Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sarir Biwi
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साहित्य-सरोजमाला स०-६
शरीर बीवी
[हास्यरस प्रधान मनोरञ्जक उपन्यास]
ले. स्वर्गीय मिर्जा अजीमवेग चगताई
अनुनादक
श्रीयुत व्यथित हृदय
प्रकाशक
छात्रहितकारी पुस्तकमाला
दारागज-प्रयाग
पाँचवाँ सरकरण]
[ मृ. १॥
प्रकाशक
श्री केदारनाथ गुप्त, एम० ए०
छानहितकारी पुस्तकमाला
दारागज, प्रयाग
मुद्रक
सरयू प्रसाद पाडेय
नागरो प्रेस, दारागज,
प्रयाग
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भूमिका मिर्जा अजीमवेग चगताई का 'कोलतार' नामक हास्यरस का उपन्यास, जो अभी हाल ही में हमारे यहाँ से प्रकाशित हो चुका है, पाठकों तथा समालोचकों को इतना सुदर और सुरुचिपूर्ण प्रतीत हुआ है कि सभी ने उसकी भूरि मूरि प्रशसा की है। आज हम उही लेखक का यह दूसरा हास्यरस का उपन्यास प्रकाशित करके पाठकों के सामने उपस्थित करते हैं । आशा है सहृदय पाठक कोलतार की तरह इसे भी पसन्द करेंगे। साथ ही पाठकों ने यदि इसे अपनाया तो यथा समय हम शीघ्र ही चगताई साहब के अन्य उपन्यास भी प्रकाशित कर उनकी सेवा में उपस्थित करेंगे। -प्रकाशक ६ ६ शरीर बीबी उन्होंने कहा, ऐसे उल्लू कहीं और रहते हैं। हमने दियासलाई जेब में रक्सी और कहा, अच्छा न दीजिये । वे हमारे पीछे दौडे किन्तु “लाहौल यिलाकूवत" कहाँ हम, कहाँ वे । हम लोग बहुत आगे निकल गये और वे लौट गये। थोडी देर बाद जब हमने मुडकर देवा, तब वे हजरत साइकिल पर धीरे-धीरे चले श्रा रहे हैं। हम एक किनारे के पेड की ओट में छिप गये कि कही देस न लें। हमने देखा, कि उनके मुह के सिगरेट के साथ ही जैसे ही साइकिल सामने आई, हाथ बढाकर उनके मुँह से सिग- रेट छीन लिया। उन्होंने जन देखा, तब झुककर सलाम किया। वे वे बिके हुए की तरह हमारे पीछे साइकिल रसकर दौडें । इधर हमारे एक दोस्त ने क्या किया कि उनकी साइकिल लेकर यह गया, वह गया। वे हमें छोडकर उस ओर लपके । जब हमने यह देसा तव हम रुक गये । हमारे साथी ने कुछ दूर जाकर साइकिल जमीन पर रस दी, किन्तु एक छेद उनके ट्य व में कर दिया । हम अपने दोस्तों से दूसरी सडक पर जाकर मिल गये । दाहिने हाथ की ओर देखते क्या है, कि एक बहुत बड़ा मैदान दूर तक चला गया है। एक आदमी लोटा लिये हुए मैदान के बीच में चला जा रहा था। मालूम होता था, कि वह पासाने जा रहा है। जिस बंगले से वह आया था, वह बहुत दूर था और नल भी वहाँ से बहुत दूर था । हम शीघ्र सडक छोड़कर दौडते हुये उसके पास पहुंचे। उसे पुकारते जाते थे, कि भाई जरा यात सुन लो। हम हॉफ्ते. काँपते हुए उसके पास पहुँचे । उसकी सूरत-सक्ल देसकर भय मालूम हुआ, क्योंकि वह तगड़ा-मजबूत जवान था। किन्तु हम भी जान पर सेल गये कि हमारी मिहनत घेकार न जाये | उलटी सीधी दो एक बातें करके लोटे में हाथ मारकर गिरा दिया और यह गया, वह गया । वह बड़े जोर से हमारी ओर दोडा, किन्तु ।
७ हमारी शरारतें हमारी खुश किस्तमी कहिये कि उस शक्ति ने उसको रोक लिया, जिससे रुस्तम भी हार मान गया होगा। हमने जब मुडकर देखा तब वे हजरत निलकुल हारे हुए से । फिर तो हमने उसको मारे इंटो के परीशान कर दिया। तात्पर्य यह कि इस काम को पूरा करके कुछ दूर गय होगे कि देसा कि एक पहलवान माहन तह चन्द वाधे चले जा रहे थे। उनके पैर इस प्रकार पड रहे थे कि हमारे मुँह में पानी भर आया, कि काश हम इनसे भी कुछ मनो- रञ्जन करते, और कम से कम इनकी मजबूत पेडुलियों में पैर अडाकर इन्हे गिगते । हमार माथियो ने कहा कि यह हमें अपश्य मारेगा । हम इसको सलाह नहीं देते । हमने कहा, चाहे जान जाये या रहे, इमको अवश्य एक दगडी देंगे। हमारे साथी धधडाकर अलग हो गये, किन्तु हमने सुदा का नाम लेकर पीछे से जार उनक पैर में इस प्रकार अडाया, कि वे घुटनों के बल गिरे । वहीं से पहलवान साहब जूता लेकर उठे और उठते-उठते उन्होंने जूता फेककर मारा, जो हमारी पीठ में लगा। हमने घेवकूफी की, जो मुडकर देखा, क्योंकि आनन-फानन में हम पक्ड लिये गय, और पहलगान माहन ने मुझे एक तमाया ऐसा मारा कि यदि हम अपने हाथ पर न रोते तो कदाचित् हमारा मुँह फिर जाता । दुसरा पडने ही को था, कि हमारे साथी सोने के काम की टोपी उनके मिर से उचक ली। वे हमे छोडफर उधर दौडे, ओर हमारे माथी ने उनकी टोपी फेंककर अपनी जान यचाइ । बहुत उल्टा-मीधा चस्कर देकर रास्ता काटा। हम चले जा रहे कि एक साहर ने हमसे एक दुकान से पुकारा, "मियाँ शाहजादे । जरा सात नो सुन जाओ।' हम जर पहुंचे तर उन्होंने एक चिठ्ठी सामने रक्सा कि यह यडी जरूरी चिट्ठी है, जग पट दो। हमारा तो जान ही जल उठा उनका
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शरीर जीनी
हम जरा दूकान से हटकर चिट्ठी को फाडकर अपने साथियों
सहित ऐसे भगे, कि गालियों की मधुर और प्रिय आनाज भी
फानो मे न पहुँच सकी । कुछ और आगे पहुंचे तो देसा, कि दो
श्रादमी आपस मे लड रहे है। चूंकि हमें मजूर नहीं था कि
उनमें लडाई हो, हम भी लडाई मे शामिल हुए, और बिलकुल
न्याय से काम लिया कि दोनों को ढेलों से मारना शुरू किया।
फल यह हुआ कि दोनो लडना बन्द करके हम पर हमला
कर बैठे, किन्तु हम भला कहाँ हाथ आते थे। दूर से देखा कि
दोनों में मेल हो गया था। क्योंकि दोनों साथ माथ चले जा रहे
थे। प्यास बहुत लग रही थी। एक नल पर पहुंच कर हमने
पानी पिया । पास ही एक कितार वाले ने एक बडी चटाई विछा
कर दूकान लगाई थी। हमने जब ध्यान से देसा, तव मालूम
हुआ कि नल से जो पानी वह कर बरबाद हो रहा है, बडी
आसानी से एक ची मुडेर तोड कर इस तरह काम में
लाया जा सकता है, कि वह इन कितान चेचने वाले साहब
की दूकान को तर-बतर कर दे, फौरन इसे काम में लाया
गया, और हमें इसमे वह मजा आया कि कह नहीं सकता।
किताब बेचने वाले साहन अपनी कितानो को यचाने के लिए
इस बुरी तरह कूद फॉद रहे थे कि हम कह नहीं सकते।
कुछ आगे बढ कर हमने देखा, कि एक साकी साहब बहुत
बडा हुक्का लिये चले आ रहे हैं । चिलम के सिर पर मानों
पेचदये की शि कैप रक्सी थी, और कोयले चोटी तक
भरे हुए खून दहक रहे थे। हम लोग मलाम बन्दगी करके
आगे बढे और हुक्का गुड गुडाने लगे । हमारे दूसरे साथी
हुक्के की तारीफ करने में लगे हुए थे, और साफी साहब
को पातों में लगाये हुए थे। हमने बॉस से इशारा किया,
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हमारी शरारतें
और एक लम्बी सॉस लेकर अपने दोनों फेफडो की ताकत को
लगाकर जोर से जर हुक्के को फूका तर पानी चिलम के भीतर
पहुंचा, उधर साकी साहब कोयलों के बुझने की आवाज से
चिलम की ओर श्राफर्पित हुए ही थे, कि हम सिर पर पैर रस
कर भागे। न मालूम कितनी गालियाँ सुनी । कुछ और दूर जा
कर हमने पतङ्गवासी देसी और कुछ डोर भी लूटी, जो फेंक
फॉक दो, कुछ ही दूर गये थे, कि सामने से मिस विलियम
अपनी साइकिल पर आती हुई दिखाई पड़ी । यह एक लडकी
थी, जो मिशन स्कूल में पढ़ती थी और हमसे बहुत डरती थी।
क्योंकि हम मौके घे मौके जब कभी उसको दूर से आते हुए
देगते, तब अपनी साइकिल की हवा निकाल कर मंडे हो जाते
और साइकिल रोक कर उसका पम्प लेकर बडी देर लगाकर
हवा भरले । हमने उसे इतना तग किया था, कि उसको हर
जगह रोकते थे। नौरत यहाँ तक पहुंची कि एक दिन हम पकड
कर उसके बाप के बंगले पर ले जाये गये, किन्तु वहाँ बजाय
सजा मिलने के मेरी पार भगत हुई, और केक साने की नौबत
'आई । इम पेशी का फल यह हुआ कि मिस सावा उलटी डॉटी
गई और हमसे कहा गया कि तुम आवश्यकता पड़ने पर इनसे
पप गॉग कर साइकिल में हवा भर लिया करो। मिस साहना
ने हमसे मेल इन शतों के साथ किया था कि वे हमको देखते ही
साइरिल से इकन्नी मडक पर डाल देती थीं, और हम केवल
मलाम ही पर सतोप करते थे। हालाकि हमारे पास साइकिल
नहीं थी, किन्तु हमने आगे श्राफर रोकना चाहा। फौरन इफ्नो
वसूल करके पोजी सलाम करके साइक्लि को नाने दिया।
इनसे छुट्टी पाई थी, कि सामने से दो गोरे श्रादे हुए दिखाई
पड़े। वे अभी दूर ही ये कि हमने निश्चय कर लिया कि
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शरीर बीवी
कुछ ही क्यो न हो, हम इनसे अवश्य उलझेंगे। वे जब पास
आ गये, तब हम स्वीकार करते हैं, कि हम डर गये और कुछ
न कर सके, किन्तु थोडी देर के बाद जोश आया, और अपना
रास्ता छोडकर गोरो का पीछा किया। खुलासा यह कि कोई
विशेप शरारत करने की हिम्मत न पडी। विवश होकर हमने
पीछे से उन पर धूल फेंकने ही पर सन्तोप किया और मिर
पर पैर रख कर भाग आये।
खुदा सुदा करके, न मालूम कितने चक्कर काटकर अन्त में
नदी के किनारे पहुंचे। यहाँ कुछ लोग हमारा रास्ता देख रहे
थे। ककडी के सेत, नदी के बीचोचीच, एक द्वीप में थे,
और
वहाँ जाने के लिए किसी नेक महाजन ने एक नाव दान में दे
दी थी। यह नार वडी सी थी, और उसके दोनों किनारों पर
रस्से बंधे हुये थे। एक रस्सा इस किनारे के सूंटे से बंधा हुआ
था, और दूसरा रस्सा नदी के उम पार। हम लोग नाव में
सवार हो गये। रस्से का दूसरा सिर घसीट कर उस पार सेत
पर पहुंचे। खेत पर पहुँच कर हमने पैसे की चार ककडियाँ
ठहराई, किन्तु शर्त यह कि कडवी होगी तो फेंक देंगे
और दूसरी लेंगे। अत बहुत मी मीठी ककडियाँ काट-काटकर
फेंक दी, और उनके बदले में दूसरी ली, किन्तु चलते समय जब
हिसार हो चुका, तब जमीन के उन काड़ियों को भी उठा-उठा
फर सा गय ओर इस प्रकार हमें पैसे की चार की जगह पर
पैसे की पॉच फकड़ियों पड़ीं। यहाँ किनारे पर साधु भी रहते
थे और हमने बहुत सफाई से, एक बहुत अच्छे ढग का
चिमटा अर्थात् प्राग उठाने का हल कवच चुराया, और उसको
कोट में विपाकर ले आये। लौटते समय हम लोग जन नार पर
पहुँचे तन यह उस पार थी, और कुछ लोग उस पर पैठना ही
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हमारी शरारते
चाहते थे। हम शीघ्र दौडे और रस्सा सींचना शुरू किया। यह
हमारी हद दर्जे की बत्तमीजी समझी गई, और वे लोग गुस्से
में आकर उधर से सींचने लगे, फिन्तु बस रस्माकशी मे हमारी
जीत हुई और हम नार पर बैठ गये। चूँकि हम इन।लोगों को
सना देना चाहते थे, अतएव हमने रस्मा घमीट कर इस किनारे
का सूंटा उग्गा दिया, जिसका पता उनको तर लगा, जब हम
जरा दूर मे सडे होकर तमाशा देख रहे थे कि ये लोग अब उस
पार नहीं जा सकते । तात्पर्य यह कि चीसो आदमी उस पार जाने
को पडे थे, और गूटा उत्पड जाने के कारण न जा सकते थे।
यहाँ से दोस्तों की सलाह हुई कि चलो वे फसली वेदाना श्रम
रूद के बगीचे में चलें, और खुलासा यह कि दो मील का
सफर ते किया और बगीचे मे पहुँच गये । बगीचा बहुत धडा
था और हमने निश्चय किया कि इस पर चारों ओर से हमला
करना चाहिए । श्रत दो दो, तीन तीन की टोलियाँ बन गई,
और चारो ओर से किनारे के पेड़ों पर बिना किसी बनावट
के चढ गये, और अमरूद तोड़ना और फेंकना शुरू कर दिये ।
नगीचे के माली की निगाह पहले हमारे ऊपर पड़ी, और यह
दौडा। मामनेवाली पार्टी ने जब देखा कि उसने मुझे देस लिया
है, तब उन्होंने बडे जोरों के साथ लकडी से कच्चे पक्के अमरूद
झाना शरू कर दिय, और शोर मचाकर उसे अपनी ओर
श्रापित किया। उमने देया कि उम ओर अधिक नुकमान हो
रहा है, वह उम भोर भागा, और इस ओर हम उसक पीछे-
पीछे उसकी भोपड़ी पर हमला कर बैठे। जो कुछ पाया, लूट
लिया। मिट्टी के घडे फोड डाले, और हुक्का फेंक दिया ।
ताल्पय यह कि बहुत नुकमान हुआ। वे लोग पेड से उतर कर
भागे । जर देगा कि माली नहीं मानता, तर दूमरी पार्टी की
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शरीर वीची
और मकेत दिया, कि देखो, ये अधिक नुकसान कर रहे हैं।
उसने जन मुड़कर देसा, तब बुरा हाल था। हमारी
पार्टी के जवॉमर्द लकडियों से मार मार कर पेड़ों को बिछाये
देते थे। वह अभागा उस ओर दौड़ा कि उस पार्टी ने फिर
अपनी जगह ले ली । सुलामा यह कि इतनी ही देर में हॉफ
कर थक कर बैठ गया, ओर कहने लगा, खूब सारो। हमने
उसके कथन को पूरा किया, और आनन्द से साफर लौट
आये । लौटते समय हमें एक सेत के किनारे नारियल का एक
हुक्का रसा हुआ मिला । जिसका हुक्का था, वह कुछ थोडी
दूर पर कुयें के पास था । हमने गट हुक्का उठा लिया।
अब मजे में उस समय तक उससे मनोरजन करते रहे, जन
तक कि उमने काम दिया। फिर फेंक दिया। वहाँ से वापसी
में हमको एक पेड मिला, जिस पर कच्चे कैंत लगे हुए थे।
सलाह हुई कि इनको तोडना चाहिए । फिर क्या था ? सैकडॉ.
हजारों फैत गिरा दिये। इतने में एक आदमी आगया। उसने
चुरा-भला कहा । तब हमने उसको उमी साधु वाले चिमटे से
मारना शुरू किया । हमारे साथियों ने हमारा हाथ बॅटाया,
और उसको वेतरह लकड़ियों से मारना शुरू किया। सुलासा
यह कि उसको उधेड कर गिरा दिया, किन्तु मारना बन्द न
किया। उसका मौभाग्य था, जो सामने से चार पॉच प्रामी
हमको लट्ठ लिये, शोर-गुल मचाते हुए आते दिमाई पड़े। हम
वहाँ से तीरे की तरह भागे । हमारा बहुत कुछ पीछा किया गया
किंतु बेकार । वापसी में किसी नई शरारत का अवसर न मिला
अलावा इसके, कि एक सौचनाले की मिठाई इस प्रकार वरवाद
की कि उसके पास की नाली में इतने - जोर से पत्थर मारा कि
तमाम छोटे उडकर उसके और उसके सोंचे पर पडे। धीरे
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हमारी शरारतें
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धीरे वहाँ से ऊलन मिल कम्पनी के पास होते हुये, और मामूली
शरारतें करते हुये हम. यगमैन असोशियसन लाव पहुंचे। वहाँ
क्या देखते हैं कि फुटबाल का एक मैच हो रहा है, और बहुत
ज्यादा भीड है। जोरो से मैच हो रहा था । हमारे सभी साथी
अलग हो गये थे। केवल वे ही रह गये, जो हमारे बंगले से
हमारे साथ चले थे। हम भी थके हुए थे। अतएव मैच में जी न
लगता था। बहुत तरकीबें मोची, कि क्या करें, किन्तु कुछ
समझ में न आया । विवश होकर समय बिताने के लिए यहाँ
पहुंचे, जहाँ अनगिनती साइकिलों की भीड थी, और सेफ्टीपेन
निकाल कर पचर करना शुरू कर दिये । खुलामा यह कि एक
एक साइक्लि काम कर दी। इससे छुट्टी पाये ही थे, कि सोचा
कि मैच खतम करना चाहिये । फुटबाल मैदान से बाहर भी
श्राकर गिरता था, और लडके टोडफर उठाकर सिलाडियों को
वापस कर देते थे। हमने भी एक बार सेघा के इस काम को
पूरा किया, किन्तु धीरे से अपने सेफटीपिन की नोक उसमें
गडा दी । कठिनाई से दो किक लगे होंगे, कि दूसरा फुटबाल
जो मौजूद रहता है, माँगा गया । उसका भी हमने वही हाल
किया। चलिय छुट्टी हुई, दूसरा फुटवाल ही न रहा। मैच
गडबड हो गया, किन्तु साथ ही हमारे उपर सन्देह-सा किया।
गया। हमने अच्छा सममा कि वहाँ से सिसक चले । मैच
तितर बितर हो गया, और वास्तविक आनन्द तो तब प्राया,
जब बाइसिक्लि घाले अपनी वाइमिफिल पर.चढकर शीघ्र
ही उतरने के लिए लाचार हुए । अजीब मजा पा रहा था, मव
लोग कह रहे थे, कि यह कौन शैतान था, जिसने फुटबाल को
भी निगाडा और बाइसिकिलो को भी। मैच से लौटकर हम
अपने गले में जाने ही वाले य, कि हमने देखा कि सामने
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शरीर बीवी
के परेड के मैदान में दो सॉड लड रहे हैं। यह मैदान चारों ओर
से एक नीची दीवाल से घिरा हुआ है, जिस पर सींकचे लगे
हुए हैं। हम उस पर सडे होकर तमाशा देखने लगे, किन्तु कुछ
लोग भीतर खडे होकर तमाशा देस रहे थे। दूमरो के साथ ही
उनमे एक मिठाई वाला भी था । साँडों में ऐसी रेल-पेल हुई कि
सोंचे वाला दीवाल और सॉडों के बीच में इस तरह आ गय
कि उसको दीवाल पर सोचा कन्धे पर रख कर इस प्रकार
बैठना पडा, कि सोंचा हमारे सामने दस्तरसान की तरह लग
गया । हमने भी खूब खाया । खोंचा वाला देख रहा था, किन्तु
फुछ कर न सकता था। क्योंकि शोर-गुल और हुल्लड
अधिक
था, अफमोस, कि हमारी हसी ने हमको अधिक न साने दिया,
और लडाई खतम होने के पहले ही हम भाग गये। चिराग
जल गये थे कि इतने में एक साहब आये। उन्होंने कहा कि
चलो सिलौनों का मेला देस आये, जो याद नहीं कि किस
मन्दिर के हाते में होता था। हमने पहले तो इन्कार किया
लेकिन फिर जाना पड़ा । परेड के मैदान से होते हुए उसके
दूसरे फाटक पर निकले । देसा कि एक आदमी कपडे की दुकान
लगाये हुये है। इस दुकान की दीवालें उसने चादरें तान कर
कपडे ही की बनाई थी, और कपड़े ही की छत बनाई थी। हम
उसके पीछे से होकर निफ्ले, कि हमको एक छोटा सा ठेला
दिखाई पडा, जिस पर इन कपड़ों को वह घर से लादकर
लाया था। हमने शीघ्र ठेले को दूर ले जाकर जोर से दौडा
कर दूकान की पीठ में इतने जोर से रेला, कि यह कपड़े की
दीवाल को तोडता हुआ दूकान के भीतर इस तरह घुस गया,
कि सारी दूकान गिर गई । भीतर से दो आदमियों के चीसने
की आवाज आई। किन्तु हम माग गये। अब हम दाम की
हमारी शरारतें
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पटरी पटरी जा रहे थे। सोचा कि लाश्रो ट्राम की पटरी पर
इंट रक्सें, देखें क्या होता है ! फौरन रस दी, और अस्पताल
के पीछे की ओर सड़े होकर तमाशा देसने लगे। इतने में एक
ट्राम जोर से भाई और इंट पर श्राफर घडे झटके से रुकी।
ग्राम वाले ने शोर मचाया और एक सिपाही दौडा हुआ आया ।
लोगों ने इधर-उधर देसा ओर एक शैतान ने न जाने हम
लोगों की ओर कुछ सन्देह से-उँगुली उठाई, या इसलिए कि
हम लोग अस्पताल की दीवाल फॉदकर भागे और हमारे पीछे
कानिसटेबुल दौडा । हम अस्पताल के कम्पाउण्ड मे अँधेरे में
बेतहाशा भागे और चदकिस्मती से ठोकर साकर गिरे और
पाडे गये। कानिसटेबुल ने बुरी तरह हमको घसीटा और
डाँटा और पकड कर ले चला, किन्तु हम भला कब हिलने
डुलने वाले थे। वहीं पसर गये। वह हमारा नाम और पता
पूछता था ओर हम बता कर शीघ्र लूट सक्ते थे। किन्तु
इसमे डर था कि घर पर मरम्मत होगी।
श्रत हमने न बताया। इतने में हमारी फौज आ गई और
हमने इतमिनान से देखा कि हमारा साथी पीछे से कानिसटेबुल
पर हमला कर बैठा, और साफा झटक कर चलता बना।
कानिसटेबुल का उस ओर मुंह करना था कि हमने झटका
देकर हाथ छुडाया और यह गया, वह गया । हमारा साथी भी
थोडी दूर चलकर हम मिला । वह साफा फेक कर आया था।
हम लोग सीधे अपने मन्दिर की ओर चले। रास्ते में देखा कि
एक सोंचे वाले ने नौजवान मजदूर को पकड रसा है, और
हुज्जत हो रही है। हम झट आ पहुँचे, और उसमे मुनासिब
दसल दिया। हमने सोंचे वाले को बडी चुरी तरह डॉटा कि
हमारे नौकर को छोडो, क्यों पक्डे हो, यह हमारा आदमी है ।
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शरीर वीची
उसने कहा कि मुझको उससे पाँच आने पैसे लेने हैं। हमने मट
कहा, इसके जिम्मेवार हम है, इसको छोड दो। यह छूटते ही
भागा, ओर इधर हम भी चल दिये। मन्दिर के हाते में पहुंचे।
बडे जोर से मेला लगा हुआ था। वह धकापेल थी कि खुदा
की पनाह । मबसे पहले यह निश्चय हुआ कि कचालू और
सोंठ के बताशे सायें जायँ। अतः खून उमसे शौक किया।
इसके बाद उसी जगह बैठ कर मिठाई की ठहरी। हम रुपया
लेकर एक माथी के साथ मिठाई लेने के लिए गये, और बाकी
दो को वहीं छोडा । हर दुकान पर पहुँच कर हर प्रकार की
मिठाई चसी और वह भी इस तरह की अन्त में उन्होंने
चसाने से इनकार कर दिया। हमने वगाली मिठाई पसन्द
की । यद्यपि हमारे साथी काश्मीरी ब्राह्मण थे, किन्तु दुकानदार
हम दोनों को भगी समझता था, और उसने कहा, अलग सडे
हो। हमको बुरा मालूम हुआ | उसने हमारी मॉग के मुतानिक
सेर भर मिठाई तौनी, और हाथ में न देकर हमसे कहने लगा,
हाथ फैलाओ, हमने हाथ फैला दिये, उसने दूर ही से मिठाई
का ढोना हमारे हाथ पर छोडा। हमने झट हाथ ढीले
कर दिये, और मिठाई का दोना नीचे गिर पडा। हम मढ़
गरज कर दुकानदार पर घरस पडे, और उधर वह दूकान से
नीचे उतर पड़ा, कि अपने पूरे दाम ले लूँगा । पूरा फमाद सडा
हो गया । किन्तु हमें न दाम देने थे, न दिये। दूसरी जगह से
मिठाई खरीदी, और लाकर पान वाले की दूकान पर पहुंचे।
यह पान की दुकान भी देखने योग्य थी। पान वाला मुख्य
दरसाजे के बाई ओर आदमी के कद की उंचाई पर एक
मचान बाँध कर बैठा था, और उसने दुकान को ऐसा सजाया
था कि लोग उसी दुकान पर टूट पडते थे। पानवाले साहब
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हमारी शरारतें
अपने आप को न जाने क्या समझे हुए थे। दूकान पर पीसों
रंग विरग की योतलें और सजावट का सामान, यडी उचाई
तक चुग हुआ चला गया था । कपड़े की छत लगाई थी, जिस
में छाटे छोटे फानुम लटके हुए थे। यहुत प्ती तलवारें चारों
ओर लगी थीं। पानवाड़ी साहय के साथ में एक छडी थी, जिसे
ये हर ऐरे गैरे लडके को रमीद करते थे, जो उनके मचान के
सम्भे के पाम आ जाता था। हमको यह बहुत बुरा मालूम
हुआ, और हमने उनसे कहा कि ऐमा क्यों करते हो, तो उन्होंने
कहा, कि साहब समय नहीं था । यह बॉस का मोटा ग्यमा,
जिस पर कि मचान रुका हुआ है, जमीन पर याही रसा हुआ
है, और मुझे डर है कि कहीं धक्का लग कर मारी दूरान
की
दूकान नीचे न आ पड़े । 'हमने कहा कि यह तो जमीन
में गड़ा हुआ है, भला कैसे गिरेगा ? उन्होंने कहा कि साहय
गड्दा सोदने का समय ही नहीं मिला । यह योंही रक्सा हुआ
है, और फिर खूनी यह कि मचान के तख्ते में बंधा भी नहीं
है, इसलिए मुझको बहुत डर है।
श्रव पान साकर हमने जब दोस्तों से सलाह की, कि भाई
बोलो क्या राय है ? इम पान वाले की दुकान क्यों न गिराई
जाय ? वन इस पर हमारे किसी साथी ने हामी न भरी। दूकान
क्या थी, पूरा तानिया था। मचान पर आराम और ठाट नाट
के इतने सामान थे, कि तिल धरने की जगह नहीं थी, और
भीड यहाँ इतनी थी कि पक्डा जाना निश्चय था, किन्तु हमने
कहा कि चाहे कुछ भी हो, हम इस काम को अवश्य करेंगे।
हमारे साथियों ने कानों पर हाथ रक्से। हमने भागने का
रास्ता इत्यादि बड़े ध्यान से देखा, और घूम-फिरकर उस समय
पहुँचे, जहाँ हाते की छोटी-सी कच्ची दीवाल थी। यह जगह
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शरीर बीवी
अलग-सी थी। हमने साथियों के साथ दो-तीन घटे सैर की,
और फिर अपने काम की ओर ध्यान दिया । घूमते फिरते
दूकान के पास आकर हमने हिम्मत करके भीड के दबाव में
सभे से लग कर जब डण्डे को घसीटा, तब एक जोर का शोर
गुल हुआ, और दुकान छत के सजावट के सामान, पान वाले,
और बोतलो के साथ नीचे आ पडी । कत्थे और चूने की
कुल्लियाँ सब एक हो गईं, और गजब यह हुआ, कि वह घर
तन भी गिरा, जिसमें पान वाला पैसे रसता जा रहा था। पैसे
जब भीड में गिरे, लोगों ने हाथ लगाना शुरू कर दिया । हमको
इसमें भागने का अवसर मिल गया, और इस शोर गुल में हम
अपने दोस्तों सहित दीवाल फॉदकर गली में कूद कर इस बुरी
तरह भागे, कि न जाने कहाँ आकर निकले । हमको पकडे जाने
का बहुत डर था, क्योकि दरवाजे पर जो कानिसटेबुल था,
उमने हमको शरारत करते हुए कदाचित् देख लिया, और आश्चर्य
नहीं कि हम पकड लिये जाते, यदि कहीदूकान न लुटने लगी होती
रात काफी हो चुकी थी। और हम नहीं मालूम किस जगह थे,
जहॉ हद से अधिक सन्नाटा था। लोग जगह-जगह धारपाइयों
पर सड़क के किनारे सो रहे थे | एक लाला एक वीच मोड
पर नगे घदन पलग पर इस तरह तोंद फैलाये लेटे हुए थे, कि
हमको लाचार होकर अपना सिगरेट, जो खतम होने के करीब
था, उनके पेट पर रस देना पडा । वे ऐसे तडपकर पेट पीटते
हुए उठे, कि हमको मजा ही आ गया और हम भाग कर
दूसरी जगह पहुँचे । कुछ आगे पहुंच कर हमने एक चारपाई
सोने वाले के सहित उलटी, और घर लौटने से पहले हमने एक
और नगे धदन सोने वाले के पेट पर जलता हुआ सिगरेट रस
कर बहुत अच्छा तमाशा देसा । अधिक रात बीते घर लौटे।
शरीर लडकी
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चूंकि मरे हम घर से छुट्टी मॉगकर नहीं गये थे, इसलिए
दूसरे दिन केवल यही जुर्म हमारे ऊपर लगाया गया था कि
दिनभर क्यों गायन रहे । इसके बदले मे हमारा दिन का
साना बन्द किया गया, और हमे विवश होकर अपने पण्डित
दोस्त के यहाँ साना साना पडा।
दूसरा परिच्छेद
।
शरीर लड़की
हम एन्ट्रेस में पढ़ रहे थे और एक कौमी स्कूल के बोर्डिङ्ग
में रहते थे। चोर्डिङ्ग से कुछ ही दूर पर एक मकान था जो
वोर्डिङ्ग से स्कूल और हाकी खेलने के फील्ड में जाने के रास्ते
म पडता था। इस मकान मे एक सय्यद साहब रहते थे, जो
कचहरी मे नौकर थे। सडक से कुछ हट कर मकान की एक
सिडकी थी जिसमें लोहे के छड लगे थे और किवाड भी लगे
थे। ये किंवाड हमेशा बन्द रहते । एक दिन की बात है कि
हम उस सिडकी के नीचे सडे होकर अपने एक दोस्त से बातें
कर रहे थे, कि हमको सिडकी के उस ओर कुछ प्राहद मालूम
हुई। हमने ध्यान से देखा तो एक सूगस से एक ऑप का भाग
दिखाई पडा। ऐसा मालूम होता था कि कोई मांक रहा है।
हम भी उस ओर देसने लगे कि ऑस उस सूरास के सामने
से छिप गई। हमको जो शयरत सूमी, तो हमने गली को सूनी
पाकर अपने दोस्त का सहारा लेकर उसी सूरास से अपनी
शरीर बीवी
आँख लगा दी, किंतु अब वहाँ वह न थी। सूरास
मकान के भीतर का भाग साफ साफ दिखाई पडा। यह सिडको
दालान में थी। दालान के बीच में एक नवजवान लडकी खडी
उस सुराख की ओर देख रही थी। यह लडकी ऐसी थी कि
हुमको बहुत अच्छी मालूम हुई और हम उसको देख रहे थे।
ऐसा मालूम होता था, कि उसने समझ लिया कि हम सूराख में
से मॉक रहे हैं। अत. वह सामने से हट गई। हम प्रतीक्षा कर
रहे थे कि फिर सामने आये। ऑस सोले हुये देख ही रहे थे
कि उसी छोटे सूरास पर किसी ने मुट्ठी भर कर धूल झोंक दी
जो सब की सब ऑरस में पड़ी और हम वेचैन होकर गिर पडे
हमारे दोस्त जो चश्मा लगाये हुये थे, उन्होंने जव पक्षों के बल
सड़े होकर देखा, तब उनके साथ भी यही व्यवहार हुआ,
श्ररी
उन्होंने देख लिया कि यह शरारत उसी लडकी की थी, किन्तु
चूँकि वह चश्मा लगाये हुये थे, अत: उनकी ऑस के भीतर
कुछ न पडा । हमारी आँस दिन भर गडती रही, और हमसे
क्लास में पढा न गया। यद्यपि उस शरीर लडकी पर बहुत ही
शोध आ रहा था, किन्तु साथ ही हमको वह पसन्द भी थी,
और निशेपतया उमका वह स्वाभाविक ढङ्ग ।
लौटते समय हमने फिर झाँका और उमने फिर हमारी
ऑस में मिट्टी डालने की कोशिश की, किंतु हम सावधान
थे
और बच गये। ऐसा मालूम होता था कि स्कूल की घटी की
आवाज सुनकर वह सिडकी के पास आ गई थी। अब भविष्य
के लिए हमने दैनिक नियम बना लिया, कि अवश्य अवश्य
सूपस में से मॉस्ते, और आँस में धूल डलवाते । जव यह
प्रतिदिन का नियम हो गया, तब हमने केवल इसीलिये तीन
पाने का चश्मा सरीद लिया, कि तु उसको इस बात का पता
-
शरीर लडकी
२१
लग गया। क्योंकि एक दिन उस चुलबुली ने हमारी आँस मे
छतरी की लोहे की लम्बी सलास इस तरह भोंफ दी, कि हम
अन्धे होते होते बचे और हमारे चश्मे का शीशा फूट गया।
किन्तु हम भी बाज न आये । उसने हमारे इस हठ को देखकर
एक दिन धीरे से जैसे निज से कहा, "ऑसें फोडे विना न
मानूंगी।" हमने क्रोध में आकर कहा कि "हम तुमको देखने
से घाज न आयेंगे।" इस लडकी से यह हमारी पहली बात
चीत हुई।
२
हमारे घर से हलुये का पारमल श्राया हुआ था और हम
जेब में डाले हुये दिन भर साते रहे। नियमानुसार हमने
आकर मॉ और उसने हमारी ऑस मे धूल झोंकी । हमने
जवान में कहा, "हलुश्रा सा।" यह कहकर हलुये का टुकडा
जो मुलायम था, सूरास के ऊपर रखकर जोर से दबा दिया।
सूरास बिलकुल गोल न था, किन्तु क्म से कम और ज्यादे से
ज्यादा दुःअन्नी बराबर था । अत काफी हलुआ पहुंच गया ।
हम थोडी देर बाद चले आये । नहीं पता, उसने हलुश्रा साया
.
न्या नहीं।
दुसरे दिन जन हम पहुँचे, और माँककर देखा तब कोई न
या। हमने सिडको पर हाथ मारा तो क्या देखा, कि लपकी
हुई आ रही है, और झट से उसने मुट्ठी भर रास जमीन से
उठाई । हम भी होशियार हो गये, और वार साली गया ।
शीघ्र ही हमको सूरास से कोई सफेद चीज पतली सी निकलती
हुई मालूम हुई। हमने पकड कर जो घसीटा, तो सोये की
लम्बी-लम्बी बत्ती सी थी। हमने झट चक्सा और उसको
था,
.
शरीर बीवी
जिममें दुनिया भर का प्रेम का हाल और रुपये पैसे के
लालच के किस्से लिसे हुये थे। हमने कहा कि हम इसके हर
गिज जिम्मेदार नहीं । उमने कहा, "यदि कहो तो मैं इसको कुछ
सजा दूँ और उल्लू बनाऊँ।" हमने सहमति दी। हमसे उसने
कहा, कि तुम मेरी ओर से अपना अक्षर बदल कर एक पत्र
लिस लाओ। उस पत्र में दूसरी बातों के अलावा यह अवश्य
लिसना, कि यदि आप मुझको इस समय दस रुपये कर्ज दे
सकेंगे, तो कृतज्ञ हूंगी।" हम गोर्डिग आये और हमने बहुत ही
विचार पूर्ण शब्दों में पत्र के लिये कृतज्ञता प्रकट करते हुए इस
रुपये की आवश्यकता प्रकट की, और नीचे नाम इत्यादि लिसने
वाली का न लिसा। बल्कि केवल लफ्ज 'फकत लिस दिया।
हमने जाकर पन सूरास से अपनी साथिनी को दिया । उसने
पढ़कर बहुत पसन्द किया, और कहा, कि इसको दरवाजे की
चौसट के पाम ईंट से दवाकर रस दो, जैसा कि उन्होंने अपने
पत्र में लिखा था। उन्होंने चालाकी, या बेवकूफी से अपना
नाम नहीं लिखा था, किन्तु पत्र की इबारत से पता चलता था,
कि हमारे साथी हैं। क्योंकि वोर्डिग और स्कूल की चर्चा थी।
हम इस फिक में थे कि किसी प्रकार हमको नाम मालूम हो तो
अच्छा है, और इसीलिये हमने वह पन अपने पास रस
लिया कि कदाचित लिखावट से हम नाम का कुछ पता लगाने
मे सफल हो जायें।
,
तीसरे दिन हमारे दोस्त ने हमको सिडकी से दस रुपये का
नोट दिया, और कहा, कि "उल्लू फंस गया।" हमने कहा,
हमको नोट नहीं चाहिए । इसका जनार हमको यह मिला, कि
इमको रस लो, मैं नहीं रक्तूंगी। हमने नोट रस लिया, और
शरीर लड़की
२५
परिणमत हमने और हमारे दोस्त ने बड़े भानन्द से महीने
भर तक मेवे साये।
इम बीच में हमने कोशिश करके यह भी पता लगाया कि
हमारी सहेली के वैवकूफ प्रेमी कौन हैं। हमने उनको अपनी
शरीर महेली से पड्या कराके इस बुरी तरह लूटा कि ये
चोटिन के बहुत से लेडकों के फर्जदार हो गये और इस तरह
रिप्रेम को विदा करने पर लाचार हो गये।
-
४
हालॉकि इस लडकी की और हमारी बडी गहरी दोस्ती हा
गई थी, किन्तु यह हमारे माथ शरारत करने से न चूकती थी।
एक दिन तो उसने हमारी उँगली मे जो हमने शरारतन्
सूराय में टाल दी थी, ऐसा फाटा कि उसमें दांतों के निशान बन
गय, और वह सूज गई, और फिर यह जुल्म ढाया, कि तीसरे
दिन जन हम नाराज होकर फिर लौटकर उम जालिम को उँगली
दिसाने आये, तब उसने उसमें इस प्रकार सुई भोंक दी, कि हमने
जोर मे जो हाथ झटका, तो सुई की नोक उंगली मे टूट कर रह
गई। हम जल कर लौट आये और वह पहले ही की भाँति
हमती हुई चली आई। हमारी उँगली में सख्त दर्द हुआ,
और
शाम तक सूज आई। रात भर हम तडपते रहे, और उस जालिम
को दुआयें देते रहे । तीसरे दिन ऐसा बुरा हाल हुश्रा, कि उँगली
बिलकुल फोडा होगई। एक दिन हम इसी बीच में गये, और
अपना हाल सुनाया, किंतु उसके दिल पर कुछ असर न हुआ।
उसने यही कहा, कि "अच्छा हुआ।" नौरत यहाँ तक पहुँची,
कि हमारी उँगली पक गई और चीरी जाने को हुई। अस्पताल
जाते समय हम यह कहते गये कि तूने हमारी उँगली का यह
हाल कर दिया है। हम कभी अब तेरे पास न आयेगे और यह
शरीर बीवी
साह्य की खिदमत में जज साहब ने हमको पेश करके कहा,
कि “योलो, यह लडका तुमको पसन्द है, या नहीं।" सय्यद साहब
की भला मजाल थी कि चूँ भी करते । हम जबरन व कहरन
पसन्द किये गये । हमसे जज साहब ने कहा, तुम जाओ। अतः
हम हॉफते काँपते लौटकर सीधे सिड़की के पास आये और
हमने सयेरे जो खुशखबरी सुनाई थी, उसे प्रमाणित करते हुए
कहा कि "अर हम तुमसे शादी करने वाले हो रहे हैं। - उसने
इसको मजाक ही समझा, और जवाय में यह कहा, कि “कदा
चित् तुम्हारी शामत आने वाली है। इस पर हमने
कहा,
कि
"लगभग बहुत जल्द हम स्वय तुम्हारी उल्टी शामत बुलाने
वाले हैं।" हमने बहुत कुछ गम्भीर होकर कहा कि हम दिल्लगी
नहीं करते, बल्कि वास्तव में हमारी शादी तुम से निश्चित् हो
गई है, किन्तु उसे विश्वास न हुआ। क्योंकि न तो वह मॅपी
और न उसने शरारत से भरी हुई बाते बन्द की।
हम बोर्डिङ्ग ही में ठहरे हुए थे कि हमारे पास हमारे
कृपालु हेड मास्टर साहब आए, जिनको जज साहब ने बुलाया
था, और वे उनसे मिलकर आ रहे थे । जव वातचीत हुई, तब
हमने उनसे साफ कह दिया कि विना अपनी बुजुर्ग मॉ से मिले
हुए और उसकी इच्छा के कुछ नहीं कर सकते । किन्तु दूसरे
ही दिन हेड मास्टर साहब ने हमारे स्वर्गीय पिता के एक दोस्त
को, जो यहाँ डिप्टी कलक्टर थे; ला सड़ा किया, और उन्होंने
उसी दिन कुछ गडबड करके ऐसा तार दिया कि हमारी अम्मा
जान दूमरे दिन ही उनके घर पर मौजूद थीं और दूल्हा
बनाये जाने की तैयारियाँ हो रही थीं। इनसे और हमारी
शरीर लड़की
अम्मा जान से कहा गया कि इस विवाह के फरने में हमारे
भविष्य की अच्छाइयाँ हैं।
चौथे दिन हमारा निकाह उस शरीर लड़की से हो गया
और निश्चय यह हुआ, कि विदाई तन होगी जय हम पढाई
खतम कर लेंगे। हममो मालूम हुआ कि जज साहब ने हमारी
बीवी से चाचा और भतीजी की सम्बन्ध जोड़कर उसको धीम
रुपया माहनार देने का विचार किया है। हमारी प्रतिष्ठा इस
यात को कभी भी स्त्रीकार न करती, किन्तु चूंकि यह मामला
हमारे ससुर साहन और जज साहब के बीच का था, अत हम
कुछ न बोले।
अब जरा विचार तो कीजिये कि निकाह के बाद जब हम
खिडकी के पास पहुंचे, तब जवाब नदारद । वहुन कुछ हाथ
मारा, सटसटाया, किन्तु बेफायदा । हम मसमार कर चले
गये और चलते समय भी हमारी विवाहिता वीवी हमसे बात
करने न आई।
किन्तु यह बेरहमी और सामोशी अधिक दिनों तक न
रही । हम खिडकी बजाने के लिए चुपके से छुट्टियो मे अली-
गढ से भाग भागकर आते थे और अपनी शरीर बीवी से मिल
कर चले भी जाते थे। हमारे ससुर साहन या किसी दूसरे
को पता भी न चलता था। हमारी बीवी की शरारतें उसी प्रकार
जारी हो गई। हम कभी न भूलेंगे कि कैसी कैमी सुशामदें
करवाती थी। तब कहीं, और वह भी उँगली में अच्छी तरह
सुई भोंकने के बाद अपनी चुलबुलाती सूरत की बस एक झलक
दिखाती थी।
पढाई खतम होने पर विदाई हो, इसकी जगह पर हमारी-
अम्मा जान हमारी बीवी को डेढ साल बाद ही घर ले प्राई ।।
३
। शरीर वीवी
जब हमसे हमारी बीवी को पहली मुलाकात हुई, तब भी वह
शरारत से बाज न आई। हम जब कमरे में पहुंचे तब क्या
-देखते हैं कि लैम्प जल रहा है, और हमारी बीवी अपने आप
को अच्छी तरह कपडों मे लपेटे और सिर मुंह मब छिपा
'पलग पर बैठी है। हमने अपनी प्यारी बीवी के कन्धे पर
हाथ रखकर हिलाकर कहा, "वन्दा परवर सलाम अलेकुम,
कहिये, मिजाज अच्छा है।"
यह कहते हुए हमने रजाई घसीट कर अलग कर दी,
'किन्तु वह न बोली, और शर्म और लज्जा की सीमा बन गई।
फिर हमने हँसी के उद्देश्य से कहा, "कहिये, आपकी वे शरारत
क्या हुई, क्या घर छोड भाई यह कहकर जब हमने
जवान न पाया, तब हम पलंग पर बैठ गये, और हमने कहा
लामो अपनी चुलबुली बीवी को जरा गले तो लगायें।" या
कह कर हमने उस शरीर को गले से लगाया ही था, किरा
में उसने ऐसी निष्ठुरता से सुई चुभोई कि हम व्याकुल हो
उछल ही तो पड़े। फिर' इसके बाद उसने मुझसे मजाक
किया और यह सुई का अन्तिम मजाक था।
हमारी इस शरीर के साथ म्यून निभी और आनन्द
निम रही है, और यह केवल उमी का फल है, कि हमार
बीवी के नक्ली चाचा अर्थात जज साहब ने हमको पदा
सतम करने के बाद ही ऐसी नौकरी दिलवा दी, कि अब
चैन करते हैं।
चूंकि हमारी कोर्टशिप की कहानी लोगों को मनोख्न
'मालम हुई, अत हमने भी उसे बहुत ही सक्षेप के साथ पाठप
को भेंट की है।
ह
तीसरा परिच्छेद गलत फहमी १ हम बीपी से सवेरे यह कहकर गये थे कि नो दस बजे तक लौट कर आ जायेंगे, किन्तु मछली का शिकार भी क्या बेकार चीज है। नौ बजे की जगह पर, गर्मिया की कड़ी धूप मे, बारह बजे के बाद घर पहुंचे। शिकार में हमे उतनी ही सफ- लता मिली, जितनी आमतौर से मछली के शिकारियों को मिला करती है। हैरान भी हुए, और कुछ न मिला। भूसे प्यासे, जलते भुनते घर पहुंचे। नहा धाकर कमरे में जन पहुंचे, तव नौकरानी ने कहा-'बेगम साहिया आपका इन्तजार करते करते अभी सोई हैं।" हम झट दूसरे कमरे में गये और गाना जाया। हाथ धोकर सिगरेट सुलगाया और सीधे कमरे में हुँचे । हमे ऐसा मालूम हुआ कि हम स्वर्ग में आ गये। तीन प्रोर सस की टट्टियाँ लगी हुई थीं, और बिजली का पट्टा जोरों में चल रहा था। हमारी शरीर पीवी सो रही थी। हमने यान से उसके पनि चेहरे को देना। कुछ सोचा। सामने वात रक्पी थी। कुछ और ख्याल आया। अत• कलम को उल्टी और से डुबोकर चेहरे को भयानक बना दिया, और उसके बाद हम भी अपने पलंग पर पड कर सो रहे । थके मादे तो थे ही। ऐसे मोये कि तन नदन का ख्याल न रहा कुछ देर के बाद हमने मुह पर ठडक मा अनुभव किया। आँस सुली तो बेगम साहिवा को शरारत करते हुए पाया। । - शरीर बीवी अर्थात् वर्फ का टुकडा लेकर हमारे मुह पर मल रही थीं। अपनी मूछों का उनको पता भी न था। जरा मोचिये, यह पाक और भयानक चेहरा, और उस पर यह शयरत । हमें वेकाबू हंसी आई, जिसे हमने अच्छी तरह शावाशी दी । उठ- कर हमने दरवाजा खोला। शाम होने को करीब थी। इतने में एक नौकरानी आई, और उसने जब अपनी स्वामिनी के भया- नक चेहरे को देखा तव हँसती हुई भागी। "क्यों हंसती है ।" हमारी वेगम साहिबा ने नाराज होकर, पूछा। किन्तु वह लौटकर न आई। गुस्से में मूछे विचित्र बहार दे रही थीं। इतने में दूसरी नौकारानी आई और दरवाजे पर पैर रसते ही उसने कहा- "क्या आप मुझे बुलाती हैं ?" यह कहकर उसने भी अपनी स्वामिनी का डरावना चेहरा देसा, और वह भी हंसी को रोकती हुई बाहर निकल गई। हमारी बीवी ने कहा, "आज मालूम होता है, इनकी शामत आई है। हमने कहा, "आज हमे भी डर लग रहा है।" वह कुछ न समझी, और हमने इस हँसी में सम्मिलित होना व्यर्थ समझा और उठ कर बाहर चल दिये। - २ घण्टे भर बाद जब हम घर में आये तब मालूम हुआ कि बेगम साहिना नहाकर निकली हैं और पाइने वाली मेज पर कधी कर रही हैं। हम कमरे के दरवाजे पर खड़े हो गये।
गलत फहमी ३७ हमने देखा कि आदमी के कद के वरामर के आइने में देख- देखकर पसे की हवा से थाल सुखाये जा रहे हैं। बाल उड-उड कर हमारे लिए विचित्र भार पैदा कर रहे थे, और हम उस सौंदर्य के प्रेमी बने हुए थे कि पाइने में हमारी ऑखें चार हुई । मुडकर हमारी ओर देसा, किन्तु शीघ्र ही फिर मुह मोड लिया कि करीब पहुँचे, और जैसे ही आँख से आँस मिली तो क्रोध से भरी ऑसे हमारी ओर डाली, और प्यों ही मुस्कुराहट आई, तो उसको दया कर और मस्तक पर शिकन डालकर चिडचिडाहट के साथ कहा, 'इस प्रकार की हरकतें हमें पसन्द नहीं हैं। हमने कहा, "क्यों, क्या हुआ "ऐसे मजाक से क्या फायदा कि सभी नौकरानियाँ हसती फिरे । "हमने कोई मजाक नहीं किया।" हमने खुशामद से कहा। "तो फिर यह आखिर क्या था " "आज हम अस्तुरा लेकर श्रादत के मुताबिक बैठे थे, तर तुमने ही तो कहा था, कि हमे मुझे बहुत पसन्द हैं। हमने दिल में सोचा की हमें तो पसन्द नहीं। क्याकि हम प्रतिदिन उनको साफ कर डालते हैं। किन्तु चूंकि हमारी बीवी को पसन्द है, तो लाश्री जरा उसकी मुछ ही बना दें।" यह सुनकर गुस्मा रफूचक्कर हो गया और चीनी ने हमारी शरारत को पसन्द करते हुए हँसकर कहा, "हमारा यह मतलब कर था मूछे तुम रक्सो" हमने खुशामद के साथ कहा, "लाहौल रिला कूह, तुमने यदि पहले ही बता दिया होता, तो यह गलती ही क्यों करते ।
शरीर बीवी
इधर-उधर मतलव की दो-तीन बातों के बाद हमने अपनी
थोवी को एक गिलास अनार का शर्वत पिलाया, और वह भी
अपने हाथ से, और मजदूरी वसूल करने के बाद हमने कहा,
"क्यों दोस्त, हमारा एक काम कर दोगे "
"फिर तुमने उमी मरदानी घोली से मुझे सम्बोधित किया,
क्या काम है "
"हमारे एक हिन्दू दोस्त आ रहे हैं, उनके साने का प्रबन्ध ।
प्रबन्ध सास, और यह कि अपने हाथ की कोई चीज उनको
अवश्य खिलाना। ये भी वैसे ही दोस्त हैं कि जिनसे रात भर
बातें की जानी चाहिये ।"
"आसिर तुम यह रात भर क्या बातें करते हो ?" चीयी ने
सोदकर पूछा।
--
-
"उनमें से अधिकतर तुम्हारी शरारतों की बातें करेंगे".
हमने हसकर कहा।
“यह गलत है। तुम बदचलन आदमियों से मिलते हो।
श्रासिर वताओ तो सही, कि गुलाबचन्द से तुमको क्यों इतना
प्रेम है ? वह अदगी, जो बाजारू औरतो मे तुम्हें ले जाये,
कभी भी मिलने योग्य नहीं "
"हम ठीक कहते हैं कि यह जो आ रहे हैं, उनसे तुम्हारी
या उनकी अपनी धीवी की बातें करने के अलावा और कुछ भी
नहीं करेंगे। तुम म्वय जानती हो कि यदि तुमसे हमे झूठ ही
घोलना होता तो हम तुमसे कहते ही क्यों ?"
वे बोली, "यह तो हम जानती हैं कि यदि तुम किसी रडी
के यहाँ जानोगे, तो हमसे अवश्य कह दोगे और यह भी मालूम
है कि यार दोस्तों के साथ जबरदस्ती चले जाते हो, किन्तु
गलत फहमी
आगिर उमा परिणाम क्या होगा ?"-यीवी ने कुछ रढता
के साथ यहा।
"कुछ नहीं, परिणाम क्या हो मफ्ता है। तुम स्वय जानती
होकि मैं तुम्हारा हूँ। चाहे मैं दिन रात बाजारू चोरतों में ही
रट्, तर भी कोई अन्तर न होगा।" इतना कहकर मैंने वीवी
को योर ध्यान से देखा और फिर पहा
"अन्या, जैसा पहोगी, धैमा ही परेगे। किन्तु इन दोरता
का हम हद से ज्यादा आदर सतार चाहते हैं।"
-
३
राम का गाना हमने याहर दोस्त के साथ कमरे में पाया।
साना साकार हम अपने दोस्त सरदार सुन्दरसिंह से बैठे हुए
बातें कर रहे थे। बिजली को रोशनी चूँकि तेज धी, अत
हम फमरे के उम दरवाजे के पास धैठे हुए थे, जो सडक की
थोर खुलता था। इस फमरे के बीच के दरवाजे के मामने ही
एक घडी आलमारी रक्सी थी, जिसमें प्रादमी के कद के घरापर
का श्राइना लगा हुआ था।
सहसा एक नौकरानी पाई और उसने मिर डालकर माँका
ही था कि झट लौट गई। हम चूँकि सरदार साहच से बातें
करने में लगे हुए थे, अत उस ओर ध्यान न दिया। नौकर को
धुलाकर पान लाने के लिए कहा और फिर बातो में लग गये।
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अब जरा भीतर का हाल सुनिये--
बीवी ने पान बनाकर नौकरानी के हाथ भेजे थे, कि इतने
में वह हॉफती कॉपती दौडी हुई आई । पान की थाली रखकर.
बोली, "वेगम साहिबा, गजब हो गया।"
"क्यों क्या, हुआ?" बीवी ने घबराकर पूछा।
शरीर बीवी उमने कहा, "मैं जब पान लेकर पहुंची, तब मुझको कोई दिसाई पडा । मैंने सोचा कि कमरे में होगा। कमरे के दरवाजे पर पहुंची ही थी कि घेगम साहिना, वम क्या बताऊँकि क्या देसा" "अरी कमपरस्त, आखिर क्या देगा " "कमरे में कोई औरत सड़ी थी। बस, मैं उल्टे पैरों ही भागी।" "भूठी कम्बस्त पागल है । औरत भला कहाँ से आई ?" "यदि विश्वास न पड़े तो किसी दूसरे को भेजकर दिखा लीजिये।" बीवी ने शीघ्र दूमरी नौकरानी को भेजा । वह भी उसी प्रकार दौडी आई और उसकी बात को सही बताया। सूरत- शकल या कपडे के बारे में कुछ निमरण हमारी बीवी को मालूम न हो सका । क्योंकि दोनों औरतें शीघ्र ही एक झलक दिग्पाकर भाग आई थीं। उधर हम इस प्रकार वातो मे लगे थे कि कुछ समर न थी। दूसरी औरत जव फिर उसी प्रकार मॉक कर चली गई तब हमने नौकर को बुलाया कि पान लाओ। नौकर पान लेने चला कि नौकरानी ने रास्ते ही मे उसको पकडा कि चलो, बेगम साहिया बुलाती हैं। बेचारा नौकर फसमें सा रहा था कि बेगम साहिवा, कोई औरत नहीं है, किन्तु बेगम साहिना को कैसे विश्वास होता, जब कि दो ऑस देसी गवाहियाँ मौजूद हों। सुलासा यह कि हम बुलाये गये। हम सरदार साहब से इजाजत लेकर गये, तो वीची को अलग टहलती हुई पाया । हमने आदत के मुतानिक पन्धे पर हाय रखकर कहा कि "दोस्त, क्या है ?"
४१ गलत फहमी कोई जवार न देकर वे रुक गई। हमने देखा तो चेहरा उदास और चिंतित था । पहले इसके कि हम कुछ कह हमाग हाथ पकडकर कहा, "मैंने कौन सा अपराध किया है ? मुझसे क्यो नाराज हो गये १" यह कहकर हमारी छाती पर सिर रख कर सिसकियाँ भरने लगी। हम इसके लिए बिलकुल तैयार न थे। धवडाकर हमने क्लेजे से लगाकर कहा-"खुदा के लिए कुछ कहो तो।" उसने ऑसू पोंछते हुए कहा, “वाहर कमरे में यह औरत कौन बैठी है ?" हमे हमी भाई और हमने प्राश्चर्य चकित होकर कहा, 'तुम क्या पक रही हो 'मैं यक नहीं रही हूँ, बल्कि सच कह रही हूँ।" बीवी ने जोर देकर कहा । "मालूम होता है, तुम्हारा दिमाग ठीक काम नहीं कर A 'मेरा दिमाग बिलकुल ठीक काम कर रहा है।" हमारी बुद्धि चकरा गई थी, किन्तु हमने मुसकुराकर कहा "मान लो यदि बैठी भी है तो तुम्हारी बला से।" "सुदा के लिये कोई नुक्सान नहीं। जिसमे तुम खुश, उममे में खुश, और मेरा खुदा खुश । जापो, शौक से रात भर बाहर रहो। किन्तु मेरे दिल पर जो चोट लगी, यह इस यात पर कि आखिर बहाना करने से क्या फायदा १ पहले ही कह देते कि एक दोस्त रण्डी सहित आयेंगे और मैं रात भर चाहर रहेगा। ये शब्द बीवी ने दर्दीले स्वर मे रहे। "आखिर तुम्हें यह इतना ही हम कहने पाये थे, कि यीच ही में बात काट दिया और फिर उसी प्रकार कहा. 5
४२
शरीर बीवी
'मैं उन औरतों में नहीं हूँ जो अपने शोहर को साईमसाइ
तग करे । मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि तुम मेरे ही' हो। चाहे
बुरे श्रादमियो मे बैंठो चाहे नेक आदमियों में । मै यदि तुमको
रोकूँगी तो और उपायों से रोगी न कि लडकर । किन्तु
दुस तो मुझे अपने भाग्य पर होता है कि तुमने मेरी इज्जत न
की। मुझको वेवकूफ समझा ओर मुझसे सचसच न कहा ।
यह तो तुम्हारे दोस्त की रण्डी है । यदि कहीं खुदा न करे,
तुम्हारी धुलाई होती तो क्या मैं उसकी या तुम्हारी सेवा न
करती। खुदा न करे कि ऐमा हो, किन्तु यदि खुदा के लिए ऐसा
हुआ, तो तुम मुझे स्थिर-चित्त पावोगे।" इतना कहने ही पाई
थी कि उसकी आवाज विचारों के श्रावेग से घुट गई और
फिर सिसकियाँ लेकर रोना शुरू किया।
हम अधिक हैरानी में थे कि इलाही, माजरा क्या है।
चीवी को हमने गले लगा लिया और चुमकारा और मीधे छत
पर ले गये । वहाँ जब हमने सय किस्सा सुना, तव दग रह
गये और दोनो नौकरानियो को बुलाया और हाल पूछने के
बाद उनको जाने का हुक्म देकर बीवी से कहा-"मालूम होता
है, तुम्हारी नौकरानियाँ झूठ नहीं बोलती हैं, किन्तु उनको
कुछ घोसा हुआ है। हम तुमसे झूठ कभी भी नहीं बोले।
और न चोलेंगे। हम सच कहते हैं और तुम विश्वास करो
कि कोई औरत क्मरे में नहीं है। कदाचित उन्होंने किसी को
कहीं और देसा है।"
"मेरा मजहन, दीन और ईमान सब तुम्ही हो। खुदा के
वास्ते जो तुम कहो वह सच है। मुझको पूरा विश्वास है
कि यहाँ कोई और नहीं । केवल इस समय से कि तुम ऐसा
कहते हो।" बीवी ने प्रगट रूप से यह खुश होकर कहा।
गलत फहमी
हम सरदार साहब के पास आये और असाधारण देर
का कारण बताया। हमारी बुद्धि काम न करती थी कि इलाही
औरतों के दिमाग में यह क्या सलल आ गयी, जो उनकी
आँखो के सामने रण्डी की करिपत तसवीर श्रागई, पडी रात
तक हम सरदार साहा से बातें करते रहे। विचार तो हमारा
यही था कि हम बाहर ही सोयें। किन्तु रात की घटना के
कारण हमने सोचा, कि हम अपनी बीवी से बातें कर लें तो
अच्छा है।
-
हम छत पर पहुंचे तो बीवी को सोती हुई पागा । यह
असम्भव था कि हममेकर एक दूसरे को सोते देस पाये,
और कुछ शरारत न करे । क्योंकि इस मामले मे हमारी बीवी
का दिल हर समय तैयार रहता था। हमने बिलकुल निश्चय
कर लिया कि वीवी का मजाक उडाया जाय, अत हमने पानी
को दो-तीन बूदें नाक मे जब डाली, तब वीवी हमती, सॉसती
और छींकती हुई उठी । बीवी ने कहा कि एक नौकरानी फिर
गई थी, और फिर आकर उसने यही कहा था कि औरत
कमरे में है।
"तो फिर तुमने क्या किया, हमने आश्चर्य से पूछा।
"मैं करती क्या' खून डाँटा कि तू झूठी है। किन्तु समक
में नहीं आता कि आखिर दोनों ने सलाह करके ऐसी भूती
घात क्यों गढी ? मुझसे तुमने कह दिया, बस काफी है।
यदि मैं स्वय भी ऑगो से देसलू, तो भी तुम्हें झूठा न
समदूंगी।
हमने प्रभावित होकर बीवी से केवल इतना कहा कि "तुम
बड़ी अच्छी हो।" हम दोनों कुछ देर तक यही बातें करते
४४
शरीर बीवी
रहे कि श्रासिर इन नौकरानियों को क्या सूझी, जो ऐसी वेजड़
की बात कह दी और फिर उस पर अटल है। वीपी उसको
निकालने को कहती थीं, किन्तु हमारा विचार यह अवश्य था कि
वे किसी गलत-फहमी में पड़ी हुई हैं।
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सरदार सुन्दर सिंह खूबसूरत जवान नहीं, बल्कि बहुत
ही सुन्दर आकर्षक जवान थे। सुदा की शान है कि बुद्धि
काम न करती थी कि उनको भी कैसा सौन्दर्य मिला था,
लोगों की समझ ही में न आता था कि इनमें स्त्री सौन्दर्य की
वास्तनिस्ता अन्तर्हित है, या पुरुप-सौन्दर्य की 1 गोरा चमकता
हुआ रग, शरीर बहुत ही कोमल और इकहरा । कद
बहुत ही मुनासिब । ऑसें, नाक, ओठ, दाँत, मतलब कि
पूरा चेहरा इस तरह हलका और सूबसूरत कि जो देखता
तारीफ करता । इन सभी बातो के अलावा कमर तक रेशम
की भाति' मुलायम बाल उनके सौन्दर्य-ससार को परिपूर्ण
करते थे, किन्तु उनकी दाढी । गुता की पनाह, माशा अल्लाह
डेढ़ बालिश्त की दाढी नहीं, बल्कि दाढा था। यही एक ऐसी
चीज थी जो उनके सौन्दर्य-समार को दबाने और पराजित
करने की अमफल कोशिश करती थी। क्योंकि सब की मिली
हुई राय यही थी कि इस तरह लम्बी दाढी को भी इस उद्देश्य
में कुछ भी सफलता नहीं प्राप्त होती। वे अपनी दाढी लपेट कर
रेशमी डारे से इस प्रकार वाँध लेते थे, कि यही मालूम होता
था कि मामूली छोटी-छोटी, दाढी है। केवल उनकी दाढी ही
एक ऐमी चीज थी जो उनको एक खूबसूरत मर्द बना देती
थी। फिर भी सो सौन्दर्य की वास्तरिकता, जैसा कि हम कह
चुके हैं, अन्तर्हित ही रहती थी। क्योंकि आपस के यार दोस्त
गलत फहमी
उनके स्त्री सौन्दर्य की इतनी तारीफ करते थे, कि ये झप आते
थ, कहा करते थे, कि यदि कहीं मेरे दादी न होती तो मुमसे
चार दोस्तों के मजाक का जवान ही देते न धन पडता ।
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सयेरे हमारी प्रांस कुछ देर से खुली। उठकर हम बाहर
पहुँचे। सरदार साहब नहाने के कमर में थे। हम बरामदे में
एक कुर्सी पर बैठे हुए थे, कि सरदार साहब नहाकर मुसकुराते
हुर निकले । डेड बालिश्त की दाढी इस खूबसूरत चेहरे पर
विचित्र पहार दे रही थी। एक सफेद धोती साडी की भॉति
चाँधे हुए थे और श्राधी प्रोढे हुए थे, जिससे सारा शरीर हाथी
की कुहनिया तक और सिर के अलावा खुला हुआ था। उनक
लम्बे और रेशमी याल कमर तक लटक रहे थे। हमारी कुर्मा
ही के पास मेज थी, जिस पर श्राइना रक्सा था। चे कुर्मा के
घराबर आइने के सामने सडे होकर वाल पोंछने लगे और
कहने लगे कि "तुम अपनी बीवी से कर मुलाकात कराओगे।"
हमने हंसते हुए और उनके पाली से सेलते हुए कहा, जो
हमारे सामने ही लटक रहे थे, कि-"सरदार साहब, हमाग
तो यह विचार था कि आप से कल ही मुलाकात करा दे, किन्तु
अभाग्यवश यह विचार बदल देना पड़ा, और अब कदाचित
मुलाकात बिलकुल न करा सकें।"
"भई। यह क्यों ?" सरदार साहब ने अपने रेशमी बाल
झटकते हुए विचित्र अदा के साथ कहा।
रात की घटना आपको मालूम है। आपको अनुमान हो
गया होगा कि हमारी बीवी ने भी कैसा सदिग्ध हृदय
पाया है।
शरीर वीवी
ने
"तो आसिर इससे क्या मतलन ?' सरदार साहब
मुसकुराते हुए कहा।
"अजी हजरत, सभी नौकरानियाँ यही कह रही हैं कि
आपकी दाढी नकली है, हमें शक है कि हमारी बीवी कहीं
आपसे जलने न लगे । अत. अच्छा है कि मुलाकात न हो।"
सरदार माहब ने एक कहकहा लगा कर कहा, "शुक्रिया,
तमलीम, तसलीम, भई । मेरी इस तरह बडी तो दाढी है।
बात तो यह है कि इस दाढी पर तुम्हारा कोई जुमला ठीक ही
नहीं बैठ माता।"
हमने हाथ मे बाल लेते हुए कहा-"सूरत और शकल
और इन्हें कहाँ ले जावोगे।"
इतना ही कहा था कि नौकर आया और उसने हमसे कहा,
कि आपको भीतर फिसी बहुत ही जरूरी काम से बुलाया है।
हम शीघ्र उठकर पाये। मालूम हुआ कि ऊपर हैं, वहाँ जय
पहुंचे, तब सबसे पहले दोनों नौकरानियॉ ऑसें फाडे व्याकुल
परीशान मिली । इलाही, सैर तो है । हमने दिल ही दिल में कहा
और कमरे में पहुंचे। क्या देखते हैं, कि बीवी साहिना तकिये में
मुंह छिपाये पड़ी है। पैरों की आहट पाकर जो सिर उठाया तो
हम देखते ही दग रह गये। रज और दुस से चेहरा लाल हो
रहा था और ऑसों से आँसू निकल रहे थे। हम अधिक परी-
शान हुए और पास बैठकर हमने कधे पर हाथ रख कर दुसी
होर कहा, "मेरी जान, तुम्हें क्या हुआ ? कुशल तो है ?"
रोते हुए वीवी ने जवाब दिया, "मालूम होता है कि मेरे
दिन भर की भागये।"
बेचैन होकर हमने फिर कहा, "कुशल तो है । आखिर क्या
हुश्रा ?"
।
गलत फहमी
"तुम्हारा विश्वास जर मेरे ऊपर से उठ गया तय मैं क्यों
कर जीवित रह सकती हूँ । यदि स्मिी बाजारू औरत मे तुम
मिलो और मुझसे कह दो तो गैर कुछ नहीं । शिन्तु यह घर में
आये और तुम मुमसे दिपाओ तो उमका गही मतलन है कि
मेरी मृत्यु परीन है । मुझको अय तक घमण्ड था कि में तुम्हारा
सच्चा दोस्त है। किन्तु सुदा ।" इतना कहकर थापाज धुंध
गई, और फिर मुंह छिपाकर बुरी तरह रोना शुरू रिया । हम
मरन चक्कर में थे कि इलाही, यह पेमी आपदा है। क्या
मुझको पागल या दोगी १ श्रापिर यह मामिला क्या है ?
कैसी रण्डी और कैसी मुण्डी ? यहाँ कहाँ है ?"
धोनी ने 'मॉमू पोंछकर और ऑमें चार करके कहा, "क्या
अय भी यही कहे जानोगे कि औरत नहीं है ?"
"कोई नहीं, निलकुल गलत है। मालूम होता है फिर यही
रात का विस्मा पेश है।"
"जो तुम कहो वह ठीक है । कह चुकी कि मेरा मजह्य तो
तुम हो और ईमान हो तो तुम हो, किन्तु अय में बिना अपनी
ऑसें फोडे न रहूँगी। मेरा मजहब है कि यदि एक चीज मेरी
ऑग्ने देने कि है, किन्तु तुम कहो कि नहीं है, तो मेरी आँसें
झूठी और तुम सच्चे । कदाचित् मेरी आँसों ने भी नौकरानियों
की आँसी की भांति घोसा साया हो। अत एक बार और
श्राजमा लू।" यह कहती हुई उठी और सिड़की से बाहर
जाकर मॉमा । उँगली से हमें इशारा किया। हम भी गये।
"वह देखो, मेरी बासें तो अब भी मुझे, घोसा दे रही हैं।"
इशारे से बनाते हुए कहा । हमने जन सिडकी मे से बाहर की
ओर दृष्टि डाली तब निस्मन्देह अपनी बीवी का कहना ठीक
पाया। क्या देखते हैं कि बरामदे में एक औरत खिडकी की
शरीर बीवी
ओर पीठ किये सड़ी श्राइना देख रही है। उसके लम्बे-लम्बे
वाल उसकी कमर तक लटक रहे हैं, जिनको वह अपने कोमल
और गोरे हाथों से सहला रही है. और भटक रही है। सफेद
साडी बाँधे, सिर और कुहनियों तक हाथ खुले हैं, जिनसे पता
चलता है कि बहुत खूबसूरत होगी। हमने यह दृश्य देख
कर बीवी की ओर देसा, तो उसने विचित्र दर्दीले और दुस
भरे ढग से कहा-"क्या पताऊँ, मेरा उम समय क्या हाल
था, जब मैंने अपनी प्रॉसें से देसा कि तुम हँस-हँसकर उसके
घालों में हाथ डालकर सेल रहे हो।"
अलावा इसके कि हम कुछ जवाब देते, हमने वीवी का
हाथ पकडा और कमरे में लाये, और गले से लगाकर बीवी से
खुशामद कर करके अपने अपराध को स्वीकार किया और हाथ
जोडकर क्षमा मांगा।
"खुदा के लिए मुझे गुनहगार न करो। मैं भला इस योग्य
हूँ कि तुम मुझसे माफी मांगो।"
"यह कोई बात नहीं । जब हमारा अपराध है, तब हम क्यों
न क्षमा मागे
राजी होकर बीवी ने कहा, "अच्छा यह बताओ कि तुमने
मुझसे रात में ही क्यों नहीं कह दिया ?"
"सिर्फ बेवकूफी और मूर्सता ! यही ख्याल था, कि तुमको
"मैं फिर कहती हूँ कि जिसमे तुम खुश, उसमें में खुश,
और मेरा खुदा खुश । खुदा के वास्ते मुझसे कोई बात न
छिपाया करो
हमने वादा कर लिया और कहा कि हम तो तुमसे असली
घात स्वय ही कहने वाले थे, क्योंकि हमें तुमको इस औरत से
।
बुरा मालूम होगा
गलत फहमी
४६.
मिलाना था । अब हम तुमसे एक बात कहते हैं और वह यह
कि तुम उमसे चलकर अभी मिल लो, जिससे हमारा दिल
हलका हो जाये।"
"मिलने में मुझको कोईइनकार नहीं, किन्तु अभी ?"
"हॉ अभी और इसी तरह । यदि तुमको मुझसे मुहब्बत है.
तो फिर मैं जो कहूँ वह करो।लो उठो।"
यह कहकर हमने बीवी का हाथ पकडकर उठाया और
कहा, "वहीं बाहर चलकर मिल लो, और इस समय उसके
अलावा दूसरा कोई नहीं है।"
हमारा शरीर किन्तु निरपराध और वफादार बीवी
सदैव हमारे इशारे पर चलती थी। सीधी हमारे साथ हो ली।
हम दरवाजे पर न आकर उस सीढ़ी से उतरे, जो सास उस
घरामदे में निक्लती थी। यहाँ सरदार साहब नहीं थे। हमने
बीवी को वहीं छोडा, और चुपके से कमरे में झाँककर देखा
कि सरदार साहब किधर हैं। सरदार साहब कमरे में सडक
की ओर वाले दरवाजे में, हमारी ओर पीठ किये हुए, पार्लो
को हवा दे देकर सुखा रहे थे। हम मट लौट आये और बीवी
को आगे किया। बीवी की दृष्टि सामने वाले लम्बे चौडे आइने
पर पडी, और वह सहसा कुछ स्की कि नजर दाहिनी ओर
पडी । भीतर आई तो देखा कि वही औरत उस ओर मुँह किये
चाल सुरपा रही है। कुछ आगे बढी कि सरदार साहब ने पैर
की
कुछ श्राट पाकर मुंह जो फेरा, तो डेढ वालिश्त की दाढी।
वाला चेहरा सामने था। घबडाहट मे सरदार साहब के मुख
से केवल इतना निकला-"हैं।" हमने जो पीछे घूमकर देसा
तो बीवी नदारद ।
सरदार साहब हैरान और परेशान थे और इधर हंसी के.
४
५२ शरीर बीवी- चौथा परिच्छेद लाहौर का सफर चाँदनी का बडे जोरों का तकाजा था कि लाहौर की सैर परें। अतः दिसम्बर की छुट्टियों में हम लाहौर गयें ! यह बनाने की आवश्यकता नहीं कि हम किस जगह ठहरे, किन्तु खून सैर की। चलने से एक दिन पहले हमने अपनी, बीवी से कहा कि बगदादी चोर का प्रसिद्ध, फिल्म आया हुआ है, क्या तू देखेगी ? चूंकि हमारी बीवी के स्वभाव में सैर और आराम समाया हुआ था, अतएन. शीघ्र ही वह तेयार हो गई। अभाग्य से हम दोनों सिनेमा ऐसे तन समय पहुँचे, कि कठिनाई है अव्वल "दर्जे में जगह मिली, और यह भी बदकिस्मती है ऐमी कि इधर हम और उवर बीवी और बीच, बाज, जो बहुत ही बडे खतरनाक ढंग ,का. बडा साफा बाँ हुए, था। हमने उनसे कहा कि साहब आप अपनी जग बदल लीजिये तो, बड़ी मेहरबानी हो, जिससे हम अपनी बीव के साथ का आनन्द उठा सकें। किन्तु वे न माने और चु स्वभाव से पेश आये, और नौनत यहाँ तक पहुँची कि कह सुनी होते-होते रुक गई । 'किस्मत की खुनी या सयोग कि की कतार से एक साहब बहादुर' उठकर रफूचक्कर हुए श्र उनकी जगह साली हुई। हमने उनसे कहा कि हजरत श्रा चौली जगह सालो है, 'श्राप बैठ जायें। अत: वे पगड़ीबा धागे जा बैठे। और चाँदनी उनकी जगह आ बेठी, और उनव जगह एक और साहब ने पीछे से श्राफर ले ली। ये माहब बहु ही सभ्य और बहुत ही मुनासिब आदमी मालूम होते थे। मे एक पगड़ी - 2
लाहौर का सफर
लाहौर के नये हिन्दू पकील थे। अय मालूम हुआ कि चाँदनी
को फुत्र दिसाई नहीं देता, क्योंकि सामने जबर्दस पगली थी।
हमने बहुत ही नम्रता से उन हजरत से व्यर्थ कहा कि हजरत
आप अपना साफा उतार लें। ये न माने और चाँदनी ने सग
पार हमको भी न देखने दिया और बातों में लगा लिया।
यह धीरे धीरे कह रही थी कि इन पगड़ीवाज से बदला लो
और उनका माफा धमीदो। हम कह रहे थे कि हमें मालूम
होता है कि तू आज मारी जायगी और हमें भी अपमानिन
करायगी । यह कहती थी कि आसिर फिर क्या किया जाये ?
वकील साहब उसकी सलाहों में बहुत दिलचस्पी ले रहे थे,
किन्तु यह सलाह उनी भी थो, कि तुम औरत हो, शरारत
करना उचित नहीं, तो इनका जवाब हमारी शरीर बीवी ने यह
दिया कि हजरत फिर आप ही मर्द बनिये ओर किसी प्रकार
उनका साफा उतरवाइये । वकील साहन ने स्वय इन पगड़ी
प्रिय हजरत से कहा कि साफा उतार डालिये या कोई और
उपाय कीजिये, किन्तु ये न माने ।
१
चाँदनी हमें तमाशा देसने ही न देती थी। हमारी कुर्सी के
तकिये पर नॉया हाथ रक्से हुए हमारी टोपी के फन्दने से खेल
रही थी और नाती में लगाये हुई थी। हम कह रहे थे किन
तो स्वय तमाशा देसती है, और न हमें देसने देती है। आखिर
यह क्या मामिला है कि इतने मे उमने कहा कि बाहर चलो,
चाय पियें । हमने इन्कार किया और कहा कि तुम जाओ और
हमें देखने दो। वह चली गई और वहाँ से जब लौट कर पाई
वय उसके हाथ में हमारी टोपी के फन्दने के दो डोर थे, जो
बत्ती की तरह सुलग रहे थे। एक इनमें से उसने वकील साहन
शरीर बीवी
को दिया और दूसरा अपने हाथ में लिया। हमने पूछा कि यह
क्या मामिला है, तो उसने न बताया। उसने हाथ बढाकर
पगडीवाज हजरत की गरदन पर सुलगता हुआ डोर का किनारा
छुआ दिया । वस, हम क्या, बतायें कि उन्होंने किस सफाई से
अपने गर्दन का पिछला भाग भांडा, मानों उनकी गर्दन में
किसी कीडे ने डक मार दिया। जैसे ही उन्होंने मुडकर देखा
तो चॉदनी ने वकील माहव से कहा कि वकील साहब आपको
ऐसा न करना चाहिये । वकील साहब ने इस मजाक से काफी
दिलचस्पी ली। पगडीवाज हजरत इस मजाक को पी गये,
और दो एक बार सिर हिला-हिला कर वकील साहब को देखने
के अलावा और कुछ न किया । अब हमारी चीवी ने फिर यही
करना चाहा । हमने बहुत कुछ कहा कि बदनमीब, तू मार
खायेगी और तेरी शामत आ रही है किन्तु वह न मानी और
उसने फिर एक चरखा दिया । अव को वार तो वे बल खा गये।
शोर तो मचा न सकते थे, न जाने क्या फुस-फुसाने लगे। किन्तु
बहुत नाराज थे। वकील साहब ने जब देखा कि मामिला
मेरे ऊपर आता है तब उन्होने हाथ की बत्ती फेंक दी। किन्तु
पगडीवाज ने उसको देखा था। और वे यही सोच रहे थे
कि शरारत वकील साहब की है । क्योंकि चाँदनी तो बिलकुल
भीगी बिल्ली बनी बैठी थी और बार-बार कहती थी कि ऐसा
न करना चाहिये, बुरी बात है। अब ऐसा मालूम होता है कि
ये हजरत पगडीवाज सावधान होकर बैठे थे, और बेहोश
न थे।
थोड़ी देर बाद वकील साहब ने उठकर एक साहब सिग.
रेट माँगना चाहा और उधर पगडीवाज समझे कि मेरे साथ
शरारत करने का विचार है। ये साहब इन पगडीवाज के वाय
"1
लाहौर का सफर
हाथ बैठे हुए थे। वकील साहब ने उठकर हाथ जो लम्या बढाया
कि पगलीवाज ने, जो बिलकुल सावधान बैठे थे, घुमाकर एक
हाथ बिना देसे भाले अंधेरे ही मे ऐमा वकील साहब को दिया
कि उनकी कनपटी पर पडा । मुनासिब बात थी कि वकील
साहन भी उसका जवाब देते, और उन्होंने जोर से पगडी पर
एक ऐसा हाथ मारा कि यह उनके गले में उनर आई। पगडी-
याज के धैर्य का प्याला भर चुका था, और वे ऐसी मुसीबत की
तरह, जिसका इलाज नहीं, शार मचाकर कूद कर हमारी लाइन
पर गिरे और वकील साहब से भिड गये । एक बड़ा हुल्लड मचा
और रोशनी हुई । एक अँगरेज सार्जेन्ट ने आकर दसल दिया।
चाँदनी ने और पास बैठने वालों ने इन पगडीवाज की भूठी
सच्ची शिकायत की । वे हजरत सार्जेन्ट से भी कडाई से पेश
आये, जिसका यह नतीना निकला कि वे हजरत परडकर
निकाले गये और फिर हमने याकी सेल इतमिनान से देखा।
खेल सतम हुआ तो वकील साहब से हमने अपनी बीवी
की शरारतों की माफी मॉगी। किन्तु वकील साहब चॉदनी की
शरारतों के कायल हो चुके थे और उन्होंने हमारा नाम और
पूरा पूरा पता पूछा और अपना पता बता दिया, और दूसरे
दिन अपने यहाँ चाय पीने के लिये बुलाया । हमने तो क्षमा
चाही, किन्तु हमारी बीवी ने बात काट कर कहा कि नहीं
साहब, हम इस सेवा के लिये हाजिर हैं और जरूर आपके
यहाँ आयेंगे। बडी कोशिश से वकील साहब हमसे आने का
दृढ वचन लेकर रुससत हुए ।
शाम को हम वकील साहब के यहाँ पहुँचे जहाँ, बहुत ही
बनावट के साथ चाय पी और कई ऐसे साहबों से ओर भेंट
शरीर बीवी
हुई कि यदि उनसे न मिलते तो अफसोस ही रह जाता। इसी
रात को हम लाहौर से लखनऊ के लिये चल दिये।
२
लौटते समय दो दिन देहली मे ठहरे और सूर सैर की।
हमने चॉदनी से कहा कि तेरी सैर सपाटे की भेंट हम दो सो
रुपये से अधिक कर चुके हैं और प्रब तुझको तीसरे दर्जे में
मफर करायेंगे । सुलासा यह कि शिकायत की दृष्टि से यह
निश्चय हुआ कि यहाँ से इन्टर क्लाम का टिकट लिया जाय।
बदकिस्मती से देहली के स्टेशन पर हमारी घीवी की एक
परिचिता मिल गई, जो अलीगढ जा रही थी और हमारी बीवी
ने कहा कि अब हम जनाने डिब्बे में सफर करेंगे। हम हमेशा
अपनी बीवी को अपने साथ ही बैठाना पसन्द करते हैं। कुछ
लोग अपनी बीवी को अपने साथ इस सवव से बैठाते हैं कि
वीवी अपनी है, किन्तु वास्तव में हम वानूनी अधिक हैं और
फिर बीवी के साथ बातें करने में जो आनन्द आता है व
किसी में नहीं।
हम सोचते थे कि अलीगढ के बाद चीवी का साथ है
जायगा किन्तु बदकिस्मती से मरदाने डिब्बे मे जगह की इस
तरह तगी हुई कि चीनी को साथ बैठाने का विचार ही छोड़
देना पड़ा। वह तैयार न हुई । क्योंकि उसको स्वय रयाल था
कि बहुत रुपया सर्च हो चुका है।
बदकिस्मती पर वदकिस्मती थी। अच्छी वीवी और अच्छा
सुमाफिर दोस्त कठिनाई ही से मिलता है। अलीगढ के बाद
तो हमें नरक के आनन्द मिल रहे थे। क्योंकि दो तीन सेठ
माह यान प्रा बैठे थे, जो व्यापार की इस प्रकार अनुचित वाते
कर रो थे कि हम मरसों और तेल का भार सुनते सुनते
. । . लाहौर का सफर परेशान हो गये और हमें फहना पड़ा कि हजरत यह रेल है दुकान नहीं, कि आप साहन तमाम सरीद फरोख्न के किस्से यहाँ सुनायें। टूडला का स्टेशन श्राया और हम चाँदनी से मजेदार गप्प करने पहुंचे। उसने इच्छा प्रक्ट की कि कहीं उम्दे केक मिलें तो अच्छा है। हम केक की तलाश मे वेटिग रूम के होटल की ओर चले । भीड भाड मे थोड़ी ही दूर गये होंगे कि सामने से पुराना दोस्त पाता हुआ दिखाई पडा । हम दौडकर उससे लिपट गये और दोनों के मुंह से एक साथ निक्ला कि भाई । सूर मिले । कहाँ जा रहे हो, कहाँ से पा रहे हो, कैसे हो और कहाँ हो ? यही दो चार वाक्य थे, जिनसे सवाल और जवान दोनों ओर से हुए। दो चार ही बातें हुई थीं कि हामिद ने हमसे कहा, "यार एक घडी जोरदार लडकी देयने मे आई है।" हमने आश्चर्य में आकर पूछा कि “कहाँ है ?" हामिद ने कहा, “जनाने डिब्बे में जमी हुई है । अरे यार क्या बताऊँ कि वरार लगभग हर एक स्टेशन पर उसे देखने के लिये उतरता हूँ, किन्तु ज्योंही पास पहुंचता है, वह जालिम मुंह फेर लेती है । भाई | क्या कहूँ, गजर की लडकी है।" हामिद यह कहते हुए हमें लेकर दिखाने चले। हम दिल में सोच रहे थे कि आसिर यह कौन लडकी है जिसने जुल्म ढा रक्सा है। क्योंकि हमे तो 'प्रय तक दिसाई न पड़ी थी। हम दोनों तेजी से जनाने डिब्बे की ओर पहुँचे । कुछ दूर सडे होकर हामिद ने कहा, "वह देको, काले बुरके की नकार सिर पर डाले मुंह सोले हुए बैठी है। कहो, कुछ है जोरदार हम भला इसके अलावा और क्या जवाब देते कि मई -- ។ हामिद हमकर बोले-"हाँ भाई । हम हार गये, नोट तुम्हारा हमने कहा कि तुम भूलते हो, हमारी इसमे कुछ चालाकी शरीर वीवी अब हामिद सख्त चक्कर में थे और कहने लगे "यार तुम्हें कुछ जादु आता है।" यह कहकर लाचारी की अवस्था में जेबो में हाथ डालकर मामिले पर विचार करने लगे। हमने नोट को जिसे हम जीत गये थे, जेब में से निकाला और आगे बढाकर उनके सामने करके उसको चुम्बन दिया। है । मिन्तु यह अवश्य कहेंगे कि हो घुटे हुए।" नहीं । बल्कि यह तो हमारी मरदानी खूबसूरती है कि ऐसी ऐसी छोकरियों न मालम कितनी प्रतिदिन फिदा होती हैं।" हामिद ने कहा, "उस्ताद बन पाई है। जो जी चाहे कहो। अर फिर जावोगे?" हमने कहा, "अव हम जाना ठीक नहीं समझते । क्योंकि वह हमसे केक मॉग रही है।" "अच्छा ग्याश्रो कसम" हामिद ने आश्चर्य में आकर कहा । हमने झट कसम साई। क्योंकि सच बात थी, कि वह केकों के लिये कडा तकाजा कर रही थी। हामिद इस पर बोल कि फिर दे क्यों नहीं आये ? जिमका हमने यह जवाब दिय कि हम ऐसी वेवकूफी भी न करेंगे। ऐसा ही है तो तुम स्वय दे आयो ।” हामिद ने जाने की इच्छा प्रकट की किन्तु इस शर्त पर कि हम जाकर मामिला ठीक कर दे । हम दौड हुए धोनी के पास पहुंचे और उसको खुशसारी दी कि दोस्त तुम्हारी दावत कर रहा है और चूकना मत। केक फौरन हामिद केक तो ले आये, किन्तु अब उनको डर लगा पही फाई म न हो। हमने कहा कि उसके साथ कोई मन ले लेना। व -
।
लाहौर का सफर
नहीं। क्योंकि वह अकेली यात्रा करने की पाती है। तुम बेडर
जाओ, किन्तु हामिद तैयार न होते थे। हमने कहा, "अच्छा
तुम केक लिए हुए डिब्बे के सामने से निकलो। यदि माँगे तो
देना, नहीं तो चले आना।
हामिद बिडकी के सामने से केक लेकर निकले। उधर
हमने अपनी चुलबुली बीवी को इशारा किया। उसने झट हाथ
बढाकर ले लिये, और कृतज्ञता ही प्रकट नहीं कि बल्कि उनके
हाथ में पान भी दे दिया।
हामिद हमारे पास आये तो क्या बतायें क्या हाल था।
हमारी बीवी के सौंदर्य और रूप की उन्होंने वह तारीफ की
कि हम कृतज्ञता प्रकट करते-करते थक गय । क्योंकि हन
हामिद से कह रहे थे कि वह हमारी है। गाडी चलने की
हुई तब हमने भी हामिद के साथ अपना टिकट दूसरे दर्जे का
धनवा लिया।
अब हामिद दूमरे तीसरे स्टेशन पर अवश्य हमारी बीवी के
पास जाते । हम बीवी से कह आये थे कि हामिद हमारा ऐमा
दोस्त है, कि उससे तिनका भर भी बनावट न करना और
साथ ही शरारत मे भी कमी न करना। हामिद के साथ एक
घार हम भी जव उतरे, तब वे बोले कि दो आदमियों का जाना
ठीक नहीं । तुम यही ठहो नहीं तो फिर वह बातचीत नहीं
करेगी। हमने कहा यदि ऐसा ही है, तो हम सब मामिला
चौपट किये देते हैं, नहीं तो तुम हमे जाकर उससे बातचीत
फरने दो। अत हम चाँदनी के पास पहुंचे, उसकी शयरत
से भरी हुई मुसुकुराहट हमारे दिल पर बिजलियाँ गिरा रही
थी। हमने जाते ही कहा कि कहो दोस्त, क्या रंग है । इस पर
,
शरीर वीवी
उन्होंने इस सफर की यादगार इस प्रकार कायम की, कि ये
शन खुदवा दिये।
“हामिद की ओर से भेंट, अपने प्यारे दोस्त की प्यारी,
किन्तु बहुत ही शरारतभरी बीवी को "
1
7
.
पांचवॉ परिच्छेद
कुनैन का इस्तेमाल
वैसे तो हमारी कई मौसियाँ हैं किन्तु इनमें से जो
छोटी हैं वे बहुत फर्स्ट क्लास हैं । इस कारण से नहीं कि ५३
अधिक प्यार करती हैं बल्कि इस कारण से कि हमें का
हमारी बीवी को वे बहुत पसन्द करती हैं। एक बार हमारे
आई तो हमारी बीवी का नाम चाँदनी रस गई। वे कहने
कि चूँ कि तेरी चीनी चाँदनी की तरह खिली रहती है.
उसका नाम चाँदनी बहुत ठीक है। हमने कहा कि आपको
मालूम यह कदापि इम योग्य नहीं कि इसका नाम
रक्खा जाये, थरिक इसका नाम
की बात सोच रहे हैं। किन्तु वे न मानी और उन्होंने ९.
जन्मजात नेक घीनी को चॉदनी की उपाधि दे ही दी। हम,
चार दिन चाँदनी कहने के बजाय अंधेरा ही कहते गय
अन्त में हम भी चाँदनी कहने लगे, जो अब तक जारी है
एसी ममय से हम उसे चाँदनी पहते हैं।
नौकरी ऐमी चीज है कि एक जगह रहना ही नहीं होर
11
'हम अँधेरा इत्यादि
कुनैन का इस्तेमाल
किन्तु एक बात यह भी है कि जहाँ जाना होता है वहाँ नये
यार दोस्त पैदा हो जाते हैं। इस नई जगह में हमारे एक दोस्त
पैदा हो गये। ये काश्मीरी पडित थे और नहर के इन्जीनियर
थे और थोडे ही दिनों में उनसे काफी दोस्ताना हो गया, जिसका
कारण कदाचित् यह था कि चाँदनी फी और उनकी चीनी की
खून घुटती थी। चाँदनी उनके यहाँ प्राय जाया करती थी।
उनके बँगले पर जन एक घडा-सा नहाने का हीज देसा, तर
उसने उनकी बीवी से कहा, कि आखिर क्यों न इसको साफ
करके भरा जाये ? यह हौज बहुत ही मेला पडा था। तैरना
मीखने के लिये बनाया गया था और नहर से उसमें पानी पाने
का रास्ता था चारों ओर से पन्द था और छत पर टीन
छाया हुआ था। दोनों की सलाह हो गई और पडित जी की
जीवी ने उसकी सफाई इत्यादि शुरू करा दी। इस हौज के शौक
में चाँदनी पागल हो रही थी। कई दिन हौज की मरम्मत और
सफाई देखने के लिए गई और घड़ी दिलचस्पी ले रही थी।
'हमने उमके लिये धम्बई से नहाने का जनाना सूट मंगाया,
जिसको देसकर इन्जीनियर साहब की बीवी ने भी मँगाया। बडे
शौक और प्रतीक्षा के बाद वह दिन आया कि हौज भरा गया
और यह नहाने गई। सफर में, पहली बार उसे पानी मे सेलने
का अवसर मिला, तो वह प्रतिदिन जाने लगी। धीरे धीरे इस
शौक ने सनामक रूप धारण कर लिया और दूसरी औरतों
को भी शौक पैदा हो गया और इन्जीनियर साहब के बंगले पर
मानो नहाने और तैरने का एक क्लब स्थापित हो गया । हम
इस क्लय से बहुत ज्यादा परीशान थे। क्योंकि यह तो प्रतिदिन
का मगडा हो गया कि पीवी तैरने चली जाती और हम शाम
को इधर उधर मारे मारे फिरते। हम बहुत प्रयत्न करते कि
मोर
।
सीस रही हूँ। हम कहते थे कि एक न एक दिन तू इवेगो
शरीर बीवी
किसी दिन तो न जाये और उसको रोकते, किन्तु वह कहती
थी कि अब तुम क्लब इत्यादि जाना शुरू कर दो, मैं तैरना
और उल्टी लटकाई जायगी। इजीनियर साहब के यहाँ उनकी
बीवी ने यह सलाह दी थी, कि मोटर के व्य व मे हवा भरकर
उसकी सहायता से तैरना चाहिये । अन हमने दो ट्य घ
के मॅगाकर दे दिये। खुलासा यह कि उमको ऐसा शौक पैदा
हो गया कि दिन भर यहीं इन्तजार करती रहती थी कि अब
शाम को और मैं जाऊँ। वहाँ से आकर अपनी तैयकी ओर
गोताखोरी को मनोरञ्जक कहानियाँ सुनाया करती। शरारतें
वहाँ भी उसके साथ थीं और उसका यह मनोरञ्जक काम था
कि वह चुपके से पानी, में बैठकर किसी नई आने वाली
वीची के पैर को घसीट कर उसे गिरा दिया करती थी।
यह हौज वास्तव मे केवल तैरने और नहाने के लिये
बनाया गया था। तीमरे दिन सवेरे नहर से साफ पानी इसमें
भर दिया जाता था। एक ओर इसमें दो तीन सीढियाँ थीं और
कम पानी था, किन्तु प्रागे दूसरी ओर सतह ऐसी ढालुओं थी
कि गहरा होता चला गया था, इस तरह कि दूसरे किनार पर
आदमी के कद से भी अधिक गहराई थी।
एक दिन की बात है कि चाँदनी ने हमसे कहा, आज हम
बहुत जल्द जायँगी, क्योंकि इन्जीनियर साइव - के यहाँ कुछ
मेहमान आये हुए हैं और दूसरी बीवियाँ भी पायेंगी। हम
कहा करती थी कि अब हम कुछ तैर लेती हैं। वहाँ आज काफी
औरतों का मजमा, था और चॉदनी को एक और शरारत भरी
चीवी यहाँ मिल गई । इन दोनो ने यह मलाह की कि एक बीवी
को जो पानी मे बहुत डरती थी, घमीटा जाय । अत. इन दोनों
।
पुनन फा इस्तेमाल
६६
ने एमा ही किया और फिर पानी मे ऐमा हुल्लड मचाया कि
वह बेचारी गहरे पानी की ओर गिरी। इस गपड में उन्होंने
चाँदनी को घसीट लिया और मका परिणाम यह हुआ कि
होनी गहरे पानी में गोते साने लगी। हालॉकि मोटर ट्यन
गनी में मौजूद थे, किन्तु वहाँ होश ही दुरस्त न ये कि उनकी
नहायता ली जाती । तात्पर्य यह कि एक दुमरे को पकडकर
इस प्रकार गोता पा रही थी कि नौनत डूब जाने तक की
गहुँची । इमी समय दूमरी बीवियों ने एक माडी भीतर फेंकी,
जेसमा निनारा पकडकर दोनों निकल आई, किन्तु बुरा हाल
था । नाक और मुह से न मालूम कितना पानी पेट मे जा चुका
या और आश्चर्य नहीं, कि यदि थोड़ी देर और बीत जाती तो
होनों डूब जाती।
हम घर पर प्रतीक्षा कर रहे थे कि वह मुसुकुराती हुई
पहुँची। हमने कहा कि आज क्या मामला है कि जल्दी आ गई
तो उसने किस्सा सुना दिया। हमने समझा कि मामूली-सी
बात है, अतः हमने वीवो की खूब दिल्लगी उडाई । उसको
ध्यास लग रही थी और उसने दो बार दो गिलास पानी पिया,
और फिर भी प्यास न घुझी । थोड़ी देर बाद उसको के हुई
और तनीयत सरान हो गई। गॉसी अलग थी। तकलीफ इतनी
हुई कि डाक्टर को बुलाना पडा । डाक्टर ने कहा, मालूम
होता है, फेफडों पर भी पानी का कुछ असर पहुँच गया है,
क्योंकि साँसी बहुत आ रही थी। उन्होंने कहा, दवा सबेरे
जायगी। पहले पेट में से पानी निकालना चाहिये। उन्होंने एक
चारपाई मँगाई और उसका पैताना खूर ऊँचा कर दिया।
-फिर चॉदनी से कहा, कि उस पर लेटो। उसको इस प्रकार
चटकाया, कि मुंह सिरहाने की ओर लटका रहे और ओंधी
कहो
हम कहते
सी हो गई । उसको बद्धी बेचैनी थी और नींद न आती थी
यपक-यपक कर और सिर महला-महलाकर सुलाया । सदर
ओढे लेटी हुई है। हम जानते थे कि अवश्य जाग रही हो -
और बन कर पडी है। अत हमने आते ही गुदगुदाया। उमन -
है कि चेहरा तमतमाया हुआ है और लाल हो रहा है। हमने-
अव चाँदनीको बारी से बुसार आने लगा। बुखार यन
हुआ तो फिर और तवियत सरान, रहने लगी। हमने हकीम के
निलाफ थी। कठिनाई से राजी हुई। दूसरे दिन हमने हकीम
इलाज की सलाह दी। वह न जाने क्यों हकीमों के इलाज के
साहय को बुलवाया। ये हकीम वास्तव में कुछ यों ही से थे।
हफीम जी ने हाल पूछा और व्योरेवार हाल सुना । हाजमें
जय हाल पूछा, तर उसको शरारत सूझी। उसने उनसे कहा
शरीर बीवी
पडी रहे । पेट के नीचे एक तकिया रसकर हम उम पर तैनात
किये गये कि समय-समय पर उसको ऊपर से दवा कर के
करायें। डाक्टर साहब के जाते ही हमने कहा,
थे न कि उल्टी लटकाई जावोगी । खुलासा यह कि दो तीन घने
तक थोडी थोडी देर बाद उसको दबाते और फिर कै होती रही
और इतना पानी निकला कि हमें बडी परेशानी हुई। के परखे
फरते चेचारी परेशान हो गई और हैरान हो जाने से हराख
और धवडाहट और प्यास थी। हमने घडी कठिनाई से ससमा
उठी तो तनियत रात की तकलीफ के कारण बहुत ही सुस्त
और कमजोर थी।
हम कचहरी से लौटे तो देखा कि चारपाई पर चार
हँसते हुये चादर को जव मुंह से हटाया वय हम क्या
मस्तक पर हाथ रख कर देखा तो बुखार था।
देश
चाँदनी ने जब उनको देश, ता और भी धुरी राय: कायम की
कुनैन का इस्तेमाल
कि हाजमा तो मेरा प्राज फल ऐसा है कि चाहे जो साऊँ, वह
सव हजम होकर पूरा पूरा खून बन जाता है। इस तरह कि
पाखाना तक नहीं बनता। हकीम साहब की समझ मे न आया
कि वे उसको जान-बूझकर अनजान बनी हुई समझे, या वास्तव
में यह समझे कि रोगी भ्रान्ति में है। बहरहाल उन्होंने पहले तो
कब्ज के सम्बन्ध मे दुहराया, फिर नुससा लिसा । चाँदनी उठ
कर दो लोटे रुपये निकाल कर लाई, जिसे हमने उनके भेंट
किये । हमे उसका पता बाद में लगा, और हमने सोटे रुपये
लौटाल लिये। हकीम जी का नुससा उसने फौरन फाड़ डाला
और फिर डाक्टरी इलाज शुरू कर दिया, जिसमे कुनैन का
इस्तेमाल अधिक था, किन्तु शीघ्र ही आराम हो गया। डाक्टर
साहब ने हमसे कहा था, कि यदि नैनीताल इनको ले जाओ,
तो बहुत शीघ्र तबियत ठीक हो जायगी। अत हमने उससे
वादा कर लिया कि तुमको अवश्य नैनीताल की सैर करायेंगे।
इन दिनों कुनैन के प्रयोग से न जाने चाँदनी को क्या हो
गया ? पहले ही अपनी शयरतो में क्या कम कुनैन का इस्तेमाल
करती थी, और अब तो मानों वह पागल हो गई। एक बडे
बोतल में, उसने सैकडों मेन कुनैन घोल-घोल कर बहुत तेज
मिक्सचर तैयार कराया और पुडियाँ अलग थीं। शक्कर मे
मिली हुई कुनैन अलग रक्सी गई, और यह सव केवल शरारत
की नियत से । समय समय पर हमारे दोस्त ही अभ्यास की पट्टी
नहीं बनते थे, बल्कि हम और बहुधा दूसरे लोग भी शरारत का
शिकार धनते थे, और फिर उनमें कुछ
मजाक करना अभीष्ट ही न होता था।
मारी में खाने पीने की
-
न
AM
कुछ रसभरी , ७२ शरीर वीवी ममय पर बीनी के साथ ही साते थे, और वस्वह य निगलती थी। किन्तु हमारे यार-दोस्त प्रायः वेवक्त उस पर डाकेजनी करते थे। एक दिन की बात है कि एक साहब इस आलमारी पर हमला कर बैठे। उन्होने एक बिस्कुट लेकर, का जाम चढाकर, उसे जव साया, तय बस पल सा गये, और थूक्ते फिरे । दोडकर बरामदे से मुराही लेकर जब फुल्ली यो। तन और भी आनन्द आया। वहाँ एक की जगह पर आज दो सुगहिया रसी थीं, और उनमें से एक मे कुनैन धुनी हुई थी। हमने देखा कि इस मुराही पर एक लेविल लगा है, कि यह पानी पीने का नहीं है। हम भीतर पहुंचे कि बीवी से इस नालायकी का कारण पूठे, तो यहाँ दुसरा ही रगया। वह सडी हुई मुर्गियों को घेर कर धीरे-धीरे पानी के कुण्डे की ओर ला रही है। हम जव आये, तब मुर्गियाँ कूद कुद कर भाग गई। प्रथम इसके कि हम कुछ कहे, वह हम पर बिगडने लगी कि मुर्गियाँ क्यों भगाई ? हमने कहा, आखिर क्या हुश्रा, वह कहने लगी, 'हम इन्हें पानी पिलाने लाई थी। हमने कारण पूछा तो हँसने लगी। मालूम हुआ कि मुर्गियों के कुण्डे में कुनैन मिलाकर रक्सी गई है। हमने उससे कहा कि आखिर यह क्यों तू इस प्रकार जालिम धन गई है कि जानवरी तक को परेशान करती है, और फिर शिकायत की कि, आखिर यह कैसी बेवकूफी है कि खाने-पीने की चीजों, और पीने के पानी में भी कुनैन मिला दी। उसने कहा, इसलिये कि हर आदमी न साये और सुराही में इसलिये मिलाई, कि दे दिन में कितने अक्लमन्द आते हैं और कितने बेवकूफ । क्योंकि सुराही पर लिखा हुआ है कि यह पानी पीने का नहीं है। फिर भी लोग न माने तो क्यिा क्या जाये ? हम सं वाते ही कर रहे थे कि तो
युनेन का इस्तेमाल
नौकर लडफा मुत्ते को घुलाफर लाया। उमका साना उसपे
घरतन में क्या हुआ था। हमने कहा, यह क्या मामिला दे,
फि कुत्ते को इस समय पाना दिया जा रण, तो कहने लगी
तुम रहने दो। हम हमी से ममम गये। ये गरे एत्ते ने जो
तेजी से रोटी और दूध पाया, तो यह यूफ्ना फिरा और
चाँदनी तमाशा देखार पागलों की भाँति हमी के मारे लोटती
फिरी । हम भी हँसने लगे कि फैमी अजीर बीवी हमे मिली
है । इतने में सीडी गई, और एक रफावी लाई । उसको सोलफर
जय दिसाया, तय हम क्या देखते हैं कि अण्डो का लाजयाय
हलुआहै। फेमर और पेड़े की महक से दिमाम तर हो गया।
पाँटी के वर्क लगे हुये हैं, यादाम और पिस्ता के छोटे-छोटे
टुपडे छिडके हुये है। हमने कहा, यह तो बडे जोर फी चीज
तुमने तैयार की है। हमें बिलकुल रयाल न पाया कि इस
नालायक ने इतने पैसे वरयाद फरके उसको भी पड़ा कर
साला है। फौरन एक कौर डाल ही तो लिया। यह प्लेट
रसकर हंसी के मारे बेदम होकर लोट पोट होकर फमरे में
पलग पर जा पडी। हमने गला फडवा होने से पहले ही मट
थूक दिया, और उसको इम शरारत की सजा के लिए गुदगुदा
फे घेदम कर दिया । तात्पर्य कि दिन रात उसको अब कुनैन के
मजाक सूमते थे। वह कहती थी, कि मेरा फाबू नहीं, जो
बाजार की सभी मिठाइयों में फुनैन मिला दूं। तात्पर्य यह कि
युनैन सिलाने का अभ्यास आज-पल जोरों पर था, किन्तु हम
नहीं जानते थे कि कुनैन का यह सन्त 'प्रभी क्या-क्या रंग
लाने वाला है।
हमने चाँदनी से कहा कि यदि तुमको धास्तर में नैनीताल
।
शरीर बीवी
चलना है, तो कुनैन खिलाने की आदत को कम करो, नहीं तो
तेरा यहाँ जाना बिलकुल स्थगित हो जायगा। इस पर उसने
कहा, यदि कहीं ऐसा हो गया, तो फिर समझ लो कि सारे
घर में कुनैन ही कुनैन दिखाई पडेगी । नैनीताल जाने की
तैयारी उसने बडे जोर से की । सामान यद्यपि थोडा था, किन्तु
फुछ गरम कपडे भी थे । चलते समय हमने देखा, कि एक डिब्बा
पान बनाने की जगह पर पान के दो हिने तैयार हो रहे हैं।
हमें मालूम न था कि एक मे कड़वे पान हैं। नहीं तो हम उस
शरारत को रोक देते । केवल पानी के कारण वास्तव में गाडी
में ऐसी देर हुई, कि हम टिकट तक न सरीद सके और कठि-
नाई से चलती गाडी में सामान इत्यादि जिस तरह हो सका
रखकर एक मरदाने ड्योढे डिब्बे में बैठ गये, जो सयोग से
सामने ही था। इसमें काफी गुञ्जाइश थी, और चाँदनी ने
झट सोलने के लिए कहा। हमने कहा कि यह इन्टर लास है।
इस समय साजी है, किन्तु आगे चलकर कदाचित् भर जाये।
किन्तु उसने कहा, कि नहीं । जय जगह काफी है, तब बेकार
क्यों ज्यादा रुपये खर्च किये जायें। पात यह थी कि यह डिब्बा
बहुत बड़ा था और आदमी केवल तीन ही थे। इसमें अधिक
क्या जगह मिलती। किन्तु हम जानते थे कि आगे चलकर
अवश्य मुसाफिर आयेंगे और आश्चर्य नहीं कि सोने को भी
न मिले । उसने कहा, कि पिछौने ऊपर की लटकी हुई बेच पर
लगा लो, जिससे कि फिर सब झगडा ही जाता रहे। अतः
हमने यही किया। एक पर उसका विस्तर लगाया और उसके
नीचे जो सीट थी, उस पर हम बैठ गये । क्योंकि हमे अभी
अगले स्टेशन पर टिकट खरीदने थे । वीपी को तो हमने ऊपर
चढा दिया और वह आराम से तकिया लगाकर लेट गई।
-
कुनैन का इस्तेमाल
अगले स्टेशन पर मौका न मिला । किन्तु हमने गार्ड से कह
दिया। दूसरे स्टेशन पर हम टिकट लेकर जन लौटे तब क्या
देखते हैं कि एक भारी-भरकम लाला साहय हमारी सीट पर
कब्जा किये पिराजमान हैं। उनका ढेर फा ढेर सामान ऊपर
नीचे सब रक्सा हुआ था। हमने कहा कि हजरत दूसरी जगह
साली होते भी आपने हमारी जगह क्यो लेली? वे कहने
लगे, कि मैं कोने की जगह चाहता था । हमने दूसरी कोने वाली
जगह जताई, तो उन्होंने कहा कि वहाँ पाखाना है। जब हमने
कुछ और बहस की तब वे बोले कि हजरत आपका नाम तो
इस जगह पर लिसा न था और न आपने अपनी जगह रजि-
म्टर कराई थी। जितना हक आपका है, उससे अधिक मुझको
है। हम चुप हो गये।
यद्यपि डिव्या काफी बडा था किन्तु धीरे धीरे मुमाफिरों
की भीड होनी शुरू हो गई। हमने देखा कि हमें नींद आ रही
है । और हमने सोचा, कि यदि मुसाफिरों के आने का यही क्रम
जारी रहा तो हम नीचे आराम से न सोयेंगे। अतहमने उस
ऊपर वाली लटकी हुई बेंच पर बिछौना लगाया, जो चाँदनी की
जगह से बिलकुल मिली हुई थी । वास्तव में बीच में एक
सिडको का अन्तर था। हमे नींद आने ही वाली थी कि नीचे
कुछ राजनैतिक मामलों पर बात-चीत होने लगी। चूंकि हमारा
भी राजनीति में काफी अधिकार है इसलिए हम बहस करने
के लिए नीचे आ गये । हम तो राजनैतिक बातों पर बहस कर
रहे थे, किन्तु हमारी शरारत भरी वीवी अपने नियमानुसार
कुछ और ही कर रही थी। वास्तव में उसको अपने नीचे की
मजिल मे रहने वाले मुसाफिर पर बहुत क्रोध आ रहा था
और वह बदला लेने की चिन्ता में थी। उन हजरत ने एक
७८
।
शरीर वीवी
लिए और हमसे इशारे से कहा, कि नीचे लोगों को घॉट दो।
हमने फिर देखा, और अमरूदों के मालिक साहब को थेरपवर
सोता हुआ पाया। अत: हमने झट उतर कर स्वाभाविक्ता के
साथ सभी लोगों के हाथ में दो दो अमरूद दे दिये, और शेष
सबके बीच मे एक बेंच पर रस दिये कि साइये । उनमें से एक
साहब चाँदनी की यह सभी शरारतें कदाचित् देस रहे थे।
क्योंकि वे कोने में बैठे हुए धीरे-धीरे मुसुकुरा रहे थे। घाँदनी
ने उनको देखा और वह समझ गई । अत उसने उंगली से चुप
रहने के लिए कहा, और वे हँसकर सिर हिलाने लगे कि मैं न
बताऊँगा । हम पहले की भाँति अपनी जगह पर आकर लेट
गये। नीचे लोग बडे आनन्द के साथ अमरूदों की दावत खा
रहे थे, कि स्टेशन अाया, और रेल के भटके से लाला साहब
जाग उठे । वे हजरत, जो उस कोने में बैठे थे और इस शरा
रत से परिचित थे, एक साहब से बोले, कि जनाब लाला साहब
को भी अमरूद खिलाइये । लोगो ने जब उनसे कहा, तब कहने
लगे कि मेरे पाम स्वय इलाहाबाद के अमरूद मौजूद हैं। एक
साहब बोले कि अच्छा होता यदि आप कम से कम अपने
अमरूदों का नमूना ही चसाते । उन्होंने मुसुफुरा कर कहा-
'थडे शोक से टोकरी से निकाल लीजिये ।' एक माहय उठे और
उन्होंने टोकरी में हाथ डालकर उसको माली पाकर कहा, “वाह
जनान आप अच्छा मजाक करते हैं । यहाँ तो पता तक नहीं
है।" यह सुनकर चे तडपकर उठे, और टोकरी को साली
पाकर चाँदनी की ओर देगा जो इस समय अमरूदों की टोकरी
की ओर पैर किये हुये और चादर ओदे हुए मानों सबर सो
रही थी। उनकी इस परेशानी पर काचिन लोग इस मामले
को समझ गये और एक अच्छा फहकहा लगा। बेचारे यह कह
-
घुनैन का इस्तेमाल
पर अपनी जगह पर बैठ गये कि यह मजाक ठीक ना ।
सवेरे हम परेली के स्टेशन पर उतरे। मामान बेटिङ्ग रूम
में रखवाया । नाश्ता किया और घरेली शहर की सून सैर की।
दोपहर को लौटकर याना स्टेशन पर साया । जय पांदनी को
मालूम हुआ कि साने के दाम पूरे सादे मात रुपये पार्ज होंगे,
चाहे हम सय मायें या थोडा, तर उसको पड़ा क्रोध आया।
वास्तव में मयेरे नाश्ता अधिक कर लिया था, और इस समय
कुछ माया न गया। हमने देखा भी नहीं और, जय हम हाथ
धो रहे ये तय उमने पचा हुआ सय साना कुनैन से सराव कर
दिया। केवल इतना ही नहीं किया, बल्कि हम तो साने की
फीमत चुकाने में लगे, और उसने अवसर पाकर बाहर के
बरामदे में अँगीठी पर चाय की जो बडी केतली रक्खी थी,
उमको भी सरान कर दिया। हम दोनों शीघ्र फिर शहर चल
दिये । दो चार मेजें और कुर्मियाँ खरीद कर घर भिजवाई
और फिर विभिन्न स्थानों को मैर करने चले गये। चिराग
जलने के बाद बड़ी देर मे स्टेशन पर लौट कर आये और हमें
यहाँ श्रार मालुम हुआ कि होटल के नौकरों ने खाना खा
कर सूप थूका, और इसके अतिरिक्त कई मुसाफिरों को कडवी
चाय पिलाने के कारण यह स्मिा तूल पकड गया।
यहाँ तक
कि एक अँगरेज ने होटल के चेहरे को मारते मारते छोडा। हम
चुप थे और हमने गिड कर चाँदनी से कहा, कि मालूम होता
है कि तेरी निलकुल शामत आगई है, और तू स्वय मार सायेगी
और कदाचित् हमे भी पकड़ावेगी। वह भी केवल अपने जुल्म
के बदौलत किन स्वय साये और न किसी को साने दे।
पासिर इससे क्या लाभ ? "हमारे इस लेक्चर का प्रभाव
उटा पड़ा और वह कहने लगी कि तुम्हारी बला से । हम
८२ . शरीर बीवी गया था, और हमने चाय की प्याली पीने के लिये उठाई, कि उसको फिर हँसी पाई, जिसको उमने यूकने के बहाने से टालना चाहा । वह अँगेठी में थूकने के लिये उठी और उधर हमने अवसर पाकर, बचान की दृष्टि से, इस सफाई मे चाय की प्याली बदल ली, कि उसको सन्देह तक न हुआ। हम इस चाय से इस तरह सेल रहे थे कि जैसे उसके ठडे होने फी प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि उसने अपने आगे की चाय की प्याली उठाई जो हमारे लिये कुनैन के द्वारा जहर के समान बना कर रक्सी गई थी और पहले ही पूंट मे बस उसको मजा मिल गया। चाय गरम न थी, और चूँकि उसको मन्देह भी न था, अच एक घड़ा घूट उसने ऐसा पी लिया कि गले के पार हो गया। क्या बतायें कि हमने कैसे अर-झुककर मलाम किय और कैसा मजा आया । उसका भी इसी के मारे वह बुरा हाल था कि थूकना मुश्किल हो गया। - ४ , इसके बाद हम प्लेट-फार्म पर पाये, और थोडी देर मे काट गोदाम वाली गाडी आ गई। हमने अपना सामान एक दूसरे दर्जे के एक डिब्बे में लगवाया, जो बिलकुल साली था । हम उस पान वाले का तमाशा देखने के लिये गये, जिमके क्त्थे और चून को चाँदनी ने क्डया" कर दिया था। हमें अधिक योजने परेशानी न उठानी पड़ी, क्योंकि बहुत शीघ्र। हमने देसा दि एक पान वाले से कुछ लोग लड रहे हैं। दूसरे लोग झगड सुनकर और आ गये और इनमें से कुछ और ऐसे थे जो कहर थे, कि हमारा पैसा वापस कर । क्योंकि तूने हमारा पान कड व कर दिया। हम तो बस मनोरजक भताडे को देखकर अपन यीची की शरारत से आनन्द पूर्ण हो रहे थ, और उधर हमारी
कुनैन का इस्तेमाल
जन्म-जात नेक बीवी कुछ और ही कर रही थी। एक सालन
रोटीवाला मुमलमान हमसे तकाजा कर चुका था, कि हम उसके
गन्दे सौदे मे से कुछ खरादें। हालॉ कि चॉदनी ने कई बार
उसको टाल दिया, किन्तु वह न माना और विवश होकर उसने
उससे कहा, कि अच्छा एक प्याले मे थोडा सा निकाल कर
हमारे सामने नमूने के तौर पर रक्सो। हमारी सीधी-सादी
वेगम साहिया ने नमूना सिडकी से भीतर लेकर निजली की
रोशनी मे देसा, और ना पसन्द करके लौटा दिया। उस बेचारे
को क्या मालूम थी कि कारगुजारी की गई है । उसने झट अपने
बडे बरतन में फिर डाल लिया। हम पानवाले का तमाशा देस
कर लौट रहे थे कि एक ड्याढे दर्जे के मुसाफिर से और उस
वावरची से झगडा होते हुये देखा । हमने देखा कि गजब हो
गया। हम जब अपने डिब्बे में लौट कर आये, तब देसा कि
किसी दूसरे साहन का सामान रक्या है और बेंच पर चाय के
लम्बे बरतन में कुछ मक्सन टोस्ट और चाय रक्सी है। हमने
धीरे से नीची से कहा, "अरे तू यह क्या जुल्म ढा रही है ।"
वह इस समय पूरी परदा नशीन बीवी बनी हुई थी और बुरका
ओढे बैठी हुई थी। उसने यह इस गरज से किया था, कि यदि
कोई भला मानुस हो तो उसको देखकर कदाचित न आये।
किन्तु एक साहव फिर भी आ गये । वे डिब्बे के याहर खडे हो
कर कुछ झिझके । पहले तो कहा कि यह जनाना डिब्ना नहीं है ।
इस पर चॉदनी बोली, कि 'जनाय । जनाना डिब्बा है।' उन्होंने
कहा कि "आप मेहरवानी के जनाने डिब्बे में चली जायँ ।"
चूंकि उसने इनकार किया, अत उनके नौकर ने उनका सामान
इत्यादि रस दिया। वह चाय मॅगवाकर किसी दूसरी जगह
बातें करने मे लगे थे। उनकी गैरमौजूदगी में, यह कहना ध्यर्य
।
1
।
शरीर बीवी
है, कि उनकी चाय के साथ चाँदनी ने क्या कार्रवाई की। इसी
पर सन्तोप न किया, बल्कि उनके लोटे मे, जो साली था,
काफी मात्रा दाल दी और फिराजुल्म यह ढाया कि उनकी बर्फ
रसने की बोतल में भी कुनैन डाल चुकी थी, जो कि हमे बाद
मे मालूम हुआ । इतने मे वे हजरत आये । बहुत ही सज्जन
थे। हमसे दो-एक घातें हुई, और हमें चाय पर बुलाने लगे।
केतीलो मे मे चाय उँडेलते हुये उन्होंने हमसे कहा, कि साहय
यहाँ स्टेशन पर आज विचित्र ही मामिला है हमने पूछा
"यह क्या ?" तो उन्होंने कहा, कि एक पानवाले से बहुत
आदमी झगडा कर रहे हैं। हमने कहा, "क्यों ?" तो वे हर
कर बोले कि साहव बडा मजा अाया।
"क्या मजा अाया " हमने पूछा।
"श्रजी जनान, तमाम लोगों के मुँह उस पानवाले ने कडु
कर दिये ।" उन्होंने अधिक हंसते हुये कहा और अब उस
सब लोग लड रहे हैं। फिर इसके अतिरिक्त सालन रोटी का
को भी दो-तीन आदमी घसीट रहे हैं, कि सब सामान कड़
है। यही नहीं, बल्कि सारा बरेली कडवा हो रहा है, कहक
लगाकर चाय मे शक्कर मिलाते हुये उन्होंने कहा।
"क्या और भी कोई किस्मा हुअा " हमने बनकर पूछ
अजी तमाम मुसलमानों के पीने का पानी कडवा हो रहा ।
और वह मजा आ रहा है कि हँसते-हँसते लोट
सा थू'
चोय की प्याली का घूट उन्होंने क्या लिया, कि गले में ।
कठोर फन्टा पडा कि थूक रहे थे। हमने कहा, 'हजरत र
क्या हुआ ?" थे वे बड़ी अच्छी तनियत के, बेतरह हँसे मैं
दोहरे हो हो गये और कहते गये, कि माहब " मालूम होता
-
"
कुनेन का इस्तेमाल
रिमी कानिल ने चाय वाले पर भी हमला कर दिया। यह
देखिये मारी चाय कडवी है । यह कहकर नौकर को बुलाया
कि चाय नाले को बुलाओ। उसने आश्चर्य में आकर कहा,
साहब क्या बतायें कि आज दोपहर से न जाने क्या हो रहा है
कि फई मुसाफिरों ने मारते-मारते छोड़ा। यह घेचारा चाय
लौटाल ले गया। इतने में नौकर उनका पाली लोटा भरकर
लाया और उन्होंने कुल्ली जन की तब और भी थूकने लगे।
कहने लगे कि यह क्या मुमीपत आई ? मालूम हुआ कि नौकर
नल से पानी लाया था। माराश, कि विचित्र परेशानी में थे ।
बाहर निकले तो मालूम हुआ, कि रेलवे पुलिस इन्सपेक्टर
इसकी जॉच कर रहा है। हम सन्नाटे में आ गये और हमने
घवडाकर पीनरी के फान में कहा, कि लो आज तू गिरफ्तार
की जायगी। चाँदनी ऐसी बातों इत्यादि से कभी न डरती थी,
किन्तु इस समय सचमुच वह चुप हो गई। हम दोनों फिर
श्राकर बैठ गये और ये हजरत, जो वास्तव में कौमिल के
मेम्बर थे, इम कडुचे मजा पर खूब हँस रहे थे। इतने
में उनके एक दोस्त आये और वे भी बैठ गये । उनके
माथ पानी की बहुत सी बोतलें थीं। उनके दोस्त ने एक
बोतल उठाई और उसको गिलास में खोलकर बर्फ की
बोतल में डालकर फिर गिलास मे लेकर के जय पिया, तब
क्या बतायें, वह किस प्रकार कूदे १ गिलास छोडकर कूद रहे
ये। उनके दोस्त का और हमारा हंसी के मारे बुरा हाल हो
गया । अन ये हजरत विचित्र चकर में थे। कहने लगे कि ये
बोतलें और वर्फ तो शहर की हैं। इसमें कहाँ से षड्यापन
ममा गई ? हमारी बीवी गरीर और बेचारी बनी हुई बुरका
'प्रोढे अपने बिस्तर पर बैठी हुई थी जैसे उसको इससे कुछ
शरीर बीवी
मतलय ही नहीं है। हमने उससे पान की डिबिया माँगी, उसने
हैंड-थेग में बताई। हमने उममें से डिविया निकाली और इन
दोनों के सामने पान किये । वे हजरत हंसकर कहने लगे, कि
"जनाव कहीं इन पानों में भी तो मुमीवत्त नहीं है।" हमने कहा
कि माहब यह तो हमारे घर के हैं। उन्होंने एक पान लिया
और एक उनके दोस्त ने लिया । वास्तव में हमें मालूम भी न
था, कि एक डिबिया कडवे पानों की है और हमने भी एक
पान मुंह में रख लिया । शीघ्र ही सबको थूकने पडे और उन
हजरत का तो हमी के मारे बुरा हाल था और कहते थे कि
यह आखिर मुसीवत क्या है कि चाँदनी ने बात धना दी ओर
कहा कि मालम होता है, कि आपने स्टेशन वाले पान साये।
दुमरी डिरिया से लीजिये । हमने कुल्ली की और दुसरे पान
साये, कडवे फेंक दिये।
५
हम खुदा खुदा करके नैनीताल पहुंचे और बीच में कोई
वर्णन करने योग्य नात सामने न श्राई । हमारे साथ मफर
करने वाले हजरत रह-रहकर रात में मामिलों पर विचार कर
रहे थे और आश्चर्य के साथ हम भी रहे थे। क्योंकि उनके
दूमरे दोस्त, जो कौंसिल की धैठक में सम्मिलित होने के
लिये आये थे, कुनैन का स्वाद या तो स्वय बरेली में ले चुके
थे और या उनका तमाशा देख चुके थे। हर आदमी आश्चर्य
प्रकट करता था कि श्रासिर यह किस तरह 'सम्भव है कि
शहर से बोतल में बर्फ आये और वह क्डुवी हो जाये।
हो गई, कि नल की टोंटी से कडवा पानी निकले । तात्पर्य हम
उनसे विदा हुये।
हमने एक पूरा मोटर किराये पर लिया और उममें पीवी
१
-
7
मुहम्मद युसुफ से, कौन ऐसा भला आदमी होगा, जोनीलाल
इन हजरत से काफी जान पहचान हो गई। क्योंकि हम अवश्य
कौन्सिल की बैठक देसने आते थे। चाँदनी को शयरत
कुनैन का इस्तेमाल
को बैठाया और नैनीताल की चढाई शुरू हुई। हमने बीपी
को सचेत कर दिया कि यदि भविष्य मे तू शरारत करेगी, तो
निश्चय पुलिस मे दी जायगी, किन्तु वह तो रात की घटनाओं
के ऊपर हमी के मारे बेकाबू थी। इस तरह उस चढाई को
हमने बडे आनन्द के माथ ममाप्त किया।
नैनीताल पहुंच कर हमने हिमालय होटल मे डेग डाला।
दूसरे ही दिन मे सागरण ढङ्ग पर चाँदनी ने फिर कुनैन का
प्रयोग जारी कर दिया। असम्भव था, कि चाय आये और
शार को छोडकर वह दूध इत्यादि को काया न कर दे ।
प्रति दिन का नियम था, मीलों हम पैदल चलते थे और
दिन भर सैर सपाटे में कटता। न जाने कब के ओर कहाँ के
दोस्तो से भेट हुई। और हम और हमारी यीवी जगह जगह
दायते साते थे। कौन्सिल की बैठा देखने गये। यहाँ हमारे
साथ सफर करने वाले दोस्त से भेंट हुई। हमने उनसे अपनी
चीनी का कायदे के साथ परिचय कराया। ये भी विचित्र
रिल्लगीनाज और मनोरखक आदमी थे। आनरेवुल नवाब
जाये, और किसी न किसी प्रकार परिचय न प्राप्त करे, या
न्नके चौड़े और बनावटपूर्ण दस्तरग्वान पर मिना बुलाये हुये
तरह-तरह के अंगरेजी और हिन्दुस्तानी माने न सा आये। ये
हजरत भी उन्हीं के यहाँ ठहरे हुय थे। इनको घरेली की घटना
इस प्रकार याद थी कि फिर चर्चा करके हँसने लगे, और कहने
लगे, कि माई, वहाँ बहुत ही आनन्द रहा । किन्तु यह न मालूम
हुआ कि आखिर किसकी शरारत थी। दो लीन हानिन मे
शरीर बीवी
किये हुये काफी दिन हो गये थे। अत उसने फिर एक ऐसी
शरारत कर डाली कि हम बहुत घबड़ा गये। कौन्सिल के
रिफ्रेशमेन्ट रूम में वैसे तो कई वार गये बल्कि प्रतिदिन जाने
का मौका मिलता था, किन्तु एक दिन हमारी फरिश्ते की आदत
वाली बेगम साहिवा को वहाँ भी अवसर मिल गया, और न
मालूम किस प्रकार चाय, शक्कर और दूध को इस तरह कडवा
किया कि हमको भी पता न चला। पता तो हमें तव चला,
जब कौंसिल के इन्टरवेल में वही हजरत हंसते हुये हमारे पास
दौडे श्राये, और कहने लगे, कि भाई होशियार हो जाओ
घरेली वाला आ गया। हमने कहा, क्या मामिला है, तो वे हमें
और चाँदनी को कौन्सिल के रिफ्रेशमेण्ट रूम में ले गये, जहाँ
कुछ थोडे से आनरेखुल सदस्यगण मुह की कडवाहट दूर
करने के लिए कुल्लियों कर रहे थे। हमने चॉदनी से धीरे से
कान में कहा कि श्रव निश्चय तेरी शामत आ गई। अच्छा है
कि यहाँ से भाग चल, अत हम शीघ्र लौट आये।
जिस दिन हम जाने वाले थे, उसके एक दिन पहले कौन्सिल
के ये मेम्बर साहब हमें झील के किनारे मिले और हमने उनकी
बार थार चर्चा की, और उनकी तबीयत से खुश होकर यह
उचित समझा कि उनसे इस कडवाहट का भेद बता दें। अत:
हमने उनसे ? चाँदनी की शरारत के लिये क्षमा माँगी, तो हक्का
वफा होकर सडे रह गये और पूरी कहानी सुनकर कहने लगे,
कि श्रव हम तुम्हें दो तीन दिन न जाने देंगे। उन्होंने दो तीन
दिन अपने दोस्तों को जो या तो स्वय बरेली के स्टेशन पर
कुनैन के शिकार हुये थे, या दूमरों का देख चुके थे
चाँदनी से मिलाया, जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारी
धीवी इस आनन्द करने की जगह से लोगों की आँखों से
-
रह गये।।
६
मँगाया करते थे।
फ्लेबा काँपने लगा। घराफर चॉदनी से कहने लगी-"वहन
युनैन का इस्तेमाल
28
बचने के लिए हमे लेकर एमे अदृश्य हुई कि लोग सोजते ही
वापमी में प्रभाग्य से पहिये या मौभाग्य से, हमारे एक
दोस्त का माथ हो गया। उसकी जीजी पर्दे की बहुत ज्यादा
पारन्द थी और ये उनको तीमरे दर्जे में सफर कराते थे, और
स्वय सेकण्ड काम में मफर करते थे। प्रोर मजा यह कि बीवी
पास तक न माँक्ते थे। नौकर या नौकरानी के द्वारा सवर
हमने भी चॉदनी को तीसरे दर्जे मे ठूमा ओर कहा-
'ले, अब अपनी हैसियत के मुतारिक सफर कर और धर्म
श्रोढकर भली औरतों की तरह मुँह लपेट कर बैठ ।” उसे
मजबूरन पैठना पड़ा। हमारे दोस्त की बीवी बहुत शर्मीली,
सामोश और सीधी साग थी। हालाकि वे उम्र में चॉदनी के
अपनर ही थीं, मगर वेचारी को दुनिया का तजरुना बिल्कुल
नया। हमारा उनका परेली तक साथ हुआ । काठगोदाम से
सुबह की गाडी में रवाना हुए। हम कभी बीवी से मुलाकात
कर आते थे, मगर हमारे साथी साहब दूर ही से सडे होकर
मिर्फ इतना देस लेते थे कि उनकी बीपी सिडकी का पट बन्द
एक स्टेशन पर जनाने डिच्चे के पास से कोई गुडा निग्ला
और उसने हमार दोस्त की बीवी को, जो उस वक्त खिडकी
पाम से गुजरते हुए कहा, "कहाँ
जा रही हो ?' वह बेचारी धक से रह गई। मार डर के उनका
खुदा के लिए खिड़कियों चढा लो, कोई बदमाश मुझसे ऐसा
स्यि है या सोले।
पोले बैठी थी, देखा,
गये। १० शरीर बीवी कहकर चला गया।" हमारी तेज तर्रार बीवी ने हँसकर कहा-"आपने यता क्यों न दिया कि वरेली जा रही हूँ।" वह वेचारी हमने लगी, और कहने लगी-"मेरे मुँह से तो आवाज ही नहीं निकल सकती, मैं बहुत घराती हूँ।" ये बातें हो ही रही थी कि वह फिर खिड़की के सामने से गुजरा और उसने फिर वही कहा । दोस्त की बीवी घबराकर एकदम से बिडकी चढाने लगी। इतने में वह चलते-चलते चोला-"यह गजव तो न करो।" इस पर वेचारी के हाथ पैर फूल खिडकी हाथ से छट पड़ी और वेदम होकर कोने मे मुह छिपा कर बैठ गई । चाँदनी हस रही थी और वह चाँदनी से कह, रही थीं कि इसी मारे तो तिडकी के पास औरतों का बैठना ठीक नहीं होता। दरअस्ल उसकी हालत काबिले रहम थी। चाँदनी दौड कर सिडकी के पाम आई, मगर वह गुडा हम जो अगले स्टेशन पर आये, तो उसने यह घटना सुनाई और दूर के उम शख्म को दिसाकर कहा "मालूम होता है कि आज उसकी शामत आई है।" हमने दे, एक मामूली लफगा-सा आदमी था । मैला पायजामा, टर्की टोपी और काली अचकन पहने था । वहाँ गाडी देर तक ठहरती थी। हम थोडी देर बाद ही चले आये । हमने अपने दोस्त से कहा, तो वे बेचारे कहने लगे-"क्या बतायें, बम, इसी मारे तो औरतों का सफर करना ठीक नहीं होता।" हमने फहा-"जनाब, आपने पर्दे की हद करके ही यह हाल कर दिया है, अगर आप अपने साथ निठायें, तो क्या हर्ज हो ?" मगर यह सब बेकार या क्योंकि हमारे उनके ख्यालात में जमीन आसमान का - जा चुका था। फर्क था।
ले लिया था। उसने आन देसा न तय, छाता लेकर गाड़ी से
कोई बेहती घात कही। चॉदनी मारे गुस्से के काँपने लगी।
उसकी आँखों से आंसू निक्ल पडे। नैनीताल में हमने उसे
कुनैन का इस्तेमाल
चॉदनी पर नटसटपन का भूत सवार हो गया। उसने
बहले तो हमारे दोस्त की बीवी की बुजदिली पर सफा होकर
बाजा के तौर पर उसे एक क्डुश्रा पान खिलाया। इसके बाद
हमने देखा कि वही हजरत पा रहे हैं। वह सिडकी की तरफ
मुह सोले बैठी थी, पान की डिबिया उसके हाथ मे थी । जैसे
ही वह पास आया, वैसे ही इसने डिविया सोली। गुण्डा
गुसकुराकर बोला "अकेले ही-अकेले ?" चॉदनी ने फौरन
एक पान उसे दे दिया, जिसे उसने फौरन ले लिया। थोडी
देर बाद हमने देगा कि वह हजरत नल पर सडे थूक थूक्कर
अपनी चोच साफ कर रहे हैं, क्योंकि सारा मुह कडुश्रा हो
वह इजरत जले भुने फिर लौटकर आये और पान की
कुडुवाहट के बारे मे चाँदनी से कोई बेहृदा शब्द कहा। उसने
डाँटकर कहा-"शरीफों की सी बातें करो। उसे बेहद गुस्सा
श्रा रहा था। हमारे दोस्त की बीवी का यह बात देखकर जो
हाल हुआ, यह धयान से बाहर है। प्राज चाँदनी ने उसे पान
लिया, तो वह कहने लगी-"अगर तुम्हारे मियाँ देस लेते, तो
क्या होता
चाँदनी ने कहा-"कुछ नहीं। इसमें क्या हर्ज है ?" वे
कहने लगीं-"खुदा के लिए रहने दीजिये, वरना बदमाश
इतने में वह फिर आया और उसने पहले से भी ज्यादा
रहा था।
और भी पीछे पड जायगा।"
मीप के हैंडिल
का एक बाढिया सा छाता साढे सात रुपये में
शरीर बीवी
उतरी ओर पीछे से उस गुन्डे के सिर पर एक हाथ जोर मे
माय। उसने जो मुड़कर देगा, तो एक डॉट बताफर जो बाते
मारने शुरू किये, तो एक गुल मच गया। लोगों ने सममा,
इम शख्स ने न जाने क्या बदमाशी की होगी। चारों तरफ
हुल्लड सा मच गया। पास में एक अँगरेज मुसाफिर खड़ा था
उसने उसे पकड लिया। चाँदनी अपनी गाड़ी में चली गई
और वह गुन्डा पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। हम चाँदनी
के पास आये, जो इम जग के बाद गुस्से से कॉप रही थी।
उसके ओठ सूस रहे थे हमारे दोस्त की बीवी कोने में सहमी
बैठी थी। हमने चाँदनी की पीठ ठोंकी और कहा-"शानाश,
खूब किया।"
।
बरेली स्टेशन पर हमारे दोन हमारी बहादुर बीवी की
तारीफ मगर ऐतराज के साथ करते हुए विदा हुए । इतने
में एक पुलिस सब इन्स्पेक्टर साहब आये और उन्होंने हमारा
पता वगैरह लिसा । वे कहने लगे-अगर आप को ऐतराज न
हो, आप की बीवी का नाम भी गवाही में लिस लू, क्योंकि
उस बदमाश के पास कोकेन भी बरामद हुई है ?"
थोड़े ही दिन बाट चाँदनी के नाम परेली के रेलवे मजि
स्ट्रेट की अदालत से समन पाया कि फलॉ तारीख को आकर
मुलजिम को शिनाख्त करो और गवाही दो। चाँदनी इम
अदालत की पेशी से चकराई। वह कहने लगी- मैं तो
जाऊँगी।"
हमने कहा-
"क्या तेरी शामत आई है? अगर ममन से
न जायगी, तो वारन्ट कट जायगा और पुलिस पकडकर तुझे
-
नदिन और तारीस जो पूछी, तो मालूम हुया कि जिस रोज बरेली स्टेशन पर तमाम चीजें कडुत्री हुई थी, वही दिन रेली स्टेशन पर चाँदनी की उपस्थिति का था। उस मामले की चीनों की डाक्टरी परीक्षा भी हो चुकी थी। परीक्षक ने बताया था कि सारी चीजें कुनैन से कडुवी की गई थीं 1 हर जगह तहकीकात से सानित हो चुका था कि कोई औरत थी। पान- - पाल ने कहा था कि मैंने एक औरत के हाथ पान बेचे थे। यही कुनेन का इस्तेमाल ले जायगी। फिर मुलजिम के वकील तुमसे जिरह करके तेरी मारी शरारतों की इकट्ठी कसर निकाल लेंगे।" समन तो लेना पड़ा, मगर चॉदनी सस्त परेशान थी। अगर हम चाहते, तो उस झगडे से निकाल सकते थे, मगर हमने सोचा कि कुछ तजरुगा होना अच्छा ही है, इसलिए हमने उससे कहा-धवरात्रो नहीं, हम तुम्हारे माथ चलेंगे।" रेलवे मजिस्ट्रेट एक डिप्टी कलेक्टर थे। जब हम खुद अपनी बीवी को लेकर हाजिर हुए तो उन्होंने अपने करीन कुर्सी नी। मुलजिम की शिनास्त हुई । जब मजिस्ट्रेट चाँदनी के बयान लेने लगे, तो हमने चुपके से उसके कान में कहा- "मील तुमसे जिरह करेगा। अगर कहीं तूने जरा भी झूठ कहा, तो समझ ले कि तुम पर झूठी गवाही (दरोगहल्फी ) का मुकदमा चल जायगा और तुझे जेल की हवा खानी पडेगी।" यह सुनकर वह और भी बौखला गई। जब उससे मुलजिम के वकील ने जिरह की, तो वह और भी घबराई । उमे मजबूरन कबूल करना पड़ा कि उसने सजा के तौर पर मुलजिम को कुनैन डालकर बडुवा पान दिया था। इत्तिफाक से वरैली की घटना अभी ताजी ही थी। मैजिस्ट्रेट तहकीकात पुलिस पहले ही कर चुकी थी। तमाम बडुवी . शरीर वीवी वात रोटीवाले ने कही थी। होटल वाले का बयान भी मौजून था। मजिस्ट्रेट ने इन सब बातों को मिलाकर देखा, तो मामला और ही नजर आया। इसके अलावा तहकीकात में लोगों ने जो बयान दिये थे, उनमें भी चॉटनी की हुलिया दर्ज थी। मैजिस्ट्रेट वेचारे बडे नेक आदमी थे। उन्होंने कुछ हमारा लिहाज किया और कुछ हमारी बीवी का जो इस वक्त बेतरह घयरा रही थी। उन्होंने एक तरफ तो वकील को बहुत से ऐसे सवाल करने से रोका, जिनका जवाब देने से पहले ही शायद चाँदनी रो पडती और दूसरी तरफ इस कडवाहट की बात को अप्रासगिक कहकर बन्द कर दिया। अदालत से छुट्टी मिली, तो उसकी जान मे जान आई, लेकिन, डवल फर्स्ट क्लास के किराय का परवाना जो उसके हाथ आया तो फिर वही हालत हो गई। हमने कहा-"क्यों, इस परवाने को आधे दाम पर हमारे हाथ बेचोगी ?" "जी, मुँह यो श्राइये,"-चाँदनी चोली-"उन्हीं आधे दामों से कुनैन बरीदी जायगा।" अदालत में जो परेशानियाँ नजर आई थीं, वह मब दूर हो गई। हमने कहा-"तू न मालूम किम भूल मे है। ताज्जुन नहीं की अभी तेरी पेशी मुलजिम के तौर पर कुनैन वाले वह यह भी जानती थी कि मैजिस्ट्रेट पोर मर इन्सपेक्टर रेलवे पुलिस कुनैनवाले मामले की खुद तहकीकात कर चुक थे, और दोनों यह जान गये थ कि तमाम चीजें उसी ने पडुवी की थीं। इसलिये वह मेरी बात सुकर कुछ घबरा गई । शाम को हम मजिस्ट्रेट के गले पर अपना मुलाम बीवी को लेकर गय और उनके सामने उसकी तरफ से हमने उमका जुर्म क्यूल किया। । . . मुकदमे में है।"
पफडी जाती।
पर लेटे हुये हुका गुडगुडा रहे थे। उनकी रूपवती श्रीमतीजी
• भी समीप ही बैठी थीं। में शीघ्र ही 'अर' कहकर लौदा, और
घे महाशय गरज पर और हुक्के की ने संभाल 'लेना-लेना
बदमाश को पकडना' कहकर फॉद पडे । मेरी शामत जो आई,
तो मैं घोसलाकर सीधा भागा और वे महाशय नगे पैर हुक्के
का मोड पर मैं शीघ्र ही सका कि कहीं लोग बदमाश समझकर
मुफ पफड न ले। श्राते ही उन महाशय ने मेर ऊपर दो तीन
हुस्के को नै लगाई । 'सुनिये तो' 'सुनिये तो मेरे मुंह से निकल
रहा था और वे मेरे ऊपर बरस रहे थे कि इतने मे कई व्यक्ति
हिन्दुस्तानी परदा
उन्होंने श्राश्चर्य और दिलचस्पी से सारा किस्मा सुना
और
अन्त में इतमीनान दिलाया कि कुनैन वाला मुकदमा दाखिल
दफ्तर कर दिया जायगा । चाँदनी का कुनैन का इस्तेमाल इतना
बढ गया था कि अगर कुछ दिन बाद इस शरारत से कुछ
उसका जी न भर गया होता, तो वह जरूर ही पुलिस में
छठवॉ परिच्छेद
हिन्दुस्तानी परदा
मैं द्वार पर पहुंचा और ड्योढी में प्रवेश किया, पर भीतर
जैसे ही पैर रमाक चौंक पड एक जेन्टिलमैन श्राराम कुर्सी
।
का नै हाथ में थामे मेरे पाछे लेना लेना' कहते दौडे। गली
बीच में पड़ गये।
शरीर वीवी "बदमाश | पानी लुच्चा दिन दहाडे कॉपते हुरे वोले। J + 11 "जरा सुनिये तो, सुनिये तो"-मैंने कहा। "ठहर जाइये। तनिक शान्ति से काम लीजिये । क्य मामला है ?-एक बडे मियों ने कहा। विनयपूर्वक मैंने कहा-“दुर्भाग्य से मैं वज्ञाय वरावर वार मकान के इनके मकान में चला गया और इसके लिए मैं बह ही लज्जित हूँ।" इम पर वे महाशय बोले-"अवे बेईमान । बदमाश झू है। जान बूझकर "नहीं साहब, ऐसा हो ही जाता है। आने दीजिये । --- मियाँ वोले। 'जाने दीजिये । मैं तो पुलिस में दे देता।"-महाशय न - te- कहा। ३ - . - अस्तु, लोगो ने मामला रफै टर्फ किया । पिटा पिटा लज्जित सडा था और फिर असली जगह जाने का विच स्थगित करके, गरदन नीचे किये, लौट आया । दिया जल चु थे, कि घर पहुंचा। [१] "आज प्रात काल न मालूम किस मनहूस का मुह देर था। कहीं तू तो सम्मुस नहीं आ गई थी ?-मैने चाँद (अपनी पत्नी) से कहा। चाँदनी ने कहा-"क्या हुआ था ? मैंने कहा था न रात को तकिये के पास बैठकर दर्पण न देयो । अशुभ हो है। तुम भूल गये और वह वहीं रखा रह गया, और प्रात को कदाचित् तुमने देख लिया।" 1 दिया था। प्रत्येक प्रकार से पूर्ण जैटिलमैन-'उफ्फ श्रोह' करके कुर्मी पर घेठ गये और मेरी ओर देखने लगे। यह वही महाशय थे जिन्होने हुक्के की ने से मेरी मरम्मत की थी। अपनी श्रीमती मेरी ओर देसकर बोले-"जनाब, कहाँ तशरीफ ले जायेंगे" कर जो उन्होंने वार्तालाप का तांता पूरा, तो दुनिया भर की यात पूछकर फिर वही पुरानी बातें प्रारम्भ की, याना की हिन्दुस्तानी परदा चाँदनी की बात सुनकर मुझे हमी आ गई, क्योकि वास्तव मे मैंने रात को दुर्भाग्य से दर्पण देखकर वहीं रखा रहने चॉदनी ने विस्तृत समाचार पूछा, तो मैंने बताया कि किस प्रकार में श्राज एक स्थान मे धोके से परदा-नशीन स्त्री के घर में घुस गया और फिर किस प्रकार पीटा गया। यात पाई गई हो गई। यह घटना लसनऊ की थी ओर उसके चार दिन उपरान्त हम वहाँ से लद गये । वेटिंग-रूम मे श्राराम कुर्मी पर लेटा हुआ में रहा था कि तनिक वाहर निकला । देखा तो एक धन्द गाडी आकर रुकी। लोगों ने परदे के लिए चादर तानी और कोई वेगम साहिता जनाना चेटिंग- मैं लौट आया और नियमानुसार समाचारपत्र पढने लगा । सटपट की जो अावाज आई, तो मैंने असनार हटाकर देखा । एक साहन-- जी को जनाना रूम में उतार आ रहे थे। "खुदा की पनाह कहकर समाचार पढ़ अपनी टोपी उत्तारी और है कि मैं आगरे जाऊँगा। मैंने ध्यान से देखा और बहुत प्रसन्न हुआ कि चलो अच्छा है। उन्होंने मुझे पहचाना नहीं और तब उनको बताया "अच्चा, आप भी आगरे तशरीफ ले जा रहे हैं। कह शरीर बीवी कठिनाई और स्त्रियों के साथ इत्यादि विषयों पर कहते-कहते बोले- क्या बताऊँ साहन, मैं तो परेशान हो जाता हूँ। यात्रा मे स्त्रियों का साथ वास्तव में एक विपत्ति है। चार घन्टे तो स्त्रियों को सवार कराने में गये।" मैं-"वह केसे " उन्होंने कहा-"अजी साहब नियो के विषय में और फिर ससुराल का मामला और तिस पर मेहमान | भीतर न जा सकता था, क्योकि अन्य रिश्तेदार त्रियाँ थीं । वाहर से कहलवाता था कुछ और भीतर से उत्तर आता था कुछ। खुदा-खुदा करके सामान बँधा । फिर भी कुछ चीजें जो बाहर रहनी थी, अन्दर बध गई और कुछ चीजें जो अन्दर बधनी थीं, वे बाहर रह गई । ड्योढी पर जब धन्दों शोरगुल मचाया गया, तर जाकर मवार होने की नौनत थाई। यात्रा में त्रियों का साथ होना वास्तव में एक विपत्ति है बवाल जान हैं। सामान को देसे या इन्हे ?" अतिम वाक्य असगर माहव ने कुछ परेशान होकर कहा, क्योंकि वे वास्तव में कुछ चौखलाये हुये से थे मनभेद प्रकट करते हुए मैंने कहा-"शायद, पर इसका कारण क्या है कि यात्रा में स्त्रियाँ बगल जान होती हैं। आखिर वे श्राराम और चैन का कारण क्यों न हों, जिससे मार्ग की परेशानी दूर हो ?" असगर माहन-"तोत्रा कीजिए। लाहौल मिलाकूनत । परेशानी दूर हो! यह फहिये, दुगुनी होती है।" मैं (मुमकराफर)-"मालूम होता है, आपके साथ बहुत- मी खियाँ है? ।
मैं मोटर साइकिल और साइकिल दोनो को सवारी गाड़ी से
हिन्दुस्तानी परदा
अमगर-"बहुत सी तो नहीं, केवल मेरे घर में मेरे
साथ हैं।
मेने अत्यन्त सादगी से पूछा- घर में से कौन साथ है।"
असगर-"स्वय मेरे ही घर में हैं।''
"कौन ? ~ मैंने फिर हँसकर नटसटपन से पूछा ।
"खुद घर ही में से हैं।"-असगर साहब ने फिर वही
उत्तर दिया।
मैं-"क्या खूब ! आपने तो कमाल ही कर दिया । श्राग्निर
घर में से कौन हैं ? मॉ, बीवी, बहन, नौकरानी । आखिर कोन
हैं ? कदाचित आपकी श्रीमती जी होगी।"
कुछ मेंपकर असगर साहब ने कहा-"जी हॉ, और आप
- की सवारिया"
मैं-"मैंने तो उन्हें कल ही बुक करा दिया।"
असगर साहब आश्चर्य मुद्रा से बुझे देखने लगे। अभी
की मुलाकात और गम्भीर वार्तालाप | वे इस प्रकार देख रहे
थ, मानों उन्हें कुछ बुरा मालम हुआ और फिर बोले-"आप
ता मजाक करते ।
मैंने गम्भीरता से कहा-"मेरी समझ मे मुझको आप से
हुँमी करने का अधिकार इतनी जल्दी प्राप्त नहीं हो सकता।
मजाक नहीं करता, वरन् ठीक बात कहता हूँ और मुझे
थाश्चर्य है कि आपको मेरे कथन की सत्यता में क्यों सन्देह
हो रहा है। यह देखिये, रसीद भी मौजूद है। मैंने अपनी
दोनों सवारियों को बुक करा दिया है ।
यह कहकर मैंने रसीद असगर को दी, क्योंकि वास्तव में
सुरु करा चुका था।
.
-
१००
शरीर बीवी
असगर कुछ भैप-से गये और, रसीदें लौटाकर रहने
लगे-"शायद आप अकेले ही यात्रा कर रहे हैं ?"
मैं-"जी नहीं, मैं अकेले यात्रा करने का अभ्यस्त नहीं।"
असगर-"पर जनाना बेटिंग रूम तो साली है। अच्छा,
शायद वह डोली जो नल के सामने रखी है, उसमे वही हैं।"
(यह बात उन्होने पूर्ण विश्वास से कही)।
मैं-(हँसकर)-"जी नहीं ।"
असगर-"फिर कहाँ बिठाया है ?"
मैं- "कहीं नहीं, बल्कि उन्होंने मुझे विठाया है।'
मेरी बात को मजाक समझ असगर ने अरुचि से कहा-
"क्षमा कीजिए, मैं आपकी बात नहीं समझ सका ।"
मैंने हँसकर कहा-"वे मुझे यहाँ बैठाकर टिकट लेने
गई हैं।
"अरे, यह क्या असगर बोले"
मैं-"साहब, कारण यह है कि सामान मेरे पास आवश्य
कता से अधिक है। उसमें से कुछ तो मालगाडी से,जायगा
और कुछ सवारी गाडी से । फिर उसमे से कुछ ऐसा है, जो
साथ रहेगा ओर कुछ ऐसा है, जो व्रक में दिया जायगा।
मेरी तबीयत कुछ सराब थी, इस कारण बाध्य होकर वे
बेचारी यहाँ मुझे आराम में पैठाकर टिकट लेने और सब
सामान बुक कराने गई हैं। श्राध घटे से अधिक हो गया है और
अभी तक नहीं आई।"
असगर साहब (आश्चर्य से )-"अरे, क्या अकेली
मैंने अत्यन्त रूसे भार से कहा-"जी नहीं, परन् - उनके
साथ बुकिंग क्लर्क और कुली भी गया है।"
तो दुनिया "याप तो कहते थे कि परदा करती हैं। ये तो मुह सोले लें और तेजी से इधर-उधर जाने, मामान यताने और उठाने हिन्दुस्तानी परदा १०१ श्रमगर साहब ऑसे फाडकर घोले-"अच्छा तो क्या वे परदा बिलकुल नहीं करती ?" मैं- क्यों नहीं, करनी क्यों नहीं हैं ? बहुत करती हैं अमगर-"तो फिर यह कैसे ?" मैं-"यह कोई आवश्यक नहीं कि परदा किया जाय, का कोई काम ही उसके कारण न किया जाय । मजबूरी है।" असगर"हदीस शरीफ मे पाया है कि स्त्रियाँ अन्धों तक से कडा परदा करें-यहाँ तक कि उनकी ओर को देखें नहीं।' मैं-"आया होगा। मुझे तो पता नहीं, पर भविष्य में में भी अवश्य ख्याल रगा, और यथासम्भव पापन्दी कराऊँगा। परन्तु मेय तो विश्वास है कि मेरी स्त्री सामखा विना जरूरत अन्धो को भी नहीं देखती। हाँ, जरूरत पड़ने पर सरको देखती है। अब ताकीद कर दूंगा, पर यह इनना ही कह पाया था कि द्वार के सामने मेरी प्रवन्धक स्त्री तेजी से जाती दिखाई पड़ी। मैंने आवाज दी, और वह आई। मैंने पूछा-~"कहो, क्या देर है ?" उसने कहा-"वस रसीद बनवानी रह गई है। अभी आती है।' यह कहकर चली गई। घूम रही है। Im.--असगर ने कहा। मैं-"सिर से पैर तातो बेचारी ने इस गर्मी में अपने से चादर से लपेट रखा है और फिर भी आप आपत्ति करते हैं। तो आपका तात्पर्य यह है कि वह मुह को भी बन कर बताइये
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वा उनका सामान लिये कुली भीड के साथ फाटक से
हुआ कि एक साहब से जो शायद इनसे भी आवश्यक
लस्वरूप दहीवडेवाले के सोमचे में पैर पडा और धुरी
-रह गिरे। तडपकर उठे कि दही बडेवाले ने परखा।
वहाँ सामान बाहर निकला जाता था। हाय का एक मटका
नेपा और छुडाकर सीधे फाटक की ओर दौडे। कुली बाहर
नरत चुका था, पर नजर अयं भी आ रहा था। फाटक पर जो
धक्का-मुक्की होती है उसे सब जानते हैं ? यहाँदर पिचकर
कोशिश की कि बाहर निक्लें कि दही पड़े वाले ने पकड़ा।
हिन्दुस्तानी परता
निन्द से लेट गया। चाँदनी ने कुली इत्यादि सरको निपटा
और थोड़ी ही देर में में ठण्डे पानी से और अपनी
ती से गातें करके अपना दिल ठण्डा कर रहा था।
पर असगर साहब का हाल सुनिये। रेल क्या श्राई कि
तयों का दफ्तर खुल गया। कहारों ने पालकी में उनको
साया को, या यों कहिये कि मृर्सता के चोझा को उठाया
आगे बढे । असगर ने सामान और कुलियो को देखा,
क कुली गायव था। उधर पालकी निकली जाती थी। एक
उधर दौडे कि फिर इधर आये, और दूसरे कुली से
। उसने कहा-"साहब अभी तो यही था। शायद आगे
गया होगा। उसको साथ लिया और तेजी से आगे बढे ।
हर होने ही वाला था, गजव हो तो हो गया। अन्धाधुन्ध
। ओर को लपके और उस हडयोंग में न मालूम क्सि-
स से टकराये। अन्ततोगत्वा इस जल्दबाजी का नतीजा
नाम पर जा रहे थे, ऐसी टक्कर हुई कि वे गिरते गिरते
चे, पर ममलने जो लगे, तो एक दही वडेवाले का सोमवा
आमने आया। फादे तो दही बडेवाले ने हाथ से रोका ।
-
१०४
शरीर वीवी
उमसे हाथ छुडाने और उसे विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया,
पर तोना कीजिये ? वह काहे को छोडता ? देखता था कि
हजरत बाहर निकले जा रहे हैं। फिर काहे को हाथ आयेंगे।
उसे क्या मालूम था कि वे कहाँ जा रहे हैं। तात्पर्य यह कि
दही बड़े वाले से छीना झपटी करते हुए टिकट। कलक्टर की
छाती पर जा पहुंचे। उसने कहा-टिकट " पर वहाँ तो
कुली निकला जा रहा था। बुरी तरह फादकर और जोर देकर
निकल गये और तडपकर कुली का हाथ जो पकड़ा।
उधर
टिकट कलक्टर और एक सिपाही उस दही बडेवाले के
साथ उन पर टूट पडे । जिम आदमी का वह कुली और
मामान था, उसने कहा-"यह क्या जगलीपन' हजरत
सैर तो है " बडे लज्जित हुए, क्योंकि न तो कुली उनका
था और न वह सामान । टिकट कलक्टर को सूक्ष्म रूप से
अपनी मुसीवत वताकर और टिकट दिसाकर बेतरह लौटे
और दही बडे वाले से तनिक रुकने को कहा। वहाँ से लौट
कर पाये तो दूसरा कुली भी गायव था। हैरान होकर पुलिस
के दफ्तर की ओर जा रहे थे। किसी ने कहा-"साइब, ऐसा
नहीं हो सकता। दोनों कुली पालकी के पास होंगे।" दौड़कर
पालकी के पास पहुंचे। वहाँ एक ही कुली मौजूद था। इतने
मे ख्याल आया कि दूसरे कुली ने पूछा था कि कौन दर्जे में
सामान रखा जायगा। शीघ्र ही दौडे हुए हमारी ओर आये
और कुली को हमारे डब्बे के पास सडा पाया । कली को
यहाँ पाकर और निना हमारी बात सुने सीधे पालकी की
ओर भागे।
उतरने वाले उतर चुके थे, और बैठने वाले बैठ चुके थे।
असगर मार ने पालकी को जनाने दर्जे से लगाकर दो
आया। पहले तो दही अडे का खोमचा फाँदने की असफलता
कोषहा।
गायद ताजा-ताजा ही चिलायत मे पाया याालयनऊ के लिय
देव थान मालूम उसने क्या मममा कि निकट आया, और
स पर आय कि हुल्लड मा हो गया। उनके साथ ये दो-तीन
और आदमियों ने मिलकर गोरे को वह श्राडे हाथों लिया कि
अगर एक दूसग गोरा श्रापरपीच-मचाव न करता,
पूरा गड़ा खड़ा हो गया होता। प्रमगर साहब बाद में कहते
कि वह गोरा बिलकुल बदमाश और झूठा था, और उसने
जान-यूझकर भारतीय मुसलमानो की तौहीन करने की नीयत
जनाने दर्जे की सब सिडकियाँ घटाकर और पानी इत्यादि
का प्रवन्ध फरक अमगर साहय एक कुली और दही-घडे वाले
साथ हमारे यहाँ आये। में शर्यत पी रहा था। पहले तो
वल्ली से वाद विवाद हुआ, और फिर दही पडे वाले का नम्बर
पदही-चंड वाले पर रसा कि यदि वह अपना हाथ अकारण
उनके पॉव मे डालता, तो वे उसे अवश्य लॉघ जाते
हिन्दुस्तानी परता
चारो म परदे तनयाय और अपनी श्रीमती से उतरने
दुर्भाग्य से एप गोग दरलता दुधा उधर आ निकला।
ना यह नगीन आगन्तुक था। उमन भला य धन्धे काहे को
उत्सुस्ता अथवा श्राश्चर्य से प्रेरित होकर उसने यह देखना
चाहा कि तने हुए कपड़ों में क्या हो रहा है। एक ओर जो
चादर को हाथ से नीचा कर और ऊपर से मिर टालकर जो
था, वो अमगर की श्रीमती तो ठही गई। चादर समेट
पर असगर साहन गोरे पर पट पड़े।
भयर गर्जना करके
तो शायद
ब
वह हरक्त की थी।
कारणों पर उन्होंने विस्तार रूप से प्रकाश टाला, और सर
हम थे। पर वे एक विपत्ति के प्रमित थे, और हम आराम से १०६ शरीर बीवी अस्तु वडी झॉय-मॉय के उपरान्त दही-बड़े वाला पाँच रुपया लेफर टला । रेल चली और तनिक मन्तोप हुआ, तब विप त्तियों का पूरा विस्तार सुनने में आया। ध्यान से असगर माहब ने अपने कपडो की ओर देखा, तो पतलून और मोजों पर जगह-जगह दही और मोंठ की चटनी के धब्बे दृष्टिगोचर हुए, इमलिए रूमाल भिगोकर छुड़ाने की कोशिश करके उनको सून ही फैलाया। तनिक विचार तो कीजिए । जितना सामान उनके पास था, उससे चौगुना हमारे पास था। यात्रा करनेवाले दो मियाँ बीवी थे। यदि उनका श्रीमती जी विपत्ती का कारण थीं तो हमारी श्रीमती जी सुप और चैन का कारण । यदि वास्तव में वे मजहब में पानन्द थे और हम उससे मुक्त, तो क्या ठीक है कि यह मजहब इस युग मे रहन सहन के लिए उपयुक्त अथवा हमारा दावा कि हमारा मजहब प्राकृतिक मजहब ठीक है । तनिक इस विषय पर फिर सोचिये । ३ तीन चार स्टेशन वाद असगर ने उतर कर अपनी श्रीमती जी की सर ली कि उनका क्या हाल है। वहाँ जाकर देखा तो सन विडकियों जिनको वे बन्द कर आये थे, खुली पाई शीघ्र ही उन्होंने उन्हें चढाया। उनकी श्रीमती जी ने उनक वह दुसद ममाचार सुनाया कि उनके चले जाने के उपरान्त काली अचक्न पहने कोई व्यक्ति जनाने दर्जे में आया औ- एक कुजी पर उनका एक ट्रक दिन दहाडे रखवाकर चलत ना । उनको श्रीमती जी बेचारी परदानशीन तथा स्री यौं । ट्रक को जाते देस, सय कहने या रोकने के बजाय अनुभवहीन - लिगये। चॉदनी ने उनसे कहा-"क्षमा कीजिये, इसमे नसे यह न हो सका, तो उनको जजीर खींचकर गाडी रोकनी आदमी को तुरन्त ही यहीं रोक देना चाहिए था, और यदि चाँदनी-"आसिर क्यों न पकड लेती। मैं होती, तो अपना ट्रक कदापि इस प्रकारनले जाने देती।" असगर-"अजी, एक टूक क पीछे हमारे यहाँ की त्रियाँ तो परदा तोडती हैं, और न मरढों से उलमती है।" चाँदनी-"क्चल इसा कारण उन्होंने उसके विषय में की भी चीज होती, तो भी वह किसी मर्द से उसके विषय में हिन्दुस्तानी परदा १०७ उन्होंने पास बैठी एक स्त्री के पान में फुट रहा, पर वह तीसरा दरजा न था। सर परतानशीन नियों थी। उसने हा--"फिर रोकती क्यों नहीं हो ?" यह भला रोकती। यह ट्रक लेकर चलता धना और गाडी भी चल दी। उस ट्रक मे बहुमूल्य कपड़ों के अतिरिक्त दो हजार के मूल्य की और भी सम्पत्ति थी। दौड़-धूप करके शीघ्र ही पुलिस का सूचा दी और तार - आपली घेगम साहिया की गलती है। पहले तो उन्हें उस थी और न सही, तो कम से कम पहले स्टेशन पर सघर असगर ने यग से कहा-"क्षमा कीजिए, उस आदमी असगर ने कुछ गौरवपूर्ण ध्वनि मे कहे । --"निस्सन्देह, यह तो एकटक है। यदि लाग्या ही करती का हाथ पकड लेती ?" - चना भी नहीं दी " असगर- तन करती - कहा कि आश्चर्य है कि अपने अपने घर की वियों . अधिकार आपको है, उतना ही मुझे भी।"' असगर ने एक १०८ शरीर बीवी फो इतना लाचार कर रखा है। मेरी समझ में तो आप उसे उदार-विचार के व्यक्ति को ऐसे निकम्मे विचार शीघ्राति शी छोड देना चाहिये। इस पर बोले-जनाव, मैं ऐमी रोशन का कायल नहीं, जो मजहब के विरुद्ध हो । यह रोशनी मुस्तफा कमाल के शासन को मुनारिक हो। ऐसी ही बातें होत रहीं कि एक स्टेशन पर अमगर ने देखा कि कोई साहब सब जनाने दर्जे की सिडकियाँ सोल रहे हैं। बस, फिर क्या था तुरन्त ही लपक कर घटनास्थल पर पहुंचे। "मैं खिड़कियाँ बन्द करता हूँ और आप हैं, जो सोल सोल देते हैं।" "अच्छा, यह आप हैं। मैं सय परेशान हूँ, और बार था ग्योलता हूँ, और आप बन्द कर देते हैं । मारे गर्मी के सिर बुरा हाल है, और आपको परदे की सूझी है। यदि ऐरू ही है, तो आप अपनी स्त्री को किसी और जगह विठाइये, फिर साथ लेकर ही क्यों चले थे" "मगर मैं आपको सिडकियाँ न सोलने दूंगा । जित . य - सिडकी बन्द करते हुए कहा। "में अधिकार-वधिकार कुछ नहीं जानता और सोलूंगा स्त्रियाँ न हुई जानवर हो गई।" "तो श्राप कम से कम मेरी ओर वाली खिडकी रह दीजिए।" "मैं श्रापकी और अपनी कुछ नहीं जानता। को तो अवश्य सोलूँगा, क्योंकि यही तो मुख्य है।"-उस और जिद्दी आदमी ने कहा । मैं इस सिड
न पर से उतरने का मजमून पेश था। हमारी समझ में तो
असगर ने कहा।
.
वह अपरिचित व्यक्ति बोला।
"आप नहीं मानते, तो मैं स्टेशन मास्टर से रहता हूँ."
आमी की जीत हुई। गर्मी भी इतनी विकट पड रही थी कि
साइशी का धन्द रखना प्रसस था। लाचार होकर असगर
पदनाव पाकर रह गये, क्रोध अपनी श्रीमती जी पर यह कह
असगर माहय की विपत्ति की अभी वास्तव में समाप्ति
मजहब और वर्तमान रहन-सहन का प्रदर्शन होता था।
गाडी चलते चलते धीमी हुई और रुक गई । जानने ड्योढे
-क पहियों क धुरे तेल की कमी और गर्मी की भयकरता के
कारण तप उठे थे और आग लग जाने की आशका थी। गाडी
बगल में रुकी हुई थी और उसके धुरे पर पानी छिडका जा
हाथारियों को जल्दी जल्दी उतारा जा रहा था। असगर
नाहर की धनराहट उपदेश प्रद थी। परदे के सम्पूर्ण ढङ्गों
साथ श्रीमती जी को उतारना और सामान उतरवाना एक
वपत्ति थी। वहाँ कौन था, जो चादरे तानता और डोली
ता। उधर गाडे 'उतरो, उतरो जल्दी करो' कहकर और भी
सहे होश उडाये देता था। बाध्य होकर असगर ने अपनी
मता जी से उतरने को कहा। प्लेटफार्म तो था नहीं, मानों
हिन्दुस्तानी परदा
"आप लाट माह्य से कह दीजिये, जाइय -श्रावेश से
स्टेशन मास्टर और गार्ड आये और उस टरें और जिद्दी
र स्वारा कि यु के ऊपर एक और चादर ओढकर फोने में
नहीं हुई थी, परन् श्रीगणेश ही हुआ था। पग-पग पर उनके
लाक लगाकर घेठ जाओ।
" गरीन को रसा। अपने साथ पिठाने को हमने ११० शरीर बीवी न आता था कि किस प्रकार कोई ऑसें चन्द करके उतर मकता है और वहाँ असगर साहब की श्रीमती जी के इस कार्य के करने की आशा की जा रही थी। वह स्त्री, जो डोला से एक पग रखकर गाडी के डब्बे में बैठने की अभ्यस्त हो, वह भला बुर्का और बुर्के के ऊपर चादर श्रोढकर उस हैरानी और परेशानी में किस प्रकार उतर सकती है ? काँपते हुए हाथों से टटोल कर गरीव ने खिडकी को पकडा । मेर नीच करके टटोल रही थी कि किस चीज पर और कहाँ पैर रखू कि वे-पर्दगी होने लगी, यानी हवा में चादर उडकर कुन भाग पोपाक का खुल गया, असगर जोर से चिल्लाये । गरीब ने घबराकर सँभलना चाहा कि पैर कहीं-का-कहीं पडा । हाय से सिडकी छूटी और धम से नीचे गिरी। नीचे ट्रक रसा गया था, जिस पर असगर सडे थे। ट्रक का कोना कोल्हू में इस जोर से लगा कि वेदम ही तो हो गई, पर जवान से उफ तक न निकली । एक तो गर्मी की तेजी, फिर उस पर कपड़ों का चोम और तिस पर वह चोट बेचारी बेहोश हो गई। जैसे तैसे करके घराहट और जल्दी में चाँदनी ने सहारा देकर उठाया । किमी दूसरे मर्द को महायता के असगर इच्छुक न थे और चाँदनी ठहरी कमजोर, फलस्वरूप घेचारी को कका रह घसीट कर ले चले। । बन पडा, हजार कठिनाइयों से एक जनाने पर - . पर जनाना और कोई दर्जा साली ही न था, उ. के सयाल से उनकी श्रीमती की सेवा पं लिए साथ हो गई । जैसे तैसे करके सामान अपन किया और गाड़ी चली। - 1
हिन्दुस्तानी परदा
चाँदनी ने यहीं गाडी के बेंच के पास श्रीमती श्रमगर को
लेदा रहने दिया, क्योंकि और कहीं स्थान न था। तकिया लगा
दिया और मुंह सोलकर हवा दी।
अगले स्टेशन पर असगर साहन उतर कर जो आये, तो
क्या देखते हैं कि जनाने दर्जे का द्वार खुला है और सामने
उनकी श्रीमती जी लेटी है और चाँदनी उनके पास बैठी हवा
दे रही है और उन्होंने बरफ का पानी माँगा । देसकर असगर
साहब आपे से बाहर हो गये और जोर से चिल्लाकर बोले-
"परे यह क्या गजय कर रही हैं ? मुँह तो ढकिये। अरे, मुँह
क्यो नहीं ढकती ? यह कहकर एकदम लरक फर दर्जे में
घुस आये । “यह क्या सितम है ? गजब है खुदा का "--
कहकर अपनी श्रीमती जी का मुंह ढक दिया और वक्र दृष्टि से
क्रोध में बाँदनी से कहा-"यह आपसे किसने कहा था कि
अपनी तरह मेरी बीवी का भी मुंह सोल दें? यह आपको
हा मुबारिक हो। आप रहने दीजिए और जाइये ।"
गई थी भले को और वहाँ हुश्रा धुरा। चॉदनी बेचारी
चुपचाप चली आई । मेरी तनीयत खराब थी, इस कारण उस
याना में उसकी हाजिर जवाबी काम न करती थी। फिर भी
कहने लगी-"कहिये तो फिर इसकी सवर. ली जाय।" मैंने
कहा-"नहीं, रहने दो।" इनने में असगर साहव आये और
उसी सले भुने लहजे में कहने लगे-"आप से आरिचर किसने
कहा था कि आप मेरी बीवी का मुंह हर एक के देखने के
लिये खोल दे।"
चाँदनी- मैं लन्जित हूँ, मगर यह तो
असगर--"जी हॉ, मगर-बगर को जाने दीजिए। आखिर
।
११०
शरीर बीवी
न पाता था कि किम प्रकार कोई ऑसें बन्द करके उतय
सकता है और वहाँ अमगर साहन की श्रीमती जी के इस
कार्य के करने की आशा की जा रही थी । वह स्त्री, जो डोली
से एक पग रसकर गाडी के डब्बे में बैठने की अभ्यस्त हो,
वह भला बुर्या और बुर्के के ऊपर चादर ओढकर उस हैरानी
और परेशानी में किस प्रकार उतर सकती है ? कॉपते हुए
हाथों से टटोल कर गरीव ने खिडकी को पकड़ा। पैर नीचे
करके टटोल रही थी कि किस चीज पर और कहाँ पैर रखू
कि बे-पर्दगी होने लगी, यानी हवा में चादर उडकर पुत्र
भाग पोपाक का खुल गया, असगर जोर से चिल्लाये । गरोय
ने घबराकर सँभलना चाहा कि पैर कहीं-का-कहीं पड़ा। हाथ
से खिडकी छूटी और धम से नीचे गिरी। नीचे ट्रक रसा गया
था, जिस पर असगर सड़े थे। ट्रक का कोना कोल्हू में इस
जोर से लगा कि वेदम ही तो हो गई, पर जवान से उफ तक
न निक्ली । एक तो गर्मी की तेजी, फिर उस पर कपड़ों का
बोझ और तिस पर वह चोट-चारी चेहोश हो गई । जैसे
तैसे करके घबराहट और जल्दी में चाँदनी ने सहाय देकर
उठवाया । किसी दूसरे मर्द की सहायता के असगर इच्छुक
न थे और चॉदनी ठहरी कमजोर, फलस्वरूप चेचारी को ककड़ों
पर मुर्दे की तरह घसीट कर ले चले ।
जिस प्रकार वन पडा, हजार कठिनाइयो से एक जनाने
तीसरे दर्जे में गरीन को रखा। अपने साथ विठाने को हमने
बहुत कुछ कहा, पर जनाना और कोई दर्जा साली ही न था,
चाँदनी सहानुभूति के सयाल से उनकी श्रीमती की सेवा
शुश्रुपा के लिए साथ हो गई। जैसे तैसे करके सामान अपने
साथ किया और गाडी चली।
१
दिया और मुंह सोलकर हवा दी। । - खुदा का क्यों नहीं ढकती १-यह कहकर एकदम लरक फर दर्जे में कहकर अपनी श्रीमती जी का मुंह ढक दिया और वक्र दृष्टि से मोर में चाँदनी से कहा-"यह आपसे किसने कहा था कि अपनी तरह मेरी बीवी का भी मुंह सोल दें? यह आपको चुपचाप चली आई। मेरी तपीयत सरान थी, इस कारण उस यात्रा में उसकी हाजिर जवाबी काम न करती थी। फिर भी कहने लगी-"कहिये तो फिर इसकी सयर ली जाय ।" मैंने कहा-"नहीं, रहने दो।" इतने में असगर साहव आये ओर उसी जले भुने लहजे में कहने लगे-"आप से आखिर किसने कहा था कि आप मेरी बीवी का मुंह हर एक के देसने के चाँदनी-"मैं लज्जित हूँ, मगर यह तो हिन्दुस्तानी परदा १११ चॉदनी ने वहीं गाडी के पेंच के पास श्रीमती अमगर को लेटा रहने दिया, क्योंकि और कहीं स्थान न था। तकिया लगा अगले स्टेशन पर असगर साहब उतर कर जो आये, तो क्या देखते हैं कि जनाने दर्जे का द्वार सुला है और सामने उनकी श्रीमती जी लेटी हैं और चाँदनी उनके पास बैठी हवा दे रही है और उन्होंने बरफ का पानी माँगा । देखकर असगर साहब श्रापे से बाहर हो गये और जोर से चिल्लाकर बोले- “परे यह क्या गजय कर रही हैं ? मुंह तो ढकिये। अरे, मुँह धुम श्राय । “यह क्या मितम है ? गजब है हा मुबारिक हो । पाप रहने दीजिए और जाइये ।" गई थी भले को और यहाँ हुआ बुरा। घाँदनी बेचारी असगर-"जी हॉ, मगर-वगर को जाने दीजिए। आखिर लिये सोल दें।"
T तो मैं अपनी मूर्सता और उदण्डता पर लज्जित हूँ और माफी ११२ शरीर नीची शर्म हया भी तो कोई चीन है। आपकी मॉति स्त्रियों की गर्म- हया को ताक जली तो चॉदनी पहले से ही बैठी थी। इतना सुनना था कि छतरा लेकर, जन तक मैंने रोग, तन तफ दो तीन श्रमगर साहन के ऊपर तडातड़ ठीक उमी भॉति लगाई, जिस प्रकार उन्होंने हुस्के के हाथ मेरे जड़े थे। अमगर साहब ने बहुत- कुछ वार रोके, पर तीन चार पुरी तरह पडे । हैं हैं। यह के मैंने डॉट कर रोका। "वातमीज बदजनन । निकल जा यहाँ से।" कहकर वह कोध में जजीर की ओर लपको और कहती गई-मैं अभी निकलवाती हूँ। "यह क्या वाहियात पात है ?" कहकर मैंने कर घसीटा और पकड कर विठायां। वह क्रोध से कॉप रही थी और कह रही थी-"मुझे छोड दीजिए।" मैंने डॉटकर निठाया। असगर साहर की विचित्र दशा थी। मैंने उनसे क्षमा मांगी और योड़ी देर में चाँदनी से भी कहा कि तुम भी मांगो। नडी कठिनाई से समझाने बुझाने पर चाँदनी ने कहा- “यदि असगर माहब अपने शबा लोटा ले, मॉगती हूँ।" "मुझको दु स है कि क्रोध में मैं आपको न मालूम क्या शन्द मैंने अमगर माहव से कहलवाये और दोनों ने हाथ मिलाया, पर न तो चाँदनी का दिल साफ था और न असगर साहब का और शेप यात्रा में एक ओर अस गर मॅह फुलाये गैठे रहे और उधर वह चुप बैठी रही। मैंने चुपके से चाँदनी के कान में कहा "दोस्त, तुमने हाथ परड- कह गया ".-ये LA कोई नतीजा नहीं।" 1 इतना जरूर पता चला कि गाडी कि वहीं समाप्त होती है हिन्दुस्तानी परदा ११३ हमारा वाला खुन लिया। इसी व्यक्ति ने उस रोज हुक्के की नै में मेरी मरम्मत की थी। चाँदनी ने आश्चर्य से कहा-"अरे" तो मैंने कहा-'चुप । सरलार जो घात निकाली। ये हजरत मुझे पहचान ही न सके। अकारण लज्जित करने से चोदनी चुप हो गई। आगरे मे हम दोनों उतर, तो शोर- निवारणार्थ फिर हाथ मिलाये। दुर्भाग्य से असगर साहन की विपत्तियों का अभी अन्त । नहीं हुआ था। पाठ मात रोज बाद जब मैं असगर साहब के घर दुवारा अपनी श्रीमती जी की अशिष्टता पर क्षमा मांगने । गया, तर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही। असगर का घर तो समवेन्नागार बना हुआ था। मैं सन्नाटे में आ गया, जब मैंने सुना कि असगर की श्रीमती सो गई। भागरे के स्टेशन पर से वे उसी प्रकार उन्हें चादरें तानकर डोली में बिठाकर लाये। स्वयतो तॉग पर थे ओर डोली के साथ नौकर था। घर पर बजाय उनकी श्रीमती जी के एक वृद्वा परतानशीन नी उतरी। उधर वह हैरान कि मैं कहाँ श्रा गई, और उधर सर पर वाले परेशात। वृद्धा कहती थी कि मेग वेटा कहाँ है, जो डोली लेकर आया था और असगर कहते थे कि मेरी बीवी लाओ। दौडकर स्टेशन पहुंचे। वहाँ से गाडी राजा मण्डी के स्टेशन को जा चुकी थी। वहाँ पहुँचे, नो इमलिए एक पुर्वापोश स्त्री के अतिरिक्त उसमे कोई नहीं पाया गया, और वह भी तरकर एक आदमी के साथ चली गई। दोनों के पास टिकट आगरी सिटी से राजामण्डी के थे।
११४ शरीर वीवी दूमरा आदमी नौकर मालूम होता था, जो उनको किसी चन्द गाडी मे बिठा ले गया। असगर का बुरा हाल था। पागलों की भॉति टकरा-टकरा कर उन्होने सिर फोड़ लिया था। यदि घर वाले न होते तो कोई आश्चर्य नहीं लि अपनी जान गँवा देते, क्योंकि उनका अपनी श्रीमती जी के प्रति प्रेम ही नहीं वरन आसक्ति भी थी। उनकी शोचनीय , दशा व्यनीय थी, और उनको देखने से उपदेश मिलता था । वे बिलकुल पागल से हो रहे थे। उनका ट्रक मिल गया था। कोई भले अादमी धोसे में ले गये थे। भूल मालूम होने पर लौटा गये। ट्रक आ गया, पर वहाँ तो ट्रकवाली का रोना था। उनके घर वालों और उनसे सहानुभूति प्रफटकर शोक-मग्न मैं घर आया, और चाँदनी को सब समाचार सुनाया । उसे भी बेहद दुःख हुआ। हम साल भर तक आगरे मे रहे। उस समय तक तो उनकी बीवी मिली नहीं थी, और उनका किस्सा भी पुराना हो चुका था, कि हम दूमरी जगह चले गये । " Im -- 1 " , 1 सातवॉ परिच्छेद । T गुमनाम पत्र हमारी बीवी इस नौकरी से प्रसन्न थी किम्बदली होती है, और नये नये स्थानों में रहने का अवसर मिलता है। हम कई जगह की हवा सा चुके थे और, फिर नई जगह की आशा थी। सयोग की बात या खुशकिस्मती कि हमारी प्रसन्नता का या मनोरञ्जन के लिये जाय, और पाँदनी हमारा साथ न दे। - नया मोटर लिया था। नया नया शोक । हम और हमारी पीवी कोराव सेर कराते श्रीर शहर सभी प्रसिद्ध स्थानों को धारी वारी से दिग्गते । हामिद की माँ और यहन से मिलकर चाँदनी बाद हमे शहर के कुछ याहर एक छोटा सा घगला उचित फिराये पर मिल गया और हम उसमे चले गये। वा परिवर्तन हो गया था, और धीरे-धीरे प्रत्येक मधिल पर हम और हमारा जीरन दोनों बदलते जाते थे। पहले भयको में रहते थे, और शहर अन्धा लगता था। गतो मे रहने लगे, और बंगला का ही उग पलियार कि। पहले चॉग्नी को हमारी सुसाइदियो और मनोरखामों से कोई सम्बन्ध गुमनाम पत्र उगाना न रहा, जम हमें मालूम हुआ कि अय हमें हामिद के बाहर में रहने का अपम मिलेगा। हामिद अपने पुराने और सरक दोस्त थे। हमने उन फौरन कर दिया और हमारी पीयी न जो मामान इत्यादि फौरनीयाँधना शुरु कर दिया। हामिद या पर आया यया था, मानों किसी स्वागत- समिति के अध्यन की ओर से मानपन था। हम नये शहर में सीधे धीवा महित हामिद के मेहमान हुए। उन्होंने हमारी इस प्रकार सातिर फी, मानो वर्षों की दोस्ती का हक पेशगी ही में अदा कर दिया। हामिद ने एक बहुत प्रसन्न हुई। न था, और हम आठ दस दिन हामिद के मेहमान रहे । फिर उसके हमारे और चॉटनी के जीवन में इन थोड़े ही दिनों में बहुत वह सीधी सादी एक गरीष और हाजालु लड़की थी। किन्तु अब यह फैसे सम्भव हो कि हम यही सैर, श्राराम परिवर्तन प्रसमता-साहित स्वीकार किया था। उसने इस १९६ शरीर वीवी पहले तो वह नाम मात्र के पर्दे में रहती थी और हम चार दोस्तों के साथ सैर करते थे और अधिकतर उनमें से भी होते थे, जेसे हमारे पुराने दोस्त मास्टर गुलामचन्त, किन्तु अब हमारे लिय यह असम्भव था, कि हम किसी असभ्य सोसाइटी, या वातनी दोस्त से मिल सके य- उसके साथ बैठ सके। क्योंकि चाँदनी हमारे साथ ही रहन पसन्द करती थी। केवल इसीलिय क्लव से भी हमारी दिल चम्पी जाती रही थी। क्योंकि घर पर अकेली बीवी घबड़ाय करती थी। हम कभी कभी चले जाते, किन्तु हमको दिलचस अधिक इमी में थी कि शाम को अपने घर पर रहें या अकेल बीवी के साथ हवा सायें। चाँदनी इस वर्तमान जीवन को या पसन्द करती थी, तो केवल इसी कारण से कि वह प्रसन्न थ कि हमारी पुरानी सोसाइटी छूट गई और हमारे दोस्तो अं मिलने वालों की संख्या घट कर इस तरह सीमित हो गई। उसमे एतराज करने की कोई गुञ्जाइश ही न रह गई। हम दोस्तों में वहाँ वैसे तो बहुत थे, और सभी थे, किन्तु वास्तव अव 'हमारे दोस्त भी दो प्रकार के थे । एक तो वे, जो के मारे थे, और जिनसे हमारी मुलाकात बैठक तक ही सीमि थी, और दूसरे वे जो हमारे और हमारी जीची, दोनों के मिक वाले थे । साफ यात है कि इस तरह के मिलने वालों की सर कम होगी और हामिद के अलाना दुसरा कोई भी न था। फिर हामिद के एक और गहरे दोस्त थे, जिनका नाम रफ- था, किन्तु चूँकि वे देहात में रहते थे, इसलिए वे केवल क पभी पाते थे। हामिद को शिफार की भी घडी बुरी लत थी, किन्तु जब मि श्राय थे, इतवार को उनको पाड लेते थे और उन .
धैरिस्टर साहब से हमारी मुलाकात कई बार हो चुकी थी, किन्तु
चाँदनी की और उनकी यह पहली ही मुलाकात थी। बडी जल्दी
से हमने चाय तैयार करवाई और छुट्टी पाकर हामिद की मोटर
में चल दिये । हामिद मोटर स्वय चला रहे थे और आगे
उनके पास हमारी बीवी बैठी थी, और हम और बैरिस्टर.
चौदह-पन्द्रह मील पक्की सडक का रास्ता तै करने के बाद
ऊची नीची जमीन से-वास्ता पंडा, यह कठिनाई भी आसानी
से सतम होगई और मील आगई। हम लोग उतर पडे और
झील में मुर्गियां और उडी बत्तसें भरी पड़ी थी। हमने
चाँदनी को ऐसी जगह में बिठा दिया, जहाँ से वह तमाशा देस
गुमनाम पत्र
अमर न मिलता था । हामिद ने प्रतिदिन कह-कहकर अन्त
में एक दिन राजी कर ही लिया। चाँदनी ने चूँकि शिकार
खेलते हुए कभी न देसा था, अतएव हमने भी लाचार होकर
स्वीकार कर लिया। शिकार को पार्टी भी बहुत ही सक्षिप्त थी ।
हम, हमारी वीवी और हामिद, और एक बैरिस्टर साहन ।
वैरिस्टर माहब का नाम हम यहाँ बताना नहीं चाहते । बहुत
ही मुनासिन सूरत, शफल और स्वभाव के जवान आदमी थे,
पंतीम वर्ष की उम्र होगी। रिलायत से बीवी लाये थे, जो साल
भर के भीतर ही मर गई। फिर दूसरी बार शादी न की।
किसी दूसरी जगह के रहने वाले थे, किन्तु शुरू से यहीं रहते
ये, और सदा से बिलकुल अकेले रहने के अभ्यासी थे।
ममेरे चार बजे ही हामिद ने आकर दरवाजा सटसटाया ।
सादर पीछे बैठे थे।
कच्ची सडक आई और फिर दो चार मील चलकर गड्ढे और
माल की ओर चले।
था, किन्तु चूं कि पे देहात मे रहते थे, इसलिए वे केवल कम ११६ शरीर बीवी पहले तो वह नाम मात्र के पर्दे में रहती थी और हम यार दोस्तों के साथ सैर करते थे और अधिकतर उनमें ऐसे भी होते थे, जैसे हमारे पुराने दोस्त मास्टर गुलाबचन्द । किन्तु अब हमारे लिये यह असम्भव था, कि हम किसी असभ्य सोसाइटी, या वातूनी दोस्त से मिल मकें या उसके साथ बैठ सकें। क्योकि चॉदनी हमारे साथ ही रहना पसन्द करती थी । केवल इसीलिय क्लब से भी हमारी दिल चस्पी जाती रही थी। क्योंकि घर पर अकेली बीवी घबड़ाया करती थी। हम कभी कभी चले जाते, किन्तु हमको दिलचस्पी अधिक इसी में थी कि शाम को अपने घर पर रहें या अकेला बीवी के साथ हवा सायें । चाँदनी इम वर्तमान जीवन को यदि पसन्द करती थी, तो फेवल इसी कारण से कि वह प्रसन थी. कि हमारी पुरानी सोसाइटी छूट गई और हमारे दोस्तों और मिलने वालों की संख्या घट कर इस तरह सीमित हो गई कि उसमे एतराज करने की कोई गुञ्जाइश ही न रह गई । हमा दोस्तों मे वहाँ वैसे तो बहुत थे, और मभी थे, किन्तु वास्तव में 'अन हमारे दोस्त भी दो प्रकार के थे। एक तो वे, जो केवल हमारे थे, और जिनसे हमारी मुलाकात धैठक तक ही सीमि 'थी, और दूसरे वे जो हमारे और हमारी बीवी, दोनों के मिल वाले थे। साफ बात है कि इस तरह के मिलने वालों की सरून क्म होगी और हामिद के अलावा दुसरा कोई भी न था। फिर हामिद के एक और गहरे दोस्त थे, जिनका नाम 'रफी कभी पाते थे। हामिद को शिकार की भी घडी बुरी लत थी, किन्तु जब थे, इतवार को उनको पाड लेते थे और उनक , ५ हम याय
चॉटनी को ऐसी जगह मे बिठा दिया, जहाँ से वह तमाशा देय
चरिस्टर साहय से हमारी मुलाकात कई बार हो चुकी थी, किन्तु
ऊंची-नीची जमीन से वास्ता पडा, यह कठिनाई भी आसानी
से खतम होगई और मील आगई। हम लोग उतर पडे और
गुमनाम पर
अवमरन मिलता था । हामिद ने प्रतिदिन कह कहकर अन्त
ने एक दिन राजी कर ही लिया । चाँदनी ने चूँकि शिकार
वेलते हुए कभी न देया था, प्रतण्य हमने भी लाचार होकर
स्वीकार कर लिया। शिकार की पार्टी भी बहुत ही सक्षिप्त थी।
इम, हमारी बीवी और हामिद, और एक चैरिस्टर माहय ।
चैरिस्टर साहब का नाम हम यहाँ बताना नहीं चाहते । बहुत
ही मुनासिव सूरत, शकल और स्वभाव के जवान प्रादमी थे,
पैंतीम वर्ष की उम्र होगी। विलायत से बीवी लाये थे, जो माल
भर के भीतर ही मर गई। फिर दूमरी बार शादी न की।
किमी दूसरी जगह के रहने वाले थे, किन्तु शुरू से यहीं रहते
ये, और सदा से बिलकुल अकेले रहने के अभ्यासी थे
सवेरे चार बजे ही हामिद ने आकर दरवाजा सटसटाया ।
चाँदनी की और उनकी यह पहली ही मुलाकात थी। बडी जल्दी
से हमने चाय तैयार करवाई और छुट्टी पाकर हामिद की मोटर
में चल दिये । हामिद मोटर स्वय चला रहे थे और आगे
उनके पास हमारी पीवी बैठी थी, और हम और वैरिस्टर
माहर पीछे बैठे थे।
चौदह-पन्द्रह मील पक्की मडक का रास्ता तै करने के बाद
कुच्ची सडक आई और फिर दो चार मील चलकर गड्ढे और
२
मील की ओर चले।
झोल में मुर्गियाँ और बडी वत्तर- भरी पड़ी थीं। हमने
-- ११८ शीर बीवी सके, और हम तीनों मील की ओर चले। हम लोग अलग अलग हो गये, और झील को तीन ओर से घेर लिया । हामिद ने पहले बन्दुक चलाई और फिर उड़ने पर बैरिस्टर साहब और हामिद ने बहुत से फैर किये । हमने भी कोशिश की। हमने तो एक पर तक न मारा, किन्तु हामिद और वैरिस्टर साहब ने मिलकर खून शिकार किया । यहाँ से छुट्टी पाकर अब हिरन के शिमर का विचार किया। थोड़ी ही देर बाद पैरिस्टर साहब हमसे और चाँदनी से भी बहुत हिलमिल गये और शिकार में वडा आनन्द श्रआया । हामिद से और वैरिस्टर साहब से शिकार की पुरानी दोस्ती थी और दोनों पुराने शिकारी थे। खुलासा यह कि हम लोग बारह बजे के लगभग लोटे । खूप शिकार हुआ और चाँदनी ने भी शिकार का खून आनन्द उठाया । चूकि खाना तैयार ही था, हामिद और बैरिस्टर माघ ने भी हमारे ही यहाँ साना साया। खुलासा यह कि दिन आराम से काटा । वैरिस्टर साहव हमसे और चाँदनी से मिल कर बहुत प्रसन्न दिखाई देते थे, और चाँदनी ने भी इनके सम्बन्ध में यह निश्चित् फैसला दिया था कि ये बहुत मुनासिब और च्छे आदमी हैं और मचमुच वे थे भी ऐसे ही । पाइव हमारी वीवी से पहली बार मिले थे। किसी है कि किमी से मिलो तो उसके सम्बन्ध में कोई करने में शीघ्रता न करनी चाहिये । वे यूरोप की एक स हुए थे। श्रामतौर से हमारे जो नौजवान विलायत और जो मामूली हैसियत के होते हैं, वे वहाँ नीचे की सोमाइटी में रहते है और वहाँ की औरती की तबीयत - 1 x x 1 7 गुमनाम पत्र और उनके आगे पढे हुए विचारों को देखकर स्त्री ससार के बारे में एक आम राय कायम कर लेते हैं और अपने आपको त्रिनों की आदतों का विशेष जानकर समझने लगते हैं। हमारे वैरिस्टर साहब का भी यही हाल था। हामिद ने जन उनसे हमारी चीत्री के सम्बन्ध में घर लौटते समय चर्चा की, तर उन्होंने एक हमी और ताने के ढङ्ग पर कहा-"आपको उनसे इम भाति क्यों दिलचस्पी है ?" "इसलिये कि वे मेरे दोस्त की वीगी हैं।" “या इसलिये कि वे एक दोस्त की खूबसूरत बीवी हैं।" "लाहौल मिलाकूह, तुम भी कैसे आदमी हो।" हामिद ने कहा। “मुझसे आधिक आपको नये ढग की प्रेम करने वाली औरतों का अनुभव नहीं है।" बैरिस्टर माहब ने कहा। "अच्छा हो, यदि आप कोई दूसरी चर्चा करें।" हामिद ने गम्भीर होकर कहा। "प्रजी जनार, आप मुझसे ।" • "मेहरवानी करके चुप हो जाओ। कसम खुदा की, मैं एक श नहीं सुन सकता।" हामिद ने प्रावश्यकता से अधिक गम्भीर होकर कहा ! वात हुई, सतम हो गई और हामिद ने हमसे भी उसकी चर्चा भी न की। , . - + x x है । इतवार का दिन था और हमने चाँदनी से कहा, कि भाज तो दोस्त हलुगा सिलायो । हमारी वीवी को हमारे ऐसे सोनों की प्रानभगत करने की चिन्ता रहती थी, जिनके घर हों। रह ऐसे दोस्त को अक्सर तरह तरह के खाने भिजनाती रहती थी। हमारी राय से हमारी बीवी १२२ शरीर बीवी दो तीन महीने में हमारे वैरिस्टर माह से ऐसे सम्बन्य हो गये कि वैसे हामिद से भी थे। बैरिस्टर साहब चाँदनी की प्रशसा करते मरे जाते थे, और अब हमारा उनसे हद से ज्यादा बिना बनावट के मेल-जोल होना था। हम पर और चॉदनी पर वे इस तरह कृपालु थे कि वे सैकडों नई चीजें हमारी बीवी को भेट दे चुके थे। और चॉदनी का यह हाल. था कि वह दिन रात बैरिस्टर माहव की तारीफ किया करती थी। खुलामा यह कि वैरिन्टर माहव हमारे अच्छे दोस्तों में से थे । - + - + हम एक दिन जर कचहरी से आये तव चाँदनी असा- धारणरूप से प्रमन्न मालूम हुई। हमने कहा, क्या मामिला है, हमें भी बताओ, तो उमने एक पत्र हमारे सामने रस दिया । उसमें कुछ थोडे प्रेम सम्बन्धी शेर लिसे हुए थे, और लिसा था कि इसका जवान यदि देना तो फला फला जगह पर रस देना। हम आश्चर्य में थे कि इलाही, यह कोन है। लिफाफे पर पते और मुहर को देखा। तो मालूम हुआ कि इसी जगह का है। हमारी वीपी का पता लिसा हुआ था। हमने बहुत कुछ किन्तु कुछ समझ में न आया। चाँदनी भी पत्र के जवान के रूप मे घडी कठिनाई से सोच विचार करके नीचे लिसा हुआ शेर लिप लाई और हमको दिखाया। एक लडके ने अपने बुड्ढ़े बाप से यह कहा-" तू सरापा नाज है, मैं नाज बरदारों में हूँ। एक लडके ने अपने बुड्ढे वाप से यह कहा पोरनों ही श्रॉग्गों में जालिम मुसुकुचना छोड़ दें। t
गुमनाम पत्र
एक लड़के ने अपने पुढे पाप मे कहा -
यार की गलियों में क्यों पर यार जा छोड़ दे।
साफ है कि हमी फ मारे हमारा क्या हाल हुआ होगा?
केन्नु हमने अपनी चुलबुली पीवी की तनियत की सेजो की
मनल के महत फरीर आ गये, और इमारतों में प्रेम की कथा
हमने अन हामिद को इस रहस्य से सचेत किया। उसने
हनरत बैरिस्टर साहब है और शिकार वाले दिन उनसे जो
गतचीत हुई थी, उसकी फिर चर्चा की। हम सन्नाटे में आगये,
और हमें शीघ्र मालूम हुआ कि कदाचित् इस सबब से पैरिस्टर
माहव ने हमारे यहाँ आना बद कर दिया है। चॉदनी को
एकदुपसा हुआ कि जैसे उसका कुछ नुक्सान।
रिन्तु वह थोड़ी देर में वोली, कि यदि आप दोनों आदमी
चुप रहे, तो में वह तमाशा दिसाऊँ, कि आप लोग जिन्दगी
र तारीफ की।
मुनाने लगे।
खुलामा यह कि पर रख दिया गया। उसका जो जगाय
श्रआया वो उसमें और भी घदे चदे शेर थे। चार पॉर ही पत्र
इम तरह श्राय गय थे, पिन भेजने वाले अपने असली
हमने बीवी से कहा कि मारो गोली, जाने दो, किन्तु वह
कठिनाई से मानी । मगर ये दूसरे हजरत भला क्यों मानते ?
उनके इस तरह लम्ये चौदे पाने लगे, कि चाँदनी ने कहा,
कि अर असभव है, कि इनके पत्रों का जवाय न दिया जाता।
जैसा कि एक औरत को
श्रत उचित जवाव लिस दिया गया,
लिसना चाहिये था।
-
जन पत्र देने, तव सिर पकडकर रह गया। उसने कहा कि ये
गया हो।
X
x
शरीर बीवी
भर याद करें । हमने कहा, वह क्या, तो उसने किसी :
बडी शरारत का उदाहरण देते हुए कहा, कि हम तुमक
पतायेंगी। उसक चेहरे पर शरारत नाच रही थी और
हंस रही थी।
उसने एक पत्र, इन गुमनाम पत्रों के लिखने वाले
उनके पत्र के जवाब में लिखा कि चूंकि आप मुझसे अ
में मिलने के अधिक इच्छुक हैं, अत आप मुझसे पोलो
मैदान में मिलियेगा। किन्तु याद रखिये कि आप वहाँ
प्रकार छिपे हुये हो, कि सड़क पर से दिखाई न पडे ( श्र
यह है कि सडक से कुछ दूर पर जो पेड है, उस पर च
पत्तों में छिप जाइयेगा । मैं अगर खुदा की मेहरबानी हुई
मगरिव के नमाज के वक्त पहुँचूंगी। दिन और तारीख
नियत ही थी । हम झट नियत समय से पहले हामिद को
वैरिस्टर साहब के यहाँ पहुँचे, और उनसे कहा, कि
मोटर पर हवा सा श्रायें धैरिस्टर साहब तैयार न हुए।
हमने कारण पूछा, तब कहने लगे कि आज मैं कह
जाऊँगा
। इस पर हम दोनों ने कहा, कि फिर हम
आप ही के यहाँ बैठते हैं । बैरिस्टर साहब चकराये और क
लगे कि भाई वास्तव मे बात यह है कि मुझे एक जगह
मुकदमें के सम्बन्ध में जाना है। हमने कहा, हम भी अ
साथ चलेगे। किन्तु चैरिस्टर माहव ने विवश होरर व
"अफसोस है, मैं कुछ ऐसे काम से शहर में ही एक स
से मिलने जा रहा हूँ, कि आप लोगों को बता नहीं सक
मुझे माफ कीजियेगा ।" जब हमने खूब छका लिया
चले आये।
५
ऊपर
।
जर उनसे कारण पूछा, तब फिर वही कहने लगे, कि शनि
होगा 'लर मे ओर क्चहरी में, मतलब यह कि किमी भी
जगह अगर कोई किमी से बहाना करें तो आपस में यह
गुमनाम पन्न
मोटर को तो हमने पोलो के मैदान से कुछ दूर छोड दिया।
हम और हामिद और दो साहब और जिनको हम सब से
पकड लाय थे, टहलते-टहलते पोलो क मैदान के उस पेड के
पास पहुंचे। लापरवाही के साथ हम पेड के नीचे आये,
जन दृष्टि उठाकर देखते हैं तव चैरिस्टर साहब लटके हुए हैं।
पारचर्य से हमने बनावट के साथ चिल्लाकर वैरिस्टर साहब
का पुकारा और साथी भी दौड कर आये । हमने और हामिद
ने घेरिस्टर साहव से कहा कि क्यों जनान, आप तो शहर में
क्सिी साहब से मिलने जानेवाले थे। आखिर उनके खिलाफ
यह क्या, कि पेड पर लटके हुए हैं। खुता के लिए जल्द इस
पहेली को हल कर दीजिये । वैरिस्टर साहन शर्म की मुसुकुराहट
से काम ले रहे थे। कहने लगे कि भई । असल में बात यह है
कि मैं आजकल तारों के परिवर्तन और उनको गति पर
विचार कर रहा हूँ। अत
एक विशेष तारे, शनि का उदय
होना देखने के लिए चढा था। हम लोगों ने एक जोर की हंसी
हँसी और अलग अलग गये कायम की। बैरिस्टर साहब न
जाने किम कठिनाई से चढे होंगे। क्योंकि जूता पहने हुए थे।
हम लोगों ने मदद देकर उतारा । अ गम्भीरता और शान्ति से
का उदय होना देस रहा था। चाँदनी ने वैरिस्टर साहब को
ऐसा शनि का ता दिखाया, कि उनकी लोगों ने बोलती ही
बन्द कर दी । यार-दोस्त, मिलने वाले, जिनको असली कारण
का ज्ञान न था, सब यही कहते थे कि न जाने क्या मामिला
१२६
शरीर बीवी
मुहाविरा चालू हो गया, कि कहीं शनि देसने तो नहीं जा रहे
हो । यहाँ तक कि चैरिस्टर साहब की नाकों में दम आ गया।
इमी प्रकार हमारी चाँदनी ने वैरिस्टर साहब को कई
जगह दौडाया। एक बार लिस दिया कि "पुराने किले के
दरवाजे के सामने ठीक मादे पॉच बजे मोटर पर मिलिएगा, में
टहलने आऊँगी । किन्तु मेहरवानी करके अकेले होइयेगा।"
हम लोग पहलकदमी के लिए निकल गये और ठीक समा
पाँच बजे वहाँ पहुँचे, वैरिस्टर साहब मौजूद थे ! हम हामिन
और एक साहब और थे, झट दौडकर मोटर में बैठ गये और
कहने लगे, भाई खून मिले । वैरिस्टर साहब ने घडी की ओर
देखा और कहा, "भाई तुम लोगों की क्या मशा है ? हमने कहा,
यही कि हवासोरी करें और घर वापस चलें । वैरिस्टर साहब
ने कहा कि मैं इतना कर सकता हूँ कि तुम लोगों को सीधा
तुम्हारे घर पहुंचा दूं, और बस । क्योकि मुझको किसी दूसरी
जगह जाना है । हमने कहा-नहीं साहब, माफ कीजिये, हम
लोग उतरे जाते हैं। यह कहकर हम लोग उतर कर एक पुल
पर बैठ गये । अब वैरिस्टर साहब बडे चकराये कि हम लोग
यहाँ से टलते ही न थे। वे यह चाहते थे, कि हम लोगों को
मोटर पर लाद मार कर कहीं फेंककर फिर लौट आयें। दूसरी
यार आये, और हमें इस बात पर राजी करने लगे, कि चलो
घर पहुंचा दें। किन्तु हम भला क्यों मानने वाले थे, वहीं बैठे-
बैठे छ बजा दिये । बैरिस्टर साहव लाचार होकर चले गये।
हम किस प्रकार बतायें कि वैरिस्टर साहब ने, इस - आकस्मिक
भेट की पन द्वारा चाँदनी से किस तरह चर्चा की ।
मतलब यह कि चाँदनी ने वैरिस्टर साहब से बहुत कवायद
कराई। कभी यत को स्टेशन पर दौड़ाया, तो कभी मीलों
.
आये। मय इन्सपेक्टर साहय से घेरिस्टर साहब की बिलकुला
जान-पहचान न थी। बैरिस्टर साहय से सब-इन्सपेक्टर साहय
ने कहा कि मैं अकेले में कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। पेरि
म्दर साहव अपने मिलने के कमरे में सब इन्सपेक्टर साय
को ले गये और कहा, “फरमाइये, क्या हुक्म है ?" इमपेक्टर
x
गुमनाम पर
१०७
'पल पलाया। सभी शिकार के लिये तैयार रिया, तो भी
ऐसी गड़यटी फर मी किम्यय न जा मफी, बोर परिस्टर साहन
ने नाते का प्रवन्ध रिया जिसे यार दोनों ने उड़ाया ।
याहा जल्द इस भूठे पन-व्यवहार मे मा भर गया, और
हमारी ममम में होने वाला था, कि पासिर कार इस प्रकार
बैरिस्टर माह से या फाय? फोई विशेष मनो
मन न होता था। किन्तु चाँदनी फाश मामिलो मे हम सभी
लोगों से अधिक दिमाग फाम करता था। हामिद के एक दोस्त
मय इन्सपेक्टर पुलिस थे, जो सिविल लाइन के थाने में दूसरे
द के अफमर थे। इनसे हमसे फेवल मामूली जान पहचान
या। मेरी पीपी ने हामिद साहर से कहकर इनसे मिलने की
इन्दा प्रक्ट की, और इनको एक दिन चाय पीने के लिये
सुलाया। इनको इम भेद की घात को बताकर हमारी चुलबुली
बासी ने जो तजबीज सामने रक्खी, यह सबको बहुत पसन्द
थाई । वैरिस्टर माहन के सभी पन चाँदनी ने उनको दे दिय ।
x
x
इतवार का दिन था, वैरिस्टर साहब अपने यगले में नाश्ता
इन्गादि से छुट्टी पार पेठे हुए थे। एक इक्का आकर रुका,
और उस पर से एक पुलिस सब इन्सपेक्टर दो सिपाहियों
१ माथ उतरा। परिस्टर साहब को सूचना दी गई ओर वे बाहर
गह क्या । 1 १२८ शरीर वीवी साहब ने ढङ्ग से अपनी जेन मे पुलिस की तलाशी रा वारन्ट निकालकर सामने रखसा, और कहा कि मैं आपके घर का तलाशी लेने आया हूँ, जिसकी इजाजत दी जाय । रिस्टर मान मामूली आदमी नहीं थे। तुनुक कर बोले, सब इन्सपेक्टर साहब ने हमारा नाम लेकर कहा, कि उन्होंने अापके और अपनी बीवी के सम्बन्ध में कुछ जवाहिरातों की चोरी के बारे में पुलिस में रिपोर्ट लिसाई है और ये पन दाग्निल किये हैं, जिनको वे बताते हैं कि आपके हैं, और मुझसे अब मुकदमे की जांच पड़ताल के लिये तलाशी लेनी है। क्योंकि उनका बयान है कि आपके यहाँ उनकी बीवी क पत्र निकलेंगे। "किन्तु ये मेरे पत्र नहीं हैं।" घेरिस्टर माहब ने मुठ पोलते हुए कहा-"यह झूठ इलजाम लगाना है।" "मैं लाचार है। तलाशी के बाद स्मय मालूम हो जायगा । क्या आप अपनी कोई लिखावट पेश कर सकते है ?" थानेदार माहय ने कहा। चैरिस्टर साहन, हालाकि कानूनदा थे, किन्तु कहने लगे, यह मेरा अपमान है । मैं हरगिज इस तरह अपनी लिखावट दिगाने को तैयार नहीं हूँ।' "माफ कीजियेगा, मैं लाचार है। और घर की तलाशी में जनान की लिग्गावट भी मुमको कहीं न कहीं मिल जायगी, जिसे में स्यय अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए ले लूंगा।' "मैं शायद तलाशी भी इस तरह न दे मा ।" रिस्टर माहन ने कहा। "माफ कीजियेगा । आप पानून-दॉ हैं और मुझे आशा नहीं कि श्राप झगड़े को अधिक तूल देगे। श्रापरो मालूम है , ने कहा। करता हूँ।" यह कह कर सिपाही को पुकारा। ना जाय, कानूनन रुरना पड़ेगा। बेरिस्टर साहब ने कहा । श्राय । सीधे कमरे में घुसे चले 'प्राये और इन्सपेक्टर माहब और बैरिस्टर साहय को घात-चीत करते हुए पाया। सब इन्स- घेस्टर साहब ने हामिद से कहा, "यह बहुत अच्छा हुआ कि आप आ गये । मेहरवानी करके साहब को सममा दीजिय।" "आप स्वय बैरिस्टर साहब से पूछ लीजिये। मैं अलग बैठ जाता हू।" यह कहकर वे बाहर आ गये, और बरामदे में देखा, जिनका विचित्र ही हाल था, और कुछ पूछने ही वाले से कहा कि जरा मेरी बात सुन लीजिये।,पहले मैं आपको सारा हाल बता दूं।" बैरिस्टर साहब का बस न था कि वे सब गुमनाम पत्र १२६ मि पुलिस अफसर को उसरी प्रफमरी के फर्तव्यों को अदा फरने से रोकना जुर्म है। मैं आशा करता हूँ, कि आप मुझको चलाती लेने में मदद देगे और अपने यया लिसा देंगे। "मैं सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस फो लिगता ।" यैरिस्टर साहर "मैं इस यीच में अपने पर्तव्यों को पूरा करने की कोशिश "आप अच्छी तरह समझ लीजिये, कि मेरी तौहीन हो रही है, और आप को जब तक पुलिस सुपरिन्टेन्डेन्ट का जवान "मैं माफी चाहता हूँ कि में एक नहीं सकता और अच्छा होता कि आप इस मामिले को तूल न देते।" इनने में मोटर की प्रावाज आई, और हामिद साहन आखिर क्या मामिला है " हामिद ९ पूछा। बैठ गये। हामिद ने बनावट के साथ आश्चर्य से बैरिस्टर साहब को थे कि यानेदार साहब फिर कमरे में घुस आये और हामिद - २३० शरीर बीवी इन्सपेक्टर साहय को इससे रोकते । सद-इन्सपेक्टर साहब ने हामिद को दूर पर कुछ अलग ले जाकर सब हाल बताया और पत्र दिसाये । वैरिस्टर साहब यह सारी वनावटी कार्रवाई देख रहे थे। इसके बाद इन्सपेक्टर साहब फिर कमरे से बाहर चले आये। हामिद का दिल तो चाहता था कि इस समय वैरिस्टर साहव से उनकी शिकार वाले दिन की घेवकूफी का बदला लेकर उनको मुफ कर सलाम करे, किन्तु इस प्रकार सेल बिगड़ जाता । उमने वैरिस्टर साहब के चेहरे और मौके को देखते हुए कहा कि अब क्या करना चाहिये । "कोई तदवीर तुम निकालो और इसको खतम करो।" कुछ देर तक चुप रहने के वाद वैरिस्टर साहब ने कहा।। हामिद इन्सपेक्टर साहब के पास आये और फिर बैरिस्टर साहब के पास जाकर कहा, कि घे। कहते हैं कि मैं बिना उन पत्रों के लिए हुए किसी प्रकार नहीं बहुत कुछ मानवी सहानुभूति और मुरौवत का परिचय दिय था और सय इन्सपेक्टर को स्वयं भी सहानुभूति थी, किन्तु लाचार थे । क्योंकि यह मामिला स्वय अफसर अव्वल अर्थात् इन्सपेक्टर के हाथ में था। बैरिस्टर साहब यह दी थी कि भाई | नजराना देकर उनको टाल इन्सपेक्टर साहन भी आ गये, और हामिद सा९५ के सामने उनसे सिफारिश की और कहा के एक बडे प्रतिष्ठित आदमी की इज्जत कामामिला है 4 इसमें नरमी और रिवायत्त से काम लीजिये और दीजियेगा कि तलाशी में कोई चीज नहीं पायी गयी। जा सकता । हामिद ने 1 1 २ वि
गुमनाम पत्र
१३१
"वाह जनान, आप मुझे फंसाना चाहते हैं। यदि ये पन्न
बैरिस्टर साहब के लिखे हुए हैं तो वे पत्र यहाँ न निकलें या
असम्भव है और हर आदमी मेरे ऊपर शक करेगा और मैं
कहीं का न रहूँगा।
"माफ कीजियेगा। मैं आपकी जो कुछ भी रुपये पैसे से
सेवा सम्भव हो, करने को तैयार हूँ।"
"हामिद साहय, मुझे बडा दुस है कि आप मुझको इस
तरह अपमानित करते हैं। मेरे काबू में होता तो मैं बिना कुछ
लिए दिये आपकी और बैरिस्टर साहब की खिदमत करता ।
किन्तु यह मामिला तो थाने के बडे अफसर से सम्बन्ध
रसता है।
"अच्छा, यह बताइये कि वे कुछ ले देकर मामिले को
खतम कर देंगे ?" हामिद ने पूछा ।
"मैं कह नहीं सकता। यह आप स्वय उनसे पूछे, तो
अच्छा है।
"अच्छा आप केवल इतना बता दें कि वे मुकदमों मे लेते
हैं १" हामिद ने कहा।
"हाँ, वे अवश्य लेते हैं, किन्तु मैं कह नहीं सकता कि इस
मामिले में उनकी क्या राय है?" सब इन्सपेक्टर साहब
ने कहा।
“यदि मानवी सहानुभूति श्राप में कुछ भी है, तो इस
मामिले को ते करा दीजिये। हामिद ने कहा।
"मैं वादा नहीं करता। किन्तु हाँ, उनसे पूरी कोशिश
करूंगा। माने या मानें, इसका मैं जिम्मेकार नहीं। किन्तु
आपको वे तमाम पर और लिखावट का नामूना परस्य देना
पड़ेगा
.
१३०
शरीर बीवी
इन्सपेक्टर साहब को इससे रोक्ते । सद-इन्सपेक्टर साहब ने
हामिद को दूर पर कुछ अलग ले जाकर सर हाल बताया और
पत्र दिसाये । धैरिस्टर साहब यह मारी बनावटी कार्रवाई देख
रहे थे। इसके बाद इन्सपेक्टर साहब फिर कमरे से बाहर
चले आये।
हामिद का दिल तो चाहता था कि इस समय वैरिस्टर
साहब से उनकी शिकार वाले दिन की बेवकूफी का बदला
लेकर उनको झुक कर सलाम करे, किन्तु इस प्रकार सेल बिगड़
जाता । उमने वैरिस्टर साहन के चेहरे और 'मौके को देखते
हुए कहा कि अब क्या करना चाहिये।
"कोई तदवीर तुम निकालो और इसको सतम करो।" कुछ
देर तक चुप रहने के बाद बैरिस्टर साहन ने कहा।
हामिद इन्सपेक्टर साहब के पास आये और फिर वैरिस्टर,
साहब के पास जाकर कहा, कि घे कहते हैं कि मैं बिना उन
पत्रों के लिए हुए किसी प्रकार नहीं जा सकता। हामिद ने
बहुत कुछ मानवी सहानुभूति और मुरौवत का परिचय दिया
था और सब इन्सपेक्टर को स्वयं भी सहानुभूति थी, किन्तु वे
लाचार थे। क्योंकि यह मामिला स्वय अफसर अव्वल अर्थात
थाने के बडे इन्सपेक्टर के हाथ में था। बैरिस्टर साहब
दूसरी राय यह दी थी कि भाई नजराना देकर उनको टाल
दो। अन इन्सपेक्टर साहब भी आ गये, और हामिद ने
चैरिस्टर साहब के सामने उनसे सिफारिश की और कहा कि-
शहर के एक बडे प्रतिष्ठित आदमी की इज्जत का मामिला है
आप इसमें नरमी और रिवायत से काम लीजिये और कहा
7 कि तलाशी में कोई चीज नहीं पायी गयी।
ने
गुमनाम पत्र
१३१
"वाह जनार, आप मुझे फंसाना चाहते हैं। यदि ये पत्र
चैरिस्टर साहब के लिसे हुए हैं तो वे पत्र यहाँ न निकलें युद्ध
असम्भव है और हर आदमी मेरे ऊपर शक करेगा और मैं
कहीं का न रहूँगा।"
"माफ कीजियेगा। मैं आपकी जो कुछ भी रुपये पैसे से
सेवा सम्भव हो, करने को तैयार हूँ।"
"हामिद साहब, मुझे बडा दुख है कि आप मुझको इस
तरह अपमानित करते हैं। मेरे काबू में होता तो मैं विना कुछ
लिए दिये आपकी और बैरिस्टर साहब की खिदमत करता।
किन्तु यह मामिला तो थाने के बड़े अफसर से सम्बन्ध
रसता है।
"अच्छा, यह धताइये कि वे कुछ ले देकर मामिले को
खतम कर देंगे ?" हामिद ने पूछा।
"मैं कह नहीं सकता। यह आप स्वयं उनसे पूछे, तो
अच्छा है।
"अच्छा आप केवल इतना बता दें कि वे मुकदमों में लेते
"हॉ, वे अवश्य लेते हैं, किन्तु मैं कह नहीं सकता कि इस
मामिले में उनकी क्या राय है ?" सब इन्सपेक्टर साहब
“यदि मानवी सहानुभूति श्राप में कुछ भी है, वो इस
मामिले को तै करा दीजिये । हामिद ने कहा ।
वादा नहीं करता । किन्तु हॉ, उनमे पूरी कोशिश
करूंगा। माने या माने, इसका मैं जिम्मेवार नहीं। किन्तु
आपको वे तमाम प और लिखावट का नामूना अवश्य देना
हैं ?" हामिद ने कहा।
ने कहा।
पड़ेगा
, - । H जिसमें १३२ शरीर वीवी "हम अभी दे देंगे। किन्तु श्राप मदद करने का वादा करे। जो रकम भी आप इस मामिले मे तै- करा देगे, वह हम उनकी भेट करा देंगे।" अत मामिला त हो गया। चैरिस्टर साहब पत्र लाने के लिये उठे, तो इन्सपेक्टर साहब भी उनके साथ उठे और कहा, कि जनाय, कोई पत्र नप्ट न हो, मेरे सामने निकालिये । विवश होकर वेरिस्टर साहर को सभी, पत्र और अपनी लिखावट का नमूना देना पड़ा। सन इन्मपेक्टर साहब ने इन चीजों को कब्जे में करके सक्षेप मे वैरिस्टर सहाय के तहकीकात बयान लिए, वेरिस्टर माहब ने हर बात से इन्कार किया। चलते समय 'तक सब इन्सपेक्टर साहब से पछा वादा ही नहीं कराया गया, बल्कि उनके साथ थाने पर गये और मामिला इस तरह तय हुआ कि पॉच मौ रुपये वेरिस्टर साहब नजर दे । हामिद लोटकर आये, और सन इन्सपेक्टर साहय की सिफारिश और कोशिशों का हाल-वतार के कहा कि वडा दारोगा तो दो हजार से किसी तरह कम नहीं करता,था। "सचमुच सर इन्सपेक्टर साहब बडे अच्छे प्रादमी मालूम होते हैं। किन्तु भई, आज उन्होंने यह काम किया कि जिन्दगी भर तक एहसानमन्द रहूँगा। मैं बस शीघ्र ही उनको एक दावत दूँगा"--हामिद ने कहा । "अवश्य देना चाहिये। सचमुच इन्होंने मेरी इज्जत घचा ली।" वैरिस्टर साहब ने -“भई हामिद माफ करना! तुमने देख लिया न कि तुम्हारे दोस्त की बीवी कैसी है।" "मैं उनको अच्छी तरह जानता हूँ। किन्तु सच बताना कि क्या पत्रों ही तक दोस्ती सीमित रही, या " - १ कहा-
आश्चर्य मे पड़े। हम उनसे बड़ी अच्छी तरह मिले, और मजा
और चॉदनी और हामिद थे। चाँदनी ने बैरिस्टर साहब से
"यह मुझसे आप न कहलवाइये।" वैरिस्टर साहर ने
गुमनाम पत्र
कहा, "यह तो केवल सयोग था, कि शायद मेरा कोई पन पकड
लिया गया किन्तु मैं तुमसे आज कहे देता हूँ, कि वह औरत
अब उनके पास न रहेगी।"
"क्यों "
"इसलिये कि वह अब मेरी हो चुकी।"
बैरिस्टर साहब ने बहुत जाद पांच सौ रुपये इन्सपेक्टर
साहन की सेवा में भेज दिये।
x
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इस घटना को पन्द्रह-बीस दिन हो चुके थे, और चैरिस्टर
साहय से हमारा बिलकुल मिलना-जुलना बन्दु था । हामिद के
यहाँ आज वडे ठाट पाट का डिनर था, और मजा यह कि
चोदनी और हम दोनो बुलाये, गये थे । वास्तव मे यह डिनर
हामिद के दोस्त सब इन्सपेक्टर साहब की आवभगत में था ।
हम और चाँदनी, शाम होते ही हामिद के यहाँ जा पहुंचे।
वह ता जनानसाने में हामिद की माँ और बहनों की दावत के
इन्तजाम मे हाथ बँटाने चली गई, और हम और हामिद
चाहर गप्पें लड़ा रहे थे।
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-
बेरिस्टर साहब भी आये, और हमको देखकर अधिक
तो तर पाया जबकि चाँदनी भी आ गई। कमरे में केवल हम
हाथ मिलाया और उनकी तबीयत का हाल पूछा और उनसे
पई दिनों से भेंट न होने की शिशयत की। परिस्टर साहय झा
। १३४ शरीर बीवी विचित्र हाल था, और उनकी बुद्धि काम न करती थी, कि इलाही यह क्या माजरा है। सैर, कुछ भी हो, किन्तु वे भी मुनासिब बातें करते रहे। हमारी बीवी इस समय प्रसन्नता और बातों का सजाना बन रही थी, और उसका सारा ध्यान वैरिस्टर साहब की ओर था। किन्तु वैरिस्टर साहप का कुछ विचित्र ही हाल था। थोड़ी ही देर में चाँदनी घर में चली गई। हम दो एक मेहमानों से बातें करते हुए बाहर चले गये। बैरि- स्टर साहब ने आश्चर्य से हामिद से हमारी और चॉदनी की मौजूदगी, और फिर इस प्रकार के अच्छे घर्ताव का कारण पूछा। हामिद ने कहा कि तुमको दावत के वाद स्वय ही मालूम हो जायगा। वैरिस्टर साहब बहुत ही प्रसन्न थे और हामिद से उन्होंने इस विचित्र मामिले को सुलझाने की बहुत कोशिश की, किन्तु हामिद ने न बताया, न बताया ? ५ दावत वह ठाट-बाट की थी, कि बहुत दिनों से ऐसी दावत साने को कौन कहे, देखने को भी मिली होगी। लगभग चालिस मेहमान थे, और मिलने-जुलने वालों, यार दोस्तों और प्रेमियों में से ऐसा कोई न था, जो मौजूद न हो। तरह तरह के अगरेजी और हिन्दुस्तानी साने थे। और वे भी इस तरह ज्यादा कि समझ में न आता, कि क्या साऊँ और क्या न साऊँ ? दावत बडे आनन्द के साथ खतम हुई। और दावत सतम हो जाने पर हामिद ने सबसे पहले चाँदनी के स्वास्थ्य के नाम पर एक-एक प्याला पीने की सलाह दी। इस पर फह- कहा लगा और लोग उसकी असलियत समझने से लाचार रहे । हामिद ने कहा कि अच्छा, आप लोग इस पर इतना आश्चर्य करते हैं तो जाने दीजिये, और मेरे निवेदन पर इस -
सिसा रक्सा था। उन्होंने बैरिस्टर साहय को इतना धन्यवाद
दिया कि बैरिस्टर साहब भी आश्चर्य में पड़ गये। इसने में
मामिला है। श्रत हामिद ने हमारी बीवी का वह पत्र पढ़कर
स्टर साहब क्यों न शनि का उदय होना देखते ? बैरिस्टर
सुनाया, और सुनने वालो से कहा, कि बताइये, कि बैरि-
रुपये ग्यारह आने दावत में सर्च हुए चार सौ बीस रुपये
पाँच आने यह हाजिर हैं, जो चैरिस्टर साहब को लौटाये जाते.
गुमनाम पर
१३५
दावत के लिए कृतज्ञता प्रगट कीजिये । इस पर कई साहन
हंसने लगे और हामिद को धन्यवाद देने लगे कि सचमुच
हम कृतज्ञ हैं कि आपने ऐसे ठाट बाट की दावत दी। हामिद
ने पौरन कहा कि हजरत, आप लोग मुझ गरीब के लिए
कृतज्ञता क्यों प्रकट करते हैं ? आप लोग वास्तव में वैरिस्टर
साहब को धन्यवाद दें। लोग हमने लगे और बैरिस्टर साहन
की ओर आकर्षित हुए। दस पाँच को पहले ही से हामिद ने
एक मुसिफ साहब जोर से चिल्लाकर बोले कि भाई आखिर
यह कौन सी पहेली है, जिससे आधे लेग तो परिचित मालूम
होते हैं और पूरा आनन्द ठा रहे हैं, और बाकी बेवकूफ
इस पर हामिद ने सबको शान्त करके असली किस्सा
सुनाया | शनि सितारे को देखने के लिए चैरिस्टर साहब जब
पेह पर थे, तब किसी को समझ में न आता था कि क्या
साहब का विचित्र हाल था, कि काटो तो बदन में खून नहीं।
इस पूरे फिरसे को सतम करने के बाद सब इन्सपेक्टर साहय
की कोशिश का हाल सुनाया और पांच सौ रुपये वसूल होने
की चर्चा करके कहा कि जनाव, पाँच सौ रुपये में से अस्सी
वने हुए हैं।
.
१३६
शरीर बीवी
हैं और आप सब लोग हृदय से वैरिस्टर साहब को धन्यवाद
दीजिये।"
इस पर नो वह मजा आया, कि शायद ऐमा कभी न आया
था। जिनको पहले ही से बता दिया गया था, उन लोगों ने
पैरिस्टर साहब को धन्यवाद देते-देते नाक में दम कर दिया।
बैरिस्टर साहब शोघ्र ही भाग गये और किसी तरह न रुके ।
वडी देर तक इसी घटना पर आपस में बातें होती रहीं, और
सभी दूसरे किस्से भी कहे गये । इस दावत में बहुत से लोगों
की हमारी धीवी की ओर से विचार बदलने पडे । खुलामा 'यह
कि दावत बडे जोर की रही।
x
अफसोस, कि वैरिस्टर साहव इम स्थान से इस तरह
नाराज हुए, कि अपनी जमी जमाई प्रेक्टिस को छोडकर इस
घटना के बाद ही अपने देश चले गये और फिर डेढ साल तक
तो हम वहाँ रहे, किन्तु तन तक तो वे आये नहीं ।
x
.
TI
r
। आठवा परिच्छेद
दोस्त की वेवकूफी
पुराने और लंगोटिया दोस्त' दो तीन ही थे, जिनमें
थे, जिनके शहर में हम रह चुके थे,'ओर एक
। किस्मत की सूची कि श्रयं उनका साथ हुआ। हम
सक्ते कि हमें उनसे कितनी मुहन्नत थी, और जब
उनके शहर में आये, तब उन्होंने हामिद से भी अधिक
-
दोस्त की बेवकूफी
२३७
हमारी और चाँदनी की आवभगत की। हामिद की तरह ये भी
रईस के लडके थे। स्न्तुि उनके पिता जीवित थे। हामिद में
और इनमें यदि कोई अन्तर था, तो केवल यह कि हामिट को
सैर और शिकार से प्रेम था और वह अपनी जायदाद का
स्वय प्रयन्य करता था और यदि एल० एल० बी० में फेल न
हो जाता तो शायद वकालत करता। किन्तु विचार अवश्य
था कि फिर इम्नहान दें। लेकिन फामिल ने एन्ट्रेन्स पाम कर
के ही पढना छोड दिया था और उनको अपनी जायदाद फे
काम इत्यादि से कोई दिलचस्पी नहीं थी, किन्तु हमारे सम्बन्ध
दोनों से एक समान थे । जिम तरह हामिद हमारे और
हमारी बीवी के लिये एक श्रावश्यक चीज थे, उमी तरह
कामिल भी थे।
जन से हम आये थे, हमें और चॉदनी दोनों को इनके
'चिना आनन्द ही न आता था। हम क्लर मे जाया करते थे
और कामिल हमारी चॉदनी को अपनी बहनों के माथ मोटर
में बैठाकर हवा सिलाने ले जाते थे। कभी अपनी बहनों को
बैठाकर हमारे यहाँ आते और चाँदनी साय ही जाती और
कमी चाँदनी को घर ले जाते और वहाँ अपनी बहनों को भी
साथ में ले लेते।
१
किसी ने सच कहा है कि आदमी की परस उसके साथ
व्यवहार करने से मालूम होती है। कुछ दिनों बाद मालूम
हुआ, कि कामिल के स्वभाव मे बुरी बातें और प्राचारगी है।
हमें यह सुनकर दुस अयश्य हुआ, किन्तु हमने कभी उसको
प्रकट न किया । यास्तव में हमें कभी कुछ ख्याल भी न हुआ।
शरीर पीपी और हमने कभी चाँदनी से यह भी न पूछा कि तू कहाँ रही है। कामिल के बारे में हमने जो पात सुनी थी, इसमें यात से तरकी हुई कि अधिक दिन नहीं बीते थे कि दिन चाँदनी ने कामिल की चर्चा केवल पाती ही चार कहा कि कामिल साहब कुछ अच्छे आदमी नहीं मालूम हो मुझे उनके साथ हवासोरी के लिये जाना ठीक नहीं म होता है। हमने इस बात को सामने रख कर उनकी चाल-चलन विचार करते हुए चॉदनी का समर्थन किया, किन्तु यह अ- पूछा कि "तुमने उनके चाल चलन के बारे में किससे सुना "वे मुझसे आवश्यकता से अधिक मनोरजन करने है और ज्यादा हिलने मिलने की कोशिश भी करने लगे है. मुझको पसन्द नहीं।" हमने कहा-"तुमसे हामिद से भी अधिक मिलना-जुन था। क्यों, वे तुमसे मनोरजन नहीं करते थे। "हामिद भाई-सा आदमी मिलना तो दुनिया में मुरि है । सब कुछ था, किन्तु वे अकेले में मेरी ओर ऑस उठ- देसना पाप समझते थे। उनके मिलने-जुलने में और का साहव के मिलने जुलन में अधिक अन्तर है।" हमने पूछा- "आखिर वह क्या अन्तर है ?" चाँदनी ने कहा, 'मेरी समझ में नहीं आता। किन्तु । अन्तर है, कि मेरी तबीयत उनकी ओर से उदास रहती है। हमने कहा कि तुमको इस बात का अनुभव आज है होगा। किन्तु मुमको कदाचित् कुछ पहले ही से सन्देह है वे मेरे कारण तुमसे नहीं मिलते, बल्कि सच बात तो यह
'कितु बुरे आदमी से दूर ही रहना चाहिये।"
दोस्त की येवष्फी
१३०
कि तुम्हारे कारण मुमसे मिलते हैं। मैं स्यय इम विचार में हूँ
कि तुम्हारा उनसे मिलना-जुलना पम हो जाय तो अच्छा है।"
चाँदनी के मन्देह की पुष्टि हुई, और यह आश्चर्य
में पड़कर घोली, "सुदा की कसम, में उनको भी ऐसा न
समझती थी।"
"वे वास्तव में यदतमीज और आवारा हैं, और तुम्हाग
उनसे मिलना-जुलना किसी तरह ठीक नहीं।"
यह सुनकर चाँदनी शोध से नाच उठी और कहने लगी,-
"माफ कीजिये, उनकी आवारगी शहर की गन्दी गलियां
ही तक सीमित रह सकती है। मेरा ये क्या बिगाड
"तू सच कहती है। हमने दिल में प्रसन्न होकर कहा-
"वे दिन भूल गये, जब कहते थे, कि धुरी मगित में उठने
ठने से तुम्हें नुकसान न पहुँचेगा।" बॉटनी ने पुगनी धातों
ने याद दिलाया। हमने कहा, "तो तुम जानो, हम तुमको
“तुम मना कर दो, तो मैं हरगिज उनसे न मिलू।" उसकी
से चमकने लगी और उसने हाथ उठाकर कहा-"ठीक पर
सकते हैं ।
कते थोड़े ही है।"
गी"
"इससे क्या मतलब ?" हमने पूछा।
“यदि वे मचमुच कुछ भी आधारा हैं तो तुम मुझसे पहले
की तरह मिलने दो। यदि कभी जरा भी गलत रास्ते पर
- रसेंगे तो वह मुहको सायेंगे कि जिन्दगी भर न भूलेंगे।"
हम चुप हो गये । हम जानते थे कि यह सैरख्याही बिल
समय
१४०
शरीर बीवी।
कुल थोडे सिद्धान्तों पर कायम है। किन्तु हम चाँदनी की
मुहब्बत और सच्चाई का श्रेष्ठ मूल्य इसी प्रकार चुकान
अच्छा समझते थे कि साधारण सिद्धान्त से अलग रहते हुए
'बिलकुल निराश न हो। खुदा जाने, इगलिस्तान के विख्यान
कवि 'मिल्टन' ने अपने सुप्रसिद्ध ना कोमिस' में किस
"किस जगह की भाषाओं का प्रयोग किया है कि उनको पढन
से हमारी तो जान तक सदा के लिये पवित्र, बन गई । इसक
कारण कदाचित् यह है कि इस सुन्दर कवि का, सा चाल-चलन
कदाचित् ही किसी को मिला, हो,। उनकी नेक चलनी की दम
उनकी कविता के शब्द शब्द से प्रकट है। हमारे कानों में इन
वे शब्द गूझ रहे थे, जो उस नाटक में एक भाई
दूमरे भाई से बहन के सो जाने पर कहे थे। "हमारी बह
हर प्रकार की मुसीबतों से सुरक्षित है । क्योंकि सम्पूर्ण अन्-
कार की अपवित्रता उसकी आवरू और परहेजगारी के प्रका
के सामने कोई चीज नहीं । उनके पास परहेजगारी के डा
है, जो वह चीज है कि यदि उसकी प्रानरू की निगाह शैता
के ऊपर पड जाये, तो वह फरिश्ता बन जाय, और यदि गुरु
के साथ वही पत्थर पर पड़े तो फट जाये और यदि फौल
पर पड़े, तो मोम हो जाये, इत्यादि, इत्यादि ।" दुर्भाग्य
सौभाग्य से, यही हमारा मजहब था और इस समय भी
हम जानते थे, कि चाँदनी और हम वास्तव में एक जान
दो शरीर हैं। हमारी बुद्वि में ही यह बात आनी गैरमुमावि
'यो, कि फिर भी हम दुनियादारी बरतनी चाहिये । और
सिद्धान्ता से पहरेज' करना चाहिये, जो प्रत्येक अवस्था
उचित हैं। हमारा ईमान सदा से यही है कि हम दोनों
ईमान नष्ट होने से पहले स्वय हमें उसका आभास मि
को। वास्तव में वे इस योग्य ही न थे कि उनसे स्सिी दोस्त
का पीवी मिले। यास्तव में हमे इस मामिले को यहीं रोक देना
चाहिये था। किन्तु हमने भूल की और प्रचलित सिद्धान्त से
अलग हटकर दूसरा रास्ता पकडा। इसका कारण हम वता
चाँदनी दाँत पीस रही थी, कि मजा चखा दूंगी और हम भी
चाहते थे कि कुछ स्वय उसे और कुछ मियाँ कामिल पो
अनुभव प्राप्त हो। हमे अव मालूम होता है कि हम सतरनाक
"कल दोपहर को जब तुम कचहरी मे रहोगे, तब उन्होंने
आने का कहा है। सिर हिलाकर यह बोली और फिर मुसु-
करने लगी। फिर देखता क्या हूँ कि उसकी ऑसा ने शरारत
प्रकट की और वह कुछ सोच चुकी थी।
"तू क्या करेगी? हमे बता तो सही" हमने पूछा।
अवश्य पहुँच जाना। आधे दिन की छुट्टी ही सही। स्वय ही
उन्होंने आने को कहा है। मैंने कोई जवान नहीं दिया। किन्तु
इतना जानती हूँ कि वे जरूर आयेंगे।"
दोस्त की घेवकूफी
१४१
नायगा, वास्तव में यही विचार था, जिससे हमारे विश्वास
मजबूती पैदा न थी।
जिसका हमें सन्देह था वही सामने आया। हम पहले
यह समझे हुए थे कि कामिल कोई न कोई बेवकूफी अवश्य
गे। उन्होंने हमी होहमा में एक दिन अकेले में चांदनी
को गोद में लेकर मोटर पर दिया और जब देखा कि
चाँदनी ने धैर्य से काम लिया, तर रास्ते में बेहूदी बातें भी
जुआ खेल रहे थे।
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२४२ शरीर बीवी हमारे दोस्त कामिल ठीक एक बजे हमारे मकान पर पहुंचे। आफर मिलने के कमरे में बैठे। हमारी चुलबुली बीवी ने जान बूझकर वीस मिनट आने ही में लगा दिये । वह सिर में एक रूमाल इस तरह घाँधकर पाई कि जैसे सिर में दर्द है और मुह भी वैसा ही बना लिया। कामिल ने सलाम बन्दगी के बाद उठकर हाथ मिलाया और तबीयत का हाल पूछा । मालूम हुआ कि सिर में दर्द है तो कहने लगे कि लाइये में सिर दवा हूँ।" कहा ही नहीं बल्कि उठकर सिर दबाने की अधिक उत्सुकता प्रकट की। चाँदनी को जान सुलग उठी और यह हरकत उसको बहुत बुरी मालूम हुई। किन्तु उसने प्रकट न होने दिया और धन्यवाद देकर के कहा कि आप तकलीफ न करें। अन्त में कामिल साहब ने वह काम कर डाला जिसके लिये वे आये थे। बातों ही बातो में चाँदनी का हाथ अपने हाथ में लेकर बोले, क्या कहूँ, बिना आपके साथ के मेरा जी हो नहीं लगता। चाँदनी ने अपना हाथ तो खुजाने के बहाने से छुडा लिया और फिर बहुत ही सरलता के साथ कहा "मिलने जुलने से आपस मे लगाव हो ही जाता है । मुझको स्वय आप की प्रशसित अच्छी आदतें बडी प्रिय लगती हैं।" इतना कहना था कि हामिद साहब ने अधिक स्पष्ट होकर आपसे बहुत ज्यादा प्रेम है।" कि इन खुराफातों की प्रतीक्षा कर रही थी, अत २ कुछ आश्चर्य न हुआ। उसने बहुत ही साधा कहा-"बहुत ही कम दिल हैं, जिनमें इस तरह के ।। सचमुच वह दिल ही क्या है, जिसमें न हो, याप की मुहब्बत न हो या बहनों की मुर की खुदा 1 5 ,
-
दोस्त की बेवकूफी
१४३
हो और या दोस्त की मुहब्बत न हो । वास्तव में मुहब्बत और
प्रेम मे पद के मुतानिक सभी का हिस्सा है।"
कामिल येवकूफी के मैदान में इस तरह और आगे बढे-
"आप भूली हैं। इस दिल में आपकी मुहब्बत के अलावा
और किसी की मुहब्बत नहीं।"
न जाने क्या गलतफहमी हुई कि नौकर की आवाज को
सुनकर, "मैं अभी हाजिर हुई। कहकर बाहर आई, और बहुत
ही बनावट के साथ घबराकर कमरे में गई और रहस्य भरे स्वर
में कामिल से कहा, "वे आ गये, जल्दी कीजिये । गुमुलसाने
में।" उसने यह पार्ट इस तरह घबराकर और जल्दी के साथ
किया, कि जैसे ही उसने कामिल का हाथ पकड़कर गुसुलसाने
का दरवाजा बताया, बिना कुछ सोचे समझे उसमे घुस गय
और उसने दरवाजा बाहर से धन्द कर लिया ।
वास्तव में देखा जाये तो कामिल को छिपाने की आवश्य
कता न थी और न उसका ऐसा विचार ही रहा होगा। लेकिन
चूँकि दिल में चोर था, अत. उसी घौसलाहट में बन्द हो गये।
हम कमरे में आये । मोटर थाहर देख ही चुके थे। अपनी
चुलबुली योगी को मुसुकुराती हुई पाया। हमने कोट उतारफर
पूछा कि हमारे दोस्स यहाँ है ?
चाँदनी ने मुसुफुराकर कहा, "टापे में ।" और गुसुलसाने
की ओर इशारा किया। और हमारा हाथ पकड़कर अपने साथ
लिया । हम दोनों दबे पॉच मिलने वाले कमरे से होकर गुसुल
खाने के पास पहुँचे। चाँदनी ने धीरे मे गुमुलग्याने के दरवाजे
पर उँगली मारी और दयी आवाज मे शामिल यो पुकारा।
उन्होंने जवाब दिया, तो उनसे कहा कि "मैंने पह दिया है
आपकी माता जी ने शोफर को मोटर लेकर मुझे मेने भेश
१४४ शरीर बीवी है। किन्तु मोटर विगड जाने के कारण वह चला गया और अभी तक लौटकर नहीं आया।" कामिल ने इस बहाने को पमन्द किया। फिर हमारे समय से पहले चले आने का कारण पूछा । जिसका जान चाँदनी ने दिया, कि "मेरे सिर दर्द के कारण चले आये।" इसके बाद उन्होंने कुछ बेवकूफी से भरी बातें पकनी शुरू की तो वह गुसलस में क्प्ट पाने के लिए मॉफी मांगने लगी, जिसका जवान उन्होने यह दिया कि "हमको इसी मे धाराम है।" हम दोनों हंसते हुए आये, अन हम यह मोच रहे थोकि इनका भला कब तक बन्द करके रक्खा जायगा। न 1 ३ चॉदनी ने व्यौरेवार कामिल की वेवकृफियो की चर्चा की। तीसरे पहर तक बातें होती रहीं। चाय तैयार हुई तो चाँदनी ने चाय की एक प्याली फामिल साहब को गुसुलसाने मे पहुँचाई। उन्होंने धन्यवाद, का, जब पुल बाँध दिया, और वेवकूफी की बातें शुरू की, तन उमने एक कागज और मिल देकर कहा, "अपने शोफर-को लिख दीजिये कि आपके दोस्त को हवा, सोरी के लिये ले, जाय । मैंने कहा है कि मैं आज कहीं न जाऊँगी।" साफ बात है कि कामिल साहब ने उससे कैसा मतलब लगाया होगा। आध घण्टे बाद शोफर आ गया, हम और चॉदनी कामिल को गुसुलसाने मे बन्द छोडकर उनके मोटर मे हवा साने चल दिये। शाम को जब लौटकर आये, तव सीधे गुसु- लसाने के पास पहुंचे। कामिल को चाँदनी ने लक्ष्य , करके कहा, माफ कीजियेगा। मैं आपको इस कैदसाने में छोड़कर जाने के लिए विवश हुई । क्योंकि मुझे विवश हो जाना पड़ा।" . .
में लाये और चाँदनी, को दिसाकर कहा, "आसिर यह प्याली
कामिल साहब को भी पेश किया कि ये तो प्रति-दिन आते हैं
"अच्छा अच्छा, मगर यह तो यताइये कि में कल दोपहर
निकले । हम कमरे ही कमरे से निकलकर पहले ही से मोटर
के पास जाकर खडे हो गये । हमे देसकर वे कुछ झिमक से
"कामिल तुम्हारी तबीयत का हाल पूछते हैं।" नये सिरे से
चाँदनी से और उनसे सलाम वन्दगी हुई और तबीयत का हाल.
चाल पूछा गया। कठिनाई से हमने हसी को रोका। हम गुसल.
साने में हाथ धोने के बहाने से गये, और चाय की प्याली कमरे
दोस्त की घेवकूफी
कामिल ने कहा, "कुछ मुजायका नहीं। कि तु अय मेरा
जी पपड़ा उठा है। दोपहर से धन्द है। अच्छा, सच पताइ
रेगा कि आपको आज की हवागोरी में अधिक आनन्द आया
या मेरे साथ अधिक आनन्द आता है।"
चाँदनी ने शरारत पी गरज से किन्तु बहुत ही ईमानदारी
के साथ कहा, "खुदा जानना है। और यह कहकर कहा कि
मैं दरवाजा खोले देती है। आप धीरे से निकल जाइयेगा । आपकी
मोटर इस ओर सड़ी हुई है।"
-
में आऊँ ?" कामिल ने
वादा कर चुनी हूँ।"
पूछा
वह बोली-"कल शाम को आइयेगा। मैं आपकी बहन से
हमने कमरे से देखा कि कामिल जल्दी से गुसुलसाने में से
च्छे, किन्तु फौरन बोले, "वाह तुम इधर हो । मैं तो तुमको उधर
हमने भी चाँदनी को आवाज देकर बुलाया कि देखो,
से देखकर पा रहा हूँ।"
.
वहाँ कैसे पहुँचे ?" इसका जवाब उसने यह दिया, कि यह
प्याली तो वहाँ कई दिन से रक्खी हुई है । और गवाही में
-- ? V । 17 १४६ - शरीर वीवी और देखते ही होंगे। इन हजरत ने भी शीघ्र ही झूठी गवाहा दे दी। हमने चाय की ताजी पत्तियों का चूरा और चाय की इस वीस वूदे दोनों को दिखाकर कहा, "क्या खून ? चोरों के गवाह गिरहकट। यह तो। आज की मालूम होती है ।" कामिल कुछ सिटपिटा मे गये। और हमने देसा, कि उनका चेहरा फक सा हो गया। चाँदनी ने किस्से को इस तरह सतम किया कि-आपको क्या ? जिसका जी चाहे गुसुलसाने मे पीये, और जिसका जी चाहे मेज पर पीये ।। थोड़ी देर बाद कामिल चले गये। किन्तु इस याद की प्याली की चर्चा के समाप्त हो जाने से। उन्हें जिस तरह इत. मीतान हुआ वह देखने के योग्य था। दूसरे दिन हम शाम को लव से आये और कपडे । इत्यादि उतारकर , चॉदनी की प्रतीक्षा करने लगे जो मामिल की बहने से मिलने गई थी । हमने बहुत कुछ। मना किया था कि श्रव नू इस तरह न जा । किन्तु वह कहती थी कि अब तुम रहने दो। इतने में मोटर की आवाज सुनाई पड़ी, जो सीधी कमरे के सामने आकर रुकी। हमने देखा कि चाँदनी हमारे या फामिल के मोटर का दरवाजा खोलने का इन्तजार न करके स्वय झट दरवाजा सोल करके तेजी से उतर पड़ी । कामिल ने मोटर का इञ्जिन चलता हुआ रखा था। उन्होंने 'उसको मोडा, और हमे जोर से पुकार कर 'गुडनाइट कहा । और माटर यह गई, वह गई। ril चाँदनी कमरे में पाई और हम पूछने ही वाले थे कि कोई नई बात तो नहीं हुई कि उसका चेहरा' गुस्से से लाल भागई। किन्तु उसने कहा, "हम नहीं बताती। जब हम अपने छोड दो।" यह कहकर फिर कन्धा हिलाकर कहा-"कुछ हमने कहा-"बताओ दोस्त, आज कैसी कटी ?" "हट जाओ।" उसने तुनुक कर कहा, "हम नहीं बताती।" "अच्छा हम किसी से न कहेंगे। तुम हमारे कान में चुपके से कह दो। यह कहकर हमने अपना कान उसके "तुम्हें बताना पडेगा।' यह कहकर हमने बहुत कुछ सींचा, ओर घसीटा, किन्तु वह बरावर यही कहती रही कि दोस्त की येवफूफी १४७ देसा। ऑसों में ऑसू थे। समझ गय और हमने ध्यान से चेहरे को देखकर एक जोर का कहकहा लगाया और कहा, कि अच्छा तेरी शरारतों को यही सजा है। यह कहकर हमने छेडने के लिये कन्धा हिलाकर पूछा--"क्यों दोस्त, फिर जाओगी, "हाँ जाऊँगी. यह कहकर चांदनी ने हमारा हाथ झटक देया-"हमें बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा है।" हमने फिर हँसकर कहा-"हम कहते थे, न कि शरारतें ताओ तो दोस्त आसिर क्या हुआ? दॉत पीसकर मुट्ठी बाँधकर -उसने जलकर कहा--"जब क इस कमीने से मैं वदला न लगी मुझे चैन न पडेगी। मैं इरगिज उससे मिलना न छोड्गी।' मुँह के पास कर दिया। . 7 - । चॉदनी का गुस्सा 'रफूचक्कर हो गया और उसे हँसी दुश्मन से बदला ले लेंगी, तब बतायेगी।" हम नहीं बताती।"--" हमने कहा--"दोस्त, तुम यतानो या न बताओ हम तो 1 - समझ ही गये हैं।"
, १५० शरीर धीची उसने महसा कुछ प्राहट से उसकी जब आँस खुली, तब अपने मुँह के पास कामिल का मुँह पाया । वे उस पर मुके हुए थे, लाचारी की दशा में उसके मुंह से एक चीस निकल पडी, और वह तडपकर उठी। कामिल कुछ घबडा गये । चाँदनी ने बड़ी कठिनाई, से अपने को संभालते हुए कहा, "चलिये मिलने वाले कमरे में चलिये । मैं अभी आती है।" "किन्तु सुनिय तो" यह कहकर चॉदनी की ओर बढे । चॉदनी ने बडे, पौरुप और साहस-से, काम लिया । वह इस तरह घयडा गई थी, कि सभी शरारतें भूल गई, और हाथ- पैर फूल उठे थे। अकेले कमरे मे जहाँ कभी कोई घर का नौकर तक भी न जा सकता- हो, वह एक आवारा और बदचलन आदमी के साथ-थी, जिसको उसने अपनी ,शरारत का शिकार बनाने के लिये आने की स्वय इजाजत दी थी। उसने कहा, "मैं मुंह धोकर अभी हाजिर हुई।" यह कहकर वह तेजी से पर्दा उठाकर निकल गई । उसका कलेजा 'धक धक हो रहा था कि कामिल: रुक गये, और उसके पीछे न गये। चॉटनी ने मुह धोया। वह तौलिया से हाथ पोंछ रही थी, किन्तु उसका शरीर कॉप रहा था और अब तक दिल काबू में न आया था, और वह हद से ज्यादा परेशान थी।। उसने एक गिलास ठण्डा पानी पिया, जिससे उसका उछः लता हुआ दिल रुकाः। वह मन में अपनी कमजोरी पर हसी और उसने कहा कि वह नालायक मेरा क्या विगाड सकता है ? वह अब बिलकुल ठीक थी और बिना किसी डर या परे शानी के मिलने वाले कमरे में पहुंची । उसने कमरे के चायें ओदेसा, सभी दरवाजे खुले हुए न होकर बन्द थे । क्योंकि कामिल ने सभी दरवाजे मजबूती के साथ वन्द कर दिये थे। । J ।
था।यह फर ठिठकी कि कामिल ने मुमुकुराकर कहा- देंग्यता हुअा। मी कि शेर आ रहा है, अपनी जगह से हिल डुल नहीं मकता । वह चुपचाप थी और उससे कुछ जवाब ही न जाने किम कोशिश के साथ उसने कहा-"पानी देने की मेहर- पानी कीजियेगा" और सुराही की ओर हाथ उठा दिया। कामिल ने पानी दिया। पानी पीकर कामिल को गिलास लौटा निया । कामिल ने देसा, कि चॉदनी के हाथ कॉप रहे है निसका पदाचित उन्होंने गलत अर्थ लगाया और गिलास को की तरह चुप थी और उन्होंने उसका हाथ अपने हाथ में ले दोस्त की पेपफूमी यह देगार उमका पौरुप और माहम फिर छूटता हुआ मालूम हुआ। न जाने वह क्यों इम तर घबड़ा रही थी। उसने घडी की ओर देगा तो टेड यजने में आठ मिनट बाकी ये। इसको घर इम कमरे में फामिल के साथ डर लग रहा 'आइये। य श इम ममय उनके पानी में हथौडे की चोट की तरह लगे, जिमको सालि तक पहुंची और माय हो, उसे यमजोरी भी मालूम हुई। किन्तु उसने अपने दिल को फिर मजनून बनाया और एक कुर्मा घमीट कर अलग बैठ गइ । कामिल ने सनाटे को भग किया और बातें करते करते वे धीरे धीरे मिसिर उसकी , फुर्सी की ओर बढ़ने लगे। इस समय पानी की विचित्र हालत थी। वह उस जानवर की तरह थी, जो शेर को देखकर ऐसा अधीर हो उठता है कि गाने को भी छोड़ देता है और यह M बन पड़ता था। दिल बुरी तरह धडक रहा था और। भोठा बिल कुल सूये हुए थे। जय कामिल बिलकुल करीब आ गये, तब न
१५४
शरीर बीवी
अलग किया, तब शरीर मे ताकत, ही न थी । आँसे वन्द थर्थी
और सॉस बढी तेजी से चल रही थी।, हालाकि, जाडे का
मौसम था, किन्तु सारा चेहरा पसीने से तर था। हमने उसको
इम बेहोशी की हालत में सोफे,पर लिटाया । नाडी देखी तो
बहुत धीरे धीरे चल रही थी। हमने, जल्दी से पूरा हाल
सक्षेप में एक कागज पर लिसकर नौकर को डाक्टर साहब के
पाम दौडाया।
साधारण बेहोशी थी, डाक्टर साहब की एक ही "खूराक
के बाद चाँदनी बिलकुल अच्छी हो गई। डाक्टर साहब' चले '
गये थे और थोड़ी ही देर में बातें करते-करते उसका 'चेहरा
शरारत और अपनी सफलता पर चमाने लगा। वह लेटे लेटे
धीरे-धीरे हस हँस कर जो कुछ हुआ था, अब सुना रही थी।
हमें अपनी बेवकूफी का अनुभव हुआ और उसको अपनी
शरारतों को सोचकर' कँपकँपी सी आ गई। किस्मत थी कि
आज वह न जाने किम' मुसीवत से बच गई। लोगों को चाहिये
कि वे इस घटना से नसीहत लें और मॉडरेट ढङ्ग से
-7
घन्टे भर के बाद चाँदनी की तेजी और फुरती, शरारत के
साथ सब उसी प्रकार लौट आई। वह सीधे हमें, गुसुलसाने
के पास ले गई। उसने दरवाजे पर उंगली मारी और भीतर
से कामिल साहय बोले, "कहिये, सैरियत तो है।"
"खुग को धन्यवाद है, सर मैरियत से बीता।"चॉदनी
ने हमकर कहा-"माफ कीजियेगा। मुमको बडी देर लगी।"
"यहाँ एफ गधा है।" कामिल ने हसकर फहा।
"म्बुदा के लिय इतनी आजिजी से काम न लीजिये ?
काम ले।
..
"
- 7 - - F L - मगर तक न ली। मगरिन के बाद चांदनी ने गुसुलसाने के पाम जाकर कहा-"माफ कीजिएगा। आज मुझको मौका ही नहीं मिला। क्योकि वे लब भी नही गये। कामिल ने घबराकर कहा, क्योकि पन्नो सेपिमारी के कामिल सुनेकर प्रसन्न ही तो हो गये। उसने कहा यदि आप से अधिक रात के दस बजे तक आपको यहाँ तफलीफ उठानी कमर मे आलमारी के पीछे पद को पाद मे लिप जाइयगा। दोस्त की बेवकूफी चाँदनी ने शरारत की गरज से हंसते हुए कहा । हम स्वय इस • नाक्य पर कठिनाई के साथ अपनी हँसी को रोक सके। कामिल बोले, "आप मजाक कर रही हैं, यहाँ सच-मुच एक गधा भी सड़ा है।" "क्या आप सचमुच सच कह रहे हैं १'चाँदनी ने बनकर कहा-"सैर माफ कीजियेगा। घुस गया होगा। किन्तु उसको अभी तो रहने दीजिये।" "बेचारा बहुत सीधा है और दीनार से सटा हुआ एक ओर सडा है।" "अभी हाजिर हुई।” यह कहकर चाँदनी और हम चले श्राये । हमने कहा- यह गधा कहाँ से आया ? तब उमने यह बताया कि सासतौर पर उसे मॅगाया है। शाम तक 'इसी तरह कामिल बन्द रहे और किसी ने कॉपत्ती हुई "किन्तु अब तो किसी न किसी सरह खोप दीजिए।" आज रात में घर न जायें, तो क्या मुउकसान है ? अधिक पड़ेगी। फिर में सोल देगी, और आप गुपके से परामर वाले में कामिल ने कहा, "यहुत अच्छा, आप जाइये । मैं समझ गया।" आवाज
शरीर बीयी।
उन्होंने कमीनी हरकत नहीं की ? क्या उन्होंने हमें और तुम्हें
अपमानित करने की येहा कोशिश नहीं की ? क्या उन्होंने मेरे
जीवनाको समाप्त कर देने की कोशिश नहीं की? क्या उन्होंने
पुरानी दोस्ती और पुराने सम्बन्ध को स्वय पहले ठोकर नहीं
लगाई ?, मेरे दिल में उनके लिये तनिक मी दया नहीं है । मेरा
बस चले तो मैं ऐसे लोगों को जीता हुआ जमीन के अन्दर
गडवा दूं।
गधे के शोर और हगामे ने मोने न दिया ।' यहा रह-रहकर
ऐसी वोहाई देता था कि खुदा की पनाह । सवेरा हुआ और
चादनी ने कहा, कि "अब तुम मानों गधे की आवाज सुनकर
उठे, हो और नौकर को साथ लेकर यदि सच्ची बात का
पता न लगायो, तो येजा है। यह तो केवलासयोग की बात
है कि रात को उन्हें सोलने का मौका न मिला।" हमने
जाने से इन्कार किया, तो फिर उसने वही जली-कटी धाते
सुनानी प्रारम्भ की कि जो श्रादमी ऐसी कमीनी हरकतें करे,
उसे ऐसी ही परेशानी मिलनी चाहिये । खुलासा यह कि उसने
हमें लाचार कर दिया । हम एक नौकराके साथ लालटेन लेकर
पहुँचे । क्या बतायें कि हमारी हिम्मत न पडती थी कि चाँदनी
भाई और उसने फिर क्रोध भरी आँखों से देखा और स्वय
दरवाजे की मार सोलकर तेजी से लौट' आई। हमने कुछ
दरवाजा खोलकर लालटेन के प्रकाश से
दृश्य ऑसो के सामने था, वह सबक सीसने
। हर एक प्रामीको इस परेशानी और
। हमारे और नौकर दोनों के मुँहासे "अरे"
आश्चर्य में था। बहुत ही मक्कारी के सा
,"कामिल यह क्या. मामिला, कामिल । यह
--
+
पेश
1 - . दोस्त की बेवकूफी १५६ मामिला ' कामिल भला इसका क्या जवाब देते १ विचिन्न दृश्य सामने था । गंधा गुमुलमाने के बीच में सडा था। सभी चीजें उलटी पुलटी पड़ी थीं। जगह जगह 'लोद पड़ी हुई थी ओर दुर्गन्ध के मारे, दिमाग उहा जा रहा था। कामिल फर्श की एक बड़ी दरी में लिपटे हुएं एक कोने में सिर झुकाकर बैठे हुए थे। हम उल्टे पाँव कमारें में लौट आये। हमारी तबीयत बहुत दुसी हो रही थी और हमने बड़े अफसोस के साथ कामिल की हालत चॉटनी से बताई। किन्तु' स्री के दिल में कदाचित् उसकी इज्जत और आषरू पर हमला करने वाले के लिए दया नहीं पैदा होती। उसने फिर चिडचिडा कर कामिल की सजा उनकी ओर से उनका हक बताया। हम सिर पकड कर एक बुर्सी पर बैठे हुए इस मुमीयत पर विचार कर रहे थे। हालाँकि कामिल ने हमारे माथ बुरा व्यवहार किया था और वे, सचमुच दया के योग्य न थे, किन्तु फिर भी वास्तव में हमारा ही कुसूर था, जो हमने इतनी ढिलाई की। हम चाहते तो यह दिन ही न पाता, हम उठे और सामने जाकर कामिल से कहा, "माफ करना। किन्तु गलती तुम्हारी भी थी, जो तुम इस शरीर क चक्कर में पड़े ।। कामिल कुछ न बोले और हम लौट आय। दूसरे गुसुलमाने में हमने जल्दी से गरम पानी और साफ कपडे पहुंचनाये और कामिल को वहाँ भेजवाया। दूसरे आदमी को उनके घर मोटर लेने के लिए भेजा। कामिल ना धोकर गुसुलसाने से सीधे उधर से उधर ही अपने" चले गये। x x . २६० शरीर बीवी अफसोस, कि बह भेद प्रकट हो गया। नौकरी में इस बात को न जाने कहाँ से कहाँ - पहुंचा दिया । विवश होकर सास- सास दोस्तों को पूरा किस्मा- ठीक ठीक शुरू से लेकर अन्त तक चताना पड़ा और धीरे-धीरे यह किस्सा सबको मालूम ही हो गया, जिनके कारण, कामिल का सोसाइटी मे वह काला मुह हुआ, कि किसी से मिलने लायक न रहे। वे हमारे हमेशा के लिए गैर हो गये और हमसे उनसे फिर कोई सम्बन्ध न रहा। यहाँ हम उन बातों की चर्चा नहीं करना चाहते, जो कि बाद में सामने आई। इतना कह देना ही काफी है, कि कामिल ने चाँदनी से भयानक बदला लेने की कोशिश की और विवश होकर हमको छुट्टो लेकर वह जगह छोड , देनी पड़ी। इस अनुभर से हमें मालूम हुश्रा, कि हमारा और हमारी चीवी का सिद्धान गलत था। शरारत और आजादी की अवश्य कोई सीमा होनी चाहिये । और आजादी की इस सीमा को प्रत्येक मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार नियत कर सकता है। चाँदनी ने शरारत को फिर कभी' इस प्रकार का सूझ नहीं दिया। एक दोस्त की बीवी और शरारत का यह परि- पोम निकला। SAN 4 - - T । - -- 7 11 . 7 T । - किन्तु शरीर पवित्र है। नवॉ परिच्छेद श्रावरू की फिलासफी एक औरत तो वह है, जो अपने शौहर की वफादार बीवी है और कोई आदमी जबर्दस्ती उसकी इज्जत लूटता है और यह फिर उस चेइज्जती की जिन्दगी से मोत को अच्छा सम- मती है, किन्तु यच जाती है। पर दूमरी औरत वह है, जो दिल से अपने शौहर की जगह पर किसी दूसरे को चाहती है। किन्तु बन्द और कैद रहने के कारण अपने उद्देश्य मे सफल नहीं होती और इस प्रकार यद्यपि उसका दिल पवित्र नहीं, सवाल यह है कि इन दोनो का दर्जा इज्जत और बेइज्जती में क्या बराबर है ? क्या यह सच बात है, उक्त औरत इस कार लाज और इज्जत को सो बैठने के बाद अपने शौहर के बम की नहीं रहती ? इसका जवान है, कि हॉ। बदकिस्मती यह सच बात है कि औरत फिर शौहर के काम की नहीं रहती। क्योंकि आबरू ही एक ऐसा जौहर है, जो एक बार आहे किसी भी प्रकार नष्ट हो जाय, यह अमभव है कि फिर बह किसी प्रकार प्राप्त हो सके। यह तो दुनिया के अधिकाश विद्वानों का फैसला है, किन्तु इस्लाम की फिलासफी क्या कहती है ? पीडितो का इस्लाम के तिरिक्त और कोई मददगार नहीं । इस्लाम का फैमला है कि मी औरत को चमड़े के कोडे से मारना तो बहुत पडी चान है, नी हुई रूई से भी नहीं मारा जा सकता। वह पवित्र है। और इज्जत वाली है और अपने शौहर और खुला के सामने
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शरीर बीवी
निडर होकर स्पष्टतया अपनी बेगुनाही का दावा कर स
है । वह बिना ऑस झपकाये हुए अपने शौहर से आँस ।
सकती है। जालिम को कानून सजा देगा और नहीं तो ह
आगरे से गय हुए काफी दिन हो गये थे कि हम
चाँदनी इलाहावाद से आगरे जा रहे थे। किस्मत की खूपी
आज फिर लगभग दो माल के बाद असगर साहव का
में साथ हुआ । घर से तो चॉदनी शयरतों का पूरा
तैयार करके चली थी, किन्तु यहाँ दूसरा ही मामिला ।
आ गया।
पहला सवाल जो हम दोनों ने असगर साहब से पूछ
उनकी बीवी के सम्बन्ध में था। वे अब तक लापता थी।
असगर माहब अपनी दूसरी शादी के सम्बन्ध में ल
जाकर लौट रहे थे। वास्तव में संसार भी बड़ा विचित्र
उनकी हालत ऐसी थी कि जो कोई यह नहीं कह सकता
असगर कभी दूसरी शादी करेंगे। किन्तु 'चात यह है कि
की चहल-पहल और यार-दोस्तों की धूमधाम
और
मजाकी में दुनिया के सभी दुस अपने श्राप दूर हो जE
यही हाल असगर का भी, किन्तु फिर भी इस च
उनके गम को ऐसा ताजा बना दिया कि उनकी आँखों
टप ऑसू गिरने लगे, और मजा यह कि चॉदनी भी
उनकी ही हालत देखकर रो रही थी। घात हुई और
हो गई और थोड़ी देर बाद हम भी भूल गये। वास्तव
और चॉदनी दोनों को असगर माहब से एक स्वाभाविक
नुभूति हो गई थी, जिसको प्रकट करने का मौका साल भर
हमको बागरे में मिल चुका था ।
श्रा असगर के करीन वाकर डगमगाया कि असगर ने उसे
और असगर बाहर पड़े थे।
ओर इशारा करफे कहा।
भारत की फिलासफी
डले के स्टेशन पर चाँदनी गाड़ी में बैठी हुई थी और हम
"जरा इस यच्चे को तो देखिये । असगर ने एक बच्चे की
वह कोई डेढ या पौने दो साल का बच्चा मालूम होता था।
नया नया चलना सीखा था और येतरह हसी का गोल-गप्पा
बना हुधा संगमगाता चला आ रहा था। खून गोरा, लाल,
नफेद और तन्दुरुस्त था । केवल एक कुर्ता पहने हुए था। पीछे
पाप हँसता हुआ आता था। यह भागता
नों हाथों से उठाकर अपने मुँह के सामने किया । बच्चे ने
मान से असगर को देखते-देसत उनके मुंह पर हाथ मार दिया
देखने वालों का हंसी के मारे बुरा हाल हो गया। असगर
हसते हुए छोड दिया और वह फिर डगमगाता इधर उधर
डने लगा। बार-बार गिरता और फिर हंस कर दौडता
चाँदनी ने कहा "मचमुच यह घडा प्यारा बच्चा है ।" फिर
अगर साहव से कहा, 'असगर साहय, इस बच्चे की
में और माया तो बिलकुल आप हो जैसा है। मैं बड़े ध्यान
मा गरीन देहाती
रता था।
देख रही थी।
अमगर साहर हँसने लगे और बच्चे को देख रहे थे, कि
ने में उसने फिर उसी और रुप किया और उसका बाप
के पीछे लपका तो वह आपर असगर माहन की टाँगों से
मट गया और इसी के मारे उसका बुरा हाल हो गया।
नगर साहब ने फिर उठा लिया और उसी तरह देसने लगे।
हमने ध्यान से देखा
-"सचमुच असगर साहय
१६४ शरीर वीवी इसकी आँसें और माथा तो विलफुल आप ही से मिलता है बल्कि नाक और मुँह की बनारंट भी कुछ आपसे मिलती है।" असगर साहय ने हँसफर कहा "आप दोनों भी विचित्र श्रादमी हैं। यह मव वातें और फिर वह भी उसके बाप, मामने जो अश्चर्य नहीं, फि अक्षर-अक्षर सुन रहा हो । किन यह है कि आजतक ऐसा प्यारा बच्चा मैंने कभी नहीं देखा।" चाँदनी ने झॉककर उम आदमी की ओर देसा और यह "आप भी कैमी याते करते हैं। यह बच्चा उसका कभी ना हो सकता " अमगर ने उमसे पूछा, "क्यों भाई यह तुम्हार बच्चा ?" "जी हॉ, मेरा ही समझिये।" उम आदमी ने कहा। "तुम्हारे किसी रिश्तेदार का होगा।"-असगर ने कहा । "जी हाँ।" "तुम कौन हो और कहाँ जा रहे हो " "मैं सिकन्दरा जा रहा हूँ, और मैं यहाँ कपडे का का करता हूँ। अमगर को ग्रह बच्चा ऐसा अच्छा मालूम हो रहा था । उनका वम न था कि उसे ले लें और उसे आँखों ही आँसो जैसे छिपाये जाते थे। उन्होंने अपने रूमाल में मिठाई लेक उस आदमी को दी कि यह बच्चे के लिये है। उसने कहा- वाह साहन, यह आपने क्यो तकलीफ की? यह कह कर हथ मे मिठाई लेने लगा कि इतने मे रेल ने सीटी दी औ चलने को हुई और असगर ने रूमाल दे दिया कि उसकी माँ के देोदो । वह किसी बरतन में रख लेगी। "मैं: आप 1 रूमाल अगले स्टेशन पर दे जाऊँगा।" या
और गाडी चल दी।
की हुई अंगूठी थी और उस पर ईरानी अक्षरों में बडी खून
आररू की फिलामफी
१६५
कह कर वह यच्चे को गोद में लेकर जनाने डिव्ये के पास गया
और रूमाल और मिठाई देकर झट से अपने डिचे में बैठ गया
रूमाल का कुछ ख्याल भी न था कि दूसरे स्टेशन पर वह
आया, जिसका नाम हुसेन ख्श था। असगर को उसने एक
सफेद अगूठी देकर कहा कि देखिये यह शायद आपकी है,
जो रूमाल मे लिपटी हुई चली गई थी। आपकी रूमाल जरा
घोल तो अभी लाता है असर पाराम से तकिये लगाये
थे
। उन्होंने ला परवाही से अँगूठी ली । हुसेनवरश
रुमाल लेने चला गया। अँगूठी को देखते ही असगर साहब
उचल से पडे, और उन्होंने कहा, "अरे ।" ये हक्का बक्का हो
गय और उनके हाथ से अंगूठी छूटकर गिर पड़ी। हमने और
चाँदनी ने आश्चर्य चकित होकर असगर को देखा, जिनकी
हालत ही विचित्र थी। उन्होंने अगूठी उठाई । “सैरियत तो
है" हमने और चाँदनी ने पूछा, और यह कहते हुए चाँदनी ने
असगर साहब के हाथ से अगूठी को लेकर देसा ।
यह एक प्लाटीन की कलई की बहुत ही हलकी और नक्शे
सूरती के साथ कुछ इबारत खुदी हुई थी । ध्यान से पढा तो
बहुत खूबसूरती के साथ उस पर शब्द "मासूमा" खुना
हुआ था।
“यह कैसी अगूठी है ?" चॉदनी ने पूछा
असगर साहब ने कहा, "मेरी सोई हुई वीवी का नाम
। वे यही अंगूठी पहने हुई थीं।"
हम दोनों हक्का-बक्का बन गये और एक दूसरे को देखने
१६६
शरीर धीवी
लगे । हमारे कान में धीरे से चाँदनी ने कहा, "कहीं यह बच्चा
सचमुच इन्हीं फा तो नहीं है । जरा पूछो तो । कहीं खून का
जोश तो नहीं था जो बच्चे की ओर स्वभावत. साँचे जा
रहा था ।"
हमने असगर माहब से धीरे से पूछा, तो मालूम हुआ
कि जब वे गुम हुई तो डेढ दो माह का हमल था । मामिला
माफ था और असगर से कहा, मेरा दृढ विश्वास है, कि
अापकी सोई हुई बीवी अपने बच्चे सहित इस गाडी में
मौजूद हैं।
असगर साहव विचित्र चक्कर में ये, और उनकी बुद्धि
काम न करती थी। वे चुप थे कि चॉदनी ने पूछा, "क्या आपके
रूमाल पर कोई ऐसा निशान था जिसे आपकी बीवी पहचान
सकती ?" असगर ने चौंक कर कहा, "आप सच कहती हैं,
रूमाल मैंने मुद्दतों के बाद निकाला है। उस पर उन्हीं के हाथ
का अंगरेजी का A अक्षर कढ़ा हुआ है।
हमने कहा, “निश्चय, अब तो बिलकुल साफ है । उन्होंने
आपकी रूमाल पहचान लिया, और पता लगाने के लिये ग्रह
अगूठी भेजी है । वह बच्चा निश्चय आपका है और बीवी भी
आपकी मौजूद है । मुबारक हो।"
असगर को इस समय विचित्र हालत थी। वे सिर लटकाये
बैठे थे। दूसरा स्टेशन जमुना विज का आया । असगर को
हमने रोका कि कहीं कोई असाधारण घटना न हो जाय ।
चाँदनी ने वहाँ जाकर देखा, तो झट पहचान लिया।
उसके हाथ मे रूमाल था और प्रॉखों में श्रॉसुत्रों की मड़ी
लगी हुई थी। हुसेनवरश श्रन सर मामिला समझ गया और
वह चुपचाप यह सन कुछ देख रहा था ।।
x
x
प्रमन होकर चाँदनी ने कहा- आखिर फिर क्या
निवेदन करते हैं, कि चे इस घटनाओं को ध्यान से पढे और
कोइ गगह ही नहीं है।
मर नाप चलें। क्योंकि आप लोगो के अलाया यहाँ दूसरा
मालूम फर लें कि चे मुम जलील में मिलना भी चाहते हैं या
न" यह कहकर उसने गाड़ी से उतरने से इन्कार कर दिया।
चाँदनी ने आश्चर्य में कहा, "पासिर यह क्यों ?"
चाहे कुछ भी हो।" उसी तरह रोती हुई उस पीड़िता ने कहा।
"ये मेरे मगे भाई के परायर है, बल्कि उससे भी यढकर।"
"श्राप जाकर बस पूछ थाय' मामूमा
श्राप का कुछ नहीं बता सक्ती"
यद्यपि असली किस्मा हमें याद में मालूम हुभा। किन्तु
दम मोक पर हम मासूमा की योती हुई सुनाकर पाठकों से
प्रापरूको फिलामो
भरे फोर्ट पर पहुँचकर पाग्नी ने जल्दी से मासूमा फो
बार दिग! पुरके की गो पाई पातही नहीं उमये पाम गादे
को एस पाटी पार के अलावा मग गोई यही पादर न
थी । उमझो तो चन्द गार्ग में ठिाया। मि स्मिी को पुत्र
मात्म न था, अत अमगर ने हम गेनों से यहा कि पाप
३
"मैं इम मरह नहीं उगी।" मासूमा ने रोते हुए
पानी से काम नहीं उतारगी, जय तक कि आप यह न
घाँदनी ने मदिग्ध होकर पहा-'
"
-"हुसेन बख्श
मामिला है"
x
उनसे शिक्षा
२। हम इसको रिस्से के रूप में यहाँ से
थे।
-
१६८
शरीर बीवी
प्रारम्भ करते हैं, जहाँ से वह सो गई थी। क्रम के लिए पाठक
पिछले परिच्छेद को देखें।
४
हम कह चुके कि आगरे के सिटी स्टेशन पर जब हम
उतरे तो चलते समय असगर से रुससत हुए
किन्तु उनसी नीवी को देसने चाँदनी न गई। क्योकि सफर
के बीच में एक बार जब उसकी तबीयत का हाल पूछने के लिए
चॉदनी ने जाने का विचार किया था, तब असगर साहब ने
कह दिया था कि पाप तकलीफन करें। मैं स्वय आपकी ओर
से उनकी तबियत का हाल पूछ लूंगा।
वेचारी मासूमा अपने शौहर का इन्तजार कर रही थी।
बुरके मे से भीड़-भाड में उसने यह भी न देखा कि असगर
माहन आये और डोली मॅगवाकर नौकर को हिदायत भी कर गये
कि उतरवा लो। मैं सामान देखता हूँ । डोली पाकर लगी ओर
चादरे तानी गई । वह आगे यही कि एक बडी बीवी ने कहा
"बेटी, वह तो मेरी है । मेरा लडका लाया है। क्योंकि मासूम
में बुरके से रात के समय न तो असगर को देखा था और न
इम भीड में नौकर को पहचान सकती थी। उसने यही सममा
कि बड़ी धीवी मच कहती हैं। अत चे बैठकर चली भी गई।
अमगर ने नौकर को जन डोली ले आते हुए देखा तब उन्होंने
भी जनाना डिब्बे की ओर देखने को फिर आवश्यकता न
। क्योकि सामान सर मरदाने डिब्बे में था।
लाचार औरतों को बदमाशों के पजे से बचाये और
ऐसी बेगुनाहों को जैसी मासूमा थो। एक लोफर न
कहाँ से आ रहा था। उसने कदाचित इम बेगुनाह को
शिकार में लिय ताड़ लिया था। वह जनाने डिब्बे के
।
प्राररू की फिलासफी
पास आया और उसने मासूमा से कहा, मियाँ ने कहा है,
आप अगले स्टेशन पर उतरें। क्योंकि न यहाँ कोई चन्द गाडी
है, और न डोली। मासूमा सोचने भी न पाई थी कि गाडी
चल पड़ी। उसने भी समझा कि घर का नौकर है, इससे
कहलवा दिया होगा और स्वय भी अगले स्टेशन पर उतरेगे।
वह वेफिक्री के साथ बैठ गई। राजा की मण्डी स्टेशन पर
गाडी जाकर रुकी और वह आदमी मासूमा के पास आया
और कहा, "उतरिये । यहाँ कोई डोली इत्यादि नहीं है। मियाँ
सामान लेकर वह जा रहे हैं। जल्दी उतरिये।" उसको भला
भीड मे बुरका और चादर में से क्या दिसाई देता ?
यह उतर आई और उसके पीछे-पीछे चली आई। राजा
मण्डी स्टेशन पर भीड तो अधिक होती नहीं है। फाटक
के पास पहुंच कर मासूमा ने अमगर को न देना तो फिर
भी उसको आश्चर्य न हुआ क्योंकि यह यह जानती थी,
कि बाहर सडे होंगे। वह बाहर आई तो उस आदमी ने दूर ही
से पुकार कर कहा, "मियाँ इधर भाइये, यह गाडी मौजूद है।"
मासूमा ने समझा, असगर को नौकर बुला रहा है।' वह उसमें
बैठ गई, और सिडकी का दरवाजा बन्द कर लिया। इतने में
उस आदमी ने कहा, "भाई । तुम गाडी जरा बढाकर पुल के
पाम ले चलो। वह देखो कुली तो उधर जा रहे हैं।" मासूमा ने
इन बातों पर ध्यान न दिया और गाडी चल पडी और वह भी
बड़ी तेजी के साथ । मासूमा ने सममा कि फुलियों के पास
पहुँच कर गाडी रोक दी जायगी किन्तु वहाँ तो गाडी वेतहाशा
जा रही थी। वह बिलकुल न घबराई स्न्तुि यह सोचती थी,
आपिर किससे और कैसे पूछु कि मामान क्यों नहीं है। क्योकि
न तो वह नौकर से बात कर सकती थी, और न कोचवान से,
१७० शरीर धीवी और न सिडकी सोलकर मडक पर चलने वाले किसी आदमी को पुकार सकती थी। यह सन क्यों ? केवल इमलिये कि जिस परिस्थिति में उसका पालन पोषण हुआ था, उसके मज- हव में यह सब मना था। वह चाहती भी तो सम्भव न था, क्योंकि वह इस कदर तबीयत की कमजोर और सीधी थी कि उससे यह मय होना असभव था । + + अव मासूमा को न जाने क्यों सन्देह हो रहा था क्योंकि गाडी वानार से न जाकर सुनसान रास्ते से जा रही थी और उसके अनुमान के मुताविक अब तक गाडी को घर पहुंच जाना चाहिए था। उमने सब बातों पर एक साथ ही विचार किया और मॉक कर जब बाहर देसा तब उसका कलेजा बैक गया। उसने परेशान होकर सिडकी पर हाथ मारना शुरू किया और जब गाडी न रुकी तन वह सिडकी को जोर से हिलाने लगी। गाडी सहसा रुकी। खिडकी खुली, और वही आदमी यह कहकर भीतर गया कि "यदि तनिक भी चिल्लाई तो मार डालूँगा।" उसने सिडको बन्दकर ली और फिर गाडी चल पडी। खुदा की पनाह, इस वेचारी मासूमा का उस समय क्या हाल हुआ होगा। किसी कलम में ताकत'नहीं, कि उमकी ठीक ठीक हालत का वर्णन कर सके। वह जीवित थी, किन्तु मुर्दे से भी बदतर । वह डर कर कोने में मरक गई। वह शरीफ और मीच सादे स्वभाव की वेगुनाह औरत, जिमने कभी किमी अजनबी से बात तक न की हो, भला क्यों कर किसी जगली जालिम की चमकियों और ज्यादतियों को पर्दाश्त कर मस्ती थी। अधिकाधिक भय से उसके मुंह से एक चीस निकली और वह बेहोश हो गई। +
थार उमका गला ऐसा रगड रगड कर घाटा कि यह घायल
के लिये सिर-तोड कोशिश की। अपनी उम्र में पहली बार उसने
अजनवी से बात की। और वह भी इस तरह कि हाथ जोड
कर कहा, “सुदा के लिय मेरे ऊपर दया करो और मुझे मेरे
घर पहुँचा दो।" किन्तु तोगा कीजिये। निर्दय ने मोध मे
आपकी फिलामफी
५
मासूमा को जय होश आया नय समय अपने प्रापको एक
जलील बिस्तर पर पड़ा पाया पारी ओर अंधेरा छाया हुआ
था। क्योंकि हम जगह जेल की तरह अधरा था । हवा में नमी
और बल्यू थी और यह भारी मातम होती थी। हाथ को हाथ न
सूगवा या और यह यही मोच रही थी कि में जीवित हूँ, या
मर गई है। भय का एक मसार था, और सनाटा छाया
हुआ था, और मासूमा का दिन घेठा जा रहा था कि अंधेरे में
इसने ऐसी बाहट मुनी कि जैसे कोई सॉप की तरह आ रहा
है। जालिम प्रा पहुंचा" उसने अपने दिल में कहा, 'हाय
मासूमा, तेरा यहॉ अब कोई मददगार नहीं।"
इतने में एक दियामालाई जली और उसने उस भयानक
चेहरे को देखा। इसके बाद कर तेल का एक चिराग जलाया ।
मासूमा ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई तो उसको मालूम हुआ कि
यह शायर किसी तहसाने में है।
वह जालिम पारपाई के पास श्राफर एक तल पर बैठ
गया। मासूमा सिछुडकर अलग हो गई । उमने मासुमा को
कुद मिठाई और दूध दिया और अफसोस कि उसने उसको मार
मार पर सिलाया।
चाँदी तक अपनी रक्षा के लिय हद से अधिक कोशिश
करती हैं, और मासूमा ने भी अपने को उम जालिम से बचाने
X
x
- x १७२ शरीर वीवी मुर्गे की भाँति तडपने लगी। उसने अपनी जान बचाने की आसिरी कोशिश की। फिर हाथ पैर ढीले हो गये, और वह वेहोश हो गई जब वह होश में आई कि फिर उसके मुंह से चीन निकली और वह बेहोश हो गई। इसी तरह वह कई बार होश में आकर बेहोश हुई। x न जाने वह कितनी देर तक बेहोशी की दशा में पड़ी रही कि उसकी आँखें खुली और उसको मालूम हुआ, कि अब दिन है । उसके हाथ पैरों में बिलकुल जान न थी, और वह बड़ी देर तक उसी तरह पड़ी रही। चारो ओर वह अंधेरे में देख रही थी। थोडी देर बाद उसको दिखाई देने लगा। वह एक तहसाने में थी, जिसके बीच में तीन सम्भे सडे थे। बडी देर तक वह उसी तरह पडी रही। फिर अन्त में उठी और उठते ही सब से पहले उसने चारपाई कि पायतानी की रस्सी सोलकर एक फन्दा बनाया कि वह अपनी घृणित जिन्दगी का जल्द से जल्द सातमा करे । उस घेचारी को यह भी न मालूम था कि इस तरह जान देना कठिन ही नहीं, बल्कि असभव है । जैसे ही फन्दा कडा होता था, हाथ छपने आप ढीला हो जाता था। हर प्रकार से उसको इममें असफलता हुई तब उसने एक पत्थर लेकर घहुत बहुत अपना सिर फोड़ा । किन्तु इस तरह को मार न सक्ती थी। वह मरने के लिये तडप रही थी। किन्तु भला मौत कहाँ ? अन्त में थक र सिर पकड कर बैठ गई। थोड़ी देर बाद उठी और उम तहखाने का कोना कोना देसा दरवाजा उमया क्या था, मानों लोहे का तस्त था, जो रङ्ग भरपूर रखा हुआ था। उसने देखा कि जब दरवाजा नहीं खुलता, तर फिर हार और थककर चारपाई पर श्राफर पड भी वह अपने से
भारत की फिलासफी
७९
रही और अपनी लाचारी पर विलय पिलस फर रोना शुरू
किया। रोते-रोते सो गई।
न जाने यह कितनी देर तक मोई कि उसने एक दु स्वप्न
देसा । उसने देखा कि असगर सामने रखीदा सड़ा है। वह
टोड़ी । उमने घृणा से कहा, "तू प्रव क्सि मुँह से मेरे पास
आती है।" यह रुक गई, और उसने गिड़गिड़ा कर अपने
प्यारे शौहर के पैर पकड़ लिए कि उसने मटका देकर पैर छुडा
लिया और वह जाग उठी। 'प्रा- जय खुनी तय वहाँ सनाटा
था। वह पगली-सी उठकर मिर धुनने लगी और पागल होकर
उसने अपना मिर दीवानों की तरह दौड़कर दीवाल के टक्ग
दिया। यह येहोश तो न हो सकी किन्तु येजार होकर जमीन
पर गिर पड़ी। वह उसी अवस्था में यड़ी देर तक पड़ी रही।
x
"
सन्नाटा उसी तरह छाया हुआ था, और वह उसी तरह
चुपचाप निर्जीव सी पडी थी। उमको पहले तो फुल सन्देह सा
हुआ किन्तु फिर उसने जब कान लगाकर सुना, तर विश्वास
सा हो गया, कि कोई आदमी दीवार की आधी से
अधिक ऊँचाई के पास पुछ सोद रहा है। धमक अधिक जोर
दार होती जाती थी, और वह उसी ओर देस रही थी कि इतने
में कुछ मिट्टी सी उस जगह से गिरी । उसका दिल धडक्ने
लगा, और वह ठिठक कर दीवार से लगकर गिरती हुई मिट्टी
और ईटों को देखने लगी। गिरनी बन्द हो गई और थोड़ी
देर याद धमाके की आवाज कम होर बन्द हो गई, और पहले
की भॉति सन्नाटा छा गया। जब काफी देर हो गई तब वह
उठी । उसको डर लग रहा था कि कहीं वह जालिम फिर न आ
पहुंचे। उसने उठकर ध्यान से दीवाल को देखा, जहाँ से इंटें
शरीर पीवी
और मिट्टी गिरी थीं। "आश्चर्य क्या, कि मैं उसी ओर से
निकल सकें।" यह विचार उसके दिल मे आया उसने पलग
को घसीट कर दीवाल के पास लगाया । किन्तु वह जगह ऊँची
थी, जहाँ से ईंटें गिरी थीं। उसने इधर-उधर देखा और पलग
को हटाकर उसकी जगह बडी कठिनाई से तख्ते को सींचकर
लाईं। तख्ते के ऊपर उसने चारपाई के सिरहाने के दो पाये
रक्से और उस पर सडी होकर जहाँ से ईटें गिरी थी, उस
स्थान का उसने निरीक्षण किया। हाथ से उसने मिट्टी और ईंटें
हटानी शुरू की और इस काम में कोई कठिनाई उसके सामने
न आई क्योंकि वह जगह अभी ताजी ही सोदी गई थी। थोडी
ही देर में उसने एक घडा सूराख कर लिया । अब केवल मिट्टी ही
मिट्टी थी, जिसे उसने हाथ से हटा हटाकर गिराना शुरू किया।
किन्तु ज्यों-ज्यों यह मिट्टी हटाती जाती थी, ऊपर से मिट्टी और
जिसकती आती थी। मिट्टी हटाने में उसका हाथ टीन के किसी
सन्दूक से लगा, जिसको उसने पकड़ कर सींचा। उसके साथ
ही बहुत सी मिट्टी खिसक श्राई। सन्दूक छोटा-सा था किन्तु
काफी वजनी था। उसने उसको हिलाकर देखा तो मालूम
हुआ कि शायद उसमें रुपया पैसा है। उसमें ताला लगा हुआ
था । उसने तेजी से मिट्टी हटानी शुरू की और थोड़ी देर में
उसकी ऑसों को दिन का प्रकाश दिखाई पड़ा। उसने और
मिट्टी हटाई और मॉककर देसा, तो उसको आसमान की जगह
पर टूटी हुई दीवार दिसाई पडी और सामने कुछ इंटें, और
कूड़ा पड़ा था । उसने जल्दी से सूरास को धडा किया और
जब काफी बड़ा हो गया, तब वह उसमें लेटकर ऊपर निकल
आई । उसने देखा कि मैं एक छोटे से पुराने किन्तु ईंटों और
चूने से बने हुए गुफा में हूँ। यह एक तग जगह थी। अब वह
निराश कर दिया था। जब उसने यह निश्चय कर लिया तव
हैं। सूरज डून चुका था और शाम हो गई थी।
ऊपर से ज्यों की त्यों थी। चारों ओर टूटी और परानी करें
दिसाई दे रही थीं और विचित्र भयानक दृश्य था। किन्तु यह
यह उस जालिम का डर ही था जो उसको इस धुधले अंधेरे
समय कब्रिस्तान में अज्ञात दिशा की ओर लिये जा रहा
मनाटा छाया हुआ था और एक आदमी भी दिखाई न पड़ता
आगरू की फिलासफी
यह सोच रही थी कि इस सन्दूक को क्या करूँ ! यदि उसी
जगह छोडती थी तो उसको पूरा विश्वास था कि वह जालिम
आकर ले लेगा। और यदि साथ लिये जाती तो उसका दिल
इसके लिए तैयार न होता क्योकि उसको पूरा विश्वास था
कि हो न हो इसमे रुपया है जिसे कोई कजूस इस जगह गाड
करके उससे छुटकारे का कारण बना है। उसने कुछ सोचा
और अन्त में लाचार और अपराधी ना स्वीकार किया स्तुि
यह मजूर न किया कि यदि इसमे कुछ रुपया पैसा और माल
हो तो वह उस जालिम के हाथ लगे जिसने उसको जिन्दगी से
उसने, डरती-डरती कि कोई देख न ले उस सकीर्ण गुफा के
वाहर मॉक कर देखा कि वह एक पुराने जमाने
के कब्रिस्तान में है, जहाँ दूर तक दूदी हुई पुरानी करें फैली हुई
६
जन कुछ अँधेरा-सा हो गया और उस जगह उसको डर
मालूम होने लगा तब वह उस गुफा से निकली । वह कुछ डर
मी गई। क्योंकि वह नडी पुरानी कत्र में से निकली थी जो
मन उस स्थान से अधिक डरावना न था जहाँ इसको उस
जालिम से दूसरी बार भेंट हो जाने का डर था ! वास्तव में
या नहीं तो वह डर कर बेहोश हो गई होती । बहुत दुर तफ
के
शरीर धीवी
था। वह अय कुछ निडर-मी थी। क्योंकि मौत की इच्छुक
थी। वह तेजी से इस जगह से दूर होना चाहती थी। इस
कारण से नहीं कि वह मुर्दो के रहने की जगह में थी, बल्कि
यहाँ वह भयानक और अधकार पूर्ण तहसाना था। वह उसी
तरह तेजी से चलने लगी। उसकी ऑसे किसी सास चीज
को सोज रही थी और उसकी खुशी की कोई सीमा न रही।
जन उसने एक बड़े कुरा की कबूतरी देखी वह तेजी से दौड़
कर वहाँ पहुंची। पुराने जमाने का न जाने किस समय क
बना हुआ एक बडा कुत्रा था । उसने झॉक कर कुएँ के भीतर
उम्र में पहली बार देखा और भीतर के अधकार को देखकर
उसका दिल कॉप उठा। मरना कोई सरल बात नहीं है, और
फिर उसके लिये जो जवान और तन्दुरुस्त हो । उसने अपने
आपको विचित्र पेशोपेश में पाया । उसको अपनी जवानी क
रयाल आया और साथ ही असगर का ख्याल आया । बस
मन मसोस कर रह गई । वह कोशिश करके उससे अवश्य
मिल सकती थी किन्तु यह कैसे हो सकता था ? नहीं, नहीं
अब मैं कमी असगर को मुह न दिखाऊँगी । तो फिर आखि
क्या होगा ? ससार उसके लिए अंधेरे के समान हो गया ।
उसके लिए मरना ही अच्छा है, और यह निश्चय कर
उसने उस , सन्दूक को कुएं में फेंक दिया। उसके गिरने क
लौटी हुई आवाज अभी गायब भी न हुई थी, कि सामने से को
आदमी अंधेरे में आया हुआ मालूम हुआ। वह डर सी ग
और उसने इस प्रकार रोती पीटती अपने को कुयें में डाल दिया
एक धमका हुश्रा और यह , पानी के भीतर तक चली ग
कि उसको पानी ने अपर फेंका । उसके हाथ पैर उसके कपडे
उलझ गये थे । उमने बेबसी की हालत में जोर से चिल्लाक
प्राररूपी फिलासपी
हाय पैर मार । क्योंकि उसयो धाराय में प्राप गालम हुआ
कि मरना कैसा होता है किन्तु उसी पीस को पानी के रेले
शान्त कर दिया और वह थोड़ी देर की कशमाश के चार एक
घेहोशी की रथा में हम गई।
पर उमपी प्रॉमें खुली तप उमने अपने पा हुसनबरस
के घर में चारपाई पर पड़ी हुई पाया भोर सेवा से लिये उनकी
घहन थी। उसे यहॉ हर तरह से पाराम मिला । जब से वह
श्राई थी हुमेनस्य धीरे से घर में प्राता और उमी तरह चला
जाता । सवा सात महीने के याद उसको यचा पैदा हुआ।
हुसेनश ने उस समय से लेकर अब तक उसको अच्छी
वरद रकमा । यह जानता था कि वह किस्मत की सताई हुई
है और पीडिता है। क्योंकि वह सदा दुसी और उदास रहती
थी और उसकी बहन हर तरह से उसके गम को दूर करने की
असफल कोशिश कर चुकी थी। लेकिन फिर भी हुसेनबख्श
को पूरी आशा थी कि कभी न कभी तो उसके मन का दुस
जाता रहेगा और तर यह मेरी औरत बन कर रहेगी। वह
अपनी बहन के द्वारा कई बार उसकी मशा मालम कर चुका था
और हर बार मासूमा को अपने रास्ते पर दृढ़ पाया था कि
यह इस प्रकार जिन्दगी बितायेगी। यह जानती थी कि हुसेन
परश के दिल की हालत क्या है ? यह नौकरी की तरह उसरी
सेवा परता था और मासूमा को भी उससे गुर शत हो गई
थी जिसको भाई की मुहनत कहते हैं। उसका मुर उसको
"भाई भाई कहते सूपता था और वह उससे हद से ज्यादा
सहानुभूति रखती थी। क्योकि उसने अपनी जान सनरे में
.
था।
डालकर सको युये मे से
शरीर वीनी
सुलासा यह कि वह इस समय तक हुसेनबख्श के यहाँ थी
और इम समय वह हुमेनख्श के साथ रेल में उनके कुछ
रिस्तेदारों से मिलकर आ रही थी। क्योंकि हुसेनवख्श उसको
घर में बिलकुल अकेली छोडकर कहीं बाहर न जा सकता था कि
सौभाग्य से असगर और हम मिल गये ।
।
-
असगर कमरे में गये । उन्होंने देखा कि मासूमा गम की
तस्वीर बनी हुई जमीन पर बैठी है । वह एक तरह के रङ्गीन
कपडे का पाजामा पहने हुए थी और एक गन्दी सी सफेद चद्दर ।
पैर में जूता तक न था । जैसे ही उसने अपनी ऑसे पोंछकर
असगर की ओर देखा तो असगर के दिल पर एक चोट लगी
और वे व्याकुल होकर उसकी ओर झुके, क्योंकि वास्तव में
असगर की मुहब्बत मासूमा से इश्क का सम्बन्ध रखती थी।
"सरदार, मुझे हाथ न लगाना । अलग, अलग" मासूमा
ने चडी गम्भीरता से कहा । असगर एक साथ ही इस एक
असाधारण घर्ताव को देखकर हैरान से हो गये। क्योंकि वे तो
यह समझते थे कि वह मुझे देखते ही लपट कर वेहोश हो
जायगी । उसके मुंह से एक साथ ही निकला, "मासूमा" और
यह कहकर वह फिर बढा कि मासूमा ने हाथ उठाकर कहा,
"अलग, अलग, सरदार, मुझे हाथ न लगाना ।"
असगर ने आश्चर्य में आकर कहा, "यह क्यों ?"
मासूमा
ने ठडी सॉस लेकर असगर की ओर विचिन ढङ्ग
से देसा ओर कहा, "अफमोम, मैं तुम्हें मुंह दिखाने के लायक
वहीं और यह केवल मयोग था कि "
"नहीं तो" असगर ने कहा ।
m " प्रायरू की फिलामपी १७६ "मैं उम्र भर तुम्ह मुँह न दिसातो-मासुमा ने कहा- 'यह यच्चा तुम्हारा है, तुम इसे ले लो और मेरा पूरा फिरसा सुन लो। इसके बाद यह निश्चय करना कि मैं तुम्हारे काम की है या नहीं ७ असगर को सचमुच सन्देह होने लगा और उसने रुरते- रुस्ते कद्दा किन्तु मुझको तो कहा गया है कि हुसेनमख्श, हुसेनवरश, हुसेना -" "वे मेरे सगे भाइ फे राबर है-"मासूमा ने कहा।" कुछ प्रसन होकर असगर ने कहा, "तो फिर क्या "पहले मेरा किस्सा सुन लो"-मासूमा ने कहा-"जल्दी न करो यह कहकर उसने दिल को हिला देने वाली अपनी कहानी रो रोकर सुनानी प्रारम्भ की और ठीक ठीक श्रारम्भ से लेकर अन्न तक ज्यों का त्यों रिस्सा सुना दिया। असगर के ऊपर कमजोरी ने अपना प्रभार डाला और वह ऑसें नीची किये हुए सोच रहा था। उसके दिल का मुहब्बत का जोश उड़ गया था। "मेरे मालिक मुझ पर रहम फरो।" यह कहकर मासूमा उठार आई और उसने अमगर के पैर पकड लिये । असगर निलकुल हिले-डुले नहीं, कि उसने कहा, "मुमको दासी की तरह एक कोने में पड़ी रहने देना और शेप घृणित जिन्दगी तुम्हारे कदमों मे ही निता दूँगी। तुम कोई दूमरी शादी कर लेना । इमी तरह गिडगिडाकर न जाने क्या कहती रही कि असगर ने ध्यान से फिर मासूमा को देखा और कुछ सोचकर मूछा, "तुमने मुझको कोई सत भी नही लिसा, यदि चाहती तो सत लिस सकती थी।" -
1"
हो गया और फिर
१८०
शरीर वीनी
"यदि मैं चाहती तो तहगाने से निकलने के बाद कुयें में
न गिरकर तुम्हारे पास पाने की कोशिश भी कर सकती थी
और आश्चर्ग नहीं कि इममें सफल भी हो जाती और फिर
यदि चाहती तो तुमसे अपनी जित्लत को छिपा भी सकती थी
और झूठ भी बोल सकती थी।" मासूमा ने रोती हुई कहा।
इस वाक्य ने असगर पर विचित्र ही प्रभाव डाला। क्या यह
सच बात न थी कि यदि वह उससे कुछ न कहती तो उसको
उसकी जिल्लत का पता भी न लगता । सुदा की कुदरत कि
अमगर ऐसे मनुष्य की पुरानी फिलासफी पर इसलाम की
आपरू की फिलासपी ने अपना प्रभाव डाला और उसने कुछ
विचार करके कहा, "मासूमा वह चुप
बोला, "तुम्हारा इसमे कुछ भी कुसूर नहीं। वास्तव मे मुझको
'आज नहीं, बल्कि अभी यह मालूम हुआ कि वास्तव में पवित्र
और बेगुनाह वह है कि जिसका दिल सभी बुराइयों से बचा
हुआ है, चाहे उसका शरीर गन्दा ही क्यों न हो? लेकिन
जिसका शरीर पवित्र है किन्तु हृदय और आत्मा पवित्र नहीं
है, वह वास्तव में किसी भी तरह पवित्र नहीं है। तेरे ऊपर
यदि किसी नीच व्यक्ति ने मैला डाल दिया तो तुमने उसको
अपना गला घोंटकर और कुयें में गिर करके धो डाला और
अब तक धो रही है। यदि तू चाहती तो इसमें सन्देह नहीं
कि मुझको अपनी मुसीबत का पता ही न लगता और वह
वास्तव में बहुत ही बुरा होता । किन्तु चूंकि तू पाक और साफ
है और बेगुनाह और सच्ची है, अत तुमने सच मच घात
कही । मैं ऐसी वीवी के निना कभी भी जीवित नहीं रह सकता।"
कठिनाई से बात सतम हो पाई थी कि मासूमा के मुंह से
खुशी की एक चीस निकली और वह वहीं असगर के कदमों में
आनर की फिलासफी
१८१
बेहोश होकर गिर पड़ी। अमगर ने अपनी प्रारूदार और
मची नीवी को उठाकर अपने गले से लगाया।
+
हम अलग कमरे में बैठे थे और सोचते थे कि चाँदनी
भीतर जनानखाने में गई है कि वह आँसों से आँसू पोछती
हुई पाई । हमने कहा, "अरे, यह तुझे क्या हुआ, तो उसने
अपनी चोरी का किस्मा सुनाया, कि वह किस तरह
वईमानी के साथ दरवाजे के एक सूरास से मियाँ बीवी की
मुलाकात देस और सुन रही थी। हमने उसकी कमजोरी और
चोरी पर उसका बहुत कुछ बुरा भला कहा किन्तु अब तो वह
सुन पाई थी और खुा को इसी तरह मजूर था, कि यह
किस्सा पूरा होकर नसीहत का कारण बने ।
ह
वेचारा हुसेनरख्श अब भी प्रसन्न था, और वास्तव मे
उसको सच्ची प्रसन्नता हुई होगी। क्योंकि वह अच्छे स्वभान
का था। मासूमा ने उसके उसकी सेवा का यह पुरस्कार दिया
वि वह जिस तरह उसको भाई कहती पाई थी, उसी तरह
उसको अब भी भाई समझेगी और उस सन्दूक का पता बता
दिया, जो अब तक उसी कुएँ में पडा था, जिसमे से उमने मासूमा
को अपनी जान पर खेलकर निकाला था। इस सन्दुक को
मासुमा अव तक अमानत समझती थी किन्तु अब उसको इम
तरह पड़ी रहने देना बुरा मालूम हुआ । उस सन्दूक में साढे
चार हजार मूल्य की नगशाही मोहर निकलीं, नो हुसेयरश
की मुहब्बत और सेना की सर्वोत्कृष्ट भेट थी।
बुरा समय किसी पर कह कर नहीं आता। समार के
झगड़ में कमजोर और बेबस होना कोई तारीफ के लायक गुण
१८२ शरीर बीवी नहीं है । प्रत्येक मजहब की सभ्यता ने शरम और हया औ पर्दे की कोई न कोई सीमा नियत कर दी है और इसमे अति शयोक्ति करना सम्भव है कि किसी तरह लाभकर हो कि सतरनाक अवश्य है। ऐसी वेवम औरतें वास्तव में न शौहर की सितमद कर सकती हैं और न मजहन ओं जाति की। क्या आवश्यकता के समय मासूमा की सी औरतें पर्दे से निकल कर तलवार चलायेंगी ? क्या हम ऐस ही औरतों के बल धूते पर आजादी लेंगे ? क्या ऐसी औरतें टर्की में रहती हैं, जिन्होंने समय पडने पर मदो कहा कि जाओ, तुम लडाई के मैदान में जाओ और शे कामों को हम सभालती हैं और समय पडने पर तुम हमे घुर लेना । हम तुम्हारे साथ दुश्मनों की गोलियों का साम- भी करेगी। इन औरतों ने जो कहा वह किया । यदि ध्यान देखा जाय तो हमारी गुलामी का सबसे बडा यही रहस्य है । J - धर्म-पथ विचारों का प्रभाव हमारी कुछ प्रकाशित पुस्तकें सदाचार एय चरित्रनिर्माण सास्थ्य एस चिकित्सा सम्पपी पुस्तके हम सौ वर्ष से जीव ? बदाचय ही जीवन है १॥) माष्य शरीर की श्रेष्ठता 1) सफलता की उन्नी 1) स्वास्थ्य और व्यायाम इश्वरीय जोध १॥) स्वास्थ्य और जलचिकित्सा मनुष्य जीवन की उपयोगिता २१) प्राकृतिक चिरित्या दूध ही श्रमृत है २) भाग्य निमाण ११) श्रादर्श भोजन ११) वेदान्त धर्म २) पल उनके गुण तथा उपयोग २) मन की अपार शक्ति 112) शरीर निशान और तात्कालिक चिकित्सा १) मनुष्य ही अपने माग्य का किशमिश चिकित्सा 11) निर्माता है धातु रोग और उसका इलाज २॥) सतान निग्रह क्यों और कैसे? ३) ११) २) भाग्य पर पिजय 11) काव्य व पालोचना हमारे मानसिक शिशु कवियों की झाँकी जेम्स एलेन की डायरी या दैनिक १) २) विद्यापति पदामृत मौन की वाटिका में ११) युपकों की गीता 1) सुदामा चरित (सटीक) ।) 110) श्रानन्द प्रकाश ॥) गुप्त जी की काव्यधारा ३॥) श्रादर्श सेवा 1) कवि प्रसाद की काव्य साधना ३) साहित्य सजना १) तपोवन शा) हिन्दी के निर्माता २१) खोज व आविष्कार ईश्वर के सम्पर्क में -1 वैज्ञानिक कहानियाँ गौरवशाली जीवन नर से नारायण रोगी सुश्रूषा ध्यान २) कवित्त सरसी विजय ये अाठ स्तम्भ 1) तुलसीदल ॥) सतों की वाणी हमारे हरिजन मानसिक दक्षता नीति की राह
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