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Grihya Sutras Of Varah
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वाराहगृह्यसूत्र की विषयमूची। पृष्ठसंख्या १ wa ... ... ५ • 2- ... १७ २० २३ २५ विषय-- १ जातकर्म ५ नामकरण ३ पुत्राभिमर्शन । अन्नप्राशन ५ चूडाकरण ६ उपनयन ७ ब्रह्मचारिव्रतनि.... ८ श्रावणी कर्म 8 चातु)त्रिक दीक्षा १. गोदान ११ विवाह १२ विवाह प्रक्दत कर्म १३ विवाह अर्घ्यदान १४ कन्यादान १५ पाणिग्रहण १६ योकत्र वर्णन ... १७ रथारोहण १८ गृहप्रवेश १६ पुंसवन २० वैश्वदेवकर्म २१ परिशिष्ट २२ पाकयज्ञ २८ ... ३० ३२ . ५२ ... .. । Rom ॥ श्रीगणेशायनमः ॥ अथ वाराहगृह्यसूत्रम् । प्राङ्मुखमुद्ङ्मुखं वा सूतिकालयं कल्पयित्वा "धवं प्रपद्ये शुभं प्रपद्ये” इति काले प्रपादयेत् ॥ १।३ "रेतो मूत्र". मिति च्यावनीभ्यां दक्षिणकुक्षिमभिमृशेत् ॥ २॥ श्राव- येद्रा पुत्रं जातमन्वहं स्नातं न मातोपहन्यात् अामन्त्रप्र- योगात् ।। ३ ।। अग्नेरभ्याहितस्य परिसमूढस्य परिस्ती- पस्य पश्चादहते वाससि कुमारं प्राक्शिरसमुत्तानं संवेश्य पालाशस्य मध्यमपर्ण प्रवेष्टच तेनास्य कर्णावाजपेत् ॥४। "भूस्त्वयि दधामी"ति दक्षिणे "भुवस्त्वयि दधामी"ति सव्ये "स्वस्त्वयि धामी"ति दक्षिणे भूर्भुवः स्वस्त्वयि दधामी"ति सव्ये ॥ ५॥ अथैनमभिमन्त्रयेत्-"अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव ॥ ६ ॥ वेदो वै पुत्रना- मासि स जीव शरदः शतम् । अङ्गादङ्गात्संभवसि हृद- यादधिजायसे ॥७॥ आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमिति यत्र शेते तद्भिमृशेत् ॥८॥ वेद ते भूमिहृदयं दिविचन्द्रमसि श्रितम् ॥६॥ वेदामृतस्य देवानहं पुत्रमहं हृद" मित्याज्यं संस्कृत्य ब्राह्मणमामन्त्र्य समिधमाधायाघारा- वाघार्याज्यभागी हुत्वा व्याहृतिभिश्चत भाज्याहुतीर्जु.
२ वाराहगृह्यसूत्रम् । mamimanusia हुयात् ॥ १० ॥ जयाभ्यातानानां राष्ट्रभृतश्चैके ॥ ११ ॥ कांस्ये चमसेवाहुतिसंपातानवनीय तस्मिन्सुवर्ण संनिघृष्य व्याहृतिभिः कुमारं चतुःप्राशयेदत्यन्तमेके सुवर्णप्राशन- मुदके निघृष्य आदादशवर्षताया “इषं पिन्वोज पिन्वेति" स्तनौ प्रदापयेत् । १२ ॥ दक्षिणं पूर्व सव्यं पश्चात् स्विष्ट. कृतं हुत्वा प्रायश्चित्ताहुतीश्च समिधमाधाय पर्युक्षति ॥ ॥ १३ ॥ एष कर्मान्तो बहिरेऽग्निनित्यः ॥ १४ ॥ कण सर्षपयवानां होमः ॥ १५ ॥ व्याहृतिभिर्जुहुयात् ।।१६।। अप्रतिरथं जपेत् ॥ १७ ॥ "इन्द्रो भूतस्य"ति षडर्च च सूतिकालयं यथाकालं समन्तादुदकेन परिषिंचेत् ॥ १० ॥ इति वाराहगृह्यसूत्रे प्रथमः खण्डः ॥१॥ भा० टी०- पूर्व मुंह या उत्तर मुंह का सूतिका घर जो बच्चे जनने के लिये गर्भवती स्त्री के लिये होता है तय्यार करावे। और जब प्रसव होने का निकटतम काल आजावे तब "ध्रुवं प्रपद्ये शुभं प्रपद्ये" मंत्र को पढ़ कर विधिपूर्वक गर्भिणी स्त्री को 'सूतिकालय' में प्रवेश करावे ॥ और जब स्त्री को प्रसवार्थ पेट में वेदना होने लगे तब "रेतो मूत्रमिति०" इत्यादि मंत्रों से स्त्री के पेट के दक्षिण भाग को स्पर्श करे । और जब सूतिका को सन्तान पैदा होजावे तो "पुत्र उत्पन्न हुआ" ऐसा सुनावे और अब तक जात कर्म सम्बन्धि क्रियायें मंत्र पूर्वक न हो जावें तब तक माता उस बच्चे को अपने गोद में न लेवे । बच्चे को स्नान करावे तो भले ही करादेवे परन्तु माता के गोद में उसे न देवे। जहां होम करना हो उस स्थान को साफ कर (पांचभू संस्कार करके ) अग्निस्थापन कर उसके पश्चिम भाग में कुशा बिछाकर उस पर कुमार को-नये चीरे अखण्ड वस्त्र पर पूर्वशिर और उत्तान कर सुला कर ढाक के पत्तों में से बीच के पत्ते को लपेट कर उसका भाषावृत्तिसहितम् । ३ mula -~ एकछोर बच्चे के कान में एक अपने मुख में लगाके-"भूस्त्वमि०” इत्यादि मंत्र को दहिने कान में पढ़े और "भुवस्त्व." मंत्र को बायें कानमें पढ़े, फिर "स्वस्त्वं०" मंत्र को दहिने कान में और भूर्भुवः० ॥ मंत्रको बांये कान में पढ़े ॥ इसके अनन्तर इस कुमार को अभिमन्त्रण कर-"अश्माभव० इत्यादि मंत्र पढ़ कर जहां कुमार शयन करता हो वहां-उसको स्पर्श करे ।। "वेदते०” इत्यादि मंत्रको पढ कर श्राज्यका संस्कार कर ब्राह्मणों को निम- न्त्रण देकर समिधा इकट्ठा कर घी का ढार दे । आज्यभाग की दो आहुती देकर व्याहृति मंत्रों से चार आहुती देवे । कोई २ आचार्य का मत है कि जयाभ्यातन और राष्ट्रभृत मंत्रों से भी होम करे ॥ और कांसे के कटोरे में या प्रणीता के समान चमस पात्र में आहुती सम्पात को लेकर उसमें सोने को घिस कर व्याहृति मंत्रों से कुमार को चार वार चटावे । कोई २ प्राचार्य कहते हैं कि अनेक वार चटावे । और सोने को पानी में घिसकर कुमार को १२ वर्ष की उमर तक चटावे ॥ और “इषं पिन्वा मंत्र को पढ़ कर कुमार को दोनों स्तन दूध पीने इस भांति देवे कि पहले दहिना स्तन पीछे बायां स्तन देवे ॥ अनन्तर स्विष्टकृत आहुती देकर प्रायश्चित्तकी आहुती करे और समिध डालकर इसका जनसे पर्युक्षण करे ॥ यह कर्मान्त विधि द्वार के बाहर नित्य अग्नि में करे । और कण, सरसो, और जव से होम करे ।। व्याहृतियों से होम करे । “अप्रतिरथ' का जप करे । "इन्द्रो भूतस्य और षडर्च मंत्रों का भी जप करे । सूतिकालय को यथा समय-- चारों ओर जल से सींचे ॥१-१८॥ प्रथम खण्ड समाप्त हुआ ॥१॥ एवमेव दशम्यां कृत्वा पिता माता च पुत्रस्य नाम ध्याताम् ॥१॥ घोषवदाद्यन्तरन्तस्थं दीर्घाभिनिष्ठानान्तं कृतं न तद्धितं यक्षरं चतुरक्षरं वा त्यक्तपितृनामधेयान्न- क्षत्रदेवतेष्टनामानो वा ॥२॥ दिनामा तु ब्राह्मणो नामैवं कन्याया अकारव्यवधानमाकारान्तमयुग्माक्षरं नदीनक्षत्र वाराहगृह्यसूत्रम् । ७ चन्द्रसूर्यपूषादेवदत्तरक्षितावर्जम् ।। ३ ॥ नवनीतेन पाणी प्रलिप्य “सोमस्य त्वा द्युम्नेने"त्येनमभिभृशेत् ॥ ४ ॥ सर्वेषु कुमारकर्मसु आग्नेयः स्थालीपाकः प्रजापत्यो वा सर्वत्रानादेशेऽग्निः पुंसामर्थमा स्त्रीणाम् ॥ ५ ॥ संवत्सरं मातापितरौ न मांसमश्नीयाताम्॥ ६॥ इति वाराहगृह्ये द्वितीयः खण्डः ॥ २ ॥ जातकर्म से लेकर दशवें दिन पूर्वोक्त प्रकार विधि पूर्वक होम कृत्य करके पिता और माता अपने पुत्र का नाम करण संस्कार करे अर्थात् पुत्र का नाम धरे । जिस के नाम का आदि अक्षर घोषवत् (ग, घ, ङ, । ज, झ, अ । ड, ढ, ण, । द, ध, न, । ब, भ, म, । और ह ) ये अक्षर अन्तस्थ ( य, र, ल, व ) अक्षर नामके बीच में हों और विसर्जनीय ( : ) अन्त में हों-नाम कृदन्त हो तद्धितान्त न हो-नाम दो या चार अक्षर का हो- और पुत्र के नाम के साथही पीछे पिता का नाम भी लगाया जाय, परन्तु अभिवादन में पिता के नाम को छोड़ देवे। जिस तिथि या नक्षत्र में पुत्र का जन्म हो उसके देवता सम्बन्धी या नक्षत्र सम्बन्धी नाम यश के लिये अच्छे हैं । परन्तु देवता और पिता का साक्षात् नाम न धरे ॥ दो नाम ब्राह्मण का अर्थात् पुत्र का धरे । परन्तु कन्या का केवल एक ही नाम हो । कन्या के नाम में अकार व्यवधान हो और अन्त में श्रा-कार और वेजोड़ वा विषम संख्यक (३, ५ आदि ) अक्षर हों । नदी, नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, पूषा, देवदत्त-इन से रक्षिता नाम न धरे-और न इन के नामों से नाम धरे। फिर धोये हुए हाथों में मक्खन लगाके अग्नि में तपा के और बच्चे को स्पर्श करने की आज्ञा ब्राह्मण से लेकर ॥ सोमस्य०” मंत्र को पढ़कर कुमार को स्पर्श करे । सब ही कुमार के कर्मों में "आग्नेय स्थालीपाक" या प्राजापत्य स्थाली पाक-करे । कुमार कर्मो में जहां २ अग्नि के नाम का पाय वाची कोई शब्द उपदिष्ट न हो वहां-कुमार के कर्मों में “अग्निः"
भाषावृत्तिसहितम् ।
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ग्रहण करना और कुमारी के कम्मों में "अर्यमा" समझना । इसके अनन्तर
कुमार के माता पिता एक वर्ष लक मांस न खावें ॥ १६ ॥ दूसग खण्ड
समाप्त हुआ ॥२॥
पुत्रस्य जाते दन्ते यजेताग्नि गवाऽपशुना वा ॥१॥
विप्रोषितः प्रत्येत्य पुत्रस्य मूर्धानं विराजित्- “पशूनां
स्वा हिंकारेणाभिजिघ्रामी"ति ॥२॥ जातकर्मवद्धस्ताङ्गुली
प्रवेष्टय तेनास्य कर्णावाजपेत् ॥३॥ अथैनमभिमन्त्रयते-
"अश्मा भवे"ति "अग्निधन्वन्तरी” इति ॥४॥ पुत्रव-
च्छागमेषाभ्यामिष्टा दीर्घाणां व्याहृतिभिः कुमारं चतुः
शयेत् ॥ ५॥ "आयुर्दा देवेति च कुमारकर्मणि शुक्ल
उदगयने पुष्य नक्षत्रे नवमीवर्ज सर्वे ऋतवो विवाहे
माघचैत्रौ मासौ परिहाप्योत्तरं च नैवाद्यमन्वारम्भयित्वा
हवनम् ॥ इति बाराहगृह्य तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
पुत्र को दान्त निकल जाने पर पशु द्वाग अग्नि निमित्त यज्ञ करे या
पशु रहित अन्नादि से ही करे ! जब पिता प्रवास मे घर पर आवे तो पुत्र के
शिरमें अपना मुख लगाकर--"पशुनांत्वां०" मंत्र को पढ़ता हुआ तीन वार
सूंघे । जात कर्म की भांति हाथ की अङ्गुली को कुमार के कान में, प्रवेश
करा कर अश्माभव०" मंत्र का जप करे । और पुत्र वाला व्यक्ति छाग
और भेड द्वारा यज्ञ कर व्याहृतियों को पढ़कर कुमार को चार वार यज्ञ से
बचे मांस के बड़े टुकड़ो को चटावे । और "आयुर्घ० मंत्र भी पढे। कुमार
कर्म-में शुक्लपक्ष, उत्तरायण, पुष्य नक्षत्र, नवमी तिथिको छोड़कर सबही
ऋतु श्रेष्ठ हैं। विवाह के लिये माध, और चैत्र मास को छोड़कर--शेष
महीनों में कृष्ण पक्ष को छोड़ कर-विवाह विहित है, परन्तु विवाह के आर-
म्भिक कार्य में हवन करे ॥ १-६॥ यह तीसरा खण्ड पूग हुआ ॥ ३ ॥
६
वाराहगृह्यसूत्रम्।
तृतीयवर्षस्य जटाः कुर्वन्ति यथा वा कुलकल्पः ॥
।। १ ।। अग्निमुपसमाधाय परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्य
दक्षिणतोऽग्नेब्राक्षणमुपवेश्योत्तरत उदकपात्रं शमीशम-
कवत् ॥२॥अथैनमभिमन्त्रयते-"हिरण्यवर्णाःशुचय'
इति चतसृभिः "या ओषधय” इत्यनुवाकेन, "शं नो
देवीरभिष्ट"य इति, "शं न आपो धन्वन्या" इति द्वाभ्या.
मिति च ॥३॥ तासामुदकार्थान्कुर्वीत पर्युक्षणे अभ्युः
न्दने स्नापने च ॥ ४ ॥ आज्यं संस्कृत्य ब्राह्मणमामन्त्र्य
समिधमाधायाघारावाघार्याज्यभागौ हुत्वा "अग्न आयूंषि
पवस” इति सप्तभिः सप्त जुहुयात् ॥ ५ ॥ "आयुर्दा
देवेति" च ये केशिनः प्रथम सत्रमासत येभिरावृतं यदिदं
विराजति ॥ ६॥ तेभ्यो जुहोम्यायुषे दीर्घायुत्वाय स्वस्तय"
इति व्याहृतिभिश्चोक्तः कर्मान्तः पूर्वेण ॥ ७ ॥ शीतेन वा
उदकेनेत्युष्णेन वा उदकेनेति तप्ता इतराभिः संसृज्य
"आईदानवस्थजीवदानवस्थोन्दतोषमावदे"त्यपोभिमन्व्य
"अदितिः केशान् वपत्वाप उन्दन्तु जीवसे ।।८।। दीर्घा
युत्वाय स्वस्तय” इति दक्षिणं केशान्तमभ्युन्दति ॥ ६ ॥
'श्रोषधे त्रायस्वैनं "इति दक्षिणस्मिन्केशान्ते ऊर्वाग्रं
दर्भमन्तर्दधाति ॥ १० ॥ स्वधिते मैनं हिंसीरिति तुरेणा
भिनिदधाति ॥ ११ ॥ येनावपत्सविता तुरेण सोमस्य
राज्ञो वरुणस्य विद्वान् ॥ १२ ॥ तेन ब्रह्माणो वपतेदम-
स्यायुष्मानयं जरदष्टियथासहमसाविति प्रवपति ॥ १३ ॥
भाषावृत्तिसहितम् । दाक्षणतो मातान्या वाऽविधवा प्रानडुहेन गोमयेन आभू- मिगतान्केशान् परिगृह्णीयात् ॥ १४ ॥-मा ते केशान् अनुगादर्च एतत्तथा धाता दधातु ते ॥ १५ ॥ तुभ्यमिन्द्रो वरुणो बृहस्पतिः सविता वर्च श्रादधु"रिति प्रवपतोऽनु- मन्त्रयते ॥ १६ ॥ तेन धर्मेण पुनरपोभिमन्त्र्यापरं केशा- न्तमभ्युन्द्यात् ।।१७। उत्तरं च । अन्यौ तु प्रवपनौ ॥१८॥ "येन पूषा बृहस्पतेरग्नेरिन्द्रस्य चायुषेऽवपत् ॥ १६ ।। तेन ते धपाम्यायुषे दीर्घायुत्वाय स्वस्तय" इति पश्चात् । ॥ २० ॥ येन भूयश्चरत्ययं ज्योक्च पश्यति सूर्यम् ॥२१|| तेन ते वपाम्यायुषे दीर्घायुत्वाय सुश्लोक्याय सुवर्चस" इत्युत्तरतः ॥ २२ ॥ यत्तुरेण वर्तयता सुपेशया वसर्वपसि केशान् शुन्धशिशरो मुखं मास्यायुः प्रमोषीरिति लोहायसं तुरं केशवापाय प्रयच्छति ॥ २३ ॥ यथार्थ केशयत्नान् कुर्वन्ति-दक्षिणत: कपदों वसिष्ठानां उभयतोऽत्रिभार्गव काश्यपानां पञ्चचूडाङ्गिरसा शिखिनोऽन्ये वाजिमेके मङ्ग- लार्थम् । व्यायुष जमदग्नेः कश्यपस्य व्यायुषं अगस्त्यस्य त्रायुषम् । यद्देवानां त्र्यायुषं तन्मे अस्तु शतायुषमि"ति शिरप्रभृति परिगृह्य गोमयेन केशानुत्तरपूर्वस्यां गृहस्यामु प्यामन्तरागेहात्पलदं निध्यात्।।२४॥अतिरिक्त वा वपने- उप्त्वाय केशान्वरुणस्य राज्ञो बृहस्पतिः सविता विष्णुरिंद्रः तेभ्यो निधानं महदन्वविन्दन्नन्तरा द्यावापृथिव्यो- रवन्युरि"ति ॥ ॥२५॥ करें वरं ददाति ।। २६ ॥ पक्ष्मगुणं वाराहगृह्यसूत्रम् । माता तिलपिशितं च केशवापाय प्रयच्छति ॥ २७ ॥ संवत्सरं नाम्लाय धारयेद्रोषाय नाश्नीयात् ॥ २८ ॥ लवणवर्ज तूष्णीम् ॥२६॥ कन्याया आहुतिवर्ज विदुषो ब्राह्मणार्थसिद्धिं वाचयेत् ॥ ३०॥ एवमुत्तरेषु ॥ ३१ ॥ इति वाराहगृह्ये चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ बालक के तीसरे वर्ष के अधिक भाग बीत जाने पर जब उत्तगया शुक्लपक्ष हो, तब नवमी तिथि को छोड़कर चूड़ा करण करावे । या जिस कुन में जिस उमर में मुण्डन कराने की प्रथा चलीआई हो और एक शिखा दक्षिण भाग में या उत्तर भाग में शिखा रखने की रीति हो उसी प्रकार या चूड़ा रखकर मुण्डन करावे मुण्डन संस्कार के लिये अग्नि को स्थापन कर वेदीका परिसमूहन, पर्युक्षण करके अग्नि के पास कुशाओं को बिछा- कर अग्नि के दक्षिण भाग में ब्राह्मण को बिठना कर उनके उत्तर भाग में जलपात्र और शमी की लकड़ी या उसके समान दूसरी यज्ञिय वृक्ष की लकड़ी रक्खे ॥ अनन्तर इसके, कुमार को 'हिरण्यवर्णाः०" इत्यादि चार ऋचाओं से "या ओषधयक" इस अनुवाक से "शंनोदेवी०" मंत्र से, "शंन" इन दो मन्त्रों से-यथा प्रयोजन जल से पर्युक्षणा करे, भिंगोये और स्नान करावे । श्राज्य का संस्कार कर ब्राह्मण को निमन्त्रण देकर समिधाओं को डाल कर घीका ढार देकर अाज्यभाग की दो आहुती कर 'अग्न आयुषि०" इत्यादि सोतमन्त्रोंसे सात पाहुती करे ॥ “आयुर्दा०' मंत्र से भी और "ये केशिनः०" इत्यादि मंत्र से और व्याहृतियों से भी--तब कर्म की समाप्ति करे जैसा पहिले कहा गया है। इसके पश्चात् शीतल जल, उष्ण जन अलग२ रक्खे और शीतल जल को गर्म में मिलाकर "आईदानवस्थ० इत्यादि मंत्र से जल को अभिमंत्रित करके "अदितिः०', मंत्र से' कुमार के शिर के दहिने बालों के अन्त को भिंगोवे।"श्रोषधे०” मंत्र से दहिने बालों के अन्त में बालों के बीच दाभ रक्खे ॥ स्वधिते मैनं हिंसी' मंत्र पढ़के .
भाषावृत्तिसहितम् । 8 दामसहित बालों पर छूरा रक्खै ॥ फिर "येनावपत्" इत्यादि तीन मन्त्र पढ़ २ कर तीन बार कुशा सहित वालों को काटे ॥ वालक के दहिने भाग में उसकी माता या अन्य कोई सघवास्त्रो-कट कर भूमि पर गिरे बालों को बैल के गोबर पर लेती जावे । “माते केशान्" इत्यादि मंत्र केशों को काटते समय पढ़ता जावे ! उसी प्रकार फिर जन्न को अभिमन्त्रित कर बचे केशों को पूर्ववत् भिंगोवे और केशों को भी इसी भांति काटे । “येन पूपा०" इत्यादि मंत्र से शिरके पीछे के भाग के केशों को काटे "येन भूयश्चरत्ययं, मंत्र पढ़कर उत्तर भाग के केशों को काटे पुनः “यत्क्षुरेण०" मंत्र पढ़के लोहे के छूरे को नापित को दे देवे और अपनी कुलरीति अनुसार शिखा छोड़कर सब केशों को कटवा देवे । चोटी या चूड़ा रखने की भिन्न २ प्रथा वशिष्ट गोत्री दाई और अत्रि भार्गव और काश्यप गोत्री दोनों ओर चूड़ा रखते हैं । आङ्गिरस गोत्री पांच चूड़ा रखते हैं अन्य गोत्र वाले शिखा मात्र रखते हैं और वाजसनेयी लोग एक ही चूड़ा रखते हैं ॥ व्यायुषं' इत्यादि मंत्र पढ़ कर सारे शिर को भिगो कर नाई उस्तरा को सारे शिर पर फेर देवे । तब बानों समेन गोबर को लपेट कर घर के उत्तर पूर्व दिशा में दूर पर जमीन में गाड़ देवे । यदि अतिरिक्त केश कट जावें तो 'उप. त्वाय०' मंत्र का जप करे ॥ और पुरोहित को दक्षिणा देवे । नापित को केशर, गुड़, और कूटे हुए तिल देवे । साल भर तक वालक की माता खट्टा न खावे, क्रोध से भोजन न करे, लवण रहित भोजन करे । कन्या का संस्कार विना मंत्र के होगा, परन्तु हवन मन्त्र पूर्वक होंगे । विद्वान ब्राह्मणों से० अर्थसिद्धि कहवावे-इसी प्रकार उत्तर कार्यों में भी ॥ सू० १-३१ ॥ इति चौथा खण्ड पूरा हुआ ॥ ४ ॥ गर्भाष्टमे ब्राह्मणमुपनयेत् ॥ १॥ षष्ठे सप्तमे पञ्चमे वा ॥२॥ ततो गर्भकादशेषु क्षत्रियम्।गर्भद्वादशेषु वैश्यम् ॥ ३ ॥ प्राक् षोडशावर्षात् ब्राह्मणस्यापतिता सावित्री। ॥ ४ ॥ श्रादिशात् क्षत्रियस्य ॥२॥ आचतुर्विंशाद्वैश्यस्य ।।
१०
वाराहगृह्यसूत्रम्
Maharsom
MORCHAKRANIK
॥ ६ ॥ अतऊर्ध्व पतितसावित्रीका भवन्ति ॥ ७ ॥
नैनान्याजयेयुः ॥ "नाध्यापयेयु"ने विवहेयुः ॥८॥ अभ्य-
न्तरं जटाकरणं बहिरुपनयनमुक्तोऽग्निसंस्कारः ॥६॥
ब्राह्मणस्य कुमारं पर्युतिनं स्नातमभ्यक्तशिरसमुपस्पर्शन-
कल्पेनोपस्पृष्टमग्नेर्दक्षिणतोऽवस्थाप्य "दधिक्राव्णो अका-
रिषमिति कुमारं दधि त्रिः प्राशयेत् ॥१०॥ "इयं दुरुत्ता-
त्परिषाधमाना वरुणं पवित्रं पुनती न अागात् ॥ ११ ॥
प्राणापानाभ्यां बलमाभजन्ती शिवा देवी सुभगा मेख-
लेयम् ॥ १२ ॥ ऋतस्य गोप्त्री तपसश्चरित्री नती रक्षः
सहमाना अरातीः ॥ १३ ॥ सा मा समन्तमनुपर्येहि
भद्रे धारस्ते सुभगे मेखले मारिषामे" ति मौनी त्रिगुणां
त्रिःपरिवीतां मेखलामाबध्नीत मौर्वी धनुया क्षत्रियस्य
शाणी वैश्यस्य ॥ १४ ॥ उपवीतमसि यज्ञस्य त्वोपवीते-
नोपव्ययामी"ति यज्ञोपवीतम् ।। १५ ।। या अकृन्तन्या
अतन्वन्यावन्या वाहरन् ॥ १६ ॥ याश्चान्या देव्योन्तान-
भितो ततन्था ॥ १७ ॥ तास्त्वा देव्यो जरसे संव्यय-
न्वायुष्मन्निदं परिधत्व वासः ॥ १८ ॥ परिधत्त वर्च:
शतायुषं दीर्घमायुः ॥ १६ ॥ शतं च जीव शरदः पुरूचीः
सूनिचाय्यो विभजा यजीयान् ॥ २० ॥ इत्यहतं वास
आच्छाद्य-"मित्रस्य चतुर्धरुणं बलीयस्तेजो यशःश्री-
स्थविरं समिद्धम् ॥ २१ ॥ अानाहनस्यं वसनं जरिष्णु
परीदं वाज्यजिनं दधेह"मिति कृष्णाजिनं च ॥ २२ ॥
भाषावृत्तिसहितम्।
आज्यं संस्कृत्य ब्राह्मणमामन्त्र्य समिधमाधायाघारावा-
घार्याज्य भागौ हुत्वाष्टौ जटाकरणीयान् जुहुयात् ॥ २३ ॥
व्याहृतिभिश्चोक्तः कर्मान्तः पूर्वेण ॥ २४ ॥ "कालाय वां
गोत्राय वा मैत्राय वां मैत्राय वामन्नाधाय वां अपने-
निजेमी"त्युदळेनाञ्जलिं पूरयित्वा "सुकृताय वामि" ति
पाणी प्रक्षाल्य "इदमहं दुर्यमन्यानि प्लावयामो"त्याचम्य
निष्ठीवति ॥ २५ ॥ भ्रातृव्याणां सपत्नानामहं भूयास-
मि"ति द्वितोयम् ॥ २६ ॥ प्रातर्जितं भगमुग्रं हुवेम वयं
पुत्रमदितेयो विधर्ता ॥ २७ ॥ आर्द्रश्चिद्यन्मन्यमानस्तिर-
श्चिद्राजा चिद्यन्भगं भक्षीमहीत्याहे" त्यादित्यमुपतिष्ठेत
॥ २८ ॥ ब्रह्मचर्यमुपागामुपमाहूयस्येति" ब्रूयात् ॥ २६ ॥
एहि ब्रह्मोपेहि ब्रह्म ब्रह्म त्वा संब्रह्म सन्तमुपनयाम्यह-
मसा" विति ॥ ३० ॥ अथास्याभिवादनीयं नाम गृह्णाति
॥ ३१ ॥ "देवस्थ त्वेति" हस्तं गृह्णाम्यहमसावि"त्यस्य
हस्तं दक्षिणेन दक्षिणमुत्तानमभि वागुष्ठमभि वा लो-
मानि गृह्णीयात् ।। ३२॥ ममेवान्वे तु ते मनो मामेवा-
ऽपि त्वमन्विहि ॥ ३३ ॥ अग्नौ घृतमिव दीप्यता हृदयं
तव यन्मयि" ॥ ३४ ॥ इत्येनं संप्रेक्षमाणं समीक्षते।
पृष्ठतोऽस्य पाणिमन्वाहृत्य हृदयदेशमन्वारभ्य जपति
"प्राणानां ग्रन्धिरसि स ते मा विस्रंसदिति ॥ ३५ ॥
ब्रह्मणो ग्रन्धिरसि" इति नाभिदेशं ॥ ३६॥ गणानां
त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ॥३७॥
१२ वाराहगृह्यसूत्रम्। .. ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्" इति प्रदक्षिणमग्नि परिणयेत् ॥३८॥ पश्चादग्नेः दर्भेषूपविशति दक्षिणतश्च ब्रह्मचारी-"अधीहि भोः" ॥३६॥ इत्युपविश्य जपति ॥ ४० ॥ प्रभुज्य दक्षिणं जानुं पाणी संधाय दर्भहस्ता"वोमि"त्युक्त्वा व्याहृतिभिः सावित्री चानुब्रूयात् ॥४१॥ एवं काण्डानुवचनेषु ॥४२ ।। तत्सवितुर्वरेण्यमि"ति गायत्रीं ब्राह्मणाय, “देवो याति सविता सुरत्न" इति त्रिंष्टभं क्षत्रियाय, "युंजते मन" इति जगतीं वैश्याय पच्छोधर्चशः सर्वामन्ततः ॥ ४३ ॥ पालाशं दण्डं ब्राह्मणाय प्रयच्छति नैयग्रोधं क्षत्रियाय अाश्वत्थं वैश्याय ॥ ४४ ॥ सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु यथा स्वं सुश्रवः सुश्रवा अस्येवमहं सुश्रवः सुश्रवा भूयासं ॥ ४५ ॥ यथा स्वं देवानां वेदस्य निधिगोपोस्येवमहं मनुष्याणां ब्रह्मणो निधिगोपो भूयासमिति दण्डं प्रति. गृह्णाति ॥ ४६ ॥ ऊर्ध्वकपालो ब्राह्मणस्य कमण्डलुः परिमण्डलः क्षत्रियस्य निचलकलो वैश्यस्य ॥४७॥ "इमा आपः प्रभराम्ययक्ष्माय यक्ष्मचातनीः ॥४८॥ ऋतेनापः प्रभराम्यमृतेन सहायुषा” ॥ ४६ ॥ इति "प्र. तिगृह्णा"मीति प्रतिगृह्य भैक्ष्यचर्य चरेत् ॥ ५० ॥ ॐ भवति भिक्षां देही'ति ब्राह्मणः ॥ ५१ ॥ 'भवतिमध्यां' क्षत्रियः ॥ ५२ ॥ भवत्यन्तां वैश्यः ॥ ५३॥ चतस्रष्ष- डष्टौ वाऽविधवा अप्रत्याख्यायिन्यो मातरं प्रथममेके भाषावृत्तिसहितम् । rani ॥ ५४ ॥ गुरवे निवेद्य वाग्यतः प्राग्ग्रामात् सन्ध्यामुपास्ते ॥ ५५॥ तिष्ठन् पूर्वी सावित्री त्रिरधीत्य "श्रध्वनाम- ध्वपते श्रेष्ठ्यः स्वस्त्यस्याध्वनः पारमशीय" ॥५६॥ तच्च- तुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रनुच्चरत् ॥ ५७ ।। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं शृणुवान शरदः शतम् ॥ ५८ ॥ प्रत्रवाम शरदः शतं अदीनाः स्याम शरदः शतम् ॥५६।। भूयश्च शरदः शतात् ।। ६० ॥ या मेधा अप्सरस्सु गन्ध- र्वेषु च यन्मनः ॥६१ ।। दैवी या मानुषी मेधा सा मा माविशतामिहै"ति प्रत्येत्याग्निं परिचरेत् ।। ६२ । इमं स्तोममहंत इति परिसमूहेत् ॥६३ ॥ एधोस्येधिषीमही" ति समिधमादधाति ॥ ६४ ॥ समिसि समेधिषीमही" ति द्वितीयम् ॥ "आपो अद्यान्वचारिषमि"त्युपतिष्ठते ॥६५॥ "मा संमृज वर्चसेति" मुखं परिमृजीत “यदग्ने तपसा तपो ब्रह्मचर्यमुपेयमसि ॥ ६६ ॥ प्रिया अतस्य भूयासमायुष्मन्तः सुमेधसः ॥ ६७ ॥ अग्ने समिधमहा- रिषं बृहते जातवेदसे ॥ ६८ ॥ स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्रयच्छतु वाहे"ति समिधमादधाति ॥ ६६ ॥ तेजसा मा समन्धि वर्चसा मा समन्धि ब्रह्मवर्चसेन मा समन्धि" इति मुखं परिमृजीत ॥ ७० ॥ आयुर्दा अग्नेऽसी"ति च यथारूपं गात्राणि संमृशति "इह धृति- रिति” पर्यायैः अंसग्रीवाश्च त्रिरालभ्य "ऋचं नो घेही" ति ललाटमभिमृशेत् ॥७१ । भाद्यन्तयोः पर्युक्षणम् ।
वाराहगृह्यसूत्रम् । गुरवे ब्रह्मण च वरमुत्तरासङ्गं च ददाति ॥ ७२ ॥ द्वाद- शरात्रमक्षारलवणमाशंदतारमेके ॥ ७३ ॥ व्युष्टे द्वादश- रात्रे षड़ाने वा ग्रामात्प्राची वादीची वा दिशमुपनिष्क्रम्य पश्चात्पालाशस्य यज्ञियस्य वा वृक्षस्य सावित्रेण स्थाली- पाकेनेष्वा जयप्रभृतिभ्यश्चाज्यस्य पुरस्तात्विष्टकृतो मेखला दण्डं चाप्लु प्रास्येत् ॥ ७४ ॥ तत्रैव हविश्शेष भुंजोतेति श्रुतिः ।। ७५ ॥ इति वाराहगृह्ये पञ्चमः खण्डः ॥ गर्भ से या जन्म से जब ब्राह्मण का बालक आठ वर्ष का हो तो उसका उपनयन ( वेद पढ़ने के लिये गुरु के पास भेजे) संस्कार करे ॥ या छठवें सातवें या पांचवें वर्ष में उपनयन करे ।। इसके पश्चात् क्षत्रिय वर्ण के बालक का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के बालक का बारहवें वर्ष में उपनयन करे । यदि कारण वश विहित सयय पर उपनयन न कर सके तो ब्राह्मण के को व वर्ष तक उपनयन करने का अधिकार रहता है, इसी प्रकार क्षत्रिय को २२ वे वर्ष तक और वैश्य को २४ वे वर्ष तक ॥ इसके पश्रात् ब्राह्मण को १७ वें से, क्षत्रिय को २३ वे से और वैश्य को २५ वें वर्ष से उपनयन करने का अधिकार नहीं रहता है और समाज बे जनेऊ का होने से प्रत्येक वर्ण पतित सावित्रीक हो जाते हैं। ये पतित ब्राह्मणादिकों का यज्ञ न करावे न इनको वेदादि पढ़ावे और न इनसे विवाह सम्बन्ध करे । उपनयन संस्कार के भीतर जो चूड़ाकरण का प्रसङ्ग आया यह विषय इसके पहिले व अलग कहा जा चुका है। शिर मुड़ाये हुए ब्राह्मण कुमार को स्नान कराकर शिर में मक्खन श्रादि लगा के उपस्पर्शन की प्रक्रिया से उपस्पर्शन कर अग्नि के दक्षिण भाग में बैठाकर "दधिक्राव्णो०" मंत्र से कुमार को तीन वार दधि चटावे। इसके पश्चात् "इयं दुरुतात्परिक' इत्यादि मंत्र पढ़ कर मुंज की मेखला को कुमार के कटि में तीन वार लपेटे। इस तीसरी लपेट में अपने २ प्रवर संख्यानुसार तीन या पांच या सात गांठे बालक भाषावृत्तिसहितम् । देकर बांध देवे । क्षत्रिय वालक के लिये मेखला गेहा या तांत की हो और वैश्य के लिये शण की करे। फिर "उपवीतमसि०" मंत्र प्राचार्य बालक से पढ़वा कर उसको पहना देवे । इसके पश्चात् “या अकृन्तन्या." इत्यादि मंत्र पढ़ कर चीरदार नया वख वालक को "परिधत्स्ववासः" । ऐसा कह कर पहनावे । और "मित्रस्य" मंत्र पढ़कर कृष्णसार मृग के चर्म को दुपट्टे की जगह धारण करे । तब प्राज्य का संस्कार कर ब्राह्मण को निमन्त्रण देकर समिधा को डालकर आधार की आहुती देकर आज्य भाग की दो आहुतियां,चूड़ाकरण की आठ आहुतियां देवे । और व्याहनियों से होम कर कर्म की समाप्ति कर देवे, जैसा पहिले कहा गया है। तब"काला. य वां०" इत्यादि मंत्र पढ़ कर अञ्जलिमें जल भर कर "सुकृताय०"मंत्र पढ़कर दोनों हाथों को धोवे। "इदमहं." मंत्र पढ़ कर आचमन करके थूके (कुल्ला करे ) और "भ्रातृव्याणां०” मंत्र से दूसरी बार आचमन करे । इसके पश्चात् "प्रातर्जितं०” मन्त्र पढ़कर सूर्य भगवान् का उपस्थान करे। तब कुमार "ब्रह्मचर्य०” पढ़े, इसके उत्तर में प्राचार्य बोले-"एहि ब्रह्मोपेहि०" इत्यादि। तब आचार्य-वालक के अभिवादनीय नाम को बोल कर “देवस्यत्वेति" मंत्र पढ़ते हुए बालक के दहिने हाथ को पकड़े और ( असौ) पद के स्थान में बालक का नाम (हे देवदत्त जैसे ) बोले । बालक के हाथ को इस भांति पकड़े कि-शिष्य का मुंह पूर्व की ओर प्राचार्य का पश्चिम की ओर हो । शिष्य बैठा हो, प्राचार्य खड़े हों, शिष्य का हाथ नीचा और खाली हो- ऐसे शिष्य के दहिने हाथ को किसी माङ्गलिक पदार्थ को अपने दाहिने हाथ से आचार्य पकड़े और "ममेवान्वतु." इत्यादि मंत्र पढ़े। यों शिष्य प्राचार्य को देखता रहे और आचार्य शिष्य को देखें और कुमार के दायें कंधे पर से अपना दाहिना हाथ ले जाकर उसके हृदय को स्पर्श करते हुए-“प्राणानां०" मंत्र बोले । "ब्रह्मणो०" पढ़ कर उस की नाभि छूवे । फिर "गणानां०" इत्यादि पढ़कर अग्निकी प्रदक्षिणा क्रम से परिक्रमा करावे और अग्नि के पश्चिम भाग में कुश पर प्राचार्य बैठे और शिष्य को अपने दहिने भाग में बिठनावे और ब्रह्मचारी बैठ कर "अधीहि भोः०" का जप - वाराहगृह्यसूत्रम् । opmNUMARHANNEL -~~~-~~-~~-~- - करे और दहिने जानु को भूमि पर टेक कर और दोनों हाथ इकट्ठा कर कुश लेकर "प्रोम्" कह कर व्याहृतियों के साथ सावित्री को कहे। इसी प्रकार काराडानुवचन क्रम से कहे "तत्सवितुर्वरेण्यम्" गायत्री को ब्राह्मगा के लिये उपदेश देवे । “देवोयाति०'' इत्यादि त्रिष्टुभ को क्षत्रिय के लिये "युंजतेमन.” जगती को वैश्य के लिये-इस क्रम से उपदेश करे कि पहिले पद २ आधी श्राधी ऋचा पुनः पूरी ऋचा और अन्त में पूरी गायत्री आदि का उपदेश करें। इसके पश्चात् ब्राह्मण के लिये पलाश का दण्ड, क्षत्रियके लिये वटवृक्षका दण्ड और वैश्य के लिये पीपर वृतका दण्ड होना चाहिये । ."सुश्रवः०" इत्यादि मंत्रों को पढ़ कर ब्रह्मचारीको दण्ड देवे देने चाहिये । ब्राह्मणका दण्ड शिखाके केशों तक ऊंचा, क्षत्रियका दण्ड मस्तक तक ऊंचा और वैश्यका दण्ड नासिका तक ऊंचा,होना चाहिये ।"इमा श्राप:०" इत्यादि मंत्र पढ़कर जल अपने शरीर पर छिड़के और भिक्षा मांगे इसका क्रम "ॐ भवति भिक्षां देहि०" ब्राह्मण बालक कहे और "भिक्षा भवति देहि."-क्षत्रिय कहे। और 'भितां देहि भवति." वैश्य कहे । चार छ: या पाठ सधवा स्त्रियों से भिक्षा मांगे-परन्तु ऐसी स्त्रियां हों जो भिक्षा मांगने पर देने से इनकार न करें। उन में से पहिले अपनी माता से भिक्षा मांगे-ऐसा कोई २ श्राचार्य कहते हैं। भिक्षा लाकर गुरु को निवेदन करके ग्राम से पूर्व भाग में चुपचाप रहे, सन्ध्योपासन करे और प्रातः काल तीन वार सावित्री को पढ़कर "अध्वनाम०" इत्यादि मंत्र पढ़कर-तब अग्नि में समिधा डाले। "इमं०'' मंत्र से परिसमूहन करे और "एधोस्येधि०' मंत्र से अग्नि में समिधा डाले “समिदसि." मंत्र पढ़कर दूसरी समिधा डाले "आपो अद्यान्व०" मंत्र से उपस्थान करे । “मा संसृज.” मंत्र पढ़ कर अपने मुख पर हाथ फेर कर मार्जन करे । “यदग्ने०” इत्यादि "स्वाहा" तक पढ़कर समिधा को डाले। और "तेजसा०' इत्यादि मंत्र पढ़कर मुख का मार्जन करे । "आयुर्दा०" इत्यादि मंत्र पढ़कर शरीर के सब अङ्गों को स्पर्श करे । "इह धृतिः०" इत्यादि इस के पर्यायवाची-अंस, ग्रीवा को तीन वार स्पर्श करे और "ऋचं०" इत्यादि मंत्र से ललाट को स्पर्श करें। .
भाषावृत्तिसहितम् ।
१७
१
HAMARE-
.
प्रारम्भ और समाप्ति में जल छिड़के । गुरु और ब्राह्मण को दक्षिणा देवे ।
बारह रात्रि तक अक्षार लवण भोजन करे-कोई प्राचार्य अक्षार पदार्थ
खाने को कहते हैं। फिर तेरहवें दिन प्रातः काल या छः रात के पश्चात् गांव
से पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में जाकर पत्नाश या यज्ञियवृक्ष के पश्चिमभाग
में सावित्री स्थाली पाक से यज्ञ कर जय प्रभृति मंत्रों से प्राज्य की आहुती
कर और स्विष्टकृत की श्राहुती कर मेखला और दण्ड को जल में छोड़
देवे और वहीं हवि का बचा अंश खाजावे-ऐसा श्रुति कहती है । सू०
१-७५ ॥ यह पञ्चम खण्ड पूरा हुश्रा ॥ ५ ॥
उपनयनप्रभृति व्रतचारी स्यात् ॥१॥ उपनयने
व्रतादेशा व्याख्याताः ॥२॥ मार्गवासाः ॥ ३ ॥ संहत-
केशः॥४॥ भैक्षाचर्यवृत्तिः ॥ ५॥ सशल्कदण्डः ॥ ६ ॥
सप्तमौजी मेखलां धारयेत् ॥७॥ आचार्यस्याप्रतिकूल:
सर्वकारी ॥८॥ यदेनमुपेयात् तदस्मै दद्यात् ॥६॥
बहूनां येन संयुक्तः ॥१०॥ नास्य शय्यामाविशेत् ॥११।।
न रथमारोहेत् ॥१२॥ न संविशेत् ॥ १३ ॥ न विहारार्थो
जल्पेत् ॥ १४ ॥ न रुच्यर्थ कंचन धारयेत् ॥ १५ ॥ स.
वाणि सांस्पर्शकानि स्त्रीभ्यो वर्जयेत् ॥ १६ ॥ न लाया-
हएडवत् ॥ १७॥ नोदकमभ्युपेयात् ॥ १८॥ न दिवा
स्वपेत् ॥ १६ ॥ विद्यकं ब्रह्मचर्य चरेत् ॥ २० ॥ इन्द्रि-
यसंयतः ॥ २१ ॥ सायं प्रातर्भेक्षाचर्यवृत्तिः ॥ २२ ॥
सायं प्रातरग्निं परिचरेत् ॥ २३ ।। अधाशयया ॥ २४ ॥
आचार्याधीनवृत्तिः ।। २५ ॥ तन्निसर्गादशनम् ॥ २६ ॥
अयाचितमलवणम् ॥ २७॥ वाग्यतोऽश्नीयात् ॥ २८ ॥
वाराहगृह्यसूत्रम् । - मधुमांसे वर्जयेत् ॥ २६ ॥ प्राच्छिन्नवस्त्रां विवृतां स्त्रिय न पश्येत् ॥ ३ ॥ योपस्य वृक्षस्य दण्डी स्यात् ॥ ३१ ॥ नानेन प्रहरेद्वे न ब्राह्मणाय ॥३२॥ न नृत्यगीते गच्छेत् ॥ ३३ ॥ न चैने कुर्यात् ।। ३४ ॥ नावलिखेत् ॥ ३५ ॥ शिखाजटः सर्वजटो वा स्यात् ॥ ३६ ॥ शाणं क्षौममजिनं वासः ॥ ३७॥ रक्तं वसनम् ॥३८॥ कम्बलमैणेयं ब्राह्म- पस्य ॥३॥रौरवं क्षत्रियस्थ ॥४०॥ आज वैश्यस्य ॥४१॥ एतेन धर्मेण द्वादशवर्षाण्येकवेदे ब्रह्मचर्य चरेत् ॥ ४२ ॥ चतुर्विशति द्वयोः षट्त्रिंशस्त्रयाणाम् ॥४३॥ अष्टचत्वा- रिंशत्सर्वेषाम् ॥ ४४ ॥ यावद्ग्रहणं वा ॥ ४५ ॥ मलजु वेलः कृशः लात्वा स सर्व लभेत यत्किंचिन्मनसेप्सितम् ॥४६॥ इत्येतेन धर्मेण साध्वधीतो ।। ४७ ।। मन्त्रब्राह्म णान्यधीत्य कल्पं मीमांसां च याज्ञिकोऽधीत्य वक्त्रं पदं स्मृति चैच्छिकः ॥४८॥ तौ स्नातकौ श्रोत्रियोन्यो वेद- पाठी ॥४६॥ न तस्य स्लानं उपविश्याचमनं विधीयते ॥५०॥ अन्तर्जानु बाह कृत्वा त्रिराचामेत् ॥ ५१ ॥ द्विःपरिमृजेत् ॥ ५२ ॥ खानि चोपस्पृशेच्छीर्षण्यानि ॥५३॥ इति वारा- हगृह्ये षष्ठः खण्डः ॥६॥ यज्ञोपवीत संस्कार होने से लेकर आगे कहे नियमों का पालन करने वाले का नाम ब्रह्मचारी है। उपनयन के प्रकरण में नियमों के पालन के आदेशों का व्याख्यान हो चुका है । मृगचर्म का वस्त्रं दुपट्टे के स्थान में श्रोदे, सब बाल रक्ख या सब कटावे । · भिक्षा मांग कर या प्राचार्य से भोजन रूप जीविका करे । बक्कल सहित दण्ड धारण करे । सात मुंजों की .
भाषावृत्तिसहितम् । .... वस्त्र गुरु आदि पर बहुत मेखला कटिभाग में धारण करें। प्राचार्य की आज्ञा से सब कार्य करे । जो कुछ धनादि वस्तु ब्रह्मचारी को मिले उसको गुरु को देवे । यदि अनेक गुरु हों तो जिसके पास विशेष रहता हो उसी को धनादि देवे । गुरु के बिछा- वन या आसन पर उन के सामने या पीछे में न बैठे। सूत आदि के अच्छेर के समान न धारण करे। रथ, घोड़ा, हाथी न चढ़े । काम भोग विषयक स्त्रियों की चर्चा या धन सुवर्णश्रादि की चर्चा न करे न सुने । चित्त को प्रसन्न करने के लिये या अपनी शोभा बढ़ाने के लिये इतर, चन्दन, पुष्प माला आदि कुछ न धारण करे। स्त्री का वर्णन काव्य सुनना स्त्री के स्तन आदि अङ्गों को देखना, छूना, खुजलाना, उब- टन करना आदि और गाना, बजाना आदि सब कामों को सर्वथा छोड़ देवे । यदि स्नान भी करे तो शरीर को मल २ कर न धोवे और उबटन न करे किन्तु लकड़ी के समान जल पर तैरता रहे। नित्य कामना से स्नान न करे, जलाशय में पैठ कर स्नान न करे । किन्तु जलाशय के समीप श्राचमन आदि करने के लिये जाया करे । दिन को सोया न करे । तीन वेदों के पढ़ने तक ब्रह्मचर्य से रहे। इन्द्रियों को दमन पूर्वक रहे। सायं और प्रातःकाल भिक्षा वृत्ति से निर्वाह करे। सायं और प्रातः दोनों समय अग्निहोत्र करे । भूमि पर शयन करे । विना मांगे प्राप्त पदार्थ और लवण रहित मौन होकर भोजन करे। आचार्य की प्राशा में रहे। गुरु की आज्ञा से भोजन करे। शहत और मांस न खावे । स्त्री के शरीर पर से बलात्कार कपड़े हटा कर या नंगी स्त्री को न देखे। यज्ञिय वृक्ष का दण्ड ग्रहण करे और उस दण्ड से गौ को न मारे और न ब्राह्मण ही को। नाच और गाने को देखने सुनने न जावे और न स्वयं नाचे या गावे । भूमि पर न खाय, किसी पदार्थ से न लिखे । केवल शिखा मात्र रक्खे या सम्पूर्ण शिर में जटारक्खे। शण, रेशम, मृगचर्म का वस्त्र व्यवहार करे। लाल रंग का वस्त्र रक्खे। ब्राह्मण ब्रह्मचारी मृगछाला का कम्बल रक्खे। रुरु मृग का चर्म क्षत्रिय रक्खे। बकरे के ऊन का वस्त्र वैश्य रक्खे। इन नियमों से बारह वर्ष तक एक वेद के पढ़ने में वर्तता हुया ब्रह्मचारी रहे ॥ चौबीस.वर्ष तक दो वेदों २० वाराहगृह्यसूत्रम् । के और ३६ वर्ष तक तीन वेदों के ४८ वर्ष तक चारो वेदों के पढ़ने में ब्रह्म- चारी रहे । या जितने समय तक वेदों को पढ़े उनने समय तक उक्त निय- मानुसार रहे । ब्रह्मचर्यव्रत धारण करता है और मलीन शरीर निर्बल पतला कृश हुआ समावर्तन स्नान करता है वह जो २ मन से चाहता है उस सब को प्राप्त कर लेता है । इस उक्त नियम से जो कुछ पढ़ता है-वह पढ़ना ठीक सुफल होता है । वेद के मन्त्रभाग और ब्राह्मण भागों को पढ़ कर कल्पसूत्र और पूर्वमीमांसा को पढ़ कर व्याकरण को पदपाठ, धर्मशास्त्र का पढ़ना इच्छा पर निर्भर है। ब्रह्मचारी दो प्रकार के होते हैं-एक नैष्ठिक दूसरा वेद पढ़ने पर समावर्तन करने वाला-इनमें से नैष्ठिक ब्रह्मचारी आजीवन ब्रह्मचर्य्यव्रत करने वाला होने से उसको समावर्तन स्नान न करना चाहिये। नैष्ठिक ब्रह्मचारी आचमन करे । दोनों जंघों के बीच दोनों हाथ रख के प्रतिदिन तीन वार आचमन करे और दो बार शरीर का मार्जन करे और शिर में स्थित ज्ञानेन्द्रियों का स्पर्श किया करे ॥ सूत्र १-५३ ॥ यह छठां खण्ड पूरा हुआ ॥६ "वर्षासु श्रवणेन स्वाध्यायानुपाकरोति” हस्तेन वा ॥१॥ प्रौष्ठपदीमित्येके ॥२॥ स जुहोति ॥ ३॥ "अप्वानाभासि तस्यास्ते जोष्ट्रीं गमेयम् ॥ ४ ॥ अहमिद्धि पितुः परिमेधा अमृतस्य जग्रभ । श्रहं सूर्य इवाजनि स्वाहा ॥५॥ सरस्वती नामासि सरस्वान्नामासि युक्तिर्नामासि योगो नामासि मतिनामासि मनोनामासि ॥६॥ तस्यास्ते जोष्टी गमेयम् । तस्यते जोष्ट्रं गमेयम् ।” ॥७॥ इति सर्वत्रानुषजति ॥८॥युजे स्वाहा ॥ ६ ॥ प्रयुजे स्वाहा ॥१०॥संयुजे स्वाहा ॥११॥ उद्युजे स्वाहा ॥१२॥ उद्युज्यमानाय स्वाहा”-इतिजयप्रभृ- तिभिश्चाज्यस्य पुरस्तात् स्विष्टकृतोऽन्तेवासिनां योग भाषावृत्तिसहितम् । २१ SmartPHONERAMANANDH .. मिच्छन्नथ जपति ॥१३॥ ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि ब्रह्म वदिष्यामि तन्मामवतु तवक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारं वाङमे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठित- माविरायुर्मयि घेहि वेदस्य वाणीस्थ उपतिष्ठन्तु छन्दांस्यु- पाकुर्महेऽध्यायान् भूर्भुवः स्वरि"ति दर्भपाणिः त्रिस्सा वित्रीमधीस्यादितस्त्रीननुवाकान् तथाङ्गानामेकैकं "को वो युनक्ती"ति च ॥१४॥ तस्थानध्यायाः ॥१५॥ समूहनवातो वलीकक्षारप्रभृ. तिवर्षी विद्योतमानस्तनयित्नुरिति" श्रुतिः॥१६॥ आका- लिकं देवतुमुलं विद्युद्धन्योलकात्यक्षराश्शब्दाः ॥ १७ ॥ आचारेणान्येऽर्धपञ्चमासानधीत्य ॥ १८॥ "पश्चाधषष्ठा- न्या" दक्षिणायनं वाधीत्य अथोत्सृजन्ति ॥ १६ ॥ एतेन धर्मेण "ऋतमवादिषं सत्यमवादिषम् ॥२०॥ ब्रह्मावादि- पम् ॥ २१ ॥ तन्मावीत् तद्वक्तारमावीत् प्रावीन्ममावीत्त- वक्तारम् ॥२२॥ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता ॥२३॥ मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरायुर्मयि धेहि ॥२४॥ वेदस्य वाणीस्थ प्रतिश्वसन्तु छन्दांस्युत्सृजामहेऽध्यायान् भूर्भुवःस्वरि"त्य- न्तमधीत्य "को वो विमुञ्चती"ति च पक्षिणी रात्रिंनाधी- यीतोभयतः पक्षान्वा नात ऊर्ध्व अभ्रेषु ॥ श्राकालिक- विद्युत्स्तनयित्नुवर्षेषु । चाथोपनिषदहीः ॥ २५ ॥ ब्रह्म- चारी सुचरितमेधावी कर्मकृद्धनदः प्रियो विद्यया वा विद्यामन्विच्छंस्तानि तीर्थानि ब्रह्मणो वेदस्य ब्रह्मचारि- २२ वाराहगृह्यसूत्रम्। त्वादयः ग्रहणे तीर्थान्युपायाः ॥ २६ ॥ इति वाराहगृह्ये सप्तमः खण्डः ॥ ७॥ वर्षाऋतु में श्रवण नक्षत्र के दिन स्वाध्याय ( वेदादि ) का उपाकरण (विद्यारम्भ ) नामक कर्म करे। या भाद्रमास के किसी तिथि के पूर्वाग्रह में हस्तनक्षत्र युक्त हो उसी दिन उपाकरण करे-ऐसा किन्हीं प्राचार्यों का मत है । वह वेदाध्ययन या ब्रह्मयज्ञ का करने वाला 'अप्वा नामासि' इत्यादि मंत्रों से आठ आहुति होम प्राधार और आज्यभाग पाहुतियों के पश्चात् करे। और सरस्वती इत्यादि छः खण्डों में जो २ स्त्रीलिङ्ग हैं उनके साथ "तस्यास्ते" जोड़े और "सरस्वान्नामा०" आदि पु नपुंसक लिङ्गों में “तस्यतेजो०" इत्यादि जोड़े और सब के अन्त में स्वाहा लगावे ॥ इसके पश्चात् विद्यार्थियों या दूसरे एक साथ पढ़ने वालों को चाहता हुआ स्नातक "युजे स्वाहा.” इत्यादि तीन मंत्रों से होम करे। इसके पश्चात् "स्विष्टकृत्' पाहुति से पहिले-"ऋतं वहिष्यामि०" इत्यादि मंत्रों का जप करे। फिर दहिने हाथ में कुश लेकर तीन वार गायत्री सावित्री मंत्र पढ़े। और “इषेत्वा०" इत्यादि तीन अनुवाक पढ़े। इसके अनन्तर "को वोयु०" इत्यादि मंत्र पढ़े ॥ अब वेदादि पढ़ने में अनध्यायों को कहेंगे। वेदादिकों के पढ़ने में आगे कहे जाने वाले अवसरों पर अनध्याय होंगेः-श्रांधी आने पर, छज्जा से पानी वर्षने पर (इतना वर्षा से कम हो जिसमें के छोर से औलाही टपकने लगे) बिजुली चमकने और बादल गरजने पर भी जब तक चमके या गर्जे तब तक वेद न पढ़े ॥ ज्योतिषशास्त्र में लिखे अनुसार ग्रहों के जब युद्ध हो तब तक दिन रात वेद न पढ़े। बिजुली, इन्द्रधनुष और बड़े २ उल्का, तारे टूटने पर, शृगाल आदि के कुसमय रोने पर, सामवेद की ध्वनि होने पर अन्य वेद न पढ़े। इनसे भिन्न लोकाचार से समझना। साढ़े चार या साढ़े पांच या छ: मास या दक्षिणायन काल-तक पढ़ कर-तब पढ़ना बन्द रक्खे-इसको वेदाध्यायो- सर्ग कर्म कहते हैं । इस उत्सर्ग कर्म में "ऋतमवादि०' इत्यादि मंत्र का जप कम ।
भाषावृत्तिसहितम् । mame MONDON ~~~. करे । वेदान्त उपनिषद् पढ़ाने योग्य अधिकारी निम्न लिखित सान होते हैं। ब्रह्मचारी सदाचारी बुद्धिमान् , प्राचार्य को प्रिय, धन देनेवाला, विद्या देने वाला, वेदादि पढ़ाने में निपुण, विद्या के बदले विद्या देनेवाला, ये सब वेद के ज्ञान प्राप्ति में उपाय हैं ॥ सू० १-२६ यह सातवां खण्ड पूरा हुआ ॥७॥ अथ चातु)त्रिकी दीक्षा सम्वत्सरम् ॥१॥ आधारा- वाचार्याज्यभागी हुत्या चतुर्होतृन स्वकर्मणो जुहुयात् ॥ ॥२॥सहपञ्च होत्रा षड्होत्रा ससहोतारमन्ततो हुत्वा व्रतं प्रदायादितो डावनुवाकावनुवाचयेत्।३। अथाग्निवताश्वमे- धिकी दीक्षा संवत्सरम् ॥ द्वादशरानं वा ॥ ४॥ प्राकू. तमग्निमि"ति षड्दुत्वा ॥५॥ व्रतं प्रदायादितोऽष्टावनु- वाकाननुवाचयेत् ॥ ६ ॥ त्रिषवणमुदकमाहरेत् ॥७॥ जीस्त्रीन् कुम्भांस्त्रींश्च समित्फलान् भस्मनि शयीत ॥८॥ करीषे सिकतासु भूमौ वा ॥ नोदकमभ्युपेयात् ॥६॥ संवत्सरे समाप्ते ॥ १० ॥ धृतवतापूपेनाग्निमिष्ट्वा वात्सप्रं वाचयेत् ॥ ११ ।। स्मार्तेन यावद्ध्ययनम् ॥१२॥ काण्ड. व्रतावशेषो होमार्थश्च प्राचन्तयोर्जुहुयात् ॥ १३ ॥ अथैनं परिदत्ते "अग्नये त्वा परिददामि ॥ १४ ॥ वायवे स्वा परिददामि ॥ १५ ॥ सूर्याय त्वा परिददामि ॥ १६ प्रजापतये त्वा परिददामी"ति ॥ १७॥ एतेनैवाश्वमेधो व्याख्यातः ॥ १८ ॥ नवमेनानुवाकेन हुत्वा दशमेनोपति- ठेत ॥ १६ ॥ अश्वाय घासमुदकस्थानं उदकं चाभ्युपेयात् ॥ २० ॥ एताभ्यामेव मन्त्राभ्यां त्रैविद्यकं व्रतमुपेयात् ॥
वाराहगृह्यसूत्रम् । LAN- ...--- ॥ २१ ॥ रहस्यमध्येष्यतः प्रवर्यः ॥ २२ ॥ तस्य व्रतोपा- यनं समिन्मन्त्रश्च ॥ २३ ॥ तिष्ठेदहनि रात्रावासोत वाग्यतः ॥ २४ ॥ पर्वसु चैवं स्यात् ॥ २५ ॥ सर्वजटश्च स्यात् ॥ २६ ॥ संवत्सरादरः प्रवर्यो भवति ॥ २७ ॥ इति वाराहगृह्ये अष्टमः खण्डः ॥ ८॥ चातुहौंत्रिकी दीक्षा-यह कर्म का नाम है। इस चातुहौं त्रि की दीक्षा को ब्रह्मचारी एक वर्ष तक करे । आधार की दो आहुनि देकर श्राज्य भाग की दो आहुति करे और वाचस्पति आदि देवों की संज्ञा चतुर्होता आदि संज्ञा हैं। ब्रह्मचारी अपना कर्म करता हुआ वाचस्पति आदि चार होताओं के लिये दीक्षा के दिनों में आहुति दिया करे और वाक् आदि छः होताओं के साथ सप्तहोतृक होम करे। अन्त में ब्राह्मणादि दोन्तित को दूध आदि भोजन के लिये नियत वस्तु देकर वेद के प्रारम्भ के दो अनुवाकों का अनुवाचन कगवे। अब अग्नि की दीक्षा जो एक वर्ष की होती है उस को कहते हैं या १२ दिन की होती है । “प्राकृतमग्निं." इत्यादि मंत्र से छः आहुति करे। अग्निकाण्ड के आदि से श्राठ अनुवाकों का अनुवाचन करावे । ब्रह्मचारी ऐसा नित्य २ वर्ष भर या बारहों दिन करे और कुछ विशेष नियम ये हैं। कि सायं प्रातः और मध्याह्न में तीनों सयम तीन २ घड़ा भर २ जलाशय से जल लाया करे और तीन २ समिधा और तीन २ फल भी लाया करे । जिस जमीन पर कुछ पलाल आदि भी न विछा हो ऐसी शून्य भूमि पर या भस्म बिछी हो या कण्डों का चूरा बिछा हो या बालू बिछाया हो उस पर एक वस्त्र केवल लंगोटी या धोती पहन कर सोया करे । दीक्षा के दिनों में जल में घुस कर स्नान न करे और अन्य प्रकार से भी स्नान न करे । वर्ष भर या १२ दिन के व्रत समाप्त होने पर मालपू द्वारा प्रधान देवता अग्नि के लिये होम करके "वत्स्त्री०" देवता वाले अनुवाक का जप करे । और जब तक अध्ययन करे स्मात विधि से वत्त । काण्ड व्रत विशेष और भाषावृत्तिसहितम् । २५ होम के लिये विधि यह है बात और होम की आदि और अन्त में आहुतियां देव । श्रव प्राचार्य ब्रह्मचारी को संकेन कर अग्नि आदि देवों को समर्पण करते है । "अग्नये०” इत्यादि मंत्रों से समर्पण करे। इसी प्रकार अश्वमेध का भी व्याख्योन हुआ जालो । बेत नामक वृक्ष की समिधाओं से अग्निको प्रज्वलित करके नवम अनुवाक से होम और छठे अनुवाक से देवता का उपस्थान करे। उसके पश्चात् भोजन के लिये नियत यवागू दीक्षित को यथा योग्य देकर आदि से ३१ अनुवाकों का अनुवाचन करे। सायं प्रातः और मध्याह्न तीनों काल में तीन २ पूजा घास घोड़े के लिये लावे। यह श्राश्वमेधिकी दीक्षा केवन क्षत्रिय ब्रह्मवारी के लिये है। इस लिये इस दीक्षा से क्षत्रिय ब्रह्मचारी अच्छे प्रकार देव बुद्धि से घोड़े की सेवा भी अन्य अपने नियम पालने के समान ही किया करे। घोड़े की सेवार्थ जल के किनारे जावे और जन में न घुस कर बाहर ही से जन लेकर घोड़े की सेवा करें। इन्हीं दो मंत्रों से विधक व्रत को करे । रहस्य नाम वेद के उप निषद भाग को पढ़ना चाहता हो तो वाराह श्रौतसूत्र में लिखे अनुसार ब्रह्म चारो प्रवर्दी संभरण कर्म के प्रतिपादक मन्त्र ब्राह्मण को पहिले पढ़े । उसके व्रतोपायन, समिधा-आदि के मन्त्र को भी वहीं से पढ़े। दिन में खड़ा रह कर व्यतीत कर और रात्रि में मौन हो बैठ कर और पर्व के दिनों ( १४, ८, १५, ३० तिथियां तथा सूर्य को संक्रान्ति) में भी ऐसा ही व्रती होकर रहे । सम्पूर्ण शिर में केश रक्खे तो एक वर्ष के पीछे श्रेष्ठ प्रवर्य हो जाता है । सू० १-२७ ॥ यह अष्टम खण्ड पूरा हुआ ॥८॥ षोडशवर्षस्य गोदानम् ॥ १॥ अग्नि वाऽध्येष्यमा- णस्य अग्निगोदानिको मैत्रायणीयजटाकरणेनोकमन्त्र- विधिः ॥ २॥ उपस्थ उपकक्षयोश्चाधिको मन्त्रप्रयोगः ॥ यत्क्षुरेण मर्चयते"ति भूमौ केशान्निखनेत् ॥४॥ अन्ते गां दद्यात् ॥५॥हे हे गुरुणाऽनुज्ञातः स्नायात् ॥६॥ छन्दस्यर्थान् बुध्वा स्नास्यन् गां कारयेत् ॥ ७ ॥ आचार्य- .
२६ वाराहगृह्यसूत्रम् । महयेत् ॥ ८॥ "आपो हिष्ठेति तिमृभिः "हिरण्यवर्णाः शुचय' इति पतमृभिः स्नात्वा अहते वाससी परिददाति ॥६॥ वख्यसि वसुमन्तं मा कुरु ॥१०॥ सौवर्चसाय मा तेजसे ब्रह्मवर्चसाय परिददामी"ति, "विश्वजनस्य छायासी"ति छत्रं धारयते ॥ ११ ॥ माला- माषनीते "यामश्विनौ धारयेतां बृहस्पतिः पुष्करस्रजम् ॥१२॥ तां विश्वेदेवैरनुमतां मालामारोपयामी"ति ॥१३॥ "तेजोसीति हिरण्यं बिभृयात् ॥ १४ । प्रतिष्ठे स्थो देवते यावापृथिवी मा मा संताप्तमि"त्युपानहौ ॥ १५ ॥ "विष्ट- म्भोसी"ति धारयेद्वैणवीं यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् ॥१६॥ नित्यव्रतान्याहुराचार्याः "द्विवस्त्रोत अवं शोभनं वासो भर्तव्यमि"ति श्रुतिः ॥ १७ ॥ अामन्त्र्य गुरून् गुरु वधूश्च स्वान् गृहान् व्रजेत् ॥ १८ ॥ प्रतिषिद्धमपरया द्वारा निस्सरणं मलवदाससा सह संभाषा रजस्वद्वाससा सह शय्यागोगुर्वोदुरुक्तवचनमस्थाने शयनं स्मयनं स्थानं यानं गानं स्मरणमिति तानि वर्जयेत् ॥ १६ ॥ याजनं वृत्तिरु- छशिलमयाचितप्रतिग्रहःसाधुभ्यो वा याचितमनायासेन सिध्यमानायां वा वैश्यवृत्तिः ॥ २० ॥ स्वाध्यायविरोधि- नोऽर्थान्विसृजेत् ॥२१॥ इति वाराहगृह्ये नवमः खण्डः ।।। जन्म से-सोलहवें वर्ष गोदान नाम के शान्त संस्कार करे । या वेदा. ध्ययन करता हुआ जब आवसथ्यादिका स्थापन विधि पूर्वक करै तब पहिले या पीछे केशान्त संस्कार करे । क्योंकि श्रुति में लिखा है कि महर्षि मैत्रा- भाषावृत्तिसहितम् । - यणि ने अग्निस्थापन के समय गोदान संस्कार किया था । उपस्थ (जन. नेन्द्रिय ) और दोनों उपकतों ( बगल ) के मन्त्र प्रयोग अधिक हैं। “यत् तुरेगा” इत्यादि मंत्र पढ़ कर केशों को काट कर भूमि में गाड़ देवे। और अन्त में प्राचार्य को दो २ गौयें देवे और गुरु की आज्ञा से समावर्तन स्नान करे। वेदों के अर्थ को भलीभांति समझ कर-तब समावर्तन का स्नान करता हुआ गौद्वारा प्राचार्य की पूजा करे । “आपो हिष्ठा०" इत्यादि तीन और "हिरण्यवर्णाः०" इत्यादि चार ऋचाओं से स्नान करने पर चीरेदार नये २ वस्त्र स्नातक को देते समय "वस्व्यसि” इत्यादि मंत्र पढ़े। और "विश्वजनस्य' मन्त्र से छाता धारण करे "या मश्विनौ०" मन्त्र पढ़ कर माला धारण करे । "तेजोसि०" मन्त्र से सुवर्ण धारण करे "प्रतिष्ठे स्थो देवते.” इत्यादि मंत्र से जूते पहने "विष्टम्भोसि०" इत्यादि मन्त्र से बांस की लाठी और जल सहित कमण्डलु को धारण करे ॥ स्नातक का नित्य जिन नियमों का पालन करना चाहिये उनको आचार्य कहते हैं:-दो वस्त्र ( एक पहनने और दूसरा अोढने या दुपट्टा) सुन्दर वस्त्र धारण करना चाहिये ऐसा श्रुति कहती है। यदि पिता से भिन्न गुरु के पास वेद पढने के लिये गुरुकुल में गया हो तो गुरु और गुरु पत्नी से आज्ञा लेकर अपने घर को जावे ॥ अब स्नातक के गृहस्थ के लिये कुछ नियमों को कहते हैं। घर के मुख्य द्वार को छोड़ कर किसी खिड़की आदि से न निकला करे। मलिन कपड़े वालों को स्पर्श न करे। रजस्वला स्त्री के साथ न सोवे । माता पितादि गुरु जनों के विषय में सामने या पीछे में कटु वाक्य न कहे और न सुने । शयन स्थान से अन्यत्र न सोये । विना प्रयोजन न हंसे 'न डोले, निष्प्रयोजन कहीं न ठहरे। गाना, बजाना, नाचना, न करे और न अन्यों के गानादि सुनने देखने को जावे ॥ यज्ञ कराना, उञ्छशिल (खेत में के गिरे अन्न को चुन चुन कर लेना) और विना मांगे धन स्वीकार करना । या अच्छे लोगों से सुगमता से मांगना भी, या आसानी से सिद्ध होने वाली वैश्य वृत्ति कर जीविका करनी। और स्वाध्याय के विरुद्ध अर्थों का त्याग करना ॥ सू० १-२१ ॥ यह नधम खण्ड पूरा हुग्रा वाराहगृह्यसूत्रम्। Mon RAMATA SAMAJDULACHHAKKIRAIL LAMADANIMATA *DAMA24TAMARHAWA-Jammer .0 विनीतक्रोधस्सहर्षःमहिषीं भायाँ विन्देता"नन्यपूर्वी यवीयसीम् ॥१॥ असमानप्रवरैर्विवाह ॥ ऊर्ध्व सप्तमा- पितृवन्धुभ्यः पञ्चमान्मातृवन्धुभ्यो बीजिनश्च ॥२॥ कृत्तिकाखातिपूर्वैरिति वरयेत् ॥ ३॥ मृगशिरश्श्रविष्ठो- तराणीत्युपयमेत् ॥ ४ ॥ पञ्च विवाहकारकाणि भवन्ति- वित्तं रूपं विद्या प्रज्ञा बान्धवमिति ॥ ५॥ एकालाभे वित्तं विसृजेत् ॥ ६ ॥ द्वितीयालाभे रूपं तृतीयालाभे विद्यां प्रज्ञायां तु बान्धवा विवदन्ते ॥ ७ ॥ अक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिस्सखायो यन्ति नो घरेयम् ॥८। समयमा संभगो नो निनीयात् सन्नास्पत्यं सुयममस्तु देवाः इति वरकान्वजतोऽनुमन्त्रयते बन्धुमती कन्याम- स्पृष्टमैथुनामुपयच्छेतानग्निकाम् ॥ श्रेष्ठं विज्ञानमस्यै कुर्यात् ॥ ६ ॥ चतुरो लोष्टानाहरेत् ॥ १० ॥ सीतालोष्टं वेदिलोष्टं गोमयलोष्टं स्मशानलोष्टं च एतेषामेकं गृह्णोष्वेति ब्रूयात् ॥ ११ ॥ स्मशानलोष्टं चेद्गृहणीयात् नोपयच्छेत् ॥ १२ ॥ असंसृष्टामधर्मेणोपयच्छेत् ॥ १३ ॥ ब्राह्मण शौल्केन वा॥शतमिति रथंदद्याद्गोमिथुनं वा उभये॥१४॥ तेजनीष्वासजत् ॥ १५ ॥ जन्यान् कौमारिकांश्च ॥ १६ ॥ पूर्वे जन्यास्युः अपरे कौमारिकाः चतुरो गोमयपिएडा- न्कृत्वा द्वावन्येभ्यस्तधान्येभ्य इति प्रयच्छेत् ॥ १७ ॥ धनं न इति ब्रूयुः पुत्रपशवो न इति ॥ १८ ॥ जन्यां ददामीति ॥ १६ ॥ प्रतिगृह्णामीति प्रतिगृह्य त्रिब्रह्मदेयानि कृतेना भायावृत्तिसहितम् । memoraryanaraumari ORIED - । न विसङ्कसेयुः ॥ २० ॥ त्रिरानन्दं मागधो ह्वयेत् ॥ २१ ॥ इति वाराहगृह्य दशमः खण्डः ॥ १० ॥ विनीत क्रोध (जिसने क्रोध को वश में कर लिया है) हर्ष युक्त पुरुष युवती स्त्री से विवाह करे जो अपनी ही वर्ण की हो और किसी से व्याही न गयी हो !! और जो एक गोत्र और प्रबर की न हा ॥ पिता और गिना के साइयों की सात पीढी और माता के भाइयों की पांच पीढी के भीतर की न हो । कृत्तिका, स्वाति और पूर्वाफल्गुनी आदि तीनों पूर्वा नक्षत्रों में विवाह के लिये वर को पसन्द करे । और दोहिणी, मृगशिर, श्रवण, धनिष्ठा, और तीनों उत्तरा ये नक्षत्र वाग्दान और विवाह के लिये अच्छे हैं । कन्या का पिता आदि वर की पांच दशा देखे १ धन २ रूप, ३ विद्या ४ बुद्धि और ५ कुटुम्ब । रूप से कागा, अन्ध आदि का निपेध और वान्धव के साथ कुलीनता भी आ जाती है । यदि उक्त पांचों शुण वर में न मिनते हों तो, धन को छोड़ दे। क्योंकि धन अनित्य है । विद्या बुद्धि वाले के पास धन हो जाना सुलभ है। दो गुण न मिलते हों तो रूप को भी छोड़ देव क्योंकि विद्या अन्डकों का भी हाल है। तीसरा न मिले तो विद्या को भी छोड़ दे क्योंकि बुद्धिमान होगा तो पीछे भी पढ सकता है जो न भी पढ़ सके तो भी बुद्धिमान निर्बुद्धि पठिन से अच्छा है और बुद्धि और कुटुम्ब इन दोनों में कुटुम्ब न होने पर भी बुद्धिमान वर का विवाह कर देवे ॥ "अनृक्षरा', इत्यादि मन्त्रों से वर खोजने के लिये जाने वाले वरकों को अनुमन्त्रण करे । जिसके साथ किसी पुरुष का संयोग न हुआ हो, भाई जिसके विद्यमान हो जो अपने वर्ण की हो, जिसके प्रवर ऋषि अपने से भिन्न हों, जो ठोक युवति अच्छी हो जिसकी छाती के स्तन न उगे हों, न ऋतुमती हुई हो जिसका रूप, लावण्य, वर्ण, अच्छा गोरा हो ऐसी कन्या से विवाह करें। विधवा या वन्ध्यादि गुप्त या अदृष्ट दोषों की परीक्षा के लिये जुना हुया खेत होम की वेदी, गौशाला, मरघट की मट्टी-में से एक ढेला लेकर कन्या से उठवावे-यदि मरघट की मट्टी ३० वाराहगृह्यसूत्रम्। Mirr- उठावे तो उसके साथ विवाह न करे । ब्राह्म या आर्ष विवाह की रीति से उसके साथ विवाह करे। एक बैल एक गौ या दो बैल दो गौ या उनका मूल्य कन्या के पिता को देकर विवाह करना आर्ष कहलाता है । या सौभरी सोना रथ या दो गौ, दो बैल या सोने आदि के भूषण भोजन के वस्तु अन्नादि वस्त्र देकर विवाह करे। ये सब पक्षान्तर में विकल्प हैं। अग्नि से पश्चिम में चार आसन बिछावे । उन आसनों पर निम्न रीति से बैठे-अग्नि से पूर्व में पश्चिमाभिमुख कन्या दाता बैठे। अग्नि से पश्चिम में पूर्वाभिमुख वर बैठे और दाता से उत्तर में पश्चिम को मुख कर कन्या बैठे और अग्नि से दक्षिण में उत्तर को मुखकर मन्त्र पढ़ने वाला पुरोहित या प्राचा- यं बैठे। उन सबके बीच पूर्वाग्र कुश बिछाकर अक्षतों सहित जल से कांसे का पात्र भरके सोहागिन स्त्री दाता के हाथ में देवे । उस पात्र में सोना डाले । और कन्या का पिता, भाई या नाना जो संरक्षक हो, वह जिस वर से मूल्य न लिया हो ऐसी ब्रह्मदेया कन्या को तीन वार "प्रतिगृह्णामि" कहकर कन्या को स्वीकार करे । यदि बरसे कुछ धनादि लेकर कन्या के पिता ने विवाह किया हो तो वर सुवर्णादि धन अञ्जलि में ले और कन्या का पिता आदि कन्या का हाथ पकड़ कर कहे कि “धनायत्वा ददामि'- और वर अपने हाथों में लिया सुवर्णादि कन्या के पिता को देता हुआ कन्या का हाथ पकड़े और कहे कि "पुत्रभ्यत्त्वा प्रतिगृह्णामि” इस प्रकार धन और कन्या का दोनों लौट फेर कर लेवें । चार वार देन लेन की लौट फेर दोनों करें। ऐसे सम्बन्ध को मगधदेशवासी त्रिरानन्द कहते हैं। सू० १-२१॥ यह दशम खण्ड पूरा हुआ ॥ १०॥ अथ प्रवदने कन्यामुपवसितां लातां सुशिरस्कामह- ताऽनाच्छिन्नदशेन वाससा संवीतां संस्तीर्णस्य पुरस्ता- विहितानि वादित्राणि विधिवदुपकल्प्य पुरस्तात्स्विष्टकृतः वाचे पथ्यायै पूष्णे पृथिव्यै अग्नये सेनायै धेनायै गायत्र्यै , ३१ ३ १ भाषावृत्तिसहितम् । त्रिष्टुभे जगत्यै अनुष्टुभे पङ्क्त्यै विराजे राकायै सिनी वाल्यै कुहे, त्वष्ट्रे माशायै सम्पत्त्यै भूत्यै नित्यै अनु मत्यै पर्जन्याय अग्नये स्विष्टकृते च जुहुयात् ॥१॥ आज्यशेषेण पाणी प्रलिप्य कन्यामुखं संमाटि-"प्रियां करो"मि पतये देवराणां श्वशुराय च ॥ २॥ रुच्यै त्वा- ग्निस्संसृजतु रुचिष्या पतये भव ॥ ३ ॥ सौभाग्येन त्वा संसृज विला देवी घृतपदीन्द्राएयग्नायी अश्विनो राड्वा- गिला चौररुन्धती"ति ॥ ४ ॥ अथ सर्वाणि वादित्राण्य. भिमन्त्रयते ॥ ५॥ या चतुर्धा प्रवदत्यग्नौ या वाते या बृहत्युत ॥ ६॥ पशूनां या ब्राह्मणे न्यदधुः शिवा सा प्रवदत्वि"हेति सर्वाणि वा वादित्राण्यलङ्कृत्य कन्या प्रवादयते ॥ ७ ॥ शुभं वद दुन्दुभे सुप्रजास्स्वाय गोमुख ॥८॥ प्रक्रीडन्तु कन्यास्सुमनस्यमानास्सहेन्द्राएया सव- यसः सनीडाः॥६॥ प्रजापतियों वसति प्रजासु प्रजा- स्तन्वते सुमनस्यमानाः ॥ १० ॥ स इमां प्रजां रमयतु प्रजात्यै स्वयं च नोरमतां संद्धातन ॥ इति प्रवदन्ति कालिकानि ॥ ११ ॥ कन्यामुकेनाभिषिञ्चेत् ॥ १२ ॥ इति वाराहगृह्ये एकादशः खण्डः ॥ ११ ॥ अब विवाह में बाजे का कर्म कहते हैं। इस कर्म के लिये कन्या को उपवास रखकर स्नान करा (शिरसे ) चीरे दार नये वस्त्र पहिनाकर यज्ञार्थ अग्नि के पास बिछाये हुए कुशों के पहिले शास्त्र से विहित बाजे गाजे का प्रायोजन कर स्विष्टकृत आहुति करने के पहिले "वाचे" आदि मंत्रों को पढ़कर आहुतियां करे । और श्राज्यशेष से दोनों हाथों को लीप कर कन्या ३२ बाराहगृह्यसूत्रम्। arreamrapMAMALINE -- के मुम्बको "प्रिया' इत्यादि मंत्रों को पढ़कर सम्मान करे ! और "याय- तुर्धा"० इत्यादि मंत्रों को पढ़कर तवाने को प्रतिमन्त्रित करे । या सत्र वाजों को अलङ्कृत करें "शुभं कई"० इत्यादि मंत्रों को पढ़कर कन्या स्वयं वजावे । तब बाजा बजाने वाले अपने २ बाजे को बजावं । और कन्या को जल से सींचे ।। सू०१-१२॥ ग्यारहवां खण्ड पूरा हुआ॥ ११ ॥ षडयाहाँ भवन्ति-ऋस्विगाचार्यों विवाह्यो राजा स्नातकः प्रियश्चेति ॥ १॥ अप्राकरणिकोनापरिसंवत्सरा. दहयन्ति ॥ २ ॥ अन्धन याज्याकर्मणो विवाहाच्च ! न जीवपितृकोऱ्या प्रतिगृह्णीयात् ॥ ३॥ कांस्ये चमसे वा सदनि मध्यासिच्य वर्षीयसा पिधायाचमनीयप्रथमः प्रतिपद्यन्ते ॥ ४ ॥ विराजो दोहोसि विराजो दोहमशीय मयि दोहः पद्याथै विराजः कल्पयता मिति ॥ ५॥ एकैक- माहियमाणं प्रतीक्षते ॥ ६॥ सावित्रेण विष्टरं प्रतिगृह्य- अहं वर्म सदृशानामुद्यतामिव सूर्यः ॥ ७॥ इदमहं तमधरं करोमि यो मा कस्यचिदासती"त्येकस्मिन्नुपवि शति ॥ ८॥ राष्ट्रभृदसीत्याचार्य आसन्दोमनुमन्त्रयते ॥ मा त्वा जोषमि"त्यन्यतरमधस्तापायोर्विष्टरमुपकर्षति 1. ६ ॥ विष्टरमासीनायकं त्रिः प्राह ॥ १० ॥ नैव भो "इत्याह ।। ११ ।। नम आर्षेयाय” इति श्रुतिः ॥ १२ ॥ स्पृशत्यय पायेन पादौ प्रक्षाल्य सावित्रेणोभयतो- विष्टरं मधुपर्क' प्रतिगृह्य " "अदित्यास्त्वा पृष्ठे साद- यामी"ति प्रतिष्ठाप्यावसाद्य "सुपर्णस्य त्वा गरुत्मतश्च- तुषाऽवेक्षे” इत्यवेक्ष्य "नमो रुद्राय पात्रसदे"-इति प्रादे भाषावृत्तिसहितम्। शेन प्रतिदिशं ब्युटिश्याङ्गुष्ठेनोपमध्यमया च "मधु वाता ऋतायत" इति तिसृभिस्संहजति ॥ १३ ॥ अमृतोपस्त- रणमसि" इत्युपस्तरति "सत्यं यशः श्रीमयि श्रीश्श्रय- तामिति मधुपर्क त्रिः प्राश्नाति भूयिष्ठम् ॥ १४ ॥ सुहृदेऽवशिष्टं प्रयच्छति ॥ १५ ॥ "अमृतापिधानमसी- त्या" चामति ।।१६।। असिपाणिर्गा प्राह "हतो मे पाप्मा पापमानं मे हत॥ १७ ॥ यां त्वा देवा वसवोऽन्वजीविषु- रादित्यानां स्वसारं रुद्रमातरम् ।। १८॥ देवीं गामदिति जनानामारभन्तामहतामहणाय॥ १६ ।। ॐ कुरुते"ति संप्रेष्यति ।। २० ॥ चतुरवरान्ब्राह्मणान् नानागोत्रानित्ये- कैकं पश्वङ्गं पायसं वा भोजयेत् ॥ २१॥ यद्युत्सृजेत्- "माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानामृतस्य नाभिः ॥ २२ ॥ अनुवोचं चिकितुषे जनाय मागामनागा. मदितिं वधिष्ठ ॥ २३ ॥ ॐ भूर्भुवस्स्वरों'-इत्युत्सृजतु तृणान्यत्तूदकं पिबतु ॥ २४ ॥ अथालङ्करणम् ॥ २५ ॥ "मलङ्करणमसि स स्मादलं मे भूयासम् ॥ २६ ॥ प्रा- णापानौ मे तर्पयामि समानव्यानौ मे तर्पयामि उदानरूपे मे सर्पयामि सुचक्षुरहमतिभ्यां भूयासं सुबर्चा मुखेन सुश्रुस्कर्णाभ्यां भूयासमि"ति यथालिङ्गमङ्गानि संस्पृशति अथ गन्धाच्छादने वाससी परिधास्ये "यशो धास्ये दी. र्घायुत्वाय जरदष्टिरस्तु शतं जीवेम शरदः पुरुची राय- स्पोषमभिसंव्ययिष्ये' इत्यहतं वासः परिधत्ते यदि पशु- ५ वाराहगृह्यसूत्रम्। pmanus- मालभते-शं नो मित्र इति पाणो प्रक्षाल्य यथार्थमालभ. नमित्येके ॥२७॥ इति वाराहगृहये द्वादशः खण्डः ॥१२॥ ऋत्विज् (पुरोहित ) १ उपनयन कराके वेद पढ़ाने वाला आचार्य २ जामाता (वर) ३ राजा ( मूर्धाभिषिक्त ) ४ स्नातक (ब्रह्मचर्य समाप्त करने वाला)५और श्वशुर आदि प्रिय व्यक्ति ६ । ये छ पुरुष मधुप- कोदि के विधान से पूजने योग्य होते हैं। विवाह और अग्निष्टोमादि यज्ञों के समय तो मधुपर्क से पूजने का प्रकरण है, वहां तो वर आदि का मधुपर्क विधि से पूजन होना ही इष्ट है । परन्तु विना प्रकरण के दैवात् पुरोहितादि आ जावे तो एक वर्ष में एक ही वार मधुपर्क से उन का पूजन करे । अर्थात एक वर्ष में उनका दोवारा पूजन न करे। यज्ञ कर्म में वरण किये ऋत्विज और सदस्य लोग भी प्राकरणिक होते हैं, उस समय उनके वग्गा से पहिले मधुपर्क से उनका पूजन होना उचित है। जिसका पिता जीवित हो वह मधुपर्क से पूजा में विकल्पित है अर्थात् उसकी पूजा करे या न करे ऐसा श्रुति में लिखा है। उक्त छः ऋत्विन आदि का पूजन निम्न लिखित गति से करे। कांसे के कटोरे में या प्रणिता के समान चमसपात्र में मधु पर्क और दही मिला के एक बड़े पात्र से ढांप कर आचमनीय जल आदि सहित पूजा के पास पूजक आवे । आचमनादि के लिये लाये एक २ जलादि वस्तु को पूज्य ऋत्विज आदि पुरुष "विराजो दोहोऽसि०" इत्यादि मंत्र पढ़ता हुआ देवे । फिर "देवस्यत्वा०" इस सविता देवता वाले मंत्र पढ़ के विष्टर को हाथ में लेके “अहं वर्म" मंत्र को जपे। प्राचार्यादि पूज्य बैठने को लाये कुर्सी चौकी या सिंहासनादिको देखता हुआ "राष्ट्रभृदसि०" मन्त्र पढ़े । “मा त्वा जोष” इत्यादि मंत्र पढ़ के पूज्य आचार्य आदि दोनों पगों के नीचे विष्टर को दबावे । “आचमनीयम्" "विष्टरः" इन दोनों को हुमा पूजक एक २ वार बोले परन्तु "अर्घ्य पाद्यादि" देता हुआ “पाद्यं पाचं पाद्यम्" इत्यादि प्रकार तीन २ वार कहे। फिर पूज्य "नैव भोः' कहे कि मैं पूजा के योग्य नहीं किन्तु नम आधाय" मैं ऋषियों को नमस्कार भाषावृत्तिसहितम् । " देवस्य त्वा० करला हूँ क्योंकि यहां भी वे ही पूज्य हैं, ऐसा श्रुति में कहा है फिर "अर्य' को छू कर ग्रहण करे ॥ पाक जल ले पहिले दहिना फिर वाम पग धोकर इस सविता देवता वाले मन्त्र से दाता के तीन वोर कहने पर मधुपर्क को दहिने हाथ में लेकर वाम हाथ में रख के दहिने हाथ की तर्जनी अंगुष्ठ से थोड़ा २ ऊपर को ईशान कोण से लेकर प्रत्येक दिशा में प्रदक्षिण क्रम से " नमो रुद्राय०" मंत्र को प्रत्येक दिशा के साथ वार २ पढ़ता हुआ मधुपर्क के छींटा देवे । फिर “ मधुवाता ऋतायते०” इत्यादि तीन ऋचा पढ़ के दहिने हाथ की अनामिका अङ्गुली से मधुपर्क को मि- लावे ॥ फिर "अमृतोप०" मंत्र पढके उपस्ताररूप ० प्राचमन पहिले करे ॥ फिर "सत्यं यशः० मंत्र को पढ़के तीन वार थोड़ा २ लेकर मधुपर्क को चाटे । एक वार मंत्र पढ़के दो वार चुप चाप । इसके पश्चात् "अमृतापि०" मंत्र पढके उपर से अभिचोर रूप प्राचमन करे । फिर शेष बचे मधुपर्क को अपने किसी प्रिय मित्र को पात्र सहित दे देवे। फिर तलवार हाथ में लेकर गौ गौं गौः ।' ऐसा दाता पूजक कहे ॥ अगर संज्ञपन चाहता हो तो पूज्य प्राचार्य्यादि " हतो में पाप्मा० " इत्यादि प्रैषवाक्य यजमान से कहे । [मधुपर्क में पशु संज्ञपन सदा से ही विकल्पित है। सत्य युगादि में भी नियत नहीं है पर कलियुग में " लोक विक्रुष्ठ मे वच० " :इत्यादि मनु आदि के वचन अनुसार सर्वथा ही वर्जित है। किसी प्रकार कर्तव्य नहीं।] फिर भिन्न २ गोत्र वाले चार ब्राह्मणों को भोजन करावे " या पशु का 'अङ्गरूप पायस नाम वीर मधुपर्क पूजन में करा लेवे क्योंकि दूध भी पशु का अंश ही है। और विकल्पित पक्षान्तर में गौ को छोड़ देना चाहे, तो "माता रुद्राणां इत्यादि मन्त्र पढ़के छुड़वा देवे ॥ फिर "अलकरगाम्०” मन्त्र पढ़ के माला आदि श्राभूषण पहने “प्राणा पानौ०मंत्र पढ़के नाक के दोनों छिद्रों को स्पर्श करे ॥' समान व्यामो०" मंत्र से नाभिका “ उदान रूपे०" मंत्र से कण्ठ का "सुचतु० " मंत्र से दोनों आंखों का “ सुवर्चामु० सुवर्चामु० " मंत्र से मुख का और "सुश्रुत कर्णाभ्या० " मंत्र से दोनों कानों का स्पर्श करे। पहिले दहिने फिर बायें कान को दहिने हाथ से सर्वत्र स्पर्श करे और .
वाराहगृह्यसूत्रम् ।
reORIRAMPAWANPRAYERan
॥
स्नातक पुरुष पूर्व कही स्नान विधि से पहिले ही मधुपर्क को प्राशन कर
लेने पर विवाह के समय शरीर में चन्दन और सुगन्ध तैल आदि सहित
उबटन लगावे । ऐसा किन्ही प्राचार्यों का मत है और विवाह के पश्चात्
स्नान विधि करे । और " परिधास्ये० " मंत्र से चीरदार नई धाती पहिने
और "यशसामा०
मन्त्र से एक चीरेदार नया दुपट्टा ओढ़े । यह बारहवां
खण्ड पूरा हुत्रा॥ १२ ॥
पश्चादग्नेश्चत्वार्यासनानि उपकल्पयीत ॥१॥ से-
पविशन्ति-पुरस्तात्प्रत्यङ्मुखो दातापश्चात्प्राङ्मुखः प्रति-
ग्रहीता ॥२॥ दातुरुत्तरतः प्रत्यङ्मुखी कन्या ॥ ३ ॥
दक्षिणत उद्ङ्मुखो मन्त्रकारः ॥ ४ ॥ तेषां मध्ये प्राङ्-
मूलान्दर्भानास्तीर्य कांस्यमक्षतोदकेन पूरयित्वा अविध-
वाऽस्मै प्रयच्छति ॥ ५॥ तत्र हिरण्यमष्टौ मङ्गलान्यावेद-
यति ।। ६ ।। मङ्गलान्युक्त्वा ददामि प्रतिगृह्णामि इति
त्रिब्रह्म देया पिता भ्राता वा दद्यात् ।। ७॥ सहिरण्या-
नञ्जलीनावपति ॥८॥ “धनायत्वे"ति दाता ॥६॥
पुत्रेभ्यस्त्वे"ति प्रतिग्रहीता॥१०॥ तस्मै प्रत्यावपति॥११॥
चतुर्व्यतिहृत्य ददाति ॥ १२ ॥ सावित्रेण कन्यां प्रतिगृह्य
प्रजापतय इति च "क इदं कस्मा अदादि"ति सर्वत्रा-
नुषजति "कामैतत्ते" इत्यन्तम् ॥१३॥ समाना वा
माकूतानीति सह जपत्यन्तादनुवाकस्य ॥१४॥ खेरथस्य
खेनसः खे युगस्य शतक्रतो ॥ १५ ॥ अपालामिन्द्रस्त्रिः
पूर्त्यवकृणोत्सूर्यत्वचं" इति तेनोदकांस्थेन कन्यामभि-
विचेत्॥१६॥ इति वाराहगृधे त्रयोदशः खण्डः ॥१३॥
भाषावृत्तिसहितम् । ३७ DRONARMmmano वर से कन्यादान के निमित्त अग्नि के पश्चिमभाग में चार श्रासन बिद्धावे । उन में से-पहिले पश्चिमाभिमुख हो दाना उसके अनन्तर दान लेने वाला वर पूर्व मुख हो बैठे । और दांतों के उत्तर भाग में पश्चिमाभिमुख हो कन्या बैठे । और दक्षिणभाग में उत्तरमुख करके कर्म कराने वाले पुरोहित बैठे। उनके बीच मे पूर्व को जड़ कर कुशों को बिछाकर कांसा के पात्र में जल अक्षत और सोना भर कर सधवा स्त्री दाता को ८ अङ्गुलि के पदार्थ सहित देवे । कन्या का पिता, भाई या नाना जो उसका संरक्षक हो वह जिसका मूल्य नहीं लिया हो ऐसी ब्रह्मदेया कन्या को तीन वार अक्षत सोना डाले जलपात्र सहिन " ददामि०" कहकर देवे और वर तीन वार प्रति- गृह्णामि" कहकर कन्या को स्वीकार करे। यदि कुछ धनादि वर से लेकर कन्या के पिता ने विवाह किया हो तो वर सोना आदि धन अपनी अञ्जली में ले और कन्या का पिता आदि कन्या का हाथ पकड़ कर कहे कि “धनाय त्वा ददामि ” और वह वर अपने हाथों में लिया सोना आदि कन्या के पिता को देता हुआ कन्या का हाथ पकड़े और कहे पुत्रभ्यस्त्वा प्रतिगृ- हामि०'' इस प्रकार धन और कन्या का दोनों लौट फेर कर लेवे ॥ यों चार वार देन लेन की लौट फेर दोनों करें ॥ वर सविता देवता वाले " देव स्यत्वा०" इत्यादि प्रत्येक मन्त्र से कन्या को स्वीकार करे० और प्रत्येक मन्त्र के अन्त में क इदं से लेकर " कामैतत्ते कामैतत्ते" तक के मन्त्र को सब के साथ जोड लेवे और अनुवाक के अन्त तक शेष बचे " प्राकूतानि" इत्यादि मंत्रों को कन्या के देने लेने वाले सब लोग एक साथ ही जपें । अर्थात् साफ बोलें । वर “खेरथस्थ० ' ऋचा पढ़के कांसे के पात्र में पूर्व से रक्खे अक्षतों सहित जल से कन्या के शिर पर अभिषेक करे ॥ सू० १-१६ यह तेरहवां खण्ड पूरा हुआ ॥ १३ ॥ प्रागुदश्ची लक्षणमुद्धत्यावोक्ष्य स्थण्डिलं गोमयेनोप- लिप्य मण्डलं चतुरस्र वा अग्नि निर्मथ्याभिमुख प्रणयेत् ॥ १॥ तत्र ब्रह्मोपवेशनम् ॥ २॥ दर्भाणां पवित्रे मन्त्र- " समानावा
वाराहगृह्यसूत्रम् ।
१
वदुत्पाद्यमं "स्तोममहत" इत्यग्नि परिसमूह्य पर्युक्ष्य
परिस्तीर्थ पञ्चादग्नेरेकवहर्हिस्तृणाति ॥ ३ ॥ उदक प्राक-
कूलान् दर्भान् प्रकृष्य दक्षिणान् तथोत्तरान् अग्रेणाग्नि
दक्षिणैरुत्तरानवस्तृणाति ॥ ४ ॥ अग्न्यायतनस्य मध्यमद.
क्षिणोत्तरप्रदेशेषु उद्गग्रपूर्वाग्रान्परिधीन्परिदधाति ॥ ५॥
दक्षिणतोग्नेब्रह्मणे संस्तृणाति ॥ ६ ॥ अपरं यजमानाय
पश्चार्धे पस्न्यै” अपरमपरशाखोदकधारयोर्लाजाधारायाश्च
पश्चाद्युगधारस्य च ॥७॥ स्योना पृथिवि भवत्ये"तयाऽ.
वस्थाप्य शमीमयीं शम्यां कृत्वाऽन्तर्गोष्ठेऽग्निमुपसमाधाय
भर्ता भार्यामभ्युदानयति ॥ ८॥ वाससोऽन्ते गृहीत्वा"
अघोरचक्षुरपतिघ्न्येऽधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः” सुवर्चाः
॥६॥वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ।
इत्यभिपरिगृह्याभ्युदानयति ॥१०॥ उत्तरेण रथं वासो वानु
परिक्रम्यान्तरेण ज्वलनवहनावनिक्रम्य दक्षिणस्यां धुयुत्त-
रस्य युगतस्तन्मना हस्तात्कन्यामवस्थाप्य शभ्यामुत्कृष्य
हिरण्यमन्तर्धाय-"हिरण्यवर्णाः शुचयः” इति तिमृभि-
रभिषिच्यात्रैव बाणशब्दं कुरुतेति प्रेष्यति ॥११॥ श्रथास्यै
वासःप्रयच्छति ॥ १२ ॥ या अतन्वन्यावन्या वा हरन् ।
॥ १३॥ याश्चाग्या देव्योऽन्तानभितो ततन्थ ॥ १४ ॥
तास्त्वा देव्यो जरसे संव्ययंत्वायुष्मन्निदं परिधत्स्व वास
इत्यहतं वासः परिधाप्यान्वारभ्याघारावाधार्याज्यभागी
हुस्वा "अग्नये जनिविदे स्वाहेत्यु" सरार्धे जुहोति ॥१५॥
भाषावृत्तिसहितम् । सोमाय जनिविदे स्वाहेत्यु"त्तरार्धे जुहोति "सोमाय जनि- विदे स्वाहेति" दक्षिणार्धे "गन्धर्वाय जनिविदे वाहे"ति मध्ये। "युनज्मि त्वे"ति "जातवेदसं कामं युक्तो वहे"ति "जातवेदसं भिषजं, विश्वाग्न” इति चाग्नि नक्षत्रमिष्वा नक्षत्रदेवतां अहः अहर्देवतां रात्रिं रात्रिदेवतां ऋतुं ऋतु. देवतां यजेत् ॥ १६ ॥ तिथिं तिथिदेवतां विरूपाक्षं च ।। ॥१७॥ सोमो द्गन्धर्वाय गन्धर्वो ददग्नये ॥ १८ ॥ रयिं च पुत्रांश्चादादग्निर्मामथो इमाम् । अग्निरस्याः प्रथमो जातवेदाः सोस्याः प्रजां मुञ्चतु मृत्युपाशात्॥१६॥ तदिदं राजा वरुणोनुमन्यतां यथेदं स्त्री पौत्रमगन्म रुद्रि- याय स्वाहेति, हिरण्यगर्भ" प्रत्युचमाज्याहु. तोर्जुहुयात् ॥ २० ॥ येन च कर्मणेच्छेत्तत्र जयान् जुहु- यात् ॥ २१ ॥ जयानां च श्रुतिस्थां यथोक्ताम् ॥ २२ ॥ "आकूत्यै त्वा स्वाहा' 'भूत्यै त्वा स्वाहा ॥ प्रयुजे त्वा स्वाहा' ॥ नभसे स्वा स्वाहा” ॥ "अर्यम्णे त्वा स्वाहा ।। समृदय त्वा स्वाहा' । 'जयायै त्वा स्वाहा' । 'कामायै त्वा स्वाहा' । इत्यूचा 'स्तोमं प्रजापतये' इति च ॥ २३॥ शुचिः प्रत्यङ्मुखः तां समीक्षस्वेत्याह ॥ २४ ॥ तस्यां समीक्षमाणायां जपति ॥ २५ ॥ मम बने ते हृदयं धातु मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु' । 'मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिस्त्वा नियुनक्ति मह्यम् । इति ॥ २६ ॥ कानामा- सो'त्याह ॥ २७ ॥ नामधेये प्रोक्त-देवस्य स्वा सवितुः इत्यष्टाभिः बाराहगृहह्मसूत्रम् । प्रसवेस्थिनोर्षाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां हस्तं गृह्यम्यसा' विति हस्तं गृह्णन्नाम गृह्णाति ॥ २८ ॥ प्रामुख्याः प्रत्य- कुमुख ऊर्ध्वस्तिष्ठन्नासानाया दक्षिणमुत्तानं दक्षिणेन नीचारिक्तमरिक्तन “यथेन्द्रो हस्तमग्रहीत्सविता वरुणो भगः । गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टि- यथासत् ॥ भगोऽयमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गाहप- त्याय देवाः । याग्रे वाक्समभवत्पुरा देवासुरेभ्यः। तामद्य गाधां गास्यामो धा स्त्रीणामुत्तमं मनः । सरस्वति प्रेमिव सुभगे वाजिनीवति । या त्वा विश्वस्थ भूतस्य भव्यस्य प्रगायाम्यस्या अग्रतः । अमोहमस्मि सा त्वं सा स्वमस्या अप्यमोहं । धौरहं पृथिवीत्वमृक्त्वमसि सामाहं रेतोऽह- मस्मि रेतो धत्तं तावेव विवहावहै पुंसे पुत्राय कर्तवै श्रिये पुत्राय वैधवै रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुधीर्यायेति ॥२६॥ अभिदक्षिणमानीयाग्नेः पश्चात् एतमश्मानमातिष्टत"म- श्मेव युवां स्थिरौ भवतम् ॥ ३० ॥ कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुर्वी शरदः शतमि"ति दक्षिणाभ्यां पद्भयामश्मानमा- स्थापयतः ॥ ३१ ॥ “यथेन्द्रः सहेन्द्राण्या अवारहद्गन्ध- मादनात् । एवं त्वमस्माश्मनोऽवरोहख समे पादौ प्रपू- ायुष्मती कन्ये पुत्रवती भवेत्येवं विरास्थापयति ॥ ॥ ३२ ॥ चतुः परिणयति समितं सङ्कल्पेथामिति ॥३३॥ पर्याये पर्याये ब्रह्मा ब्रह्मजपं जपेत् ॥ ३४ ॥ इति वाराह- गृह्ये चतुर्दशः खण्डः ॥
লিবিড় Naray यज्ञशाला में कुण्ड से अलग पूर्व को पांच और उत्तर को एक रेखा करके वहां कुछ मट्टी फेक जल सेंचन करके गोलाकार या चौकोण स्थण्डिल वेदी को गोबर से लीपकर अग्निमन्थन करके सम्मुख रक्खे । वहां ब्रह्मा के लिये श्रासन ठीक करे । दामों के दो प्रादेश मात्र पवित्रों को तीन दाभों से " वैष्णवेस्थः ', मन्त्र द्वारा काढ़कर अग्निदेवता के लिये स्थालीपाक पकावे । "इमं स्तोममहत०” मंत्र से अग्नि सब ओर झाड़ कर, सब ओर जल सेचन कर कुशों से परिस्तरण कर अग्नि के पश्चिम भाग में एक पर्त पूर्व को अग्रभाग करके एक मुट्ठा कुश विडावे ॥ अग्नि के सब ओर कुश बिछाने की रीति यह है कि अग्निकुण्ड से उत्तर और दक्षिण में पूर्व को अप्रभाग कर के और पूर्व पश्चिम में उत्तर को अग्रभाग करके बिछावे । अग्नि के दक्षिण में ब्रह्मा के लिये और ब्रह्मा से पश्चिम में यजमान के लिये और यजमान से दक्षिण पश्चिम की ओर यजमान की पत्नी के लिये उनके आसन पर कुछ बिछावे । वेदि से उत्तर और दक्षिण में पूर्व को अग्रभाग करके अग्नि से पूर्व में उत्तर को तथा पश्चिम में दक्षिणों के साथ मिलते हुए उत्तराग्र बिछावे ॥ अग्नि से दक्षिण भाग में ब्रह्मा के लिये बिछाये आसन पर और ब्रह्मा से पश्चिम में यजमान के आसन पर और यजमान से पश्चिम में पत्नी के श्रासन पर कुछ बिछावे । ब्रह्मा, यजमान और पत्नी से दक्षिण में ग्राम का पल्लव शाखा को धारण के लिये और उस्से पश्चिम में जलभरे कलश को धारण करने वाले के लिये कुछ बिछावे और इन से पश्चिम २ को लाजा धारण करने वाली सौभाग्यवती स्त्री और हल का जूआ धरने वाले के लिये कुछ बिछावे ॥ फिर " स्योना पृथिवि० " मन्त्र से शाखा धार आदि चारों को स्थापित करके पहिले से नवनामी हों तो शमी (छोंकर ) वृक्ष की शम्या प्रादेश मात्र बनाकर गोशाला के भीतर अग्नि को प्रज्वलित करके आगे कही गति से वर अपनी स्त्री को अग्नि के पास लावे । पत्नी के दुपट्टे का छोर पकड़ के “ अघोरचक्षु० " इत्यादि मन्त्र पढ़े पश्चात् दोनों बाहु से उठा कर लावे । खडे हुए रथ या शकट ( छकड़ा) उत्तर से दक्षिण की ओर ४२ वाराहगृहासूनन् । " " परिक्रमा कर या अग्नि और गाड़ी के बीच से निकल के युग (जू) के दोनों भाग वैचों के कन्धों पर रहते हैं उनके बीच को “ धुर" कहते हैं उस धुर और शभ्या (सैल) के छिद्र के बीच उत्तर को नीच करके कन्या को स्थिर करके शम्या को छिद्र से निकाल के उस युग छिद्र में सोना धर के "हिरण्यवर्णाः" इत्यादि तीन ऋचा पढ़ २ के ऊपर से कुशों या श्राम के पत्तों से कन्या के शिर पर अभिषेक करके और इसी अवसर में "बाण शब्दं कुरुत” ऐसे वाक्य द्वारा बाजे बजाने की आज्ञा देवे। फिर पत्नी को अग्नि के पास उठाकर लावे और या प्रकृन्तनूक इत्यादि मन्त्र पढ़ के चीरेदार साड़ी पत्नी को पहनावे। उसके पश्चात् पत्नी के अन्या- रम्भ करने पर प्रजापति और इन्द्र देवता के लिये दो आधार, अग्नि और सोम देवता के लिये दो आज्य भाग की आहुति देकर 'अग्नये जन' मंत्र से वेदिस्थ प्रज्वलित अग्नि के उत्तरार्द्ध में 'सोमाम जन०" से दक्षि. णार्द्ध में और “ गन्धर्वायजन.” से बीच अग्नि में आहुति देवे ॥ पश्चात् "युक्तो वह" यदा कृतं. इन दो मंत्रों से अग्नि देवता को युक्त नाम सन्बोधित करके जिस तिथि में वह काम विवाह होता हो उस दिन जो नक्षत्र हो उस नक्षत्र का जो देवता हो और प्रतिपद आदि जो तिथि हो उसके नाम से और उस तिथिक दवना के नाम से और उस समय जो ऋतु हो उस ऋतु का जो देवता हो उन सबके गाम छः प्राहुति देवे। फिर "सोमो- ददद०" इत्यादि ऋचाओं से एक आहुति देकर " हिरण्यगर्भः० " इत्यादि पाठ ऋचाओं से घी की पाठ आहुति देवे । जिस कर्म से कार्य की सिद्धि चाहता हो वहां २ जया होम करे । जया संज्ञक आहुतियों की यथोक्त श्रुति हैं कि शत्रु के विनाश के लिये भी जया होम होता है । इत्यादि जया होम की आठ आहुति देकर “ ऋचास्तोम० " मन्त्र से नवमी और प्रजापतये, स्वाहा मंत्र से दशमी आहुति देवे ॥ पवित्र हुआ वर पश्चिम को मुखकरके पत्नी से कहे कि (समीक्षस्व) मुझे देखो वह पत्नी वर को देखती हो तब वर मम व्रते ते.” इत्यादि मंत्र को पत्नी की ओर देखता हुआ पढ़े ॥ इसके पश्चात् वर कन्या से कहे कि "कानामा- प्राकूत्यै” " কাঙ্খালিস্তাবন্দু। " सि" तुम्हाग क्या नाम है ? जब कन्या अपना नाम बोले तब "देवस्यत्वा" मन्त्र पढके निम्न रीति कन्याका हाथ पकड़े और मन्त्र के अन्त में पढे हुए असौ” पद की जगह कन्या का नाम सम्बोधनान्त कहे । कन्याका मुख पूर्व को वर का मुख पश्चिम को हो, कन्या बैठी हो और वर खड़ा हो, कन्या का हाथ रीताउत्तान उपर को और बरके दहिने हाथ में कोई फल आदि हो यों अपने दाहिने हाथ से कन्या का दहिना हाथ अंगुठा अङ्गुलियों सहित पकड़के " यथेन्द्रो० " इत्यादि मन्त्र पढ़े ! अन्य कोई पुरुष कन्या को वर से दक्षिण में और अग्नि से पश्चिम में खड़ी करके कन्या वर दोनों के दहिने पगों को एक पत्थर की शिलापर रखवाना हुआ "एतमश्मान०" इत्यादि मन्त्र पढ़े। फिर " यथेन्द्रः " मन्त्र को पढ़के दोनों के पगों को नीचे उतरवावे । पश्चात् उक्त प्रकार एलमश्मा० मन्त्र से फिर पा- षाण शिलापर दोनों के दहिने पगों को धरा के " यथेन्द्र० मन्त्र से फिर उतरवावे ऐसे दो वार करके । इसके अनन्तर चार वार अग्नि के प्रदक्षिया परिक्रमा आगे कहे लाजा होम के साथ कन्या वर दोनां करें॥ और "स. मितं संकल्पेथां०" मन्त्र का प्रत्येक परिक्रमा के साथ एक २ वार ब्रह्मा जप करे ॥ सू० १-३४ ॥ यह चौदहवां खण्ड पूग हुश्रा ॥ १४ ॥ ततो यथार्थ कर्मसंनिपातो विज्ञेयः । अयम्णेऽग्नये पूष्णे- ऽग्नये वरुणाय च वीहीन्यवान्वा निरुप्यप्रोक्ष्य लाजाभृजति मात्रे प्रयच्छति "सजाताया अविधवाय ॥ १॥ अथास्यै द्वितीयं वासः प्रयच्छति ॥२॥ तेनैव मन्त्रेण ॥ दर्भरज्ज्वा इन्द्राएयाः सन्नहनमित्यन्तो समायम्य पुमांसं ग्रन्थि बध्नाति ॥ ३॥ सं त्वानह्यामि अद्भिरोषधीभिः । सं त्वा नह्यामि प्रजया धनेन सा सन्नद्धा सुनुहि भागधेयम्। इत्यन्तरतो वनस्य योक्त्रेण कन्यां साह्यति ॥४॥ अथै नामुपकल्पयते-शूर्प लाजाः इषोकाश्मानं अननम् ॥
४४ वाराहगृह्यसूत्रम् । PARATI चतमृभिः सतूलाभिरित्येकैकयाककुभस्याञ्जनस्य सन्नि- कृष्य "वृत्रस्यासि कनीनिके"ति भतुर्दक्षिणमक्षि त्रिः प्रथममाङ्क्त तथा परम् ॥५॥ तथा पत्न्याः शेषेण तूष्णीम् ॥६॥ दिशि शलाकाः प्रविद्धयति । "यानि रक्षांस्यभितो बजन्त्यस्या वध्वा अग्निसकाशमागच्छन्त्याः । तेषामहं प्रतिविद्धयामि चतुः स्वस्ति वध्वे ॥ भूतपतिर्दधात्वि"ति ॥७॥ लालाः पश्चादुपसाद्य शमीपणैः संसृज्य शूर्पे समं चतुर्धा विभज्याग्रेणाग्नि पर्याहृत्य लाजाधायें प्रयच्छति ॥८॥ लाजा भ्राता ब्रह्मचारी वा अञ्जलिनाऽजल्योरा- वपति ॥ ६ ॥ उपस्तरणाभिधारणैः सम्पातं तावच्छिन्न जुहुत्तः ।। १० । अर्यमणं नु देवं कन्याऽग्निमथक्षत । स इमां देवो अर्यमा प्रेतो मुश्चातु नामुतः स्वाहा। तुभ्यमग्ने पर्यवहन् सूर्या वहतुना सह । पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह । पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा । दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम् । इयं नायुपब्रूते लाजानावपन्ति तौ । दीर्घायुरस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम" इति ॥ ११॥ एवं “पूषणं नु देवं वरुणं नु देवम् । येन द्यौरुग्रा"-इत्यादय उदाहे होमाः जयाभ्यातानाः सन्ततिहोमं राष्ट्रभृतश्च ॥ १२ ॥ "प्राकूताय स्वाहेति जयाः ॥ १३ ॥ प्राचीदिग्वसंत ऋतुरित्याभ्यातानाः ॥ १४ ॥ प्राणदपानं सन्तन्वि"ति सन्ततिहोमाः ॥ १५ ॥ ऋताषाइतधामेति" राष्ट्रभृतश्च ॥
भाषावृत्तिसहितम् । ॥१६॥ "बातारमिन्द्रविश्वादित्या" इति माङ्गल्ये। लाजा: कामेन चतुर्थ स्विष्टकृतमिति ॥१७॥ अथैनां प्राची सप्तप. दानि प्रक्रमयति ॥१८॥ एकमिथे। वे ऊर्जे। त्रीणि प्रजाभ्यः। चत्वारि रायस्पोषाय ॥ पञ्च भवाय ॥ षडतुभ्यः ॥ सखा सप्तपदी भव । सुमृडीका सरस्वती। मा ते व्योम संदृशि । विष्णुस्त्वामुन्नयत्वि"ति सर्वत्रानुषजति ।।१६।। पञ्चादग्नेः रोहिते चर्मण्यानडहे प्राग्नीवे लोमतो दर्भानास्तीर्य तेषु वधूमुपवेशयति । अपि वा दर्भेष्वेव । "इमं विष्यामि वरुणास्य पाशं यजग्रन्थ सविता सत्यधर्मा । धातुश्च योनौ सुकृतस्य लोकेऽरिष्टां मा सह पत्या दधातु" । इतियोक्त्र- पाशं विषाय वाससोऽन्ते बध्नाति ॥ २०॥ अनुमतिभ्यां व्याहृतिभिश्च "त्वं नो अग्ने मनो ज्योतिः त्रयस्त्रिंशत्त. न्तवः अयाश्चाग्ने। असीति च शमीमयीस्तिस्रोक्ताः समिधः ॥ २१ ॥ समुद्रादूमिरि"त्येताभिस्तिमृभिः स्वाहाकारा ताभिराद्धाति ॥ २२ ।। अक्षतसक्तनां दध्नश्च सम- वदाय "इदं हविः प्रजननं मे” इति च हुत्वा ॥२३॥ इम स्तनं मधुमन्तं धयायां प्रपीनमग्ने सलिलस्य मध्ये । उत्स- अषस्व मधुमन्तमूर्मि समुा सदनमाविवेश स्वाहा” इति परिधिविमोकमभिजुहोति ॥ २४ ॥ "अन्नपते" इत्यनस्य जुहुयात् वि ते मुश्चामि रशनां विरश्मीन्” इति च हुत्वा पवित्रेऽनुप्रहृत्य प्राज्येनाभिजुहोति।२५। "एधिषीमही"ति समिधमादधाति ॥२६॥ "समिसि समेधिषी"ति रिती.
४६ वाराहगृह्यसूत्रम् । याम् ॥ २७ ॥ आपो अद्यान्वचारिषमि"त्युपतिष्ठते ॥२८॥ कुम्भादुदकेन “पुनन्तु मा पितर" इत्यनुवाकेन मार्जयन्ते ॥ २६ ॥ आपोहिष्ठीयाभिरित्येके' ॥ ३० ॥ वरो दक्षिणा ॥ ३१ ॥ इति वाराहगृह्ये पञ्चदशः खण्डः ॥१५॥ जिस कर्म का जहां प्रयोजन हो उस अवसर में उसका अनुष्ठान करना चाहिये । अर्थात् सूत्रकार किसी अन्यत्र करने के काम को अन्यत्र भी कह देते हैं पर करने वाले को अवसर देख कर यथावसर करना चाहिये। अर्य- माग्नि, वृषाग्नि और वरुणाग्नि देवता के लिये लाजा भूजने के अर्थ धन या जौ का ग्रहण करके लाजा भूजे ॥ वे भूजे हुए लाजा या जौ कन्या की माता को या जो सोहागिन स्त्री हो ऐसी कन्या माता की सहोदर बहिन ( मौसी) को देवे ॥ इसी के अनन्तर इसी मन्त्र से कन्या को ऊपर से ओढ़ने के लिये दूसग वस्त्र देवे ॥ फिर इन्द्रारायाः संहनन० ' मंत्र को पढ़ के प्राचार्य दाभ की रस्सी के दोनों छोर मिला कर प्रदक्षिण रीति से गांठ देवे ॥ फिर "संत्वा नह्यामि०" मन्त्र पढ़ के कन्या के कदिमाग में पहने हुए साड़ी वस्त्र बोच (दोनों ओर ऊपर नीचे वस्त्र रहें) में वह दर्भ रज्जु प्रदक्षिण लपेटे। यह पत्नी की दीक्षा के लिये मेंखला है। इसके अनन्तर सूप, खीले, दाभ, या मूंज की चार सीके, पत्थर की शिला और आंखों में लगाने का सुरमा इन सब को सम्हाल के रक्खे। जिनमें से मूंज और अग्रभाग में फूला धुआं लगा हुआ ऐसी पूरी लम्बी दाम की या मूंज की चार सीकों के छोरे ठोक करके उन में एक एक में पहाड़ी :सुरमा लगा के पहिले कन्या एक सींक से वर के दहिने नेत्र में "वृत्रस्यासि मंत्र से तीन वार सुरमा लगावे और इसी प्रकार बाये नेत्र में दूसरी सींक से लगावे फिर शेष बची दो सीकों से वर पत्नी की दहिने और बायें नेत्रों में विना मला सुरमा लगावे ॥ फिर 'यानि रक्षांसि.' मन्त्र पढ़ के सब दिशाओं में एक २ सींक (जिनसे सुरमा लगाया है) प्रदक्षिणं क्रम से वर फेके । इसके पश्चात् लाजा नाम धान की खीलों को ।
भाषावृत्तिसहितम् । NARA में " मन्त्र को अग्नि से पश्चिम में धर के उनमें शमी वृक्ष के पत्ते को मिला कर उनको चूप चार भाग मिला कर अलग २रकावे । अग्नि के उत्तर पूर्व से प्रदक्षिण नाके सूप को दक्षिण की ओर खड़ी लाजा धरने वाली रथी को देवे ॥ न्या का भाई या ब्रह्मचारी विद्यार्थी कन्या वर दोनों की मिलाई हुई प्राली में लाजा अपनी अञ्जली में लेकर गिरावे । लाजा गिराने से पहिले प्रज्जली में उपस्तार रूप घी लगावें फिर लाजा गिरा के खीलों के ऊपर ने घी छोड़े वह, “अभिधारण" कहाता है । फिर बीच में न रुकते पर बांध कर "अर्यमणं०" आदि मन्त्रों से दोनों कन्या वर होम करें। 'अर्यमणंनु०” मन्त्र से लेकर “प्रजया सह” मन्त्र तक पहिले वर पढ़े ॥ फेर 'पुनः पत्नीम्०' मन्त्र को अध्वर्यु पढ़े। "इयंनार्युपब्रूते०” मन्त्र को कन्या पढ़े। चारों मन्त्रों के पाठ के साथ धीरे २ निरन्तर दोनों कन्या र लाजा गिगते जावें । यह एक आहुति हुई ॥ फिर पूर्व लिखी अग्नि की रिक्रमा दोनों एक बार करें ॥ परिक्रमा के साथ समितं० मा पढ़े अर्थात् वहां क्रम यह है कि पहिले वेदि में रेखा करे, अग्नि थापन, दर्भ पवित्र बनाना, अग्नि का परिसमूहन आदि स्थापन तक व आदि पात्र स्थापन, लाजा सुवर्ण आदि सूपादि का स्थापन फिर ज्य ग्रहणादि समिद आधान तक पूर्व कहे अनुसार फर "ऋचाओं .” मन्त्र तक आधार होमादि । और हस्त ग्रहण तक करके शिला स्था- न लाजा होमादि करे । फिर पूषा और वरुण का ऊह, अर्यमा के स्थान करके "वृषणां नु देवं कन्या०" इत्यादि मन्त्रों स दो वार लाजा होम रिक्रमा और अश्मारोहण, अवरोहण फिर करें। " येन द्यौरुग्रा०॥ त्यादि होम विवाह में करे और "श्राकूतायः" इत्यादि पूर्वोक्त नया होम प्राचीन दिगबं०" इत्यादि अभ्यानान प्राणापानं० इत्यादि सन्तति 'म और "ऋतापाड्” इत्यादि वारह आहुति राष्ट्रभृत् होम भी विवाह में रे ॥ "त्रातारमिन्द्र०" "विश्वादित्या०' इन दो मन्त्रों से मङ्गल आहुति रे। फिर "अर्यमणमनु" इत्यादि पूर्वोक्त मन्त्रों में 'अर्यमा' के स्थान में गम' शब्द का ऊह करके 'कामनुदेवं०' चौठी स्विष्ट कृत्त स्थानो वाराहगृह्यसूत्रम्। लाजा होम करे ॥ फिर इस कन्या को एक मिषे०' इत्यादि के आगे भवसु- मृडीका०' मन्त्र से 'मुन्नमतु' मन्त्र तक मन्त्र सब में लगा २ के एक २ मन्त्र से एक पग पूर्व को चलावे ! उसके पश्चात् अग्नि से पश्चिम में लाल बैल के चर्म को पूर्व को शिर और ऊपर को लोम करके विछावे उस पर दाम डाल कर वधू को बैठावे या केवल दाभों पर बैठावे । फिर 'इमं विष्या- मि०' मन्त्र को पढ़ के कन्या के कमर में बान्धी हुई दाभ की रस्सी को खोल कर ओढ़े हुए वस्त्र के छोर में बान्ध देवे ॥ फिर 'अनुमति०' के लिये दो, तीन व्याहृति और त्वं नो अग्ने० मन्त्र से तीन आहुति देवे। इसके पश्चात् शमी वृक्ष की तीन समिधा घी में डुबो के समुद्रा दृ० १ इत्यादि स्वाहाकारान्त तीन मन्त्रों से अग्नि में चढ़ावे ॥ पश्चात् विना कटे जौ के सत्तू और दही में से दो २ अाहुति के अंश अवदान लेकर 'इदंहविः प्र०' मन्त्र से होम करके पवित्रों में घी लगा के पवित्रों का होम कर दे और 'विते मुञ्चामि०' इत्यादि मन्त्रों से घी की आहुति करे । पश्चात् 'एधोऽसि.' मन्त्र से एक और समिदसि०" मन्त्र से दूसरी समिधा अग्नि में चढ़ावें। फिर आपोअद्यान्व०" मन्त्र से अग्नि का उपस्थान करे । फिर जल भग घड़ा कलशधारण करने वाले के कलश से दाभ या आम के पत्तों द्वारा जल ले २ कर 'आपोहिष्ठा' आदि तीन मन्त्रों से पत्ती का अभिषेक करे । और श्रेष्ठ गौ दक्षिणा में प्राचार्य को देवे । सू० १-३१ ॥ यह पन्द्रहवां खण्ड पूरा हुआ ॥ १५ ॥ "सुमङ्गलीरियं वधूरिमा समेत पश्यत । सौभाग्य मस्यै दवायाथास्तं विपरेतन ॥” इति प्रेक्षकान्ब्रजतोऽनु- मन्त्रयते ॥१॥ अनव सीमन्तं करोति ॥२॥ विश्वे. तथा शलल्या समूलेन वा दर्भेण ॥ ३॥ "सेनाहनामि- त्ये"तया ॥ अथाभ्यञ्जलि । अभ्यज्य केशान् "सुमनस्य- मानाः प्रजावरीयशसे अघोराः । शिवा भव भर्तुः श्वशु- भाषावृत्तिसहितम् रस्या बदायुष्मती श्वश्रुमती चिरायुः” इति ॥४॥ जीवो- पायोपसमस्यति ॥५ "समस्य केशान्वृजिनानघोरान् शिवा सखिभ्यो भव सर्वाभ्यः । शिवा भव सुकुलोह्यमाना शिवा जनेषु सह वा जनेषु' । इति ॥ ६ ॥ अथैतौ दधि मधु समश्नुतः ॥७॥ यद्वा हविष्यं स्यात् ॥८॥ तस्य स्वस्ति वाचयित्वा “ समानावाकूतानी"ति सह जपन्ति ॥ उभी सह प्राश्नीतः ॥ ६॥ इति बाराहगृह्ये षोडशः खण्डः॥ जो लोग विवाह देखने को आये हों और फिर लौट कर अपने २ घर को जाते हों उनको देखता हुआ "सुमङ्गली०" मंत्र पढ़े। इसी अवसर में वह अपनी पत्नी का सीमंतोन्नयन करे । अर्थात् उसके मांग को भरे । तीन जगह श्वेत चिन्ह वाले सेही के कांटे से या जड़ सहित उखाड़े 'दाभ के गुच्छे से "सेनाहनाम०" इस ऋचा को पढ़के मांग के केश को दोनों ओर को करे पश्चात् “ अभ्यज्य केशान्०" मंत्र पढ़ के बालों में तेल लगावे और कंकत से काढ़े। फिर जीते हुए मेढ़ा की ऊन से बनाये डोरे के साथ वालों को "समस्य केशान०५ मन्त्र पढ़ के गूंथे अर्थात् वेनी बना के बांध देवे । पश्चात् दोनों पति पत्नी दही और मधु मिला कर एक साथ खावे या हविष्यान्न खावें । खाने से पहिले पुरोहिन आदि से कहे "स्वस्ति ब्रूहि, तब ब्राह्मण मन्त्र सहित स्वस्ति कहे । फिर ब्राह्मण सहित तीनों "समानो वा०” मन्त्र को साथ पढ़ें। फिर पति पत्नी दोनों दही शहत मिला के या हविष्यान्न को साथ २ खावें ॥ सू०१-६॥ यह सोलहवां खण्ड पूरा हुआ ॥ १६ ॥ पुण्याहे युङ्क्ते ॥१॥ "युञ्जन्ति बध्नमिति द्वाभ्यां युज्यमानमनुमन्त्रयते-दक्षिणमथोत्तरम् ॥ २ ॥ श्रहतेन वाससा दर्भेर्वा रथं समाटि ॥ ३ ॥ अको न्यावभितो ७
वाराहगृहासूत्रम्।
"
रथम् ।। ये ध्वान्ता वाताग्निमभि ये सञ्चरन्ति ॥४॥ दूरे हेति:
पतत्री वाजिनी वांस्ते नोऽग्नयः पप्रयः पालयन्तु ॥ इति
चक्रेऽभिमन्त्रयते॥५॥"वनस्पते विबङ्ग" इत्यधिष्ठानम्।
मुकिंशुक शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्ण सुवृत्तं सुचक्रम् ।
प्रारोह सूर्यम् ॥६॥अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणु-
ध्व इत्यारोहयति ॥ ७ ॥ "अनुमआयन्तु देवता अनु ब्रह्म
सुवीर्यम् । अनु क्षत्रं तु यहलमनु मा मैतु यद्यश इति
प्राक् अभिप्रायाय प्रदक्षिणमावर्तयति ॥८॥ "प्रति मायन्तु
देवताः प्रति ब्रह्म सुचीयम् । प्रति क्षत्रं तु यद्धलं प्रति
मामैतु यद्यशः” ॥ इनि यथाऽस्तं यन्तमनुमन्त्रयते ॥ ६ ॥
"अमङ्गल्यं चे"त्यतिक्रामति ॥१०॥"नमो रुद्राय ग्रामसद्"
इति "ग्रामे॥ इमा रुद्रायेति" च ॥११॥ "नमो रुद्रायैकवृक्ष
सद" इत्येकवृक्ष-"ये वृक्षेषु शष्पिचरा” इति च ॥१२॥
" नमो रुद्राय श्मशानसद " इति श्मशाने-'ये भूता.
नामधिपतय” इति च ॥ १३ ॥ " नमो रुद्राय चतुष्पथ-
सद " इति चतुष्पथे " ये पथां पथि रक्षम्” इति च ।
" नमो रुद्राय तीर्थसद " इति तीर्थे । “ ये तीर्थानि प्रच-
रन्तीति च ॥ १४॥ यत्रापस्तरितच्या प्रासीत्-“ अति
समुद्राय वैणवे सिंधूनां पतये नमः । नमो नदीनां सर्वासां
पत्ये विश्वाह्यजुषतां विश्वकर्मणामिदं हविः स्वः स्वाहे"
त्यसु उदकाञ्जलिं निनयति ॥ १५ ॥ अमृतं वा आस्ये
जुहोम्यायुः प्राणेऽप्यमृतं ब्रह्मणा सह मृत्युं तरति ॥१६॥
भाषावृत्तिसहितम् । व्युत्काम पथा जरि- "प्रासहादिति रिष्टिरि"ति जपेत् ।। १७ ।। यदि रथाक्षः शम्याणि वा रिष्येत अन्यछा रथाङ्गं तत्रैवाग्निमुपसमाधाय जयप्रभृतिभिर्हत्वा “ सुप्रालीरियं वधू" रिलि जपेत् । वध्वा वधूं समेत पश्यत ॥ १८ ॥ तांजवेन शिवेन वैश्वानरः " इत्यस्याग्रतः ॥ १६ ॥ आचार्यो येन येन पथा प्रयाति तेन तेन सह । इत्यभावेव व्युत्कामतः गोभिः सह ।। २० ॥ अस्तमिते ग्राम प्रविशंति ॥ २१॥ ब्राह्मणवचनादा ॥ २२ ॥ इति वाराहगृह्ये सप्त- दशः खण्डः ॥१॥ अब शुभ नक्षत्र और शुभ ग्रह युक्त पुण्य दिन में अपने घर पत्नी को ले जाने के लिये स्थादि को जोड़े । जब कोई अध्वर्यु आदि ग्थ में घोड़े या बैल को जोड़ना हो, तब उसकी ओर देखता हुअा वर "युजन्ति ब्र" मंत्र पढे, पहिले दहिने को जोड़ते समय फिर बायें को जोड़ते समय अलग२ दो वार मन्त्र पढ़े। इसके पश्चात् 'कन्यङ्काब०' मन्त्र पढके रथ के पहियों का अभिमन्त्रणा करे। पहिले दहिने का फिर बांये का । "वन- स्पते०' मन्त्र पढके पत्नी को अध्वर्यु श्रादि के द्वारा रथ पर चढवावे । फिर आप रथपर बैठके "अनुमायन्तु मन्त्र पढके पहिले थोड़ा पूर्व को रथ चलाकर प्रदक्षिण क्रम से जाने के मार्ग पर फेर कर लावे । ठीक घरको जाने के रास्ते पर रथ चलता हो, तब रथको देखता हुआ "प्रतिमायन्तु देव० मन्त्र को पढ़े ॥ यदि मार्ग में मरघट कूड़ा आदि का ढेर और अनिष्टघृणित अमङ्गल वस्तु के पास होके निकलना पड़े तो "अनुमायन्तु०" इत्यादि मन्त्र का जप करे । यदि ग्राम में होकर निकले तो “नमो रुद्राय प्राम." और "इमारुद्रायः” इन दो मन्त्रों का जप करे । मार्ग में एक वृक्ष पड़े तो "नमो रुद्रायैक वृक्षसदे०' और 'ये वृत्तषु०" दो मन्त्रों को जपे। यदि मार्ग में मरघट पड़े तो "नमोरु०"। ये भूतानां०' दो मन्त्रों को जपे। यदि - ५२ वाराहगृह्यसूत्रम् । momsasur MANOHARBELIENDSHEDMARIND- -~- चौराहा पड़े तो "नमो रुद्राय । ये पां०" मंत्रों को जपे। यदि मार्ग में कोई घाट पड़े तो "नमो रुद्राय" । ये तीर्थानि दो मन्त्रों को जपे ॥ यदि नदी आदि पार उतरने योग्य जलाशय आवे तो अन्जुली से जलभर कर "समुद्राय वैः' मंत्र पढके जलाशय में अञ्जली के जलका होम कर देवे । फिर तीन वार अपने शिर आदि अङ्गों पर जल से मार्जन करके "अमृतं वा आस्ये०" मंत्र पढके तीन वार आचमन करे । यदि नौका पर चढ़कर पार उत्तग्ना हो तो नौका पर चढ़ा हुआ “सुत्रामाणं०” मन्त्र का जप करे ॥ यदि मार्ग में चलते २ रथकी धुरी सैल या श्राग श्रादि कोई ग्थ का अङ्ग, टूट फूट जाये तो ( उसको बढ़ई से बनवाना यह भिन्न लौकिक काम है उसको तो सबही तुल्य करे ) पर विवाह के वेदीका अग्नि साथ (लाना चाहिये ) लाया हो उसको प्रज्वलित कर आधार, आज्यभाग के पश्चात् जयादि होम करके "सुमजलीरि०" मन्त्र को पत्नी सहित पढे । "इमां समेत०" के स्थान में “वधूं समेत'० कहे ॥ फिर स्त्री पुरुष दोनों"व्यु: क्राम पथां०" मंत्रको पढके स्थ से उतरे और अलग २ चले। फिर बैठ जावे । सूर्य नारायण के अस्त होने पर और जंगल से गौत्रों के घर आने के साथ विदा कराके बराती लोग गांव में घुसे । यदि दिन या अधिक रात जाने का समय हो तो ब्राह्मण की प्राज्ञा लेकर गांव में जावें। सू०१-२२॥ यह सत्रहवां खण्ड पूरा हुआ ॥ १७ ॥ अस्मिन्नहस्सन्धौ गृहान् प्रपादयीत ॥१॥"प्रतिब्रह्म- नि"ति प्रत्यवरोहति ॥ २॥ मङ्गलानि प्रादुर्भवन्ति ॥३॥ गोष्ठात्संतता मूलपराजितं स्तुशाति ॥ ४ ॥ रथाद्ध्योप- सादनात् । “येष्वध्येति प्रवसन् येषु सौमनसं महत् । तेनोपहध्यामहे तेनोजानन्त्वागतम् ।।इति तयाऽभ्युपैति।।५।। गृहानहं सुमनसा प्रपद्ये वीरं हि वीरवतः सुशेवाः । इरां वहन्तीं घृतमुक्षमाणास्तेष्वहं समना संविशाम"। इत्य- भाषावृत्तिसहितम् । Sature भ्याहिताग्नि सोदकं सौषधमावसथं प्रतिपद्यत । रेवत्या रोहिण्या मूलेन वा यद्रा पुण्योक्तम् ॥ ६ ॥ पश्चादग्नेः रोहिते चर्मण्यानडुहे प्राग्नीधे लोमतो दर्भानास्तीर्य तेषु वधूमुपवेशयति । अपि वा दर्भेष्वेव ॥ ७॥ अथास्या ब्रह्म- चारिणं जीवपितृक जीवमातृकमुत्सङ्गमुपवेशयेत् ॥८॥ फलानामञ्जलिं पूरयेत् तिलहण्डुलान्दा ॥६॥ "अच्युता ध्रुवा ध्रुरूपत्नी ध्रुवं पश्येम विश्वत" इति ध्रुवं जीवन्ती सप्तर्षीनरुन्धतीमिति दर्शयित्वा प्राजापत्येनस्थालीपाकेनेष्टा जयप्रभृतिभिश्चाज्यं पुरस्तात्स्विष्टकृतः आज्यशेषे ध्या- सिच्य " दधिक्राणोऽकारिषमिति नस्त्रिः प्राश्नाति ॥ १० ॥ चक्रीविषाऽअडुहः पदं मामेवान्वेतु ते मनो मां च पश्यति सूर्य छ । अन्येषु मनस्कृथा सोमेनादित्याः चाक्रवाकं संवनन् तन्नो संवननं कृतमित्यवशिष्टं पत्न्यै प्रयच्छति ॥ १२ ॥ तूष्णी सा प्राश्नाति ॥१३॥ अपराह्ने पिण्डपितृयज्ञः॥१४॥स व्याख्यातः।१५। संवत्सरं ब्रह्मचर्य चरतः द्वादशरानं वा ॥ १६ ॥ अथास्यै गृहान् विसृजेत् ॥ १७॥ योक्त्रपाशं विवाय तौ सन्निपातयेत् ॥ १८ ॥ " अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभू- तम् । इह प्रजामिह रयिं रराणः प्रजायस्व प्रजयापुत्रकाम। अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनूं ऋत्विये नाथ. मानाम् । उप मानुच्चा युवतिर्बभूयाः प्रजायस्व प्रजया पुत्रकामे । प्रजापतिस्तन्वं मे जुषस्व त्वष्टा देवैः सहमान वाराहगृह्यसूत्रम् । इन्द्रः । इन्द्रेण देवैर्वीरुधः संविदानां बहूना पुंसां पितरः स्यावः ॥ अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं गर्भमधामोष धीषु। अहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तरहं प्रजाभ्यो बिभर्षि पुत्रान् ।” इति स्त्रिया दीव्यत्या सञ्जपति ॥ १८ ॥ "कर- दिति "भसद"भि” मृशति ॥ १६ ॥ जननी"त्युपजन- नम् ॥ २ ॥ बृहदिति जातम् ॥ २१ ॥ एतेन धर्मेण ऋता वृतौ संनिपातयेत् ॥ २२ ॥ इति वाराहगृह्ये अष्टादशः खण्डः॥ अब वधू के गृहप्रवेश की रीति दिखाते हैं। ठीक सन्ध्या के समय रथ से उतार के बहू को घरमें लावे "प्रतिब्रह्मन्०” मंत्र को पढ़के यजमान बहू को रथ से उतारे | उस समय दही चन्दनादि मंगल वस्तु कोई घरमें से लावे और मङ्गल सूचक मन्त्रादि का उच्चारण घर में हो ॥ रथ से लेकर घर के भीतर तक पूर्वको अग्र भाग कर २ बराबर निरन्तर कुश बिछावे और अध्वर्यु "येष्वध्येति प्र.” मंत्र को पढता हुआ उन बिछाये कुशों पर बहू को घरमें ले चले ॥ फिर "गृहानहं सुमनसः ०" मन्त्र को पढ़ते हुए एक जल भरा पात्र, धान की खीलें आदि और विवाह के अग्नि को साथ लिए हुए घरमें प्रवेश करे । प्रवेश के समय रोहिणी या मूल नक्षत्र हो । या ज्योतिः. शास्त्रानुकून मुहूर्त हो ॥ प्रथम से बनाये कुण्ड में अग्निस्थापन करके उस अग्नि से पश्चिम में लाल बैल का चर्म पूर्व को शिर और ऊपर को लोम रख के बिछावे, उस पर दाम बिछाके उनपर या बैल का चर्म न मिले तो केवल दामों पर बहू को बैठावे ॥ फिर " सोमेनादित्या०" मन्त्र पढ़के मृग चर्मादि धारण किये किसी ब्रह्मचारी को इसी बहू के गोद में बैठावे ॥ तब कोई फल जिनमें मिले हों ऐसे तिल और चावलों से ब्रह्मचारी की अञ्जुली भर कर बहू की गोदी से उठा देवे ॥ इसके अनन्तर ध्रुव, अरुन्धती, जीवन्ती और सप्तऋषि इन नक्षत्रों को बहू को दिखा वे ॥ बिछाये हुए भाषावृत्तिसहितम् । सप्तऋषियों के बीच की नारा जीवन्ती कहाती है ॥ वह बहू जब ध्रुवादि को देखनी हो तब बर "अच्युता ध्रुवा०" इन्यादि मंत्र का जप करे । फिर अग ने दिन प्रातःकाल प्रजापति देवता के लिये दूध में पूर्व कहे अनुसार स्थाली पाक पकाके उसले 'प्रजापतयेस्वाहा." मन्त्र द्वाग प्रजापति के लिये तूष्णी प्रधान होम करे ॥ फिर शेष बचे घी में दही मिलाकर इस दही के साथ शेष बचे स्थानीपाक को 'चक्रीवानडुहो', मन्त्र पढके यजमान तीन वाय खावे और शेष बचे को पत्नी विना मन्त्र तीन वार खावे । फिर उसी दिन दोपहर के पश्चात् श्रौतसूत्र में कहे अनुसार पिण्ड पितृयज्ञ करे ॥ विवाह विधि हो जाने पर स्त्री पुरुष दोनों एक वर्ष या बारह दिन या तीन दिन या एक दिन तक ब्रह्मचारी ( मैथुन न करें) रहें ॥ इसी अवसर में घर के काम कान धन के लेन देन आदि का अधिकार पत्नी को देवे ॥ ब्रह्मचर्य की समाप्ति में पूर्वोक्त मंत्र से पत्नी की कटि में बान्धी मेखना को खोलकर वक्ष्यमा पनि से दोनों समागम करें। समागम से पहिले "अपश्य त्वा मनसा” मन्त्र को पति को देखनी हुई पत्नी पढ़े फिर "अपश्यं त्वा मनसा०” मंत्र को पत्नी के तरफ देखता हुआ पनि पढ़े, फिर प्रजापतिस्त- न्वं०', मन्त्र को पत्नो पढ़े ॥ और अंहंगर्भ मद." मन्त्र को पत पड़े । फिर "करत" ऐसा कहकर पुरुष पत्नी के उपस्थेन्द्रिय का स्पर्श करे । "जननी' ऐसा कहकर अपने उपस्थेन्द्रिय का स्पर्श करे ॥ "बृहत्'' कहकर दोनों के संयोग के अन्त में गर्भाशय का स्पर्श करे ॥ इसी रीति से प्रत्येक ऋतु काल में दोनों समागम किया करें । सू० १-२२ ॥ यह अठारहवां खण्ड पूग हुआ ॥ १८॥ अथाऽस्यास्तृतीये गर्भमासे पुंसा नक्षत्रेण यदहश्च- न्द्रमा न दृश्यते तदहोपोष्याप्लाव्याहतं वास आच्छाद्य न्यग्रोधावरोहशुङ्गान् उदपेषं दक्षिणस्मिन्नासिकाच्छिद्र आसिश्चेत् ॥ १॥ हिरण्यगर्भोऽद्भयः संभूतः॥ इत्येताभ्यां ॥ २ ॥ अथाऽस्या दक्षिणं कुक्षिमभिमृशेत्-'घुमानग्निः वाराहगृह्यसूत्रम्। ~~~ त्यनुषजेत् ॥ ५॥ नम इत्यन्ने च ये ब्राह्मणाः प्राच्या दिश्यहन्तु ये देवा यानि भूतानि प्रपद्ये तानि मे स्वस्थ यनं कुर्वन्विति' दक्षिणस्यां प्रतीच्या उत्तरस्थासूङयां "ये ब्राह्मणा" इति सर्वत्रानुषजेत् ॥६॥ स्नेहवांसमन्नं भोजयित्वा विदिशो ब्राह्मणानर्थसिद्धं वाचयेत् ॥७॥ बलिहरणस्थांते यामाशिषमिच्छेत् तामासीत ॥८॥ गृहपतिः अक्षयमन्नमस्त्वित्याह ॥ ६ ॥ भिक्षा प्रदाय सायं भोजनमेव प्रातराशेत् ॥१०॥ विप्रोष्य गृहानुपतिष्ठेत् ॥ ११ ॥ इति वाराहगृह्ये वैश्वदैविकः खण्डः ॥ विश्वे देवों के उद्देश्य से पकाया अन्न वैश्वदेव कहाता है । उस अन्न से गृहस्थ सायं प्रातः काल बलि कर्म करे ॥ इन पञ्च महायज्ञों में यहां पहिले देव यज्ञ दिखलाते हैं ॥ १ अग्नि, २ सोम, ३ धन्वन्तरि ४ विश्वेदेव, ५ प्रजा- पति और "अग्निस्विष्टकृत' इन छ देवताओं के लिये "अग्नये स्वाहा." इत्यादि प्रकोर छः आहुति हविष्यान्न की अग्नि में देवे । अब भूतयज्ञ कहते हैं-अग्नये नमः, सोमायनमः, इत्यादि मन्त्रों से अग्निस्थान यज्ञ- शाला में उत्तर २ को छः ग्रास धरे "अभ्यो नमः" जलभरे मटका के पास "श्रोषधिभ्यो नमः" से ओषधियों के पास वनस्पतिभ्यो नमः" से बीच के खम्भे के पास "गृह्याभ्यो देवताभ्यो नमः" से घर के बीच "धर्मायाधर्माय नमः" से द्वारपर "मृत्यवकाशाय नमः' से आकाश में बलि फेके । “अन्त- गोष्ठायनमः से गोशाला के भीतर' 'बलिः श्रवणाय नमः से घरके बाहर पूर्व में विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः" से घरके बीच में । इन्द्राय नमः, इन्द्र पुरुषेभ्यो नमः" से घर से पूर्व में "यमाय नमः यमपुरुषायनमः' से घर से दक्षिण भाग में एक बलिधरे । वरुणाय नमः । वरुणपुरुषेभ्यो नमः" से घर से पश्चिम भाग में । “सोमाय नमः । सोमपुरुषेभ्यो नमः" से घर के उत्तर भाग में । ब्रह्मणे नमः । ब्रह्म पुरुषेभ्यो नमः। घरके मध्य भागमें । पापा.
भाषावृत्तिसहितम् । तिकेभ्यो नम:', इत्यादि वाक्यों से ग्यारह बलि पूर्व में धरे। दिवाचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः" से दिन में "नक्तंचारिभ्यो भूतेभ्यो नमः" से रात में एक २ बलि बीच में घरे । “धन्वन्नरये नमः' से एक बलि धन्वन्तरि की तृप्ति के लिये धरे, जितना बलिकर्म के लिये अन्न लिया था उसमें से शेष बचे अन्न में थोड़ा जल मिलाके असव्य दक्षिणाभिमुख हो घर से दक्षिण में "पितृभ्यः स्वधा' कहकर एक बलि भूमि पर धरे ॥ फिर यथा विधि अतिथि को भोजन कराके शेष बचे अन्न को पति पत्नी खावें ॥ पितरों के लिये जो एक बलि है वही पितृयज्ञ कहाता है। यह वैश्वदेविक खण्ड पूरा हुआ। अनः परं परिशिष्टं मैत्रायणीयसूत्रस्य गृह्यमगृह्य- पुरुषः प्रायश्चित्तानुग्रहिक-हौतृक-शुल्बिक-उत्तरेष्टिक वैष्णव-आध्वधिकार्षक-चातुर्होतृक गोनामिक-अकुल- पादहस्य-प्रतिग्रहयमक-वृषोत्सर्ग-प्रश्न-द्रविण--षट्कार- ण-प्रधान--सान्देहिक- प्रवराध्याय - हविधान च्छन्दोन- क्रमणी-अन्तःकल्प-प्रवासविधि प्रातरुपस्थान-भूतोत्पत्ति रिति द्वाविंशतिः परिशिष्टसंख्यानाम् ॥ १ ॥ इसके अनन्तर मैत्रायणीय गृह्यशाखा के ( वाराह गृह्यसूत्र के परिशिष्ट को कहते हैं ) परिशिष्ट के विषयों की २२ संख्या है, जैसे-गृह्य अगृह्य पुरुषः प्रायश्चित्तानुग्रहिक हौतृक, शुल्विक, उत्तरेष्ठिक, वैष्णव, श्राध्वर्य विकार्षक, चातुर्होतृक, गानामिक, अकुल पाद रहस्य, प्रतिग्रह यमक, वृषोत्सर्ग, प्रश्न, द्रविण, षटकारण, प्रधान, सान्देहिक, प्रवराध्याय, रुद्रे विधान, छन्दो- नुक्रमण, अन्त:कल्प, प्रवासविधि, प्रातरुपस्थान, और भूतोत्पत्ति ॥ गृह्याग्नौ पाकयज्ञान् विहरेत् ॥१॥ हस्वत्वात् ।।२॥ पाकयज्ञो हस्वं हिपाक इत्याचक्षते ॥३॥ दर्श पूर्णमास- - -
वाराहगृह्यसूत्रम्
प्रकृतिः पाकयज्ञविधिः अप्रथाजानुशाजोऽसामिधेनिका
स्वाहाकारान्ते निगद्य होमाः परतंत्रोत्पतिर्दक्षिाग्नावा-
हिताग्निः गोमयेन गोचर्ममात्रं चतुरनं या स्थंडिलमुप.
लिप्येषुमानं तस्मिन् लक्षणं कुर्वीत "सत्यसदसी"ति पश्चा-
र्धादुदीची लेखां लिखेत् ।। ४ !! "ऋतसदसी"ति दक्षिणा-
धर्थात् प्राची धर्मसदसीत्युत्तरार्धात् प्राची मध्ये हे तिस्रो
वा प्राचीः ॥ "ऊर्जस्वतो”ति दक्षिणाम् ॥६॥ पयस्व.
ती "त्युत्तराम्। "इंद्रायत्वेति” मध्यावा सर्वाः प्रादेशमाच्या
दर्भणावलिखेत् ।। ८॥ अद्भिः प्रोक्ष्याग्नि सादयति ॥६॥
परिसमुह्य पर्युक्ष्य परिस्तीर्थ लूणीिनिमावहिस्सना प्राग-
ग्रैर्दक्षिणारंभैः उदक्संस्थैः अयुग्मैर्धात भिस्तृणाति ॥१०॥
दक्षिणतोऽग्ने ब्राह्मणमुपदेश्योत्तरतः उदक्षानं वर्हिषः
पवित्रे कुरुते ॥ ११॥ समिधावप्रच्छिन्नप्रान्तौ दी प्रादे.
शमात्रौ "पवित्र स्थो वैष्णव्य" इत्योषध्या छित्वा "वि-
णोर्मनसा पूते स्थ" इत्यद्भिः त्रिरुन्मृज्य प्रोक्षणीधर्मः सं-
स्कृत्य प्रणीताः प्रणीय निर्वपणोक्षणसंचपनमिति यथा-
दैवतंचरुमधिनित्य सुक्वौ प्रमृज्याभ्युक्ष्य अग्नौ प्रताप्य
अद्भिरासिच्य अच्छिन्नपात्रेत्याज्यमग्नौ अधिश्रयति॥१२॥
पृश्नेः पयोऽसी"ति आज्यं निर्वपति ॥ १३ ॥ परि वाज-
पतिरित्याज्यं हविश्च त्रिः पर्यग्नि करोति ॥ १४ ॥ देव-
स्स्वा सवितोत्पुनात्वि"त्याज्यं श्रपयति ॥ १५॥ तूष्णी-
मिमा बर्हिः प्रोक्ष्य यथानातमभि परिस्तृणाति ॥ १६ ॥
भाषावृत्तिसहितम् । - परिधीन परिदद्धाति ॥ १७ ।। ओजोसी"त्याज्यमवेक्ष्य पश्चादग्ने दर्भेष्वासादयति ॥ १८॥ अभिधार्य स्थाली पाक मुत्तरत उछालयति ॥ १६ ॥ सकृदेवेध्यमादाय विरू- पाक्षः प्रथमो होमानां ब्राह्मणमामन्त्र्य समिधमादायाघा- रावाधार्याज्यभागौ हुत्वा "युनजिन त्वे"ति च योजयित्वा नह्यति ॥ २० ॥ "युक्तो वह" इति हविज्ञायते ॥ २६ ॥ कामं पुरस्ताद्धरोजुहोति "युक्तो वह जातवेदः पुरस्तादि. दंविधिक्रियमाणं यह त्वं भिषग्भेषजस्यासि गोता त्वया प्रसूता गामश्वं पुरुषं सनेमि स्वाहेलि ॥ २२ ॥ विश्वाग्ने त्वया वयं धारा उदन्या इव ।। अदि गाहेमहि द्विष"मिति नक्षत्रभिष्ट्वा देवतां यजेत ।। २३ ।। अहोरात्रऋतुं तिथिं च अभिघार्य यद्देवतं हविः स्यात् तज्जुहुयाद्यथादेवतम् ॥ २४ ॥ यथा देवतथा बर्चा आकूताय स्वाहेति जयान् जुहुयात् ॥२५॥ प्रजापतिः प्राथच्छदिडामग्ने” इति स्विष्ट- कृतमुत्ताधपूर्वार्धे जुहुयात् ।। २६॥ मेक्षणमुपधामं पवित्रे चान्बादध्यात् "अन्वयनो अनुमतिरन्विदनुमते स्वंभूःस्वा- हे"ति प्रायश्चित्ताहुतीश्च ।। २७॥ त्वं नो अग्ने स त्वं नो अग्ने मनो ज्योतिः त्रयस्त्रिंशत्तन्तवः श्रयाश्चाग्नेड- सीति" च । इमं स्तनं मधुमन्तं धयाय प्रपीनमग्ने सलि- लमध्ये। उत्संजिषस्व मधुमन्तपूर्वी समुद्य् सदनमाविवेश स्वाहेति परिधिविमोकमभिजुहोति ॥ २८ ॥ "अन्नपत" इत्यनस्य जुहुयात् ।। २६ ॥ “एधोस्येधिषीमहि स्वाहेति" ६२ वाराहगृह्यसुत्र । समिधमादधाति ।। ३० ॥ “समिसि समेधिषी"महीति द्वितीयाम् ।। ३१ । बर्हिषि पूर्णपात्रं निनयेत् । एषोऽवभृथः पाकयज्ञानाम् ॥ ३२ ॥ आपोहिष्टीयाभिर्मार्जयित्वा पर्यु: क्षेत ॥३३॥ वरो दक्षिणा ॥३४॥ अश्वं वरं विद्याद्गााम- त्येके ॥३५॥ इतिवाराहगृह्ये प्रथमः खण्डः संपूर्णः ।। ।। इति वाराहगृह्यमेकविंशतिखण्डैः समाप्तम् ॥ . पाकयज्ञ छोटे २ होते हैं, इस लिये इनके लिये दूसरे अग्नि के प्राधान की आवश्यकता नहीं, गृह्य अग्नि ही में पाकयज्ञों को सम्पादन करे । दर्श और पौर्णमास (यज्ञ) की प्रकृति पाक-यज्ञ विधि है अप्रयाज, अनुयाज, और असामधनि के मन्त्रों में "स्वाहा” को जोड़कर निगद (वाक्य) से होम करे, यह बात दुसरे गृह्यसूत्रों से लियी गई है। दक्षिणाग्नि में श्राहिताग्नि व्यक्ति गौचर्म मात्र भूमि चौकोण या वेदी को गौके गोबर से लीपकर उसपर धनुष की बराबर सत्यसद सि मंत्र से इस प्रकार रेखा खींचे कि पश्चिम भाग आधे में उत्तर को रेखा खींचे। और "ऋतसदसि०" म. से दक्षिण आधे में पश्चिम को रेखा खींचे । “धर्म सदसि०" म. से उत्तर के आधे भागमें पूर्व की ओर रेखा खींचे। दो या तीन रेखा पूर्व की ओर “ऊर्जस्वनि" म. से दक्षिण को रेखा खींचे। “पयस्वति०” मंत्र से उत्तर की ओर रेखा खींचे। या "इन्द्रायत्वा०" मन्त्र से बीच से विलस्तभर (प्रादेश परिमाण) सारी रेखाओं को कुश से खींचे । और जल से छोटा देकर अग्निके पास प्रयोजनीय पदार्थों को रक्खे । वेदी को साफ कर जल सींचे और अग्निके चारो ओर कुशाओं को बिछाकर विना मंत्र समिधा, और बहिको पास में रख के पूर्वाग्र कुशाओं को दक्षिगा भाग से प्रारम्भ कर उत्तर को रख के जोड धातों को बिलावे और अग्नि के दक्षिणा भाग में ब्राहामा को भाषावृत्तिसहितम् । RAAN- तुवा बैठाकर उत्तर भाग में जलपान को और बहि कुशाको पवित्र बनावे । जिनके अग्रभाग टूटे न हों ऐसे दो कुशाओं (प्रादेशपरिमाण के ) "पवित्रे स्थो वैष्णाव्यः' मंत्र से कुशा को काट कर "विष्णोमर्नसापूतेस्थ०" मंत्र से जल से तीन वार मार्जन कर प्रोक्षणी से संस्कार कर प्रणीता से प्रणयन कर निर्वपण, प्रोक्षण, संवपन" कर्म को यथा देवा चरु को अग्नि पर चढाकर लुक और को मार्जन कर उसपर जल छिड़क कर अग्नि में तपाकर जल से सींचकर "अच्छिन्न पत्र” मंत्र से अग्नि में तपावे । "पृश्निःपयोसि" मंत्र से आय से निर्वापकरे । "परिवाजपतिः' मंत्र से प्राज्य और हवि को तीन वार अंगारे" को अग्नि के चारो ओर भ्रमण कगये । “देव- स्तव'' इत्यादि मंत्र से प्राज्य को आगपर चढ़ावे । और विना मंत्र बहिः कुश को प्रोक्षण कर यथा विधि अग्नि के चारो ओर बिछावे और परि. धिको परिधान करे । “ोजोसि" मंत्र से प्राज्य को देखकर अग्नि के पश्चिमभागमें कुशों पर रखे। और अग्नि में घी का ढार देकर स्थानी पाक के उत्तर में छोड़ देवे.। और एक ही बार में इध्म को लेकर विरूपाक्ष नामक प्रथम होम, ब्राह्मण को आमन्त्रण कर समिधा लेकर घी का दो ढार देकर आज्यभाग की दो आहुतियां देकर "युनज्मित्वा०'' मंत्र जोड़कर आर. म्भ करे । "युक्तो वह०" से इविः का ज्ञान होता है। तब इच्छानुसार पहिले धुरको हवन करे। फिर “युक्तोवह'' इत्यादि मंत्रों से नक्षत्र की पूजा कर देवता की पूजा करे । अहोरात्र को, तिथिको आज्य का ढार देकर जिस देवता के निमित्त हविः हो उनके नाम तथा उनके मंत्र से हवन करे । "अाकूताय०" मंत्र से स्विष्टकृत् की आहुति उत्तरार्ध पूर्वार्ध भाग में देवे । दर्वा, उपग्राम, पवित्रे इनको अग्नि में डाले । “अन्वधनो, इत्यादि मंत्र से और "इमं स्तनं०' मंत्र से परिधि को त्याग करते समय हवन करे । "अन्नपते." मंत्र से अन्नको हवन करे। "एधासि" मंत्र से समिधा की आहुति करे । “समिदसि." मंत्र से दूसरी समित की आहुति करे और बर्हिषि तथा पूर्णपात्र को भी अग्नि में डाले । यह कर्म पाक यज्ञों का अव-
वाराहगृह्यसूत्रम्।
RDINIOAM
RAIN
भृथ है । फिर "आपोहिष्टा" मंत्र से मार्जन कर जल से सींचे । और
ब्राह्मणों को दक्षिणा देवे ॥ कोई २ प्राचार्य दक्षिणा में घोड़ा, या गौ
देना बताते हैं ॥ इति ठाकुर-उड्यनारायण सिंह कृत मापानुवाद सहित
वाराह गृह्यसूत्र २१ खण्डों में पूरा हुआ।
वाराहगृह्यसूत्र का प्रथम खण्ड पूरा हुआ ॥
पुस्तक प्राप्तिस्थानम्:
ठा. उदयनारायणसिंह
शास्त्रप्रकाश भवन
मधुरापुर, विदूपुर बाजार (मुजफ्फरपुर)।
वाराहगृह्यसूत्र का शुद्धिपत्र । पृष्ठ संख्या पंक्ति १ y १४ १२ अशुद्ध दाक्षणे दक्षणतो आदिशात् अतस्य सयय पहिले का देवे देना सयम विवाह दक्षिणे दक्षिणतो आद्वाविंशात श्रुतस्य समय पहिले ही देना चाहिये १६ ९ समय २ विवाहः हो १६ स स्मादलं सर्वस्मादलं धोती गाथा अग्निके धाती गाधां अनि . ४१ ६ ४१ कुछ १८ १० कटे १६ ३ अंहंगर्भ वैश्वदेव सायां गानामिक विद्याद्गाम- अगर्भ वैश्वदेवः मूर्ध्वायां गोनामिक विद्याद्गामि- २० ६२