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Thirthkar Bhagwan Mahaveer

Jain,virendra Prasad · 2010/06

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प्रकाशक:
मौखल विश्व जैन मिशन,
अलीगज (एटा)
उ०प्र०
जिओ और जीने दो।
अहिंसा परमोधर्मः यतो धर्मस्ततो जया
निबलों को मत त्रास दो।
मुद्रक:-
महावीर मुद्रणालय,
अलीगज (एटा)
उ०प्र०

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आभार-मदर्शन जैन साहित्यकारी ने भारतीय साहित्य के सभी अगो-को अपनी मूल्यमयी खानो द्वारा गमलकृत किया है । तामिल, कन्नड, अपभ्रश प्रादि भापात्रो के श्रादि माहित्य निर्माना निस्सन्देह जैन साहित्यकार ही है। गंम्वृत भाषाम 'चतुविशति संधान' मदृश अद्भुत चमत्कारक रचनायो यो भी जैनो ने रचा है। हिन्दी भाषा साहित्य के आदिकाल में जनो ने ही अपनी रचनामो से उसको मूल्यमई बनाया है । अब भी जैन समाज ने माहित्य जगत को पैरिस्टर चम्पतराय जी जैन, श्री जैनेन्द्र जी प्रभृति उन्लेखनीय लब्ध प्रतिष्ठिन साहित्यकार प्रदान कियेहै, किन्तु इतना होते हुये भी एक बात जो पढ़कती है वह यह है कि जैनो की पुरातन साहित्य परम्परा का पहले जैसा समुज्रल और प्रभावक रूप अव देखने को नहीं मिलता । जैन कथावार्ता को लेकर प्रायुनिक शैली में रचनामो का प्राय अभाव ही है । उमपर जैन महापुरुषों के प्रादर्श जीवन और चोधप्रद शिक्षामो की परिचायत्मक नई रचनायें तो मिलती ही नहीं । आज हिन्दी भाषा को भारत की राष्ट्र भापा होने का गौरव प्राप्त है और उसमें एक दो अजैन साहित्यकारो ने जैनधर्म के अन्तिम तीर्थधर-भ० महावीर के पवित्र जीवन को काव्य बद्ध करने का सदप्रयास भी किया, परन्तु जैन सिद्धान्त पौर जन माहित्य का गम्भीर और गहन परिचय न होने के कारण उसका ठीक निर्वाह वह न कर सके । इस परिस्थिति में प्र. वि. जैन 'मिशन ने इस प्रकार के साहित्य के सृजन की आवश्यकता का अनुभव करके हिन्दी भाषा में 'पातिक जैन काव्य ग्रन्थमाला' नामक नई शैली की पुस्तकमाला का प्रारम्भ किया है, जिसमें अभी तक दो रचनायें प्रकाशित की जा चुकी है। प्रस्तुत रचना उसका तीसरापुप्प है।

सीथंकर भ० महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं है और नहीं ही जैनधर्म हिंसक यज्ञ परम्परा के विरोध में उद्भूत हुआ है। यह दोनों ही मान्यतायें भ्रान्त और निराधार हैं । इस कल्पकालमें जैनधर्म की पुनर्स्थापना प्रथम तीर्थङ्कर ऋषभदेव ने उस प्राचीन युग में की थी, जब अन्तिम मनु नाभिराय इस ससार को सुशोभित कर रहे थे। उनके पश्चात् कालान्तर से २३ तीर्थंकर और हुए, जिनमें मर्व अन्तिम भगवान महावीर थे। उन्होने अपने समय की आवश्यकताओं को लक्ष्य करके जैनधर्म का पुनरोद्धार किया था। उन्ही के प्रवचन और आदर्श लोक के लिए विशेष उपकारी है । यद्यपि उनके दो तीन जीवन चरित्र हिन्दी गद्य में प्रकाशित हो चुके हैं, परन्तु हिन्दी पद्य में एक प्रमाणिक काव्य का अभाव खटकता था। चि. वीरेन्द्र प्रसाद जैन, बी० ए०, सा० २०, साहित्यालङ्कार ने प्रस्तुत काव्य को रेच कर उस प्रभाव को पूर्ति का सराहनीय प्रयास किया है । जिनेन्द्र के गुण अथाह गम्भीर हैं । उनका ठीक निर्वाह मानव बुद्धि से परे की वस्तु है । फिर भी उसके परिशीलनसे जो भावोमें निर्मलता आती है उसके फलस्वरूप जो भी साहित्यप्रसून प्रस्फुटित हो वे सुन्दर और सुखद ही होते हैं । अतः प्रस्तुत रचना स्वागतार्ह है । सौभाग्यवश इसका प्रकाशन भी दानवीर श्रीमान् साहु शान्तिप्रसाद जी जैन की उदारता से सुगम साध्य हो गया है । उनकी ममदार चित्तवृत्ति मिशन के कार्यों के प्रति प्राकृष्ट हुई और उन्होने मिशन को एक हजार रुपया प्रदान किया । उम निधि का उपयोग इस प्रकाशन में किया गया है, जिसके लिए मिशन उनका आभारी है। इस प्रकार प्रस्तत काव्य सभी मिशन सदस्यो और विद्वानो को भेंट रूप में प्राप्त हो रहा है । कठिनाई से सौ-दोमो प्रतियां ही शेप बचेंगी जिनको जनता पा सकेगी। भविष्य में मिशन अपनी साहित्यनिर्माण योजना को श्रीमान् और धीमान् सहयोगियों की समुदार सहकारिता के बल पर ही सम्पन्न करने की माशा रखता है । विश्वास है, मिशन को पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा। विनीत- - अलीगज [एटा] MARATE - १८-४-५६ - श्रानरेरी संचालक अ. विश्व जैन मिशन

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श्रीमान् साहू शान्ति प्रसाद जी जैन, बी० ए०
कलकता
(आपके ही आर्थिक सहयोग से प्रस्तुत पुस्तक प्रकाशित
हो रही है । एतदर्थ धन्यवाद ।)

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प्रस्तृत रचना महाकाव्य है अथवा खण्डकाव्य है या क्या ?
और मेरा कतई लक्ष्य नहीं है और न इससे मुझे कुछ सरोकार ही है। यह
जो कुछ भी है मेरे माराध्य के प्रति मेरा हार्दिक भक्तिभावयुत श्रद्धाय है।
तीर्थकर गुणानुवाद वडा ही विशद् है तथा वर्णनातीत होता है। कवि
'यूवर कहते है
'जिन गुन कथन अगम विस्तार, बुधि बल कोन लहे कवि पार ?'
इसी बात का प्रतिपादन कवि मनरगलाल जी के निम्न दोहे में भी
देखिए
'इन्द्र थके गणधर थके, अरु भुजगेश थकन्त ।
जश वरनत बिनवर तनो, नर किम पार लहत "
भक्त हरजमराय का भी यही मत है
'श्री जिन जग में को ऐसो बुधिवन्त जू,
जो तुम गुण वर्णन करू पावै अन्त जू ।
?
जव जिन गुण-गान की बात यह तव सर्वांग तीर्थकर जीवन को प्रकट
करना सम्भव कहाँ साक्षात्
केवली भगवान उसकों
अनुभव
में ले पाते
है, परन्तु वे उसको मुख से वर्णन करने में समर्थ नहीं होते। अपने प्रति-
द्वन्दी धर्मनेता म० बुद्ध से प्रशसित, इतिहास प्रसिद्ध राजा श्रेणिक विम्बसार
द्वारा पूजित नर-अमर-वन्ध तीर्थङ्कर भगवान महावीर के विषय में भी
.

- जैनाचार्य का मत यप अतिशयोक्ति पलवार युपत है तथापि उनके भवर्णनीय गुणो की पोर इगित करता है प्रसितगिरि सम स्पारकज्जल सिन्धुपाने, सुरतरुवर शाखा सेखनी पत्रमूर्ती । लिखति परि गृहीत्वा, शारदा सर्वकाल, तपपि तव गणानां धीर पार न याति ऐसी दशा मे मैने जो यह तीयंसर म महावीर का पावन जीवनचरित् इन्दबद्ध करने का प्रतिसाहस किया वह भी सूर्य को दीपक दिनाने के सदृश है । उसका पूर्ण होना तो असम्भव है। ययायं बात यह है कि भगवान महावीर का समग्र जीवन ही वह शतपत्रीय मादशं काध्य क्मत है जिनकी सुरभि-प्रसाद से अनुप्रेरित हो हर कोई अपनी अदाकृति पुसमाजनि मर्पित कर सकता है। मैं भी उस महामानव के असाधारण व्यक्तित्व से प्रापित हो, भक्तिवश कुछ रच सका तो इसमें माश्चयं ही क्या ? 'मतामर स्तोत्र' में प्राचार्य मानतुङ्ग ने कहा है: सोह तथापि तव भक्तिवशान्मुनीश, कर्तु स्तब विगतशक्तिरपि प्रवृत्त । ४ xxx अल्पभुत श्रुतवता परिहास धाम , स्वभक्तिरेव मुखरी कुरुते बलानमा । = पर परमसुधी श्री मानतुङ्ग जैसे मस्कृताचार्य पुङ्गव अपने को शक्ति हीन, मल्पज्ञ, विद्वानो के उपहासयोग्य बताते हैं तब भला मुझ जैसे हिन्दी साहित्य के बच्चे का ठिकाना ही क्या ? लेकिन वास्तव में यह भक्ति की शक्ति ही है जिसने मुझ से मेरे माराध्यके प्रति ११११ छद लिखवा लिए। इन छदो को लिखने में यद्यपि तीन साल का अन्तराल लगा पर यथार्थ में देखा जाय तो मैंने प्रतिसाल के दिसम्बर, जनवरी और इनके पास-पास के कुछ रिन-इसतरह लगभग ६ XXX XXX + अर्थ- समुद्र रूपी दावात में मेरु पर्वत जितनी रोशनाई डालकर ससार के सारे वृक्षों की कलमों से पृथ्वी रूपी कागज पर शारदा के सदैव लिखते रहने पर भी म महावीर के सम्पूर्ण गुणों का वर्णन नहीं हो सकता। * सो में शक्तिहीन धुति करू, भक्तिभाववश कछु नहि डकैं। मैं शठ सुधो-हंसन को धाम, 'मुझ तव भक्ति चुलावै राम । । मा मा में RTI पोर महीनों में पसरा पयलोकन ( मपवाररूप marar ruोपामो पपने जीपा २५ में यहन्त में इसे पूरा का दीपदी पर पादरे नोकरंजना मेमान युग में परमापिक पाग RE TRAI पर सभी देरी हुई। परफेस एक साल कीही frifर परितोष है कि मरा मे लिगने मे मिरा ही मेरा गपग में योग में मगा। चोर में पापा करता हरि जो पाानुगामी मा परामरा, उनके गमय गा भी भोपयोग होगा, रा पुगी पर भी प्रकार र गगा। TALणा की भी बात न मानिए । जब मैं हाईम्मान य 12 दिया गमग २९ मारा तुरमोदाम भी 'रामचरित् म.विभिनीगण गुणा र प्रिोष जी का प्रिपarrfan-TR"प गई गोगनगा नि व प्रधान प्रमणमस्थति में माr: म.पहार पर भी रिमी महत्वपूर्ण गाव्यान्प का गृजन ना FIRSTी एप TII भ० महावीर पर रप- र रोगास मानो पर गुगामा । श्रोतापो ने मत्र gariir-पोर मरी नापा भीगी। नापा यो मुझे प्रन्यानुरुप पगद नाममुग्प होगर गुण गार पन्छा नगा । याद गोगा परिदिप ५० एसीपी गई। यी00 के अध्ययन गे लिए गरे IIT में रक्षा । गीगमय भारतीय भान पीठ, पानी से प्राणिर्मा यान' महागाप्य का विज्ञापन पढ़ा। सभी माना? पे पुम्नगागर में गए पुमार भी मंगाई जाने वाली थी। मैंने उस पृन्ता मा नाम दिया पुस्तक पाई पोर सबसे पहले मेरे हाथ पाई। र उमाह में पढ़ना मुमगिया । पढ़ते पढ़ो उत्साह सिरोहित होने लगा मोर उगा “पाTोभ ने मेलिपा। बात यह कि अटल तपस्यी तोयंकर म० महातीर में गपित जो गाय हो उसका प्रधान रस पगार हो यह मनी नी नपुग ही हो मरता । पौली परम्परागत शास्त्रीय झोपर विपयानु- rप न हो सो यह अनुपयुवा ही मानी जायगी। दूसरे जैनधर्म के महान उनाया पं मुबारपिद मे हो जैन गिदान्तो के विपरीत सिद्धान्तो जैसे गष्टि गृतित्यवाद प्रादि का प्रतिपादन राना भी न्याय-संगत नही जान पड़ा। सामयिक पत्र-पत्रिकामी ये पालोचना स्तम्भ में इस बात की चर्चाएँ भी हई। फिरभी 'यममान' पदे ही परिश्रम से रची गई सस्कृत वर्णवृत्तों की अच्छी रचना है। ययाय बात यह कि भ० महावीर के जीवन को देखते हुए तो उनसे सम्वन्धित रचना के प्रतल्प में शान्तरस, करगरस व वीररस (विशेषकर इ धर्मवीर रस ) का परिपाका होना ही प्रेयपर है । गहना न होगा fr पर जब में तटस्य होकर अपनी इस रचना को देगना है तो प्रतीत होता है जिउगम प्रमगानुरुप उपयुत रसो का परिपा स्वभावत हो गया है । पही-गती सीमित श्रगार व अन्य रसोपी भी छाप है। भविन तो है ही। वी० ए० परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात जर में घर पर पाया, तब छात्रावास के कस-मायी (Room Partner) श्री नीनानार गुप्त का राई आया जिसके एक अग का आशय यह पा पि अाप भ० महार पाय लिखना चाहते थे वह लिख गया या नहीं ? -इमने मेरी गुप्त अमितापा को जागृत कर दिया और प्रस्तुत ग्रन्थ की रनना होगई जिाके लिए में गुप्त जी का आभारी हूँ। यद्यपि मैने दिगम्बर व दवेताम्बर दोनो पाम्नायो की वीर-जीवन विपयक घटनाग्रो का समन्वय करने की चेप्टा की सयापि मैंने भगवान को कुमार तीथंकर या बाल ब्रह्मचारी ही माना है । इसके पीठ मेरे पृ० पिता जी (श्री कामता प्रसाद जी ) द्वारा प्रणीत 'भगवान् महावीर पुस्तक का 'युवावस्था और गृहस्य जीवन' अध्याय की छाप है । मु के भ. महावीर का यह वाल ब्रह्मचारी स्वरूप ही सदैव से प्रिय व स्पृहणीय रहा है। हो- सकता है कि वाल्यकाल और नप काल की घटनामो के क्रम में या और कही मेरे लिखने मे कुछ हेर-फेर हो गया हो, लेकिन मैने प्राय सभी प्रमुख घटनाग्रो के समावेश करने की चेष्टा की है । सम्भव है कोई प्रमुत्र वातें रह भी गई हो जिनके प्रति मेरी दृष्टि ही न गई हो। बहुत सावधानी बरतने पर यह भी हो सकता है कि अजान वश कोई वात अनुचित लिज गई हो। इन सव अटियो के लिए मैं अपने महृदय पाठको से क्षमा चाहूंगा तथा उनके सूचित करने पर वे त्रुटियां अगले मम्करण में दूर करने का प्रयल करूंगा। अव अन्त मे में अखिल विश्व जैन मिशन का आभार मानता हूँ जिसके द्वारा प्रस्तुत रचना प्रकाश में आरही है। मेरी प्रा० अग्रजा श्रीमती सरोजनीदेवी जैन ने भी इस पुस्तक की रूप-योजना मे सहयोग दिया है उसके लिए मैं उनको भुला नही सकता । ज्ञात या अज्ञात रूप मे जिन महानुभावो या जिन स्त्रोतो से मुझे इस पुस्तक के निर्माण में योग मिला उन सवका मैं आभार मानता हूँ। समस्त शुभ कामनायो के साथ । . वीर जयन्ती १६५६ विनीत् - वीरेन्द्र

तीर्थङ्कर भगवान् महावीर
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30
१६मा ।
कति की वाणी के अलङ्कार, कवि के कविलय के स्वम सुघर ।
विमानों के चिर गाने, फिर भी कवि-प्रशा के बाहर ॥

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मगल प्रभात की मधुर मांगलिक वेला ।
पल्लव दल से सुरमित मलयानिल खेला ॥
लाई प्राची मे अलसाई अरुणाई ।
हो गई निशा की अब तो पूर्ण विदाई ॥
हर दिशा हो रही अनुरञ्जित इस क्षण में ।
है विखर रहा अरुणिम अवीर अम्बर में ।
खिच रहे उषा की मृदुल तूलिका से अब ।
रमणीय दृश्य निझर, नगादि के नीरव ।।
बन गये गगन में इस विधि चित्र सलोने।
हो मूर्तिमान ज्यो नव यौवन के सपने ॥
ये मनमोहन-से विविध रूप रंग लाते ।
क्रम-क्रम से स्वर्णिम हुये सभी हैं जाते ।।
लो, नव आशा-सा ,सूर्य उदित हो आया ।
उत्साह-पुल-सा किरण-निकर जो लाया।
हो गया विश्व में स्वर्णिमाशु का प्रसरण ।
अणु-अणु ज्योतित सा हुआ,प्रकृति-प्रमदित-मन ॥
पा स्वर्ण ज्योति, पल्लव हीरे से लगते।
पौधों पर सुन्दर सुमन, नगो-से जडते ॥
इस भांति रँगीली, कुसुमावलिं मुस्काई ।
मृदु कलिकालो मे आई नव तरुणाई ॥
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उडत । है गजाद्यान में त्रा गई म। श्यामल मृङ्गों ने भी तो ली गडाई । पुष्पों के जग में नत्रुग्मि तान नुनाई ॥ हमत इन्दीवर नर के उर्मिल जल में । करत गुञ्जन जिन पर मकर मन्ती में || उडता पगग सुमित समीर हैं करता । जो न्त्रॉन-स्त्रॉम में नव-जीवनय मन्ता || स्वगन्त फुटस्त और हर्कत अछ कहाँ कतारों में जात, व ऋन्त ॥ ऋएड-ग्राम में छटा छवाली छाई । ल्यांश मुन्काई ॥ घृमन सम्राज्ञी उपलन न्छ सखियों को भी लाई है वे सँग मे ॥ ा के कामल तल पर ये सुन्दग्यिाँ । चल रही चरण शत्-ठल र ज्यों अप्परियाँ । इनंक आन में छटा औं छुर्वि पाती । मुन्दरता मी ज्यों इनमे है शम्माती ॥ कने उपवन ने निज आमा को दगुरिणत । क्या हिला पात-कर इनको क्रिया निमन्त्रित ॥ इनक स्वागत में क्या खग मारे गाते । क्या तनि-विन्द-ऋण उनको मलक झिाते ।। शीतल मलयज भी क्या इनका मन हग्न । चलता भावों सा थिक्-थिन्क सुख कग्ने । ये घृम म्ही सब ही हप्रित हो मन मे । कर न्हीं हाय परिहास मुदित जीवन में || आ गए इसी व्रण श्री सिद्धार्थ नृपति भो । हो गया मुदित सा और, मोट तत्तण हो । उन्नत ललाट नृप का प्रभाव आँखों में । भन्याकृति शोमित राजकीय - वस्त्रों में ॥

मे में । सम्राट मम्मिलित हुये मनोरञ्जन मे । सन गया हाम-परिहास वचन-अमृत मे ॥ वोले नृप, 'छाई आज अनौखी आमा । कोई विशेष क्या बात तभी अमितामा ।। जी चाह रहा मैं रहू, निरखता यह छवि । दरवार-समय हो रहा और चढ़ता रवि ॥ सम्राज्ञी ने भी कहा 'प्रकृति मुखरित सी। मुकुलित सुन्दरता साथ लिए 'आई सी ॥ है समा रहा अति हर्ष हमारे मन में । लगता शुभफर कुछ बात हुई समृति मे ॥ कुछ बातों को है मुझे आपसे कहना। ठरवार समय हो गया, आपको जाना ॥ प्रत बताऊँगो दरवा-भवन कुल सपने जो देखे मैने रजनी में। क्या आप जिनालय से आए हैं हो कर । 'हो, मैं आया जिनमन्दिर से दर्शन कर ॥ है सपने देखे तुमने कौन कौन से। होती अभिलापा जाने में जल्दी से। 'मुझको बतलाने की उत्कएठा भी है पर नियत समय दरवार पहुंचना भी है ॥ श्रीमान् चलें दरवार । ओर अव सत्वर । : मैं भी आती सखियों सँग जिनदर्शन कर ।। 'पर" ' कहने को कुछ, रहे मौन नृप मन में । चल दिए स्वयम् दरवार दिशा के मग में । उत्कण्ठा-सी छाई सम्राट-वदन पर । था रखा नियन्त्रण ने जिसको बन्दी कर ॥ सम्राट गमन के बाद स्वयम् राज्ञी भी । चल दी जिन-मन्दिर साथ लिए सखियाँ भी ॥ है । - - , sat 1 ५ जिसमे ।। इस है प्रकृति किन्तु अब भी हँसती सी अविरत । चढ़ आया दिनकर चटख धूप है प्रन्ति ।। झिलमिल झिलमिल अब तल्पग्छाई होती । वह मस्त झकारे पा कर हिलती-ढलती ।। है किन्तु और छवि छाई गज-भवन में । नर कृत सुन्दरता मूर्त हुई वन्दन-वागे चित्रों से हुआ अलकृत । ताजी सुरभित पुष्यो से भी यह मजित ।। स्वच्छता स्वयम् ज्यों वास यहाँ है करतो । प्रति वस्तु नियत उपयुक्त स्थान पर रहती ।। राज भवन के वर्हिद्वार पर प्रहरी । है खडे कि जिन पर छाई निष्टा गहरी ॥ हैं सावधान कर्तव्य-कार्य मे ये रत । क्या कर सकता कोई भी इनको विचलित ।। लो, लगा अभी दरवार आ गए कुछ जन । सुप्रतिष्टित नागर जो सचमुच ही सजन ॥ मन्त्री, सेनापति अन्य आ गए सभी सम्राट सहित धीग्ज मन || जा पहुँचे सब अपने अपने आसन पर | निज रत्न-जटित सिंहासन पर भी नृपवर ॥ वन्दीजन गाने 'लगे सुभग विरुदालि । ज्यो गुनन गुनन गुन गाती हो भ्रमरावलि || इनके गाने के बीच वाद्य भी बजते । वादित्रों के स्वर रसीले लगते ॥ इनकी सरगम है परम मनोरम अनुपम । सङ्गीत स्वयम् साकार थिरकता क्रम-क्रम ॥ इस गुण गरिमा गायन के मधुरस क्रम में । आ गई स्वयम् साम्राज्ञी राज-भवन में || कर्मचारी गण । रस्य

तीर्थकर भगवान् महावीला
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तीर मा ग्रिपाला देवी के सोलह स्वप्न
"देरो मैंने कुछ सपने सुख-निद्रा में।"
-त्रिशला

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अन्तरियो स्वयम् सखिया भी अपने साथ साथ वे लाई । मानो शची सँग आई ॥ वे आई या आए लक्षण सत्र श्री के । मत्र खडे हो गए, मान हेतु रानी के ॥ गजा ने भी कर दिया रिक्त अासन । मन बैठे अब हो रही सभा अति शोमन || मिहामन पर राजा रानी यों लगते । माझार न्याय सुषमा हो कर ज्यों सजते ।। चल हा किन्तु विस्टावलि का अविरल क्रम | सुन है सभी हो मन्त्र मुग्ध जिसमें ग्म ॥ पर शान्ति हुई जब हुआ अन्त गायन का । चल दिया कार्यक्रम जो निश्चित प्रति दिन का। जब नियत कार्य क्रम अन्त हुआ नृप बोले । सम्राजी से उत्सुक अमृत रस घोले ॥ 'हे शुभे ! स्वप्न देखे क्या क्या हैं तुमने ! वनलायो जो हैं मुने नहीं हम सबने । सम्रानी वाली 'पिछले प्रहर रात्रि में । देसे मैन सपने कुल सुख निद्रा मे ॥ इनके आशय के ज्ञान हेतु उत्सुक मैं ।। जपो उत्कण्ठा स्वप्न ज्ञान को सब मे ॥ मन्त्री बोले श्रीमान् हमारे हमारे नृपवर । बतलाएँगे म्वमार्थ कहे रानीवर ॥ कारण सुमाग्य से नृप निमित्त जानी हैं है तोब बुद्धि उनकी. वे विज्ञानी है। और सम्राजी कुछ मुस्काए । फिर सम्राजी ने अपने स्वर सुनाए । वे बोली 'देखा सर्व प्रथम गज मैंने । नृप लगे सांच कर उत्तर को यों कहने ॥ सम्राट - सब दिखते 'इसका आशय तुम भाग्यवान सुत की माँ । होओगी जग फैलेगी तव गरिमा ॥ सम्राज्ञी त्रिशला ने आगे बतलाया । 'देखा वृष जिसकी हृष्ट पुष्ट सित काया ।' 'होगा तव सुत वह धर्म सुरथ का चालक । यों सोच समझ वोले वे जनता-पालक । रानी बोली, 'फिर आया स्वप्न सिंह का ।' 'होगा अनन्त वल पौरुष तब उस सुत का ॥' 'इससे अगला है स्वप्न सुभग लक्ष्मी का ।' 'स्वामी होगा वह सुथिर मोक्ष लक्ष्मी का ॥' यों बतलाया नृप ने रानी स्वप्नोत्तर । थे मन मुदित हुए तदनन्तर ॥ 'मैंने देखी सुरभित फूलो को माला ।' इस भांति कहा रानी स्वप्न निराला ॥ नृप उत्तर मे गेले 'उस सुभग पुत्र का जग मे फैलेगा अविरल सौरभ यश का ॥' 'देखा है मैने पूर्ण चन्द्र गका में । 'वह नष्ट करेगा मोह तिमिर जीवन में ।' 'फिर इसके वाद सुहाया सपना रवि का ।' 'वह ज्ञानालोक करेगा. आशय जिसका ॥' तदनन्तर आया युगल मीन का संपना ।' 'लाएगा सुन्दर साम्य भाग्य वह अपना || 'फिर देखी नोडी भरे हुए कलशों की। 'वह · प्यास बुझाएगा अशान्त तृपितों की ।' 'पश्चात स्वप्न में आया स्वच्छ सरोवर ।' 'पाएगा सर से सहस्राष्ट । लक्षण वर ।' सब उत्कण्ठित से स्वप्न अर्थ यों सुनते । सम्राट स्वयम् मन अमित मोद से भरते ॥ e - फिर स्वप्न कथन मे हुई अग्रसर रानी । 'देखा लहराता निर्मल सागर पानी ॥ उत्तर मे बोले नृप सुज्ञान के धारक । 'तव सत पयोध-सा होगा शान्त विचारक ॥' 'फिर स्वप्न पटल पर दिखा सुभग सिहासन ।' 'वह तीन लोक का पाएगा - राज्यासन ॥' 'फिर देव यान स्रूनो मे मुझ दिखाया ।' चय स्वर्ग लोक से तव सु गर्भ मे आया ॥' 'तब दिखा नाग प्रासाद स्वप्न मे क्रम से ।' 'वह पूर्ण त्रिज्ञानी होगा जन्म समय से ॥' इस स्वप्न श्रखला मे सुरत्न अवलोके ।' 'इनका आशय शुभ गुण होंगे उस सुत 'के ।' 'स्वप्नों की चित्रपटी पर अन्तिम सपना । मैंने देखा था प्रचण्डाग्नि का जलना ॥' इसका मतलब नृप ने आखिर बतलाया । 'वह पुत्र करेगा अपनी प्रवल तपस्या ॥ जिससे भस्म कर्म' का ईधन । यों प्राप्त करेगा केवल पद अक्षय धन ॥' सब के श्रीमुख से धन्य धन्य ही निकला । यह धन्य बात ह होगा पुत्र निराला || यों क्रम क्रम स्वप्नों का आशय सुन . मानों । साकार , हर्ष नाचने कुछ सोच नृपति ने कहा प्रकृति उपवन में । थी अमित मुदित क्या इस शुभ वृत्त कथन मे ॥ साम्राज्ञी त्रिशला ने भी कुछ मुस्का कर | 'हॉ' ही जैसे कह दिया मौन भी रह कर ॥ तदनन्तर कोई दरवारी थिरता से । बोला उत्पीडित आज घा हिंसा से ॥ कर देगा लगा है जानों ॥ 6

श्रीमन् स्वराज्य की सीमा मे तो किञ्चित ।
कुछ शान्ति धर्म मा दिस पडता है निश्रित ॥
पर लोक हा म्हा हिमा में है आगे।
भौतिकता-टिशि में लोग जा रहे भागे ॥
पट दलित शान्ति सल के प्यासे दिखते हैं।
पर कौन बुझाय प्यास टीन मरते है ॥
यह धन्य भाग जो धरती पर आएंगे।
भावी कुमार निज जो दुख दूर करेंगे ॥
ऐसा ही तो स्वप्नार्थों से
यह ही तो अपनी चिर सञ्चित आशा
दरवार विसर्जित हुआ किन्त,
प्रारम्भ हुई नव अभिलाषा ।
नूतन कुमार मुख-दर्शन की,
जागी सब ही मे जिज्ञासा ॥.
भासा है
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॥

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द्वितीय सर्गः
--
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जन्म महोत्सव

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char
phor
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कुण्ड ग्राम का नगर सौम्य-सा, चहल-पहल से भरा हुआ ।
दूर छुद्र झगडों से है यह, सुभग शान्ति मे सना हुआ ॥
न्याय मार्ग में निरत नृपति भी, फियत अनीति न करते हैं।
समता के सुन्दर प्राङ्गण में, सब स्वच्छन्द विचरते हैं |
नागर वृन्द प्राय सजन सब, जीवन सग्ल विताते है
चोर, दस्यु, गुण्डे, दुर्व्यसनी, सुनने में कम आते हैं |
और उधर भी राज भवन में सुन्दर जीवन की लय
सुलभ सभी सामग्री जिसमें, स्वयम् मोट का आलय
अन्त.पुर में त्रिशला देवी, सुख जीवन यापन करती ।
उनकी परिचर्या में तत्पर, दासी है अनेक रहतीं ॥
धीरे-धीरे क्रम-क्रम करके, समय सरकता जाता है।
जो भी क्षण जाता है लेकिन, सौख्य-सृष्टि कर जाता
यों सम्राज्ञी त्रिशला माता, के दिन सुख से वीत रहे ।
प्रसत्र काल आता जाता है, किन्तु न कोई कष्ट सहे ॥
ये लक्षण तो बतलाते हैं, वत्स असाधारण कोई ।
माँ त्रिशला के होने वाला, क्या इसमें शङ्का कोई ॥
त्रिशला मा की टहल वजाती हैं छप्पन कुमारियाँ सब ।
भाँति भाँति की चर्चा करके, वे प्रसन्न करती हैं सब ।।
इस चर्चा के सुन्दर क्रम में प्रखर बुद्धि' सम्राज्ञी की।
दिव्य झलकती ही रहती है, यह विशेषता है उनकी ॥
१३
है

?" इन चर्चा वार्ताओ मे भी, गर्हित बात न है होती । ज्ञान धर्म के विषयों पर ही, चर्चा पग्म सरल होती ॥ इन वार्तायो मे कुमारियाँ, पहले जिज्ञासा करतीं । रानी वित्युत्पन्न बुद्धि से, उनका समाधान करतीं ॥ कोई पूछा करती 'वोलो, प्राणी क्यो नोचा होता झट से रानी कह देती है, 'भङ्ग प्रतिज्ञा जो करता ' || कोई जटिल प्रश्न करती हैं, 'हे जग मे ऐसा दिखता कोर्ट जन तो मुँह रख कर भी, बोल नहीं किञ्चित सकता' । इसका कारण रानी कहतीं, 'पूर्व जन्म मे जो करते पर-निन्दा अपनी सु-प्रससा, वे प्राणी गॅगे होते ॥ एक प्रश्न के बाद शीघ्र ही, प्रश्न दूसरा है होता । 'बोलो जी किस पाप कर्म से, प्राणो है बहरा होता ॥' रानी त्वरितोत्तर देती हैं, 'प्राणीं वे बहरे होते । जिनको आवश्यकता होती, उनकी बात न जो सुनते ॥'.. प्रश्न इसीविधि होते रहते, जैसे क्यों हू डे होते , रानी कहती - 'पूर्व-जन्म मे, दान न जो किञ्चित देते ॥' इसी भाँति ही अन्य कुमारी, पूछ बैठतीं हैं ऐसे । 'बोलो मॉ श्री कौन पाप से, होते कुछ जन लॅगडे-से " सम्राज्ञी कहतीं मृदुता से, 'सनों सहेली मम सुन्दर । यह तो बात तनिक-सी ही है, भाव नहीं कोई गुरुतर ॥ जो पशुओ को अधिक लादते, और कष्ट उनको देते । वे दुर्जीव समय पा कर ही, हैं लूले लॅगडे होते ॥ उत्तर सुन-सुन सन कुमारियाँ, हैं आश्चर्यचकित होतीं । लेकिन मन की जिज्ञासा को, पूर्ण शान्त वे हैं करतीं ॥ रानी उत्तर देती या ज्यों, स्वयम् बुद्धि साकार हुई। उत्तर दे जाती चुपके से क्या विचित्र यह बात हुई ! या मेधावी वत्स गर्भ मे, अत वुद्धि अति प्रखर हुई । चाहे कुछ भी हो कारण, पर माँ श्री को मति दिव्य हुई ॥ .

ऐसे ज्यों-ज्यो दिवस बीतते, सुख-आहलाद-बृद्धि होती । जीवन की इस सन्दर गति में, अति प्रसन्नता है होती ॥ वत्स-जन्म का समय आ गया, पर कष्टों का नाम न सब मे हर्ष समाया जाता, दुख-विषाद का काम न है ॥ केवल अति सुख राज-भवन मे, हो- ऐसी ही बात नहीं । निखिल नगर सम्पन्न हो रहा, दिखता है यह सभी कहीं ॥ शुभ प्रभात मध्याह्न समय में, ऐसा लगता है जानों । रत्न-राशि वरसाया करता, है कुवेर ही सच मानों ॥ अब पुर मे समृद्धि थिरकती, कोई दीन न दिखता है सब ही हैं सम्पन्न हुए ज्यों, कोई धित न मरता है ॥ यों समृद्धि-प्रसार सहित ही, समय मन्द-सा थिरक रहा । 'चैत्र शुक्ल तेरस के दिन का शुभकर हो आगमन रहा । विमल रुपहली चन्द्रकला भी, क्या हँस कर शशि से कहती । 'प्रियतम ! तुमसे सुभग चन्द्र यह, पाने वाली है धरती ॥' 'हा प्रिय ! ठीक-ठीक कहतीं तुम, यह अपना सुमाग्य होगा।' बोला व्ह , 'भू-शशि दर्शन का, शुभ सुयोग अपना होगा । उधर नगर की निकटवर्तिनी, प्रकृति सलौनी है हँसती । लगता कोई बात निराली, होने को क्या यह कहती । धीरे-धीरे प्राची-पट पर, अरुणिम ऊषा मुस्काई । अनुपम अरुणोदय हो निकला, तरुण दिव्य आमा आई ।। चिर आह्लाद आज ऊपा मे, चरम-विन्द सुन्दरता का । लो, क्या हो निकला मृदु कम्पन, उसके लाल कपोलों का || उसके अरुण अधर हिल निकले, बोल उठी वह क्या मानों । 'मेरे दिनकर ! आज तुम्हारे, साथ उदय होगा जानों ।। पृथ्वी पर 'जाज्वल्यमान रवि ' ज्ञानालोक दिव्य जिसमा । ध्वस्त करेगा निखिल विश्व में, धन प्रसार मिथ्या-तम का ॥ लो, इस शुभ दिन, शुभ वेला में, 'त्रिशला-सुत' का जन्म हुआ । वीन लोक में मङ्गल चाया, पुण्य-पुञ्ज अवतरित हुआ । - १५.

C कहते नर्क-लोक मे भी तो, प्रगट हुई क्षण-भर साता । भूतल की क्या, देवलोक में जन्म-महोत्सव था होता ॥ उधर बज उठी भुवन-वासियो, दवों की सुन्दर भेरी । व्यन्तर देव-मृदङ्गो की भी, हुई न वजने मे देरी ॥ घनन घनन घन, घनन घनन घन, टनन टनन टन, टन टन टन । कल्पवासियो के घण्टे भी, बाज उठे थे यो क्षण-क्षण । छन छन छन छन, छनन छनन छन, नाच उठी कुछ अप्सरियाँ । उनकी रुन-झुन, नूपुर ध्वनि सुन, गान गा उठी किन्नरिया ॥ सारा नभ प्रतिध्वनित हो उठा, 'जय-जय' मङ्गल नादो से । मृदु सङ्गीत सुरीले स्वर भी, निकल रहे सुर-वाद्यो से ॥ और उधर सौधर्म इन्द्र का, हुआ प्रझम्पित सिंहासन | लगा सोचने अवधिज्ञान से, कम्पित होने का कारण ॥ भासा सहसा ऐसा उसको, वसुधा के शुभ वक्षस पर । अपने पुण्यों को सञ्चित कर, हुए अवतरित तीर्थकर ॥ सीमा लॉचा अमित मोट भी, हर्षातिरेक-सा उसे हुआ । क्षणभर की भी देर न कर के, चलने को तैय्यार' हुआ || आ पहुंचा वह कुण्डग्राम को, सीमा मे ले निज परिकर । त्रिशला-सत के जन्म-स्थान पर, शची साथ पहुंचा सत्वर ॥ दखा जब नवजात-पुत्र तो, तृप्त न इन्द्र हुआ स्वर्गिम । शिशु कमनीय रूप लखने को, किए सहस्र नेत्र कृत्रिम || तृप्त न फिर भी निर्नि मेष वह, हा निरखता छवि अनुपम । शेष रही फिर भी नेत्रेक्षा, शिशु-सजीवता यह अनुपम ॥ किन्तु अन्त मे मायामय-सी, निद्रा मे कर त्रिशला को | की नियुक्त कुछ सर-बालाएँ, माँ श्री की परिचर्या को ॥ फिर निर्मित कर शिशु स्वरूप-सा, एक वत्स मायावी जो । उठा लिया नव वत्स शची ने, लिटा दिया शिशु कृत्रिम को ॥ क्यों कि इन्द्र की न्हवन हेतु था, 'शिशु' सुमेरु तक ले जाना । इस अन्तर मे अत किसी को, पडें न सत-वियोग सइना ।। १६ C ऐरावत गज पर शिशं सँग ले, सुभग इन्द्र ने गमन किया । अगणित देवों ने भी उसका, मोदं सहित अनुसरण किया । गाजे-बाजे' साथ-साथ . हो, नृत्य-गान होते" जाते । पुष्प वृष्टि अम्बर-पथ में भी, जय-जय' स्वर करते जाते ॥ जब पहुंचे सुमेरु पर, सुत को, स्फटिक शिला पर बिठलाया । क्षीरोदधि से कञ्चन-कर्णी, में सुनीर फिर मँगवाया ॥ हार्थों ही हाथो देवों ने, जुल ला. कर अभिषेक किया । शिशु के सस्मित मुख-मण्डल पर, दिव्य कान्ति ने जन्म लिया । धन्य भाग्य जो तीर्थकर सुत, के दर्शन का योग मिला । संस्तुति गान स्नान करने का, दवों को शुभ समय मिला || और धन्य य त्रिशला संत जो, इनकी सेवा सुर, करते । पूर्व उपार्जित सद्कृत्यों के फल ऐसे ही हैं मिलते ।। यों अभिषक आदि कर के सुर, कुण्डग्राम की ओर चले : तीर्थकर शिशु साथ लिए बे, मोद मनाते हुए चले ॥ नृत्य गान वादित्रों की लय : लहर, रही जल-लहरों-सी ॥ उत्सव का आह्लाद समाया, देवो की सुस्थिति ऐसी ॥ ले आया सौधर्म इन्द्र फिर, वत्स निकट माँ त्रिशला के । पर्ण देव-कृत, जान न पाए, मात-पिता, कुछ जन घर के || मायावी पुतले को तब फिर, इन्द्र-शची ने, नष्ट किया । उसकी जगह शीघ्र त्रिशला-सुत, को स्वाभाविक लिटा दिया | सम्राज्ञी माँ 'त्रिशला की अब निद्रा का भी अन्त' हुआ । और तभी ही कुछ सुयोग से, नृपवर का आगमन हुआ ॥ देवो ने तब मात-पिता का, मङ्गलमय यश-गान, किया । तीर्थकर सत के होने का, यों शुभकर सन्देश दिया | दे कर के फिर हर्ष बधाई, कर के शत वन्दन शिशः के । गए स्वर्ग को देव सभी फिर, मोद भरा मन में उनके ।। और इधर भी निखिल नगर में जन्मोत्सव को धम,हुई । केवल राजभवन में ही क्या, घर घर में सुख-सृष्टि हुई ॥ ܚ १ १७

जन्म वधाई गीत गा रही, घर-घर महिलाए मिलका |
ढलक बजती जाती होते, साथ मजीतो के मृद-स्वर ॥
राज-भवन में आज हर्ष का छोर नहीं है कुछ दिखता ।
राजकीय बाजे बजते है, मधुरिम नृत्य गान होता ।
केशरिया ध्वज फहा-फहर कर, लहर रहे छत के उपर |
तोरण वन्दनवार बंध रहे, गज-महल के द्वाों पर ||
उधर नाट्य शालाओ मे भी, नाटक है खेले जाते ।
चार चांद उत्सव शोभा में सुभग लगाए है जाते ॥
जन्मोत्सव-समयोपलक्ष में, खुली दान की शालाएँ !
निशि दिन दान जहाँ वटता है, रिक्त न लौट व्यक्ति जाएँ।
दश दिन तक यो हुआ महोत्सव, हर्प ज्योति अविरत जागी ।
गया निराशा अन्धकार भी, निविड क्लेश-रजनी भागी ।।
राज-ज्योतिषी ने ज्योतिष से, योग लगा कर बतलाया ।
उत्तर फाल्गुणी नक्षत्र में जन्म पुत्र ने है पाया ॥
इसके जन्म समय से ही है, सब चीजो की वृद्धि हुई।
अत राज-सुत 'वर्द्धमान' ही, होगा इसका नाम सही ।।
पुर का चर्चा-विषय बन रहा, जन्म-वृत्त त्रिशला-सुत का ।
कोई कहता 'देवो ने भी, शुभाभिषेक किया इनका ॥'
कोई कहता, 'जो भी हो पर शुभ लक्षण है बालक के ।
जब से जन्म हुआ तब से ही, बढ़ती है होती सबके ॥
काश ! इसी से 'वर्द्धमान' है, नाम रखा इनका सुन्दर ।
यथा नाम चरितार्थ हो गया, यह शिशु की महिमा गुस्तर ॥
जबसे जन्मा शिशु तवसे ही, कोई दृखट न बात हुई ।
शुमकर शकुन दिखाई पडते, होती बाते नई नई ॥
उघर वनो मे प्रकृति सजीली, देखो तो हँसती-सी है
क्या शिशु जन्म-प्रभाव प्रबल से, उसकी छवि वासन्ती हें ॥
पीत-हरित कुछ विविध रह के हैं दुकूल उसने धारे ।
पुष्पों के मुख से मुस्काती, हर्ष-प्रदर्शन लॅग न्यारे ॥
१७

कुञ्जों के अवगुण्ठन से क्या, इठलाती-सी पेख रही -
जन्मोत्सव की शोभा को, स्पृहा-भाव से देख रही ।
वह भी तो मधुकर-गुञ्जन मिस, जन्म बधाए गाती है
ढोलित पात सरर-सर निर्भर, नद-स्वर तान सुनाती है ।
और उधर अव राज-भवन में, जहाँ कि माँ त्रिशला रहतीं ।
अगणित सखियाँ परिचर्या में उनकी सदा लगी रहतीं ॥
मन-हर सुत को मैं ले पाऊँ, तनिक खिला पाऊँ उसको ।
सब प्रयत्न ऐसा करती है, हर्षित करती माँ श्री को ॥
माँ त्रिशला भी गोद लिए शिशु, अमित मोद मन में भरती ।
तन-मन भोले सस्मित शिशु पर, निशिदिन न्योछावर करतीं ॥
बार-बार ।
वत्स की माँ ले रही है,
मृदु
वलैया
धन्य उनका मातृ-पद है,
सौम्य-सा शिशु होनहार ॥

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तृतीय वर्ग
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शिश क्य
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'द्वितिया रफा-पंति से अब, शिशु 'वर्द्धमान बढ़ते हैं ।
"छवि किन्तु कलाधर मे भी, अपनी अनन्त रखते हैं ।
"वे अभी किन्तु 'नन्हें-से, मुन्ना भोले से लगते ।
है बोल नहीं पाते पर, 'आ-आ,''आ-आ । 'स्वरं करते ॥
''उनके आ-आ' स्वर में भी, मधुरिम सङ्गीत निखरता ॥
..। सुनने के लिए सभी का क्षण मे जमघट सा लगता ||
वे बीच-बीच “मुस्कोते, जैसे कि "फूल झंड पडते ।
'ग्द-रहित वदन' पर उनके, स्मित' लख सब जन हँसते ॥
झालरें-मय मणियों वाले, 'लेटते पालने में वे ।
। धीरे-धीरे से में के पाकर झट सो जाते वे ॥
जब सोते हैं. तब उनकी, मुर्ख मुद्रा को सबै लखते ।
उनके 'अङ्गों की उपमा , ललितोपमान में "करते ॥
कोई कहती, 'देखो तो अब रूपं शयन करता है ।
"उसके ऊपर भी तो अब मृदु हास हास हंसती है ।
मुख-मण्डले तो विल्कुल ही "शशि की समता है रखता ।
भौं पलक श्याम दर्शाती भुख चन्द्र वीच श्यामलता ॥
पर अरुण अधर से मुख तोम बोली एक सहेली ।
"लगता है बालभानु-सा, 'तू समझान इसे पहेली ॥
हैं जिसकी धवल ज्योति से, 'तैम केश भागते 'पीछे ।
फिर भला-नहीं रवि तो क्या कोई हमसे तो पूछ ।'

'जी नहीं, एक उपमा तो, मन उमड रहो मेरे है
मुन्ना शरीर-सरवर में, मूढ-मुख अरविन्द खिला है ।
यह प्रफुलित पूर्ण कमल-सा, जो अरुण सुरमि-मय जैसे ।
युग श्रवण पात से लगते, तम केश भू-माला-से ॥'
इस पर कोई सखि इटलए छलाकर कुछ यों बोली ।
हैं नवल कमल से कोमल, तो इनके कर-पग-तलही ॥
मुख तो अल्पोदय लगता, कुछ छटा अल्ण-सी रखता ।
जिसको लख अपने उका, मीलित-इन्दीवर खिलता ॥
इतन मे-बोली मा श्री, कुछ मन हो- मन-मुस्काती ।
जब है उपमेय, हृदय-हर, उपमाएँ अगणित आती ।।
मैं तो इतना कह सकती, नन्हा-सा मुन्ना अपना ।
उसके मिस ज्यों हम सबको, साकार हुआ सुख-सपना ॥'
ऐसे सुख-चर्चा क्रम में, सम्राट स्वयम् आ जाते ।
वे भी शामिल हो प्रमुदित, हे स्वाट अनौखा पाते ।
सोते ही बर्द्धमान शिशु, है तनिक मुस्करा देते ।
तो व्यङ्ग-सहित रानी से, कुछ कहते नृप मुस्कात ।।
"है सहज विमाता देखो, यह खिला न्ही तव सुत- अव ।
तुम खिला नहीं पाती हो, क्या पुत्र नहीं है यह तव ॥
अथवा रूठा हे तुमसे, वह मुदित खेलता उसस ।
क्या बात हुई है ,ऐसी, जो नहीं खेलंता तुमस ?'
'जैसे कि अश- आए हैं, वैसे ये लक्षण होते ।
मैं क्या जाने कि कौन-सा, - जादू श्रीमन् है करते ?.
-क्या आप-मातृ-पद मेर- हैं. सहज- चाहते लेना ?
पर- व्यर्थ आपका यह सब, मेरा मुन्ना- है -अपना ॥
- बह जब कि-जागता है तब, खेला करता है मुझस 1
तब स्वयम् आप-आ जाते, 'आ-आ' सुनने को जैसे ॥
सन्निकट आपके रहतए व्यङ्गों का भरा.
पर मुझे न पा सकता, वह स्वयम् - पूर्ण वेचारा ॥'
-
पिटारा ।

1 1- रानी उत्तर सुन नृप का, फिर भला प्रश्न यह होता । 'तव कौन व्यक्ति सोते में मुन्ने को कहो हँसाता " क्यों आप बन रहे भोले, 'ज्ञानी हो कर भी कहते । सोते में कौन खिलाता, मुन्ने को हँसते-हंसते? प्रतिफलित हो रहा शिश के, सञ्चित कर्मों का लेखा'। जो हमने सौम्य वदन पर देखी' सुहासे की रेखा ॥ सम्राट स्वयम् मुस्काए, • उत्तर 'सुन सम्राज्ञी ' का । स्वीकार कर लिया जैसे, यह कथन नृपति ने उनका ।। इतने मे मुन्ने ने झंट, सोते में करवट बदली । माँ बोलीं- 'जाग रहा शिशु सुन कर के अपनी बोली ।। उसकी निद्रा मे बाधा, पड रहीं अत. मत करिए । कोई भी वार्ताएँ अब, कुछ शान्ते हुए-से रहिए ॥ सब हुए मौन ही सहंसाः रुक गया बात का कहना । । पर खला सभी को उस क्षण, मुन्नासमीप 'चुप रहना ।। क्षण एक न" लेकिन बीता' मुन्ना ने खोली आँखें । लग रहीं मनोहर कैसी, उनकी कुछ श्यमल पाई। रत्नारे नयनों से छवि, झीनी जीवन्त झलकती । जिसको लखने को निशदिन, ये ओखें' सदा तरसती ॥ हैं धन्य भाग्य रानी नृप, सखियो भृत्यों पुरजन के । हाँ, किए जिन्हों ने होंगे, दर्शन त्रिशला-नन्दन के । जगने पर सुत' के सब जन्, 'बातें हैं उनसे करते वे बोल न कुछ भी पाते, पर बीच-बीच मुस्काते ।। उनके मुस्काने पर हो, सब उन पर वलि बलि जाते करते प्रसन्न सबको यो शिशु वर्द्धमान हैं । बढ़ते । जब रात पडें पर भी है, शिशु को न नींद. कुछ आती। सो जा 'मुन्ना' तू सो''जा, मॉलोरी ललित सुनाती ।। लोरी को सुनते-सुनते, वे सो जाया है करते। तो मात-पिता कुछ चर्चा, उन पर ही करते सोते ।। १. २५, रजनी । मे , सोते-सोते, जब वे हैं जाग ठते । तो घण्टों जगमग जगमग, हैं दीप जोहते रहते ॥ शुभ जगा-मगर दीपक- सँग, उनको यह क्रीडा मनहर । देखा करते हैं नृप भी, अपनी निद्रा को खोकर || उनका प्रसन्न चित रहता, रोते न कभी है दिखते । क्या इसी लिए उन पर हे, निशिदिन दुलार सब करते -11- शुभ प्रातकाल नर-नारी, उनका मुख लखने आते - कहते वे इससे उनके, सब कार्य सिद्ध हो जाते ॥ मङ्गलमय मङ्गलकारक, शिशु का मञ्जुल मधुरानन । यह स्वयम् शकुन ही जैसे, सर्जक ससृति-सुख-कानन ॥ धीरे धीरे वे बढ़ते, मानों कुछ ऐसा लगता । जैसे विहान-वेला मे, क्रम-क्रम प्रकाश हो बढ़ता ॥ दो-तीन मास ही वीते, लेकिन वे घुटनों के भर । चलने की कोशिश करते, शिशु वय में अमित शक्तिवर ॥ वे अब कलबल कलवल- कर, बातें भी करने लगते। अपने नन्हें हाथों से, कुछ सकेतों को करते ॥ जब सुभग महल-ऑगत मे, वे कुछ कुछ-सरका करते- तब मातृ-पिता कुछ गृह-जन, टुक झुक उनका श्रम लखते-|| उनके सस्मित मुख-विधु के, भामण्डल पर छवि बसती ।- निर्द्वन्द-भाव मे कैसी सुन्दर निरीहता- हॅसती ॥ सब उनको गोदी लेते, पर वे तो भूमि ओर हो, जाने की कोशिश करते, दिखती उनकी यह रुचि हो । पृथ्वी पर लोट-लोट कर, घुटनों वे, चलने लगते । मजुल प्रसन्न-आनन से, दो दाँत, हृदय-हर दिखते-॥ मानों कि अधर अम्बुधि से, युग-रद के रत्न -निकलते ।। लख जिन्हे, मात-पित, गह-जन हैं, फूले नहीं समाते || बढ़ते शिशु. वर्द्धमान कुर्ब, अब स्वयम् बैठ जाते हैं घुटनों के बल तो वे अब अति विप्र चाल चलते हैं। . T - । . मोत्रिशला उनकी गति को, लख कर प्रसन्न होने को . कुछ दूर-दूर जा कर के वे प्रायः बुलाती उनको ॥. 'आ-पा, मॉ-मो' कुछ करते, मी निकट शीघ्र वे. जाते- इतने में वे हट जाती, ज्यो ही माँ ;निकट पहुँचते ॥ वे शीघ्र वहां से मुड कर, मो ओर दौड है भरते । घपटों ही यों वे मा-सैग, है खेल खेलते, रहते ॥ जब बहुत देर हो जाती, वे तनिक खीझने लगते । लेकिन न नेक भी कते, मों को वे छूते फिरते..॥ मो त्रिशला थका जान कर, हैं उन्हे गोद में लेती । वे अति दुलार से उनको, पुचकार सहज ही लेती ।। सारा वैभव ही उनका, इस पर न्योछावर होता । क्या तीन लोक का कोई, सुख इससे समता रखता ॥. शिशु वर्द्धमान छोटे ही. घुटनों ही अभी सरकते ।, पर अपनी सीमा में हो, वे सभी यत्न हैं करते. ॥. उनके मन में जब भी है, ऊँची ,टहरी आ जाती । तब उसे पार करने की, उनकी कोशिश है होती ॥. माँ त्रिशला नृपति अन्य जन, आ कर सुत चेष्टा लखते । देखते-देखते शिशु को दूसरी ओर हैं पाते ॥ शिश वर्द्धमान जब इस विधि, निज कार्य सिद्ध कर लेते । ताली निज लघु हाथों से, तब बजा बजा- कर- हसते ।। इस पर सहसा हो कुछ जन, लोकोक्ति सुमग दुहराते -1, होने वाले 'विरवा' के, 'चीकने पात' . है होते ॥ नृप-सम्राज्ञी के-मुख-पर,- कुछ, म्वभिमान की- रेखा । एसे समयों पर ही तो, सव, जन करते हैं देखा ॥ त्रिशला,सुत कभी शून्य में, देखा करते इकटक-हो । जैसे गभीर भाव, से, करते, कोई। चिन्तन हों ॥ शिशु वय में मही दार्शनिक, जैसे,-योगी ही, लाते- उन्नत ललाट पर उनके कुछ रेखा-चिह्न , झलकते॥ . - -- २७

इस दिव्य भाल पर उनके, है लगा दिया चुपंक मे ।
मॉ श्री ने काजल तिरका, लग जाए 'नजर' न जिसस ॥
यह कजल-बिन्दु सोहता, उनके मुख पर है ऐसे ।
शुभ उर्मिल जल मे हँसता, मृदु नील कमल हो जैसे ॥
धीरे-धीरे वढ कर, अब उठने स्वयम् लगे हैं ।
पः डगमग-डगमग हिलते, वे स्वयम् खंड होते है ।
उठ कर नन्हे हाथों से, वे ताली खूब बजाते ।
खिलखिला हास वे करके, सबको निहाल कर देते ॥
मा या नृप-हाथ पकड वे हर्षित स्व अजिर मे चलते ।
या कभी स्वत भी चलने, का साहस करने लगते ॥
ठो पग ज्यों ही वे चलते, वैसे ही है गिर पडते ।
पर नहीं हार ले का के, कुछे बैठे ही वे रहते ॥
वे पुन खडे हो का है, चलने का यत्न सजाते ।
क्रम-क्रम चलने में यों हो, वे पारंगत है हाते ॥
यों लख कर शिशु की दृडता, अध्चर्य चकित सब होते ।
सब के भी चकित वदन लख, शिशु वईमान मुस्काते ।।
उनके ही मुस्काते सब खिलखिला हास है ऋगते ।
जैसे दिनकर को लख कर, अनगिन सरसिज हो खिलते ॥
सम्राट वत्स को प्राय हैं राज-भवन मे लाते ।
दरवारी शिशु-दर्शन कर, चिर आशा सफल नाते ।।
शिशु वर्द्धमान छोटे हैं, पर शिष्टाचार उन्हें ' है ।
माँ त्रिशला की शिक्षा से, अभिगदन ज्ञान उन्हें है |
सबका अभिवादन करते सुत को जव 'नृप पाते हैं ।
तो मन ही मन वे सचमुच, अति तोष-हर्ष करते है ॥
शिशु बर्द्धमान मोलेसे कटक प्रति वस्तु देखते।
उनमे जिज्ञासा रहतो, ऐसा सर्व अनुभव करते ॥
है उन्हे कमी कोई भी ले जाता पुर मार्गों से ।
तो उनका मन मोहक मख, सब लखते उकएठा से ।
२८

. महिलाएँ शीघ्र मोखो बज्जो द्वारों पर आती । लख सस्मित शिशु को वे सब, निज जीवन सफल बनाती ॥ यो राज कुमार स्वयम् भी, घूमते हर्ष है फरतें । वे नगर हाट उद्यानों, देख :मोद मन भरते ॥ पर जब तक मा त्रिशला से वे विलग •हा ared • तब तक विश्लता मे क्षण है उन्हें वितान पते ॥ व बाट जोहती रहतीं, अन्यत्र न मन रमता है । मा की कितनी कोमलतम, हातो अभिन्न ममता है || वे थों पकाकीपन में, मुत-स्मृतियों सुभग जाता । जिनमें निमम हो कर वे अपना हैं समय विताता ॥ दासी को कभी बुला कर, उससे है बात करती । इन बातों में भी, तो वे, सुत चर्चा ही है स्वनी ।। व कभी द्वार पर आहट, सुन दासी तुरत भेजन । शिशु आया हुआ न पा कर, कुल खोझ-खीम यों कहती ॥ जाने कब तक आएगा, प्यारा-सा मुन्ना- अपना । में कहीं न जाने देगी, उसको निश्चय यह ,अपना ।। हो जाय कहीं यदि कुछ भी, अपने मुन्ने को बंलो । मैं क्या फिर समझ रहगी, मम हृदय-दशा ते ला ॥ ठाग्गी कहतीं कि आप है, यह व्यर्थ सोचती सब कुछ । मन्ना का भाग्य बढ़ा, है, उसका होगा न तनिक कुछ ॥ -फिर आहट पाकर मा.श्री, ह,स्वयम् द्वार तक जाती । अपना मन लिए हुए सी, पा शिशु न लौट व आती ।। फिर स्वयम् उसे पाने, को, चलने को, उद्यत होती इतने में, मुन्ना आतावे अमित मोदमन करती ।। जब मन्ना आ जाता है, तो मानों माँ त्रिशला के साचात रूप , आ जाते . उनके मानुस प्राणों के ॥ शुक्र निहाल हो जाती, मुन्ने को गोद उठा कर । मुन्ना भी मातृ मङ्क, में, हसता है हर्षित हो कर || - वे ર जब कभी कभी माँ त्रिशला, दर्पण लें चोटी करती । तो वे अपने सुत को तब कुछ उलझा उसमें पाती ।। वे निज प्रतिविम्ब देख कर, मन में अति प्रमुदित होते । उसको छूने को सहसा, हैं वे निज हाथ बढ़ाते ॥ इस पर माँ और उपस्थित, जन अट्टहास-सा करते । शिशु भी अपनी मस्ती में, खिलखिला खूब हैं हँसते ॥ बचपन की कैसी मस्ती, कोई छल-छन्द नहीं है जीवन का परम सरलतम, सात्विक आनन्द यही है ॥ धीरे-धीरे यों करके, हैं दिवस वीतते जाते । त्यो-त्यों त्रिशला-नन्दन भी, क्रम-क्रम हैं बढ़ते जाते ॥ अब बात चीत भी प्राय , वे करने खूब लगे हैं । उनकी बातों के रस में, सब जन भी खूब पगे हैं | अन्य मनस्क कभी जब, रहते, कोई चुपके से । ले उनके शिरस्त्राण को, दुवका"देता धीरे-से ||- वे शीघ्र समझ जाते सब, कहते 'मम शिरस्त्राणं क्यों ? हैं उठा लिया जो तुमने कुछ समझ ने पाया मैं ज्यों ? वह व्यक्ति कि जिसने उनका, था शिरस्त्राण दुवैकाया । बोला-'क्यों लेता उसको, होगा कौंवा ले” घाया ॥' इस पर शिशु वर्द्धमान कुछ, उठकर निज शिरस्त्राण ले । 'फिर कहते हैं वे उससे, *क्यों व्यर्थ झूठ थे वोले ' उनकी यह सजग सुचेष्टा, लख नृपवर कुछ यो कहते । 'निज वत्स कुशलतम शाशक, होगा ये लक्षण दिखते ॥ शिशु वर्द्धमान' के कारण, हर्षातिरेक-सा रहता । त्रिशला-गृह के आँगन में, ज्यों चाँद खेलता फिरता || उनकी कुछ बाल सुलभ-सो, चेष्टाएँ मन हर लेती । जिनमें कुशाग्र मति उनकी, नया रङ्ग भर देती ॥ ज्यों कजरारे सावन के, अति सघन' मेघ-प्रसरण' में । द्युति चमक-दमक कर जैसे, भर देती आमा उसमें ।। है अथवा पापा मुगल्फ बारल-पट पा | न्तःही इनपी फतो शोमा सुन्दातर ॥ न मानन्द, है बम खिलौने रहते । ५. तो ने स्वयम् , निन्न कार रोल रचाते ।। मनी पर भी शिमी, भपिटया बनाया करते । frनं पति में पन ह गान दुर्गला गाते ॥ गिरा का पुती को पा कर हर्ग मनाते । फि६: सर से उन गुलस्ते हार बनाते ।। इस बल्ल मामला तो उनका शुभ हस्तकला है । जिमी शशि ज्यो, अनुपम मौन्दर्य भग है ॥ गजा-गनी यह लव मब है पूलं नहीं समाते । निज सुन-सा बालक पार, निज भाग्य सराहा करते ॥ वशिश के जुग-जुग जीने की आश सजाते रहते । -निधि ६ अपना वे जापन, शुभ सास सालतम करते ॥ जब गत हुए सुन मा-गंग, लेटा करते शया पर । तो मो जो उन मुनात, कुछ लउ कहानियो सुन्दर ।। जब वे रहती-'या गजए धी रानी एफ नगर मे ।' तो मत कुमार कद देते, कुछ सुरुचि साथ उत्तर में || 'मैं सुनना नहा चाहत, राजा-रानी की गाथा । इनक सुनने में तो है, कुछ व्यर्थ पचाना माथा || मुझको तो भली लगी थी, उस दिन की क्षमा-कहानी । जिससे कि पार्सस्वामी के जीवन की झोकी जानी ॥ अब उनी भीति को कोई, माँ कह दो सत्य कहानी । मठ की सुनाओ मुझको, राजा था या थी रानी ॥' रानी फिर बोली- 'वठाजो तुमको अच्छी लगता । वैमी ही कोई गाथा, तुमको अभी सुनाती ।। श्री ऋपभदेव-जीवन की, सुस्मृत रेखाएँ जो थी । अब उनको निज शन्दों में कर रही सुभग चित्रित थी ।। . ३१

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जिनमे आफषित हो कर, शिशु मग्न हुए-रे सुनते ।
यह देख कहानी क्रम भी, नृप शामिल हो रस लेते ॥
निज शिशु की कुछ ऐसी ही, गाथाओं में रुचि लखकर |
सम्राट सोचते होगा, यह ऋपम-पार्श्व-सा नवर ॥
यों सुत-चिन्तन में नृपवर, सो जाते शान्त भाव से ।
मॉ-पुत्र नीद मे भी आ, सोजाते हे धीरे से ॥
शुभतर प्रभात बेला मे, पौ फटते ही जब हैं खग ।
माङ्गलिक प्रभाती गाते, त्रिशला कहती-'मुन्ना जग' ||
माँ का मुन्ना जब जगतो, तो नित्य नियमवत् करता ।
परमेष्टि सिद्ध को वन्दन, यों विनय भाव दर्शाता ॥
अन्तर आशीष-पिता माँ, अति रीझरीम कर देते ।
शिशु बर्द्धमान मुख पर भी, आनन्द-चिह्न हैं दिखते ॥
हँसते हँसते जीवन क्रम, सानन्द बीतता
प्रति खेल बात मे भी तो, पड रही आदतें सस्कृत ।
शिशु वर्द्धमान शैशव के, कृत्यो से प्रति मन-रञ्जन ।
हैं सदा किया करते वे वरसाते मोट भरा धन ।।
आए दिन वे तो कोई, अभिनव-सा दृश्य दिखाते ।
व बना कूप-तरु-रोसें, आंगन बाग लगाते ॥
अथवा 'ले कर वे लकडी, हैं घोडा उसे बनाते ।
फिर' चारों ओर ' विप्रतम, हैं ' दौड दौड दौडाते ॥
सस्मित ।
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वर्द्धमान की बाल सुलभ ये;
शुभ चेष्टाएँ हृदयः मोहतीं ॥
उनकी तुच्छ क्रियाओं मे भी,
मौलिक बातें अमित सोहती ॥

किशोर.बय चतुर्थ सर्ग

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बच्चे टोली में इधर-उधर, है घूम रहे कुछ मस्त हुए ।
जैसे अम्बर में बादल-दल, गडराते हैं स्वच्छन्द हुए |
ये बालक-वृन्द मुदित मन पत्र, इनमें विषाद का नहीं लेश ।
ये जहाँ पहुँचते वहीं किया करते निर्मित मुखप्रद प्रदेश ।।
मानों उल्लास हाम-जगती, इनके ही साथ चला करतौ ।
अथना कि सालता-समति हास उल्लासमाशि इनमें बसती ॥
ये तो निर्द्वन्द विचरते हैं, इन पर चिन्ता का भार नहीं ।
ये मन चाहा सो करते हैं, घूमे फिरते हैं सभी कहीं ॥
इन बचों की टोली के है, अधिनायक बालक वर्द्धमान ।
उनकी सर्वोपरि बुद्धि शक्ति, रहती उनको आज्ञा प्रमाण ॥
यह बालक टोली खेल जहाँ, अब करती-वहाँ-युगल यतिवर ।
आनिकले जिनका नाम विजय, मञ्जय जो-चारणऋद्धि-निकर ॥
इनको शङ्का यह थी - जाता है जीव मरण के बाद कहाँ !
है स्वर्ग नर्क भी या कि नहीं, या केवल मोचर लोफ यहाँ ।
यह शङ्का-शूल हृदय में था, उद्विग्न, किए युग मुनिवर को ।
जैसे कि फसि साला,करती, जिसके चुम जाती उस जन को ।
पर वर्द्धमान वालक-नायक का मुख-मण्डल -प्रभावशाली ।
लख दूर हो गई स्वयम् आप, शङ्का अस्थिर करने वाली ।
! युग मुनिवर ने इनको पाया, सु-विचक्षणः बालक मेधावी ।
कटसोचा सन्मतिः नामसुभग, मति भेद.सकी गति मायौवी ॥
-३५

इन दिग्वेषी सु-साधु जन को, श्री वर्तमान ने देखा जव ।
बोले वे सभी साथियों से चल करें साधु-स्वागत हम सब ॥
बालक घिर आए मुनि समोप, निज नायक के क्रयनानुसार ।
युग यति का अभिनन्दन करने, थे खडे हुए सब विनय धार ||
मुनि द्वय ने भी बालक गण को आशीर्वाद हो मुदित दिया ।
फिर वर्द्धमान का नाम सुभग, सन्मति' बच्चों को बता दिया !!
तदनन्तर युग मुनिवर सत्वर, थे विदा हुए अपने पथ पर ।
पर सन्मति बालक ने 'सन्मति उपयुक्त नाम पाया सुन्दर ।।
प्रतिवात खेल में अवकहते, उनसे 'सन्मति' वालक-गण सत्र ।
पर समरस 'सन्मति' को किञ्चित था गर्बन पा यह गुरु गौरव ॥
जब लौटे घर को बर्द्धमान, मॉ-पिता, समी को बच्चों ने ।
तलाया 'सन्मति' नाम रखा, जब खेल रहे वे युग मुनि ने ॥
सुन यह घटना सब मुदित हुए, माँ त्रिशला का मृद्र मुख दमका ।
कुछ स्वाभिमान की रेखा से, था नृप-मुख-मण्डल भी चमका ||
जब वर्द्धमान के शिक्षक ने, इस शुभ घटना को था आना
हर्षातिरेक त्वामाविक ही, मन-मोद ज्हों ने था माना ॥
बोले यहता- 'इस बालक का, नाम यही तो सोच रहा।
जो अमिन्त्र मैने बतलाया, वह इन्हें सदा ही ज्ञात रहा ॥
जब कमी कहीं मैं भूला कुछ, इनको लख शीघ्र याद आया ।
इनकी स-पन्न मुद्रा ऐसी, मैंने भी यह अनुभव पाया ।
व्ह स्वयम् प्रज-से लगते हैं, उनको कोई च्या शिक्षा दे ।
सचमच मुभाको ऐसा लगता, इनसे शिक्षक भी शिक्षा ले ॥
वे अध्ययन करते और खूब, नित नूतन खेल रचाते हैं।
निज जीवन को बहुमखो सौम्य, वे इस विधि सत्स बनाते हैं ।
इस जीवन को वे नव वय में, हैं सत्य वचन बोलते सदा ।
अस्तेय पालते पूर्णतया, करते हिंसा किञ्चित न कदा ॥
वे ब्रह्मचर्य से रहते हैं, विषयों में जाती नहीं दृष्टि ।
परिमाण परिग्रह में उनके, सजीवन को आदर्श सृष्टि ।
३६
मैं

इस सदाचरण परिणाम रूप, उनमे अनन्त दृढ़ता सु-धैर्य ।
बढ़रहानिरन्तर दिन प्रति दिन, उनमें साहस बल अमित शौर्य ।।
उनके साधारण कृत्यों में, है वीर-वृत्ति दिखती सदैव ।
पुरुषार्थ हेतु उद्यमी सदा, उनका आदर्श न रहा दैव ॥
इसलिए 'वीर' अवनाम पडा, विकसित सन्मति का वल विक्रम ।
साहसिक कार्य प्रायः करते, दुर्गम भी उनके हाथ सुगम ॥
मानों कि वीर्य-साहस अनुपम, आकर उनमें ही चरम हुआ।
अथवा कि सफलता से उनका, कोई अभिन्न सम्बन्ध, हुआ ||
यह बाल वीर-वल-यश-चर्चा, अब चारों ओर ठिकीर्ण हुई।
उस स्वर्ग लोक मे भी तो हॉ, सन्मति-साहस पर बात हुई ।
बोला-'त्रिलोक में कोई सुर, 'साहसनक्रिसी का सन्मति-सम ।'
इस पर लेकिन विश्वास नहीं कर पाया कश्चित सुर-सङ्गम ॥
अतए परीक्षा सन्मति की, करने की उसने मन ठानी।
अति जटिल परीक्षा कोई-सी, वह सोच रहा था विज्ञानी ।।
खेलते बाग में वर-तरूतर, जव सन्मति निज साथियों सड़।
तव सङ्गम सुर झट वन आया, अति भयकारी काला भुजङ्ग ।।
वह वृक्ष तने पर लिपट गया, कुछ भाग रहा उसका भू पर ।
विष की विषाक्त-सौ फुफकारें, अब मार रहा था वह विषधर ।।
जैसे ही बच्चों ने देखा, वे नौ-दो-ग्यारह शीघ्र हुए।
मुंह ठा उसी दिशि में भागे, वे महा भीत निर्वाक हुए ।
पर वर्द्धमान वे बाल वीर, फिञ्चित न डरे उससे दृढ़तर ।
पहुँचे तत्काल फणीश निकट, जा खडे हुए उसके फण पर ।
उसके फण पर खेलते रहे, थे बहुत देर वे अति निर्भय
था रचता क्रीडा रहा वहीं, फणधर भी मन हुआ अतिशय ॥
बच्चों ने राज-भवन में जा, विषधर वृतान्त सब बतलाया।
उद्विम हुए अति नृप-त्रिशला, जब साथ न सन्मति को पाया ।।
मॉ त्रिशला बोलीं नृपवर से, 'क्या बात नहीं सन्मति आया ।
वह जाने कहाँ किस तरह है १ 'जी त्रिशलाका अति भर आया ।
३७

मैं
नृप वोले 'तुम चिन्ता,न करो, मैं अभी ज्ञात सब करता हूँ ।
मैं भृत्य भेजता और स्वयम्, उस वाग ओर ही जाता हू ।'
त्रिशला बोलीं-'शीघ्रता करें, कोई न घटित दुर्घटना हो ।
यदि राज-वैद्य भी साथ लिए, जावे तो अति ही अच्छा हो ।
जी चाह रहा यों मेरा भी, मैं भी श्रीमन् के साथ चलें।
निज वर्द्धमान को देख सक, कैसे मन मारे यहाँ रहू ?
नृप बोले- 'तुमको साथ लिए, चलने मे तनिक देर होगी ।
कारण रथ की तैय्यारी सब, तव गमन-हेतु करनी होगी ।
जाता, नहीं विलम्ब करूँ,' कह नृपति गए झट ही बाहर ।
वे चले वैद्य कुछ जन ले कर, वन को, चर भेजे इधर उधर ।।
लेकिन अन्त पुर में त्रिशला, माता को धैर्य न कियत हुआ।
वे क्षण-क्षण पर हैं सोच रही: जाने क्या होगा वहाँ हुआ है।
दासियाँ निरत परिचर्या में सखियाँ मृदु उनसे बोल रहीं।
सब विधि से ढाढस दे उनको, हैं ध्यान वटा हर समय रहीं ॥
माँ त्रिशला कहतीं हैं उनसे, जब भी- 'अब जाने क्या होगा ??
तो कहतीं उनसे हैं सखियाँ, 'उनका न वाल बॉका होगा ।
कारण सन्मति हैं भाग्यवान, उनकी होगी अति दीर्घ आयु ।'
यह सुन माँ जी को भी ऐसा, लगता पाती ज्यो धेर्य-वायु ॥
लेकिन सफल्प-विकल्पों के झूलों पर हैं वे झूल रहीं।
वे धैर्यवान हो कर भी हैं, चिन्तित-सी सब कुछ भूल रहीं ।।
मों के अन्तर को कोमलता, माँ के अन्तस की मृदु ममता ।
माँ का मानस ही जान सका, क्या इसकी कहीं प्राप्य समता ?
जा पहुंचे उघर बाग में जब, सब सन्मति को टॅढते हुए ।
नृप वैद्य आदि ने देखा तन, उनको फण पर खेलते हुए ।
आश्चर्य चकित कुछ स्तम्भित, रह गए सभी जन जो आए ।
कौतूहल पर सबके मुँह पर, भय-चिह्न सहज ही दिखलाए ।
पैरों की भूमि सरकती-सी, उन सबको थी 'मासने लगी।
रोंगटे खड़े सबके आगे-बढ़ने की पर हिम्मत न जगी ॥
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तीर्थकर भगवान् महावीरो-
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खेलते बाग में बट-तरु-तर, जब सन्मति निज साथियों संग ।
तब संगम सुर कट बन आया, अति भयकारी काला भुजग ।।
बह वृक्ष तने पर लिपट गया, कुछ भाग रहा उसका भू पर ।
विष की विषाक्त-सी फुफकारें, अब मार रहा था वह विषघर ॥
जैसे ही बच्चों ने देखा, वे नौ-दो-ग्यारह शीघ्र हुए ।
मुंह उठा उसी दिशि में मागे, वे महामीत निर्वाक् हुए ॥
पर वद्धमान वे बाल वीर, किंचित न डरे उससे दृढतर ।
पहुँचे तत्काल फणीश निकट, जा खडे हुए उसके फण पर ॥
उसके फण पर खेलते रहे, थे बहुत देस वे अति निर्भय ।
था रचता क्रीड़ा रहा वहाँ, फणधर भी मग्न हुआ अतिशय ॥

तीर्थकर भगवान् महावीर
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पर महावीर ने जाना जब, इम उन्नद हाथी का वृतान्न।
उत्पान जहाँ यह गज ऋता पहुंचे उन थल निर्मय नितान्त ।।
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वे सिंह महश केहरि मम्मुत्र, जा खड़े हुए भय-भाव-रहित ।
नदनाता हाथी उड उटा, झपटा इन पर अतिवेग-महित ॥
पर वीर तूड से बड़े शीघ्र, उसके नट विगलिन मस्तक पर ।
गज नहह्मगया नद भूल गया, पा शामन सन्नति का शिर पर ।।

हुए। - लेकिन वे वर्दमान निर्भय उस सर्प-साथ खेलते रहे । पर एक दूसरे का मुंह वे, आगन्तुक गण देखते रहे || लेकिन सन्मति को कुशल देख नृप को साहस कुछ तोष हुआ। इतने मे हो सङ्गम सुर को, आगत जन-संकुल-बोध हुआ । वह स्वाभाविक स्वरूप मे झट, आया सन्मति को उठा लिया । बैठाया निज़ कन्धों ऊपर, आनन्द-सहित, मन हर्प किया ।, पहुंचा वह स्वयम् वीर को ले, आगन्तुक स-जनो के समीप । 'तमने यह क्या था खेल रचा १ सङ्गम सर से बोले महीप-॥ उत्तर न देव कुछ दे पाया, सन्मति उतरे झट कन्धों से । सम्राट निकट जा खंड हुए, वे स्वस्तिवाद कर सब जन से ॥ नृपवर सन्मति के शिर पर अव, थे हाथ फेरते, खडे सङ्गम-सुर-उत्तर सुनने, क्रो, मानों वे केवल रुके हुए । बोला सुर-'खेल कुतूहल जो, समझ पर शौर्य-परीक्षा-हित । मैंने यह था सब ढोंग रचा, पर हुए वीर वर इसमे जित ।' नृप ने फिर पूछा- 'देवराज ! क्यों शौर्य-परीक्षा की ठानी, ।' तब उत्तर में वह बोला यों, जाज्वल्यमान स्वर्गिम-प्राणीं ।। 'जब स्वर्गलोक मे बात चली, सन्मति-सम जग मे शौर्य नहीं ।' तब मै विश्वास न कर पाया, ली अतः परीक्षा जटिल यहीं ॥ यह सन्मति केवल वीर नहीं, ये तो सच अतिशय, धीर वीर । मैं तो कुछ सोच समझ इनका, हू नाम रख रहा 'महावीर' ।। यह यथा नाम है तथा गुण, इसमे कोई 'अत्युक्ति नहीं । सबके अन्तस,मे यही बात, सत्य बनी अब गज रहीं ॥ नृप, ने शावासी दी सत को, अति ,हर्ष समाया सबके मन । बोले नृप-'शीघ्र चलें घर, माँ, इनकी इन-विन होंगी उन्मन ।' सुर ने सन्मति को पुन उठा, अपने कन्धों पर विठलाया । सवक्रे फिर साथ चला, पुर, को, हर्षातिरेक सा हो आया । जा पहुंचे सब प्रासाद निकट, माँ त्रिशला खडी द्वार पर थों । सखियों संग बाट जोहतीं वे, सत-मिलन हेतु अति आतुर थीं । " Citor जब देखा सुन के कन्धों पर, वालक सन्मति को चढ़े हुए । तो वे प्रमदित लेकिन विस्मित, भाव तिनहित शीघ्र हुए । वे भूलों-सों देखने लगों, सन्मति को निनिमेष दृग से। पर वर्द्धमान झट देख उन्हे, उतरे सङ्गम के कन्धं से | आ पहुंचे वे मां के समीप, शुचि प्रेम पगा सस्वाद किया । मॉ ने दुला से आशिष दे, सुत ने अङ्क में ला लिया । नृप गज्ञा, सखियाँ सर, सन्मति, फिर अन्दर गए महल प्रशान्त । इतने मे नृप ने बतलाया, सब देव-परीक्षा का वृतान्त ॥ सम्राज्ञी बोला-'देवराज यह खेल तुम्हारे लिए न्हा । यदि हो जाता कुछ सन्मति को, ता जाता उस दर सहा ।। सचमुच जोवन तब मुश्किल था, हम तो सुत भन ही जीते हैं। उनके विन तो सब काम घाम, लगत हमको अति नेते हैं।' सुर बोला-'माँ जो ! वर्द्धमान, हाते इतने यदि वीर नहीं । तो सुन पगेक्षा की नौवत, ला सकता थी किञ्चित न कहीं | फिर भी मे चना मांगता हू, श्रीमती आपसे भूपति से । पर वर्द्धमान होगे प्रसिद्ध सच 'महावीर' जग में अब से ।। इतना कह कर सुर सङ्गम ने, ली विना उपस्थित सब जन से । कर नमस्कार वह चला गया निज स्वर्गलोक को भूतल से || यह घटना कई दिवस तक थी, वन गई विषय जन-चची का । नृप-राज्ञो स पछता अगर कोई वृतान्त इस घटना का ।। तो वे बतलाते मन्न हुए, प्रमुदित जो हुला घटित श्रोता तन्मय हो कर सुनते, करते सन्मति श्लाघा हर्षित ।। सम्मानित होते वर्द्धमान, अव 'महावार' शुभ सज्ञा से | लेकिन उनमें अभिमान नहीं, बाहर-भीतर व समरस से ।। सागर-से व गम्भीर-धीर, त्राकाश सध्श विस्तीर्ण दृष्टि । योद्धाओ से बढ़ अतुल शौथे, पर हृद-ऋजुता की मृदुल सृष्टि ।। त्रानन्द सहित दिन बीत रहे, सन्मति हो आए अव किशोर । साहसिक कार्य करते रहते, चिन्तन में मी रहते विभोर ।। कुछ था

है
सामाजिक कार्यों मे उनको, रहता किञ्चित सङ्कोच नहीं ।
जन-हित निज प्राण-समर्पण म, होता कुछ उनको सोच नहीं ।।
एक दिवस की बात कि जब, गज हुआ एक अति मदोन्मत्त ।
झन्झा-सा भगता इधर-उधर, स्वच्छन्द हुआ मद में प्रमत्त ।।
वह लौह-सॉकले तोड-ताड़, भागा था हाथीखाने से ।
ज्यों काल मूर्त हो दौड रहा, गज मिस उन्मुक्त हुआ जैसे ॥
हस्ती-पग-तल मरते अगणित, जन जो भी पथ पर आ जाते ।
पर असह्य वेदना से वे सब, तज रहे प्राण थे चिल्लाते ।।
थे सभी महावत चडाए, वश कर न सके गज मतवाला ।
हिम्मत परास्त थी हो जाती, देखते जभी हाथी काला ।।
गण्डस्थल से मद चूता था, चिंघाड रहा घन-गर्जन-सा ।
अतिशय विशाल जस्तोड रहा, वह महा भयानक राक्षस-सा ।।
पर महावीर ने जाना जब, इस उन्मद हाथी का वृतान्त ।
उत्पात जहाँ यह गज करता, पहुंचे उस थल निर्भय नितान्त ।।
रोका सब ने श्री सन्मति को, पर वे न रुके साहसी अतुल ।
वे अभयदान नागर जन को, देने को मन में थे आकुल ॥
वे सिंह सदृश केहरि-सम्मुख, जा खडे हुए भय भावरहित ।
मदमाता हाथी सॅड उठा, झपटा इनपर अति वेग-सहित ।
पर वीर सॅड से चढे शीघ्र, उसके मद-विगलित मस्तक पर ।
गज सहम गयामद भूल गया, पा शासन सन्मति का शिरपर ||
दर्शक थे सब आश्चर्य चकित, इस पौरुष साहस से विस्मित ।
कर उठे प्रशंसा भूरि-भूरि, गज पर बैठे सन्मति सस्मित ।।
पहुंचाया गज को यथास्थान, सन्मति फिर लौटे महलों में ।
माँ निकट खडे वे विनयवान, माँ हुई मुदित निज अन्तस में ।
वे बोली- 'बेटे कहाँ गए, मैं तो तुमको थी देख रही ।
गज मदोत्पात कर रहा यहाँ, सुन कर तब से कुछ सोच रही ॥
आशङ्का में मन डूबा था, पर शकुन हो रहे पल प्रति पल ।
इसलिए हृदय कुछ सन्तोषित, पर बाट जोहता तव अविरल ।।

'लेकिन मो जी ता लानी तो कर कर भाषा हार हा ।
यदि क्रिया न जाता वर वश तो कंग टलती या रियति ।
नतने मे गाए ही नपवर स्वागत गति ने गहन किया।
आशीर्वाद तव भति ने ति हपित हो उन्हें दिया ।
वोले वे त्रिपला ने, 'साना-सन्मति ने बह गज म्नवाला ।
व्श कर न सके जिनकी येला पोलान व्श डाला ||
हम मत्रि प्रवर सोच मे
कैश में गज किया जाय ।
पर साधन हो सब तिफल , कोई न झता था उजाय ।।'
'श्रीमन् कैमे हे नृपति कि जो, गज एक मत्त वश क न सके ।
जिस पर सन्मति मे बच्चे भी, अपना शासन हे जमा सके।
अब त्याग-पत्र टे नृप-पद से, त्रिशला सव्यङ्ग बोली एये ।
तब कहा नृपति ने उत्तर मे-'तुम ठीक कह रही हो मुझमे ॥
मै भी ऐसा ही सोन रहा, सन्मति को राज-तिलक का है।
लँ मैं विगम अब शान्ति महित तव सञ्चित अभिलापा भर दे ।।'
इस पर सन्मति कुछ कहने को, पर कहा नृपति ने कुल पहले।
तब शान्त न्हे शम बर्द्धमान, वे शब्द न कोई थे वोले ॥
नृप थे उनसे बोले-'तुपने, जीवन को कुत्र परवाह न की।
पर भला हुआ उत्पात-शमन, वच गई जान अगणित जन की ।'
ऐसे समयों पर पर्द्धमान, प्राय कुछ करते बात नहीं ।
वे तो शम दिखते हैं निरुपम, उनमें उच्छृखल-दृष्टि नहीं ।
पर मात-पिता का मृदुल हृदय, मन फूला नहीं समाता है
कारण इसका शायद लगता, सुत होने का शुभ नाता है ॥
तदनन्तर थे दरवार गए, सिद्धार्थ नृपति जब सन्मति सँग।
तो सबने स्वागत पूर्ण किया, मानों ले कर नूतन उमॅग
॥

नियमित कार्यों के बाद चलो, चर्चा उस केहरि घटना पर ।
'है धन्य कुमार किया वश गज' वार्ता मे बोले मत्रि प्रवर ॥
पर मूक रहे वे विनयवान, मृदु वर्द्धमान सुन निज बखान ||
अब अन्यमनस्क विलोक रहे, वे द्वार-पार कुछ आसमान ।
पर बोला कोई नागर जन, 'उत्पात-शान्त शत धन्य इन्हें ।
अब अभय मार्ग पर चलते सब, कह रहालोक 'अतिवीर' इन्हें ॥
जनता के प्रिय बन गए 'वीर'
'महावीर' और 'अतिवीर' हुए।
सन्मति किशोर यश-शोर हुआ,
चहुंओर वीर गम्भीर हुए ।

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• विराग
पंचम सर्गः
तरुणाई एवं

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तरुण विकसित मजु तन में, वेणु बजती भावना की ।
कौन हृदय खसोटता ? क्या सुप्त रेखा वासना की ।
कामना के गीत गाने को, हृदय आकुल हुआ-सा ।
मधुर जग मे सञ्चरण हित, मन-विहग व्याकुल हुआ-सा ॥
कल्पना के सौम्य नम में, पख मन-खग खोलता-सा ।
मुक्त उडने को इधर कुछ, कुछ उधर वह डोलता-सा ॥
मदिर सम्गम के सुरीले, तार झन झन कर उठसे ।
और 'स्ल-भुन शब्द सुनने को मचलते भाव जैसे ॥
चाह की मृदु चाँदनी है, फैलती-सी उर-गगन मे ।
नाचता-मा मोर मन का, हो मगन ससार-वन मे ॥
मोह-आकर्षण रंगीले, जाल कुछ फैला रहे-से ।
बाँधने अभिलाष-पक्षी, कर रहे थे यत्न जैसे ||
किन्तु सन्मति सूक्ष्म दृष्टा, देखते सब हो सजग-से |
चेतना में लीन सक्रिय, विज्ञ यौवन आगमन से ||
जानते वे काम उग-सा, है रहा मानस पटल पर ।
सूक्ष्म और अदृश्य जिसकी गति रहा चुपचाप पय धर ||
प्रथम ऊषा की किरण-सा, यह हृदय रजित बनाता ।
किन्तु भावी के लिये यह, विश्व टलदल में फंसाता ॥
'अहे यौवन ! इन्द्रधनु-सी, छिटकती तव छवि निराली ।
नाच उठती कामना के, नीर-तट पर मन-माली ।'

चंटगी । सोचते एकान्त मे यों, वईनान प्रशान्त मुद्रा । 'यह जवानी है नशोली, रच रही जो मदिर तद्रा ॥ शुद्ध 'म का रूप कब है ? यह नशा है धमनियो का। रक्त का उदंग कह लो, यह स्वरुप नत्रातमा' का ॥ मोह, ममता, लोम, रति, धन, हुए हावा तरुण वय पर । आवरण नित डालते य, ज्ञान के शाश्वत निलय पर । और प्राणी सोचता कव, यह जवानी भी लुनानी । थिर न रह सकती कमी भी, अथिर इसको चिर कहानी ॥ हे जवानी | किन्तु मुझको, तु नहीं भग्मा संगी । तू न मेरे मर्त्य तन में, काम-तरु पनपा संकगी ॥ क्योकि मैने है न खाया, शुद्ध ज्ञान विवेक-साथी । अत पास न आ संकगा, काम का उन्मत्त हाथी ।। शुद्ध चतन-भाव-नभ मे, जूतना मगे कल्पना क्रियमाण ग्नकर, त्याग-खा पर उंगी ॥ बँधा मेग 'पातमा' जो, दह की जड जेल में है। उसे निश्चय एक दिन तो, मुक्त करना हो मुझे है। मुझ लगता, हैं कि जब तक, लोक इच्छाय मधुन तम | कर्म-कोल्हू मे जता हू, दैल-या बनकर अचम्तम् ॥ अत जग की एपणाऐ, न्यूनतम करनी मुम ह । ह विषम पथ | भाव मेरे, दे रहे न्योता तुझे है ॥ मुझे अस्थिर रूप जगका, दिख रहा चारो तरफ है । अन्त परिवर्तन सभी के, शीश पर चुप नाचता है ।। कहाँ हे व राम लक्ष्मण स्ती सीता-सी शिंगर्माण । वीर योद्धा, चक्रवर्ती, हे को उनकी मुकुट-माण ॥ काल के ही गाल मे है -ल: जीवन । हमारा। तहिन ऋण-सा यह अधिर है, रत्न जीवन का इलाग || अत. निश्चित मृत्यु मुझको, सब तरफ दिखला रही है । है न इससे शरण जगम, विश्व-गति यह गा रही है। : १८,

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सदक्रियाएं शुभ्र
वीर्य-रज से देह उपजी, छो अचि अवतार है यह ।
चर्म बेष्टित हाइ मज्जा, रक्त का आगार है यह ॥
कौन इससे घृणित अतिशय, वस्तु जग मे हा सकेगी ।
ना मुखों से मैल बहता, रात दिन क्या लाभ देगी ||
विप मरा जैसे कलश हो, रोग शोकों का पिटारा ।
किन्तु फिर भी लीन इसमें, जीव सहता दुख विचारा ।।
मोह का पर्दा पडा है, ज्ञान-ज्योति न मिल रही है।
इसलिए इस जीव की तो, भ्रमण की गति हो रही है ॥
भ्रमित प्राणी ठेह के हित, नवल इच्छाएँ सँजोता ।
कर्म पुढगल का निमत्रण, आस्त्रव यों नित्य होता ॥
मित्रा कर्मों के न जग में, और जो मम अहित कर ले।
कर्म का ही आगमन, जो पुण्य पीडा में बदल दे ||
भावनाएँ श्री क्रियाएं, खींचतीं है कर्म रहतीं ।
इसलिए सद्भावनायें,
रहतीं ॥
मोच के हित किन्तु हमको, चाहिए सब कर्म का क्षय ।
अत आना रुक सके, ग्पुि - कर्म का, हो दर जग-भय ।।
पञ्च व्रत शीलापरिग्रह, मत्य औ अस्तेय करूणा |
अनुसरण हो, पञ्च इन्द्रिय की विजय की वहे वरुणा ॥
इस तरह हों वन्द कर्मों के लिये निज क्रिया द्वारे ।
तभी सवर, हो सकेंगे वन्द सत्र के किनारे ॥
वन्द जव आस्त्रव हुआ तो, कर्म सञ्चित जो पुराने ।
साधना की अग्नि में वे, तब सभी होंगे जलाने ॥
क्योंकि हो जाते किसी विधि, यान मे जब छिद्र किञ्चित ।
तो कुशलतम पोत चालक, वन्द करता छिद्र निश्चित ।।
वाद में फिर पोत-वाहक फेकता आया हुआ जल ।
इस तरह जल-यान करता, ठीक, वह होता न वोमिल ॥
यो स्वचेतन यान के सब, बन्द आस्रव-द्वार करने ।
और सञ्चित कर्म-जल-कण, निर्जरा से वार करने ॥

- पार होगा इस तरह यह, विश्न-जल से 'यान अपना । और पायेगा सहजे हो, मोक्ष-तट-चिर लक्ष्य अपना ॥ सोचता क्या' लोकरचना, द्रव्य छः का खेले लगता। काल धर्माधर्म चेतन, शून्य जर का योग दिखता ।। एक पुद्गलें दिख रहा है, और द्रन्य अदृश्य सारे । किन्तु संसृति चल रही है, एक 'इसरे के सहारे ॥ नर्क पशु सुर मनुजे गति में, जीव मोही घूमते हैं । कर्म के अनुरूप अपना, भाग्य नित ही ढालते हैं । मोह के वश जीव-जा की ' भेद दृष्टि न समझ आये । कर्म छिलका हेटे चेतन-धान से "तो जन्म जाएं ॥ ज्ञान' संत दुर्लभ जगत में, भोग-सम्पति सबै मिलें है। पर यथार्थ सुबोधि विन तो भ्रान्ति वश जंग में स्ले हैं | धर्म का बस एक सम्वल, जो जगत से पार करता । वस्तु का निज रप ही तो, धर्म सत् है मुझे दिखता ।। किन्तु जग में आज तो है, धर्म की विकृति हुई अति । स्वार्थ-साधन बन रहा यह, बलवती हैं हिंस्र जमति ।। दूर दुःस्थित यह करेगा, अब यही मन ठानता है । सत्य करुणा आत्म-थिति को, धर्म सत् मैं मानता हूँ ॥ सहो'श्रद्धा मान चारित की · त्रिवेणी जीव तुमको । स्नात करके, यह करेंगी, दूर तरे विश्व-मल को , इसलिये सन्मति स्वयं अब, दूर भौतिक दृष्टि से हैं । सत्व की अनुपम तो पैर, आत्म निधि वे तोलते हैं । प्राय एकाको हुये वै, ' भीव ऐसे ही गसँजोहें । बाह्य आकर्षण रगीले, अंब'न किश्चित मी रिमति ।। देख सन्मति की दशा यह, मात-पित कुछ सोचते यों । ये अभी से ही विरागी, लग रहा है, हो रहे ज्यों ॥ है तरुण य हुई ईनकी, व्याह करना इट हमको । बाद में दुस्तर । बनगों, सैमीनी हमें इनको ॥ ५१. - -- 1- । - - सौम्यता सम्बन्ध गोडे दृटने के हेतु- स्व जन । भेज नृपवर ने दिए हैं, जो रुशल है मोदयट म्न || वर्द्धमान स्वल्पवल की, कीर्ति में थे: सभी परिचित । निज सुता सम्बन्ध हित यों, बहुत से नृप- हुए उद्यत ।। ज्वकि राजकुमानियों -ने, बात सन्मति की सुनी तब | रहज कल्ने लगा उनका, मन्स मानस -मदिर कलरव ॥ कामना के स्वप्न त अव - कान्हे विन-प्रकृत-निद्रा--- रक्त यौवन का मन्दि -यह, मृदु-नशीली मत्त द्रा- किन्तु नृप सिद्धार्थ त्रिसृता-ने सुना विवण सभी का । ल्प, ग, लावण्य गुस्स-की- दृष्टि से विस्तार उनका || तो कलिङ्गाधिप सुता; पर- शुम यशान नाम- जिसका |-- मुग्ध हो आया हृदय अति, सुत-क्-हित हेतु उनका ॥ -; मात्र- त्रिसला और-नृप के, जब कलिङ्काधीश ने भी । । ज्ञात कर पाये तमी वे, शीघ्र आए. ले-शिविर भी ॥ नाम था, नितशत्रु, इनका निज-सुता को साथ लाए । देख जिसका रूप गुण, सिद्धार्थ-त्रिसला- मुस्कगए 1127 TE स्त-वधु के सम्बरण-हित, -वे सभी विधि से लुभाए । 1' प्रश्न-पर यह चात कैसे, कौन सन्मति को सुनाए । नृपति बोले, 'तुम्ही त्रिसला. वृत्तसन्मति-को- बताओ और उनको किसी विधि भी न्याह करने को मनानो ॥ क्योंकि तुम-ही-साघ-सकती; बात यह-मेये समझ में । मातृपढ के जोर से-तुम्ः मना सकती हो तविक में ।' 'मैं अभी तैयार लेकिन, -आप भी आना वहाँ पर । दिया उत्तर राज्ञिवर ने-'अपका-व्या -वह न सुनवर- - नृपति वोले विह्स, अच्छा रात जव होगी अभी तव । " व्याह का प्रस्ताव रखना, बीर के- सम्मल सु-नीरव ॥ वाद में मैं आउँगा व मुष्टि करने को तुम्हारी पूर्ण होगी इस तहि से, समन्ता डछा हमाप्ती॥ -

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- वर्द्धमान स्व-कक्ष मे थे सोचते बैठे हुए वे । आगई सम्राज्ञि त्रिसला, निरत विनयाचार मे वे ॥ भक्ति से कर विनय स्वागत, उच्च आसन पर बिठाया । स्नेहयुत आशीष-वादन, मात से सुख-पूर्ण पाया ।। प्रेम से बोली जननि मृदु- 'प्राय रहता सोचता-सा । तु अकेले में हुआ क्या, मनन करता साधु जैसा ।' 'कुछ नहीं जब तब कभी मैं, लोक क्या है ? स्वय क्या है । इन्हों प्रश्नो मे, रसा-सा, सोचता रहता यहाँ है ।' 'बन रहे तुम तो अभी से, दार्शनिक से इस जगत मे।' 'नहीं इतने में ही से हो गया माँ दार्शनिक मै ॥' किन्तु त्रिसला मृदुल बोली- 'वत्स, मेरे आश-दीपक ! एक चिर अभिलापू मेरी, क्या भरोगे -कुल-प्रदीपक ।' 'कब नहीं आदेश माँ तव, कहो मैंने है निवाहा । मैं सदा निश्चित करूंगा, आपने यदि उचित, चाहा ॥' 'उचित, का बन्धन कहो क्या, वत्स, तुमने यह लगायी । अन-उचित क्या कहूगी, मम, तुम्हीं मे सब कुछ समाया ॥ सुत-बधू औ' पौत्र-दर्शन, "की-हदय- चिर, साध साधे । आज आया समय वह जब, तू सफल मम आश-कर दे।' वीर विस्मत मुस्कराए, 'भोह का यह जाल- कैसा 3 मात ममता आपकी यह, कर रही जो. प्रश्न ऐसा', । आगए सिद्धार्थ नृप भी, इसी वार्ता के कथन मे । किया सम्मति ने विजय युत, पितृ-स्वागत निज मनन में ॥ उन्ह भी दे, उच्च आसन, आप बैठे उचित थल पर, प्राप्त कर आशीष उनकी, था मुदित अतिवीर-अन्तर ।। नृपति बोले, मोह,, ममता, की चली, त्यह बात कैसी ? तरुणवय सन्मति तुम्हारी, फिर, कहो कैसी उदासी ? कह रहे सन्मति, कि सहसा, मात त्रिसला ने अहा यो । 'व्याह का प्रस्ताव स्वखा, वह अस्वीकृत किया है यों || - - - स! ते * तम हो जानता मैं भी तया यह । बाम गमल्याण के हिव, दुश सत्त ही जन्म बना। तुम रोग साधु-त्रा समय पर फरले जरा दो । अादि तार अपम रत, पा सस्ता भी बना लो ।। स्वामी ने प्रथम तो गृहन्याम ही बसाया । बाद में पिन त्यागर-भादरों को भी पा निभाया ॥" ाि उस में बस या, पुन प्रिम ने अति पित्तय युत । सार, उनकी आयुष थी, तीन पल्मों की स-विस्तृत ॥ किन्त मी आयु उनणे, बीथियाई मी नहीं है भारत का तिम्लन र अत. कला शुभ नही है ॥ मिन्नु बोली गात विस्ता- 'वत्स! क्या पूरी न होगी ! आर तय माता पिता को ध्या मारी ही गेहगीर मात कमी मार गई, शब्द निम्त आपके यह । *मिनियों सी सुख सापक मन्मुस सुका कह।। Team सनात जग में है। अमित हो। योग मान-नि , म र मेरे बात है ॥ पदों अब मिट गए स्य, मोह किम्मानिता का निभाऊँ ? समया मनार में सब, आपको क्या, मैं. बताऊँ। देवठा मी ४ मनुज के, जन्म पाने को तरसते । प्यो कि नर तन प्राप्त पाक, त है. पाल, सकते ॥ पुन प्रिय या वात सी विश्व सुन्दरि-जो यशोदा । गुगावती मृदापिणी विद, जो त्वनेगी सर्व सुनवा ॥ तय मुसाग्गिय हित हवाई, वह कलिंगाधिप , सहित है। फित तुम्हारी बात यह त्या वस्तुस्थिति से हित , है ।" व्यर्थ में ही श्री.पिता जी, कष्ट इतना है उठाया । 'विना मेरी, रास मयों मापते, उसको सोच्छा में और कुछ है, कर रहे हैं 'आम हुन्छ , मह, मैं पहंगा साधु दोषण पूर्व निश्चय मम हुआ, यह ॥ मुलाया १ .

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I shir आज नारी इस जगत में नही गई वस भाग का रस ।
! बानप्रस्थी रख रहे हैं, भोग-हित युवतियोः दश-देश ॥
हो रही हिंसा: चतुर्दिक धर्म के हो नाम , पर है।
मंसि लोलुप व्यक्तियों का सधैं रहायों स्वार्थ नित है।
IF दीन पीडित प्राणियों की..गायटनाएर चि काहे ।
'/ कर रही आहान मे आज जग्वं यातनाएँ ॥
यन के मिसा हो रहा जोदष्ट 'जन, का स्वार्थ-साधन ।
मुझे जिसका पूर्ण करनए धर्म का ही, पंथ विघटन, ।-
मैं, न हिसा, को मिटाना चाहता हूँ हिना जल से ।
।। मैं वुझाऊँगा अनल, यह, मृद अहिंसा के सलिल से ||
अत. मुझको इष्ट अव. है; नहीं परिणय यह रचना :
ब्रह्मचर्यादर्श मुझको, विश्व के हित है दिखाना ||
| ar: मूक थी त्रिसला सुदेवी, किन्तु नृपयर ने कहा यों ।
। राज्य का आदर्श भी तो, तुम्हे खना चाहिये यों ।'
किन्त सन्मति ने कहा यो, 'राज्य तो ,ससार वन्धन ! :
नित बढ़ाता और रचता, कर्म का यह जाल क्षण-क्षण- -
राज्य-लिप्सा, भोग लिप्सा, मिटी किसकी, इस जगत मे ।
अग्नि यह वह जो धधकती, इत्य हित हो हर समय में ॥
है बुझी कब प्यास तृष्णां - प्राणियों को किसी विधि भी ---
गृहण करता सरित जल-नित, तृप्त पर जल-निधि कमी भी १ ----
चक्रवर्ती मी नृपतिनगण, कहाँ इस जग भे रहे हैं।
। मृत्यु से ही हार खाकर, अन्त में जम से गये हैं।
भाग्य से प्राया नहीं यहा मनुज-तन का उचित, साधन ।
क्यों न फिर मैं कर्म-दय हित करूं मुनिव्रत का प्रसाधनः।। .
I TEE इस तरह से जीव के है,, छूट। सकते. कर्म सारे ।
: पहुँचासमता इस तरह वह, विश्व-जल-निधि के किनारे ।'
नृपति त्रिसला,देखते मुख, मौन आपस में जब
कहा नृप से किन्तु सहसाद राशिवर ने शान्त नोरखा :

मैं
॥
"पार्ट! अब तोव्यर्थ लगता व्याह हित इनको मनाना ।
ये विरागी, रोककर लाब, व्यर्थ इनका दिल दुखाना ||
सुखी अब हो नहीं सकते, ये गृहस्थी-जाल में हैं ।
और इनको देख उन्मन, हम ने रह सकते सुखी हैं ।
'शुमे । कहती ठीक इसका साम्य-ऋजुता से पगा मन ।
और भोगों के घृणित, जग से भगा इनका मु-चेतन ॥
नीड शाश्वत प्राप्त-हित हृदु, है हुआ इनका सु-जागृत ।
दुखी जीवों को सु-करुणा, दान देने को समुद्यत ॥
नृपति का सुन यह सुउत्तर, राज्ञिवर बोली स्व-सुत से ।
'मैं नहीं अब रोक सकती, पुत्र प्रिय तुमको सु-पथ से ॥
किन्तु ममता एक मेरी, जग रही है कष्ट कैसे ।
तुम सहोगे शीत, वर्षा, ग्रीष्म के दृख बज्र जैसे ॥
'किन्त मात विवेक शीला, भूलतीं तम इस जगत मे |
नर्फ से दुस महा रौरव, सह चुका वहबार हूं
ये न दुख उन-से भयाभय मरण-जन्मों के जटिल-से ।
फिर न माँ तव पुत्र ऐसा, जो डरेगा सकटों से ॥'
'जानती सन्मति तमे में, जन्म से तू साहसी है ।
और तेरे धैर्य से ही, बॅध रही हिम्मत मुझे है ॥
मोह का आवेग सच यह, जो कि निकले वचन ऐसे ।
तुम कहीं जाओ जगत मे कामना वस रहो सुख से ॥'
कराठ भर आया स-माँ का, किन्तु साहस कर कहा यह ।
किवली हो जब करोगे- विश्व-हित, होगा सु-दिन वह ॥
'धन्य मा श्री धन्य !' सहसा, विनत सन्मति सहज बोले ।
'धन्य आर्यादर्श महिला' नृपति मुख से शब्द निकले ॥
भाव गद्गद् थे सभी के किन्तु नृप भर स्वास बोले ।
'वत्स ! मम स्वीकृति तुम्हारे, हित सफलता द्वार खोले ॥
राजि-नृप किस हेतु आए, और अब क्या होगया है ।
है सु-बलिहारी समय की, यह विचक्षण क्षण नया है |

'चिर ऋणी हूँ आपका मैं विनययुत थे वोर बोले ।
कहा तदनन्तरं उन्होंने, परम श्रद्धा भक्ति-धीले ॥
धन्य पिताजी घन्य जननि मम्, “
धन्य धन्य आदर्श ‘ललाम ।
चन्य भाग्य मम मिले श्राप सम,
मात-पिता अनुपमै अभिम र

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अष्टम
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अभिनिष्क्रमण,
एवं तप
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हो गया • समरस सवेरा, 'फैलता मालोक ।
रागतम छिपता दिखाता,चिरविरति का लोक ॥
जागते अब नींद से -सन्मति, कि उगता"सूर्य ।
है लगा उनको 'बुलाते,. 'साधना के तूर्य ।।
'ओम् सिद्धान्त वन्दन, शोश' विनंत सभक्ति।
पूर्ववत फिल जग उठी बह, भावपूर्ण विरक्ति ।।
चल घरू अब साधु दीक्षा, सोचते यी वीर ।
जिन्दगी हो पूर्ण, काटें कर्म' की जजीर ॥
धन्य में जो मात-पत ने, की मुदित स्वीकार -
मम तपस्या प्रार्थना भी, अव न सोचविचार ||
कर रहे जब चिन्ठवन, यों,-वीर-निज मि/लीन।
प्रशम -लौकान्तिक सुरपगण, आगए रति-हीन ||
आ किया वन्दन, विनयःयुत शान्त वे मतिमान ।
और बोले, ""धन्य"स्वामिन् :आप हैं धीवान ॥
आपने यह सत् विचारा, है अथिर संसार, ।,
सार इसमें है नहीं. कुल, मोह “का आगार ।।
आपने मुनिव्रत- गृहण का छद किया-सु-विचार ।
जन्म सार्थकता मनुज की, मोक्ष का यह द्वार ॥
हैन मिलताज्यह- मनुज भव' बार-बार संदेवा।"
१, साधना सम्भव इसी में - यही मिटता देव ॥
J
-
,
६१

Batt कर्म का यह आवरण जो, किए आत्म मलीन । साधना से यहाँ होते घातिया सब क्षीण ॥ आप स्वय विवेक आलय धन्य मानव-त्न । जा रहे करने स्व-पर हित, प्राप्य दुर्गम यत्न ।। काम को इस तरुण वय में, कर रहे विभु नष्ट । हो रहे आक्रान्त जग-जन, इसी से भ्रष्ट ॥ आपकी सत्दृष्टि अन्तर, दूर सब दुर्भाव । साधना के हेतु केवल, जग रहा चित चाव ।। आपके सद्भाव-इमको नाथ ! लाये खींच । आप सचमुच हे सफल जन छोडते जग कीच ॥ देव दर्शन आपके कर दूर इच्छा भार । धन्य हम सौभाग्य पाया, 'दर्श' का उपहार ।। आपसे निर्मलं हमारे भी बने सु-विचार । है सहज जिससे सदा ही, आत्म का उद्धार ॥ आगए सन्मति पिता-माँ, वे वहाँ पर साथ । वीर सुरगण ने जिन्हे लख नत किये निज माथ ॥ देव बोले-'आप पितु-मा, के उभय आदर्श । धन्य अनुमति आपने जो, दी इन्हे सह-हर्ष ॥' ये धरेंगे साधु दीचा, आत्म मे क्रिय माण'। आत्म हितकर ये करेंगे, विश्व का कल्याण ॥ मौन थे सन्मति कि बोले, भूपवर सिद्धार्थ । यह समझ 'हमने न रोका, स्व-पर' कल्याणार्थ ॥' 'आप हैं मतिमान नृपवर, दूर दृष्टा विज्ञ । है तभी इनकों न-रोका, 'आप देव न अज्ञ ॥' देवगण ने नृपति उत्तर में कहीं 'यह बात 1 फिर कहा-'अब जा रहे हम स्वर्ग को अवदात .' और तदनन्तर किया फिर, "भक्ति' सहित प्रणाम"' ! नृपति, रानी, "वीरवर को, 'सुर गए निष्काम ।। ६२ । - 4 ." 17 बाद लौकान्तिक-गगन के, सुदृढ़ वीर विराग ।। जग गया अब तो हृदय-मे, भाव समरस त्याग । वीर बोले - 'पूज्य पितु-मो, करूंगा प्रस्थान । सोचता निज वस्तुओं को मैं करू -सन्न दान ॥' नृपति बोले ठीक है यह, दान को सवृत्ति । सोचते हम और भी कुछ दान, दो सम्पत्ति ।' भूप, त्रिसला, वीर के अब इस सु-निश्चय रूप । -दानशालाएँ गई खुल, बहुत बृहत. अनूप ॥ मुक्त हाथों वट रहा है, दान चारों ओर । दान-द्रव्यों का न फिर भी, आ रहा है छोर ॥ पुस्त अब दर पुस्त तक को, प्राप्त सबको 'द्रव्य । चल रही चर्चा-चतुर्दिक,दान यह तो भव्य ।। वीर के वैराग्य का भी, प्रकट पुर में वृत्त मोहवंश-व्याकुल हुँए सब नगर जना मृदु चित्त ॥ किन्तु सन्मति सौम्य मुद्रा, हृदय अति -गम्भीर । -निकट जिनके मोह-युत जन्, विगतामोह-समीर ।। जव चले सन्मति विपिनि को,-साथ उमड़ी भीड । -ज्यों कि पंधी जा रहे हों, छोड़कर निज नीट || करुण सागर-सा उमडता, जा रहा चहुंओर । मन क्यथित-से दिख रहे जन, दुख-रहा--भाकमोर ॥ वीर-आकर्षण-खिचे से, साथ- “जाते, व्यक्ति । -रोकने पर भी न करे, • वीर प्रतिरअनुरक्ति । पगे उनमें जा रहे हैं, वरूण बालक. बृद्ध । मोहतिज पर -वीर रजाते, हृदय करले शुद्ध ॥ किन्तु नायक का भला क्यों व्यक्ति तज दे संग १, । er. चिर सहायक व्यक्ति की क्यों प्रीति कर दें भंग ? जब कि पहुँचे ना-बाहर लौटने के अर्थ कहा-सन्मति ने विनय युतम् किन्न सकाम व्यर्थ ।। .

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साथ आये विदा करने मात-त्रिसला-भप-1
वचन कहने को समुद्यत, कण्ठ' गद्गद् रूप ।।
अत. समरस शान्त सन्मति, ने. कहा गरमीन।
'दर पुर • से आगए अव, लौटिये: धर- धीर ॥
योग और वियोग का तो, इस जगत में खेल ।-
कब रहा सयोग सब कुछ; कालः देता ठेल ||
आप ज्ञानी सोचिए यह, मोह, का उद्वेग ।
जो विकल कर रहा सत्रको, व्याज्य वह आवेग ॥
नृपति ने साहस सहित तब, कहा-'नागर बन्धु ।
व्यर्थ अव तो है बढ़ाना, मोह/का- दुख-सिन्धु ॥
जा रहे यह तो सु-पथ पर, है न दुख की वात ।
चिह्न-इनके त्याग के कुछ, जन्म से ही ज्ञान ।।
आज आया समय वह जब, यह रहे सव- त्याग ।
जा रहे क्रियमाण करने, सफल विश्व-विरार ॥'
भूप की यह बात सुनकर, मौन थे सब लोग ।
दिख रहे अति तुच्छ सबको, अवजगत के भोग |
मात त्रिशला ने कहा तव; धार उर में धीर ।
'तुम सफल हो कामना वस। यही अन्तिम वीर ।'
'धन्य श्री मात-पिता तव, ज्ञानपूर्ण विवेक ।
धन्य मै हु आपको पा, सफल जन्मा अनेक ॥
क्षमा त्रुटियाँ कीजिथे सव, जान अपना वाल ।'
कह रहे जब बात यह सुर - आगए तत्काल ॥
पुष्प वर्षा हुई नभ से; वीरः का जयनाद ।।
प्रति-ध्वनित तव किया सबने, गुञ्जरित सुनिनाद ॥
किंतु समरस आत्म दृष्टा, वीर ने सविवेक ।
सौम्या अमृत-स-घुले-से; कहे शब्द कुछेक ॥
'मृय टुलता जा रहा अब, लौटिए जन-वृन्द ।
तोडिए अब तो सु-जन जन मोह के दृढ़ फन्द ।'

धार तदनन्तर उन्होंने, मो-पिता प्रति भक्ति । क्रिया अन्तिम विदा वादन क्षीण ममता शक्ति || दिया आशिष मॉ-पिता ने, 'हो, सफल मम पुत्र । लक्ष्य हो तव पूर्ण जीवन- का खिले शत पत्र ।' शेष पुरजन से विदा भी, मांगकर श्री वीर । थे समुद्यत वन-गमन को, हदय अति गम्भीर ॥ इन्द्र ने इतने समय में, पालकी अभिराम । की उपस्थित था कि जिसका, चन्द्रप्रभ शुभ नाम ॥ वीर फिञ्चित मुम्कराये, और बोले, 'द्र ! कष्ट इतना कर रहे क्यों, आप सौग्या सुरेन्द्र ।। इन्द्र बोला, 'आपका यह, सभग-मुकृत प्रमाव । जो कि मेरे हुये आने, के यहाँ सद्भाव || राज्य-जिसके लिए करते व्यक्ति हैं उत्पात । भरत-बावलि कि जिसके हित लडे हो भ्रात ।। तथा कैकेयी जननि ने, स्व-सुत-हित कर आश । दिया रघुवर को, चतुर्दश, वर्ष का बनवास ॥ महाभारत का समर भी, राज्य के ही अर्थ । हुआ जिसमें हुए अगणित, दर्दनाक अनर्थ ॥ उसे दिनकी रेंट-सा 'तज, जा, रहे हैं। प्राप। देव । इससे और गुरुतर बात क्या निष्पाप ? धन्य है निज भाग्य पाया, जो कि ऐसा योग। आपके दर्शन सश्र पा, का मिला संयोग ।।' इंद्र आग्रह देखकर, श्री वीर वैठे शांत । चन्द्रप्रभ पालकी मीतर, सौम्य अद्भुत कांति ॥ हुए जय के नाद सहसा, गुञ्जरित भू-व्योम । उच्च यह उद्घोप, बोले ज्यों सभी के रोम || श्याम दशमी माह मगसिर, की सु-सांध्य ललाम ।। ', चल दिए वन पालकी में वीरवर निष्काम || - - और लौटे स्व-पुर" नागर।। नृपतिः राज्ञी साथ । ना किंतु'त्रिशलानन्द सन्मति, अवान उनके साथ ॥ थी विचित्र दशा सभी की, क्या कहूं उपमान ? - कभी आकुल कमीसमरसता जाना कभी अमान । उधर समतापूर्ण सन्मति, जा रहेम गतिमान । " "ज्ञातृखण्ड सु विपिन पहुंचे कामहतरावृतिवान ॥ हुए त्यागी त्यागभूषण, वस्त्र के दिग्वेष । . औरणलुञ्चित किए सारे,पञ्चमुष्ठी केश ॥ 'ॐ नमः सिद्धेभ्यः' कह वह शिला पर शांत । 7 मुख किये उत्तर न विराजे, वीरवर सम्भ्रान्त || सांध्य का ढलता समय यह, स्वर्ण-सा स्वयमेव । · विनय वर्दन कर गये, स्वर्ग को सब देव ॥ अब परिग्रह का न सन्मति - पर रहा -कुछ लेश । मान, माया, लोम रति भया आदि सबाट निःशेष ॥ सूर्य अस्तगत हुआ-सार फैलता 'तम-जाल वीररथे पर साधना-रत, भूल सब जग-हाल ॥ ने वहाँ बैठे अंचल-से, मूक नीरव गात । 11 ध्यान ही साकारीहो ज्यों ध्यान में निष्णात ॥ आत्मिक सत् दृष्टि' उनकी, बाह्य दृष्टिविहीन | 1. आरहे अब हैं न उर में, "भाव"कियतः मलीन । सघन होती जा रही है, अबे अँधेरी रात । 12 ( • कितासन्मति के लिये यह, है नभय की बात ॥ वे नहीं उद्विग्न किञ्चित कर रहे कुछ याद । ।।६ ले रहे वेत्तो'अलौकिक आत्माका सुख स्वाद ॥ समय जैसे बढ़ रहा है, जम रहा है ध्यान । "वीर को अंतर्जगत है शांत साम्य महान || ध्यान में आरूढा' इनको देख कुछ निष्पन्द । तारिकाएँ क्या गगन में, मुस्कसती मंद । - . १५ . - , किन्तु सन्मतिकप्तान त रूप जग से बंदः ।। 'वे न सुनताअब तनिकामी लोका के छवि-छंद ॥ भूख-प्यास न तनिक उर में कर सको मुछ खेद। भूलकर सब ज्यान में रम, भाव है निर्वेद ॥ रात आई ज्योंकि इनको जो डराने हेतु जा रही निष्फल ना पायाचिर-विजय का केतु ॥ छा रही प्राची नितिजापर, 'लालिमा मुस्कान ।। रवि उदय की स्वर्ण : किरणे • फैलतीं अम्लान ॥ कर रहीं जो वीर। का, ज्यों हैं सुमग अभिवाद।। किंतु • सन्मति लीन योगी, दूर हर्ष-विषाद ॥ सूर्य-किरणालोक .. में मुख, ग, कांति पूर्णापूर्व ।। साम्य-दिनार ज्योति मय-साए छकिन ऐसी पूर्व ।। फुदकते से। गाल रहे। अन्न, खगलप्रभाती नाल । कित सन्मतिको न कुछ भी, लोका का है भान || तीन दिन के ध्यान का था, अमन क्रिया, संकल्पा एक्रमासना। वहीं..दृढ़ कर रहे अविकल्प ॥ भ्रन हिलती दृष्टि मी भिर, नाशिका अन..! आधि न्याधिाउपाधि उनको। कर पाई व्यग्र ॥ समय भगता जा महा है, ध्यान में ने जीत ।। कर्म का आना स्कार हैं, ऐषणाएँ क्षीण ॥ हो गई पूरी अवचि- अब तीन दिन की सर्व । । गि प्रशम सारणा-हित, चल, दिए बिन गर्व ॥ समिति यो पालते वे, .जीवताना मात्र.-) दबन जावें जंत लघु सी, हो.न, उनके घाव ॥ विन निमत्रणाही चले वे स्मारणा के हमर्थ । ध्यान आको निज-क्रिया से छोज, घटित अनर्थ ॥ जा रहे उस ओराअब के है. जिधर कुल ग्राम ॥ वातामुलनायक जहाँगाके.सप रक्का । नाम ॥

2 , कुल नृपति ने मक्तियुत हो, कर सविधि सुविचार - . था दिया सन्मति सु-मुनि को, क्षीर रस आहार ।। कर रहे जब -पारणा विभु, देव कुंदुभिनाद । पुष्प वर्षा, रत्न वर्षा और -जय-जय नाद | हो उठा सहसा वहाँ पर, दिव्य यह सौन्दर्य । लो बहा सुरभित मस्त भी, पञ्च ये आश्चर्य || धन्य कुल नृप ने दिया जो, शुद्ध शुभ - आहार । वीर से सत्पात्र मुनि को, 'धन्य यह सत्कार || पारणा पश्चात लेकिन, बन गए मुनि वीर । साधना मे रत हुए जा, वे कहीं घर धीर ॥ ध्यान करते एक स्थल पर तीन दिन गम्भीर।।। . . फिर म्रमण कर दूसरे स्थल, जा 'पहुँचते वीर ॥ इस तरह दृढ़ भोह बन्धन, हो न पाते पुष्ट । इस तरह सम प्राय रहता, सौम्य जीवन-पृष्ठ ।। किंतु वर्षा काल मे वे एक ही हॉ स्थान ! चार मांसों तक निरतर, साधते हैं ध्यान ॥ हो विराधित ' नहीं जिससे, 'जीव-राशि 'अपार । कीट-कृमि, तरू घास का जो, रूप लेती धार ॥ और जिससे कर्म आश्रेव, हो न कुछ अनजान ।' इसलिये करते न मुनिवर, अन्य स्थान प्रयाण || वीर करते साधना सब भूल जग जजाल'। यातनायें भी न उनको, कर सकीं वेहाल || भूख की पीडान उनका, कर सकी कुंछ ' ह्रास । मास छः छः ' मास के वे मॉडते उपवास ॥ पर क्षुधा भी थीन उन पर,'पा सकी कुछ जीत । - - क्षीणं होता था कलेवर, पर नमन भयभीत ।। आत्म-दृष्टा, जानते आत्मनिजशाश्वत सदाही, फिर बनूं न अधीर ।। ३ 3 नाशवान शरीर ।

इसीविधि ही सोचकर वे, जीतते हैं प्यास ।
सूखता जब कण्ठ होते, तब न तनिक उदास ॥
वेदनीय दु-कर्म का यह, जानते विस्तार ।
है जिसे करना उन्हे यों, आत्म से हो चार ॥
जब कि जाडे हैं कड़ाके -की गिराते शीत ।।
सिकुडते जन जब कि कहते, 'है विकट यह शीत ॥'
जब कि जमती नदी, होती- उपल को भी वृष्टि ।
जब नहीं कोहरे को भी, पार, करती दृष्टि ।
अमि की जबाशरण लेते, वस्त्र पहने व्यक्ति ।
और सी-सी तदपि करते, स्व-तन में अनुरक्ति ।
योगि सन्मति सरित-सर-तट, माढ़ते तब योग ।
पूर्व के यों कर्म-मल का- मेटते. संयोग ।
और जब है। ग्रीष्म आती, भूमि बनती तप्त ।
सूखते सर-नदी-नाले, सलिल होता लुप्त ॥
सूर्य किरणें ज्वलित शोलों-- सी बरसती उग्र-1
विहग भगते छोड़ अण्डे, प्यास में अति व्यग्र ॥
जब कि चलती अनल-सी लु, झुलसता संसार ।
जब न करते मनुज, पशु, खग एक पग संचार ॥
वीर तब सतप्त, गिर-शिर, धारते ध्यान ।
पूर्व कर्मों के समिघि को, दग्ध करते जान ||
डॉस मच्छर, कनखजूरे, सदा देते, त्रास ।
पर न सन्मति कमी भरत, दुख भरा- उच्छवास ॥
शेर चीते लकड़भग्गे, हिंस्र जन्तु विहार ।
कर न पाता कमी उनमें, भीति, का सञ्चार ॥
सौम्य मुद्रा और उनका, परम ऋजु आचार ।
सर्वहित कल्पा सभी में वैर करती चार ॥
कहीं मच्छर काट ले तो, व्यक्ति कहते 'क्लश'।
वीर होते पर न बेकल, लोक बुद्धि न शेष ॥
१९
-

बाह्य-भीतर से परिग्रह, ग्रन्थि-हत दिग्वेष ।
वासना के चिह्न उनमें, थे न किञ्चित शेष ॥
वाल से वे निर्विकारी, कामनाएँ भूल ।
नग्न रहते परिग्रह तज, दुःख का जो मूल ।।
वासना रहती हृदय में और बाहर लाज |
घर न पाता अतः दीक्षा, नग्न लोक-समाज ॥
किन्तु सन्मति आत्म-शासक, विगत इच्छा-काम ।
मानवी कमजोरियों पर, विजय वे अभिराम ॥
योग और वियोग में वे, सदा समरस भाव ।
अरतिमय उनका हृदय-मन, प्रशम सम्यक् भाव ॥
मोहनीय
चरित्र कर्मावरण- यों चकचूर ।
किया करते नित्य सन्मति, यत्ल यों भरपूर ।।
रमणियों में वान प्रस्थी, भी बने अनुरक्त !
वात क्या फिर अन्य की पर वीर पूर्ण, विरक्त ||
रूपसी-सौन्दर्य-वैभव, पर न सन्मति मुग्ध ।
घवल उनका चरित पावन, श्वेत-सा ज्यों दुग्ध ॥
वीर चर्या के विकट दुख भोगते सम-भाव ।
घृमते जो पालकी में, आज नगे पाँव ।।
मार्ग ककड और पत्त्थर, शूल से आकीर्ण ।
अभय चलते पैर होते, कहीं पूर्ण विदीर्ण ॥
किंतु सन्मति को न इसकी, ओर कुछ भी ध्यान ।
निरत होते साधना में, हृदय ऋजु अम्लान ||
साधना में एक आसन में सदा आसीन ।
कभी विचलित वे न होते, कप्ट के आधीन ||
एक आसन .माढ़ लेते, गिरि सदृश निष्कम्प |
चलित उनको कर न पाता, प्रवलतर भूकम्प ॥
कभी हैं वे खडे होते, अचल कायोत्सर्ग ।
निर्जग करते प्रशम सह, प्रवल कटु उपसर्ग ||

फूल-सी मृदु सेज पर जो, शयन करते नित्य । तथा जिनकी व्यवस्था में लगे रहते भृत्य ।। अब कभी वे रात भर भी, शिला पर आसीन । भूलकर विश्राम, रहते आत्म-चिन्तन-लीन ॥ कभी पिछले प्रहर निशि में सजग सोते शान्त । एक करवट से सदा वे पर न किञ्चित क्लान्त ।। वेदनीय दु-कर्म का यों, मेटते वे लेख । और निर्मल आत्म-पद की, खींचते हैं रेख ।। कोप का आवेग उनको, कर न पाता उग्र। शान्त हृदय पयोध-सा होता न कुछ भी व्यग्र ।। कोप-कारण भी न उनमें, उगा पाता क्रोध । क्रोध-अवसर पर सदा के हृदय लेते शोध ॥ सबल होकर भी न उनमें, दृष्टिगत आक्रोष । साधु जीवन का सु-सहचर, है सुभग सन्तोष ॥ अन्य लेकिन कोप के वश, उन्हें देते त्रास । पर न बदला-क्षोभ से वे, छोडते निश्वास ॥ द्वेष या अज्ञान के वश पीटते जब लोग । पूर्व अघ-हत-समय सन्मति समझ धरते योग ।। महाभीषण यातनाएँ, क्रूर डिगा पाते पर ने उनकों, दुष्ट कष्ट अपार || मॉगते किञ्चित नहीं वे किसी से कुछ द्रव्य । गुरु अमावों में प्रशम के साधना यह दिव्य ।। भूख का आदेग हो या, हो जटिलतम प्यास । याचना फिर भी न करते, शान्त सहते त्रास ॥ याचना करना बहुत ही, दूर की है बात । मांगने के भाव तक की, लग न पाती घात ॥ पारणा में यदि कमी भी हुआ पूर्ण अंलाम । तो न वे उद्विग्न मुख पर पूर्वक्त अमिताभ || वज प्रहार ।

अन्तराय दुकर्म का यह जानते परिणाम |
यों न कहते कुछ किसी से, अन्तरंग अकाम ।।
खेद किञ्चित भी न करते, भाव से गम्भीर ।
और लाभालाभ में यों, सौम्य समरस वीर ॥
यदि असाता के उदय से, होगई कुछ व्याधि ।
तो न वे तजते कभी भी, आत्म-योग समाधि ॥
रोग का आक्रोष उनमें ला न पाता शोक।
मग्न निज मे प्राप्तकर कुछ, आत्म-निधि का लोक ।
वेदना के कर्म को वे किया करते ध्वस्त ।
आत्म से तन भिन्न लखकर, आत्म-चिन्तन व्यस्त ।
गमन करते कहीं चुभता, फैर में यदि शूल ।
को न उसकी व्यथा में कुछ, सोचते प्रतिकूल ।।
आँख में तिनका पडा तो, है न कुछ परवाह ।
चोट लगने पर तनिक भी, हैं न करते आह ।।
जान तन को भिन्न निज से, भूलते दुख-भार।
ध्यान में ही लीन रहते, आत्म-कोष निहार ॥
मैल जम जाता स्व-तन पर, पर न करते ग्लानि ।
लीन तप मे वे न पाते, आत्म-निधि की हानि ॥
डाल दे यदि धूल कोई, तो न वे उद्विग्न ।
स्वच्छ कोई तन करे तो, भी न' सुख में मम ॥
भग्न उनका मानकर दो, तो न कुछ परवाह ।
मान पाने की न उनमें, उमगती चित चाह ॥
सोचते वे न्यो, 'न है मम, उच्च तप बल ज्ञान ।
विश्व जन अब तो करें मम श्रेष्टतम सम्मान |
मान या अपमान की यों, है न कोई वृत्ति ।
सौम्य समतामय सादा ही पथ है निवृत्ति ॥
प्रौढ़ प्रज्ञा. भी न उनमे, ला सकी अभिमान ।
ऋद्धियों या सिद्धयों का भी न । उनको भान ।।

ज्ञान पाते जा रहे लेकिन, न करते गर्व ।
विश्व-जन लघु ज्ञान पा भी, 'फूलते हैं सर्व ॥
कर रहे तप दृढ़ जटिलतम, पूर्ण करने ज्ञान ।
पर न केवल ज्ञान पाते, हैं न वे भ्रममान ॥
सोचते अज्ञानकर्ता,
कर्म है बलवान ।
तप न जिसको नष्ट करता, और दृढ़ हो ध्यान ॥
अतः ज्ञानावरण कारक, समिधि प्रबल अपार ।
सबल तप-ज्वाला जलाकर, उसे करते क्षार ॥
धर्म-पथ वे 'चल रहे जो, आत्म-वस्तु स्वरूप।
"वे न शङ्का कियत करते, सत्य श्रद्धा रूप ॥
धर्म करते चपल जग-जन, स्वार्थ से संलग्न ।
प्राप्त फल होतान, होते, तो न तोष-निमग्न ॥
हीन साधन पर-न करते, स्वयं शात- विचार ।
धर्म' को दोषी बताते, म्रष्टतम आचार ॥
पान सन्मति सिद्धि, लाते -- पर न तुच्छ विचार ।
आत्म-अन्वेषण किया करते स्व-त्रुटि-परिहार ॥
दृढ़ तपस्या और करते,
कर्म करने बिद्ध ।
आत्म निर्मल कर उन्हें तो, आप होना सिद्ध ॥
एक दिन 'ध्यानस्थ सन्मति, पास ग्राम कुमार ।
बैल ले आ रहा कोई, ग्वाल मग्न विचार ॥
कार्य उसको याद कोई, आ गया तत्काल ।
'देख सन्मति को वहाँ तब, शीघ्र बोला ग्वाल ।
'जा रहा मैं गाँव को हू - कार्य है अनिवार्य ।
देखना मम बैल आता- पूर्ण कर निज कार्य ।।
मौन पर सन्मति न बोले- ध्यान मे रत भाव ।
"समझ सम्मति छोड युगवृष, वह गया निज गाँव ।।
बैल लेकिन हुए ओझल, कहीं चरते घास ।
ग्वाल आया तब न देखे, बैल सन्मति पास ॥

ध्यान में रत वीर अव भी, ग्वाल पर अति ऋद्ध।
सोचने वह कुछ लगा विन, बैल वह हत बुद्ध ।
दूर तक वह देख आया, खोज पर सव व्यर्थ ।
कह रहा उसका हृदय 'यह हाय महा अनर्थ ।।
बिना बैलों के न मेरा, चल सकेगा काम |
खॉयगे क्या वाल मेरे, मात्र प्रभु का नाम ||
भासता कुछ वैल मेरे, ले गये हैं चोर ।
क्या इसी का ढोंग, चारों का यही शिरमौर ॥
छद्मवेषी घात में रहता यहाँ दिन-रात ।
चार चेले ले सटकते, माल ऐसी बात ॥
देख अब भी बैल देदे, है नहीं कुछ बात ।
अन्यथा सहना तुमे होगा प्रवल आघात ||
मौन व्रत में लीन उत्तर, में अतः नि शब्द ।
ग्वाल उत्तेजित हुआ कहने लगा अपशब्द ॥
कान में ठोका नुकीला, दण्ड जब सुविशाल ।
पर निरर्थक वज-तन में, वे अचल उस काल |
वेदनाकृत कर्म सञ्चित, कर रहे
ग्वाल भी आध्वर्ययुत-सा, देख तपमें निष्ट ॥
बैल उसको कुछ दिखाए, झाडियों के पास ।
चर रहे गरदन झुझाये, जो हरित-सी घास ॥
झट गय गया वैलो निकट वह,भूलकर सब कृत्य।
कर रहा परिताप अव वह, 'क्यों किया दुष्कृत्य १
बैल ले आया जहाँ पर, वीरवर ध्यानस्थ ।
शीघ्र ही उसने निकाला, दण्ड जो श्रवणस्थ ॥
फिर क्षमा को याचना की, ग्वाल ने नत शीश ।
पर तपस्या लीन सन्मति, द्वेष विगत मनीश ||
एक दिन सन्मति चलें श्वेताम्वि थल की ओर ।
भूमि पर थी दृष्टि उनकी शोधते हर और ॥
C
यों नष्ट ।

तीर्थकर भगवान महावीर
-
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.
.
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--
नगदशिक मपं उनकी, देश कर अपार ।
नर उटा भीपण घसा मी, विषमयी कार ।।
लो, विपला हा गया गल, वृक्ष का पतझार |
कर सफापर श्रात्मयोगी का न यह अपकार ।।
और इस पर कुन विषधर, जान अपनी हार ।
वह गला करनं जटिलतम, दन्त का दुर्वार ||
परन उसमेलर सफीवह पारग शक्ति प्रसीम।
यांग में सप शान्त होत अणु ज्वलित निस्सीम।

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. The देख निष्फल सर्व निज वल, वह हुआ हत वुद्ध । देखता सन्मति सु-मुख को, जोकि ऋजु शम शुद्ध । वह विनत फण भक्ति जागी, वीर प्रति अभिराम । सुन रहा कुछ शब्द ज्यों अव, कर्ण में निज नाम । 'भव्य प्राणी पूर्व दुष्कृत, वश हुए तुम सर्प । छोड दो सव क्रूरता तुम, छोड दो अव दर्प ॥ यों करो कल्याण अपना, आत्म का उद्धार ।' देखता वह कर रहे अव, योगिराट विहार ॥ और इस दिन से कभी वह, न होता क्रुद्ध। सत्प्रकृति उसकी दिखाई दे रही अविरुद्ध ॥ फिर गये उस प्रान्त सन्मति, लाढ़, जिसका नाम । साधना मे रत हुए, वे मौन हैं निष्काम || वस रहों कुछ जातियाँ हैं, हिंस्र दृष्टानार्य । वे समझती जातियों जो आर्य ॥ देख सन्मति को वहाँ पर, क्रूर जन अति क्रुद्ध । कर उठे दुष्टाचरण वे शीघ्र वीर विरुद्ध ॥ एक दिन तो वीर पर छोडे -- शिकारी श्वान | पर न मिञ्चित वीर चञ्चल, वे निरत निज ध्यान || और जितने त्रास सम्भव, दे रहे सब क्रूर । अन्त मे देखा कि ऋषिवर, द्वेष से पर दूर ॥ भूल सहसा ही गए वे भाव । दिख रहा अव तो अहिंसा, प्रति हुआ कुछ चाव ॥ वीर की यह साधना सम भाव होती मूक । पर सुनाई है यहाँ पडती मनुजता-कूक ॥ निज भ्रमण मे वीर कौशाम्बी नगर के पास । शान्त पहुंचे घूमते वे, मेटते जग-त्रास ॥ सौम्य कौशाम्बी नगर में पारणा के अर्थ । थे चले सन्मति सकारण, घूमते न निरर्थ ॥ शत्रु उनको, करता का तीर्थदर भगवान महावीर १ - META - . १ . - --- ने शिया भार के हुए he गन्दना टानी कि जिसके मुई मय फेश । गंट हपममेन पली दुवंश ॥ पन्धना में पड़ी दुखिया, मुन रही जयया । पारणा हित-धीर, समन्दी आरहे इस द्वार ।। स्वयमाहार दन उत्प। किन्नु उमपाम या रह मात्र कोदों अन । XXX समुद्यत गस्तियुत आहार । बेड़िया सब श्राप टूटी पुण्य का सचार ॥ XXX XXX अाज दासी-हाथ प्रभु ने जो लिया आहार । हो गई यो झांति जग में दीन महिलोद्धार । xxx XXX XXX

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देस महिला दुर्दशा दासत्य का उपहास ।
नारियों का मेघना हा । यह मनुज हास ॥
चौर ने ली या विश, आज का आहार ।
में करू दासी तिस्पत, के यहाँ स्वीकार ॥
जोकिन्चन में पड़ी हो, शिर मुटा पिन पाल ।
मुफ रोती-सी कि जिसका, हो बुरा यो हाल |
और कोदों नाज का बस, ६ मुझं आहार ।
आज उसका भत्तियुत, स्वीकार हो उपहार ||
जा रहे अब वीर पुर में बोलते जय लोग।
सोधते आहार देने का मिलेगा योग ।।
किन्तु राजा और सेठों, के ग्रहों के द्वार ।
वीर हैं छोड़ जात, आज तो हर वार ॥
चन्दना दामी कि जिम थे मुझे सब केश ।
मेठ वृपभसेन-पत्नी ने लिया टुवंश ।
बन्धनों में ग्रस्त दुखिया, सुन ही जयकार ।
पारणादित वीर सममी, या रहे इस द्वार ।
मात्र स्वयमाहार देने, के हुए उत्पन्न ।
किन्तु उसके पास था वह, मात्र कोदो अन्न ||
पारया लेकिन काने, का किया मु-विचार ।
भक्तिवत् आहार देने, को खढी तैयार ॥
पूर्ण होलाम मुख पर दिख रहा मुख पूर्ण ।
वीर आए इस तरफ भी, शान्ति शम परिपूर्ण ।
मक्ति से पढ़ता ळी वह, सौम्य शृद्धामाव ।
विमुले क्षण बढ़े फिर, कौन सा दुर्भाव ।।
रोळी अब चन्दना, वह कोसती निज भाग्य ।
दे न वह आहार पाई, . कौन-सा दुर्भाग्य !
वीर ने जा दूर देखा, धूम पीछे-ओर ।
रो रही ह चन्दना है, दुख रहा मानमोर ॥

शीघ्र लौटे वीर स्वामी, पूर्ण रुदनाभाव । निज प्रतिज्ञा रूप अव तो, दिख रहे सब भाव ॥ वीर लेने को समुद्यत, इसलिए आहार । वेढ़ियों सब आप टूटी, पुण्य का संचार ॥ कर रहे हैं पारणा अव, वीर समता भाव । दिव्य पञ्चाधर्य दर्शित, यह सु-कृत सद्भाव ॥ आज दासी हाथ प्रभु ने, जो लिया आहार । हो गई यो क्रान्ति जग में दीन महिलोद्धार ॥ वीरवर लेकिन गए वन, साधना के हेतु । बॉधने वे इस जगत से, मुक्ति तक का संतु ।। एक दिन गगा नदी के रेत पर से वीर । एक तरु के पास पहुंचे, ध्यान धरने धीर ।। खिंच गए सिकता धरणि पर, आप युग पग चिह्न । ज्योतिषी निकला जहाँ से, देखता ये चिह || नाम था पुष्पक कि जिसका, रेख पग की देख । सोचता यह चक्रवर्ती, भूप जैसी रेख ॥ और फिर पुस्तक निकाली, जो बगल में साथ । देखता उससे मिलाकर, पुस्तिका निज हाथ ॥ चक्रवर्ती के चरण ये थे जे चे सब भाँति । सोचता भूला स्व-पथ है, वह मिले किस भाँति ।। प्राप्त यदि मैं उसे कर लूँ, लाभ ले मैं साध । यदि हुआ चक्रोश नृप वह, मिले द्रव्य अगाध ।। यदि न वह चक्रीश अब तक, तो करूं कुछ यत्न । और उसको मैं बनाऊँ-विश्व अधिपत रत्न । इस तरह कुछ हाथ आए, ज्योतिषी यों सोच । चल दिया वह खोजता - पग चिह से विन शोच ॥ देखता पग चिन्ह जिसके, ध्यान में वह लीन । बाजुओं पर चक्र चिहित, वस्त्र से पर हीन || १

और माथे पर बना भी है मुकुट का रूप ।
'मिद यह कहता हदय में, 'हो न सकता भूप ॥'
और यह निज पुस्तिका को शु काने अर्थ ।
है गत एक दर्शक देख बोला- 'व्यर्थ ॥
फरते क्यों बन्यु! पुस्तक - क्या हुई है बात है
'मा बताउमिन ' बोला, ज्योतिषी निष्णात ||
'अन्य या भान्त यो में, कर झा भन्न।
ग्रंथ के अनुसार ने यह, व्यक्ति जो है नम ||
राहिए क्रीश होना, पर नहीं यह बात ।
सत्य हो सस्ती कभी भी, या यहाँ ६ ज्ञात ॥
फिन्त दर्शक ने कहा- 'दगे तनिक मम मित्र ।
व्यर्थ ही मत नष्ट कर दो, अन्य के मब पत्र ॥
नम मिद्धक ये सुना है, कुपण्डपुर-युवराज ।
तच्च रनके सामने है, सब जगत का राज ||
क्रिी बनेंगे-तीर्थ के कर्तार ।
ये विचक्षण व्यक्ति जग में, शान्ति के आगार ||
वृत्त मुन उनको सर्चमा-सा, हुआ विन माप ।
लौट निज पथ पर गया तब, ज्योतिपो चुपचाप ||
वीर पहुंचे एक दिन थे, धूमते उज्जैन ।
माधना में लोन कहते, है न कुछ भी बैन ।
नाम अतिमुक्तक कि जिसका शव-दहन सस्थान ।
योग प्रतिमा में वहाँ पर, थिर हुए घर ध्यान ।।
म्वर्ग में इस ही समय पर थी चली यह बात।
वीर-सा कोई न जग में, ध्यान में निष्णात ॥
सुर न पर भव व इस पर, कर सफा विश्वास ।
वह परीक्षा हेतु आया, कर उठा बहु त्रास ।।
हाँ प्रथम उसने बहुत ही, दैत्यगण विकराल ।
थे रचे निज शक्ति माया, से कुडौल विशाल ॥

कष्ट जिनसे दे अमित ही, हो न पाया तुष्ट ।
चिघता हाथी दिखाया, मारने को दुष्ट ॥
पर न इससे वीर अस्थिर, शान्त दृढ़ गम्भीर ।
आत्म-दृढ़ता में जढे-से, व्यर्थ दुःख-समीर ॥
किन्तु इससे देव वह, भव रुद्र अति ही उग्र ।
कर उठा उत्पात टुस्तर, वीर वर के अग्र ॥
शीत की ऋतु और उसने, अति किया हिम-पात ।
पर रहा निष्कम्प ऋपिवर का प्रबलतम गात ||
और तब उसने वहाया, तेज झंझावात ।
मेघ गर्जन, विद्यु तडपन, और वर्षाघात ॥
सर्प विच्छू कनखजूरे, जन्तुओं के वार !
क्रूर मायावी उपस्थित, ध्यान करने चार ||
किन्तु इससे योगि सन्मति, है न अस्थिर चित्त ।
सह रहे उपसर्ग निश्चल, शान्ति समता वृत्ति ॥
रुद्र वे सब कृत्य निष्फल, देख सोची बात।
चाहिए करना मुझे अब, नीति का आघात ।।
इसलिए हो मात त्रिशला, का रखा निजरूप ।
और आया पास उनके, छलमयी घर रूप ॥
छभवेषी सुष्ट बोला-'आह ! मम प्रिय नन्द !
टॅदती तुझको फिरी मैं, गिरि गुहा सुखकन्द ॥
तव पिता जी आज अन्तिम, भर रहे हैं श्वॉस ।
देखने को' मुख तुम्हार, जग रही है आश ॥
तुम चलो झट पास कर दो, तुष्ट दर्शन-प्यास ।'
वीर का तन भी हिलाते, यों कहा 'भर श्वाँस ॥
आत्मनत पर वीर ने कब, ये सुने छल-छंद।
'वे न मोही अब जगत के, 'ध्यानस्त निर्द्वन्द ॥
मोह-कारक कर्म-दुस्तर, कर रहे यों ध्वस्त ।
पा रहे अब तो.अहर्निश, "शुक्ल ध्यान प्रशस्त ।।
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तीर्थकर भगवान् महानेर
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ला न पाई दवियाँ इस बात पर विश्वास |
वे गई लेने परीक्षा, अन्त मे सोल्लास ॥
नव किए शृङ्गार पहुँची, थे जहाँ पर वीर ।
छोड़ने अब तो लगी वे, काम के दृग तीर ।
पर न इससे विद्ध सन्मति, तप निरत निष्काम |
वे पुनः करने लगी तव, नृत्य मदु अभिराम ||
पास चारों ओर उनके, कर रहीं वे नृत्य ।
गान गातीं साथ मधुमय, वासना के कृत्य ॥
यह मदिर मधुरिम रसीला, स्वर्ग का सगीत ।
पर न पाया वीर की यह, साधना को जीत ॥
फिन्तु इससे अप्सराएँ, हो न पाई
तुष्ट ।
वासना की चेष्टाएँ, कर उठी अति पुष्ट ।
सन्निकट जा वीर के वे कर रहीं मृदु स्पर्श ।
कर रही अभिसार-चेष्टा, काम वृत्ति सहर्ष ।
पर विरागी वीर वर है, मग्न रति-हत ध्यान ।
मूर्तिवत् ही देख निश्चल, देवियाँ हैं रात ॥
वे ठगी सी देखतीं अब, है चकित-से भाव ।
शर्म-सी उनमें
समाई, गत हुए दुर्भाव ॥
फिर गई निज मुंह लिए-सी, देवियाँ ये स्वर्ग।
किन्तु तप में लीन सन्मति, प्राप्त हो अपवर्ग ।।
स्वर्ग चाहिए नहीं वीर को,
विपदामय संसार ।
उपसर्गों को मेल कर रहे,
कर्मों का संहार ॥
दर

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तीर्थकर भगवान् महावीर r nuar- . XXX XXX XXX जगोपकार हित रचा इन्द्र ने उपदेशालय । ममशरण यह मिली सभी को शरण साम्यमय ।। जिसके चारों ओर सभागृह बारह दिसते । जिसमें चेठ धर्म ध्वनि सुन भवि भय हरने ॥ साधु आर्यिका पशु मानव की । शेप कल्प भुव व्यन्तर ज्योतिप देवि देव की। xxx नवल कली-सी भली चनी उस गंधकुटी पर । अन्तरीक्ष विभु वीर बिराजे विभा विभव तर ॥ शिर पर शोभित तीन छत्र अद्भुत छवि वाले। लगते हैं सर्वज्ञ सर्व दर्शीश निराले ॥ चार सभाणे XXX XXX

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द्वारों से भीतर अगणित ही, सजी ध्वजाएँ ।
लहर-फहर कर जो सन्मति की विजय जताएँ।।
इससे बढ़कर कोष्ट दूसरा कञ्चन छत्रि का ।
प्रसरित इसके मिस प्रकाश ज्यों पहले रवि का ॥
द्वारों पर हैं खडे भुवनवासी सुर प्रहरी ।
फब जाती जिनसे स्वभावतः कान्ति सुनहरी ॥
फिर उपवन है जिसमें दिखते, खडे कल्प-तरु ।
बने सभागृह, जहाँ विहरते देव-साधु-गुरु ॥
कोट तीसरा धवल फटिक-सा, इससे बढ़ कर ।
जिसके द्वारों पर प्रहरी से, खडे कल्प सुर ।।
आगे इसके बने लतागृह, सुन्दर-सुन्दर ।
स्थान-स्थान पर दिखते हैं, स्तूप आदि वर ।।
इसके भीतर मध्य भाग में तीन पीठ पर ।
श्री मण्डप है बीच कि जिसके गधकुटी वर ।।
जिसके चारों ओर समागृह, बारह दिखते ।
जिनमें बैठ धर्म-ध्वनि सुन भवि भव-भय-हरते ॥
चार समाएँ साधु, आर्यिका, पशु मानव की।
शेष कल्प, भुव, व्यन्तर ज्योतिष देवि-देव की।
निज स्थानों पर जमें जीव भवि, वाट जोहते ।
। चातक-से, ध्वनि-स्वॉत बॅद की ओर देखते ।।
नवल कली सी भली बनी उस गधनुटो पर ।
अन्तरीक्ष विभु वीर विराजे, विभा-विभव वर ॥
शिर पर शोभित तीन छत्र अद्भुत, छवि वाले ।
लगते हैं सर्वज्ञ सर्वदर्शीश निराले ॥
आहार न नीहारों की कुछ बाधाएँ ।
हैं सशरीरी ईश न जग की कुछ विपदाएँ ।
नख केशों की वृद्धि हुई इति, जीवन दमका ।
बाया प्रतिछाया न वहाँ पर प्रभु तन चमका ॥
20

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-
निर्माण गतं
अष्टम सर्ग

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सन्मति-जीवन के बोते हैं, पूर्ण रहत माल प्रगति में । वपे वहत्तरवा अब चलता, आत्मा की अपनी परिणति में ॥ विघट चुका है समवशरण अब, कवल ग्रामिक चिन्तन नीग्य। नहीं ध्यान मे परिकर वैभव, नहीं लोक का मुन पन्ता ॥ शान्तिमयी जीवन का अचल, नहा अनि बनाता चचल । आत्मिक निधि प्रावण-होन सा, हाता जाता मदना पल-पल ॥ जीवन की मन्ध्या प्रशान्ति में, ना इ-मी चली आ हो। यह अपूर्व समता-सी पिलायत, पग-पग बढ़ता बढ़ा जा रहा ॥ सन्ध्या का दूसरा चरण है, चि. विश्राम त्रि का आना। पर सन्मति का ध्यान शुभ्रता, शेप कम्मल उन्हें सपाना ।। कातिक कृष्ण चतुदर्शा-निशि बीत हा है दूल-रल अबिन्त। चिर अघातिया कमै तिमि भा, घात कर रह शुद्ध ध्यान रत || शुद्ध विहान वेला भी क्रम-क्रम, मन्या गति से चली आ रहो। और साधना सन्मति विभु को, लक्ष्य दिशा को बढ़ी जा रही ॥ शेप कर्म तारागण देखा, कुछ-कुछ विघटित हुए जा रहे। चरम लक्ष्य शिवपद अल्णोदय चिह सहज हो चले आ रहे ।। वोरात्मा ने तोडा लो वह शेष कगे-वन्धन का पिजडा । उन्मुक्त व्हिग-सा उडा-उडा, आलोकमयी चित् ज्ञान-जडा। कर गया सहज ही अ-गमन, सत् शुद्ध-बद्ध नि-ल चतन । तन-गृह से अव शिव सांख्य-सदन, पहुँचा, लहराया जय-केतन ।। 'जय जय जय बोलीसुर नर ने, 'निवारण-धाम-गामी को जय। भूमते भक्ति में बोल न्हे-'श्री महावीर स्वामी की जय' || जयजय जिनवर, जय-जय जिनेन्द्र,जय-जय जगत्राताजगन्नाथ। जय परमात्म पावन प्रझाम'जय' उचारित उत्साह साय ॥ प्रतिध्वनित हुआभनभ मण्डल 'जयजय'ध्वनिको लहर चञ्चल। परसन्मति विभु नेसचे पाया,चिर सौख्य स्थान अक्षय अविचल। देवों ने रत्नविकीर्ण किए, मिलमिल झिलमिल जगमग-जगमग। आलोकमयी अब भूमि मन, उपदेश वीर का ज्योतिर्मग ॥ - १ १००

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तुच्छतम जग-जीवन ॥
कोई भौतिक अमिलाप नहीं, केवल नियश का साधन ।
सन्नति-अनुगामी चहेगा, कब तच्छ,
स्वातत्र्य चिन्तन सन्मतिवत् चाहिए पूर्णपट आत्मा का।
जिसस जग-पीडित पुल्य स्त्रय, पा ले रूल्प परमात्मा का ।।
जिग्ने ल भक्तिस्वाद पाय, वह कैसे आत्मिक न्स ढोले ।
जिसने क्षीरोदन पान निया, वह कैस खाने जल पोले।
हे देव ! न जग ने दिला हे निस्पृहो, आप सा उपकारी ।
तब जीवन का प्रत्यक चरण, उति सोपान क्ना मागे॥
हे कौन मादका ना, जिनेन्द्र अतिरिक्त आपके दर्शाता ।
जैसी कि आपकी विमल डॉह, अन्यत्र कहा यह जग पाता !
सस्मरण मात्र से होता है गुरु पाप-तप का ग शान्त ।
जैस फुहार से मिट जाती अति ग्राम-तपन को जलन लान्त ॥
अति गेग शोक जनप्ति प्रलय मोपण रण विपति वावर ।
व भक्ति समक्ष न ल पाते, ज्यों भगा तम पा ज्योति जार।
इस भाँति वीर का विशद् विल्द, करते अनमत्र कहते प्रशस्त ।
सत्तवन भजन या कीर्ति कयन, जय-माल गानमें लोगव्यत्त ।
प्रभु वीर चिन्तन-चर्चा मे, भवि जीव समय यो गिता रहे।
सन्नति निर्वाण-प्रसग आज, निर्वाण पर्व हैं मना रहे ॥
निर्वाण-न कोई गम का क्रम शाश्वत सुख का शाश्वत उगम ।
समरसता का अक्षय व्हिान, चिर दर्श, नान, बल, सुख-सगम।।
इस भौतिक जग में भी रहता, शव रूप न जो दुख उद्दीपक ।
पुल अणु स्वयं विखर जाते, रहते जो आत्मा के वाधक ।।
इसलिए प्रशम मूढ मृदल लहर, सव ओर थिरकती-सी रहती।
अात्मिक उन्नति को वेला में, आहलाट पूर्ण सत्यिति रहती॥
आनदमयी अभिनय होते, जिनमें शाश्वत आनन्द झलक ।
मोनीसुखमयी मालकपडतो, लखते जिसको दर्शक अपलक ।
सन्मति पगचिहो के अनुचर, सब रकरान्, उन्नत अवनत ।
तर कालष्य मिटाने को, हद-दीप जलाने को उद्यत ।।।
१०३

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1
-
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हिंसा रजनी को शरच्चन्द्र, अत्याचारों के प्रति द्वन्दी,
सद्दया-तीर्थ के तीर्थकर, शुभ सत्य शाति के अमिनन्दी ।।
प्रभु ! पर पीडा हेमन्त हन्त, जग हित-हरियालो के वसन्त.।
कटु क्लेश-कहर के पूर्ण अन्त, शुभ मोक्ष लक्ष्मी के सु-कत ॥
भव-सिन्धु वरण को वारियान, विभु ! सत्य शिव सुदर मय।
रे जगजननि के सफल पूत, हे वीतराग! हो गए अभय ||
सत्र कालों में आदर्श अमल, चिर उन्नति के अति उच्च भाल,
गत आगत और अनागत मे, सुख प्रद प्रशाति के अमरलाल ॥
सद्धर्म सु-स्वर सुमधुर सरगम, वाणी कल्याणी तव, प्रकाम।
हे सहस नाम घारी ललाम, तुम निल्पमान उपमान नाम ।
कवि-की वाणी के अलकार, कवि के कवित्व के काव्य सुघर ।
कवि के गानों के चिर गाने, फिर भी कवि प्रज्ञा के बाहर ।।
फिर कैसे गरिमा गायन हो, कैसे असीम ! अभ्यर्थन हो ?
कैसे अमिनदन पद बदन, कैसे श्रद्धाञ्जलि अर्पण हो ।
निस्सीम देव ! सीमित वाणी, यश-गान न कुछ भी वन पाता।
श्रद्धालु विनत अन्तस लेकिन, जय बोले भुका शिर सुख पाता।।
जय जय जय जयवन्त सदा त्रिशला नदन ,।
जय जय जय जय जग वद्यनीय शत-शत वदन।

. .. सन्देश और सम्मतियां [प्रस्तुत पुस्तफस पर्प की पीर-जयन्ती पर प्रकाशित हुई कितु मर गयोगी रिल्द नाम नहीं बँध सकी। लगभग ५०० प्रतियों हारिन्द धने से रह गई। सनराल में यह विश्रुत और गपयमान्य गन, नेता विज्ञान महानुभायों तथा रट बनों ने अपने आशीर्वाद, गुम फागनार एवं सम्मानिया भेज पर मुझे प्रोत्साहित एवं अनुमहीत शिपा, गमका मेरम ने साभार मानता। शुभ सन्देशों एप सन्मतियों को नहीं सामार उद्धन पिया जा रहा है। -धीरेन्द्र] स्तन्वर चल्लक श्री १०५ गणेशप्रसादजी वर्णी, उदासोनायम ईसरी:- " योग पम्मान मात्रा । पापसी पुरसफ मिली। मापने रापन परिमाि तदर्गापवाद । भ. गार के परिन दी गाने मरा-पं, परिपा । मन भी पाते हैं। परन्तु को मापन दो बार्गको पनागा क मस्याग पान होगा। स्वय मदापोर हो जायगा। (पण ता० १३३४५९) ग्योवृद्ध हिन्दी-सेवक गजर्षि श्रीमान् पुरुषोत्तमदास जी टण्डन, न दिल्ली "भेत्री पृतिक सौर्य मावान् महावीर' मिनी । पन्यवाद । भने मोर पर उपर पहै। मेरा स्वास्थ्य पर विशेष काम नही मा पापको गन्दी मार पर वपाई देता है। मापकी प्रतिमा दिन दिन प्रौटी यह मेरी गामा है।" (पन ता० ८1५1५८) राष्ट्रकवि श्रीमान् मैथिलीशरण जी गुप्त, चिरगांव । "सायंकर नगगन महावीर पर लिग्राफर प्रापने जो अपनी श्रद्धा प्राटगी है पर प्रगानीय है। यामाहभविष्य में पाप और भी अच्छा निमगा।" (पत्र त० १५॥४॥५६) वयोवृद्ध हिंदी एवं जैन साहित्य-सेवक श्रीमान् नाथूगम जी प्रेमी, गजपंथ, - - म्हसरूल नासिक "तीयार भगवान महावीर' की प्रति जो प्रापने भेजी है वह यथा ममय मिल गई थी, उगके पहुंचने की सूचना भी मैं पापको न दे सका।

यहा पाए हुए डेट महीने से अधिक हो गया, परन्तु सावन की मुधरी। गन फिर भी नही सकता । पहनी प्रगत हो गया। परना लिपना भी नहीं हो सकता | प्रापये इम मत्प्रयत्न का प्रतिनाही गर ना हूँ। प्राशा है, श्राप इस मार्ग में उत्तरोत्तर उन्नति ।" (पशना० २८111) प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी के उद्भट विद्वान डॉ०हीगलाल जो जैन, एम०ए० एल-एल० बी०, टी० लिट०, डाइरेक्टर प्राकृत जैन विद्यापीठ, मुजफ्फरपुर ( विहार ) 'तीथपर भगवान महावीर' की प्रति पा उपहार मिल गया जिमफे लिए मैं यहस पृसा है। माई का पता प्रमाद जी की 'भगवान् महावीर' पुस्तक द्वारा ममाज म भगवान के जीवन परितको प्रन्टी जानकारी हो गई । प्रप जो उनके पुत्र द्वारा ही उक्त परिम का पात्र में रूपान्नर समाज के सम्मुप पाया में उनसे पाठपो को भगगन के परिन की जानकारी के साथ साथ सचिरर मरम, मनोहर कम्य-रग का भी माम्पादन मिलेगा। इस वहमूल्य माहित्य सेवा के लिए में दोनो मा हदय से अभिनन्दन करता हैं मथा भतीजे पे नाते तुम्हे पाशीर्वाद "ता हूँ कि तुम अपनी काव्य पतिभा का लर विनास परो और धर्म पी ज्योनि बढ़ामो।" (पत ता. २६५५६) Dr A. N Upadhye, MA, D Litt, Raja Ram College, Kolhapur "I read portions of Shri Virendra Prasada's poem "Tirthank a Bhagawana Mahavira' He secms to possess a natural gift and his verses 1 low with a remarkable liquidity and poctic grace (His letter to Shri K P Jain dated 15-5-59) हिदी के प्रख्यात उपन्यासकार श्री जैनेन्द्र जी, दिल्ली : चिरंजीव वीरेन्द्र की काव्य कृति मिल गई । जहा तहा मे कुछ पढ़ भी गया । कविता में प्रवाह है भावाकुलता तो है ही । मेरी उन्हें बधाई दीजिए।" (पत्र ता २२२५६) भारतीय प्रत्न विद्या के विश्रुत विद्वान डॉ. वासुदेव शरण जी अग्रवाल, एम० ए०, डी. लिट्, काशी विश्वविद्यालय, वाराणसी "तीर्थङ्कर भगवान महावीर' रचना में तुम्हारी काव्य साधना की सफलता देखकर पित्त प्रसन्न हुमा । भगवान से यह प्रार्थना है तुम्हारा यह पार्ग उत्सरोत्तर पालोकित हो।" ( पत्र ता०६५६) श्रीमान डॉ. माता साद जी गात, एम० ए०, डी० लिट, रीडर हिदी विमाग, प्रयाग विश्वविद्यालय, प्रयाग : 'तीर्थ भगवान महावीर' की प्रति मिली । अनेक धन्यवाद । में उसे प्रादि ने अन्न तक पढ़ गया। विषय का निर्वाह मापने बड़े ही सरस घोर कायोनित उग मे किया है । जीवनी से सम्बन्धित काव्यो में सूचनात्मक विवरणो के कारण प्राय नीरसता पा जाती है। आपने उनको प्रमुनता नहीं दी है यह आपने अच्छा किया है। पापको इस रचना के लिए बधाई देता हूँ। ( पत्र ता. २६) श्रीमान् डॉ० हरदेव बाहरी, एम० ए०, डो० फिल०, डी० लिटा हिंदी विभाग, प्रयाग विश्व विद्यालय, इलाहाबाद :- 'तीर्थगर भगवान महावीर' की एक प्रति भी प्राप्त हुई। यी सरम और सुन्दर माहित्यिक मापा है इसकी । यह मै नही जानता था फि मापातने प्रकवि हैं । मापके भाव-चित्रण का सौष्ठव देसकर चित्त प्राप्त हो गया।' (पत्र सा० १७:५५६) श्रीमान् डॉ० पद्मसिंह शर्मा 'कमलेश', एम० ए०, पी-एच० डी० हिन्दी विभाग, आगरा कालेज, आगरा :- "यंकर भगवान महावीर देस गया हूँ। मुझे पापका यह काव्य अत्यन्त गन्दर लगा । भगवान् महावीर का जीवन आपने जिस रूप में रसा है, यही स्वाभाविक है और नमी को दृष्टि में रख कर श्रद्धाल श्रेय के पथ पर वह मरते हैं । मापने इतनी छोटी वयमें एक महापुरुपके जीवन पर ऐमी उत्कप्ट और पर्यागपूर्ण रचना रचफर अपनी प्रतिभा का परिस्य दिया है उमो लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिए।" (पत्र ता० ६६०५६) राजस्थानी साहित्य के अन्वेषक विद्वान् श्रीमान् अगरचन्द जी नाहटा वोकानेर:- 'तीयंकर भगवान महावीर' नामक प्रापका काव्य मिला। पापण फाव्य-प्रतिमा उनरोत्तर वृद्धि प्राप्त करे-~यही शुभ कामना है। काय बहुत अच्छा बन पाया है । जैनेतर व्यक्ति जैन सस्कृति को ठीक समझ नहीं पाते इमलिए प्रापका यह प्रयास वास्तव में सफल पोर महन्ध का है ( पत्र ता० २३३२५९) श्रीमान बदरीप्रसाद जी साकरिया, सम्पादक राजस्थान-भारती' (वीकानेर ) आनन्द :- प्रथम प्रयास होने पर भी भापका यह काव्य कडा सुन्दर निर्माण हमा है । हमें तो यह पता ही नहीं था कि पाप इतने जवरदस्त कवि भी है। "पुस्तक वधाई के योग्य है।" (पत्र ता० १५१५२५६ ) - Shri Digamber Das Jain, Author of 'Shanti Ke Agraduta Bhagawan Mahavira, Shaharanpur Not by jace, but from the various articles of VOA & A B Shri Virendra got a sacred place in my heart and as such I know him perfcctly well His latest entcrprize "Tirthandara Bhagawan Mahavira' is self-speculating, conclusive proof of his ability. The book is well arranged, richly illustrated and to the point The whole book is a very interesting poem divided into eight different chapters The language though very simple and easily understandablc but very effective, impressive and attractive I heartly appreciate Mr Virendra's hard labour, hc look to compose this very valuable book. Its paper is white and get-up excellent I wish it great success and hope that our Jains will distribute this unforgetable sweets to non-Jains at Virajayantı and Vira Nirvana festivals " (His letter to Shri KP Jain, dated 15-5-59) कविवर श्री कल्याण कुमार "तीर्थद्वर भगवान् महावीर' पुस्तक के लिए धन्यवाद ।' पुस्तक बहुत सुन्दर थोर उपयोगी है । पापके प्रयत्न की सराहना करता हूँ।" ( पत्र ता० २३।५।५६ ) सुकवि धन्यकुमार जैन 'सुधेश' नागौद • पुस्तक का प्रकाशन सुन्दर हुआ है । मारने उसे जो सर्वाङ्गीण सुन्दर बनाने का प्रयत्न किया है वह प्रशसनीय है। भापकी पुस्तक को मैने आद्योपान्त पढा है । पुस्तक आपने श्रम- पूर्वक लिखी है-इसमें सन्देह नही । आपका यह प्रयास प्रशसनीय है। अभी इस दिशा में लिखने फैं लिए पर्याप्त क्षेत्र है। आशा है भावी कवि जो इस विषय पर अपनी लेखनी चलाना चाहेंगे, आपकी कृति से पर्याप्त प्रेरणा प्राप्त करेंगे । मुझे आपकी इस सफलता से हार्दिक प्रसन्नता है। प्राशा है आप इसीप्रकार काव्य सृजन कर जैन साहित्य के भण्डार को श्री सम्पन्न करते रहेंगे।" ( पत्र दि०१ व २२||५६ ) श्रीमान् मा० उग्रसेन जी जैन, मत्री-अ०भा०दि० जैन परिषद् परीक्षा बोर्ड, काशीपुर:- प्रापकी पुस्तक तीर्थकर भगवान महावीर प्राप्त हुई । धन्यवाद कविता सुन्दर और भावपूर्ण है और अच्छी लिखी है जैन 'शशि' रामपुर :- - - श्रीमान श्रादीश्वर प्रसाद जैन, सेक्सन आफीसर यू० पी० एस० सी०,' मंत्री जैन मित्र मण्डल, देहली "पापो द्वारा रचित 'तीयङ्कर भगवान महावीर' फाव्य मिला। भगवान् महायोर पर इतना सुन्दर काव्य लिखने का प्रापका प्रयत्न श्लाघ- - मीय है पापको जैन धर्म को प्रचार को मापना तथा जैन धर्म के अन्तिम तीपंकर भ० महावीर के प्रति प्रगाढ श्रदा के कारण ही इस, सुन्दर पुस्तक का निर्माण हो सका है। भगवान महावीर के जीवन सम्बन्धी इस प्रकार के पाप को फमो बडी पसरसी पी । भोर उस कमी को पूर्णकर आपने जैत- माहित्य को जो प्रगति की है उसके लिए पापको अनेकानेक पत्यवाद । भागा है कि पाप भविष्य में भी इस प्रकार के जैन-साहित्य की सेवा में राषित रहेंगे।" ( पत्र ता० २५॥५॥५६) डॉ. शांतिलाल बालेंदु, संचालक हिंदी ज्ञान-पीठ, इदौर :- यह प्रसन्नता वी पास है कि श्रीरेन्द्र प्रसाद पौन ने हिन्दी में भ० महावीर के जीग्न-दशन पर अपने शृत ज्ञान द्वारा तीर्यकर गयान महायोर' पोर्पक एकार्थ काव्य को निवर्तना की है। इस ग्रन्थ को भने न्यय देखा है. यह अपने ढंग का एक अच्छा ग्रन्थ है । कवि अपने विपय भी महत्वपूर्ण विवेचना में पूर्णत सफल है । हम श्री वीरेन्द्र प्रसाद के इस मद्भगारा का अभिनदन करते है । बागा है भविष्य में भी हमें इनकी पीयूप पपिणी वाणी का लाभ सजित साहित्य केम्प में, प्राप्त होता , रहेगा ", सीयंदर भक्ति की भावना में करते हुये इस द्राक्षा मधुर ग्रन्थ के प्रकाश- नार्थ प० रामता प्रसाद जी जैन एव श्रीमान् , साहू शान्तिप्रसाद जी जैन वस्तुत अनेक धन्यवाद.के.पात्र हैं। (सम्मति ता० १९५१५६) ।। श्री ज्ञानचन्द्र जैन 'स्वतंत्र', सह सम्पादक 'जैन-मित्र', सूरत " सत्साहित्य वह नहीं जो वहृत वृडी पुस्तक या ग्रथ रूम में हो।।, यह तो मात्र एक कलेवर है।। सत्साहित्य वह है जिसमें पाठक की रुचि बनी रहे, पुन पढने की इच्छाको । मौलिकता एव तवीनता मिले । तीर्थर म. महावीर इसी,प्रकार की सुन्दर काव्यात्मक रचना है, जो पाठको को अपनी-पीर-वग्यस खीच लेती है।" (विस्तृत समालोचना का एक मश) श्रीमती रूपवती देवी जैन 'किरण' जबलपुर "भाई वीरेन्द्र प्रमाद जी का फाव्य 'महावीर' हस्तगत हुआ। पढ़ा पारा प्रवाही होने के साथ ही अत्यन्त रोचक बन पडा है । भ० महावीर की पाणी जन-जन तक पहुँचाने का प्रयल स्तुत्य है। द्वेष, स्वार्थ, असीम अमिलापामों से पीडित विश्व को इस युग में शान्ति की साधना असभव सी -- . -- प्रतीत होती है । मृग-मरीचिका की विभीषिका में सच्ची शान्ति के प्राप्ता भगवान के सन्देशो का पुण्यस्मरण ही मङ्गलमय है।" (पय ता०६१६४५६) श्रीमान् लालचद जी काशलीवाल, संयोजक अ. वि. जैन मिशन केन्द्र कलकत्ता, दाँता:- "तीर्थदर भगवान महावीर' काव्य-प्रथ मिला भ ई वीरेन्द्र प्रसाद जी के इस प्रयास के लिये मैं हादिक प्रशसा करूंगा। आपने बहुत ही सुन्दर ढंग व सरस कविता में भगवान महावीर का जीवन चित्रण किया है । छपाई एव कागज भी वढिया है।" (पत्र ता. २५॥२५६) श्री प्रकाशचद टोग्या, सयोजक अ० वि० जैन.मिशन केन्द्र इदौर-- "श्री वीरेन्द्र जी की तीथङ्कर भगवान महावीर रचना सुन्दर है।" (पत्र ता० २।५।५६) 'नत्र भारत टाइम्स' (दैनिक) ता० ७ जून १९५६, दिल्ली : "विद्वान लेखक ने 'तीर्थकर भगवान महावीर' के अवतरण का विशद् रूप से वर्णन पद्यो में प्रस्तुत पुस्तक में किया है । साथ ही साथ भ० महावीर के वह चित्र भी चित्रित है जिन्हें देखकर मनुष्य आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकता है। लेखक महोदय ने पद्य रचना करने में अथक परिश्रम किया है। आशा है कि जन-साधारण भी इससे लाभान्वित होगे।" साप्ताहिक 'ज्वाला' ७ मई १९५६, जयपुर:- इन पाठ सर्गों में ( भ० महावीर के ) अवतरण से निर्वाण तक का सम त वृत्त कवि ने शुद्ध हिन्दी में छन्दोबद्ध किया है । सिद्धपुरुष महावीर जैसे महान व्यक्ति की जीवन था वर्णना के कारण प्रस्तुत काव्य महा काव्य है। -श्री अगरिस (त्रिस्तुन समीक्षा का एक प्रश) सप्ताहिक 'जैनमित्र ता० १०-४-५६, सूरत :- इस प्रकार के एक सुन्दर सचित्र काव्य में भ० महावीर का जीवन परिचय यह प्रथम ही प्रकट हुआ है । रचना सादी, सरल व भाव- वाही व स्वाध्याय करने योग्य है। -श्री मूलचन्द किशनदास कापडिया ('प्राप्ति स्वीकार' स्तम्भ में प्रकाशित समालोचना का एक प्रश)

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Thirthkar Bhagwan Mahaveer

Author
Jain,virendra Prasad
Title
Thirthkar Bhagwan Mahaveer
File name
Thirthkar Bhagwan Mahaveer
Text
OCR done
Citation
1949
Published
2010/06
Publisher
Aliganj.,shri Akhil Vishva Jain Mishan
Language
Sanskrit
Pages
134
Library
Bhartiya Shruti Darshan Kendra,jaipur
DLI number
327185
Barcode
99999990002672.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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