University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
संस्कृतप्रबोधः चतुर्थ भागः
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COMPLEP
संस्कृतनकाध
97
TAाममा
चतुथाभागः
बदरीदत्त शर्मणा
संस्कृत-भाषा-व्युत्पिपित्सूनाम्
उपकाराय
प्राकृतभाषया विनिर्मित
The
SANSKRIT PRARADUA
WISE
or
A Sanskrit Gramma
PANT IV
By
P. Badri Datt Sharma.
13. D. Press Cavenpore
प्रथमावत्तौ १००० ] १९०७१ [ मूल्यम्
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मुद्रणाधिकारः स्वायत्तः
विषयानुक्रमः
संख्या
विषयः
पृष्ठाङ्कम्
२
२१
३७
१ कृदन्त प्रकरणम्
२ भावकर्मवाचिनः
३ भाववाचिनः
४ कर्तृवाचिनः
५ सामान्यार्थकाः
६ ताच्छील्यार्थकाः
७ तद्वितप्रकरणम्
८ सामान्यवृत्तिः
अपत्यार्थकाः
१० देवतार्थकाः
११ सामूहिकाः
१२ अध्ययनार्थकाः
१३ शैषिकाः
१४ विकारावयवार्थकाः
१५ अनेकार्थकाः
१६ मतुबर्थकाः
१७ स्वार्थिकाः
१८ भाववाचकास्तद्धिताः
१८ अव्ययसंशकास्तद्धिताः
६५
६०
C
--
संस्कृत प्रबोधे।
E
चतुर्थो भागः
अथ कृदन्तप्रकरणम्।
अब कृत् प्रत्ययोंका निरूपण किया जाता है
तिङ् प्रत्ययों के समान कृत् प्रत्यय भी धातु से ही
होते हैं, धातु के अधिकार में तिङ् प्रत्ययों को छोड़कर
शेष सब कृत् प्रत्यय कहलाते हैं ।
प्रातिपदिकों के समान कृदन्त शब्द भी प्रथमादि
सात विभक्तियों और पुंलिङ्गादि तीन सिङ्गों तथा वचनों
में परिणत होते हैं।
कृत् प्रत्यय भी तिङ् प्रत्ययों के समान भाव, कर्म
और कर्ता इन तीन अर्थो और भूतादि कालों में होते हैं।
यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि कृत् प्रत्ययों के
आदि में यदि कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, लकार, शकार और
षकार हों तो उनका लोप हो जाता है और अन्त्य के
हल का भी सर्वत्र लोप होता है।
यदि किसी प्रत्यय के अङ्ग यु और त्रु हों तो उनको
क्रम से अन और अक आदेश होजाते हैं।
यदि किसी प्रत्यय की आदि में ठ, फ, त, ख, छ,
और घ ये वर्ण हों तो इनको क्रमशः इक, प्रायन , एय,
ईन , ईय और इय आदेश होजाते हैं ।
जिन प्रत्ययों के ज, ण और क् का लोप हुवा हो
(२) संस्कृतप्रबोधे-- उनके पूर्व पदस्थ शब्द का जो पहिला अच है, उसको वृद्धि होजाती है। कृदन्त को पढ़नेवाले इन नियमों पर ध्यान रखें। कात् प्रत्ययों के ३ भेद हैं (१) भाववाचक ( २ ) मायवाचक (३) कत्तवाचक ॥ १-अथ भावकर्मवाचिनः सघ से पहिले हम भाव और कर्म में होने वाले कृत्य प्रत्ययों का वर्णन करते हैं । तयन , अनीयर्, यत् , क्यप् , रयत्, खन , युच् और क्त ये आठ प्रत्यय कृत्यसंज्ञक कहलाते हैं और गाव कर्म दोनों में होते हैं ॥ * ये श्राठों प्रत्यय अकर्मक धातुओं से भाव में और सपार्शकों से धर्म में होते हैं । -सब धातुओं से भाव और कर्म में “तव्यत्' प्रत्यय होता है। अकर्मक से भाव में-या-स्यीयते यस्मिस्तद्-क्या- तपन जिम में ठहरा जाय-सास-प्रास्यते यस्मि- स्तद्-प्रासितव्यम=जिसमें बैठा जाय । उदाहरणम्-- दुःसने हि त्वया वत्स! न स्यातव्यं कदाचन । सत्तएव नितरामासित सुखार्थिना हे वरम ! दुःसङ्ग में तुझ को कभी न ठहरना चाहिये । मुसार्थी को सदा सत्मा में ही बैठना चाहिये ॥ * भाव में मदा नपुंसककिङ्ग और कर्म में विरोष्य के मातर लिङ्ग होता है। तव्यस-
कृदन्त प्रकरबन्।
-
सकर्मक कर्ममें--अधि-इ-अधीयते यत्तद्-अध्ये-
सख्यम्-जो पढ़ागाय । नि-शिप-निक्षिप्यते यत्तद् निजे
प्तश्यम्-जो रक्खाजाय ॥ उदाहरणम्----
श्रोतव्यानि शास्त्राणि बुद्धिवेशद्यमिच्छता ।
पात्रेष्वामि धनिभिनिक्षेप्तस्यानि सर्वतः-
बुद्धि का विकाश चाहनेवालों को शास्त्र पढ़ने चाहिये ।
धनवानोंको सब ओर से पात्रोंमें धन लगाने चाहिये ।
अनीयर्तव्यत् के समानही सब धातुओं से भाज
और कर्म में अनीयर् भी होता है। भाव में--रम-रम्यो
यस्मिस्तद्रमणीयम् जिसमें रमण कियाजाय। यत्-
यत्यते यस्मिस्तद्-यतनीयम्=जिसमें यत्न कियाजाय ।
कर्म में--कृ--क्रियते यत्तद्-करणीयम् जो किया जाय ।
श्रा-चर्-प्राचर्यते यत्तद्-भाचरणीयम्जो आचरण
किया जाय ॥ उदाहरणम्
कर्तव्ये रमनीयं मा यतनीयं कदाप्यातंत्र्ये ।
करणीयच्च शुभं तन्नाचरणीयं शुभेतरं यत्स्यात्
कर्तव्यमें रमण करना चाहिये धकतर में कभी यरन नहीं
करना चाहिये । शुभकर्म करना चाहिये शुमसे इता हो
अशा कर्म है उता को प्राचरण न करना चाहिये ।
यत् प्रान्त, महारो पात, श. म,
और वह आदि धातुओं से भाव और कर्म में ( यत् )
प्रत्यय होता है । पा-पोयते यत्तद्-पेयन जो
पीया जाय । दा-दीयते यत्तद्-देवम्= जो दिया
जाय । प्रादा-प्रादेवन् । हा• हेरम् । चि--चेयम् ।
जि-नेयम् । नो- नेयम् । न गेरम् । शक्- शश्या ।
संस्कृतप्रबोधे- लभ लभ्यम् । सह सहयम् । चर् चर्यम् । पह- वहयते M येन तद्-वयम् ॥ . उदाहरणानि-वनपूतं जलं पेयं देयं दीनाय चे- दुनम् । प्रादेयं शास्त्रवचनं हेयं दुःखमनागतम् ॥ चेयं धर्मफलं लोके जेयं तु बलपम्मनः । नेयं तदेव सन्मार्गे नेयं हरिकथामृतम् ॥ शक्यं परोपकरणं लभ्यं धस्तुचतुष्ट- यम् । सहयं सुखं च दुःखं च चर्य सत्यवतं सदा ॥ वह- नत्यनेन करणे यह शकटमुच्यते ॥ इन उदाहरणों में सब धातु सकर्मक हैं, इसलिये सब से कर्म में प्रत्यय हुवा है । (स्था) धातु अकर्मक है, उससे भाव में प्रत्यय होगा। यथा-स्थीयते यस्मि रतद् - स्पेयम् = जिसमें ठहरा जाय। (धह) धातु से भाव और कर्म में प्रत्यय नहीं होता, किन्तु करण कारक मैं (यत्) प्रत्यय होकर ( वयम् ) बनता है, जिसके द्वारा वहन किया जाय, उस शकदादि को (वहय) कहते हैं। स्यप-इ, स्तु, शास्, वृ. दु, जुष, क और भ शादि धातुओं से भाव और कर्म में (क्यप्) प्रत्यय होता है- ईयते प्राप्यते यः स इत्यः प्राप्तव्यः जो पाया. आय । स्तु-तुत्यः-स्तोतव्यः । शास-शिष्यः = शिक्षणी. यः । -- वृत्या बरणीयः पा-दृ-मादृत्य श्रादरणीयः । जुष्--जष्यः सेवनीयः। क-कत्यः करणीयः। भ-भल्याभरणीयः॥ ..... उदाहरणानि इत्यास्तु सतजना शार्याः स्तुत्यः सर्वेश्वरो नभिः। भाज्ञाकारी भवेत् शिष्या प्रत्यः कार्येषु . - - --- कृदन्त प्रकरणम् । (१) कार्यविद् ॥ प्रात्याः गुणवन्तो ये जल्यो धर्मपथः सदा। कृत्यः स स्याद्य उचितः भृत्यो यो भियते सदा ॥ मान प्रार्य प्राप्त होने योग्य हैं। ईश्वर मनुष्यों ने स्तुति करने योग्य है । प्राजाकारी शिक्षा करने योग्य होवै । कार्य कार्यों में घरख करने योग्य है । गुग- वन्त आदर करने के योग्य हैं । धर्मपथ सदा सेवन करने योग्य है । जो उचित है वह करने योग्य है। जिस का सदा भरणा किया जाता है वह भृत्य है । ण्यत्-ऋकारान्त और हलन्त धातुओं मे तथा पावश्यकार्थक उकारान्त धातुओं से भी भाव और कर्म में [ गयत् ] होता है । क-क्रियते यत्तद्-का-गो किया जाय । धू-धार्यम् । वच् उच्यते यशद्- बापाम- शब्दमयम् । अन्यत्र- वाच्यम् । भुज-- भुज्यते यत्तद्- भोज्यम् = भत्यम् । अन्यत्र-भोग्यं धनादि। युज युज्यते प्रेर्यते यत्तद् योज्यम-प्रेर्यम् । अन्यत्र. योग्यम् ॥ पू. पूयते यत्तद् पाव्यम् । त्यज्- त्याज्यम् । वप्- वाच्यम्। लू-लाध्यम । भ.- भियते या सा-भार्या ॥ उदाहरणानि---कार्य वेदोदितं कर्म धार्य धर्म मंदा नृभिः । वाक्यं तु शब्दसंज्ञायां वाच्यमन्यदुदीरि- तम् ॥ भोज्यं भदये भोग्यमन्यत् योज्यं प्रेरितमुच्यते । सुचरित्रैः कुलं पाध्यं त्याज्यं दुष्कर्म मानवैः ॥ क्षेत्रे वी. आनि वाप्यानि लाठयं कण्टकमादितः । भियते यातु संज्ञायां भी भार्यति कश्यते ॥ वेदोदित कर्म करना चाहिये । मनुष्योंको सदा धर्म धारण करना चाहिये । शब्द की संज्ञा में वाफ्य और (६) संस्कृतप्रबोधे- सु और अन्यत्र वाच्य कहलाता है। भत्य में भोज्य अन्यत्र भोग्य और प्रेरित को योग्य और तद्भिन्न को योग्य कहते हैं । सुचरित्रोंसे कुल्ल पवित्र करना चाहिये । दुष्कर्म मनुष्यों को छोड़ना चाहिये । क्षेत्रमें बीज बोने चाहिये । कांटेको पहिलेही से उखाड़ना चाहिये । भासे जिसका भरण किया जाय वह संज्ञा में भार्या कहलाती है। चन--सुख दुःख वाचक दुस् उपसर्ग उप- पद में हों तो धातु से भाव और कर्म में (खल) प्रत्यय होता है सु-क- सुखेन क्रियते-मुकरः। दुम्-फ- दुःखेन क्रियते-दुष्करः । सु-लभ सुखेन लभ्यते= सुनभः । दुर्-ज़म - दुःखेन लभ्यते दुर्लनः। इसी प्रकार गु-"म्= लुगमः । दुर्-गम-दुर्गमः । सु-वच्=सुवचः । दुर्- व-दुर्वचः ॥ इत्यादि उदाहरगानि-यत्नेन दुःकरं कर्म सुकरं जायते खन । गुल नोऽपि हि योऽर्गः स्यात्म प्रमादेन स दुर्लभः ॥ दुर्गमोऽपि हि यः पन्या गत्यैव सुगनो भवेत् । मुवचा नागरी भाषा यवनानी तु दुर्वचा !! दुष्कर कर्म भी सुकर होजाता है। सुलभ भी जो अर्थ हो वह प्रमाद से दुर्लन हो जाता है । दुर्गम मार्ग भी चलने से सुगम होजाता है : नागरी भाषा सुख से पढ़ी जा सकती है, फारसी बड़ी कठिनता से पढ़ी जाती है ।। युच श्राकारान्त धातों से उक्त दोनों उपसगी के उपपद होने में 'यु' प्रत्यय होता है - सु-पा- सुखेन यत्र से
कृदन्तप्रकरणम्।
(9)
-
पीयते-सुपानम । दुस्- पा- दुःखेन पीयते दुपानम् ।
मु-दा-सुदानम् । दुर्- दा-दुर्दानम् । इत्यादि
उदाहरणम्-सुपानं रुच्यते सर्वैद्यानं कष्टदं
स्मृतम् ।
। सुदानं सात्विकं ख्यातं दुर्दानं तामसं स्मृतम्
सुपान सबको रुचता है, दुष्पान कष्टका देनेवाला है।
सुदान सात्विक और दुर्दान तामस कहलाता है।
क्तसर धातुओं से भतार्य में 'क्त' प्रत्यय होता
है-कृ--कृतम् किया । पा-पीतम पिया । भुज-भुक्तम=
खाया। विद्-विदितम् जाना। मष-मर्षितम्-सहा ॥
उदाहरणानि मया तत्र गमनं न कतम् =मैंने वहां
गमन नहीं किया । शिशुना पयः पीतम बालकने दूध
पीलिया । ब्राह्मणोसत्र भुक्तन ब्राह्मशों ने वहां खाया
था । विदितं मया तत्र चेष्टित न =मैंने तुम्हारा प्रकल्प
जाना । मर्षितं साधुना खलवाक्यम = साधुने खलके वाक्य
को सहलिया।
कहीं २ वर्तमान अर्थ में भी 'क्त' प्रत्ययका प्रयोग
किया जाताहै। यथा-क गतरछात्रः ? स इदानीमेव सुप्तः==
कात्र कहां गया ? वह अभी सोया है। त्वयेदानों कि
क्रियते ? पठनार्यमुद्यतोऽस्मि-तुझ से इस समय क्या
किया जाता है ? पढ़ने के लिये तयार हूं। यन्मयोक्तं
तदेव तस्याऽपि मतम जो मैंने कहा वही उसका भी
मत है । इन सदाहरवों के उत्तरवाक्यों में सर्वत्र
वर्तमान में हुवा है।
भावकर्म के अतिरिक्त कहीं पर काम भी 'क्त' होता
है। पथा-सतत्र गतः वह यहां गया। अहमत्र स्थितः=मैं
१८) संस्कृतग्रमोधे- - यहां ठहरा हूं। त्वं वृक्षमारूढः-तू वृक्ष पर चढ़ा है । यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि जहां भाव में 'क्त' होता है यहां सदा नपुंसकलिङ्ग होता है यथा-- मया शयितम मुझसे सोयागया। तेन हसितम = उस से हंसा गया। जहां कर्ता और कर्म में होता है, वहां विशेष्य के अनुसार लिङ्ग होता है। कर्त्ता में-फलं पतितम =फल गिरा । शिशः सुप्तः बालक सोया। लता विस्तृता-लता फैली । कर्म में त्वया विद्या नाधिगताः तेने विद्या नहीं पढ़ी। मया धनं लब्धम-मैंने धन पाया। तेन धर्मोवासितः उसने धर्म की उपासना की ॥ इत्यादि २-अथ भाववाचिनः अब केवल भाव में होनेवाले कृत् प्रत्ययोंका निरू- पण किया जाता है। अन् , अप घन, घ, नङ्, कि, स्युट , क्त, क्तिन, युच, क्यप् , अ, अङ्, और श ये चौदह प्रत्यय सदा भाव में होते हैं । भाववाचक शब्दों में अच् , अप, घन, घ, नङ् और कि प्रत्ययान्त पुंल्लिङ्ग, ल्युट और क्त प्रत्ययान्त नपुंसकलिङ्ग और शेष स्रोलिङ्ग होते हैं। प्रच-इकारान्त धातुओं से भाव में अन् होता है--- ईयते प्राप्यते पृथिव्यामित्ययः लोहः । चि.-चीयतेऽस्मिनिति चयः=राशिः। जि- जीयतेऽस्मित बित्ति जया उत्कर्षः । क्षि-क्षीयते नश्यते वयते वारिम चिति बनानायः निवासो वा.॥ , - प्रस्पय कृदन्तपकरसम्। () - उदाहरणानि-तप्तः सन् प्रणमत्ययः लोहातपा- या हुवा लचता है। गृहस्थेनादश्यकपदार्थानां सञ्चयः कार्यगृहस्थ को आवश्यक पदार्थों का सञ्चय करना चाहिये । यतो धर्मस्ततो जयः-जहां धर्म है वहां जयहै। जिगीषुणा द्विषतां क्षयः कार्यःजपाभिलाषीने शत्रुओंका नाश करना चाहिये। विरक्तेन गृहेषु क्षयरत्यज्यते-विर- कसे घरों में रहना छोड़ दिया जाता है। अप-उकारान्त, ऋकारान्त और किन्हीं२ हलन्तधातु- प्रों से भी भाष में 'अप' प्रत्यय होता है । उकारान्त.. भू भूयतेऽस्मिन्निति भवः संसारः उत्पत्तिक । परि. भू-परिभवः-तिरस्कारः। प्रमु-भ-अमुभवः साक्षात्कारः। प्र-सू-प्रसूयतेऽस्मिन्निति प्रसवः उत्पत्तिः । सं-स्तु-संस्तू- यतेऽस्मिन्मनेम वा संस्तवः-परिचयः॥ ऋकाराम्त-क-क्रिय- तेनेनेति कर:-हस्तः । शृ-शीर्यतेऽनेनेति शरः बाणः। वि. स्त-विस्तरः ॥ हलन्त--आ-- युध् प्रायुध्यतेऽमेनेत्यायु- -संयम्यते मिलनेन धा मनः संयमा मनोनिग्रहः । नि-यम नियमः । मद्-माद्य- ते मिलनेन वा मदः हर्प अभिमानो वा । यदि 'म' धातु के पूर्व कोई उपसर्ग हो तो 'घ' प्रत्यय होता है प्रमादः । उन्मादः ॥ हन्यते रिमन्निति वधा-हिं. साकर्म । विग्रह-विगृहयतेऽस्मिन्निति विग्रहः । प्रवग्रहः । प्रग्रहः । भिग्रहः । प्रतिग्रहः । संग्रहः । प्राग्रहः । प्र-क्रम :-प्रक्रम्यतेऽस्मिन्न नेम वा-प्रक्रमः । उपक्रमः . प्रपनारम्भः ॥ सम अज = समजः = पानां समुदायः । उद्-अज = उदजः आज = उदजः = पशनां प्रेरलम् ॥ - admin धम-शस्त्रभ'। सम (१०) संस्कायो- उदाहरबानि-रामियो गानाः पुनःपुनर्भवाम्मी निमज्जन्ति : रागीवन वारवार भवसागर में डूबते हैं। परिभवे पराक्रम एव भूषणम तिरस्कार में पराक्रमही भूपण है। अनुभवेन विना विद्यापि फलं न प्रसूते अनुभव के बिना विद्या भी फल नहीं उन्पन्न करतो । महात्मनां प्रसवो लोकाभ्युदयाय भवति-महात्माओं का जन्म संसार के करपारा के लिये होता है। परिच- सायं गुणानां संस्तयः क्रियते-परिचय के लिये गुपोंका वर्णन किया जाता है। दानेन करः शोभते-दान से हाय शोमा पाता है । धनुपि शरः सन्दीयते-धनुष ने बाथ जोड़ा जाता है। जाते वाचां विस्तरेण किम जाने हुवे विषयमें वासीके फैलावसे क्या ? प्रशिक्षिताय भीर. वे चायुधं न दातठयम अशिक्षित और डरपोक को शत्र नहीं देना चाहिये । सर्या सिद्धी मनसः संयम एव परं कारण सम मयों की सिद्धि मनका रोकना ही प्रधान कारण है। नियम विना किमपि कार्य न सिध्यति नियम के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता। भदोभत्ताः कस्यापि कार्यस्य परिणामं नावेक्षन्तमदी. भमत्त किसी कार्य के परिणाम को नहीं देखते । मा कुपाः प्राणिनां वचः = प्राणियों का यथ मत कर । वैयाकरी. म पदानां विपहावयही डियेते = बैपाकरण से पदों के विस्तार और किमाते हैं। केनापि समं विप्रह म कुर्वीत = किसी के भी साप विरोध मत करो। वृष्टे. रवाहेब दुर्भिक्षो जायते - वृष्टिके रुकने से दुर्भिय होता । अपराधिनां प्रग्रहो भविष्यति = अपराधियों को कदन्तपकरवाम् । (११) अल होगा। शत्रणां निग्रहः कार्यः = शत्रुओं का निग्रह धारमा चाहिये । मालवानां पट् कर्मसु प्रतिग्रह एकावर फर्म - ब्राह्मनों के कर्मों में प्रतिग्रह ( दान लेना) ही नीच कहै । गुहम्येन तापानेव संयहः कार्यः यावान् योगमायालं स्यात् = गृहस्प को सतनाही संग्रह करना चाहिये जितना योगक्षेम के लिये पर्याप्त हो । सर्वः शुभकर्म स्वेवाग्रहो विधेयः = सशको शुभकों में ही माग्रह करना चाहिये। कविना ग्रन्धस्य प्रझम सपक्रमो पा पिते - कवि से ग्रस्यका भारम्भ किया जाता है। समजेन पशवोऽपि शत्रून निवारयन्ति समुदाय से पशु गी शत्रुओं का निधारण करते हैं। स्वामिनो बनाय पशूनामुद कुर्वन्ति = स्वामी वन के लिये पशुत्रों का प्रेरणा करते है। पत्र-प्रायः धातुओं से भाव में [ घन] प्रत्यय होता है भू-भूपतेऽतिमान्नति = भावः । रञ्ज - रज्यतेऽस्मि. मिति = रागः । पच-पाकः। भज = भागः । लभ = लाभः । दर = दायः । अधि. - अध्यायः । मा-- = आधारः । = प्रस्तावः । उद्- गृ = उद्गारः। वि--स्तु - वि. अत्र-तृ = अवतारः।भा-लप = पालापः। संलापः। विलापः ।। सम्--बद संबादः । विवादः। परिवादः--परीवादः । प्रवाहः । परिभावः । समाजः ॥ उदाहरणानि-नासतो विद्यते भावो नामावो विद्यते सतः = अभाव का भाव और भाव का प्रभाव नहीं होता। राग एव मनुष्याणां यस्यहेतुः = रागही मनुष्यों के बन्ध का कारण है । गृहस्यः पाके सिद्ध सति प्र - स्तु (१२) संस्कृतप्रबोधे- दीनेभ्यो भागो देयः - गृहस्थोंने पाक सिद्ध होनेपर दीनों के लिये भाग देना चाहिये । को लाभो ? गुजिसनमः लाभ क्या है ? गुखियोंका समागम । दायादाः दायभाग नियमेन दायं प्राप्नुवन्ति = वारिस कानुनविरासत से विरते को पाते हैं। ग्रन्याथ्यायेष किमधीयते भवद्भिः? ग्रन्यके अध्यायों में आप से क्या पढ़ा जाता है ? हयस्स- मायामध्यक्षेण कः प्रस्तावः कृतः ? = फल सभा में सभा- पति ने क्या प्रस्ताव किया था? हृदयस्योद्गाराः वाचा स्वयमेव निःसरन्ति हृदय के उद्गार (भाव) वाणी से अपने आप निकलते हैं । तन्तूनां विस्तारं पटोजायते =तन्तुओं के फैलावसे कपड़ा बनताहै। सिद्धानामवता. रोहि धर्म संरक्षणाय भवति=सिद्धोंका अवतार धर्मकी रक्षा के लिये होता है। गाथकेन स्वराणामालापः क्रियते= गवैये से स्वरों का पालाप किया जाता है। वाग्मिना सभायां संलापो विधीयते-वक्ता से सभा में सुभाषण किया जाता है । दुःखातेन भृशं विलापः क्रियते दुःखा. त से बार बार विलाप किया जाता है। सर्वैःसह संवाद एवं कार्य: सबके साथ संवादही करना चाहिपे । केनाs पि सह विवादो न कर्तव्यः किसीके भी साथ विवाद नहीं करना चाहिये। कस्यापि परिवादो न वक्त यो न श्रोतव्यश्च किसी की भी निन्दा न कहनी और न सुननी चाहिये । वृष्टरवग्राहो कदापि माभूयात-वृष्टिका अवरोध कभी मतहो । तेजस्विनां परिभावः केनापि कर्तुं न शक्यते तेजस्वियोंका तिरस्कार किसीसे नहीं किया जासकता। विदुषां समाजे मूर्खाणां गानमेव विभूषणम् विद्वानों के कृदन्तपकरणम् । (१३) - समाज में मूों का मौनही भूषण है ॥ घ-किन्हीं २ धातुओं से भाववाचक संसा में 'घ' प्रत्यय होता है। गो-चर्--गाव इन्द्रियाणि चरन्त्य- स्मिन्निति गोचर:-प्रत्यक्षः। सह घरन्त्यनेन सहधरः- मित्रम् । श्रा-पण-श्रापणन्तेऽस्मिनिति आपणः- क्रयविक्रयस्थानः । प्रा-----आकुर्वन्त्यस्मिमिति आकरः खानिः । श्रा-ली. -मा समन्तारलीयतेऽस्मि. निति-प्रालयः मन्दिरम् ॥ उदाहरणानि-अगोचरोों बुद्धा विमर्षणीयः- परोक्ष अर्थ बुद्धि से विचारणीय है। सहचरेष्वभिचारो ना. चरणीयः = सहचरों में अभिचार ( भेद ) नहीं डालना चाहिए। आपणे गत्वा वस्त्राणि क्रीणीमहे बाज़ार में जोकर कपड़े खरीदेंगे। आकराद्विरण्यं प्रभवति खान से सौना निकलता है। प्रालयाते मनुष्यैः कुत्र स्थीयेत? गृह के सिवाय मनुष्यों से कहां ठहरा जावै ? यज् , याच, यत्, प्रच्छ और स्वप आदि धातुओं से भाव में नङ् प्रत्यय होता है -यज-इज्यते- ऽस्मिन्न नेनवा=यज्ञः । याच याच्यतेऽनया-याना। यत्-यत्नः । प्रच्छ-प्रश्नः । स्वप-स्वप्नः ।। उदाहरणानि-यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः देवताओं ने यज्ञ से विष्णु का पूजन किया। याज्ञा समा नास्त्य- पमान भूमिः याचना के समान और कोई अपमान की भूमि नहीं है। यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः- यत्न करने पर यदि कार्य सिद्ध न हो तो क्या दोष है ? नङ संस्कृतप्रबोधे- - जिज्ञासुना विनीतभावेन प्रश्नः कर्तव्यः नतु मात्सर्यण- जिज्ञासु ने नमभाव से प्रश्न करना चाहिए न कि मत्स- रता से । स्वप्ने किमपि नानुभूयते- निद्रा में कुछ भी अनुभव नहीं किया जाता ॥ कि-उपसर्ग या कर्म उपपद हो तो धातु से भाव में 'कि'प्रत्यय होताहै । उपसर्गोपपद- विधा -विधी- अन्तेऽस्मिन्नर्था इति विधिः-आज्ञा, प्रेरणा वा । नि-धी- निधीयन्तेऽस्मिन्नर्थानीति निधिः कोषः। कर्मोपपद- जलं धीयतेऽस्मिन्निति जलधिः समुद्रः । इषवो धीयन्ते- ऽस्मिन्निति इषुधिः तर्कशः ॥ उदाहरणानि-कर्त्तव्याकर्तव्येषु शास्त्रेण विधिः क्रिय- ते कर्तव्याकर्त्तव्य में शास्त्र से आज्ञा की जाती है। राजपुतः प्रजाभ्यः करमादाय निधौ निधीयतेप्रजाओं से कर लेकर राज पुरुषों से कोष में रक्खा जाता है। चतसृषु दिक्षु जलधिना वेष्टिता पृथिवी चारों दिशाओं में पृथिवी समुद्र से वेष्टित है । शरैः पूर्ण इषुधिः कटिना बध्यतेचाणों से भरा हुमा तर्कश कमरसे बान्धा जाता है ल्युट्-सब धातुओं से भाव में 'ल्युट्' प्रत्यय होता है। कृ-क्रियतेऽनेन-करणम् । जीव-जीवनम् । म नरणम् । शुश्रूयतेऽनेन-श्रवणम् । गम्=गमनम् ।शी शयनम् । प्रास-प्रासनम् । स्था-स्थानन्। या यानम् उदाहरणानि-करणं जीवनं प्रोक्तं मरणं तदभावता। शास्त्रस्य अवर्ण कार्य गमनं साधुसङ्गतौ ॥ दिषा न शयनं कार्यमासनच्च गुरोरधि । स्थानयानेऽपि कर्तव्ये यथाऽवसरमात्मनः ॥ -- कृदन्तप्रकरणम् । करनाही जीवन है और उसका न होनाही मरण है । शास्त्र को सुनना चाहिए, साधु संगति में जाना चाहिए। दिन में सोना नहीं चाहिए और गुरु बैठना न चाहिए । अपने स्थान यान भी यथाऽवसर करने चाहिये। क्त - सब धातुओंसे भूतकालिक भाव में 'क्त' प्रत्य- य होता है। कृ-अकारि यत्तत् कृतम =किया गया । श्रु-अप्रावि यत्तत् श्रुतम् =सुना गया। भुज भुक्तम् । पा-पीतम् । गम =गतम ।नी नीतम् । पाम् आमि- तन । शी-शयितम् । स्था=स्थितम । यायातम् । गै गीतम् । जलप जल्पितम् ।भक्ष=भक्षितम् इत्यादि। उदाहरणानि-किन्त्वयाऽऽन्हिकं कृतम् ? क्या तैने आन्हिक (दैनिक कर्न) कर लिया? मया तस्य व्याख्या- न श्रुतन न मैंने उसका ठपाख्यान सुना था। यज्ञावमाने ब्राह्मणस्तत्र भुक्तम = यज्ञ की समाप्तिपर ब्राह्मणों ने वहां खाया था । शिशुना पयः पीतम = बालक पीलिया। मया तत्र न गतम्-मुझसे वहां नहीं जायागया। विषयेषु नीनं मनस्तापमुत्पादयति = विषयों में ले जाया गया मन जलन उत्पन्न करताहै। दिवा मया यत्रासितं रात्रौ तत्रैव शयितम = दिनमें मुझसे जहां बैठा गयाथा । रात को वहीं सोया गया । अत्र स्थितं तेन तत्र यातं मया = उमसे यहां पर ठहरा गया और मुझसे वहां पर मायागया । आदिकविना रामायसे रामचरितं गीतम् = वारमीकि रामायण में रामवरित गाया गया। तेन तत्र ।
(१६) संकृतप्रबोधे- - कि जल्पितम = उसने वहां क्या कहा था। मया तत्र न भतितम = मैंने वहां पर नहीं खाया ॥ क्तिन-सब धातुओं से भाव में 'क्तिन' प्रत्यय होता है--क-क्रियतेऽनया कृतिः रचना । भृ--भूतिः== चेतनम् । धू-धृतिः धारणा । मन- मन्यतेऽनया मतिः बुध बुद्धिः । गम=गतिः । नम नतिः। भज-भक्तिः । यज-इष्टिः । श्रु--श्रूयतेऽनया-श्रुतिः । स्तु-स्तुतिः । प्राप्=प्राप्तिः । ग्लै ग्लानिः । हा-हानिः ॥ इत्यादि उदाहरणानि-विचित्रा पाणिनेः कृतिः पाणिनि की रचना विचित्र है। स्वामिना भृत्येभ्यो भृतिर्दीयते स्वामी से भृत्यों के लिए वेतन दिया जाता है । धृति. रेव धर्मस्य प्रथमं लक्षणम् धैर्यही धर्म का पहिला लक्षण है। मतिरेव बलाद् गरीयसी=मतिही बलसे बड़ी है। बुद्धिर्यस्य बलं तस्य-नीसमें बुद्धिहै उसी में बल है। गहना कर्मणां गतिः कर्मों की गति बड़ी गहन है। नतिरेवोनतेः कारणम-मतिही उन्नति का कारण है। परमात्मनि सदा भक्तिः कार्या-परमात्मा में सदा भक्ति करनी चाहिये । स्वर्गकाम इष्टिना यजेत स्वर्ग चाहने वाला इष्टि से यज्ञ करै । श्रुतिभिः श्रोतव्यो धर्मः श्रु तियों से धर्म सुनना चाहिये । उपासकाः स्तोत्रैः स्तुति कुर्वन्ति-उपासक रतोत्रों से स्तुति करते हैं । धर्मेणार्थ- स्याप्तिः कर्तव्या धर्म से अर्थकी प्राप्ति करनी चाहिये। विषयासक्ती शरीरस्य ग्लानिरर्थस्य हानिश्च जायते विषयासक्ति में शरीर की ग्लानि और अर्थ की हानि होती है।
कृदन्तप्रकरणाम्। (१७) यु-णिजन्त सब धातुओंसे तथा अणिजन्त श्रास. घट , विद्, वन्द्, और अनिच्छार्थक इव धातु में भाव में 'युच्' प्रत्यय होता है। णिजन्त-भू-भावयतेऽनया भावना। चित्- चेत- यतेऽनया-चेतना। - धारयतेऽनया धारणा । वस वासना । कम्=कामना । युज-योजना । स्था स्थापना । वि-ज्ञा-विज्ञापना ॥ अणिजन्त--आस-प्रास्यतेऽनया पासना । घटयतेऽनया घटना । विद्यतेऽनया-वेदना । वन्द्यते नया-वन्दना । मन्विष्यते नया-अन्वेषणा ॥ उदाहरणानि-यादृशी भावना यस्य बुद्धिर्भवति तादृशी जैसी जिसकी भावना होती है वैसीही उसकी बुद्धि होती है । शरीरे यावच्चेतना वर्तते तावदेव जीवनम् शरीर में जब तक चेतनता है तभी तक जीवन है। चित्तस्य धारणामन्तरा समाधिन सेत्स्यति-चित्त की धारणा के विना समाधि सिद्ध न होगी । वासना तन्तुभिर्बद्धो जीवो जगति जाजायते-वासना के तन्तुओं से बन्धा हुआ में वार वार जन्म लेता है। भोगः कामनाया पूर्तिर्न भवति-भोगों से कामना की पूर्ति नहीं होती । कार्याक्षमे भृत्ये योजनया किं भवि- ध्यति ?==भृत्य के कार्य में असमर्थ होने पर योजना से क्या होगा ? तेन तत्र पाठशालायाः स्थापना कृता- उसने वहां पर पाठशाला की स्थापना की। अद्यैव मया तस्य विज्ञापना श्रुता ता - अभी मैंने उसकी सूचना सुनी है । गुरुणामुपरिष्टादासना न कर्तव्या-गुरुओं को जीव जगत् (१८) सस्कृतप्रबोधे , जपर श्रासना नहीं करनी चाहिये । हस्तित्रैका महती घटना सञ्जाता=कल वहाँ पर एक बड़ी घटना हुई। नहि बन्ध्या विजानाति गुरू प्रसववेदनाम भारी प्रसव की वेदना को बन्ध्या नहीं जानती । सायं प्रातः सर्वदेश्वरस्य वन्दना कार्या=सुबह शाम सदा ईश्वर की बन्दना करनी चाहिये। मुमुक्षु । हयात्मतावस्यान्वेषणा कर्तश्या-मुमुक्षुको प्रात्मतत्वकी अन्वेषणा करनी चाहियो। क्यप्-वज् , यज् , विद् और शी नादि धातुओं से भाव में 'क्यप' प्रत्यय होता है-वज-वज्यतेऽनया वज्या यात्रा । यज-इज्यतेऽनया-ज्याष्टिः । विद्- विद्यतेऽनया - विद्या । शी-शच्यतेऽनया-शय्या ॥ उदाहरणानि-वज्या तीर्थेषु कर्तव्या इज्या पर्वणि पर्वणि । विद्या समधिगन्तव्या शध्या त्याज्यारुणोदये तीर्थों में यात्रा करनी चाहिये, पर्व पर्व में इष्टि करनी चाहिये, विद्या प्राप्त करनी चाहिये और सूर्योदय होने पर शय्या छोड़ देनी चाहिये । अ-सन् प्रत्ययान्त धातुओंसे तथा हलन्त गुरुमान् धातुओं से भाव में 'अ' प्रत्यय होता है । सन्नन्त-क- कर्तुमिच्छा=चिकीर्षा । गम्-जिगनिषा । वच्-वक्तु- मिच्या-विवक्षा । पा-पिपासा । ज्ञा-जिज्ञासा । ग्रह- ग्रहीतुमिच्छा = जिघृक्षा । हा = जिहासा । भुज = बुभुक्षा । लभ- लब्धुमिच्छा = लिप्सा । दा-दातु- मिच्छा = दित्मा ॥ हलन्त गुमान्-~-ईह -ई हितुमिच्छा ई हा । अह -कहितुमिच्छा = जहा ॥ इत्यादि ।
कृदन्तप्रकरणम् ।
(१९)
उदाहरणानि-चिकोषर्षी विना कार्य प्रवृत्तिः कथं
स्यात् ? = करने की इच्छा के विना कार्य में प्रवृत्ति
कैसे हो? भवतां तत्र जिगमिषा नास्ति किम ? प्रापकी
वहां जाने की इच्छा नहीं है क्या ? यस्य विवव
नास्ति तस्य भाषणे कथं प्रवृत्तिः स्यात् = जिसको कहने
की इच्छाही नहीं है उसकी बोलने में प्रवृत्ति कैसे हो?
ग्रीमे पिपासा बर्द्धते = ग्रीडम ऋतु में पिपासा बढ़ती
है। जिज्ञासया समोऽप्यों ज्ञायते = जिज्ञासा से मूक्ष्म
अर्थ भी जाना जाता है। यद्यप्यनुकूनेषु जिघक्षा प्रति-
कूलेषु जिहासा च प्राणिनां स्वाभाविकी तथाप्यविद्यया
तैरादयं हीयते हेयं च गृहयते = यद्यपि अनुकूल में
जिघृक्षा और प्रतिकूल में जिहाना प्राणियों की स्वाभा-
विक है, तथापि अविद्या से आदेय छोड़ा जाता है और
हेय ग्रहण किया जाता है । दारिद्रये बुभुक्षा वरी
वृद्धयते = दरिद्रता में
भूख
व वार वार बढ़ती है। मृतस्य
लिप्सा कृपणस्य दित्सा श्रुता न केनाऽपि न चेह दृष्टा =
मुर्द में लेने की इच्छा और कंजूस में देने की इच्छा
न किसीने यहां सुनी और न देखी । यथा जङ्गमेष्वीहा
तयैव विद्वत्सूहा विद्यते = जैसे जङ्गमों में चेष्ठा वैसेही
विद्वानों में विचारणा रहती है।
अङ्--जु, त्रप् , क्षम् , लज् , दय् , चिन्त , पूज,
क्षय , चर्च और अर्च धातुओं से तथा उपसर्ग पूर्धक
आकारान्त धातुओंसे भी भावमें अङ प्रत्यय होता है ।
ज-जीर्यते नयाभ्यां वा = जरा । पत्रपा । क्षम् =
क्षमा । लज = लज्जा । दय् = दया । चिन्त - चिन्ता।
(२०)
संस्कृतपुबोधे-
%3D
-
पूज् = पूजा । कथ-कथा । मर्च चर्चा । अर्च-अर्चा ।
नि [--स्था :निष्ठा आ-स्था = प्रास्था । सम
संख्या । श्रा-रूया = प्रारूया । सम्-ज्ञा = संज्ञा ।
अत् और अन्तर् अव्ययों के योग में भी 'अ' होता है
अत् धीयतेऽस्यां सा श्रद्धा । अन्तर्थीयतेऽस्यां सा-अन्तर्धा।
उदाहरणानि---जरया जीर्यते कायस्त्रपया भूज्यते
नरः = जरा से शरीर जीर्ण होता है, लज्जा से मनुष्य
भूषित होताहै। सर्वदा भूषणं पुमां क्षमा लज्जेव योषिताम्
जप्ते लज्जा सदा स्त्रियों का भूषण है वैसे ही क्षमा
पुरुषोंका भूषण है । दया दीनेषु कर्तव्या चिन्ता शास्त्रस्य
सर्वदा - सदा दीनों पर दया और शास्त्र की चिन्ता
करनी चाहिए । पूजा गुरूणां कर्तव्या कथा धर्मात्मनां
सदा = गुरुओं की पूजा और धर्मात्माओं की कथा
करनी चाहिये । वर्धा विधेया शास्त्राणामर्चा प्रेम्णा
सतां सदा = सदा शास्त्रों की चर्चा और प्रेमसे सत्पुरु-
षोंकी पूजा करनी चाहिये । निष्ठा धर्म विधेया वै श्रास्था
तु शुभकर्मसु = धर्म में निष्ठा और शुभकर्मो में प्रास्था
करनी चाहिये। अङ्गैस्तु संख्या कर्तव्या संज्ञ याख्या विधी.
यते = अडों से संख्या करनी चाहिये, संज्ञासे आख्याकी
जातीहै । श्रद्धा सत्यस्य जननी अन्तर्धा गोपनं स्मृतम् -
श्रद्धा सत्य की माता है और अन्तर्धा छिपानेको कहते हैं
श-कृ, इष्, परिचर्, परिस, जागृ और मृग
धातुओं से भाव में 'श' प्रत्यय होता है । कृ-क्रियते
नया = क्रिया । इ = इच्छा । परिचर्या । परिसर्या ।
जागर्या।
मृगया
कृदन्तपकरणम् ।
(२२)
उदाहरणानि-क्रिया या करणैर्जाता मनसेच्छा प्रजा
यते - क्रिया वह है जो करणों से उतान हो, मन मे
इच्छा उत्पन्न होती है । परिचर्या गुरोः कार्या परिसय च
साधुषु = पूजा गुरु की करनी चाहिए और साधु के
समीपमें जाना चाहिए । जागर्या विषमे कार्या हिमानां
मृगया वने = विषमकालमें जागरण करना चाहिये और
हिंस जन्तुओं का वन में शिकार करना चाहिये ।।
इति भाववाचिनः।
२-अथ कर्तृवाचिनः
.
अब कर्ता में जो कृत् प्रत्यय होते हैं, उनका निरू-
पण किया जाता है।
कर्तवाचक प्रत्यय दो प्रकार के हैं, एक सामान्य
अर्थ में होनेवाले दूसरे ताच्छोल्य अर्थ में होने वाले,
जिन को सामान्य रीति पर कर्ता सम्पादन करै वे
मामान्यार्थक और जिनके करनेका कर्ता में शील अर्थात्
स्वभाव हो वे ताच्छील्यार्थक कहलाते हैं ।
अब हम विस्तरभय से सब प्रयोगों के उदाहरणा
न लिखेंगे किन्तु निदर्शनार्थ किन्हीं २ प्रयोगों के
उदाहरण लिखेंगे॥
१-सामान्यार्थकाः
गवुल-~-सघ धातुओं से कर्ता में रात्रुल' प्रत्यय
होता है । कृ-करोतीति = कारकः । मी = नायकः । पू
हन 3 घातकः । दादायकः । जन
= पावकः
Pana
(२२) संस्कृतप्रबोधे- mage D जनकः । लभ = लम्भकः । दृश् = दर्शकः । यज् = याजकः । अधी - अध्यापकः । सिच = से बकः । भुज = भोजकः ज्ञा = ज्ञापकः । ग्रह - ग्राहकः। इत्यादि * उदाहरणानि-पावक दहनेन सर्वानपदार्थान पुनाति अग्नि जलानेसे सब पदार्थीको पवित्र करताहै । अध्या- पकः शिष्यानध्यापयति = अध्यापक शिष्यों को पढ़ाताहै तृच्-क-करोतीति = कर्ता । भृ = भर्ता। नी नेता । पा = पाता । दृश् = द्रष्टा । वच् = वक्ता । श्रु = श्रोता । हन् = हन्ता । जन् = जनिता । लभ = लब्धा । यज् = यष्टा । अधीङ् = अध्येता । सिच् = सेक्ता। भुज = मोक्ता । ज्ञा = ज्ञाता । सह - सोढा । वह = वोढा । ग्रह = ग्रहीता ॥ इत्यादि उदाहरणानि-कर्ता कर्मफलेन युज्यते = कर्ता कर्म फल से युक्त होता है । नेतारमनुयान्त्यनुयायिनः अनुयायी नेताके पीछे चलते हैं। किं करिष्यन्ति वक्तारः प्रोता यत्र न विद्यते - जहां श्रोता नहीं है वहां वक्ता क्या करेंगे? ल्यु-नन्दयतीति = नन्दनः । मदनः । दूषणः । साधनः । वर्द्धनः। शोभनः । रोचनः । महनः । तपनः । दमनः । अस्पनः । रमः। दर्पणः । यवनः । लबणाः । जनार्दनः । मधुसूदनः । विभीषणः । इत्यादि । उदाहरणानि-मदनः दिषयासक्तान् मदयति काम विषयासक्तोंको उन्मत्त करता है। विद्यया मनुष्यः * एवळ् में ण और ळका लोप और 'बु' को 'अक' आदेश होजाता है।
कृदन्तप्रकरणम् । (३) शोभनो जायते नतु भूषणैः :- विद्या से मनुष्य शोभन होता है न कि भूषणों से ॥ शिनि-गृङ्गातीति = ग्राही । उत्साही । स्थायी । मन्त्री । विषयी । अपराधी । ब्रह्मवदतीति। ब्रह्मवादी। = मुनिः। ब्रह्मचारी = माणवकः । साधु करोति साधु. कारी = सज्जनः । साध दायी = पुण्यात्मा । अनु–पश्चात् यातीनि अनुयायी = पुत्रः शिष्यो वा पुत्रः शिष्यो वा । उप-समीपे जीवति उपजीवी = प्राश्रितः । स्थगिडले शेते स्थगिडल. शायी भिक्षः। क्षीरं पिबति क्षीरपायी = शिशुः । आत्मानं पाण्डतं मन्यते : परितमानी। यात्मानमभि. समन्तान्मन्यते = अभिमानी। आत्मानं बहु मन्यते = बहुमानो। मित्रं हतवान् = मित्रघाती । सोमेनेष्टवान् सोमयाजी । अग्निष्टोमयाजी ॥ उता०-अनुयायिन अग्रेसरमनुयान्ति = अनुयायी लोग अग्रणी के पीछे जाते हैं। अभिमानी अन्यानव. मन्यते - अभिमानी दूसरों का अवमान करता है ॥ इनि-मद्यं विक्रीतवान् = मद्यविक्रयी । रसविक्रयी। उदा-मद्यविक्रयिणो लोके निन्दनीया भवन्ति मद्य बेचनेवाले लोक में निन्दनीय होते हैं । अच-प्लवतीति प्लवः = जलयानम् । चोरः = तस्करः। श्वानं पचतीति श्वपश्चागडालः। अंशं हरति अंशहरो दायादः । भागहराः = भातरः । पूजामर्हति पूजाहः = विद्वान् । विद्याईः = छात्रः । दण्डाहः = अप- राधी । शंकरोतीति = शङ्कर ईश्वरः । शंधदः - ब्राह्मणः । खे शेते = खशयः = पक्षी । कूपशयः = मयडूकः । उद- - संस्कृतप्रबोधे- - रजकः रेण शेते = उदरशयः सर्पः । गिरौ शेते = गिरिशः शिवः । गृह्णन्ति धारयन्ति प्राकर्षणादिना सर्वान् पदार्थानिति ग्रहाः = सूर्यादयः ॥ उदा०-लवेन जनाः नदी तरन्ति-बेड़े से लोग नदी को तरते हैं । अंशहराः दायाधमनुहरन्ति - वा- रिस विरासत को पाते हैं । खशयैः नभम्युड्डीयते पक्षियों से आकाश में उड़ा जाता है । प्वुन नृत्यतीति = नर्तकः । खनतीति रजतीति । एयुट -गायतीति = गायनः थकन--गायकः। उदा०-नर्तकेगा नृत्तं गाथकेन गीतम् = कत्थक ने नांचा और गवैये ने गाया। क-क्षिपतीति - क्षिपः । लिखः । बुधः । कृशः । प्रोगातीति = प्रियः । प्रकर्षण जानाति = प्रज्ञ.। विज्ञः । गाः ददाति = गोदः । धनदः । श्रा-समन्तात् हयति श्राहः । प्रहः । समे तिष्ठति । विषमस्थः । द्विस्तिष्ठति = द्विष्ठः । त्रिष्ठः । द्वाभ्यां पिबतीति = द्विपः हस्ती । तुन्दं परिमार्टि तुन्द परिमृजः = अलसः । शोकम अपनुदति = शोकापनुदः - सुहत् । को पृथिव्यां मोदते = कुमुदः । महीं दधातीति = महीधः = एवंतः । सर्व प्रकर्षेण ददाति = सर्वप्रदः। पथिप्रज्ञः। गाः संचष्टे : गोसंख्यः = गोपालः । गृह णाति धान्यादिकमिति - गृहम् उदा—कुमुदश्चन्द्रोदयमपेक्षते - कुमुद चन्द्रोदयको चाहता है। महीधाः पृथिवीं धारयन्ति = पर्वत पृथिवी को धारण करते हैं। %3D । 3 समस्थः 3D -
कृदन्त प्रकरणम् ।
(२५)
श-पिबतीति : पिबः। जिघः । धमः । धयः ।
पश्यः । लिम्पतीति : लिम्पः। विन्दः । धारयतीति =
धारयः। पारयः । वेदयः । उदेजयः । चेतयः । सातयः ।
साहयः । ददातीति = ददः । दधातीति - दधः । गाः
विन्दतीति = गोविन्दः । अरविन्दम् ॥ इत्यादि
उदा०-पश्यः सर्वान् पश्यति = देखनेवाला सबको
देखता है । घेतयः सर्वान् घेतयति= चेतनवाला सब
को चिताता है।
गा-ज्वलतीति = उवालः । चालः । अवश्यायः ।
प्रतिश्यायः । ददातीति = दायः । धायः । विध्यतीति
= व्याधः। श्रा-समन्तात् सवतीति = आसावः । संसावः।
अति-एतीति = प्रत्यायः । अत्र-स्यतीति 3 भवसायः।
प्रव-हरतीति = अवहारः । लिहतीति : लेहः । निष्य.
तीति मेषः । श्वसितीति = श्वासः । दुनोतीति
= नायः । गृह गातीति = ग्राहः = नकः
उदा०-हेमन्तेऽतिश्यायेन पर्वता आउछन्नाभवन्ति
- हेमन्त ऋतु में बर्फ से पर्वत ढके हुवे होते हैं ।
व्याधः मृगानवरुध्य बाणेन विध्यति = व्याध मृगों को
रोककर बाण से बीन्धता है।
भण-ग्रन्थं करोति = ग्रन्थकारः । वृत्तिकारः ।
भाष्यकारः । कुम्भकारः । स्वर्ग हृयतीति-स्वर्गहायः ।
तन्तून् वयति-तन्तुवायः। सस्यानि मातीति-
उदा०-भाष्यकारेण यदुक्तं वैयाकरणानां तदेव
%3D
-
दावः। नयतीति
-
संस्कृतबोधे- - - प्रमाणम-भाष्यकारने जो कुछ कहा वैयाकरणों को वही प्रमाण है । तन्तुवायस्तन्तुभिः वस्त्राणि वयति-जुलाहा सूतों से कपड़ों को बुनता है। ट-दिवा करोति दिवाकरः सूर्यः। विभां करोति विभाकरः। प्रभाकरः । भास्करः। अहस्करः। निशां करोति निशाकरश्चन्द्रः। कर्मकरः=भृत्यः। निशायां चरति-निशा. चरश्चारः । वनेचरः सिंहः । पुरःसरति-पुरःसरः । पूर्व सरः । अग्रतः सरः । अग्रेतरः । दुःखं करोति । दुःखं करोति दुःखकरः- व्याधिः । सुखकरमारोग्यम् । यशस्करी विद्या ॥ उदा--भास्करः प्रभाते पूर्वस्यां दिश्युदेति-सूर्य प्रातःकाल पूर्वदिशा में उदित होता है। निशाचराः नक्तं चरन्ति चोर रातको विचरते हैं । अग्रेसरः यूयस्या ग्रतएव सरति अग्रेसर यूथ के आगेही चलता है । टक्-छन्दांसि गायति छन्दोगः । सामगः । क्षीरं पिबतिक्षीरपः मद्यपः । शत्रु हन्ति-शत्रुधनः। कृतघनः । हस्तिनं हन्तु शक्तः हस्तिघनः सिंहः । कपाटघनश्चौरः ॥ उदा०-छन्दोगा एकश्रुत्या छन्दासि गायन्ति छन्दोग एकश्रुतिसे छन्दोंको गाते हैं । कृतघ्नस्य लोके निष्कृति- र्नास्ति-कृतघन का लोक में प्रायश्चित्त नहीं है ॥ ह-अध्वानं गच्छति-अध्वगः पान्थः । दूरगः अश्वः। पारगः नाविकः। सर्वगः ईश्वरः । उरसा गच्छति उरगः सर्पः । पन्नं पतितं गच्छतीति पन्नगः सर्पः । बिहायसा गति विहगः-पक्षी। विहायसा को 'विह' - कृदन्तप्रकरणम्। (२७) -जातः-प्रजाः - - - .-- आदेश होगया है न--गच्छति-नगः 'पर्वतः । पङ्के जातम् पङ्कजं कमलम्। सरभि जातं सरोजम् । मनसि जात -मनोजः कामः । बुद्धः जाता-बुद्धिजः विवेकः । संस्कारजः पुत्रः । आत्मनो जातः --प्रात्मजः पुत्रः। अनु -पवाजात: अनुजः कनिष्ठभाता । अग्रे-जाता= अग्रजः ज्येष्ठभाता । क्लेशं हन्ति= क्लेशापहः पुत्रः । तमी पहः सूर्यः । न- पारमा । द्विांत द्विजः त्रैवर्णिकः॥ उदा०-अस्तंगते रवावध्वगाः विश्रामालयमाश्रय- न्ते-सर्य के प्रस्त होने पर पान्ध विश्रामालयका प्राश्रय लेते हैं । विषधरेणोरगेण दष्टः सद्यएव म्रियते विषधर सर्प का इसा हुधा तत्कालही मरता है। यौवने मनोजः सर्वान् यथयति युवावस्था में कामदेव सब को व्यथित करता है । क्लेशापहे पुढे जाते पित्रोः कामनासिद्धिर्जायते= क्लेशापह पुत्र के होने पर माता पिता की कामनासिद्धि होती है। धु-वि - विशेषेण भवति = विभुः घ्यापकः । प्र- प्रकर्षण भवति = प्रभः स्वामी॥ उदा०विभुना सर्व व्याप्यते = विभुसे सब व्याप्त किया जाता है। प्रभुणा वशं नीयतेऽनुचरवर्गः = स्वामी से अनचरवर्ग वश में लाया जाता है । खश-जनानेजयति = जनमेजयः = जनमेजयः = शूरः। अङ्गान्ये- जयति = अमेजयः = शीतः । प्रस्थं पचति = प्रस्थंपचः = कटाहः । मितंपचा = स्थाली। विधुं तुदति = विध.
(२८) संस्कृतप्रबोधे- - - परन्तपः- न्तुदः = राहुः । असन्तुदः = व्याधिः ॥ * उदा०-यथा जनमेजयः शत्रून ध्यथयति तथैवाङ्ग मेजयः दीनान् पीडयति = जैसे शूर शत्रुओं को व्यथित करता है, ऐसेही शीत दीनों को पीड़ित करता है। विधुन्तुदः सूर्यचन्द्राधेव ग्रसति = राहु सूर्य और चन्द्र कोही ग्रास करता है। खच्-प्रियं वदति प्रियंवदा - भार्या । वशंवदः पुत्रः। द्विषन्तं तापयति = द्विषन्तपः। परान तापयति = -शूरः। ।वाचं यच्छति = वाचंयमः = मितभाषी। पुरं दारयति पुरंदरः। सर्व सहति = सर्वसहः = साधुः। मेघं करोति = मेघंकरः = वायुः । भयङ्करः = सिंहः = क्षेमं करम् = पुण्यम् । प्रियंकरः = पुत्रः । विश्वं बिभर्ति विश्वम्भरः ईश्वरः। रथन्तरम् = साम । पतिंवरा = कन्या । शत्रुजयः = योद्धा । युगन्धरः = पर्वतः । मन्युसहः धीरः । शत्रुन्तपः = वीरः । अरिन्दमः = शूरः॥ * उदा०-यस्य प्रियंवदा भार्या वशंवदश्च पुत्रस्तस्येहैव खर्गः = जिसकी प्रियवादिनी स्त्री और अनुकूलवादी पुत्र है, उसको यहीं पर स्वर्ग है। परन्तपएव वाचंयमो भवति = शूरही वाणी को रोकने वाला होता है। शूराः विवेकिनश्च मन्युसहा भवन्ति = शर और ज्ञानी क्रोध को सहने वाले होते हैं। इन् -स्तम्बं स्तृणगुरुई करोति = स्तम्बकरिः - * जिन शब्दों के योग में खर और खच प्रत्यय होते हैं, उनको 'मुस्' का आगम होजाता है-'उम्' का लोप होकर 'स' को मनुस्वर होजाता है।
कृदन्तप्रकरणम् ।
-
वीहिः । शकृत पुरीषं करोति = शकृत्करिः = वस्सः ।
दूवि चर्मपात्रं हरति = इतिहरिः = पशुः । नाथं नासा
रज्जु हरति = नायहरिः = पशुः। फलानि गृह णाति ।
धारयतीति = फलेग्रहिः = फलवान् = वृतः । प्रात्मानं
बिभर्ति = प्रात्मम्मरिः = कुक्षिम्भरिः- उदरम्भरिः
स्वोदरपूरकः ॥
उदा०-शकृत्करिः मातरमनुधावति = बालक माता
के पीछे दौड़ता है । फलेग्रहिवक्षः जनः संरक्ष्यते
फलवान् वृक्ष मनुष्योंसे रक्षा किया जाताहै । प्रात्म
म्भरिः स्वाश्रितान नावेक्षते = पेटपाल अपने माश्रितों
को नहीं देखता ॥
क्विप-वेदं वेत्ति = वेदवित् = ब्राह्मणः । मित्रं
द्वेष्टि-मित्रविद्=कृतघ्नः । वीरं सूते वीर सूखी।
ब्रह्म हतवान ब्रह्महा = प्राततायी। भूगाहा । वृत्रहा।
सुष्टु कृतमान-सुकृत-सज्जनः । दिनकृत्-सूर्यः । मन्त्र
कृत्-ऋषिः । पापकृत-पापात्मा । पुण्यकृत पुण्यात्मा।
शास्त्रकृत् । भाष्यकृत् । ग्रन्थकृत् । अग्नि चितवान
अग्निधित्-याजिकः । सेामं सूनवान् सामसुत्-दीक्षितः।
विशेषेण राजति = विराट् । सम्राट् । परिवाट् । प्र.
अञ्चति = प्राङ् । प्रति- अञ्चति-प्रत्यङ्। उत-अञ्चति-
उड् । प्रति अन्तरे भवति = प्रतिभूः मध्यस्थः ।
उदा०-वेदविदेव विप्रः कृत्स्नं कर्मकाण्डं जा-
नाति वेदवित् ब्राह्मणही सम्पूर्ण कर्मकाण्ड को जा-
नता है । हे राजन ! तव पत्नी वीरसः भूयात् = हे
राजन् ! तुम्हारी बी वीर को उत्पन्न करनेवाली हो ।
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संस्कृतप्रबोधे... दिनकृतोदेत्यापहतं नैशं तमः सूर्यने उदित होकर रात्रि का अन्धकार दूर किया । अग्निचिता अग्नि सञ्चित्य यज्ञः समापितः अग्निचित् ने अग्नि का सञ्चयन करके यज्ञ समाप्त किया । क्विन्-मर्म स्पृशतीति = मर्मस्पृक-शरः । ऋतौ. यति-ऋत्विक होता । तं पश्यति अनुकरोति-तादृक् =तैसा । यादृक् = जैसा । एतादृक्-ईट्टक = ऐसा । त्वामनुकरोति = त्यादृक् = तेरे जैसा । मादृक् = मेरे जैसा । भवाक् = आप जैसा। अन्यादृक् = और जैसा । उदा०-मर्मस्पृशा वाकशरेया कत्यापि हृदयं मा विध्येत् मर्मस्पक वाणी के बाण से किसी के भी हृदय को मत धीधो । यादृक् त्यं तादृगेवाहम् = जैसा तू है वैसाही मैं हूं। भवादृशाः समनाः सर्वत्र न लभ्याः= श्राप जैसे सजन सर्वत्र नहीं प्राप्त होते ॥ क्वनिप--पारं दृष्टवान् = पारदृश्वा । मेरुदूश्वा । राजानं योधितवान् = राजयुवा । रामकृत्या । सह- युध्वा । सहकृत्वा ॥* उदा-अस्माकमग्रजाः शास्त्राणां पारदृश्वानः हमारे पूर्वज शास्त्रों के पारदर्शी थे। तवत्-कृ- कृतमनेन = कृतवान् । गम्- गतवान्। श्रु- श्रुतवान् । भुज्- भुक्तवान् । पा. पीतवान् । दृश्- दृष्टवान् । स्था- स्थितवान् । हन- हतवान् ॥ इत्यादि उदा०-पुरा पठनार्थमहं वाराणसी गतवान् = * क्वनिप् और तत् प्रत्यय भूतकाल में होते हैं।
कृदन्तपकरणम् । (३१) %3 पहिले पढ़ने के लिये मैं काशी को गया था। भीमः जरासन्धं हतवान् = भीम ने जरासन्ध को मारा था । कसु-के- चकारेति = चकृवान् । गम् अग्मिवान- जगन्वान् । शु-शुश्रुवान् । अद्- अक्षिवान्। पा. पपि- वान् । दृश्-दहशिवान् ददृश्वान् । स्था- तस्थिवान् । हन्- जनिवान्- जघन्वान् । सद्- सेदिवान्। वच्- अधिवान् । वस्- ऊषिवान्। यज-ईजिवान् । विश्- विशिवान- विविश्वान् । विन्द्- विविदिवान - वि- विद्वान् । स्तु- स्तुष्टुवान् । सिच्- सिषिच्वान् ॥ * उदा.-यकृवान् विश्वमीश्वरः ईश्वर ने विश्व को किया । अग्मिवान् जगन्यान् वा कृष्ताः पाण्डवान् कृष्ण पाण्डवों की श्रोर गया था। भीष्म मुखात धर्म शुश्रुवतः युधिष्ठिरस्य वैराग्यं जातम् भीष्म के मुख से धर्म सुनते हुवे युधिष्टिर को वैराग्य उत्पन्न हुवा । द्वारिकापामूषिक्ता कृष्णेन किं कृतम्-द्वारिका में बसते हुवे कृष्ण ने क्या किया ? राजसूयमीजिवति युधिष्ठिरे कः प्रत्यवायो जातः=युधिष्ठिर के राजसूय या करते हुवे कौन विधन हुआ ? कानच - कृ. चकारेति चक्राणः । धृ. दधामः । युध- युयुधानः। व्यथ्- विठयथानः । सह - सेहानः । शित शिशिक्षाणः । स्तु- स्तुष्टुवानः । ब्रू- अचानः। मुच- मुमुचानः । यज- सन्- कानच् = यियक्षमाणः॥ * * क्वसु और कानच् दोनों 'लिट् लकार के स्थान में होते हैं। इनमें से क्वसु परस्मैपद और कानमात्मनेपद कहलाताहै ।
(३२) संस्कृतप्रबोधे- उदा०-युयुधानयोः कार्जुनयोरर्जुनस्य जयो बभूव कर्म और अर्जुन के युद्ध करते हुवे अर्जुन का जय हुवा । विठयथानोऽप्यभिमन्युः युद्धे पृष्ठं न ददौ - व्यथित होते हुवे भी अभिमन्यु ने युद्ध में पीठ न दी। व्ययां सेहानोऽपि भीष्मः युधिष्ठिरं शिक्षितवाम् = पीड़ा को सहते हुवे भी भीष्म ने युधिष्ठिर को शिक्षा की। यियक्षमाणेनाहूतः पार्थनाथ मुरं द्विषन् = यज्ञ करना चाहते हुवे युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को बुलाया था । शतृ-भू-भवतीति भवन् । क-कुर्वन् । गम्-गच्छन् । श्रु- शृण्वन् । स्था- तिष्ठन् । पा- पिबन्। दृश् पश्यन् । सद् - सीदन् । हन्- धनन् । अस्- सन् । इ- यन् । विद. विद्वान् विदन् । हु- जुहन् । भो- बिभ्यन् । हा- जहन् । दिव् - दीक्ष्यन् । ज - जीयंन् । ठयध् - विध्यन् ॥ * उदा० - कार्यं कुर्वन् ग्रामं गच्छति = काम करता हुवा गांव को जाता है। गच्छन्तं पश्यन तिष्ठति = जातेहुवेको देखता हुवा ठहरताहै । पङ्के सीदता हस्तिना चीत्कारितम् = कीचड़ में धसते हुवे हाथी ने चिंघाड़ा। घनते शत्रवे न कोऽपि क्षमां भजते = भारते हुवे शत्रु पर कोई क्षमा नहीं करता। यतोऽखात् पतति = जातेहुवे घोड़े से गिरता है । जुहतोऽपि होतुः स्पृष्टःसन् अग्निर्द- हति - होम करते हुवे भी होताको स्पर्श करनेपर अग्नि जलाताहै । जीर्यति वयसि केयं विषयवासना = प्रायु के जीर्ण होने एर यह विषयवासना कैसी शानच्--क करोतोति कुर्वाणः। गम्-गम्यमानः । शु-शरवानः (स्था-स्थीयमानः । पा-पोयमानः ।
कृदन्तप्रकरसम् । (३३) दृशन 4- - -दृश्यमाणः । सद्--सद्यमानः । हन्--निधनानः हन्यमानः । अस् - भूयमानः । इ - ईयमानः । विद् - विद्यमानः । हु-ट्रयमाणः । भी - भीषयमाणः - भी- ध्यमाणः।हा-हीयमानः। दिव-दीव्यमानः । अस् प्रासीनः । शी-शयानः । ज -जीर्यमाणः । व्यध- विध्यमानः ॥ * कुर्वाणो गच्छति = करताहुआ जाता है । गम्यमाणं श्रावयति = जातेहुवे को सुनाता है । दृश्यमाणेनाभिहि- तम् = देखते हुवे ने कहा । प्रासद्यमानाय विप्राय ददाति = बैठे हुए ब्राह्मण को देता है। ईयमानाद्रथात् शस्त्रं प्रहिणोति = चलते हुवे रथसे शस्त्र छोष्ठता है । होयमा- नस्यार्थस्य को विश्वासःजातेहुवे धनका क्या विश्वाम? शयाने सति सर्व मनोरथाः मनसि विलीयन्ते - सोनेपर सारे मनोरथ मन में विलीन होजाते हैं। स्यत----करिष्यतीति = करिष्यन् । गम्-गमि- ष्यन्। श्रु-श्रोष्यन् । स्था - स्थास्यन । पा दृश् - द्रश्यन । हन - हनिष्यन । इ यास्यन् । विद् वेत्स्यन् । भी - बिभेष्यन ॥ इत्यादि * उदा० - करिष्यन् गमिष्यति करता हुवा जावेगा। गमिष्यन प्रोष्यति = जाता हुवा सुनेगा। स्थास्यन्तं दर्श यिष्यति = ठहरे हुवे को दिखलावैगा ॥ इत्यादि और शानन वर्तमान काल में होते हैं, इनमें से शत परस्मैपद और शान पात्मनेपद कहलाता है। * स्यतृ मोर स्यमान दोनों भविष्यत् काल में होते हैं, इन में से स्यतृ परस्मैपद और स्यमान मात्मनेपद कहलाता है। पास्यन * शतृ (३४) संस्कृतप्रबोधे- . स्थमान - - करिष्यमाणः । गम् ~ गमिष्यमाणः । अ- श्रोष्यमासः । स्था-स्थास्यमानः। पा पास्य मानः । द-द्रक्ष्यमाणः । हन् - हनिष्यमाणः । इ - यास्यमानः । विद् - वेत्स्यमानः । भी - विभेष्यमायाः ॥ उदाहरणा स्यान्त के समान जानो। तुमुन्-धातुके आगे 'तुमुन् प्रत्यय लगादेनेसे निमित्त अर्थका बोध होताहै, परन्तु उसके साथ क्रिया क्रिया का प्रयोग अवश्य होना चाहिए । भू - भवितुम् । गम् गन्तुम । श्रु- श्रोतुम । वह - वोढुम । दृग् - द्रष्टुम् भुज - भोक्तम् । हन् - हन्तुम् । वच् - वक्तुम् । कृ कर्तुम् । ग्रह - ग्रहीतुम् । चित् - चिन्तयितुम् । क णिच् - तुमुन् = कारयितुम् । कृ=सन - तुमुन् = चिकी- र्षितुम् ॥ इत्यादि उदा०- सर्वे भवितुमिच्छन्ति = सब होना चाहते हैं। पान्थः गन्तुं यतते = पान्य जाने को उद्यत है। श्रोता श्रोतुं वाञ्छति = श्रोता सुनना चाहता है । सार- हारः वोढुं शक्नोति = मज़दूर ढोने को समर्थ है । चक्षुष्मान् द्रष्टुमीहते = प्रांखवाला देखना चाहता है। बुभुक्षितः भोक्तुं प्रक्रमते = भूखा खाने का करता है । आततायिनं हन्तुमर्हति = आततायी को मारना चाहताहै । वाग्मी धक्तुमारभते = वक्ता बोलना प्रारम्भ करता है । उत्साही कार्य कत्तुं शक्नोति उत्साही कार्य कर सकता है । स कस्मादपि ग्रहीतु नेच्छति वह किसी से भी लेना नहीं चाहता । गतं चिन्तयितुं नाईसि = गये हुवे की चिन्ता करने को सारम्भ.
कृदन्तपूकरणम्। (३५) । योग्य नहीं है । स तैः कारयितुं शक्नोति = वह उनसे कराना सकता है । स कस्याप्यनिष्टं चिकीर्षितु न शक्नोति = वह किसी का भी अनिष्ट करना चाहने को समर्थ नहीं है। क्त्वा-जहां दो धातुओं का एकही कर्ता हो वहां पूर्वकाल में विद्यमान धातु से 'क्त्या' प्रत्यय होता है-क- कृत्वा । गम्-गत्वा । श्रु- श्रुत्वा । स्था-स्थित्वा । पा- पीत्वा । दृश- दृष्ट्वा । स्ना- स्नात्वा । हन्-हत्वा । भुन्- भुक्त्वा । विद्- विदित्वा । वच्- उक्त्वा । वस- उषित्वा ॥ उदा०-कार्यं कृत्वोपरमते कार्य करके विश्राम क- रता है। तत्र गत्वा तिष्ठति = वहां जाकर ठहरता है। स्नात्वा भुङ्क्ते = न्हाकर खाता है । भुक्त्वा व्रजति = खाकर जाता है। दृष्ट्वा स्मयते = देखकर आश्चर्य करता है। ल्यप-समास में यदि 'नन्' पूर्व न हो तो क्त्वा' को 'ल्यप' आदेश हो जाता है-अधि- कृ त्वा = अधिकृत्य । प्रा- गम् त्वा = आगम्य- आगत्य । सम्- श्रु- त्वा = संश्रुत्य । अधि- इ- त्वा = अधीत्य । प्र- इ. स्वा = प्रेत्य । प्रेत्य । प्रा. दा. त्वा = प्रादाय । वि- धा- त्वा = विधाय ॥ इत्यादि उदा०-राजा प्रजास्वधिकृत्य वर्तते = राजा प्रजा- त्रों में अधिकार करके रहता है। शिशुः गृहमागम्य आगत्य वा शेते = बालक घर में आकर सोता है। अधीत्य गच्छति = पढ़कर जाता है । प्रेत्य जायते = मर कर उत्पन्न होता है । पुस्तकमादाय गतः = पुस्तक
संस्कृतमयीधे-
-
लेकर गया । स्वकृत्यं विधाय सुप्तः = अपना काम
करके सोया ॥
णमल-'कत्या' के अर्थ में ही 'णमुल्' प्रत्यय भी
होता -स्मृ- स्मारं स्मारम्। भुज- भोज भोजम् ।
कथम्. कृ= कथङ्कारम् । कन्या- दृश् = कन्यादर्शम् ।
यावत्- जी = यावज्जीवम् । उदर- पृ - उदरपूरम् ।
समूल- हन् = समूलघातम् । पाणि-ग्रह-पाणिग्राहम् ।
चक्र- बन्ध = चक्रबन्धम् । शय्या- उत्. स्था = शय्यो
त्यायम् । यष्टि- ग्रह = यष्टिग्राहम् ॥ इत्यादि
उदा-स्मारं स्मारं पाठमधीते छात्रः - वार वार
स्मरणा करके छात्र पाठ पढ़ता है । भोज भोज धावति
शिशुः = वार २ भोजन करके बालक दौड़ता है । यदि
धनं नास्ति तर्हि कथङ्कारं निर्वाहो भविष्यति = यदि
धन नहीं है तो कैसे करके निर्वाह होगा ? कन्यादर्श
वरयति स्नातकः %3D ब्रह्मचारी कन्या को देखकर वरता
है । यावज्जीवं परोपकुरुते साधुः = साधु यावज्जीवन
परोपकार करता है । उदरपूरं भुङ्क्ते बुभुक्षितः
भूखा पेट भरकर खाता है । समूलघातं हन्ति राजा
विद्रोहिणम्: = राजा बागी को जड़ मूल
से मारता है।
पाणिग्राहं गृह णाति = हाथ से ग्रहण करता है। चक्र.
बन्धं बन्धनाति शत्रुम् = चक्रव्यूहमें शत्रुको बान्धता है।
शय्योत्थायं धावति ताडितः = ताड़न कियागया शय्या
से उठकर दौड़ता है। यष्टिप्राहं युध्यन्ते मल्लाः = मल्ल
यष्टि को पकड़कर युद्ध करते हैं ॥ इत्यादि
इति सामान्यार्थकाः
कृदन्तपकरसम् ।
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२-अथ ताच्छील्यार्थकाः
अध ताच्छील्य अर्थ में जो कर्तृ प्रत्यय होते हैं,
उनका मिरुपण करते हैं ।
इष्णुच्- अलं करणं शीलमस्य-अलंकरिष्णः निरा-
करिष्मः । प्रजनिष्णुः । उत्पविष्णः । उत्पतिष्णः । उन्म.
दिष्णुः । रोचिष्णः । श्रपत्रपिष्णः ।वर्तिष्णः । वर्द्धिप्याः ।
सहिष्णः । चरिष्णः । भविष्णुः ।।
उदा०-वाचोऽलंकरिष्यवः कवयः कवि लोग
बाणियों के अलङ्कार करने वाले होते हैं । अपपिण्णः
निन्दितं न समाचरति लज्जाशील निन्दित का आचरण
नहीं करता । सहिष्णः जगति प्रतिष्ठां लभते सहनशील
जगत् में प्रतिष्ठा पाता है।
स्नु-जेतुं शीलमस्य-जिष्णुः । ग्लास्नुः । स्थास्नुः।
भष्मः ॥
उदा-जिष्णः परकृतामवज्ञां न सहते-जयन
शील दूसरे की की हुई अवज्ञाको नहीं सहता । भूगुना
कदाप्यधर्मो नाद्रियते-भवनशील से कभी अधर्म का
श्रादर नहीं किया जाता ॥
क्नु-असितुं शीलमस्य-त्रस्नुः। गृध्नुः। धृष्णः।तिप्नुः॥
उदा०-सेनापतिना त्रस्नवो युद्धे न प्रेष्यन्ते सेना-
पतिसे डरपोक बुद्धमें नहीं भेजे जाते । धृष्णवो वर्जिता
अपि धाष्टयं न जहति-धृष्ट लोग रोके हुवे भी धृष्टता को
नहीं छोड़ते ॥
(३८) संस्कृतप्रबोधे- पिनुण-शमितुं शीलमस्य-शमी । दमी। अमी। जयी । क्षयी। प्रत्ययी । प्रसवी। संपी। अनुरोधी। आयामी । संसगी। परिवादी । अपराधी। दोषी । द्वेषी। द्रोही । योगी । विवेकी । त्यागी । रागी । भागी। विलासी । वित्थी । विनम्मी । प्रलापी ।प्रमाथी। प्रवादी। प्रवासी॥ उदा०-अमी सदा सुखमनुभवति=श्रमी सदा सुखका अनुभव करता है । व्यायामी रोगैर्नाभिभूयते व्यायामी रोगों से नहीं सताया जाता । संसर्गी दोषैलिप्यते संसर्गी दोषों से लिप्त होता है। परद्रोही विनश्यति परद्रोही नष्ट होजाता है । विवेकिनोऽस्मिन् संसारे न रज्यन्ते ज्ञानी पुरुष इस संसार में अनुराग नहीं करते। रागिणो जनाः भवाब्धौ निमज्जन्ति=रागी पुरुष संसार सागर में डूबते हैं । ये विसम्मिभिःसह विश्वासघातं कुर्वन्ति तान धिक=जो विश्वासियों के साथ विश्वास- घात करते हैं, उनको धिक्कार है। बुञ्-निन्दितुं शीलमस्य=निन्दकः । हिंसकः । लोशकः । खादकः । विनाशकः। परिक्षेपकः । परिवादकः । असूयकः । परिदेवकः । श्राक्रोशकः ॥ इत्यादि उदा०—निन्दकैः परगुणेषु दोषारोपणं क्रियते निन्दकों से पराये गगों में दोषारोपण किया जाता है। हिंसकाः हिंसाजन्य पापेन युज्यन्ते हिंसक हिंसाजन्य पाप से युक्त होते हैं । परिदेवकैः परिदेवनं क्रियते' दुःखियों से विलाप किया जाता है । m
कृदन्तप्रकरणाम।
(३८)
युच्-चलितुं शीलमस्य-चलनः। शब्दनः । वर्द्धनः ।
जवनः । चक्रमणः । दन्द्रमणः। सरणः । गर्दनः। ज्वलनः ।
लषसः। पतनः । क्रोधनः । रोषणः। मण्डनः। भषखः ।
उदा०-चलनः तृणानि नोन्मूलयति वायु तृगों
को नहीं उखाहता। जवनो मनः क्षणात् दूरमभ्युपैति
वेगवाला मन क्षण में दूर पहुंचता है। चङ्क्रमणोऽश्वः
प्रशस्तो भवति कदम चलने वाला घोड़ा अच्छा होता
है । गर्द्धनो जनः लोके निन्दा लभते लोभी जन लोक में
निन्दा पाता है । ज्वलनः सर्वान् पदार्थान् भस्मसात
कुरुते-अग्नि सब पदार्थों को भस्मसात करताहै । क्रोधन
आश्वासितोऽपि शान्ति न भजते-क्रोधी समझाया हुधा
भी शान्ति को नहीं सेवन करता ॥
उक-अभिलषितुं शीलमस्य-अभिलाषुकः । प्रपा-
तुकः । उपपादुकः । स्थायुकः । भावुकः । प्रवर्षुकः । प्राधा-
तुका । कामुकः । आगामुकः । शारुकः ।।
उदा०—विद्याभिलाषुकः श्रद्धया गुरु सेवते विद्या-
भिलाषी
गुरु की सेवा करता है । भावुको जनः
सवृत्तमाश्रयते-होनहार पुरुष सदाचारका आश्रय करता
। कामुकस्य राज्येनाऽपि तुष्टिनं भवति-कामनाशील
की राज्य से भी तृप्ति नहीं होती ।।
षाकन्-जल्पितुं शीलमस्य-जल्पाकः । भिक्षाकः।
कुहाकः । वराकः।
उदा०--जल्पाको याचं दुरुपयुक्त-बहुत बोल
ने वाला वाणी का दुरुपयोग करता है । भिक्षाकः सर्वे-
-
(४०) संस्कृतप्रबोधे- - -- घामवज्ञाभाजनो भवति भीख मांगने वाला सब का अवज्ञास्पद होता है। वराकः स्वहितैषिणमपि द्वेष्टि- मूर्ख अपने हितैषी से भी द्वेष करता है। श्रालुछ्-स्पर्द्धितुं शीलमस्य-स्पृहयालुः। गृहयालुः। पतयालुः । दयालुः। निद्रालुः। तन्द्रालुः। श्रद्धालुः । शयालुः उदा०-स्पृहयालुः परोदयं न सहते-स्पर्दाशील दूसरे के उदय को नहीं सहता । दयालुः दीनानुदुरते- दयाशील दीनों का उद्धार करता है । श्रद्धालुः विप- द्गतोऽपि धर्म नातिवर्तते-श्रद्धालु विपत्ति को प्राप्त हुवा भी धर्म का अतिक्रमण नहीं करता ॥ रु-दातुं शीलमस्य-दारुः । धारुः । सेरुः । शद्रुः। सद्रुः। उदा०-दारुः सदा पात्रमपेक्षते-दानशील सदा पात्र की अपेक्षा करता है । सेरुः पशुबन्धनान्मुक्तोऽपि गृह एव प्रविशतिबन्धनशील पशु बन्धन से छूटा हुवा भी घर में ही प्रवेश करताहै। सद्रुराश्वासितोऽपि विषादं न जहाति-विषादशील समझाया हुवा भी बिषाद को नहीं छोड़ता ॥ क्मरच–सतुं शीलमस्य-समरः । घस्मरः। अगरः ॥ सृमरो वायुः केनापि नावरुध्यते-गमनशील वायु किसी से भी नहीं रोका जाता । अमरो मनुष्यः भक्ष्याभक्ष्य नावेहते-भक्षणशील मनुष्य भक्ष्याभक्ष्यको नहीं देखता । घुरच्-भक्तुं शीलमस्य-भंगुरः । भासुरः। मेदुरः ॥ उदा०-भंगुरे देहे को विश्वास भजनशील देह में क्या विश्वास है ? भास्करस्य भासुरं ज्योतिः प्रकाशते सूर्यको प्रकाशशील ज्योति प्रकाशित होती है। - - कृदन्तप्रकरणम्। (४१) - कुरम-बेतुं शीलमस्य-विदुरः । भिदुरः । छिदुरः ॥ उदा०-विदुरो बुद्धिबलेमानुक्तमनागतश्चापि जानाति = पण्डित बुद्धि के बल से अनुक्त और भनागत को भी जान लेता है। कुठारेण भिदुरं काष्ठं मिद्यते कुठार से भेदनशील काष्ठ भेदम किया जाता है। छिदुरया रउवा कूपे छिद्राणि सम्पद्यन्ते = छेदनशील रस्सी से कुर्वे में गड़े होजाते हैं । क्वरप्-एतुं शीलमस्य = इत्वरः । नश्वरः। जि- त्वरः। सत्वरः। गत्वरः ॥ उदा०-इत्वरोऽश्वः स्वामिनं दूरं गमयति = गमन शील घोड़ा स्वामी को दूर लेजाता है । नश्वरेण देहे- नाविनश्वरा कीर्तिरूपार्जनीया = नाशशील देह से न नाश होनेवाली कीर्ति उपार्जन करनी चाहिये । जित्यरैः शूरैः आहवाग्नौ प्राणाहुतयो टूयन्ते=जयन शील शूरों से युद्ध रूपी अग्नि में प्राण की शाहु- तियां दीजाती हैं । सृत्वरी लता पार्श्वस्थं वृक्षं परिवेष्ट- यतिसरणशील लता समीपस्थ वृत को लपेटती है। गत्वरः पान्थः निर्दि थः निर्दिष्टं देशं समधिगच्छति-गमन शील पान्य निर्दिष्ट देश को प्राप्त होता है। जक-जागरितुं शीलमस्य-जागरूकः । पुनः पुन- रतिशयेन वा यष्टुं शोलमस्य-यायजूकः । वावदूकः ॥ उदा०-आगरकेभ्यश्चौराः पलायन्ते-जागरणशीलों से चोर भागते हैं। यायतका इष्टिभिर्यजन्ते वारवार यजनशील इष्टियों से यजन करते हैं। वावदूकेन कदा.
(४२)
संस्कृतप्रबोधे-
वाय से
चिदपि मौनं नाश्रीयते वावदूक से कभी धुप नहीं
रहा जाता।
र-नमितु शीलमस्य = नमः । कम्प्रः । स्मेरः ।
कमः । हिंसः । दीप्रः॥
उदा०महत्त्व प्राप्य सरजना नमा भवन्ति
महत्व को पाकर सज्जन नम होते हैं । कम्प्रा शाखा
वायुना मुहुर्मुहुर्नमति = कम्पनशील शाखा वायु
वारवार लचती है। स्मेरं मुखं मर्वदा शोभते = हंसने
वाला मुख सदा शोभा पाता है। राज्ञा हिंसभ्यो दीना
रक्षणीया । राजा को हिंसकों से दीनों की रक्षा
करनी चाहिये ॥
उ-चिकीर्षितु शोलमस्य = चिकीर्षुः । जिज्ञासुः ।
जिगमिषुः । पिपासुः । जिहासुः । जिघृक्षः । बुभुक्षः
दिलः । लिप्सुः । प्राशंसितु शीलमस्य = श्राशंसुः ।
भिक्षुः। वेदितु शीलमस्य = विन्दुः । एषितु शील
मस्य = इच्छुः॥
उदा०-ये लोकहितं चिकीर्षवस्त एव सज्जनाः =
जो संसार का हित करने की इच्छा करते हैं वे ही
सज्जन हैं। जिज्ञासुना प्रश्नावसरे मत्सरो न कार्यः =
जिज्ञासु ने प्रश्न के समय मत्सर नहीं करना चाहिये।
पिपासवे जलं दातव्यम् = प्यासे के लिये जल देना चा-
हिये । जिघृक्षुणा प्रतिग्रहस्य फल्गुता न ज्ञायते
ग्रहणशील से प्रतिग्रह की असारता नहीं जानी जाती ।
दित्सुः कदापि कार्पण्यं न भनते-दानशील कभी कृपणता
को सेवन नहीं करता। भिक्षुः गृहस्थेभ्यो याचतेभिक्षु
।
.
कृदन्तप्रकरणम् । (४३) । शरारुः। गृहस्थों से याचना करता है। भूतिमिच्छवो धर्ममाघ- रन्ति = उन्नति चाहनेवाले धर्म का प्राधरण करते हैं। नजिङ्-स्वप्तुं शीलमस्य = स्वप्नक । तर्षितुं शील मस्य = तृष्णक । धृष्णक ॥ उदा०-स्वप्नक जागरितोऽपि शेते = शयनशील जागता हुवा भी सेाता है। तृश्शक शान्तिं न लभते = तृष्णाशील शान्ति को नहीं पाता ॥ आरु:-गरितु शरीतु वा शीलमस्य वन्दितु शीलमस्य = वन्दासः ॥ उदा०-~-शरारुर्निर्दयो भवति = हिंसाशील निर्दय होता है। वन्दारुव॒द्वानभिवादयते = वन्दनशील वृद्धों को अभिवादन करता है । कु-क्रुकन्भेतु शीलमस्य भीरुः- भीरुकः। उदा०-भीरुणा भीरुकेण वा संग्रामे न स्थीयते- डरपोक से युद्ध में नहीं ठहरा जाता ॥ वरच्-स्थातुं शीलमस्य-स्थावरः । ईशितुं शीलमस्य =ईश्वरः । भासितुं शीलमस्य-भास्वरः । पुनः पुनरति- शयेन वा यातुं शीलमस्य-यायावरः ॥ उदा० स्थावरः स्वस्थानाब चलतिस्थावर अपनी जगह से नहीं चलता। ईश्वरस्य सत्ता सर्वत्र वर्तते= ईश्वर की सत्ता सर्वत्र वर्तमान है ॥ यायावरः स्थावराबत्योति-अत्यन्त गमनशील स्थितिशीलों का अतिक्रमण करता है। किप-विभाजितुं गीलमस्य-विभाट्। विद्योतितु
संस्थतपुबोधे-
शीलमस्याः विद्युत् । वक्तशीलमस्याः वाक् । अतिशयम
गन्तुं शील मस्य-जगत् । ध्यातुं शीलमस्याः = धीः ।
अपितु शीलमस्या=श्रीः । भवितुं शीलमस्याः=भः ॥
उदा-घनेषु विद्योतते विद्य तबादलों में बिजली
चमकती है। परिवर्तिनि जगति कोऽपि स्थैर्य न लभते
=परिवर्तनशील जगत में कोई भी स्थिरता को नहीं
पाता । उद्योगिनं पुरुषं श्रीः समाश्यते = उद्योगी पुरुष
का लक्ष्मी प्राय लेती है।
इति ताछील्यार्थकाः
समाप्तच कृदन्तप्रकरणम।
%3-
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--
अथ तद्वितप्रकरणम्।
औपगवः । उपगुकापुत्र
परस्पर सापेक्ष शब्दोंसे किन्ही विशेष अर्थों में जो
प्रत्यय होते हैं, उनको तद्वित कहते हैं। यथा-उपगो-
रपत्यम् = श्रीपगवः ।
शौपगव कहलाताहै
अनपेक्ष पदों से तद्धित प्रत्यय नहीं होते। जैसे
कम्बल उपगोः, अपत्यं वसिष्ठस्य = कम्बल उपगु का,
पुत्र वसिष्ठ का । यहां 'उपगु' शब्द के साथ अपत्य शब्द
की अपेक्षा नहीं है।
यह भी नियम है कि परस्पर सापेक्ष पदों में जो
पहिला पद होता है उसीसे तद्धित प्रत्यय होते हैं,भन्यों
से नहीं जैसे-~-अश्वपतेरपत्यम् - माश्वपतम् । यहां पर
सहितपकरणम् । पूर्वपद 'अश्वपति' से ही सद्धित 'अण' प्रत्यय होता है नकि उत्तरपद अपत्य से ।। कृदन्त शब्दों के समान तद्वितान्त शब्द भी प्रयमा- दि सात विभक्तियों, एकवचनादि तीन धचनों और पुंल्लिङ्गादि तीन लिङ्गों में परिणत होते हैं । तद्धित में जो प्रत्यय होते हैं, उनके आदि में यदि षकार, चवर्ग और टवर्ग हों तो उनका लोप होजाता है और अन्त्य के हल का भी सर्वत्र लोप होता है । यदि किसी प्रत्यय के अङ्ग 'यु' और 'वु' हों तो उनको क्रम से 'अन' और 'अक' श्रादेश होजाते हैं। यदि किसी प्रत्यय को प्रादि में ठ, फ, ढ, ख, छ, और घ ये वर्णहों तो सनको क्रमशः इक्, प्रायन, एय, ईन्, ईय, और इय् ादेश होजाते हैं । जिन प्रत्ययों के ज, ण और क का लोप हुवा हो उनके पूर्वपदस्थ शब्द का जो श्रादि अच् है उसको वृद्धि होजाती है। तद्धितप्रकरणको पढ़नेवाले उक्त नियमोंपर ध्यान रखें ।। तद्धित तीन प्रकार का है १-सामान्य वृत्ति २-भाववाचक ३-अव्ययसंजक ॥ १-अथ सामान्यवृत्तिः सामान्यवृत्ति सद्वितके विभागहें, जिन के नाम ये हैं- (१) अपत्यार्थक (२)देवतार्थक (३) सामूहिक (४)अध्य- यनार्धक (५) शैषिक(६) विकारावयवार्थक (७) भनेकार्थक (८) मतुवर्धक (E? स्वार्षिक । अन्न इन में जिस २ दशा में संस्कृतप्रबोधे- जो २ प्रत्यय होते हैं, उनको हम क्रमशः सदाहरणापूर्वक दिखाते हैं। १-अपत्यार्थकाः अपत्य के तीन भेद हैं (१) अपत्य (२) गोत्रापत्य (३) युवापत्य ॥ जो अपने से विना व्यवधान के उत्पन्न हों, ऐसे पुत्रादि की अपत्य संज्ञा है । जो अपत्य से उत्पन्न हों, ऐसे पौत्रादिकी गोत्रापत्य संज्ञा है और जो पिता आदि जीवित हों तौ पौत्र के पुत्रादि की युवापत्य संज्ञा है। इन्हीं तीन अर्थों में अपत्यार्थक प्रत्यय होते हैं । गोत्रापत्य में एकही प्रत्यय होता है, अर्थात् पौत्र के पश्चात् फिर अपत्यार्थक प्रत्यय नहीं होता। जैसे- गर्ग शब्द से गोत्रापत्य में 'य' होकर 'गार्यः' बना, अब इससे फिर कोई अपत्यार्थक प्रत्यय न होगा, फिन्तु गार्य के पुत्र और पौत्र भी गार्ग्य ही कहलावेंगे ॥ युवापत्य में केवल गोत्र प्रत्ययान्त शब्द सेही प्रत्यय होता है, अन्य से नहीं। यथा--गार्यस्य युवापत्यम् गाायणाः । गर्ग शब्द से गोत्रापत्य में 'य' प्रत्यय होकर 'गायः' बना था, अब उमसे युवापत्य में 'फक्' प्रत्यय होकर “गाायणः" बनगया । अब अपत्यार्थ में जिन २ शब्दों से जो २ प्रत्यय होते हैं, उनको दिखलाते हैं- प्रण शिवादिगणपठित शब्दों से अपत्यार्थ में 'अब प्रत्यय होता है-शिवस्यापत्यम् = शैषः। काकुत्स्थः । हैहयः । वैश्रवणः । मार्टिषेणः । गाङ्गः । यास्कः । भौमः ।
तद्वितप्रकरणम् ।
(४७)
ऐलः । सापत्नः । इत्यादि । आदि के अच् को वृद्धि
होजाती है ॥
अश्वपति आदि शब्दों से भी अपत्यार्थ में 'अ'
होता है-अश्वपतेरपत्यम् आश्वपतम-शातपतम्
गाणपतम् । कौलपतम् । पाशुपतम् । इत्यादि ।
जिनके अचों में वृद्धि न हुई हो ऐसे नदी और
मानुषी के नामों से भी अपत्यार्थ में 'अण' होता है।
नदी-यमुनाया अपत्यम् = यामुनः । ऐरावतः । वैतस्तः ।
नार्मदः ॥ मानुषी-शिक्षिताया अपत्यम् = शैक्षितः ।
चैन्तितः ॥ इत्यादि
ऋषि, अन्धक, वृष्णि, और कुरु इनके वाचक शब्दों
से भी अपत्यार्थ में 'अण' होता है ऋषि-वसिष्ठस्या-
पत्यम् = वासिष्ठः। वैश्वामित्रः ॥ अन्धक-श्वाफल्कः ।
वृष्णि-वासुदेवः । आनिरुद्धः।। कुरु-नाकुलः। साहदेवः॥
ऋषि मन्त्र द्रष्टाओं का और अन्धक, वृष्णि और कुरु ये
वंशों के नाम हैं ॥*
* शब्द नित्य हैं ऐसा भाष्यकार का मत है, फिर अन्धक,
वृष्णि और कुरु इन अनित्य वंशोंका आश्रय लेकर क्यों उनका
व्याख्यान किया गया ? इसका उत्तर यह है कि वास्तव में
शब्द नित्य और असंख्य हैं । यदि इन वंशादि वाच्यों के होने
से पूर्व इनके वाचक शब्द न होते तो इनके ये नामही कैसे रक्खे
जाते ? जैसे अब कोई अपने पुत्रका वासुंदव नाम रक्खे तौ
क्या इससे यह सिद्ध होसक्ता है कि उसने वासुदेव संज्ञा
को बनाया? कदापि नहीं। किन्तु यही माना जायगा कि उस
ने बनी बनाई संज्ञा को लेकर अपना काम चळाया। ऐसेही
कुरु मादि शब्दों की व्यवस्था भी समझो, इससे इनमें अनि-
त्यता का दोष नहीं प्रासका।
( ४ ) संस्कृतप्रबोधे- । संख्यावाचक तथा सम् और भद्र शब्द पूर्व हो तौ मातृ शब्दसे भी अपत्यार्थ में 'अण' होता है. द्विमात्रो. रपत्यम् द्वैमातुरः। षाएमातुरः । सांमातुरः। भाद्रमातुरः॥ कन्या शब्द से भी अपत्यार्थ में 'अम्' होता है और उसके योग से कन्या शब्द को 'कनीन' श्रादेश भी हो जाता है-कन्याया अपत्यम = कानोनः । कन्या - अनढा से जो उत्पन्न हो वह कानीन कहलाता है ॥ मनु शरद से भी अपत्यार्थ में 'अम' होता है- मनोरपत्यम् जनपद ( नगर ) वाचक दो अच वाले शब्द तथा मगध, कलिङ्ग और सूरमस् शब्दों से यदि वे क्षत्रिय के अभिधायक हों तो अपत्यार्थ में 'अण' होता है- अ. स्यापत्यम्=प्राङ्गः।वाङ्गः। पौराष्ट्रः । मागधः । कालिङ्गः। सौरमसः ॥ क्षत्रियसे अन्यत्र- पाणिः। वाङ्गिः । इत्यादि वक्ष्यमाश 'इम्' होगा ॥ = मानवः ॥2 प्रभ उत्स आदि शब्दों से अपत्यार्थ में 'म' होता है- उत्सस्यापत्यम् - औत्सः । पार्थिवः। पाततः । भारतः । औशीमरः । पैलः । बाहतः । सात्वतः । कौरवः । पाञ्चालन * मनु शब्द से केवल अपत्यार्थ में 'मण' होता है, यदि जाति अभिधेय हो तो मा और यत् प्रत्यय होते हैं-मनोरप- त्यं जातिश्चतनमानुषः। मनुष्यः । दोनों में घुक् का मागम होजाता है। + अण और अञ प्रत्ययान्त शब्दों के रूप एकजैसेही होते हैं केवल स्वर में कुछ भेद होता है।
तद्वितप्रकरणम् ।
(e)
विदादि शब्दों से गोत्रापत्य में ( अ ) होता है-
विदस्य गोत्रापत्यम वैदः। काश्यपः। कौशिकः। भारद्वाजः।
औपमन्यवः । वैश्वानरः । प्राष्टिषेणः। शारद्वतः। शौनकः।
पौनर्भवः । पौत्रः । दौहित्रः॥
जनपद [नगर वाचक शब्दों से यदि वे क्षत्रिय के
अभिधायक हों तो अपत्यार्थ में 'अम्' होता है-पञ्चा-
लस्यापत्यम्=पाञ्चालः । वैदेहः । गान्धारः । इत्यादि ।
दो अच् वाले शब्दों से 'अण' विधान कर चुके हैं। क्षत्रिय
से अन्यत्र--पाञ्चालिः । इत्यादि इञ्' होगा ॥
कम्बोज, चोल, केरल, शक और यवन शब्दों से
अपत्यार्थ में 'अ' होकर उसका लोप होजाता है-
कम्बोजस्यापत्यम कम्बोजः। चोलः । केरलः। शकः। यवनः॥
इञ्
अकारान्त शब्दों से अपत्यार्थमें 'इम्' प्रत्यय होता
दक्षस्यापत्यम् दाक्षिः । दाशरथिः । द्रौरिणः ।
बाहु धादि शब्दों से भी अपत्यार्थ में 'इन'
होता है - बाहोरपत्यम् बाहविः। बालाकिः। सौमित्रिः।
कार्णिः । यौधिष्ठिरिः । प्रार्जुनिः ।
सुधातु, व्यास, वरुड़, निषाद, चण्डाल और विम्ब
शब्दों से भी अपत्यार्थ में 'इज्' और उससे पूर्व इनको
'अ' आदेश भी होता है-सौधातकिः । वैयासकिः ।
वारुडकिः । नैषादकिः । चागडालकिः । वैम्बकिः ॥
शिल्पवाचक, लक्षण और सेना शब्द जिनके अन्त
में हों ऐसे शब्दों से भी अपत्यार्थ में 'इ' होता है
।
(५०) संस्कृतप्रधोधे- - शिल्पवाचक-कौम्भकारिः । तान्तुवायिः । लक्षण- लाक्षणिः । सेनान्त-कारिणिः। शौरसेनिः॥ शिल्प, लक्षण और सेना शब्दान्त से 'यय' प्रत्यय भी होता है-कौम्भकार्यः । तान्तुवाय्यः। लाक्षरयः । कारिषेण्यः। शौरसेन्यः॥ दिति, अदिति और पत्यन्त शब्दों से भी अपत्यार्थ में 'रय' प्रत्यय होता है-दितेरपत्यम्=दैत्यः । श्रादित्यः । प्राजापत्यः ।। क्षत्रियवाचक कुछ और नकारादि शब्दों से भी अपत्यार्थ में 'राय' प्रत्यय होताहै - कुरोरपत्यम्=कौरव्यः । नैषध्यः । नेपथ्यः ॥ इत्यादि गर्गादि गणपठित शब्दों से गोत्रापत्य में 'या' प्रत्यय होता है-गर्गस्य गोत्रापत्यम्=गायः । वात्स्यः । अगस्त्यः । पौलस्त्यः । धौम्यः । वाभव्यः । माराव्यः । काएवः । शाकल्यः। कौण्डिन्यः। याज्ञवल्क्यः । शाण्डित्यः। मौद्गल्य ः। पाराशर्यः । जातूकरर्यः । आश्मरथ्यः । पैडल्यः । दाल्भ्यः । जामदग्न्यः । इत्यादि फञ्-फि नहादि शब्दों से गोबापत्य में फक प्रत्यय होता है 'फ' को 'प्रायन' आदेश होकर-नहस्य गोत्रापत्यम्= नाडायनः । चारायणः । नारायणः । मैत्रायसः । शाकटायनः । इत्यादि तद्वितप्रकरणम् । (५२) इन होता यमन्त और इअन्त शब्दों से युवापत्य 'फक' प्रत्यय होता है । यमन्त-गाग्यस्य युवापत्यम् गार्या- यणः । वात्स्यायनः । इत्यादि इसन्त-दाः युवाप- त्यम-दाक्षायणः । प्लाक्षायणः । इत्यादि द्रोण, पर्वत और जीवन्त शब्दों से गोत्रापत्य में विकल्प से 'फक' होता है, पक्ष में इन होता है- द्रौणायनः । द्रौणिः । पार्वतायनः । पार्वतिः । जैयन्ता- यनः । जैवन्तिः॥ अश्खादि गणपठित शब्दों से गोत्रापत्य में 'फ' होता है - प्राश्वायनः । आश्मायनः । इ० तिकादि गणपठित शब्दों से अपत्यार्थ में 'फिन' प्रत्यय होताहै - तिकस्यापत्यम्=तैकायनिः । कैतवायनिः दो अध वाले प्रशन्त से भी अपत्यार्थ में फिस' होता है--करिपत्यम कार्बः। कात्रस्यापत्यम =कात्री- यणिः । हााणिः । ३० तद् श्रादि सर्वनामों से भी अपत्यार्थ में 'फित्र' होता है-तस्यापत्यम =तादायनिः । यस्यापत्यम - यादायनिः। ३० स्त्री प्रत्ययान्त प्राबन्त शब्दों मे अपत्यार्थ में 'ढर' प्रत्यय होता है--विनताया अपत्यम् वैनतेयः । गाङ्गेयः। मारमेयः । मैत्रेयः । इत्यादि 'ढ' को 'एय' आदेश होकर वृद्धि होजाती है। दो अथ् वाले पुंल्लिङ्ग इकारान्त शब्दों से भी यदि
(५२)
संस्कृतप्रबोधे-
वे 'इन' प्रत्ययान्त न हों तो अपत्यार्थ में 'ढक' होता
है- अरपत्यम-शात्रेयः । नैधेयः । इ०
शुभादि गणपठित शब्दों से भी अपत्यार्थ में
'ढक्' होता है - शौभ यः । गौधेयः। कागवेयः । कौमारि-
केयः । प्राम्बिकेयः । ३०
विकर्ण और कुषोतक शब्दों से यदि ये दोनों
कश्यप के अपत्यविशेष हों तो 'ढक्' होता है; अन्यथा
-वैकर्णेयः । कौषीतकेयः । काश्यप से भिन्न -
वैकर्णिः। कौषीतकिः॥
कुलटा शब्द से भी अपत्यार्थ में 'ढक' होता है
कुलटाया अपत्यम =कौलटेयः । किन्हीं के मत से 'इन्'
श्रादेश होकर - कौलटिनेयः । भी होता है ।
पितृष्वस और मातृष्वस शब्दों से भी अपत्यार्य में
'उक' होता है- पितृष्वसुरपत्यम् पैतृष्वसेयः ।मातृण्वसेयः
गृष्टयादि गणपठित शब्दों से अपत्यार्थ में 'ढ'
प्रत्यय होता है--गृष्टेरपत्यम =गाष्टेयः । हार्टयः ।
हालेयः । बालेयः । इ०
--
छण
स्वस
और भातृ शब्दों से अपत्यार्थ में (छ) प्रत्यय
होता है - स्वसुरपत्यम =स्वसीयः । भात्रीयः। 'छ' को
( ईय् ) श्रादेश होजाता है । भातृ शब्द से अपत्यार्थ में
( व्यत् ) प्रत्यय भी होता है - भातुरपत्यं भातृष्यः ॥
पितृष्वस और मातृध्वस शब्दोंसे अपत्यार्थ में 'छम
भी होता है - पैतृष्वसीयः । मातृष्वसीयः ॥
तद्वितप्रकरणम् । (५३) यत् राजन् और श्वशुर शब्द से अपत्यार्थ में यत् प्रत्यय होता है- राज्ञोऽपतघम-राजन्यः । * श्वशुर्यः । घ 'क्षत्र' शब्द से अपत्यार्थ में (घ) प्रतघय होता है- क्षत्रस्यापतघम क्षत्रियः । * 'घ' को ( अय् ) प्रादेश होजाता है। C- शब्द से । कुल शब्द जिसके अन्त में हो ऐसे पद से अप- तथार्थ में (ख) प्रत्यय होताहै । (ख) को (ईन) आदेश होकर-पाढयकुलीनः । श्रोत्रियकुलीनः ॥ केवल कुल शब्द से अपत्यार्थ में खन् , यत् और ढकञ् तीन प्रतघय होते हैं--कुलीनः । कुल्यः । कौलेयकः।। महाकुल शब्द से खञ् और अज तथा दुष्कुल खन और ढक् प्रतश्य यथाक्रम होते हैं-महा- कुलीनः । माहाकुलः । दुष्कुलीनः । दौष्कुलेयः ॥ ठक-ण रेवतघादि गणपठित शब्दों से अपतधार्थ में 'ठक' प्रतय होता है, 'ठ' को 'इ' होकर-रेवत्या अप- तयम्-रैवतिकः । प्राश्वपालिकः । ३० गोत्रवाचक स्त्रीलिङ्ग शब्दोंसे अपतधार्थ में निन्दा सूचित होती हो तो ठक् और ग प्रतयय होते हैं । *राजन् और क्षत्र शब्दसे क्रमशः यत् और घप्रत्यय जाति के अभिधान में होते हैं, जाति से अन्यत्र राजन से अण और क्षत्र से प्रत्यय होंगे-राजनः । शात्रिः॥
संस्कृतप्रबोधे-
पिता का ज्ञान न होने पर माता के नाम से जो पुत्र
का ध्यपदेश किया जाता है, वह पुत्र की एक प्रकार
की निन्दा है-गार्या अपतयम -गानिकः । गार्गः ॥
जापालिकः । जाबालः । इ०
२-देवतार्थकाः
प्रथमान्त देवतावाचक शब्दों से षष्ठी के अर्थ में
हव्य और सूक्त के अभिधानमें देवतार्थक प्रत्यय होते हैं ।
अण--इन्द्रादि शब्दों से देवतार्थक अप प्रत्यय
होता है- इन्द्रो देवतास्य ऐन्द्रं हविः सूक्तं वा-इन्द्र
देवता के उद्देश से जो हविस् दियाजाय वा सूक्त पढ़ा
जाय उस हविस् वा सूक्त को 'ऐन्द्र' कहते हैं । ऐसे ही
वारुणम् । बाहम्पतम्। कः प्रजापतिर्देवतास्य कायं हविः
सूक्तं वा । 'श्रण' होकर 'क' को इकारादेश भी होता है।
धन्--शुक्रो देवतास्य-शुक्रियं हविः सूक्तं या ॥
घन्-छ-शतं रुद्रा देवता अस्य शतरुद्रियम्- शतरुद्रो-
यम् । अपोनत्रियम्- अपोनपत्रीयम् । अपाम्ननियम :
अपानपत्रीयम् ।
टयण- सोमो देवताऽस्य = सौम्यम् ।
अण- घ- छ-महेन्द्रो देवताऽस्य-माहेन्द्रम - महे-
न्द्रियम - माहेन्द्रीयम् ॥
यत्-वायुर्देवतास्य-वायव्यम । ऋतव्यम् ।
पित्र्यम् । उपस्यम् ।
छ-यत-द्यावापृथिव्यौ देवते अस्य द्यावापथिवी-
यम् - द्यावापृथिव्यम् । शुनासीरीयम - शुनासीर्यम् ।
मरुत्वतीयम्- मरुत्वत्यम्। अग्नीषोमीयम् अन्नोयोम्यम्।
।.
सद्धितप्रकरणम् । वास्तोष्पतीयम्- वास्तोष्पत्यम्। गृहमेधीयम् गृहमेध्यन् ।। ढक-अग्निदेवताऽस्य-प्राग्नेयम् ॥ ठ -महाराजो देवताऽस्य-माहाराजिकम । प्रौष्ट- पदिकम ॥ पितृ और मात शब्दों से यदि उनके भाता अभिधेय हों तो क्रम से व्यत् और लच प्रत्यय होते हैं और यदि उनके पिता अभिधेय हो तौ महच् प्रत्यय होता है- पितुर्भाता पितृल्या चाचा वा ताज। मातुर्भाता मातुलः मामा । पितुः पिता पितामहः बाबा । मातुः पिता मातामहःलाना ॥ प्रा ३-सामूहिकाः षष्ठयन्त शब्द से समूह ( समुदाय ) के अर्थ में सामू- हिक प्रत्यय होते हैं। -काकानां समूहः काकम । वाकम् ॥ भिक्षाणां समूहः भैक्षम् । गर्भिणानां समहः गार्भिणम् । युवतीनां समूहः यौवनं यौवतं वा ॥ धु--श्रीपगवानां समूहः औपगवकम् । उक्षाणां समूहा औक्षकम् । औष्ट्रकम् । औरभूकम् । राजकम् । राजन्य कम । राजपुत्रकम् । वात्सकम् । मानुष्यकम । प्राजकम । बाईकम । काठकम । कालापकम् इत्यादि 'कु' को 'क' श्रादेश होजाता है । पञ्- धुश् - ठम् -केदाराणां समूहः यौदार्यन , दारकम , केदारिकम् ॥ या गणिकानां समः=गाणिक्यन् ।। . - संस्कृतप्रबोधे- यत- - ब्राह्मणाना समूहःब्राह्मण्यम । माणाव्यम् । वाडव्यम ॥ ठक .. dowan छ. अशा कचिनां समूहः कावधिकम् ॥ हस्तीनां समूहः हास्तिकम् । धेनुकम । आपू- पिकम । शाकुलिकम् ॥ तल--ग्रामाणां.समूहः-ग्रामता । जनता । बन्धुता। सहायता । गजता ॥ अन – कपोतानां समूहः कापोतम्। मायूरम् । तैत्तिरम या- ठक केशानां समूहः केश्यम - कैशिकम ॥ अश्वानां समूहः अश्वीयन । प्राश्वम् ॥ ४-अध्ययनार्थकाः द्वितीयान्त शब्द से पढ़ने और जानने के अर्थ में अध्ययनार्थक प्रत्यय होते हैं। -व्याकरणमधीते, बेद वा वैयाकरणः जो व्याकरण पढ़ता है पा जानता है उसको वैयाकरण कहते हैं ऐसेही-नरुक्तः । छान्दमः । इत्यादि टक-यज्ञविशेषवाचक और उक्थादि गणपठित शब्दों से अध्ययनार्थक ठक् प्रत्यय होता है । यज्ञवाचक अग्निष्टोममधीते, वेदवा-आग्निष्टोमिकः । वाजपेयिकः । उक्थादि-उक्थान्य धोते, वेद वा-ौक्थिकः । नैयायिकः । लौकायतिकः । नैमित्तिकः । याक्षिकः । धार्मिकः । वार्तिकः । इत्यादि विद्या, लक्षगा और कल्प ये शब्द जिनके अन्त में हों, उनसे तथा इतिहास और पुराण शब्दों से भी प्रण तद्वितप्रकरणम्। (५१) लक उक्तार्थ में 'ठक' होता है-नक्षत्रविद्यामधीते, वेद वा= माक्षत्रविधिकः । सार्पविद्यिकः । प्राश्वलक्षणिकः । मातृ- कल्पिकः । ऐतिहासिकः । पौराणिमः । वसन्तादि गणपठित शब्दों से भी उक्तार्थ में ‘ठक्' होता है-वसन्तविद्यामधीते, वेद वा=वान्तिकः । प्रैष्मिकः । धार्षिकः । शारदिकः । हैमन्तिकः । शैशिरिकः। प्राथमिकः । गौणिकः । प्राथमिकः ॥ घुन-क्रमादि गणपठित शब्दों से उक्तार्थ में 'वुन्' होताहै--क्रममधीते, वेद वा क्रमकः । पदकः । शिक्षकः। मीमांसकः । सामकः । इत्यादि प्रोक्त प्रत्ययान्त शब्दोंसे अध्ययनार्थक प्रत्यय का लोप होजाताहै । पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयं तद- धीते तद्वेद वा-पाणिनीयः । श्रापिशलः । ५-शैषिकाः जिन अपत्यादि अर्थो में अबतक प्रत्यय कहे जा चुके हैं, उनसे जो शेष जातादि अर्थ हैं, उनको शैषिक कहते हैं। शैषिक प्रत्यय जिन २ अर्थों में कहे जावेंगे, उन सब अर्थो में समष्टि रूप से जो प्रत्यय होते हैं प्रथम उनको दिखलाते हैं । शैषिक प्रत्यय अनेक विभक्तियोंसे और अनेक प्रों में होते हैं, यथा-सुघ्नादागतः, सुघ्नेजातः, मुख्नः नि- वासोऽस्य-सौनः सुघ्न से प्राया, मुघन में उत्पन्न हुवा, सुधन जिसका निवासस्थान है, ये सब सौधन कहलावेंगे।
(५८)
संस्कृतप्रबोधे-
य. खज
.
-ग्राम शब्द से जातादि अर्थों में शैषिक
य और खा प्रत्यय होते हैं. प्रामे जातः, ग्रामःनिवासोऽ.
स्य वा-ग्राम्यः । ग्रामीणः ।।
ढक-नद्यादि गणपठित शब्दों से शैषिक ( ढक )
प्रत्यय होताहै - नद्यां जातं नादेयं जलम् । महयां जातं
माहेयं जतु । वानेयं काष्ठम् ॥
त्यक्- दक्षिणा, पश्चात् और पुरस् शब्दोंसे शेषिक
(त्यक) प्रत्यय होता है- दक्षियस्यां जातः दाक्षिणात्यः ।
पाश्चात्यः । पौरस्त्यः॥
यत् - दिव, प्राथ, अपाच, प्रत्यच और उदच शब्दोंसे
हैषिक ( यत्) प्रत्यय होता है- दिधि जातं-दिव्यम् ।
प्राच्यम् । अपाध्यम । प्रतीच्यम उदीध्यम,
त्यप् - श्रमा, इह, क्व, तसन्त ओर त्रान्त अध्ययों
से शैषिक 'तथप्' प्रतयय होताहै- श्रमा = सह जातः -
अमात्यः । * इह जातः इहत्यः। क्वत्यः । इतरत्यः ।
तत्रत्यः । अत्रन्यः । (नि) अव्यय से धुवार्थ में ( त्यम्)
होता है. नित्यं ध्रुधम् ॥
छ - जिसके आदि का
वृद्धि हुईटो. उसे शैषिक
(ब) प्रत्यय होता --शालायर्या भवः शालोयः। मालीयः ।
तद्, यद्, एतद्. युष्मद् और अम्मद इन सर्वनामों
से भी शैषिक (छ) प्रत्यय होता है-तस्मिन् भवः तदीयः ।
एतदीयः। युष्मदीयः-त्वदीयः । अस्मदीयः- मदीयः ।।
अण- सत्र - छ-युष्मद् और अस्मद् सर्वनामों से
अध्
* राजा का सहचर होने से अमात्य मन्त्री को कहते है।
तद्धितप्रकरणम् । ५९) भवम - (छ) के अतिरिक्त प्रण और खज प्रतयय भी होते हैं, परन्तु इन दोनों में दोनोंको क्रमसे युध्नाक और अस्मा- क आदेश होजाते हैं, केवल (छ) में ये अपने स्वरूप से रहते हैं- युधमासु- भवः यौष्माकः, यौठमाझीणः; युष्म- दीयः । अस्मासु-भवः प्रास्माकः, आस्माकीनः, अस्म- दीयः । एकवचन में तवक और ममक प्रादेश भी होते हैं तावकः - तावकीनः । मामा-मामकीनः ॥ ठक-छस् -----भवत् सर्वनाम से टक और छस् प्रतयय होते हैं.-भवत्सु-भवः = भावरका-भवदीयः ॥ यत्-अर्द्ध शब्द से ( यत् ) प्रतयय होता है-अर्द्ध- अद्धर्यम् ॥ म - प्रादि, मध्य, अवस् और अधस् शब्दों से 'म' प्रतपय होताहै - शादी भवः = आदिमः। मध्यमः। । अधमः । अवस् और अधस् के सकार का लोप होमाता है । युजनगर शब्दसे निन्दा और प्रवीणता में शैषिक ( वुज ) होता है - नगरे - भवः नागरकश्चौरः । नागरकः शिलपी। अन्यत्र - नागरो ब्राह्मणः । अण होगा ॥ छ-पर्वत शब्द से मनुष्य अभिधेय हो तो शैषिक (अ) प्रतपय होता है. पर्वते - भवः पर्वतीयः पुरुषः पर्वतीयो राजा । मनुष्य से भिन्न में प्रण भी होता है । पर्वतीयं पार्वतं वा फलम् ॥ यत् -द्वीप शब्द से यदि वह समुद्र के समीप हो तौ शैषिक ( यत ) होता है - द्वीपे भवं द्वैप्यम् ॥
संस्कृतप्रबोधे-
mokaar
ठज - कालविशेष वाचक शब्दों से शैषिक (ठ )
होताहै- अहि कृतम्-माहिकम् । मासिकम् । वार्षिकम् ।
शरद् शब्द से यदि श्राद्ध अभिधेय हो तो 'ठ'
होता है अन्यत्र श्रण - शरदि भवं शारदिकं श्राद्धम् ।
अन्यत्र - शारदं नमः ॥
ठज -अण - रोग और श्रातप अभिधेय हों तौ शरद
शब्द
से और अण् दोनों होते हैं - शारदिकः
शारदो रोगः । शारदिकः शारद प्रातपः । निशा और
प्रदोष शब्दों से भी टत्र और प्रण दोनों होते हैं-
निशायांभवं नैशिक, नैशं वा तमः । प्रादोषिक, प्रादोषम्
अण् ~ ऋतु और नक्षत्र वाचक शब्दों से शैषिक
( अण् । होता है । ऋतु - ग्रीष्मे भव-ग्रेष्मम् । शैशि-
रम् । इत्यादि ॥ नक्षत्र- तैषम् । पौषम् । इ० ॥
एगय-ठक - प्रावृष से एण्य और वर्षा से ( ठक )
होता है - प्रावृषि भवः प्रावृषेण्यः। वर्षासु भवः वार्षिकः
तनस् - सायम् , चिरम् आदि अव्ययों से तनस्
प्रत्यय होता है - सायं भवः सायन्तनः । चिरन्तनः ॥
इम् - अन, पश्चात् और अन्त शब्दों से शैषिक
(इम् ) प्रत्यय होताहै - अग्रे भवम्-अग्रिमम् । पश्चिमम्।
अन्तिमम् । पश्चात् को (पञ्च) आदेश भी होजाता है ।
अब एक २ विभक्ति से एक २ अर्थ में जो शैषिक
प्रत्यय होते हैं उनको व्यष्टि रूप से दिखलाते हैं:
१-जातार्थकाः
जाता से लेकर भवार्थ पर्यन्त सम प्रत्यय सप्त.
म्यन्त से होते हैं।
सद्धिलप्रकरणाम ।
(६१)
प्रश्–मुचने जातः औधनः । माथुरः । पाञ्चालः ।
सैन्धवः । रौहिणः । मार्गशीर्षः ।
उप--प्रावृपि जातःप्रावृषिसः ।
बुन्----पथि जातः पन्थलः । पथिनको पन्ध आदेश
हो जाता है। पूर्वान्ह यातः पूर्वान्हकाः । अपराम् कः ।
ईकः । मनसः । प्रदोषकः ।
अरा-स-या अमावास्यायां जातःप्रामावास्यः,
अमावास्यः, अनावास्यधाः ।
दुज -कोशे जातं को गेयं वस्त्रम् ॥
(२) उप्ताकाः
प्र-मन्ने उप्ताः है मन्ता=यवाः । ष्माः = बीहयः।
ग्रीले उप्तानि श्रेष्मकाशि- सस्यानि ।
वामन्तिकाइक्षादः ।
३) देवार्यकाः
मासे- देयं मासिकम् ऋणम् । वार्षिकम् ।
ठा -ला ---- संवत्सरे दय-सांवत्सरिकम्, सांवत्सर.
कम् । प्राग्रहायगिकम्, भाग्रहायणाशम् ।
(४) पवार्थकाः
अगा.—र बने भवं-मौनम् । माथुरम् ।
यत् -दिगादि गणपठित शब्दों से भवार्थ में
'यत्' प्रत्यय होता है । दिशिभवं दिश्यम् । वर्यम् ।
गययम् । मेध्यम् । पथ्यम् । रहस्थम् । साक्ष्यम् । प्रायम् ।
अन्त्यम् । मुख्यम् । जघन्यम् । यूथ यम । न्याया।
वंश्यम् । प्राप्यम् ॥ इत्यादि । शरीरावयव वाचक शब्दों
संस्कृतप्रबोघे- . से भी भवार्थ में 'यत्' होता है-दन्तेभवं दन्त्यम् । कार्यम् । कण्ठयम् । ओष्ठयम् । तालव्यम् । मूर्द्धन्यम् ॥ ढ-द्वती भवंदातेयम् । कौक्षेयम् । प्राहेयम वारतेयम् । प्रास्तेयम् । अण-दा-ग्रीवायां भवं प्रैवं, अवेयम । जय-गम्भीरे भवं गाम्भीर्यम् । बाध्यम । दैव्यम् । पाञ्चजन्यम् ॥ अन्तर्वेश्मनि- भवम प्रान्तश्मिकम् । प्रान्त- गैहिकम । प्राध्यात्मिकम् । आधिदैविकम । प्राधि- भौतिकम । और्ध्वदेहिकमाऐहलौकिकम्। पारलौकिकम छ--जिहामूले- भवं-जिहामलीयम । अंगुलीयम । वर्गान्त अक्षर समूहवाचक शब्द से भी 'छ' प्रत्यय होता है- कवर्गीयम् । चवर्गीयम् ॥ ख-यत्--वर्गान्त शब्द अक्षरसमह से भिन्न किसी और समुदायका वाचक हो तो ख और यत् प्रत्यय होते हैं- ब्राह्मणवर्गीयाः, ब्राह्मणवर्यः ॥ (५) व्याख्यानार्थकाः षष्ठयन्त व्याख्यातव्य से व्याख्यान के अर्थ में व्या. ख्यानार्थक प्रत्यय होते हैं । अण-सुपां व्याख्यानः सौपः । तैङः । कार्तः । ऋगयनानां व्याख्यान: आर्गयनः । पौनरुक्तः । नैगमः। वास्तुविद्यः । नैमित्तः । औपनिपदः । शैक्षाः । इत्यादि अण्-यत्--छन्दसां व्याख्यानः छान्दस, छन्दस्यः॥ ठक् - प्रष्टीनां व्याख्यानः=ऐष्टिकः । चातुर्योतृकः'। ।
तद्वितप्रकरणम् । । ब्राह्मणिकः । आर्चिकः । प्राथमिकः। प्राध्यरिकः। पौरश्च- रणिकः । नामिकः । श्राख्यातिकः ॥ ठञ् - अग्निष्टोमस्य व्याख्यानः आग्निष्टोमिकः । वाजपेयिकः । इत्यादि (६) आगतार्थकाः पञ्चम्यन्त शब्द से आने के अर्थ में पागतार्थक प्रत्यय होते हैं। श्रण – मुनादागतः सौनः । माथुरः । वाङ्गः । कालिगः । शुण्डिकादागतः शौपिडकः। कार्पणः । स्था. गिडलः । तैर्थः । इत्यादि ठक्-भाकरादागतम् प्राकरिक सुवर्णम् । आप - णिकं वस्त्रम् ॥ वुन् - विद्या और योनि सम्बन्ध वाचक शब्दों से 'वुञ्' होता है । विद्यासम्बन्ध - उपाध्यायादागतः = प्री- पाध्यायकः । प्राचार्यकः । योनिसम्बन्ध - पितामहा. दागतः पैतामहकः । मातामहकः ॥ इत्यादि ठा - विद्या और योनि सम्बंध वाचक ऋकारान्त शब्दोंसे ठञ् होता है। विद्या - होतुरागतं-हौतृकम । पौतृकम । योनि - भातृकम् । मातृकम ॥ ठञ् - यत्--पितुरागतं-पैतृकं पित्र वा ॥ (9) प्रभवार्थकाः पञ्चम्यन्त शब्दसे उत्पन्न होने के अर्थ में पुभवार्यक प्रत्यय होते हैं। अण - हिमवतः प्रभवति-हैमवती गङ्गा । समुद्रात् पभवति सामुद्रं रत्नम् ॥
संस्कृतप्रयोथे- mon m- अब-विदूरात्प्रभवति-वैदूर्यो नशिः ॥ (८) प्रोक्तार्थकाः ततीयान्त शब्द से कहने के अर्थ में प्रोतार्थक प्रत्यय होते हैं। अ- ऋषिणा प्रोक्तम्- प्रार्षम् । मनुना प्रोक्त मानवम् । पातलम् ॥ छ-पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम । तैत्तिरीयम्। पौरुषयम् ॥ (९) कृतार्थकाः तृतीयान्त शब्द से करने के अर्थ में कृतार्थक प्रत्यय होते हैं -कायेन कृतं कायिकम् । वाचिकम् । मानसिकम् मक्षिकाभिः कृतं माक्षिकं मधु । वज ---कुलालेन कृतः कौलालको घटः । कार्मा- रकः । नैषादकः। (१०) इदमर्थकाः षष्ठयन्त से प्रथमाके अर्थ में इदमर्थक प्रत्यय होते हैं- यत् - रयम्रोदंरथ्य चक्र युग वार५५ धक्र वा युग को कहते हैं। अ -वाहन वाचक तथा अध्वर्यु और परिपद शब्दों से इदमर्थ में 'अञ्' होता है - अश्वत्थेदम् श्राश्यम। श्रीष्टम । हास्तिनम् । आध्वयंवम् । पारिषदम् ॥ ठक हलम्येदं हालिकम । सैरिकम् । बुर गोत्र वाचक और घरमा वाचक शब्दों से इदमर्थ में 'धुन' होता है। गोत्र - उपगोरिदम औपग- अरा- तद्धितरकर पम् । वकम् ।। परा-कास्येदं - काठकम ॥ अथ - छन्दोगानामिदं = शान्दोग्यम् । पौविय- क्यम् । याशियम । बाहच्यम् । नाध्यम ॥ प्रण - सार्वसिफ शब्द से उतार्य में 'अ' और उसके अन्त्य 'इ' का लोप होता है - प्राथमिक- स्यायम -यापर्वगः ॥ (६) विकाराक्यवार्थकाः अब यहां से विकार और प्रवयव अर्थमें जो प्रत्यय होते हैं, उनका विधान करेंगे. परन्तु यह बात स्मरण सनी माहिये कि प्राली, ओषधि और लक्ष वाचक शब्दों से तो उक्त दोनों अर्थों में प्रत्यय होते हैं और इनमे मिज द्रव्यों के बाचक्ष शब्दों से केवल विक्षारार्थ में प्रत्यय होते हैं। ओषधेयको विकारो औषधस । श्राश्यत्यः । सत्तिकाया विकारः मार्तिकः । अश्मनो वि- कार मानवः । प्रत्ययके योगसे प्रश्मन् शब्दके नकार का लोप होजाता है। भास्मनः ॥ बिल्वस्य विकारोऽवयवो या चैल्वः । श्रेहधः । लोद्गः। गोधूमः । ऐक्षक्षः । वैशावः। कार्यासः । इत्यादि पुणो विकारः = त्रापुषन् । जातुषम् अघु और जतु शब्दों को 'पक्ष का आगम भी होता है । पलाशस्य विकारोऽवयको वा=पाला- शम् । खादिरम् । शैशपात । कारीरम । गैरीधन । इत्यादि । रूप दोनों के एस से ही होते हैं, केरल स्वर में कुछ भेद होता है। - शा . - अर अज .
संस्कृतप्रबोधे- R- अञ् - उकारान्त प्राणिवाचक और रजत आदि शब्दों से उक्त दोनों अर्थों में 'अन' होता है - उकारान्त - दारोर्विकारः दारवम ॥ प्राणिवाचक कपोतस्यावयवी विकारो वा = कापोतम् । मायूरम् । तैत्तिरम् । रतादि-राजतम् । सैसम् । लौहम् । औदुम्बरम् । ब्लञ् - शम्या अवयवो विकारो वा-शामीनम् ॥ मयट - भक्ष्य और आच्छादन वाचक शब्दों को छोड़फर सब शब्दों से उक्त दोनों अर्थों में 'मयट्' प्रत्यय होताहै - अश्मनो विकार पाश्ममयम् । बिल्व- मयम् । पुमयम् । पलाशमयम् । इत्यादि । भक्ष्य और प्राच्छादन में नहीं होता = मोद्गः सूपः । कार्पासमाच्छादनम् ॥ वृद्धि, युक्त शरादि और एकाच शब्दों से नित्य हो 'मयट' होता है - वृद्धियुक्त- प्राममयम् । शालमयम् । शाकमयम् । शरादि- शरमयम् । दर्भमया । मृन्मयम्। तृणमयम । एकाच-त्वङ्मयम । वाङ्मयम् ॥ इत्यादि 'गो' शब्द से पुरीष अभिधेय हो तो 'मयट्' अन्यत्र 'यत्' प्रत्यय होता है - गोविकारोऽवयवो वा-गोमयं पुरीषम् । पुरीषसे अन्यत्र-गव्यं घृतम् । वीहि शब्द से पुरोडाश अभिधेय हो तो 'मयट्' होता है - वीहीणा विकारः = वीहिमयः पुरोडाशः । अन्यत्र- वहम । श्रण होगा। तिल और यव शब्दों से संज्ञा से अन्यत्र 'मयट्' तद्वितप्रकरणम् । - होता है - तिलमयं पात्रम । यवमयं क्षेत्रम । संज्ञा में तिल से 'अण' और यवमे 'कन्' होकर--तिलस्य विकारः तैलन । यवस्य विकारः = यावकः । बनेंगे ॥ तुज - उष्ट्रम्यावधयो विकारोवा = औष्ट्रकः । वुन-अण - उमाया विकारः भीमकम्, श्रीमम । शौर्णकम ,पौर्णम् ॥ ढ - एण्या अवयवो विकारोया = ऐणेयं मांसन । पुंलिला एग शब्द से ऋण होकर ऐणम । होगा। यत् - गो, पयस् और हु शब्दों से 'यत्' प्रत्यय होता है - गव्यम् । पयस्यम् । द्रव्यम् लुक - फल अभिधेय हो तो विकारावयवार्थक प्र- त्यय का लोप होजाता है - आमलक्याः फलम आमल- कम । आमम । बदरस । नारिकेलम ॥ हरीतकी । कोशातकी = द्राक्षा ॥ जिनके फल पककर भूख जाते हैं, उनसे भी प्रकृत प्रत्यय का लोप होजाता है - वीहीणां फलानि = ब्रीहयः । यवाः । मुद्गाः । माषाः । तिलाः ॥ पुष्प और मूल अभिधेय हों तो भी कहीं २ पर प्रत्यय का लोप होजाता है-मल्लिकायाः पुष्पं मल्लिका । जातिः । कदम्बम । अशोकम् । विदार्याः मूलं विदारी। अंशु- मती । बृहती ॥ इत्यादि (७) अनेकार्थकाः अब की भिन्न २ विभक्तियों से भिख २ अर्थों में प्रत्यय होते हैं उनको दिखलाते हैं - (६८) संस्कृतप्रबोधे- प्रथमान्ताद्. ठवा - प्रथमान्त से षष्ठी के अर्थ में प्रत्यय होते हैं । सुवर्ण पायमस्य - सौवर्णिकः । वालिकाः । लावगिकः । मृदयं शिल्पनस्य = मार्दङ्गिकः । पागाविसः ॥ अतिः प्रहरगमस्य प्रासिकः । धानकः ॥ शस्तीति मत- नस्य = आस्तिकः । नास्तिकः । देटिकः ॥ ईकक्ष - शक्तिः प्रहरमात्रस्य = शालीकाः । पाष्टीकः ॥ प्राप्तोऽय मामयिक कर्म । कालिक चरम ॥ ऋतुः प्राप्तोऽस्य = सावं पुष्पम् ॥ कालः प्राप्तोरस्य कारपत्तायः । काल्यं शीलम् ।। छ - अनुप्रवचनं प्रयोजनमस्थ = अनुपाचनीयन् । उत्थापनीयन् । प्रदेश नीयम् । शारम्भलीयन । आरोहणी- यम् । सन्दः समापनीयम् ॥ स्वर्मः प्रयोजनमस्य :- स्वयंन । यशस्यम् । - यस सत् साभायम । काम्यम । धन्यम ॥ । इतम् - तारकाः सजाता प्रस्य = ताकितं नमः पुष्पिता वृक्षः । पल्लविता लता ॥ कन् - द्वे परिमाणमस्य = द्विकन । त्रिका । पञ्चकम् । अष्टकम वत् - यत्परिमाणमस्य = यावान् = जितना तावान = उतना । एतावान् = इतना । किं परिमाण- कियान* = कितना । इदं परिमाणमस्य श्याम = इतमा । 'किम' सर्वनाम से संख्या के परि- किम और इदम् सर्वनामसे परे बल के वकार को आकार होकर 'ध, को इय' होजाता है । मस्य:
तद्धितप्रकरणम् । माण में 'ति' प्रत्यय भी होता है। का नंख्या परिमाण- मेषां छात्रायाम = कति छात्राः । कियन्तरछात्राः ॥ तयप - पञ्चावयवा अस्य-पञ्चतयम । दश्तयम् । चतुष्टयम् । द्वितयम् । त्रितयम् ॥ अयच - द्वावयवावस्य-द्वयम । त्रयम । उमयम द्वितीयान्तात्. टक - समाज रक्षांत समाज रक्षांत-सामाजिकः ॥ सामाजिकः ॥ शब्दं करोति शाब्दिशः। पूतीपं वर्तते पातीपिकः । श्रन्धीपं वर्तते भान्वी पिकः । पातिलोमः । भानलोमिशः । पातिकलिकः । प्रानकलिकः । *पक्षिणो हन्ति-पाक्षिकः। मात्स्यिकः । भैनिकः । मागि कः ॥ धन धरति धार्मिकः । समुदायान् मनवैति सामुदायिकः । सामघायिकः । सामूहिकः । सामाजिकः । छेदमहति छैदिकः । भैदिकः ॥ हल घहति -हालिमः । सैरिकः ॥ राय - परिषदं समवैति-पारिषद्यः । एय - ठक--सेनां समवेति = सैन्यः, सैनिकः ॥ यत् - रथं वहति - रथ्यम् । युग्यन । शीर्षच्छेद- महति शीघच्छेद्यः ।। य-दरामहति-दण्डयः । कश्यः । भेयः । अधर्यवध्यः ॥ यत् - डा -धुरं वहति = धुर्यः, धौरेयः ॥ -शकटं वहति-गाकटः ॥ * ईप् और कूल शब्द प्रति के योग में प्रतिकूल और अनु के योग में अनुकूल अर्थ के याचक है ॥
(७०)
संस्कृतप्रबोधे-
यत्-घ--पात्रमहंति-पात्रयः, पात्रियः । दक्षिणा
महति-दक्षिणयः, दक्षिणीयः ॥
घ-यज्ञमहति यज्ञियो ब्राह्मणः देशो वा ।।
खत्र-ऋत्विजमहति आर्विजोनो यजमानः ।
ठज - संशयं प्राप्तःसांशयिकः । योजनं गच्छति
यौजनिकः ॥
एकन. पन्थानं गच्छतिपान्थः, पथिकः ।
तृतीयान्तात.
ठक - प्रर्दीव्यतिप्राक्षिमः ॥ कुद्दालेन खनति
कौद्दालिकः ।। दध्ना संस्कृतं दाधिकम ॥ दण्डेन चरति
दाण्डिकः ॥ तुडुपेन तरति-प्रोडुपिकः ॥वेतनेन जीवति-
वैतनिकः । धानुष्कः । औपस्यानिकः ॥ प्रोजसा वर्तते
औजसिकः
शूरः।
। साहसिकश्चौरः । श्राम्भसिको मत्स्यः ॥
अहा निर्वृत्तं, लभ्यं, कार्यवा आहिकम । मासिकम ॥
ठन
-नावा तरति = नाविकः । पलविकः । घटिकः ।
बाहुकः । वस्नेन जीवति वग्निकः । ऋयिकः। विक्रयिकः।।
यत्--नावा नायं नाव्यम् ॥ वयसा तुल्यम 3
धर्मेण प्राप्यं धय॑म ॥ विषेण यध्य विष्यम् ।
मलेन समं मूल्यम् ॥ सीतया समितं सीत्यम ॥ तुलया
सम्मितं तुल्यम ॥
यत् -अण्--उरमा निर्मितः = उरस्यः, औरसः पत्रः ॥
कन् -पष्टिरात्रेण पच्यन्ते षष्टिका धान्यविशेषाः ।
प्रत्यय के योग से रात्र शब्द का लोप होजाता है ।
वयस्यम -
तद्वितप्रकरणम् । (७१) । खत्र चतुर्यन्तात्. यत्-दभ्यो हितं दन्त्यम् । नस्यम् । कण्ठयम् । शीर्षण्यम् । * खल्यन् । यव्यम् । माष्यम् । तिल्यम् । वृष्यम् । ब्रह्मण्यत् ॥ ख---प्रात्मने हितम प्रात्मनीनम् । अध्वनीनम् । विश्वजनीनम् । पंचजनीनम ॥ ख-ठा - सर्वजनेभ्यो हितं सर्वजनीनम सार्वजनिकम । टज :महाजनाय हितं माहाजनिकम । सन्तापाय प्रभव- ति = सान्तापिकः । सांग्रामिकः । सांपरोयिकः । नैसर्गिकः -सर्वेभ्यो हितं सार्वम -सर्वोयम ॥ ढा -पुरुषाय हित पौरुषेयम ॥ .. -माणवाय हितं माणवीनम । धारकी गाम ॥ यत--राज-योगाय प्रभवति योग्यः, यौगिकः ॥ उक-कर्नणे प्रभवति=कार्मुकं धनुः ॥ पंचम्यन्तात्. यत: धर्मादनपेतं धय॑म । पश्यम । अयम् । न्याय्यम षष्ठघन्तात. यत्-हृदयस्य प्रियः हृद्यः ॥ प्रत्यय के योग से हृदय को 'हृत्' श्रादेश होजाता है ॥ श्रण - प्रा --सर्वभूमेरो श्वरः सर्वभौमः । पृथिव्या * प्रत्यय के योग से शिरम शब्दको शीर्षन मादेश होजाता है * पुरुष शब्द से वध, समूह, विकार और कृत अर्थ में ढा. प्रत्यय होता है यह वृत्तिकार का मत है-पौरुषेयो वधः स हो विकारो ग्रन्थों वा ।। केवल धनुष्कही अभिधान में यह प्रत्यय होता है ॥ .
(१२) संस्कृतप्रबोधे- - -- A- ईश्वरः पार्थिवः ॥ तथा सर्वभूमेरुत्पातः सार्वभौमः । पृथिव्या उम्पा तयार्थिवः ॥ त्पन्न - उप और अधि उपसर्गो से यथाक्रम पासन्न और भारूढ़ भार्य में (त्यकन् ) प्रत्यय होता है - पतस्यासनम उपत्यका । पर्वतस्यारूढ़म् पित्यका ॥ पर्वत की अधोभागीय स्थल को उपत्यका और ऊर्धमागीय स्पल को अधित्यका कहते हैं । हट् - एकादशानां पूरगाः = एकादशः = ग्यारहवां । द्वादशः - बारहवां ॥ मन - पञ्चानां परमः - पञ्चमः । सप्तमः । भ्रष्टमः । नवमः । दशमः ॥ परणः पाठः । चतुर्थः । कलिथः ॥ तिथद - बहूनां पुरणः = बहुतिथः । पूगतिथः । गरम- तिथः । संघतिथः ॥ इथट् - यावतां पूरणः = यावतिथः । तापतिथः । एतावतियः॥ तीय - द्वयोः परणः = द्वितीयः । त्रयाश पूरणः== ततीयः ॥ त्रि के ( र् ) को (ऋ) सम्प्रसारण हुआ है । छ - यत् - चतुर्गा पूरणः = तुरीयः, तुयः ॥ श्रा- धक्षर का लोप होता है। हद-तमट - विंशतेः पूरणः = विंशः विंशः = विंशतितमः। एकविंशः - एकविशतितमः ॥ २० से लेकर हल तक ये दोनों प्रत्यय होते हैं । शत १२० और उससे ऊपर फिर केवल ( तमह) ही होता है-शततमः । महस- तमः । लसतमः॥ षष्टि ६० सप्तति 9 अशीति ८० और PAR
तद्वितप्रकरणम
(७३)
नवति ९० शब्दों से भी केवल ( तमह ) ही होता है -
षष्टितमः । सप्ततितमः । अशीतितमः । नवतितमः।।
सप्तम्यन्तात्.
ठक् - प्राकरे नियुक्तः श्राकरिकः । आपतिकः ।
दौवारिकः ॥ निकटे वसति नैकटिकः । श्रावसथिकः ।।
ठन् - देवागारे नियुक्तः = देवागारिकः । कोष्ठागारिकः ।
टज गुडे
साधुः
गौडिक
इक्षुः। साक्तको यवः ॥
लोके विदितः = लौकिकः । सार्वलौकिकः ।।
यत्-सामसु साधुः सामन्यः । कर्मण्यः । शरणयः॥
समानतीर्थ वसति = सतीर्यः । समानादरे वाति
सोदयः । समान शब्द को 'स' आदेश होता है । सती-
र्य सहाध्यायी और सोदर्य सगे भाई को- कहते हैं ।।
खञ्-प्रतिजने साधुः प्रातिजनीनः । सांयुगीनः
सार्वजनीनः ॥
रा-राय--परिषदि साधुः = पारिपदः, पारिषद्यः ।।
ढा -पथि साधुः = पायेयम् । प्रातिथेयम् ।
वानतेयम् । स्वापतेयम् ।
य सभायां साधः = सभ्यः । वेदमें ढभीहोताहै-ससेयः ।।
अण-अञ्-सर्वभूनौ विदितः = सार्वभौमः । पृथिव्यां
विदितः पार्थिवः ॥
८-मतुबर्थकाः
भूमनिन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेऽतिशायने । सम्बन्धे.
ऽस्तिविवक्षायां भवन्ति मतुमादयः ॥ बाहुल्य, निन्दा,
नः।
॥
(१४) संस्कृतमबोधे- प्रशंसा, नित्ययोग, अत्युक्ति, सम्बन्ध और होने के अर्थ में मतुप आदि प्रत्यय होतेहैं-बाहुल्य-धनवान् । निन्दा. दाचालः । प्रशंसा-गुणावान्। नित्ययोग-लोमशः । अत्युक्ति- अनुदरी । सम्बन्ध-दण्डी । छत्री । सत्ता-अस्तिमान् ॥ प्रथमान्त शब्द से षष्ठी और सप्तमीके अर्थ में मतु- बर्थीय प्रत्यय होते हैं। मतुप-गायो यस्य सन्ति स गोमान देवदत्तः । वृक्षा यस्मिन् मन्ति स वृक्षवान् पर्वतः । यवा यस्मिन् सन्ति तद्यवमत् क्षेत्रम् । शीलं यस्याः यस्यां वा अस्ति सा शीलवती कन्या । रसोऽस्मिन्नस्ति रसयानिक्षुः । * रूपवान् । गन्धवान् । स्पर्शबान् । शब्दवान् । स्नेह- वान । गणवान । विद्य त्वान् । उदन्वान् ॥ लच्-मतुप-चट्टा अरिमनस्ति ट्रान्तः, चूठावान् । सिघ्नलः, मिध्मवान् । मांसलः,सांसवान् । गीतलः,शीत- वान् । श्यामलः,श्यानवान् । पिंगलः,पिंगवान् । पृथुलः, पृथुमान् । मृदुलः,मृदुमान् । मंजुलः,मंजुमाम् -बत्त और नंस शब्दों से क्रमशः इच्छा और बल के अभिधान में 'ल' छोता है-दरसलः=शामुकः । अंसलः-अलवान् ॥ * यवादि शब्दोंको छोड़कर मकारान्त, परकारान्त समारोपध और प्रकारांपध शब्दोस पर मतुपके मकार को वकार आदेश होजाताई । मकारान्त-किंवान । शंवान् । अकारान्त-शानवान । विद्यावान् ॥ मकारोपध-लस्मीवान् । शमीयान् ॥ अक्षारापध- यशस्वान् भास्वान् ॥ इत्यादि । लच- तद्भुितप्रकरणम् (७५) , लच्-इल-मतुप-फेमा अस्मिन् सन्ति फैनलः, फेनिलः, फेनवान ॥ श-मतुप-लोमानि अस्यसन्ति = लोमशः,लोमवान् । रोमशः,रोमवान् ॥ न-मतुप-पामा अस्यास्ति=पामनः, पामवान् । वामनः,वामवान्। ऊष्मणः, ऊष्मवान् ॥ इन्नच-मतुप्-पिच्छिलः, पिच्छवान् । उरसिलः, उरखान् । पङ्किलः, पकवान ।। गा-मतुप - प्रशानस्याम्मिन् वा अस्ति-प्राज्ञः,प्रज्ञावान् । श्राद्धः, श्रद्धावान् । प्रार्चः,अर्धावान् । वार्तः,वृत्तिमान् ॥ विन्-प्रण-सपोऽस्यास्मिन् वा अस्तितपस्वी,तापसः इन्-अ-महमाण्यस्य सन्ति-सहमी,साहसः ॥ अण-ज्योत्स्ना अस्मिन्नस्ति ज्योत्स्नःचन्द्रः पदावा । तामिसः पक्षः । तामिसी रात्रिः ।सिकता अस्मिन्मस्ति= सैकतो घटः । शर्करा अस्मिन्नस्ति-शार्करं पयः ।। इलच-त्रय-मतुप्-सिकता और शर्करा शब्दों से यदि देश अभिधेय हो तो तीनों प्रत्यय होते हैं मिकता मस्मिन् विद्यनेमिक तिलः,सैकतः,सिकतावान् दंभः । शरिलः, शारः शर्करावान देशः ।। तरच-दन्त शब्दसे यदि वे बढ़े हुवे हों तो 'उरच्' प्रत्यय होता है-दन्ता उन्नता अस्य सन्ति-दन्तुरः ॥ र-कषोऽस्मिन्नस्ति अषिरं क्षेत्रम् । मुषिरं काष्ठम् । मुष्करः पशुः । मधुरो गुहः । खरः। मुखरः । कुञ्जरः । नग- रम् । पांसुरम् । पागधुरम् ।।
(७६)
संस्कृतप्रबोधे-
धु रस्मिन्नस्तीति-द्युम प्राकाशः । द्रमः वृक्षः ॥
व-इन् ठन् मतुप-केशा प्रस्य अस्मिन् वा सन्ति=
केशवः,केशी,केशिका,केशवान् ॥
व-गागडी और अजग शब्दोंसे संज्ञा में 'व' प्रत्यय
होता है-गाण्डीवं धनुः । अजगवं पिनाकः ॥ १
ईरन-काण्डानि अस्य अस्मिन वा सन्ति=का-
राहीरस्नृणाः ग्रन्थो वा॥
इरच्-अगहानि अस्य अस्मिन् वा सन्ति प्राण्डीरः
पक्षी नीडो वा ॥
वलच--रजोऽस्यां विद्यते-रजस्वला-स्त्री। कृषि-
रस्यास्तीति=कृषीवलः कृषकः । दन्ता अस्य सन्ति दन्ता-
बलः हस्ती । शिखावलो मयूरः ॥२
इन-ठन्-अकारान्त और वीयादि शब्दोंसे मतु-
वर्थीय इन और ठन् प्रत्यय होते हैं-
अकारान्त-दण्डमस्यास्तीति-दण्डो,दगिडकः ।
छत्री,छत्रिकः ॥ वाहयादि-वीहयोऽस्य सन्ति वीही,
घोहिकः ॥ मायी,मायिकः । शिखी,शिखिकः ॥
इन्-ठन-इलच-तुन्दमस्पास्तीति-तुन्दी, तुन्दिकः,
तुन्दिलः । उदरी,उदरिका,उदरिलः ॥
विन-यशोऽस्यास्तीति-यशस्वी। पयस्वी। तपस्वी ।
मायावी । मेधावी । सग्वी ॥
युस्--कर्णा अस्य विद्यन्ते-कर्यायुरविः ॥
१ गाण्डीव अर्जुन के और अजगव शिव के धनुष की संज्ञा है
२ दन्त और शिखा शब्द से 'वलच, प्रत्यय केवल संक्षा
में होता है।
.
तद्वितप्रकरणम् । (१७) ग्मिन्-वाचोऽस्य सन्ति वाग्मी भाषणपटुः ॥ भालच्-माटच-कुत्सितं बहुभाषते वाचालः,वाचाटः ॥१ प्रामिन् - स्वमैश्वर्यमस्यास्तीति-स्वामी ॥ अच - अर्थोऽस्यास्तीति-अर्शसः । उरसः । चतुरः इन्-ज्वरोस्यास्तीतिज्वरी। व्रणी । कुष्ठी । वातकी । अतीसारकी ॥२ सुखी । दुःखी । द्विजधर्मी । आर्यशीली। ब्राह्मणवर्णी ॥ हस्तोऽस्यास्तीति-हस्ती ॥ ३ हस्त नान यहां शुण्ड का है और वह हाथ ही का काम करता भी है ॥ वणी = ब्रह्मचारी ॥ ४ पुष्करिणी । कुमुदिनी। पद्मिनी । मृणालिनी ॥५ इन्-मतुप - बलमस्यास्तीति-बली-बलवान् । कुनी, वान् । उत्साही,उत्साहवान् । आरोही,नारोहवान् । ब-भ-युस्-ति-तु-त-यस् - कम् और शम् अव्ययों से मतुबर्थीय उक्त ७ प्रत्यय होते हैं-कमस्यास्तीति=कम्बः, कम्भः, कंयुः, कन्तिः, कन्तुः,कन्तः,कंयः। शमस्यास्तीति-- शम्बः, शम्भः, शंयुः, शन्तिः,शन्तुः,शन्तः,शंयः॥ युस - अहम और शुभम् अध्ययोंसे मतुवर्थ में 'बुल' प्रत्यय होता है-अहमस्यास्तीति-अहंयुः अहंकारवान् । शुभमस्यास्तीति शुभंयुः = कल्याणवान् ॥ १ आलच और आटच प्रत्यय निन्दा में होते हैं ।। २ वात और अतीसार शब्द को प्रत्यय के योग से 'कुछ' का आगम होता है। ३ हस्त शब्द से जाति के अभिधान में 'इनि' प्रत्यय होता है । ४ वर्ण शब्द से ब्रह्मवारी के अभिधान में 'इनि' होताहै ॥ ५ पुष्करादि शब्दों से देश के अभिधान में 'इनि' होता है ॥
(७८)
संस्कृतप्रबोधे-
तमप
8-स्वार्थकाः
अबस्वार्थ में जो प्रत्यय होते हैं उनका निरूपण करते हैं।
तमप-इष्ठन् - अतिशायन ( बड़े हुवे ) के अर्थ में
जहां बहुतों में से एक का निर्धारण किया जाय वहां
और इष्ठन् प्रत्यय होते हैं । तमप-अयमेषामति-
शयेनाढयः आढवतसः यह इन सबमें अत्यन्त धनवान है।
दर्शनीयतमः । सुझुमारनमः । इष्ठन्-अयमेषा मतिशयेन
पटुः
पटिष्ठः = यह इन सबमें अत्यन्त चतुर है । लघुः,
लघिष्ठः = छन्टा ॥ गुरुः, गरिष्ठः = बढ़ा ॥
तरप-ईयर - अतिशायन में ही जहां दो में से एक
का निर्धारण किया जाय वहां तरप और ईयस् प्रत्यय
होते हैं । तरप अयमनयारतिगयनाढयः = आढवतरः =
यह इन दोनों में अत्यन्त धनवान है । दर्शनीयतरः ।
सुकुमारतरः । ई यस् - अयमनयोतिशयेन पटुः = पटी-
यान= यह दोनों में अत्यन्त चतुर है । लघुः लघीयान् ।
गुरुः, गरीयान् ॥ १
यह बात स्मरण रखनी चाहिए कि इनमें से इष्ठन
और ईयस् प्रत्यय केवल गुणवाचक शब्दों से होते हैं ।
द्रव्यवाचक और क्रियावाचकों से तमप और तरप
प्रत्यय होते हैं । गुणवाचक और द्रव्यवाचकों के उदा.
हरम दिखलाये जाचुके । क्रियावाधकों से - अतिशयेन
पचति = पचतितमाम् पचतितराम २ इत्यादि
१ इष्ठन् और ईयम प्रत्ययों के योग में पूर्व शब्दक अन्त्य
अच् का लोप होजाता है।
२ तिडन्त के योग में तरप और तमप् प्रत्ययों को ग्राम का
मागम होजाता है।
तद्वितप्रकरणम् 9) = यह प्रशस्य शब्दको इष्ठन् और ईयस् प्रत्ययके योगमें 'श्र' और 'ज्य' प्रादेश होजाते हैं - अयमेपामतिशयेन प्रशस्यः = श्रेष्टः, उयेष्ठः = यह इनसबने अत्यन्त उत्तम है। अयमनयो रतिगयेन प्रशस्यः श्रेयान-ज्यायान् १ दोनों में प्रत्यन्त उत्तम है। अन्तिक और बाढ शब्दों को उक्त दोनों प्रत्ययों के योग में नशः नेद और माघ आदेश होते हैं - अयमेषा. मतिशयेनान्तिकः - नेदिष्ठः = यह इन सब में अत्यन्त निकट है । अयमनयोरतिशयेनान्तिः = नेदीयान् = यह इन दोनों में अत्यन्त निकट है ॥ अयमेषामतिशयेन बाढः साधिष्ठः । श्रयमनयोरतिशयेन बाढः साधीयान बुध और अल्प शब्दों को उक्त दोनों प्रत्ययों के योगमें पाक्षिक 'कन्' आदेश होता है - अयमेषामति- शयेन युवा-कनिष्ठः, यविष्ठः । अयमनयोरतिशवेन युवो कनीयान-यवीयान् ।। ऐसेही कनिष्ठः,अल्पिष्टः । कनो- यान, अल्पीयान ॥ विन और मतुप प्रत्ययों का उक्त दोनों प्रत्ययाके योगमें लोप होजाता है अयमेषामतिशयेन सम्वी मुजिष्ठः,सजीयान ॥ श्रयमेषामतिशयेन त्वग्वान = त्वचिष्ठः,त्वचीयान ॥ स्थूल, दूर, युव, इस्व, क्षिप्र और क्षुद्र इन शब्दों को उक्त दोनों प्रत्ययों के योगमें बीच के यम् अर्थात् य, व, र, ल, का लोप और पूर्व को गुण होकर १ 'ज्य' को ईयम के योग में प्राकारादेय होजाता है। - दो (८०) संस्कृतप्रबोधे- अयमेषामतिशयेनस्थलः = स्थविष्ठः । स्थवीयान ।। दविष्ठः । दत्रीयान ॥ यविष्ठः । यवीयान् ॥ हसिष्ठः । इसीयान॥ क्षेपिष्ठः। क्षेपीयान ॥ क्षोदिष्ठः। क्षोदीयान इन्हीं दोनों प्रत्ययों के योग में प्रिय को प्र, स्थिर को स्थ, स्किरको स्त, ऊतको वर, बहुलको बंहि.गुरु को गर्, वृद्ध को वर्षि, तृण को त्रपः दीर्घ को द्राधि और वृन्दारक को वृन्द श्रादेश होजाते हैं-अयमेषामतिशयेन प्रियः = प्रेष्ठः । प्रेयान ॥ स्येष्ठः । स्धेयान ॥ स्फेष्ठः । स्फेयान ॥ वरिष्ठः । वरीयान ॥ बंहिष्ठः । बहीयान ।। गरिष्ठः । गरीयान ।। बर्षिष्ठः । वर्षीयान ॥ अपिष्ठः । अपीयान॥द्राघिष्ठः । द्राधीयान गवृन्दिष्टः। वृन्दीयान 'लु' शब्द को उक्त दोनों प्रत्ययों के योम में 'भू' आदेश होकर-अयमेषामतिशयेन बहुः = भूयिष्ठः भूयान इतर-इतमच् - किम , यद् और तद् शब्दोंसे जहां दो में से एक का निर्धारण हो वहां इतरच और जहां बहुतों में से एक का निर्धारण हो वहां उतमच् प्रत्यय होता है - भवतोः कठः कतरः = तुम दोनों में से कठ कौनसा है ? यतरो भवतोदेवदत्तः ततर श्रागच्छतु = तुम दोनोंमेंसे जौनसा देवदत्त है वह आवै। कतमो भवतां कठः = तुम सबमें से कठ कौनसा है ? यतमो भवतां यज- दत्तस्तम आगच्छतु = तुम सब में से जौनसा यज्ञदत्त हो वह श्रावै॥ छ- जाति और स्थान शब्द जिसके अन्त में हों ऐसे पद से 'छ' प्रत्यय होता है, यदि जातिमान और स्था- तद्वितप्रकरणम् (८२) नवान अभिधेय हों तो - ब्राह्मणजातीयो ब्रह्मदत्तः = ब्रह्मदत्त ब्राह्मण जातिवाला है ॥ पितस्थानीयः सोम- दत्तः = सोमदत्त पिता का स्थानापन्न है ॥ कृत्वन् - संख्या शब्दों से क्रिया की अभ्यावत्ति [गणना में 'कृत्वस्' प्रत्यय होता है - पश्चकृत्वोऽधीते = पांचवार पढ़ता है ॥ सुच् - द्वि, त्रि और चतुर् शब्दों से उक्तार्थ में 'तुच्' प्रत्यय होता है - द्विभुक्तं = दोवार खाता है । त्रिर्वा चतुरधीते = तीन वा चार बार पढ़ताहै ॥ 'एक' शब्दको 'सकृत' भादेश होताहै - सकृद्भुक्ते = एकवारखाताहै धा-कृत्वम् - बहुधाऽधीते। बहुकृत्वोऽधीते = बहुत वार पढ़ता है। मयट - बहुतायत से प्रस्तुत होने के अर्थ में मयद होता है - अन्न वाहुल्येन प्रस्तुतम् = अन्नमयम् = अन्न बहुतायत से प्रस्तुत है । लवणमयम् ॥ कन - निन्दा, संज्ञा, अल्प और ह्रस्व अर्थ के द्योतन करने में कन् प्रत्यय होता है । निन्दा - कुत्सितोऽश्वः= अश्वकः = बुराघोड़ा ।। संज्ञा - वंशकः । वेणुकः ॥ अल्प- अल्पं तैलं तैलकम् । लवणकम् ॥ इत्व - इखो वृक्षर वृक्षकः । वत्सकः। शावकः । बालकः ॥ तरप् - वत्स, उत, अश्व और ऋषभ शब्दों से युवा अर्थ में 'तरप्' प्रत्यय होताहै - युवा वत्सः वत्मतरः = जवान बड़ा ॥ उततरः । अश्वतरः । ऋषभतरः ॥ जय - अनन्त, श्रावसथ, इतिह और भेषज शब्दों से
(८२)
संस्कृतप्रबोघे-
।
स्वार्थ में 'अप' प्रत्यय होता है - अनन्तएव श्रानन्त्यम् ।
श्रावसथ्यम् । ऐतिहम् । भैषज्यम् ॥
यत्-चतुर्दान्त देवता,पाद और अर्घ शब्दों से
तादर्य में 'यत्' प्रत्यय होता है। अग्निदेवतायै इदम् =
अग्निदेवत्यम् । पितृदेवत्यम् । पद्भ्यामिदं पाद्यम् ।
अर्घायेदम् अर्यम् ।।
अय - धतुर्यन्त अतिथि शब्द से तादर्य में 'प्रय'
प्रत्यय होता है। प्रतिथये इदम् = आतिथ्यम् ।।
घेयस् - भागएव मागधेयम् । रूपधेयम् । नामधेयम् ॥
तल - देव शब्द से स्वार्थ में 'तल' प्रत्यय होता है -
देव एव देवता
कन - पुत्र शब्द से कृत्रिम और स्नात शब्द से
वेदसमाप्ति अभिधेय हो तो स्वार्थ में 'कन' होता है
पुत्र एव पुत्र कः = कृत्रिमः । स्नातकः = ब्रह्मचारी ॥
ठक - संदेश में वर्तमान वाक् शरद से स्वार्थ में 'ठक'
प्रत्यय होता है - वाचिक कथयति = संदेशको कहता है
प्रणा - निम्नलिखित शब्दों मे स्वार्थ में 'प्रया'
प्रत्यय होता है - प्रश्नएव प्रासः मन एव मानमः ।
औरः । मारुतः । शौचः । सात्वतः । दाशार्हः । वापसः ।
मासुरः । राक्षसः । पैशाचः । देवतः । धाग्यवः । औषधः ।
तिकन - मृद् शब्द से स्वार्य में 'तिकन' प्रत्यय
होताहै - मृदेव मृत्तिका । प्रशंमा में मृद् शब्द से मा
और स्मा प्रत्यय होते हैं-प्रशस्ता मद् = मृत्मा,मत्स्ना।
शस्
बहु और अल्प शब्द तथा इनके पर्याय बाधक
तद्धितप्रकरणम् मन कृष्ण । शब्दों से कारकों के प्रयोगमें एवं संख्या और एकवचन से वीप्सा ( द्विर्वचन ) में शस् प्रत्यय होता है - बहूनि, बहुभिः, बहुभ्यः; बहुषु वा ददाति - यशो ददाति । अल्पशः । भूरिशः । स्तोकशः ।। ढा द्वा ददाति द्विशः। त्रिशः । पञ्चशः ॥ करणंकणं ददाति = कणशः तस् - कर्मप्रचनीय प्रति के योग में जो पञ्चमी विधान की गई है। तदन्त से स्वार्थ में 'तस्' प्रत्यय हो ताहै प्रद्युम्नः कृष्णातः कष्णतः प्रति मधुम्न की ओर से प्रतिनिधि है। तिलान यच्छ भाषतः प्रति = उदों के बदले में तिलों को दे॥ माद्यादि शब्दों से अधिकरण कारक में तस् प्रत्यय होता है - अादितः = आदि में । मध्यतः = मध्य में अन्ततः = अन्त में । पृष्ठतः । पार्श्वतः ॥ फरणा कारक में भी कहीं पर 'तस्' प्रत्यय होताहै-स्वरेण स्वरतः । वलेन = वर्णतः ॥ दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्यो प्रयुक्तो न तमर्थमाह = दुष्ट शब्द जो स्वरसे और दमे भिध्या प्रयोग किया गया है। वह उस अर्थ को नहीं कहता, जिमके लिये प्रयुक्त हुवा है । वृत्तेन-वृत्ततः । वित्तेन वित्ततः । अशीखो वित्ततःक्षीरसो वृत्ततस्तु हतो. जो धन से होनई वह हीन नहीं पर जो चरित्रसे गया वह गया। हा और रूह धातुकी क्रिया को छोड़कर अपादान कारक में मी ( तम्) होता है - गृहतो गच्छति = घर से जाता है। ग्रामत आगच्छति = गांवसे पाताहै।
(८४)
संस्कृतप्रबोधे-
-
स्वर्गाद्वीयते - स्वर्गसे भष्ट होता है। पर्वतादवरोहति
पर्वत से उतरता है। यहां न होगा ।
जहां किसी पक्ष का आश्रय लिया गया हो वहां
षष्ठयन्त से भी ( तन ) प्रत्यय होता है - भीष्मद्रोण.
शल्याः कौरवतोऽभवन = भीष्म द्रोण शल्य कौरवों की
अोर हुदे । कृष्णाः पाण्डवतोऽभवत् = कृष्ण पाण्डवों
की ओर हुवा ॥
वि- अभूततभाव (न होकर होने के ) अर्थ में क,
भ और अस्लि धातुओं का योग होने पर (च्वि) प्रत्यय
होता है। मलिनं वस्त्रं शुक्कीकरोति रजकः-धोबी मलिन
वस्त्रको सफेद करता है। वर्षासु मलिनीभवति जलन =
वर्षा
কার
में जल मलिन होता है।
सात् - जिस दशा में (च्वि) प्रत्यय कहा गया है,
उनी
दशा में ( सात् ) प्रत्यय भी होता है यदि क्रिया
के फल में सम्पूर्णता वा अधीनता विवक्षित हो ।
सम्पूर्शता - अग्नितात् भवति लोहन = लोहा सम्पूर्ण
अग्निके समान होजाता है। जलसात् भवति लवणम् --
सारा लवण जलके समान हो जाता है। भस्मसात् भवती-
न्धनम् = इन्धन समस्त भस्म के समान होजाता है ॥
अधीनता - राजसात भवति प्रजाधनम् । प्रजा का धन
राजा का होता है । प्रात्मसात् कुरुते राजा विद्रोहिणां
सर्वस्वम् राजायागियों के सर्वस्व को अपना कर लेता है
डाच् - जहां भव्यक्त का अनुकरगाहो वहां कृ श्रादि
के योग में 'डा' प्रत्यय होता है - पटपटा करोति -
तद्वितप्रकरणाम (८५) . पटत् इस शब्द का अनुकरण करता है । इसके सिवाय अन्य अर्थों में भी 'डाच्' होता है-समयाकरोति = समय को यापन करता है । सुखाकरोति मित्रम् - मित्र को सुख देताहै । दुःखाकरोति शत्रुम् = शत्रुको दुःख देताहै। इति सामान्याख्यस्तद्वितः २-अथ भाववाचकस्तद्धितः अग्रभाववाचक तद्धित प्रत्ययों का निरूपण कियाजाताहै षष्ठयन्त शब्द से भावार्थ में भाववाचक प्रत्यय होते हैं। स्व-तल-अश्वस्य भावः-अश्वत्वम् अश्वता । वृक्ष- स्वम् , वृक्षता ॥ इत्यादि * भावाधिकार में त्व और तल प्रत्यय सबही शब्दों से होते हैं, इसलिये अब आगे इनको छोड़ कर और जो प्रत्यय होते हैं उनको दिखलाते हैं। स्त्रिया भावः स्त्रैसम् । पुंनो भावः=पौंस्नम् इमन -अशा---पृथोर्भावः प्रथिमा, पार्थवम् । मदिमा, मार्दवम् । पटिमा,पाटवम् । तनिमा, तानवम्। लघिमा, नाघवम् । गरिमा, गौरवम् । अणिमा, प्राणवम् इमन-व्यञ---शुक्लस्य भावः =शुक्लिमा, गौतयम् । कृष्णिमा, कार्यम् ॥ दृढस्य भावःद्रढिमा, दाढयम् कृशिमा,कार्यम्। लवणिमा,लावण्यम्। मधुरिमा,माधुर्यम् गुणवाचक तथा ब्राह्मणादि शब्दोंसे भाव और कर्म दोनों में 'प्यज' होता है । गुणवाचक-जस्य भावः कर्मवा आयम् । मौढयम् । धातुर्यम् । पारिष्ठत्यम्। * भाववाचक प्रत्ययों में तल और इमन् प्रत्ययोंको छोड़कर शेष सब नपुंसकलिङ्ग होते हैं । तलन्त स्त्रीलिङ्ग और इमनन्त पुल्लिङ्ग होते हैं। नजना ॥ ष्यत्र संस्कृतप्रबोधे- - सौख्यम् । सौजन्यम् ॥ ब्राह्मणादि----ब्राह्मणस्य भावः कर्मवा-ब्राह्मण्यम् । माणाव्यम् । ऐश्वर्यम् । कौशल्यम् । चापल्यम् । नैपुण्यम् । पैशुन्यम् । बालिश्यम् । श्राल- स्यम् । राज्यम् । प्राधिपत्यम् । दायाद्यम्। वैषम्यम् ॥ किन्हीं २ शब्दों से स्वार्थ में भी 'त्या' होता है। चत्वारो वर्णाश्चातुर्वर्यम् । चातुराश्रभ्यम् । त्रैवर्यम् । पाइ गुण्यम् । सैन्यम् । सामीप्यम्। श्रौपम्यम् । त्रैलोक्यम् यत्-स्तेनस्य भावः कर्मवा=म्तेयम् । प्रत्यय के योग से नकार का लोप होजाता है । य-सख्युर्भावः कर्मवा=सख्यम् । दूत्यम् ॥ ढक-कपेर्भावः कर्मवा-कापेयम् । ज्ञातेयम् ॥ यक--पत्यन्त और पुरोहित आदि शब्दों से भाव और कर्म में यक प्रत्यय होता है। पत्यन्त -सेनापतेभीक कर्मवा=सैनापत्यम् । गार्हपत्यम् । प्राजापत्यम् ।। पुरोहितादि-पुरोहितस्य भावः कर्मवा=पौरोहित्यम्। राज्यम् । बाल्यम् । मान्यम् । धार्मिक्यम् । प्राधिक्यम्। सारथ्यम् । प्रास्तिक्यम् । नास्तिक्यम् ॥ -प्राणभृउजातिवाचक, वयोवाचक और उद्गात्र आदि शब्दोंसे उक्त दोनों अर्थों में 'अन' प्रत्यय होता है । प्राणभृउजातिवाचक-मनुष्यस्य भावः कर्मवा=मानु- षम्। श्राश्वम् । श्रोष्ट्रम् । सैंहम् ।। वयोवाचक-कुमा- रस्य भावः कर्मवा=कौमारम। कैशोरम् ॥ उद्गात्रादि- उद्गातुर्भावः कर्मबा=ौद्गात्रम्। श्रौन्नेत्रम् । होत्रम् । पौत्रम् । सौष्ठवम । श्राध्वर्यवम् ॥ अण- हायनान्त और युव आदि शब्दों से तथा इकारान्त और उकारान्त शब्दों मे भी उक्त दोनों अर्थों গল -- तद्वितप्रकरणम् (८७) - . में श्रण होता है। हायनान्त --द्विहायनोर्भावः कर्मवा- द्वैहायनम । हायनम ॥ युवादि-यनो भावः कर्मधा= यौवनम् । स्थाविरम । पौरुषम् । कौतुकम् । सौहृद- यम् । सौहृदम् । दौईदयम् । दौह दम् । कौशलम् । चापलम्। कौतूहलम् । श्रोत्रियस्य भावः कर्मवा-श्रोत्रम्। प्रत्ययके योगसे यकारका लोप होजाताहै ॥ इकारान्त-- शुर्भायः कर्मवा = शौघम् । मुनेर्भावः कर्मघा-मौमम् । उकारान्त-पटोर्भावः कर्मधा=पाटवम्। लाघवम् । गौरवम् ॥ छ- ऋत्विग्विशेषवाचक शब्दों से उक्त दोनों अर्थो में 'छ' प्रत्यय होता है । होतुर्भावः कर्मवा-होत्रीयम् । पोत्रीयम् । प्राग्नीधम । परन्तु ऋत्विग्विशेष 'ब्रह्मन्' शब्दसे भाव और कर्म में 'त्व' प्रत्यय होता है। ब्रह्मयो भावः कर्मवा-ब्रह्मत्वम ॥ इति भावाख्यस्तद्धितः ३-अथाव्ययसंज्ञकस्तद्धितः प्रय अव्यय संज्ञक तद्वित प्रत्ययोंका (जिनके योग से प्रातिपदिक भी अव्यय होजाते हैं)निरूपण किया जाता है तमिल-सर्वनामों से पञ्चमी के अर्थ में तमिल प्रत्यय होता है । कस्मात-कुतः । * यस्मात=यतः । सर्वस्मात सर्वतः । उभाभ्याम उभयतः ॥ परि और अभि उपसर्गों से भी 'तमिल' होता है-परितः । अभितः ॥ त्रल-सप्तमी के अर्थ में सर्वनामों से 'बल' प्रत्यय होता है । कस्मिन कुत्र । * यस्मिन यत्र । तस्मिन सत्र अस्मिन् अत्र । सर्वस्मिन् सर्वत्र। अन्यस्मिन् अन्यत्र ॥ 'किम् शब्द को 'कु' और 'इद' शब्द को 'अप्रादेरा होताहै ८) संस्कृतप्रबोधे- ह- 'इदम' शब्द को सप्तमी के अर्थ में 'ह'प्रत्यय और 'इ' आदेश भी होता है-अस्मिम् = इह ॥ प्रत-ह 'किम शब्द को सप्तमी के अर्थ में अत् और ह प्रत्यय तथा क्व और कु आदेश भी होते हैं - कस्मिन्क्व, कुह ॥ दा - सर्व, एक, अन्य, किम , यद् और तद् सर्वनामों से कान की विवक्षा में 'दा' प्रत्यय होता है-सर्वस्मिन् काले सर्वदा,सदा-सबकालमें। एकस्मिन् काले-एकदा एककाल में । अन्यस्मिन् काले अन्यदा = अन्य काल में कस्मिन् काले = कदा = कब । यस्मिन् काले = यदा = जब । तस्मिन् काले = तदा = तब ॥ हिल-धुना-दानीम्-सप्तम्यन्त इदम्' शब्द से काल की विवक्षा में उक्त तीनों प्रत्यय होते हैं। इन तीनों के योगमें 'इदम्' शब्द को क्रमसे एत, अ.और इ आदेश होते हैं--अस्मिन् काले-एतर्हि, मधुना,इदानीम् अश्य ॥ दा-दानीम-सप्तम्यन्त 'तद्' शब्दसे कालकी विवक्षा में उक्त दोनों प्रत्यय होते हैं - तस्मिन् काले तदा, तदानीम् = तब ॥ वर्तमानकाल वा दिन अभिधेय हो तो ( समान) को स'और (इदम्) को अप्रादेश होकर इनसे 'द्य' प्रत्यय होता है । समानेऽहनि = सद्यः प्राजका दिन । अस्मि- नहनि = अद्य = अाज ॥ उत् प्रारि-पूर्व और पूर्वतर वत्सर अभिधेय हों तो इन दोनों को पर आदेश और यथाक्रम उत् और पारि प्रत्यय होते हैं। पूर्वस्मिन् वत्सरे - परुत् = पहिले वर्ष में । पूर्वतरस्मिन् वत्सरे-परारि = उससे पहिले वर्ष में । द्य
तद्वितप्रकरणम्।
(८)
समण - वर्तमान संवत्सर अभिधेय. हो तो 'इदम्'
को 'इ' श्रादेश और 'समण' प्रत्यय होता है। अस्मिन्
संवत्सरे = ऐषमः = इस वर्ष में है ,
एवम् - पूर्व, उत्तर, अधर, अपर, इतर, अन्य, अन्यतर
और उभय शब्दोंमे दिवस् अभिधेय हो तो 'एस् प्रत्यय
होता है । पूर्वमिनहनि - पूर्वेद्युः = पहिले दिन में ।
उत्तरेद्यः - पिछले दिन में । अधरेद्यः = नीचे के दिन
में । अपरेध : इतरेयु :, अन्येयुः = और दिन में। अन्य
तरेयु: और से और दिन में । उभयेयुः दोनों दिनमें।
एद्यवि - पर शब्द से दिवसाभिधान में होता है।
परस्मिनहनि = परेद्यवि = परले दिन में ॥
थाल - सर्वनाम शब्दोंमे प्रकारकी विवक्षा में 'थाल'
प्रत्यय होता है। तेनप्रकारेण तथा-तैसे । येनप्रकारेगा=
यथा जैसे । सर्वप्रकारेण = सर्वथा = सब प्रकार से। अन्य
प्रकारेण - अन्यथा = अन्यप्रकार से ॥
शम् - इदम् और किम् सर्वनामों को प्रकार को
विवक्षा में क्रमसे इत् और क आदेश होकर 'थम् प्रत्यय
होता है। अनेन प्रकारेण = इत्यम् = इस प्रकार । केन
प्रकारेण - कथम = किस प्रकार ।।
अस्-अस्तात्-पूर्व, अधर, और अवर इन दिक,
देश और कालवाचक शब्दों को सप्तमी, पञ्चमी और
प्रथमा विभक्ति के अर्थ में पुर,
पुर, मध् और अव प्रादेश
होकर भस् और अस्तात् प्रत्यय होते हैं ।
सप्तमी पूर्वस्यां दिशि वनति = पुरः पुरस्तात् वा
वसति = पूर्व दिशामें रहताहै। पञ्चमी - पूर्वस्माई शा-
दागतः = पुरः पुरस्ताद्वागतः = पूर्व देश से भाया।
(१०) संस्कृतप्रबोधे- aam- . प्रथमा - पूर्वो रमणीयः = पुरःपुरस्ताद्वा रमणीयः पूर्व काल रमणीय था । इमोप्रकार-अधः,अधस्तात् और अवः, अवस्तात् । को भी समझो ॥ प्रतस् - उक्त विशेषणविशिष्ट दक्षिण और उत्तर शब्दोंसे उक्त तीनों प्रों में प्रतस्' प्रत्यय होताहै। दक्षि- समयां,दक्षिणस्याः, दक्षिणावादिक-दक्षिणतः । उत्तरतः॥ प्रतस्-अम्तात् - उक्तार्थमें ही पर और प्रवर शब्दोंसे ये दोनों प्रत्ययहोते हैं। परतः परस्तात्। अवरतः,प्रवरम्तात रि-रिष्टात् - ऊर्ध्व शब्द को उक्तार्थ में 'उप' प्रादेश ओर उक्त दोनों प्रत्यय होते हैं। उपरि, उपरिष्टात् ॥ प्रात्--अपर शब्द को 'पश्च' आदेश और 'आत्' प्रत्यय होता है---पश्चात् ॥ प्रात्-एनप - उत्तर, अधर और दक्षिण शब्दों में उत्तार्थ में प्रात् और एनप् प्रत्यय होते हैं । उत्तरात्, उत्तरेण । अधरात्-अधरेण । दक्षिणात्.दक्षिणेन ॥ धा-संख्यावाचक शब्दों से प्रकार अर्थ में 'धा' प्रत्यय होताहै। पञ्चधा । बहुधा ॥ इत्यादि धा-ध्यमुन - एक शब्दसे प्रकार अर्थ में दोनों प्रत्यय होते हैं-एकधा,ऐकध्यम् ॥ धा-धमुञ्-एधाच्-द्वि और त्रिशब्दोंसे प्रकार अर्थमें तीनों प्रत्यय होते हैं। द्विधा, द्वैधन द्वेधा । त्रिधा,त्रैधम, त्रेधा ॥ इत्यव्ययाख्यम्तद्वितः समाप्ताच तद्धितप्रकरणम् सम्पूर्याश्चायं चतुर्योभागः
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