University Liberey Allahabad
Kathopanisad
Front matter
कठोपनिषद
( प्रथमोऽध्यायः शाङ्करभाष्यसमेतः )
व्याख्याकार
डॉ० आद्याप्रसाद मिश्र
भूतपूर्व कुलपति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
इलाहाबाद
अक्षयवट प्रकाशन
इलाहाबाद
प्रकाशन के अन्य महत्त्वपूर्ण पाठ्य-ग्रन्थ • किरातार्जुनीयम् : प्रथम सर्ग -डॉ. राजेन्द्र मिश्र 0 ७.५०/- * छन्दोऽलङ्कारसौरभम् -डॉ० राजेन्द्र मिश्र 0 ५.५०/- 28 शिशुपालवधम् : प्रथम सर्ग -डॉ० आद्याप्रसाद मिश्र 0 ४.५०/- 8 शिशुपालवधम् : द्वितीय सर्ग -डॉ० आद्याप्रसाद मिश्र 0 ४.५०/- ॐ साँख्यतत्त्वकौमुदीप्रभा -डॉ० आद्याप्रसाद मिश्र - १८/- संस्कृत-निवन्ध-मन्दाकिनी -डॉ० आद्याप्रसाद मिश्र - १०/- ® कादम्बरी-कथामुखम् -डॉ० राजेन्द्र मिश्र 0१३.५०/- मूल्य * विद्यार्थी संस्करण : पांच रूपया पचास पैसा ॐ पुस्तकालय संस्करण : दस रूपया - प्रकाशन वर्ष प्रथम सस्करण : अक्तूबर १६८३ : Dप्रकाशक - 8 अक्षयवट प्रकाशन, २६ बलरामपुर हाउस, इलाहाबाद 28 शुभचिन्तक प्रेस, ३१३ बस्की खुर्द, दारागंज, इलाहाबाद Dमुद्रक प्राक्कथन उपनिषदे भारतीय वाङ्मय के महा रत्न हैं । सारे वैदिक वाङ्मय का ज्ञानकाण्ड हैं ये उपनिषदे । सर्वोच्च आध्यात्मिक ज्ञान का प्राकट्य इनमें हुआ है । इसीसे ये 'वेदान्त'-वेद अर्थात् ज्ञान का अन्त अर्थात् पराकाष्ठा-कही जाती है । 'अध्यात्मविद्या विद्यानाम्' कह कर भगवान् श्रीकृष्ण ने भी आत्मज्ञान को सर्वोच्च ज्ञान कहा है। ऐसे ज्ञान से विमुख भारतीय सच्चा भारतीय नहीं कहा जा सकता । इसी कारण इन उपनिषदों का अध्ययनाध्यापन नितान्त स्पृहणीय है। विश्वविद्यालयों की स्नातक एव परास्नातक परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में तो इन्हें स्थान मिलना ही चाहिये, उससे पूर्व की हाईस्कूल, इण्टर परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में भी इनके सरल एवं उपदेशप्रद मन्त्रो का सङ्कलन निर्धारित हो तो बहुत अच्छा । इससे चरित्र-गठन में सहायता मिलेगी उन्हें। इसी दृष्टि से अनेक भारतीय विश्वविद्यालयो ने अपनी स्नातक कक्षाओ के पाठ्यक्रम में कोई न कोई उपनिषद् या उसका कुछ अंश अवश्य ही रखा है। कठोपनिषद् स्नातक कक्षाओं के लिये सम्भवतः सर्वाधिक उपयुक्त है अपनी सरल- सुबोध आख्यानात्मक संवादपरक शैली के कारण । फिर भी यत्र-तत्र वैदिक-भाषा- सम्बन्धी दुरुहता इसमें भी मिलती ही है, विशेषतः शब्दों, और भावों में । इसे दूर करने के विचार से कई हिन्दी अनुवाद हैं जिनमें गीता प्रेस का सर्वोत्तम है । परन्तु उसमें शब्दों की व्युत्पत्ति इत्यादि के न होने से छात्र मूल के शब्दों से अनुवाद का ठीक-ठीक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाते । फलतः वे अनुवाद को रट लेते है । प्रस्तुत संस्करण इसी कठिनाई को दूर करने के विचार से अनुवाद, व्याख्या एवं टिप्पणी के साथ प्रकाशित किया जा रहा है । आशा है, यह अपने उद्देश्य में सफल होगा। शारदीयनवरात्र वि० सं० २०४० अवतरणिका वैदिकवाङमय वेद भारतवर्ष के आर्ष वाङ्मय की सर्वाधिक मूल्यवान् ज्ञानराशि है, और उपनिषद् उस 'वेद' का सर्वोच्च ज्ञानकाण्ड है, वेदान्त है, वैदिक वाङ्मय की सर्वोत्कृष्ट परिणति है । यह 'वेद' क्या है ? कात्यायन एवं आपस्तम्ब ने 'मन्त्र- ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्' कहा है जिसका सामान्य अर्थ यही है कि मन्त्र अर्थात् मन्त्रों के सङ्ग्रहभूत संहिता-ग्रन्थ एवं ब्राह्मण-ग्रन्थ वेद कहे जाते है । जैसा आगे के विवेचन से स्पष्ट होगा, ब्राह्मणग्रन्थों से ही सम्बद्ध आरण्यक-ग्रन्थ हैं और आरण्यकों से सम्बद्ध-उपनिपदे है । अतः 'ब्राह्मण' से इन दोनों का भी ग्रहण हो जाने से संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद्-इन चारों का सामूहिक एक नाम 'वेद' है । इस प्रकार प्रत्येक वेद की अपनी संहिता, अपने ब्राह्मण-अपने आरण्यक और अपनी उपनिषदें होती हैं । उदाहरणार्थ 'ऋग्वेद' से ऋक्-संहिता, ऋक् ब्राह्मण, ऋक-आरण्यक तथा ऋक्-उपनिषदें ग्राह्य हैं । इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के विषय में भी जानना चाहिये। वैदिक संहिताओ में सङ्कलित मन्त्रों का यज्ञानुष्ठान में विनियोग होता है । इनका विनियोग करने वाले पुरोहित क्रमशः होता, अध्वयु, उद्गाता तथा ब्रह्मा कहलाते हैं । यज्ञ में प्रयोग के अनुसार, 'होता' पुरोहित देवो को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए ऋचाओं के द्वारा उनकी स्तुति करता हुआ उन्हें निमन्त्रित करता है। 'अध्वर्यु' पुरोहित आहुति देने में यजुर्वेद का प्रयोग करता है । 'उद्गाता' पुरोहित देवों के प्रसन्नतार्थ मन्त्रों का गान प्रस्तुत करने में सामवेद का प्रयोग करता है । 'ब्रह्मा' पुरोहित यज्ञों में होने वाले विघ्नों को दूर करने तथा तदङ्ग- भूत शान्ति-पुष्टि आदि कर्मों में अथर्ववेद का प्रयोग करता है ऋग्वेद के मन्त्रों को 'ऋक्' कहा जाता है-'ऋचां वेदः ऋग्वेदः' । इन 'ऋचाओं का प्रयोग यज्ञों में देवों का आह्वान करने के लिये किया जाता था। इन देवों के स्वरूप के सम्बन्ध में दो विचार-धारायें प्रमुख हैं, एक तो पाश्चात्त्य विचारकों 'एवं उनके अनुयायियों की, जो विकासवाद के नाम से जानी जाती है; और दूसरी पौरस्त्य विद्वानों एवं व्याख्याताओं की जो देवत्व को विकसित नहीं मानते । पाश्चात्त्य विद्वान् विकासवाद के आधार पर यह मत प्रकट करते है कि अपने चारों ओर अहर्निश होने वाली प्राकृतिक घटनाओ से चकित-चमत्कृत आदिम-युगीन सरल- ( ५ ) - स्वभाव मानव ने इन्हे प्रेरित नियमित करनेवाले जिन अतिमानवीय तत्त्वो की कल्पना की, वे ही 'देव' कहलाये । इन नियामक या प्रेरक शक्तियों से सुखप्राप्ति एवं आत्मरक्षा के लिये स्तुतिपूर्वक प्रार्थना करना एवं उन्हे उपहार देना उचित समझा गया । यही 'यज्ञ' कहलाया । यह शब्द देवपूजासङ्गतिकरणदानार्थक भ्वादिगणी 'यज्' धातु से नङ् प्रत्यय जोड़ने से बनता है । यह सारी चर्चा 'बहुदेव वाद' से सम्बद्ध है । अवान्तर काल में इन्हीं अनेक देवो में से कही पुरुष, कहीं प्रजापति, कहीं अदिति, कही हिरण्यागर्भ और कहीं अन्य किसी एक ही देवता को प्रधान या अधिपति कहा गया तथा शेष को उसके अधीन । यह वेदों का एकेश्वरवाद था । उसके भी बाद सर्वेश्वरवाद की कल्पना हुई । ऋग्वेद (१०८९) में अदिति को सब कुछ कहा गया है--"अदितिरिदितिरन्तरिक्षम् अदितिर्माता स पिता स पुत्रो विश्वेदेवा अदितिर्जातमदितिजनित्वम् ।" ( ऋ० १०.८९)। इसीप्रकार पुरुषसूक्त (ऋ० १०९०) की 'पुरुष एवेद, सर्व यद् भूतं यच्च भव्यम्" इत्यादि पंक्तियों में भूत, भविष्य सभी कुछ कह दिया गया है । यही भावना 'सर्वेश्वरवाद' के नाम से बोधित हुई। 'पुरुष' को पाश्चात्त्य विचारको के मत में वैदिक देवतावाद का यही संक्षिप्त विकास- क्रम है । किन्तु वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन से स्पष्ट पता चलता है कि देवत्व की कल्पना वेदों में इतनी भौतिक नहीं है जितनी पाश्चात्त्य वैदिक विद्वान् बतलाते है । आचार्य ने निरुक्त के देवतकाण्ड (सप्तम अध्याय में) में देवता-तत्त्व का विवेचन बड़े स्पष्ट शब्दों में किया है । इस जगत् के मूल में एक ही तत्त्व, एक ही महत्त्वशालिनी शक्ति विद्यमान है जो ईश्वर कहलाती है। वह एक और अद्वितीय है । उसी एक देवता की अनेक रूपों में स्तुति की जाती है.---"माहाभाग्याद् देवताया एक एवात्मा बहुधा स्तूयते । एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ।” (निरुक्त ७.४.८.६)। बृहद्दवता (१.६१.६५) भी यास्क के इस कथन का समर्थन करती है । परन्तु इस विषय में पिछले साहित्य के निरीक्षण की अपेक्षा नहीं। ऋग्वेद के अध्ययन से ही देवता तत्त्व का रहस्य भली-भाँति समझा जा सकता है । देवता-गण को ऋग्वेद में 'असुर' कहा गया है । 'असु' का अर्थ है प्राण, उससे सम्पन्न 'असुर' हुआ-अस न् प्राणशक्ति राति गृह्णातीति असुरः । इस प्रकार देवता-गण अविनश्वर शक्ति-मात्र हैं। वे आतस्थिवांसः, अनन्तासः, अजिरासः तथा विश्वतस्परि (ऋक्-संहिता ५१४७।२) हैं । एक पूरे स क्त ( ऋक्संहिता ३।५५ ) में देवताओं का असुरत्व एक ही माना गया है-महद् देवानाम सुरत्वमेकम् ; अर्थात् समस्त देवों का महत् सामर्थ्य एक ही है । .
( ६ ) ऋग्वेद में देवताओं के द्विविध रूप का वर्णन मिलता है-एक तो स्थूल दृश्य रूप, दूसरा सूक्ष्म अदृश्य रूप । इसे क्रमशः आधिभौतिक और आधिदैविक कहते हैं । इनके अतिरिक्त एक तृतीय-आध्यात्मिक-रूप की चर्चा भी किन्हीं-किन्हीं मन्त्रों में मिलती है । उदाहरणार्थ, सूर्य के त्रिविध रूपों-उत्, उत्तर तथा उत्तम- का वर्णन एक ही मन्त्र (ऋ० १।२०।१०) में मिलता है । सूर्य की उस ज्योति का नाम ‘उत्' है जो इस भुवन का अन्धकार दूर करती है । यह सूर्य का आधिभौतिक रूप है । इस ज्योतिर्मण्डल का अभिमानी देव, जो देवों के मध्य देव रूप से निवास करता है, 'उत्तर' नामवाला है । यह उसका आधिदैविक रूप है। इन दोनों से बढ़कर विशिष्ट ज्योति की संज्ञा 'उत्तम' है । यह सूर्य का आध्यात्मिक रूप है जो सर्वव्यापी एवं नित्य है । शुक्ल यजुर्वेद मे भी इसे सूर्य का कल्याणतम रूप कहा है :-"पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्रजापत्य व्यूह रश्मीन्, समूह । तेजो, यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि, योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ।।" ( शुक्ल यजु० ४०-१६) । यह आदित्यमण्डलस्थ 'पुरुष' ही आदित्य या सूर्य देव का नियमन करने के कारण बृहदारण्यक ३.७ (अन्तर्यामि-ब्राह्मण) में अन्तर्यामीरूप से वर्णित है :-“य आदित्ये तिष्ठन् आदित्यादन्तरो, यमादित्यो न वेद, यस्यादित्यः शरीरं, य आदित्यमन्तरो यमयति, एष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः” ( बृहद १०३७-६ )। सूर्य के इसी अन्तर्यामी परमात्मतत्त्व की दृष्टि से ऋक्संहिता के एक मन्त्र में उसे स्थावर-जङ्गमात्मक त्रिभुवन की आत्मा कहा गया है :-"चित्रं देवानामुदगादनीकं, चक्ष मित्रस्य वरुण- स्याग्नेः । आ प्रा द्यावापृथिव्यन्तरिक्षं, सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ।।" ऋक्०-१.१५.१ इस प्रकार यह सुस्थापित हो जाता है कि ऋग्वेद इस विश्व के सर्वाभिभावी, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक, सर्व-नियन्ता, एक परमात्मतत्त्व से आदिम काल से ही परिचित है, तथा वह विभिन्न देवताओं को उसो की नाना शक्तियों का प्रतिनिधि मानता है :-'इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते' । इससे पाश्चात्त्यों का विकासवाद अमान्य ठहरता है। इस एक परमा देवता की विभिन्न संज्ञायें वेद में मिलती हैं । ऋग्वेद में प्रजापति, हिरण्यगर्भ, पुरुष, अदिति आदि, तथा अथर्ववेद में स्कम्भ, उच्छिष्ट आदि । 'स्कम्भ' का अर्थ आधार है । इसी से हिन्दी भाषा का खम्भ या खम्भा शब्द निकला है जिसे अंग्रेजी भाषा में Pillar कहते हैं । ब्रह्म या आत्मा के लिये इसका प्रयोग इसे समस्त चराचरात्मक विश्व के आधार रूप में प्रतिष्ठित करता है । इसी प्रकार 'उच्छिष्ट' शब्द भी ब्रह्म का वाचक है-'उत ऊवं निषेधानन्तरं शिष्टम्' अर्थात् दृश्य प्रपञ्च के निषेध करने पर जो अवशिष्ट रहता है, वही उच्छिष्ट है । ब्रह्म के इसी स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये बृहदारण्यक उसे 'नेति नेति' द्वारा वर्णित करती है 4 ( ७ ) -'अथात आदेशो नेति नेतीति' (बृहदा० २. ३. ६); ‘स एष नेति नेतीत्यात्मा' (बृहदा० ४. ५-१५) । अथर्वसंहिता ११-६.१ में इसका वर्णन इस प्रकार है :- "उच्छिष्टे नामरूपं च, उच्छिष्टे लोक आहितः । उच्छिष्ट इन्द्रश्चाग्निश्च विश्वमन्तः समाहितः॥" आगे आने वाली उपनिषदो के ब्रह्म तत्त्व तथा ब्रह्मात्मैक्यवाद की यही पूर्व पीठिका है । ऋग्वेद का नासदीयसूक्त (१०, १२६) ऋग्वेदीय अद्वत-भावना को जिस रूप में प्रकट करता है, उस रूप में अन्य कोई भी सूक्त नहीं :--"नासदासीनो सदासीत्तदानीं नासीद् रजो नो व्योमा परो यत् । किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्, अम्भः किमासीद् गहनं गभीरम् ।। न मृत्युरासीदमृतं न तहि, न रात्र्या अह्न आसीत् प्रकेतः । आनीदवातं स्वधया तदेक, तस्माद्धान्यन्न परं किञ्चनास।" उस परम तत्त्व के निर्धारण मे असमर्थ होकर वैदिक ऋषियो ने उसके लिये 'तत्' (तदेकम्), सत् आदि नपुं० शब्दो का प्रयोग किया है। वह एक होकर भी अनेक नामो से पुकारा जाता है :- 'इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपणों गरुत्मान् । एक सद् विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यम मातरिश्वानमाहुः ॥” (ऋक्साहता १.१६४) ।। जसा पहले कहा जा चुका है, वैदिक सहिताओं में सङ्ग्रहोत मन्त्रो का होता; अध्वर्य, उद्गाता तथा ब्रह्मा नामक पुरोहित यज्ञो मे विनियोग करते थे । इन मन्त्रों के द्वारा यज्ञों मे विभिन्न देवताओ को पुरोडाश या हवि प्रदान किया जाता था। 'ब्रह्मन्' शब्द मन्त्र का वाचक है, इसी ब्रह्मन् के विनियोगादि का व्याख्यान करने वाले ग्रन्थ 'ब्राह्मण' कहलाये । यह शब्द ब्रह्मन से अण् प्रत्यय लगा कर बनता है और इसका अथ होता है ब्रह्म अर्थात् मन्त्र के विषय में लिखे गये ग्रन्थ । 'ब्रह्मन्' शब्द बृह धातु से बना है और इसका एक अर्थ यज्ञ भी होता है । यज्ञ अर्थात् वैदिक कर्म से सम्बन्ध होने से भी ये 'ब्राह्मण' कहे गये । दूसरे शब्दों में यह वेद का कर्मकाण्ड है। जैसे संहिता मन्त्रकाण्ड है। इन ब्राह्मण-ग्रन्थो के बाद आरण्यकों का निर्माण हुआ। 'अरण्यान्मनुष्ये' (अष्टा० ४।२।१२६) सूत्र से अरण्य से वुन प्रत्यय लगने पर 'आरण्यक' शब्द बनता है । इसका अर्थ होता है अरण्य या वन मे जाकर रहने वाला मनुष्य वानप्रस्थ । इनके कर्तव्यो एव धर्मों का वर्णन इन ग्रन्थों में किया गया है, इसी से ये 'आरण्यक' कहलाये। इन आरण्यकों में प्रतिदिन किये जाने वाले पञ्च महायज्ञों (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, नृयज्ञ, पितृयज्ञ तथा भूतयज्ञ या वैश्वबलि) के अतिरिक्त अनेक प्रकार की उपासनाओ का वर्णन है, इसी से इन्हें वेद का उपासना-काण्ड कहा जाता है । वैदिक यज्ञों का निष्काम भाव से भगवत्प्रीत्यर्थ अनुष्ठान करने मे जितनी चित्त-शुद्धि होती है, उससे कहीं अधिक इन उपासनाओं से होती है । तृष्णा, काम, लोभ, मोह, द्वेष ( ८ ) आदि मलों से रहित होकर चित्त ऐकाग्र्योन्मुख-समाहित होने लगता है क्योंकि ये मल ही चित्त को विक्षिप्त या चञ्चल बनाते रहते है, एवं समाहित चित्त ही आत्म- विचार के योग्य होता है, आत्म-स्वरूप के विचार से ही निदिध्यासन द्वारा उसका साक्षात्कार या अपरोक्ष ज्ञान होता है, इसी से ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त होता है । यही सब वर्णन एवं विचार का विषय है उपनिषदों में। इस प्रकार सुस्पष्ट है कि वैदिक संहिताओं, विशेषतः उनके उत्तर कालीन सूक्तों एवं उपासना-परक आरण्यकों, दोनों के ही द्वारा औपनिषद ज्ञान-साधना की सुदृढ़ पृष्ठभूमि ज्ञान साधक के लिये तैयार की जाती है जिसमें स्थित होकर ही साधक साधना परी कर पाता है और जीवन के परम पुरुषार्थ या लक्ष्य 'मोक्ष' को प्राप्त करने में सफल होता है । कठोपनिषद् पृथक्-पृथक - पहले कहा जा चुका है कि प्रत्येक वैदिक शाखा की संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद् है । ऋग्वेद की २१ शाखाओं में से आज केवल शाकल शाखा की संहिता उपलब्ध है । इसी प्रकार यजुर्वेद की १०५ शाखाओं में से केवल छः ही उपलब्ध हैं । 'सहस्रवा सामवेदः'३ की केवल तीन शाखायें उपलब्ध हैं । इसी प्रकार 'नवधाऽथर्वणो वेदः' की केवल दो ही शाखाये उपलब्ध हैं । इससे लगता है कि वेदों की अनेक शाखाओं की ही तरह उन शाखाओं से सम्बद्ध उपनिषदें भी लुप्त हो गई हैं । तथापि मुक्तिकोपनिषद् में १०८ उपनिषदों की सूची उपलब्ध होती है । इनमें १० ऋग्वेद से, ३२ कृष्ण-यजुर्वेद से, १९ शुक्ल यजुर्वेद से, १६ सामवेद से, तथा ३१ अथर्ववेद से सम्बद्ध बताई गई हैं। ये १०८ उपनिषदें मुक्तिकोपनिषद् में सारभूत कही गई हैं । इसका तात्पर्य यह हुआ कि इनकी संख्या मुक्तिकोपनिषद् के समय में १०८ से कहीं अधिक रही होगी। १. मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार; चरण-व्यूह के अनुसार शाकल, वाकल आश्वलायन, शाखायन तथा माण्डकायन, ये पांच ही शाखायें ऋग्वेद की थीं। २. एकशतमध्वयुंशाखा:-पतञ्जलिकृत महाभाष्य, आह्निक १ । ३. वही। ४. वही ।
( ६ ) यों, उपनिषदों की संख्या वर्तमान काल में २०० से भी अधिक है जिनमें अनेक, काल में अत्यन्त अर्वाचीन तथा प्रतिपाद्य विषय में साम्प्रदायिक हैं । १०८ उपनिषदों में भी दस उपनिषदे प्रमुख मानी जाती हैं क्योंकि इन्हीं पर लिखे गये शाङ्कर-भाष्य जगद्गुरु आद्य शङ्कराचार्य के माने जाते है । वे ये हैं:-ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य तया वृहदारण्यक । इनके अतिरिक्त श्वेताश्वतर, नृसिंहतापनी, कौषीतकी एवं मैत्रायणी भी प्राचीन एव प्रमुख उपनिषदे मानी जाती है । इन्हें अपने ब्रह्मसूत्रभाष्य में आद्य शङ्कराचार्य ने वेदान्त-सिद्धान्तों के समर्थन में अनेकशः उद्धृत किया है । इससे इतना तो स्पष्ट ही है कि आद्य शङ्कराचार्य इन चारों को भी पूर्वोक्त दस उपनिषदों की तरह ही प्रामाणिक मानते थे। न सिंह- तापनी पर उपलब्ध भाष्य भी आद्य-शङ्कर-कृत माना जाता है। कुछ विद्वान श्वेताश्वतरभाष्य को भी शंकर-कृत मानते हैं । यजुर्वेद की पूर्वोक्त छः शाखाओं में से चार तो कृष्णयजुर्वेद की, तथा दो शुक्लयजुर्वेद की हैं । शुक्लयजुर्वेद की माध्यन्दिन और कण्व शाखाओं से सम्बद्ध माध्यन्दिनसंहिता एवं काण्वसंहिता उपलब्ध होती है । कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ एवं कपिष्ठल, ये चार शाखायें हैं । इनमें कठशाखा से सम्बद्ध कृष्णयजुर्वेदीय उपनिषद् ही कठोनिषद् के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें यज्ञ-विद्या या अग्नि विद्या का संक्षेप में सांकेतिक वर्णन ही प्राप्त होता है। इसमें 'वेदी के लिये अपेक्षित ईटों की संख्या, आकार एवं चयन-प्रकार आदि का वर्णन यम ने नचिकेता के प्रति कर दिया'-इतना ही कथित है । क्या है वह संख्या, प्रकार तथा आकार, यह इस उपनिषद् में नहीं वर्णित है । इसका कारण सम्भवतः यही है कि कर्मकाण्ड स्वर्ग-कामियों के लिये उपयोगी होने पर भी ज्ञानकाण्डात्मक उपनिषद् का मुख्य वर्ण्य विषय न होकर गौण विषय होता है। मुख्य वर्ण्य विषय तो आत्म-ज्ञान है, अतः उसी का निरूपण इस उपनिषद के प्रथम अध्याय की द्वितीय-तृतीय वल्लियों एवं समूचे द्वितीय अध्याय (की ३ वल्लियों) में किया गया है। आत्मज्ञान या ब्रह्मविद्या का यह निरूपण यम और नचिकेता के बीच हुये संवाद के माध्यम से बड़े ही विशद ढंग से किया गया है । इसकी वर्णन- शैली आख्यानपरक होने से बड़ी ही सरल और रुचिकर है । इसमें अन्य उपनिषदों की भाँति जहाँ आत्मज्ञान का गम्भीर विवेचन है, वहाँ नचिकेता का चरित्र पाठकों के समक्ष एक अनुपम आदर्श भी उपस्थित करता है । जब वे देखते हैं कि पिताजी जीर्ण-शीर्ण, गलित-पलित गायें ब्राह्मणों को दान करा रहे हैं और दूध देने वाली पुष्ट गायें मेरे लिये रख छोडी हैं तो बाल्यावस्था होने पर भी उनकी पितृ-भक्ति उन्हें चुप नही रहने देती और बाल-सुलभ चापल्य से वे पिता वाजश्रवस से पूछ बैठते हैं- 'तत ! कस्मै मां दास्यसि ?' वस्तुतः उनका यह प्रश्न ठीक ही था क्योंकि विश्वजित् + ( १० ) थाग में सर्वस्व का दान कर दिया जाता है और अपने तथा अपने कौटुम्बिकों के लिये कुछ भी नहीं रखा जाता । किन्तु नचिकेता के पिता ने उसके प्रति मोह के कारण याजक ब्राह्मणो को बूढी गायें देकर अच्छी पुष्ट गायें उसके निमित्त रख छोड़ी थीं। पिता की यह आसक्ति उन्हें नरक में गिराने वाली थी, उसमें पिता को बचाने का एक मात्र उपाय यही था कि जिसके प्रति मोह होने से पिता ने यह पाप किया, उसे भी दान मे दे दिया जाय, "न रहेगा बॉस, न बजेगी बाँसुरी" । अपने प्रश्न के उत्तर में पिता के मौन धारण करने पर नचिकेता के इसी तरह दुबारा-तिबारा पूछने पर जब वाजश्रवस ने खीझकर कहा कि 'मैं तुम्हे मृत्यु को देता हूँ', तो उन्होंने यह जानते हुये भी कि पिताजी ने मेरा हृद्गत भाव विना समझे ही क्रोध-वश ऐसा कह दिया है, उनके कथन की उपेक्षा नहीं की क्योकि ऐसा करने से उनके पिता को असत्य-भाषण का अतिरिक्त पाप लगता। पिता को एक पाप से बचाने के प्रयास मे नचिकेता न एक और पाप में निरत उन्हें फैसा देख कर उनके वचन को सत्य प्रमाणित करने के लिये मृत्यु के देवता यम के पास जाने का निश्चय कर लिया और पिता को समझा दिया कि पक जाने पर काट ली जाने वाली खेती की तरह मनुष्य का भी जीवन किञ्चित्कालिक है, ऐसे नश्वर जीवन के लिये मुह से निकले वचन को असत्य होने देना बुद्धिमान् पुरुष का लक्षण नहीं है । तदनन्तर पिता से विदा लेकर जब नचिकेता यमलोक पहुँचा तो यमराज से उसकी भेट नही हुई क्योकि उस समय वे अनुपस्थित थे । तीन दिन बाद यमराज वापस लौटे। तब तक नचिकेता ने अन्न-जल, कुछ भी नहीं ग्रहण किया था। जब यमराज को इस बात का पता चला तो वे बड़े दुःखी हुये । फिर नचिकेता के पास जाकर विनम्रता-पूर्वक तीन रातों के लिये तीन वर मांगने का प्रस्ताव रखा । नचिकेता ने प्रथम वर के रूप मे अपने खिन्न-क्ष ब्ध पिता के सौमनस्य- मानसिक शान्ति-की याचना की। द्वितीय वर से स्वर्ग के साधनभूत अग्नि-विज्ञान (यज्ञ विद्या) के ज्ञान की याचना की । तृतीय वर से निःश्रेयस या मोक्ष के साधन-भूत आत्मज्ञान की याचना की, आत्मा के स्वरूप को उद्घाटित करने की याचना की। तीनों वरों तथा उनके विशिष्ट क्रम का रहस्य नचिकेता ने यमराज से जो तीन वर मागे हैं, उनके क्रम में भी एक अद्भुत रहस्य है । उनका पहला वर था पितृ-परितोष । वे पिता के सत्य की रक्षा के लिए उनकी इच्छा के विरुद्ध यमलोक को चले आये थे। इससे उनके पिता स्वभावतः बहुत खिन्न थे । इसलिये उन्हें सबसे पहले यही आवश्यक जान पडा कि उन्हें शान्ति मिलनी चाहिये । यह नियम है कि यदि हमारे कारण किसी व्यक्ति को दुःख या ( ११ ) अशान्ति हो तो जब तक हम उसका दुःख निवृत्त न कर देंगे, तब तक हमें भी शान्ति नहीं मिल सकती। यह नियम मनुष्य-मात्र के लिये समान है; और यहाँ तो स्वयं उनके पूज्य पिता को ही दुःख हुआ था, इसलिये सबसे पहले उनकी शान्ति उन्हें अभीष्ट होनी ही चाहिये थी। यह पितृ-परितोष उनकी ऐहलौकिक शान्ति का कारण था । इसलिये सबसे पहले उन्होंने यही वर मांगा। लौकिक शान्ति के पश्चात् मनुष्य को स्वभाव से ही पारलौकिक सुख की इच्छा होती है, यहाँ तक कि जब वह अधिक प्रबल हो जाती है तो वह ऐहिक सुख की भी परवाह नहीं करता। नचिकेता में इस इच्छा का मुख्य कारण लोक-कल्याण की भावना थी । उनका विचार था कि यज्ञ-विज्ञान के प्रचार हो जाने से अनेक लोग इसके द्वारा स्वर्गादि प्राप्त कर लेगे एवं शोकातीत हो जायेंगे । जन्म-जरा-मृत्यु तथा अशनाया-पियासा से होने वाले दुःख स्वर्ग में नहीं है और यह स्वर्ग यज्ञ द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । इसी से नचिकेता ने यज-प्राप्ति के साधन-भूत अग्नि का विज्ञान दूसरे वर से प्राप्त करना चाहा । अग्नि-विज्ञान को द्वितीय वर के रूप में प्राप्त करने की प्रार्थना नचिकेता ने इसलिये भी की कि यज्ञ करने से न केवल स्वर्ग की प्राप्ति होती है, अपितु निष्काम भाव से केवल लोक-कल्याणार्थ किये जाने पर उससे चित्त शुद्धि भी होती है । विना चित्त-शुद्धि के आत्मस्वरूप का चिन्तन नहीं होता और विना आत्मचिन्तन के आत्म-साक्षात्कार नहीं होता। किन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिये कि वे स्वर्ग-सुख के इच्छुक थे। जिस प्रकार उनके पहले वर में पिता की शान्ति-कामना थी, उसी प्रकार इसमें मनुष्यमात्र की हित-चिन्ता थी। सबके हित में उनका हित था ही, किन्तु वे स्वयं स्वर्ग-सुख के लिये लालायित नही थे । यह बात उस समय स्पष्ट हो जाती है जब यमराज के- "ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाश्पूछन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामा: सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो! मरणं मानुप्राक्षीः ॥" शश२५ ॥ कहने पर वे कहते हैं- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगोते ॥ न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्षम चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु में बरणीयः स एव ।। अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मयः अभिध्यायन वर्णरतिप्रमोदानतिदीधे जीविते रमेत ॥ CINEMA क्वधःस्थः प्रजानन ।
( १२ ) यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत् सांपराये महति ब्रहि नस्तत् । योऽय वरो गूढमनुभविष्टो नान्य तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ १।१।२६-२६ ॥ उपयुक्त उद्धरणो से उनकी तीव्र जिज्ञासा और आत्मदर्शन की अनवरत पिपासा स्पष्ट प्रतीत होती है । इसी से प्रेरित होकर उन्होने तृतीय वर माँगा था। यमराज ने उनकी जिज्ञासा की परीक्षा के लिये उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन दिये और बड़े-बड़े मनोमोहक सब्जबाग दिखलाये, परन्तु आत्मामृत के लिये लालायित नचिकेता ने उनपर कोई दृष्टि नहीं दी क्योकि वे खूब अच्छी तरह जानते थे कि सारे भोग-पदार्थ-लौकिक और पारलौकिक भी-अनित्य है, केवल आत्मा ही अजर, अमर, अविनाशी, नित्य पदार्थ है । इसीसे भोगों पर दृष्टि न डालते हुए उन्होने यही कहा-'वरस्तु मे वरणीयः स एव, नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते' इत्यादि । इस प्रकार जब यमराज ने देखा कि उनमें नित्यानित्य का पूर्ण विवेक विद्यमान है, वे लौकिक और पारलौकिक भोगो से सर्वथा उदासीन हैं शमदमादि साधनों से सर्वथा सम्पन्न हैं और उनमें तीव्र मुमुक्षा की प्रच्छन्न अग्नि तेजी से धधक रही है तो उन्हें उनकी शान्ति के लिये ज्ञानामृत की वर्षा करनी पड़ी। नित्या- नित्य-वस्तु-विवेक. इहामुत्रार्थफलभोग-विराग, शमदमादिषट्क-सम्पत्ति तथा मुमुक्षत्व- वेदान्त में ये ही चार ज्ञान-प्राप्ति के अन्तरङ्ग माने गये है, और साधन-चतुष्ट्य के नाम से प्रसिद्ध हैं । इनसे सम्पन्न साधक ही आत्मज्ञान का सही पात्र है । इसी कारण से यमराज को उनके प्रति आत्मज्ञान का उपदेश करने के लिये विवश होना पड़ा। वही ज्ञानोपदेश आज भी कठोपनिषद् के रूप मे विद्यमान है। इससे विशुद्ध बोध का अंकुर उसी हृदय मे प्रस्फुटित हो सकता है जो नचिकेता के समान विवेक, वैराग्य, शम-दम-उपरति-तितिक्षा-समाधान-श्रद्धा रूप छः गुणो तथा मुमुक्षत्क्ष----इन चार साधनों से सम्पन्न है। नचिकेता का यह पावन, उदात्त एव समुज्ज्वलचरित्र सर्वथा अनुकरणीय है। आत्मा का स्वरूप पिछले प्रकरण में तीसरे वर की चर्चा करते समय निःश्रेयस-प्राप्ति के साधन रूप में आत्म-ज्ञान का उल्लेख किया गया है । अब प्रश्न यह है कि उस आत्मा का स्वरूप किस प्रकार का है। जगत् के दृश्यमान सभी पदार्थ नश्वर है, अनित्य हैं। क्या मनुष्य भी इसी प्रकार अनित्य है, क्या उसके शरीरादि दृश्यमान रूप के नष्ट हो जाने पर कुछ भी नहीं बचता ? इसी के उत्तर में यमराज ने निष्कर्ष रूप से नचिकेता को यह बताया कि शरीर के नष्ट हो जाने पर भी वह नष्ट नहीं होता। यह नष्ट न होने वाला अनश्वर या नित्य तत्त्व मनुष्य का अपना वास्तविक रूप - ( १३ ) है । यही आत्मा है । प्रश्न यह है कि जो जिज्ञासा नचिकेता को थी अपनी वास्तविकता के सम्बन्ध मे, क्या यही सर्व-साधारण मानव में सहज रूप से उदित होती है। उत्तर है 'नहीं' । फिर प्रश्न उठता है-ऐसा क्यों? इसका उत्तर यह है कि सर्व- साधारण मनुष्य इच्छाओं की पूर्ति को ही सुख मानने के कारण यावज्जीवन तदर्थ साधन जुटाता रहता है, धन-जन-जायादि पदार्थों का संग्रह करता रहता है और एक दिन ऐसा भी आता है जब सारे सञ्चित पदार्थ धरे रह जाते है और सग्राहक डेरा कूच कर जाता है। ऐसी वस्तु-स्थिति समक्ष उपस्थित होने पर सब में न सही किन्तु हजार या लाख में थोड़ा भी विवेक रखने वाले किसी एक मनुष्य में इस विचार का उदय करती है कि जो रहेगा नहीं, उसके सञ्चय-संग्रह मे आजीवन निरत रहना, तदर्थ विकल-विह्वल रहना कौन सी बुद्धिमत्ता है ? मृत्यु आने पर भी जो रहे, नष्ट न हो, उसी का परिग्रह करना चाहिये और वहो मूल्यवान् मानव जीवन का लक्ष्य या पुरुषार्थ भी हो सकता है, नश्वर भोगपदार्थो का सञ्चय-सङ्ग्रह नहीं। फिर इस प्रकार के सद्विचार का उदय उस जिज्ञासा को जन्म देता है जो नचिकेता में उदित हुई और जिसे उसने यमराज के समक्ष इस रूप मे रखा कि मृत्यु के बाद मनुष्य की सत्ता किसी रूप में रहती है या नहीं। इसी जिज्ञासा के समाधान या उसकी शान्ति के प्रयास में स्व-रूप या आत्मा के ज्ञान का उदय होता है, जैसा कि कठोपनिषद् के आख्यान से स्पष्ट है । थोड़ा पूर्व कहा जा चुका है कि नचिकेता के प्रति यमराज के उपदेश का निष्कर्ष यही है कि मनुष्य मृत्यु के बाद भी रहता है, शरीर से नहीं; स्वरूप से । 'आत्मा' शब्द स्वरूप का ही वाचक है । मनुष्य का यह स्वरूप, उसका आत्मा नित्य और अविनाशी है । जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु भी अवश्यम्भावी है। यदि मनुष्य का आत्मा मृत्यु से परे अविनाशी या नित्य तत्त्व है तो निस्सन्देह उसका जन्म भी नहीं होता, ऐसा मानना पड़ता है । यह अज-अविनाशी आत्मा यमराज के शब्दों में इस प्रकार वर्णित है :-- न जायते नियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१-२-१८॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्त, हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ।।१-२-१६॥ फिर उसकी सर्व-व्यापकता, एवं अनित्य शरीर के भीतर रहने पर भी उसके अनित्यत्वादि धर्मों से अस्पृष्ट रहने के विषय में यम ने इस प्रकार कहा है :- आसीनो दूरं बजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मदन्योज्ञातुमर्हति ॥१-२-२१॥ . - ( १४ ) स्थूल अशरीर शरीररेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्त विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ १-२-२२ ॥ यहाँ यह तथ्य अवधेय है कि इस द्वितीय प्रकार के वर्णन मे आत्मा के आपाततः विरोधी स्वरूप को यमराज ने नचिकेता के समक्ष प्रकट किया है । जो बैठा हुआ भी दूर तक जाता है, लेटा हुआ भी सर्वत्र पहुँचा हुआ है, जो हर्ष से युक्त भी है और रहित भी, जो शरीर में स्थित होकर भी उसके धर्मो से रहित है, अनित्यों में भी नित्य रूप से स्थित है, तथा जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर और से भी स्थूलतर है (अणोरगीयान् महतो महीयान् आत्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् श२।२०) । इस प्रकार के वर्णन से सम्भवतः यमराज नचिकेता के प्रति आत्मा की प्राप्ति की कठिनता का वर्णन करना चाहते हैं । वे बताना चाहते हैं कि सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम आत्मा की प्राप्ति सूक्ष्मतन को देखने की अभ्यस्त हुई सूक्ष्म बुद्धि से ही हो सकती है, सांसारिक पचड़ों-प्रपञ्चों में उलझी हुई स्थूल बुद्धि से नहीं। 'कस्तं मदामदं देव मदन्यो ज्ञातुमर्हति' में उन्होने इस तथ्य की ओर संकेत किया है और प्रथम अध्याय की तृतीय वल्ली में तो इसका कारण सहित स्पष्ट कथन भी किया है : "इन्द्रियेभ्यः परा ार्था अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धरात्मा महान् परः ।। महतः परमव्यक्तम् अव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ।। एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ।। १.३-१०-१२॥ प्रथम वल्ली के "तं दुर्दशं गूढमनुप्रविष्ट गुहाहितं गह्वरेष्ठ पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति ॥१-१-१२॥" मन्त्र में भी प्रकारान्तर से यम ने इसी तथ्य का कथन किया है। यहाँ आत्म-विषयक बुद्धि-योग (चित्त-समाधान) से उसकी प्राप्ति की बात कही है यम ने । आत्मा जसे सूक्ष्मतम तत्त्व पर स्थूल बुद्धि या चित्त केन्द्रित हो ही नहीं सकता, उसे तो अभ्यास से ही धीरे-धीरे सूक्ष्मतम को देखने के योग्य बनाया जा सकता है । भगवान् भाष्यकार जगद्गुरु शंकराचार्य के शब्दों में इस अभ्यास का स्वरूप द्रष्टव्य है :-"विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतसः आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्षशोको आत्मन उत्कर्षापकर्षयोरभावाज्जहाति ।' बुद्धियोग-चित्त-समाधान-की अपेक्षा पर यमराज ने अनेकशः प्रकाश डाला है। द्वितीय अध्याय का आरम्भ ही उन्होंने इसी से किया है :-"पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तमात् पराङ् पश्यति नात्मरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मान- मैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥२-१-१" ॥ इन्द्रियों का स्वभाव ही बाह्य विषयों को ग्रहण करने का है और बुद्धि के लिये ये इन्द्रियाँ ही साधन ठहरी, तब इनके द्वारा उसे आन्तरिक-गुहाहित-अतश्च दुर्दर्श प्रत्यक् आत्मा का बोध या ज्ञान कैसे हो सकता है । कोई धीर साधक ही अमृतत्व-प्राप्ति की इच्छा से (योग का साधन करता हुआ कालान्तर में) उन्मीलित-नेत्र होने पर प्रत्यगात्मा का दर्शन कर पाता है । प्रथम अध्याय की सारी तृतीय वल्ली रथ रूपक के माध्यम से इसी साधन-प्रक्रिया का उन्मीलन करती है। in । यह रथ रूपक क्या है, इसको समझने की बड़ी अपेक्षा है आत्मसाक्षात्कार अर्थात् तत्त्व-दर्शन के लिये । मुख्यतः तो यह प्रथम अध्याय की तृतीय वल्ली के तृतीय एवं चतुर्थ मन्त्रो मे दिया गया है । परन्तु एतत्सम्बद्ध विषय आगे के नवम मन्त्र तक चलता है । इसकी पृष्ठभूमि तो प्रस्तुत वल्ली के प्रथम मन्त्र में ही यमराज ने प्रस्तुत कर दी है । इसमें यह कहा गया है कि इस शरीर के भीतर बुद्धि- रूपी गुहा में स्थित परम प्रकृष्ट ब्रह्म-स्थान हार्दाकाश में छाया और आतप की तरह दो विलक्षण तत्त्व बैठे हुवे है जिनमे से एक छाया की तरह मलिन संसारी जीवात्मा है जो अपने शुभाशुभ कर्मो का फल भोग रहा है, और दूसरा आतप की तरह देदीप्यमान अससारी साक्षी परमात्मा है जो क्लेश कर्मादि से रहित होने के कारण फल का भोक्ता नहीं है हाँ भोजयिता अर्थात् जीवो को स्वकर्म-फल- भोग के लिये प्रेरक जरूर है । इस प्रकार इस मन्त्र में जीवात्मा और परमात्मा या ब्रह्म, इन दो पृथक् पृथक् या विभिन्न तत्त्वो का कथन किया गया है । वस्तुतः तो उपनिषदे अनेकशः जीव को ब्रह्म से अभिन्न बताती हैं परन्तु ससारावस्था या अविद्यावस्था में उनमें भेद का भी प्रतिपादन करती हैं। ब्रह्म से वस्तुतः अभिन्न भी जीव अविद्या काम-कर्मादि के सम्पर्क या सश्लेष से जन्म-नृत्यु-परम्परा अर्थात् संसार-आवागमन में फंस जाता है । इस बन्धन से विमोक्ष के लिये कठिन ज्ञान- साधना जीव को करनी पड़ती है। साधना वस्तुतः द्वतावस्था की वस्तु है । एक साधक, दूसरा साध्य। साधक है जीव, और साध्य है परमात्मा जो अपने निर्गुण, निष्कल रूप में अद्वत ब्रह्म ही है । संक्षेप मे जीव परमात्मा की उपासना और भक्ति करके क्रमशः स्वरूप का साक्षात्कार करने में समर्थ होता है । यह स्वरूप ब्रह्म से अभिन्न है । परन्तु यह तभी सम्भव है जब उसके इन्द्रिय, मन और बुद्धि, सब वशीभूत हों। असंयत इन्द्रिय, स्वच्छन्द मन तथा विकृत बुद्धि से जीव कभी साधना नहीं कर सकता। इसी तथ्य को सुस्पष्ट करने के लिए यम ने रथ-रूपक की योजना की है। उनका कथन है कि जीवात्मा रथी है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और मन बागडोर या लगाम है । इन्द्रियाँ घोड़े हैं, विषय उनके सञ्चरण-मार्ग हैं । शरीर, इन्द्रिय, मन हाथ से ( १६ ) और बुद्धि से युक्त जीवात्मा भोक्ता है । जैसे ठीक लक्ष्य या यात्रा के सही गन्तव्य पर सुरक्षित पहुँचने के लिए रथी के सारथी को सजग-सावधान रहते हुए बागडोर या लगाम के द्वारा घोड़ों को सही मार्ग पर चलाना आवश्यक है, उससे उन्हे इधर- उधर नहीं होने देना है, इसी प्रकार स्वलक्ष्य अर्थात् मानव-जीवन के यथार्थ गन्तव्य विष्णु या परमात्मा तक सुरक्षित रूप से पहुंचने के लिए मानव की बुद्धि को सावधान-विकारों से दूर-रहकर इन्द्रियाधिष्ठाता मन को अपनी पकड़ में रखकर- अपने हाथों में रखकर उसके माध्यम से पञ्च कर्मेन्द्रियों एवं पञ्च ज्ञानेन्द्रियों को वशीभूत करके सन्मार्ग-सदाचार-मार्ग से यात्रा करनी है । सारथी असावधान या प्रमत्त हुआ नहीं कि हाथ से बागडोर छूटी नहीं और बागडोर के छूटते ही घोड़े निश्चित ही मार्ग छोड़कर रथ और उस पर बैठे हुए रथी को खन्धक में ढकेल देंगे, स्वगन्तव्य पर नहीं पहुंचायेगे। इसी प्रकार बुद्धि प्रमत्त हुई नहीं कि मन उसके छूटा नहीं, और उसके स्वच्छन्द होते ही इन्द्रियाँ भी स्वच्छन्द हो जाएंगी क्योंकि उनका नियमन तो उनके अधिष्ठाता मन के द्वारा ही सम्भव है । इन्द्रियों के स्वच्छन्द विचरण करन पर-विषयासक्त होने पर-निश्चित ही जीव सन्मार्ग की साधना से भ्रष्ट होकर जीवन के पुरुषार्थ-ब्रह्म-प्राप्ति-से भ्रष्ट हो जायगा, ब्रह्म तक नहीं पहुंच सकेगा, संसार -जन्म-मृत्यु-ही प्राप्त करता रहेगा। इस प्रकार रथ-रूपक के माध्यम से यम ने नचिकेता को साधन-मार्ग का सदुपदेश दिया है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि तीसरे मन्त्र से नवें मन्त्र तक जिस रूपक की कल्पना की गयी है, उससे यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो गई है कि यह अनित्य तथापि अतिदुर्लभ मानव-शरीर जिस जीवात्मा को अपने शुभ कर्मो के परिणामस्वरूप प्राप्त हो गया है, उसे अपना सौभाग्य समझकर अपने जीवन को मानव-जीवन की लक्ष्य-पूर्ति के निमित्त लगा देना चाहिए । भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में अर्जुन से इसी बात को स्पष्ट करते हुये कहा है-“अनित्यमसुखं लोक- मिमं प्राप्य भजस्व माम् ।" अपने जीवन के इस अमूल्य समय को यदि पशुओं की तरह सांसारिक भोगों को भोगने में ही नष्ट कर दिया गया तो उसका परिमाण यह होगा कि उस व्यक्ति को संसार के आवागमन अथवा जन्म-मृत्यु के चक्र में ही घूमते रहना पड़ेगा । और इस भाँति मानव-जीवन के लक्ष्य अथवा उद्देश्य की पूर्ति वह कभी भी न कर सकेगा। अतः मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपनी बुद्धि का सदुपयोग करे। सांसारिक विषय-भोग-जनित क्षणिक सुखों की वास्तविक दुःख- रूपता को समझकर उनसे उदासीन हो जाय तथा केवल शरीर-निर्वाह के लिये अपेक्षित कमों को निष्काम भाव से करता हुआ परमात्मा में अहर्निश तल्लीन या अनुरक्त रहे और इस प्रकार ब्रह्म का साक्षात्कार करके उस परमपद को प्राप्त कर ले जहाँ से लौटकर फिर इस संसारचक्र या जीवन एवं मृत्यु के बन्धन में न पड़ना पड़े।
तत्-सद्-ब्रह्मणे नमः ॐ कठोपनिषद शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! अर्थ-सर्वरक्षक परमेश्वर हम (आचार्य और शिष्य) दोनों की साथ-साथ रक्षा करे । हम दोनों का साथ-साथ पालन करे । हम दोनों साथ-साथ (विद्याविषयक) पराक्रम (पुरुषार्थ) करें। हम दोनों का अध्ययन तेजोयुक्त हो। हम परस्पर द्वेष न करें। (हमें) त्रिविध ताप से शान्ति मिले । विशेष-ॐ-अवति रमतीति ॐ [ अ+मन् प्रत्यय । 'ज्वरत्वरस्रिव्य- विमवामुपधायाश्च ।। ६।४॥२०॥] अर्थात् उक्त धातुओं में उपधा तथा वकार के स्थान में ऊठ (ऊ) आदेश हो जाता है झलादि तथा अनुनासिकादि प्रत्यय लगने पर, इस नियम से अव् के अ तथा व के स्थान में ऊ हुआ। फिर 'उ' को गुण होकर 'ओ' हुआ और मन् के टि अर्थात् अन् का लोप होकर 'ओम्' बना। इसका अर्थ 'रक्षक' होता है । यह परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम एवं प्रतीक है। अधीतम्-अधि+इङ्+क्त नपुंसके भावे, अध्ययनमित्यर्थः । तेजस्वि-तेजस्+विनि, नपुं०प्र०एक० [अस्-माया- मेघा-स्रजो विनिः अर्थात् अस् में अन्त होने वाले शब्दों, एवं माया, मेधा तथा स्रज् शब्दों से विनि प्रत्यय लगता है जिससे तेजस्वी, तमस्विनी (रात्रि), पयस्विनी (नदी) इत्यादि, एवं मायावी, मेवावी तथा स्रग्वी (मालाधारी) शब्द बनते हैं। शाङ्करभाष्यम्- -ॐ नमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय नचिकेतसे च । अथ काठकोपनिषद्वल्लीनां सुखार्थप्रबोधनार्थमल्पग्रन्था वृत्तिरारम्यते । सदेर्धातोविंशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य किप्प्रत्ययान्तस्य रूपमुपनिष- दिति । उपनिषच्छब्देन च व्याचिस्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यबेद्यवस्तुविषया विद्योच्यते । केन पुनरर्थयोगेनोपनिषच्छब्देन विद्योच्यत इति ? उच्यते-ये मुमुक्षवो दृष्टानुअविकविषयवि- २ | कठोपनिषद् तृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्दवाच्या वक्ष्यमाणलक्षणां विद्यामुपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषामविद्यादेः संसारबीजस्य विशरणाद्धिसनाद्विनाशनादित्यनेनार्थ- योगेन विद्योपनिषदित्युच्यते । तथा च वक्ष्यति-"निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते।" (क० उ० १।३।१५ ) इति । पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षुन्वा परं ब्रह्म गमयतीति ब्रह्म- गमयितृत्वेन योगाद् ब्रह्मविद्योपनिषद् । तथा च वक्ष्यति-"ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युः" (क० उ० २।३।१८) इति । लोकादिब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्तद्विषयाया विद्याया द्वितीयेन वरेण प्राय॑मानायाः स्वर्गलोकफलप्राप्तिहेतुत्वेन गर्भवासजन्मजराद्य पद्रववृन्दस्य लोकान्तरे पौनः पुन्येन प्रवृत्तस्यावसादयितृत्वेन शैथिल्यापादनेन धात्वर्थयोगादग्नि- विद्याप्युपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति-"स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते" (क० उ० १११११३ ) इत्यादि । ननु चोपनिषच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलषन्ति । उपनिषदमधीमहेऽध्यापयाम इति च । नैष दोषोऽविद्यादिसंसारहेतुविशरणादेः सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमा. सम्भवाद्विद्यायां च सम्भवात् । ग्रन्थस्यापि तादर्थ्येन तच्छब्दत्वोपपत्तः, आयुर्वे घृतमित्यादिवत् । तस्माद्विद्यायां मुख्यया वृत्त्योपनिषच्छब्दो वर्तते, ग्रन्थे तु भक्त्येति । एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्तः। विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः परं ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजनं चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी संसारनिवृत्तिनाप्राप्तिलक्षणा। सम्बन्धश्चैवं भूतप्रयोजनेनोक्तः। अतो यथोक्ता- धिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलल्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धा एता वल्ल्यो भवन्तीति । प्रतिभानं व्याचक्ष्महे । अतस्ता यथा- प्रथमः अध्यायः प्रथमा वल्ली ॐ उशन्ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥१॥ अर्थ ऐसी प्रसिद्धि है कि अपने विश्वजित् यज्ञ की सफलता को) कामना करने वाले वाजश्रवस ने सर्वस्व दान कर दिया । उसका नचिकेता नामक पुत्र था । विशेष --ॐ... इससे उपनिषद् का आरम्भ मंगल प्राप्त्यर्थ किया गया है क्योंकि यह परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम वेदादि सभी के द्वारा कहा गया है । ऐसी प्रसिद्धि है कि सृष्टि के आदि में ॐ तथा अर्थ शब्द ब्रह्मा जी के मुख से बलात् बाहर निकले थे, तभी वे सृष्टि करने में समर्थ हुये थे,-'ॐ शब्दश्चाथ शब्दश्च द्वावेनी ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ।' योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र इत्यादि अनेक सूत्र-ग्रन्थ 'अथ' से आरम्भ होते हैं-'अर्थ योगानु शासनम् 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इत्यादि । वाजश्रवसः-वाजश्रवसोऽपत्यं पुमान् (वाजश्रवस्+अण् अपत्यार्थे)। इन्हीं का एक नाम 'गौतम' आगे के १०वें मन्त्र में उल्लिखित है । सम्भवतः यह गोत्र-नाम था । उसी के बाद ११वें मन्त्र में यम ने उन्हीं को 'औद्दालकिः' और 'आरुणिः' भी कहा है । शङ्कराचार्य ने 'उद्दालक एव औद्दालकिः' व्याख्या देकर यह बात स्पष्ट की है कि वाजश्रवस का दूसरा प्रसिद्ध नाम उद्दालक था, कुछ लोग औद्दालकि भी कहते थे । उनके 'अरुणस्यापत्यमारुणिः' लेख से स्पष्ट है कि उद्दालक के पिता का नाम अरुण था जिससे वे आरुणि भी कहे जाते थे। उशन्-वर (कान्ती, कान्तिः इच्छा, वष्टि उष्टः उषन्ति)+शत, प्र० पुं० एक० । ह, वै-ये दोनों प्राचीन वृत्तान्त का स्मरण कराने वाले निपात हैं । इनका अर्थ है-'ऐसी प्रसिद्धि या जनश्रुति है' इत्यादि । सर्ववेदसम्-सर्वश्चासौ वेदाश्च ( विद्लु लाभे+असुन् 'सर्वधातुभ्योऽसुन्' ॥उगादि ४।६३८।। सूत्र से ) इति सर्ववेदाः ( कर्मधा.), तं सर्ववेदसम् । 'जो प्राप्त किया जाय' इस अर्थ में वेदस् शब्द बनता है जो सकारान्त पुंल्लिङ्ग है। इससे बनने वाले अन्य अधिक ज्ञात शब्द चेतस् सरस्, पयस्, सदस् ( सभा ), ओजस्, शिरस्, यशस्, रेतस् (वीर्य) इत्यादि हैं किन्तु ये सभी नपुं० हैं। इस प्रकार 'वेदस्' शब्द धन-सम्पत्ति का वाचक है । आस-/अस्+लिट् (प्र० पु० एक० ।
४ | कठोपनिषद् शा० भा०-तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था । उशन्कामयमानः। ह वा इति वृत्तार्थस्मरणार्थी निपाती। वाजमन्नं तद्दानादिनिमित्तं श्रवो यशो यस्य स वाजश्रवा, रूढितो वा । तस्यापत्यं वाजश्रवसः । स किल विश्वजिता सर्वमेधेनेजे तत्फलं कामयमानः स तस्मिन् ऋतौ सर्ववेदसं सर्वस्वं धनं ददौ दत्तवान् । तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किल आस बभूव ॥ १ ॥ तह कुमार सन्तं दक्षिणासु नीयमानासुश्रद्धाविवेश । सोऽमन्यत ॥२॥ अन्वय-दक्षिणासु नीयमानासु कुमारं सन्तं तं ह श्रद्धा आविवेश । सः अमन्यत । अर्थ-जिस समय (ऋत्विजों के लिये) दक्षिणाओं (तत्स्वरूप गायों) को (वाजश्रवस के लोग) ले जा रहे थे, तभी कुमार होने पर (भी) उस (नचिकेता) में भद्धा का प्रवेश हुआ । वह सोचने लगा। विशेष-त', कुमार:-दोनों पदों में अनुस्वार को हो गया है। इसका उच्चारण गवं' इस रूप में होता है । इसका नियम यह है कि यजुर्वेज में यदि अनु- स्वार के बाद शल अर्थात् श ष स ह में से कोई वर्ण हो तो उसका उच्चारण 'वं' रूप से होता है । इसे इस विशेष चिह्न से प्रदर्शित किया जाता है । सन्तम् - अस् + .शत, पुं० द्वि० एक० । दक्षिणासु नीयमानासु-'यस्य च भावेन भावलक्षणम्' से दोनों पदों में सप्तमी विभक्ति हुई है। नीयमानासु-/नी+यक् कर्मणि+शानच्+ टाप् स्त्रियाम, स० बहु । श्रद्धा-शास्त्रादि में अविचल निष्ठा को श्रद्धा कहते हैं । भाष्यकार शङ्कराचार्य ने इसे 'आस्तिक्यबुद्धि' कहा है। आस्तिक वही है जो वेद- शास्त्रादि के वचनों को सत्य मानता है। उसी के प्रवेश के कारण नचिकेता पिता के बेदशास्त्र-विरुद्ध गोदान-कार्य के विषय में सोचने-विचारने को विवश हो गया। शा०भा०-संह नचिकेतसं कुमारं प्रथमवयसं सन्तमप्राप्तजननशक्ति बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः पितुहितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती। कस्मिन् काल इत्याह- ऋत्विभ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षिणासु नीयमानासु विभागेनोपनीयमानासु दक्षिणासु गोषु समाविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत ।।२।। पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥३॥ अन्वय-पीतोदकाः जग्धतृणाः दुग्धदोहाः निरिन्द्रियाः ताः ददत् सः, ते अनन्दा नाम लोकाः, तान् गच्छति ।
प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली | ५ - . अर्थ-(सदा के लिये) पानी पी चुकी, घास खा चुकी, दुही जा चुकी, तथा इन्द्रिय (प्रजननादि) शक्ति से विहीन हुई उन (जीर्ण)गायों को देने वाला यजमान निस्सन्देह, जो सुख-रहित लोक हैं, उन्हें प्राप्त करता है । विशेष---पीतोषका:-पीतम् (/पा+क्त)उदकं याभिस्ताः,बहु० । जग्धतृणा। जग्धं (/ अद्+क्त, अदो जग्घिय॑प्तिकिति ।।२।४।३६।। सूत्र अर्थात् अद् धातु से ल्यम्, क्त्वा, क्त, क्तवत् इत्यादि प्रत्यय होने पर उसको जग्ध आदेश हो जाता है, इस नियम से 'जग्ध' हो गया है) तृणं याभिस्ताः, प्र०बहु० । दुग्धदोहा:-दुग्धः (V दुह, +क्त)दोहः (दुह+घन भावे)यासां ताः, बहु । निरिदिन्या:-निर्गतानि इन्द्रियाणि पाभ्यस्ताः, प्र० बहु । अनन्दा:-अविद्यमानः नन्दः (नन्द्+घन्) येषु ते, बहुव्रीहि समास: आनन्द-रहिताः असुखा इत्यर्थः । वदत्-Vदा+शत, प्र.पुं० एक० । यहाँ 'नाभ्यस्ताच्छतुः ।।७।११७८॥ से शत को नुम् नहीं हुआ, अर्थात् 'ददन्' नहीं बना। सूत्रार्थ यह है कि अभ्यस्त धातुओं से जुड़ने वाले शतृ को नुम् नहीं होता। 'अभ्यास' संज्ञा 'जक्षित्यादयः षट् । ६।१॥६॥ सूत्र से जक्ष (भक्षणे) तथा जागृ, दरिद्रा दुर्गती) शासु (अनुशिष्टौ), चकास (दीप्तौ), दीधीङ् (दीप्तिदेवनयोः), वेवीङ्-ये छ:, इन सात घातुओं की है शा०भा०-कथमित्युच्यते-दक्षिणार्थी गावो विशेष्यन्ते । पीतमुदकं यामिस्ताः पीतोदका: । जग्धं भक्षितं तृणं याभिस्ता जग्धतृणाः । दुग्यो दोहः क्षीराख्यो पास ता दुग्धदोहाः। निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः। यास्ता एवम्भूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्ध्या ददत्प्रयच्छन् अनन्दा अनानन्दा असुखा नामे- स्येतद्य ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ॥ ३॥ स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं त" होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥४॥ अन्वय-सह पितरम् उवाच, तत ! कस्मै मां दास्यसि इति । द्वितीय तृतीयम् (उवाच)।तं ह (पिता) उवाच, मृत्यवे त्वा ददामि इति । अर्थ-उसने पिता से कहा-पिताजी ! आप मुझे किसको देंगे ? दूसरी- तीसरी बार (उसने यही कहा)। तब पिता ने उससे कहा-तुम्हें मृत्यु को देता हूँ। विशेष-कुत्सित दान से प्राप्त होने वाले नारकीय लोकों से पिता को बचाने के लिये ही नचिकेता ने उनसे कहा-'मुझे किसको देंगे? पुत्र प्राणातिप्रिय वस्तु होता है, अतः उसके सत् दान से कुदान का अनिष्ट फल नष्ट हो जायगा, इस प्रकार उसका पुत्रत्व सार्थक हो जायगा, क्योंकि 'पुत्र' वही कहा जाता है जो अपने ६ | कठोपनिषद् पिता को नरक से बचावे-"पुन्नाम्नो नरकाद् यस्मात् पितरं त्रायते सुतः। तस्मात् पुत्र इति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा ।" पिता के उपेक्षा-वश उत्तर न देने पर उसने अपनी बात दुबारा-तिबारा कही । किन्तु पिता ने यह सोचकर कि यह बालकों के से स्वभाव वाला नहीं है, ऋद्ध होकर कहा कि तुम्हें मृत्यु को देता हूँ। तत-यह 'तात' इस अर्थ में सम्बोधन-पद है। आकार का मकार छान्दस हस्वत्व है । स्वा-युष्मद् शब्द के द्वितीया एकवचन में त्वाम्' रूप बनता है, इसी के विकल्प रूप से 'त्वा' यह अन्वादेश होता है। चूंकि 'त्वाम्' के पूर्व प्रयोग के बिना 'त्वा' का प्रयोग नहीं किया जाता, अतः इसे त्वाम् का अन्वादेश कहा जाता है शा० भा०-देव ऋत्वसम्पत्तिनिमित्तं पितुरनिष्टं फलं मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मप्रदानेनापि ऋतुसम्पत्ति कृत्वेत्येवं मत्वा पितरम् उपगम्य स होवाच पितरं हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थं मां दास्यसि प्रयच्छसीत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोऽपि द्वितीय तृतीयमप्युवाच-कस्मै मां दास्यसि कस्मै मां दास्यसीति । नायं कुमारस्वभाव इति क्रुद्धः सन् पिता तं ह पुत्रं किलोवाच-मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वां ददामीति ॥ ४॥ बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः। कि स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥५॥ अन्वय-बहूनाम् प्रथमः एमि बहूनाम् मध्यमः एमि । यमस्य किस्वित् कर्तव्यम् यत् (पिता) अद्य मया करिष्यति । अर्थ-बहुतों के बीच मैं प्रथम हूँ, अन्य बहुतों के बीच मध्यम हूँ। यम का ऐसा कौन सा काम है जिसे (पिताजी) आज मेरे द्वारा करेंगे (करना चाहते हैं)। विशेष-पिता के 'मृत्यवे त्वा ददामि' ऐसा कहने पर नचिकेता को जो अनुताप हुआ, उसी का वर्णन प्रस्तुत मन्त्र में है। किंस्वित्-'स्वित्' वितर्क अर्थ वाला निपात है। 'कि' के साथ प्रयुक्त होकर यह 'कौन सा' इस अर्थ को प्रकट करता है । बहूनाम् -- यतश्च निर्धारणम् ॥२॥३॥४१॥ सूत्र से षष्ठी हुई है। क्योंकि नचिकेता अनेक के समुदाय में अपने स्थान का निर्धारण (एकदेशस्य पृथक्करणम्- सि० को०) कर रहा है। शा०भा०-स एवमुक्तः पुत्र एकान्स्ते परिदेवयाञ्चकार । कथमित्युच्यते-बहूनां शिष्याणां पुत्राणां वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्यया शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थः । मध्यमानां च बहूनां मध्यमो मध्यमयैव वृत्त्यैमि । नाधमया कदाचिदपि । तमेवं विशिष्टगुणमपि पुत्र मो मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् पिता । स किंस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजनं मया प्रत्तैन प्रथमोज्यायः प्रथमावल्ली/७ करिष्यति यत् कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनम् अनपेक्ष्यैव क्रोधवशाक्तवान् पिता। तथापि तत् पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्ट किं मयोक्तमिति ।। ५॥ अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सत्यमिजाजायते पुनः ॥६॥ अन्वय-यथा पूर्वे (आचरितवन्तः तत्) अनुपश्य । तथा अपरे (यथा तत्) प्रतिपश्य । मत्यंः सत्यम् इव पच्यते, पुनः सस्यम् इव आजायते । अर्थ-पिताजी ! पूर्व पुरुष जैसा आचरण किया करते थे, उसको भली-भांति देखिये । एवं अन्य (वर्तमानकालिक) पुरुष जैसा आचरण करते हैं, उसे (भी) देखिये । मनुष्य खेती (फसल) की तरह पकता (वृद्ध होकर मर जाता है, और खेती की तरह ही पुनः उत्पन्न हो जाता है। विशेष - मन्त्र के पूर्वार्ध का तात्पर्य यह है कि न तो प्राचीन और न ही अर्वाचीन शिष्ट पुरुष कभी भी असत्य का व्यवहार करते थे। इसका कारण मन्त्र के उत्तरार्ध में दिया गया है जिसका तात्पर्य यह है कि वे असत्य का आचरण इस कारण से नहीं करते थे कि वैसा करने से वे अजर-अमर तो हो नहीं जायंगे, फिर जब जीवन मणिक ही है तो उसके लिये अपनी रहन क्यों बिगाड़ी जाय, अपनी बात को असत्य क्यों बनाया जाय । नचिकेता के कथन का तात्पर्य यही है कि पिताजी अपने वचन को सत्य करते हुये उसे यम के यहां जाने की अनुमति दे दें । प्रस्तुत मन्त्र का महत्त्व अत्यधिक है क्योंकि इसमें सत्याचरण के जो दो गम्भीर कारण दिये गये हैं, वे वस्तुतः भारत की प्राचीन आचार-संहिता (code of conduct) के मूलभूत आधार ही हैं । मन्त्र के पूर्वार्ध पर ही गीता का “यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत् प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते" ॥३॥२१॥ तथा मनु- स्मृति का "वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥११॥ वचन आधृत है। जहां तक मन्त्र के उत्तरार्ध के भाव की बात है, वह तो भारतीय मनीषियों की सबसे बड़ी खोज है। यह सारा जगत् और प्राणियों का जगतिक जीवन सर्वथा नश्वर है, यह विचार वह केन्द्र-बिन्दु है जिस पर दृष्टि केन्द्रित करके ऋषि-मनीषी सदैव सदाचार एवं सवृत्त की प्रेरणा ग्रहण करते आये हैं। मर्त्यः-/ मृङ् प्राणत्यागे+तन् (हसिमृग्रिण्वामिदमिलूपूधुविभ्यस्तन् उणादि ३७३) = मर्तः (म्रियते इति)। मत एव मर्त्यः (मर्त+ यत् स्वार्थे) उद्धृत उगादि सूत्र का अर्थ यह है कि हस्, मृङ्, गृ, इण, वा, अम् (गतो) दम्, लून्, पून तथा .
- छ| कठोपनिषद् धुर्वी (हिंसायाम्)-इन दस धातुओं से तन् प्रत्यय लगता है। पाणिनि के द्वारा स्वार्थिक प्रत्ययों में 'यत्' गृहीत नहीं है । शा० भा०-अनुपश्यालोचय निभालय अनुक्रमेण यथा येन प्रकारेण वृत्ताः पूर्व अतिक्रान्ताः पितृपितामहादयस्तव । तान् दृष्ट्वा च तेषां वृत्तमास्थातुमर्हसि । वर्तमानाश्चापरे साधवो यथा वर्तन्ते तांश्च तथा प्रतिपश्यालोचय, न च तेषु मृषाकरणं वृत्तं वर्तमानं वास्ति । तद्विपरीतमसतां च वृत्त मृषाकरणम् । न च मृषा कृत्वा कश्चिदजरामरो भवति । यतः सस्यमिव मर्यो मनुष्यः पच्यते जीर्णो म्रियते । मृत्वा च सस्यमिव आजायत आविर्भवति । पुनरेवमनित्ये जीवलोके किं मृषाकरणेन । पालय मात्मनः सत्यम् । प्रेषय मां यमाय इत्यभिप्रायः ॥६॥ पूर्वापर-सम्बन्ध-पुत्र के इस प्रकार कहने पर पिता ने अपनी सत्यता के लिये उसे यम के पास भेज दिया । वह यम के यहां जाकर बिना कुछ भी खाये-पिये तीन रात टिका रहा क्योंकि यम उस समय बाहर थे। प्रवास से लौटने पर यम की पत्नी अथवा मन्त्रियों ने नचिकेता की बात बताते हुये उसका आतिथ्य करने के लिये इस प्रकार कहा- वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिह्यह्मणो गृहान् । तस्यैता शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥७॥ अन्वय-ब्राह्मणः अतिथिः वैश्वानर (एव) गृहान् प्रविशति । तस्य एतां शान्तिं कुर्वन्ति, वैवस्वत ! उदकं हर ।, अर्थ-ब्राह्मण-अतिथि अग्नि के रूप में घरों में प्रवेश करता है। उसकी यह (अर्घ्यपाद्यादि-दान रूप) शान्ति (सत्पुरुषों द्वारा की जाती है । हे वैवस्वत ! (आप भी) जल ले जाइये। विशेष-वैश्वानर:--विश्वानरस्यापत्यं पुमान् (विश्वानर+अण् ) । 'विश्वानर' से अपत्यार्थक अण् प्रत्यय "ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ।।४।१।११४"।। सूत्र से लगा है। इसका अर्थ यह कि ऋषिवाचक शब्दों तथा अन्धक, वृष्णि एवं कुरुवंश के व्यक्तियों के नामवाचक शब्दों से भी अपत्यार्थक अण् प्रत्यय लगता है, जैसे विश्वामित्र से वैश्वामित्र, अन्धकवंशी श्वफल्क से श्वाफल्क, वृष्णिवंशी वसुदेव से वासुदेव, तथा कुरुवंशी नकुल से नाकुल । विश्वानर एक ऋषि का नाम था। इन्हीं के पुत्र होने से अग्नि 'वैश्वानर' कहलाये। 'विश्वानरः' का विग्रह 'विश्वश्चासो नश्च' है। 'नरे संज्ञायाम्' ।।६।३।१२६॥ से 'विश्व' शब्द के आकार को दीर्घादेश अर्थात् थाकार हो जाने से 'विश्वानरः' बना । इसका अर्थ यह है कि 'नर' शब्द के आगे आने पर पूर्ववर्ती शब्द के अन्तिम स्वर को दीर्घादेश हो, यदि पूरा समास किसी का नाम प्रथमोध्यायः .प्रथमावल्ली] 8 हो। विश्वानर अग्नि के पिता का भी नाम है, और सविता तथा इन्द्र की भी उपाधि है। अतिथि:-अविद्यमाना (अनियतेत्यर्थः) तिथिर्यस्य सः, बहुव्रीहि० । ब्राह्मणः- ब्रह्मणोऽपत्यं पुमान् (ब्रह्मन्+अण्)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रादि-सभी ब्रह्माजी के पुत्र हैं किन्तु सभी ब्राह्मण नहीं होते । सम्भवतः समस्त पुत्रों में जो सर्व- प्रथम उत्पन्न हुये, वे ही पिता की प्रमुख सन्तान होने से तन्नाम्ना 'ब्राह्मण' कहे गये- ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहूराजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ऋक् १०६०।१२।। वैवस्वतः- विवस्वतः (विवस् + मतुप-विवः प्रभा तेजः, तदस्यास्ति विवस्वान् सूर्यः, तस्य) अपत्यं पुमान्, यम इत्यर्थः (विवस्वत् +अण् अपत्यार्थे) । यहाँ 'वैवस्वत' से यम का ही ग्रहण है। यों, सूर्य के पुत्र होने से सप्तम (वर्तमान) मनु भी 'वैवस्वत' कहे जाते हैं। अमरकोश में यम के अनेक नामों में 'वैवस्वत' भी सम्मिलित है-कालो दण्डधरः श्राद्धदेवो वैवस्वतोऽन्तकः (अमर. ११११५६)। शा० भा०-वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् प्रविशत्यतिथिः सन् ब्राह्मणो गृहान् दहन्निव । तस्य दाहं शमयन्त इवाग्नेरेतां पाद्यासनादिदानलक्षणां शान्तिं कुर्वन्ति सन्तोऽतिथैर्यतोऽतो हराहर हे वैवस्वत ! उदकं नचिकेतसे पाद्यार्थम् । यतश्चाकरणे प्रत्यवायः श्रूयते ॥ ७ ॥ Lआशाप्रतीक्षे संगत सूनृतां च श्च सर्वान् । एतद् वृक्त पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ।।८।। अन्वय-यस्य गृहे ब्राह्मणः अनश्नन् वसति, तस्य अल्पमेधसः पुरुषस्य आशा- प्रतीक्षे, संगतम्, सूनृताम् च, इष्टापूर्ते, सर्वान् पुत्रपशून् च-एतद् वृङक्ते । अर्थ-जिसके घर में ब्राह्मण-अतिथि बिना भोजन किये निवास करता है, उस मन्दबुद्धि पुरुष की आशा (अज्ञात पदार्था की प्राप्ति की कामना) एवं प्रतीक्षा (ज्ञात पदार्थों की प्राप्ति की कामना) को, सङ्गत (आशा एवं प्रतीक्षा के संयोग से प्राप्त होने वाले फल-शा० भा०) एवं सत्यप्रिय वाणी (से उत्पन्न फल) को, इष्ट (यागादि-जन्य फल ) एवं पूर्त (कूप-निर्माण आदि सार्वजनिक हित-कार्यों से उत्पन्न फल) को, सारे पुत्रों और पशुओं को-इन सब को नष्ट कर देता है। विशेष-आशाप्रतीक्षे-आशा च प्रतीक्षा चेति (इतरेतर द्वन्द्व०)। जिस इष्ट पदार्थ की प्राप्ति का कोई निश्चित ज्ञान न हो परन्तु उसे प्राप्त करने की इच्छा अवश्य हो, तद्विषयिणी कामना 'आशा' कही जाती है । जिस इष्ट पदार्थ की प्राप्ति इष्टापूर्ते पुत्रपशू १० कठोपनिषद् निश्चित हो, तद्विषयिणी कामना 'प्रतीक्षा' कही जाती है । अंग्रेजी भाषा के Hope तथा Expectation शब्द क्रमशः इनके पर्याय कहे जा सकते हैं । अनुकूल परिस्थि- लियों में पदोन्नति की 'आशा' की जाती है, वह प्रतीक्षित वस्तु नहीं हैं । किन्तु वर्तमान वेतन-क्रम में वार्षिक वृद्धि निश्चित होने से प्रतीचित वस्तु है, उसकी प्रतीक्षा सम्बद्ध व्यक्ति वर्ष भर करता रहता है, जब तक कि नये वर्ष के प्रारम्भ में उसकी प्राप्ति नहीं हो जाती। संगतम्-सम् + गम् + क्त (नपुंसके भावे) । सूनृताम्-सत्य एवं प्रिय वाणी 'सूनतं प्रिये । सत्येऽथ सङ्कलसंक्लिष्टे परस्परपराहते' । अमर० १।६।१६ ॥ मूल में यह शब्द स्त्रीलिङ्ग में परित है, जबकि अमरकोश में यह नपुंसकलिङ्ग में है। १॥ ६॥ १७ के चतुर्थ चरण 'वाग्भेदास्तु निषूत्तरे' में अमरकोशकार ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि उत्तर अर्थात् बाद में कहे जाने वाले वाक्-प्रकार 'त्रिषु' अर्थात् तीनों लिङ्गों में होते हैं, जैसे 'रुषती वाक्' 'रुषन् शब्दः', 'रुषत् वचः' । यहाँ 'वाक् की अपेक्षा से 'सूनृता' प्रयुक्त है, इसी प्रकार 'वचः' की अपेक्षा से 'सूनृतम् प्रयोग होगा। । इष्टम्-यज्+क्त भावे । वचिस्वपियजादीनां किति ।।६।११५॥ से कित् क्त प्रत्यय जुड़ने पर 'यज्' के 'य' को सम्प्रसारण अर्थात् 'इ' आदेश हो गया है। पूर्तम्- ( पृ या पृv+क्त)। यहाँ 'उदोष्ठ्यपूर्वस्य' १७।१।१०२।। से ओष्ठयवर्ण पूर्वक ऋकारन्त पृ या पृ को उ अर्थात् उकार आदेश होने पर पु हुआ जो रपर होने पर पूर बन गया। अब रकारान्त धातु होने से 'रदाभ्यां निष्ठानो नः पूर्वस्य च दः ॥८८ ४२॥ से त को न होना था, परन्तु 'न धाख्यापमूच्छिमदाम्' ।।८।२॥५॥ से उसका बाध होने पर पूर+त = 'पूर्त' बना । इष्टापूर्ते-इष्टं च पूर्त चेति इष्टापूर्ते (इतरे- तर द्वन्द्व० । 'अथ ऋतुकर्मेष्टं पूर्त खातादि कर्म यत्' (अमर० २७१२८) के अनु- सार ऋतुकर्म अर्थात् यज्ञयागादि कर्म को 'इष्ट' तथा खात अर्थात् पोखरा, तालाब इत्यादि खुदवाने एवं वृक्षारोपणादि को 'पूर्त' कहा जाता है । एक देवों के प्रति स्वकर्तव्य-पालन का साधन है तो दूसरा मनुष्यों तथा तदितर भूतों के प्रति । धर्म-शास्त्रों में दोनों के लक्षण क्रमशः इस प्रकार दिये गये हैं :-"एकाग्निकर्म हवनं प्रेतायां यच्च हूयते । अन्तवैद्यां च यद् दानमिष्टं तदभिधीयते"। "वापीकूपतागादि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामाः पूर्तमाः प्रचक्षते ।।" वृङक्त-विनाशयति (Vवृजी अदादि, लट् प्र० पु० एक०) । अल्पमेधसः अल्पा मेधा यस्य सः (बहु०), तस्य । 'नित्यमसिचप्रजामेधयोः' से समासान्त असिच् (अस्) प्रत्यय लगाकर बना है । अनश्नन्-न अश्नन् इति अनश्नन् उपवसन्नित्यर्थः, नन् + अ +शत, प्र. पु० एक० (नञ्तत्पु०)।
प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली| ११ क शा० भा०- आशाप्रतीक्षेऽनितिप्राप्येष्टार्थप्रार्थना आशा, नितिप्राप्यार्थ- प्रतीक्षणं प्रतीक्षा, ते आशाप्रतीक्षे । सङ्गतं तत्संयोगजं फलम् , सूनृतां च सूनृता हि प्रिया वाक्तन्निमित्तजं च, इष्टापूर्ते इष्टं यागजं पूर्तमारामादिक्रियाज फलम्, पुत्रपशूश्च पत्रांश्च पशूश्च सर्वानेतत्सर्व यथोक्तं वृक्त आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्पुरुषस्याल्प- मेधसोऽल्पप्रज्ञस्य यस्यानश्नन्नमुखानो ब्राह्मणो गृहे वसति । तस्मादनुपेक्षणीयः सर्वावस्था- स्वप्यतिथिरित्यर्थः।।८।। तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीगृहे मे, अनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिनमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु, तस्मात्प्रति त्रोवरान्वृणीष्व ॥६॥ अन्वय-ब्रह्मन् ! यत् त्वं नमस्यः अतिथिः अनश्नन् मे गृहे त्रिस्रो रात्री: अवात्सीः, तस्मात् प्रति श्रीन् वरान् वृणीष्व । ब्रह्मन् ! ते नमः अस्तु, मे स्वस्ति अस्तु । अर्थ-हे ब्रह्मन् ! चूंकि तुम पूज्य अतिथि होकर बिना खाये मेरे घर में तीन रात तक रहे, इसलिये प्रत्येक रात्रि के अनुसार तीन वर चुन लो (ले लो) 1 तुम्हें हमारा नमस्कार हो, हमारा कल्याण हो । विशेष-यत्-'यस्मात्' के अर्थ में प्रयुक्त अव्यय । तिनः रात्री:-यहाँ 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे' सूत्र के. अनुसार द्वितीया विभक्ति हुई है । अवारसी:--- / वस् + लुङ् म०पु० एक० । नमस्यः-नमस्+यत् (अर्हार्थे) नमस्कारयोग्य इत्यर्थः । मे स्वस्ति-'ते' तथा 'मे' में चतुर्थी 'नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालवषड्योगाच्च' के अनुसार हुई है। प्रति 'प्रतिरात्रि' के अर्थ में प्रयुक्त अव्यय । स्वस्ति- 'कल्याण' के अर्थ में प्रयुक्त अव्यय । इसका रूप ज्यों का त्यों ही रहता है, बदलता नहीं सम्भवतः अपनी अव्यय-पूर्व अवस्था में इसका खण्ड'सु+अस्ति'रहा होगा । वेदों में प्राप्त 'स्वस्तये' इत्यादि प्रयोगों से इस बात की पुष्टि होती है। 'सु'अर्थात् 'शोभनम्' 'अस्ति' । जैनों के 'स्याद्-वाद' शब्द में 'स्यात्' की तरह ही 'अस्ति' भी अस् का रूप होते हुये भी अव्यय हो गया होगा। वरान् व+अप् । 'ऋदोरप्' अर्थात् ऋकारान्त तथा उकारान्त धातुओं में भावार्थक अप् प्रत्यय लगता है, इस नियम से 'वियते इति' इस अर्थ में अप् लगा है। शा० भा०-तिस्रा रात्रीर्यद्यस्मादवात्सीः उषितवानसि गृहे मे ममानश्नन् हे ब्रह्मनतिथिः सन्नमस्यो नमस्काराहश्च तस्मान्नमस्ते तुभ्यमस्तु भवतु । हे ब्रह्मन् स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद् भवतोऽनशनेन मद्गृहवारानिमित्ताद्दोषात्तत्प्राप्त्युपशमेन । ते नमः १२ | कठोपनिषद् यद्यपि भवदनुग्रहेण सर्व मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिकसंप्रसादतार्थमनशनेनोषिताम् एकैकां रात्रि प्रति त्रीन वरान् वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् प्रार्थयस्व मत्तः ॥९॥ पूर्वापर-सम्बन्ध-वर के लिये प्रार्थित नचिकेता यम से कहता है- - शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्या- द्वीतमन्युगौतमो माभि मृत्यो। त्वप्रत्सृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१०॥ अन्वय-मृत्यो ! गौतमः मा अभि यथा वीतमन्युः शान्तसङ्कल्पः सुमनाः स्यात्, त्वत्प्रसृष्टं मा अभि प्रतीतः वदेत्, त्रयाणाम् एतत् प्रथमं वरं वृणे । अर्थ-हे यम ! मेरे पिता गौतम मेरे प्रति जिससे शोक-रहित, शान्त विचारों वाले एवं प्रसन्नचित्त हो जायं और आप द्वारा भेजे गये मुझको पहचान कर मुझसे बोलें (बातें करें), (तदर्थ) मैं तीनों में से यह प्रथम वर वरण करता हूँ। विशेष-(i) 'वीतमन्युः शान्तसङ्कल्पा सुमनाः' यही अन्वय सही है और एतदनुसार ही अर्थ भी किया जाना चाहिये क्योंकि यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि दुःखी व्यक्ति के विचार कभी भी शान्त नहीं हो सकते, मन स्थिर नहीं हो सकता और उद्विग्न, अस्थिर या अशान्त मन प्रसन्न तो हो ही नहीं सकता। क्रम यही है कि पहले दुःख शान्त हो, जिससे विचार शान्त हों, तब फिर दुःखी व्यक्ति का मन स्थिर शान्त एवं प्रसन्न होगा। खेद एवं आश्चर्य का विषय है कि भाष्यकार शंकराचार्य का ध्यान इस तथ्य की ओर नहीं गया, आधुनिक व्याख्याकारों का तो गया ही नहीं। (ii) शान्तसङ्कल्पः-शान्तः (V शम् दिवादि०+क्त--'शमादीनामुपधादीपी' नियम से शम् को शाम होने पर 'म्' के स्थान में अनुस्वार और फिर उसके स्थान में परसवर्ग 'न्' होकर 'शान्त' बना) सङ्कल्पः यस्य सः (बहु०) । सुमना:-सु शोमनं मनः यस्य सः (बहु०) । वीतमन्युः-वीतः (वि+इण्गतौ+क्त) विगतः मन्युः शोका यस्य सः (बहु०) । 'मन्युशोको तु शुक् स्त्रियाम्' (अमर० १।२५) के अनुसार 'मन्यु शब्द शोकवाची भी होता है। प्रस्तुत तथा अगले श्लोक मे इसका यही अर्थ उचित प्रतीत होता है, 'क्रोध' अर्थ नहीं क्योकि नचिकेता के पिता का क्रोष तो तभी काफूर हो गया था जब वह उनके वचन को सत्य सिद्ध करने के भाव से यमलोक के लिये प्रस्थान करने को प्रस्तुत हो गया था और इसे देखकर वे सन्न हो गये एवं अपने किये पर पश्चात्ताप करने लगे थे जैसा १-५ के शां०भा० से भी स्पष्ट है-पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह पितरं शोकाविष्टं कि मयोक्तमिति । अगले मन्त्र में प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली१३ यमराज के 'सुख' रात्री.....प्रमुक्तम्' कथन से भी इस बात की पुष्टि होती है । पुत्र को मृत्यु के मुख से छूटा हुआ देखकर पिता का शोक-मुक्त होना ही उपयुक्त है, क्रोध-मुक्त होना नहीं। ऐसी वस्तु स्थिति में इस शब्द का भाष्यकार कृत 'रोष' अर्थ उचित या संगत नहीं लगता । अभि-अभिलक्ष्य, प्रति इत्यर्थः । त्वत्प्रसृष्टम्-त्वया प्रसृष्टः प्रेषितः इति त्वत्प्रसृष्टः (युष्मत्त्वत् एकवचने +:+सृज्+क्त तृतत्पु०), तम् । मभि-तृतीयपंक्ति-गत यह शब्द 'वदेत्' से पृथक् लिया जाना चाहिये । यहाँ भी इसका अर्थ पूर्ववत् 'प्रति' ही है। 'वदेत्' के साथ लेने पर तो 'अभिवदेत्' पद 'अभि- वादन'-प्रणाम-पूर्वक नाम्गोत्रादि-कथन अथवा केवल प्रणाम-का वाचक होने से सर्वथा अनुचितार्थक होगा, क्योंकि पुत्र के प्रति उसके पिता का अभिवादन तो सर्वथा ही लोक-वेद-विरुद्ध बात है। मा-यह 'माम्' का अन्वादेश है। इसमें 'अभि' के योग में द्वितीया विभक्ति 'कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया' ॥२॥३८॥ सूत्र से हुई है, और इसकी 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा 'अभिरभागे' ॥१२४६१॥ सूत्र से होगी। इसका अर्थ यह है कि 'भाग' अर्थ को छोड़कर शेष तीन अर्थो-लक्षण, इत्थम्भूताख्यान एवं वीप्सा-में 'अभि' की 'कर्मप्रवचनीय' संज्ञा होती है। यहां यह 'लक्षण' अर्थ में प्रयुक्त है । प्रतीतः-प्रति+/इण् गतो+क्त प्रत्यय । शा०भा०-नचिकेतास्त्वाह-यदि दित्सुर्वरान्, शान्तसङ्कल्प उपशान्तः सङ्कल्पो यस्य मां प्रति यमं प्राप्य किं नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसङ्कल्पः सुमनाः प्रसन्नमनाश्च यथा स्याद्, वीतमन्युविंगतरोषश्च गौतमो मम पिता माभि मां प्रति हे मृत्यो, किं च त्वत्प्रसष्टं त्वया विनिर्मुक्त प्रेषितं गृहं प्रति माम् प्रतीतो लब्धस्मृतिः स एवायं पुत्रो ममागत इत्येवं प्रत्यभिजानन्नित्यर्थः । एतत्प्रयो- जनं त्रयाणां प्रथममाद्यवरं वृणे प्रार्थये यत् पितुः परितोषणम् ॥१०॥ पूर्वापर-सम्बन्ध-उत्तर में मृत्यु ने इस प्रकार कहा- यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुख" रात्रीः शयिता वीतमन्यु- स्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥११॥ अन्वय-मत्प्रसृष्टः आरुणिः औद्दालकिः यथा पुरस्तात् (तथा) प्रतीत: भविता, त्वां मृत्युमुखात् प्रमुक्तं ददृशिवान् वीतमन्युः रात्रीः सुखं शयिता। अर्थ-मेरे द्वारा प्रेरित हुआ (तुम्हारा पिता) अरुण-पुत्र उद्दालक तुम्हें पहले की ही तरह पहचान लेगा। और तुम्हें मृत्यु के मुख से छूटा हुआ देखकर चिन्ता-रहित होकर (आने वाली) रात्रियों में सुख-पूर्वक सोयेगा। अभि वदेत् - . १४ ] कठोपनिषद् विशेष-पुरस्तात्-पूर्व+अस्ताति । 'पूर्व' को 'पूर्वाधरावराणामसि पुरधवश्च- षाम् ॥५॥३॥३६।। सूत्र से पुर्' आदेश हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि अस्ता- ति तथा असि प्रत्यय लगने पर पूर्व को पुर्, अधर को अध् तथा अवर को अव आदेश हो जाते हैं । भविता-/भू + लुट् (प्र०पु०, एक०) । रात्री:-कालाध्वनोरत्यन्तसं. योगे सूत्र से द्वितीया विभक्ति हुई है । शयिता Vशी+लुट् (प्र०पु०, एक०)। वोतमन्युः- वीतः (वि+/इण्+क्त) मन्युः शोको चिन्ता वा यस्य सः (बहु०) । दृशिवान्-/दृश् + लिडर्थे क्वसु प्रत्यय (प्र० पु०, एक०) 'दृशेश्च' से विकल्प से अनिट् रूप 'दहश्वान्' भी बनता है। शा० भा०-- मृत्युरुत्राच-यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमासीत् स्नेह- समन्विता पितुस्तव, भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीतवान् सत्रौद्दालिकः । उद्दालक एवौद्दालकिः । अरुणस्यापत्यमारुणिः, यामुष्यायणो वा । मत्प्रसृष्टो मयानु ज्ञातः सन् इतरा अपि रात्री: सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्युविगतमन्युश्च भविता स्यात्वां पुत्रं दद्दशिवान् दृष्टवान् स मृत्युमुखान्मृत्युगोचरात् प्रमुक्तं सन्तम् ।। ११ ॥ पूर्वापर-सम्बन्ध-प्रथम वर पा लेने पर नचिकेता पुनः बोला- स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्वाऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥ . अन्वय~स्वर्ग लोके किञ्चन भयं न अस्ति । तत्र न त्वं, न जरया (कश्चित्) बिभेति । अशनायापिपासे उभे ती शोकातिगः स्वर्गलोके मोदते । अर्थ-स्वर्गलोक में कोई भय नहीं है । वहाँ न तुम (मृत्यु के देवता यमराज) हो, और न कोई बुढ़ापे से ही डरता है। भूख और प्यास, दोनों को पार करके शोक का अतिक्रमण करके (प्राणी) स्वर्ग मे आनन्द करता है। विशेष-जरया-यहाँ तृतीया का प्रयोग अपाणिनीय है, क्योंकि भीत्रार्थानां भयहेतुः सूत्र से बिभेति' के योग में इसमें पञ्चमी होनी चाहिये थी । अशनाया- पिपासे-अशनाया च पिपासा चेति अशनायापिपासे (इतरेतर द्वन्द्व) । 'अशनायोदन्य- धनाया बुभुक्षापिपासागर्थेषु ॥७:४६३४॥' सूत्र से अशन्, उदक तथा धन शब्द से क्रमशः बुभुक्षा (भूख), पिपासा (प्यास) तथा गधं (लोभ, तृष्णा) अर्थ में ही क्यच् प्रत्यय लगने पर अशनायति, उदन्यति तथा धनायति रूप निपातित होते हैं । प्रथम प्रथमोध्यायः प्रथमावली) १५ भजन्त, तथा अन्तिम रूपों में अंग के अन्तिमस्वर 'अ' के स्थान में दीर्घ निपात हो जाता है, तथा द्वितीय में 'उदक' के स्थान में 'उदन्' भाव निपातित होता है । ये अर्थन होने पर क्रमशः अशनीयति, उदकीयति तथा धनीयति रूप बनते हैं । इस प्रकार अशन + क्यच् + अ भावे + टाप् स्त्रियाम् से 'अशनाया' शब्द बनता है कि 'अशनाय' क्यज- न्त रूप है, अतः 'अ प्रत्ययात्' सूत्र से भावार्थक अप्रत्यय लगा है। प्रत्ययान्त धातु से 'भाव' अर्थ में अप्रत्यय लगता है, यह सूत्रार्थ है । इसी नियम से / पा+ सन् + अ भावे+टाप् स्त्रियाम् से 'पिपासा' शब्द बनता है । शोकातिगः-शोकम् अतीत्य गच्छतीति (शोक+अति+ गम् +ड कर्तरि-उपपदसमास)। शा० भा०-नचिकेता उवाच-स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्तं भयं किञ्चन किञ्चिदपि नास्ति न च तत्र त्वं मृत्यो सहसा प्रभवस्यतो जरया युक्त इह लोकवत्त्वत्तो न बिभेति कुतश्चित् तत्र । किबोभे असनायापिपासे तीनतिक्रम्य शोकमतीत्य गच्छ- तीति शोधातिगः सन् मानसेन दुःखेन वजितो मोदते हृष्यति स्वर्गलोके दिध्ये ॥१२॥ स त्वमग्नि स्वर्गामध्येषि मृत्यो, प्रब्रूहि त्व” श्रद्दधानाय श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥१३॥ अन्वय-(हे) मृत्यो ! सः त्वम् स्वय॑म् अग्निम् अध्येषि । त्वं श्रद्दधानाय मह्यं (तं) प्रब्रू हि (येन) स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते । द्वितीयेन वरेण एतद् वृणे । अर्थ-हे मृत्युदेव ! आप स्वर्ग के साधनभूत अग्नि को जानते हैं। मुझ श्रद्धालु के प्रति आप (उस अग्नि का उपदेश करें (जिसके द्वारा) स्वर्ग लोक के निवासी अमरता प्राप्त करते हैं (कर चुके हैं)। दूसरे वर के द्वारा मैं इसी का वरण करता हूँ। विशेष-स्वय॑म् - स्वर्गाय हितम् (स्वर्ग+यत् हितार्थे । अध्येषि-अधि +इक् स्मरणे, म० पु० एक० । परस्मैपदी होने से यह पद 'इङ् अध्ययने' का रूप नहीं हो सकता क्योंकि इङ् धातु आत्मनेपदी होती है एवं उसके रूप अधीते, अधीयाते. अधीयते होते हैं। माधवीयधातुवृत्ति में इस बात का स्पष्ट कथनहै:- एतदादयो वच्यन्ताः परस्मैपदिनोऽनुदात्ताः । इङ त्वात्मनेपदी ।' (पृ० ३५१) 'इक् स्मरणे । अयमप्यधिपूर्वः। मातुरध्येति' (पृ० ३५९) इसी से भाष्यकार ने 'अध्येषि' का अर्थ 'स्मरसि जानासि' ऐसा किया है । 'इण् गतौ से भी यह बन सकता है। श्रद्धानाय-श्रत् + धा+शानच् चतुर्थी एक० । स्वर्गलोका:-स्वर्गों लोको येषां ते (बहु०) -- इण् मतो। - १६ | कठोपनिषद् । शा० भा०-एवंगुणविशिष्टस्य स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनभूतमग्निं स त्वं मृत्युरध्येषि स्मरसि जानासि इत्यर्थः, है मृत्यो यतः; त्वं प्रब्रू हि कथय श्रद्दधानाय श्रद्धावते मह्य स्वर्गाथिने. येनाग्निना चितेन स्वर्गलोकाः स्वर्गों लोको येषां ते स्वर्ग- लोकाः, यजमाना अमृतत्वम् अमरणतां देवत्वं भजन्ते प्राप्नुवन्ति । तदेतदग्निविज्ञानं द्वितीयेन वरेण वृणे ॥ १३ ॥ पूर्वापर-सम्बन्ध-नचिकेता के उत्तर में यम इस प्रकार बोले- प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध, स्वर्ग्यमग्नि नचिकेतः प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां, विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥१४॥ अन्वय--(हे ) नचिकेतः! स्वयंम् अग्नि प्रजानन् ते प्रब्रवीमि । तत् उ मे निबोध । अनन्तलोकाप्तिम् अथो प्रतिष्ठाम् एतम् त्वम् गुहायाम् निहितं विद्धि । अर्थ-हे नचिकेता ! स्वर्ग के साधनभूत अग्नि को अच्छी तरह जानता हुआ मैं (उसका) तुम्हारे प्रति उपदेश करता हूँ। उसे तुम मुझसे अच्छी तरह समझ लो। इस अग्नि को तुम अनन्त-कभी न अन्त होने वाले अर्थात् नित्य-स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने वाला, (विराट रूप से) इस जगत का आश्रय, एवं (विद्वानों की बुद्धि-रूपी) गुहा में स्थित जानो। विशेष-(i) स्वर्ग के साधनभूत जिस अग्नि का उपदेश प्रस्तुत मन्त्र में यमराज नचिकेता को दे रहे हैं, उसके सम्बन्ध में उन्होंने यहां तीन बातें कहीं हैं- १. वह अग्नि 'स्वर्ग्य' अर्थात् स्वर्गलोक की प्राप्ति का साधक है। वह 'अनन्तलोकाप्ति' अर्थात् अनन्त-जिसका अन्त न हो अर्थात् नित्य-स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने वाला है। आगे के १८वं मन्त्र के चतुर्थ चरण 'शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके' में भी यही भाव पौनःपुन्येन स्थूणानिखननन्याय से व्यक्त किया गया है । २. वह जगत का 'माश्रय' है। भाष्यकर ने 'विरारूपेण' शब्द के द्वारा इसका भाव स्पष्ट कर दिया है । इसका तात्पर्य यह है कि अग्नि ही इस जगत् का कारण होने से व्यापक देद है और व्यापक होने से 'विराट' कहा जाता है। जो कारण होता है, वह व्यापक होता है और जो कार्य होता है, वह व्याप्य होता है। जैसे बट का कारण मिट्टी उस घट के प्रत्येक अंश में व्याप्त रहती है, मिट्टी ही घट का आश्रय है अर्थात् घट मिट्टी में ही प्रतिष्ठित है । यदि घट में से मिट्टी निकाल ली जाय तो 'घट' नाम से कोई वस्तु बचेगी ही नहीं। अगले मन्त्र १११४१५ में अग्नि - - प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली १७ को 'लोकादि' कहकर यम ने प्रकारान्तर से यही भाव प्रकट किया है । आगे के १७३ मन्त्र में इसे 'ब्रह्मजज्ञ' कहा है जिसका अर्थ ब्रह्मा अर्थात् हिरण्यगर्भ से उत्पन्न तथा ज्ञानवान् है । यह प्रथम शरीरी है जिसका शरीर या उपाधि यह भूलोक है। इसे समस्त देवों का मुख कहा गया है-'अग्निमुवा वै सर्वे देवाः ।' अतः इसी सर्वमुख- स्थानीय अग्नि में समस्त देवों का भोज्य पुरोडाश डाला जाता है f ससे यजमान को अभीष्ट लौकिक सुख वैभवादि तो प्राप्त होते हो हैं, शरीर छूटने के अनन्तर अनन्त-नित्य-स्वर्गलोक भी प्राप्त होता है । ३. वह गुहा में निहित है । 'गुहा' का अर्थ भाष्यकार ने 'विद्वानों-ज्ञानियों की बुद्धि किया है । ऊपर कहा जा चुका है कि यह भूलोक अग्नि का कार्य होने से उससे अभिन्न है । ब्राह्मण ग्रन्थों में 'भूरिति अग्निः' 'भूरिति वा अयं लोकः' उक्तियों से यह भाव स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। जो व्यक्ति पारस्परिक अभेद के इस तथ्य को जानकर आत्म-भाव से उसका अनुभव कर लेता है, वही उसके द्वार से स्वर्ग लोक प्राप्त करता है । इसी से उसे ज्ञानियों की बुद्धि में स्थित कहा गया है । अज्ञानी के लिये तो उसका आधिभौतिक रूप भले ही प्रकट हो परन्तु उपर्युक्त आधि दैविक रूप बिल्कुल ही तिरोहित या अप्रकट रहता है । इसी भाव से १६ व मन के द्वितीय चरण 'य एवं विद्वांश्चिनुतेनाचिकेम्' का अर्थ करते हुए भाष्यकार ने 'एतद्वि- दिस्वावगत्य यश्चवमात्मरूपेण अग्नि विद्वांश्चिनुते निर्वतयति स मोदते स्वर्गलोके वराजे विराडात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या' इत्यादि लिखा है । इसके पूर्व १७ वें मन्त्र के उत्तरार्ध 'ब्रह्मजज्ञं देवमीडयं विदित्वा, निवाय्येमा शान्निमत्यन्तमेति' के भाष्य में भी वे इस तथ्य को सुस्पष्ट कर चुके हैं, जो इस प्रकार है:-'तं देवं द्योतनाज्ञानादि- गुणवन्तमीडयं स्तुन्यं विदित्वा शास्त्रतो, निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावेने मां स्वबुद्धि- प्रत्यक्षां शान्तिमुपरतिमत्यन्तमेत्यतिशयेनैति । वैराजं पदं ज्ञान-कर्मसमुच्चयानुष्ठानेन प्रापोतीत्यर्थः। (ii) ते अवामि-लौकिक संस्कृत में ते प्रब्रवीमि' ऐसा ही रूप होगा। क्योंकि 'ते प्राग्धातोः' (१/४/८०) सूत्र से उपसर्ग धातु-रूप के ठीक पूर्व ही होगा। वैदिक संस्कृत में 'व्यवहिताश्च' १/४'८२) सूत्र से दूर भी रह सकता है। तदु - तत् उ । 'तत्' अग्नि के लिये आया है। 'तम्' के स्थान में 'तत्' का प्रयोग लिङ्ग-व्यत्यय का स्थल है जो वैदिक भाषा में प्रायः प्राप्त होता है । 'उ' निपात निश्चयार्थक है। अनन्तल'काटितम्-अविद्यमानः अन्तोयस्य सः अनन्तः नित्य इत्यर्थः, बहु० । अनन्तो लोकः अनन्त लोक: स्वर्ग इत्यर्थः । तस्य आप्तिर्यस्मात् सः, बहु०; तम् । प्रतिष्ठाम्-प्रति + स्था+अ+ ( आतश्चोपसमें से) + टाप् । निहितम्- १८ | कठोपनिषद् नि+/धा+क्त ('द धातेहिं' से)। गुहा-V गुह+का+टाप् । गुहा अर्थात् बुद्धि या हृदय । शा० भा०-मृत्योः प्रतिज्ञेयम् - प्र ते तुभ्यं प्रब्रवीमि, यत्त्वया प्राथितं तदु मे मम वचसो निबोध बुध्यस्वैकाममनाः सन् स्वयं स्वर्गाय हितं स्वर्गसाधनमग्नि है नचिकेतः प्रजानन् विज्ञातवानहं सन्नित्यर्थः । प्रब्रवीमि तन्निबोधेति च शिष्यबुद्धिसमा- धानार्थ वचनम् । अधुनाग्नि स्तौति । अनन्तलोकाप्ति स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनम् इत्येवत्, अथो अपि प्रतिष्ठाम् आश्रयं जगतो विरापेव, तमेतमग्नि मयो च्याणनं विद्धि जानीहि त्वं निहितं स्थितं गुहायां विदुषां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः ॥ १४ ॥ पौर्वापयं-सम्बन्ध-यम ने नचिकेता को 'प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध' इस प्रकार सम्बोधित करके अग्नि के स्वरूप के विषय में जो कुछ भी कहा, वह उनके शब्दों में तो नहीं किन्तु उसका प्रतिपाद्य श्रुति के शब्दों में अगले मन्त्र में उपलब्ध । इसीलिये इसकी अवतारणा भाष्यकार शङ्कराचार्य ने 'इदं श्रुतेर्वचनम्' इन शब्दों के द्वारा की है। लोकादिमग्नि तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । स चापि तत् प्रत्यवदद् यथोक्त- मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥१५॥ अन्वय-मृत्युः लोकादि तम् अग्नि, या यावतीः वा यथा वा (चेतव्याः) इष्टकाः, तस्मै उवाच । स चापि तद् यथोक्त प्रत्यवदत् । अथ मृत्युः अस्य तुष्टः पुनः एव आह। अर्थ-यम ने लोकों के आदि (कारण-भूत) उस अग्नि का, तथा उसके चयन में जैसी और जितनी ईटें होती है, एवं जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है, उस सबका नचिकेता के प्रति वर्णन कर दिया और उसने भी उसे ज्यों का त्यों दोहरा दिया। तब उससे प्रसन्न होकर यमराज ने पुनः कहा- विशेष-लोकादिम्-लोकस्यादिः, तम् । यावती-यत्+वतुप् + डीप् । 'मा सर्वनाम्नः सूत्र से 'यत्' के 'टि' अर्थात् अत् को आ होने पर यावत् होने पर यावती' बनता है। यहां प्रथमा बहु० का रूप 'यावत्यः' होना था। उसके स्थान में द्वि० बहु० का 'यावती:' रूप विभक्ति-व्यत्यय का स्थल है । वा---'समुच्चय और ङीप् .
प्रथमोध्याय: प्रथमावल्ली] १. - अर्थ में प्रयुक्त निपात । यथोक्तम्-उक्तम् अनतिक्रम्य (अव्ययी० )। मथास्य"तुष्ट:-इस चतुर्थ चरण में ११ से एक वर्ण अधिक होने से छन्दोभङ्ग का स्थल उपस्थित होता है । 'एवं' हटा देने से यह व्यत्यय दूर हो जाता है। शा० भा०-इदं श्रुतेर्वचनम् -लोकादि लोकानामादि प्रथमशरीरित्वादग्निं तं प्रकृतं नचिकेतसा प्रार्थितमुवाचोक्तवान् मृत्युस्तस्मै नचिकेतसे । किं च, या इष्ट- काश्चेतव्याः स्वरूपेण, यावती संख्यया, यथा वा चीयतेऽग्निर्येन प्रकारेण सर्वमेत- दुक्तवा नत्यर्थः । स चापि नचिकेतास्तन्मृत्युनोक्तं यथावत् प्रत्ययेनावदत्प्रत्युच्चारितवान् । अथ तस्य प्रत्युच्चारणेन तुष्टः सन्मृत्युः पुनरेवाह वरत्रयव्यतिरेकेणान्यं वरं दित्सुः। पौर्वापर्य-सम्बन्ध-यमराज द्वारा उपदिष्ट सारी अग्नि-विद्या को ज्यों का त्यों दोहरा देने पर नचिकेता से प्रसन्न हुये यम उसे अगले मन्त्र द्वारा एक अतिरिक्त वर दे रहे हैं : तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः । तवैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥१६॥ अन्वय-प्रीयमाणः महात्मा तम् अबवीत्-इह तव अद्य भूयः वरं ददामि । अयम् अग्निः तव एव नाम्ना भविता, इमां च अनेकरूपां सृङ्का गृहाण । अर्थ-प्रसन्न होते हुये महात्मा यम ने उससे कहा-अब मैं तुम्हें फिर एक वर और देता हूँ। यह अग्नि तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगा। और तुम इस अनेक रूपों वाली अर्थात् विचित्र माला को ग्रहण करो। विशेष-प्रीयमाण:-/प्री (दिवादि, प्रीयते)+शानच् पुं० प्र० एक० । तव-'ददामि' के योग में चतुर्थी होती है, परन्तु यहाँ 'शेष'-सम्बन्ध सामान्य'- में षष्ठी हुई है । भूयः-'पुनः' अर्थ में अव्यय है। यों, बहु + ईयसुन् = भूयस्-भूयः 'बहुतर' या 'अधिकतर' अर्थ में विशेषण पद है किन्तु पुनः' अर्थ में अव्यय होकर प्रयुक्त होता है । 'बहोर्लोपो भू च बहोः' से बहु को भू आदेश तथा ईयसुन के ई का लोप हो जाता है । भविता-/भू+लुट् प्र. पु० एक० । सृका प्रस्तुत स्थल में शङ्कराचार्य ने इसके दो अर्थ दिये हैं :- (१) शब्दवती रत्नमयी माला (१) कर्म की अकुत्सित (प्रशस्त) गति । आगे द्वितीय वल्ली के तृतीय मन्त्र में पुनः प्रयुक्त इस शब्द का वहाँ 'सृति कुत्सितां me- २० | कठोपनिषद् मूढजनप्रवृत्तां' अर्थ किया है। सृति का अर्थ सरणि या मार्ग है जो 'गति' का ही वाचक है । इस प्रकार द्वितीय तथा तृतीय अर्थ एक ही हैं । भेद केवल तदर्थ प्रयुक्त विशेषण का है। द्वितीय अर्थ में कर्म-मार्म को 'अकुत्सित' कहा है, जबकि तृतीय में उसे 'कुत्सित' कहा है । 'रत्नमयी माला' यह जो प्रथम अर्थ है, वह भी शब्दतः ही भिन्न है, तात्पर्यतः नहीं । वैदिक कर्म का मार्ग-यज्ञों का मार्ग-निस्सन्देह विभूतियों और समृद्धियों का मार्ग है । देवों को उनका देय भाग देकर तथा उनको प्रसन्न करके ऐश्वर्य-प्राय अनन्त स्वर्गलोक की प्राप्ति की जाती है। इसी से तो पूर्ववर्ती मन्त्र १।१।१४ में 'अग्नि' को 'अनन्तलोकाप्ति' कहा है यम ने । यह तो स्वर्ग लोक में प्राप्तव्य विभूतियों एवं ऐश्वर्यो की बात हुई, यज्ञ करने वाला यजमान इस लोक में भी समस्त अभीष्ट वैभव-सुख प्राप्त करता है। इसी कारण से यह अकुत्सित अर्थात् प्रशंसनीय मार्ग है। द्वितीय स्थल अर्थात् १।२।३ में 'सृङ्का' को कुत्सित बताने का दूसरा रहस्य है । वस्तुतः तो सांसारिक सुख-वैभव तथा अभ्युदय के इच्छुक लौकिक व्यक्ति के लिये सर्वोत्तम मार्ग वैदिक यज्ञों का ही है । इनसे यहाँ उत्तम सुख भोग कर यजमान मृत्यु के अनन्तर स्वर्ग-सुख भोगता है, जैसा कि आगे के १७वें मन्त्र के त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू' तथा उसके बाद के १८३ मन्त्र के 'शोकाति- मो मोदते स्वर्गलोके' पादों में यम ने स्पष्ट कहा है। ऐसी स्थिति में भाष्यकार का उसे 'अकुत्सित' या प्रशंसनीय मार्ग बताना ठीक ही है । १।२।३ मन्त्र में तो यम ने नचिकेता के सर्व-विषय-त्याग की प्रशंसा करते हुये कहा है कि 'नचिकेता' !तुम सचमुच बड़े विवेकी हो जो सांसारिक विषयों की असारता को समझते हुये उनके चक्कर में नहीं पड़े और धन-प्राय-विभूति-बहुल-उस सृङ्का (मार्ग) को तुमने मेरे देने पर भी नहीं स्वीकार किया जिसमें प्रायः सभी प्राकृत सामान्य जन जापादमस्तक डूबे रहते हैं । इस प्रकार लोक-विरक्त नचिकेता जैसे आत्मज्ञानार्थी विवेकी के प्रति तो कम-मार्ग त्याज्य ही ठहरता है। इसी दृष्टि से भाष्यकार ने उक्त स्थल में इसे कुत्सित मार्ग कहा है जो सर्वथा उचित ही है । विषय को न समझकर मनमानी व्याख्या करने वालों ने इसे 'बुद्धि में रहने वाली, जानाग्नि के साथ रहने वाली, तत्त्वज्ञान-परम्परा को अबाधित गति से स्थिय रखने वाली ज्ञान-माला' बताया है जो सर्वथा उपहासास्पद एवं उपेक्षणीय है। शा० भा०-तं नचिकेतसमब्रवीत्प्रीयमाण: शिष्ययोग्यतां पश्यन्प्रीयमाण प्रीतिमनुभवन् महात्माक्षुद्रबुद्धिर्वरं तव चतुर्थमिह प्रीतिनिमित्तमद्य दानी ददामि भूय! पुनः प्रयच्छामि । तवैव नचिकेतसो नाम्ना विधानेन प्रसिद्धो भविता मयोच्य- मानोऽयमग्निः । किं च, सृङ्को शब्दवती रलमयीं मालामिमामनेकरूपां विचित्री या प्रथमोध्यायः.प्रथमावल्ली| २१ गृहाण स्वीकुरु । यद्वा सृङ्काम् अकुत्सिता गति कर्ममयीं गृहाण । अन्यदपि कर्म- विज्ञानमनेकफलहेतुत्वात् स्वीकुवित्यर्थः ॥ १६ ॥ पौर्वापर्य-ऊपर 'सङ्का' की टिप्पणी में कहा गया तथ्य १७वें तथा १८वे मन्त्र में यम के द्वारा भी कथित है । ये यज्ञ-कर्म की प्रशंसा में कहे गये हैं- त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्रह्मजज्ञ देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ।।१७।। अन्वय-विगाचिकेतः त्रिभिः सन्धिम् एत्य त्रिकर्मकृत् जन्ममृत्यू तरति, ब्रह्मजज्ञम् ईड्यम् देवम् विदित्वा निचाय्य इमाम् शान्तिम् अत्यन्तम् एति । अर्थ-नाचिकेत अग्नि का तीन बार (ज्ञान, अध्ययन एवं अनुष्ठान रूप से- शां. भा०) चयन करने वाला मनुष्य तीन व्यक्तियों (माता-पिता-आचार्य) से सम्बन्ध को प्राप्त होकर अर्थात् तीनों से सम्पर्क करके तीन कार्यों ( इज्या, अध्ययन और दान) को करता हुआ जन्म और मृत्यु को पार कर जाता है । तथा ब्रह्म से उत्पन्न, ज्ञानवान और स्तुति-योग्य देव (अग्नि) को जानकर एवं (आत्म भाव से) उसका साक्षात्कार करके इस-स्वबुद्धि-प्रत्यक्ष-शान्ति को आत्यन्तिक रूप से प्राप्त कर लेता है। विशेष-त्रिणाचिकेत:-त्रि+नाचिकेतः । पिछले मन्त्र में नचिकेता को दिये गये अतिरिक्त वर के अनुसार इस मन्त्र में यम ने अग्नि को ठीक ही 'नाचिकेत' कहा । 'त्रि' के र के कारण न को ण होने पर 'त्रिणाचिकेत' शब्द बना जिसका अर्थ हुआ नाचिकेत अग्नि का ज्ञान, चिन्तन एवं अनुष्ठान, इन तीन प्रकारों से चयन करने वाला । ब्रह्मजज्ञम् -ब्रह्मणो जातः ब्रह्मजः (उपपद समास)। स चासो ज्ञश्चेति ब्रह्मज्ञः (विशेषणोभयपद कर्मवा०); तम् । यह पद अग्नि देव के लिये ही आया है जिसे पीछे १४३ मन्त्र में 'स्वाम् अग्निम्' तथा १५वे मन्त्र में 'लोकादिमग्निम्। कहा है । भू लोक में ब्रह्मा से उत्पन्न प्रथम शरीरी होने के कारण ही उन्हें यहाँ 'लोकादि' एवं 'ब्रह्मज' कहा । ईड्यम्-/ ईड् (स्तुतौ)+ यत् । निवाग्य-नि+चि + णिच् (स्वार्थे)+क्त्वा ल्यप् । त्रिकर्मकृत्--त्रयाणां कर्मणां समाहारः त्रिकर्म (समाहार विगु) । तत् करोतीति त्रिकर्मकृत् = त्रिकर्म + / कृ+ स्विप कतथि (उस द.) । अत्यन्तम् -अन्तम् अतिक्रान्तम् इति अत्यन्तं (प्रादिसमास), तत् यया । २२ | कठोपनिषद् स्यात् तथा, अतिशयेनेत्यर्थः । यह (अव्यय) की तरह यहां प्रयुक्त हुआ है और 'एति' क्रिया का विशेषण है, न कि 'शान्तिम्' का विशेषण; क्योंकि तब इसका रूप 'अत्यन्ताम्' होता। शा० भा-पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह-त्रिणाचिकेतस्त्रिःकृत्वो नाचिकेतो. ऽग्निश्चितो येन स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्तदध्ययनस्तदनुष्ठानवान्वा । त्रिभिर्मातृपित्रा- चार्यैरेत्य प्राप्य सन्धि सन्धान सम्बन्धं मात्राद्यनुशासनं यथावत्प्राप्येत्येतत् । तद्धि प्रामाण्यकारणं ध्रुत्यन्तराद् अवगम्यते, यथा “मातृमान् पितृमानाचार्यवान् ब्रूयात् ( बृ० ४।१।२ ) इत्यादेः । वेदस्मृतिशिष्टैर्वा प्रत्यक्षानुमानागमैर्वा, तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षा, त्रिकर्मकृदिज्याध्ययनदानानां कर्ता तरत्यतिक्रामति जन्ममृत्यू । कि च ब्रह्मजज्ञं ब्रह्मणो हिरण्यगर्भाज्जातो ब्रह्मजः । ब्रह्मजश्चासौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञः सर्वज्ञो ह्यसौ। तं देवं द्योतनाज्ञानादिगुणवन्तमीड्यं स्तुत्यं विदित्वा शास्त्रतो निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावनेमा स्वबुद्धिप्रत्यक्षा शान्तिमुपरतिमत्यन्तमेत्यतिशयेनैति वैराजं पदं ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठानेन प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ १७ ॥ त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वा श्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ।।1८|| अन्वय-यः त्रिणाचिकेतः विद्वान् एतत् त्रयम् विदित्वा एवं नाचिकेतम् चिनुते सा मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगः स्वर्गलोके मोदते । अर्थ-जो त्रिणाचिकेत इन तीनों (अर्थात् कैसी और कितनी ईटें होती हैं और अग्नि का चयन कैसे किया जाता है) को जानकर नाचिकेत अग्नि को इस प्रकार आत्म- रूप से जानकर उसका चयन करता है, वह मृत्यु के बन्धनों को (शरीर-त्याग से) पूर्व हो तोड़कर शोक-रहित होकर स्वर्ग-लोक में आनन्द करता है। विशेष-नाचिकेतम्-नचिकेतसः अयम् इति नाचिकेतः (नचिकेतस् + अण्), तम् । यहाँ सकारान्त शब्द नचिकेतस् अकारान्त अर्थात् नचिकेत बन गया है और (उससे अण्) प्रत्यय लगाने पर 'नाचिकेत' शब्द बना है । मृत्युपाशान्-मृत्योः पाशाः मृत्युपाशाः (षष्ठी तत्सु०), तान् । भाष्यकार शङ्कराचार्य ने 'मृत्युपाश' से अधर्म- मज्ञान-राग-द्वेषादि लिया है। प्रणोद्य-प्र+ / नुद् + णिच् + क्त्वा-ल्यप् । कुछ आधुनिक व्याख्याकार इस मन्त्र में जीवन्मुक्तावस्था का वर्णन मानते है। यह उनका शुद्ध प्रमाद है । प्रकरण चला आ रहा है अग्नि-विज्ञान या यज्ञ-विद्या का जो इसी मन्त्र में उपसंहृत हुआ है, जैसा कि इसके शंकर-कृत अवतरणिका-भाष्य प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली | २३ से भी स्पष्ट है-'इदानीमग्निविज्ञानफलम् उपसंहरति प्रकरणं च'। फिर आत्म- ज्ञान की फलभूत जीवन्मुक्तावस्था बीच में कहां से आ जायगी ? अभी तक तो आत्म- ज्ञान का प्रकरण आरम्भ ही नहीं हुआ। वह तो अगले मन्त्र में तृतीय वर मांगने के लिये यम द्वारा प्रेरित होने पर नचिकेता द्वारा २० वे मन्त्र में उठाया जायगा। फिर उसके स्वरूपसाधनादि का वर्णन होने के बाद फल-भूत जीवन्मुक्ति का वर्णन आयेगा। इसीलिये 'मृत्युपाशान्' का अर्थ शङ्कराचार्य ने अधर्म-अज्ञान-राग-द्वषादि किया है। इस बात का अनेकशः वर्णन उपनिषदों में हुमा है कि यज्ञादि का विशिष्ट फल विविध सांसारिक सुखों एवं स्वर्गादि की प्राप्ति तो है ही, चित्त-शुद्धि भी उसका फल है। अधर्म अज्ञान-राग-द्वेषादि चित्त-दोष भी यज्ञानुष्ठान से प्रायेण दूर हो जाते हैं । किन्तु जन्म-मृत्यु के बन्धन से आत्यन्तिक रूप से छुटकारा तो आत्म-ज्ञान से ही हो पाता है। शा० भा०-इदानीमग्निविज्ञानचयनफलम् उपसंहरति प्रकरणं त्रिणाचिकेतस्त्रयं यथोक्तं या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वावगत्य यश्चवमात्मरूपेण अग्नि विद्वांश्चिनुते निवर्तयति नाचिकेतमग्नि ऋतुं, स मृत्युपाशान् अधर्माज्ञानरागद्वषादिलक्षणान् पुरतः अग्रतः पूर्वमेव शरीरपातात् इत्यर्थः- प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसद खैर्वजित इत्येतत् मोदते स्वर्गलोके वैराजे विराडा- त्मस्वरूपप्रतिपत्त्या ॥१८॥ एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वग्र्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्नि तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥१६॥ अन्वय-हे) नचिकेतः! एष: ते स्वर्ग्य: अग्नि: यं द्वितीयेन वरेण भवृणीथाः । जनासः एतम् अग्नि तव एव (नाम्ना) प्रवक्ष्यन्ति । (हे) नचिकेतः । तृतीयं वरं वृणीष्व । अर्थ-हे नचिकेता ! यह रहा तुम्हारा स्वर्ग का साधन अग्नि जिसको तुमने दूसरे वर के द्वारा वरण किया था। लोग इस अग्नि को तुम्हारे ही नाम से कहेंगे (पुकारेंगे)। हे नचिकेता! (अब) तीसरा वर मांगो। विशेष-स्वयं-स्वर्ग + यत् । जनास:-'जन' शब्द का प्रथमा बहु० का रूप । वेद में 'जनाः' के विकल्प से 'जनासः' भी रूप होता है । प्रवक्ष्यन्ति-प्र+/ब्रूपा वच २४ | कठोपनिषद् आदेश होने पर मे का लुट् +लुद्, प्र० पु० बहु० । 'ब्रुवो वचिः सूत्र से ब्रू वच 'वक्ष्यति' इत्यादि ही रूप बनते हैं। शा० भा०-एष ते तुभ्यमग्निर्वरो हे नचिकेतः स्वर्ग्यः स्वर्गसाधनो यमग्निं वरमवृणीथाः प्रार्थितगनसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निवरो दत्त इत्युक्तोपसंहारः । किञ्चैतमग्नि तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो 'ना इत्येतत् । एष वरो दत्तो मया चतुर्थस्तुष्टेन । तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व । तस्मिन्ह्यदत्त ऋणवानहमित्य- भिप्रायः ॥१६॥ येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाह वराणामेष वरस्तृतीयः ॥२०॥ अन्वय-प्रेते मनुष्ये या इयम् विचिकित्सा, अस्ति इति एके, अयम् न अस्ति इति च एके । त्वया अनुशिष्टः अहम् एतत् विद्याम्, वराणाम् एषः तृतीयः वरः। अर्थ-मृत मनुष्य के विषय में जो यह सन्देह है, कुछ लोग कहते हैं कि 'रहता है' अन्य लोग कहते है कि 'नहीं रहता' (तो) आप से शिक्षित हुआ मैं इसको (तत्त्वतः) जानें, वरों में यह तीसरा वर है । विशेष-(i) इस मन्त्र में नचिकेता ने जो प्रेत मनुष्य के सम्बन्ध में अस्ति, नास्ति का महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाया है, उसे लेकर अत्यन्त प्राचीनकाल से ही विवाद होते रहे हैं । जो प्रेत या मरे हुये पुरुष का अस्तित्व मानते रहे, वे 'आस्तिक'-अस्ति परलोको जीवस्येति मतिर्यस्य सः अर्थात् जीवनित्यत्ववादिनः-कहलाये । इसके विप- रीत जो अस्तित्व इनकारते रहे,वे 'नास्तिक'-नास्ति परलीको जीवस्येति मतिर्यस्य सः अर्थात् जीवानित्यत्ववादिनः-कहलाये । आस्तिकता का सिद्धान्त वैदिक ऋषियों का था, इसीसे मनु ने 'नास्तिको वेदनिन्दकः' कहा । अर्थात् वेद-विरोधी नास्तिक है। इससे वेदानुयायी या वेद समर्थक आस्तिक है, यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है । न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्वमीमांसा, उत्तरमीमांसा या वेदान्त-ये छ सम्प्रदाय आस्तिक हैं क्योंकि ये सभी मृत्यु के बाद भी जीव की सत्ता मानते हैं। उनके अनुसार वह इस लोक से चले जाने पर भी अपने पूर्व कर्म के भोग के लिये बना रहता है, नष्ट नहीं होता। दूसरे शब्दों में आस्तिक स्वकृत कर्मों के प्रति कर्ता का नैतिक उत्तरदायित्व मानता है जिसका फल उसे अवश्य ही भुगतना पड़ेगा । इस प्रकार आस्तिकता - प्रथमोध्यायः प्रथमावली | २५ या जीव के नित्यत्व में विश्वास नैतिक आचार की आधार-शिला है । इसी कारण नचिकेता इस प्रश्न का सही समाधान चाहता था,और मृत्युदेव यमराज इसके लिये सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे। . . (ii) प्रेते-प्र+/ इण् (गतो)+क्त (सप्तमी एक०)। प्र अर्थात् दूर, इत अर्थात् चला गया अर्थात् मृत व्यक्ति । विचिकित्सा-वि+/कित् + सन् + अ+टाप् । भ्वादिगणी कित् धातु नित्य सन्नन्त होती है । केतयति इत्यादि रूप तो चुरादिगणी कित् धातु के होते हैं, ऐसा माधवीय-धातु-वृत्ति का मत है । इस प्रकार 'चिकित्सति' (चिकित्सा करता है । इत्यादि रूप 'गुतिकिझ्यः सन्' इस नियम से बनते हैं । "गुप्' से जुगुप्सते (निन्दा करता है,, इत्यादि तथा 'तिज्' से तितिक्षते (सहता है) इत्यादि रूप बनते हैं । इसी प्रकार बध (बन्धने) से मन लगने पर बीभत्सते (वरूप्य उत्पन्न करता है ) बनता है । इन सभी धातुओं मे सन् प्रत्यय इच्छा से भिन्न तत्तद् अर्थों में लगता है जैसाकि वृत्ति में स्पष्ट किया गया है-'अयं च सन् गुपेनिन्दायाम् तिजेः क्षमायाम्, बन्धेरूप्ये' । कित् में भी सन् 'व्याधिप्रतीकारे सन्' इस वृत्ति-गत कथन के अनुसार चिकित्सा' अर्थ में लगता है । परन्तु माधवीय-धातु-वृत्ति के अनुसार यह उपलक्षण-मात्र है, अर्थात् सन्नन्त कित्-चिकित्स-धातु के संशय करना आदि अन्य अर्थ भी होते हैं। प्रस्तुत प्रसङ्ग में विचिकित्सा का अर्थ संशय ही है । विद्याम्-/विद् ज्ञाने + विधिलिङ् उ० पु० एक० । अनुशिष्टः-अनु + शास् +क्त । शास् धातु के आ के स्थान में इ 'शास इद्हलोः' सूत्र से हुआ है। शा० भा०-एतावद्ध्यतिक्रान्तेन विधिप्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनावगन्तव्यं यदरद्वयसूचितं वस्तु । न आत्मतत्त्वविषययाथात्म्यविज्ञानम् । अतो विधिप्रतिषेधार्थवि- षयस्यात्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य संसार । बीजस्य । निवृत्यर्थ तद्विपर तब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं क्रियाकारकफलाध्यारोपणलक्षणशून्यम् आत्यन्तिकनिःश्रयसप्रयोजनं वक्तव्यमिति उत्तरी ग्रन्थ आरभ्यते। तमेतमर्थ द्वितीयवरप्राप्याकृतर्थत्वंतृतीय-त्यावरगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण इत्याख्यायिकया प्रपञ्चयति-यतः पूर्वस्मात्कर्मगोचरात् साध्यसाधनलक्षणादनित्याद्विरक्तस्य आत्मज्ञानेऽधिकार इति तन्निन्दार्थ पुत्राधुपयामेन प्रलोभनं क्रियते । नचिकेता उवाच तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्वेत्युक्तः सन्-येयं विचिकित्सा संशयः प्रेते मते मनुष्येऽस्तीत्येकेऽस्ति शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिव्यतिरिक्तो बहान्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येके नायम् अस्तीति चैके नायमेवंविधोऽस्तीति चैके अतश्चा- माकं न प्रत्यक्षेण नापि वानुमानेन निर्णयविज्ञानमेतद्विज्ञानाधीनो हि परः पुरुषार्थ धर्मः । २६ / कठोपनिषद् इत्यत एतद्विद्यां विजानीयामहम् अनुशिष्टो ज्ञापितस्त्वया । वराणामेष वरस्तृती- योऽवशिष्टः॥ २० ॥ पौर्वापर्य-जीवात्मा-जैसे अत्यन्त सूक्ष्म पदार्थ के ज्ञान का अधिकारी या पात्र नचिकेता है भी या नहीं, इसे जानने के लिये यम की अगली उक्ति है। शङ्कराचार्य ने भी अवतरणिका-भाष्य में इसे स्पष्ट किया है:-किमयमेकान्ततो निःश्रे- यससाधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्परीक्षणार्थमाह। देवैरत्नापि विचिकित्सितं पुरा न हि हि सुज्ञ यमणुरेष अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥२१॥ अन्वय-पुरा देवैः अपि अत्र विचिकित्सितम् । (एतत्) न हि सुविज्ञयम् । एषः धर्मः अणुः । । हे नचिकेतः ! अन्यं वरं वृणीष्व । मा मा उपरोत्सीः । एनं मा अतिसृज । अर्थ-प्राचीन काल में देवों ने भी इस विषय में सन्देह किया था क्योंकि यह सरलता से जानने योग्य नहीं है। यह आत्मतत्त्व बड़ा सूक्ष्म है, नचिकेता ! तुम कोई दूसरा वर ले लो । मेरे लिये रुकावट न उत्पन्न करो। इसे मेरे लिये छोड़ दो। विशेष-हि-'क्योकि' के अर्थ में प्रयुक्त निपात (अव्यय)। उपरोत्सी:- उप +1 रुध् + लुङ् म. पु. एक. । 'भाङि लुङ' सूत्र से लुङ् लकार तथा 'न माङ्योगे' सूत्र से माङ् के योग में अट् आगम का निषेध हुआ। अन्यथा उप+ अरोत्सीः-उपारोत्सीः रूप होता। मा, मा-माम्' के स्थान में अन्वादेश । अतिसृज- अति+/सृज् + लोट् म० पु० एक० । इस स्थल में अति ( उपसर्ग ) एवं सृज (धातु-रूप ) अलग-अलग प्रयुक्त हैं । वैदिक भाषा में उभयथा-साथ भी और पृथक भी-प्रयोग होता है। शा० भा०-किमयमेकान्ततो निःश्रेयससाधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्परी- क्षणार्थमाह-देवरप्यत्रतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्व, न हि सुज्ञेयं सुष्ठ ज्ञेयं श्रुतमपि प्राकृतैर्जनैर्यतोऽणुः सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽतोऽन्यमसन्दिग्धफलं वरं नचिकेतो वृणीष्व । मा मां मोपरोत्सीरुपरोध मा कार्षीरधमर्णम् इवोत्तमर्णः । अतिसृज विमुञ्च एनं वरं मा मां प्रति ।। २१ ॥ पौर्वापर्य०-यम का वचन सुन नचिकेता ने इस प्रकार कहा- प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली| २७ देवैरत्नापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञ यमात्थ । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ।।२२।। अन्वय-( है ) मृत्यो ! त्वं यत् आत्थ देवैः अपि अत्र विचिकित्सितं किल, ( एतत् ) च न सुविज्ञ यम्, ( अतः) अस्य वक्ता च त्वादृग् अन्यः न लभ्यः । एतस्य तुल्यः अन्यः कश्चित् वरः न । - , अर्थ-हे यमराज ! आप जो कहते हैं कि प्राचीन काल में देवों ने भी इसके विषय में सन्देह किया था और यह सरलता से जानने योग्य नहीं है । अतः स्पष्ट है आप-सदृश इसका दूसरा कोई वक्ता नहीं मिल सकता और इसके समान दूसरा कोई वर (भी) नहीं है। विशेष-विचिकित्सितम्-वि+/कित्+ सन्+क्त । सुज्ञ यम्--सु+ / ज्ञा+यत् । वक्ता--/ वच्+तृच कर्तरि प्रथमा पुं० एक० । आत्य--/ + लट् म पु० एक० । ब धातु के लट् में ब्रवीति बूतः ब्रवन्ति, ब्रवीषि और ब्रू था, इन परस्मैपदी पांच रुषों के स्थान में विकल्प से आह, आहतुः, आहुः, मात्थ एवं आहथुः ये पांच रूप होते हैं । त्वाहक-युष्मत्→त्वत् + / दृश् + क्विन् (त्वादृश् ) प्रथमा पुं० एक? यहाँ । 'त्यदादिषु दृशोऽनालोचने का च' ।३।२।६० सूत्र से क्विन् लगा है । कन् प्रत्यय लगने पर 'त्वादृश' ( क का अ जुड़ने से ) रूप बनता है । शा० मा०-देवरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं किलेति भवत एव (नः) श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यद् यस्मान्न सुज्ञेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि, अतः पण्डितैरप्यवेद- नीयत्वाद् वक्ता चास्य धर्मस्य त्वाह क्त्वत्तुल्यः अन्यः पण्डितश्च न लभ्यः अन्विष्यमाणो- ऽपि । अयं तु वरो निःश्रेयसप्राप्तिहेतुः। अतो नान्यो वरस्तुल्यः सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनित्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यवेत्यभिप्रायः ।। २३ ।। पौपियं.-नचिकेता की दृढ़ता देखकर यम उसे इस प्रकार प्रलोभन दे रहे हैं- शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
२८ | कठोपनिषद् भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३॥ अन्वय-शतायुषः पुत्रपौत्रान्, बहून् पशून हस्तिहिरण्यम् अश्वान् वृणीष्व, भूमेः महत् आयतनं वृणीष्व, स्वयं च यावत् शरदः इच्छसि जीव । अर्थ-(हे नचिकेता!) तुम शतायु पुत्र-पौत्र, अनेक पशु, हाथी, सुवर्ण और घोड़े मांग लो, महान भूमण्डल भी मांग लो और स्वयं भी जितने वर्ष चाहो, जिभो। विशेष-शतायुषः-शतम् मायूषि येषां ते शतायुषः (बहुव्रीहि.), तान् । हस्तिहिरण्यम् -हस्तिनश्च हिरण्यानि चेति हस्तिहिरण्यम् (समाहार द्वन्द०)। यावत् शरवः-'शरद् वर्षवाची स्त्रीलिङ्ग शब्द है । 'शरदः' इसका द्वि० बहु० का रूप है । यहाँ 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे' सूत्र से द्वितीया प्रयुक्त हुई है । तदनुसार 'यावत्' के स्थान में 'यावती: (स्त्री० द्वि० बहु० ) पद प्रयुक्त होना चाहिये था । यहाँ विभक्ति एवं लिङ्ग, दोनों का विपरिणाम करके ‘यावत्' के स्थान में 'यावतीः' ग्रहण करना चाहिये । वेद में ऐसा प्रायः करना पड़ता है। शा० भा०-एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभयन्नुवाच मृत्यु:--शतायुषः शतं. वर्षाण्यायू षि एषां तान् शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व । कि च गवादिलक्षणान बहून् पशून्, हस्तिहिरण्यं हस्ती च हिरण्यं च हस्तिहिरण्यम्, अश्वांश्च, किं च भूमेः पृथिव्या महद्विस्तीर्णमायतनमाश्रयं मण्डलं राज्यं वृणीष्व । किं च सर्वमप्येतद् अनर्थकं स्वयं चेदल्पायुरित्यत आह-स्वयं च जीव त्वं जीव धारय शरीरं समन्द्रियकलापं शरदो वर्षाणि यावदिच्छसि जीवितुम् ॥ २३ ॥ एतत्तुल्य यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥२४॥ अन्वय-एतत्तुल्यं यदि (अन्य) वरं मन्यसे (तहित), वित्तं चिरजीविका च वृणीष्व । [है ] नचिकेतः ! त्वं महाभूमौ एधि । त्वा कामानां काममा करोमि। अर्थ-इसके समान यदि तुम कोई और वर समझते हो तो उसे तथा धन प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली| २९ और चिरस्थायिनी जीविका मांग लो। हे नचिकेता ! तुम इस विस्तृत पृथ्वी पर वृद्धि प्राप्त करो। मैं तुम्हें भोगों का इच्छानुसार भोक्ता बना देता हूँ। विशेष-चिरजीविकाम्-चिरं ( चिरकालं यावत् ) जीविकेति चिरजीविका ( सुप्सुपा० ), ताम् । एषि- एध्वृद्धी+लोट् म० पु० एक० । कामानाम् -काम्यन्ते इति कामाः (/कम् + णिङ् स्वार्थे + घन् कर्मणि । 'कमेणिङ् से स्वार्थ में णिङ् प्रत्यय कम् धातु में लगता है), तेषाम् । यहाँ काम का अर्थ भोग या भोग-विषय है। कामभाजम्-काम: (/कम् + णिङ्+घञ् भावे) इच्छा, तेन तस्माद् वा भजते इति कामभाक् ( काम+/ भज् + ण्विः, 'भजोण्विः' इस सूत्र से), तम् । शा० मा०-एतत्तु ल्यमेतेन यथोपदिष्टेन सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि वृणीष्व । किं च, वित्तं प्रभूतं हिरण्यरत्नादि चिरजीविका च सह वित्तेन वृणीष्वेत्येतत् । किं बहुना, महत्यां भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव । कि चान्यत्, कामानां दिव्यानां मानुषाणां च त्वा त्वां कामभाज कामभागिनं कामाई करोमि । सत्य- संकल्पो शह देवः ॥ २४ ॥ ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् काम श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥२५॥ अन्वय-मर्त्यलोके ये ये कामाः दुर्लभाः [तान्] सर्वान् कामान् छन्दतः प्रार्थयस्व । इमाः सरथाः सतूर्याः रामा । ईदृशाः मनुष्यः न लम्भनीयाः हि । मत्प्र- साभिः आभिः परिचारयस्व । नचिकेतः। मरणं मा अनुप्राक्षीः । अर्थ-मृत्यु-लोक (मनुष्य-लोक) में जो-जो भोग (भोग्य-विषय) दुर्लभ हैं [उन] सब भोगों को स्वेच्छानुसार मांग लो। रथ एवं वात्रों के सहित ये रमणियाँ हैं । निस्सन्देह ऐसी (रमणियाँ) मानवों को प्राप्त होने योग्य नहीं होती। मेरे द्वारा दी गई इनसे अपनी परिचर्या सेवा करामो (किन्तु) नचिकेता ! मरण के सम्बन्ध में मत पूछो। विशेष-दुर्लभाः-दुर् + लभ् +खल (ईषदुस्सुषु कृच्छकृच्छ, गर्थेषु खल्, ।
३० कठोपनिषद् सूत्र से ) । हि-'निस्सन्देह' के अर्थ में प्रयुक्त निपात । लम्भनीयाः- लभ् +णिच् स्वार्थे+अनीयर् । 'लभेश्च' से लभ् में णिच् लगने पर नुम् का आगम होकर 'लम्भय' हो जाता है । छन्दतः-छन्द (इच्छावाची अकारान्त पु० शब्द जो सकारान्त नपुंसकलिङ्ग 'छन्दस्' शब्द से भिन्न है)+तसिः (तस्) प्रत्यय । सरथाः- रथैः सह ('तेन सहेति तुल्ययोगे' सूत्र से बहुवीहि) । इसी प्रकार सतूर्याः भी बनेगा। मत्प्रत्ताभि:-मया प्रत्ताः मत्प्रताः (तृ० तत्पु०), ताभिः । प्रत्ता-प्र+/दा +त+टाप् स्त्रियाम् । 'अच उपसर्गात्तः' सूत्र से 'दा' के स्थान में 'त्' आदेश होने पर प्र++त= प्रत्त शब्द बनता है । परिचारयस्व-परि + / चर् +णिच् + लोट म० पु. एक० । शा. भा०-ये ये कामाः प्रार्थनीया दुर्लभाश्च मर्त्यलोके सर्वास्तान् कामांश्छ- न्दत इच्छातःप्रार्थयस्व । किं चेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुरुषानिति रामाः सह रथैर्वर्तन्त इति सरथाः सतूर्याः सवादित्रास्ताश्च न हि लम्भनीयाः प्रापणीया ईदृशा एवंविधा मनुष्यमत्यै रस्मदादिप्रसादमन्तरेण । आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभिः परिचा. रिणीभिः परिचारयस्व आत्मानं पादप्रक्षालनादिशुश्रूषां कारयात्मन इत्यर्थः । नचिकेतो मरणं मरणसम्बद्धं प्रश्न प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीक्षारूपं मानुप्राक्षीमॆवं प्रष्टुमर्हसि ।। २५ ॥ पौर्वापयं०-इस प्रकार प्रलोभन दिये जाने पर भी अक्षोभ्य नचिकेता ने कहा- श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । अपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥२६॥ अन्वय-(हे) अन्तक ! श्वोभावाः मर्त्यस्य सर्वेन्द्रियाणां यत् एतत् तेजः (तत्) जरयन्ति । सर्व जीवितम् अपि अल्पम् एव । तव वाहाः नृत्यगीते तव एव । अर्थ-हे यम ! कल तक भी निश्चित रूप से न रहने वाले अर्थात् सर्वथा क्षणिक भोग--पदार्थ मनुष्य की सारी इन्द्रियों के तेज को क्षीण कर देते हैं । सम्पूर्ण जीवन भी तो थोड़ा ही है । अतः आपके वाहन और नाच-गान आपके ही पास रहें। विशेष-श्वोभावाः-श्वः भावः (सत्ता) येषां ते (बहुव्रीहि० )। 'इसका शब्दार्थ हुमा क्षण-स्थायी, क्षणिक । भाष्यकार के अनुसार इसका अर्थ है 'आने वाले कल को प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली | ३१ भी सन्दिग्ध सत्ता वाले' । अर्थ तो यही ज्यादा युक्त है, क्योंकि पूर्व अर्थ में कल की सत्ता निश्चित मान ली गई जो सम्भावित सत्य तो है परन्तु निश्चित नहीं। हो सकता है, वे कल भी न रहें, आज ही, अभी ही समाप्त हो जायं । यह सातिशय क्षणिकत्व भाष्यकार के अर्थ में झलकता है । परन्तु पूर्व अर्थ अधिक शाब्दिक है, शब्दानुसारी है, जैसा कि समास-विग्रह में दिखाया गया है। जरयन्ति-ज (वयोहानी) णिच् + लट् प्र० पु० बहु । शा० भा०-एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महाह्रदवदक्षोभ्य आह-श्वो भविष्यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्तानां भोगाना ते श्वोभावाः । किं च, मर्त्यस्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो ! यदेतत्सर्वेन्द्रियाणां तेजस्तज्ज- रयन्ति अपक्षयन्त्य सरप्रभृतयो भोगाः । अनर्थायवैते, धर्मवीयंप्रज्ञातेजोयशःप्रभृतीनां क्षपयितृत्वात् । यां चापि दीर्घजीविकां त्वं दित्ससि तत्रापि शृणु । सर्व यद् ब्रह्मणोऽपि जीवितमायुरल्पमेव, किमुतास्मदादिदीर्घजीविका । अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादयः तथा नृत्यगीते च ॥ २६ ॥ न वित्तन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥२७॥ अन्वय-मनुष्यः वित्तेन न तर्पणीयः, त्वा चेत् अद्राक्ष्म वित्तं लप्स्यामहे । यावत् त्वम् ईशिष्यसि (तावत्) जीविष्यामः । मे तु स एव वरः वरणीयः । अर्थ-मनुष्य धन से सन्तुष्ट नहीं किया जा सकता। यदि आप को देख लिया है तो धन पा हो लेंगे। (और) जब तक आप शासन करेंगे (तब तक तो) हम जियेंगे (ही) । (इसलिये) मेरे लिये तो वही वर वरण करने योग्य है। विशेष-तर्पणीयः-तृप्+अनीयर् । लप्स्यामहे- लभ् + लृट् (उ.पु० बहु०) । अद्राक्ष्म--/दृश्+लुङ् (उ०पु०बहु०) । वर!-/+अप् ('ऋदोरप्' सूत्र से)। वरणीयः- वृ+अनीयर् । शा. भा०-कि च, न प्रभूतेन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः । न हि लोके वित्तलाभः कस्यचित्तृप्तिकरो दृष्टः । यदि नामास्माकं वित्ततृष्णा स्याल्लप्स्यामहे प्राप्स्यामह इत्येतहित्तमद्राक्ष्म दृष्टवन्तो वयं चेत्त्वा त्वाम् । जीवितमपि तथैव । जीविष्यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशिष्यसीशिष्यसे प्रभुः स्याः । कथं हि मय॑स्त्वया .
३२ / कठोपनिषद् समेत्याल्पधनापुर्भवेत् । वरस्तु मे वरणीयः स एव यदात्मविज्ञानम् ॥ २७ ॥ अजीर्यताम मृताना मुपेत्य जीर्यन्मयं. क्वध स्थ. प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीचे जीविते को रमेत ॥२८॥ अन्वय-वध स्थ जीर्यन क प्रजानन् मर्त्य अजीर्यताम् अमृतानाम् उपत्य वर्णरतिप्रमोदान् अभिध्यायन् अतिदीर्घ (अपि) जीविते रमेत । अर्थ-नीचे पृथ्वी पर रहने वाला जराग्रस्त एव मरणाशील कौन विवेकी व्यक्ति जरा एव मरण से ग्रस्त न होने वाले अजर-अमर देवो के समीप पहुँचकर वर्ण के राग अर्थात् आसङ्ग से उत्पन्न होने वाले (स्त्री-सम्भोगादि) सुखो को (अस्थिर) देखता हुआ अति दीर्घ जीवन मे (भी) सुख मानेगा? विशेष--अजीर्यताम्-नन् +ज/ + शतृ (पु. षष्ठी बहुवचन)। अमृतानाम् -न मृता अमृता (नन् तत्पु०), तेषाम् । मस्यं -द्रष्टव्य पीछे मन्त्र ६ मे दी गई टिप्पणी विष स्थ को (पृथिव्या) अधःष्ठितीति (कु + अघ + /स्था+क कर्तरि), उपपद समास । प्रजानन् -प्र+/ज्ञा +शन ( पु० प्र० एक०) । अभिध्यायन्-अभि +/ध्य+शतृ (पु० प्र० एक०)। वर्णरतिप्रमोवान्-वर्षे रति (मासक्ति मोहो वो) वर्णरति (स. तत्पु०), तया तस्या' वा प्रमोदा वर्णरति. प्रमोदा (तृ• या पं० तत्पु०), तान् । बोषिते-/ जीव+क्त (नपुसके भावे) जीवने इत्यर्थ । शा० भा०-यतश्च अजीर्यता वयोहानिमप्राप्नुवताममृताना सकाशमुपेत्योपग- म्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तर प्राप्तव्य तेभ्यः प्रजानन् उपलभमान स्वय तु जीयम. यो जरामरणवान, क्वष स्थ कु. पृथिवी अधश्चान्तरिक्षादिलोकापेक्षया तस्यां तिष्ठतीति क्वध स्थ. सन् कथमेवमविवेकिभि प्रार्थनीय पुत्रवित्तहिरण्याद्यस्थिर वृणीते । क्व तदास्थ इति वा पाठान्तरम् । अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना । तेषु पुत्रादिष्वा- स्था आस्थिति तात्पर्येण वर्तन यस्य स तदास्थः । ततोऽधिकतर पुरुषार्थ दुष्प्रापमपि प्रापिपयिषु क्व तदास्थो भवेन्न कश्चित्तदसारजस्तदर्थी स्याद् इत्यर्थ । सर्वो ह्य पर्यु- पर्येव बुभूति लोक तस्मान पुत्रवित्तादिलोभ. प्रलोभ्योऽहम् । किं चाप्सर प्रमुखान् वर्णरतिप्रमोदाननवस्थितरूपतयाभिध्यायनिरूपयन् यथावत् अतिदीचे जीविते ।
प्रथमोध्यायः प्रथमावल्ली| ३३
विवेकी रमेत् ।। २८ ।।
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽय वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२६॥
अन्वय मृत्यो ! यस्मिन् इदं विचिकित्सन्ति यत् (च) महति साम्पराये तत् नः
ब्रू हि । गूढम् अनुप्रविष्टः यः अयं वरः तस्मात् अन्यं नचिकेता न वृणीते ।
अर्थ-हे यम ! जिस (प्रेत) के विषय में (रहता है या नहीं) यह शड्ढा
(लोग) करते हैं, एवं महान् परलोक के विषय में जो 'विज्ञान) है, वह दोनों हमें
बतलाइये । यह जो गहनता मे प्रविष्ट गूढ वर है, इससे भिन्न (वर) नचिकेता नहीं
वरण करता।
विशेष-साम्पराये-सम्परायः(सम् +परा+ /इण् गतौ+अच्) एव
साम्परायः (सम्पराय + अण् स्वार्थे ) । 'सम्पराय' का अर्थ है परलोक-सम् सम्यक्
परा दूरम् ईयते गम्यते प्राप्यते इति सम्परायः परलोकः । आगे की द्वितीय वल्ली के
छठे मन्त्र में भी 'साम्पराय' शब्द आया है । वहाँ भाष्यकार ने इसका अर्थ
परलोक का (शास्त्रीय) साधन-विशेष कहा है-'सम्पर ईयत इति सम्परायः परलोकस्त-
प्राप्तिप्रयोजनः साधनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः ।' गूढम् -/गुह+
क्त । अनुप्रविष्ट:-अनु + प्र+/ विश् +क्त ।
शा०भा०-अतो विहायानित्यः कामैः प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्-
यस्मिन् प्रेत इदं विचिकित्सनं विचिकित्सन्ति अस्ति नास्तीत्येवंप्रकारं हे मृत्यो साम्पराये
परलोकविषये महा पहा ---- आत्मनो निर्णयविज्ञानं यत्तद् बूहि
कथय नोऽस्मभ्यम् । किं बहुना, योऽयं प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढं गहनं दुविवेचन
प्राप्तोऽनुप्रविष्टः । तस्माद्वरादन्यमविवेकिभिः प्रार्थनीयमनित्यविषयं वरं नचिकेता न
वृणीते मनसापीति श्रुतेर्वचनमिति ॥ २६ ॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमदाचार्यश्री-
शङ्करभगवतःकृतौ कठोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये प्रथमवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥१॥
- MS द्वितीया वल्ली पौर्वापर्य-पिछली वल्ली के प्रतिपाद्य विषय के साथ इस द्वितीय वल्ली के सम्बन्ध को शङ्कराचार्य ने अपने अवतरणिकाभाष्य में इस प्रकार स्पष्ट किया है-परीक्ष्य शिष्यं विद्यायोग्यतां चावगम्याह । अर्थात् शिष्य की परीक्षा कर एवं उसमें विद्याग्रहण की योग्यता जान कर यमराज ने कहा- अन्यच्छे योऽन्यदुतैव प्रेय- स्ते उभे नानार्थे पुरुष सिनीतः । तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥१॥ बन्वय-श्रेयः अन्यत् उत प्रेयः अन्यत् एव । नानार्थे ते उभे पुरुषं सिनीतः । तयोः श्रेया आददानस्य साधु भवति, यः उ प्रेयः वृणीते (सः) अर्थात् हीयते । अर्थ-श्रेय ( विद्या) और है तथा प्रेय (अविद्या ) और ही है। विभिन्न प्रयोजन वाले वे दोनों पुरुष को बांधते हैं। उनमें से श्रेय का ग्रहण करने वाले का कल्याण (शुभ) होता है और जो प्रेय का वरण करता है, वह पुरुषार्थ से च्युत (भ्रष्ट) हो जाता है। विशेष-श्रेयः-प्रशस्य + ईयसुन् । ईयसुन् तथा इष्ठन् लगने पर 'प्रशस्यस्य धः'। ५।३।६० सूत्र से प्रशस्य को 'अ' आदेश हो जाता है। इस प्रकार श्र+ईयस्-श्रेयस् शब्द बनता है। प्रेयः--प्रिय + ईयसुन् । ईयसुन् तथा इष्ठन् प्रत्यय लगने पर 'प्रिय' को 'प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवन्दारकाणां प्रस्थस्फवहिगर्वर्षित्रन्द्राधिवृन्दाः' । ६।४।१५७ सूत्र से 'प्र' आदेश होना है। इस प्रकार प्र+ईयस् = प्रेयस् शब्द बनता है। संरचना की दृष्टि से श्रेयस् तथा प्रेयस्, दोनों ही शब्द विशेषण होने पर भी संज्ञा की तरह प्रयुक्त होते हैं । यहाँ कल्याण या विद्या तथा अकल्याण या अविद्या के अर्थ मे ये संज्ञावत् ही प्रयुक्त हुये हैं। नानार्थे-नाना विभिन्नी अर्थों प्रयोजने ययोस्ते, बहुव्रीहि । सिनीत:-/षिन् बन्धने (क्यादि०), लट् प्रथम द्विवचन । आददानस्य-या+/दा+शानच्, ष० एक. (गृह पतः इत्यर्थः) ।
३५ | कठोपनिषद् हीयते-- हा + लट् प्रथम० एक० । वृगीते-/वृन् वरणे (त्यादि०), लट्, प्रयम० एक० । यह उभयपदी धातु है। अतः वृणाति एवं वृणीते, दोनों प्रकार से रूप बनते हैं। शा०मा०-अन्यत्पृथगेव श्रेयो निःश्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेयः प्रियतर- मपि । ते प्रेयःश्रेयसी उभे नानार्थे भिन्न प्रयोजने सती पुरुषमधिकृतं वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बन्नोतस्ताभ्यामात्मकर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्वः पुरुषः । श्रेयःप्रेयःसोह्य भ्युदया- मृतत्त्वार्थी पुरुषः प्रवर्तते । अत: श्रेयः प्रेयः प्रयोजन कर्तव्यतया ताभ्यां बद्धः इत्युच्यते सर्वः पुरुषः । ते यद्यप्येकै कारुषार्थ सम्बन्धिनी विद्या विद्याप त्वाद्विरुद्ध इत्यन्यतरा- परित्यागेनकेन पुरुषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोहित्वा विद्यारूपं प्रेयः श्रय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वतः साधु शोभनं शिवं भवति । यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थिकात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः । को 5 सौ ? य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् ॥ १ ॥ पौर्वापर्य०-यदि मनुष्य श्रेय एवं प्रेय में अन्यतर को ग्रहण करने में स्वतन्त्र है तो क्यों अधिक लोग प्रेय को स्वीकार करते हैं ? यम का उत्तर है- श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत- स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमावृणीते ।।२।। अन्वय-श्रेयः च प्रेयः च मनुष्यम् एतः, धीरः तौ सम्परीत्य विविनक्ति, धीरः प्रेयसः श्रेयः हि अभिवृणीते, मन्दः योगक्षेमात् प्रेयः वृणीते । अर्थ-श्रेय और प्रेय (दोनों घुले-मिले से) मनुष्य के पास आते हैं । बुद्धिमान् पुरुष उन दोनों को भली-भांति समझ कर अलग-अलग करता है । एवं वह प्रेय के समक्ष श्रेय को ही वरण करता है। किन्तु मूढ योग और क्षेम के कारण प्रेय को वरण करता है । विशेष -एतः-आ+V इण् गतौ, लट् प्रथम द्वि० (आगच्छत इत्यर्थः) । सम्परीत्य--सम् + परि + / इण्+क्त्वा→ल्यप् । विविक्ति-वि+ V विचिर् पृथग्भावे (रुधादि०), लट् प्रथम एक । योगक्षेमात्-योगश्च क्षेमश्चेति योगक्षेमम् (समाहार द्वन्द्व), तस्मात् । यहाँ हेतौ' इस सूत्र से कारण अर्थ में पञ्चमी हुई है । 'योग' शब्द 'युजिर्' योगे (रुधादि०) से धञ् प्रत्यय लगकर बना है। इसका शाब्दिक - . , - प्रथमोध्यायः द्वितीयावल्ली | ३६ अर्थ है किसी वस्तु या पदार्थ का योग या संयोग । फिर इसी से इसका विकसित अर्थ हुआ 'भप्राप्त की प्राप्ति' । इसी प्रकार क्षेम' का शब्दार्थ होता है कल्याण, कुशल । इसी से विकसित होकर इसका पारिभाषिक अर्थ हो गया 'प्राप्त वस्तु की रक्षा' । वस्तुतः सांसारिक व्यक्ति के लिये श्रम तथा कष्ट से प्राप्त या अजित वस्तु के सुरक्षित रहने से बढ़कर और कोई क्षेम होता भी नहीं । संक्षेप में योग और क्षेम के अन्तर्गत सारी सांसारिक्ता का समावेश है। सामान्य व्यक्ति का सारा जीवन अभीष्ट वस्तुओं के अर्जन या संग्रह और उसके संरक्षण में ही बीतता हैं। शा-भा-या भे अपि कर्तृ स्वायत्ते पुरुषेण, किमर्थ प्रेय एवादत्त बाहुल्येन लोक इत्युच्यते- सत्यं स्वायत्त तथापि साधनतः फलतश्च मन्दबुद्धीनां दुविवेकरूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुष्यमेतः पुरुषमा इतः प्राप्नुतः श्रेयश्च प्रेयश्च । अतो हंस इवाम्भसः पयस्तो श्रेयःप्रेयःपदार्थों सम्परीत्य सम्यक्परिगम्य मनसालोच्य गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रेय एवा- भिवृणीते प्रेयसोऽभ्यहितत्वात् । कोऽसौ ? धीरः । यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धिः स विवेकासामर्थ्याद्योगोमाद योगक्षेमनिमित्त शरीरा- युपचयरक्षणनिमित्तमित्येतत्प्रेयः पशुपुत्रादिलक्षणं वृणीते ॥ २ ॥ पौर्वापर्य-तृतीय मन्त्र में प्रेय के प्रलोभन में न फंसने वाले नचिकेता की प्रशंसा करते हुये यमराज कहते हैं- स त्वं प्रियान्प्रियरूपाँच कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥३॥ अन्वय-नचिकेतः ! स: त्वम् प्रियान् प्रियरूपान् च कामान् अभिध्यायन अत्यनाक्षीः, एताम् वित्तमयीम् सृकाम् न अवाप्तः, यस्याम् बहवः मनुष्याः मज्जन्ति। नैता सृङ्का अर्थ-हे नचिकेता ! उस तुमने (पुत्रवित्तादि) प्रिय एवं (अप्सरादि) प्रियरूप भोगों को ( उनकी अनित्यता एवं असारता को ) सोचते हुए त्याग दिया, (और) इस धनमयी गति (सरणि) को नहीं प्राप्त हुए जिसमें अनेक जन डूब जाते हैं । विशेष-स:- इसका तात्पर्य है-उस प्रकार से प्रेय के त्याग के कारण ३७ | कठोपनिषद् विदित । प्रियरूपान्-प्रियाणि रूपाणि येषां ते (बहुव्रीहि)। अप्सरा इत्यादि अपने रूप के कारण प्रिय लगने वाले भोग-पदार्थ हैं । पुत्रादि तो कुरूप होने पर भी माता-पिता को प्रिय लगने के कारण 'प्रिय' पदार्थ हैं। किसी मां का काला-कलूटा, कान' बेटा भो उमका लाल ही है। कामान्-काम्यन्ते इति कामा भोगविषयाः ( कर्मणि घळ ), तान् । अभिध्यायन्-अभि+ध्य+शत पुं० प्र० एक० । अत्यनाक्षी:--अति + / सृज, लुङ् मध्यम० एक० । सृङ्काम्-यह शब्द पीछे १।१।१६ मन्त्र में भी आया है। इस पर टिप्पणी वही द्रष्टव्य है । अवाप्त:- अव+/आप्+क्त कर्तरि । मज्जन्ति-V (टु) मस्जो शुद्धो (तुदादि०) लट् प्रथम० बहु० । 'झलां जश् झशि' सूत्र से स् के स्थान में न होने पर. आगे स्थित ज् के कारण 'स्तोः श्चुना श्चुः' सूत्र से द् के स्थान में ज् होकर मज्जति मज्जतः मज्जन्ति इत्यादि रूप बनते हैं। शुद्धि के लिये स्नानादि किया जाता है, और तदर्थ जल में डूबा जाता है, अतः इस धातु के स्नान करना तथा डूबना भी अर्थ हो गये । यहाँ यह डूबने-निमग्न होने-के अर्थ में प्रयुक्त है। शा०भा०-स त्वं पुनः पुनर्मया प्रलोभ्यमानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन ग्यिरूपां- श्चाप्सरःप्रभृतिलक्षणान् कामानभिध्यायश्चित् यस्तेषामनित्यत्वासारत्वादिदोषान् हे नचिके नोऽत्यस्राक्षीरतिष्टवान् परित्यक्तवानस्यहो बुद्धिमत्ता तव । नैतामवा. प्तवानसि सृङ्कां सृति कुत्सिता मूढानप्रबृतां वित्तमयीं धनप्रायाम् । यस्यां सतो मज्जन्ति सोदन्ति बह पोऽने के मूढा मनुष्याः ।। ३ ॥ पौर्वापर्य०-श्रेय को वरण करने वाले का कल्याण तथा प्रेय को वरण करने वाले का पतन- -पुरुषार्थ-भ्रश-होता है । इस प्रथम-मन्त्रोक्त कथन का कारण बताते हुये यमराज कहते हैं: दूरमेते विपरीते विषची अविद्या या च विद्यति ज्ञाता । विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुमन्त ॥४॥ अन्वय-या विद्या अविद्या च इति ज्ञाता, एते दूरम् विपरीते विषूची, (त्वां) नचिकेतसम् विद्याभीप्सिनम् मन्ये, (यतः) बहवः कामाः त्वा न अलोलुपन्त । अर्थ-जो विद्या और मविद्या रूप से जानी जाती हैं, ये दोनों परस्पर अत्यन्त विरुद्ध और विभिन्न दिशाओं को जाने वाली (गतियाँ) हैं अर्थात् विभिन्न फल - प्रथमोध्यायः द्वितीयावल्ली ३८ देने वाले मार्ग हैं। मैं तुझ नचिकेता को विद्या का अभिलाषी मानता हूँ (क्योंकि) अनेक काम्य पदार्थ तुमको (अपने लक्ष्य से) भ्रष्ट नहीं कर सके (अलग नहीं कर सके) । विशेष-ज्ञाता-/ ज्ञा+क्त+टाप् । दूरम्-अत्यन्त । यहाँ यह अव्यय की तरह प्रयुक्त हुआ है और 'विपरीते' इस विशेषण-पद की विशेषता प्रकट करता है । विपरीते-वि+परि+Vइण् गतौ+क्त स्त्री० प्रथमा द्वि० । विषूची- विषु+/अञ्च गतौ+क्विन्+ङीप् (स्त्रियाम्)। 'विषु' का अर्थ है नाना या अनेक । इस प्रकार इस शब्द का अर्थ है 'नाना या विभिन्न दिशाओं में जाने वाली। यह विशेषण पद है और विद्या तथा अविद्या के लिये प्रयुक्त हुआ है । वस्तुतः द्विवचन में 'विषूच्यो' यह द्विवचनान्त प्रयोग ('विपरीते' की तरह) होना चाहिये था, इसके स्थान मे एकवचनान्त 'विषूची' का प्रयोग छान्दस या वैदिक कहा जायगा । अपेक्षा- नुसार इसका ' विच्यौ' यह द्विवचनान्त विपरिणाम कर लेना चाहिये, जैसा शङ्कर ने अपने भाष्य में किया है। विद्याभीप्सिनम्-विद्याम् अभीप्सतीति विद्याभीप्सी (विद्या + अभि+ /आप् + सन्+णिनिः-उपपदतत्पु०), तम् । ध्यान देने की बात है कि सन्नन्त आप् धातु के आ के स्थान में 'आज्ञपृधामीत्' ७४।५५ सूत्र से ई होकर ईप्स् बनता है। इस प्रकार अभि + ईप्स = अभीप्स् रूप बन जाता है जिसका रूप अभीप्सति इत्यादि बनता है। अलोलुपन्त--/ लुप्लु छेदने (तुदादि) +यङ्-लुक्, लङ्लकार प्रथम० बहु० । विमोहन (लुभाना) अर्थ वाली लुप धातु दिवादिगणी है और इसके रूप लुप्यति, लुप्यतः, लुप्यन्ति इत्यादि होते हैं जबकि लुप्ल के लुम्पति, लुम्पतः, लुम्पन्ति इत्यादि रूप होते हैं। यङ् लगने पर इसके लोलुप्यते इत्यादि रूप लट् लकार में होते हैं । इसी से शङ्कराचार्य ने 'नालोलुपन्त' का 'न विच्छेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गात्' इत्यादि अर्थ किया है । एतदनु- सारी अर्थ ही ऊपर दिया गया है । जिन्होंने इससे भिन्न 'नहीं, लुभाया' अर्थ किया है, उन्होंने ठीक नहीं किया है क्योंकि 'अलोलुपन्त' रूप विमोहन अर्थ वाली लुप (दिवादि०) से बनेगा ही नहीं । हाँ, इतना अवश्य सत्य है कि श्रेयोमार्ग से अलग न करने का अप्रत्यक्ष अर्थ 'अपनी ओर खीचना' या 'लुभाना' ही है, अतः भावार्थ की दृष्टि से ऐसा अर्थ करना बहुत असंगत या अनुचित नहीं है। शा०भा०-दूरं दूरेण महतान्तरेणते विपरीते अन्योन्यव्यावृत्तरूपे विवेकावि- वेकात्मकत्वात्तमःप्रकाशाविव । विषची वि च्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्षहेतुत्वेने- त्येतत् । के ते इत्युच्यते---या चाविद्या प्रेयोविषया विद्ये ति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्मा- तावगता पण्डितः । तत्र विद्याभीप्सिनं विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । कस्मा- यस्मादविबुद्धिप्रलोभिनः कामा अप्सरःप्रभृतयो बहवोऽपि त्वा त्वां नालोलुपन्त न
३६ | कठोपनिषद्
.
विच्छेदं कृतवन्तः श्रेयोमार्गादात्मोपभोगाभिवाञ्छासंपादनेन । अतो विद्यार्थिनं श्रेयो
भाजनं मन्य इत्यभिप्रायः ।।४।।
पौर्वापर्य-अगले दो मन्त्रों में यमराज अविद्या में संलग्न व्यक्ति को
दुर्दशा का वर्णन करते हैं
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
दन्द्रम्बमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥५॥
अन्वय-अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमानाः स्वयम् धीराः पण्डितं मन्यमानाः
दन्द्रम्यमाणाः मूढाः परियन्ति, यथा अन्धेन एव नीयमानाः अन्धाः ।
अर्थ- अविद्या के भीतर रहने वाले, अपने-आप बुद्धिमान् बने हुये, अपने
को पण्डित मानने वाले मूढ पुरुष निरन्तर कुटिल (टेढ़े-मेढ़े) मार्गों से चलते हुये
वैसे ही भटकते रहते हैं जैसे अन्धे के द्वारा नीयमान अन्धे ।
विशेष-अविद्यायामन्तरे-यह आर्ष प्रयोग है। लौकिक संस्कृत में
'अविद्यायाः अन्तरे' प्रयोग होगा अथवा केवल 'अविद्यायाम्' । मन्यमाना:-/मन
(दिवादि०) ज्ञाने+शानच्, पुं० प्रथमा बहु० । दन्द्रम्यमाणा:- द्रम् गतौ (म्वादि,
द्रमति)+यङ्+शानच्, पुं० प्रथमा बहु० । 'नित्यं कौटिल्ये गतौ' । ३॥१॥२३ अर्थात्
गत्यर्थक धातुओं से 'कौटिल्य' अर्थ में ही यङ् प्रत्यय लगता है, इस नियम से कुटिल
रूप से चलने के अर्थ में 'द्रन्द्रम्य' धातु निष्पन्न होती है । यङ् प्रत्यय के अभ्यास
(पुनरावृत्ति)-कारक होने से द्रम् का अभ्यास होकर दम् द्रम् = दन्द्रम् हुआ
और यङ् का य् जुडकर द्रन्द्रम्य बनता है जिसके दन्द्रम्यते, दन्द्रम्येते, दन्द्रम्यन्ते
इत्यादि रूप बनते हैं। परियन्ति --परि+/ इण् गतौ, लट्लकार प्रथम० बहु० ।
मूढाः Vमुह+क्त, पुं० प्रथमा बहु० । नीयमानाः-/ नी+यक् कर्मणि
+ शानच् पुं० प्रथमा बहु ।
शा०भा०- अविद्यायामन्तरे मध्ये घनीभूत इव तमसि वर्तमाना वेष्ट्य-
मानाः पुत्रपश्वादितृष्णापाशशतैः । स्वयं वयं धीराः प्रज्ञावन्तः पण्डिताः शास्त्रकुशला.
श्चेति मन्यमानास्ते दन्द्रम्यमाणा अत्यर्थ कुटिलामनेकरूपां गतिमिच्छन्तो जरामरण-
रोगादिदु.खैः परियन्ति परिगच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धेनैव दृष्टिविहीनैव नीयमाना
विषमे पथि यथा बहवोऽन्धा महान्तमनर्थमृच्छन्ति तद्वत् ॥५॥
प्रथमोध्यायः द्वितीयावल्ली| ४. न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥६॥ अन्वय-वित्तमोहेन मूढम् प्रमाद्यन्तम् बालम् साम्परायः न प्रतिभाति, अयम् लोकः परः न अस्ति इति मानी पुनः पुनः मे वशम् आपद्यते । अर्थ-धन के मोह से अन्धे हुये, (अतः) प्रमाद करने वाले उस मूढ को परलोक का साधन नहीं सूझता। यही लोक है, परलोक नहीं है, ऐसा मानने वाला वह बार-बार मेरे वशीभूत होता है। (अर्थात् जन्म-मरण की परम्परा को प्राप्त होता है, संसरण करता रहता है, आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता)। विशेष-साम्पराय:-यह शब्द १.१.२६ में पीछे आ चुका है । अतः इसकी व्याख्या और टिप्पणी वहीं द्रष्टव्य है । प्रमाद्यन्तम्-प्र+/मदि हर्षे (दिवादि०) + शतृ पुं०वि० एक० । प्रपूर्वक मद्धातु का अर्थ हर्ष न होकर प्रमाद या स्खलन होता है। 'शमामष्टानां दीर्घः श्यनि' ७।३।७४ सूत्र से शमु, तमु, दमु, श्रम, भ्रमु, क्षमू, क्लमु तथा मदि-इन आठ धातुओं की उपधा को दीर्घ होकर शाम्, दाम् इत्यादि हो जाता है, दिवादिगणी होने से आगे श्यन् लगने पर । इस प्रकार शाम्यति, ताम्यति दाम्यति, श्राभ्यति इत्यादि रूप बनते हैं। मानी- मन् (दिवादि०)+णिनिः। आपद्यते-आ+ पद् (दिवादि०), लट् प्रथम० एक० । शाभा--न साम्परायः प्रतिभाति । सम्पर ईयत इति सम्परायः पर- लोकस्तत्प्राप्तिप्रयोजनः साधनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः। स च बालमविवेकिन प्रति न प्रतिभाति न प्रकाशते नोपतिष्ठत इत्येतत् । प्रमाद्यन्तम् प्रमादं कुर्वन्तं पुत्र. पश्वादिप्रयोजनेष्वासक्तमनस तथा वित्तमोहेन वित्तनिमित्तेनाविवेकेन मूढं तमसाच्छन्नं सन्तम् । अयमेव लोको योऽयं दृश्यमानः स्त्रयन्नपानादिविशिष्टा नास्ति परोऽदृष्टो लोक इत्येवं मननशीलो मानी पुनः पुनर्जनित्वा वशं मदधीनतामापद्यते मे मृत्यो- मम । जननमरणादिलक्षणदुःखप्रबन्धारूढ एव भवतीत्यर्थः। प्रायणवविध एव लोका ।। ६ ।। पौर्वापर्य-अगले मन्त्र ७ में यम नचिकेता से आत्मज्ञान की दुर्लभता का वर्णन करते हैं:- -- ४१ / कठोपनिषद् - श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा- श्चर्यों ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥७॥ अन्वय-यः बहुभिः श्रवणाय अपि न लभ्यः, बहवः श्रृण्वन्तः अपि यम् न विद्य:, अस्य वक्ता आश्चर्यः, लब्बा कुशलः, कुशलानुशिष्टः ज्ञाता आश्चर्यः । अर्थ-जो (आत्मा) बहुतो को सुनने के लिये भी प्राप्य नहीं है, जिसे सुनते हुये भी बहुत से जान नहीं पाते हैं, (ऐसे) इस (आत्मा) का निरूपण करने वाला कोई आश्चर्य रूप ही होता है, इसको प्राप्त करने वाला (भी) कोई निपुण पुरुष (ही) होता है, तथा कुशल आचार्य द्वारा उपदिष्ट ज्ञाता भी आश्चर्य रूप होता है। विशेष-लभ्यः- लभ् + यत् । शृण्वन्त:- श्रु+शत, पुं०प्रथमा बहु० । विद्यु:- विद् ज्ञाने (अदादि) विधिलिङ् प्रथन बहु । कुशलानुशिष्टा-कुशलेन अनुशिष्टः (अनु+/शास् + क्त-कित् प्रत्यय लगने पर शास् को शिष् हो जाता है ) कुशलानुशिष्टः (तृ• तत्पु०) । वक्ता-Vवच् + तृच् कर्तरि, पुं० प्रथमा एक० । लब्धा- लभ् + तृच् पुं०प्रथमा एक० । ज्ञाता-/ज्ञा + तृच्, पुं० प्रथमा एक० । -श्रवणायापि श्रवणार्थ श्रोतुमपि यो न लभ्य आत्मा बहु- भिरनेकैः, शृण्वन्तोऽपि बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्य न विदन्नि अभागिनोऽसं- स्कृतात्मानो न विजानीयुः । किं चास्य वक्तापि आश्चर्योऽद्भुतवदेवाने केष कश्चि- देव भवति । तथा श्रुत्वाप्यस्य आत्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चि- देव भवति । यस्माद् आश्चर्यों ज्ञाता कश्विदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेन आचार्येणानुशिष्टः सन् ॥ ७ ॥ पौर्वापर्यः-८-६ मन्त्रों में यम नचिकेता से आत्मज्ञान की दुर्लभता का कारण बताते हुये कहते हैं :- न नरेणावरेण सुविज्ञ यो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र' नास्ति अणीयान् ह्यतय॑मणुप्रमाणात् ॥६॥ शा.भा--- प्रोक्त एष प्रथमोध्यायः द्वितीयावल्ली! ४२ अन्वय-बहुधा चिन्त्यमानः एषः अवरेण नरेण प्रोक्तः न सुविज्ञेयः, अनन्य- प्रोक्ते अत्र गतिः न अस्ति, अणुप्रमाणात् अणीयान् अतळम् हि । अर्थ-(अस्ति-नास्ति, कर्ता-अकर्ता इत्यादि) अनेक प्रकार से (वादियों द्वारा) विचारित आत्मा तुच्छ या प्राकृत जन के द्वारा उपदिष्ट होने पर अच्छी तरह नहीं जाना जा सकता। किसी अभेददर्शी आचार्य के द्वारा उपदिष्ट इसके विषय में विविध विकल्प अवशिष्ट नहीं रह जाते। क्योंकि यह सूक्ष्म परिमाण वालों से भी सूक्ष्मतर अतश्च तर्क से परे है। विशेष-(i) इस मन्त्र के पूर्वार्ध का एक और भी (अपेक्षाकृत सीधा) अर्थ यह हो सकता है:-तुच्छ पा प्राकृत व्यक्ति के द्वारा उपदिष्ट हुआ यह आत्मा अनेकशः चिन्तित-विचारित होकर भी अच्छी प्रकार से विज्ञात नहीं हो पाता, अर्थात् श्रुतज्ञान विज्ञान-साक्षात्कारात्मक ज्ञान, अनुभव-नहीं बन पाता। (ii) अवरेण-न वरः अवरः (नञ्तत्पुरुष) तेन । प्रोक्तः-प्र+/वच् + क्त (प्रकर्षण उक्त इति प्रोक्तः-प्रादि०) सुविज्ञ य:-सु+वि+ / ज्ञा+ यत् (सुष्ठ विज्ञेय. इति) । चिन्त्यमानः-/चिन्त+यक् कर्मणि+शानच् । अनन्यप्रोक्त -अविद्यमानः अन्य यस्मात् सः अनन्यः (बहुव्रीहि०)। 'नमोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः' वार्तिक के अनुसार यह समास बना है । इसका अर्थ यह है कि नन् के साथ अस्त्यर्थक अस्, भू, विद् सत्तार्थक (दिवादि०) इत्यादि-धातुओं से बने कृदन्तों के समर्थ सुबन्तों के साथ बहुव्रीहि समास बनते हैं, और विकल्प से कृदन्तों का लोप भी हो जाता है । 'अविद्यमानः' ऐसा ही कृदन्त शब्द है। 'विद्यमान' का लोप होने पर अ+अन्यः रहेगा । फिर 'तस्मान डचि' सूत्र से अजादि उत्तरपद 'अन्यः' को नुट् का मागम होने पर अन् अन्यः = अनन्यः निष्पन्न होगा। लोप न होने पर 'अविद्यमा- नान्यः' समास बनेगा। अनन्येन प्रोक्तः अनन्यप्रोक्तः (तृ० तत्पु०), तेन । अणीयान्- अणु + ईयसुन्, पुं० प्रथमा एक० । 'अणु' के उकार का लोप होकर अण् + ईयस् 'अणीयस्' प्रातिपदिक बनता है । अतर्यम्-न तय॑म् (Vतक् + यत्) नञ्तत्पुरुषः । यहाँ लिङ्ग-विपरिणाम करके 'अतर्व्यः' ग्रहणीय है क्योंकि यह एषः का विशेषण है। अणुप्रमाणात्-अणु प्रमाणं यस्य सः (बहु०), तस्मात् । + शा०भा०-न हि नरेण मनुष्येणावरेण प्रोक्तोऽवरेण हीनेन प्राकृतबुद्धिना इत्येतदुक्त एष आत्मा यं त्वं मां पृच्छमि । न हि सुष्ठु सम्यग्विज्ञ यो विज्ञातुं शक्यो, यस्माद् बहुधास्ति-नास्ति कर्ताकर्ता शुद्धोऽशुद्ध इत्याद्यनेकधा चिन्त्यमानो वादिभिः ।
४३ | कठोपनिषद् कथं पुनः सुविज्ञ य इत्युच्यते-अनन्यप्रोक्तेऽनन्येन अपृथग्दशिना आचार्येण प्रतिपाद्यब्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त आत्मनि गतिरनेक्धास्ति नास्तीत्यादिलक्षणा चिन्ता गतिरत्रास्मिन् आत्मनि नास्ति न विद्यते सर्वविकल्पगतिप्रत्यस्तमितत्वादात्मनः । अथवा स्वात्मभूतेऽनन्यस्मिन् आत्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्ते गतिः अत्रान्याव- गतिर्नास्ति ज्ञेयस्यान्यस्य अभावात् । ज्ञानस्य ह्यषा परा निष्ठा यदात्मकत्वविज्ञानम् । अतोऽवगन्तव्याभावान्न गतिः अत्रावशिष्यते । संसारगतिवत्रि नास्त्यनन्य आत्मनि प्रोक्ते नान्तरीयकत्वात्तद्विज्ञानफलस्य मोक्षस्य । अथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्मभूतेनाचार्येण प्रोक्त आत्मनि अगतिरनवबोधोऽय रिज्ञानम् अत्र नास्ति । भवत्येवावगतिस्तद्विषया श्रोतुस्तदस्म्यहमित्याचार्यस्येवे त्यर्थः। एवं सुविज्ञ य आत्मा आगमवता आचार्येणानन्यतया प्रोक्तः । इतरथा ह्यणीयानणप्रमाणादपि सम्पद्यत आत्मा । अत यमतर्क यः स्वबुद्धयाभ्यूहेन केवलेन तर्केण तय॑माणेऽणुपरिमाणे केनचित् स्थापित आत्मनि ततो ह्यणुतरम् अन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणुतममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा क्वचिद्विद्यते ॥ ८ ॥ नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय यां त्वमापः सत्यधृतिबंतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥२॥ अन्वय-प्रेष्ठ ! सुज्ञानाय अन्येन एव प्रोक्ता एषा मति याम् त्वम् आपः तर्केण न आपनेया; बत सत्यवृतिः असिः, नचिकेतः ! त्वादृक् प्रष्टा नः भूयात् । अर्थ-हे प्रेष्ठ ! . आत्मा के) सम्यक् ज्ञान के लिए (तार्किक से भिन्न किसी दूसरे (अनन्य आचार्य) के द्वारा ही उपदिष्ट यह बुद्धि, जिसे तुम प्राप्त हुए हो, तर्क द्वारा नहीं प्राप्त की जा सकती। हर्ष है कि तुम सत्य सङ्कल्प (धारणा) वाले हो। हे नचिकेता! तुम जैसा ही प्रश्नकर्ता हमें प्राप्त हो । विशेष-(i) अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति, प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय- दोनों ही पंक्तियों का तात्पर्य एक सा है । पूर्व पंक्ति में यह बात स्पष्ट कही गई है कि अभेददर्शी अर्थात् ब्रह्मात्मैक्यानुभवी गुरु ही सही-समर्थ आत्मतत्त्वोपदेष्टा होता है क्योंकि उसी के द्वारा उपदिष्ट होने पर अतयं अतएव दुर्विज्ञेय आत्मा के विषय में शुश्रूषु शिष्य सन्देह-रहित हो पाता है । 'अन्येनैव प्रोक्ता' का तात्पर्य है 'शुष्क ताकिक से भिन्न ज्ञात प्रेष्ठ। .
प्रथमोध्यायः द्वितीयवल्ली | ४४ पुरुष के द्वारा उपदिष्ट आत्म-विषयिणी मति' । यह 'अन्य' पूर्व मन्त्र के 'अनन्य' की ओर ही संकेत करता है। ताकिक तो प्रायः वितण्डा आदि के द्वारा विषय को सुलझाने के बजाय उलझाते ही हैं । शब्द का - (ii) आपनेया-यदि इस भाष्यकार-कृत 'प्रापणीया- 'प्राप्त होने योग्य' अर्थ लिया जाय, तब तो इसका व्याकरण होगा/आप्+अनीयर, +टाप्, यद्यपि इससे 'आपनेय' न बनकर 'आपनीय' बनना चाहिये । ऐसी स्थिति में एक मात्र गति यही है कि इसे वैदिक या आर्ष प्रयोग माना जाय । दूसरी गति यह हो सकती है कि इसे आप्ल (आप) धातु से निष्पन्न न मानकर नी धातु से निष्पन्न माना जाय-आ+अप+/नी+यत् । तब इसका अर्थ 'दूर करने योग्य, काटने योग्य' होगा। फिर मन्त्र के पूर्वार्ध का अर्थ इस प्रकार होगा-'हे प्रेष्ठ ! सम्यक् ज्ञान में परिणत होने वाली अवर से भिन्न किसी श्रेष्ठ आचार्य द्वारा दी गई यह आत्म- विषयिणी मति, जिसे तुमने प्राप्त किया है, शुष्क तर्कादि से खण्डित हाने देने योग्य नहीं है' । सुज्ञानाय-सु सुन्दरं ज्ञानं सुज्ञानं (प्रादि०), तस्मै । इस स्थल में 'तादर्थ्य चतुर्थी वाच्या' से चतुर्थी का प्रयोग हुआ है। प्रेष्ठ--सम्बोधन पद । इसकी व्यत्पत्ति के लिये पीछे १-२-१ मन्त्र के 'प्रेयस्' शब्द की टिप्पणी द्रष्टव्य है । इसके खण्ड हैं- प्रिय+ इष्ठन् । आप-/आप+लुङ्, मध्यम एक० । सत्यतिः-सत्या धृतिर्यस्य सः (बहुव्रीहि०) । त्वाहक-युष्मद् + दृश् + क्विन्, पुं० प्रथमा एक० । इस शब्द के लिये १.१.२२ के विशेष में दी गई टिप्पणी द्रष्टव्य है । भूयात् -/भू आशीलिङ् प्रथम० एक० । प्रष्टा-/प्रच्छ + तृच् कर्तरि, पुं० प्रथमा एक० । शाभा०-अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मनि उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्ममतिषा तर्केण स्वबुद्धयम्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणोयेत्यर्थः । नापनेतव्या वा न हातव्या ताकिको ह्यनागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्किञ्चिदेव कथयति । अत एव च येयमागम- प्रभूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञेन आवार्येणैव ताकिकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम । का पुनः सा तांगम्या मतिरित्युच्यते-यां त्वं मति मद्वरप्रदानेन आपः प्राप्तवानसि । सत्यावितथविषया धृतिर्यस्य तव स त्वं सत्यतिबंतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्युर्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये । त्वादृक्त्वत्तुल्यो न अस्मभ्यं भूयाद् भवताद भवत्वन्यः पुत्रः शिष्यो वा प्रष्टा; कोहग्याक्त्वं हे नचिकेतः प्रष्टा ॥ ६॥ पौर्वापर्य -दशमन्त्र में यमराज अनित्य पदार्थों या साधनों के द्वारा नित्य मात्मतत्त्व की प्राप्ति का निषेध करते हैं:- - ४५ | कठोपनिषद् जानाम्यहं, शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्र वैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि- रनित्यैव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ।।१०।। अन्वय-शेवधिः अनित्यम् इनि अहम् जानामि, अभ्र वैः तत् ध्रुवं न हि प्राप्यते, ततः मया नाचिकेतः अग्निः चितः, अनित्यैः द्रव्यः नित्यम् प्राप्तवान् अस्मि । अर्थ--(कर्मफलरूप) निधि अनित्य है, यह मैं जानता हूँ। नित्य आत्मतत्त्व अनित्य साधनों से निश्चित ही नहीं प्राप्त होता । तथापि मेरे द्वारा नाचिकेत अग्नि (जिसका मैंने अभी तुम्हें उपदेश दिया है) चयन किया गया। (जिसके परिणामस्वरूप सांसारिक) अनित्य साधनों से (आपेक्षिक) नित्य स्थान (यमलोक, स्वर्ग ) को प्राप्त हुआ हूँ। विशेष-(i) मन्त्र का लो अर्थ ऊपर दिया गया है, वह शाङ्करभाष्यानुसारी है । मन्त्र के पूर्वार्ध में कथित तथ्य के साथ उत्तरार्ध में कथित तथ्य का स्पष्ट विरोध है। पूर्व में यह कहकर कि अनित्य साधनों से नित्य साध्य या फल की प्राप्ति नहीं होती,उत्तरार्ध में यह कहना कि मैंने तो नाचिकेत अग्नि का चयन किया और उस अनित्य अग्नि-चयन कर्म एवं तदर्थ अपेक्षित चरु इत्यादि अनित्य द्रव्यों से नित्य पद या स्थान की प्राप्ति कर ली,सर्वथा वदतोव्याघात या स्वकथन-विरोध उपस्थित करता है। इसी से भाष्यकार को विवश होकर 'नित्य' का अर्थ 'आपेक्षिक नित्य लेना पड़ा। अग्निचयन अर्थात् यज्ञ-कर्म तो श्रुतियों में स्वर्ग का साधन अनेकशः कहा ही गया है और स्वर्ग के अनित्य होने की प्रसिद्धि है ही। गीता में भी तो उपनिषदों के इस सिद्धान्त का कथन है-'विद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्र लोकमश्नन्ति दिब्यान् दिवि देवभोगान् ।। ते तं भुक्त्वा स्वर्ग- लोकं विशालं क्षोणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति' । अब प्रश्न यह है कि आत्मज्ञानी होकर भी यमराज ने अपने यमत्व की प्राप्ति से पूर्व कर्म-परित्याग क्यों नहीं किया जिससे सर्वथा शुद्ध आत्मज्ञान से सर्वथा नित्य आत्मा की प्राप्ति हो जाती? इसके उत्तर का प्रथमतः तो प्रयास कम ही हुआ एवं जो एक-दो हुये भी वे ठीक नहीं कहे जा सकते । इसका एक उदाहरण प्रस्तुत है- "जीवन्मुक्त रहकर मनुष्यादि को उनके कर्मानुकूल फल (मृत्यु) देकर उनपर शा- सन करके शर्तव्य पालन करना ही स्वयं को श्रेयस्कर लगने से यम ने नाचिकेताग्नि का चयन किया, न कि अज्ञान से उद्भूत भोगलिप्सा के कारण" । इस समाधान की प्रथमोध्यायः द्वितीयावल्ली | ४६ साक्षात्कार अपार्थकता सुस्पष्ट है । जीवन्मुक्त का पुनर्जन्म, फिर वह चाहे यम, इन्द्र या किसी अन्य देव के रूप में जन्मे, वेदान्त-विरुद्ध होने से अपसिद्धान्त है। इसी प्रकार जीव- न्मुक्त के कर्तव्यों की बात भी अपसिद्धान्त ही है, उसके लिये तो कुछ भी करणीय अवशिष्ट नहीं रहता। इस प्रकार से तो सभी देवों, कम से कम उनमें से प्रमुख को अवश्यमेव, जीवन्मुक्त मानना होगा, जबकि औपनिषद सिद्धान्त यह है कि ज्ञान के साथ कर्म में आस्था बनी रहने के कारण उच्च ज्ञान कर्म-समुच्चय से ऐन्द्र, याम्य आदि, और यहाँ तक कि देवों में सर्वोच्च ब्राह्म पद भी प्राप्त होता है और अधिकार समाप्त होने पर ही ब्रह्मा मुक्त होते हैं । इन्द्र आदि के तपश्चरण-पूर्वक प्रजापति से तत्वज्ञान प्राप्त करने की भी चर्चा उपनिषदों में हुई है। ऐसी वस्तु स्थिति में पूर्व उठाये गये प्रश्न का यही समाधान है कि आत्मा का श्रुत ज्ञान होने पर भी न होने से यम को कर्म तथा उसके उच्चतम के सम्बन्ध में यत्किचित् मोह बना रह गया था जिसके कारण वे पूर्व जन्म में अन्त तक उच्चतम कर्म (यज्ञ करते रहे थे और उसी के फलस्वरूप उन्हें वर्तमान याम्य पद प्राप्त हुआ जो मानव-जीवन की तुलना में लाखों गुना स्थायी होने के कारण मन्त्र में 'नित्य' कहा गया है पर है वह भी अन्वतः विनाशी ही। अगले मन्त्र में उच्चतम श्रौत कर्मों के 'एवंविध' फल का स्पष्ट उल्लेख है, और उसका दुष्कर त्याग, जो यम स्वयं नहीं कर सके थे, कर सकने के कारण नचि- केता के त्याग की प्रशंसा भी। शा०भा०-पुनरपि तुष्ट आह-जानाम्यहं शेवधिनिधिः कर्मफललक्षणो निधि- रिव प्रार्थ्यत इति । असावनित्यमनित्य इति जानामि । न हि यस्मादनित्यैः अत्रु वैनित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः । यस्त्वनित्यसुखात्मकः शेवधिः स एवानि- त्यव्यः प्राप्यते । हि यतस्ततस्तस्मात्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इतिनाचि- केतश्चितोऽग्निः । अनित्यैव्यैः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधनभूतोऽग्निनिर्वतित इत्यर्थः । तेनाहमधिकारापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यमापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि ।। १० ।। कामस्याप्ति जगतः प्रतिष्ठा क्रतोरनन्त्यमभयस्य स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥११॥ अन्वय-(हे) नचिकेतः! धीरः (त्वम्) कामस्य आप्ति, जगतः प्रतिष्ठां, पारम् ।
४७ / कठोपनिषद् ऋतोः अनन्त्यम्, अभयस्य पारं, स्तोममहत् उरुगायं, प्रतिष्ठां (च) दृष्ट्वा धृत्या अत्यनाशीः । अर्थ-हे नचिकेता ! बुद्धिमान् तुमने यज्ञ के अनन्त फल रूप हिरण्यगर्भ-पद मे भोगों की समाप्ति, जगत् का आश्रय (आधार), अभय की परम सीमा, स्तुत्य और महती (अगिमादियुक्त) विस्तीर्ण गति तथा उत्तम स्थिति को देखकर (भी) धैर्य से (उसका) परित्याग कर दिया। विशेष-(i) आप्तिम्-/ आप् +क्तिन् , द्वि० एक० । प्रतिष्ठाम्- + /स्था +अङ् अधिकरणे + टाप, द्वि० एक० (प्रतितिष्ठति अस्यामिति प्रतिष्ठा आश्रयः आधारऽत्यर्थः) । अनन्त्यम्-अनन्त+ ष्यभावे । 'आनन्त्यम्' के स्थान में 'अनन्त्यम्' वैदिक स्वर-ह्रस्वता का उदाहरण है। पारम्-परमा सीमां, परमां काष्ठाम् । स्तोममहत् - स्तोमं च महत् चेति सौममहत्, विशेषगोभयपद कर्मधारयः । उरुगायम्-- उरुः महान) गायः (गतिः) इति, तम् (विशेषणपूर्वपद कर्मधारय०) । प्रतिष्ठाम्- प्रति+/स्था+अङ भावे+टाप, द्वि० एक० ( प्रतिष्ठानं प्रतिष्ठा उत्कृष्टा उत्तमा वा स्थितिः) । अत्यस्राक्षो:-अति+/सृज् + लुङ, मध्यम० एक० । (ii) कर्म-ज्ञान-समुच्चय से प्राप्रव्य सर्वाधिक ऊंचा पद हिरण्यगर्भ का है । ऋतु या पज्ञ का जो सर्वोच्च फल है, वह हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) के पद की प्राप्ति है। इसी का वर्णन प्रस्तुत मन्त्र में है। और इसके माहात्म्य-वर्णन के द्वारा वैदिक यज्ञ- यागादि के महत्त्व का ही वर्णन इसमें यमराज ने प्रस्तुत किया है। इसे पाकर सारी इच्छायें समाप्त हो जाती हैं । मुण्डक० ११२।११ की 'स पुरुषो ह्यव्ययात्मा' पंक्ति के शा० भा० से यह तथ्य सुस्पष्ट हो जाता है:-'स पुरुषः प्रथमजो हिरण्यगर्भो ह्यव्ययात्म यावत्संसारस्थायी । एतदन्तास्तु संसारगतयोऽपरविद्यागम्या:'। शा०भा०-त्वं तु कामस्याप्ति समाप्तिम्, अत्रैवेहैव सर्वे कामाः परि- समाप्ताः, जगतः साध्यात्माध्यिभूताधिदैवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्मकत्वात्, तोः फलं हैरण्यगर्भ पदमनन्त्यमानन्त्यम्, अभयस्य च पारं परां निष्ठाम्, स्तोमं स्तुत्यं महदणिमाद्य श्वर्याधनेकगुणसंहतं स्तोमं च तन्महच्च निरतिशयत्वात्स्तोममहत् उरुगाय विस्तीर्णा गतिम्, प्रतिष्ठां स्थितिमात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा धृत्या धैर्येण धीरो: धीमान्सन् नचिकेतोऽत्यसाक्षी; परमेव आकाङ्अन्नतिसृष्टवानसि सर्वम् एतत् संसार. भोगजातम् । अहो बतानुत्तमगुणोऽसि ॥ ११ ॥ पौर्वापर्य:-अगले मन्त्र में यमराज नचिकेता को आत्मा की प्राप्ति के स्थान, साधन और फल के विषय में बता रहे हैं:- प्रथमोध्यायः द्वितीयवल्ली] ४० - - तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गहवरेष्ठं पुराणम् । अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति ॥१२॥ अन्वय-धीराः तं दुर्दशं गूढम् अनुप्रविष्ट गुहाहितं गह्वरेष्ठ पुराणं देवं अध्यात्मयोगाधिगमेन मत्वा हर्षशोको जहाति । अर्थ-धीर पुरुष कठिनता से दीख पड़ने वाले, गूढ स्थान में प्रविष्ट, बुद्धि और विशेषतः उसके गर्त (गहरे स्थान में स्थित उस पुरातन देव को आत्म- विषयक चित्तैकाग्य की प्राप्ति के द्वारा जानकर हर्ष और शोक को त्याग देता है । अर्थात् उससे परे हो जाता है । विशेष-(i) जो तथ्य 'गुहाहितं गह वरेष्ठम्' में उद्घाटित है, वही ११३३१ मन्त्र के 'गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे' इस द्वितीय चरण में भी प्रकट किया गया है। ब्रह्म तत्त्व को अपने में छिपा रखने के कारण हृदय (बुद्धि, गुहा है, उसमें 'पर' अर्थात् ब्रह्म का 'अर्ध' अर्थात् स्थान है जहाँ ब्रह्म रहता है । मुण्डक २२१७ में भी इसे सुस्पष्ट कहा गया है: --'यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्यैष महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योमन्यात्मा प्रतिष्ठितः' । इस पर शङ्कराचार्य का भाष्य इस प्रकार है: दिव्ये द्योतनवति सर्वबौद्धप्रत्ययकृतद्योतने ब्रह्मपुरे, ब्रह्मणोऽत्र चैतन्यरूपेण नित्या. भिव्यक्तत्वात् । ब्रह्मणः पुरं हृदयपुंडरीकं. तस्मिन् यद् व्योम, तस्मिन् व्योमनि आकाशे हृत्पुण्डरीकमध्यस्थे प्रतिष्ठित इवोपलभ्यते । नहि आकाशवत् सर्वगतस्य गति- रागतिः प्रतिष्ठा वान्यथा सम्भवति' । शङ्कराचार्य ने श्रुति-वाक्य का अर्थ स्पष्ट करने के अतिरिक्त एक और भी महत्त्व की बात कही है जो उसके तात्पर्य पर प्रकाश डालती है । उन्होंने श्रुति के 'प्रतिष्ठितः' शब्द की व्याख्या की है-'प्रतिष्ठितः इव' 'और 'इव' जोड़ने का रहस्य उसके बाद की पंक्ति में उद्घटित किया है जिसमें कहा है कि वस्तुनः तो आत्मा आकाशवत् विभु है और विभु की स्थान- विशेष में स्थिति अथवा उसका आना-जाना सम्भव ही नहीं है। अतः श्रुति के 'प्रतिष्ठित' शब्द का अर्थ 'प्रतिष्ठित इव' लेना चाहिये । अर्थात् वह हार्दाकाश में वस्तुतः स्थित नहीं है। फिर प्रश्न यह उठता है कि तब किस कारण से श्रुति ने 'प्रतिष्ठितः' या 'गुहाहितः' कहा ? श्वेताश्वतर में भी त ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशम्' (आत्मबुद्धौ प्रकाशते इति आत्मबुद्धिप्रकाशस्तम्-शा० भा०) इत्यादि प्रकार से आत्मा को बुद्धि में प्रकाशित या प्रतिष्ठित कहा है। इसका समाधान भाष्यकार ने कठ mms प्रथमोऽध्यायः द्वितीयावल्ली| ४६ - के प्रस्तुत मन्त्र के भाष्य में बड़े संक्षेप मे किन्तु बड़े स्पष्ट ढंग से किया है:- *ग हाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात्' । उनका कहना है कि हार्दाकाश में उस आत्मतत्त्व को स्थित इस कारण से कहा कि वहाँ चित्त का समाधान करने से क्रमशः उसके स्वरूप की उपलब्धि होने लगती है । यह तो गूढ साधना का विषय है और भाष्यकार-जैसे आत्मानुभवी ही अपने अनुभव के आधार पर अतियों में अनेकशः कथित इस तथ्य का वास्तविक तात्पर्य बताने के अधिकारी हैं। जिस चित्त-समाधान से हार्दाकाश में आत्मा का प्रत्यक्ष होता है, उसे यम ने भी 'अध्या- स्मयोगाधिगमेन' पद के द्वारा कहा है जिसकी व्याख्या शङ्कराचार्य ने इस प्रकार की है:-'विषय भ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोगस्तस्याधि- गमेन' । वस्तुतः परमातिपरम सूक्ष्म-'पुरुषान परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः' (कठ० १॥३॥११) होने के कारण आत्मा की उपलब्धि बिखरे चित्त से हो नहीं सकती। तदर्थ उसका समाधान करना ही होगा और समाहित-केन्द्रित होकर ही वह सूक्ष्म का ग्रहण करने में समर्थ होता है-"दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः' (कठ • ११३।१२) । जब गणित, भौतिकी, ज्योतिष इत्यादि व्यावहारिक विद्याओं के सूक्ष्म सिद्धान्तों को समझने के लिये केन्द्रित चित्त की आवश्यकता होती है अन्यथा कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता, तो फिर इन सबसे अनेक गुना सूक्ष्म-'बाला- प्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः तदानन्त्याय कल्पते'- आत्मतत्त्व के ग्रहण या बोध के लिये तो चित्त को सहस्रों गुना समाहित-केन्द्रित होना होगा। (ii) दुर्दर्शम् -दुर् + / दृश् + खल् (अ)। गूढम्-/गुह + क्त, तम् । गुहाहितम्-गुहायाम् माहितः (आ+/धा+क्त-'दधातहि, सूत्र से धाके स्थान में 'हि' आदेश) गुहहितिः, तम् । गह वरेष्ठम् - गह्वरे तिष्ठतीति गहवरेष्ठः (गहवरे+/स्था + कः कर्तरि-अलुक् तत्पु०) तम् । पुराणम्-पुरा+टयु (अन) र के कारण न को 'रषाभ्यां नो णः समान पदे' से ण हो गया। अध्यात्मयोगाधि- गमे-आत्मनीति अध्यात्मम् (अधि+आत्मन् +टच् )। इसका अर्थ है आत्मा के विषय में । अध्यात्म योगः अध्यात्मयोग (आत्मविषयक चित्तैकाग्रयम् इत्यर्थ), सुप्सुपासमास । तस्य अधिगमः प्राप्तिरिति अध्यात्मयोगाधिगमः (षष्ठी तत्पु०), तेन । शा०भा०-तं दुर्दर्श दुःखेन दर्शनमस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात् गूढं गहनमनुप्रविष्टं प्राकृतविषयविकारविज्ञानः प्रच्छन्नमित्येतत्, गुहाहितं गुहायां बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात् गह्वरेष्ठं गह्वरे विषमेऽनेकानर्थसंकटे तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एवं गूढमनुप्रविष्टो गुहाहितश्चातो गह वरेष्ठः अतो दुर्दर्शः। तं पुराणं पुरातन- फा०-४ ५० | कठोपनिषद् मध्यात्मयोगाधिगमेव विषयेभ्यः प्रतिसंहृत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोग- सतस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं धीरो हर्षशोकावात्मन उत्कर्षाकर्षयोः अभावाज जहाति ॥ १२ ॥ पौर्वापर्य०-जिस अध्यात्मयोग से आत्मज्ञान और उससे शोकादि से मुक्ति की बात नचिकेता से यम ने कही, वह कैसे प्राप्त किया जाय, इसे वे १३ मन्त्र में बता रहे हैं :- एतच्छ् त्वा संपरिगृह्य संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमा प्य । स मोदते मोदनीय हि लब्ध्वा विवृत सद्म नचिकेतसं मन्ये ।।१३।। अन्वय-सः मर्त्यः एतत् श्रुत्वा सपरिगृह्य, धर्म्यम् प्रवृह्य अणुम् एतम् आप्य मोदनीयम् हि लब्ध्वा मोदते, नचिकेतसम् (प्रति) सद्म विवृतम् मन्ये । अर्थ-मनुष्य इस आत्मतत्त्व को सुनकर और (आचार्य के अनुग्रह से) भली- भौति समझकर, (शरीर-इन्द्रियादि के) धर्मो से युक्त (मैं मोटा हूँ, मै दुर्बल हूँ, मैं देखता हूँ सुनता हूँ इत्यादि) रूप में ज्ञात होने वाले इसको उनसे पृथक् करके सूक्ष्म (केवली) तथा आनन्द रूप में प्राप्त करने से आनन्दित हो जाता है । तुझ नचिकेता के लिये ब्रह्म-लोक खुला है, ऐसा मैं समझता हूँ विशेष-(i) यह मन्त्र आत्म-प्राप्ति के साधन बताने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । अध्यात्म-योग से आत्म-ज्ञान और उससे आत्म-प्राप्ति होती है, यह सुविदित है। किन्तु अध्यात्म-योग हो कैसे, यह बड़ा विषम प्रश्न है । इसी को संक्षेप किन्तु स्पष्ट रूप से यम ने इस मन्त्र में बताया है। यह तो स्पष्ट ही है कि आत्मा के स्वरूप पर चित्त को एकान या समाहित करने के पूर्व उस स्वरूप का ज्ञान होना आवश्यक है। इसी के लिये 'श्रुत्वा' कहा अर्थात् किसी अभेद-दर्शी ब्रह्मनिष्ठ आचार्य से पहले 'समित्याणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्' इत्यादि में प्रतिपादित विधि से उसके वास्तविक रूप को सुने और समझे (संपरिगृह्य) 'मनन' करे, ताकि शरीर. इन्द्रियादि के धर्मों से युक्त जो उसका रूप प्रतीत होता है, उससे उसको 'प्रवृह्य' अर्थात् अलग करके जो उसका धर्मरहित, सूक्ष्म एवं शुद्ध आनन्द-रूप है, उसे साधक जान सके । फिर आत्मा के इसी केवली या शुद्ध रूप पर महर्निश चित्त को लगाये- आत्मयोग करे-जिससे उसका साक्षात्कारात्मक ज्ञान अर्थात् अपरोक्षानुभूति हो है . प्रथमोऽध्यायः द्वितीयाको ५१ सके। उसका इस प्रकार का अनुभवात्मक ज्ञान ही उसकी प्राप्ति है, क्योंकि का अपना स्वरूप तो सदा से ही प्राप्त है, उसे कोई क्या प्राप्त करेगा, केवल माया-वश, अज्ञान् वश-भूला हुआ है, वही भूल समाप्त करके स्वरूपतः उसे जान ले, काम बन जाय, सारे अनर्थो से छुट्टी मिल जाय, जैसा कि पिछले मन्त्र के 'मत्वा धोरो हर्षशोको जहाति' इस चतुर्थ चरण में यम ने स्पष्ट कर दिया है। आगे भी २.३.१७ में आत्मा को शरीरादि से पृथक् करने की बात यम ने इस प्रकार दोहराई है :- "अनुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । तं स्वा. च्छरीरात्पबृहेन्मुजादिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृत मेति ॥" इससे साधना मे इस पृथक्करण रूप सोपान का अत्यधिक महत्व स्वतः सुस्पष्ट है । फिर यह मन्त्र सिद्धान्त-प्रतिपादक अन्तिम मन्त्र भी है कठोपनिषद् का । इसका तात्पर्य यह है कि अध्यात्म विद्या के परम गुरु यमराज को यह बात सर्वथा अभिप्रेत है कि आत्मा के श्रवण की पूर्ण सार्थकता तभी है जब साधक तदनुरूप उस स्वरूप को शरीरेन्द्रियादि-संघात से अलग करे क्योंकि अनित्यों से अलग करके ही उसकी नित्यता का अनुभव करके सावक मृत्यु के भय से मुक्त हो सकेगा, नान्यथा। (ii) सम्परिगृह्य-सम् + परि + / ग्रह, + क्त्वा ल्यप् । प्रवृह्य--प्र+ Vवृहू उद्यमने (तुदादि०) + क्त्वा→ल्यप् । धर्म्यम्-धर्म + यत् । आप्य-आ+/ आप्ल + क्त्वा→ल्यप् । मोदनीयम् - मुद् हर्षे (स्वादि०)+अनीयर् । 'कृत्यल्युटो बहुलम् से यहाँ अनीयर् कर्ता-अर्थ में जुड़ा है जिससे 'मोदनीय' का अर्थ इस स्थल में 'मोदयिता'-आनन्द-स्वरूप है। विवृतम् वि+/ वृन (तुदादि०) + क्त । सद्म- नकारान्त नपुं० शब्द है । प्रयमा तथा द्वितीया एकवचन में 'सद्म' रूप बनता है। यहाँ द्वि० एक० में प्रयुक्त है और 'मन्ये' क्रिया का कम है । शा० भा०-एतदात्मतत्वं यदहं वक्ष्यामि तच्छ त्वाचार्यप्रसादात्सम्यगात्म- भावेन परिगृह्योपादाय मर्यो मरणधर्मा धर्मादनपेतं धर्म्य प्रवृह्योद्यम्य पृथक्कृत्य शरीरादेः अणुं सूक्ष्ममेतमात्मानमाप्य प्राप्य स मर्यो विद्वान्मोदते मोदनीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा । तदेतदेवंविधं ब्रह्मसद्म भवनं नचिकेतसं त्वां प्रत्यपावृतद्वारं विवृतमभिमुखी. भूतं मन्ये मोक्षार्ह त्वां मन्य इत्यभिप्रायः ॥ १३ ॥ पौर्वापर्य -~-यम से इतनी बात सुनकर नचिकेता के चित्त में पूर्वतः वर्तमान आत्म-जिज्ञासा जैसे नवीकृत हो गई। अतः वह पुन: यम से अपनी जिज्ञासा इस प्रकार से प्रकट करने लगा : . - ५२ | कठोपनिषद् अन्यत्र धर्मादन्यनाधर्माद्- अन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्न भूताच्च भव्याच्च यत् तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥ अन्वय-धर्मात् अन्यत्र, अधर्मात् अन्यत्र, अस्मात् कृताकृतात् अन्यत्र, भूतात् च भव्यात् च अन्यत्र यत् तत् पश्यसि, तत् वद् । अर्थ-जो धर्म से पृथक्, अधर्म से पृथक् तथा इस कार्यकारण रूप प्रपञ्च से भी पृथक है, और जो भूत एवं भविष्य (वस्तुओं) से भी भिन्न है, ऐसा आप जिसे देखते हैं उसी का मुझसे कथन करें। विशेष- कृताकृतात-कृतं च अकृतं च कृताकृतम् (समाहार द्वन्द्व), तस्मात् । कृत अर्थात् कार्य, एवं अकृत अर्थात् कारण ! भूतात-/भू क्त, पं० एक० । भव्याव-/भू+यत्, पं०एक० । भू के उकार को गुण होकर अव हो गया । शा०भा०-अन्यत्र धर्माच्छास्त्रीयाद् धर्मानुष्ठानात् त्फलातत्कारकेभ्यश्च पृ. थग्भूतमित्यर्थः । तथान्यत्र अधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् कृतं कार्यमकृतं कारणमस्मा- दन्यत्र । किं चान्यत्र भूताच्चातिक्रान्तात्कालात् भव्याच्च भविष्यतश्च तथा वर्तमानात, कालत्रयेण यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः । यद् ईदृशं वस्तु सर्वव्यवहारगोचरातीतं पश्यसि तद्वद मह्यम् ॥ १४ ॥ पौर्वापर्य-नचिकेता के प्रश्न के उत्तर में यम ॐकार का उपदेश कर सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँ सि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥१५।। मन्वय-सर्वे वेदाः यत् पदम् आमनन्ति, सर्वाणि तपांसि च यत् वदन्ति, पत् इच्छन्तः ब्रह्मचर्यम् चरन्ति, तत् पदम् ते संग्रहेण ब्रवीमि, एतत् 'ओम्' इति । मर्थ-सारे वेद जिस पद का बार-बार वर्णन करते हैं, समस्त तपों के प्रथमोऽध्यायः द्वितीयावल्ली|५६ सिजकी प्राप्ति के लिये (सावन) बताते हैं, जिसकी इच्छा से (मुमुक्ष) ब्रह्मचर्य का माचरण करते हैं, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ । ॐ-यही वह पद है । विशेष-आमनन्ति-आ+/म्ना अभ्यासे (म्बादि०)+लट्, प्रथम० बहु । इसके रूप मनति, मनतः, मनन्ति बनते हैं। 'अभ्यास' का अर्थ है बार-बार कहना या वर्णन करना। यद्-प्रस्तुत स्थल में इसका अर्थ 'यदर्यम् है, जैसाकि भाष्यकार शङ्कराचार्य ने 'यत्प्राप्त्यर्यानि' लिखकर सष्ट किया है। संग्रहेग-सम् + बह + अप्, तृ• एक० (सक्षेपेण समासेन वेत्यर्थः)। शा०मा०-सर्वे वेदा यत्पदं पदनीयं गमनीयमविभागेनामन न्ति प्रतिपादयसि अपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्यानीत्यर्थः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य गुरुकुलवास- अक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थ चरन्ति तत्ते तुभ्यं पदं यज्ञातुमिच्छसि संग्रहेण संक्षेपतो ब्रवीमि । ओमित्येतत् । तदेतत्पदं यद् भुत्सितं तवया । यदेतद् ओमित्योंशब्दवाच्यमों- शब्दप्रतीकं च ॥१५॥ एतद्ध्येवाक्षर ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् । एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥१६॥ अन्वय - एतत् अक्षरम् एव हि ब्रह्म, एतत् एव हि परम्, एतत् अक्षरम् एव हि ज्ञात्वा यः यत् इच्छति तस्य तत् (भवति)। अर्थ-यह अक्षर ही (अपर) ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर (ब्रह्म) है । इस अक्षर को ही जानकर जो जिसकी इच्छा करता है, वही उसका हो जाता है । - विशेष-अमरम्-शरतीतिरम् (Vक्षर्+अच् कर्तरि) । न क्षरम् इति अक्षरम् (नन् नत्पु०) । ब्रह्म - बृह, +मनिन् । वस्तुतः ओम् परमात्मा के अनन्त नामों में सर्वश्रेष्ठ नाम है। साथ ही यह उसका प्रतीक भी है। अर्थात् इसका जप करना चाहिये, एवं इस पर ध्यान भी लगाना चाहिये । इससे उसका शीघ्र साक्षात्कार होता है। प्रतीक होने से ही यम इसे अगले मन्त्र में मन का श्रेष्ठ आलम्बन बताते हैं । अपेक्षाकृत स्थूल मन के द्वारा उससे अत्यन्त सूक्ष्म आत्मा की आसना के लिये मन का कोई आलम्बन तो होना ही चाहिये । वह आलम्बन 'ओम्' ही तो है क्योंकि वह निर्गुण-निराकार ब्रह्म का प्रतीक है शा०मा०-एतद्धि एवाक्षरं ब्रह्म परमेतद्ध्येवाक्षरं परं च । तयोहि प्रतीक.
५४ | कठोपनिषद् हमेतदक्षरम् एतद्ध्येवाक्षर ज्ञात्वोपास्य ब्रह्मति यो यदिच्छति परमपर वा तस्य तद् भवति । पर चेज्ज्ञातव्यमपर चेत्प्राप्तव्यम् ।। १६ ॥ एतदालम्बन, श्रेष्ठमेतदालम्बन परम् । एतदालम्बन ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१७॥ अन्वय-एतत् आलम्बनम् श्रेष्ठम्, एतत् आलम्बनम् परम्, एतत् आलम्ब- नम् ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते । अर्थ यह ओम् ही श्रेष्ठ आलम्बन है, यही पर मालम्बन है । इस आल- म्बन को जानकर पुरष ब्रह्मलोक मे पूजित होता है। विशेष- श्रेष्ठम्-प्रशस्य+ इष्ठन् । प्रशस्य के स्थान मे 'थ' आदेश के लिये पौछ १-२-१ के अन्तर्गत 'श्रेय' शब्द की टिप्पणी द्रष्टव्य है । आलम्बनम् आ + लम्ब+ल्युट्→ अन । महीयते-/महीड्+यक् लट् प्रथम०एक० । 'कण्ड्वा- दिभ्यो यक' ३।१।२७ से कण्ड्वादिगण की महीड, धातु से स्वार्थ मे यक् प्रत्यय लगा है। शा०भा०- यत एवमत एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्यालम्बनाना श्रेष्ठ प्रश- स्यतमम् । एतदालम्बन परमपर च परापरब्रह्मविषयत्वात् । एतदालम्बन ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परस्मिन् ब्रह्मणि । अपर स्मिश्च ब्रह्मभूतो ब्रह्मवदुपास्यो भव- तीत्यर्थ ।। १७॥ पौवापर्य-जिसकी उपासना के लिये यम ने 'ओम्' को आलम्बन बताया, भब उसी का स्वरूप बता रहे हैं न जायते म्रियते वा विपश्चि- न्नाय कुतश्चित् न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽय पुराणो न हत्यते हा यमाने शरीरे ॥१८॥ अन्वय-विपश्चित् न जायते (न) वा म्रियते अयम् कुतश्चित् न बभूव, न कश्चित् (बभूव) । अजः नित्य शाश्वत पुराण अयम् शरीरे हन्यमाने न हन्यते । मर्य-मेषावी (नित्यचैतन्य स्वरूप) यह आत्मा न उर होता है, मतन पन्न प्रथमोऽध्यायः द्वितीयावल्ली [५५ हैं । न तो किसी (अन्य कारण) से उत्पन्न हुआ है, और न स्वयं ही कुछ अन्य वस्तु (कार्य) हुआ है। अन्मा,नित्य,क्षय-रहित तथा पुरातन यह आत्मा शरीर के माजानेरे पर (भी) नही मारा जाता-मृत्यु को नहीं प्राप्त होता। विशेष-विपश्चित् - वि++/चित् + क्विप् (विप्रकृष्टं चेततीति)। 'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् सूत्र के बल से प्र को पश् आदेश हो जाता है । अनः- नन् . /जन्+ड: कर्तरि (न जायते इति अजः -उपपदसमास) । हन्यमाने- हिन्+यक् कर्मणि+शानच्, स एक०। हन्यते-/हन् यक् कर्मणि + लट् एक० । - प्रथम । शा०भा०-न जायते नोत्पद्यते म्रियते वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनो- नित्यस्य अनेकविक्रियाः तासामाद्यन्ते जन्मविनाशलक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रति- बिध्येते प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थ न जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मेवावी अविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात् । किं च नायमात्मा कुतश्चित् कारणान्तराद् बभूव । स्वस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूतः । अतोऽयमात्माजो नित्यः शाश्व- तोऽपक्षयविवर्जितः। यो ह्यशाश्वतः सोऽपक्षीयते; अयं तु शाश्वतोऽत एव पुराण: पुरापि नव एवेति । यो ह्मवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वय॑ते स इदानी नबो यथा कुम्भादिः । तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवजित इत्यर्थः । यत एवमतो न हन्यते न हिंस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे । तत्स्थोऽप्याकाशवदेव ॥ १८ ॥ हन्ता चेन्मन्यते हन्तु, हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नाय हन्ति न हन्यते ॥१६॥ अन्वय-हन्ता (आत्मानं) हन्तुं चेत् मन्यते, हतः (आत्मान) हतं चेत् मन्यते (तहि) तो उभौ न विजानीतः। अयं न हन्ति,न हन्यते । अर्थ-यदि मारने वाला आत्मा को मारने के लिये सोचता है, और मारा जाने वाला उसे मारा हुआ समझता है, तो वे दोंनो ही उसे नहीं जानते । वस्तुतः न यह मारता है और न मारा जाता है। विशेष-(i) जैसे विभु आकाश शस्त्रादि से काटा नहीं जा सकता, उसी प्रकार विभु आत्मा भी । शरीरेन्द्रिय-संघात से तो पृथक् या परे इसे इसके पहले ही यम बता चुके हैं । अतः एक शरीर द्वारा अन्य शरीर पर किया जाने वाला प्रहार आत्मा पर स्वरूप- ज्ञान-वश आरोपित किया जाता है, न कि वह वस्तुतः हन्ता या ५६ ] कठोपनिषद् शाभा- हग्यमान है। (ii)विजानीत:--वि+ज्ञा + लट् प्रयम द्वि० । चेत्-यह यदि का पर्याय है । वाक्य के आरम्भ में इसका प्रयोग वजित है । -एवंभूतमप्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिहन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनमिति योऽप्यन्यो हतः सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मानं हतोऽहमित्युभावपि तौ न विजानीतः, स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वा- दात्मनस्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव । अतोऽनास्मज्ञविषय एव धर्माधर्मा- दिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य । श्रुतिप्रामाण्यान्यायाच्च धर्माधर्माद्यनुपपत्तः ।। १६ ।। पोपियं०-तब फिर उस आत्मा को सही-सही कैसे जाना जा सकता है ? इसका उत्तर यम अगले मन्त्र में इस प्रकार दे रहे है:- अणोरीयान्महतो महीया- नात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् । तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥२०।। अम्बय-अणोः अणीयान् महतः महीयान् आत्मा अस्य जन्तोः गुहायाम् निहितः। अक्रतुः वीतशोक: धातुप्रसादात् आत्मनः तं महीमानम् पश्यति । अर्थ-यह अणु से भी अणुतर और महान से भी महत्तर आत्मा प्राणी पुरुष) की हृदय रूप गुहा में स्थित है। निष्काम पुरुष इन्द्रियों की निर्मलता से आत्मा की उस महिमा को देखता है और शोक-रहित हो जाता है । विशेष-(i) पीछे १३ वे मन्त्र के विशेष में इस मन्त्र का सारा विषय आ चुका है, अतः वहीं द्रष्टव्य है । इसमें इतनी ही बात अधिक कही गई है कि देहेन्द्रि- यादि-संघात से अलग करके अणीयान् आत्मा पर चित्त को एकान या समाहित करने के लिये सर्वप्रथम इन्द्रियों का शमन करना होगा क्यों कि वशीभूत इन्द्रियों वाले का ही चित्त एकाग्र हो पायेगा, अन्यथा इन्द्रियों के द्वार से उनके तत्तद् शब्द-स्पर्श-रूप- रस गन्धादि विषयों तक पहुँचने को आतुर चित्त कभी भी स्थिर और शान्त नहीं हो सक्ता । गीता में भगवान कृष्ण ने भी इस तथ्य को-"इन्द्रियाणां हि चरतां यन्म- नोऽनुविधीयते । तदस्य हति प्रज्ञा वायुविमिवाम्भसि" ॥ श्लोक में स्पष्ट किया है।
प्रथमऽध्यायः द्वितीयावल्ली | ५७ (ii) अणीयान् ~ अणु + ईयसुन्,पुं०प्रथमा एक० । महीयान्-महत् + ईयसुन् । इसमें 'टि'-अत्-आठवें का लोप होकर मह + ईयस् = महीयस् शब्द बनता है। अक्रतुः-अविद्यमानाः ऋतु : (कामाः) यस्य सः बहु । पीछे ८वे मन्त्र में आये हुये 'अनन्य' की ही तरह इसको भी सिद्धि होगी। बीतशोकः-वीतः वि +/इण् गतो+क्त) शोकः यस्य सः (बहु) । धातुप्रसादात्-धातूनां (इन्द्रियाणां) प्रसादः (प्र+ / सद्+घन्) षष्ठीतत्पु०, तस्मात् । इसमें 'हेती' सूत्र से पञ्चमी विभक्ति आई है। महिमानम् - महत् • इमनिच्, पुं० द्वि एक० । यहाँ भी 'टि' -अत्-का लोप होने से ‘महिमन्' प्रातिपदिक निष्पन्न होता है। शा०भा०-कथं पुनरात्मानं जानातीत्युच्यते--अणोः सूक्मादणीयाश्यामाका- देरणुतरः । महतो महत्परिमाणान्महीयान्महत्तरः पृथियादेः । अणु महद्वा यदस्ति लोके वस्तु तत्त नैवात्मना नित्येनात्मवत्संभवति । तदात्मना विनिर्मुक्तमपसंयते । सस्माद् असावेवात्माणोरणोयाम्महतो महीयान्सर्वनामरूपव स्तूपगाषिकत्वात् । स वात्मास्य जन्तोब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहायां हृदये निहित आत्मभूतः स्थित इत्यर्थः। तमात्मानं दर्शनश्रवणमनन विज्ञानलिङ्गमकतुरकामो दृष्टादृष्टबाह्य वेषयो- परतबुद्धिरित्यर्थः । यदा चैवं तदा मनादीनि करणानि धातवः शरीरस्य धार- गात्प्रसीदन्तीत्येषां धातूनां प्रसादादात्मनो महिमानं कर्मनिमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्य- ध्ययम् अहमस्मीति सामाद्विजानाति । ततो वीतशोके भवति ॥ २० ॥ पौर्वापर्य-निष्काम जितेन्द्रिय पुरुष ही आत्मा को प्राप्त कर सकता है,यह यम बता चुके । ऐसा क्यों ? क्योंकि प्रतीतितः विरुद्ध स्वभाव वाला होने से यह प्राकृत पुरुषों के लिये सर्वथा दुर्विज्ञेय है । यह तथ्य आने दो मन्त्रों में कहा जा रहा है: आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्त मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥२१॥ अन्वय-आसीनः दूरम् व्रजति, शयानः सर्वतः याति, तम् मद मदम् देवम् मदन्यः कः ज्ञातुम् अर्हति । अर्थ---यह स्थित हुआ भो)दूर तक जाता है, शयन करता हुआ भी सर्वत्र पहुंचता है । हर्ष से युक्त (भी) और रहित (भी) उस आत्मदेव को मेरे सिवा और कोन जान सकता है ?
५८ | कठोपनिषद् विशेष- (i) स्थिति-गति तथा मदामद आदि अनेक विरुद्ध धर्म रूप उपाधि वाला होने से यह आत्मा विश्वरूप सा लगता है। इसी से यम ने इसे दुविज्ञेय कहा । इसको सम भने और जानने के लिये सूक्ष्म बुद्धि चाहिये। इन्द्रियों के उपक्रम को यहां शयन कहा गया है । शयन करने वाले अर्थात् शान्त इन्द्रियों व.ले पुरुष का इन्द्रिय जनित एकदेश सम्बन्धी विज्ञान शान्त हो जाता है। उस समय केवल सामान्य विज्ञान होने से वह सर्वत्र जाता हुआ सा जान पड़ता है । जब वह विशेष विज्ञान में स्थित होता है तो स्वरूप से स्थित हुआ भी मन आदि उपाधियों वाला होने से उनकी गतियों के कारण दूर जाता हुआ सा जान पड़ता है- यही 'आसीनो दूरं व्रजति' कथन का भाव है । 'मदामद' कथन का तात्पर्य यह है कि अन्त:करण के सत्वगुण की वृत्ति सुखात्मक एवं रजोगुण की वृत्ति दुःखात्मक है, अत: उससे उहित आत्मा सत्त्व का प्राबल्य होने पर सुखी एवं रजस् का प्राबल्य होने पर सुखरहित-दुःखी सा प्रतीत होता है । वस्तुतः तो वह नित्यानन्द स्वरूप है, और अन्तःकरण की इन सुखदुःखात्मक वृत्तियों से उसमें कोई अन्तर नहीं पड़ता, प्रतीतितः या व्यवहारतः वह जरूर सुखी दुःखी होता दिखाई पड़ता है। (ii) आसीन:-आस्+शानच् । 'ईदासः' ६।२।८३ सूत्र से/ आस् के आगे जुड़ने वाले शानच् के 'आ' के स्थान में 'ई' हो जाता है । इस प्रकार, आस् + आन = आस्+ईन = 'आसीन' शब्द बनता है । शयानः- शी+शानच् । 'ई' को गुण होकर 'ए' होने पर, आगे स्थित 'आ' के कारण 'ए' को अय् आदेश होकर श् + अय +आन= शयान शब्द बनता है । महामदम्--मदश्च अमदश्चेति मदामदः (विशेषणोभयपद कर्मधारय), तम् । मदन्यः--मत् (अस्मत् शब्द का पं० एक० का रूप) अन्य: मदन्यः (अस्मत्→ मत् + अन्यः), पं० तत्पु० । 'अस्मत्' को समास में एकवचन में 'मत्' आदेश हो जाता है । शा० भा०-अन्यथा दुर्विज्ञ योऽयमात्मा कामिभिःप्राकृत पुरुषैः यस्मात्- आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन् दूरं व्रजति । शयानो याति सर्वत एवम सावात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽशक्यत्वाज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देव मदन्यो ज्ञातुमर्हति ? न कोडीत्यर्थः । अस्मदादेरेव सूक्ष्मबुद्धः पण्डितस्य सुविज्ञ- योऽयमात्मा स्थितिगतिनित्यानित्यादिविरूद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुद्धधर्मवत्वाद्विश्वरूप । 'इव चिन्तामणिवदवभासते । अतो दुर्विज्ञ यत्वं दर्शयति कस्तं मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति । करणानामुपशमः शयनं करणजनितस्यैकदेशविज्ञानस्य उपशमः शयानस्य भवति । . - प्रथमोऽध्यायः द्वितीयावल्ली | ५६ अशरीर, यदा चैवं केवलसामान्य विज्ञानत्वात् सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनआदिगतिषु तदुपाधिकत्वाद्रं बजतीव । स चेहैव वर्तते ।। २१ ।। शरोरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।।२२॥ अन्वय-धीरः शरीरेषु अशरीरम् अनवस्थेषु अवस्थितम् महान्तम्, विभुम् आत्मानम् मत्वा न शोचति । अर्थ-बुद्धिमान् पुरुष समस्त शरीरों में अशरीर अर्थात् शरीर-रहित, अस्थायियों अर्थात् अनित्यों में नित्य रूप से स्थित, महान् तथा सर्वव्यापक आत्मा को जानकर शोक नहीं करता। विशेष- अशरीरम्-अविद्यमानं शरीरं यस्य सः (बहु०), तम्। अनवस्थेषु- अविद्यमाना अवस्था अवस्थितिः येषां ते (बहु०), तेषु । शा० भा०-तद्विज्ञानाच्च शोकात्यय इत्यपि दर्शयति-अशरीरं स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीरं शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थिति- रहितेष्ववस्थितं नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्तं महत्त्वस्यापेक्षिकत्वशङ्कायामाह-विभु, व्यापिनमात्मानम्-आत्मग्रहणं स्वतोऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्दः प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीदृशमात्मानं मत्वा अयमहमिति धीरो धीमान शोचति । न ह्यवं विध- स्यात्मविदः शोकोपपत्तिः ॥ २२॥ पौर्वापर्य:-दुर्विज्ञेय आत्मा उपाय-विशेष से प्राप्तव्य है, इस पूर्वोक्त बात को यम फिर कह रहे हैं अद्यावधि अकायत आत्मानुग्रह रूप उपाय बताने के लिये:- - न बहुना नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो मेधया श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनू, स्वाम् ॥२३॥ मन्वय-अयम् आत्मा प्रवचन न लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन, एषः यम् वृणुते तेन लभ्यः, तस्य एष मात्मा स्वाम् तनम् विवृणुते ।
६० | कठोपनिषद् अर्थ-यह आत्मा न तो प्रवचन से न मेधा या धारणा शक्ति से, और न बहुत श्रवण से ही प्राप्त होने योग्य है । जिस साधक को यह बात्मा वरण कर लेता है, उसी के द्वारा (वह) प्राप्त होने योग्य है । उसी साधक के प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है। विशेष-(i) गोस्वामी जी ने राम-वाल्मीकि संवाद में वाल्मीकि द्वारा इसी भाव को इन शब्दों में कहा है :-'सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हइ तुम्हइ हो जाई ।। (अयोध्याकाण्ड) ।। यह आत्म-कृपा सापक पर कै हो, इसका उत्तर तो यही होगा कि इन्द्रिय, मन आदि का निग्रह करके सच्चरित्र बने और आत्म- निवेदन करे । अगो मन्त्र में निग्रह की बात यम ने कही भी है। (ii) प्रवचनेन-प्र+/वच् + ल्युट्→अन, तेन । विवृणुते-वि + Vवृज् (स्वादि०)+लट् , प्रथम ० एक० । शा० भा०-यद्यपि दुर्विज्ञ योऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह- नायमात्मा प्रवचनेनानेकवेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञयो नापि मेषया प्रस्थार्थधारणशक्त्या । न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन तहि लभ्य इत्युच्यते- यमेव स्वात्मानमेष साधको वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना वरित्रा स्वयमात्मा लम्यो ज्ञायत एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानम् एव प्रार्थयत आत्मनैवात्मा लभ्यत इत्यर्थः। - कथं लभ्यत इत्युच्यते---तस्यात्मकामस्यैप आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पार- मार्थिकी तनूं स्वां स्वकीयां स्वयाथात्म्यम् इत्यर्थः ॥ २३ ॥ नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेननमाप्नुयात् ॥२४॥ अन्वय-दुश्चरितात् अविरतः, न अशान्तः, न असमाहितः, न अशान्त- मानस: वा अपि प्रज्ञानेन एनम् न आप्नुयात् । अर्थ---जो पाप-कर्मों से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं है जो समाहित नहीं है, और जिसका चित्त शान्त नहीं है, वह आत्मा को केवल (शुष्क) ज्ञान से प्राप्त नहीं कर सकता । विशेष-अविरतः-न विरतः (वि+रम् + क्त) इति, नञ्तत्पु० ।
प्रथमोऽध्यायः द्वितीयादजी | ६१
wam-
दुश्चरितात्--दुष्ट चरितम् (चर्+क्त) इति दुश्चरितम् ।दुस् + चरितम् प्रादि
तत्पु०, तस्मात् । अशान्तः-न शान्तः (V शम् +क्त) इति, नञ्तत्पु० । असमाहितः-
न समाहितः (सम् +आ+ धा+क्त) इति, नतत्पु० ! अशान्त मानसः-अशान्तं.
मानसं (मनस् + अण् स्वार्थे) यस्य सः (बहुव्रीहिः) । प्रज्ञानेन--प्र + /ज्ञा + ल्युट,
तेन ।
शा० भा०-कि चान्यत्-न दुश्चरितात्प्रतिषिद्धाच्छ तिस्मृत्यविहितात्पाप-
कर्मणोऽविरतः अनुपरतो नाषीन्द्रियलोल्याद् अशान्तोऽनुपरतो नाप्यसमाहितोऽनेकाग्रमना
विक्षिप्तचित्तः, समाहितचित्तोऽपि सन् समाधानफलाथित्वान्नाप्यशान्तमानसो व्यात.
चित्तः प्रज्ञानेन ब्रह्मविज्ञानेननं प्रकृतमात्मानमाप्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रिय-
लोल्याच्च समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तम्
आत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थः॥ २४ ॥
पौर्वापर्य०-जो पूर्वोक्त प्रकार का नहीं है अर्थात् असमाहित और अशान्त
है, वह उस परमतत्त्व को न जानने से बार-बार उसके काल-रूप के वशीभूत
होता है:-
यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ।।२।।
अन्वय--ब्रह्म च क्षत्रम् च उभे यस्य ओदनः भवतः, यस्य उपसेचनम् मृत्युः,
कः इत्था वेद यत्र सः।
अर्थ---जिस आत्मा के ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों भात (खाद्य) हैं, तया मृत्यु
जिसका शाकादि है, वह जहाँ है उसे कौन (अज्ञ पुरुष) इस तरह खाद्य (अर्थात्
उपर्युक्त साधन-सम्पन्न अधिकारी की तरह) जान सकता है।
विशेष-
-ब्रह्म... ब्राह्मण क्षत्रम्--क्षत्रिय । मोदन:--[उन्दीक्लेदने
(रुधादि०)+युच् →अन अक्षरार्थ -जो पानी में डाल कर पकाया जाय)।
उपसेचनम्-उप+/सिच् + ल्युट् --> अन इत्था-इत्थम् के अर्थ प्रयुक्त अव्यय पद ।
शा. भा० - यस्त्वनेवं भूतः-यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्मविधारके अपि
सर्वत्राणभूते उभे ओदनोऽशनं भवतः स्याताम्, सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्योपसेचनम् इवौद-
नस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्तं प्राकृतबुद्धियथोक्तसाधनरहितः सन् क इत्था इत्थमेवं
यथोक्तसाधनवानिवेत्यर्थः, वेद विजानाति यत्र स आत्मेति ॥ २५ ॥
इति-प्रथमा ध्याये द्वितीय वल्ली भाष्यं समाप्तम् ॥ २॥
तृतीया वल्ली । पौर्वापर्य०-द्वितीय वल्ली में विद्या और अविद्या का कथन किया गया किन्तु उनका फलसहित यथावत् निर्णय नही किया गया था । तदर्थ रथ पक की कल्पना के साथ प्रस्तुत तृतीय वल्ली का प्रारम्भ किया जा रहा है । रथ-रूपक मे अन्य सब बातो के अतिरिक्त रथी और उसके गन्तव्य की बात अवश्य ही कथित होनी चाहिये । क्योकि रथ, घोड़े, सारथी, लगाम, रथ-मार्ग आदि अन्य सब तो रथी की गन्तव्य-पर्यन्त यात्रा के अङ्ग या साधन होने से गौण होते हैं और रथी तथा उसका गन्तव्य ही प्रधान होता है । अत. प्रथम मन्त्र मे रथी या गन्ता और गन्तव्य रूप से दो प्रकार के आत्माओ, जीवात्मा तथा परमात्मा का उपन्यास किया जा रहा है । यह उपन्यास साधना की दृष्टि है, वस्तुतः तो तत्त्व एक ही है । अतः व्यावहारिक भेद को लेकर ही साधक एवं साध्य अथवा गन्ता एव गन्तव्य की बात सार्थक है, परमार्थ-दृष्टि से तो इसे निरर्थक ही कहना होगा । व्यावहारिक वस्तु-स्थिति को लेकर ही श्रुति-स्मृति मे साधक-साध्य रूप से द्वत का कथन किया गया है । उसी न्याय से यहां भी प्रथम मन्त्र मे द्विविध आत्मा का वर्णन प्रस्तुत किया जा रहा है- - ऋत पिबन्तो सुकृतस्य लोके गुहा प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेता ॥१॥ अन्वय-ये ब्रह्मविद पञ्चाग्नय. त्रिणाचिकेता' च (ते) सुकृतस्य ऋत पिवन्तौ लोके गुहा परमे परार्धे प्रविष्टौ छायातयो वदन्ति । मर्थ-ब्रह्मवेत्ता एवं नाचिकेत अग्नि का तीन बार चयन करने वाले पञ्चाग्नि के उपासक (गृहस्थ), दोनो ही कहते हैं कि इस शरीर मे बुद्धि रूपी गुहा के भीतर प्रकृष्ट ब्रह्म-स्थान में प्रविष्ट होकर स्वकृत कर्म का फल भोगने वाले छाया और धूप (के समान क्रमश मलिन एव शुभ्र) दो तत्त्व हैं ।
प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्लो | ६३ - विशेष-(i) गुहां प्रविष्टौ-बुद्धि या हृदय रूपी गुहा में प्रविष्ट । इसके अभिप्राय या तात्सर्य के लिये १-२-११ का 'विशेष' द्रष्टव्य है । 'विश्' का कर्म होने से गुहा शब्द में द्वितोया प्रयुक्त हुई है । संस्कृत में विश् पातु सकर्मक है जैसे, चौरो गृहं प्रविष्टः । परार्धे-परस्य (ब्रह्मणः) अर्थ (स्थानम्) परात्रम् (प० तत्पु०), तस्मिन् । हार्दाकाश या हृदय-रन्ध्र में चित्त एकान करने से आत्मसाक्षात्कार होता है, यह ऋषि-मुनियों का स्वानुभव है, इसी कारण से उसे 'पराध' अर्थात् ब्रह्म-स्यान कहते हैं । यह विषय पीछे १.२-१२ के 'गह वरेष्ठम्' शब्द के पापान में सविस्तर स्पष्ट किया जा चुका है । (ii) ऋतम् -कर्म फल । इसकी सत्यता या अनिवार्यता के कारण ही यह शब्द नैतिक व्यवस्था तथा सत्य का बोधक हो गया। सुकृतस्य सुन्दरं शोभनं वा कृतम् सुकृतम् (प्रादितत्पु०) पुण्यमित्यर्थः, तस्य । 'सुकृत' दुष्कृत का भी उपलमग होने में प्रस्तुत स्थल में कर्म मात्र का बोधक है । पिबन्नौ-/पा+शत, पुं० प्र० द्विवचन । इसका तात्पर्य है, भोगते हुये । यद्यपि कर्मफल तो जीवात्मा हो भोगता है, इसी से उसे छायावत् मलिन रूप कहा गया है, और परमात्मा या ईश्वर' तो कर्म, कर्माशय, विपाकादि से रहित होने के कारण आतर अर्थात् धूम के समान शुभ्र रूप कहा गया है, तथापि छत्रि--न्याय से मुख-दुखादि भोगने वाले अनन्त जीवों के साथ अन्तर्यामी या साक्षी रूप से उपस्थित होने के कारण उसे भी भोक्ता कह दिया गया है। जैसे अनेक मनुष्यों के समुदाय में किसी एक के पास बाता होने से पूरे समुदाय को 'छत्री'-छत्त वाले-नाम से बोध कराया जाता है, उसी प्रकार यहाँ भी समझना चाहिये । लोके-/लोक +घञ् अधिकरणे,लोक्यन्ते सामाक्रियन्ते कर्मफनान्यस्मिन्निति लोकः शरीरम्, तस्मिन् । 'अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजात्र माम् ।' (गोता ६.३३) में भी 'लोक' का अर्थ शरीर ही है । न्यायशास्त्र में भी इसी दृष्टि से शरीर को 'अर्थाश्रयः' अर्थात् भोगायतन कहा गया है। ब्रह्मविद -ब्रह्मन् +/विद्+क्विप् कर्तरि, पुं प्र० बहु० । इसका अर्थ है ब्रह्मज्ञानी अर्थात् ज्ञानमार्गी कर्मसंन्यासी। पञ्चाग्नयः---पञ्च अग्नयः ( गार्हपत्यदक्षिणाहवनीयसभ्यावसथाः, धु नोकपर्जन्यपृथ्वी पुरुष- योषाः-बृहदा० ) उपास्या येषां ते ( बहुव्रीहि०) । यह शब्द कर्ममार्गी गृहस्थों के लिये प्रयुक्त है । इन्हीं के लिये 'त्रिगाचिकेताः' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है। इसकी विशेष व्याख्या १-१-१७ मन्त्र के विशेष में द्रष्टव्य है। छायातपौ--छाया च आतपश्चेति (इतरेतर द्वन्द्व०) । इसका भाव मुण्डकोपनिषद् ३-१ मन्त्र में भी आया १, क्लेशकर्मविपाकाशयरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वर:-योगसूत्र १-२४ अथवा ६४ / कठोपनिषद् है जो इस प्रकार है.--"द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वावत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति" ॥ इसका तात्पर्य यह है कि दो सखा पक्षी एक वृक्ष पर बैठे हैं। उनमें से एक तो वृक्ष के फल को स्वाद पूर्वक खा रहा है, भोग रहा है। किन्तु दूसरा तो न खाता हुआ अर्थात् फलभोग से रहित रहता हुआ सर्वत्र चमकता है, प्रकाशित होता है । भाष्यकार शङ्कराचार्य ने 'अभिचाकशीति' पद का अर्थ किया है 'चारों ओर देखता रहता है अर्थात् साक्षी या द्रष्टा मात्र है, भोक्ता नहीं। - शा० भा० ऋतं पिबन्तावित्यस्या वल्ल्याः सम्बन्धः-विद्याविद्य' नाना- विरुद्धफले इत्युपन्यस्ते न तु सफले ते यथावन्निर्णीते; तन्निर्णयार्था रथरूपककल्पना, तथा च प्रतिपत्तिसौकर्यम् । एवं च प्राप्तृप्राप्यगन्तृगन्तव्यविवेकार्थ द्वावात्मानी उपन्यस्येते- ऋतं सत्यमवश्यम्भावित्वात् ? कर्मफलं पिबन्ती, एकस्तत्र कर्म फलं पिबति भुङ्क्ते नेतरः, तथापि पातृसम्बन्धात्पिबन्तौइत्युच्यते छत्रिन्यायेन । सुकृतस्य स्वयं- कृतस्य कर्मण ऋमिति पूर्वेण सम्बन्धः, लोकेऽस्मिन् शरीरे गुहां गुहायां बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्य पुरुषाकाशसंस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्रह्मणोऽधं स्थानं परार्धम् । तस्मिन्हि परं ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन्परमे परार्धे हार्दाकाशे प्रविष्टावित्यर्थः । तौ चच्छायात- पाविव विलक्षणो संसारित्वासंसारित्वेन ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति, पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः त्रित्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यस्ते त्रिणाचिकेताः ॥१॥ पौर्वापर्य-अब मन्त्र २ में यम दो साधनों, कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्ड, का वर्णन करते हैं: यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत शकेमहि ॥२॥ अन्वय-यः ईजानानां सेतुः, (तं ) नाचिकेतं; यत् तितीर्षताम् अभयं पारं ( तच्च ) अक्षरं परं ब्रह्म ( ज्ञातुं ) शकेमहि । अर्थ-जो यज्ञ करने वालों का सेतु है (अर्थात् दुःख-सागर को पार करने के प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली | ६५ लिये सेतु के समान है), उस नाचिकेत अग्नि को, एवं जो (संसार-सागर को) तैर जाने के इच्छुकों के लिये भय-शून्य किनारा है, उस अविनाशी परब्रह्म को जानने में हम समर्थ हों। विशेष-सेतुः-पुल । नदी, जलाशय या समुद्र के एक पार से दूसरे पार जाने के साधन को सेतु कहते हैं । यहाँ नाचिकेत अग्नि को यज्ञ करने वालों का सेतु कहा है । पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि अग्नि प्रथम शरीरी या विराट् प्रजापति है, इसमें आहुतियां देकर जो यज्ञ का सम्पादन करते है, उन्हें परमेश्वर अपने अग्नि रूप से पृथ्वी से द्यु लोक या स्वर्ग तक पहुँचाता है । इस प्रकार वह यजमानों के लिये पृथ्वी एवं लोक के बीच सेतु बन जाता है। तात्पर्य यह है कि यज्ञ-कर्मी के लिये जो परमात्मा अग्नि रूप से स्वर्ग-प्राप्ति करवाता है, वही ज्ञान-मार्गी के लिये अकुतो. भय परम पद या मोक्ष की प्राप्ति भी करवाता है। इस प्रकार कर्म-मार्गी का आश्रय अपर ब्रह्म है तथा ज्ञान-मार्गी का आश्रय परब्रह्म है । ईजानानाम् -/ यज् + (लिड्थे) कानच्, पुं० १० बहु० । अक्षरम्-क्षरतीति क्षरम् विनाशि । न क्षरम् इति अक्षरम् (नन् तत्पु०)। अभयम्-अविद्यमानं भयं यस्मिन्, तत् (नम् बहुव्रीहि० ) । तितोताम्--Vत+सन् + शत, पुं० १० बहु० । शकेमहि-Vशक् + विधिलिङ्, उ० पु. बहु० । यह रूप वैदिक संस्कृत का है, इसे आर्ष या छान्दस मानना चाहिये। लौकिक संस्कृत मे 'शक्नुयाम' रूप बनता है। शा० भा०-यः संतुरिव सेतुरीजानानां यजमानानां कर्मिणां दुःखसन्त- रणार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्तं वयं ज्ञातुं चेतुं च शकेमहि शक्नुवन्तः। किं च यच्चाभयं भयशून्यं संसारपारं तितीर्षतां तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदां यत्परमाश्रयमक्ष रमात्माख्यं ब्रह्म तच्च ज्ञातुं शकेमहि शक्नुवन्तः । परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये वेदितव्ये इति वाक्यार्थः । एतयोरेव ह्य पन्यासः कृत ऋतं पिबन्ताविति ॥२॥ पौर्वापर्य:-द्वितीय मन्त्र मे कथित अभय परम पद किन साधनों से प्राप्त हो सकता है, इसे तृतीय से अष्टम मन्त्र तक रथ-साक द्वारा यमराज नचिकेता से बता रहे हैं। आत्मान रथिनं विद्धि शरीर रथमेव तु । बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ।।३।। अन्धय-आत्मानं रथिनं विद्धि, शरीरम् एव तु रथम्, बुद्धि तु सारथि विद्धि, मन.एव च प्रग्रहम् ।
६६ | कठोपनिषद् अर्थ-आत्मा को रथी समझो, शरीर को ही रथ (समझो), बुद्धि को सारथि समझो, तथा मन को ही लगाम (समझो)। विशेष-रथ-रूपक की व्याख्या भूमिका में द्रष्टव्य है । रथी-रथ + इनिः (रथः+अस्यास्तीति रथी रथस्वामीत्यर्थः) । बुद्धिम्-बुध्यतेऽनयेति (Vबुध् + क्तिन् करणे) बुद्धिः, ताम्। शा. भा०-तत्र य उपाधिकृतः संसारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्षगमनाय संसारगमनाय च, तस्य तदुभयगमने साधनो रथः कल्प्यते । तत्र तत्रात्मानमृतपं संसारिणं रथिनं रथस्वामिनं विद्धि जानीहि । शरीरं रथमेव तु रथबद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियरा- कृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य । बुद्धि तु अध्यवसायलक्षणां सारथिं विद्धि बुद्धिनेतृप्रधानत्वा. च्छरीरस्य सारथिनेतृप्रधान इव रथः । सर्वं हि देहगतं कार्य बुद्धिकतव्यमेव प्रायेण । मनः संकल्पविकल्पादिलक्षणं प्रग्रहं रशनां विद्धि । मनसा हि प्रगृहीतानि श्रोत्रादीनि करणानि प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वाः ॥ ३ ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुविषयास्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तत्याहुर्मनीषिणः ।।४।। अन्वय-मनीषिणः इन्द्रियाणि हयान् आहुः, तेषु विषयान् गौचरान् (आहुः, आत्मेन्द्रियमनोयुक्त (आत्मानं) भोक्ता इति आहुः। अर्थ-मनीषी इन्द्रियों को घोड़े बतलाते है, उन इन्द्रियों के घोड़े होने पर उनके (शब्द स्पर्शादि) विषयों को उनके मार्ग बतलाते हैं, और शरीर, इन्द्रिय एवं मन से युक्त आत्मा को भोक्ता-जीव-कहते हैं । विशेष-मनीषिणः -मनीषा + इनिः, पुं० प्र० बहु० । गोचरान्- गच्छ- न्तीति गावः (गम् +डो) पशव इत्यर्थः, तेषां चराः-(/चर् + घन) गोचराः, तान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तम्-आत्मा च इन्द्रियाणि च मनश्चेति आत्मेन्द्रियमनांसि (द्वन्द्व) तैर्युक्तः (तृ० तत्पु०), तम् । यह पद तृतीयमन्त्रोक्त 'आत्मानम्' का विशेषण है, उसका यहाँ अध्याहार करना पड़ेगा अर्थ को पूर्ण करने के लिये । भोक्ता- भुज् + तृच् कर्तरि पुं० प्रथमा एक० । यद्यपि आत्मा अपने विशुद्ध वास्तविक रूप में भोक्ता महीं है, तथा शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि इत्यादि भी स्वरूपतः अचेतन होने से पृथक्-पृथक् अथवा संहत रूप में भी विषयों के भोक्ता नहीं हो सकते, तथापि शरीरेन्द्रियादि से उपहित आत्मा अज्ञान-वश उनके कर्मों को अपना समझता हुआ उनके फल के भोग के लिये विवश होकर जन्म लेता है । यहाँ समास-गत 'आत्मा' शब्द शरीर का वाचक है, /अत् गतौ धातु से उगादि मनिण् प्रत्यय लगने पर 'आत्मन्' शब्द निष्पन्न होता है । इसका सामान्य प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली | ६७ । अर्थ गन्ना-चलने वाला होता है । 'शरीर' गतिशील होन से ही 'आत्मा' कहा जाता है । 'अतति गच्छति सर्वत्र व्याप्नोति सर्वम्' इस अर्थ में 'आत्मा' व्यापक, निर्विकार, विशुद्ध चैतन्य रूप प्रसिद्ध अर्थ का वाचक होता है । 'भोक्ता' में शरीर, इन्द्रिय तथा मन के साथ बुद्धि का भी ग्रहण होना चाहिये, जैसा कि अगले मन्त्र से स्पष्ट है । वहाँ 'विज्ञान' शब्द से बुद्धि का ही ग्रहण है। यहाँ 'मन' में ही उसका अन्तर्भाव समझ लेना चाहिये । शा० भा०-इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान् आहू रथकल्पनाकुशलाः शरीर- रथाकर्षणसामान्यात् । तेष्वेव इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेषु गोचरान्मार्गान् रूपादीन् विषयान् विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं शरीरेन्द्रियमनोभिः सहित संयुक्तमात्मानं भोक्तेति संसारीत्याहुर्मनीषिणो विवेकिनः । न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति बुद्ध्याधुपाधि- कृतमेव तस्य भोक्तृत्वम् । तथा च श्रुत्यन्तरं केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्शयति "ध्यायतीव लेलायतीव" (बृह० उप०४-३-७) इत्यादि । एवं च सति वक्ष्यमाणरथकल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यते नान्यथा स्वभावानतिक्रमात् ॥ ४॥ यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथः ।।५।। अन्वय -यस्तु सदा अविज्ञानवान् अयुक्तेन मनसा भवति, तस्य इन्द्रियाणि सारथे: दुष्टाश्वा इव अवश्यानि (भवन्ति । अर्थ-जो (बुद्धि-सारथी) सदा अविवेकी एवं असमाहित मन से युक्त रहता है, उसके वश में इन्द्रियां उसी प्रकार नहीं रहती जैसे इतर सारथी के वश में दुष्ट घोड़े। विशेष-य:-यह सर्वनाम बुद्धि-सारथी के लिये आया है। अविज्ञानवान्- विज्ञानं विवेकः तद्वान् (विज्ञान+मतुप्) विवेकीत्यर्थः, न विज्ञानवान् इत्यविज्ञानवान् अविवेकी । भाष्यकार शङ्कराचार्य ने अविवेकी एवं अनिपुण-इन दो शब्दों के द्वारा इस शब्द का अर्थ प्रकट किया है । युक्तन - युज समाधौ+क्त, तृ० एक०, एकाग्रेण समाहितेनेत्यर्थः । मनसा-'इत्थम्भूत-लक्षणे' सूत्र से तृतीया विभक्ति हुई है। 'मनसा उपलक्षितः युक्तः' यह अर्थ शा० भा०-तत्रैवं सति यस्तु बुद्ध्याख्यः सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽविवेकी प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च भवति यथेतरो रथचर्यायामयुक्तेन अप्रगृहीतेनापमाहितेन मनसा प्रग्रहस्थानीयेन सदा युक्तो भवति, तस्याकुशलस्य वुद्धिसारथेः इन्द्रियाण्य- श्वस्थानीयान्यवश्यानि अशक्यनिधारणानि दुष्टाश्वा अदान्ताश्वा इतरसारथे- भवन्ति ॥ ५ ॥ हुआ।
६८ | कोपनिषद् यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥६॥ अन्वय-यः तु सदा विज्ञानवान् युक्तेन मनसा भवति, तस्य इन्द्रियाणि सारथः सदश्वा इव वश्यानि (भवन्ति। अर्थ-किन्तु जो ( बुद्धि-सारथी ) सदा विवेकी एवं समाहित । एकाग्न), मन से युक्त रहता है, उसके वश में इन्द्रियों उसी प्रकार रहती हैं जैसे इतर सारथी के वश में अच्छे घोड़े। विशेष-सदश्वा:- सन्तः अश्वा इति ( सत् = / अस्+शतृ + अश्वाः) विशेषणपूर्वपदकर्मधारय । शा० भाoयस्तु पुनः पूर्वोक्तविपरीतः सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्रगृहीतमनाः समाहितचित्तः सदा, तस्याश्वस्थानीयानीन्द्रियाणि प्रवर्तयितुं निवर्तयितुं वा शक्यानि "वश्यानि दान्ताः सदश्वा इवतरसारथः॥ ६ ॥ यस्त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः । न स तत्पदमाप्नोति स सारं चाधिगच्छति ॥७॥ अन्वय-यः तु सदा अविज्ञानवान् अमनस्कः अशुचिः (च) भवति, स तत् पदं न आप्नोति, संसारं च अधिगच्छति । । अर्थ-जो सदा विवेक-रहित, अयुक्त या असावधान मन वाला तथा अपवित्र रहता है, वह उस परम पद को नहीं प्राप्त करता अपितु संसार-आवागमन या जन्म-मृत्यु-परम्परा-को प्राप्त करता है। विशेष-अमनस्क:-अविद्यमानं मनो यस्य सः ( नम् बहुव्रीहि ), समासान्त कप् प्रत्यय । अशुचिः-न शुचिः (नञ् तत्पु०) । संसारम् -सम् - + घन् भावे, पुं० द्वि० एका पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो बुद्धिसारथेरिदं फलमाह - यस्त्वविज्ञानवान्भवति अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्कः सः तत एवाशुचिः सदैव, न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षरं यत्परं पदम् आप्नोति तेन सारथिना । केवल कैवल्यं नाप्नोति संसारं च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति ॥ ७ ॥ यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥८॥ अन्वय-यः तु सदा विज्ञानवान् समनस्कः, शुचिः (च) भवति, स तु तत् पदम् आप्नोति यस्माद् भूयः न जायते । अर्थ-जो सदा विवेक-युक्त, युक्त या सावधान मन वाला तथा पवित्र शा० भा०-तस्य प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली | ६६ - रहता है, वह उस परम पद को प्राप्त करता है जहाँ से फिर नहीं उत्पन्न होता है। विशेष-समनस्क:-मनसा सहेति समनस्कः (सह→स+मनस्+कप प्रत्यय समासान्त) बहुव्रीहि समास । शा० भा०-यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान् इत्येतत् युक्तमनाः समनस्कः स तत एव सदा शुचिः, स तु तत्पदमाप्नोति, यस्मादार प्तात्पदाद् अप्रच्युतः सन् भूयः पुनर्न जायते संसारे ॥८॥ पौर्वापर्य०-नवम मन्त्र में पूर्वोक्त रथ-रूपक का उपसंहार करते हुये विवेकी पुरुष के परमपद-प्राप्ति-विषयक तथ्य को पुनः स्पष्ट करते हुये यमराज नचिकेता से कहते हैं :- विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परम पदम् ॥६॥ अन्वय-यः नरः तु विज्ञानसारथिः मनःप्रग्रहवान् (अस्ति) सः अध्वनः पार्स विष्णोः तद् परमं तद् परमं पदम् आप्नोति । अर्थ--जो विवेकयुक्त बुद्धिरूपी सारथि से युक्त और मनरूपी लगाम इन्द्रिय रूपी घोड़ों) को वश में रखने वाला होता है, वह मनुष्य ससार-मार्ग के पार में स्थित परमात्मा के उस परम पद को प्राप्त कर लेता है। विशेष-(i) तीसरे मन्त्र से नवे मन्त्र तक जिस रथ के रूपक की कल्पना की गयी है, उससे यह बात पूर्णतया स्पष्ट हो गई है कि यह अनित्य तथापि अतिक दुर्लभ मानव-शरीर जिस जीवात्मा को अपने शुभ कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त हो गया है, उसे अपना सौभाग्य समझकर अपने जीवन को मानव-जीवन की लक्ष्य-पूर्ति के निमित्त लगा देना चाहिए। भगवान् श्रीकृष्ण ने भी गीता में अर्जुन से इसी बात को स्पष्ट करते हुये कहा है-"अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ।" अपने जीवन के इस अमूल्य समय को यदि पशुओं की तरह सांसारिक भोगों को भोगने में ही नष्ट कर दिया गया तो उसका परिणाम यह होगा कि उस व्यक्ति को संसार के आवागमन अथवा जन्म-मृत्यु के चक्र में ही घूमते रहना पड़ेगा । और इस भौति मानव-जीवन के लक्ष्य अथवा उद्देश्य की पूर्ति वह कभी भी न कर सकेगा। अतः मनुष्य का यह कतव्य है कि वह अपनी बुद्धि का सदुपयोग करे, सांसारिक विषय-भोग से जनित क्षणिक सुखों को वास्तविक दुःखरूपता को समझकर उनसे उदासीन हो जाय तथा केवल शरीर-निर्वाह के लिये अपेक्षित कर्मों को निष्काम भाव से करता हुआ परमात्मा में अनिश तल्लीन या अनुरक्त रहे और इस प्रकार ब्रह्म ७० | कठोपनिषद् का साक्षात्कार करके उस परम पद को प्राप्त कर ले जहाँ से लौटकर फिर इस संसार- चक्र या जीवन एवं मृत्यु के बन्धन में न पड़ना पड़े। (ii) विज्ञानसारथि:--विज्ञानयुक्तः सारथिरिति (शाकपार्थिवादिसमासः)। मनःप्रग्रहवान्--मन एव प्रग्रह इति मनःप्रग्रहः (अवधारणपूर्वपदकर्मधा०), तद्वान (मनःप्रत्रह+मतुप्, पुं० प्र० एक०) । अध्वनः -अध्वन् +ङस् (षष्ठी एक०) संसार मार्गस्येत्यर्थः। तत्-प्रसिद्धम् इत्यर्थः । शा० भा०-कि तत्पदमित्याह विज्ञानसारपिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथिः पूर्वोक्तो मनः प्रग्रहवान् प्रगृहीतमनाः समाहितचित्तः सञ्शुचिर्नरो विद्वान् सोऽध्वनः संसारगतेः पारं परमेव अधिगन्तव्यमित्येतदाप्नोति मुच्यते सर्वसंसारबन्धनैः तद्विष्णोः व्यापनशीलस्य ब्रह्मणः परमात्मनो वासुदेवास्यस्य परमं प्रकृष्टं पदं स्थानं सतत्त्वमित्येत- घदसौं आप्नोति विद्वान् ।। ६ ।। पौर्वापर्य०-अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि बलवान् इन्द्रिय-समूह को उनके प्रिय तथा अभ्यस्त असत्-मार्ग से कैसे हटाया जाय । अगले चार मन्त्रों में इस विषय का तात्त्विक विवेचन करते हुए इन्द्रियों को असत्-मार्ग से हटाकर भगवान् की ओर लगाने के प्रकार का वर्णन करते हैं- इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धरात्मा महान्परः ॥१०॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥११॥ अन्वय-इन्द्रियेभ्यः हि अर्थाः पराः, अर्थेभ्यः च मनः परम्, मनसः तु बुद्धिः परा, बुधैः महान् आत्मा परः ।।१०।। महतः अव्यक्तं परम्, अव्यक्तात् पुरुषः परः, पुरुषात् न किञ्चित् परम्, सा काष्ठा, सा परा गतिः। अर्थ-इन्द्रियों से उनके शब्द-रूप-रसादि विषय सूक्ष्म या श्रेष्ठ हैं, विषयों से मन सूक्ष्म या श्रेष्ठ है, मन से बुद्धि सूक्ष्म या श्रेष्ठ है, बुद्धि से महान् आत्मा अर्थात् हिरण्यगर्भ सूक्ष्म या श्रेष्ठ है ॥१०॥ हिरण्यगर्भ से अव्यक्त सूक्ष्म या श्रेष्ठ है, अव्यक्त से पुरुष सूक्ष्म या श्रेष्ठ है, पुरुष से सूक्ष्म या श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है । वही (सूक्ष्मता की) चरम सीमा है, वही अन्तिम गति-गन्तव्य है। विशेष--(i) इन्द्रियों से उनके विषयों को इसलिये श्रेष्ठ कहा है क्योंकि वे उन्हें अपनी ओर खींच लेते है-विषिण्वन्ति बध्नन्ति स्वेन रूपेण निरूपणीयं कुर्वन्तीति विषयाः (सा० का० ५ मे स्थित 'प्रतिविषय' शब्द की वाचस्पतिमिश्र-कृत - प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली| ७१ - तत्त्वकौमुदी) । इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय के सम्पर्क में आकर तद्रूप--उनके रूप से निरूपित-हो जाती हैं। (ii) महान् आत्मा-समष्टि बुद्धि का अभिमानी देवता हिरण्यगर्भ है । वह सभी व्यष्टि-वैयक्तिक-बुद्धियों का नियामक या स्वामी होने से उनकी अपेक्षा श्रेष्ठ कहा गया है । समष्टि बुद्धि का स्वामी होने से ही वह 'महान्' कहा जाता है । (iii) अव्यक्त-हिरण्यगर्भ से पूर्व की स्थिति है, जैसा कि भाष्यकार शंकर ने स्पष्ट किया है- "महतोऽपि परं सूक्ष्मतरं प्रत्यगात्मभूतं सर्वमहत्तरं चाव्यक्तं सर्वस्य जगतो बीजभूतम् अव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्वकार्यकारण-शक्तिसमाहार- रूपम् अव्यक्ताव्याकृताकाशादिनामवाच्यं परमात्मनि ओतप्रोतभावेन समाश्रितं वटकणिकायामिव वटवृक्षक्तिः ।" पुरुष समस्त कारणो का भी कारण-भूत, सभी का प्रत्यगात्म-स्वरूप, सभी को पूरित करने के कारण 'पुरुष' इस नाम से जाना जाता है । इसी को पुरुष-सूक्त में 'पुरुष एवंद सर्व यद् भूतं यच्च भव्यम्' इत्यादि रूप से वर्णित किया गया है। अव्यक्त इस पुरुष एवं हिरण्यगर्भ के बीच की अवस्था है । सांख्यानुयायो 'अव्यक्त' से प्रकृति का ग्रहण करते हैं । (iv) इन्द्रियम् - इन्द्र+घ प्रत्यय (इय)। इन्द्र अर्थात् आत्मा के लिये होने से श्रवणादि की 'इन्द्रिय' संज्ञा है। इन्द्रियों जड़ हैं, इनका उपयोग करने वाला कोई चेतन कर्ता होना चाहिये जैसे बसूले आदि का उपयोग करने वाला तक्षा या बढ़ई । इस प्रकार इन्द्रियाँ चेतन आत्मा के अनुमान मे लिङ्ग बनतो हैं-इसीलिये वाचस्पति मिश्र ने अपनी सांख्यतत्त्वकौमुदी में 'इन्द्रलिङ्गत्वमिन्द्रियत्वम्' कहा है । यद्यपि बुद्धि के भी उसी तरह आत्मलिङ्ग होने से उसके भी इन्द्रिय होने का प्रसङ्ग उठेगा, तथापि 'इन्द्रिय' शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से ऐसा कहा गया है । परिष्कृत लक्षण तो वही होगा जिससे श्रवणादि दश बाह्य तथा मन नामक आन्तरिक इन्द्रिय का ग्रहण हो, इन्द्रियेतर बुद्धि का ग्रहण न हो। इस दृष्टि से वाचस्पति ने 'सात्त्विका- हजारोपादानकत्वमिन्द्रियत्वम्' कहा है । अर्थात् जो सात्विक अहङ्कार से उत्पन्न हो जिसको उत्पत्ति में सात्त्विक अहङ्कार उपादान कारण हो, वह इन्द्रिय है। चूंकि सांख्य में सात्तिक अहङ्कार से केवल ग्यारह इन्द्रियाँ ही उत्पन्न होती है, बुद्धि नहीं, अतः यह इन्द्रिय-मात्र का लक्षण हुआ। शा भा०.-अधुना यत्पदं गन्तव्यं तस्य इन्द्रियाणि स्थूलान्यारभ्य सूक्ष्मता- रतम्यक्रमेण प्रत्यगास्मतया अधिगमः कर्तव्य इत्येवमर्थमिदम् आरभ्यते- स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यदर्थं रामप्रकाशनाय आरब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्यः स्वकार्येभ्यस्ते पूरा ह्यीः मूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च । तेभ्योऽयर्थेभ्यश्च पर सूक्ष्मतरं महत्प्रत्यगात्मभूतं च मनः । मनःशब्दवाच्यं ७२ | कठोपनिषद् मनसः आरम्भकं भूतसूक्ष्म संकल्पविकल्पाद्यारम्भकत्वात् । मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा महत्तरा प्रत्यगात्मभूत्रा च बुद्धिः, बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भकं भूतसूक्ष्मम् । बुद्धरात्मा सर्वप्राणिबुद्धीनां प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्सर्वमहत्त्वात् । अव्यक्ता- द्यत्प्रथमं जातं हैरण्यगर्भ तत्त्वं बोधाबोधात्मकं महानात्मा बुद्ध: पर इत्युच्यते ।। १० ।। महतोऽपि परं सूक्ष्मतरं प्रत्यगात्मभूतं सर्वमहत्तरं च अव्यक्तं सर्वस्य जगतो बीजभूतम् अव्याकृतनामरूपसतत्त्वं सर्वकार्यकारणशक्तिसमाहाररूपम् अव्यक्ताव्याकृताकाशादिनाम- वाच्यं परमात्मन्योतप्रोतभावेन समाश्रितं वटकणिकायामिव वटवृक्षशक्तिः । तस्मादब्यक्तात्परः सूक्ष्मतरः सर्वकारणकारणत्वात् प्रत्यगात्मत्वाच्च महाश्च, अन एव पुरुषः सर्वपूरणात् । ततोऽन्यस्य परस्य प्रसङ्ग निवारयन्नाह-पुरुषान्न परं किंचिदिति । यस्मान्नास्ति पुरुषात् चिन्मात्रधनात् परं किचिदपि वस्त्वन्तरं तस्मात् सूक्ष्मत्वमहत्त्वप्रत्यगात्मत्वानां सा काष्ठा निष्ठा पर्यवसानम् । अत्र हीन्द्रियेभ्य आरभ्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्तिः । अतएव च गन्तृणां सर्व. गतिमतां संसारिणां परा प्रकृष्टा गति: “यद्गत्वा न निवर्तन्ते" (गीता ८।२१; १५।६) इति स्मृतेः ॥ ११ ॥ एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्र यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥१२॥ अन्वय-सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा एषः न प्रकाशतेः, सूक्ष्मदर्शिभिः तु अन्यया सूक्ष्मया बुद्ध्या दृश्यते । अर्थ-सभी प्राणियों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित नहीं होता (अपितु) सूक्ष्मदर्शी (विद्वानों) द्वारा कुशाग्र और सूक्ष्म बुद्धि से ही देखा जाता है । विशेष-(1) जीवात्मा प्राणी के हृदय में निवास करता है । परमात्मा भी सर्वव्यापक होने के कारण प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता है । सांसारिक विषयों में लिप्त रहने के कारण जीवात्मा परमात्मा को पहचान नहीं पाता। जीवात्मा अपनी स्थूल बुद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता । सूक्ष्मदर्शी जीवात्मा अपनी तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है । सांसारिक विषयों का परित्याग करके अध्यात्म-योग साधने से बुद्धि तीक्ष्ण और सूक्ष्म हो सकती है। (1) गूढोत्मा-यह वैदिक या आर्ष प्रयोग है, पाणिनि मत से ठीक रुप नहीं है। पाणिनि-कृत व्याकरण से 'गूढः आस्मा' का सन्धि-कृत रूप 'गूढ आत्मा' होगा। विसर्ग का लोप हो जायगा, फिर सवर्ण दीर्घ सन्धि (गूढात्मा) नहीं होगी।
प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली | ७३ हो, समास करने पर गूढश्चासौ आत्मा चेति" इस अर्थ में 'गूढात्मा' बनेगा। अन यया-- अग्रमिव इति अग्न या (तीक्षणेत्यर्थः) = अग्र+यत् +टाप् स्त्रियाम्, तया। शा०भा०-ननु गतिश्चेदागत्यापि भवितव्यम् । कथं यस्माद्भूयो न जायत इति? नैष दोषः, सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्युपचर्यते । प्रत्यगात्मत्वं च दर्शितमिन्द्रियमनोबुद्धिपरत्वेन । यो हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यन पं गच्छत्यनात्मभूतं न विपर्ययेण । तथा च श्रुतिः-"अनध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः' इत्याद्या । तथा च दर्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य-एष पुरुषः सर्वेषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढः संवृतो दर्शनश्रवणादिकर्माविद्यामायाच्छन्नोऽत एवात्मा न प्रकाशते आत्मत्वेन कस्यचित् । अहो अतिगम्भीरा दुरवगाह्या विचित्रा माया चेयं यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थतः परमार्थसतत्त्वोऽप्येवं बोध्यमानोऽहं परमात्मेति न गृह्णात्यनात्मानं देहेन्द्रियादिसङ्घात- मात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहममुष्य पुत्र इत्यनुच्यमानोऽपि गृह्णाति । ननं परस्यैव मायया मोमुह्यमानः सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा च स्मरणम्-"नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः" (गीता ७।२५) इत्यादि । ननु विरुद्धमिदमुच्यते "मत्वा धीरो न शोचति" (कठो० २।१।४) "न प्रकाशते" (कठो० १।३।१२) इति च । नैतदेवम् । असंस्कृतबुद्ध रविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् । दृश्यते तु संस्कृतया अग्र यया अग्नमिव अन या तया, एकाग्रतयोपे- तयेत्येनत्. सूक्ष्मया सूक्ष्मवस्तुनिरूपणपरया, कैः ? सूक्ष्मदर्शिभिः "इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः" इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्य दर्शनेन परं सूक्ष्मं द्रष्टु शीलं येषां ते सूक्ष्मदर्शिनस्तैः सूक्ष्मदर्शिभिः पण्डितैरित्येतत् ॥ १२ ॥ यच्छेद्वाङ मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ।।१३ । अन्वय-प्राज्ञः वाक् मनसी यच्छेत् । तत् ज्ञाने आत्मनि यच्छेत् । ज्ञान महति आत्मनि नियच्छेत् । तत् शान्ते अात्मनि यच्छेत् । अर्थ-विवेकी पुरुष वाक (आदि) इन्द्रियों का मन में उपमंहार करे, उसको प्रकाश-स्वरूप बुद्धि में नियन्त्रित या लीन करे, बुद्धि को (सब ओर से रोककर) हिरण्यगर्भ में लगावे, और हिरण्यगर्भ को शान्त -निविशेष-निष्कल-ब्रह्म में लीन करे। विशेष-(i) इस मन्त्र का तात्पर्य यह है कि विवेकी साधक पूर्वोक्त क्रम .
७४ | कठोपनिषद् से स्थूल का सूक्ष्म में लय करते-करते अन्ततः सूक्ष्मतम निविशेष एवं समस्त-प्रत्यय- साक्षिभूत मुख्य आत्मा तक पहुंच जाता है । यही समस्त जीवन-यात्रा का अन्तिम गन्तव्य' है, यह पहले मन्त्र ६, फिर मन्त्र ११ में यम नचिकेता से कह चुके हैं । अतः स्वरूपभूत मुख्य आत्मा की प्राप्ति हो जाने पर कोई पुरुषार्थ या प्राप्तव्य प्राप्त किये जाने को शेष नहीं रह जाता। इस प्रकार स्वरूप-प्राप्ति-जो स्वरूप के दर्शन या साक्षात्कार से अभिन्न है ही एकमात्र कृतकृत्य या मुक्त होने का उपाय होने से सर्वथा संसाध्य' है । इसी लिये अग्रिम मन्त्र में एतदर्थ ज्ञानी पुरुषों के पास जाने के लिये श्रुति साधक का उद्बोधन करती है । (ii) प्राज्ञः-प्रकर्षण जानातीति प्रज्ञः (प्र+/ज्ञा+क प्रत्यय कर्तरि) प्रज्ञ एव प्राज्ञः (प्रज्ञ+ अण् स्वार्थे)। वाक्-द्वितीया-एकवचनान्त रूप 'वाचम्' के लिये प्रथमा एकवचन का रूप छान्दस विभक्ति-व्यत्यय से प्रयुक्त हुआ है। यह शब्द वाक्-सहित समस्त दसों बाह्य इन्द्रियों का उपलक्षण है । मनसी- यह छान्दस दैर्ध्य का उदाहरण है । 'मनसि' ऐसा ह्रस्व इकारान्त प्रयोग होना था । ज्ञाने आत्मनि, महति आत्मनि, शान्ते आत्मनि-ज्ञानात्मा बुद्धि है, महानात्मा प्रथम शरीरी हिरण्यगर्भ है, एवं शान्त आत्मा सर्व-विशेष-रहित कार्य-कारणादि समस्त विक्रियाओं से शून्य तथा सर्व-प्रत्यय साक्षी मुख्य आत्मा है । यही ब्रह्म है । . शा०भा०- तत्प्रतिपत्त्युपायमाह--यच्छेन्नियच्छेदपसंहरेत्प्राज्ञो विवेकी, किम् ? वाग्वाचम् । वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रियाणाम् । क्व ? मनसी। मनसीति च्छान्दसं दैर्घ्यम् । तच्च मनो यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे बुद्धौ आत्मनि । बुद्धिर्हि मनआदिकर- णान्याप्नोतीत्यात्मा प्रत्यक् तेषाम् । ज्ञानं बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत् । प्रथमजवत् स्वच्छस्वभावकमात्मनो विज्ञानम् आपादयेदित्यर्थः । तं च महान्तम् आत्मानं यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमितरूपेऽवित्रिये सर्वान्तरे सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य आत्मनि ॥ १५ ॥ पौर्वापर्य-जो साधना विवेकी साधक के लिये १३वे मन्त्र में यम ने बताई उसका अन्त या पूर्णत्व आत्म-साक्षात्कार, आत्म-दर्शन या आत्म-ज्ञान में ही होता है, और आत्मा के सूक्ष्मतम तत्त्व होने से उसका ज्ञान भी बड़ा ही दुष्कर है, इसी से यम १४३ मन्त्र में आत्म-ज्ञान के मार्ग को क्षुरे की तेज धार की तरह दुर्गम बताते हुये प्राप्त ज्ञान (कृतकृत्य) श्रेष्ठ पुरुषों की शरण लेने की शिक्षा नचिकेता को, और उसके द्वार से समस्त श्रेयस्काम मानव को देते हुये कहते हैं- प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली | ७५ उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥१४॥ अन्वय-उत्तिष्ठत जाग्रत वरान् प्राप्य निबोधत । कवयः क्षुरस्य निशिता दुरत्यया धारा (इव) तत् पथः दुर्ग वदन्ति । अर्थ-उठो, जागो, श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो। तत्त्वज्ञानी लोग छुरे की तेज की गई दुस्तर धार (की तरह) उस (ज्ञान-) मार्ग को दुर्गम बतलाते हैं। - विशेष-उत्तिष्ठत-उठो अर्थात् आत्मज्ञान की ओर उन्मुख होओ। उद् स्था+लोट (उ० पु० ब०)। जानत-जागो अर्थात् अज्ञान-निद्रा को त्यागकर ज्ञान प्राप्त करने के लिए उद्यत हो जाओ। वरान्-श्रेष्ठों अर्थात् श्रेष्ठ आचार्यो को। प्राप्य-पाकर । प्र/ आप् + क्त्वा-ल्यप् । निबोधत-(परमात्मा को) जान लो। नि/ बुध् + लोट् (म० पु० ब०)। कवयः-कान्त द्रष्टा, ज्ञानी या मेघावी जन । निशिता-नि+ शो तनूकरणे + क्त+टाप् (तीक्ष्ण) । दुरत्यया- दुस्तर, कठिन । दुर्गम्-दुर्गम । दुर् / गम् +ड । यह 'पथः' का विशेषण है । यद्यपि 'पथः' पुं० द्वितीया बहुवचनान रूप है, अतएव 'तत्' और 'दुर्गम्' के स्थान में 'तान्' और 'दुर्गान्' पद प्रयुक्त होने चाहिए तो भी छान्दसत्वात् लिंग और वचन का व्यत्यय मान कर 'पथः' को 'तत्' और 'दुर्गम्' के साथ अन्वित करना होगा । वस्तुतः 'पथः' के स्थान में 'पन्थानम्' (पुं० द्वि० एक) प्रयुक्त होना था। उस स्थिति में 'तं पन्थानं दुर्ग वदन्ति कवयः' यह वाक्य बनता जो पाणिनि-व्याकरण के नियम से शुद्ध होता। स्वस्थः शा०भा०-एवं पुरुष आत्मनि सर्व प्रविलाप्य नामरूपकर्मत्रयं यस्मिथ्याज्ञान- विजृम्भितं क्रियाकारकफललक्षणं स्वात्मयाथात्म्यज्ञानेन मरीच्युदकरज्जुसर्पगगन- मलानीव मरीचिरज्जुगगनस्वरूपदर्शनेनैव प्रशान्तात्मा कृतकृत्यो भवति यतोऽनदर्शनार्थम् -अनाविधाप्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव आत्मज्ञानाभिमुखा भवत, जाग्रताज्ञाननिद्राया घोररूपायाः तिर्थदीजभूताः: क्षयं कुरुत । कथम् ! प्राप्योपगम्य वरान् प्रष्टानाचार्यास्तद्विदस्तदुपदिष्ट सर्वान्तरमात्मानमहमस्मीति निबोधतावगच्छत । न ह्य पेक्षितव्यमिति श्रु तिरनुक्रम्पयाह मातृवत् । अतिसूक्ष्मबुद्धि- विषयत्वाज्ज्ञ यस्य । किमिव सूक्ष्मबुद्धिः इत्युच्यते; क्षुरस्य धारा निशिता तीक्ष्णीकृता ७६ | कठोपनिषद् तथारसं दुरत्यया दुःखेनात्ययो यस्याः सा दुरत्यया । यथा सा पद्भ्यां दुर्गमनीया तथा दुर्ग दुःसम्पाद्यमित्येतत् पथः पन्थानं तत्त्वज्ञानलक्षणं मार्ग कवयो मेधाविनो वदन्ति । शेयस्यातिसूक्षमत्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य दुःसम्पाद्यत्वं वदन्तीत्यभिप्रायः ।। १४॥ पौर्वापर्य-जिस आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिये १४३ मन्त्र के द्वारा यम ने नचिकेता एवं उसके द्वार से श्रेयस्काम मानव-मात्र का उद्बोधन किया, संसार-चक्र या जन्ममरण-परम्परा से नित्य मुक्ति का साधन होने से उसी की परम पुरुषार्थता १५वें मन्त्र में यमराज बता रहे है अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥१५॥ अन्वय-यत् अशब्दम् अस्पर्शम् अरूपम् अव्ययम् अरसं नित्यम् अगन्धवत् अनादि अनन्तं महतः परं तथा ध्र वं च, तत् निचाय्य मृत्युमुखात् प्रमुच्यते । अर्थ-जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध से रहित (अछूना) है, अव्यय अर्थात् अविनाशी तथा नित्य है, अनादि तथा 'अनन्त है, महत् अर्थात् बुद्धि-तत्व से भी पर और ध्र व अर्थात् कूटस्थ (निश्चल) है, उस आत्म-तत्त्व को जानकर (साधक) मृत्यु के मुख से छूट जाता है। विशेष-अशब्दम् -अविद्यमानः शब्दः यस्मिन् (बहुव्रीहि०) । इसी प्रकार अपर्शम् इत्यादि का भी विग्रह जानना चाहिये । अगन्धवत्-न गन्धवत् (गन्ध+ मतुप) इति, नञ्तत्पु० । निचाय्य -नि+/चिन् +णिच् + ल्यप्)। शा०भा०-तत्कथमतिसूक्ष्मत्वं ज्ञेयस्य इत्युच्यते; स्थूला तावदियं मेदिनी शब्दस्पर्शरूपरसगन्धोपचिता सर्वेन्द्रियविषयभूता तथा शरीरम् । तत्र कैकगुणापकर्षण गन्धादीनां सूक्ष्मत्वमहत्त्व विशुद्धत्वनित्यत्वादितारतम्यं दृष्टमवादिषु यावदाकाशमिति ते गन्धादयः सर्व एव स्थूलत्वाद्विकाराः शब्दान्ता यत्र न सन्ति, किमु तस्य सूक्ष्मत्वादि. निरतिशयत्वं वक्तव्यम् इत्येतद्दर्शयति श्रुति:-- - - - अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् एतद्व्याख्यातं ब्राह्माव्ययम् -यद्धि शब्दादिमत्तव्येतीदं तु अशब्दादिमत्वादध्यायं न व्येति । क्षीयते, अत एव च नित्यम् । यद्धि व्येति तदनित्यमिदं तु न व्यत्यतो नित्यम् । इतश्च
प्रथमोऽध्यायः तृतीयावल्ली | ७७
नित्यम् अनाद्यविद्यमान आदिः कारणम् अस्य तदिदमनादि । ययादिमत्तत्कार्यत्वाद-
नित्यं कारणे प्रलीयते यथा पृथिव्यादि । इदं तु सर्वकारणत्वादकार्यम कार्यत्वान्नित्यम् ।
न तस्य कारणमस्ति यस्मिन्प्रलीयेत ।
तथानन्तम् अविद्यमानोऽन्तः कार्यमस्य तदनन्तम् । यथा कदल्यादेः फलादि-
कार्योत्पादनेन अपि अनित्यत्त्वं दृष्टं न च तथाप्यन्तवत्त्वं ब्रह्मणः, अतोऽपि नित्यम्। महतो
महत्तत्त्वाद् बुद्ध्याख्यात् परं विलक्षणं नित्यविज्ञप्तिस्वरूपत्वात्सर्वसाक्षि हि सर्व.
भूतात्मत्वाद् ब्रह्म । उक्तं हि "एष सर्वेषु भूतेषु' (क० उ० ११३११०) इत्यादि ।
ध्रुवं च कूटस्थं नित्यं न पृथिव्यादिवदापेक्षिकं नित्यत्वम् । तदेवं भूतं ब्रह्मात्मानं
निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्युमुखान्मृत्युगोचरादविद्याकामकर्म क्ष गात्प्रमुच्यते
विमुच्यते ।। १५ ॥
पौर्वापर्य०-येम-प्रस्तुत आत्म-विज्ञान की प्रशसा अगने मन्त्र में कर रहे हैं,
ताकि उसकी ओर सभी का आकर्षण हो-
नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त सनातनम् ।
उक्त्वा श्रु त्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥१६॥
अन्वय --मेघावी मृत्युप्रोक्त सनातनम् नाचिकेतम् उपाख्यानं उक्तवा श्रुत्वा
च ब्रह्मलोके महीयते ।
अर्थ-नचिकेता द्वारा प्राप्त तथा मृत्युदेव यम के द्वारा कहे हुये इस
सनातन उपाख्यान को कह एवं सुन कर बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मलोक में महिमान्वित
होता है।
विशेष- नाचिकेतम्-नचिकेतस् + अण् । सनातनम् - सना+ ट्यु (तन)।
मेधावी-मेघा + विनिः ('अस्मायामेधास्रजो विनिः' सूत्र से)। महीयते-/मही
(कण्ड्वादिगणी) + लट् यक् प्रत्यय ।
शा०मा०-प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुतिः-
नाचिकेत नचिकेतसा प्राप्तं नाचिकेतं मृत्युना प्रोक्तं मृत्युत्रोक्तमिदमाख्यान-
मुपाख्यानं वल्लीत्रयलक्षणं सनातनं चिरन्तनं वैदिकत्वादुक्त्वा ब्राह्मणेभ्यः श्रुत्वाचा-
येभ्यो मेधावी, ब्रह्म व लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत आत्मभूत उपास्यो भवती-
त्यर्थः ॥ १६ ॥
य इमं परमं गुह्य श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते
तदानन्त्याय
कल्पत
इति ॥७॥
७८ | कठोपनिषद् अन्वय-यः प्रयतः ब्रह्मसंसदि श्राद्धकाले वा इमं परमं गुह्य श्रावयेत्, तत् आनन्त्याय कल्पते । तत् आनन्त्याय कल्पते इति । अर्थ-जो व्यक्ति पवित्र होकर (ब्रह्मवेत्ता) ब्राह्मणों की सभा में अथवा श्राद्ध के समय इस अत्यन्त गोप्य आख्यान को सुनाता है, वह (सुनाना) अनन्त फल के लिए समर्थ होता है, अथवा वह (श्राद्ध) अनन्त फल के लिए समर्थ होता है ॥१७॥ विशेष-प्रयत:-प्र+/यम् +क्त । ब्रह्मसंसदिब्रह्मणः संसद् तस्याम् (ब्रह्म-विचारकों की सभा में)। गुह्यम् - V गुह, + क्यप् (रहस्यमय आख्यान को) । श्रावयेत्-श्रु+णिच् + विधिलिङ् (प्र० पु० एक०) । आनन्याय- अनन्तस्य भावः आनन्त्यम् (अनन्त+ष्य) तस्मै । 'तदानन्त्याय कल्पते' यह वाक्य अध्याय की समाप्ति को सूचित करने के लिए दो बार लिखा गया है । शा०भा०-यः कश्चिदिमं ग्रन्थं परमं प्रकृष्टं गुह्य गोप्यं श्रावयेद् ग्रन्थ- तोऽर्थतश्च ब्राह्मणानां संसदि ब्रह्मसंसदि प्रयतः शुचिर्भूत्वा श्राद्धकाले वा श्रावयेद् भुजानानां तच्छाद्धमस्यानन्त्या यानन्त फलाय कल्पते संपद्यते । द्विवचनम् अध्याय- परिसमाप्त्यर्थम् ॥१७॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमदाचार्य श्रीशङ्करभगवतः कृतौ कठोपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयवल्लीभाष्यं समाप्तम् ॥ ३ ॥ ॥ इति कठोपनिषदि प्रथमोऽध्यायः समाप्तः।।
परिशिष्ट विशिष्ट पदों पर टिप्पणी आशा-प्रतीक्षा आशा च प्रतीक्षा चेति (इतरेतर द्वन्द्व०) । जिस इष्ट पदार्थ की प्राप्ति का कोई निश्चित ज्ञान न हो परन्तु उसे प्राप्त करने की इच्छा अवश्य हो, तद्विपयिणी कामदा 'आशा' कही जाती है । जिस इष्ट पदार्थ की प्राप्ति निश्चित हो, तद्विषयिणी कामना 'प्रतीक्षा' कही जाती है । अंग्रेजी भाषा के Hope तथा Expectation शब्द क्रमशः इनके पर्याय कहे जा सकते हैं । अनुकूल परिस्थितियों में जो पदोन्नति की 'आशा' की जाती है, वह प्रतीक्षित वस्तु नहीं हैं । किन्तु वर्तमान वेतन-क्रम में वार्षिक वृद्धि निश्चित होने से प्रतीक्षित वस्तु है, उसकी प्रतीक्षा सम्बद्ध व्यक्ति वर्ष भर करता रहता है। जब तक कि नये वर्ष के प्रारम्भ में उसकी प्राप्ति नही हो जाती। इष्टापूर्ते इण्टम्-यज्+क्त भावे । वचिस्वपियजादीनां किति ॥६।१।१५ । से कित् क्त प्रत्यय जुड़ने पर 'यज्' के 'य' को सम्प्रसारण अर्थात् 'इ' आदेश हो गया है । पूर्तम्- ( पृ या पृ+क्त) । यहाँ 'उदोष्ठ्यपूर्वस्य' ॥७।१।१०२॥ से ओष्ठ्यवर्ण-पूर्वक ऋकारान्त पृ या पृ को उ अर्थात् उकार आदेश होने पर पु हुआ जो रपर होने पर पूर बन गया। अब रकारान्त धातु होने से ‘रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः 1८1८।४२।। से त को न होना था, परन्तु 'न धाख्यापृमूच्छिमदाम्' ।।८।२।५७।। से उसका बाध होने पर पूर+त = - 'पूर्त' बना । इष्टापूर्ते-इष्टं च पूर्त चेति इष्टापूर्त (इतरेतर द्वन्द्व), इष्ट' का 'इष्टा' छान्दस दैर्ध्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है । 'अथ ऋतुकर्मेष्टं पूर्त खातादि कर्म यत्' (अमर० २।७।२८) के अनुसार ऋतुकर्म अर्थात् यज्ञयागादि कर्म को 'इष्ट' तथा खात अर्थात् पोखरा, तालाब इत्यादि खुदवाने एवं वृक्षारोपणादि को 'पूर्त' कहा जाता है । एक देवों के प्रति स्वकर्तव्य-पालन का साधन है तो दूसरा मनुष्यों तथा तदितर भूतों के प्रति । धर्म शास्त्रों में दोनों के लक्षण क्रमशः इस प्रकार दिये गये हैं :-“एकाग्निकर्म हवनं त्रेतायां यच्च हूयते । अन्तर्वद्या च यद् दानमिष्टं तदभिधीयते"।। "वापीकूपतडागादि देवतायतनानि च प्रदानमारामाः पूर्तमाः प्रचक्षते ॥" इससे स्पष्ट है कि /इष् इच्छायाम् से क्त ड़ कर 'इष्ट' को निष्पन्न करना प्रस्तुत प्रकरण में सर्वथा ही असत् है । 'इष्ट' Vइष् से बनता है अभिलषित के अर्थ में । अन्न. प्रत्यय | कठोपनिषद् त्रिणाचिकेत त्रि+नाचिकेतः । पिछले मन्त्र में नचिकता को दिये गये अतिरिक्त वर के अनुसार इस मन्त्र में यम ने अग्नि को ठीक ही 'नाचिकेत' कहा । 'त्रि' के र के कारण नं को ण होने पर 'त्रिणाचिकेत' शब्द बना जिसका अर्थ हुआ नाचिकेत अग्नि का तीन बार चयन करने वाला अथवा उसका ज्ञान, चिन्तन एवं अनुष्ठान करने वाला भगवान् भाष्यकार शङ्कराचार्य ने कठ०१११११७ में स्थित इस पद पर भाष्य करते हुए इस प्रकार लिखा है :-त्रिः विकृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चित तो ये नस त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्तदध्ययनस्तदनुष्ठान वानवा" । ब्रह्मा से उत्पन्न, प्रथम शरीरी इस अग्नि देवता का इस प्रकार का ज्ञाता एवं आराधक-उन्हें आहुतियों से सन्तुष्ट करने वाला-पुरुष स्वर्ग लोक मे जाकर चिरकाल के लिए जन्म-जरा-मृत्यु से मुक्त होकर स्वर्ग-सुखों का उपभोग करता है । पुण्य क्षीण हो जाने पर ही वहाँ से लौटकर पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है, उसके पूर्व नहीं । - सृका-शङ्कराचार्य ने इसके दो अर्थ दिये हैं (१) शब्दवती रत्नमयी माला ( २ ) कर्म की अकुत्सित (प्रशस्त) गति । द्वितीय वल्ली के तृतीय मन्त्र में पुनः प्रयुक्त इस शब्द का वहाँ 'सृति कुत्सितां मूढजन प्रवृत्तां' अर्थ किया है ! सृति का अर्थ सरणि या मार्ग है जो ‘गति' का ही वाचक है । इस प्रकार द्वितीय तथा तृतीय अर्थ एक ही है । भेद केवल तदर्थ प्रयुक्त विशेषण का है । द्वितीय अर्थ मे कर्म-मार्ग को 'अकुत्सित' कहा है, जबकि तृतीय में उसे 'कुत्सित' कहा है 'रत्नमयी माला' यह जो प्रथम अर्थ है, वह भी शब्दतः ही भिन्न है, तात्पर्यतः नहीं । वैदिक कर्म का मार्ग-यज्ञों का मार्ग-निस्सन्देह विभूतियों और समृद्धियो का मार्ग है । देवों को उनका देय भाग देकर तथा उनको प्रसन्न करके ऐश्वर्य-प्राय अनन्त स्वर्गलोक की प्राप्ति की जाती है । इसी से तो पूर्ववर्ती मन्त्र १।१।१४ में 'अग्नि' को 'अनन्तलोकाप्ति' कहा है यम ने । यह तो स्वर्ग लोक में प्राप्तव्य विभूतियों एवं ऐश्वयों की बात हुई, यज्ञ करने वाला यजमान इस लोक में भी समस्त अभीष्ट वैभव-सुख प्राप्त करता है । इसी कारण से यह अकुत्सित अर्थात् प्रशंसनीय मार्ग है । द्वितीय स्थल अर्थात् १।२।३ मे 'सृङ्का' को कुत्सित बताने का दूसरा रहस्य. है । वस्तुतः तो सांसारिक सुख-वैभव तथा अभ्युदय के इच्छुक लौकिक व्यक्ति के लिये सर्वोत्तम मार्ग वैदिक यज्ञों का ही है । इनसे यहाँ उत्तम सुख भोग कर यजमान मृत्यु के अनन्तर स्वर्ग-सुख भोगता है, जैसा कि आगे के १७वें मन्त्र के 'त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू' तथा उसके बाद के १८३ मन्त्र के 'शोकाति- विशिष्ट पदों पर टिप्पणी] ८१ गो मोदते स्वर्गलोके' पादों में यम ने स्पष्ट कहा है। ऐसी स्थिति में भाष्यकार का उसे 'अकुत्सित' या प्रशंसनीय मार्ग बताना ठीक ही है । ११२१३ मन्त्र में तो यम ने नचिकेता के सर्व-विषय-त्याग की प्रशंसा करते हुए कहा है कि 'नचिकेता' ! तुम सचमुच बड़े विवेकी हो जो सांसारिक विषयों की असारता को समझते उनके चक्कर मे नहीं पड़े और धन-प्राय-विभूति-बहुल-उस सृका (मार्ग) को तुमने मेरे देने पर भी नही स्वीकार किया जिसमे प्रायः सभी प्राकृत या सामान्य जन आपादमस्तक डूबे रहते हैं। इस प्रकार लोक-विरक्त नचिकेता जैसे आत्मज्ञानार्थी विवेकी के प्रति तो कर्म-मार्ग त्याज्य ही ठहरता है। इसी दृष्टि से भाष्यकार ने उक्त स्थल में इसे कुत्सित मार्ग कहा है जो सर्वथा उचित ही है। विषय को न समझकर मनमानी व्याख्या करने वालों ने इसे 'बुद्धि में रहने वाली, ज्ञानाग्नि के साथ रहने वाली, तत्त्वज्ञान-परम्परा को अबाधित गति से स्थिर रखने वाली ज्ञान-माला' बताया है जो सर्वया उपहासास्पद एवं उपक्षणीय है। श्वोभावाः श्वः भावः (सत्ता) येषां ते (बहुव्रीहिः) । इसका शब्दार्थ हुआ क्षण-स्थायी, क्षणिक । भाष्यकार के अनुसार इसका अर्थ है 'आने वाले कल को भी सन्दिग्ध सत्ता वाले' । अर्थ तो यही ज्यादा युक्त है, क्योंकि पूर्व अर्थ में कल की सत्ता निश्चित मान ली गई जो सम्भावित सत्य तो है परन्तु निश्चित नहीं । हो सकता है, वे कल भी न रहें, आज ही, अभी ही समाप्त हो जायं । यह सातिशय क्षणिकत्व भाष्यकार के ही अर्थ में झलकता है । परन्तु पूर्व अर्थ अधिक शाब्दिक है, शब्दानु- सारी है, जैसा कि समास-विग्रह में दिखाया गया है । साम्पराय साम्परायः (सम् +परा+Vइण् गती+अच्) एव साम्परायः (सम्पराय+ अण् स्वार्थ) । 'सम्पराय' का अर्थ है परलोक-सम् सम्यक् परा दूरम् ईयते गम्यते प्राप्यते इति सम्परायः परलोकः । सम्पराय एव साम्परायः । इस प्रकार यहाँ साम्पराय शब्द का भी अर्थ भाष्य के अनुसार परलोक ही है । आगे की द्वितीय वल्ली के छठे मन्त्र में भी 'सम्पराय' शब्द आया है । वहाँ भाष्यकार ने इसका अर्थ परलोक का (शास्त्रीय) साधन-विशेष कहा है-'सम्पर ईयत इति सम्परायः पर- लोकस्तत्प्राप्तिप्रयोजनः सावनविशेषः शास्त्रीयः साम्परायः।' यह शास्त्रीय साधन- विशेष आत्मज्ञान या आत्म-विद्या है।
८२ | कठोपनिषद् श्रेयस्-प्रेयस् श्रेय-प्रशस्य+ईयसुन् । ईयसुन् तथा इष्ठन् लगने पर 'प्रशस्यस्य श्र'। २३।६० सूत्र से प्रशस्य को 'थ' आदेश हो जाता है । इस प्रकार श्र+ईयस् श्रेयस शब्द बनता है । प्रेय-प्रिय+ ईयसुन् । ईयसुन् तथा इष्ठन् प्रत्यय लगने पर 'प्रिय' को 'प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणा प्रस्थस्फवर्बहिगर्वर्षि- अब्दाधिवृन्दा' । ६।४।१५७ सूत्र से 'प्र' आदेश होता है । इस प्रकार प्र+ईयस् : प्रेयस् शब्द बनता है। सरचना की दृष्टि से श्रेयम् तथा प्रेयस्, दोनो ही शब्द विशेषण होने पर भी सज्ञा की तरह प्रयुक्त होते है । यहाँ क्रमश विद्या कल्याण-मार्ग तथा अविद्या प्रिय किन्तु अकल्याणकारी मार्ग के अर्थ मे ये सज्ञावत् ही प्रयुक्त हुये हैं । योगक्षेम योगश्च क्षेमश्चेति योगक्षेमम् ( समाहार द्वन्द्व), तस्मात् । यहाँ 'हेतो' इस सूत्र से कारण अर्थ मे पञ्चमी हुई है। 'योग' शब्द 'युजिर्' योगे ( रुधादि० ) से घन प्रत्यय लगकर बना है । इसका शाब्दिक अर्थ है किसी वस्तु या पदार्थ का योग या सयोग । फिर इसी से इसका विकसित अर्थ हुआ 'अप्राप्त की प्राप्ति' । इसी प्रकार 'क्षेम' का शब्दार्थ होता है कल्याण, कुशल । इसी से विकसित होकर इसका पारिभाषिक अर्थ हो गया 'प्राप्त वस्तु की रक्षा'। वस्तुत सासारिक व्यक्ति के लिये श्रम तथा कष्ट से प्राप्त या अर्जित वस्तु के सुरक्षित रहने से बढकर और कोई क्षेम होता भी नही । सक्षेप मे योग और क्षेम के अन्तर्गत सारी सॉसारिकता का समावेश है। सामान्य व्यक्ति का सारा जीवन अभीष्ट वस्तुओ के अर्जन या सग्रह और उसके सरक्षण मे ही बीतता है। विषूची विषु +/अञ्च गतौ+ क्विन +डीप् (स्त्रियाम)। 'विषु' का अर्थ है नाना या अनेक । इस प्रकार इस शब्द का अर्थ है 'नाना या विभिन्न दिशाओ मे जाने वाली'। यह विशेषण पद है और विद्या तथा अविद्या के लिये प्रयुक्त हुआ है। वस्तुत द्विवचन मे 'विषूच्यों यह द्विवचनान्त प्रयोग ( 'विपरीते' की तरह ) होना चाहिये था, इसके स्थान मे एकवचनान्त 'विषूची' का प्रयोग छान्दस या वैदिक कहा जायगा। अपेक्षानुसार इमका विषूच्यो' यह द्विवचनान्त विपरिणाम कर लेना चाहिये, जैसा शङ्कर ने अपने भाष्य मे किया है-"विषूची विषच्यो नानागती भिन्नफले ससार मोक्ष, हेतुत्वेनेत्येतत् ।" शाङ्करभाष्य से यह तथ्य भी सुस्पष्ट हो गया कि विद्या या ज्ञान-मार्ग तथा अविद्या या अज्ञान-मार्ग विभिन्न दिशाओ मे जाने वाले मार्ग हैं। एक का फल है मोक्ष, तथा दूसरे का ससरण या आवागमन अर्थात् विशिष्ट पदों पर टिप्पणी] ८३ - बन्ध । मोक्ष और बन्ध-इन विपरीत फलों के कारण बनने से ही ये मार्ग या साधन 'विषूची' ( अर्थात् नानागतिक ) कहे गये है । अध्यात्मयोग यह शब्द कठ० ११२।१२ मन्त्र में आया है। यह मन्त्र आत्म-प्राप्ति के साधन बताने की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । अध्यात्म-योग आन्म-ज्ञान और उससे आत्म-प्राप्ति होती है, यह सुविदित है। किन्तु अध्यात्म-योग हो कैसे, यह बड़ा विषम प्रश्न है । इसी को संक्षेप किन्तु स्पष्ट रूप से यम ने इस मन्त्र में बताया है । यह तो स्पष्ट ही है कि आत्मा के स्वरूप पर चित्त को एकाग्र या समाहित करने के पूर्व उम स्वरूप का ज्ञान होना आवश्यक है । इ'मी के लिए 'श्रुत्वा' कहा अर्थात् किसी अभेद-दर्शी ब्रह्मनिष्ठ आचार्य से पहले 'समित्पाणिः श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठम् इत्यादि में प्रतिपादित विधि से उसके वास्तविक रूप को सुने और समझे (संपरिगृह्य) 'मनन' करे, ताकि शरीर-इन्द्रियादि के धर्मों से युक्त जो उसका रूप प्रतीत होता है, उससे उसको 'प्रवृह्य' अर्थात् अलग करके जो उसका धर्म रहित, सूक्ष्म एवं शुद्ध आनन्द-रूप है, उसे साधक जान सके । फिर आत्मा के इसी केवली या शुद्ध रूप पर अनिश चित्त को लगाये-आत्मयोग करे-जिससे उसका साक्षात्कारात्मक ज्ञान अर्थात् अपरोक्षानुभूति हो सके । वस्तुतः तो जीवात्मा प्राणी के हृदय में ही निवास करता है । परमात्मा भी मर्वव्यापक होने के कारण प्रत्येक प्राणी के हृदय में निवास करता है। किन्तु सांसारिक विषयों में लिप्त रहने के कारण जीवात्मा परमात्मा को पहचान नहीं पाता । जीवात्मा अपनी विषयासक्त स्थ ल बुद्धि से परमात्मा का साक्षात्कार नही कर सकता। सूक्ष्मदर्शी जीवात्मा अपनी तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि से परमात्मा का माक्षात्कार कर सकता है । साँरारिक विषयों का परित्याग करके अत्र्यात्म-योग जीव के आत्मा अर्थात शुद्ध स्वरूप पर चित्त या बुद्धि का समाधान या उसकी एकाग्रता करने से वह तीक्ष्ण और सूक्ष्म हो सकती है, और इसी बुद्धि से जीव के वास्तविक अणुतम रूप का उपर्युक्त श्रवण-मनन-निदिध्यासन हो सकता है जिसके फलस्वरूप आत्मसाक्षात्कार एवं कालान्तर में अभ्यास को दृढ रखने से ब्रह्म के साथ उसके ऐक्य का अनुभव सम्भव है । यह अनुभव ही उसकी प्राप्ति है क्योंकि जीव का अपना स्वरूप तो सदा से ही प्राप्त है, उसे कोई क्या प्राप्त करेगा, केवल उसे माया-वश, अज्ञान वश-भूला हुआ है, वही भूल समाप्त करके स्वरूपतः उसे जान ले, काम बन जाय, सारे अनर्थो से छुट्टी मिल जाय, जैसा कि पिछले मन्त्र के 'मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति' इस चतुर्थ चरण में यम ने स्पष्ट कर दिया है। आगे भी m