Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shree Shidchkra Vidhan

Pandit Shantlal G · 2011/08

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Ratanfrastram. Antimoreता
isirfalve arringtantra
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wrenTri.।
HEREHRESHREEREFERESEX
र मून सदरमा नियाने
wa are for ERRON हालिया या इससे अनेक पुरेशी बाई
INT EK RARIहिम सुधार।
फागुन
धीठात जेन काम्पनीर्ष
मंडी-माने जैन सिति प्रशिको संस्कार

श्री सिदचक विधानका महत्व और उसकी विधि रम्प जीरनको नायक बनाने के लिये पूर्व सांसारिक विभूतियाँको प्राप्त करने के लिये भगान जिनेन्द्रका वजनादि विधान करना अन्यतम मापन है। यह निषित किये जनादि विधान मविधि किये जांच तो गृहस्यको मनवांछित आपकी पिदि करते हैं इसमें घोड़ा नी मंदेह नहीं है। प्रत्येक विधान की विधि भिन्न भिन्नई किन्तु सरका उदय गुन गान्तिका मिलना है इसलिये मुखशान्तिके प्रानी मनोन इन विधानों के करने लगाना चाहिये। जो गृहस्य सम्मन्न होकर इन जा आदि विवानी मानी मक्ति एवं द्रव्यादि सन नहीं करते गो उनका दर पाना मायंक नहीं कहा जालना। जैन शाखांमें मिद्धनक विधान ऋषि मंडल विधान ममोगा विधान आदिका रुल मुक्किार मिलना बतलाया है गो गांगारिक विनियको प्राति दोना. गंगादिकी शान्ति होना. भयंकर विसभर आदिगे या ना प्रामि दाना और मागगदिमें धनप्रापिका होना आदि कुछ मी माग नहीं पता है. करनी ममेर विमान विधानाको प्राप्त होही जाता है। .

।
८
ममंशिजीक पार गौरत (पास) जाना चाहिये। प्रतिदिन
हूँ और मंगाएक पाना चाहिये। एवं ममराना अभियंक होगा
पाहिय।
विधानको यह मंधित विधि लिग दी गई है। इस रिषिक निसनेमें कोई त्रुटि
रह गई हो तो सिरोपा ठीक कर लें और देश कालके अनुसार पिचिपक इस
सिरपा विधानको उन्नत मारोंसे करें जिससे उनको अक्षय पुण्पका संचय हो।
355555555REY
• चिरहोली.
पो. आपलखेग
(आगरा)
निर्दक
श्रीनिवास जैन शास्त्री
3555555555

ॐ नमः गिदभ्यः
कविवर पं० सन्तलालजी कृत
श्रीसिद्धचक्रविधान।
1555555555555555555555
मङ्गलाचरण।
जिनाधीश शिवईश नमि, सहसगुणित विस्तार ।
सिद्धचक्र पूजा रचा, शुद्ध नियोग संभार ॥ १ ॥

HERE इस प्रकरण पर अनाहनपराक्रमाय मिदाधिपतये अपिदिति अपं नि० स्याहा प्रथम पूजा ही अहंक मगपडअनाहनपराक्रमाय मिद्धाधिपतये अमिदिशि अप नि० स्वाहा वर्ण वर्ग प्रसिद्ध, यमुविधि अर्घ उतारिके । मिलि है वसुविधि रिद्धि, दक्षिण दिश पूजा करों ॥९॥ ॐ ही अहं च छ ज झ ञ अनाहनपराक्रमाय मिदाधिपतये दक्षिणादिशि अप० । वर्ण टवर्ग प्रशस्त, जलफलादि शुभ अर्थ ले। पाऊँ सब विधि स्वस्ति, नैऋत्य दिशि अर्चा करों ॥१०॥ ॐ ही अहंट उदण अनाहनपराक्रमाय सिद्धाधिपतये नैमात्यदिशि अप० । वर्ण तवर्ग मनोग, यथायोग्य कर अर्घ धरि । मिलि है सब शुभ योग, पूजन करि पश्चिम दिशा ॥११॥ ही अहं त थ द ध न अनाहतपराक्रमाय गिद्धाधिपतये पश्चिमदिशि अप० । वर्ण पवर्ग सुभाग, कर आरती अर्घ ले। सब विधि आरति त्याग, वायव दिशि पूजा करों ॥१२॥ ॐ ही अहं प फ भ म अनाहनपराक्रमाय मिद्धाधिपतये वायव्यदिशि अप० । ४ गिनक वर्ण गवर्गी सार, दर्व अर्घ वसु वय करि । भाव अर्घ उर धार, उत्तर दिशि पूजा करी ॥१३॥ गरल नानारामा गिदाधिपतये उारदिगिमा शेष वर्ण चउ अन्त, उत्तम अर्घ बनाइके। नशे कर्म वसु भन, पूजा हो ईशान दिशि ॥११॥ औही अशागद अनाहनपराक्रमाग गिद्धाभिषनगे ईशान दिशि अप० । 5995. firynt 195555555555555555555 उरच अधो सुरेफ सु बिशु, हकार विराजे, अकारादि स्वर लिस कर्णिका अन्त सु छाजे । वर्गन पूरित वसुदल अभ्युज तत्व संधि घर, अग्रभागमें मंत्र अनाहत सहित सोहत अतिवर ॥ फुनि अति ही वेन्यो परम, स्वर ध्यावतअरि नागका। केहरि सम पूजन निमित, सिदचक मंगल करां ॥१५॥ ही णमो सिवाणं श्रीसिद्धपरमेष्टिभ्यो नमः शनावतरानतर गंवौषट् आहाननं । HERERRRRREE मिद्धचक्र प्रथम पूजा विधान ६ अब तिष्ठतिष्ठ ठाठ स्थापनं । अब मम गनिहितो भव भव पाट, गमिधिकरणं परिपुष्पांजलिं क्षिपन् । दोहा सूक्ष्मादिक गुणसहित हैं, कमरहित निःशोग। सकल सिद्ध पूजों सदा, मिटे उपनग योग । इनि गंवस्थापनार्थ पुष्पांजलि धिपन् । अथाष्टकं । चाल नन्दीधर दीपपूजाकी। शीतल शुभ मुरभि मुनीर, कंचन कुम्भ भरा। पाऊ भवसागर तीर, आनन्द भंद धरा॥ अन्तरिगति अष्ट स्वरूप, गुणमई राजन हैं। नम सिद्धचक शिव-भूप, अचल विराजत हैं ॥१॥ AN - 15555555 ॐ हीं नमी मिदागं श्रीनिद्रपरमेष्टिभ्यो नमः श्रीनमा दंगारित मिद्धचक्र मुहमनहेब अवग्गहणं अगुमलघुमन्यापाई अष्टगुणगंयुक्ताप जलं नियामीति माह चन्दन तुम चंदन हेत उत्तम मान्य गिना । विधान नातर सब काष्ट समेत, ईधन ही अपना ॥ अन्तरिगति अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं। नमूं सिद्धचक शिव-भूप, अचल विराजत हैं ॥२॥ ॐ हीं णमो मिद्वाणं श्रीमिदपरमेष्ठिम्यो नमः योगमनागमनीरज मुहमन हेव अबग्गहणं गुरु लनु अचाबाई अटगुणगंगुनार नन्दनम् ॥ २॥ दीरघ शशि किरण समान, अक्षत ल्यायत हूं। शशिमंडल सन बहुमान, पूज रचावत हूँ ॥ अन्तरिगति अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं। नम सिद्धचक शिव-भूप, अचल विराजत हैं ॥३॥ ॐ हीं णमो निशाणं श्रीमिदपरमेषिम्यो नमः श्रीगमनमाणदंगमगीरज सुहमतहेव अबग्गहणं अगुल्लएमव्यापाई अटगुणयुकार मनगं निसामीनिमाहा॥३॥ ।

प्रथम पूजा तुम चरणचंद्रके पास, पुप्प धरे सहि । मानू नक्षत्रनकी रास, सोहत मन मोह। अन्तरिगति अट स्वरूप, गुणमई राजत हैं। नभू सिद्धचक शिव भूप, अचल विराजत हैं ॥ ४ ॥ ॐ ही पमोमिद्धाण, पुष्पं ॥ ४ ।। उत्तम नेवज बहु भांति, सरस सुधा साने । अहिमिन्द्रन मन ललचाय, भक्षण उमगाने ॥ अन्तरिगति अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं। नमृसिद्धचक शिव भूप, अचल विराजत हैं॥५॥ ओ ही नवेयं ॥५॥ फैली दीपनकी जोति, अति परकाश करे। जिम स्यादवाद उद्योत संशय तिमिर हरे॥ अंतरिगति अष्ट सरूप, गुणमई राजत हैं.। नमू सिद्धचक शिव-भूष, अचल विराजत है॥६॥ ८ सिद्धचक पूजा . ओं ही णमो सिद्धाणं श्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः श्रीसम्मत्तणाणदंसणवीर्यसुह- मत्तहेव अबग्गहणं अगुरुलघुमव्वावाहं अष्टगुणसंयुक्ताय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ धरि अग्नि धूपके ढेर, गंध उडावत हूं । कमोंका धूप वखेर, ठोंक जरावत हूं ॥ अन्तरिगति अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं। नमूं सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं॥७॥ ओं ह्रीं धूपं ॥ ७ ॥ जिन धर्म वृक्षकी डाल, शिवफल सोहत हैं। इस शुभ फल कंचन थाल, भविजन मोहत अन्तरिगति अष्ट स्वरूप, गुणमई राजत हैं नमूं सिद्धचक्र शिव-भूप, अचल विराजत हैं॥८॥ ओ ही० फलं ॥ ८॥ करि दर्व अर्घ वसु जात, यातें ध्यावत हूं। अष्टांग सुगुण विख्यात, तुम ढिंग पावत हूं ॥ F999999 अथ द्वितीय पूजा। छप्पय छन्द मिद्धना विधान द्वितीय पूजा ऊरध अधो सरेफ विंदु हंकार विराजे, अकारादि स्वलित कर्णिका अन्तसु छाजे । वर्गनिपूरित वसुदल अम्बुज तत्व संधिधर, अग्रभागमें मंत्र अनाहत सोहत अतिर । फुनि अन्त ही वेढ्यो परम सुर, ध्यावत ही अरिनागको । है केहरिसम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो॥१॥ आं ही णमोमिद्धाणं श्रीगिद्धपरमेष्टिभ्यो नमः पोडशगुणसँयुक्तमिद्ध परमेष्टिन अतरायतरायनर मंत्रीपद आह्वाननं । अत्र निष्ठ निष्ट ठः ठः स्थापनं । अब मम मन्निदिनो भव भव पद मनिधीकरणं । सूक्ष्मादि गुण सहित है, कर्म रहित निररोग। सिद्धचक्र सो थापहूं, मिटै उपद्रव जोग ॥ २॥ दोहा।

: 9. सिद्धचक्र 95555 द्वितीय विधान अथाष्टका गीता छन्द। हिमशैल धवल महान कठिन पाषाण तुम जस रासते, शरमाय अरु सकुचाय द्रव ह वही गंगा तासते । सम्बन्ध योग चितार चित भेटार्थ झारीमें भरूं, पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करूं। ओं ही णमोसिद्धाणं श्रीसिद्धपरमेष्ठिभ्यो नमः श्रीसमनणाणदंगणवायमुह- मत्तहेव अवग्गहणं अगुल्ला अयावाई पोडशगुणगंयुक्ताप जलं निपामीति स्वाहा। 3955 काश्मीर चंदन आदि अन्तर बाह्य बहुविधि तप हरे, यह कार्य कारण लखि नमित मम भाव ह उद्यम करे। मै हुं दुखी भवतापसे घसि मलय चरनन ढिंग धरूं, पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करूं। १७ २ मिनक द्वितीय पूजा शहीणमोमिडाणं धीगिपरमेषिभ्यां नमः धीममनमाण दगणीग मुहमनहेय अपग्रहले अगुस्लपुमन्बाराह मालहगुणगंयुनाय चन्दनं। सौरभ नमक जिस सहन सकि अम्बुज बसे सरतालमें, शशि गगन वसि नित होत कृश अहिनिश भ्रमे इस ख्यालमें। सो अक्षतोष अखण्ड अनुपम पुंज परि सन्मुख घरूं, पोडश गुणान्धित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करूं ।। अक्षतं ।। जग प्रगट काम सुभट विकट कर हट करत जिय घट जगा, तुम शील कटक सुघट निकट सरचाप पटक सुभट भगा। इम पुष्पराशि सुवाप तुम ढिंग कर सुयश बहु उनलं, पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करूं ।पुष्पं ॥४॥ जीवन सतावत नहिं अघावत क्षुधा डाहनसी बनी। सो तुम हनी तुम ढिंग न आवत जान यह विधि हम ठनी ।। ;2 मद्धनक नैवेद्य के संकेत करि निज बुधानाशन निधि वर. पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र नितार उस पूजा करूंगनेवे ॥ ५॥ में मोह अन्ध अशक्त अम पद विषम भवन है मदा. ऐमे रुलेको ज्ञानदुनि चिन पार निवरन हो कहा। सो ज्ञान व उघार स्वामी दीप ले पाइन गरू. पोडश गुणान्वित मिचक्र वितार 3 पूजा यादी॥३॥ पामुक सुगंधित द्रव्य सुन्दर दिन बाग सुटानी परि भगि दश दिश वाम परिन ललिन म महानो। तुम भक्तिभाव उमंग का प्रसंग पा मुशिन. उश गुणाधिन मिदन चिनारा || वित हरन अविन सुरंग समिनिमोहने. मनालमान काम, गर न मोहने। iiii5555555151

द्वितीय
मदनक
पूजा
विधान
भरि थाल कंचन भेट धरि संसार फल तृष्णा हरूं,
पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र वितार उर पूजा करूं फलं। ८।
शुभ नीर वर काश्मीर चंदन धवल अक्षत युत अनी.
वर पुष्पमाल विशाल चरु सुरमाल दीपक दुति मनी।
वर धूप पक मधुर सुफल लै अर्घ अठ विधि संचरूं,
पोडश गुणान्वित सिद्धचक्र चितार उर पूजा करूं ॥ अघी।
गीता छन्द।
निर्मल सलिल शुभवास चन्दन धवल अक्षत युत अनी,
शुभ पुष्प मधुकर नित रमै चरु प्रचुर स्वाद सुविधि धनी।
करि. दीपमाल उजाल धूपाइन रसायन फल भले,
करि अर्थ सिद्ध समूह पूजत कर्मदल सब दलमले ॥
ते कर्मवर्त नशाय युगपत ज्ञान निर्मलरूप है,

-- द्वितीय पूजा मिद्धचक्र विधान दुख जन्म टाल अपार गुण सूक्षम सरूप अनूप है। काष्ट विन त्रैलोक्य पूज्य अछेद शिव कमलापती, मुनिध्येय सेय अमेय चहुं, गुण ज्ञेय द्यो हम शुभमती ॥ ओं ही अहं सिद्धचक्राधिपतये नमः संमत्तणाणादि अट्ठगुणाणं महाघ । अथ सोलह गुण सहित अघं। बोटक छन्द। दर्शन आवर्णी परकत हनी, अथिता अवलोक सुभाववनी । इक साथ समान लखो सव ही, नमुं सिद्ध अनंत द्रगन अवही ॥१॥ ओं ही अनन्तदर्शनाय नमः अर्थ । विधि ज्ञानावर्ण विनाश कियो, निज ज्ञान स्वभाव विकाश लियो। समयांतर सर्व विशेष जनों, नमूं ज्ञान अनंत सु सिद्ध तनों ॥२॥ ओ ही अनन्तज्ञानाय नमः अर्घ । सुख अमृत पीवत स्वेद न हो, निज भाव विराजत खेद न हो। २१ 1॥

: मिद्धनक द्वितीय पूजा विधान २२ असमान महावल धारत हैं, हम पूजत पाप विहारत हैं ॥३॥ ओ ही अतुलवीर्याय नमः अर्थ । विपरीत सभीत पराश्रितता, अतिरिक्त धरै न करें थिरता! परकी अभिलाप न सेवत हैं, निज भाविक आनन्द वेवत हैं ॥४॥ ओ ही अनन्तमुपाय नमः अर्घ । निज आत्म विकाशक बोध लह्यो, भ्रमको परवेश न लेश यलो। निजरूप सुधारस मग्न भये, हम सिद्धन शुद्ध प्रतीति नये ॥ ५॥ ओं ही अनन्तसम्यक्त्वाय नमः अर्थ । निज भाव विढार दिभाव न हो, गमनादिक भेद विकार न हो। निजथान निरूपम नित्य वसे, नमूं सिद्ध अनाचल रूप लसे ॥६॥ ओ ही अचलाय नमः अर्थ । गुणपर्यय परणतिके भेद, अति सूक्षम असमान अक्षेद । '.- चौपाई। .

मिद्धचक्र दिनीय एका विधान ज्ञान गहै, न कहै जड चेन, नमों सिद्ध सूक्षम गुण ऐन ॥ ७ ॥ ओं ह्रीं अनन्तममाय नमः अर्य । जन्म मरण युत घरे न काय, रोगादिक संकेश न पाय। नित्य निरंजन निर अविकार, अव्यावाध नमों सुखकार ॥८॥ ओं ही अव्यावाधाय नमः अर्थ। एक पुरुष अवगाह प्रजंत, राजन सिद्ध समूह अनन्त । एकमेक बाधा नहिं लहैं, भिन्न भिन्न निजगुणमें रहें ॥९॥ ओं ही अवगाहनगुणाय नमः अर्घ । काययोग पर्यापति प्रान, अनवधि छिन्न छिन्न ही मान । जरा कष्ट जग प्रानी लहै , नमों सिद्ध यह दोष न सहे ॥१०॥ ओ ही अजराय नमः अर्घ । काल अकाल प्राणको नाश, पावै जीव मरनको वाम। : तासौ रहित अमर अधिकार, सिद्ध समूह नमूं सुखकार ।११॥ ទាំង मिदनक द्वितीय पूजा द्वितीय विधान २४ ओ ही अमराप नमः अर्थ। गुण गुण प्रति है भेद अनन्त, यो अथाह गुणयुत भगवन्त । है परमाण अगोचर तेह, अप्रमेय गुण वंदूं पह ॥ १२॥ ओं ही अप्रमेयाय नमः अर्घ। भुजंगप्रयात छन्द । अनूकर्मते फर्स वर्णादि जानो, किसी एक वीशेषको किं प्रमानो। पराधीन आवर्ण अज्ञान त्यागी, नमूं सिद्ध अत्येन्द्रिय ज्ञान भागी ॥१३॥ औ ही अतीन्द्रियोत्मयाय नमः अर्थ । त्रिधा भेद भावित महाकष्टकारे, रमण भावों आकुलित जीव सारे । निजानन्द रमणीय शिवनार स्वामी, द्वितीय पूजा मिद्धचक - विधान २५ नमो पुरुप आकृत सवै सिद्धनामी ॥ १४ ॥ ओ ही अवेदाय नमः। विशेष सकल चेतना धार माही, भये ले भली विधि रही भेद नाहीं। तथा हीन अधिकार्यको भाव टारी, नमो सिद्ध पूरण कला ज्ञानधारी ॥१५॥ ओ ही अभेदाय नमः अर्थ। निजानन्दरस स्वादमै लीन अंता, मगन हो रहै रागवर्जित निरंता । कहांलों कहूं आपको पार नाही, घरो आपको आप ही आपमाही ॥१६॥ ओं ह्रीं निजाधीनजिनाय नमः अर्घ । यहां १०८ बार जाप देना चाहिये। ithinnni २५ मिद्धचक्र अथ जयमाला। दोहा-पंच परम परमात्मा, रहित कर्मके फंद । जगत प्रपंच रहित सदा, नमों सिद्ध सुखकंद ।। द्वितीय पूजा विधान २६ तोटक छन्द । दुखकारन देप विडारन हो, वश डारन राग निवारन हो । भवितारन पूरणकारण हो, सब सिद्ध नमों सुख कारण हो । समयामृतपूरित देव सही, परआकृत मूरति लेश नहीं। विपरीत विभाष निवारन हो, सब सिद्ध नमो सुखकारन हो ॥२॥ अखिना अभिना अछिनासुपरा, अभिदा अखिदा अविनाशवरा। यमजाम जरा दुखजारन हो, सब सिद्ध नर्मों सुखकारन हो ॥३॥ निर आश्रित स्वाश्रित वासित हो, परकाश्रित खेद विनाशित हो। विधि धारन हारन पारन हो, सब सिंद्ध नंगी सुखकारन हो।॥४॥ on AUSERIES दिलीप विधान अमुधा अबुधा अद्विधा अविघं. अकुधा सुसुधा सुयुधा सुसिधं । विधि आरन जारन हारन हो, सत्र सिद्ध नमो सुखकारन हो। शरनं चरनं वरनं करनं, घरनं वरनं मरने दरनं । तरनं भव वारिपि तारन हो, सब मिद्ध नमो सुखकारन हो।६। भववास परास विनाशन हो, दुखराम विनाश हुताशन हो। निज दासन त्रासनिवारन हो, सब सिद्ध नमों सुखकारन हो।७। तुम ध्यावत शाश्वत व्याधि दहै, तुम पूजत ही पद पूजि लहै । शरणागत संत उभारन हो, सत्र सिद्ध नमो सुखकारन हो।८। दोहा-सिद्धवर्ग गुण अगम है, शेष न पावं पार । हम किंह विधि वरणन करें, भक्ति भाव उर घार ॥ ९॥ आं ह्रीं अनन्तदर्शनमानादिपोडगगुणयुक्तमिदं यो महाप। इति द्वितीय पूना मणम् । 15ERF 1555555555 २७ . अथ तृतीय पूजा बत्तीस गुणमहित । सिद्धचक्र छप्पय छन्द। तृतीय पूजा विधान अरघ अधो सुरेफ सु बिंदु हकारं विराजे अकारादि स्वर लिप्तकर्णिका अंत सु छाजे । वर्गन पूरित वसुदल अम्बुजतत्व संधिवर, अग्रभागमें मंत्र अनाहत सोहत अतिवर ।। फुनि अति ही वेढ्यो परम, स्वर ध्यावत अरि नागको । केहरि सम पूजन निमित्त, सिद्धचक्र मंगल करो॥१॥ श्री ही णमो मिद्धाणं श्री सिद्धपरमेष्ठिन वसीमगुणमहित विराजमान अप्रा. वनगरतर गयौपट आह्वाननं, अत्र निष्ठनिष्ठ स्थापनं । अब मम मन्निहितो भव मय वपट मन्निधीकरणं । दोहा। सूक्ष्मादि गुण सहित है, कर्म रहित निररोग। २८

गिद्धचक्र
तृतीय
पूजा
विधान
जापागा555555559
सकल सिद्ध सो थापहूं, मिटै उपद्रव योग ।
इति यंत्रस्थापन।
अथाष्टकं
'प्रभु पूजो रे भाई इस चालमै ।
तुम पूजोरे भाई, सिधवक बत्तीसगुण, तुम पूजोरे भाई
भवत्रासित आकुलित रहै, भवि कठिन मिटन दुखताई ॥
विमल चरण तुम सलिल धार दे, पायो सहज उपाई।
तुम पूजोरे भाई ॥ सिद्धचक्र बत्तीसगुण, प्रभु तुम०॥
ओ ही णमोसिद्धाणं श्री सिद्धपरमेष्ठिने श्री समत्तणाणदंसणवीर्य सुहमत्तहेय
अवग्गहणे अगुरुलघुमन्यावाहं बचीसगुणसंयुक्ताय जन्मजरारोगविनाशनाय जलं।१।
जगवंदन परसत पदचन्दन, महाभाग उपजाई ।
हरिहर आदि लोकवर उत्तम, कर घर शीश चढाई ॥
तुम पूजोरे भाई ॥ सिद्धचक्र बत्तीस गुण, तुम० ।
२३
55555

स पूजा विधान २ 555555555555 तुम पूजोरे भाई ॥ मिनिक बनीम गुण, तुम० ॥ नाही नमामिद्धा थी मिागरमेष्ठिने थी ममनपानदमणीयमुहमनहर तृतीय अपहले अगुस्लपमधाराई बन्लीमगुणसंयुताय अटकमदहनाय च ।। ७ ।। सोत्तम फल द्रव्य टान मन, पजू हूं तुम पाई। जासोंज में मुक्तिपद पइये मात्तम फलदई ।। तुम पूजोरे भाई । मिद्धचक वत्तीम गुण, तुम० ॥ भो ही नमो मिझापं थी मिदपरमेष्ठिने श्री मम्मत्तणाणदंगण वीर्यमुहमतहेच आगाम अगुरुलपुमनाराई पस्तीसगुणमंयुक्ताप मोक्षफलप्राप्तये फलं ॥ ८॥ वसुविधि अर्घ देऊ तुम मम द्यौ, वसुविधि गुण सुखदाई। जासु पाय वसु त्रास न पाऊं, सन्त कहे इर्पाई॥ तुम पूजोर भाई ॥ सिद्धचक्र बचीस गुण, तुमः ॥ ओ ही नमोमिदा श्रीमिद्धपरमेष्टिने श्रीममनणागदसण वीर्य मुहमनदेव पग्गा अगुस्लमबागाई यत्तीसगुणसंयुक्ताय ममुराप्राप्तये अयं ॥६॥ ३२

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" FREE ततोग पूजा f717 (नामावलि प्रत्येक अर्थ) अय बत्तीस गुण सहित अर्घ । पदडी उन्द । चेनन विभाव पुद्गल विकार, है शुद्ध बुद्ध तिसनि.मत टार । द्रगबोध सुरूप सुभाव एइ, नमू साय चेतना सिद्ध देह ॥ १ ॥ ओ ही शुद्धचेतनाय नमः अपं ॥१॥ मति आदि भेद विविछेद कीन, छायक विशुद्ध निज माव लीन । निरपेक्ष निरन्तर निर्विकार, नमूं शुद्ध ज्ञानमय सिद्ध साम्॥२॥ ओ ही शुदनानाय नमः अयं । सर्वांग चेतना व्याप्तम्प, तुम हो चेतन व्यापक सरुप । परलेश न निज परदेश माहि, नमूं शुद्ध सिद्ध चिद्रूप ताहि ॥३ ओ ही गुचिठ्ठपाय नमः अर्थ । अन्तर विधि उदय विपाकटार, तुम जातिभेद वाहिज विडार । निज परिणनिमें नहीं लेश शेष, नमूं शुद्धरुप गुणगण विशेष ॥४॥ श्री ही शादमरूपाय नमः प्रथ।

गगादि मिदचक्र विधान तुतीय पूजा ... का विध्वंश, आकुलित भाव राखो न अंश पायो निज शुद्ध सरूप भाव, न सिद्धवर्ग धर हिये चाय ॥ ५ ॥ ओ ही परम शुद्धसरूपभाषाय नमः अर्थ दोहा-निहं कालमें ना डिगे, रहैं निजानन्द थान । नमं शुद्ध दृढ़ गुण सहित, सिद्धराज भगवान ॥ ६ ॥ ओं ही शुद्धढ़ाय नमः अर्थ । निज आवर्तकम वसे, नित ज्यों जलधि कलोल । नम शुद्ध आवर्तको, करि निज हिये अडोल ॥७॥ 3. ही शुद्धआवर्तकाय नमः अर्थ । परकृत कर उपज्यो नहीं, ज्ञानादिक निज भाव । नमो सिद्ध निज अमलपद, पायो सहज सुभाव ॥८॥ ही शुद्धस्वयंभवे नमः अर्घ पद्धड़ी छन्द। म्वमिद्ध अनन्त चतुष्ट पाय, स्वैशुद्ध चेतना पुंजकाय । mr मिदना तृतीय पूजा विधान अप मा..555555555555 पड़ी छन्द । परद्रव्य जनित भोगोपभोग, ते खेदरूप प्रत्यक्ष योग । निजरस स्वेदन हैभोगसार, सो भोगो तुम हम नमस्कार ॥१८॥ ॐ हीं शुद्धभोगाय नमः दोहा-निर्ममत्य युगपद लखो, तुम सब लोकालोक शुद्ध ज्ञान तुमको लखो, नमो शुन्द्र अवलोक ॥ १९ ॥ 0 दी शुदावलोकाय नमः अप । पदडी छन्द । निग्इच्छुक मन वेदी महान, प्रज्वलित अग्नि है शुरुध्यान । निभेद अर्घ दे मुनि महान, तुम ही पूजत अहंत जान ॥ २०॥ श्री ही अहं प्रज्वलिनशुलध्यानाग्निजिनाय नमः अर्थ । दोहा-आदि अन्त वर्जित महा, शुद्ध द्रव्यकी जात । स्वयं सिन्द्र परमात्मा, प्रग सिद्ध निपात ॥ २१ ॥ ओ ही शुद्धनिपानाय नमः । ३० मिदचक्रः विधान 5993 लोकालोक अनन्त, भाग वसो तुम आन । ये तुमसों अति भिन्न है, शुद्ध गर्भ यह जान ॥ २२ ।। ओं ह्रीं शुद्धगर्भाय नमः अर्ध । लोकशिखर शुभ थान है, तथा निजातम वास । शुद्ध वास परमात्मा, नमा सुगुणकी रास ॥ २३ ॥ ओं ही शुद्धवामाय नमः अप । अति विशुद्ध निज धर्म, वसत नशत सब खेद । परम वास नमि सिद्धको, वासी वास अभेद ॥ २४ ॥ ओं ही विशुद्धपरमवागाय नमः अप । वहिरंतर है विधि रहित, परमातम पद पाय । निरविकार परमातमा, नमू नमसुखदाय ।। २५ ॥ आं ही शुद्धपरमात्मने नमः अर्थ हीन अधिक इक देशको, विकल विभाव उछेद । शुद्ध अनन्त दशा लई, नमूं सिन्द्र निरभेद ।। २६ ।।

मिद्दचक्र तृतीय पूजा विधान ४० आं ही शुद्ध अनन्ताय नमः अघ । प्रोटक छन्द । तुम राग विरोध विनाश कियो, निज ज्ञानसुधारसस्वाद लियो । तुम पूरणशांति विशुद्ध धरो, हमको इक देश विशुद्ध करो ॥२७॥ ओं ह्रीं शुद्धशांताय नमः अर्थ । विद पंडित नाम कहावत है, विद अन्त जु अन्तहि पावत है निज ज्ञान प्रकाशसुअन्तलहो,कुछ अंशनजाननमाहि रहो ।२८॥ ओ ही शुद्धविदंताय नमः अपं। वरणादिक भेद विडारन हो, परिणाम कपाय निवारन हो। मनइन्द्रिय ज्ञान न पावतही,अति शुद्ध निरूपम ज्योति मही ।२९। ओ ही शुद्वज्योतिजिनाय नमः अप जन्मादिक व्याधि न फेरि धरो, मरणादिक आपद नाहि घरो। निर्वाण महान विशुद्ध अहो, जिन शासनमें परसिद्ध कहो । ३०॥ ओ हो शुद्धनिर्वाणाय नमः अप।

- तृतीय द्वचक्र 'विधान "ऊऊऊऊमा करि अन्त न गर्भ लियो फिरके, जनमे शिववास जनम धरके। जिनको फिर गर्भ नहो कवहूं, शिवराज कहाय नमूं अबह ३११ ओं ही शुद्धसंदभगर्भाय नमः अप । जगजीवन काम नशायक हो, तुम आप,महा सुखनाइक हो । तुम मंगल मूरति शांति सही, सवःपाप नशे तुम पूजतही ।३२॥ ओं ही शुद्धशांताय नमः अर्थ दोहा-पंचपरमपदईश है, पंचमगति जगदीशः। जगत प्रपंच रहित वसे न सिद्ध जग ईश ॥ ३३ ॥ ओही सिद्धचक्राधिपतये नमः महापं निर्वामि स्वाहा । यहां १०८ बार जाप देना चाहिये। अथ जयमाला। दोहा-परम ब्रह्म परमातमा, परम ज्योति शिवथान । परमातम पद पाइयो, ना सिद्ध भगवान ॥१॥ 乐乐安乐 ४१ " प तृतीय पूजा . हिन्द-शामिनी मोहन मात्रा २० । जय मरण कटको टार अमरा भये, जय जन्म व्याधि परिहार अजरा भय । जय द्विविध कर्ममल जार अमला भये, जय दुविधि टार संसार अचला भये ॥ १ ॥ जय जगत वास तज जगत स्वामी भये, जय विनाशनाम थिर परम नामी भये,। जय कुबुधि रूप तजि विविधि रूपा भये, जय निषध दोष तज सुगुण भृपा भये ॥२॥ कर्मरिपु नाशकर परम जय पाइए, लोकत्रयपरि तुम सुजस घन छाइये। इन्द्र नागेन्द्र पर सीस तुम पद जजें, महा वैराग रस पाग मुनिगण भजे ॥ ३ ॥ विघन वन दहन दो अघन घन पौन हो, IPIPPIPI. -

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गिमा चतुर्थ रिधान --.-.-.-.- तुम पद अम्बुज यास लेन मनु, चन्दन मन माई, निजसों गुणाधिस्य संगतिको, लहिय न हाई सिद्ध०॥ चौसठ गुणनामा विधिमाला, मुमरो सुखदाई सिद्धा ओ ही सिद्धपरमेष्टिने चौमठ गुणसहित श्री ममनणाणदंगण वीर्य गुहमत्तहब अमरगहणं अगुलामधारा मंमारतापग्निाशनाय चंदनं ।।२।। क्षीरज धान सुगसित नीरज, करसों छरलाई। अंगुलसे तंदुलसों पूजत, अक्षय पद पाई । सि० ॥ चौसठ गुण नामाविधिमाला सुमरों सुखदाई ॥ सि० ॥ ओ हो धीमिद्धपरमेष्टिने चौमठ गुणमहित श्रीसमनणाणदंसण वीर्य मुहमत्तहेव अग्गहणं अगुलामधाराहं अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं ॥३॥ धूलि सार छवि हरण विवर्जित, फूलमाल लाई । काम शूल निरमल करणको, पूजहुं तुम पाई ॥सि०॥ चौसठ गुणनामा विधिमाला, सुमरों सुखदाई ॥ सि०॥ - -- ........

राजा ព្រះអង្គ ॐ ही सिदपरमेष्ठिने चौसठ गुणसहित श्रीसमनणागदसण वीर्य गुहमनहेर सिद्धचक्र अपग्गहणं अगुरुलघुमव्यावाहं कामवाणविनाशनाय पुप्पं ॥४॥ भूख गार अक्षोण रसी हूँ, पूरति है नाई। चारुमाल तुम पद पूजत हों, पूरन शिवराई । सिद्ध०॥ चौसठ गुणनामा विधिमाला, सुमरो सुखदाई। सिद्ध० ॥ ॐ हीं मिद्धपरमेष्ठिने नौमठगुणमहित श्रीसमत्तगाणदंसण वीर्य मुहमत्तहेब अवग्गहणं अगुल्लघुमव्यावाहं धुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं ।। ५ ।। दीपनिप्रति तुम पद पूजत, शिव मारग दरशाई। घोर अंध संसार हरणकी, भली सुझ पाई ॥ सिद्ध०॥ चौसठ गुणनामा विधिमाला, सुमरो सुखदाई ॥ सिद्ध० ॥ ओं ह्रीं श्री सिद्धपरमेष्टिने चौसठगुण सहित श्री समरणाण दंसण वीर्य मुहमत्तहेर अवग्गहणं अगुरुलघुमन्यावाहं मोहांधकारविनाशनाय दीपं ।।६।। कृष्णागरु कर्पूर पूर घट, अगनीसे प्रजलाई। 555 Th 1 मिद्धचक्र पूजा विधान उडे धूम यह, उडे किधों जर करमनकी छाई। सिद्धगण पूजोरे भाई। चोसठ गुण नामा विधि माला, सुमरो सुखदाई ॥ सिद्ध० ॥ ओ ही मिद्धपरमेष्ठिने चौमठगुणसहित श्री मम्मनणाणदंगणवीर्य सुहमनहेर अबग्गहण अगुरुलघुमवावाहं अष्टकर्मदहनाय धूपं ।। ७॥ मधुर मनोग सुप्रासुकफलमों, पूजों शिवराई । यथायोग विधि फलको दे गुण, फलकी अधिकाई । सि०॥ चोसठ गुणनामा विधि माला, सुमरो सुखदाई । सिद्धगण ॥ ओ ही श्री मिद्धपरभेष्टिने चौमठगुणमहिन श्रीममत्तणाणदंगण वीर्य मुहमतहेय अवगहणं अगुम्लघुमन्यायाहं मोक्षफलप्राप्तये फलं ॥ ८ ॥ निरघ उपावन पावन वसुविधि, अर्घ हर्ष ठाई। भेट घरत तुम पद पाऊँ पद, निर आकुलताई ॥ सिद्ध० ॥ चौसठ गुणनामा विधिमाला. सुमरों सुखदाई । सिद्ध० ॥ के ही श्री गिद्धपरमेष्टिने चौमठ गुण महिन समनणाण दंगण वीर्य मुहमनहर अग्गहणं अगुरुलघुमव्यापाई मरंमुगप्राप्ताय अर्थ निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ .

• • । सिद्धचक्र नतु पूजा विधान । ४६ अथ चौसठ गुण सहित अर्घ । चाल छन्द चउ घातो कर्म नशायो, अरहंत परम पद पायो। द्वे धर्म कहो सुखकारा, नमूं सिद्ध भए अविकारा ॥ १ ॥ औं ही अरहत जिनसिद्धभ्यो नमः अर्थ । संक्लेश भाव परिहारी, भए अमलअवधि बलधारी। सो अतिशय केवलज्ञाना, उपजाय लियो शिवथाना ॥२॥ आंही अवधिजिनसिद्धभ्यो नमः अप । निर्मल चारित्र समारा, परमावधि पटल उघारा। केवल पायो तिस कारण, नम सिद्ध भये जग तारण ॥ ३ ॥ ओं ही णमो परमावधिजिनमिळेभ्यो नमः अप । वर्द्धमान विशद परिणामी, सर्वावधिके हो स्वामी । ar ४ r । चतुर्थ पूजा विधान अन्तिम नमुरार्म नमाया, नमूं सिद्ध भये मुपदाया ॥४॥ ओ मरांधिजननिम्मी नमः । जिस अन्त अवधिको नाही. तुम उपनायो पद नाहीं। निर्मल अवधी गुणधारी, मर मिद्ध नमूं सुखकारी ।।५।। ओ ही अनन्नारधिनिमिद्धम्या नमः अयं । तप चल महिमा अधिकाई, बुद्धि कोष्ठ रिद्धि उपजाई । ध्रुत ज्ञान कोष्ट भंडारी, नमूं सिद्ध भये अविकारी ॥६॥ ओ ही कोष्टबुद्धिऋद्धिमिदभ्यो नमः अयं । ज्यां योज फले बहुरासी, त्यो छिनही बहु अभ्यासी । यह पावन ही योगीशा, भये सिद्ध नमूं शिव ईशा ॥७॥ ओं ही गोजयादशद्धिमिद्देश्यो नमः अयं । पदमात्र समस्त चितारे, है रिद्धि यह पद अनुसारे। यह पाय यतीश्वर ज्ञानी, भये सिद्ध नमूं शिवधानी ॥ ८॥ ओही पाहानमारणीमडियापिभ्यो नमः अघ । पा...सालाना-नानी चतुर्थ पूजा गिद्धन विधान श्रुत अर जो भिन्न भिन्न इक लारे, शब्दन सुन अर्थ विचारै । यह ऋद्धि पाय सुखदाता, नमूं सिद्ध भये जगत्राता ॥९॥ ओं ह्रीं संभिन्नश्रोतृऋद्धिऋषिभ्यो नमः अर्घ । मति अवधि अनूपा, विन गुरुके सहज सरूपा । भयो स्वयंबुद्ध निज ज्ञानी, नमूं सिद्ध भये सुखदानी ॥ १०॥ ओं ह्रीं स्वयंयुद्धाणं नमः अर्घ । जो पाय न पर उपदेशा, जाने तप ज्ञान विशेषा। प्रत्येक बुद्ध गुण धारी, भये सिद्ध नमूं हितकारी ॥ ११ ॥ ओं ह्रीं प्रत्येकबुद्धऋद्विऋपिभ्यो नमः अर्घ । गणधरसे समकित धारी, तुम दिव्यध्वनि अनुमारी । ज्ञानि निसिरताज कहाये, भये सिद्ध सुजस हम गाये ॥१२॥ आँ ह्रीं अर्ह बोधयुद्धाणं नमः अर्थ ।। मन योग सरलता धारे, तिस अन्तर भेद उघारे । ५१ DID चतुर्थ पूजा विधान ५२ यो होय ऋजुमति ज्ञानी, नमूं सिद्ध भये सुखदानी ॥ १३॥ ओं ही ऋजुमतिमृद्धिशापिग्यो नमः अर्घ । वाके मनको सब वाता, जाने सो विपुल कहाता। तुम पाय भये शिवधामी, नमूं सिद्धराज अभिरामी ॥१४॥ ओं ही विपुलमतिमृद्धिप्रापिभ्यो नमः अर्थ । सुर विद्याको नहीं चाहें, निज चारित विरद निवाहें। दस पूर्व ऋद्धि यह पायो, भये सिद्ध मुनिन गुण मायो।१५। ओं ही दमपूर्वद्धिप्रापिम्पो नमः अर्थ । चौदह पूरव श्रुतज्ञानी, जाने परोक्ष परमानी। प्रत्यक्ष लखो तिस सारूं भये सिद्ध हरो अघम्हारूं ॥१६॥ ओं ही चौदहपूर्वमद्धिऋपिम्यो नमः अघ । सुन्दरी छन्द। ज्योतिपादिक लक्षण जानक, शुभ अशुभ फल कहत वखानि । ५२ चतुर पूजा सिद्धचक्र विधान निमित ऋद्धि प्रभाव न अन्यथा, होय सिद्घ भये प्रण यथा ॥१७॥ ओं ह्रीं अष्टांगनिमित्त रिद्धि रिपिभ्यो नमः अर्घ । बहुत विधि अणिमादिक रिद्ध जू, तप प्रभाव भई तिन सिद्ध जू निष्पयोजन निजपद लीन है, नमूं सिद्ध भये स्वाधीन है।॥१८॥ ओं ही विवर्णरिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्थ । भूमि जल जंतु जिय ही ना हरे, नमूं ते मुनि शिव कामिन वरें नेक नहिं वाधा परिहार हो, नमूं सिद्ध सभी सुखकार हो ।१९। ओं ही विज्जाहरणरिद्धिरिपिभ्यो नमः अघ । जंघपर दो हाथ लगावहीं, अन्तरीक्ष पवनवत जावहीं। पाय ऋद्धि महामुनि चारणी, यथायोग्य विशुद्ध विहारणी॥२०॥ ओ ही चारणरितिरिपिभ्यो नमः अर्घ। खग समान चलै आकाशमें, लीन नित निज धर्म प्रकाशमें। शुद्ध चारण करि निज सिद्धता, पाइयो हम नमन करें यथा ॥२१॥ ५३ ५३ सिद्धचक्र चतुर्थ पूजा विधान ५४ ओ ही आकाशगामिनीरिदिरिपिभ्यो नमः । वाद विद्या फुरत प्रमानही, वज्रसम परमतगिरि हानही । सब कुपक्षी दोप प्रगट करें, स्यादवाद महादुतिको धरै ॥२२॥ आं ही परामर्शरिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्ग। विपम जहर मिला भोजन करें, लेत ग्रासहिं तिस शक्ती हरें। ते महामुनि जग सुखदाय जू ,हम नमें तिन शिवपद पाय जू।२ । ओही आशीविपरिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्म । जो महाविप अति परचण्ड हो, दृष्टि करि तिन कीने खण्ड हो । सो यतीश्वर कर्म विडार, भये सिद्ध नमूं उर धारके ॥२५॥ ओ ही दृष्टिपिपंरिपरिद्धिरिपिम्यो नमः अर्थ । अनशनादिक नित प्रति स्गधना, मरणकाल तई न विराधना। उग्र तप करि वसुविधि नासतें. हम नमें शिवलोक प्रकाशतें। ५। ओ ही उग्रतपरिद्धि रिपिभ्यो नमः अर्ष । . ४ पूजा : मिदना विधान 5555555555555555 बढती नित प्रति सहज प्रभावना, उग्र तप करि क्लेश न पावना। दीप्ति तप करि कर्म जराय, भये सिद्ध नमूं सिर नायक ॥ २६ ॥ ओ ही दीप्ततपरिदिरिपिभयो नमः अप । अन्तराय भये उत्सव वढ, बाल चन्द्र समान कला चढे। वृद्ध तपकी ऋद्धि लहे यती, भये मिद्ध नमत सुम्ब हो अनी ।२७। ओ ही तपदिरिपिभ्यो नमः अघ । सिंह क्रीडित आदि विधानतें, नित वढावत तप विधि मानते। महामुनीश्वर तप परकाशतें, नमूं मुक्ति भये जगवासतें ॥ २८ ॥ ओ ही महातपरिधिरिपिभ्यो नमः अर्थ । सिपिरिगिरि ग्रीपम, हिम सरतटें, तरु निकट पावस निजपद रटैं। घोर परिपद करि नाही हटें, भये सिद्ध नमत हम दुख कटें । २१ औ ही घोरतपरिधिरिपिभ्यो नमः अर्ष।

चतुर्थ पूजा रिधान tr ५८ ओरी मनापली रिद्धिगिषिम्यो नमः अर्प।. भिन्न भिन्न अति शुद्ध उम स्वर उमरे, एक महूरत अन्तर श्रुत वर्णन करें। बचनवली यह ऋद्धि भई सुखदाय जू. भये मिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू ॥ ३८ ॥ ओ ही वचनबली रिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्ष । खड्गासन इक अंग माम छै मास लो, अचल रूप थिर रहै छिनक खेदित न हो। कायवली यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजों तिन पांय जू ॥ ३९ ॥ ओ ही कायपली रिद्धिरिपिम्यो नमः अर्ष । अति अरम चरु क्षीर होय कर घरत हो, वचन खिरन परश्रवण तुष्टता करत ही । -- ५८ मिद्धचक्र चतुर्थ विधान क्षीरश्रवी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू ॥ ५० ॥ ओं ह्रीं क्षीरसाची रिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्ग। रूखे भोजनसे करमें घृत रस अवै, वचन सुनत परको घृत सम स्वादित हो। सार्पश्रावी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू ।। ४१ ।। ओं ही सर्पिश्रावीरिद्विरिपिभ्यो नमः अर्घ । हस्तकमलमें अन्न मधुर रस देत है, मधुकर सम जिय वचन गंधको लेत है। मधुश्रावी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू॥४२॥ ओं ह्रीं मधुधावीरिद्धिरितिभ्यो नमः अर्प। ५३ PIPIrrPIPIP चतु 5555555555 ओरी मनोरली रिद्धिगिरिम्पो नमः अर्य।. भिन्न भिन्न अति शुद्ध उन स्वर उन्नरें, एक महूरत अन्तर ध्रुत वर्णन करें। वचनवली यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये मिध सुखदाय जजू तिन पांय जू ॥ ३८ ॥ ओ ही बननवली रिद्धिरिपिम्यो नमः । खड्गासन इक अंग माम छै मास लो, अचल रूप थिर रहै छिनक खेदित न हो। कायवली यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजों तिन पांय जू ॥ ३९ ॥ ओ ही कापरली रिद्धिरिपिम्यो नमः । अति अरम चरु क्षीर होय कर घरत हो, वचन खिरत पर श्रवण तुष्टता करत ही । । .

चतुर्थ শিল্পণ ॥ १० विधान 9999999993595555555555555555E क्षीरश्रवी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू ।। १०॥ औ ही क्षीरसाची रिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्ग। रूसे भोजनसे करमें घृत रस अंचे, वचन सुनत परको घृत सम स्वादित हवे। साश्रिावी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भगे सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जु॥४१॥ ओं ही सर्पिधावीरिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्ध । हस्तकमलमें अन्न मधुर रस देत हैं, मधुकर सम जिय वचन गंधको लेत है। मधुश्रावी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू ॥ ४२ ॥ ओ ही मधुश्रावीरितिरिषिभ्यो नमः अर्थ ।

२ मिद्धचक्र चतुर्थ पूजा विधान E अमृतसम आहार होय कर आयके, वचनामृत दै सुक्ख श्रवपमें जायके । आमियरस यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पाय जू ॥ ४३ ॥ औ ही अमियरमरिद्धिरिपिभ्यो नमः अर्घ | जिस वासन जिस थान आहार करें यती, चक्री सेना खाय अखे होवे अती। अशीण रसी यह ऋद्धि भई सुखदाय जू, भये सिद्ध सुखदाय जजू तिन पांय जू ॥४४॥ ओ ही अक्षीणरमरिद्विरिपिभ्यो नमः अर्थ । सोरठा-सिद्धरास सुखदाय, वर्धमान नितप्रति लसे । नमूं ताहि सिर नाय, वृद्ध रूप गुण अगम है ॥ ४५ ॥ ओ ही बडढमाणमिद्वेभ्यो नमः अर्थ । - ६० EPIPI सिद्धचक्र म) पूजा विधान - रागादिक परिणाम, अन्तरके अरि नासके । लहि अरहंत सु नाम, नमों सिद्धपद पाइया ॥ ४६ ॥ ओं ही अरहन्तसिद्धेभ्यो नमः अर्घ । दो अन्तिम गुण थान, भाव सिद्र इस लोकमें तथा द्रव्य शिव थान, सर्व सिद्ध प्रणमूं सदा ॥४७॥ ओं ही णमो लोए सब्यसिद्धार्थ नमः। अर्घ शत्रु व्याधि भय नाहि, महावीर धीरज धनी। नमूं सिद्ध जिननाह, संतनिके भवभय हरे ॥४८॥ ओं ही भयवदो महावीरवड्दमाणं नमः अर्थ । क्षपकश्रेणी आरूढ़, निजभावी योगी यथा । निश्चय दर्श अमूढ़, सिद्ध योग सब ही जजों ॥ ४९ ।। ओ ही णमो योगसिद्धाणं नमः अर्थ। वीतराग परधान, ध्यान करे तिनको सदो। ६१ 卐55 गिद्धक चतुर्थ पूजा विधान ६२ सोई ध्येय महान, णमो सिद्ध हम अघ हरो ॥ ५० ॥ औ ही णमो ध्येयसिद्धाणं नमः अर्ष। लोक शिखर शिव थान, अचल विराजत सिद्ध जिन । लोकवास सर्वान, भए सिद्ध प्रणमूं सदा ।। ५१ ॥ ओ ही णमो मयासिद्धाणं नमः अर्ष । औरन करत कल्याण, आप सर्व कल्याणमय । सोई सिद्ध महान, मंगलहेतु नमूसदा ॥५२॥ औ णमो स्वस्तिसिद्धाणं नमः अर्ष । तीन लोकके पूज, सर्वोत्तम सुखदाय है। जिन सम और न दूज, तिनपद पूजों भाव युत ॥ ५३ ।। ओ ही अह सिद्धाणं नमः अर्ष। लोकोत्तम परधान, तिन पद पूजत है सदा । तातें सिद्ध महान, सर्व पूज्यके पूज्य हो ॥ ५४ ॥ ओ ही अहं मिद्ध सिद्धार्ग नमः अर्ध। -.-.-1 ६ सिद्धचक्र पूजा विधान ६३ परम धरम निज साध, परमातम पद पाइयो । सोई धर्म अबाध, पूजत हमको दीजिये ।। ५५ ।। ओ ही परमातमसिद्धाणं नमः अर्ध । सर्व रिद्ध नव निद्ध, सिद्ध भये नहिं सिद्ध हो। • निजपद साधत सिद्ध, होत सही तिनको णमों ॥ ५६ ॥ आं ही परमसिद्धार्ण नमः अर्थ । परमागमकी शाख, परम अगम गुणगण सहित । सोई मनमें राख, श्रद्धायुत पूजा करा ॥ ५७ ॥ ओ ही परमागममिद्धाणं नमः । गुण अनंत परकाश, महाविभव मय लसत है। आवर्णित पद नाश, ते पूजूं प्रणमं सदा ॥ ५८ ॥ ऑहीं णमो प्रकाशमान सिद्धाणं नमः अर्य। स्वयं सिद्ध भगवान. ज्ञानभूत परकाश मय । लसत नमूं मन आन, मम उर चिंता दुख हरो।। ५९ ! ६ गिद्धनक चतुर्थ पूजा विधान ६४ ओं ही णमो स्वयंभूसिद्धाणं नमः अब । मन इन्द्रियों भिन्न, मन इन्द्री परकाश कर । सोई ब्रह्म अखिन्न, साधित सद्ध मए नमूं ॥६०॥ ओ ही णमो ब्रह्ममिद्धाणं नमः अर्ध । द्रव्य अनन्त गुणात्म, परणामी परसिद्ध के, सोई पद निज आत्म, सापत सिद्ध अनन्त गुण ॥ ६१॥ ओं ही णमो अनन्तगुणसिद्धाणं नमः अर्थ सर्व तत्वमय पर्म, गुण अनन्त परमातमा। सो पायो निजधर्म, परम सिद्ध तिनको नमुं।। ६२ ।। आं ही पमो परमअनन्तगिद्धार्ण नमः अर्थ। लोक सिखरके वास, पायो अविचल थान निज। सब लोक परकाश, ज्ञानज्योति तिनको नमो ॥६३॥ जी ही लोकवासमिदाणं नमः अध। ३२ काल विभाग अनादि, शास्वत रूप विराजते । याते नहिं सो आदि, नमि अनादि सिद्धानको ।। ६४ ॥ ओ ही णमो अनादिसिद्धाणं नमः अर्थ । चतुर्थ पूजा विधान गीता ६५ निर्मल सलिल शुभ वास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी, शुभ पुष्प मधुकर नृत्यभुं चरु, प्रचुर स्वाद सुविधि धनी। पर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भलै, करि अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्मदल सब दलमलै ॥ १॥ ते कर्मवर्त नसाय युगपति, ज्ञान निर्मल रूप है, दुग्ध जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप कर्माष्ट विन त्रैलोक्य पूज्य, अदूज शिव कमलापती, मुनि ध्येय सेय अमेय चाहूं, ज्ञेय यो हम शुम मती ॥२॥ ओं ही अई तजिनादिसिद्धेभ्यो नमः पूर्णाध । REFERESHERE ५ अथ जयमाला। दोहा-तीर्थंकर त्रिभुवन धनी, जापद करत प्रणाम । हम किह मुप वर्णन करें, तिन महिमा अभिराम ॥ १ ॥ + चतुथ जा --------- नापाई। 555555555555 अप भवि कुमुदन मोदन चंदा, जय दिनन्द त्रिभुवन अरिविंदा । भव तप हरण सारण रस कृपा, मद ज्वर जरन हरण घन रूपा ॥२॥ अधित महिमा अमित अधाई, निर उपमेय सरसता नाई। भावलिंग विन कर्म खिपाई, द्रव्य लिंग विन शिवपद पाई ॥३॥ नय विभाग विन वस्तु प्रमाणा, दया भाव बिन जिन कल्याणा। गु सुमेरु चूलिका परसे, गुंग गान आरंभे स्वरसे ॥ ४ ॥ यों अजोग कारज नहिं होई, तुन गुण कथन कठिन है सोई। सर्व जेन शासन निजमाही, भाग अनन्त धरै तुम नाहीं ॥५॥ गोबुरमें नहीं सिंधु समावै, वायस लोक अन्त नहिं पाये।

चतुर्थ पूजा 15555 द्धचा विधान 5959599999999NEFFERE नातं केवल भक्ति भाव तुम, पावन करी अपावन उर हम ॥ : ज तुम यश निज मुख उच्चारै, ते तिहुँ लोक सुजस विस्तारे। तुम गुण गान मात्र कर प्रानी, पावै सगुण महासुखदानी ॥७॥ जिन चित ध्यान सलिल तुमधारा, ते मुनि तीरथ है निरधारा । तुम गुण हंस तुम्ही सरवासी, वचन जालमें लेत न फासी ॥ ८॥ जगन बंधु गुणसिंधु दयानिधि, बीजभूत कल्याण सर्वसिधि । अक्षय शिव स्वरूप श्रिय स्वामी, पूर्ण निजानन्द विश्रामी ॥९॥ शरणागत सर्वस्व सुहितकर, जन्म मरण दुख आधि व्याधि हर । मन भक्ति तुम हो अनुरागी, निश्चे अजर अमर पद भागी ॥१०॥ 30 ही चतुःपष्टिदलोपरिस्थितसिद्धम्यो नमः महापं निर्यपामि नाहा । पत्तानन्द छन्द। जय सुखसागर सुजस उजागर, गुणगण आगर तारण हा विपति विडारण, सुख विस्तारण कारण IF । पिना જા अथ जयमाला। म दाहा-नाथंकर त्रिभुगन भनी, जापद करत प्रणाम । हम किस मुग्न वर्णन करें, जिन महिमा अभिराम ॥ १॥ पूजा i פופולתבלבלברטוב= Y. गोपाई। फ जग भय कमदन मोदन चंदा, जय दिनन्द त्रिभुवन अरिविंदा । मानपतरण शरण ग्म कृपा, मद ज्यर जरन हरण धन रूपा ॥२॥ ६.चिन महिमा अमिन अथाई, निर उपमेय सरसता नाई। भापरिग नि कर्म ग्यिपाई, द्रव्य लिंग यिन शिवपद पाई ॥३॥ नय विभाग विन यस्तु प्रमाणा, दया भाय चिन जिन कल्याणा। पंग सुमेर चूलिका परसे, गुंग गान आरंभे स्वरसे ॥ ४ ॥ या अजोग कारज नहिं होई, तुम गुण कथन कठिन है सोई । मर्य जेन शासन निजागाहीं, भाग अनन्त धेरै तुम नाहीं ॥५॥ गोयुग्में नहीं सिंधु समाये, पायस लोक अन्त नहिं पागे ----..

गतुर्थ पूजा सावधान तातें केवल भक्ति भाव तुम, पावन करी अपावन उर हम ॥६॥ जे तुम यश निज मुख उच्चारे, ते तिहुं लोक सुजस विस्तारे । तुम गुण गान मात्र कर प्रानी, पावै सुगुण महासुखदानी ॥ ७॥ जिन चित ध्यान सलिल तुमधारा, ते मुनि तीरथ है निरधारा । तुम गुण हंस तुम्हीं सरवासी, वचन जालम लेत न फासी ॥८॥ जगत बंधु गुणसिंधु दयानिधि, वीजभूत कल्याण सर्वसिधि । अक्षय शिव स्वरूप श्रिय स्वामी, पूर्ण निजानन्द विश्रामी ॥ ९॥ शरणागत सर्वस्व सुहितकर, जन्म मरण दुख आधि व्याधि हर संत भक्ति तुम हो अनुरागी, निश्चे अजर अमर पद भागी ॥ १०॥ 30 ही चतुःपटिदलोपरिस्थिनगिद्धगों नमः महापं निमामि पाहा। घनानन्द छन्दा जय सुखसागर सुजस उजागर, गुणगण आगर तारण हो। संत उधारण विपति विडारण, सुख विस्तारण कारण हो॥ ७ 卐h . + मा मा प्रमान विधान कर। अरहरी भरकी व्याधि हरू पंचमी पूजा 1 4पमा पूजा। 555555559 व हकार विराजे, 7. कणिका अन्त सु छाजें। +4 . 11 पदर नम्बज नत्व संधिधर, मागम मत्र अनाहत सोहत अतिवर ।। अन्1 हा वट्या परम. मुर ध्यावत अरि नाशको। हरि न पूजन निमित्त, सिद्धचक्र मंगल करी ।। १ ।। "लमा महान श्रीमदपरमष्टिम् अाविंशत्यधिश्मन १२८ गुण- पंनी सिद्धचक्र विधान सहित विराजमान अनायतरावतर संयोपट आहाननं, अत्र तिष्ठ तिष्ठठः ठः स्थापनं । अत्र मम सन्निहितो भव भव वपद। दोहा-सूक्ष्मादि गुण सहित है, कर्म रहित निररोग। सिद्धचक्र सो थापहुं, मिटे उपद्रव योग ।। इति यंत्रम्थापनं। अथाष्टकं। चाल बारामासा छन्द । चन्द्रवर्ण लखि चन्द्रकान्तमणि, मनर्ते श्रये हुलसधारा हो । कंज सुवासित प्रासुक जलसों, पूजूं अंतर अनुसारा हो । लोकाधीश शीश चूड़ामणि, सिद्धचरण उर धारा हो । चौसठ दुगुण सुगुण मणि सुवरण सुमिरतही भव पारा हो ।। औहीं णमी मिदाणं श्रीमिद्धपरमेष्ठिने एकसे अट्टाईग गुणमंयुक्काग श्री गमन- पाणदसणार्य सुहमतहेव अपग्गहणं अगुम्लधुमबापाई जन्मजरारोगधिनागनाग जत।।

मिदना पंचमी सा तुम गुण गान परम फलदान, मो मंत्र प्रमान विधान कर। जहरी , कर्मनि येरी की कहरी, असहरी भयकी व्याधि पर इल्पाचागीरदः। नि गाजा ममण ।। अथ पंचमी पूजा। न 5555555555 उप उन्द । ऊरच अधो मुरेफ सुविद् हंकार गिराने, अकारादि पर लिस कर्णिका अन्त महाजें। वर्गन परित यसुदल अम्बुज तत्व संधिधर, अग्रभागमें मंत्र अनाहत सोहन अतिवर ॥ फुनि अन्त ही वेदयो परम, सुर ध्यावत अरि नाशको । फेहरि सम पूजन निमिन, सिद्धगा मंगल करी ॥१॥ ही गमी गिहाणं श्रीगिढपरमेष्टिन् प्राचियधिाम १२८ गुण- 355555555555555555555555555 सुगुण 7 पंचमी समान Fr"555555555555555 गनमान अबावतरारतर संग्रौपट आह्वानन, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापन मम गन्निहिना भय भर वषट् । । पंचमी दोहा-पृथ्मादि गुण सहित है, कर्म रहित निररोग। पूजा मिन्दचक्र सो थापहूं, मिटै उपद्रव योग ।। इति यंत्रस्थापनं । अथाष्टकं । चाल बारामासा छन्द । चन्द्रवर्ण लखि चन्द्रकान्तमणि, मनतें अवै हुलसधारा हो । कंज सुवासित प्रासुक जलसों, पूजू अंतर अनुसारा हो । लोकाधीश शीश चूड़ामणि, सिद्धचरण उर धारा हो। ओ हीं णमो सिद्धाणं धीसिद्धपरमेष्ठिने एकसे अठाईस गुणसंयुक्ताय श्री समत्त- पाणटमणीर्य सुहमत्तहेब अवग्गहणं अगुरुल घुमव्यावाहं जन्मजरारोगविनाशनाय जल।१। द६ 4. + पंचमी पूजा 45555555555555552. सुरमन मणिधर जास वास लहि, मद तजि गंध लुभावत हैं। सो चन्दन नन्दनवन भूषण, तुम पद कमल चढ़ावत हैं। लोकाधीश०, चौसठ० ॥२॥ ओ ही गमो मिद्वाणं श्रीसिदपरमेष्ठिने एकसे अढाईमगुणसंयुक्ताप श्री ममत्त ॥ण दमण वीर्य गुहमतहेव अपग्गबणं अगुरुलघुमन्नावाहं मंमारतापविनाशनाय चन्दनं० चपक होके भ्रम भ्रमरावलि, भ्रमत चकित चकराज भए, शशि मण्डल जानो सो अक्षत, पुजधार पद कंज नये लोकाधीश शीश चुडामणि, सिद्ध चरण उर धारा हो, चौसट दुगुण सुगुण मणि सुवरण सुमिरत ही भवपारा हो। ओं ही मिद्धपरमेष्ठिने १२८ गुणसहित श्रीममत्तणाण दमण वीर्य मुहमत्तहेव अपग्गहणं अगुरुलघुमन्नालाई अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति सराहा ॥३॥ मदन वदन दुतिहरन वरन रति लोचन अलिगण छाय रहे । पुष्पमाल बासित विसाल सो, भेंट धरत उर काम दहै ॥ लोकाधीश० चौसठ० ॥ ७० पंचमी 30 ही श्रीसिद्धपरमेष्ठिने १२८ गुण संयुक्ताय श्रीसमत्तणाणदंगण वीर्य सुगम- नहेब अम्गहण अगुलयूमगावाहं कामवाणविनाशनाय पुष्प निर्वधामीति स्वाहा ४ चितवत मन वरणत रसना रस, स्वाद लेत ही तृप्त धये । जन्मांतरह छुपानिवारे, सो नेवज तुम भेट धरै ॥ लोकाधीश शीश चूड़ामणि, सिद्धचक्र उरधारा हो। चौसठ दुगुण सुगुण मणि सुवरन, सुमरत ही भवपारा हो॥ ओ ही सिद्धपरमेष्ठिने १२८ गुणसहित श्री समत्तणाणदंसण वीर्य गुहमनहेन अवग्गहणं अगुरुलधुमन्यापाई शुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० ॥ ५॥ लवमणिप्रभा अनूपम सुर निज, शीश धरणकी रास करे हो। या विन तुच्छ विभव निज जानें, सो दीपक तुम भेट धरे हो । लोकाधीश०, चौसठ०॥ ओ हो श्रीसिद्धपरमेष्ठिने १२८ गुणसंयुक्ताय श्रीममत्तणाणदंगण वीर्य मुहमत्त- हेब अवग्गहणं अगुरुघुमन्यावाह मोहधिकारविनाशनाय दीपं ।। ६ ॥ नीलंजसा करी नभमें ज्यों, ऋपभ भक्तिकर नृत्य कियो हो ७१ । सिद्धचक्र पंचमी पूजा विधान -1 . सुरमन मणिधर जास वास लहि, मद तजि गंध लुभावत हैं सो चन्दन नन्दनवन भूपण, तुम पद कमल चढ़ावत हैं। लोकाधीश०, चौसठ० ॥ २॥ ओ ही गमो मिद्वाणं श्रीगिद्धपरमेष्टिने एकसे अहाईमगुणगंयुक्ताय भी ममन जाण दमण वीर्य मुहमतहेव अवम्गहणंअगुल्लामन्चाराई समारतापरिनामनाय बन्दनं० चंपक होके भ्रम भ्रमरावलि, भ्रमत चकित चकराज भए, शशि मण्डल जानो सो अक्षत, पुजधार पद कंज नये । लोकाधीश शीश चूडामणि, सिद्ध चरण उर धारा हो, चौसठ दुगुण सुगुण मणि सुवरण सुमिरत ही भवपारा हो। औं ही सिद्धपरमेटिने १२८ गुणसहित श्रीयमनमाण दंगण वीर्य मुहमनहेर अवग्गहणं अगुल्लघुमन्यावाहं अक्षयपदप्राप्तये अधतं निपामीति साहा ।। ३ ।। मदन वदन दुतिहरन वरन रति लोचन अलिगण छाय रहे। पुष्पमाल बासित विसाल सो, भेंट धरत उर काम दहै ।। लोकाधीश० चौसठ०॥ ७० मिदनक विधान पंचमी पूजा पंचगी " ही श्रीसिद्धपरमेष्टिने १२८ गुग मंयुक्ताय श्रीसमनणाणदंगण वीर्य मुहम- गडेव अग्गहणं अगुलमनापाई कामवागविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा चितवत मन बरणत रसना रस, स्वाद लेत ही तृप्त थये । जन्मांतरह छुधानिवारे, सो नेवज तुम भेट धरै ॥ लोकाधीश शीश चूड़ामणि, सिद्धचक्र उरधारा हो। चौसठ दुगुण सुगुण मणि सुवरन, सुमरत ही भवपारा हो । ी ही गिदपरमेष्टिने १२८ गुणमहित श्री समनणाणदंसण वीर्य सुहमत्तहेव अचम्गहण अगुलमभाचा शुभारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० ॥ ५॥ लयमणिप्रभा अनूपम सुर निज, शीश धरणकी रास करे हो या विन तुच्छ विभव निज जानें, सो दीपक तुम भेट धरे हो । लोकाधीश०, चौसठ० ॥ जी ही श्रीमिदपरमेष्टिने १२८ गुणगंयुक्ताय श्रीयमनणाणदंगण वीर्य देव अपग्गहणं अगुम्युमन्चावाहं मोहांधकारविनाशनाग दीपं ॥ ६ ॥ नीलंजसा करी नभमें ज्यों, पभ भक्तिकर नृत्य कियो हो । मुहह्मत्त- ७ 'माफक पंचमी पूजा 5955559" सो तुम सन्मुख धूप उड़ावत, तिसछविकोनहि भाव लियो हो। लोकाधीश शीश चुडामणि, सिद्धचक्र उरधारा हो। चौसठ दुगुण सुगुण मणि सुवरन सुमिरत ही भवपारा हो । ओ ही श्रीमिद्धपरमेष्ठिने १२८ गुणसंयुक्ताय श्रीममत्तणाणदंसण वीर्य सुहम- नहय अपग्गहणं अगुम्युमव्यावाहं अष्टकर्मदहनाय धूपं ॥ ७ ॥ सेब रंगीले अनार रसीले, केलाकी ले डाल फली हो। डालो हू नृपमाली हू, नांतर प्रासुकताको रीति भली हो । लोकाधीश०, चौसठ०॥ आँ ही श्रीमिद्धपरमेष्टिने १२८ गुणमयुक्ताप श्रीममनणाणदंमण वीर्य मुहम- नहेर अवगहणं अगुरुधुमन्यायाहं मोक्षफलप्राप्तये 'फलं ॥ ८॥ एकसे एक अधिक सोहत वसु, जाति अर्घ करि चरण नमूं हूं । आनंद आरति आरत तजिक, परमारथ हित कुमति व हूं ।। .लोकाधीश०, चौसठ०॥

मिदमत्र
55555
" ही श्रीसिद्धपरमेष्ठिने १२८ गुणसंयुक्ताय श्रीसमत्तणाणदसणवीर्य सुहमत्तहेव
अवग्गहणं अगुरुलघुमन्यायाहं अनर्घपदप्राप्तये अर्घ ।
पंचमी
पूजा
गीता छन्द ।
1-nna+555555
निमल सलिल शुभ वास चन्दन धवल अक्षत युत अनी,
शुभ पुष्प मधुकर नित रमें चरु प्रचुर स्वाद सुविधि घनी।
वर दीपमाल उजाल धूपाइन रसायन फल भले,
करि अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्मदल सव दलमले ॥
ने कर्मवत नसाय युगपत, ज्ञान निर्मल रूप है,
दुख जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम स्वरूप अनूप है।
काष्ट विन त्रैलोक्य पूज्य, अछेद शिव कमलापती,
मुनि ध्येय सेय अमेय चाहं, ज्ञेय द्यो हम शुभमती ॥
30 ही अष्टाविंशतियधिकशतगुणयुक्तसिद्धेभ्यो नमः पूर्णा ।
३

दचक्रम पंचमी पूजा बधान 5555555555555 अथ एकसै अठाईस गुण सहित अर्घ । पोटक छन्द । निरवाध सु तत्त्व सरूप लखो, इक लेश विशेप न शेप रखो। अति शुद्ध सुभाविक छायक है, नमूं दर्श महासुखदायक है ॥ १ ॥ आं ही सम्यग्दर्शनाय नमः अर्थ । निरमोह अकोह अबाधित हो, परभाव थकी न विराधित हो। निरसंस चराचर जानत हैं, हम सिद्ध सु ज्ञान प्रमानत हैं ॥२॥ ॐ हीं सम्यग्जानाय नमः अर्घ । सब राग विरोध निवारन है, निज भाव थकी निज धारन है परमें न कभू निज भाव वहै, अति सम्यक्चारित्र नाम यहै ॥३॥ ओ ही सम्यकचारित्राय नमः अर्थ उतपाद विनाश न वाध धरै, परनाम सुभाव नहीं निसरे। तुम धारत हो यह धर्म महा, हम पूजत हैं पद शीश यहां ॥४॥ औ ही अस्तित्वधर्माय नमः अपं । - ७४

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मिद्वचन पंचमी पूजा विधान अमृतित्वधमाय नमः अघ । परको न कदाचित धर्म गहें, निजधर्म सरूप न छांडत हैं। अतिउत्तम धर्म सुधारत हैं, हम पूजत पाप विडारत हैं ॥१०॥ ओं ही ममकितधर्माय नमः अर्घ । जितने कछु हैं परिणाम विपं, सब ज्ञान स्वरूप सु जान तिसें । मुख ज्ञानमई गुण धारत हैं, हम पूजत पाप विडारत हैं ॥११॥ ओ ही ज्ञानधर्माय नमः अर्घ । चिन्मय चिन्मूरति जीव सही, अति पूरणता विन भेद कही। निज जीव सुभाव सुधारत हैं, हम पूजत पाप विडारत हैं॥१२॥ ओ ही जीवधर्माय नमः अर्घ मनको नहि वेग लखावत हैं, जिस वेन नहीं बतलावत है। अति सूक्षम भाव सु धारत हैं, हम पूजत पाप विडारत हैं ॥१३॥ ओं ही सूक्ष्मधर्माय नमः अर्थ । ७६

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पंचमी पिरान अननाएयाय नमः । सुष समलित आदि महागण को, तुम माधिन सिद्ध भए अबहो। यह उनम भाव सुधारत है, हम पूजन पार विडारन हैं ॥ १॥ ओ मारवादिगुलामगिवेभयो नमः । दोहा-निधय पंचागार सय, भेद रहित तुम साथ । चेतनको अति शक्तिमें, सूचत मा निरवाध ॥ २० ॥ ओहरी पंचाचारवाया नमः अयं । चौपाई। PIPIPI सब विकलप तजि भेद सरूपी, निज अनभूति मग्न चिद्रूपी । निश्चय रत्नत्रय परकासो, पूजू भाव भेद हम नासो ॥२१॥ ओ होरक्त्रयप्रकाशाय नमः अप । करण भेद रलाय धारी, कर्म भेद निज भाव संसारी। फरता भेद आप परिणामी, भेदाभेद रूप प्रणमामी ॥२२॥ ओं से सरपमापकमर्वमाधुभ्यो नमः अयं । ७८

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पंचमी पूजा 955555555555फ दोहा-समारम्भ कोधित सुमन, परकारित दुख नाहि । परमातम पद पाइयो, नम सिद्ध गुण ताहि ॥ २७ ॥ औको भागिमनानाधनमारम्भपरमानन्दाय नमः प्रय भुजंगप्रगान छन्द। समारम्भ कोधी मनोयोग माही, धरे मोदना भावका जीव ताही। भये आप संतुष्ट ये त्याग भावा, नमूं सिद्ध सो दोपनाही उपावा ।२८॥ * ही नानुमोदितमनःक्रोधममारम्भपरमानंदसंतृष्टाय नमः अघं। पद्धड़ी छद। निज क्रोधित मन आरम्भ ठान, जग जिय दुखमें सुख रहै मान । सो आप त्याग संलश भाव, भये सिद्ध नमूं धर हिये चाय ॥ २९ ॥ ही अकृतमनःकोधारम्भस्वसंम्धानाय नमः अर्थ । कोधित मनसो आरम्भ हेत, प्रेरित निज अपराध लेत । जग जीवनकी विपरीत रीति, तुम त्याग भये शिव वर पुनीत ॥३०॥ औरी अकाग्निमनाकोधारम्मवन्धसंस्थानाय नमः अप। ८० ८०

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गिद्दन पंचमी पूजा विधान अडिय छन्द। समारम्भ परिवर्तमान युत मन धरे, विकलपमई उपकरण विविध इकठे करें । महा कष्टको हेतं भाव यह ना गहो, पृणमूं सिद्ध अनन्त सुखातम गुण लहो ॥ ३५॥ औ ही अनमनीमानममारम्भमुग्यात्मगुणाय नमः अर्थ । मान सहित मनयोग द्वार चितवन करें, समारम्भ पर कृत्य करावन विधि परे । तहां कष्टको देत भाव यह ना गहो, प्रणमूं सिद्ध अनन्यगुणातम पद लहो॥ ३६॥ औदी अकारितमनोमानगमारम्भ अनन्यगताग नमः अर्प। जोडे चित न समाज विविध जिस काजमें, समारम्भ तिस नाम' सो मति जिनराजों।. . . -- मिद्धचक्र विधान पंचमी पूजा माने मानी मन आनन्द सु नमतिसे नमूं सिद्ध है अतुल वीर्य त्यागत तिसे ॥ ३७ ।। ओं हीं नानुमोदितमनोमानसमारंभअनन्तवीर्याय नमः अर्घ । अशुभ काज परिवर्त नाम आरम्भको, मान सहित मन द्वार तास उद्यम गहो। जगवासी जिय नित प्रति पाप उपाय णमो सिद्ध या रहित अतुल सुखराय है ॥ ३८॥ ओं ही अकृतमनोयोगमानारम्भअनन्तमुखाय नमः अर्थ । दोहा-मनो मान आरम्भके, भये अकारित आप। अतुल ज्ञान धारी भए, नमत नसे सब पाप ॥ ३९ ॥ ओ दी अकारितमनो मानारम्भअनन्तनानाय नमः अध । मनो मान आरम्भमें, नानुमोदि भगवंत । गुण अनन्त युत सिद्धपद, पूजत हैं नित संत ॥ ४०॥ .

रंगमी Im पिान ीही प्रत मनोमापारम्भररमानाय नमः । पूर्वोक्त अकारित विपि सरूप, पायो निर आकुल मुझ अनूप । सर्वोचम पद पायो महान, हम पूजत हैं उर भक्ति ठान ॥४८॥ ओहरी प्रसारित मनीमापारंभनिगालाय नमः अयं । दोहा-मायावी आरम्भ करि, मनमें आनन्द मान । सो तुम त्यागो भाव यह, भये परम सुख खान ॥११॥ ओ ही नानुमोस्तिमनोमायारंभअनन्तमुखाय नमः अर्थ । लोभी मन द्वारे नहीं, करे सदा समरंभ। हम अनन्तद्विग सिद्धपद, पूजत हैं मनथंभ ॥५०॥ ओह अहतमालोभमरम्भअनन्तद्रगाय नमः अर्थ । लोभी मन ममरंभको, परसों नहिं कराय। हगानन्द भावानमा, सिद्ध नमूं मन लोय ॥ जारी प्रसारितमनालीममांभगानन्दमाराय नमः । - m गंजगी सिद्धचक विधान ८७ HEEEEEEE लोभी मनं समरंभमें, माने नहीं आनन्द । नमूं नमूं परमातमा, भये सिद्ध जगवंद ॥ ५२ ॥ ओ ही नानुमोदितमनोलोभसंरंभामभावाय नमः । समारम्भ नहि करत हैं, लोभी मनके द्वार। चिदानन्द चिदेव तुम, नमूं लहूं पद सार ॥५॥ ओ ही अक्रतमनोलोभममारम्भनिटं वाय नमः । परसों भी पूर्वोक्त विधि, कवहूं नहीं कराय । निराकार परमात्मा. नमूं सिद्ध होय ॥५४॥ ओं ह्रीं अकारेतमनो लोभसमारंअनाकागय नमः । ऐसे ही पूर्वोक्त विधि, हार्पित होवे नाहि । चित्तरूप साकारपद, धारत हुँ उरमाहि ॥ ५५॥ आँ ह्रीं नानुमोदितमनी लोभसमारम्भमाकाराय नमः अप । रचना हिंसा काजकी, लोभी मनके द्वार ।

मिस्र विधान पंचमी पूजा ८८ नहीं करें हैं ते नम, चिदानन्द पद सार ॥५६॥ भी ही अकृतमनोलोभारंभचिदानंदाय नमः । लोभी मन प्रेरित नहीं, परको आरम्भ हेत । चिनमय रूपी पद घरै, नमूं लहूं निज खेत ।। ५ ।। ओ ही अकारिनमनोलोभारम्भचिन्मयसम्पाय नमः अर्थ । मन लोभी आरंभमें, आनन्द लहे न लेस । निजपदमें नित रमत हैं, ध्याऊ भक्ति विशेष ॥५८॥ ओं ही नानुमोदितमनोलोभारंभस्वरूपाय नमः अआ । अडिल्ल छन्द। कोपित जिय वचयोग द्वार उपयोगको, रचना विधि संकल्प नाम समरंभ सो। तामें करें प्रति पाप उपजावते, न मिट या विन वचगप्ति उपायते॥ ५९॥ ...." 1-.-.-10 ८८.

. मिहनक .. पंचमी विधान 4555555 ओहो अकृतवचनकोंधसंरंभवाग्गुप्ताय नमः अर्ष। क्रोध अग्नि करि निज उपयोग जरावही, वचन योग करि विधि संरंभ करावही । सो तुम त्याग विभाव सुभाव सरूप हो, नम उरानन्द धार चिदानन्द रूप हो ॥६०॥ ओ ही अकारितवचनकोधसंरंभस्वरूपाय नमः अर्ध। सोरठा-कोधित निज वय द्वार, मोदित हो संरंभमें । सो तुम भाव विडार, नमूं स्वानुभव लब्धियुत ।। ६१ । ओहो नानुमोदितवचनकोधसंरंभस्वानुभवलब्धये अर्थ । दोहा-क्रोध सहित वाणी नहीं, समारंभ परव्रत्त । स्वानुभूति रमणी रमण, नमूं सिद्ध कृतकृत्य ॥ ६२॥ ओं ही अकृतवचनक्रोधसमारंभस्वानुभूतिरमणाय नमः अर्थ । समारंभ कोधित जिये, प्रेरित पर वच द्वार।

* मिहनमः पंचमी पूजा पंचमी विधान ६० नम सिद्ध ईस कर्म विन, धर्मघरा साधार ।। ६३ ।। ओ ही अकारिनवचनकोथममारंभसाधारणधर्माय नमः अर्ष । समारंभ मय वचन करि, हर्पित हो युत क्रोध । नमंसिद्ध गा विन लहो. परम शांति सुख धोध ॥६४ ॥ ही नानुमोदिनवननक्रोधसमारंभपरमशांताय नमः अप। छन्द मोनियादाम । वैर वयोग घरै जियं रोप, करें विधि भेद अरम्भ सदोष । तजो यह सिद्ध भये सुखकार, नमू परमामृततुष्ट अवार।५। ओ ही अकृतवनकोधारम्भपरमामृततुष्टाय नमः अघ । अंकांरित वैन सदा युत क्रोध, महा दुखकार अरम्भ अवोध भये समरूप महारस धार, नमें इमं सिद्ध लहैं भवपार ६६ ओ ही अकारित्यचनक्रोधारम्भसमरसाय नमः अर्थ । दोहा-नानुमोद आरम्भमें, कोष सहित वच द्वार ।

man विधान परम प्रोति निज आत्मरति, नमूं मिद सुखकार ॥ ६७ ॥ ओ ही नानुमोदितवनकोधारंभपग्मग्रीको नमः । अडिट। वचन द्वार संरम्भ मानयुन जे करें, जोड़ करन उपकरण मानमो ऊनरें। नाना विघि दुख भोग निजातमको हरे, नम मिद्ध या विन अविनश्रर पद परे ।।३।। ओ ही अनबननमानसंगम्भ अविनयरधनाय नमः पर्ष मान प्रकृति करि उदे करावे ना कदा, वचन न करि संरम्भ भेद वरण चदा। मन इन्द्रिय अध्यक्त स्वरूप अनूप हो, नमूं सिद्ध गुण मागर स्वातम रूप हो ॥ ६९॥ ओं ही अकारितवचनमानमरम्मत्रगतमम्पाय नमः । 5555555555thilisit: 120 सिद्धचक्र पंचमी पूजा विधान ६४ मायायुत वचननको प्रयोग, संरंभ करावत अशुभ.भोग । तुम यह कलंक नहीं धरो लेश, हो अमृत शशी पूजू हमेश ७८॥ आं ही अकारितवचनमायामरंभअमृतचन्द्राय नमः अर्ष । वचमायायुत संरंभ कीन, सो पापरूप भावी मलीन । तिस त्याग अनेक गुणात्म रूप, राजत अनेक मूरत अनूप ७९। ओ ही नानुमोदितवचनमायागंरंभअनेकमूर्तये नमः अमः। तुम समारंभकी विधि विधान, नहीं करत कुटिलता भेद ठान । हो नित्य निरअन भाव युक्त, में नमूं सदा संशय विमुक्त ॥८॥ औ ही अकृताचनमायाममारंभनित्यनिरजनस्वभागय नमः अर्ग। दोहा-मायायुत निज येनतें, समारंभके हेत ! नहीं प्रेरित परको नमू, निजगुण धर्म समेत ॥ ८१ ॥ ओ ही अकारितवचनमायाममारंभआरमकधर्माय नमः अर्प। मायाकरि बोलत नहीं, समारंभ होय । '. सूक्ष्म अतीन्द्रिय पृप नमू, नमूं सिद्ध मन लाय।। २ ।। , १४

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सिद्धचक्र 55555554 पंचमी विधान वर्तावन संरंभ हेत परके तई, लोभ उदे करि वचन कहै हिंसामई । नमं सिद्ध पद यह विपरीति सु जिन हरो, सकल चराचर ज्ञानी व्यापक गुण वरो ।। ८७ ।। ओं ही अारितवचनलोभसंरंभव्यापकगुणाय नमः अर्थ । लोभी वच संरंभ हर्प परकाशनं, नाना विधि सञ्चरे पाप दुख राशनं । सो तुम नाशत शाश्वत ध्रुवपद पाइयो, नमूं अचल गुण सहित सिद्ध मन भाइयो ।।८८॥ ओ ही नानुमोदितयननलोभमरंभअनलाय नमः अर्प। सोरठा-समारम्भके वेन, लोभ सहित पर आसतजि । तज निरलम्बी ऐन, नम सिद्ध उर धारिके ॥ ८९ ॥ ओ ही अकृतवचनलोमममारंभनिरालंयाय नमः अर्य । समारंभ उपदेश, लोभ उदै थिति मेटिकें। 159999999991

पंनमी
बंधान
पायौ अचल स्वदेश, नमूनिराश्रय सिद्ध गुण ॥ ९० ॥
सिद्धचक्रम
औं ही अकारितवननलोभसमारम्भनिराश्रयाय नमः ।
नानुमोद वच लोभ, समारंभ परवृत्तमें ।
नमू तिन्हें तजि क्षोभ, नित्य अखण्ड विराजते ॥ ९१ ॥
ओ ही नानुमोदितवरनलोभगमारम्भ असण्डार नमः अर्म।
दोहा-लोभ सहित आरंभको, करत नहीं व्याख्यान ।
नूतन पंचम गति लहो, नमू सिद्ध भगवान ॥ ९२ ॥
आही अकृतवचनलोभारम्भपरीतावस्थाय नमः अर्म।
लोभ वचन आरंभको, कहत न परके हेत ।
समसार परमातमा, नमत सदा सुख देत ॥ ९३ ॥
ओं ही अकारितवचनलोभारम्भसमयनाराय नमः अर्प।
गोरठा-नानुमोद वच द्वार, लोभ सहित आरम्भमय ।
जर अमर सुखदाय, नमू निरन्तर सिद्धपद ॥ ९ ॥

मंचमी
पूजा
१८
ओं ही नानुमोदितवचनलोभारम्भनिरंतराय नमः ।
सिद्धचक्र अडिल्ल-क्रोधित रूप भयंकर हस्तादिक तनी,
करत समस्या सो संरम्भ प्रकाशनी।
विधान
सो तुम नाशो काय गुप्ति करि यह तदा,
दृष्टि अगोयर काय गुप्ति प्रणमू सदा ।। ९५ ॥
ओ ही अकृतकायक्रोधमरंभकायगुप्तये नमः अर्घ।
सोरठा-पर प्रेरण निज काय, क्रोध सहित संरम्भ तज ।
चेतन मूरति पाय, शुद्ध काय प्रणमू सदा ॥ ९६ ॥
औ ही अकारितकायक्रोधर्मरंभशुद्धकापाय नमः अप ।
हर्षित शीश हिलाय, क्रोध उदय समरम्भमें ।
त्यागत भये अकाय, नमूसिद्ध पद भावयुत ।। ९७ ॥
ओं ही नानुमोदितफायक्रोधमरंभ अकायाय नमः अर्थ।
समारम्भ विधि मेटि, कायिक चेप्टा क्रोधकी।
स्वे गुणपर्य समेट, भक्ति सहित प्रणमू सदा ॥ १८ ॥

पंचमी पूजा सेनक पान ओ ही अकृतकायक्रोधसमारंभस्वान्वयगुणाय नमः अर्थ । दोहा-समारम्भ विधि क्रोध युत, तनसों नहीं कराय । नित प्रति रति निजभावमें, वंदू तिनके पाइ ॥ ९९ ॥ ओ ही अकारितकायक्रोधसमारम्भभावरतये नमः अर्ण। समारम्भ सो कायसों, क्रोध सहित परसंस। स्वे अभिन्न पद पाइयो, नमू त्याग सरवंस ॥ १० ॥ ओं हीं नानुमोदितकायक्रोधसमारम्भसान्वयधर्माय नमः अर्थ। कोधित कायारम्भ तजि, परसों रहित स्वभाव । शुद्ध द्रव्यमें रत नमू, निज सुख सहज उपाव ॥ १०१॥ ओं ही अकृतकायक्रोधारंभशुद्धद्रग्गरताय नगः अघ । कोधित कायारम्भ नहीं, रंच प्रपंच कराय । पंच रूप संसार हनि, नमू पंचमगति राइ ॥ १०२ ॥ ओहीं अकारितकागक्रोधारम्भसंमारछदकाय नमः अघ । कोधित कायारम्भमें, हर्ष विपाद विडार पंचमी पूजा पिपान अनेकान्त वस्तुत्य गुण, धरै नमों पदं सार ॥ १०३ ॥ ओही नानुमोदितकापकोधारम्भजैनधर्माय नमः अर्घ । मान सहित संरम्भकी, तनसो रचना त्याग । पर प्रवेश विन रूप निज, लियो नमू वडभाग ॥ १०४ ॥ ओं ही अकृतमानकायमरंभस्वरूपगुतये नमः अर्थ । मान उदय संरंभ विधि, तनसों नहीं कराय । निज कृत पर उपकार जिन, लियो नमूतिन पाइ ॥ १०५ ।। ओं हों अशारितमानकायमरम्भनिजकनये नमः अर्य। मान सहित संरंभमें, तिनसों हर्ष न लेश । ध्यान योग निज ध्येय पद, भावित नमू अशेश ॥ १०६ ।। ओ हो नानुमोदितमानकायमरंमध्येयभाषाय नमः अर्प । मदयुत तनसों रंच भी, समारंभ विधि नाहि । परमाराधन योगपद, पायो प्रणमूताहि ॥ १०७॥ ओं पतमानकापपमारंभपरमाराधनाय नमः अध।

मिद्धचक्र पंचमो जा विधान समारंभ निज कायसों, मदयुत नहीं कराय । ज्ञानानंद सुभाव युत,प्रणमूं शीश नवाय ॥ १०८ ॥ ओं ही अकारितमानकायसमारंभआनंदगुणाय नमः अर्थ । समारंभ मय विधि सहित, तनसों हर्ष न होय। निजानन्द नंदित तिन्हें, नमू सदा मद खोय ॥ १०९॥ औ ही नानुमोदितमानकायसमारंभस्वानंदनंदिताय नमः अर्घ अर्द्ध चौपाई। अकृत मानारम्भ शरीर, पर अनिंद्य वन्दू धर धीर ॥ ११ ॥ औ ही अकृतमानकायारम्भमंतोषाय नमः अर्थ । कायारम्भ अकारित मान, स्वसरूपरत वन्दु तान ॥१११(अ)।। ओ ही अकारितमानकायारम्भस्वसरूपरताय नमः अर्य । मानारम्भ अनंदित काय, प्रण विमल शुद्ध पर्याय ॥ ओ ही नानुमोदितकायारम्भशुरूपर्यायाय नमः अर्थ । १०. 4.

i मिद्धचक्र पंचमी पूजा विधान दोहा-मायायुत संरम्भ विधि, तनसों करत न आए। गुप्त निजामृत रस लहै, नमू तिन्हें तज पाप ॥ ११२ ।। ओं ही अकृतकायमायासंरम्भअमृतगर्भाय नमः अर्थ । मायायुत संरम्म वि.ध, तनसों नहीं कराय। मुख्य धर्म चैतन्यता, विनवै प्रण पाय ॥ ११३ ॥ ओह अकारितकायमायासंरम्भपतन्यताय नमः अर्थ । मायायुत संरम्भ मय. नानुमोदयुत काय । वीतराम आनंद पद, समरस भावन भाय ॥११४ ॥ ओ ही नानुमोदितकापमायासंरम्भसमरसीभावाप नमः अप। समारम्भ माया सहित, अकृत तन विच्छेद । वन्ध दमा स्वै पर द्विविधि, नमत नसे भव खेद ॥ ११५।। औही अतफापमापासमारम्मभवछेदकाय नमः अर्थ । समारम्भ तन कटिलसो. भए अकारित स्वामि । L 55 पंचमी पूजा पंचमी विधान 1955..' निज परिणति परिणमन विन, गुण स्वातंत्र नमामि ॥११६॥ औ ही अकारितकायमायासमारम्भस्वातंत्रधर्माय नमः अर्घ । नानुमोदि तन कुटिलता, समारंभ विधि देव गुण अनंत युत परिणमुं, धर्म समूही एव ॥ ११७ ॥ औ ही नानुमोदिनकायमापासमारम्भधर्मसम्हाय नमः अर्थ । मायायुत निज देहसों, नहीं आरम्भ करेह । परमातम मुख अक्ष विन, पायो वन्दू तेह ॥११८ ।। ओं ही अकृतकायमायारम्भपरमात्ममुखाय नमः अर्थ । मागारम्भ शरीर करि, परसों नहीं करान। निष्टातम स्वस्थित नमू, सिद्धराज गुणखान ॥ ११९ ॥ ही अकारितकायमायारम्भनिष्ठात्मने नमः अर्घ । मापारम्भ शरीरसों, नानुमोद भगवन्त । दर्शज्ञानमय चेतना, सहित नमें नित सन्त ॥ ११० ॥ १०३ IPIPE सिमका विधान पंचमी पूजा औ ही नानुमोदितापमापारम्भचेतनाय नमः अर्ग । अई पाडी मरम्भ चाह नहिं काययोग, चित परिणति नमि शुद्धोपयोग।१२१ ओ ही अमतकापलोभमरम्भपरमचितपरिणताय नमः अप । सरम्भ अकारित लोभ देह । निज आतम रत स्वसमेय तेह ॥ १२२ ॥ ओ ही अकारितकापलोभसंरम्भस्वममयरताय नमः अर्थ । संरम्भ लोभ तन हप नाश। नमि व्यक्त धर्म केवल प्रकाश ॥ १२३ ॥ * ही नानुमोदितकायलोभसंरम्मन्यक्तधर्माय नमः अर्थ । सोरठा-लोभी योग शरीर, समारम्भ विघि नाशके । ध्रुव आनन्द अतीव, पायो पूजू मिद्धपद ॥ १२४ ॥ ओ ही अछतरायलोभममारम्भनित्यमुसाप नमः यप । १०४ सिद्धचक्र नमो जा विधान ५ लोभ अकारित काय, समारम्भ निज कर्म हनि । पायो पद अकपाय, सिद्ध वर्ग पूजू सदा ॥ १२५ ।। ॐ ह्रीं अकारितकायलोभसमारम्भअकरायाय नमः अघ । पूरववत् नानन्द, परिग्रह इच्छा मेटिक । पायो शौच स्वछन्द, नमं सिद्धपद भक्ति युत ॥ १२६ ॥ ओं ही नानुमोदितकायलोभसमारम्भशीनगुणाय नमः अर्प । दोहा--काय द्वार आरम्भकी. लोभ उदय विधि नाश । नमो चिदातम पद लियो, शुद्ध ज्ञान परकाश ।। १२७ ॥ ओं ही अकृतलोभारम्भचिदात्मने नमः अप । काय द्वार आरम्भ विधि, लोभ उदय न कराय । निज अवलम्वित पढ़ लियो, नमूं सदा तिन पाइ ॥ १२८ ॥ ही अकारितकायलोभनिरालंबाय नमः अप । लोभी तन आरम्भमें, आनंद रीती मेंट । 35555555555555555555555555555555 १०५

मिद्धचक्र
पंचमी
पूजा
विधान
नम सिद्ध पद पाइयो, निज आतम गुण श्रेष्ठ ॥ १२६ ।।
ओं ह्रीं नानुमोदितकायलोभारम्भआत्मने नमः अप।
सवैया इकतीसा-जैते कछु पुदगल परमाणु शब्दरूप,
भये हैं अतीत काल आगे होनहार हैं।
तिनको अनन्त गुण करत अनन्तवार,
ऐसे महाराशी रूप धरै विसतार हैं।
सब ही एकत्र होय सिद्ध परमातमके,
मानो गुण गण उचरन अर्थ धार है।
तौभी इक
समयके अनन्त भाग आनंदको
कहत न कहें हम कौन परकार हैं।
ओ ही अष्टाविंशत्यधिकशतगुणयुक्तसिद्धेभ्यो नमः अर्थ।
१०८ बार जाप देना चाहिये।
१०६

विधान 55555555 अथ जयमाला। दोहा-गिरायुग मला भरिभर केवल निज आनंद कर. करन 31 मोहन जर मदन सदन मनका ना.नानि जय कपट सुभट पर नग्न भूर. जब योमर' पर परान लो अगन्न भिल, नित अन्यन्न विमल मोमिलान 2 : मगि दीप नार नियनयोति, सामाविका मोनोग। लोक्य गियर गजन पर यानि ॥३॥ मन मन्दिरको अन्धकार बार होना l नो मुलभ प ग निजाय जिनामा ॥

fort विधान जो फाप कालग होत सिद्ध, तुम छिन ध्यावत लहिये प्रसिद्ध । भवि पतितनको उद्धार हेत, हस्तावलम्ब तुम नाम देत ॥ ५॥ तुम गुण सुमिरण सागर अथाह, गणधर शरीर नहीं पार पाह । जो भवधि पार अभव्य रास, पावे न वृथा उद्यम प्रयास ॥६॥ जिन मुख ब्रहसों निकसी अभंग, अति वेग रूप सिद्धान्त गंग। नय सत भंग कल्लोल मान, तिहुँ लोक वही धारा प्रमान ॥ ७॥ सो द्वादशांग वाणी विशाल, ता सुनत पद्धत आनंद विशाल यानं जगमें तीरथ सुधाम, कहिलायो है सत्यार्थ नाम ॥८॥ सो तुम ही सो हे शोभनीक. नातर जल सम जु वहे सु ठीक । निजपर आतम हित आत्म भूत, जबसे है जब उतपत्ति सूत ।। ६ ॥ ज्यों महाशीत ही हिम प्रवाह, हे मेटन समरथ अगिन दाह । त्यों आप महामंगल स्वरूप, पर विधन विनाशन सहज रूप ॥ १०॥ । १०८

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1 पष्ठमी पूजा वेधान फुनि अन्त ही वेढ्यो परम सुर, ध्यावत ही अरि नागको। है केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो॥१॥ औ ही श्री मिद्धपरमेष्ठिने २५६ गुण सहित विराजमान अत्रापतरायतर संबोपट् आह्वाननं। अत्र निष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं । अब मम सन्निहितोभन भव वपट् सनिधीक० दोहा-सूदमादिक गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग। सकल सिद्ध सो थापहूं, मिटे उपद्रव योग ॥२॥ इति यंत्रस्थापन। अथाष्टका गीताछन्द। अति नम्रता तिहुं योगमें निज भक्ति निर्मल भावहीं। यह गुप्त जल प्रत्यक्ष निर्मल सलिल तीरथ लावहीं ॥ यह उभय द्रव्य संयोग त्रिभुवन पूज्य पूज रचावहीं। दै अर्द्धशत पट अधिक नाम उचार विरद सु गावहीं॥

विधान पूजा परमष्ठिने २५६ गुण सहित श्री समनणाण दंगण नीर्य मुहम- सद्धचक्र नहेब अवग्गहणं अगुरुलघुमन्यावाहं जन्मजरारोगविनाशनाय जलं ॥१॥ अति वास विषय न वासनायुत मलय शील सुभावहीं. अरु चन्दनादि सुगन्ध द्रव्य मनोग्य प्राशुक लावहीं । यह उभय० ॥ई अर्द्धशत पट०॥ ओं ह्रीं श्रीसिइपरमेष्ठिने २५६ गुण सहित श्री ममनणाणदंगण वीर्य मुहम- सदेव अवग्गहणं अगुरुलघुमन्यावाहं संमारतापविनाशनाय नन्दनं ॥ २ ॥ परिणाम धवल सुवर्ण अक्षत मलिन मन न लगावहीं. तिस सार अक्षत अखय खच्च सुवास पुंज बनावहीं। यह उभय द्रव्य संजोग त्रिभुवन पूज्य पूज रचाचहीं. द्व अर्ध शत पट अधिक नाम उचार विन्द सु गावहीं ॥ ॐ हीं श्रीसिद्धपरमेष्टिने दोसेछप्पन गुण माहित विराजमान श्रीममनणाणदंगण मत्तहेब अवग्गहणं अगुरुलघुमन्याचाहं अश्यपदप्राप्तये असतं निपामीति पाहा। फ्रजम इनक वेधान - फुनि अन्त ही वेढ्यो परम सुर, ध्यावत ही अरि नागको। है केहरि सम पूजन निमित, सिद्धचक्र मंगल करो॥१॥ पष्टमी ओं ही श्री मिद्धपरमेष्ठिने २५६ गुण सहित पिराजमान अनायतरायतर संवौषट् पूजा आहाननं। अत्र तिष्ठतिष्ठ ठः ठः स्थापनं । अत्र मम मन्निहितो भव भव वपट् सनिधीक० दोहा-सूक्ष्मादिक गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग। सकल सिद्ध सो थापहूं, मिटे उपद्रव योग ॥२॥ इति यंत्रस्थापनं । अथाष्टक। गीताछन्द। अति नम्रता तिहुं योगमें निज भक्ति निर्मल भावहीं। यह गुप्त जल प्रत्यक्ष निर्मल सलिल तीरथ लावहीं ॥ यह उभय द्रव्य संयोग त्रिभुवन पूज्य पूज रचावहीं। है अर्द्धशत पट अधिक नाम उचार विरद सु गावहीं॥

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मद्दचक्राम पष्टमी पूजा विधान मन पाग भक्त्यनुराग आनंद तान मालपुरावही । निम भाग कुसुम मुहाग अर सुर नागवास सु लावही ॥ यह उभय० । अर्द्धशत पट०॥ आ ही बीपि द्वापरमप्टिने दोमछप्पन गुण सहित श्री समनणाण दंगण वीर्य मुहमन हवाग्गहण अगुगलपमन्यावाह कामवाणविनाशनाय पुष्पं निर्यपामि स्वाहा । जिन भक्ति रममें तृप्तता मन आन स्वाद न चावही । अंतर चम वाहिज मनोहर रसिक नेवज लावही ॥ यह उभय० । द्वे अर्द्ध शत पट०॥ 3. हा श्रामिह परमपिन २५६ गुण महिन श्री समनणाण देसण पीर्य मुह- मनहब अवगहाण अगुमरयमव्यापाई क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० ॥ ५॥ मरधान दीप प्रदीप्त अंतर मोह तिमिर नशायही। मणिदीप जगमग ज्योति तेज सुभास भेट धरावही ॥ HEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEP यह उभय० अदनात Tra -- पष्टमी ओ ही श्रीगिदपरमेष्टिने २५६ गुण महिन श्री गमनमाण दंगा वीर्य मुहमा मिडना नहेर अगरगहणं अगुम्लघुमनामाई गाहांधकाशीनामनार दीपं निः ॥६॥ आनन्द धर्म प्रभावना मन घदा धून सु डावहीं । विधान गंधित दरव शुभ प्राण प्रिय अति अग्नि संग जगवहीं॥ यह उभय द्रव्य संयोग त्रिभुवन पृच्च पृज ग्वाही आई। 3. ही श्रीगिद्धपरमेष्ठिने २५६ गगनहिन श्री गमनमान दंगा नी मुहम- नहेय अग्गाणं अगुरुलामन्यावाई अष्टकमंदानाय निर्वामीनि पाहा ॥७॥ शुभ चितवन फल विविध रंग युत भक्ति का उपजावही। रसना लुभावन कल्पतम्के सुर असुर मन भावही॥ यह उभय द्रव्य मंयोग त्रिभुवन पृज्य प्रज ग्वायही अ॥ ही श्रामिद्धपरगेप्लिने २५६ गुणमाहिन श्री ममनमा दंगा वीग गुहम- तहेय अवग्गहणं अगुरुनगुमनाचा मोक्ष प्रापये पलं निवामीनि मगहा ।। ८॥ * "कला नग्गी पिच आर गुलाल कमग्य नावही" पला पाट 'क' प्रनिमें है। ११ पष्ठमी पूजा महगा 'विधान 1-1-1-.---.-..- मन पाग भक्त्यनुराग आनंद तान मालपुरावही। तिस भाग कुसुम सुहाग अर सुर नागवास सु लावही ॥ यह उभय० । द्वे अर्द्ध शत पट० ।। औ ही श्रीमिद्धपरमेष्टिने दोमैडप्पन गुण सहित श्री समत्तणाण दंगण वीर्य गुहमनहेवअपग्गहणं अगुल्लामन्चावाहं कामवाणविनाशनाय पुप्पं निर्यपामि स्वाहा । जिन भक्ति रसमें तृप्तता मन आन स्वाद न चावही । अंतर चरू वाहिज मनोहर रसिक नेवज लावही । यह उभय० । द्वे अर्द्ध शत पट०॥ ॐ श्रीसिद्धपरमेष्टिने २५६ गुण सहित श्री समत्तणाण देसण वीर्य सुह- मत्तहेर अवग्गहणं अगुरुलघुमन्याराहं सुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० ॥५॥ सरधान दीप प्रदीप्त अंतर मोह तिमिर नशावही । मणिदीप जगमग ज्योति तेज सुभास भेट धरावही । यह उभय०।३ अर्द्ध शत पट०॥ ११२ 为期5万 पी विधान ११५ मुनि ध्येय सेय अभेय चाहूं. गुणगेह यो हम शुभमनो1?! ओ ही गमी मिट्टाणं सिद्धनकाधिपतये संमतमाणादि अगुगाणं पूणार अथ २५६ गुण सहित नामावली अर्घ । चौपाई--मिथ्यातम कारण दुखकारा, नित्य निरंजन विधि संमारा । तिस हनि समरथ अतिशय रुपा, केवल पाय नम शिव भूपा ॥१॥ ॐ ही चिरतरसंगारकारणाननिर्द्धनो न केवलवानातिगरपन्नार पिदाधि- पतये नमः अथा मन इंद्रियनिमित मति ज्ञाना, योग देश निष्टत पद जाना। क्षय उपशम आवर्ण विनाशो. नमो सिद्ध बज्ञान प्रकाशो॥२॥ औ ही अभिनिरोधवारकविनाशकाय अयं । द्वादश अंगरूप अज्ञाना, श्रुत आवरणी भेद वखाना । क्षय उपशम आवर्ण विनाशो, नमो सिद्ध, बलान प्रकाशो ॥ ३ ओ ही द्वादशांगश्रुतावरणीकर्म विमुक्ताय नमः अब । म पष्ठी पूजा चक्र -- रधान है असंख्य लोकावधि जेते, अवधिज्ञानके भेद सु तेते। क्षय उपशम आवर्ण विनाशो. नमो सिद्ध खज्ञान प्रकाशो ॥४॥ ओं ही असंख्यभेदलोक अपितानापरणीविमुक्ताय नमः अघ । हे असंख्य परमान प्रमाना, मनपर्ययके भेद वखाना । क्षय उपशम आवर्ण विनाशो. नमो सिद्र वज्ञान प्रकाशो ॥ ५ ॥ ओ हो अमग्या कारमनःपर्णयवानावरणीकर्म यिमुनाय नमः अर्प। निखिल रूप गुणपर्यय ज्ञानं. सत स्वरूप प्रत्यक्ष प्रमानं । केवल आवर्णो विधि नाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥६॥ ॐ निसिलरूपगुगपर्यायरोधकालज्ञानावरगचिमुकाय नमः अर्थ । द्वारपती भूपतिके ताई, रोक रहे देखन दे नाहीं । सोई दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥७॥ औ ही मालदर्शनारगोकर्मविनाशकाय नमः अर्प। मूर्तीक पदको प्रनिभासन, नेत्र द्वार होवे परकाशन । 199355555555555555 " गिद्धचक्र विधान 355 पष्ठमी पूजा चक्षु दर्शनावरण विनाशो, नमो त्वज्ञान प्रकाशो॥ ओ ही चक्षुर्दर्शनावरणकर्मरहिताय नमः अर्थ । गविन अन्य इन्द्री मन द्वारे. वस्तुरूप सामान्य उघारे । अग दर्शनावरणविनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥ ६ ॥ ओ ही अचक्षुर्दर्शनावरणकर्मरहिताय नमः अर्घ । देशकाल द्रव भाव प्रमानं, अवधि दर्श होवे सब ठानं । अवधि दर्श आवरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥ १० ॥ ओ ही अवधिदर्शनावरणरहिताय नमः अर्घ । विन मर्याद सकल तिहु काल, होय प्रगट घटपट तिहं हाल । केवल दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥ ११ ॥ ॐ हीं केवलदर्शनावरणरहिताय नमः अर्थ । बैठे खड़े पड़े घुम्मरिया, देखे नहीं निद्राकी विरिया। निद्रा दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो । ज । पष्टमी पूजा विधान 15555555 ओ ही निद्राम्महिनाय नमः । सारधान कितनी की जाये, रंच नेत्र उघड़न नहीं पात्र । निदा निद्रा कर्म रिनाशी, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥ १३ ॥ ॐो निद्रानिद्रामरहिताय नमः अप। मंदरूप निद्रामा आना, अबलोके जाग्रतहि समाना । प्रचला दर्शनावरण विनाशो, नमो सिद्ध स्त्रज्ञान प्रकाशा ॥ १४ ॥ ॐ हीं प्रचलार्मरहिताय नमः अर्थ । मुग्वसों लार यह अति भारी, हस्त पाद कंपत दुग्यकारी । प्रचला प्रनला वर्ण विनाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥ १५ ॥ ओ ही प्रचलाप्रचलाफर्मरहिताय नमः अर्थ । सोता हुआ कर सब काजा, प्रगटाचे प्राकर्म समाजा। यह स्त्यानधि विधि नाशो, नमो सिद्ध स्वज्ञान प्रकाशो ॥१६॥ ओ ही ज्यानगृहिकमरहिनाय नमः अपं । - पष्ठम पूजा जे पदार्थ है इन्द्रीय योग, ते सव वेदे जिय निज जोग। मिद्धचक्र सोई नाम वेदनी होई, नमूं सिद्ध तुम नासो सोई ।। १७। । विधान ओ ही वेदनीकर्मरहिताय नमः अर्थ । रतिके उदय भोग सुखकार, भोगे जिय शुभ विविध प्रकार ११६ माना भेद वेदनी होय, नमं सिद्ध तुम नाशो सोय ॥ १८॥ आ ही सातावेदनीकर्मरहिताय नमः अर्घ । अरति उदय जिय इन्द्री द्वार, विषयभोग वेदे दुखकार । एही भेद असाता होय, नम सिद्ध तुम नाशो सोय ॥ १६ ॥ आ ही असातावेदनीकर्मरहिताय नमः अर्थ । ज्यों असावधानी मदपान, करत मोह विधितें सो जान । ता विधि करि निज लाभ न होय, नमूं सिद्ध तुम नाशो सोय॥ आ ही मोहकर्मरहिताय नमः अर्घ । जाके उदय तत्व परतीत, सत्य रूप नहीं हो विपरीत । ११६ सिद्धचक्र - पधर्म पूजा I विधान १२२ देशवती श्रावक नहीं होत है, वक्रताको जहं उद्योत है। है प्रत्याख्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमू तिन नासियो ॥३०॥ थों ही अप्रत्याख्यानावरणमायाविमुक्ताय नमः अर्थ । मोह लोभ चरित जे जिय वसे, देशवत श्रावक नहीं ते लसै। है अप्रत्याख्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नम तिन नासियो॥३१॥ ओं ही अप्रत्याग्ग्यानापरणलाभविमुक्ताय नमः अर्थ अडिल-प्रत्याख्यानी क्रोध सहित जे आचरे, देशवती सो सफल ल व्रत नाहीं धरें। चारित मोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो में नमूं सिद्ध शिवधाम है ॥ ३२॥ आं ही प्रत्यारगानीकोधविमुनाय नमः अर्थ । प्रत्याख्यानभिमान महान न शक्ति है, जास उदय पूरणसंयम अव्यक्त है। चारित मोह सु प्रकृति रुप तिह नाम है, नाश कियो० ॥३३॥ 1-1-1-1-1-1-1-1-1- १२८

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मिम 1-1-1-1-1-1- पप्ठमी पूजा पिधान 55555555555555555 देशमती श्रावक नहीं होत है, वक्रताको जहं उद्योत है। है प्रत्याग्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नम तिन नासियो ॥३०॥ ओहरी अप्रत्याख्यानापरणमायारिमुक्ताय नमः अथ । मोह लोभ चरित जे जिय वसे, देशवत श्रावक नहीं ते लसै। है अप्रत्याग्यानी कर्म सो. भये सिद्ध नमूं तिन नासियो॥३१॥ ओ ही अप्रत्याग्व्यानावग्णलीभविमुक्ताय नमः अर्थ । दिल-~-प्रत्याख्यानी क्रोध सहित जे आचरे, देशवती सो सफल व्रत नाहीं धरें। चारित मोह मु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो में नम सिद्ध शिवधाम है ॥ ३२॥ ओ ही प्रत्याख्यानीकोपविमुक्ताय नमः अर्थ । प्रत्याग्यानभिमान महान न शक्ति है, जास उदय पूरणसंयम अव्यक्त है। चारित मोह सु प्रकृति रूप निह नाम है, नाश कियो० ॥३३॥ १२२

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। सिद्धचक पष्ठमी ने विधान १२२ देशवती आवक नहीं होत है, वक्रताको जहं उद्योत है। है प्रत्याख्यानी कर्म तो, भये सिद्ध नमू तिन नासियो ॥३०॥ ओं ही अप्रत्याख्यानावरणमायाचिमुक्ताय नमः अप । मोह लोभ चरित जे जिय वसे, देशवत श्रावक नहीं ते लसै। है अप्रत्याख्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमूं तिन नासियो॥३१॥ ओं दी अप्रत्याख्यानापरणलोभविमुक्ताय नमः अर्घ । अडिल-प्रत्याख्यानी क्रोध सहित जे आचरे, देशवती सो सकल व्रत नाहीं धरें। चारित मोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो में नमूं सिद्ध शिवधाम हे ॥ ३२॥ ओ ही प्रत्यारगानीक्रोधविमुक्ताय नमः अर्थ । प्रत्याख्यानभिमान महान न शक्ति है, जास उदय पूरणसंयम अव्यक्त है। चारित मोह मु प्रकृति रुप तिह नाम है, नाश कियो० ॥३३॥ १२२ .. विधान पष्ठमी पूजा प्रत्याख्यानावरणमानरहिताय नमः अघं । मिद्धनका प्रत्याख्यानी माया मुनि पदको हतै,श्रावक वृत पूरण नहीं खण्डे जासते। चारित मोह सु प्रकृति रूग तिह नाम है, नाश कियो० ॥ ३४॥ ओं ही प्रत्याख्यानावरणमायारहिताय नमः अर्थ । श्रावक पदमें जास लोभको वास है। प्रत्याख्यानी श्रुतमें संज्ञा तास है। चारित मोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो० ॥३५॥ ओ ही प्रत्याख्यानावरणलोभरहिताय नमः अर्थ । भुजगप्रयात छन्द । यथाख्यात चारित्रको नाश कारा, महावत्तको जासमें हो उजारा । यही संज्वलन क्रोध सिद्धांत गाया, नमूं सिद्धके चरण ताको नसाया।३६ ओं ही संज्वलनावरणकोधरहिताय नमः अर्घ । रहे संज्वलन रूप उद्योत जेते, न हो सर्वथा शुद्धता भाव तेते । यही संज्वलन मान सिद्धांत गाया, नमूं सिद्धके चरणताको नशाया ओं दी संज्वलनमानरहिताय नमः अर्घ । १२३ - 1 मिलनक पप्ठमी पूजा विधान अघ 5555555555555555555 देशवती श्रावक नहीं होत है, वक्रताको जहं उद्योत है। है प्रत्याख्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमं तिन नासियो ॥३०॥ ओं ही अप्रत्याख्यानावरणमायाविमुक्ताय नमः अघ । मोह लोभ चरित जे जिय वसे, देशवत श्रावक नहीं ते लसै। है अप्रत्याख्यानी कर्म सो, भये सिद्ध नमूं तिन नासियो॥३१॥ ओं दी अप्रत्याख्यानावरणलोभविमुक्ताय नमः अटिल-प्रत्याग्न्यानी क्रोध सहित जे आचरे, देशवती सो सकल व्रत नाहीं धरें। चाग्नि मोह सु प्रकृति रूप तिह नाम है, नाश कियो में नमूं सिद्ध शिवधाम है ॥ ३२॥ आं ही प्रत्याख्यानीकोधविमुक्ताय नमः अर्थ । प्रत्याख्यानभिमान महान न शक्ति है, जासउदय पूरणसंयम अव्यक्त है। चारित मोह मु प्रकृति रुप तिह नाम है, नाश फियो० ॥३३॥ १२२

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मिद्वन
पठो
पूजा
विधान
१२६
5555555
ओ हो जुगुप्साकर्मरहिताय नमः अर्ध ।
जो नर नारि रमावनकी, निजसों अभिलाप धरै मनमाहीं,
सो अति ही परकाश हिये नित, कामकी दाह मिटे छिन नाहीं।
सो जिनराज वखान नपुंसक, वेद हनो विधिके वश ऐसो,
हे भगवंत ! नम तुमको तुम जीति लियो छिनमें अरि तेसो ।
ओं ही नपुंसकवेदरहिनाय नमः अर्थ ।
जो निय संग रमें विधि यो मन, औरनसे कछु आनन्द माने ।
किंचित् काम जगे उरमें नित, शांति सुभावनकी शुधिठाने ।।
सो जिनराज वखानत है नर, वेद हनो विधिके वश ऐसो।
हे भगवन्त ! नम तुमको तुम, जीत लियो छिनमें अरि तेसो ॥
औ ही पुरुषवेदरहिनाय नमः अर्थ ।
जो नर संग रमें सुग्व मानत, अन्तर गूढ न जानत कोई ।
हाय दिलाम हि लाज धरै मन, आतुरना करि तृप्त न होई ।।
1959
१२६

SH)
पूष्ठमी
"चक्रः
पूजा
धान
१२७
सो जिनराज बखानत है तिय, वेद हनो विधिक वश एसा ।
हे भगवन्त नमूं तुमको तुम, जीति लियो छिनमें अर तैसो॥४८
ओ ही स्त्रीवेदरहिताय नमः अर्ध ।
वसंततिलका छन्द ।
आयु प्रमाण दृढ वन्धन और नाहीं, गत्यानुसार थिति पूरण कर्ण नाही।
सोई विनाश कीनो तुम देव नाथा, वंदू तुम्हें तरण कारण जोरहाथा॥
ओं ही आयुकर्मरहिताय नमः अघ ।
जो है कलेश अवधी सव होतजासो,तेतीस सागर रहै थिति नर्कतासो।
सोई विनाश कीनो तुम देव नाथा,वेदूतुम्हें तरण कारण जोर हाथा॥
ओं ही नरकायुरहिताय नमः अघ ।
याही प्रकारजितने दिनदेव देही, नासैअकाल नहि जे सुर ओयुसे ही।
सोई विनाश कीनो तुमदेव नाथा,वंदू तुम्हें तरण कारणजोर हाथा ॥
औ ही देवापुरहिताय नमः अघ ।
जासो करै त्रिजगकी थितिआउ पूरी,सोई कहो त्रिजगआयु महालपुरी।
१२७

पष्टमी 151, FFLIF55 । 15555555556" माईविनाशकांनो तुम देवनाधा,पं तुम्हें नग्ण कारण जार हाधा। ५२। श्री विनापुरहिताय नमः अप । जननरापुविधिक रस आपनाको,ते ते प्रजाय नर रूप भुगाय ताका । साई विनास कोनों तुम देवनाथा,वंदू तुम्हें तरण कारण जोर हाथा ।। ओही मनुष्पापुरहिताय नमः । पड़ी छन्द-जो करे जीवको बहुप्रकार,ज्यों चित्रकार चित्राम सार। मा नाम कर्म तुम नाश कीन, में नम मदा उर भकिलोन ५४ आहा नामकमहिनाय नमः अब । जामा उपजे नियंच जीत. रहै ज्ञान हीन निर्मल सदीय । मा नियंचगति तुम नाश कीन ॥ में नम सदा॥ ५५॥ ही निर्यचमनिरहिताय नमः अयं । जा उदय नारकी देह पाय, नाना दुख भाग न जाय । मा नरंगती तुम नाश कीन ।। म नमू मदा० ।। ५६ ।। श्री नरंगनिहिनाय नमः । .. . १२८

95
पष्ठमी
सिद्धचक्र
(.
55
विधान
१२६
चउ विधि सुरपद जासों लहाय, विषयातुर नित भोगे उपाय ।
सो देवगती तुम नाश कीन । मैं नमू० ॥ ५७ ।।
ओ ही देवगतिकर्मरहिताय नमः अप
जा उदय भये मानुष्य होत, लहै नीच ऊच ताका उद्योत ।
सो मानुप गति तुम नाश कीन,
तुम नाश कीन, मैं नमूं सदा उर भक्ति लीन ।५८
ओं दी मनुष्यगविरहिताय नमः अर्थे ।
कामिनीमोहन छन्द।
एक ही भाव सामान्यका पावना, जीवकी जातिका भेद सोगावना ।।
होत जो थावरा एक इंद्री कहो, पूज हूं सिद्धके चरण ताको दहो॥
ओं ही एकइन्द्रीजातिरहिताय नमः अघ ।
फर्स के साथमें जीभ जो आमिलें, पायसों आपने आप भूपर चलें।
गामिनी कर्म सो दोय इन्द्री कहो, पूजहूं सिद्धके चरणताको दहो ।
औ ही दोइन्द्रीजातिरहिताय नमः अर्घ ।
१२६
६

PIMIRIPTA मदनक पष्टमी विधान BHEES5555555555555555 नाक हो और दो आदिके जोड़में, हो उदय चालना योगसों दोलमें। गामिनी कर्म सो तीन इन्द्री कहो, पूजहूं सिद्धके चरणताको दहो६१ ओ ही बीइन्द्रियजानिरहिताय नमः अप । आंग्व हो नाक हो जीभ हो फर्श हो, कानके शब्दका ज्ञानजामेनहो। गामिनी कर्म सो चार इन्द्री कहो, पूज९० ॥ ६२ ॥ आ ही चतुरिद्रियजातिरहिताय नमः अर्घ । कान भी आमिले जीभ जा जातिमें, हो असंझी सुसंज्ञी यह दोभांतिम। गामिनी कर्मकी पञ्च इन्द्री कहो, पूजहूं० ।। ६३ ।। ओ ही पंचन्द्रियज्ञाविरहिताय नमः अर्ध । छन्द लावनी-हो उदार जो प्रगट उदारिक, नाम कर्मकी प्रकृति भनी, लहै औदारिक देह जीव तिस, कर्म प्रकृतिके उदय तनी। भय अकाय अमूरति आनन्द, पुंज चिदातम ज्योति धनी, नमं तुम्हे कर जोर युगल तुम, सफल रोगथल काय नी ।६।। ही औदारिकशरीरयिमुनाप नमः ।

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नूतन कारण करण मल तन, कारमाण तिस नाम फहें । भए अज्ञाप० ॥ नमूं तुम्हें० ॥६॥ ओही कारमाणशरीरहिनाप नमः अप । i पप्ठमी सरपा पूजा विधान १३२ जेते परेशा तन वीच आयें, सारे मिलें जोड़ न छिद्र पावें । संघात नामा जिय देह जाना, पूजूं तुम्हें सिद्ध यह कर्म भानो।६९। औही औदारिफमपातरहिनाप नमः अर्ग ऐसे प्रकारा तनमें अहारा, संघी मिलाया करवेतसारा । संघात नामा जिय देह जानो, पूजूं तुम्हें सिद्ध यह कर्म भानो ७०। ओही पाहारकर्मपातरहिताय नमः अर्ण। पेक्रियके जोड़ जो होत नाही, संघातनामा जिन पेन माहीं। संघात नामा जिप देह जानो, पूजू तुम्हें सिद्ध यह कर्म भानो ७१। utti ammunारिताय नम: । १३२ मिहन नेजम्मक, अन पंग मारे संधी मिन्दागा नियमांहि पारे। मंघान नामा जिय ह जानो पक्ष में मिद गह कम भानो १२॥ ॐ नमानम मा प्रानादि आवाजो कम काया. नाको मिलाया अन मारि गाय म्यान नामा विग देह जाना. पूनं तमिन्द्र र कम भानो ।७ विधान ३३ 55555555555555555 नाबाला कन्द-पदगर गया जाग.ने जब जिय करत अहारा। प्राचार निनको एकत्र कार, वंच उदर अनुमाग ।। प्रोदारक बन्धन तुमने. बेर फिर निस्वारा। भी अवध अकाय अन्यम. जज भतिउर पारा॥७॥ नारनमः वक्रिया नन परमाणु मिन्न. 'राम्ग अनिवाग। हो म्कन्ध गप पाई, पह मन परकारा॥ वक्रियिक ननु चन्धन तुमने. कियो निरधारा॥ भए । 155555555515saliintinshnin या सिद्धचक्र पूछनी पूजा . विधान यह FASTEFF5555555555nn. कुन्ज नाम संस्थान ताहि वरण जिन वानी। यह विपरीत० ॥ वीजभूत कल्याण ॥८२॥ औ ही कुञ्जकनाममंस्थानरहिताय नमः अर्थ । लघुसा लघु ठिगना रूप एम तन होवे जाको, वामन है परसिद्ध लोकम कहिये ताको। विपरीत स्वरूप त्याग, पायो निजात्म पद, वीजभूत कल्याण नमू, भव्यनि प्रति सुखप्रद ॥३॥ औ ही वामनमंस्थानरहिताय नमः अप । जिततित बहु आकार कहीं नहिं हो यक सारू, हुंडक अति असुहावन पाप फल प्रगट उघारू । यह विपरीत० ॥ पीजभूत कल्याण ॥४॥ ओं ही टुंडकर्मस्थानरहिताय नमः अप । लक्ष्मीधरा छन्द-जीव आप भावसों जु कर्मकी क्रिया करत, अन्न वा उपङ्ग सो शरीरके उदय समेत ।

मिद्धचक्र विधान १३७ पष्ठमी पूजा सो औदारिकी शरीर अंग वा उपंग नाश, सिद्धरुप हो नमो सुपाइयो अबाध वास ॥८५।। ओ ही औदारिकआङ्गोपांगरहिताय नमः अघ । देव नारकी शरीर मांस रक्तसे न होत, तासको अनेक भांति आप देसकै उयोत । वैक्रियिक सो शरीर अंग वा उपंग नाश, सिद्धरूप हो नमो.सु पाइयो अवाध वास ॥८६॥ ओ ही क्रियिकांगोपांगरहिताय नमः अर्घ । साधुके शरीर मूलतें कड़े प्रशंस योग, संशयको विध्वंसःकार केवली सुलेतभोग । आहारक सो शरीर अंग वा उपंग नाश सिद्ध रूप हो नमो सु पाइयो अबाध वास ।।८।। ओंदी आहारकआंगोपांगरहिताय नमः अर्थ १३७ पष्ठमी मिक विधान पूजनी पूजा E PIPPIPP कुन्ज नाम संम्धान ताहि यरणें जिन वानी। यह विपरीत०॥ योजभूत कल्याण ॥४२॥ वृजनामसंस्थानरहिताय नमः अयं । लघुसा लघु ठिगना रूप एम तन होवे जाको, वामन है परसिद्ध लोकमें कहिये ताको। यह विपरीत स्वरूप त्याग, पायो निजात्म पद, वीजभूत कल्याण नमू, भव्यनि प्रति सुखप्रद ॥३॥ ओही वामनसंस्थानरहिताय नमः अघ । जिततित पहु आकार कहीं नहिं हो यक सारू, इंडक अति असुहावन पाप फल प्रगट उघारू । यह विपरीत. ॥ वीजभूत कल्याण ॥४॥ ओ हो एंडक स्थानरहिताय नमः अप । लक्ष्मीपरा छन्द-जीव आप भावसों जुकर्मकी क्रिया करेत, अन वा उपर सो शरीरके उदय समेत ! ७ सिद्धचक्र विधान १३७ पटमी सो औदारिकी शरीर अंग वा उपंग नाश, सिद्धरुप हो नमो सुपाइयो अवाध वास ॥८५।। ओं ही औदारिकआरोपांगरहिताय नमः अघ । देव नारकी शरीर मांस रक्तसे न होत, तासको अनेक भांति आप देसके उयोत । वैक्रियिक सो शरीर अंग वा उपंग नाश, सिद्धरूप हो नमो सु पाइयो अवाध वास ॥८६॥ ओं ही क्रियिकांगोपांगरहिताय नमः अघ साधुके शरीर मूलतें कड़े प्रशंस योग, संशयको विध्वंसःकार केवली सुलेतभोग । आहारक सो शरीर अंग वा उपंग नाश सिद्ध रूप हो नमो सु पाइयो अबाध वास ।।८७॥ ओंदी आहारकआंगोपांगरहिताय नमः अर्थ 2300 गिरका पष्ठमी पूजा विधान १४० 1-1-1-1-1-1- यह त्याग कन्ध अवन्ध निवसो परम आनंद धार हो ॥२३॥ स्फाटिकसंहननरहिताय नमः अब । रोहा-वर्ण विशेषण स्वेत है, नामफर्म तन धार। स्वच्छ स्वरूपी हो नम, ताहि कर्मरज टार ॥ ९४ ॥ ॐ नामस्मरहिताय नमः अर्प। वर्ण विशेषन पीत है, नामकर्म तन धार ॥ स्वर० ॥९५ * पीतनामकर्मरहिताय नमः अब वर्ण विशेषन रक्त है, नामकर्म तन धार ।।। स्वच्छ स्वरूपी हो नम, ताहि कर्मरज दार ।। ॐ रक्तनामफर्मरहिवाय नमः अपं । वर्ण विशेषन हरित है, नामकर्म तन धार ।। स्वच्छ० ॐ हरितनामकर्म रहिवाय नमः अपं । वर्ण विशेपन कृष्ण हैं, नामकर्म तन धार ।। स्वच्छ० ॥ ॐ प्णनामकर्मरहिताय नमः अर्य। १४० ---

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सिहपक पष्टमी पूजा विधान ही कापरसरहिताप नमः अयं । फर्स विशेषन नर्म है, नामकर्म तन धार ॥ स्वच्छ० ॥ १०६ ॥ ॐ मृदुत्वस्पर्शरहिताय नमः अर्थ । फर्स विशेषन कठिन है, नामकर्म तन धार ॥ स्वच्छ० ।। १०७॥ *ही कठिनस्पर्शरहिताय नमः अर्थ । फर्स विशेषन भार हे, नामकर्म तन धार ॥ स्वच्छ० ॥ १०८ ।। * गुरुस्पर्शरहिताय नमः अर्थ । फर्स विशेषन अगुर है, नामकर्म तन धार ।। स्वच्छ० ॥ १०९ ।। ॐही लपुस्पनरहिताय नमः अर्थ । फर्स विशेपन शीत है, नामकर्म तनधार ॥ स्वच्छ० ॥ ११०॥ अही शीतस्पर्शरहिताय नमः अर्थ फर्स विशेषन उष्ण है, नामकर्म तन पार ।। स्वच्छ० ॥ १११॥ ॐही उष्णस्पर्शरहिताय नमः अर्प। फर्स विशेषण चिकण है, 'नामकर्म तन.पार ॥ स्वच्छ० ।। ११२॥ १४२

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सिरप पष्ठमी पूजा विधान STREEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEY विमहसौ चालमें अन्तरालमें धरें पूर्व आकार । सो देव नाम करि गावत० ॥ तुम ताहि नशायो० ॥ ११६ ।। ॐ दी देवगत्यानुपूर्वी विमुक्ताय नमः अर्थ । हो मिश्र प्रणामी वा शिवगामी वरै मनुष्यगति सार, विग्रहसों चालमें अन्तरालमें धरै पूर्व आकार । सो मनुष्य नाम करि गावत० ॥ तुम ताहि नशायो० ॥११७॥ ॐ ही मनुष्यगत्यानुपूर्वीविमुक्ताय नमः अप छन्द प्रोटक। तनभार भए निज घात ठने, तिसकी कछ विधि ऐसी जु बने । अपघात सुकर्म सिद्धांत भनों, जग पूज्य भए तसु मूल इनों ॥११॥ *ही अपपातकमरहिवाय नमः अर्घ विप आदि अनेक उपाधि घरे, पर प्राणनिको निर्मूल कर। परघाति सु कर्म सिन uat. An a man m. .... १४४

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सिद्धचक्र विधान पष्ठो पूजा ॐ ही विहायोगतिकर्मविमुक्ताय नमः अर्थ । इक इन्द्रिय जात विरोध मई, चतुरांति सुभावक प्राप्त भई । उस नाम सु कर्मसिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तिस मूल इनो॥१२४ ॐ हीं अमनामकर्मयिमुक्ताय नमः अर्घ । इक इन्द्री जातहि पावन हैं, अरु शेप न ताहि घरावत हैं। यह थावर कर्म सिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तिस मूल हनो ॥१२॥ ॐ ही थावरनामकमरहिताय नमः अर्थ । परमें परवेश न आप करें, परको निजमें नहिं थाप धरै । यह वादर कर्म सिद्धांत भनो, जग पूज्य गये तिस मूल हनो॥१२॥ ॐ ही वादरनामकर्मरहिताय नमः अर्प। जलसों दवसों नहीं आप मरे, सब ठौर रहै परको न हरै। यह सूक्षम कर्मसिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तिस मूल इनो ॥१२७॥ औही यामनामकर्मरहिताय नमः अप ।

11 सिक विधान 95555555 पठो पूजा १४६ ही विहायोगतिकर्मविमुक्ताय नमः अर्घ । इक इन्द्रिय जात विरोध मई, चतुरांति सुभावक प्राप्त भई । बस नाम सुकर्मसिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तिस मूल इनो॥१२४ ॐही असनामकर्म विमुक्ताय नमः अर्थ। इक इन्द्री जातहि पावत हैं, अरु शेप न ताहि घरावत हैं। यह थावर कर्म सिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तिस मूल हनो ॥१२॥ ॐदी पावरनामकर्मरहिताय नमः अर्प। परमै परवेश न आप करें, परको निजमें नहि थाप धरें। यह वादर कर्म सिद्धांत भनो, जग पूज्य गये तिस मूल हनो॥१२६॥ ॐ ही वादरनामकर्मरहिताय नमः अर्प। जलसों दवसों नहीं आप मरे, सब ठोर रहै परको न हरे। यह सूक्षम कर्मसिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तिस मूल हनो ॥१२७॥ समानामam .nt REARRESTER १४६. .

सिद्धचक्र पठ पूजा विधान १४८ इह भेद निगोद सिद्धांत भनो, जग पूज्य भये तसु मूल हनों ।१३२ ॐ ही साधारणनामकर्मरहिताय नमः अघं। उपेन्द्रवज्रा छन्द । चले न जो धातु तजै न वासा, यथाविधी आप धरै निवासा । यही प्रकारा थिर नाम भासो, नमामि देवं तिस देह नासो ।।१३३ ॐ ही स्थिरनामकर्मरहिताय नमः अर्घ । अनेक थानं मुख गौण घातं, चलंति धारं निजवास धातं । यही प्रकारा थिर नाम भासो, नमामि देवं तिस देह नासो॥१३४ ॐ ही अस्थिरनामफर्मरहिताय नमः अर्घ । यथाविधी देह विलास सोहै, मुखारविंदादिक सर्व मोहैं । यही प्रकारा शुभ नाम मासो, नमामि देवं तिस देह नासो १३५। * ही शुभनामकर्मरहिताय नमः अर्ध । असुन्दराकार शरीरमाही, लखों जहासों विटरूप ताही J-

.
पूजा
999
विधान
१४६
यही प्रकारा अशुभ नाम भासो, नमामि देवं तिम देह नासो १३६
ॐ हीं अशुभनामकर्मरहिताय नमः अर्थ ।
अनेक लोकोत्तम भावधारी, करें सभी तापर प्रीति भारी।
सुभगताको यह भेद भासो, नमामि देवं तिस देह नासो ॥१३७
ॐ हीं मुभगनामकर्मरहिताय नमः अर्थ ।
धरें अनेका गुण तोन जासों, करें कभी प्रीति न कोई ताम।
दुर्भाग ताको यह भेद भासो, नमामि देवं निम देह नासो ।१३८
ॐ हीं दुर्भगकर्मरहिताय नमः अर्थ ।
पद्धडी छन्द।
ध्वनि वीन भांति ज्यों मधुर वैन, निसरै पिक आदिक सुरस दैन ।
यह सुस्वर नामा प्रकृति कहाय, तुम हनों नमूं निज सीस लाय 1.
ॐ दी मुस्वरनामकर्मरहिताय नमः अध।
गर्दभस्वर जैसो कहो भास. तसो रव अशुभ कहो सु भास ।
१ अस्पष्ट भूतवानी समान, असुहावन भयंकर शुन्द जाना ऐसा पाठ "क" प्रतिमें है
१४३
फफफफफ्र

सिद्धचको विधान पूजी १५२ ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हें हम अघ दहो ॥११५॥ ओ ही निर्माणनामकर्मरहिताय नमः अर्थ । पंचकल्याणक चोतिस अतिशय राज ही, पातिहार्य अठ समोशरण द्युति छाज ही। तीर्थकर विधि विभव नाश स्वै पद लहो, ध्यावत हैं जगनाथ तुम्हें हम अघ दहो ॥१४६॥ ओ हों तीर्थकरप्रकृतिरहिताय नमः अप । चाल छन्द-जो कुम्भकारकी नाई, छिन घट छिन करत सराई। मो गोत कर्म परजारा, हम पूज रचो सुखकारा ॥१४७॥ ओ ही गोत्रकर्मरहिनाय नमः अर्थ । लोकनिमें पूज्य प्रधाना, सब करत विनय मनमाना। यह ऊंच गोत्र परजारा, हम पूज रचो सुखकारा ॥१८॥ ओ ही ऊँचगानकर्मरहिताय नमः अर्घ । १५२ ।

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सिहरको पष्टी विधान 215555555555555555 मोतीपादाम छन्द । नदो परिणाम विपकड खेद, सदाइकसा प्रण विन भेद । निजाधिा भाव रमै सुखधाम, करुं तिस आनन्दको परिणाम ओ ही आनन्दस्वभावाय नमः अयं ॥१२॥ परें जितने परिणामन भेद, विशेषन ते सब ही विन खेद । पराश्रितता दिन आनन्द धर्म, नमूं तिन पाय लहं पद शर्म। ओहो आनन्दयाय नमः अप ११६३॥ न हो परयोग निमिच विभाव, सदा निवसे निज आनन्द भाव । यही वरणो परमानन्द धर्म, नमू तिन पाय लहं पद शर्म ॥ ओ ही परमानन्दधर्माय नमः अर्थ ॥१६॥ कभू परसों कछु द्वेष न होत, कभू फुनि हर्ष विशेष न होत । रहै नित ही निज भावन लीन, नमूं पद साम सुभाव सु लीन ॥ ओ हो माम्पसभाराय नमः अयं ॥१६॥ १५६

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MRIFIFFririri पष्टी जा विधान 355555555555555555 नयनाय नमः ॥१७॥ गेरमे गेर हो आपमें ले रहो चतुर खेतमें वाम पायो । धर्म समुदाय हो परमपद पाइयो, में तुम्हें भक्तियुन शीश नायो ओरी अनन्यथमाय नमः अब ॥१७६१॥ सापना जयतई टोत है तबतई, दोऊ परिमाणको काज जामें। आप स्वैपद लियो तिन जलांजलि दियो अन्य नहीं चहत निज शुद्धतामें ओ ही परिमाणिमुक्ताय नमः अयं ।।१८०॥ तोमर उन्द-द्रग ज्ञान रणचन्द्र-अकलंक ज्योति अमन्द । निरद्वंद ब्रह्मस्वरूप नित पूजह चिद्रूप नों ही ब्रह्मस्पाय नमः अयं ॥१८॥ सय ज्ञानमयी परिणाम, वर्णादिको नहिं काम । निरवंद ब्रह्मस्वरूप, नित पूजह चिप ॥ १८२॥ ---...

ता
विधान
१६१
5555555555555555SHIP
ओही प्रामगुणाय नमः अप ।
निज चेतनागुण धार, विन रूप हो अविकार।
निरद्वंद ब्रह्मस्वरूप, नित नई विदुर ।। १८३ ॥
श्रोही मानतनाग नमः भर ।
गुन्दरी छन्द।
अन्य रूप सु अन्य रहै सदा, पर निमिन विभाव न हो कदा।
कहते हैं मुनि शुन्द्र सुभावजी, नम मिद सदा तिन पायजी ।१८१॥
आंही शुदम्वभावाय नमः अपं ।
पर परिणामनमो नहि मिलन है, निज परिणामन मो नहिं चलत हैं।
शुद्ध परिणामी तुम पद नम,नमत तुम पद सब अपको दमू॥८५
आं ही शुद्धपारिणामकाय नमः अप ।
वस्तुता व्यवहार नहीं ग्रह, उपस्वरूप असत्यारथ कहै।
* 'परिणामी शुद्धग्रुप ए, नमू मिद गदा निन पांग नेहऐगा पाट 'निमें है।
555555555555
१६१

ENT गिरपा पठो पूजा प्रधान FFEESE555555 गुद्ध सम्पनताकरि साध्य है, निविकल्प समाधि अराध्य है ।१८६ ओ ही अादरहिनाय नमः अर्घ । द्रव्य पर्यायाधिक नय दोऊ, स्वानुभवमें विकलप नहिं कोऊ । सिद्ध शुद्धाशुद्ध अतीत हो, नमत तुम तिसपद परतीत हो ॥१८७।। औ ही गुद्वाशुद्धरहिताय नमः अयं। चौपाई-क्षय उपशम अवलोकनटारो,निज गुण क्षाइक रुप उधारो। युगपत सकल चराचर देखा,ध्यावत मन हर्प विशेखा ।१८८५ ओ ही अनन्तहगस्वरूपाय नमः अप। जर पूरण अवलोकन पायो, तर पूरण आनन्द उपायो। अविनाभाव स्वयं पर देखा, ध्यावत हूं मन हर्प विशेग्वा ॥ १८९ ॥ औ ही अनन्नाहगानन्दस्वभावाय नमः अर्घ । नाश सुपूर्वक हो उतपाता, सत लक्षण परिणति मरजादा । क्षय उपशमनन क्षायक पेषा, ध्यावत हूं मन हर्प विशेखा ॥ १९०॥ १६२ गिन..... गिद्रवर पूजी पूजा विधान द्रव्य-दृष्टिमं यह गुण देखा, ध्यावत हूं मन हर्ष विशेखा ॥१९॥ ओ हीं अनन्त वाय नमः अर्थ । कर्म नाम जो स्वापद पावे, रञ्च मात्र फिर अन्त न आवे । यह अव्यय गुण तुममें देखा, ध्यावत हूं मन हर्ष विशेखा । १९२ । श्री ही अव्ययभावाय नमः अघ । पर नहीं व्यापे तुमपद माही, परमं रमण भाव तुम नाहीं। निज करि निज निज गुण देखा, ध्यावत हूं मनहर्प विशेखा।१९३ औदी अनन्तनिलयाय नमः अप । शंखनारी छन्द । अनन्नाभिधानो, गुणाकार जानो।धरोआपसोई, नमूमानखोई १९४ आं हीं अनंताकाराय नमः अघ। अनन्ना स्वभावा, विशेपन उपावा। धरोआपसोई, न मानखोई।१९५॥ औदी अनन्त स्वभावाय नमः अघ । १६३ . मेद्धचक्र पष्ठी पूजा विधान १६४ विनाकाररूपायह चिन्मय स्वरूपाधिरो आपसोई, नमूं मान खोई ।१६६ ओं ही चिन्मयस्वरूपाय नमः अर्थ । सदा चेतनामें, न हो अन्यतामें ।धरो आपसोई,नमूं मान खोई ।१९७ ओ ही चिद्रूपाय नमः अर्थ । दोहा—जो कछ भाव विशेष है, सब चिद् पी धर्म असाधारण पूरण भये, नमत नशे सब कर्म ॥ १६८ ॥ ओ ही चिद्रूपधर्माय नमः अघ । परकृति व्याधि विनाशके, स्वै अनुभवकी प्राप्त । भई, नमूं तिनको, लहूं यह जगवास समाप्त ॥ १६ ॥ ओ ही स्वानुभवउपलब्धिरमाय नमः अप । निरावरण निज ज्ञान करि, निज अनुभवकी डोर । गहो लहो थिरता रहो, रमण ठोर नहीं और ॥ २०॥ १६४ विधान 595555 BIPIP. PFIm 555555555555555 सवात्तमलाकाक रस, सुधा 1 सन साग । निज पद परमामृत रसिक, नर्मू चरण बडभाग ॥ २० ॥ गादी परमागृतरनाग नमः । विषयामृत विपसम अमचि, अरस अशुभ असुहान । जान निजानन्द परमरस, तुष्ट सिद्ध भगवान ॥ २०२ ॥ भीनी परमागूनतमाग नम: अग । शंकातीत अतीतसो, धरे प्रीति निज माहि । अमल हिये संतनि प्रिये, परम प्रीति नम ताहि ॥ २०३ ॥ जीही परमप्रीताय नमः अप । अक्षय आनन्द भाव युत, निज हितकार मनोग। सान चित बालभ परम, दुर्जा न दुर्लभ योग ।। २०४ ।। ही परगवाहमगीगाय नमः अग। शब्द गन्धरसफरश नहीं, नहीं वरण आकार ।

अप। ..-.-.- .-. पष्टी पूजा प्रधान -.-.-.-.-.-14 दुलि गहे नहिं पार तुम, गुप्त भार निरधार ॥ २० ॥ अमरभाराय नमः सर्व दसों भिटर है, नहिं अभिन्न निहुंकाल । नमं सदा परकाश घर, एक हि रूप विशाल ॥ २०६॥ से एकत्वस्वरूपाय नमः अप। सर्व दतं भिन्नता, जिम गुण निजमें वास । नमं अखंड परमातमा, सदा सुगुणकी राश ॥ २०७ ।। ही एकत्रगुणाय नमः अप । सर दर्य परिणामसों, मिले न निज परिणाम । नमं निजानन्द ज्योति धन, नित्य उदय अभिराम ॥ २० ॥ ओही एकत्सभाराय नमः अप। चौपाई-पर संपोग तथा समवाय, यह संवाद न हो वें भाय । all. १FF सिद्धना विधान पष्ट श्री ही वेगभावनायकाय नमः अर्थ । पूर्व पर्याय नासियो सोई, जाको फिर उतपाद न होई । अव्यय अविनाशी अभिगम, शाश्वत रुप नमसुग्यधाम ॥२१० औदी शाश्वताय नमः अप । निर्विकार निर्मल निजभाव, नित्य प्रकाश अमन्द प्रभाव । अव्यय अविनाशी अभिराम. शाश्वत रुप नम सुग्वधाम॥२११॥ श्री ही गावतप्रकामाय नमः अघ । निरावरण रवि विम्ब समान, नित्य उद्योत धगे निज ज्ञान । अव्यय अविनाशी अभिगम, शाश्वत रुप नम सुबधाम ॥२१२ ही गाधनउद्यानाय नमः श्रम । ज्ञानानंद सुधाकरचन्द्र, सोहत पूरण ज्योति अमन्द ।। अव्यय अविनाशी अभिराम, शाश्वत रुप नम सुखधाम॥२१३॥ ओ दी शाश्वतातचन्द्राय नमः अप । ।

मिचक्र पर विधान १६८ ज्ञानानन्द सुधारस धार, निरविवछेद अभेद अपार । अव्यय अविनाशी अभिराम, शाश्वत रूप नमसुखधाम॥२१४॥ ओं ही शाधतअमृतमूर्तये नमः । पद्भडी छन्द-मन इन्द्रिय ज्ञान न पाय जेह, हे सूक्षम नाम सरूप तेह। मनःपर्यय जावू नाहिं पाय, सो सूक्षम परम सुगुण नमाय ॥२१५॥ औ ही परमयक्ष्माय नमः अघ । बहु रास नभोदरमें समाय, प्रत्यक्ष स्थूल ताको न पाय । इकसों इकको बाधा न होहि, सूक्षम अविनाशी नमों सोहि ॥२१६॥ औ ही मामावकाशाय नमः अर्प । नभ गुण ध्वनि हो यह जोग नाहिं, हो जिसो गुणी गुण तिसो ताहिं सो राजत हो सूक्षम स्वरूप, नमहूं तुम सूक्षम गुण अनूप ॥२१७॥ ओं ही गृहमगुणाय नमः अर्घ । तुम त्याग द्वैनताको प्रसंग, पायो एकाकी छवि अभंग ।

गठी मिदनक विधान जाको कयह अनुभव न होय, नम पग्म रूप है गुप्त सोय ॥२१८ ।। ओही परगपगुमाय नमः । छंद त्रोटक-सर्वार्थ विमानिक देव नथा, मन इन्द्रिय भोगन शक्ति यथा। इनके सुम्बको इक सीम सही, तुम आनंदको पर अन्त नहीं ॥२१॥ मी निरवधिमाय नमः अर्थ । जग जीवनिको नहिं भाग्य यहे. निज शक्ति उदय करि व्यक्तिलहे। तुम पूरण क्षायक भाव लहो, इम अन्त विना गुणगन गहो। २२० । औदी निरवधिगुणाय नमः अप। भवि-जीव सदा यह रीति धरे, निन नूनन पर्य विभाव धेरै । निम कारणको सब व्याधि दहो, तुम पाइ सुरुप जुअन्त न हो ।२२१ औ ही निरवधिगुवाग नमः अर्थ । अवधि मनःपर्यय सु ज्ञान महा, दर्वादि विपं मरजाद लहा। तुम ताहि उलंघ सुभावमई, निजबोध लहो जिस अन्त नहीं ।२२२॥ ? १६१ 55फ

पष्ठी
पूजा
विधान
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औ ही अतुलज़ानाय नमः अघ ।
हुँ काल तिहूं जगके सुखको, कर वार अनंत गुणा इन को।
तुम एक समय सुखकी समता, नहीं पाय नमूं मन आनंदता ।२२३॥
ॐ हीं अतुलमुखाय नमः अघ' ।
नाराच छंद-सर्व जीव राशके सुभाव आप जान हो,
आपके सुभाव अंशु और कौन ज्ञान हो।
सो विशुद्ध भाव पाय जासको न अन्त हो,
राज हो सदीव देव चरण दास संत हो।२२४॥
ओ ही अतुलभावाय नमः अघ ।
आपकी गुणोध वेलि फैलि है अलोकलों,
शेपसे भ्रमाय पत्रकी न पाय नोकलों।
सो विशुद्ध भाव पाय जासको न अन्त हो,
राज हो सदीय देव चरण दास सन्त हो ॥ २२५।
ओ ही अतुलगुणाय नमः अर्घ ।
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मिचक्र पष्ठी पूजा विधान पूर्वोत्तर सन्तति तनी, भव भव छेद कराय । असंसार पदको नमं, यह भव वास नशाय ॥ २३८ ॥ ओ ही अमंसाराय नमः अर्थ । नागरूपिणी तथा अर्धनाराच छन्द । हरो सहाय कर्णको, सुभोगता विवर्णको। निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही ॥ २३६ ।। ओं ही स्वानन्दाय नमः अघ। न हो विभावता कदा, स्वभावमें सुखी सदा । निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही ॥ २४०॥ आं ही स्वानन्दभावाय नमः अघ । अबंद रूप सर्वथा, उपाधिकी नहीं व्यथा। निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही ॥ २४१ ॥ ओं ही स्वानंदस्वरूपाय नमः अर्ध । १७४ पठो पूजा पादनक विधान दुभेदता न वेद ही, सचेतना अभेद ही। निजातमीक एक ही, लहो अनन्द तास ही ॥ २४२ ॥ ओ ही स्वानंदगुणाय नमः अर्थ । न अन्यकी प्रवाह है, अचाह है न चाह है। निजातमीक एक ही, लहो अनंद तास ही ॥ २४३ ॥ ओ ही स्वानंदगंतोपाय नमः अर्घ । सांग्ठा-रागादिक परिणाम, हैं कारण संसारके । नाश लियो सुखधाम, नमत सदा भव भय हर ॥२४४ ॥ ओ ही शुद्धभावपर्यायाय नमः अर्घ । उदइक भाव विनाश, प्रगट कियो निज अर्थको । स्वातम गुण परकाश, नमत सदा भव भय हरं ॥ २४५ ॥ आ ही स्वतंत्रधर्माय नमः अर्घ । निजगुण पर्ययरूप, स्वयं-सिद्ध परमातमा । १७५ मिद्धचक्र पर्ड पूजा विधान १७६ राजत हैं शिव भूप, नमत सदा भव भय हा ॥ २४६ ॥ ओ ही आत्मस्वमावाय नमः अर्घ विमल विशद निज ज्ञान, है स्वभाव परिणतिमई । राजे हैं सुखखानि, नमत सदा भव भय हरं ॥ २४७ ॥ ओ ही परमचित्परिणामाय नमः अर्थ । दर्श ज्ञानमई धर्म, चेतन धर्म प्रगट कहो। भेदाभेद सुपर्म, नमत सदा भव भय हरं ॥ २४ ॥ आं ही निद्र पधर्माय नमः अर्ध । दर्शज्ञान गुणसार, जीवभूत परमातमा । राजत सब परकार, नमत सदा भर भय हरण ॥ २४६॥ ओ ही चिद्रूपगुणाय नमः अर्थ । अष्ट कर्म मल जार, दीप्तरूप निज पद लहो। स्वच्छ हेम उनहार, नमत सदा भव भय हरण ॥ २५० ॥ जही परमम्नानकाय नमः अप। १७६ पष्ठी सिध विधान । रागादिक मल सोध, दोऊ विविध विधान विन । लहो शुद्ध प्रतिबोध, नमत सदा भव भय हरण || २५१ ॥ औ ही स्नातकधर्माय नमः अर्घ विधि आवरण विनाश, दर्श ज्ञान परिपूर्ण हो । लोकालोक प्रकाश, नमत सदा भव भय हरण ।। २५२ ।। आ ही सर्वावलोकाय नमः अघ । निजकर निजमें वास, सर्व लोकसों भिन्नता। पायो शिव सुख रास, नमत सदा भव भय हरण ॥२५३॥ आही लोकाग्रस्थिताय नमः अर्घ ज्ञान-भानकी जोति, व्यापक लोकालोकमें। दर्शन विन उद्योत, नमत सदा भव भय हरण ॥ २५.४ ।। औदी लोकालोकन्यापकाय नमः अर्घ । जो कछ धरत विशेप, सप ही सब आनन्दमय । १७७ सिपा पष्ठी विधान हलेदान भाव कलेश, नमं सदा भव भय हरण ॥ २५५ ॥ ही अतुलभाय नमः अप। जिस आनन्दको पार, पावत नहीं यह जगतजन । सो पायो हितकार, नमत सदा भव भय हरण ॥ २५६॥ ओ ही आनंदविधानाय नमः अर्थ। नाग लिसा पाठ "क" प्रतिमें है। नित्य शर्म सुखकार, दर्शन ज्ञान चरित्रमय । मनतों दुविधा टार, नमत सदा भवभय हरो ॥२५५ ॥ ओ ही रत्नत्रयसयुक्ताय नमः अप । सब जीवन के हेत, दशविधि धर्म बताइयो । जासों होय, सुचेत, आलस तजि धारण करो ॥ २५६ ॥ ओरी दशधर्ममयुक्ताय नमः अर्थ। १७८

पूजा
विधान
१७६
ऑ ही आनंदपूर्णाय नमः अर्थ।
ॐ ही पट्पंचाशन अधिकद्विगनगुणयुक्ताय सिद्धाय महापं निर्वामीनि स्याहा।
( यहाँ १०८ बार जाप देना चाहिये।)
अथ जयमाला।
दोहा-यावर शब्द विषय धरे, उस थावर पर्याय ।
यो न होय तो तुम सुगुण, हम किहविधि वर्णाय ।।
तिसपर जो कछु कहत हैं, केवल भक्ति प्रमान ।
वालक जल शशिविको, चहत ग्रहण निज पान । २१
पद्धडी छन्द।
जय पर जग निमित्त व्यवहार त्याग, पायो निज शुद्ध स्वरूप भाग ।
जय जग पालन विन जगत देव, जय दयाभाव विन शांतिभेव ॥१॥
परसुख दुखकरण कुरीति टार, परसुख दुख कारण शक्ति धार ।
फुनि फुनि नव नव नित जन्मरीत, बिन सर्वलोक थापी पुनीत ॥२॥

मिद्धचक पष्ठ विधान १७८ क हलेश न भाव कलेश, नर्म सदा भव भय हरण ॥ २५५ ॥ ॐ ही अतुलभावाय नमः अप। जिस आनन्दको पार, पावत नहीं यह जगतजन । सो पायो हितकार, नमत सदा भव भय हरण ॥ २५६॥ ओं ही आनंदविधानाय नमः अर्थ । * नीच लिखा पाठ "क" प्रतिमें है। नित्य शर्म सुखकार, दर्शन ज्ञान चरित्रमय। मनलों दुविधा टार, नमत सदा भवभय हरो ॥ २५५ ॥ ओ ही रत्नत्रयसयुक्ताय नमः अप । सय जीवन के हेत, दशविधि धर्म वताइयो जासों हेाय, सुचेत, आलस तजि धारण करो ॥ २५६ ॥ औ ही दशधर्मसंयुक्ताय नमः अर्थ । दोहा-इत्यादिक आनन्द गुण, धारत सिद्ध अनन्त । तिन पद आठों दग्यो, पूजन हो. निज सन्त ।। १७८

গগন
..१७६
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प्रधा5555555
ओ ही आनंदपूर्णाय नमः अर्थ ।
* पटनाशनधिकद्विगतगुणयुक्ताय सिद्धाग महापं निर्वगामीति स्याहा। पठो
( यहाँ १०८ बार जाप देना चाहिये।)
पूजा
अथ जयमाला।
हा-यावर शब्द विपय घर, उस थावर पर्याय ।
यो न होय तो तुम सुगुण, हम किहविधि वर्णा य । १॥
तिसपर जो कछु कहत हैं, केवल भक्ति प्रमान ।
वालक जल शशिबिंधको, चहत ग्रहण निज पान । २ ।
पदडी छन्द।
जय पर जग निमित्त व्यवहार त्याग, पायो निज शुद्ध स्वरूप भाग ।
जय जग पालन विन जगत देव, जय दयाभाव विन शांतिभेव ॥१॥
परसुख दुखकरण कुरीति टार, परसुख दुख कारण शक्ति धार ।
फनि फुनि नव नव नित जन्मरीत, विन सर्वलोक थापी पुनीत ॥२॥

सिद्धचक्र पप्ली पूजा विधान जय लीला रास विलास नाश, स्वाभाविक निजपद रमण वास। शयनासन आदि क्रिया कलाप, तज सुखी सदा शिवरूप आप ॥३॥ विन कामदाह नहीं नार भोग, निरद्वद निजानंद मगन योग । वरमाल आदि शृंगार रूप, विन शुद्ध निरंजन पद अनूप ॥ ४॥ जय धर्म भर्म वन हन कुठार, परकाश पुंज चिद्रूप सार । उपकरण हरण दव सलिलधार, स्वै शक्ति प्रभाव उदय अपार ॥ ५॥ नभ सीम नहीं अा होत होउ, नहीं काल अन्त लहो अन्त सोउ । पर तुम गुण रास अनंत भाग, अक्षय विधि राजत अवधि त्याग ।६। आनंद जलधि धारा प्रवाह, विज्ञानसुरी सुखद्रह अथाह । निज शांति सुधारस परम खान, समभाव वीज उत्पत्ति थान १७ । निज आत्मलीन विकलप विनाश, शुद्धोपयोग परिणति प्रकाश । दग ज्ञान असाधारण स्वभाव, स्पर्श आदि परगुण अभाव ।। निज गुणपर्पय समुदाय स्यामि, पायो अग्यण्ड परम धाम ।

पठो
विधान
१८१
अव्यय अबाध पद स्वयं सिद्ध, उपलब्धि रुप धर्मी प्रसिद्ध ।।
एकाग्ररुप चिंता निराध, जे ध्यावे पायें स्वयं बोध ।
गुण मात्र संत अनुगग रूप, यह भाव देहु तुम पद अनूप । १० ।
पत्ता--दोहा-सिन्द्र सुगुण सुमरण महा, मन्दराज हे सार ।
सर्व सिन्न, दातार है, सर्व विधन हार । ११ ।
ही अहं पटपंचागदाधिकद्विगहलोपरिस्थित सिद्धम्मो नमः अर्थ नि०।
तीन लोक चूडामणी, सदा रहो जयवन्त ।
विधन हरण मंगल करण, तुम्हें नमें नित संत । १२ ।
इत्याशीर्वादः।
इति पष्ठी पूजा सम्पूर्ण।
នារីក
१८१

मिरन विधान सप्तमी पूजा अथ सप्तमी पूजा प्रारम्भ । छप्पय छन्द-ऊरध अधो सरेफ विंदु हंकार विराज, अकारादि स्वर लिस कर्णिका अन्त सु छाजे । वर्गन पूरित वसुदल अम्बुज तत्त्व संधि धर, अपभागमें मंत्र अनाहत सोहत अतिवर । फुनि अन्त ही वेढ्यो परम सुर, ध्यावत ही अरि नागको। हूँ केहरि सम, पूजन निमित्त, सिद्धचक्र मंगल करो ॥ १ ॥ ओं ही णमो सिद्धाणं श्रीसिद्धपरमेष्ठिन् द्वादशाधिकपंचशत ५१२ गुणसंयुक्त विराजमान अप्रावतरायतर संवौषट् (आह्वाननम्) अत्र तिष्ठ तिष्ठ :: (स्थापन) अग्र मम समन्निहितो भव भव पद (मन्निधीकरणं ) दोहा-सूदमादि गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग । सिद्धचक सो थाप हं, मिटै उपद्रव योग ॥1 १८२ .

9 सप्तमी विधान अथाष्टक। चाल-बारामामा छन्द । मुग्मणि कुम्भ क्षीरभर धारत, मुनि मन शुद्ध प्रवाह वहावहीं। हम दोऊ विधि लाइक नाही, कृपा करहु लहि भवतट भावहिं ।। शक्ति मार सामान्य नीरसों, पूजू हं हे शिवतियके स्वामी । द्वादया अधिक पंचशत संग्ख्यक, नाम उचारत हूँ सुखधामी ॥ १ ॐ ह्रीं श्रीमिद्धपरमेष्टिने ५१२ गुण सहित श्री समनणाणदंगण वीर्य मुहमत्त- हेव अवग्गहणं अगुरुलधुमन्यावाहं जन्मजरारोगविनाशनाय जलं निर्वधामीति स्वाहा । ननु कोऊ चन्दन नतु कोऊ केसरि, भेट किये भवपार भयो है। केवल आप कृपा द्रग हीसों, यह अथाह दधि पार लयो है रीनि सनातन भक्तिनकी लख, चन्दनकी यह भेट घरामी। द्वादश अधिक पंचशत संख्यक, नाम उचारत हूं सुखधामी ।। ॐ ही श्रोसिद्धपरमेष्ठिने ५१२ गुणसंयुक्ताय श्रीसमत्तगाणदंसण वीर्य मुहम- महेव अवग्गहणं अगुरुलघुमन्यावाहं संसारतापविनाशनाय चंदनं नि० ॥२॥ 15555 १८३ PPPM ससमो ८४ 55555559 । इन्द्रादिक पद हू अनवस्थित, दोखत अन्तर रुचि न करें हैं। मिापक केवल एकहि स्वच्छ अखण्डित, अक्षयपदकी चाह धरें हैं। पिधान नातें अक्षतसों अनुरागी, हूं सो तुम पद पूज करामी । द्वादश अधिक पंचशत संख्यक नाम उचारत सुखधामी ॥३ ओ ही श्रीसिइपरमेष्ठिने ५१२ गुण संयुक्ताय श्रीसमत्तणाणदंसण वीर्य मुहम- तहेव अबग्गहणं अगुरुलथुममावाहं अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं नि । पुष्प वाण हीसो मन्मय जग, विजई जगमें नाम धरावे । देवहु अद्भुत रीति भक्तकी, तिस ही भेट धर काम हनावे ॥ शरणागतिकी चूक न देखी, तातें पूज्य भए शिरनामी । द्वादश अधिक पंचशत संख्यक, नाम उचारत हूं सुखधामो ॥४ ॐ हा श्रासिद्धपरमेष्ठिने ५१२ गुण संयुक्ताय श्री समत्तणाणदसण वीर्य साहेब अपग्गहणं अगुरुउघुमगारा कामपाणविनाशनाय पुष्पं नि० । हनन असाता पीर नहीं यह, भीर परे चरु भेटन लायो। भक्त अभिमान मेंट हो स्वामी, यह भव फारण भाव सतायो । १८४ सप्तमी जा 1 4 + मम उगम करि कहा आपत्री, सो एकाकी अर्थ लहामा । डामा अधिक पंचशन संग्न्यक, नाम उचारत हूं सुखधामी ।५। योगद्वारधिन १२ गुण गंयुक्ताय श्रीगमनणाणदंगण वीर्य पए प्रमाण अगुलाम गालाई धागेगविनाशनाय नैवेयं नि। पण ज्ञानानन्द ज्योति घन, विमल गुणातम शुन्द्र स्वरूपी । पानम पूज्य भये हम पूजक. पाय विवेक प्रकाश अनूपी ।। मा अन्ध विनमा निह कारण, दीपनमों अचं अभिरामी। द्वारा अधिक पंचशन मंग्यक, नाम उचारत हूं सुखधामी ।६। 41 ।। धीगिद्धपरमेष्टिने ५१२ गुणगंगुक य श्रीममनणाण दंगण चोर्य गुह- मग अगदणं अगुल्लामन्यापाई मोहांपकार विनाशनाय दीपं नि । धृप वर उप प्रजरें मणि, हेम धरे तुम पदपर वारू । पारवार आगत जोरि करि, धार धार निज शीश न हारं॥ धूम्र धार समतन रोमांचित, हर्ष सहित अष्टांग नमामी। यादा अधिक पंचशत संग्ख्यक, नाम उचारत हूं सुखधामी ॥७॥ भ 555555 • मिचक्र सप्तम पूजा विधान ॐदी श्रीमिद्धपरमेष्ठिने ५१२ गुणसंयुक्ताय श्रीममत्तणाणदंसण वीर्य सुहम- महेव अवग्गहणं अगुरुलघुमन्यावाहं अष्टकर्मदहनाय धूपं नि० । तुम हो वीतराग निज पूजन, वन्दन थुति परवाह नहीं है। अरु अपने समभाव वहै कछु, पूजा फलकी चाह नहीं है ॥ तौभी यह फल पूजि फलद, अनिवार निजानन्द कर इच्छामी। द्वादश अधिक पंचशत संख्यक, नाम उचारत हूं सुखधामी ॥८ ॐ ही श्रीमिद्धपरमेष्ठिने ५१२ गुणसंयुक्ताय श्रीममत्तणाण दंसण वीर्य मनहेब अवग्गहणं अगुरुलधुमन्यावाहं मोक्षफलप्राप्तये फलं नि० तुमसे स्वामीके पद सेवत, यहविधि दुष्ट रंक कहा कर है। ज्यों मयूरध्वनि सुनि अहि निज विल, विलय जाय छिन विलमनधर है। तातें तुम पद अर्घ उतारण, विरद उचारण करहुं मुदामी। ૨૮દ २॥

सेही श्रीसिद्धपरमेष्टिने ५१३ गुणसंयुक्ताय श्रीसमक्षणाणदंसण वीर्य सुहम- पहेर अयग्रहणं अगुरुलघुगन्चावाई सर्यमुखप्राप्तये अर्थ नि० । सप्तमी गिक विधान गीता छन्द। १८७ निर्मल सलिल शुभ वास चन्दन, धवल अक्षत युत अनी, शुभ पुष्प मधुकर नित रमें, चरु प्रचुर स्वादसु विधि धनी वर दीपमाल उजाल धूपायन रसायन फल भले। करि अर्घ सिद्ध समूह पूजत, कर्मदल सब दलमले । ते कर्मवत नशाय युगपति, ज्ञान निर्मल रूप है ।। दुख जन्म टाल अपार गुण, सूक्षम सरूप अनूप है। फाष्ट विन त्रैलोक्य पूज्य, अछेद शिव कमलापती ॥ मुनि ध्येय सेय अमेय चाहूं गुण-गेह यो हम शुभ मती॥ ॐ ही अह सिद्धनकाधिपतये नमः समरपाणादि अहगुणार्ण पूर्णपदप्राप्तये महाघ २८७ ..

-1 । सिना सप्तमो पूजा विधान १८८ ! . पांचसैचारह गुणसहित नाम अर्घ अथ नामावलि प्रत्येक अर्थ अई छन्द जोगीरामा। लोकत्रय करि पूज्य प्रधाना, केवल ज्योति प्रकाशी। भव्यन मन तम मोह विनाशक, वन्दू शिव थल वासी ॥१॥ ॐ दो अरहंताय नमः अथ । सुरनर मुनिमन कुमुदन मोदन, पूरण चन्द्र समाना । हो अहंत जात जन्मोत्सव; चन्दं श्री भगवाना ॥ २ ॥ ॐ ही अहाताय नमः अर्प। केवल दर्श ज्ञान किरणावलि, मंडित तिहुं जग चन्दा । मिध्या तप हर जल आदिक करि, वन्दं पद अरविन्दा ॥३॥ '* अईचिपाप नमः अर्थ ।। घाति फर्म रिपु जारि छारकर, स्त्रे पतष्ठ पद पायो ।। #IP L मतमो मिदच विधान १८६ 3599999 निज स्वरूप चिप गुणातम, हम तिन पद शिर नायो ।।४।। ओ हो अईचिट्ठागुणाय नमः अर्थ ज्ञानावरणी पटल उघारत, केवल भान उगाया। भव्यनको प्रतिवांध उधारे, बहुर मुक्ति पद पायो ॥ ५ ॥ औ ही अन्नानाय नमः अर्प। धर्म अधर्म तास फल दोनों, देखो जिम कर रेखा । बतलायो परतीत विषय करि, यह गुण जिनमें देखा ॥६॥ ॐ ही अहंदशनाय नमः अर्य मोह महा दृढ बंध उघारो, करभिसतंतु समाना। अतुल बली अरहंत कहायो, पाय नम शिवथाना ॥७॥ ओ ही अहंद्वीयर्याय नमः अर्घ ।। युगात लोकालोक विलोकन, है अनन्त द्रगधारी। गुप्तरूप शिवमग दरसायो, तिनपद धोक हमारी ॥८॥ ॐ दी अहदर्शनगुणाय नमः अर्य। । १८३

मिनक
सप्तमी
पूजा
रिधान
१६०
घटपटादि सब परकाशत जद, हो रवि किरण पसारा ।
तेसो ज्ञान भान अरहंतको, ज्ञेय अनंत उघारा ॥९॥
औ ही अहज्ज्ञानगुणाय नमः अर्घ ।
आसन शयन पान भोजन विन, दीप्त देह अरहता।
ध्यान वान कर तान हान विधि, भए सिद्ध भगवंता ॥१०॥
ॐ ही अहंद्वीर्यगुणाय नमः अर्घ ।
सप्त तत्व पट् द्रव्य भेद सब, जानत संशय खोई।
ताकरि भव्य जीव संवोधे, नम भये सिद्ध सोई ॥ ११ ॥
ॐ ही अर्हत्सम्यक्त्वगुणाय नमः अर्प।
ध्यान सलिलसों धोय लोभ मल, शुद्ध निजातम कीनो
परम शौच अरहंत स्वरूपी, पाय नम शिव लीनो। १२ ।
ओ हो अरहनशीनगुणाय नमः अर्थ।
नय प्रमाण श्रुतज्ञान प्रकारा, द्वादशांग जिनवानी
प्रगटायो परतक्ष ज्ञानमें, नम भये शिव थानी ॥ १३ ॥

५७.समी h स .. अदद्वादमागार मन इन्द्रिय चिन मकल चराचर, जगपद करि प्रगटायो । गह अरमन्न मती कहलायो, बंदू तिन शिव पायो ॥ १४ ॥ * अदमिनियोधकाय नमः अप । अनुभव मम नहीं होन दिव्यध्वनि, ताको भाग अनंता । जाना गणधर यह श्रुत अवधी, पाड़ नमू अरहन्ता ॥ १५ ॥ ॐ दी अनश्रुनायधिगुणाय नमः अयं । मर्यावधि निधि गृन्द्रि प्रवाही, केवल सागर मांही। एक भयो अगहन्त अवधि यह, मुक्त भाग नमि ताही ॥ १६ ॥ श्री ही अहंदयधिगुणाय नमः अयं । अनि विशुद्र मय विपुलमती लहि, हो पूर्वोक्त प्रकारा । यह अगहन्न पाय मनः पर्यय, नमूं भए भवपारा ॥१७॥ ti नामनःपर्ययमागाय नमः अर्प। मांह मन्दिनना जग जिय नाशे, कवलता गुण पायें । 555555555 सिहचक्र . पू विधान सर्व शुद्धता पाइ नमत हैं, हम अरहन्त कहावें ॥१८॥ ओ हों अरहन्तकवलगुणाय नमः अर्घ मोह जनित सो रूप विरूपी, तिस विन केवलरूपा। श्री अरहन्त रूप सर्वोत्तम, बन्दू हो शिवभूपा ॥ १९ ॥ ओ हो अईत्केवलस्वरूपाय नमः अर्थ । तास विरोधी कर्म जीति करि, केवल दरशन पायो इस गुण सहित नमत तुम पदप्रति,भावसहित शिर नायो ॥२०॥ ओ ही अर्हत्केवलदर्शनाय नमः अर्थ । निर आवरण करण विन जाको, शरण हरण नहीं कोई । केवलज्ञान पाय शिव पायो, पूजत हैं हम सोई ॥ २१ ॥ *ही अर्हत्केवलज्ञानाय नमः अर्प । अगम अतीर भवोदधि उतरे, सहज ही गोखुर मानो। केवल वल अरहन्त नमें हम, शिम थल पास करानो ॥ २२ ॥ . ॐ अईलफेयलषीईए नमा अर्ण ।

ܣܕܪ. ܢ܇ सप्तमी पुजा मय विधि अपना निवारण, आरन 4 विडारी। मंगलमय अनि मर्यदा, नम मुक्ति पदधारी ॥ २३ ॥ ॐ अहन्मंगलाय नमः अब । ना आदि मर विधन विदुरित, लाइक मंगलकारी । पट गवर्ग पायर्या में, नम भये शिव धारी ।। २४ ॥ ॐही अहन्मंगलदानाय नमः अघ । निजपर मंगय आदि अंन तिन. निरावग्ण विकमानो। मंगरमय अरहंत ज्ञान है, बन्दु शिव मुग्न थानो ॥ २५ ॥ ॐही महन्मंगमनानाय नमः । परका जग आदि मंकट विन अतुल चली अर्हता। नम मदा शिवनार्गक मंग, मुत्यसो कलि, करंता ॥ २६ ॥ श्री दी ई.न्मंगलवीयांग नमः अब । पापम्प एकान्न पक्ष विन, सर्व तच परकाशी । -55555555555 ६ १६३ H मिदचक्र ससमी पूजा विधान द्वादशांग अरहंत कहो नमं भये शिवयासी ॥ २७ ॥ ओ ही अर्हन्मंगलद्वादशांगाय नमः अर्थ । विन प्रतक्ष अनुमान सवाधित, सुमतिरूप परिणामा । मंगलमय अर्हतमती मैं, नम देउ शिवधामा ॥ २८ ॥ ओ ही अर्हन्मंगलअभिनियोधकाय नमः अर्थ । नय विकलप श्रुतांग पक्षके, त्यागी हैं भगवन्ता । ज्ञाता दृष्टा वीतराग, विख्यात नमूं अरहन्ता ॥२९॥ ओ ही अर्हन्मंगलश्रुतात्मकजिनाय नमः अ । मंगलमय सर्वावधि जाकरि, पावै पद अरहन्ता । वन्दू ज्ञान प्रकाश नाश भव, शिव थल वास करता ॥ ३०॥ औ ही अहन्मंगलामधये नमः अर्थ । वर्धमान मनपर्यय ज्ञान करि, केवल भानु उगायो। भव्यनि प्रति शुभ मार्ग घनायो, नमूं सिन्द्र पद पायो ॥ ३१ ॥ भी अगलगतापर्यशागत गिद्धचक्र सप्तमी ধুলা विधान १६५ REFFEFFEE EFFEEFFEEFFEREFERE जा विन और अज्ञान सकल, जग कारण बंध प्रधाना। नमूं पाइ अरहन्त मुक्ति पद, मंगल केवलज़ाना ॥ ३२ ॥ आं ही अईन्मंगलकेवलज्ञानाग नमः अर्थ । निरावरण निरखेद निरन्तर, निरावाधमई राजें केवलरूप नमूं सत्र अघहर, श्री अरहन्त विराजें ॥३३॥ ओ ही अर्हन्मंगलकेवलम्वरूपाय नमः अर्थ । चक्षु आदि सब भेद विघन हर, क्षायक दर्शन पाया। श्री अरहन्त नमूं शियवासी, इह जग पाप नशाया ॥३४॥ ॐ ही अर्हन्मंगलकेवलदर्शनाय नमः अर्थ । जग मंगल सब विधन रूप है, इक केवल अरहन्ता । मंगलमय सब मंगलदायक, नमूकियो जग अन्ता ॥३५॥ ओ ही अहन्मंगलफेवलाय नमः अर्थ । केवलरूप महामंगलमय, परम शत्रु छयकारा । सो अरहन्त सिद्धपद पायो, नमूं पाय भवपारा ॥ ३६ ॥ १६५ L:- मिद्धचक्र मप्तम पूजा विधान १६६ ॐदी अर्हन्मंगलकेवलरूपाय नमः अर्ष । शुन्द्वातम निजधर्म प्रकाशी, परमानन्द विराजें। सो अरहन्त परम मंगलमय, नम शिवालय राजें ॥ ३७॥ ॐ ही अहन्मंगलधर्माय नमः अपं । सव विभावमय विधन नाशकर, मंगल धर्म स्वरूपा । सो अरहन्त भये परमातम, नमूं त्रियोग निरूपा ॥ ३८ ॥ ॐही अहन्मंगलधर्मस्वरूपाय नमः । । सर्व जगत सम्बन्ध विधन नहीं, उत्तम मंगल सोई। सो अरहन्त भये शिववासी, पूजत शिवसुख होई ॥ ३९ ॥ श्री ही अहन्मंगलउनमाय नमः अर्ष। लोकातीत त्रिलोक पूज्य जिन, लोकोत्तम गुणधारी । लोकशिम्बर मुग्वरूप विराजें, तिनपद धांक हमारी ॥१०॥ .-1PI-IPIPPIPI-RIPTIFIPIPIPIPI 8 पार ॥ ११ ॥ विधान सप्तमी पूजा F។ "' तिनको त्याग भये शव बन्दु, काटो बन्द मी अटीकोनमगुणाय नमः अर्घ । मिथ्या मतिकर सहित ज्ञान, अज्ञान जगतमं सारा। ता विन ज्ञान अरहन्त कहाये, लोकोत्तम पृज हमारो ॥१२॥ ॐ दी अर्हन्लोकोनगवानाय नमः अर्घ । क्षायक दरशन है अरहन्ता, और लोकमें नाहीं। सो अरहन्त भये शियवासी, लोकोत्तम सुग्वदाई ।। ४३ ॥ ॐ ही अहल्लांकाचमदर्शनाय नमः अर्घ । कर्मवलीने सब जग बांध्यो, ताहि हनो अरहन्ता । यह अरहन्त वीर्य लोकोत्तम, पायो सिद्ध अनन्ता ॥ १४ ॥ ॐ ही अहल्लाकोनमवीर्याय नमः अयं । अक्षयतीत ज्ञान लोकोत्तम, परमातम पद मूला। सो अरहंत नमूं शिवनाइक, पाऊँ भवदधि कूला ॥ १५ ॥ ॐ ही अहल्लोकोचमभिनिरोधकाय नमः अर्थ । १६७ सिद्धचक्र सप्तमी पूजा विधान परमावधि ज्ञानसो छानी, केवलज्ञान प्रकाशी। यहै अवधि अरहन्त नमूं में, संशय तमको नाशी ॥ ४६॥ ॐ ही अहल्लोकोत्तमअवधिज्ञानाय नमः अप । जो अरहन्त धरै मनपर्यय, सो केवलंक माहीं। साक्षात् शिवरूप नमो में, अन्य लोकमं नाहीं ॥४७॥ ॐही अहल्लोकोत्तममनःपर्ययशानाय नमः अर्घ । तीन लोकमें सार श्री अरहंत स्वयंभू ज्ञानी । नमूं सदा शिवरूप आप हो, भविजन प्रति सुखदानी ॥४८॥ ओ ही अहल्लोकानमकंवलज्ञानाय नमः अर्थ । सर्वोत्तम तिहुं लोक प्रकाशित, केवलज्ञान स्वरूपी । सो अरहन्त नमूं शिवनायक, सुखप्रद सार अनृपी ।। ४९ ॥ ही अहल्लोकोचमकवलस्वरूपाय नमः अर्ष । ज्ञान तरंग अभंग यह लोकोत्तम धार अनूपी । १९८ मामी पना मिमा गिधान लोकोगमकालपांगाय नमः । अगाधारण गुण पर्गय महिन मत्र कंवलज्ञान सम.पी। मां अगन नम शिवनायक. सुखप्रद मार अनृपी ।। ५१ ।। हामांगमकवनगाग नमः । जाजय सत्र अमुन्द्र कही, एक केवल शुद्ध मरूपी । मो अगहन्न नम शिवनायक, मुग्यप्रद सार अनूपी ।। ५२ ॥ *ही प्रहरीकोनकवलाय नमः अग । विविध करप मर्य जगवामी. केवल म्वयं सरपी। गो अरहन नम शिवनायक, मुग्यप्रद सार अनूपी ॥ ५३ ।। लोकानमारगम्पाय नमः अग। होनाधिक धिक धिक जग प्राणी, धन्य एक ध्र वरूपी । सो अरहन नम शिवनायक, मुग्यप्रद सार अनृपी ॥ ५४ ॥ ॐ लोकगमन भायाय नमः अष। दोहा-संसारिनके भाव सर, बन्ध हेत वरणाय । 卐9959555 " मिरच सप्तमी पूजा रिधान PRESE5555555ESSURRRESS मुक्तिरूप भरहंत, भाव नम मुपदाप ।। ५५ ॥ भी अबलोकानममानाय नमः अप। क्यहं न होय विभावमय. सोधिर भाव जिनेश । मुक्तिरूप प्रणमं सदा, नादो विघन विशेष ॥ ५६ ।। ओही अईल्दोमानम्धिरभाराय नमः अयं । जा संपत वेश्त स्रसव, सो सर्वोत्तम देव । शिववासी नादी विजग-फांसी नमहूं एवं ॥ ५७ ॥ ओह अहहरणाय नमः अर्य। जिन ल्यायो तिन पाइयो, निश्चय सो सुखरास । शरण स्वरूपी जिन नभु, करें सदा शिश्वास ।। ५८ ॥ श्रीहरी अई छरपस्पाय नमः अप । पहाडी छन्द। दाभाविय. गुण आहंन गाय, नासों पुरण शिवमुम्ब लहाय । at Finiचारा. Fa २००

F坛
सिद्धचक्र
मामी
पूजा
विधान
.
२०१
.
ओ दी अहह मारणाय नमः अर्थ ।
विन केवलज्ञान न मुक्ति होय. पाया है श्री अरहन्त जोय ।
हम शरण गही मन बचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय।६०
श्री ही बह जबानगरणाय नमः अर्थ ।
प्रत्यक्ष देव सर्वज्ञ देव,भाग्यो है शिव मारग अमेव ।
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय।६११
ही अहहानगरणाय नमः अप ।
संसार विषम बन्धन उच्छेद, अरहन्त वीर्य पाया अग्वंद ।
हम शरण गही मन वचनकाय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ।६२॥
ही अह वीर्यगरणाय नमः अघ ।
सय कुमति विगत मत जिनप्रतीत, हो जिसते शिवसुख दे अभीत
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमैं सन्त आनन्दपाय।६३
औ ही अहवामांगमरणाय नमः अयं ।
२०
भ

99 SEEKSHEES. ldinidi- विज्ञान, अरहमा मती प्रत्यक्ष जान । HER! हमारण गही मन बचन काय. नित नमें सन्त आनन्द पाय१६४। रिधान ओहरी अदिभिनिधाय नमः अर्थ । जिन भापित भुत सुनि भव्य जीव, पायो शिव अविनाशी सदी । हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें मन्त आनन्द पाय ॥६५॥ * अछुतशरणाय नमः अर्थ । प्रतिपक्षी सर जीते कषाय, पायो अवधि शिव-सुम्ब कराय। दम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ॥६६॥ *ही अहंदवधिवांधशरणाय नमः अप। मुनि रहे गहे परिणाम घेत, जिन मनपर्यय शिव वास देत । हम शरण गही मन वचन काय. नित नमें सन्त आनन्द पाय १६७४ ॐ अन्मिनःपर्ययशरणाय नमः अपं । अपर्ण रहित प्रत्यक्ष ज्ञान, शिपमा काली निस

रा
विधान
हम शरण गही गन वरन काय. नित नमें सन्त आनन्द पाय। २८
ॐहीदकरलागणाय नमः ।
मुनि केवलज्ञानी निज अराध, पाय गियसुख निश्चय अवाप।
हम शरण गही मन वचन काय, नित नग मन्न आनन्द पाय ।६।।
ओ ही कामामपाय नमः ।
शिव सुखदायक निज आत्म ज्ञान, मो केवल पावे जिन महान ।
हम शरण गही मन बचन काय, नित नमें मन्न आनन्द पाय 1७०
ही कालभमयणाय नमः पर।
यह केवल गुण आतम स्वभाव. अरहन्तन पनि शिव सुम्न उपाय !
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें मन्न आनन्द पाय 1७१।
ओ ही प्रान्करलगुणगरणाय नमः ।
संसार रूप सवविधन टार, मंगल गुण श्री जिन मुक्तिकार ।
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ७२।
२०२
35555

५
सप्तमी
पूजा
२०४
12137545555EESENSETE
ओह अह मंगलगुणशरणाय नमः अयं ।
सिझनक य उपशम ज्ञानी विघन रूप, ता विन जिन ज्ञानी शिर सुरूप ।
विधान हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ।७।।
ॐही अहन्मंगलतानशरणाय नमः अप ।
है, अरहन्त दर्श मंगल स्वरूप, तामों दर# शिव-सुख अनूप ।
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ७४।
ओ ही अन्मंगलदर्शनमरणाय नमः अयं ।
अरहन्त वोध है मंगलीक, शिव मारग प्रति वरते अलीक।
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ७५।
ओ हो अह मंगलयोधारणाय नमः अघ ।
निज ज्ञानानन्द प्रवाह घार, वरते अखण्ड अव्यय अपार ।
हम शरण गही मन वचन काय, नित नमें सन्त आनन्द पाय ७६।
ईन्मंगलकलशाणाय नमः ।
.
२०४

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.
मिद्धचक्र
विधान
२०८
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इनहींसो हे पज्य मिद्ध परमेश्वग,
हम हूं पह गुण पापनमा पार्ने
ही अहदननगुनारयाय नमः ।
क्षयोपशम मम्यापिन तान कलाहरी,
पृरणायक स्वयंयुदि श्रीनिवर्ग।
इनहीमों है पृज्य मिद पामेभरा,
हम हं यह गुण पाय नमन गाने कगा॥
* हमिसानपरंभ न.
जनमन ही दश अनिशय दामन में कही,
स्वयं नि भगवान सानिनोट्टी।
इनहीमो हे पृज्य मिद्ध परमेश्वरा,
इम हूं यह गुण पाप नमन याने बरा ।। ९१ ॥
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मिद्धनका
विधान
२०८
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इनहींमो हे पुज्प सिद्ध परमेश्वग,
हम हूं यह गुण पाप नमन पान करा ८६॥
जो ही अहदननगुगमनुष्टपार नमः ।
क्षयोपशम मम्बाधित ज्ञान कलाहरी,
प्ररण शायक स्वयंवृदि श्रीजिनवरी।
इनदीमो हे पूज्य मिद् परमेभरा,
हम है यह गुण पायनमा यानं कम
ॐ अपमानापम नम.
जनमत ही दश अनिाय मामन में नहीं,
स्वयं दानि भगवान आपतिनकोटही।
इनद्दीमो हैं पूज्य मिद परमेश्वरा,
दमई यह गुण पाय नमन गाने दस ११॥
SSISTARSHIVSHRESi555555
FPIR.
६म्बिा ५५

सिद्धचक्र सप्तमी पूजा विधान २०६ दश अतिशय के घांति कर्मको छय करें, महा विभवको पाय मोक्ष-नारी वरें। हनहींसो हैं पूज्य सिद्ध परमेश्वरा, हम हूं यह गुण पाय नमन यातें करा ॥ ९२॥ ओ हों अहदराअतिशयघातिश्याय नमः अघ । केवल विभव उपाय प्रभू जिनपद लहो, चौदै अतिशय देवन करि सेवन कियो। इनहींसो हैं पुज्य सिद्ध परमेश्वरा, इम हूं यह गुण पाय नमन यातें करा ॥ ९३ ॥ ओं ही अहं चतुर्दशअतिशयदेवकताय नमः अघ । चौतीस अतिशय जे पुराण बरनी महा, मुक्ति समाज अनूपम श्रीगुरुने कहा। २०६ अफ मिद्धचर विधान २०८ इनहींसो हे पूज्य मिद्ध परमेश्वग, हम हूं यह गुण पाय नमन यान 11: ओ ही अहदनन्नगुणपाटणार नमः । क्षयोपशम मम्बाधित नान कलाहरी, पृष्णायक बदि श्रीजिन। इनदीमो हे पृज्य मिद परमेयम, हम टुं यह गुण पापनमन यान ग॥ *अहमिवानाद नम: जनमन ही दश अनिाय मामन में नही, स्वयं निः भगवान आप निमको नही। इनद्दीमो हैं पूज्य मिद परमेश्वरा, स्मटुं यह गुण पाय नमन याने परा॥११॥ RSSEShifishKSHA POPIPIFIFirr सनियर्थ व 4: ।

मतमी विधान २११ उत्तर गुण सब लख चौरासी, पुरण चारित भेद प्रकाशी। सो अरहन्त सिद्धपद पाया, भाव माहित हम शीश नवाया।९८ ओ ही अहं पदअनन्तगुणाय नमः अर्घ । आतम शक्तिजाम करि छीनी, ताम नाश प्रभुनाई लीनी । सो अरहन्त सिद्धपद पाया, भाव महिन हम शीश नवाया।९९॥ ओ ही अहं परमात्मने नमः अध। निज गुण निज ही माहि समाये, गणधरादि वरनन करि नाये । सो अरहन्त मिद्धपद पाया, भाव माहित हम शीश नवाया। ओं ही अहंद्गुप्तम्बरपाय नमः अयं ॥ १० ॥ दोधक छन्द । जो निज आतम माधु सुखाई, मो जगतेश्वर मिद्ध कदाई। लोक शिरोमणि है शिवस्वामी. भावमहित तुमको प्रणमामी। ऑ ही गिद्धभ्यो नमः अप ॥२०॥ २११

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विधान
पूज
अर्थ
हनीमो है पूज्य मिद्ध परमेश्वग,
हम है यह गुण पाय नमन याने कर।।९४ ।।
प्रारी अहमिदनिशविराजमानाय नमः अप।
दातर छन्द।
रोकालोक आत्म सम जानो, ज्ञानानंद सुगुण पहिचानो।
सो अरहन्त मिद्धपद पाया, भाव महित हम शीश नवाया९५
ओ ही अज्ञानानन्दगुणाय नमः
समरस सुधिर भाव उद्धारा, युगपति लोकालोक निहारा ।
मोअरहन्त गिद्धपद पाया, माव सहित हम शीश नवाया ।।१६।
मोदी अहयानान-तपेयाय नमः अर्घ ।
इक हा गुणका भाव अनन्ना, पर्यपहा मो है भरहन्ता।
मोअरहन्त मिदाद पाया, भाव माहित हम शीश नवाया ५७
प्रोगगुलाए नमः प्रय।
जफफफ

সিগান
155555
२११
लय चारासी, पूरण चारित भेद प्रकाशा।
सो अरहन्त सिद्धपद पाया, भाव महित हम शीश नवाया।९८
औदी अह पदमनन्तगुणाय नगः अर्य।
आतम शक्तिजाम करि छीनी, तास नाश प्रभुताई लीनी।
सो अरहन्त सिद्धपद पाया, भाव महिन हम शीश नवाया।९९
औ ही अपरमात्मने नमः अर्य।
निज गुण निज ही माहि समाये, गणधरादि वरनन करि नाये ।
सो अरहन्त मिद्धपद पाया, भाव सहित हम शीश नवाया।
औदी अहंदगुप्तस्वरूपाय नमः अर्घ ॥ १०० ।।
दोधक छन्द।
जो निज आतम साधु सुखाई, सो जगतेश्वर सिद्ध कहाई ।
लोक शिरोमणि है शिवस्वामी, भावसहित तुगको प्रणमामी।
औ ही सिद्धेभ्यो नमः अर्थ ॥१०१।।
२११

सिचक्र विधान सप्तमी पूजा २१२ सरव विरूप विरुद्ध संरूंपी, स्वातम रूप विशुद्ध अनूपी । लोक शिरोमणि है शिवस्वामी, भावसहित तुमको मणमामी । औं ही सिद्धस्वरूपेभ्यो नमः अर्घ ॥१०॥ पराश्रित सर्व विभाव निवाग, स्वाश्रित सर्व अवाघ अपारा । लोक शिरोमणि है शिवस्वामी, भावसहित तुमको प्रणमामी । १०३३ ॐ ही मिद्धगुणं म्यो नमः अर्थ । आकुलता सर ही विधि नाशी, ज्ञायक लोकालोक प्रकाशी। लोक शिरोमणि है शिव स्वामी, भाव सहित तुमको प्रणमामी ।१०४ आही मिद्धज्ञानेभ्यो नमः अर्थ । जीव अजीव लेखे अविचारा, हो नहीं अन्तर एक प्रकारा। लोक शिरोमणि है शिवस्वामी, भावसहित तुपको प्रणमामी ॥१०॥ ओ ही मिढदर्शनेम्पो नमः अर्य। अन्तर माहिर भेद उघारी. दर्श विशद्धाय सम्बकाती। २१२ मिचक गानी जा विधान २१३ लोक शिरोमणि है शिवस्वामी, भावमहित तुमको प्रणमामी ॥१०॥ ओ हों मिशुदगम्यक्त्वेभ्यो नमः अय। एक अणुमल कर्म लजावे, सोय निरंजनता नहि पावे। लोक शिरोमणि हे शिवस्वामी, भावमहित तुमको प्रणमामी । १०७) ॐहीं मिद्धनिरंजनेभ्यो नमः अय। अबरोला छन्द-वारों गतिको भ्रमण नाशकर थिरता पाई। निज स्वरूपमें लीन, अन्य सो मोह नशाई ॥ १०८॥ ओ ही मिअचलपदग्राप्ताय नमः अप । रत्नत्रय आराधि साधि, निज शिवपद पायो। संख्या भेद उलंघि, शिवालय वास करायो । १०९।। ओ ही संख्यातीतसिद्धभ्यो नमः अप। असंख्यात मरजाद एक ताह सो बीते । विजय लक्ष्मीनाथ, महावल सब विधि जीते ।। ११०॥ 5555555 २१३ सिपा सप्तमी पूजा विधान २१४ #555359999REEEEEEEEEEEEEEEEE औही अमंडपातमिद्धभ्यो नमः अर्प। काल आदि मर्याद आदि, सो इह विधि जारी। भए अनन्त दिगम्बर साधु जु, शिवपद धारी ॥ १११॥ ओ ही अनन्तमिदभ्यो नमः अर्थ । पुष्कराई सागर लों, जो जल धान वखानो। देव सहाइ उपाइ, ऊर्च गति गमन करानो ॥ ११२ ॥ ओ ही जलमिदभ्यो नमः अर्थ । वन गिर नगर गुफादि सर्व थलसों, शिव पाइ। सिद्धक्षेत्र सब ठोर वखानत, श्री जिनराई ॥ ११३ ।। श्री ही स्थल मिद्धभ्यो नमः अप । नभही में जिन शुफलम्यान, वल कर्म नाश किय । आउ पूर्ण वश ततलिनाही शिवधाम जाय लिय ॥ ११४॥ २१४

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सिद्धचक्र विधान तामी पूजा । २१६ गर्भ कल्याणक आदिः युत, तीर्थकर सुख धाम है। सिद्ध भये तिहुं योगते, तिनके पद परिणाम है ॥ ११९॥ औं ही तीर्थ करसिद्धम्यो नमः अर्थ तीर्थकरके समय में, केवली जिन अभिराम है। सिद्ध भये तिहूं योगते, तिनके पद परिणाम है ॥ १२०॥ ओ ही तीर्थकरअनन्तसिद्धभ्यो नमः अप । पंच शतक पच्चीस फुनि, धनुषकाय अभिराम है। सिद्ध भये तिहुं योगते तिनके पद परिणाम है ।। १२१ ॥ ओ ही उत्कृष्टअवगाहनसिद्धेभ्यो नमः अर्प । आदि अन्त अन्तर विष; मध्यवगाहन- नाम हैं। सिद्ध भये तिहु जोगते, तिनके पद परिणाम है ॥ १२२॥ ओ ही मध्यमअवगाहन मिद्धभ्यो नमः अर्घ । केवली तनः तीन अर्थ, इस्त. प्रमाण कहाय है।

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मिक सप्तमी पूजा विधान 135955599999965522 समय एक दो तीन धाराप्रवाही, कियो कर्म छय अंतगय होय नाहीं। भये सिख राजा निजानंद साजा, यही मोक्ष जाना नमःसिद्ध काजा॥ ही श्रिममयमिदभ्यो नमः अयं ॥१३६॥ हुये हो सु होगे सुहो है अवारी, त्रिकालं सदा मोक्ष पंधा विहारी । भये सिद्ध राजा निजानंद साजा, यही मोक्ष जाना नमः सिद्धःकाजा। ओ ही त्रिकालसिद्धभयो नमः अर्थ ॥१३७॥ तिहुँ लोकके शुदध सम्यक्त धारी, महा भार संजम धरै हैं अयारी । भये सिद्ध राजा निजानंद साजा, यही मोक्ष जाना नमः सिद्धः काजा ॐ ही त्रिलोकमिद्धेभ्यो नमः अर्थ ॥१३८॥ मरहठा छन्द-तिहुँ लोक निहारा; सय दुखकारा, पापरूप संसार । ताको परिहारा मुलभ मुखारा, भये सिद्ध अविकार ॥ हे जगत्रय नायक मंगलदायक, मंगलमय सुखफार ।। में नम् प्रिकारही अप टाय मराशि जमदार ... PU

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सद्धचक्र सप्तमी पूजा विधान । + २२२ हे जगत्रयनायक मंगलदायक, मंगलमय सुखकार । में नमूत्रिकाला हो अघ काला, तपहर शशि उनहार ॥१४२॥ ओं ही मिद्धमंगलदर्शनेभ्यो नमः अर्घ । निजबंधन डोरी छिनमें तोरी, स्वयं शक्ति परकाश । निरभय निरमोही परम अछोही, अन्तराय विधि नाश ॥ हे जगत्रय नायक मंगलदायक, मंगलमय सुग्वकार । में नमूनिकाला हो अघ काला, तपहर शशि उनहार ॥ १४३॥ ॐ ही मिद्धमंगलवीर्यभयो नमः अयं । जाके प्रसादकर सकल चराचर, निजसो भिन्न लयाय । रुपराग निवारा सुख विस्तारा, आकुलता विनशाय ॥ हे जगत्रय नायक मंगलदायक, मंगलमय सुखकार । में नम त्रिकाला हो अघ काला, नपहर शशि उनहार ॥ १४४॥ it गिद्धमंगलाम्गकन्वेनगो नमः । २२२

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गागो সিরুণ विधान २२४ में नम निकाला हो अप काला, नपार शशि उगमार ॥१४॥ श्री ही गिदमंगलमगुगलागयो नमः पुमल त सारी विविध प्रकारी, सभाय अधिकार सब भांति नियाग निज मुग्यकारी, पागो पद अधिकार ॥ है जगप्रय नायक मंगलदायक, मंगलमय गुपकार'। में नगं निकाला हो अप फाला, नपार शशि उनहार ॥ १४ ॥ गिदमंगलमगाराभिमयी नमः अपगान प्रणामी ज्ञानागी, दर्शन पीएं अपार । मूक्षम अयका अग अपिनार्थ, अगुम्ला, मुषकार ।। है जगप्रय नायक मंगलदायफा, मगरमग गुणकार । में ना किया हो अपमाला, गार शशि उनहार ॥ १५९॥ tattinginmeी नगा 'अर्थ । for IAL निका -hts:- 卐 सिद्धचक्र विधान सप्तमी पूजा . नि... परधान सम्यकज्ञान, आदि अन्त सावकार ।। जगनयनायक मंगलदायक, मंगलमय सुखकार । में नम त्रिकाला हो अघटाला, तपहर शशि उनहार ॥ १५०॥ यी ही सिद्धमंगलअष्टस्वरूपेभयो नमः अर्थ मंगल अरहन्तं अष्टम भन्तं, सिद्ध अष्ट गुण भास । ये ही विलसावे, अन्य न पावं, असाधारण परकाश । हे जगत्रयनायक मंगलदायक, मंगलमय सुखकार । में नम त्रिकाला हो अघ-काला, तपहर शशि उनहार ॥ १५१॥ ओ ही मिद्धमंगलअष्टप्रकाशकेभयो नमः अर्थ । निर आकुलताई सुख अधिकाई, परम शुद्ध परिणाम । संसार निवारण वन्ध विडारन, यही धर्म सुखधाम ॥ हे जगनयनायक मंगलदायक, मंगलमय सुखकार ।

IPIPIES सिद्धचक्र विधान मप्तमी पूजा २२६ में नम त्रिकाला हो अघ काला, तपहर शशि उनहार ॥१५२॥ ओ ही मिद्धमंगलधर्मेभ्यो नमः अर्घ । चूलिकाछन्द-तीनकाल तिहुँ लोकमें, तुम गुणऔरन माहि लखाने । लोकोत्तम परसिद्ध हो, सिद्धराज सुख साज घरवाने ॥ १५३॥ ओं ही सिद्धलोकोत्तमगुणंभयो नमः अर्घ । लोकत्रय शिर छत्र मणि, लोकत्रय वर पूज्य प्रधाने । लोकोत्तम परसिद्ध हो सिद्धराज, सुखसाज वखाने ॥१५॥ ओं ही मिद्धलोकोनमेभ्यो नमः अर्थ। अमल अनूप तेजघन, निरावरण निजरूप प्रमाने । लोकोत्तम परसिद्ध हो, सिद्धराज मुख साज वखाने ॥१५॥ ओ ही मिद्धलोकोतमस्वरूपाय नमः अर्थ । २२६ सप्तमी सिद्धचक्र 151515151515457 " विधान २२७ लोकोत्तम परसिद्ध हो, सिद्धराज सुख साज बखाने॥१५६॥ ओं ही सिद्धलोकोत्तमज्ञानाय नमः अर्थ । सकल दर्शनावरण विन, पूरन-दरसन जोत उगाने । लोकोत्तम परसिद्ध हो, सिद्धराज सुख साज घखाने ॥१५७॥ ओ ही सिद्धलोकोत्तमदर्शनाय नमः अघ । अतुल अतीन्द्रिय वीरजकर, भोगे नित शिवनारि अघाने । लोकोत्तम परसिद्ध हो, सिद्धराज सुख साज वखाने ॥१५॥ औ ही सिद्धलोकोत्तमवीर्याय नमः अर्थ । त्राटक छन्द। विन कारण ही सबके मितु हो, सर्वोत्तम लोकविपं हितु हो । इनही गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं ।१५६। अ ही सिद्धलोकोचमग्ररणाय नमः अर्थ । २२७ ~ * 'लोकत्रयशिर छत्रमणि, लोकत्रय वर पूज्य प्रधाने' ऐसा पाठ 'क' प्रतिम है। THE - सिद्धचक्र विधान मतमो पूजा २२८ तुम रूप अनूपम ध्यान किये, निज रूप दिखावत स्वच्छ हिये। इनहीं गुणमें मन पागत है, शिवयास करो शरणागत है ।१६०॥ ॐ ही मिद्धस्वरूपशरणाग नमः अप । निरभेद अछेद विकाशित हैं, सब लोक अलोक विभासित हैं। इनही गुणमें मन पागत है, शिववास करो शरणागत हैं ।१६१। ॐ ही गिद्धदर्शनगरणाय नमः अर्थ । निरवाघ अगाध प्रकाशमई, निरद्वंद अबंध अभय अजुई । इनही गुणमें मन पागत है, शिववास करो शरणागत है।।१६२॥ आं ही मिद्धमानमारणाय नमः अप। हित कारण तारण तरण कहै, अप्रमाद प्रसाद प्रयास न है। इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिश्वास करो शरणागत हैं ॥१६३॥ औदी गिद्ववीयशाणाप नमः अध। अविरुद्ध विशुद्ध प्रसिद्ध महा, निज आतम-सस्य प्रयोघ यहा। 1-1-1-1-1-1-1-1-1-in- मिदचक्र विधान समगी २२६ इनहीं गुणमें मन पागत है, शिववास करो शरणागत है॥१६॥ आं ही गिद्धसम्यक्त्वगरणाय नमः अर्य। जिनको पूर्वापर अन्त नहीं, नित धार प्रवाह बहै अति ही । इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं । १६५। ओ ही सिद्धअनन्तशरणाय नमः अघ । कबहुं नहीं अन्त समावत है, सु अनन्त अनन्त कहावत है। इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं।१६६। ओ ही मिद्धअनन्तानन्तगरणाय नमः अघ । तिहुं काल सु सिद्ध महा सुखदा, निजरूप विपं थिर भाव सदा इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं।१६७। ओही गिद्धत्रिकालगरणाय नमः अघ । तिहुँ लोक शिरोमणि पूजि महा, तिहुँ लोक प्रकाशक तेज कहा इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं ।१६८॥ ओ दी सिद्धत्रिलोकशरणाय नमः अर्घ । २२३

सिद्धचक्र
विधान
सप्तमी
पूजा
२३०
गिनती परमाण जु लोक धरे, परदेश समूह प्रकाश करे।
इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिक्वास करो शरणागत हैं।१६९।
ओ ही मिद्धअसंख्यातलोकशरणाय नमः अर्थ।
पूर्वापर एकहि रूप लसे, नित लोक सिंहासनवास बसे ।
इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं ।१७०
ओ ही मिद्धधौव्यगुणशरणाय नमः अर्थ ।
जगतास परजाय विनाश कियो, अवनीश्वर रूप विशुद्ध भयो
इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं ।१७१।
ओ ही सिद्धउत्पादगुणगरणाय नमः अर्प।
परद्रव्य थको रुप राग नहीं, निज भाव विना कहुं लाग नहीं।
इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिवयास करो शरणागत हैं ।१७२।
औ ही मिदसाम्पगुणशरणाय नमः अर्थ ।
विन कर्म करेफ विराजत हैं, अति स्वच्छ महागण राजत
है
२३०

सप्तमा किमान *12 इनहीं गुणमें मन पागत है, शिववास करो शरणागत है । १७३। ीही मिदम्पन्दगुणशरणाय नमः । मन इन्द्रिय आदि न व्याधि नहां, म्प गगलंश प्रवेश न हां। इनहीं गुणमें मन पागत है, शिववास कगे शरणागत हैं।१७॥ ही गिदम्पम्धिनगुणगरणाय नमः अघ । निज मप विनित मगन रहे, परयोग वियोग न दाह लहें । इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं ।१७५! औ ही गिद्धगमाधिगुणधरणाय नमः अघ । शुनज्ञान नथा मतिज्ञान दऊ, परकाशन हं यह व्यक्त सऊ । इनहीं गुणमें मन पागत हैं, शिववास करो शरणागत हैं ॥१७६ ।। ओमी गिद्धगतगुणगाणाय नमः अर्प। परनक्ष अतीन्द्रिय भाव महा,मन इन्द्रिय बोधन गुज्य कहा। इनहीं गुणमे मन पागत है, शिववास करोशरणागत हैं।॥ १७७॥ २३१ सिद्धचक्र विधान सप्तमी पूजा २३२ ॐ ही मिअव्यक्तगुणशरणाय नमः अर्थ । मालिनी छन्द-निज गुणवर स्वामी शुद्ध संबोध नामी, परगुण नहिं लेशा एक ही भाव शेपा । मन वच तन लाई पृजहों भक्तिभाई, भवि भव भय चूरं शाश्वतं सुक्ख पूरं ॥१७८॥ ॐ ही मिद्धगुणागुणस्वरूपाय नमः अर्थ । सब विधि मल जारा बन्ध संसार टारा, जग जिय हितकारी उच्चता पाय सारी। मन वच तन लाई पृनहीं भक्तिभाई, भवि भव भय चूरं शाश्वतं सुक्ख पूरं ।१७९। ॐ ही सिद्धपरमात्मस्वरूपाय नमः अयं । पर-परणतिग्वण्ई भेदयाधाविहाडं, शियमदननिवामी नित्य रधानंदगमी । २३२

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सिद्धचक्र विधान सप्तमी पूजा २३४ विधि वश सब प्रानी हीन आधिक्य ठानी, तिस कर निरमूला पाय रूपा धरूला। मन वच तन लाई पूजहों भक्तिभाई, भवि भव भय चूर शाश्वतं सुक्खपूर ॥१८॥ ॐ ही सिद्धअछेदरूपाय नमः अर्थ जवलग परजाया भेद नाना धराया, इक शिवपद मांही भेद आभास नांहीं। मन वच तन लाई पूजहाँ भक्तिभाई, भवि भव भय चूरं शाश्वतं सुक्ख पूर ॥१८४ ॥ ॐ ही मिद्धअभेदगुणाय नमः अर्थ । अनुपम गुणधारी लोक संभाव टारी, सुरनर मुनि ध्यावें सो नहीं पार पायें। मन वय नन लाई पूजहाँ भफिभाई, २३४ सिद्धचक्र विधान २३५ ससमो ..1 न भय र शाश्वतं सुरवपूरं ॥१५॥ औदी सिद्धअनुपमगुणाय नमः अयं । जिस अनुभव सरसे धार आनन्द बरसे. अनुपम रस सोई स्वाद जासो न कोई। मन वच तन लाई पूज हो भक्तिभाई. भवि भव भय चूरं शाश्वतं सुस्वपुरं ॥१८॥ औ ही गिद्ध अमृततचाय नमः अघ । सब श्रुत विस्ताग जास माहीं उजाग. यही निजपद जानो आत्मसंभाव मानो। मन वच तन लाई पूजहों भक्तिभाई, भवि भव भय चूरं शाश्वतं सुक्रवपूरं ॥१८॥ ओं ही सिद्धश्रुतप्राप्ताय नमः अयं । 1993 २३५ मिपा. सप्तमी पूजा विधान २३८ सुभाव निजातम अन्तर लीन, विभाव परातम आपद हीन । भजो मन आनन्दसों शिवनाथ, धरों चरणांयुजको निज माथ ॥१६॥ ओ ही सिद्धअन्तराकाराय नमः अर्थ । जहां लग द्वप प्रवेश न होय, तहां लग सार रसायन होय । भजो मन आनंदसों शिवनाथ, धरो चरणांबुजको निज माथ ॥१७॥ ओ ही मिद्धमाररमाय नमः अप । जिसो निरलेप हुए विपतव्य, तिसो जग आग्र निराश्रय लुंध्य । भजो मन आनंदसों शिवनाथ, घरों चरणांयुजको निज माथ ॥१६॥ ॐही मिशिखरमण्डनाप नमः अप । तिहूं जग शीस विराजित नित्य, शिरोमणि सर्व समाज: अनित्य । भजो मन आनंदसों शिवनाथ, धरों चरणांवुजको निज माथ । १६६ । ओ मिद्धत्रिलोकाग्रनिवामिने नमः अर्प। अकाप अरुप अलक्ष अवेद, निजातम लीन महा अविलंट। २३८

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गिडन सप्तमी पूजा विधान २४० --- भेद अगोचर रूप महासुख संभयो निज स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है ॥ २०३ ॥ ओ ही सरिस्वरूपगुणभ्यो नमः अर्ध । तत्व प्रतीत निजातम रूप अनुभव कला, पायो सत्यानन्द कुमारग दलमला । निज स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार है ॥ २०४ ॥ ओं ही सूरिसम्यक्त्वगुणेभ्यो नमः अघ। वस्तु अनंत धर्म प्रकाशक ज्ञान है, एक पक्ष हट गृहित निपट असुहान है। निज स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार है, परमारथ आचार्य सिद्ध मुग्वकार हे ॥ २०५॥ २४०

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मिद्धचक मामी एजा विधान निज-स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार हैं। परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार हैं ॥ २०८ ॥ ओ ही सरिपत्रिंगतगुणभ्यो नमः । पंचाचार आचार्य साध शिवपद लियो। वास्तवमं ये गुण निज परगट कियो । निज-स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार हैं। परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार हैं ॥२०९ ॥ ॐही परिसंसानारगुणभगो नमः अर्थ गुणसमुदाय सरूप द्रव्य आतम महा। परसों भिन्न अभेद निजातम पद रहा ।। निज-स्वरूप थितिकरण हरण विधि घार हैं। परमारथ आचार्य सिद्ध मुस्खकार है ।। २१० ॥ ॐ ही परिव्यगुणमयो नमः अप । FIFrr35555 २४२ . -1 २४२ घीन परगति रगही म्पकार . विधान ४३ पूजा 5555 परम शुन्द्र स्वसिद्ध भयो अनिवार जू॥ निज स्वरूप थितिकरण हरण विधि चार हैं । परमारथ आचार्य सिद्ध सुखकार हैं ॥ २११ ।। ओ ही रिपर्यायगुणभ्यो नमः अयं । छन्द रचना (एक हम एक दीर्य) आप सुक्खरूप हो सु, और सौख्यकार होत । ज्यूं घटादिको प्रकाश कार है सुदीप जोत ॥ सृरि धर्मको प्रकाश सिद्ध धर्म, रूप जान । नमं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥ २१२ ॥ ओ ही गरिमंगलमयो नमः अर्घ । संस अंस भान वस्तु भावका प्रकाशमान । ज्ञान इन्द्रियाअनिन्द्रिया कहै उभय प्रमाण ।। स्मृरि धर्मको प्रकाश सिन्दू धर्म रूप जान । मैं नमूं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥२१ । 5555555 २४३ सिद्धपक्र. सप्तमी नूजा विधान २४४ . ओ ही सरिज्ञानमंगलेभ्यो नमः अर्प । लोक उत्तमा सु वसु कर्मको प्रसंग टार, शुद्ध युद्ध रिन्द्ध पाय लोक वेदना निवार । सूरि धर्मको प्रकाश सिद्ध धर्म रूप जान, मैं नमूं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥ २१४ ॥ आ ही गरिलोकोत्तमेभ्यो नमः अर्ब । लोकभीतसो अतीत आदि अन्त एक रूप, लोकमें प्रसिद्ध सर्व भावको अनूप भूप। सूरि धर्मको प्रकाश सिद्ध धर्म रूप जान, मैं नमूं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥ २१५॥ ओं ही यूरिज्ञानलोकोत्तमभ्यो नमः अर्थ योच न अन्तराय, आप ही सुखाय धाय, २४४ या अपाघ धर्मको. प्राडा m मिचक्र विधान २४५ सप्तमी पूजा 393 सार धर्मको प्रकाश, सिद्ध धर्म रूप जान, नमंत्रिकाल एक ही अभेद पक्ष मान ।। २१६।। ओ ही मूरिदर्शनलोकोनमेभ्यो नमः अर्य । मोह भारको निवार, शुद्ध चेतना सुधार, येह वीर्यता अपार, लोकमें प्रशंसकार । सृरि धर्मको प्रकाश, सिद्ध धर्म रूप जान, मैं नम त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ।। २१७ ॥ ओं ही गरिवीर्यलोकोनमेभ्यो नमः अध। धर्म केवली महान, मोह अन्ध तेज भान, सप्त तत्त्वको वखानि, मोक्ष-मार्गको निधान । सूरि धर्मको प्रकाश, सिद्ध धर्म रूप जान, नमं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥ २१८ ॥ अहीं सरिकेवलधर्माय नमः अपें । शील आदि पूर भेद कर्मके कलाप छेद ... 1 सिद्धचक्र विधान सतमो पूजा । २४६ आत्म-शक्तिको प्रकाश, शुद्ध चेतना विलास । सूरि धर्मको प्रकाश, शुद्ध धर्म रूप जान, मैं नमं त्रिकाल एक ही अभेव पक्षमान ॥ २१९ ॥ औ ही गरिनपभगो नमः अब। लोक चाहकी न दाह, द्वेपको प्रवेश नाह, शुद्ध चेतना प्रवाह, वृद्धता धरे अथाह । सूरि धर्मको प्रकाश, सिद्ध धर्म रूप जान, मैं नमूं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥ २२० । ओ ही मूरिपरमतपेभयो नमः अर्ष । मोहको न जोर जाय, घोर आपदा नसाय, घोरतें तपो सु लोक शीश जाय मुक्ति पाय । सूरि धर्मको प्रकाश, सिद्ध धर्म रूप जान, मैं नमूं त्रिकाल एक ही अभेद पक्षमान ॥२२१ ।। श्री का परितगोपीरपुर्णभगो नमः । -1-1-1-1-1-1-1-1-1-1........। २४६ মিল पूजा सप्तमी 55555555555 विधान कामिनीमोहन छन्द मात्रा २० । वृद्धपर वृद्ध गुण गहन नित हो जहाँ, शाश्वतंपूर्णता सातिशय गुण तहां । सूरि सिद्धांतके पारगामी भये, मेंनमू जोरकर मोक्षधामी भये ॥२२२॥ ओ ही मरिचारगुणपराक्रमेम्यो नमः अर्थ। एकसम-भाव सम और नहीं धाद्धि है, सर्वही रिन्द्र जाके भये सिद्ध है। सृरि सिद्धांतके पारगामी भये, में नम जोरकर मोक्षधामी भये ।२२३॥ ॐ हीं सूरिरिद्धिऋषिभ्यो नमः अर्थ। जोगके रोकसे कर्मका रोक हो, गुप्त साधन किये साध्य शिवलोक हो। सरि सिद्धांतके पारगामी भये, में नम जोरकर मोक्षधामी भये ।२२४॥ मी ही सरिमुगाँगेभ्यो नमः अर्ष । ध्यान बल कर्मके नाशको हेतु है, कर्मको नाश शिववास ही देतु है। सरि सिद्धांतके पारगामी भये, में नमूं जोरकर मोक्षधामी भये ॥२२५॥ ओं ही सूरिध्यानेभ्यो नमः अर्थ।

-1-Hindi- सिद्धचक्र मतमी पूजा विधान - २४८ आचारमें आत्म अधिकार है, वाप्य आधार आधेय सुविकार है। सूरि सिद्धांतके पारगामी भये, में नम जोरकर मोक्षधामी भये ।२२६ ओ ही मृरिधात्रिभ्यो नमः अर्घ । सूर सम आप पर तेज करनार है, सूर ही मोक्षनिधि पात्र सुग्वकार है। सूरि सिद्धांतकेपारगामी भये, में नम जोरकर मोक्षधामी भये ।२२७॥ ओ हो मरिपात्रं भ्यो नमः अर्प। वाह्य छत्तीस अन्तर अभेदात्मा, आप-धिर रूप हे सूर परमात्मा । सूरि सिद्धांतके पारगामी भये, में नम जोरकर मोक्षधामीभये।२२८॥ ओ ही गारगुणशरणाग नमः अयं । ज्ञान उपयोगमें स्वस्थिता शुद्धता, पूर्ण चारित्रता पूर्ण ही बुद्धता । सृरि सिद्धांतके पारगामी भये, में नमजोरकर मोक्षधामी भये।२२९॥ ॐ ही मरिधर्मगुणशरणाय नमः अर्थः । शरण दाय उरण पर आप म्य शर्ण , आपने फार्म आपही कर्ण।

ពីរ मिदनक विमान सप्तमी सरि सिद्धांतक पारगामी भये, में नम जोरकर म...ाना मया२३०॥ ही गरिम्पारणाग नमः अग। दोहा-ज्यों कान बिन कालिमा, उनल, गप सुहाय । त्यांनी कर्म-कलंक विन. निज न्यरूप दरशाय ।। २३१ ॥ ही गरिम्यापमणाय नमः । भेदाभेद मु नय थकी. एक ही धर्म विचार । पायो मरि मुबोध कार, भवदधि करि उधार ॥ २३२ ॥ श्री ही गरिधर्मम्मम्पारणाय नमः अर्थ । अन्य ममग्न विकल्प ताज, केवल निजपद लीन । पुग्ण ज्ञान ग्वरुप यह, पायो सरि मुधीन ।। २३३ ।। ही गरिसानग्यरूपमरणाय नमः अर्ष । सुग्याभास इन्द्रीजनिन, त्यागी सरि महन्त । पृरण मुग्य स्वाधीन निज, साध्य भये सुखवन्त ॥ २३१ । २४६ শিদ। सप्तमी पूजा विधान । २५० ॐ ही सरिमुखस्वरूपाय नमः अर्ष । अनेकांत तत्वार्थके, ज्ञाता सूरि महान । निरावर्ण निजरूप लखि, पायो पद निरवाण ॥ २३५ ॥ ॐ ही सरिदर्शनस्वरूपाय नमः अर्घ मोहादिक रिपु नाशिके, सूर्य महा सामर्थ । शिव भामिन भरतार नित, रमै साध निज अर्थ ॥ २३६ ॥ * ही त्रिवीर्यस्वरूपाय नमः अर्प। पद्धडी छन्द। जिन निज आतम निष्पाप कीन, त सन्त करें पर पाप छीन । शिवमग प्रगटनआदित्य सूर, हम शरण गही आनंद पूर । २३७ । ॐ ही सरिमंगलशरणाय नमः अर्थ । रनो जीव सुभाव भाय, भवि पतित उधारण हो सहाय । शियमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनंद पूर।२३८। . २५० ॐ मHिerman art.

गिद्धन
विधान
२५?
गतमी
पुना
तपकर ज्यों कश्चन आन जोग, # शुद्ध निजातम पद मनोग।
शिवमग प्रगटन आदित्य सृर, हम शरण गही आनंद पुर ।२३६
ॐ हीं मुग्निपःशरणाय नमः अर्ष ।
एकाग्रह चिंताकर निरोध, पावं अवाध शिव आत्म सोध ।
शिवमग प्रगटन आदित्य सृर, हम शरण गही आनंद पुर ।२४०
ओ ही मरियानगग्णाय नमः अर्थ ।
केवलज्ञानादि विभूनि पाइ, ह
शुद्ध
निरंजन पद सुग्वाइ।
शिव मग प्रगटन आदित्य सृर, हम शरण गही आनंद पुर ।२४१
ओ ही मरिमिशरणाय नमः अर्ध
निहं लोकनाथ तिहुँ लोक माहिं, यासम दूजो सुखदाय: नाहिं ।
शिवमग प्रगटन आदित्य सृर, हम शरण गही आनंद पूर । २४२
ओं दी मूरित्रिलोकशरणाय नमः अर्थ ।
आगत अतीत अरु वर्तमान, तिहुं काल भव्य पावे निर्वाण ।
4
फ
२५१

मिद्धचक्र
सप्तमो
पूजा
विधान
शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनंद पूर।२४३।
ॐ ही मूरित्रिकालशरणाय नमः अर्थ ।
मध अघो ऊर्द्ध तिहुं जगतमाहिं, सब जीवन सुखकर और नाहिं।
शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनंद पूर ।२४४
ओं ही मूरिशिजगन्मंगलाय नमः अर्थ ।
तिहुँ लोकमाहिं सुखकार आप, सत्यारथ मंगल हरण पाप ।
शिवमग प्रगटन आदित्य सुर, हम शरण गही आनंद पूर ।२४५
ओं ही मूरित्रिलोकमंगलशरणाय नमः अर्थ ।
उत्तम मंगल परमार्थ रूप, जग दुख नासे शिव सुख स्वरूप ।
शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनंद पूर ।२४६।
ॐ ही सरित्रिजगन्मंगलानमगरणाय नमः अर्थ।
शरणागत दुःखनाशन महान, तिहुं जगहित कारण सुख निधान।
शिवमग प्रगटन आदित्य सूर, हम शरण गही आनंद पूर ।२४७१
श्री गरिधिजगन्मगारपरणाय मगा बर्ष ।

'" " 55. मसमी एमा " .::m II म नाथ तिर लाकपाग. शरणागत प्रतिपालन अज्य । ग प्रगा। जानिय सर. हम शरण गही आनंद पूर ।२४८ .मानणाय नमः । ।। समय यत. मंसारातीत विमोहमुक्त । म. हम शरण गही आनंद पूर ।२४९ • मरणाय नमः । सन्दा १. 2 1.32 171 ] जगमें यह मंत्र महान' कहो। 2. . . . . . प्रणमं शिययास करें सुखदा ॥२५०॥ • पाय नगः अयं । | ...': । . It it . मग वास हरण तुम नाम निधी । .!" . . . ] ::''! | पा. प्रणमं शिययास करे सुखदा ॥२५१॥ · गुणाग नमः अध। अगमारिल 11 . . . यह मंत्र सु धर्म कहावत " " २५३ myme f सप्तमी पूजा 5555555555 । ॐ ही सुरिमंत्रगुणानन्दाय नमः अर्थ । मिद्वचा परमोत्तम सिद्ध परियाय कही, अति शुद्ध प्रसिद्ध सुखात्म मही। विधान धरि भनि हिय गणराज सदा, प्रण शिक्वास करे सुखदा ।।२६२॥ ओ ही मूरिमिद्धानन्दाय नमः अर्थ । माला छन्द-शशि सन्ताप कलाप निवारण ज्ञान कला सरसै, मिथ्यानम हरि भवि आनन्द करि अनुभव भा दरसे मृगि निज भंद कियो परसें, भय मुक्ति में नम शीश निज जोर युगल करसै ॥ २६३ ।। प्रां हां मरिअमृतचन्द्राय नमः अर्थ । पुरण चन्द्र सरूप कलाधर ज्ञान सुधा वरस, भवि चकोर चित चाहत नित मनु चरण जोति परसे । सृरि निज भंद कियो परसें, भये मुक्ति मैं नमूं शीश० ॥२६४॥ औ ही गरिगुधारन्द्रायरूपाप नमः अर्थ । IPIPIPIPIPIPI M २५६ নিয়ন सप्तमी पूजा विधान 55555999999999999ऊधमक देव सुधा सम गुण निवाहकर सकल चराचरस । सूरि निज भेद कियो परसे, भये मुक्ति में नमूं शीश० ॥२६॥ ॐ ही सरिसुधागुणाय नमः अर्थ । जा धुनि सुनि संशय विनसे जिम ताप मेघ बरसे, मनहं कमल मकरंद वृन्द अलि पाय सुधासरसे । सूरि निज भेद कियो परसें, भये मुक्ति में नमूं शीश ० । २६६ । जी ही गरिसुधाधनये नमः अर्घ । अजर अमर सुखदाय भाय मन ज्यों मयूर हरसे, गाजन धन वाजत ध्वनि सुनि मनु भाजत भय उरसें। सूरि निज भेद कियो परसें, भये मुक्ति में नमूं शीश ० । २६७ । औ ही मूरिअमृतध्वनिमुरूपाय नमः अर्थ । चकोर छंद-जो अपने गुण वा पर्याय, वरै निजधर्मनहोत विनास । २५७ HTTE

नगरपक.
सप्तमो
पूजा
(उधान
29589F
प्रव्य महारत है सु अनंत, स्वभाव धर निज आत्म विलास ॥
सूरि फहाय सु कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम
आतमराम सदा अभिराम भये सुख काम नमूं वसु जाम।२६८।
ओं ही सूरिद्राय नमः अर्घ ।
ज्यों शशि जोति रहे सियरा नित, ज्यों रवि जोति रहे नित ताप ।
ज्यों निज ज्ञानकला परिपूरण, राजत हो निज करण सु आप ।
सूरि कहाय स कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमूं वसु जाम २६९
ओं ही परिगुणग्याय नमः अर्थ ।
हो अविनाश अनूपम रूप सु, ज्ञानमई नित केलि करान ।
पेन तजे मरजाद रहै, जिम सिन्धुलोल सदा परमाण ॥
सूरि कहाय सु कर्म विभाइ, निजातम पाय गये शिवधाम.।
एआतपास सहा अभिराम, भये पम्पकार नगं नाम जागर७०
२५८
.

सममी
मिन्द्र क्रम
ओं ही मरिपर्यायाय नमः ।
जे कछु द्रव्य तनो गुण है, सु समस्त मिले गुण आतम माहीं।
ताकरि द्रव्य कहावत है, अविनाश नमें हम ताई ॥
सुरि कहाय स कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमूं वसु जाम २७१
ओ दी गरिद्रव्यम्परूपाय नमः अग।
जा गुणमें गुण और न हो, निज द्रव्य रहै नित और न ठौर ।
सो गुण रूप सदा निवसे, हम पृजत हैं करके कर जोर ॥
सूरि कहाय सु कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमूबसु जाम २७२
ॐ हीं मरिगुणस्वरूपाय नमः अर्थ ।
जो परणाम घरें तिनसो, तिनमकरहे वरते तिस रुप ।
सो पर्याय उपाय विना नित, आप विराजत है स अनूप ॥
सूरि कहाय मु कर्म खिपाइ, निजातम.पाय गये शिवधाम ।
151599
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मिद्दचक्र
सप्तमी
पूजा
विधान
२६०
सुआतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नम वसु जाम २७३
ओं ही सरिपर्यायस्वरूपाय नमः अप ।
हो नित ही परणाम समै प्रति, सो उत्पाद कहो भगवान ।
सो तुम भाव प्रकाश कियो, निज यह गुणका उत्पादमहान ॥
सूरि कहाय सु कर्म खिपाइ निजातम पाय गये शिवधाम ।
सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमूं वसु जाम २७६
* ही सूरिगुणोत्पादाय नमः अर्प।
ज्यों मृतिका निज रूप न छोडत, है घटमांहि अनेक प्रकार ।
सो तुम जीव स्वभाव धरौ नित, मुक्त भए जगवास निवार ।
सूरि कहाय सुकर्म खिाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमूं वसु जाम २७५
ॐ हीं मूरिध वगुणोत्पादाय नमः अर्घ !
जगमें सब भाव विभाव, पराश्रित रूप अनेक प्रकार ।
२६०

.
सप्तमी
भयेसखकाम
नमू वसु
गिद्रन
विधान
655555555555555555559
सूरि कहाय सु कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधान ।
सु आतमराम सदा
अभिराम,
जाम २७६
ॐ हीं मरिन्ययगुणोत्पादाय नमः अर्थ ।
जे जगमें पद्व्य कहै, तिनमें इक जीव :सु ज्ञान स्वरूपा ।
और सभी विनज्ञान कहै, तुम राजत हो नित ज्ञान अनूपा ॥
सूरि कहाय सुकर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सुआतमराम सदा अभिराम, भये
सुखकाम नमू वसुजाम २७७
ओं ही मूरिजीयतचाय नमः अर्थ ।
ज्ञान सुभाव धरो नित ही, नहीं छाड़त हो कबहुं निज वान ।
येही विशेष भयो सव सों नहीं, औरनमें गुण ये परधान ॥
सूरि कहाय सुकर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सु आतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमूं वसु जाम २७८
ती सरिजीवतत्वगुणाय नमः अयें ।

पूजा
558
हो कादि अनेक प्रकार, निजातममें परमै अनिवार ।
सो परको न लगाव रहो, निज ही निजकर्म रहो सुखकार ।।
सूरि कहाप सुकर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सुआतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम न वसुजाम।२७९॥
ॐ ही मरिवीववियो नमः अर्थ ।
द्रव्य तथापि विभाव देऊ, विधि कर्म प्रवाह वहै विन आदि ।
ते सब एक भये घिरम्प, निजातम शुद्ध सुभाव प्रसाद ॥
सूरि कहाय सु कर्म खिपाइ, निजातम पाय गये शिवधाम ।
सुआतमराम सदा अभिराम, भये सुखकाम नमू-वसु जाम २८०
अहो मुरिआयपश्निाशय नमः अर्थ ।
मोदक छन्द बंघ दऊ विधिक दुख कारण, नाश कियोभवपार उतारण
सूरि भये निज ज्ञान कलाफर, सिद्ध भये प्रणाम में मनपर २८१)
प्रोसिपिलमरिना नमः अर्थ ।
पदेन. आर ओपनको पद
PAR

सप्तमा
मिद
मान
ऊ5555555555555555555
मुरि महा निज ज्ञान कलाकर, सिद्ध भय प्रणभू मन मैं धर।२८२।
ओ दी गरिसंवरगुणाय नमः अयं ।
ज्यूं मणि दीप अडोल अनूप ही, संवर तत्त्व निराकुलरूप ही।
मृरि महा निज ज्ञान कलाकर, सिद्ध भये प्रण मन में घर।२८३।
ओ ही सरिसंचरतचस्वरूपाय नमः अर्थ ।
संवरके गुण ते मुनि पायत, जो मुनि शुद्ध सुभाव सुध्यावत ।
सरि महा निज ज्ञान कलाकर, सिद्ध भये प्रणमूं मन मैंधर।२८४।
औ ही मृरिसंवरगुणाय नमः अप ।
मंबर धर्मतनी शिव पावहि, संवर धरम तहां दरशावहि ।
सूरि महा निज ज्ञान कलाकर, सिद्ध भये प्रणमूं मन में धर।२८५।
आं दी गरिसंबरधर्माय नमः अर्घ ।
दोहा-एक देश या सर्व विधि, दोनों मुक्ति स्वरूप ।
नमूं निरजरा तत्त्वों, पायो सिद्धः अनूप ।२८६।
गोह सरिनिर्जरातचाय नमः अयं ।
२६३

Fatar मा सप्तमी पूजा ३धान॥ . EAR24555555393 राक्ष सुभाव जहां तहां, कहो कर्मको नाश । एम निरजरा तत्वका, रूप कियो परकाश ॥ २८७ ।। ही सरिनिर्जरातत्वस्वरूपाय नमः अप । कोटि जन्म विधि सकल, सके तृण समजान । दहे निर्जरा असिसों, इह गुण है परधान ॥ २८८ ॥ ॐही मरिनिर्जरागुणस्वरूपाय नमः अर्थ । निज वल कर्म खपाइये, कहो निर्जरा धर्म धर्मी सोई आत्मा, एक हि रूप सुपर्म ॥ २८९ ।। * मरिनिर्जराधर्मस्वरूपाय नमः अर्थ । समय समै गुण श्रणिका, खिरे कर्म पल ध्यान । पे सम्बंध निगार करि, करे मुक्ति सुख पान ।।२९० ॥ में ही मरिनिरानुबंधाय नमः अर्ष। अतुल शक्ति पिर भावकी, मो प्रगरी तुम माहि। परी निर्जरा रूप है, न भनिा कर गादि॥ २९ ॥ २६४ 15 सही सरिरी जा मिङ्गचक्र विधान सर्व कर्मके नाश विन, लहै न शिव-सुखरास । निश्चय तुम ही निर्जरा, कियो प्रतीत प्रकाश ॥ २९२ ॥ ओं ही सुरिनिर्जराप्रतीताय नमः अर्थ । सकल कर्ममल नाशतें, शुद्ध निरंजन रूप । ज्यों कंचन विन कालिमा, राजै मोक्ष अनूप ॥ २९३ ॥ ॐ हीं सूरिमोक्षाय नमः अर्थे । द्रव्य भाव दोनों सुविधि, करै जगतमें वास । दोऊ विध वन्ध उखारके, भये मुक्त सुखरास ॥२९४ ॥ ॐ हीं सरिवन्धमोक्षाय नमः अप॑ ।। पर विकलप सुख दुख नहीं, अनुभव निज आनन्द । जन्म मरण विधि नाशकर, राजत शिवसुख कंद ॥ २९५॥ ॐ हीं सूरिमोक्षस्वरूपाय नमः अर्थ । २६५ मिचक्र सप्तमी पूजा विधान -.-1-1-1-1-1-.-.-.-.- जहां न दुःखको लेश है, उदय कर्म अनुमार । सो शिवपद पायो महा, नमूं भक्ति उर धार ॥ २९६ ।। ओं ही सरिमोक्षगुणाय नमः अर्घ । जो शिव सुगुण प्रसिद्ध है, तिनसों निच प्रवन्ध । जे जगवास विलास दुख, तिनसों नमूं अवन्ध ॥ २९७॥ ओ ही सरिमोक्षानुवंधाय नमः अर्थ । जैसी निज तन आकृती, तज कीनो शिववास । ते तैसें नित अचल हैं, ज्ञानानन्द प्रकाश ॥ २९८ ॥ *ही मूरिमोधानुपकायाय नमः अर्थ । खयोपशम परिणाम कर, सधै न निजका रूप। या निजपदमें लीनता; ये ही गुप्त स्वरूप ॥२९९ ।। ही मरियरूपगुप्तपे नमः अर्ष । इन्द्रिपजनितनादुख जी: मदा निजानन्दरूप । PL सप्तमी पूजा 55555555555555555555555 निर आकुल स्वाधीनता; परले शुद्ध स्वरूप ॥ ३००॥ गहन *ही गरिपरमात्मस्वरूपाय नमः अघ । विधान गेला छन्द-संपुरण श्रुत सार निजातम बोध लहानो, निज अनुभव शिव मूल मनुज उपदेश करानो। शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अंधियारा, पाठक गुण संभवे सिद्ध पति नमन हमारा ॥ ३०१॥ ही पाठफभयो नमः अर्थ । मुक्ति मूल है आत्मज्ञान सोई श्रुत ज्ञानी, तत्व ज्ञानसों लहे निजातम पद सुखदानी। शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अन्धियारा. पाठक गुण संभवे सिद्ध प्रति नमन हमारा ।। ३०२॥ *ही पाठकमोक्षमण्डनाय नमः अथ । भवसागर भन्य-जीव तारण अनिवारा, २६७ सप्तमी पूजा विधान । तुममें यह गुण अधिक आप पायो तिस पारा। शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अन्धियारा, पाठक गुण सभंवे सिद्ध प्रति नमन हमारा ॥३०३॥ ओं ही पाठकगुणेभ्यो नमः अर्थ। दर्शन ज्ञान स्वभाव धरो तद्रूप अनूपी, हीनाधिक विन अचल विराजत शुद्ध सरूपी । शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अन्धियारा, पाठक गुण सभवे सिद्ध प्रति नमन हमारा ॥३०॥ ओं ही पाठकगुणस्वरूपेभ्यो नमः अर्ष । निज गुण वा परयाय अखण्डित नित्य धरै है। तिहुं काल प्रति अन्य भाव नहीं ग्रहण करे हैं। शिष्यनके अज्ञान रेषयू रवि अन्धियारा, २६८ सप्तमी गिद्धचक्रम विधान 5555555555555555555 पाठक गुण सम्भवै सिद्धपारानमन हमारा ॥३०५॥ ओ ही पाठकद्रन्याय नमः अर्घ । सह भावी गुण सार जहां परभाव न लेसा, अगुरुलघू परणाम वस्तु सद्भाव विशेषा। शिष्यनके अज्ञान हरै ज्यूं रवि अन्धियारा, पाठक गुण सम्भवै सिद्ध प्रति नमन हमारा ॥३०६॥ ओं हो पाठकगुणपर्यायेभ्यो नमः अर्थ गुण समुदायी द्रव्य याहितें निरगुण नाही, सो अनन्त गुण सदा विराजत तुम पद माहीं। शिष्यनके अज्ञान हरै ज्यूं रवि अन्धियारा, पाठक गुण सम्भव सिद्ध प्रति नमन हमारा॥३०७॥ ओ ही पाठकगुणद्रव्याय नमः अयं । TIT प सब द्रव्य सधै नीके अवाधकर, २६९ सिद्धचक्र ससमी पूजा विधान २७० n सो तुम सत्स सरूप विराजो द्रव्य भाव धर । शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अन्धियारा, पाठक गुण सम्भवै सिद्ध प्रति नमन हमारा ३०८॥ ओं ही पाठकद्रव्यसरूपाय नमः अर्थ । जे जे हैं परनाम विना परनामी नाही, परनामी परनाम एक ही है तुममाही। शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यों रवि अंधियारा, पाठक गुण सम्भवै सिद्ध प्रति नमन हमारा ॥३०॥ ओं ही पाठकद्रव्यपर्यायाय नमः अर्ष। अगुरुलघू पर्याय शुद्ध परनाम वखानी, निज सरूपमें अतरगत श्रुतज्ञान प्रमानी।

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मिद्धनक
सप्तमी
पूजा
विधान
२७२
दर्शन कर सुखसार मिले सब ही अघ भाजे।
शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यं रवि अंधियारा,
पाठक गुण सम्भवै सिद्ध प्रति नमन हमारा ।३१३।
ओ ही पाठकमंगलगुणस्वरूपाय नमः अर्य।
आदि अनंत अविरुद्ध शुभ मंगलमय मूरति,
निज सरूपमें वसे सदा परभाव विदूरित ।
शिष्यनके अज्ञान हर ज्यं रवि अंधियारा,
पाठक गुण सम्भवै सिधप्रति नमन हमारा । ३१४ ।
ओ ही पाठकद्रन्यमंगलाय नमः अर्ष।
जितनी परणति धरो सबहि मंगलमय रूपी,
अन्य अवस्थित टार धार तप अनूपी।
शियनके अज्ञान हरे ज्यं रवि अन्धियारा,
--
२७२
8. mm -

सप्तमी
पूजा
..
विधान
आ हीं पाठकमंगलपयापार नमः अध।
निश्चय वा विवहार सर्वथा मंगलकारी,
जग जीवनके विधन विनाशन सर्व प्रकारी।
शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अन्धियारा,
पाठक गुण सम्भवे सिधप्रति नमन हमारा। ३१६ ।
औ ही पाठकद्रव्यमंगलपर्यायाय नमः अर्ष।
भेदाभेद प्रमाण वस्तु सर्वस्व बखानो,
वचन अगोचर कहो तथा निर्दोप कहानो।
शिष्यनके अज्ञान हरे ज्यूं रवि अन्धियारा,
पाठक गुण सम्भवे सिद्ध प्रति नमन हमारा । ३१७।
ओ हो पाठकद्रव्यगुणपर्यायमंगलाय नमः अर्ध ।
विशेष प्रतिभासमान मंगलमय भासे,
२७३
२५
5E5

मिरमा
सप्तमी
पूजा
FFERENESS
दर्शन कर मुखसार मिल सब ही अप
भाजे
शिप्यनके अशान हरे ज्यं रवि अंधियारा,
पाठक गुण सम्भवै सिद्ध प्रति नमन हमारा ।३१३।
औ ही पाठकमंगलगुणस्परूपाय नमः अर्ग।
आदि अनंत अविरुद्ध शुभ मंगलमय मूरति,
निज सरूपमें वसे सदा परभाव विदूरित ।
शिप्यनके अज्ञान हर ज्यं रवि अंधियारा,
पाठक गुण सम्भवै सिधप्रति नमन हमारा । ३१४ ।
ओं ही पाठकद्न्यमंगलाप नमः अर्ष ।
जितनी परणति धरो सयहि मंगलमय रूपी,
अन्य अपस्थित टार धार तद्रूप अनूपी ।
शिप्पन अशान हरे ज्यं रवि अन्धियारा,
पाठक TM my n:----
-
२७२

. सद्धचक्र मतमी जा विधान २७५ 65555555555555555555 निज ज्ञान शुद्धता पाई, जिस करि यह है प्रभुताई । तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२२ ॥ औ ही पाठकमानाय नमः अर्थ जग जीव अपूरण ज्ञानी, तुम ही लोकोत्तम मानी। तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥ ३२३।। आं ही पाठकवानलोकानमाय नमः अर्थ । युगपत् निरभेद निहारा, तुम दर्शन भेद उघारा । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया॥ ३२॥ औ ही पाठकदर्शनाय नमः अघ । हम सोवत हैं नित मोही, देखे देखत तुमको ही। तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२५॥ आं दी पाठकदर्शनलोकोमाय नमः अर्ष । गवंत महासुखकारा, तुम ज्ञान महा अविकारा। २७५ Satya

सिद्धचक्र
सप्तम
पूजा
विधान
२७४
निर्विकल्प आनन्दरूप अनुभूति प्रकाशे।
शिप्यनके अज्ञान हरे ज्यू रवि अंधियारा,
पाठक गुण सम्भवै सिदध प्रति नमन हमारा। ३१८ ।
ओं ही पाठकस्वरूपमंगलाय नमः अर्म।
पायता छन्द-निर्विन निराश्रय होई, लोकोत्तम मंगल सोई।
तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया । ३१६ ।
ओ ही पाठकमंगलोचमाय नमः अर्थ ।
जगजीवनको हम देखा, तुम ही गुण सार विशेखा।
तुम गुण अनन्य श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया । ३२० ।
ओ ट्ठी पाठकगुणलोकोत्तमाय नमः ।
पद्व्य रचित जग सारा, तुम उत्तम रूप निहारा ।
तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया। ३२१ ।
२७४
दी वारपद्रवानाफोनमाग मा ani .

নিল 195555 पूजा विधान 155))))) មមមមមមម निज ज्ञान शुद्धता पाई, जिस करि यह है प्रभुताई । तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२२ ॥ ओ ही पाठकमानाय नमः अर्ष। जग जीव अपूरण ज्ञानी, तुम ही लोकोत्तम मानी । तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२३॥ ओ हीं पाठकमानलोकोत्तमाय नमः अथे। युगपत् निरभेद निहारा, तुम दर्शन भेद उघाग । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया।। ३२४॥ आं ही पाठकदर्शनाय नमः अयं । हम सोवत हैं नित मोही, देखे देखत तुमको ही। तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२५॥ ओही पाठकदर्शनलोफोनमाय नमः । द्रगवंत महासुखकारा, तुम ज्ञान महा अविकारा। २७५ fh " क ससमी नूजा विधान २७६ तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया॥३२६॥ ओं ही पाठकदर्शनस्वरूपाय नमः अर्ष । निरशंस अनंत अवाधा, निज वोधन भाव अराधा । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२७॥ ओ ही पाठकसम्यक्त्याय नमः अपं । सम्यक्त महा सुखकारी, निज गुण स्वरूप अविकारी । तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३२८॥ ओ ही पाठकसम्यक्त्वगुणस्वरूपाय नमः अर्थ । निरखेद अछेद अभेदा, सुख रूप वीर्य निर्वेदा । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया॥३२६॥ ओ ही पाटकवीर्याय नमः अर्घ। निज भोग कलेश न लेशा, यह वीर्य अनन्त अदेशा। २७६ .

सप्तमो पूजा 359 सिद्धचक्र विधान FEST ही पाठकवायगुणाय नमः अ५ ॥ २२० ॥ परनाम सुधिर निज माहीं, उपज न कलेस कदाही । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया। ॐ हीं पाठकवीर्यपर्यायाय नमः अर्थ ॥ ३३१॥ द्रव्य भाव लहो तुम जैसो, पावे जगवासी नहि ऐसो। तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥ ओ ही पाठकवीर्यद्रव्याय नमः अर्थ ॥ ३३२ ।। निज ज्ञान सुधारस पीवत, आनन्द सुभाव सु जीवत । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया । ॐ हीं पाठकवीर्यगुणपर्यायाय नमः अर्घ ॥ ३३३ ॥ अविशेष अनन्त सुभावा, तुम दर्शन माहि लखावा । तुम गुण अनन्त श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥ ॐ ही पाठकदर्शनपर्यायाय नमः अर्थ ॥ ३३४ ॥ एकवार लखे सबहीको, तद्रूप निजातम ही को। ममममममम २७९

dane
सिपा
indian
सप्तमी
पूजा
रिधान
२७८
तुम गुण अनंत भुत गाया, हम सरथत शीश नवाया।
ओही पारदर्शनपर्यायस्वरूपाय नमः अपं । ३३५ ॥
सपरस आदिक गुण नाही, चिप निजातम माहीं।
तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरपत शीश नराया। ३६।
ओं ही पाठकज्ञानद्रव्याय नमः अर्थ ।
मरनागति दीनदयाला, हम पूजत भाव विशाला।
तुम गुण अनंत श्रुत गाया, हम सरधत शीश नवाया।३३७।
ओ ही पाठकसरणाय नमः अर्थ ।
जिनशरण गही शिव पायो, इम शरण महा गुण गायो।
तुम गुण अनंत ध्रुन गाया, हम सरधत शीश नवाया ॥३३८॥.
औ ही पाटम्गुणधरणाय नमः अर्य।
अनुभव निज बोध कराने, यह तान शरण कहलाये।
भगण मनन पुन मागा.म मरयममीशननापा९॥

मना ... 111.11.ना.नियमिवाम कगना । नमा अनंत शुन गाया. हम सम्पन भीग नवाया ॥ ३४॥ हाय नम: अब । निम्मंदा नग, है मग नगी गिव भूगा। नगगुर अनंत अन गाया. इस सरयन भीग नवाया ॥ ११॥ श्री नमः च । नियाममायामा, दात शिवपद पाया। नम गुग अनंना गाया, हम सपन योग माया ॥२॥ मामाधाना गमगा गहा मंगाना। गम गुण रायन गाया. इस मम्मा गीग नारा ॥ ३५३॥ itti METIREयनमः २७२ विधान HEAREFEEFEREF55FFESSESAREEFFE पूर्ण श्रुतज्ञान वल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया ॥ ३५२॥ ओ ही पाटकतपसाचाराय नमः मुक्तपद दैन अनिवारी, सर्व बुध चरण आचारी। पूर्ण श्रुतज्ञान वल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया ॥ ३५३ ॥ औं ही पाटकरवत्रयाय नमः अर्थ। शुद्ध रत्नत्रय धारी, निजातमरूप अविकारी। पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया ।। ३५४ ।। ओं ही पाठकरलायसहायाय नमः । वो ध्रुव पंचमगती पाई, जन्म फुनि मरण छुटकाई। पूर्ण श्रुनज्ञान फल पाया, नमूं मत्यार्थ उपझाया ॥ ३५५॥ ओ हों पाठक वर्गमाराय नमः अनुएम रूप अधिकाई, अमाधारण स्वाद पाई। -.-. Serinrn५॥

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विधान सप्तम पूज २८४ ज्ञान दर्शन स्वरूपी हो, असाधारण अनूपी हो। पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया ॥३:१॥ ओ ही पाठकएकत्वचेतनस्वरूपाय नमः अर्थ । गहे नित निज चतुष्टय को, मिले कबहुं नहीं परसों। पूर्ण श्रुतज्ञान वल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया ॥३६२॥ ॐ ही पाठकएकत्वद्रव्याय नमः अर्थ । स्वपद अनुभूत सुखरासी, चिदानन्द भाव परकासी। पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया नमूं सत्यार्थ उवझाया ॥ ३६३ ॥ ओ ही पाठकचिदानन्दाय नमः अर्प । अन्त पुरुषार्थ साधक हो, जन्म मरणादि वाधक हो। पूर्ण श्रुतज्ञान वल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया ॥ ३६४ ॥ ही पाठकमिदमाधाय नमः अर्घ । स्वमानम ज्ञान दरशागा,गे गरण सिस PIP २८४

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मिद्धमा
सप्तमी
विधान
स्वपर हितकार गुणधारी, परम कल्याण अविकारी।
पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया । ३७० ।
ओं ही पाठककल्याणगुणाय नमो अघ।
अहित परहार पद जो है, परम कल्याण तासो है।
पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया । ३७१ ।
औं ही पाठककल्याणस्वरूपाय नमो अर्थ ।
स्वसुख द्रव्याश्रये माहीं, जहां कछु पर निमित्त नाहीं ।
पूर्ण श्रु तज्ञान फल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया ।३७२।
ओ ही पाठककल्पाणद्रव्याय नमो अर्थ ।
जोहे सोहे अमित काला, अन्यथा भाव विधि टाला।
पूर्ण श्रुतज्ञान फल पाया, नमूसत्यार्थ उवझाया । ३७३ ।
श्री ही पाठकनवगुणाय नमो अर्श ।
निस जतना
m
२८६
-

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farya! मममी विधान पूजा FFEREKHKAREEREST ही पारदर्शनचंतनाय नमो i | रिशेषण युक्त सातारा, त न दुनिमें प्रगट मारा। पूरण धुततान फल पापा, नमू मत्यारय उवझाया ।।३७९॥ ओही पारज्ञानगंदनाय नमो अर्थ । ज्ञानमो जीव नामी है. भेद ममवाय स्वामी है। पूरण भ्रतज्ञान फल पाया. नेम मत्यारथ उवझाया ॥३८॥ ओ पाउसजीवचिदानंदाय नमः अप। चरावर वस्तु स्वाधीना, एक ही ममय लमारीना। पुरण शुनजान फल पाया. नमूं मत्यार्थ उपझाया।॥ ३८१ ॥ ओं हो पाटस्वीरवतनाप नमः अर्थ। माल जीरोंक सुम्ब कारन, मरन तुमही हो अनिवारन । परम भुनजान फल पाया. नम मत्यार्थ माया ॥ ૨૮૮

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मिदपक सप्तमी विधान पाटी-01-1-1-1-1-1-1-1 IPIPIPPIPIP विन आये नाही, भये निर आश्रवा ताही। पूरण श्रुतज्ञान फल पाया, नमूं सत्यारथ उवझाया ॥३८७॥ ॐ हीं पाठकआश्रयवेदाय नमः अर्थ । आश्रव करगका होना, कार्य था आपका खोना । पूरण श्रुतज्ञ न फल पाया, नमूं सत्यारथ उवझाया ॥ ८८ ॥ ॐ ही पाठकआश्रयविनाशाय नमः अर्थ। तत्त निर्वाध उपदेशा, विनाशे कर्म परवेशा। पूरण श्रु ज्ञान वल पाया. नमू सत्यारथ उवझाया ॥३८९॥ औ ही पाठकआश्रयउपदेशछेदकाय नमः अर्थ। प्रकृनि सब कमकी चूरी, भाव मल नाश दुख पूरी। पूरण श्रुतज्ञान वल पाया, नमूं सत्यार्थ उवझाया ॥३९०॥ ओ ही पाठमपंधमुनाय नमः अर्थ । न फिर संसार अवताराचंध विधि अत्ताना ..

* 2 गममी 5:555555555555 पूरण शुनजान वल पाया. नमुंमत्यारव उवझाया ॥३९१।। 'मदनाक ओ दी पाठविधिरहिनाग नमः पर। आश्रय कर्म दुखदाई सके, संबर ये मुग्वदाई। विधान पूरण शुनज्ञान वल पाया, नमूं सत्यारय उपटाया ।। ३९२ ।। ॐही पाठकगंबराय नमः भए । पर्वथा जोग विनसाया, स्वमंवर रूप दरशाया। पूरण श्रुतज्ञान वल पाया, नमूं सत्याग वाया ।। ॐही पाठकसंवरम्परूपाय नमः अप। भावम कलुपता नाही, भये संपर करण नायी। पुरण श्रुतज्ञान बल पाया, नमृ सत्यारथ उमझागा ॥३९॥ ॐ हीं पाटकनंबरकरणाय नमः अग। कुपरगति राग मन्य नाशन, निरजरा रूप प्रतिभासन । पृण श्रुतज्ञान बल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया }} ३९५ ॥ - 55555555555575554155 २१२ * गिद्धपको सप्तमी विधान २६२ HERRESTERNHS555553HERS भी ही पाठकनिर्जराम्वरूपाय नमः भर्ष । कामदव दाहै जग सारा, आप तिस भस्म कर डारा । पूर्ण श्रुतज्ञान बल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया ॥ ३९६ ॥ श्री ही पाटकरपछेदकाय नगः अर्घ । चहं विधि बंध विधि चूरा, ये विस्फोटक कहो पूरा । पूर्ण श्रु तज्ञान बल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया ॥ ३९७ ॥ श्रीदी पाटकर्मविस्फोटकाय नमः अर्घ । दऊ विधि कर्मका सोना, सोई है मोक्षका होना। पूर्ण श्रुतज्ञान चल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया ॥ ३९८ ॥ ॐ ही पाठकमोक्षाय नमः अर्प। द्रव्य अर भाव मल टारा, नमू शिवरूप सुखकारा । पूर्ण श्रुतज्ञान बल पाया, नमू सत्यार्थ उवझाया ॥ ३९९ ॥ ॐ ही पाठमोक्षयरूपाय नमः अर्प। अरति रति परिणमित बाई, आसर रनि प्रगट सोई ।. २६२ P4P1

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55555555
सप्तमी
पूजा
प्रधान
२६४
95959ERRIES
* ही माधुयाय नमः अर्थ ।
जीव सदा चित भाव विलासी, आप ही आप सधे शिव राशी ।
साधु भये शिव साधनहारे, सो तुम साधु हरो अघ म्हारे ४०५
ॐ ही गर्यमाधुगुणद्रव्गाय नमः अर्थ ।
ज्ञानमई निज ज्योति प्रकाशी, भेद विशेप सबै प्रतिभाशी।
साधु
भये शिव साधनहार', सो सब साधु हरो अधम्हार ४०६
ही माधुबानगुणाय नमः अर्थ ।
एक हि वार लखाय अभेदा, दर्शनको सब रोग विछेदा ।
साधु भये शिव साधन हार, सो सब साधु, हरो अध म्हारे ४०७
ॐ ही मादर्शनाय नमः अर्थ । ४०८ ।
आपहि साधन साध्य तुम्ही हो, एक अनेक अवाधतुम्ही हो।साधु ।
श्री ही माधद्रव्यभावाय नमः अर्थ
चलनमा निज भाट नारे
२६४

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FE L मिद्धचक्र सप्तमी पूजा विधान FIRRITESFERESHE535555555EERIES औ ही साधुमंगलाय नमः अयं । मंगल रूप अनूपम सोहे, ध्यान किये नित आनंद होहे । साधु भये शिव साधनहारे, सो सब साधु हरो अघ म्हारे ।४१४ औ ही साधुमंगलस्वरूपाय नमः अर्ध । पाप मिटै तुम शरण गहेत, मंगल शरण कहाय लहेत। साधु भये शिव साधनहारे, सो सब साधु हरो अघ म्हारे ४१५ ॐ ही माधुमंगलशरणाय नमः अघ । देखत ही सब पाप नसे है, आनंद मंगलरूप लसे है। साधु भये शिव साधनहारे, सो सव साधु हरो अघ म्हारे ॥४१६॥ ओ ही माधुमंगलदर्शनाय नमः अर्थ । जानत हैं तुमको मुनि नीके, पाप कलाप मिटे तिनहीके। साधु भगे शिव साधनहारे, सो सब साधु हरो अघ म्हारे ॥४१७॥ औ ही माधुमंगलनानाग नमः अर्थ ज्ञानमई तुम हो गुणगमा, मंगल जोनि धरै रवि जैसा । २६६

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सिद्धचक्र
सप्तमी
नूजा
विधान
२६८
S55555555
औ ही माधूवीर्यद्रन्याय नमः अर्थ ।
तीन हि लोक लखे सव जोई, आप समान न उत्तम कोई ।
साधु भये शिव साधनहारे, सो सब साधु हरो अघ म्हारे ४२३
ॐ हीं माधुलोकोत्तमाय नमः अर्थ ।
लोक सभी विधि बन्धन माही, उत्तम रूप धरो तुम ताहीं। साधु०
ओ ही माधुलोकोत्तमगुणाय नमः अर्घ । ४२४ ।
लोकनके गुण पाय कलेशा, उत्तम रूप नहीं तुम जैसा । साधु ॥
ॐ ही माधुलीकोनमगुणस्वरूपाय नमः अर्घ । ४२५ ।
लोक अलोक निहारक नामी, उत्तम द्रव्य तुम्ही अभिरामी । साधु०॥
ॐ ही माधुलोकोनमद्रव्याय नमः अर्थ । ४२६ ।
लोक सभी पद्व्य रचाया, उत्तम द्रव्य तुम्ही हम पाया । साधु ॥
आं ही गाधुलोकोनमध्यस्वरूपाय नमः अर्थ 1 ४२७ ॥
ज्ञानमई चित उत्तम मोनोसोम मि my .
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२३८

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सिद्धचक्र सप्तर्म विधान ३०२ निज आत्मरूपमें दृढ़ सरधातुम पाई, थिर रूप सदा निवसो शिववास कराई निज रूप मगन मन ध्यान धरै मुनिराजे, में नमूं सा०॥ ४४७ ॥ ओ ही साधुश्रात्मशरणाय नमो अध। तुम निराकार निरभेद अछेद अनूपा, तुम निरावरण निरव'द स्वदर्श सरूपा निज रूप मंगन मन ध्यान धरै मुनिराज , में नमूं सा० ॥ ४४८ ॥ ओ ही साधुदर्शनमरूपाय नमो अध। तुम परम पूज्य परमेशपरम पद पाया, हमशरण गही पूजे नितमनवचकाया निज रूप मगन मन ध्यान धरै मुनिराजे, में नमूसा० ॥ ४४९ ।। औ ही माधुपरमात्मगरणाय नमो अर्ष। तुभमन इन्द्री व्यापार जीत सुभीता,हमशरण गही मनु आजकर्मरिपुजीता निज रूप मगन मनु ध्यान धर मुनिराजे, मैं नमू साधु० ॥४५०।। ओ ही माधुनिजामशरणाय नमो अर्ष। भववास दुखी जे शरण गहें तुम मनम, तिनको अवलम्य उभारोभयहर छिनमें निज रूप में०१५५९॥ ३०२

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1-1-
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सिद्धचक
सप्तमी
पूजा
विपन
तुम काल अनन्तानन्त अबाध विराजो,
परनिमित्त विकार निवार सु नित्य जु छाजो । निज० में। ४५६
औ ही माधुध वाय नमो अर्ग।
तुम छायक लब्धि प्रभाव परम गुण धारी,
निवसो निज आनन्द मांहि अचल अविकारी। निज० में०१४५७
ओं ह्रीं साधुगुणध वाय नमो अर्थ ।
तेरम चौदस गुणथान द्रव्य हे जसो,रहे काल अनन्तानन्त शुद्धता तसो
निज रूप मगन मनु ध्यान धरै मुनिराजे, में नमूं सा० । ४५८ ।
ओ ही गाधद्रव्यगुणध वाय नमी अर्ध ।
फिर जन्म मरणनहीं होय जन्म यो पाया, संसार विलक्षणस्वै अपूर्व पद पाया
निज रुप मगन मन ध्यान धरै मुनिराजे, में नम सा० । १५६ ।
श्री ही मापुद्रगोपादाय नमी बर्ष।
सूक्षम अलथिअपर्याप निगोद.शरीग,नेत्तुच्छ द्रव्य फर नाशभयेभव नीरा
०
३०४

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सिद्धचक सप्तमो पूजा विधान ओं ही साधुचेतनमरूपाय नमः अर्थ । चेतन विलास सुख रास नित्य परकाशी, सो साधु दिगम्बर साधु भये अविनाशी । निज०, मैं० १९६५ ओं ही साधुचंतनाय नमः अर्थ तुम असाधारण अरु परमात्म प्रकाशी, नहीं अन्य जीव यह लहै गहै भववासी। निज रूप मगन मनु ध्यान धरै मुनिराजे, मैं नमूं साधु सम सिद्ध अकंप विराजे॥ ॐ ही साध परमात्मप्रकाशाय नमः अर्घ ॥ ४६६ ॥ तुम मोह तिमिर विन स्वयं सूर्य परकाशी, गुण द्रव्य पर्य सब भिन्न भिन्न प्रतिभाशी । निज० मैं० । औही गाध ज्योतिसरूपाय नमः अप ॥ ४६७ ॥ ज्यों घटपटादि दीपककी ज्योति दिखावे, स्यों ज्ञान ज्योति सघ सिय ar arms R मिद्धनक विधान mm ॐ हीं साधु ज्योतिप्रदीपाय नमः अथ ॥ ४६८ ॥ सामान्य रूप अवलोकन युगपत सारा, तुम दर्शन ज्योति प्रदीप हरे अंधियारा । निज० में ओं ही साधु दर्शनज्योतिप्रदीपाय नमः अर्थ ॥ ४६६ ।। साकार रूप सु विशेष ज्ञान युति माहीं, युगपत कर प्रतिर्विवित वस्तू प्रगटाई । निज०. मैं । ओ ही साधु मानज्योतिप्रदीपाय नमः ॥ ॥ ४७० ।। जे अर्थजन्य कहैं ज्ञान वो झूठे वादी, है स्वपर प्रकाशक आतम ज्योति अनादी । निज० मैं । ओं ही साध आत्मज्यानिपे नमः अर्घ ॥ ४७१ ।। तारन तरण जिहाज अथित भवसागर, हम शरण गहें पावें शिववास उजागर । निज में० ॐ हीं माधु शरणाय नमः अयं ।। ४७० ॥ - सामान्य रूप सब साधु मुक्ति मग साधे, ३०७ मदचक्र विधान पूज -- ३०८ . हम पावै निज पद नेमरूप आराधे। निज रूप मगन मनु ध्यान धरै मुनिराजे, में नमूं साधु सम सिद्ध अकंप विराजे । आदी माघ सर्वशरणाय नमः अर्थ॥ ४७३ ।। उस नाड़ी ही में तत्त्वज्ञान सरपानी, ताकर साधे निश्चय पावे शिवरानी। निज० में । ओ ही माधु लोफशरणाय नमः अर्थ ॥ ४७४ ॥ तिहुँ लोक करन हित वरते नित उपदेशा, हम शरण गही मेटो भववास कलेशा । निज० में। ॐ हीं माधुप्रिलोकशरणाय नमः अप ॥ ४७५।। संसार विषम दुखकार असार अपारा, तिस छेदक पेदक सुखदायक हितकारा । निज० मैं। औदी माधगंगादकाय नमः अप" ।। ४७६ AS 141 गदनक जापान सप्तमी पूजा तगपि निज सपा माह भिन्नता साज । निज० म०। ओं ही साधएकत्याय नमः अर्थ ॥ ४७७ ।। यद्यपि सामान्य सु पृरण ज्ञानी, नयपि निज आश्रय भाव भिन्न परनामी । निज० मैं. ॐ हीं साधणकत्वगुणाय नमः अर्थ ॥ ४७८ ॥ है असाधारण एकत्व द्रव्य तुम माही, तुम सम संसार मंझार और कोऊ नाहीं । निज. मैं. ओहो माधएकन्नद्रव्याय नमः अर्थ ॥ ४७६ ॥ यद्यपि सब ही हो असंख्यात परदेशी, तद्यपि निजमें निज रूप स्वद्रव्य सुदेशी । निज० मैं. भी दी गागकन्यस्वरूपाय नमः अर्म ।। ४८० ।। सामान्य रूप सब ब्रह्म कहावे ज्ञानी, तिनमें तुम वृषभ सु परम ब्रह्म परणामी । निज० में० ओ दी साधुपरमत्राय नमः अर्ग ।। ४८१ ।।

सिद्धचक्र विधान सप्तमो पूजा सापेक्ष एक ही कहै सु नय विस्तारा, तुम भाव प्रगट कर कहै सुनिश्चै कारा। निज० मैं० ओं ही साधु परमस्याहादाय नमः अर्थ ॥ ४८२ ।। है ज्ञान निमित यह वचन जाल परमाणा, वाचक वाच्य संयोग ब्रह्म कहलाना । निज० मैं नमं० । * ही माघ शुद्धब्रह्माय नमः अर्थ ॥ ४८३ ॥ पट् द्रव्य निरूपण करें सोई आगम हो, निधान सु परमागम हो। निज रूप मगन मनु ध्यान धरै मुनिराजे, नमूं साधु सम सिद्ध अकंप विराज । ओ ही साध परमागमाप नमः अर्थ ॥ ४८४ ॥ तोफैश कहै सर्वज्ञ दिव्य धुनि माहीं, तुम गुण अपार इम कहो जिनागम साहीनिल-*- तिसके तुम मूल

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दिनार ससमी यान पूजा HEERENEFFERFFFFFF5555555 तम मव कर्ममल नाशि परम पद पायो।निज० में ॥४८॥ ओही माघ पवित्राय नमः अर्थ तम म्हो बन्धनों दूरि एकांत सुखाई, ज्या नभ अलिप्त सब द्रव्य रहो तिसमाहीं। निज०म० ४६० आदी माधु बन्धविमुक्ताय नमः अप। सब दव्य भाव नोकम वन्ध छुटकाया, नम शद्ध निरंजन निज सरूप थिर पाया ।निज० में॥६॥ ओं ही माध बन्धमुक्ताय नमः अर्थ । अडिल्ल छन्द-भवाश्रय विन अतिशय सहित अवन्ध हो, मंघ पटल विन ज्यों रवि किरण अबन्ध हो । मोक्षमार्ग वा मोक्षाश्रय सब साधु हैं, नमन निरंतर हमहूं कर्मरिपुको दह ।। ६२ ॥ IPIP

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तुम सप्तमी पूजा विधान मंत्त शिष कारण शुद्ध अनूप हैं । मोक्षमार्ग नमत. अहो माध निमित्तमुक्ताप नमः अप ।। ४६७ ॥ संशय रहित सुनिच सन्मतिदाय हो, मिथ्या मतम नाशन सहज उपाय हो । मोक्षमार्गः नमत. ही माप योषयमाय नमः अर्थ ॥ १६८ ॥ अति विशुद्ध निज ज्ञान स्वभाव सु धरत हो, भव्यनके संशय आदिक तम हरत हो ।मोक्षमार्ग० नमत. ॐ मा योपगुणाप नमः अर्थ ।। ४६६ ।। अविनाशी अधिकार परम शिवधाम हो, पायो सो तुम मुगत महा अभिराम हो । मोक्षमार्ग नमत० ॐ माय मुगतिमाय नमः अयं ।। ५०० ॥ जासो परे न और जन्म या मरण हो, सो उनम उत्तर परम गतिको लहो । मोक्षमार्ग. नमत.

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है सिद्धचक्र विधान सप्तमी पूजा कर शव को जीत अहं पद पावही । मोक्षमार्ग० नमतः । ओ ही माधु अर्हत्स्वरूपाय नमः अर्थ ॥ ५०६ ॥ परम इष्ट शिव साधत सिद्ध कहाइयो, तीन लोक परमेष्ट परम पद पाइयो । मोक्षमार्ग० नमत । ओ ही माधु सिद्धपरमेष्टिने नमः अर्थ ॥ ५०७ ।। शिव मारग प्रगटावन कारण हो तुम्हीं, भविजन पतित उधारन तारन हो तुम्हीं। मोक्षमार्ग० नमतः । ओ ही माध गरिनकाशिने नमः अर्ब || ५०८ ।। स्वपर स्वहितकरि परम बुद्धि भरतार हो, ध्यान धरत आनंद वोध दातार हो । मोक्षमार्ग० नमत। औदी साध उपाध्यायाय नमः अर्थ ॥ ५०६ ॥ पंच परम गुरु प्रगट तुम्हारो नाम है, भेदाभेद मुभाव मु आतमराम है। मोक्षमार्ग० नमत । ओ ही गाध अननिहाचा पायागगराध म्यो नमः अप। ५१० ॥

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मिद्धचक्र सप्तमी पूजा विधान ३१८ FEEEEEEEEEEEEEFEREFEREFERENCE • पद्धडी छन्द ।। जय महामोह दल दलन सूर, जय निर्विकल्प आनंदपूर । जय दोऊ विधि कर्म विमुक्त, देव जय निजानंद स्वाधीन एव १ जय संशयादि भ्रम तम निवार, जय स्वात्मशक्ति युति थुति अपार । जय युगपति सकलं प्रत्यक्ष लक्ष, जय निरावरण निर्मल अनक्ष २ जय जय जय सुखसागर अगाध, निरवंद निरामय निर उपाधि । जय मन वच सब व्यापार नाश, जय थिरसरूप निज पद प्रकाश ३ जय पर निमित्त सुख दुख निवार, निरलेप निराश्रय निर्विकार । निजमें परको परमें न आप, परवेश न हो नित निर मिलाप ॥ ४ ॥ तुम परम धरम आराध्य सार, निज सम करि कारण दुर्निवार । तुम पंच परम आचार युक्त, नित भक्त वर्ग दातार मुक्त ५ एकादशांग सर्वाग पूब, स्खें अनुभव पायो फल अपूर्व । अन्तर पाहिर परिग्रह नसाय, परमारथ साधू पद लहाय ६

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19996555555555
अर अष्टमी पूजा १०२४ नाम सहित ।
१' उन्द-उरथ अधो सरेफ विन्दु हंकार विराजे,
अकारादि स्वरलिप्त कणिका अन्त सु छाजे ।
वर्गनि पूरित वसुदल अम्बुज तत्व संधिधर,
अग्र भागमें मंत्र अनाहत सोहत अतिवर ॥
पुनि अन्त ही देख्यो परम, सुर ध्यावत अरि नागको,
है केहरि सम पूजन निमित्त, सिद्धचक्र मंगल करो।
चाहनमा मिर्ष घोमिइपरमेष्ठिन चतुर्विशत्यधिकैकमहरा १.२४ गुणमहित विरा-
जमान प्राररावतर मंदौपद, अप्रतिष्ठः ठः, अत्र मम मनिहितो भव भव वपट ।
इति यंत्र स्थापनं।
दोहा-सूदमादि गुण सहित हैं, कर्म रहित निररोग।
३२०

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जाणदमा मिचर अष्टमी विधान 1555555 मत्तहेव अरगहणं अगुल्लघुमन्यायाह समारतापविनाशनाय चन्दनं । अक्षय अबाधित आदि अन्त, समान स्वच्छ सुभाव हो। ज्या तुम बिना तंदुल दिपै त्यू, निखिल अमल अभाव हो । यानं उचित ही है जु तुमपद, अक्षतं पूजा करें। क. सहस अरु चौवीस गुण गण, भावयुत मनमें धरं ॥३॥ हा श्री सिद्धपरमेउिने चतुर्विशत्यधिकैकमहस १०२४ गुणसंयुक्ताय श्री ममता मणीय मुहमनहेब अम्गहणं अगुरुलघुमन्याराहं अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं । गुण पुप्पमाल विशाल तुम, भवि कंठ पहिरें भावसों। जिनके मधुप मनरसिक लुब्धित, रमत नित प्रति चावसों याने उचित ही है जु तुमपद, पुप्पसा पूजा करूं। इक महस अरु चौवीस गुण गण, भावयुत मनमें धरं॥४॥ ही श्री मिद्धपरमेष्ठिने चतुर्विशत्यधिक गहरा १०२४ गुणमयुक्तस्य श्री समन जाणदमपर वीर्य गुइमनहर अवग्गणं अगुफलपमम्याग कामवाण चिनाशनाग पुप्पं । राष्द्वात्म सरस सपाक मधर. समान और न मा...: ३२२ 55 भष्टमा + -: । " हा आम्बादी मो तुम सम, और संतुष्टित नहीं । यात चिन हा है ज़ तुमपद, चरुनसा पृजा कर। याप या चावाम गुण गण. भावयुत मनमें धरं ॥ ५ ॥ .. ? परमान चतुविशन्यधिककमहमगुणगंयुक्ताय श्रीगमनणाण . . .। प्रयागरणं अगुगलघुमन्यावाहं क्षुधागेगविनाशनाय नैवेयं । र काटा स्वभावधर. ज्यू निज स्वरूप संभारने । न्य ही त्रिकाल अनंत द्रव्य पर्याय, प्रगट निहारते॥ यान चिन ही है जु तुमपद, दीपसों पूजा करूं। उक. मग अ. चोवीस गुण गण, भावयुत मनमें धरं ॥ ६ ॥ अ मद्रपरमेष्टिने चतुर्विशन्यधिकमहम १०२४ गुणमंयुक्ताय श्रीममत्त. HT) दमण : १५ गहमनर व अबग्गहणं अगुरुलघुमन्यावाह मोहांधकारविनागनाय दीपं वर ध यान अनि जराय वसुविधि, उद्ध गमन स्वभावतं । गजे अवर शिव थान नित, तिह धर्मद्रव्य अभावते ॥ ३२३ - अष्टमी पूजा **++++++++sf5555乐乐式开开 पाने उचित ही है जु तुमपद, अपनों पूजा कर। इक सहस अरु चाँबीस गुणगण, भावयुन मनमें धर॥७॥ th श्री सिद्धपरमेटिने चतुरिंशत्यधिककनहम १०२४ गुणसंयुनाय श्रीमम- राजमणार्य मुहमनहर अग्गहण अगुरुनगुमधाबाई अष्टकर्मदहनाय धूपं । सगष्ट मु पुण्य फल, तीधश पद पायो महा। नाथा पदको स्वरुचिधर, अन्यय अमर शिवफल लहा ।। याने उचित ही है जु तुम पद, फलनसों पूजा करें। इक सहम अरु चौवीस गुणगण, भावयुत मनमें धर्॥८॥ tही थी मिसरमेष्टिने चतुविशत्यधिरकमहम १०२४ गुणमंयुक्ताय श्रीमम- नमा दमार्ग गुहमनहेर अगहपं अगुल्लपुमव्याराह मोशफलप्राप्तये फलं । अष्टांग मूल मुविधि हो, निज अष्ट गुण पायो सही। अशाई गति संग्मार मेटि मु अचल, है अष्टम महो॥ - ३२४

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जग १.२४ नामगुणमाहित अर्य।
ni T. अन्दर : मदान ।
कारो सजिल भरे न सिर भगदान ।।
समारो
शदिक जोरे नजिन, दिन दुन पन।
बात बार जिनेन्द्र है. नन महा धीर ध्यान । २ ।
ARRUKRISHRESTERNATURERARE
गादिक विदा दिन, गुद्ध निरंजन देव ।
जिनद नुन नि. गजर हो म्वयमेव ।।
sti करो।
हार को जैन जिन नहीं होर।
कर र सस्टम जिन ३ मध्य ।।
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मिद्धचक्रम
अपमो
जा
विधान
३२७
95555555555
इन्द्रादिक पूजत चरन, सेवत हैं तिहं काल ।
गणधरादि श्रुत केवली, जिन आज्ञा निज भाल । ५ ।
ओं ही जिनराजे नमः अयं ।
गणधरादि सत पुरुष जे, वीतराग निरग्रन्थ ।
तुमको सेवत जिन भये, साधत हैं शिवपंथ । ६।
आं ही जिनाधिपाय नमः अर्ष।
एक देश जिन सर्व मुनि, सर्व भाव अरहंत ।
द्रव्यभाव सर्वातमा, नमू सिद्ध भगवंत । ७।
ओं ही जिनाधीशाय नमो अघ ।
गणधरादि सेवत चरन, शुद्धातम लवलाय ।
तीन लोक स्वामी भये, नमू सिद्ध अधिकाय ।
ओं हीं जिनस्वामिने नमो अय।
नमत सुरासुर जिन चरन, तीन काल धरि ध्यान ।
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भिरमा अष्टमी पूजा रिधान A- FIREFERESEREE9555 सिद्ध जिनेश्वर में नमू, पाऊँ शिवसुग्व थान ।। भी हो जिनधराय नमो अयं । तीन लोक तारण तरण, तीन लोक विख्यात । सिद्ध महा जिननाथ हैं, सेवत पाप नशात । १० । ओ ही जिननाधाय नमी अप। एकदेश भारक तथा, सर्वदेश मुनिराज । नितप्रति रक्षक हो महा, सिद्ध सु पुण्य समाज । ११ । ही जिनपतये नमो अप। त्रिभुवन शिखाशिरोमणी, राजत सिद्ध अनन्त । शिवमारग परसिद्ध कर, नमत भवोदधि अन्त । १२ । ही जिनप्रभवे नमः अर्थ। जिन आता त्रिमुग्नविय, बरते सदा अखंड । मिपामति दुरपसको देन नीति सों दंड । १३ । । । ३२८ 1.

पदनाक i. अष्टमी पूजा विधान - ...555555555555555555555555 ीही जिनाराय नमः अर्ण । तीन लोक परिपूर्ण है, लोकालोक प्रकाश । राजत हे विस्तीर्ण जिन, नमू हगे भववास ॥ १४ ॥ *ही जिनविभवे नमः अप । आत्मज्ञ जिन नमन हैं शुद्रातमके हेत। स्वामी हो तिहं लोकके, नमूं बसे शिवखेत । १५ । ओ ही जिनभत्रे नमः अर्थ। मिथ्यामतिको नाश करि, तत्त्वज्ञान परकाश । दीप्ति रूप रविसम सदा, करो सदा उर वास ॥ १६ ॥ जी ही तयप्रकागाय( श्रीजिनरपये ) नमः अर्घ । कम शत्रु जीते मु जिन, तिनके स्वामी सार ॥ धर्ममार्ग प्रगटात है, शुद्ध सुलभ सुखकार ॥ १७ ॥ ओ ही जिनकर्मजिते नमः अप । ३२६

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मिद्धचक्र
अष्टमी
पूजा
विधान
सेद्ध जिनेश्वर में नमू, पाऊँ शिवसुख थान । । ।
ओ ही जिनेधराय नमो अर्थ।
तीन लोक तारण तरण, तीन लोक विख्यात ।
सिद्ध महा जिननाथ हैं, सेवत पाप नशात । १० ।
ओ ही जिननाथाय नमो अर्थ ।
एकदेश श्रावक तथा,
सर्वदेश मुनिराज।
नितप्रति रक्षक हो महा, सिद्ध सु पुण्य समाज । ११ ।
ॐ ही जिनपतये नमो अर्थ ।
त्रिभुवन शिखाशिरोमणी, राजत सिद्ध अनन्त ।
शिवमारग परसिद्ध कर, नमत भवोदधि अन्त । १२ ।
ॐ ही जिनप्रभवे नमः अर्य।
जिन आज्ञा त्रिभुवनविणे, वरते सदा अखंड ।
मियामति दुरपक्षको, देत नीति माँ दंड । १३ ।
३२८

T मदना विधान it from नमः । तीन लोक परिपूर्ण है, लोपालोर. प्रगा। गजन विग्नीगंजिन, नमागे भागय ॥ १॥ iff! आत्मज्ञ जिन नमन नाममा । ग्गामी ही निई लोगो. ना गं ति:। attimनमः मियामतिको नाटा करि. नाजान पाता दीप्ति रग रविसम मदा. कंगे गदा र पार॥ शादी नरकामागा भाटिनगी नमः । कर्म शत्र जिन. निन, गगी मार। धम माग प्रगटान : गुरु गुलन साकार ॥ ॥ निकम नमः । RECEIVE 155555555 जान म प

मिद्धचर!
अष्टमी
पूला
विधान
चार संघ नायक प्रभु, बन्दूं सिद्ध समाज । ३५ ।
ओ ही जिनकुअराय नमः अर्घ ।
दीप्त रूप तिहुं लोकमें, है प्रचण्ड परताप ।
भक्तनको नित देत हैं, भोगें शिवसुख आप । ३६ ।
ओ ही जिनाय नमः अर्थ।
रत्नत्रय मग साधकर, सिद्ध
भये भगवान ।
पूरण निजसुख धरत हैं, निजमें निज परिणाम । ३७ ।
ओ ही जिनधीर्याय नमः अप ।
तीन लोकके नाथ हो, ज्यू तारागण सूर्य ।
शिव सुख पायो परम पद, यन्दों श्री जिन धूर्य । ३८ ।
ओ ही जिनपूर्याय नमः अर्घ ।
पराधीन यिन परम: पद, तुम बिन लहै न और।
उनमानमा में नम तीन
तीन लोक शिरमौर । ३६ ।

आमा जिनानमाय नमः । अष्टमी पूजा P । जहां न दुखको लेश है, तहां न परसों कार । तुम विन कहुं न श्रेष्ठता, तीन लोक दुख टार । ४० । ओ ही त्रिलोकदापनिवारणाय नमः अर्थ । पूर्ण रूप निज लक्ष्मी, पाई श्री जिनराज। परम श्रय परमातमा, चन्दू शिवसुख साज । ११॥ औ ही जिनवराय (जिनवर्याय) नमः अर्थ निग्भय हो निर आश्रय, निरसंगी निरबंध । निज साधन साधक सुगुन, परसों नहिं सम्बंध । १२ । ही जिननिःगंगाय नमः अर्प। अन्तराय विधि नाशके, निजानन्द भयो प्राप्त । संत नमें करजोर युग, भव-दुख करो समाप्त ॥ ४३ ॥ औ ही जिनउदाराय नमः अर्थ । शिवमारगमें धरत हो, जग मारगते काढ़। ३३५

1994
सिद्धचक्र
अष्टमी
पूजा
विधान
धर्मधुरन्धर मैं नमू, पाऊ' भव वन वाढ़ ॥
ॐ ही जिनपभाय नमः अघ । ४४ ।
धर्मनाथ धोश हो, धर्म तीर्थ करतार ।
रहो सु घिर निज धर्म में, मैं बन्दू सुखकार ॥
ॐ ही जिनपभदेवाय नमः अर्थ । ४५ ।
जगत जीव विधि धूलि सों, लिप्त न लहै प्रभाव ।
रत्नराशि सम तुम दिपो, निर्मल सहज सुभाव ।।
* ही जिनरत्नाय नमः अर्थ । ४६ ।
तीन लोकके शिखर पर, राजत हो विख्यात ।
तुम सम और न जगतम, बड़ा कोई दिखलात ॥
ओ ही जिनौरसाय नमः अर्थ । ४७ ।
इन्द्रिय मन व्यापार बहु, मोहशत्र को जीत ।
लही जिनेश्वर सिद्धपद, तीन लोकके मीत ॥
श्रीजिनेशाय नमः ।

पिचक्र
11:14
5555555
चारि घातिया कर्मको, नाश कियो जिनराय ।
घाति अघाति विनाश जिन, अग्र भये सुखदाय ।।
ओही जिनानाय नमः अघ । ४६ |
निज पौरुपकर साधियो, निज पुरुपारथ सार।
अन्य सहाय नहीं चहैं, सिद्ध सु वीर्य अपार ।।
औ ही जिनशालाय नगः अर्घ । ५० ॥
इन्द्रादिक नित ध्यावते, तुम सम और न कोय ।
तीन लोक चूडामणी, नमूं सिद्ध सुख होय ॥
ओली (त्रिलोकचूडामणये) जिनपुंगवाय नमः अर्थ । ५१ ।
निजानंद पदको लहो, अविरोधी मल नास ।
समकित विन तिहुं लोकमें, और नहीं सुखरास ।
औ ही जिनप्रकाय नमः अर्थ । ५२ ॥
जगत शत्रु को जीतिके, कल्पित जिन कहलाय ।
55555
३३
२२

विधान
३३८
99245999999999999
मोहशत्रु जीते सु जिन, उत्तम सिद्ध सुखाय ॥
ओ ही जिनहंगाय नमः अर्घ । ५३ ।
द्रव्य भाव दोनों नहीं, उत्तम शिवसख लीन
मन वच तन करि मैं नमू, निज सम भवि जन कीन ॥
औ ही जिनोनममुराधारकाय नमः अर्थ । ५४ ।
चार संघ नायक प्रभू, शिवमग सुलभ कराय ।
तारण तरण जहाज हो,
जहाज हो, में चन्दू शिवराय ।।
ओ ही जिननायकाय नमः अर्थ । ५५ ।
स्वयं युद्ध शिवमार्गमें, आप चले अनिवार
भविजन अग्रेश्वर भये पन्दू भक्ति विचार ॥
औ ही जिनाग्रण्यै नमः अर्थ ५६ ।
शिव मारगके चिह्र हो, सुखसागरकी पाल ।
शियपुरके तुम हो धनी, धर्म न ति

. अष्टमी विधान *55555555555555555555555 तुम सम और न जगतमें, उत्तम श्रेष्ठ कहाय । आप तिरे भवि तार दे, बन्दूं तिनके पाय ॥ ५८ ।। ओ ही जिनमत्तमाय नमः अपें । स्वपर कल्याणक हा प्रभू, पंचकल्याणक ईश। श्रीपति शिव-शंकर नम, चरणाम्बुज धरि शीश ॥ ५९॥ ओ ही जिनमभवाय नमः अथ । माह महावल दलमलो, विजय लक्ष्मीनाथ। परम ज्योति शिवपद लहो, चरण नमूं धरि माथ ॥६० ।। ओ ही परमजिनाय नमः अघ । गति दुःख विनाशिया, पुरा निज पुरुपार्थ । नमूं सिद्ध कर जोरिक, पाऊ में सर्वार्थ ॥ ६१ ॥ औ ही जिनचतुर्गतिदुःखान्तकाय नमः अघ । फर्म निकृष्टको, श्रेष्ठ भये जिनदेव । तुम सम और न जगतमें, वन्दू में तिन भेव ।। ६२ ।।

मिद्धनक विधान अष्टम पूजा ३० ओं ही जिनश्रेष्ठाय नमः अर्थ। आप मोक्ष मग साधियो, औरन सुलभ कराय। आदि पुरुप तुम जगतमें, धर्म रीत वरताय ॥ ६३ ॥ औ ही जिनज्येष्ठाय नमः अप । मुख्य पुरुषारथ मोक्ष है, साधत सुखिया होय । में पन्दू तिन भक्तिकर, सिद्ध कहावे सोय ॥ ६४॥ औ ही जिनमुखाय नमः अर्थ । सुरपति सम अग्रेश हो, निज पर भासनहार । आप तिरे भवि तारियो, पन्दूं योग संभार ।। ६५ ।। यो ही जिनानाय नमः अप। रागादिक रिपु जीत तुम, श्री जिन नाम धराय । सिद्ध भये कर जोरिके, घन्, तिनके पाय ।। ६६ ॥ ओ हो श्रीजिनाप नमः अर्घ । विषय फायन देश है, दृष्टि ज्ञान परिपर्ण। ३४० फ- अष्टमी पूजा 195555555555555 उत्तम जिन शिवपद लियो, नमत कर्मको पूर्ण ॥ ६७ ।। श्रीही जिनउनमाय नमः । चई प्रकारके देवता, नित्य नमावत नमावत शीश। तुम देवनर देय हो, नमं सिन्द जगदीश ।। ६८।। ओही वृन्दारकाय नमः । जो निज सुग्घ होने न दे, सांचा रिपु है सोय । ऐसे रिपुको जीतके, नम सिद्ध जो हाय ।। ६९ ॥ ओ ही अगिजिनाय नमः अर्य। अविनाशी अविकार हो, अचलरूप विख्यात । जामें विश न लेश है, नमूं सिद्ध कहलात ।। ७० ।। औदी निर्विघ्नरामरतये नमः अर्प। रागदोष मद मोह अरु, ज्ञानावरण नशाय । शुद्ध निरंजन सिद्ध हैं, चन्द्र तिनके पाय ।। ७१ ॥ आँ दी विरजसे नमः अथ । ३४१ गिद्धनको अष्टमी पूजा विधान ३४२ 95% ERESEARSHEEEEEEEEEEEEEEEEEE मत्सर भाव दुखी करें, निजानन्दको घात । सो तुम नाशो छिनकमें, शम सुखिया कहलात ॥७२॥ ओ ही निरस्तमत्सराय नमः अर्थ । परकृत भाव न लेश है, भेद कह्यो नहि जाय । वचन अगोचर शुद्ध हैं, सिद्ध महा सुखदाय ॥ ७३ ॥ ओ ही शुद्धाय नमः अर्घ। रागादिक मल विन दिपो, शुद्ध सुवर्ण समान । शुद्ध निरंजन पद लियो, नमूं चरण धरि पान ॥७॥ ओं ही निरंजनाय नमः अर्घ । द्रव्य भाव दो विधि करम, नाश भये शिवराय । वन्दू मन वन काय कर, भविजनको सुखदाय ॥७५॥ ओ ही कम नमः अर्थ। ज्ञानावर्णी आदि ले, चार घातिया कर्म। 14.-.-.-.-.-.-.-. ३४२

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मिद्धचक्र विधान अष्टमी पूजा ३४४ ॐ ही वीतरागाय नमः अर्थ। क्षुधा वेदनी नाशकर, स्खे सुख भुंजनहार । निजानन्द सन्तुष्ट हैं, वन्दं भाव विचार ॥८१॥ ओ ही (निजानंदाय) अक्षुधाय नमः अर्थ । एक दृष्टि सबको लखें, इष्ट अनिष्ट न कोय । द्वेष अंश व्याप नहीं, सिद्ध कहावत सोय ।। ८२॥ ओ ही अद्वैपाय नमः भवसागरके तीर हो, शिवपुरके हैं राह । मिथ्यातमहर सूर्य हो, में वन्दं हूँ ताहि ॥८३॥ ॐ ही ( तमोहराय) निर्माहाप नमः अर्थ जग जनमें यह दोष है, सुखी दुखी बहु भेव । ते सब दोष निवारियो, उत्तम है स्वयमेव ।। ८४॥ +----

निद्रन
विधान
जनम मरण यह रोग है. तिनको कठिन इलाज।
परमौषध यह रोगकी, बन्दू मेटन काज ।। ८५॥
ॐही अगदाय नमः अय।
राग कहो ममता को, मोह कर्म मो होय ।
सो जिन मोह विनाशियो, नमूं सिद्ध है मोय ॥ ८६ ।।
ओ ही निममन्वाय नमः ।
तृष्णा दुखको मूल है, सुखी भये निम नाश ।
मन वच तन कार में नर्मू, है आनन्द विलाम ।। ८७ ॥
ओं ही बीततृष्णाय नमः अथ ।
अन्तर बाह्य निरइच्छ है, एकी रूप अनूग ।
निष्पृह परमेश्वर नमूं, निजानन्द शिवभूप ।। ८८ ॥
ओ ही अमंगाय नमः अपं ।
सायिक समक्तिको घरं, निर्भय थिरता रूप।
i5555555555555

सिद्धचक विधान अष्टमा पूजा ३५० ओ ही अनन्तपीयांय नमः अर्थ । सुखाभास जग जीवके, पर निमित्तसे होय। निज आश्रय पूरण सुखी, सिद्ध कहावे सोय ॥१०॥ ओ ही अनन्तसुखाय नमः अर्म । निज सुखमें सुख होत है, पर सुखमें सुख नाहि । सो तुम निज सुखके धनी, मैं वन्दं हूं ताहि ।। १०८ ॥ औ ही अनन्तसौख्याय नमः । तीन लोक तिहुँ कालके, गुण पर्यय कछु नाहि । जाको तुम जानों नहीं, ज्ञान भानुके माहि ॥ १०१ ॥ ओ ही विश्वज्ञानाय नमः अर्घ । द्रव्य तथा गुण पर्यको, देखे एकीवार । विश्व दर्श तुम नाम है, चन्दों भक्ति विचार ।। ११०॥ ओं ही विश्रदर्शिने नमी अर्ग। ।

मिद्धचक्र विधान ३५१ 555555555 अमो पूजा मंपूरण अवलोकते. दर्शन धरा अपार । नमूं मिद्ध कर जोरिके. करो जगतमे पार ॥ ११ ॥ ओं ही असिलावदर्शिने नमः अध। इन्द्रिय ज्ञान परोक्ष है, क्रमवर्ती कहलाय । विन इन्द्रिय प्रत्यक्ष है, घरो जान सुखदाय ॥ ११२ ॥ ओ ही निप्पक्षदानाय नमः अर्ष। विश्व मांहि तुम अर्थ मब, देखो एकीवार । विश्व चक्षु तुम नाम है, बन्दं भक्ति विचार ॥ ११३ ॥ ओ ही विश्वनाप नमः अथ । तीन लोक के अर्थ जे, वाकी रहो न शेष। युगपत तुम सब जानियो, गुण पर्याय विशेष ।। ११५ ॥ ॐ हीं अशेषविद नमः अथ। पराधीन असनि- सिद्धचक्र विधान अष्टम पूजा ३५२ सो . गतिमें तुम लियो, में बन्दं सुखकंद ।। ११५॥ ओं ही आनन्दाय नमः अर्थ। सत प्रशंसया नित्य है, या सद्ध्वा सरूप । सो तुममें आनन्द है, बन्दत हूं शिवभूप ॥ ११६ ।। ओ ही सदानन्दाय नमः अर्प। उदय महा सत् रूप है, जामें असत न होय । अन्तराय अरु विधन विन, सत्य उदै है सोय ॥ ११७ ॥ ओ ही सदोदयाय नमः अर्घ। नित्यानन्द महासुखी, हीनाधिक नहीं होय । नहीं गत्यन्तर रूप हो, शिवगतिम है सोय ॥ १८ ॥ ओ हों नित्यानंदाय नगः अर्थ । जासों परेन और सुख, अहमिन्द्रनमें नाहिं। सोई श्रेष्ठ सुख भोगते, चन्दं ई में ताहि॥ --- ३५२

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मिद्धचक्र विधान अष्टमी पूजा 巧乐玩玩乐乐五折折%折$$ ओ ही परमजिसे नमः अर्थ । महातेजके पुंज हो, अविनाशी अविकार । झलकत ज्ञानाकार सब, दर्पण वल आधार ।। १२४ ।। ॐ ही परमतेजसे नमः अर्घ । परम घाम उतकृष्ट पद, मोक्ष नाम कहलाय । जासों फिर आवत नहीं, जन्म मरण नहीं पाय ।। १२५॥ ॐ ही परमधाम्ने नमः अर्थ । जग गुरु सिद्ध परमातमा, जगत सूर्य शिव नाम । परम हंस योगीश हैं, लियो मोक्ष अभिराम ॥ १२६ ॥ *ही परमहंसाय नमः अर्थ। दिव्यज्योति स्वज्ञानमें, तीन लोक प्रतिभाम। शंका विन विश्वास कर, निजपर कियो प्रकाश ॥ १२७॥ ओ ही प्रत्यक्षमाये नमः अर्थ । 2td ३५४

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अष्टमी
मिनमा
पूजा
विधान
आतमके पोधत, किया कर्मको नाश । १३२ ।
ओ ही प्रबोधारमने नमः अर्थ।
कर्म मैलसे लिप्त हैं, जगति आत्म दिन रेन ।
कर्म नाश महापद लियो, यन्दू हूं सुख देन । १३३ ।
ओ ही महात्मने नमः अर्थ।
आतमको गुण ज्ञान है. यही यथारथ होय ।
ज्ञानानन्द ऐश्चर्यता, उदय भयो है सोय। १३४ ।
ओ ही आरममहोदयाय नमः अर्थ ।
दर्शज्ञान सुम्ब वीर्यको, पाय परम पद होय ।
सो परमातम तुम भये, नमूं जोर कर दोय । १३५ ।
ओ ही परमात्मने नम अर्ग।.
मोहकर्मफे नाशनं, शान्ति भये मुखदेन ।
तिलो मान्न न सय रेल १३६ ।
३१६

पदचक
अष्टमी
पूजा
খান
ओ ही प्रशांतात्मने नमः अर्य।
पूरण पद तुम पाइयो, बात परे न कोय ।
तुम समान नहीं और हैं, बन्दू हूं पद दोय । १३७ ।
ओही परमात्मने नमो अर्म ।
पुद्गल कृत तन छारक, निज आतममें वास ।
स्वं प्रदेश ग्रहके विय, नित ही करत विलास । १३८ ।
ॐ हीं आरमनिकेताय नमः अर्थ ।
औरनको नित देत हैं, शिवसुख भोगें आप।
परम इष्ट तुम हो सदा, निज सम करत मिलाप । १३६ ।
आं ही परमेष्टिने नमः अघ ।
मोक्ष लक्ष्मी नाथ हो, भक्तन प्रति नित देत ।
महा इष्ट कहलात हो, चन्दू शिवसुख हेत । १४०।
ओ ही महिनात्मने नमः अर्य।

-
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सिद्धना
विधान
अष्टम
पूजा
३५८
रागादिक मल नासिके, श्रेष्ठ भये जगमाहि ।
सो उपासना करणको, तुम सम कोई नाहिं । १४१ ।
ओ ह्रीं श्रेयात्मने नमो अर्ग।
परमें ममत विनाशके, स्व आतम थिर धार।
पर विकल्प संकल्प विन, तिष्ठो सुख आधार । १४२ ।
ओं ह्रीं स्यात्मनिष्ठिनाय नमो अध।
स्व आतममें मग्न हैं, स्व आतम लवलीन ।
परमें भ्रमण करें नहीं, सन्त चरण शिर दीन । १४३ ।
ओ ही ब्रह्मनिष्ठाय नमो अर्ग।
तीन लोकके नाथ हो, इन्द्रादिक कर पूज ।
तुम सम और महानता, नहि धारत है दूज । १४४ ।
आँ ह्रीं महावेष्टाय नमो अर्थ ।
तीन लोक परसिद्ध हो, सिद्ध तुम्हाग नाम ।
३५

15
गिदचत्र
अष्टमी
पूना
विधान
२५६
155555555555555555
सर्व सिद्धता ईश हो, पूरहु सबके काम । १५ ।
ओ ही निम्दान्मने नगः अब
स्व आतम थिरता धरं, नहीं चलाचल होय।
निश्चल परम सुभावमें, भये प्रकृतिको खोय । १४६ ।
ओ ही दहात्मने नमः अध।
क्षयोपशम नानाविध, आयक एक प्रकार ।
सो तुममें नहीं और सौ, बन्दू भाव लगार । १४७ ।
ॐ दी एकविद्याय नमः अय ।
कर्म पटलके नाशत, निर्मल ज्ञान उदार ।
तुम महान विद्या धरें, बन्दू योग संभार । १.१८ ।
ओ ही महाविद्याय नमो अध।
परम पूज्य परमेश पद, पूरण ब्रह्म कहाय ।
पायो सहज महान पद, वन्दू तिनके पाय ।१४६।

मिद्धनका अएमी पूजा विधान 35555555555555555555 ॐ ही महापदेश्वराय नमो अर्थ । पंच परम पद पाईयो, ब्रह्म नाम हे एक । पजें मन वच काय करि, नाशै विघन अनेक । १५० । ओ ही चत्रमणे नमः अर्घ । निज विभूति सर्वस्व तुम, पायो सहज सुभाव । हीनाधिक विन विलसते, वन्दू ध्यान लगाय। १५१ । ओं ही सर्वस्वाय नमो अर्थ। पूरन पंडित ईश हो, बुदिध धाम अभिराम । चन्दू मन वच काय करि, पाऊ मोक्ष सुधाम ॥ १५२ ॥ ओ ही सर्व विदेश्वराय नमः अप। मोह कर्म चकचूरतें, स्वाभाविक शुभ चाल । शुभ परिणाम धेरै सदा, पंटू नित नमि भाल ॥ १५३ ॥ ही मुचये नमी अर्य।

卐 फ प्र अष्टमी पूजा 14. 5 है 卐 जान दश आवर्ण विन, दीपो नंताऽनंत । मकल शं य प्रतिभास है, तुम्हें नमें निन संत ॥ १५ ॥ श्री ही अनन्नदीप्तये नमो प्रर्ष । इक इक गुण प्रति छेदको, पार न पायो जाय । मी गुण रास अनंत हैं, चंदू तिनके पाय । १५५ । ॐ ही अनन्नान्गनं नमः अप । अहमिदनकी शक्ति जो, करो अनंती रास । मी तुम शक्ति अनंत गुण, करें अनंत प्रकाश । १५६ । ॐ ही अनन्तशक्तये नमः अप । छायक दर्शन जोतिमें, निरावरण परकास । सो अनंत द्रग तुम धरौ, नमें चरण नित दास । १५७ । ओ ही अनन्नदृशे नमः अर्म । जाकी शक्ति अपार है, हेतु अहेतु असिद्ध । ३६१ मिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान 35555555 ॐ ही महापदेवराय नमो अर्ष । पंच परम पद पाईयो, ब्रह्म नाम है एक । पूजं मन यच काय करि, नाशे विधन अनेक । १५० । औ ही रचत्रमणे नमः अर्थ । निज विभूति सर्वस्व तुम, पायो सहज सुभाव । हीनाधिक विन विलसते, बन्दू ध्यान लगाय। १५१ । ओं ही मर्यस्वाय नमो अर्ष। पूरन पंडित ईश हो, घुदिध धाम अभिराम । मन वच काय करि, पाऊं मोक्ष सुधाम ॥ १५२ ॥ ओ ही मर्यविदेधराप नमः अघ । मोह कर्म चकचूरतें, स्वाभाविक शुभ चाल । शुभ परिणाम धेरै सदा, बंदूं नित नमि भाल ॥ १५३ ॥ ओ ही शुचये नमो अध।

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ܕܝܕܚܨܝܪ
गिद्धनका
पिधान
पूज
RRE55555555555555
इन्द्री मन व्यापारमें, जाको नहिं अधिकार ।
सो अलक्ष आतम प्रभू, होउ सुमति दातार । १६७ ।
औ ही अलक्षात्मने नमः अर्प।
नहीं चलाचल अचल हैं, नहीं भ्रमण थिर धार।
सो शिवपुरमें बसत हैं, य, भक्ति विचार । १६८ ।
औदी अवलस्थानाय नमः अर्घ ।
पर कृत निमित्त विगाड है, सोई दविधा जान ।
सो तुममें नहीं लेश है, निरायाध परमाण । १६६ ।
ओं ही निराधापाप नमः अर्थ ।
जैसे हो तुम आदिमें, सोई हो तुम अन्त ।
एक भांति निवस सदा, पंदत हैं नित सन्त । १७० ।
*ही प्रतिमानात्मने नमः ।
धर्मनाथ जगदीश हो, मुर मुनि मान आन ।

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मिद्धचक्र
अष्टमो
पूजा
विधान
फरश आ दे पन इन्द्रियां, द्वार ज्ञान कछु नाहि ।
यातें अतिइन्द्रिय कहो, जिन-सिद्धांतक मांहि ॥ १७६ ॥
ओ ही अतींद्रियाय नमः अर्घ ।
एक ज्ञान असहाय हो, शुद्ध बुद्ध निर अंश ।
केवल तुमको धर्म है, नमें तुम्हें नित संत ॥ १७७ ॥
ओं ह्रीं केवलाय नमः अर्प।
लौकिक जन या लोकमें, तुम सारूं गुण नाहिं ।
केवल तुमहीमें बसे, में चन्दू हूं ताहि ॥ १७८ ।।
औ ही केवलभवलोकनाय नमः अप ।
लोक अनंत कहो सही, तातें नन्तानन्त ।
है अलोक अवलोकियो, तुम्हें नमें नित संत ॥ १७९ ॥
औ ही लोकालोकअवलोकाय नमः अर्थ।
ज्ञान द्वार निज शक्ति हो, फेलो लोकालोक।
भिन्न भिन्न सत्र जानियो, नमूं चरण दे धोक ॥ १८०॥

दन पान अष्टमी पूजा ASS5555555555पाना। ओ दी विकृताय नमः अध। विन सहाय निज शक्ति हो, प्रगटा आपाआप । स्वयं बुन्द्र स्वे सिद्ध हैं, नमत नसे सब पाप ॥ १८१ ।। ओ ही केवलाय नमः अघ । मृक्षम सुभग सुभावनें, मन इन्द्रि नहिं ज्ञान । वचन अगोचर गुण धरै, नम चरन दिन रात ॥ १८२ ॥ ओहीं अव्यक्ताय नमः अघ । कर्म उदय दुख भागवे, सर्व जीव संसार । निन सबको तुम ही शरण, देहो सुक्ख अपार ।। १८३ ॥ ओ ही सर्वशरणाय नमः अघ । चितवनमें आये नहीं, पार न पावे कोय । महा विभवके हो धनी, नमूं जोर कर दोय ॥ १८४ ॥ ओ ही अचिंत्यविभवाय नमः अर्घ । छहो कायके वासको, विश्व कहै सब लोक । ३६७ 5 मिद्धचक्र अटमो पूजा अष्टमी विधान निनक धमनहार हो, राज काजके जोग ।। १८५।। ओ ही विश्वभृते नमः अर्घ। घट घटमें राजो सदा, ज्ञान द्वार सब ठोर । विश्व रूप जीवात्म हो, तीन लोक सिरमोर ॥ १०६॥ ओ ही शिवरूपात्मने नमः अर्थ । घट घटमें नितव्याप्त हो, ज्यों घट दीपक जोति । विश्वनाथ तुम नाम है, पूजत शिवसुख होत ॥ १८ ॥ ॐ ही विश्वात्मने नमः अर्ष । इन्द्रादिक जे विश्वपति, तुम पद पूजें आन | यात सुखिया हो सद्दी, में पूजूं धरि ध्यान ॥१८॥ औ ही विश्वतोमुखाय नमः अर्थ। ज्ञान द्वार सब जगत, व्यापि रहे भगवान। यति गति कहत हैं. ज्यं नमो शशि मान ॥ १८९॥ ३६८

पर नाम।
पूजा
वेधान
सोई परमानन्द है, भोगे निज आधार । १६८ ।
ही महागांगाय नमः अप ।
दर्श ज्ञान सुख भोगते, नेक न वाधा होय ।
अतुल वीर्य तुम धरत हो, में बन्दू हूं सोय । १६६ |
औ ही अतुलनीय नमः अर्ग।
शिवस्वरूप आनन्दमय, क्रीडा करत विलास ।
महादेव कहलात हैं, बंदत रिपुगणनाश । २०० ।
ॐ हीं यशाहाय नमः अपें ।
महा भाग शिवगति लहो, तासम भाग न और ।
सोई भगवत हे प्रभू, नमूं पदाम्बुज ठौर । २०१ ।
ओ दी भगवते नमः अर्थ
तीन लोकके पूज्य हैं, तीन लोकके स्वामि ।

4.. सिद्धचक्र अष्टमो पूजा विधान ओं ही महाबोधाय नमः अर्थ। कर्मयोगते जगतमें, जीव शक्तिको नाश । स्वयं वीर्य अद्भुत घरे, नम चरण सुखराप्त ॥ १९४ ॥ ओ ही महावीर्याय नमो अर्घ । छायक लब्धि महान है, ताको लाभ लहाय । महा लाभ यातें कहै, चन्दं तिनके पांग ॥ १९५॥ ॐही महालाभाय नमः अप । ज्ञानावरणादिक पटल, छायो आतम ज्योति । ताको नाश भये विमल, दीप्त रूप उद्योत ॥१९६ ओं ही महोदयाय नमः अर्ष। ज्ञानानन्द स्वै लक्षमी, भोगै बाधाहीन । पंचम गतिमें वास है नमूं जोग पद लीन ॥ १९७ ॥ औ ही महाभोगमुगनये नमः अर्थ । ३७०

म
पद्रमा
ज
पूजा
.
प्रधानम
पर निमित जामें नहीं, स्व आनन्द अपार ।
सोई परमानन्द है, भोगे निज आधार । १६८।
taiगापनमः ।
दश ज्ञान सुख भोगते, नेक न वाधा होय ।
अतुल वीर्य तुम धरत हो, में वह सोय । १६ |
attी अतुलनीय नगः अर्ष।
शिवस्वरुप आनन्दमय, कीडा करत विलाम ।
महादेव कहलात हैं, बंदत रिघुगणनाश । २०० ।
ॐदी पाहांग नमः अर्प।
महा भाग शिवगनि लहो, तासम भाग न और।
सोई भगवत हे प्रभू, नर्मू पदाम्बुज ठौर । २०१ ।
जगदी भगवते नमः अर्ष।
तीन लोकके पूज्य हैं, तीन लोकके स्वामि।
३७१

१ AFTE अटमा पता विधान TIMER555575hahanisit चुको ध्य कियो, नान अगहन्त नाम । २०२। *आपलार नमः । सुग्गर पूजन चरण युग, द्रव्य अर्थ जुत भार । महाजर्ष तुम नाम है, पूजन कम अभाव ॥ २०३ ॥ ओ ही महाराय नमः अयं । दान इन्द्रन करि पूज्य हो, अहमिंद्रनके ध्येय । दप भार करि पूज्य हो, पूजक पूज्य अभेय ॥ २० ॥ ओही मरवान्तिार नमः अर्ग। हो द्रव्य गुणयको, जानन भेद अनन्त । महापुर त्रिभुवन धनी, पूजन में नित सन्त ॥ २०५ ॥ ओ हो भनार्थपाप नमः अर्थ तुममों कछु हाना नहीं, तीन लोकका भेद दातार, सग भाग, नमन कममल छेद ।। २०६॥ ३७२

मित्रम
रिभान
154:555575555
ॐ ही भूगावराजाय नमः ।
मकल, शंयके ज्ञानतं, हो सबके सिरमोर ।
म्यानम तुम नाम है, तुम लग सत्रकी दौर || २०७॥
ओ ही भृनार्थकतगुरुपाय नमः अर्थ ।
ग्वयं बुद्ध शिवमग चरन, स्वयंचुन्द्र अविरन्छ ।
शिवमगचारी नित जज, पाचं आतम शुन्छ । २०८ ।
जीही पूजयाय नमः अर्ष।
सब दवनक देव हो, तीन लोकके पृज्य ।
मिया निमिर निवारते, सूरज और न दूज । २०६ ।
औदी महारफाय नमः ।
मुग्नर मुनिक पूज्य हो, तुमसे श्रेष्ठ न कोय ।
नान लोकके स्वामि हो, पृजत शिवमुख होय । २१० ॥
जी ही गभगने नमः ।
5555555555555SERIES
.

मिद्धक
अष्टमी
पूजा
विधान
३७४
555555555555555
महा पूज्य महा मान्य हो, स्वयंयुद्ध अविकार ।
मन वच तनतें ध्यावते, सुरनर भक्ति विचार । २११ ।
आं ही अप्रभाते नमः अर्ध ।
महाज्ञा केवल कहो, सो दीखे तुम मांहि
महा नामसों पृजिये, संसारी दुख नाहिं । २१२ ।
ओ ही महते नमः अर्थ ।
पज्यपणा नहीं औरमें, इक तुमहीमें जान ।
महा अर्ह तुम गुण प्रभू, पूजत हो कल्याण । २१३ ।
ॐ ही महाहाय नमो अर्थ ।
अचल शिवालयके विपं, अमित काल रहे राज ।
चिरंजीवी कहलात हो, वन्दू शिवसुख काज । २१४ ।
ओ ही नत्रायुपे नमो अर्घ
मरण रहिन शिवपद लम, काल अनंतानन्त ।
ht
३७४

अष्टमी
1. I
..
555555555555555555
टीयांग नुम नाम है. बन्दन निनप्रति संत । २१५ ।
श्री ही दीपांग नमः ।
मकल तत्त्वक अर्थ कहि, निगवाध निग्शंस ।
धर्ममार्ग प्रगटाइयो. नमत मिट दुग्य अंश । २१६ ।
ही अपवार नमी अग।
मुनिजन नितप्रति ध्यावतं. पात्र निज कल्याण ।
मजन जन आगव्य हो. में ध्याऊं धरि ध्यान । २१७ ।
श्रीही गजनवादमाग(आराध्याग) नमः अथ ।
शियसुग्य जाको ध्यावत, पात्रं सन्त मुनीन्द्र ।
परमागण्य
कहात हो, पायो नाम अतीन्द्र । २१८ ।
ही परमागध्याय नमः ।
पंचकल्याण प्रसिद्ध हैं. गर्भ आदि निर्वाण
देवन करि पजत भये, पायो
शिवसुख थान । २१६ ।
३७५

मिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान FES959555555555555 ओं ही पंचकल्याणपूजिताय नमः अर्थ । देखो लोकालोकको, हस्न रेखकी सार । इत्यादिक गुण तुम विप, दीखे उदय अपार । २२० । ओ ही द्रगविशुद्धिगुणोदयाय नमः अर्ध। छायक समकितको धरै, सोधर्मादिक इन्द्र । तुम पृजन परभावते, अन्तिम होय जिनेन्द्र । २२१ । ॐ ही सुरार्चिताय नमः अर्थ निर्विकल्प शुभ चिह्न है, वीतराग सो होय । सो तुम पायो सहज ही. नमं जोर कर दोय । ॐ ही दिवाकरी सुखदात्मने नमः अर्थ ।। २२२ ॥ स्वग आदि सुख थानके हो परकाशन हार । दोप्त रूप बलवान है, तुम मारग सुखकार ॥ ही दिवौजसे नमः अर्थ ॥२३॥ , ३७६

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अष्टमी पूजा फ क मगट साज समाज मर. उपजा दिन गत। *नित्योपनारोपचिनाय नमः ।। २२८ ।। कंवलज्ञान सुलक्षमी, धरत महा विस्तार । गरणकमल सुर मुनि जउँ, हम पूजन हितधार । हो पद्यभराय नमः अर्ष ।। २२६ ।। निहु विधि नन मल धोयकर, उज्वल निर्मल होय । गिर आलयमें बसन हैं, शुद्ध सिद्ध है सोय । ओ ही निखिलाय नमः अयं ॥ २३० ॥ अमंग्यात परदेशमें, अन्य प्रदेश न होय । म्पयं रभार स्वजात हैं, में प्रणमामी सोय । *ही मनभाय नमः अपं ॥ २३१ ॥ पृज्य यह आराधना, जो कुछ भनि प्रमाण । नगदी राय माल दो, गमत अमंगल हान । २३२ । SE555555

अष्टमी
पूजा
न
"55555575555555555
सूर्य मुमेरु समान हो, या सुरतरुकी ठार ।
महा पुन्यकी राश हो, सिन्द नम कर जोर । २३३ ।
श्री ही पुन्यांगाय नमः अप ।
ज्यं मृगज मन्याहमें. दिपे अनंत प्रभाव ।
गों नम ज्ञानकला दिपे. मिथ्या निमिर अभाव । २३.४ ।
श्रीही भाम्बा नमः अप ।
पविधि देवनमें मदा. तुम मम देव न आन ।
निजानंद कलिकर. पृजत हं धरि ध्यान । २३५ ।
आदी अमावाय नमः ।
वित्र ज्ञान युगपद धरे. ज्यू दर्पण आकार ।
पर प्रशासक हो मही, नम भक्ति उग्धार । २३६ ।
श्री ही विसानगम्मने नमः ।
मन पाप मन ज्ञान है. तुम ही पृज्य प्रधान ।
३७६

सिद्धचक्र
।
अटमो
विधान
पूजा
नित विश्वजन, देव मान परमान । २३७ ।
ॐ ही विश्वदेवाय नमः अर्थ ।।
सृष्टीको सुख करत हो, हरण दुक्ख भववास ।
मोक्ष लक्षमी देत हो, जन्म जरा मृत नास । २३८ ।
ओ ही सृष्टिनिर्धनाय नमः अर्घ ।
इन्द्र सहस लोचन किये, निरखत रूप अपार ।
मोक्ष लहै सो नेमते, में पूजं निरधार
ॐ हीं महसासगात्मवाय नमः अर्घ ॥२३६।।
संपूरण निज शक्तिके, हे परताप अनन्त ।
सो तुम विरतारण करो, नमें चरण नित संत
ओ ही सर्वशक्तये नमः अर्घ २४०॥
ऐरावतपर रूद हैं, देव नृत्यता मांड |
पूजत हैं सो भक्तिसों, मटि भवार्णव हांड ।
ही देघगरनायित u ari 100...

गिना
अष्टमी
पूजा
मुमेर विम्यात।
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गुग्नर नारण मुनि गज, सुलभ गमन आकाश।
परिपुरण हानि पर
मनकी आश।
दी हमलामावगवारणारिमतामयाग नगः अपं ॥२४२।।
रक्षक ही पट कायके, शरणागति प्रतिपाल ।
पर व्यापि निज ज्ञानने, पृजन होय निहाल ।
श्री ही पिणवे नमः अर्थ ।। २५३ ।।
महा उस आसन प्रभू, है मुमेर
जन्म अभिषेक मुग्न्द करि, पृजन मन उमगान ।
श्री ही ग्नानान्गजो नमः श्री ।। २४४ ।।
जाकर नगि नीयमों, मान मुनिगण मान्य ।
गम मम गान शु श्रेय असत्यार्थ हे अन्य ।
को दी नीलगानग्यायो नमः अर्म ।। २१५ ॥
गिलानना, मेंट मंल, शरीर ।
13555555555555555555

मिट्टचक्र अटमो पूजा विधान आतम प्रक्षालित कियो, तुम्ही ज्ञान सु नीर । ओ ही स्नानवास्तरताय नमः अर्थ ॥२४६ ।। नारण तरण सुभाव हैं, तीन लोक विख्यात । ज्यू सुगन्ध चम्पाकली, गन्धमई कहलात ॥ २४७॥ ओ ही गन्धपवित्रितत्रिलोकाय नमः अर्थ। मृक्षम तथा स्थूलमें ज्ञान कर परवेश। जाको तुम जानों नहीं, खाली रहो न देश ॥ २४८॥ ओ ही वसूचये नमः अर्थ। औरन प्रति आनन्द करि, निर्मल शुचि आचार । आप पवित्र भये प्रभू, कर्मधूलिको टार ॥ २४९ ॥ ओ ही शुचिश्रये नमः अर्थ कों करि किरतार्थ हो, कृत फल उत्तम पाय । करपर कर राजत प्रभू, पन्दू हूं युग पाय ॥ २५० ।। ॐ ही गमार्थम्तहानाय नमः अर्म । ३८२ अष्टमी पूजा मान ..SSSSSSSS51545555 वईन इन्त्र अयान हैं. इष्ट मान उर माहि । कम नाशि शियपुर बसे, में बन्दु हुं ताहि ॥ २५१ ॥ जो हम प्राय नमः । मर जाफे नृत्य करि, ताके तृप्नि महान । मा में उनको जनन हं, होय कर्मी हान ॥ २५२ ।। श्री ही इन्दनृत्यनातिकाय नमः अयं । शची इन्द्र अम काम ये, जिन दासनके दास । निश्चय मनमें नमन कर, नित वंदन पद जास ॥ २५३ ॥ श्री हो या विम्मापिनाय नमः अयं । जिनक सनमग्न नृत्य करि, इन्द्र हर्ष उपजाय। जनम मुफल मानं सदा, हमपर हाउ सहाय ॥ २५ ॥ ही कारयानंदनृत्याय नमः अयं । धन सुवर्णन लोकम, पुरण इच्छा होय । चक्रवर्ती पद पाइये, तुम पूजत हैं सोय ।। २५५ ॥ ३८३ अएमो पूजा - मिद्धचक्र विधान ३८२ ...rani.in anSHRESTHA ओ ही रैदपूर्णमगीरथाय नमः अयं । तुम आज्ञामें हैं सदा, आप मनोरथ मान । इन्द्र सदा सेवन करें, पाप विनाशक जान ॥ २५६ ॥ ओं ही आचार्थइन्द्रकुनमनोरथाय नमः अर्थ । सब देवनम श्रेष्ठ हो, सब देवन सिरताज । सब देवनके इष्ट हो, बंदत सुलभ सुकाज ॥ २५७ ॥ औ ही देवश्रेष्ठाय नमः अर्थ । तीन लोकमै उच्च हो, तीन लोक परशंस । सो शिवगति पायो प्रभू, जजत कर्म विध्वंस ॥ २५८ ।। ओ ही शियाधमाय नमः अर्थ। जगत्पूज्य शिवनाथ हो, तुम ही द्रव्य विशिष्ट । हित उपदेशक परम गुरू, मुनिजन माने इष्ट ॥ २५९ ॥ औ ही अजगत्पश्यनिरनाथाय नमः (दीधावण शुधजगने) अप।.

अटमो
है
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"
"
नरिया, आपस
दीपगंभुने नमः ।
समागरण अदभुन महा, और लेह नहीं कोय ।
जनन ग्ची उलाहमां, मैं पृचं हं सोय । २६१ ।
श्री हो उपचनणानाय नमः ।
जाको अंतन हो कभी, ज्ञान लक्षमी नाथ ।
मा सिरके धनी. नम भाव धरि माथ। २६२ ।
को अनलवी नमः अयं ।
गगधगदि नित ध्यावत, पाय शिवपुर यास ।
पगाय नम नाम है, पूरे मनकी आश । २६३ ।
श्री गांगायनिनाय नमः ।
परमसनका लाम ठा, तुम पद पाया सार ।
नि जाना हो गढी, नर निश्चय व्यवहार । २६४ ।
ܕܲܪܼܲܝܲܕ̄ ܗ̄ܪܹܝܼܵܕܵܝܵܐ
३८५

गिद्धगर
अष्टमी
पूजा
विधान
555415999999965555
ओ ही प्रायविद नमो अर्ष।
सर्व तत्तके आदिमें, ब्रह्म तत्व परधान ।
तिसके ज्ञाता हो प्रभू, मैं बंदू धरि ध्यान । २६५ ।
ओ ही मनचाय नमो अर्ष ।
द्रव्य भाव द्वै विधि कही, यज्ञ जजनकी रीति ।
सा सब तुमहीं हेत हैं, रचत नशे सब (ईति) भीति । २६६ ।
ओं ही यनपतये नमः अर्ध।
महादेव शिवनाथ हो, तुमको पूजत लोक ।
पूजं भावसों, मेटो मनको शोक । २६७ ।
ओं ही (यज्ञाय) शिवनाथाय नमः अर्ष ।
कृत्य भए निज भावम, सिद्ध भये सब काज ।
पायो निज पुरुषार्थको, चंदू सिद्ध समाज ।। २६८ ॥
श्री ही जनविभवे नमः ।
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in an II 12मी. बारम्यान । ani मा. अमर मंत्र हो आप। मा. अगर दो नियार ॥ ॥ नम: का! न हो. मिमय होय । wranो. मिया मनिका बांध ॥ २७१ ॥ मग मामान्य जापान र अनेक बार यही करो, चं मित्र प्रक॥ २२ ॥ म। पति करें.मन भनि गार। गांधा गान, नादि करि गार! 2 ।। itifyhi 15515513555555557515 सिद्धचक्र पिधान पूज 55555555555555 मगन रहो निज तत्वमें, द्रव्य भाव विधि नाश । जो है सो है विविध विध, नमूं अचल अविनाश ।। २७४ ।। ॐ ही भाषाय नमः अर्ध । तीन लोक सिरताज हैं, इन्द्रादिक करि पूज्य । धर्मनाथ प्रतिपाल जग, और नहीं है दूज्य ॥ २७५ ॥ ओ ही महापतये नमः अर्ष । महाभाग सरधानतें, तुम अनुभव करि जीव । सो सेवत पुन पाप तज, निजसुख लहै सदीय ॥ २७६ ॥ जो ही महायज्ञाय नमः अर्ष। यह विधि उपदेशमें, तुम अग्रेश्वर जान । यज्ञ रचावनहार तुम, तुम ही हो यजमान ।। २७७॥ आ ही अग्रगाजकाय नमो अध। तीन लोकके पूज्य हो, भनि भाव उर धार । ३८८ धर्म अर्थ अम्माक्षक, दाना नम हो मा.

हा जापान मा जय । अष्टमी धान दया मोह पुन्य पापत, दूर भये स्वतंत्र । ब्रह्मज्ञानमें लय सदा, जपं नाम तुम मंत्र॥ २७६ ।। ॐ ही दयापराय नमो अर्ष। तुम ही पूजन योग्य हो, तुम ही हो आराध्य । महा साधु सुख हेतुत, साधे हैं निज साध्य ॥ २८० ।। ओ हों पूज्याहाय नमो अर्घ । निज पुरुषारथ सधनको, तुमको अर्चत जक्त । मनवांछित दातार हो, शिव सुख पावे भक्त ॥ २८१ ॥ ओ ही जगदार्चिताय नमो अर्थ । ध्यावत हैं नितप्रति तुम्हें, देव चार परकार । तुम देवनके देव हो, नमू भक्ति उर धार ।। २८२ ।। ॐ ही देवाधिदेवाय नमो अर्थ। ३८६ मिद्धनक अष्टमी पूजा विधान नमः HARESSFERFESSFERREE इन्द्र स न न भक्त है, तुम समान नहीं देव । ध्यावत हे नित भावसों, मोक्ष लहें स्वयमेव ॥ २८३ ॥ ही शक्राचिंताय अर्थ तुम देवनके देव हो, सदा पूजने योग्य । जे पूजत हैं भावसों, भोगें शिवसुख भोग ॥ २८४ ॥ ओ ही देवदेवाय नमः अघ । तीन लोक सिरताज हो, तुमसे बड़ा न कोय । सुरनर पशु खग ध्यावते, दुविधा मनकी खोय ॥ २८५ ॥ आं ही जगतगुरवे नमः अर्थ। जोहो सोही तुम सही, नहीं समझमें आय । सुरनर मुनि सब ध्यावते, तुम वाणीको पाय ॥ २८६ ।। औ ही मंहत देवगंधाचार्याय नमः अर्य। रथलक्षमी, नाके हो भरतार । ज्ञानानन्द अएमो पूजा मिदचक्र विधान 9555555555555555555555555) म्बमुगंध वासित रहो, कमल गंधकी सार ॥ २८७ ॥ ॐदी पद्यनन्दाय नमः अघ । मव कुवादि वादी हते, वन शैल उनहार । विजय ध्वजा फहरात हे, वन्दू भक्ति विचार ॥ २८८ ।। ॐ ही जयध्वजाय नमः अर्घ । दगांदिशा परकाश है, तिनकी ज्योति अमंद । भविजन कुमुद विकाश हो, वन्दं पूरण चन्द ॥ २८६ ॥ औ ही भामण्डलाय नमः अर्ष। चमर्गन करि भक्ति करें, देव चार परकार । यह विभूनि तुम ही विपं, बन्दू पाप निवार । २६० । ॐ दी चतुःपष्टी चामराय नमः अर्थ देव दुदुभी शब्द करि, सदा कर जयकार । तथा आप परसिद्ध हो, ढोल शब्द उनहार । २६१ ।

पटमी पूजा विधान १९० nam8959999RESERNET इन्द्र समान न भा है, तुम समान नहीं देव । ध्यारत हे नित भारसों, मोक्ष लहें स्वयमेव ॥ २८३ ॥ औही समाथिनाय नमः अर्य। तुम देवनके देव हो, सदा पूजने योग्य । जे पूजन हे भारसों, भोगें शिवसुख भोग ॥ २८४ ॥ भो ही देवदेवाय नमः अपं। तीन लोक सिरताज हो, तुमसे पड़ा न कोय । सुरनर पशु ग्यग ध्यायने, दुविधा मनकी खोय ॥ २८५ ॥ ओ ही जगतगुरवे नमः अयं। जोहो सोही तुम सही, नहीं समझमें आय । मुग्नर मुनि सर ध्यारने, तुम वाणीको पाय ॥ २८६ ॥ श्रीमंत देवांपाचागांय नमः अपं । माके हो भरमार ।

मिद्धचक्रम अष्टम पूजा विधान ३६१ । स्वसुगंध वासित रहो, कमल गंधकी सार ॥ २८७ ॥ ॐ ही पमनन्दाय नमः अर्थ । सब कुवादि वादी हते, वज्र शेल उनहार । विजय ध्वजा फहरात है, बन्दू भक्ति विचार ॥ २८८ ॥ ॐ हीं जयध्वजाय नमः अघ दशोंदिशा परकाशे है, तिनकी ज्योति अमंद । भविजन कुमुद विकाश हो, वन्दं पूरण चन्द ॥ २८६ ॥ औ ही भामण्डलाप नमः अर्म । चमरनि करि भक्ति करें, देव चार परकार । यह विभूति तुम ही वि, वन्दू पाप निवार । २६० । ॐ हीं चतुःपष्टी चामराय नमः अर्थ । देव दु'दुभी शब्द करि, सदा करें जयकार । तथा आप परसिद्ध हो, ढोल शब्द उनहार । २६१ । ३६

अष्टमो
विधान
पूजा
ओं ही देवदुंदुभोवाद्याय नमः अर्थ ।
तुम वाणी सब मनन कर, समझत हैं इक सार ।
अक्षरार्थ नहीं भ्रम पड़े, संशय मोह निवार । २६२ ।
ऑ ही पासष्टाय नमः अर्थ ।
धनपति रचि तुम आसनं, महा प्रभूता जान ।
तथा स्व आसन पाइयो, अचल रहो शिवथान । २६३ ।
ओ ही लब्धामनाय नमः अर्थ ।
तीन लोकके नाथ हो, तीन छन विख्यात ।
भव्य जीव तुम छांहमें, सदा स्व आनन्द पात । २६४ ।
औदी छत्रत्रयाय नमः अर्घ ।
पुष्प वृष्टि सुर करत है, तीनों काल मझार ।
तुम सुगन्ध दश दिश रमी, भविजन भ्रमर निहार । २६५ ।
4..
.
३१२
ॐt Tो

अष्टमी
पूजा
1 "5555555555555555ains5555
देव रचित आशोक है, वृक्ष महा रमणीक ।
समोशरण शोभा प्रभु, शोक निवारण ठीक । २६६ ।
ओहीं दिव्याशोकाय नमः अघ।
मानस्तम्भ निहारके, कुमतिन मान गलाय ।
समोशरण प्रभुता बहे, नर्मू भक्ति उर लाय ॥ २६७ ।
औ ही मानस्थम्भाय नमः अर्थ ।
सुरदेवी संगीत कर, गावं शुभ गुण गान ।
भक्ति भाव उरमें जगो, चन्दत श्री भगवान । २६८ ।
औ ही संगीताहाय नमः अर्थे ।
मंगल सूचक चिह्न है, कहै अष्ट परकार ।
तुम समीप राजत सदा, नमू अमंगल टार । २६६ ।
ओं ही अप्टमंगलाय नमः अर्थ ।
भविजन तरिये तीर्थसों, तुम हो श्री भगवान ।

मिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान धर्मनाथ जगमें प्रगट, तारण तरण जिहाज । तीन लोक अधिपति कहो, वन्दू सुखके काज ॥ ३० ॥ ओं ही तीर्थवेधसे नमो अर्थ । श्रावक या मुनि धर्मके, हो दिखलावनहार । अन्य लिंग नहीं धर्मके, बुधजन लखो विचार ॥ ३१०॥ ओं ही तीर्थविधाय नमो अर्घ । स्वर्ग मोक्ष दातार हो, तुम्ही मार्ग सुखदान । अन्य कुभेपिनमें नहीं, धर्म यथारथ ज्ञान ॥ ३११ ॥ ओं ही मत्यतीर्धकराय नमो अर्थ सेवन योग्य सु जक्कमें, तुम्ही तीर्थ हो सार । सुरनर मुनि सेवन करें, में पन्दू दुख टार ॥ ३१२ ॥ औ ही तीर्धव्याय नमः अर्घ । भव समुद्र भवस तिरं, तो तुम तीर्थ कहाय । 2

मिद्धचक्र
अष्टमी
पूजा
धान
हो तारण निहुं लोकमें, सेवन हूं तुम पाय ॥ ३१३ ।।
ओ ही तीर्थतारकाय नमः अर्घ।
सर्व अर्थ परकाश करि, निर इच्छा तुम वेन ।
धर्म सुमार्ग प्रवर्तको, तुम राजत हो ऐन । ३१४ ।
औ ही सत्यवाक्याधिपाय नमः अघ ।
धर्म मार्ग परगट करे, सो शासन कहलाय ।
सो उपदेशक आप हो, तिस संकेत कराय । ३१५ ।
ओं ही सत्यशामनाय नमः अयं ।
अतिशय करि सर्वज्ञ हो, ज्ञानावरण विनाश ।
नेम रूप भवि सुनत ही, शिवसुख करत प्रकाश । ३१६ ।
ओं ही अप्रतिशासनाय नमः अपें ।
कहै कथंचित धर्मको, स्यात वचन सुखकार ।
सो प्रमाणत साधियो, नय निश्चय व्यवहार । ३१७ ।
HERE HERE

सिद्धचक्र
अष्टमी
पूजा,
विधान
३६८
आं ही स्याद्वाय नमः अर्थ।
निर अक्षर वाणी खिर, दिव्य मेघकी गर्ज।
अक्षरार्थ हो परिण, सुन भव्यन मन अर्ज । ३१८ ॥
ओ ही दिव्यध्धनये नमः अर्घ ।
नय प्रमाण नहीं हतत है, तुम परकाशे अर्थ ।
शिवसुखके साधन विप, नहीं गिनत है व्यर्थ । ३१६ ।
ओ ही अव्याहतार्थाय नमः अर्प।
करें पवित्र सु आत्मा, अशुभ कर्म मल खोय ।
पहुंचावे ऊंची सुगति, तुम दिखलायो साय । ३२० ।
ॐ ही पुण्याचे नमो अर्थ।
तत्वारथ तुम भासियो, सम्यक विप प्रधान ।
मिथ्या जहर निवारणं, अमृत पान समान । ३२१ ।
ओ ही अर्थवाचे नमः वर्ष ।
३६८

अष्टमी
IITH
frHAIR
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र अनिसायमा विग्न हो, अक्षगय मय होय ।
दिल्य पनि निलय कर, संशय नमको ग्योय । ३२२ ।
यी ही अदमागधी युनाय नमो ।
मर जीवनको इष्ट है, माक्ष निजानन्द वास ।
ग्गा न मने दिग्गनाइयो, संशय माह विनाश । ३२३ ।
श्री दी इयान नमः अष।
गय समान ही कान है, द्रव्य पर्याय सुभेद।
अनेकांन माय मही, वरन भेद निवेद । ३२४ ।
आदी अनेकांनदगिने नमः ।
जुनंच कान पकांनका. नाको अन्न कगय ।
मायकान प्रगटाइयो,
प्रजं तिनके पाय । ३२५ ।
*दी दुनयानकाय नमः अन ।
एक पक्ष मिथ्यात्व, नाका निमिर नियार ।

गिना
अएमी
पूजा
विधान
195FEREHES99999999999999655
स्यादवाद सम न्यायनं. भविजन तारे पार । ३२६ ।
श्री ही एकांनभातमेदाय नमः ।
जो है सो निज भावमें, रहे सदा निरवार ।
मोक्ष साध्यमें सार है, सम्यक वि अपार । ३२७ ।
ओ ही तयाचे नमः अर्घ।
निज गुण निज परयायमें, सदा रहो निरभेद ।
शुद्ध युद्ध अव्यक्त हो, पूजू हूं निरखेद । ३२८ ।
* ही प्रधानाय नमः अर्य।
स्यानकार उद्योतकर वस्तु धर्म निरशंस ।
नासुध्वजा निर्वितको, भाषो विधि विध्वंस ! ३२६ ।
श्री ही या कारवजाराने नमः अपं ।
परम्पराई धर्म को उपदेशो श्रुन द्वार ।
भरि भवसागर नीर लह, पायो शिव सुग्यकार । ३३० ।
४००

अष्टमी
पूजा
HES
हाय नमः ।
यदि नहिं पुनर न. है अनादि पम्मान ।
गो तुम भाग्यो । मही. या पर्याय नु जान । ३३१ ।
काजीमानिने नमः ।
मनोजवानान, बोट दो. जिम वाणीके होत ।
ग में ना किया. मोक्षमाग उद्यान । ३३२ ।
को अपनीमानिने नमः अप ।
गम मम्मान अनादि वाचन नित्य ग्याप ।
का चन्द्र भारया. पाऊँ मिच-मुख कृप । ३३३ ।
दी गायनाय नमः अर
मादिक या और विधि नहीं विमलना जान ।
का सामान्य नाही मुबकी ग्वान । ३३ ।
१०१
41.3

मिपाऊ
अष्टमो
पूजा
विधान
ओ हो अपिलद्वाप नमः अर्थ
नय विवक्षने सधत है, सप्त भंग निरयाध ।
सो तुम भारयो नमत हूं, वस्तु रूपको साध । ३३५ ।
ओहीं मप्तभंगानिने नमः अर्घ ।
अक्षर विन वाणी खिरे, सर्व अर्थ करि युक्त ।
भविजन निज सरधानते, पावे जगते मुक्त । ३३६ ।
ओं ही अपर्णगिरे नमः अर्थ।
क्षुद्र तथा अक्षुद्र मय, सब भाषा परकाद।।
तुम मुखते खिरके करे, भर्म तिमिरको नाश । ३३७ ।
ओ ही मर्यभाषामयगिर नमः अर्थ ।
कहने योग्य समय सब, अर्थ करें परकाश ।
नम पाणी मुग्यन घिरे, करे भग्म तम नाश । ३३८ ।
1-1-1-1-1-
ttणमिरे नमः प्रपं ।

अष्टमी . पूजा मतिवान । ३४० । 14 नमयागा नहायत: TA ' ' गानार मुलं विग. मंशय नमको खोय । ३३६ । *दी मापतानिने नमः । यम अनल पाय है. वचन अगोचर जान । नाम दिवसाये महज ही, हर्ग कुमति ॐदी अवाच्या नाचिने नमः अर्थ । वचन अगोचर गुण धगे, लहं न गणधर पार । गम महिमा न महीं विपं, मुझ नागे भवपार । ३४१ । श्री डी वाय नमः अर्थ। नगर पचन न कहि सके, असदमती उदमस्थ । धर्म मार्ग प्रगटाइयो, मंटी कुमति समस्त ॥ ३४२ ॥ uttiनगिं नमः । त्यप्रिय गतिमित भविजन हेत। ४०३

.
अष्टमी
पूजा
विधान
KERSITERSItihaashithi15
सो मुनिजन तुम ध्यावते, पाय शिपुर खेत ॥ ३४३ ॥
ओ ही मन्नगिरं नमः ।
नहीं सांच नहीं झूठ है, अनुभय वचन कहात ।
सो तीर्थकर पनि कही, सत्यारथ सत वात ॥ ३४४ ॥
ओ ही सत्यानुभयगिरे नमः अयं ।
मिथ्या अर्थ प्रकाश करे, कुगिरा ताको नाम ।
सत्यारथ उद्योत करे, सुगिरा तुम अभिराम ॥ ३४५ ॥
ॐ हीं मुगिरे नमः अर्य।
जोजन एक चहूं दिशा, हो वाणी विस्तार ।
श्रयण सुनत भविजन लहै, आनंद हिये अपार ॥ ३४६ ॥
श्री हो गोजनच्यापिनगिरे नमः अघ ।
निर्मल क्षीर समान है, गौर श्वेत तुम चैन ।
पाप मलिनता रहिन है, मस्य प्रकाशक पन ॥ ३७॥

. अष्टमी पूजा नार्थ नच्च जो नहीं तज, तारण भविजन वान । यानं नाथंकर प्रभू, नमन पाप मल हान ॥ ३४८॥ मां ही नीयनचगिरे नमः अध। नम नार्थ पर्याय करि, आत्म तत्वको जान । मातम मन्यारथ कहो, मुनिजन उत्तम मान ॥ ३४९ ॥ ॐ ही परमार्थगवे नमः अर्य। भयानको श्रवणनि सुखद, तुम वाणी सुख देन । में बन्द हूं भावसा, धर्म बतायो एन ॥ ३५० ॥ आं ही भव्यकश्रयणगिरे नमो अर्थ । मंशय विभ्रम नाश करो निमूल। मन्य वचन परमाण तुम, छेदत मिथ्या शूल ॥ ३५१ ।। आं ही सद्गवे नमः अर्थे । तुम वाणीमें प्रगट है, सब सामान्य विशेष । नानाविध सुन तर्क में, संशय रहै न शेष ॥ ३५२ ॥ मोहको, ४०५ मिनाक 45055 अष्टमी पूजा . E955555, श्री ही चिगवे नमः अप । परम कहे उतएको, अर्थ होय गम्भीर । मो नम वाणीमें खिरे, चन्दत भवदधि तीर ॥ ३५३ ॥ श्री ही परमार्थगवे नमः अयं । माह क्षोभ परशांत हो, तुम वाणी उरधार । भविजनको सन्तुष्ट कर, भव आताप निवार ॥ ३५४ ॥ ओहीं प्रशांनगवे नमः अर्थ चारह सभा सु प्रश्न कर, समाधान करतार। मिथ्यामनि विध्वंस करि, वन्दं मनमें धार ॥ ३५५ ॥ ओ ही प्रानिकगिरे नमः अर्थ महापुरुष महादेय हो, मुरनर पूजन योग याणी मुन मिध्यात तन, पावे शिवसुस भोग ॥ ३५६ ॥ श्री ही याग्यभुत नमः अर्य। मिशग उपमास मुभम, मनमें अर्थ विचार । नाना.....

अष्टमा
मिटर
किमान
साक्षात् उपदेश तुम, तारे भविजन पार ।। ३५७ ।।
औ ही अंने नगः ।
तुम समान तिहुं लोकमें, नहीं अर्थ परकाश ।
भविजन सम्बोधे सदा, मिथ्यामतिको नाश ।। ३५८ ॥
ओ हो महायने नमः अथ ।
जो निज आत्म-कल्याणमें, वरने सो उपदेश ।
धर्म नाम तिस जानियो, चन्द्वं चरण हमेश ।। ३५९ ॥
ॐ हीं धर्मश्रुने नमः अर्य।
जिन शासनके अधिपती, शिव मारग बतलाय ।
वा भविजन सन्तुष्ट करि, चन्द्रं तिनके पाय । ३६० ।
ओ हीं श्रुतपतये नमः अयं ।
धारण हो उपदेशके, केवलज्ञान संयुक्त ।
शिवमारग दिखलात हो, तुमको बन्दन युक्त ।। ३६१ ।।
ओ हीं भूननाय नमः अर्थ।

मिद्धक ! अष्टा पूजा विधान SH5555755-5555555 जैसो है तैसो कहै, परम्पराय सुरीत । सत्यारथ उपदेशते, धर्म मार्गकी रीत ॥ ३६२ ॥ भों ही घूयश्रुतये (धृतये) नमः अर्थ । मोक्षमार्गको देखियो औरनको दिखलाय । तुम सम हितकारक नहीं, वन्दूं हूं तिन पाय ॥ ३६३ ॥ ओ ही निर्वाणमागोपदेशकाय नमः अर्घ । स्वर्ग मोक्ष मारग कहो, यति श्रावकको धर्म । तुमको यन्दत सुख महा, लहै ब्रह्मपद पर्म ओ ही यतिश्रावकमार्गदेशकाय नमो अर्थ' । ३६४ । तत्व अतत्वस जानियो, तुम सब ही परतक्ष । निज आतम सन्तुष्ट हो, देखो लक्ष अलक्ष ॥ औ ही तत्वमार्गदृशे नमः अर्थ । ३६५ । सार तत्त्व वर्णन कियो, अयथार्थ मत नाश ।

मिद्धचक्र
विधान
ओही मारनवार्धाय नमः । ३६६।
आप तीर्थ औरन प्रती, सर्व तीर्थ करनार ।
उत्तम शिवपुर पहुंचना. यही विशेषण सार ।
ओ ही नाथारमनीयतनाम नमः अप । ३६७।
लाकालाकका
रंग्या
हस्त समान।
युगपत सबको देखिये, किया भर्म तम हान ।
औ ही दृष्टाग नगः अर्घ । ३६८।
जिनवाणी रसिक हो. तासी रनि दिन रेन ।
भोग उपभोग करी सदा, चन्दत ह' सम्बचेन ।
ओ ही वाग्मीधगय नमः अध । ३६६ ।
जो संसार-समुद्रस, पार करत सो धर्म।
तुम उपदेश्या धर्मकुं, नमन मिटे भव भर्म।
ओही धर्मशागनाय नमः अप। ३४० ।
धर्म रुप उपदेश है, भवि जीवन हितकार ।
..
१०६

मिना अष्टमी पूजा विधान SEEEEEEEEEEEEEFEREFFE 59999999999 शिवलक्षपीके नाय हो, पूजू तिनके पाय ॥ ३८९ ॥ *ही महानंदाय नमः अर्घ तुम सम कविवर जगतमें, और न दूजो कोय । गणधरसे श्रुतकार भी, अर्थ लहैं हैं सोय ॥ ३९॥ ॐ ही कवींद्राय नमः अर्थ । हित करता पद कायके, महा इष्ट तुम वैन । तुमको बन्दं भावसों, मोक्ष महासुख दैन ॥ ३९१ ॥ ओं ही महेष्टाय नमः अर्थ । मोक्ष दान दातार हो, तुम सम कौन महान । तीन लोक तुमको जजे, मनमें आनन्द ठान ॥ ३९२ ॥ ओं ह्रीं महानदाताराय नमः अर्थ । द्वादशांग श्रुतको रचै, गणघरसे कविराज । तुम आज्ञा शिर धारफे, नगं निजातम काज ।। ३९३ । ४१४ air

मन
अरमो
पता
चभान'
95959555555555555555555
औदी की धराय नमः ।
देव महा ध्यान करत है, तुम मन्मुख घर भाव ।
केवल अतिशय कहत हैं, में पूजू युतवाय ॥ ३९४ ।।
ॐ ही इंदुभीषगप नमः अपं ।
इन्द्रादिक नित पूजते, भक्ति पूर्व शिर नाय ।
त्रिभुवन नाथ कहात हो, हम पूजत नित पाय ।। ३१५॥
ही विश्वननाधाय नमः अर्थे ।
गणी मुनीश फणीशपति, कलोन्द्रनके नाय ।
अहमिन्द्रनके नाथ हो, तुमहि नमूं धरि माय ।। ३९६ ।।
औही महानाथाय नमः ।।
भिन्न भिन्न देख्यो सकल, लोकालोक अनन्त ।
तुम सम दृष्टि न औरकी, तुमें नमें नित सन्त ।। ३१७ ॥
ओं हीं परद्रष्टाय नमः ।

। अष्टमो पूजा यति जगके भरतार जग, मुनि गणमें परधान । तुमको पूजें भावसों, होत सदा कल्याण ॥ ३९८ ॥ ॐ हीं जगत्पतये नमः अर्प। श्रावक या मुनिराज हो, तुम आज्ञा शिर धार । वरते घम पुरुषार्थगे, पूजत हं सुखकार ।। ३९९ ॥ ॐ हीं सामिने नमः अर्घ । धर्म कार्य करता सही, हो ब्रह्मा परमार्थ । मालिक हो तिहुँ लोकके, पूजनीक सत्यार्थ ॥ ४०० ॥ ओ हीं कत्रे नमः अप । तीन लोकके नाथ हो, शरणागत प्रतिपाल । चार संघके अधिपती, पूजूं हूं नम भाल ॥४०१॥ ओवी भत्रे नमः अर्घ । तुम सम और विभव नहीं, घरो चतर अनन्त ।

मिटचत्रम अयमी पूजा धान क्यों न करो उद्धार अत्र, दास कहावे सन्त ॥ ४०२ ॥ ओ ही विभवे नमो अर्ष। जामें विघन न हो कभी, ऐसी श्रेष्ठ विभूत । पाई निज पुरुषार्थ करि, पूजत शुभ करतूत ॥ ४०३ ॥ ओं ही प्रभवे नमो अर्थ। तुम सम शक्ति न औरकी, शिवलक्ष्मीको पाय । भोग सुख स्वाधीन कर, वन्दं तिनके पाय ॥ १० ॥ ॐ ही ईश्वराय नमो अब। तुमसे अधिक न और में, पुरुषारथ कहं पाह । हो अधीश सब जगतके, वन्, तिनके पांह ॥ ४०५॥ ओ ही अधीश्वराय नमो अर्ष । अग्रेश्वर चउ संघके, शिवनायक शिरमोर ।

मिद्धपा. अष्टमी पूजा विधान .....25555425359999999999.53 जत हुं नित भावमों, शीश दोऊ कर जोर ॥ ४०६॥ औ ही अधीशाय नमो अर्थ । छायक सुमति सुहावनी, वीजभून तिम जान । तुमसे शिवमारग चलै. मैं वन्दं परि ध्यान ॥४०७॥ ॐही अधोशानाय नमः अर्घ । सहज सुभाव प्रयत्न रिन, तीन लोक आधीश । शुद्ध सुभाव विराजने. वन्दं पद धर गीश ॥ ४०८॥ ओ ही अधिशिवाय नमः अर्घ । स्वयं बुद्ध शिवनाथ हो, धर्म तीर्थ करतार । तुम सम सुमति न को घरे, में वन्दं निरधार ॥ ४०९॥ ओं ही ईशित्रे नमः अर्थ। पूग्ण शक्ति सुभाष घर, पूरण ब्रह्म प्रकाश। पुरण पद पायो प्रभू, पूजत पाप विनाश ॥१०॥ ४१८ अपनी 55555 राधान 1-1-55555555555555555557555 ओही इंगानाग नगः अध। तुमसे अधिक न और है, त्रिभुवन ईश कहाय । तीन लोक अतियन्त सुग्व, पायो बन्द, ताय ।।११।। ओ हीं अधिपतये नमो अब। तीन लोक पूजत चरण, ईश्वर तुमको जान । में पूजों हों भावसों, सबसे बड़े महान ॥ ४१२ ॥ ही ईशाय नमः अप। सूरज सम परकाश कर, मिथ्या तम परहार । भविजन कमल प्रबोधको, पायो निज हितकार ।। ४१३ ॥ ओ ही ईनाय नमो अर्ष। क्रीडा करि शिवमार्गमें, पाय परम पद आप। आज्ञा भंगन हो कभी, वन्दत नाशे पाप ।। ४१४ ।। मौ ही इन्द्राय नमो अध।

मिद्वचा
अपनी
विधान
rrrrr"फ़5555
जत हुं नित भावमों, शीश दोऊ कर जोर ॥ १०६॥
औ ही अधीनाय नमो अषं।
छायक सुमति सुटायनी, बीजभून निम जान ।
तुममै शिवमारग नलै, में वन्दं परि पान ॥४०७॥
ॐ अधोगामाय नमः अप।
महज सुभाव प्रयत्न विन, तीन लोक आधीश।
शुद्ध मुभाव विराजते. वन्दं पद पर शीश ॥ ४०८।।
औ ही अधिशिवाय नमः ।
स्वयं बुद्ध शिवनाथ हो, धर्म तीर्थ करतार।
तुम सम सुमति न को घरे, में बन्द निराधार ॥ ४०९॥
ओ ही ईशिव नमः अप।
पूरण शक्ति मुमार घर, पूरण प्रा प्रमाश ।
पुरण पद पायो प्रम, पूजत पाप विनाश ॥ ४१०॥

सिद्धचत्र अष्टमी पूना विधान 95595555555555 तुम से अधिक न और है, त्रिभुवन ईश कहाय । तीन लोक अतियन्त सुम्ब, पायो वन्द ताय ।। १११ ।। ओ ही अधिपतये नमो अर्ग। तीन लोक पूजत चरण, ईश्वर तुमको जान । में पूजों हों भावसों, सबसे बड़े महान ॥ ४१२ ॥ ॐ ही ईशाय नमः अय। सूरज सम परकाश कर, मिथ्या तम परहार । भविजन कमल प्रबोधको, पायो निज हितकार ॥ ४१३ ॥ ओ ही ईनाय नमो अर्ष। क्रीडा करि शिवमार्गमें, पाय परम पद आप। आज्ञा भंग न हो कभी, वन्दत नाशे पाप ॥ ४१४ ।। भो ही इन्द्राय नमो अध। 5555555555555555555555555 ११२ मिचक्र अष्टमी विधान म EFFESSFFFFFFFFFF995 उत्तम हो तिहुँ लोकमें, मयके हो शिरताज । शरणागत प्रतिपाल हो, पूजूं आनम बाज ॥ ४१५॥ ॐकी अधिपाय नमः अयं । अधिक भूतिके हो धनी, म मुखी निरधार । सुरनर तुम पदको लहै, पूजत हूं सुखकार ॥ ४१६॥ ओ ही अपिभुरे नमः अप। तीन लोक कल्याण कर, धर्म मार्ग बनलाय । सब देवन के देव हो, महादेव सुखाय ।। ४१७ ॥ ॐही महेश्वराय नमः । महा इंश महाराज हो, महा प्रताप पाराय। महा जीव पूजे चाण, मत्र जन शरण महाय ॥ ४१८ ॥ श्री ई मदेशाय नमी प्रर्ष परम 'कहो उनको, धर्म ती का ४२० .55 अष्टमी पूजा परमेश्वर यात भये, वन्दं तिनके पाय ॥ ४१५ ही परमेश्वराय नमः अर्थ । तुम ममान कोई नहीं, जग ईश्वर जगनाथ । महा विभव ऐश्वर्यको, धरो नमू निज माथ ॥ ४२०॥ औ ही विभामहेशाय नमः अर्थ । चार प्रकारनमें सदा, देव तुम्हें शिर नाय । मव देवनमें श्रेष्ठ हो, नमूं युगल तुम पांय ॥१२१ ॥ ओ ही अधिदेवाय नमः अप । तुम समान नहिं देव अरु, तुम देवनके देव । यो महान पदवी धरौ, तुम पूजत हुँ एव ॥ ४२२ ॥ ओ ही महादेवाय नमः अर्थ । शिवमारग तुममें सही, देव पूजने योग । तुम गुण है सहचारणी, और कुदेव अयोग ॥ ४२३ ॥ । 155555555575555 अष्टमी मिट्टचर विधान HEERIES5555555555""'5'5'८५६:555 उत्तम हो तिहुँ लोकमें, सबके हो शिरताज। शरणागत प्रतिपाल हो, पूजूं आतम काज ॥ ४१५॥ ॐही अधिपाय नमः अप । अधिक भूतिके हो धनी, सर्व सुखी निरधार । सुरनर तुम पदको लहै, पूजत हूं सुम्वकार ॥ ४१६॥ ओ ही अधिभुवे नमः अप। तीन लोक कल्याण कर, धर्म मार्ग बतलाय । सब देवन के देव हो, महादेव सुखदाय ॥ ४१७ ॥ ॐ ही महाराय नमः अयं । महा ईश महाराज हो, महा प्रताप घराय। मदा जीव पूजें चरण, मय जन शरण महाय ।। ४१८॥ श्री ही महंगाय नमो भर्ष । परम फद्दो उताएको. धर्म तीर्थ aur I 5555555555555555555 ४२० अष्टमी पूजा मद्धचक्र विधान '"55555555555571515 परमेश्वर यात भये, बन्दं तिनके पाय ॥ ४१९ ॥ ओ ही परमेश्वराय नमः अर्थ । तुम समान कोई नहीं, जग ईश्वर जगनाथ । महा विभव ऐश्वर्यको, धरो नमूं निज माथ ।। ४२०॥ ओ ही विभवमहेशाय नमः अघ । चार प्रकारनमें सदा, देव तुम्हें शिर नाय । सब देवन में श्रेष्ठ हो, नमूं युगल तुम पांय ॥ ४२१ ॥ ओ ही अधिदेवाय नमः अर्घ । तुम समान नहिं देव अरु, तुम देवनके देव । यो महान पदवी धरो, तुम पूजत हूं एव ॥ ४२२ ॥ ऑ ही महादेवाय नमः अर्थ। शिवमारग तुममें सही, देव पूजने योग । तुम गुण है सहचारणी, और कुदेव अयोग ॥ ४२३ ॥ ४२१ सिद्धचक्र पूजा विधान ४२२ TEETHARASHIFFERSNEY... औ ही देय नमो अ। तीन लोक पूजत चरण, तुम आज्ञा शिर धार । त्रिभुवन ईश्वर हो सही, में पूजें निरधार ॥ ४२४ ॥ ओ ही भुवनेनगय नमः अपं । विश्वपती तुमको नमें, निन कल्याण विचार । मर्य विश्वके तुम पती, में पृथं उर धार ।। ४२५ ॥ ओ ही विश्वशाय नमः अयं । जगत जीव कल्याण कर, लोकालोक अनन्द । पटकायक आहादकर, जिम कुमोदनी चन्द ।। ४२६ ॥ दी पिस्वभनगाय नमः इन्द्रादिक जे विश्वपति, तुमको पृजन आन । यानं तुम विश्वेग हो, मांच न घर ध्यान ॥ ४२७ ॥ 5555555555555555555555

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।
मिद्धपक्र
विधान
अष्टमी
पूजा
४२४
..
.
पूजों नित भावसां, करो भवार्णच पार ॥ ४३२ ॥
ओही लोकनाथाय नमो अध।
पूजनीक जगमें सही, तुम्हें कहें सब लोग ।
धर्म मार्ग प्रगटित कियो, यातें पूजत योग ॥ ४३३ ॥
ॐ ही जगन्पतये नमः अर्प।
ऊरध अधो सु मध्य है, तीन भाग यह लोय ।
तिनमें तुम उतकृष्ट हो, तुम्हें देत नित धोक ।। ४३४ ।।
ओ हों त्रिलोकनाधाय नमः
अर्घ
तुम समान समरथ नहीं, तीन लोकमें और ।
स्वयं शिवालय राजते, स्वामी हो शिरमोर ॥ ४३५ ॥
ही लोकेशाय नमः अर्य।
जगत नाथ जग ईश हो, जगपति पूजे पाय ।
में पूजे निन भाव युन, नारण नरण सहाय ॥ ४३६ ॥

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गिदमाफ़
अष्टमी
पूजा
समान
मोहादिक रिपु जीतिके, विजयवन्त कहलाय ।
जैन नाम परसिद्ध है, पन्, तिनके पाय।
ॐ ही जेवाय नमः । ४४१ ।
रक्षा हो पट कायके, कर्म शत्रु क्षयकार ।
विजय लक्ष्मी नाथ हो. में पूजू सुखकार ।
औही जिष्णवे नमो अर्घ । ४४२ ।
फरता हो विधि कर्मके, हरता पाप विशेष ।
पुन्य पाप सु विभाग कर, भ्रम नहीं राखो लेश
ओ ही करे नमः अर्थ । ४४३ ।
स्थानन्द ज्ञान विनाश विन, अचल सुधिर रहे राज।
अविनाशी अविकार हो, पन्, निज हित काज ।
प्रादी अग्निाचगण नमः अयं । ४४४।
हाधिक पुजन ना,
गदा भतिर भार
४२६

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* गिद्धगा अहमी पूजा বিধান 5555555HEERESTER ही लोकजिने नमो अयं । ४४६ । विध नाम संसार है, जन्म मरण सो होय । सोई व्याधि विनासियो, जजू जोर कर दोय । ओ ही विश्वजित नमो अब । ४५० । विश्व कपाय निवारक, जग सम्बन्ध विनाश । जनम मरण विनु ध्रुव लसे, नमूं ज्ञान परकाश । ओ ही विसत्र नमो अर्थ १४५१ । विश्व यास तुम जीतियो, विश्व नमावे शीश । पूजत हैं हम भक्तिसों, जयवन्तो जगदीश ॥ ४५२ ॥ ॐ ही विसजिने नमः अप। इन्द्रादिक जिनको नमें, ते तुम शीश नवाय । विश्वजीत तुम नाम हैं, शरणागत सुग्यदाय ॥ ४५३ ॥ * विमजिस्काए नमः अध। ४२८ गिर अष्टमी पूजा 1955555555555555555555555ऊ तीन लोककी लक्षमी, तुम चरणांचज दोर । यानं सा जग जीनिके, राजत हो शिर मार ।। ४५२ ।। ॐही जग नमः अर्थ नीन लोक कल्याण कर, कर्मशत्रुको जीत । भव्यन प्रनि आनन्द कर, मेटत तिनकी भीति ॥ १५५ ।। ॐही जगजिष्णवे नमः अयं । जग जीवनको अन्ध कर, फलो मिथ्या घोर । धर्म मार्ग प्रगटाय कर, पहुंचायो शिव टौर ॥ ४५६ ॥ ॐदी जगन्नेत्राय नमः अथ। गोहादिक जिन जीनियो, सोई जगजय नाम । सा गुम पद पायो महा, तुम पद कर प्रणाम ।। १५७ ॥ हो जगजगाग नमः अय। जो तुम धर्म न प्रगट करि, जिय आनन्द न होय । ४२१ s सिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान ४३० भये कल्यान कर, तुम पद प्रणमं सोय ॥ ४५८ ॥ ॐ हीं अग्रण्य नमः अर्थ। रक्षा करि पट कायकी, विपय कपाय न लेश। त्रास हरो जमराजको, जयवन्तो गुण शेष ॥ ४५६ ॥ ओ ही दयामूर्तये नमः अर्थ। सत्य असत्य लखन करे, सोई नेत्र कहाय । पुद्गल नेत्र न नेत्र हो, सांचे नेत्र सुखाय ॥ ४६०॥ ॐ ही दिव्यनेत्राय नमः अर्प सुरनर मुनि आज्ञानितें, जानें निज कल्याण । ईश्वर हो सब जगतके, आनन्द सम्पति खान ॥ ४६१ ॥ ॐ अधीनराय नमः अर्घ । धाभास मनोक्तके, मूल नाश कर दीन । सत्य मार्ग घतलाइयो, कियो भव्य मुख्य लीन ॥ ४६२ ।। . SHREEEEEEFF59.... +

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मिद्धक
अष्टमी
पूजा
C
विधान
४३२
तुल वीर्य स्वशक्ति हो, जीते कर्म जरार ।
तुम सम बल नहीं और है, हो असहाय अबार । ४६७ ।
ओ ही याजसे नमः अघं।
धर्म मृति धरमातमा, धर्म तीर्थ बरताय ।
खें सुभाव सो धर्म है, पायो सहज उपाय । ४६८ ।
ओ ही पृाय नमः अर्थ।
हिंसाको वजित कियो, जे अपराध महान ।
परिग्रह अर आरंभके, त्यागी श्री भगवान । ४६६ ।
ओ ही परिग्रहत्यागीजिनाय नमः अर्घ ।
सर्व सिद्ध तुम सुलभं कर, पायो स्वयं उपाय ।
सांचं हो वश करणको, जगमें मंत्र कहाय। ६७०।
ॐदी मंगहने नमः अर्य।
जितने फछु शुभ चिाह है, दीप अनोग्न भ्यरूप ।
४३२

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सिद्धपम
विधान
aal--.-
अटमो
४३४
PRESEFFFFFFFFFFFEREFEREFERERIES
व थल जाय सुवास लहि, धर्म द्रव्य सहकार । ४७५ ।
ओ ही निस्तमस्फाय नमः अर्थ ।
मुनि ध्या पावै सुपद, निकट भव्य धरि ध्यान ।
पावे निज कल्याण नित, ध्यान योग तुम मान । ४७६ ।
ओं ही परमध्येयग्निाय नमः अर्मा।
रक्षक हो जगके सदा, धर्म दान दातार ।
पोषित हो सब जीवके, वन्दू भाव लगार । ४७७ ।
ओं ही जगतापहराय नमः अर्थ ।।
मोह प्रचंड वली जयो, अतुल वीर्य भगवान ।
शीघ्र गमन करि शिव गये, नमू हेत कल्याण | ४७८ ।
औ ही अनिजयाय नमः अध।
तोन लोक शिर मोर सब, पूजत हैं हरपाय ।
परमेम्बर हो जगनफे, यंदन निम पाय । १७ ।
४३४

पना
555555555555575
औदी विजगारमेनगर नमः अयं ।
चोमियपर अचल निन, गजन है तिह काल ।
मनिम आगन लिया, लोक शिरोमणि भाल । ४८०।
ही विभागने नमः ।
विमति प्राणीनके, ईश्वर हैं भगवान ।
मयके निगार पग धर, मर्य आन तिन मान । १८१।
ओही विध्यभुनेशाय नमः अप ।
मोक्ष संपदा होत हो, निन अक्षय ऐश्वर्य ।
कौन मह कौड़ी लह, सातम धनवर्य । ४८२ ।
श्रीही विभवाय नमः ।
त्रिभुवन ईश्वर ही तुम्ही. और जीव हैं रंक ।
गुम ना पाहै औरको, ऐसा को युध बैंक । ४८३ ।
atो त्रिभुवनमगय नमः भव ।
४३५

मिचक्र विधान अष्टमी पूजा C- उत्तरोत्तर तिह लोकमें, दुर्लभ लन्धि कराय । तुम पद दुर्लभ कठिन है, महा भाग सो पाय । ४८४ । ओ ही त्रिजगदुर्लभाय नमः अर्प। चढवारी परणामसों, अभ्युदय पूरण पाय । भई अनन्त विशुद्धता, भये विशुद्ध अथाय । ४८५ । ओ ही अभ्युदयाय नमः अप । तीन लोक मंगल करण, दुखहारण सुखकार । हमको मंगल द्यो महा, पूजों वारम्बार । ४८६ । ओ ही त्रिजगन्मंगलोदयाय नमः अर्थ । आप धर्मके सामने, और धर्म लुप जाय । धर्म चक्र आयुध धरो, शत्रु नाश तव पाय । ४८७ । ओ ही धर्मचक्रायुधाय नमः अर्थ । सत्य शक्ति तुम ही सही, सत्य पराक्रम जोर । ४३६ . अष्टमो पूजा दुचक्र बधान P है प्रसिद्ध इस जगतमें, कर्म शत्रु शिरमोर । ४८८ । ओ ही सद्योजाताय नमः अयं । मंगलमय मंगल करण, तीन लोक विख्यात । सुमरण ध्यान सुकरत ही, सकल पाप नश जात ॥ ४८९ ॥ ओ ही त्रिलोकमंगलाय नमः अर्ष । द्रव्य भाव दऊ वेद विन, स्वातम रति सुख मान । पर आलिंगन रतिकरण, निरइक्षक भगवान ॥ ४९० ॥ आं ही अवेदाय नमः अर्थ घातिरहित स्वपर दया, निजानन्द रसलीन । सुखसों अवगाहन करें, सन्त चरण आधीन ॥ ४९१ ॥ औ ही अप्रतिघाताय नमः अर्ष। निजानन्द स्वैदेशमें, खंड खंड नहीं होय । पूरण अविनाशी सुखी, पूजत हूं भ्रम खोय ॥ ४९२ ॥ औ ही अछयाय नमः अर्ष । ४३७ Poud से मिडचक्र अएमी पूजा विधान ४३८ नि सु शुभ नहीं, और नाम विख्यात । कभू न जगमें जन्म फिर, सोई दृढ़ कहलात ॥ ४९३ ।। ओं ही महीयसे नमः अर्थ । जन्म मरणके कष्टस, सर्व लोक भयवंत । ताको नाश अभय करण, तुम्हें नमें जिय संत ॥ ४९४ ॥ औ ही अभयंकराय नमः अर्थ। ज्ञानानन्द स्व लक्षमी, भोगत हो निरखेद । महा भोग यातें भये, हैं स्वाधीन अखेद ॥ ४९५ ॥ ओ ही महाभोगाप नमः अर्थ। असाधारण असमान हो, सर्वोत्तम उतकृष्ट । परसों भिन्न अखिन्न हो, पायो पद अविनष्ट । ४९६ । ॐ ह्रीं निरूपममुग्यस्वरूपाय नमः । दश लक्षण शुभ धर्मक, राजप्सम्पदा भाग। नायक हो जिन धर्म के, पूज नमैं निहं योग । ४९७ । ४३८

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म सिद्धन अष्टमी विमान ४४० 558559EEEEEEEEEE ल्प नहीं भावमें, पूजत हों धरि चाय । ५०२ । । ओं ही मामायिक्नेि नमः अर्घ निजानन्द से लक्षमी, भोगत ग्लानि न होय । अतुल वीर्य परभावतें, परमादी नहीं होय । ५०३ । ओं ही निप्प्रमादाय नमः अपं । है अनादि संतान करि, कभी भयो नहीं आदि । नित्य शिवालय पूर्णता, वसै जगत अघ वादि ॥ ५०४ ॥ * ही पछताय नमः अर्घ । पर पदार्थ नहीं इष्ट हैं, स्वैपदमें लवलीन विस हरण मंगल करण, तुम पद मस्तक दीन ॥ ५०५ ॥ ओ ही परमभागय नमः अर्ग। नित्य शौच संतोप मय, पर पदार्थसों रोक। निश्चय सम्यक् भाय मय, है प्रधान यूं धोक ॥ ५०६ ॥ ४४० tी प्रधानाय नमः ।

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मिद्धचक्र
अमो
पत्रा
विधान
।
४४२
धारणाधीशाय नमः ।
रागादिक मल नाशिके, ध्यान मु धर्म लहाय ।
अचल रूप राजे सदा, बन्दं मन यच काय ।। ५१२ ।।
ॐदी धर्मध्याननिष्पाप नमः ।
निजानन्दमें मगन है, पर पद राग निवार
समदृष्टी राजत मदा, हम करा भव पार । १३ ।
श्री ही ममाधिगजाय नमः अप ।
वीतराग निर्विकल्प हैं, ज्ञान उदय निरदोस ।
समरस भाव परम सुखी, नमन मिटें दुख अंश । ५१४ ।
*ही म्हग्निममराभाय नमः ।
पक रूप विराजते, नय विकल्प नहिं टीर ।
वचन अगोचर शुद्धता, पाप विनाशो मोर । ५१५ ।
श्री एकीभाषनयम्याग नमः प्रध।
परम दिगम्बर मुनि मदा, मामी मुमिनाथ ।
5555555555555555555555555

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मिद्धचक्र विधान ४४६ क्रोध प्रकृति विनाशके, धरै क्षमा निज भाव । समरस स्वादसु लहत है, य, शुद्ध स्वभाव ॥ ५३० ।। ओ ही महाक्षमाय नमः । मोह रूप सन्ताप विन, शीतल महा स्वभाव । पूरण सुख आकुल नहीं, यन्दू मन पर गाय ॥ *ही महागीतलाय नमः अयं ।। ५३१ ।। मन इन्द्रियके क्षोभ विन, महा शांति मुग्वरूप । स्वपद रमण स्वभाव नित, में पन्दू विभूप ॥ *ही महागांताय नमः अर्थ ॥ ५३२ ॥ मन इन्द्रियको दमन कर, पायो ज्ञान अतीन्द्र । स्वाभायिक स्वशक्ति करे, वन्दू भये जितेन्द्र ॥ ही महोदयाय नमो अर्थ ॥ ५३३ ।। पर पदार्थको दश मजि, थ्याप निज पद माहिं पूजा 555555॥ महा तुष्ट सुबकार ।। ॐही निभ्रांताय नमी अघे ॥ ५३५ ॥ शांतिरूप निज शांति गुण, सो तुमहीम पाय । निज मन शांति सुभाव धर, पूजत हूं युग पाय । ओ ही प्रशानाय नमः अर्थ ।। ५३६ ॥ मुनि श्रावक हुँ धर्मके. तुम अधिपति शिवनाथ । भविजनको आनंद करि, तुम्हें नवाऊं माथ ॥ ओ ही धर्माध्यक्षाय नमः अर्मा ॥ ५३८ ॥ दया नीति घरताइयो, सुखी किये जगजीव । कल्पित राग ग्रसत नहीं, जानत मार्ग सदीव ।। ४४७ ।

सिद्धचक्र
अएर
पूजा
विधान
४४८
ॐ हीं दयाध्यताय नमः अर्थ ।। ५३८ ॥
केवल ब्रह्म स्वरूप हो, अन्तर वाह्य अदेह ।
ज्ञान ज्योति घन नमत हूं, मन वच तन धरि नेह ॥
ॐ हीं ब्रह्मयोनये नमो अर्थ ।। ५३६ ।।
स्वयं बुद्ध अविरुद्ध हो, स्वयं ज्ञान परकाश ।
स्वै परभाव दिखात हो, दीपक सम प्रतिभास ॥
ओ ही स्वयंयुद्धा नमो अर्थ ॥ ५४०॥
रागादिक मल नाशियो, महापवित्र सुखाय ।
शुद्ध स्वभाव धरै कर, सुरनर थुति न अघाय ॥
ओ ही पूतात्मने नमः अर्थ ॥ ५४१ ॥
वीतराग
संपूरण
उप रहित शुभ गुण महित, रह सदापग लाग ।
.
श्रद्धानता,
श्रृंगग।
४४८
श्रीही स्नानकार नमा अर्षी ॥ ५१२ ॥

अष्टमी पूजा पदनाम ११ ....5555555555555755फ माया मद आदिक हर, मय शुकशुस ता"। निर्मल भाव थको : जजू, होत पापकी हान ।। ही अमदनाचाय नमः । ॥ ३४३ ।। अतुल वीर्य जा ज्ञानमें, सूर्य समान प्रकाश । मोक्ष नाथ निज धर्म जुन, खगेश्वर्य विलास ॥ यही परमेश्वर्याय नमः अपं ॥ ५४४ ॥ मत्सर क्रोध न ईरपा, परमें ट्रेप सु भाव । सो तुम नाशो सहज ही, निंदित दुखित विभाव । ॐ ही बीतमत्मराय नमः अर्घ ।। ५४५ ॥ धरम भार सिर धारकर, समाधान परकाज । तुम सम श्रेष्ट न धर्म अरु, तारण तरण जिहाज । ओ ही धर्मपाय नमः अथ ॥ ५४६ ।। ४४६. २६ मिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान ४५० क्रोध कम जडसे नसो, भयो क्षोभ सब दूर । महा शांति सुखरूप हो, पूजत अघ सब चूर ओ ही अक्षोमाय नमः अर्थ ॥ ५४७ ।। इष्टमिष्ट चादर झरी, विद्युत विध कर खण्ड । जिप्णु महा कल्याण कर, शिवमग भाग प्रचण्ड । ओ ही महाविधिपुण्डाय नमः अप ॥ ५४८॥ अमृतमय तुम जन्म है, लोक तुष्टताकार । जन्मकल्याणक इन्द्र कर, क्षीर नीर कर धार । ओही अमृतोदयाय नमः 'अगं ॥ ५४६ ।। इन्द्री विषय मुविपहरण, काम पिशाच विडार। मूर्तीक शुभ मंत्र हो, देव जज हिन धार । श्री ही मंत्रमूर्तये नमः अपं ॥ ५५० ।। सोम्य दिशा परगट तनी, जानि विरोधी.जीय । + '11 सदान। पूजा अष्टमी पूजा .ទឹកកក៏5555555555ោះ។ ही नियंग्गीम्गमावाग नमोअप ॥ ५५१ ।। पगधीन इन्द्री विना, गग विरोध निवार । हो म्वाधीन न कर्णपर, स्वयं सिद्ध सुखकार । ओ ही स्वतंत्राय नमः अर्ष ।। ५५२ ।। ब्राह्मरूप नहीं बाघ तन, संभव ज्ञान स्वरूप । म्वयं प्रकाश विलास धर, राजत अमल अनूप । आँ ही नामयम्भवाय नमः अयं ।। ५५३ ।। आनंदधार सु मगन है, सब विकल्प दुख टार । पर आश्रित नहीं भाव है, पूजू आनंद धार । श्रोही महाप्रमन्नाग नमः अयं ॥ ५५४ ॥ परिपूरण गुण सीम है, सर्व शक्ति भण्डार । तुमसे मुगुण न शेष हैं, जो न होय सुखकार ।। -

सिद्धचक्र
अष्टमी
विधान
पूजा
४५२
ओ हों गुणांयुधये नमः अर्घ ।। ५५५ ॥
ग्रहण त्यागको भाव तज, शुभ वा अशुभ अभेद ।
व्याधिकार है वस्तुमें, तुमें नम निरखेद ॥
ओ ही पुन्यपापनिरोधकाय नमः अर्घ । ५५६ ।
सूक्षम रूप अलक्ष है, गणधर आदि अगम्य ।
आप गुप्त परमातमा, इन्द्रिय द्वार अरम्य ॥
ओ ही अहं महाअगम्यगक्ष्मरूपाय नमः अर्थ ।। ५५७ ।।
अन्तरगुण व आत्मरस, ताको पान करात ।
पर प्रवेश नहीं रंच है, केवल मन सु जात ॥
ॐ ही सुगुप्तात्मने नमः अर्घ ॥ ५५८ ।।
स्व कारक स्वं कर्णकर, स्व पद स्वं आधार ।
सिद्ध कियो के रस लियो, पूजत हैं हितकार ।
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४५२
श्री दी मिलान नमा अपं । ५५६.

:
55559
गिदार
अष्टमी
जपा
पिपान
१५3
निल्य उद विन अग्न हो, पुग्ण दुति घन आप ।
प्रहे न गह जाम शशि, सो हो हर सन्ताप ।
ही निमावाय नमः अप । ५६० ।
लियो अग्य लाभको, अचल भये सुखधाम ।
प्रज चं जे भावनों, पूरण होइ सत्र काम ॥
औदी महादकांग नमो भय । ५६१ ।
हे प्रगंस तिहुँ लोकमें, तुम पुरुषाय उपाय ।
पायो पम सु धामको, पूजों तिनके पाय ॥
ॐ महापागाय नमः । ५६२ ।
गणधगदि जे जगतपति, तथा सुरेन्द्र सुरीश ।
नुमको पूजन भक्तिकरि, चरण धरं निज शीश ॥
श्री ही जगपितामहाय नमः अर्ष । ५६३ ।
तुमहीसों भवि
सुख
विन दुख ही पाय ।
5555555555
४५३
लहे, तुम

홈 विधान अष्टमी पूजा आं ही असजाय नमः अर्थ। यथायोग्य पद थिर सदा, यथायोग्य निज लीन । अविनाशी अविकार है, नमै सन्त नित दीन ।। ५६९ ॥ ॐ हीं गदायोगाय नमः अर्य। स्वामृत रसको पान करि, भोगत हैं निज स्वाद । पर निमित्त चाह नहीं, करै न तिनको याद ।। ५७० ॥ ओ ही सदाभोगाय नमः अर्थे। निर उपाधि निज धर्ममें, सदा रह सुखकार । रत्नत्रयकी मूरती, अनागार आगार ॥ ५७१ ॥ ओ ही सदाकृतये नमः । रागद्वेप नहीं मूल है, है मध्यस्थ स्वभाव । ज्ञाता द्रष्टा जगनके, परसों नहीं लगाव ॥ ५७२ ॥ ओं ही परमौदासीनाय नमः अर्थे । ४५५ मिद्धचक्र अपर पूज विधान नादि अन्त विन बहत है, परम घार निरधार । अन्तर परत न एक छिन, निज सुख परमाधार ॥ ५७३ ॥ ओ ही शाश्वते नमः अर्थ । मूल देह आकृति रहै, हो नहिं अन्य प्रकार । सत्याशन इम नाम हैं, पूजू भक्ति लगार ॥ ५७४॥ ॐ हीं सत्पाशने नमः अर्थ । परम शांति सुखमय सदा, क्षोभ रहित तिस स्वाम । तीन काल प्रति शांति कर, तुम पद करूं प्रणाम ॥५७५॥ ॐ ही शांतिनायकाय नमः अर्थ । काल अनंतानंन करि, लगो जीव जगम हैं। आत्मज्ञान नहीं पाइयो. तुम पायो है ताहि ॥ ५७६ ॥ ओ ही अपूर्वविद्याप नमः अर्थ। यथाख्यात चारित्रको, जानो मानो भेद ।

अष्टमो पान 195555555555555555555555 आत्मज्ञान केवल यकी, पायो पद निरभेद ।। ५७७ ॥ ओं ही गोगनायकाय नमी अयं । पर गर्व हो, गजन शुद्ध स्वभाव । धर्ममूर्ति तुमको नमुं पाऊं मोक्ष उपाय ।। ५७८ ।। ओ ही धर्ममूनचे नमः अर्थ । म आत्म परदेशमें, अन्य मिलाप न होय । आकृति है निज धर्मकी, निज विभावको खोय ॥ ५७९ ॥ दी धमदहाय नमः । स्थामी योनिन आत्मके. अन्य सहाग न पाय। स्वयं मिद परगानमा. हम पर होउ महाय ॥५८०॥ प्रय गाय नमः । निज पुरपाम्म करि लियो, गोक्ष परम सुखकार । करना था सो करि चुके, तिष्ठो सुम्स आधार ॥ ५८१ ॥ .

। मिढचक्र अष्ट पूर विधान ४५८ ओं ह्रीं कृतकृत्याय नमो अर्थ असाधारण तुम गुण धरत, इन्द्रादिक नहीं पाय। लोकोत्तम बहु मान्य हो, वन्दं हूं युग पाय ॥ ५८२॥ ओं ही गुणात्मकाय नमो अर्घ । तुम गुण परम प्रकाश कर, तीन लोक विख्यात । सूर्य समान प्रताप धर, निरावरण उघरात ।। ५८३ ॥ ओं ही निरापरणगुणप्रकाशाय नमः अर्घ समय मात्र नहीं आदि हैं, वह अनादि अनन्त । तुम प्रवाह इस जगतमें, तुम्हें नमैं नित सन्त ॥५८४॥ ओ ही निनिमेषाय नमः अर्घ । योग द्वार विन करम रज, चढे न निज परदेश । ज्यों विन छिद्र न जल ग्रहै, नवका शुद्ध हमेश॥ ५८५॥ श्री ही निराधवाय नमो अर्ष । ४५८ पवनका अष्टमी पूजा विधान 555555555555559 परम ब्रह्म पद पाइयो, पूरण ज्ञान प्रकाश । तीन लोकके जीव सव, पूजे चरण निवास ॥ ५८६॥ ओ ही महानापरये नमः अर्य। दुग पर्थिक नय दोऊ, साधत वस्तु स्वरूप । गुण अनन्त अवरोध कर, कहत सरूप अनूप ॥ ५८७ ॥ ॐ हीं मुनयाय नमः अर्प। सूर्य समान प्रकाश कर, कर्म दुष्ट हनि सूर । शरण गही तुम चरणकी, करो ज्ञान दुति पूरि ।। ५८८ ॥ औ ही सूरये नमः अर्थ । तुम सम और न जगतमें सत्यारथ तत्त्वज्ञ । सम्परज्ञान प्रभावतें, हो अदोप सर्वज्ञ ॥ ५८९॥ औ ही वचनानाय नमो अर्ष । तीन लोक हितकार हो, शरणागति प्रतिपाल ।

अष्टमी पूजा विधान ४६० 19945555555555555 पनि मन आनन्द करि. वन्दं दीनदयाल ।। ५९० ॥ ही महामित्राय नमो अर्थ । समता सुबमें मगन हैं, राग द्वेप मक्लेश । ताको नाश सुखी भए, युग युग जयो जिनेश ॥ ५६१ ॥ ओं ही साम्यभाधारकजिनाय नमः अर्घ । निरावरण निज ज्ञानमें, संशय विभ्रम नाहिं। सम्यग्ज्ञान प्रकाशते, वस्तु प्रमाण दिखाय ॥ ५६२ ॥ ओं ही प्रयोपान्धाय नमः अप। एक रूप परकाश कर, दुविधि भाव विनशाय । पर निमित्त लयलेश नहीं, यन्, तिनके पाय ॥ ५६३ ॥ *दी निन्दाय नमो अर्थ। मुनि रिशेष मानक कहै, परमानम परमेश । सुगध्यापन निर्माण पद, पावै भधिफ हमेश ॥ ११ ॥ ४६० .

मिदनाम
अष्टम
पूजा
विधान
४६१
5555555555555555
ओ ही परमपये नमः अर्थ ।
पंच प्रकार शरीर विन, दीप्त रूप निजरूप ।
सुर मुनि मन रमणीय हैं, पृजत हूं शिवभूप ॥
ॐ ही अनंगाय नमः अयें । ५६५।
द्रय प्रकार बन्धन रहित, वन्दू मोक्ष सरूप ।
भविजन वन्ध विनाशकर, देहो मोक्ष अनूप ॥
ॐ ही निर्वाणाय नमः अर्घ । ५६६ ।
सुगुण रलकी राशके, आप महा भण्डार ।
अगम अथाह विराजते, बन्दू भाव विचार ॥
ओ ही सागराय नमः अर्घ । १६७ ।
मुनिजन ध्यावं भावयुत, महा मोक्षपद साध ।
सिद्ध भये में नमत हूं, चहूं संघ आराध ॥
ओही महासाधये नमो अर्थ । ५६८ ।
४६१

गिद्धपक्र:
अष्टमी
पूजा
विधान
जोति प्रतिभासमें, रागादिक मल नाहिं ।
विशद अनूपम लसत हो, दीत ज्योति शिव राह ॥
ओं ही विमलभाषाय नमो अप। 188 |
द्रव्यभाव मल नाश कर, शुद्ध निरञ्जन देव ।
निज आतममें रमत हो, आश्रय विन स्वयमेव ॥
ओं ही शुद्वात्मने नमः अर्थ । ६००।
शुद्ध अनन्त चतुष्ट गुण, धरत तथा शिवनाथ ।
श्रीधर नाम कहात हो, हरिहर नावत माथ ॥
*ही श्रीधराय नमः अर्घ । ६०१ ।
मरणादिक भयसे सदा, रक्षित है भगवान ।
स्वयं प्रकाश विलासमें, राजत सुखको खान ॥
ॐ हीं मरणभयनिवारणाय नमः अ । ६०२
राग द्वेष नहीं भाव, शुद्ध निरसन आप।
४६२

अष्टमी
मिदनक्रम
19555555555555555555555555
ज्योंके त्यों तुम थिर रहो, तनक न व्यापं पाप ॥
ॐही विमलाभाग नमः अध। ६०३ ।
पार हो, पहुंचे शिवपद तीर ।
भाव सहित तिन नमत हूं, लहून फुनि भव पीर ।।
*ही उद्धाराय नमः अयं । ६०४।
अग्निदेव वा अग्नि दिश, ताके देव विशेष ।
ध्यावत है तुम चरणयुग, इन्द्रादिक सुर शेप ।।
ॐ हीं अमिदेवाय नमः अप । ६०५।
विषय कपाय न रंच हे, निरावरण निरमोह ।
इन्द्री मनको नमन कर, बन्दू सुन्दर सोह ॥
ही मोह विजयसंगमधारकजिनाय नमः अर्घ । ६०६ ।
मोहरूप कल्याण कर, सुख-सागरके पार ।
महादेव स्वशक्ति धर, विया तिय भरतार ।
४६३

सिद्धना
अष्ट
विधान
४६४
धुर
ॐ ही शिपाय नमः अर्थ । ६०७ ।
पुष्प भेट धर जजत सुर, निजकर अंजुलि जोड़॥
कमलापति कर कमलमें, धरै लक्ष्मी होड़॥
ॐ ह्रीं पुप्पांजलये नमः अर्थ । ६०८ ।
पूरण ज्ञानानंद मय, अजर अमर अमलान ।
अविनाशी निखिल पद, अधिकारी सब मान ।
ॐ ह्रीं शिवगुणाय नमः अर्थ । ६०६
रोग शोक भय आदि विन, राजत नित आनंद ।
खेद रहित रति अरति विन, विकसत पूरणचन्द्र ॥
ॐही परमोत्माहजिनाय नमः अर्थ । ६१० ।
जे गुण शक्ति अनंत हैं, ते सव ज्ञान मझार ।
एक मिष्ट आकृति विविध, सोहत हैं अविकार ॥
४६४

बटमा र सन . परमप्रति आभार । शाम 77 रामानमा. समभर मुमहार॥ tareeर नमः ।१२। गरी. मम मन्नार अन्लोर। in माग्यन, भावननको परपोर॥ १३ कागल युग में, समारणले. आदि। कारिक निक करा. तुम गुग मा अनुवाद ॥११॥ 1595555557555555555555555555 2n नाम मा है. भारी भार कमाय । सुगात गोपियन मा. निज नीना दगाव ॥१५॥ *TR: पर। मान समाधि पर.गिया गोड निधार ।

सिद्धचक्र विधान अष्टमी पूजा र हितकर उपदेश है, निश्चय वा व्यवहार ॥६१६॥ ॐ ही मोहतिमिरविनासकाय (मानपतये) नमः अर्थ । वीतराग सर्वज्ञ हैं, 'उपदेशक हितकार । सत्यारथ परमाण कर, अन्य सुति दातार ॥६१७१ औ ही मुमतये नमः अर्प। मायाचार न शल्य है, शुद्ध सरल परिणाम । ज्ञानानन्द स्वलक्षमी, भोगत हैं अभिराम ।६१८॥ ॐ हीं भद्राय नमः अर्थ शील स्वभाव सु जन्म लै, अन्त समय निरवाण भविजन आनन्दकार हैं, सर्व कलुषता हान ॥६१६॥ ओ ही शांतिजिनाय नमः अर्प । धरम रुप अवतार हो, लोक पापको भार । मृतक रथल पाडयो. मलम कियो m .... ५६६ अटर्म मानावर जनुकी. निमित पर नहीं जोर । किलर नमी नाच प्रो. पूनं हं कर जोर ।३२१ अनार नमः । गीन चोर, श्रानंदी. अंट जन्म गुम होन। पग मोर हामार हो. पवन नहीं कुमांत ॥२२॥ FEER 'म मुवी नम पार हो. पर आनंद अगर । गमा प्रजा भावगी. मोक्ष नामी गय ॥१२॥ मिनन्द नारनमा । आदि पकांनी. ना किया जिन माहिं। मीना, और ना1ि8 नमः । ४१७ ।

सिह अष्टम पूजा विधान ४६८ EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE- भ वेजन मधुकर कमल हो, धरत सुगन्ध अपार । तीन लोकमें विस्तरी, सुयश नामकी धार ।६२५॥ ओं ही पचप्रभाय नमः अर्ष । पारस लोहा हेम करि, तुम भव बंध निवार । मोक्ष हेतु तुम श्रेष्ठ गुण, धारत हो हितकार ॥६२६॥ ॐ ही मुपापि नमः अर्थ । तीन लोक आताप हर, मुनि मन मोदन चन्द । लोक प्रिय अवतार हो, पाऊं सुख तुम वन्द ॥६२७॥ ॐ ही चन्द्रप्रभाय नमः अर्थ। मन मोहन सोहन महा, धारै रूप अनूप । दरशत मन आनंद हो, पायो स्वे रस कृप ॥६२८। ओ हों पुष्पदंताप नमः अर्घ भव भव दाह निपार फर, शीतल भए जिनेश। ४६८ अष्टमी पूजा विमान ११ 6555555555555555555555 मानो अमृत सींचियो, पूजत सदा सुरेश ॥६२६। श्री ही गीतलनाथाय नमः अर्ष । तीर्थकर श्रेयांश हम, देहो श्री शुभ भाग । श्री सु अनंत चतुष्ट है, और सकल दुरभाग ॥६३०॥ ओ ही श्रेयांगनाथाय नमः अर्य । प्रस नाड़ी या लोकमें, तुम ही पूज्य प्रधान । तुमको पूजत भावसों, पाऊसुख निरवाण ॥६३१॥ श्री ही चागपूज्याय नमः । अन्य भाव मल रहित हैं, महा मुनिनके नाथ । इन्द्रादिक पूजत सदा, नम पदांबुज माथ ॥६३२॥ ओ ही विमलनाथाय नमः अप । जाको पार न पाइयो, गणधर और सुरेश । "भनानको गुणकार हो, नम्पदाबुन माय ।" ऐगा "क" प्रनिमें पाठ है। ४६६ सिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान ४७० थकित रहे असमर्थ करि, प्रणमें सन्त हमेश ६३३॥ ॐ ही अनंतनाथाय नमः अपं । अनागार आगारके, उद्धारक जिनराज धर्मनाथ प्रणमं सदा, पाऊ शिवसुख साज ।६३४॥ ओं ही धर्मनाथाय नमः अर्य। शांति रूप पर शांति कर, कर्म दाह विनिवार शांति हेत वन्दू सदा, पाऊ भवदधि पार ॥६३५॥ ओ ही भांविनाथाय नमः । क्षुद्र वीर्य सब जीवके, रक्षक हैं तीयेंश । शरणागति प्रतिपाल कर, ध्या सदा सुरेश ॥६३६॥ ओ ही कुन्धुनाथाय नमः अर्प । पूजनीक सब जगतके, मंगलकारक देव । पूजत है हम भापसो, विनशे अप स्वयमेव ॥६३७॥ ४६०

19Y
मिदनक्रम
নিন
औहीं अरहनाथाय नमः अर्थ ।
मोह काम भट जीतियो, जिन जीतो सब लोक ।
लोकोत्तम जिनराजके, नम चरण दे धोक ।६३८॥
ओ ही महिनाधाय नमः अघ ।
पंच पापको त्यागकरि, भव्य जीव आनन्द ।
भये जासु उपदेशतें, पूजत हूं. पद वृन्द ॥६३६।
ओ ही मुनिमुत्रताय नमः अर्घ ।
सुरनर मुनि नित नमन करि, जान धरम अवतार ।
तिनको पुजं भाव युत, लहूं भवार्णव पार ६४०।
ओ ही नमिनाथाय नमः अर्घ ।
नेम धर्ममें नित रमें, धर्मधुरा भगवान।
धर्मचक्र जगमें. फिरे, पहुंचावे. शिव थान ॥६४१।
ओ ही नेमिनाथाय नमः अर्थ ।

मियम अष्टम पूजा विधान ४७२ शरणागति निज पास दो, पाप फांस दुख नाश । तिसको खेदो मूलसों, देहु मुकत गति वास ।६४२॥ ओं ही पार्श्वनाथाय नमः अध। वृद्ध भावतें उच्चपद, लोक शिखर आरूढ़। केवल लक्षमी पर्वता, भई सु अन्तर गुढ़ ॥ ६४३ ॥ ओं ही पर्द्धमानाय नमः अर्थ । अतुल वीर्य तन धरत है, अतुल वीर्य मन बीच । कामिन वश नहीं रंच भी, जैसे जल विच मीच ॥ ६४४ ॥ ॐ ही महाराय नमः अर्थ । मोह सुभटकू पटकियो, तीन लोक परशंस। श्रेष्ठ पुरुष तुम जगतम, कियो कर्म विध्वंस ॥ ६४५॥ औ ही गुगीराय नमो अर्ष। मिथ्या-मोह निवार करि, महा सुमति भण्डार । शुभ मारण वरसाइया, शुभ अम अशुभ विचार ॥ ६१६ ॥ ५७२ विधान ४७३ अर्थ औ ही सनातये नमः अपे । निज आश्रय निर्विन नित, स्व लक्ष्मी भण्डार । चरणाम्बुज नित नमत हम, पुष्पांजलि शुभ धार ॥ ६४७ ।। औ ही महापद्माय नमः अ । हो देवाधिदेव तुम, नमत देव चउ भेद । धरो अनन्त चतुष्टपद, परमानन्द अभेव ॥ ६४८ ॥ औ ही गुरदेवाय नमः निरावर्ण आभास है, ज्या विन पटल दिनेश । लोकालोक प्रकाश करि, सुदर प्रभा जिनेश । ६४६ । श्री दी सुप्रभाग नगः अर्थ । आतमीक निज गुण लिये, दीप्ति सरूप अनूप । स्वयं जोति परकाशमय, वंदत हं शिवभूप । ६५० । आं ही स्वयंप्रभाग नमः अषं । स्से शक्की से करण है, साधन वाह्य अनेक । P 5S5E...., ৪৩

अष्टमी
सिद्धचक्र.
पूजा
विधान
४७४
मोह सुभट क्षय करनको, आयुधराशि विवेक । ६५१ ।
ॐ ही सर्वायुधाय नमः अर्थ ।
जय जय सुर धुनि करत हैं, तथा विजय निधि देव ।
तुम पद जे नर नमत हैं, पावै सुख स्वयमेव । ५२ ।
ॐ ही जयदेवाय नमः अथ ।
तुम सम प्रभा न औरमें, घरो ज्ञान परकाश ।
नाथ प्रभा जगमें भ्रमत, नमत मोहतम नाश । ५३ ।
ओ ही प्रभादेवाय नमः अर्घ।
रक्षक हो पट कायके, दया सिन्धु भगवान ।
शशि सम जिय आल्हाद करि, पूजनीक धरि ध्यान । ५४ ।
ओं ही उदकदेवाय नमः अर्थ ।
समाधान सबके करें, द्वादश सभा मझार।
सर्व अर्थ परकाश कर, दिव्य ध्वनि सुखकार । ५५ ।
* प्रश्नफीतये नमः अर्घ।
४७४

अष्टग
555555555555555
काह विधि बाधा नहीं, कबहुं नहीं व्यय होय ।
उन्नति रूप विराजते, जयवन्तो जग सोय । ५६ ।
ी ही जगरूप जिनाग जगाय नमः अब ।
केवलज्ञान :स्वभावमें, लोक प्रय इक भाग।
पूरणताको पाइयो, छांडि सकल अनुरग । ५७ ।
ओ दी पूर्ण युद्धाय नमः अर्ध ।
पर आलिंगन भाव तज, इच्छा लश विडार ।
निज सन्तोप सुखी सदा, पर सम्बन्ध निवार । ५८ ।
ॐही निजानंदगंतुष्जिनाग (नि:मंगाय) नमः अप।
मोहादिक मल नाशकर, अतिशय करि अमलान ।
विमल जिनेश्वर में नमं, तीन लोक परधान । ५९ ।
आंनी विमलाय नगा अघ ।
स्वेपदमें नित रमत हैं, कभी न आरति होय ।
अतुल वीर्य विधि जीतियो, नमूं जोर कर दोय । ६० ।

मिरचक्र
अष्टमी
पूजा
विधान
४७८
पुरुषोत्तम परधान हो, परम निजानन्द धाम ।
चक्रपती हरिवल नमें, मैं पूजं निष्काम । ६७० ।
ॐ ही महापुरुषदेवाय नमः अर्थ ।
शुभ विधि सव आचरण हैं, सर्व जीव हितकार ।
श्रेष्ठ बुद्ध अति शुद्ध हैं, नमूं तजो भवपार । ६७१ ।
औ ही मविधये नमो अर्ण ।
है प्रमाण करि सिद्ध ज, ते हैं बुद्धि प्रमाण ।
सो विशुद्धमय रूप हैं, संशय तमको भान । ७२ ।
ओं ही प्रज्ञाप्रमिताय नमः अप ।
समय प्रमाण न मित तनी, कभी अंत नहीं होय ।
अविनाशी थिर पद धरै, मैं प्रणम हूं सोय । ७३ ।
श्री ही अव्ययाय नमः अर्थ।
प्रतिपालक जगदीश हैं, सर्व मान परमान ।।
अधिक शिरोमणि लोकगरु, जत नित कल्याण । ७४ ।
.
४७८

४७६
प्रभू, धर्म मार्गकी लीक ।
शुद्ध मर्यादा वन्ध प्रति, करण चलावन ठीक । ७५ ।
ओ ही धर्मसारथये नमः अप ।
शिव मारग दिखलाय कर, भविजन कियो उद्वार ।
धर्म
सुयश विस्तार कर, वतलायो शुभ सार । ७६ ।
ओ हा शिवकीर्तिजिनाय नमः अर्थ ।
मोह अंध हन सूर्य हो, जगदीश्वर शिवनाथ ।
मोक्षमार्ग परकाश कर, नमूं जोर जुग हाथ । ७७ ।
ओ ही मोहांधकारविनाशकजिनाय (विश्वकर्माय) नमः अर्घ ।
मन इन्द्री व्यापार विन, भाव रूप विध्वंश ।
ज्ञान अतीन्द्रिय धरत हो, नमत नशे अघवंश । ७८ ।
ओं ही अतीन्द्रियज्ञानरूपजिनाय (अनक्षाय) नमः अघ ।
पर उपदेश परोक्ष विन, साक्षात परतक्ष ।

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रथा
HEHREFHKihi FREEEE...
आत्महालक प, धारे हान अक्ष। ६.१२ ।
सह महाशिनापजामापाय नमः ।
यापक हो निहुं लोकने, ज्ञान ज्योति मर टोर
गुमशे पूजन भारसों, पाझं भवधि और । ८ ।
ओहो विशाय नमः ।
इन्द्रादिक र पृय हो, मुनिजन प्यान धराय ।
तीन लोक नायक प्रभ, हमपर होउ सहाय । ८१ ।
ॐरी विश्वनारकाय नमः अध।
तुम देश्नके देव हो, महादेव है नाम ।
दिन ममल मुद्धामा, तुम पद कर प्रणाम । ८२
काही दिगम्य नमः ।
मावि कुमती कहैं, करो भित्र विश्राम ।
Rो सोना, राउन हो शिश्याम । ८३ ।

मिदचक्र
विधान
४८१
अष्टम
5. 1995
हितकारी अति मिष्ट हैं, अर्थ सहित गम्भीर ।
प्रिय वाणी कर पोखते, द्वादश सभा सु तीर । ८४ ।
ओं ही मिष्टदिव्यध्वनिजिनाय (निरारंकाय) नमः अघ ।
भवसागरके पार हो, सुखसागर गलतान ।
भव्यजीव पूजत चरन, पावै पद निरवाण ॥
ॐ ही भवांताय नमः अर्थ । ८५ ।
नहीं चलाचल भाव हैं, पाप कलाप न लेश ।
दृढ़ परिणत स्वे आत्मरस, पूजू श्री मुक्तेश ॥
ॐ ही द्रवताय नमः अघ । ८६ ।।
असंख्यात नय भेद हैं, यथायोग्य वच द्वार ।
तिन सवको जानो सुविध, महा निपुण मति धार ॥
आं ही नियुक्तिज्ञानधारकजिनाय (नियोक्ताज्ञाय) नमः अर्थ । ८७ ।
क्रोधादिक सु उपाधि हैं, आत्म विभाव कराय ।

-
अष्टमो
पूजा
বিখান।
४८२
*451548EREFERENRELHI
तिनको त्याग विशुद्ध पद, पायो पूजू पाय ॥
ओहीं निफरापाप नमः अर्थ । ८८॥
ज्यों शशि किरण उद्योत है, पूरण प्रभा प्रकाश ।
कलाधार साह सु इम, पूजत अघ तम नाश ॥
ओ हो
पूर्णकलाधराय नमः अय। ८६ ।
जन्म मरणको आदि ले, जगमें क्लश महान ।
तिसके हंता हो प्रभू, भोगत सुख निर्वाण ॥
ॐही विसशहननाय नमः अघ । ६० ।
ध्रुव स्वरूप थिर हैं सदा, कभी अन्त नहीं होय ।
अव्यायाध विराजते, पर सहायको खोय ॥
दीधीप्यरुपजिनाय नमो अर्थ । ६६१।
व्पप उत्पाद मुभाव हैं, ताको गौण कराय।
अपल अनन्न स्वभारमें, तीन लोक सुम्पदाय॥
प्रनालभारामजिनाय (अपंगाय) नमो अर्ण ।।
555555555555555

अष्टम
सिद्धचक्र
पूजा
विधान
१४८३
55555मऊमऊमऊ
स्व ज्ञानादि चतुः५२,
सोहत हैं शुभ चिह्न करि, भवि आनंद कराय॥
ॐ हीं वत्सलांछनाग नमः अर्ब । ६३ ।
धर्म रीति परगट कियो, युगकी आदि मझार ।
भविजन पोपे सुख सहित, आदि धर्म अवतार ॥
औ ही ब्रहमणे नमः अर्ष । ६४ ।
चतुरानन परसिद्ध हैं, दर्श होय चहुं ओर ।
चउ अनुयोग वखानते, सब दुख नासौ मोर ॥
ओ ही चतुर्मुखाय नमः अर्घ । ६५ ।
जगत जीव कल्याण कर, धर्म मर्याद वखान ।
ब्रह्म विष्णु भगवान हो, महामुनी सब मान ।
ओं दी जगतजीयकल्याणकारणजिनाय (धात्र) नमः अर्ब । ६६ ।
प्रजापति प्रतिपाल कर, ब्रह्मा विधि करतार ।
मन्मथ इन्द्री वश करन, चन्दू सुख आधार ।
४८

सिगा
45555555555
अष्टमी
पूजा
रिधान
४८४
SHARESHEHREERSHISHERE
श्री ही रिधान नमो ॥६७ .
तीन लोककी लक्षमी, तुम चरणाम्बुज यास ।
धीपति श्रीधर नाम शुभ, दिव्यासन सुखरास ॥
ओं ही कमसामनाय नमः अर्य। ६८
बहुरि न जगमें भ्रमण है, पंचम गतिमें वास ।
नित्य अमरता पाइयो, जरा मृत्युको नाश ।।
ही अजन्मिने नमः अपं । ६६ ।
पांच काय पुद्गलमई, तामें एक न होय ।
केवल आत्म प्रदेश ही, तिप्ठत हैं दुख खोय ॥
ओ हों आत्मभुवे नमः अप। ७०० ॥
लोक शिवर मुग्यसो रहैं, ये ही ' ता जान ।
भारत हैं तिहं लोरम, अधिक प्रम परधान ॥
प्रारी लोमिनिवामिनी मंगाय) नमः अप ! ७.१

विधान ४८५ अष्टमी पूजा 卐55555SHASTRIES सूरज शाश प्रतिभास ॥ ७०२ ॥ आं ही मुरजलाय नमः अघ । प्रजापाल हित धार उर, शुभ मारग वरताय । सत्यारथ ब्रह्मा कहें, तुमरे वन्दू पाय ।। ७०३ ॥ ओ दी प्रजापतये नमः अघ । गर्भ समय पट्मास ही, प्रथम इन्द्र होय । रत्नवृष्टि नित करत हैं, उत्तम गर्भ कहाय ॥ ७०४ ॥ ॐ हीं हिरण्यगर्भाय नमः अयं । तुम ही चार अनुयोगके, अंग कहे मुनिराज । तुमसों पूरण श्रुत सही, अंतर मंगल काज ॥ ७०५ ॥ ओ ही वेदांगाग नमः अर्घ । तुम उपदेश थकी कहें, बादशांग गणराज । पूरण ज्ञान तुम्ही धरो, प्रनमू में शिवकाज ॥ ७०६ ॥ ४८५ मिपा अटमो पूजा विधान अप' ४८६ ET99999RSERIEEEEEEE लाही पूर्णवेदज्ञाप (वेदज्ञानायो नमः अर्थ पार भये भवसिंधुके, तथा सुवर्ण समान । उत्तम निर्मल थुति धरै. नमत कर्ममल हान ॥ ७०७ ॥ ही भरसिंधुपारगाय नमः सुखाभास पर निमित्ततें, पर उपाधित होत । खतः सुभाव धरो सही. सत्यानंद उद्योत ॥ ७०८ ॥ श्री ही मरपानंदाय नमः अर्घ । मोहादिक परवल महा, सा इसको तुम जीत । औरनकी गिनती कहां, तिटो सदा अभीत ॥ ७०६ ॥ ओं ही अजपाय नमो अषं। दिव्य रनमय ज्योति है, अमिन अकंप अडोल । मनोटिन फलदाय हो, गजन अक्षय अमोल ॥७१०॥ ४८६ गिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान ४८७ देह धार जीवन मुक्त, परमातम भगवान । सूर्य समान सुदीप्त धर, महा पोश्वर जान ॥ ७११ ॥ ॐ ही जीवनमुक्तजिनाय (हंसजाताय) नमः अर्थ स्व भय आदिकसे परे, पर भय आदि निवार । पर उपाधि विन नित सुखी, वन्दू भाव समार ॥७१२ ॥ ॐ हीं पातानंदाय नमो अर्म । ईश्वर हो तिहुँ लोकके, परम पुरुप परधान । ज्ञानानन्द स्वलक्ष्मी, भोगत नित अमलान ॥ ७१३ ॥ ॐ ही विष्णवे नमः अर्थ। रत्नत्रय पुरुषार्थ करि, हो प्रसिद्ध जयवंत । कर्मशत्रुको क्षय कियो, शीश नमें नित सन्त ॥७१४ ॥ ओं ह्रीं त्रिविक्रमाय नमः अ । सूरज हो शिवराहके, कर्म ४८७ दलन वलि

5. मग १ .
Fire पर जि. प4
WE ARE , नगर नभा र ! 515 !!
HESHARIRAMANARRihiny...
सिज प्रोदणे सरनो सन।
गरदिनिवान 51 ॥
रा:
व RTER, ITनम भारक।

'प्रधान १८ नमक 15:555555 (उगवतार) नमः पर। मुानमन कुमुदिन मोदकर. भव नंतार विनाश । पृरण चन्द्र त्रिलोकमें. पूरण प्रभा प्रकारा ।। ७२० ॥ ओ ही हरिमाय सांगाय नमो अर्म । दिनकर मम परकार कर. ही देवनके देव । ब्रह्मा विष्णु कहात हो. शशि नम दुनि स्वयमेर ।। ७२१ ॥ ओ ही दव नमी म्वयं विभय हो धनी. स्वयं ज्योति पकाया। म्वयं ज्ञान हग चीय सुभाष चिलाम ॥२॥ "ही परंभुवे नमः । धर्म भाग्यर धारिणी. हो जिनंन्त्र भगवान। नमको प्रजों भावमी. पाऊं पद निरांग ॥१॥ मोदी विशंभगर नमः । भ35555555: सुख, स्वयं सिद्धचक्र अष्ट विधान ४६० असुर काम अर हास्य इन, आदि कियो विध्वंश । महा श्रेष्ठ तुमको नमू, रहे न अघको अंश ॥ ७२४ ॥ ओ ही कामादिअमरपंसिने नमः अर्घ । सुधाधार यो अमरपद, धर्म फूलकी वेल । शुभ मति गोपिन संगमें, हमें राख निज गेल ॥ ७२५ ॥ ओ ही माधवाय नमः अप। विषय कपाय स्व वश करी, वलि वश कियो जु राम । महा वली परसिद्ध हो, तुम पद करूँ प्रणाम ॥ ७२६ ॥ ओ ही पलिवन्धनाय नमः अर्थ । तीन लोक भगवान हो, स्वै परके हितकार । सुरनर पशु पूजत सदा, भक्ति भाव उर धार ॥ ७२७ ॥ ॐ अधोक्षजाप नमः अयं । हितमित मिष्ट प्रिय वचन, अमृत सम सुखदाय ।

मिद्धनक अष्टमी जपा विधान धर्म मोक्ष परगट करन, बन्दू तिनके पाय ॥७२८ ।। ॐही हिनमितप्रियवचन जिनाग (मधये) नमः अर्थ । निज लीलामें मगन हैं, सांचा कृष्ण सु नाम । तीन खण्ड तिहुं लोकके, नाथ करू' परणाम ।। ७२६ ॥ औही केशवाय नमः अघ। सूके तृण सम जगतकी, विभव जान करवास । धरे सरलता जोगमें, कर पापको नाश ॥ ७३०॥ आँ दी विष्टरश्रवसे नमः अर्घ श्री कहिये आतम विभव, ताकरि हो शुभ नीक । सोहत सुन्दर बदन करि, सज्जन चित रमणीक ॥ ७३१ ॥ ओ दी श्रीवत्सलांछनाय नमः अप । सर्वोत्तम अतिश्रेष्ठ हैं, जिन सन्मति थुति योग । धर्म मोक्ष मारग कहें, पूजत सजन लोग ।। ७३२ ।। ।

अपनी
पूजा
पिन
.ޕީ.ގެވިޖް،3] 515.45 ގެ ޑޭއޯ.މާފު :..ބާޣީ ޤޤީ
* भारत
विनाशी शिकार है. नहीं बिग निज भार ।
पर मुसाभप रहत है, में पूर्व पर वाच ।। ७३३ ।।
ओ अन्नाय नमः ।
नाशो लौकिक यामना, निर इक्षक योगीश ।
नारगार न मन पसे, चंदन हूं लोकी ॥ ७३४ ॥
नासानाय नमो ।
मारक लोकालोरमें, विष्णुरुप भगवान ।
धर्मरूप ना लह लहै, पूजत हूं पर ध्यान ॥ ७३५ ॥
ओहो यिनाय नमः ।
धर्म पा. मन्मुर नाले, मिपानति रिपुधात ।
नर लोक गपक प्रभ, पुजन हूँ दिनगत ॥ ३६॥

तीन विधान " Ir:5555 Uष्ट अति, जन्म धर्म अवतार । लोककी लक्षमी, हे एकत्र उदार ॥ ७३७ । ओ ही पद्यनाभाय नमः अर्घ । मुनिजन आदर जोग हो, लोक सराहन योग । सुरनर पशु आनंद कर, सुभग निजातम भोग ॥ ७३८ ।। ओ ही जनार्दनाय नमः अर्थ। सब देवनके देव हो, महादेव विख्यात । ज्ञानामृत सुखसों खिर, पीवत भवि सुख पात ॥ ७३६ ॥ ॐ ही श्रीकण्टाय नमो अर्थ। पाप पुंजका नाश करि, धर्म रीति प्रगटाय । तीन लोकके अधिपती, हमपर दया कराय ॥ ७४०॥ ओ दी त्रिलोकाधिपशंकराय नमः अर्थ । स्वयं व्यापि निज ज्ञान करि, स्वयं प्रकाश अनूप ।

अष्टमी विधान SHASHTRIEFITHERSSFERSHISHETay.... स्वयं भाव परमातमा, व, स्वयं सरूप ॥ ७४१ ॥ ओं ही सयंप्रभवे नमः अर्थ। सव देवनके देव हो, महादेव है नाम । स्वपर सुगंधित रुप हो, तुम पद करप्रणाम ॥ ७४२ ॥ ओं ही लोकपालाय नमः अर्य। धर्मध्वजा जग फरहरे, सब जग माने आन । सब जग शीश नमें चरण, सब जगको सुखदान ॥ ७४३ ॥ ॐ ही घृषभफेलवे नमः अर्थ । जन्म जरा मृत जीतिक, निश्चल अव्यय रूप । सुखसों राजत नित्य हो, वन्दू हूं शिवभूप ॥ ७४४ ओं ही शिवरूपमहामृत्युंजयाय नमः अर्थ । सब इन्द्री मन जीतिके, करि दीनो तुम व्यर्थ । स्वयं ज्ञान इन्द्री जग्यो, नमं सदा शिव अर्थ । ७१५ । ४६४

सिचक्र
विधान
ॐही विरूपाक्षाय नमः ।
सुन्दर रूप मनोज है, मुनिजन मन वशकार ।
असाधारण शुभ तन लगे, केवलज्ञान मझार । ७४६ ।
ओ ह्रीं कामदेवाय नमः अर्थ
सम्यग्दर्शन ज्ञान अम, चारित एक सरूप ।
धर्म मार्ग दरशात है, लोकित रूप अनूप । ७४७ ।
ओ ही त्रिलोचनाय नमः अर्थ ।
निजानन्द स्व लक्ष्मी, ताके हो भरतार ।
शिव कामिन नित भोगते, परम रूप सुखकार । ७४८ ।
ओं ह्रीं उमापतये नमो अब ।
जे अज्ञानी जीव हैं, नित प्रति बोध करान ।
रक्षक हो फ्ट कायके, तुम सम कोन महान । ७१६ ।
ॐ हीं पशुपतये नमो अर्घ ।

मिद्धक
अष्टमो
पूजा.
रिधान
रमण भाव निज शक्तिसो, धरै तथा दुति काम ।
कामदेव तुम नाम हैं, महाशक्ति बल धाम । ७५० ॥
ओं हो सम्परारये नमो अर्थ ।
कामदाहको दम कियो, ज्यों अगनी जलधार ।
खें आतम आचरण नित, महाशील श्रिय सार । ७५१ ।
ॐ ही त्रिपुरांनकाय नमो अर्ध ।
स्यै सन्मति शुभ नारसो, मिले रले अरधांग।
ईश्वर हो परमातमा, तुम्हें नमूं सर्वांग । ७५२ ।
ओ ही अर्द्धनारीधराय नमः अप।
नहीं चिगे उपयोगसे, महा कठिन परिणाम ।
महावीर्य धारक नमू, तुमको आठो जाम । ७५३ ।
*ही रुद्राय नमः अर्थ ।
गुण पर्याय अनन्त युत, वस्तु स्वयं परदेश।

विधान अष्टमी पूजा កងកើត។។។។។។។ हो, स्वयं सुभाव विशेष । ७५४ । ही भावाय नमः अप। सुक्षम गुप्त स्वगुण धरै. महा शुद्धता धार । चार ज्ञान घर नहीं लखै, मैं पूजू सुखकार ॥ ७५५॥ ॐही गर्भकल्याणकजिनाय नमः अर्ण। शिव तिय संग सदा रमें, काल अनन्त न और । अविनाशी अविकार हो, महादेव शिरमौर ॥ ७५६ ॥ औही सदाशिवाय नमः अर्ग। जग्त कार्य तुमसो सधे, सब तुमरे आधीन । सबके तुम सरदार हो, आप धनी जगदीन ॥ ७५७ ।। ओं ही जगत्कर्षे नमः अर्थ। महा घोर अंधियार है, मिथ्या मोह कहाय । ३२ ४६७ मिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान जगमें शिव गग लुप्त था, ताको तुम दरशाय ॥७५८ ॥ औ ही अन्धकारांतकाय नमः अर्प। सन्तति पक्ष जुदी नहीं, नहीं आदि नहीं अन्त । सदा काल विन काल तुम, राजत हो जयवन्त ।। ५५९ ॥ ओ ही अनादिनिधनाय नमः अर्थ । तीन लोक आराध्य हो, महा यज्ञको ठाग । तुगको पूजत पाइये, महा मोक्षसुख पाम ।। ८६०॥ ॐ हीं हराय नमः अर्घ । महा सुभट गुणराम हो, मेवत हैं तिहुँ लोक । शरणागति प्रतिपाल फर. चरणाम्बुज , धोक ॥ ७॥१॥ ओ ही महासेनाय नमः अर्ध । गणघरादि मेवें चरण, महा गणपती नाम । पार को भर्मिधुतें. मंगलकर सुख धाम ॥ ७६२ । 1-1-1-1-1-1-1-1

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与主
量。
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由

परमी धान 5555555555555 अतुल प्रभा धारो महा, तुम पद करूं प्रणाम ॥ ७७१ ॥ श्रीदी निषगानवे नमः । तुग अजन्म विन मृत्यु हो. मदा रहो अविकार । ज्यों के त्यों मणि दीप मम, पूजत हूं मन चार ॥ ७७२॥ औ ही अजरअमरजिनाय (अनुत्पादाग) नमः पा । संस्कारादि स्वगुण माहित. तिन करि हो आराध्य । तुमको बन्दो मायाँ, मिटे मकल दुग्न व्याध्य ।। ७७३ ॥ पोही हिजागणाय नमः । निज आतम स्वै ज्ञान है, ताम झवि परतीन । पर पद मोहै अमचिता, पाई अक्षय जीन ।। ७७५॥ ॐ ही मुधारोनये (अमृगाय) नमः अर्प जन्म मरणको आदि लै, सकल रोगको नाश । व्य ओपधी तुम घर, अगर करन मुखराम ।। ७७५ ॥ १ 107 55555 बटमी धानी पानव मनार, भवन भोग हिरन उहामिद्ध महाप नः १८१५!! पमान का मय टीक, मोसरी दिनराशे लोक । निद्ध। च गुगनन र "नः ॥ ८१६॥ HTRA , नाका बना स्वरमेव । मिद्धः । ८१७ । होनसा नो अब मन व कार जोग परिदार. कर्मवर्गणा नाहि लगार । मिद।८१८ ओहो गिराय नमः । र अनुरोग कियो उपदेशा, भव्य जीव मुग्न लड्न हा । in मन साप, भर भाने मपनिदाय ।।। मनाय नमः । का ५६ टन र पा मोर । मि: ८२० i555555555555 21.

---- अष्टमी 3599355552 हो समाधिमें नि..चलान, विन आश्रय नित ही स्वाधीन । सिद्ध०८२१ मिदनाम आं ही योगाय नमः अर्थे। लोक भाल हो निलक अनृप, हो लोकोत्तम शेष स्वरूप । सिद्ध०८२ विधान औदी लोकमालनिलकोउनाय (विशेषकाय) नमः आग । अक्षाधीन हीन हे शक्त, तिसको नाश करी निज व्यक्त । सिद्ध०८२३ ओ ही तुच्छभावभिदे नमो अर्घ । जीवादिक पदार्थ पट जान, तिनको भलीभांति है ज्ञान । सिद्धसमूह जजू मन लाय, भव भवमें सुखसंपतिदाय ।। ८२४ ॥ ॐही पटपदार्थदर्शने नमः अर्थ । विकलरूप नय सकल प्रमाण, वस्तु भेद जानो स्वज्ञान । सिद्ध० ओ ही सकलवस्तुविनाय नमः अर्थ ॥ ८२५ ॥ सव पदार्थ दर्शत तुम वैन, संशय हरण करण सुख चैन । कि ओ ही पीडशपदार्थवादिने ना. -- 155555 अष्टमी पूजा स्थान , KHEREFEREFFFFFFFFFFERSAREES द्वादश सभा करें सतकार, आदर योग वैन सुखसार । सिद्ध। ही समोमरणद्वादशमभापतये नमः अर्थ ॥ ८३६ ॥ आगम अक्ष अनक्ष प्रमान, तीन भेदकर तुम पहिचान । सिद्ध० । ॐ त्रिमाणाय नमः अर्थ ॥ ८४०॥ विशद शुद्ध मति हो साकार, तुमको जानत है सु विचार । सिद्ध । ओंही अक्षप्रमाणाय नमः अर्घ ॥ ८४१ ।। नयसापेक्ष कहें शुभ वैन, हैं अशंस सत्यार्थ ऐन । सिद्धसमूह जजू मन लाय, भव भवमें सुखसंपतिदाय ॥ ८४२ ॥ ओरी स्यानादो नमो अर्य। लोकालोक क्षेत्रके माहि, आप ज्ञानमें सब दरशाय । सिद्धसमूह जर्न मन लाय, भव भवमें सुखसंपतिदाय ।८४३ । ओहरी क्षेत्रलाप नमो अप। अन्तर पाया नहीं और, काल आतममई अठोर । गिद्ध। 39555555555555555 - विधान ५१५ औ ही शुद्वात्मने नमः अर्थ ।। ८४५ ॥ अन्तिम पौरुप साध्यो सार, पुरुप नाम पायो सुखकार । सिन्द्र० । ओ ही पुरुषाय नमो अर्थ ॥ ८४५ ॥ चहुंगतिमें नरदेह मझार, मोक्ष होत तुम नर आकार । सिद्ध० । औं ही नराधिपाय नमः अब ।। ८४६ ॥ दर्श ज्ञान चेतनकी लार, निरावर्ण तुम हो अविकार । सिद्धः । ॐ ही निरापरणचंतनाय नमः अयं ॥ ८४७॥ भाव न वेद वेद नरदेह, मोक्ष रूप हे नहीं सन्देह । सिद्ध० । ८४८ । ओं ही मोक्षरूपजिनाय(मे) नमः अर्ष । सत्य यथारथ हो सब ठीक, स्वयं सिद्ध राजो शुभ नीक । सिद्धसमूह जजू मन लाय, भव भवमें सुखसम्पतिदाय ॥८४६ ॥ ओं ही अकृत्रिमाय नमः अर्म। दोहा-जाकरि तुमको जानिये, सो हे अगम अलक्ष । 卐555555555555 र १ मा मात्र है. भाभातम ! पोय नम: । 5. g, को नम एनोर। र मान देश हो, २३ प्रदंदा चिदगय ।।१। जोवनो। हमाली जिनुग्न नो. गजनन् भग्वार । निजानन्दको अदि ले. महा नुष्ट निरधार । ८५२ । मोनार ननः प्रा। W लोकारने. ज्ञान ज्योतिक दार। लोगशनिटर अपल, करो भन्दा उदार ॥ ८५३ ॥ को कम शानियो गर र निरधार। *555555FERESUSHAREURRERY 34 ज 17-मान ॐही प्रक्रियाय नमः अर्थ । सर्वोत्तम अति उच्च गति, जहां रहो स्वयमेव । देव वास है मोक्ष थल, हा देवनक देव ॥॥ ओ हों देवेष्टविनाय (दिविष्ठय) नमः ॥ ८५५ ।। भवसागरके तीर हो, अचलरूप अस्थान । फिर नहीं जगमें जन्म है, राजत हो सुखथान ।। ओ दी तटम्याय नमो अयं ।। ८५६ ॥ ज्योंके त्यो नित थिर रहो, अचलम्प,अविनाश । स्वपदमय राजत सदा, स्वयं ज्योति परकाश ॥ ॐ ही कूटस्थाय नमः अर्थ ॥ ८५७ ॥ तत्त्व अतत्व प्रकाशियो, ज्ञाता हो सब भास । मूर्ति हो ज्ञान धन, ज्ञान ज्योति अविनाश ॥ ॐ दी मात्र नमो अयं ।। ८५८ ॥ पर निमित्तके योगते, व्यापे नहीं विकार ।

~~~ विधान IPIPIFIFIPL अष्टमी पूजा REFERENSFERREEEEEEEEE स्खे स्वरूपमें थिर सदा, हो अबाध निरधार ॥ ओ ही निरावाधाय नमः अघ ।। ८५६ ।। चारवाक वा सांख्यों, झूठी पक्ष घरात । अल्प मोक्ष नहीं होत है, राजत हो विख्यात ॥ ओ हों निराभाषाय नमो अर्थ ।। ८६० ॥ तारण तरण जिहाज हो, अतुल शक्ति के नाथ । भव वारिधसे पारकर, राखो अपने साथ ॥ ही भयवारिधिपारकराय नमो अर्थ ॥ ८६१ ॥ पन्ध मोक्षको कहन है, सो भी है व्यवहार । तुम विवहार अतीत हो, शुद्ध वस्तु निरधार ॥ ८६२ ॥ ॐ ही निर्माताप नमः अर्थ। चारों पुरुषारथ यि, मोक्ष पदारथ सार । तुम साधो परधान हो, सबमें मुग्य आधार ॥ ८६३॥ प्रधानाय नमः श्रयं ।

15 मदचत्र पवान निज वस्तुता, ५१. 卐 6555555555555555555 कर्ममल प्रक्षालक, निज आतम लवलाय । हो प्रसन्न शिवथल विप, अन्तर मल विनशाय ॥ ८६४ ॥ ओ ही कर्मव्याधिविनागकजिनाय(गवधानाप) नमः अप । निज सुभाव निज सुभावमें लीन । वन्दू शुद्ध स्वभावमय, अन्य कुभाव मलीन ॥ ८६५ ॥ ॐही प्रकृनाय नमः अथ । निज स्वरूप परकाश है, निरावर्ण ज्यों सूर । तुमको पूजत भावसी, मोह कर्मको चूर ।। ८६६ ।। ओ ही निगवरणमुर्गजिनाय नमः अर्म। निज भावनतें मोक्ष हो, ते ही भाव रहात । स्वगुण स्व परजायमें, थिरता भाव धरात ॥ ८६७ ।। ओ ही बसपारदजिनाय नमः अयं । सब कुभावको जीतियो, शुद्ध भये निरमूल । E3955555555555555 द्वपक्र! विधान अष्टमी पूजा शुद्धातम कहलात हो, नमत नशे अघ मूल ॥ ८६८॥ ॐ ही प्रातिप्राप्ताय नमः अर्थ निज सन्मतिके सन्मती, निज वुधके बुधवान । शुभ ज्ञाता शुभ ज्ञान हो, पूजत मिथ्या हान ॥ ८६९ ॥ ओ ही विशुद्धमन्मानेजिनाय (मत्यभिज्ञानाय) नमः अर्घ कर्म प्रकृतिको अंश विन, उत्तर हो या मूल । शुद्ध रूप अति तेज धन, ज्यों रवि विंच अधूल ॥ ८७० ॥ ओं ही प्रतये नमो अर्थ । आदि पुरुप आदीश जिन, आदि धर्म अवतार । आदि मोक्ष दातार हो, आदि कर्म हरतार ॥ ८७१ ॥ ओं ही ब्रह्मणे नमः अर्प। नहीं विकार आवै कभी, रहो सदा सुखरूप । रोग शोक व्यापे नहीं, निवसे सदा अनूप ।। ८७२ ॥ आह निविहतये नमः अर्य। ५२०

मदनी
...
::555555555555
निज पौरुप करि सूर्य सम, हरो तिमिर मिथ्यात ।
तुम पुरुषारय सफल है, तीन लोक विग्यात ॥ ८७३ ।।
ॐ ही मिथ्यानिमिरविनायकाय (कतिने) नमः ।
वस्तु परीक्षा तुम बिना, और झूठ करग्वेद।
अंधकूपमें आप सर, डारत हैं निरभेद । ८७ ।
ओ ही मीमांगकाय नमः पर ।
होनहार या हो लई, या पइये इस काल ।
अस्तरूप सब वस्तु है, तुम जानो यह हाल । ८७५ ।
ओं ही अम्निमर्यवाय नमः ।
जिनवाणी जिन सरस्वती, तुम गुणसा परिपूर ।
पृज्य योग तुमका कहें, करें मोहमद चूर । ८७६ ।
आँ ही धूतपूज्याय नमः अर्थ ।
स्वयं स्वरूप आनन्द हो, निज पद रमन सुभाव ।
मदा विकाशित हो रहै, वन्दू सहज सुभाष । ८७७ ।
5555555555555555555555555555555555
१२१

अपं ।
गिद्वन
अष्टमी
पूजा
विधान
.
--
-
औ ही सदोत्सयाय नमः अप
मन इन्द्री जानत नहीं', जाको शुद्ध स्वरूप ।
वचनातीत स्वगुण सहित, अमल अकाय अरूप । ८७८ ।
ॐ ही परोक्षजानागम्याग(वाक्यातोताप) नमः अर्थ ।
जो श्रुतज्ञान कला धरै, तिनको हो तुम इष्ट ।
तुमको नित प्रति ध्यावते, नाशे सकल अनिष्ट । ८७९ ।
औ ही इष्टपाठकाय नमः अर्थ
निज समरथ कर साधियो, निज पुरुषारथ सार।
सिद्ध भये सब काम तुम, सिद्ध नाम सुखकार । ८८० ।
ओ ही गिद्वकर्मक्षयाय नमः अर्ष ।
पृथ्वी जल अगनी पवन, जानत इनके भेद ।
गुण अनंत पर्याय सब, सो विभाग परिछेद । ८८१ ।
श्रीहरी भाकाय नमः अप ।
म्येसंगेदन ज्ञानमें, देग्यत होय प्रत्यक्ष ।
५२२

卐
मिदनक्रम
फ़
विधान
अष्टमी
पूजा
रक्षक हो तिहूं लोकके, हम शरणागति पक्ष । ८८२ ।
ओ ही प्रत्यक्षकप्रमाणाय नमः अर्घ।
विद्यमान शिवलोकम, स्वगुण पर्याय समेत ।
कहैं अभाव कुमती मती, निजपर धोका देत । ८८३ ।
ॐ हीं अस्तिपरलोकाय नमः अर्घ ।
तुम
आगमके
मूल हो, अपर गुरू हैं नाम ।
तुम वानी अनुसार ही, भये शास्त्र अभिराम । ८८४ ।
ॐ हीं गुरुश्रुतये नमः अर्घ ।
तीन लोकके नाथ हो, ज्यों सुरगणमें इन्द्र ।
स्वेपद रमन स्वभाव धर, नमें तुम्हें देवेन्द्र । ८८५ ।
ॐ ही त्रिलोकनाथाय नमः अर्थ ।
सब स्वभाव अविरुद्ध हैं, स्वैपर घातक नाहिं ।
सहचारी परिणाम हैं, निवसत हैं तुम माहिं । ८८६ ।
ॐ हीं स्वस्वभावअविरुद्धजिनाय(अविरुद्धवर्णाय) नमः अर्ण ।
५२३

अएमो
पूजा
.
विधान
५२४
FRESHEEEEEEEEEEEEEEEEHHRESEREHREE
ब्राह्म ज्ञानको वेदकर, भये शुद्ध अविकार
पूरण ज्ञानी हो नमू, "लहो वेदको सार । ८८७ ।
ॐ ही वेदांतनयाय नमो अब
शब्द ब्रह्मके ज्ञानते, आतम-तत्त्व विचार ।
शुरुभ्यानमें लय भए, हो अतर्क अविचार । ८८८ ।
ओ ही शब्दावेंतत्रमणे(नयाय) नमः अर्थ।
सुक्षम तत्त्व प्रकाश कर, सूक्षम कर्म उच्छेद ।
मोक्षमार्ग परगट कियो, कहो सु अन्तर भेद । ८८९ ।
ओं हो पक्षमतत्त्वप्रकाशकजिनाय (विस्फोटनयादिने) नमः अर्घ ।
तीन शतक केसठ जु हैं, सब माने पाखण्ड ।
धर्म यथारथ तुम कहो, तिन सबके ताई. खण्ड । ८९० ।
जी ही पागण्डमण्डकाय नमः अर्थ ।
कर्णरुप करतार हो, कोईक नयके
सुर मुनि फरि पूजन भए, माननीक सावकार । ८९१ ।
५२२

गटचरम
साक्षात
विधान
:"5555555555555555555
ओ ही अमडानन्दजिनाय नमः अय।
केयललान उपाइक. तदन्तर हो मोक्ष।
बड़भागसं. . पूजें इहां परोक्ष । ८१२.।
ॐ ही अन्नानं नमः अयं ।
शरणागतको पार कर, देत मोक्ष अभिगम ।
नारण तरण मु नाम हैं, तुम पढ़ कर प्रणाम । १३ ।
ओ ही पारकुनाय नमः अयं ।
भव समुद्र गम्भीर हे. कठिन जासको पार ।
निज पुम्पार्थ करि तिर. गहो किनारो सार । ८९४ ।
ओ ही नीरप्रामाय नमः ।
एकवार जो शरण गहि, ताको हो हितकार।
यात सब जग जीवके, हो आनंद दातार । ६५
ओ ही परहितस्थिताय नमः अथ ।
35555555555555
५२१

अष्टमो
पूजा
अष्टमो
विधान
रत्नत्रय निज नेत्रसों, मोक्षपुरी पहुंचात ।
महादेव हो जगत पितु, तीन लोक विख्यात । ८६६ ।
ॐही रत्नत्रयनेत्रजिनाय(ध्यक्ष्णे) नमः अयं ।
तीन लोकके नाथ हो, महा ज्ञान भण्डार ।
सरल भाव विन कपट हो, स्वच्छ शुद्ध अविकार । ८६७ ।
*ही शुद्धयुद्धजिनाय (द्वथक्षणे) नमः अर्थ ।
निश्च या व्यवहारके, हो तुम जाननहार ।
वस्तुरूप निज साधियो, पूजत हूं निरधार । ८८८ ।
ओ ही शानफर्मममुगाय नमः अर्घ
सुरनर पशु न अघावते, सभो ध्यावते ध्यान ।
तुमको नित ही ध्यावते, पार्व सुख निर्वाण । ८६६ |
ओ ही नित्यतृप्तजिनाय (गहनध्यनये) नमः अब ।
- मेल प्रशाल फरि, नीनो योग समारि ।

मिरचक
अष्टमी
पूजा
विधान
५२७
-
पाप शेल छिन्न भिन्न कर, भये अयोग सुखार । ६०० ।
औ ही पापमल निवारकाय (उत्पादनयोगाय) नमः अर्ध ।
सूरज हो स्वं ज्ञान घन, ग्रहण उपद्रव नाहिं ।
व खटके शिवपंथ सब, दीखत हैं जिस माहिं । ६०१ ।
आँ दी निरावारणमान जिनाय नमः अर्घ।
जोग योग संकल्प कर, हरो देहको साथ ।
रहो अकंपित थिर सदा, में नाऊँ निज माथ । ६०२ ।
ओ ही योग शापहाय नमः अर्घ ।
जोग सुधिरताको हरे, कर आगमन कर्म ।
तुम तासों निर्लेप हो, नशो मोहमद शर्म । ६०३ ।
ओ ही योगातनिलंपाय नमः अर्थ |
निज आतममें स्वस्थ हैं, स्वपद योग रमाय ।
निर्भय निर इक्ष हो, नमूं जोर कर पाय । ९०४ ।
५२७
तुम

-
अष्टमी
पूजा
रधान
SHREFEEEEEFFFFFFFFFFESER
ओ हो सस्थलयोगातये नमः अप
महादेव गिरिराज पर, जन्म समें जिन सूर ।
योग किरण विकसात हो, शोकतिमिर कर दूर । ६०५ ।
ओ ही गिरिमंयोगजिनाय नमः अर्थ ।
सूदम निज परदेश तन, सूक्ष्म क्रिया परिणाम ।
चितवत मन नहिं वश चले, राजत हो शिवधाम । ६०६ ।
ओ ही प्रक्ष्मीकवपुःक्रियाय नमः अर्थ।
मूक्षम तत्व परकाश है, शुभ प्रिय वचनन द्वार ।
भविजनको आनंद करि तीन जगत गुरु सार । ६०७ ।
ओ ही मूमनाचिनयोगाय नमः अप
कर्म रहित शुद्धात्मा, निश्चल क्रिया रहात ।
प्रदेदा मय थिर
पापा सदा, रस्यात्य मुख पात । ९०८।
५२८

प्रकाश । मिनचक्रम ' वाट T. 77 ! विद्यमान प्रत्यक्ष है, चतनराय कर्म कालिमासों रहित, पृजत हो अघ नाश । ०६ । ओ ही भृनाभिव्यक्तचननाय नमः अप । ग्रहि स्वाचरण सुभेद करि, धर्मरुप सत्यांश । एक तुम्ही हो धर्म करि, पायो शिवपुर वास । ६१० । ओं ही दण्डिने नमः अघ। सूर्य प्रकाशन मोह तम, हरता हो शुभ पंथ । पाप क्रिया विन राजते, महायती निरग्रंथ ॥ ९११ ॥ ओ हों परमहंसाय नमः । बंध रहित सर्वस्व करि, निर्मल हो निर्लए । शुद्ध सुवर्ण दिपे सदा, नहीं मोह मल लेप ॥ ९१२ ॥ ॐ ही परमगंबराय नमः अर्थ । ५२२, ३४ मिनक ":5555555 अष्टमी पूजा अष्टमी विधान ५३० मेघ पटल विन सूर्य जिम, दीप्त अनन्त प्रताप । निरावर्ण तुम शुद्ध हो, पृजन मिट है पाप (१९१३ ॥ ॐ हीं निरावर्णाय नमः अर्थ । कर्म अंश सब झर गिरे, रहो न एक लगार। परम शुद्धता धारक, तिष्ठो हो अविकार ॥१४॥ ओ ही परमनिर्जराय नमो अध। तेज प्रचण्ड प्रभाव है, उदय रूप परताप। अन्य कुदेव कुआगिया. झूठा परत कलाप ॥ ९१५॥ ओं ही प्रज्वलितप्रभावाय नमः वर्ष। भये निरर्थक कम मध, शक्ति भई है हीन । तिनको जीने छनक, भये मुबी स्वाधीन ॥ ९१६ ॥ ओ हों गमनकर्मक्षयजिनाय (मापकर्मण) नमः अ । फर्म प्रकृतिका गेग सम. जो की Encr ..

955 5555 अष्टम गिदपक विधान निज स्वरूप आनन्दमें, कहो विगार निहार ॥ ९१७॥ ओ ही कर्मविस्फोटकाय नमो अर्थ । हीन शक्ति परमादको. आप कियो है अन्त । निज पुरुषार्थ सुवीर्यसो. सुग्वी भए सु अनन्त ॥ ९१८ ।। औ ही अनंतवीर्य जिनाय(शैथिल्यान्ताय) नमः अर्थ । एक रूप रम स्वादमें, निर आकुलित रहाय । विविध रूप रम पर निमित, ताको त्याग कराय ॥१९॥ ॐदी एकाकाररसास्वादाय नमः अर्घ । इन्द्री मनके सब विषय, त्याग दिये इक ल.र । निजानन्दमें मगन हैं. छांडो जग व्यापार ॥ ९२० ॥ औ ही विश्वाकाररसास्वादाकुलिताय नमो अर्घ । पर सम्बन्धी प्राण विन, निज प्राणनि आधार । सदा रहे जीतव्यता, जरा मृत्युको टार ॥ ९२१ ॥ 卐59595 सद्धचक्र अदन विधान पूजा ५३२ REFEEYAFFFFFFFFFATHERSITESHEELATESTHA ॐ ही जीविताय नमः अयं । निज रसके सागर धनी, महा प्रिय स्वादिष्ट । अमर रूप राजे सदा, सुर मुनिके हो इट ॥ ९२२ ।। औ ही अमृताय नमः अर्प। पूरण निज आनन्दमें, सदा जागने आप। नहिं प्रमादमें लिप्त हैं, पूजत विनशे पाप ॥ ९२३॥ ॐ ही जाग्रताय नमः अर्प। क्षीण (दिपै) ज्ञान ज्ञानावरण, करै जीवको नित्य । सो आवर्ण विनाशियो, रहो अस्वप्न सुवित्य ॥ ९२४॥ ओ ही अस्वप्नाय नमः अयं । स्व प्रमाणमें थिर सदा, स्वयं चतुष्टय सत्य । निगवाघ निर्भय मुग्वी, त्यागत भाव असत्य ।। ६२५ ।। ५३२ सपनाय नमः ।

मद्रचक्र
अष्टग
पूजा
विधान
५३३
श्रम करि नहीं आकुलित हो, सदा रहो निरखेद ।
स्वस्थरूप राजो सदा, वेदो ज्ञान अभेद । ६२६ ।
ओं ही अप्रयासाय नमः अर्थ ।
मन वच तन व्यापार था, तावत रहो शरीर ।
ताको नाश अकंप हो, चन्दू मन धर धीर । ६२७ ।
ओं ही अयोगिने नमः अर्थे ।
जितने शुभ लक्षण कहे, तुममें हैं एकत्र ।
तुमको बन्दू भावसों, हरो पाप सर्वत्र । ९२८ ।
ओ ही चतुरशीतिलक्षणाय नमः अघ ।
तुम लक्षण सूक्षम महा, इन्द्रिय विषय अतीत ।
वचन अगोचर गुण धरो, निर्गुण कहत सुनीत । ६२६ ।
ॐ हीं अगुणाय नमः अर्घ ।
अगुरुलघू पर्यायके, भेद अनन्तानन्त ।
५३३

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मद्धचक्र अदमी पना विधान ५३४ गुण अनन्त परिणाम करि, नित्य नमें तुम संत । आं ह्रीं अनन्नानन्तपायाय नमः अर्थ । ६३० । रागद्वेपके नाशते, नहीं पूर्व संस्कार । निज सुभावमें थिर रहे, अन्य वासना टार । ॐ ही पूर्वसंस्कारवाय नमः अर्ग। ६३१ । गुण चतुष्टमें वृद्धता, भई अनन्तानन्त। तुम सम और न जगतमें, सदा रहो जयवंत ॥ ३२ ॥ आं ही पृद्धाय नमः अप। आप कथित उत्तम वचन, धर्म मार्ग अरहन्त । सो सब नाम कहो तुम्ही, शिवमारगके सन्त ॥ ६३३॥ ओ ही प्रिययननाय नमः अर्ष । महामुहिके धाम हो, सूक्षम शुद्ध अवाच्य । चार ज्ञान नहीं गम्य हो, धानुरुप सो साध्य ॥ ६३४॥ .

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मिद्धचक्र
अष्टमी
पूजा
विधान
५३८
FFERESENTERPRESEFFES
औ ही व्यवहारगुप्ताय नमः अप । ६४७ ।
निज पदमें नित रमत है, अप्रमाद अधिकाय ।
निज गुण सदा प्रकाश है, अतुलवली नर्मू पाय ।
ॐ ही अनिजागरकाय नमः अर्प । ९५८ ।
सकल उपद्रव मिटि गये, जे थे परकी साथ ।
निर्भय सदा सुखी भये, वन्, नमि निज माघ ।
आं ही स्वस्थिताय नमः अयं । ६४६ ।
कहे हुये हो नेमसे, परमाराध्य अनादि ।
महातमा जगतके, और कुदेव कुवादि । ९५० ।
आँ ही उदिनोदिनमाहात्म्पाय नमः अपं।
तत्त्वज्ञान अनुकूल सब, शब्द प्रयोग विचार ।
तिसके तुम अध्याय हो, धर्म प्रकाशनहार । ९५१ ।
ॐ नवज्ञानानुलजिनाप (तिTHAmms

गिदानका अष्टमी पूजा A ना फासो जन्म हो, ना फाईसो नाश । स्वयं सिद्ध चिन पर निमित, स्वस्वरूप परकाश । ९५२ । ॐ हीं अत्रिमाय नमः अघ । अप्रमाण अत्यन्त है, तुम सन्मति परकाश । तेजरूप उत्सवमई, पाप-तिमिरको नाश ॥ १५३ ॥ आं ही अप्रमेयमहिम्ने नगः अर्थ । रागादिक मलको धरै, तनक नहीं अनवास । महा विशुद्ध अत्यन्त हैं, हरो पाप अहि डांस ।। ९५४ ॥ औ ही अत्यन्तशुद्धाय नमो अर्थ । गिद्ध स्वयं भरतार हो, शिव कामिनके संग। रमण भाव र योग, मानों अरह अनंग ॥ ९५५॥ श्री ही गंगराय नमः अर्थ। विविध प्रकार न भरत है, है अजन्म अव्यक्त । SHEELS REFRESHEET955555 .

मिद्धचक्र
अदमा
पूजा
विधान
५२४
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ॐ ही याजकाय नमः अर्थ ।
मोह महा परचण्ड बल, सक न तुमको जीत ।
नमूं तुम्हें जयवंत हो, धार सु उरमें प्रीत । ९७४ ।
ओ ही अजय्याय नमः अर्थ ।
जज्ञ विधानमें जजत ही, आप मिलो निधि रूप ।
तुम समान नहीं और धन, हरत दरिद्र दुख कूप । ६७५ ।
ओ ही याज्याय नमः अर्थ।
लोकोत्तर संपद विभव, हे सर्वस्व अघाय ।
तुमसे अधिक न और है, सुख विभूति शिवगय । ६७६ ॥
ओ ही अनत्रग्रहाय नमः अर्थ।
तुमको आह्वानन यजन, प्रामुक विधिसे योग ।
निजग अमोलिक निधि मही; देत पर्म मुख भोग । ६७७ ॥
R5555555555555555
श्रोही बननो नमी ओ ।

सिद्धार HELLS धान 4555555555 एक देश मुनिगज त सर्प दंश जिनगज । भव तन भोग विलाता. निर्ममत्त मुग्न साज ॥१७॥ ॐही पग्मनिष्ठाय नमो । परदुग्यौ दुग्व हो जहां. मोह प्रक्रनिके द्वार । दया कहें निसको सुर्मात. मो तुम मोह नियार । १७२ । ओ ही अन्यन्ननिर्दयाय नमः । स्वयं बुद्ध भगवान हो, सुर मुनि पृजन योग । विन शिक्षा शिवमार्गको, साधो हो धरि योग ।९८० । ॐ हीं अशिष्याय नमः अय। तुम एकत्व अन्यत्व हो, परसों नहीं सम्बन्ध स्वयं सिद्ध अविरुद्ध हो, नाशो जगत प्रबन्ध ।। २८१ ।। ओ ही परसम्बन्धविनायकाय नमः अर्थ । Finniaithili

मिचक्र
अष्टमा
पूजा
विधान
354 1553HISith
ही ज्ञाननिर्भराय नमः अर्ष।
मुनिजन जेन सेवन करें, पा निज पद सार ।
महा शुद्ध उपयोग मय, वरतत है सुखकार । ६६१ ।
औ ही महायोगीश्वराय नमः अयं ।
भाव शुद्ध सो देहमें, द्रव्य शुद्ध विन देह ।
कर्म वर्गणा लिये, पूजत हूं धरि नेह । ६६२ ।
ही दव्यशुदाय नमः
अर्य
पंच प्रकार शरीरको, मूल कियो विध्वंश ।
स्व प्रदेशमय राजते, पर मिलाप नहीं अंश । ९९३ ।
ओ हों अंदेवाय नमः ।
जाको फर न जन्म है, फिर नाहीं संसार ।
मो पंचमगति शिवमई, पायो तुम निरधार । ९६४ ।
ही अनर्भयाय नमः अपं ।
५४८

अष्टमी मिट्टचक्र विधान ४ 155555555555555 सकल इन्द्रियां व्यर्थ करि, केवलज्ञान सहाय । सब द्रव्यनिको ज्ञान है, गुण अनन्त पर्याय ॥ ६६५ ॥ ॐ ही जानकाविद नमः अब । जीव मात्र निज धन सहित, गुण समूह मणि खान । अन्य विभाव विभव नहीं, महा शुद्ध अविकार ॥ ६६६ ।। ओवी जीवधनाय नमः अर्य। सिद्ध भये परसिद्ध तुम, निज पुरुषारथ साध । महा शुद्ध निज आत्म मय, सदा रहे निरवाध ॥ ६६७ ॥ आं ही सिद्धाय नमः अथ । लोकशिखरपर थिर भए, ज्यों मंदिर मणि कुंभ । निज शरीर अवगाहमें, अचल सु थान अलंभ ॥ ६९८ ॥ ही लोकाग्रस्थिताय नमः अथ । सहज निरामय भेद विन, निरावाध निस्संग।

मिदपक अष्टमी पूजा विधान एक रुप सामान्य हो, निज विशेष मई अंग ॥ ६ ॥ ओ ही निदाय नमः अर्थ। जे अविभाग प्रछेद हैं, इक गुणके सु अनन्त । तुममें पूरण गुण सही, धरो अनन्तानन्त ॥ १०००॥ ओं ह्रीं अनन्तानन्तगुणाग नमः अर्थ । पर मिलाप नहीं लेश है, स्वप्रदेशमय रूप । क्षयोपशम ज्ञानी तुम्है, जानत नाहिं स्वरूप ॥ १००१ ॥ ओ हो आत्मरूपाय नमः अर्थ । क्षमा आत्मको भाव है, क्रोध कर्मसों घात । सो तुम कर्म खियाइयो, क्षमा सु भाव धरात ॥ १००२॥ ॐही महाक्षमाय नमः अर्थ । शील मुभाष मु आत्मको, क्षोभ रहित सुखदाय । निर आपलता धार है, चंद्रं तिनके पाय ॥ १००३ ॥ ५५० पिन अपमा पूजा न ५१ F".5555555555555555555 ओमी महागीलाय नमः अघ । शशि स्वभाव ज्यों शांति धर, और न शांति धराय । आप शांति पर शांतिकर, भवदुख दाह मिटाय ॥ १००४ ॥ औधी महाशांताय नमः अर्थ । तुम सम को बलवान है, जीत्यो मोह प्रचण्ड । धरो अनन्त स्त्र वीर्यको. निज पद सुथिर अखण्ड ॥ १००५ ॥ ॐ हीं अनन्तवीर्यातकाग (अनंनोजस्विने) नमः अर्थ । लोकालोक विलोकियो, संशय विन इकवार । खंद रहित निश्चल सुग्वी, स्वच्छ आरसी सार ॥ १००६ ॥ ॐ ही लोकालोकशाय नमः अर्थ । निरावर्ण स्व गुण सहित, निजानन्द रस भोग। अव्यय अविनाशी सदा, अजर अमर शुभ योग । १००७ ॥ ओ ही निरावरणाय नमः अर्ष । 95955555555 मिदपक अष्टमो पूजा विधान परम पर ध्यान धर, पावै निजपद सार । ज्यों रविवि प्रकाश कर, घटपट सहज निहार । १००८ । ओ ही ध्येयगुणाय नमः । कवलाहारी कहत हैं, महा मृढ मतिमंद । अशन असाता पीरविन, आप भये सुख कंद ॥ १००६ ॥ ॐ ही अशनदग्धाय नमो अर्थ। लोक शीप छवि देत हो, धरो प्रकाश अनूप । बुधजन आदर जोग हो. सहज अकम्प सरूप ॥ १०१०॥ ॐ ही पिलोकमणये नमो अर्ष । महागुणनकी रास हो. लोकालोक प्रजन्त । मुर मुनि पार न पारते, तुम्हे नमें नित सन्त ॥ १०११॥ ॐही अनन्नगुगप्राप्ताय नमः अर्थ । परम सु गुण परिपूर्ण हो, मलिन भाव नहीं लेश ।

गिदानक
अष्टमी
पूजा
विधान
15555555555555555555
जगजीवन आराध्य हो, हम तुम यही विशेष ॥ १०१२॥
श्री ही परमात्मने नमः अघ ।
केवल प्रद्धि महान है, अतिशय युत तप सार ।
मो तुम पायो सहज ही, मुनिगण बंदनहार ॥ १०१३ ॥
ओही महामापये नमः अर्थ ।
भूत भविष्यत् कालको, कभी न होवे अंत ।
निन प्रति शिवपद पायकर, होत अनन्तानन्त ॥ १०१४ ॥
ॐ ही अनन्तसिद्धभ्यो नगः अप।
निर्भय निर आकुलित हो, स्वयं स्वस्थ निरग्वेद ।
काह विधि घबराट नहीं, निज आनंद अभेद ॥ १०१५ ॥
ओहीं अक्षोभाय नमः अपं ।
जो गुण गुणी सुभेद करि, सो जड मती अजान ।
निज गुण गुणी सु एकता, स्वयं बुद्ध भगवान ॥ १०१६ ॥

अष्टमो पूजा विधान HELLESTER5E5E55555EFFESEFFERESERY परम मुनीश्वर ध्यान धर, पाय निजपद सार । ज्यों रविवि प्रकाश कर. घटपट सहज निहार । १००८ । ओ ही ध्येयगुणाय नमः अर्थ । कवलाहारी कहत हैं, महा मृड मतिमंद । अशन असाता पीरविन, आप भये सुख कंद ॥ १००६ ॥ ॐ ही अशनदग्धाय नमो अर्घा लोक शीप रवि देत हो, धरो प्रकाश अनूप । बुधजन आदर जोग हो, सहज अकम्प सरूप ॥ १०१०॥ ॐही पिलोकमणये नमो अर्थ । महागुणनकी गस हो, लोकालोक प्रजन्त । मुर मुनि पार न पारते, तुम्है नमें नित सन्त ॥ १०११ ॥ ॐ है। अनन्नाणप्रामाय नमः अपं । परम सु गुण परिपूर्ण हो, मलिन भाव नहीं लेश ।

निद्धचक्र विधान ५५३ जगजीयन आराध्य हो. हम तुम यही विशेष ॥ १०१२॥ ओ ही परमात्मने नमः अघ । केवल मान्द्धि महान है, अतिशय युत तप सार । सो तुम पायो सहज ही, मुनिगण वंदनहार ॥ १०१३॥ ओ ही महामाये नमः अम। भूत भविष्यत् कालको, कभी न होचे अंत । नित प्रति शिवपद पायकर, होत अनन्तानन्त ॥ १०११ ॥ ॐही अनन्तमिदम्या नगः भर । निर्भय निर आकुलिन हो. स्वयं स्वस्थ निग्ग्वद । काह विधि वगट नहीं. निज आनंद अभेद ॥ १.१५ ॥ ओ हीं अक्षीभाय नमः अथ । जो गुण गुणी मुभेद करि सो जड मती अजान । निज गुण गुणी मु एकता, स्वयं बुन्द्र, भगवान ॥ १०१६ ॥ 5ោះរកកោនេះ។ .31555 ..

अष्टम विधान 4954539REEEEEF ओ ही सययुद्धाय नमः अर्ष। निराकरण निज ज्ञानमें, सर्व स्पष्ट दिखाय । संशय विन नहिं भरम है, सुधिर रहो सुखपाय ॥ १०१७॥ *ही निरापरपज्ञानाय (निर्ममाय) नमः अर्थे । राग द्वैपके अंशमें, मत्सर भाव कहात । सो तुम नासो मूल ही, रहे कहांसो पात ॥ १०१८ ॥ ओही वोतमत्मराय नमः अर्थ अणुवत लोकालोक है, जाके ज्ञान मझार । सो तुम ज्ञान अथाह है, पन्दू में चित धार ॥ १०१६ ॥ ॐ दो अनन्तानन्तशानाय नमो अर्ष। हस्त रेग्य सम देख हो, लोकालोक सरूप । सो अनन्त दर्शन धरो, नमत मिट भ्रम कूप ॥ १०२०।। * मन्नानन्नदर्शनाय नमः अर्थ ।

मिन
एमो
पूजा
विधान
::."59555555555
तान लोकका पूज्यपन, प्रगट कहे दिखलाय ।
तीन लोक शिरवास है. लोकोत्तम सुखदाय ॥ १०२१ ।।
ओ ही लोकाग्रवामिने नमः अर्थ ।
निज पदमें लवलीन हैं, निज रस बाद अघाय ।
परसों इह रस गुप्त है, कोटि यत्न नहीं पाय । १०२२ ।
ओ ही मुगुप्मात्मने नमः अघ ।
कर्म प्रकृतिको मूल नहीं, द्रव्य रूप यह भाव ।
महा स्वच्छ निर्मल दिपो, ज्यों रवि मेघ अभाव । १०२३ ।
ओ ही पृतात्मने नमः अपं।
हीन अभाव न शक्ति है, कर्मबन्धको नाश ।
उदय भये तुम गुण सकल, महा विभवकी राश । १०२४ ।
ओ ही महोदयाय नमः अयं ।
पाप रूप दुख नाशियो, मोक्ष रूप सुख रास ।

.
मिद्वचक
अष्टमा
विधान
पूजा
EHERE57555555555575
ते मंगल करण, स्वयं संत है दास । १०२५ ।
ओ ही महामंगलात्मकजिनाय नमः अर्थ ।
इति अर्थ मम्पूर्ण ।
दोहा-कह कहांलों तुम सुगुण, अंशमान नहीं अन्त ।
मंगलीक तुम नाम ही, जानि भजें नित सन्त। १ ।
इत्याशीर्वादः।
ओ ही अहं पूर्णस्वगुणजिनाय नमः इति अर्घ, पूर्णा ।
अथ जयमाला।
दोहा-होनहार तुम गुण कथन, जीभ द्वार नहीं होय ।
काष्ठ पांवसें अनिल थल, नाक सके नहीं कोय ॥१॥
सूक्षम शुद्ध स्वरुपको, कहना हे व्यवहार ।
सो व्यवहारातीत हो, यात हम लाचार ॥२॥

बना अष्टमो पूना 95555555- भान 5. पं जो हम कछु कहत हैं. शांति हेत भगवंत । चार बार थुति करनमें, नहीं पुनरुक्त भनन्त ॥ ३ ॥ पदड़ी छन्द मात्रा-१६ जय ग्वयं शक्ति आधार योग, जय स्वयं स्वस्थ आनंद भोग । जय स्वयं विकाश आभाग्न भास, जइ खयं सिन्द्र निज पद निवास ? जय म्वयं बुन्द्र संकल्प टार. जय स्वयं शुद्ध रागादि जार । जय जयं म्वगुण आचार धार, जय स्वयं सुखी अक्षय अपार ५ जय पगं चतुष्टय गजमान. जय स्वयं अनन्त सुगुण निधान । जय ग्वयं स्वस्थ सुस्थिर अयोग. जय स्वयं स्वरूप मनोग योग।६। जय ग्वयं बन्छ निज ज्ञान पूर, जय स्वयं वीर्य रिपु वन चूर । जय महामुनिन आराध्य जान, जय निपुणमती तत्त्वज्ञ मान । ७ । जय सन्तनि मन आनन्दकार, जय सजन चित वल्लभ अपार । LA . 5555

मिन
अश्मा
पुजा
{ান।
REFERENEFFEFFFFFFFFFFFFFE 55545
दार
प्रति मंगल करण, स्वयं संत हे दास । १०२५ ।
ओं ही महामंगलात्मकजिनाय नमः अर्प
इति अर्थ सम्पूर्ण ।
दोहा-कहें कहांलों तुम सुगुण, अंशमात्र नहीं अन्त ।
मंगलीक तुम नाम ही, जानि भज नित सन्त । १।
इत्याशीवादः।
ओं ही अहं पूर्णस्वगुगजिनाग नमः इति अर्थ, पूर्णाप ।
अथ जयमाला।
दोहा-होनहार तुम गुण कथन, जीभ द्वार नहीं होय ।
काष्ठ पांयसें अनिल थल, नाक सके नहीं कोय ॥१॥
सूक्षम शुन्द्र स्वरूपको, कहना है व्यवहार ।
सो व्यवहारातीत हो, यति हम लाचार ॥ २ ॥

फ 5555 मिद्धचक्र अष्टमी पूजा विधान ज्यूं पंगु चढ़े गिर, गूंग भरे सुर, अभुज सिन्धु तर कष्ट भरे । त्यों तुम थुति काम महा लज ठाम, सु अंत संत परणाम करे ।। ॐ ही चतुर्विशत्यधिकमहस्रगुणयुक्तमिद्धं भ्यो नमः अब निर्वपामीति स्वाहा इति पूर्णाम् । तीन लोकचूड़ामणि, सदा रहो जयवन्त । विघ्नहरण,मंगल करन, तुम्हें नमें नित सन्त ॥ १॥ इत्याशीर्वादः। अथ पूर्ण आशीर्वादः । अडिल्ल छन्द । पृरण मंगल रूपमहा यह पाठ है, सरस सुरुचिसुखकारभक्तिको ठाठ है। शब्द अर्थमें चूक होय तो हो कहीं,श्रुतिवाचक सवशब्द अर्थ या सही।।

卐 मचक्र विमान जिन गुण करणआरम्भ हास्यकोधाम है,वायसका नहिं सिंधु उतीरण कामहै प भक्कानिकी रीति सनातन है सही, क्षमा करोभगवन्त शांतिपूरण मही हुन्गागादि-परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेन् । इति श्री गिद्धचक्रपाट भाषा-कवि मन्तलालजी कृत ममाप्तं । जाप्य मंत्र-ॐही अ मि आउ मा नमः ॥ १०८ ॥ अटमो पूजा 155555555 समात B600.03.

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Shree Shidchkra Vidhan

Author
Pandit Shantlal G
Title
Shree Shidchkra Vidhan
File name
Shree Shidchkra Vidhan
Text
OCR done
Citation
1904
Published
2011/08
Publisher
Kalkatta,univarcity Press
Language
Sanskrit
Pages
518
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313841
Barcode
99999990311228.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
JIloOfLFScQ
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