो नास्तिकः पुरा । समाश्रयेदादिदेवं श्रद्धया शरणं हि यः । निर्दोपं विद्धि तं जन्तुं प्रभावात्परमात्मनः" इति । अपिशब्देन यद्येवविधा दुराचारिणोऽपि भगवन्तं प्रपद्य सर्व- दोपनिरासेन परं धाम प्राप्नुवन्ति चेत्तहिं सदाचारनिष्ठा ज्ञानवैराग्ययुक्ता भगवदनन्यशरणास्तदारा- नेतरकोपेक्षकास्तत्पद माप्नुयुरिति किमु वक्तव्यमिति कैमुत्यं दर्शितमित्यलं विस्तरेण ॥ ६६ ॥ : म. टी०-अधुना तु ईश्वर सर्वभूताना हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । तमेव सर्वभावेन शरण गच्छ इति यदुक्त पद्विवृणोति-सर्वेति । केचिद्वर्णधर्मा केचिदाश्रमत्रर्मा, केचित्सामान्यधर्मा इत्येवं सर्वानपि धर्मान् परित्यज्य विद्यमानानविद्यमानाम्वा शरणस्नानादृत्य मामीश्वरमेकमद्वितीयं सर्वधर्माणामधिष्ठातार फलदातार च शरणं प्रज, धर्मा सन्तु न सन्तु वा किं तैरन्यसापेक्षः भगवदनुग्रहादेव त्वन्यनिरपेक्षादहं कृतार्यो भवि. यामीति निश्चयेन परमानन्दघनमूर्तिमनन्त श्रीवासुदेवमेव भगवन्तमनुक्षणभावनया भजस्व, इदमेव " [अ० १८ लो. ६१] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता १२९५ परमं तत्त्वं नातोऽधिकमस्तीति विचारपूर्वकेण प्रेमप्रकर्षेण सर्वानामचिन्ताशून्यया मनोवृत्त्या वैलधारा. वदविच्छिन्नया सततं चिन्तयेत्यर्थः । अत्र मामेकं शरणं प्रजेत्यनेनेन सर्वधर्मशरणतापरित्यागे लब्धे सर्व- धर्मान् परित्यज्येति निषेधानुवादस्तु तत्कार्यकारितालाभाय यज्ञायज्ञीये सान्नि ऐरं कृत्वोद्नेयम् । इत्यत्र 'म गिरा गिरेति यात्' इतिवत् । तथाच ममैव सर्वधर्मकार्यकारित्वान्मदेकदारणस्य नास्ति धर्मापेक्षेत्यर्थः । एतेनेदमपास्तं सर्वधर्मान् परित्यज्येत्युक्ते नाधर्माणां परित्यागो लभ्यते, अतो धर्मपदं कर्ममात्रपरमिति । नक्षत्र कर्मत्यागो विधीयते अपि तु विद्यमानेऽपि कर्मणि तत्रानादरेण भगवदेफशरणतामात्र ब्रह्मचारि- गृहस्थवानप्रस्यभिषणां साधारण्येन विधीयते । तत्र सर्वधर्मान् परित्यज्येति तेषां स्वधर्मादरसंभवेन तन्नि- वारणार्थम्। अधर्म चानर्थफले कस्याप्यादराभावात्तत्परित्यागवचनमनर्थकमेव शास्त्रान्तरप्राप्तत्वाच । तस्मा- द्वर्णाश्रमधर्माणामभ्युदयहेतुत्वप्रसिद्धर्मोक्षहेतुत्वमपि स्यादिति शङ्कानिराफरणार्थमेवैतद्वच इति न्याय्यम् । नच सर्वधर्माधर्मपरित्यागोऽन विधीयते, संन्यासशास्त्रेण प्रतिपेधशास्त्रेण च लब्धत्वादेव । न चेदमपि संन्यासशास्त्रं, भगवदेकशरणवाया विधिस्तितत्त्वात् । तस्मात्सर्वधर्मान परित्यज्येत्यनुवाद एव । सर्वेषां तु शास्त्राणां परमं रहस्यमीश्वरशरणनैवेति । तत्रैव शास्त्रपरिसमाप्तिभंगवता कृता, तामन्तरेण संन्यासस्यापि स्वफलापर्यवसायिस्वात्, अर्जुनं च क्षत्रिय संन्यासानधिकारिणं प्रति संन्यासोपदेशायोगात् । अर्जुनव्याजे- नान्यस्योपदेशे तु-वक्ष्यामि ते हितं त्वा मोक्षयिष्यामि सर्वपापेभ्यस्त्वं माशुच इति चोपक्रमोपसंहारी न स्याताम् , तस्मात्संन्यासधर्मप्वप्यनादरेण भगवदेकशरणतामाने तात्पर्य भगवतः। यस्मात्त्वं मदेकशरणः सर्व- धर्मानादरेण अतोऽहं सर्वधर्मकार्यकारि वा स्वां सर्वपापेभ्यो वन्धुवधादिनिमित्तेभ्यः संसारहेतुभ्यो मोक्ष. यिष्यामि प्रायश्चित्तं विनैव 'धर्मेण पापमुपनुदति' इति श्रुतेधर्मस्थानीयत्वाच मम । अतो मा शुचः युद्धे प्रवृत्तस्य मम वन्धुवधादिनिमित्तमत्यवायात् कथं निस्तारः स्यादिति शोकं मा कार्षीः । भाष्यकारनिर- स्तानि दुर्मतानीह विस्तरात् । अन्यव्याख्यानमात्रार्थी न तदर्थमहं यते ॥ तस्यैवाई ममैवासौ स एवाह- मिति त्रिधा । भगवच्छरणत्वं स्यात्साधनाभ्यासपाकतः ।। विशेपो वर्णितोऽस्माभिः सर्वो भक्तिरसायने । प्रन्यविस्तरभीरुत्वादिड्मात्रमिह कथ्यते ॥ तत्राद्यं मृदु यथा-'सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाई न मामिकी- नस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः कवन समुद्रो न तारङ्गः ॥ द्विवीयं मध्यं यथा-'हस्तमुक्षिप्य यातोऽसि बलात् कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयाद्यदि निर्यासि पौरुपं गणयामि ते ॥ तृतीयमवधिमानं यथा-'सकल. मिदमहं च वासुदेवः परमपुमान् परमेश्वरः स एकः । इति मतिरचला भवत्यनन्ते हृहयगते न वान् विहाय दूरात् ॥” इति दूतं प्रति यमवचनम् । अन्यरीपग्रहाद्गोपीप्रभृतयश्चास्या भूमिकायामुदाहर्तव्या: अस्मिन् हि गीताशाखे निधात्रयं साध्यसाधनभावापन्नं विवक्षितमुक्तं च बहुधा । तत्र कर्मनिष्ठा सर्वकर्म- संन्यासपर्यन्तोपसंहृता 'स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानव.' इत्यत्र । संन्यासपूर्वकश्रवणादिपरि- पाकसहिता ज्ञाननिष्टोपसंहृता तितो मां तत्त्वत्तो ज्ञात्वा विशते तदन्तरम्' इत्यत्र । भगवकिनिष्ठा सूभय- साधनभूतोभयफलभूता च भवतीत्यन्त उपसंहृता 'सर्वधर्मान परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' इत्यत्र । भाग्य- कृवस्तु सर्वधर्मान्परित्यज्येति सर्वकर्मसंन्यासानुवादेन मामेकं शरणं प्रति ज्ञाननिष्ठोपसंहवेत्याः । भय. वभिप्रायवर्णने के वयं वराकाः? वचो यद्गीताख्यं परमपुरुपस्यागमगिरां रहस्यं तद्वयाख्यामनविनिपुणः को वितनुताम् । अहं त्वेतद्वाल्यं यदिइ कृतवानस्मि कथमप्यहेतु नेहानां वदपि कुतृकायैव महताम् ॥१६॥ शं० टी०-एवमारुरुक्षोक्षिार्थमीश्वरैकशरणत्वेन फर्तव्यः कर्मयोग एवेति निर्धार्य त्वारूढस्याविभूता.. स्मविज्ञानस्याप्रतिवद्धत्वसिद्धये सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकं ज्ञाननिष्ठैव कर्तव्येति निर्धारयितुमाह-सर्वधर्मानिति । नन्यस्य वचनस्य कर्गप्रकरणान्त पातित्वाकर्मिपरत्वमेव, न त्वर्मिपरत्तमिति चेन्न। सर्वधनिवि सर्वकर्म- । - . २९ १२९६ श्रीगनगवद्गीता [अ० १८० १६] संन्यामवणानदारुक्षेमुगुनोगृहिणः मर्वकर्मसंन्यास उपयुग्यवे ये वेवदम्यसूयन्तो नानुनिन्ति मे मवम् । सज्ञानाधिमुढांतामिद नष्टानचेतसः पति, 'सर्वकर्मयहि तर इति विहीनः पवत्येव खालम्बरहि- तान्धवत् । इति स्मरणात्सर्वकर्मपरित्यागे दुर्वाक्षगत्यपतितत्यादिदोपापत्तेः। ननु मामेकं शरणं प्रगतीश्वरभ. जनात्मकस्य कर्मणो विहितस्यात्यकत्वादुफदोषा न संभयन्तीति चेन। सफणा वमभ्ययति स्मरणानाम- कीर्यादिलक्षणस्य फर्मणः श्रुतिस्मुसविदितत्याधर्ममानुपपपिहितत्यागाविहिवकरणदोषौ च प्रसन्येयातां, श्रेयास्वधर्मो विगुण इति विगुणस्यापि स्वधर्मस्य श्रेष्ठत्वस्मरणात् । 'नियतं गुरु कर्म स्वं कर्मपायो फर्मणः' इति, कर्मण्येवाधिकारस्त इति, न कर्मणामनारम्भादिति, नहि संन्यसारादेव सिविं समधिगतीधि, उस्माद- सकः सततं कार्य कर्म समाचारति, मकन्मत्परम इनि, यमदानवपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तदिति, उपनयनं वेदाध्ययनं फलन्ति च फर्माणोति, दारं त्वामीनाधाय फर्माण्यारमन्त इति पाणिप्रहगादिगणं परिचरेत्, इति, उदिते सूर्य प्रावर्जुहोति, यावत्रीपनिमहोने जुहोतीत्यादि श्रुतिस्मृतिकोदिभिर्मालगाविस- स्थैव फर्मणः स्वधर्मत्वेन कस्यत्वविधानात् । ननु सर्वधर्मान परित्यज्यत्यत्र लभगया सफफरत्याग एवोच्यते, न तु कर्मपरित्यागस्ततः कर्मप्रकरणाजयोनास्य चयनस्येति चेन्न, संपन्धानुपपत्तिभ्यां मोति. न्यायेनाऽनार्थानुपपत्त्यभावाहक्षणाऽप्रसके । मुख्यस्य गत्यन्तरामाये सलु लक्षणा, गत्यन्तराभावाभावाड क्षणा नाम प्रसज्यते । कथं गत्यन्वरमिवि घेदुच्यने 'लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोका मयानघ । ज्ञान- योगेन साख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् । इति योगिनामारुरुक्षूगां फर्मिणां कर्मयोगेन निष्ठा, सारूपानामारू ढानां संन्यासिना मानिदां ज्ञानयोगेन निष्ठेति निष्ठाद्वयमुपक्रम्य नियदे कुछ कर्मत्वमिति कर्मयोगमारम्य प्रविजाने प्रियोऽसि मे इत्यन्तेन पन्नारुरुक्षोनियमेन कर्तव्यवया . फर्मयोग साट्न सफलं प निर्धायर्याय साख्याना प्राविदा सर्वकर्मसंन्यासिनामारूढानां यस्त्वात्मरविर स्यादित्यारम्य सर्वकर्माणि मनसेवि, योगारूढस्य तस्यैवेति, योगी युजीव सततमात्मानं रहसि स्थित इति, ध्यानयोगपरो नित्यमिति, प्रमभूयाय कल्पत इति, दतो मा तत्ववो ज्ञाना विशवे वदनन्तरमित्यन्तेन मन्येन सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक नियमेन फर्तव्य तया ज्ञाननिष्ठा सफला निर्धार्यान्त तामेव निष्ठामुलक्षणां साट्न सफलामुपसंहरति-सर्वधर्मति । यवस्ततो नास्य वचनस्य फर्मप्रकरणान्त:पावित्वं कर्मिपरत्वं च सिम्यवि । नन्वादस्यापि यः सर्वकर्म- संन्यासो न युक्तः, किं तु यत्किचित् स्मातेन कर्मणा भवितव्यमेवेति न शनीय, तृतीयाध्याये श्रीभाष्य- वृदिरेवपा शङ्का परिहवा तनं द्रष्टव्या, मन्थविस्तरभयान्नान मीमास्यते। जन्मान्तरानेकशतेषु श्रद्धाभक्तिभ्यां समनुष्ठितरीश्वरप्रसादकप्रयोजनैः श्रौतस्मातकर्मभिनि.शेपनिबूवाशेपपापौघतया विशुद्धान्त:करणरत्वं सभ्य- विज्ञानात्मरूपो भूत्वोत्पन्नज्ञानस्याप्रतिवद्धत्वसिद्धये ज्ञाननिष्ठयं कर्तुकाम: सन्नादौ प्रयोजनरहिवानसद्धिपया- निष्ठाप्रतिबन्धकत्वेन दुष्प्राश्च सर्वधर्मान् सर्वे च वे धर्माश्च तान् श्रौतानि स्मातानि च सर्वाण्यपि च कर्माणि सरधनानि परित्यज्य । ननु कर्मणा शाखोकानामसद्विपयत्वमप्रयोजनवत्त्वं चानुपपन्नं "ब्राह्मणा विविदिपन्ति यशेन दानेन" इति यज्ञदानादीना फलवचा अवणात् । स्वकर्मणा तमभ्ययेति कर्मणामीश्वरा- राधनात्मकत्वादस्त्येव सतिपयत्वं फलस्वं चेवि चेत्सत्यमरत्येव कर्मणामीश्वराराधनात्मकत्वं चिचशुद्धषेक- प्रयोजनवं च । तथापि तदज्ञविपयं कर्तृत्वादिकारकभेदबुद्धिनिबन्धनवान्नात्मकस्वदर्शिनो विदुषः कर्मोपयु. ज्यते । ज्ञानकर्मणोः परस्परविरोधिनो: सहभावायोगाचित्तशुद्धि तकलं ज्ञानं च प्राप्तवतरत: प्रयोजनमप- श्यतो ब्रह्मविदस्त परित्यागो युक्त एव भवति "सत्यान्ते सुखदु.खे वेदानिम लोकममुं च परित्यग्यात्मानम. 'विच्छेत् इति, "स्वाध्यायं च सर्वकर्माणि संन्यस्य” इति विदुषः सर्वकर्मपरित्यागश्रवणात् । ननु कर्म- गेश्वरः प्रीयते, तत्पीत्यै कर्भ कर्वव्यमेवेति चेन्न प्रहानिष्ठया परमेश्वरस्य ततोऽधिकतरप्रीत्युत्पत्ते"जीवेशा.
। [अ० १८ ०६१] तत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता वाभासेन करोति" इति श्रवणान्ममामासिक मायिकमसत्यस्वरूपं परित्यज्य माया तत्कार्यसेवन्धरहित नित्यं निरन्तरं निराभासं निष्फलं निष्क्रिय शान्तमन्वमनाद्यन्वं सचिदानन्देकरसं प्रमाणान्तराबाध्य परिपू. र्णमद्वैवं परं ब्रह्म मामेकमेवायमुपास्त इति यथार्थदर्शिनि सत्यवादिनि सत्यनिप्छे ब्रह्मविदि परमेश्वरस्याधिकत्त- प्रीतिसंभवान्मम वैभवमयं निर्वहतीति यथा राज्ञः शूरतमे तद्वत् । 'प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमई सघ मम प्रियः' इत्युक्तत्वात् प्राविदि परमा प्रीतिः परमेश्वरस्य युक्ता, पितुः पुत्रादौ गुणाधिक्ये प्रीत्याधिक्यं दृश्यते तद्वत् । ततः सिद्धं परमेश्वरस्य निर्गुणं नित्यममायिक स्वरूप प्राप्तुमिन् उया श्रवणमनननिदिध्यासनादावेव श्रद्धया नियमेन प्रवृत्तेषु सत्यनिष्ठेषु सत्सु मुमुक्षुपु परमा प्रीतिरिति । ननु सर्वधर्मान् परित्यज्येति धर्मः स्यैव परित्यागो विधीयते, न स्वधर्मस्यातस्तत्र प्रवृत्तिः प्रसज्जत एवेति चेन्न। 'न कलवं भक्षयेत् । इति पूर्वमेव परित्यक्त्तस्य कलसमक्षणादेरधर्मस्योचरफाले प्रसक्त्यसंभवाद्ब्रह्मचर्य एव परित्यकरय पर्युपिता- नभोजनस्य गाईरध्ये यथा प्रचिर्न प्रसज्यते तद्वत्तथापि त्यजधर्ममधर्म चेति, न तेषां धर्माधर्माविति वचनात्सर्वधर्मपदेनाधर्मोऽपि गृह्यते, तो धर्ममधमै च परित्यज । यद्यपि अर्जुनस्य संन्यासोऽनुपयुक्तस्त- थापि मुमुखं ब्राह्मणं विषयीकृत्योच्यते सर्वधर्मान्परित्यज्येवि ज्ञानकर्मणोस्वमस्तेजसोरिव परस्परप्रति- योगित्वेनकाश्रयत्वानुपपत्ति निर्धार्य भगवता । ततः सर्वधर्मान्परित्यज्य विधिना संन्यस्य मामेकम् "अय- मात्मा ब्रह्म । तत्त्वमसि" इत्यादिश्रुतिभिह्मात्मनोरेकत्वप्रतिपादनात् " अस्थूलमनवस्वम्" इति, "सर्व होतद्ब्रह्म " इत्यादिश्रुतिभिरारोपितस्य जगतोऽपवादपूर्वकं सर्वस्य ब्रह्ममानत्वनिरूपणात् "एकमेवाद्विवीयं प्रा । एक एव हि भूतात्मा । एक पर रुद्रो न द्वितीयाय तस्थु." इत्यादिश्रुतिभिहाण एकत्वावधा- रणादेकं सजातीयविजातीयस्वगनभेदरहितं नित्यशुद्धयुद्धमुक्तस्वभावमपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमखण्डं विदे- करसमद्वितीयं मा परं ब्रह्म शरणं जा सर्वमिदमहं च प्रवेति प्रत्यग्दृष्टयाऽनुसंधेहि । साधकस्यैवाभ्यास- दशाया 'बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च । शब्दावीन्विपयोस्त्यक्त्वा' इत्यादिदेशकाल. टिस्थापनादिनियमः, न तु सर्वमिदमहं च नौवेति प्रत्यग्दृष्टया स्वं च स चारोपिचनामरूपाद्यमहणपू- 4 ब्रह्मेव पश्यतो ब्रह्मवित्तमस्यानो गच्छन् तिष्ठन्नपविशन् शयानो वान्यथा वा स्थितः सन् सर्वदा सर्वत्र मामेकमेव परं ब्रह्मानुसंधेहि । एवं दृष्टं स्पृष्टं श्रुवं मतं विज्ञातं च सर्व सर्वदा मलेव पश्यन्तं त्वामाई परमात्मा स्वात्मत्वेन सम्पग्विज्ञातश्चक्षुपो लपववृत्तेवहिरन्तश्च सर्वतोपलभ्यमानः सन् सर्वपापेम्य:- अत्र पापशब्देन पुण्यपापारमकानि कर्माणि गृह्यन्ते, वेभ्यः पापेभ्यः पापकार्येभ्यो जन्मजरामृत्युवन्भेभ्यो मोक्षयिष्यामि जन्मादिवन्धनिर्मुक्तं करिष्यामीत्यर्थः । यद्वा पापानि कर्माणि, पापपदेन तत्कारणभूताश्चा. विद्याकामाय गृह्यन्। सर्वेभ्यः पापेभ्योऽविद्याकामकर्मभ्यः संवतजराजन्ममृत्युदुःखप्रवाहहेतुभ्यः सन्यमो- चयिष्यामि-नित्यः कूटस्थोऽसङ्गचि प: परिपूर्ण एवाहमिति नित्यकूटस्थासङ्गचिन्मात्रस्वरूपस्य स्वात्मनो याथात्म्यप्रकाशनेनारोपितदेहेन्द्रियादिसर्वदृश्यतद्धर्मतस्कर्मतवस्थासंवन्धरहिवमेवात्मानमाकाशवदसङ्गमवि- क्रियं परिपूर्णमेकरसमेव सदा सर्वत्र प्राहयित्वा, सर्वत्र स्वमात्रग्रहणेनाविद्या वासनात्मिका कामाच कर्मा- ज्यपि सर्वाणि निर्मूल्य, विपरीवभाव निःशेष विवस्य, पूर्णश्चिदानन्द एक पवाहमस्मीति वृश्चिमप्रतिपद्धां. कारयित्वा, सर्वदा मुक्तोऽहमिति मुक्तमेवात्मानं भावयिष्यामि । एवमात्मानमविद्यावत्कार्यवन्धनिर्मुकं निर्वि. शेपमझात्मना स्थित साक्षादपरोक्षीकत्य जीवन्नेव मुक्तत्व मा शुचः । नत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुप- श्यतः" इति स्वात्मकत्वं पश्यतो विदुषः शेफाभावश्रवणात्सर्वमात्मानमेव पश्यम्मुक्तस्त्वं, शोकं मा कार्षीः! स्वातिरिक्तमनर्थकारणमर्थान्तरं पश्यत एव मूढतमस्य शोको नत्वहमेवेदं सर्वमिति स्वमेव सर्व पश्यतो विदुषः शोककारणं संभवति, सदभावात्वं मा शुच इत्यर्थः। यदा अशोच्यानन्वशोचस्पमित्युपक्रान्तं शोका..
१२९८
श्रीमद्भगवद्गीता
[म. १८०९६]
पनोदनमुपसंहरवि भगवान्मा शुचस्वमिति । अद्वैतं पश्यतधात्मनोऽर्तृत्वं च पश्यतस्तव शोको न युक्त
इत्युपकान्तशोकापनोदनमेवानूयते, न तु विदुषः शोक संभाव्य तस्यापनोदः क्रियते तत्र को मोहः का
शोकः' इत्यादिश्रुतिविरोधप्रसङ्गात् 'न शोचति न काहति' इत्युक्तस्ववचनव्याघातप्रसनाधोपसंहारार्थकमेवदं
वचनमिति युक्तम् । एवं निर्विशेषमेव परं नझ स्वात्मना समधिगतमनुसंदधतो विदुपस्तदनुसंधानफलं सम्य-
ज्ञानं तत्फलं विदेहकैवल्यं च 'ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्' इति पूर्वमेव निरूपितं, न पुनरत्र निरूपितव्यं
भवति, यस्माज्ञानकर्मणोः साध्यसाधनभाव एवात्र सम्यशिरूपितः सर्वज्ञेनेश्वरेण, वस्मादिसद्ध कर्मकाण्डस्य
अझकाण्डस्य च मोक्षकारणत्वम् ।। ६६ ॥
थी०टी०-ततोऽपि गुह्यतममाह-सर्वति । मनचयैव सर्व भविष्यतीति दृढविश्वासेन विधिकलय
त्यक्त्वा मदेकशरणो भव । एवं वर्तमानः कर्मत्यागनिमित्तं पापं स्यादिति मा शुचः, शोफ मा कापीः ।
यतस्त्वा त्वां मदेकशरणं सर्वपापेभ्योऽहं मोचयिष्यामि ॥ ११ ॥
स० टी०-पूर्वोक्तभक्तियोगस्य प्रारम्भस्य विरोधिनः॥पापाख्यप्रतिवन्धाये ऽनेकजन्मार्जिता मला॥१॥
तद्विनिर्मुकपुंसः स्यादतियोगेऽधिकारिता ॥ आनन्त्याधैव पापानां भक्त्यारम्भविरोधिनाम् ॥ २ ॥ तना.
यश्चित्तरूपेस्तु धनानाविधैरपि ॥ अल्पकालवेस्पां पापानां दुस्तरत्वतः ॥ ३ ॥ इत्येवमात्मनो
भक्तियोगारम्भेऽप्ययोग्यताम् ॥ आलोच्य शोचतो जिष्णोः शोक चापनुदन्हरिः ॥ ४ ॥ आहानुप-
हवात्सल्यवारिधिः पार्थसारथिः ॥ सर्वधर्मान् श्रुतिप्रोक्तप्रायश्चित्तात्मकान्यहून् ॥ ५॥ कृच्छ्रचान्द्रायणेष्ट्या-
दोस्वचत्पापानुरूपिणः ॥ नानाविधांस्त्वया धर्मानस्वल्पकालानुयायिनः ॥ ६ ॥ दुरनुष्ठानरूपांश्च परि-
त्यज्यत्र सर्वशः ॥ निविभक्तियोगस्य सम्यगारम्भसिद्धये ॥ ७॥ माभेकमीश्वरं सर्वासाधारणगुणान-
यम् ॥ शरण्यं करुणासिन्धुं शरणागतवत्सलम् ॥ ८॥ तवारमीति धिया शुद्धपा प्रपद्यस्व सुखा-
स्पदम् ।। शरणं हे हरे कृष्ण मां गृहाण स्वसेवकम् ॥ ९॥ अनन्य शरणत्वान्मे त्वमेव शरणं भव ।।
इत्येवमनुसंधाय सर्व कृत्यं विहाय माम् ॥ १० ॥ आश्रयस्व ततोऽहं त्वा पापेभ्योऽत्यन्तशोकिनम् ।।
भक्त्याऽऽरम्भविरोधिभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।। ११ ॥ सकलमपि विहाय भ्रान्तिजालं अमा-
दयं ब्रज हरिशरणं श्रीब्रह्मविद्याविहेतुम् ॥ भजनमपि हरेः श्रीकृष्णचन्द्रप्रसादात्स्वयमिह सुजनस्य
प्रेमयुक्तं सुसिद्धषेत् ॥ १२ ॥ यदा लोकद्वयस्याह तात्पर्य भगवान्हरिः ॥ ईश्वरः सर्वभूताना
हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ॥१३॥ तमेव शरणं गच्छेत्येवं प्रागीरितस्य न ॥ धर्माः केचन वर्णानां केचिदाश्रमवा-
सिनाम् ॥ १४ ॥ केचित्सामान्यधर्माश्च वेदस्मृतिगिरेरिताः ॥ विद्यमानांश्च तान्धर्मान्समस्तान्सफलानपि
॥१५॥ अविद्यमानान्वा शास्त्रविहितानपि सर्वशः ॥ संसारेऽस्मिन् हि ये पूर्व शरणत्वेन संमताः ॥१६॥
आसंस्तांस्त्वमनाइत्य मामीश्वरमजं विभुम् ॥ आनन्दं सर्वधर्माणामधिष्ठातारमक्षरम् ॥१७॥ धर्माणां फलदा-
तारमुदारं शरणं बज ॥ धर्माः सन्तु न वा सन्तु किमतः परतन्त्रकैः ॥ १८॥ भगवद्वासुदेवस्यानु महादेव
सर्वथा ॥ कृतार्थोऽहं भविष्यामीत्येवं निश्चित्य चेतसा ॥१९॥ वासुदेवमनन्तं श्रीपरमानन्दविग्रहम् ।। करु.
शासागरं सर्पकल्याणगुणसंश्रयम् ॥ २० ॥ कृतज्ञं दीनबन्धुं मां भगवन्तमनुक्षणम् ।। भक्तिभावनया सारं
भजस्व सततं हरिम् ॥ २१ ॥ इदमेव परं सत्त्वं नातोऽधिकमिति स्वयम् ॥ विचारपूर्वकेणैवं प्रेमाधिक्येन
सर्वथा ॥ २२ ॥ चिन्तय त्वं मनोवृत्त्या संत्यक्तानात्मचिन्वया ॥ तेलधाराषदच्छिन्नरूपयाऽत्यन्तशु-
द्वया ॥ २३ ॥ मदेकशरणस्यास्य नास्ति धर्माद्यपेक्षणम् ॥ सर्वेषामपि शास्त्राणां रहस्यं परमं विदम् ।।
॥ २४ ॥ यदीशशरणत्वं स्यात्पुण्यसंवतिहेतुकम् ॥ भत्रैव गीताशास्त्रस्य समाप्तिहरिणा कृता ।। १५ ॥
भगवच्छरणत्वेन विना सर्वस्य फर्मण; ॥ 'संन्यासस्य फले नास्ति स्वत: पर्यवसाथिता ॥ २६ ॥
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भ०१८ लो० १६] वत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपैदा
मदेकशरणो । यस्मात्त्वं धर्मानप्युपेक्ष्य तान् ॥ मशिन्तनपरो नित्यं विष्टस्यनत्यमानसः ॥ २७ ॥
अवो. सर्वधर्माणां कार्यकारितयेश्वरः ॥ संसारानहेतुभ्यः सर्वपापेभ्य' एव च ॥ २८ ॥ पन्धुहि-
सादिजन्येभ्यो मोक्षयिष्यामि मा सुचः ॥ मम युद्ध प्रवृचस्व स्वकुलाचार्यघातिनः ॥ २९ ॥ नि.
स्तारोऽतः कथं मे स्यान्मा कारिति शोचनम् ॥ प्रायश्चित्तं विनवाहं धर्मस्थानीय ईश्वरः ॥३०॥
पापान्धवमसरत्वां वे मोक्षयिष्यामि भास्करः ॥ संदेहो नात्र कर्तव्यो मानमोलौ पचस्यवः ॥ ३१ ॥
निगमविहितधर्मोस्तद्विरुद्धानधर्माननिमतिभयमुलांस्तनभोगानुपेक्ष्य ॥ भवमृतिभयसिंधौ पोतभूतं शरण्यं
हरिपदमकरन्दं वित्तमित्राश्रयस्व गा ३२ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यत्र भाष्यकृतां मतम् ॥ सम-
स्तकर्मसंन्यासानुवादेनैव युक्तिभिः ॥ १३ ॥ मामेकं शरणं चेवि ज्ञाननिष्टोपसंहृता ॥ श्रीम-
अगववेत्येवं संमतं साधुसंमतम् ॥ ३४ ॥ अन्नायनाशयो भाति श्रीमहाध्यकृतां सताम् ।
गीतासु सर्वदाथै संगृह्य करुणानिधिः ॥ ३५ ॥ प्रोक्तवाञ्छ्रीरमानाथो बोधसौकर्यसिद्धये ॥ उक्त-
मष्टादशाध्यायरुपसंहृतवान्मतम् ॥ ३६ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यत्र लोके रमापतिः ॥ ज्ञाननिष्ठा
[पक्रान्वा मुख्यागमविदा मता ॥ ३७ ॥ तत्राधिकारसिद्धयर्थ कर्मनिष्ठेरिता परा ॥ तयाऽधिकारे सिद्धे-
ऽपि भगवतिरुत्तमा ॥ ३८ ॥ अन्तरङ्गत्या प्रोता तृतीया ज्ञानसाधनम् ।। यस्य देवे परा भक्ति-
यथा देवे तथा गुरौ ॥ ३९॥ तस्यैते कथिता यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः ॥ इति ब्रह्मक्यजिज्ञासोक्तिः
स्यात्सायनं परम् ॥ ४० ॥ प्रधानानुगुणं न्याय्यमित्यतोऽन्ते हरिः स्वयम् ॥ उपसंहृतवान्ज्ञाननिष्ठामेव
ससाधनाम् ॥ ४१ ॥ तत्रापि प्रथमे पादे सर्वधर्मपदेन च ॥ धर्माधमद्वयं प्रोक्तं त्याज्यत्वेनात्र संमतम् ।।
॥ ४२ ॥ तेनोपसंहृतः कर्मसंन्यासो ज्ञानसाधनम् ॥ चिन्शुद्धि विना नासौ सा न कर्म विना भवेत् ।।
॥ ४३ ॥ वेनौपसंहृता कनिष्टाति सफला परा ॥ पादे द्वितीये भगवत्तत्वधीरुपसंहता ॥४४॥
भगवतिसहिता पुरुषार्थकजन्मभूः॥ उत्तरार्धेन मुख्याया निष्ठायाः फलमीरितम् ॥ ४५ ॥ अवि.
द्यायाः सकार्याया निवृत्तिश्चेत्यतो हरिः ।। प्रतिश्रुत्य जगादेमं लोकं गुह्यतमं परम् ।। ४६ ॥ इत्येवं
गूढतात्पर्यमविदित्वाऽन्यथाऽन्यथा ॥ कल्पयित्वा मतं स्वीयं दृपणोद्धाटनं कृतम् ।। ४७ ॥ कैश्विद्यतन
साधूक्तमित्यलं बहुनाऽधुना ।। तत्त्वज्ञानकसूर्याणां श्रीमनाप्यतां पुरः ॥ ४८ ॥ अस्मदादिजनः स्वल्पः
स सद्योतायते न किम् ॥ अन्ये त्वेवं व्यवस्था च प्राहुरोपसंहृतो ॥ ४२ ॥ साध्यसाधनमावेन
गीताशास्त्रे विवक्षितम् ॥ निष्ठात्रयं भगववाध्यायेऽस्मिन्नुपसंहृतम् ॥६० ॥ तन संन्यासपर्यन्ता
कनिष्ठोपसंहृता ॥ स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥ ११॥ इत्यत्र सफला सांगा
श्रीमद्भगवता स्वयम् ॥ संन्यासपूर्ववेदान्त श्रवणादिनिरन्तरा ॥ ५२ ॥ सफला च सझोपायनिनि-
टोपसंहृता ॥ ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशवेऽत्रेति विष्णुना ।। १३ ॥ भगवद्भक्तिनिष्ठा तु मेढीभूता
द्वयोरपि ॥ सैवान्ते वासुदेवेन सम्यगेवोपसंहृता ॥ १४ ॥ सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यत्रैवात्यन्वपावनी ॥
यस्य देवे पराभक्तिरितिश्रुसा हरेविभोः ॥ १५ ॥ परा भफिः परब्रह्मज्ञाने मुरयतयेरिता ॥
'सर्वोपायन भगवान शरण्यो भक्तवत्सलः ।। १६ ।। आराध्य इति तात्पर्य सर्ववेदविदा सताम् ।। आरा-,
धिते हरौ मोक्षहेतु नमवान्तरम् ॥ ५७ ॥ भवत्येव फलं वरमादाराव्यो हरिरीधरः ॥ इत्यस्यामपि
नितिव्यवस्थायां मनागपि ॥९॥ विरोधो नास्ति भावाप्यकारानुयायिनाम् ॥ निर्विवादा हरेभकिना-
नमोक्षप्रदायिनी ॥ ५९ ॥ सर्वोपरि वरीवति सिद्धमित्येव मङ्गलम् ॥ क प निगमशिरोवाग्वेवकुण्ठ-
वाणी कच परिमित्युद्धिर्मादृशः कर्मवश्यः ॥ हरिपदशरणा ये दुर्लभं नास्ति वेषां किमपि जगति
ऋत्य ज्ञेयमाप्यं विचार्यम् ॥ १० ॥ विषयविषयिभावभ्रान्तिशून्यं विशुद्धं सकलानेगमवाणीभावगम्यं स-
राभ्यम् ॥ हृदि सकलजनानामांशितारं निविष्ट यदुपविमभिवन्दे सर्वविज्ञौनसारम् ॥ ३१ ॥१६॥
. - श्रीमझगवहीदा म. १८०६१] भा० टी०-परमेश्वरयजनात्मकं कर्मयोग, तनिष्ठाया: परमरहस्यमीश्वरशरणतालक्षणं भक्तियोगं घोपसंहृत्यायदानीमुभयपालभूत सम्यग्दर्शन सर्ववेदान्तप्रतिपादितं तत्र तत्र विस्तरेण प्रोक्तमुपसंहरति- सर्वति । सर्वधर्मान् सर्वे च वे धर्माय सर्वधर्मास्तान । धर्मशब्देनाबाधामोऽपि गृहाते, कर्म्यस्य विव. क्षितत्वात् " नाविरतो दुश्चरितानाशान्तो नासमाहितः, नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेननमाप्नुयात् " त्यज धर्ममधर्म च' इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः सर्वधर्मान् सर्वाणि कर्माणि परित्यज्य संन्यस्य मामेकं सर्वा- मानं समं सर्वभूतस्थमीश्वरमच्युतं गर्भजन्मजरावर्जिवमहमेववाहशः परमात्मेत्येवमेकं शरणं प्रज, न मत्तोऽन्यदस्तीत्यवधारयेत्यर्थः । अहं त्वामेत्र निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्धः सर्वेभ्यो धर्माधर्मनन्धनरूपेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशकरणेन । उक्तं च दशमे-नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्त्रता इति, अवो मा शुचः शोक मा कारित्यर्थः । यत्तु फश्चिपललाप 'स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानव.' इत्यत्र कर्मनिष्ठा कर्मसंन्यासपर्यन्वोपसंहृता । ततो मा त्यो सात्वाविशते तदन्तरमित्यन संन्या- सपूर्वकश्रवणादिपरिपाकसहितज्ञाननिष्टोपसंहवा, अधुना तु 'ईश्वरः सर्वभूताना हृदेशेऽर्जुनविष्ठति । तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन ' इति यदुक्तं तद्विवृण्वन भगवद्भकिनिष्ठामुभयसायन-वादुभयफलभूतत्वाच्चान्ते उपसंहरति-सर्वधर्मानिति । सर्वान वर्णाश्रमादिधर्मानविद्यमानान् विद्यमानान्वा परित्यज्य शरणत्वेना- नादृत्य मामीश्वरमेकमद्वितीयं सर्वधर्माणामधिष्ठातारं फलदातारं च शरणं प्रजा धर्माः सन्तु न सन्तु वा, कि तैरन्यसापेक्षे ? भगवदनुमहादेव अन्यनिरपेक्षादहं कृतार्थो भविष्यामीति निश्चयेन परमानन्दघनमू. तिमनन्द श्रीवासुदेवमेव भगवन्तमनुक्षणभावनया भजस्व । इदमेव परम तत्वं नातोऽधिकमस्तीति विचा- रपूर्वकेण प्रेमप्रकर्षेण सर्वानात्मचिन्ताशून्यया मनोवृत्त्या तलवारापदविच्छिन्नया सततं चिन्तयेत्यर्थः । मात्र मामेकं शरणं बजेति सर्वशरणतापरित्यागे लब्धे सर्वधर्मान्परित्यज्येति निषेधानुवादस्तत्कार्यकारिता. लाभाय यज्ञायशीये सान्नि "ऐरं कृत्वोद्रेयम् " इत्यत्र "न गिरा गिरेति यात्" इतिवत् । तथाच ममैव सर्वधर्मकारित्वान्मवेकशरणस्य नास्ति धर्मापेक्षेत्यर्थः । एवेनेदमपास सर्वधर्मान्परित्यज्येत्युके नाधर्मागा परित्यागो लभ्यतेऽतो धर्मपद कर्मपरमिति । नात्र कर्मत्यागो विधीयतेऽपि तु विद्यमानेऽपि कर्मणि श्रा नारेण भरवकशरगतामा ब्रह्मचारिगृहस्थानप्रस्थभिक्षूणा साधारण्येन विधीयते । तत्र सर्वधः- म्परित्यज्येति तेपा स्वधर्मादरसंभवेन तन्निवारणार्थम् । अधर्मे बानर्थफलं कस्याप्यादराभावात् त्यागवचन- मनर्थकमेव, शास्त्रान्तरप्राप्तत्वाच । तस्माद्वर्णाश्रमधर्माणामभ्युदयहेतुत्वप्रसिद्धीक्षहेतुत्वमपि स्यादेव""न चे. दमपि संन्यासज्ञान, भगवदेकशरणताया विधित्सितस्मात् । तस्मात्सर्वधर्मान्धरित्यज्येत्यनुवाद एव । सर्वेषा वच्छात्राणा परमरहस्यमीश्वरशरणतेवेति तत्रैव परिसमाप्तिर्भगवता कृता । वामन्तरेण संन्यासस्यापि स्वफलापर्यवसायित्वात् । अर्जुनं च क्षत्रिय संन्यासानधिकारिणं प्रति संन्यासोपदेशायोगात् । अर्जुनन्या- जेनान्यस्योपदेशे तु वक्ष्यामि ते हितं, त्या मोक्षयिष्यामि सर्वपापेभ्यः, (वं मा शुचः इत्युपक्रमोपसंहारी न स्याताम् । तस्मात्संन्यासधर्मेप्वप्यनादरेण भगवदेकशरणतामाने तात्पर्य भगवत । यस्मात्त्वं मदेकशरणः 'सर्वधर्मानादरेणातोऽहं सर्वधर्मकार्यकारी वा त्वा सर्वपापेभ्यो बन्धुवधादिनिमित्तेभ्यः संसारहेतुभ्यो मोक्ष- यिष्यामि प्रायश्चित्तं विनव धर्मण पापमपनुदति" इतिश्रुधर्मस्थानीयत्वाच्च मम । अतो मा शुच. युद्धे प्र. तस्य मम वन्धुवादिनिमित्तप्रत्ययायात्कथं निस्तारः स्यादिवि शोकं मा कापीरित्यादि । तन्नादर्तव्य, श्रीमता सर्पाना भगवदारमत्वाद, भगवभिप्रायविदा भगवा भायकवाभिमायापरिज्ञानविजृम्भितत्वात् । वथाहि सदाभ्यायान्तगीताशावापिसंहारात्मकेऽस्मिन्नध्याये प्रतिपादितेन कर्मादिना . एतदभ्यायान्त- समनशानापसंहारो नोपपद्यते । नहि 'स्वकर्मणा तमम्पर्य सिद्धि विन्दति मानव' इत्यत्र फर्मनिष्टानिरु- - 1 [भ० १८ लो० ६१] तत्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता पणस्य समाप्तिदृश्यते सर्वकर्माण्यापि सदा कुर्वाणो मदव्यपानयः । चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्य- रः॥ इत्युक्तत्वात्तस्मात्तत्र तत्र प्रतिपादित कर्मयोग भक्तियोगं ज्ञानं चास्मिन्नध्याये संग्रहेणोपपाद्य सर्वशास्त्रान्ते उपसंहरतीत्येव युक्तम् । अन्यथा 'युद्धियोगमुपाश्रित्य मचित्तः सततं भव । मचित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरि- ध्यसि' इत्यत्र भक्तियोग उपसंहृत इत्यपि कुतो न स्यात् । तस्मात्कर्मयोगादिप्रतिपादनपरिसमाप्तावेव यथासं- भवमुपसंहारवर्णनं युक्तं, न तु यत्रकुत्रचित्। 'तेपां सतवयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुमयान्ति ते॥ नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । इदं तु ते गुह्यतम, नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासे. नाधिगच्छति' इत्यादिना प्रतिपादितायाः समस्तवेदान्ततापर्यभूतायाः कर्मयोगमक्तियोगफलभूवायाः संन्या- सपूर्विकायाः ज्ञाननिष्ठाया: उपसंहारस्य शास्त्रान्ते कर्तव्यत्वावश्यकत्वेन सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यनेन सर्वकर्मसं. न्यासस्य स्पष्टतया प्रतीयमानावेन च तादृशज्ञाननिष्ठोपसंहारस्य युक्ततामभिप्रेत्याचार्य: सैवास्मिन्लोके उपसंहृता । ईश्वराभिप्राय ईश्वरेणैव ज्ञायते न तु वराकैरस्मादिभिः । विष्णुशिवयोरेकात्मत्वं परमात्मत्वं च श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिसिद्धम् । तमेव शरणं गच्छेत्यस्य विवरणमनेन क्रियत इत्यपि न । असंदिग्धार्थस्य संदिग्धार्थेन विवरणायोगात् । सर्वधर्मान्मरित्यज्येति तु तत्र तत्रार्जुनं निमित्तीकृत्य संन्यासपूर्वकज्ञान- निष्ठापतिपादनमिवार्जुनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायामनधिकारेऽपि ते पुरस्कृत्याधिकारि- भ्यस्तस्योपदिदिक्षितत्वान्न विरुध्यतेऽर्जुनं निमित्तीकृत्य लोकोपकाराय भगवतः प्रवृत्तिरिति संमतम् । अत्यया क्षत्रियस्यार्जुनस्य श्रोतुर्यस्मिन्नधिकारस्तस्यैव वक्तव्यत्वे संन्यासपूर्विकायाः ज्ञाननिष्ठायाः वर्णन- मनर्थकं स्यात् । वस्तुतोऽर्जुनस्क स्वविनहत्य सर्वज्ञत्वेनोपदेशानक्यं च भवेत् । अपि च तं प्रति सर्वधर्म- परित्यागकथनं भगवतः पूर्वापरविरुद्धम् 'फर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा- ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ कर्मव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । न कर्मणामनारम्भान्नैष्कम्यै पुरुषोऽश्नुते । स्वेस्व कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लमते पराम् । स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः । श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः । सहजं कर्म कौन्तेय सदोपमपि न त्यजेत् । सर्वकर्माग्यपि सदा कुर्वाणो मद्यपाश्रयः । स्वभावजेन कौन्तेय' इत्यादिना तत्रतत्र कर्मापरित्यागमत्या- महेण प्रतिपाद्यात्रैवं कथने परस्परविरोधस्य स्पष्टत्वात् । एतेन सर्वधर्मापरित्यज्य शरणवेनानाहय धर्माः सन्तु न सन्तु वा किं तैरित्यादिवर्णनमपास्तम् । 'यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् । यज्ञो दान तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् । मत्कर्मकृन्मत्परमः । स्वकर्मणा तमभ्यय॑' इत्यादिवचनाना विरोधस्या- स्मिन्नश्रुतकल्पनेऽपि तुल्यत्वात् । कर्माधिकनाशेन वेदविहितं धर्ममनादृत्य मदूपोपासनं कार्यमिति सर्व स्मिन्गीताशाने काप्यनुक्तत्वेन तदुपसंहारवर्णनस्यानुचितत्वात् । “अन्धं समः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ततो ते तमो य उ विद्यायार रता:" 'मामनुस्मरयुध्य च,' 'श्रुतिस्मृती ममैवाने ते उङ्घय प्रवर्तते । आज्ञाभङ्गो मम द्रोहो महतोऽपि न वैष्णवः ॥ वर्णाश्रमांचारवता पुरुषेण परः पुमान् । विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोपकारणम् ॥ तस्मात्सदाचारवता पुरुपेण जनार्दनः । आराध्यते स्ववर्णोकधर्मानुष्ठानका. रिणा॥' इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यः कर्मसमुचितोपासनाया वैशिष्टयवोधनाच । यत्र तु कर्मणो निन्दा पुराणा, दिपु श्रूयते, न सा भगवदाराधनलक्षणस्य निष्कामकर्मणो वेदविहितस्य नियतस्य, अपि तु भगवत्परा - खेनानुष्ठानस्य सकामस्य । तस्मादर्जुनेन सर्वकर्मत्याग: कर्तव्य इति भगवतो नाभिप्रेतं, किंतु त्यागाधिकारिभिः कर्ममात्रं संन्यस्याहमेव भगवान्स वासुदेवः न तु मत्तोऽन्योऽस्तीवि ज्ञाननिष्ठा सम्यक् संपादनीयेति, वक्ष्यामि ते हितं त्वा, मोक्षयिष्यामि सर्वपापेभ्यस्त्वं मा शुच इति चोपक्रमोपसंहारात । 'वद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रभेन सेवया । उपदेश्यन्ति वे ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः' इत्यादिवत् अर्जुनव्याञ्जनान्यस्योपदेशेऽपि न विरुध्यते । भूय इव १३०२ श्रीमतगवद्गीता [अ० १८० ११] यपि सर्वपापेभ्यः बन्धुवधादिनिमित्तेभ्यः-इत्यादि तदपि साहसमात्रं, 'धाद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यरक्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादी अग्नीपोमीयपशुहिंसावत् युद्धे शत्रुहननरूपाया: विहिताया हिंसायाः पापजनकत्याभावस्यात्यान- हेग खेनैव स्थापितत्वात् । यदप्यत्यादि तदपि चालविमोहनमात्रम्, उक्तयुच्या मामेकं शरणं प्रजेत्यत्राचार्यों- तार्थस्यैव विवक्षितत्वात् । मामेकं शरणं व्रज स्वधर्माचरणादिना मामेवाराधय न तु देवतान्तरमित्यर्थस्यापि संभवेन सर्वधर्मत्यागस्य लाभायोगाच । यदप्येतेनेदमपास्तमित्यादि तदपि तुच्छमेव 'नाविरतो दुश्चरितात्, त्यज धर्ममधर्मं च इलि भाग्योदात्तश्रुतिस्मृत्यनवलोकन विजम्भितत्वात् । वधाच-सर्वस्याप्यक्षस्य कामिनो विपयरागवशात् अधर्माचरणं दृश्यते, शरीरस्थितिमात्रविषयकामनया सदाचरणं संन्यासाधिकारिणोऽपि संभाव्य तस्परित्यागयचनस्य श्रुतिस्मृत्यनुरोधेन सार्थक्यम् । अधर्मेऽनर्थफले कस्याप्यादरो नास्तीवि वक्तुम. शक्य, लोके तदादरस्योपलभ्यमानत्वात् , अन्यथा 'न सुरां पिवेत् । न कलसं भक्षयेत्' इत्यादिनिषेधवाक्या- नां धैयर्थ्यं स्यात्। तस्मादत्रार्जुनं निमित्तीकृत्याधिकारिभ्यो वेदविहितः कर्मत्यागो गीताशास्ने उपपाद्य वदन्वे उपसंहियते, भगवदेकशरणतायाः तमेव शरणं गच्छेत्यनेनोफत्वात् । मन्मना भव मलको मद्याजीत्यनेन भक्तियोगस्य फर्मयोगस्य चोपसंहृतत्वात् । यत्तु संन्यासशावेण प्रविपिद्धशात्रेण च लब्धत्वान्नात्र सर्वधर्म- त्यागो विधीयते इति तत्र विधिनिषेधरूपेण वेदेन प्राप्तत्वात् । तदर्थप्रतिपादकरमृतीतिहासपुराणानां वैयर्थ्य- प्रसङ्गादित्यास्तां तावत् । एवमन्येपामपि कुकल्पना भाप्यविरुद्धाः सम्यग् विचार्य निराकर्तव्याः ।। गोभाराह- रणार्थिना सुविहता वेदार्थनाशे रता येताद्यं जगतां निदानममलं शाखस्य योनि विभुम् । यत्कारुण्यकटा- क्षतोऽभिलपितं पूर्ण ममाप्यद्भुतं तं वन्दे परमामृतं शिवमहं कृष्णं गुरूणां गुरुम् ।। ६६ ।। ५० टी०-अतो गुह्यतममाह-सर्वधर्मानिति । मद्भक्त्यैव सर्वे भविष्यतीति दृढविश्वासेन विधिकतर्य त्यक्त्वा मामैकमद्वितीयं शरणं ग्रज मदेकशरणो भव । एवं वर्तमानस्य कसत्यागभवं पापं भविष्यतीत्याह-मा शुच इति । शोक मा कार्यतोऽहं त्वां मदेकशरणं सर्वपापेभ्यो मोचयिष्यामि, यथा घनैकशरणस्य चातकस्य धनादेवाभीष्टसिद्धिरित्यर्थः । अनेन स्वसामातिशयो दर्शितः । एतदर्थेऽस्माभिः पूर्व व्याख्या- तम् । “अहमेव स्वयमिदं वदामि" इति श्रुतिरपि (श्ो. ९६) दर्शिवा । यद्वा पूर्वश्लोके सेव्यसेवकभावत्वेन मन्मना भवेत्यादयो मत्प्रापकाश्चत्वारो धर्माः प्रोक्ताः, तान् सर्वधर्मान् परित्यज्यानवमुक्त्वा ततो मामेकमखण्डेकरसं शरणं व्रज मज्ज्ञानात्सकलविकारराहित्येन मदाकारतां भज । एवं जाने सत्यहमात्मैव अयमहमिति भेदभावनोतेभ्यः पापेभ्यो दु:खहेतुभ्यो मोचयिष्यामि, तदुकम्-'दग्धासिलविकारश्चेद् प्रम- ज्ञानामिना मुनिः । वर्तमानः श्रुतेर्मुनि नैव स्याद्विधिक्रिक" इति मा शुच:-अनन्तरं शोकः फास्तीत्यर्थः। तदुक्तम्- स्वान्तकान्तमुपागते यदुपतौ शान्त्या समं क्रीडितुं निर्यात बहिरन्वरमगतिभिस्तत्राष्टमिः सा- विकः । प्राणापानगती मनागुपरते स्वानन्दपूर्ण मनः श्रुत्वा गानमनाइतध्वनिभवं न त्वं न चाई जगत् ॥ १॥' एतदर्थे-"यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः” इति श्रुतिः पूर्व सभाप्या दर्शिता ॥ ६६ ॥ ग०टी०-कथं मन्मनस्त्वादिमित्यद उक्तम्-सर्वधर्मानिति । अन्यसर्वधर्मान्परित्यज्य मन्मनाः मरको मद्याजीत्येवम् । पूर्वशेषोऽयम् । मन्मना भवेत्यादिना किमुक्तं भवतीत्यतस्तस्योपसंहाररूपेण व्याख्या क्रियते-मामेकं शरणं व्रजेति । मन्मनस्त्वादेरेव शरणागविरूपत्वात् । उक्तं हि-'सर्वोत्तमत्वविज्ञानपूर्वे हत्र मनः सदा । सर्वाधिकोमयुक्तं सर्वस्यान समर्पणम् । अखण्डा त्रिविधा पूजा तद्रत्यैव स्वभावतः । रक्षतीत्येव विश्वासस्तदीयोऽहमिति स्मृतिः ।। शरणागतिरेपा स्याद्विष्णौ मोक्षफलप्रदा' इति । यद्वा सर्वधर्मा- परित्यज्येत्ति. सर्वधर्मफलानि परित्यज्येत्यर्थः अन्यथा युद्धविधिविरोध: स्यात् । यद्वाऽवैष्णवसर्वधर्मान्प- [अ०१८ रो०१७] तत्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता रित्यज्येत्यर्थः । अनादिजन्मकृतप्रतिवन्धकसत्त्वात्कथं मामेव एण्यसीत्युक्तिरित्यत आह-अहं वेति । त्वा त्वामनादिजन्मस्तपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि विनिर्मकं करिष्यामि। मा शुचः संसारभयाच्छोकं मा कापीः॥६६॥ इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥ त० टी०-एवं सर्वशास्त्रस्य सारभूतं गीताशास्त्रमुपदिश्येदानीमस्य शास्त्रस्योपदेशाधिकारिनिय- ममाह-इदमिति । इदं कर्मज्ञानभुक्तिविषयं गुह्यतमं शास्त्रं तुभ्यं मया कृपयोपदिष्टं, ते त्वया अतप- स्काय वाअपमानसशारीरीतित्रिविधतपोरहिताय, तपः स्वधर्मवर्तित्वं तद्रहितायेति वा न वाच्यं नोपदेष्टव्यं, तपोयुक्ताय अभक्ताय गुरावीश्वरे च भक्तिशून्याय कदाचन न वाच्यं, न चाशुश्रूपत्रे वाच्यं भक्तायापि अशुश्रूपवै परिचर्यामकुर्वते न च वाच्यं, न च मां योऽभ्यसूयति मां भगवन्त वासुदेवं दोपारोपेण यः पश्यति दोपगन्धास्पृष्टस्वरूप दिव्याप्राकृतानन्तगुणे ब्रह्माद्यचिन्त्यनित्य- श्वर्येऽपि दोषमारोपयतीत्यर्थः तस्मै तपस्विने भक्ताय शुश्रूपवेऽपि कदाचन न वाच्यं, तपस्विने भक्ताय शुश्रूपवेऽनसूयवे श्रीकृष्णेऽनुरागयुक्ताय वाच्यमित्यर्थः ॥ ६७ ।। म० टी०-समाप्तः शास्त्रार्थः । शास्त्रसंप्रदायविधिमधुना कथयति-इदमिति । इदं गीताख्यं सर्व- शास्त्रार्थरहस्यं ते तव संसारविच्छित्तये मयोकं नावपस्काय असंयतेन्द्रियाय न वायं कदाचन कस्या- मप्यवस्थायामिति पर्यायत्रयेऽपि संबध्यते । तपस्विनेऽग्यभकाय गुरौ देवे च भकिरहिताय न वाच्य कदाचन । तपस्विने भक्तायापि अशुश्रूपवे शुश्रूपां परिचर्यामकुर्वते च न वाच्यं कदाचन । चशब्दो 'वाच्यं कदाचन' इति पदद्वयाकर्षणार्थः । न च मां योऽभ्यसुयति मां भगवन्तं वासुदेवं मनुष्यमसर्वज्ञत्वादि- गुणक मत्वा अभ्यसूयति आत्मप्रशंसादिदोपाध्यारोपणेनेधरत्वमसहमानो द्वेष्टि यः तस्मै श्रीकृष्णोकपास- हिप्णवे वपस्विने भकाय शुश्रूपवेऽपि न वाच्यम् । कदाचनेत्यनुकर्षणार्थश्वकारः । तपस्विने भक्ताय शुश्रूपवे श्रीकृष्णानुरक्ताय च वाच्यमित्यर्थः । एकविशेषणाभावेऽप्ययोग्यताप्रतिपादनार्थाश्चत्वारो नकारा: मेधाविने तपस्विने वेत्यन्यत्र विकल्पदर्शनात् शुश्रूषा गुरुभक्तिभगवदनुरक्रियुताय तपस्विने तयुक्ताय वाच्यम् मेधातपसोः पाक्षिकत्वेऽपि भगवदनुरक्तिगुरुभक्तिशुश्रूपाणां नियम एवेति भाष्यकृतः ॥१७॥ शं० टी०-एवमारुरक्षोरारूढस्य चोभयोरात्यन्तिकसंसारदुःखोपशान्वये नियमेन कर्तव्या विभज्य दर्शयित्वा तत्फलमप्युपपाद्य ज्ञानकर्मणोमोक्षसायनत्वावृधारणेन सर्वेषामपि वेदाना सकलाया अपि गीता- याच निर्विशेषब्रह्मपरत्वमेव सूचयित्वा इति वे ज्ञानमित्युपकान्तं शास्त्रमुपसंहृत्याधुना शास्त्रप्रवर्तकानामस्य मोक्षशास्त्रस्य संप्रदायप्रवर्तने नियममाह-इदमिति । इदं मोक्षशास्त्रं वे स्वया अतपस्काय "नरतं वपः सत्यं वप: " इत्यादिश्रुत्युक्तं तपो न यस्यास्ति सोऽतपरकरवस्मै अतपस्काय वेदोक्तकर्मानुष्ठानविहीनाय न वाच्यं कदाचन नोपदेष्टव्यमित्यर्थः । स्वधर्मनिष्ठायाप्यभक्ताय यस्य देवे परा भक्तिरिविन्यायेन गुरौ देवे भति- रहितस्त्वभक्तस्तस्मा अभक्ताय कदाचन न वाच्यम् । वपाखिने भक्तिमतेऽप्यशुश्रूपवे गुरुशुश्रूपामवे कहा-, पन न वाच्यं, किंतु विशेषणद्वययते गुरोः शुश्रूषा कुर्वत एव वाच्यम् । चकारान्मेधाविने मन्यवधारणशक्ति- मत एव वाच्यं, न तु पूर्वोक्तविशेषणवतेऽपि मेधाशून्याव कदाचन वाच्यम् । वथा चतुर्विशेषगववेऽपि यो मा चासुदेवं प्रावं मनुष्यं मत्वाऽभ्यसूयति निन्दवि तस्मै तु न कदाचन वाच्यम् । यद्वा मां निविशेष पर प्रझाभ्यसूयति ब्रह्मणो निर्विशेषत्वं केवलवं सजातीयाविभेदरहितत्वमद्वितीयत्वं चायुक्तमिवि विदेहकैवल्य- मपि लोकशावधिकसमित्यौव ग्रहमाप्तिश्चायुक्तत्यद्वैतमद्वैतरतसं विदेदरल्यं चासहमानो यो निन्दवि मेधाविने वा :
१३०४ श्रीमजगवद्गीता [अ० १८ श्लो०६७ तस्मै चतुर्वेदिनेऽपि शतमातवेऽपि च सगुणभक्तिमतेऽपि घाद्वैतद्वेपिणे कथंचिदपि नोपदेष्टव्यम् । उपदेष्ट. व्यस्याद्वैतशास्त्रत्वादद्वैते प्रीतिमत एवोपदेष्टव्यं, न तु शानशास्त्रतर्थासहिष्णव इत्यर्थः । चकारान्मुमुक्षवे यथारोग्यकामिन एव दिव्यौपवं, तथा मोक्षच्छावत एव ज्ञान शावमुपदेष्टव्यं नान्यस्मा इति सिद्धम् ॥६॥ श्री० टी०-एवं गीतार्थतत्त्वमुपदिश्य तत्संप्रदायप्रवर्वने नियममाह-इदमिति । इदं गावातत्त्वं वे त्वयाऽतपरकाय स्वधर्मानुष्ठानहीनाय न वाच्यं, न चाभकाय गुरौ ईश्वरे च भक्तिशून्याय कदाचिदपि न वाच्यम् । न चाशुश्रूपवे परिचर्यामकुर्वते श्रोतुमनिच्छते वा याच्यम् । मां परमेश्वरं योऽभ्यसूयति मनुष्यदृष्टपा दोपारोपेण निन्दति तस्मै च न वाच्यम् ॥ ६७ ॥ स० टी०-समाप्तः सर्वशास्त्रार्थः शास्त्रस्यैवाधुना हरिः ॥ संप्रदायविधि प्राह सर्वज्ञो भगवानिति ॥१॥ इदं समस्तशास्त्रार्थरहस्यं प्रप्यसमितम् ॥ गीताख्यं तव संसारवन्धविच्छित्तये मया ॥२॥ सर्वक्षेनेरितं सम्यग्ज्ञानसाधनमुत्तमम् ॥ नासंयतेन्द्रियायोक्तं तप.शून्याय कहिंचित् ॥ ३ ॥ वाच्यं यस्मा. चपोहीने निष्फलं स्यादुदीरितम् ॥ तपस्विनेऽपि नो वाच्यं भक्तिहीनाय केशवे ॥ ४ ॥ सद्गुरी भक्तिहीनाय न वाच्यं कर्दिचित्तथा ।। कस्याचिदप्यवस्थायां भक्तायापि तपस्विने ॥ ५ ॥ न चाशुश्रूपवे वाच्यं परिचर्यामकुर्वते ।। यो मां श्रीवासुदेवं हि भगवन्तमधोक्षजम् ॥ ६ ॥ स्वप्रशंसादिदोपाध्यारोप- गेन ममेशताम् ॥ अजानन्प्रत्युत द्वेष्टि मन्दभाग्यतयाऽधमः ॥ ७ ॥ शुश्रूपवेऽपि भक्काय गुरावपि वप- स्विने । न तस्मै जातु वाच्यं श्रीकृष्णोत्कर्षासहिष्णवे ॥ ८॥ सर्व धर्मा अतिक्रान्ता न कुर्युस्तादर्श महत् ॥ अनर्थनाल यद्वच्छ्रीकृष्णप्रसूया करोत्यपम् ॥ ९ ॥ यतो 'वेदान्तसिद्धान्तरहस्यं मुनिसम- तम् ॥ श्रीकृष्णाख्यं परं धाम सदानन्दधनं परम् ॥ १०॥ अतो यस्य' हृषीकेशे कृष्णे भगवतीश्वरे ॥ अवज्ञास्ति न सोऽत्यज्ञः संभाष्योऽपि कदाचन ॥ ११ ॥ कृष्ण कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नराः ॥ जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न संभाध्याः कदाचन ।। १२ ।। किं पुनर्ब्रह्मविद्याया जनन्यो भगवद्विरः ॥ तस्मै वाच्या सुधीमद्भिनिरपेक्षरितीरितम् ॥ १३ ॥ तपस्विने च भक्ताय गुरुशुश्रूपवे सते ॥ श्रीकृष्णे चातु- रक्ताय वाच्यं शास्त्रमिदं परम् ॥ १४ ॥ विशेषणाना संपामस्स्यपेक्षेति सिद्धये ।। चत्वारोऽत्र नकाराः श्रीहरिणा संप्रयोजिताः ॥ १५ ॥ एफस्यापि ह्यभावेन योग्यता प्रतिवद्धयते । अतो विचार्य गीताख्यं शास्त्रं श्राव्यं मुमुक्षवे ।। १६ ॥ ६७ ।। भा० टी०-एवं सप्तदशाध्यायान्तगीताशास्त्रार्थ सर्व प्रतिपत्तिसोफार्थमस्मिन्नध्याये विस्तरेणोपसंह- त्यान्वे मन्मना भवेति द्वाभ्या पुन: स्वशास्त्रदायाय संक्षेपत्तस्तस्योपसंहारं कृत्वाथेदानी शास्त्रसंप्रदायविधि माह-इदमिति । इदंशास्त्र संसारविच्छित्तिहेतुभूतं तव हिताय मयोक्तम् । अतपस्काय उक्तशारीरादितपोरहिताय न वाच्यं कदाचन-कस्याचिदप्यवस्थायामपि-सर्व संवभ्यते। तपस्विनेऽन्यभक्ताय गुरौ देवेच भक्तिरहिताय कदाचन न वाच्य पिशेपणद्वययुक्तायाप्यशुश्रूपवे शुभ्रूपावर्जितम्य कदापि न वाच्यम् । यो मां वासुदेवं मनुष्य प्राकृतं मत्वाऽभ्यसूयति आत्मप्रशंसादिदोपाध्यारोपणेन मत्स्वरूपानभिज्ञो ममेश्वरत्वं न सहते तस्मै • ममेश्वरत्वासहिष्णवेऽतपस्विनेऽभक्ताय शुश्रूपयेऽपि कदाचन न वाच्यम् । तपस्विने भक्ताय शुश्रूपवेऽनसूयवे शानं वाच्यमिति प्रतिपेधसामोद्गम्यते । तत्र मेधाविने तपस्विने वा इति स्मृत्यन्तरे मेधावितपस्विनोविक- ल्पदर्शनात् ।शुश्रूपाभक्तियुक्ताय भगवत्ससूयारहिताय तपस्विने वाच्यम् । शुश्रूपाभत्त्यनसूयासहिताय मेधाविने वा वाच्यम् । शुश्रूपाभक्तिवियुक्ताय वपरिखने मेधाविने वापि न वाच्यम्।भगवससूयायुक्ताय समस्तगुणवतेऽपि न वाच्यम् । गुरुशुश्रूपाभक्त्यनसूयायुक्ताय तपस्विने मेधाविने वा वाच्यमित्येप शास्त्रसंप्रदायविधिः ॥१७॥ १. टी-एवं गीतार्थतत्त्वमुपदिश्य तत्संप्रदायप्रवर्तने नियममाह-इदमिति । इदं गावातत्त्वं ते त्वया- [अ०१८ श्लो. १८] सस्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता तपरकाय स्वधर्मानुष्ठानहीनाय न वाच्यं, न वाभरताय परमेश्वरभक्तिशून्याय, न चाशुश्रूपवे परिचर्यामकुर्वते । तथा यो मां परमेश्वरमभ्यसूयति मनुष्यदृष्टया दोपारोपेण निन्दति तस्मै न वाच्यम् । श्रुतिरपि नैरुक्ती- "विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि । असूयकायानृजवेऽयताय न मा ब्रूया अवी- यवती स्याम्" इति । भाष्यम्-विद्या औपनिपदध्यात्मविद्या एतद्वक्तं ब्राह्मणं ब्रह्मनिष्ठं प्रतीत्याभिमुख्येन समक्षं जगाम प्राप्ता । तल्कि मा इति मां त्वं गोपाय । वक्ष्यमाणाय पुरुषायेति चतुर्थ्या द्विवीयोक्ता । तं पुरुष प्रति गुप्तं कुरु न कथयेत्यर्थः । यतोऽहं ते शेवधिर्निरवधिरस्मि । चतुर्विधपुरुषार्थसाधनत्वात् । यथा निधिप्तः क्रियत इत्यर्थः । फिलक्षणायेत्याह । असूयकाय निन्दकाय । अनृनवे सदायकाय | अयताय नियमशून्याय । मामात्मविद्यां न बूया न कथय । एवं सति यदि ब्रूपे तर्यवीर्यवती स्याम् । त्वय्यपि सामयं न स्थास्यतीत्यर्थः ।। ६७ ॥ रा० टी०-गीताशास्त्रेऽनधकारिनिरासेन लक्षणयाऽधिकारिणमाह-इदमिति । इदं गीवाशास्त्रं तपोहीनाय ते स्वया न वाच्यम् । अशुश्रूपवे सेवामकुर्वते न वाच्यम् । तपोहीनोपदेशादप्यशुश्रूपोरुपदेशो महादोपकर इति सूचनायान चशब्दः · समुचयेऽथवाधिक्ये न्यूनत्वे चः प्रयुज्यते' इत्युक्तेः । चश्चकार इत्यर्थः । अशुश्रूपू- पदेशादप्यभक्ताय कदाचन कदापि न वाच्यमित्युक्ति: अल्पमानतपःशुश्रूपावतो भकिमतः कदाचिदुपदे- शेऽपि मक्तिहीनायोपदेशे महान्दोष इति सूचनाय । मां योऽभ्यसूयति तस्मै न वाच्यमित्यत्रापि चशब्दः वपोहीनादित्रितयोपदेशादप्यसूयावत उपदेशे दोषाधिक्यज्ञापनार्थः । एतेन तपःप्रभृतिगुणयुचोऽधिका- रीति सूचितम् ॥ १७॥ य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ॥ भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ ६८ ॥ त० टी०-एवमुक्तदोपरहितेभ्यो भगवद्भक्तेभ्यो यो ददाति तस्य फलमाह-य इदमिति । यः कश्चिद्रीतासंमदायप्रवर्तक इदं मदुक्तं परमं गुह्यमतिरहस्यत्वात्सर्वत्र प्रकाशनानईमतो मद्भक्तेषु मयि भगवति वासुदेवे भक्तियुक्तेषु योऽभिधास्यति अभितो ग्रन्थतोऽर्थतश्च स्थापयिष्यति, पूर्वश्लोकेभ- तस्य निषेधेन भक्तस्पैवार्थतो ग्रहणेऽपि पुनर्भक्तग्रहणात् तपाद्यभावेऽपि मद्भक्तिमात्रेणाप्यस्य शास्त्रस्य संमदानपात्रता भवति । भक्तरेव तदधिकारापादनत्वमिति सूचितम् । कथमभिधास्यति तंत्राह-भक्ति मयि परां कत्लेति । गीताकर्तुगवतो गरीयसः परमप्रीत्यर्थ मया भक्तेभ्यो दीयते, नतु केनचिदुपाधिनति निश्चित्य यो वक्ष्यति स मामेवैप्पत्यत्र संशयो न कर्तव्यः । अथवा यो मन क्तेभ्योऽभिधास्यति स मयि पर प्रेमलक्षणां भक्ति कृत्वा तया मामाराध्य मामेवैष्यति । अवधारणे. नोक्तार्थसिद्धौ सत्यां पुनरसंशयवचनं यथा यज्ञादिकर्मनिष्ठो भक्तिहीनज्ञाननिष्ठो वाऽन्यदेवान्तवत्सलं मामोति, न तथा मद्भक्त इति दाायेति भावः ॥ ६८ ॥ म० टी०-एवं संप्रदायस्य विधिमुक्त्वा तस्य कर्तुः फलमाह-य इति । यः संप्रदायस्य प्रवकः, इदमावयोः संवादरूपं प्रन्यं परमं निरतिशयपुरुषार्थसाधनं गुरुवं रहस्यार्थत्वात् सर्वत्र प्रकाशयितुमन मडकेषु मां भगवतं वासुदेवं प्रत्यनुरक्वेषु भभिधास्यवि अभितो अन्यतोऽवश्य भास्यवि स्थापयिष्यति । भफेः पुनर्महणात् पूर्वोफविशेषणाय राहतस्यापि भगवनतिमात्रेग पानवा सूभिता भगति । कथमभिभा- स्यवि वाह-मकि मथि परा कृत्वा भगवतः परमगुरोः मुथूपैयं मया क्रियत इत्येवं या निहित्य योऽभिधास्यति स मामेश्यति मां भगवन्तं वासुदेवमेव्यत्येव भपिगन्मोऽसत एव संसागदा संशयों में, .
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१३०६
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो. १८]
कर्तव्यः । अथवा मयि.परां भक्तिं कृत्वाऽसंशयो नि:संशयः सन्मामेव्यत्येवेति वा मामेवैष्यति नान्यमिति
यथाश्रुतमेव या योज्यम् ॥१८॥
शं० टी०-तपस्वित्वं भक्तिमत्त्वं शुश्रूपत्वमद्वैते प्रीतिमत्त्वं मुमुक्षुत्वं पाधिकारिणः शुद्धात्मत्वे ज्ञान
शास्रोपदेशयोग्यत्वे च लिङ्गमित्यधिकारिलक्षणमुक्त्वा, निरुफलक्षणलक्षितेभ्य एवाधिकारिभ्यो शानशा.
बमुपदेष्टुः फलमाह-य इति । यः श्रोत्रियो मानिष्ठो यतिमहकेषु मामेव परमेश्वरं संसारमोक्षस्थिति.
वन्धहेतुं मोक्षेच्छया स्वकर्मभिराराधयन्तो ये भजन्ति वे मकास्वेषु तपस्सिने भक्कायेति पूर्वमुक्त्वा
मरप्विति पुनर्भक्तिप्रणम् " ह देवमात्मधुद्धिप्रकाशं मुमुधुर्वे शरणमहं प्रपद्ये" इति, "अमृतस्यैष सेतुः"
इति शिवप्रसादेन विना न सिद्धिरिति मोक्षस्येश्वरप्रसादेकलभ्यत्वश्रवणान्मुमुक्षूणामीश्वरक शरणत्वेन भवि-
तव्यं, परमेश्वरैक शरणैरेव कृवं श्रवणादिकं फलत्यवस्तत्रैव दृढा भक्तिः कर्तव्येति ज्ञापनार्थ मदक्तेषु मदे-
कशरणेषु पूर्वोक्तविशेषणवत्सु च। आविषयसप्तमी । मनतानात्मतत्तजिज्ञासूनुद्दिश्येत्यर्थः । परमं परमपुरु-
पार्थसाधनं गुह्यं गोप्यमयोग्येप्वप्रयोकव्यमिदं गीताख्यं ज्ञानमयं शास्त्रमभिधास्यति परमकरुणयैवोपदे-
क्ष्यति, न तु शुश्रूषायपेक्ष्य मन्यं तदर्थं च यथा गृहीयुस्तथा व्यारयास्यतीत्यर्थः । ननु ब्रह्मनिष्ठस्य
विदेहकैवल्यार्थिनः शिष्येभ्यो गीताशास्त्रोपदेशे नोपयुज्यते, ज्ञाननिष्ठातत्फलप्रतिबन्धकत्वात् "ब्रह्मसंत्योऽम
वत्वमेति" : प्रमाद वै मृत्युमई ब्रवीमि' इतिश्रुत्या स्मृत्या च प्रमविदो वहिर्मुखत्वं मुफिप्रतिवन्धक
निपिध्यत इति चेद्धवानन प्रष्टव्यः-तत्त्वोपदेष्टा साधको वा सिद्धो वा संसिद्धो वेति । नायः । साधकस्या-
स्मयाथात्म्यविशानाभावाद्वाफ्यार्थोपदेशमा विना निर्विचिकित्सं, तच्चोपदेशानुपपत्तेः । यथा शालेण
लक्षणेन स्वरूपेण च वनमणि विज्ञातवत एव मणितत्त्वोपदेश उपपद्यते, न तु शास्रमानाध्येतुर्नापि लक्षणं
श्रुतवतो नापि चापातदर्शनवतः सिध्यति तद्वत् । नापि तृतीयः, सप्तमी भूमिकामधिरुह्य प्रपञ्चं विस्मृत्य
परप्रयत्नाच्छारीरं कर्म कुर्वत उपदेशायोगात्पारिशेप्यासिद्धस्यैवोपदेशयोग्यत्वम् । ननु सिद्धस्यापि चहिः-
प्रवृत्त्या ज्ञान प्रतिवध्येवेति चेन्न, मुमुक्षुभ्यः शिष्येभ्यस्तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थोपदेशेनात्मज्ञानं दृढमेव
भवति । तत: शिष्येभ्यो मुमुक्षुभ्यः सिद्धेनोपदेष्टव्यम् , अन्यथा त्वाचार्याभावप्रसङ्गाच्छानानर्थक्यप्रसद्गान्मु-
मुक्षूणामगतित्वप्रसशाच । तत: 'स्वयं तीर्णः परान् तारयति । इतिन्यायेन सिद्धः स्वयं मुक्तोऽन्यान्
शरणागतान मुमुक्षून् बन्धान्मोचयति, नदेव फलमैहिकज्ञानसंपत्तेविदुषः । ननु तदेवत्सत्यं, तथापि मूढा-
नामुपदेशप्रवृत्त्या द्वैतवासना प्रवर्धते, क्या विपरीतप्रत्ययवृद्धिः, तया सर्वात्मत्वज्ञान प्रतियद्धपते, तेन
मोक्षश्च । कथमात्महानि विद्वानङ्गीकृत्योपदेक्ष्यतीत्यत आह-भक्तिमिति । 'पुरानुपुतविषयेषु च तत्परोऽपि
ब्रह्मावलोकननिरूढमना हि योगी। संगीतवालपरिनृत्यवशं गतापि मौलिस्यकुम्भपरिरक्षणधीनटीव '
इतिन्यायेन परोपदेशे प्रवृत्तोऽपि सिद्धो यतिमयि सर्वात्मन्यद्वितीये परे ब्रह्मण्यारोपितं सर्वदृश्यं चिरका-
लनित्यनिरन्दरसमाध्यभ्यासवलेन सन्मात्रतया गृहातीति परा प्रकृष्टा तामुत्तमा भक्ति सर्वत्र सन्मान-
ग्राहिणी प्रत्याष्टिं कृत्वा । सदा सर्वत्र सर्वे ब्रह्मैव पश्यन् , निःशेषविनष्टद्वैतभावो विद्वान्मामेवाद्वितीय
निर्विशेष परं ब्रह्मेष्यति प्राप्स्यति, न तूत्क्रमणं नापि लोकान्तरं नापि देशान्तरं नैव च देहान्तरं यास्यति ।
अत्र संशयो न कर्तव्यः । ब्रह्मविदो यत्तेः सिद्धस्य कचि परोपदेशे प्रवृत्तस्य ब्रह्मप्राप्तौ शङ्कामेवकारेणैव
निरस्य तस्यापि दाढ्यार्थमसंशय इत्युक्तम् । तेन सिद्धं ब्रह्मविद्यतिः सिद्धः कचित्परोपदेशे प्रवृत्तोऽपि स्वयं
सर्वत्र ब्रह्मदृष्टिममुञ्चानो ब्रह्मभावमेव गच्छति, नास्त्यत्र संशय इति ॥ १८ ॥
श्री०टी०-एतदोपैविरहितेम्यो गीताशास्रोपदृष्टुः फलमाह-य इति । मद्भकेवभिधास्यति महतेभ्यो
वो वक्ष्यति, स मपि परा भकि, करोति, ततो नि.संशयः सन्मामेव प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ६॥
१३०७ ॥ . [अ० १८ श्रो० १९] तत्त्वप्रकाशिकाराष्टटीकोपेता स० टी०-संप्रदायविधि प्रोच्य तत्कर्तुः फलमुच्यते ॥ य आवयोरिमं ग्रन्थं संवादात्मकमद्भुतम् ॥१॥ रहस्यार्थतया गुह्यं सत्पुरुषार्थसाधनम् ॥ वक्तुं योग्यं न सर्वत्र मद्भक्तेष्वगिधास्यति ॥ २ ॥ मां श्रीम- द्वासुदेवाख्यं भगवन्तं जगद्गुरुम् ॥ हरि प्रत्यनुरक्तेषु योऽमितो ग्रन्थतोऽर्थतः ॥ ३॥ स्थापयिष्यति मनक्त्या संप्रदायप्रवर्तकः ॥ भगवद्वासुदेवस्य समस्तजगतां गुरोः ॥ ४ ॥ शुश्रूपैव मयापीयं क्रियते मनसा गिरा ।। इत्येवं निश्चयाकारां भक्ति कृत्वा मयीश्वरे ॥ ५ ॥ योऽभिधास्यति सोऽत्यन्तप्रियं मामेव चिद्धनम् ॥ भगवन्तं जगन्नाथं वासुदेवमघोक्षजम् ॥ ६ ॥ एप्यत्येवाशु संसारान्मुच्यते नात्र संशयः ।। भगवद्भक्तिमात्रेण पानतां याति मानवः ॥ ७ ॥ इति सूचयितुं भक्तरुपादानं पुनः कृतम् ॥ ८॥ १८॥ भा० टी०-एवं संप्रदायस्य विधिमुक्त्वा शास्त्रसंप्रदाने प्रवृत्त्यर्थे तस्य कर्तुः फलमाह-य इति । इस यथोक्तं केशवार्जुनयोः संवादरूपं ग्रन्थम् । इदमितिपाठस्त्वाचारव्याख्यातत्वादनादरणीयः । य इमं निःश्रे- यसार्थत्वात्परमं प्रकृष्टं गुह्यं गोप्यं रहस्यार्थविषयत्वात् । मक्तेषु मयि भक्तिमत्सु योऽध्यापकोऽभिधास्यति प्रन्थतोऽर्थतन्वाध्यापयिष्यति। यथा मयि वासुदेवे नित्यभक्के त्वयि मया प्रन्यतोऽर्धतश्व स्थापितस्तथा मद्धतेषु यो प्रन्थमिमं स्थापयिष्यति, स मक्किं मयि परां कृत्वा भगवतः परमगुरोः शुश्रूपा.मया क्रियत इत्येवं कृत्वा मामेवैष्यति नान्यं, मुक्तो भविष्यत्येवेत्यर्थः । अत्र संशयो न कर्तव्यः । मद्भक्तेष्विति भक्तेः पुनर्ग्रहणं भक्तिमात्रेण शास्त्रसंप्रदाने पात्रं भवतीति गम्यते, भाक्तिं परामद्वैतलक्षणामुपासनां कृत्वेति तु गीताशास्त्रप्रदानलक्षण- भक्तेः फलं वक्तुं प्रवृत्तस्येवरभक्तिफलकथनमनुचितमित्यभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातम् ॥ १८ ॥ १० टी०-एतैपिविरहितेभ्यो भक्तेभ्यो गीताशास्त्रोपदेषुः फलमान-य इति । य आचार्य इदं परमं गुह्यं गोप्यं गीतार्थतत्त्वं महकेषु जिज्ञासया प्राप्तेपु सत्स्वभिधास्यति वक्ष्यति साभिप्रायं निरूपयिष्यति, स मयि जगदीश्वरे परामव्यभिचारिणी माः कृत्वाऽसंशयः सन् मामेव प्राप्नोति । आत्माख्यदक्षिणादातुः किमन्यत् फलं वाच्यमित्यर्थः । श्रुतिरपि ऋग्वेदे-" आविरभून्महि माघोनमेपां विश्वं जीवन्तमसो निर. मोचि ! महिज्योतिः पितृभिर्दत्तमागादुरुः पन्था दक्षिणाया अदर्शि" इति । अत्र रावणभाष्यम्-एपा- माचार्याणां माधोनं महि आविरभूत् । इन्दति जानातीति व्युत्पत्या मघोन इन्द्रस्य परमात्मन इदं माघोनं महि महत्त्वमाविरभूत् । कुत इत्याह-महीति । महित्वं ज्योतिर्ज्ञानं च पितृभिरस्माभिर्दत्तं सदागात् प्राप्त तेष्वाचार्येषु परिणतं, येन ज्योतिषा विश्वं जीवं सर्वं जगत् तमसोऽज्ञानानिरमोचि निर्मोचितम् । अथ कथमस्माभिस्तेभ्य एवार्पितमित्याह-तैः उरुनिरवधिकफलो दक्षिणायाः पन्या मार्गोऽदर्शि दृष्टः । मोक्षा- थिभ्य आत्माख्यदक्षिणाया मार्गस्य फलं निरवधिकमिति ज्ञातमित्यर्थः । अत एव सावधिकफला दक्षिणा- मनिमश्रुत्याह-उच्चादिवीति ।। ६८ ॥ रा० टी०-गीताशास्त्रस्य व्याख्यान फलोक्त्या प्रशंसति-य इत्यादिद्वाभ्याम् । परमं गुह्यमति- गोप्यमिदं गीताशास्त्रं योऽधिकारी महकेपु मम भक्तेभ्योऽभिधारयति उपदेश्यति स इति योज्यम् । मयि परा भक्तिं कृत्वा मामेवैष्यति प्राप्स्यति । असंशय: नास्ति संशयः ॥१८॥ न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ।। ६९ ॥ त० टी०-मामेवैष्यतीत्युक्तं तत्र हेतुमाह-न चेति । मक्तेषु यो गीताशाखाभिधायकस्त- स्मादन्यो मनुष्येषु मध्ये कश्चिन्मे मम मियकृत्तमः अविशयेन मियकन्नास्ति' वर्तमानकाले, न च मे . तस्मादन्यः कश्चिलियतरो भुपि अस्मिलोके भविता भविष्यति ।। ६९ ॥ ग० टी०-किंच-नैति । वस्मारकेषु शास्त्रसंप्रदायकृतः सकाशाद्न्यो मनुष्येणु मध्ये कचिदपि में, . १३०८ श्रीमनगवद्गीसा [१०१८.७०) मम प्रियंकत्तमः अतिशयन प्रियछन् गद्विषयप्रीत्यतिशयबालारित वर्तमाने फाले, नापि प्रागासीतारा कश्चित् । न च कालान्तरे भक्तिा भविष्यति। ममापि तस्मादत्यः प्रियवरः प्रीत्यविशयविषयः फघिदप्यासीन अधुना घ भुषि लोकेऽस्मिन्नास्ति । न प कालान्तरे भवितेत्यागृत्त्या योग्यम् ॥ १९॥ २० टी०-एवं करुणथैव मुगुम्यो गोवाशानं चदा चोपदिशन्न स्तौति-न चेति । यो प्रविता तिर्मुमुक्षुम्यो निरुतविशेषणवयो गीतां तदधैं घोपदिशति, यस्माद्गीवाशालोपदेष्टुर्यवेरन्या प्रियकचमः मे प्रियमिष्टं मत्प्राप्तेरन्तर साधनं श्रयामननपानादि नित्यं प्रयानेन ये फुन्ति से प्रियतस्वेभ्यः सर्वेभ्योऽयुत्तमः प्रियकृत् प्रियछत्तमः । गनुष्येषु स्तोत्रमन्त्रजपजादिवहिरसाधनपरेपु कश्चिनारित, पहिरनसाधनपरेभ्योऽन्तरजसाधनपराः मम प्रियास्वेभ्यः सर्वेयः प्रियो गीतार्थोपदेष्टा । यत: स्वयं सीर्णः परेपामपि वारणाय प्रचस्ते तु स्वतरण एव प्रचारतस्मादयोव प्रियकृत्तमो नान्यः कश्चिदिदानी- मित्यर्थः । इतः परमपि में मम तस्मान्मम भफेभ्यो गीताशाग्नोपदेधुरन्या प्रियवरः प्रियछत्तरो भुवि भूलोके न भविता प न भविष्यति । संसारदुःससागरनिमनान मजलान् मुमुझून् दययैव ज्ञानशास्त्रायो- पदेशेन यो मानविद्यतिः समुद्धति स एव कालत्रयेऽपि मम परमेश्वरस्य प्रियछत्तम वि वात्सर्याय:॥१९॥ श्री०टी०-किंच-न चेति । तस्मान्मभ्यो मीताशास्त्रव्याख्यातुः सकाशादन्यो मनुष्येषु मध्ये कश्चिदपि मम प्रियकृत्तमोऽत्यन्त परितोपफर्ता नास्ति, नर कालान्तरे भनिता भविष्यति ममापि तस्मादन्यः प्रियवरोऽधुना भुवि वाचनास्ति न प फालान्तरेऽपि भविष्यतीत्यर्थः ॥ १२ ॥ स० टी०--तस्मान्मय्यनुरचेपु संप्रदायप्रवर्तकांत । पुरुपादपर: फधित्तेपु मध्ये ममेशितुः ॥ १ ॥ न चैपातिशयेनास्ति प्रियकत्सांप्रत फचित् ॥ नापि कश्चित्पुप नाहगांसीद्वा पुरुपोचमः ॥ २॥ नप कालान्तरे कश्चिद्धविष्यति नरोत्तमः ।। तामाकश्चिन्ममाप्यन्यो नासीनियरो भुवि ॥ ३ ॥ वर्तमाने. ऽधुना नास्ति न वाप्यने भविष्यति ॥ ४ ॥१९॥ भा० टी०-तनु सर्वेषां मुक्तिसाधनानां ध्यानस्य श्रेष्ठत्वात्तनिष्ठस्य मुमुक्षोः कुत एतच्छात्रसंप्रदाने प्रवृत्तिरित्याशइयाह-न चेति । न च तस्माच्छात्रसंप्रदायकृतो मनुष्येपु मनतिमत्सु वर्तमानेषु मध्ये क. चिन्ने विपतमोऽतिशयन प्रीतिकृचतोऽन्यो नास्त्येव नाप्यतीतध्वेतादृक् कश्चित् आसोदिति शेषः। तस्मादेनच्छात्रसंप्रदानकर्तुरन्यो द्वितीयो गुपि लोकेऽस्मिन्कालान्तरेऽपि न च भविता न भविष्यतीत्यर्थः । ध्यानकर्तुः श्रेष्ठत्वेऽपि एतच्छात्रसंप्रदानकर्तुरन्यस्य कालगयेऽपि श्रेष्ठतमत्त्वाभावादेतच्छास्त्रसंप्रदाने प्रवृत्तिरुचितैवेति भावः ॥ ६९ ॥ ५० टी०-अथैवमेवाभिप्रायमाह-न च तस्मादिति । तस्मान्मदुक्तं गुह्यमात्मतत्त्वं मद्भक्तेभ्यो दातुः पुरुपासकाशादन्यः कश्चिदपि मे प्रियकृत्तमो न चास्ति न वर्तते । कालान्तरेऽप्येवादप्रियकरो भुधि न भविता । अनेन बहुजननकृतसुकृतसामग्रीसंनाहव्यतिरेकेणताहग्वता न भविष्यतीति तस्य दुर्लभत्वमुक्तम् । तथा सर्वभजनापेक्षयेदं भजनं मम परमप्रीतये भवतीत्यर्थः ।। १९ ।। • रा०टी०-न चेति । तस्माद्गीताव्याख्यातुः मनुष्येपु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः न चास्ति नवास्ति । तस्मादन्यो मे प्रियतमो भविता च न, नाऽभूदिति च ज्ञेयम् । अत्र मनुष्येष्वित्युक्त्या देवाना फला. धिक्यं सूचयचि ॥ १९॥ अध्येष्यते च य इमं धयं संवादमावयोंः ॥ ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७०।। -- १३०९ [अ० १८ रो७०] वत्त्वप्रकाशिकाद्यष्टटीकोपेता त० टी०-एवमध्यापकस्य फलमुक्त्वा अध्येतुः फलमाह-अध्येष्यत इति । आवयोोसु- देवार्जुनयोरिमं ध धर्मादनपेतं संवादं सर्वशास्त्रार्यनिर्णयं यश्चाध्येष्यते यथोक्तार्थविशिष्टं सद्गुरोः सम्पगधार्यार्थीनुसंधानसहित नियमेन पठिष्यति, तेन पुंसा ज्ञानयज्ञेन चतुर्थाध्यायोक्तसयज्ञेषु न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रामिह विद्यते । सर्वकर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते । श्रेयान् द्रव्य- मयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप' इति विशिष्टतयोक्तेन अहमिष्टः पूजितः स्यामिति मे मतिर्मम निश्चयः । यद्यपि ज्ञानयज्ञस्त्वर्थविचारेणैव भवति तथाऽपि यो मद्भक्तः केवलपाठमात्रेणापि मां स्तौति सोऽपि स्वमाहात्म्यं शृण्वतो मम मियो भवति । यथा लोके कश्चिदल्पबुद्धिरपि कस्यचिन्महाजनस्य यथा- बुद्धि माहात्म्यं वाडूमात्रेणापि ख्यापयति स तस्य प्रियो भवति, तथा गीतापाउमात्रकृदपि ममैश्चर्य- गुणसूचकोऽयमिति में प्रियो भवतीत्यर्थः ।। ७० ॥ म०टी०-अध्यापकस्य फलमुक्त्वाऽध्येतुः फलमाह-अध्येष्यत इति । आवयोः संवादमिमं अन्धं धन्य धर्मादनपेतं योऽध्येष्यते जपरूपेण पठिष्यति ज्ञानयज्ञेन ज्ञानात्मकेन यशेन चतुर्थाध्यायोकेन द्रव्य. यज्ञादिश्रेष्ठेनाहं सर्वेश्वरः तेनाध्येत्रा इष्टः पूजितः स्यामिति मे मतिर्मम निश्चयः । यद्यप्यसौ गीतार्थमबु- ध्यमान एव जपति तथापि तच्छृण्वतो मम मामेवासौ प्रकाशयतीति बुद्धिर्भवति । अतो जपमानादपि ज्ञानयज्ञफलं मोक्षं लमते सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारा । अनुसन्धानपूर्वकं पठतस्तु साक्षादेव मोक्ष इति कि वक्तव्यमिति फलविधिरेवायं नार्थवादः । श्रेयान्द्रव्यमयायनाज्ञानयज्ञः परंवप' इति हि प्रागुतम् ॥७॥ शं० टी०- to-श्रद्धया भत्या च नित्यं यो मुमुक्षुगीतापारायणं ,करोति तस्य फलमाह ह-अध्येष्यत इति । तव च मम चावयोः संवाद सल्लापरूपं धन्य धर्मस्य मोक्षैकारणस्य ज्ञानस्य सिद्धिहेतुत्वा- धर्मादनपेतं धमिमं प्रन्धं गीताशास्त्र यश्च मुमुक्षुाह्मणादिः श्रद्धया भच्या चार्थज्ञानपूर्वकमध्ये- भ्यते नित्यं नियमेन पठिष्यतीत्यर्थः । तेनार्थज्ञानपूर्वक गतिाप्रवृत्ति कुर्वता मदनाहं परमेश्वरः सततं ज्ञानयज्ञेन ज्ञानमात्मैकत्वविषयं ज्ञानमेव यज्ञो ज्ञानयज्ञस्तेन ज्ञानयक्षेन इष्ट: आराधितः स्यां मवेयम् । गीता- पठनस्यार्थज्ञानपूर्वकत्वाद्ब्रह्मण एव तदर्थत्वात्तदनुसंधानेन यत्फलं कैवल्यलक्षणं तक्रमेण गीताध्येता प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ७० ॥ - श्री०टी०-पठतः फलमाह-अध्येष्यत इति । आवयोः कृष्णार्जुनयोः इमं धन्य धर्मादनपेतं संवाद योऽध्येष्यते जपरूपेण पठिष्यति तेन पुंसा सर्वयज्ञेभ्यः श्रेष्ठेन ज्ञानयज्ञेनाहमिष्टः स्यां भवेयमिति मे मतिः । यद्यप्यसौ गीतार्थमबुद्धयमान एव केवलं जपति तथापि मम वच्छृण्वनो मामेवासौ प्रकाशयतीति बुद्धिर्भवति । यथा लोके यहच्छयाऽपि कश्चित्कदाचित्कस्यचिन्नाम गृहाति तदासी मामेवायमायतीति मत्वा तत्पार्धमागच्छति तथाहमपि तस्य सन्निहितो भवेयम् । अत एव अजामिलचनबन्धुप्रमुखानां कथं- चिन्नामोच्चारणमात्रेण प्रसन्नोऽस्मि, तथैवास्यापि प्रसन्नो भयेयमित्यर्थः ॥ ७० ॥ स० टी०-फलम यापकस्योक्त्वा फलमध्येतुरुच्यते ।। य आक्योरिमं मन्य संवादात्मकमादरात् ॥१॥ स्वधर्मादनपेतं च पठिप्यति जपात्मना ॥ ज्ञानात्मकेन यज्ञेन तुर्याध्यायेरितेन वै ॥२॥ द्रव्ययज्ञा., दिश्रेष्ठेन सर्वयझेश्वरो ह्यहम् ॥ तेनाध्येनाऽविपुण्येन पूजितः स्यामितीशितुः ॥ ३ ॥ ममास्ति निन यस्तेन कृतमयोऽस्ति मत्प्रियः ॥ यद्यप्यसौ जपत्येवासुद्धधमानोऽर्थमाशयम् ॥ ४ ॥ तच्छृश्यतस्तथापीति भवत्येवं मतिर्मम ॥ प्रकाशयति मामेवाध्येताऽयमिति धीपतेः ॥ १ ॥ ज्ञानयज्ञकर्म तस्माजपमात्रादपी. रितम् ॥ चित्तशुद्धधात्मविज्ञानद्वारा मोक्षमुदारधीः ॥ ६ ॥ प्राप्नोति भगवद्गीताशाखाध्येता न संशयः। पठनोऽर्थानुसंधानपूर्वक युरुपस्य तु ॥ ७ ॥ साक्षादेव भवेन्मोक्ष इति किं वाच्यमित्ययम् । साक्षाफल .
--- भीमनगट्टीठा [म. १८ मो०७१] विधेरैवोदेशो नास्यार्थवादता ॥ ८ ॥ श्रेयान्द्रव्यमयाद्याज्ञानयज्ञः परंतप ॥ इत्येवं पूर्वमेयोकमतो नित्यं मुमुक्षुभिः॥९॥ अत्यादरेण.गीताख्यं शास्त्रमध्येयमित्यलम् ॥ १०॥ ७० ॥ भा० टी० एवमेतच्छात्रसंप्रदानकर्तुरध्यापकस्य फलमुक्त्वाऽध्येतुस्तदाह-अध्येप्यते इति । योऽध्येता धर्म्य धर्मादनपेवमिममावयोः संवादमध्येभ्यते च पठिप्यति वेन अध्येता शानयोनाहमिटः स्यां 'श्रेयान्द्र- व्यमयाद्याज्ञानयज्ञः' इति सर्वयझेभ्यः श्रेष्ठतमत्वेनाभिहितस्य देवतादिविषयज्ञानयज्ञस्य फलं कैवल्यं सत्तुल्यं देवताद्यात्मत्वमस्य फलं भवतीत्यर्थः । तेनाध्येता ज्ञानयज्ञफलतुल्यफलेनाध्ययनेनाइमिष्टः पूजिता स्या भवेयमिति मे मम मविनिश्चयः । फलविधिरेवायं न त्वर्थवादः ॥ ७० ॥ १० टी०-अथ गीताशास्त्रस्य पठनफलमाह-अध्येप्यते चेति । आवयोः कृष्णार्जुनयोरिमं धभ्य धर्मादनपेतं संवादं योऽध्येप्यते जपरूपेण पठिष्यति, वस्य जपयज्ञफलेन भवितव्यम् । परंतु तेन पुंसा सर्वयझेभ्यः श्रेष्ठेन ज्ञानयज्ञेनाइमिष्टः स्या ज्ञानयझेन संवर्पितो भवेयमिति मे मतिर्मम संमतम् । यद्य- प्यसौ गीतार्थमबुद्धाजपि (पि जपति) तथापि मप्रसादकर एव । यतो गीतारूपरन्दर्पिदेवतायुतो माला- मन्तः । तत्र छन्दास्यनुष्टुवादीनि, ऋपिवेदव्यासः, देववा श्रीकृष्णास्वन मन्त्रशब्दार्थस्तु-सन्तारं नायवेऽसौ मन्त्र प्रति व्युत्पत्या जपमात्रेणैव सिद्धिदो भवति, नहि तन मन्त्राों मृग्यते । तथा च यद्देवताको मन्न- स्तेन मन्त्रेण सा देवता प्रीयते । प्रकृते तु चित्तशुद्धिद्वाराई प्रीतः सन् स्वरूपं दर्शयामीत्यर्थः ।। ७० ।। रा० टी०-गीताध्ययनमपि फलस्थनेन प्रशंसति-अध्येप्यते चेति । धय॑ धारकत्वाद्धर्मो भगवान् । तदीयं धर्म्यम् । धर्मसाधनमिति वा । इममावयोः संगद गीताप्रवन्धं यः मध्येध्यते घ पठिष्यति च । वेन इंसा ज्ञानयज्ञेन ज्ञानाख्ययतेनाहमिष्टः पूजितः स्या भवेयं, इति मे मति. ॥ ५० ॥ श्रद्धावाननसूयश्व शृणुयादपि यो नरः॥ सोऽपि मुक्तः शुभाँलोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥ त. टी०-इदानीमन्यस्य पठतो योऽन्यः शृणोति तस्य फलमाह-श्रद्धावानिति । यः कश्चि- नरः अन्यस्य विदुषो चोथैः पठतः सकाशात् केवलं शृणुयादपि । कथंभूतः ? श्रद्धावान् साक्षाशग- वद्गीतत्वान्महाफलमिति विश्वासवान् । पुनरनसूयश्च-सम्यक्ष पठति, अयं पवितुमनई इति दोषारोपम- कुर्वन् यः शृणुयात्सोऽपि पापमुक्तः पुण्यकर्मणामश्वमेधादिपुण्यकर्मकृतां शुभाँल्लोकान् पुण्यफलभोग- भोग्यान्माप्नुयात् ।। ७१ ॥ म० डी०-प्रवक्तुरभ्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरिदानी फलं कथयति-श्रदेति । यो नरः कश्चिदपि अन्यस्योचैर्जपत: फारुणिकस्य सकाशात् श्रद्धावान् श्रद्धायुक्तः, तथा किमर्थमयमुच्चैर्जपत्यबद्धं वा जपतीति घोपदृष्ट्याऽसूर्यया रहितोऽनसुयश्च केवलं शृणुयादिम ग्रन्थम् अपिशब्दात् किमुतार्थज्ञानवान्-सोऽपि केवला. क्षरमात्रश्रोतापि मुक्तः पापैः शुभान् प्रशस्तान् लोकान् पुण्यकर्मणामश्वमेधादिकृतां प्राप्नुयात् । ज्ञानवतस्तु किं वाध्यमिति भावः ।। ७१॥ •० टी०-प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरिदानी फळमाह-श्रद्धावानिति । विचाराध्ययनयोरनधि- कारी योऽपि-यश्च नरो नरमात्राकारवान् मूदो वा वृद्धो वा स्त्रीजनो या, अन्वहं अद्धावान् वक्तरि गी- तायामपि परमेश्वरे च श्रद्धाभक्तिसंपन्नस्तथानस्युरसूयादिदोपरहिवो भूत्वा नित्यमिदं गीताशा वं शृणुयात । सोऽपि भौतापि ज्ञानाज्ञानकतेभ्या पापेभ्यो मुक्त, सन पुण्यकर्मणामश्वमेवादियागकर्तृणा ये लोकास्तान शुभान अत्यन्तसुराकरान् प्राप्नुवात् । नित्यं गीताश्रवणमात्रेण सत्यादिपुण्यलोकानू' प्राप्नोतीत्यर्थः ।। १ ।। .
[म. १८ ० ७२] वश्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेवा श्री० टी०-अन्यस्य जपतो योऽन्यः कश्चिच्छृणोवि वस्यापि फलमाह-श्रद्धावानिति । यो नरः श्रद्धायुक्तः केवले शृणुयादपि । श्रद्धावानपि कश्चिकिमर्थमुमर्जपति अवद्ध जपतीति वा दोपदृष्टिं करोति वघ्यावृत्त्यर्थमाह-अनसूयश्च । असूयाराहितो यः शृणुयात् सोऽपि सर्वैः पापैर्मुक्त: सन् अश्वमेघादिपुण्यकृतां लोकान्प्राप्नुयात् ॥ ७१ ॥ स० टी०-फलं प्रवक्तरध्येतुश्चोक्त्वा श्रोतुः फलं हरिः ॥ इदानी कथयत्यद्धा करुणारससागरः॥१॥ य: कथन मनुष्योऽपि जपतोऽन्यस्य कस्यचित् ।। उचैर्दयानिधेः, पुंसः सकाशाच्छ्रद्धयाऽन्वितः ॥ २ ॥ उच्चैनपत्यपद्धं वा किमर्थमिति दोपहम् ॥ असुया वतिहीनः सन्केवलं शृणुयादिमम् ॥ ३ ॥ प्रन्थम. चापिशब्दात्तु किमुतार्थावबोधयान् ॥ केवलाक्षरमात्रस्य श्रोवापि त्यक्तकिल्विपः ॥ ४ ॥ लोकान्प्रशस्ता- नाप्नोति सोऽश्वमेधादियाजिनाम् ॥ किं वाच्यं भगवद्गीताशास्त्रार्थविद इत्यलम् ॥ ५ ॥ १ ॥ भा० टी०-प्रवक्तुरध्येतुश्च फलमुक्त्वा श्रोतुरपि फलं कथयति-श्रद्धावानिति । श्रद्धावान् श्रद्द- धानोऽनसूयश्च-पौरुषेयत्वात् श्रुतितो निकृष्टमिदमिति दोषदृष्टिरसूया-तद्रहितः सनिमं अन्यं यो नरो यः कश्चिच्छृणुयादपि । नरशब्देनेवच्छ्रवणेनापि यो हीनो नासो नरः किंतु पशुरिति सूचयति । सोऽपि मुक्तः पातफारहित: पुण्यकर्मणामग्निहोत्राश्वमेधादिपुग्यकर्मवता लोकान् शुभान प्रशस्तान् प्राप्नुयात् । अपिशब्दात् किमुतार्थज्ञानवान् ।। ७१ ॥ प० टी०-अथ श्रवणफलमाह-श्रद्धावानिति । यो नरः श्रद्धायुक्तः सन् केवलं शृणुयादपि कश्चिकिम- थमयमुधैर्भपत्यवद्धं वेति दोषदृष्टपा शृणोति तन्निवृत्यर्थमाह-अनसूयश्चेति । असूयारहितः शृणुयात्सोऽपि सर्वेः पापैर्मुक्तः सन्मश्वमेधादिपुण्यकृतां लोकान् प्राप्नुयात् ।। ७१ ॥ रा० टी०-गीवानवणमपि फलोक्त्या प्रशंसति-श्रद्धावानिति । अस्मादस्ति मे फलमित्यास्तिक्यबु- द्धिमान् । अनसूयः भसूयादिदोपरहितश्च नरः इममावयोः संवादं शृणुयाचेदपि । सोऽपि मुक्तः सन्पुण्य- कर्मणां शुभान्छोकानवाप्नुयात् । अत्र सोऽपि श्रवणं कुर्वन्नपि मुक्तः । किमु तदध्येतेत्युक्त्या श्रवणं कुर्व- तोऽपि तदध्येतुर्मुक्तावधिकसुखमिति सूचितम् । तथा तस्मादपि व्याख्यातुर्मुनुप्यस्याधिकं सुखम् । ततो देवानामिति ज्ञातव्यम् ॥ ७१ ॥ कचिदेतच्छ्रुतं पार्थ ! त्वयैकाग्रेण चेतसा ॥ कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रणष्टस्ते धनंजय ! ॥ ७२ ॥ त० टी०-एतद्गीताशास्त्रस्य वक्तुरध्येतुः श्रोतुश्च फलमुक्तम् । इदांनी यावच्छिप्यस्याज्ञानं न नश्येत्तावद्गुरुणा शिष्यः पुनरुपदेष्टव्य इति गुरुधर्मे शिक्षयन्सर्वज्ञोऽपि भगवानर्जुनं मोहनिवृत्ति पृच्छति- [कचिदिति । ] कचिदिति प्रश्ने । एतन्मयोक्तं गुह्यतममज्ञाननाशनं गीताशास्त्र हे पार्थ ! स्वयकाने णाविक्षिप्तेन चेतसा श्रुतं किं, साक्तिभिरषघारितम् ? तेन तयाज्ञानसंमोहः अज्ञानहेतुको विपर्ययः भगष्टः कचित हे धनञ्जय ? येन संमूढः सन्न योत्स्यामीत्युक्तवान्स यदि ननाः स्यात्तर्हि पुनरुपदेश्यामीति भावः॥७२॥ म०टी०-शिष्यस्य ज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तं गुरुणा कारुणिकेन प्रयास: कार्य इति गुरोधर्म शिक्षरितुं सर्वज्ञोऽपि पुनरुपदेशापेक्षा नास्तीवि ज्ञापनाय पृच्छवि-कचिदिति । कचिदिति प्रश्ने । एतन्मयोक्तं गीताशास्त्रमेकामेण व्यासहरहितेन चेतसा हे पार्थ ! त्वया किं श्रुतमर्थतोऽवधारितम् ? कचित्-कि अज्ञान- संमोहो अज्ञाननिमित्तः संमोहो विपर्यय: अज्ञाननाशात् प्रनष्टः प्रकर्पण पुनरुत्पचिविरोधित्वेन नष्टरवे वव हे धनंजय ? यदि स्यात् पुनरुपदेशं करिष्यामीत्यभिप्रायः ॥ ७२ ॥ .
श्रीमनगवद्गीता [अ० १८० ७२ शं० टी०-शास्त्रार्थ सम्यग्ज्ञाते शिप्य: कृतार्थ एव स्यात् , अज्ञाते तु प्रकारान्तरेण योधयित्वा तदज्ञान- विपरीतग्रहणादिदोपमपास्य तस्य कृतार्थता संपादनीया-अयमाचार्यस्य धर्म इत्युपदेष्णा सूचयितुमर्जुनस्य स्वबोधितार्थग्रहणं तदग्रहणं च विज्ञातुमिच्छया पृच्छति श्रीभगवान् कचिदिति । हे पार्थ तत्त्वजिज्ञासु- ना त्वया एतन्मयोपदिष्टामात्मतत्त्वप्रकाशकवाक्यजातमेकाप्रेण सावधानेन चेतसा श्रुतं कचिकि ?-मयोकं सर्व सावधानेन गृहीतं न गृहीतं वा वक्तव्यमित्यर्थः । एवमुपदेशं पृष्ट्वा तत्कार्य पृच्छति-कचिदिति । ते तवाज्ञानसंमोहः अज्ञानात्मतत्त्वावरकं, तिमिरवदावरणलक्षणं तन्निमित्तम: संमोहो विपरीतग्रहः नष्टो नाशं गतः कचित् ? मयोक्तवचनजन्यज्ञानेन तन वुद्धिनमो नष्टः किं न वेत्यर्थः ।। ७२ ॥ श्री०टी०-सम्यग्योधानुत्पत्तो पुनरुपदेक्ष्यामीत्याशयेनाइ-कचिदिति । कचिदितिप्रश्नार्थे । अज्ञा- नसंमोहः तत्वाज्ञानकता विपर्ययः । स्पष्टमन्यत् ॥ ७२ ॥ स० टी०-विज्ञानोत्पत्तिपर्यन्तं शिष्यस्यानुगतस्य च ॥सम्यक्प्रयासः कर्तव्यो गुरुणा करुणाधिना ॥१॥ इति शिक्षयितुं सम्यागुरोधर्म कृपानिधिः ॥ सर्वशोऽपि स्वयं शिष्यं पृच्छति स्वानुगं जयम् ॥ २ ॥ एतन्मयोक गीताख्यं शास्त्रं हे पार्थ चेतसा ।। व्यासंगान्तरशून्येन किं त्वया श्रतमर्थतः ।। ३ ।। अवधा- रितमेतत्कि मोहोऽज्ञाननिमित्तकः ।। अज्ञाननाशतो नष्टः प्रकणैव कि तव ॥ ४ ॥ यदर्थोऽयं ममायास उपदेष्टुतया तथा ॥ तवापि श्रवणायास: स किं नष्टो धनंजय ॥ ५॥ यदि स्यादुपदेशं वे करिप्यामि पुनर्बाहम् ॥ ६ ॥७२॥ भा० टी०-तं तु प्रयत्नमास्थाय सर्वप्रकारेण शिष्यः कृतार्थः कर्तव्य इत्याचार्यधर्म दर्शयितुमुपदि- धार्थाग्रहणे ज्ञाते पुनहियिष्याम्युपायान्तरेणेत्यभिप्रायवान् शिष्यस्य शास्त्रार्थमहणं विवित्सुः पृच्छति- कचिदिति । कचिदिति प्रशस्तप्रश्नार्थे । एकामेण चेतसा चित्तेन त्वया एतन्मयोकं श्रुतं श्रवणेनावधा- रितं किंवा प्रमादेन नावधारितम् ? अज्ञानसंमोहः अज्ञाननिमिचः संमोह: अविवेकस्वभावः कञ्चिदिति कि तेऽज्ञाननाशाप्रनष्टः प्रकर्पण पुनरुत्पत्तिविरोधित्त्वेन नएः ? यदर्थोऽयं तव शास्त्रश्रवणायासो मम चो- पदेष्टुत्वायास: प्रकृतः । हे पार्थेति संवोधयन् स्त्रीस्वभावशोकमोदनिवर्तकमेतत्त्वयकाप्रेण चेतसा श्रुतमिति सूचयति । यदि त्वया न श्रुतं स्यात्तर्हि पुनर्गया वक्तव्यं, पृथापुत्रेण प्रेमापदेन त्वया यावन्नावधारित वावन्मया पुन: श्रावणीयमिति वा संबोधनाशयः । मदाज्ञया लोकोद्धारार्थ त्वया नीस्वभावो शोकमोहा- वङ्गीकृतौ । लोकोद्धारोपायस्य च मया प्रोक्तस्यैतस्य त्वयैकाग्रेण मनसा श्रुतत्वादिदानी तो विहाय स्वस्वभा- वमाविर्भावयेति पार्थेतिसंवोधनस्य गूढाभिसंधि, । धनंजयेवि संवोधयन् यदि ते मोहः प्रनष्टस्तहि धनं- जयो भव, नोचे पुनस्तन्नाशाय यत्प्रष्टव्यं तत्पृच्छेति सूचयति । गुढाभिसंधिपक्षे 'वीरोऽनन्तो धनंजयः इत्यत्रोक्तेन धनंजयेन स्वनाम्ना संबोधयन् मदवतारस्य तवाज्ञाननिमित्तकमोहाभावान्मदाज्ञया लोकोपकारा- याङ्गीकृतोऽज्ञानसंमोहः कचित्प्रनष्ट.-अज्ञाननिमित्तकसंमोहप्रणाशनसामर्थ्य मदुपदेशस्यास्ति कचिदिति .ध्वनयति ॥ ७२॥ प० टी०-सम्यग्बोधानुत्पत्तौ पुनरुपदेश्यामोत्याशयेनाह-कचिदिति । अज्ञानसंमोहस्ते प्रनप्दः कचि. दिति प्रभाविपर्ययः । स्पष्टमन्यत् ।। ७२ ।। रा० टी०-एतावानुपर्देशः अरण्यरुदितवजातो न भवति किलतिभावेन पृच्छति-कचिदिति । किमित्यर्थेऽव्ययभवत् । हे पार्थ त्वयैकामेण चेतसा एतन्मदुक्तं गीताप्रमेयं श्रुतं किम् ? अज्ञानोत्थः संमोहः कच्चिचे प्रणतः ।। ७२॥
. [अ० १८ लो०७३] वत्त्वप्रकाशिकायष्टीकोपेता अर्जुन उवाच-नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाऽच्युत ! ॥ स्थितोऽस्मिगतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥ त० टी०-एवं पृष्टः स्वकृतार्थतामर्जुन उवाच नष्ट इति । य आत्मविपयो मोहोऽन्यथा- ज्ञानजो विपर्ययोऽभूत्स नष्टः । तत्र हेतुमाइ-त्वत्मसादादिति । मोहनाशे गमकमाइ-स्मृतिर्ल- ब्धेति । यथाऽवस्थिततत्त्वज्ञानमवाप्तं, तच पूर्वजन्मन्यासीनररूपनारायणसखित्वात् । पूर्वसिद्धमेवेह जन्मान विनष्टं पुनर्भगवत्कृपया लब्धमतः स्मृतिर्लब्धेत्युक्तम् । मम ज्ञानं च्युतं, त्वं तु सदैकरसज्ञान इत्यभिमायेण संबोधपति-हे अच्युतेति । एतेन त्वत्प्रसादात्सत्यज्ञानानन्दस्वरूपमजहद्गुणशक्तिकं सर्वनियन्तारं सर्वस्य भवाभवहेतुं परमात्मानं साक्षाद्भगवन्तं वासुदेवं त्वां जानामीति सूचितम् । स्मृतिलामस्य "स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विममोक्षः" इति श्रुत्युक्तं संदेहनिटत्तिरूपं फलमाह-स्थितो- ऽस्मि गतसंदेह इति । गता मुक्ताः संदेहाः संशया आत्मपरमात्मस्वरूपगुणसंवन्धमोक्षमाप्ति- साधनविषया यस्य सोऽहं स्थितोऽस्मि, निश्चितत्वयुक्तशास्त्रार्थी निःसंशयोऽस्मीत्यर्थः । तथा हि 'न सेवाहम् । इत्यादिनाऽऽत्मनित्यत्वनानात्वाविनाशित्वनिश्चयादनित्यत्वैकत्वपिनाशित्वसंशयो नष्टः । तत 'एपा तेऽभिहिता साङ्खथे' इत्यारभ्य यावदध्यायसमाप्ति पूर्वोक्तात्मज्ञानमाप्तिसाधनतया कर्म- योगज्ञानयोगभक्तियोगाः संक्षिप्य दर्शिता ज्ञाताः। तत्र कर्मज्ञानाधिकारिविशेषानिश्चयजामत्संदेह- निरासपूर्वकासंगकर्मानुष्ठानतन्माहात्म्यकर्माकर्मादिज्ञानं, नदनासत्या नैष्कर्मकर्मणि ब्रह्मदृष्टिर्यज्ञभेद- स्तज्ज्ञानमाहात्म्यमात्मनोऽकर्तृत्वानुसंधानेन कर्मानुष्ठानसंन्यासयोरैपयं, देहेन्द्रियमनोनियमनेन ध्यानयो- गनिप्पत्त्या सर्वत्र समात्मस्वरूपानुसंधानायाभ्यासवैराग्यभगवद्भक्तियोयनिष्ठेति तृतीयादिपष्ठाध्याया- न्तेन साधनसंशयो गतः । ततो भजनीयभगवत्पदार्थतनक्तिनिरूपणोपयुक्तचिदचिल्लक्षणपरापरप्रतिद्व- यविभागः स्वस्य तत्स्वामित्वसर्वात्मत्वसर्वकारणत्वसर्वपरमत्वं गुणमायया जगन्मोहकत्वं स्वाश्रितानां ततो मोचकत्वं भक्ताभक्तादिभेदतत्फलकथनेनात्मनः सर्वमुमुक्षूपास्यत्वं परमफलरूपत्वं भक्तिमाहा- त्म्यानन्तविभूत्यैश्चर्य ब्रह्मचानदेवादिसुरासुरनरदुर्दर्शदिव्यापाकृताछुतैश्वररूपदर्शनं भक्त्यैकलय भक्तमुलभतं भक्तसंसारोद्धारकत्वं भक्तप्रियमिति सप्तमादिद्वादशाध्यायाम्तेन निश्चयाद्भगवद्विभूतिगुणै- श्वर्यभक्तलक्षणभक्तिमाप्तिविपयकसंशयो गतः । ततः परापरप्रकृती एव क्षेत्रक्षेत्रज्ञशब्दवाच्ये तयोर्भ- गवच्छक्तित्वेन स्वरूपेण भिन्नत्वेऽपि पृथस्थितिमत्त्यनईतया तचादात्म्य क्षेत्रस्वरूपकथनपूर्वक क्षेत्रज्ञस्वरूपज्ञानोपायममानित्वादिविंशकं ज्ञानशब्दवाच्यं तत्स्वरूपं तु सदसद्विलक्षणं स्वयंप्रकाशं नित्यमेव । तथाविधस्य सदसोनिजन्ममु प्रकृत्युद्भवस्वादिगुणसङ्गः कारणं, तस्याणुरिमाणकत्वेन देहाद्यावरणे धर्मभूतज्ञानेन सर्वक्षेत्रप्रकाशकत्वं, तबन्धकगुणानामुत्पत्तौ खस्य .हेतुत्वं तल्लक्षणवन्धक त्वमकारतत्कार्यभेदगुणातीतलक्षणगुणातिक्रमणप्रकारो गुणातीतस्य ब्रह्मभावमाप्तिरिति त्रयोदशचतुर्द- शाध्यायाभ्यां निश्चयात् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञभूतयोः प्रकृतिपुरुपयोः परमात्मना केवलभेदो वैश्यं वेति संवन्ध- विषयः, पुरुषस्य पारमार्थिक स्वरूपं कीदृशं ? कथं संसार: ? कथं वा मोक्षः ? कीदृशो मोक्षा? इति स्वरूपविषयश्च संशयो गतः । ततो ब्रह्मभावमाप्त्यर्हस्य पुरुषस्य बन्धनिराम्हेतुबैराग्याथै संसारस्या- श्वत्थरूपकेण ज्ञानासिना छेदनपूर्वकपरमपुरुषमपत्त्या मानमोहादित्यागेन परमपदमाप्तिः। प्रपद्यस्य पाप्यभूतस्य परमात्मनः सर्वचेतनाचेतनात्मत्वसर्वभकाशकत्वसर्वजीवनहेतुत्ववेदवेद्यत्ववेदान्ताचार्य, त्वसर्ववेदार्थवेत्तृत्वक्षराक्षरपुरुपद्वयातीतत्वेन पुरुषोत्तमत्वं, तथा ज्ञातुः सर्वगत्वं कृतकृत्यत्वमिति पञ्चदशेन'
श्रीमद्भगवद्गीता
[स. १८ लो० ७३]
निश्चपादनादिसंसारस्य कथं केन साधनेन वा निवृत्तिः स्यात, परमात्मा किस्वरूपः कीदृशगुणशक्त्यै-
धर्यवानिति संशयो गतः । तथा उक्ततत्त्वाधिकार्यनधिकारिनिर्णयाय हेयोपादेयदैवासुरसंपदयविभाग-
निरूपणं, देव्याः संपदो मोक्षहेतुत्वम्, आमुर्याः कामक्रोपलोभमूलकत्वेन नित्यामुरभावद्धया अधमग-
तिनारक्यादियोनिमाप्तिफलम् । ततो हेयोपादेपमदर्शनार्थ सत्त्वादिगुणत्रयविभागेन श्रद्धाऽहारयज्ञतपो-
दानविभाग इति पोडशाद्यध्यायद्वयेन निश्चयः । तेन तत्त्वज्ञानस्य कोऽधिकारी को वाऽनधिकारी किं
हेयं किमुपादेयमिति संदेहो नष्टः । ततोऽन्तिमेऽस्मिन्नध्याये सर्वाध्यायोक्तार्थ संगृह्य ग्राहयितुं तावत्प-
राभक्त्यनधिकारिणामविशुद्धबुद्धियुक्तानां यज्ञदानतपादिकर्मनिष्ठयैव थेयो, नान्यथा । विशुद्धबुद्धया-
दियुक्तस्य विगतकामक्रोधरागद्वेपस्य ब्रह्मभूतस्य पराभक्तिलाभः, तयैव त्वत्स्वरूपगुणैश्वर्ययाधात्म्यज्ञानेन
त्वमाप्तिः, सर्वजीवानां त्वनियम्यत्वं, तव स्वतन्त्रत्वं, निरङ्कुशैश्चर्यक्त्वम् । अतस्त्वदाज्ञानुवर्तिनोऽनन्य-
शरणस्य निरतिशयप्रेम्णा त्वां भजतो निष्कामस्य स्वेच्छया किंचित् कर्म कुर्वतोऽकुर्वतो वा न किंचित्
पापस्पर्शस्त्वत्माप्तिसंदेहश्चेति त्वद्वचनानिश्चिततत्त्वो निर्गतसंदेहो निर्भयोऽस्मि । अतस्त्वच्छासने याव-
जीव स्थितोऽस्मि, युद्धादिविपयं सर्व त्वद्वचनं मरिष्ये, परमगुरोर्भगवतस्तवाज्ञापालनमेव करिष्ये
इत्यर्थः । अत्र मामेकं शरणं व्रजेति शरणागतावेव शास्त्र(स्य)समापनात् " शिष्यस्तेऽहं शाधि मा त्वां
प्रपन्नम्" इत्युपक्रमेऽपि प्रपन्नशब्देन शरणागतस्यैवोपदेश्यत्वज्ञापनात् “निवासः शरणं महत्" इति
मध्येऽपि उपास्यस्य सर्वशरणत्वाभिधानाच्छरणागतिपरमेवेदं गीताशास्त्रमित्यवगम्यते । सा च पड्विधा
"आनुकूल्यस्य संकल्पः प्रतिकूलस्प वर्जनम् । रक्षिप्यतीति विश्वासो गोप्तृत्ववरणं तथा ।। आत्मनि-
क्षेपकार्पण्ये पविधा शरणागतिः" इति नारदपञ्चरात्रवचनात् । तत्रानुकूल्यादिपञ्चाङ्गानि, आत्मनिक्षेपो-
ऽट्टी। तथा च "सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः" इत्यादिनाऽऽनुकूल्यसंकल्पाख्यः प्रथमोऽङ्गो
दर्शितः । हेयतया आसुरीसंपत्पतिपादनम् । अन्यत्रापि निवरत्वादिमतिपादन प्रातिकूल्यवर्जनारुयो
द्वितीयोऽङ्गो दर्शितः । " योगक्षेमं वहाम्यहम्" इति विश्वासाख्यस्तृतीयोऽनो दर्शितः । " पिताऽसि
लोकस्य चराचरस्य' इत्यादिना "प्रसीद देवेश! जगनिवास' इत्यन्तेन गोप्तृत्ववरणाख्यथतुर्थोऽङ्गो
दर्शितः । " दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जननिवास!। नहि प्रजानामि तव मट्ट-
तिम्" इति कार्पण्यरूपः पञ्चमोऽङ्गो दर्शितः । आत्मात्मीयस्य सर्वस्य विधिश्रद्धया भगवत्यर्पणमात्मनि-
क्षेपः स च "तमेव चाद्यं पुरुपं प्रपद्ये मामेकं शरणं व्रज" इति पष्ठोऽङ्गो दर्शितः। अवशिष्टो ज्ञानकर्म-
भक्तिप्रतिपादको ग्रन्थः प्रपत्तृप्रपदनमपत्तव्यस्वरूपगुणाङ्गैश्वर्यप्रतिपादनेन तत्रैव परम्परया संवध्यते
इति विवेकः । अथवोपास्यस्वरूपमुपासकस्वरूपं तदुपासनस्वरूपं तदुपासनफलं तद्विरोधिस्वरूपमित्यः
थपञ्चकं निरूपितम् । तत्र सप्तमाध्यायादिषु तत्र तत्र सर्वज्ञसर्वकारणसर्वनियन्तृभक्तवात्सल्यादिगुणार्णवं
भगवत्तत्त्वमुपास्यस्वरूपमुक्तम् । १ । तत्माप्तृतया तत्र तंत्र जीवक्षेत्रज्ञाक्षरपुरुषादिशब्दवाच्यं ज्ञानं
ज्ञातृप्रतिशरीरभिन्नमसंख्यक भगवदधीनं वन्धमोक्षाई नित्यमित्युपासकस्य स्वरूप निीतम् । २ ।
तत्माप्तिसाधनं कर्मज्ञानभक्तिमपत्तिगुर्वनुवृत्तिभेदात् पञ्चविधं तदुपासनं तत्र तत्र निर्दिष्टम् । ३ ।
निशिपाविद्यानिवृत्या परमानन्दस्वरूपतत्साधर्म्यभगवद्भावादिशब्दाभिधेयं मोक्षाख्यं तदुपासनजं तत्क-
पाफलम् । ४ । एतचतुष्टयस्य प्रतिबन्धकं कामक्रोधरागद्वेषादिकमामुरीसंपञ्च विरोधस्वरूपमित्यर्थपञ्च-
कमेव गीतायां श्रीभगवतोपदिष्टमिति बोध्यम् । ५ । तदुक्तं भगवता आधाचार्येण श्रीनिम्बादित्येन-
":उपास्यरूपं तदुपासकस्य च कृपाफलं भक्तिरसस्ततः परम् । विरोधिनो रूपमथैतदरप्तेर्तेया इमर्धा
अपि पञ्च साधुभिः" इति ॥७३॥
[ अ० १८ लो० ७३] तत्वप्रकाशिकायष्टटौकोपेवा म०टी०-एवं पृष्टः कृतार्थत्वेन पुनरुपदेशानपेक्षतामात्मनः अर्जुन उवाच-नष्ट इति । नष्ट उच्छिन्नो मोहः अज्ञानतो विपर्ययः । तन्नाशकमाइ-स्मृति:ब्धा त्वप्रसादान्मया । यस्मात्त्वदुपेदशादात्मज्ञानं लम्ब सर्वसंशयानाक्रान्ततया प्राप्तमतः सर्वप्रतिवन्धशून्येनात्मज्ञानेन मोहो नष्ट इत्यर्थः । हे अच्युत ! आत्मत्वेन निश्चितत्वात् वियोगायोग्य । "स्मृतिलम्भे सर्वप्रन्यानां विप्रमोक्षः" इति श्रुत्यर्थमनुभवन्नाह-स्थितोस्मि गवसं- देहः निवृत्तसर्वसंदेहः स्थितोऽस्मि युद्धकर्तव्यतारूपे त्वच्छासने । यावजीवं च करिष्ये वचनं तव-भगवतः परमगुरोराज्ञा पालयिन्यामीति प्रयाससाफल्यकथनेन भगवन्तमर्जुनः परितोपयामास । अनेन गीताशा- साध्यायिनो भगवत्प्रसादादवायं मोक्षफलपर्यन्वं ज्ञानं भवतीति शास्त्रफलमुपसंहृतं " तद्धास्य विज. शौ" इतिवत् ॥ ७३ ॥ शं० टी०-एवं पृष्टपन्तं भगवन्तं प्रति कार्यकथनेन फारणसिद्विरुक्तप्रायेवि मत्त्वा भगवदुपदेशजन्य- शानफलं वक्तुमर्जुन उवाच-नट इति । जन्मजरामरणदुःखप्रवाहकारणं सर्वानहेतुर्दुरन्तो मोहः स्वाज्ञानसं- भवः शावरवत्सयोऽपि हे अच्युत कूटस्थभगवन् त्वासादात् त्वदुपदेशजन्यज्ञानान्नष्टः स्वरूपेणादर्शनं गत इत्यर्थः । एवं भगवदुपदिष्टवास्यजातस्य तदर्यस्य च महणं कार्यप्रकाशनेनैव ज्ञापयित्वा तत्प्रसादसिद्धायाः स्वाक्षानतत्कानिवृतेः फलमाह-स्मृविरिति । अधिकृतकर्तृवभोक्तृत्वादिसर्पसंसारनिर्मुक्तो नित्यफूट- स्योऽसङ्गचिद्रूपो निष्कलो निष्क्रियः शान्तो य आत्मा सर्ववेदान्तप्रसिद्धः स एवाहमस्मीति स्वात्मतत्त्व- विपया स्मृतिलंधा, यथा प्रमादाद्विस्मृतार्थस्यातवाक्येन स्मृतिस्तथा त्वत्प्रसादान्मया लब्धा भवति । सर्वहृदय- पन्थीनां निर्मूलनकारणं यतस्ततो गतसंदेहः गतोऽभावंगतः संदेहः स्वजनवधो दोपः कर्तुं शक्यते वा न वा, मत्वेन कर्मणा लेपोऽस्ति वा न वा, कर्तृत्वमात्मनोऽस्ति वा न वेत्येवमादिद्विकोटिकः स्वतत्त्वनिर्धारण- विषय यस्य सोऽहं गतसंदेहः । गतसंदेर इत्यनेन विपरीतभावस्य तत्कारणस्य च नि:शेषनिवृत्तिः सूचिता । सति विपरीवभावे तत्कारणसहावे च संदेहनिवृत्त्यसंभवादतः संदेहनाशात्सर्वविकल्पनाशः सिद्धो भवति । एवं त्वदुपदेशजनितविज्ञानेन सर्वानर्थवीजे मोहे सकारणे विनष्टे सति संप्राप्तात्मयाथास्यविज्ञानोऽहं गवसंदेहः सन्नक्षोभ्यस्वभावेन स्थितोऽन्यविद्यातत्कार्यवद्धर्मतत्कर्मतवस्थानिर्मुक्ता विक्रियात्मस्वरूप एव । श्व:परं मम न किंचिरज्ञातव्यं प्राप्तव्यं वापीपदस्ति, तथापि मद्गुरोरीश्वरस्य तव वचनं करिष्ये । नन्वविद्या- संवन्धनिर्मुक्तेनार्जुनेन करिष्ये वचनं तवेति यदुक्तं तद्युक्तमेव, मुक्तस्य कर्तव्याऽसंभवान्ममेदमीश्वरस्य वचनं कर्तव्यमिति करणमधर्मो, न तु तत्त्वज्ञधर्मः तज्ज्ञस्यायमीश्वरोऽहं तद्वचनं करिष्य इति भेदज्ञाना. संभवात् । नाइमेवेदं सर्वमिति सर्वमात्मानमेव विजानतो विदुपस्त्वयमीश्वर इति तस्येदं वचनमहं करिष्य इति भेदज्ञानं संभावयितुं शक्यते, कार्यशेपो वा “ तस्य कार्य न विद्यते " इति विदुपः कृत्यनिषेधात् । "नैवास्ति किंचित्कर्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित्" इति कृत्यशेषवतोऽज्ञत्वस्मरणाच । ततो ज्ञानित्वं कर्मि- त्वं चैकस्य न संभवति, परस्परविरुद्धं सम्राटूत्वं भिक्षुत्वं चैकस्य यथा तद्वत् । यद्यर्जुनस्य कर्तव्यशेषस्त. हि शत्वमेव न संभवति । ननु नष्टो मोहः रमतिलैब्येत्यज्ञाननिवृत्तिज्ञानप्राप्तिश्च• कण्ठरवेणोक्ता, अतो. ऽस्त्येव जत्वमिति चेन्न करिप्ये वचनं तवेत्येवमपि कण्ठरवेणैवोतवादज्ञत्वमपि संभवति । नन्विष्टोऽसि मे दृदमिति हितबुद्धया दयया च मद्याजी भवेति भगवतोक्तहितवचनकरणं तज्ज्ञस्याप्यर्जुनस्य युक्तमेवेति चेन्न । वदारु विषयत्वादारूढस्यास्यानुपयुक्तेः । मद्यजनमारुरुशोः कर्तव्यमित्युक्तकर्माचरणमर्जुनस्यारुढ- स्यानुपयुक्तमेवेति चेत्त्वयोक्तं सत्यम् । ब्रह्मविद आरूढस्य कर्मानुपयुक्तमेव तथाप्यधिकारिकत्वादर्जुनस्य तदु- पपद्यते । यथा जनकाश्वपतिप्रभृतीना मुक्तानामन्याधिकारिकाणा लोकसंग्रहचिकीर्पया कर्माचरणं तद्वदर्जुन- स्याप्याधिकारिकस्य लोकहिताय कर्माचरणमविरुद्धमेव लोकसंमहमेवापि संपश्यन् कर्तुमहसि । यपदाचरति 2 [अ० १८ श्लो० ७४] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता प० टी०-कृतार्थः सनर्जुन उवाच-नष्ट इति । आत्मविपयो मोहो नष्टः । यत: अचमहमस्मीति स्वरूपानुसंधानरूपा स्मृतिस्त्वत्मसादान्मया लब्धा , अतः स्थितोऽस्मि युद्धायोत्थितोऽस्मि । गतः स्वधर्मविषये संदेहो यस्य सोऽहं तवाज्ञां करोमि ॥ ७३ ॥ • रा० टी०-इति पृष्ठस्योत्तरमाहार्जुन:-नष्ट इति । नष्टो मोहः प्रथमाध्यायोक्तो विपरीवज्ञानलक्षणो मोहो नष्टः । त्वत्प्रसादान्मया स्मृतिलब्धा । नारायणद्विट्तदनुवन्धिनिग्रहः परमो धर्मोऽवश्यं कार्य एवेत्यादि- स्मृतिर्मम जाताऽस्ति, । गतसंदेहः युद्धे स्थितोऽस्मि । यथेच्छसि तथा कुर्विति भगवत्कृताक्षेपपरिहाराय भग- वन्तमनुसरति-करिष्ये वचनं तवेति ।। ७३ ॥ सञ्जय उवाच-इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥ संवादमिममश्रौपमद्भुतं रोमईपणम् ।। ७४ ॥ त० टी०-तदेवं सर्वं श्रीकृष्णार्जुनसंवादं धृतराष्ट्रापावेद्य स्वयमनुसंदधानः सञ्जय उवाच- इतीति । इत्येवमुक्तमकारेण वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन इत्युभयोविशेषणम् । अद्भुतमाश्चर्यरूपमत एव रोमहर्पणं रोमाञ्चकर संवादं यथोक्तमहमश्रीपं श्रुतवानस्मि ॥ ७४ ॥ म०टी०-समाप्तः शास्त्रार्थः । कथासंवन्धमिदानीमनुसंधानः सञ्जय उवाच -इतीति । अनुतं चेतसो विस्मयाख्यविकारकर लोकेष्वसंभाव्यमानत्वात् । लोमहर्पण शरीरस्य रोमाञ्चायविकारकर सेनातिपरिपुष्टत्वं विस्मयस्य दर्शितम् । स्पष्टमन्यतू ॥ ४ ॥ शं० टी०-एवमर्जुनस्याविद्यातत्कार्यभ्रममार्जनायोपान्तस्य ज्ञानशास्त्रस्य तदर्थस्य च परिसमाप्ति झात्या तच्छ्रवणतदर्थानुभवसंजावात्मानन्धरसातिरेकेण स्वगुरोरनुग्रहं स्वतृप्ति पाविष्कर्तुं कथासंदर्भमवता- रयितुं च संजय उवाच-इतीति । " सर्वभूताधिवास यद्भूतेषु च वसत्यभि " इतिश्रुतलक्षणलक्षितत्वा- द्वासुदेवः सर्वज्ञः परमेश्वरस्तस्य वासुदेवस्य महात्मनो महानुभावस्य पार्थस्य चार्जुनस्य इत्युकप्रकारक संवादं प्रश्नप्रतिवचनरूपमिमं गीतामन्यमद्भुतमत्यन्तविस्मयकरं रोमहर्पणमश्रुवपूर्ववेनातिगम्भीरत्वेनामे. यार्थत्वेनातिलोकत्वेनाद्भुतरसत्वेन च रोमाश्यावह वयोः संवादमहमीपं श्रुतवानस्मि ॥ ७ ॥ श्री. टी०-तदेवं धृतराष्ट्र प्रति श्रीकृष्णार्जुनसंवाद कथयित्वा प्रस्तुती कथामनुसंधानः संजय घ-इतीति । रोमहर्षणं रोमाञ्चकर संवादमीपं श्रुतवानहम् । स्पष्टमन्यत् ॥ ७४ ।। स० टी०-शास्त्रार्थोऽयं समाप्तोऽथ कथासंवन्धमुत्तमम् ।। इदानी संजयः प्राह धृतराष्ट्रनृपं प्रति ॥१॥ इतिशब्दः समाप्तौ स्याच्छास्त्रार्थस्येरितस्य च ॥ रोमाञ्चनकर बुद्धेरिमापकवयाऽश्रुतम् ॥२॥ लोके संभाव्यमानस्वारस्पष्टमन्यत्तथाऽर्थतः ॥ ३ ॥ ७४ ॥ भा० टी०-परिसमाप्तः कृष्णपार्थसंवादासकःशावार्थः । अथेदानी कथासंवन्धप्रदर्शनार्थे संजय उवाच- इतीति । इत्येवं वासुदेवस्य सर्वात्मनः सर्वज्ञस्य सर्वेधरस्य पार्थस्य पृथापुत्रस्य च महात्मनोऽक्षुद्रस्त्रमावस्य भगवदनगृहोवस्य सम्यग्वाद संवादं गुरुशिष्यवचनेन प्रभाविवचनाभिधानमिमं त्वां प्रत्युकमजनमत्यन्त, विस्मयकर, रोमाणि हुप्यन्ति पुलकीभवन्त्यनेनेवि रोमहर्षण, हपनिमित्तकरोमाञ्चकरमापं श्रुतवानाम । अतिधन्यो वसुदेवो यद्गृहे स्वयं भगवानवतीर्णः, पृथा च धन्या यस्याः पुनः परमभागवतो भगवदनुगृहीत: प्रतिक्षणं भगवता संवदमानः । त्वं त्वत्यन्ताधन्यो यस्य पुत्रो दुर्योधनः कृमापराङ्मुरस्तरक्तद्रोही चेति वासुदेवपातिशब्दाभ्यां ध्वनितम् ।। ७४ ।। १० टी०-तदेवं धृतराष्ट्रं प्रति श्रीकृष्णार्जुनसंबाई कथयित्वा प्रस्तुवां कयामनुसंधानः संजयः उवाच- J
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बीपशावत [अ० १८ प्रो० ]
प्राइ-इत्यहमिति । अनुतापूर्णश्चर्यकरमत एव रोमहर्षणं रोमाञ्चकरं संवादमत्रोपं श्रुज्वहम् ।
सटमन्यत् ॥ ७ ॥
रा० टी०- एकान्ते संज्ञात: कृष्णार्जुनसंवाद, कथं त्वया ज्ञात इति धृतराष्ट्रइतशाङ्की निराह संजय
इयाह-त्यइमिति । इतिपदेन प्रथगन्यायायुलस्य सर्वस्य परामर्श: । महानात्मा मनो यस्य तस्य सहा
मन: । अनुतं प्राजकुमापि न श्रुतमान्चर्य रोमाञ्चनम् ॥ ४ ॥
व्यासप्रसादाव्यानवानेतद्दामहे परम्
योग योगेन्या कृष्णालाकात कर्यतः स्वयम् ॥ ७॥
त० टी०-अप्सनिकृष्टस्य व्यवहितस्य संवादस्यात्मनः श्रवणयोग्यतायो हेतुमाह-व्यासप्रसादा.
विति । दियवादिजाम दामादादाजुई गोऽयं पर सोलर पापपुल्यायोग
योगेश्वरान् अण्णात्यमेवेश्वारूपेण कथयतः साक्षादई श्रुतवानसि, नातु परम्पया । अहो मे भाय.
न
मित्यभिमायः ॥ ७ ॥
१३१९ ॥ ७५ ॥ [अ० १८ श्लोक ७६] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता एप योगस्तं श्रुतवान् योगेश्वरात् कृष्णासाक्षात्स्वयं कथयत; न तु परंपरातः ) योगानामीश्वरादित्युत्त्या व्यवहितेन मया येन योगसामार्थेन श्रुतं तत् तस्यैव योगेश्वरस्य सामध्ये न तु ममेति सूचयति कृष्णादि- त्यनेन कृष्णप्रसाद एव कृष्णद्वैपायनप्रसादो न त्वन्य इति ध्वनयति ॥ ७९ ।। • ५० टी०-अथात्मन ईदृशश्रवणासंभावनामाह-व्यासेति । गत्सेवया प्रसन्नेन भगवता व्यासेन मा. मलौकिक मचक्षुःश्रवणादिकं दत्तं तेनाई श्रुतवानस्मि । किं तदित्याह-परं योगम् । परत्वमेवाह- योगेश्वराच्छीकृष्णानस्वरूप स्वयमेव वा साक्षात्स्वमुखेनार्जुनं प्रति कथयतः श्रुतवान् । तदुक्तं महाभारते भीष्मपर्वणि संजयेन धृतराष्ट्र प्रति- नमस्तस्मै भवपिने पाराशाय धीमते । यस्य प्रसादादिव्यं मे प्रज्ञाविज्ञानमुत्तमम् ।। दृष्टिश्चातीन्द्रिया राजन् दूराच्छ्रवणमेव हि । परचित्तस्य विज्ञानमतीतानागतस्य च ।। व्युस्थितात्पत्तिविज्ञानमाकाशे च गतिः सदा । अस्त्रैरसङ्गो युद्धे च वरदानान्महात्मनः।। प्रत्यक्षं यन्मया दृष्टं दृष्टं योगवलेन च । शृणु तत्पृथिवीपाल मा च शोके मनः कृथाः रा० टी०-व्यासेति । ब्यासेन हि संजयस्य कुरुक्षेत्रे युद्धसमातिपर्यन्तं तत्र प्रवृत्तस्य सर्वस्यापि दर्श- नश्रवणे तव स्यातामिति दिव्यदृष्टिदानापासप्रसादादित्युक्तम् । योगं पुमर्थोपाय योगेश्वरात्सर्वोपायानामी- श्वरात स्वयमेव कथयतः कृष्णात् साक्षादन्याव्यवधानेन श्रुतवानित्यन्वयः ॥ ७५ ।। राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृम्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥ त० टी०-तदेव विशदयति साजनिति । केशवार्जुनयोरिमं पुण्यं श्रवणमात्रेण पापहरं पुण्यो- त्पादनमद्भुतं संवादं संस्मृत्य मुहुर्मुहुरिंवारं हृष्यामि हर्षे पामोमि ।। ७६ ॥ म०टी०-राजनिति । पुण्यं श्रवणेनापि सर्वपापहरं केशवार्जुनयोरिम संघादमजुतं न केवलं श्रुत. वानस्मि, किंतु संरमृत्य संस्मृत्य, संभ्रमे द्विरुक्तिः । मुहुर्मुहुर्वारंवारं हृष्यामि च हर्प प्राप्नोमि प, प्रतिक्षणं रोमाञ्चितो भवामीति वा ॥ ७६ ॥ शं० टी०-ग्रुत्वा किं कृतवानसीत्याकाहायां संतु यामीत्याह-राजनिति । पुण्यं पुण्यकर पायनं अवणपठनाभ्या ज्ञानाज्ञानमतसर्वपापविध्वंसक केशवार्जुनयोः संवादमुचलक्षणामिमं गीताख्यं मन्थ श्रत मुहर्मुहुश्च स्मृत्वा स्मृत्वा हृष्यामि । किं गया जन्मान्तरशवेपु पुण्यं कृत, किं ततं, किं दचं, किं हु, किष्टं वा न जाने, येन क्योरिदं संवादलक्षणं गीवाशास्त्रं मैया श्रुतमित्यर्थः ।। ७६ ।। श्री० टी०-किंच-राजनिति । हृष्यामि रोमाञ्चितो भवामि, हर्ष प्राप्नोमीति वा । स्पष्टमन्यत्॥७॥ स० टी०-पुण्यं श्रवणमात्रेण सर्वपापहरं, शुभम् ॥ कश्च प्रजापतिः प्रोक्त ईशः भांशंकरः स्मृतः ॥१॥ तयोरपि पिताऽऽचार्य: स्वामी चात्मेति केशवः ॥ तदुक्तं हरिवंशे श्रीशंभुना केशवं प्रति ॥२॥ क इति ब्रह्मणो नाम ईशोऽहं सर्वदेहिनाम् ॥ आवां क्वाङ्गसंभूती वस्मारकेशवनामवान् ॥ ३ ॥ शुद्धसंप: समायुक्तः सद्विद्याधिकृतोऽर्जुनः ॥ संवादो यस्तयोः साक्षातमिम परमाद्भुतम् ॥ ५॥ न केवलमई सम्यक् श्रुतवानस्मि विस्मयात् ॥ किं तु संस्मृत्य संस्मृत्य द्विरुक्तिरिति संभ्रमे ॥ ५॥ वारंवार पर हर्ष. मवाप्नोमि प्रतिक्षणम् ॥ रोमाञ्चितो भवामीह प्राप्तोऽहं विस्मयावपिन् ॥ ६॥ ७६ ॥ भा० टी०-किंच-राजनिति । इममेर केशवार्जुनयोः संवादमजुवं पुण्यं श्रवणमात्रेणापि पापहा श्रुत्वा, संरमृत्य संस्मृत्यै पुनः पुनः स्मृत्वा मुटुर्मुहुः प्रतिक्षणं प्यामि रोमाञ्चितो भामि, हमें प्राप्नोमानि 4 ] १३२० श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ७७ वा । तयोः संवादं श्रुतवान् त्वमपि वैरं विहाय कृष्णभक्तिमत्यादरेणाङ्गोकुर्वनत्यन्तदीप्तिमानस्यन्तहष्टो वास्तवो राजा भवेति चोधयन् संयोयति-हे राजनिति ॥ ७६ ॥ ५० टी०-अथ व्यासप्रसादसामर्थ्यमेवानुवदति-राजनिति । राजन् धृतराष्ट्र इममद्भुतं केशवार्जुनयोः संवाद संस्मृत्य सकृच्छ्रुतमपि स्मरणारूढं कृत्वा पुनर्यधावत्संस्मृत्य मयि निष्पन्नोऽयं गीतार्थसंग्रह इदि हृप्यामि रोमाञ्चितो भवाम्येतावतैव कृतकृत्योऽस्मीति हर्षे प्राप्नोमि ॥ ७६ ॥ रा० टी०-तच्छ्रवणेन स्वस्य जातं तात्कालिकं फलमाह-राजनिति । हे राजन ! धृतराष्ट्रस्य संबो- धनम् । पुण्यं पारत्रिक सुसहेत्वदृष्टकरम् ॥ ७६ ॥ तच संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।। विस्मयो मे महानाजन् ! हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥ त० टी०-अथार्जुनाय दर्शितं विश्वरूपमनुसंदधान आह-तच्चेति । यदर्जुनाय प्रकाशितमत्य- द्भुतमैश्वर हरे रूपं मया साक्षात्कृतं तच संस्मृत्य संस्मृत्य हे राजन् ! संस्मरतो मे महान् विस्मयो जायते, पुनः पुनश्च हृष्यामि रोमाञ्चितो भवामि ॥७७ ॥ म०टी०-यद्विश्वरूपाख्यं सगुणं रूपमर्जुनाय ध्यानाथ भगवान् दर्शयामास तदिदानीमनुसंधान आह-तचेति । तदिति विश्वरूपम् ।हे राजन्मम महान्धिस्मयोऽत एव हुप्यामि चाहम् । स्पष्टमन्यत् ॥७॥ शं० टी०-विश्वरूपसंदर्शनां तृप्ति वर्णयति-तनेति । हरेः स्वसाक्षात्कारमात्रणाविद्यां तत्कार्यं च हर- ति स्वस्मिन्नेव तिरोभावयतीति हरिः । सच्चिदानन्दस्वरूप: परमेश्वरस्तस्य । अनन्तवाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ' इत्युक्लक्षणं वध रूपं विश्वरूपमपि अत्यद्भुतं महाश्चर्यकरं पुनः पुनश्च संस्मृत्य संस्मृत्य स्मृत्वा स्मृत्वा हृष्यामि, धन्योऽहं धन्योऽहं कामत्योऽहमिति संतोपसागरे मजामीत्यर्थः ।। ७७ ॥ श्री०टी०-किंच-तचेति । तदिति विश्वरूपं निर्दिशति । स्पष्टमन्यत् ।। ७७ ॥ स. टी०-यत्पूर्व विश्वरूपाख्यं सगुणं रूपमझुवम् ॥ अर्जुनाय हरि: साक्षाद्दर्शयामास सर्ववित् ॥१॥ आहानुसंधान: सन्निदानी ध्येयमेश्वरम् ।। वच्चेति विश्वरूपं भो राजन्संस्मृत्य चेतसा ॥ २ ॥ स्मारं स्मार महानस्ति विस्मयो मे पुनः पुनः ॥ अत एव महाभाग्यफलं हर्षे गतोऽस्म्यहम् ॥ ३॥ ७७ ॥ भा० टी०-यतु विश्वरूपं सगुणमर्जुनाय भगवान्ध्यानार्थे दर्शितवान् । तच हरेरत्यद्भुतं सूपं संस्मृत्य संस्मृत्य मे महान विरमयो भवति हृष्यामि च पुनः पुनः । हरेः । यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः' इत्यर्जुनसंशयस्य विश्वरूपप्रदर्शनेन हरणे प्रवृत्तस्य सर्वोपसंहरणं प्रदर्शयतः विश्वरूपं श्रुत्वापि त्वं तु द्रोहं परित्यज्य संभ्यर्थमुद्यतः सन् न सनस इत्याश्चर्यमिति धनयन्नाह-हे राजनिति ॥ ७७ ।। प० टी० प-तचेति । तच्चाद्भुतं हरे रूपं विश्वरूपशुभयवाक्यः श्रुतं न च दृष्टम् । तथाविधमपि ण्यममक्षरता संस्मृत्य पुनरर्थं च संस्मृत्य मे महान् विस्मयो भवति । अहो कयमर्जुनस्य भाग्यं यद्देवैरपि हुमशस्य पुरमात्मनः समष्टिरूपं साक्षात्मतवांस्तथा सम्लामागोचरोऽपि परमात्मा कृपया परमार्थिक वरूप दर्शितवानिवि सविस्मयत्वेनाइवरसस्याविर्भावन रोमहर्षावटसात्विकोद्रेकशाली पुनः पुनर्भवामी- यर्थः । देवं विश्वरूपदर्शने-'द्रोण प भीष्मं च जयद्रथं च कर्ण वधान्यानपि योवीरान् । मया हवा. स्वं जहि मा व्ययिष्ठा. इस्मादिभगवद्वास्यानि, तथा अमीच त्वां धृवराष्ट्रय पुनःसंदृश्यन्ते चूर्णित- ६चमाने इत्यर्जुनवाश्यानि प त्वया मन्मुखाच्छ्वान्येय ॥ ७७ ॥ रा० टोल-तदिति । वक्ष रू विश्वरूपरूपम् ।। ७७ ।। .
[अ० १८ श्लो० ७८] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः॥. तत्र श्रीविजयो भूतिर्बुवा नीतिमतिर्मम ॥ ७८ ॥ इति श्रीभगवद्गीतासूपनिषत्सु संन्यासयोगो नामाऽष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ तटी-एवं चैश्चरेश्वरकृष्णपराङ्मुखस्वपुत्रसैन्यविजयादिदुराशा ते त्र्यैवेत्याह-पन्नेति । यत्र यस्मिन् पक्षे योगेश्वरः योग्मेऽघटितघटनापटीपस्त्वसामर्थ्य राज्यैश्वर्यादिमाप्त्युपायो वा योग- स्तस्यैश्वरो निवर्तको नियामको वा सर्वकर्मसिद्धीनामपीश्वरः सर्वकर्मफलप्रसुः सर्वज्ञोऽचिन्त्यश- क्तिर्भगवान कृष्णः स्वाश्रितदुःखकपकस्तिष्ठति, यत्र पार्थस्तत्पिस्वतीयो धनुर्धरी गाण्डीवध- न्वार्जुनो वर्तते तत्रोभयाधिष्ठिते धर्मराजपक्षे श्रीः राज्यलक्ष्मीः, विजयः शत्रुविनाशः, भूतिः सर्व- संपत् ऐश्वर्य वा, नीतियोऽपि तत्रैव । धुवा निश्चितेति सर्वत्रान्वेतव्यम्। इति मे मम मतिनिश्चयबुद्धिः। तस्मात्स्वपुत्रविजयाशां त्यक्त्वा श्रेयस्कामनया श्रीभगवदाश्रिीलक्ष्मीविजयाद्यः पाण्डवैः सह राज्या- द्यर्पणेन सन्धि विधाय स्वीयानां संरक्षणं कुविति भावः ॥ ७० ॥ स्वतन्त्रः सर्वफलदः सर्वोपास्यो हि यो हरिः॥ कर्तृत्वं सर्वजीयानां तत्तन्त्रमिति निश्चयात् ॥ १ ॥ श्रेयस्कामो मुमुक्षुर्वा तमेव शरणं व्रजेत् ॥ स्वाभिमानं परित्यज्य ह्येतदन्ते दृढीकृतम् ॥ २ ॥ संसाराम्बुधिमनानां स्वभाजकृपया हरिः ॥चकार गीतानावं तं वन्दे सर्वगरीयसम् ॥ ३ ॥ इंसस्वरूपं सनकादिकेभ्यस्तत्त्वोपदेशाय विधाय शुद्धम् ॥ तत्वं परं भागवतं घ धर्म सत्संप्रदायार्थमुपादिशयः ॥ ४ ॥ श्रीवासुदेवो भगवान्स एव भक्ताप पार्थाय तु भारते वै ॥ मोहापहं शास्त्रमुवाच गीतां सर्वेश्वरं तं शरणं प्रपद्ये ॥५॥ व्याख्यातमादौ तदनवोधादाचार्यवर्येण हरिप्रियेण ॥ निम्बार्कनानातिगभीरवोध श्रीनारदानुग्रहभाजनेन ॥६॥ तत्पादचिन्ताप्रतिबुद्धबुद्धिना भट्टेन श्रीकेशवसंज्ञकेन । तदर्थवोधाय तदाश्रितानां संक्षिप्य चैवविटतं सुवोधम् ॥ ७ ॥ इति श्रीभगवदगीताटीकायां तत्त्वप्रकाशिकायां धरामण्डल विजयिश्रीभारतिकेशवका- श्मीरिभट्टाचार्यवर्यविरचितायामष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ म०टी०-एवं च सति स्वपुत्रे विजयादिसंभावनां परित्यजेत्याह-योति । यत्र यस्मिन् युधिष्ठिरपक्षे योगेश्वरः सर्वयोगसिद्धीनामीश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिभंगवान कृष्णो भक्तदुःखकर्षणस्तिष्ठति नारायणः, यत्र पार्थो धनुर्धरः यत्र गाण्डीवधन्वा तिष्ठत्यर्जुनो नरः, वत्र नरनारायणाधिष्ठिवे वस्मिन् युधिष्टिरपक्षे श्रीः राज्यलक्ष्मीः, विजयः शत्रुपराजयानिमित्त उत्कर्षः, भूविरुत्तरोत्तरं राजलक्ष्म्या विवृद्धिधुवाऽवश्यंभाविनीति सर्वत्रान्वयः । नीतिनयः । एवं मम मतिर्निश्चयः । तस्माद्बुगा पुत्रविजयाशां त्यक्त्वा भगवदनगृहीतेलकमीन विजयादिभाग्भिः पाण्डवैः सह संधिरेव विधीयतामित्यभिप्राय: ।। ७८ ॥ वंशीविभूपितकरानवनीरदाभात्पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात् । पूर्णेन्दुसुन्दरसुखादरविन्वनेनात् कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने ॥ १॥ काण्डत्रयात्मकं शास्त्रं गीताख्यं येन निर्मितम् । आदिमध्यान्वषट्केषु तस्मै भगवते नमः ॥२॥ . .
श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ श्लो० ७८ ] , श्रीगोपिन्दमुखारविन्दमधुना मिष्टं महाभारते गीताख्यं परमं रहस्यमृपिणा व्यासेन विख्यापितम् । व्याख्यातं भगवत्पदैः प्रतिपदं श्रीशङ्कराख्यैः पुन विस्पष्टं मघूसूदनेन मुनिना स्त्रज्ञानशुद्धथै कृतम् ॥ ३ ॥ इह योऽस्ति विमोहयन् मनः परमानन्दघन: सनातनः । गुणदोपभृदेष एव नस्तुणतुल्यो ययं स्वयं जनः ॥ ४ ॥ श्रीरामविश्वेश्वरमाधवानां प्रसादमासाद्य मया गुरूणाम् । व्याख्यानमेतद्विहिवं सुबोधं समर्पितं तचरणाम्बुजेषु ॥५॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीविश्वेश्वरसरस्वतीपूज्यपादशिष्यश्रीमधुसूदनसरस्वती- विरचितायां श्रीभगवद्गीतागूढार्थदीपिकायां संन्यासयोग- प्रतिपादन नामाष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ शं० टी०-किमतः परं वक्तव्यमस्ति ? मम निश्चयं शृष्विस्याह-योति । योगेश्वर: योगास्तेजोवलपो. रुपविद्याराज्यजयधनधान्यपुत्रपौवाद्यभ्युदयानां घटनास्तेपामीश्वरः । यद्वा “ विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः " इति श्रवणात् युज्यते आभ्यामिति योगी विद्याविद्ये ईशितुं शीलमस्यास्तीति योगेश्वरः । यद्वा युज्यते समाधीयते चित्तमेतेष्विति योगा: ऐहिकामुध्मिकसुखविशेषाः कर्मसाध्या उपास्तिसाध्याश्य, तेषां प्रदाने शक ईश्वरो योगेश्वरः । यद्वा योगों ज्ञानयोगः कर्मयोगी वा तयोः फलसिद्धेरीधराधी- नत्वाद्योगेश्वरः । " संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः" इतिश्रुतेः । एवंलक्षणः परमात्मा श्रीकृष्णो यन्न यस्मिन्पशे तिष्ठति, धनुर्धरो धनुर्विद्यापारगोऽतिरथो गाण्डीवधन्वाऽर्जुनः यत्र यस्मिन् पक्षे तिष्ठति, कत्र तस्मिन् पक्ष एव ध्रुवा अव्यभिचारिणी नीतिः शानदृष्टा मर्यादा तिष्ठति, धर्मस्तत्रैव तिष्ठतीत्यर्थः । यतो धर्मस्ततो जयः । इति न्यायेन विनयोऽपि तत्रैव तिष्ठतीत्यर्थः। श्रीधुवा निश्चला राज्यलक्ष्मीस्तत्रैव तिष्ठति । भृतिर्गजतुरगपनधान्याविसंपत्तिस्तत्र तस्मिन्नेव पक्षे ध्रुवा निश्चला तिष्ठतीति मम मतिनिश्चयः । त्वमत: पुत्राणां जयाशी परित्यजेत्यर्थः । गुरुभ्रात्रादिहिंसालक्षणं घोरं कर्माहं कृत्वा पापी स्या, तेन नरके यास्यामी- त्यनात्मकर्तृके कर्मण्यकरिमेवामानं कर्तारं भोकार मत्वा मोहेन शोचतोऽर्जुनस्य मोहसागरे निममस्यो- द्वरणमात्मयायाम्यविज्ञानेन विना नान्येन सिध्यति, आत्मयाथात्म्यविज्ञानं च तत्त्वंपदार्थयो: शोषितयोरेक- त्वप्रतिपादन विना न सिध्यत्यतस्तयोः शोषनं कर्तव्यमिति तत्वेवाई जातु नासम्' इत्यारभ्य प्रथमप. Tण त्वंपदार्थ शोधयित्वा, द्वितीयेन तस्पदार्थ व शोधयित्वा, तृतीयेन तयोरेकत्वं प्रतिपाद्य कर्तृत्वभोक्तृत्वा- यविद्यावकार्यसंवधरहितं सर्वसंसारधर्मनिमुक्तमात्मतत्त्व बोधयित्वा तस्यैव बोधस्याप्रतिबन्धलसिद्धये ज्ञाननिष्ठामुपदिश्य तत्परिपकज्ञानेन 'भात्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्वतः । ततो मां तत्त्वतो मात्वा विशवे तदनन्तरम् इत्यात्मयायात्म्यावधारणं, वेन प्राप्राप्तिय प्रतिपादिता। वः सर्वस्या अपि गीतायाः प्रतिपाद्यं प्रत्यगभिन्न परं प्रौच । तज्ज्ञानमेव मोक्षसाधनमिति पर्यवसितम्। तथैव सर्वस्या अपि गीतायाः अवर्ण फरवतोऽर्जुनश्योकिरप्यनुभवारूढा 'नष्टो मोहः स्मृतिलब्याइवि ज्ञानेनाज्ञाननिवृत्ति तस्कलभूतमात्मलाभं च पोधयति। अतः सिद्धं शानमेव मोक्षस्य परमकारणामिति । तथा च श्रुचि: "ज्ञानादेव तु कैवस्यम्" तमेव विदित्याविमृत्युमेति नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय" इति, 'एषा तेऽभिहिता सांध्ये' इति ज्ञानयोगमुपदिश्य स्पेनोपदिष्टमानसंपादने पुरुषस्य प्रसामान्यमालक्ष्य 'पुद्धियोंगे विमां गणु' इति कर्मयोगमुपक्रम्य ' युद्धौ शरणमान्यो, 'योगः कर्मसु कौशलम्' इति ज्ञानयोग प पन: प्रस्ताय 'सानयोगेन सांघानां कर्मयोगेन . - [अ०१८ श्लो. ७८] तत्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता योगिनाम्' इति तयोविषयभेदव्यवस्था कृत्वा, राजसतामसत्यागनिन्दापूर्वकं सात्त्विकत्यागस्यैव श्रेष्ठत्वमुक्त्वा, तश्चापि परमेश्वरप्रीत्यै कर्तव्यमिति निश्चित्य, कर्मनिष्ठया परिशुद्धचित्तस्य ज्ञान प्राप्तवतो ज्ञाननिष्ठा वि. हिता । सत: कर्मयोगो ज्ञानयोगस्य साधनमेव भवति , नतु साक्षान्मोक्षकारणमित्येव सिद्धान्तितं भवति । जन गीतायां ज्ञानकर्मयोगयोरेव द्वयोरुपक्रमोपसंहारदर्शनाद्योगान्तरस्य न प्राधान्यं प्रतीयते । अमानित्वा- देतृत्वशुद्धबुद्धित्वादयो यथा ज्ञानतत्फलसिद्धिसाधनानि, तथा मुमुक्षुत्वनिष्टावत्वसास्तिकश्रद्धासक्तिमत्त्वा- दयः कर्मफलसिद्धिवाधनानीति सिद्धं सर्वमनवद्यम् ।। ७८ ॥ कालकूटसमो दोपो यस्य कण्ठे लयायते । गुणोऽपि वा कलामात्रो यस्य भूपायते सतः ।। तमहं पुरुपं वन्देऽविद्यादोपहरं परम् ।। १ ।। इति श्रीमत्परमहंसपरिवाजकाचार्यश्रीमदानन्दात्मसरस्वतीभगवत्पादपूज्यशिष्यश्रीशंकरानन्दसर- स्ववीकृतौ गीतातात्पर्ययोधिन्यामष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ श्री०टी०-अतस्त्वं स्वपुत्राणा राज्यादिशङ्का परित्यजेत्याशयेनाइ-यति । यत्र येषां पाण्डवानां पक्षे योगेश्वरः श्रीकृष्णो वर्तते, यत्र च पार्थों गाण्डीवधनुर्धरः, तत्रैव श्री: राज्यसक्ष्मीः, तत्रैव च विजयः, तत्रैव च भूतिरुत्तरोत्तराभिवृद्धिश्व, नीतिर्नयोऽपि तत्रैव । ध्रुवा निश्चितेति सर्वत्र संबध्यते । इति मम मतिनिश्चयः । अत इदानीमपि तावत्सपुत्रस्त्वं श्रीकृष्ण शरणमुपेत्य पाण्डवान्प्रसाद्य सर्वस्वं च तेभ्यो निवेद्य पुत्रमाण- रक्षणं कुर्विति भावः ।। ७८ ।। भगवद्भक्तियुक्तस्य तत्प्रसादात्मवोधन। सुखं बन्धविमुक्तिः स्यादिति गीतार्थसंग्रहः ॥ १॥ तथादि, 'पुरुषः स पर: पार्थ भक्ष्या लभ्यस्त्वनन्यया । भत्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन !' इत्यादी भगवदमोक्ष प्रति साधकतमत्वश्रवणात् तदेकान्वभक्तिरेव तत्प्रसादोत्थज्ञानावान्तरव्यापारमात्र. युक्ता मोक्षहेतुरिति स्फुटं प्रतीयते । झानस्य च भक्त्यवान्तरव्यापारत्वमेव युक्तम् । तेषां सत्ततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोग तं येन मामुपयान्ति ॥ मद्भक्त एतद्विज्ञाय महावायोपपद्यते' इत्या- दिवचनात् । न च ज्ञानमेव भक्तिरिति युक्तम् 'समः सर्वपु भूतेपु मनक्ति लभते पराम् । भत्त्या मामभिजा- नाति यावान्यश्वास्मि तत्त्वतः ॥' इत्यादी भेदेन निर्देशात् । नवं सति " वमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय" इत्यादिश्रुतिपिरोधः शङ्खनीय:, भत्त्यवान्तरव्यापारस्वाज्ज्ञानस्य । नहि काछैः पपतीयुक्त श्वालानामसाधनत्वमुक्तं भवति । किंच “यस्य देवे पराभक्तिर्यघा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता पर्याः प्रकाशन्ते महात्मन,") "देहान्ते देव; परं ब्रह्म तारकं व्याच" | "यमेवैप वृणुवे वेन लभ्य," इत्यादिश्रुविस्मृतिपुराणवचनान्येवं सति समजुसानि भवन्ति । तस्माद्भगवनतिरेव मोक्षहेतुरिति सिद्धम् । सेनेव दत्तया मत्या तद्गीतावितिः कृता । स एव परमानन्दस्वया प्रीणातु माधवः ॥ २ ॥ परमानन्दपादाब्जरज:श्रीधारिणाऽधुना । श्रीधरस्वामियनिना कृता गीतासुबोधिनी ॥ ३ ॥ स्वप्रागल्भ्यबलाद्विलोडप भावगीतातदन्तर्गतं तत्त्वं प्रेप्सुरुपति किं गुरुकृपापीयूपर्टि पिना । अम्बु स्वाजलिना निरस्य जलधेरादित्सुरन्तर्मणानावपु न कि निमन्नति जनः सत्कर्णधार विना ॥४॥ इति श्रीमन्महाभारते शबसाइस्रयां सहितायां चयासिक्या भीष्मपर्वणि श्रीमनगवद्गीतासूपनिषत्सु महाविद्याया योगशास्ने श्रीकृष्णार्जुनसंवादे योगशाम्ननिर्णयसंन्यासादितत्त्वनिर्णये सुनो- धिन्या टोकाया श्रीधरस्वामिकृताया मोक्षयोगों नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥, .
१३२४ श्रीमद्भगवद्गीता [म. १८ लो० ७८] स० टी०-एवं च सति पुने स्वे जयस्याशा बलीयसीम् ॥ त्यज त्वं सर्वथा राजन्भगवन्तं हरि स्मर ॥ १ ॥ यस्मिन्यौधिष्ठिरे,पक्षे योगमायेश्वरो हरिः ।। समस्तयोगसिद्धीनां योगस्याप्यथ योगिनाम् ॥ २ ॥ ईश्वरो भगवान्कृष्णः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ॥ भक्तदुःखहर: श्रीशो विभुनारायणोऽच्युतः ॥३॥ तिष्ठत्यात्मीयरूपेण गृहीत्वा पाण्डुनन्दनान् ॥ यत्र गाण्डीवधन्वा च तिष्ठत्यषोऽर्जुनो नरः ॥ ४ ॥ तस्मिन्यौधिष्ठिरे पक्षे नरनारायणाश्रिते ।। श्री राज्यलक्ष्मीविजयः शत्रुहानिनिमित्तकः ।। ५॥ समुल्क- स्तिथा भूतिः श्रीविशेषोऽतिविस्तरः ।। राज्यलक्ष्म्या विवृद्धिश्चेत्यवश्यंभाविनी ध्रुवा ॥ ६ ॥ ध्रुवेत्यस्या- न्वयो ज्ञेयः सर्वत्रवाविशेषतः ॥ नीतिर्नयो यथाशानमेवं मे निश्चयो नृप ॥ ७ ॥ तस्मात्त्वं सर्वया राजन् नृथा पुरनयाशिपम् || त्यक्त्वा श्रीभगवत्कृष्णानुगृहीतश्च पाण्डवैः ॥८॥ लक्ष्म्यादिभागिभिः साफ संधिरेव विधीयताम् ॥ इत्यभिप्राय एवास्य संजयस्यात्र गम्यते ॥ ९ ॥ यतो धर्मस्तत: कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः । इत्युक्तरीत्या धर्माद्या संपद्यस्मादलीयसी ॥ १० ॥ तस्या एव जयस्तस्मादासुर्यास्तु पराजय. ॥ महामोहोदवा संपन्नाश्या देव्या सुसंपदा ।।११ ।। सा धर्ममूलिका यस्मात्कृष्णपक्षावलम्विनी ।। आसुरी कृष्णविमुखा बलहीनतयाऽवमा ॥ १२ ॥ अतो धर्म समाश्रित्य कृष्णपादरतो भवेत् ॥ तेनैव संसृतेः पुंसो निस्तारः सुलभः स्वयम् ॥ १३ ॥ इत्येवं रूपकस्योपसंहारो मुनिना कृतः । अतः सर्वे सुसंपन्नं कृष्णपादानुरागिणान् ॥ १४ ॥ नैवास्ति दुर्लभं किंचित्तत्कटाक्षकभागिनाम् ।। सिद्धमित्येवशा- स्त्रीय रहस्यं सर्वमङ्गलम् ।। १५ ।। ५८ ॥ स्वाभाविकानवधिकातिशयेऽशनोजस्तेजोऽववोधवलधैगुणैकमाभिः । वेदान्तवाक्यपरिशीलनतत्त्वनिष्याशिरक्षरपदोऽवतु नो मुकुन्दः ॥ १ ॥ शुद्धो बुद्धो विमुक्त: श्रुतिशिखरगिरा मुख्यतापर्यभूमि- यस्माजात समस्तं जगदिदममृताद्वयाप्य सर्व स्थितो यः ।। यस्योशाशावतारैः सुरनरवनजे रक्षितं सर्वमेत- भूमानं मुकुन्दं हृदि गतममलं कृष्णमेव प्रपद्ये ॥२॥ अत्यन्त गम्भीरमतीव विस्तृतं निर्मध्य वेदाब्धिमिदं विनिर्मितम् ।। सुधारसं शास्त्रमगाधगोचरं सुबोधनिष्ठं किल येन तं श्रये ॥ ३ ॥ यदुपतिमभिराम सर्वविश्रामधामाभयपददमकामं वामदेवादिरामम् ॥ सकलसुरललानं श्याममाराममूर्ति भवृजलधिविरामं नौमि कृष्णं सरामम् ॥ ४ ॥ फ शास्त्रं गीताख्यं हरिमुरासरोजाद्विगलितं क चास्माकं बुद्धिर्विपयाविषपङ्के निपतिता ॥ तथापि श्रीकान्तप्रचुरगुणलक्ष्मीविरचितं कटाक्षं स्वच्छाच्छं ह्यनुसृतवतां किं न सुलभम् ॥९॥ इदं गीताशावं परमपुरुषार्थेकनिलयं त्रिकाण्डं वेदार्थ सकलमिह संगृह्य कथितम् ।। स्वयं श्रीकृष्णेन श्रुतिविशदतत्त्वेन विभुना जपाद्यपानासानाच्छ्रुतमपि फलत्येन सुधियाम् ॥ ६ ॥ कृतिभिरपि कृतं यन्न प्रशंसन्ति लोके फिमु मितमतिनेहाई प्रवृत्तस्वथापि ।। मम भवतु कथंचिकृष्णपादेऽनुरागस्विति मनसि निधाय क्षन्तुमईन्ति सन्तः ॥ ७॥ नरवमापय सपनामयं विरम्य भोगेभ्य इदं विलोक्यताम् ॥ बदाशयं जमशेपसाक्षिणं स्वयं विदित्वा कृतिनः फरिलम् ॥ ८ ॥ गीताशास्त्रमगाधमन्महदय श्रीमन्मुकुन्दानना- म्भोजानि समिात्मतत्त्वमतिभिर्यास्यातमत्यादरान ।। 1 f . - अ० १८० ७८] तत्त्वप्रकाशिकायष्टटीकोपेता गद्यैस्तदृदयं विलोडय सुगमः पद्यैः सदानन्दवि- चके तद्विवृति स्वमङ्गलम्ते भावप्रकाशाभिधाम् ॥ ९ ॥ गीताभावप्रकाशः श्रीसदानन्देन निर्मितः ॥ श्रीमत्कृष्णपदाम्भोजसेवामुद्दिश्य केवलम् ॥१०॥ दीनबन्धुः कुपासिन्धुः सुखाराध्यो जगत्सविः ।। प्रीयतां तेन भगवान् श्रीकृष्णो भक्तवसलः ॥ ११ ॥ मुनिगुणवसुचन्द्र विक्रमाक्त्यिराज्याच्छुभफलवति वर्षे माघमासे सितेऽशे ॥ पशुपतितिथिसंघौ चन्द्रवारे सुलग्ने विवृत इति निवन्धः सिद्ध ईशप्रसादात् ॥ १२ ॥ इति श्रीमद्भगवद्गीताभावप्रकाशे सारस्वतवंशावतंसश्रीसदानन्दविदुषा विरचि गीतार्थनिष्ठात्रयोपसंहारवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः । टीका-लोकसंख्या ॥ ६८९ ॥ आदितष्टीकाश्लोकसंख्या ॥ ५२५९ ॥ भा० टी०-द्वयोरपि कृष्णार्जुनयोः नरनारायणयोः संवादस्य प्रामाण्यार्थे जयाशाशाननार्थं च परममु- स्क दर्शयति-पत्रेति । यत्र यस्मिन्पक्षे योगेश्वरो योगानां कर्मयोगादीनामघटित घटनापटीयसीना माया- शक्तीनां चेश्वरः कृष्णः 'कृषिभूवाचक: शब्दो णश्च निर्वृतिवाचकः । तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधी- यते' इत्युक्तः सच्चिदानन्दपनोऽयाकर्पणश्च यत्र यस्मिन्पक्षे, यत्र च पार्थोऽर्जुनो धनुरी गाण्डीवधन्वाऽस्ति, तत्र तस्मिन्पाण्डवानां पक्षे श्री लक्ष्मी:, विजयः परंभ उत्कर्षः, विभूमिः गनादिरूपेण श्रियो विस्वारः, ध्रुवा- ऽव्यभिचारिणीति सर्वत्र संपन्धनीयर, नीति: नय:-एतत्स तस्मिन्पक्षेऽस्तीति मम मतिः निश्चयः॥७॥ सदननाष्टादशाध्यायेन समस्तमिताशावार्थ विस्तरतः संक्षेपतश्वोपसंहरता एतत्संप्रदायप्रवर्तकादेरना. यासेन सर्वशास्त्रज्ञानफलं कैवल्यं भवतीति प्रकाशितम् । निष्कामकर्मणां परमेश्वराराधनलक्षणेन शुद्धचित्तस्य भक्तिवशीकृतपरमेश्वरस्य लब्धतत्प्रसादस्य तत्वज्ञानाधिकारिणः तत्वसाक्षात्कारात्केवलादन्यनिरपेक्षान्मोक्ष इति गीतशास्त्रार्थसंग्रहः । क्याहि- ज्ञानानिः सर्वकर्माणि भस्मसारकुरुते तथा । "नहि ज्ञानेन सहशं पवित्रमिह विद्यते ।" "ज्ञानं लब्ध्वा परा शान्तिमचिरेणाधिगच्छति', 'गच्छन्त्यपुनरावृत्ति ज्ञाननिधूतकल्म. पा', व तेर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः', 'अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्', 'ज्ञान- यान्मां प्रपद्यते', 'ज्ञानं विज्ञानसहित यज्ञात्वा मोदयसेऽशुभात्', 'क्षेयं यत्तटावश्यामि यज्ञात्वाऽमृतम- श्नुते' इत्यादिना तत्त्वज्ञानस्यैव मोक्षानन्यसाधनत्वेनोक्तत्वात् 'पुरुषः स पर: पार्थ मक्त्या लभ्यरत्वनन्य. या' इत्यत्र भक्तिपदं तु ज्ञानलक्षणभक्तिपरम् , 'चतुर्विधा भजन्ते माम्""आत? जिज्ञासुरायी ज्ञानी च भरत- पंभ ॥ तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभफिर्विशिष्यते' इत्यत्र ज्ञानलगायाः भकेरुकत्वात् । अन्यथा ज्ञानल. भ्यो भक्तिलभ्य इत्युक्ते परस्परविरोधः स्यात् । भक्त्या मामभिजानाति' इत्यादी भेदनिर्देशस्तु 'शानेन तु सदानं येपां नाशिवमात्मनः । नेपामादित्यवरज्ञानं प्रकाशयवि वत्परम् । इत्यादिवत चोष्यः । यतापि भक्तिपदं शानेवरसाधनभक्तिपरं, वत्रापि ज्ञानद्वारेवि व्याख्येयं, झानस्य श्रुतियुक्तिसिद्धमोक्षानन्यसामन- स्वस्य त्यागायोगात् । तथाच श्रुतयः- ब्रह्म वेद प्रमेव भवति', 'श्रीयन्ते चास्य कर्माणि वस्मिन्दृष्टे परा. वरे', 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न विभति कुतश्चन', 'अभयं के जनक प्राप्तोऽसि', वात्मानमेगावदई ब्रह्मा- रमीकि, 'वस्मात्तत्सर्वमभवचय को मोहः कः शोक एकत्तमनुपश्यतः', 'वाह नः पिता योऽस्माकमपि. यायाः परं पारं तारयसि', 'श्रुत येव मे भगवझेभ्यस्तरवि शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि मा भगवाजोकस्य पारं तारयतु', 'तस्मै मृविकषायाय दमसरपारं दर्शया भगवान्सनत्कुमारः, मेव वि .
- . १३२६ श्रीमद्भगवद्गीता [अ० १८ शो० ७८] दित्वाऽतिमृत्युमेति । नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय', 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्', 'कते ज्ञानान्न मोक्ष.' इत्येव- माद्या अज्ञानपरिकल्पितस्य संसारस्य ज्ञानेनैव निवृत्तिर्युक्ता, न तु कर्मणा, उपास्विक्रियया वा, तथा सति मोक्षस्यानित्यत्व, साविशयत्वं च प्रसज्येत इत्यन्यत्र विस्तरः । एतेनोपासनायाः साक्षानमोक्षसाधना ज्ञानस्य चावान्तरव्यापाररूपत्वं च वदतामपरेपामुक्तिनिरस्ता । वेदान्तडिण्डिमेयु मोक्षानन्यसाधनवेन. प्रसिद्धस्य तत्वज्ञानस्यावान्तरव्यापाररूपस्वप्रदर्शनानौचित्यात् । अन्यथा मुख्यफलस्याप्यवान्तरव्यापा. रत्वकल्पनायाम् ' स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः' इत्युक्त्वाकमेव । साक्षान्मोक्षसाधनं भक्तिर्ज्ञानं चावान्तरूयापार इत्यपि कुनो न स्यादित्यास्ता तावत् ।। आशया भाष्यकाराणा दत्ताभिः सुयुक्तिभिः । आपातरम्यव्याख्याना मया निरसनं कृतम् ॥१॥' जयरामारयतिमिः शास्त्राभिज्ञे सुसाधुभि.! विरक्तैरतिरकैश्च रामे कृप्ये शिवेऽद्वये ॥ २ ॥ प्रेरित, कृतवान् गीताभाष्यस्योत्कर्पदीपिकाम् । सनिर्विलोक्यता सम्यक् प्रमादः क्षम्यतां बु.॥३॥ क्षेत्रादन्यमनादिमध्यनिधनं सत्त्वादिसत्ताप्रद लभ्यं संसृति क्षच्छेदनपरेयुक, सता संपदा । सद्यशाविदिधृतमानसमलेगावास्यशास्त्रार्थगन्दे स्यात्मसुगाप्तये शियमई कृष्णं परं केवलम् ॥४॥ कृत्या धनपतेः कृष्णः प्रीयता परमेश्वरः । शिवाख्यः कृष्णसंज्ञश्च शिवः सर्वेश्वरेश्वरः ॥५॥ रामेष्वहीन्दुसंवत्सरस्य प्रभवसंजिनः । फाल्गुने कृष्णपञ्चम्या पे सिद्धा गुरावियम् ॥ ६ ॥ इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीनालस्वामिशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुबनपतिविदुपा सारस्वतेन विरचिताया गीताभाष्योकपदीपिकायामष्टादशोऽध्यायः ॥१८॥ प० टी०-अतः परं तव पुत्राणा जीवनसंदेह, किं पुना राज्यप्रातिरिति मनसा विचार्य पाण्डवेभ्यःसर्वस्व १त्त्वा श्रीकृष्णं शरणं गत्वा प्राणसंरक्षण कार्यमित्याशयेनाह-यति । यत्र येषा पझे योगमायेश्वर: कृष्णो वर्तते । टिप्पणिकासु-कर्षणेन मनोभूमेनिवृत्ति, फलमाप्यते । कृष्णनाम्ना समाग्नातस्तस्मारव देव ईदृश।' इति । यत्र च तत्पक्षपातसाधितसकलपुरुषार्थ. पार्थो धनुर्धरी गाण्डीवधन्वा परमेश्वरस्य विभूतिवर्तते तत्रैव श्रीराज्यलक्ष्मीस्तत्रैव विजयस्तव भूतिरुत्तरोचरैश्वर्य तत्रैव ध्रुवाचला नौविनयमार्गः । न त्वन्यायिना तव पुत्राणा लाक्षागृहे गरदानभ्रातृजायावनाहरणादिकूटकारिणामिति में मतिनिश्चयः। तदुक्तं भारते आदिपर्वणि धृतराष्ट्र प्रति संजयेन तव पुत्रा दुरात्मान: प्रतप्ताश्चैव मन्युना । लुब्धा दुर्वृत्तभूयिष्ठा न सान् शोचितुमईसि ।।' इति । तयारण्यफेऽपि 'द्रौपदीहरणे भग्नो युधि राजा जयद्रथः । शिवं प्रसाद्य तपसा ययौ च जयमर्जुनात् ॥ इति राजा प्रवीदेवं नेति देवस्तमब्रवीत् । ऋतेऽर्जुनं महावाहुर्देवैरपि दुरुत्सहम् ।। यमाहुरजित देवं शङ्खचक्रगदाधरम् । प्रधानं शासविदुप तेन कृष्णेन रक्षितम् ॥ इति ॥ ७८ ।। अथ सजयस्य धृतराष्ट्रस्य च हाद व्यावण्यते । यो लाक्षावेश्मदाहादतिविषमविपाद्विप्रशापानान्ते दुष्टयूवात्सभाया युवतिपरिभवात्सजुगोप स्वभक्तान् ॥ दूत. सूतश्च भूत्वा स युधि निजजने किं करिष्यत्युपेक्षा सत्येवं तावकाना त्रिगुणहतधिया जीवितेच्छाऽधुनापि ॥१॥ उपनिपदुपदेशतीक्ष्णबाणैर्हदि वसतोऽपि जघान यः सपत्नान् ।। स्वचरणशरणस्य पाण्डुसनोः स च किमु न प्रभवेनिहन्तुमेवान् ॥ २ ॥ कृष्योऽखिलप्रलयहेतुरचिन्त्यशक्ति. शप्तेषु तेन तनयेषु कियान पुमर्थः ।। पार्थस्य वा निहतमारणके तु पुण्य पुण्यैर्यशो भवति संजय नार्जवेन ॥ ३ ॥ .