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Dinker Ka Nibandh Sahitya

Seema Gupta · 2011/03

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दिनकर का निबन्ध-साहित्य

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दिनकर का निबन्ध साहित्य सीमा गुप्ता

मुस्य : अस्मी रुपये मात्र
प्रथम मरकरण : 1990
प्रकाशक : कविता प्रकागन, तेलीवाड़ा बीकानेर-334001
मायरण : हरि प्रकाश त्यागी
मुक : पारस प्रिटस, नवीन गाहदरा, दिल्ली-32
DINKER KA NIBANDHI SAISTYA
try Seema Gupta Price Rs. 80.00

प्राक्कथन -- - राष्ट्रीय चेतना के अमर-गायक युगद्रष्टा और युग स्रष्टा साहित्यकार श्री रामधारी सिंह दिनकर को गौरवान्वित वृतिया भारती के भण्डार को अमूल्य निधि है । बहुमुखी प्रतिभा के धनी दिनकर जी ने साहित्य की सभी प्रमुख विधाओ मे अपनी रचनाधर्मिता क कीर्तिमान स्थापित किये है। उन्होंने मुख्यत प्रबध काव्य, प्रगीत, मुक्तव, सस्मरण, रेखाचित्र, बाल साहित्य, काव्य स्पर, डायरी, समालोचना, निवध आदि साहित्यिक विधाआ म सृजन किया। काव्य कृतिया यदि दिनकर जी की कारयित्री प्रतिभा की प्रतिमान हैं ता गद्य रचनाए उनके प्रखर विचारक रूप की प्रतिपादा है । विलक्षण व्यक्तित्व और बहुमुखी प्रतिभा क धनी श्री दिनकर ने लगभग अर्द्ध शताब्दी तव साहित्य साधना करके मनीपी स्रष्टा के रूप म अपनी पहचान हिन्दी साहित्य जगत् म बनाई है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलकृत 'उर्वशी' काव्य रूपक के प्रणेता, 'कुरक्षेत्र' प्रबध काव्य के यशस्वी रचयिता और 'सस्कृति के चार अध्याय' के लखक के रूप मे अपार यश अजित करने वाले दिनकर जी के वैविध्यपूर्ण साहित्य का विविध दृष्टियो एव कोणोस अध्ययन-अनुशीलन किया गया है । दिनकर साहित्य से सबधित असख्य समीक्षापरक ग्रय और गभीर शोध प्रबध भी लिखे गय हैं, जिनम जनक कृतित्व की सृजन प्रेरणा, रचना दृष्टि, शैली विधान, युगीन प्रभाव, कलात्मक वैभव, चरित्र-सृष्टि, बोध क विविध आयाम आदि उजागर हुए हैं। दिनकर जी का महाकवि, समीक्षक, प्रवुद्ध विचारक, रखाचित्रकार, सस्मरण लेखक, बाल- साहित्य प्रणेता, इतिहासकार और संस्कृति समीक्षक के रूप म अन्वपण एव मूल्याकन किया गया है, किन्तु निबंधकार के रूप म दिनकर जी की दन अल्प- ज्ञात ही है। प्रकारान्तर से यह कहा जा सकता है कि दिनकर जी प्रणीत निवध- साहित्य समीक्षको की दृष्टि से ओझल प्राय रहा है। इसीलिए दिनकर जी को निबध कला पर कोई स्वतत्र समीक्षात्मक ग्रथ उपलब्ध नहीं है। मैंन इस लघु शोध प्रबध ये माध्यम से दिनकर जी के निवध साहित्य के अन्वेषण एव मूल्यापन का विनम्र प्रयास किया है । इस प्रयास म मैं वहा तर सफल हुइ हूँ, इसका मूल्याकन तो अधिकारी विद्वान ही करग । मुझे तो इतना ही सतोप है कि इस उपरम के माध्यम से एक अछूते विषय पर शोध काय करन का सुअवसर प्राप्त हुआ है। निबध विधा के रूप मे दिनकर जी द्वारा लिखित कृतिया इस प्रकार है- 1 रेती के फूल 2 वेणुवन, 3 अद्धनारीश्वर, 4 मिट्टी की ओर 5 शुद्ध कविता की खोज 6 साहित्यमुखी, 7 वट पीपन । दिनकर जी के समीक्षात्मक निबध सग्रह इस प्रकार है- 1 काव्य की भूमिका, 2 पत प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त 3 हमारी सास्कृतिक एकता 4 सस्कृति के चार अध्याय 5 राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता 6 धम, नतिकता और विज्ञान, 7 राष्ट्रभाषा आदोलन और गाधी जी। प्रस्तुत लघु शोध प्रवध म उल्लिखित प्रथम सात निवध सकलना को अवपण एव मूल्याकन के लिए लिया गया है । वस्तुत सच्चे अर्थों म निवध विधा का प्रतिनिधित्व इही सकलनो म हुआ है । अय सात सकलन समालोचना विधा वे अतगत समायोजित किये जा सकत हैं। दिनकर जी के निबध विषय वस्तु और शैली विधान दोनो ही दृष्टियो से स्वत पूर्ण है । इहे विषय की दृष्टि से यदि साहित्यिक, सामाजिक, सास्कृतिक एव ललित निबंधो के रूप म वर्गीकृत किया जाता है तो शैलीगत आधार पर वणनात्मक, विवेचनात्मक गवेपणा मक व्यक्तिव्यजक एव ललित निबध कहा जा सकता है । ययि और विचारव रूपो का समाहार होने के कारण दिनकर जी मे निवघा म विचार तत्त्व के समानान्तर राग तत्त्व की भी धारा प्रवाहित होती रही है । दिनकर की निवध क्ला का निजी वैशिष्टय है, जिसे विषय की विवेचना से लकर शलीगत निरूपण तक म सवा लक्षित किया जा सकता है। निराध के प्रतिपाद्य विषय की गहरी सूझ-बूझ के साथ साथ गहन सवेदना और अनुभूति का समाहार भी अपन निवधो म करते हैं । अस्तु विचार बोध की शुप्क्ता उनक निवद्या म यही भी हावी नही होती है। निवधनार के रूप म दिनकर जी को सबस बडी सिद्धि और उपलब्धि यह है शिव विवेच्य विषय की तलस्पर्शी विशद् प्याख्या रागा मर धरातल पर करत हैं । इसी विशपता व कारण दिनवर जी का निवधपारस रूप म निजी पहचान है। यह प्रय पांच अध्याया म विभक्त है । प्रस्तुत शोध प्रबध का पूण वरन म मुझ जिनस प्ररणा प्रोत्साहन और सहयोग मिला है उनर प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना मैं अपना पुनीत फत्तव्य मानती । सवप्रयम तो मैं मनीश साहियकार दिनकर जी र प्रति ही कृतज्ञ हू जिना। पतियो इस सपु गोध प्रबंध का मूलाधार बनी हैं। उन सभी विद्वान् सयरामा भी मैं नमन् परता? जिनकी प्रतिया वा महाया प्रपा 4 रूप में उपयाग पिया है । यह मधु शोध प्ररथ आधुनिक हिन्दी साहियम अध्येता प्रबुद्ध हा वेद शर्मा जी के निर्देशन में लिखा गया है, उन्होंने जिस स्नेह और आत्मी- यता से उत्साह सम्वर्द्धन करते हुए मार्गदर्शन किया उसके लिए मैं हृदय के गहन- तल से उनकी आभारी हू । महाविद्यालय के प्राचार्य श्री रवि टिक्कू एव हिन्दी विभाग के समस्त प्राध्यापको ये प्रति भी मैं अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती हूँ । प्रस्तुत शोध विषय के चयन की प्रेरणा मुये अपने पिताश्री हा० देवीप्रसाद गुप्त, हिन्दी विभागाध्यक्ष, डूगर कालेज, बीकानेर से प्राप्त हुई तथा इस शोध प्रबंध को पूरा करने में प्रत्येक चरण पर अग्रज डा० उमावात गुप्त से अतुननीय सहायता मिली। इनके प्रति मैं श्रद्धावनत होकर शुभाशीय की कामना करती है । परिवार के अन्य सदस्या में प्रेरणा और प्रोत्साहन प्रदान करने वाला म ममतामयी मम्मी जी श्रीमती सरला गुप्ता, बडी बहिन डा. श्रीमती निर्मला गुप्ता, आदरणिया भाभीजी श्रीमती रजनी गुप्ता, स्नेहमयी श्रीमती सुशीला शर्मा, श्रीयुत् प्रेमशकर शर्मा भाई डा०दिलीपकुमार मोदी एव चिरजीव जयकात, आयुष्मती क्नु और बुआ अयो (श्रीमती विद्या देवी श्रीमती माया देवी तथा श्रीमती शिरोमणि देवी) का श्रद्धा एव स्नेह मे स्मरण करते हुए मैं पुलकित है। इम ग्रन्थ के आकर्षक प्रकाशन के लिए कविता प्रकाशन के व्यवस्थापक श्री दिनेश रगा तथा उनके सुपुत्रधी धर्मेश रगा के प्रति आभारी हू। विनीता विजयदशमी 10 अक्तूबर, 1989 सरला सदन, जेलवेल, बीकानेर (राजस्थान) --सीमा गुप्ता

अनुक्रम
1 रामधारी सिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व
9-38
2 हिन्दी निवध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनकर 3958
3 दिनपर का निवध साहित्य परिरायात्मक विवेचन एव वर्गीकरण 5982
4 दिनवर के निबध साहिय का शैनीगत वैशिष्टय
83-100
5 दिनकर के निवध साहि य मे भाषामन सरचना का स्वरूप
101 109
6 प्रथानुक्रमणिका
110112

-- रामधारी सिंह दिनकर ! व्यक्तित्व और कृतित्व ! जन्म व सस्कार 'विभा-पुत्र', 'जागरण-गान के गायब', 'विश्व को अक्षय आलोव प्रदान करने वाले', 'मत्यं मानव की विजय के सूर्य और अपने समय के सूर्य के रूप मे आत्म परिचय लेने वाले साहित्याकाश श्री रामधारीसिंह दिनकर का जन्म लगभग छप्पन वर्ष पूर्व बिहार के मुगेर जिले के सिमरिया गाव के एक पृषक परिवार मे हुआ। अगरेजी कैलेण्डर से यह तारीख 30-9-1908 होती है और माघे अनु- सार 'आसिन अजोर तेरह से सोरह फसली नवरात्रि के दिन बुधवार दिनकर जी का जन्मस्थान सिमरिया ग्राम शस्य-स्यामल सेतो, वृक्षा, आम्रकुजो और वेणु वनो के साथ-साथ दो नदियो-गा और बाया से घिरा होने के फलस्वरूप रमणीय प्राकृतिक दृश्यो से समृद्ध है । ग्राम के वास-कुजो के प्रति तो उनका विशेष आकर्षण और अनुराग था इस विपय मे स्वय दिनकर जी के उद्गार दृष्टव्य हैं-'बास को देखकर मेरा हृदय उल्लास से भर जाता है । मेरी जन्म- स्थली मे बासो वे वगीचे हमारे घर के पास ही थे। उन्ही के परिवेश म मेरा वचपन बीता था। अतएव वासा से मुझे प्यार है।" प्रकृति के सुरम्य रूप के साथ- साथ उसके भयावह स्प का भी दिनकर जी पर व्यापक प्रभाव पड़ा। दिनकर भीमा असली नाम 'रामधारीसिंह था। 'दिनकर' उपनाम था, जो उन्होंने अपने पिता श्री रविसिंह के नाम के अनुकरण पर रखा था। उनकी मा 'नून कहती थी । घर मे सभी उन्ह 'मालिर' रहते थे। दिनकर जी का गोत्र 'सावणि' था। वस्तुत दिनकर जी दिनकर के समान ही तेजस्वी एव ऊजस्थित थे। 1 प्रो० मुरलीधर श्रीवास्तव-युग कवि दिनकर, पृ. 1 2 प्रो० विनोदवाला शर्मा-दिनकर ये वाय्य मे जीवन दर्शन, पृ० 18 101 दिनपर का नियन्य गाहित्य परिवार दिनार जी 4 मिह का नाम श्री शरमिह पा। उनरा परिवार आपिर दृष्टि म निम्न-मध्यम वर्ग मा पादिनार जी मे पहने परिवार में उन्ध शिक्षा का प्राय अभाव रहा । गरे परिवार में रामायण, महाभारत, गीता, पुराण आदि धार्मिर ग्रन्या मो महत्व दिया जाता पा। सिर जी मे पिता वृषण होते हुए भी उनसे व्यवहार मारण उन्हें आदर देते थे। दिनार जी जय दो वर्ष ये पे तभी उन पिता मा देहान्त हो गया। दिपर जी ये दो भाई पे। इनके नाम प्रमश हैं-अप्रज श्री यमनसिंह और अनुज श्री सत्यनारायण सिंह । दिनकर जी का विवाह पन्द्रह वर्ष मी आयु में हो गया था। दिनार जी के दो पुत्र, दो पुत्रिया थी । दिनकर जी ने पैसठ वर्ष की आयु मे दो पुत्रियो, छह भतीजियो और दो पोत्रियों का विवाह किया । परिवार ये प्रति मोह, साधु-रातो की महिमा म विश्वाग, पशुपालन से प्रेम इत्यादि गुण इन्हें भारतीय ग्रामीण की मोटि मे रखने के लिए पर्याप्त हैं । परिवार एव गृहस्थी ये लिए उनमे अपधिप मोह रहा। उनकी पारिवारिष विषमता वे मारण अच्छे-अच्छे साहित्यकारो यपा- भगवतीचरण वर्मा, मन्मयनाथ गुप्त आदि मो सोचने पर याध्य होना पड़ा पि दिनकर इतनी दुपद स्थिति में इतनी सुन्दर रचनाए किस प्रकार करते हैं । इम विषय में श्री प्रफुल्लचन्द ओझा या वपन उल्लेखनीय है कि -"दिनकर जिस पारिवारिव परिवेश में रहने को मजबूर थे, उसमे पढ़ने-लिपने की बात तो दर किनार, कोई जीवित भी करो रह सकता है, यह सोचता है तो आश्चर्य होता है। हृदय मे भयानक ज्वालामुखी छिपाये हुए वे ऊपर से शात और प्रतिस्थ ही दीखते थे । मित्रो मे बैठते तो हलको फुलसी यातें भी परते और खुलकर अट्टहास भी करते । उस समय कौन कल्पना कर सकता था कि यह आदमी भीतर से इतना दुखी और टूटा हुआ है।" शिक्षा-दीक्षा दिनकर जी की प्रारम्भिक शिक्षा बडी ही पठिनाइयो मे हुई । प्रात उठकर पाच छह मील की दूरी पर स्कूल जाना पड़ता था। उन्होने बाढ के सिर पर पर 1 प्रो. विनोदबाला शर्मा-दिनकर के काव्य मे जीवन दर्शन, पृ. 19-21 2. डा० रमारानीसिंह-दिनकरः साहित्य मे व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति, पृ० 43 3 श्री गोपालराय-समीक्षा, पृ० 8 रामधारीसिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 11 रखपर और गर्मी मे तप्त बालू मे होकर भी आरम्भिव शिक्षा का क्रम चलाये रखा। बचपन से ही 'वन्देमातरम्' गाने का शोर था। सन् 1922 मे असहयोग आन्दोलन के कारण पाठशाला वद हो गयो । दिनकर जी को अब राजकीय मिडिल स्कूल में जाना पड़ा । सन् 1928 मे मोकाम घाट के एच० ई० स्कूल से मैट्रिक और पटना से इतिहास लेकर बी० ए० उत्तीर्ण की। वे अपनी ओजस्वी वाणी से अपने श्रसालु जिज्ञासु ग्रामवासियों के समक्ष 'रामचरितमानस' का सस्वर पाठ परते थे। सादगी ही उनके जीवन की प्रमुख विशेषता थी, दिनकर जी पौरुष के कवि ही नहीं, बल्कि स्वय भी पौरुपवान थे। उनके व्यक्तित्व को यदि हम एक शन्द म बद करना चाहें तो वह है 'पोरुप'। बचपन से ही कविता रचना उनका अभिन्न अंग बन गया था। पढने के माथ-साथ ये ओजपूर्ण कार्यक्रमो मे भी बडे उत्साह से भाग लेते थे। यही सस्कार उनके आगामी जीवन मे फलीभूत सस्कार-शीलता विद्यार्थी जीवन के सस्कार दिनकर जी ने प्राथमिक शिक्षा गाव की पाठशाला मे प्राप्त की। प्राथमिक शिक्षा के लिए उन्हे तीन मील दूर बारो नामक ग्राम रोज पैदल जाना पड़ता था। यहा हिन्दी के साथ उन्होंने उर्दू भी पढी । यही पर दिनकर जी के बाल मन पर राष्ट्रीयता के सस्कार पडे । इसके बाद दिनकर जी ने मोकामा घाट, जो गगा वे दूसरे तट पर था, से हाई स्कूल पास किया। रोज गाव से पैदल जाते थे। जूतो का रिवाज नही था।गर्मी को ऋतु मे तेज धूप मे पैदल चलने के कारण उनके पैरो में छाले पड गये थे ।पढाई मे अपनी कक्षा मे वे प्रतिभाशाली और सर्वश्रेष्ठ छात्र थे। इसीलिए दसवी की परीक्षा मे केवल दिनकर जी ही पास हुए। हिन्दी मे सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करने के कारण उन्हे 'भूदेव हिन्दी पदक प्राप्त करने का गौरव प्राप्त हुआ। होनहार बिरवान के होते चीकने पात' उक्ति दिनकर जी के बाल्यकाल मे चरित्रार्थ होने लगी। 1932 में पटना कालेज में इतिहास ऑनर्स 1 कु. पद्मावती-दिनकर व्यक्तित्व एव कृतित्व, पृ० 43 2 डा० रामधारी सिंह दिनकर--बाचाल, पृ. 24 3 प्रो० सिद्धेश्वर प्रसाद (स.)-राष्ट्रकवि दिनकर एवं उनकी साहित्य साधना, पृ० 24 4 डा० सावित्री सिन्हा-युग चारण दिनकर, पृ० 4 5 डा. विनोदबाला शर्मा-दिनकर ने काव्य मे जीवन दर्शन, पृ. 23 12 / दिनकर या निबन्ध साहित्य लेकर बी० ए० को परीक्षा उत्तीण पी। आगे चलकर यही इतिहास उनले सस्कृति और दर्शन विपयव चिन्तन का आधार बना ।। दिनकर के व्यक्तित्व मे उनके मित्रो का बहुत बडा हाथ है । उनमे सभी तरह के मित्र थे। उनके व्यक्तित्व पर श्री जयप्रवाशनारायण, श्री रामवृक्ष बेनीपुरी, थी गगाशरण सिंह, श्री वनारसीदास चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानन्दन पत, महादेवी वर्मा, रवीन्द्रनाथ टैगोर, इक्बान, काजी नजम्न इस्लाम तथा विदेशी कवियो जैसे-शंली, वई सवयं, लारेंस, इलियट आदि का भी प्रभाव था। दिनकर इकबाल से तो इतने प्रभावित थे कि उनके सघर्ष क क्षणो को वैसा का वैसा माहित्य म उतार लिया। दिनकर अपनी काव्यालोचना सम्बन्धी पुस्तक 'शुद्ध कविता की खोज' मे लिखते है कि-"जिसे हम व्यक्तित्व कहते है वह सघर्ष की अवस्था है, जब तक वह अवस्था वनी रहती है, तभी तक मनुष्य का व्यक्तित्व कायम रहता है।' दिनकर जी म एक अक्खड देहाती के सस्कार भी थे । ये आचार-व्यवहार तथा रीति रिवाज के पालन मे एक ग्रामीण की कट्टरता अपनात । शादी-ब्याह और यज्ञ प्रयोजन मे ये देहाती परम्परा के कायल रहे । इन कार्यों म प्रातिकारी कदम उठाना इनके लिए असम्भव था । धर्म सम्बन्धी इनकी मान्यताए कितनी ही आधुनिक और वौद्धिक क्यो न हो, उनके व्यावहारिक रूप से समक्ष आते ही मे रूढिवादिता का दामन छोड नहीं पाते हैं । दिनकर जी ने विद्यार्थी जीवन बडी सादगी से व्यतीत किया। वेश भूषा और व्यक्तित्व की कृत्रिम साज सज्जा की ओर उनका ध्यान कभी नहीं गया । वे सदा साधारण धोती व मोटे कपडे का कुर्ता पहनते और चादर डाले रहते थे। उनके सिर वाल छोटे किन्तु शिखा लम्बी होती थी । वेशभूपा साधारण होत हुए भी उनके चेहरे पर एक ओज और तेज था । यह भोज और तेज उनवे मुखमण्डल पर हमेशा रहा। दिनकर जी के बाह्य व्यक्तित्व की तेजस्विता आतरिक ऊर्जा का परिणाम थी। साहित्यिक एव राष्ट्रीय सस्कार दिनकर जी कठोर परिश्रमी थे । उनको वचपन मे रामचरितमानस, नाटक, 1 ममथनाथ गुप्त-रामधारीसिंह दिनकर, पृ० 14 2 दिनकर-सस्कृति के चार अध्याय, भूमिका से उद्धृत 3 डा० रमारानी सिंह दिनकर साहित्य म व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति, पृ. 41-42 4 डा. रामधारी सिंह दिनकर-चश्वाल, भूमिका पृ० 29 5. डा. विनोदवाना शर्मा-दिनकर वे वाव्य मे जीवन दर्शन, पृ. 24 रामधारी सिंह दिनकर . व्यक्तित्व और कृतित्व | 13 रामलीला तया पत्र-पत्रिकाओ के माध्यम से साहित्यिक सस्कार प्राप्त हुए। 1920 मे लोकमान्य तिलक की मृत्यु के सदर्भ मे प्रकाशित 'प्रताप' पत्रिका में 'एक भारतीय आत्मा' कविता ने दिनकर जी को साहित्यक संस्कारो की ओर प्रेरित किया । वह युग भी राष्ट्रीय आन्दोलन का था। उन्हें राष्ट्रीय कविताए बहुत अधिक रुचिकर लगती थी और वे सभी कविताओ को याद कर लेते थे। इसी से उनमे माहित्यिक सस्कारो के साथ-साथ राष्ट्रीय भावनाए भी जाग्रत हिन्दी से उन्हे विशेष प्रेम या क्योकि हिन्दी भाषा के साहित्य की दरिद्रता उनके सामने विद्यमान थी । इस सम्बन्ध मे उन्होने एक घटना का उल्लेख किया है-"मैट्रिक मे हिन्दी मे मैंने विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया और 'भूदेव हिन्दी मैडल' प्राप्त किया। पटना कालेज मे आई० ए० मे जब मैंने नाम लिखवाया तो मैंने सोचा हिन्दी ले लू लेविन प्रिंसीपल हान ने मुझे हिन्दी लेने की इजाजत नहीं दी । आई० ए० पास करने के बाद जब मैं बी० ए० मे पहुचा तो मैंने फिर कोशिश की कि प्रिंसीपल पेपर मे हिन्दी ले लू । इस वार मिस्टर लिबर्ट प्रिंसीपल थे, विपाक्त स्वर मे उन्होने कहा-"भले ही तुम हिन्दी मे सर्व. प्रथम आये हो मगर अग्रेजी मे तो नहीं। हिन्दी भाषा का साहित्य दरिद्र है, मैं इसे प्रोत्साहन नहीं दे सकता।" दिनकर जी के लिए ये शब्द प्रेरणा का विषय बने और वे अधिव विश्वास के साथ हिन्दी की सवा म सलग्न हो गये। स्वभाव से दिनार जी ईमानदार एव स्पष्टवादी थे। प्रथम भेंट मे ये किसी को भी अविश्वसनीय नही मानते थे किन्तु बाद मे धोखा खाने पर अपनी पीडा भी नही छिपाते थे । भगवतीचरण वर्मा ने लिखा है वि--"कलाकार की हैसियत से दिनकर जी को मैं सबसे अधिक स्पष्ट और ईमानदार पाता हू।" दिनकर जी की स्पष्टवादिता जायन्त उनके जीवन और व्यवहार म विद्यमान रही। दिनकर सामाजिक, सास्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिर सभी प्रकार के पर्यावरण से प्रभावित हुए । इसी अवस्था मे उनवे साहित्यिक सस्कारो का जन्म हुआ। दिनकर जी न अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वो के कारण साहित्य को माध्यम बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से अपने कार्य को सम्पन्न किया। दिनार की पहली पुस्तक 'वारदोली सत्याग्रह' थी, जो राष्ट्रीयता की भावना से ओतप्रोत है। इसके बाद उनका पण्डकाव्य 'प्रणभग' आया। 1935 में 'रणुका' लिखी गई ।दिनवरजी - 1 दिनकर के काव्य मे जीवन दर्शन, पृ० 24 2 प्रतापचन्द्र जैसवाल (स.)--राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी साहित्य साधना,पृ.8 3 आजवल, फरवरी 1960, पृ. 17 - 14 / दिनवर का निवन्ध साहित्य का जीवन समय के साथ-साथ बदलता गया । सघर्ष के समय गर्जन एव शाति के समय रस का अजस्र धारा-प्रवाह दिनकर के साहित्य का मूल आधार बना । जीवन के अन्तिम दिनो मे 'उर्वशी' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' सभी को त्याग- कर ईश्वर की भक्ति मे लीन हो गये। इसके बाद 'हारे को हरि नाम' नामक काव्य-सग्रह प्रकाशित हुआ। दिनकर जी बहुमुखी प्रतिमा के धनी रचनाकार थे । सम्पूर्ण दिनकर साहित्य को इस प्रकार विभाजित किया जा सकता है—काव्य कृतिया, सस्मरण, आलो. चना, यात्रा-विवरणात्मक निवन्ध, सास्कृतिक निबन्ध और गद्य-काव्य । दिनकर साहित्य मे काव्य के दोनो रूपो-प्रबन्ध एव मुक्तक की रचना हुई । दिनकरजी की लेखनी काव्य की दोनो विधाओ पर समान रूप से गतिशील हुई। विभिन्न कृतियो पे अध्ययन-मनन के साथ-साथ दिनकर जी के साहित्यिक सस्कार गहन से गहनतर तथा राष्ट्रीय सस्कार विभिन्न राष्ट्रीय आन्दोलनो, राजनीतिक सम्मेलनो एव प्रातिकारी क्रियाकलापो के प्रभावस्वरूप प्रवल से प्रबलतर होते चले गये। सरकारी नौकरी मे रहते हुए दिनकर जी ने अनेक देशो का भ्रमण किया। इन्ही यात्राओ का चित्रण उन्हान अपने सस्मरणात्मय निवन्धो में किया है। दिनकर गद्य की अन्य विधाओ को रचने मे जितने सफल हुए हैं, उतने ही सस्मरणा- रमय नियन्धो मे भी । दिनरर जी ने अपनी डायरी (1974) लिखकर अपने गद्य एव पद्य साहित्य का समापन किया। व्यवसाय एव कार्य क्षेत्र अर्याभाव ने दिनकर जी को व्यावसायिप क्षेत्र में प्रवेश करने को वाय किया। सन् 1932 मे बी० ए० ऑनसं परने के पश्चात् दिनयर जी पूर्णरूपेण गृहस्प जीवन में उतर आये । एक स्कूल में प्रधानाध्यापर का पद मिला परन्तु प्रिटिग रातार पक्षपाती जमीदारो से इनका पासा पहा। जिसके कारण दिनकर जी को भी सरकारी नौकरी तो कभी प्राइवेट नौकरी करनी पड़ी। सरपारी नौकरी में प्रवेश परने पर दिनकर जी यो स्वामी सहजानन्द सरस्वती ने सापीरोरापरन्तु राष्ट्रद्रष्टा पोप ये धनी, युगधर्म येत्ता, युग पुरुरवा, अलौषि पाप्य प्रतिमा धनी दिनार पर रखने वाले पे? अनेर सपो से जूमने हुए मरमवार पप पर निरन्तर आगे बढ़ने रह । एष और क्रांति मोर विद्रोह उपोर उन पछ में निर्गत होने के लिए मरण उत ये और दूमरी और सर 1 दिनार माहिप में यस्तित्व की अभिव्यक्ति, पृ. 46 : मिराम में जीपन दर्गन, पृ० 24 रामधारी सिंह दिनकर . व्यक्तित्व और कृतित्व / 15 कारी नौकरी होने के कारण दमनचक्र मे भी उनको पिसना पडता था । सरकार की दृष्टि मे वे बागी थे, विद्रोही थे । जो भी हो, सरकारी नौकरी की विवशता और गुलामी को झेलते हुए भी दिनकर जी ने राष्ट्रीयता के जिस युगगम्भीर और निर्भीक राग का उद्घोष किया, वह विशेष रूप से स्मरणीय बना। दिनकर जी भारतीय साहित्य जगत मे एक अभूतपूर्व व्यक्तित्व को धारण किये हुए थे । साहित्य सृजन के अतिरिक्त वे वक्ता, विचारक तथा हिन्दी सेवी के रूप मे हमारे सामने आये। एक हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक होने के बाद उनके जीवन में कई मोड आये । सन् 1935 मे 'रेणुका' के प्रकाशन के बाद इनकी नियुक्ति बिहार सरकार के अधीन सब रजिस्ट्रार पद पर हुई। नौ वर्ष बाद युद्ध प्रचार के विभाग के उप निर्देशक भी रहे । इसी बीच 1934 से 1947 तक साहित्य के माध्यम से स्वतत्रता संग्राम मे महत्त्वपूर्ण योगदान किया । सन् 1950 से 52 तक मुजफ्फरपुर कालेज मे हिन्दी विभागाध्यक्ष भी रहे और कुछ समय पश्चात सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर राज्यसभा के काग्रेसी सदस्य चुने गये । दिनकर जी ने राज्यसभा से अलग होकर भागलपुर विश्वविद्यालय मे उपकुलपति पद को सुशोभित किया, किन्तु उपकुलपति पद से इस्तीफा दे दिया और सन् 1966 में गृह भवालय मे हिन्दी सलाहकार के रूप में कार्य करने लगे। इसी बीच उनके बडे पुत्र का निधन हो गया जिसका उनके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। दिनकर जी ने एक तरफ सरकारी, गैर सरकारी कार्य कर देश की सेवा की तो दूसरी तरफ साहित्य-सृजन में अभूतपूर्व योगदान दिया। प्रतिष्ठा और सम्मान दिनकर जो आधुनिक भारतीय साहित्य परम्परा मे राष्ट्रीय भावना के सजग प्रहरी थे। आपने सामाजिक, आर्थिक, राजनीति और धामिव जागृति मे अपूर्व योगदान दिया। समय-समय पर प्राप्त पुरम्बार एक सम्मान उनके आदान की स्वीकृति है। सन् 1953 में सुकवि दिनकर जी को उनरे प्रय 'सस्कृति के चार अध्याय' पर साहित्य अकादमी ने राष्ट्रीय पुरस्कार दिया। सन् 1959 मे उनकी साहित्यिक सेवाओ वे उपलक्ष मे गष्ट्रपति ने उन्हे पद्मभूषण' को उपाधि से गौर- यायित पिया। 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय ने उन्हे डॉक्टर आफ लिटरेचर की उपाधि दी । इसके अतिरिक्त 'कुरुक्षेत्र' माव्य कृति पर इलाहाबाद को साहि- स्यकार ससद ने एव मध्य समारोह में दिनार जी को एक हजार रुपये, उत्तर 1. जगदीशप्रसाद चतुर्वेदी (स०)-दिनगर : पस्तित्व एवं कृतित्व पृ. 44 2. डा. प्रतिभा जन-दिनकरः काय मला मोर दर्शन, 1.52 16/दिनकर का निवन्ध साहित्य प्रदेश सरकार ने बारह सौ रुपये, भारत सरकार ने दो हजार रुपये, काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने द्विवेदी पदक देकर सम्मानित किया। 'रश्मिरथी' वृति पर भी दिनकर जी को द्विवेदी परक तथा उत्तर प्रदेश सरकार से आठ सौ रुपये का पुरस्कार प्राप्त करने का श्रेय मिला। 1973 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करके तो वे गौरव और यश के अत्युच्च शिखर पर पहुच गये। हिन्दी विभागा- ध्यक्ष तथा उपकुलपति के रूप में उन्होंने शैक्षणिक क्षेत्रो मे पर्याप्त ख्याति और लोकप्रियता प्राप्त की । राज्यसभा, राजमापा आयोग, केन्द्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड तथा आकाशवाणी की केन्द्रीय सलाहकार समिति के सम्मानित सदस्य के रूप मे एव केन्द्रीय सरकार के हिन्दी सलाहकार के पद पर कार्य करते हुए उन्होंने राजनीतिक और राजकीय क्षेत्रो मे गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया। इतना ही नही, सन् 1955 मे पोलण्ड, लन्दन, जिनेवा, पेरिस और वाहिरा, 1957 मे चीन, हागकाग, बैंकाक और वर्मा, 1961 मेस, 1967 मे मारीशस तथा 1968 मे पश्चिम जर्मनी की यात्रा के समय उन्होंने सास्कृतिक और साहित्यिक प्रतिनिधित्व किया, उससे राष्ट्र के सास्कृतिक एवं साहित्यिक गौरव गरिमा मे तो वृद्धि हुई ही, साथ ही उन्हें भी विदेशो मे पर्याप्त प्रतिष्ठा और ख्याति अजित करने का सौभाग्य मिला। दिनकर जी की कृतियो का विदेशी और अन्य भारतीय भाषाओ मे भी आदर हुआ है। उनके गद्य-अथ 'संस्कृति के चार अध्याय' का अंगरेजी अनुवाद श्री नरेन्द्र गोयल ने किया है। इस प्रथ के प्राचीन खण्ड का अनुवाद जापानी भाषा मे भी हुआ है । 'कुरुक्षेत्र' काव्य का अनुवाद कन्नड, तेलुगु आदि मे हुआ और पष्ठ सर्ग का अनुवाद अगरेजी मे रघुवश कपूर ने किया है। श्री प्रतापनारायण करण 'रश्मिरथी' कुछ अंशो का अनुवाद असमिया मे किया है । 'उर्वशी' की कुछ कविताओ का अनुवाद श्री केशव ने अगरेजी मे क्यिा है । जापान से प्रकाशित होने वाले एक अगरेजी पत्र 'ओरियण्ट वेस्ट' में 'कलिंग-विजय' का अनुवाद प्रकाशित हुआ । इसके अलावा सगीत निर्देशक श्री जयदेव द्वारा 'उर्वशी' काव्य का जो सगीत तैयार किया गया है वह भी दिनकर जी के कृतित्व और अप्रत्यक्ष रूप से दिनकर जी के प्रति सम्मान का परिचायक है। जीवन के सघर्ष और वैषम्य अलौकिक काव्य-प्रतिभा के धनी, योजस्विता की गौरव-गरिमा से समन्वित, वाणी-रश्मिरथी, काव्य-गगन में भानु के समान दीप्यमान श्री रामधारीसिंह दिनकर जी का व्यक्तित्व सघर्ष एव विचित्रताओ से परिपूर्ण था। उन्होंने स्वय अपने विषय में कहा है-"मैं न तो सुख मे जन्मा था, न सुय मे पलकर बढा हू। ...."धनाभाव को पोडा, दफ्तरों में मिलने वाले प्रच्छन्न अपमान, बेटियो के रामधारीसिंह दिनवर व्यक्तित्व और वृतित्व / 17 विवाह की चिन्ताए और पारिवारिक कष्ट मैंने बहुत सहे है ।" उन्हे जीवन के प्रत्यक क्षेत्र मे इतने दुखो और कठिनाइया का सामना करना पड़ा कि उन्ह यह जीवन ही दद का अजस स्रोत प्रतीत हुआ--1 जीवा दर्द का झरना है। जो भी जीत हैं दर्द भोगते है। और दर्द भोगते भोगत ही हम मरना है। दिनकर जी के वपम्यो का अवलोक्न निम्न शीपको के अन्तगत पिया जा सकता है- , व्यावसायिक जीवन के सघप और वैषम्य 2 साहित्यिक जीवन के सघप और प्रतिकूल आलोचनाए 3 पारिवारिक जीवन के संघप 4 शारीरिक कष्ट व्यावसायिक जीवन के संघर्ष और वैपम्य शिक्षार्जन के उपरान्त व्यावसायिक जीवन की ओर उन्मुख होत ही उहे सामा- जिप विषमताओ का कटु अनुभव हुआ। दिनकर जी एक निम्न परिवार से सबंध रखते थे जबकि उन दिनो प्रतियोगी परीक्षामा के अभाव में बड़े पदो पर उच्च वर्ग (धनी परिवार) के युवा नियुक्त होत थे अत्त दिनकर जी अपनी महत्त्वाकाक्षा को पूर्ण नहीं कर सके । जब वे राष्ट्रीयता और जन-जागरण के लिए ज्वलत कविताओ के माध्यम से अगरज शासका के विरुद्ध प्राति विद्रोह आज और शौर्य की भीषण हुवार करते तो अगरेज सरकार के कान खड़े हो जात । उन्ह तग करने के लिए सरकार न चार साल की अवधि में उनका बाईम बार स्थानान्तरण किया । उह अनेक व्यक्तियो को निमम आलोचनाआ जुगुप्साज य प्रतिक्रियाओ तथा गहन अन्तर्द्वन्द्र का सामना करना पड़ा। उसस पीडित हाकर वह उठे- विनय मान मुमको जान दो, शप गीत हिप पर गान दो, 1 डा. विनोदयाला शर्मा-दिनर जीवन वृत्त, व्यक्तित्व और कृतित्व, पृ० 2627 2 दिनपर-हार को हरिनाम, १० 65 3 दिनकर जीवनवृत्त, व्यक्तित्व और वृतित्व, पृ. 28-29 18 / दिर का निबन्ध साहित्य मुझसे तो न सहा जायेगा अब असीम यह पोलाहल जी न सकूगा पर शेल अव पी न रागा ग्लानि-गरल।' जीवन को इन्ही सघपंपूण एव अन्तर्द्वन्दमयी परिस्थितियों में वे मधुमय जैम दारुण रोग से ग्रस्त हुए। हिन्दी सलाहकार वे पद से निवृत होने पर तो उनक जीवन मे निराशा एव अवसाद परिव्याप्त था। अपने स्वर्गीय पुत्र के अनाय परि वार की चिन्ता और आर्थिक कठिनाइयो ये कारण प्राय अशांत और उद्विग्न रहने लगे थे। साहित्यिक जीवन के संघर्ष और प्रतिकूल आलोचनाए साहित्य का मार्ग सरल, सुगम न होकर यण्टयाकीर्ण होता है। साहित्यिक जीवन मे पदापण करने वाले व्यक्ति यो अनेक सघर्षों एव प्रतिकूल आलोचनाओ का सामना करना पडता है। दिनकर जी अपने अध्यवसाय और प्रतिभा के बल पर अपने जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियो को तो अपने अनुकूल बनाने में कुछ सफल हुए किन्तु हिन्दी वाड मय को अपनी उच्च कोटि की कृतियो से समृद्ध करने पर भी प्रतिकूल आलोचनाओ और आक्षेपो से बच नही सके । जब 'उर्वशी काव्य प्रकाशित हुआ तो कुछ लोगो ने उसे अनौचित्य पूर्ण बतलाते हुए कहा कि-' इस समय उर्वशी की रचना गद्दारी है ।"2 डा० भगवतशरण उपाध्याय ने अपनी पुस्तक 'समीक्षा के सदर्भ में उर्वशी की कटु आलोचना की है और यह कहा है कि-- "आज गर्ज कि हिन्दी उर्वशी सस्कृत विक्रमोर्वशीय' का कथानुवाद है ।" जब दिनकर जी का गद्य-ग्रथ 'सस्कृति के चार अध्याय' प्रकाशित हुआ तो कुछ कट्टर हिन्दुओ ने इसकी आलोचना की तथा कुछ स्थानो पर उसकी प्रतियो को जलाया गया। मैथिलीशरण गुप्त जैसे घनिष्ठ मित्र और प्रशसक ही उनसे विद्वेषपूर्ण बातें करत उनकी निन्दा और आलोचना करते तो उनके मर्म को आघात पहुचता था। कुछ लोगो ने तो उनके राष्ट्रकवित्व का लेकर मजाक भी उडाया। कुछ व्यक्ति तो उनकी महत्ता पर आक्षेप करने से भी न चूके- जन्मजात होत महान कुछ अपने से बनते हैं लोग । कुछ पोपी जाती है महानता एकमात्र सजोग । . 1 दिनकर-मत्ति तिलक, पृ०16 2 दिनकर-दिनकर को डायरी, पृ० 63,322 3 डा० भगवतशरण उपाध्याय-समीक्षा के सदर्भ, पृ० 14-10 4 वहीं 5 दिनकर-दिनकर की डायरी, पृ० 44 रामधारीसिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 19 सौवे चाल हरा की चलते पर आवाज न छिपती है, हसा वो क्या, दुनिया भोगे अपने कर्मों का भोग।" पारिवारिक जीवन का सघर्ष दिनकर जी को प्रारभ से ही पारिवारिक सघर्षों से जूझना पहा । निम्न मध्यवर्गीय परिवार में उत्पन्न और केवल दो वर्ष की वय में ही पिता को छत्र- छाया से वचित दिनकर जी आर्थिक अभावो और विभिन्न पारिवारिक समस्याओ म पलकर बडे हुए और आजीवन इन समस्याआ से दो चार होते रहे । अपना भरा-पूरा परिवार होते हुए भी वे मयु से एक-डेढ वर्ष पहले से नि सग भटक्ते फिर रहे थे और सन्यास लेने की बात यह रहे थे । अपने पुत्र के असामयिक निधन से तो दिनकर जी बुरी तरह टूट ही गये । इस प्रकार दिनकर जी की नियति का यह दूर व्यग्य था कि जीवन में पर्याप्त सम्मान, यश, पद प्रतिष्ठा तथा धन अर्जित करने के उपरात भी व पारिवारिक जीवन के विषम सघर्षों में उलझे रहे और अपने जीवन के अतिम दिन भी सुख-चन, निश्चितता और निरुद्विग्नता में व्यतीत न कर सके। - शारीरिक कष्ट जिस व्यक्ति ने आजीवन समर्प झेले हो उसका अनेक रोगो से जर्जरित हो जाना पोई आश्चर्यजनक अथवा अप्रत्याशिन नहीं है । वे व्यावसायिक साहित्यिक और पारिवारिक जीवन की कठिनाइया के कारण मधुमेह, रक्तचाप और दिल की बीमरी से ग्रस्त हुए। वे ऐनजाइना के दर्द से भी पीडित थे । मृत्यु से कुछ माह पूर्व उन्हे आधे मुह का पक्षापात भी हो गया था। वह एक वैद्य महोदय के उप- चार से ठीक हो गया। वस्तुत उनका शरीर कई रोगो के कारण अन्दर ही अन्दर क्षरित होता जा रहा था। उन्ह अपनी मृत्यु का भी पूर्वाभास होने लगा था।' जीवन की लीला का अन्त प्रतिभासम्पन्न दिनकर जी के बारे मे मन्नूलाल जी लिखत है-'कवि के रूप म हृदप उच्चीलिनी प्रतिभा मे मिश्रित भाव विभोरिती कल्पनामयी काव्य लहरी के सतर्क, साहित्यिक, विचारक एव समालोचव के रूप में जल-दुग्ध भेद पारगत 1 धर्मयुग, 21 अक्टूबर 1972, ५० पद्मवात मालवीय, पृ05 2 धर्मयुग, 12 मई, 1974, पृ०2 3 लोकराज, दिनकर अक, पृ०37 --"हिन्दी दिनकर जी 20 / दिनार का निबन्ध साहित्य अम्गोजिनी-वन नित्यवागी-विलासी हस के मूल्य राहग वास्तविाता के उन्मोदक, ससद सदस्य के रूप मे अमोघ, सम्मोहक शक्ति वे जाज्वल्यमान भावधारण, सामाजिक के रूप मे सहज सुलभ आस्वादमयी वाक्चातुरी के प्रणेता इत्यादि रूप मे दिनकर जी बहुमुखी व्यक्तित्व वाले महामानव थे।"1 दिनकर जी जिस अप्रत्या शित और आकस्मिक रूप से दिवगत हुए, उसकी कल्पना किसी को भी नहीं थी। दिनकर जी की अतिम इच्छा तिरुपति जाने की थी। मृत्यु वाले दिन वे आत प्रसन्न और स्वस्थ लग रहे थे । दिनकर जी की इच्छा पूर्ण हुई और 1974 की 24 अप्रैल को अस्पताल मे ही दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हो गयी । डा. हजारीप्रसाद दिवेदी ने उनके निधन के विषय में ठीक ही कहा था--" भापा उन्ह पावर धन्य हुई थी, खोबर शोचनीय हो गई।"2 वस्तुत का जीवन एक ओर यश एव प्रतिष्ठा की उज्ज्वल गाथा है, दूसरी ओर सघर्षों एव विपत्तियो की करुण कहानी रहा है । इसी सघर्प ने उन्हे महान् बनाया। साहित्यिक जीवन के प्रेरक साहित्य समाज का दर्पण है । समाज का वातावरण एव परिस्थितिया ही कलाकार को प्रेरित एव उत्साहित करती है । कवि या गद्यकार अतीत का वेत्ता, भविप्य का दृष्टा और वर्तमान का सजग प्रहरी है। इतिहास की गतिविधियो से उनको प्रेरणा तो मिलती है, पर अतीत के प्रति ऐमा मोह नही जगता जो उन्हें वर्तमान के अनुभवो के सबध मे कुछ बाधा पहुचाये। वर्तमान भी उनके लिए उतना ही प्रेरणादायक है जितना अतीत । अतीत तो वस्तुत उनके लिए वर्तमान को समझने की दृष्टिमात्र है । वर्तमान का यह आग्रह और उसके साथ कवि का विचार तथा भावमिश्रित तादात्म्य उसके व्यक्तित्व को अन्य राष्ट्रीय कवियो के व्यक्तित्व से पृथक् कर देता है । दिनकर जी पर तुलसी और कदीर का प्रभाव भी था। उनके सस्कार तुलसी और कबीर की सहज गम्भीरता तथा प्रसाद के गुण आदि थे । 'मानस' का प्रभाव उन पर वचपन ग ही था। उन्ही के शब्दो मे-- "जहा तव पविना का सवध है, मैंने प्रेमपूर्वक पहलेपहल तुलसीकृत रामायण पढी यो।" दिनकर जी की कविता म सामाजिक वैषम्य, आर्थिक शोपण, राजनीतिक हलचल सर्वत्र मुनायो देती है। वे स्वय स्वीकारत है-"मरी कविताआ के भीतर 1 मनूलाल द्विवेदी (स)-अलौविक काव्य प्रतिभा धनी दिनकर, पृ073 2 सोमराज, दिनकर अक, ५०५ 3 व्यक्तित्व एव तिरव ववि दिनकर, पृ० 48 4 डा. सावित्री मिन्हा--युगवारण दिनकर,प. 19 दिनार--चत्रवाल, भूमिका पृ. 24 1 रामधारी सिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 21 जो अनुभूतिया उतरी वे विशाल भारतीय जनता की अनुभूति थी।"1 दिनकर जी पर पूर्ववती एव समकालीन रचनाकारो की प्रेरणा स्पष्ट दिखाई देती है । वे एक ओर नातिकारी कवियो के प्रतिनिधियो के रूप मे हमार सामने आते है तो दूसरी ओर समीक्षक के रूप मे । काव्य-सृजन के बारे में उन्होन लिखा--"सस्कारो से मैं क्ला के सामाजिक पक्ष का प्रेमी अवश्य बन गया था किन्तु मन मेरा भी चाहता था कि गर्जन-तर्जन से दूर रहू और केवल ऐसी ही कविताए लिखू जिसमे कोमलता और कल्पना का उभार हो।" दिनकर जी को काशीप्रसाद जायसवाल, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', श्री रामवृक्ष बेनीपुरी, मैथिलीशरण गुप्त, हरिवशराय बच्चन, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पत, भारतेन्दु, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी से भी साहित्य-सृजन की प्रेरणा मिली । उन्हे अगरेजी कवियो मे शैले, वर्ड्सवर्थ तथा भारतीय कवियो मे रवीन्द्रनाथ तथा इकबाल से प्रेरणा मिली। एतदर्थ दिनकर का मत उल्लेख्य है कि-"मैं यह निवेदन कर देना चाहता हूं कि वर्तमान कविता की कमवद्ध आलोचना करना मेरा उद्देश्य नही था। कुछ निबन्ध तो मैंने भापणादि की विवशता के वारण लिखे और कुछ इस लिए कि कविता के जिस रूप से मैं आसक्त रहा हूँ उसके सबध की निजी धारणाओ को मै सुस्पष्टता के साथ जान सकू। कविता लिखने की प्रेरणा का प्रथम चरण था-रामलीला और नाटक 'छान सहोदर' नामक पत्रिका पढ़ने से काफी लाभ हुआ।वे लिखते भी है--"मैं हर महीने इस पनकी राह बडी आतुरता से देखता और महीने का अक निकलते ही उसमे प्रकाशित सब पद्यो को चाट जाता।" प्रताप मे छपी 'तिलक' शीर्षक कविता के बारे मे दिनकर जी का कहना है कि-"मुझे भली भाति याद है कि वह कविता मुझे अत्यन्त पसन्द आयी थी और मैंने उसे कण्ठस्थ कर बहुत लोगा को सुनाया भी था। आगे चलकर मेरी मनोदशा के निर्माण मे इस तथा भारतीय आस्मा की अन्य कविताओ ने बहुत प्रभाव डाला।" आर्य समाज के प्रवर्तक दयानद का भी प्रभाव दिनकर जी पर दृष्टिगोचर होता है । एक स्थान पर वे लिखते है कि-"जिस प्रकार में हिमालय और हिन्दमहासागर का ऋणी हू उसी प्रकार रवीन्द्र, इक्वाल और दूसरे कवियो का ऋण भी मुझ पर है।" राजनैतिक क्षेत्र मे नेहरू जी, डा. राजेन्द्रप्रसाद, डा. राधाकृष्णनन, जय 15 1 दिनकर-चक्रवाल, भूमिका पृ० 43 2 चरवाल भूमिरा, पृ० 33 3 दिनकर-मिट्टी की ओर, आत्मनिवेदन से उपत 4 यही 5 दिनार-रेणुका वो भूमिका से उद्धृत 22 / दिनकर का निवन्ध साहित्य प्रकाश नारायण आदि का सहयोग भी मिला। अहिन्दी भाषी साहित्यकारों में दिनकर से निकटता का सवध था, श्रीमती पद्मा सचदेवा से । दिनकर पद्मा जी को अपनी पुत्री सदृश मानते थे। पद्मा जी डोगरी लोकगीतो व कविताओं की रचयिता है । दिनकर पद्मा जी की कविताओं को पढकर आवेशपूर्ण हो गये। पद्माजी दिनकर के इतने निकट थी कि दिनकर ने अपने जीवन में अतिम पत्र भी पद्मा जी को ही लिखा था। यद्यपि वे गाधी के अहिंसावाद के विरोधी ये तथापि उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण से प्रभावित भी थे। कार्ल मार्क्स का प्रभाव भी दिनकर पर प्रत्यक्षत देखने को मिलता है। क्रूर शासको वे विरोध मे जाति की स्वीकृति कार्ल मार्स ने दी। व्यक्तित्व का वैशिष्ट्य दिनकर जी के व्यक्तित्व को दो आधारो पर देखा जा सकता है- (क) व्यक्तित्व का बाह्य पक्ष (ख) व्यक्तित्व का आन्तरिक पक्ष । (क) व्यक्तित्व का बाह्य पक्ष पाच फुट ग्यारह इंच लम्बा कद, भारी-भरकम शरीर जो वढती हुई वय के साथ-साथ कुछ शिथिल होता जा रहा था, रक्तिम सौन्दर्य से युक्त उज्ज्वल गौर- वर्ण,आत्मविश्वास की दृढता,स्वाभिमान के दर्प, पुरुष के तेज और प्रभुत्व कीआभा से प्रदीप्त मुखमण्डल, गर्वोन्नत ललाट, अनुभूति की स्निग्धता, गम्भीरता और चिन्तन की क्लिष्टता से युक्त भावो मे डूबी हुई सी बडी-वडी स्वप्निल आखो, सुन्दर नासिका, दातो के बीच में निश्छल प्रकृति की व्यजक जगह, प्रलम्व बाहु. लम्बी और पतली उगलिया, सिंह की सी गति तथा प्रगल्भ एव ओजस्वी वाणी से समन्वित दिनकर जी का तजस्वी और प्रभविष्णु व्यक्तित्व प्रथम दर्शन में ही व्यक्ति को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता था। दिनकर के उन्नत ललाट को देख पर सहज ही मन आकर्षित हो उठता है। हिन्दी काव्य जगत का परशुराम भी हमारे सम्मुख अक्ति हो उठता है। खादी का साफ-सुथरा सफेद लम्बा कुर्ता और घोती, कण्ठ मे जरी की विनारी का उत्तरीय, शीत ऋतु में अचवन के वर्ण का ही मफलर और हाथ मे छडी उनकी वेशभूषा विषया सुरचि का परिचय देते थे। 11. रमारानी सिंह दिनकर साहित्य में व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति, पृ.55 2 डा. विनोदवाला शर्मा-दिनकर के वाय्य में जीवन दर्शन, १०35 31. शिवरद जैन-राष्ट्रीय कवि दिनार और उनकी काय्य क्ला,१० 50 रामधारी सिंह दिनकर ध्यक्तित्व और कृतित्व 123 विशिष्ट वेश-भूषा के कारण उनका व्यक्तित्व और भी आकर्षक हो जाता था तथा अपरिचित व्यक्तियो को उनके नेता अथवा उद्योगपति होने का भ्रम हो जाया करता था। एक रमणाश्रम में एक अगरेज साधर श्री आस्वनं ने विस्मित स्वर में दिनकर जी से पूछा, "आप ही हिन्दी के कवि दिनपर है ? यहा आश्रम मे आपका नाम सुना था। मगर अव तर मैं यही समझ रहा था कि आप उद्योगपति हैं।" दिनकर का बाह्य व्यक्तित्व भी उनने अह का द्योतर पा। श्रीमती पद्मा सचदेवा के शब्दो मे-"उनका व्यक्तित्व हिमालय के सदृश उन्नत व समुद्र के समान गुरु गम्भीर और विशाल था। उनके सम्मुख हम सभी अपने आपको बहुत छोटा महसूस क्यिा करत थे। जब वे बोलते थे तो ऐसा लगता था कि धारो दिशाए फाप रही हैं। श्रीमती सावित्री सिन्हा के शब्दो मे • उनके बाह्य व्यक्तित्व में भी शानिय का तेज ग्राह्मण या अह, परशुराम का गर्जन और कालिदास की क्लात्मकता है।" दिनचर्या दिनकर की दिनचर्या पर पूर्णरूपेण प्राश उनकी पुस्तक 'कोयला और पवित्व' से सगृहीत कविता 'दिनचर्या' से पडता है। अपने शारीरिक कप्टो का विवरण वितनी चतुराई से अल्पाहार पा वर्णन करते समय दिया है- 'मधुमेही हू, चना चवापर चाय पीता हू तभी मिलने वाला का अटूट पारावार परतु सभी स्वार्थान्ध । यह दिनकर को प्रिय नही, परतु जिस पद पर वे आसीन हैं, वहा यही खोखलापन है, अपना कोई नही । दिन म डाव या समय व सध्या में साहित्य- सलाप, राधि के स्तब्ध वातावरण मे चिन्तन-मनन, रात रात भर ध्यान-मग्न नि- शब्द जगा रहता हू ।"4 दिनकर जी की साहित्य व राजनीति दोनो मे रचि होने के कारण उनकी दिनचर्या निश्चित नहीं थी। रचना-प्रक्रिया दिनकर जी की विशिष्टता यी--एक भाव, एक सवेग जिसके कारण उन्होंने इतने विशाल साहित्य का सृजन किया। दिनकर की अधिकाश रचनाए क्रोध के का ही परिणाम है । "जब वह पत्नी, पुत्र अथवा परिवार के किसी अन्य व्यक्ति या किसी मित्र पर नाराज होते हैं तब दरवाजा बंद कर खूब देर तक लिखते 1 दिनकर के काव्य मे जीवन दर्शन, पृ० 35 2.दिनकर की डायरी, पृ० 98 3 युगचारण दिनकर, पृ० 22 4 दिनकर-कोयला और कवित्व, पृ० 39 24 / दिनकर का निवन्ध साहित्य है।"1 दिनकर मे धीरता का अभाव था। इसी अधीरता वा परिणाम है-'नई दिल्ली व हिमालय' जिनके कारण दिनकर यश के भागीदार बने। दिनकर का मन कुठाग्रस्त भी था क्योकि समाज ने उन्हे राष्ट्रकवि, काति व ओज का कवि माना था। वस्तुत उनका रचनाधर्मी वैशिष्ट्य ही उनके सृजन का सार्थक्य है। व्यसन और रुचिया दिनकर जी को तम्बाकू, खनी का शौक था। लेकिन 1973 मे डाक्टरो के परामर्श पर खैनी व तम्बाकू छोडना पडा । दिनकर जी शराब का सेवन कभी नहीं करते थे। मास-मछली भी डाक्टर के कहने पर शुरू किया था । दिनकर जी की रचि अत्यधिक अध्ययन मे रही है । इसी का परिणाम है विशद् साहित्य । दिनकर की क्ला मे भी रुचि रही है । दिनकर लिखते है कि-"शापिंग करने में मुझे आनन्द मिलता है, मगर शापिंग छोटी चीजो की करता हूँ ।"4 दिनकर ने पारि- वारिक विसगतियो के मध्य अपना जीवन व्यतीत किया परन्तु इनमे से कुछ विस- गतिया भी उनकी रुचि का विषय रही-"प्रत्येक कन्या के लिए वर ठीक करना, वर-वधू के लिए साज-सामान जुटाना और अपनी जेब से जी खोलकर विवाह में खर्च करना। यह सब घर गृहस्थी के मामले में उनका प्रिय धधा था। 5 दिनकर जी को रसगुल्ला और जलेबी खाने में भी रुचि थी। दिनकर का जात्मविश्वास, अह, निर्भीकता, स्पष्टवादिता, सामाजिक्ता, निस्वार्थी स्वरूप उनके साहित्य में स्थान-स्थान पर द्रष्टव्य है । अह कितना ठोस है, तभी तो वे कहत है--"तू जो इस हयौडे से चट्टान का पत्थर तोडेगा और तेरे तोडे हुए अनपढ़ पत्थर भी बाल मे ममुद्र मे फूल समान तरेंगे।" व्यक्तित्व या अतरग पक्ष श्री कान्तिमोहन शर्मा के शब्दो मे--"उनका व्यक्तिपक्ष जितना ही कोमल और भावुन है, उनका सामाजिप पक्ष उतना ही प्रबल, आग्रहशील एव नियामा और इन्ही दोनो पक्षो के द्वन्द्व का इतिहास उनके कवि के विकास को समझने में 1. युगातरण दिनकर, पृ. 27 2 यही 3 दिनार साहिय में पवित्व की अभिव्यक्ति, पृ.59 4 दिनकर पीटापरी, पृ. 204 5. गमीसा, दिनार स्तुतिसर, पृ०॥ 6. लगतीग प्रगाद पाटी (१०)-दिनार 'यक्तित्व और कृतित्व, पृ. 102 रामधारीसिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 25 लिए अमूल्य सहायक है। दिनकर जी की अन्तरगता के विविध सदर्भ उनकी लोकप्रियता मे द्रष्टव्य है। राष्ट्रीयता दिनकर जी एक महान् राष्ट्र भावनावादी कवि थे, जिनकी वाणी की गूज आज भी विद्यमान है। दिनकर जी की राष्ट्रीयता के तीन रूप दृष्टिगोचर होते है । प्रथम अतीत गौरवमान, द्वितीय बर्तमान की वारुणिक स्थिति और तृतीय उसके निदान के लिए आतकवाद का सहारा। वे अत्यधिक उग्न विचारो के राष्ट्रकवि थे, साथ ही साथ भारतीय स्वतत्रता के समर्थक कवि भी । उनका कहना था--- "राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नही जन्मी उसने बाहर मे आकर मुझे आक्रान्त किया है ।"3 दिनकर जी जन-जागरण चाहते थे, इसी कारण वे विद्रोही और नातिकारी कवि बने । स्वभाव से ही वे भावुक और कल्पनाशील थे परन्तु वातावरण तथा सस्कार ने राष्ट्रीयता के बीज बो दिये। मित्र जी का कहना है कि, "राष्ट्रीयत्ता उनकी आत्मा का प्रधान स्वर बन गया। युद्ध और राष्ट्रीयता को समरया पर भी उनका विचार है कि--"युद्ध और राष्ट्रीयतादोनो मे राज- नीति है राजनीति जब तक सफेद लिबास मे होती है, उसे हम शाति कहते है, जब उसके कपडे लाल हो जाते है, तब वह युद्ध कहलाती है।" 4 ओजस्विता से पूर्ण ओजस्विता का परिचय हमे उनकी समस्त रचनाओ मे मिलता है। गौर वर्ण, उन्नत भाल, तेजपूर्ण नेत्र और ऊचे कद को धारण करने वाले दिनकर जी ओज एव तेज के धनी थे । विद्याथी जीवा का चित्राकन करती हुई डॉ. सावित्री सिन्हा लिखती हैं-"लखनऊ के सलोने विद्यार्थियो के बीच उनका दृढ पौरुप और ओजपूर्ण व्यक्तित्व अलग ही दिखाई दे रहा था।" ओज के धनी दिनकर जी बचपन से ही घोर विरोधो से जूझते हुए अत मे उन्नति के चरम विन्दु पर जा पहुंचे। सन् 1959 मे उन्होने राष्ट्रपति से पद्मभूषण की उपाधि प्राप्त की। 1 1 वातिमोहन शर्मा-बुरुक्षेत्र मीमासा, पृ०17 2 भगवती चरण वर्मा--आज के लोकप्रिय कवि रामाधारी सिंह दिनकर, पृ. 15 ३ चक्रवाल, भूमिका, 433 4 लक्ष्मीगारायण सुधाशु-दिनकर, पृ० 89 5 दिनार--शुद्ध कविता वीयोज, पृ० 219 16 युगचारण दिनकर, पृ० 23 नारी भावना को यही विशिष्टता है। वे बाहर से जितना कठोर है अदर से उतने ही अधिक उसे वे मनुष्य समझते है, और सतुलित मनुष्य वही है जिसम बुद्धि और भावना पौरूपता और मृदुता, नर और नारी के वैशिष्ट्य, एक-दूसरे के उत्तरा दिनकर जी को विद्यार्थी जीवन से ही हिन्दी से प्रेम था । आगे चलकर राष्ट्र प्रेम से राष्ट्र चेता वन गये। उन्होंने आजीवन राष्ट्रभापा की उन्नति लिए सभी 26 / दिनकर का निवन्ध साहित्य 1953 मे गाहित्य अकादमी द्वारा राष्ट्रीय पुरस्कार से वे सम्मानित हुए। इसी क्रम मे उन्हें समय-समय पर अन्यान्य सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए । कल्पनाशील कवि हमेशा कल्पनाशील होता है। दिनकर जी ने भी छायावादी रवियों। भाति कल्पना लो वा भ्रमण किया। जगे-ज्योत्स्ना नक्षत्र, तितली, विहगी मलयानिल, निर्झरिणी, स्वर्ण-विहान आदि दिनवर जी के निबधो पर भी या प्रभाव यथास्थान देखा जा सकता है । जो पुरुष बाह्य रूप मे पुरुपोचित विशेषताओ का जितना धनी होता है उसका अन्तर्मन स्त्री के भावो से उतना ही अधिर घनीभूत हो जाता है। दिनकर स्त्रीत्व भाव लिये हुए है । उन्होने अपने इसी व्यक्तित्व की पूर्ण निदर्शना अड़े नारीश्वर' नामर निवधो मे की है। दिनर प्रेयसी को प्रेरणा शक्ति, अभि लापाओ की प्यास व सपनो को साकार प्रतिमा मानते है । नर-नारी विषण्ड यही भाव उनकी पुस्तक 'उजली आग' मे द्रष्टव्य है- "विस्मृति के जिस सुधा सिन्धु मे तुम्हे कविता और दर्शन पहुंच हैं, वहा मैं नारी के प्रेम की नाव पर चढकर गया है।" "नारी जब मुस्कराती है तव स्वर्ग का दरवाजा खुल जाता है। "नारी जय बाह बढाती है, तब दृश्य और अदृश्य के बीच सेतु व जाता है।" कमलारत्नम् के शब्दो मे-"दिनवर नारी को न देवी समझते हैं न भोग्या हो।" राष्ट्रभाषा प्रेम रिया तथा सघानिय स्तर पर भी अपना रनामा किया। वे राष्ट्रभार । I दिनार-उजली आग, पृ० 23 2 गोल एव शास्त्री (स)-दिनकर . मष्टि और रामधारीसिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 27 सबधी आदोलनो मे स्वय सक्रिय कार्यकर्ता रह तथा समय समय पर विचारो- तेजक लेख भी लिखें। कान्तिमन्तता दिनकर जी शोषण, पूजीवाद, भ्रष्टाचार आदि कुरीतियो के भयकर विरोधी थे और इन्ही असमानताओ ने उावे हृदय मे विद्रोह तथा नाति के बीज यो दिये एव वे यथार्थ द्रष्टा बनकर हमारे सामने आये । यथा- "रह-रह पखहीन खग सा में गिर पडता भू की हलचल में शटिका एक बहा ले जाती स्वप्न राज्य आसू के जल मे।" पुग-धर्म चेता जब भारत परतत्रता की वेडियो मे जकडा हुआ था उस समय जनजीवन सामाजिक विभीपिका, धार्मिक रुढिचक्र, आर्थिक उत्पीडन और शोपण शिकजे मे छटपटा रहा था । छायावादी कपोल-कल्पित रचनाओ मे लिप्त थे, तब दिनकर जी ने युग को चेताने के लिए 'कर्म वीच धम' या सदेश दिया तथा राष्ट्रीय जागरण की दुन्दुभि बजायी। इनका काव्य 'परशुराम की प्रतीक्षा' युगो-युगो तक हमारा पथ आलोकित करता रहेगा। श्री भगवतीचरण वर्मा ने लिखा है- ‘दिनपर हमारे युग के यदि एक मात्र नहीं तो सबसे अधिक प्रतिनिधि कवि है। भारतीय संस्कृति के प्रति अनन्य अनुराग प्रत्येक देशवासी अपने देश पी सस्कृति से श्रद्धा समन्वित प्रेम अवश्य करता है । दिनकर जी भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम रखते थे। हमारी यह सस्कृति है कि प्रवासी जन भी भारतीय सभ्यता एव ससारो से जुडा ही रहता है। यथा- "एतद्देश प्रसूतस्य सकाशदग्रजन्मा । स्वं स्व चरित्र शिक्षेन् पृथिव्या सर्वमानवा ॥ मनु० 2 1200 दिनकर जी भी 'सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे सन्तु निरामया' का पाठ जानते थे। सस्कृति के चार अध्याय' अप उनके सस्कृति प्रेम का ज्वलत प्रमाण है। 1 दिनपर-हुकार, पृ० 29 2 भगवती चरण वर्मा-आज वे लोरप्रिय कवि रामाधारी सिंह दिनकर, पृ० 15 3 आचार्य डा. सुरेन्द्रदेव शास्त्री (स.)-राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी साहित्य साधना, पृ०63 वर्मको थेष्ठ मानते हैं वहा वे प्रवृत्तियों से दूर जाने की बात न कर रसास्वादा दिनकर जी की रसात्मक वृत्ति वा चरमोत्कर्ष 'उर्वशी' नाट्य प्रबध वाव्य में चलाई है। ये कवि के साथ आलोचक, निबधकार, कहानीकार भी हैं। इन्होंने 28 1 दिनकर का निबन्ध साहित्य - अध्यनशील दिनकर जी अध्यनशील थे। हिन्दी साहित्य में अतिरिक्त उन्होंने बगला में थी रवीन्द्रनाथ ठाकुर, पाजी नजरल इस्लाम और श्री सत्येन्द्रनाथ दत्त के काव्य तथा उर्दू में मर सवाल के काव्य 'यागेदरा बाले जिवरईल', 'जरवेवलीन' तथा जोश मलीहाबादी के काव्य वा पर्याप्त अध्ययन किया था। संस्कृत मे कालिदान और भवभूति उन्हें विशेष प्रिय थे। इलियट की पविताओ तथा बट्रेंड रमल और नीत्शे के दशा का उन पर यापर प्रभाव पड़ा था। फास ये वादपर, स और मेलामें ये याव्य या भी उन्हें पर्याप्त ज्ञान था। इसके अतिरिक्त शेगा कीट्स, रित्वे, डी० एच० लारेन्स, गुमिलेव और पेशन तथा कुछ चीनी कदियों के काव्य का भी उन्होने अध्ययन दिया था। व्यक्तित्व का रसात्मक पक्ष दिनकर पा कर्मकाण्डी व्यक्तित्व भी म्या नहीं था, अपितु उसमे रस प्रकीर्ण मागर था, जिसकी रसधार 'रसवन्ती' मे प्रभावित हुई। दिनकर जह की अनुमति देते व लेते है। उनका भीष्म जैसा पात्र भी रूप, रस, स्पर्श, रसन व दृग आदि को ग्राह्य मानता है। इसी कारण दिनकर ने लिखा है- " 'सुप तो मुझे हुपार मे ही मिला विन्तु आत्मा तो मेरी 'रसवन्ती' म बसती है।" 'सन्ती' व 'उर्वशी मशृगार यो अनुपम सरिताए हैं, जो पाठव को स्वप में स्नान कराये बिना नही छोडती । रस की प्रधानता ही दिनयर का मूल कवि है। द्रष्टव्य है, जहा कामाध्यात्म का रूपक 'रसवती' भूमिका पर उजागर हुआ है । कृतित्व-परिचय दिनकर जी ने जीवन म साहित्य की प्राय सभी प्रमुख विधाओ पर लेखनी प्रवध काव्य, मुक्तक, समीक्षात्मक निवध, कहानी, बाल-माहित्य के माध्यम से अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। दिनकर जो की अवता प्रकाशित कृतियां 1 दिनकर के काव्य मे जीवन दर्शन, पृ० 41 2 दिनकर-कुरुक्षेत्र, पृ० 113 रामधारी सिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 29 ---20 [ प्रवध काव्य 2. मुक्तक कविताओ का संग्रह प्रथ 3 समीक्षात्मक निबध सग्रह 4 निबध सग्रह 5 सस्कृत से सम्बद्ध कृतिया 6 बहानी 7 बाल साहित्य 8 सस्मरण साहित्य १ यात्रा विवरणात्मक साहित्य 10 विविध प्रबध काव्य रण भंग यह खण्ड काव्य है । इसका सर्वप्रथम प्रकाशन सन् 1929 ई० मे हुआ किन्तु भाज यह अप्राप्य है। कुरुक्षेत्र (1946 ई०) 'कुरुक्षेत्र' आधुनिक युग की गीता है, जिसकी रचना द्वितीय महायुद्ध के समय हुई । यह सात सर्गों में विभाजित है। इम कृति मे दिनकर जी ने बताया है कि सन्यास कापुरुषता है । गीता के अनरूप ही 'कुरुक्षेत्र मे भी अधिकार के लिए लडना उचित बतामा । 'कुरुक्षेत्र की रचना मे तत्कालीन परिस्थितिया प्रतिफलित हो रही है । इसको पृष्ठभूमि अन्तर्राष्ट्रीय धरातल पर द्वितीय महा- पुर है और राष्ट्रीय धरातल पर स्वतत्रता आन्दोलन के लिए हिंसा अपवा अहिंसा को वरेण्यता का प्रश्न है। कुल मिलाकर 'कुरुक्षेत्र' मे दिनकर की दृष्टि विभ्रान्त और स्पष्ट हो गयी है । समष्टिमूलक और वैयक्तिक दोनो ही दृष्टि- कोणो में कहीं अस्वस्थता मूलक तत्त्वो के निराकरण और कही विरोधी तत्त्वो के सामजस्य के द्वारा वे स्थायी निष्कपों पर पहुच गये है। रश्मिरथी (1952) प्रवधत्व की दृष्टि से 'रश्मिरथी' 'कुरुक्षेत्र' को ओक्षा अधिक पुष्ट एश । (डा० जगदीश प्रमाद वे लेख में उद्धृत) राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी माहित्य माधना, पृ. 98 2. युगाररण दिनकर, १० 138 पाद्यो को छोडकर परियो के देश में पहुच गये हैं। जिससे रहस्यात्माताको 30 / दिनकर का निबन्ध साहित्य सशक्त है । इसमे महारथी कर्ण वा प्रभावशाली, महत्त्वपूर्ण चरित्राकन है । जिन कर्ण-धर्म के प्रसार का सदेश प्रस्तुत काव्य से माध्यम से प्रसारित किया गया है वह हमारे युग जीवन एव समाज की वर्तमान परिस्थितियो मे सर्वथा वाछनीय है।' डा० सावित्री सिन्हा ने भी कर्ण वे चरित्राकन की भूरि-भूरि प्रशसा की। उर्वशी (1961) इसके कथ्य सूत्र वेद, पुराण, महाभारत और भागवत आदि में मिलते। 'उर्वशी' मूलत नारी और नर के रागात्मक सबधो वा विवेचक काव्य है 'उर्वशी' में पुरुरवा और उर्वशी प्रेम के माध्यम से शृगार के अन्य रूपो के मार साथ उसके आध्यात्मिक पक्ष या चित्रण है।' मुक्तक काव्य वारदोली विजय यह एक मुक्तक कविताओ का संग्रह है। रेणुका (1935) उस समय भारत पराधीन था। 'रेगुका' मे प्राति या जो स्वर मिलता है उसमें वीर भगतसिंह के शिष्यो का श्रद्धा भाव सन्निहित है । 'रेणुका' तीन घण में विभाजित है। इसम एक और राष्ट्रीय भावना प्रधान है तो दूसरी ओर नारी और शृगार वर्णन है । जहा तक सौदयं चेतना वा प्रश्न है दिनकर लौविवार झलक भी मिलती है। हुकार (1939) ओज, शौर्य, वीरता, उत्साह तथा विद्रोही भावनाओ से ओत-प्रोत का मूसर राष्ट्रीय चेतना हो 'हकार' की कविताओं का मूल स्वर है । 'हुकार मे। पति की देवी और युग में देवता की पूजा के गीत है। इग 'हुशार' मा जन्म उन - मूल्यानि, पृ. 430 1 रा. देवीप्रसाद गुप्त-हिनी महापाव्य · गिदात और 2.स.सीप्रसाद गुप्तवानभ्योत्तर हिन्दी महाराव्य, पृ० 227 3. विनोदाला गर्मा-दिनार याव्य म जीवन दर्गन, १० 45 4 am-रेणुग, विधया' रविता मे उत, पृ०98 प्रा. मुरमीयर धीवाताव-युगावि दिनकर, १०93 रामधारी सिंह दिनकर न्यक्तित्व और कृतित्व / 31 हृदय की गहरी व्यथा स हुआ है । उसी व्यथा से जो वंशाली के भग्नावशेष, मिथिला के भिसारी वेग, चित्तौर का ज्वाल-वरान्त और पलियो का अत देखकर मिसपी भर भर वर सिहर उठी थी। उस समय पी राजनीतिय दासता जन- जीवन के शोपण का नग्न चित्र देखबर प्राति का स्वरूप हुशार म स्पष्ट होता रसवती (1940) 'रगवती' एर भिन्न रस की कृति है । जिगका पूर्ण परिपाक उर्वशी' काव्य म हुआ है । इराम सगृहीत कविताए प्रेम एव शृगार यो अनुभूतियो को लेकर लिखी गयी है। दिनकर जी ने इसम प्रकृति का भी सुन्दर चित्रण किया है। द्वन्द्वगीत (1940) 'द्वन्द्वगीत रूचाई अथवा चतुष्पदी प्रौली मे लिखा गया मुक्तर काव्य है। द्वन्द्वगीत म अध्यात्म भावना और व्यप्टि-समिष्ट के द्वन्द्वो की प्रधानता है। इसमें दिनकर जी ने ब्रह्म, जीव, जगत, मृत्यु आदि पर विचार किया है । सामधेनी (1947) 'सामधेनी ऋग्वेद की उन ऋचाओ को कहा जाता है, जिनके पढने से । यज्ञाग्नि प्रज्वलित हो जाती थी। दिनकर जी ये स्फुट रविता सग्रह 'सामधेनो' म भी प्रमुख रूप से वे कविताए मगृहीत है, जिनकी रचना कवि ने स्वातत्र्य यज्ञ है की अग्नि को उद्दीप्त करने के लिए की थी जैसे-तिमिर मे स्वर वाले दाप आज फिर आता है कोई, 'आग की भीख आदि ।' . 4 बापू (1947) इस कृति मे बापू ने अपनी सत्य एव अहिंसात्मक नीति के द्वारा विदेश नीति को परास्त किया, परतत्रता की वडिया तोडी। ऐसे तेजस्वी प्रतिभासम्पन्न, पावन चरित्र बापू को अपनी वाणी का सहारा राकर श्रद्धाजलिया अपित की, उनका यशोगान गावर अपने को धन्य माना। है इतिहास के आँसू (1951) यह पवि की दस ऐतिहासिक कविताओ का संग्रह है। भी । 1 प्रो० सुधीद्र-हिदी कविता का क्रान्ति युग, पृ० 304 2 दिनपर वे काव्य म जीया दर्शन, पृ० 47 3 वही, पृ० 48

32 / दिनकर का निबन्ध साहित्य
धूप और धुआ (1951)
इस सग्रह की समस्त कविताए स्वतत्रता, राष्ट्रहित, राष्ट्रपिता एव
बलिदानी वीरो के प्रति श्रद्धाजलि तथा वीर भावना आदि विषया से संबंधित
दिल्ली (1954)
इसमे कवि वी दिल्ली के प्रति समय-समय पर लिखित पार कविताए सालिन
नीम के पत्ते (1954)
'नीम के पत्ते' व्यग्य प्रधान कविताओ का संग्रह है। इसमे स्वातत्र्योतर
भारत मे फैले भ्रष्टाचार और शासन-तत्र की शिथिलता के प्रति तोत्र असतोष
की अभिव्यक्ति हुई है।
नील कुसुम (1954)
यह पवि की 40 कविताओ का संग्रह है, जो चार भागो में विभाजित है।
'नील कुसुम' म दिनकर जी की राजनीतिक, सामाजिक और दार्शनिक चतना से
ओतप्रोत कविताए मिलती है।
चत्रवाल (1956)
इस संग्रह वी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमे कवि द्वारा लिखी हुई
लगभग 76 पृष्ठ पी लबी भूमिरा है ।
पवित्री (1956)
इसमे चौदह कविताए सगृहीत हैं । जैसे-वालिका से वधू, रास की मुरतो
प्रीति, नारी, प्रतीक्षा आदि ।
सीपी और शय (1957)
यह 44 कविताओ वा राग्रह है। इसमें कुछ कविताएं चीनी कवियों सारेन्न
रिस्त और पभेन को रवितामा का अनुवाद है।
परशुराम को प्रतीक्षा (1962)
यह इति पीनी रमण पश्चात् रची गयी है। इसम पानी मात्रमण
उग्न पनि हामि प्रतिक्रियामा अपन है । इगमे 18 बविताए हैं।

रामधारी सिंह दिनकर ध्यतित्व और कृतित्व / 33
नये सुभापित (1957)
यह एक छोटा सा सो विषयो स राबधित दा सो पदो वा संग्रह है। जिसमे
अधिकाश पद हास्य-व्यग्य पूर्ण भावा से ओतप्रोत है।
आत्मा को आखें (1964)
यह ववि की एक सग्रह कृति है जिसकी प्ररणा डी० एच० लारेन्स को
कवितामा स मिली। कवि ने नयापन लाने के लिए मौलिक विम्बा और चित्रा
या प्रयोग किया है।
मृत्ति तिलक (1964)
इसमे मुक्तक पविताआ का संग्रह है ।
हारे को हरि नाम (1970)
इसम ईश्वर प्रति आस्था को व्यक्त किया है।
कोयला और कवित्व (1964)
यह एक नवीन सग्रह वृति है जिसम एव विषय को लेकर उसके विभिन्न
पहलुओ पर प्रकाश डाला है। क्ला रिकाम आनद की भावना से उपास्य है
उपयोगिता की दृष्टि से नही- इस वाय सग्रह की रचनाए कवि के युगबोध
और आत्मचिंतन से परिपुष्ट हैं । इन्हीं प्रश्ना को लरर इसका समाध न प्रस्तुत
किया है।
रश्मिलोक (1973)
इसम दिनकर जी की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
समीक्षात्मक निवन्ध संग्रह
मिट्टी की ओर (1946)
यह दिनकर जी का प्रथम आलोवरात्मक प्रय है जिसमे वेवल उही 14
निवधो का संग्रह है जो छायावाद की कुहेलिका से निकलकर प्रसन भालोक के
देश को ओर बढने वाली हिन्दी कविता को लक्ष्य करवे लिखे गये है।
-
4
1 दिनकर-मिट्टी वी ओर, निवेदन

34 / दिनकर का निबन्ध साहित्य काव्य की भूमिका (1958) इस आलोचनात्मक कृति में दिनकर जी ने रीतिमातीन काव्यधारा से लेकर प्रयोगवाद तक के हिन्दी काव्य का विस्तृत विश्लेषण एव मूल्याकन किया है । इसमे काव्य स्वरूप, काव्यात्मा, पाव्य हेतु, गव्य प्रयोजन, याव्य के तत्त्व, वाव्य का आदर्श सबधी धारणाआ मे प्राय पूर्ववतियो यी स्थापनाओ का मौलिक रीति से पुनर्विचार हुआ है। पत, प्रसाद और मैथिलीशरण (1958) इस रति मे तीन प्रतिष्ठित महान् कवियो-पत, प्रसाद और मैथिलीशरण का अत्यन्त विस्तृत एव समीचीन अध्ययन प्रस्तुत क्यिा गया है । शुद्ध कविता को खोज (1966) इस कृति मे इन्होने पाश्चात्य एव प्राच्य साहित्य मनीपियो वे मन्तव्यो के आलोव मे शुद्ध कविता के रूप म तटस्थ भाव से विचार किया है। यह प्रथ आलोचना साहित्य की श्रेष्ठ कृतियो मे से है । साहित्यमुखी (1968) इरामे 21 निबधो का सग्रह है जिसमे साहित्य तथा साहित्य से सबंधित विषयो पर प्रकाश डाला है। पवि ने कुछ निबधो यथा-आधुनिकता और भारत धर्म, आधुनिकता का वरण आदि में आधुनिकता के सवध में अपने विचार व्यका दिये हैं । उनको मान्यता है कि भारत मे आधुनिकता स्वयमेव उत्पन्न हुई थी। राष्ट्रभाषा आन्दोलन और गाधी जी (1968) यह पुस्तक आठ निवधो वा सग्रह है। राष्ट्रभाषा मे गाधी जी के योगदान पा विश्तेपण दिया गया है। निबंध-सग्रह अर्द्धनारीश्वर (1952) यह दिनार निघो का दूसरा संग्रह है । इसमे कविता के बारे मे बौदिर चिन्तन या विश्लेषग प्रधार निवध हैं। 1. दिनकर-साहित्यमुखी, पृ० 174

रामधारीसिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व / 35
रेती के फूल (1954)
यह दिनफर जी के स्फुट निवधो पा सग्रह है। इन निबधो मे ववि अपने
भावा और विचारो को अभिव्यक्त करने म पूर्ण सफल हुआ है।
राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता (1955)
इस निबध सग्रह म भापा और रास्कृति से सबंधित निबध है ।
वेणुवन (1958)
यह राजनीति और सस्कृति सयबी आलोचनात्मक निवधा का संग्रह है।
जो विभिन्न कविया सत साहित्य आदि पर लिखे गये है।
धर्म, नैतिकता और विज्ञान (1959)
यह केवल तीन विधो का संग्रह है। पुरानी और नयो नैतिकता प्रेम एव
है या दो, धम और विज्ञान।
वट-पीपल (1961)
यह भी मिले-जुले निवघो वा संग्रह है।
राष्ट्रभाषा आदोलन और गाधी जी (1968)
इसम राष्ट्रभाषा समस्या पर जोर दिया गया है।
साहित्यमुखी (1968)
इसम साहित्य एव साहित्य से सम्बद्ध विविध विषयो एव भापणो का सग्रह
चेतन की शिखा (1973)
इसगे महर्षि अरविद के वृतित्व क मूल्याकन सवधी निबध सकलित है ।
आधुनिक बोध (1973)
यह नौ निवघो का संग्रह है। इसम सभी निबध दिनकर जी के सुविचारित
और सुचिन्तित है।
विवाह की मुसीबत (1974)
यह दिनवर जी पी अतिम कृति है । इसमे आधुनिव युग की ममस्या काम'
पर विचार किया गया है।

36 / दिनकर का निबन्ध साहित्य
सस्कृति से सम्बद्ध कृतियां
हमारी सांस्कृतिक एकता (1954)
यह पुस्तक नव निबधो का सग्रह है, जिसमे भारतीय राष्ट्रीय एकता पर जोर
दिया गया है।
राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता (1955)
यह पुस्तक दिनकर जी के कुछ भापणो और लेखो का सग्रह है । हिन्दी के
बारे मे उन्होने लिखा है कि-"हिन्दी को हमने इसलिए चुना है कि उससे राष्ट्र
की एकता का विकाम होने वाला है इसलिए नहीं कि उसे बहाना बनाकर हम
प्रान्तो के बीच की खाई को और चौडी कर दें।"
सस्कृति के चार अध्याय (1956)
इस ग्रथ मे सस्कृति को चार खण्डो मे विभाजित किया गया है ।
धर्म, नैतिकता और विज्ञान (1959)
इसमे रोचक शैली मे लिखित अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के तीन विचारोत्तेजक निबंध
सगृहीत है।
कहानी
उजली आग (1956)
यह कविता, कहानी और दर्शन की त्रिवेणी है। हिन्दी साहित्य की यह बेजोड
रचना है।
बाल साहित्य
धूप-छांह (1947)
छह कविताए ही मौलिक है, शेष प्रसिद्ध कविताओ के छायानुवाद हैं ।
चित्तौड़ का साका (1989)
इस पुस्तक मे चित्तौड के तीनों साकाओ की कहानिया, बालोपयोगी भापा
मे अत्यन्त ओजस्वी ढग से कही गयी हैं ।
इसमे
दिनार-राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता, पृ० 37

रामधारी सिंह दिनकर व्यक्तित्व और कृतित्व 137
मिर्च का मजा (1951)
यह भी ऐसा ही सग्रह है।
सूरज का ब्याह (1955)
यह नो कविताओषा सग्रह शिक्षाप्रद वाल-साहित्य है।
भारत की सास्कृतिक कहानी (1955)
यह बालोपयोगी नव निवधों का संग्रह है।
सस्मरण साहित्य
लोक देव नेहरू (1965)
प० जवाहरलाल नेहरू के निधनोपरात दिनकर जी ने जो सस्मरण 'धर्मयुग'
मजिसे उन्ही का यह संग्रह है। यह प्रथ उपन्यास के समान रोचर और इतिहास
के समान ज्ञानवर्धक है।
सस्मरण और श्रद्धाजलिया (1970)
दिनपर जी ने इस सग्रह में अपने समकालीन महापुरपो एवं साहित्यकारी
की विशेषताओ को दर्शाया है।
यात्रा विवरणात्मक साहित्य
देश विदेश (1957)
इसम दिनकर जी ने अपनी सौराष्ट्र, काश्मीर, यूरोप यात्रा का वर्णन किया
मेरी यात्राए (1971)
इसमे यूरोप यात्रा, जर्मनी यात्रा, मारीशस यात्रा का वर्णन किया गया है।
इन सग्रहों मे उहोने वहा की प्रकृति, रहन सहन तथा राजनीतिक, सामाजिक
साहित्यिक स्थिति का वर्णन किया है।
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विविध-साहित्य
चित्तोड का साका (1948)
यह बालोपयोगी साहित्य है।

38 / दिनकर का निवन्ध साहित्य हे राम (1968) इराम दिनकर जी के तीन रहियो रपको का सग्रह है। दिनकर की डायरी (1973) इससे दिमकर जी वी दिनचर्या का पता लगा है। दिनयर जी के गद्य साहित्य का यह वैशिष्टय है कि वह नीरस विवेचनारमा गद्य न होकर सरग काव्यात्मय एव विम्यात्मर गय हैं। वस्तुत गद्य और पद्य दोनो ही रचना क्षेत्रो म दिनकर जी ने समान अधिकार से लिया है। निष्कर्ष दिनकर जी के व्यक्तित्व एव कृतित्य के मूल्याकन से हम सहज ही इस निष्पर्प पर पहुचत है कि वे बहुमुखी प्रतिमा के धनी, दुद्धपं चेतना के महान् कृतिकार थे। दिनकर के व्यक्तित्व की प्रखरता और रागात्मकता उनके कृतित्व मे समग्रता से प्रतिविम्बत हुई है। इनके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन के सघर्ष ने उनकी रचनाओ को अधिक धारदार और प्रसर बनाया है। दिनकर की छवि हिन्दी के गद्य और पद्य साहित्य म समान अधिवार से लिखने वाले युगचेता और जाप्रिय रच गवार के रूप म सदैव अविस्मरणीय बनी रहेगी। वे सास्कृतिक विचारय, राष्ट्रभाषा हिंदी के महान् सपूत, वामाध्यात्म के प्रकाण्ड पण्डित और फातिमन्त चेतना के पतिवार क रूप में ही नहीं, वे राष्ट्रकवि के रूप मे भी सम्मानित हुए। उनका विचारक स्वरूप गद्य ने माध्यम से निबन्ध विधा मे ही व्यक्त हुआ है । अस्तु निव धकार दिनकर निश्चय ही महान् है । | दिनकर के काव्य म जीवन दशन, पृ० 61 2 हिन्दी निबंध का स्वरूप विकास और निबंधकार दिनकर हिन्दी साहित्य में निवध गद्य की अन्य विद्याओ(उपन्यास, यहानी, रिपोर्ताज, आत्मकथा, जीवनी, सस्मरण, रेखाचित्र आदि) यी भाति आधुनिक गाल म ही विकमित हुआ है । हिन्दी निबध विविध आयामो वा स्पर्श परता हुआ गद्य की पेन्द्रीय विधा ये रूप म स्थापित हो चुवा है । वस्तुत निवध व्यक्ति एव उससे सम्बद परिवेश और स्थितियो वी निधि भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निवध या महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कहा है पि--- 'यदि गद्य ववियो या लेखको की गोटी है तो निवध गद्यपी मोटी है। वस्तुत विध रचनाकार के हृदय की बलात्मर अभिव्यकित है । तिथियाद रूप मे नियध गद्य की ऐसी विधा है जिसमे रचावार अपने व्यक्ति-म्यातन्य, निजता और दृष्टिकोण का प्रतिपादन मौलिव ढग से करता है । त, रथन, मगिमा, मवाद और शैली वैविध्य या समजन परते हुए पाठय की मनोभूगि पर अपना प्रभाव अक्ति करता है। वैचारिक्ता एव व्यक्तित्व प्रकाशन वा ऐगा प्रभावपूर्ण एव रजक माध्यम निबंध के अतिरिक्त अन्य विसी विधा मे नहीं है। निवघ : शाब्दिव व्युत्पत्ति एव पारिभाषिक विवेचन 'निवध' शब्द या अर्थ यांधना पयवा रोक्ना है।f+पय (वाधना)+ धन् (सग्रह) । 'प्रबंध' मब्द भी इमी या समानार्थी है- प्रध+ अन् ==बंधना। सस्कृत में दोनो वा एव ही अर्ष स्वीपारा गया है । इसमें पर्याय- 1 भाषाय रामचन्द्र शुक्न-हिन्दी साहित्य का इतिहाग, १० 505 40 / दिनकर का निवन्ध साहित्य वाची के रूप में 'लेख' 'रचना', सदर्भ आदि का उल्लेख किया जाता है । प्रवध शब्द तो आख्यान या क्या ये तारतम्य पर आधृत काव्य के लिए प्रयुक्त होने लगा और 'प्रबध-काव्य' के रूप मे रूढ हो गया । आज निबध जिा अर्थों में प्रयुक्त होता है, वह पाश्चात्य साहित्य की देन है । निवध शब्द आज लैटिन के 'एग्जी- जियर' (निश्चिततापूर्वक परीक्षण) से व्युत्पन्न 'ऐसाई (फ्रेंच) व ऐसे (अंगरेजी ऐसे) के अर्थ मे प्रयुक्त होता है । यहा निवध के सदर्भ मे पाश्चात्य एव पौर्वात्य विद्वानो के मतो का विश्नेपण समीचीन होगा। पाश्चात्य मत निवध का जन्मदाता फास का मिसेल इकुए सूर द मानतेन था।सन् 1850 मे एसेइरा' नाम से मानतेन का निवध सग्रह प्रकाश में आया जिसमे 57 निबंध सगृहीत थे। सर्वप्रथम मानतेन ने ही अपनी रचनाओ को 'निवध' की सजा दी। इससे पूर्व 'ऐसे' का आशय प्रयास या परीक्षण रहा। साहित्य के सदर्भ मे 'ऐसे' शब्द का प्रयोग कर मानतेन ने नया आयाम जोडा । मानतेन ने निवध को विचारो, उद्धरणो और वयाओ वा मिश्रण माना है। अगरेजी के प्रख्यात आलोचक रचना- कार डा० सेम्युअल जानसन ने निवध की परिभाषा करते हुए कहा कि-"निबंध मस्तिप्प का प्राव स्मिा और उच्छ पल आवेग, असम्बद्ध और चितनहीन युद्धि पिलाम है।' सर एडमण्ड गास ने निवध वो गद्य मे सीमित आकार का लन माना है । इस लेख में सेवा एप ही विषय से सबधित विचारो को असयत किन्तु मुगम ढग से व्यका करता है ।जाज मेंटबरी नियध को कलापूर्ण गद्य लेप के रूप में स्वीकारा है । मारिस ह्यूलट के विचागे म निवध एक मनुष्ट व्यक्ति या मनमिष सतुनन एव ओविम्य स्थिति में स्वपथन मात्र है । मास के प्रसिद्ध लेखक तथा आलोपप-मा यार ने निवध यो साहित्यिम अभिव्यजना वा गवस पठिन रूप माना है, क्योकि यह निवधवार म गागर में सागर भरने की क्षमता या अनिवार्य होना अनिवार्य गमशन है । पल न निवध की परिभाषा देते हुए निया है- 'निय मेगन यहुत प्रिय साधन है। निबध उस्ये अनुकूस पहता है, जिस सेयर मन प्रतिमा है और न मान विम्नार की जिनामा और पाठा उमकी विविधता 1. Montanigac-Issay is Alodhey of relection, quotation and anecdotes 2 Dr Johnon- A loose salicy of mind and irregular undafiscal Docerot cragular and orderly performance 3.नागप: मापुर-पारचाप निव समास उन " हिन्दी निबध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनकर / 41 1 । और हल्की रचना मे आनन्द लेता है । वस्तुत क्रेवल निबंध के विषय म पूर्वाग्रह युक्त रहे है, यही कारण है कि उनका मत तवसम्मत एव समीचीन जान नहीं पडता क्योकि निबध केवल मनोरजन अथवा विनोद का साधन नहीं है। हा, इसे आत्मीयता एव निजता की प्रमुखता के कारण एक गुण के रूप मे अवश्य स्वीकृत किया जा सकता है। इस मत के विपरीत लोक्स निवध को गम्भीर विषयो का व्यवस्थित विश्लेपण करने वाला माध्यम स्वीकारते है। बेक्न का कहना है-- "निबध गम्भीर और विशिष्ट विचारो का सक्षिप्त किन्तु सुगुम्फित रूपान्तरण है।" हडसन निवध को आवश्यक रूप से व्यक्तिवादी स्वीकारते है। पाश्चात्य विद्वानो द्वारा प्रस्तुत निवध की परिभाषाओ के अध्ययन-अनुशीलन के पश्चात् निम्नाकित तथ्य स्पष्ट होते है-- 1 गद्य की सक्षिप्त रचना निबंध है। 2 स्व व्यक्तित्व, भाव एव विचार की अभिव्यक्ति का माध्यम है। 3 यह असम्पूर्णता मे पूर्णता का समावेश होता है । 4 रचनाकार एव पाठक के प्रत्यक्ष सानिध्य का आधार है। इस प्रकार पाश्चात्य विचारणा मे निवध गद्य की वह लधु विधा है, जिसमे रचनाकार अपनी निजता के साथ भावो एव विचारो की सुगुम्फित व्यजना करता - भारतीय मत "निबंध' का सर्वप्रथम प्रयोग सस्कृत साहित्य मे उपलब्ध होता है किन्तु वहा इसे विधागत स्वरूप मे ग्रहण नहीं किया गया । निबध का प्रयोग प्रमाणो ये निवधन के कारण धर्मशास्त्रीय एवं दार्शनिक विवेचना के नथो के सदर्भ म होता था। हिन्दी मे निबध' वा प्रयोग प्रथमत तुलसीदास ने प्रबंध काव्य के सदर्भ मे किया है-'भाषानिबधमतिमजुलमातनोति ।"5 आज निबध अपन रूढ परिवृत्त 17 I Crable--"The Essay is most popular mode df writing It suits the writer who has neither talent nor Inclination to persue hts enquiries further an generally the reader amused Rith variety and superficiality' 2 Lockes--"Ponderous volume closed packed with philoso. phic matter 3 Bacon-"An Essay consists of few pages of concentrated Wisdom with little claboration of the Idens expressed 4 Hudson--"The true essay is essentially personal" 5 डा धोरेन्द्र वर्मा (स.)-हिन्दी साहिय काश, पृ० 407-408 " 42 / दिनकर का निवध साहित्य से निकलवर नवीन अर्थों में प्रयुक्त होने लगा है जो परम्परागत अर्थों से भिन अगरेजी 'ऐसे' के अयं का पर्याय है। निबंध को वर्तमान म आत्माभिव्यक्ति का साधन स्वीकार किया गया है । निवधवार स्वतत्रतापूर्वक किसी भी विषय पर अपने विचार विना पिगी आहम्बर वे व्यक्त करता है। उसमे नियत्रण एव निषेध का अभाव होता है । आज निवध यो विकास की जो धारा प्राप्त हुई है उसे देखन हुए उसे शब्दो म वाधना दुप्पर है तथापि विद्वानो ने इसे पारिभाषिक स्वरूप दने का प्रयत्न किया है । सम्यक विश्तषण हेतु निम्नाक्ति मतो पर विचार करता समीचीन होगा- डा. गुलाबराय के मतानुसार-"निवध उस गद्य रचना को कहते हैं जिसम एक सीमित आकार के भीतर पिसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एप निजीपन, स्वछ दता सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक सगीत और सम्बद्धता के साथ किया गया हो।" डा० गणपतिचन्द्र गुप्त के अनुसार-"साहित्य की श्रेणी म आओ वाले निवन्ध चाहे क्तिने ही गम्भीर क्यो न हा वे हमारे हृदय की भाव वीचियो को अवश्य उद्वेलित करत हैं ।"2 आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी का मतम्य है कि --"असम्पूणता का विचार न करने वाला गद्य रचना का यह प्रकार जिसम स्वानुभूति की प्रधानता हो विपय निरूपण म स्वतत्रता हो, जिसमे लेखक का पूण व्यक्तित्व प्रतिबिम्बित हो, जिसवी शैली मौलिक तथा साहित्यिक कोटि की हो निबन्ध कहलाएगा।' आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के अनुसार- वास्तविक निबन्ध वही होता है जिसम लेखक किसी मन में उठे हुए भावात्मक विचार की दाशनिक रूप से तत्त्व निरूपण की शैली से व्यक्त करे। साधारणत निबन्ध वह साहित्य प है जो न वहत वडा हो, न बहुत छोटा, जो गद्यात्मक हो, जिसम किसी विषय का अत्यन्त सरल चलता सा विवरण हो, विशेषत उस विषय या वर्णन हो जिसका स्वय लेखक से सम्बन्ध हो । अनुभव और गम्भीर ज्ञान का गक्षिप्त और लघु परिणाम निबन्ध है ।' 10 जयनाय नसिन के मतानुसार 'निबन्ध स्वाधीन चितन और निश्च्छल अनुभूतियो का सरस, सजीव और मर्यादित गद्यात्मक प्रकाशन है। '5 श्री शिवदानसिंह चौहान के मत के अनुसार- 'निवन्ध गद्य वा अस्य त शक्तिशाली रूप विधान है । कुशल निबन्धकार अपने रचाव लाघव स अत्यन्त सक्षेप म बहुत बडी तत्त्व को वात सरल कलात्मक ढग 1 डा० गुनायराय-काव्य के प, पृ० 236 2 डा० गणपतिचद्र गुप्त-साहित्यिक निवध, पृ० 428 3 आचार्य नददुलारे वाजपेयी-निवध निलय, प्राक्वथन से उद्धृत 4 आचापं गीताराम चतुर्वेदी-समीक्षाशास्त्र, पृ. 972-73 5 जपनाप नलिन-हिदी निबंधकार, पृ०10 हिन्दी निबंध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनकर /43 से या सुबोध वैज्ञानिक पद्धति स पाठो तर प्रेषित करता है।"1. रामगोपाल सिंह चौहान के अनुसार--"निवन्ध में लेखप विशेप को मानपिक चेतनागत भायात्मक अनुभूति की अभिव्यक्ति होती है । उसमे एव निजीपन होता है, जिसमे लेखक सहन ही पाठर वे माथ निकटता स्थापित कर लेता है । निबन्ध आत्मानु- भूतियो का लेखन और पाठव के गाय परस्पर सचार करने का प्रयास है । निवन्ध मे लेखन के व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति होती है । अपने उस व्यक्तित्व के आधार पर लेखप अपने निबन्ध में अपन वथन में सबलता, सशक्त आग्रह और प्रवाह शीलता उत्पन्न कर देता है।" हा भागीरप मिथ का मन्तव्य निम्नलिखित शब्दो में व्यक्त हुआ है-"वह गद्य रचा जिममे पिसी विषय वा शृखलित विवेचन अथवा वैयत्तिा भाव या विचारधारा या प्रमबद्ध रोचव प्रकाशन प्रस्तुत किया जाता है, निबन्ध कहलाता है।" हिन्दी साहित्य कोश मे-"नियन्ध ये लक्षणा मे स्वच्छन्दता, सरलता, आडम्बरहीनता तथा घनिष्ठता और आत्मीयता ये साथ लेयर के वैयक्तिक मात्मनिष्ठ दृष्टिकोण का भी उल्लेग दिया जाता है परन्तु ये लक्षण विभिन्न लेखको की वृतियो मे किाने विभिन्न पो म मिलत है, इसे स्मरण रखना आवश्यक है। निव-धकार की स्वच्छन्दता उच्छ सलता नहीं है । उसकी अनिय- मितता मे भी नियम है और उसकी अव्यवस्था में भी व्यवस्था है। ज्ञान के लिए उसे स्वत अपनी गोलिय पद्धति खोजनी परती है । अत निवन्ध एक ऐसी क्लापति बन जाता है कि जिसपे नियम लेपव द्वारा ही आविपत होत है । इसी प्रकार सहन, सरल, आदम्परहीन आस्माभिव्यक्ति के लिए परिपक्व और विचारशील गम्भीर व्यक्तित्व की अपेक्षा है। यद्यपि उसकी कृति मे प्राय रचना की परिपक्वता का अभाव सा दिखाई देता है परन्तु पाठय के साथ लेखव की निकटता और यात्मीयता वास्तविक होती है । इसके अभाव मे सफा कथात्मय निवध रचना सभव नहीं। लेकिन बिना सोच वे लेखप अपने जीवन अनुभव सुनाता है। उसकी यह घनिष्ठता जिती सच्ची और सघन होगी, उसका निबन्ध पाठको पर उतना हो सीधा और तीन असर परेगा। मी आत्मीयता के साथ नियध लेखर पाठको को अपने पाडित्य से अभिभूत नही करना चाहता और अधिकाधिप ऋज और उदार रूप मे प्रगट होता है। निवध की वैयक्तिक्ता, आत्मनिष्ठा भी इसी जात्मीय दृष्टिकोण का परिणाम कही जा सकती है। स्वभावत उससे भी ओर रूप और परिणाम निकल सकते है । निबध लेगक मी आत्मनिष्ठा, वैयकिक्ता व्यक्ति सापेक्ष्य है। उसकी मात्रा में न्यूनता हो सकती है, उगया सर्वथा अभाव हो, ऐसा संभव नहीं है । निवध लेखा पी विचार प्रबलता, अनुभवशीलता और प्रौढता का 1 शिवदान सिंह चौहान-हिन्दी साहित्य के अस्मी वर्ष, पृ. 195 2 रामगोपाल सिंह चौहान - हिन्दी वे गद्यकार और उनकी शैलिया, पृ० 59 44 1 दिनकर का निवध साहिय परिचय देता है परन्तु यह एक विशेष मनोदशा (मूड) मे लिया जाता है इसलिए उमम परिपूर्णता स्वभावत नहीं होती है, परन्तु ऐमा नहीं कि वह लेखर वे विमी भी विषय-सवधी विचारो का सक्षेप वा मार हो । प्रयुक्त सीमित दृष्टिकोण से क्सिी विशेप मनोदशा के अन्तर्गत लेखक उसमे अपने विचार प्रकट करता है। परिणामस्वरूप निवध का आधार माधारणतया बहुत अधिक लम्बा नहीं हो सक्ता।" उपर्युक्त परिभाषाओ के सूक्ष्म अन्वीक्षण के पश्चात् यह कहा जा सकता है कि इनमे निबंध के अनिवार्य तत्त्वो का विवेचन तो किया गया है किन्तु स्वतत्र विश्लेषण की दृष्टि से य विवेचन अपूर्ण हैं । इस अपूर्णता का मूल कारण कालक्रम निजी दृष्टिकोण एव निबध विधा के प्रति रझान रहा है । इन परिभाषाओ म निबध सवधी पाश्चात्य मान्यताओ का भी प्रभूत प्रभाव द्रष्टव्य है । इन परिभाषाओ सम्यक् अनुशीलन के पश्चात् निम्नाकित तथ्य प्रकाशित होते हैं- 1 निवध गद्य की लघु रचना है जो अपने सीमित आकार मे ही विषय का प्रतिपादन और सम्प्रेषण करती है। 2 इसमे रचनाकार के व्यक्तित्व, दृष्टिकोण एव विचार को छाप रहती है। 3 निवध मे अनुभूति-प्रवणता, सरसता, स्वच्छन्दता एव अभिव्यजना लाघव विद्यमान रहते है, जिसके कारण विषय का रोचक प्रकाशन होता है। निष्पर्पत "निवध साहित्य की उस गद्यात्मक विधा को कहा जाएगा जिसके लघु कलेवर मे रचनाकार अपनी निजी अनुभूतियो एव विचारो को स्वातश्य बोध के साथ सुगुम्फित एव सुव्यवस्थित रूप मे जीवन्त अभिव्यक्ति देता है।" के निबन्ध की तात्त्विक विवेचना निवध विषयक पारिभाषिक स्वरूप विवेचन के पश्चात् दुछ प्रमुख तथ्य सामने आते हैं, जिन्हें निवध के तत्त्वो के रूप मे स्वीकार किया जा सकता है । निवध के रचाव मे इन तत्त्वो की भूमिका महत्त्वपूर्ण है- विचार तत्त्व विचार निवध की प्रथम आवश्यकता है । स्वतत्र विचारो की अभिव्यक्ति को ही पतिपय विद्वानो ने निवध की सजा दी है । विवेकशील प्राणी होने के कारण मनुष्य की तबुद्धि उसके विचार-बोध की शक्ति होती है । रचनाकार निवध म अपनी इसी मूलभूत प्रवृत्ति वा स्वछदतापूर्वक प्रयोग करता है । विषय चयन एवं तग्जन्य गहनता विचार व्युत्पन्न करता है। 1 १० धीरन्द्र वर्मा-(स.)-हिन्दी साहित्य कोश, १० 408409 हिन्दी निबध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनवर / 45 भावानुभूति जीवन की गति के साथ परिवेश से जुड़ा अनुभव रचना सगार को व्यापक स्वरूप प्रदान करता है । इन्ही अनुभूतियो के फलस्वरूप उद्भूत भाव निवध का विपय बनते है । भावात्मक निबधो में भाव पक्ष की सबलता एव प्रमुखता रहती कल्पना-समाहार अन्य विधाआ की भाति निबंध में विचार, संवेदना एव सहृदयता आदि के साथ ही कल्पना या समाहार होता है । कल्पना की समाहृति रचना को जीवन्तता प्रदान करती है । सूक्ष्म निरीक्षण दृष्टि एव कल्पना प्रभावोत्पादकता मे सहायक सिद्ध होती है । शैली निवध रचना मे शैली की भूमिरा प्राण तत्त्व के समान है । निबन्धकार के लिए शैलीगत सिद्धि एव विशिष्टता होना अत्यावश्यक है। शैली के कारण ही वह लघु कलेवर म सुगठित अभिव्यक्ति मे सफल हो सकता है। वस्तुत निबन्ध की सफलता विचार, भाव, कल्पना एव शैली के सम्यक् प्रयोग पर निर्भर करती है । सम्यक् प्रयोग से ही रोचकता, सरसता एव स्वाभा- विक्ता का सचार कर निवन्धकार पाठक से नकट्य स्थापित कर अपना प्रभाव सम्प्रेपण कर पाता है। निबन्ध एव समानधर्मो विधाए साहित्य सामान्यत सवेदनशील सामाजिक की अनुभूतियो की कलात्मक अभिव्यक्ति होती है। यही कारण है कि उसके उपागो के उपकरणो म बहुत सी समानताए-असमानताए प्राय सर्वत्र मिलती है, किमी म कम किसी मे ज्यादा।। गद्य की प्रमुख विधा के रूप म निबन्ध प्रतिष्ठित है । गद्य की अन्यान्य विधाए निबध स उद्भूत है इसलिए इनम सूक्ष्म भिन्नताए है । 'निबन्ध के स्वरूप को भलीभाति समझने हतु उसकी अन्य विधाओ से तुलना समीचीन होगी। निवन्ध और सस्मरण निबन्ध की तरह सस्मरण भी हिन्दी के लिए नवीन विधा है । डा० पद्मसिंह शर्मा ने इस क्षेत्र मे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी है । सर्वश्री बनारसीदास चतुर्वेदी, 1 डा० गगाप्रसाद गुप्त-हिन्दी साहित्य मे निबन्ध और निबन्धकार, पृ० 89 46 / दिनवर का निवध साहित्य कन्हैयालाल प्रभावर प्रमति ने रास्मरण वो नये आयाम प्रदान करते हुए विक मित किया है । यद्यपि सस्मरण और निबन्ध में निवट वा सम्बन्ध है । "जिम प्रकार निबन्ध मे किसी एक समय को विशेष मनोदशा की विशिष्ट अनुभूतिया तया विचारो का चित्रण दिया जाता है, उसी प्रकार सस्मरणो मे भी किसी समय की एक विशेष स्थिति का चित्रण रहता है । तथापि दोना में अन्तर है। सस्मरण प्राय प्रख्यात व्यक्तित्वा पर प्रख्यात व्यक्तिया द्वारा ही लिसे जात हैं, निवघम ऐसा वधा नहीं है। मस्मरण में निवन्ध के विपरीत रचनाकार व्यक्ति के चरित्र से बचा रहता है । सस्मरण घटना प्रधान होता है, निवन्ध भावो या विचारी की अभिव्यक्ति होता है। निबन्ध और आत्मकथा आत्मकथा-जैसा नाम स सप्ट है- -स्सय लखक की कथा होती है, जिसम वह अपने जीवन स सम्बन्धित तथ्यो वा तटस्य होकर वर्णन करता है । अतीत की स्मृतिया इसम समाहित होती है । "आत्मकथावार यो व्यक्तियो के सस्मरण लिखने वाले क्लावार को जिन तीन याता का ध्यान रखना पडता है, उनके अतिरिक्त एक और बात का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है कि न तो भावा वेश मे आवार अथवा अत्यधिक नम्रता के साथ अपनी दुर्वलताओ का अतिरजित वर्णन करे और न ही किसी प्रकार के आत्म आस्फालन का आखेट बनवर आत्म- प्रशसा करने लग जाये।"2 निबन्ध मे रचनाकार की स्व सहभागिता आत्मकथा के समान ही होती है। दोनो मे स्व-व्यक्तित्व का अक्न होता है। आत्मकथा आकार एव स्वरूप की दृष्टि से निबन्ध की तुलना मे विस्तृत होती है । निबन्ध मे सद्य उद्भूत भावना की व्यजना होती है, आत्मकथा स्मृतियो का अकन करती है। अतएव उसमे मनोवेग एव अनुभूतियो का अभाव रहता है । निबन्ध म अनुभूति एव विचार को प्रमुखता होती है । निबन्ध मे रचनाकार को तथ्य के साथ पूण सलग्नता रहती है आत्मकथा मे मूल्याकन की तटस्थता, आत्मकथा का क्षेत्र निबन्ध की अपक्षा अधिक व्यापक एव बहुआयामी होता है । निवन्ध और जीवनी जीवनी भी गद्य साहित्य की एक सशक्त विधा है। आज इस कोटि की विपुल 1 डा० गगाप्रसाद गुप्त-हिन्दी साहित्य म निरन्ध और निवन्धवार, पृ० 2 डा० देवीशरण रस्तोगी-हिदी माहित्य का विवचनात्मक इतिहास, पृ° 95 257 हिन्दी निवा का स्वरूप विवाग और निबंधकार दिनकर | 47 रचनाए उपलब्ध है। इसमे लेखक किसी प्रख्यात व्यक्ति (वह जीवन के किसी क्षेत्र का हो) के जीवन का क्रमबद्ध परिचय प्रस्तुत करता है । "इममे लेखक का जीवनी के नायक के साथ निजी सम्पर्क होता है। इसमे रोचक प्रभावपूर्ण घट- नाओ और विवरणो को चुनकर जीवन चरित्र का पूरा रूप प्रस्तुत किया जाता है । नायक कोई प्रसिद्ध व्यक्ति होता है । घटनाओ का सच्चा सजीव वर्णन और उनके द्वारा व्यक्ति की स्थिति व्यक्तित्व, योग्यता, निपुणता और चारित्र्य का प्रभावपूर्ण लेखा प्रस्तुत करना ही इसका ध्येय होता है।" वस्तुत "जीवनी साहित्य म एक स्वतन्त्र विधा के रूप में अपने चरित्र नायक के अन्तर और बाहर, उसके जीवन सम्बन्धी घटनाओ, परिस्थितियो, व्यक्तियो का उसके गुणो और दोषो का महान् व्यक्ति बनने मे उसके जीवन की विकास गति का तथा उसके जीवन के प्रभाव का कलात्मक, रोचक, सजीव, सहृदयतापूर्ण किन्तु तटस्थ चित्रण होता है।" इस विधा म ऐतिहासिकता एव कल्पना का कलात्मव सयोग होता है । निव-ध और जीवनी वैयक्तिकता की प्रधानता एव शैलीगत भूमि पर निकट और समानधर्मा है । विषय चयन की दोनो मे स्वतन्त्रता एव व्यापकता होती है। समा- नता के तत्त्व होते हुए भी दोनो मे अन्तर विद्यमान है । जीवनी मे जीवन का आद्योपान्त वर्णन रहता । निबन्ध मे किसी एक विषय पर विचारो की पुष्टि होती है । जीवनी म लेखक दूसरे के वैयक्तिक जीवन का वर्णन करता है किन्तु निबन्ध मे निबन्धकार का व्यक्तित्व प्रमुख रहता है। जीवनी मे लेखकीय पक्षधरता की आश का होती है, निवन्ध इसके विपरीत स्वय लेखकीय व्यक्तित्व का दर्पण होता है । जीवनी मे निबन्ध से भिन्न घटनाओ का सस्पर्श मिलता है क्योकि जीवनी नायक के जीवन का इतिवृत होती है, जो निबन्ध के आकार की लघुता एव शैली की रोचकता स भिन्न है । निवन्ध एव रेखाचित्र रेखाचित्र का शाब्दिक अर्थ है-रेखाओ के माध्यम से निर्मित कोई चित्र जो कलम या तूलिका से निर्मित हो । हिन्दी मे यह पाश्चात्य विधा 'स्वेच' वे पर्याय के रूप में विकसित हुई। रेखाचित्र किसी प्राणी के चरित्र का भावात्मक शब्द- चित्र है । रचनाकार इमम चित्रवार की भाति उस प्राणी के वाह्य एव आतरिक सौन्दय को उभारता है। डा० भागीरय मिश्र मतानुमार-"अपने सम्पर्य में आए किसी विलक्षण व्यक्तित्व अथवा सवदना को जगाने वाली, सामान्य विशेष- 1 डा० भागीरथ मिश्र-काव्यशास्त्र,प.76 2 डा० रामगोपालसिंह चौहान-हिन्दी गद्ययार और उनकी प्रेलिया, ५० 208 48 /दिनकर का निवध साहित्य ताओ से युक्त किसी प्रतिनिधि चरित्र के मर्मस्सगी स्वरूप को देखी, सुनी या सकलित घटनाओ को पृष्ठभूमि इन प्रकार उभारकर रखना वि उसका हमारे हदय मे एक निश्चित प्रभाव अपित हो जाए, रेखाचित्र कहलाता है। यह विधा भावात्मक एव व्यक्तिवादी निबन्धो से नि सृत है । "निवन्ध के विचार क्षेत्र मे लाघव की प्रवृत्ति जगी। उसके फलस्वरूप ऐसी विचारबद्ध कृतिया भी निर्मित होने लगी जो रेखाचित्र या स्थूल चित्र (स्केच) के रूप में सामने आयी। इनमे कही तो कुछ शब्दो को ही लेकर विचार सरणि चला और कही व्यक्ति को, कही वस्तु यो, कही भाव को, कही स्मृति तथा वही व्यग्य को।" वस्तुतं यह निबध एव कहानी के बीच की विधा है। निवध एव रेखाचित्र दोनोमे वैयक्तिक्ता की प्रमुखता होती है । रेखाचिन प्राणी की विशिष्टताआ को इस प्रकार व्यजित किया जाता है कि एक विशेष आभार प्राप्त कर चित्रात्माता उभरती है। निबन्ध और रेखाचित्र दोनो कलात्मक विधाए होते हुए भी एक दूसरे से भिन्न है । रेखाचित्र विषय की दृष्टि से सीमित क्षेत्र में व्यापक रहता है जबकि निबन्ध स्वछन्द एव व्यापक होता है । रेखाचित्र मे जहा हृदय पक्ष का प्राधान्य होता है, वही निबन्ध मे हृदय पक्ष की सवलता के साथ विचार या मस्तिष्क पक्ष की अवहेलना नहीं होती । रेखाचित्र जहा व्यक्तित्व की आकृति उपस्थित करता है वही नियन्ध म विषय-विवेचन, अनुभूति अकन एव विचार-प्रस्तुति होती है । रेखाचित्र शब्द के अर्थ रग द्वारा तो निबन्ध मे शब्द विचार लहर बनकर प्रभावात्मक्ता लाते है। इस प्रकार निब और रेखाचित्र पृथक्-पृथक् जीवन्त साहित्यिक विधाए है। निवन्ध और रिपोर्ताज 'रिपोर्ताज' मूलत परकारिता के क्षेत्र की विधा है । पत्रकार जब किसी घटना की क्लास्मा शब्दबद्ध प्रस्तुति करता है तो रिपोर्ताज' आवार ग्रहण करता है । वस्तुन खिोजि कासीमी शब्द है जो गरजी रिपोर्ट के आधार पर हि म रिपोर्ताज के रूप में स्वीकृत हुा । "आज के प्रातियुग में रिपोर्ताज ऐसा रूप विधान जिम am मान को सर्षमयो वास्तविकता वा अनुभव पायो तक पहुचाया जा सपता है। रिपोर्ताज म उपन्याम और कहानी के कई गुण रहते हैं लेकिन उमर भन्दा तयार किये गए परिवश, परित्र और घटना में यपाना और सत्यता अधिक मात्रा में रहती है। वस्तुत अववारी रपट हो 1. भागीरप मिय-वाथ्यशास्त्र, पृ०97 2 विश्वनाप प्रगाद मिश्र-हिन्दी वा गामयिर साहिय 3 गिवान गिह चौहान-माहि पाभीसन, पृ० 56 हिन्दी निवध का स्वरय विकास और निवधकार दिनकर / 49 जब भावार एव सवेदना से जुडकर पलात्मव आकृति पाती है तोरिपोर्ताज की सजा पाती है । अखबारी रिपोर्ट में कलात्मकता नही होती। "रिपोर्ताज मे तीन बातें प्रमुख हैं-(1) वर्ण्य वस्तु या घटना, (2) घटना में भाग लेने वाले पात्र, (3) लेखक की सजगता, सचेप्टता, सूक्ष्म दृष्टि और कल्पना । रिपोर्ताज की विशेषता सक्षिप्तीकरण में है। वर्तमान म ससक्ति, तथ्यात्मकता एव कथात्मकता रिपो. ताज के लिए अनिवार्य तत्त्व है । निबन्ध लेखक को जिस प्रकार विचार और भाव के साथ सक्षिप्त कलेवर की सीमा में रहना पडता है उसी प्रकार रिपोर्ताज लेखक को फैलाव की स्वच्छन्ता नही है । इस दृष्टि से वह निबन्ध के तथा शैली की दृष्टि से कहानी के निकट है । रिपोर्ताज म घटना अथवा दृश्य या यथातथ्य अकन होता है तथा इममे व्यक्तित्व निक्षेपण नहीं होता किन्तु निबन्ध मे व्यक्तित्व का प्रभूत प्रभाव दृष्टिगत होता है और उसमे वर्ण्य के प्रति यथातथ्य वर्णन का आग्रह नहीं होता । आवार की दृष्टि से सक्षिप्तता रिपोर्ताज वी शतं है, निबन्ध को नहीं। निवन्ध के समानधर्मी विधाओ से तुलनात्मक अनुशीलन के पश्चात् हम कह सकते हैं कि नियन्ध एव स्वतन्य विधा है। विकास की गति के साथ उसम भी परिवर्तन परिवर्धन हो रहे है तथा निबन्ध सम्बन्धी मान्यताए और परिभाषाए नया आकार ग्रहण कर रही है । निबन्धो का वर्गोकरण परिणाम के स्तर में निव-धो के प्रयारो का उल्लेख करना दुष्कर है किन्तु उसको आतरिख एव बाह्य विविधता को आधार बनाकर वर्गीकरण किया जा सक्ता है । विवेचन पद्धति, भाषा शैली, विपय, विचार, भाव एव अनुभूतिया आदि को आधार बनाकर निवन्ध के भेद विय जाते हैं । अध्ययन विश्लपण की मुविधा के लिए निबन्ध का वर्गीकरण निम्नांक्ति प्रकार से किया जाता है-- विपयगत आधार 1 साहित्यिक निबन्ध 2 सामाजिक धार्मिक निबन्ध 3 सांस्कृतिक निबन्ध 4 राजनीतिक निबन्ध 5 अन्य 1 १० गगाप्रमाद गुप्त-हिन्दी निबन्ध और निबन्धार, १० 101 50/दिनकर का निवध साहित्य शैलीगत अनुभूत्यात्मक आधार 1 विचारात्मक निबन्ध 2 भावात्मक निबन्ध 3 विवरणात्मक निबन्ध 4 वर्णनात्मक निवन्ध 5 आत्मपरक निबन्ध 6 समीक्षात्मक निबन्ध हिन्दी निबन्ध का विकासात्मक परिदृश्य हिन्दी साहित्य मे निबंध की विकास यात्रा का सूत्रपात आधुनिक काल में भारतेन्दु युग में हुआ। मुद्रण कला की उन्नति, समाचार-पत्रो के प्रसार एव प्रच लन तथा गद्य के विकास से साहित्य की विधा के रूप में निबन्ध विधा प्रगतिपय पर अग्रसर हुई । इगके अतिरिक्त सामाजिक-राजनीतिक चेतना के उन्मेष एर पश्चिमी साहित्य के सम्पर्क ने निबन्ध के विकास मे महती भूमिका प्रदान की। हिन्दी निबन्ध की अद्यतन काल तक की यात्रा को समीक्षको ने चार कालो म विभक्त किया है। (क) भारतेन्दु युगीन राष्ट्रीय सास्कृतिक चेतनापरक निबन्ध (सन् 1843 से 1903 तक) (ख) द्विवेदी युगीन परिष्कृत एव परिमाजित निबन्ध (सन् 1903 से 1920 तक) (ग) शुक्ल युगीन प्रोड निबन्ध (सन् 1920 से 1947 तक) (घ) स्वातन्त्र्योतर निबन्ध साहित्य (सन् 1947 से आज तक) भारतेन्दु युगीन राष्ट्रीय-सास्कृतिक चेतनापरक निवन्ध-मरचना (1843 से 1903 तक) राष्ट्रीय जागरण की नव सास्कृतिक एवं राजनीतिक चेतना के उन्मय कात में भारतेन्दु युग का आरम्भ हुआ । इस युग का निबन्ध सेखन विविधोन्मुखी पा। ममाज, धर्म, सस्मृति, शिक्षा और साहित्यिक सभी में अनेकश गुगार अपक्षित पे। निबन्ध मे इस अपेक्षा यो निर्वाहित करने की क्षमता थी। पत्र-पत्रिकामा के माध्यम स सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहाभिर, राजनीतिक, माहित्यिर, प्रति वर्णन, व्यग्य विनोद, यात्रा विवरण आदि समस्त विषय निवन्ध के पलेयर म प्रस्तुति पाने सगे । इस युग में निबन्ध पारिता के गुण आत्मगान रिये था। पदी पारदरित विधा में विषा-व्यासता एव वैविध्य है। ग युग प्रमुख निबन्धकार में युग प्रसर भारतन्दु अतिरिक्त मासकृष्ण भट्ट (मेला व हिन्दी निवध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनकर 151 हेला, वकील. आशा, वात, यटका, माधुर्य आदि प्रमिद्ध निबध), बद्रीनारायण चौधरी प्रेमधन, (दिल्ली दरवार म मित्र मण्डली, समय आदि), प्रतापनारायण मिश्र (दात, पट, भौं, मूछ, नावादि), बालमुकुन्द गुप्त (शिवशम्भू का चिट्ठा), राधाचरण गोस्वामी (यमपुरी की यात्रा), अम्बिकादत्त व्यास प्रभृति के नाम उल्लयनीय हैं । भारतेन्दु युग के निवन्ध सचमुच एप प्रयास है । उनम न बुद्धि- वैभव है न पाण्डित्य प्रदशन और 7 अन्य ज्ञानज्ञापन । इन लेखका की रचि सभी विषया म है पर किसी भी विषय म ये अतिम वात नहीं रहते बल्कि पाठप वसाय सोचना विचारना चाहत हैं। उनम कुछ ऐमी आत्मीयता और वेत- कल्लुफी है कि पाठय भी उनसे घुल मिल जाना चाहता है । 1 वस्तुत भारत दु पुग के निवन्धा म आत्मपरसता, वैयक्तिक्ता के साथ साथ सामाजिकता का समन्वय मिलता है। उनके हास्य व्यग्य की चोट का वेन्द्र राजनीतिक, मामाजिक एव धार्मिक विषमता रही है । गम्भीर विषय को सरल सररा प्रस्तुति देना इस काल म निबन्धकारा का पशिष्ट्य रहा है । इस वाल वे निबन्धो वा प्रबलतम स्थर वतमान पर क्षोम, राष्ट्रीय जागरण, भावोद्वेलन एव सामाजिक चेतना के उत्यान का रहा है। वस्तुत "इस पाल क लेखका को निबन्ध रचना म जितनी सफलता मिली उतनी कविता और नाटक म नही ।"" भारतन्दु युगीन नियाधा की प्रवृत्तियो को निम्नावित स्पा में प्रस्तुत किया जा सकता है। । यह काल आरम्भिव निबन्धा या था अतएव इसम परिपक्वता एव प्रौढता दृष्टिगत नहीं होती विन्तु तात्त्विक दृष्टि से पूर्ण हैं । 2 इरा काल व निबन्धो में विपय वैविध्य उपलब्ध होता है । सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक आदि सभी विषयो पर निवध लिसे गये। 3 साहित्य की अन्य विधाआ की भाति सामाजिक विसगतिया, आर्थिक शोपण, राजनीतिक पड्यन, धार्मिक कुचत्रा के विरोध म जागृति के स्वर का उद्घाप क्यिा । साहित्यिक आग्रह इन निबन्धो मे कम था। 4 इस युग के निबन्धो म हास्य और व्यग्य का स्वर प्रमुख रहा है । उप- देशात्मकता इस काल के निबन्यो का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है । 5 इस युग के निवधवार पत्रकारिता से जुड़े थे तथा निबन्ध साहित्य प्राय पत्र-पत्रिकाओ क माध्यम से प्रकाशमान हुआ भारतन्दु युगीन निबध साहित्य के आकलन से यह बात सष्ट हो जाती है कि - 1 1 डा. गियकुमार शर्मा-हिदी साहित्य युग और प्रवृत्तिया, पृ० 643 2 डा० रामबिलास शर्मा-भारतेन्दु युग, पृ० 95 52 / दिनकर का निवध साहित्य कविता, नाटक तथा अन्य विधाओ की अपेक्षा निवध के क्षेत्र में इस काल = रचनाकार का रुझान रहा है । इसका कारण पत्र-पत्रिकाए रही। जिनक सम्पादन ऐसे लोगो के हाथ म था जो न केवल स्व निबंध के लेखक थे अपिल उहोने दूसरो को निबध लेखन हेतु प्रोत्साहित भी किया। माथ ही निवध आलेखन युग और पत्रकारिता की प्रकृति के अनुरूप भी था । द्विवेदी युगीन परिमार्जित निबध सरचना (1903 से 1920 तक) 'द्विवेदी युग का आरम्भ हम आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के 'सरस्वती' के सम्पादन कार्य भार सभालने के समय मन् 1903 से मान सक्त है। द्विवेदी जी के आविर्भाव के साथ ही गम्भीर और उच्च श्रेणी के साहित्यिक निवधो की परम्परा का सूत्रपात हुआ। भाषा का सस्कार एव परिमार्जन इस युग की देन रही है । द्विवदी जी की परिष्कार नीति का प्रभाव इस काल क रचनाकारो पर तो स्पष्टत पडा ही, साथ ही परवर्ती रचनाकारो को भी प्रेरणा मिली। इस युग प्रमुख निवधकारो मे स्वय आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (कवि और कविता प्रतिभा, कविता, साहित्य की महत्ता, कवियो की उर्मिला विषयक उदासीनता, हस सदश, दण्ड देव का आत्मनिवेदन, कवि कर्तव्य, नाटक और उन्यास, प्रोध, लोभ आदि नूतन विचरात्मक निबध) का नाम उल्लेखनीय है। सर्वश्री माधवप्रसाद मिश्र (घृत, सत्य),गाविन्द नारायण मिश्र, श्यामसुन्दर दास (भारतीय साहित्य भी विशेषताए, समाज और साहित्य, कर्तव्य और कथा), चन्द्रधर शर्मा गुलरी (कछुआ धर्म, मारेसि मोहि कुठाव, सगीत), सरदार पूसिंह (आचारण की सम्यता, सच्ची वीरता, मजदूरी और प्रेम), पद्मसिंह शर्मा (पद्म पराग एव प्रवध मजरी सग्रह) प्रभूति द्विवेदी युग के प्रमुख निबध कार रहे है । इस युग में निबधो म अजित ज्ञान का पुनरावत्तन प्रमुखता स मिलता है । विषय वैविध्य का अभाव है । डा. गणपतिचन्द्र गुप्त द्विवेदी युग के निधो का मूल्यापन करत हुए लिखा है-"इस युग व निवध सामान्यत विचार प्रधान ही है । भारतन्दु युगीन निवधो की भाति इनम तत्कालीन जीवन की अभिव्यक्ति एवं राजनीतिक, सामाजिर व धार्मिक परिस्थितिया का अक्न नहीं मिलता। हास्य और व्यापक स्थान पर इनम गम्भीरता अधिक है । आध्यापर जो एव गुलरी जी के निवधा मो छोड़कर शेष म पक्तिकता का प्रस्फुटन नहीं मिलता । मौलिक्ता, नवीनता ताजगी भी इनम नहीं है। वस्तुत य निवध बम, विचारा व सग्रह अधिक है। पारण ये दृष्टि स अवश्य इन निधो को भाषा शुद्ध एव परिमार्जिन है । 1. ग. गणपतिपएन्द्र गुप्त-गाहियर निबंध, पृ. 433 2 बहा, पृ. 436 हिन्दी निवध का स्वरूप विकास और निबंधकार दिनकर /53 बस्तुत इम वाल निबधो मे उपदेशात्माता अधिक है। इस युग मे पनवारिता वो स्वछदना समाप्त हो गई तथा निवधकार यो जनोन्मुखता लुप्त हो गई। निवध मध्य वर्ग, शिक्षित एव शिष्ट समाज के निकट आया । यही कारण है कि विषय वैविध्य ममाप्त हो गया तथा वैचारिक गाम्भीर्य आ गया, बौद्धिकता का समावेश हुमा । सम्पूर्ण द्विवेदी युगीन निवध सरचना के अनुशीलन के आधार पर इस युग की प्रमुख प्रवृत्तिया इस प्रकार निर्धारित की जा सकती है- । इस युग में वैचारिस, भावात्मव, आलोचनात्मय एव विवरणात्मर निवध लिये गय। 2 ये निवध भाषात्मक दृष्टि से परिष्कृत एव व्यापरण के नियमानुकूल हैं । सस्तनिष्ठ तत्सम शब्दायती का प्रयोग बहुश हुआ है । 3 इग युग निवघो मे भारतेन्दु युग की तुलना म गम्भीरता एव प्रौढता दृष्टिगत होती है। 4 इस युग में मुख्यत साहित्य, मनोविज्ञान, सस्कृति, इतिहास जैसे विषयो पर अधिन निबध लिसे गये। वस्तुत द्विवेदी युगीन निवध भारतन्दु युग के उन्मेपकालीन निवध को एक तात्त्विक स्वरूप एव सही दिशा देने वाले है । भापा एव शैली यी दृष्टि से द्विवेदी युग या निबध साहित्य अधिर विसित एव प्रौड है । हास्य व्यग्य के स्थान पर युग मे गाम्भीर्य दृष्टिगत होता है । शुक्ल युगीन प्रौढ निवध सरचना (1920 से 1947 तक) हिन्दी निवध लेखन कला एवं शैली वा पूर्ण विकास आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के निवघो म मिलता है। "इनवे निवध अन्त प्रयास से निकली हुई सहज विचारधारा के प्रतिरूप हैं। उनये आगमन से हिन्दी जगत को नई अनुभूति, नये विचार और नयी भावाभिव्यक्ति शैली के दर्शन हुए "1"चिन्तामणि' नामव दो भागो मे उनका प्रसिद्ध निवध सग्रह है। शुक्न जी के निबधो वी पुष्ट भाषा, कसावट से पूर्ण शैली, विचारो की परिपक्वता, उनका क्रम विन्यास, सभी कुछ नवीन और हिन्दी निवध कला को उत्कर्ष प्रदान करने वाला है । वैज्ञानिक रचना दृष्टि, मनोवैज्ञानिक शैली, उच्चकोटि की भावुकता, विरल तथ्यपरक्ता, तीक्ष्ण व्यग्य दृष्टि शुक्ल जी के निवधो की उल्लेखनीय विशेषताए हैं, जिन्होने उनके समकालीन ही नही परवर्ती निवधकारोवो भी प्रभावित किया।वस्तुत तत्कालीन निवध साहित्य यो समस्त प्रवृत्तियो के दर्शन शुक्ल जी के शिवधो मे होते हैं। शुक्ल युग के अन्य निबधकारो में डा. गुलाबराय (मेरी असफलताए, मेरे निबंध द्विवेदी } हाशिमार शर्मा-हिन्दी साहिय युग और प्रवृत्तिया, पृ० 645 54 / दिनकर का निबध साहित्य सग्रह), यख्शी पदुमलाल पुन्नालाल (उत्सव, रामलाल पण्डित, समाज सेवा, विज्ञान, नाम आदि निवर) माखनलाल चतुर्वेदी (जिनके निवध माखन रचनावली मे प्रकाशित हो चुके है), वासुदेवशरण अग्रवाल, वियोगी हरि नाम उल्लेखनीय हैं। समीक्षात्मक निवध लेखको मे प्रमाद (काव्य कला तथा अन्य निवध), महादेवी वर्मा प्रमुख हैं । शातिप्रिय द्विवेदी शुक्लोत्तर युग में भी सृजनशील रहे । इस काल मे समग्रत निवधो मे गम्भीर्य एव सूक्ष्मता आयो । साहित्य, मनोविज्ञान, संस्कृति, इतिहास जैसे विशेष गम्भीर विषयो को नवीन किन्तु मौलिक दृष्टि से प्रस्तुत पिया गया । भाषा शैली की भी दृष्टि से भी इस युग का नियध साहित्य अधिक विकसित एव परिपक्व है । वस्तुत इस काल में हिन्दी निबध बहुमुखी दिशाओ मे विक्सनशील हुआ। विचार, भापा एवं शैली सभी दृष्टियो से शुक्ल युग हिन्दी निवध का उत्वर्प काल है। शुक्न युगीन निवधो की प्रवृत्तिया इस प्रकार निर्धारित की जा सकती हैं- | इस युग के निवधो में चिन्तन के स्तर पर गम्भीरता तथा वैचारिक प्रौढता आयी। 2- विचार के साथ-साथ भावात्मकता का मणिपाचन योग इस युग के निवघो में देखा जा सकता है। 3 इस युग मे सास्कृतिक, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक, साहित्यिक, यात्रा सम्बन्धी विपयो पर निवध लिखे गये। गभीर समीक्षात्मक निबध भी लिखे गये। 4 समीक्षात्मक निबधो मे प्रौढता आयी तथा प्रचुर मात्रा मे इस प्रकार के विध लिये गये। 5 शैली (गवेपणात्मर, सूत्रात्मय, विवेचनात्मक आदि) वैविध्य भी इस काल मे देखने को मिलता है। 6 भाषा के स्तर पर परिपति एवं प्रौउता के दर्शन होते हैं । उरामे युगीन विचार गम्भीयं को अभिव्यक्त परने की क्षमता विद्यमान है। निष्पर्पत यह कहाजा रापता है वि द्विवेदी युग मे विषय विस्तार,परिमार्जन मा जो स्वरूप दृष्टिगत हुआ है, शुक्ल युग में उसे उत्सर्ष प्राप्त हुआ। विवेचन एप बौद्धिकता जो प्रमुखता मिली। साथ ही सूक्ष्म विश्लेषण दृष्टि वा समावेश हुआ। निवघ साहित्य मे विविध वैचारिख यादो का समावेश बौद्धिक विचारधाराए विवेकपूर्वर प्रविष्ट हुई। मरमता के माय गम्भीरता तपा व्यागा पे माय गहनता यो गमाहुति शुक्लगुगीन निवप्रो की उलेयनीय विपना नहीं जा सकता है। इम मुग हुआ और हिन्दी निबंध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनकर 155 स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी निबंध संरचना (1947 से आज तक) इस युग को शुक्लोत्तर युग एव समकालीन युग की संज्ञा दी जाती है। यह हिन्दी निबंध के इतिहाम में उत्कर्ष का काल है । इसमे निबंधकारो के तीन वर्ग मिलते हैं- 1. ये निबंधकार (व वि, उपन्यासकार, कहानीकार आदि) के माथ निबंध लेखक भी हैं। 2. समीक्षक निबंधकार 3. ललित निबंधकार प्रथम श्रेणी मे महादेवी वर्मा, चतुरसेन शास्त्री, प्रभाकर माचवे, मुक्तिबोध, रागधारमिह 'दिनकर', सच्चिदानद हीरानद वात्स्यायन अज्ञेय, जैनेन्द्र, विश्वम्भर नाथ उपाध्यान, डा. देवराज, धर्मवीर भारती प्रभृति के नाम उल्लेखनीय है । द्वितीय वर्ग मे नगेन्द्र, रामविलाम शर्मा, नन्ददुलारे वाजपेयी, नामवर सिंह, रमेश पुन्तल मेघ आदि तथा तृतीय वर्ग में विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, हजारीप्रमाद द्विवेदी, रामवृक्ष वेनीपुरी आदि प्रमुख है । स्वातंत्र्योत्तर युगीन निवध साहित्य विविधोन्मुखी रूप से विकसित हुआ। इस काल के निबंधो मे ममीक्षात्मक, मस्मरणात्मक, यात्रा-वृतांत, रिपोर्ताज आदि शैलिया विकसित हुई । मुंह, गला, गाली, बिल्ली, मयान (प्रभाकर माचवे), एक युग: एक प्रतीक, रेखाए बोल उठी (देवेन्द्र सत्यार्थी) जैसे सामान्य विषयो पर निवध लिखे गये तो अतीत के चलचित्र, स्मृत्ति की रेखाए (महादेवी वर्मा), क्या भूलू क्या याद करूं (बच्चन) मग्रहो मे सस्मरणात्मक निवध सगृहीत है । सस्मृति और माहित्य, प्रगति और परम्परा (डा. रामविलास शर्मा), विचार और विवेचन, विचार और विश्लेषण (डा० नगेन्द्र), आलोचना के प्रतिमान, माहित्यानुशील (शिवदानसिंह चौहान), क्योकि समय शल्द है (रमेश कुन्तल मेघ), जलते उबलते प्रश्न (डा० विश्वम्भर उपाध्याय), साहित्य सिद्धात और समालोचन एव साहित्यक निबंध (देवीप्रसाद गुप्त) आदि गम्भीर समीक्षात्मक निबधो के सग्रह है जो इस युग की प्रवृत्तियो का प्रतिनिधित्व करते हैं । ललित निवध स्वातत्र्योत्तर नियंध की विशिष्ट उपलब्धि है। रामवृक्ष बेनीपुरी (गेहू और गुलाव, वन्दे वाणीविनायको), हजारीप्रसाद द्विवेदी (अशोक के फूल, कुटज, कल्पलता, विचार और तिसग्रह), विद्यानिवास मिश्र (छितवन की छाह, मेरे हाथ का मुकुट भोग रहा है, पर्णकुटी, तुम चन्दन हम पानी संग्रह), कुवेरनाथ राय (प्रिया नील कण्ठी, रस आखेटक, विपाद योग, गन्धमादन संग्रह) के इस क्षेत्र मे प्रयास स्तुत्य है । इस युग के निवधो की प्रवृत्तियां इस प्रकार है- 1. इस युग के नियधो में शैली वैविध्य दृष्टिगत होता है ।

56/ दिनकर का निवध साहित्य 2 स्वातत्र्योत्तर पाल मे हास्स व्यायपरक निबध लेखा की परम्पग विक- हुई जिमे हरिशर परमाई, लक्ष्मीकान्त वर्मा, नरेन्द्र कोहली, शरद जोशी, श्रीलाल शुक्ल प्रभृति न समृद्ध किया। 3 माहित्य, समाज, राजनीति, धर्म, संस्कृति, विज्ञान एव युग जीवन की समस्याए सभी विषय निवध की परिधि मे आ गये विन्तु साहित्यिक निवध लेखन की प्रवृनि अधिक पायी जाती है। 4 इस युग मे विषय वस्तु ये प्रति मूक्ष्म निरीक्षण एव विश्लेषणात्मक वृत्ति का विकास हुआ। 5 समीक्ष्य निवधो मे युगीन विचार धाराओ(माक्र्सवाद, समाजवाद, मानव वाद, गाधीवाद आदि) का प्रभूत प्रभाव सृजन-प्रेरणा के रूप मे दृष्टि- गत होता है। 6 हिन्दी निबंध स्वतत्र पुस्तको, पत्रिकाओ एव समाचारपत्रो के माध्यम से प्रकाशित होने लगे। हिन्दी निवध के विकासात्मक स्वरूप विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दी निबध ने अल्प अवधि मे पर्याप्त विकास किया है। कुछ निवधो में पाश्चात्य विचारधाराओ की जुगाली का क्रम इसे दूषित भी कर रहा है। इसके विपरीत कुबेरनाथ राय एव विद्यानिवास मिथ के निबधो मे मौतिक चिंतन एव वैयक्तिकता की छाप के कारण हिन्दी निबध सृजन को नये आयाम प्रदान किये हैं जो प्रशस्य एव अनुकरणीय है । निबंधकार रामधारीसिंह दिनकर हिन्दी निवध के विकासम्म के अनुशीलन से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस गद्य विधा का प्रारभ एव विकास आधुनिक काल की देन होते हुए भी रचना की दृष्टि से उसने प्रौढ स्वरूप ग्रहण कर लिया है । हिन्दी निवध विधा राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन से ममानानर द्रुत गति से विकसित हुई है अतः उसमे स्वाधी नता पूर्व और पश्चात् की राजनीतिक, सामाजिक और सास्कृतिक चेतना का समावेश स्वयमेव हो गया है। भारतेन्दु, द्विवेदी और शुक्ल युगीन हिन्दी निवध रचना की प्रवृत्तिया एव विशेषताए परवर्ती पाल की निवघ-रचना मे भी परि- सटित हुई है। आधुनिक काल के निवघकारो मे दिनकर जी के निवध साहित्य का योगदान इस अर्थ मे ऐतिहासिक है कि उन्होने विषय और शैली दोनो ही दृष्टियो से हिन्दी निवध को नई दिशा की ओर दिनयर जी काम यी दृष्टि से स्वातत्र्योत्तर युगीन निवध परपराने रचनाकार हैं। कवि के रूप मे जितनी म्याति उन्हें मिली, उनका गद्यार मूल्यांकन के अभाव मे प्रकाशमान न हो सका। मिट्टी की ओर', 'रेती के फूल, उन्मुख लिया।

हिन्दी निवध का स्वरूप विकास और निवधकार दिनकर | 57 - 'अर्धनारीश्वर', 'वेणुवन', 'साहित्यमुखी', 'शुद्ध वविता की पोज' आदि उनवे प्रसिद्ध निवध सग्रह है। वस्तुत वे जितने श्रेष्ठ और उच्चकोटि ये रवि थे उतने ही सिद्धहस्त निवधनार भी हैं । गूक्ष्म चिन्तन एव गभीर विश्लेषण उनके निवधी यो विशिष्टता है । वयक्तिकता, भावात्मक्ता, मौलिक दृष्टि और काव्यात्मरता उनरे निवघो षी अन्य विशेषताए हैं। दिनकर ने साहित्य, इतिहास, संस्कृति, मनोविज्ञान एव युगीन समस्याओ वो अपने निवधो का विषय बनाया है। दिनार रे निवधो की सबसे बड़ी विशेषता सप्रेपणीयता या गुण है। साथ ही उनम विश्वसनीयता, स्पष्टवादिता एव तय्यपरसता पे गुण भी विद्यमान है। युगीन विचारधाराओ की स्पष्ट छाप उनये निधो में दयी जा गवती है। सास्कृतिक ज्यान एव मानववादी स्वर उनके सभी नियघो मे ध्वनित हुआ है । भाषा के स्तर पर भी दिनपर के निवध प्रौढ हैं तथा ली यी दृष्टि से वैविध्यपूर्ण हैं । निबध के क्षेत्र में उनकी उल्लेयातीय कृतिया इस प्रकार है- 1 रेती के फूल 2 वेणुवन 3 यधनारीवर 4 गुद यविता की योज 5. पत, प्रसाद और मंपिलीगरण 6. मिट्टी की ओर 7 पाप्प वी भूमिरा 8 माहित्य भूमिरा १ वट-मीपस 10 राष्ट्रभाषा आन्दोलन और गाधी जी 11. हमारी मांगतिर एका 12 राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता 13 धर्म, ननिर और विभाग 14. रानियेगार अध्यार। अपंत निबन्ध-गरननो में रपनात्मर और ममालीरनामा दोनों ही मार निराध सरतित है। तिर पो ने प्ररर मटिको निर राम रगिरी प्रति रो प्रमुगमा प्रदान पोहै। पनामा निगर निगमों में रिपार व भाव प्रोमो मी REAT रियर | full पनिार जोगी रचना माग मिट्टीगो मोर' (गन् 1946) मे शाराम शार माग और बाहरी दामो में घिर गई। रहरिगीति पागनी जाती, अनेम तिt. "ffar मारिन सिरि.

58 / दिनकर का निबन्ध साहित्य पार के रूप में दिनपर जी की विशिष्ट पहचान न बन पाने का कारण उनके निबन्धा मे बौद्धिक विश्लेषण की प्रवृत्ति की प्रमुखता ही कही जा सकती है। सजा समीक्षक अर्थात् समकालीन रचनावारों के समालोचर होने कारण भी दिनकर जी का निवन्धकार रूप प्राय परोक्ष ही बना रहा । वे ललित निवन्ध तो नहीं हो लिय सवे, साथ ही निवन्धो मे लालित्य की सृष्टि के प्रति भी सजग नहीं रहे। फिर भी दिनकर जी की निवन्ध रचना का अपना महत्त्व है और उन्होंने हिन्दी निवन्ध सृजन परम्परा मे उल्लेखनीय योगदान दिया है । निष्कर्ष हिन्दी निबन्ध की विकास परम्परा के अन्येपण एव मूल्यांकन से इस तथ्य की सम्पुष्टि होती है कि निबन्ध रचना युग सापेक्ष चिन्तन से अनुप्रेरित एव बौद्धिर विश्लेपण की प्रवृत्ति की ओर उन्मुख रही है । भारतेन्दु और द्विवेदीयुगीन निवन्ध- कारो न रागतत्त्व को प्रमुखता प्रदान करते हुए व्यग्य विनोद का समाहार भी अपनी रचना शैली मे किया। उन्होने हल्के-फुलो समाजोपयोगी सामान्य विषयो पर भी निवध लिख । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के पदार्पण से निवध और समा लोचना के क्षेत्र में प्रौढता और गम्भीरता का सूत्रपात हुआ। शुक्ल जी हिन्दी निवन्ध रचना के श्लाका पुरप के रूप में उभरे । शुक्लोत्तर निबन्ध रचनाम व्यक्ति व्यजक और ललित निबंधकारो ने अपनी अलग पहचान वायम की। सर्वश्री हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र और कुबेरनाथ राय इसी परम्परा के लतित निबन्धकार है । निबन्धवार के रूप म दिकर जी ने हिन्दी निबन्ध परम्परा की सभी प्रमुख प्रवृत्तियो को अपनी रचना में आत्मसात क्यिा। दिनकर जी के निबन्धो म तकसम्मत विश्लेषण की प्रवृत्ति ने उन्हें विशिष्ट काटि के निबंधकारो के रूप में प्रतिष्ठित किया।पवि, विचारणा और समीक्षक वी भाति निबन्धकार दिनार जी वी निबन्ध रचना भी प्रशस्य है ।

3 दिनकर का निबंध साहित्य : परिचयात्मक विवेचन एवं वर्गीकरण भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट आस्था दिनकर जी की विचारधारा की मूल शक्ति है। दिनकर जी ने निबन्यो के माध्यम से भारतीय सस्कृति के वैविध्य और वैशिष्ट्य को रेषाक्ति पर निबन्ध सरचना के क्षेत्र मे नयी दिशा का उन्मेष रिया है। उनकी विचारधारा मुख्यत जनोन्मुखी रही है । उत्कट राष्ट्रीयता का उपोष उनके निबन्धो मे मर्वत्र लक्षित किया जा सकता है । जहा दिनकर का काय राग और पराग, कामाघ्यात्म और राष्ट्रीयता का स्वरोत्पल है वहा उनी निबन सरचना एक प्रबुद्ध विचारक एव प्रखर चिन्ता की दृष्टि का जीवन्त प्रमाण है। उनवे नियन्ध व्यापर तथा गहन अनुभूति की समन्वयात्मक अभिव्यक्ति है। दिनकर के निवन्धो मे विषयो की विविधता है। आप निबन्धो ने सरसुति और साहित्य से लेकर दैनदिन जीवन की गतिविधियो, प्रिया-व्यापारो और आगो तक को शक्तिमन्त अभिव्यक्ति दी है। उनके निबन्ध गम्भीर चिन्तन-गार के जीवन्त दस्तावेज हैं। दिनकर का निबन्ध साहित्य : परिचयात्मक परियोध दिनकर कृत निबन्ध-सग्रह वाल-क्रमानुसार इस प्रकार है- 1 मिट्टी की ओर 2 अर्द्धनारीश्वर 3 रेती के फूल 4 काव्य की भूमिका 5 पत, प्रसाद और मैथिलीशरण 60/दिनकर का निवध साहित्य 1958 1961 1966 1968 - 6 वेणुवन 7 वट-पीपल 8 शुद्धि कविता की खोज 9 साहित्यमुखी उपयुक्त निबन्ध-सग्रहो का परिचयात्मक विवेचन इस प्रकार है- मिट्टी की ओर 'मिट्टी की ओर दिनकर जी का प्रथम निबन्ध-सग्रह है । इसका प्रकाशन सन् 1946 म हुआ। इसम साहित्यक विपयो पर समीक्षात्मक शैली मे लिखे गये निबन्ध सगृहीत हैं। इसमे दिनवर जी ने किसी विषय विशेष का सपूण विवेचन नहीं किया है। उन्होने उन कविताओ वी नवीन प्रवृत्तियो और समस्याओ को विवेचनीय विषय बनाया है, जो छायावाद की सीमा को लापकर नई दिशा की ओर उ मुख हो रही थी । इसम 'इतिहास के दृष्टिकोण से', 'दृश्य और अदृश्य वा सेतु' 'कला मे सोद्देश्यता का प्रश्न , हिन्दी कविता पर अशक्तता का दोप, 'वतमान कविता की प्ररक शक्तिया, 'समकालीन सत्य से कविता का वियोग , हिनी कविता और छद, 'प्रगतिवाद-समकालीन की व्याख्या', हिंदी काव्य समीक्षा पा दिशा निर्देश' 'साहित्य और राजनीति , 'पवि श्री सियारामशरण गुप्त' एक 'तुम पर कब आओगे कवि और 'खडी बोनी का प्रतिनिधि कवि बलिशाला हो मधुशाला शीपप चौदह निवघ सगृहीत है । इन निवन्धो मे उनके काव्य मिद्धातो को भी अभिव्यक्ति मिली है। मानव जीवन और समाज को दृष्टि-पथ म रखते हुए उन्हान याव्य म शिव और गुदर की प्रतिष्ठा की है। दिनकर की रचना दृष्टि कवि, कविता एव समीभा प्रत्ययो पर ही वेद्रित रही है। दिनार वी समीक्षा दृष्टि चिन्ताभीरता एव तारिक्ता को इन निवधो म पयाप्त अवसर मिता है । ये नियध प्रयुद्ध पाठा म 'पविता की समझ में नये द्वार खोलने म मक्षम हैं यही इनपी रचनात्मर सिद्धि और सपरता है। अद्धनारीश्वर 'अनारीश्वर' सन् 1952 म प्राशित दिनकर पा दूसरा निवघ साह है । मम पारे म दिनकर 'आमुय मरियत है इस संग्रह म ऐसे नियध हैं जो मन वहताय म लिये जान सकारण रयिता की चौहद्दी के पास पाते हैं और पृछ एमे भी है बिनम बोटिस पितन या विश्रेषण प्रधान है। इसीलिए मैंने इस गह का नाम 'रेस नारीश्वर' रया है।मग निवधा का संग्रह है ! निरर-अनारीवर, मामुय दिनकर का निवध साहित्य परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण | 61 जिनक शीर्षक इस प्रकार है-मन्दिर और राजभवन, और चाहिए किरण जगत को और चाहिए चिनगारी, दीपक की लो अपनी ओर, हड्डी वा चिराग (य भावात्मक शैली के निबन्ध है), महाकाव्य की वेला, कविता का भविष्य, नई कविता के उत्यान की रेखायें, पाविस्तान के पीछे साहित्य की प्रेरणा, स्वतग्रता के बाद, समाजवाद के अन्दर साहित्य, रजत और आलोक की कविता, कविता राजनीति और विज्ञान, गाधी से मार्क्स की परिप्कृति, गुप्तजी कवि के रूप म, कविवर मधुर, जार्ज रसल का साहित्यिक चितन, रवीन्द्र जयती के दिन, रवीन्द्रनाथ की राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता, क्या रवीन्द्र अभारतीय है ? महर्षि अरविन्द की साहित्य साधना एव कला वे अर्द्धनारीश्वर । मन्दिर और राजभवन, और चाहिए किरण जगत को और चाहिए चिनगारी, दीपक की लो अपनी ओर तथा हड्डी का चिराग भावात्मक श्रेणी के निबन्ध है जिनमे आध्यात्मिकता से भौतिकता की यात्रा की गई है । गाधी से मास, गुप्त जी, रवीन्द्रनाथ एव रसल के माध्यम से आलोचनात्मक चितन सबधी निबन्ध है। जिनमे समाज, सस्कृति एव व्यक्ति का सही सन्दर्भ खोजते हुए लक्ष्योन्मुख दृष्टि मुखर हुई है । वस्तुत इस संग्रह के निबन्ध गम्भीर चितन एव सुव्यवस्थित विचारधारा के द्योतक है । रेती के फल 'रती के फूल' निबन्ध सग्रह सन् 1954 में प्रकाशित सकलन है । यह सग्रह कम की दृष्टि से तृतीय है। इसमे मनोविज्ञान, सस्कृति साहित्य कला आदि विपया पर रचित पन्द्रह निवन्ध सगृहीत है । 'हिम्मत और जिंदगी' कर्म की महत्ता प्रतिपादित करता है तो 'चालीस की उम्र' काल की अवधारणा एव महत्त्व पर बल देता है । 'ईर्ष्या तू न गई मरे मन से' मनोविज्ञान पर आधारित गम्भीर भावो को व्यजना करता है । 'हृदय की राह', 'कर्म और वाणी', 'खड्ग और वीणा एव 'विजय के आसू' वैचारिक किंतु नवयुवको म प्रेरणा की लौ जगाने वाले आत्म- परक निबध है तथा 'कला धर्म और विज्ञान , 'राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता' विचार प्रधान निबध । भविष्य के लिए लिखने की बात' आत्मपरक शैलीम रचित है। 'सस्कृति है क्या' तथा 'भारत एव है' तथा 'भगवान बुद्ध' सास्कृतिक तथा हिन्दी कविता म एवता का प्रवाह' राष्ट्रवादी चिन्तन का साहित्य विषयक निबंध है। 'नेता नही नागरिक चाहिए' राजनीतिक साच पर आधृत मूल्य चिन्तनपरक निबध है । इन निबन्धो मे दिनकर जी अपने भावा और विचारो को सशक्त रूप में अभिव्यक्त करने में सफल हुए । इन निबन्धो की विशेषता यह है कि दिनकर का जीवन-दशन और सृजन दृष्टि दोनो पाठक के समक्ष उभरकर आती हैं । ये दिनकर के तेजस्वी व्यक्तित्व एव ओजस्वी कृतित्व वे प्रखर उद्धरण है ।

62 / दिनकर का निवध साहित्य काव्य की भूमिका दिनकर का ममीक्ष्य निबन्ध-सग्रह सन् 1958 मे प्रकाशित चतुर्थ संग्रह है। 'इसमे रोतिराल का नया मूल्यान', 'छायावाद की भूमिका', 'छायावादोत्तर काल', 'प्रयोगवाद', 'वोमलता से कठोरता की ओर', 'भविष्य की कविता', 'पविता ज्ञान है या आनन्द', 'रूप काव्य एव विचार काव्य',प्रेरणा का स्वरूप', 'सत्य शिव सुन्दरम्', एव 'कविता की परख' शीर्षक ग्यारह निवन्धो का सग्रह है। समीक्ष्य निबन्धो की प्रकृति के सदर्भ मे दिनकर जी सग्रह की भूमिका मे बहते है--"आरम्भ के चार निवन्धो मे ऐतिहासिक गम से रीतिकाल से लेकरप्रयोगवाद तर की प्रमुख प्रवृत्तियो वा विवेचन किया है । पाचवें निबन्ध वा विषय भी यहुत कुछ यही है । और छठे निवन्ध मे यह समझने की कोशिश की गई है कि वैज्ञानिक युग में कविता अपने क्नि गुणो पर जोर देकर अपना अस्तित्व कायम रख सकती ।" इस सग्रह के निवन्धो मे साहित्यिक समस्याओ एव इतिहास के सदों को सशक्त प्रस्तुत दी गई है । इनमे जहा वे साहित्य के इतिहास के अस्पशित पक्षो को उद्घाटित करने में सक्षम हुए हैं, वही मौलिक चिन्तन शक्ति का परिचय भी दिया है । ये निबन्ध सृजनात्मक सामथ्यं एव गम्भीर विचारक सूत्री का प्रमाण हैं तथा आलोचनात्मक दृष्टि को विकसित करन मे दिनकर के आदान के स्वरूप को भी स्पष्ट घरते हैं। इन निबन्धो की अन्य विशेषता यह है कि दिनयर ने जहा साहित्य वे अन्तरग पक्षो को उद्घाटित किया है वही साहित्य के सामाजिक दायिन्य यो भी प्रााशित किया है । इन निबन्धो मे साहित्य विपयर विचारों में एक अनियति है, निरन्तरता है, एक प्रवाह है तथा प्रभावोत्पादकता भी विद्यमान है। पत, प्रसाद और मैथिलीशरण गन् 1958 मे प्रकाशित इम सग्रह मे तीन निबन्ध संग्रहीत है । इन शीर्षक इस प्रकार है-'पुनरुत्थान वे यवि श्री मैथिलीशरण गुप्त', 'कामायनी दोप रहिन, दूपणा महित' एव 'विचार कवि पत।' सोच और तेवर की दृष्टि से ये सीनो नियन्ध बाप की भूमिका' राग्रह व अग प विन्तु मलेबर ने अनावश्यक दिनार से बमने हेतु सोन निबन्धो को अलग पुस्ता मा आकार दिया गया है। अपम निरथ 'पुनरपान के पि श्री मंपिसीशरण गुप्त' मे पुनरुत्पान म स्वरूप को उपारित पग्न हुए गुप्त जी पाय मास्कृतिक पक्ष हो उभारते हुए भागोर परिप्रेक्ष्य में उनकी महत्ता का प्रतिपादन किया है। मूलत इस निबन्ध 1. रितार-चारी भूमिका, 'दो गम्' दिनकर का निवध साहित्य परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण 163 का ध्येय उत्कट राष्ट्रीयता का उद्घोप है । द्वितीय निबन्ध 'कामायनी दोपरहित दूपण सहित' प्रसाद वृत 'कामायनी' पी सृजन सामय्यं एवं सीगा या लेगा- जोपा है । उन्होने 'कामायनी' का मूल्याकन करते समय इस गूग यो सामने रखा कि-'कविता न केवल भापा है, न केवल भाव या विचार।1 इसी आधार पर उसके गुण-दोपो का सम्यक् मूल्याकन किया है । तृतीय निवन्ध 'विचारक कवि पत' में कविवर सुमित्रानदन पत की 'गुजन' परवर्ती साहित्यिक प्रवृत्तियो या विवेचन है। दिनवर की मान्यता है कि-"पत साहित्य मे पल्लब, वीणा, गुजन और ग्रथि को जो प्रसिद्धि मिली वह पतजी रे बाद की पुस्तरो को नसीय न हुई। अतएव मैंने पल्लव, वीणा गुजन और अयि को छोड़ दिया है। इस निवन्ध में मुख्य ध्येय यह रहा है कि गुजन ये वाद अब तय पत जी क्या करते रह हैं।" दिनकर जी ने तीनो ही नियन्धो में तर्कपूर्ण साहित्यिक विश्लेषण किया है। इन निबन्धो मे दिनकर वा साहित्यकार वहुन ऊचाई पर जा पहुचा है। सूक्ष्म निरीक्षण- शक्ति, सुगुम्फित भाषा विधान एव मोलिव चिन्तन सभी युछ दिनयर की रचना सामयं को ही प्रमाणित करता है। विचार के साथ भाव या प्रवाह, भाषा के साथ शैली वैविध्य, दृष्टि के साथ सृष्टि सभी वुछ उनके इन निवन्धो को स्थायी महत्व का सिद्ध करता है। वेणुवन 'वेणुवन' दिनकर ये साहित्यिक, सास्कृतिक एर राजनीतिक विचारोवा निबन्ध सक्लन है । इस मा प्रकाशन सन् 1958 मे हुआ। साहित्यिक निवन्धी में 'मैथिल बोलि विद्यापति', 'विद्यापति और बज बुलि', 'महादेवी जी की वेदना', "निर्गुण पथ पो सामाजिक पृष्ठभूमि' उल्लेदर है। साहतिक निवन्ध है--संस्कृति सगम, बौद्ध धर्म को विश्वव्यापकता। राजनीति है-शाति की समस्या एव जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। वस्तुत इन निवन्धा मेदिनार या सफल निवन्धकार म्प उभर गया है। इन निवन्धो म ये पूनियन्ध रपना की अपेक्षा स्पष्ट दृष्टिगत होत है । निवन्धोवी गरिमा मे प्रोड निनन एव गम्भीर विचार प्रस्तुत हुए है। सर जगह उनसरा प्रगतिमोर-मानवतावादी चिन्तन मुरार रहा है । निश्चय ही उनकी स्थापनाए मौनिक और अशिम ।। गाय हो ये निबन्ध दिनार की नियन्य यारा में विकाम सोपान में समान प्रसीन होते है। वट-पीपल ग निवध-गनलन का प्रसाशन गन् 1961 में। इसमें सम्मारमा, 1. निसार-पत, प्रमाद और मैपितीशरण, पृ. 72-73 2. दही, १०98 64 / दिनकर का निवध साहित्य सास्कृतिक एव साहित्यिव निवध रागृहीत हैं । पुण्यलोक जायसवाल जी, श्री राहुल सात्यायन, प० बालकृष्ण शर्मा नवीन, १० सुमित्रानन्दन पत, मामा वरेसर, रक्मणि देवी और उनका वला चित्र तथा पौण्ड के राष्ट्रपति शीर्षक निवध सस्मरणात्मक है। इनमे उपर्युक्त व्यक्तित्वों तथा उनके कृतित्व का मूल्याक्न प्रस्तुत किया है । लेखक की दृष्टि में नारी, सस्कृति और सभ्यता, नया भारत कैसा हो, चार सास्कृतिक वानिया एव क्वीर के स्वप्न, सास्कृतिक चेतनापरक निबध हैं । एक कविता की जन्मकथा, साहित्यिक धर्म, आटी कला, महाकाव्य में सत्य और कल्पना, साहित्यिक निवध है। 'देश भापा क्यो' युगीन भापा समस्या पर लिखा निवध है । ये निबध दिनवर की सहज समझ, दृष्टि एव सौम्य सृष्टि के उद्धरण है । इनम तत्त्वाग्रह उतना नहीं जितना आत्मीयता वा आग्रह है। इनमे दिनकर का कवि, विचारक, सस्कृति चेता इतिहास स्वरूप एक साथ जी उठा है। शुद्ध कविता की खोज दिनकर जी के निवधो का आठवा सक्लन है-'शुद्ध कविता को खोज।' इसका प्रकाशन सन् 1966 मे हुआ । इस पुस्तक का केन्द्रीय तत्त्व है-यूरोप में प्रचलित नई कविता का आदोलन । दिनकर जी कहते है--"नयी कविता का आदोलन यूरोप मे लगभग सौ वर्षों स चल रहा है। आश्चर्य है वह अब भी पुराना नहीं पड़ा है। उसके भीतर से बराबर नय आयाम प्रक्ट होते जा रहे है। बराबर नयी चिनगारिया छिटकती जा रही है। पुराने आलोचको को नई कविता को छूने म अप्रियता एव कुछ सकोच का भी अनुभव होता है। वर्तमान पुस्तक इमी महान् आदोलन को समझने का विनम्र प्रयास है ।" हिन्दी के लेखक कवि, पाठक अग्रेजी अथवा किसी विदेशी भाषा के द्वारा पाश्चात्य साहित्य द्वारा सोधे सम्पर्क में नहीं है, इस पुस्तक का उद्देश्य विशेषत उन्ही के साथ वार्तालाप करना है।"' साथ ही इस पुस्तक म भारतीय साहित्य से इतर साहित्य मे प्रचलित उन काव्य साम्प्रदायो का पर्यावलोकन किया गया है, जो नयी कविता से सबंधित है । 'शुद्ध कविता को खोज' सग्रह म अनक रचनाए निवध कोटि की नहीं है यथा--'कविता और शुद्ध कविता', 'शुद्ध कविता का इतिहास', 'भाग एक और दो', 'कविता म दुम्हता' 'शुद्ध वाव्य की मीमाए', 'परिभाषाहीन विद्रोह', एव "गाहित्य में आधुनिक बोध' आदि । किन्तु इस सकलन म दिनकर जी के महत्व- पूण निबध है-'मनीपी और समाज','पला म व्यक्तित्व और चरित्र' एव 'क्ला का सन्याम'। उनमे विचारा की प्रधानता सहज दखी जा सकती है । इसके निबंध माहित्यिक है जिार विस्तृत वयर म गहन अध्ययन, गम्भीर चिन्तन, सूक्ष्म । दिनकर-~-शुद्धरविता की खाज, भूमिका दिनकर का निबध साहित्य परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण / 65 निरीक्षण शक्ति एव विचार शक्ति समाहित है, जो दिनकर के व्यक्तित्व को मूर्त करती हैं। भाषा के स्तर पर इसके निबंध पूर्व के सकलनो से कही आगे है तथा दिनकर को अपूर्व गद्य रचना सामथ्यं के परिचायक भी है। साहित्यमुखी 'साहित्यमुखी' संग्रह का प्रकाशन सन् 1968 मे हुआ। दिनकर जी कहते है कि-"साहित्य अथवा साहित्य से सरधित विषयो पर मैने जो निबध लिसे या भापण दिए है, उनका सग्रह 'साहित्यमुखी' के नाम से निकल रहा है।" समीक्ष्य संग्रह मे इक्कीस निवध सगृहीत हैं जिनके शीर्षक इस प्रकार है-शीर्पक मुक्त चिन्तन, आधुनिकता और भारत धर्म, शेक्सपीयर, कविता मे परिवेश और मूल्य, निराला जी को श्रद्धाजलि, मराठी के कवि केशव सुत, आधुनिकता का वरण, इलियट का हिन्दी अनुवाद, चार काव्य संग्रह, हिन्दी साहित्य पर गाधीवाद का प्रभाव, सर्वभाषा कवि सम्मेलन, लेखको का शिविर, डोगरी कविताए, हिन्दी और उसको उप भाषाओ का सम्बन्ध, महात्मा टालस्टाय, राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता, इल्म की इन्तिहा है वेताबी, हिन्दी साहित्य में निगम धारा', युद्ध और कविता, शिक्षा के पाच लक्षण एव साहित्य मे आधुनिकता। इस सग्रह मे आधुनिकता, शिक्षा, भाषा, संस्कृति सम्बन्धी विषयो पर निबंध लिखे गये हैं। ये सभी दिनकर जी के सुविचारित एव सुचिन्तित निवध है। इनमे प्रौढ और परिपक्व विचारो का भास मिलता है। इनमे उनकी गहन-जीवन दृष्टि का प्रतिफल है । इनमे दिनकर सुव्यवस्थित विचार-सूत्री का अवलम्ब लिये क्रियमाण रहे है। सकलित निवधो के आधार पर कहा जा सकता है वि दिनकर पर प्रगतिशील विचारधारा, मानवतावादी विचारधारा एव राष्ट्रवादी चिन्तन वा प्रभूत प्रभाव है । समग्रत इन निवधो मे दिनकर की अन्नदृष्टि एव गहरी समझ के दर्शन होते हैं। ये निबध न देवल हिन्दी निबंध साहित्य को निधि हैं अपितु आलोचना के क्षेत्र में भी नई दिशा देने मे ममर्थ है । इस दृष्टि से इस सग्रह का दोहरा महत्त्व है। रिष्कर्पत यह कहा जा सकता है कि दिन र जी का निबध माहिय उनकी काव्य-सरचना के समान हो परिमाण की दृष्टि से विपुल है । वस्तुत उन्होंने निबंध साहित्य का सृजन काव्य के समानान्तर ही किया । यही कारण है कि उनका निबंध और काव्य समान रूप से निश्चित जीवन-दर्शन एव विचारधरामओ से अनु- प्राणित है। दिनकर के निवध काव्य के ही समाा मरस, रजक, मानवर्धक एवं सम्प्रेरणीय है। आपके निधो में निवधवार का गहन चिन्तन-मनन और कला- 1. दिनार-साहित्यमुखी, 'दोशन्द' 66 /दिनकर का निवध साहिय प्रम मवत्र दिखाई देता है। परिग्यात्मक विवेचन से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है वि दिनकर के निवध सक्लनो म कुछ निवधवी पमोटी पर खरे नहीं उतरते है। इसका मूल कारण वैयक्तिवा एष भावात्मक्ता का अभाव है। य शुद्ध साहियिक आलोचना व निबध है। दिनार के निग्ध विश्वनामक शैली प्रधान है । इनम विपय का प्रमबद्ध विवचन सचेप्ट होकर जीवन्त भाषा म किया गया है । दिनकर जी को नियत्र सरचना में विपयगत वैविध्य नियमार के अगाध नान एव समुनत भाववोत्र का परिचायक है। दिनकर क निबधो का वर्गीकरण दिनकर का विपुल निग्ध साहित्य विषय यविध्य की दृष्टि स याव्य सरचना समाना तर ही है । उनका निवध साहित्य मुख्यत विचारात्मक है । वह तर्माधारित एव विवक सवलित है। दिनकर एस निवधकार है जिहान जिन विपयो को निबध का आधार बनाया इनका विपय एव शंनी दोनो दृष्टिया स सम्यक निर्वाह किया । दिनकर जी ने अपनी अपूव रचना सामथ्य से अनकानेक नवीन विपया की ओर निव धा के माध्यम स साहित्य ममा एव पाठको का ध्यान आकृष्ट करने का सफल प्रयाम किया है। आपके सभी निवध गहन चिंतन, मनन, प्रखर बौद्धिकता पाण्डित्य, सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति, सहृदयता और आस्था वान जीवन दष्टि के परिचायक है । विषय की अतलस्पर्शी गहराई तक पहुचना दिनकर जी की प्रकृति है। निवधकार दिनकर के सम्यक मूल्याकन हतु उनके निधो का वर्गीकृत स्वरुप विवचन आवश्यक है । दिनवर के समस्त निव धो वा वर्गीकरण दो आधारा पर किया गया है। प्रथमत विषयानुसार और द्वितीयत शैलीगत वैशिष्टय के आधार पर। (क) दिनकर के निवन्धो का विषयानुसार वर्गोवरण निय धाक विषयानुसार वर्गीकरण को विद्वाना और समीक्ष न अत्यत दुष्कर', असम्भव' थमसाध्य एव भवथा निरय कहा है। शिव धकार विविधो मुखी चि का स्वामी होता है अतएव उमकी सरचना म विषय बविध्य स्वाभाविक है । दिनकर जी रुचि-वैविध्य र रचनाकार ह । अस्तु उनक निबधी 1 डा. माधुरी दुवे-हिदी गद्य का वैभव पृ० 100 2 डा० प्रभार माचव-हिदी बिध, पृ. 16 3 डा० भोलानाथ-हिदी गाहिय पृ० 293 डा० नश्मीनारायण सुधाशु (स०)-हिदा साहिय का वृहत इतिहास (भाग 13) + दिनकर का निबन्ध साहित्य : परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण /67 .. का विषयानुसार वर्गीकरण निम्नावित शीर्षको मे हो सकता है-- | साहित्यिक निरन्ध 2 सास्कृतिक निबन्ध 3 राजनीतिक एव राष्ट्रीय चेतनापरक निबन्ध 4 सामाजिक निबन्ध 5 अन्य निबन्ध साहित्यिक निबन्ध इस कोटि मे उन निवन्धो की गणना होती है जो सृजनात्मा (मौलिक) होते है तथा समीक्षा के प्रतिमानो से अनुशासित होते है । प्रयेक रचनाकार साहित्य के प्रति वयक्तिक धारणा रखता है, उसकी निजी मान्यताए होती है। दिनकर जो मूलत सर्जक है, प्रकृति से पवि। अपनी साहित्य की यात्रा पर उन्होंने मौलिव चिंतन-प्रसूत निबन्धो की रचना की है। दिनकर विरचित निबन्ध अधिकाश साहित्यिक विषया पर ही लिखित है। साहित्यिक निबन्धो मे दिनकर के समीक्षक रचनाकार के अन्तस् की वेदना भी व्यजित हुई है । वे साहित्य को इस रूप मे लेत है-1 "साहित्य जीवन के अगो से रस ग्रहण करता है।" "साहित्य स्वय जागरूक एव चैतन्य है।" "साहित्य समाज एव धर्म को सही रास्ता दिखाता है।" दिनबर साहित्य को युग का प्रतिबिम्ब मानते है । साथ ही ये स्वीकारत है कि रचनाकार वर्ण्य वस्तु के साथ आत्मीयता अनुभव करता है तथा प्रतिक्रिया भी व्यक्त करता है 'प्रगतिवाद-समकालीनता की व्याख्या' निबन्ध मे वे लिखते है- "साहित्य का उद्देश्य प्रगतिशीलता है । साहित्य मे काव्य की प्रेरक शक्तिया फूलो, पहाडो, क्लाल करते झरनो आदिम नही अपितु उस सामायिक ययायं म हैं जो अपने सघर्षशील जीवन मे आग बढना चाहता है।' कला का सर्वोपरि धर्म सौन्दर्य है किन्तु सर्वोत्तम क्लावति हम उस कहते हैं जो सुन्दर होन के साथ- साय सत्य भी हो और शिव भी।" "कविता व्यक्ति और युग दोनो की चेतना का प्रस्वेद होती है।" 'साहित्य जीतना ही शुद्ध, जितना हो तटस्थ, जितना ही 1 दिनकर-गिट्टी की ओर, 'साहि य और राजनीति' निबन्ध 2 दही, १० 126 3 दिनार-काव्य की भूमिका, पृ० 134 4 वही, पृ. 69 68 / दिनार या निबन्ध साहिये अप्रत्यक्षा होता है, उतना ही उसकी शक्ति और उग्ज्वलता में वृद्धि होती है।' साहित्य विषयक उक्त अवधारणाओं द्वारा दिनकर सोच को अभिव्यक्ति मिली है। साथ ही दिनकर के गमीसा पा स्वरूप भी प्रकट करती है। साहित्यिक निबन्ध उनपी इस रचना दष्टि या ही प्रतिनिधित्व करते हैं। दिनपर वे माहित्यिय निवन्धी में दो प्रकार के निवन्धो की परिगणना की जा गपती है । एक तो वे जिनकी वृत्ति सृजना मक है । जैसे-मन्दिर और राज- भवन, दीपर पी लो अपनी ओर, हड्डी का चिराग वर्म और वाणी आदि। द्वितीय वे जो मिदातपरव साहित्यिक निबन्ध हैं । मेला में सोद्देश्यता का प्रश्न, पाव्य समीक्षा का दिशा निर्देश, साहित्य और राजनीति, प्रयोगवाद, साहित्य में आधुनिकता वोध आदि । इस परिधि में दिनकर के समस्त साहित्यिक निवन्ध इस प्रकार हैं- इतिहास के दृष्टिकोण से, दृश्य और अद.श्य वा सेतु, हिन्दी कविता पर अशक्तता का दोप, वर्तमान कविता की प्रेरक शक्तिया, समकालीन सत्य से कविता या वियोग, हिन्दी कविता और छद, बलिशाला हो मधुशाला, कवि श्री सियारामशरण गुप्त (मिट्टी की ओर) इन निवन्धो में दिनकर ने छायावादी कविता का मूल्याक्न किया है। साथ ही नई दिशा की ओर भी सकेत किया है जिस ओर कविता छायावादी बेंचुल छोडवर उन्मुख हो रही थी। मन्दिर और राजभवन, महाकाव्य की थैला, कविता का भविष्य, नयी कविता के उत्थान की रेखाए, रजत और आलोक की कविता, गुप्त जी कवि नै स्प मे, कविवर मधुर, जार्ज रसल का साहित्यिक चिन्तन एव कला के अर्धनारीश्वर (अर्धनारीश्वर) ये सिद्धातमूलक साहित्यिक निवन्ध है जिनमे साहित्य के विभिन्न पक्षो को गभीर चितन के परिप्रेक्ष्य में विवेचित किया गया है। हिम्मत और जिंदगी, चालीस की उन, ईष्र्या तू न गई मेरे मन से, हृदय की राह, खड्ग और वीणा एव विजय वे आसू(रेतो व फूल)। इस संग्रह के निबन्ध अधिकाशत सृजनात्मक है, जिनमे भाव एव अनुभूति को प्रस्तुति मिली है । रीतिकाल का नया मूल्याकन, छायावाद की भूमिका, छायावादोत्तर काल, प्रयोगवाद, कोमलता से कठोरता की ओर, भविष्य की कविता, प्रेरणा का स्वरूप, सत्य शिव सुन्दरम्, कविता ज्ञान है या मानन्द एव कविता की परख (काव्य की भूमिका) ये निबन्ध ममीक्षात्मक निवन्ध हैं । इनमे कवि सृजक दिनवर की विचार-दृष्टि एव आलोचनात्मक सोच मुखर हुआ है। पुनरत्थान के कवि मैथिलीशरण गुप्त, कामायनी दोष रहित, दूषण सहित एव विचारद रवि पत (पत, प्रसाद और मैथिलीशरण) यह 'दाव्य की भूमिका संग्रह वा ही एक अश के रूप में पृथर से प्रकाशन है । इसमे प्रवृति की 1. दिनकर-शुद्ध कविता की खोज, पृ० 181 दिनकर का निबध साहित्य परिचयात्मक विवेचन एवं वर्गीकरण | 69 दृष्टि से भी 'काव्य की भूमिका' के समान मिक्षातमूलक साहित्यिक मान्यताओ के निबन्ध सगृहीत है । मैथिल कोकिल विद्यापति, विद्यापति और अजवुलि, महादेवी जी की वेदना एव निर्गुण पथ की सामाजिक पृष्ठभूमि (वेणुवन), पुण्य श्लोक जायसवाल जी, श्री राहुल साकृत्यायन, प. वालकृष्ण नवीन, प० सुमित्रा. नन्दन पत, मामा वररकर, खमणि देवी और उनका कला चिय, पोलेण्ड के राष्ट्रकवि, साहित्य का धर्म, आटी वला, महाकाव्य म सत्य और पल्पना एव देश भापा क्यो (वट-पीपल)। ये निवध सस्मरणात्मक निबन्ध हैं । इनमे दिनकर का समीक्षक स्वरूप मुखर हुआ है । मनीपी और समाज, कला में व्यक्तित्व और चरित्र, कला या सन्यास (शुद्ध कविता की खोज), शीप मुक्त चिंतन, आधुनि- कता और भारत धर्म, शेक्सपीयर, कविता परिवेश और मूल्य, निराला जी को यद्धाजलि, मराठी ये कवि केशव सुत, आधुनिकता का वरण, लेखको का शिविर, महात्मा टालस्टाय, हिन्दी माहित्य में निगम धारा (साहित्यमुखी)। उपर्युक्त निवन्ध दिनकर के निबन्धा की साहित्य विषयक मोच, रचाव एव रुचि के द्योतक हैं । दिनकर ने इन निवन्धो मे तटस्थ होकर माहित्य के स्वरूप, प्रेरणा शक्ति, इतिहास एव भविष्य कोही रूपायित नही किया अपितु साहित्य से जुड़ी समस्याओ के प्रति मौलिक चिंतन-प्रसूत स्थापनाए भी की हैं। उनकी ये स्थापनाए एव मान्यताए प्रगतिशील चतना की परिचायक है। दिनपर के साहित्य विपपर निबन्ध उनवे गम्भीर, सूक्ष्म, व्यापर एव सुदीर्घ चिंतन-मनन से अनुस्यूत है। इनके बल पर वे हिन्दी साहित्य को नई दिशा देने में सक्षम हुए हैं। सास्कृतिक निबन्ध सस्कृति पिसी भी देश, जाति या समाज वा प्राणतत्त्व होती है । “सस्कृति एर प्रक्रिया है, जिसके द्वारा व्यक्ति, जाति, समाज, राष्ट्र और विश्व जीवा के अन्तर वाह्य उत्थान का म रियमाण रहता है । सस्कृति का सीधा सम्बन्ध मानवीय चेतना से है, जो युग जीवन के प्रभावो को आत्मसात करती हुई अभ्यु- स्पान मूलक किंवा ऊर्वोन्मुग होता है ।" माहिग्य मानवीय चेतना से जुड़ा है तथा समाज का प्रतिविम्व होने के वारण सस्कृति उसका जीवन-तत्त्व है। साहित्य को परिकल्पना सस्कृति के बिना असभव होती है क्योकि सस्कृति में समाज, धर्म, राजनीति, दर्शन, न्याय, नीति, आदर्श रामी पुछ समाहित होता है। वस्तुत साहिय सस्कृतिमूलक ही होता है। 1 डॉ० देवीप्रमाद गुप्त-साहित्यिव निबन्ध ('महत् पाव्या की सास्कृतिक भूमिका' सीपंव निबन्ध), पृ० 36 70 / दिनकर का निवध साहित्य दिनवर के सम्पूर्ण साहित्य मे सस्कृति को प्रमुख स्थान मिला है । भारतीय सस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा के कारण उन्हें भारतीय संस्कृति के आख्याता की सजा दी जाती है । दिनकर के निवन्धी मे सस्कृति के विविध पक्षो का निरूपण मानवतावादी जीवन दर्शन के परिपावं म हुआ है । दिनवर के निवन्धो में निरूपित सास्कृतिर चितन से प्रसूत उद भावनाए इस प्रकार है- (क) सस्कृति के प्रतीक महापुरपो का उल्लेख एव उनके दर्शन या अक्न । (प) प्राचीन परम्पराओ की रक्षा के साथ उनमे युगानुरूप परिवर्तन का समर्थन, संस्कृति के संदर्भ मे व्यावहारिप जीवन दर्शन अपनाने का सदेश। (ग) अन्य सस्कृतियो के गुणो को आत्मसात करने के प्रयासो का समर्थन । (घ) उच्च सास्कृतिक जीवन मूल्यो का समाहार के प्रति आग्रह । दिनकर के निबन्धा म सस्कृति के प्रति सवत्र व्यापक एवं मानवीय दृष्टि- कोण वा परिचय मिलता है । अन्य सस्कृतियो के श्रेष्ठ गुणा को अगीकृत करने को दिनकर 'सस्कृति' का कल्याण एवं प्राण कहते है- 'सस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान प्रदान से बढती है। जो जाति केवल देना ही जानती है, लेना कुछ नहीं जानती है उम सस्कृति का एक दिन दिवाना निकल जाता है । इसके विपरीत जिम जाशय वे पानी लाने वाले दरवाजे वरावर युन रहत है, उसकी सस्कृति कभी नहीं सुनती। उसमे सदा ही स्वच्छ जल लहराता है, और कमल के फूल विगते है । कूपमण्टक्ता और दुनिया से रूठकर अलग बैठने का भाव सस्कृति का को ले डूबता है। "आदान-प्रदान की प्रक्रिया समृति की जान है और इसी के सहारे वह अपने को जिंदा रखती है ।' 2 दिनकर जी जीवन के उदार और उदात्त गुणो म ही सस्कृति को निहित मानते है । सस्कृति के प्रति मानवतावादी दृष्टिकोण दिनकर के निबन्धो की विशेषता है। वे कहते है-"सस्कृति मनुष्य की आत्मा की चीज है । यह उसे भीतर से कोमल, दयालु और विनम्र बनाती है ।"3 इसी क्रम मे आगे लिखते हैं - सस्कृति सुख नही सदाचार है। सस्कृति तावत नहीं विनम्रता है । सस्कृति सचय नहीं त्याग है । सस्कृति विजय नहीं मंत्री है । और सबसे बढकर सस्कृति की चरम साधना अहिमा में प्रकट होती है।' दुराग्रह नहीं सहनशीलता को कहते हैं । सस्कृति युद्ध को नहीं समझौत का नाम 4 'सस्कृति 1 दिनकर-रेती के फूल, पृ० 126-127 2 वही, पृ. 128 3 वटपीपल, पृ० 64 4 वही, पृ० 67 दिनकर का निवध साहित्य परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण / 71 है।" दिनकर के निवन्धो मे सास्कृतिक पक्ष बडा उदात्त एव प्रेरणादायक है। उन्होंने युग बोध को ही सास्कृतिक धरातल पर प्रस्तुत पिया है। दिनपर ने संस्कृति के मूल मे उन महापुग्पो को लेकर नियध रचे जिनसे सस्पति परिभाषित होती है एव इमो स्वरूप वा निर्धारण होता है। उन साहित्यकारो और उनकी कृतियो को लेकर भी निवन्ध रचे, जिन्होने सस्कृति को समझा एव सस्कृति पो जानने-पहचानने की शक्ति दी। दिनपर ये सास्कृतिक निबन्धो मे भगवान बुद्ध, संस्कृति है क्या ? भारत एक है (रेती ये फून), शिक्षा के पाच लक्षण, हिन्दी साहित्य पर गाधीवाद का प्रभाव (माहित्यमुखी), मास्कृतिय सगम, वौद्धिय धर्म की व्यापकता, सस्कृति और सभ्यता (वेणुवन), चार सास्कृतिय शान्तिया, नया भारत कसा, कबीर के सपने (वट-पीपल) उल्लेखनीय है। दिनकर ने सास्कृतिक नियधो में सस्कृति के पारिभापिर स्वरुप से लेकर उसके लाक्षणिक एक व्यवहृत स्वरूप ता को निरूपित किया गया है। इस विवे- चन प्रम मे उनके सोच का वेन्द्रबिन्दु भारतीय सस्कृति रही है । भारतीय संस्कृति की विशेषताओ को उजागर करना एव अन्य सस्कृतियो से उसकी तुलना करना भी दिनकर का लक्ष्य रहा है। इस विवेचना मे उत्कट राष्ट्रप्रेम दिनरर की चितन प्रक्रिया या सचालन गूग रहा है । अतएव भारतीय सस्कृति का गौरवगान उन्होंने सर्वर ही लिया है। रिपंत यह कहा जा साता है कि दिनार जी के नियधो मे सस्मृति के विविध पक्षो के चित्रण के साथ साथ उनके मानवतावादी दृष्टिकोण को अभिव्यक्ति मिली है । दिनार का सासनिक चिन्तन भारतीयता से अनुप्राणित है। राजनीतिय एव राष्ट्रीय चेतनापरक निबंध राजनीति वर्तमान मानव जीवन का अविच्छिन्न अग है । रचनाकार समाज का रावेदनशील प्राणी होने के कारण उस पर राजनीतिक परिस्थितियो एव विचारधाराओ का प्रभाव पडना स्वाभाविक ही है । दिनार इगये अपवाद नही हैं। उनके साहित्य में राजनीतिक नितन एव राष्ट्रीय चेतनापरक दृष्टि का निर्धारण भी युग के परिपार्श्व में हुआ है । उन्होने मानवीय कल्याण को लक्षित पर युगानुकूल राजनीतिक आदर्शों की प्रस्थापना की है । दिनकर युग धर्म के समर्थक सचेत रचनाकार हैं ।उनका आविर्भाव ऐसे मोड पर हुआ, जब सारा समार विश्व राजनीति मे एक नये दौर से गुजर रहा था। भारत भी इस राज- नीतिक उथल-पुथल मे सघर्षरत था-एर प्रगतिशील उन्नत समाज के निर्माणार्य 1. वट-पीपल, पृ० 86 72 / दिनकर का निवध साहित्य दिनरर वे साहित्य में विश्व राजनीति (पूजीवाद बनाम सर्वहारा वर्ग) एव भारतीय राजनीति की चेतना पूर्णपण उभरी है । दिनपर ने जिन रचनाकारो (मैथिलीशरण गुप्त, इक्याल, माघनलाल नतुर्वेदी, नजाल आदि) कोमाहित्यिक प्रेरणा के रूप में ग्रहण पिया, वे भी तत्यालीन राजनीतिक चेत मे प्रमावित हुए दिनकर जी माहित्य और राजनीति ये परस्पर सवधो की गहराई को स्वीकारते हैं । उन्ही के शब्दों में "यह तो प्रयुद्ध जीवन के आवेगमय अभियान का दृश्य है निमये जुए में साहित्य और राजनीति दोनो को अपनी गर्दनै लगानी पडती हैं ।" साहित्य और राजनीति के जीवन से यही सम्पक्ति दोनो सम्बन्धी की गहराई का कारण है । "राजनीति उस जीवन का एक अग है जो अपनी पूरी विविधता के साथ साहित्य की व्याख्या का विषय होता है। जिस प्रकार साहित्य जीवन के अन्य अगो से रसानुभूति प्राप्त करता है उसी प्रकार राजनीति से भी वह रम ग्रहण करता है।" युग सत्य के प्रभावी मे अपने को पूरी तरह विलग कर पाना सचेत और सवेदनशील रचनावार के लिए असम्भव है । दिनकर के ही शब्दो मे--"आदमी कलाकार उतनी ही देर है, जितनी देर वह कला की रचना मे लगा हुआ है । रचना से छूटकर विवेचना मे पडते ही वह कुछ-न-कुछ राजनीति करने लगता है अथवा यो कहे नि अनजाने ही राजनीति की पकड में चला जाता है ।"3 कलाकार और राजनीतिक दोनो का लक्ष्य सर्व कल्याण है। सत्य और शिव राजनीति भी उपकरण है तथा माहित्य के भी। साहित्य जीवन की सम्पूर्णता को तलाशता है तो राजनीति उसकी इकाई मात्र है । "साहित्य राजनीति का अनु चर नही बनता अपितु उससे गौरव प्राप्त करता है। राजनीति साहित्य की द्रोही नहीं, उसके पास ही वहने वाली एक भिन्न धारा है । जब वह साहित्य को धारा से आकर मिलती है, उसका अपना रूप विलीन हो जाता है। दिनकर साहित्य को राजनीति के प्रचार का हथियार नहीं मानते, क्योकि साहित्य के अपने मानदण्ड एव आदर्श है जिनकी परिधि व्यापक होती है। अत साहित्य राजनीति का प्रचार करे यह न तो सभव है और न उचित ही। यदि साहित्य को राजनीति का प्रसारक बनाया जाए तो-"उस उद्देश्य की सिद्धि दुर्लभ 1. दिनकर-मिट्टी की ओर, पृ. 106 2 वही पृ० 126 3 दिनकर-वर-पीपल, पृ० 121 4. मिट्टी की ओर, प० 55 5 वही, पृ. 142 6 दिनकर-मिट्टी की ओर, पृ० 54 दिनकर का निवध साहित्य परिचयामक विवेचन एव वर्गीकरण / 73 होगी, जिगये लिए माहित्य की आवश्यरता है। दिनकर माम्यवाद एव गाधी- वाद से प्रभूतत प्रभावित रहे हैं । ये समाज की प्रगति मे दोनो की सम्मिलित भूमिका को महत्त्व देते हैं । समीक्ष्य निवन्धो मे उनो दृष्टिकोण पर यह प्रभाव भली भाति देखा जा सकता है । दिनकर के राजनीतिक चिन्तन विषयव निवन्ध है-माहित्य और राजनीति, नेता नही नागरिख चाहिए, शाति की समस्या, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरोपसी, हिन्दी माहित्य पर गाधीवाद का प्रभाव एव प्रगतिवाद । इन निबन्धो मे साहित्य के बहाने गाधी एव माक्स के सिद्धान्तो का मूल्याकन भारत के सदर्भ मे किया गया है । राजनीतिक मूल्यो का सधान भी इन निवन्धो का लक्ष्य रहा है। आधुनिक युग में राष्ट्रीयता का उद्घोप करने वाले साहित्यकारो मे दिनकर का नाम सर्वोपरि है। उनके राजनीति विषयप विचार भी राष्ट्रीयता पर अवलबित हैं । दिनकर मे भारत के प्रति तीव्र एवं गहन अपनत्व एव ममत्व का भाव विद्य- मान है । उनका साहित्य राष्ट्रीयता का वह मत्रोच्चार करता है, जो जन हृदय मे एक्ता एव सर्व-कल्याण का भाव उद्बुद्ध कर सके । दिनकर वे राष्ट्रीय चेतना परव निवन्धो मे प्रमुख हैं--क्या रवीन्द्र अभारतीय हैं ? क्ला के अर्धनारीश्वर, राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता, हिन्दी कविता मे एकता का प्रवाह, भारत एक है, पुनरत्थान ये कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त, देश भाषा क्यो ? राष्ट्र भाषा और राष्ट्रीय एकता एव युद्ध और कविता । सामाजिक निबंध दिनकर जनोन्मुखी प्रगतिशील चेतना के रचनाकार हैं । वै 'कला जीवन के लिए' सिद्धान्त पे पक्षधर हैं । उाका निबन्ध साहित्य राष्ट्रीय चेतना के माथ- साथ सामाजिक चेतना से भी अनुस्यूत है। समसामरिक परिस्थितियो के परि- पार्श्व में सामाजिक जीवन के विविध प्रश्नो वा विवेकसम्मत प्रस्तुतीकरण एव समुचित समाधान उनके निबधो के विषय रहे हैं । दिनवर के निबध साहित्य मे सामाजिक चिन्तन के निम्नाक्ति आयाम परिलक्षित होत हैं- 1 सामाजिक शोषण का विरोध 2 जातिगत भेदभाव का निषेध 3 साम्प्रदायिकता के प्रति विद्रोह 4 वर्गहीन ममतावादी समाज की प्रतिष्ठा का आग्रह । दिनकर का आविर्भाव अगरेजी-शासन काल में हुआ।वह काल राजनीतिक उथल पुथल का था । दिनकर मे राष्ट्रप्रेम कूट कूटकर भरा था, आनो पूर्ण 1 दिनकर--अर्धनारीश्वर, पृ. 101 741 दिनकर का निवध साहिय पाणी में दिपा, गोषण, वंषम्य एवं भेदभाव का वे विरोध करते रहे। मपा- "हम प्रयाश चाहने हैं, परम्परा को तमिस्रा को छिन्न-भिन्न कर देने वाले विभा. विशागो मे गवरित ज्ञान का प्राश, रूढियो के जाल पर ज्वाला पात करने वाला उद्धारक प्रयाश, मनुष्य-मनुष्य के बीच जो नैसगिक सम्बन्ध है, उगे प्रत्यक्ष पर दिखलाने याना समत्व विधायक प्रकाश ।" दिनकर का यह आशेश उनके ममम्न साहित्य में विद्यमान है। आरोग के परिणामस्वरूप उनके भाव भी प्रातिशारी हो गए। उनके निधो ने विषय नारी विषपर हो या गमाज पेतना. परय, गवंत्र प्राति या उद्घोष सुनाई देना है। उनो नारी चेतना विषयक यई निबन्धो में लेयर की दृष्टि नारी ये प्रति उदास भाव से पूर्ण रही है। उन्होंने समाज की हर पुरीति की जड तर पहबार ा गोषणविहीन आदर्श समाज बी माल्पना प्रस्तुत की। मामाजिर विषमतामो में 'मून में ये मानप ये अहसार की प्रमुर मानते हैं--"गामाजिर विषमताओं में मूल में मानय मा अहवार नियाग करता है । जाति का अहसार, यशरा अहसार, धन और शक्ति का अहगर, मिद्धि और मफलतामा अवार। ये गभी अपार विभाजा रेगाए हैं, जो मनुष्य को मनुष्य मे अलग करती है ।" उनको श्रेष्ठ गमाग सरोधारमा इम प्रगर हैं-"श्रेष्ठ समाज यही है, जिसके सदस्य मान और मर्ग में गेप यो श्रेष्ठ और दूगर यो अधम नहीं माना। श्रेष्ठ गमान पर गोगदम्य जी पोतसर यम करते है, तब भी जारत में अधिर धन पर अधिकार जमान पी उनसरी इच्छा नहीं होती।" दिसरगे गागाजिर गिन्तन पस्वामीनिहामीपी और मगाज, ममाजवाटारमारिय गागी ग मार्ग की परिणति, सवालोदष्टि में नारी गाय निवन्धो में मुगर अन्य निवन्य हर वर्ग में शिरमय नियम वर्गादत है सामन्य गौ मे नाही मिगित ए । निरन्धो मेसिन (रविणा, रानीति और पितान), धर्म विपर (Tमा भोर मिान, गौर धर्म की किस HTTHI, सानिमार धर्म), मोरिन (सोनई मेन गे) विर नियनीयो। निरमाभीर किसान, मदिरामारा. भारतीय भार artmपिपाणी पाटिभी jिarafm I four-xmir.." : mer - ART."

दिनकर का निबंध साहित्य परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण /75 शैलीगत वर्गीकरण विचारात्मक निवन्ध जिन निबन्धों में युद्धि तत्व की प्रधानता एवं विचार का प्रतिपादन होता है, वे विचारात्मक निबन्ध' की सजा पाते हैं । इस प्रकार के निबन्धो के लिए गभीर अध्ययन, चिंतन-मनन एव स्वानुभूत सत्य की आवश्यकता होती है। रचनाकार इस प्रकार के निवन्धों में नवीन जीवन-दृष्टि एवं विचार-दर्शन को प्रस्तुति देता है। इसमे कुछ आधारभूत सिद्धान्तो के आधार पर विचारो को अभिव्यक्त पिया जाता है । तर्कभावना एव अनुभूति का अवलम्ब इन विचारो को ग्रहणीय बनाता है। विचारात्मक निबन्धो में निम्नाक्ति विशेषताए पायी जाती है- 1. बुद्धि तत्त्व की प्रमुखता 2. विचारो की सुगुम्फित एव सतुलित अभिव्यक्ति 3. ताकिनता एव वैज्ञानिकता का समावेश 4. भाषा मे प्रतीकात्मकता 5. समाग शैली का प्रयोग। दिनकर जी ने अधिकाशत. विचारात्मक निवन्ध लिखे हैं । उनके विचारो में निर्भाक्ता एव म्वछन्दता है। भाषा और विचारो की कमावट, सक्षिप्तता तथा प्रतिभा का सुष्छु शमन्वय दिनकर के विचारात्मक निबन्धो में मर्वग लक्षित होता है । उनमा महिमा मण्डित प्रबन्धपार व्यथितत्व निव-धो मे सप्टत परिलक्षित होता है। भापा का सहग, सरम, स्वाभाविक प्रयोग निबन्धो को सम्प्रेपणीयता से युक्त करता है। एक समीक्षक के शब्दो मे-"विचारो के सहज समन्वय द्वारा उनके निबन्ध पाठक की बुद्धि को प्रेरित और हृदय यो रमसिक्त करते है । उनके निबन्धो मे स्वच्छता, सरलता और आडम्बरहीनता का समर्थन मिलता है। ये गुण निवन्ध को पूर्ण और आकर्षक बनाते है ।" दिनकर के विचारात्मक निबन्धो मे तर्क-शक्ति का सम्बल है, फलत वे पाठक को उबुद्ध करके विचार मथन हेतु विवश करते हैं । उदाहरणार्थ कतिपय निवरधाश द्रष्टव्य है- (क) "जिस दिन वैयक्तिक्ता ममाप्त हो जाएगी, उमी दिन साहित्य मे नवीनता भी समाप्त हो जाएगी।" (ख) "सत्य शिव और सुन्दर में से प्रत्येक तत्त्व अपने भीतर बाकी दो तत्त्वो का निचोड लिए हुए है । मगर यह अनुभूति तभी आती है जब मनुष्य 1. डॉ० मुशीला मिश्रा-दिनकर की साहित्य दृष्टि, पृ० 334 2. दिनकर--मिट्टी की ओर, पृ० 14 76/ दिनकर का निवध माहित्य का जीयन का हो जाय, जब वाहगे भेदो को चीरकर वह उस जगह पहुच जाये जहा जीवन और कल्पना, शब्द और विश्वास तथा विश्वास और कर्म में कोई भेद नहीं रह जाता।" (ग) "जो लोग वर्तमान के द्रोही और भविष्य के अध भक्त हैं, उनकी स्थिति यह होगी कि वर्तमान का जीवित अश भविष्य में उनका विरोधी रहेगा।" (घ) “आदान-प्रदान-प्रक्रिया सस्कृति की जान है और इमी के सहारे वह अपो को जिन्दा रखती है।"3 दिनकर जी ने तसगत एव धारदार तथ्य निवन्धो मे प्रस्तुत किये हैं । यथा- "नवीन युग की मभी प्रातिया पहले मनीपियो के दिमाग मे सुलगी थी, पीछे उनकी लपेट में जनता भी आ गई। स्थापित समाज के विरुद्ध पदि मनी- पियो के मन में असन्तोप नहीं है तो वह समाज नहीं टूटेगा। लेकिन यदि मतीपी उसके विरुद्ध है तो उस समाज को आज नहीं तो कल बदलना पड़ेगा। मनीपी यह सरल, निश्छल मन्त्र है, जिसके भीतर जनता की छाती धडमत्ती है, सभ्यता और संस्कृति के हृदय के स्पन्दन सुनाई देते है और जन जन के मन की पीडाए बोलती हैं।" दिनकर जी के कुछ विचारात्मक निवन्धो मै उनका प्रगतिशील चिंतन भी मुखर हुआ है । यथा- "कर्म के अभाव मे चिंतन दुखदायी हो जाता है । जो अप्रतिवद्ध हैं, वह अपनी स्वमन्त्रता को इस उद्देश्य मे बचाए फिरता है कि श्रम के पास जान मे रही स्वतन्त्रता मलिन न हो जाए किन्तु मनुष्य की महिमा प्रतिबद्ध होने में देखी जाती है, दायित्व और खतरो का सामना करने में परखी सकती है।" 'समाजवाद के अन्दर साहित्य साक्षात्कार की मुद्रा में लिखा गया निबंध है, जिसमे वे समाज, सस्कृति और साहित्य के अस्तित्व, भूमिका और भविष्य के लिए चितित दिखाई देते है । 'गाधो से मार्म की परिष्कृति" मे व्यक्ति और 1 दिनकर--रेती वे फूल, पृ० 60 2 वही, पृ. 76 3 वही, पृ० 128 4 दिनकर-शुस कविता की खोज, पृ० 169 5 वही, पृ. 209 6 दिनकर- अर्धनारीश्वर, पृ० 76 7 वही, पृ० 105 दिनकर का निवध साहित्य : परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण | 77 समाज के आदर्श को खोज की गई है। प्रश्नात्मक मुद्रा मे नियध का अत दिनकर को निबध शैली को उल्लेखनीय विशेषता है। इसके कारण निवन्ध पठन के पश्चात् भी पाठक की भूमिका समाप्त नहीं होती है अपितु वह समानान्तर रूप गे चितन में लीन हो जाता है। उक्त दोनो नियधो मे इस शैली को देखा जा सकता है । दिनकर की भापा यहा एकदम सहज है । वे अपनी रचना सामथ्यं से दुस्ह विषयो को भी सरल ढग से प्रस्तुति दे पाते है । 'रवीन्द्र जयन्ती के दिन' निवध का उद्धरण द्रप्टव्य है--- "सभ्यता के ममस्त रोगो का निदान यह है कि मनुष्य ने हृदय की उपेक्षा करके मस्तिष्क की आवश्यकता से अधिक आराधना की है। जब तक हृदय का आसन मस्तिष्क की ऊचाई तक नही पहुचेगा, तब तक ससार यो ही दग्ध होता रहेगा।" 'साहित्य में आधुनिकता' निवध में आधुनिकता के सदर्भो में विचार के स्तर पर उजागर किया गया है--जिसे हम आधुनिकता कहत है, यह एक प्रक्रिया का नाम है। यह प्रक्रिया अन्धविश्वाग से निकलने की प्रक्रिया है। आधुनिकता कोई मूल्य नहीं, बल्कि अत्याधुनिक कवि और लेखक जो कुछ लिखते हैं, उससे अनुमान लगाया जा सकता है कि वह मूल्यो के विघटन का पर्याय दिनकर जी विचारो की अभिव्यक्ति मे निर्भीक्ता के पक्षधर दृष्टिगोचर होते हैं । वे इस बात को कतई परवाह नहीं करते कि उनके दृष्टिकोण से कोई सहमत होगा या नही, किन्तु उनके तर्क गम्भीर चितन प्रसूत है। उनकी सरल विश्लेषणात्मक शैली प्रभावित किए बिना नहीं रहती। उनके निवधो मे बौद्धिकता का समावेश बोझिलता का कारण बन नही पाता है । विपय विविधता, स्वतत्र- चिंतन, मौलिक स्थापनाए दिनकर के निबन्धो की शक्ति हैं। उनके उल्लेखनीय विचारात्मक निबंध इस प्रकार है-कला धर्म और विज्ञान, सस्कृति है क्या, भविष्य के लिए लिखने की बात, मदिर और राजभवन, कला, राजनीति और विज्ञान, कला का सन्यास, प्रेरणा का स्वरूप, सत्य शिव सुन्दरम्, आधुनिकता का वरण, युद्ध और कविता, सस्कृति सगन, शाति की समस्या, सस्कृति और सभ्यता, नया भारत कैसा हो, विज्ञान की सीमाए , देश भापा क्यो, साहित्य का धर्म, कला की सोद्देश्यता का प्रश्न, साहित्य और राजनीति आदि । भावात्मक निबन्ध भावारमक निबन्धो का सम्बन्ध भाव प्रधान विवेचना से होता है । इनमे 1. अर्धनारीश्वर, पृ. 149 2. साहित्यमुखी, पृ. 173 781 दिाकर का निवध साहित्य भावो की प्रधानता तथा बुद्धिम स्थान पर रागात्मक तत्त्व की प्रमुखता होती है । 'भावात्मर निवध का लेप अपनी भावुरतापूर्ण मर्मस्पर्शी राजीव भाषा- शैली और भावानुकूल उगक उतार-चढार की सहायता से पाठप को पर्याप्त प्रभावित करता है। लघन की अनुभूति-तन्मयता उसपे रागात्मक कथन को प्रभावशाली बताती है और उसकी सत्यता पर बल देती है।" वस्तुत हृदय की स्वछन्द उडान, कल्पना का विस्तृत अवाश और भाव- नाओ की तीव्रता इन निबन्धो के प्रमुख लक्षण है । भावात्मक निवन्धो को विशप- ताए इम प्राार है- 1 अन्य तत्त्वो की अपेक्षा रागात्मयता प्रमुख रहती हैं । 2 हृदय की निश्छलता एव स्वछन्दता इनर प्रमुख लक्षण है। 3 अन्तराभूतियो एव तीन भावो का सच्चा चित्रण होता है । 4 प्रवाह, तरग एव प्रलाप पोलिया इन नियधो में उपयुक्त मानी गई हैं। 5 सरस, कोमल शब्दावली का प्रयोग इन निधो की भाषा की प्रवृत्ति स्वभाव, प्रकृति मनोविकार, सुख दुपात्मक स्थितिया की प्रतिक्रियात्मक व्य जना सम्बन्धी नियन्धा म उस्त गुण समाहित होत है । दिनकर ने भावात्मक निवन्ध परिमाण की दृष्टि से वम वितु महत्वपूर्ण निबन्ध सृजित पिए है । हिम्मत और जिन्दगी, चातीम की उम्र, हृदय की राह, ईया तू न गयो मेरे मन से, खड्ग और वीणा, विजय के आसू, तुम घर कब आओग कवि, दीपक की लो अपनी ओर, हड्डी और चिराग, कविता का भविष्य, नता नहीं नागरिक चाहिए, और चाहिए विरण जगत को और चाहिए चिंगारी स्वतन रूप से भावात्मक निबध व अतगत रये जा सकत है । इन निवाधो में विचारा- स्मय निबन्धो की अपेक्षा काना की प्रधानता है । इन निबन्धो में काव्यात्मकता का आनद आता है । व स्वीकारत है कि-"एक मनुष्य से दूसर मनुष्य तक जाने की जितनी पगडण्डिया है, उनमे बुद्धि की पगडण्डी सबमे कठिन और हृदय का रासा सबसे आसान है। आत्मीयता, लालित्य एव निजता दिनकर के भावा गव निधन्धा की उल्लेखनीय विशेषताए है । 'चातीग की उन' इसका अच्छा उदाहरण है । यथा-- कहत है-~जवानी शरीर में नहीं, शरीर के भीतर कही दिल मे रहती है । भीतर से फूटने वाला उमगो का फबारा जिनका ताजा और जवान है, वे उम्र के ! डॉ० गगाप्रमाद गुप्त-हिंदी साहित्य म निवन्ध और निबन्धकार, पृ० 15-16 2 रती के फल, ५026 जरत दिनकर का निवध साहित्य परिचयात्मक विवेनन एवं वर्गीकरण / 79 उतार ये मौसिम में भी जवान रहत है फिर भी जो लोग उग्र वी चोटी पर उमगों के साथ उतर रहे है वे भी अगर अपने आपसे तटस्य गोचे तो उन्हे पता चलेगा कि यह जवानी रेवल मन की जवानी है।" "मैंने उन की तलगार में वट वितने ही लोगो को झीखते देया है। लेकिन यह भीखना किम काम या ? दोपहरी नो ऊपा बनाना कठिन है और पित्र करा से तो दोपहरी और भी तेजी मे ढलने लगेगी। ममय रखने का नहीं । है समय के साथ बदलने की।"" व्यग्य यो दिनकर ने भागत्मक निबन्धा म महत्त्व दिया है । यथा--"ईर्ष्या का यही अनोखा वरदान है। जिम मनुष्य के घर मे ईर्ष्या घर पर लेती है, वह उन चीजो मे आनन्द नहीं लेता जो उसके पास मौजूद हैं, बल्कि उन वस्तु । दुख उठाता है जो दूसरो के पास है ।"3 यहा चित्रात्मक भाषा का उद्धरण द्रप्टव्य है जो भाव और भाषा की दृष्टि से गरिमापूर्ण है-"आज हिमालय की गुहा में भीषण अधकार या साम्राज्य है । सूर्य, चन्द्र और कितने ही उपग्रह पराजय स्वीकार करके क्षितिज ये पार उतर गए । सना दीयती है तो उल्कापात की, जो अधवार को भी डरावना बना रहे हैं। ऐमा लगता है कि हमारा राष्ट्रीय जीवन ही शिथिल और विजडित हो गया है। मानसिक विचारो की लहरो पर नृत्य की मुद्रा मे भावो या प्रवाह दिनकर के निवधो मे देखते ही बनता है-'मनुष्य के भीतर कोई मनुष्य होता है जो अभावो मे भी सतुष्ट और समृद्धिया के बीच भूय से व्याकुल रहता है। उसका आहार रोटी और दाल नही, बलि फूल, नदी, पर्वत, भाव और विचारो का सौंदयं है।" निष्कर्षन कहा जा सकता है कि दिनकर वे भावात्मक निबन्धो का आधार आत्म सौदर्य को अभिव्यक्ति है । उनक निबन्धो मे कोरी भावुकता के स्थान पर विचारोन्मुख राग तत्त्व वे दर्शन होते है । विवरणात्मक निबन्ध विवरणात्मव निवध वे है जिनमे किसी ऐतिहामिक वृत्त, क्या अथवा घटना का विस्तृत विवरण हो। इसमे काल का महत्त्व रहता है। इसमे व्यक्तित्व की 1 रती के फूल, १०१ 2 वही, पृ० 10 3 वही, पृ. 16 4 अर्धनारीश्वर, पृ. 10 5. वही, पृ. 27 80 / दिनकर का निवध साहिय छाप एव आत्मीयता प्रमुरा होती है । कल्पना एव अनुभूति के सहारे रचनाकार क्रियाशील व्यक्तित्व का आकलन करता है तथा रागात्मकता का सस्पशं इस प्रकार के निधो की अनिवार्यना है। घटनाक्रम सुगुम्फित रहते है। इतिहास एव पिवरणात्मक निबन्ध मे मूलमूत अतर यह है कि इतिहास का सम्बन्ध वाह्य तत्त्व से है तथा निबन्ध का अन्तर मे । सर्जक इसमे तटस्थ रहकर आत्मीयता के साथ वर्णन प्रस्तुत करता है । यात्रा, सस्मरण, जीवनी, शिकार इत्यादि विषयक रच- नाए भी इसी कोटि मे आती है। शुक्लोतर निवध साहित्य मे विवरणात्मक निबन्ध पूर्वापेक्षया कम लिखे गये है। विचारात्मक निबधोका इस युग मे प्राधान्य रहा है । दिनकर युग स्रष्टा एव द्रप्टा रचनाकार है, उन्होने भावात्मक एव विचारात्मक निबध ही अधिक लिसे है, तयापि जिन निबधो मे युगीन व्यक्तित्वो के सास्कृतिक आक्लन में घटनाक्रम, उनका प्रतिफल, व्याख्या, उदाहरण मिलते है, विवरणात्मक बन गये हैं । कर्म और वीणा, भगवान बुद्ध, रजत आलोक की कविता, कविवर मधुर, स्वतत्रता के बाद, पाकिस्तान के पीछे साहित्य की प्रेरणा, बलिशाला हो मधुशाला, निराला जी को श्रद्धाजलि, महात्मा टालस्टाय, मैथिल कोक्लि विद्यापति, लेखक की दृष्टि मे नारी, आटी वला, मामा वरेरकर, प० सुमित्रानन्दन पत, एक कविता की जन्मकया,भारत एक है निबन्यो में विवरणात्मकता उपलब्ध होती है । दिनकर की काव्यात्मक, अनुभूतिपरक स्थलो के अनेक दृश्य विवरणात्मक निवन्धो की क्लात्मक विशेषता है । भाषा मे प्रसाद गुण एव आवेश शैली का प्रयोग उनके निबन्धो को सजीव स्वरूप प्रदान करता है। कुछ उद्धरण द्रष्टव्य (क) “1919 ई० मे गाधी जी और रवि वाबू के बीच जो चख-चख चली वह प्रकारान्तर से, कर्म और वागी के इमी मनातन सघर्ष का परिणाम । इस बार वाणी जुटी जरा डटवर, मगर सिद्ध यह हुआ कि वाणी के मुकाबले में हथौडा ही नही, चरखे वा तपुआ भी काफी वलवान है । आश्चर्य है कि जागरण की ज्योति तो कम और पाणी दोनो ही भूमियो मे एर साथ चममी, मगर कर्म आगे बढ़ता गया और वाणी धीरे-धीरे स्वप्न नीड़ में फिर से समाविष्ट हो गई।" (प) "वालमुन्द गुप्त भारतेन्दु के सच्चे वारिमों में से थे। उनो पद्यो मे सौदपं चित्रण कम, ममय के चित्रण का प्रयास अधिक है। उनका वाव्य बाल कांग्रेम के जन्म के तीन-चार मार वाद में प्रारम्भ होता है । मन. एप ग देगते हैं वे भारतेन्दु की तरह मावधान रहार मयत नही 1. रेती रे फूस, पृ० 31 दिनकर का निवन्ध साहित्य . परिचयात्मक विवेचन एव वर्गीकरण / 81 करते बल्कि उन्हे जो कुछ कहना है, उसे बडी निर्भीकता मे वह जाते (ग) "रवीन्द्रनाथ हमारे राष्ट्रीय कवि है क्योधि उन्होंने भारतवर्ष की आत्मा के गौरव वी जैसी व्याख्या की वैसी पहले और पिसी ने भी नहीं की थी। उनका महत्त्व इसलिए भी बढ जाता है कि वे ऐसे समय उत्पन्न हुए जबकि भारतवर्ष को एक ऐसे व्याख्याता यी आवश्यकता जान पड़ी थी, जिसकी वाणी के सदेश को स्वदेश ही नहीं, विदेश भी समझे।" दिनकर के विवरणात्मक निवधो में जहां व्याख्यात्मक्ता, तुलना, घटना- स्माता, चित्रात्मकता मिलती है, वही कल्पना एव भाव-चिवार समन्वय भी। दिनकर जी के विवरणात्मक निवधो मे तथ्यपरक विश्वसनीयता आद्यत विद्यमान समीक्षात्मक निबन्ध जिन निबन्यो मे साहित्यालोचन की प्रधानता हो, वे समीक्षा-मव निवन्ध कहलाते हैं । समीक्षात्मक निबन्धो मे आत्मीयता एव वैयक्तिकता का अभाव होता है । समीक्षात्मक निबन्धो मे रचनातार की आलोचना दृष्टि मे विषय के साथ तादात्म्य की इच्छा विद्यमान रहती है । सर्जक के मताग्रह एव दृष्टि की प्रधानता रहती है । दिनकर के समीक्षात्मक निवन्ध परिमाण की दृष्टि से विपुल मात्रा मे है। इनमे दिनार की प्रगतिशील रचना दृष्टि एव युगीन अनुचिंतन उजागर हुआ है । 'काव्य की भूमिया' एवं 'पत, प्रसाद और मैथिलीशरण' उनके समीक्षात्मक निवघो को ही पुस्तके है । इसके अतिरिक्त कविता मे दुस्हता, जाज रसल का साहित्य चितन, महापि अरविन्द को साहित्य साधना, मराठी कवि वेशव सुत और समकालीन हिंदी कविता, हिंदी साहित्य पर गाधीवाद का प्रभाव, साहित्य में आधुनिकता, विद्यापति और मजवुति, महादेवी को वेदना, कबीर के स्वप्न आदि निरन्ध समीक्षात्मक प्रवृत्ति के हैं। इन निबधो मे दिनकर को चिंतनपरक समीक्षा दृष्टि उभरी है । इसके अतिरिक्त समीक्ष्य निवधो मे दो प्रवृत्तिया आधारभूत स्प मे मुखर है-एक सौदर्यवादी दृष्टि और दूसरी राष्ट्रीयतापरक विचारणा । भावनाओं और विचारो पा समन्वय उनके पाठक की बुद्धि एव भावना को झकृत करते हैं । इन निधो मे पाण्डित्य प्रदर्शित न करक साहित्य के विविध पक्षो, रचनाओ और रचनाकारो का मूल्याकन कर उन्हे सहज ग्राह्य 1. अर्घनारीश्वर, पृ०112 2. वही, पृ० 160 82 / दिनकर का निवध साहित्य रूप में प्रस्तुत किया गया है । आत्मीयता एव वैयक्तिकता इन समीक्षाओ को निवध की आस्था प्रदान करती है। निष्कर्ष उपर्युक्त विवेचन थे पश्चात् महज ही कहा जा सकता है कि दिनकर का विपुल परिमाण युक्त निवध साहित्य सशक्त एव विरल है । विषय की विविधता, भाव और विचार का समन्वय एव मौलिकता, भाषा की प्रौढता एव सरसता, शैली की अभिनवता उनकी निवध साहित्य में भी पहचान बनाने में सहायक हुई है । मूलत दिनकर जी की वृत्ति विचारात्मक एव समीक्षात्मय निधो मे रमी है किंतु भागात्मक एव विवरणात्मक निबर सरचना में भी उनकी रचना मामर्थ्यवान रूप में उजागर हुई है। इस दृष्टि से उन्हें समर्थ निवधवार कहा जाये तो अनुचित न होगा।

4 दिनकर के निबंध साहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य "style is man Itself.'' के अनुसार शैली व्यक्तित्व की पहचान का मुगर उपादान है । निबध के सदर्भ मे यह उक्ति और भी महत्त्वपूर्ण है, शैली वैशिष्ट्य ही निबन्धकार का,परिचय स्वयमेव करा देता है।शैली वस्तुतः रचनाकार पी निजता को पहचान होने के साथ-साथ रचना की शक्ति भी होती है। हिन्दी मा 'शैली' शब्द अगरेजी के 'स्टाइल'(style जो लैटिन शब्द Stupus लोह लेखनी मे व्युत्पन्न है) के लिए प्रयुक्त होता है । समकालीन साहित्यशास्त्र मे शैली सदभिन विचारणा 'स्टाइल' के परिप्रेक्ष्य में ही विकसित हुई है । अगरेजी में 'स्टाइल' शब्द बहुआयामी अर्थों को व्यक्त करता है । यथा- 1. धातु निर्मित वह नुकीला उपकरण जो धातु या तावे के पत्रो पर चित्र वनाने के काम में आता है। 2. अभिनय, नाव खेने, गाने, चलने-फिरने, घुडसवारी आदि जीवन-त्रिया को विशिष्ट पद्धति । 3. सजना-धजना एव विशिष्ट अदाज । 4. किमी को सम्बोधित करने की विधि या विशिष्टता सूचक उपाधि । 5. मुन्दर पाकार और मस्ती भरा व्यवहार । 6. लिखने या बोलने में भावाभिव्यक्ति की पद्धति । 7. भावाभिव्यक्ति की सुन्दर पद्धति । 1. • उद्घत-द न्यू डिक्शनरी आफ थाट, बुफो का क्यन 2. ग. राघव प्रकाश-शैली विज्ञान और पाश्चात्य एव भारतीय साहित्य मास्त्र, पृ० 13-14 84 / दिनकर का निबध साहित्य , 'पद्धति', अदाज', 'विशिष्ट भगिमा वा अर्थ बोध उपर्युक्त जीवन निराओ में समान रूप से विद्यमान है । साहित्य शास्त्र में 'स्टाइल' लिपने-बोलने में भावाभिव्यक्ति की विशिष्ट पद्धति के रूप में प्रयुक्त हुआ है । भारतीय साहित्य शास्त्र मे अभिव्यजना हेतु रीति, वृत्ति, मार्ग, संघटना आदि अनेक शब्द प्रचलित रहे है । आचर्य वामन ने विशिष्ट पद रचना' को रीति कहा है, तो भरतमुनि 'प्रवृत्ति' शब्द का प्रयोग करते हैनाना देश वेश भावाचार वार्ता, रूपापयनीति प्रवृत्ति । वाणभट्ट 'भापा रूप' यो रीति रहते है तो दण्डी ने मार्ग' शब्द का प्रयोग किया है। आनन्दवर्धन ने सगठन राजशेखर ने बचन विन्यास प्रम', मम्मट न 'नियत वर्ण व्यापार आदि शब्दी का प्रयोग किया है । वस्तुत सस्कृत साहित्य शास्त्र में पद रचना की रीति ही शैली का द्योतक है। 'शैली' शब्द 'शील' से बना है । 'शैली' शब्द का प्रयोग भारतीय वाडमय में प्राचीन काल से होता रहा है। महर्षि पात जलि ने महाभाष्य मे शैली' शब्द का प्रयोग दूसरी सदी ईसवी पूर्व मे क्यिा है- "एपा हि आचार्यस्य शैली लक्ष्यति ।" 11 वी सदी मे प्रदीपकार बच्चयद कहते हैं-'शी स्वभावे भव्या वृति शली। 13वी सदी मे 'मुग्धवोध व्याकरण के टोकावार दुर्गादास लिखते हैं-- आचार्याणाम् इय पाली यत् सामान्येनाभिधाय विशेषेण विवृणोति । कथन 'शैली' शब्द के प्रयोग की प्राचीनता को प्रमाणित करते हैं किन्तु-"अभिव्यक्ति की पद्धति के अर्थ मे 'शैली' का प्रयोग आधुनिक है जो अगरेजी के स्टाइल का पर्याय है।" शैली : पारिभाषिक परिवृत्त 'शेली' शब्द रचनाकार के व्यक्तित्व, सामाजिक पर रचना के प्रभाव एव रचना के विशिष्ट सदर्भो को स्पायित करता है । साहित्य मनीषियों ने इन्ही 1 वामन-चाव्यालकार मूत्र वृत्ति, 12-13 2 भरतमुनि-नाट्यशास्त्र 3 बाणभट्ट हफ्नति, प्रस्तावना 4 दण्डी-चाव्यादर्श, 1-40 5. आनदवर्धन-धान्यालोर, 3-6 6 मम्मटवाव्य प्रकाश,9-79-104 7 पातजलि-महाभाप्य 2-1-3,40563 स० झज्यर 8 3. भोलानाय तिवारी-शैली विज्ञान, पृ० 12 9. स०१० नगेन्द्र-हिन्दी व्यालकार सूत्र, पू. 55

दिनकर के निवध साहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य | 85
सदर्भो को उकेरते हुए शैली को परिभाषित करने का प्रयत्न किया है।
1. शापेन हादर
"शैली आत्मा की मुख्याति शास्त्र है।"
2. इ० पी० व्हीपल
"ली लेखक के व्यक्तित्व का अविभाज्य तत्त्व है।"
3. ददले
"शैली कलामार की यह वैयक्तिकता है जो (कला ) माध्यम, तत्वो एवं
गटन में परिलक्षित होती है ।"3
4 गेटे
"शैली लेपर ये मस्तिष्क वी सत्य प्रतिलिपि है।"
5 रेमी द गोरमोन्तस
"जय कोई व्यक्ति सार्वजनीन भापा वो विशिष्ट, निराली और अद्वितीय
बोली ये रूप मे प्रस्तुत करता है वह उसी शैली ही है ।"5
६ टी. ई. ह्यम
"ली पाठर को अभिभूत परने का साधन मात्र होती है।'
7. एफ० एल० लुकास
"मैली यह माधग है जिमने द्वारा मनुप्प दूगगे से गम्परं स्थापित करता
है"साहित्यक शेती यह साधन है, जिगमे एक व्यक्ति दूगरो को उद्दीप्त करता
2 टी. एडय
1.एनमाइकोपीडिया आफ रिटानिमा, योल्यूम 21, पृ. 488
-६न्यू टिकरानरी आफ. पाट
3. नई ददरे-- यूमिनीटिज, प.413
4 2-ए आपर'म स्टास इज द फेपपत पापी आफ हिम मान
5. एफ. विम्ट-लिग्गिम्टिरग एड स्टाइन
6 टी०० यम-नोट्ग आन संमेज एण्ड स्टाइल
7. एफ. एस. सुशास-स्टाइल, पृ. 49

86 1 दिनकर का निबंध साहित्य 8. एम साफचेको "लेषक द्वारा अपनी कल्पना में विद्यमान विश्व की अभिव्यक्ति का माधन एव पाठक को सतुष्ट एवं मोहित करने का गायन ही शैली है।" 9 मिल्टन मरि "शैली अनुभूति के वैयक्तिक रूप की निर्वाध अभिव्यक्ति है।" 10. जे. वारवर्ग "एक अनुभूति की अभिव्यक्ति के लगभग गमानार्षी शब्दो मे से उपयुक्त चयन से ही अच्छी शैली पनती है।" 11. ग्रीनी "शैली कलात्मक विशिष्टता या अभिव्यंजना शक्ति का पर्यायवाची है।" उपर्युक्त परिभाषाओ के विश्लेषण से शैली के सम्बन्ध में जो समान तथ्य उभरकर मामने आता है, वह उमे अभिव्यक्ति के माध्यम से जोड़ता है । स्थूल रूप से वामन के विशिष्ट पद रचना रीति.' को ही स्वीकृति मिली है। वस्तुतः शैली अभिव्यंजना को ही कला है जो रचना को जीवन और विशेष स्वरूप प्रदान करती है । शैली ही है, जिसके कारण रचनाकार कही भी और किसी भी रूप में पह- चाना जाता है। शैली ही पाटक को प्रभावित कर आकर्षित करती है । शैली ही रचना की सम्प्रेपण शक्ति की परिचायिका होती है । जहा तक शैली के गुणो का सम्बन्ध है, पाश्चात्य विद्वानों ने शेती के गुणो को दो भागो में विभिक्त किया है- एक प्रात्मक और दूगरा रागात्मक प्रजात्मक गुणों में उन्होंने प्रसाद और स्पष्टता को और रागात्मक में शाक्ति, करण और हास्य को गिनाया है । इनके अतिरिक्त लालित्य के विचार से माधुर्य, सस्वरता और कलात्मक विवेचन को भी शैली की विशेषताओ मे स्थान दिया है ।....हमारे यहां के माधुर्य, ओज, प्रसाद के तीन गुण अधिक संगत, व्यापक और सुव्यवस्थित जान पड़ते है।"5 साहित्य के संदर्भ मे भावो, विधारो एवं अनुभूतियो की अभिव्यक्ति शैली का ही कार्य है। 1. एम० खाफचेको द राइटर्स क्रियेटिव इन्डीविजुवेलिटी एण्ड द डिवलपमेट आफ लिट्रेचर, पृ० 104 2. मिल्टन मरि-द प्रोबलम आव स्टाइल, पृ०17 3. जे० कारवर्ग-सम आस्पेक्ट्स आफ स्टाइल, पृ. 50 4. ग्रीन---आर्ट स एण्ड आर्ट मिटिसिज्म, पृ. 374 5. बाबु श्यामसुन्दर दाम -माहित्यालोचन (बारहवा संस्करण संवत् 2014), पृ०263 दिनकर के निवध साहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य / 37 निबन्ध और शैली शैली की मही पहचान निवध भे होती है। निवध को शैली की कसौटी पहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। सुचिन्तित, विषय गाभीर्य एव परिष्कृत भाव-विचार निवन्ध की विशेषता है तथा शैली इस विशेषता की अभिव्यक्ति का माध्यम है। शैली-सामर्थ्य पर निबन्ध की सफलता निर्भर करती है । जयनाथ नलिन ने ठीक ही लिया है, "विचार या भाव निबन्ध की आत्मा है तो भापा शरीर एव शैली प्राण ।" वस्तुत निबन्ध मे हम लेखक की आन्तरिक झाकी देखते है क्योकि उसका बाह्य रूप उसके अन्तर का प्रतिबिम्ब मात्र है और अन्तर का ठीक-ठीक ज्ञान हमे शैली से ही मिलता है। यही कारण है कि अन्य विधाओ की अपेक्षा निबन्ध मे शैली का विशेष महत्त्व होता है । शैली . प्रकार विश्लेषण शैली के पारिभापिक विवेचन से उसका अभिव्यक्तिगत स्वरूप स्पष्ट हो गया। भाव, विचार और अनुभूति की व्यजना शैली का वार्य है। इसी आधार पर शैली के प्रकारो का सधान किया जाता हैं । निबन्ध मे व्यवहृत शैली के जो रूप तर्कसम्मत, वैज्ञानिक एव मान्य हैं, वे इस प्रकार हैं- 1, प्रसाद शैली 2. व्याम शैली 3. समास शैली 4. विवेचन शैली 5. व्यग्य ती 6. तरग शैली 7. विक्षेप शैली 8. प्रवाह शैली इन शैली प्रकारी का परिचयात्मक विवेवन करना समीचीन होगा। प्रसाद शैली प्रसाद शैली का सम्बन्ध भापा से है। इस शैली का प्रयोग प्राय वर्णनात्मक, विवरणात्मक, वैचारिक एवं हास्ययुक्त नियन्धो मे प्रभूत मिलता है । प्रसाद शैली के लक्षण इस प्रकार हैं--- 1. इसमे वाक्य रचना सरल एव सीधी होती है । । 1 हा० जयनाप नलिन-~-हिन्दी निवधवार, पृ० 30 2. डा० गगाप्रसाद गुप्त-हिन्दी साहित्य मे निबन्ध और नियन्धकार, पृ० 30 88 / दिनकर का निवध साहित्म 2 भाषा अभिधात्मक सुबोध एव माधुर्य युक्त होती है । 3 उपमा एव क अलसार की छटा सवत्र देखी जा सकती है। 4 भावाभिव्यक्ति सुगुम्पित मुव्यवस्थित और स्पष्ट होती है । 5 इसम गति एव त्रिपारमाता का अभाव होता है किन्तु मिठास, स्वच्छता एव आपण विद्यमान होता है। उदाहरपााथ-- "वात का तत्व समझना हर एक का काम नहीं है और दूसरा की समझ पर आधिपत्य जमाने योग्य वात गढ सकना भी ऐसो वसो का साध्य नहीं है। बडे-बडे विनयरा तथा गहा महा रवीश्वरो वे जीवन वात ही ये समझने ममझाने में व्यतीत हो जाते हैं । सहृदयगण की बात के आनन्द वे आगे सारा संसार तुच्छ जचता है। -~40 प्रतापनारायण मिश्र कृत बात निवन्ध से व्यास शैली व्यास शैली व्यापकता एव विस्तार से युक्त होती है। कुछ विद्वान् प्रसाद शैली एव व्यास शंती को एक ही मानते है जवकि व्यास शैली की व्याख्यात्मकता विस्तार पाण्डित्य प्रदशन एव उपदेशात्मकता उसे प्रसाद शैली से भिन्न करती है । व्यास शैली की विशेषताए इस प्रकार है- | इसम विस्तार और फैलाव अधिक होता है। 2 इममे एक ही भाव अथवा विचार की विभिन्न प्रकार से व्याख्यात्मक जावृत्ति होती है जिसका उद्देश्य पाठ को सम्बन्धित विषय के प्रत्येक पक्ष को समगाना होता है। 3 उपदेशात्मकता एव पाण्डित्य प्रदशन का भाव भी इसमे सन्निहित होता उदाहरणस्वरूप यह अश द्रष्टव्य है- 'यदि सचमुच भारतवर्ष की भाषाओ को उन्नत और समृद्ध बनाना चाहते हैं और देशवासियो की देशी भाषा के द्वारा उन क्षगडा का फैसला सुनाना चाहत हैं तो यह कम से कम करणीय राय है । मैं दृढता के साथ रहना चाहता हू कि यह भारतीय जनता या जन्मसिद्ध अधिकार है । वाई सरकार उसकी उपेक्षा नही कर मस्ती । देश की जनता का अपनी भाषा म उच्चतर मान प्राप्त करने, पोशल मीखने और न्याय प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अधिकार है।" -~-प्राचाय हजारीप्रमाद द्विवेदी न बुटन से दिनकर के निबध साहित्य का शंलीगत वैशिष्ट्य | 89 समास शैली कम से कम शब्दो मे अधिकाधिक अभिव्यक्ति समास शैली की विशेषता है। चिन्तन प्रधान निबन्धो म इस शैली का प्रभूत प्रयोग किया जाता है । इस शैली की कतिपय विशेषताए इस प्रकार है- 1 इसमे सस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली का बाहुल्य होता है। 2 वाक्य-रचना संश्लिप्ट एव मिश्र प्रकृति की होती है इस प्रकार अर्थ व्याप्ति अधिक होती है तथा एक म अनेक भाव या विचार गुम्पित हो जात है। 3 चित्रात्मकता का आग्रह अधिक रहता है फलत शब्दजाल मे अर्थ बोध की सहजता लुप्त हो जाती है। 4 विचार और शब्द गुथे हुए से एक श्रम म अग्रसर होते हैं । 5 उपमा, रूपर और उत्प्रेक्षा आदि की आलकारिक्ता भी विद्यमान रहती उदाहरणाथ- ‘गति अनिवार्य है। उसने भीतर सगति अनिवाय है । प्रगति सगति के अनुकुल ही हो सकती है। उसम प्रतिकूलता टिव नही सक्ती । जैसे बहती हुई धारा वे वेग म स उछन कर कुछ पानी के कण मौज से किसी भी दिशा म उडत रह सकते है, वैसे ही इतिहास की गणना मे न आने वाली कुछ बूंद बहर कर इधर उधर जा सकती है । पर, इतिहास की धारा का प्रवाह ता एक है और एक ही ओर है वह 'और' स्वय इतिहास मे से स्पष्ट है।' -जैनेन्द्र कृत साहित्य का श्रेय और प्रेय' से यहा मनोविश्लेपणात्मक चितन की सामाजिक व्यजना दखते ही बनती विवेचन शैली विचारात्मक, सैद्धातिर एव समीक्षात्मक निबन्धो म इस शैली का प्रयाग मिलता है । इसमे दार्शनिकता, ताविकता, खण्टन मण्डन वृत्ति, व्याख्या एव 'विवेचना आदि विशेषताए रहती हैं। समीक्ष्य शैली की विशेषताए इस प्रकार हैं- (क) भापात्मक सरचना जटिल एव शब्द विधान तत्सम युक्त होता है। वैज्ञानिक पारिभापिर शब्दावली वा प्रयोग भी होता है। (ब) वैचारिक्ता एव बौद्धिकता की प्रधानता रहती है। विचार कूट-कूट कर भरे होते है, जिसके कारण सघनता एव गाम्भीयं आ जाता है। ।

90/ दिनकर का निवध साहित्य (ग) विचार तधिारित होते है । विचार मूत्रात्मक से व्याख्यात्मक परिक्षेत्र वी यात्रा करते है। (घ) अर्थ बोध शब्दजाल ये वृत्त में से प्रस्फुटित होता है । उदाहरणार्थ- 'मेरी समझ म आधुनिकता निज मे कोई मूल्य या तथ्य नहीं, बलि एक स्वभाव है, एक ससार प्रवाह है, एव बोध प्रक्रिया है। चाहे जो माने पर गुण- धर्म के हिसाब से 'स्वभाव' बोध प्रक्रिया सस्कार प्रवाह आदि एक ही बातें हैं । इसे तथ्य का मूल्य मानने का प्रश्न तभी होता है जब लोग सवार को ही मूल्य मान बैठते है, यथा-प्रशाकुलता, आस्वादन में विश्वास या यायावर-वृत्ति आदि जो सस्कार है, या स्वभाव के अग है, चिन्तन की असावधान अवस्था में मूल्य मानकर लोग आधुनिकता की मूल्य के तौर पर चर्चा करने लगते हैं । पर यदि उनसे बात आगे बढ़ायी जाए तो घुमा फिराकर यही जवाब मिलेगा-"मूल्य हीनता ही आधुनिकता का मूल्य है।" ----वुवेरनाथ राय कृत 'गन्ध मादन' से आधुनिकता की मस्तिष्क वो झवृत करो वाली त शक्ति के माध्यम से ज्ञान की विभिन्न पर्ते खोलने मे विवेचन शैली की सफलता छुपी है । व्यग्य शैली विनोद, तलखी, व्यग्य एव चुटीलापन इस शैली में यथानाम गुण विद्यमान रहते है । भाषात्मक सरचना व्यजनात्मक अर्थ बोध से युक्त होती है । अन्तस् को झकझोर देने वाली शक्ति इसी विशेषता है । बालमुकुन्द गुप्त, बालकृष्ण भट्ट रामचन्द्र शुक्न, हजारीप्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र, अज्ञेय, हरिशवर परसाई आदि के निबन्धो मे इम शैली के प्रयोग के प्रभूत उदाहरण देखे जा सकते हैं । व्यग्य शैली की विशेषताए इस प्रकार है- (क) भाषा मे सरलता साथ दश एव गम्भीरता के साथ व्यजना का सौन्दर्य विद्यमान रहता है । शब्द सरचना नेपात्मक होती है। (प) अल्प शब्दा मे अर्थ सघनता की व्याप्ति होती है । (ग) व्यजक्ता, तीक्ष्णता, नुकीली एव चुटीली होती है, साप ही रजाता भी ध्येय होती है। (प) बुद्धि और हृदय अर्थात् विचार मोर भाव का समन्वय होता है। (ड) व्यग्य शैली तीक्ष्ण, श्लेष एव परिहारा तीन रूपो म विपासमान है। (अ) धारदार, चुभने वाले नुकीले शब्द प्रयोग द्वारा दूसरो के विश्वासो, दिनकर के निवध माहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य | 91 नीतियो, विचारो और मान्यताओ पर चोट करना शैली की तीक्ष्णता (आ) मीठे लगने वाले सरल किन्तु व्यापक अर्थ देने वाले शब्दो का प्रयोग किया जाता है । शालीनता के आवरण मे गहरी चोट श्लेषात्मक व्यग्य शैली की विशेषता है। (इ) श्लेपात्मक स्वरूप मे जहा गभीरता विद्यमान होती है वही हास-परि- हास मे हल्कापन रहता है । बाह्म प्रहार करते हुए गुदगुदाना इसका वैशिष्ट्य है। क्रमश उदाहरण द्रष्टव्य है- (अ) "एक पीढी भर मे क्तिना बडा परिवर्तन हो गया, इसका प्रमाण देने पे लिए कुछ कल्पना-विहीन लोग कदाचित् आरडो की ओर दौडें, कोई बुनियादी तालीम लेकर भाखडा-नागल तक किया-वलाप की दुहाई दें" पर इस सबकी कोई आवश्यकता नहीं है, आप एक चौराहे पर खडे होकर किसी से मागं पूछिए और उसी के उत्तर मे युगालर बिजली सा कौंध जाएगा वह जो बडे-बडे दो लाल बोर्ड हैं न, जिन पर छ-छ फुट के अक्षरो मे लिखा 'खाज- पुजती' वहा से बायें को मुड जाइए । वहा एक रास्त के सिरे पर बहुत बडे बोर्ड पर लिखा है-'डोन्ट वाक्ट योर डेथ' और मरते आदमी का चित्र है। उमी महा पर हो लीजिए, कोई पचास वदम आगे जाकर एक पक्की दीवार दिखेगी जिम पर चूने से लिखा है 'नामर्दी-नामर्दी-नामर्दी' । हा उन्ही की छत के ऊपर एक बोर्ड है जिगम विजली की वतियो से लिखा है-'न्यूरोसिम'। बस आप न्यू- रोमिस वे बोर्ड के नीचे चले जाइए-वह आधुनिकता का दूसरा नाम है और समकालीन जीवो के उपयुक्त विल्ला । समार भर के न्यूरोटिको एक हो जाआ, तुम्हारे न्यूरोमिम ये मिवा और तुम्हारा क्या कोई छीन लगा।" -अशेव वृत राब 'रग' के मार्ग दर्शन निधि से (आ) "जब-जब मैं क्लवत्ता के चिरियाघर मे गया हूँ, तब-तब मुझे ऐमा सगा है कि ससार के जीवो सबसे गम्मीर और चिन्तामग्न चेहरा उस चिरियापर में रखे हुए बनमानुग का है मैं ममता या कि यह कलरत्ते वाना वनमानुप ही बहुत गम्भीर और तत्त्व चिन्ता लगता है । अब मैंने अपनी राप में सगोधन कर लिया है । वस्तुत ममार ने मभी वनमानुप गम्भीर और तस्वर्गदिमाई देते हैं।" --आचार्य हजारी प्रमाद द्विवेदी कृत 'गोर के फूल' मे (१) "उल्लू पिर किसी के पाग ग वर कहता है--देवी यह मेग माह भाई । नामी पिर उम र पाट कर देती है । इस तरह उल्लू लदमी सा, मामा, पूषा, भाई, भतीजा के पास ले जाता है और चेक दिलवा 921 दिनकर का निवध साहित्य देता है । लक्ष्मी पूछती है -'क्यो रे । हरिशकर परसाई तेरा कोई नहीं हैं ?' उल्लू कहता है-वह मेरा दुश्मन है, उसका नाम मत लो देवी।' -हरिशकर परसाई कृत 'येईमानी की परत' से तरग शैली इसी को कुछ साहित्य-समीक्षक आवेग शैली की सजा देते हैं । इसमे भावो या विचारो का आवेग मिलता है, वे एक दूसरे पर आधिपत्य जमाने के लिए गतिमान रहते हैं । इम शैली की प्रमुख विशेषताए इस प्रकार हैं- (क) भापा सगठन छोटे-छोटे वाक्यो पर आधृत होता है । वाक्य कभी रियाहीन, कभी वक, कभी पण्डित ही रह जाते हैं । (ख) शब्दावली मरल, मधुर एव आवेग युक्त होती है। कठिन, तत्सम शब्दावली युक्त सस्कृतनिष्ठता का निपेध रहता है। (ग) भावो-विचारो के झरनो की उत्ताल तरगो वा उतार-चढाव आलोडन- विलोडन स्पष्ट परिलक्षित होता है। उदाहरणार्थ- "सामने जहा तक नजर जाती है, समुद्र-ही-समुद्र है । उसमें ज्वार आया है, वडी-यडी तरगे उठती, एक दूसरे से टकराती, फेन उडाती, गर्जन करती, आगे बढती और बाध पर सर पटव कर फिर लौट जाती। उपर जो पूर्णचन्द्र आधी रात तय करके सर पर खडा मुस्करा रहा है, उसकी मुसराहट उन तरगो पर उद्वेलन कर रही है । कभी-कभी मालूम होता है, किसी अदृश्य छोर को पकडवर शत. सहस्र ज्योत्स्ना कुमारिया चन्द्रमण्डल से उतर रही है और बाकुल व्याकुल समुद्र की इन तरग मालाओ से कम्पित अधरो को चूम-चूम कर अट्टहास कर उठती -रामवृक्ष वेनीपुरी-गेहू और गुलाव' से विक्षेप शैली विक्षेप का सामान्य अर्थ है-बिखरा हुआ, विच्छिन्न, अस्थिर, मन वा इधर- उधर विचरण । निवन्य लेखक जव स्वच्छद रूप से विना प्रम का ध्यान रखे विचारो को प्रकाशित करता है । विक्षेप शैली की उल्लेखनीय विशेषताए द्रष्टव्य (क) भाषा काव्या मक्ता से युक्त होती है । (घ) भावुक्ता के प्रवाह मे भाव एव विचारधारा ध्यवस्थित रूप मे न बह करखण्ड-खण्ड होकर रुक-रुक कर व्यक्त होती है।

दिनकर के निवध साहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य | 93 (ग) कल्पना विचार एव भाव के गगन मे रचना को स्वच्छंद अनुक्रम प्रदान करती है। उदाहरणार्थ- "न मैं गिरजे मे जाता है और न किसी मन्दिर मे, न मैं नमाज पढता हू और न रोजा ही रखता हू, न सध्या ही करता हूं, न विसी आचार्य पे नाम का मुझे पता है और न किमी के आगे मैंने सिर ही झुकाया है। इन सबसे प्रयोजन ही क्या और हानि ही क्या ? मैं तो अपनी खेती करता हू, अपने हल और वैलो को प्रात उठकर प्रणाम करता हू, मेरा जीवन जगल के पेडो जोर पक्षियो की सगति में बीतता है।" --अध्यापक पूर्णसिंह-'आचरण की सभ्यता' जब कभी आवेग की अतिशयता बढ जाती है और विचार के स्थान पर भाव प्रधान हो जाते है तो प्रलाप का रुप धारण कर लेते है। ? प्रवाह शैली जब रचनाकार भायो को इस प्रकार प्रस्तुति दे कि वे निश्चित वैग से अग्रसर हो तो वहा प्रवाह शैली प्रयुक्त होती है। कतिपय आवेग शैली एव प्रवाह शैली को एक ही मानते है। हमारी दृष्टि मे आवेग शैली मे भाव-विचार वेग के कारण क्रम छोडते हुए, खण्डित रूप में भी आगे बढते है। इसके विपरीत प्रवाह शैली मे भावो मे त्रमबद्धता होती है तथा सम का भाव विद्यमान रहता है। इस शैली मे उच्छ खलता भी नहीं होती है । प्रवाह शैली की विशेषताए द्रष्टव्य है-- (क) इसमे भावो की प्रधानता रहती है किन्तु ये बुद्धि एव विचारो द्वारा नियत्रित होते है। (ख) भाषा सरल, सरल, भावानुकूल एव प्रवाहमयी होती है । (ग) इसमे कल्पना प्रवणता एव काव्यात्मकता के दर्शन होते है। उदाहरणार्थ--- "जिन्होंने पांच जल की धाराओ से घिरा और रग विरग फूलो मे छिपे चरणो से लकर शून्य नीलिमा मे प्राट मस्तक राफेद हिम म समाधिस्य केदार वा पर्वत देखा है वे ही इसका आकर्षण जान सकते है । मीलो दूर से ही वह उज्ज्वल शिखर अक्षरहीन आमत्रण के समान खुला दिखाई देता है । जैसे-जैसे हम उस ओर बढ़ते हैं यह विस्तार मे वढता जाता है और उसकी रजत विद्युत लेखाओ के समान मिलमिलाती हुई रेखाए स्पष्टतर हो जाती है।" -~महादेवी वर्मा-'स्मृति की रेखाए' 94 / दिनकर का निवध साहिय दिनवर जी वे निव धो म उपयुक्त उल्लिखित अनक शैलियो को यथा प्रसग प्रयोग हुआ है। दिनकर क निबन्ध साहित्य मे शैली विधान का स्यस्प दिनकर जी अपने अन्तस ये भावा जोर विचारो को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप ही प्रभावशाली ढग से शन्नायित करने मे गिद्धहस्त है। समथ ववि होने वे कारण निवध रचना मे भी समान रूप स सजग रहत हुए श्रम करते हैं । भावात्मकता विचारा मक्ता एव क्लात्मकता को दृष्टि से उनकी निबंध रचनाए आक्पा और सफल ह । दिनकर जी वे निवधो म विचार तत्त्व अनुभूति कल्पना और आत्मीयता सभी तत्त्वो का समावेश मिलता है जो उनकी पारदर्शी शैली के साथ उनक हर निबध म दया जा सकता है। तक और प्रमाण के साय अपने अनुभवो और गहन अध्ययन प्रसूत सम्र्मा को साथ लकर चलने के कारण उनी शैली का निजा आपण है। कही बौद्धिकता के साथ साथ व्यग्य का समावेश मिलेगा तो कही विचारो को गूढ गुम्पिा परम्परा उनमे मिलेगी और यही भावात्मक ररासिक्ता । वस्तुत शैली दिनवर की सम्पूण रचनाशीनता का ही अग है उसके साथ पूरी तरह जुडी हुई। उनके निव । प्राय विचारात्मक और ममीक्षात्मा है । इसीलिए उसम विवेचनात्मक शैली क अतिरिक्त प्रसाद शैली प्रवाह शली व्यग्य शली एव तरग शैली वा भी प्रयोग मिलता है। इन शनियो ने प्रयोग स ए" बात समर्मावत रूप से रखावन योग्य यह है कि उनकी अभिव्यक्ति की स्पष्टता सहजता और स्वाभाविक्ता सवत्र विद्यमान रहती है । दिनकर के निव धो म प्रमुखत प्रयुक्त शलिया इस प्रकार है- | विवेचन शैली 2 प्रसाद शैली 3 प्रवाह शता 4 व्यग्य शैली - विवेचन शैली विवनन गली दिावर नी सवप्रिय शली है । उनव सद्धातिक और रामीमा स्मा ही नही भावात्मा शिव धो म भी इस शैला का प्रयोग मिलता है । वस्तुत यह कहना अधिक उचिा है कि तिकर वा अध्ययन और मनन उन विधो के रूप म विवचनामा शैली के माध्यम स प्रस्तुत हुआ है । माहित्य धम समाज राजनीति गस्मृति एव युगीन जनुनिता समभित निबधो म उनी विवेचन शक्ति तार्विक्ता एव वैचारिस परिवमा दया जा सकती ह । एम शिवधो म वाभाविक रूपम विवचनामा गती वा प्रयोग पिया गया है । व अयन्त गृह -- ।

दिनकर के निबंध साहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य 1 95 एव सद्धातिक विषयों को भी विवेचन-शैली से अत्यत सरल बनाते चलते हैं । विचारो की सुसम्बद्ध व्यवस्था और गम्भीर विषय-प्रतिपादन करने वाली इस शैली में बोधगम्यता बनाए रखना दिनकर की उल्लेखनीय शैलीगत विशेषता है । यया- (क) "जिसे हम मन की जवानी कहते है, वह उम्र को कोडे मारकर हावने की क्ला का नाम नहीं है। उम्र के साथ हमारे शरीर और मन में जो परिवर्तन होने लगते है, उनका प्रसन्नतापूर्वक साथ देने के लिए दिमाग को राजी करना ही मन की असली जवानी है। साथ तो देना ही पड़ता है । अब बात रह जाती है कि दिमाग तल्पी के साथ-साथ देता है या मौज के साथ । जिराने मौज के साथ साथ दिया, उसे पछताने की जरूरत नहीं होती।" (a) "क्ला की खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने का सही तरीका यह नहीं है कि हम उनकी प्रचारात्मकता पर जोर दें, वलि यह कि, हम उन गुणो की कद्र करे जिनका प्रतिनिधित्व करने के कारण क्ला आज तक आदरणीय रही है, उन मूल्यो पर जोर डालें जिनका दर्शन पा विकास वैज्ञानिक तर्कों से नहीं प्रत्युत्त, कल्पना और सहज वृत्ति से किया जाता है।" (ग) “गाधी जी की कल्पना का समाज है। उसमे प्रधानता समूह की नहीं' बल्कि व्यक्ति की है। समाज के रोग निदान के लिए वे समाज रूपी रोगी की कल्पना नहीं करते बल्कि रोगी तो वे एक-एक सदस्य को मानते है और रोग निवारण के लिए वे भी समाज के ढाचे पर प्रहार नही करके व्यक्ति को ही समझाते हैं।" दिनकर के निबन्धों में बौद्धिकता का प्राधान्य होते हुए भी भावात्मकता के दर्शन होते हैं । उनके ऐसे निबन्ध तथ्य प्रधान, स्पष्ट, तर्फ और युकिा युक्त ढग से कारण-कार्य देखकर विचारो और भावानुभूतियो को सुगुम्फित वाक्य विन्यास एवं सटीक शब्दावली में विवेचनात्मक शैली के माध्यम से प्रस्तुत करते है। उदाहरण द्रष्टव्य हैं- "चरित्र कर्म है, व्यक्तित्व चिन्तन है । चरित्र की कठोरता साहित्य में क्लामिक शंलो को जन्म देती है। व्यक्तित्व को उद्दामता से रोमाटिक शैली का आविर्भाव होता है । साहित्य वी आधुनिक समस्या यह है कि लेखक शैली तो चरित्र को अपनाना चाहते हैं, किन्तु उद्दामता उन्हे व्यक्तित्व को चाहिए । 1. रेती के फूल, पृ०11 2 रेतो वे फूल, १० 65-66 3 अर्धनारीश्वर, पृ० 108 4. शुट रविना को खोज, १० 199 96 / दिनकर का निबंध साहित्य अथवा । "सभ्यता के किमी मूल्य का समर्थन करना गलत मूल्य का समर्थन है क्योकि गभ्यता के सारे मूल्य खोखले हो चुके हैं। मनुष्य विरासत नहीं, योजना है। वह अतीत का वोझ ढोने को नही भविष्य के निर्माण के लिए जन्म लेता है । सभ्यता के साथ व्यक्ति के जो भी एकरारनामे है, उनका आधार अतीत है। इन एकरार- नामो को फाडकर मनुष्य को चाहिए कि शुद्ध चिन्तन एवं बौद्धिक अन्तर्दृष्टि के साथ वह अपना मूल्य आप तैयार करें।" विचारो की शृखला की दृष्टि से निम्नाक्ति अंश उदाहरणीय हैं- (क) "और धर्म का जन्म हमारे आत्मा वाले धरातल पर होता है। किन्तु धर्म विजय की आत्मा के धरातल से उतरकर जैव धरातल पर आने मे है ।"धर्म आत्मा के कोठे पर और आचरण पशुओ के समान, यह अच्छे मनुष्य का लक्षण नहीं है, उसके धर्म का मूल्य आध्यात्म मे, किन्तु उसकी (धर्म की) अभिव्यक्ति दैनिक आचरणो को पवित्रता मे होनी चाहिए।"2 (ख) "प्रेरणा बुद्धि के केन्द्रीयकरण से उत्पन्न कोई अनिर्वचनीय शक्ति है जिसके मूल हमारे सस्कारो मे रहते है, जिसकी शिराए हमारी स्मृतियो मे गडी होती है तथा जो मनुष्य की सद्बुद्धि से समन्वित होती है । "जब हम जीवन के स पूर्ण अनुभवो, समस्त स्मृतियो एव बुद्धि की सारी शक्ति को लेकर सोचने लगते है अर्थात् चिन्तन की प्रक्रिया मे जव वेवल मन ही नही सम्पूर्ण अस्तित्व विलीन हो जाता है, उस समय हमारे भीतर एक विलक्षण शक्ति जग पडती है जो छलाग मारकर अदृश्य पर से आवरण को खीच लेती है जो तर्कों की राश मे चलकर अनायास समाधान के दर्शन करा देती है यही शक्ति प्रेरणा शक्ति है।" इन उदाहरणो से दिनकर वी विश्लेषण क्षमता का प्रमाण मिल जाता है । अपने कथन वो जिस निर्भीकना और दृढता के साथ वे कहते है वह ध्यान योग्य है। कोरी लफ्फाजी से दूर तथ्यपरक्ता उनकी विवेचन शैली की विशेषता है । विवेचन शैली मे दिनकर जी के विचार और अनुभूतिया कसी हुई जीवन्त भाषा मे सुगुम्फित हैं । प्रसाद शैली दिनकर के निबन्धो मे प्रसाद शैली का प्रयोग सशक्त रूप मे हुआ है, किन्तु प्रतिनिधि रूप मे नही । भाषा की स्वच्छता, विचारो की स्पष्टता, वाक्य विन्यास 1. शुद्ध रविना पीखोज, पृ० 200 2. दिनकर-वट-पीपल, पृ० 112 3. दिनार-काव्य की भूमिका, पृ० 129 दिनकर के निबंध माहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य / 97 को सरलता और अभिव्यजना की सुबोधता इस शैली की विशेषताएं है। वे सीधी स्वाभाविक आत्मीयतापूर्ण वात कहते हैं। इनमे गत्यात्मकता नहीं है। कभी स्वानुभूत चिन्तन की रश्मिया तो, कभी राष्ट्रप्रेम तथा सस्कृति का रग, दिनकर की रचनाओ मे प्रसाद शैली की पहचान है। समीक्षात्मा निबन्धो मे इस शैली के कुछ उदाहरण विशेषत देखे जा सकते है- (क) “मनुष्य के भीतर जो एक सूक्ष्म आध्यात्मिक व्यक्तित्व है, उसी ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम खोजते हुए कविता का आश्रय लिया और इसी जीवन को अभिव्यक्त करने के लिए कविता प्रादुर्भूत हुई । मस्तिष्क के जो गुण है, बुद्धि मे जो चमत्कार है, वे मनुष्य के स्यूल जीवन को सजाते-सवारते और व्यक्त करते हैं। किन्तु मनुष्य के भीतर वाला मनुष्य इनकी पकड मे नही आता। उसे पकड़ने के लिए भावना का जाल और हृदय की जजीरें चाहिए।" (ख) "नारी का शिक्षा ग्रहण करना गौरव की बात है। और उस शिक्षा को समाज सेवा में लगाना और भी गौरव की बात है। आज का युग आधुनिक युग है, बुद्धिवाद इस युग का जनेऊ है ।" (ग) "जिसे हम आधुनिकता कहते हैं, वह एक प्रक्रिया का नाम है। यह प्रक्रिया अधविश्वाम से निकलने की प्रक्रिया है। आधुनिकता कोई मूल्य नही, यल्कि अत्याधुनिक कवि और लेखक जो कुछ लिखते है उससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह मूल्यो के विघटन का पर्याय है ।"3 भापा की सरलता, सुबोधता एव सरल वाक्य रचना तो दिनकर प्रयुक्त प्रसाद शैली की विशेषता है ही, साथ ही शब्दो का विशिष्ट प्रयोग भी एक आकर्षण है । यह निबन्धांश द्रष्टव्य है-"राजमहल चाहता है प्रतिरोध और प्रताप, सम्पत्ति शक्ति और विशालता । हम कुवेर है, हम सूर्य है, हम अर्जुन और भीम है, हम दहकते हुए अगारे है और जो कोई हमारा स्पर्श करेगा, वह जल जाएगा । भला कौन कह सकता है कि राजमहल के उद्देश्य हीन है ? मगर मन्दिर सिखाता है अनवरोध; मन्दिर सिखाता है विनयशीलता, मन्दिर सिखाता है अपरि ग्रह दीनता और ब्रह्मचर्य।"4 दिनकर जी के विवरणात्मक-वर्णनात्मक निबन्धो मे मुख्यत. प्रसाद शैली के दर्शन होते हैं; तथापि यह उनकी आधारभूत शैली नहीं है । प्रसाद शैली का प्रयोग विवेचनात्मक शैली की छाया मे ही हुआ। हा, वे सरलतम भाषा मे कठिन- 1. अर्धनारीश्वर, पृ० 22 2. साहित्यमुपी, पृ० 137 3. साहित्यमुखी, पृ० 173 4. अर्धनारीश्वर, पृ०३ 98 / दिनकर का निबंध साहित्य तम बात कहने मे अवश्य सफल हुए हैं । शीघ्र समझ में आने वाले विवार और पथन का साधारण ढग से प्रयोग इनका शैलीगत वैशिष्ट्य है। प्रवाह शैली दिनार जी ने अपने निबन्धो मे शुष्प बौद्धिकता एव वैचारित प्राबल्य कही भी नहीं रहने दिया । उनम ययास्यान भावुवता का सचार किया है । वे पाठय के साय आत्मीयतापूर्ण सम्बन्ध वरावर बनाए रखते है । कुछ निबन्ध तो उनके स्वच्छन्द भावो विचारो के अविरल प्रवाह को बढे ही कलापूर्ण ढग से प्रस्तुत करते हैं। ऐसे स्थलो पर स्वाभाविक रूप से प्रवाह शैली अपना प्रभाव दिखाती है। इस कोटि की रचना शैली में भापा भावो को अपने साथ लेकर वह चलती है या भाव भाषा वो बहा ले जाते है । माधुयं गुण युक्त गतिमान भाषा मे व्यक्त भाव और विचार अपना अमिट प्रभार पाठक पर छोडते है । कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य (क) "दूगरी सूरत यह है कि वह उन गरीब नात्माओ की हमजोली बन जाये, जो न बहुत अधिर सुख पाती हैं और न जिन्हे बहुत दुख पाने का ही सयोग है, क्याकि ये आत्माए ऐसी गोधूलि मे बसती है, जहा न तो जीत हसती है और न कभी हार के रोने की आवाज सुनायी पडती है। इस गोधूलि वाली दुनिया के लोग बधे हुए घाट का पानी पीत है, व जिंदगी के साथ जुआ नहीं खेल सकते । और कोई को कौन कहता है कि पूरी जिन्दगी को दाव पर लगा देने मे कोई आनद नहीं है ?" (ख) "एक बार भूकम्प और अग्नि काण्ड, दोनो का धरती पर साथ ही आक्रमण हुआ। महल गिर गए, झोपडिया जलकर खाक हो गई। वही नई जमीन पानी में म निकल आई । कही बस बसाए नगर समुद्र म रामा गए। पशु-पक्षियो, कोडे-मकोडो के साथ आदमी बहुत बर्बाद हुए। कितने ही महावृक्षो का पता नही रहा और कितन ही पहाड़ा की छाती फट गई।" ऐसे स्थलो म कविता का सा आनन्द मिलता है । भाषा मे प्रवाह और लालित्य विद्यमान है । दिनकर का कवि व्यक्तित्व के अनुकूल है इसमे उनकी भावुकता का प्रभाव स्पष्टत परिलक्षित होता है । दिनकर न भावात्मक निबन्धा मे प्रवाह शैली का प्रयोग किया है। ऐसे निबन्धो मे व अपनी रागात्मक अनुभूति मे हमारे हृदया का विभोर कर देते है । 1 रेती ने फूल पृ०३ २ वही पृ. 40 दिनकर के निवध साहित्य का शैलीगत वैशिष्ट्य 199 व्यंग्य शैली विचारपूर्ण गम्भीर निवन्धो को झेल पाना पाठक के लिए कठिन है, इस तथ्य से दिनकर भली भाति परिचित थे । अतएव उन्होने कुछ निवन्धो मे व्यग्य शैली को अपनाया । अनुभूतिमय भावात्मक्ता, व्यग्य एव हृदय की चुटकी लेन वाली उक्तिया विचार यात्रा के विश्राम के अवसर देते है। ऐसे स्थल समीक्षात्मक, भावात्मक एव विचारात्मक निवन्धो में द्रष्टव्य हैं । व्यग्य शैली के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं- (क) "ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले वह उसी को जलाती है जिसके हृदय में उसका जन्म होता है। आप भी ऐसे बहुत से लोगो को जानते होगे जो ईर्ष्या और द्वैप की साकार मूर्ति है और जो बराबर इस फिक्र मे डूबे रहते हैं कि कहा सुनने वाले मिलें कि अपने दिल का गुवार निकालने का मौका मिले । श्रोता मिलते ही उनका ग्रामोफोन बजने लगता है और वे बड़ी ही होशियारी के साथ एक-एक काड इस ढव से सुनाते है, मानो, विश्व कल्याण को छोडकर उनका और कोई ध्येय ही नहीं हो।" (प) "कल्पना कीजिये कि देश का एक-एव आदमी जवाहरलाल हो गया। तो फिर यहा का एक-एक आदमी सोचेगा, योजना बनाएगा और बहस करेगा। लेकिन इन पैतीस करोड जवाहरलालो को भोजन कौन देगा? उनके लिए कपडे कौन चलाएगा? जवाहरलाल बनने में और सब ठीक है, कठिनाई सिर्फ इतनी है कि जवाहरलाल कुदाल नहीं चला सकता, हथोडे नहीं उठा सकता और ज्यादातर वह अपनी मोटर भी आप नहीं हाकता।"2 (ग) “साहित्य मे सौन्दर्य देवल चाशनी है। उसकी लपेट मे समाज को हमे चुनन की गोलिया खिलानी है। जिस साहित्य का कोई उपयोग नहीं, वह हमे बिलकुल नहीं चाहिए।" दिनकर का शिष्ट व्यग्य मन-मस्तिष्क को झकृत कर देता है और गम्भीर चिन्तन को आत्मसात करने का अवकाश भी प्रदान करता है। उनके व्यग्य मे अर्थमित्त हास्य की गम्भीरता विद्यमान है। दिनकर वा व्यग्य केवल विनोद के लिए नहीं है । व्यग्य मे रजकता के साथ चुभन भी है, सरसता के साथ पैनापन है, जो रचना शैली को प्रभावशाली एव विचार को सम्प्रेषणीय बनाता है। 1, रेती के फूल, पृ० 17 2. वही, पृ० 103 3. शूद पविता की खोज, पृ० 193 100 / दिनकर का निवध माहित्य निय दिसतर जी के नियन्धो वा शैली विधान पी दृष्टि मे मूल्यापन इम तय्य यी सपुष्टि करता है वि व गैलीगत वैविध्य यो निबन्ध की राफलता पी यमोटी मानते है। उन्होंने निबन्धा की विषयवस्तु के अनुम्प गभीर, सरल प्रवाहपूण व्यग्यपूर्ण एव विक्षेपपूर्ण शैलिया या प्रयोग किया है । वे ललित निबन्धकार न होते हुए भी लालित्य का सपल ममाहार अनेर निरन्धा में कर सके है । पिन्ही नवीन रचना शैलिया का पुरस्सा तो उन्ह हम नही यह मरत है, हा, शैलीगत प्रयोग वा वैशिष्ट्य उनके विचारामर तया गरेपणात्मक निबन्धो म निश्चय ही लक्षित होता है । वहुआयामी रचनाधर्मी प्रतिभा पे वृतिवार होन के कारण शैलीगत प्रयोग उनका अभिप्रेत भी नहीं था। उन्हान विषयवस्तु वी तथ्यपरक्ता और ताविकता पर रचना दृष्टि केन्द्रित दी है। हा, शैलीगत आभिजात्य दिनवर के निबन्धा की निश्चय ही उल्लपनीय विशेषता है।

5 दिनकर के निबंध साहित्य मे भाषात्मक संरचना का स्वरूप मानव के जीवन मे भापा की महत्ता अथ से इति तक परिव्याप्त है । वस्तुत भाषा ही अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विशिष्ट साधन है । भाषा ही वह सेतु है, जिस पर च नकर भाव, विचार, अनुभूतिया और अनुभव सामाजिक तक पहुचते हैं, एक का सत्य दूसरे तर सप्रेपित होता है। डा. रामकुमार वर्मा ने ठीक ही लिखा है-"भाषा भावो की वाहिका है। इसीलिए भावो का स्पष्टीकरण और प्रभाव- शाली प्रयोग भाषा पर ही अवलम्बित है।" भाषा बहता नीर है अस्तु परिवर्तन उसका नियम है । परिवर्तन की यह प्रक्रिया उसमे निरन्तर रहती है और इस क्रम मे रचनाकार की अभिरुचि और प्रतिक्रियात्मक दृष्टि भाषा को अलग अलग दिशा और स्वरूप प्रदान कर विकासमान करती है।" भाषा बदलती है तो भापा के परिवर्तन भाषा से निकलते हैं, भाषा एक सामाजिक और युगीन समय है जिससे आगे बढा तो जा सकता है, पर सीढी दर-सीढी समाज को अपने साथ लिए हुए ही। भाषा को समूल उखाडकर उसकी जगह नही। भापा हम नही दे सकत, नये शब्द नये मुहावरे, नये प्रयोग हम कर सकते है तो एक जाने हुए उभय पक्ष द्वारा स्वीकृत ढाचे के भीतर ही।"सामान्य जीवन मे भाषा दो स्तरो पर विकसित होती है। प्रथम बोलचाल की भाषा, द्वितीय सर्जनात्मक भाषा भाषा के इन दोनो स्तरो मे भिन्नता होती है।" बोलचाल की भापा निरन्तर के जीवित उपयोग से 1 डा० रामकुमार वर्मा-साहित्य शास्त्र, पृ० 116 2 साप्ताहिक हिन्दुस्तान, 25-31 मई, 1980 (श्री अज्ञेय का 'युग सधियो पर देशीयता और मौलिकता' लेख), पृ० 10 102 / दिनकर का निवध साहिय - विकसित होती है । इस दृष्टि से पिमी भी देश की साहित्यिक भाषाए वहा के जन समुदाय की भाषा के विकास की विभिन्न मजिलो को सूचित करती है-- परस्पर मिलती-जुलती योलियो के समूह मे से कोई योती किन्ही विशिष्ट कारणो से राजनीतिक, सामाजिक अथवा अन्य साहित्यिक सृजनशीलता का माध्यम बन जाती है। फिर वई शताब्दियो के प्रयोग के उपरात जब उसकी प्राण शक्ति घटने लगती है और बदलते हुए नये युग के यथार्थ से जब यह अपने-आपको सपृक्त करने मे असमर्थ पाती है तब उसके विवास की मजिल पूरी हो जाती है और उसका गत्यात्मक स्वरूप जड हो जाता है। निवन्धकार भापा के प्रयोग मे वैशिष्ट्य का परिचय विषय विवेचना के माध्यम से प्रस्तुत करता है । निबन्ध मे भाषा सतुलित, सप्रेपणीय एव व्यजनापूर्ण होती है। दिनकर की भाषात्मक सरचना इन्ही गुणो के परिप्रेक्ष्य मे द्रष्टव्य है । दिनकर के निवन्धो की भाषात्मक संरचना का वैशिष्ट्य दिनार जी के निबन्धो मे भापा विविधोन्मुखी स्तरो पर विकासमान हुई है । इनम बोलचाल एव सस्कृतिनिष्ठ पदावली वा प्रयोग प्रमुख है। दिनकर के निबन्ध म भाषा-वैशिष्ट्य के प्रस्थान बिन्दु उभी वी विषयानुकूलता, सहजता, स्वाभाविक्ता, प्रयाह एव प्रभावोत्पादकता कहे जा सरते हैं। सहज, खरी और पारदर्शी अभिव्यक्ति के कारण वे अन्य निबन्धकारो से भिन्न ही नहीं, अपितु हिन्दी निब ध साहित्य मे अपनी पहचान कायम करने म सफल हुए हैं। उनकी निबन्ध भापा मे रागात्मक्ता और बौद्धिकता कदम-म-दम मिलाकर साथ चलती है, जिसके कारण सहज रूप मे पाठर को ज्ञान सवेदन हो जाता है। निवन्ध म निरूपित घटना दिनकर के हाथो में सजीव हो उठती है तो कोई गुरु गम्भीर विषय सहज ग्रहणीय बन जाता है तथा भिन्तन गुथे हुए सूत्र खुले रूप में व्यक्त हो जाते हैं । वस्तुत भाषा मे उनके साहित्यिा व्यक्तित्व का आतक कही भी दिखाई नहीं देता है। हा, दिनकर का रवि मन उन्मुक्त होकर निबन्धो मे विचरता भासित होता है, जो प्रकारान्तर से भापा को शक्ति सम्पन्न ही करता है। इसी प्रयोग- धर्मी विचार बिन्दु वो हम दिनार की निवन्ध भाषा का प्राण तत्त्व यह रावते रामाधारी सिंह दिनकर के निबन्धो की भाषात्मक सरचना के वैशिष्ट्य का मूल्याक्न निम्नांक्ति शीर्पयो के अन्तर्गत किया जा सकता है- 1 शब्द चयन और रचना विधान 2 मुहावरे-लोकोक्तियो का प्रयोग 1 ० रामस्वरूप चतुर्वेदी-भाषा और सवेदना, पृ. 12-13 दिनकर के निबंध साहित्य में भाषात्मक सरपना का स्वरूप / 103 3. वाव्यात्मा सरमता का पुट 4. चिनात्मकता 5. सूत्रा मक्ता शब्द चयन और रचना विधान शब्द भाषा वी इकाई माना जाता है । भापा मम्दो से ही बनती है । अतएव अभिव्यक्ति या आधार होता है-शब्द चयन और उनका प्रम। दिनपर ने भी गन्द चयन और शब्द प्रयोग यो महत्त्वपूर्ण माना है । इस प्रमग मे उन्होने 'मिट्टी की और राग्रह में लिखा है-"ववि मानस की सबसे बडी द्विघापूर्ण स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब वह अपनी कल्पना की अभिव्यक्ति के लिए अनुकूल तथा शक्तिशाली शब्दो यो चुनने की चिन्ता करता है और इसी कार्य की सफलता से उस महान् आश्चर्य का जन्म होता है जिसके सामने समालोचना पराजित हो जाती है। उपयुक्त शब्द चयन के अभाव में साहित्य मे पलात्म- कता के निर्वाह को वे सदिग्ध मानते है। रचनाकार वी पक्ड मे शब्द भण्डार कौशल से नहीं आता अपितु वह अन्तद्वंप्टि और सहज वृत्ति के अनुमार भाव और विचार यो अनुकून शब्दो में व्यक्त करता है। शब्द चयन ही शैली और भाव के मध्य सामजस्य उत्पन्न करता है । शब्द के रूप गुण की सही पहचान रचनाकार के लिए आवश्यक होती है, जो "दीपं साधना यी गहन भूमिका मे गोते लगाने से मिलती है।" शब्द चयन की कमौटी पर दिनकर का निबन्ध साहित्य खरा उतरा है । प्राब्द की शक्ति, रूप एव गुण से वे सच्चे पारखी है। अन्त स्थ भावो की सप्रेषणीयता में पूर्णतः सक्षम है। पैविध्यपूर्ण शब्दावली का प्रयोग दिनकर के निबन्धो की भापात्मक सरचना- सामयं को व्यजित करता है। उदाहरणार्थ दिनकर के निबन्धो में प्रयुक्त कुछ शब्द प्रस्तुत है- सस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली विरक्त, अनुरवत, अपरिग्रह, प्रच्छन्न, शृग, अतिरजन, अभिनव, गह्वर, आयान्त, गवेषणा, उर्वर, प्रखण्ड; मध्याह्न, स्रष्ट, उत्स, मार्जन, तृष्णा, उत्कट स्पर्धा, सम्पृक्त, अरण्य, मजूपा, अभ्युत्थान, द्विघा, वैवल्य, श्लाघ्य, विविक्षा आदि। । मिट्टी की ओर, पृ० 117 2 वही, पृ० 151 104 /दिनकर का निबंध साहित्य देशज शब्दो का प्रयोग दिनकर जी ने अपने निबन्धो की भाषा मे लोकमानस में व्याप्त तद्भव शब्दो के प्रयोग से भी विशिष्ट प्रमाव उत्पन्न किया है । कुछ प्रयुक्त देशज शब्द इस प्रकार है-अलबत्, लोट-पोट कर, निरी-कोरी, ढब-डाचे, माथापच्ची, भौंडी आदि। उर्दू रिवाज, ह्वाला, क्वायद, इल्जाम, तफसील, मिल्कियत, मनमुबा, मखौल, एहसास देखौफ जुल्म, तल्खी, बन्दिशे, वर्खास्त, मुआफ्वि, जनाजा,जमहूरियत लिवास, खता, बदतर, तहजीब, हाफिज, पन्दको, नेमतो आदि । दिनकर ने अपने नियन्धो म उर्दू के ऐसे शब्द प्रचुर मात्रा म प्रयुक्त किए हैं, जो, भापा को सहज और सप्रेषणीय बनाते है। अगरेजी रिफार्मेशन, इम्प्रेशन, शार्टकट, एम्बिग्विटी, गियर, फ्लुइड, लेबर्ड, स्पिरिट, कनासिक, रेस्टोरेशन, पलेक्मीविलिटी मेटा फिजिकल, रेजीमेटेशन, रेनेमा' टेक्नीक, अप स्टार्ट इन्टेलेक्चुअल आदि । भाग्द चयन के अतिरिक्त इन भाषाओ मे प्रयुक्त उद्धरणो को भी नि सकोच प्रयुक्त किया गया है । यथा-- "सम्मान से ब्राह्मण उसी प्रकार भागे, जैमे मनुष्य जहर से भागता है और अपमान की कामना वह उसी प्रकार करे जैसे लोग अमृत की कामना करत हैं। अचिंत पूजितो विप्र दुग्ध गोरिव सीदति । अर्थात् अचित पूजित विप्र दुही हुई गौ के समान सूख जाता है।" अथवा- Earth is crammed with heaven And every common bush afire with God'? दिनकर जी इन प्रयोगो से अपनी निवन्ध भापा को नया तेवर देने में सफल हुए हैं। इससे शैली म एक नयी सरसता और वात को प्रभावशाली ढग से कहो की शक्ति बढ़ गई है। दिनवर ने पारिभापिक शब्दावली का भी प्रचुर प्रयोग दिया है । यया--गाय प्रेरणा, त्रिवर्ग, सहज ज्ञान, निवृत्ति प्रवृत्ति, आध्यात्म- 1 मुद्ध कविता की खोज, पृ० 168 2 अर्धनारीश्वर पृ. 167 दिनकर के निवध साहित्य में भापात्मक सरचना का स्वरूप / 105 वाद, उपचेतन, अतिमानम, चेतना शक्ति, अस्तित्व, द्रश्य, अपस्टार्ट, रेनेसा, क्लासिक आदि का प्रयोग उनसी शब्द सामर्थ्य के ही द्योतक है। मुहावरे एव लोकोक्तियो का प्रयोग मुहावरो और लोकोक्तियो वा प्रयोग निबन्धो की भाषा मे नई अर्थवत्ता और स्फूर्ति प्रदान करता है तथा भावो को सक्षमता से सप्रेपणीय बनाता है। इनके प्रयोग से भाषा मे लाक्षणिक्ता एव व्यग्य का पैनापन भी आ जाता है । दिनकर जी ने अभिव्यजना शक्ति एव विवेचनात्मक सौदर्य की सृष्टि के लिए मुहावरो और लोकोक्तियो ये अनेक प्रयोग किये हैं । यथा- लग मारना, खट्टे अगूर, आख मिचौनी खेलना, मील का पत्थर, काम इस हाल से उडकर उस डाल पर बैठना, दूर के ढोल सुहान, लिखत सुधाकर लिखिएगा, राहू आदि। काव्यात्मक सरसता का पुट दिनकर जी सहृदय रचनाकार हैं, उनकी प्रतिभा बहुमुखी होते हुए भी वे मूलत कवि ही हैं। काव्येत्तर विधाआ मे उनका कवि व्यक्तित्व यत्र-तत्र प्रति- विम्बित होता है। उनके निवन्ध इसके अपवाद नहीं हैं। उनके भावात्मक, विचारात्मक एव विवरणात्मक निबन्धो मे प्राय काव्यात्मक भाषा का प्रयोग मिलता है। इन तिबन्धो मे अलकारिता विद्यमान है। इन अलकारो के प्रयोग से भाषा मे माधुर्य और सौंदर्य की सृष्टि हुई है। इस प्रकार के प्रयोग पाठक के मन को बाधने मे मक्षम है। कविता मे प्रयुक्त उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि अनेक अलकार निबन्धो की गद्य भापा मे स्वाभाविक रूप से प्रयुक्त हुए हैं । भाषा की यह प्रवृत्ति उनवे यवि हृदय की ही प्रतिकृति है । भाषा का सहज प्रवाह और प्राणवत्ता इन्ही तत्त्वो के कारण है। भाषा मे काव्यात्मकता वे पुट से चमत्कृत उनवे निबन्धो ये कतिपय उद्धरण द्रष्टव्य हैं- 'एक तरह से समझिए तो चालीस की उम्र निराशा और उदासी की सूखी घडी न होकर आशा और उल्लास की ही नई वरसात है। जो घटा अपनी रगोनियो के साथ आवाश वे कोने-कोने मे आनद से मण्डरा रही थी, अब वह बरसने वाली है । यह वह मौसम है, जब थाम मे पन लगते और पक कर तैयार होते हैं । यह ठीक है कि जब कोमल मजरियो के कुज मे प्रवेश करती है, तब प्राणा को पागल कर देने वाली सुगध उसके कण्ठ से निकलने वाली प्रत्येप पुकार को कविता का उच्छ्वाम बना देती है। मगर रसाल जब पद पर तैयार हा जाता है, तब उसे चूसने वाले रसज्ञ की भी बाखें आनद की सिरहन से बद हा जाती 106 / दिनकर का निवध साहित्य - है। पके हुए पल के भीतर भी एक कविता है, जो सिर्फ सूधने की वस्तु नहीं, बल्कि रक्त में मिला लेने की चीज है।" वाणी का ओज एव वीर रसात्मक मनोभाव इस निबधाश मे देखने योग्य है-"बरसो से देश के शेर सोयचो मे बद है और बाहर शृगाल और भेडिये अपनी तुरही वजा रहे है । देश ने गर्जन किया, लेकिन वदीगृह के प्राचीर नहीं गिरे। देश ने तप्त आहे भेजी, लेकिन सीखचे गले नही, कडिया पिघली नहीं। देश ने आगोश भेजा, लेकिन प्रलय के वादल धुमडक्र रह गये, शाप का एक वज भी आततायियो पर नहीं गिरा सके, प्रोध, आकोश, गर्जन, आसू और आह्, सब के सब वेकार हुए । अस्सी वर्षों की कठिन तपस्या जव सफल होने जा रही थी, ठीक तभी इद्र का आसन डोल गया। मार ने आकर अभियानियो का मार्ग घेर लिया। निर्भीक प्रवाहित होने वाला निर्झर सहसा ठिठक्कर एक गया। वर्षों से उद्दीप्त होकर जलने वाली आग ने अपनी लपटें समेट ली, मानो क्सिी दुष्ट देवता ने उसकी गति वाघ दी हो।" दिनकर जी के निवन्धो की भापा मे कही-कही तत्सम शब्दावली का प्रयोग हुआ है तो वही जमकर उर्दू शब्दावली का आधिपत्य भी दृष्टिगत होता है । कभी-कभी निबन्ध भापा की ये दोनो प्रवृत्तिया एक ही निबन्ध मे परिलक्षित होती है । जैसे-"भूगोल ने भारत की जो चौहद्दी वाध दी है उमके साथ दस्त दाजी करने की कोशिश कभी भी कामयाब नही हुई। "हम दुनिया के किसी ऐसे हिस्से को भारत के साथ बाघ रखने की कोशिश करें जो भारत की चौहद्दी से बाहर पडता है और जिसे भारत का भूगोल अपने भीतर पचा नही सकता। दुनिया के हिस्से को काटकर उसे भारत के साथ मिला रखने का काम उतना ही अप्राकृतिक साबित हुआ है जितना कि हिन्दुस्तान के किसी अग का काटकर उसे अलग जिंदा रखने की कोशिश ।"3 दिनकर वी भापा का एक गुण ओज है । ओज की गुणात्मक सिद्धि दिनकर को पद्य भाषा मे ही नहीं हुई अपितु निबंध जैसी गद्य मरचना मे भी हुई है। सन् 1944 मे लिखित 'हड्डी का चिराग' शीर्षक निबन्ध मे वे परतत्र भारत के जन-जन को उद्बोधन शैली में जो सदेश देते हैं वह भापा मे 'ओज' की सृष्टि का परिचायक है-"ज्योतिर्मय मनुष्य । तू अपने को भूल रहा है। तुझ मे युद्ध का तेज है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी दोना के लिए प्रकाश का निर्माण किया था। तुझ मे राणा प्रताप का प्रताप है, जिसने वन-वन मारे-मारे फिरकर भी अपन 1. रेती ये फूल, पृ. 18 2 अर्धनारीश्वर, पृ. 10-11 3 रेती वे फूल, द्वितीय सस्वरण-भारत एक है, पृ० 141 दिनकर के निवध साहित्य मे भापात्मक सरचना का स्वरूप | 107 आदर्श के प्रदीप को वुझने नहीं दिया । तुझ मे मसूर की जिद है, जिसके मर जाने पर भी उसके मास की बोटी-बोटी 'अनलहक' पुकारती थी। आज या घनान्धकार तेरे पौरप को चुनौती दे रहा है । नीद से जाग । आलस्य को झाडकर उठ खडा हो । सूरज और चाद के प्रकाश में चलने वाले वहुत हो चुके है । इतिहास उनकी गिनती नहीं करता। आज तुझे अपने भीतर के तेज को प्रत्यक्ष करना है । तेरे लहू मे तेल, शिक्षा मे वर्तिका और हड्डी मे चिराग है । मिट्टी के दीये शाम को जलते और सुबह से पहले ही बुझ जाते है । आज दीवाली की रात अपनी हड्डी के उस चिराग को जला, जिसकी लो सदियो तक जलती रहती है।" 'हिम्मत' और 'जिन्दगी' शीर्षक निबन्ध मे व्यक्ति के चरित्र की मनोवैज्ञानिक व्याख्या का आलकारिक दृश्य दर्शनीय है-"जो लोग पाव भीगने के खौफ से पानी से बचते रहते है, समुद्र मे डूब जाने का खतरा उन्ही के लिए है । लहरो मे तैरने का जिन्हे अभ्यास है, वे मोती लेकर बाहर आयेंगे । चादनी की ताजगी और शीतलता का आनन्द वह मनुष्य लेता है, जो दिन भर धूप मे खटकर लौटा है।" प्रवाह-शैली मे आलकारिकता के वैभव निदर्शनीय यह अश भी उद्धरणीय है-"विचारो के ढाचे मे कही कोई तत्त्व है जो फेन और बुदबुद का विरोधी है, जो इन्द्र धनुष को धरती की वेणी पर वाधना चाहता है, जो चादनी को समेट पर शीशी मे बंद कर देना चाहता है और जिसे यह चिंता सताती है कि अधकार और प्रकाश इस प्रकार निरवयव होकर क्यो फैले ?"3 दिनकर जो वस्तुत जिन निबन्धो मे कल्पना के रगीन आवरण से अपने भावो के परिधान भाषा को पहनाकर काव्यात्मक रूप मे सामने लाते हैं, भापा मे भाव गाम्भीर्य के साथ-साथ आवर्पण भी उत्पन्न हुआ है । चित्रात्मकता दिनकर जी ने चिनात्मकता को गद्य और पद्य दोनो मे सौंदर्य का विधायक तत्त्व माना है । काव्य के सदर्भ में तो वे इसे अपरिहार्य मानते है । उनके निबन्धो मे चित्रात्मकता की वृत्ति को स्पष्टत्त लक्षित किया जा सकता है । वह अर्थवत्ता, सप्रेषण एवं सार्थकता का कारक बनकर निबन्धा में प्रयुक्त हुई है । वे उपमाओ के बल पर उन्हें ऐन्द्रिय स्वरूप प्रदान कर देते हैं। उनके निबन्ध चित्रात्मकता की कसौटी पर सर्वथा खरे उतरत है । भावात्मक एव विवरणात्मक निबन्धो मे चित्रोपम भाषा के उत्कृष्ट स्थल सजोये गए है । यथा- 1. अर्धनारीश्वर, हड्डी का चिराग, पृ. 12 2. रेती ये फूल, पृ० 1-2 1. अर्धनारीश्वर, पृ० 120 108/दिनकर का निबंध साहित्य 1 (क) “मानवता अधकार को वारा मे युद्ध कर रही है। मंमार के कोने कोने में इस प्राचीर पर प्रहार किये जा रहे है । पता नहीं, यह प्राचीर पहते वहा टूटेगा। मगर जहा भी टूटे प्रकाश का जो प्रवाह फूट निलंगा, वह एक-दो बहो को नहीं समस्त मानवता को प्लावित करेगा।" (a) "कार्तिक अमावस्या को सरणी हिन्दू-इतिहास में आलोक की लडी बनकर चमपती आयी है। प्रत्येक वर्ष की एक अधेरी रात को भारत की मिट्टी अपने अग में असख्य दीपो के गहने पहनकर तारी से भरे आकाश से होड़ लेती है और आदर्शनिष्ठ हिन्दू प्रकृति को यह सदेश देता है वि काल निर्मित कुरूप अधवार को वह सौदर्य और ज्योति दे सकता है।" अभिव्यक्ति की स्पष्टता हेतु दिनकर द्वारा पौराणिक प्राग पा यह चित्र- विधान उनकी भापा को प्राणवान बनाता है-"सभ्यता की विशाल अट्टालिकाओ पर मस्तिष्क हनुमान यन कर मानाग्नि से सबको दग्ध करता हुआ उछल रहा है और नीचे अशोक के उपेक्षित वन में हृदय की गीता वन्दिनी और उदास बनकर जी रही है ।" सूत्रात्मकता दिनकर जी ने सूत्रात्मक वाक्यो के प्रयोग से अपने निबन्धो की भापा को अर्थ-गाम्भीर्य एव उक्ति वैचित्र्य प्रदान किया है। विचारो को अभिव्यक्ति हेतु सरल एव छोटे वाक्यो का प्रयोग दिनकर के नियधो की भाषा को जीवंत बनाता है । इस विधि से भाषा सौष्ठव, कसाव, और प्रभाव मे वृद्धि हुई है। उदाहरणार्थ दिनकर जी के निवन्धो में प्रयुक्त कुछ मून वाक्य द्रष्टव्य हैं- "ईर्ष्या का काम जलाना है, मगर सबसे पहले उसी को जलाती है, जिसके हृदय में उसका जन्म होता है।" ('ईप्या तू न गई मेरे मन से) "मस्तिष्क सिद्धात बनाता है, हृदय उस सिद्धात के प्रति आस्था उत्पन्न करता है।" "मस्तिष्क आदर्श की रचना करता है, हृदय उस सिद्धात के प्रति आस्था उत्पन्न करता है।" ('हृदय की राह'-रेती के फूल) "मन्दिर है उपासना का स्थल, जहा मनुष्य अपने आपको ढूढता है।" 1. दिनकर---अर्धनारीश्वर, पृ. 5 2. वही, पृ. 10 3. वही, पृ०149 दिनकर के निवध साहित्य में भापात्मक संरचना का स्वरूप / 109 "राज भवन है दण्ड-विधा की आवाज, जहा मनुष्यो को शान्त रहने का पाठ पताया जाता है।" ('मदिर और राजभवन'-अर्धनारीश्वर) भाषा में सूत्रात्मकता का समावेश थोडे मे बहुत को जीयन्त प्रस्तुति देता निष्कर्ष दिनकर जी के निबन्धो की भापा का यध्ययन हमे युछ ऐरी तथ्यो में साक्षा- सारपराता है, जिनके आधार पर हम उन्हें भाषा-शिल्पी रचनाकार यह रास्ते है । यो तो हिन्दी के मूर्धन्य समालोचको की दृष्टि मे दिनार के भाषा-शिल्प या प्रतिमान 'उरंगी' नाट्य प्रबन्ध है; किंतु 'उर्वशी' में संस्कृतनिष्ट तत्सम शब्दा- पनी में प्रयोगों का ही वैशिष्ट्य है; जो मामान्य पाठक के लिए दुर्गम नहीं तो दुपार अवश्य है। इसके विपरीत दिनवर जी के निवन्धो की भाषा में विपय के अनुप ढलने यो अद्भुत शक्ति है । ये विपप को सरलता और गहनता ये अनुरूप निबन्धी मे भाषा या चपन करते हैं। एक समयं गम्द-शिल्पी के संस्थारी मे मपन्न होने पारण दिनकर जी नये-नये मन्द गरते हैं, पुराने शब्दों में नई आमा निपन्न करते है, गुयोध भाषा मे धारदार व्ययता उत्पन्न करते है और गबसे भरी बार भाषा में सम्प्रेषणीयता के गुण को यसरार रपते है। दिनकर जी नियन्यो यो भाषा में ओज के माय लालित्य का समावेश एक पिरत अनधि है । भाषा पर पूर्णाधिरार होने से पारण दिनकर जी निबन्धो मे दुल्ह वियो को गुगमता से प्रस्तुत पग्ने मी असाधारण क्षमता का परिचय देन है। उना मादिय गमालोचना गंधी निबन्यों में ग समता को सक्षित पिया जा माता है। वस्तुतः दिनार के निबन्धों को भापात्मर सरपना की उपलब्धि एम विरस गहनता योर गम्प्रेषणीयता ही है।

ग्रन्थानुक्रमणिका आधार-प्रथ अद्धनारीश्वर काव्य की भूमिका मिटटी की ओर ' रामधारी सिंह दिनकर 2 रामधारी सिंह दिनकर 3 रामधारी सिंह दिनकर 4 रामधारी सिंह दिनकर 5 रामधारी सिंह दिनकर 6 रामधारी सिंह दिनकर 7 रामधारा सिंह दिनकर 8 रामधारी सिंह दिनकर रती के फूल वट-पीपल वेणुवन शुद्ध कविता की खोज साहित्यमुखी सदर्भ ग्रंथ 1 आनद वधन 2 कातिमोहन 3 (डा०) कैलाशचद्र माथुर 4 पोल एव शास्त्री (स.) 5 (डा०) गणपतिपद गुप्त 6 (डा०) गुलाबराय 7 गापालराय 8 (हा०) गगाप्रसाद गुप्त १ जगदाशप्रसाद चतुर्वेदी 10 (डा.) जयनाय नलिन 11 दण्डी 12 (डा०) देवीप्रसाद गुप्त 13 (डा०) देवाप्रमार गुप्त 14 (110) दवा प्रगाद गुप्त 15 (10) दवोरण रग्नोगी IC (टा०) नगद (ग) 17 (आवाय) नमार वाजायी 18 (१०) पदमावता ध्वयालोक कुरुक्षम की मीमासा पाश्चात्य शिवध कला दिनवर सृष्टि और दृष्टि साहित्यिक निवध काव्यप समीक्षा हिदी साहित्य म निबध और निबंधकार दिनकर व्यक्तित्व एव कृतित्व हिदा निवधवार वाव्यादेश साहित्यिक निबंध स्मानायोत्तर हिदा महाकाव्य हिला महाकाव्य गिडांत और मूल्यापन हिती गाहिय या विश्पनारमर इतिहास हिदी माव्यापार गूत्र नियध नितय दिनार व्यक्तित्व एव निस्व प्रधानुक्रमणिका / 111 23. वाणभट्ट 31 मन्मथनाथ गुप्त 32.मम्मट 19. प्रतापचन्द जैसवाल : राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी साहित्य साधना 20. (डा०) प्रतिभा जैन दिनकर काव्य कला और दर्शन 21. (डा०) प्रभाकर माचवे : हिन्दी निबन्ध 22. पातंजलि : महाभाष्य : हर्षचरित 24. भगवतशरण उपाध्याय : समीक्षा के मदर्भ 25. (डा०) भगवतीचरण वर्मा आज के लोकप्रिय कवि रामधारी सिंह दिनकर 26. (डा०) भरतमुनि : नाटयशास्त 27. (डा.) भागीरथ मिश्र :काव्यशास्त्र 28. (डा०) भोलानाथ : हिन्दी साहित्य 29. (डा०) भोलानाथ तिवारी : शैली विज्ञान 30. मन्नूलाल द्विवेदी (स०) आलोक पाव्य प्रतिभा के धनी दिनकर : रामधारी सिंह दिनकर : काव्य प्रकाश 33. (डा०) माधुरी दुबे हिन्दी गद्य का वैभव 34. (प्रो०) मुरलीधर श्रीवास्तव . युग कवि दिनकर 35. (डा०) रमारानी सिंह दिनप र साहित्य मे व्यक्ति की अभिव्यक्ति 36. (डा०) रामकुमार वर्मा : साहित्य शास्त्र 37. रामगोपालसिंह चौहान : हिन्दी के गद्यकार और उनकी शैलिया 38 (डा०) राघव प्रकाश : शैली विज्ञान और पाश्चात्य एव भारतीय साहित्य शास्त्र । 39. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : हिन्दी साहित्य का इतिहास 40 रामधारी सिंह दिनकर : उजली आग 41. रामधारीमिह दिनकर कोयला और कवित्व 42. रामधारी सिंह दिनकर : चरवाल 43. रामधारी सिंह दिनकर : जीवन वृत, व्यक्तित्व और कृतित्व 44. रामधारी सिंह दिनकर : दिनकर की डायरी 45. रामधारीसिंह दिनकर : पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त 46. रामधारीसिंह दिनकर : मृत्ति तिलक 47. रामधारी सिंह दिनकर : राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता 48. रामधारीसिंह दिनकर : रेणुका 49. रामधारीसिंह दिनकर : लोकराज दिनकर 50 रामधारीसिंह दिनकर : साहित्य में व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति 51. रामधारीसिंह दिनकर : संस्कृति के चार अध्याय 52. रामधारी सिंह दिनकर : हारे को हरिनाम 53. रामधारी सिंह दिनकर हकार 54 (डा०) रामविलास शर्मा : भारतेन्दु युग .

112 / दिनकर का निबध साहित्य 5: (डा०) रामस्वरूप चतुर्वेदी भापा और सवेदना 56 (डा०) लक्ष्मीनारायण सुधाशु दिनकर 57 (डा.) लक्ष्मीनारायण मुधाशु हिन्दी माहित्य का वृहत् इतिहास 58 वामन काव्यालकार सूत्र वृत्ति 59 (प्रो०) विनोदबाला शर्मा दिनकर के काव्य मे जीवन दर्शन 60 विश्वनायप्रसाद मिश्र हिन्दी का सामयिक साहित्य 61 श्यामसुन्दरदास साहित्यालोचन 62 (डा.) शिवकुमार शर्मा हिन्दी साहित्य युग और प्रवृत्तिया 63 शिवदान सिंह चौहान साहित्यानुशोलन 64 शिवदान सिंह चौहान हिन्दी साहित्य के अस्सी वर्ष 65 (डा.) शिखरचन्द्र जैन राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी काव्यकला 66 (डा०) सावित्री सिन्हा युगचारण दिनकर 67 (प्रो०) सिद्धेश्वरप्रसाद (सं०) राष्ट्रकवि दिनकर एव उनकी साहित्य साधना 68 आचार्य सीताराम चतुर्वेदी समीक्षाशास्त्र 69 (प्रो.) सुधीन्द्र हिन्दी कविता का कातियुग 70 आचार्य डा. सुरेन्द्रदेव राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी माहित्य शास्त्री माधना 71 (डा०) सुशीना मिश्रा दिनार की साहित्य दृष्टि अगरेजी 72 एक विष्ट लिग्विस्टिक एण्ड स्टाइल 73 एफ०एल० लुकास स्टाइल 74 गेटे ए आयरेम स्टाइल इज द फेयफुल कापी आफ हिस माइन्ड 75 ग्रीनी आर्ट स एण्ड आर्ट मिटिसिज्म 76 जे० वारवर्ग सम आस्पेक्टस आफ स्टाइल 77 लुई ददले द ए मिनीटिज 78 एम० यापैकी द राइटसं क्रियेटिव इन्डीविजुवेलिटी एण्ड द डेवपमट आफ लिट्रेचर 79 मिल्टन मरि दप्रोबलम आफ स्टाइल 80 ठी०ई०म नाम आन लैंग्वेज एण्ड स्टाइल कोश एवं विश्वकोश 1 धीरेन्द्र वर्मा हिन्दी माहित्य पोश 2 टी० एडवर्ड ६न्यू डिक्शनरी आफ पाट 3 बाल एनसाइसापीडिया आफ विटानिरा पत्र-पत्रिवाए 1 आजपर 2 दिनार स्मृति अप 3 धर्मयुग, 21 अवरबर, 1972 4 साप्ताहिर हिन्दुस्तान aa 112314 नाव

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Dinker Ka Nibandh Sahitya

Author
Seema Gupta
Title
Dinker Ka Nibandh Sahitya
File name
Dinker Ka Nibandh Sahitya
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2011/03
Publisher
Kavita Prakashan Teliwada Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
116
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551162
Barcode
4990010031931.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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