Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sawad Sangrah
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संवाद संग्रह
[बालकबालिकाओं के खेलने और स्त्रीपुरुषों
एव वालवालिकाओंके हदयोंमें
आत्माभिमानकी भावना जागृत
करनेवाला एक उत्तम
सग्रह]
लेखक
कृष्णलाल वर्मा
माग
पथमहार, लेजीमादिश रोड,
माटुंगा-4बई ,
AASAASAA LARLAAAAAAAAAAAAAA
सन १९२८
मुल्य परामपया
प्रकाशक- कृष्णलालजी वर्मा, प्रथमडार, लेडीहार्डिज रोड,मागा-बई सर्व हक लेखकके आधीन है। - मुद्रक- भास्कर महादेव सिद्धये, मुबईवैभव प्रेस, सईट्स् ऑफ इडिया सोसायटीज़ होम, सँढरीरोड, गिरगाव-मुवई
समर्पण
जिनने इन सवाटोंको सफलतापूर्वक खेलकर दर्शकोंको हँसाया,
रुलाया, आनदमें विभोर किया और उनके हृदयों में
स्वाभिमानकी भावना जागृतकर पीरनामी
विनली दौड़ाई उनके और भविष्यमें
भी ऐसा ही करेंगे उनके-
उन सभी चारक
वालिकाओं के
करकमलोंमें
यह मगर
आग्रह
और प्रेम के माय ममर्पित
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उपहार पृष्ठ
ओरसे
भेट
विषय सूची AN- पृ. १ " . " " " ३२ १ कृष्णकुमारी लेखक-कृष्णलाल धमा २ महारानी मीनलदेवी ३आत्म-रक्षा ४ सेठानी और पाढपीडित स्त्री ५ पडोसिनॉकी बैठक न. १,२ ६ अमीदा और ससिया ( सुदरावरुस्तम नाटक्से) ७ तारा और उसरी ससी ले०-गृष्णलाल वर्मा ८ रानी जवाहरवाई और कर्णपती ९ पाठशालामें आनंद नं० १, २, १. पडोसिनोंकी बैठक न. ३ ११ पाठशालामें आनद न. ३ १० रमा, इन्द्राणी और लक्ष्मी १३ क्षमत " ३८ " " ४५ " " ६० " ६९ " १४ वनिया ७६ " " " " " " " ८३ ८९ १५प्रहसन १६ महर्षि गौतमरा आश्रम (अहल्या नाटकसे) १७ महाराजनद और चाणक्य (चद्गुप्त नाटकसे) १८ शाहाजादा पुर्रमकी उदारता (मेवाडपतन नाटकसे) १९ महाराणा अमरसिंह और महानसा (, २० २१ लव और शत्रुघ्न (सीता नाटकसे) १२ सरदारवा ले. कृष्णराल वमो ) " " सासह (" ) १०८ " ११४ ११८ " निवेदन। + २ - विद्यार्थियोंके खेलने लायक सवाद हिन्दीमें बहुतही कम है। कन्याओंके खेलने लायक उत्तम संवादोंका तो-जहाँ तक मैं जानता हूँ-एक तरहसे अभाव ही है । इस अभावकी पूर्तिके लिए ही मैंने ये सवाद, लिखे हैं । सात सवाद इनमें सग्रहीत हैं । प्राय सभी संवाद वबई म्यु० स्कूलोंके विद्यार्थियोंने खेल हैं । और उन्हें अच्छी सफलता मिली है। 'आनको रक्खा जान गंवाकर ' इस पद्यांशकी भावनाको दृष्टिमें रखकर ये सवाद तैयार किये गये हैं। मेरा सयाल है कि, बालोंके कोमल हृदयोंमें इन भावनाओंको अकित करना बहुत जरूरी है । स्वात्माभिमानके भावोका जितना अधिक प्रचार देशमें होगा और घालबालिकाएँ जितनी अधिकतासे इन भावोंको व्यवहार में लायेंगे उतनाही अधिक देशका कल्याण होगा। इन सवादोंको सफलता पूर्वक सेलनेकी तैयारी करनेकी व्यवस्था करदेनेवाले म्युनिसिपल गुजराती स्कूलोंके सुपेरिप्टेण्डेण्ट साहिय श्रीयुत हिम्मतलाल गणेशजी अजारिया एम ए एल एल वी , व लेडी सुपेरिण्टेण्डेप्ट साहिवा श्रीमती शीरीनगाई डालास एम ए और म्यु० मराठी स्कू० सुपेरिटेण्डेप्ट साहिन श्रीयुत, कृष्णराव थाबूराव पाडगांवकर पी ए तथा लेडी सुपेरिण्टेण्डेप्ट साहिया श्रीमती शान्तावाई फाशालार एम ए का मैं हदयसे आभार मानता हूँ। अगर इनकी कृपा न होती तो इन सवादोंकी तैयारी असभवसी ही थी। साथ ही नीचे लिखे सज्जनों व सरियोंका उपकार माने विना भी नहीं रह सकता कि जिन्होंने परिश्रम करके सवादों और गायनोंको तैयार कराया। (१) लेमिंग्टनरोड लइकोंकी शालाके हैड मास्टर श्रीयुत सीताराम भीकाजी पेंढुरक्र, एव घाणेकर (२) ठाकुरद्वार लडकोंकी शालाके हैडमास्टर श्रीयुत शकर केशव आठवले ( ३ ) गिरगाँव मराठी लड़कोंकी शालाके हैडमास्टर श्रीयुत पेशव नारायण जोशी (४) भूलेश्वर गुजराती ए वी स्कूलके हैडमास्टर श्रीयुत मणिभाई प्रागजी देसाई ( ५ ) धुद्धिवर्दक गुजराती ल्डकोकी शालाके हैडमास्टर
म्युनिसिपल मराठी और गुजराती स्कूलोके सुप्रिण्टेण्डेण्ट ओर लेडी सप्रिण्टेण्डेण्ट .
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श्रीमती शोरीनवाइ डालास ३ साभाग्यवती
दाहिनी तरपसे-१ श्रीन हिम्मतराल गणेजी अनारिया
शान्तावाद शाळकर. ४ श्रीयुत दृष्णगर यानुराग पाडगावकर
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(७) श्रीयुत चदुलाल अर्जुनलाल पन्या ( ६ ) चालीवाई गुजराती कन्याशालाकी हैडमिस्ट्रेस सौभाग्यवती काशीबाई (७) कालवादेवी कन्याशालाकी हैडमिस्ट्रेस ग. स्व० श्रीमती गुलारवाई (८) लेमिंग्टनरोड मराठी कन्याशालाकी हैडमिस्ट्रेस ग० स्व. श्रीमती शाताराई (९) ठाकुरद्वार रोड मराठी कन्याशालाकी हैडमिस्ट्रेम सौभाग्यवती रक्ष्मणीबाई कावतकर एव गायन शिक्षक श्रीयुत चौघुले, गोसले, मुडले और पागनीस । ऊपर लिखे हुए गायन शिक्षकोंके अलावा कुछ गायनोके नोटेशन श्रीयुत एम ए दीवान और श्रीयुत कृष्णाजी महादेव गोखलने भी किये हैं, इसलिए इनका भी उपकार मानता हूँ। इनके अलावा उन सभी असिस्टेंट शिक्षकोंका भी मैं कृतज्ञ हूँ जिन्होंने मुझे सहा यता दी है। उन वालवालिकाओंको भी मैं धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने ये सवाद और गायन तैयार करके हमारे परिश्रमको सफल बनाया। जिसने इन सवादों और गायनोंको लिखने या सग्रह करनेमें सहायता दी, जिसने मुयै उत्साहित किया जिसकी प्रेरणा और आग्रहसे मेरी कलम चली, जिसके प्रेम और आश्वासनसे मेरा, विनोंके कारण निराश बना हुआ, हृदय आशान्वित हुआ और जिसके मद हास्यने कठोर परिश्रम और विनोके कारण मुझाये हुए मनको प्रमुदित कर दिया, इतनाही नहीं जिसने सवादों आर गायनोंकी माफ नफले की और गायनों को, स्वरलिपिके अनुसार यजाकर देख लिया, उस मेरे जीवनकी शक्ति अपनी अर्धाङ्गनाका उपकार मैं किन शब्दोमें मायूँ ? इनके अलावा जिनके गायन मने लिये हैं उन गायन लेखकोंका और नाथू रामजी प्रेमीका-जिनके द्वारा प्रकाशित नाटोका मैंने उपयोग किया है तथा अन्य उन सभी सन्जन व सन्नारियोंका मैं उपकार मानता हूँ जिनसे मुझे थोडीसी भी सहायता मिली है। मारवाडी सम्मेलनका उपकार मानना तो मेरा सबसे पहला पर्नव्य है, क्योंकि आजतक हिन्दीके जितने जसे-जिनमे इस सप्रहमें आये हुए प्राय सभी सवादों उपयोग हुआ-हुए हैं वे सभी सम्मेलन के उद्योग और द्रव्यसे हुए हैं और मैं आशा करता हूँ कि, सम्मेलन राष्ट्रभाषा हिन्दीका प्रचार करनेके लिए इस तरहके उत्सव सदा जारी रस्खेगा। , (८) . मारवाडी सम्मेलनकी हिन्दी स्पर्धापरीक्षा उत्तीर्ण विद्यार्थियोंको इनाम देने के लिए, जो उत्सव, मारवाडी सम्मेलन द्वारा सन १९२५, २६ और २७ में किये गये थे, उनमें ऊपर लिखे हुए स्कूलोंने इन सवादोंका प्रयोग किया था। इनके अलावा नीचे लिखें अवसरोंपर भी इनका उपयोग हुआ है। १-गुजराती रिलीफ फडमें मदद करनेके लिए भागवाडी थियेटरमें न १,४,५, २-अप्रसेन जयतीपर नरनारायणके मदिरमें न ८ का [११ का ३---म्युनिसिपल गुजराती टीचर्स कॉ फरेंसमें न ८ का ४- भांगवाडी थियेटरमें कानजी करमसी स्कूल और चिंचपोकली स्थानकवासी जैन स्कूलके वार्षिकोत्सवोपर न १४ का ५-माहीम गुजराती कन्याशालके वार्षिकोत्सवपर न १२, न ८ का ६-कालकादेवी कन्याशालाके वार्षिकोत्सवोंपर न २, ३, ५, ९, १०, ११ का --महिला होस्टल नासिरके विल्डिंग फडके 'फेन्सी फेअरमें' और ग स्व गुलाब बेनके मानके मेलावडेमें न २ का ८-श्राविकाश्रमके वार्षिकोत्सवपर न १३ का नोटेशनोंमें भूलोकी बहुत सभावना है । क्योंकि मैं गायनका उस्ताद नहीं और दूसरोंसे लिये हुए नोटेशनों में प्रूफ सुधारते भलें रह जाना स्वाभाविक है । इसके लिए क्षमाका प्रार्थी हूँ। मुझे पूरी आशा है कि, उत्सव करनेवाले सजन इस सग्रहका उपयोग कर मेरे परिश्रमको सफल करेंगे । वे जिस सवादका उपयोग करें उसकी मुझे सूचना देनेकी अगर कृपा करेंगे तो उपस्त होऊँगा । आशा है, सजन ऐसा जरूर करेंगे । . निवेदक कृष्णलाल वर्मा संवाद-संग्रह कृष्णकुमारी se प्रथम दृश्य स्थान-रस्ता,-समय-सवेर (दो सखियोंका प्रवेश) १-( दूसरीको सिरसे पैरतक देखकर ) वाह ! आज सज धजके किधर चली ? तुम्हें इस तरहसे सजी हुई तो कभी न देखी थी । हम दासी ! हमें इतना साज-सिंगार नहीं सोहता। क्या तू राजकन्या है? २-हुश ! क्यों नहीं सोहता ? हिंदुआम्रज, मेवाडके राणा भीमसिंहजीकी कन्या कृष्णकुमारीके पास उनके वैभवको सुशो- भित कर सके ऐसी दासियाँ न चाहिए? १-हॉ, हॉ, चाहिए, जरूर चाहिए मगर- २-मगर भी नहीं और तगर भी नहीं । मैं राजकन्याको छाजे, शोभे ऐसी उनकी मानीती दासी हूँ। इतना ही नहीं में उनकी सखी भी हूँ । समझी ? १-चाह ! तू ही सखी है और में नहीं ? २.--(सिर हिलाती है) ऊँ हुँ ! सखी तो मै हूँ और तू - 'कृष्णाकुमारीका । खेल करनेवाली लडकियाँ (पृ. १) संवाद-संग्रह कृष्णकुमारी --+-+- प्रथम दृश्य स्थान-रस्ता, समय-सवेरा (दो सखियोंका प्रवेश) १-( दूसरीको सिरसे पैरतक देखकर ) वाह ! आन सन घजके किधर चली ? तुम्हें इस तरहसे सजी हुई तो कभी न देखी थी । हम दासी ! हमें इतना साज-सिंगार नहीं सोहता। क्या तू गजकन्या है ? २-हुश ! क्यों नहीं सोहता ? हिंदुआम्रज, मेवाडके राणा भीमसिंहजीकी कन्या कृष्णकुमारीके पास उनके वैभवको सुशो- भित कर सके ऐसी दासियाँ न चाहिए? १-हॉ, हॉ, चाहिए, जरूर चाहिए मगर- २-मगर भी नहीं और तगर भी नहीं । मैं राजकन्याको छाजे, शोभे ऐसी उनकी मानीती दासी हूँ । इतना ही नहीं में ननकी, मावी भी हूँ। समझी.? १- वाह ! तू ही सखी है और मैं नहीं ? २--(सिर हिलाती है) हु ! सखी तो मै हूँ और तु
सवाद-संग्रह
?
१–में कौन हूँ, बता दे ?
२-ताऊँ? वताऊँ?
१-चता, पता।
२--दा सी हा! हा! हा!
१---देख मुझे यह दिल्लगी अच्छी नहीं लगती।
२---तो क्या अच्छा लगता है ? लड्डू, पुरी, हलुवा
१-हुश ! मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता! क्या फिजूल
वात है ! हट ! मुझसे न बोल ।
२-तुझे क्या अच्छा लगता है सो मै जानती हूँ । तेरे
मनकी विलकुल छिपी बात बता सकती हूँ । वताऊँ ? बताऊँ ?
१-वता, वता देखें १ आई है वडी जोपण कहीं की !
२-~-अगर बता दी तो क्या दोगी?
१-4ठ चैठ वताई!
२-तुझे पसंद अच्छा क्या पसंद है ? (एक तरफ मुंह
करके मीन-मेख, नृप, आदि गिनती है) एलो ! साफ दिख गया।
तुझे पसंद है मेरा सा लू! हूँ कि नहीं पक्की जोपण ? बाहरे
मैं ( आपही अपनी पीठ ठोकती है)। कैसी मनकीसी कही ?
तवीअत खुश हो गई।
१- क्या खिल खिल दॉत निकालती है ? आज मेरी
हँसी करती है। मगर कल तेरे लिए रोनेका वक्त आयगा ।
२---आने दे ! आने दे! (हँसकर मुँह फेर लेती है थोडी
टेर दोनों चुप रहती है फिर )
१--क्योरी ! यह सालू तो पुराना दिखता है (पास जाकर
देखती है) यह तो राजकुमारीका साल है । हाथ मारा न ?
कृष्णकुमारी २-वाह! हाथ क्यों मारती? रानी साहिवाने मुझे वख्शा है। १-मैं समझी नहीं। २-इसमे समझनेकी कौनसी बात है ? राजकन्या कृष्ण- कुमारी और जयपुरके राजा जगत्सिंहका ब्याह होना नकी हुआ है। उसीकी यह पशिश है। समझी ? १-क्या कहा ? जयपुरके राजा और कृष्णकुमारीका च्याह होना नकी हुआ है ? २-हॉ, दरिने फर्माया था। (नेपथ्यसे दिद्वारा सुनाई देता है ) सुनो! सुनो ! राज- कुमारीका ब्याह आवरमें होगा यह बात सुनकर जोधपुरका राजा चिह गया है और उसने सेधियाको साथ लेकर मेवाड पर चढ़ाई कर दी है । गॉवोंको लूट रहा है और जला रहा है । इस- लिए सभी सावधान रहो ! सावधान ! २---(पराकर ) लूट रहा है ! हाय राम ! अब मै क्या करूं--(अपना जेवर निकाल निकाल कर रूमाल्में जमा करती है फिर ) वहिन मुझे घर पहुंचा दे। १-(जरा हँसकर ) वाहरे कृष्णकुमारीकी सखी ! २-( हाथ जोडकर रुदनके स्वरमें ) तेरे हाथ जोडती है तेरे पाओं पड़ती है, हा हा खाती हूँ। मुझे घर पहुंचा दे। १--पाओं पड ! मेरे पैरोकी धूल सिरपर चहा ! २-(पैरों पडती है और धूल सिर पर चढाती हैं ) अब तो राजी ? मुझे जल्दी घर पहुँचा दे। ( दोनों जाती है।)
सवाद-संग्रह
दूसरा दृश्य
स्थान-उदयपुरके अन्त पुरका एक कमरा ।
समय-दुपहर।
(कृष्णकुमारीको काकी हाथमें छुरी लिए, कमरेमें
फिरती हुई अपने आप )
काकी---हा ! यह निठुर काम भी मेरे ही भाग्यमे लिखा
था। जिस स्वर्ण-प्रतिमाको मैंने इन हाथोंमें पाला, पोसा,
बड़ा किया, लाड लड़ाये उसीको इन्हीं हाथोंमें नष्ट करना
पड़ेगा ! हा विधिविडंबना ! जिन ऑखोने उसके खेल कूदको
देखा वे ही ऑखें उसके तडपनेको देखेगी जिन्होने उसकी
हसीका फब्बारा छूटते देखा, वे ही आज उसकी छातीसे
रक्तका फयारा छटते देखेंगी ? क्या देख सकेंगी ? स्थिर रह
सकेगी ? आह ! कितना भयानक दृश्य होगा? ना, ना, ये
ऑखें उस दृश्यको न देख सकेगी, यह हाथ उसकी छातीमें
छुरी न भोंक सकेगा; यह हृदय स्थिर न रह सकेगा। उह !
कितनी यत्रणा है ? ( एक दीवार के सहारे हाथ पर सिर रख, खडी
हुई कुछ सोचती है। कुछ क्षणके बाद वहाँसे हटकर) यह काम
करना ही होगा। भगवान ! हृदयमे वल दो कर्तव्यपालनकी
शक्ति दो।
(प्रार्थना करती है।)
,
.
५ कृष्णकुमारी -- .- [ राग मित्र जोगिया ] व्याकुल में होगई कन्हैया ॥ ध्रु० ॥ कैसे करूँ मै, सुध न रही सब तन मनकी अब, दीना होगई |न्या०॥ लान रखो हरि भीर परी है, करुणर क्यों छुप गई । व्या० ॥ (प्रार्थना करके खडी होती है । कृष्णकुमारी आती है और नमस्कार कर) कृष्ण -क्या काम है काकाजी? ( काकीनी वीणाविनन्दित स्वर और अप्सराको लजित करनेवाला रूप देसती है। वह घबरा जाती है और उसका हृदय पुन दु ग्वा- क्रान्त हो जाता है। छुरी हाथसे गिर पडती है । ) कृष्ण- (छुरीको पडती देस चौककर पीछे हट जाती है और पूठती है ) काकीनी ! घबराये क्यो ? क्या बात है ? यह छुरी कैसी है ? काकीनी--( आकदन पूर्ण स्वरमें ) वेटी ! यह बात न पूछो ! मै राक्षसी हूँ। यह छुरी तुम्हारे ही कलेनेमे भौकनेके लिए लाई थी। कृष्ण--(विस्मयसे दोनों आँखे फाड, काफीजीके मुखपर स्थिर- कर बोली ) मेरे ही कलेजेमें भौकनेके लिए ! काफीजी ! मैने ऐसा क्या अपराध किया है ? काकीनी-तू मेवाडकी काल हुई है। तेरे लिए सारा मेवाड़ नष्ट हो रहा है । तुझे लेनेके लिए आरके राजा आये
संवाद-सग्रह
६
है और सेधियाको साथ लेकर जोधपुरके राजा भी आये हैं।
दोनों मेवाड़को लूट रहे है । मेवाड़ इस समय दुर्वल है । वह
कुछ नहीं कर सकता । महाराजको फिसीने सुझा दिया है कि
अगर तु दुनियासे उठ जायगी तो मेवाड़ पच जायगा ।
कृष्ण ---(कुछ देर सोच, फिर मुस्कराकर ) व , स ! इसीके
लिए आप दुखी हैं ? मै एक स्त्री मात्र ! मेरे जानेसे यदि.
मेवाडकी रक्षा होती है तो काकीजी ! उठाइए छुरी और कीजिए
मेरे कलेजेके पार।
काकीजी-(और दो कदम पीछे हटकर ) ना घेटी ! ना!
मेवाड़ जाय ! राज जाय ! सर कुछ नष्ट हो जाय ! मुझसे यह
कार्य न होगा।
-अच्छी बात है। अगर आप यह काम नहीं कर
सकती है तो मै खुद करूँगी। अपने हाथों यह छुरी अपने
कलेजेके पार करूँगी। मेवाडकी कन्या क्या मेवाडकी भलाईके
समय पीछे हटेगी ? छि ऐसा भी हो सकता है ?
(कृष्णकुमारी छुरी उठाकर अपने कलेनेमें मारने को तैयार होती
है । काकीनी दौड़कर उसके हाथसे छुरी छीन लेती है और
कहती है)
काकीजी-नहीं बेटी ! नहीं ! मेरे सामने नहीं ! मेरी छुरीसे
भी नहीं ! ठहरो ! मै राणाजीके पास कहलाती हूँ। वे जैसा
कहेंगे वैसा किया जायगा । (पट परिवर्तन )
कृष्णकुमारी तीसरा दृश्य स्थान-अन्त पुरका दीवानखाना समय-चार बजे [ राणा भीमसिंहनीके पास ये समाचार जाते हैं। मत्री वगैरा मिलकर कृष्णकुमारीको जहर देना स्थिर करते है । यह बात रनवा- समें पहुँचती है । रानी वगैरा सभी दुखी है । कृष्णकुमारीका प्रवेश ! रानी दु खसे रोने लग रही है । दूसरी स्त्रियाँ भी आँसू बहाती हुई कृष्णाको घेरकर खड़ी हो जाती हैं। कृष्णकुमारी-छि ! छि ! तुम यह क्या कर रही हो ? मेरा- डकी भलाई के लिए उसकी एक कन्या मर रही है । यह देख- कर तुम्हें रोना क्यों आता है ? तुम्हें गेते देखकर मुझे लजा आ रही है। मेवाड़की पुत्रियाँ हँसते हँसते अनिमें कूदी हैं। हाथोमें तलवारे नचाती हुई उल्लासके साथ युद्धमें गई हैं। तुम क्या उन्ही राजपूतानियोकी पुनिया नहीं हो ? बाहिर-मेवाड़में- एक भी राजपूत न रहा, मगर घरमें मेवाड़में क्या एक राजपू- तानी भी न मिलेगी ! मेवाड क्या एकदम ही निक्षत्री हो गया है ? छि: रोते तुम्हें लाज नहीं आती ? हॅसते हुए मुझे आज्ञा दो। मेवाडकी कन्या-मेगाडकी भलाईके लिए हँसती हुई, चारो तरफ हँसी देखती हुई, अपना बलिदान दे। सब (ऑसू पौड़कर) सच है, कृष्णा ! राजपूतानी देशरक्षाके लिए प्राण देती है । यह तो आनंदकी बात है । रोना भूल है । 1 सवाद-सग्रह कृष्णा-(माताके पास जाती है ।) उठो माँ ! सामने में- तुम्हारी कृष्णा-खड़ी है। एक बार मेरी तरफ देखो। मेरे जानेका समय हो गया है। फिर मुझे न देख सकोगी। ( रानी और भी जोरसे रोती है और कृष्णाको अपनी छातीसे लगा लेती है। कृष्णा धीरे धीरे अपनी माताले सतोष देती हुई कहती है। कृष्णा-मॉ तुम वीरकन्या हो। तुम्हें क्या इस तरह रोना सोहता है ? हम राजपूत स्त्रियाँ । इस तरह मरनेके लिए ही तो जन्मती हैं । युद्धमें मरेंगी, जलकर मरेंगी, जहर पीकर मरेंगी, छरीसे मरेंगी-किसी तरह मरेहींगी। सुखके साथ धुढापेतक जीना किस राजपूतानीके भाग्यमे लिखा है ? आज यदि दुष्ट शत्रु हमारी लाज लूटने आते तो क्या हम जौहर न करती ? या यदि जगदम्बाकी आज्ञा होती तो रणसाजसे सजकर युद्धमें न जाती ? आज यदि मै विवाहिता होती और मेरे स्वामी स्वर्गमें जाते तो क्या मैं चितारोहण न करती ? क्या उस समय हॅसते मुख मुझे आशीर्वाद न देकर तुम रोने बैठती ? माँ ! मेवाड़ नष्ट हो रहा है। एक कन्याके प्राण देनेसे वह बच सकता है। प्राण देना हमारे लिए खेल है । देशके लिए प्राण देनेका खेल कर- नेहीमें राजपूतानांके जीवन की सफलता है । उठो माँ ! मुझे शृगार कराओ! आशीर्वाद दो और हँसते हुए विदा करो । मै मैवा- ड़की रक्षाके लिए माण देकर देवताओके देशमें जाऊँ। रानी--( आँसू पौडकर ) मैं क्या जानकर रोती हूँ वेटी ! मेवाड़ नष्ट हो रहा है, परन्तु एक भी वीरने
कृष्णकुमारी
लिए तलवार न पकड़ी। एक भी वीरने इस आमको बुझा-
नेके लिए अपना रक्त नहीं दिया, और तुझ फूलको उस
आगमें बलि दे रहे हैं। आज अगर मै देखती कि मेवाड़के
वीर मेवाडकी रक्षाके लिए मत्त हो रहे हैं; पागलोंकी तरह
लडाईकी आगमें कूदनेको दौडे जा रहे है। 'हर हर महा-
देव । के जयनादसे आकाशको गुंजाते हुए शत्रुओंको मार
रहे हैं, और खुद भी मर रहे हैं तो क्या मेरा जी इतना
छोटा होता ? ( कुछ ठहर कर ) अगर देखती कि वीरोकी
लाशोका ढेर लग रहा है; राना, उनका बेटा और उनके
भाई शत्रुओंकी असंख्य सेनामे कूद कर उसका धस करते
हुए विलीन हो रहे है तो आज क्या में रोती ? तुझे वीर वेपसे
सजाकर युद्धमे अपने साथ ले जाती और रणभूमिमें मरते
देख उल्लाससे कहती कि मेरी कोख उज्ज्वल हो गई। अगर
जौहर करनेका अवसर आता तो कम्मल वस्त्र धारण करा
जगदंबाके गीत गाती हुई तुझे लेकर धूधू कर जलती हुई
अग्निमे हँसती हॅसती कूद पडती । (एक निश्वास छोडकर )
मगर बेटी ! आज ऐसा नहीं देखती । सभी कायर होकर
घरमें बैठे है और अपने अधम जीवनकी रक्षा करनेके लिए
मेरे इस फूलको नाश कर रहे है । कैसे धीरज धीं बेटी ?
कैसे धीरज धरूँ ? (रो पडती है । कृष्णाके भी आँसू आजाते हैं)
कृष्णा--(आँसू पोछकर ) ऐसी बाते कहकर मुझे दुःखी
न करो माँ ! मेवाड़ गिर गया है। मालूम नहीं भर वह
उठेगा या नहीं ? यदि मेवाड़में आज वे पुरुष होते तो क्या
सवाद-संग्रह
मेवाड़की ऐसी दशा होती ? जाने दो मॉ ! इन पातीको
सोचनेसे लाभ ही क्या है ? मेवाड़ निपूता हो गया है तो
क्या उसकी पुत्रियाँ क्या उसकी रक्षाका उपाय न करेंगी?
करेंगी, जरूर करेंगी ! हँसते हँसते विदा दो माता! शायद
मरा बलिदान इस मरती हुई जातिमें जीवनका संचार करे।
मेवाड़ी कायरता छोड़ फिर क्षत्रिय बनें और शानके साथ
जान देकर आवरूकी रक्षा करे।
रानी----( कृष्णाके सिरपर हाथ फेग्कर) तब जा वेटी! माँ
जगदंवा तेरा कल्याण करें। हंसती हँसती देशके लिए प्राण
देकर स्वर्गको जा! तेरे बलिदानसे मेवाड़ीयोंकी कायरताका
मैल धुल जाय और चे फिर अपने असली रूपमे-वीरताके
रूपमे खड़े हों।
(कृष्णाको नहरका प्याला दिया जाता है। कृष्णा प्याला
हाथमें लेकर, जहर पीनेके पहले ईश्वरसे प्रार्थना करती है-
[राग-मालकोंस 7
कृष्णा माधो राम निरजन
इतनी विनती मोरी, सुन लोजे तू ही
तू ही करेगो तेरो काम ॥
कृष्णा प्याला पीजाती है। उसे उल्टी हो जाती है। दूसरी
बार फिर तेन जहर दिया जाता है । कृष्णा उसे पीती है। और
तडपकर प्राण दे देती है)
[नोट-यदि कृष्णाकुमारीका काम करनेवाली लडकी होशियार
हो तोही उसे दर्शकोंके सामने जहरका प्याला देना चाहिये अन्यथा
प्राधनाके बाद खेल समाप्त कर देना चाहिए।]
महारानी मीनलदेवीका न्याय
महारानी मीनलदेवीका न्याय
Arch
[ यह रानी गुनरातके महारान कर्णकी धर्मपत्नी और महारान
नयमिदनीकी माता थी। मारान कर्णका देहावसान हुआ तब
महारान जयसिंहनीकी आयु तीन ही बरसी थी। इस लिए
महारानी स्वय रानका कारवार टेवती थी। उसी समयमें उन्होंने
पाटनमें एक तालाब बनवाया था, उस मौके पर जो घटना हुई
भी उसीको लेकर यह सयाद निरा गया है। तालाब और बुढि-
यागी झोपड़ी वहाँ अब तक मौजूद है। ]
स्थान-महल
समय तीन पहर दिन
(महारानी मीनलदेवी दरि गाकर बैठी है । सेविकाएँ और
मरी दर्नारी स्त्रियाँ यथास्थान बैठी या खडी हैं।)
मीन देवी-लीलापती ! मैंने तालार धानेका हुक्म दिया
या उसके पियमे क्या कार्रवाई हुई ?
लीलावती देवी ! आपकी आज्ञाके अनुसार सब व्यवस्था
हो गई है। नशा तैयार है। देखिए (नकशा बताती है)
इस नकशेमें यह जो औपटी दिखती है वह एक गरीब बाईकी
है। झोपडी देनेके लिए कामदारोने उसे बहुत समझाया; परन्तु
• नहीं होती।
ܒܝܟ݂
सवाद-संग्रह
मजुला-हमने भी उस वाईको बहुत समझाया । धन
देना चाहा, उसने इन्कार किया। बड़ा पक्का मकान लेकर झोपड़ी
छोड़ने के लिए कहा उसने मुंह फेर लिया।
दमयती-महारानी साहिबा ! अव तो आज्ञा दीजिए कि
कामदार जबर्दस्ती उस वाईसे झोपड़ी' खाली करा लें। अगर
प्रजाके लोग सरकारी और लोकहितके कामोमें बाधा डालेंगे
और उनकी बातोका खयाल किया जायगा, तो कैसे राज चलेगा
और कैसे प्रजाहितके काम होगे ?
महारानी--( कुछ सोचकर ) अच्छा उस वाईको मेरे पास
बुलाओ।
(सेविका बाहर जाकर हरकारेको कहती है। वह गरीब स्त्रीको
बुलाता है। गरीब आकर यथोचित नमस्कार कर एक ओर खडी
हो जाती है।)
महारानी-(गरीबसे ) वाई मेरे कामदार कहते हैं कि तुम
राजके काममें विघ्न डालती हो । क्या यह सच है ?
गरीब-( हाथ जोड कर ) महारानी साहिवा ! मेरे जैसी
एक गरीव स्त्री राजके कामोंमे क्या विघ्न डाल सकती है ?
महारानी-यह ठीक है; परन्तु जब तुम ज्यादा मूल्य लेकर
भी जगह नहीं देती; अच्छी जगह लेकर भी
छोडती, इसका अर्थ क्या है ? यही न कि तुम ,
नेक काममे विघ्न डाल रही हो । क्या
'जबरदस्ती की जाय?
4
||
महारानी मीनलदेवीका न्याय
गरीब--महारानीजी ! आप जैसी न्यायी और मजाहित
फरनेवाली देवी कभी जोर-जुल्म न करेगी। यह मुझे विश्वास
है। मैंने यह भी स्थिर कर रखा है कि जान दूंगी, मगर
औपढी न दूंगी।
महारानी-~याई ! तुमने तो मुझे वही चिन्तामें डाल दी !
बताओ तुम ऐसी हठ क्यों कर रही हो? तुम रद्ध हो चली
हो तुम्हारे पीछे कोई नहीं है । इस लिए आज नहीं तो कुछ
दिन बाद यह जगह सरकारी ही होगी । ऐसी दशामें क्या यह
उचित नहीं है, कि तुम खुद ही झोपड़ी दे दो । जिससे यह
तालाव एकसा सुंदर बन जाय ।
गरीब-महारानीजी ! आप कहती हैं सो सर ठीक है; परन्तु
क्या मैं आपसे कुछ पू??
महारानी-~-हॉ पूछो।
गरीब-आपके एक पुत्र रत्न है । आपको किसी वातकी
कमी नहीं है । तो भी आप यह तालार क्यो वनवाती है ?
महारानी---इसलिए कि, प्रजाका हित हो और मेरा नाम
हमेशा कायम रहे।
गरीब-यदि आप मुझे अभय वचन दें तो मैं अपने मनकी
वात कहूँ।
महारानी-भीनलदेवी मजाको हमेशा ही निर्भय रखती है।
तुम जो कुछ सत्य पात हो सो कहो ।
सवाद-संग्रह १४ गरीब-आपकी प्रजाहितैपिताका मुझे विश्वास है । इसीलिए मैने यह साहस किया है । मुनिए, जब आपने तालाब बँधवा कर नाम कायम करना स्थिर किया तभी मैने स्थिर किया कि कोई ऐसा काम करूँ जिससे मेरा नाम भी अमर हो । नाम भलाईसे भी अमर होता है और बुराईसे भी । भलाई में नहीं कर सकती; परन्तु तालावको शोभाहीन करनेकी बुराई कर सकती है। इससे आपके साथ ही मेरा नाम भी अमर रहेगा। महारानी--(कुछ देर सोचकर ) लीलावती ! कामदारको कहो कि वे इस नकशेके माफिक तालाव वनवा ले । दुनियामै राजा और रैयत सबको स्वतंत्रता होनी ही चाहिए । इस बाईने दृढ- तापूर्वक अपना इरादा बताकर मुझे धर्म सुझाया है । तालावके साथही झोपड़ीके कारण मेरी न्यायप्रियता अमर होगी। गरीब-धन्य है ! गुजरातकी महारानीको धन्य है ! जिन्होंने प्रजाको अपनी सन्तानके समान समझा है, किसीके मनको दुखानेका काम कभी नहीं किया है और न्याय करते समय सदा ईश्वर और धर्मको सामने रक्खा है । ऐसी महारानीजीको हजारों धन्यवाट है। परमात्मा इनके राज्यको बढावे और इनकी आयु चडी करे । वोलो महारानी श्रीमीनलदेवीकी जय ! [नोट-फिर अगर रास (गरवा) करानेकी इच्छा हो तो रास कराना चाहिये । अन्यथा दार समाप्त करा देना चाहिए।
आत्मरक्षा
आत्मरक्षा
स्थान--एक क्लेिमें माताका मदिर ।
समय--प्रात साल।
(कुछ स्त्रियाँ माताकी पूजा करके प्रार्थना कर रही हैं । एक
स्त्री बोलती है और दूसरी चुपचाप हाथ जोडे खड़ी हैं।)
१ स्त्री-हे जगन्माता! जगतकी रक्षा करो ! हे दुष्टदलनी !
दुष्टोका सहारकर देशको वचाओ । हे महिपासुर मर्दिनी !
अधर्म असुरका पर्दन करो। हे शुंभनिशुंभ हननी ! अन्या-
चारका हनन करो।
माता ! हजारो माताएँ पुत्रहीन हुई। हजागे पिताओंका
सहारा गया, हजारों वारक अनाथ बने, हजारो सतियोंके
सिरनाज मिट्टीमें मिल गये ! असहायोके दीन रुदनसे आका-
शमडल गूंज उठा ! देशमे रक्तकी नदिया वह चली, तो भी
जननी ! क्या तुम्हारी आँख न सुली ? क्या अब भी तुम्हारा
क्रोध शान्त न हुआ ? क्या अब भी तुम हमारी रक्षा न
फरोगी ? क्या सतियाँका सत्त लुटेगा । (शस्त्रास्त्रोंसे सज्जित
राजकुमारी और उसकी सखियोंका प्रवेश ।)
राजकुमारी-चुप ! चुप ! ऐसी वात न वोलो! सतियोका
सत दावानल है, जो उसमें पडेगा जलके राख हो जायगा ।
सतियोंका शील तेजोमय सूर्य है, जो उसकी तरफ देखेगा अधा
वन जायगा।
.
सवाद-सग्रह
धर्म
१ सखी-वेगक 1 किसकी ताकत है कि सतियोंका सव
लूटनेको हाथ बढ़ावे ! जिस महारली रावणने फैलाशको उठा
लिया था और इन्द्रादि देवोंसे सेवा कराई थी वही रावण-जब
उसने सतीफा सत लूटनेको हाथ वढाया-मिट्टीमें मिल गया।
२ स्त्री-यह पुरानोंकी बात है । अव न वे सतियाँ हैं न
उनके रक्षक पुरुप । आज स्त्रियाँ निर्माल्य है, और पुरुष कायर ।
दोनोका मीतके मुंहमे पड़े हुए शरीरपर मोह है । दोनोंको
क्षणिक सुख प्यारा है । इनके लिए वे मान, इज्जत, सत,
सब कुछ दे सकते है।
२ मखी-वहिन ! पाँचौ रॉगिलयाँ समान नहीं होती।
आज भी ऐसी स्त्रियाँ है जो शीलरक्षाके लिए हँसते हँसते प्राण
दे सकती हैं। आज भी ऐसे पुरुप हैं जो जान देकर मानकी
रक्षा करते है।
३ सखी-हिन ! जान पड़ता है तुमने घृणित स्त्रीपुरुषोंको
देखकर ऐसा विचार कर लिया है । जिनके आदर्श सीता और
राम हों, जिनके आदर्श शैव्या और हरिश्चन्द्र हो, जिनके
आदर्श पद्मिनी और भीमसिंह हो वे स्त्रीपुरुप सत और धर्मके
वदले क्या कभी मुख और प्राण खरीद सकते हैं ?
, सब--असंभव । सर्वथा असंभव ।
(दूरसे एक स्त्रीको आवाज आती है) भागो ! भागो । प्राण
लेकर भागो । दुश्मनोकी फौज, टिट्टीदलकी तरह, सारे शहरमे
फैल गई है । मुट्ठीभर वीर किलेकी रक्षा कर रहे हैं। किला
आत्मरक्षा
टूटनेहीवाला है ! [ इस आवाजको सुनकर मदिरमसे सभी बाहर
रस्तेपर आजाती हैं । और बोलनेवाली स्त्रीको भागते देखकर कुछ
नागरिक स्त्रियाँ भी भागने लगती है । राजकुमारी अपनी सखियों सहित
रस्ता रोककर खड़ी हो जाती है।
राजकुमारी--मत भागो! भागनेसे माण न बचेंगे। वे तो
जावेहींगे साथ ही शील भी न बचेगा । अतः आओ हम वीरोको
किलेकी रक्षा करनेमें मदद दें।
१ना० हम अवला क्या कर सकती है ? लाखो वीरोके
सामने हम किस खेतकी मूली है ?
२ स.--छि ! किसने कहा, हम अबला है ? वीरोकी माता
और पहिने क्या कभी अपला हो सकती है ?
१ स०-बहिनो ! घबराती क्यों हो ? वह देखो माँ दुर्गा
त्रिशूल और खड्ग लिए हमारी रक्षाके लिए तैयार खडी है।
२ नावेशक ! शीलके बलसे वलवान, माता अम्बाके
आशीर्वादसे अभय हम लाखों ही नहीं करोडों शत्रुओंका नाश
कर सकती है।
१ ना०- -चलो! तर लो तीर कमान हाथोंमें, चढ जाओ
किलेकी दीवारोपर, करो शत्रुओंपर बोछार, गनुदल ध्वस
हो और वह समझे कि जय अधर्मकी नहीं धर्मकी होती है।
२०-और शत्रु यह भी जान ले कि, अपना धर्म, अपना
शील, अपनी टेक, अपनी आपरू और अपनी स्वाधीनताके
,
२
त्र
संवाद-सग्रह
लिए पुरुष ही नहीं लियाँ भी तलवार पकड सकती है और
शत्रुओफी अकल ठिकाने ला सकती है।
राजकु०-तो करो प्रस्थान | तलवार खींच लेती है और
दौडती हुई] बोलो सिंहवाहिनीकी जय ! बोलो असुरसंहारिणीकी
जय ! [दूमरी सखियाँ भी कमानमें तीर चढाकर राजकुमारीके साथ
चलती हैं । नागरिक लिया भी उनके पीछे पीछे जाती है।]
-~किया (पृ. ११) *
सेठानी और वाढ-पीडित गृहस्थ स्त्री।
प्रथम दृश्य
स्थानसेठानीका बंगला
समय-दुपहर
[ सेठानी अपने टीवानखानेमें कोच पर लेटी हुई एक उपन्यास
पढ रही है। बाहर कपाउडके दर्षाजेपर दो स्त्रियाँ वैठी बातें कर रही
हैं । एक स्त्री और छ सात वरसगी वालिकाका प्रवेश 1]
आगत स्त्री-बहिन ! सेठानीजी हैं ?
एफ-मतला?
आ०-सेठानी मॉके दर्शन करने है।
एक-सीधी क्यो नहीं बोलती कि कुछ मागना है।
दूसरी-(पहलीको) पतला दे न विचारीको (स्त्रीको)
सेगनीजी उस दीवानखानेमें हैं। चली जा ! वाहर खडी रहकर
पुकारना । अंदर मत जाना।
[स्त्री सिर नीचा किये, चुपचाप, लडकीका हाथ पकडे जाती है।
टोजेके बाहर खटी रहती है। मगर सेठानी उस तरफ नहीं देखती ।
तब स्त्री पुकारती है।
स्त्री-सेठानी मॉ! (सेठानी सुना अनसुना करती है। कुछ ठहर
संवाद-संग्रह
२०
.
कर वह और भोरसे पुकारती है ) सेठानी माँ ! (सेठानी फिर नहीं
देखती, इसलिए स्त्री ओर जोरसे पुकारती है) ओ सेठानी माँ'
सेठानी--(जरा टेढी निगाह से देखकर ) क्या है ?
[सेठानीको प्रश्न करते देखकर स्त्री अदर घुसती है, और सिर
नीचा किये खडी रहती है।
सेठानी-बोलती क्यों नहीं ? क्या मतलब है ?
स्त्री-(दुखके स्वरमें) इस वाहमें हमारा सब कुछ नाश हो गया।
सेठानी--( बेपरवाहीसे ) मैं क्या करूँ ? भोग तेरे कर्मका !
स्त्री-(एक निश्वास डालकर ) सच है-भोग मेरे कर्मका!
(कुछ ठहरकर ) भाग्यवती मॉ ! इस छोकरीको कुछ खिलाओ ।
तीन रोजसे इसने कुछ नहीं खाया है।
सेठानी---'तुम लोगोंके घरोंपर बंबईने खानेपीनेको भेजा है।
फिर तुम यहाँ भीख मांगने क्यो आई हो?
स्त्री-माँ उससे गरीव और हल्की कौमके लोग फायदा
उठा रहे है।
सेठानी-ओहो ! तुम तो धन्ना सेठकी बेटी हो! इसी लिए
भीख माँगने आई हो?
स्त्री-सेठानीजी । मध्यम वर्गके लोग न कुछ मॉगने जा
सकते है और न कुछ लेही सकते है । भूखसे भी ज्यादा उन्हें
आवरू, प्यारी है।
सेठानी-तो फिर वे मरें।
.
-
-
०१
सेठानी और पाढ-पीडित गृहस्थ स्त्री।
.
स्त्री-अनेक भले घरके मौतकी राह देख रहे हैं और
प्रार्थना कर रहे है कि, भगान् जैसे आपने हमारे घरवार नष्ट
किये है वैसे ही हमें भी नष्ट कर दो। मगर मै इस लडकीका
तडपना न देख सकी, वहाँ गर्मसे कुछ ले भी न सकी इसी
लिए यहाँ आई हूँ। माँ दयाकर लडकीको कुछ खिलाओ और
मुझे हो सके तो महनत मजूरीका काम दिलाओ।
सेठानी-~-हमारे अन्नक्षेत्रमें चली जा।
स्त्री-म वहाँ भिखारियोमें न जा सलूगी।
सेठानी--( गुम्सेसे ) न जा सकेगी तो कूएमे जा ।
निकल यहाँसे ।
स्त्री--(घुटने टेककर ) सेठानीनी दया करो।
सेठानी---( पडी हो जाती है) निकल यहाँसे । चम्पा !
ओ चपा!
बालिकासेठानीजी ! मेरी मॉको कुछ दो। इसने पाँच
दिनसे कुछ नहीं खाया है । ( चपाका प्रदेश)
सेठानी---तू मर गई थी या जिंदा थी। यह अदर कैसे चली
आई ? निकाल उसको । [चम्पा स्त्रीका हाथ पकडने आगे बढ़ती
है , बालिका वीचमें आकर ]
बालिका खवरदार ! मॉको हाथ न लगाना । हम आप ही
चली जाती हैं । ( माँस ) उठो मॉ, चलो ! तुम तो कहा करती
थी कि, अपमानसे मरना अच्छा है ! आज कैसे अपमान
सहती हो?
.
संवाद-सग्रह
स्त्री ( उठकर ) सच कहा बेरी ! अपमानसे मरना अच्छा है।
चलो। दोनों चली जाती है।
सेठानी----( चंपासे) खवरदार किसीको आने दिया तो !
उपन्यास पढ़नेमें कैसा मजा आरहा था। अभागिनीने आकर
सब मजा बिगाड़ दिया। क्रोधसे कोच धोलकर चली जाती है।]
दृश्य दूसरा
स्थान--शहरके बाहर एक रस्ता
समय- दुपहर
[स्त्री और बच्ची चले जा रहे है ]
बच्ची-~~-मॉ, अब नहीं चला जाता, पैर दुखते है । सिर फिर
1
स्त्री-चल वेटी ! उस कूएके पास झाडके नीचे कुछ
आराम करेगी।
[कए पर पहुँचती है। दोनों बैठती हैं । लडकी सो जाती है।
स्त्री~भगवान् क्या तुम हो ? अगर हो तो कहाँ हो ?
आओ ! जिस फलको तुमने विकसित किया उसकी रक्षा करो!
(बची के मुंह पर हाथ फेरती है। मेरा फल तीन दिनसे भूसा
है। मुझे पाँच दिनसे कुछ न मिला । तुम्हें कितना पुकारा; मगर
तुम न आये । तुम नही हो, अगर होते तो जरूर आते। (योडी
,
सेठानी और वाढ-पीडित गृहस्थ स्त्री। देर गाल्पर हाथ रखकर सोचती है) क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? धू धू करके भूखकी आग जल रही है। उसे कैसे घुझाऊँ ? इस वालिकाके दुःखमी ज्याला कैसे सहूँ ? हा ! नहीं सही जाती। नहीं सही जाती ! नहीं सही जाती ! (चुप रहती है, गालपर हाथ रख सोचती है फिर एकटम खटी हो जाती है।) हॉ, मौत इसका इलाज है। इसीसे शान्ति मिलेगी। (कुछ सोचती है और अपने मनसे पूछती है ) आत्महत्या पाप है ? वह पाप क्या इस ज्वालासे भी बढ़कर है ? नहीं ! कभी नहीं ! अपमान सहकर जीनेसे मौत लास दर्जे अच्छी है । क्या आत्महत्यासे नरक मिलेगा ? मिले । इस ज्वालासे नरककी ज्याला भयंकर न होगी । अपनी कुसु- मके समान बालिकाको भूखसे तडपते देसनेकी ज्वालासे नरक- की ज्वाला हलकी ही होगी। [कए पर जाती है ] का कितना गहरा है ! कैसा शान्त है ! फॉद पद ? फॉट पड़ें फॉद ही पढ़ें! प्रभो । अगर तू सच मुच ही दीनबंधु है तो मेरी वचीकी रक्षा करना ! ( कूदना चाहती है ) क्या बच्ची पुकार रही है ? मेरे साथ चलनेको कहती है। [ लटकीके पास जाती है, मगर हडी वैसे ही शान्तिप्त सोई हुई है । ] तो क्या भ्रम हुआ ? मन मौतसे डरता है। [ फिर कए पर जाती है ] कॉन पुकार रहा है ? ओह ! यह तो माकी आगाज है । स्वर्गमें सुला रही है। आई माँ ! आई ! (कूटना चाहती है ) क्या कहा ? कुसुमको भी लेती आऊँ ? हाँ सच तो है । इस निर्दय दुनिया
सवाद-सग्रह
मेरी बच्ची किसके भरोसे रहेगी ? जब वह मॉ मॉ कहकर पुका-
रेगी ? तब उसे कौन छातीसे लगायगी [ वच्चीके पास जाती
है। उसे उठाती है।]
वालिका--(ऑखें मलती हुई) मॉ, भूख बड़े जोरकी
लग रही है।
स्त्री-तेरी नानी पुकार रही है कुसुम !
वालिका-वे कहाँ हैं?
स्त्री-स्वर्गमें ! हमें भी वहीं बुला रही है ।
वा०-तुम स्वर्गका रस्ता जानती हो मॉ?
स्त्री०--हॉ, हॉ, पासहीमें तो है।
[ दोनों कूएके पास जाती है ]
-मॉ, रस्ता किधर है ?
स्त्री०-इसी कूएमें होकर ।
वालिका–(आश्चर्यसे) कूएमें होकर ? नहीं मॉ डूब जायेंगी।
स्त्री-अपमानसे क्या दृवना बुरा है वेटी ?
बालिका-डर लगता है मॉ,
स्त्री-मैं साथ हूँ। फिर तुझे क्या डर है कुसुम !
बालिका-तब जल्दी चलो । नानीने मेरे लिए मिठाई मंगवा
रक्खी होगीन?
,
वा०-
स्त्री-जरूर
[ दोनों कूएमें कूदती है । दरसे कुछ लकिया उन्हें देखती हैं।
वे दौडकर कए पर जाती है। अपनी साडियोंके सहारे एक लडकीको
सेठानी और वाद-पीडित गृहस्थ स्त्री।
अदर उतारती हैं। वह दोनोंको निकाल लाती है । पेटमेंसे पानी निका-
ल्नेका उपचार किया जाता है । स्त्री होशमें आती है । पूरती है।
स्त्री-मै कहाँ हूँ ? मेरी कुसुम कहाँ है ?
एक-कुछ चिन्ता नहीं है बहिन । भगवानने तुम्हारी रक्षा की
है। तुम्हारी कुसुम यह रही (कुसुमको उसकी गोदमें देती है । वह
कुसुमको छातीसे लगा लेती है। कुसुम अपनी माँके गलेसे लिपट जाती है। )
दूसरी लड़की-बताओ बहिन तुम कूएमें क्यों गिरी थी ?
स्त्री-क्यों पूछती हो वहिन कि हम कूएमें क्यों गिरी थीं ?
जिनके घर वार नष्ट हो जाय; जिनकी कुलीनता पानीमें
मिल जाय; जो अनेकोको खिलाकर खाती थीं उनको भीख
मॉगनेपर भी कुछ न मिले, दानी कहलानेवाली सेठानियाँ
जिनका तिरस्कार करें वे दुनिया जीकर क्या करें ?
ती० ल०-उठो बहिन हमारे आश्रममें चलो । वहाँ तुम्हें
किसी तरहका कष्ट न होगा।
स्नो--( आकाशकी तरफ देख, हाथ जोड ) दयामय तू है,
तेरी माया अपार है । ( सत्र प्रार्थना करती है)
प्रार्थना
त् है करणानिधान ॥
तेरी महिमा महान, मुनिगण तव करत ध्यान ।
भक्तोंका प्राण, ज्ञान ॥०॥
दीननको त्राण-दान, करता है तब विधान ।
पावत सुख सत्र जहान, ॥०॥
पड़ोसिनोंकी वैठक
(१
स्थान-~एक मकान
समय-दुपहर
[पाँच सात स्त्रियाँ बातें कर रही हैं। ]
१-बहिन सुनी तुमने रमणियोके अपमानकी बात?
२-हॉ सुनी और जी मसोस कर रह
३-पुरुप प्राण लेकर भाग गये और स्त्रियोंका धर्मधन
लुट गया।
४-छिः! उन वायलोंका नाम न लो! किसने कहा कि वे
गई।
पुरुष हैं ?
१--विधिने।
२-~-शरीर धारण करनेहीसे कोई पुरुप नहीं हो जाता ।
३-पुरुपमे पौरुष चाहिए, मर्दमे मर्दानगीकी जरूरत है।
४--जिस समय वालोंमें मॉग निकाले, ठुमक ठुमक कर
चलते, स्त्रियोकी तरह मधुर स्वर बना कर बोलनेकी कोशिश
करते मै किसी पुरुपको देखती हूँ, मेरे ..
जाती है।
१-~-विचारे चाहते हैं कि
पटोसिनोकी बैठक २-पुरुप बनाकर विधाताने जो भूल की । उसको वे बायलापन करके सुधारना चाहते है। ३--(एक निश्वास छोड कर ) एक समय था जब भार- तके पुरुपोंमें पौरुप था। ४-रामचद्रजीने सीताका अपमान करनेवाले राक्षसवंश- का नाश कर डाला। १-द्रौपदीका अपमान करनेवाले कौरव कुलको पाण्डयोने मिट्टीम मिला दिया। २-पुरुष जब कभी स्त्रियोके अपमानकी बात सुनते थे सिंहकी तरह गर्ज कर अपमान कर्ताका हृदय चीर डालते थे। ३. -अप चे पुरुप चले गये । उनके साथ पुरुषार्थ भी नष्ट हो गया। ४-अप रह गई है केवल घृणित विषय चासनाकी लीला और नीच भोगविलासकी क्रीडा । १--नरकके कीडोंकी तरह कहते है, अभी जीवनके अनेक भोग भोगने बाकी है। अद्वितीय उल्हासोका उपभोग अभी अधूरा है। २-टन्ही भावनाओके वश कुत्तोंकी तरह अपनी खियोका सतीत्व लुटने देते है। ३. इतना ही नहीं स्त्रियोका अपमान करनेवालोंके पैर चाटते हैं। ४-आज वे बाते उनानेमें पीर है। १-और कर्म करनेमें कायर ।
सवाद-संग्रह
Namanna
२-मगर स्त्रियाँ भी क्या कम गिरी है ?
३- नारी अपला । वह क्या करे ?
४-नारियाँ सब कुछ कर सकती हैं। वे अपमान करने-
वालेका गला घोट सकती है।
१-पैनी छुरी अत्याचारीके पेटमें भौंक सकती है।
२-अगर और कुछ नहीं तो वे आन देनेकी अपेक्षा अपने
माण दे सकती हैं ?
३-प्राण तुच्छ वस्तु नहीं है कि सहजमे दे दिये जायें।
४-कैसी बात कहती हो ? हम जौहर करनेवाली क्षत्रिय
रमणियोकी सन्तान क्या इन तुन्छ प्राणोंको मान-रक्षाके लिए
बलिदान न कर सकेगी।
१-उठो बहनो ! हम पुरुपोंको पुरुषार्थ करनेके लिए
उत्तेजित करेंगी।
२-उनके सोते हुए विक्रमको जगायेंगी।
३---और अगर ऐसा न कर सकी ?
४-तो खुद अपनी इज्जत पर हाथ डालनेवालेको दढ
देनेका उद्योग करेंगी।
१-असुर-संहारिणी मॉ, इन कोमल करोमें भीमकासा
वल देगी।
२-विध वाधाओके पहाड हमे फूलसे लगेगे।
३-साहस करनेवाली पुत्रियोको काली हर समय मदद
देती है।
४-तो उठो, कर्तव्यमें लगो! ( सब आती है)
पड़ोसिनोंकी बैठक (२)
स्थान --एक मकान
समय-दुपहर
[पाँच सात युवतियाँ बातें कर रही है। ]
कमला- क्यो चपला तुझे भी ऐसा सजना आता है ?
चपला-कैसा?
कमला--अरुणवालाके जैसा ।
विमला-आधे कपाल तक वालोको लाना ।
सुशीला-उनको बेसलिनसे जमाना ।
निर्मला-आधे सिरपर साडीको रखना।
चपला-ठुमक ठुमक कर नजाकतसे चलना ।
सुशीला श्योरी विमला ! तेरी पडोसिन गौरी तो साक्षात
दूसरी झाँसीकी रानी है।
कमला--वरको तो वंदरकी तरह नचाती है।
अमला--विचारे देवरके तो नाफों दम है।
कमला---उसका वर भी तो वायला है।
सुशीला--और नहीं तो क्या ?
विमला-सवेरे चाय पीने वैठते है तो छोकरेको घरसे बाहर
निकाल देते है।
अमला-दोनों जोरू मर्द पी लेते है।
संवाद-सग्रह
२~मगर स्त्रियाँ भी क्या कम गिरी हैं ?
३- नारी अबला । वह क्या करे ?
४-नारिया सब कुछ कर सकती हैं। वे अपमान करने-
वालेका गला घोट सकती है।
१-पैनी छुरी अत्याचारीके पेट में भौक सकती है।
२--अगर और कुछ नहीं तो वे आन देनेकी अपेक्षा अपने
प्राण दे सकती हैं?
३-माण तुच्छ वस्तु नहीं है कि सहजमें दे दिये जायें।
४-कैसी बात कहती हो ? हम जौहर करनेवाली क्षत्रिय
रमणियोकी सन्तान ज्या इन तुन्छ प्राणाको मान-रक्षाके लिए
वलिदान न कर सकेंगी।
१--उठो वहनो! हम पुरुपोंको पुरुषार्थ करनेके लिए
उत्तेजित करेंगी।
२-उनके सोते हुए विक्रमको जगायेंगी।
३-~और अगर ऐसा न कर सकी ?
४-तो खुद अपनी इज्जत पर हाथ डालनेवालेको दह
देनेका उद्योग करेंगी।
१- असुर-संहारिणी मॉ, इन कोमल करोमें भीमकासा
बल देगी।
२-विन बाधाओके पहाड़ हमे फलसे लगेगे ।
३- साहस करनेवाली पुत्रियोको काली हर समय मदद
४-तो उठो, कर्तव्यमें लगो! (सत्र जातो है)
पड़ोसिनोंकी
वैठक (२)
स्थान--एक मकान
समय--दुपहर
[पाँच सात युवतियाँ बातें कर रही है। ]
कमला-क्यो चपला तुझे भी ऐसा सजना आता है ?
चपला--कैसा?
कमला--अरुणपालाके जैसा।
विमला--आधे कपाल तक बालोको लाना ।
सुशीला--उनको येसलिनसे जमाना ।
निर्मला--आधे सिरपर साडीको रसना।
चपला-ठुमक ठुमक कर नजाकतसे चलना।
सुशीला---गयारी विमला ! तेरी पडोसिन गौरी तो साक्षात
दूसरी झाँसीकी रानी है।
कमलावरको तो वढरकी तरह नचाती है ।
अमला-विचारे देवरके तो नाफा दम है।
कमल-उसका वर भी तो वायला है।
सुशीला---और नहीं तो क्या ?
विमला--सवेरे चाय पीने चरते है तो छोकरेको घरसे बाहर
निकाल देते हैं।
अमला-दोनों जोरू मर्द पी लेते है।
सवाद-संग्रह
३०
चपला--फिर छोकरेको वची वचाई दे देते हैं ।
सुशीला-दूधके तो विचारेको कभी दर्शन भी नहीं होते।
विमला-~~-एक दिनकी बात है कहींसे मिठाई आई थी। गौरीने
अपनी छोकरीको दी। छोकरीने अपने काकाको भी कुछ देदी।
गौरीको खबर पड़ी। उसने छोकरीको बहुत पीटा।
अमला----शामको वर नौकरीपरसे आया । गोरीने झूटी
वाते बनाकर देवरको भी पिटवाया।
निर्मला-कमला तुम तो बहुत बढ़िया लाचर देती हो।
चपला--अरी यह तो कोयलकी तरह कुछकती है।
सुशीला--बडी होगी तब तो यह एनी बीसेट वन जायगी।
विमला नहीं जी यह तो देवी सरोजनी वनेगी।
अमला-वाह ! सुनते ही इसका दिल खुश हो गया।
निर्मला-पहले तो 'सरोजनी' नाममें ही जादू है ! ऊपरसे
महात्मा गॉगीने पढवी दी थुलथुले हिन्द !
चपला-~~वाहवा ! अगर मेरा भी कंठ मधुर होता ।
सुशीला- तपम्या चाहिए तपस्या! ।
विमला-~-कम्मू तेरा वह गाना बड़ा मीठा लगता है ।
सुना तो वदिन।
कमला-~-जाओ तंग न करी । मुझे कुछ नहीं आता।
अमला-~-मेरी अच्छी कम्मू !
निर्मला-~-मेरी प्यारी सखी ।
चपला-महिना मेरी, अब तो सुना ही दो।
1
अफ्रीदा और सखियाँ
अमीदा-सोचती हूँ, कि, कहाँ जाऊँगी ?
२ री सखी-सुना है, स्वर्ग नामका एक नगर है । वहाँ
सुख ही सुख है।
अफ्रीदा-सखी हसी न करो।
३ री सखी-जिसके हृदयमे रात दिन चिन्ताकी आग
जलती रहती है उसे हॅसी क्या अच्छी लगती है?
२ री सखी--मैं उसी अग्निको परिहाससे दावना चाहती थी।
अफ्रीदा-सखी ! उसको दवानेके लिए पहाड़ रख दो तो
वह राख होकर उड जायगी।
४ थी सखी-चिन्ता छोड़ो ! रात हुई है प्रभात भी होगा।
अफ्रीदा-जवतक पिताकी मौतका बदला न लूँगी; और
विश्वास-घातक हुनिरको न मारूँगी तर तक यह जलन नहीं
मिटेगी।
५ वी सखी-मगर अफ्रीदा सच कहना ! क्या तुम सुहरा-
चको नहीं चाहती ?
अफ्रीदा-चाहती हूँ ! अगर वह देशका शनु न होता तो मैं
अनायास ही उसके चरणोमें प्राण अर्पण कर देती ! मगर जो
स्वदेशका शत्रु है वह हमारा भी शत्रु है ? चाहे वह पिता, भाई
या पति ही क्यों न हो? इसी लिए मैं सुहरावको वैसे ही चाहती
है, जैसे अग्नि घृतको चाहता है, जैसे सिंह बकरीको चाहता है,
जैसे विल्ली चुहेको चाहती है।
अफ्रीदा और सखियाँ। [रुस्तम ईरानका प्रसिद्ध योद्धा था। उसके लडकेका नाम सुह- राब था। जब वह गर्भमें था तभी उसका पिता उसे छोड़कर चला आया था । वडा होनेपर वह तरानके वादशाहकी फौज लेकर पिताको ढूंढने ईरानकी तरफ चला। रस्तेमें उसने चूड दुर्गको जीत लिया। चूड दुर्गके राजाकी कन्या अफ्रीदा भागकर, अपनी सखियों सहित ईरानके वादशाहकी मदद लेनेको जा रही थी । जंगलमें एक पडावपर उसकी और सखियोंकी जो बातचीत हुई थी, वहीं यहाँ दी गई है। स्थान--जगल। समय--ध्याकाल 1, अफ्रौदा--( अकेली) ओह ! जंगल कैसा भयानक है ? मे कहाँ हूँ ? मेरा चूड दुर्ग कहाँ है ? मेरे स्वजन संबंधी कहाँ है ? मेरे पिता किस महासागरमें विलीन हो गये ? मेरी सेना सव नष्ट हो गई। केवल चार सिपाही बचे है । वे प्राणपणसे हमारी रक्षा करते है। विधाताके किस विधानसे मुझ पर यह दुःख पडा है ! पिताकी मौत आज भी हृदयमें साल रही है। प्रति- हिंसाकी आग धू धू करके हृदय में जल रही है ! हाय । कैसे यह आग बुझेगी ? किससे मदद मिलेगी ? सखियों का प्रवेश] १ ली सखी-अफ्रीटा ! क्या सोच रही हो ?
अफ्रीदा और सरियाँ
अफ्रीदा--सोचती हूँ, कि, कहाँ जाऊँगी ?
२ री सखी-सुना है, स्वर्ग नामका एक नगर है । वहाँ
सुख ही सुख है।
अफ्रीदा-सरली हँसी न करो।
३ री सखी-जिसके हृदयमे रात दिन चिन्ताकी आग
जलती रहती है उसे हँसी क्या अच्छी लगती है ?
२ री सखी-मै उसी अग्रिको परिहाससे दावना चाहती थी।
अफ्रीदा-सखी! उसको दबानेके लिए पहाड़ रख दो तो
वह राख होकर उड जायगी।
४ थी सखी-चिन्ता छोडो ! रात हुई है प्रभात भी होगा।
अफ्रीदा-जवतक पिताकी मौतका बदला न लूंगी; और
विश्वास-घातक हुजिरको न मागी तब तक यह जलन नहीं
मिटेगी।
५ वी सखी--मगर अफ्रीदा सच कहना ! क्या तुम सुहरा-
वको नहीं चाहती?
अफ्रीदा-चाहती हूँ ! अगर वह देशका शत्रु न होता तो मैं
अनायास ही उसके चरणोमें प्राण अर्पण कर देती ! मगर जो
स्वदेशका शत्रु है वह हमारा भी शत्रु है ? चाहे वह पिता, भाई
या पति ही क्यों न हो? इसी लिए मैं सुहराको वैसे ही चाहती
हूँ, जैसे अग्नि घृतको चाहता है, जैसे सिंद चकरीको चाहता है।
जैसे विल्ली चुहेको चाहती है।
३
सवाद-संग्रह
छठी सखी-मगर हुजिर तुम्हे, प्रेम करता है।
अफ्रीदा-चुप ! उस विश्वास-घातकका नाम न लो।
१ ली सखी---यह तो द्वेष है।
२ री सखी-हो, मगर प्रेम तो नहीं है। प्रेममें और द्वेपमें
बहुत अन्तर होता है।
३ री सखी-ट्रेप मारता है और प्रेम प्राण देता है।
अफ्रीदा-~~~-अगर यह मेम हो तो भी जो प्रेमी देशका द्रोह करे
मैं उसे घृणाकी दृष्टिसे देखती हूँ।
४ थी सखी--देशद्रोहीके वरावर संसारमें विश्वासघातक और
'पापी कौन होगा?
अफ्रीदा----सखियो ! तैयार हो ! चलो ईरान चलें । उसकी
मददसे शत्रुओका नाश करें। (सब गाती हैं)
राग, माढ
हम ईरानी वीर नारियों, चलो चलें हम वहीं समी।
उठे खब रणरंग-तरंगें, नहीं युद्ध नि.शेप अभी ।
नहीं समाप्त एक रणसे यह, एक हारसे नष्ट न देश ।
एक बार यदि हुई विफल फिर, नव आयोजनका उद्देश ।।
साज वर्मसे यह उत्तम तनु,
कोमल करमें लेंगी शर-धनु,
चपला तुल्य चमक कर मलकर,
चकाचौध आँखामें भर भर,
r
अमीदा और सखियाँ
!
सुन ईरान !
पुन करेंगी गढ अवरोध,
लेंगी हम लेंगी प्रतिशोध,
सुन तरान
रमणी गण
करता है दृद्ध प्रण,
उदे निशाण
मान रहित जीवनको धिक है, मन न जाना इसे कभी ।
हम ईरानी वीर नारियाँ, चने चले हम वहीं सभी ।।
बजे विषाण,
तारा और उसकी सखी
स्थान-बदनोरका किला ।
समय-सध्याकाल |
[ सुमित्रा और ताराका बातें करते हुए प्रवेश ]
तारा-सुमित्रा ! तुम्हें भी क्या धुन लगी है ? 'जयमल
तुम्हें चाहता। 'जयमल तुम्हें चाहता। सुनते सुनते हैरान हो
गई । घृणासे हृदय भर गया ! अब नहीं सुनना चाहती ।
सुमित्रा-~मगर तारा ! मेवाड़के राजकुमार तुम्हें जी जानसे
चाहते है।
तारा-वे चाहें या न चाहें । मेरा कुछ बनता विगड़ता
नहीं है।
सुमित्रा--तारा ! क्या सच कहती हो ? तुम्हारा कुछ वनता
विगड़ता नहीं है?
तारा-एक वार नहीं सौ वार कहती हूँ। मेरा कुछ बनता
विगड़ता नहीं है।
सुमित्राचया तुम मेवाडकी रानी बनना नहीं चाहती ?
तारा--मेगाडकी क्या मै स्वर्गकी रानी बनना भी नहीं
चाहती । मै प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ कि, जवतक मेरी मातृभूमिका
उद्धार न होगा तब तक मैं कोई दूसरी वात नहीं सोचूंगी।
सुमित्रा--मगर मातृभूमिका उद्धार कैसे होगा?
तारा और उसकी सखी तारा-नहीं जानती कि, कैसे होगा ? सुमित्रा । मैं शस्त्र चलाना जानती हूँ। मै युद्ध करना जानती हूँ। मगर मैं अकेली नारी क्या करूँगी ? सुमित्रा-इसी लिए कहती हूँ पुरुपका साथ करो! तारा--छि ! पुरुपोंका नाम न लो ! वे सब बेफिक्र होकर घृणित जीवन बिता रहे है। वे नीच विलास-वासनाके दास हैं ! हाय ! अगर पुरुप ही 'पुरुष' होते,-वे पुरुषार्थ करते तो आज किस बातका दुःख था ? यह नहीं जानती कि, जन्मभूमिका उद्धार होगा तो भी मैने प्रतिज्ञा की है कि जबतक मातृभूमि पराधीन और दुखी है तबतक व्याह न करूँगी। सुमित्रा--मगर ब्याह करनेसे तो मातृभूमिका उद्धार करनेकी तुम्हारी भावना नष्ट नहीं हो जाती। तारा-ब्याह करनेसे सर कुछ नष्ट हो जाता है। रह जाता है सिर्फ घृणित भोग विलास ! नीच विपय वासनाका खेल ! और कुत्तोमा जीवन ! सुमित्रा-मगर- तारा--जाओ सुमित्रा ! मैं कुछ सुनना नहीं चाहती ! मुझे चाहिए जननी जन्मभूमिका उद्धार (प्रस्थान) - रानी जवाहरवाई और कर्णवती [ रानी जवाहिरवाई और रानी कर्णवती दोनों चितौडके राना साँगा या सग्रामसिंहनीकी पत्नियों थीं। विक्रमजित रानी जवाहिरवा- ईकी कोख से जन्मे थे। मगर उनका स्वभाव उच्छृखल या, इसलिए सारे क्षत्रिय नाराज होकर, उन्हें छोड गये थे। मालवेका बादशाह बहादुर शाह राना सॉगासे बुरी तरह हारा था, इसलिए मेवाडको ध्वस कर- नेका उसने यह अच्छा मौका देखा और मेवाडपर चढाई कर दी। विक्रमजित हारकर कहीं भाग गये । मगर चितौड अभीतक बहादुर- शाहके हाथ नहीं लगा था । कुछ क्षत्रिय वीर उसकी रक्षा कर रहे थे। उसी समय रानी जवाहरबाई और कर्णवतीने जो सक्ल्स क्यिा था वही सवादकेरूपमें यहाँ दिया गया है। । पात्र । रानी जवाहरबाई-राना विक्रमजितकी माता । । कर्णवती-उदयकी माता पन्ना धाय क्षत्राणियॉ, क्षत्रिय आदि प्रथम दृश्य स्थान-क्षत्राणियोकी व्यायाम शाला। समय--माताकाल [क्षत्राणियाँ, लाठी, तल्वार, वगैरा चलानेका अभ्यास कर रही हैं । ] - - " । M -- Na- "रानी जवाहिरवाई और कर्णवती के खेलका एक दृश्य (. ३८)
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रानी जवाहरवाई और कर्णवती
- नोट-(१) अगर लडकियोंको लाठी तलवार वगैरा चलाना
सिखलाया न जाता हो तो यह प्रवेश छोड देना चाहिए । लेखक
की आन्तरिक इच्छा तो यह है कि, यह दृश्य जरूर रक्खा जाय ।
लड़मियाँ इसके लिए तैयार कर ली जायँ । (२) जहाँ राजपूत
आते हैं, वहाँ अगर लडके लिए जा सकते हों तो अच्छा है । वरना
वहाँ लडकियाँ ही राजपूत मान ली जायें ।
द्वितीय दृश्य
कर्णवती-बहिन ? हम वीरवाला ! हम ही यह काम करेंगी।
कौन फरे?
स्थान-चित्तौडके अन्तःपुरका कमरा
समय-सवेरा
[ रानी कर्णवती और कुछ सखियाँ बैठी है। रानी जवाहरवाई
अपनी सखियोंके साथ आती है। ये सभी युद्धसाजसे सनी हुई है।
इन्हें आते देखकर कर्णवती आदि खडी हो जाती है। ]
कर्णवती-(हाथ जोड नमस्कारकर) आओ जीजी! विराजो!
( कर्णवती बैठती नहीं है । खडी हुई ही कहती है ।)
जवाहरवाई-बहिन ! आज विक्रम नहीं है । युद्धमें गया
वापिस नहीं आया । कहाँ है, सो भी नहीं जानती । चिनौट
शत्रुओंने घेर लिया है। विक्रमसे नाराज होकर सारे क्षत्रिय
अपने घरोंमे बैठे हैं। ऐसे समयमै आज मेवाड़की रक्षा
-
संवाद-सग्रह
जबतक हम जीवित हैं, तबतक शीशोदियोकी लाल धजा पृथ्वी-
पर न गिरेगी।
जना-शाबाश वहिन ! मैं तुमसे यही सुनने आई थी।
माताको पददलित होते देखकर भी आज राजपूत चुप हैं ।
उनके वाप दाढोंने अपना रक्त देकर जिस चित्तौड़की स्वाधी-
नता वचाई थी, उसीका आज नाश हो रहा है। तो भी ये स्थिर
भावसे देख रहे है । तब हम स्त्रियाँ ही आज मेवाड़की रक्षाके
लिए हथियार पकड़ेगी।
कर्ण०-हॉ वहिन चलो ! हम ही शत्रुदलमें कूदेंगी और
देगी कि शत्रुओंकी भुजाओंमें कितना वल है ?
जवा-बहिन ! तेरी गोदमें शीशोदिया कुलका अन्तिम
दीपक उदय है। उसकी रक्षाके लिए तुम यहीं रहो । मैं
जाऊँगी । अन्तःपुरवासिनी वीर राजपूतानियोंको लेकर शत्रुदल
पर आक्रमण करूँगी। दुश्मनोंको मारते मारते मरूँगी। दुश्मन
देखेंगे कि क्षत्राणियोंकी भुजाओंमें भी कितना वल है । तुम
उदयकी रक्षाकर अपनी आवरू बचानेके लिए जो उचित जान
पडे सो करना।
कर्ण---(प्रणाम करके) जाओ जीजी ! चित्तौड़की स्वर्गस्य
सतियाँ तुम्हारी और तुम्हारे साथकी चीर वालाओंकी रक्षा करें ।
और मैं उदयकी रक्षाके लिए यहाँ रहती हूँ। देव् चित्तौड़को
और उदयको बचा सकती हूँ या नहीं ?
जवा०-(क्षत्राणियोंसे) वहिनो ! आओ हम चलें। इन
`लुटेरोंको नाश करते हुए रण-सागरमें विलीन हो जायें!
४१ रानी जवाहरवाई और कर्णवती क्षत्राणियों-रानीजी चलो रानी। रानी-~-वोलो जगदम्बा मैयाकी जय ! रिपुदल संहारिणीकी जय ! [ सब जय बोलती हुई जाती हैं ] (पट परिवर्तन) तीसरा दृश्य 4 स्थान--अन्त पुर समय -प्रात काल [ रानी कर्णवती और पन्ना धाय बातें कर रही है । ] कर्णवती-पन्ना ! तुम और तुम्हारे बड़ावे हमेशा राजकुल- को पालते आये हैं। उदयको तुम्दै सौपती हूँ। (चालक उदयको पन्नाकी गोदमें देती है) इसे भी तुम्हीं बचाना । पन्ना--( उदयको लेकर) रानीजी ! आप कोई चिन्ता न करें अपना प्राण-प्राणोंसे भी बढ़कर समय आया तो अपना पुरतक- देकर उदयकी रक्षा करूँगी। आप निश्चिन्त होकर देशकी रक्षाके उद्योगमें लगिए। एक क्षत्राणी-रानीजी ! एक वार रूठे हुए क्षत्रियोंको जमा कीजिए। दूसरी क्षत्राणी---हाँ रूठों हुओंको मना लीजिए। तीसरी -उनके सोते हुए क्षात्र तेजको जगाइए । चौथी ,उनकी नसोमें वीरताकी बिजली दौडाइए । वर्णवती-चलो उद्योग करके देखू । (प्रस्थान ) -
संवाद-संग्रह
चौथा दृश्य
-
स्थान-गॉवका एक भाग ।
समय-संध्याकाल
[ राजप्त लोग जमा है। कुछ क्षत्राणियोंके साथ कर्णवतीका प्रवेश ।
क्षत्रिय लोग उठकर रानीका अभिवादन करते है । ]
कर्णवती-क्षत्रियो ! मै-मेवाड़की रानी और तुम्हारा भवि-
ष्यका राजा आज संकटमें पड़े है।
एक राजपूत-तो हम क्या कर सकते है ?
दूसरा रा०-पहलवान कहाँ हैं जिनके खातिर राजपूतोका
अपमान किया गया था।
कर्ण०-सर्दारो ! सुनो ! मैं अपना ही दुखड़ा रोने तुम्हारे
पास नहीं आई । मैं आई हूँ सुंदर मेवाडके लिए | दुश्मन
असंख्य फौज लेकर आया है । तुम मेवाड़की सन्तान हो; तुम
राजपूत हो; तुम वीरोके नामसे प्रसिद्ध हो फिर भी, क्या तुम
चुपचाप खड़े हुए इस मेवाड़को लुटते और मिटते देख सेकोगे ?
एक सर्दार-(भयसे) असंख्य सेना | बापरे !
दू० सर्दार-इतनी सेनासे युद्ध, करना हमारे लिए संभव
.
नहीं है।
रानीके सायकी क्षत्राणी-(आवेशसे) संभव नहीं है १ संभव नहीं
है ? तो तुम यही चुप चाप खड़े देखोगे कि, तुमको निकाल कर,
४३
रानी जवाहरवाई और कर्णवती
तुम्हारा नाश कर शत्रु इस स्वर्ण भूमिपर अधिकार कर ले। धिक्कार
है। जिस मेवाडके एक एक कंकरकी रक्षाके लिए तुम्हारे
पुरखोंने अपना रक्त महाया था उसी मेगाड़को तुम चुप चाप
दुश्मनोके हाथमें सौप दोगे। तुम राजपूत हो, तुम वीर हो,
फिर भी कहते हो कि, संभव नहीं है । अगर जाज बडे रानाजी
जीते होते तो तुम्हें यह कहनेका साहस कभी न होता, मगर
आज महारानी अनाथा है । इनकी वात तुम क्यों मानोगे ?
हा दुर्भाग्य !
सभी सर्दार-नही, नहीं, हम इनकी बात मानेंगे ।
रा० क्ष०-अगर मानोगे तो उठो! तुरहीकी आवाजसे
जैसे सिंह गर्ज उठता है वैसे उठो! पूँगीका नाद सुनकर जैसे
सर्प फुकार उठता है वैसे उठो! बादलोकी टकरसे जैसे बिजली
कडक उठती है वैसे उठो ! ऑघीके समय जैसे समुद्रमें तूफान
उठता है वैसे उठो तलवार पकडो और शत्रु दलपर टूट पडो।
एक सर्दार-दम लडेगे, मगर मौतके सिना इस लड़ाईम
कुछ हाथ न आयगा ।
रा० क्ष०---मरना क्या मौत सवको एक दिन न आयगी ?
रोगशय्यापर पडे दुःख झेलते हुए मरना मुग्वकी मौत नहीं है।
वह तो अभिशाप है। सुखकी मौत है, अपनी इन्छासे, उत्सा-
हके साथ इसते हँसते देशकी रक्षामें प्राण देना।
सत्र-इम लडेंगे, मरेंगे; देशकी रक्षा करेंगे ।
सवाद-संग्रह
४४
रानी कर्णवती-शाबाश! यही तो मेवाड़ी वीरोंके लायक
वात है । सुनो, मैं किसीकोउसकी इच्छाके विरुद्ध नहींधुलाती।
अगर किसीको अपनी जन्म भूमिका खयाल हो; यदि किसीको
अपने धर्मपर भक्ति हो, यदि कोई स्वाधीनताके लिए प्राण
देनेको तैयार हो तो वह आवे । वह अकेला ही एक सौके परा-
पर है । देखो एक तरफ, गुलामीके साथ, संसार, घरवार और
शान्ति है; दूसरी तरफ स्वाधीनताके साथ देशके कर्तव्य हैं।
कर्तव्यके लिए मरना है । दोमेंसे एक पसंद कर लो।
सब-हम कर्त्तव्यको ही पसंद करते हैं।
कर्ण-अच्छी बात है । तव उठो, चलो । बोलो जननी
जन्मभूमिकी जय !
सत्र-जननी जन्मभूमिकी जय !
पाठशालामें आनंद । (१)
स्थान-पाठशालामें एक श्रेणी ।
समय-ग्यारह बजेका ।
[श्रेणीमें लडकियाँ बैठी हैं। कोई शिक्षिका नहीं है । लडकियाँ
बातें करने लग रही है।]
१-कमला, कलका पाठ तैयार किया?
कमला--था ही क्या कलके पाठमें !
१-जो कुछ हो, मुझे वताओ मैं कल आ न सकी थी।
२--मैं बताऊँ, शुद्ध लेखन, सिलाई, इंग्लिश और गणित ।
१-गणितमे क्या बताया था ?
३.-मेरे तो गणितके मारे नाकों दम है।
४-मै भी तो इसके कारण हैरान हूँ।
५-न जाने हमें कहॉका साहकारा करना है।
१-तुम तो इतना बता दो कि, कौनसी उदाहरणमाला
फरनेको दी थी।
३-अच्छा तुम ही कहो, व्याजका व्याज लगाना सीखके
हम क्या करेंगी?
१---इससे तो बड़ा फायदा है। हमें कोई ठग न सकेगा।
३--बाहरी अक्ल ! हम क्या किसीसे कर्ज निकलवाने
जायेंगी सो हमे कोई ठग लेगा।
४.-शिक्षिकाएँ सीखी है या नहीं?
संवाद-सग्रह ४६ ५-उन्हें तो ट्रेन्ड ( Trained ) होना था, हमें कहाँ ट्रेन्ड होना है। २ अच्छा बताओ तुम क्या पढ़ना पसंद करती हो ? ३---मुझे तो दुनियाकी सभी भाषाएँ सीखना अच्छा लगता है। ४-मै तो कहती हूँ हमे सिलाई बहुत अच्छी आनी चाहिए। १- क्यों सिलाई तो हमें सिखलाई जाती है न ? ५---खाक सिखलाई जाती है। छः चरस सीखते हो गये; परन्तु अभीतक हमें अपने वदनका एक कपड़ा भी अच्छी तरह सीना नहीं आया। २-~-वहिन वात तो सच कहती हो । मेरे भाई कहते थे कि, अगर हमें कोट, कमीज, चोली, फ्राग वगैरा सीना आजाये तो साल भरमें कमसे कम हमारे सौ रुपये वच जायें । ३- मेरी माताजी भी यही बात कहती थीं। ४-मुझे तो ड्राइंग सबसे अच्छा लगता है । कैसी सुंदर- ताके साथ अपना घर सजाया जा सकता है। ६-मै तो गायनको सबसे ज्यादा पसंद करती हूँ। किसी तरहकी चिन्ता हो, गायनकी एक तान छेड़ दो। आनंदमें मग्न हो जाओगी। १-अच्छा समझी कि, गणितमें चक्रवृद्धि ब्याज सिख- लाया था और इंग्लिशमे क्या बताया था ? ६-इंग्लिशमे तो सारी वारहखड़ी ही बता दी थी। . - - ४७ पाठशालामें मानद ६-देसो-(आ) के लिए आता है (A) (इ) के लिए (I) (ई) के लिए ( LE) (उ) के लिए (0) (ज) के लिए (00) (ए) के लिए (E) (ओ) के लिए(0) (ऐ) के लिए (A,I) (औ) के लिए (A, U) वस। [घटा बनता है। इलिश शिक्षिका आती है। लड़कियाँ किता निकालकर नवरवार बैठ जाती है ] शिक्षिका--(एकसे ) अन्छा आकी मात्राके शब्द वताओ। एक---Car, war, mat, (कार, वार, माट) शिक्षि०-एम. ए. टी. माट नहीं मॅट । (दूसरीसे) तुम इकी मानके शब्द बताओ। दूसरी-Big, fig, sar (विग, फिग, सिर) शिक्षिः -एस, आइ, आरका उच्चारण क्या कहा ? दू -सिर। शिक्षि०-सिर, तुम्हारा सिर । इसका उच्चारण होता है 'सर (तीसरीसे ) तुम ईकी मानाके बोलो । तीस.---Deep, keep, Deer, (डीप, कीप, डीर) शिक्षि डीर नहीं 'डीअर । कैसी बेपरवाह लड- कियाँ हैं। (चौथीसे ) तुम उकी मात्राके शब्द बोलो । चौथी-~-Put, pal, shut (पुट, पुल, शुट) शिक्षि०-( मेनपर हाथ मारकर ) 'शुट। नहीं ' वोलो। सव एकसे एक बढ़कर हैं । ध्यान देना तो जानती . . शट.
संवाद-सग्रह
ही नहीं। (पाँचवीसे) अच्छा तुम ऊकी मात्राके बोलो ।
खवरदार, गलती न करना।
पाँचवीं-Boot, Shoot, Door (बूट, शूट, ड्र)
शिक्षिका-(आवेशसे खडी हो जाती है और फुट उठाकर )
दूर नहीं 'डोअर (छठीसे ) तुम ओके वताओ । (बैठती है)
छठी-Go, Lo, Do (गो, लो, डो)
शिक्षि०-( हताश भावसे ) अरे लक्ष्मी डीओ 'डो नहीं
'डू' (सबको सबोधन करके ) तुम लोग जरासा भी ध्यान
नहीं रखतीं । इतनी क्या लापरवाही ? हम महनत कर करके
मरें और तुम्हारे भावे कुछ नहीं ।
एक-(साहस करके ) हम तो वैसे ही वोली जैसे आपने
नियम बताये थे।
शिक्षि -अपवाद होते ही न होंगे?
एक-हम क्या जानती थीं, कि अपवाद भी होते है ।
शि०-चुप रह ! सामने बोलती है? एक पाठ नहीं करना और
ऊपरसे जवान लड़ाना ? खवरदार फिर सामने बोली तो (सिर
पकडकर बैठती है । छोकरियाँ बातें करने लगती हैं । नाराज होकर)
होगई न तुम्हारी कट कट शुरू ! पाठ करना तो सीखा ही नहीं
पाठ करो। ( इतनेहीमें घटा बज जाता है। शिक्षिका अपनी छत्री
और थेली ( Bag ) सभालकर रवाना होती हुई ) कल वरावर
पाठ करके लाना । नहीं तो देखना । [ हाथसे पीटनेका सकेत
कर, जाती है]
पाठशालामें आनंद
१-बड़े सस्तेमें छुटे।
२-कान न ऐठे गये, सद्भाग्य ।
३-इस अंग्रेजीके मारे तो नाकों दम है ।
४---यह कोई नियम मानकर तो चलती ही नहीं ।
५ कैसा अंधेर है U का कहीं 'उ' होता है और कहीं
'अ' ही होता है।
६-अब तो हिन्दीका घंटा है। हिन्दी मास्टर आज आवेगे
नहीं । अच्छा आओ कुछ कविता ही करें।
१-~तर में शुरू करती हूँ । सुनो-
हुए आम पकके तैयार, मै खाऊँगी पूरे चार ।
२-- स, मै कितने खाती हूँ देख जरा-
तू रहेगी खाके चार, मैं उडाउँ एक हजार ।
३-चाह ! गप हो तो ऐसी हो; मगर मै मतलपकी कहती हूँ-
लेसन करो शीघ्र तैयार, नहीं पड़ेगी तुमपे मार ।
४-बैठ बैठ मारवाली!
५-जरा मेरी भी सुनिए--
चाय हुई किटलीमें रेडी, (ready) पालो कप भरके तुम लेडी ।
६-देखा न अभीसे चायकी तलप लग गई । मगर छुट्टी
वगैर चाय कहाँ ? अच्छा मेरी मुनो-
हुआ घडीमें हाफ पास वन, मिल गई छुट्टी खुशी है मन ।
१-मुँह, धो लो, छुट्टीमें अभी एक घटेकी देर है । (घटा
बनता है)
संवाद-संग्रह - ३-रह गई न जीभ चट खाती आम और चाय बिना ! [ गायन मास्टर आते है । पेटी बनने और लड़कियाँ गाने लगती हैं। पीलू खम्माच। वन बंसी बजावत बनवारी ॥ देह गेहको नेह न राखत, नीर छीरकी सुधि बिसरावत, वसी सुनि बनको ही धावत, है व्याकुल सब बननारी ॥ २० ॥ चहक उठी कुजनमें चिरियाँ, लागी चलन वायु यहि विरिया, चटक उठीं फलनकी कलियाँ, खन बनी है मतवारी ॥ १० ॥ चन्दकिरन जमनामें गेरत, राधा राधा बसी टेत, राधा भौचक इत उत हेरत, कोयल कूक रही डारी ॥ व०॥ है व्याकुल निक्सी सब वामा, तजि तनिके निज घरको कामा, देखन चलीं चतुर घनश्यामा, है कैसो वसीधारी ॥ व० ॥
Man
rok
'बनबसी वजावत बनमाली गरबा करनेवाली लडकियाँ (पृ. ५०)
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पाठशालामें आनंद (२)
.
स्थान--कन्याशालाका परामदा।
समय-साढे दस (म्कल प्रारभ होने के पहले )
[ कुछ लडकियाँ इधर उधर फिर रही हैं ।
१--बहिनो ! घंटा बजनेमें देर है, आओ कुछ खेल ही करे।
२-पहले रमाको चुलाइए।
३-चलोजी रमाको पकड़ लावें । [ रमा एक तरफ बैठी
पढ़ने ला रही है-" सी. ए. टी. कॅट, कॅट माने पिल्ली; आर.
ए. टी. रेंट, रॅट माने चूहा ।" जल्दी, जल्दी स्पेलिंग करती हुई
लडकी रॅट, कॅट बोलती है । लड़कियाँ उसके पास पहुंचती हैं ]
१-कितानकी कीडीजी ! प्रणाम ।
२--खिलाइए बदाम, लीजिए छदाम ।
३-~-उठिए जनाब आला।
४-होगा बोलवाला;
५-नहीं तो पडेगा हमी से पाला ।
रमा-जाओ, हैगन न करो । मुझे इंग्लिशका लेसन करना
है । ( फिरसे स्पेलिंगके साथ रेटकॅट' बोलने लगती है।)
६---अजी, कॅट रॅटको खा जायगी।
-अच्छा होगा पला टल जायगी ।
१-और कपडोकी जान आराम पायगी।
.
संवाद-संग्रह
२-वाह ! आपके कपड़े तो जानदार भी हैं । कमाल है।
३-अजी रॅट कॅटको खा चुकी अब उठो!
रमा-चलो टलो भी, मै न आऊँगी।
४-आपके विना हम क्या टल सकती हैं ?
५-गुड़ विना क्या लट्ठ वनते है ?
६-वाहरे तेरी उक्ति ! मेरी रमा क्या गुड़ है। हट परे
(पाँचवींको हटाती है और रंमाका हाथ पकड कर ) चलो हमारी
लीडर साहिवा!
रमा--(फितात्र वद कर ) तुम क्या पढने दोगी ? लाल
कीड़ीकी तरह चिपकती हो । ( खडी होती है) अच्छा क्या
खेलोगी?
१-आज पहेलियों की हारजीत ।
२-सखी तुमने तो मेरे मनकीसी कही।
-अच्छा तो रमा और चंदा अपनी कप्तान ।
४-वस तो वीड वॉट लो । [ बीडू बॉटती है । एक तरफ
एक पार्टी खडी होती है और दूसरी तरफ दूसरी । चार प्रश्न पहली
पार्टी पूछती है और चार दूसरी ]
प्रश्न १-यातकी वात ठठोली की ठठोली,
मर्दकी गाँठ औरतने खोली।
उ० -कहूँ सखि 'ताला।
प्र०—बाँबी वाकी जल भरी,. ऊपर जारी आग |
जवे बजाई वॉसुरी, निकस्यो कारो नाग ।
.. पाठशालामें आनद - - उ०-पताऊँ यह तो हुका प्र० पान सहें घोड़े अड़ें विद्या विस्मृत होय । अगारे वाटी जले, क्यों सखि कैसे होय ? उ.---सखि 'फेरे न थे। प्र०~~लाल लाल लटकन, वाजू बंद चटकन । खाते जायें, पीते जायँ हाय हाय करते जायें। ओ हो ! यह तो बडी अच्छी चीज है। कह डाल ? 'लाल मिरच: रमा-~अच्छा अब आप पूछिए । चदा--अभी लीजिए- -एक जानपर ऐसा है, जो दुमसे पानी पीता है । विन पानी तुरत मर जाता, पानीसे वह जीता है। उ०-~-वाह वा बडा भारी जानवर है ! कहूँ सखि ? 'दीपक' प्र०--देखा एक शैतानका बच्चा, पडा गुफामें अकडे । वड़ों वडोंकी ऑखो चढ़कर, नाक कान दोउ पकड़े। -शावाश ! शैतान हो तो ऐसा हो ! बडो वडोके कान- के साथ नाक भी पकडता है ? खून करता है। कहूँ सखि ! 'ऐना' प्र०-चार टाँग पर पशु नहि, है चलनी सम छेद । पीडितको आनंद दे, कहो सखी यह भेद । कहूँ सखि प्र०-- .
संवाद-सग्रह
प्र०-~अभय दान वह देत है, जानत सकल जहान ।
श्याम वर्ण द्वारका वासी, नहीं कृष्ण भगवान ।
उ०—कृष्ण भगवान नहीं तो उनका प्रसाद पकवान ही होगा।
(प्रश्न करनेवाली लड़कियाँ हँसती है और ताली बजाती हैं।)
चदा०—मैं बताती हूँ सुनो । यह तो है 'ताला'
रमा-आओ वहिनो ! अब तो कल गायन मास्टरने
सिखलाया वह गायन गावे ।
चदा-हॉ, हॉ, बड़ा सुंदर है-
खम्माज-(मालगोस भी)
सोइ चन्द्र-बदन मोहि भावत है ।।
करत प्रकाशित जो वसुधाको,
मधुर रूप दरसावत है।
पास रहत जब खिल्त चाँदनी,
दूर भये तम छावत है ॥
चदा जात जात नहिं सौरभ,
फूलनसों जो आवत है ॥
समझ परत नहिं भेद कहा
कोयल कूक सुनावत है।
माधो विना लगत जग सूनो,
मन रहि रहि धवरावत है ।
(घटा बनता है। लडकियॉ श्रेणियोंमें जाती हैं।)
-
है,
पड़ोसिनोंकी बैठक (३)
[ दस पन्द्रह पडोसिनें बैठी बातें कर रही है । ]
१यहिनो ! जमाना खरार है।
२-अपनी आवरू संभालना भारी हो गया है ।
३-~-राह घाटमें निकलते बदमाशोका डर रहता है ।
४-इसी लिए कहती हूँ कि मजबूत बनो।
५-दुनियामे शक्तिकी पूजा होती है।
६-बलवानके आगे सभी सिर झुकाते हैं।
१-मगर हमारे ये दुवले पतले हाथ, इनमें बल कहाँ ?
४~-इसी लिए कहती हूँ कि कसरत करो।
२-क्या दड पेले?
३-नहीं जी बैठक लगावे।
४-या मुद्रे ही फिरावे।
५-अथवा मलखम पर चढ़े।
६-ॐ हूँ ये सब वाते तो आ वुट्टी खरखड हो गई हैं।
१-वेशक, डवल वार सीखो।
२--सिंगल वार पर उछलो कूदो।
३-या लाँग जप हाई जप करो।
५- नहीं जी फुट बालके किक लगाओ।
७-~या हाफीके डडे चलाओ।
सेठानी-सबसे अच्छा मै बताती हूँ जी । टेनिस खेलो।
संवाद-संग्रह
५६
[ एक वही आयुकी स्त्री आती है ]
स्त्री-अरे क्या निकम्मी वड़ बड़ लगा रखी है ?
१-(वीचहीमें ) ओ हो ! आप हैं बड़ीजी ?
२--आइए ! आइए!
३-किसीकी निंदाका चरखा चलाइए ।
५-कुछ भक्तिका उपदेश दीजिये ।
६-~या किसीकी प्रशंसाके ही पुल बॉधिए ।
४-अजी मै कहती हूँ ताकत वर बननेका रस्ता बताइए।
नई स्त्री-हमें चौके चूल्हेसे ही कहॉ फुर्सत मिलती है सो
हम दूसरी तरफ ध्यान दें।
चार पॉच स्त्रियाँ-वेशक | वेशक !
सेठानी—यहॉ कौन चूल्हेमें सिर देती है । हमें तो अपने
कामसे ही फुर्सत नहीं मिलती।
१ इनके तो बनाव सिंगारके मारे ही नाको दम है।
२---महा परोपकार करते फुर्सत कहाँ ?
३---सभा मुसाइटियाँ और लेकवर वाजियाँ इन्हें कहाँ
दम लेने देती है?
४-सभाओकी धूमसे ये हैरान हैं।
५-और उपन्यासोके वाचनमें मस्तान हैं।
६-इतने कामोंके रहते हुए चूल्हे चक्कीके लिए ये वक्त
कहाँसे लावें?
धनिक स्त्री-यही तो गरीवोंकी औरतोंमे ऐव है ।
느
--
R- पड़ोसिनोंकी बैठक १.--ये ऊँची पातें क्या समझें? २-इनकी सगति करनेमें भी अपना अपमान है। ३-चलो चले। [ धनिक स्त्री और तीनों जाती हैं। एक उनके जानेकी नकल करती है] ५...-सेठानी मटक कर चली गई। ६-अब चूल्हे चौके वालियाँ संभल जायें । ४-कसरत करो कसरत । घरका काम करनेमें भी कस- रत हो सकती है। ५--इस कसरतके मारे तो नाकों दम है। ६. थोडे दिनमें तो यह पागल हो जायगी। ७-घरमें कसरत कैसे हो सकती है ? ४-मैं बताती हूँ सुनो-विस्तर धीरेसे न उठाओ ( बताती है ) जरा ताकतसे उठाओ ( बताती है ) ५--अरे हाँ, हाँ, समझी-कचरा निकालनेको बुहारी धीरे धीरे न फेरो ( बताती है ) जरा जोर लगाके फिराओ ( बताती है) ६-नहाते वक्त ऐसे ( बताती है ) धीरे धीरे हाथ न फेरो शरीरको जोरसे मलो ( बताती है) ७-टालसे शरीर इस जोरसे पॉछो कि चमडी छिल जाय (बताती है)
सवाद-संग्रह
८-शाक बनारनेको चाकू इस तरह चलाओ मानों
दुश्मनों पर तलवार चला रही हो । उँगली कट जाय तो कुछ
परवाह नहीं।
६-आटा यूँ अधर न ग्धो ( बताती है ) इस तरह वहा-
दुरीसे गूधो ( बताती है ) मानों वॉक्सिग हो रहा है ।
७-कढाईसे पूरी झटकेके साथ निकालो ( बताती है )
घी उछले और जल जाओ तो कुछ परवाहकी बात नहीं है।
८--बहिनो ! कसरतकी बातें तुम्हें दिल्लगी मालूम हो रही
है, इसका मुझे दुःख है। अगले जमानेमें औरतें कसरत ही नहीं
करती थीं वल्के इथियार भी चलाती थीं और इसी लिए वे
अपनी ही नहीं अपने देशतककी रक्षा कर सकती थीं।
४-(हॅसकर ) अरे मर्दुए मर्द ही जब कसरत नहीं करते
तब औरतोंको तो करना ही क्या है ?
५-हथियारका नाम सुनकर तो उनकी नानी मर जार्ती है।
६--और पठानके हाथमें छुरी देखकर तो उनके माण
ही
सूख
अजी तुमने भी अच्छी गप्प लगाई कि औरतें हथियार
चलाती थी।
५-तुम जागती हुई सपना तो नहीं देखती ?
८-सुनो बहिनो ! मुसलमान महिला चाँद सुल्ताना आदि
और क्षत्रिय वीरांगना ताराबाई अहल्या वाई आदि अनेक महि-
लाओने हथियार उठाए हैं, दुश्मनोके दॉत खट्टे किये हैं और
जाते हैं।
पडोसिनीकी बैठक
अपनी व अपने देशकी आवरू बचाई है। हम भी उन्हीं महिला-
ऑकी जातिकी है।
समी-येशक! वेशक!
८-इस लिए हमें भी औरतोके लायक कसरते करना और
लाठी तलवार वगैरा चलाना सीखना चाहिए।
९--पुरुपोको हमी वहादुर वनाती है और इमी कायर कर
देती है।
५-कैसे?
८-क्यों कि उनको बचपनसे हम जैसी शिक्षा देती है
वैसे ही वे होते हैं । इसलिए पुरुषोंकी शिकायत करना फिजूल है।
४-इसी लिए कहती हूँ वहिनो ! कसरत करो ! कसरत!
७-~मर्दो, सावधान ! अर औरतें दंड पेलेगी।
भरोदा पाठशालामें आनंद (३) इसर- स्थान-पाठशाला। समय-दस बजे दिनके । [ पाँच सात लडकियाँ खडी बातें कर रही है। अ--बहिनो ! घंटी वजनेमें अभी देर है । आओ कुछ खेलें। क-क्या खेलेंगी? ख-तब कमलाको भी बुलाइए । ग--अरे, देखो वह तो कुछ पढ़ने लग रही है। च-हॉ जी, इसे तो जब देखो तब पढ़ना, जर देखो तव पढ़ना ! -न जाने कहॉका कामदारा करेगी । क-अजी वह तो वरको घर विठायगी और आप पेढी चलायगी। ख-चाहरे अक्कल ! मोंसे भी आगे बढ़ना चाहती है । ग-आओ जी चले, कितावे फैंक दें और उसे पकड लावें । (कमला मेनपर बैठी रामायणका पाठ कर रही है।) चोपाई अस जियनानि सुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु-पद-सेनकाई ॥ मवन भरत रिपुसूदन नाहीं । राउ वृद्ध अति दुख मन माहीं ।
पाठशालामे आनद
मैं बन जाऊँ तुमहिं ले साथा । होइ हि सब विधि अवध अनाथा ॥
रहहु करहु सवार परितोप् । न तरु तात होइहिं बड टोप् ॥
[सब लडकियॉ कमलाके पास जाती है ]
-पंडितानीजी महाराज हो चुकी कथा ! अव उठिए ।
ख-ये रामायणकी कया पडितोके लिए रहने दीजिए।
गब्राह्मणों के लिए कुछ कमाईका धंधा भी छोडिए।
कमला-बहनो जाओ ! मुझे पाठ याद करने दो। घरमें
न कर सकी थी।
-पाठ याद न हुआ न सही । कह देना घरमें काम
करती थी।
च-~~-हॉ वहिन, कह देना मॉको मदद देती थी।
क-हिनजी ज्यादा नाराज हो तो कह देना कि, मॉकी
तबीअत खरार थी।
ख-मीधी बात है। कह देना रामायण पढकर मुझे क्या
कथाभट्ट होना है?
कमला--बहिनो ! क्या तुम यह कहना चाहती हो कि मैं
झूठ पोले?
ग-ओहो ! यह तो साक्षात सत्य हरिचंद्रका अवतार है।
ध-नहीं जी धर्मराज युधिष्ठिरकी छोटी बहिन है ।
चऐसी छोटी छोटी बातें क्या झूठ कहलाती है ?
क-ऐसी झूठ तो हम रात दिन ही वोला करती है।
संवाद-संग्रह
लो धन लट।
कमला-बहन, जान पड़ता है कि तुम जो कुछ पढ़ती हो
वह भूलनेके लिए । क्या तुमने नहीं पढ़ा ?-
सॉच बरोबर तप नहीं, झूठ बरोबर पाप ।
जाके हिरटे साँच है, ताके हिरटे आप ॥
सब-( हँसती है)
क-ये सब पोथीके वेगन हैं।
ख-दुनियामें तो यह कहावत है कि-
बोलो
करो धरम, फूटे करम ॥
ग-सच कह देनसे मॉ भी नाराज होती है ।
घ-हॉजी मैने एक दिन एक रुपया चुराया था । फिर
पूछने पर सच कह दिया । पिताजीने मेरे कान ऐंठ दिये ।
च-तुम सच कहती हो । मुझे भी वहनजीने (शिक्षिकाने)
सजा दी थी। मै एक दिन खेलने लग गई थी। पाठ न कर
सकी। पूछा पाठ क्यो नहीं किया ? मैने कहा:-"खेलनेमें भूल
गई थी।" वहिनजीने झटसे चार फूट फटकार दिये।
क-उस दिन मैं भी इसके साथ खेलमें पाठ न कर सकी
थी। मगर बहिनजीको कह दिया:- घरमें काम करती थी।"
बस वाल बाल बच गई।
ख-हॉनी सच बोलनेसे हाकिम भी नाराज होते है।
ग-पेशक ! झूठी खुशामद करो सब खुश !
पाठशालामे आनंद
घ-कहावत है:-
सुशामदसे सुदा राजी।।
च-हम तो रातदिन झुटकी जय और सत्यको सजा ही
देखती सुनती हैं।
च-हटाओजी अब ये सारे झगड़े । पडिवानीजी चलो उठो!
[फमला एक निश्वास डालकर उठती है और गरदन हिलाती हुई
वहिनो ! ईश्वरकी माया अपार है । कलियुगमे झूठका राज है।
सत्य कैदमें पड़ा है।
क-चलो रहने भी दो ये ढोग । एक तात्त छेडो देखें-
ख-नही जी आज तो सब मिलकर भारत वर्षकागरवा गायँगी
ग-तो करो मारंभ
-
मारत वर्ष हमारा प्यारा,
दुनियाभरकी प्रकृति देवीका, आँखोंका यह तारा है।
होनेको बलिदान इसीपर, तीस कोटि सिर रहते तत्पर,
कहते हैं सब गरज गरज कर, भारत वर्ष हमारा है ।। भा० ॥
जिसका मुकुट किरीट हिमाचल, है यज्ञोपवित गगानल,
जिसमें फल कर विविध फूलफल, सुरभि सुयश विस्तारा है ॥ मा० ॥
उमा, इन्द्राणी और लक्ष्मी - स्थान-कैलाशपुरीमें शकरका महल समय---रात्रिका प्रारंभ [उमा स्वर्णके सिंहासन पर बैठी हैं । सेविकाएँ पखा झल रही है। कुछ सखियाँ सामने बैठी हुई हैं । वार्ता विनोद हो रहा है । इन्द्राणी और लक्ष्मी सखियोंके साथ आती है और उमाकी विधिसहित पूजा करती हैं। उमा उन्हें आशीर्वाद देती हैं और पूछती है ] उमा-हे शचि ! हेलक्षी ! आज तुमने यहाँ आनेका कष्ट कैसे किया ? इन्द्राणी--(हाथ जोडकर ) माता ! इस दुनियामें कौनसी वात है जिसको आप नही जानती ? तो भी अपने आनेका कारण बताती हूँ। देवोंके द्वेपी रावणने घबरा कर अप मेघ- नादको सेनापति बनाया है । इसका पराक्रम आपसे छिपा नहीं है । सामान्य देवोंकी वात छोड़ दीजिए । खुद इन्द्र भी उससे घबराते है । फिर मनुप्य रामलक्ष्मणकी तो सामर्थ्य ही क्या है जो उससे लड़ सके। १ इन्द्राणीकी सखी-हे शुभंकरी जगतका नाश करनेवाले इन्द्रके वज्रतकको जिस महाबलीने तुच्छ कर दिया । उससे लड़नेके लिए कौन खड़ा होगा?
उमा, इन्द्राणी और लक्ष्मी ३ सखि-और अगर कोई होगा तो वह उस अतुल शक्ति शालीके आघातसे चूर चूर हो जायगा। लक्ष्मी-इसी लिए कात्यायिनी ! हम आपके पास आई है। आप रामफी रक्षा करें। अगर आप कृपा न करेंगी तो दुरंत मेघनाद कल इस पृथ्वीको रामहीन बना देगा। उमा--हे लक्ष्मी ! हे शचि ! रावण और मेघनाद शैवकुल- में श्रेष्ठ पुरुष हैं । वे शंकर को अत्यंत प्रिय है। ऐसी दशामे क्या में उनका कोई अनिष्ट कर सकती हूँ ! लंकाफी ऐसी दुर्गती हो रही है इसका कारण यह है कि अभी शूलपाणि तपमें मम है। शचि-(हाथ जोड़कर ) हे नगेन्द्र नन्दिनी ! लङ्कापति पूरा अधर्मी है । देवकुलका दुश्मन है ! दूसरोका रत्न हरण करने वाला चोर है । उसी पर आपकी कृपा ? आश्चर्य है । लक्ष्मी-अपने पिताका सत्य रखनेको जो राम राजपाट डोडकर वनवासी बने, जिन्होंने सुखोपभोगका त्याग किया, जो पिताकी आज्ञा पालनेके लिए वल्कल वसन धारण कर फल फूलो पर जीवन टिका कर रखने लगे; जिन्होने शक्ति- शाली होनेपर भी पिताकी आज्ञा पालनेके लिए तपस्वी रहना स्वीकार किया और जो आपके परम भक्त है उन्हीं रामकी गौरी ! क्या आप सहायता न करेंगी ! क्या उन्हें आप मिट जाने देंगी?
संवाद-संग्रह
.
शचि-ऐसे परम धर्मात्मा रामके पास एक 'सीता' रूपी
अमूल्य रत्न था । उस रत्नकी वे सौ संकट सहकर भी रक्षा
करते थे। उस रत्नको जो चुराकर ले गया, उनकी परम
साध्वी सीताको जो हर कर ले गया उसी चोरकी, उसी
दुराचारीकी, अम्बे ! क्या आप रक्षा करेंगी ? और
धर्मात्मा, पवित्र रामकी क्या आप सहायता न करेंगी ?
उमा--देवियो ! मैं क्या करूँ ? पशुपति जिनके रक्षक हो
उनको हानि पहुंचाने का सामर्थ्य किसमें है ?
रक्ष्मीदेवी! तब क्या अबसे धर्मको अधर्म जीतेगा ?
पवित्रताको अपवित्रता नष्ट करेगी ? सदाचारियोंको दुराचारी
दलेंगे और आप चुप चाप बैठी यह सब देखा करेंगी?
उमादेवियो ! शंकरकी इच्छाके सामने मै लाचार हूँ।
शचि--भवानी ! क्या आप यह कहना चाहती हैं कि, अव
आपमें कोई शक्ति नहीं रह गई है ? क्या आपका सर्वमंगला
नाम अव निरर्थक होगा ? जिन शकरने आपके लिए दक्षयज्ञको
बस कर दिया वे ही शंकर क्या आपके लिए--आपको प्रसन्न
करनेके लिए-दुराचारी राक्षस वंशका नाश न करेंगे ? न
होने देंगे?
एक सखि-दक्षने तो स्वयं महामाया और शकरका अपमान
किया था; यहाँ वह वात नहीं है ।
दूसरी सखि-शिव और शिवा दोनों धर्म, न्याय और सदा-
चारकी साक्षात मूर्ति हैं। इसलिए जो अधर्म करता है, जो
-
६७ उमा, इन्द्राणी और लक्ष्मी अन्याय करता है और जो दुराचार करता है, वह शिव और शिवा दोनोंका द्रोही है। द्रोहियों पर स्नेह करना यह तो अभृत- 'पूर्व घटना है। तीसरी सखि-~मगलढा मॉ ! जरा सीताकी दशा देखिए; आज वह त्रिभुवन-मोहिनी रूप किस दशामे है ? प्रफुल्ल मुख आज म्लान है, हास्यपूर्ण आँखोमें आज विपाद है, गुलाबसे सिले हुए गालों पर आज झुर्रियाँ पड़ी है; सौन्दर्यका साक्षात अवतार आज हड्डियोका कंकाल मात्र रह गया है। यह दशा क्यो दुई ? केवल धर्म पालने के लिए ? ४ सखि-दयामयी ! ऐसी धर्मपरायणा नारीका दुःख क्या आप देख सकती है ? जिस दुराचारीने इस देवीको दुःख दिया क्या उसको दह दिये पिना आप रह सकती हैं। ५ ससि-राक्षसक्शसे पृथ्वी धारा गई है, वासुकी (शेष नाग) पृथ्वी धारण करनेमें असमर्थ हो रहा है। उसके आत नादसे त्रिभुवन व्याप्त हो गया है। देवी ! तो भी क्या आप शात बैठी रहेंगी ? शंभुके वलका उनकी कृपाका क्या इसी तरह दुरु- पयोग होता रहेगा और आप यह होने देंगी? ( उसी समय वहाँ सुगध फैलती है ) उमा--यह सुगध कैसी है? शचि-सर्वान्तर्यामिनी ! क्या आप नहीं जानतीं कि आपके परम भक्त राम आपकी उपासना कर रहे है । यह सुनिए- सवाद-समह [अन्तरिक्षमसे आवाज आती है,-" हे माता रामकी रक्षा करो, धर्मकी रक्षा करो ! राक्षस वशको त्रिपुरारीने अभय और अजेय बना दिया है। इसीलिए देवी मै तुम्हारे आश्रयमें आया हूँ।"] लक्ष्मी -उमा! आप अब भी क्या चुप रहेंगी ? उठो देवी! रामकी-नही नही धर्मकी रक्षा करो, और भ्रममें पड़े हुए जग- तको समझा दो कि चिरस्थायी धर्म ही रहता है, अधर्म नहीं; धर्म ही जीतता है अधर्म नहीं । ( उमा कुछ क्षण विचार कर उठती है) उमा-देवियो! तुम ठीक कहती हो; मै रामकी रक्षा करेगी। मै धर्म और सदाचारको विजयी वनाऊँगी; मै तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगी; मै रावण और उसके साथियोका नाश करूँगी और दुनियाको वताऊँगी कि, स्त्री जातिका अपमान करनेवाला, उसके सतकी तरफ हाथ बढ़ानेवाला दुनियामे नहीं रह सकता चाहे वह रावण और इन्द्रजीतके समान महान वीर और शंकर का भक्त ही क्यों न हो। शचि-और इन्द्राणी-~-माता । तुम धन्य हो । तुमने सीजा- तिका मान रख लिया। बोलो सिंहवाहिनी माताकी जय । [ सब जय बोलती है और जाती हैं।
झमकू प्रथम दृश्य स्थान--एक मकान । . समय-दुपहर । [ शिवगौरी और समन् पाने कर रही हैं। शिवगोरी--भोजाईजी! देखो आज भाईजी आवेंगे। हॉ तुम्हारे लिए ईसे बढ़िया बढिया चीजें लावेंगे। कुछ मुझे भी दोगी न भाभी? झमकू-( जरा तिरस्कारके स्वरमें) रेवा दो रेवा! मने तो म्हारे अशी मसकरी आछी नी लागे । शिवगौरी-इसमें मस्वरीकी क्या बात है ? दादाभाई साद- बका कल पर आया था। उसीमें तो यह लिखा था कि, झमक्-देरया, देख्या थाने ने थाणा दादाभाईने ! म्हूँ कई मेमटी हूँ जो म्हारे वास्ते मेपटियाँ जसी चीजॉ लायेगा । शिवगोरी-नहीं भाभी ! दादाके पत्रका यह अर्थ नहीं था। झमकू-जाण्या, जाण्या, थाने ने पाणा दादारा पर्थने । दोई से गिया मजारा फिरस्टान ! व्हारे थाणी अल! म्हाराऊँ पण था किरस्टानी वोलवा लाग्या के ? शिवगौरी-यह तो भारतकी भापा है, इसमें फिरस्टानी फैसी?
संवाद-सग्रह
७०
अमक्--और कई किरस्टान व्हेवामें सींगड़ा लाग ही ?
बोलवामें हम तम वोलवा लाग गिया, मेमटियाँरी नॉई हरेक
आदमीऊँ वातॉ करवा लाग गिया; गेणो गॉगे पेरणो छोड़
दीदो; अंग्रेजी, पारसी, भणवो सरू कर ही दीदो है; री पी
आपणा देशरी पोशाक भी छोड़ दीढी, अवे कसर ही कई
री है ? अतरीज नी के मेमटियॉरी जसी टोप नी लगावा
लाग्या हो।
शिवगौरी-भाभीजी, आप यह क्या कह रही हैं ? मेमोंने
तो यह भारतीय भापा हमारे ही देशमें आकर सीखी है । यह
तो देशभापा है। इससे हम भारतके प्रत्येक प्रान्तमे जाकर
अपना काम चला सकती है। हरेक पुरुपसे वोलनेमें कोई पाप
नहीं । इससे तो उल्टा हृदयका भय निकलता है, कभी किसी
स्थानमे अकेले रह जानेपर भी यदि निर्भीकतासे बोलनेका
स्वभाव होता है तो हमारे पर कोई पुरुष अत्याचार नहीं कर
सकता है । और
झमक्-अवे असी वातॉ तो रेखा दो । थॉइज न्याराई अस्या
चवदे विद्या निधान पैदा व्हिया होके ? आपणा पुरखा कई
सगाई मूर्ख हा, जणा लुगायॉनें पर्दामें राखी ही ने पर पुरुप
न बोलवारी मनाई कीदी ही ?
शिवगौरी--मुनो! वीचमेजवकि मुसलमानोंका राज्य था-
मुसलमान हिन्दुओंकी वहु वेटियोको पकड लेजाते थे । इसलिए
७१
झमत
-
हमारे पुरुपाओने पर्देका रिवाज कर दिया था; परन्तु अब वह
बात नहीं रही है । अब तो उल्टे पटेंमें रहनेसे लोग हमारे
पर अत्याचार करने लगे है। यह वात तो मैने नई ही सुनी
है, कि अंग्रेजी फारसी पढ़नेसे लोग फिरस्टान हो जाते
है। देखो, दादा कितनी अँगरेजी और फारसी पढे है, क्या
वे फिरस्टान बन गये?
झमकू-किरस्टान नी तो और कई है ? जूतियाँ अने कपड़ा
पेरचा थकाई तो रसोई जीमवा लाग गिया । डबल रोटी अने
विस्कूट सारा लाग गिया, रेलमें, वग्गीय गेलाम, हर कई कई
खाई ले कई संज्ञा नी राखे । वोलो अवे वणामे ने किरस्टानमें
कई फरक है?
शिवगौरी-यह आप कह क्या रही है ? क्या पिस्कूट खाना
पाप है ? क्या गदी गलियोंमें-जहाँ कि पासहीमें पारखाना भी
पटा होता है-बैठ, पत्तले पिडा, अपने नीचे जूतोंको डिपाकर
जीमनेसे, जूते पहिन कर जीमना बहुत बुरा हो गया ? और
दादा आज अंग्रेजी फारसी भी नहीं पड़े हुए होते तो उन्हें
पॉच सौ रुपये मासिक कभी नहीं मिलते ।
झमकू-पण लुगायॉने कसी कमाई करवा जाणो है ? आपणो
घर धंदो करणो आयो ने व्हियो।
शिवगौरी-मगर घर धंधा भी तो बिना पढे ठीक नही
आता है।
सवाद-संग्रह ७२ झमकू-व्ह्या ओ! व्या ! था कीदो घर धंदो ! म्हूँ भणी नी हूँ जणीऊँज तो सब काम कर लूं। भणयावालाने तो वॉच- वाऊँ छुट्टी नी मिले, फेर धंदो कदी करे। शिवगौरी-खेर । अब दादाभाईने लिखा है, वह कामा करोगी या नहीं? झमा और कई लिख्यो है ? शिवगौरी-यही कि एक तो ये जेवर उतार दो, दूसरे पढ़ना प्रारंभ करो । यदि ऐसा नहीं करोगे तो वे नाराज हो जायेंगे । झमकू--( क्रोधसे ) चूल्हामे जाय थाणो भणणो । म्हारे भणने कई राँड वणणो है ? म्हारे ऐवात कायम रेई तो सनी चाना व्हेई । म्हारे भणीने ऐव्हात ( सौभाग्य ) नी खोबणो । गेणारी वात घड़ी घड़ीमें कई को हो । घणो जोर तो थाणा घररा गेणा पे है के ? यो लो थाणो गेणो ( एक दो जेवर उतार कर फैक देती है। और जाती हुई कह जाती है ) म्हारा वापरा दीदा गेणा पे तो थाणो कई जोर नी है । (पट परिवर्तन) दृश्य दूसरा ( झमकू और उसकी माँ भी।) झमकू (डस्के भरती हुई ) ए म्हारी मॉ ! अमे कई करूँ रे। (बोलती बोलती भूरीकी गोदमें मुँह देके रोने लगती है।)
झमकू भरी-(उसकी पीठ पर हाथ फेरती हुई, प्यारसे) कई व्हीयो बेटी, आज धे रोने क्यूँ है ? अमर-( कडके मोडती हुई) सत्या नाश जाय अणी रॉडरो ! अणीज हीकाई हीकाईने वणोंने घेराजी कर दीटा है। भरी-(साश्चर्य ) कई जमाई थाराऊँ राजी व्हे गिया है ? अमक्पणी लुची रॉडरीज सब करतूता है। भूरी-हाँ बेटी, सॉची बात है । जमाई तो म्हारो होना हरीको है । थारी देराणी महा खोडीली है । वणीज जमाईरा कान भर्या व्हेई । मरद माणस है । लुगायॉरी यातॉ वी कई हमजे? रोर मती, म्हूँ हमजाई देऊँगा । अमानी ए मॉ! नी ! वणा तो हठ पकड लीदी है, अने केवे है के शिवगौरीरा केवा परमाणे भणेगा अने चलेगा तो म्हूँ थाराऊँ वोलॅगा, नहीं तो थारे म्हारे कई लेणो देणो नहीं भूरी-(आवेशसे) हैं! कई फियो ? थारे म्हारे लेणोदेणो नी । अमकू-(एक निश्वास छोडकर ) हाँ ! ऑ। ऑ ! भूरी-(गुस्सेसे ) ओहो ! म्हें कई वोलें नहीं जणीऊँज अतरी चाता व्हे है के ? चाल म्हारी साथे । म्हें देगा देखाँ किस तरे थाराऊँ नी बोले है ? म्हूँ तो केऊ, वाई जवान छोरा है, जावा दो ने ई तो माथापेइज चढ गिया है। (भरी झम- कूको लेकर जानेको तैयार होती है । अमक्की सखी कमला प्रवेश करती है । दोनों एक दूसरेसे गले मिलती हैं। ) wwww सवाद-सप्रह ७४ कमला--(हँसते हुए ) क्यो वहिन, आज माँ बेटियाँ कहाँ चढ़ाई करने चली हो ? ( दोनों कमलाकी बोली और पहिनावको देख कर साश्चर्य बोलीं-) क्यू कमला, यूँ पण फिरस्टान व्हेगी के ? कमला-हॉ, मैं तुम्हें किरस्टान ही मालूम देती हूँ ! परन्तु वहिन सच पूछो, तो अब मै वास्तविक हिन्दू, रमणी हूँ। पहिले मैं बिलकुल अँगली थी। तुम्हारी तरह मेरे घरमें भी नित्य झगड़े रहा करते थे । मेरी माँ कई वार मेरे स्वामीसे लड़ी; परन्तु उस लड़ाईका उल्टा परिणाम हुआ । एक दिन मैं दुखी होकर शिवगौरीके घर चली गई। शिवगौरी अपने स्वामीके साथ आनंदसे बैठी बातें कर रही थी। दानोंने मेरा अच्छा सत्कार किया। फिर उसके पति तो थोड़ी देरसे अपने काम पर चले गये । मैंने उससे पूछा:-" क्यो वहिन तुम्हारे पति तुमसे कभी नाराज होते है ?" उसने कहा:-" नहीं।" मैंने पूछा:-" क्यों ?" उसने उत्तर दिया:-" मैं प्रत्येक काम अपने स्वामीकी आज्ञानुसार करती हूँ। खाली समयमें उनके साथ बैठकर देशकी समाजकी और धर्मकी बाते किया करती हूँ। इसलिये वे सदा ही मुझसे प्रसन्न रहते हैं।" क्या तेरे पति के साथ तेरा झगडा होता है ? तेरे पति तो बड़े ही सीधे पुरुष हैं। मैंने कहा:-" हो होता है।" उसने पूछा:-" क्यो ?" मैंने कहाः-" वे कहते है कि तू पद और मै इन्कार करती हूँ।" फिर मैने गिडगिडा कर उससे कहा:-" बहिन कोई ऐसा उपाय वता जिससे मेरे
झमक
स्वामी मुझसे प्रसन्न रहें । " उसने मुझे पहन लिसनेके लिए
कहा । इतना ही नहीं उसने पढ़ा लिखा भी दिया। मेरे पहने
लिखनेका हाल जानकर मेरे स्वामी बहुत प्रसन्न हुए । अर वै
मुझसे कभी नाराज नहीं होते । वहिन, आजकलके पढे लिखे
पढने लिखनेहीसे सुश रहते है। अतः यदि तुम अपनी भलाई
चाहती हो तो पढो, रिखो। यदि इससे विपरीत करोगी तो
पछताओगी। जैसे कि मै पहिले बहुत दिनों तक पउताती रही थी।
झमक्-आछो व्हेन, जिस तरे यूं केगा विस्तरेई करूँगा।
(पट परिवर्तन)
बनिया
प्रथम दृश्य
स्थान--राजमहल
समय-दुपहरका
[ राजा और दर्बारी बैठे हुए है । उसी समय खबर आती है कि,
शत्रुओंने आक्रमण किया है। यह खबर सारे शहरमें फैल जाती है।
एक वनिया हथियारोंसे लेस होकर राजमहलके दर्वाजे पर पहुंचता
है। चोबदार राजाके पास जाकर नियमानुसार कोर्निसकर अर्ज
करता है।]
चोवदार---अन्नदाता ! कोठारी तेजमल हुजूरके कदमोमें
हाजिर होने की अर्ज कराते है।
राजा-आने दो।
[ कोठारी तेजमल रिमें धीरे धीरे प्रवेश कर ]
कोठारी-खम्मा घणा अन्न दाताने । ( मुजरा करता है)
राजा-आओ कोठारी ! आज हथियारसे सज कर
कैसे आये ?
कोठारी-गरीव परवर ! सेवक भी लड़ाईमे हुजूरके साथ
चलना चाहता है।
एक सार- ( जरा तिरस्कारपूर्ण हँसो हँसकर ) ढीला हाजी!
वहाँ तुम्हारा काम नहीं है।
७७ पनिया कोठारी-सुनिए सर्दार साहब- अगरचे चाल ढीली है, वलाका जोश रखता हूँ । बनाता फर्नमें अपना, सदा सतोप रखता हूँ। दूसरा सदीर-जाओ सेठ हाटमे बैठो, सौदा तोलो, लामा है वोलते हुए कॉटेपर घडियाँकी गिन्ती करो, अपने वलाके जोशसे ग्राहकोंको ठगो, और अपने बाल बच्चोंको पालकर चैन की बंसी बजाओ। यह काम तुम्हारा नहीं, हम राजपूतोका है। कोठारी-( जरा उत्तेजित होकर सिर हिलाता हुआ) सुनिए ठाकुर ! आप फक्त एक ही काम फक्त मारकाटका ही काम कर सकता है। मगर मै हाटमे तोलता सौदा, युद्ध में वीर तोलगा। यहाँ पै बोल्ता लाभाँ' वहाँ ' जय अब' बोलूंगा ॥ यहाँ काँटा पडता हूँ, वहाँ तलवार पकड़ेगा। यहाँ ग्राहक आता हूँ, वहाँ दुश्मन खपाऊँगा ॥ दूसरा सार-~ओ हो ! बनिएकी जात और यह दिमाग ! कोठारी-ठाग, बनियेकी जातको न ललकारो। इस कामकी कृपासे सैकडी राज बने हैं और इसकी नाराजगीसे सैकडों मिट्टीमें मिल गये है। मुसद्दी है कचेरीमें, हाटमें वैठ बनिया है । युद्धमें शेर बबरसा, ये ऐसी जात वनिया है।
संपाद-सयह
राना-कोगरी खवर ! होश ठिकाने रखकर वात कर ।
जानता नहीं कहाँ और किसके सामने बोल रहा है?
कोठारी-हुजूर जानता हूँ । दर्वारमे अपने राजाके सामने
खडा सर्दारोंसे बोल रहा हूँ। मगर मुझे फिर भी कहने दीजिए
कि जहाँ वनिया नहीं है, वहाँ कल्याण नहीं है। वनियेकी बुद्धि
राजपूतकी तलवार और बनियेकी हाट जिस राजमे न होगे वह
राज कभी, न फलेगा फूलेगा और न टिकेहीगा, वह नष्ट हो
जायगा।
राजा-चुप ! ऐसी वे अदवी ? क्या तेरी मौत तुझे बुला
रही है?
कोठारी-सच कहनेसे मुझे मौतका डर न रोक सकेगा।
अब वह दिन दूर नहीं है कि जब मुसद्दीपन, वहादुरी और
वनियापन तीनो गुण जिस कौममें होंगे वही कौम दुनियापर
राजकरेगी दूसरी कौमें उसकी दास वनकर रहेंगी।
राजा-(सारोंसे ) इस नालायकको कैद कर लो । (सार
कैद करनेके लिए आगे बढते है।)
कोठारी-( तलवार खींचकर ) खवर ! जान प्यारी हो तो
आगे कदम न वढाना । ( राजासे ) महाराज ! हुजूरके चरणों में
सिर झुकाता हूँ। आप सजा दीजिए । (सिर झुकाता है)
एक वृद्ध सर्दार-महाराज इसे युद्ध में साथ ले चलिए । अगर
बहादुर होगा तो हमारा पक्ष सबल होगा और अगर कायर
हुआ तो आप ही दुश्मनोके हाथसे मारा जायगा ।
राजा-अच्छी बात है। (पट परिवर्तन)
"
७९
बनिया
दुसरा दृश्य।
स्थान-युद्ध भूमि ।
[ युद्ध हो रहा है । कोठारी दोनों हाथोंसे तल्वार चला रहा है।
उसकी तलवारसे अनेक कट कट कर गिर रहे है। राजाके पास जब
वह लडता लडता पहुंचता है तब वह कहता है ]
कोठारी-महाराज
चमकती है ये बनिएकी, असि कुछ ध्यान तो कीने ।
वजन करती बराबर है, जरासा देस तो लीजे ॥
[उसी समय रानाकी तलवार लडते हुए गिर पडती है । उस
'पर एक शत्रु आपात करता है । झपटकर कोठारी उस आघानको
रोकता है । खुद गहरी चोट लगनेसे गिर पड़ता है । शत्रु भी गिर
पडता है । राजा उसके पास बैठ जाता है ।
राजा-
मैने
तुम पर अन्याय किया, इसका मुझे दुःख है।
कोठारी-अपने राजाका प्राण वचा सका इसका मुझे सतोप है।
राजा-कोठारी ! मैं तुम्हारा ऋणि हूँ। जो मांगोगे वही दूंगा।
कोठारी-महाराज ! मै यही माँगता हूँ कि, मजाको जाति
पातिके भेद विना वीर वनाइए । प्रजामे एक भी मनुष्य ऐसा
न रहे जिसे आप युद्ध भूमिमें न भेज सकें । केवल राजपूतोंके
वलपर ही देश न बचेगा। सारी प्रजा ही उसे बचा सकेगी।
राजा-कोठारी तुम्हारी इच्छा पूरी होगी । इतना ही नहीं,
में तुम्हींको इस कामका भार सौपता हूँ । जो मदद चाहिए वह
राजकी तरफसे तुम्हें मिलेगी । (पट परिवर्तन )
प्रहसन
पात्र
हजामत अली-नई सभ्यता के पीछे दीवाना, बना हुआ वे
पढ़ा रईस।
कल्ल-हजामत अलीका नौकर ।
( रमजान, हुसेन वगैरा खुशामदी लोग )
स्थान-हजामत अलीकी बैठक
समय-शामका
[ खुशामदी बैठे है । हजामत अली इग्लिश पोशाफमें अकडता
हुआ आता है । खुशामदी उठते हैं और झुककर सलाम करते है । ]
हजा-~-आ गये साहव वहादुर आ गये ! वोय ! वोय वोय!
कम्बख्त सुनता ही नहीं है । अवे ओ कल्लू ?
कल्ल-जी हज्जू मियाँ !
हनामतअली-चुप ! यहॉ कौन हिज्जू मियाँ है वे ? सो वार
तोतेकी तरह पढ़ाया तब भी वही । हमारा नाम है-' मियाँ हजा-
मत अली खॉ साहब वहादुर ! ' समझा ओयू फूल
खुशागदी–वेशक ! वल्लाह ! क्या अच्छा नाम है । नाम
रखनेवालेने कमाल किया है।
हनामत-क्योंजी इडिअन लोग सिंगिंग करता है या
Brayng ( रेंकना) करता है।
खुशामदो-निलकुल रेकना । झटसे आssssss करने लगते हैं।
प्रहसन 0- हजाद ओ यस तुमने रिचार्डके लायक वात कहा है। सुनो- Twinkle twinkle little star, How I wonder what you are ! ४ खुशामदी-सुभान अल्लाह ! सुभान अल्लाह ! ५ खुशामदी-क्या बेकायदा वफ रहा है । चौलना चाहिए हीअर ! हीअर। हजामत-ओ यस तुम रूल समझता है। १ खुशामदी-हुजूर नाच भी बहुत बढिया करते हैं। २ खुशाल -अजी नाच नहीं बॉल कहो। ३ खुशा०- -वाह कमाल है! ४ खुशा०-अच्छे अच्छे नाचनेवाले हार मानते हैं। ५ खुशा हुजूर वदा अबतक इस नजारेसे महरूम है। हनामत-~~-आइ सी तुम देखना मॅगता है ? ६ सुशा०---अगर हुजूरकी नवाजिश हो । हजाम ऑल राइट देन ।( all right then ) ( नाचनेको खडा होता है) १ खुशार -मगर हुजूर वगैर लेडीके ? हजा० -ओह ! आइ विलकुल फॉरगेट ( forget ) २ सुशा-गैर लेडीके रौनक नहीं आती। ३ खुशा०-यही तो इम नाचकी खूबी है। कल्ल-हुज़र मै बताऊँ तरकीब ? ०- 0- ०- 0- ५
hummami
संवाद-संग्रह
हजार -अच्छा वॉय बोलो।
कल्लू.---तो आज लेडी नहीं लेडा ही सही हुजूर ?
५ खुशामदी-हीअर हीअर, इसे कहते है मूझ ।
हजा०-बहुत वेरी गुड ( very good ) कहा । आओ
मियॉ रमजान ! तुम और हम दोनों ।
१ खुशाल-जी बंदा तो इस हुनरको नहीं जानता ।
हमा०-वेल हुसेन तुम ?
ना साहब मेरे वापने यह हुनर नहीं सिखाया ।
३ खुशा०-हुजूर हम लोगोंमेसे कोई भी ऐसी किस्मत
वाला नहीं है।
कल्लू-अगर साहवका हुक्म हो तो कल्लू आज वायसे
लेडा बन सकता है।
हजा०-हीअर हीअर डेनियल कमटू द ( the ) जजमेंट !
अच्छा तब आओ।
[ दोनों नाचते हैं। और नाचकर जाते है।
२ खुशाल
महर्षि गौतमका आश्रम समय-सवेरा। स्थान-बागीचा। [ कुछ तपस्वियोंके लडके लडकियाँ खेल रहे है। चिरनी शर्मा- का प्रवेश।] चिर- -यहॉ कौन कौन है ? तपस्वियोंके लडके लडकी-अजी हम लोग है। चिरo-हुँ; तुम तो बड़े भारी लोग हो ! जाओ। (लडके लडकी जाना चाहते हैं ) चिर०-~-अच्छा टहरो, तुम्हीं लोगोंसे पूडना होगा। लडके लडकी-क्या ? चिर०-~-तुम बता सकते हो, मैं क्या करूँ ? एक बड़े भारी सन्देहमे पड़ गया हूँ। १ लडका-~~-या सदेह है महाशय ? चिर--सन्देह यह है कि धमसे गिरता है या गिरनेपर धमाका होता है ? २ लडका-~-सचमुच ही यह तो बड़े भारी सदेहकी बात है। ३ लडका---तो यह आप महपिसे क्यों नहीं पूछते ? चिर-पूछा था । ३ लडका-~~-महर्षि क्या कहते हैं ?
-n-- सवाद-संग्रह चिर-महर्पि कुछ भी नहीं कहते । २लडका -और आप? चिर०-मेरी यही राय है। ४ लडका-तो अब निर्णय कैसे होगा ? चिर०-यही तो गड़बड़ है। दर्शनशास्त्र के किसी भी माम- लेका निर्णय नहीं होता।अरे तुम लोग दर्शनशास्त्रकी बातें सुनोगे? सव लड़के लड़की-कहिए, सुर्ने । (चिरजीव गाता है।) वाह कैसी दुनिया मजेदार रंगीन । वातें सब इसकी कैसी है सगीन ॥ दिनके पीछे रात, रातके पीछे दिनका सीन । एकके ऊपर दो तब बारह, एक और दो तीन ॥ वा० ॥ गर्मीमें है वेढव गर्मी सर्दीमें है ठडा । जच्चा देती बच्चा देखो, मुर्गी देती अडा। ॥ वा० ॥ गऊ पुकारे " बॉ बाँ" भैया, 'हुआ हुआ हो' स्यार 'काय कॉय कॉ' कौआ करता, रहनाजी हुशियार || वाह० ।। हायीके ऊपर है हौदा, घोडे पर है जीन । धनियोंके सिर चिन्ता डाकिन, दीन बनाते बीन ॥ वा० ॥ २ लडका-वाह, यह तो बड़ा भारी दर्शन शास्त्र देख पडता है। चिर०-क्यों ! सव वाते ठीक है कि नहीं ? 1
मपि गोतमका आश्रम
सब लड़के लडकी-पिलकुल ठीक है, खुप ठीक है।
चिरo-मैने ही सोच सोचकर इनका आविष्कार किया है।
३ लडका -सच ? यह सर आपके ही आविष्कार है ?
[विश्वामित्रका प्रवेश ।
विधामि.--( चिरजीवसे ) यही क्या महपि गौतमका
तपोवन है ?
चिर--(विश्वामिनको तल्से ऊपर तक देखकर) आपको क्या
जान पड़ता है ?
विधायही क्या महर्पिका आश्रम है ?
विर०-नही तो क्या यह ताडीको दूकान जान पड़ती है ?
विधाo-तनिक सीधी भापामें उत्तर दो तो क्या कुछ
चिरo-~और नहीं देनेसे ही क्या कुछ हानि है ?
विचा० -महर्षि कहाँ है ?
चिर०-क्यो, उनकी ग्वोज क्यों करते हो वाग ? क्या कुछ
प्रयोजन है?
विधाहॉ, प्रयोजन है; क्या वे इस समय आश्रममें है ?
चिर--ना, वे पापका शिकार करने गये है।
विधा ०--बड़े ढीठ देख पडते हो ! तुम कौन हो ?
चिरo-मैं भी पूछता हूँ, तुम कौन हो?
विश्वामित्र-मै महर्षि विश्वामित्र हूँ।
चिर-मै चिरंजीव
.
अशी है।
सवाद-संग्रह
विश्वा ---अर्शी कैसे?
चिर-मुझे अर्शरोग( बवासीर ) हो गया है । इससे अधिक
कुछ नहीं हुआ। लेकिन अर्श इतना अधिक हो गया है कि महर्षि
होनेमे अब अधिक देर नहीं है।
विश्वा०—मेरे साथ दिल्लगी करते हो ?
चिर०-ना, दिल्लगी करनेका नाता तो अभीतक नहीं जुड़ा ।
विधा०-देखो ! मुझे देखते हो ?
चिर०-देखता नहीं हूँ तो क्या; देख तो रहा ही हूँ।
विश्वा० -क्या देख रहे हो?
चिर०-एकदम नव कार्तिकेय ! एकदम मदन-मोहन !
शरीर गोलाकार है । मस्तक लंबाईकी अपेक्षा चौडा अधिक है।
चेहरेका रंग दाढ़ीके रंगसे टक्कर ले रहा है ।
विश्वा०-देखो ! मेरे मनमे धीरे धीरे क्रोध पैदा हो रहा है।
चिर-सो अपने बारेमें ऐसा बखान सुनकर क्रोध न पैदा
होगा तो क्या प्रेम पैदा होगा ?
विद्या -शाप देकर तुमको भस्म कर दूं क्या ?
चिर०-घूसे मारकर तुमको रूईकी तरह धुनक डालूं क्या?
विश्वा०-ना, देखता हूँ-भस्म ही कर देना पड़ा । हर हर
हर हर हर । ( टहलने लगते है।)
चिरजीव-राम राम राम राम राम (दूसरी और टहलने
लगता है।)
विधा-राम राम क्यों कर रहा है ?
0-
महर्षि गौतमका आश्रम
चिर० -सुना है, रामका नाम लेनेसे भूतका भय नहीं रहता।
विधाo-मै क्या भूत उतार रहा है ?
चिर--नहीं तो क्या व्याहके मंत्र पढ रहे हो ?
विश्या --तू वडा ही मूर्ख है ! जा! ( गला पकडकर धक्का
.
चिर०
-अच्छा! तो फिर आजा-देखू । (विश्वामित्रको
मारने लगता है।)
[ गौतमका प्रवेश ।
गौत -यह क्या चिरंजीव ! यह क्या कर रहे हो ?
चिर
-(मकपकाकर ) जी कुछ नहीं, इन महपिके साथ
जरा जोर कर रहा था।
गौतम -(विश्वामित्रसे ) आप कौन है ?
विश्वा०--- मैं महर्षि विश्वामित्र हूँ।
चिर-सुन लिया गुरुजी ! महपिका ऐसा ही चेहरा होता
है ? आजकल जिसे देखो वही महपि है।
विधा--आप ही क्या गौतम ऋपि हे?
गौतम -इस दासहीका नाम गौतम है।
चिर
-ऐ। दासके क्या माने?
गौतम-चिरजीव ! इनके चरणोफी रज मस्तकमे लगाओ।
ये एक अत्यत तेजस्वी महर्षि हैं।
चिर -क्या? इसीके लिए तो इनके साथ मेरा झगड़ा हो
रहा था।
.
.-
सवाद-संग्रह
गौतम-यह अपने तेजके वलसे महर्षि हुए है । मैं इनके
आगे कीटाणुकीट हूँ। तुमने इनके साथ बहुत ही बुरा व्यवहार
किया है । घुटने टेककर इनसे क्षमाकी भिक्षा मागो।
चिर०-हॉ। (विश्वामित्रकी पीठपर हाथ रखकर उन्हें सिरसे
पैर तक देखता है और फिर स्नेहके भावसे दो तीन बार पीठ ठोकता
है। ) महाशय, कुछ धुरा न मानियेगा (प्रस्थान)
गौतम-(विश्वामित्रसे ) महर्पिजी ! यह मेरा शिष्य है।
इसकी ढिठाई माफ कीजिएगा । इसका हाल मै फिर आपसे
कहूँगा । इस समय दया करके मेरे आश्रममें पधारिए । नहीं
जानता, किस पुण्यके वलसे आज सवेरे ही आप जैसे महात्मा
साधु पुरुपके दर्शन प्राप्त हुए ।
विश्वा० (स्वगत ) इतनी नम्रता ? (प्रकट ) चालिए ।
(दोनोंका प्रस्थान)
महाराज नंद और चाणक्य
स्थान-महाराज नन्दका प्रमोद उद्यान ।
समय-रात्रि।
[ महाराज नन्द, और पारिपद गण (दरतारी ) बैठे है।
चाणक्य आता है।
चाणक्य-महाराज !
१ पारिपद--है! कौन है ? वला है ।
२ पारिपट-ए चान्द । तुम किस आकाशसे उतरे हो?
३ पारिपद--क्या तुम नाचना जानते हो ?
नन्द-तुम कौन हो?
चाणक्य- मै ब्राह्मण हूँ।
१-~-पारिषद-जाओ, यहाँ कुछ नहीं मिलेगा।
२-पारिपद-स्त्री, गौ, ब्राह्मण उनसे हम कुछ नहीं कहते ।
चलो हटो!
३ पारिपद---ब्राम्हणकी भी क्या ही अहदी जाति है।
नन्द-तुम इस समय हमारे पास क्यो आये हो ?
चाणक्य---
-महारजा
में आपके मातामहके श्राद्धमें पुरोहिताई
करने आया था, कुछ भीख मांगने नहीं आया था।
नन्द---तो तुमसे भी कौन यहाँ आनेकी प्रार्थना करने गया
था महाराज?
सवाद-संग्रह
चाणक्य---तुम्हारा मन्त्री।
नन्द-मन्त्री तुम्हें बुला लाया है तो जाओ, उसी
पास जाओ।
चाणक्य-तुम्हारे सालेने हमारा अपमान किया है।
१ पारिपट-घे तो करेंगे ही।
२ पारिपद-सभी साले अपमान करते है।
३ पारिपट-सालेको सात खून माफ है। उनकी बात मत करो
चाणक्य-(पृथ्वीपर जोर से पैर पटक कर) चुप रहो, कुत्तो ।
(पारिपट लोग भयभीत होकर स्तब्ध हो रहते हैं । )
नन्द--उनके द्वारा अपमानित होनेसे क्या हुआ महाराज
जानते ही हो वे मगध-सम्राटके साले है ।
[ वाचालका प्रवेश ।।
वाचाल-अरे ब्राह्मण, मुझे क्या तूने मामूली आदमी समझ
रक्खा है ? सुन, मै महाराजका साला हूँ, महाराजके पिता मेरे
पिताके समधी हैं, महाराज मेरे भगिनी-पति है, और महारा-
जके लड़के मेरे भानजे हैं। मुझे तूने मामूली आदमी समझ
रक्खा है, ब्राह्मण !
नन्द-जाओ, यहाँसे चले जाओ, यहाँ हम ब्राह्मणकी
शिकायत सुनने नहीं आये है ।
चाणक्य-~महाराज, सुनोगे ही क्यों ? आज ब्राह्मण वह
ब्राह्मण नहीं है। इसीसे आज क्षत्रिय सहजमें ही उसकी
सम्पति निःशंक होकर लूटता है और निःशंक होकर उसे लाल
महाराज नद और चाणक्य
लाल ऑखे दिखाता है। यदि आज ब्राह्मणका वह तेज
होता, तो अपने सामने उसका क्रोधसे लाल मुख देखते ही
तुम सिंहासन समेत मिट्टीमें मिल जाते; पृथ्वीमें धंस जाते ।
किन्तु महाराज, निश्चय जानिये अब भी वह प्रताप विल्कुल लुप्स
नहीं हो गया है।
वाचाल----अच्छा ब्राह्मणका प्रताप एक बार देखा और तू भी
एक बार देख ले कि महाराजके सालेका प्रताप कैसा होता है।
चाणक्य-देगा, और महाराज तुम भी देखोगे यदि इसका
प्रतिविधान न करोगे।
नन्द-ऐ भिखमगे, तू यहाँ खडा हुआ लाल ऑखें दिग्वाता
जा दूर हो यहॉसे।
चाणक्य-हे कलिकालके ब्राह्मण ! कान सोलके सुन !
क्षत्रिय ब्राह्मणसे कहता है कि, दूर हो यहाँसे, तो भी ऑधी
नहीं उठती, अग्निकी दृष्टि नहीं होती और न पृथ्वी ही कॉप
उठती है । सव स्थिर है। कैसा आश्चर्य है !
नन्द-गर्दनिया देकर निकाल दो।
चाणक्यभगवति वसुन्धरे ! दो टूक हो जाओ!-ब्राह्मण!
जड तुल्य सडा हुआ और क्या देख रहा है । ससार तेरी हँसी
करता है। ऐश्वर्य वालोंके द्वारो पर भिक्षा मांगते फिरते हुए
तुझे लज्जा नहीं आती ? यदि शक्ति हो तो उठ ! कपिलके तेजकी
अग्निष्टष्टि करके नीचका मद चूर करदे ! और यदि यह नहीं हो
है
,
संवाद-सग्रह सकता हो तो ए क्षुद्र ! ओ धृणित ! अरे पददलित ! अरे महत्व- के कंकाल ! अव उजेलेमें मुख न दिखलाना, रसातलको चला जा! नन्द--क्या हम लोग यहाँ पर एक पागलके उन्मादको सुनने आये है ? वाचाल, इसको बाहर निकाल दो। वाचाल-(चाणक्यकी शिखा पकडकर खींचते हुए) निकल जा भिक्षुक । चाणक्य--चया ?-अच्छा ! जाता हूँ ! जाता हूँ ! किन्तु जानेके पूर्व कहे जाता हूँ कि महाराज नन्द ! तुम इसी कलिकाल- में फिर एक वार क्षीण और नष्ट भायः ब्राम्हणके प्रतापको देखोगे । यदि नन्दवंशका नाश न करूं तो मै चणककी सन्तान नही । अव तुम्हारे रक्तमे रंगे हुए हाथोंसे ही इस शिखाको वाचूंगा । तब तक यह शिखा सुली रहेगी । यही प्रतिज्ञा करके मैं जाता हूँ। यह याद रखिएगा महाराज! और यह मेरी भविष्यद्वाणी है कि एक दिन इसी भिक्षुफके पैरोपर पडकर तुम्हें अपने प्राणोकी भिक्षा मागनी होगी। परन्तु मै वह भिक्षा तुम्हें न दूंगा। उसी दिन तुम इस ब्राम्हणकी शक्ति, ब्राम्हण- के प्रतिभाका प्रभाव, ब्राम्हणकी प्रतिज्ञाका वल, ब्राम्हणके अभिशापका तेज, ब्राम्हणके क्रोधका विक्रम, और ब्राम्हणके दुर्जय प्रतापको देखोगे । (प्रस्थान ) था, और वात क्या हुई थी? N नन्द-- -यह कौन
महाराज नद और चाणक्य
~~
वाचाल---और क्या होता, यह मूर्ख जानवर पुरोहिताई करने
आया था और इधर मैं एक दूसरे पुरोहितको ले आया था।
मैने इससे कहा,-तू उठ जा । यह नहीं उठा, तब मैने गर्दना
देकर निकाल दिया। मेरा जो अपराध है वह यही है।
नन्द--तुमने ब्राह्मणको गर्दना देकर क्यों निकाला ?
वाचाल-मे महाराज का साला हूँ-
१ पारिपट-~और उसपर तुर्रा यह कि महाराज इनके
बहनोई है ।
२ पारिपद-और उनके वाप महागजके ससुर होते है-
३ पारिप-अच्छा किया, खूब किया।
नन्द--सारा मजा किरकिरा कर दिया, रहने दो वस ।
१ पारिपद-चुराई क्या हुई, एक नया तमाशा हो गया।
२ पारिपद-~भाई उसने गाया खून ।
१ पारिपट--जो हो श्राद्धमें इतना आनन्द कभी नहीं आया।
हाँ लडकीके विवाहमें तो इस प्रकारका नाचना गाना हो जाता है।
२ पारिपद-वह भी एकका श्राद्ध ही है ।
१ पारिपद सो कैसे ?
२ पारिषद-श्राद्ध होते है तीन प्रकार के । यथा,--एक चापका
श्राद्ध, इसको कहते हैं श्राद्धः, दूसरा लड़कीका श्राद्ध, इसको
कहते हैं विवाह, तीसग रुपयोंका श्राद्ध, इसको कहते हे मुकदमा ।
३ पारिपद--और भूतके वापका श्राद्ध, उसको क्या कहते है ?
४ पारिपट-यही जो यहाँ हो रहा है।
शाहजादाखुर्रमकी उदारता पात्र महाबतखाँ-राणा प्रतापसिंहके भाई सगरसिंहका मुसलमान चना हुआ लड़का। सत्यवती-~-सगरसिंहकी कन्या । अस्णसिंह-सत्यवतीका पुत्र । हिदायत अली--मुगल फौजका एक सेनापति । शाहजादा खुर्रम---अकवर वादशाहका लड़का । सिपाही चारणियाँ आदि। [ नोट-अगर सत्यवती और चारणियाँ बननेवाली लडकियाँ न हो तो उनकी जगह पुरुप पात्रोंकी योजना करलेनी चाहिए । भाष- णमें सबोधनमें भी ययोचित परिवर्तन कर लेना चाहिए।] स्थान-मेवाडका पहाड़ी रास्ता । समय-सन्ध्या । [सत्यवती, अरुणसिंह और कई चारणियाँ गा रही हैं। १-ट्टा है सुखस्वप्न हमारा, तार बीनके टटे है। गावें क्या मेवाडदेशके, भाग देख लो फूटे है ॥ इस मेवाड-शैलकी शोभा, सत्यानाश हुई सारी। आसमानसे मानों इस पर, आकर वज्र गिरा भारी ।। अब मेवाड-शिखर पर झडा, लाल नहीं फहराता है। दशा देख आँखों के आगे, अधकार छा जाता है । . -
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سماكة عازل
शाहजादाखुर्रमकी उदारता - पात्र महाबतखाँ-राणा प्रतापसिंहके भाई सगरसिंहका मुसलमान बना हुआ लड़का। सत्यवती-सगरसिंहकी कन्या । अरुणसिंह-सत्यवतीका पुत्र । हिदायत अली-मुगल फौजका एक सेनापति ।' शाहनादा सुर्रम---अफवर वादशाहका लड़का । सिपाही चारणियाँ आदि। [नोट---अगर सत्यवती और चारणियाँ बननेवाली लडकियाँ न हो तो उनकी जगह पुरुष पात्रोंकी योजना करलेनी चाहिए । भाष- णमें सबोधनमें भी ययोचित परिवर्तन कर लेना चाहिए।] स्थान-मेवाडका पहाड़ी रास्ता । समय-सन्ध्या । [सत्यवती, अरुणसिंह और कई चारणियाँ गा रही हैं] १-टूटा है सुखस्वप्न हमारा, तार चीनके टूटे है। गावें क्या मेवाडदेशके, भाग देख लो फूटे है । इस मेवाड-शैलकी शोभा, सत्यानाश हुई सारी। आसमानसे मानों इस पर, आकर वज्र गिरा भारी ॥ अब मेवाड-शिखर पर झडा, लाल नहीं फहराता है। दशा देख आँखोंके आगे, अधकार छा जाता है ।
शाहजादाखुर्रमकी उदारता -~-पक्षीगण इसकी कुनामें गीत नहीं अब गाते हैं । फलोंका रस पानेको अब, नहीं भ्रमरगण आते है ।। शशि भी शोभाहीन हुआ है, मलय वायु नहिं बहती है । छाई टोनों तीर उदासी, नदी हो शुष्क रहती है । अब० ॥ जगलमें मगल नहिं होता, चहल पहल नहिं गॉवोंमें । नरनारीगण फिरें बिलखते, फंसे हुए विपदाओंमें ।। राजपूत वीरोंकी अब है, नहीं चमकती तलवारें । सुन्दरियाँ भी डरके मारे, नहीं वसन भूपण धारें ॥ अब० । -~-तिमिरावृत मेवाड हुआ है, सुख सर्वस्व गॅवाया है। चारण-गणने यश गाकर वस, धीरज उसे धराया है। चला जाय सुख उसका सारा, किन्तु कहानी रह जावे । गॅन उठे मेवाड शून्य यह, जब चारण इसको गावे ॥१०॥ [ तीन सैनिकोके साथ हिदायत अलीका प्रवेश ] हिदायत सत्य०--मै चारणी हूँ। हिदा--तम गलियो और रास्तोंमें यही गाना गाती -तुम कौन हो? 1 यह है • आ
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शाहजादा खुर्रमकी उदारता
--
(सिपाही आगे बढकर अरुण पर वार करते है अरुण उनसे
लडता है।)
सत्य -शावाग वेटा ! अपनी माताकी रक्षा करो।
(एक मुगल सिपाही घायल होकर गिर पडता है)
सत्य -शापाश वेटा ! प्राण रहते अन न छोडना । ऐसा
ही चाहिए 1 वाह कैसा आनन्द है।
[हिदायतअली अरुण पर स्वय आक्रमण करता है। अरुणसिं-
हको दोनों सिपाही और हिदायतअली घेर लेते हैं। अपने पुत्रकी
मृत्यु
निकट समझकर सत्यती थोड़ी देरके लिए ऑग्में बन्द कर
लेती है। इतनेमें महाबतखाँ कई सिपाहियोंके साथ वहाँ आ पहुँ-
महावत -हिदायतअली ! ठहर जाओ। (सब लोग लडना
छोड देते हैं।)
महाबत० -हिदायतअली, तुम्हे शम नहीं आती! एक लडके
पर दो दो जवान मिल कर वार कर रहे है, और ऊपरसे तुम भी
उनकी मदद करते हो ! छि ! ( अरुणसे ) बेटा ! तुम अपनी
जानकी परवा न करके अपनी माँको बचा रहे थे तुम धन्य हो !
प्राणों के उत्सर्ग करनेका मार्ग यही तो है ! जीते रहो !
[ सत्यवती इतनी देर तक चुपचाप बड़े गौरव और आनन्दसे
अपने पुत्र अरुणकी ओर देख रही थी। अब वह महाबतखाँकी ओर
दो कटम आगे बढती है और फिर पीछे हटकर सिर झुका लेती है।
महाबतखा सत्यवतीकी ओर देखने लगते है।]
७
संवाद-संग्रह
सत्य०---मुगलोंकी जय हो! जितने दिनों तक मेवाड़ स्वाधीन
था, उतने दिनों तक हम लोगोंने युद्ध किया । पर जब मेवाड़ने
सिर झुका कर मुगलोंका अधिकार मान लिया, तब मुगलोके
साथ हम लोंगोंका कोई झगड़ा नहीं है । लेकिन क्या इसी लिए
हम लोग रो भी न सकेंगे ? सिपाही साहब ! दुनियामें सभी
लोग अपनी माँको चाहते है, तब अभागे मेवाड़वासी ही उस
पर प्रेम करना क्यों छोड़ दें?
हिदा०-नहीं, तुम यह गीत न गा सकोगी ।
अरुण-हम लोग गावेंगे, देखें कौन रोकता है; गाओ मॉ!
हिदा०—अगर तुम लोग यह गाना गाओगे, तो कैद कर
लिये जाओगे।
सत्य--अच्छी बात है, आप हम लोगोंको कैद कर
लीजिए । हम लोग आपके अंधेरे कैदखानेमे ही बैठे बैठे अपने
दुःखका यह गीता गावेगे । गाओ वेटा !
हिदा०—अच्छी बात है ! अब तुम लोग कैद हो गये।
(आगे बढता है।)
अरुण०-(तलवार खींचकर ) अगर जान प्यारी हो तो खवर
दार! मॉको हाथ न लगाना।
हिदा -अरे उद्धत छोकरे ! तलवार रख दे।
अरुण---( कडककर ) रखा लो।
हिदा०—सिपाहियो ! इसे मारो ।
शाहजादा खुरमकी उदारता . में महा.---यदि मुसलमान होनेको भी पाप मान लिया जाय तो भी वह पाप क्या इतना भयानक है कि मनुष्यक हृदयकी सारी कोमल पत्तियोको नष्ट कर दे ! वहन, मैं जानता हूँ कि स्त्रियोंका हृदय पवित्रताका तपोवन, आत्मोत्सर्गका लीलास्थल और प्रीतिका नन्दन कानन है । पर क्या आचारके नियम इतने कठोर है कि वे स्त्रीके ऐसे हृदयको भी पत्थर बना दें! एक बार थोडी देरके लिए तुम यह भूल जाओ कि तुम हिन्दू हो और मुसलमान, तुम पीडित हो और में अत्याचारी । केवल इतना ही समझो कि तुम भी मनुष्य हो और मैं भी मनुष्य हूँ, तुम बहन हो और मैं भाई हूँ । उस बाल्यावस्थाका यान करो जव तुम मुझे गोदमें लेकर घूमती थीं, और मुझे छातीसे लगाकर सोती थीं ! वहन, स्मरण करो, हम तुम वे ही मातृहीन भाई बहन हैं। सत्य०-~- हे भगवान् ! महान सत्य०--- -अब नहीं सहा जाता । जो होना था सो हो चुका । छोटे भैया मेरे ! जाओ, मैंने तुम्हारे सारे अपराध क्षमा कर दिये ! भगवानसे प्रार्थना है कि वे भी तुम्हे क्षमा कर दें। जाभी भैया, में अर तुम्हें मुगल-सेनापति महारतखों नहीं समझती । मेरे लिए अब भी तुम मेरे वही छोटे भाई महीपति हो । भैया, जाओ! महान -अच्छा वहन, अब मै जाता ह । (सत्यवतीको प्रणाम करते हैं।) " D- -वहन। ०- ।
संवाद-सग्रह - महा.-बहन ! मैं तुमसे क्या कहूँ ? अब तुम्हें 'बहन' कहकर पुकारनेका अधिकार भी मुझे नहीं रह गया, तब में क्या कहूँ ? मुझे क्षमा करो वहन ! सत्य. हे ईश्वर ! यह तुमने क्या किया? मेरा छोटा भाई मुझे बहन कहकर पुकार रहा है, तो भी मै उसे खींच कर हृद- यसे नहीं लगा सकती हूँ। अरुण-मॉ, ये कौन है? सत्य०-- -ये मुगल -सेनापति महाबतखा है। महा०—बेटा, मै तुम्हारा मामा हूँ। सत्य -बलो वेटा, हम लोग चलें। महा०-कहाँ जाओगी ? मुझे क्षमा करती जाओ। सत्य०-महावतखॉ, तुम जानते हो कि तुमने कौनसा पाप किया है ? महा०-हॉ, मै जानता हूँ। मैंने अपने हाथसे अपने घरमें आग लगाई है और उसमें से उठते हुए धूऍको पैशाचिक आनन्दसे देखा है। केवल इतना ही ? महा.-और क्या? मै मुसलमान हो गया हूँ, पर इसके लिए मै यह स्वीकार नहीं करता कि मैंने कोई पाप किया है। जिसका जैसा विश्वास हो वैसा माननेके लिए वह स्वतंत्र है। तो भी- -बहुत ठीक ! ( अरुणसे ) आओ बेटा चलें। सत्य- - सत्य.
शाहजादा खुर्रमकी उदारता
महा.-यदि मुसलमान होनेको भी पाप मान लिया जाय
तो भी वह पाप क्या इतना भयानक है कि मनुष्यके हृदयकी
सारी कोमल मत्तियोको नष्ट कर दे ! वहन, मै जानता हूँ कि
खियोंका हृदय पवित्रताका तपोरन, आत्मोत्सर्गका लीलास्थल
और प्रीतिका नन्दन कानन है । पर क्या आचारके नियम इतने
कठोर है कि वे स्त्रीके ऐसे हृदयको भी पत्थर बना दें। एक बार
थोडी देरके लिए तुम यह भूल जाओ कि तुम हिन्दू हो और
मै मुसलमान, तुम पीडित हो और मै अत्याचारी । केवल इतना
ही समझो कि तुम भी मनुष्य हो और में भी मनुष्य हूँ, तुम
घहन हो और मैं भाई हूँ । उस बाल्यावस्थाका भ्यान करो जब
तुम मुझे गोदमें लेकर घूमती थी, और मुझे छातीसे लगाकर सोती
थीं ! वहन, स्मरण करो, हम तुम वे ही मातृहीन भाई बहन है।
सत्य----
हे भगवान् !
महा---
सत्य-अब नहीं सहा जाता! जो होना था सो हो
चुका । छोटे भैया मेरे ! जाओ, मैने तुम्हारे सारे अपराध
क्षमा कर दिये । भगवानसे प्रार्थना है कि वे भी तुम्हे क्षमा कर
दें। जाओ भैया, मै अब तुम्हें मुगल-सेनापति महारतखॉ नहीं
समझती। मेरे लिए अर भी तुम मेरे वही छोटे भाई महीपति
हो । भैया, जाओ!
-अच्छा वहन, अब मैं जाता हूँ।(सत्यवतीको प्रणाम
-वहन।
महा
0-
-
सवाद-सम्रह
सत्य-आयुष्यमान् होओ भैया ! ( अरुणसे)
बेटा, चलें।
हिदा.---तुम लोग कहाँ जाओगे ? मै तुम्हें कैद करूँ
महा-किसीकी मजाल नहीं जो मेरे सामने मेरी वा
बाल भी बॉका कर सके । जाओ बहन !
हिदा०---खाँसाहव ! अब आप सिपहसालार नहीं है
लिए मै आपकी बात नहीं मान सकता । इस वक्त सिपहस
है शाहजादा खुर्रम।
[ शाहजादाका प्रवेश ।
शाह ०-~-अच्छी बात है ! खैर, मै खुद हुक्म देत
( सत्यवतोसे ) जाओ, तुम लोग अपने घर जाओ।
हिदा०-लेफिन शाहजादा साहब ! यह औरत यों ही।
कर बगावत फैलाती फिरती है।
शाह-मै दूरसे उसका गाना सुन रहा था। वह
मायूसी और गमसे भरा हुआ है !
हिदा -शाहजादा साहब, इस तरहके गानोसे सल्त
अमनअमानमे खलल पडेगा।
शाह नही, सल्तनतके अमन-अमानकी हिफाजत
ली जायगी। मुगल बादशाह उसकी हिफाजत करना जान
हिदायतअली, अगर वतनकी मुहब्बतके इस तरहके गानोंसे
मेवाडसे ही नहीं बल्कि सारे हिन्दोस्तानसे मुगलोंकी हु
जाईके मौसमके एक बादलके टुकड़ेकी तरह जाती रहे तो
,
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राणा अमरसिंह और महाबतखाँ
स्थान-उदयसागरका किनारा।
समय--सन्ध्या।
[ बादल घिरे हुए है । राणाअमरसिंह अकेले खडे है।]
राणा-मेवाड़का आकाश क्रोधसे गरज रहा है। मेवाड़के
पहाड़ लज्जासे मुँह ढंके हुए है । मेवाड़का सरोवर क्षोभके मारे
किनारोसे टकरा रहा है । मेवाड़के कुलदेवताओने रोपसे मुंह
फेर लिया है । आज हमारे हाथो हमारे मेवाड़का-राणा प्रतापके
मेवाड़का--पतन हो गया । हाय ! ( इधर उधर टहलेने लगते हैं।)
[ महाबतखाँ आते है।]
राणा०-चन्दगी जनाव!
महा०—मेवाड़के राणाकी जय हो !
राणा--जनाव सिपहसालार साहब ! आप खाली लहूकी
नदियाँ बहाना ही नहीं जानते, बल्कि व्यंग करना भी खूब
जानते है । अच्छी बात है, मेवाड़के राणाकी जय हो !
महा०-नहीं महाराज ! मै व्यंग नहीं करता।
राणाo-तुम्हारे व्यंग करने या न करनेसे कुछ होता जाता
नहीं । महारतखाँ, हम तुमसे एक वार मिलना चाहते थे ।
महा० कहिए, क्या आज्ञा है ।
,
राणा अमरसिंह और महाबतखाँ
राणा -तुममें विनय तो खूब है ! अच्छा सुनो । हमने
तुम्हें एक ऐसे कामके लिए बुलाया है जो तुम्हारे सिवा और
किसीसे नहीं हो सकता।
महा.--आज्ञा कीजिए, महाराज !
राणाo-महारतखॉ, जरा एक वार हमारी ओर देखकर
बतलाओ तो सही कि तुम इमारे कौन हो ?
महा.-महाराज, मै आपका भाई हूँ।
राणा०----
-बहुत ठीक; और तुमने काम भी भाईके योग्य हो
किया है । तुमने अपने पितामह और प्रपितामहकी भूमि मेवाडको
मुगलों द्वारा पद-दलित कराया है । तुम्हारे दोनों हाथ उसके
लहूसे रंगे हुए है।
-महाराज, मेने बादशाहका नमक खाया है।
-सो करसे १ महावतखॉ, जाने दो, तुमने तुम्हारा
जो काम था उसे किया। उसके लिए तुमसे वादविवाद करना
व्यर्थ है । जो विधर्मी हो, मुगलोंकी जूठन खानेवाला हो, उसके
लिए यह काम अनुचित नहीं है । जो एक अनियम और
उद्दाम स्वेच्छाचारका उद्वमन हो, उसके लिए यह काम अनुचित
नहीं है । तुमने मेवाडका ध्वस किया है। पर वह काम अभी
तक पूरा नहीं हुआ। तुम्हें उचित है कि तुम उसके साथ मेवा-
के राणाका भी अन्त कर दो। यह लो, तलवार । ( तलवार
आगे बढाते हैं)
राणाo
सवाद-संग्रह
१०४
--
.-
महा -राणा-
राणाo-जो हम कहते है उसके विरुद्ध कुछ भी मत कहो।
सुनो, तुम हमें मारो । इससे तुम्हारा कलंक कुछ अधिक न बढ़
जायगा । और हम तुम्हें कोई ऐसा काम भी नहीं वतला रहे हैं
जो तुम्हें अप्रिय हो । हम जानते हैं कि तुम हमारा रक्त पीनेके
लिए छटपटा रहे हो । तुम्हारा दाहिना हाथ हमारे प्राण लेनेके
लिए आग्रहसे कॉप रहा है । तुम हमारा वध कर डालो ।
महा.-महाराज, महावतखॉ इतना हीन नहीं है। मैंने
तलवार चलाकर और आग लगाकर मेवाड-भूमिको श्मशान
अवश्य बना दिया है, पर तो भी मैंने अन्याय्य युद्ध नहीं किया
है, न्याय्य युद्ध किया है।
राणा न्याय्य युद्ध ! महाक्त, तुम इसे न्याय्य युद्ध कहते
हो ? एक छोटेसे राज्यके मुहीभर सैनिकों पर इतने बड़े साम्रा-
ज्यकी विपुल सेनाकी चढ़ाई ! एक चिनगारीको चुझानेके लिए
समुद्रका प्रवाह । एक बालककी आत्मा पर नरकका दुःस्वम !
और फिर भी उसे न्याय्य युद्ध बतलाते हो ? जाने दो, तुम
जीत तो गये ही हो, अब उसमें जो कसर है उसे भी पूरी कर
डालो। यह तलवार राणा प्रतापसिंहजी मरते समय दे गये थे
और कह गये थे-'देखो इसका अपमान न होने पावे ।'
पर हमने इसका अपमान किया है। अतः वह अपमान हमारे
रक्तसे धुल कर साफ हो जायगा ।
महाराज, महावतखॉ योद्धा है, जल्लाद नहीं ।
महा
०-
०- - राणा- १०५ राणा अमरसिंह और महाबतखाँ राणा०- -अच्छी बात है । तो फिर युद्ध कर लो। लो, हाथमें तलवार । ( तरवार सँभालते हैं।) महाo-महाराज, मैंने मेवाडके विरुद्ध अख उठाना छोड दिया है। राणा० यह करसे ? तलवार लो, तलवार ! आज मेवाड़के स्मशानपर मृत माताका शव कन्धे पर रख कर हम तुम्हें इंद्र- युद्धके लिए आह्वान करते है। महा.---महाराजा सुनिए- नहीं, हम कुछ भी न सुनेगे । भीरु ! म्लेच्छ ! कुलागार ! युद्ध कर । देखें, तेरी किस वीरता-किस वहादुरीके कारण सारा भारत काँपता है । मैं छोटूंगा नहीं । अधम ! नर- कके कीड़े । शैतान ! महा.-- -अच्छी बात है महाराज, तव लड़ ही लीजिए । ( तलपार निकाल कर ) सावधान ! भारतमें यदि महाबतखॉका कोई मतिद्वन्द्वी है तो एक राणा ही है, तो भी सावधान ! (दोनों तलवारोंको सँभालते हैं।) राणा--आज भाई भाईमें युद्ध होता है; ऐसा युद्ध ससारमे किसीने न देखा होगा । वस अर पृथ्वी पर मलय हो जाय ! [ इतनमें एक धारण दोनोंके बीचमें आकर खड़ा हो जाता है ] चारण- यह क्या महाराज ! यह क्या--(महाबतखाँसे) शान्त होओ।
सवाद-संग्रह
1108
-राणा-
पर हमने इसका अपमान किया है। अतः वह अपमान हमारे
महा०
राणाo-जो हम कहते है उसके विरुद्ध कुछ भी मत कहो ।
सुनो, तुम हमें मारो । इससे तुम्हारा कलंक कुछ अधिक न बद
जायगा । और हम तुम्हें कोई ऐसा काम भी नहीं वतला रहे हैं
जो तुम्हें अमिय हो । हम जानते है कि तुम हमारा रक्त पीने के
लिए छटपटा रहे हो । तुम्हारा दाहिना हाय हमारे प्राण लेनेके
लिए आग्रहसे कॉप रहा है । तुम हमारा वध कर डालो ।
महा०—महाराज, महावतखॉ इतना हीन नहीं है। मैंने
तलवार चलाकर और आग लगाकर मेवाड़-भूमिको श्मशान
अवश्य बना दिया है, पर तो भी मैंने अन्याय्य युद्ध नहीं किया
है, न्याय्य युद्ध किया है।
-न्याग्य युद्ध ! महावत, तुम इसे न्याय्य युद्ध कहते
हो ? एक छोटेसे राज्यके मुट्ठीभर सैनिकों पर इतने बड़े साम्रा
ज्यकी विपुल सेनाकी चढ़ाई ! एक चिनगारीको बुझानेके लिए
समुद्रका प्रवाह ! एक वालककी आत्मा पर नरकका दुःस्वप्न !
और फिर भी उसे न्याय्य युद्ध वतलाते हो ? जाने दो, तुम
जीत तो गये ही हो, अब उसमें जो कसर है उसे भी पूरी कर
डालो । यह तलवार राणा प्रतापसिंहजी मरते समय दे गये थे
और कह गये थे–'देखो इसका अपमान न होने पावे ।।
राणा-
.
रक्तसे धुल कर साफ हो जायगा ।
महा.-महाराज, महावतखॉ योद्धा है, जल्लाद नहीं ।
१०५ राणा अमरसिंह और महावता राणा०--- -अच्छी बात है । तो फिर युद्ध कर लो। लो, हाथमें तलवार । (तल्वार सँभालते हैं।) महा.-महाराज, मैने मेवाडके विरुद्ध अस्त्र उठाना छोड दिया है। राणा वह कबसे १ तलवार लो, तलपार ! आज मेवाडके श्मशानपर मृत माताका शर कन्धे पर रख कर हम तुम्हें इंद्व- युद्धके लिए आह्वान करते है। महा०-महाराज, सुनिए- राणाo--नहीं, हम कुछ भी न सुनेगे । भीरु ! म्लेच्छ । कुलागार ! युद्ध कर । देखें, तेरी किम वीरता-किस वहादुरीके कारण सारा भारत काँपता है । मैं छोडूंगा नहीं । अधम ! नर- कके कीडे । शैतान ! महा0- अच्छी बात है महाराज, तब लड ही लीजिए । (तलवार निकाल कर ) सावधान ! भारतमें यदि महावतखाँका कोई प्रतिद्वन्द्वी है तो एक राणा ही है, तो भी सावधान ! (दोनों तलवारोंको सँभालते हैं।) राणा-आज भाई भाईमें युद्ध होता है, ऐसा युद्ध ससारमे किसीने न देखा होगा । वस अब पृथ्वी पर मलय हो जाय ! [ इतनेमें एक चारण दोनोंके बीचमें आकर खड़ा हो जाता है ! चारण-~यह क्या महारान ! यह क्या--( महाबतखाँसे) शान्त होओ।
सवाद-समह
१०६
राणा-हट जाओ, तुम इसमे वाधा मत डालो।
चारण-महाराज ! शान्त होइए । जो कुछ , सर्वनाश होना
था सो हो चुका । अव उस सर्वनाशको अपने भाईके रक्तसे
रजित न करिए । इस शोककी सान्त्वना इत्या नहीं है। इसकी
सान्त्वना है फिरसे मनुष्य होना ।
राणा--मनुष्य होना ! सो कैसे ?
चारण-~शत्रु-मित्रका ज्ञान भूल कर, विद्वेष का त्यागकर
अपनी कालिमा और देशकी कालिमाको विश्व-प्रेमके जलसे
धोकर !-गाओ वालको, वही गीत गाओ जो मैने तुम
लोगोंको सिखलाया है।
[ कई बालक गाते हुए आते है। चारण भी उनके
साथ गाने लगता है ]
सोहनी-गजलकी धुन ।
तुम सोक काहेको करो, फिरसे मनुष्य सबै बनो ।
जो देस छुट्यो दुख न तो, फिरसे मनुष्य सवै वनो ।
है कोप औरनपे
वृथा,
जो आप अपने
शत्रु
हो,
है दोष अपनो मन धरो, फिरसे
मनुष्य
सनै बनो ॥
'वर्तमान ' आशा-रहित, जो चाहो मिटि जाय ।
तो भाई भाई मिलो, करो सप्रेम सहाय ॥
यह आपनो, यह गैर, ' तनि यह, गैरको अपनो करो।
यह जग-भवन अपनो गनो, फिरसे मनुष्य सबै बनो ॥
1
१०७
राणा अमरसिंह और महावतखाँ
होय शत्रु उन्नत हृदय, जो उदार तो ताहि ।
प्रेमसहित दीने हृदय, सबसों सदा सराहि ॥
अरु मित्र जो है धूर्त कपटी, शन्नु वह सबसे बडो।
तुम दूर ही वासों रहो, फिरसे मनुष्य सबै बनो ।
जग महँ द्वै सेना खड़ी, करिवेको नित नग ।
पाप सैन्य तजि पुण्यके, दलको कीने सग ॥
जगदीसको नित ही नवौ, बे स्वदेस समान है।
है धर्म नित तित ही रहो, फिरसे मनुष्य सबै बनो।
राणा---महारत!
महा. महाराज!
राणा---तुम्हारा कोई दोप नहीं है । हमारा ही दोप है।
भाई, क्षमा करो।
-भैया, आप मुझे क्षमा करें। (दोनों गले मिलते हैं)
(पटपरिवर्तन)
--
.
राणा अमरसिंह और सत्यसिंह
स्थान--उदयपुरके महलका एक भाग।
समय--प्रातःकाल ।
[ राणा अमरसिंह अकेले टहल रहे हैं।
राणा--(स्वगत, आकाशकी तरफ देखकर ) यह जीवन भी
एक स्वप्न है । यह आकाश फैसा नीला, स्वच्छ और गहरा
है ! उसके नीचे अलस, उदार और मन्थर मेघ उमड़ रहे हैं।
प्रकृतिके जीवन में समुद्रकी तरह लहरें उठती है और फिर बैठ
जाती हैं । यह अलस सौन्दर्य कभी कभी बहुत ही भीम आकार
धारण कर लेता है । आकाशमें बादल गरजते है । पृथ्वी पर
जल वरसकर वह जाता है। और इसके बाद पहलेफी तरह
सब शान्त और स्थिर हो जाते है। [ गोविन्दसिंह आते है । ]
राणा--कौन, गोविन्दसिंहजी ! कहिए, इस समय अचा-
'नक कैसे आये?
गोविन्द महाराज ! मेवाड़ पर फिरसे आक्रमण करनेके
लिए मुगलोंकी नई सेना आई है।
राणा-~आ गई ? यह तो हम पहलेसे ही जानते थे कि केवल
देवारीके युद्धसे इस युद्धकी समाप्ति नहीं होगी । मुगल सारा-
राजपूताना जब तक उजाड़ न देगे तब तक न मानेंगे।
राणा अमरसिंह और सत्यसिट गोविन्द०-महाराज! क्या कारण है कि अभी तक हम लोगों- की ओरसे कुछ तैयारी नहीं हुई ? राणा-क्यो ? तैयारीफी लावश्यकता ही क्या है ? गोविन्द०-~ -क्या अब महाराज युद्ध न करेगे ? राणा-क्यों ? युद्ध करनेसे क्या होगा? गोविन्द०-महाराज, तब तो मुगल आकर मेवाड पर तुरंत ही अधिकार कर लेंगे। राणा-~-जव उनका इतना आग्रह है तब फिर इसमें हर्ज ही क्या है ? D- गोविन्ट०-- क्या सचमुच महाराज युद्ध न करेंगे ? राणा- -नहीं; एक बार हुना, हो गया । गोविन्द० -किसी प्रकारका उद्यम, प्रयत्न या प्रतिवाद किये विना ही- राणाo-लेकिन इन सर वातोंकी आवश्यकता ही क्या है। हमारी समझमे तो यह सब व्यर्थ होगा । देवारीके युद्धमें हमारे मायः आधेसे अधिक सैनिक नष्ट हो चुके है । अब मुगलोंके साथ लडनेके लिए हमारे पास सेना ही कहाँ है ? [ सत्यसिंह आता है।] महाराज, जान फोडकर सेना निकल आयगी। सेनाकी आप चिन्ता न करे। राणा-कौन ? चारण ? सत्य०---
सवाद-सग्रह
सत्य.---हॉ महाराज ! मै चारण हूँ। मैने सुना है कि
मुगल फिर मेवाड पर आक्रमण करने आये है । पर मैं देखता
हूँ कि मेवाड़ अभी तक निश्चिन्त और उदासीन है । मैने समझा ।
कि कदाचित् अभीतक महाराजकी निद्रा भंग नहीं हुई । इसीसे
मै महाराजकी निद्रा भंग करने के लिए आया हूँ।
राणा ०-चारण ! अब हमारी युद्ध करनेकी इच्छा नहीं
है । अबकी बार हम सन्धि करेंगे।
सत्य-यह क्यों महाराज ? देवारीके युद्धकी विजयके
उपरान्त सन्धि क्यों ? क्या महाराज उस गौरवके शिखरपरसे
फिसल कर अपमानके गहरे गढेमें गिर जायेंगे ?
चारण ! देवारीकी विजयकी वात छोड़ दो।
देवारीमें हमारी जीत अवश्य हुई है; पर जानते हो, वह जीत
किस प्रकार हुई है ? उसमें हमारे लगभग आधे सैनिक मारे
गये हैं। इतने चीरोंका रक्त बहा कर हमने वह विजय प्राप्त
राणा०
।
सत्य-महाराज ! यह कोई चिन्ता या दुःखकी बात नहीं
है। वीरोका रक्त हो जातिको उर्वर करता है। जिस देशमे
चीर मरते है, उस देशके लिए दुःख नहीं करना चाहिए।
किन्तु दुःखी उन देशोंके लिए होना चाहिए जहॉ वीर नहीं मरते।
राणाo-लेकिन हम तो देखते है कि यदि एक वार इमने
और भी युद्ध किया, तो भी उसका कोई फल नहीं होगा।
राणा अमरसिंह और सत्यसिंह राणा- इस समरका कभी अन्त न होगा । इन मुट्ठीभर सैनिकोंको लेकर विश्व-विजयी दिल्लीसम्राट्की सेनाके विरुद्ध खड़े होना पूरा पूरा पागलपन है। सत्य० -महाराज ! यदि इसको पागलपन कहते है तो भी इसका स्थान सारी विवेचनाओं और सारे विचारोसे बहुत ऊंचा है। सारा विश्व इसी पागलपनके पैरों पर आकर लोटता है । स्वर्गसे एक गरिमा आकर इस पागलपनके माथे पर मुकुट पहनाती है । जिसे महाराज पागलपन कहते है, क्या उस पाग- लपनके रिना आजतक किसीने कोई बड़ा काम किया है ? -लेकिन इस युद्धका अन्तिम परिणाम निश्चित मृत्यु है। --महाराज ! राणा प्रतापसिंहके पुत्रके लिए यह समझना कठिन नहीं होगा कि आधीनता श्रेष्ठ है या मृत्यु ! क्या मरनेके भयसे हम अपना रत्न डाकुओके हाथमे सीप दें ? रत्नसे भी कहीं बढकर अपने इस सर्वस्व, पूर्व-पुरुषोंके सचित और अनेक शतान्दियोंके स्मारकको क्या केवल प्राणभयसे बिना युद्ध किये ही सौप दें ? अगर वह लेना ही चाहता हो तो मर कट कर ले । और निश्चित मृत्युकी तो चात ही क्या ? वह क्या सभीको एक दिन न आयगी ? महा- राज ! उठिए ! मुगल हमारे विल्कुल पास आ पहुँचे है । अव स्वम देखनेका समय नहीं है। राणा०–चारण ! तुम कौन हो ? तुम्हारे वाक्योंमे गर्जन, तुम्हारे नेत्रोंमे विजली और तुम्हारी अग-भगीमें ऑधी है. सत्य- सवाद-सग्रह ११२ । सूर्यके समान प्रकाशमान , जल-अपातके समान प्रपल, वज्रके समान भीपण, तुम कौन हो? तुम केवल चारण ही तो नही हो! सत्य-----महाराज ! यदि आप पूछते ही हैं तो मैं बतलाये देता हूँ । अब मुझे अपने आपको छिपानेकी अधिक आवश्य- कता नहीं है । मै राणा प्रतापसिंहके भाई सगरसिंहका छोटा लड़का सत्यसिंह हूँ। राणा-हैं ! तुम राजा समरसिंहके पुत्र हो ? सत्य०-महाराज ! यह परिचय देते हुए मेरा सिर लज्जासे झुका जाता है । तो भी पिताके पापोंका प्रायश्चित्त इस पुत्रसे जहॉतक हो सकता है, वह करता है । मेरे पिता अपने भतीजेको सिंहासनसे उतारनेके लिए चित्तौड़के दुर्गमें कल्पित राणा वन- कर बैठे हुए है और मैं उन्हींका लडका होकर उन्हींके विरुद्ध मेवाड़-वासियोंको उत्तेजित करता फिरता हूँ। मै लोगोंको यह बतलाता फिरता हूँ कि सगरसिंह मेवाडके कोई नहीं है, वे केवल मुगलोके खरीदे हुए दास है। महाराज ! यह तो आप जानते ही होगे कि, आज तक मेवाड़के किसी प्राणीने पिताको कर नहीं दिया। राणा-हॉ भाई ! हमें मालूम है । महाराज ! मेवाड़के लिए मै अपना सुख, सम्भोग, पिता और पुत्र आदि सब कुछ छोड़कर उसके जंगलो और तराइयोंमें चारण वनकर उसकी महिमा गाता फिरता हूँ। क्या - सत्य०-
लय और शाम
योग्य है ! इस किशोर कोमल शरीर पर शत्रपात ! शिव
शिव ! यह तुम्हारा मुख चूमनेके योग्य है भैया ! महाराजका
घोडा फेर दो और बेखटके अपनी माताकी गोदमें जाकर क्रीडा
करो! तुम अभी सुकुमार हो !
लव-~-युद्धकै पिना मैं घोडा नहीं दूंगा । समझे ? शनुन,
तुम क्या जाग नहीं रहे हो ? या वहरे हो ? तो सुनो-(ऊँचे
स्वरसे,) यह निश्चय समझो कि मै पिना युद्धके घोडा नहीं दूंगा !
नहीं दूंगा! अर सुन लिया ?
शत्रुन-( हँसकर ) अगर तुम पिल्कुल इसी पर उतारू हो
तो फिर मै लाचार है । अच्छा, तरवार खींचो ।
( दोनों तरवार लेकर युद्ध करते हैं । शत्रुघ्न केवल अपनेको बचाते हैं।)
शत्रुध-~धन्य हो चालक ! तुम्हारी अस्त्र शिक्षा, कौशल और
फुर्ती सराहने योग्य है । लव, ठहरो!
लव ठहरकर ) तो तुम हारना स्वीकार करते हो, क्यों ?
शत्रुनअच्छी बात है । मै अपनी हार मजूर करता हूँ।
५, और घोडा फेर दो।
-
लव और शत्रुघ्न
स्थान-वन।
समय-दो पदर।
[समर-वेपर्म लप और
হন
खडे हैं । शत्रुमके
पास बहुत से सिपाही है।
शनुन-पालक ! उद्धत शिशु ! शस रख दो । बच्चे ! तुमको
शायद अभी तक यह बोध नहीं हुआ कि युद्ध खेल नहीं है !
लग-युद्ध खेल नहीं है ? सेनापतिजी, मै तो युद्धको-कमसे
फम अपने लिए-खेल ही समझता हूँ।
शत्रुघ्न- तुम जानते हो, शस्त्रके लगनेसे देहमें घाव होता
है और घाव होने पर उससे रुधिर वहता है ? तुमने कभी
खून देखा है ? कभी तरवारकी चोटसे धड़से सिर अलग
होते देखा है ?
लव-हे वीर । अगर सच पूछो तो मैने अपना सिर कभी
धड़से अलग होते नहीं देखा ! और, कभी अपने शरीरमे
धावकी व्यथाका भी अनुभव नहीं किया !
शत्रुन--तो फिर युद्धसे निवृत्त होओ। तुम अभी निरे बच्चे
हो । तुम्हारा यह कोमल शरीर शस्त्रकी चोटके योग्य नहीं है।
गोदमें लेकर दुलरानेके योग्य है, स्नेहपूर्वक हृदयसे लगानेके
लव और शत्रुघ्न
योग्य है ! इस किशोर कोमल शरीर पर शस्त्रपात ! शिव
शिव ! यह तुम्हारा मुख चूमनेके योग्य है भैया ! महाराजका
घोडा फेर दो और वेखटके अपनी माताकी गोदमें जाकर क्रीडा
करो ! तुम अभी सुकुमार हो !
लव-युद्धके बिना मै घोडा नहीं दूंगा | समझे ? शत्रुघ्न,
तुम क्या जाग नहीं रहे हो ? या बहरे हो ? तो सुनो-(ऊँचे
स्वरसे;) यह निश्चय समझो कि मै विना युद्धके घोडा नहीं दूंगा!
नहीं दूंगा! अव सुन लिया ?
शत्रुघ्न--(हँसकर ) अगर तुम बिल्कुल इसी पर उतारू हो
तो फिर मै लाचार है । अच्छा, तरवार खींचो ।
(दोनों तरवार लेकर युद्ध करते है । शत्रुन केवल अपनेको बचाते हैं । )
शत्रुघ्न-~~धन्य हो वालक ! तुम्हारी अस्त्र शिक्षा, कौशल और
फुर्ती सराहने योग्य है । लव, ठहरो !
लव-~-(ठहरकर ) तो तुम हारना स्वीकार करते हो, क्यों ?
शत्रुघ्न-~~-अच्छी बात है । मैं अपनी हार मंजूर करता हूँ।
युद्ध छोड दो वीर, और घोडा फेर दो।
-ना, तुम हँस रहे हो । अगर शक्ति हो तो घोडेको ले
जाओ । युद्धमें मुझे हराये पिना तुम उस घोडेको नहीं पा सकते ।
आओ, युद्ध करो।
शत्रुन-~-अच्छा तो वही हो । तुम वालक अवश्य हो, मगर
अपने शरीरमें सिंहका ऐसा पराक्रम रखते हो, तुमने विधिपूर्वक..
,
-
+ लव और शत्रुघ्न -Set- स्थान-वन । समय-दो पहर । [ समर-वेपर्म लय और शत्रुघ्न खडे हैं । शत्रुनके पास बहुतसे सिपाही है।] शत्रुघ्न--वालक ! उद्धत शिशु ! शस्त्र रख दो । बच्चे ! तुमको शायद अभी तक यह बोध नहीं हुआ कि युद्ध खेल नहीं है ! लप-युद्ध सेल नहीं है ? सेनापतिजी, मैं तो युद्धको-कमसे फम अपने लिए-खेल ही समझता हूँ। शत्रुघ्न- तुम जानते हो, शस्त्रके लगनेसे देहमें घाव होता है और घाव होने पर उससे रुधिर वहता है ? तुमने कभी खून देखा है ? कभी तरवारकी चोटसे धड़से सिर अलग होते देखा है ? लप-हे वीर अगर सच पूछो तो मैने अपना सिर कभी धड़से अलग होते नहीं देखा ! और, कभी अपने शरीरमें घावकी व्यथाका भी अनुभव नहीं किया ! शत्रुघ्न-तो फिर युद्धसे निवृत्त होओ। तुम अभी निरे बच्चे हो । तुम्हारा यह कोमल शरीर शस्त्रकी चोटके योग्य नहीं है। गोदमें लेकर दुलरानेके योग्य है; स्नेहपूर्वक हृदयसे लगानेके
लव और शत्रुघ्न
चालक लवने आज भेडॉकी तरह रामकी सारी क्षत्रिय सेनाको
भाग दिया ! हा धिकार है।
१ सैनिक-सेनापतिको डेरेमें ले चलो ! इनके बहुत गहरी
चोट लगी है!
(शत्रुधको लेकर सब सैनिकों का प्रस्थान ।)
२ सैनिक-(जाते जाते ) इस बालककी शस्त्रशिक्षा धन्य है !
चाहुवल धन्य है ! यह क्षत्रिय-तापस बहुत ही श्रेष्ठ वीर है !
(लवका प्रवेश।)
लव-सब भाग गये ! राजाकी सेनाका पता नहीं है ! असंभव
सभव हो गया। इसीको युद्ध कहते है ? यह तो लडकोका खेल
ही है । आश्रमको चलें । दिन समाप्त हो आया है । (प्रस्थान ।)
सवाद-संग्रह
अस्वशिक्षा भी प्राप्त की है। लच, तुम्हारे साथ कौशलकी परीक्षा में
कोई लज्जाकी वात नहीं है। लो, हथियार हाथमे लो, चार करो।
लव-तुम वीर हो । तुम्ही आगे बढ़कर वार करो।
[फिर युद्ध होता है । शत्रुघ्न मच्छित और घायल होकर पृथ्वी पर
गिर पड़ते हैं । तब सब सैनिक लव पर आक्रमण करते हैं।
लव उनके साथ युद्ध करते करते बाहर निकल जाते हैं।
कुछ सैनिकोंका फिर प्रवेश।]
१ सैनिक-यह क्या! क्या सेनापतिके सिरमें चोट आई है?
शत्रुघ्न-चोट ?-साधारण नहीं, गहरी चोट है ।
२ सैनिक- तो फिर शिविरमें ले चलो। यह क्या, यह
कैसा शोर गुल सुन पड़ता है ?
[ बहुतसे सैनिकोंका प्रवेश ।]
३ सैनिक-सर्वनाश हो गया सामी 1 भयसे विवल सारी
सेना 'शत्रुन्न मारे गये सुनकर अयोध्याकी ओर भागी जा रही
है। धीरकुलश्रेष्ठ निर्भय लव अकेले कार्तिकेयकी तरह उस सेनाका
पीछा कर रहे है!
और सैनिक-धन्य है लव, धन्य है !
शत्रुघ्न-तो यह भयसे विद्धल होकर अयोध्याकी ओर भाग
रही हमारी सेनाका कोलाहल है ? धिक्कार है ! धिक्कार है।
अयोध्याके सब क्षत्रिय चीर कायर है ! शेरकी तरह अकेले
लव आर शत्रुघ्न
चालक लवने आज भेडॉकी तरह रामकी सारी क्षत्रिय सेनाको
भाग दिया ! हा धिक्कार है।
१ सैनिक-सेनापतिको डेरेमें ले चलो ! इनके बहुत गहरी
चोट लगी है !
(शत्रुघ्नको लेकर सब सैनिकोंका प्रस्थान 1)
२ सैनिक-( जाते जाते ) इस वालककी शस्त्रशिक्षा धन्य है।
बाहुपल धन्य है ! यह क्षत्रिय-तापस बहुत ही श्रेष्ठ वीर है !
( लवका प्रवेश।)
लव--सब भाग गये! राजाकी सेनाका पता नहीं है। असंभव
सभव हो गया । इसीको युद्ध कहते है ? यह तो लडकोका खेल
ही है । आश्रमसो चलँ । दिन समाप्त हो आया है । (प्रम्यान ।)
संवाद-संग्रह
N
अस्त्रशिक्षा भी प्राप्त की है। लव, तुम्हारे साथ कौशलकी परीक्षामें
कोई लज्जाकी वात नहीं है। लो, हथियार हाथमे लो, वार करी!
लव--तुम चीर हो । तुम्ही आगे बढ़कर वार करो।
[फिर युद्ध होता है । शत्रुघ्न मच्छित और घायल होकर पृथ्वी पर
गिर पडते है । तब सब सैनिक लव पर आक्रमण करते हैं।
लव उनके साथ युद्ध करते करते बाहर निकल जाते हैं।
कुछ सैनिकोंका फिर प्रवेश ।।
१ सैनिक-यह क्या! क्या सेनापतिके सिरमें चोट आई है?
शत्रुघ्न-चोट ?-साधारण नहीं, गहरी चोट है !
२ सैनिक-तो फिर शिविरमें ले चलो। यह क्या, यह
कैसा शोर गुल सुन पड़ता है ?
[ बहुतसे सैनिकोंका प्रवेश ।]
३ सैनिक-सर्वनाश हो गया स्वामी ! भयसे विद्वल सारी
सेना 'शत्रुघ्न मारे गये सुनकर अयोध्याकी ओर भागी जा रही
है। वीरकुलश्रेष्ठ निर्भय लव अकेले कार्तिकेयकी तरह उस सेनाका
पीछा कर रहे हैं।
और सैनिक-यन्य है लव, धन्य है !
शत्रुघ्न-तो यह भयसे विशाल होकर अयोध्याकी ओर भाग
रही हमारी सेनाका कोलाहल है ? धिकार है ! धिकार है !
अयोध्याके सर क्षत्रिय वीर कायर है ! शेरकी तरह अकेले
--
लव और शत्रुघ्न
बालक लाने आज भेड़ोंकी तरह रामकी सारी क्षत्रिय सेनाको
भाग दिया ! हा धिक्कार है।
१ सैनिक-सेनापतिको डेरेमें ले चलो! इनके बहुत गहरी
चोट लगी है।
(शत्रुनको लेकर सब सैनिकोंका प्रस्थान 1)
२ सैनिक-(जाते जाते ) इस बालकफी शस्त्रशिक्षा धन्य है !
बाहुबल धन्य है ! यह क्षत्रिय-तापस बहुत ही श्रेष्ठ वीर है !
(ल्वका प्रवेश।)
-सव भाग गये ! राजाकी सेनाका पता नहीं है ! असंभव
संभव हो गया। इसीको युद्ध कहते है ? यह तो लड़कोका खेल
झी है । आश्रमको चलें । दिन समाप्त हो आया है। (प्रस्थान।)
सरदारबा
-
पात्र
सरदारवा-रानीपुरकी राजकन्या ।
रूपादे-सरदारवाकी भोजाई।
साध्वी, सरदारखाकी माता, सखियाँ, पहरेदार स्त्रिया आदि।
दृश्य पहला
समय-तीन पहर।
स्थान-रानीपुरका महल ।
[ सरदारत्रा और रूपादे बैठी बातें कर रही है।
एक सखि पत्र लेकर आती है। ]
सरदारवा--कमला! यह क्या है ?
चपा-युवराजके नामका पत्र है । पाटनसे आया है।
रूपादे-यहॉ ला देखें (कमला पत्रदेकर जाती है और रुपादे
उसे पढती है )
युवराज।
तुम खुश होगे । बहुत दिनोंसे तुम्हारा खत नहीं सो देना ।
और तुमने वादा किया था उसके माफिक अब जल्दी ही तुम्हारी
वहिनका ब्याह मेरे साथ कर दो। मैं तुम्हारी वहिनको अपनी
सरदारवा - खास बेगम बनाऊँगा और तुमको छोटीसी जागीरसे बहुत बडे सूचेका मालिक बना दूंगा। अगर इन्कार करोगे तो रानीपुरकी ईंटसे ईट वजा दूँगा । और तुमको धूलमें मिलाकर जबर्दस्ती तुम्हारी बहनसे व्याह करूँगा । मुझे उम्मैद है कि तुम कोई ऐसा काम न करोगे जिससे हमारी दोस्ती टूट जाय । तुम्हारा दोस्त- रहमतखाँ" रूपादे-~-क्या युवराजने वादा किया था ? नहीं, नहीं, झूठ बिलकुल झूट चपा--(प्रवेश करके ) नही, सच ! निलकुल सच ! रूपादे--(चपाका हाथ पकड कर) चंपा। तुम यह क्या वक रही हो ? रानीपुरका गजकुमार अपनी यहिनको शत्रुसे व्याहनेका वचन दे १ सर्वथा असमव है। चपाबाई सादिवा ! दुःखसे कहना पड़ता है कि यह यात सर्वथा सच है । कुमार साहिनने रहमतखॉको वचन दिया उसके शब्द इन कानोंने सुने है और उसके लिए सकडो पार मेरी इन ऑखोंने ऑसू बहाये है। रूपाटे--ओ भगवान ! मै यह क्या सुन रही हूँ ? रानी- पुरका राजकुमार, क्षत्रियका पुन, स्पादेका सामी इस तरहका अधर्म आचरण करे, यह सर्वथा असह्य है । (कुउ ठहरकर ) दयामय ! यह वात झूठी हो! -
संवाद-संग्रह
१२०
कमला-(फिर प्रवशेकर ) वाई साहना ! पाटनका राजदूत
पत्रका जवाब चाहता है।
रूपादे-(पत्रको फाडकर) कमला दूतको ये टुकड़े देकर कह
दो यही हमारा जपान है । राजहंसिनी कौवेके लिए नहीं है।
सरदारवा-भोजाईजी ! जरा शान्तिसे विचार कीजिए।
भाईजीको और पिताजीको इसका जवाब देने दीजिए।
रूपाढे-ससुरजी रोगशैयापर सोते हैं । वे क्या जवाब
देंगे ? और तुम्हारे भाई तुम्हें व्याहनेका वचन दे आये हैं।
( सरदारवाका हाथ पकडकर ) वोलो, तुम पाटनकी वेगम बनना
चाहती हो ?
सारत्रा-में चाहती हूँ कि प्रजा सुखसे रहे, पिताजीको
इस बुढापेमें तकलीफ न हो, रानीपुरके धनवैभव सदा बढते
रहे और राजकुमार वेखटके राज करते रहें।
रूपादे और ये बातें तभी हो सकती है, जब तुम
रहमतखॉसे शादी कर लो। मगर यह वात असंभव है ।
श्वसुरजीने अब तक जो बात न होने दी वही वात अब उनकी
लाचार दशामे क्या तुम भाई बहिन मिलकर करोगे ?
सरदारबाकी माता-(प्रवेशकर ) नहीं, कभी नहीं ! बहू !
जब तक तुम जीवित हो, जब तक मेरे दममें दम है, यह
वात न होगी। रानीपुरकी प्रजापी आवरूकी धजा नीचे
न गिरने पायगी।
सरदारवा
सरदारखा~माता ! मुझपर अन्याय न करो। मेरे कहनेका
अर्थ उल्टा न निकालो।
स० माता-(सरदारवासे ) छोकरी चुप रह ! (रूपादेसे)
वह ! यह मेरी कटार लो, अगर सरदारवा पाटनकी वेगम
बननेकी इच्छा करे तो इसके पेट में भौक देना (रूपादे कटार लेती
है और दोनों वहाँसे जाती है।)
सरदारना---(एक निश्वास टालकर ) दयामय ! दया करो!
(पट परिवर्तन )
दूसरा दृश्य
[ गाँवका किनारा, पाँच सात स्त्रियाँ घायल रूपादेको उठाकर
लाती है। सरदारवा रूपादेके पास बैठती है।
सरदारवा-भाभी ! भाभी ! मुझे छोड़कर कहाँ चली ? भाई
गये, माता पिता कैट हुए, रानीपुर ध्वंस हुआ। तुम भी
चलीं । ठहरो मै भी तुम्हारे साथ चलगी । ( कटार निकाल कर
आत्महत्या करनेको तैयार होती है )
रूपादे-~-( उत्तेजनाके साथ बैठकर ) खपरदार ! ऐसा काम
न करना । जीवित रहकर माता पिताको फैदसे छुड़ाना, मेरी
मौतका बदला लेना और सारे गुजरातमे इस अन्यायके विरुद्ध
आग जलाना । पाटनकी सत्ता उसमें जलकर खाक होगी।
आह ! आह ! ( वापिस गिर पड़ती है।
संवाद-सग्रह
सरदारवा-(सडी होती हुई) गई! गई!! गई मुझे छोड़कर
हमेशाके लिए चली गई । भाभी! तुम्हारी आज्ञा शिरोधार्य
है । प्रतिज्ञा करती हूँ कि जर तक इस अन्यायका बदला न
लेगी तब तक जमीन पर सोऊँगी और सिरके वाल न वाँधूगी।
देवताओ ! मेरी मदद करो, स्वर्गस्थ सतियो ! तुम्हारे सलकी
शक्ति मेरे रोम रोममें भर दो जिससे मै अन्यायका बदला
ले
सकूँ । वदला ! बदला !! बदला !!!(नेपथ्यमें )
(नेपथ्यसे—" पकडो पकड़ो भागने न पावे" की आवाज
सुनाई देती है।)
सरदारत्रा- अरे ! दुश्मन आ रहे है। चलो इधरसे निकल
जायँ । ( रूपाटेको लेकर सर जाती है।)
दृश्य तीसरा
स्थान-पाटनके अन्तःपुरका एक भाग ।
समय-सध्या काल ।
[ सरदारवा कैदीकी दशामें खडी है । एक पहरेदार
स्त्री पहरा दे रही है।
सरदारवा--(प्रार्थना कर रही है)
फिन तेरो गोनिंद नाम धर्यो ।
लेन देनके तुम हितकारी, मोसे कछु न सर्यो । कि० ॥
निप्र सुदामा कियो अनाची, तदुल
भेट धयो ॥कि० ॥
सरदारवा arenAR द्रुपद सुताकी ते पत रावी, अबर दान कयों ।। कि० ।। सदीपनके तुम सुत लये, विद्या पाठ पर्यो । कि० ॥ सूरकी विरियाँ निठुर है बैठो, कानहिं मँदि धर्यो ॥ कि० ॥ (म्वगत ) कैदमें पड़े हुए प्रतिज्ञा कैसे पूरी होगी ! भगवान कोई रस्ता बताओ । [लीपारके सहारे हाथपर सिर रखकर कुछ सोचती है । उसी समय भोजन लेके एक स्त्री आती है। वह मेल- रखानेका दर्वाना खोलकर भोजन रखनेको नीचे झुकती है । सरदारवा झपटकर उसको गिरा देती है और उसके मुंहमें कपडा मेंस उसके हाथ पैर बाध उसे एक तरफ डाल देती है । उसी समय पहरेदार स्त्री आजाती है । उसके साथ सरदारबाका झगडा होता है सरदारना उसे गिरा जख्मी कर भाग जाती है।] (पट परिवर्तन ) दृश्य चौथा स्थान- वन समय-सध्याकाल सरदारला--(स्वगत ) दौडते दौडते थक गई । रस्ता भूल- कर वनमें आ पहुँची । चारो तरफसे जगली जानवरोंकी डरा- वनी आवाजे आ रही है । ( कटार निकाल कर ) अबलाओकी रक्षिका मेरी रक्षा करना (एक सिंहकी गर्नना । सुनाई देती है ।) अब क्या करूँ ? कैसे अपने माण वचाऊँ ? (अपनी साडी सवाद-संग्रह १२४ । निकाल कर बाएँ हाथ पर लपेट लेती है और दाहिने हाथमें कटार लेकर खडी हो जाती है । उसी समय सिंह आक्रमण करता है । सरदारत्रा सिंहके मुंहमें हाथ डाल कटार उसके कलेनेमें भोंक देती है। सिंह गिर पडता है। सरदारवा भी पजोंकी चोटके कारण घायल होकर गिर 'पडती है । एक साम्बी और उसके साथ कुछ अन्य स्त्रियोंका प्रवेश) एक स्त्री-( सिंहको देखकर भयसे ) ओ मॉ, वाघरे ! मारारे! खायारे! साध्नी--( हाथ पकटकर ) चुप ! चुप ! चलो एक तरफ छिपकर देखें । ( छिप जाती हैं कुछ देर के बाद ) साध्वी-देखो दोनों स्थिर पड़े हैं। जान पडता है, मर गये हैं। आओ देखें। स्त्री--ना मैं नहीं आऊँगी । मुझे क्या सिंहका शिकार वनना है ? साध्वी--अच्छा में ही जाकर देखती हूँ। (साध्वी डरते डरते सिंहके पास जाती है । सिंहको मरा हुआ समझकर अपने साथकी औरतोंको बुलाती है। " आओ आओ सिंह मरा पड़ा है। " औरतें आती है। साध्वी लहू लूहान सरदारखाको पहचानती है। साध्वी-( आश्चर्यसे ) अरे यह तो सरदारवा है । यह कैद- से छूटकर कैसे आई ? (सरदारवाकी जाँचकर ) अभी श्वास- बाकी है । हे भगवान! जैसे तुमने इनको कैदसे छाड़या, 4
सरदारबा
वैसे ही इन्हें प्राणदान भी दो । बहनो! चलो हम इन्हें
अपनी झोपडीमें ले चले । (त्रियाँ सरदारत्राको उठाकर
अपनी झोपडीमें ले जाती है।)
दृश्य पॉचवॉ
स्थान--जंगलमें झोपड़ी।
समय-सवेरा।
[ सरदारखा और साध्वी खडी बाते कर रही है ।
सरदारबा-वहिन तुम कौन हो और जंगलमें क्यों रहती हो।
साध्वी-~-(एक निश्वास डालकर ) वहिन, मैं भी तुम्हारी ही
जैसी सताई हुई एक स्त्री हूँ | मेरा सब कुछ जुल्मी रहमतखॉने
नष्ट कर दिया है । उसीका बदला लेनेके लिए मै साध्वी होकर
जंगलमें रहती है।
सरदारवा-~-इस जगलमें रहकर बदला कैसे ले सकोगी ?
साध्वी--( अपनी कमरमें छिपी हुई कटार निकाल कर उत्तेजनाके
स्वरमें ) यह कटार जुल्मीके कलेजेमे चुभाकर; उसको यमधाम
पहुँचा कर ।
सरदारवा---यह कैसे बनेगा ?
सावी-~-रहमतावॉ असर शिकार खेलने इस जगलमें
आया करता है । मैंने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि अबकी
सवाद-संग्रह
१२६
wwwwwwwwwww
बार वह जव आयगा तब उसको इस झोपड़ीमें बुलाऊँगी और
यमधाम पहुँचाऊँगी।
सरदारवा--मुझे यह काम इस तरह होना कठिन जान पड़ता
है । अगर हो गया तो भी उससे क्या फायदा होगा ? उसकी
जगह दूसरा गद्दीपर बैठेगा और वह जुल्म शुरू करेगा ।
साध्वी-मै केवल बदला चाहती हूँ। मुझे रुलाकर जो इस
रहा है उसे मै ठंडा कर देना चाहती हूँ।
सरदारवा--एकको ठंडा करोगी दूसरा उसकी जगह बैठकर
हॅसेगा । इस लिए आओ हम ऐसा उपाय करें जिससे गुजरात
जागे, गुजराती जागें, मानवजात जागे और अन्यायकी हँसी
हमेशाके लिए बंद हो जाय ।
साध्वी--( कुछ सोचकर ) वहिन, तुम ठीक कहती हो । हम
ऑपी और जलप्रपात बनें, गुजरातमें तूफान उठेगा और
पाटनकी सत्ता उसमे नष्ट हो जायगी; हम भूकम्प बने, गुजरात
चौचीर होकर फटेगा और अन्याय उसमें सदाके लिए विलीन
हो जायगा; हम चिन्गारियाँ वने, गुजराती भयकर आगका रूप
धारण करेंगे और जुल्म उसमें जलकर राखकी देरी होजायगा।
सरदारत्रा--तव चलो ! हम काममें लगें।
सरदारवा दृश्य छठा स्थान--पाटनका राजमहल, समय-सभ्याकाल [ सरदारवा और एक शहरकी प्रमुख स्त्री वात कर रही हैं। साध्वी एक तरफ वैठी हैं।] शहरकी एक प्रमुख स्त्री-सरदारता ! आज गुजरातियोंका स्वर्ण दिन है। आज गुजरातके भाग्याकाशमें स्वाधीनताका सूर्योदय हुआ है । गुर्जर वीर और वीरागनाएँ कोसे कथा भिडाफर अन्यायके विरुद्ध लडे हैं, स्वतत्रताके युद्ध में उन्होने आज पहली वार विजय पाई है। भगवान करे उनकी यह जय- पताका हमेशा आकाशमे उडती रहे। और यह जय सरदारवा आपकीही वीरताके कारण मिली है । इस लिए गुर्जर प्रजाकी तरफसे मै आपको जयमाल पह- नाती हूँ। गुजरातके नरनारी उल्लासके साथ आज उत्सव मना रहे है । आइए आप भी इस आनंदमें भाग लेकर हमें आभारी कीजिए। सरदारबा--गुजरातको यह सौभाग्यका दिन, परम स्नेहमयी साध्वीजीके यत्नोसे मिला है। इसलिए आओ यह जयमाल उन्हीके गलेमें डालें (दोनों सान्वीनीके पास जाती हैं।) साध्वी सरदारवा ! यह माला तुम्हारे ही गलेमें सोहती है। गुर्जर प्रजाकी यह स्नेह और भक्ति परिपूर्ण भेट स्वीकार करो।
संवाद-सग्रह (साध्वी गलेमें माला पहनाती है ) आओ ! अब प्रजाके उत्सव, सम्मिलित होने चले। (जाती है।) दृश्य सातवॉ , स्थान-एक भन्यमडप भैरवी-तीन ताल कहाँ मिलेगा कृष्णमुरार प्राणाधार, स्नेहागार ! १ मदिरके नरिव पत्थरमें, भक्तोंके शुचि सुमधुर स्वरमें, पृथ्वीमें, नभमें, सागरमें, अनल, अनिलमें, तिल-तिल-भरमें, सुना तुम्हारा है आगार, क्या यह सच है कृष्णमुरार ॥ १ ॥ २ स्नेहमयी जसुमतिके करमें, विरह-विधुर राधा-अतरमें, कृष्णाके अनत अवरमें, या काली कुनाके घरमें या इस वसुधाके उस पार, कहाँ मिलेगा कृष्णमुरार 2 ॥ २ ॥ कल कदव, कालिंदी तटमें, गिरि-गह्वर वसुधाके पटमें, वन-वीथी, वन, वशीवटमें, जन, जनपद, पथमें, पनवटमे, खोजा, खोज हुई लाचार, यहाँ मिला है कृष्णमुरार ॥ ३॥ ३ - .
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कहां मिलेगा कृष्ण मुरार " का गरवा करनेवाली लड़किया (पृ. १२८ )
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स्वरलिपि [संकेत मद्र या पहले सप्तकके स्वर-सा रे ग म प ध नि मध्य या दूसरे सप्तकके स्वर-~सा, रे, ग, म, प, ध, नि तार या तीसरे सप्तकके स्वरसा, रे, ग, म, प, ध, नि जिनस्वरों के नीचे लकीरें है वे स्वर कोमल है जैसे रे, ग, x यह चिन्ह पहरी तालका है। • यह चिन्ह खाली तालका -इस चिन्हमें आये हुए स्वर सभी एक मात्राके अदर बोले या वजाये जाते है । जैसे सारेग है । गायन. राग-भीमपलासी, ताल मिताल, माना १६ चरन कमल बद हरि राई। जाकी कृपा पगु गिरि लघे, अधेको सब कुछ दरसाई॥ वहिरो सुने मूक पुनि बोले, रक चले शिर छत्र धराई। सूरदास स्वामी करुणामय, बार बार वदा तेहि पाई। ૨ म नि प ग ग रे सा रे नि सा सामग म दौ ६ हरिरा व हि रोड 5 क पु नि बो ले ३ च र S -- S सवाद-संग्रह १३० . ३ - - म प म प ग माप नी नी पनी मारें नीसा जा 5 की कृपा 5 गू 5 गि रिलsss S चले 5 शि राछS त्र व (A र x २ नी नी सा म₹ सां सा नी नी ध प ग म प सां sधे को 5 स व।कु छ द रसा सू र दास स्वा भी s क राणा 555 मय S ३ X २ - म नी प ग ग रे सा रे नि सा सा [म ग म sदौ ७ ते हि पा या S र वा15 र व राग-विलावल, ताल-एफताल, मात्रा १० दीननके प्रति पालक, श्याम विरुद तुम्हारी। विभुवर तय क्रीडास्थल, भारत काहे विसार्यो । गजकी पुकार सुनकर, दौडे गरुडको तजी । दुपदाकी पत राखी, अजामीलको तार्यों ॥ भारत जन है अनाथ, तुम विन कोन हमारो। गिरिधर कस विदारी, त्राहि नाथ अब हार्यो । स्थाई १ क २ . ४ सा नि ध नि| सा ३ सां सां नि त्र ति पा S प दी S न ने के S क .
स्वरलिपि १ २ 3 ४ म प ग म रे वि S म S S . ४ सा सा नि सा विभु प नी ध की S र घ डा S S स्थ ल . 3 म माग ग १ ग |भा प S र त का S हे वि सा S यों S अतरा १ . . ३ १ प ध प निसा - (सा । ग ग ज की s पु का s न र . o ४ १ . म प म ३ ₹सा को S दो है S रू ड S त जि S ४ १ सा ३ नीसा नि ब प २ सा नी। ध दा 5 को सी S प sl . . . ३ ग म प म म ग S को S S यों S में जा 5 मी पहले अतरेकी तरह दसरा धजाना ।
सवाद-संग्रह अतरा. भा s र त ज S अब 5 थ S न S म | वि रिध हमा वि दा गि क S स S री S वा 5 | हि ना s थ य हा S 5 राग-मालकास, ताल-निताल (माना १६) कृष्णा माधो राम निरजन । हे गोविंद गोपाल ॥ इतनी विनति मोरी सुन लीजे तूही। तूही करेगो तेरो काम ॥ स्थायी ग . . ३ ग सा म म - x धनी सा म मम म ग घ मग ऽ धोऽ, रा ss मनि र Sज POR) कृ Sणा SIS मा . . - गमधनी साधमनी ध मनी ध म-मम (म) ग सा हेssss गोs s विद गो पा ऽलs s S S अन्तरा x गम -नी सा सा सासा सा सा सा नी ध नी न ति मो री | मु न ली जे तू ऽ ही 5) wwwnewww स्वरलिपि x २ - - - - - - नी - धि नी सा मांग सा तू ही करे गो ते S काम राग-देस, अक्षर छद ब्रह्मानदम् परमसुसदम् केरलम ज्ञानमूर्तिम् । द्वद्वातीतम् गगनसदृशम् तत्वमस्यादि लक्ष्यम् ।। एक नित्यम् विमलमचलम् सर्वधी साक्षीभूतम् । भावातीतम् निगुणरहितम् सद्गुरु त नमामि ॥ सा नी सा रे सा नी ध परे म पनी व प न 5 झान 5 दम्प र म सुसि द S - - - गरेगमप ध सा - म गरे ग नी क्षा 5 ने म s व SIS म् S सा - - रेग म ग रे-रे म प नीध प द्वा/तीss त ऽम्/7 ग न S S द्व मू -सा - - - ग रेगमप ध म गरे।ग नि त्व मjss स्या s|दि ल S क्ष्यम s नी ₹ नी सा सा निसा सा ऽ त्य म्। दिम म ए s म २ ल क S सवाद-संग्रह नी - सा - नि सा रे ग म रे ग रे नि - सssधी s sss सा 5 क्षि भूs प - रें - - नी - नी ध सा -नी सां नि गुण भावा म् - - ~ - में रेगमप ध म गरेग नि - - - दु हss 5 त S न मा 5 मि/ss राग-छाया नर झपताल, माना १० नमो मात मारत, नमो देश-माता नमो ज्ञान विज्ञान, तन पान-दाता तुम्ही मात भक्ति, तुम्ही मात-शक्ति तुम्ही मात मुक्ति च, भक्ति प्रदाता तुम्हीं कल्पवृक्ष, ओ तुम्ही कामधेनु तुम्ही सर्व-दाता, तुम्ही ज्ञान-गाथा जो नर गा वजा कर, रिझाता है तुमको वह जीवनका अपने, है आनद पाता स्थाई २ ३ प स्वरलिपि - १ १ पनी नी नी नी नी सा रे में सानी सा त म की ना तरी ता S SS -- - १ - - प सा सा लि यो ग्रा नी ध प प ध प म ग म प को उ वा ऽरी $ १ १ - गरे सा - प ध प माप भा S 5(द भा S S १ - प म प प्रभु नि नी जो। द्धा 5 नी १ नीनी प नी पनी रकी शशि S SITS S S १ १ - - - . - नी आ 5 वो Na. . नी सा रे ग सा रे सा दो 5 ये ही 5 5क्षा 5 S . -- - - १ सा नी सा रेसा घ सानी चप घप आS वो 5/15 आ sयो s आ sवोs S १ . . - - - - प - - प आ वो 5 s S दास S S E सवाद-संग्रह 0 १ प ध प म ग - ग म प म ग रे सा मको छु डा s! वो व S ध S S S राग कालगडा, ताल त्रिताल, माना १६ व्याकुल मै होगई कन्हैया। कैसे करूँ मै सुध न रही अब तनमनकी दीना होगई ॥ क०॥ लाज रखो हरि मीरपरी है, करुणा क्यो छुप गई ॥ क० ॥ । गम पर S S 475 SS - . ३ १ ग म | सानी - - सारम P)) S ऽ हो । s S |प धुप ग म प ध का ss से कहूs मैं 5 प ५ प ध म प ग मरे रही 5 अ धाम प ग म न की 5 स मु घ न ब म - गम पथ पग म रेसा नि सा रे म दीनाss हो 5 गई S था
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सवाद-संग्रह
१४०
३
.
X
क
-
-
३
नी नी सा साग सा नी धाम ध नी धाम
म बु र रूप द र सा 5 व
दू र म ये 5
मछा
फूल
न से 5 जो आ s व
को 5 य
लाकूड क मुना व
म न र हिर हि घ वारा S च
य
s
S
सो
राग-भैरवी, ताल त्रिताल, मात्रा १६
आरोह-नी सा ग म प ध नी सां
अवरोह–सा नी ध प म ग रे सा
कहाँ मिलेगा कृष्ण मुरार?
पाणाधार, स्नेहागार ?
मदिरके नीरव पत्थरमें, भक्तोंके शुचि सुमधुरस्वरमें
: पृथ्वीमे नभमे मागरमें, अनल अनिलने तिल तिल भरमें
सुना तुम्हारा है आगार,
क्या यह सच है प्राणाधार? ॥१॥
स्नेहमयी जसुमतिके करमें, विरह-विधुर राधा-अतरमें
कृष्णाके अनत अपरमे, या काली कुब्जाके घरमें
या इस वसुधाके उस पार
कहाँ मिलेगा भाणाधार? ॥२॥
कल-फदव कालिंदी-तटमें, गिरि-गदर, वतुधाके पटमे,
ब्रज-चीथी, वन, वसीवटमे, जन, जनपद, पथमे पनघटमे,
खोजा, खोज हुई लाचार
यहाँ मिला है कृष्णमुरार। ॥३॥
१४३ स्वरलिपि x ३ सांनी ध प म ग रे सा नी सा ग म प धनी सां x - म. राग-काफी, ताल त्रिताल, माना १६ सुन ससी मोहन वसी बजावे, साँझ समय गोधनके पीछे, अच्छे धनी ठनी आ वे ॥सुन०॥ कहुँ पुष्प कहुँ कुसुम मँजरी कहुँ तुलसी दल ला ये ॥तु०॥ गुंजमाल घन माल लाल-उर अग अग छवि छा वे ॥ सुन० ॥ स्थाई ३ म ग म प म ग रे सा रे ग म माप स खीमो 5 ह नव s सी वजा प - २ - घ - x घ धनी व प म ग ग म पग श साम यो अध पी и т. s S २ . - - ३ रे ग ग म म प ध नी तानी ध प 5 छे व नीठ नोआ s - आ S ARMAN सवाद-संग्रह ४२ x . ३ म - - - ग - मा म पधु नीसा नी धप ऽ तुम्हाऽ ऽs रा ना - आ - गाड S x ० नी - - सा रे ग य हास ३ म -गम ध प मग च है sxs ss प्ण मुरा s र क्या S S तानके साथ x २ . ३ प - - - -नी सा सारे सारे/नी सा नी ध मयी s ज सु। म ति के 5 hd क र x ३ पम धपनीध सांनी र सा नी धपम गम x म - प - . ले 5 x २ प - - ३ सा रे सा रे नी सा नी ध सा Sघा S अS त र x ३ 1ग रे ग - रे सा रे - सा नी ना -1नी धनी -1 १४५ स्वरलिपि पुन करेंगी गढ-अवरोध, लेंगी हम लेंगी प्रतिशोध, सुन तूरान। सुन ईरान। रमणी गण, करता है हद प्रण, उडे निशान ! बजे विषाण। मान-रहित जीवनको धिक है, भूल न जाना इसे कभी। हम ईरानी वीर नारिया, चलो, चले हम वहीं सभी । x २ २ . नि - - -- - ३ x सा नि ध प माग s slat 5 ३ रे सानि नारि चाs र x . x २ - - २ ३ सा म ग म ग म प ध नि सा नि धप च लोड चलें । ह म व ही s सभी S S S . x २ पनि नि ३ २ ३ नि ध नि ध नि सा रे सा नि सा - रे णार S ग तार s में 5 खूS x २ ३ XF २ पनि नि घ निधी सा नि ध प म ग रे or s युs ri sos s प अभी s SS म गायन शिक्षक- 24 Lates - TAN satastLLNA दाहिनी तरफसे, सीताराम नारायण मुडले, विनायर देशव चौघले, नरहरि विनायक गोगले विष्णु दत्तात्रय पागनीस १४५ स्वरलिपि पुन करेंगी गढ-अवरोध, लेंगी हम लेंगी प्रतिशोध, सुन तूरान! सुन ईरान। रमणी गण, करता है हद प्रण; उडे निशान ! बजे विषाण! मान-रहित जीवनको धिक है, भूल-न जाना इसे कभी। हम ईरानी वीर नारियाँ, चलो, चले हम वहीं सभी॥ . x x २ ३ ० नि - - २ ३ म ग रे सा नि र नारि याँs सां नि ध प म ग s नी 5वीs . x ३ x ३ . - - - २ २ सा म ग म ग म प ध नि सा नि ध प च रोड चाल S है म व हो । सभी S S S ३ २ ० a ax - - (EIN ३ x २ नि नि ध नि ध नि सा रे सा नि सा- s गेंs खूड घ णार ६ ग र x . x पनि नि न ही 5 यु २ ३ नि ध नि धनि सा नि ध प म ग रे। SS द्ध नि s| शेss प अभी s गायन शिक्षक- 1- . " 4 - । A " ३ । १ " 3 -~- की तर -T-1घनि सा . भ A . म 12 म प घ पा म 44 CAL स्वरलिपि ० अरax - - २ नि नि नि लें s गीह म x २ ध नि सा रेसा सा sगी s प्र ति| शो ss घ - 3633 २ 0 . - - - - २ सो गरें सारे रें नि सा नि ध नि नि सुनहरा SS न। सु न ई sरा SSन . २ ३ x २ |ग प ध नि ध नि सा सा रे सा नि ध नि सा सा म णी ग ण क र ता 5 है se 8 प्र X † w ण ० . ३ x २ ३ - - x सांग उदेड निशा सारे ₹ - S S ण व जे s विपा SS ण २ - x २ ३ x ३ सा सासा सा सां नि सा नि धप ध सा मा s न रहि त जी S1 न को ऽधि क है सा D . - - x २ ३ x २ ग म ग माप प ध नि सा निघाय ( मूल न जाना sइ से s कभीs S S vinod संवाद-सग्रह १४६ x . २ ३ x सा म ग म ग म प ध नि च लो S व २ सां नि धप ही 5 स/भी -- - नहीं समाप्त:-से' नत्र अयोजना उद्देशतक स्थाई की तरह अन्तरा X २ . x २ . - - प ग म प ध सा Sज वs में मे Sय ह उ त म त नु X ३ . ३ |प ध नि सा। म २ x २ प प ध ध नि प ध म लाक र में डालें s गी - - को s Sir र . ० x २ सा गरें नि २ नि नि ध प म - - ग) ग म प ध प ला S] तु 5 ल्य चम क क ज ल घ र x . . ३ x २ ० 1 सा नि रेसा रे सा सा ग म ग s चीs ऑसोमें च का SIभ र भ र x २ ३ x प ग प ध निधि कार5 गीग ८ वरो ss -- - पुन S ध स्वरलिपि २ x २ नि दो IRL ३ रिं सां (सा सा रिसा रिं सां सां नो । Min सा प म x नि - २ ३ १ निध में धनि रिं सां नि ध sध्य सबै S नो S तु म (साखी) ग ग - में - में ध - - सा रि नि सा हि S S S न आ S शा S - - - - - - ध ध त S s जो 5 चा s हो S मि 3 ट जा ध नि सा नि नि ध घ नि सा ग - ग - s s S S S S S मा ई s - Eि 20 - सा सा - - - - मैं ध नि प्रे म न sमि से उ S S A2 सां - - S हा S S य 1 नोट-दोष सब अन्तरे और सापियाँ ऊपरकी तरहसे बजते हैं। पेज १०६ पर देखो।
संवाद-सग्रह १४८ राग-सोहनी, गजलकी धुन, तालरूपक स्थायी सा सा म 1 x ग ग - २ ३ में में में घसा का s) को 5 - सां २ ३ सा सांसा रो S फि शो हे क ३ ३ x नी - x धनि री सांनि नो घ म अन्तरा । ३ x में ध (सा सां सां रिसां सां। जो ऽ x सा ३ ३ सासारींनी सानि २ घनि - . आ s S त्रु S --- १५१ स्वरलिपि ។ ४ सा सारी - प ग री | सा सो नि निध है वि क S S च घा S x . । ४ ३ पनि निध प प ध म गा त वगु ण | सु जा S न x O X २ सां सां नि नि म पा S च प ग प री - मा ख ब - राग-पीलु खमाज, निताल, मात्रा १६ घन बंसी बजावत वनमाली।। देह गेहको नेह न राखत, नीर छीरकी सुधि विसरावत, बसी सुनि धनको ही धावत, है व्याकुल सब बजनारी ।। व०॥ चहक उठी कुजनमे चिरियों, लागी चलन वायु यहि विरियाँ, चटक उठी फूलनकी कलियाँ, खूब बनी है मतवारी ॥३०॥ चन्द्रकिरन जमनामे गेरत, राधा राधा बसी टेरत, राधा भौचक इत उत हेरत, कोयल कृक रही डारी । व०॥
संवाद-संग्रह १५० राग-यमन, एकताल (मध्यलय) स्थायी ४ Pex सा सानि नि। मैं o go प ३ प में नि ग S - क ह S धा S X ३ री निरि सा ते ४ x सा सारे रे नि ग गः ग | म म प ध ध्या S न x नि नि ₹ ₹ भ S तों S |सा ₹ सां नि ध प का S प्रा S ण S न अन्तरा x . प ३ सा सा ग प - २ घ प सां को 5 त्रा - सा दी S न न S ण S स्वरलिपि . नी xFF म s नी सा रे नी सा सा ग ग ग म प म ग रे नी सा जमना ss र त सा र . में च द्र ३ x ग - -1म रा राऽ घा 5 धा ss सी st s र ३ . MRI म प x. P)) )) 614 sts र त (A २ x s - ध प ग सा ग म ध प ग - नी सा धारा 5 धाय 5 सी sas र s रा ३ 4x (14 मध 5 धाव s s S s ལ བ धाम प ग म गम पप त उ hy - नी नी - s s संवाद-सग्रह दै व्याकुल निकसी सब वामा, तजि तजिके निज घरको कामा, देखन चली चतुर धनश्यामा, है कैसो घसीधारी॥ -- स्थाई नी सा व न प - - ३ प पमप ध प म ग s सी व जाss व त रे म गरे न मा ली घ s S अतरा नी सा रे नी सा नी सा ग म प म ग रे नी सा sह को ने s ह नारा 5 ख ता ग २ म प मग - ३ x ग रछी र की सु - - नी सा - S धि वि सरा S व त O x २ ३ प पप ध प ध म s सी सुनी 5 नको प ग म गम प प प s ही धाs व त व च ३ २ x नी धनी ध प म नी धप म ग रे सा नी सा है व्या s|पु ल ब नारी 5 ब - ज न स्वरलिपि ७ राग-भैरवी, ताल निताल, माना १६ फिर पावन करिये इस घरको जब आयेंगे आप यहाँ पर मन प्रमुदित होवेगे फिरसे अतरा जव आवेंगे आप अतिथी तन मन धनसे सेवा करिहें सदा उदार आप सजन है भारोह-सा रे ग म पध नी सा अवरोह--सा नी ध प म गरे सा स्थाई ३ - - सा रीसा नि सा र को 5 ३ x ध प म पाग - म प SR x २ प मारी सा सा - प र - ३ ग - - गे S/आ सा घ २ 4140. S घ आS x 41. ३ नी सा ग म प प प -प धुनी सा नीराध प ग म प्रम/दि त हो sss s गेs/फि र न संवाद-सग्रह १५६ स्थाई नि सा नि सा मा तो गि रि ध र गोपा S ल १ ग - ग ग सा] ग म सा को S रा S ई S car S S अंतरा । सा सा ग म प प मो जा n S के S सि र मु ट १ १ - - ग रे नि सा धुपम पण तित मे S रो S S 5 सो १ ។ . प प मप ध प म ग ग म श S च S ग दा S प S -० . १ 0 सा ग ग ग ग सा प ग सा सो ठ S ई S S . १ १ याकी लाई अतरेकी तरह स्वरलिपि . - प - ग गग म मग रिरि रिरिरि सा सा र त नौ s का s मैं व र ही ऽ है । S -सा/नि सा निध - S S निघ में गम घ नि सारं याध्या 5 न घ S - - - ग ग गम धनि सा रिरिसारि नि नि सा सां तावा sरे s नि नि ध ध में ध नि सा ध नि ध नि नि नि - सा हामा ध्र में में ग गम में ध ध म ग में गरि के इर्ण धा र य - - सा/नि सा निध s/हे मं ध नि सारि S S - - Sस सारे । राग-भैरवी ताल त्रिताल स्थाई 0 ३ x माप ध प मारि ग सा रिसा गो s वि दानाs धयों सा संवाद-सग्रह अंतरा . - - - ३ x २ ध घ ध ध मधु नी सा - सा सांरी सा घ आ s sगे s आ ड प अति थी 5 - ज . ३ x २ - - नी नी नी नी सा सा सारी ग सा री सा प ध त न म न ध न सेss से 5 वा sक रि S x . ३ पाप २ -नी साध प प -धु - Fitter दा s उादा S ₹ Sआ5 प न स ।ज x राग-सोहनी, ताल निताल हे हरि अब न विलव करो। भारत नौका भंवर पडी है उसकी ध्यान धरो ॥ ठेहरि ॥ कर कुटिल केवट मतवारे, लगने देते नहीं किनारे कर्णधवर बन शीघ्र हमारे सारे दुख हरो। हे हरि०॥ स्थायी नि सा नि ध म ग ग ग म ध नि सारि ह रिक्ष व न विल करो । - सा S वा S S
यह एक पौराणिक सुदर कथा है। पद पद पर संकट और उसमें सती-
धार्मिक और पवित्र जीवनकी समुज्ज्वल मूर्ति, सेवाकी मूर्तिमती प्रतिमा,
रहासमें ग्रहण कराये हुए बह्मचर्य व्रतको भी यावज्जीपन पालनेवाली पुराण
सिद्ध इस देवी के चरित्रका पाठ जिसने नहीं किया हो उसे तत्कालती कर
लेना चाहिए । सुदर चित्रोंसे सुशोभित । मूल्य चौदह आने ।
वीरकी परम प्राविका चदनवालाके पवित्र चरित है। जैन पुगणाही सुप्रसिद्ध
सतियोंके चरित्र बहुत सुदरताके साथ लिखे गये।मनोदर चिों
ग्रंयभंडार हीरागाग, गिरगॉर वबई द्वारा प्रकाशित.
अपनी वहिन, बेटियों और स्त्रियोंको भेटमें देने,
पढाने लायक उच्च, पवित्र और शिक्षाप्रद पुस्तके।
-
सुरसुंदरी या सात कौड़ी में राज्य ।
(लेसक-श्रीयुत कृष्णलाल वर्मा।)
।
वकी रक्षाका दर्शन । पतिकी निर्दयता और निर्दयको सतीकी क्षमा । बडा ही
दिययाही और वरुण चित्र है। प्रत्येक स्त्री और वालिफासे, प्रतिदिन इस
चरित्रका पाठ कराना चाहिए । सुदर चित्रोंसे सुशोभित । दुमरी बार छपी है।
मूल्य मात्र पाँच आने।
अनन्तमती।
(लेखक-श्रीयुत कृष्णलाल वर्मा।)
a
स्त्रीरत्न।
(लेखक-श्रीयुत कृष्णलाल वर्मा ।
इसमें भगगन अपमदेवकी पुत्रियों बाहरी और सुदरी एव भगवान मा-
सुशोमित । मुल्य छ आने मार।
संवाद-सपर १६० अन्तरा ध म प धु ३ X प पाप प ध ध ध प ग म के s|तु म हि त का 5 री 5 S न । %3D नि सा प प ध प ग म गम धनि सांग रिसानीध पम गरि सान मोs से sक छु न सर्यो 5s ss ssss ssssss नोट -दूसरे अन्तरे ऊपरकी तरह से बजते हैं । पूरा गायन पेज १२२ में देखो -भैरवी ताल त्रिताल राग- . २० - x नी नी सा साग म माप टा s मुरास्व प - ध माप . है S S रा - ३ प पाप र वी • FIR नी X प रिसा - - ध प म S टेs ह S S - . प प धनी सा प ध प म प म प म Sqया 5 मे वा श के-5 । गा s X २ m - रि साता रि ग म |ग म, ग रिसा नि सा लो नोट-दुसरी लाइनें इसी तरह बजेंगी। पूरागायन पेज ९४ में देखो ।, ग दे5-ख, S S S 7.
1 भी लौर उमझे हायों कैद हो जाने पर भी उमसे लम नहीं करती है और उसको जपने पिता के साथ सुरत करने लिए अपनी गोन भाषाहारा, - रोनासीनता द्वारा विवश करती है । वटी ही बहुत कया रे। (७)त्याग इसमें बताया गया है कि, स्त्री अपने पतिको प्रसन्न करने के लिए कर्नय स्मशकर अपने प्राण तक दे सकती है। अनेक बहुरगी और एक रंगी चित्रोंसे सुशैमित पुस्तकमा मूल्य माना -21) गुनी अक्षरोवारी वाइडिगके) रु. सममिद्ध विधान दिदी प्रथरत्नाकर कार्यालयके मालिक श्रीयत गाथू- उमजी प्रेमी लिसते है- "गृहिणी- गौरवकी माता गप बढी ही सदर और शिक्षाप्रद हे सानाहीम कोगलता, कमनीयता और त्यागशीलनाक मनोमुग्धार चित्र चिरित किये गये है। इन्हें देखकर आँस जुड़ा जानी हैं और प्रदय पवित्र 'प्रेमकी भावनासे माना प्राय प्रयक कहानीमें ऐगे प्रसग आये है जिन्हें पढ़कर आँसुआमा रोकना नमभन हो जाता है । पढी लिखी बहिन- बेटियोंको देने के लिए इसमे अच्छी भेट और क्या होगी? जो स्रियाँ पढ़ नहीं सकती हैं उन्हें पढ़कर ये कहानियां सुनानी चाहिए। इससे उनके हृदयपरित्र और उनत धनेंगे । पनि कहानियोका ऐसा सुदर सग्रह प्रकाशित करके जापने नियोपयोगी साहित्यके मनोरजक अशकी बात अच्छी पूर्ति की है।
- । गृहिणीगीमा (म-श्रीयुत कृष्णलाल वर्मा।) रसम नारी नपिनका गौग्यापित करने वाली गात गा है (१) गृहिणीगौरव-दम यताया गया है, पतिकी वीरता, पतिकी गाता चार पति के गोमती मीका गान्त स्त्रीका गौरव इसम नई कि वह राष्ट्रकारकी या राजारी पुत्री ने अपने आपको बडी माने और पति को तुम दृटिंग टेसे। (२)प्राणयिनिमय-~-इसमें बताया गया है कि,गरीजीम भी पतिपत्नी से गुससे रा सस्ते गरी नी अपने पतिशमके प्रभारी राजपुत्र मकको मजा दिला समती रे मोर एक नारीको विमानेसे बचानमें अपने प्राण दे सस्ती है । इतनी करण क्या है कि, पटने पदो आँस रोके नहीं रुकते। (3) मेवाका अधिकार दाम बताया गया है कि, पुरूष किस तरह एक नारी पत पाला कर सकता है । सी किस तरह विमुख स्वामी- . को भी सेवा परके अपनी ओर जापित कर सकती है। पतिकी अमानीती होने पर भी किस तरह पतिमी निदा करनेवाका मीठा तिरस्कार करती है और अपने पाचरण द्वारा यह सताती है कि, पको धर्म पहनत नेमा, मन वचकाय पतिपद प्रेमा । (४) वीणा-इसमें बताया गया है कि, आज कलके पढ़े लिखे पुरुष मी कसे धनलोलुप होते हैं। एक सुशिक्षिता, कन्या किस भाति अपने पिताको कर्जकी बदनामीत बचाने के लिए अपना सब कुछ देकर आप दाने- दानेकी मोहताज हो जाता है । फिसतरह अपने गुणोंसे फिसे, घरको मुयवस्थित करके सुसी होती है। (५) सतीतीर्थ-इसमें बताया गया है कि एक सरल। कृषक बालिका क्सि भाति एक टाकूकोभी सन्मार्ग पर ला सकती है। (६) अरुणा-इसमें बताया गया है कि एक-स्त्री अपने कर्तव्यके लिए अपने पिता की मान मर्यादाको बचाने के लिए, एक पुरुषसे प्रेम करती * , । , . . (७) सर्वोदय। -म० गाँधी। कानपुरकी 'मा' लिसती है " अर्थशास्त्र और सार्वजनिक सुसके सबध सुविर यात अग्रजी लेसक स्वर्गीय जॉन रस्किनके विचार अत्यत सुदर और दिव्य है । इस पुस्तकमें वे ही विचार महात्मा गाँधीकी लेखी द्वारा व्यक्त क्येि गये है ।xxxxx रोटीवाद और भौतिक सुखपादकी अति रोक्ने के लिए, उनके कृष्णपक्षको जानने के लिए व उनके मादक और पतनकारी फदमे बचनेके लिए सर्वोदयके विचार विशेष महत्व के हैं। N मृ. चार आने। गॉपीजीका बयान या सत्याग्रह मीमांसा । आवरण पृष्ठपर महात्माजीका फोटो । मू०॥) छपाई सफाई सदर । प्रमाने लिसा है -“ पाठकोंको मालूम होगा कि, पजाब-इत्याकाड सबधी जॉच करनेके लिए हटर कमेटी नामकी एक कमेटी बैठी थी । उस कमेटीमें महात्माजीने लिखित इकरार दिया था, वहीं इस पुस्तिका रूपमें प्रकाशित किया गया है । गॉगीजीका यह बयान एक अत्यत महत्वपूर्ण वक्तव्य है। इसीमें महात्माजीने अपने सिद्धान्तोका मडन और सत्याग्रहपर किये जानेवाले आक्षेपोंका सडन अपनी स्वाभाविक योग्यता और असावारण उत्तमतासे किया है । प्रकाशकोंने इस बयानको हिन्दीमें प्रकाशितकर हिन्दीकी अच्छी सेना की है।" तीन रत्न ले--महात्मा गाँधी। इसमें तीन कथाएँ है । (१) मूसराज (२.) मनुष्य कितनी । जनीनका मालिक हो सकता है ? (३) जीवनडोर । ससारके प्रसिद्ध याएँ लिसी है । उहीमेंसे जो क्याएं सर्वोत्कृष्ट . 1 - . । (६) मृल पुस्तके कठिन उर्दू और अप्रचारित हिन्दी शटोंके अर्थ पाटी- कामे दिये है। मौलाना साहबने इस कवितामें विशेषकर हिंदु विधवाओंके इसोका वर्णन किया है । मनाजातका विषय करुणा प्रधान है । आरमके १४ पृष्ठोंमें विधा शोकभरे शब्दों में ईश्वरकी लीलाका वर्णन करती है, फिर शेष अशम वह अपनी राममहानी सुनाती है । 'भाव और रसकी प्रधानताके सिवा, इस कवितामें अलकार, प्रकृति वर्णन, मनोहर पदयोजना आदि अनेक चमत्कार है, 1 जिनका आनद पुस्तकको आयोपान्त पढनेहींसे प्राप्त हो सकता है । भाव और भाषा दोनोंके विचारसे 'विधवाप्रार्थना' एक आदर्श-रचनाका आदर्श है । म्० पाँच आने । कविता घटी ही सरस, स्वाभाविक और हृदयद्राविणी है । पुस्तकको पढकर कठोर हृदय भी विधवाओंकी दीन दशाओंपर बिना दो आंसू बहाये नहीं रह सकता । 'पुस्तक आदिसे अत तक प्रसाद गुणसे परिप्लानित है प्रत्येक सहदय पाठकको एक बार यह पुस्तक अवश्य पढनी चाहिए।" प्रभा ( कानपुर) जनरामायण। (१०-श्रीयुत कृष्णलाल वर्मा।) इसम राम, लक्ष्मण, सीता और रावणके मुख्यतासे और हनुमान, अनना-. सुन्दरी, पवनजय तथा वालीके 'गोणरूपसे चरित्र है । प्रसगवश और भी कई कथाएँ इसमें आगई है । वर्णन करनेका ढग बडा ही सुन्दर हे । हिन्दु रामायणसे यह बिलकल मिन्न है । इसके पढनेसे पाठकोंको यह भी ज्ञात हो जाता है, कि दीकी ओरसे युद्ध करनेवाले 'वानर' पशु नहीं थे बल्कि ये विद्याधर थे। 'वानर ' एक वशका नाम था। इसी तरह रावण आदि ‘राक्षस देत्य नहीं थे बल्कि 'राक्षस' एक वशका नाम था। जैनाचार्य, श्रीहेमचद्राचार्य रचित विपष्टिशलाका पुरुष ,चरित्रके सातवें पर्वका यह अनुवाद है । छपाई : सफाई बाढ़या । पक्की बाइडिंग ! ऊपर सुनहरी अक्षर मु०४)रु . . - - " 1 -- 4
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