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Sri Sandhichandrika

Pandith Sri Ramchandra Jha

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॥ श्रीः।।
* हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला,
२२२
॥ श्रीः ॥
सन्धिचन्द्रिका
कारक-समास-तिङन्त-कृदन्तादिपरिशिष्टसहित ।
-
लेखक:-
पण्डित श्री रामचन्द्र झा व्याकरणाचार्य
चौखम्बा-संस्कृत-पुस्तकालय, बनारस-१
० २००९]
मूल्य १)
[ सन् १९५२

प्रकाशक
जयकृष्णदास हरिदास गुप्ता,
चौखम्बा-संस्कृत-सीरिज आफिस,
पो० बाक्स नं०८ बनारस
पुनर्मुद्रणादिकाः सर्वेऽधिकाराः प्रकाशकाधीनाः
JAYA KRISHNA DAS HARI DAS GUPTA
The Chowkhamba Sanskrit Series Office,
P. 0. Box 8, Banaras.
-
मुद्रक:-
विद्याविलास प्रेस,

भाकथन संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में अन्यतम है । भारतीय पुरात-चके विषयमें पूर्ण और यथार्थ ज्ञान के लिए संस्कृत ही एकमात्र अनन्य साधारण साधन बहुत ही संतोष और प्रमोदका विषय है कि संस्कृत शिक्षापद्धतिके सुधारकी ओर भी स्वतन्त्र भारतको सरकारका ध्यान आकृष्ट हुआ है और अनुदिन हो रहा है । 'आवश्यकता आविष्कारकी जननी होती हैं अतः राष्ट्रभाषा हिन्दी स्त्रीकृत होनेके पश्चात् जब संस्कृत अनिवार्य रूपसे पढ़ने की आवश्यकता हो गयी है तव विद्वानोंने भी विविध इति कर्तव्यतामय स्वल्प श्रममें अधिक लाभप्रद ग्रन्थोंके प्रणयनमें यथेष्ट ध्यान दिया है । प्रस्तुत पुस्तिका भो उसीका हेतुभूत है। अगर अल्प वयस्क वालकों को इससे कुछ भी लाभ पहुंचा तो मैं अपने श्रमको सफल सममूंगा। इस पुस्तकके प्रणयनमें मित्रवर श्री पं० शोभित मिश्र जी न्यायव्याकरणाचार्यने विशेष सहायता प्रदान की है तदर्थ मैं उनका बहुत ही कृतज्ञ हूँ। साथ ही साथ जिन ग्रंथों से मुझे आंशिक सहायता मिली है मैं उन ग्रंथकारोंका भी विशेष आभारी हूँ। अन्तमें इस पुस्तकके प्रकाशक 'चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय' के अध्यक्ष श्रेष्टिवर स्व. बाबू हरिदासजी गुप्त के सुपुत्र बावू जयकृष्णदासजी गुप्तका आभार प्रदर्शित करना भी मेरा पुनीत कर्तव्य है । अंग्रेजके शासनकाल में जब संस्कृत मृत भाषा कही जा रही थी. उस समय भी आपका उत्साह कम नहीं था । संस्कृत के उत्थान के लिये ६२ वर्षों से निरन्तर आप भगिरथ प्रयत्न कर रहे हैं। अपने ही हाथों से एक सहस्रसे अधिक प्राचीनसे प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंको प्रकाशित कर अपने भगवती सुरभारतीकी जो सेवा की है वह सराहनीय है और इसके लिये स्वतंत्र भारत आपका कृतज्ञ है श्रावणी झूला वि० सं० २००९ विनीत श्री रामचन्द्र झा विषयसूची • .. १ संज्ञाप्रकरण सन्धिप्रकरण .. ९ स्विर-सन्धि १० २१ ३ ३९ ... ... ५७ व्यञ्जन-सन्धि (विसर्ग-सन्धि कारक-विचार समास-विचार तिङन्त-विचार कृदन्त-विचार संख्याओंका गणनाक्रम गुप्ताशुद्धिप्रदर्शन उपसर्ग-विचार अनुवादोपयोगिधात्वर्थ व्याकरणादिलक्षण विद्यार्थि-शिक्षासूत्र ... ५८ ६२ ... ६७ ७३ ७४

सन्धि-चन्द्रिका
हयवरद ५।
लण ६।
संज्ञाप्रकरण.
श्रोङ्कारं मुरलीधरं प्रभुवरं वृन्दावनाधीश्वरम्
भक्ताभीष्टफलप्रदं सुरवरैरासेव्यपादाम्बुजम् ।
वन्दे रासविहारिणं निजजनानन्दप्रदं माधवं
श्रीराधादिसमस्तगोपवनितासंसेव्यमानं प्रभुम् ॥
अइउण १ । ऋलुक् २ । एप्रोङ् ३ । ऐऔच ४ ।
अमङणनम् ७।
झमञ् ८॥
घढ्यष्९। जवगडदश् १० । खफछठयचटतव ११। कपय १२ ।
शषसर १३ । हल १४ ॥
इन्हीं चतुर्दश (१४) सूत्रोंके आधार पर महर्षि पाणिनिने समस्त व्याकरणकी
सभी बातें सरलरूपेण संक्षेप में कही हैं । ये चतुर्दश माहेश्वर सूत्र अण, अक्,
अच् इत्यादि संज्ञा ( प्रत्याहार ) सिद्धिके लिए हैं। (आचार्य पाणिनिने भगवान्
शंकरका अतिशय प्रिय डमरूके शब्दोंसे इन सूत्रोंको उपलब्ध किया था ! )
नोट:-आचार्य पाणिनि और कात्यायन दोनों पाटलिपुत्र (पटना) के महा-
प्राज्ञ श्री प. उपवर्षाचार्यजीके शिष्य थे। सतीर्थ्य होने के कारण दोनोंमें परस्पर
शाश्वतिक विरोध रहता था । एकदा कात्यायनसे परास्त होकर पाणिनि तीर्थराज
प्रयागमें अक्षयवटके नीचे जहां सनकादि ऋषि गण तप कर रहे थे वहीं जाकर
घोर तपस्या करने लगे । अनन्तर तपस्वियोंकी विकट तपश्चर्यासे प्रसन्न होकर
आशुतोष भगवान् शङ्करने ताण्डव नृत्य करते हुए उन लोगोंको दर्शन दिया और
१४ बार अपना डमरू बजाकर तपस्वियोंका अभीष्ट सिद्ध किया । जैसा कि
नन्दिवेश्वर विरचित 'काशिका में लिखा है।
-

२ सन्धिचन्द्रिका नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नव-पञ्चवारम् । उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धानेतद्विमर्श शिवसूत्रजालम् ।। (विस्तृत समीक्षा 'इन्दुमती' टीका सहित लघुकौमुदी' की प्रस्तावना में देखो) इन चतुर्दश सूत्रोंके अन्तिम वर्ण ( ण् , क् आदि ) इत्संज्ञावाले हैं हलन्त्यम्' सूत्रसे इनकी इत्संज्ञा हो जाती है। हकारादि वर्गों में संमिलित जो अकार हैं वे केवल वर्णोच्चारण करने के लिये हैं-इत्संज्ञाके लिये नहीं। 'लण्' सूत्रके मध्यमें (लकारोत्तरवर्ती ) जो प्रकार है वह इत्संज्ञक है-उच्चारण भात्रके लिये नहीं । क्योंकि उससे 'र' प्रत्याहारकी सिद्धि होती है । (१) हलन्त्यम्- उपदेश अवस्थामें जो अन्त्य हल् ( व्यञ्जन वर्ण ) उनकी इत्संज्ञा होती है। नोट:-आद्य (प्रथम ) उच्चारणको 'उपदेश' कहते हैं। व्याकरण शास्त्रके प्रवर्तक पाणिनि, कात्यायन, पतञ्जलि मुनिका जो आद्यो- चारण है उसीका नाम 'उपदेश' है । कहा भी है- धातु-सूत्र-गणोणादि-वाक्य-लिङ्गानुशासनम् । आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः ।। (२) तस्य लोपः- जिसकी इत्संज्ञा होती है उसका लोप हो जाता है। नोट:-प्रसक्त ( शानतः वा अर्थतः विद्यमान प्राप्तोच्चारण ) का जो अद- र्शन ( श्रवणाभाव ) वह लोपसंज्ञक होता है-उस अभावको लोप कहते हैं। (३) आदिरन्त्येन सहेता- अन्त्य इत्संज्ञक वर्णके साथ उच्चारित आदि वर्ण अपने तथा मध्यवर्ती वर्गों का भी बोधक हो। नोटः-'अ इ उ ' सूत्रघटक 'अण' प्रत्याहारमै अन्त्य इत्संज्ञक 'ण' के सहित उच्चारित आदिवर्ण हुआ 'अ-'। वह 'अण्' अपने बीचमें इ, उ, का तथा अपना अर्थात् 'अ' का भी संज्ञक हुआ ( एवम् अन्यत्रापि )। यथा 'अ' प्रत्याहार अ, इ, उ वर्गों की संज्ञा (बोधक ) है, तथा अच्, हल् आदि प्रत्याहारों को भी जानना चाहिये । प्रत्याहार निम्न होते हैं। - - " - , , ऐ, . . शिवसूत्र-प्रत्याहार स्यादेको अणवटः, षेण द्वौ, त्रय इह कणमैश्च । चत्वारश्च चयाभ्यां, पञ्च रेफेण, शलाभ्यां षट् ।। अक्-अ, इ, उ, ऋ,ल। एक-ए, श्रो। अच-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, ऐ,औ एच-ए, ओ, ऐ, औ। अब्-अ, इ, उ, ऋ, लू, ए, ओ, ऐ, ऐच-ऐ, औ। औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, खय-ख, फ, छठ, थ, च, ट, त, ण, न, झ, भ। अट्-अ, इ, उ, ऋ, लू, ए, ओ, ऐ, खर्व, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त,क, औ, ह, य, व, र। प, श, ष,स। अण-अ, इ, उ, ऋ, लु, ए, ओ, उम्-ङ, ण, न । औ, ह, व, र, ल। चय-च, र, त, क, प, अम्-अ, इ, उ, ऋ, लू, ए, ओ, ऐ, चर्च, ट, त, क, प, श, ष, स । औ,ह,य, व, र, ल,ज,म,,ण,न छव-छ, ठ, थ, च, ट, त । अल-अ, इ, उ, ऋ, लू, ए, ओ, ऐ, जश्-ज, ब, ग, ड,द। औ, ह, य, व, र, ल, ब,म,ड, झय-झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, ण, न, म,भ,घ,ढ, ध, ज, ब, दख,फ,छ,ठ,थ, च,ट,त,क,प ग, ड, द, ख, फ,छ, ठ,थ,च, ट, त, क, प, श, ष, स, ह। झर-झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड.द,ख, फा, छ,,थ, च,ट, अश-अ, इ, उ, ऋ, ल, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल, म, म, छ त, क, प, श, ष,स। ण, न, म, म, थे, ढ, ध, ज, झल-झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ब, ग, डसाद ड, ६, ख, फ, छ,ठ, थ,च,ट, त, क) प, श, ष, स, ह। -इ, उ,ऋ इच्-इ, उ का नए, ओ, ऐ, औ। मश्-म,भाषा, ढ, ध, ज, ब, ग, ड,द लं, ए, ओ, ऐ, औ, झर-झ, भ, घ, ढ ध। , । , - , , - र भी) पर - एक-

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re संज्ञाप्रकरण सन्धिन्द्रिका ४ २. तालु आदि स्थानों के अधोभागमें उच्चारित जो 'अ' वह 'अनुदात्त' कहलाता है। मट-मछ, ण, न, झ, भ, घ,घ, फ, छ, ठ, थ, च,टत, ज, वड, दख, फ, छठ, श, ष, स, ह। बल-व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, यन-य, के, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, भ, घ, द, ध, ज, २, ग, छ,फ,छ, ठ, थ, व, र, झा,म यम् य, व, र, ल, ञ, म, इ, ण, ना वर-व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, यय-य, व, र, ल, ग, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ङ,घ,ज,ब,ग,ड,द, शर-श, ष, स । ख, फ; छ, ठ, थ,च,ट,त,कप सल-श, ष, स, है यस्-य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, हलू-ह, य, व, र, ल, ञ, म, म.भ घ, ३, ५, ज, ब, ग, ड, न, झ, भ, घ, ङ, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च.दत ३. उदात्त और अनुदात्त जिस स्वर में समिलित हो उसे स्वरित' कहते हैं। वह ( उदात्त, अनुदात्त स्वरितभेदेन ) नौ प्रकारका हस्व, दीर्घ, प्लुत संक्षक 'अच्' पुनः अनुनासिक और अननुनासिक मेदसे दो दो प्रकारका होता है ( ४ ) मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः-- मुख और नासिका (उभय ) से जिस वर्णका उच्चारण हो वह अनुनासिक संज्ञक वर्ण कहलाता है नोट:-इस प्रकारसे 'अ, इ, उ, ऋ इन वर्षों में प्रत्येको १८ भेद होते हैं । दीर्घ न होने के कारण ४' वर्णके ( १८ भेद न होकर ) १२ मेद होते हैं। एवं ( हस्व न होने के कारण ) 'एच' वर्गों के प्रोकका भी ( अठारह २ भेद न होकर ) १२ भेद होते हैं। स्वरोका अष्टादश भेदज्ञापक चक्र- " म रल्-र, ल, ञ, म, छ, ण, न, की, भ, हर-ह, य, व, र, ल, ञ, घ, द, ध, ज, ब; ग, इ, द, ख, न, मा, भ, घ, ढ, ध, ज, अ इ उ ऋल अइउ ऋ ए पो ऐऔ अइउऋलुएनओऐौ wwwwwwwwww (४) उकालोजमस्वदीर्घप्तुत:- उकाल, शाल, उड्काल (एकमात्रिक, द्विमात्रिक, त्रिमात्रिक ) के स उचारण काल हो जिसका वह 'अच् यथाक्रमसे ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत संज्ञावाला हे नोट-मात्रा' कालको कहते हैं । मुर्गाका शब्द -कू-कु३' में एक, तीन मात्राोंका उपचय क्रमिक स्पष्ट प्रतीत होता है; अत्तः सकार ही दृष्टान में दिया गया है । हस्यादि का लक्षण- एकमात्रो भवेद्भवो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते विमानस्तु प्लुतो झेबो व्यञ्जन चार्धमात्रिका बह ( हस्ख, दीर्घ, प्लुतसंझक ) प्रत्येक 'अन्' उदात्त स्नात, र धर्मविशेषसें तीन तीन प्रकारका होता है। भाग में उच्चारित जो हस्वभेद दीघभेद प्लुतभेद १ ह्रस्व उदात्तानुनासिक ७ दीर्घ उदात्तानुनासिक १३ जुत उदात्तानुनासिक २ ,, उदात्ताननुनासिक ८ , उदात्ताननुनासिक १४ , उदात्ताननुनासिक ३ , अनुदात्तानुनासिक ९ ,, अनुदात्तनुनासिक १५ , अनुदात्तानुनासिक ४ , अनुदात्ताननुनासिक १० , अनुदात्ताननुनासिक १६ अनुदात्ताननुनासिक १६ ,, अनुदात्ताननुनासिक 1 , स्वरितानुनासिक ११ ,, स्वरितानुनासिक १७ ', स्वरितानुनासिक ६ ,, स्वरिताननुनासिक १२ , स्वरिताननुनासिक (१८ ,, स्वरिताननुनासिक (५) तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्- जिस वर्ण का जिस वर्ण के साथ तालु आदि स्थान प्राभ्यन्तर प्रयत्न एक हो वह परस्पर सवर्ण संज्ञावाला होता है। नोटः-वर्णकी (भिन्न स्थान होनेपर भी) परस्पर सवर्णसंज्ञा होती है | श सन्धिचन्द्रिका - स्थानविचार- १. अ-अकार, कु-कवर्ग, ह-और विसर्ग का उच्चारणस्थान कंठ है-अतः इनको कण्ठ्य वर्ण कहते हैं। २. इ-इकार, चु-चवर्ग, 'य' और 'श' का उच्चार- णस्थान 'तालु' है-अतः इनको तालव्य वर्ण कहते हैं। ३. ऋ-ऋकार, टु-टवर्ग, 'र' और 'ष' का उच्चारणस्थान 'मूर्धा है-अतः इनको मूर्धन्य वर्ण कहते हैं । ४ लु-लकार, तु-तवर्ग, 'ल' और 'स' का उच्चारणस्थान ‘दन्त' है-अतः इनको दन्त्य वर्ण कहते हैं । ५. उ-उकार, पु-पवर्ग और उपध्मानीय ( प फ ) का उच्चारण स्थान 'श्रोष्ठ' है-अतः इनको अोष्टय वर्ण कहते हैं। ६. 'अ-म---- न' का उच्चारणस्थान 'नासिका' तथा 'कण्ठ-तालु-मूर्धा-दन्त-ओष्ठ' भी हैं- अनः इनको नासिका तथा कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य और ओष्ठ्य वर्ण भी कहते हैं। ७. एकार-ऐकारका उच्चारणस्थान कंठ और तालु है-अतः इनको कंट्य, तालव्य दोनों कहते हैं। ८. ओकार-औकारका उच्चारणस्थान कंठ और ओष्ट है-अतः इनको 'कंट्योष्टय' वर्ण कहते हैं। ९. ८कार का उच्चारणस्थान दन्त तथा ओष्ट है-अतः इसको 'दन्त्योष्टय' वर्ण कहते हैं। १०. क ख का उच्चारणस्थान जीभका मूल ( जड़ भाग ) है-अतः इनको जिह्वामूलीय कहते हैं। ११. अनुस्वार का उच्चारणस्थान नासिका है। वर्णोद्भवस्थान ज्ञापक चक्र- कंठ | तालु | मूर्धा दन्त | पोष्ट नासिका कं. ता.क.पो.दं. ओ. जि. मू. नासिका ञ ए व क ओ ट -- ख ख ण 44.५244 449) अनुस्वार 22042 2 aa ह र ष प्रयत्नविचार- यत्नो द्विधा-यत्न ( प्रयत्न ) दो प्रकार का होता है-आभ्यन्तर और बाह्य । नोटः-"प्रकृष्टो यत्नः प्रयत्नः' अर्थात् वर्णोच्चारणके पूर्व हृदयमें जो यत्न संज्ञाप्रकरण , करना पड़ता है, उसी प्रयत्नको 'आभ्यन्तरप्रयत्न' कहते हैं । इसका अनुभव उच्चारण करने वालाको ही होता है। दूसरा प्रयत्न मुखसे वर्ण निकलते समय होता है । इसका अनुभव सुनने बालेको भी होता है, अतः वह 'बाह्यप्रयत्न' कहा जाता है। इसका उपयोग सवर्णसंज्ञामें नहीं होता, किन्तु आन्तरतम्यपरीक्षा अर्थात् वर्गों में परस्पर अत्यन्त समानताका अन्वेषण करनेके समय इससी आवश्यकता पड़ती है। पहला-'आभ्यन्तर' प्रयत्न, पांच प्रकारका है १. स्पृष्ट, २. ईषत्स्पृष्टः ३. ईषद्विवृत , ४. विवृत और ५. संवृत। इन पांचोंमें स्पृष्ट प्रयत्न ( स्पर्शका) 'क' से 'म' पर्यन्त वर्णों का है। ईष- स्पृष्ट-प्रयत्न ( अन्तःस्थोंका ) य व र ल वर्णोका है । ईषद्विवृत-प्रयत्न ( ऊष्मा- का ) शल् वर्णीका है। विवृत-प्रयत्न ( स्वरका ) अच्का है। संवृत-प्रयत्न ह्रस्व अकारका प्रयोगावस्थामें-परिनिष्टित सिद्ध रूपमें, होता है। किन्तु प्रक्रिया- दशा ( साधनिकावस्था) में विवृत ही रहता है । दूसरा बाह्यप्रयत्न' ग्यारह प्रकारके होते हैं-१.विवार, २.संवार, ३. श्वास, ४. नाद, ५. घोष, ६. अघोष, ७. अल्पप्राण, ८. महाप्राण, ९. उदात्त, १०. अनुदात्त और ११. स्वरित । नोट:-जिन वर्णीका उच्चारण करते समय कंठका विकाश हो उनको 'विवार' तदतिरिक्तको 'संवार' एवं जिन वर्णों का उच्चारण करते समय श्वास चलता हो उनको 'श्वास' जिनका उच्चारण नादसे हो उनको 'नाद' तथा जिन वर्णांका उच्चारण करनेपर गूंज होता हो उनको घोष' तदतिरिक्तको 'अघोष' एवं जिनके उच्चारण करनेमें प्राणवायुका अल्प उपयोग हो उन्हें 'अल्पप्राण' और अधिक उप- योग हो उन्हें महाप्राण कहते हैं। १. खर-प्रत्याहारका विवार, श्वास और अघोष प्रयत्न है। २. हश- प्रत्याहारका संवार, नाद और घोष प्रयत्न है । ३. वोंके प्रथम ( क च ट त प ), तृतीय (ग ज ड द ब), पंचम (ङ बण न म ) तथा यण ( य व र ल ) का अल्पप्राण प्रयत्न है। एवं वर्गों के द्वितीय ( ख छ ठ थ फ), चतुर्थ (घ झ ढ ध भ ) तथा 'शल्' (श ष स ह ) का महाप्राण प्रयत्न है। ४. 'क' से 'म' पर्यन्त ( कवर्ग, चवर्ग, वर्ग, तवर्ग, पवर्ग ) वर्ण स्पर्श कहलाते हैं। नोट:-जीभके अग्र (चोटी) उपाय (अग्रके समीपस्थ प्रदेश), मध्य , सन्धिचन्द्रिका वायु का (वीच ) और मूल (आदि ) भागद्वारा कण्ठ, तालु प्रभृति स्थानोंको स्पर्श करके कवर्गादि वर्गोंका उच्चारण होता है अतः इनका नाम स्पर्श वर्ण है। ५. यण-( य व र ल ) अन्तःस्थ कहलाते हैं। नोट:~अन्तःस्थ का मतलब है बीचवाला । 'य व र ल' स्वर और व्यंजनके बीचके हैं। ६. शल-श ष स ह ऊष्मा कहलाते हैं-जिन वर्णों के उच्चारणमें गर्म प्राधान्य हो उसे ऊम वर्ण कहते हैं। ७. अच-(अ इ उ ऋ ल ए ओ ऐ औ) स्वर कहलाते हैं। क ख-यहाँ ककार, खकारसे पूर्व विसर्गार्थ (-) के समान जो ध्वनि है वह जिह्वामूलीय है। xxफयहाँ पर पकार, फकारसे पूर्व विसर्गार्धके समान जो ध्वनि है वह उप- ध्मानीय है। अं अः-यहां पर अकारसे पर जो ध्वनि है वह यथाक्रमसे अनु- स्वार, विसर्ग वाचक है। नोटः-न्' और 'म्' के स्थानमें अनुस्वार तथा 'रेफ' के स्थानमें विसर्ग होता है अतः अनुस्वार-विसर्ग पृथक् वर्गों में नहीं गिने जाते । आभ्यन्तर और बाह्यमयत्न ज्ञापक चक्र- त्राभ्यन्तर प्रयत स्पृष्ट ईषत्स्पृष्ट ईषद्विवृत विवृत संवृत संज्ञा स्पर्श ऊष्मा स्वर उदात्त, अनु- स्वरित दात्त, गड अन्तःस्थ 44 कप ग्र व्यञ्जन, स्वर ho उ श्रो क ख घ श ब म च छ टठ ढ त थ ध अ.प्रा.म.प्रा. अल्प.प्रा.म.प्रा. अल्प. म.प्रा. म.प्रा. विवार संवार संवार संवार विवार सं. श्वास नाद नाद नाद श्वासना अघोष घोष घोष घोष अघोष घो. प्रयोग में ह्रस्व अ. लो वाह्यप्रयत्न अल्पप्राण संवार नाद घोष अल्प. संवार जाद घोष स्वरसन्धि (६) अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः जो विधान किया जाय वह प्रत्यय और तद्भिन्न अप्रत्यय कहलाता है। एवं च सूत्रार्थ यह हुआ कि )-जिसका विधान न किया गया हो ऐसाअण ( प्रत्याहार ) और उदित् ( कु चु टु तु पु ) अपने सवर्ण के बोधक हों। फल यह हुआ कि 'अस्य च्वौ' ह्रस्व अकारसे दीर्घ आकारका भी ग्रहण हुआ और उससे 'गाडी' भवतिमें 'गङ्गा' के अाकारका ईत्वविधान सफल हुआ। नोट:-केवल इसी ( अणुदित् ) सूत्र में 'अण' प्रत्याहार पर (लण्' सूत्रस्थ) णकारसे समझना चाहिये। तथा च हरिकारिका- परेणैवेणग्रहाः सर्वे पूर्वेणैवाणग्रहा मताः । ऋतेऽणुदित्सवर्णस्येत्येतदेकं परेण तु ॥ 09४२ , सन्धिप्रकरण दो वर्ण परस्पर अत्यन्त निकटवर्ती होनेसे जो मिल जाते हैं, उस मिलनको 'सन्धि' कहते हैं। सन्धि ३ प्रकारकी होती है। १. स्वर-सन्धि, २. व्यञ्जन-सन्धि और ३. विसर्ग-सन्धि। सन्धिकी व्यवस्था- 'सन्धिरेकपदे नित्या, नित्या धातूपसर्गयोः। नित्या समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥' एक पदमें, धातु और उपसर्गकी तथा समासमें नित्य ( निश्चितरूपेण ) सन्धि होती है, किन्तु वाक्यमें विवक्षाकी अपेक्षा रखती है अर्थात् वाक्यमें वक्ताकी इच्छा पर सन्धि होती है। * १. 'पद' 'सुप्तिङन्तं पदम्' 'सुप्' अथवा तिङ् प्रत्यय जिसके अन्तमें हो वह पद कहलाता है । (भ्याम् आदि हलादि विभक्ति के पूर्व जो हो वह भी 'पद' कहा जाता है)। २. 'धातु' 'भूवादयो धातवः जिन 'भू' प्रभृति शब्दोंसे क्रियाका ज्ञान हो उन्हें धातु कहते हैं। ३. 'समास' 'उपसर्गाः क्रियायोगे'-क्रियाके साथ योग होनेपर-प्र-परा-अप-सम्- अनु-अव निस-निर्-दुस्-दुर्-वि आङ-नि-अधि अपि अति सु-उत्-अभि-प्रति-परि-उप शब्दोंको उपसर्ग कहते है। ४. 'समास'दो अथवा उससे अधिक शब्दोंके मेलका नाम 'समास' है।

सन्धिचन्द्रिका उदाहरण- १. एक पदमें-ने- अयनम् = नयनम् । भोxअति भवति । २. धातु और उपसर्ग में-अधि आगच्छति = अध्यागच्छति । ३. समासमें-राज्ञःX अश्वः-राजाश्वः । ४. वाक्यमै-द्वाविंशे एव वर्षे इन्दुमती अधिजगाम नाकम् । स्वर-सन्धि स्वर वर्णको स्वर वर्णके साथ जो सन्धि होती है उसे 'स्वर-सन्धि' कहते हैं ? (१) अकः सवर्णे दीर्घः- 'अक्' प्रत्याहार घटक वर्ण से अव्यवहित परमें कोईभी सवर्ण (सजातीय) अच्' प्रत्याहार घटक वर्ण हो तो दोनो मिलकर दीर्घ होजाता है * ( यह सूत्र गुण और यण का वाधक है)। उदाहरण- १. अ अ-आ-दैत्य x अरिः = -दैत्य - अरिः = दैत्यारिः । ग्राxआ-श्रा- विद्या र अालयः = विद्यालयः। अ४ा = पा-कमल x आकरः = कमला- करः। आ४ अ=आ-श्रद्धा अस्ति = श्रद्धास्ति । २. इxइ-ई-फणि ४ इन्द्रः = फगीन्द्रः । ई x ई = ई-श्रीx ईशः = श्रीशः। ई xइ = ई-महती x इच्छा = महतीच्छा। इx ई = ई- कवि x ईश्वरः = कवीश्वरः। ३. उX3%Dऊ-भानु - उदयः = भानूदयः । ऊxऊ%Dऊ-भूX ऊर्ध्वम् = भूर्ध्वम् । ऊ x उ = ऊ-वधू x उत्सवः = वधूत्सवः। उX ऊ = -लघु X ऊर्मिः = लघूर्मिः। ४. ऋxऋ = ऋ-होतृX ऋकारः = होतृकारः । ऋx ल = ऋ-होत x लकारः = होतृकारः। * 'शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्'-शकन्धु आदिके विषयमें जिस प्रकार उनकी सिद्धि हो वैसा पररूप करना चाहिये। इसलिये-शक x अन्धुः =शकन्धुः, कर्क x अन्धुः- कर्कन्धुः । इन स्थानों में दीर्घ नहीं होता। शकन्धवादि 'आकृतिगण' है-'आकृत्या स्वरूपेण, कार्यदर्शनेन, गण्यते =परिचीयते' इति 'प्राकृतिगणः' । अतएव-मृत x अण्डः = मृतण्डः सम x अर्थः = समर्थ इत्यादिकी भी सिद्धि होती है।

स्वरसन्धि (२) श्राद्गुण:- अवर्णसे पर 'अ' * ( इ-उ-ऋ-ल वर्ण ) हो तो पूर्व परके स्थानमै गुण एक आदेश होता है । उदाहरण- १. अXइ-ए-उपX इन्द्रः % उपेन्द्रः। अxई - ए-देव x ईशः देवेशः । आxइ=ए-महा ४ इन्द्रः महेन्द्रः । आxई-ए-रमा x ईशः - रमेशः। २. अX उ = श्रो-सूर्य x उदयः = सूर्योदयः । अXऊ=ो-प्रा- साद X ऊर्ध्वम् = प्रासादोर्ध्वम् । आ x उ = श्रो-गङ्गा x उदकम् गङ्गोदकम् । आऊ = ओ-दया X ऊनः = दयोनः । ३. अXऋ = अर्-देव X ऋषिः = देवर्षिः । अX ऋ = अर्-उप x ऋकारीयति = उपर्कारीयति ! आx ऋ% अर्-ब्रह्मा x ऋषिः - ब्रह्मर्षिः ! आ X ऋ = अर्-देवता X ऋकारः = देवतर्कारः । ४. अXX = अल-प्लुत X लुकारः = प्लुतलकारः । आलु = अलू आx लुकारः = अलकारः। नोटः-विशेष रूपसे कहे गये कार्योंके प्रति सामान्य रूपसे कहे गये कार्य बाधित होजाते हैं । यथा-( गुण-बाधक वातिक )- (क) 'अक्षादूहिन्यामुपसंख्यानम्'--'अक्ष' शब्दसे पर 'ऊहिनी' शब्द हो तो पूर्व परके स्थानमें ( अX ऊ मिलकर ) वृद्धि एकादेश (औ ) होता है। यथा-अक्ष अहिनी-अक्षौहिणी (परिमाण विशेष विशिष्ट सेना +) (ख) स्वादीरेरिणोः-स्व शब्दसे पर 'ईर' वा 'ईरिन्' शब्द रहे तो अ ई मिलकर वृद्धि ऐ होता है। यथा--स्व x ईरः = स्वैरः (स्वाधीनता) स्व x ईरिन् = स्वैरी (स्वच्छन्दचारी) (ग) 'प्रादूहोढोढयेषैष्येषु-प्र उपसर्ग के वाद ऊह, ऊट, ऊढि और एष * हल x ईषा-हलीषा, लाइल x ईषा = लागलीषा, इन जगहोंमें गुण न होकर "शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्" से पररूप होजाता है। जिस सेनामें २१८७० हाथी हों और इतने ही रथ हों तथा ६५६१० घोड़े हों, १०९३५० पैदल चलनेवाले हों उन विशिष्ट सेनाओंका नाम 'अक्षौहिणी' है । प्रमाण "अक्षौ. हिण्याः प्रमाणं तु खाङ्गाष्टकद्विकैगजैः । रथैरते है यस्त्रिानैः पञ्चनैश्च पदातिभिः 'महाभारत ।

१२ सन्धिचन्द्रिका ) एष्य शब्द रहे तो अX ऊ मिलकर 'औ' तथा अX ए मिलकर बृद्धि 'ऐ' होता है। यथा-प्रX ऊहः = प्रौहः ( उत्तम तर्क)। प्रx अढः = प्रौढः ( विचारवान, निपुण ) । प्र- ऊढिः = प्रौढिः ( प्रौढता ) * प्रx एषः = प्रैषः = ( प्रेरणा ) । प्रx एष्यः = प्रेष्यः ( नौकर )। (घ) 'ऋते च तृतीयासमासे'-अवर्णसे पर ऋतशब्द हो तो (तृतीया समासमें ) अवर्ण और ऋवर्णके स्थानमें वृद्धि 'आर' होता है । यथा-( सुखेन ऋतः ) सुख X ऋतः = सुखार्तः । (E) 'प्रवत्सतरकम्बलवसनार्णदशानामृणे'-प्र, वत्सतर, कम्वल, वसन, ऋण और दश शब्दोंसे पर यदि 'ऋण' शब्द हो तो पूर्व-पर (अXऋ) मिलकर वृद्धि 'पार' होता है। यथा-प्रxऋणम् = प्राणम् । वत्सतर ४ ऋणम् = वत्सतराणम् । कम्बल x ऋणम् = कम्बलार्णम् । वसन X ऋणम् = वसनार्णम् । ऋण X ऋणम् = ऋणा- नम् ( ऋण चुकानेके लिये लिया हुआ दूसरा ऋण )। दश x ऋणः = दशार्णः । (दश ऋणानि = दुर्गभूमयः यस्मिन् प्रदेशे सः । इस प्रयोगमें ऋण शब्दका दुर्ग- भूमि अर्थ है । विन्ध्यप्रदेशका नाम 'दशार्ण' प्रसिद्ध है।) (३) वृद्धिरेचि- अवर्णसे पर 'एच' हो तो पूर्व-परके स्थानमें वृद्धि एकादेश हो ।। नोट:-'वृद्धिरादैच्' इस सूत्रसे आ और ऐक्की वृद्धिसंज्ञा होती है । एवंच श्रा-ऐ-ौ इन वृद्धिसंज्ञक वर्षों में अतिशय सादृश्यात् अकार एकारके स्थानमें पूर्व पर मिलकर 'ऐ और अकार-प्रोकारके स्थानमें पूर्व-पेर मिलकर औं होता है। उदाहरण- १. अX ए = ऐ-कृष्ण X एकत्वम् = कृष्णैकत्वम् । अx ऐ = ऐ- - प्र एषः तथा प्रx एष्यः मैं 'एङि पररूपम्' सूत्र ६ से पररूप प्राप्त था । | "निरवकाशो विधिरपवाद:-जिस विधिका अवकाश कहीं नहीं हो उसे 'अपवाद' कहते हैं। 'वृद्धिरेचि' की जहाँ प्राप्ति होती है, वहाँ आद्गुणः' अवश्य प्राप्त होता है। अतः 'वृद्धिरेचि' अपवाद हुआ और अपवाद विधि वलवान् होती है इसलिये जहां वृद्धिको प्राप्ति होगी वहाँ आद्गुण नहीं लगेगा।

स्वरसन्धि देव x ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम् । अxो = औ-दिव xोकसः-दिवौकसः । अx औ = औ-कृष्ण ४ औत्कण्ट्यम् = कृष्णौत्कण्ठ्यम् । २. आ४ ए = ऐ-सदा x एव = सदैव । आx ऐ==ऐ-महा x ऐरा- बतः = महैरावतः। आxो = औ-गङ्गा X श्रोधः = गौघः । आx औ= औ-महा x औचित्यम् = महौचित्यम् । (४) एत्येधत्यूठ- अवर्णसे पर एजादि इण धातु ( एति ), और एध धातु (एधते ) तथा ऊट रहे तो अX ए मिलकर 'ऐ' और अX ऊ मिलकर वृद्धि ‘ौ' होता है। यह सूत्र पररूप और गुण का वाधक है। उदाहरण- १. उप ४ एति = उपैति । २. उप X एधते = उपैधते । ३. प्रष्ट X ऊहः = प्रष्ठौहः ( यहां 'वाह' को “वाह ऊल्" सूत्रसे 'ऊ' आदेश होनेसे 'ऊहः' बनता है)। (५) उपसर्गाहति घातौ- अवर्णान्त उपसर्गसे पर ऋकारादि धातु हो तो पूर्व-परके स्थान में वृद्धि 'पार होता है। (यह सूत्र गुणका बाधक है) उदाहरण- १. म X ऋच्छति = प्रार्छति | उप x ऋच्छति = उपार्च्छति । प्रXऋ- णोति = प्रार्णोति । प्रxऋच्छन् = प्राच्र्छन् । उप Xऋच्छन् = उपार्छन् । (६) एङि पररूपम्- अवर्णान्त उपसर्गसे पर एकादि धातु हो तो पूर्व-परके स्थानमें पररूप एकादेश हो अर्थात् पूर्व वर्ण (अ) का दर्शनाभाव होजाय । ( यह सूत्र वृद्धिका बाधक है ) उदाहरण- १.प्र एजते प्रेजते। २. उप ४ ओषति = उपोषति।

सन्धिचन्द्रिका HOUD- - (७) अोमाङोश्च- अवर्णसे पर 'ओम्' अथवा 'आङ्' हो तो पूर्व-परके स्थानमें पररूप एकादेश हो। ( यह सूत्र वृद्धि का बाधक) उदाहरण- शिवाय xओं नमः शिवायों नमः। (आ x इहि = एहि ) शिव X एहि-शिवेहि । (८) इको यणचि- इक् प्रत्याहारके बाद यदि अच् प्रत्याहार हो तो इक् प्रत्याहारके स्थान में यण प्रत्याहार होता है। नोट:-(क) इवर्ण के बाद इवर्णभिन्न स्वरवर्ण रहनेपर इवर्णके स्थानमें 'य्' होता है। ख) उवर्णके बाद उवर्णभिन्न स्वरवर्ण परे रहने पर उवर्ण के स्थानमें '' होता है। (ग) ऋवर्णके बाद ऋ-तृभिन्न स्वरवर्ण रहनेपर ऋवर्णके स्थानमें 'र' होता है और र् पूर्व वर्णसे युक्त होजाता है । (घ) लवर्णके बाद लु-ऋभिन्न स्वरदर्ण रहनेपर लुके स्थानमें' 'ल्' होता है और ल् पूर्व वर्णसे युक्त हो जाता है। उदाहरण- १.३४ अ-य--अति - अन्नम्-अत्यन्नम् । इ४ा-य-दधिx आनय = दध्यानय । ई ओ = य–देवी ४ अर्चा = देव्यर्चा । ई x अा-य्- देवी x आगच्छति देव्यागच्छति। इx उ-य-प्रति X उपकारः-प्रत्युपकारः । इx ऊ = य–अति X ऊचुः = अत्यूचुः । ई x उ = य्-सुधी x उपास्यः = सुध्युपास्यः । ई ४ ऊ = य्-सखी X ऊरुः = सख्यूरः। इxऋ-य-अभिx ऋकारः = अभ्यकारः । ई x ऋ-य-देवी x ऋषभः देव्यूषभः । ईxऋ = य-देवी x ऋकारीयति-देव्यकारीयति । इx लु-य्-अति x लुकारः अत्यल: कारः* इ-ए-य-प्रति x एकम्-प्रत्येकम् । इx ऐ-य-मति x ऐक्यम्= * ऋकार और लकारघटित प्रयोगोंका प्रचुर व्यवहार लोक में नहीं होता। पा० महामाण्य आदि ग्रन्थों में ऐसे अधिक प्रयोग देखे जाते हैं।

स्वरसन्धि स्वकारः । मत्यैक्यम् । ई x ए-य-गौरी ४ एवम् = गौषेत्रम् । ई xऐ = य्- लक्ष्मी x ऐश्वर्यम्-लक्ष्म्यैश्वर्यम् । इx ओ=य्-दधि x प्रोदनः दध्योदनः । इx औ= य्-अति x औदास्यम् = अत्यौदास्यम् । ईxो = य–देवीxोजः देव्योजः । ई x औ= य-सखी x औपम्यम् = सख्यौपम्यम् । २. उXअ-वस्तु अत्र = वस्त्वत्र । उx श्रा--लघुx प्राचारः = लध्वाचारः । ऊx अ = व्-वधू अन्वेषणम् = वध्वन्वेषणम् । ऊ आ =-वधू आगमनम्वध्यागमनम् । उ+इ-व-लघु X इन्दुः- लधिन्दुः । उx ई = व्–मधु x ईशः = मध्वीशः। ऊx इ = व्-तनू x इन्द्रः = तन्विन्द्रः! ऊx ई =-वधू x ईक्षणाम् = वध्वीक्षणाम्। उ x ऋ-- लघु ऋणम् = लध्वृणम् । उXऋ-व-सुX नकारः = उX = व-मधु X लुतः = मध्वलतः । उ४ ए = व्-अनु X एषणम् = अन्वेषणम् | उx ऐ = व्-साधु x ऐक्यम् = साध्वैक्यम् | ऊ ए = व-वधू= एका = वध्धेका । ऊx ऐ=-तनू x ऐश्वर्यम्=तन्वैश्वर्यम् । उxो व् = साधु x ओकः = साध्वोकः । उ X औ-व्-लघु x औदार्यम् लब्बौदार्यम् ।। ऊxो = व्-दृन्भू ४ ओषधिः = इन्भ्वोषधिः। ऊx औ = व-करभूx औडलोमिः = कर चौडलोमिः । ३. ऋx अ = र्-पितृ ४ अर्थम् = पित्रर्थम् । ऋxआर- मातृ x प्राकृतिः = मात्राकृतिः । ऋX अ% कृX अर्थम् = क्रर्थम् । ऋx आ = र्- कृX प्राकृतिः = क्राकृतिः। ऋxइ-र-मातृ ४ इच्छा = मात्रिच्छा | ऋxई = र्-पितृ x ईहितम् = पित्रीहितम् । ऋx उ = र्- पितृ x उदकम् = पित्रुदकम् । ऋXऊ%र-भातृX ऊनः=भ्रात्रनः । ऋx ए = र्-धातृ एवम् = धात्रेवम् । ऋx ऐ = र्-भातृ x ऐश्वर्यम् = भात्रैश्वर्यम् । ऋx श्रो-र-जामातृ xोकः = जामात्रोकः । ऋx औ -पितृ x औदार्यम् = पित्रौदार्यम् । ४. लुx अ = ल्-M X अर्थम् = लर्थम् । लु आल-लुx आकृतिः = लाकृतिः । (8) एचोऽयवायावः- 'एच्' प्रत्याहारके बाद 'अच्' प्रत्याहार रहे तो एच्-(ए ओ ऐ श्री) के स्थानमें, क्रमसे अय् , अच् , आय , श्राव आदेश हो। %3D -- १६ सन्धिचन्द्रिका 'उदाहरण- १. एx अ अय-ने x अनम् = नयनम् । एx आ = अय-रमे x आ = रमया | ए ४ इ = अय्-शे ४ इतः = शयितः। एxई - अय-शेx ईत = शयीत । ए ४ उ = अय्-मृगे x उः = मृगयुः । एx ऊ = अय्-मेx ऊरः = मयूरः । एx ऋ = अय्-गृहे x ऋत्विक् = गृहत्विक्। एx लु- अय्-वने ~ तृतकः = वनयलुतकः । एx ए = अथ्- हरे x ए = हरये । . ए - ऐ = अय्-शेx ऐ = शयै । एओ = अय्-वने ४ ओः = वनयोः । ए४ औ = अय्-से x औ= सयौ । २. ऐxअ = पाय-नै x अकः = नायकः ऐ x आ = आय- रैx अाम् = रायाम् । ऐ x इ-आय-शैx इतः = शायितः । ऐx ई-आय्- रैx ईशः-रायीशः । ऐ४ उम्पाय-ऐ x उः-आयुः । ऐ४ ए=अाय्-रैx ए- राये । ऐx ओ=अाय- ओः = रायोः । ऐx औ-बाय-सखै x औ । सखायौ। । ३. ओ४ अ अ-भो x अनम् = भवनम् । ओ x आ = अव- गो x अाम् = गवाम् | ओइ = अवगो x इ = गवि । ओ x ई = अव- औों x ईत्-और्णवीत् । ओ x उ-अव्–अजुहो ४ उः-अजुहवुः । ओ x ए= अव्—गो x ए = गवे । ओ xओ = अ-गो+ोः = गवोः । ४. औx अ = श्राव-पौx अकः-पावकः। औ x आ-आव-ग्लौ x श्रा- ग्लावा । औx इ-अाव अभौx इ-अभावि। और उ-श्राव-अदादौ ४ उच्य- न्ताम् = अदादावुच्यन्ताम् । औx ऊ अाव-भ्वादौ ४ ऊचुः = वादावुचुः । औx ए = आ–ग्लौx एग्लावे । औx ओ = श्राव-नौ x औः = नावोः। औx औ = श्राव-गौ ४ औ = गावौ । (१०) लोपः शाकल्यस्य- अवर्णपूर्वक पदान्त यकार-वकारका लोप हो, विकल्पसे अश्के परे ( यहां लोप होने पर सन्धि नहीं होती है।) उदाहरण- १. हरे ४ इह = हर इह-हरयिह । २. विष्णो x इह = विष्ण इह-विष्णविह ।

स्वरसन्धि १७ ३. देव्यै ४ अर्पय = देव्या अर्पय-देव्यायर्पय । ४. खौअस्तगते = रवा अस्तङ्गते-रवावस्तङ्गते । (११) एङः पदान्तादति- पदके अन्तमें स्थित 'एङ्' के बाद अत्' ( ह्रस्व अकार ) रहे तो अकारका पूर्वरूप होता है अर्थात् श्रवणाभाव हो जाता है । उदाहरण- १. हरे ४ अव = हरेव । मुने ४ अत्र = मुनेत्र । २. विष्णो x अव - विष्णोव। गुरो x अव = गुरोव ! (१२) अव स्फोटायनस्य- अच् परे रहने पर पदान्त विषयमें एङन्त गोशब्दको अवङ् आदेश हो, विकल्पसे । (१३) सर्वत्र विभाषा गो:- अत् (ह्रस्व अकार) परे रहने पर पदान्त एङन्त गोशब्द ( गोशब्दावयव प्रोकार ) को विकल्पसे प्रकृतिभाव हो अर्थात् सन्धि नहीं हो। नोट:-अच् परे रहने पर पदान्तमें स्थित गोशब्दके श्रोकारको १२ वां सूत्रसे 'अव आदेश होकर १ ला सूत्रसे सवर्ण दीर्घ हो जाता है अथवा १३ वां सूत्रसे प्रकृतिभाव होता है (ज्यों का त्यों रह जाता है ) अथवा ११ वां सूत्रसे अकारका पूर्वरूप होजाता है। उदाहरण- गो x अग्रम् = गवाग्रम्-गो अग्रम्-गोग्रम् । (१४) इन्द्रे च- इन्द्र शब्द परे रहने पर गो शब्दके अोकारको नित्य ही, 'अव होता है (अवादेश होने पर अ-इ मिलकर गुण ए होजाता है।) उदाहरण- गो४ इन्द्रः = गवेन्द्रः। - -- २स०च० - (स्वरसन्धि-निषेधप्रकरण) १) दूराद्धूते च- दूरसे सम्बोधन ( नामोच्चारणकर पुकारने ) में प्रयुक्त वाक्यकी टि को विकल्पसे प्लुत हो ( अर्थात् कोई भी सन्धि नहीं हो केवल प्लुतका चिन्ह (३) रह जाय ) उदाहरण- आगच्छ कृष्ण ३ अत्र गौश्चरति । भो मित्र (३) इन्दुमती त्वां नमस्करोति । (२) ईदेवद्विवचनं प्रगृह्यम्- स्वर वर्ण परे रहनेपर द्विवचन में निष्पन्न ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त पदको सन्धि नहीं होती। उदाहरण- १. हरी - एतौ = हरी एतौ । कवी x आगच्छतः = कवी आगच्छतः। २. विष्णू x इमौ = विष्णु इमौ । ऋतू ४ अतीतौ = ऋतू अतीतौ। गङ्गे x अमू = गङ्गे अमू । बालिके x उच्चलतः = बालिके उच्चलतः । (३) अदसो मात्- स्वरवर्ण परमें रहने पर अदस् शब्द निष्पन्न 'अमी' और 'अमू' पदको सन्धि नहीं होती उदाहरण- १. अमी x ईशाः अमी ईशाः। अमी x अश्नन्ति-अमी अश्नन्ति । २. रामकृष्णावमू-X आसाते = रामकृष्णावमू आसाते । अमू X अत्तः = - अमू अत्तः। - (४) ओत- स्वरवर्ण परे रहनेपर ओकारान्त निपात । (अव्यय ) की सन्धि नहीं होती। उदाहरण- अहो x ईशाः = अहो ईशाः । अहो x आश्चर्यम् = अहो आश्चर्यम् । (५) निपात एकाजनाङ- एक स्वर मात्र निपात (अव्यय) की सन्धि नहीं होती। - स्वरसन्धि उदाहरण- अX अच्युतः = अ अच्युतः । आएवं किल तत् = आ एवं किल तत् । इ४ इन्द्रः%इ इन्द्रः । उउमेशः = उ उमेशः। नोट:-ईषत् ( अल्प ) अर्थ समझनेसे एवं क्रियाके साथ योग होनेसे तथा मर्यादा और अभिविधि अर्थमैं एक स्वर मात्र निपात होते हुए भी आङ् (आ) की सन्धि होती है । इसी लिये उपर्युक्त सूत्र में 'अनाङ' (आवर्जित) कहा गया है। उदाहरण- १. ईषत् अर्थमें-श्रा x उष्णम् = श्रोष्णम् ( थोड़ा गर्म ) २. क्रिया के योगमें-श्रा x इहिं = एहि । (आत्रो) ३. मर्यादा ( सीमा ) अर्थमें-श्रा x अम्बुधेः = अाम्बुधेः ( समुद्रतक ) ४. अभिविधि ( मर्यादाका प्रमेदव्याप्ति' अर्थमें आ x एकदेशात्-ऐक- देशात् ( एकदेश व्यापकर) सन्धि करो- १. त्रिपुर x अरिः। महा + आलयः। अभि x इष्टम् । प्रति x ईक्षणम् । भानु ४ उदयः । तनू X ऊर्ध्वम् । पितृ ऋणम् । २. देव X इन्द्रः । गण x ईशः । यथा x इति । उमा x ईशः। हित x उप- देशः । एक X ऊनविंशतिः। गङ्गा x उत्तरम् । महा ४ ऊरुः। शुभ्र ४ ऋषिः । ह्रस्व लकारः। ३. जन ४ एकता। महा x ऐश्वर्यम् । जल x अोघः। सुखस्य x औपयिकम् । ४. अव ४ एति । प्र४ एधते । विश्व X ऊहः । ५. प्रx ऋणोति । उप xऋच्छन् । ६. अव ४ एजते । उप४ एजते । प्रx ओषति । ७. का x श्रोम् । या ४ ओम् । अद्य ४ ओटा । कदाxोढा । अव ४ एहि । अद्य x अात् । ८. दधि ४ अत्र । वस्तु x इदम् । वधू आननम् । सुधी- ऊहितम् । मातृ ४ अर्थम् । गम्तृ x अर्थम् । ९. चे ४ अनम् । लोx अनम् । चैx अकः । स्तौ ४ अकः । मुने ४ ए। ..

- सन्धिचन्द्रिका गुरो ४ ए। केएते ! अ, ४ इ । अलौ ४ इ | गुरौ x उत्कः । हरौx औत्सुक्यम् । व्ये एते। १०. के x आसते । अस्मै x उद्धर । श्रियै x उद्यतः । द्वौ ४ अत्र । असौ x आदित्यः । हरेx इह । विष्णो ४ इह । ११. वायो x अत्र । कवे ४ अव । विभो र अव । हरे-४ अत्र। १२. गोx अजिनम् । गोx ईशः । गो x उष्ट्रभु । गो - ओदनम् । गो ४ अक्षः गो४ अञ्ची । गो x अक्षु । गो अग् । १३. गोx अश्वम् । गो X अजिनम् । गो- अञ्चा। गोX अक्षु । विच्छेद करो- १. शशाङ्कः । रत्नाकरः । लतान्तः । दधीव । लक्ष्मीशः। महीन्द्रः । क्षितीशः। विष्णूदयः । भूर्ध्वम् । ऊरूद्भवः । गुरूहः । २. महेन्द्रः । देवेशः । तथेति । महेश्वरः । व्याघ्रोत्पातः । इतोर्ध्वम् । महोष्णम् । विद्योनः । हिमतुः । देवतः । महर्कारः । तवल्कारः । अल्कारः । ३. पञ्चैते . शुद्धरावती। मैवम् । विद्यैश्वर्यम् । तवौदनः । चित्तौदास्यम् । महौचित्यम् । ४. अपैति । अवैधते । विश्वौहः । ५. प्रार्छन् । उपाणोति । ६. प्रेषयति । अवोषति । ७. अवेहि । रामहि । ८. अत्यव्यक्तः । हर्यागमनम् । नद्यम्बु । लक्ष्म्यागमनम् । मुन्युचितम् । इत्यू- र्ध्वम् । सख्युपदेशः । नयुष्णा । अत्य॒जुः । देव्यृणम् । नह्येवम् । अध्यैरावती। लक्ष्म्येकता। पप्यैषमः । अध्योङ्कारः । अत्यौदरिकः (भूखसे व्याकुल)। नद्योघः । देव्यौदार्यम् । तन्वङ्गी । स्वागतम् । वध्वाचारः। चञ्च्वाधातः । साध्विदम् । धेन्वीरितः । सुवीशः । वध्वैक्यम् । धेन्वोकः । जामात्रर्थम् । भ्रात्रागमनम् । कत्रिदम् । दुहित्रीहितम् । भ्रात्रुपकारः। प्रशास्त्रूर्ध्वम् । भ्रात्रेकान्तः। पित्रै- श्वर्यम् । पित्रोदनम् । कत्रौत्सुक्यम् । लर्थम् । लानय । ६. जयति । शयिष्यते । गृहयुदकम् । भूपतये। अनयोः। रायौ। ग्लायति । मुनयागच्छ । सर्वस्मायिदम् । मायुः (पित्त ) ग्लायेः । स्तवनम् । हविः । ।

व्यञ्जन-सन्धि २१ गवुत्सवः । गवैश्वर्थन् । स्मृतावौ । स्तावकः । स्मृतावः । श्रावयिष्यति । भावुकः । गवे । जनावौ। १०. ययिह । श्रियायुधतः । विधावुदिते । ११. केपि । देवोपि । पण्डितोसौ। १२. गचायनम् । गवोद्धः। १३. गवेन्द्रः। १४. एहि मित्र ३ अत्र पठेव । आगच्छ राम ३ इह मैथिली पुष्पं सञ्चिनोति । १५. कवी इमौ । शम्भू आगच्छतः । बालिके अधीयाते । १६. अमी अश्नन्ति । अनू आस्ताम् । १७. अथो अपि । अहो आगतः । १८. आ एवं नु मन्यसे । उ उमेशः । शुद्ध करो- . . रामात्र एहि, विष्णूभौ, कवीमौ, मृताण्डः, दिगेशः, स्वेरः, उपरोक्तम् , दिवो. कसः, अक्षोहिणी, प्रोढः, सुखर्तः, प्रैजते, केशवौर्ध्वम् , तबैदम् , प्रेषयति, रामहि, उपतः, प्रेषः, अवैहि, मालार्छति, प्रार्छकः, देवोजः, बालोषति मालेजते, रामेति, वेधसायोंनमः, विष्णवायोंनमः, वस्त्बुदकम् , दध्यिदम् , पित्रणम् , रयीशः, गविन्द्रः, भवुकः, देव अतति । हरौऽव, विष्णोऽव, चेऽनम् । गवे, चित्रगवानम् , गो उष्ट्रम् , गो ईशः, गो उद्धः,। , , x व्यञ्जन-संन्धि व्यञ्जन वर्णके साथ व्यञ्जन अथवा स्वर, वर्णके मेलको ‘व्यञ्जन-सन्धि' कहते हैं। यथा-तत् टीका तट्टीका । तस्मिन् X इति = तस्मिन्निति | (१) स्तोःश्चुना श्चुः- सकार और तवर्गके स्थानमें शकार और चवर्गके योग होनेपर ( आगे या पीछे रहनेपर ) दन्त्य सकारके स्थानमें तालव्य शकार और तवर्गके स्थानमें चवर्ग* होता है। * 'शात्' सू० । शकारसे पर तवर्गको चवर्ग नहीं होता। यथा-विश्नः, प्रश्नः ।

२२ सन्धिचन्द्रिका - - उदाहरण- रामस् ४ शेते = रामश्शेते। रामस् ४ चिनौति = रामश्चिनोति । तत् ४ शिवः = तच्छिवः। सत् x चित् = सचित् । तत् ४ छविः = तच्छविः । एतद् ४ जलम् = एतज्जलम् । शान् िX जय = शाङ्गिञ्जय । तत्-X मनत्कारः = तज्झनत्कारः । याच ना%D याज्ञा । जनः% यज्ञः। (२) टुना टुः- षकार या टवर्गके योगमें (आगे या पीछे रहनेपर) दन्त्य सकारके स्थानमें मूर्धन्य षकार और तवर्गके स्थानमें यथाक्रमेण टवर्ग* होता है। उदाहरण- रामस् X षष्टः = रामष्षष्ठः । रामम् ४ टीकते = रामष्टीकते। तत् ४ टीका-तट्टीका । अग्निचित् ४ ठकार:-अग्निचिट्ठकारः । सोमसुत् ४ डीनः = सोमसुड्डीनः । अद् ४ डति = अडुति। चक्रिन् ४ ढौकसे = चक्रिण्डौ- कसे | पेष्४ ता-पेष्टा | अधिष् ४ थाता = अधिष्ठाता। (३) झलां जशोन्ते- पदान्तमें + स्थित ‘झल्' प्रत्याहारके स्थानमें 'जश्' प्रत्याहार होता है उदाहरण- वाक् ४ ईशः = वागीशः। अच्X अन्तः= अजन्तः । षट् ५ विद्वांसः षविद्वांसः । जगत् ४ ईशः = जगदीशः । तत् ४ धनम् = तद्धनम् | युध्x भ्याम् = युद्भ्याम् | अप्४ भाण्डः = अब्भाण्डः । (४) झयो होऽन्यतरस्याम्- 'झय' प्रत्याहारके बाद याने ड्--ण-न्-म्-को छोड़कर वर्गके किसी * 'न पदान्ताटोरनाम् सू० । 'अनाम्-नवति-नगरीणामिति वाच्यम्' वा०॥ पदान्त टवर्गसे पर नाम्, नवति और नगरी भिन्न शब्दकै सकार और तवर्ग के स्थानमें टुत्व नहीं शेता। यथा-षट् सन्तः, षट् ते । +'झलां जश शशि' सू० । यदि अपदान्तमें 'झल' वर्णसे पर 'झश' वर्ण हो तो 'झल' के स्थानमें 'जश' (वर्गका तीसरा ) होजाता है। 'तु धू धू य उपास्यः' ऐसी स्थिति में 'ध' को 'द' होकर 'सु द् ध य उपास्यः' ऐसा बनता sho व्यञ्जन-सन्धि भी वर्णके आगे 'ह' रहे तो उस वर्गके स्थानमें उसी वर्गका तृतीय वर्ण (ग- ज्-ड्-द्-ब् ) और 'ह' के स्थानमें क्रमसे उसी वर्गका चतुर्थ वर्ण (ध-म्-ट्- ध-म् ) विकल्पसे होता है। उदाहरण वाक् हरिः = वाग्धरिः-वाग्रहरिः । तत् x हितम् - तद्धितम्-तद् हितम् । तत् ४ हननम् = तद्धननम्-तद्हननम् । विपत् ४ हेतुः-विपद्धेतुः-विपद् हेतुः । अच् ह्रस्वः = अज्मस्वः-अज् हस्वः । षट् ४ हलानि-षड्ढलानि षड्हलानि । अप्४ हरणम् = अब्भरणम्-अब हरणम् । (५) खरि च- 'खर्' परमें हो तो 'मल्' के स्थान में 'चर्' (क-च्-ट्-त्-प्) होता है । उदाहरण- १. उद्थानम्-उत्थानम् । २. उद्४ तम्भनम्-उत्तम्भनम् । ३. उद्x थापकः = उत्थापकः। दिग्४ पालः = दिक्पालः । सम्पद् ४ कामः= सम्प- कामः। विराड् पुरुषः = विराटपुरुषः । (६) तोलि:- तवर्गका 'त्-द्-न्' अक्षरके बाद 'ल' रहे तो तू-द् के स्थानमें 'ल' और 'न् के स्थानमें सानुनासिक 'लू' होता है । उदाहरण- तत् ४ लयः = तल्लयः । तद् ४ लीनः = तल्लीनः। विद्वान् ४ लिखति = विद्वालँ लिखति । (७) यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा- पदान्त 'यर् से पर अनुनासिक वर्ण हो तो 'यर' के स्थानमें विकल्पसे अपने वर्गका अनुनासिक वर्ण होजाता है । नोटः-वर्गका पञ्चम (ड्-अ-ण-न्-म् ) वर्ण परमें रहनेसे पदके अन्तमें विद्यमान वर्णका प्रथम वर्ण (क्-च-ट-त्-प्) के स्थानमें उसी वर्गका पञ्चम वर्ण और तदभावमें तृतीय वर्ण होता है। परन्तु प्रत्यय परमें रहनेपर ('प्रत्यये भाषायां नित्यम्' वा० से) सिर्फ पांचवा वर्ण ही होता है। म सन्धिचन्द्रिका . -- उदाहरण- दिक् ४ नागः = दिङ्नागः-दिग्नागः । षट X मासाः—षण्मासाः-षड्- मासाः। एतत् ४ मुरारिः= एतन्मुरारिः-एतमुरारिः । अप् ४ मग्नः = अम्मनः-अबमनः। प्रत्ययपरे रहनेपर-तत् ४ मात्रम् = तन्मात्रम् (मात्रच प्रत्ययान्त) चित् ४ मयम् = चिन्मयम् ( मयट्प्रत्ययान्त । ) (८) मोऽनुस्वारः- व्यञ्जन वर्ण परमें रहनेपर पदके अन्तमें स्थित 'म्' के स्थान में अनु- स्वार होता है । उदाहरण- हरिम् ४ वन्दे - हरिं वन्दे । पुष्पम् ४ सिञ्चति = पुष्पंसिञ्चति | गृहम् x गच्छति = गृहं गच्छति । ईश्वरं ४ भजति = ईश्वरं भजति । (९) नश्वाऽपदान्तस्य झलि- 'मल्' परे रहनेपर अपदान्त में स्थित 'न्' और 'म्' के स्थान में अनुस्वार हो जाता है। उदाहरण- आक्रम् ४ स्यते आक्रस्यते। रम् ४ स्यते । स्स्यते । यशान् ४ सि-यशां- सि । दन् शनम् = दंशनम् । * अपवाद-(क) 'मो राजि समः क्वौ विप्' प्रत्ययान्त राज्यातु परे होनेपर 'सम्' के मकारके स्थानमें मकार ही आदेश होता है अर्थात् अनुस्वार नहीं होता। यथा- सम्राट - सत्राट्। (ख) 'हे मपरे वा मकार परक हकार परमें हो तो मकार के स्थानमें विकल्पसे अनुस्वार होता है। यथा-किम् ४ मलयति =कि मलयति-किम् ह्यलयति । (ग) यवलपरे यवला वा' वा० । यकार, वकार और लकार परक हकारके पूर्व पदान्त मकारके स्थान में विकल्पसे क्रमिक सानुनासिक य-व-ल होजाता है। यथा-किम् ४ ह्यः = किय ह्यः-कियः। किम् ४ हलयति =किव वलयति-किंवलयति । किम् ४ लादयति किल हादयति-किलादयति । (घ) 'नपरे नः-नकार परक हकार परे हो तो पदान्त मकारके स्थानमें विकल्पसे नकार होजाता है । यथा -किम् ४हते =किन्हृते-किलते। - व्यञ्जन-सन्धि - - (१०) अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण:- पदके मध्य में स्थित अनुस्वार के बाद जिस वर्गका वर्ण रहता है अनुस्वारके स्थानमें उसी वर्गका पञ्चम वर्ण होजाता है । उदाहरण- आशं ४ कते = आशङ्कते । वां x छति = बाञ्छति । उत्कं ४ ठते = उत्क- एठते । शां x तः = शान्तः । पंx फुल्यते = पम्फुल्यते । (११) वा पदान्तस्य- पदान्तमें स्थित अनुस्वारसे पर 'यय' प्रत्याहारका कोई भी वर्ण हो तो अनु. स्वारके स्थान में परसवर्ण अर्थात् परवर्णके वर्गका पांचवां अक्षर और परमें य-ल-च् हो तो क्रमिक अनुनासिक विशिष्ट यं-ल- विकल्पसे होता है । उदाहरण- १. त्वं ४ करोषि = त्वङ्करोषि-त्वं करोषि । पुष्पं x चिनोति = पुष्पञ्चि- नोति-पुष्पं चिनोति । ऊर्ध्व x डीयते = ऊर्ध्वण्डीयते-ऊर्ध्वं डीयते । धनंx ददाति = धनन्ददाति-धनं ददाति | पुस्तकं x पठति = पुस्तकम्पठति-पुस्त- कं पठति। २. संx यन्ता = सय यन्ता-संयन्ता। यx लोकम् = यल् लोकम् यंलो- कम् । वशं वदः = वश बदः-वशं वदः । सम् ४ वत्सरः =स वत्सरः- संवत्सरः। (१२) नश्छव्यप्रशान्- 'अम्' परक 'छन्' प्रत्याहार परे रहनेपर प्रशान् भिन्न नान्त पदके स्थानमें रु* आदेश होता है। नोट-प्रशान्' शब्दको छोड़कर अन्यत्र यदि पदान्तमें 'न्' रहे और उसके बाद च्-छ्-ट्-त्-त्-थ् रहे तो 'न्' को रुत्व होकर च्-छ्-ट्-ठ्-त्-थ् के स्थान में क्रमसे श्च-श्छ्-ट्र--स्-स्थ् तथा उसके पूर्व अनुनासिक अथवा अनुस्वार हो जाता है। * 'रु' होने के पश्चात्-'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा” इससे अनुनासिक हो जाता है अथवा "अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः" से पूर्व वर्णको अनुस्वार का आगम होता है और "खरवसानयोर्विसर्जनीयः" से रेफको विसर्ग होजाता है। विसर्गके बाद-"विसर्जनी- २६ सन्धिचन्द्रिका महान् ४ छेदः उदाहरण- गच्छन् ४ चकोरः = गच्छंश्चकोर:-गच्छंश्चकोरः । महाँश्छेदः-महाश्छेदः । महान् ४ टीकाकारः = महाँष्टीकाकारः-महांष्टीका कारः। महान् ४ ठक्कुरः = महाँष्ठक्कुरः-महांष्ठक्कुरः । चक्रिन् ४ त्रायस्व = चबिखायस्व-चस्त्रिायस्व । क्षिपन् X थुत्कारः = क्षिपस्थूत्कारः-क्षिपस्थूत्कारः (१३ ) नश्च- नान्त पदसे पर दन्त्य सकारसे पूर्व विकल्पसे धकार आजाता है और धकारको चर्व तकार होजाता है। उदाहरण- सन् ४ सः = सन्त्सः-सन्सः। मतिमान् ४ सन्तरति = मतिमान्त्सन्त- रति-मतिमान् सन्तरति । (१४) शि तुक- पदान्त नकारसे पर तालव्य शकार हो तो नकारके आगे विकल्पसे तकार आ जाता है। नोट-तकारका आगम होनेपर प्रथम सूत्रसे 'त्' को च और 'न्' को श्रुत्व 'म्' होता है और तदुपरान्त २० वां सूत्रसे शकारको विकल्पसे छकार होता है और छकार होनेपर चकारका विकल्पसे लोप * होजाता है। उदाहरण- सन् ४ शम्भुः = सञ्छम्भुः सञ्च्छम्भुः-सञ्चशम्भुः-सअशम्भुः। - यस्य सः" से विसर्गके स्थानमें 'स' होता है ! तदनन्तर-सम्भावना रहनेपर कहीं श्चुत्व और कहीं ष्टुत्व होता है । इसी सब कार्यको ऊपर 'नोट' करके बतलाया गया है। याद रहे कि जहां कही किसी वर्ण के परे किसी वर्णको 'ह' होगा वहां उपर्युक्त विसर्ग, सत्त्वऔर अनु. नामिक अथवा अनुस्वार अवश्य होगा। नोट:-'ह' के दो प्रकरण हैं। एक अष्टम अध्यायके दतीय पादमें 'ससजुषो रु और दूसरा अष्टम अध्यायके तृतीय पादक प्रारम्भका “मतुवसो रुः सम्बुद्धौ छन्दसि" से "कानाडिते" तक है। इस द्वितीय प्रकरणके सूत्रोंसे ही विहित 'रु' से पूर्व वर्णको अनुनासिक या अनुस्वार होता है। ऐसा समझना चाहिये। * लोप विधायक सूत्र-"झरो झरि सवर्णे"-हल से पर भरका लोप हो सवर्ण मर परे विकल्पसे ।

व्यञ्जन-सन्धि २७ (१५) नन् यदि पकार परे हो तो नृन्के नकारको विकल्पसे रु(र्) होता है । (१६) कुप्वोः कः पौ च *- कवर्ग या पवर्ग ( क, ख, प, फ) परे हो तो विसर्गके स्थानमें विकल्पसे अर्ध विसर्ग (x) होता है। नोट-रुत्व होनेपर १२ वां सूत्रोक्त ( नोट ) रीत्या अनुनासिक या अनुस्वार होनेके पश्चात् रेफको विसर्ग होजाता है और विसर्ग होनेपर १६वां सूत्रको प्राति होती है। उदाहरण- १. नृन् ४ पाहि = न पाहि-नृपाहि-न:-पाहि-नृ:पाहि-नृन्पाहि । २. (कवर्गपरकका उदाहरण विसर्गसन्धिमें देखो) (१७) समः सुटि- 'सुट' (सुट् के सकार ) परमें होनेपर 'सम्' के मकारको रु (र) होता है। नोट- (२) होनेपर उससे पूर्व अकारको अनुनासिक वा अनुस्वार और रेफको विसर्ग होकर स् । हो जाता है । उदाहरण- सम् ४ स्कर्ता सस्स्कर्ता-संस्कर्ता । सम् ४ स्कार:-सँस्स्कारः-संस्कारः ।। (१८) पुमः खय्यम्परे- 'अम्' परक 'खय् परमें होनेपर पुम्के मकारके स्थानमें रु ( र् ) होता है । नोट- होनेके बाद अन्य कार्य सम् ४ स्कर्ता के समान होते हैं परन्तु सम्भावना रहनेपर कहीं श्रुत्व और कहीं ष्टुत्व भी होजाता है । उदाहरण- पुम् X कोकिलः = (स्कोकिला-पुंस्कोकिलः । पुम् ४ खनित्रम् = पुस्खनि- त्रम्-पुस्खनित्रम् । पुम् ४ चरित्रम् = पुश्चरित्रम्-पुंश्चरित्रम् । पुम् ४ टीका = पुष्टीका = पुंष्टीका। * इस सूत्रको विसर्ग संन्धिप्रकरणमें भी देखो।' * सकार विधायक वार्तिक-'संपुंकानां सो वक्तव्यः । ।

सन्धिचन्द्रिका - - ( १९) ङमो ह्रस्वादचि ङमुण नित्यम्- स्वर वर्ण परमै रहनेसे ह्रस्व स्वरके बाद पदान्त ङ्-ण-नके स्थानमें द्वित्व (दो) -ण्ण-न्न हो जाता है। उदाहरण- प्रत्य आत्मा = प्रत्यङ्ङात्मा । सुगण + ईशः = सुगएणीशः । सन् X अच्युतः = सन्नच्युतः। (२०) शश्लोऽटि- पदके अन्तमै स्थित मय प्रत्याहारके बाद तालव्य शकार हो तो शकारके स्थानमें विकल्पसे छकार होता है, अटके परे । नोट:-शकारके पूर्व तवर्ग रहनेसे तवर्गको श्रुत्व होकर चवर्ग हो जाता है। उदाहरण- तत् ४ शिवः = तच्छिवः-तशिवः। वाक् X शूरः वाकछूरः-वाकशूरः । (२१) छे च- हस्वसे पर तुक् (त् ) हो, छकार के परे । ( २२) दोर्घात- दीर्घसे पर तुक् ( त् ) हो, छकारके परे ! नोट-तुक् होनेके बाद 'त्' को श्चुत्व होकर च होता है अर्थात-स्वर वर्णके बाद छ' रहनेसे छक्के स्थानमें ‘च्छ्' होजाता है। उदाहरण- २१. शिव X छाया = शिवच्छाया | २२, आ४ छादयति = आच्छादयति । सन्धि करो १, कृष्णस् ४ शेते । तपस् ५ चिनोति । सूर्यस् ४ छन्नः । सत् x चित्रम् । तद् ४ छविः । विपद् ४ जालम् । धीमन् ४ जय । बृहद् ४ मटिका। राज्४ ना । जज नाते। २. त्रयस् ४ षटपदाः। देवस् ४ टीकते। मत् ४ टीका । एतत् ४ ठक्कुरः। महान् ४ डमरुः । जगद् ४ टक्काइ ४ तः। षष् ४ थः । ३. दिक् X अम्बरः । षट् X दर्शनम् । तत् ४ भवनम् । क्षुव्x भ्याम् । अपx अब्जम् । , व्यञ्जन-सन्धि २६ ४. दिक्x हस्ती! अच्x हलौ । रत्नमुट x हरति । ईषत् ४ हसितम् । सम्पद् ४ हर्षः । ५. उद् X स्थापयति । भेद् X तुम् । लम् ४ स्यते ।। दिक् X रक्षकः । ६. महत् ४ लावण्यम् । एतद् ४ लीला । महान् ४ लाभः । ७. दिक् ४ मुखः । षट् X मुखोऽवतरति । सत् ४ मित्रम् । अप् ४ नायकः । ८. पुस्तकम् X पठति । देवम् ४ भजति । दिव्यम् ४ सरः । ९. पयान् ४ सि । संगम् ४ स्यते । जिघान् ४ सति । वृन् x हितम् । १०. अंx कितः । अंxचितम् । लुx ठितः । गं x तव्यम् । गुंx फितः। ११. कार्य x करोति । इदं x चित्रम् । अयं x डमरुः । नदी x तरति । इदंx पुष्पम् । सं x पतति । ग्रामं x याति । धनं - लभते । हरि x वन्दे । १२. कस्मिन् ४ चित् । केशान् x छिनत्ति । महान् ४ टकारः। धीमान् ४ ठक्कुरः ।... महान् ४ तडागः । महान् थुत्कारः। १३. धनवान् ४ स्वपिति । बुद्धिमान् ४ सहते । १४. मतिमान् ४ शोभते । अप्रज्ञावान् ४ शत्रुः । १५. नृन् X पालय । नृन् X प्रतिगच्छ । १६. सम् X स्कृतम्। १८. पुम् X कार्यः । पुम् ४ छविः । १९. प्रत्यङआस्ते । सुगण ४ अस्ति । हसन् ४ आगतः । १९ मनाक् ४ शूरः । जगत् ४ शान्तिः । त्वत् श्वशुरः । अच्. शेषम् । २० तरुx छाया । चे x छिद्यते । आ४ छायम् । विच्छेद करो- १. पयश्शीतम् । देवश्चिनोति । महच्चक्रम् । शरच्छटा। जगज्जीवनम् । राजञ्जय। बृहज्मरः । राज्ञी। जज्ञ। २. देवष्षष्टः । वृक्षष्टीकते । अग्निचिट्टीकते । उड्डयनम् । एतड्ढक्का । महाण्ड- मरुः । राजण्डौकसे । हृष्टः । पुष्टः । ३. वाग्दानम् । दिगीशः । अजन्तः । वषडिन्द्राय । अब्भाजनम् । ४. वणिगधसति । उद्धरणम् । ददद्धसति । तद्धेयम् । ५. उत्तम्भते । छेत्तुम् । विराट्राजा । दिक्पालः | सन्धिचन्द्रिका ६. एतल्लयः । जगल्लीयते । ग्रन्थाल लाति । ७. धिमूर्ख ? । षण्णाम् । जगन्निस्तारः । ककुम्नायकः । ५. ग्राम शास्ति। रामं हासयति । तं हन्ति । ९. सरांसि । आक्रस्यते । ध्वस्यते । भंस्यते । १०. अङ्कितः । सञ्चितम् । कुण्ठितः। क्षन्तव्यम् । शम्भुः । ११. मधुरङ्गायति । आम्रञ्चिनोति । कथण्डीयते । शङ्खन्धमति । रामम्भजति । देवयं यजति । दिव्यल् लोकम् । सव्वत्सरः । १२. भास्वाँश्चन्द्रः। महाश्छेदः । उद्यष्टकारः। भवाष्टक्कुरः। महाँस्तरुः। महाँस्थकारः। १३. विद्वान्त्सहते । जलवान्त्सरोवरः । १४. विद्वानछोभते । शिशुञ्छाययति । १५. नृप्रतिषेधति । न प्रतिकरोति । १६. संस्स्करोति । १७. पुस्कर्तव्यः । (श्चमत्कारः । पुँष्टिटिभः । १८. धावन्नपतत् । एकस्मिन्नहनि । हसन्नामतः । १९. यावच्छक्यम् । विश्वसृट्छेते । मच्छरीरम् । षट्छ्यामाः । २०. वृक्षच्छाया। स्वच्छात्रः। शुद्ध करो- - कृष्णस्शेते। तत्छविः। अधिस्थाता । ददत्धसति । महानात्मा। विषया- नाह । जगत्नायकः । संचितः । गंगाजलम् । यमलोकम् । गच्छंचकोरः। मतिमा- नच्छान्तः । पुस्खनित्रम् । वाच्छूरः । वाक्मात्रेण । वटस्छाया । -- - विसर्ग-सन्धि (१) खरवसानयोर्विसर्जनीयः- अबसान * में रेफ हो अथवा पदान्त रेफ के बाद वर्गों के प्रथम, द्वितीय (क ख, च छ, ट ठ, त थ, पफ) और श ष स, का कोई वर्ण हो तो रेफके स्थानमें विसर्ग होता है। *विरामोऽवसानम् ।। सू०॥ जिस वर्णके उच्चारणोत्तर वर्णान्तरका उच्चारण नहीं किया गया हो उस वर्णको अवसान कहते हैं।

विसर्ग-सन्धि ३१ । यथा- विसर्ग दो प्रकारके होते हैं सजात और रजात । (क) (१) शब्द (२) विभक्ति * ( सुप्-तिङ्) अथवा (३) प्रत्यय सम्बन्धी सकारके स्थानमें '' होकर जो विसर्ग होता है, उसे 'सजात' विसर्ग कहते हैं । उदाहरण- १. निस् = निः । दुस् = दुः। शनैस् = शनैः । उच्चैस् = उच्चैः । नीचैस् = नीचैः ।हविस् = हविः । पयस् = पयः । २. देवस् = देवः । पठावस् = पठावः । ३. एकशस्-एकशः। बहुशस - बहुशः। नोट-कहां मूर्धन्य 'ष' के स्थानमें भी 'र' होकर विसर्ग होता है। यथा-सजुष् = सजूः । (ख) (१) स्वाभाविक अथवा (२) ऋकारस्थानिक 'र' के स्थानमें जो विसर्ग होता है उसे रजात विसर्ग कहते हैं। १. स्वर् = स्वः । अन्तर - अन्तः । प्रातर् प्रातः। पुनर् = पुनः । निर्=निः । दुर् = दुः । धू-धूः । २. गोर् = गीः । पूर् = पूः । मातर् = मातः। पितर् = पितः । भ्रातर् = भ्रातः । दुहितर् = दुहितः । जामातर् = जामातः । ज्ञातर् = ज्ञातः । नोट-कहीं ‘न्' के स्थानमें भी '' होकर विसर्ग होता है। यथा-अहन् =अहः । (२) कुप्वोः क-पौ च- क ख, और प फ परे रहनेसे विसर्गके स्थानमें अर्धविसर्ग () होता है अथवा विसर्गका विसर्ग ही रहजाता है। उदाहरण- कः४ करोति = क करोति, कः करोति । कः खनति = क खनति, कः खनति ।। कः- पतिक पचति, कापचति । कःX फलति = कफ- लति-कः फलति । *विभक्तिश्च ।। सू० ॥ सुप् (सु-औ-जस्, अम्-औट-शस् , या-भ्याम्-भिस् , भ्याम्-भ्यस, ङसि-भ्याम्-भ्यस् , ङस-ओस-आम् , ङि-ओस-सुप् ) और तिङ् (तिप- तस्-झि, सिप्-यस्-थ, मिप्-वस्-मस्। त-आताम्-झ-यास्-आयाम्-ध्वम्-इट्-वहि- महिङ्) को विभक्ति संज्ञा होती है।

३२ ३ सन्धिचन्द्रिका । नोट-निम्न समास स्थलमें क ख, प फ के परे विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होता है, अधः४ पदम् = अधस्पदम्। शिरः ४ पदम् = शिरस्पदम् । भाः ४ करः = भास्करः। भाः पतिः भास्पतिः । वाचः पतिवाचस्पतिः । (३) अतः कृ-कमि-कंस-कुम्भ-पात्र-कुशा-कर्णी-वनव्ययस्य समासमें-'कृ' और 'कम्' धातु निष्पन्न पद ( कार, कर, काम, कान्त ) और कंस, कुम्भ, पात्र, कुशा तथा कर्णी शब्द परमें रहनेसे, अकार से पर अव्यय सम्बन्धिभिन्न विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होता है। उदाहरण- अयः ४ कारः = अयस्कारः । श्रेयः = करः = श्रेयस्करः। अयः ४ कामः- अयस्कामः। अयः कान्तः-अयस्कान्तः। अयः ४ कंसः अयस्कंसः। पयः X कुम्भः = पयस्कुम्भः । पयः X पात्रम् = पयस्पात्रम्। अयः ४ कुशा = अयस्कुशा । अयः ४ कर्णी = अयस्कर्णी। ( ४ ) नमस्पुरसोर्गत्योः- क ख, प फ के परे गतिसंज्ञका 'नमस्' और 'पुरस्' शब्द सम्वन्धी विसर्गके स्थानमें दन्त्य 'स्' होता है। उदाहरण- नमः ४ कारः = नमस्कारः । नमः ४ करोति-नमस्करोति । पुरः ४ कारः पुरस्कारः । पुरः ४ करोति = पुरस्करोति । (५) तिरसोऽन्यतरस्याम्- क ख, प फ के परे 'तिरस्' शब्द सम्बन्धी विसर्गके स्थानमें विकल्पसे दन्त्य 'स्' होता है। उदाहरण- तिरः ४ करोति = तिरस्करोति-तिरः करोति । (६) सोऽपदादौ- पाश, कल्प, क और काम्य प्रत्ययके परे विसर्ग के स्थानसे दन्त्य 'स्' होता है। 2 "साक्षात्प्रभृतीनि च" इस सूत्रसे नमस् शब्द और पुरस् शब्दको गतिसंशा होती है । ( साक्षात् प्रभृति गण आकृतिगण है)।

विसर्गसन्धि उदाहरण पयःX पाराम् = पयस्पाशम् । यशः कस्यम् = यशस्कल्पम् । यशः कम् = यशस्कम् । यशः ४ काम्यति = यशस्काम्यति । नोट-अव्यय सम्बन्धी विसर्गः स्थानमें 'स्' नहीं होता ! यथाः-प्रातः कल्पम् । एवं 'काम्य' प्रत्ययके परे रजात विसर्ग के स्थानमें 'स्' नहीं होता। यथा--गीः काम्यति । (७) इणः प:- पाशादि प्रत्ययके परे इण्से परमें स्थित विसर्गके स्थानमें मूर्धन्य 'म्' होता है। उदाहरण- सर्पिः ४ पाशम् - सर्पिष्पाशम् । सर्पिः ४ कल्पम्-सर्पिष्कल्पम् । सर्पिः x कम् = सर्पिष्कम् । सर्पिः काम्यति = सर्पिष्काम्यति । (८) इदुदुपधस्य चाऽप्रत्ययस्य क ख, प फ के परे इकार और उकारोपध* अप्रत्यय सम्बन्धी विसर्ग के स्थानमें मूर्धन्य '' होता है। उदाहरण- निःX कृतम् = निष्कृतम् । दुःX कृतम् = दुष्कृतम् । बहिः ४ कृतम् = ब- हिष्कृतम् । प्राविः ४ कृतम् = आविष्कृतम्। चतुः ४ कोणः = चतुष्कोणः । निः x फलः = निष्फलः । निःX प्रत्यूहम् = निष्प्रत्यूहम् । (९) इसुसोः सामर्थ्य- क ख, प फ के परे इस् और उस् भागान्त शब्दके विसर्गके स्थानमें विकल्पसे मूर्धन्य 'कू' होता है। उदाहरण- सर्पिः ४ करोति = सर्पिष्करोति-सर्पिःकरोति | धनुः X करोति = धनुष्क- रोति-धनुःकरोति । (१०) नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य- समासमें क-ख 'अथवा प-फ के परे अनुत्तरपदस्थ ‘इस्' और उस् भागान्त शब्दके विसर्गके स्थानमें मूर्धन्य 'ष' होता है । *अलोन्त्यात्पूर्व उपधा ॥ सू० ॥ अन्य अल' से पूर्व वर्णकी उपधासंज्ञा होती है। ३सं०च० - सन्धिचन्द्रिका --- ३ उदाहरण- १. जर्षिः - कुण्डिका = सर्पिकुण्डिका | हविः X कुण्डम् = हविकुण्डम् । २. धनुः X खण्डम् = धनुष्खण्डम् । धनुः X पाणिः = धनुष्पाणिः ! (११) विसर्जनीयस्य सः- खर के परे विसर्गके स्थानमें सकार आदेश होता है नोट-(१) च अथवा छ के परे विसर्गके स्शनमें दन्त्य सकार होता है और उसको भी श्चुत्व होकर तालव्य शकार हो जाता है। २) ट अथवा ठ परे रहनेसे विसर्गके स्थानमें दन्त्य सकार होता है और उसको भी टुत्व होकर मूर्धन्य षकार होजाता है। ( ३ ) त अथवा थ के परे विसर्ग के स्थानमें केवल दन्त्य सकार मात्र होता है । उदाहरण- १. वालः ४ चलति = बालश्चलति | तरोःX छाया = तरोश्छाया । २. धनुःX कारः = धनुष्टङ्कारः। चतुःX ठरकुरः - चतुर ठक्कुरः। ३. विष्णुः ४ त्राता = विष्णुस्त्राता | क्षिप्तः ४ इत्कारः = क्षिप्तस्थुत्कारः । (१२) वा शारि शर के परे विसर्गके स्थान में विकल्पसे 'स्' होता है। नोट-(1) तालव्य शकार के परे विसर्गके स्थानमें विकल्पसे दन्त्य सकार होता है और तदुपरान्त श्रुत्व होनेसे वह तालव्य शकार होजाता है। १२) मूर्धन्य षकार के परे विसर्ग के स्थान में विकल्पसे दन्त्य सकार होता हे और तदुपरान्तटुल होनेसे वह मूर्धन्य षकार होजाता है। (३) दन्त्य सकार के परे विसर्गके स्थानमें विकल्पसे दन्त्य सकार मात्रहोता है। उदाहरण- १. हरिः x शेते = हरिश्शेते, हरिः शेते। शिशुः x शेते = शिशुश्शेते, शिशुः शेते। २. देवाः ४ षट् = देवाष्षट्-देवाः षट् । चतुरः X षट्पदः = चतुरष्ष- ट्पदः-चतुरः षट्पदः । ३. मनः X सुखम् = मनस्सुखम्-मनः सुखम,। प्रथमः ४ सर्गः = प्रथम- स्सर्गः-प्रथमः सर्गः।

विसर्गसन्धि Hair हश्, , (१३) समजुपो :- पदान्त सकार तथा सजुष् शब्दले षकारले स्थान, रु (२) होता है । (१४) तोरोदयजुता पडते- अप्लुत अत् के परे अप्लुत अरसे पर रु ( ) के स्थान उकार होता है नोट-उ होने पर अउ जिलकर गुण भी होता है और पुनःोके अग्रवर्ती जो 'अ' रहता है उसे पूर्वरूप होजाता है। उदाहरण- शिवस् + अर्ग्यः = शिवोऽर्यः । यशस् ४ अभिलाषी = यशोऽभिलाषी । देवस् X अयम् = देवोऽयम् । | वेदस् X अधीतः = वेदोऽधीतः । (१५) हशि च- (वर्गका तृतीय, चतुर्थ अथवा पञ्चम वर्ण अथवा य, र, ल, व, अथवा ह) के परे रहने पर भी अप्लुत अकारसे पर रु सम्बन्धी र को उ होता है। नोट-यहां उ होनेके पश्चात् गुण मात्र ही होता है । उदाहरण-- १. रामस् ४ गच्छति = रामो गच्छति । पूर्णस् X घटः = पूर्णो घटः । अद्भुतस् ४ कारः = अद्भुतो कारः । २. कृष्णस् X जयति = कृष्णो जयति । मधुरस् X मङ्कारः = मधुरो झङ्कारः । ठस्थेकस x अश्च = ठस्येको अश्च । ३. सुन्दरस् X डमरुः सुन्दरो डमरुः । बालस् ४ ढोकते = बालो ढोकते । कसन्तेभ्यस् X णः = कसन्तेभ्यो णः । ४. निर्वाणस् x दीपः = निर्वाणो दीपः । मृगस् ४ धावति = मृगो धावति । सुन्दरस् ४ नरः =सुन्दरो नरः। ५. रामस् ४ ब्रवीति = रामो ब्रवीति । मनस् ४ भावः = मनो भावः । देवदत्तस् ४ मन्यते = देवदत्तो मन्यते । ६. ( य-र-ल-व-ह) नरस् ४ याति = नरो याति । मनस् ४ रथः = मनोरथः । यशस् X लभते = यशो लभते । शिवस् ४ वन्द्यः शिवो वन्धः । वालस् ४ हसति = बालो हसति । नोट-सजात 'र' से अतिरिक्त स्थलों में 'र' के बादमें वर्गका तृतीय, चतुर्थ सन्धिचन्द्रिका या पंचम वर्ण रहे अथवा य, ल, व या ह रहे तो र अग्रिमवर्ण की चोटी पर चला जाता है। उदाहरण- १. प्रातर्X गमनम् = प्रातर्गमनम् । पुनर् धर्मः = पुनर्घमः । २. निर् ४ जलम् = निजलम् । दुर् ४ झनत्कारः = दुमनत्कारः । ३. पुनर् X डीयते = पुनडीयते । अन्तर् X ढक्का = अन्तर्डका । ४. दुर्x दिनम् = दुर्दिनम् । अन्तर्X धत्ते-अन्तर्धत्ते । पुनर् X नमनम् = पुनर्नमनम् । ५. भ्रातर् ४ याहि = भ्रातर्याहि । पुनर् ४ लब्धः-पुनर्लव्धः । जामातर् ५ वद = जामातर्वद । प्रातर् ४ हसति = प्रातहसति । (१६) भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य योऽशि- अश् के परे 'भो' पूर्वक, ‘भगो' पूर्वक, अघो पूर्वक और अवर्ण पूर्वक (र) के स्थानमें यकार आदेश होता है । (१७) हलि सर्वेषाम्- 'हल' के परे भो, भगो, अघो और अवर्ण पूर्वक य् का लोप होता है । उदाहरण- १. भोस् देवाः भो र्देवाः भो य देवाः भो देवाः । भगोस् नमस्ते भगो- र X नस्मते = भगोय् नमस्ते-भगो नमस्ते । अघोस् ४ याहि अघोर्X याहि अघीय ४ याहि अघो याहि । २. देवास् ४ हसन्ति-देवा र ४ हसन्ति = देवा य ४ हसन्ति देवा हसन्ति । . भक्तास्X भजन्ति-भक्ता र X भजन्ति भक्ता य X भजन्ति भक्ता भजन्ति | नोट-१७ सूत्र में सर्वेषाम् कहा गया है। इससे सिद्ध होता है कि हल के परे सभीके मतसे यकारका नित्य लोप हो । किन्तु 'अच्' के परे अवर्ण पूर्वक पदान्त यकार का "लोपः शाकल्यस्य” (स्वरसन्धि-प्रकरण सू० ८) से विकल्पसे लोप हो। उदाहरण- देवास् ४ इह-देवार् ४ इह-देवा य् इह-देवा इह-देवायिह । ब्राह्मणास् ५ आगताः ब्राह्मणा र आगताः = ब्राह्मणा य् अागता = ब्राह्मणा आगताः- ब्राह्मणायागताः। देवासः ४ ऊचुः = देवा र ४ ऊचुः = देवा य ऊचुः = देवा ऊचुः-देवायूचुः । रामस् ४ एति = राम र् X एति = राम य् एति = राम एति- रामयेति । एवं-देव इच्छति-देवयिच्छति इत्यादि ।

विसर्गसन्धि LAN -- (१८)रो रि- रेफ के परे रेफका लोप होता है । ( १९) दूलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण:- ढकार * और रेफ लोपके निमित्त ढकार और रेफके परे पूर्व अण्के स्थानमें दीर्घ आदेश होता है। उदाहरण- पुनर् ४ रमते = पुन X रमते = पुना रमते । हरिर् ४ रम्यः = हरि x रम्यः= हरी रम्यः । शम्भुर् X राजते-शम्भु x राजते-शम्भू राजते। अन्तर्४ राष्ट्रीयः- अन्त X राष्ट्रीयः=अन्ताराष्ट्रीयः । हरिर्X रक्षति-हरि ४ रक्षति-हरी रक्षति ( २० ) एतत्तदोः सुलोषोऽकोरनसमासे हलि- नन् समास । को छोड़कर-हल् के परे ककार । रहित एतद् और तद् शब्द सम्बन्धी सु (स् ) का लोप होता है। उदाहरण- एषस् x विष्णुः = एष विष्णुः। सस् ४ शम्भुः = स शम्भुः चलति = एष चलति । एषस् ४ हसति = एष हसति । ( २१ ) सोऽचि लोपेचेत्पादपूरणम्- लोप होनेसे ही , यदि पादकी पूर्ति होती हो तो अच् के परे स ( तत्- शब्द ) सम्बन्धी मु (स् ) का लोप होता है * ढकार लोपका उदाहरण तिङ्न्तमें देखो ?-लिद् ढ:-लिX ढः =लीढः । अलि x =अलि x = अलीढ । 1 नअसमासमें सकारका लोप नहीं होता। यथा-न सः असः, असस्४ शिवः= असः शिवः। + एतद् शब्दसे "अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः" इस सूत्रसे अकच् होकर 'एषकः' रूप बनता है। वहां हल के परे सकारका लोप नहीं होता इसी लिये ककार रहित कहा गया है। उदाहरण यथा-एषकसx रुद्रः = एषको रुद्रः। यहां लोप नहीं होकर रुत्व-उत्व-गुण हो जाता है। अत एव "सोऽहमाजन्मशुद्धानाम्" यहाँ लोप नहीं हुआ। क्योंकि लोप नहीं होने पर भी सकारको रुत्व, उत्व, गुण तथा पूर्वरूप होनेसे भी (प्रयोग सिद्ध होता है और) पादकी पूत्ति हो जाती है। एषस्x सन्धिचन्द्रिका उदाहरण- सस् ४ इमामविढि प्रभृतिम् = स ४ इमामविद्धि प्रभृतिम् = सेमामविड्डि प्रभृतिम् - ( लोप होने पर गुण हो जाता है )। सस् + एष दाशरथी रामः = स X एष दाशरथी रामः = सैप दाशरथी रामः + ( लोप होने पर वृद्धि हो जाती है) सन्धिकरो- पुनर् X करोति । रामःX ब्रुध्यति । यशः X करः । नमः X कारः । पू: x काम्यति । हविः ४ काम्यति । निःX फलम् । धनुः ४ खण्डितम् । धनुः ४ खण्डम् । गोपालः ४ शेते । रामः X अयम् । चन्द्रशेखरः ४ हसति । पुनः X हसति । भोः ४ नमस्ते । अन्तर् ४ रामः । शुद्ध करो- रामो क्रुध्यति । श्रेयष्करः ।अधिस्थाता, अहर्मु । हविर्कुण्डम् । सो रामः । बालो चलति । मनो सुखम् । एषो बालः । सूर्यो शोभते । हतो शत्रुः। मनो कल्पना । अज्ञो इन्द्रः। यशाल्लभते। प्रातो गमनम् । देवाः हसन्ति । अहोगतः । अन्तर्राष्ट्रीयः भ्रातः रमय । एषो विष्णुस्शिवो वा । इति सन्धि-प्रकरण समाप्त । * "सेमामविढि प्रभृति य ईशिधे" यह वैदिक छन्द "जगतो'का एक पाद है १२ अक्षर होने पर इस पादकी पूत्ति होती है। यदि यहां लोप नहीं होगा तो १३ अक्षर होजांयूगे और उससे छन्दोमङ्ग हो जायगा । 1. संपूर्ण श्लोक इस प्रकार का है- "सैष दाशरथी रामः, सैघ राजा युधिष्ठिरः। सैष कर्णो महात्यागी, सैष भीमो महाबलः ॥” इति । यह अनुष्टुप् छन्द है । इसके प्रति पादमें ८ अक्षर होते हैं। यहां सु का लोप नहीं होनेसे सकारको रुत्व, यत्व तथा "लोप शाकल्यस्य" से यकारका लोप हो जायगा और यलोपके असिद्ध होनेसे फिर वृद्धि नहीं हो सकेगी। एवंच प्रत्येक पादमें ९ अक्षर हो जायेंगे जिससे पाद की पूर्ति न हो सकेगी। P- परिशिष्टम् (१) कारक-विचार- करोति क्रियां जनयतीति कारकम् । क्रिया के उत्पादक को कारक कहते हैं संस्कृत व्याकरण में सम्बोधन और सम्बन्ध को छोड़कर छ कारक कहे गये हैं- कर्ता कर्म च करणाञ्च सम्प्रदानं तथैव च । अपादानाधिकरणञ्च इत्याहुः कारकाणि षट् ।। 'स्वतन्त्रः कर्ता'-किसी भी काम को करने में जो पूर्ण स्वतन्त्र हो ( दूसरों के अधीन न हो । उसे कर्ता कहते हैं । 'रामो गृहं गच्छति' यहाँ पर घर जाने में राम स्वतन्त्र है, इसलिये उक्तवाक्य में राम ही कर्ता है । 'सम्बोधने च'-'सम्बोधनं स्वाभिमुखीकरणन् ।' प्रयोजनक्श आह्वान के द्वारा जिसको अपनी ओर किया जावे उसे सम्बोधन कहते हैं और सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति होती है जैसे हे राम ! यहाँ पर पुकार कर राम को बता अपनी ओर करता है, इसलिये 'राम' सम्बोधन हुआ और उसमें प्रथमा हुई। प्रायः करके चेतन पदार्थों में ही सम्बोधन किया जाता नोट-भवेद्विभक्तिः प्रथमा कर्तृवाच्यस्य कर्तरि । सम्बुद्धौ नाममात्रे च कर्मवाच्यस्य कर्मणि ।। क्वचिदव्यययोगे च प्रथमा कथ्यते बुधैः ॥ 'कर्तुरीप्सिततमं कर्म-कर्ता अपनी क्रिया ( व्यापार ) द्वारा जिसको प्राप्त करना चाहता है उसे कर्म कहते हैं । और अनुक्त कर्म में द्वितीया होती है। "कृष्णो * संस्कृत साहित्यमें कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, और भाववाच्यमें प्रयोग किये जाते हैं । कर्तृवाच्य में कर्ता के अनुसार क्रिया में वचन पुरुषादि को व्यवस्था होती है। कर्ताके एकत्व, द्वित्व, और बहुस्त्र के अनुसार क्रिया में एकवचन द्विवचन और बहुवचन होते हैं और युष्मदकर्ता की प्रधानता होने पर क्रियामें मध्यम पुरुष, अस्मद्कर्ताकी प्रधानता होने पर उत्तम पुरुष और इन दोनोंके अप्राधान्यमें या अभावमें प्रथम पुरुष होता है जैसे क्रमसे 'त्वं पश्यसि' 'अहं पश्यामि' 'मोहनःपश्यति' इत्यादि । इसी तरह 'युवां पश्यथः, 'यूयं पश्यथ' 'आवां पश्यावः' 'वयं पश्यामः' "चैत्रमैत्रौ पश्यतः” 'गुरवः पश्यन्ति', इन सभी वाक्योंम कर्ताके प्राधान्य होनेसे उसीके अनुसार क्रिया हुई है, इसलिये इसे कर्तृ. वाच्य कहते हैं। कर्तृवाच्यमें कर्तासे प्रथमा विभक्ति होती है। ((३) 'तिङन्तविचार' देखो) सन्धिचन्द्रिका । प्रामं गच्छति" इस वाक्य में ग्राम कर्म है क्योंकि कृष्ण गमन क्रिया द्वारा ग्राम को प्राप्त करता है इसलिये ग्राम कर्म हुआ इस कर्म के तीन भेद हैं- 'निर्वर्त्य' 'विकार्य' और 'प्राप्य' । 'घट करोति' 'तण्डुलं पचति 'ग्रामं गच्छति' ये क्रमशः तीनों के उदाहरण है। 'तथायुक्तं चानीप्सितम'–उत्तकर्म के और भी दो भेद हैं-'उपेक्ष्य ( उदासीन ) और 'द्वेष्य' । इच्छा के नहीं रहने पर भी कर्ता अपने व्यापार द्वारा जिसको आनुषङ्गिकरूप ( अनायास ) से प्राप्त कर लेता है उसे ही 'अनीप्सित' ( उपेक्ष्य और द्वेष्य ) कर्म कहते हैं। जैसे 'ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' 'प्रोदनं भुञ्जानो विषं भुक्त' यहाँ पर ग्राम जाना ही कर्ता का अभिलषित है तृण का छूना तो यों ही हो जाता है। इसी तरह भात खाना ही कर्ता का इष्ट है, जहर खाना उसका इष्ट नहीं फिर भी धोखासे चावल के साथ जहर भी खा जाता इसलिये उक्त स्थलों में क्रमशः 'उपेक्ष्य' और 'द्वेष्य' कर्म के उदाहरण सम भने चाहिये। 'अकथितञ्च' -अपादान वगैरह कारकों की अविवक्षासे कर्मत्व रूप में ही वक्ता की विवक्षा होने पर अपादानादि भी कर्म हो जाते हैं। इसे 'अकथित' कर्म कहते हैं । जैसे 'गां दोग्धि पयः' 'बलिं भिक्षते वसुधाम्' 'सुधां क्षीरनिधि मध्नाति' 'अजां ग्रामं नयति गर्गान् शतं दण्डयति' 'माणवकं धर्म शास्ति' इत्यादि । नोट-कर्मलक्षण यथा-"कर्तृवृत्तिव्यापारप्रयोज्यफलवत्वप्रकारकेच्छा- निरूपितविषयताश्रयत्वम्" । * कर्मवाच्य में कर्मको प्रधानता होती है, और कर्मके अनुसार क्रिया में वचन पुरुषा- दिकी व्यवस्था होती है, जैसे 'रामेण घटौ क्रियेते' यहाँ पर दो घटरूप कर्मके प्राधान्य होनेसे क्रियामें भी द्विवचन एवं प्रथम पुरष हुआ। परन्तु कर्मप्राधान्यस्थलमें कर्मके उक्त होनेसे कर्ममें प्रथमा विभक्ति हो जाती है, और कर्ता में तृतीया विभक्ति हो जाती है क्योंकि उक्त- वाक्य में कर्ता अनुक्त है इसलिये "कर्तृकरणयोस्तृतीया' इससे अनुक्त कोमें तृतीया हुई। किन्तु कर्ताके उक्त होनेसे प्रथमा और कर्म के अनुक्त होने पर द्वितीया होती है जैसे "देव ओदनं पचति'। कर्मवाच्य में धातुसे आमनेपद ही आता है और मध्यमें यक प्रत्यय लग जाता है। भाववाच्यमें क्रियाकी प्रधानता होती है और अकर्मक धातुसे ही भावमें लकार होते हैं। इसलिये कर्ता के अनुक्त होनेसे तृतीया हो जाती है। और क्रिया में एकवचन और प्रथम पुरुषही होते हैं जैसे 'त्वया, मया चैत्रेण वा भूयते' इत्यादि । ( (३) 'तिङन्तविचार' देखो) कारक-विचार ४१ 'साधकतमं करणम्'-जिसके व्यापार के अव्यवहित (तुरत ) उत्तरकाल में क्रिया की निष्पति होती है उसे करण कहते हैं और अनुक्त करण में तृतीया होती है। जैसे-रामेण बाणेन हतो बाली' यहाँ पर बाण के व्यापार होने के अत्याहित उत्तर काल में ही वाली का हनन हो जाता है इसलिये बाग करण और उक्तस्थल में कर्म में क्त प्रत्यय होने से करण अनुक्त रहा इसलिये अनुक्त करणमें “कर्तृकरणयोस्तृतीया” इससे तृतीया हुई। उक्तस्थल में रामकर्ता को करण नहीं कह सकते क्योंकि राम के व्यापार के अव्यवहित उत्तर क्षण में हनन क्रिया नहीं हो पाती है इसलिये कर्ता करण नहीं हो सकता। परन्तु यह करण- त्वादि वक्ता के विवक्षाधीन माना गया है। अर्थात् कर्तादि कारकों को भी जब वत्ता करणत्वेन विवक्षित कर देता है तव कादि भी करण हो सकता है परन्तु ये सारी बातें वक्ता की विवक्षा के ऊपर निर्भर रहती हैं। भर्तृहरि ने भी इस बात को पुष्ट किया है-'क्रियायाः परिनिष्पत्तिर्यद्व्यापारादनन्तरम् । विवक्ष्यते यदा यत्र करणं तत् तदा स्मृतम् ।' 'वस्तुतस्तदनिर्देश्यं नहि वस्तु व्यवस्थितम् । स्थाल्या पच्यते ह्यषा विवक्षा दृश्यते यतः।' इत्यादि। 'हेतौ'-हेतु में भी तृतीया होती है। जैसे 'दण्डेन घटः' 'पुण्येन दृष्टो हरिः' यहाँ पर घटकार्य के प्रति दण्ड हेतु है एवं हरि दर्शन के प्रति पुण्य (धर्म ) हेतु है । हेतु को करण नहीं कह सकते क्योंकि क्रिया मात्र का जनक एवं व्यापा- रवान् करण होता है, किन्तु द्रव्य गुण क्रियाओं का जनक व्यापारवान् और कहों पर व्यापाराभाववान् भी हेतु होता है जैसे 'दण्डेन घटः' यहाँ पर दण्ड व्यापारवान् एवं घटरूपद्रव्य का जनक है, इसी तरह "पुष्पेन दृष्टो हरिः” यहाँ पर पुण्य दर्शन- क्रिया का जनक होते हुए भी व्यापार शून्य है इसलिये इन दोनों को करण नहीं कह सकते । “कुठारेण काष्टं छिनत्ति' यहाँ पर कुल्हाड़ी करण है क्योंकि यह छेदनक्रिया मात्र का जनक और व्यापारवान् भी है। इसी तरह जिस अङ्ग के विकार से शरीरी में बैगुण्य व्यवहत होता हो उससे भी तृतीया होती है जैसे "अक्षणा काणः" "पादेन खनः" इत्यादि । नोट-हेतु और करणके लक्षणों में विभिन्नता-१. 'द्रव्य-गुण-क्रिया- त्मककार्यत्रयनिरूपित-निर्व्यापार-सव्यापार-वृत्ति च यत्तद्धेतुत्वम्' । २. “क्रियाजनकमात्रवृत्तिव्यापारववृत्ति च यत्तत् करणत्वम्" ।

सन्धिचन्द्रिका तृतीया कहां २ होती है इसके लिये निम्न कारिका स्मरण रखने योग्य 'तृतीया करणे चैव कर्मवाच्यस्य कर्तरि । सहाथैश्च तथा हेतौ प्रकृत्यादिभ्य एव च ।। ऊनाथारणार्थश्च सहशार्थस्तथैव च । अङ्गिनो विकृतिर्येन तृतीया त्यात्तदङ्गतः ।। 'कर्मणा यमभिप्रेति स सम्प्रदानम्'-दान क्रिया के कर्म के साथ जिसका सम्बन्ध स्थापित किया जाय उसे सम्प्रदान कहते हैं। जैसे 'विप्राय गां ददाति' यहां पर दान क्रिया के कर्म गो के साथ वाहण का स्वत्व ( अधिकार) सम्बन्ध स्थापित किया गया है इसलिये ब्राह्मण सम्प्रदान हुआ। और अनुक्त सम्प्रदान में चतुर्थी हो जाती है। 'रजकाय वनं ददाति' ऐसा वाक्य नहीं होता किन्तु 'रजकस्य वस्त्रं ददाति' ऐसा वाश्य ही शुद्ध माना गया है, क्योंकि जिस वस्तु से जब बिलकुल ही अपना अधिकार हट जाय और दूसरा ही व्यक्ति उसका मालिक हो जाय तभी चतुर्थी मानी जाती है । सम्प्रदान शब्द का अर्थ भी यही होता है कि सर्वथा अपना अधिकार हटाकर दूसरे का अधिकार स्थापित हो जाय, क्योंकि 'स्वस्व- स्त्रनिवृत्तिपूर्वकपरस्वत्वोत्पत्तिजनक व्यापार' ही दाधातु का अर्थ माना गया है। कोई विद्वान् तो 'परस्वत्वोत्पतिजनकव्यापार' को ही दाधात्वर्थ मानते हैं। उनकी विचार धारा से त्याग वाक्य में 'हरये नमः' इत्यादि स्थल में इदं न मम' ऐसा जोड़ना जरूरी हो जाता है। लेकिन उक्त सिद्धान्त पक्ष में इस को जोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। "नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलं वषट्योगाच्च"-तमः प्रभृति शब्दों के योग में भी चतुर्थी होती है । जैसे 'हरये नमः' 'प्रजाभ्यः स्वस्ति' 'अग्नये स्वाहा' इत्यादि । "क्रियया यमभिप्रेति सोऽपि सम्प्रदानम्”–जिसके उद्देश्य से कुछ क्रिया की जाती है उसे भी सम्प्रदान कहते हैं। जैसे 'पत्ये शेते' इस वाक्य में पति के उद्देश्य से शयन क्रिया का विधान किया गया है इस लिये पति की सम्प्रदान संज्ञा और चतुर्थी हुई। नोट-चतुर्थीके लिये निम्न कारिका स्मरण करने योग्य है- 'सम्प्रदाने चतुर्थी स्यात् तादर्थं च क्रियायुते । रुच्यर्थानां प्रियमाणे नमो योगे च सा भवेत् ।।' 'ध्रवमपायेऽपादानम्'-जिस से किसी भी वस्तु का विश्लेष (अलगाव ) - कारक-विचार , होता है उसे अपादान (ध्रुव) कहते हैं, 'वृक्षात्पर्ण पतति' इस वाक्य में वृक्ष ले पत्ते का वियोग होता है इसलिये वृक्ष अपादान हुआ। अर्थात् प्रस्तुत धात्वर्थव्यापार का जो आश्रय नहीं हो किन्तु विछुड़ाव में अवधि होता हो उसे ही ध्रुव या अपादान कहा गया है । और अनुक्त अपादान में पञ्चमी विभक्ति होती है। जिस मे नियमानुसार विद्यादि ग्रहण किया जाता है उस से भी पञ्चमी, होती है जैसे 'गुरो- रधीते' गुरु से नियमपूर्वक विद्या पढ़ता है। जिससे डरना या लुकना एवं त्राण चाहता हो उससे भी पञ्चमी होती है जैसे 'चौराद् विभेति' 'मातुर्निलीयते' 'सिंहात् त्रायते' इत्यादि । जहां से जिसकी उत्पत्ति एवं अभिव्यक्ति होती है उससे भी पञ्चमी मानी गई है जैसे-'ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते' 'हिमतो गङ्गा प्रभवति' इत्यादि । नोट-अपादाने ल्यबर्थे च योगे पूर्वादिभिस्तथा । उत्कर्षे पञ्चमी ज्ञेया हेत्वर्थे तु विभापया ।। ऋते विनादिभियोगे पञ्चमी च स्मृता बुधैः ।। 'षष्ठी शेपे'-उक्त अर्थो से भिन्न स्वस्त्रामिभावादि सम्बन्ध सामान्य में पी होती है। जैसे 'राज्ञःपुरुषः' 'चैत्रस्य पुत्रः' इत्यादि। सम्बन्ध षष्टी को कारक नहीं माना गया है क्योंकि सम्बन्ध में क्रिया जनकत्व रूप कारकल नहीं हो सकता । जैसे 'माणवकस्य पितरं पन्थानं पृच्छति' इस वाक्य में पिता से ही प्रश्नादि क्रियाकी उपपत्ति हो जाने के कारण उसके प्रति माणवक अन्यथा सिद्ध हो जाता है। घट कार्य के प्रति दण्डादि का कारणत्व सर्वमत सिद्ध होने पर भी रासभ को कारण नहीं माना गया है, इसलिये कारणत्व के लक्षण में "अन्यथासिद्धिशून्यत्वे सति नियतपूर्ववृत्तित्वरूप” निवेश करना जरूरी हो जाता है ऐसी स्थिति में रासभ अन्यथा सिद्ध होने से कारण नहीं हो सकता, इसी तरह प्रकृत में माणवक भी अन्यथा सिद्ध होने से क्रियाजनक नहीं हो सका। अतः कारकत्व भी सम्बन्ध षष्ठी को नहीं माना गया। नोट---षष्ठी भवति सम्बन्धे कृदन्ते कर्तृकर्मणोः । तृतीया स्यात् तथा षष्ठी कृत्यानां कर्तृकारके ।। तुल्यार्थयोगे षष्ठी स्यात् तृतीया च विभाषया ।। 'आधारोऽधिकरणम्'-कर्ता और कर्म के द्वारा तवृत्ति क्रिया का जो आधार होता है उसे अधिकरण कहते हैं। जैसे 'कटे प्रास्ते' 'स्थाल्यां पचति' यहां ।

सन्धिचन्द्रिका पर चटाई और बटलोही, देवदत्तादिकर्ता एवं तण्डुल कर्म के द्वारा उपवेशन एवं विक्लेदन क्रिया का आधार होती हैं इसलिये इन्हें अधिकरण संज्ञा हुई और अनुक्त अधिकरण में सप्तमी विभक्ति हुई। अविकरण के तीन भेद हैं-'औपश्लेषिक' 'वषयिक' और 'अभिव्याएक' । क्रमशः तीनों के उदाहरण निम्न प्रकार समझने चाहिये कटे आस्ते 'मोक्षे इच्छास्ति' 'तिलेषु तैलम्' इत्यादि । नोट-आधारे च तथा भावे विभक्तिः सप्तमी भवेत् । अनादरे च निर्धारे षष्ठी स्यात् सप्तमी तथा ।। छै कारकों के उदाहरण एक ही साथ निम्न श्लोक में देखो:- रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे । रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः । रामान्नारित परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् । रामे चित्तलयः सदा भवतु मे हे राम मामुद्धर ।। (२) समास-विचार- 'समसनं समासः'-संक्षेप को समास कहते हैं। अर्थात् बड़े वाक्य को छोटा करना ही समास का मुख्य उझेश होता है। और विस्तार को व्यास कहते हैं। व्याकरण में विस्तृत वाक्य ही व्यास पद से लिया जाता है । लाघव के लिए किसी पदसमूह को छोटा करना हो तो वहां पर समास कर दिया जाता है जिससे वह पदसमुदाय छोटा हो जाता है, समास करने का यही प्रयोजन है। कृदन्त-तद्धितान्त-समास-एकशेष और सनादि द्वादश प्रत्ययान्तधातुरूप, ये पांच वृत्तियां मानी गयीं हैं। जैसे पाचक, औपगव, राजपुरुष, पितरौ पुत्रीयति इत्यादि, इन वृत्तियों में विशिष्ट ( समुदाय ) में ही अर्थबोधजनकशक्ति मानी गयी है, यह शक्ति दो प्रकार की है-'एकार्थीभाव' और 'व्यपेक्षा' । तत्र 'पृथगर्थानां पदानां समुदायशक्त्या विशिष्टैकार्थोपस्थितिजनकत्वम् , एकार्थीभावत्वम् , पृथक् २ अर्थवाले पदों में समुदाय शक्ति से पानी में मिली हुई धूलि की तरह मिले जुले अर्थों का ज्ञान कराने वाली वृत्ति को एकार्थीभाव कहते हैं, 'अनेकार्थो हि एकार्थों भवति अनेनेति एका भावः' अनेकार्थ जिससे मिलकर एकार्थ हो जाय उसे ही वास्तव में एकार्थीभाव कहते हैं। जिसके बदौलत उक्तस्थलों में जैसे 'पित', । , समास-विचार ४५ कहने से माता और पिता इन दोनों का ही वोध होता है, प्रत्येक का अक्षम २ बोध नहीं होता यही वात उक्त पांचों वृत्तियों में मानी गयी है, इसके दो भेद हैं-जहत्त्वार्या' और 'अजहत्त्वार्थ' जहां पर प्रत्येकपद अपने २ अर्थों को छोड़कर विशिष्टार्थों को ही बतजाता है उसे जहत्स्वार्थावृत्ति कहते हैं। जैसे 'प्रतित्रा' 'निष्टा' 'कृष्णसर्पः' इत्यादि स्थलों में अवयवों का कुछ भी अथ न होकर एक बिलक्षण अर्थ ही ज्ञात होता है। जहां पर प्रकपद अपने २ अर्थों के साथ २ समुदाय के अर्थ को प्रधान रूप से बतलाता है उसे 'अजहत्वार्था' वृत्ति कहते हैं। जैसे 'पङ्कज' कहने से कीचड़ से पैदा होने वाला कमल समझा जाता है इसलिये यहां पर अवयवार्थों के साथ ही विशिष्टार्थ कमल का बोध होने से अजस्वार्था वृत्ति । इसे ही योगरूढिशक्ति कहते हैं। यही वृति प्रायः अधिक स्थलों में ली जाती है क्योंकि इसमें अवयवार्थों का भी ज्ञान होने से अधिक लाभ होता है। जहत्स्वार्था तो वहीं पर मानी जाती है, जहां पर अवयवार्थों का संग्रह नहीं हो सकता हो । कहा भी है-'जहत्स्वार्था तु तत्रैव यत्र रुढिविरोधिनी' इत्यादि। जहत्स्वार्था को ही रुढिशक्ति कहते हैं। जैसे-'प्रतिष्टा' कहने से इज्जत या महत्ता का बोध होता है-प्रत्येकपद का अर्थ कुछ भी नहीं संगत होता । 'स्वार्थपर्यवसायिनां पदानामाकांक्षादिवशात् यः परस्परं सम्बन्धः सा व्यपेक्षा' अपने २ अर्थों को बतलानेवाले पदों का जो अपेक्षावश आपस में अन्वय होता है उसे व्यपेक्षा कहते हैं । इस में अलग २ ही पदार्थों की उपस्थिति होती है । एकार्थीभाव की तरह मिले जुले दोनों पदार्थों की उपस्थिति नहीं होती, केवल आकांक्षावश एकपदार्थ को दूसरे के साथ सम्बन्ध मात्र हो जाता है। यह शक्ति वाक्य में मानी गयी है । उक्त समास के पांच भेद बतलाये गये हैं-'केवल समास' 'अव्ययीभाव' 'तत्पुरुष' 'बहुव्रीहि' और 'द्वन्द्व' । तत्पुरुष के दो भेद हैं-कर्मधारय' और 'द्विगु । १. 'विशेषसंज्ञाविनिर्मुक्तः केवलसमासः प्रथमः'—जिसकी कोई विशेष संज्ञा न हो उसे केवल समास कहते हैं । यह समास कहीं पर सुबन्त को सुबन्त के साथ किया जाता है जैसे 'पूर्व भूतः' 'भूतपूर्वः ।' और कहीं पर तिङन्त के साथ भी किया जाता है जैसे 'अनुव्यचलत्' 'पर्यभूषत्' यह सारा कार्य ‘सह सुपा के सहारे पूरा किया जाता है। 'इवेन समासो विभक्त थलोपश्च' इव के साथ में यह समास होता है लेकिन इसमें समासमध्यवर्ती विभक्ति का लोप नहीं होता है ।

सन्धिचल्किा . जैसे वागर्थाविव' 'जीभूतस्येव' 'हरीतकी मुंव राजन् 'मातेव' हितकारिणीमित्यादि। २. 'पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावः'। जिसमें प्रायः करके पूर्व पदार्थ की प्रधानता हो उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। इस समास के पूर्वपद प्रायः अव्यय ही होते हैं। जैसे- उपकृष्णम्' (कृष्ण के पास)। इसमें उप पूर्वपद अव्यय और उनी का सामीप्य रूप अर्थ मुख्यरूप से प्रतीत होता है। यह नित्य समास होता है 'अविग्रहोऽस्वपदविग्रहो वा नित्यलमासः' जिसमें विग्रह वाक्य नहीं बनता हो या बनता भी हो तो समास जिसके साथ होता है उससे भिन्न के साथ ही विग्रह किया जाता हो यही नित्य समास का चिह्न है जैसे- कृष्णल्य समीपम् “उपकृष्णाम् । यहां पर समीपपद के साथ विग्रह किया गया है और उप के साथ समास होता है । यह समास अव्ययों के अधिकरण आदि विलक्तथर्थ, सामीप्य, समृद्धि, विगतऋद्धि, अथाभाव, अत्यय (ध्वंस) सम्प्रति (अभी) शब्दप्रादुर्भाव, पश्चात् , यथार्थ, ( योग्यता, वोप्सा, पदार्थानतिवृत्ति, सादृश्य ) आनुपूर्ण्य, यौगपद्य, सादृश्य, सम्पत्ति, साकल्य, अन्त इत्यादि अनेकों अर्थों में समस्त होने से अत्यन्त ही व्युत्पत्ति वर्द्धक और चमत्कारजनक होता है जैसे- 'अधिहरि हरि में 'उपकुम्भम्' घट के पास ‘सुमद्रम्' मद्रों की समृद्धि 'दुर्यवनम्' यवनों की बदहालत निर्मक्षिकम्' मक्षिकाओं का अभाव अतिहिमम्' पालाओं का नाश 'अतिनिद्रम् असमय में सोना अच्छा नहीं 'इतिहरि' हरि शब्द का प्रकाश 'अनुविष्णु' विष्णु के पीछे 'अनुरूपम्' स्वरूप के योग्य 'प्रत्यर्थम्' अर्थ अर्थ के प्रति 'यथाशक्ति' शक्ति के अनुसार-सहरि' हरि का सादृश्य 'अनुज्ये- टम्' वड़ों के अनुक्रम से सचक्रम् चक्र के एक साथ “ससखि' मित्र के तुल्य 'सक्षत्रम् क्षत्रियों की सम्पत्ति, 'सतृणम्' तिनकों के साथ ही साग्नि' अग्नि ग्रन्थ- पर्यन्त इत्यादि विलक्षण ही उक्त प्रयोगों के अर्थ हो जाते हैं । 'अनुगङ्गं वाराणसी' गङ्गा के फैलाव के अनुसार काशी का फैलाव है। 'अभ्यग्नि शलभाः पतन्ति' आग की ओर पतंगें गिर रहे हैं। 'पारेगङ्ग' गङ्गा के पार 'मध्येयमुनम्' यमुना के मध्य इत्यादि अनेक अर्थों में यह समास होता है। अव्ययीभाव को अध्यय संज्ञा हो जाती है और नपुंसकत्व भी हो जाता है इसलिये प्रायः करके अधिक प्रयोगों में अकारान्त को छोड़कर सभी जगह विभक्ति का श्रवण नहीं होता है। जैसे "अधिहरि' 'यथाशक्ति' इत्यादि अकारान्त में पञ्चमी को छोड़कर सभी विभक्तियों का अम् आदेश हो जाता है और पञ्चमी का अलुक हो जाता है।

समास-विचार -- परन्तु तृतीया सप्तमी में चित्र रूप से यह कार्य होता है। जैसे 'पण' 'उपकृष्णात्' 'उपकृष्णेन' वा उपकृष्णे' वा । कहीं पर पूर्व पदार्थ की प्रधानता नहीं की होती है जैसे–'उन्मत्तगहम्' 'लोहितगङ्गम्' इत्यादि । ३. 'उत्तरपदार्थप्रधानत्तत्पुरुषः-जिल में उत्तर पदार्थ की प्रधानता रहती है उसे तत्पुरुष समास कहते हैं । जैसे-'राजपुरुषः' राजा का पुरुप (जिपावी वगैरह ) यहाँ पर पुरुष अर्थ सुब्यहप से भासित होता है अतः इसे तत्पुरुष कहते. हैं । इसमें द्वितीया से लेकर सलमी विभत्त्यन्त पूर्वपदों के साथ सनास होता है ? जैसे कृष्णं श्रितः 'कृष्णश्रितः, 'शङ्खलया खण्डः शङ्कुलाखण्डः 'यूपाय दारु 'यूपदारु' 'चोराद्भयम्' 'चोरभयम्' 'राज्ञो धनम्' 'राजधनम्' 'अक्षेषु शौण्डः' अक्षशौण्डः इत्यादि । इसमें 'उपपद समास' 'गतिसमास' 'प्रादिसमास' 'मध्यमपदलोपी समास' 'उपमित समास उपमान समास' और 'नञ् समास भी आ जाता है। जैसे-'कुम्भकारः' 'व्याघ्री' अतिमालः' 'निष्कौशाम्बिः' 'शाकपार्थिवः' 'देवव्राह्मणः' 'पुरुषव्याघ्रः' 'घन- श्यामः' 'अनश्वः' इत्यादि । तत्पुरुषविशेषः 'कर्मधारयः' तत्पुरुषविशेष को कर्मधारय समास कहते हैं । 'तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः' विशेषण विशेष्यभाव से एकार्थप्रतिपादक समास को कर्मधारय कहते हैं। जैसे-'नीलोत्पलम्' 'महानवमी' 'मयूरव्यंसकः' इत्यादि । कर्मधारय विशेषको द्विगु समास कहते हैं । 'संख्यापूर्वो द्विगुः'-द्विगु समासमें संख्यावाचक शब्द पूर्व पद में होता है। 'पञ्चगवधनः' 'पाण्मातुरः' 'द्वैमातुरः' 'सप्तर्षयः' 'पञ्चगवम्' इत्यादि । कहीं पर उत्तर पद की प्रधानता नहीं भी होती है जैसे-'अर्ध- पिप्पली' पिप्पली का आधा हिस्सा। यहां पर पूर्व पद 'अर्ध' का अर्थ ही प्रधान रूप से भासित होता है। अकारान्त उत्तर पदक द्विगु स्त्रीलिङ्ग हो जाता है। जैसे--- पञ्चमूली' दशमूली' इत्यादि । 'परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः'द्वन्द्व और तत्पुरुष समास में उत्तर पद की तरद लिङ्गव्यवस्था होती है। जैसे 'मयूरीकुकुटौ इमौ' 'कुकुटमयूर्यो इमे' 'राज- कुमारी' इयम् । 'ब्राह्मणीपुत्रोऽयम्' । किन्तु-रात्रि, अह्न और अन् शब्दान्त द्वन्द्व और तत्पुरुष पुंल्लिङ्ग हो जाता है . जैसे-'अहोरात्रः' 'पूर्वाणः' 'यहः' इत्यादि। परन्तु संख्यावाचक शब्द पूर्व पद में रहने से रात्रि शब्दान्त उक्त समास नपुंसक होता है। जैसे-'द्विरात्रम्' 'त्रिरात्रम्' । अर्द्धचादिगणपठित शब्द पुंल्लिङ्ग एवं नपुंसक भी होते हैं । जैसे-'अर्द्धर्चः' 'अर्द्धर्चम्'। सेना सुरा छाया शाला और सन्धिचन्द्रिका । - निशा शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसक और स्त्रीलिङ्ग हो जाता है । जैसे-'ब्राह्मणसेनम्' 'ब्राह्मणसेना' इत्यादि । अमनुष्य पूर्वक राजादि और सभा शब्दान्त तत्पुरुष नपुंसक हो जाता है। जैसे-ईश्वरसनम्' 'इससभम्' इत्यादि । ४. 'अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिः'-जिसमें समासान्तर्वर्ती से कोई अन्य पदार्थ हो मुख्य रूप से जाना जाता है. उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। द्वितीया विभक्ति से लेकर सप्तमी विभक्तिपर्यन्त के अर्थ अन्य पदार्थ में लिये जाते हैं, किन्तु प्रथमान्तपदों का ही समास होता है। जैसे-प्राप्तमुदकं यं स 'प्राप्तोद- को ग्रामः' ऊढो रथो न स 'ऊडरथोऽजब्वान्' 'उपहतपशूरुद्रः' 'उद्धृतौदना- स्थाली' 'पीताम्बरो हरिः' 'वीरपुरुषको ग्रामः' इत्यादि । इसे समाजाधिकरण बहुव्रीहि कहते हैं । कहीं पर सप्तम्यन्तादि और प्रथमान्तपदों का भी यह समास प्रयोजनवश माना जाता है। इसे व्यधिकरण बहुव्रीहि समास कहते हैं । जैसे- कण्ठे कालो यस्य स 'कण्ठेकालः' पद्मनाभौ यस्य स 'पद्मनाभः' दण्डः पाणौ यस्य स “दण्डपाणिः" इत्यादि । तद्गुणसंविज्ञान और अतद्गुणसंविज्ञान के भेद से यह समास दो प्रकार का होता है । जहाँ पर आनयनादि क्रिया में अन्य पदार्थ के साथ २ समास मध्यवर्ती पदार्थों का भी विशेषणरूपसे बोध होता है वहां उसे तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहते हैं। जैसे-'लम्वकर्णपुरुषमानय' यहाँ पर आनयन क्रिया में पुरुष के साथ २ लम्बे करें का भी अन्वय होता है इसलिये यह तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहलाता है और जहां क्रिया में अन्य पदार्थों के साथ २ समास के मध्यवर्ती पदार्थों का अन्वय नहीं जाना जाता हो वहां उसे अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहते हैं। जैसे-'दृष्टसागर पुरुषमानय' । यहाँ पर आनयन क्रिया में पुरुष के साथ २ समुद्र का अन्वय नहीं होता है वहां यह अतद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि कहलाता है । इस समास में सप्तम्यन्त और विशेषणवाचक शब्दों का पूर्वप्रयोग ही होता, जो ऊपरके उदाहरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है। इसमें अन्य पदार्थों के लिङ्गों के अनुसार ही समास के मध्यवती पदों का लिङ्ग हो जाता है, यह बात भी ऊपर के उदाहरणों से स्पष्ट ही प्रतीत हो रही है। इस समास में कहीं पर अन्य पदार्थ की प्रधानता नहीं भी रहती, जैसे 'द्वित्राः' 'पञ्चषा.' त्रिचतुराः' ( दो या तीन, पाँच या छै, तीन या चार ) इन स्थलों में समासके मध्यवर्ती पदार्थों की ही प्रधानता देखी जाती है।

समास-विचार ४६ - पर ५. "उभयपदार्थप्रधानो द्वन्द्वः'--'सर्वपदार्थप्रधानो वा द्वन्द्वः' जिसमें समासमध्यवर्ती सभी पदार्थ मुख्यरूप से जाने जाते हैं उसे द्वन्द्वसमास कहते हैं । जैसे 'घटपटौ' घड़ा और कपड़ा दोनों ही मुख्य रूप से प्रतीत होते हैं . 'हरिहरगुरव' (विष्णु महादेव, और गुरु) ये तीनों ही मुख्यरूप से जाने जाते हैं । चार्थ में यह समास होता है । चकारके निम्न चार अर्थ माने गये हैं- (१) समुच्चय, (२) अन्वाचय, (३) इतरेतरयोग और (४) समाहार । १. 'परस्परनिरपेक्षस्यानेकस्यैकस्मिन्नन्वयः समुच्चयः'--जहाँ एक क्रियापद की श्रावृत्ति करके उसमें पहिले असमस्यमान एक पदार्थ का अन्वय होता है, बाद में दूसरे का अन्वय होता है उसी को समुच्चय कहते हैं जैसे- 'ईश्वरं गुरुच्च भजस्व' यहाँ पर गुरु का च शब्द के साथ सम्बन्ध होने से ईश्वर सापेक्षत्व है किन्तु ईश्वरका गुरुसापेक्षत्व नहीं है क्योंकि ईश्वर के साथ च शब्द का सम्बन्ध नहीं होता, इसलिये यहाँ एक ही च शब्द का प्रयोग किया गया है । ऐसी दशा में 'ईश्वरं भजस्व' 'गुरुञ्च भजस्व' इस प्रकार से दो वाक्य बन जाते हैं । इसलिये यहाँ पर उक्तरीति से ईश्वर गुरु को परस्पर निरपेक्ष होकर ही भजन क्रिया में क्रमसे कर्मरूपेण अन्वय होने के कारण परस्पर अन्वय नहीं होने से सामर्थ्य नहीं रहा, अतः समास भी नहीं हो सका क्योंकि ‘समर्थः पदविधिः' इसके अनुसार परस्पर सामर्थ्य रहने पर ही समास होता है। २. 'अन्यतरस्यानुषङ्गिकत्वेऽन्वाचयः'- जहाँ पर एक क्रिया में एक पदार्थ का अप्रधानरूपसे अन्वय होता है और दूसरी क्रिया में दूसरे का मुख्यरूप से अन्वय होता है, उसे अन्वाचय कहते हैं जैसे-'भिक्षामट गां चानय' यहाँ पर भिक्षा प्राप्त करना जरूरी है किन्तु गो का लाना कोई जरूरी नहीं मालूम पड़ता, हाँ इतना अवश्य जो कहीं मिल जाय तो गो को भी लेते आना, यही वक्ता का अभिप्राय है न कि उसके लिये कोई विशेष प्रयत्न करना जरूरी है, इसलिये यहाँ पर एक की प्रधानता और दूसरे की अप्रधानता होने से परस्पर अन्वय नहीं हो सकने के कारण सामर्थ्याभाव से समास नहीं होता है । ३. 'मिलितानामन्वये इतरेतरयोगः'-जहाँ पर परस्पर अपेक्षित समुदित का एक क्रिया में अन्वय होता है उसे इतरेतर योग कहते हैं । जैसे 'धवश्व खदिरश्चति धवखदिरौ' छिन्धि, यहाँ पर समुदित धव और खदिर का ही एक ४सं०च० सन्धिचन्द्रिका - साथ छेदन क्रिया में अन्वय होने से परस्पर साहित्य हो जाने के कारण सामर्थ्य रहने से समास हो जाता है और दोनों की प्रधानता होने से द्विवचन होता है ४. 'समूहः समाहारः-समुदाय को ही समाहार कहते हैं। जैसे- 'पाग्योः पादयोश्च समाहारः पाणिपादम्' यहाँ पर समुदाय में दो हाथ और दो पाद का एक साथ ही अन्वय होने से परस्पर साहित्य हो जाने से सामर्थ्य की क्षति नहीं हुई इसलि समाल हो गया। किन्तु इसमें समुदाय की प्रधानता और एकत्र होने से नपुंसकत्व और एक वचन ही आता है। जैसे-'संज्ञापरिभाषम्' 'मार्दङ्गिकपाणविकम्' 'रथिकाश्वारोहम्' 'रथिकावारोहम्' इत्यादि उदाहरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है । इसमें अल्प स्वरवाले पदों का पूर्व प्रयोग होता है। जैसे-'शिवकेशवौ' इत्यादि । पूज्यवाचक शब्दों का भी पूर्व प्रयोग हो जाता है जैसे-'तापसपर्वतो इत्यादि । इकारान्त और उकारान्त घिसंज्ञकका भी पूर्व प्रयोग हो जाता है । जैसे- 'हरिहरौ' इत्यादि । ब्राह्मणादिवों में क्रमसे ही पूर्व प्रयोग होता है । जैसे 'ब्राह्मण क्षत्रियविट्शदाः' इत्यादि । लघु अक्षर का भी पूर्व प्रयोग होता है | जैसे—'कुश- काशम्' इत्यादि । भ्रातृवाचक शब्दों में वड़ों का ही पूर्व प्रयोग होता है । जैसे- 'युधिष्टिरार्जुनौ इत्यादि । समान अक्षरवाले ऋतु और नक्षत्र वाचक शब्दों में क्रम से ही पूर्व प्रयोग होता है। जैसे—'हेमन्तशिशिरवसन्ताः' 'कृत्तिकारोहिग्यो' इत्यादि । अप्राणिवाचक जाति शब्दों का समाहार द्वन्द्व ही होता है । जैसे धाना शकुलि' इत्यादि। - - (३) तिङन्त-विचार- प्रयोग कालमें धातुके उत्तर जो तिङ् विभक्ति होती है; उस तिङ विभक्तिके योगसे जो पद निष्पन्न होता है वह 'तिजन्त' कहलाता है । लट लिट् लुट लूट लेट लोट् लङ् लिङ् लुङ्लङ्- कालका ज्ञान एवं विधि आदिका अर्थज्ञान कराने के लिए धातु के बाद लादि तिङ विभक्तियां दश प्रकार की होती हैं। इनमें लेट्' का प्रयोग वेदमें होता है । १–वर्तमाने लट्- वर्तमान क्रियावृत्ति धातु से लट् लकार होता है । नोट-जिसमें क्रियाका प्रारम्भ हो उसे 'वर्तमान' कहते हैं । वर्तमानके सामीप्य रहने पर भूत और भविष्यत् कालमें भी लट्' होता है ! यथा-'इदानी- मेव आगच्छामि' (अभी आया हूं)। 'अयमहं गच्छामि' ( मैं अभी जाउंगा ) । 'स्म' के योगसे भूत कालमें भी ‘लट' का प्रयोग होता है । यथा- 'स पठतिस्म' ( उसने पढ़ा )। यानत्' के योगसे भविष्यत् कालमें भी 'लट' का प्रयोग होता है । यथा-'स यावत् नागच्छति' ( वह जब तक नही आयगा) : लकारके स्थानमें तिबादि विभक्तियां होती हैं (पृ. ३० की टि० देखो) विभ- क्तियोंमें ३ पुरुष होते हैं-प्रथम, मध्यम और उत्तम | क्रियाके साथ युष्मद् या अस्मद् शब्दसे भिन्न शब्दोंके प्रयोग रहने पर प्रथम पुरुष, युष्मद् शब्दके प्रयोग रहने पर मध्यम पुरुष और अस्मद् शब्द के प्रयोग रहने पर उत्तम पुरुष होता है, तथा कर्ता का जो बचन रहे वही क्रिया का भी बचन होता है । यथा- १. बालकः पठति । बालकौ पठतः । बालकाः पठन्ति । २. त्वं पठसि । युवां पठथः । यूयं पठथ | ३. अहं पठामि । अवां पठावः । वयं पठामः ! ३-परोक्षे लिट्- भूत अनयतन और परोक्षार्थ वृत्ति जो धातु उससे 'लिट् लकार होता है । नोट-अनयतन कालके दो भेद हैं-भूत और भविष्यत् । पूर्व दिन की आधी रात ( १२ बजे ) तक जो क्रिया हुई हो वह भूत अनद्यतन और आगामी (आज) रातके बारह बजेके बाद जो क्रिया होने वाली हो वह भविष्यत् अनद्यतन (लुट् ) की क्रिया कही जाती है । लक्षण यथा-'अतीताया रात्रेः पश्चार्धन आगामिन्याः पूर्वार्धेन च सहितो दिवसोऽद्यतनः, तद्भिन्नोऽनद्यतनः । - सन्धिचन्द्रिका 'परोक्ष' उसको कहते है जिसमें वक्ताका प्रत्यक्ष नहीं हो । एवं च सिद्ध यह हुआ कि 'परोक्ष' और 'अनद्यतन' भूत कालमें 'लिट' का प्रयोग हो । यथा- 'रामो बालिनं जघान । स्मरण रहे कि चेत्तविक्षेपमें तथा किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करने पर प्रत्यक्ष ( उत्तम पुरुष ) में भी 'लिट का प्रयोग होता है। यथा--१. 'सुप्तोऽहं किल विललाप' २. 'नाऽहं कलिङ्गा जगाम | ३-अनद्यतने लुट- भविष्यत् अनद्यतन अर्थमें धातु से लुट् लकार होता है । ४--लुट शेषे च- भविष्यत् अर्थमें धातुसे 'लूट' लकार होता है, क्रियार्थकक्रिया रहे या न रहे । नोट-एक क्रिया यदि दूसरी क्रियाके लिये हो रही हो तो उस किया को 'क्रियार्थक क्रिया' कहते हैं । यथा-'पठितुं गच्छति' इति-'पठिष्यति' । ५-लोट् च- विध्यादि अर्थों में धातुसे लोट् लकार होता है । ६-आशिषि लिङलोटौ- आशीर्वाद अर्थमें धातुसे लिङ और लोट्लकार होता है। ७-अनद्यतने लङ्- अनद्यतन भूतार्थवृत्ति धातुसे 'लङ् लकार होता है । ८-विधिनिमन्त्रणामन्त्रणाधीष्टसम्प्रश्नप्रार्थनेषु लिङ्- विधि, निमन्त्रण, आमन्त्रण, अधीष्ट, संप्रश्न और प्रार्थना अर्थोंमें धातुसे 'लिङ् लकार होता है। नोट-विध्यादि अर्थोंमें 'लोट्' का भी विधान हो चुका है । अब यहां दोनों का स्पष्टीकरण इस प्रकार है-विधिः = प्रेरणम्, भृत्यादेनिकृष्टस्य प्रवर्तनम् । जैसे—'भवान् वस्त्रं क्षालयतु, क्षालयेद्वा' । निमन्त्रण = नियोगकरणम्, श्राव- श्थके श्राद्धभोजनादौ दौहित्रादेः प्रवर्तनम् । जैसे—'इह मातामहश्राद्धे दौहित्रा- दयो भवन्तः भुञ्जताम् वा भुञ्जीरन् । आमन्त्रणं = कामचारानुज्ञा । जैसे- मत्पुत्रोत्सवे भवान् आगच्छतु, आगच्छेद्वा। अधीष्टः = सत्कारपूर्वको व्यापारः । जैसे—मदात्मजं चन्द्रशेखरं गोपालं वा भवान् अध्यापयतु अध्या- पयेद्वा । सम्प्रश्नः = सम्प्रधारणम् । जैसे-किं भोः व्याकरणं भवान् अधीयीत, उत तकम् ? प्रार्थनं याच्या । यथा-भवान् मे फलं ददातु दद्याद्वा । - - ।

तिङन्त-विचार है-माङि लुङ- 'माङ्' उपपद रहने पर धातुसे लुङ् लकार होता है १०-लिङ निमित्त लुङ क्रियातिपत्तौ- भविष्यत् अर्थमें विद्यमान धातुसे हेतुले रद्भावादि ( कार्यकारणभावादि) अर्थमें 'लुङ' लकार होता है, क्रियाकी अनिष्पत्ति यदि गम्यमान रहे। ११-लः कर्मणि च भावे बाऽकरलेभ्यः --सकर्मक धातुसे कर्म और कर्ता तथा अकर्मक धातुसे भाव और कमि लकार होता है। नोट-१ कर्तृवाच्यमें कर्ता प्रथमान्त और सर्व द्वितीयान्त तथा क्रियाके पुरुष-वचन कर्ता के अनुसार प्रयुक्त होते हैं। यशा-इन्दुमती पुष्पं चिनोति' ! एवं कर्म वाच्यमें कर्ता तृतीयान्त और को प्रभान तशा क्रिया के पुरुष-वचन कर्मके अनुसार होते हैं । यथा-'गोपालेर बेला यन्ते'। एवं भाव वाच्यमें कर्ता कर्म वाच्यवत् तृतीयान्त होता है पर कर्म नहीं होता तथा क्रिया सदैव प्रथम पुरुष की एक वचनान्त ही होती है। यथा-'अस्माभिः स्थीयते । तथाहि- 'प्रयोगे कर्तृवाच्यस्य कर्तरि प्रथमा भवेत् । द्वितीया कर्मणि, तथा क्रिया का स्मिा ।। प्रयोगे कर्मवाच्यस्य तृतीया भारि । कर्मणि प्रथमा चैव क्रिया कानुनरिणी ।। काभावः सदा भावे तृतीला चैन परि। प्रथमः पुरुषश्चैवषयं च पिदे ।।' १२----आवकर्षणोः- भाववाच्य और कर्मवाच्य लकारके मानीं बालनेपद होता है। १३---सार्वगार- भाववाची और कर्मवावी सार्बधानुकले पर गाने 'यक्' प्रत्यय होता है। नोट-भाव क्रियाको कहते हैं। वह नाम तारसे अनूदित होता है। भावमें प्रत्यय करनेपर 'तिङ्' के साथ गुरुपद्-ऋ पद रब्द एकार्थवाचक नहीं होते, अतः धातुसे प्रथम पुरुष ही होता है। इसमें प्रत्यय करनेएर ति और युष्मद्- अस्मद् शब्द कर्तारूप एकार्थके वाचत होते हैं, अतः धातुसे मध्यम-उत्तम पुरुष होते हैं ) तिर्थ क्रियाके द्रव्यरूप न होलेसे दित्व, वहुत्व संख्याको प्रतीति नहीं होती । इसलिये द्विवचन, बहुवचन नहीं होते, किन्तु स्वाभाविक एकवचन ही होता सन्धिचन्द्रिका गोपालमें है, अतः 'शी धातु १ भावमें प्रत्यय होनेपर कर्ताके अनुक्त होनेसे कर्तासे तृतीया विभक्ति होती है। जैसे-त्वं भवसि' इस अर्थमें 'स्वथा भूयते' इत्यादि । फल और व्यापार धातुके अर्थ होते हैं-'फलव्यापारयोर्धातुः व्यापारका आश्रय कर्ता और फलका श्राश्रय कर्म होता है । जिसका फल और व्यापार भिन्न २ आश्रय हो उसे सकर्मक कहते है:-'फलव्यधिकरणव्यापारवाच- कत्वं सकर्मकत्वम् । यथा-'देवदत्तः तण्डुलं पचति' यहां विक्लित्ति रूप फल तण्डुलमें और पाकरूप व्यापार देवदत्तमें है, अतः 'पच्' धातुको सकर्मक समझना चाहिये । जिसका फल और व्यापार एक ही प्राश्रयमें हो उसे अकर्मक कहते हैं-'फलसमानाधिकरणव्यापारवाचकत्वमकर्मकत्वम्' | यथा- 'गोपालः शेते' यहां विश्राम रूप फल और चक्षुनिमीलनादि रूप व्यापार भी अकर्मक है। [सामान्यनियमः-साकांक्षित क्रिया ‘सकर्मक', यथा-पठति, खादति आदि २ । क्या पड़ता है ?, क्या खाता है ? । एवं निराकांक्षित क्रिया 'अकर्मक, अथा-जागता है, हंसता है । यहां क्या जागता है, क्या हंसता है, इत्यादि आकांक्षा ही नहीं उठती।] विशेष नियम- 'धातोरर्थान्तरे वृत्तेर्धात्वर्थेनोपसंग्रहात् । प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया'। यहां पर प्रत्येक वाल्यका पार्थ इस प्रकार है- १. सकर्मक धातु यदि अर्थान्तर (अकर्मक क्रियारूप अर्थान्तर ) को कहने लगे तो वह अवार्मक हो जाती है। यथा 'भारं वहति = प्रापयति' यहां प्रापणार्थक 'वह' धातु सकर्मक है, परन्तु यही अर्थान्तर ( स्यन्दतेरूप अर्थ ) में प्रवृत्त होकर कहीं अकर्मक होती है । यथा 'नदी वहति = स्यन्दते-प्रस्रवति' । २. यदि कर्मका धात्वर्थसे उपसंग्रह हो जाय तो धातु अकर्मक हो जाती है । यथा 'जीवति' 'कृत्यति' यहां 'जीव' का प्राणधारण करना और 'नृत' का अङ्गविक्षेप करना अर्थ है। परन्तु दोनों जगह प्रण और अङ्ग रूप कर्मका थात्वर्थमें ही अन्तर्भाव हो जाता है। अतः ये दोनों धातु सकर्मक नहीं होते। ३. कहीं प्रसिद्ध कर्म रहने पर भी धातु अकर्मक हो जाती है । यथा 'मेघो तिङन्त-विचार वर्षति' अर्थात् मेघो जल वर्षति । यहां पर जलरूप कर्म प्रसिद्ध है, क्योंकि मेघ जल ही वर्षाता है आग वगैरह नहीं । इसलिये धातु अकर्मक कही जाती है । ४. कर्मको अविवक्षा करने पर भी धातु अकर्मक हो जाती है, यथा- 'हितान्न यः संशृणुते स किं प्रभुः' ( हितात् हितपुरुषात् यः न संशृणुते स्वहित न मन्यते, स किं प्रभुः, कुत्सित इत्यर्थः ) यहां पर स्वहितरूप कर्मकी अविवक्षा करने पर धातु अकर्मक हो जाती है । 'अकर्मकोप्युपसर्गवशात्सकर्मक'-अकर्मक धातु भी उपसर्गदशात् सक- र्मक हो जाती है । यथा-'अनुभूयते आनन्दश्चैत्रेण' इत्यादि । यहां अनुपूर्वक भूधातु अनुभवार्थक होनेसे सकर्मक होगया और उससे कर्ममें भी प्रत्यय सिद्ध हुआ | कर्म उक्त होनेपर कर्मसे प्रथमा और कर्ता अनुक्त होनेपर कर्तासे तृतीया विभक्ति होती है । एवं कर्मके एकवचन रहनेपर क्रिया प्रथम पुरुषके एकवचन, द्विवचन रहनेपर द्विवचन और बहुवचन रहनेपर बहुवचन होती है । केवल युष्मद् कर्म रहनेपर मध्यम पुरुषकी और अस्मद् कर्म रहनेपर उत्तम पुरुषकी क्रिया होती है । यथा-गोपालेन आनन्दः अनुभूयते, गोपालेन आनन्दौ अनुभूयेते गोपालेन आनन्दाः अनुभूयन्ते । एवं गोपालेन त्वम् अनुभूयसे, गोपा- लेन युवाम् अनुभूयेथे, गोपालेन यूयम् अनुभूयध्वे । गोपालेन अहम् अनुभूये, गोपालेन आवाम् अनुभूयावहे, गोपालेन वयम् अनुभूयामहे । ( इसीप्रकार अन्यत्र भी समझना)। नोट-अकर्मक धातु ण्यन्त होनेपर भी सकर्मक होजाता है और सकर्मक होनेपर उससे कममें भी प्रत्यय होने लगता है तथा कर्मानुसार क्रिया होती है। यथा कर्ता-गोपालः भवति चन्द्रशेखरः तं प्रेरयति इति चन्द्रशेखरः गोपालं भावयति। कर्म में चन्द्रशेखरेण गोपालः भाव्यते, गोपालौभाव्यते गोपालाः भाव्यन्ते । एवं-चन्द्रशेखरेण त्वं भाव्यसे, युवां भाव्येथे, यूयं भाव्यध्वे । अहं भाव्ये, आवाम् भाव्यावहे, वयम् भाव्यामहे । द्विकर्मक धातुओंके किस कर्ममें लकार होगा इसकी व्यवस्था निम्न है:- 'गौणे कर्मणि दुह्यादेः प्रधाने नीहृकृष्वहाम् । बुद्धिभक्षार्थयोः शब्दकर्मकाणां निजेच्छया ॥ प्रयोज्यकर्मण्यन्येषां एयन्तानां लायोः मताः ।।

सन्धिचन्द्रिका अर्थात् दुह् , याच , पच् , दण्ड, रुधि, प्रच्छि, चि, ब्रू, शासु, जि, मन्थ, मुष् इन धातुओं के (अकथितञ्चेति सूत्रविहित ) गौणकर्ममें लकार होता है। ( इसलिये गौण कर्मसे ही प्रथमा विभक्ति होती है, यथा 'गौदुमुते पयः' । नी, है, कृष् , तथा वह धातुओंके ('अकथितञ्च' से भिन्न सूत्रविहित ) प्रधान कर्ममें लकार होता है, ( इस लिये प्रधान कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है) यथा 'अजा प्रामं नीयते' । वुद्धयर्थक, मक्षार्थक, और शब्दकर्मक धातुओंके ('गतिबुद्धि' सूत्रविहित गौण या तदतिरिक्त सूत्रविहित प्रधान ) दोनों कर्मों में स्वेच्छासे लकार होता है ( इसलिये प्रधानाप्रधान उभय कर्मोंसे प्रथमा विभक्ति होती है ) यथा- 'बोध्यते माणवकं धर्मः, माणवको धर्मम्' इति वा। अन्येषां--पूर्वोक्तोंसे अन्य अर्थात् ण्यन्त जो गत्यर्थक, अकर्मक तथा 'हनोरन्यतरस्याम्' इस सूत्रोपात्त हृञ् और कृञ् धातुओंके प्रयोज्य कर्ममें लकार होता है ( अतः प्रयोज्य कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है ) यथा–मासमास्यते माणवकः, हार्यते कार्यते वा भृत्यः कटं गोपालेन । १४-कर्मवत्कर्मणा तुल्यक्रियः- कर्मस्था ( कर्ममें वर्तमान ) जो क्रिया उसके समान ही क्रिया है जिसकी ऐसा जो कर्ता, वह कर्मवत् हो, इससे यगादि होते हैं । ( जहां कर्ममें क्रियाकृत विलक्षणता दिखाई पड़े वहां कर्मस्था क्रिया होती है। जैसे पके अोदनमें ।) नोट -कर्म ही यदि कर्ता हो अर्थात् क्रियाका कर्तृत्व यदि कर्ममें प्रारो- पित हो तो 'कर्म फर्ता हो जाता है और प्रायः सकर्मक सभी धातु अकर्मक हो जाते हैं, इसलिये भाव और कर्ता में लकार होता है। भाव वाच्य में कर्म कर्ता से तृतीया हो जाती है । जैसे-'भिद्यते काष्ठेन' इत्यादि और कर्तृवाच्यमें कर्मकर्तासे प्रथमा विभक्ति होती है, अन्य कर्म पद नहीं रहता तथा क्रियाका रूप कर्मवाच्यकी क्रियाके तुल्य होता है । यथा-'काष्ठं भिद्यते स्वयमेव । कार्य करनेके समय जो 'कर्मकारक कर्ताके सुखकर निजगुणोंसे स्वयं ही सिद्ध होता है, उसे 'कर्मकर्ता' कहते हैं। कहा भी है:- 'क्रियमाणं तु यत् कर्म स्वयमेव प्रसिध्यति । सुकरैः स्वैर्गुणैः कः 'कर्मकर्ते ति तद्विदुः ॥' - - (४) कृदन्त-विचार कृत्' प्रत्यय धातु के अन्तमें प्रयुक्त होते हैं और उनके योगसे बने शब्द 'कृदन्त' कहलाते हैं । कर्तृवाच्यमें कृदन्त की क्रिया कर्ताका विशेषण और कर्म वाच्यमें कर्मका विशेषण होती है तथा भाववाच्यमें नपुंसकलिंगका एक बचनान्त होती है । यथा- कर्तृवाच्य–स अस्मान् उक्तवान् । कर्मवाच्य-तेन वयमुक्ताः। भाववाच्य-तेन उक्तम | कृदन्तके निम्न मुख्य पांच प्रत्ययों पर ध्यान दो- १. तव्य-अनीयर-इनके प्रयोग कर्तासे तृतीया अथवा षष्टी विभक्ति होती है । सकर्मक धातुसे ये प्रत्यय होनेपर तीनों लिङ्ग और तीनों वचन होते हैं, और अकर्मक धातुसे होनेपर केवल नपुंसक लिंग और एक वचन ही प्रयुक्त होते हैं । यथा-'तेन ( तस्य वा ) पाठः पठितव्यः' । त्वयेदं कर्तव्यम् , करणीयं वा' । 'तेन आसितव्यम्' । प्रायः विधि' अर्थमें ही इसका प्रयोग होता है। २. क्त-'क्त' प्रत्यय भूतकालमें होता है और 'क्त' प्रत्ययान्त क्रियाके कर्तासे तृतीया और कर्मसे प्रथमा विभक्ति होती है तथा कर्मके लिंगके अनुसार ही क्तप्रत्ययान्त पदका लिंग होता है। जैसे-तेन माला निर्मिता । मया फलं भक्षितम् | अकर्मक धातुसे भावमें 'क' प्रत्यय प्रायः नपुंसक लिंगमें होता है । जैसे-मया हसितम् । कुछ धातु ऐसी भी हैं जिनसे 'क्त' प्रत्यय कर्ता में भी होता है। जैसे-गत्यर्थक अकर्मक, श्लिष, शोङ, स्था, आस, वस, जन, रुह और जु, धातु । उदाहरण यथा-'वनं गतो रामः' । इत्यादि । २. क्तवतु-'क्तवतु' प्रत्यय भी भूतकालमें होता है, परन्तु · यह कर्ता ही होता है और कर्तृवाच्यके अनुसार कर्ता और कर्मसे विभक्तियां भी होती हैं । जैसे—'अहं पुस्तकं पठितवान् । तौ पुस्तकं पठितवन्तौ' । ४. क्त्वा--जब एक क्रियाके बाद दूसरी क्रिया की जाती है तब प्रथम कालिक क्रियासे क्त्वा' प्रत्यय किया जाता है और क्त्वा प्रत्ययान्त क्रिया अव्यय ।

सन्धिचन्द्रिका D रूपसे मयुक्त होती है तथा कर्म आदि मुख्य (द्वितीय) क्रियाके अनुसार ही होते हैं : यथा-'शत्रून् जित्वा निवर्तते रामः' । 'क्त्वा' प्रत्ययान्त क्रियाके पूर्व यदि कोई उपसर्ग रखा जाय तो 'क्ला' के स्थान पर 'च' हो जाता है। जैसे- विजित्य, निहत्य, आदि। ५. तुमुन्-जब एक क्रिया करनेके लिये दूसरी क्रिया की जाती है, तव प्रथम क्रियासे 'तुमुन्' प्रत्यय होता है और तुमुनप्रत्यान्त अव्यय हो जाता 'तुमुन्' प्रत्ययान्त क्रियाक कर्मादि प्रथम क्रियाके साथ संबद्ध होते हैं परन्तु कर्ताका संवन्ध मुख्य क्रियासे ही होता है । जैसे-'इन्द्रियाणि जेतुमुपक्रमते' । - १= एकम् २%Dद्वे ३त्रीणि ४ - चत्वारि (५) संख्याओंका गणनाक्रम- ९-नव १८ = अष्टादश १०- दश ऊनविंशतिः ११ एकादश एकोनविंशतिः १२ -द्वादश एकान्नविशतिः १३ = त्रयोदश एकागविंशतिः १४ = चतुर्दश २० = विंशतिः १५ = पञ्चदश एकविंशतिः १६- षोडश २२ = द्वाविंशतिः १७%3 सप्तदश २३ त्रयोविंशतिः - ६-षट ७-सप्त স্বী স্পষ্ট (१,३) 'द्वयष्टनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः' = द्विशब्दस्य अष्टन् शब्दस्य च संख्या- वाचके उत्तरपदे परे आत्स्यात् , न तु बहुव्रीहौ, अशीतिपरे चेत्यर्थः । बहुव्रीही निषेधात् , द्वौ वा त्रयो वेति विग्रहे 'संख्याव्ययेति बहुव्रीही 'द्वित्राः' इत्यत्र आत्वं न भवति । अशीतिपरे आत्वन्नेत्यस्योदाहरणन्तु अनुपदमेव "यशीतिः" इति वक्ष्यामः । (४) एकेन न विंशतिः इति विग्रहः । 'एकादिश्चैकस्य चादुक' इति नमः प्रकृतिमावे अदुगागमे च दोघे अनुनासिको विकल्पः । (२,५) 'स्त्रयः = प्राक्शतात् संख्याशब्दे उत्तरपदे परतः विशब्दस्य त्रयस् श्रादेशः स्यात न तु बहुव्रीहौ, अशीतिपरे चेत्यर्थः। एवञ्च त्रयसादेशे रुत्वे संख्याओंका गणना क्रम ७३ २४ = चतुर्विंशतिः ४७ = सप्तचत्वारिंशत् ६७ = सप्तषष्टिः २५ % पञ्चविंशतिः अष्टाचत्वारिंशत अष्टाषष्टिः ४८ ६८ २६ = षड्विंशतिः স্মৃপ্তিঃ २७ = सप्तविंशतिः ऊनपञ्चाशत् ऊनसप्ततिः ४९ एकोनपञ्चाशत् एकोनसप्ततिः २८ = अष्टाविंशतिः ७० = सप्ततिः ५० - पञ्चाशत् ऊनत्रिंशत् एकोनत्रिंशत् ५१ - एकपञ्चाशत् एकसप्ततिः =সির द्विपञ्चाशत् द्विसप्ततिः ७२ द्वापञ्चाशत द्वासप्ततिः ३१ = एकत्रिंशत् ३२ = द्वात्रिंशत् त्रयःपञ्चाशत् (त्रयःसप्ततिः ५३ त्रिपञ्चाशत् त्रिसप्ततिः ३३ = त्रयस्त्रिंशत् ७४ = चतुःसप्ततिः ५४ - चतुःपञ्चाशत् ३४ = चतुस्त्रिंशत् ७५ = पञ्चसप्ततिः ५५ - पञ्चपञ्चाशत् ३५ = पञ्चत्रिंशत् ७६ = षट्सप्ततिः ३६ = षट्त्रिंशत् ५६ ८ षट्पञ्चाशत् ७७ = सशसप्ततिः सप्तत्रिंशत् ५७-सप्तपञ्चाशत् अष्टासप्ततिः श्रष्टापञ्चाशत् ३८ = अष्टात्रिंशत् अष्ट सप्ततिः अष्टपञ्चाशत् ऊनचत्वारिंशत् ऊनाशीतिः ऊनषष्टिः ७९ एकोनचत्वारि० ५६ एकोनषष्टिः एकोनाशीतिः ४० = चत्वारिंशत् ६० = षष्टिः ८० =अशीतिः ४१ = एकचत्वारिंशत् ६१%=एकषष्टिः ८१ = एकाशीतिः द्वाचत्वारिंशत् মিছি: ८२ = द्यशीतिः रद्वाषष्टिः ८३ त्र्यशीतिः ८४- त्रयःषष्टिः चतुरशीतिः त्रिचत्वारिंशत् ६३ त्रिषष्टिः ८५% पञ्चाशीतिः चतुश्चत्वारिंशत् ६४ - चतुःषष्टिः ८६ = षडशीतिः पञ्चचत्वारिंशत् ६५% पञ्चषष्टिः ८७ = सप्ताशीतिः ४६ = षट्चत्वारिंशत् ६६ = षट्षष्टिः ८८ % अष्टाशीतिः उत्वे च गुणः । (१-३) 'विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेषाम् द्वि-अष्टन:-त्रेश्च प्रागुक्तम् (दि-अष्टनोरात्वं, त्रिशब्दस्य त्रयसादेशश्च ) वा स्यात् चत्वारिंशदादौ परे इत्यर्थः । (४-६) 'दयष्टनः संख्यायामबहुव्रीहौ, इति सूत्रे, त्रेस्त्रयः' इति सूत्रे च न तु अशीता. { ऊनाशीतिः ४२ द्विचत्वारिंशत् ४३ (त्रयश्चत्वारिंशत् .

६० सन्धिचन्द्रिका ९४ = चतुर्णवतिः ९५ - पञ्चनवतिः ऊननवतिः एकोननवतिः ९० = नवतिः ९१ = एकनवतिः द्वानवतिः द्विनवतिः त्रयोनवतिः त्रिनवतिः ९६ - षण्णवतिः नवनवतिः ऊनशतम् एकोनशतम् . १००% शतम् १०१ - एकशतम् द्विशतम् १०३ - त्रिशतम् , इत्यादि। - ९७ = सप्तनवतिः 3 अष्टानवतिः अष्टनवतिः अथ संख्यायाः कुत्र विश्राम इत्याह- “एक दश शतञ्चैव सहस्रमयुतं तथा । लक्षञ्च नियुतञ्चैव कोटिरवुदमेव च ॥ वृन्द खवों निखर्वश्व शङ्खः पद्मश्च सागरः । अन्त्यं मध्यं परार्द्धञ्च दशवृद्धया यथाक्रमम् ॥" उत्युक्तत्वात् दधष्टन शब्दयोरात्वं, त्रिशब्दस्य त्रयसादेशश्चाऽत्र न भवत इत्यवधेयम् । (१) एकञ्च शतश्चेति समाहारद्वन्दः । (२-३) द्वे च शतञ्च, त्रीणि च शतं च इति समा- शारद्वन्दः । 'यष्टनः' इति सूत्रे 'स्त्रयः' इति सूत्रे च 'प्राक् शतादिति वक्तव्यम्' इत्युक्तत्वात् शनशब्दे परे द्विशब्दत्य आत्वं, त्रिशब्दस्य त्रयसादेशो न भवतीति । कर्मधारये तु 'दिशतम् इत्यस्य २००, 'त्रिशतम्' इत्यस्य ३०० इत्ययो भवतीति दिक् । (४) एतत् संख्याक्रमो नेदानी व्यवहारे दृश्यते ।

संख्याओंका गणना क्रम ६१ ... १ a एकम् = एकाई । दश = दहाई -शतम् 3 सैकड़ा १०० 3सहस्रम् = हजार 4 दशसहस्रम् -दश हजार १०००० 5 लक्षम् -लाख १०००००० 6 दशलक्षम् = दश लाख 7 कोटिः = कडोर 8 दशकोटिः = दश कडोर १०००००००० १ अर्बुदम १००००००००० १०००००००००० -खरब १०००० ००००० - अरब 1० दशार्बुदम् = दश अरव खर्वः दशखर्वः =दश खरब 13 नीलम् = नील 1+ दशनीलम् = दश नील १०००० ००००० १०००० ००००० . ०० १०००० ००००० 15 पमम् - पदुम १०००० .. ००००० .. दशपमम् = दश पदुम 17 शंखः = शंख १४ महाशंखः = दश शंख १०००० ०००००० १०००० ०००००० (६) गुप्ताशुद्धिपदर्शनम् पतिना रक्षिता सर्वा दारा भवति शोभना । सो विधि गृहाना सा करोति मतिना मुदा ।। १ ते गृहः कुत्र मित्राइस्ति द्रक्षिष्यामि सखेरह 13 १. पत्या । पति शब्द को समान में ही घिसंज्ञा होने से नाभाव नहीं होता। २. रक्षिताः । दारशब्द के 'दाराः पुंसि च भूम्नि एव' इस नियम से पुंल्लिङ्ग और नियत बहुवचनान्त होने से उसके विशेषण रक्षित' शब्द भी वैसा होगा। ३. सर्वे । दारशब्दका विशेषण होनेसे सर्वशब्द भी पुंल्लिङ्ग बहुवचनान्त होग!! ४. भवन्ति । दाररूप कर्ता के अनुसार भानक्रिया से वहुवचन होगा। ५. शोभनाः । पूर्वोक्तनियमानुसार दारविशेषण शोभन से भी बहुवचन होगा। 5. सर्वम् । 'क्यन्तो धुः' इसलिङ्गानुशासन क्रम से किप्रत्ययान्त विधि शब्द के पुंल्लिङ्ग होने से उसका विशेषण सर्व शब्द भी पुल्लिङ्ग होगा। १. गृहाणाम् । ‘अटकुप्वाङ् से णत्व हो जायगा । ८ ते । तत् शब्द प्रस्तुत बुद्धिविषय के ग्राहक होने के कारण उपस्थित दारा अर्थ का बोधक होने से पुंल्लिङ्ग बहुवचनान्त होगा। १. कुर्वन्ति । कर्तृवाच्य में कर्ता के अनुसार क्रिया में वचन और पुरुष की व्यवस्था होने से यहाँ बहुवचनान्त होगा। १०. मत्या । स्त्रीलिङ्ग में नाभाव का निषेध है अतः ना आदेश नहीं होगा। ११. तव । 'अनुदात्तं सर्वमपादादौ' ऐसा सूत्र है अतः यहाँ पादके आदिमें रहनेसे तवको ते आदेश नहीं होगा । १२. गृहम् । “गृहाः पुंसि च भूमन्येच" इस नियम से एकत्व संख्या अर्थ में गृह शब्द से नपुंसक में एकवचन होना ही समुचित है। १३. मित्र ३ ! अस्ति । सम्बोधन में प्लुत होनेसे प्रकृतिभाव होगा। १४. द्रक्ष्यामि । दृश्धातुको अनिट् होने से लूट में स्य प्रत्ययको इट नहीं होगा। १५. सख्युः । सखि शब्द को घिसंज्ञाका निषेध होने से "डिति" से गुण न होकर यण और "ख्यत्यात्परस्य" इस सूत्रसे उत्व हो जायगा । १६. अहम् । हल्के परे न होनेसे “मोऽनुस्वारः" से अनुस्वार नहीं होगा। " गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम् । विहित्वा' सर्वकार्यानि विप्रं दद्यां बहुं धनम् ॥ २॥ प्रभुक्त्वा त्वं गृहेणा अागतो सखिना सह । 'भ्रातत्वदीयमित्रोऽत्र नागतः केन हेतुना ।। ३ ।। तव साकं गमिष्येऽइ3 नोचेत् प्रेमस्य बन्धने । मरिष्ये नात्र संदेहस्त्यजिष्यामि असुं निजम् ॥ ४ ॥ १. विधाय । 'समासेऽनपूर्वे क्त्वो ल्यप्' से क्त्वा का ल्यप् हो जानेपर तकारादिके परमें नहीं रहनेसे दधातेहि' से हि आदेश नहीं होगा। २, कार्याणि । रेफ के उत्तर नकार को 'अट्कुप्वाङ' से णकार हो जायगा । ३. विप्राय । दाधातुके योगमें सम्प्रदान संज्ञा होकर चतुर्थी हो जायगा। ४. बहु । धन शब्दके विशेषण होनेसे बहुसे भी नपुंसकत्व होगा ५. प्रभुज्य । 'समासेऽनपूर्वे' से ल्यप हो आयगा। ६ गृहात् । अपाय अर्थ भासित होनेपर ध्रुवसे अपादानमें पञ्चमी होजाती है ७. आगतः । वा शरि' इस सूत्रसे शर् परे रहने पर विकल्पसे विसर्गको विसर्ग हो जाता है । पक्षान्तर में विसर्गको सकार हो जायगा । ८. सख्या । . सखि शब्द को घिसंज्ञा नहीं होती अतः टाको ना नहीं होगा। ९. भ्रातस्त्वदीयम् । “विसर्जनीयस्य सः" से विसर्ग को सकार होगया। १०.मित्रम् । सखिवाचक मित्रशब्द नपुंसक ही माना गया ११. नागतम् । नपुंसक मित्र का विशेषण होने से नपुंसक ही होगा। १२. त्वया । सहार्थवाचक शब्दके योगमें 'सहयुक्तेऽप्रधाने' से तृतीया होगी। १३. गमिष्यामि । गमधातु परस्मैपदी हैं अतः तक नहीं होगा। १४. प्रेम्णः । प्रेमन् शब्द नकारान्त है इस लिये अदन्तत्व के अभाव होने से 'टाङसिङसामिनात्स्याः' इस सूत्र से डस् को स्य आदेश नहीं होगा। १५. बन्धनात् । हेतु अर्थ में 'हेतौ' इस सूत्र से पञ्चमी हो जाती है। १६. मरिष्यामि । मृधातु को लुङ् लिङ और शित्प्रत्यय में 'म्रियते लिश्च' इस सूत्र से प्रात्मने पद होने से लूट में परस्मैपद ही होगा। १७. त्यक्ष्यामि । त्यज् धातुको अनिट् होने से इडागम नहीं हुआ। १८. असून् । असु शब्द बहुवचनान्त है । ( 'पुंसि भूम्नयसवः प्राणाः') १९. निजान् । बहुवचनान्त असु के विशेषण होने से बहुवचनान्त होगा। है .

१२ १२ भुङ्क्ते सन्धिचन्द्रिका वमनानेनं गच्छन्तः कर्म कुर्वन्ति ये नरः । नमस्कृत्वा प्रभुं यान्ति मरित्वा ते न संशयः ॥५॥ गुरुणा श्रुतिमधीते नाधीती शब्दानुशासनम् । न्यायशास्त्रमधीयन्तो नो बिभ्यन्ति केनचित् ॥ ६॥ ये नो ददन्ति नो पुनर्रमन्ति योषितः१४ १. वर्त्मना । वर्त्मन् शब्द नान्त है अतः टाको इन आदेश नहीं हुआ । २. कर्म । कर्मन् शब्द नकारान्त नपुंसक है इसलिये “स्वमोनपुंसकात्" से अम् विभक्ति का लुक् होकर नकार का भी लोप हो जायगा । ३. नराः। नर शब्द को अदन्त होने से जस् विभक्ति में 'प्रथमयोः' से दीर्घ हो जाता है । ऋकारान्त नृ शब्द के ग्रहण पक्ष में 'नरः' का प्रयोग ठीक ही है। ४. नमस्कृत्य । गति संज्ञक नमः शब्द के साथ "कृत्वा” को “कुगति- प्रादयः" से समाप्त होने पर “समासेऽनअपूर्वे' से क्त्वा को ल्यप् हो जायगा। ५. मृत्वा । मृधातु अनिट् है इसलिये इडागम नहीं होगा और कित् होने से "किति च” से गुण का निषेध भी हो जायगा । ६. गुरोः । “आख्यातोपयोगे च” से नियम पूर्वक जिससे विद्या ग्रहण करें उससे अपादान संज्ञा द्वारा पञ्चमी हो जाती है। ७. शब्दानुशासने। "क्तस्येविषयस्य कर्मण्युपसंख्यानम्” से सप्तमी होगी। ८. अधीयानः । इङ् धातु आत्मनेपदी है इसलिये शानच् प्रत्यय होगा। ९, बिभ्यति । भीधातु अभ्यस्त संज्ञक है इसलिये “अदभ्यस्तात्"। से मि प्रत्यय का अत् आदेश होजायगा । १०. कस्माच्चित् । भयार्थक धातु के योग में "भीत्रार्थानां भयहेतुः" से भय के हेतु वाचक शब्द के अपादान संज्ञा द्वारा पञ्चमी हो जाती है । ११. ददति । दाधातु भी अभ्यस्त संज्ञक है अतः अदादेश होगा। १२. भुञ्जते । कर्ता के बहुत्व होने से बहुवचनवी क्रिया होगी । १३. पुनारमन्ते । रम् धातु आत्मनेपदी है इसलिये मप्रत्यय का अन्त आदेश होकर "रोरि" इस से रेफ का लोप होने पर दीर्घ हो जायगा । १४. योषिद्धिः। योषित् शब्द तकारान्त है अतः ऐसादेश नहीं होगा।

गुप्ताशुद्धिप्रदर्शनम् ६५ जहित्वा सर्वं ते जान्ति जगतेऽस्मिन् विनिन्दितः ॥ ७ ॥ सन्धिस्त्वया न कर्तव्या महती" रिपुणा सह । प्राप्ते विपत्तौ धीरत्वं नो जहन्ति महज्जनाः ॥८॥ फले इमेऽतिमधुरे बाला जक्षन्ति हर्षिताः । क्रीडन्ते च अहोरात्रं रोदन्ति न कदाचनः ॥ ६ ॥ १. हात्वा । क्त्वा प्रत्यय आर्थ धातुक है इसलिये श्लु प्रत्यय नहीं होने से द्वित्व नहीं होगा। २. यान्ति । या धातु यकारादि है इसलिये जकारादि अशुद्ध है। ३. जगति । जगत् शब्द तान्त है अतः ङिविभक्ति में गुण नही होगा । ४. कर्तव्यः । सन्धि शब्द पुंल्लिङ्ग है अतः उस का विशेषण पुंल्लिग ही होगा। ५. महान् । पुंल्लिङ्ग सन्धिशब्दके विशेषण होनेसे यहां भी पुंल्लिङ्ग ही होगा। ६. प्राप्तायाम् । विपत्तिशब्द 'क्तिन्नन्तं स्त्रियाम्' इस नियमले स्त्रीलिङ्ग है । अतः उसका विशेषण होनेसे यह भी स्त्रीलिङ्ग हो जायगा। ७. जहति । 'अदभ्यस्तात्' से मिप्रत्ययको अत् आदेश होगा। ८. महाजनाः । महत् शब्दको 'पान्महतः से आत्व होगा। ९. इमे अतिमधुरे । 'ईदूदे द्विवचनम्' से प्रगृह्य होकर प्रकृतिमात्र होगा! १०. जक्षति । 'जनित्यादयः षट् से झिप्रत्ययका अत् आदेश होगा। ११. हृष्टाः । हृष्धातु अनिट् है अतः क्तप्रत्ययको इडागम और कित् होनेसे गुण नहीं हुआ १२. क्रीडन्ति । क्रीडधातु परस्मैपदी है अतः आत्मनेपद नहीं होगा। १३. चाहोरामः । श्लोकपादके मध्यमें रहनेसे सन्धि और "रात्राहाहः पुंसि' से पुंस्त्व हो जायगा। १४. रुदन्ति । झिप्रत्ययको ‘सार्वधातुकमपित्' से डित् होनेसे गुण नहीं होगा। १५. कदाचन । तद्धितश्वासर्वविभक्तिः' से अव्यय होनेसे विभक्ति नहीं होगी। ५सं०च० सन्धिचन्द्रिका नीचाऽपि ये नमस्यन्ति विष्णवे कुप्यन्ति नो नवा ! प्राप्त्वा महत्वमातास्ते वञ्चयन्ति न सज्जनान् ।। १० ।। (७) उपसर्ग-विचार- उपसर्गकी गति तीन प्रकारकी होती है। कोई उपसर्ग धातुके मुख्यार्थको बाधकर नवीन अर्थका बोध कराता है, कोई धात्वर्थका ही अनुवर्तन करता है और कोई विशेषण होकर उसी धात्वर्थको और भी स्फुटित कर देता है। तदुक्तम्--- धात्वर्थ बाधते कश्चित्कश्चित्तमनुवर्तते । विशिनष्टि तमेवाऽर्थमुपसर्गगतिस्विधा ।। अन्यच्च- उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते । प्रहाराऽऽहार-संहार-विहार-परिहारवत् ।। विविध उपसर्गके बलसे धात्वर्थ भी विविध अर्थमें परिवर्तित होता है। (निम्न परिशिष्ट नं० ८ देखो)। १. नीचा अपि । यलोप की असिद्धता होनेसे दीर्घ नहीं होगा। २. विष्णुम् । कर्मत्व होनेसे कर्म में द्वितीया होगी। ३. प्राप्य । 'समासेऽननपूर्वं' से क्त्वा प्रत्ययका ल्यप् आदेश होगा। ४. वञ्चयन्ते । 'गृधिवञ्च्योः' से आत्मनेपद होजायगा।

असु क्षेपणे- (८) अनुवादोपयोगिधात्वर्थ- अञ्च-गतिपूजनयोः- १ अञ्चति--जाता या पूजता है। १ अस्यति-फेंकता है, १ प्राञ्चति--उन्नत होता है २ अपास्यति-दूर करता है, ३ पराञ्चति--लौटता है। ३ अध्यस्यति-आरोप करता है, न्यञ्चति-नीचे जाता है। ४ वन्यस्यति स्थापित करता है, ५ प्रत्यञ्चति--अवनति प्राप्त करता है। ५ न्यस्यति-सौंपता है, ६ उदञ्चति-ऊपर जाता है । ६ अभ्यस्यति-कण्ठस्थ करता है, ७ सहाञ्चति--साथ जाता है। ७निरस्थति-हवाता है, ८ अवाञ्चति--अधोमुख होता है। ८व्युदस्यति-नकालता है, ६ पर्युदञ्चति- बैंचा लेता है। ९ परास्यति परास्त करता है, ३० समञ्चति-अच्छोतरह जाता या पूजता है। १० व्यत्यस्यति-उलटपलट करता है, ३१ तिरोञ्चति--टेढा जाता ११ विपर्यस्यति-विपर्यास करता है, ११ समस्यति-संक्षिप्त करता है, है अय गतौ- आप्न व्याप्तौ- है, - १ आप्नोति प्राप्त करता है, व्याप्त करता २ व्याप्नोति- फैलता है, ३ समाप्नोति- समाप्त करता समाप्त होता है, ४ अवाप्नोति--प्राप्त करता है, ५ पर्याप्णोति-(पर्याप्त होता है, . १ अयते-जाता है, २ प्लायते-भागता है, ३ पलायते- ४ उदयते-उदय लेता है, ५ व्ययते-खर्च करता है, ६ निरयते-निकलता है, दुरयते-दुःखी होता है, मनिलयते-विलीन होता है, दुलयते-काँपता है, अर्थ उपयाच्यायाम्- १ अर्थयते-मांगता है, २ समर्थयते--अनुमोदन करता है, अभ्यर्थयते-निवेदन करता है, प्रार्थयते-प्रार्थना करता है, ५ व्यर्थयते-विफल करता ६ अन्वर्थयते--अर्थानुकूल करता आस उपवेशने- २ आस्ते-बैठता है, २ उदास्ते-उदासीन होता है, ३ उपास्ते-ध्यान करता है, ४ अध्यास्ते-रहता है, ५ अन्वास्ते-पीछे बैठता है, ३ . इण् गतौ- है. १ एति-जाता है, २ प्रत्येति-विश्वास करता है, है ६- सन्धिचन्द्रिका है है क है होता है ३ अत्येति-नट होता है। ४ अन्वेति-पीछे निलता है। विपर्येति-उलवा समझता है। ३ उपैति - पास जाता या पाना अभ्येति-सामने आता है। व्यत्येति--उलट पलट करता या बीतता है। ज्येति--खर्च करना है। १० अवैति--जानता है। ११ अपैति--दूर १२ समवैति--सम्बद होता है । १३ समन्वेति-समन्वय करता है : १४ अभिप्रैति--इष्ट करता है। १२ उदेति--उदित होता है। ईह चेष्टायाम्- 1 ईहते-- चेष्टा करता है। समीहते-चाहता है। ३. निरीहते-नि:स्पृह होता है ईनदर्शने- इक्षते--देखता है। अपेक्षते--इच्छा करता है। ३ उपेक्षते-लापरवाही करता है। ४ वीक्षते-देखता है। ५ प्रतीक्षते--प्रतीक्षा करता है। ६ परीक्षते--परीक्षा करता है। ७ निरीक्षते--निगरानी करता है। ८ समीक्षते-विमर्श करता है। ९ उत्प्रेक्षते--सम्भावना करता है। १० अन्वीक्षते-चिन्तन या मनन करता है। ऊह वितर्के १ऊहते--विचार करता है। २ अपोहते- छोड़ता है। ३ उपोहते-चमविचार करता है। ४ समूहते--शोधित करता ५ प्रत्यूहते-विघ्न डालता है ६ ब्यूहते--संगठित करता है। ७ दुरुहते-कठिनाई से जानता है डु) कृष करणे- १ करोति--करता है। २ अनुकरोति-नकल करता है। ३ अपकरोति--हानि करता है। ४ विकुरुते--उच्चारण करता है। ५ विकुर्वते--विकार प्राप्त करता है। ६ उपकुरुते--सेवन करता है। ७ अधिकुरुते--क्षमा या पराभव करता है। ८तिरस्करोति-तिरष्कार करता है। ९ निराकरोति--हटाता है। १० परिष्करोति--परिष्कृत करता है। ११ आविष्करोति-प्रकट करता है। १२ संस्करोति--संस्कार करता है । १३ उत्कुरुते-चुगली करता है। १४ उदाकुरुते-झपटता है। १५ प्रकुरुते--जबर्दस्तीकरता है १६ उपस्कुरुते--दूसरे का गुण ग्रहण -- । करता है १७ अलंकरोति-भूषण पहनता है। १८ उपकरोति--भलाई करता है। १९ प्रतिकरोति--प्रतिकार करता है। २० अपाकरोति-खण्डन करता है। २१ प्रत्युपकरोति-प्रत्युपकार करता है, - क्रमुपाद विक्षेपे- १क्रामति--चलता है। २ क्रमत--उत्साह करता है। ३--उपक्रमते-प्रारम्भ करता है। ४प्रक्रमते- ५ विक्रमते--आगे बढ़ता है। ६ पराक्रमते. -अप्रतिहत होता है। " m गम्ल गतौ- है है अनुवादोपयोगिधात्वर्थ । ६६ आक्रमते--उदय लेता है। २ उच्चरते-उल्लंघन करता है। ८ अतिक्रामति--उल्लंघन करता है ३ उच्चरति-ऊपर जाता है। ९ परिक्रामति--प्रदक्षिण करता है । ४ विचरति-विचरण करता है १०निष्क्रामति--निकलता है। ५ आचरति--प्राचरण करता है ११ अपक्रामति-हटता है। ६ परिचरति-सेवा करता है। १२ संक्रामति--संक्रान्त होता है। ७ उपचरति-उपचार करता है। १३ अनुक्रामति--अनुक्रम करता है। ८ अनुचरति-अनुसरण करता है ११ आक्रामति--ऊपर जाता है। ९संचरते-भ्रमण करता है। १० दुराचरति-बुरा आचरण करता १ गच्छति-जाता है। ११ अतिचरति-जादा गमन करता है २ आगच्छति-आता है। १२ व्यभिचरति-व्यभिचार करता ३ संगच्छते-संगत होता है। १३ अपचरति-विपरीत करता है। ४ निर्गच्छति-निकलता है। चित्र चयने- ५ अनुगच्छति-पोछे जाता १ चिनोति-दुनता है। ६ अवगच्छति-जानता है। २ परिचिनोति-पहचानता है। ७ अधिगच्छति-प्राप्त करता है ३ निचिनोति-इकट्ठा करता है। ८ अभ्यागच्छति-सामने आता है। ४ उपचिनोति-बढ़ाता है। ९ प्रतिगच्छति-लौटता है। ५ अपचिनोति-घटाता है। १० अभ्युपगच्छति--स्वीकार करता है। ६ संचिनोति-जमा करता है। ११ उद्गच्छति-ऊपर जाता है। ७ निश्चिनोति-निश्चय करता है। १२ अपगच्छति-दूर हटता है। ८ समुचिनोति-अधिक करता है। ग्रह-उपादाने- ९ अन्वाचिनोति-आनुषङ्गिक करता १ गृह्णाति-लेता है १० अवचिनोति-इकठ्ठा करता है। २ आगृह्णाति आग्रह करता ज्ञा अवबोधने- ३ अनुगृह्णाति-कृपा करता १ जानाति-जानता है। ४ दुरागृह्णाति-हठ करता है। २ जानीते-प्रवृत्त होता है। ५ प्रतिगृह्णाति-दानलेता है। ३ अपजानीते-छिपाता है। ६ विगृह्णाति लड़ाई करता है। १ प्रतिजानीते-प्रतिज्ञा करता है। ७ निगृह्णाति-कैद करता है। ५ अनुजानाति-अनुमति देता है। ८ संगृह्णाति-इकठ्ठा करता है। ६ अभ्यनुजानाति-स्वीकार करता है। ९ परिगृह्णाति-पासक्ति करता ७ त्यभिजानाति-प्रत्यक्ष का स्मरण चर गतिभक्षणयोः- १ चरति-घूमता या खाता है। ८ अभिजानाति-पहचानता है। । - है - है है करता है। - Criter है है करता है। है -- 95 । है ९ अपिधत्ते--, 39 -लाता है सन्धिचन्द्रिका ९ उपजानाति-आरम्भ करता है। १० अपदिशति बहाना करता है। १० संजानीते-देखता है प्रतिनिर्दिशति-विक्षय को बतलाता है। ११ अवजानाति-अपमान करता है। (ड) धाम-धारणपोषणयोः- १२ विजानाति-निन्दा करता है १ दधाति-धारण करता णी प्रापणे- २विदधाति-करता १नयति लेजाता है। ३ अनुसंधालि-अनुसशन ( खोज २ विनयक्ति-विनय करता है। ३ विनयते-गिनता या खर्च करता ४ अन्तर्धत्ते-छिपता है। ४ अनुनयति-मनाता है। ५तिरोधत्ते- ५ परिणयति-विवाह करता है। अभिधत्त--बोलता है। ६ निर्णयति-निणय करता है ७ अवधत्ते-ध्यान देता है। ७ अभिनयति-अभिनय करता है। ८ पिधत्ते-डाँकता है। ८ उपनयति-पासमें लाता ९ अपनयति-हटाता है। १०संधत्ते-मेल करता है। १० आनयति- ११ परिधत्ते-पहनता है। ११ प्रणयति-प्रेम करता है। १२ आधत्ते-स्थापित करता है। १२ उन्नयते-ऊपरले जाता है। १३ निधत्ते-रखता है। तृ प्लवनतरणयोः १४ प्रणिधत्ते-ध्यानकरता १ लरति-नैरता है। १२ प्रतिनिधत्ते-प्रतिनिधि करता है। २ अवतरति-उतरता है। ३ वितरति देता है। ४ उत्तरति-जबाब देता है। १ पतति--गिरता है। ५ संतरति-ऊपर तैरता है। २ प्रणिपतति-प्रणाम करता है। दिश अतिसर्जने- ३ निपतति-गिरता है। १दिशति देता है। ४ उत्पतति-उड़ता है। २ आदिशति -आज्ञा देता है। ५ प्रपतति-गिरता है। ३ निर्दिशति-बतलाता है। ४ उद्दिशति--उद्देश कहता है । ५ उपदिशतिः १ पद्यते-जाता है। -उपदेश करता है। ६ निदिशति-अनुमति देता है। २ उत्पद्यते--पैदा होता है। ७ संदिशति-संदेश कहता है। ३ विपद्यते-मरता है। ८ व्यपदिशति-मुख्यव्यवहार करता है। ४ संपद्यते---सुखी होता है। ९ अतिदिशति-काल्पनिक व्यवहार ५ उपपद्यते-युक्त होता है ६आपद्यतेबोद लगता है - है पत्तृ पतने- पद गतौ- - - करता है M । अनुवादोपयोगिधात्वर्थ! ७ प्रपद्यते-शरण में जाता है २ अभियुनति-अभियोग करता है : .८ निष्पद्यते-निष्पन्न होता है। ३ उयुनक्ति-उद्योग करता है। २ प्रतिपद्यते-आज्ञा मांगता है। ४ संयुनक्ति-संयुक्त करता है। ३० व्युत्पद्यते-युत्पन्न होता है। ५ प्रतियुनक्ति-पर्दा करता है बन्ध बन्धने- ६ अनुयुनक्ति-पूछता है। १ बध्नाति-बांधता है। पर्यनुयुनक्ति प्रत्युत्तर देता है २ प्रबध्नाति-प्रबन्ध करता है। ८ उपयुनक्ति-उपयोग करता है : ३ निबध्नाति--रचता है। वियुनक्ति-वियुक्त करता है। ४ प्रतिबध्नाति-रोक लगाता है। १० नियुनक्ति-नियुक्त करता है ! ५ सम्बध्नाति-जोड़ता है। ६ उद्बध्नाति--फासी लगाता है। रुह बीजजन्मनि- निबंधनाति--प्रेम करता है रोहति जमता है। २ प्ररोहति-उत्पन्न होता है। भू सत्तायाम्- ३ अधिरोहति-चढ़ता है। १ भवति होता है। ४ अवरोहति-उतरता है। २ अनुभवति अनुभव करता है। ५आरोहति-चढ़ता ३ अभिभवति-दवाता है। ६ संरोहति-मिलता है। . ४ पराभवति-पराभव करता है ! ५ परिभवति-तिरस्कार करता है। १ लपति-बोलता है। ६ उद्भवति-उत्पन्न होता है। २ विलपति-विलाप करता है । ७ आविर्भवति-प्रकट होता है। ३ प्रलपति-बकवास करता है। ८ प्रादुर्भवति-- ४ आलपति-बोलता है। ९ सम्भवति हो सकता है ६ संलपति वार्तालाप करता है । १० तिरोभवति-छिपता है । ६ अपलपति-छिपाता है। ११ अन्तर्भवति-"" वद व्यक्तायां वाचि- १२ प्रभवति-समर्थ या पैदा होता है। १. वदति-बोलता है। मनु-अवबोधने- -छोड़ता है। १ मन्यते-मानता है। २ अवमन्यते--तिरस्कार करता है। ३ अपवदति-दूषित करता है । ३ अनुमन्यते सलाह देता है । ४ अनुवदति-अनुवाद करता है ! ४ संमन्यते-सम्मान करता ५ उपवदते--प्रार्थना करता ५ विमन्यते-उपेक्षा करता है। ६ विवदते-झगड़ता है। ६ अभिमन्यते-घमण्ड करता है। ७ संप्रवदन्ते-मिलकर बोलता है। युजिर योगे- ८ अनुवदते-तुल्य बोलता है। १ युनक्ति-जोड़ता है। ९ विप्रवदन्तेविरुद्ध बोलता है। लप लपने- " २ अपवदते- है सन्धिचन्द्रिका १० प्रतिवदति--जबाव देता है। ११ संवदति--बात करता है। वृतु वर्तने- -- है है । १ वर्तते--है। २ प्रवर्तते--प्रवृत्त होता है। ३ निवर्तते-लौटता है ४ परिवर्तते-घूमता है। ५ अनुवर्तते-पीछे चलता है। ६ निर्वते-शान्त होता है। दुर्वर्तते-बुरा आचरण करता है। ८ विवर्तते-बदलता है। ९ आवर्तते-दुहराता है। षद्ल विशरणगत्यवसादनेषु- सीदति-ठहरता या दःखी होता है। २ प्रसीदति--बुश होता है। ३ विषीदति-खिन्न होता है। ४ निषीदति-बैठता है ६अवसीदति---थकता है। ६ पर्यवसीदति--समाप्त होता है। ७ उपसीदति-पास में बैठता है ! ष्ठा गतिनिवृत्तौ- १तिष्ठति--ठहरता है ! २ प्रतिष्टते-प्रस्थान करता है। ३ उपतिष्टते-उपस्थान करता है ४ उत्तिष्ठति--उठता है ५ अनुतिष्ठति करता है ६ संतिष्ठते-मरता है। ७ अवतिष्ठते--स्थिर होता है। ६ अपसरति हटता ७ परिसरति-धूमता है। ८संसरति-सम्बद्ध होता है। ९ उत्सरति-अलग होता है, १० उपसरति-पास जाता है। हज हरणे- १ हरति-ले जाता है। २ अपहरति-चुराता ३ अनुहरति-नकल करता ४ परिहरति--छोड़ता है। ५ आहरति-लाता ६ व्याहरति-बोलता है। ७ व्यवहरति-यवहार करता है ८ अभ्यवहरति-वाता है। ९ग्रहरति-मारना है। १० संहरति-नाश करता है। ११ उपसंहरति-उपसंहार करता है। १२ विहरत्ति-विहार करता १३ समाहरतिकट्ठा करता है । १४ उद्धरति-निकालता है १५ उपहरति-उपहार देता है। १६ उपाहरति-लाता है। १७ उदाहरति-उदाहरण देता है। १८ प्रत्युदाहरति-इसरा उदाहरण देता है। क्षिप प्रेरणे- १ क्षिपति-फेकता है। २ निक्षिपति-नीचे फेकता है। सौंपता है ३ प्रक्षिपति-प्रक्षेप करता है। ४ आक्षिपति-दोष लगाता है। ५ अधिक्षिपति-दोष लगाता है। ६ संक्षिपति-छोटा करता है । ७ उत्क्षिपति-ऊपर फेकता है। ८ अधः क्षिपति-नीचे फेकता है। ९विक्षिपति-विक्षिप्त होता है। مونو - मृ गतौ-- १ सरति-जाता है। २ अनुसरति-अनुसरण करता है। ३ प्रसरति-फैलता है। ४ अभिसरति-निकलता ५ निःसरति-निकलता है। है - EMA , (९) व्याकरणादिलक्षणम् १-व्याकरणम् व्याक्रियन्ते = व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनेनेति-शब्दज्ञानजनकं व्याक- रणम्, तच्च सूत्रम् । जिससे साधु शब्दका ज्ञान हो उसीका नाम व्याकरण है। ( व्याकरणका इतवृत्त मेरी 'इन्दुमती' टोकायुत 'लघुकौमुदी' की प्रस्तावनामै पढ़िये, २-मूत्रलक्षणम् अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद्विश्वतो मुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। सूत्रोंके भेद-सञ्ज्ञा च परिभाषा च विधिनियम एव च अतिदेशोऽधिकारश्च पविधं सूत्रलक्षणम् ।। १. संज्ञासूत्रं यथा-वृद्धिरादैच् , अदेखणः, इत्यादि । २. परिभाषासूत्रम् (कुव्यवस्थायां सुव्यवस्थासम्पादकं सूत्रम् ) यथा-श्रादेः परस्य, तस्मिन्निति गिर्दिष्टे पूर्वस्य, इत्यादि । ३. विधिसूत्रं यथा-इको यणचि, एचोऽयवायाकः, इत्यादि । ४. नियमसूत्रं यथा-कृत्तद्धितसमासाश्च, रात्सस्य, इत्यादि । ५. अतिदेशसूत्रं यथा--'स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ, तृज्वत्क्रोष्टुः, इत्यादि ! ६. अधिकारसूत्रं यथा-या प्रातिपदिकात्, आर्धधातुके, इत्यादि । ३-चार्तिकलक्षणम् । उक्ताऽनुक्तदुरुक्तानां चिन्ता यत्र प्रवर्तते । तं ग्रन्थं वार्तिकं प्राहुर्वार्तिकज्ञा मनीषिणः ॥ ४-भाष्यलक्षणम् । सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र वर्णैः सूत्रानुसारिभिः । स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदुः।। ५-व्याख्यानुलक्षणम्। पदच्छेदः पदार्थोक्तिर्विग्रहो वाक्ययोजना । आक्षेपश्च समाधानं व्याख्यानं षड्विधं मतम् ॥

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(१०) विद्यार्थि-शिक्षालूत्रम्
छात्राणामुपकाराय हितमुपदिशाम्यहम् ।
येन जीवनसतेयामुन्नतिप्रवणं भवेत् ॥ १॥
छात्रों के उपकारार्थ मैं कुछ हित बात बतलाता हूँ। जिससे उनका जीवन
उन्नतिशील हो ॥१॥
इन्द्रियाणि वशीकृत्य सलाधाय मनस्तथा !
प्रत्यहं प्रातरुत्थाय प्रसुंबन्देदतन्द्रितः ॥ २ ॥
सबसे पहिले इन्द्रियोंको अपने वश में कर और मनको एकाग्र बनाकर प्रति-
रोज सवेरे उठकर आलस्य छोड़कर ईश्वर की वन्दना करें ॥ २ ॥
शौचस्नानादिकं कृत्वा सन्ध्याहवनमाचरेत् ।
पूर्वं पठितपाठानामावृत्तिं नित्यशश्चरेत् ॥ ३ ॥
शौच दन्तधावन स्नान आदि शारीरिक पवित्रता सम्पादन कर सन्ध्या
: परमात्मचिन्तन ) और हवन करें । तदुपरान्त पड़े हुए गठों का आवर्तन करें।
ततो गुरुमुखाग्रन्थमाद्योपान्तं पठेन्मुदा ।
गुरुशुश्रूषणं कृत्वा सततं पाठमभ्यसेत् ।। ४ ।।
तदनन्तर गुरु मुखसे अपनेर पाठों को पढ़ें। बाद में गुरुकी यथोचित सेवाकर
हमेशा पाठ का अभ्यास करें ।। ४ ।।
परीक्षोत्तीर्णतार्थाऽपि योग्यता परमौचिती।
अर्जनीया सदा शिष्यैर्वा व्युत्पत्तिरन्ततः ॥ ५ ॥
परीक्षा में सफलता प्राप्त्यर्थ उचित योग्यता हासिल करते हुये आन्तरिक
व्युत्पत्ति बढ़ाने की भी चेष्टा करें ॥५॥
व्युत्पत्तिमन्तरा नैव प्रतिपत्स्यात् कथंचन ।
अतो व्युत्पत्सुभिर्भाव्यं छात्रैजिज्ञासुभिस्तथा ॥ ६ ॥
व्युत्पत्तिके बिना कुछ भी पदार्थों का वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता इसलिये
विद्यार्थियों को व्युत्पत्ति की जिज्ञासा अवश्य रखनी चाहिये ॥ ६ ॥
समयस्य महामूल्यमज्ञात्वा य उपेक्षते ।
जीवनं तस्य व्यत्येति व्यर्थमेव न संशयः ॥७॥
जो विद्यार्थी समय की कीमत को नहीं जानकर (पढ़ने में) लापरवाही करता
उसका जीवन निःसन्देह व्यर्थ ( कंटकाकीर्ण ) हो जाता है ॥ ७ ॥

विद्यार्थि-शिक्षासूत्र परीक्षां दातुकामो वै लेखशक्तिं विवर्धयेत् । अल्पेनापि सुलेखेन परीक्षोत्तीर्यते ध्रुवम् ।। ८ ।। परीक्षा देनेवालोंको चाहिये कि लिखने की शक्तिको अच्छी तरह बढ़ावे क्योंकि थोड़े भी सुन्दर लेखोंसे निश्चितरूपेण परीक्षामें सफलता मिलती है ॥ ८ ॥ लेखशक्तिविहीनेन बहुश्रमयुताऽपि वा । परीक्षामुत्तरीतुं हा! पार्यते न कथंचन || || उत्तम लेख करने में कमजोर छात्र अधिकसे अधिक मेहनत करने पर भी परीक्षा में सफलता प्राप्त नहीं करते ॥ ९ ॥ परीक्षा भवनं गत्वा मनश्चाञ्चल्यमुत्सृजेत् । निर्भीकतां समासाद्य शान्तचित्तो भवेज्जनः ।। १०॥ परीक्षाभवनमें जाकर मनकी चञ्चलता को दूर कर हृदयसे भयको विलकुलः हटाकर प्रसन्नचित्त हो जाना चाहिये ॥ १०॥ प्रश्नपत्रं गृहीत्वादौ प्रश्नान् सर्वान् निभाल्य च। उत्तरं विदितं सम्यगादौ लेख्यं सविस्तरम् ॥ ११ ॥ पहले प्रश्नपत्र लेकर सब प्रश्नोंको अच्छी तरह हृदयङ्गम करके सबसे पहिले जिस प्रश्न का उत्तर खूब उत्तम रूपसे आता हो उसीको लिखें ॥ ११ ॥ कालानुपातमाश्रित्य सारगर्भेण सत्वरम् । संक्षेपेणैव लेखेन प्रश्नानामुत्तरं लिखेत् ।। १२ ।। परीक्षा समयके औसत को ध्यानमें रखकर संक्षेपमें ही सारगर्भित लेखसे अनिवार्य प्रश्नोंका उत्तर लिखना चाहिये ॥ १२ ॥ समयस्य समाप्तः प्राक स्वासनं परिहाय च । केन्द्रान्न बहिर्गच्छेदनुतापोऽन्यथा भवेत् ॥ १३ ॥ समयके समाप्त होनेसे पहिले आसनको परित्याग कर केन्द्र भवनसे बाहर नहीं निकलें, नहीं तो बड़ी हानि होगी ॥ १३ ॥ सिंहावलोकनन्यायात् शोधयेल्लिखितोत्तरम् । गच्छतः स्खलनन्यायात् जाता त्रुटिविनश्यति ॥ १४ ॥ अन्तमें लिखित उत्तरोंको पीछेकी एक निगाह डालकर संशोधित करलें, जिससे भ्रमवश लेखकी सारी भूलचूक दूर हो जायगी ॥ १४ ।

७ - ७ उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल पंजाब आदि की संस्कृत तथा हाई स्कूल की परीक्षा स्वीकृत अनुवाद का सर्व श्रेष्ठ ग्रन्थ- संस्कृतरचनानुबादशिक्षकः (सन्धि, धातुरूप आदि से परिवर्द्धित अभिनव संस्करण ) इसमें परीक्षार्थी छात्रों को अनुवाद करने के नियम अत्यन्त सरल रूपमें -समझाए गये हैं और तदनुसार अनुवादार्थ अभ्यास भी दिए गये हैं। अभ्यासार्थ वाक्यों में आए हुए प्रत्येक कठिन शब्दों को संस्कृत से हिन्दी तथा हिन्दी से संस्कृत अनुवाद करने के प्रबन्ध भी पुस्तक के अन्त में ९० प्रकरणों में दे दिये हैं जिनसे अनुवाद करने में अत्यन्त सरलता हो गई है। पुस्तक की उपादेयता पर गवर्नमेण्ट सं० कालेज, हिन्दू विश्वविद्यालय काशी तथा आगरा, खुर्जा, सहारनपुर, इन्दौर आदि के बड़े बड़े विद्वानों ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसापत्र दिए हैं जो पुस्तक में प्रकाशित श्राप को प्राप्त होंगे। परीक्षार्थी विद्यार्थियों के लिए इस से बढ़कर अनुवाद के लिये पथ- प्रदर्शक दुसरी पुस्तक नहीं है । इस परिवर्द्धित संस्करण में बालकों को संधि आदि का झटिति ज्ञान कराने का सुगम पथ प्रदर्शित किया गया है (ह० १३३) २१) सन् १९५३ की परीक्षामें निर्धारित-प्रबन्ध ग्रन्थ- प्रबन्ध-पारिजातः लेखक-पं. रामचन्द्र मिश्र, प्रोफेसर-धर्मसमाज संस्कृत कालेज, मुजफ्फरपुर । इसमें परीक्षार्थी छात्रों को संस्कृत प्रवन्ध रचना लिखने के नियम अत्यन्त सरल रूप में समझाये गये हैं और तदनुसार परीक्षोपयोगी 'प्रवन्धलेखनप्रकार ( परीक्षामें आने योग्य निबन्धों के उत्तर') इस तरह सरल और संक्षिप्त में लिखे गये हैं कि अभ्यास कर लेने पर विद्यार्थी परीक्षा में पूरी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इतना ही नहीं अन्त में (१) 'पत्र-लेखन प्रकार' चिट्ठी-पत्री, आवेदन पत्र आदिका उल्लेख ) तथा प्रसङ्गोपयुक्त (२) 'सुभाषित गद्यावली' (३) 'सुभाषित- पद्यांशावली' और (४) लौकिक न्यायमाला' आदि विषयोंका समावेश करके आधु- निक चतुरस्र विद्वान् बनने का सुगम रास्ता दिखाया गया है। विश्वास है कि आजतक के प्रकाशित प्रवन्धोपयोगी ग्रन्थों में इस 'प्रबन्धपारिजात' के समान दूसरी कोई भी पुस्तक नहीं है। नवीन पाठ्यक्रम के अनुसार संशोधित संस्करण ११)

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प्रकाशित होगई ! अभूतपूर्व संस्करण !! प्रकाशित होगई !!! 'इन्दुमती' संस्कृत हिन्दी टीका, नोट्स विभूषित- लघुसिद्धान्तकौमुदी , लिंगानुशासन, गणपाठ, गूढाशुद्धिप्रदर्शन, शब्दरूपावली, धातुरूपावली, अनुवा. दोपयोगि धात्वर्थ, भाषार्थप्रयोगसूची, सूत्रसूची, धातुसूची, व्याकरणादि लक्षण, परीक्षार्थिशिक्षासूत्र तथा काशी-बिहार-पंजाब परीक्षा के अनेक वर्षों के प्रश्नपत्रादि विविध परिशिष्ट समलंकृत यद्यपि लवुकौमुदी की अनेकानेक टोकायें प्रकाशित हो चुकी हैं पर आचार्य वरदराज की "पाणिनीय प्रवेशाय लघुसिद्धान्तकौमुदी" का झटिति और सरल रूपेण संक्षेप में पान कराने वाली अल्पवयस्क बालकोपयोगी एक भी अन्य टीका प्रकाशित नहीं हुई थी। संस्कृत का स्तर ऊंचा करना स्वतन्त्र भारत का पुनोत कर्तव्य हो गया है । प्रत्येक व्यक्ति संस्कृतश होना चाहता है, परन्तु यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि पठन- पाठन प्रणाली का सुधार न हो । अत एव इस अभिनव संस्करण में सबसे अधिक यह विशेषता है कि इस पुस्तक के आधार पर विद्यार्थी को पढ़ाया जाय तो व्यर्थ में उनका अधिक समय नष्ट न होगा । बालकों को परीक्षा के लिये लेख रटाने या लिखाने-पढ़ाने की आवश्यकता न होगी । ग्रंथ के भावों का दिग्दर्शन मात्र कराने पर ही विद्याथों 'इन्दुमती' रीका के आलोक में सभी बातें सरल रूपेण संक्षेप में समझ जायगे। परीक्षा पास करना तो अब उनके लिये बायें हाथ का खेल हो जायगा। ई० २० से ई० ५२ तक ३२ वर्षों के प्रश्नोत्तर भी इस टीका में यथास्थान पर दिये गये हैं तथा सर्वत्र यथास्थलों पर हिन्दी नोट्स में सन्धि, कारक, समास, तद्धित, तिङन्त, कृदन्त विषयों की सरल समीक्षा भी इस तरह की गई है कि विद्यार्थी को तत् क्षण ही उस विषय का पूरा ज्ञान हो जाय । अनुवादोपयोगी सभी विषय प्रायः नोट्स में दिये गये हैं। नोट्स का अभ्यास विद्यार्थियों को कराया जाय तो अल्प समय में ही विद्यार्थी अनुवाद में इतने पारंगत होजायगे कि महापुराणों का भी अनुवाद उनके लिये दुरूह नहीं होगा। इस संस्करण के विविध परिशिष्ट ने तो और भी सोने में सुगंधि पैदा कर दी है। प्रत्येक अल्पवयस्क छात्रों के लिये यह संस्करण नितान्त उपयुक्त है । प्रायः सभी प्रान्त के शिक्षा अधिकारियों ने इस संस्करण पर अपना अपना प्रशंसापत्र भेजा है। कागज को कमी से यह संस्करण कम संख्या में छपा है, शीघ्र आर्डर भेजें अन्यथा द्वितीय संस्करण की प्रतीक्षा करनी होगी। २) लघुकौमुदी-सोत्तरा-प्रयोगसूची । प्रयोगार्थ सहित परीक्षा- पयोगी 'इन्दुमती' टिप्पणी विभूषित ॥3) सोत्तरा-प्रथमाप्रश्नावली-बिहार २) बनारस २) प्राप्तिस्थानम्-चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय, वनारस-१ .

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Sri Sandhichandrika

Author
Pandith Sri Ramchandra Jha
Other authors
Ccl
Title
Sri Sandhichandrika
File name
Sri Sandhichandrika
Text
OCR done
Citation
1952
Publisher
Chowkhamba Sanskrit Series Office
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Scl
DLI number
326508
Barcode
2020010008157.00
Scanning centre
City Central Library, Hyderabad
Digital publisher
par informatics, hyderabad
VMLT id
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