Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shri Laghu Prakaran Mala Hindi Anuvad Sahita
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॥ श्रीलघुप्रकरणमाला हिन्द्यनुवादसहिता ॥
आ२०5
हिन्धनुवादक
अध्यात्म जीतमुनि.
उसके प्रसिद्ध कावाले शेठ वाडीलाल पानाचद-पणनिवासी
नमे
भेट
पार मत् २५३.
विक्रम सतत् (९७२
मन १९९८
बडोदा-शियापुरा-लहाणामिन स्टीम प्रिन्टिंग प्रेमर्म टकर विभाइ आशारामने प्रसिद्ध कर्ताक लिये
छापक प्रसिद्ध किया ता १-१-१९१९
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॥जीवविचारप्रकरणमूलहिन्द्यनुवादसहितम्॥
॥ भुवणपईववीर नमिऊणभणामि अवुहबोहल्थ
विसरूव किंचिवि जहभणियपूबसूरिहिं ॥ १॥
पर मुवण ) तिन मुवनमें (पई) दीपक समान (वीर) वीरप्रभुको (नमि-
जण )नमार करके (भणामि ) कहतो । (अयुबोहथ्य) अक्षनीवोको बोध होनेक लिये
(जीव ) जीवका (-सम्व) स्वरूप किंचिवि ) किचित्मात्र (जह ) नेसे ( भणिय )
क्हा हे (पूर्वसरिहि) पूर्वक आचार्यान ॥ १ ॥
॥ जीवामुत्ताससारिणोय तसथावरायससारी
पुढविजलजलणवाऊ वणस्सईथापरानेया ॥ २ ॥
विचार FEEEEEEEEEE ॥ ( जीवा ) जीन ( मुत्ता) एक मुक्तिका (संसारिणो) दुसरा संसारी (य) फिर (तस ) त्रसजीव (थावरा) स्थावर जीव (य) और ( संसारी) संसारीके दो भेद है (पुढवि) पृथ्वीकाय (जल) अप्काय ( जलण )तउकाय (बाऊ) वाउकाय (वणस्सई) वनस्पतिकाय ( थावरा) स्थावरके पाँच भेद ( नेया ) जानना ॥ २ ॥ ॥ अत्र दो गाथाओंसे पृथ्वीकायके भेद कहते हैं । ॥ फलिहमणिरयणविदुम हिंगुलहरियालमणसिलरसिंदा कणगाइधाउसेढी वन्नियअरणेश्यपलेवा ॥ ३ ॥ ॥ अभ्पयतूरीऊसं मट्टीपाहाणजाइओणेगा सोवीरंजणलूणाई पुढविभेयाइइच्चाई ॥ ४ ॥ ॥ (फलिह ) स्फाटिकरत्न (मणि) चंद्रकान्तादि मणीरत्न (रयण ) रत्न (विहुम) मूंगीगा (हिंगुल ) हिंगलू (हरियाल ) हरताल ( मणगिल ) मैनसिल (रसिंदा ) पारो ( कणगाई ) कनकादि सातों (धाउ ) धातु (सेढी) सटी (वन्निय ) लालरंगकी मट्टी ( अरणेट्टय ) अरणेट्टय नामे पापाण (पलेवा) पारेवा नामे पाषाण (अभ्पय) अभरत (तूरी) 公子冬長至
तेनतुरी (ऊस) क्षार (मट्टी) मिट्टीकी (पाहाण) पापाणकी (जाईओणेगा) आफ
प्रकारकी जातीओ ( सोवीरजण) अनन करनेका सुरमा (लूणाई) पाच प्रकारके लुण (पुढवि)
पृथ्वीकाया (भेयाइ) भेटो (इचाई ) ईत्यादिक हे ॥ ३-४ ॥
॥ अव एक गाथासे अपाय जीवाका भेद कहत है ।।
॥ भोमतरिरखमुदग ओसाहिमकरक हरितगृमहिआ
हुतिघणोदहिमाई भेआणेगायआउस्स ॥ ५ ॥
॥ (भोम) भूमिका (अतरिख्ख ) आकाशका (उद्ग) जल (ओसा)
गामा (हिम) स ( करग) गडाका (हरितणू) हरिवनम्पती पर रहाइवा (महिया)
धुअरा (हुति ) हे (घणोदहिमाई ) प्रनोदधिआदि (भेआ) भेदो (अणेगाय ) अनेक
प्रसारक (आऊस्स) अप्नायरा ॥५॥
1) अब एक गायास अगिाय निवोंका भेदो कहते है।
॥ इंगालजालमुम्मुर उकासणिकणगविज्जुमाईया
अगणिजियाणभेयानायवानिउणबुद्धीए ॥ ६ ॥
॥३॥
-- विचार ॥ ( इंगाल ) अंगारांकी (जाल ) ज्वालाकी ( मुम्मुर ) वोभरकी (ऊका) उल्का- पातकी ( असणि ) वज्रकी अग्नि (कणंग) आकाशमे उडनेवाले अनिके कणे (विज्जु) चिनलीकी (आईया) इत्यादि लेकर ( अगगि ) अनिकाय ( जियाणं) जिवोंका ( भेया) भेटो ( नायव्वा ) जानना (निउणवुद्धीए) अच्छी बुद्धी करके ॥ ६ ॥ ॥ अत्र एक गाथासे वायुकाय जीवोंके भेद कहते है ॥ ६EEEEEEEEEEE FFEFE FEEEEEEEEEE ॥ उभ्पामगउकलिया मंडलिमहसुद्धगुंजवायाय घणतणुवायाईयाभेयाखलुवाउकायस्स ॥७॥ ॥ ( अभ्पामग) उद्भ्रामक वायु उंना चढने वाला ( उक्कलिया) निचे जमीनसे फर्सता चले सो उत्कलिक ( मंडलि) विंटोलिया ( मह ) महावायु (सुद्ध) शुद्ध मंद वायु (गुंजवायाय ) गुंजारव करता चलेसो (घण) नवा (तणु) तनवा ( वाया) वायु (आईया) इत्यादिक ( भेया) भेदो (खल) निश्चे (वाउकायस्स) वायुकायका ॥ ७॥ FREEEEE ॥ अब एक गाथासे वनस्पतिकाय जीवोंके भेद कहते है ।
FEEEEEEEEEE ॥ साहारणपत्तेया वणस्सइजीवादुहासुएभणिया जेसिमणताणतणु एगासाहारणातेऊ ॥८॥ ॥ (साहारण) साधारण (पत्तेया) प्रत्येक (वणस्सइ) वनरपतिकायक (जीवा) जीवो (दुहा) दो मारके (सुग) सूनके विषे ( भणिया) कहा है (जेसि) जिसका (अणताण ) अनन्त जीवोंका (तणु ) गरीर (गा) एकहो (साहारणा ) साधारण (तेऊ ) उमको माधारण कहिये ॥ ८ ॥ ॥ अब गो गाधाओसे साधारण वनस्पतिकाय जीवोके भेट करते हे ॥ ॥ कंदाअकुरकिसलय पणगासेवालभूमिफोडाय अल्लयतियगज्जरमोथ्थवथ्थुला थेगपल्लका ॥९॥ ॥ कोमलफलचसब गूढसिराइसिणाइपत्ताइ थोहरिकुआरिगुग्गुलि गलोयपमुहाइछिन्नरुहा ॥ १० ॥ ॥(कदा) सरनमीकद (अंकुर ) अकुरा (किसलय)नयेकोमलपत्ते (पणगा) MEECARICHERE विचार 333333322 ॥६॥ पाच प्रकारकी (सेवाल) सेवाल (भूमिफोडाय) भूमिफोडा छनके आकारे चोमासामें होताहेसो ( अल्लयतिय ) अद्रक, लीली हलदी और कचुरा यह तीन ( गजर ) गाजर ( मोथ्य) नागरमोथ ( वथ्थुला ) बथुआ (थेग) शेगकी भाजी ( पल्लंका )पालतो ( कोमल)कोमलहो (फलं ) फल जीसमे वीज न हो (च) और (सिराइ ) जिसका पुंक आदि प्रगट देखने नहीं आता है ऐसे (सिणाईपत्ताई) सनआदिके पत्ते ( थोहरि ) थूहर ( कुंआरि) पारपालो (गुग्गुलि ) गुगलॉनी (मलोय) गिलोष (पनुहाइ ) प्रपुरा (छिन्नरुद्धा) छेदा मायनेगे भी पीछा उग जावै ॥ ११-१२ ॥ th ॥ अत्र दो गाथाओंसे अनन्तकायका विशेष लक्षण दीलगने है ।। ॥ इच्चाइणोअणेगे हवंतिभेयाअणंतकायाणं तेसिंपरिजाणणथ्यं लख्खणमेयंसुएभणियं ॥ ११ ॥ ॥ गूढसिरसंधिपवं समभंगमहीरुगंचछिन्नरुहं साहारणंसरीरं तविवरीयंचपत्तेयं ॥ १२ ॥ ॥ (इचाइणो) इत्यादिक (अणेगे ) अनेक (हवंति) है (भेया) भो
H
अणतकायाण) अनन्तकाय नीतोंके (तेसिं) उमके (परिजाणणथ्य ) अच्छीतरह
जाननेके न्येि ( लम्खणमेय ) यह तयण ( सुए) सूत्रके चिपे ( भणिय) कहा है (गूढ)
गुप्तहो निमका (सिर) पुफआदि (सधि ) सापा (पन्च ) और गाठा (समभग)
नो ताटनपर ममभाग टुना हो जाय ( अहीमगच) जिसम कोड ततु न हो (छिन्नम्ह)
टेगीन पानस भी उगनार (माहारण) माधारणा (सरीर) शरीर हे (तन्निवरीयच)
रामसे विपरीत पक्षणपाली (पत्तेय) प्रत्येक वनम्पनिकाय हे ॥ ११-१२ ॥
|| अब एक गारासे प्रत्येक वनस्पतिकायके क्षण तशा भेद कहते है ॥
॥ एगसरीरेएगो जीवोजेसितुतेयपत्तेया
फलफूलछल्लिकहा मूलगपत्ताणिवीयाणि ॥ १३ ॥
॥ (गसरीरेण्गो) एक शरीमें 7 (जीया ) जीव (जेसि) जिसम हो
(तु) और (तेय ) उमको ( पत्तेया) प्रत्येक रहिये (फल) फल (फूल) फूल
(उल्लि) गाल ( कट्टा) काप्ट (मलग) मूर ( पत्ताणि) पत्ते ( वीयाणि) और वीन
ऐसे एक क्षमें सात ठीकाने जीव होते है ॥ १३ ॥
EF ॥ अन पृथ्वीकाय आदि जीवोंके विषयमें कुछ विशेष कहते है ।। ॥ पत्तेयंतरुमुत्तंपंचविपुढवाइणोसयललोए सुहुमाहवंतिनियमा अंतमुहुत्ताउअघिस्सा ॥ १४ ॥ ॥ ( पत्तेयंतर) प्रत्येक वनस्पतिकायकों ( मुत्तं) छोटकर (पंचवि) पांचोही ( पुढवाइणो) पृथ्वीकाय आदि लेकर साधारणतक ( सयललोग ) सब लोकके विषे भरी हुई है (सुहमा ) सुक्ष्म ( हवंति) है ( नियमा) निश्चे करके ( अंतमुहत्ताउ ) अन्तर्मुहूर्त आयुवाला ( अहिस्सा ) अदृश्य है ( जरमनसे नही देखा जावे ) ॥ १४ ॥ ॥ अब दो इंद्रिय जीवोंका भेद कहते है ॥ ॥ संखकवड्डयगंडल जलोयचंदणगअलसलहगाई मेहरिकिमिप्यरगाबेइंदियमाइवाहाई ॥ १५ ॥ ॥ (संख) शंखदक्षीणगर्त आदि (कवड्य ) कोडाकोडीयों (गंठ्ठल ) गंडोला (जलोय) जोक (चंद्गण) नंदनक ( अलस) अलशीया ( लहगाई ) लालीगा नीमो FREFEREEEEEEEEEEERE -EEEE HEEEEEEEEEEEEEE (मेररि ) फाटके कीडे ( किमि) कृमिया (पूयरगा) पानीके पुरे (बेडदिय) दो इद्री जीवों ( माइवाहाई) चूटेल इत्यादि ॥ १५ ॥ । अब दो गाथाओंसे ते इद्रिय जीवोंके भेद कहते है ॥ ॥ गोमीमकणजुआ पिपीलिउद्देहियायमकोडा इल्लियघयमिल्लीओ सावयगोकोडजाइआ ॥ १६ ॥ ॥ गदहयचारकीडा गोमयकीडायधनकोडाय कुथुगुवालियइलिया तेइदियइदगोवाई ॥१७॥ ॥ (गोमी) Tानग्वनुरा ( मकण) सटमल (जूआ ) नउआ तथा जू (पिपीलि) जीटीका ( उद्देहिया ) उद्देहिका (य) और ( मकोडा) माकोडा (इल्लिय) इल्लिका (घयमि- ल्लीओ) जो पीमिलो धृतमें पडति है सो ( सावय) जो चश्चम पडति है सो जू (गोकीड) गायके कानमे पडति है सो (जाइओ) रत्यादि प्रकारकी नातियों औरभी (गद्दय) गधैया (चोरकीडा) पिटाके कीडे (गोमयकीडा) गोत्ररके कीडे (य) और (धन्नकीडा) धान्यके कीटे (य) और (कुंथु) कथुआ (गोगालिय) गोपालिका (इलिया) इल्लिका (तेइदिय ) तेइद्री जीवों ( इदगोवाई) इदगोप जो वर्षाकालम होते हे इत्यादि ॥१६-१७॥
विचार EEEEEEEEEEEE ॥१०॥ ॥ अब चउरिद्रिय जीवोंके भेद कहते है ।। ॥ चउरिदियायविच्छु ढिंकुणभमरायभमरियातिड्डा- मच्छियडंसामसगा कंसारीकविलडोलाइ ॥ १८ ॥ ॥(चरिंदिया) चौरिद्रीवाले (य) और (विच्छु ) बिच्छु (ढिंकुण) वग (भमराय) भमरा ( समरिया) भ्रमरिका ( तिड्डा) तिडी ( मच्छिय ) मख्खी (डंसा) डाँस ( मसगा) मच्छर ( कंसारी) कंसारी ( कविल ) करोलिया ( डोलाई ) खडमाकडी. ॥ १८॥ ।। अन पंचेन्द्री जीव और नारक पंचेन्द्रीका भेद कहते है । ॥ पंचिंदियायचउहा नारयतिरियामणुस्सदेवाय नेरइयासत्तविहा नायबापुढविभेएणं ॥ १९ ॥ ॥(पंचिंदिया) पंचेद्री जीवों (य) और ( चउहा) चार प्रकारे ( नारय) नारक ( तिरिया ) तिर्यंच (मणुस्स ) मनुष्य ( देवाय ) देवता (नेरइया) नारकी (सत्त- 会长长长长长 FFFE EEEEEEL विहा) सात प्रकारे ( नायव्वा ) जानना (पुढवि) पृथ्वीरत्नप्रभा आदिका (भेण्ण) भेटोसे । अब तिर्यन पचद्री और जलचरतियना भेद कहते है ।। ॥ जलयरथलयरखयरा तिविहापचिदियातिरिख्खाय सुसुमारमच्छकच्छव गहामगराईजलचारी ॥ २० ॥ ॥ (जलयर) जलनर (थलयर) स्थलचर (खयरा) रोनर आकाशमे उडनेवाले (तिविरा) से तिन प्रकार (पचिदियातिरिरखाय) तिर्यन पचेदी जीवोका है (सुसुमार ) शिशुमार (मच्छ) मारले ( कच्छय ) माछो (गहा) जलनतु (मगराई) मगरमच्छ आदि (जलचारी) जल्चरजीव है |॥ २० ॥ ॥ अब स्थलचरजीवोंके भेद कहते है । ॥ चउपयउरपरिसप्पा भुयपरिसप्पायथलयरातिविहा गोसप्पनउलपमुहा वोघवातेसमासेण ॥ २१ ॥ |॥११॥ HERE विचार ॥ ( चउपय) चार पैरसे चलनेवाले (उरपरिप्पा) छातीसे और पेटसे चलनेवाले उरपरिसर्प ( भुयपरिसप्पा) भुजपरिसर्प भुजासे चलनेवाले ( य ) और (थलयरातिविहा) थलचरके तीन भेद है (गो) गौ ( सप्प ) साँप (नउल ) नौलिया (पमुहा) प्रमुख ( बोधव्वा ) जानना (ते) वे ( समासेणं ) संक्षेपसे कहा. ॥ २१ ॥ ६६६EEEEEE ॥१२॥ ॥ अब खेनर जीवोंके भेद कहते है ! ॥ खयरारोमयपख्खी चम्मयपख्खीयपायडाचेव नरलोगाओबाहिं समुग्गपख्खीविययपख्खी ॥ २२ ॥ (खयरा) खेनर आकाशमें उडनेवाले पक्षीयो ( रोमयपख्खी) रोमकी पांखवाले पक्षी ( चम्मयपख्खी) चर्मकी पांखवाले पक्षी (पायडा) प्रगट है (चेव ) निश्चे (नरलो- गाओ) मनुष्य लोकसे (बाहिं ) बाहेर (समुग्गपख्खी) संकोची पाखवाले पक्षी (विययपख्खी) खुली पांखवाले पक्षी ॥ २२ ॥ ॥ सवेजलथलखयरा समुच्छिमागभ्पयादुहाहुँति- कम्माकम्मगभूमी अंतरदीवामणुस्साय ॥ २३ ॥ 长子李子交 393
EEEEEEEEEEEEEEEEEE
(सब्वे) सत्र (जल) जल्चर (थल) स्थलचर (खयरा) और खेचर (समु-
च्छिमा) सम्मुच्छिम (गभ्पया) गर्भन (दुहा) दो प्रकारके प्रत्येकप्रत्येक (हुति) है ।।
अब उत्तरार्धगाथासे मनुप्यके भेट कहते है (कम्मा ) करमाभूमीके (अकम्मगभूमी)
अकरमाभूमिके ( अतरदीवा ) अतरद्वीपके (मणुस्साय) मनुप्य है ॥ २३ ॥
॥ अन देवो भेद करते है।
॥ दसहाभवणाहिवई अटविलवाणवतराहुति
जोइसियापचविहा दुविहावेमाणियादेवा ॥ २४ ॥
(दसहा) दश प्रकारके (भयणाहिबई) मुवनपती (अठविहा) आठ प्रकारके
(वाणवतरा) व्यत्रीक और वाण यत्रीक (हुति ) है (जोइसिया ) ज्योतिषी (पचविहा)
पाच प्रकारके (दुविहा ) दो प्रकारके (वेमाणिया) वेमानीक ( देवा ) देवता है। इस
प्रकारे ससारी जीवोंका सक्षेपसे भेद कहा है ॥ २४ ॥
॥ अब सिद्धाके जीवोका भेद कहते है ॥
॥ सिद्धापनरसभेया तित्थातित्थाइसिद्धभेएण
एएसखेवण जीवविगप्पासमख्खाया ॥ २५ ॥
॥१३॥
३३. जीव विचार ॥१४॥ (सिद्धा) सिद्धोके (पनरस ) पन्द्रह (भेया) भेद है (तित्थ) तीर्थंकर सिद्ध (अतित्थाइ) अतीर्थकर आदि (सिद्धभेएण) सिद्धोंके भेदोसे . (एए) इस प्रकारे (संखेवेणं ) संक्षेपसे (जीव) जीवोका ( विगप्पा) भेद (समख्खाया) अछी तरहसे कह गये ॥ २५ ॥ ॥ अब आगे कहना है सो द्वार इस गाथा करके कहते है ।। ॥ एएसिंजीवाणं सरीरमाऊठिईसकायंमि पाणाजोणिपमाणं जेसिंजंअत्थितंभणिमो॥ २६ ॥ FREE (एएसिं) इन पुर्वोक्त (जीवाणं) जीवोंके (सरीरं) शरीर कितना (आऊ) आयुप्रमाण कितना (ठिईसकायंमि) स्वकायामें रहनेकी स्थिति कितनी (पाणा)प्राण कितना (जोणिपमाणं) योनिका कितना प्रमाण (जेसिं) जिसके (ज) जितना (अधि) है (तं) इतना ( भणिमो) कहूंगा ॥ २६ ॥ शरीरदार ॥ इसमें प्रथम एकेंद्रियका शरीर प्रमाण कहते है। EEEEEER FEEEE
EEEEEEEEEE
EEEEEEGE FEEEEEE
॥ अगुलअसखभागो सरीरमेगिदियाणसवेसि
जोयणसहस्तमहिय नवरपत्तेयरुख्खाण ॥ २७ ॥
(अगुल ) गुला (अमर) असख्यातम (भागो) भागे (सरीरमेगिदि-
याणसवेर्सि) सब एकेंद्री नीर्मा। (प्रतेक वनस्पतिको छोडकर हे (जोयणसरस्सम-
दिय) हमार नोमनसे कुछ अधिक (नवर ) इतना विशेष ( पत्तेयरुख्खाण) प्रत्येक
वनस्पतिका शरीर जानना ॥ २७ ॥
। अब विफलेंद्री जीवोके शरीरसा प्रमाण कहते है ॥
॥ वारसजोयणतिन्नेव गाऊआजोयणचअणुकमसो
वेइदियतेइदियचउरिदियदेहमुच्चत ॥ २८ ॥
(बारसजोयण) मारह जोनका (तिन्नेवगाऊआ) तिन कोशका (जोयणच)
एक नोजनका (अणुकमसो) अनुक्रमसे (बेइदिय) दोइद्री जीवोका (तेइदिय) तेइद्रीका
(चउरिदिय) और चोरिंद्री जीवोंका (देहमुच्चत्त) शरीरका उचपणा जानना ॥ २८ ॥
॥१५॥
|| अब नारक जीवोंके शरीरका प्रमाण कहते है । जीव विचार M FEEEEEEE ॥१६॥ ॥ धणुसयपंचपमाणा नेरइयासत्तमाइपुढवीए तत्तोअध्धधूणा नेयारयणप्पहाजाव ॥ २९ ॥ (धणु) धनुष्य (चार हाथको एक ) ( सयपंचपमाण) पांचसोका प्रमाण (नेरइया) नारक जीवोंका ( सत्तमाइ) मातगी (पुढवीए ) पृथ्वीके ( तत्तो) उससे (अद्धघृणा) आधा आधा कम प्रमाण (नेया) जानना ( रयणप्पहाजाव) याक्त् पहिली रत्नप्रभातक॥ २९ ॥ ॥ अल जो तीन कारके गर्भन पंचेन्द्रीनिर्मच होत है उसके शरीरका प्रमाण कहते है । ॥ जोयणसहस्समाणा मच्छाउरगायगभ्पयाहुति धणुअपुहुत्तंपक्खीसु भुअचारीगाउअपुहुत्तं ॥ ३० ॥ (जोयण) जोनन ( सहस्स) हजार (माणा) प्रमाणका शरीर (मच्छा मच्छका (उरगा) और उरपरी सर्पका (य) फिर (गभ्पया) गर्भजका (हुति ) (पशुह) धनुष्य (पुहुत्त) दोसे लेकर नव तकका (पख्खीसु) पक्षीयोका शरीर है (भुअचारी) मुनपरी सर्पका (गाउअ ) कोश (पुहत्त) दोसे लेकर नवतक गर्भनका जानना ॥ ३० ॥ ॥ अत्र सुमुछिम् पचेंद्री तिर्यचका देहमान कहते है । ॥ खयराधणुअपुहुत्त भुअगाउरगायजोयणपुहुत्त गाउअपुहुत्तमित्ता समुच्छिमाचउपयाभणिया ॥३१॥ (खयरा) खेचर पक्षीयोका शरीर (धणुअपुहुत्त) दो धनुष्यसं लेकर नव धनुष्य तस्का है (भुअगा) और मुनपरी सर्पकाभी इतना है (उरगाय) उपरी सर्पका (जोयण) जोनन (पुरत्त) दोसे लेकर नवतकका हे (गाउअ ) कोश (पुहत्तमित्ता) दोसे नवतकका प्रमाण (समुच्छिमा) सम्मुच्छिम (चउपया) चारपेर वाले जीवोका (भणिया ) कहा है ( अढाइ द्वीपके बहार ) ॥३१॥ ||१७॥ 我安安长长长长长长长 । अब गर्भन चतुष्पद तियन तथा मनुष्यका शरीरमान कहते है ।
जीव विचार EFEEEEEEEEEEEEEE FREEEEEEEEEE ॥१८॥ ॥ छच्चेवगाउआई चउप्पयागभ्पयामुणेयवा कोसतिगंचमणुस्सा उकोससरीरमाणेणं ॥ ३२ ॥ (छ) छ ( चेव) निश्चे (गाउआई) कोशका ( चउप्पया) चार पैरवाला (गम्पया) गर्भजका (मुणेयव्वा ) जानना (कोसतिगं) तीनकोशका (च) फिर ( मणुस्सा) मनुष्योंका (उकोस) उत्कृष्ट ( सरीर ) शरीरका (माणेणं) प्रमाण जानना ॥ ३२ ॥ ॥ अब देवोंका स्वाभाविक शरीरमान कहते हैं । ॥ इसाणंतसुराणं रयणीओस्नत्तहुंतिउच्चत्तं दुगदुगदुगचउगेविजणुत्तरेइकिक्कपरिहाणी ॥ ३३ ॥ (इसाणंत ) भुवनपतिसे लेकर दुसरा इशान देवलोक तक ( सुराणं) देवताओंके शरीरका प्रमाण ( रयणीओ) हाथ ( सत्त) सातका (हुंति) है (उच्चतं ) उतपणे (दुग) तीसरा और चोथा देवलोकका एक दुग इसमे देवोंका शरीर छ हाथका हैं (दुग) पंचमा और छठा देवलोकका एक दुग इसमें देवोंका शरीर पान हाशका हैं (दुग) सातमा और
आउमा देवलोकका एक दुग इसमें देवोंका शरीर चार हाथका है (चउ) एक चतुष्क इसलिये नरमा
दशमा ग्यारमा और वारहमा यह चार देवलोकके देवोका शरीर तीन हाथका है (गेविज ) नव
ग्रैवेयक देवोंका शरीर दो हाथका है (अणुत्तरे) पाच अनुत्तर विमानके देवोका शरीर एक हाथका
है (इकिकपरिहाणी) एक एक हाथकी हाणी करणा ॥ ३३ ॥
आयुष्यद्वार
। इसमें प्रथम एफेंद्रिय जीवोंके आयुका प्रमाण कहते है ।
॥ वावीसापुढवीए सत्तयआउस्सतिनिवाउस्स
वाससहस्सादसतरु गणाणतेऊतिरित्ताउ ॥ ३४॥
(बावीसा) वावीश हमार वर्पका (पुढवीए) पृथ्वीकायके जीवोका आयु हे (सत्तय)
सात हजार वर्षका (आउस्स ) अपकायके जीवोंका आयु है (तिन्नि) तीन हजार वर्षका
( वास्स ) वाउकायके जीवोका आयु है (वाससहस्सादस) दश हजार वर्षका (तरु)
प्रत्येक वनस्पतिका आयु है (गणाणतेक) अग्निकाय जीवोके समुहका (ति) तिन
(रित्ताउ) अहोरात्रीका आयु कहा है || इसप्रकारे वादर एके द्रीका आयुष्य उत्कृष्टा कहा
और जब यसै अतर्मुहूर्त्तका समज लेना ॥ ३४ ॥
॥१९॥
विचार जीव ॥२०॥ FEEEEEEEEEEEEER ॥ अब विकलेंद्री जीवोंके आयुका प्रणाम कहते है ॥ ॥ वासाणिबारसाऊ बिइंदियाणंतिइंदियागंतु अऊणापन्नदिणाई चउरिंदीणंतुछम्मासं ॥ ३५ ॥ ( वासाणिवारसाऊ) बारह वर्षका आयु (बिइंदियाणं) दो इन्द्री जीवोंका कहा है (तिइंदियाणं) तेइन्द्री जीवोंका (तु) फिर ( अऊणापन्नदिणाई) गुणपंचास दिनका है ( चउरिंदीणं) चौरिन्द्री जीवोंका आयु (तु) फिर ( छम्मासं) छ मासका आयु उत्कृष्टा कहा है ॥ ३६॥ ॥ अब पंचेंद्रि जीवोंका आयुप्रमाण कहते है ॥ ॥ सुरनेरइयाणठिई उक्कोसासागराणितित्तीसं चउपयतिरियमणुस्सा तिन्नियपलिओवमाहुति ॥ ३६ ॥ (सुर ) देवता ( नेरइयाण ) और नारककी (ठिई) आयु स्थिति ( उक्कोसा) उत्कृष्टी (सागराणितित्तीसं) तेतीस सागरोपमकी है (चउपय) चार पैरवाले (तिरिय) तिर्यचका (मणुस्सा) और मनुष्यका उत्कृष्टा आयु (तिन्निय ) तीन (पलिओवमा) पल्योपमका (हुंति) हैं ॥ ३६ ॥ FEEEEEEE EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE
EFERER
FREEEEEE
॥ अब गर्भन तिर्यच पत्रंदिका आयुप्य कहते हे ॥
॥ जलयरउरभुअगाण परमाउहोइपुवकोडीओ
पख्खीणपुणभणिओ असखभागोयपलियस्स ॥ ३७॥
॥ (जलयर ) जलचर जीवोंका (उर ) उपरी सर्पका ( भुअगाणं) और मुजपरि
सर्पका ( परमाज) उत्कृष्ट आयु (होइ ) होते हे (पुव्वकोडीओ) एक पूर्वकोडीवर्षका
(परूखीण) पक्षियोंका आयुप्य (पुण) फिर (भणिओ) कहा है ( असख भागोय-
पलियस्स) पत्योपमके असख्यातमें भागे ॥ ३७ ॥ इस प्रकार जीवोंकी उत्कृष्टी आयु
स्थिति कही
।। अब सुक्ष्म स्थावर और समुच्छिम मनुष्यकी आयु स्थीति कहते है ।।
॥ सवेसुहुमासाहारणाय समुच्छिमामणुस्साय
उक्कोसजहन्नेण अतमुत्तचियजियति ॥ ३८॥
॥(सब्वे) सब (सुहुमा) सुक्षम (साहारणा) और साधारण वनस्पतिकाय
य) फिर (समुच्छिमा) समूच्छिम (मणुस्साय) मनुष्य ( उक्कोस) उत्कृष्ट
॥२१॥
--- जीव विचार ॥२२॥ (जहन्नेणं) और जघन्यसे ( अंतमुहुत्तं) अंतर्मुहूर्तमान (चिय) निश्चय करके (जियंति) जीता है ॥ ३८ ॥ ॥ ओगाहणाउमाणं एवंसंखेचओसमख्खायं जेपुणइत्थविसेसा विसेससुत्ताउतेनेया ॥ ३९ ॥ ॥ ( ओगाहणा) शरीरकी अवगाहनाका ( आउमाणं) और आयुका प्रमाण (एवं) इस प्रकार (संखेवओ) संक्षेपसे (समख्खायं) अच्छी तरहसे कहा (जे) जो (पुण) फिर ( इत्थ) इसमें (विसेसा) विशेप है (विसेससुत्ताउ) विशेष सूत्रोंसे (ते) उनको (नेया) जानना ॥ ३९ ॥ स्वकायस्थितिद्वार ॥ इसमें प्रथम एकैदिकी स्वकाय स्थिति कहते है। ॥ एगिदियायसवे असंखउस्सप्पिणीसकार्य उववज्झंतिचयंतिय अणंतकायाअणंताओ॥ ४० ॥ 长长长长长长长长长
॥ (गिदियाय) ऐकन्द्रि (अनतकायको छोटकर) (सब्वे) और सर्व (असख)
असख्याती (उस्सप्पिणी) उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालतक (सकायमि) अपनी
काया ( उववज्झति) उत्पन्न होते है (चयति ) चवते हे (य) और (अणतकाया)
अनतकायके जीवों स्वकाया ( अगताओ) अनती वेर ॥ ४० ॥
॥ अब विकलेंद्रि और पर्चेद्रि जीवोसरी स्वाय स्थिति कहते हे ॥
॥ सखिज्झसमाविगला सत्तठभवापणिदितिरिमणुआ
उववज्झतिसकाए नारयदेवायनोचेव ॥ ४१ ॥
॥ (सखिज्यसमा) सख्याता वर्ष तक (विगला) विकलेन्द्रीकी स्वकाय
स्थिति है (सत्तठभवा) सात आठ भवतक (पणिदितिरि) पचेंद्री तिर्यच (मणुआ)
और मनुष्य (उववज्झति) उपनते है (सका) अपनी काया (नारयदेवाय )
नारकी और देवता अपनी कायम (नो) न उपजे न चव तेसेहि नारक चक्के देवता न होवे
और देवता चवकर नारक न होवै (चेव) निश्चय करके इस प्रकारे जीवोंकी स्वकाय
स्थिति कही ।। ४१॥
॥२३॥
खरत गन्छ जान . •7 जयश 'जीव विचार 133933 ॥२४॥ * प्राणदार ८॥ अब दो गाथासे सब जीवोंका प्राण कहते है ।। ॥ दसहाजिआणपाणा इंदिऊसासाउजोगवलरूवा एगिदिएसुचउरो विगलेसुछसत्तअहेव ॥ ४२ ॥ ॥ असन्निसन्नीपंचिंदिएसु नवदसकमेणवोधवा तेहिंसहविप्पओगो जीवाणंभण्णएमरणं ॥ ४३ ॥ ॥ (सहा) दश प्रकारके (जिआण) जीवोंके (पाणा) प्राण है (इंदि) पोंचोइंद्री (ऊसास ) स्वासोच्छ्वास (आउ) आयु (जोगवल) मनादि तीन योग बल (स्वा) रूप (एगिदिएम) एकेंद्रिको (चउरो) चार प्राण १ फरशइंद्री २ कायवल ३ स्वासोच्छास और आयु ऐसे चार (विगलेसु) विकलेन्द्रिको (छसत्त) छ, सात ( अठेव) और आठ अनुक्रमसे जान लेना ॥ ४२ ॥ ॥ (असैन्नि ) असंनी पंचेंद्रीयको ( सन्नीपंचिदिएसु) संनीपंनेन्द्रि जीवोंका प्राण (नव) नव (दस) दश (कमेण ) अनुक्रमसे ( बोधव्या) जान लेना (तेहिंसह) उसकी साथसे (विप्पओगा) जो वियोग होना (जीवाणं) जीवोंका ( भण्णए) कहते है (मरणं) सो मरण ॥ ४३॥ इति प्राणद्वार EEEEEEEEEEEEEEEEEE FEEEEEEEE
FEEEFEE EEEEE
॥ अब जीवोंके प्राणवियोग रूप मरण कितनी वेर हुए है सो कहते हे ॥
॥ एवअणोरपारेससारे सायरम्मिभीमम्मि
पत्तोअणतखुत्तो जीवेहिअपत्तधम्महि ॥ १४ ॥
॥ (एव ) इस प्रकारसे (अणोरपारे ) जिसका पार नही है एसा ( ससारे)
समाररूपी ( सायरम्मि भीमम्मि ) भयकर ममुद्रमें ( पत्तो) मरण प्राप्त हुआ है (अणत-
खुत्तो) अनन्निवर (जीहि ) जीवों (अपत्तधम्मेह) जिनेश्वर महारानाक धर्मको नही प्राप्त
हुआ ऐसा ॥ ४४ ॥
योनिहार
! इसमें प्रथम पीकाय आदि चार स्थापरकी योनि कहते है ।
॥ तहचउरासीलरखा सखाजोणीणहोइजीवाण
पुढवाईणचउण्ह पत्तेयसत्तसत्तेव ॥ ४५ ॥
थी घरखरगम्झीय शान मन्दिर, जयपुर
॥२५॥
जीव विचार 1233333 |॥२६॥ ॥ (तह ) तेसेही ( चउरासीलख्खा) चोरासी लाख ( संखाजोणीणहोइ) संख्या योनिकी है ( जीवाणं) जीवोंकी (पुढवाईण) पृथ्वीकाय आदि (चउण्हं ) चारकी (पत्तेयं ) प्रत्येक प्रत्येककी ( सत्तसत्तेव ) सात सात लाख है ॥ ४५ ॥ ॥ अन वनस्पतिकाय, विकर्लेदी जीवों और पंचेन्दी तिर्यचकी योनि कहते हैं । ॥ दसपत्तेयतरूणं चउदसलख्खाहवंतिइयरेसु विगलिंदिएसुदोदो चउरोपंचिंदितिरियाणं ॥ ४६ ॥ ॥ (दस) दश लाख योनि (पत्तेयतरूणं) प्रत्येक वनस्पतिकी है (चउदसलख्खा- हवंति) चौदह लाख है ( इयरेसु) इतर साधारणकी (विगलिदिएसुदोदो) विगलेन्द्रिकी दोदो लाख कही है ( चउरोपंचिंदितिरियाणं) और नार लाख तिर्गच पंचेन्द्रियकी है॥४६॥ ॥ अन तिर्यचके बिना सन पंचेन्दी जीवोंकी योनि कहते है । ॥ चउरोचउरोनारय सुराणमणुआणचउदसहवंति संपिंडिआयसवे चुलखीलख्खाउजोणीणं ॥४७॥ EEEEE ॥ (चउरोचउरो) चार चार लाख योनि (नारयसुराण) नारीकी और देवोंकी है (मणुआण) मनुप्यकी (चउदसहवति) चौदह लाख योनि है (सपिडिआयसब्वे) ऐसे सब इकठ्ठी मिलानसे (चुलसीलख्खाउजोणीण) सब जीवोकी योनिकी सख्या चोरासी लारत है॥ ४७ ॥ इति ससारी जीवोंका वर्णन समाप्त ॥ अव सिद्ध जीवोके आश्रयी द्वार कहते है ।। ॥ सिद्धाणनत्थीदेहो नआउकम्मनपाणजोणीओ साइअणतातेसि ठिईजिणदागमेभणिया ॥ १८ ॥ ॥( सिद्धाणनत्थीदेहो) सिद्ध जीवोको शरीर नहीं है ( नआउकम्म) आयु भी नही और कर्म भी नहीं है ( नपाणजोणीओ) प्राण भी नहीं और योनि भी नहीं है (साइअणतातेसिं) उसकी सादि अनत (ठिई) स्थिति (जिणंदागमेभणिया) निनेश्वर महाराज के सिद्धातोर्म वही हे ॥४८॥ ॥२७॥ ॥ अखीरका उपदेश ॥
जीव विचार ॥२८॥ ॥ कालेअणाइनिहणे जोणिगहणम्मिभीसणेइत्थ भमियाभमिहतिचिरं जीवा जिणवयणमलहंता ॥ ४९ ॥ ॥ ( कालेअणाइनिहणे) अनादि अनन्तकालमें (जोणिगहणम्मि) योनियोसे गहन और ( भीसणेइत्थ ) भयंकर इस संसारमे ( भमिया) भ्रमण करचुके (भमिहंति) फिर भ्रमण करेगा (चिरं) बहोत काल तक ( जीवा) जीवा (जिणवयणमलहंता) जिनेश्वर महाराजका उपदेशरूपी वचनको नही प्राप्त हुवा ऐसा ॥ ४९ ॥ ॥ तासंपइसंपत्ते मणुअत्तेदुल्लहेविसंमत्ते सिरिसंतिसूरिसिढे करेहभोउज्जमंधम्मे ॥ ५० ॥ ॥ (ता) इस वास्ते ( संपइसंपत्ते ) इस समयपर प्राप्त हुवा ( मणुअत्ते) मनुष्य भव (दुल्लहे ) महा दुर्लभ है (वि) इसमें भी दुर्लभ ( संमत्ते) सम्यक्त्व प्राप्त हुवा है (सिरि) ज्ञान रूपी लक्ष्मीका' धरणेवाले ( संतिमूरि ) इस जीवविचारका बनानेवाला शांतिसुरि महाराज कहते है ( सिठे ) श्रेष्ठ पुरुषोने कहा हुआ (करेहभो) हे भव्य प्राणियो करलो (उनमं) उद्यम (धम्मे ) धर्मके विषे ॥ १० ॥ EFEE
॥ एसोजीववियारोसखेवरुईण जाणणाहेउ
सखित्तोउद्धरिओ रुद्दाओसुयसमुदाओ ॥ ५१ ॥
॥ (एसो) इसप्रकासे (जीव ) जीर्वोका (वियारो) विचार (संखेवरुईण)
सक्षेप रुचीवाले जीवोंको (जाणणाहेऊ) जाननेके लिये (सखित्तो) सक्षेप मात्र (उहरिओ)
उद्धार किया है ( महाओसुयसमुद्दाओ) बहोत विस्तार वाले सूनरूप समुद्रसें ॥५१॥
इति श्रीमन्महायोगीन्द्र आनन्दघन महाराजचरणोपासक अध्यात्मजितमुनि-
विरचित हिन्द्यनुवादसहित जीवविचारप्रकरण समाप्तम्
॥२९॥
332
FERFEEEEEEEEE
॥अथ नवतत्त्वप्रकरण प्रारंभः॥
॥३०॥
EER
33
॥ जीवाऽजीवापुण्णं पावाऽसवसंबरोयनिजरणा
बंधोमुक्खोयतहा नवतत्ताडंतिनायवा ॥१॥
॥ (जीवा) जीव, द्रव्य और भावप्राणको धारण करनेवाले ( अजीया ) ज्ञान-चेतनासे
रहित सो अजीव (पुण्णं) शुभ फलका जो भोगना वह पुण्य (पावा) अशुभ फलको जो
भोगना वह पाप (आसव ) जो शुभाशुभ कर्मका आना वह आश्रव कहलाते है (संवरो)
जो शुभाशुभ कर्मको रोकना वह संवर कहलाते है । (य) और (निजरणा)जो आत्मध्यानसे
शुभाशुभ दोन कर्मको वालके भस्मीभूत करके सर्वथा नही लेकीन देससे उडादेना वह निर्जरातत्त्व
(यंधो) जो शुभाशुभ कर्मका खीरनिरकी तरह आत्मप्रदेशकी साथ बंधहोना वह बंधतत्त्व
(मुख्खो) सर्वथा कर्मोसे जो मुक्त होना सो मोक्षतत्त्व (य) फिर (तहा) तेसे (नव )
नव (तता) तत्त्व याने रहस्य (हुंति) है (नायव्या) जानने योग्य ॥ १ ॥
॥ चउदसचउदसबायालीसा बासीयहुतिबायाला
सत्तावन्नबारस चउनवभेयाकमेणेसि ॥२॥
॥ (चउदस) जीयका गेह भर (चउदस) अजीवका भी चौदह भेद (यायालीसा)
पुण्यके वयालीस भेद (यासीय ) पा5 व्यासी भेद (हुति) है ( बायाला) आश्रवके
यालीस भेद हे ( सत्तावन्न ) र सत्तावन भेद (वारस ) निर्जराके बारह भेद (चउ)
धो चार भेट ( नव ) और मोना नव (भेया ) भेद है ( कमेणेसि) अनुक्रमसे नवे
तत्त्वस सत्र मिरकर २७६ भेद है ॥ २ ॥
॥ अब जीवकी छे जाति कहते है ॥
॥ एगविहदुविहतिविहा चउविहापचछविहाजीवा
चेयणतसइयरेहिवेयगई करणकाएहिं ॥३॥
॥ (एगविर) चेतना लक्षणसे सर जीवो एक प्रकारे है (दुविर) उस और स्थावरपणेसे
जीवांके दो भेद है (तिविता) सीवेद पुरपवेद और नपुसकवेदर्से जीवोंके तिन भेद है (चउविहा)
॥३१॥
长长长长长 तत्व ॥३२॥ 33 देव मनुष्य तिर्यच और नारक इसप्रकारसे जीव चार तरहका (पंच) एकेन्द्रि आदिसें जीव पाँच तरहका (छविहा) पृथ्वी आदि लेकर छे तरहका (जीवा) जीव है (चेयण) ज्ञानादि चेतना सहित (तस) त्रस हलते चलते सो ( इयरेहिं ) इतर स्थिर रहे सो स्थावर ( वेय) तीन वेद (गई) चार गति (करण) इंद्री पाँच (काएहिं ) काया छ ॥ ३ ॥ ॥ अब प्रथम जीवका चौदह भेद कहते है । ॥ एगिंदियसुहुमियरा सन्नियरपणिंदियायसबितिचड अपजत्तापजत्ता कमेणचउदसजियठाणा ॥४॥ ॥ (एगिदिय ) एकेन्द्रि जीवोंके दो भेद है ( सुहमियरा ) एक सूक्ष्म और दुसरा वादर (सन्नि ) मन सहित (इयर) दुसरा असंनि मन रहित ऐसे (पणिंदियाय) पंचेन्द्रिके दो भेद है (स) उस पूर्वका चारकी साथ (वि) दो इंद्रीका एक भेद (ति) तेइंद्रीका एक भेद (चउ) चौरींद्रीका एक भेद यह तिन मिलानेसे सात हुवा ( अपजत्तापजत्ता) वह सात अपर्याप्ता और दुसरा सात पर्याप्ता (कमेणचउदस) अनुक्रमसे ऐसे सब मिलकर चौदह (जिय) जीवोंका ( ठाणा) स्थान है ॥ ४ ॥ EEEEEEE
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। अब जीवका लक्षण कहते है ।
॥ नाणचदसणचेव चरित्तचतवोतहा
वीरियंउवओगोय एयंजीवस्सलख्खण ॥५॥
॥ (नाण) ज्ञान आठ प्रकारे पाँच सम्यात्व जासरे और तीन अज्ञान मिग्यात्व आसरे
(च) और ( दसण ) दर्शनका चार भेद ( चेव) निश्चे (चरित्त) चारीत्रका पाँच भेद
सामायक आदि निश्चय व्यवहार (च) फिर (तवो) तपक बारह भेट (तहा) तेसेही
(वीरिय ) वीर्य दो प्रकारके ( उवओगो) उपयोगके बारह भेद (य) और (ग्य ) ये
(जीवस्स) जीवका (लरसण) लक्षण हे ॥ ५ ॥
।। अत्र जीवोंकी पर्याप्ती कहते है ।
॥ आहारसरीरइदिय पजत्तीआणपाणभासमणे
चउपचपचछप्पिय इगविगलासन्निसन्नीण ॥६॥
॥(आहार ) आहारपर्याप्ति १ (सरीर ) शरीरपर्याप्ति २ (इदिय) इद्रियपर्याप्ति
॥३३॥
नव ॥३४॥ ६EREFREEEEEEEEEEEEEEEEEE ३ ( पज्जत्ती) ऐसे तिन पर्याप्ति (आणपाण) स्वासोस्वास ४ ( भास ) भाषा ५ (मणे) मनपर्याप्ति ६ (च) आहारादि चार (पंच) मन छोडकर पाँच (छप्पिय ) मन सहित संपूर्ण छे पर्याप्ति ( एग) एक इंद्रीको चार ( विगला) बिगलेंद्रीको मन छोडकर पाँच (असन्नि ), असंनी पंचेन्द्रिको मन छोडके पांच ( सन्नीणं) संनी पंचेन्द्रिको छे है ॥ ६ ॥ अब जो इस अपनी अपनी पर्याप्ति पूरी करके मरे सो जीव पर्याप्ता और बीना पुरी कीए मरे सो जीव अपर्याप्ता कहलाता है | ॥ अब जीवोंका प्राण कहते है ।। ॥ पणिंदियत्तिबलूसा-साऊदसपाणचउछसगअठ इगदुतिचउरिंदीणं असन्निसन्नीणनवदसय ॥ ७ ॥ ॥ ( पणिदिय ) पाँच इंद्रीयों (त्तिबल ) मनादि तीन वल ( ऊसास ) स्वासो- स्वास ( आऊ) आयु ( दस ) ऐसे दस (पाण) प्राण है (चउ) स्पर्शनेंद्रिय कायबल स्वासोस्वास और आयु ऐसे चार (छ) पूर्वका चारकी साथ रसना और वचन ऐसे छे ( सग) पूर्वका छेकी साथ नासीका ऐसे सात, ( अठ्ठ) आठ प्राण, पूर्वका सातकी साथ चक्षु (इग एकेंद्रिको पूर्वका चार (दु) दो इंद्रीको पूर्वका छे (ति) ते इंद्रिको पूर्वका सात (चउरिंदीणं) FEEEEEEEEE
चौरिंद्रीको पूर्वका आठ (असन्नि ) असनी पद्रिको ( सन्नीण) और सनी पंचेन्द्रिको
(नवदसय ) अनुक्रमसें नव और दश प्राण जान लेना जेसेकी पूर्वका आठकी साथ श्रोत
मिलानेसे नव और नवकी साथ मन मिलानेसें दश । चार भावप्राण तो सबकाही समान है ।। ७ ।।
इति जीवतत्त्वम्॥
॥ अब अनीव तत्त्वका चौदह भेट कहते है ।।
॥ धम्माऽधम्माऽगासा तियतियभेयातहेवअद्धाय
खधादेसपएसा परमाणुअजीवचउदसहा ॥ ८॥
॥ (धम्मा) धर्मास्तिकाय (अधम्मा) अधर्मास्तिकाय (आगासा) और आकाशा
स्तिकाय (तियतिय) प्रत्येक प्रत्येकका खधादि तीन तीन ( भेया) भेद है ऐसे नव (तहेव)
तेसेही (अहाय ) कालका एक भेद इस प्रकारसे पूर्वका नव और कालका १ सन मिलकर दश
हुआ सो अरूपी है (खधा) और खध ( देस ) देश (पएसा ) प्रदेश (परमाणु) परमाणु
यह चार पुद्गलका रूपी कहा (अजीव ) रूपी अरूपी टोनु मिलकर अजीवका (चउदसहा)
चौदह भेद है ॥ ८ ॥
॥३५॥
नव तत्व ॥३६॥ ॥ अत्र अजीव तत्त्वका विशेप स्वरूप देखलाते है । ॥ धम्माऽधम्मापुग्गल नहकालोपंचहुंतिअजीवा चलणसहावोधम्मो थिरसंठाणोअहम्मोय ॥ ९ ॥ ॥ (धम्माऽधम्मा) धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय (पुग्गल) पुद्गलास्तिकाय (नह) आकाशास्तिकाय ( कालो) और काल (पंच) यह पान (हुंति) है (अजीवा) अजीव द्रव्य (चलणसहायो) चलन स्वभाव गुणवाला (धम्मो) धर्मास्तिकाग है ( थिर- संठाणो) और स्थिरस्वभावगुण वाला ( अहम्मोय) एक अभर्मास्तिकागमें है ॥ ९ ॥ ॥ अवगाहोआगासं पुग्गलजीवाणपुग्गलाचउहा खंधादेसपएसा परमाणुचेवनायवा ॥ १० ॥ ॥ (अवगाहो) अवकाश स्वभावगुणवाला ( आगासं ) आकाशास्तिकायमें है, वह (पुग्गल) पुद्गलकोः (जीवाण) और जीवको अवकाश देता है (पुग्गला) पुदलक (चउहा):चार मेद है ( खंधा) खंध (देस ) देश (पएसा) प्रदेश ( परमाणु) और परमणु:ऐसे (चेव) निश्चे (नायब्वा) जानना ॥ १० ॥ FFFFFEFFEFFEEFEFFERREEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE EFFEE 4
॥ सद्दधयारउज्जोय पभाछायातवेहिआ
वष्णगधरसाफासा पुग्गलाणतुलख्खण ॥ ११ ॥
॥ (सई) जीव शद्वादि तिन (अधयार) अधकार (उज्जोय) प्रकाश (पभा)
ज्योति (छाया) छाया (तवेहिआ) सुर्य आदिकी आतापना (वण्ण) पाँचोही वर्ण
(गध) दोनु गध ( रसा) पाँचरस ( फासा) आठ स्पर्श (पुग्गलाणतु) पुद्गल्का ऐसे
(लख्खण ) लक्षण हे ।। ११ ।।
॥ अव कालद्रव्यका स्वरूप कहते है ।।
॥ एगाकोडिसतसठि लख्खासत्तहुत्तरीसहस्साय
दोयसयासोलहिया आवलियाइगमुहुत्तम्मि ॥ १२ ॥
॥ (एगाकोडि ) एक कोड (सतसहिलख्खा) सडलठ लाख (सत्तहत्तरी-
सहस्साय ) सित्तोतर हजार ( दोयसयासोलहिया) दोसोसे कुछ सोलह अधिक (आव-
लिया) १६७७७२१६ अवलिका (इग) एक (मुहुत्तम्मि) मूहुर्तके विषे होती है ॥१२॥
॥३७॥
नव FESEER 'FEERESE तत्त्व ॥३८॥ ॥ समयावलीमुहुत्तं दीहापख्खायमासवरिसाय भणिओपलिआसागर उस्सप्पिणीसप्पिणीकालो ॥ १३ ॥ ॥ (समय) समय, अतिसुक्ष्म कालको समय कहते है ऐसे असंख्य समयकी (आवली) एक आवलिका होती है ( मुहुत्तं ) मुहूरतकालका प्रमाण आवलीकी संख्यासे पूर्वकी वारवी गाथार्से जाणलेना ( दीहा) ऐसे तीस मुहूर्तका एक अहोरात्री दिन (पख्खा) ऐसे पंद्रह दिनका एक पक्ष ( य) और ( मास ) ऐसे दो पक्षका एक मास ( वरिसा) ऐसे बारह मासका एक वर्ष (य) और (भणिओ) कहा है (पलिआ) ऐसे असंख्य वर्षका एक पल्योपम, ऐसे दश कोडाकोडी पल्योपमका ( सागर ) एक सागरोपम, ऐसे दश कोडाकोटी सागरोपममिलनेसे एक ( उस्सप्पिणी) उत्सर्पिणी और ऐसे दश कोडाकोडी सागरोमकी एक (सप्पिणी) अवसर्पिणी होती है ( कालो) ऐसे उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी मिलकर एक काल चक्र और ऐसे अनंते काल चक्र जानेपर एक पुद्गल परावरतन होते है । ऐसा अनंता पुदल परावरतन होचुके और आगे होवेंगे इति कालद्रव्यका मान कहा ॥ १३ ॥ ॥ अव द्रव्यका स्वरूप इग्यारे बोलसे देखलाते है ।
Etket
FEFEE
॥ परिणामिजीवमुत्त सपएसाएगखित्तकिरिआय
णिञ्चकारणकत्ता सव्वगयइयरअप्पवेसे ॥ १४ ॥
॥(परिणामि) छ द्रव्यम परीणामी क्तिना और अपरीणामी कितना निश्चयनयसे तो
छेही द्रव्य अपरीणामी है और व्यवहारनयम तो एक जीव दुसरा पुद्गल यह दो परीणामी बाकीके
नार अपरीणामी हे १ (जीर) यह उद्र यमें एक जीवद्रव्य चेतन हे शेप पाँच द्रव्य अजीव
अनैतन्य है २ ( मुत्त) यह छे द्रव्यम एक पुद्गल जो हे वह मुर्तिमत हे वार्कीके पाँच द्रव्य अमुर्त
अरूपी है (सपासा ) यह छे द्रव्यम पाँच प्रदेशी हे और एक कालद्रव्य अप्रदेशी है (ग)
यह छे द्रव्यमें धर्म अधर्म और आकाश ये तीन द्रय एक है शेष तीन अनेक है (खित्त) यह
छ त्यमें एक आकाश द्रव्य जो है वह क्षेत्र हे शेप पॉच क्षेत्री है (किरिआय ) इस छे द्रव्यम
जीव और पुद्गल यह दो द्रव्य सक्रिय है शेष चार द्रव्य अक्रिय है (णिच) ये छे द्रव्यमें
व्यवहारसे तो धर्म अधर्म आकाश और काल यह चार नित्य है वाकीके दो द्रव्य अनित्य है और
निश्चयसे छेही द्रव्य नित्य हे (कारण) जीवको छोडकर पाँच द्रव्य कारण है और जीवद्रव्य
अकारण है (कत्ता) ये छे द्रव्यमें जीव तथा पुद्गल व्यवहारसे कर्ता वाकीके चार अर्ता
(सव्वगय) ये छ द्रव्यमें एक आकाशद्रव्य लोकालोक व्यापक है और बाकीके पाँच द्रव्य लोक
व्यापी हे (इयर) इतर (अप्पबेसे) कोई द्रव्य कोईसें मिले नहीं ॥ १४ ॥ इति अजीवतत्त्वम् ।।
॥३९॥
FREE ॥४०॥ ॥ अव पुण्य तत्वके क्यालिस भेद कहते है । -॥ साउच्चगोअमणुदुग सुरदुगपंचिंदिजाइपणदेहा आइतितणुणुवंगा आइमसंघयणसंठाणा ॥ १५ ॥ ॥ (सा) शाता वेदनी कर्म १ ( उच्चगोअ) उंच गोत्र कर्म २ ( मणुदुग) मनुष्य- गति ३ और गनुष्यानुपूर्वी ४ (सुरदुग) देवगति ५ और देवानुपूर्वी ६ (पंचिंदिजाइ) पंचेन्द्रि जातीनाम कर्म ७ ( पणदेहा) औदारीकादि शरीर पाँच १२ (आइतितणु ) आदिके तीन शरीरका ( णुवंगा ) अंगोपांग १५ ( आइमसंघयणसंठाणा ) आदि वज्ररुपभनाराच संघयण १६ और प्रथम संस्थान समचोरस १७ ॥ १५ ॥ ॥ वण्णचउकागुरुलहु परघाऊसासआयवुजोयं सुभखगइनिमिणतसदस सुरनरतिरियाउतित्थयरं ॥१६॥ ॥(वष्णचउका ) शुभवर्णादिचार २१ ( अगुरुलहु ) अगुरुलघु २२ (परधा) पराघातनाम कर्म २३ (ऊसास ) शुभ स्वासोस्वास नामकर्म २४ (आयव) आतापना नामकर्म EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE । 1
१५ (जो ) उपोतनामकर्म २६ (सभखगइ) शुभ विहायोगति निस कर्मके उदयसें जीवकी
हससमान पासी हो २७ (निमिण) निर्माण नामकर्म २८ (तसदस) त्रस दशक ३८ इस
दशकेका भेद आगेकी गाथा कहेंगे (सुर ) देवआयु नामकर्म ३९ (नर) मनुष्यआयु नाम-
कर्म ४० (तिरियाउ ) तिर्यचआयु नामकर्म ४१ (तित्थयर) और तीर्थकरनामकर्म ४२
।। अब त्रसका उसका कहते है ॥
॥ तसवायरपज्जत्तं पत्तेयथिरसुभचसुभगच
सुस्सरआइजजस तसाइदसगइमहोइ ।। १७ ।।
॥ (तस) सनामार्म १ (वायर) वादरनामकर्म २ (पज्जत) पर्याप्तनामकर्म
एक लवधि पर्याप्ता दुनाकरणपर्याप्ता ऐसे दो भेद ३ (पत्तेय) प्रत्येकनामकर्म ४ ( थिर)
स्थिरनामार्म ५ (सुभ) शुभनामर्म ६ (च) और (सुभग) सौभाग्यनामकर्म ७ (च)
और (सुस्सर) मुस्तरनामकर्म निसका स्वर कोकिलाकी तरह मधुर हो ८ (आइजा)
आदेयनामकर्म ९ (जस) यशकीर्तिनामकर्म १० (तसाइ ) नस आदिक (दसग ) दशक
(इमहोइ) इस प्रकारसे है ॥ १७ ॥ इतिपुण्यतत्त्वम् ।।
॥४१॥
॥ अब पाप तत्त्वके वयासी भेद कहते है। ॥४२॥ ॥ नाणंतरायदसगं नवबीयेनीयसायमिच्छत्तं थावरदसनरयतिगं कसायपणवीसतिरियदुगं ॥ १८ ॥ ॥ (नाण) पाँच ज्ञानावरणी मतिज्ञानावरणी १ श्रुतज्ञानावरणी २ अवधिज्ञानावरणी ३ मनःपर्यवज्ञानावरणी ४ और केवल ज्ञानावरणी ऐसे पाँच ( अंतराय) अन्तराय दानान्तराय १ लाभान्तराय २ भोगान्तराय ३ उपभोगान्तराय ४ और वीर्यान्तराय यह पांच अन्तराय ( दसगं) ऐसे दश भेद कहे ( नववीये) और नव दुसरा दर्शनावरणी कर्मके निंद्रा १ निंद्रानिंद्रा २ प्रचला ३ प्रचलाप्रचला ४ थिणद्धी ५ चक्षुदर्शनावरणी ६ अचक्षुदर्शनावरणी ७ अवधीदर्शनावरणी ८ और केवलदर्शनावरणी ९ ऐसे नव और पूर्वकादशमिलकर ओगुणीस (नीय) निचगोत्र २० (असाय) असातावेदनीका २१ (मिच्छत्तं) मिथ्यात्व मोहनीनामकर्म २२ (थावर ) स्थावरको (दस) देशको इरा दशकेका भेद आगे कहगे. ३२ (-नरयतिगं) नरकत्रिक नरकगती नरकानुपूर्ती और नरका आयु ऐसे तीन ३५ ( कसायपणवीस) कशाग पचीस सो देखलाते है अनन्तायुबंधी आदि क्रोधके चार तथा अनन्तानुनंधि आदि मानके चार फिर अनन्तानुबंधि आदि मायाके चार और अनन्तानुबंधी आदि लोभके चार यह सोल कपाय अब नवनो कशाय कहते हैं हास्य १ रति २
अति ३ शोक ४ भय ५ दुगछा ६ खीवेद ७ पुरुपवेद ८ नपुसकोट ९ पूर्वके सोल रुपाय और
यह नव नोशाय सब मीठ २५ तथा पूर्वके ३५ सर मिल साइठ (तिरियदुग) और तिर्यचद्विक
इस लिये तिर्यनगति ६१ और तिर्यंचानुमुवी ६२ ॥ १८ ॥
॥ इगवितिचउजाईओ कुखगइउवघायहुतिपावस्स
अपसत्थवण्णचउ अपढमसघयणसठाणा॥ १९॥
॥ (इग) एकेन्द्रिनाति (वि) दोइन्द्रिनाति (ति) तेरिद्रीनाति (चउ) और चोरिदिनाति
(जाईओ) ऐसे चार जाति नामकर्म यह सब मिल्के छासठ (कुसगइ ) अशुभ विहायोगति
नामकर्म इस नामकर्मसें जीव गधेकी नाइ चले सो ६७ ( उवधाय) उपधात नामकर्म ६८
(हुतिपावरस) वह सब पापके भेद है (अपसत्थवष्णचउ) अशुभ वर्णादि चार ७२
(अपढमसघयणसठाणा) प्रथमका सघयनको छोडकर ऋपभनाराच १ नाराच २ अर्धनाराच
३ कीलीका ४ और सेवठा यह पाच सपेयन और प्रथमका संस्थान छोडकर न्यग्रोध १ सादि २
कुन ३ वामन ४ और हुडक यह पाच सस्थान सब मिलकर पापतत्वका व्यासी भेद हुआ॥ १९ ॥
॥ अब स्थावरका दशका कहते है ॥
॥४३॥
-- ॥४४॥ ॥ थावरसुहुमअपज साहारणमथिर मसुभदुभगाणि दुस्सरणाइजजसं थावरदसगंविवजत्थं ॥ २० ॥ ॥ (थावर ) स्थावर नामकर्म १ (सुहुम) सुक्ष्म नामकर्म २ ( अपज्जं) अनर्याप्ति नामकर्म २ (साहारणं) साधारण नामकर्म ४ (अथिरं) अस्थिर नामकर्म ५ (असुभ ) अशुभ नामकर्म ६ (दुभग्गणि) दुर्भाग्य नामकर्म ७ ( दुस्सर) दुःस्वर नामकर्म जो गधेकी तरह मुंकना ८ (अणाइज ) अनादेय नामकर्म ९ (अजसं) अपयश नामकर्म १० (थावरदसगंविवजत्थं) यह स्थावरको दशको त्रससे विष्परित जान लेना ॥२०॥ इतिपापतत्वम् ॥ अब आश्रव तत्त्वके बयालीस भेद देखलाते है ।। ॥ इंदिअकसायअवय जोगापंचचउपचतिन्नीकमा किरिआओपणवीसं इमाउताओअणुक्कमसो ॥ २१ ॥ । अब पुद्गलका लक्षण कहते है ।। ।
(इदिअ) इन्द्रियो पाच (कसाय) क्रोधादि पाय चार (अन्वय) प्राणा
तीपातादि अनत पाँच (जोगा) मनादि योग तीन (पच) पाँच (3) चार (पच)
पाँच (तिमी) तीन (कमा) अनुत्रमसे जान लेना (किरिआओपणवीस) क्रिया
पनीश (इमाउताओअणुकमसो) यह पचीस नियाको अनुक्मस कहते है ॥ २१ ॥
॥ काइयअहिगरणीआ पाउसिआपारितावणीकिरिया
पाणाइवायारभिअ परिग्गहियामायवत्तीय ॥ २२ ॥
॥ (काइय) कायाको अनतनासे वरतावनासो कायिकि क्रिया १ (अगिरणीआ)
निप्त कियासें जीव नरकादिक्का अधिकारि हो उसको अधिकरणिकी क्रिया कहते है जैसे कि
शवादिसें जीवोंकी हत्या करना (पाउसिआ) नीव अजीवसें जो द्वेष करना वह प्राद्वेपिकी
किया ३ (पारितावणीकिरिया) अपने जीवको या दुसरा जीवोको तकलीफ पहुचाना वह
पारितापनिकी क्रिया ४ (पाणाइवाय)नो किशी जीवको प्राणोंसे रहित करना वह प्राणातिपातिकी
निया ५ (आरभिअ)जो खेति आदि आरमका काम करना सो आरभिकी क्रिया ६
(परिग्गहिया)जो परिग्रह रखना या परिग्रहे पर ममत्त्व रखना सो परिग्रहिकी क्रिया ७
(मायवत्ती)नो माया-कपटसे किशीको ठगना सो मायाप्रत्ययिकी क्रिया ८ ॥ २२ ॥
॥४५॥
नन 长长长长长长长长长长长长长 तत्त्व ॥४६॥ ॥ मिच्छादसणवत्ती अपञ्चक्खाणायदिठिपुडिअ पाडुचिअसामंतो--वणीअनेसत्थिसाहस्थि ॥ २३ ॥ ॥(मिच्छादसणवत्ती) जिनेद्रके सिद्धांतसे जो विपरीत एकान्तक्रियारुची आत्म- ज्ञानसे हिन वहिरात्मा सम्पक् हिन और दृष्टीरागी जिसको सत्यासत्यका निरणे नहीं सो मिथ्या दर्शनकी क्रिया ९ ( अपचक्खाणाय) व्रतपचखान नही करनेसें जो क्रिया लगती है वह अप्रत्याख्यानिकी क्रिया १० (दिठि) जो अशुभ दृष्टीसें देखना सो दृष्टीकी क्रिया ११ (पुडिअ) जो रागादिसें कलुपितचित्ते स्त्री आदिके अंगका स्पर्श करना सो सृष्टीकी क्रिया १२ (पाडचिअ) जो अपने मनसे स्वपरका बुरा विवारना सो १३ (सामंतोवणीअ) अपना अश्व प्रमुखकी प्रशंसासें हर्ष करना सो अथवा दुध दही घी आदिके भाजन खुला रखनेसें उसमें जो अस आदि जीव पडकर गरे उससे लगे सो सामंतोपनिपातीकी क्रिया १४ (नेसस्थि) नैसृष्टिकी क्रिया १५ (साहत्थि) स्वहस्तिकी क्रिया १६ ॥ २३ ॥ ॥ आणवणिविआरणिआ अणभोगाअणवकंखपच्चइआ अन्नापओगसमुदा-णपिज्जदोसेरिआवहिआ ॥ २४ ॥ Pr FERFEEEEE ॥ (आणवणि) जो जीप अजीवको लाने लेजानेसे क्रिया लगे उसको आनयनिकी त्रिया कहते हे १७ (विआरणिआ)जो जीव अजीवको विढानेसे विदारणि लगेसो निया १८ (अणभोगा) अना उपयोगम जो चीन रकम उठाना रखना तथा हल्ने चल्नेसं जो रिया लगे उसे अनाभोगीकी क्रिया कहत है १९ (अणवकखपञ्चइआ) इस लोक तथा परलोकसें जो विरुद्ध आचरण करना से नामाक्षाप्रत्ययीकी किया कहते है२०( अन्नापओग) दुसरी प्रायोगिकी क्रिया २१ ( समुदाण) समुदायकी क्रिया २२ (पिज) माया और लोभ करोसे जो क्रिया लगे उसे प्रेमीकी क्रिया कहते है २३ ( दोसे) क्रोध और मानर्भ जो क्रिया त्गे उसे द्वेपीकी क्रिया कहते हे २४ (इरिआवहिआ) रस्ते चलनेसे शरीरके व्यापारसे जो किया लगे उसे इर्यापथिकीकी क्रिया कहते है २५ सो क्रिया अप्रमत्त साधु तथा सयोगी केवलीको भी लगति हें ॥ २४ ॥ इति आश्रवतत्वम् ॥ ॥ अब सवरका सत्तावन भेद कहते है ।। ॥ समिईगुत्तिपरीसह जइधम्मोभावणाचरित्ताणि पणतिदुवीसदसवारस्स पचभेएहिसगवन्ना ॥ २५ ॥ ॥ (समिइ ) सुमति (गुति) गुप्ति ( परीसह ) परिसह (जधम्मो) यतिधर्म ॥४७॥ FEEEEE तत्व 7713 ॥४८॥ (भावणा) भावना (चरित्ताणि) चारित्र (पण) समिति पांच (ति) गुप्तितीन (दुवीस ) परिसह बावीश (दस) दशविध यति धर्म (बारस) बारह भावना (पंच) चारित्र पॉच (भेएहिं ) ऐसे सब मिलके संवरके भेद ( सगवन्ना) सत्तावन कहै जिसमें दो भेद है एक द्रव्यसंवर और दुसरा भावसंवर नवीन कर्मको रोक देना जो आते हुये आत्मस्वरुपमे रहकर उसको भाव संवर कहते है और कर्म पुद्गलकी रुटवटको द्रव्यसंवर कहते हैं ।। २५ ॥ ॥ अब संवरके सत्तावन भेद विस्तारसे कहते है । ॥ इरियाभासेसणादाण उच्चारेसमिईसुअ मणगुत्तिवयत्तिकायत्तितहेवय ॥ २६ ॥ ॥(इरिया) यत्तनापूर्वक रस्ते, चलना उसको ईर्यासमिति कहते है १ (भासे) निर्दोष भाषाका जो बोलना उसे भाषासमिति कहते है २ (सणा) निर्दोष आहारको जो ग्रहण करना सो एपणासमति ३ (दाणे) दृष्टिसे और पुजनीसे प्रमार्जन करके चीजको उठाना और रखना उसको आर्दननिक्षेपसमिति कहते है ४ (उच्चारे) कफ मल मुत्र आदिको जतनापूर्वक परठना उसे पारिष्टापनिकाय कहते है ( समिई ) पांचसमिति (सुअ) यह ५ (मणगुत्ति) और मनोगुप्तिके तीन भेद है असत्कल्पनावियोग समताभावकी और आत्मविचार ६ (वयगुत्ति) 3333333333333 FFEEEEEEEEEEE EEEEEEEEEEE वचनगुप्तिजिसके दो भेद हे अशुद्ध मिश्र और शुद्ध न्यवहार ७ ( कायगुत्तितहेवय) कायगुप्ति अशुभ करणीसे कायाको गौपरखना ८ ॥ २६ ॥ ।। अत्र बाइस परिसहोंको कहते है । ॥ खुहापिवासासीउण्ह दसाचेलारइथिओ चरिआनिसिहियासिज्जा अकोसवहजायणो ॥ २७ ॥ ॥ (खुहा) क्षुधापरिसह १ (पिवासा)प्यासको सहन करना वह पिपासा परिसह २ (सी) शीत परिसह ३ (उपह) उष्ण परिसह ४ (दसा) डश परिसह ५ (चेला) अचेलक परिसह ६ (अरह) अरति परिसह ७ (थिओ) स्त्रीके अगउपाँगको सराग दृष्टिसे न देखे सो स्त्री परिसह ८ (चरिआ) चलनेका परिसह ९ (निसिहिया) नेपेधिकी इस लिये स्मशान और सिंहकी गुफा आदि स्थानोमें ध्यानक समय नाना प्रकारक कष्टको सहता हुवा भी निपिद्ध न करे सो १० (सिज्जा.) सधारेकी भूमी क्हाही उची निती मिलमानेपरभी मुनि उद्वेग न करे सो सय्या परिसह ११ ( अक्कोस) आक्रोश इस लिये कोई गाली देवे तोभी सहन करे १२ (वह) वध इस लिये कोई दुष्ट नीव मुनिको मारे पीटे या जानसे मारडाले तो भी वीतरागी साधु क्रोध न करे १३ (जायणा) याचना परिसह १४ ॥ २७ ।।
१३३३३३.12. ॥५०॥ ॥ अलाभरोगतणफासा मलसकारपरीसहा पन्नाअन्नाणसम्मत्तं इअबावीसपरीसहा ॥ २८ ॥ ॥ (अलाभ) लाभान्तराय कर्मके उदयसे जो मागने परभी चीज न मिले तोभी समता रखे और विचारे कि अन्तराय कर्मका उदय है सो अलाभ परिसह १५ (रोग) ज्वरादि अति रोग आने परभी साधु चिकीत्सा करानेकी इच्छाभी न करे किन्तु संभावसे सहन करे सो रोग परिसह १६ (तणफासा ) तृण स्पर्श परिसह साधुको तृण आदिको जो संथारो मिले तोभी शांत चित्तसे वेदना सहन करे १७ (मल) मलपरिसह इस लिये शरीरपर जो पसीनेसे मेल चढ जावे तोभी स्नानादिकी इच्छा न करे १८ (सकारपरीसहा) सत्कारपरिसह, उत्कर्षमें न आवे, स्तुति करणेपर समचित्त रखे १९ (पन्ना) प्रज्ञा इस लिये बडी विद्वता होनेपरभी मुनि घमण्ड न रखे २० (अन्नाण अज्ञान परिसह अज्ञानके उदयसे मुनि दुर्ध्यान न करे २१ ( सम्मत्तं ) सम्पक्त्वपरिसह ( इअ) इस प्रकारसे (बावीसपरीसहा) वावीशपरिसह जाणना २२ ॥ २८ ॥ ॥ अब इसगाथासें दश प्रकारे यति धर्म कहते है ॥ ॥ खंतीमद्दवअजव मुत्तीतवसंजमेअबोधवे सञ्चंसोअंआकिंचणंच बंभचजइधम्मो ॥ २९ ॥ FEEEE ॥ (खती)क्षमा सब प्राणीमात्रपर सम दृष्टी रखे किन्तु यति कोइपर क्रोध न रखे १ (महव) मानका त्याग करना उसको मार्दव धर्म कहते है २ (अजव)किशीके साथ कपट नहि रखना सो आर्जव धर्म ३ (मुत्ती) निरलोभता ४ (तव) तप जो इच्छाका निरोध करना वही तप ५ (सजमे ) सत्तरे प्रकारे सयमका आराधन करना वही समय ६ (अ) और ( बोधव्वे ) जानना (सच ) सत्यधर्म ७ (सोअ) मन आदिको पवित्र रखना वह शौच धर्म ८ (आकिचण) वाह्य अभ्यन्तर परीग्रहका त्याग सो अकिंचन धर्म ९ (च) और (वभ) द्रव्यर्स और भावसे जो मैथुनका त्याग करना वह ब्रह्मचर्य धर्म १० (जइधम्मो) ऐसे दश प्रकारे यति धर्म पाले उसको यति कहना योग्य है इससे जो विपरित हो वह यति नही समजना कुयति समजना ॥२९॥ ! अन बारह भावना कहते है। ॥ पढममणिच्चमसरण ससारोएगयायअन्नत्त असुइत्तआसवसवरोअ तहनिजरानवमी ॥ ३० ॥ ॥ (पढममणिच) प्रथम अनित्यभावना इस भावनामें भव्यजीव ऐसा विचारे कि धन यौवन आदि सब पदार्थ अनित्य है आत्माका मूल धर्म अविनाशी है १ (असरणं) अशरण भावना कि मृत्युके समय इस जीवको ससारमें धर्म बिन कोई भी शरणभूत नही है एक धर्मही शरण है ऐसा
--
तत्त्व
॥५२॥
विचारना सो २ (संसारो) संसारभावना इस भावनामें भव्य ऐसा विचारे कि मेरे जीवने चौरासी लख
योनिमें परिभ्रमण करते अनन्तेकाल चक्र हो गये है इस संसारमें पिता सो पुत्र और पुत्र सो पिता ऐसा
उलट सुलट अनंती वेर होते है ऐसा विचारना सो संसार भावना ३ (एगयाय) एकत्व भावना
इस भावनामें भव्य ऐसा चिनवे कि मेरा जीव अकेलाही आये है और अकेलाही जावेंगे सुखदुःख भी
अकेलाही भोगेंगे ४ ( अन्नत्तं ) अन्यत्त्व भावना इसमें भव्य ऐसा विचारे कि मेरा आत्मा अनन्त
ज्ञानमयी है और शरीर जड पदार्थ है शरीर आत्मा नहीं है न आत्मा शरीर है ऐसा सदैव विचारे ५
(असुइतं ) अशुचि भावना यह शरीर खून मॉस हड्डी मलमूत्र आदिसें भराहुआऐसा जो विचा-
रना वह अशुचित्त्व भावना ६ (आसव) आस्रव भावना रागद्वेप और अज्ञान मिथ्यात्व आदिके
जोरसे नये नये कर्मका जो आना अर्थात् शुभाशुभका विचार वह आस्रव ७ (संवरोअ)संवर भावना
शुभाशुभ विचारको छोडकर स्वसरूपमें लीन रहना अर्थात् नवीन कर्मको आने नहीं देना वह निश्चय
संवर और अकेला अशुभ विचारोंको :रोकदेना सो व्यवहार संवर भावना ८ (तह ) तेसेही
(निजरानवमी) नवमी निर्जरा भावना निर्जराके दो भेद है एक सकाम निर्जरा और दुसरी अकाम
निर्जरा ९॥ ३० ॥
॥ लोगसहावोबोही दुल्लहाधम्मस्ससाहगाअरिहा
एआओभावणाओ भावेअवापयत्तेणं ॥ ३१ ॥
॥ (लोगसहावो) दशमी लोकम्वरूप मावना इसमें चौदह रानलोक्का स्वरूप विचारना
(योहीदुलहा ) ११ मी सम्यक्त्वकी प्राप्ति होनी होत दुर्लभ है ऐसा रिचारना वह बोधि दुर्लभ
भावना (धम्मस्स) मारहवी धर्म भावना इसम भय ऐसा विनारे कि ससारसमुद्रसे पार होनेके लिये
नो निनम्वर महाराजने कहा हुआ धर्म है उसका (साहगाअरिर) साधक अरिहतादि मिलना दुर्लभ
है (एआओ) इस प्रसारसे वही हुई (भावणाओ) भावनाओ (भावेअध्वा ) विचारनी
(पपत्तेण)प्रयत्नमें ॥ ३१ ॥
। अत्र चारित्रके पान भेद कहते है ।।
॥ सामाइअत्थपढमं छेओवठ्ठावणभवेवीअ
परिहारविसुद्वय सुहुमतहसपरायच ॥ ३२ ॥
॥५३॥
॥ (सामाइ) सामायिक नारिनद्रव्य और भावसे (अत्य) इधर (पदम) पहिले हे १
(छेओवठवणभवेबीअं) दोपस्थापनीयचारित दुसरा हे २(परिहारविसुद्धीय)परिहार-
पिशुद्धि नारिन ३ (सुहमतहसपरायच) फिर चोथा सुक्ष्मसपराय चारित्र ४ यह चारित्र दशमा
गुणस्थानवाले मुनिको होते हो ॥ ३२ ॥
नव 山山山山山出出出出出出 ॥ तत्तोअअहख्खायं खायंसबम्मिजीवलोगम्मि जंचरिऊणसुविहिआ वच्चंतिअयरामरंठाणं ॥ ३३ ॥ ॥ (तत्तोअअहख्खायं) उस पीछे पाँचमा यथाख्यात चारित्र (खायंसव्वम्मिजीव- लोगम्मि) यह चारित्र सब जीव लोग प्रसिद्ध है (जंचरिऊणसुविहिआ) जिसका सेवन करनेसे साधु लोगों ( वचंतिअयरामरंठाणं) अजरामररथानकको पाते है ॥ ३३ ॥ इति संवर तत्त्व तत्त्वम् ॥ ॥५४॥ : ॥ अब निर्जरा तत्त्वके बारह भेद कहते है ॥ ॥ अणसणमूणोअरिआ वित्तीसंखेवणंरसच्चाओ कायकिलेसोसलीण-यायवज्जोतवोहोइ ॥ ३४ ॥ ॥ (अणसणं) सर्वथा आहारका त्याग सो अनशन तप १ (ऊणोअरिआ)आहार कम करना सो उनोदरी तप २ (वित्तीसंखेवणं ) वृत्तिका संक्षेप करना सो वृत्तिसंक्षेप तप ३ (रसचाओ) विगयका त्याग करना सो रस त्याग तप ४ ( कायकिलेसो) लोचादि जो कष्ठ करना वह कायाकलेश तप ५ (संलोणयाय) सब इन्द्रियोंका दमन करना वह संलीनता तप (बजोतवोहोइ) इस प्रकारसें बाह्य तपके छे भेद कहै ॥ ३४ ॥ FERE FEE FEEEEEEEFER ॥ पायच्छित्तविणओ वेयावञ्चतहेवसज्झाओ झाणउस्सग्गोविअ अप्भितरोतवोहोई ॥३५॥ ॥ (पायच्छित्त) जो शुद्ध म से गुरु महाराजके पास आलोयणा लेना सो प्रायश्चित तप १ (विणओ) विनय तप २ (यावच्च ) वेयावृत्य तप ३ (तहेवसज्झाओ) तेसेही स्वाध्याय तप ४ ( झाण) व्यान तप 'यानका स्वरूप गुस्गमसे धारना ५ (उस्सग्गोविअ) और उत्सर्ग तप ६ (अप्भितरोतवोहोइ) ऐसे छे प्रकारसे अभ्य तर तप कहै | ३५ ।। ॥ वारसविहतवोनिजराय वधोचउविगप्पोअ पयईठिइअणुभागो पएसभेएहिनायवो ॥३६॥ ॥(बारसविह) ऐसे सत्र मिलकर बारह भेदे (तवो) तप (निज्झराय) निर्जराके लिये है। इति निर्जरातत्त्वम् (बधो) अब वधतत्त्व (चउविगप्पोअ) चार भेदे है (पयई) १ प्रकृतिवध (ठिइ ) स्थितिबध (अणुभागो) ३ अनुभाग बध (पण्स) और प्रदेशवध ४ (भेएहिं ) ऐसे चार भेदसं (नायव्वो) जानना ॥ ३६ ॥ ॥ अत्र वधतत्वका विशेष सरूप देखलाते है ।
- नव EEEEEEF तरक ॥५६॥ ॥ पयइसहावोवुत्तो ठिईकालावहारणं अणुभागोरसोनेओ पएसोदलसंचओ ॥३७॥ ॥(पयइसहावोवुत्तो) प्रकृतिबन्ध इसलिये कर्मोका स्वभाव (ठिईकालावहारणं) कर्मोकी स्थिति-कालका निश्चय वह स्थितिवन्ध २ (अणुभागो) ३ अनुभाग बन्ध सो ( रसोनेओ) कर्मोका रस जानना (पएसो) ४ प्रदेशबन्ध ( दलसंचओ) कर्मोके दलका संचय ॥ ३७॥ ॥ पडपडिहारसिमज्ज. हडचित्तकुलालभंडगारीणं जहएएसिंभावा कम्माणविजाणतहभावा ॥ ३८॥ ॥ (पड) पाटा, जैसे किसीके आंखेपर बन्धे हुए पाटेके संयोगसे कुछ नहीं देखाए देते तेसे ही ज्ञानावरणीय कर्मके स्वभावसे आत्माके अनन्त ज्ञान नहीं दिखलाते है १ (पडिहार) द्वार- पालकेसमान दर्शनावरणीय कर्मको स्वभाव है जैसे राजाको दर्शन चाहनेवालेको द्वारपाल रोक देते है उसी तरह आत्माके दर्शनगुणको दर्शनावरणीय कर्म रोक देते है २ (असि) तरवार, वेदनी कर्मका स्वभाव ऐसा है कि जैसे सक्कर खरडी तलवारकी धारको चाटनेसे अच्छा लगता है मगर जबजीभ कटा- जाति है तब दुख होते है वैसीही तरह शातावेदनीसें जीवको सुख होता है और अशातावेदनीसे FEEE FFFFFFFE जीवको दुख होता है ३ (मज्ज) मराकीछाक समान मोहनीयकर्मका स्वभाव है जैसे मदिरासें जीव वेभान होनाते है तसेही मोहनीयकर्मके उयदसे जीव ससारम मुझाते है यह कर्म आत्माका सम्यग्ज्ञानको और सम्यक् चारित्र गुणोको रोकते है अर्थात् ढक दते है ४ ( हड ) खोडासमान आयुकर्म है जेसे खोडेमें पडे हुए चोर रानाके हुक्म बिन नही निकल शगते है तैसे ही आयुकर्मके जोरसे जीव गतीसे नहीं निकल शगते है ५ (चित्त) इस नामकर्मका स्वभाव चित्रकार जैसा है यह कर्म आत्माके अरूपि वर्मको रोकते है जैसे चित्तारा अच्छा बुरा नाना प्रकारका चिनामन बनाते है तेसे ही यह नामर्म आत्माको अछी धुरी गतियांमे पहुचा ढते हे नाना प्रकारके स्वरुपको धारण करा देते है ६ (कुलाल) यह गोनकर्म कुमार जैसा हे असे कुभार अछे और बुरे नाना प्रकारके वरतन बनाते है तेसेही इस कर्मके उदयस जीव ऊच निच कुलको वारण करते हे ७ (भडगारीण) इस अतराय नर्मका स्वभाव भडारी जैसा हे क्योंकि जब राना किमीको दान देनेके लिये भडारीको कहे परन्तु भगरी उमको देव नहीं ऐसेही इस कर्मक उदयसे नीर नानादि नहीं कर शकते है८ (जहाणसि- भागा ) जैसा यह आठोही वस्तुका स्वभाव है (कम्माण) तैसेही आठोही कर्माकाभी (विजाण) विदमान है (तहभावा) तैसेही स्वभाव ॥ ३८ ॥ ।। अत्र कर्माकी मूल तथा उत्तर प्रकृती कहते है ।।
तत्व
॥५॥
॥ इहनाणदसणावरण वेयमोहाउनामगोआणि
विग्धंचपणनवदु अठवीसचउतिसयदुपणविहं ॥ ३९ ॥
॥ (इहनाण ) यह ज्ञानावरणीयकर्म १ (दसणावरण) और दुसरा दर्शनावरणीकर्म
२ (वेयमोहाउनामगोआणि) तीसरा वेदनीयकर्म ३ ४ मोहीनीकर्म ५ आयुकर्म ६ नामकर्म
और सातमा गोत्रकर्म ७ (विग्धं ) अन्तरायकर्म ८ (च) यह आठ कर्म (पण) ज्ञाना-
वरणीयकी उत्तर प्रकृतियों पाँच है ( नव ) और दर्शनावरणीयकी उत्तरप्रकृति नव (दु ) वेदनीकी
प्रकृति दो ( अठवीस ) मोहीनीकर्मकी उत्तर प्रकृति अठ्ठावीस ( चउ) आयुकर्मकी उत्तर प्रकृति
चार (तिसय ) नामकर्मकी उत्तर प्रकृति एकसो तीन (दु) गोत्रकर्मकी उत्तर प्रक्रति दो (पण)
और अन्तराय कर्मकी उत्तर प्रकृति पांच (विहं ) ऐसे सब कर्मोकीउत्तर प्रकृति एकसे अट्ठावन
जान लेना ॥ ३९ ॥
FEEEEEEEEEEL
॥ अव आठोहि कर्मोकी उत्कृष्टी स्थितिका बन्ध कहते है ।।
॥ नाणेयदसणावरण वेअणिएवंअंतराएअ
तीसं कोडाकोडी अयराणंठिईयउक्कोसा ॥ ४० ॥
॥(नाणेयदसणावरणवेअणिए ) ज्ञानावरणी दर्शनावरणी वेदनी (चेव) निश्चय (अतराण्अ ) और अन्तराय इन चारो कर्माकी (तीसकोडाकोडी) तीस कोडाकोडी (अयण) सागरोपमकी (ठिईयउक्कोसा) उत्कृष्टी स्थिति कही है ।। ४० ॥ ॥ सत्तरिकोडाकोडीमोहणिए वीसनामगोएसु तित्तीसअयराइ आउठिइबधउक्कोसा ॥४१॥ (सत्तरिकोडाकोडी) सित्तर क्रोडामोडी सागरोपमकी स्थिति (मोहणिए) मोरनीय कर्मकी है (वीसनामगोण्सु) वीस कोडाकोडी सागरोपमकी स्थिति नामर्म और गोत्रकर्मकी हे (तित्तीसअयराड ) तैतीस सागरोपमकी (आउ ) आयुकर्मकी (ठिइ ) स्थिति रही (बघउकासा) ऐसे सव व मौकी उकृष्टी स्थितिका वध रहा है ॥ ४१ ॥ ॥ वारसमुहुत्तजहन्ना वेयणिएअठनामगोएसु सेसाणतमुहुत्त एयवठिईमाण ॥ ४२ ॥ । अब आगेही कमौकी जान्यस्थिति कहते है ।।
नव FEEEEEEEEEEEEEE FEEEEEEEEE ॥६॥ %D ॥ (बारसमुहुत्तजहन्ना) बारह मुहूत्र्तकी जघन्यस्थिति ( वेयणिए ) वेदनीयकर्मकी हैं ( अठनामगोपसु) आठ मुहूर्तकी जनन्यस्थिति नामकर्म और गोत्रकर्मकी हैं (सेसाणंत- मुहत्तं ) शेष पाँच कौकी जघन्यस्थिति अन्तर मुहूर्तकी है (एयंबंधठिईमाणं) इस प्रकासे सन कर्माकी उत्कृष्टी और जधन्यसे स्थिति का प्रमाण कहा ॥ ४२ ॥ इति बंधतत्वम् ।। ॥ अन अठारे गागायोंसे नवमा मोक्षतत्त्वका नव भेद और सिद्धोके पन्द्रह भेद देखलाते है । ॥ संतपयपरूवणया दवपमाणंचखित्तफुलणाय कालोअअंतरभाग भावेअप्पाबहुचेव ॥ ४३ ॥ ॥ (संतपयपरूवणया ) सत्पदकी प्ररुपणादर १ ( व्वपमाणं) फिर सिद्धजीवोंके द्रव्यका प्रमाणद्वार २ (खित ) क्षे द्वार ३ (फूसणाय ) सिद्धोकी स्पर्शनाद्वार ४ (कालोअ) कालद्वार ५ ( अंतर ) अन्तरद्वार ६ ( भाग) भागद्वार ७ (भाव) भावद्वार ८ (अप्पाबहु) और अल्प बहुत्वद्वार ९ ( चेव ) निश्चे यह मोक्षके नव द्वार कहै ॥ ४३ ॥ ॥ प्रथम सत्पद प्ररुपणाद्वार स्वरूप देखलाते हैं । ॥ संतंसुद्धपयत्ता विजंतंखकुसुमबनअसंतं मुक्खत्तिपयंतस्सओ परूवणामग्गणाईहिं ॥ ४४ ॥ EEEEEEEEEEEE FEFF
FEEEEEEEEEEER
॥ (मत) मोक्ष मत्य है (मुह) शुद्ध (पयत्ता) पद (विज्जत्तखकुसुम-
म्वनअसत्त) यह विद्यमान है परन्तु वह आकाशक कुसुमकी तरह असत्य नही है (मुक्ख-
त्तिपयतरसओ) यह मोक्षपत की (परूपणा) प्ररूपणा ( मग्गणाईहि) मार्गणाद्वारको
दिनाग्मे कहते है ।। ४४ ॥
। गडइटीएकाये जोएवेएकसायनाणेय
सजमदसणलेसा भवसम्मे सन्नि आहारे ॥४५॥
(गड) गतिमार्गणा १ (इदी ) इद्रिमार्गणा ( काय ) कायमार्गणा ३ (जोग)
-- (वेग) वनमार्गणा ५ ( कसाय) पायमार्गणा ६ (नाणेय) ज्ञानमार्गणा ७
(मन) मासमार्गणा ८ ( दसण ) दर्शनभार्गणा ९ (लेसा) लेश्यामार्गणा १० (भव)
- ११ ( सम्मे) सम्यरमार्गणा १२ (सन्नि) सनिमार्गणा १३ (आहारे)
माहानागा १४ ॥ ४५ ॥
।। अत्र निचेकी गायासे जीव कितनी मार्गणामें मोस जाते है सो देखलाते है ।
॥ नरगइपणिदितसभव सन्निअहक्खायखइअसम्मत्ते
मुक्खोणाहारकेवल दसणनाणेनसेसेसु ॥ ४६ ॥
॥६॥
तत्त्व ॥६२ REEEEEEEEEEEEEEEE ॥(नरगइ ) मनुष्यगतिसें १ (पणिदि) पंचेन्द्रिसें २ (तस) त्रसकायसें ३ (भव ) भव्यपणसे ४. (सन्नि) संनीपंचेन्द्रिसे ५ (अहक्खायं) यथाख्यातचारीबसें । (खइअसम्मत्ते) क्षायकसम्यक्त्वसे ७ (मुक्खो) मोक्ष जाते हैं और ( णाहार ) अणहारीक पदसैं ८ (केवलदसण) केवल दर्शनमें ९ (नाणे) और केवलज्ञानसे इन दश मार्गणा द्वारसे जीवों मोक्ष जाते है १० ( नसेसेसु) परन्तु शेप मार्गणाओंसे मोक्ष नही जाते ॥ ४६ ॥ ॥ इति प्रथमद्वार ॥ ॥ अत्र द्रव्यप्रमाण और क्षेत्रद्वार कहते है। ॥ दवपमाणेसिद्धाणं जीवदवाणिहुंतिणंताणि लोगस्सअसंखिझे भागेइकोयसवेवि ॥४७॥ ॥ (द्वपमाणेसिहाणं) सिद्धोके द्रव्यकाप्रमाण (जीवदवाणिहुतिणंताणि) सिद्धोमें जीवद्रव्य अनंता है। इति दुसरा द्वार २ (लोगस्सअसंखिजेभागे) चौदह राजलोकके असंख्यातमे भागमे ( इकोय) एक सिद्ध और (सव्वेवि) सत्र सिद्ध रहते है ॥ इति तीसरा द्वार ३ ॥ ४७ ॥ FERREE ॥सणाअहिआकालो इगसिद्धपहुञ्चसाइओणतो पडिवायाभावाओ सिद्धाणअतरनत्थि ॥४८॥ ॥ (फूसणा) पर्शना सिद्ध जीवोंकी (अहिआ) अधिक हे यह चौथा द्वार ४ (कालो) काल (इगसिहयाचसाइओणतो) एक सिद्ध आश्रित सादि अनन्त स्थिति है और अनेक सिद्ध आश्रीत अनादि अनन स्थिति है ॥ इति कालद्वार ५ (पडिवायाभावाओ) सिद्धाके जीवोंको पिठा पडनेका अभाव हे ॥ इति छठा द्वार ६ (सिद्वाणअतरनत्थि) सिद्धोंके जीवोंको अन्तर नहीं हैं कालकृत और क्षाकृत दोनोंसें इति सातमा द्वार ॥ १८ ॥ ॥ अब भागद्वार कहते है। ॥ सदजियाणमणते भागेतेतसिदसणनाण खइएभावेपरिणामि एअपुणहोइजीवत्त ॥ ४९ ॥ ॥(सव्यजियाणमणते) सत्र समारी जीवोंसे सिद्धके जीवों अनतम (भागे) भागे है इति आठमो द्वार ८ (तेतेसिदसणनाण) उन सिद्धोके जीवोंको केवलदर्शन और
नव
॥६४॥
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केवलज्ञान (खइए) क्षायिक (भाव) भावे है (परिणामी) परिणामी हैं (एअपुण)
यह पुनः ( होइजीवत्तं) जीवत्वपना हे ॥ ४९ ॥
॥ अत्र अल्प बहुत्वद्वार कहते हैं |
॥ थोवानपुंससिद्धा थीनरसिद्धाकमेणसंखगुणा
इअमुक्खतत्तमेअं नवत्तत्तालेसओभणिआ ॥ ५० ॥
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॥ (थोवा) सबसे कम ( नपुंस) नपुंसक (सिन्हा) सिद्ध हुवा (थी) नपुंस-
कसे सीसिद्ध संख्यातगुणी अधीक हैं स्त्री सिद्धसे ( नरसिहा) पुरूप सिद्ध संख्यातगुणे सिद्ध हुए
(कमेपासंखमुणा) अनुक्रम संख्यातगुणा जानना (इअमुक्ख) यह मोक्षके (तत्त-
मेअं) तत्व इस प्रकारसे नव भेद कहे (नवतत्तालेसओभणिआ) इस प्रकारे नव तत्त्व
संक्षेपसे कहे गये ।। ५० ॥
॥ जीवाइनवपयत्थे जोजाणइतस्सहोइसम्मत्तं
भावेणसद्दहंतो अयाणमाणेविसम्मत्तं ॥ ५१ ॥
॥(जीवाह) जीवादि लेकर ( नवपयत्थे ) नव पदार्थको (जोजाणह) जो जीव
जाणते हे (तस्सहोइसम्मत्त ) उस जीवको अवश्यही सम्यक् हो (भावणसहरतो) और
भावसे जो सद्द है तो (आयाणमाणेवि) अनान जीवोको मी ( सम्मत्तं) सम्यक् प्राप्ति हो
॥ सवाइजिणेसरभासिआइ वयणाईनन्नहाहुति
इअवुद्धोजस्समणे सम्मत्तनिचलतस्स ॥ ५२ ॥
॥(स-वाइ ) सब प्रकारर्स (जिणेसरभासिआइ)निनेश्वर महाराजके कहे हुए
( वयणाई) बान ( नन्नहाति ) अ यया नही हे लेकीन सत्य है (एअयुद्धीजस्समणे)
ऐसी बुद्धि गिमको हो ( सम्मत्तनिचलतस्स ) उस प्राणीको निश्चय सम्यक् हो ॥ १२ ॥
।। अतोमुत्तमित्तपि फासिअहुजजेहिसम्मत्त
तेसिअवठ्ठपुग्गल परिअहोचेवससारो ॥ ५३ ॥
।। (अतोमुहत्तमित्तपि) एक अन्तर मुहुर्त मानभी ( फासिअहुजजेहि) स्पर्श
॥६५॥
नव हुआ हो जिसको (सम्मत्तं ) सम्यक् ( तेसिं ) तिस जीवको ( अबदु ) अर्ध (पुग्गल- परिअढ़ो) पद्गल परावर्ततक उसको परिभ्रमण करना होगा (चेव) निश्करेके (संसारो) संसारमं बाद मोक्षमे जावेंगे ॥ ५३ ।। ॥ उस्तप्पिणीअगंतापुग्गलपरिअमो मुगेअदो तेणंतातीअंदाअणालयद्वाजतगुणा ॥ ५४ ॥ ॥ (उस्सप्पिणीअणंता) अनन्ती उत्सपिणी और अनमी समर्पिणी जाने पर (पुग्गलपरिअदृओमुणेअव्यो) एक पुद्गल परावर्तन होते है (गतातीमा) तेगा अनन्ता पुद्गल परावर्तन अतितकाले हो चुके ( अणागयहाणेनगुणा) और अनागत काले अनन्तगुणा आगे जावेंगे ॥ ५४ ॥ fif山山山山山山山山山山山 १५ ॥ अव सिद्धोके पन्द्रह भेद कहते है ॥ ॥ जिणअजिणतित्थतित्था गिहिअन्नसलिंगथीनरनपुंसा पत्तेअसयंबुद्धा बुद्धबोहिक्कणिकाय ॥ ५५ ॥ 4"
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॥ (जिण) निनसिद्ध १ (अजिण) अजिनसिद्ध २ (तित्थ) तीर्थसिद्ध ३
(तित्था) अतिर्थसिद्ध ४ (गिहि ) गृहीलिंगेसिद्ध ५ ( अन्न) अन्यलिंगेसिद्ध ६ (स-
लिंग) स्वलिंगेसिद्ध ७ (थो) स्वीलिंगसिद्ध ८ ( नर) पु परिगेसिद्ध ९ (नपुसा) नपुसकलिंगे
सिद्ध १० (पत्तेअ) प्रयेफ शुद्धसिद्ध ११ (सययुद्धा) स्वयबुद्धसिद १२ (घुडयोहि)
बुद्रोधिसिद्ध १३ (कणिकाय) एकसिद्ध १४ और अनेक सिद्ध १५ यह सिद्धके पन्द्रह भेद
सक्षयसे कहा फिर बिश देग्वलाते है ॥ १५ ॥
॥ जिणसिद्धाअरिहता अजिणसिद्धायपुंडरियापमुहा
गणहारितित्थसिद्धा अतित्थसिद्धायमरुदेवो ॥ ५६ ॥
॥(जिसिड ) ती क्रि होके मोक्ष गये वह तीकरसिद्ध (अरिहता) शपभादि
अपरिहतसिद्ध १ (अजिगनिहाय उरियापनुहा) अमिनसिद्ध मामा य केली पुटरिक गावा
आदि २ (गग रिति य सहा ) गग र गौमादि तीर सिद्ध ३ (अतित्यसिडाय-
मरुदेवी) अतीथसिद्ध पह म यी ४ ॥ ५६ ॥
॥ गिहिलिगसिद्धभरहो वलकलचीरीयअन्नलिंगम्मि
साहुसलिगसिद्धा थीसिद्धाचदणापमुहा ॥ ५७ ॥
॥६७॥
॥६॥ + M ॥(गिहिलिंगसिह ) गृहीलिंगे सिद्ध हुये (भरहो) वह भरतादि ५ (वलकल- चीरीय) वल्कल चीरीयादि तापशके वेपमें जो सिद्ध हुये ( अन्नलिंगम्मि) वह अन्यलिंगे सिद्ध जानना ६ ( साहुसलिंगसिद्धा) साधुके देपने जो सिद्ध हुए वह स्पलिंगसिद्ध ७ ( थीसि- डाचंदणापमुहा ) स्त्रीके लिंगमे जो सिद्ध हुए वह चंदन वालादि लेकर ८॥ १७ ॥ ॥ पुंसिद्धागोयमाई गंगेयाईनपुंसयासिद्धा पत्तेयसयंबुद्धा भणियाकरकंडकविलाई ॥ ५८ ॥ ॥(पुंसिद्धागोयमाई ) पुरुष लिंगे सिद्ध गौतमादि ० (गांगेयाईनएसयासिद्धा) गंगेयादि जो सिद्ध हुए वह नपुंसकलिंगे सिद्धा १० (प्रत्तेयसयंबुद्धा) प्रतेक बुद्धसिद्ध और स्वयं बुद्ध अनुक्रमसें ( भणिया ) कहा ( करकंडु) करवंडु राना ११ ( कविलाई ) और कपिल आदि कहे १२ ॥५८ ।। ॥ तहबुद्धबोहिगुरुबोहिया इगसमयएगसिद्धाय एगसमएविअणेगा सिद्धातेणेगसिद्धाय ॥ ५९॥ FEEFFER ॥ (तह ) फिर तेसे ही (बुद्धयोहिगुरुपोरिया) बुद्धबोधित सिद्ध हुए वह गुरु उवदेशप्त १३ ( एगसमयएगसिहाय) एक समयमै एकही सिद्ध होए (एगसमविअ- गा) एक सिद्ध महायीर आदि १४ और एक समयमें अनेक (सिहातेणेगसिहाय) सिद्ध होये वह स्वभादि १५ ॥ १९ ॥ ।। जइआइहोइपुच्छा जिणाणमग्गमिउत्तरतइया इक्कसनिग्गोयस्स अणतभागोयसिद्धिगओ ॥६०॥ ॥ (जइआइहोइपुच्छा) जित निस समयपर भगवान्को पुछनेमें आवै (जिणा- णमग्गमिउत्तरतइया) उस उस समयपर निनेस्वर महाराजके मार्गमें यह ही उत्तर मिलते है कि (इकसनिग्गोयरसअणतभागोय ) एक निगोतक अनतमे भागे (सिडिगओ) सिद्धोमें गये हे इति श्रीमद् महायोगीन्द्र श्री आनन्दधन महारानके चरणोंपाशक || ॥अध्यात्म जितमुनिविरचित हिन्दीअनुवादसहित नवतत्त्व प्रकरणं समाप्तम् ।। ॥१९॥ SKETERREEEE 1 ॥ॐ आनन्दघन गुरुभ्यो नमः ॥ ॥७॥ अथ श्रीदंडकप्रकरण मूलसहितं हिन्दी अनुवाद प्रारभ्य।। Rake ॥ नमिउंचउवीसजिणे तस्सुत्तवियारलेसदेसणओ दंडगपातेच्चिय थोसाभिसुहसोमवा ॥ १ ॥ (नमिउंचचीसजिणे) चोवीशे जिनस्वोरोको नमस्कारकरके (तरसुत्तवियारले सदेसणओ) उसके सूत्रके विनारसे लेशमात्र कहनेसे (दंडगपएहिंतेच्चिय)दंडगके पदेकरके (थोसामिसुणेहभोभन्या) मैं कहताहुं सो हे भव्य तुम सुनो ॥ १ ॥ ॥ निचेकी गाथासे चौवीश दंडकके नाम देखलाते है ॥ ॥ नेरइआअसुराई पुढवाईबेइंदियादओचेव गभ्ययतिरियमणुस्सा वंतरजोइसियवेमाणी ॥२॥ EFFFFFEEFFEEF ॥ (नेहआ) सात नारकको १ (असुराई ) अमुरादि दा भुवनपतिका १० (पुढवाई ) पृथ्वीरायादि पाच स्थावरक ५ (बेइदियादओचेव ) दो इद्रियादि विकलेंद्रिके ३ (गल्ययतिरिय ) गर्भनतिर्यंचा १ (मणुस्सा) गर्भन मनुष्यका १ ( वतर) व्यतरका १ (जोइसिय) ज्योतिपि देवोका १ (वाणि) और वैमानिक देवोंका १ ऐसे सत्र मिलकर चोवीश दइक समझ लेना ॥ २ ॥ । अत्र चोरीश टाक चोवीग द्वार कहते है ।। ॥ सखित्तयरोउइमा सरीरमोगाहणायसग्घयणा सन्नासठाणकसाय लेसइदीयदुसमुघाया ॥३॥ ॥ (संखित्तयरीउइमा) यह सघणी सक्षेप मात्र है (सरीर) शरीग्द्वार १ (नोगारणाय) - वाहा र २ (सग्घयणा) सग्घयणद्व र ३ (स.) ज्ञाद्वार ४ (साग) सस्थानद्वार ५ ( कसाय ) पायद्वार ६ (लेस) लेश्याद्वार ७ (इदिय) इन्द्रियद्वार ८ (दुसमुग्धाया ) दो प्रकारे समुद्रातद्वार ९ ॥ ३ ॥ १७१॥
दंडक प्रकरण PEEEEEEEEEk ॥७२॥ ॥ दिठीदसणनाणे जोयुवओगोववायचवणठिई पजत्तिकिमाहारे सन्निगइआगईवेए ॥ ४॥ ॥(दिठी) दृष्टिद्वार १० (दसण ) दर्शनद्वार ११ (नाणे) ज्ञानद्वार १२ अज्ञान- द्वार १३ (जोगु ) योगद्वार १४ ( वओगो) उपयोगद्वार १५ (ववाय ) उपपातद्वार १६ (चवण) च्यवनद्वार १७ (ठिइ ) स्थितिद्वार १८ ( पजत्ति) पर्याप्तिद्वार १९ (किमा- हारे ) लिमाहारद्वार २० (सन्नि) संज्ञाद्वार २१ (गई ) गतिद्वार २२ (आगई ) अगति- द्वार २३ (वेद) वेदद्वार २४ इति चौवीश ॥ ४ ॥ ॥ अब इस चोवीश दंडकोके विषे कुणशा कुणशा द्वार आवेगे वह देखलाते है । प्रथम शरीरद्वार ॥ चउगभ्यतिरियवाउसु मणुआणपंचसेसतिसरीरा थावरचउगेदुहओ अंगुलअसंखभागतणू ॥ ५॥ । 长安长长长长长长好! 33 -
॥(उगभतिरियवाउसु) गर्भनतिर्यचको और वाउकायको औदारिक वैक्रिय
तेनस और कर्मण ऐसे चार शरीर होते है (मणुआणपंच) ओर मनुष्यको पाचोही शरीर होते है
(सेसतिसरीरा) बाकीके एकादश दडकोके विपे तिन तिन शरीर है इति १ शरीरद्वार ॥ ५ ॥
।। अत्र दुसरा अवगाहनाद्वार कहते है ।।
(थावरचउगेदुरओ) वास्पतिपरजके चार स्थावरको जप य और उत्कृष्ट ऐसे दो प्रकारे
(अगुलअससभागतणु ) अगुल्के असख्यातमें भागे शरीरकी नवगाहना होति है ॥ ५ ॥
॥ ससिपिजहन्ना साहावियअगुलस्सअसखसो
उक्कोसपणसयघणू नेरइयासत्तहत्यसुरा ॥ ६ ॥
॥ (सव्वेसिपिजहन्ना) (चार स्थावरवरनके ) सब दडकोके विपे जघन्यसे
(सारावियअगुलस्सअसखसो) स्वाभाविक अगुल्के असख्यातमे भागे शरीर होते है
(उकोसपणसयधणू) और उत्कृष्टी अवगाहना पाचसे धनुष्यकी (नेरइया) नारकीके नीबोकी
(सत्तहत्यसुरा) और देवोंरा उत्कृष्टा शरीरमान सात हाथका होता है ॥ ६ ॥
॥७३॥
।
इंडक
प्रकरण
长长长长长长长长
||७४॥
॥ गभतिरिसहस्सजोयण वणस्सईअहियजोयणसहस्सं
नरतेइंदितिगाऊ बेइंदियजोयणेबार ॥ ७॥
॥(गभतिरिसहस्सजोयण) गर्भजतिर्यंचका शरीर एक हजार जोजनका है (वण-
सईअहिंयजोशणसहस्सं) और वनस्पतिकायका शरीर एक हजार जोजनस कुछ अधिक होते है
(नरतेइंदितिगाऊ) मनुष्य और तेइंद्रिका शरीर तिन गाउका होते है (बेइंदियजोयणे-
बार) और दोइंद्रिका शरीर बारह जोजनका है ॥ ७ ॥
॥ जोयणमेगंचउरिदि देहमुच्चत्तणंसुएभणियं
वेउवियदेहपुण अंगुलसंखंसमारंभे ॥ ८॥
॥ (जोयणमेगंचउरिंदि) एक जोजन चौरंद्रिका ( देहमुच्चत्तणंसुएभणियं)
शरीरका उंचपणा सूत्रमे कहा है (वेवियदेहपुण) फेर पैक्रिय शरीरका अनुमान कहते है
( अंगुलसंखंसमारंभे) आरंभतीवेर सदैवअंगुलके संख्यातमे भागे होते है ॥ ८ ॥
॥ देवनरअहियलक्खं तिरियाणंनवयजोयणसयाई
दुगुणंतुनारयाणं भणियंवेउवियसरीरं ॥९॥
॥(देवनरअहियलक्ख) देवताका वैक्रिय शरीर एक लाख जोजनका होता है और मनुष्यका वैनिय शरीर एक लाख जोजनमें कुछ अधिक होता हे (तिरियाणनवयजोयणसयाइ) और तिर्यचका वेक्यि शरीर नरसे नोनना (दुगुणतुनारयाण) और नारकका शरीर मूल्से दुना होते है (भणियवेवियसरीर ) इसप्रकारे वैक्रिय शरीरका प्रमाण कहा ॥ ९ ॥ ॥ अन एक वैकि र शरीर कितनो काल रहे वह देखलाते है । ॥ अतमुहुत्तनिरये मुहुत्तचत्तारितिरियमणुएसु देवसुअद्धमासो उक्कोसविउवणाकालो ॥१०॥ ॥ (अतमुत्तनिरये) नारक्फे वैक्रिय शरीरका काल अतर्मुहूर्त्तका होते है फेर दुसरा करणा पडता है (मुरत्तचत्तारितिरियमणुण्सु) मनुष्य और तिर्यचके वैक्रिय शरीरका काल मान चार गुहूता है ( देवेसुअदमासो) और देवोके वेक्रिय शरीरका काल एक पक्षदिनका (उकोसवि- उन्यणाकालो) इस प्रकारसे वैनिय शरीरका उत्कृष्टकालमान कहा है ॥ इति शरीर अवगाहना द्वार २॥ १०॥ ॥ अब तीसरा सघयणहार कहते है ॥
दंडक प्रकरण ॥७६॥ ॥ थावरसुरनेरइया असंघयणायविगलछेवठ्ठा संघयणछक्कंगस्पय नरतिरिएसुमुणेय ॥ ११ ॥ ॥(थावरसुरनेरझ्या) पांच स्थावर तेरे देवता और एक नारक ऐसे सब मिलके उगणीसदंडकोके विषे (असंधयणाय) संवयण नहीं होते है (विगलछेवडा) और तीन विकलेंद्रिको एक छेवठा होते है (संघयणकंगमय) छे संनयण गर्भजको (नरतिरिएमुविमुणेयई ) मनुष्य और तिर्यंचको जान लेना ॥ इति चौविस दंडके संघयण द्वार ॥ ३ ॥ ११ ॥ ॥ अव चोथा संज्ञाद्वार कहते है | ॥ सवेसिंचउदहवा सन्नाससुरायचउरसा नरतिरियलसंठणा हुंडाविगलिंदिनेरइया॥ १२ ॥ ॥ (सवेसिंचउदहवा) सब दंडकोके विषे चार दश तथा सोले ( सन्ना) संज्ञा होते है ।। इति चोवीश दंडके चतुर्थ संज्ञाद्वार । ॥ अत्र पंचमा संस्थानद्वार कहते है । EFFE (सवेमुरायचउरसा) सत्र देवोका समचोरस सस्थान है (नरतिरियछसठाणा) मनुष्य और तिर्यचको छेही सस्थान होते हे (हुडाविगलिदिनेरईया) विकलेंद्रि और नारकको एक हुडक ही सस्थान होते है ॥ १२ ॥ ॥ नाणाविहधयसूई बुब्बुहवणवाउतेउअपकाया पुढवीमसूरचदा-कारासठाणओभणिया ॥ १३ ॥ ॥ (नाणाविह ) नाना प्रकारका (धय) वनाके आकारे मस्थान (सई) सुईके आकारे (बुब्बुह ) जलके बुबुढाके आकारे, (वणवाउतेउअपकापा) अनुक्रमसे वन स्पतिकाय वाउकाय तेउकाय और अपकायका है (पुढवीमसूरचदाकारा ) और पृथ्वीकायका मसूरकीदाल अथका अर्धचद्रके आकारे (सठाणओभणिया) इस प्रकारर्स चोवीश दइके पचम सस्थानद्वार कहा ॥ १३ ॥ ॥७७॥ ॥ अब छठा कपायद्वार कहते है ॥ ॥ सवेविचउकसाया लेसछक्कगभतिरियमणुएसु नारयतेऊवाऊ विगलावेमाणियतिलेसा ॥ १४ ॥ FEEEEEEEEN
प्रकरण
इंडक
HERE FEFFEE
॥ (सोविचउकसाया) सर्व दंडकोके विषे चारोही कपाय होते है इति चोवीश दंडके
छठा कपायद्वार ॥
॥ अब सप्तम लेशाद्वार कहते है।
(लेसछकंगभतिरियमणुएसु) छेहीलेसा गर्भज तिर्यंच और मनुष्यकोहोते है (नारयतेऊ-
वाज) और नारक तेउकाय वाउकाय (विगला ) और तिनविकलेद्रि एसे छे दंडकोके विषे प्रथ-
मकी तीन लेस्या होति है (वेमाणियतिलेसा) और वैमाणिक देवोंको अन्तकी तीन लेस्या
होतिहै।॥१४॥
॥ जोइसियतेउलेसा सेसासवेविहुँतिचउलेसा
इंदियदारंसुगमं मणुआणंसत्तसमुग्धाया ॥ १५ ॥
॥ (जोइसियतेउलेसा) और ज्योतिपीको एक तेजोलेस्याही होति है (सेसासवे-
विद्युतिचउलेसा) और शेष सब दंडकोके विषे कृश्नादि चार लेस्या है इति चोवीस दंडके
लेस्याद्वार ७ (इंदियदारंसुगम ) और इन्द्रियद्वार तो सुगम है ८ ॥
॥ अब समुद्घातद्वार कहते है ॥ ९
(मणुआणंसत्तसमुग्घाया) मनुष्यको सातोही समुद्घात होति है ॥ १५ ॥
EEEEEEEEEEEEEEE
। अब एक गाथसे सातोही समुद्घातका नाम देखलाते है।
॥ वेयणकसायमरणे वेउवियतयएयआहारे
केवलियसमुग्घाया सत्तइमेहुतिसन्नीण ॥ १६ ॥
।। (वेयण) वदना (कसाय) कपाय ( मरणे) और मरण (वेउव्विय)
वैक्रिय (तेयण्य ) तेस और (आहारे) आहारक (केवलियसमुग्धाय) केवली समुद्घात
(सत्तइमेहुतिसन्नीण) इस प्रकारसे सातोही सम्दात सन्नि-पचद्री मनुष्यको होति है ॥१६॥
॥ एगिदियाणकेवलि तेउआहारगविणाउचत्तारि
तेवेउवियवजा विगलासन्नीणतेचेव ॥ १७ ॥
॥(एगिदियाणकेवलि) एकेन्द्रीको केवली (तेउआहारगविणाउचत्तारि)
तथा तेजस और आहारक इस तिनुको वरजके बाकीको चार समुन्यात एकेन्द्रिको होति हे (तेवेउधि-
यवजा) वह तिन और वैक्रिय यह चार वरजके (विगलासन्नीण) तीन समुद्रात विकलेन्द्रि
ओर असतीको होति हे ( तेचेव ) निश्चे करके ॥ १७ ॥
॥७९॥
993 प्रकरण दंडक 16010 ॥ पणगभ्पतिरिसुरेसु नारयवाऊसुचउरतियसेसे विगलदुदिठीथावर मिच्छत्तिसेसतियदिही ॥ १८ ॥ ॥(पणगभतिरिसुरेसु) परन्तु गर्भज तिर्यच और तेरह देवोंको प्रथमकी पांच समुद्घात होति है (नारयवाऊसु) नारक और वाउकायके विषे प्रथमकी (चउर) चार समुद्घात है (तिय- सेसे) और शेपके सात दंडकोके विषे प्रथमकी तीन समुद्घात होते है॥ इति चोवीस दंडके नवमा समुद्घात द्वार ॥ ॥ १० अव दृष्टिद्वार कहते है। (विगलदुदिठ्ठी) विकलेन्द्रिको दो दृष्टि होती है एक सम्यक् और दुसरी मिथ्यादृष्टि ऐसे दो (थावर ) पांच स्थावरको (मिच्छत्ति) एक मिथ्यादृष्टिही होति है ( सेसतियदिछी) शेष रहे हुये जो सोलह दंडक उसके विषे सम्यक् मिश्र और मिथ्यात्व यह तीन दृष्टि होति है।। इति चौविश दंडके दशमा दृष्टि द्वार ॥ ॥ अब दर्शनद्वार कहते है। ॥ थावरवितिसुअचरकु चउरिंदसुतदुगंसुएभणियं मणुआचउदंसणिणो सेसेसुतिगंतिगंभणियं ॥ १९ ॥ EFE EFEE
॥ (धावर) पाच स्थावरको (बितिसुअचरकु) तथा दोइन्द्रि और तेइन्द्रिको एक अच
खुदशर्नही होते है ( चारिदिसु) चउरिद्रिको (तदुगसुण ग्भणिय ) चक्षु तथा अचक्षु ऐसे दो
दर्शन सूत्रमे कहा है(मणुआचउदसणिणो) और मनुष्यके विषे तो चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन
और केवल दर्शन ऐसे नारोहीहोते हे (सेसेसुतिगतिगभणिय) वाकीके सत्र ढडकोके विषे केवल
वनके तिनतिन दर्शन कहा है ॥ इति चोवीश दडके ११-१२-१३ दर्शनद्वार ॥ १९ ॥
।। अत्र ज्ञान अज्ञानद्वार कहते है।
॥ अन्नाणनाणतियतिय सुरतिरिनिरएथिरेअनाणदुग
नाणान्नाणदुविगले मणुएपणनाणतिअनाणा ॥ २० ॥
॥ (अन्नाणनाणतियतिय) तीन अज्ञान और तीन ज्ञान (सुरतिरिनिर)
देवताको तथा तिर्यन और नारकको होते है (थिरेअनाणदुग) और स्थावरको मति तथा श्रुत
ऐसे दो अज्ञान होते है (नाणानाणदुविगले) दो ज्ञान तथा दो अज्ञान विकलेंदिको होते है ॥८॥
(मणुएपणनाणतिअनाणा) और मनुष्यको तो पाच ज्ञान और तीन अज्ञान एसे आठोही
होते हे ॥ इति चौवीश दडक ज्ञान अज्ञानद्वार १३ ॥ २० ॥
३ प्रकरण दंडक; EEEEEEEEEEE ॥८२॥ ।। अब योगद्वार कहते है॥ ॥ इक्कारससुरनिरए तिरिएसुतेरपनरमणुएसु विगलेचउपणवाए जोगतियंथावरेहोई ॥ २१ ॥ ॥ (इकारससुरनिरए ) देवता और नारकको इग्यारे योग होते है (तिरिएसुतेर) तिर्यनको तेरह (पनरमणुएस) और मनुष्यको पन्द्रही योग होते है (विगलेचउ ) विकलेंद्रिको चार (पणवाए ) वाउकायको पांच (जोगतियंथावरेहोइ) और स्थावरको तीन योग होते है ॥ इति चोवीश दंडके योगद्वार १४ ॥ २१ ॥ ॥ अत्र उपयोगद्वार कहते है ।। ॥ उवओगामणुएसु बारसनवनिरयतिरियदेवेसु विगलदुगेपणछक्कं चउरिंदिसुथावरेतियगं ॥ २२ ॥ ।। (उवओगामणुएस) मनुष्यके विषे उपयोग (बारस) बारहही होते है (नवनि- रयतिरियदेवेसु) नारक तिर्यंच और देवोंको नव उपयोग होते है (विगलदुगेपण) दो विकलें- द्रिको पाच (छक्क) छे (चरिदिसु) चौरेद्रिको (धावरेतियग) और स्थावरको तीन उपयोग होते है ।। इति चोवीश दडके उपयोगद्वार १५ ॥ २१ ॥ ।। अब उत्पति और चवनद्वार कहते है || ॥ सखमसखासमए गप्भयतिरिविगलनारयसुराय मणुआनियमासखा वणऽणताथावरअसखा ॥ २३ ॥ ॥ (ससमसखासमए) एक समयके विषे सख्याता और असग्न्याता (गप्भय- तिरि) गर्भनतिर्यच (विगलनारयसुराय) विश्लेंद्रि नारक और देवता उत्पन्न होते है (मणु- आनियमाससा) मनुष्योनिश्चररके सरयाता उत्पन्न होते है (वणऽणता) वनस्पतिकाय अनता (थावरअसखा ) और स्थावर असख्याता उत्पन्न होते है ॥ २३ ॥ ॥ असन्निनरअसखा जहउववाएतहेवचवणेवि वावीससगतिदसवास सहस्सउविठ्ठपुढवाई ॥ २४ ॥ ॥(असन्निनरअसखा) असन्नी मनुप्यो असरयाता उत्पन्न होते है (जववाए) ባሪ በ दंडक प्रकरण ॥८४|| जैसेही उत्पन्न होते है ( तहेवयवणेवि) तैसेही चवते है ॥ इति चौवीश दंडके उपयातद्वार तथा चवणद्वार ॥ अव ( स्थिति ) आयुद्वार कहते है ॥ (बावीससगतिदसवाससहस्स) वावीस हजार सात हजार तिन हजार और दश हजार वर्षको आयु ( उकिठ्ठपुढवाई) उत्कृष्टो अनुक्रमे पृथ्वीकायादि इस लिये पृथ्वीकाय अप्काय वाउकाय और वनस्पतिकायका जान लेना ॥ २४ ॥ ॥ तिदिणग्गितिपल्लाऊ नरतिरिसुरनिरयसागरतितीसा वंतरपल्लंजोइस वरिसलख्खाहिअंपलिअं॥ २५ ॥ ॥(तिदिणग्गि) तिन अहोरात्रिका आयु अग्निकायका (तिपल्लाऊ) तीन पल्यो- पका आयु (नरतिरि ) मनुष्य और तिर्यचका (सुरनिरयसागरतितीसा) देवता और नारकका उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरोपमका होते है (वंतरपलं) व्यंतरका आयु एक पल्योपमका (जोइस) और ज्योतिपी देवोका आयु (वरिसलख्खाहिअंपलिअं) एकलाख वर्ष अधिक एक पल्योपमका होते है ॥ २५ ॥ EEFE ॥ असुराणअहियअयर देसूणदुपल्लयनवनिकाए वारसवासुणपणदिण छम्मासउकिठविगलाऊ ॥ २६ ॥ ।। (असुराणअहियअयर) असुरकुमारनिकायका आयु एक सागरोपसे कुछ अधिक होते है (देसूणदुपल्लयनवनिकाए ) शेषनवनिकायका आयु देसेउणा दो पल्योपमका होते है ( बार- सवामुणपणदिण ) बारह वर्ष और गुण पचास दिन (छम्मासउकिट्ठविगलाऊ) छे मासका उस्कृष्ट आयु अनुक्रमसे विकलेदिका समज लेना ॥ २६ ॥ ॥ पुढवाइदसपयाण अतमुहुत्तजहन्नआउठिई दससहसवरिसठिइआ भवणाहिवनिरयवतरिया ॥ २७ ॥ ॥(पुदवाइदसपयाण) पृथ्वीकायादि दशपदकी इसलिये पाच स्थावर तीन विकलेन्द्रि तिर्यंच और मनुष्यकी ( अतमुहत्तजनआउटिई) जघन्यसे आयुकी स्थिति अत हुनकी कही हे (दससहसवरिसठिइआ) दश हजार वर्षकी आयुस्थिति जपयर्स (भवणाहिवनि- स्यवतरिया) दश मुवनपति नारक और व्यतरीककी कही है ॥ २७ ॥ ॥८॥ HEREFE -- इंडक प्रकरण ॥८६॥ ॥ वेमाणियजोइसिया पल्लतयठंसआउआहुति सुरनरतिरिनिरएसु छपज्जत्तीथावरेचउगं ॥ २८ ॥ ॥(वेमाणियजोइसिया) वैमानिक और ज्योतिषीका आयु जघन्यसे ( पल्लतयठं- सआउआहुति ) एक पल्योपमके आठमे भागे होते है १८ ॥ इति चौवीश दंडके उत्कृष्ट और जघन्यसे स्थितिद्वार कहा ॥ || अब पर्याप्तिद्वार कहते है ॥ (सुरनरतिरिनिरएम) देवता मनुष्य तिर्यच और नारकके विषे (छपजत्ती ) छेही पर्याप्ति होति है (थावरेचउगं) और पांच स्थावरके विषे प्रथमकी चार पर्याप्ति है ॥ २८ ॥ ॥ विगलेपंचपजत्ती छदिसिआहारहोइसवेसिं पणगाइपएभयणा अहसन्नितियंभणिस्सामि ॥ २९ ॥ ॥(विगलेपंचपजत्ती) तीनो विकलेंद्रिके विषे प्रथमकी पांच पर्याप्ति होति है १९॥ इति चौवीश दंडके पर्याप्तिद्वार ॥ FREE FFEREFER BEEFER || अब किमाहाग्द्वार कहते है | (छद्दिसिआहारहोइसवेसिं) सब जीवोंके आशरे छेही दिशीका आहार जान लेना (पणगाइप- एभयणा) इतना विशेषकि पृथ्वी कायादि पाचोही स्थावर पदके विषे भनना है इस लिए छए- दिशीका आहार होव भी सही और ही भी होवे २० ॥ इति चौवीश दडके छेदिशी आहारद्वार ॥ (अहसन्नितियंभणिस्सामि) अब तीन सज्ञाद्वार कहता हु ॥ ॥ २९ ॥ ॥ चउविहसुरतिरिएसु निरएसुअदीहकालिगीसन्ना विगलेहेउवएसा सन्नारहियाथिरासवे ॥ ३०॥ ॥(चउविरसुरतिरिसु) चार प्रकारके देवोके विषे तथा तिर्यच (निरण्सुअदी- एकालिगीसन्ना) और नारक्के विषे दीर्घ कारकी सज्ञा होति है (विगलेहेउवएसा) और विकलेंद्रिके विषे हितोपदेशकीसज्ञा होति है ( सन्नारहियाथिरासवे) और स्थावरो सवही सज्ञा रहित होते है ॥ ३०॥ ॥ मणुआणदीहकालिय दिछीवाओवएसिआकेवि पज्झपणेतिरिमणुअच्चिय चउविहदेवेसुगच्छंति ॥ ३१ ॥ [11८७॥
दिंडक प्रकरण ॥८॥ ॥ (मणुआणदीहकालिय) मनुष्यको दीर्घकालकी संज्ञा होति है (दिठीवाओवए- सिआकेवि) कितनेक मनुष्यको दृष्टिवादोपदेशकी २१ संज्ञा भी होती है ॥ इति चोवीश दंडके तिन प्रकारकी संज्ञाद्वार ॥ ॥ अव गति आगति दो द्वार कहते है ॥ (पज्झपणतिरिमणुअच्चिय ) पर्याप्ता पंचेदितिर्यंच और मनुष्य निश्चय करके ( चउविहदेवे सुगच्छंति) चार प्रकारके देवोंके विषे जाते है ॥ ३१ ॥ ॥ संखाउपज्झपणिदि तिरियनरेसुतहेवपज्झत्ते भूदगपत्तेयवणे एएसुच्चियसुरागमणं ॥ ३२ ॥ ॥ (संखाउपझपणिदि) संख्याते आयुवाले पर्याप्तापंचेन्द्री (तिरियनरेसु- तहेवपझत्ते) तेसेही पर्याप्ता तिर्यंच और मनुप्यके विषे (भूदगयत्तेयवणे) पृथ्वीकाय अपकाय और प्रत्येक वनस्पतिकाय (एएसुचिय) इस पांचोके विषे निश्चय करके (सुरा- गमणं) देवताका आना इस लिये उत्पन्न होना ।। ३२ ।। .
॥ पजत्तसखगप्भय तिरियनरानिरयसत्तगेजति निरउवद्याएएसु उबवजतिनसेसेसु ॥ ३३ ॥ ॥ ( पजत्तसखगप्भय ) सख्याता वर्षके आयुवाले पर्याप्ते गर्भन ( तिरियनरा) तिर्यन और मनुष्य (निरयसत्तगेजति) यह दोनोही सातोही नारकके विषे जाते है (निरउ- वहा) इस सातोही नारकसे निकले हुवे जीवो (एण्सु) यह दो दडक विन (उववज्जतिन- सेसेसु) शेष दडकोके विषे उत्पन्न नहीं होते है ।। ३३ ॥ ॥ पुढवीआउवणस्सइ मझेनारयविवजियाजीवा सवेउववजति नियनियकम्माणुमाणेण ॥ ३४ ॥ ॥ (पुढवीआउवणस्सइ) वीकाय अप्काय और वनस्पतिकाय (मज्झे) विषे (नारयविवज्जियाजीवा) नारको जीयोको वर्नके (सब्वेउववज्जति) और सर्व जीवो उत्पन होते हे (नियनियकम्माणुमाणेण) अपने अपने कर्मानुसारे ॥ ३४ ॥ ॥ पुढवाइदसपएसु, पुढवीआउवणस्सईजति ॥ पुढवाइदसपएहिय, तेउवाउसुउववाओ ॥ ३५ ॥ 1८९॥
दंडक करण ॥९॥ ॥(पुढवाइसपएसु) पृथ्वीकायादि दश पदके विषे (पुढवीआउवणस्सई- जंति) पृथ्वीकाय अप्काय और वनस्पतिकायके जीवो सब होते है (पुढवाइदसपएहिय) और पृथ्वी कायादि दश पदमेसे निकले हुये जीवों ( तेउवाउसुज्यवाओ) तेउकाय और वाउकायके विषे उत्पन्न होते है ॥ ३५ ॥ ॥ तेउवाउगमणं, पुढवीपमुहम्मिहोइपयनवगे पुढवाइठाणदसगं, विगलाइंतियतहिंजंति ॥ ३६ ॥ ॥ (तेउवाउगमण) तेउकाय और वाउकायकाजाना (पुढवीपमुहम्मिहोइपयनवगे) पृथ्वीकायादि नवपदके विषे होते है (पुढवाइठाणदसगं) पृथ्वीकायादि दश स्थानकके जीवों (विगलाइंतियतहिंजंति) तीन विकलेन्द्रिमें उत्पन्न होते है ॥ ३६ ॥ ॥ गमणागमणंगप्भय, तिरिआणंसयलजोवठाणेसु सवत्थतिमणुआ, तेउवाहुहिनोति ॥ ३७॥ ॥ (गमणागमणंगमयतिरिआणंसयलजीवठाणेसु) गर्भनतिर्यचका जाना आना FEFFE
सब दोके विष होता है (सहत्यजतिमणुआ) और मनुष्योकामी जाना सब दडको के विषे
होता है (तेउवाहहिंनोजति) परतु तेउकाय और वाउकायके विषे नहीं जाते ॥ ३७ ॥
॥ वेयतियतिरिनरेसु, इत्थीपुरिसोयचउविहसुरेसु
थिरविगलनारएसु, नपुसवेओहवइएगो ॥ ३८ ॥
॥ (वेयतियतिरिनरेसु) तीन वेद तिर्यन और मनुप्यको होते है ( इत्थीपुरिसो-
याविरसुरेसु) और नार प्रसारक देयोके विषे सी वेट तथा पुस्प वेद होते हे (थिरविगल-
नारसु) और पान स्थावर विद्रि और नाररुके विरे (नपुसवेओहवडएगो) एक नपु
सा ही होते हे ॥ ३८ ॥
॥ पजमणुवायरग्गी, वेमाणियभवणनिरयवतरिया
जोइसचउपणतिरिया, वेइदितिइदिभूआउ ॥ ३९ ॥
॥ अब अस्प बहुल द्वार कहते है ॥
॥(पहमपायरगी) पर्याप्ता मनुष्य और बादर अग्निकाय (वेमाणियभव-
॥९॥
दंडक दं निरयवंतरिया) वैमानिक मुवनपति नारक और व्यंतर (जोइसंचउपणतिरिया) ज्योतिषि चौरिन्द्रि और पंचेन्द्रि तिर्यच (बेइंदितिइंदिभूआउ) तथा दोइन्द्रि तेइन्द्रि पृथ्वीकाय करण और अप्काय ॥ ३९॥ ॥१२॥ ॥ वाऊवणस्सईचिय, अहियाअहियाकमेणमेहुँति सविइमेभावा, जिणामएणंतसोपत्ता॥ ४०॥ ॥(वाजवणस्सईचिय) वाउकाय और वनस्पतिकाय यह सत्र निश्चय करके (अहियाअहियाकमेणमेहुँति) अनुक्रमे एक एकसे अधिक होते है ( सविइमेभावा) यह सवही भी भावो (जिणामएणंतसोपत्ता) हे जिनेश्वर देव मैने अनंती वेर प्राप्त किया है ॥४॥ 长长长长长长长长长长长 ॥ संपइतुह्मभत्तस्स, दंडगपयभमणभग्गहिययस्स दंडतियविरयसुलह, लहुममदितुमुकपयं ॥ ४१ ॥ ॥ (संयइतुह्मभत्तस्सदंडगपयभमणभग्गहिययस्स) अब चौवीश दंडकोके स्थानकके विषे भमनेसे निवृत्त हुवा है मन जिसका एसा तुमारा भक्त एसा मुझको (दंडतियवि- FFFFER रयसुलह) मन वच और काया यह तीन दडकका विरामसे मुर्लभ एसो (लहुममदितुमुरकपय) मोक्ष पद जलदी देदो ॥४१॥ ॥ सिरिजिणहंसमुणीसर, रज्जेसिरिधवलचदसीसेण गजसारणलिहिया, एसाविन्नत्तीअप्पहिया ॥ ४२ ॥ ॥(सिरिजिणहसमुणीसर) श्री जिनहसमुनिके (रज्जेसिरिधवलचदसी- सेण) राज्यके समय श्री धवलचद्रमुनीके शिष्य (गजसारेणलिहिया) गनसार मुनिने लिखा है (एसाविन्नत्तीअप्पहिया) यह विज्ञप्ति अपनी आत्माके अर्थे ।। ४२ ।। ॥ इति श्रीमन्महायोगीन्द्र आनद्घन महाराज चरणोपासक जित विरचित हिन्दी अनुवाद सहितं दडक प्रकरण समासम् ।। ॥९३॥ RE
somr.
॥ अथ अनुभव पञ्चविंशति लिख्यते ॥
Hindi
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भोगी भगाविभागी,
अग्राम अनमा का, Hindi,
गह मर गा पि, पर: गन tak:
जपलग दि पानी :
पर मी रंगी गदा, नुमान
अनुसार मानमहारण, गित :
न नीन अमान, नर जाने ।
नरला मसारमें, न मानी !!! ||
र नीन पासपनी, मारपरको दार
र नीन मपनी में को गुम पार ॥ ५ ॥
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