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Harishchandraleela
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श्रीगणेशायनमः।
अथ श्री हरिश्चन्द्रलीला
AIPUR
हो -शिवसुतचरणमनायके,धरिसरस्वतीकात्यात
हरि भक्तन सिर नायके,लीला र सुजान।
प्रथम सुमिर श्री सारदा,ळंकृष्णकोध्यान।
हरिश्चन्द्रलीलारचित,सुन्दर कहत बखान ।।
सो-पुरी अयोध्यावास.नृपतिबसतहरिश्चन्द्रइक।
नीत निपुण हरिदास-सुन्दर सतवादीमहा।।
नृपति पुनीत यज्ञ नित करही। हर चरणारविंद
उर घरही ॥ टेक ॥षेद वेदान्त सार गहि लीना।
हरिजन भक्त ज्ञान उर चीन्हा । तासुपुत्ररोहितास
पियारो। अति धर्मज्ञशील अतिभारो । तास नाम
नृपतिकी नारी। पतिव्रत धर्मको पालनहारी । सु
न्दर यज्ञ अनेक कराये। पिछली यह मख अति
शुभदाये।
---
में
हरिश्चन्द्र लीला
नारदजी आगमन ।
दो-नारद मुनि आवत भये भूप यज्ञ के माय ।
देखत नृप असो भयो हाथ जोर सिरनाय ॥
सोग-धन्यधन्य महाराज आज कृतारथ मेंभयो।
बोले द्विज महाराज चिरंजीवरहो भूप तुम ।।
समाजी वचन।
दो-सतवादी हरिश्चन्द्र नृप करतसुधर्य दृढाय ।
खुरपति सिंहासन कँप्यो.थरथराय थर्राय ॥
इन्द्र पचन
झे-महा सोचबसइन्द्रसुर धुकर पुकर जियमाय।
"सिंहासन किसअर्थवहे.हाल्यो अतिषबग्य
समाजी वचन
दोहा-नारद पहुंचे स्वर्ग में इन्द्र रहौ पछिताय ।
सिंहासन कै हल्यो सुरनते पूछी जाय ।
इन्द्र वचन
दोन-तेतीसकोटि जो देवता इन्द्रने लिये बुला,
सिंहासन केले हल्यो मोते कटो बगा।'
-
हरिश्चन्द्र लीला ३
दो-इतने में नारद ऋषी, हरि गुणगावत आय।
कहन लगे सबभेदही, मन प्रसन्न हरपाय।।
गारदजी वचन.
सो:-सुनो इन्द्र सराय. समाचार तुमसे कहूं।
हरिश्चन्द्र भूपं कहाय. मृत्युलोक के बीच में।।
यज्ञ करत हरषायःमन बच कर्म ओं धमतें।
कीजे कछू उपाय.नहीं स्वर्ग तुमसे छिन ।
समाजी पचन
दो-सोचभयो महा शकडूं, कीजे कहा उपाय ।
विश्वामित्राहि तब कह्यो, बार बार हरपाय ॥
विश्वामित्र वचन कक्ति ।
सुनो महाराज देव देवनके देव ऐतो सोचकाईको
जो हृदय माहिं कीजिये। केती यह बात बडी जा
को आप मोच करत करूं तुम काज आज मोय ह
क्म दीजिये। राजा और रानी वाके सुलहको देखें
जाय छिनमें डिगाऊंसतमान मेरीलीजिये। इन्दर
सो सत्यवान मानोंकही मेरीनाथ औरते नदीय
काज व्यर्थ तन छीजिये।
हरिश्चन्द्र लोला
इन्द्र वचन।
दोहा-ठीकसत्व सनिबात बह, जाउअयोध्याग्राम।
अति प्रवीनमहा चतुरतुम, करोआजमोकाम।
॥ समाजी पचन ॥
दोहा-चले ऋषी कर हर्षमन, आये अवध मँझार।
हरिश्चन्द्र के बाग धस, सूकरतन लियोधार॥
सो-दीये वृक्ष हटाय, विघ्न अनेकन ऋषिकियो
गये भूपपै. धाय, रखवारे घायल भये ।।
वाता-विश्वामित्र अवधपुरी में आप मनसोचने
लगे किअब कोई ऐसाउपाय करेंजासे राजा एका-
न्तमें मिले तब वाय छठू ये विचार शूकरको रूप
धारण कर राजाके बागमें गये समस्त बागळूउखार
रखवारने दूं घायल किया।
सो-भाली अतिदुख पाय, हाथजोर नृपते कह्यो।
आयो एक बाराह, टाय बगीचा जिनदियो।।
दोहा-अरे भजो एक वेगभृत, लाओ अश्वसजायो,
राजा वचन
५ * हरिश्चन्द्र लीला धनुषवान मोकर देओ,मैं देखों ताय धाय ॥ सो कयो भूप समझाय,सेना पतिहि बुलाय के । लेउ बाग घिरवाय, सूकर वह भगजायनहिं ।। समाजी वचन ॥ दोसुकरलखिनृपको भन्यो,महाविकटबनाया घोडा नप पीछे दियो,चाबुक मार भजाय ॥ सो-भाज्यो बनी मझार शुकर ते मृग है गयो । ढिंग कन्या बैठार,भेष पलट द्विज बनगयो । दो -मृगते ब्राह्मण बनगयो, बैठो बनी मझार । प्यासलगी नृपराजको,भजत भजतगयेहार ॥ सो कन्याएक शुभबाल,द्विज बैठो नृपनेलख्यो। पूछन लगो हवाल,डाट दियो घाडा तहां ॥ राजा वचन दो-सुनो विप्र महाराज तुम,तुम्हें नवाऊं माथ । जो देखो मृग तुम कोई, हमें बताओ नाथ सो:-सूपको लागी प्यास,पूछन ब्राह्मण ते लग्यो। सुनो मेरी अरदाम,नाथडते मृगतुमलख्यो । • omm-
* हारेश्चन्द्र लाला र
वाह्मण पचन राग गुंगधपान
सुनो नृपति महाराज वचन हों सत्य विचारी।
अटकोमेरोकाजआजहरिश्चन्द्रसोंभारी,मेरेकन्या
चारतिनके में ब्याहरचाऊदानद्रव्यके काज आज
हरिश्चन्द्रपे जाऊं में नहि देख्योहिरन फिकर मोव
धनकीमारीपारे हाथ में कर सुता मैरे क्वारी॥
सतबादी हरिश्चन्द्र सुनों मैंने बडदानी । मुन्दर
तम कहां रहोकहोतुम सत्य बखानी।।
राजा वचन राग गुंगवधान
हाथ जोर सिरनाय भूप अस वचन सुनायोअहो
अहो महाराज धन्य,मोय दरस दिखाये। मेरोही
हरिश्चन्द्रनाम सुनो तुमसत्यकृपालाजो मांगो.सो
दउंचलों घर परही दयाला। करन अखेट काज
आज यहाँ आयोसवारी।याते मोको भई बनहिं में
तहि अवारी.॥ जब करिहों स्नान प्रथम तुम्हें
दान दिवाऊँ। जबहि करों जल पान अन्न इतने
नहिं खाई। बोले नृप महाराज महल निज चरण
हरिश्चन्द्र लीला पधारों। जोर हाथ नाउंमाथ चलो संग काजए. म्हासे । सीधो सामा लेउ रसोई मम गृह कांजे। घर ठाकुरको भोग महाप्रसादहि लीजे। सीतप्रसा दहि चहत नाथ सुनों बिनती मेरी । दर्शन तुमर करे रानी तुम चरणन चेरी। चलूं नहीं नृप महल दानदेउ यहांही मोकू । चिरंजीवरहो पुत्र विष्णुखुश राखे तोकू॥नाथ कहा में दऊं यहां नहीं कछुमो- पासा। तारी और लगाम करो संकल्पाहि खासा।। सनो नृपति सुज्ञान यहांसब कछु तुम पासा ।आ- ये करन अखेंट भई मम पूरन आसा ॥ पुनि हसि पोले भूपवित्र कछु मांग बहोरी। द्रव्य जो दऊं अ- चाय चलो मेरेमहलन ओरी ॥ तारी और लगाम अहो द्विज द्रव्यहे थोसे। सुन्दर जानत नाहि विन तू है आति भोरो॥ वार्ता ब्राह्मण कहने लगो हेराजा। आपने सकल पदार्थ करराखें कोईबात कीतेरे कमी नहीं है परन्तु.
८..
* हरिश्चन्द्र लीला
मेरी कहीं मानों या आपको ही लाभ है ताते
याही समय के माही एक मुहुर्त के बीच में ताली
और लगाम संकल्प कर देउ,अब मैं तेरे प्रति तेरो
लाभ वर्णन करत हूँ॥
कवित
सुनों महाराज या कारण है और एक चार घडी
मावस सो सोमबारी सारी है। महाभारीयोग यती
देवन को दुर्लभ जोताते मैंने तारी और लगामही
निहारी है ।। कीजिये स्नान भूप सरयू निकट वहैं.
पर्व जाय चूक ताप चूक अति तिहारी है। सुन्दर
निप कीजै मोहि दान आज पुत्र चि.जीव रहो
आशिषा हमारी है।
दोहा-जो जाओनृप महलको पर्वयह जायबिताया
यावेअश्व लगाम ही.और चाबी देउ महाय।।
राजा वचन ॥
दो-बोलोदिज मंकल्प तुम. हे प्रपन्न मनमाय।
-
९
* हरिश्चन्द्र लीला
जलप्रवेश भूपति कियो. मानुदिशीशनवाय॥
सो कर प्रवेश जलमाय हो प्रसन्न हरिचन्दनृप।
विलंब न नेकलमाष,अबबोलो संकल्प द्विज ॥
विन वचन
दो-पूरव मुख नृप कीजिये.दक्षिणकरलेउ वारि।
हृदयथ्यानहरिकोपये,निजकुलगोत्रठचारि।
राग गुंगवान
तारी और लगाम नृपति दक्षिणकरलीनोजल
संकल्प्यो तभी अर्घ सविताको दीनों ॥ पुनि बोले.
द्विजराज सुनों नृपबात हमारी। देउ मोयकछुऔर
जोमरजी होयतुम्हारी ॥ जो मांगो सो दकं अरे
द्विजझूठ न भाखू । तनदाराधनधाम सभी विभ
हित राखं ॥ एहो नृपति पायो माल दक्षिणामै नहीं
पाई । सुवरण देउ सौ भारदक्षिणा मेरे ताई ॥ पनि
लीनो मंकल्प भूप कञ्चन साभारा । गहिपकरी
द्विज फेंट कहाँ देउ हाल मुआग रहो न तुमपे
१० हरिश्चन्द्र लीला
कछू देख नृप करो विचारा । सुन्दर राजोरपाट
भया धनधाम हमारा॥
कविच।।
राज और पाट धन धाम सब मेरो भयोतारीतें
संकल्पकरी तोपेकहा रहायो । टापतो तुरंगकीमें
भूमि सब आय गई प्रथम लगामको दानहीकरा
यौ है । एक तेरी रानी और बेटा रोहितास रह्यो
सेये बच्यो तन जासों पुण्य करायो है । सुन्दर
दव द्विज सुनो हो वचन मम हार आओ सत्य
वहीं सर्वस गमायो है।
हा-तब मई नृपको चेतना, मैं दोनों सर्वस्व ।
बांयेकर गूंठी बची,हीरा जटित सो अन्ध ॥
सो सुनो श्रीमहाराज,अंगूठी चालीसमारकी ।
ये लेउ मोते आज, साठमार बाकी रह्यो ।
-
विम वचन
दो०-अरे नृपति भयो बाबरो,कहोजो मेरोमान!
हारोसत्यकरोनायतुम नहिंधनसम्पतिहानि॥
--
* हरिश्चन्द्र लीला ११
सो-मान हमारी बात, अरे भूप भयो बाबरो ।
नहिंधनसम्पतिजाय, हारोसतकरोनांयतुम ।।
लावनी-नृपकही सुनो महाराज अजी संसार में
क्या कुछ लेना। एक सत्य वचन रहि जाय और
कुछ लेना है ना देना ॥ क्या रहना हो सदा
जन्त भूतकी सम्पत सब मिटजाई। धन धाम पुत्र
परिवार यार हित संग कोई नजाई। सब ठाठपडा
रहजाय हाय धनधुरमें सब मिलजाई। मेरो सरबस
जाय तो जाय रहै एकसत तो संगखदाई । उड़ान
दिज चलो महलके माहीं। नेक रानी ते बतराई॥
धन दौलत सारी लेड और लेड सजी सजाई से-
ना॥ नृपकहीसुनोमहाराज०॥द्विजधीरजमनमेंधरो
तुमारा रहा साठभार सोना । मैं झूठन जानूं बोल
फेर मुख ऐसे वचन कहोना ॥ मैने संकल्प जो
दियों समोरविआगे जल दोना। बाचासोहारू
नहीं पिछारी होनहार मो हो होना ॥ उड़ान ॥
A
१२ * हरिश्चन्द्र लीला सुतनार वेच मैं डारूं। पर वचन कभी नहार। सिर काल रो महराय हस्यारी हरदम इसकी . हना ॥ नृपकही सुनो महाराज."२॥ वचनों के बांधे खडे सिंहसे बली महारणधारी। जलऊपर थापीभूमिउधर आकाशदियरचन्यारे॥ औरशेषभार सिरधरेवचनतुम मानासत्य हमारे।। उड़ान । करपकडचले द्विजराई । भग अवधपुरी समुहाई ॥ घसेडचोढी भीतरजाय कुमर रोहितास से ऐसे कहना । दृपकही सुनों महाराज.॥२॥ तुमसुनो कुमरजीबात अब यहमहल जोखाली कीजै । और सनीऐ लेउबुलाय वचनसमझायजो ऐसे दीजे । मेंहार कौलजोगया माल धनसर्वस द्विजही जीको ।उडान।। येहवेही द्विजराई। जिन मोय संकल्प लिवाई। सुन्दर कहमुत कहा करूँ कनक मोपे तिलभरकरिझोना ॥ नृप कही सुनो महाराज ॥४॥ -
.
हरिश्चन्द्र लीला १३
दोहा-हे माता अबसुख तजो,विपतासे परयोकाम।
नृपति कियोसंकल्पसब,राजपाट धनधाम।
राग कलिंगला।
'मेरी मानोरी महतारी। छांडो महल तिवारी॥
नृपति गये आखेट करन को तहां विप्र एकपायो।
राज पाट संकल्प करो सब बाकीकछु नरहायो।
मेरी मानोरी० ॥ पूतसपूत वही या जगतमंतातके
ऋणहि चुकावे। नारि कुलीन सती पतिभरता
पतिहित तनाहि गमावै ॥ मेरीमानोरी महतारी ॥
वेदन धर्म पुत्र को गायो श्रुतिको कहत पुकारी।
पिता कर्जजो सुत नचुकावै सो कुपात्रतनधारी॥
मेरी मानोदी ने यही सारसुन माता पिताको
ऋपा चुकाऊँ। साठमार मुवरणजोदे ताकेकर
बिकजाऊँ ॥ मेरी मानोरी०॥ उठोग अबदेरको
जिन द्विज पकरेनृपढाथा । सुन्दरदान दिये पिन
विहि करो न अनं जलनाता | मेरी मानो०॥
११ *हारश्चन्द्र लाला
रानी वचन ब्राह्मण प्रति
दोहा-रांनी उठि तहते चली,पहुंची द्विजके पास।
हाथजोर सिरनायके,असमुख वचन प्रकाश ॥
कवित॥
दोउ करजोर सिरनाय रानी ऐसे बोली सुनों
महाराज यह विनती हमारीहै। बेटा रोहितास और
मोय संग लीजें आप बेचो साठमारमें जहां मरजी
तिहारी है। खाऊ नहीं अन्न और पानी मेंतो जब
पीकं दकं दक्षिणा सो साठभार सारी है। सुन्दर
करम गति देखो न टरत दारी बन में विचारी रोई
जानकी सी नारी है।
विष पवन रानी प्रति
दौ-मत पावे दुखतू त्रिया,महलन की सुकमार।
रांजा को समझायदे,नेक वचन जायहार ।।
शहर शहर लीये फिर घर घरद्वार बजार ।
कहो मुख हमहारेसतहि वृथाहोयक्योंख्वार।।
रानी पवन मह्मण भति कवित्त ।
सुनों महाराज द्विजराज़ अर्ज सत्य मुख केतो
*हरिश्चन्द्र लीला १५. जगत जीवनको पापसिर ढोवे। झूठेनकी जीमन को यम छेद भालनसों महाभारीपावे दुखसिरधुन रोवे है ॥ ब्याहकी बरात ज्यों बजार लूटे पूतरी हायरलुटवाय व्यर्थतन खोवे है । सुन्दर कहोजी लाखबार चाहै विप्र आप जायन हमारो सचदेह कौन जोवै है॥ विष पचन कमर प्रति । दो-सुन बेटात चतुर अति,नृपको दे समझाय। सत हारेनाहींकरे, व्यर्थ बिकनको जाय ॥ सोरग-पावो कष्ट अनेक, घर २ डोलो भटकते। सत की जंडोटेक, नाहीते बिगर न कछु कमर पचन दादरा-क्या मोको समझावैरेब्राह्मण ॥ दुनिया दोलत माल खजाना संग नहीं कछु जावे। यमके दूत कण्ठकोधेरे फिरपीछेपछतावरे.बाह्मण । सत्य असत्य संग जगसाथीहै हरिनामसहारा। महाक- ठिन मवसिन्धु प्रवल अति साराई, धुन्ध पसारा - १६ * हरिश्चन्द्र लीला रे ब्राह्मण ॥ चलना दूर देश नर्दि अपना गांठ न खर्च छदामें। काम क्रोध मदलोद मोह यहठगर राह भुलावेरे ब्राह्मण ।। कहांजाय आवै पुनि कहते अमर ब्रह्म सुखछावै। सुन्दर वेयवेव नहिं मिलता जो यह भेद बतावैरे ब्राह्मण। क्या मोको सम- झावरे ब्राह्मण ॥ कुमरं पचन निभर्वि दो • बारबार अब जिनकहो, हमसे तुम यह बेन। जी चाहेबेचो जहां, हमें उजर कछु हैन । संग लक्ष्मी हे सदा, सत्य रूप भगवान । सत छोडो जिनसोगयो,घोर नर्कनादान॥ विपन दो-चलोउठो तीनोंपरो,काशी सडक किनार। घेवू जाग्राहक घने, बीच शहर बाजार । समाजी वचन। दो-तीनों प्राणी चलदिये नृपति पुत्र औरनार! महाप्रसन्न अति,मगनमन सत्य हदयमेधार। M.1...
हरिश्चन्द्र लीला
TIONAL
COM
एनी
SAKASHARMA
छक्ति।
राजा और रानी सुत तीनों प्राणी चल दिये
रो. नगर नरनारी छाती फार फारके। ऐसो विध
कर्मरेख मिटत मिटाई नाहि केसी विध विपतदई
नृपतिको टारके ।। रानी सुकुमारीको विचारी न
चल्योजाय और २बैठजाय क्षण २ हारके। सुदर
बनायके बिगारे अभू काऊकी नाजीवतही मरजाय
आपको निहारके ॥
HYTOL १८ * हरिश्चन्द्र लीला दो०-पग २ पै बैठत चलो,असी झुकाम है दूर। काशी यहांसे दूर है, सुनिये अर्ज इजूर ॥ रानी वचन दादरा॥ धीरेचलो मैं हारीरे ब्राह्मणादोउ पगनम्हारेछाले पड़ गयेप्यास लगीम्हाने भारीरे ब्राह्मण॥ केतीद्वर थारी काशीनगरी कहो मुख सत्य उचारीरे ब्राह्मणा कमल बदन अकुलाय कुमरकोप नेक लेउ पुच- कारीरे ब्राह्मण ॥ जो अकूर विधाता. लिख दियो सो नहिं टरते टारीरे ब्राह्मण । प्राण रहें चाहें जांय हमारे पर नहिं हम सत हारीरे ब्राह्मण ॥ सुन्दरवैद्य विपतिको टारे गिरि गोवर्धन धारीरे ब्राह्मण। धीरे चलो मैं हारीरे बामण ॥ वार्ता-विश्वामित्रने मनमें विचारा कि राजारा- और कुमर तीनों सत्वको नहीं छोड़ते हैं और प्यास के मारे इनको जीव घवडायोजात है.ताते इनको काहू विधः जल पिवायः इनके सत्यको
* हरिश्चन्द्र लीला १९
खण्डन करूं ये विचार अपनो रूप बदल लोटा
डोरले कुआपर बैठ गये।
दो-लोटा डोरी हाथमें, रच मायादिजराज ।
कहन वचन नृपते लगे जलपीयो महाराज ॥
विष वचन राजाप्रति कविच ॥
एहो नृप बैठो नेक छायालेउ वृक्षनकी ठण्डोपि-
ओ पानी खचू लोटा ताजी मांज के । महा भारी
धूप पडे मुखपै पसेव छायो रही थोरी दूर काशी
पहुंच रहियो सांझके ॥ ऐसो कहा काज जाते पते.
घवडाय रहेकहो समझाय सब सत्य हृदय मांझको
मुन्दरजो काया राखे धर्म या जहान बीच याते.
पियो नीर सुखदेड काया काज के ॥.
राजा वचन गुंगधपान
जल पीऊं नाहिं सुनो द्विज बात हमारी।
दीजे यह आशीश बिके जो मत औरनारी।।
जोतीनों बिकजाय सत्य मेरो रहि जाई। सत्य एका .
रहजाय जाओ चाहेमाण मलाई। पानी से
.
।
-
१
हरिश्चन्द्र लीला
पीऊं दान द्विजकों नहिं दीनी । सुन्दर समझ
विचार सत्य संकल्पति कीना।
समाजी वन
दो०-ऐसे कहिनृप चलदिये, जिनजलपीयोनाहि।
धीरे २ चलतही, रानी पहुंची आय ॥
विम वचन गनीसे
दो०-गुन शनी तरावती, बैठ जो छायामाय ।
पानी ठण्डा पीजिये, जो शरीर सुखपाय ॥
सो-तुमरे नृप भतीर, रानी, पानी पीचुड़े।
सुनामुन्दरिसकुमारि, पियोनीर करोसोचना।।
रानो वचन गुंगधपान॥
मुनो वित्र महाराज नीर हरगिज़ नहिं पीऊं।
प्राण रहो चाहै.जाउ सत्य तज कबलों जीडी।
। नृपति पिझो तो पिओ उन्हें सबरी सामर्था ।
हम पतिशा नारि वह मेरे स्वामी भर्ता ।
देओ यही अशीश नाथ हा कई विकजाई !
तब आप गावे नीर उमाण द्विजते है. जाई ॥
।
-
है।
हरिश्चन्द्र लीला २१
राग गुंगधशान
घुनि पीछे शहितास कुमर आये कुँआ पासा ।
द्विजने हाथ बढ़ाय को पानी पिओ खासा ।।
राजा रानी पिया यहां पर ठण्डा पानी।
काया पावै चैन होय नाई या हानी।।
शीशनाय ढिंगजाय कुमर यह वचन सुनाया।
आप कहो सो सत्य वचन तुमरो मन भाया।
दे सेरे माता पिता करें सो उन्हें सोहे।
सत में छोडों नहीं काय तन और का होहे ॥
ऐसे काहि चल दीये कमरने रस्ता लीना।
सुन्दर बैब सोधन्य जिनन यह दृढपण कोना।
समाजी बचन ॥
दो०-अति व्याकुल तीनों जने काशी पहुंचे जाय।
सुन्दरजोविधिलिखा, काऊ विधिनगिटाय।।
सो-चौपड बीच बजार हिजने गडे का दिये।
रोवें नर और लार देख रूप तीनोनको ॥
विप्र बगन
दो कर उठाय द्विजने कझो,सुनो सफलनरनार।
मैं बेचं इन तीन कंचन मालहि मार ।।
,
२२ हरिश्चन्द्र लीला के
सो सुन्दर कान्ति अनूप,चन्द्रवदन मृगलोचनी।
देखत याको रूप, रती शशी शरमात हैं।
दो -जस नारी हरिश्चन्द्रकी, तीनलोक तसनाय।
महाभवानी पतिव्रता,सत्य सती सुखदाय॥
तरावती जेहि नाम है , हरिश्चन्द्रकी नार
आडी वीच बजारमें , देखत सब संसार ।
नृपसुंत दारापुर अड़े काशीजी जेहि नाम।
रामनाम मुख रट रहै,और कछु नहिकाम॥
हिर सब कर रहे,काशीके नरनार ।
लिखोजोविधिक अंको,सकेकोनविधिटार।।
विप्र पचन ॥
दो०-अरे होय गाहक कोई, जो या पुरके माहि
तो मोते सादा करो, है प्रसन्न मनमाहि ॥
फवित्त ॥
नगरीअयोध्या नामराजाहरिश्चन्द्र येतो औरयाकी
रानी यह तारा सुकमारी है। बेटा रोहितास पढ़ो
लिखो होशियार जाकी कर्मनकी रेख कछु टरत
है
in
कवित ॥
* हरिश्चन्द्र लीला ૨
न टारी है। बीस २ भार सुर्वण सो एक एक को है
जाप होय लेय सोई मनमें विचारीहै । सुन्दर करम
गति विधि जैसो लिख दियो भोगनो पडेगो संब
देह दण्ड भारी है।
दोहो-गौर वरण नवयोवनी, कन्चन रूप अपार।
सुन्दर त्रिय हरिश्चन्द्रकी,रोवैखड़ी बजार ॥
नैननसा नीर जारी रोवैसो विचारी नारी बिपता
को संगी नाहिं कोई संसार में। मुखमें अनेक हितू
चित्र और विचित्र सम नीके नीके बोलें बोलीमीठी
सी दारव्दीनबन्धुदीनानाथ टेरजोइमारीमुनों
भेजो बेग गाहक सो लेय साठ भार में । मुन्दरसो
नारी देख.गणिका एक बोल उठी को विध मोल.
कहा बैठे विचार में।
मणिका वचन दादरा ।
बीसभार ले सोनार ब्राह्मणां यह नारी हमको
देदीजे याकी आँखों में टोनारे बक्षिण ।। बैंठी मोज.
ॐ. हरिश्चन्द्र लीला
करो पलंगनपरखाओ मिठाई दौनारे ब्राह्मण पान
सुपारीमेवा मिश्री मेरे कछु कमीनारेबालग॥ मारी
लोट गिलम तक्रियनपर पर पुरुपनसंग सोनारेबा-
मण । सेवा कर टहलनी तनकी दुख मो घर कछु?
नारे ब्राह्मण । सुन्दर करत बीनती हिज सों मोय
याके हाथ न बेचारे ब्राह्मण
विप्र वचन ।
दोहा-ईगनिकाअति चतुरतू,जोतें कलो मुखमोल।
बीस भारला द्रव्य अब,गांठगिरहसे खोला।
लामनी।
सत बादिन तारा नारिखडी बाजारनेनसरोवे।
हाय अब मैं कैसीकर किसब गनिका को मोपैन
होवे विधि कीनी सोतेभली गलीरझाडूंसबबानि
आवौपानीभरलेकेआरक्षणकोजहांकहुंमोयपठावे,
महा कठिन कठिनते कठिन कठिनते कठिन काज
कर आऊं। मेरीहाथजोरसुनोअर्जविजी गनिका
संगनजाऊं ॥उड़ान। परपुरुष न मोयसुहाईमिगे
ॐ हारश्चन्द्रलाल को ૨
पतिव्रत धर्मनसाई । कुछ सोच और समझविचार
अरे द्विज जागहें कैसोवासातवादिन ॥ योकहन
वेश्या लगी याकी मति हरी श्री गिरधारी। अरीतू
जिन चिन्ताकरे विचारी भोरी सीतू नारी ॥ जल
भर लाइयो बडे भोर जोरमें कछु नाहींतोतेकरती।
निपता तेरी कटि जाय भटू क्यों नयनन में जल
भरती । उडान ॥ नहींझूठे पात्र मजाऊ पगनाय
री बीर दबाउं॥जो बने सो करियो रहल अरी
सब बात भला भल हो ॥ सत वादिन ॥२॥
द्विज कयो देउ सोय दास माम मोय जाना बडी
सवारी। यह है हरिश्चन्द्रकी नारि वडी मुकमार
येकोमल भारी॥ घरतेबाहरनहींकढी. विपतवस
तेरे हाथ बिकानी । दुखदेना इसको नहींबातमेरी
इतनी लेनानी उडान।। दिया हाथ चिपक
राई । ले जावो यहांसे जाई॥ सब काम में है
हुशियार फुलकिया पतरी पतरी पोवै ॥सत ॥३॥
२६ हरिश्चन्द्र लीला चलिदई जो तारा नारि गहमोकर वेश्याने हरषाई। नेक मोडिंग आ मेरे लाल अरे तोय छाती लङ लगाई।जोलिख दियो विधि अङ्कर मिटतसोहरागि ज नहीं मिटाया। एक रयो सत्य सब जाउ अमर कहो किसकी जगमें काया। उडान चिन्ता करिः यो सुत नाहीं। ये वक्त न रहे सदाही ॥ जो कृपा कर जगदीश पुत्र सब बिएता पलमेंखोवै सतवा दिन तारा नारि खड़ी बाजार नैन भर रोवै॥४॥ । समाजी दचन ॥ दो-रानी सुत रोवत तजो, सरे बीच बाजार। गनिकाके संग चलदई,बहैनयन जलधार।। दोहा-क्यों रानी तू छोडती,नैनो से जल धार । जोपावे कछु दुख दृदय,अबहुवचनजाहार ।। रानी दवन विभ प्रति॥ दोझ-ई स्वभाव यहदेहको सुनों वित्र महाराज। दुखमें रोवै सुख इसे, चहे कर लाखइलाज विप्र वचन
की हरिश्चन्द्र लीला २७
सोरठा-मिले न अन्न अहार,लंघन चाहे लाखहों।
परनसत्य हमहार,प्राणकाल चाहैआजजाय॥
समाजी वचन।
दोहा-गणिका गृह रानी गई,तजञ्चत ले पतिसोखा
सुन्दर अवआगे भनतजो चरित्र शुभदीख।
सेठ वचन ।
दोहा-बैजनाथ मम नाम है, रहूंजो याही ग्राम ।
लडका मोर दीजिये,बीसभार लेउदाम ॥
विप्र वचन।
दोहा-आउ सेठजी बैठिये, लेउ दोनों को आप।
यह बेटा रोहितास है, यह है इसको बाप॥
सेटजी वचन कवित्त।
यक्ष तो बनारस में वास मेरो सुनों विप्र नाम
बैजनाथ साहूकारो मेरो भारीहौहाथा और घोड़ा
रथ पीनसडू कई जोडी माल और खजानेकीपरत
नशुमारीहै । एक नहीं पुत्र याते धूर सम सब
कहो कैले चले नाम मम लोकिक संसारीहे । सुन्दर
२८
हरिश्चन्द्र लीला
सो याते आज गोद में बैंगरो याहि भोगो पुत्र
राज धूप छह ना निक्षरीहै ।
समानी वचन।
दो-दोस भार कंचन विपे,विले कुंवर रोहिताल ।
सुन्दर मिटत न लेख विधि होनहारवहपास।
सरानी बचन।
दोहा-रोक्त रूप सतको बध्यो,खडोविर के पासा
आपभीरलसिसुरपरयो सुन्दरविहिदास।
सुपच वचन।
दाइरा-कहि द्विज मोल विचारी सूपको,
कालुआ नाम जासनेरी भनी दहल हमारी भारी
टकरावील भार कंचन ले हम से जो तुम दुख
उच्चारी । चना बना सत्तू लाज शाशे शहर
सपारी भूपको० ॥ मरघट जाय उतारो कफ्फन
लेउ जोकर ये जारी।भूप०॥यापुरको कोतवाल
ही हूं इज्जत धनी हमारी।सुन्दर वैध भूप कहा
सोची कर्मन की गति न्यागभिया
२९
* हारश्चन्द्र लाला का
दो०-बीस भार कंचन दियो, मनमें अति हरलागा
सुन्दर नृप चलेनीचवर, कर्म न रेखामटाया,
नाथ गति तेरी न जान परे। धर्म कियेते पाप
होतहे पापिन वर्गपरे ।। नृप लूग कहा कपट प्रभु
कीनों गिरगट योनि घरे । शुक्र शिष्य को भला
चहत हो ताकी आंख हरे॥ नाथ० ॥
हिरनाशनुतको समझावै मौत कुमौतमरे। तारा
बाम नृपति हरिचन्द की गनिका की टहल करे।।
नायगति०॥ सत्यसरूप भूपसतबादी सुपच को
नीर भरे। हायदई यह गति कहा तेरी भत्ताहि भार
जरे।सुन्दर तुम गति महा अगम प्रभुभावई अमर
फिरे । युरो भलो जैसे तसतेये पुनि २ होत भूमे।।
नाथ गति ॥
दो-सुपच घडा नृपकोदिबोपानी भरला जाउ।
देरजश कीजों नाह, बेगी भर कर लाउ॥
एडा से वरखें घरोफिर आऔ समपासा
३० * हरिश्चन्द्र लीला
तोय बताऊं हाटमें, बनियाकी सुखरास ।।
सुनो सेठजी ममवचन, लिखो बहीमनाम
यह चाकर हमरो खरोसौदा देउ बिनदाम।।
जो मांगे सो दीजिये, करिये मत इनकार ।
लेखोकर सब लीजिये,सब रुपया कलदार॥
सो -नितप्रति लेउ तुलाय,या बनियांकीहाटते ।
मनमें मति सरमाय,जो चहियेसो लीजिये।।
दो-तीन दिनाभये भूपढूं,कियो नअनजलपाना
सत लेकर चल दियो, करन गंगल्लानः ।।
द्विज वचन।
दो-नित्यनेम नृपनेकियो,रविको शीशनवाय ।
सत्तू चोरोगंगजल,द्विज एक पहुंचो आय॥
सो-चिरंजीव रहो भूप आशिरबाद जोमेंदङ।
लागि रहीमोयभूख तीनदिनाभये अन्नबिन॥
रा०-अहाअहा महाराज,वक्त नीकेपर आये।
भली भई में प्रास.अभी करनाय उँठाये।
हारश्चन्द्र लोला
३१
आधो, सतुआ बांट भूपने द्विजको दीनों।
कहन लगे द्विजराज अरे तैंने यह कहा कीनों।
मेरो भरो, न पेट भूख मोय लागी भारी।
सुन्दर पुनि हरिचन्द्र अगारी करदई थारी ॥
वेश्या वचन रानी प्रति ॥
गनिका रानीतकयो मुनि बांदी मेरी बात ।
गंगाजल भर लाउ तू बैठी कहा जम्हात ॥
शीश थरी गागर त्रिया चली गयन्दी चाल।
जल हिलोर घटको भरो.बगदी ले उत्ताल.॥
रानी जल भर ले चली गागर सोहे शीस ।
सुन्दर विध रेखा अमिट मिटत न मेटे ईश।
सो जलभरलौटीनारि मारग घरकोलेलियो।
जात मिलो साहूकार जाघर सुत रोहतासहै।
राना वचन सेठसे,कवित्त।
नेननते नीर बई.रानी कुशलात पूछ कहो पिता
सेठ मेरे लालकी कुशलात है। कैसे रहे कहा करे
रोवत के मेरे लिये विधिने बिछोयो हाय कियो
का हरिश्चन्द्र लीला
एक साभहानिगरीको मोल कहा कायदा विदेश
नाय सोरदेयगारी पिता वेश्या विन बात है।
सुन्दरकहत सेठ मेरी बेटी तुम गोर इकलौता पुत्र
बिन देखेन सुहात है।
खेड इनन।
दोहा-सुनत्री मेरी बात,मतमन मनकापासो
लोय वेश्याले लायके, रावं तो सुत पास।
गनिका के गृहसेठजी तुरतहि पहुंचे जाय।
गनिका अपनो द्रव्यले रानी देर महायः ।।
सो -यह राणी दे मोय, पुत्री समचाहि राखिहो ।
तेरी टहल नहोब मेर हरिसेवा करे
दोहा मन प्रसन्न गनिका भई कमो देख मोघ दाम।
बैठी हिन भर यहरहें करे नहीं कुछकाम ।।
सो सुनमुख अतिभयोमोयअहोसठतुममलको
टहल न यापे होय निशदिन मैं झींकतरहू।।
दोहा-सेठ वेश्याते लई रानी हाल में मोल ।
बौस भार सोनांवणिक तुस्त देत बिनतोला।
समाजी पचन
हरिश्चन्द्र लीला सनी वचन कवित्त । माता देख पुत्रको आनन्द भयो महामन धन्वर सेठ तुम धन्य पितारामजी । जुगर जीओजोअ- शीश तुम्हें देत मेंहूं अन्त समय बासकरोवैकुण्ठसे धामजी ॥ फूली २ फिरत मानों नवनिधि की ढेरी पाई एक पर भूप नहीं यही रह्यो काम जी। सुन्दर कहत ठाडो विधि करो भाग्य कब देकेधन्य वाद लखें अयोध्या सो गामजी ॥ समाजी वचन। माता और पुत्रदोनों सेठही के धाम में हर कों भजन करें ध्यानहीं लगायके । पूजा और पाठ करें भली भांति नित्य नेम प्रात काल न्हाय जांय गंगा हूं पे धाय के ॥रोयदेत रानी और बेटा रोहितास कुमर सुधू कर जाने कैसे काटे दिन भूप वहां जा- यके । सुन्दर विधाता अंक विधये न मंटे जांय तीन लोक पति रोये बनोवास पायके ।
३४ * हरिश्चन्द्र लीला
दो-जलभर नृप सत्त लियों,बनियासेतुलवाय ।
मनीकरणका घाट पर,विन घसे जल माय॥
नित्यनेम नृप कृत्यकर,सत्तु जलहि घुराय।
भोगसमपोंविष्णुकों,पुनिद्विजपहुंचोआय॥
॥ ब्राह्मण वचन
राजा वचन ।
दो. हाय हाय भूखो मरो, भये तीन दिन रात।
भेट भयो न अन्नते, जी मेरो अकुलात ॥
समाजी वचन।
दो-अहो विप्र सुनिये अरज तुम्हें नवाऊं साथ ।
है प्रसन्न भोजन करो, यह लेउ सत्तू नाथ ॥
दो-याविधि नितप्रति विप्रही सत्तू छक गृहजाय।
चालिसदिनभयेभृषको, अन्ननिल्योहतलाय॥
सो०-नृपपैचलोन जाय, शिथिलमई इन्त्रीदसों।
प्रभु को भूलत नाहि,पीवत जलभर पेंटही ।।
दो०-पी जल बांधो पेट नृप पा लगायो हाण
डगमगडगमगायघटननातघरमोमाथ।
ॐ हरिश्चन्द्र लीला
राग गुंगधपान ॥
नृप बल बहुतकि करो घड़ा नहिं उठत उठायो।
कितनेन ते कह पच्यो हाथ काडू न लगायो।
बिगरीका नहींमोल हाय कोई टिंग नहींआवे।
भूप हृदय महा सोच सुपचआज बहुत रिसावे।।
नैनन छायो नीर नज़र रानी पर जाई ।
नीर सेठको भरन तीर गंगा के आई ॥
सुन्दर नारी देख नृपति को शीश नवायो ।
परकम्मादे सात बहुरि अस वचन सुनायो ।
रानी पचन।
दो -सुनिपति सतमतांडियो,सतोडेपतजाय ।
सतकी बांदी लक्ष्मी,बहुरि मिलैगी आय ।।
दो-हेरानीमें क्या कहूं कहो कळू नहिं जाय।
चालिसदिनभयेअन्नाविनषडाउन्योनहिंजाय।
सो-दोन घड़ा उठाय हे संनी तागवती ।
मोपेउच्योनजायचालिसदिनभये अनविन ।।
-
राजा वचन
१४.
२
* हरिश्चन्द्र लीला के
वार्ता-हे महाराज आप दिन भर पानीढोबेहो
क्या आपको सुपच लाने को नहीं देतहें यह सुन
राजा बोलो रानी सुपच विचारनेतो मोदीकी दु-
कान बताय दीनी है परन्तु जा समय में ठाकुरजी
को भोग सम' हूं ताही समय एक भूखो ब्राह्मणं
आय जायहे । सो वोसब पदार्थ वाकू देदऊहूं और
केवलं जल पीरकर कर चालीस दिन व्यतीतकिये
पर आज मेरे प्राण लण्डनत आय रहे हैं सोतू मेरे
सिरपर घड़ा उठान्य कर रखदे तो मैं ले जाऊं ॥
राजा वचन ।
सो-दीजे घड़ा उठाय, हे रानी तारामती ।
प्राण कण्ठगति आय,शिथिलभईइन्द्रीदसों।
दो नानीजी नेक मो घडा, दीजै हाथ लगाय ।
बिगरको कछु मोलना,देखलोग निखाय॥
। रानी बचन ५
-राजाजाने क्या कर, चर्म न छोडो जाय।
मोपे गांगर सेठकी, तुमपे सुपच की हाय ॥
RAN----
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की हरिश्चन्द्र लीला * ३७
राजा जी छीऊ नहीं, तुमरी गागर आय।
जो तुमरी गागर छिडं, धर्म हमारो जाय ॥
सो-दऊं उपाय बताय,गौडन पर धरिये घड़ा।
लीजें फेर उठाय,या विध धरियेशीश पर ।।
दो-याही विधनृप घटधन्यो सुपच गृहगयोधाय ।
महा क्रोधभयो मुपचमन,गारीदेत रिसाय।।
।
सुपच वचन।
दो
०
o-महा आलसी जीव तू, सुनरे हरिया भूप।
घर की सम्हरे टहलना, तोपें उत कपूत ॥
तो कछ नहीं कामहो,मोपै नारि रिसाय।
यहांतजा समशान विच, मृतक वनलेधाय।।
पांचटका करके लेओ, मुर्द घाट परजाय ।
और स्तारो वस्त्र वह, कफन नाम कदाय ॥
. . नृपको देखो सुपचने, पुनि दई टहलबताया
मुर्द घटा मणिकर्णका,मुर्द घाट पर जाय ॥
नृपचाले मणिकर्णका, घाटहि बैठे जाय ।
सुन्दर वैद्यजो भनतअब,आगे कथाबुझाय॥
,
३८ हरिश्चन्द्र लीला
दो०-पूजाकरत जो सेठने,लियेरोहितास बुलाय।
फूल तोरला बागते,बेगी उठ भज धाय ।।
समाजी वजन
दो०-सुनतवचनंगये कुमरजी,जपत चले हरनाम।
सुन्दर वैवजो भावई काहू पै न मिदाय ॥
विश्वामित्रजो अहिबने,महा कारियल हाया
फूलन बेलन बीचही झटही गयौ लुकाय ।।
सो-जबडिकुमर रोहितास.फूलतोरवेकू लग्यो।
भई देव की घात, डस्योकारियल नागने ।
'राग गुंगधपान ॥
पुनि द्विजनालणबन्यो भज्यो रानीटिंग आयो।
हाय रानी रोहितास बागमें नागने खायो। लीलो
भयो शरीर जहरछायो सब अगा। रोयेते कहाोय
बेगलेचलिये गंगा ॥ रानी खाय पछारहाय बिधने
कहा ज कीनी। परदेशनमें लायविपति अतिहमको
दीनी ॥ पिता सेठते कहूं दुःख उन्हें होगा भारी।
* हरिश्चन्द्र काला ३९
छूटे तिनको भजन होय महामारी ख्वारी रोवत
रानी भनी तुरत सुतके टिंग आई। देख कुमरको
हाल गिरी धरणी मुरझाई होनी नाय मिटायकर्म
की रेखा न्यारी । सुन्दर वेद्य सहाय करे गिरिवर
गिरधारी॥
लामनी।
रखलिया गोदमें शीशबागके बीच त्रियारोवै।
हायटुकतो मुखसे बोल अरे मेरे लाल धरणिकैसे
मोथै ॥ कुछ कहना होयतो कहो करू, मैं कैसे रई
में कैसे । मेरे इकलौता सुकुमार अकेली छोडजाय
मोय कैसे ॥ ले चलिये अपने साथ दगांनहीं परदे
शन में दीजें । और कैसे जीवे भूप सुनतही कृप
माहिं गिर परिये॥चौपाई। विधि तैने यह कहाकी-
न। मेरो छीन लाल क्यों लीनों ।। करीदयाकुमर
सुना अर्ज हाथ तेरी सात रोय तन खोव ॥ छ
भयो कुमरको होश देतजाको इस्तेि.लगोजोभारी।
यो कहन मातले लनो अरी मुनकर्मनकी गति
३. परिश्चन्द्र लीला *
न्यारी।क्यारुदनकरेले होय विधात अंकन मिटत
मिटाई । मेरी रामराम लेमाय दीजेसमझाय भूपक
ताई। चाहे लाख विपत परजाय सत्यकोहरगिज़
त्यागे नाहीं ॥ चौपाई॥ को पुत्र कोन महतारी।
मिथ्या संसार असारी।। ढर जाय हवाकेलगेओस
को मोती कहिको पोवें ॥ धलियो हर माया
काम ओर क्रोध लोभ जग चार लोहकी बेडी।
किसकी सुख सम्पत भई मये योंही अन्त चकवे
पेडी।। जाके उदय अस्तलों राज योंही क्षण भये
राखकी देरी। मेरी मेरी कहगये अरी यह मेरीभई
न तेरी ॥ चौपाई॥जब हुक्म धनीकोआवै । तब
सिर धुनरपछतावै ॥ लुटजांय दशों बाज़ार सुनो
फिर रोनेसे क्याहोवेधिरलियो० गंगाजलतुलनी
पात आन सुख भीतर डारजो दाज । उस हरिको
सुमरन करूं तां भवधार सुखसे पीज छोडासद
यहां का ठाट हाट जाने कहां जायकखालूं। मोपे
नहीं बोलो जाय घिर आयोकण्ठकैम में बोलू ।।.
..
४१
की हरिश्चन्द्र लीला
चौ:--मेरी हाथ जोर सुनों माता । सुन्दरजग
जीवत नाता। लेओ बोल भूपते कहो लाशमेरी
अब गंगा कू ढोवे ॥ धर०॥
समाजी वचन।
दो -कुमर गये वैकुण्ठको, रानी खात पछार'
सिरधर मरघटको चली, संगनहीं कोईनार॥
वार्ता-रानी कुमरकी लाशको लेकर गंगापर
आईऔरराजा को क्यादेखकर हाथजोडकरबोली
आज ये बाग में सर्प के काटने से मृत्युहोकरमो
अभागनसे मुख्मोडकर चलढ़िया जैसी आपकहो
तेंसी में कलं.॥
सो -हाथ जोड सिर नाय,रानी राजातेकयो।
दीजे याहि जराय,पुत्र तुम्हारो अहिडत्यो।
r
॥
राजा वचन ।
सो -सुन रानी मेरी बात में सत• त्यागू नहीं।
पांच टका घर हाथ,जव फंको तमकमरको।
RE
---
--
------
-
हरिश्चन्द्र लीला
रानी दम लादनी
कंथजी अर्ज सुनो मेरी हाय मैं बिपतानेरी।
॥ टेक । परदेशन में आयो बुरी करी करतार ।
पुत्र विछोयो विधिने कियो बीच हृदय हुआ पार॥
हाय कसं मानन की ढेरी ॥ कंथजी ॥ टेक ॥
पांच टका तुम मांगते मोपे नहीं छिदाम ।'
पानी भर गुजरान करत हों सेठ विचारे के धाम॥
चितौ नेक पति मोतन हेरी ।। कंथजी ॥टेक ।।
धन इकठौरा कर चिता चिनूं दऊं आग ।
पांच टका करो माफ प्राणपति फूटे मेरे भाग ।
हुक्म करो बेगहोत देरी ॥ कथजी अर्ज०॥टेका
बाकर डूं सपच को सुन रानी मेरी बात ।
बिना करलिये फूकनजोदउंतो धर्म मेरो अबजात।।
मानकही सुन्दरि त मेरी कंथजी अर्जमुनोंमेरी ॥
राजा वचन कवित्त।
मेरेकुंछ हाथ नहींगनी मेरीबातमुनोंमरचौपुत्रजो
पैतो भलेई मरजानो धर्म नहीं छोडूंमें तो चाकरहूं
------
-
हरिश्चन्द्र लीला ४३
चूहरेको संग चले सत्य रानीमुनों कानदेहोनहार
नाहिं मिटे लाखों जतन करोयोनदेपहिलपांच
टका पीछे चिता ठानद । सुन्दर जहान बीच अमर
नरहे कोई सबकाल खाय वीन कालहालबानदे॥
समाजी वचन
दो राजा ने मानी नहीं, रानी भई लाचार ।
पांच टका के मोल में, चूदर दई उतार ।।
सो-रोवत जार बजार, फूंकत प्यारे लाल को।
बुरीकरी करतार,सुन्दर विधि अक्षर अभिट।
रानी वचन रागगुंगरपान
रानी करत विचार कहा कैसे घरजाऊंसिरऊपर
नहिं चीरनगन तन लाज जाऊं चार घड़ीदिन
अभी बैठकर यहीं बिनाऊं। रात जभीहै जायअधर
उठकर घर जाऊस सक्ती को मठ दूर सडकतेदूर
न्यारो।ताभीतर धसगई विचारी लेन सहारौं ।
दिनभर मिलो न अन्न विपति हरि दीनी भारी।
सुन्दर अपगये नेन नींद आई दुखकारी ।।
4.
के हरिश्चन्द्र लीला
समाजी पचन संग बंगधपान
विश्वामित्र अब आय रचो एक चरित्र अपारा।
व्याघ्र बदन भये जाय पुत्र एक वैश्यकामाराधर
गनीकेनिकर अचकचुप मृतकसिधारारिक्तलगाय
शरीर त्रिया कर डाकन डालापुनि मुनि मग मग
मांझ आयो पुरके पासा सीस नाय करजोरवचन
मुख अहित.प्रकाशा ॥ सत्ती के मठ भूप आईएक
डाकिन नारी। सुत एक देखत भक्यो अर्ज यह
सत्य इमारी ॥नृप को ऐसो धर्म वेद श्रुति कहत
पुकारी । सुन्दर पालन करेपुत्र सम प्रजा विचारी॥
दो-कलुआ सुपचह कोलफे,कयोवचननृपराय।
जल्द जाय डांकन इनौ,सत्ती मठपै जाय।
सुनत वचन कलुआ चलो,आयो मठफेमाया
जायकझो हरिश्चन्द्रते,व्यारे बार मुनाय ।
सो सुनरे हरिया भूष, डाकिन मठ बैठी दबकि।
कग्दे रूप कुरूप, सीस काटला बड़ते।
सुपच वचन
1 * हरिश्चन्द्र लीला ': पद-खड्ग कादि मृपमठकू धायो । खड्ग ॥ टेक ॥ सोवै सतीनारितारासी नग्न शरीररक्तालिप- टायो केशपकार लीने नृप गहिकर दे ललकारहि शोर मचायो । लखि त्रियकोतन चकितभयानक यहतो मेरी नारी । होयतो होय धर्म नहीं अंडों कर्मनकी गत कछुटरत नटारी । गृह छूटो और सर्प डस्यो सुत को जाने अब कैसी होई । सुन्दर वेव सत्य नहिं छोडू सुत दारा धन रहै न कोई ॥ समाजी पचन दो-नृप ठाडो कर केञ्च गहि हाथ नम तलवार। थर थर काँपै तियं बदन,रोवै जार बेज़ार॥ वार्ता-रामीका विलापकरके श्रीविष्णु भगवान कीस्तुति करना और राजाका रानीके केश पकड कर झुंझलाना और मंठसे बाहर घसीट लाना रानीका ईश्वर से.विनय करना। रानी वचन। लावनी-मेरी टेर सुनों भगवान भक्ताहितकारी
हरिश्चन्द्र लीला
मैनेकरी कौनतकसीरजोऐसीमारी।।टेकातजपुरी
अयोध्या धाम यहांहम आनृपभरैसुपचकोनीर
महादुख पाये ॥ गनिका हाथ बिकीमैं दुखिया
नारी । अब सेठकी करतीटहल विपति कीमारी॥
ममरमाण चाहेंजांय कंथपर रहो सत्यबतधारी।
मेरीटेर सुनों महाराज कृष्णगिरधारी।। बेटा मेरो
रोहितासनागने खायो । जिसे अपनेहाथोंआजमैं
गंग बहायो । अब सुनोमरे महाराज खड्ग मेरे
मारोजीनेसे भरना ठीकन तरसं विचारोलिया
पुत्र रामने छीन बिपतदई भारी । मेरी टेरसुनों०॥
जीनेकी तजो तुम आसं सत्य सुनोंरानी । तुम्हें
मारमर मैं आप यहीउर ठानी। अब चलोपुत्रके
पास स्वगको प्यारी । हम भी पीछे से फेंट बांध
करें त्यारी । निशदिनोंही आ जायसड़कमग
जारी । मेरीटेर०॥ सुनों देके सहस्त्र कान कृष्ण
बनवारी बिन बुझमें गर्दन महं खड़गपटतारी।।
सुन्दर प्रस्तावाल नाम वेदक चातौ निरीटेर .
N
हरिश्चन्द्र लीला
सुनों भगवान॥
समानी वचन ॥
दो०-लोक चतुर्दश थर हरे, कांपे दिग्गज शेष ।
विष्णु बोल नारदलिये,सुनों पुत्र संदेश ॥
सो -परी भक्तपै भीर,मृत्युलोक जाओ पुत्रतुम
महादास तनपीर हालन लाग्यो स्वगमम ॥
दो• बेगि जाओ नारदकुमर,वचन हमारोमान ।
कहो भूप हारेचन्दते,तजो चियाको पान ॥
नृप काटे त्रिय शीशको,करकृपाणगहिधोर।
रोवत रानी डर विवश हाय हायकर शोर ।
अस कहियोतू भूपते, सुनले तेरी बात ।
सत्य भयो पूरो तेरो धन्य भक्त कुशळात।।
समाजी वचन
-नारदमुनि पहुंचे तहां जहां भूप हरचन्द ।
खड्ग पकडनृपतको क्योंमईतबमतिमन्द।।
नारद वचन
पद-मानी कही हमारीअरेनृपमानोंकहीहमारी।
.
४८ की हरिश्चन्द्र लीला
॥ टेक ॥ गऊ ब्राह्मण बालक नारी इन्हें बधे इत्या
भारी।महा घोर मझधार नर्क परोदेखो हृदय वि
चारी || नारि ब्याहता को जो मारेते अति दुष्ट
अनारी । तुमतो सतवादीहो राजा क्यों अनति
विचारी ॥ यह तो नारि तिहारी प्यारी कांपतगात
विचारी का क्रियो अपराध निया ने जाकरो
खड्ग प्रहारी ॥ भयो सत्य तुमरो नृप पूरणे धन्य
कख अवतारी । सुन्दर छोड देउ रानीको व्यर्थ
कहा बुद्धि विचारी ॥
दो-हे ब्राह्मण सुन बाबरे,हत्या कैसी होय ।
इसे ह→ सतना गिनूं, क्या समझावे मोय।।
सत्य कह्यो प्रण मैं गह्यो,सूलूंना हरनाम ।
: सुपच गेह धन्धो करूं,मरूं नीर लखमाम।।
सो -सुपचको खायो नॉन, हम वाको टहलुआ।
कहीं वचन मुख जोन अंठो होय नस्वप्नमें।।
दो-तू ब्राह्मण कहा जानिहै मांगन खानीजात।
राजा वचन।
नारद वचन।
हरिश्चन्द्र लीला '४९
मुन्दरजाओलाख चहै,रहौ सत्य यकसाथ।
सो०-यहडाकिनअतिघोर सुतखायोसाहकारको।
स्वामी आज्ञा मोर,सुन्दर वैद्यसो.पापक्यों।
-रानीको नृप छोड तू, कही हमारी मान ।
नारद ऋषिममनामहै, विष्णुवचन परमान॥
॥ समाजी वचन ॥
दोहा-वचन अनेकन मुनि कहे, नृपने मानी नाय।
सुन्दर तब प्रगटे हरी, भक्तवत्सल यदुराय॥
चतुर्भुजी प्रभु कर बदन, प्रगटे भूप अगा।
धन्य २ सुत धन्य तुम,सुन्दर भन्न हमार ॥
सो कही जो मेरी मान, रानी को नृप छोडदे।
तू है भक्त सुजान, में प्रसन्न तो भयो ।
दोहा-क्रयाविशु मुनियनृपति, सत्यभयो तबपूर ।
के बीच में तुम भक्तन या
कि वचन राग कालिंगडा
ला, म स्वामी सत्य बोले बैनाधन्यहरि
मोन। सत्य नर जे सुख
is मरठ भारत जो बदनने ते
हारश्चन्द्र लीला
परत भवळूपाकैसे छोडों कर त्रियापै यह तिहारी
नारा तुमसरीलो भक्त दूजो और नासंसार ॥ मार
के कहा सुनहि पायोकीजिये निरधाराभक्तवत्सल
नाम मेरो वेद गावें चार ।। अब चलो सुतधाममेरे
विष्णुमेरो नाम । सत्य तेरो भयो पूरण मिलहि स्व
गहि धामपुष्पको ये विमानठाडो यामे बैठोआया
कहत सुन्दरराज नृपतुम अटलकीजै जाय ।
। राजा वचन ॥
दो-दीनबन्धु भगवान प्रभु, सत्य देव महाराज।
पुत्र जिवाओये दोउ, सफल होय ममकाज!
समाजी वचन ।
दो-काहि ऐसे नृप हरिचरण, गिरो महा हर्षाय
सुन्दरवैद्यसो मन्दमति सोमुख करोनजाय।।
वैश्यपुत्र ओ भूप सुत नाम तामु रोहिताश ।
हरि इच्छाते जी परे,महामुख वचन प्रकाश।
धुबनामरोहितासजेहि,और नृपतिहरिश्चन्द्र
रानी सहित जो जगपरे,महासुखी आनन्द ।।
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* हरिश्चन्द्र लीला
५१
राजा वचन कवित
दोडकर बोर नृपमानमयो सोमन अति अहार
शब्द कर विनती उधारी है। ऐहो प्रभु धन्य मोहि
धन्यमेरे भागनकोजो प्रदर्शदियोजान दासमुख
सारी है। आवत ना ध्यान बीच ईशाहू के ध्यान
घरे निशिदिन प्रेम ओनिज तपकोहारीहै। सुन्दर
बदन मृटु इसन दसन प्रिय फोटिन जनम लखि
वारितन डारी॥
राजा का स्तुति करना
आज मोसम और जलदिनाथ मलहे धन्यको।
देव देवन प्रतिहे स्वामी लोक लोकन पर्नको।सह
समुखसे शेष हारे बेद पार न पावहीं एकाग्र चित्त
से प्रभु तुम्हें सनकादि शंकर.ध्पावही घटहि घट
सर्वज्ञ व्यापक अलहि थलक रूपमापतित सुन्दर
कितिक तार कहा तुच्छक भूप में ॥
रोला छन्द
जप कृपालुजक्त चिन्तामणि सर्व लोक कारण
करणं महा अमाध पार नहिं महिमा अखिलनाथ
भवभयहरण संवा सर्वमर्वज्ञशिरोमणि कमलवदन
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५२ हरिश्चन्द्र लीला
श्यामल बरणं । सोहत लोल अमोल गोल हरिमा
ल मणिन शुभतन धरणं । सुर मुनि नायक दीन
सहायकपारब्रह्म श्रीरमावरं । दुष्टन पालक बजजन
पालक वृत्तवाविपिने केलिकराजगन्नाथ जगदीश
दयानिधि पुरुषोतम पृथ्वी ईशं । सुन्दर सुतदारा
नृपति भुआर जय २ हरि सुरपति धशि ॥
विष्णु वचन ।
दो-जो मांगे सो मांग नृप, तू .मोसे घरदान ।।
अटलराजकर स्वर्गमें,ममपद धरकरध्याम॥
चलो नृपति वैकुण्ठको बैठो पुष्प विमान ।
जयरधुनि सब मुनिकरें, हर्ष अप्सरा गान॥
सो-सहित पुत्र औ नारि,चलोभूपमम स्वर्गको
आति अभन्द उरधार, बजे पुष्प विमानमें।
दो-सुनो नाथ ममजर्जको, सुपचसंग बिननाया
स्वर्गचलोतो सुपचहु,और अवधमुखदाय॥
सो संग सुपच जो जाप औरअयोध्याममपुरी।
भली भांति सुख पाय तोमें चलिहोस्वर्गको
राजा वचन।
कि हरिश्चन्द्र लीला ५३
विष्णु पटन
दो-विष्णु कलो सुत धन्यातुम मानी तुम्हरी बात।
सहित सकल परिवारयुत चलोमुपचलेसाथ
समानी बचन
सो-बैठे पुष्प विमान सुपच सहितलगरी दोउ ।.
करतचलेमुखगानकुटुम्बसहितहरिपुरनृपति।।
दो०-जगतधन्यअसनिपुणनरकरतविष्णुगुणगान।
सुन्दरमूढ ते असुरनर करें और को ध्यान ॥
चो०-धन्य जगत जननी वानरकी। करतभक्त
ऐसी दृढ हरकी और कोन याजगकेमाही। बिना
विष्णु भवको सुखदाई ॥ भक्त वत्सल दीनन के
नाथा । सदा भक्त शिर राखत हाथायोगीजन ज
पतप जिह ध्या। शंभु रटत अज ध्यानन पावें ॥
सो प्रभु प्रेम विवश भगवानामित अधीन वेदमुख
गाना ॥ जे नरतन धरि जप माझी जपत नहरि
को नाम सदाहीं । तिनको बान समान निहारी।
सकल मुनीजन देउ विमारी ॥ हरि बिभुखन संगत
ঝুঁট ছিল তাই
जे करि हाविश्स्यतेउनरकविपरिहें।जभीतर
शुम गाम मँडोई । नाम मनमुख कह सब कोई
पास करहला गाम मुहाई । जाको यश मुनिवेदन
गाई । सुन्दर वैन विनतन पायो। नमकरहलावास.
सुहायो। सब मुनिजन कविजन को चेरोक्षमियो
प्रभु अपराशहि मेरो।। में अजान बालक अज्ञानी!
मकल दोपसमियोजनजानी।। सक्तचरित्रयथामत
गायो एकल जन्मकोअघहिनसायो।।सीलेसुनेगो
र शहलीलाामिले भक्ति अनुपम सुखशीलाचार
पदाच सुलभ जो पावै । दृढकर पाठजो नए कोई
मा मैं तो पतित कृष्ण को दासा । महा दान
हरि यक्ति पिलासा
झरे श्रीहरिश्चन्द्र लाला
समाधम्
इस पुस्तक का साधिकार प्रन्यकतास कर प्रकाशकने
स्वाधीन रस्या है।
* टी प्रचार * पद देयक का छोटाश गम्य अपने उन का निराज Vाष को महारमा सान्त पुरसमस की ने अपने जीवनसार मनुभव किये हुए घुट- कालों से मत है इसमें प्रत्येक छोटे और परे रोने के पासही मुगम उपाय न पुरतंक के पात्र रहने में मद्य अपने घर तथा विदेश में अपना और अपने ग्राथियों का रोग पर न कता है पार बार वैद्य हकीमी के पास होने की आवश्यकता नहीं रहम इस लिये इसकी एक प्रति अप पाय रसना नाहिये, इसमें धातुगों के पारण मारण की विपि धगम बजी टियों द्वारा रहुत ही सदा सिसी जिन २ बढी धूटियों का काम इस पुस्तक में पड़ा है उस सपंक ऐ. सन्दर चित्र दिये है मानों पक्स ही कीय कर रख दिया है यह चित्र प्रायः ३०० से अधिक है पुस्तक में मानेवर यन्त्र पासुमा पन्ध नृशंग यन्त्र मादि से कितने ही भयभुत और सपयोगी चित्र दिय त तरह सय मिलकर यह पुस्तक प्रायः ३०. पुष्ट ३ सम्म हुई मुल्य १) व्यय =) से पुस्तक मिलने का ठिकाना- श्यामलाल अग्रवाल श्यामकाही ग्रेस खपुरा।
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साडेननिगार आवे भाग।
वह किला मतिरोधक उपन्यास ले ढम र लिखा गया है agree
में रजिगना ने लिया के पट का पूर्ण रूप से नक्सा खींच कर दिया दिवा
ई तथा शांसारिक शिक्षाओं का वर्णन छोटी २ कहानियों में (जो कि राक
मारीन अपने प्रेगी गार घनश्याम सिंहले कदोहै । भली भांति किया
है इस पुस्तक को एक पार हाथ में लेकर घिर जाने को जो नहीं चाइना
सपता यह है कि इसको पदि नीति तथा पातुर्य का भार कहे तो भायु-
किम योगी मूल्य it)
तोबाना आठों भाम् ।
पदमागी अपने दंग की निराली ही है इसमें तो ने मार सिगे
के दोष, कुश्मन, मालाकियों व जाल मादि की बातें कहानी को
है और इसी तरह मैना ने पुरुषों की घामावियों का वर्णन किया है जन्त में
बोका बाप मैना का विवाह हुगा है इस पुस्तक को पढ़कर स्त्री पुल दो.
नो शिक्षा प्राप्त कर सकते है और बोटे स्त्री पुरसों के घोसे से नली माते
सकते हैं।
पुस्तक मिलने का ठिकाना-
श्यामलाल अग्रवाल
श्यामकाशी प्रेस
मधुस।
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sashatani
। देखिये)
रा का बनाया
प्रश्न
ना
न
पेट का दर्द,जीमिचलाना, के होना, अरुची, हैजा, शूल,
मन्दाग्नी, कब्जियत, कफ, खांसी, जुखाम, नजला, संग्रहणी,
आदि पेट की बीमारियों की अचूक दवा मू०१शी० ॥) खर्चा
1)३ शी० १॥] ६.शी० २॥) १२ शी० ४॥ खर्चा माफ
भारत सरकार से रजिष्टरी किया हुआ
पान बिहार
HINERS
यह मसाळा अत्यन्त सुगंधित स्वादिष्ट, पवित्र, रचने,
वाला मुंह की वदवू को दूर हटाकर चित्त प्रसन्न करता है, पान
में जरासा डालने से पान खुश जायके हो जाता है की० ।)
अनेक रोगोंकी एकही मशहूर दवा है, यह सेकडों रोगीपर
बिजलीक माफक तुरन्त गुण दिखातीहै पेटके भीतर के तमाम
रोग, ऊपरी हिस्से के दर्द, और विच्छू, कुत्ता, श्रादि जानवरों
के काटे पर फायदा करती है।
कीमत)
दादकीदवा
देवा के लगाते ही खुजली बंद होती है, और ३ दिन
दवा लगाने से दाद जाता रहता है।
कीमत।)
TAINE(हर जगह एजन्टों की जरूरत है) NARIKE
सिर्फ टाइटिल पेज " एल० पी० नागर प्रेस" मथुरा में इपा।