Hindi Sahataya Samalayan

Biraha Nikabhad

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बिरहा।
नायिकाभेद
बाबू रामकृष्णवर्मा
उपनाम बलबीर कृत।
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काशी।
भारतजीवन प्रेस में मुद्रित हुआ।
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सन् १९०० ई.।
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प्रथम बार १०..]
[ मूल्य ।

भूमिका। इस बिरहे छन्द की चाल हमारे इस पश्चिमोत्तर प्रान्त में प्रायः छोटी जाती अर्थात् अहीर कहार और गँडेरियों में बहुत है, परन्त जैसा यह छन्द रोचक है वैसो साधु क- बिता इसमें नहीं देखी जाती। यदि इस छन्द में भी उत्तम कविता का प्रचार होता तो इन जातियों में भी उच्च जाति को नाई' नायक नायिका और अलङ्कार इत्यादि का ज्ञान भली प्रकार होजाता । प्रायः इन जातियों में पढ़ने लिखने को चाल बहुत कम है। इन बिरहों के छापने से एक तात्पर्य हमारा यह भी है कि इन लोगों में पढ़न लिखने की रुचि हो जावै, हमे विखास है कि बिरहों की उत्तमता से कदा- चित् ऐसा ख्याल इन लोगों को हो "पढ़ ले मर्दे, देव- नागरी में तो बल बिरवा का बिरहा छपन्न हौ आठ दिन में त देवनागरी आवैला"। इस छन्द में प्रत्येक चरण में दो जगह यति होती है, प्रथम यति १६ अक्षर पर और दूसरो दस अक्षर पर । अन्त में एक गुरू और नाई होते हैं। दोनों चरणों के प्रथम पद में दो अक्षर बढ़ भी सकते हैं अर्थात् १८ अक्षर और १० अक्षर का भौ चरण होता है जैसे बिरहा नं. १० और बिरहा नं. २४, कहीं कहीं मौड़ के साथ एक अक्षर खोंच लेने से प्रत्यक्ष लघु दोहे की नायिकाभेद, बिरहारागमें। बाबू रामकृष्णवी उपनाम बलबीर कृत। आलम्बन विभाव। जिसके आश्रय से रस का ठहराव होता है, उसको आ- लम्बनविभाव कहते हैं, जैसे नायिका और नायक ॥ १ ॥ लजिया दबावै मनमथवा सतावै मोसे, एको छन रहलो न जाय । लखि बलबिरवा जमुनवा के तिरवाँ री हियरा क धिरवा नसाय ॥ १॥ नायिका। सुन्दर और जवान स्त्री को नायिका कहते हैं, इनके कर्मानुसार ३ भेद हैं, स्वकीया, परकीया और सामान्या । और उमर के अनुसार भी ३ भेद हैं, मुग्धा, मध्या, और प्रौढ़ा ॥ २ ॥ रुपवा के भरवा त गोरी से पयरवा रे सोझवा धरल नाहीं जाय ।

( ५ ) आज बरसाइत रगरवा मचावो जिन नहकै झगरवा उठाय। अपनों ही बरवा मैं पूजौं बलबिरवा पीपरवा * पूजन तृही जाय ॥६॥ मुग्धा। जिस स्त्री को यौबन उभड़ आया हो परन्तु उसे काम की इच्छा न हो उसे मुग्धा कहते हैं, इनके दो भेद हैं, अज्ञातयौबना और ज्ञातयौबना । जिस मुग्धा को अपने ज- वानी आने की खबर नहीं है, उसे अज्ञातयोबना कहते हैं, और जिस मुग्धा को अपनी जवानी का ज्ञान है, उसे ज्ञात. यौबना कहते हैं इनके दो भेद हैं,नवोढ़ा और विश्रब्धनवोढ़ा। अज्ञातयौवना का उदाहरण ! तैहूं न बतावै गोड्यां झूरे भरमावै काहे सवती क मुहवां नराज । ॐ पीपर का वृक्ष अथवा पराया पी। बरसाइत के दिन बर (वृक्ष) की पूजा होती है। बर से तात्पर्य बट वृक्ष का भी है और अपना बर अर्थात् अपने पति का भी है।

( ७ ) उठलैं जोबनवां नैहर के भवनवां गवनवां भयल दिनचार। भावै नाहीं गोरिया के गुड़िया क खेल नीक लागै बलबिरवा भतार ॥११॥ फिरली रोहनियाँ जोबनवाँ क पनियां जवनियां चढ़ल घनघोर । रोवैली सवतिया निरखि कैपिरितिया बढ़त बलबिरवा क जोर ॥ १२॥ तोहरी नजरिया री प्राऽनपिअरिया । मछरिया कहलै कबि लोग। तोहरा जोबनवां त बेलवा क फल बलबिरवा के हथवाही जोग ॥ १३॥ नवोढा । जो नायिका लाज और भय से अपने पति से नहीं मिला चाहती उसे नवोढ़ा कहते हैं, जैसे:- हथवा पकरि दुओ बहियां जकरि पिय सेजिया बैठावै जस लाग।

( १ ) लजिया की बतिया में कैसे कहों ए भौजी जे मोरे बूते कहलो न जाय । पर के फगुनवा की सिअली चोलियवा में असौं न जोबनवाँ अमाय ॥ १७॥ प्रौढ़ा। जो नायिका बिहार में अत्यन्त चतुर और पूरी होती है, उसे प्रौढ़ा कहते हैं, प्रौढ़ा के २ भेद हैं, रतिप्रीता और आनन्दसंमोहिता ॥ १४ ॥ छतियां लगति रस बतियां पगति सारी रतियां जगति बिच केल । मैया भैया न सुहावै मनमथवा सतावै मन भावै बलबिरवा क खेल ॥१८॥ रतिप्रीता। जो नायिका नायक के पाने पर यह मनावै कि भोर न हो और उसका नायक चला न जावे, उसे रंतिप्रीता क- इते हैं ॥ १५ ॥ दैया दैया कैके बलबिरवा मैं पायो गुइयाँ सेजिया सुवार्यों सुखधाम ।

( ११ ) अधीरा। सोनवा क पनवा कमोतिया क हिरवा क काहे क बनल यह माल ? । गरवा से हरवा उतारो बलबीर तनी मोहूँको दिखाओ मोरे लाल ॥ २२ ॥ इसी प्रकार आदर सहित प्रत्यक्ष कोप करनेवाली स्त्री को अधीरा कहते हैं, यथा भूरे भूरे दोषवालगावै बलबीर तोहें लबरी सजनियांऽ मोर । रतियां के आवे तौन चोरवा कहावें तुम सहुआ जे आये मोरे भोर ॥ २३ ॥ इसी प्रकार कुछ छिपा और कुछ प्रगट तथा आंसू स- हित कोप प्रकाश करनेवाली स्त्री को धीराधीरा कहते हैं। मुँह पिअरी परल दुओ अँखिया भरल तोरा दुखवा न होला अनुमान । मोहें दुखवा कवन मोरे सुख के भवन जहाँ तुमसे रसीले मोरे प्रान ॥ २४ ॥ धीराधीरा।

( १३ ) बगरै की कोठरी मे सूतब न दैया उहाँ झपटला मुसवा बिलार ॥ २६ ॥ बर्तमान गुप्ता। मत मनवाँ में अनवाँ समुझ कुछ गुइयां काहे सुघली हौँ मुहवाँ अहीर । मुँह सूंघे के करनवा क इतनै बखनवा मखनवा खेलेस् बलबीर ॥ २७॥ भरली गगरिया उठौली जैसे गोड्यां तैसे बिछलल गाड़वा हमार । जो पै बलबिरवा न बहियां धरत तो पै बही थी जमुनवां के धार ॥२८॥ बचनविदग्धा। बोलचाल को चतुराई से जो स्त्री पराये पुरुष से अपने प्रीति का काम निकाले उसे बचनबिटग्धा कहते हैं, जैसे:- s सखी न सहेली मैं तो पडिल्यूं अकेली मोरी, सोने सी इजतिया बचाव ।

(१५) कुइयां आधा मरद से बुढ़वा बेराम । ससुर भसुर छोड़ बचलें केतने मोहैं नहकै करलें बदनाम * ॥ ३२ ॥ अनुशयाना । जिस स्त्री का पर पुरुष मिलने का संकेत स्थान नष्ट हो जाये उसे अनुशयाना कहते हैं, जैसे- गुइयाँ उखियौ उपार ई किसनवन के तनिको न त । कवनो पुरनवा न बेदवा बखा. अर- हरिया क काटौ जनि खेत + ॥ ३३ ॥ सनहू उजारें धेही पुरुष * इस संसार में आधो पृथ्वी है जिसका आधा भाग नदी ताल इत्यादि से रुका है, जो बस्ती है उसमें भी प्रा. हैं आधो स्त्रियां, उन आधे पुरुषों में भी आधे लड़के बूढ़े और बीमार हैं, तिस में भी ससुर भसुर को छोड़ कर बाकी बचही कितने गये जो मुझे कुलटा कुलटा कह कर नाहक बदनाम करते हैं। + जैसे पोपल और तुलसौके वृक्ष काटने की मनाही है वैसे ही सन और अर- हरइत्यादि के काटने को मनाहो क्यों नहीं को ?

( १७ ) हिरवा क हरवा सु गरवा क देके बल- बिरवा चलल परदेस ॥ ३६॥ अन्य सुरतदुःखिता। अपने नायक के सुरत के चिन्ह को अन्य स्त्री पर देख- कर खेद करनेवाली स्त्री को अन्यसंभोगदुःखिता कहते हैं यथाऽ- प्यारे को बुलावन पठाई तोकों गुइयां जिन हाँफे री सुनावै मोहि हाल । परम रँगीली मोरी सजनी रसीली कैसे पायो बलबिरवा रसाल * ॥३७॥ गर्विता। जो नायिका अपने नायक के प्रेम अथवा अपने रूप का गर्व करै उसे क्रम से प्रेमगर्विता वो रूपगर्विता कहते हैं। यथा:- * नायक को रसाल और अपनी सखी को जो रसौली कहा इस्से साभिप्राय विशेषण है और सखौ को रंगोली कहने से भी वही अभिप्राय है।

(१९) रजवा करत मोर रजवा मथुरवा में हम सब भइलीं फकीर । हमरी पिरितिया निबाहे कैसे ऊधो बलबिरवा की जतिया अहीर ॥४१॥ खण्डिता। दूसरी स्त्री के संभोग के चिन्हं सहित जिसका नायक प्रात: काल उसके घर आवे और वह कोप करै तौ ऐसी स्त्रो को खण्डिता कहते हैं । यथा:- ओठवा के छोरवा कजरवा कपोलवा पै पिकवा की परली लकीर । तोरी करनी समुझ के करेजवा फटत दरपनवां निहारो बलवीर ॥ ४२ ॥ तोरी लटपट पगिया औ डगमग डगिया स अगिया लगावै मोरे जान। छाओ छाओ वही गेहिया लगाओ

( २१ )
इतनै कह्यो मैं हँस रतियाँ कहां ते
बस आवत अलसभरे भोर ॥ ४६॥
विप्रलब्धा ।
संकेत स्थान में अपने प्रिय को न पाकर जो स्त्रीब्याकु-
ल होतो है उसे बिप्रलब्धा कहते हैं। यथा:-
तन तपवा तयल, मन दपवा दयल,
धन-मुँहवा गयल मुग्झाय ।
हिय सधवा हटल जासों जियरा पटल
बलबिरवा भेटल नाहीं हाय ॥४७॥
उत्कण्ठिता।
नायक के संकेत स्थान पर न पाने के कारण जो ना-
यिका बितर्क करै उसे उत्कण्ठिता कहते हैं। यथाः-
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डगरा के लोगवा से झगरा भयल
कीधों बगरा के लोगवा नराज ।
सगरा रयन मोहि तकतै बितल बल-
बिरवा न आयल केहि काज ॥४८॥

( २३ )
गोरी तोहैं कोरवा में अपने वैसौले
होला प्यारो बलबिरवा निहाल ॥५१॥
अभिसारिका।
प्रिय से मिलने के निमित यो नायिका अपने नायक
के पास जावे अथवा उमे अपने पास बुलावे उसे अभिसा.
रिका कहते हैं। यथाः-
चल चल गोइयाँ तोरी बल बल
जाऊं होला पल पल मनुआ उचाट ।
फूलन-सेजरिया कोठरिया बिछौलै
बलबिरवा जोहला तोरी बाट ॥५२ ।।
प्रवत्स्यतपतिका ।
प्रिय के बिदेस जाने का हाल सुन कर जो नायिका व्या-
कुल हो उसे प्रवत्सातपतिका कहते हैं। यथा:-
दुखवा क बतिया नगीचचो न आवै
गुइयां हँसी खुसी रहला हमेस ।
बजुआ सरकि कर-कँगना भयल सुनि
प्यारे क गवनवां बिदेस ॥ ५३॥

( २५ ) तोरी सी पियरिया के गरवा लगावै धन प्यारे बलबिरवा क भाग ॥ ५५ ॥ रूपका गोरा गोरा रंग हौ भभुतवा रमौले मानो सेली लाल ललिया लकीर । रुपवा क भिखिया पलकिया में मांगेंबल- बिरवा की अखियाँ फकीर ॥ ५६ ॥ झप झप झपकैली सोई मानो गो- रियारी झुक झुक करैली सलाम । (तोरे) गोड़वा क धुरवा बरौनियां से पोछे बलविरवा क अँखिया गुलाम ॥५७॥ दूतीवचन । जनि घबरावै हबरावै मोरी गुड्या दैया काहे होली इतनी अधीर ।

उपन्यास।
अघोरपन्थी
पानन्दसुन्दरी प्रथमभाग
अमलात्तान्तमाला
३)
8)
भकवर उपन्यास प्रथम भाग
आर्य चरितामृत
ईलाउपन्यास
ईखरीलीला
उथेलो
कमलिनी उपन्यास
कपटी मित्र अभो छपा
कुसुमलता चारो भाग
कटोराभरखून।
कुलटा उपन्यास
चन्द्रकला
चन्द्रप्रभापूर्णप्रकाश
चित्तौरचातकी
चन्द्रकान्ता चारो भाग
चन्द्रकान्तासन्तति पन्दरह हिस्सों में
1)
1
)
॥
1)
७॥)

Biraha Nikabhad

Title
Biraha Nikabhad
File name
Biraha Nikabhad
Text
OCR done
Citation
1900
Publisher
Kashi
Language
Sanskrit
Pages
15
Library
Hindi Sahataya Samalayan
Classification
Literature
DLI number
486406
Barcode
5990010113688.00
Scanning centre
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