Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shatpath Khand-5 Bhag-2

Sharma, Motilal · 2011/08

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। गत भाषणाइ ववधि संस्मरण में यह स्पष्ट किया गया था कि, गुमोकोप मक्षित मन्तरिम में, एवं पृथिवी में दोनों स्थानों में समानरूप से वृष्टि हुमा करती है। पम्निोपना मन्तरिम में पानी परमाते हैं, पर्जन्मदेवता भूमि पर पानी पर साते हैं। प्रत संस्मरण में भी उसी पूर्व संस्मरण का स्पष्टीकरण हुमा। बिस प्रकार सौरसावित्राम्नि रश्मियों के हारा मूपिण की भोर अमन रूप से पाया करता है, एवमेव पाविव महिराऽम्नि भरगणों द्वारा पुलाक की मोर माया करता है। माते हुम इस प्राणाम्नि के भाकपेण से भापित समुद्र मरित मोपपि, बनस्पति, प्राणिशरीर भादि में मुक्त पार्थिव मठमात्रा ( रस्मात्रा ) पूम (पाप्प ) रूप में परिणत शेषर मन्तरिक्ष में चली माती है। यही इम पार्थिव पानियों का पार्माभान' है। मन्तरिक्ष में म्याम मायुपिरोप मरुन् नाम से प्रसिद्ध जिस के सप्त-समक (४६ महत) अन्तरिक्ष में इतस्तव प्रवाहित गये हैं। भूलोक मे मात ए अकिरोम्नि काग बसरिक्ष में प्रभिप्त (फैरे गए) बाप्परूप पानी इन वायु परातों में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। शिम पिन पाना का भग्निद्वारा पायु परावस में गर्भाधान ऐवा रे, स से ठीक १६५६ दिन पर पानी सम्व रमियों क बापात से भूमि पर गिर पाता है यही इम का प्रमा माना गया है। गभगाल मसनकाल दोनो मध्य का काल पाएकाम' कामापारे। पार्षिष अग्नि सौररश्मि मतिरिक्त-पजन्यमामु, विपुत तनयित्नु मन मेप भारि भावि अन्य पदाम भी इम बठिकम्मरे महायक बनते हैं। भारतीय भन्यान्य विपानों में पष्टिविणा भी अपना एक विशेप महत्व रखती है। प्रस्तुत माह में दव होने वाले घ गावापन प्रासम की १८ बी कणिका में इसी पुष्टिविया का विश्लेपन हुमा है। ततकणिका विवेचना प्रकरण में विस्तार में इसी विधा पर प्रकारा रामा गया है जो पाठक मिग विशपरंप से मनुराम की सामग्री मानी जापगी। प्रस्तुत भारे १५२४ मे पष्टिविधान का प्रारम्भ हुमा है। एवं मगमग ५ - ६ प्रष्ठों में इसका प्रतिपादन हुभा है। दिन में से प्राव भर में मुम्पप्मानुगवा परिस्थिति वा बम २ प हो प्रकाशित हो पाप है। रोपारा भगफे (३) मारकी प्रतीमा में है मिम प्रतीक्षा की सफलता प्राम्पसाहित्य प्रमियों की रुपा परी अमलम्बित है। .

- घ-सूत्रानुगतपद्धतिसग्रह- म इम प्रकार भारतीयामि भिम भूप्रदेश में कारोघर भाइयनीवामि की दमित्रामि लासा में समन्मा वागनुगत उत्तरापार करने के भनन्तर (गम्पिन भान भी पपिपिएम पारास्प मे आहुति देने क अनला) वा भषई भावनीन में पभिम माम में सार भाता है। वहा आन उपमत् स भमसृप कुछ क भाग्परोप का बागम्य भाग म तम रा देता है" यह इतिकतम्पना पूधमत्र म ( 1 ) प्रतिपारित हुई है। अन प्रमप्राप्त मानुगत भाग की निकायमा पठाती है। गुरम्भित भाम्यगा भुमास्फित भामरे भाष ममान करान न भनम सर मा में पूर्वमिराशागत की इतिकर्तपमा समास रन छ भन्नर पर भषय उपमन् जुर नाम दानों पात्रो वरपान में (उनक रिस पनि म निपत स्थान में ) ग्न देता है। मभावापी समपारपान रमम र भनन्तर पर भष्पम् होला म उलमार्ग बारा निकम पर उत्कर कृष्ण के पश्चिम माग की भार पूर्वाभिमुप नहा राम रमममदनों (आर बाचन रमलों ) को भपन हाप में पता हुभा- भो भावप" इम निगरमा उभारम परता। अभिवगममी भएप माप पालान पाए नमानों यामान तापीचन पग्न के उप मरी भो भावप' मा का पात्रता। न नात्पर्य नही निकला है कि भामीम भव तुम बसमान परिम्प देनाभी मति मुनगई कगे। अपर्यु मुन मे निरम हुए भा भाम सक्षम भाभाषपदी मरम्ता गति प्रतामा मामीम नाम पता भषV म उना स्विाभिमर मरा हुमा स्प सभा पप्पमताम्म हराम में मन बोमना .. भन्न भागर । मला त भो भार म्म भाभापत्र सम्म . वं भामीमल भनु भोपर कर्म ग्रन्या पप भामापत्र, दपा मसाभार पप्म पासाय प्रमान एम्ने शिरमनपानों को मसिना गरिए । दिन पर पारि काममा प्रकान्तिप्रिा र परमिप का भारीपनमा उनार उम राम मेरमामान प्रवाधान है भिमा है। मालवा। माता का सम्मान में सामान किमान मन महोतपरक सम्बन्धी मामान मालामाल में ही रोग है। मामा- प्रत्याभान की इसी इविना का निडमिनि दाजुबली से साल मारे- (१) "निपामासानामा बोभा यह (ो ) (२)-"वस्तु और रिस्पीद" (ii). (३) "वेदिवर्हि रिमामयसमापिजिये। (५) "एक सर्वत्राऽऽभुव-प्रत्याभुते भाभान-प्राणामारणसम्मानन्तर र भन्न प्रणाली को भपने बाप में रस्ता दुभा रो दिमानियहोवा का अपने इस सा में मागोम्नी दोनो मान्यवहाभिफिल्मान्मनुकारात्' इस निगदमा उचारण तुमा परम करता है। इस प्रकार सर्वप्रथम रिमाणि काही मम किया बारे सरकार्म का निम मिसित सूत्र से सपाकरमभा है- "अब प्रालीवे-"ऽभिगो रैम्पो होता देखापतिविमित्तान- मनुपरवबद" (रा.)। रिम्नामि का इस प्रकार होवन रकम ममन भार कमाता नाम- मान पूर्वक परब करता है। समान साल से कम माग पम्माना गए। पर से इस मोर- गोक्मात् मरतनत्-मासरोग इत्यादि रूप से, 'पमत मातारकर ने पबत् इस्पादि स्म से वादिम से गौतम मतप, मुगु महागारि एक्मान गोषानुगर समानतीन पपों का मिगदमम्यारमबेन उबारक मता है। भवया पबमान में मिल्ने मी मंगा प्रक्राम्याप में उपयमित उन का माम लिया जाता है। मिली।

मारामा मालक अपि है पदो पर प्रवर प्रमाया है। किमी करो मवात, पिसी तीन जिी पार सिी के पांच प्रमा हिमपर मिसपर पप्पयर पमप्रपर मा। मिमक मिलने प्रबर। उन मन का मी परम धरना पक्षास्तर यही हाल है। गेनों पक्षों के सम्मान में निर्ष यही है कि, माग प्रवरण में भाग्य पीत' पर पर मगवान् मापस्लम मे पाई-पापीत भोपनीसे श्रीन चीन न चनुगणीने न पातिणीत" (मार भो २।१८) । परि मुपगत निपम को पिपिपरक मान मिा गाता है तो तीन काही परम स्पारग्रास होता है एक नही पापापन प्रपप पसी । पदि भावं पपीत से विभि-यामानामाना है मो नमो मन-प्रपामों का परन प्राप्त हो पाता है एक यही कास्पायन का उत्तरपन है। मभिषित भत्रिय (राग), अनमिपिन त्रिय ना रेम इन नीनों में पर कम्मानुरामा विश्वम्पा कुछ पिरोता रखती है। परि मिषिक्त क्षत्रिय या कर रहा । वो मष उस परिप राग दुसपुरोहित के भाषयों का मी परम प नच्या । भपया तर रागगरेमापनों मी परम पर सता है।' परि मनभिषित सामान्य भत्रिप का नया मेल का कहर, वो उन भरमा में प्रत्येक दणम इन कुम-पुरी हितों रे मापयों का ही परन होता है। एपम पर भी बिमामय ममिपित मभिपरामा मनापिक सामान्य नियमोप मा ा मनुवन्' इस निगद मवहारा भी माय परम थिा मा सम्मा। निम्पित मनपा मे इसी बाप-पानसम्म पा स्पपीरमभा - । " (१)-"ममुपदस" दिति पजमानापयाम्पाद परस्तादधि श्रीणि" (प्र । (२)-"पावन्तो वा मन्त्ररुत (प ३३१००)। (३)-"पुरोहितायण मा" (प्रा.) (५)-"पत्रिप-पेभ्ययोप नित्यम्" (1091) (५) "मनुष' दिसि पा सपाम्" (Vai).

-
उत प्रकार से माबोवालामगार र मन--
पास प्रापितार" इस नगरोन्मत्र का उबालता है।
पम्मा होता मानुष' (जे मया ) बोलो।
होम सापक है। मानुष होपा का समर से बाम पीना की
म (उपापुरूम ) नामोर मला पवार। नए मानुभोलाराम
बता (मानुष रोवा) 'एकला देव तापनीत
सामानवप करने के मातर ) मग या भान नीला प्रदेश का मर्य
करता है। सपानन्तर मां कमा मालीन, दोनों पकान मते है। इन
इतिता का बोलते हुए कारते
(१)-"प्राचदापमानामस्वयम प्रापितरोऽसी मानुष
इति होवनामानी
(२)-"उपांशुमार
(३)-"सम्मृप्य उपतिः
(110)
इति स्वागतपतिसंहा (प)
है
M
.
।

ड-वैज्ञानिक विवेचना- १-आभाषणकम्मोपपतिः - उपगार कम्मानन्दम बहस्पिन माम्परोपका मुबारिपत भाम्प से समजन कराया माता भनन्तर का उपयत् नामा दोनों मुगलों को पारवान रल दिया गया है। इस वर्म में मन्न्तर परणसम्म मारम्म शेने पाता है। जिन दमनूनसमूहों से पक्षिय रम (कार) बारे गाते हैं पर तमसमरि 'पप्पसमदन' नाम से म्पत हुई। भफ्न राप में तकरी भन तथा मामीन नामक ऋलिए भाभान-सम्म पीपति सम्पता पूरी करता है। पहिसे मप्पा 'भा भाव' इस निगद मन प उपारण करता रे मनन्तर भामीम भतु भौर इस निगद मन्त्र का उपारन प्रना है, पही प्रत्या भारतानुगत भाभाषण धर्म की रठिकत्तम्पता है जैसा कि सूत्रानुगत परविमवरम में पस मिा मा पुरा। ग्रामत्र को १ २ ३ इन तीन पिनाभी में उपपत्ति प्रदान पूमा इन भाभावय कर्म से प्रतिपादन हुमा है। परण कर्म से परिसे भाभापम मो सिा गावा! इसी प्रभा बोपपतिक समा भान करती हुई भुवि पाती है-'पा माभाषन गर्म निधन पर । परमपर्म म Tत प्रतियों के पाय मोनिपता दी तपान ममीप है। दूनो धमों में बग्न सम्म एक प्रकार का पगवितार (मोतिकाम्पता-निहारिकार)मान है। इस पहा पिकार मगनमाम परमपम रे उपक्रम में प्राकृतिक पर का नाम भपेशित है। एनी रस की पूतिरे सिर भाभापनामा साकारणार्म से पहिल भनुगमन विरा मागी। भी भाप' निगद मात्र तत्पण रही है कि बिना भार मारत स में परम मना पा, उसे मारवित का तीसरा हेम भात समाप पा कर्म ठिए भाम हम वा बना " ही भाभारला नि है। पाहिरत पारि मायदेणाभी 7 भादति इमारा नापि पनारस मार-माभी हाय अतमाम बास्मा मरना है। भावासम्म दिनार ऐक्ताओं की रहित सम्म की भोर मेt पानी लामा कम मामानको साप्रा बा मना है। सर मामा कर्म करना हम्माला म्मा मा अनुगमन मना है। मिली वस्प मिचिए परम कर्म मी है, माभाषन फर्म से कम है। माम से परिते मावा- कर्म भावस्पक मन गावा॥१॥ ग्नि पर्मनसमूहों से (वमरगम् से ) पनि एम-4 पोचे गात रमतवा' (ममी बापने की दरम्) नाम से महत र बागेतन मारिला परत उने र दर्मराम्यू से यता माता है। पस मोप में कर दी मष भामाश्च कर्म रता है। मानापम पर्म गणमान हम में समयोगिता गाता , सी प्रम का होपपत्ति समाषानक रदी हुई ति करती है कि, बाद मर्मु पहारमा इस मनान को आसान बनाए बिना भाभारच कोया तो भन्मात्मसरमा अमित दो बानगी मा भोर किती सिधि का सामना करना फोगा। पोकरण प्राम-रेक्तामों का पालामा मात्राम-कर्म पर गर्व कणिका में सा किया जा सके। 'मामा मामासमे-मानमा रही करना पाहिए' इस कपन से मुक्ति मिलन मे मीसमका यौ। तात्पर्य इस फन का ही है कि साल मनाम भारत- पिता मागों में पिमल है। रसमाला- जानिार्मसीमामागे अमित या भाभिरपि । पार्षिमा मागवानोमात्मा, मोपडसित या माधिमौतिक का' है। पबचान-मालोमा गरीकि भाणाम्मिा भाषाल कर्म कतार मा मा भाषिक मी भाभाषपाती म मानामिका। एष रम-सन्न निरामेन माथि मौकिया। साप ही विमात्मा परमेख मेनवाल के मोतिर्मयमाम से मना होने के कारण धर्म सामाकप से मी पानिपत पर 'मम्मा पमिती मिन्ता मुतार मफ्तार सपा पापिषस अमात्मक (मेनारमक) रस का स्थावीच मी है। सागर ममात्मणा इस मोर के पानि (मारिमीति) समोर किन भापामा u (भाभिषिक)स, गोनों में भगदीत एता। तर इसका स्वरूप प्रतिसि गमा है। दोनों में मी पापिपशरीरमपाना भप्यारमनपा की प्रधान प्रतिठा भाधिमोतिष पापिय पर। हम मतिराक निकष माने सही निधनावरपापा भागमन रोता । मरिमारियनि म इस पर अनाना सित्तिा भामा प्रती हैं। बन पापिय पर- प्रनिरा उपिफस से माती है, तो बस पुराण का पापाप र गाता है। मोशायण मापायी पापियाम्पर का कारण है। पापरामुर्मोंगपप्पस उमया सुप्रामाप्ति का सिपही मोरपानीय भाइपनीप सपा मूठोधपानीम गाहपत्य दोनों के मन में ना होकर मप उपस' (भारमन ) कर्म किला गातार मा कि. प्रतमुपेप्पम्नम्तोमाबनीपच गापचय मा तिरप उपयुगति" (पत १।११।११) स्मादिकप में विस्तार से चलाया बापा। ठीकपदी प्रपोग्न पदो अपमित गरि भप पाथिग पत्र को मापालन बनाए बिना मोकानुगत माघिदेविक पासप्राण आभाषण सम्म परगा वा मिस रिमाश प्रापम्प मे हमसी पापिय पम्प्रतिया पर प्रापरतोगा। समका प्रतिषिम्युति हो पापगी भपका वो अम्प पिमी विपत्ति भनुगमन परना पड़ेगा। इम मापति म पने पिप आभारय सम्म करते समय (मापिदरित महमपति-तमह परत एमप) पापिय यसको मामान बनाना भाषणा दो गाता है। रमी उरोप से रमतमान का (पाशिव मनिपाम) हाब में मकर ही भाभार्म पिया गावा।। २n इस (पकिनी) पेरि" (शत ) अति मनुमार भारिमोतिष यह भी प्रतिता (क्विानरवान) पपिपी वही इस पारी पदि है। प्रात पत्र में मी परिना गांपा निदानन पपिपीरबानीरा ही परीत पानी प्रतिता ।। परि पर रिदे हुए नर्मदन भोपनियमरति एगानीम की पह-ममनुमान की में परिम्प भारीर पोम (भोषि) पेग (फमसति) मी करा गया है। भमि मम्मसिन परने के लिए, नण नामिरेनीसम्म-समारन सिए मोम मार (कारमार) सापा माता पर निरामन ममि है। 'गोपनपु मायो ससा मन रमते (चपन ८ १७) इत्यादि मत्रभूति - मनुनार कार में ममि सुप्त है। पदी मम्पमान पनि सिमे भप्रसत्र नम्मर से पण मग मा पाता है। पेरि भोर मा रोनों पाधि ( भानिमोनि) सामा। भाभान कर्म में गालि प्रतिमा मतएव या दो बेदि पर विमर्मतुन प्रेम मानापन मना पास रमाको तेल भाषाक्य कर्म करना चाहिए। पिन साहात सस तप से परम्परा पाणि प्रतिष्ठा प्राप्त हो गयी। इस पति को मात्र सिने एक साम्पराकमाणात कर्म में अदिरिक्त दमन, मला पणतन समर्पन रहे। मगवान् पासपरम की शि में मेरित भया इमाय, दोनों में से किसी मी लेकर मावान कर्म करना विवानपिस । कारण सामा मा सबा पप्पला दोनों ही पापि प्रतिसामना भर चिनिनु । बेरितन को लेना एका मापुसमम शोना अपान प्रमा हैनी से पूपिनी की मौषधि-वनसति को मिली (मेरि) पर मरते स्तर बनाना है। इसके भतिरिक पेरिस्थित पर्मतनगम मनुनार रेवाभी का प्रदिपारमा मासन है। इसे उठाना भात देवामी को प्रतिष्ठा मिलना। पेली रण में दिन मात्र मनाचा मनुचित परता। माप इन-मि- मन कर्म के लिए नियत है। इसका साना समित्यकर्म में भपूर्ण बनाना है। बात माना प्रान भी अपन गावा। मायाम उन गम्मापिथ है कि जिन दर्मतनों सेपमा मापा गावागणी" मा इनमें पापि प्रविष्ठा नही। इन बदला गातारे इन से भाम-सम्मान कर्म होवारे, मानापिकिस्मामा सम्मान भी एक परिशिम होते है तो इनकी गा में लानाय बाग है। क्या यो रम तपनप ऐसे ऐसे परिधिा सम्मों के पिए हो तिमी परिण वमा प्रमाणात मनुस्तिो तो प्रकरण में (मलन पाती भाभान पर्म करना चाहिए ॥१॥ ।

माराम २-दिन्याप्रिप्रवरणकोपपति पगिता से भारम्म री गित पर्पत पाच अगितामों में प्राविप दिप, प्राणानि के परम की सोपपत्ति वितस्ता समीकरण हुआ। दिम या में रोतृत्तेन व प्रागानि के या म्या पम्म, प्रविगत टपरति मानस में सी प्रभ का समाशन हुभारे। दिन उपमनभानहरून वर्मम समूहों से परिपार सम्मार थापा गागो पूर्णचनानुमार उमे राप में सेम मामा-मो भाषप' इस निगमाया उपारण परवा हुमा 'भाभावम' कर्म रता है। भारत मामा- भर पर्म रे भन्न्तर मामीन नामक कृति 'भस्तु भीषर' इस निगरमन्नोपारपस प्रस्पामात्र म पता है। भपरपस भाषाषण, सपा मामीत्राचा प्रत्या भारत-म्म मनम्तर मनमु उन पमनाननूनों को भाने राय में रतला हुमा दी-"भाग्नदगो देम्पो रोता देवान् यामिश्लिान् मनुप्पामरतवत्' इस निग मन्त्र का उपारप परता दुभा रिम्माग्नि मादी माने इस प पश में रोत्स्वेन परम करणारे यो कि मममयुनाम रोपवरमकम्म' पसापा है। फार्म में होनेवाले दोष म श्री रतिपदा ति ऋम्मेठी अस्मिक धाग मापन होती है वही सेवा' पाठापा । रामवित्तम्पदा-मतप मषिकार प्रदान लिए होने पाण मपर्म ही रोतमपरम कर्म है। इस मामुप होतावरण कर्म से परिठे दिम्मामि का नम्वना पो भाषा समझा गया! पूनर उमों में दिम्माभिवरण क्यों मभिव। इसी मम का सोपरचित समाधान करतो र भुति पावी फिरत परपरम्म से देलाभोंदवा ममि से सपा मायदेवताभ से मानी पाता का निराम सिा बावा है। वासर्प यही है कि, मारुतिर साम्बलाक, ममीगेमामा यसरी पत्तरित पर है। इस यस कारोक्ष पार्थिव प्रामामि पर भर मित है। पापि प्रामामि के एवि-पति मम गमनागमन मागर से ही पारमेय गेमा भारोवा। रमारमा इस गायत्रानि से महल सोमरी पासिंग मा मेर मार देपताभों के परमार सगस मता। इन फापन-निति के अतिरिक्त पुलोमा डोर-मारित मा म पानिक प्रामामि के गप सम्मान गना मी उम्र मापशामि। म गाहात सातसयन (२ 1 गया है। ममापरिमानानुसार भौतिशत परिणावा विकार, प्रायन चिविस्थान है। गेम्परिमापानुसार भागिनाधिपाता शिान है या चिविस्तार है। समावस्पेन परिखासा मिहान् विमानेन परिणाम दि है (रेलिए पात १ म । १५ । म साबमाण)। प्रामाणि पिन का शिान् मौ है, मौर चिरिला मी। मपले मौगित म्प न के निशान -मुनानि हिान् । एवं अपने मापस से बेगामि दिनमा माक्वरूप के विरोष परिमाता करते हुए विशिलान् है। फार्म में उमरियम ताभी का मूतों के भागार पर गबन होता है। ता ममे मेष सा में भी भी सपने प्राप्त करता है, की ठीक ठीक ( मनुष्मा ) न सच्ची को मनाने विहान् वा मानों का चिकिला है। सम्मान केस में मानानि के पदा दोनों सम्मो का समावेश कर प्रामानि मनुमा से प्रस्तासितिमि बार इस्लादिमा गमा॥६॥ 'ममुकारतमत्' र मन का माग मानहै। एक्का-मामालाना राती सम्पत्ति से युक्त मनरेगोक्सीक्ल नाम से मनुचीच, की--- कास प्राताल दी मारिक्ति मा। ही मारित सामामिलान से भारिकि सम्मान सम्म समर्पन | पापा भाय-खम्मापिठाता पालामक मोडीत मायनोमानामिक मनु है। कही शारीर प्राचाम्नि मसोपो मानामा ससम्म र पर भोग, प्रमा नाम ही कामालभारि मगार सम्म् भा- भातिक (निाति) मनु ()। मोंने ही मालि सर्वप्रथम मा मान मिाt(पा)। मामा-मार भूत वीनारों से निमिष मनु होस प्रा। एक साल में या पर मनु कार (मनोरंकाल गाउभाः) मलि। मिम मगर पमुई एम उमाणिमा ( नपुतिमा तमा पुगिमा) पसमय उकारान्त 'मनुः शम पुहिा। एक बारम्त मनुः सम नमुन्न। मनुपा दिप सान्त मनुपए हे साप रपनपब माना रि सम उमरान मापारणामम पस सम्बन्धी ।। प्रात में तान्त मनुः सम कारी माल हुमा है। पर मनुष्यत्' का का तारार्म निषमता - मनुषि । मिर्म प्रकार मनु मे यमन किया था एपमेष यह प्रामाग्नि भी शेता बन कर इस पर में ऐपवाभों का मन से 'मनुष्यत्' मा माग का मसी एक वार्य है। यदि मनुप्पा मरिष बिमा न कर मनोरिव' या विमापा गाता है तो इसका तात्पर्प पर निकलता है कि उस मनु क पा में होता मन कर भनि ने रेषताभों का पान किवा पा तब इस पर में मी ये प्नि होता बन पर देवनाभी 7 यस पर। मनुा वाम ने से मनुरिष विमान भार प्रपमा भपेक्षित है। एर मनोरमस्य गा मा इम से मनोरि पिमा मुसार रितीपा मिरत है। मपमार्य स भाषिभौतिक मनु का समीरन हुभा। रिवोवा स भाष्यास्मिक मनु म माविक मनु का सीन हुभा है। दयाक जिस उमथ मार मनु है परिम्पभिान मई मार (मिमात्र ) मानानि है। सपा का कि स्थान मद स पार्थप है माय मनु से पुपा तथा भग्नि का पृष्ठ मान पिगमपारे। एप इसी से मनारिवा ममन्नो बाता। उरपार अभिमा सरर मे उपब ममु भोर भा भम्नि दोनों मित्र। इनी भाषार पर-पतमो परम्पग्नि मनुमन्य (ममा १२।१११) सह का नाता है। गणिा उम्पसहब मनु से युक्त तप भनएर वामिम भएप प माता ग्नि दी मा सम्प मगरको मनुष्य पापही वास है। मात्रा मन्तिम भाग मरता है। रता प्रगना ते (देवा उमापन्ति) (ऐ भा २।१८) इत्यादि ऐतब मति के भनुमार समागमक मम्मर मगर में प्रतिलि मोर रिम देवताओं को प्रवर्प भाग पापिप सग में पिन (बर) रोता राना पापिर मरोनि मामा मामाग्नि गा मिसम्न माग पदो मे ग र उन पियन माग की पूनि पिता परसा है। न त उगपन् विशम्पायर पादिग्मो ययुः इत्पारि मान मनुमार भूमोड़ से निरसोरी गाभा मदिरोनिती रेवरिधि नपान बनता है। भमुन मनादीमा मुषित (ऐ मा २१५१) अनुसार पा में (होम) रेसमाग मा प्रपत्र मे निरनर भागनन होता गला रे नी से प्रयासम्र निधि रोता है। पर पूर्णरूप

नानुसार मणिरा बा पारिता मानकापावा भी क्या। ण
मा-मबारम्पल भावान-प्रदान प्रापा नामल
मुसोत्सव रेक्तामों के थिए पानि इर्मिनकामेबाना एकमान पाकिम
पी भवम्बित है। बीए-एक विमोल भरविरे
पता मवय मता है। भूपिन व सानेपानि (म,
पार्षिक प्रमा का सास-निम्मान मा है। इस पालि प्रथा में मोम
मनिकित पता है रिसे 'पिप्पारोपनिषद' की परिमात्रा पानाम्नि' मीमा
प्रामाग्नब एतस्मिन् पुरे (गैरे) बाधि' (अमोनित ) मा
मपान, उमान बान मान, मात्र, मे मिन बना विमा प्रातानि दीपक
पत्ता (भपाममा) में बना पामते पोहै। इस मापानिपती प्रमा
माम-गोपन होता है। मिस दिन प्रातापि पर ममतो पाणी मामा
साम महरार्मश ( मेमस) कर हो पाता है या मतामा मागत से गया
इस मम्माम समाबीसे मी वान' वा मनिको मनमा
भन्यप करता है। किस ग (मान) में इसी पब्लिी पर मोम-काम-
भुग में मेसे मोम-लग के एसोपात् ( मालाषा भविता ) क्या बता मणि
के सनसोपान पर एपमेष स्क्पम्मू मनु आर के शान्ति र किसी
अनमोपात् भनि रेषता है। पालि प्रवासमा रहे
पहुँचाना, पार्षिक प्रमा की बामदेवादि लोग मरोज मला ना नी
मौम अनि रेक्ता ( मनुपरेवा)का कार्यबा। पर माध्मिौ (ऐतिहानि)
में मी अम्नि को 'म' मना मनमत ये भर-पोल पर्म से
भनि मत पिया 'भारत' भार है। इसी के समान से परिजरेश 'मारस
किस प्रकार उक्त तीनों यम्-मयामों का जवान मरताम्नि से हुआ
एवमय हमारे इस ऐप पर की इतिता मी उसी मरताभि से सम्पन हो इसे
माना थिए 'मरवत्' मा गगारे॥८॥

सम्ममरपमा ३–आयावरणकम्मॉरपतिः 'अमिगो रेम्पो होता हत्यादि मनपाट बारा मपने इस प यह में प्राविक रिम्म प्रापामि की माग्ना परना हो भनि का रोतृत्वेन परभ रनारे सि पा से ८पी गिला पय्यम्त गितामों में सारी मा ।। मा क्रमप्राप्त मारेप मगरकर्म की उपासिका शिवन मापा गातारे। पााचा पम्मान क मगौरप पापीचर ही भापकरणकम्म' है। इह परण से पापिकार पोम्पठा काही मपन उभा है। पहम्म सिमर्म नीरे भनि बेदिक शि-कर्म है। सोहित सम्म कामभिकार महा मनुप्पमार और यहाँ रेरिक पा-सपा-बान-मर्मत्रयी 7 मरिकार एमाण रिगति प्रथा को हीरे मिमक पोप म मम्मतः ऋप्मिान, तया देवमाम पति- रित एवारे। पाररिक-महम्म प्राकृतिक निस्प दिप मह की विपि पर क्तित सेवा है, मेमा कि ममेकपा सर रिसा ना है। प्राततिक पर सम्बत्तरपन है, मारिनी पत्र की १९ मी रिका में सर होने पाए। भरिसिमर' से सम्मम्प है। इन अदितिमगम के गर्भ में मिलतामापडिया भमिपचाना पूपिनी पगालोमागिन पायुमपान भरिश एशिस्लोमाभिएस रमप्रधान दुलोक ये तीनों मोम्पमोड़ प्रतिष्टित । मेमा कि- म-ितिपोरी-तिर सरिभमरिविम्माता पिता स पुषः" (ऋस १८ 1) स्पादि पत्रमर्गन मे प्रमाणित है। भरितिगम में प्रतिष्ठित पिप्रमुख पासिंबल मनुदेवता दामुप्रमुन भा. म्नरिएस ११ परेक्ता इन्द्रामुक्त रिप १२ मागिप रेफना मानस्प-२५ मामा २ साम्प रेस्ता नम्म्य ॥ प्रारमा प्रतिष्टित । पेरी परेवा गिपिउन सम्पनरपस स्वम्प सम्पास। मनग्य-स्प परम प्रिय मनोरंग पग्रािम' (इम ८ ) म्यादि भनि , मनुमार यही देवता पशिए देवता गए 11 एम नम्पलरपरा में प्रातास, मप्पा मापहाम मेर से तीन सान है। रेपवानुगा प्रानपास मादनान ग्रोक्तानुगत मपाइ माप्पन्दिनवान है एष मा रिस्परमतानुगत भागार मायसन। राधिगत पूरामात तफ्नारामा मानर परमपी सीमा मे बदमत है। मानवमा में मे मिमा पीप मम मात उसीय रपमा प्रतिष्ठित पस । परमात्या मामम है। किवीप में मानिन 4 समनीव रेक्ता प्रतिष्ठित यत्ते, नगाला मपि । मालास। रागित सामान पाम प्रगा। भीमा- पूषामात्र से सम्मान है। इस प्रकार प्रमाल -RA वो पासोमा मन्तर्गत है। एपी वाहन पोनी सीमा है। इसी भाषार पर भगवान् माला- महानिक तिवात मावि हुमा है। माहतिक, पोमो सास की प्रविति स्परमाता एवं तलामाबेर र प्रतिसिमिती प्रविनि- दिक महकमें दोनों एकमात्र विगति माया कोही भाकर, प्रम काही समित उतर।। यदि कोई मक्ति कर्मचा क्लामिमान रमा मास में प्राचा पाया ती कि उचाल्वा मामा देसी नीतीवोसमामा विकार बेश ही नहीं। भक्ति भम्पुषसान में सर्वनाश का नाम- कर्म में गीति ससा है ये मना गाति मिसाला प्रपितामहरि सामना रियाति सि के पीर्म म उत्तम नम tam वाप साम गोपि अप्मिान का परम्पत्वा समाज गति भतएप भाग माने गोम रेमा बासा चाहि-f एप हमारा प्रस्तुत भागसमर्म र भावसार माता-rat। पडमान गापा दियाति है, इसका nिt Nar- हो पाना भनियाम्मे । भिाषि तथा मान-सासर सम्मान मनभिाव। भताप दिम होतामा र बचा माल रोकारका पूर्व यम्मान इन दानो गति बमोका सपना भाषा। मे भाग प्रकरण म निहित है। गे महानुभाष रम्पानभाता है कामना गति को पमपा करते हुए परसपा मनुप्पमा पपा का अधिकारी बनान दुप ग्नमा भनिप र रहे है म उनस पूछत हैं कि भसम्म में नि गोग धषि उपाप राग । गम्मिना राहग्गिोत्र स तपमा परिभूत है। Ta ममा धे- 'भूपिमाननमेवावेम्पम निरत इम भुति पा से समसग र उनी नामों में पाना चाहिए। - भापमान । अषि तथा प्रान गेनाबीफ से मम्मद नपि पम्म से । अपि एष देवपाप ए मम्मच पीप में बना पारिए। पीडियाविपही यगपि कारी है। इस समानुगत पीपमाष (मातिमाप) का सारीपरपरने के रिए ही का गवारे-भव महावीणा पो यस प्रापत् । इसी बीर्यमापनारा सम्मान का महाधिकारस्थ सर करम के पिए भागेश्वरम होता है। एक मही इन कर्म भी मभिम उपपति-करमागर्म प्रापीत ॥ ६ ॥ उपपल्पनम्वर परप-निराप्ता बताती हुए भति करती है कि, मरिकम के भनुराष म पितामह पिता पुष इस प्रम से ही पियश-परम्परा का उम्न होना चाहिए । इस सएिमांग क माभन क भावरित स्वप पाकर्म की रिसे मी 'परस्तात् मान ही परब होना चाहिए । पात्मम्ममा रिम्पप्रमोपचिदी मार्म का प्रधान सम्स है। एप उचिभम में पितामह-पिता-पुष पौष पहोम है। भवः इस मगोत्पादक श कर्म में मी आपरवान परते समय पहिल बसमान के पितामा का, मनन्तर पिता का सबम्ति में पुषस्थानीय पयमान का नामोल परना भावसा सपा क्रममा तरमात् परस्वाद प्रापीठे ॥ १ ॥ - ४-अपि प्रामणानुग्रहप्राप्तिकोपपति-- पिए मदत तपा समना रिमावि यद सबमान पर का भपिणारी भास परन्तु सदा यह भपिकार तक वापरूम में परिभव नहीं रो मा बस्नु उनके इस पम्मान में भारफ्नीरामिण में दिम्म प्रापदेवताभों का समय नरो बाय। या देशाबान कम्म एकमात्र सम्पीय प्रबचा पालामि व्या बापान इलिग मामलों के भनुमा नयोग पर ही निर्भर है। रिम्पामिवरण से ममि रेवा परमगरम में पपार भवाय भान । परम्नु प्राति से निपत सभापार पर इन का देशाबान पम्मे दो पेनानिय भन्नान उन रामों नहयोग परी माणित मा उन पगभ पापतित मूष मात्र भाषगरका मबारमा सोम-धम्म-मर मारि कम्मो गमपद परन पीमि समन मियो रेग्यो होना इत्पारि पूर्पोर निग मन्त्र म भागत भमि पनपन पग्न पर सिमा पानभोक्ता पम्मान

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ममलामन भाल से इसे विचारी मी लिपिमा मना
मानर, वा इत माग रेप मर की वन me
के मना की मोपा। इसी उमसोरेल शिरि मामा-
मानुहोरम से पहिले-मामा, मामललावा.
बदमन्त्र का पाठ किया गया। मित कापला रामानुसार मन
४-
५-भानुहोठयग्नोलपि-
प्रानपिच नम्पलर में होता भन वा प्रणा पवमान मारि-
मानविकी। इन मानविष प्राकृतितमको पिपास पितापमान समानीपिच
मानुप पम में प्रति सम्मानादि कारपसाना मी प्रातापिय हो। बाला
पूपिम्प प्रानामा तम्मर प्रमापति (सम्मान ) मनुस माली की
म पनिमीप बना हुआ व बसपएलानीत ना दुभा मात्र मानीषिय
पत्रमान है। प्राषिष णि वायु मारिल पामा इनोवा न माग
बमा नाम अलियों, अनुप प्रानीषिष मन्समुदाय मागतान
होता है। प्रानी बामनुपडीत कर का भला।
भारिपातील नामका भावाल गावा।
समान
पीन अमरता अमिता सरोक्लिा भाव
अवामन मा रोप-मर्म पि निभामानाज पालामार का मन
ना मी भापम्पा । इम परमपर्म मपनि भानाी ममीना
देपासात सम्म में अपित है। इन भषिकर मान लिदी भाषाखाना
नीबाट हिरा शता। इन प्रशन प्राममान भामापत्र, रिमाधिपान भालर
माष भनिनाममानुपम नागन इन कामो मानहान + अनन्तर पा भनाई
भनी मानु म निग' मात्रा पार करता भास पर्मक भार
मानुगतान बाग पाता है। पही प्रारमिता (मि) प्रतिनिधि ॥१५॥

प्रयागमन ६-पस्त्ययनमपोपपत्ति- भवनपुट 'भमो मानुप' गम निगः माघ म दोष-सम्म के लिए होता मात्र पास्तव में होता बन गया है। मी सम से "स पर उम सम्पूर्ण उत्तरापिस्वका मार मागमा गोत्रकर्म से मामय रनता है। अपन इमी उपरगामित्वको मन बनान की कामना से शेता स्पत्यपन बरता है मिस का एकमात्र सापप्प पही कि प्राकृतिक मम्मरप रे मना दिन प्रापरेगनाभी भनुमा से मनुप्प मपन गामीर कम्मो में माता प्राप्त प्रने में ममर्थ पाता उन प्राजक्ताभी का मना- गति रा अनुमा प्राप्त करना। बिम प्रकार छापिकापष्ट भपिकारी अधिकार प्रास दासी अधिकारसिद्ध पम्मो को भाने छम्स में है माता है ठीक उसी प्रकार परम सम्म से होगाधिकार प्राप्त करते ही रोता उन प्राणरेषवामी की भोर मनुगत हो मावा नि का इमे मविष्य में माहान मना है। प्रत्येकाप में नियुक्त होने से पहिने पर मावश्यक है कि उस कार्य की मासूम कसरेमा का चित्रण भपने भन्तर्मगत् में मषिय कर मिया मार। ऐसा करने मे भविप में परिभाने की हम्माफ्ना नारी गती। जो पति मिना भपिकाग्मपारा कर्ममादा का निरमन पिए रात फर्म में प्रारो गावे , भास ही भपने सामाणिक भरमार से गदी पर नि देवनामों का भावान करना है निके पिए पपरभार माना है मिन रेमि दमिप्रदान करना है उन सत्र मागदेवताभों उन मा पर्ममारों को परमा नन्ता ही मन में भान अपि स्परम्पपनसर-कर्म पिरित है। वही लसम्म पी मानीति-मम्मन मा उपपचि है गित ४ पगिता में सहीण भा बेटो ।। पीपगिरास भारम्म पर २९पी गिरप्पन्न (वामनमाप्ति पम्पन्त) स्वस्थपन पम्म मे नमाप एन पान मन्त्रों गौ मोपपतित पापा । उनी का प्रमय दिग्दार्गन मगरा गता। मरमपम हाता-पतला सरिता मत २६ मन मोलता इमराहना नबिता कीनी भनुमा प्राप्त करता है। पाटीमित्र गणितागपातिर दोवा मनि । भनुपह मत करता हुभा पा मनुष्य वा वचा मागरेपनाभी भादान में नम हो गाता है। परगम मानकम्म मम

प्रतिता मकिना देवा दी है। सौरमा मो यम बनेर
नदीपायें भोर ताति, मलसा, मारि सारी
प्रकार परिषमा माग प्रकिनादि सपा पोर।
पारमेण उपयों में से विवा' मामा मामला मेस
मना। सौर जिला में नि मारणामा यो मौ बर्मनलमष
मी तमिा प्रा। मारप इसे रेवामा प्रमपिता (पिता) माना।
इस पारमा पिता की मरमा बम वन में भायमन at भजन
को भी बन तन सक्ति' नाम से मना कर दिया गया है। सारी और
मिकी में प्रति प्रा में सक्विापान प्रेमाला भागममता का
भाषार -पुगिन।
मक्सिा पासात से सब । मोल-भाता
पूर्वनामुमो मानि इम उत्तोमा प्रथम इस नियम क मनुवार धर्म से पूर्वनेकों में
गत में परसदि प्रतिनि। उरहोगे में मपरिम्म में इन (गैर मला) प्रति
म स उपर बारात . परि सति व इसके अपर साधा।
मपिता प्रा का (भप से ) भागमन पगिनवम्मा सवि वामन
पाल्पनि 'न गोनों पारमेय उपमो सममि रोमी (गैर लाम)
पाता। बाधिपति नाति ही भक्न पाम' नामा जमेर में
उमरीया भावान मत हो सम्पीय मश्विामानामा भाम्म
शानिमम पाप्रा मना है। इसी ममनावी प्रचा
माना गया है ना कितननक्विान थियो पोन प्रपोग्बान' स्पामिन
प्रमागिता
नए परीकि नन मानेनामी का मार्म में माना
मरितापान मचा बार परी भवति ।
होना भान भाष्यारिमा
मपितामा म पिरिम मिामान राम प्रात नदीक मेला तरना अपाम
गानुगत भाषिपनि पागम्बनातक न ममम ममा भाभि कि प्रानदेशाभी
का अनुपा प्राम नी ।
मी मरितामाभानमा माति र रिए मा में पदित
- या न मी उगम भूत पनि म निम्नदे।

इमे मन्त्र पारा नही भावना परनी पावी है कि,-हे मस्तिा देता! देवाबान माम होत्रम्म कहिप मर म्पार से भम्पमु मोग बम्म भाप का ही परम कर रहे। इस प्रकार नवप्रथम मस्तिाका भनुग्रह प्रामर भतर-मस्मि होभाव' म मा से भग्नि नपा अम्निमम ॥ यशिवदानाभो मनुमद प्राप्त करता है। दोष कर्म का उपरदापित्त भग्नि पर दी है या भनषा सर स्मिा या पुर। माय दी - तानसे पतापेम्पम' " स्पारिकाप का सीकरण मी पप से वाप -(निर प्रात हा ४ गिया) ॥ ५॥ भाभिमीनिक मापनों काग भाप्पारिमा पन नि भाभि कि मा से सम्पन्ध अपेक्षित पर ममासरनाम से प्रमिड है। मम्बरमर यादी सामग प्रमाः मया स्वारिक मनुमार चतुपमूत्मास्मिा प्रमा का प्रबनपिता (उत्पादक) मम्कनर का प्रपर्प येतो माग पापिन पोनि में माहुत होता है। इसी पागा- पृथिम्परम गम्पप से प्रयोसति है। अ भवाय ही तम्पस्मर को पिता' मा मानना है। भिमस्म भूत अग्नि तपा उत्तरस्म ऋत मोम गेनों के उमाम निमाम में पचा साप निष्पमोठा । ऋतु मर ही सम्बलर है। पतु स्थानुरूप ऋतु मात्र को मेरी प्रारम्त शेती है। पहिसे मी श्वनुमरि मप मममसर का पिता' मा मा मरवा है वो कि मम्मत्सर अपने तीन सपनों से वानर' बन गा है। मूरि र मदितिर स ममप्न सिस्तोम प्रावासान है परी सामगिरीप माकनर का पिरीमा गरी पहिला वि. ती म पना पपापम भनि ( भनि ) नामक ना (नापा) प्रतिलिपि पर मे मम्म साम मापटिन नान है पहरी मामरा अनधि सा है यही मग विभो नी म मामापम्पारण अग्नि (पापु) नामक ना प्रविरित है। पराग र म नरम्न परिंगमाम नापनम्न । पटी नमनर का समापही तीनग पिथ २ मी में सिमापाप भग्नि ( भारिस ) नामा 'नर प्रनिनि। मम्मर पवित-पास-पपिंग सानीय पुषिती भन्नपि पा नामक दोन विभो भग्नि- नापु भागिर नामानीनों नगै ५ पागसरिष या नम म मामनर बिमाकी में पान निगर from I-मत्र नामा नीन भर मा 1 उप तसा है। पिपि में । मस्तक पसरप बाबु एषधि मारित्व दोनों भी माइति से माना कि सम्म होग, की 'किरार है। पापमान में कि, एमाल श्री माहुवि से अपच पर मचान मिलि है। एक में तिरमि पास बापु, गेनों की मावि मा मालित Mom 'सका। तीनों के भनि-मा-आदिल-बापान काहिराती गर्म-सपा में तीन पुक्क पुल नाम का सोनोप मच्चाला एक मार है। 'किनेम्पो नरेम्मो बातो वा' सचिन वानो मिति तपय विरार हिरगर्म-समुचि र भुवि मे- पिता वानरा परिवा। मराहीबार AIN मामा. . अनुमा से ऐसा नम्मच महो। हैबो नम्बलर रूप से मिला बार से पेमे पार है। इसी माना मिए- भनि शेत्राव व पिनासार इस मसला । नवार्य है। पूर्षिती अन्तरिकम् पी पाश चित् (६) मनानम् पनामि (ममि) मापन्दिन भवनम वामित (पान) सिणध (मासिक) अमि भपिप्रधान विभूतिपिंगट्-क्षमा भारिवा २ भमि वायुप्रभानस्तितिदिगम्पगम-शाना समस्मगेचानर भाव भमि ३ मारित्यपधानत्रिमूर्ति मन-धानर.

मारपपनगर मन्त्र का अंगठा माग है - अम्ने ! पान पासवे ! प्र म प्र पर"। भनुपरन, भौर पान कर्म में पार्थिव भाम, पाथिप भूत, एवं पाड पे तीनों नापन भपेकिन है। पापिर मतमाग बयन सम्म का मनुगामी है बागमाग अनुवचन धर्म का अनुगामी है! बिन अमि का परम किरा राता है पर मापाइपिषी में माल वानर सन प्रालाग्नि था. एप मस्त मात्र में परिम अनि भूपिनाना पृथिवी म नगप रनम गाना मवाग्नि है। इस मूगानि का पोपत्र मि पापिय पान म होता पा पपा' नाम से प्रबिरे। राष्टिप्रवकक मदभ्वक पूरा प्राय ग्बती-नमनारमा पापाल भारिपसाटन पूगापार वीनों में स मातमन्न के पूषा' " स भान्तक पापिय प्रामाप दी भमिप्रेत ।। रामो-पो. देवीन पपिपी के मनोठा माने गए हैं। इन तीनों में पार्पियी मारमा परस्पति म मम्मको बित सससा पास पापिपपपरकार का साप निम्माप होता है। पापिडी गो का भाग्न ममब, बिम -'गौला भग्निहोत्रम्' भनुमार पाबि मनिष पर मगरम होता है। पण पापिंग पो मनाता का पूरा म मम्बन्ध है। इन तीनों पापिय तापी नमम्पस में दी पापिय म साम्पा, मा भनुपाया सम्म उम्पप रोते हैं। मनाग उन्दी सीनो नम शिबावारे ॥१५॥ स्वस्पपन सरमन प भगा माग रे- मदन रातो साम, दानामुम्पानी, मा. रिस्पा अस्तिम स्पामानदसा । पापिषमा पाश्म स्तिानपक्ष मद से दो पिस ।। स्माच एपमा पारपत्र । भोस प्रेवाप्निया विवानपर है। पापिन गार फत्पानिया परमता में भारिपस पिम्पानि का परमता स सपा दिय भार पनोगपि भारिम्प सता म माल है। दवायी म मनुष्यीत भनित्रपी रिवान (भिषी म मा पपन पेणप) ही दिलाना है। इन वीना गमरेवसामी पनमा में माता पिवान पानी मात्र कामना दो पाता है। मान मन म मी शिचि का समद ाि गवा है। पार्मिक अपनापति, पानात वा द्वापनमत्ति, नीनों सी नमरि राति । गिम दौलत' का वा उनी रेरिए में मगति सम प्रमुन हुमा। पर पनि मम-प-म्प मर म प्रिपा पिमान एर तीनो पापिय नमुमता म ममप है। भतपय मनि कोम भी

बाबाता है। भूवामा पानि मान होता ही माnि
भमिमान से पता रावी साम'मा मारे।
के साप का संरीकरणमया--
बर्षित मन्ने यो मुरम्य पन्ति ।
अस्तमन्त पालो मिस्वासो पानिपोरना।
मागता अन्तरिम भपिशाता है। ममा उह,
पुनरिकमान्यमि' ला प्रामावि से प्रमाणित पोक्तायो माता
पद भरतरिम मी उसरे एक-'मलाता लामिणा तारा-
नानुनार इस उस भरिम में राने पाले भपिरेमा (प
)ीर
भाष मे पुन भा-परमारि गसिपोराला।
पामिन नपत्ति के मोना में मान्नति - मार (भियान्ता रामवा)ी
भागती समता पाविमति मोर कमी ली।। भारष नापिनु
गतिमा मा ही प्रान्तसिप मका उम्भाष मी भारतमा ति।
पागामुग्पाम' म उनी भूमाभाषी प्रान भभीपिना।
निगनारमा भन्तग्भि ल भीर पनिमानामा पिलोमानिय पत्रिी
है पम उम भार भारि पनि नरम मा । मगर भाग्भ में प्रपिा पिता
नाamuk भन भनागा उभारन (नामालीन) परिका माना
गयारा fr-- भ्रमणमभन्न परिनिमम । गाँ: नाना में पमानित।
पहा पर मानीस (पानिन ) ननिय में गारगरपन्न गति
जिभा गम्गग Aafne ग गाभा घn 7 नियम पुनियन
ना मा रानिया-मार माना।
TH भाग म ती भाति पनि रामपर भारे। गा पूनम न भूमा
fATA17 नानपानपानी भनिगा

प्रथराम में पूतिपित है। मदिन स्यामानेहमः' इस मन्त्र भाग से सबान्त में नमी रेषमाता भारति का अनुमा प्राप्त किया जाना है। १७ ।। स्वरूपमनमपमान र भगा भाग रे-“सुपरामद देवेम्पो मारमुपासम्"। होत्र कम की सपमता के लिए नि नि देवताओं का अनुपद अपक्षित मा, पूर्वमन्त्रमार्गों सर से होता मे पर प्राप्त कर लिया। मा पर सय भपम उस माप्यास्मिक बामप पेषता के अनुमा की कामना गया, जिस की प्राप्ति से सब कुछ सफर एक सिरे अभाव में सब कुछ पर्थ है। मनुपचन कर्म से समय रमन पाले मिन देवामी के टिए रोण मनुवारपा तारे पदि उन मत्रों के उपारण में भवर-पर-बाप भारि का उबारनसोप्ठन-माधुर्यरे पो यथानुरूप उरित मन्त्र मानी उतर-भनु प-सखि भादि परमप्पारा से, तपा गायत्री विष्णम् गगती, भावि योमर्यादा से सरदार न्दोमर पाविक पानदेववाभों स वस्ति होते हुए तत्परक्ताबाइन में समर्थ रामान है। पेमी देवात्रपिभी छोमना-परिपता भनु गरी मन्नपारी पामरेट्राओं लिए आप की वस्तु नती हुई 'पुरा' मा प्रसाई है। पदि मन्त्रापारण में नर-स्वरमा रे सरदोषरे उभारनशेगो स्मसनदोषो तो इस की सन्तानपारा गि पिछप है। ऐसी विपिमा मनपा मी देवार्यकर्म में सल नही रो सकती। दोष में मी सा दुख नापन-सामग्रियों के विधमान गने पर मी फमम भपनी रोग- यापारमा भम्परिधव पारस सब कुछ म्पप दो बाता है। भनपद पर सब सापनी की अपेशा रस अाम पा-मापन का नोउप पूत्पड या में अपठित गित रे मनु मह स मापन प्राप्त माते । एष पाप मी मदन पाता है। भताएक-तरि पा पर रेपेम्पोम्पत् सारिप से उपा-बार पी यापी पूषान नर माना गया ! १८॥ ममूबम देवाएत्रपरिवारम्दम! भारिस्मा इमोसअसिौर परन्तर -मागिमापर मन्त्रामीन देता। माम मन्नार भौज म मोलित मानों के भाषीन मवएप बाम मा पवारिमा गनिकी बार का यह गानने पाठे मचान मारे। वो पूवि मी स्था भनुरोगामी पापा का ही पूगोन या चाite। पायल मगर्म (माम से उपक्ति प. स्थापानमर्म में मी) में सोमवाली सनी ही चाहिए कि किसी भी प्राय गोमाय माला गोम वो मसी हो गया। बामन को अप्रतम्नता सालासरे दिलाए मौत एवं की मन्नता स्वरूपातमरिमिए पर्यात है। स्नकासम्मो मौमावा कीषिय, मिन में सम्मान होम ग्रामों का अपमान र मारते है। म्न राम मोरे कुपों का मन्वेषन कीमिर दिन में मानव दानदाता मरमान पुरस्त गान करते र अपना भनाश मारे। उन मरिमेषियोकी र नायिका मी म पना न भूपि गोरेपन को ही बुद्धिमता का कामको रमाका अपमान र मफ्ने मषिमो मायाम है याममूत पर मारा मना तो ऐसा मात्म निवासी कि भारत कीर्तमान पौनशा मम्मान कारणों में से जानकी मति तपासमा मपमान मी एक मुम कारण है। ममूर यो बुर वाममेमोग्नुमत्' इत्पारि भौतारेस मी इसी कारण का सीकरण ह्या प्रममा या मवमाग इनी ग्रामवानुमामाप्ति के रि प्रभा है॥१६॥ मंगमा मनामाग उर्व नराग। वामन नि येस या इन पायें बों में प्रामभवण इतर तीनों लोका रूपमय प्रहरवानीप है। प्रम एकाकी परि करने में मनमर्थ होता हुमा भने तप से पर नो को उत्सब पता है-निए १४ का I म २ मा २५।)। प्रम सारितत भएप पर सम्मिति से सग्मण रसम बाट प्रमार्मा से परिम्त है। प्रयास ग्राम प्रथा फा (पम्मत से) समान सविप योग-शामा प्रमाण है। इस नामाम मगग बिरहरी मेरभाषा में नर पद प्रमुक्त हुभा है। ग्राम नर (मनुष) नहीं भपिनु रेक्ला ( भरेष) है। सामान्य प्रमावर्ग से इस का पारस पाने के - न मा सिप, साथ ही इसे प्रसारमा पतलान के म्पि पूष (१६) इण्डिका में-'जुय ब्रमम्पा' पपा गया है। भव प्रस्तुत करिया में ग्रामपातिरित गम्यूम प्रमाग के पि मुश बाप्रयोग का विधान हुआ है। प्रत्येक कर्म में समी के गुमसरस्म मपभित ।। पदी पर्म समृर माना गया है, मिम को देखने पाठ न दमने पाठे, ममी एकसर मे माधु पार दिसा प्रवे है। शायर्प, होमसदारि से सभी की एम कामनार सपेक्षित है। इसके लिए समी के प्रति मुराणा का प्रयोग होना चाहिए । भगठा म प्रमाग - पाप होतब सिप चा पराक्तत् , ममियत् पुनरप्रिया माता विपि । राता मपि ययाति मापदेवताभोस, तत्सम प्राममों का, मगावग का सभी का मनुमा भी प्राप्त कर लेता है। मत्रप्रयोग मी पपामिभिदी परखा है। इस प्रकार मानी बान में पह भपने रासम्म में कोई भरि नहीं रहा । पापि सहार में समासमोरबी मी नहीं है। सपभेन निर्णोप कम्मों में भी सोम्-रेम करने वाले मिसही मात ।। रोमाता है-छोरिस कम्मो का इस रिदार से कुछ न विगवा । परन्तु पेदिक कर्म भवस्य हो इस पिप से विन दावा है। प्रितारा मात्सिव भाषना पहावाबरम में यदि पप र गाती है, तो उसी प्रकार पासम्म शिव जाता है स मागनु तत्रादि से स्वा मी पर मसिन गाता है। रोता का पर मी एक पम्प हो गवा है कि ऐसे पुर समायोनकों की रिपोर से दोपमुक पने हुए सम्म भो नि बनाम के रिए ममि घे मार्पना पर है। नही मानते कि दिन के रिपोप से मम्मम्बस्प पिख हुमा । परन्त बछयान्न पासे भवरच 'मावेश' नाम से प्रसिस भनि भवत्य ही उसे गनते। मपाप ही इमारी मावना से प्रेरित हराम उस दिौर को इस र पुनः यसबार का ज्यान परने की समवा रमते ॥१॥ भावयेरा पिरामि पर सस्पपनयर करने मनन्तर पर दोवा मपर्नु सपा मामीम मामा अविर्गास परता। पला मपएं प्रापप्पागर का उता तया रोग रोनों पागमापार एषमा मनोमागर पर माने गए । परम पाहां रिपतिमापको सपना पर पति ने मपएको 'मन' मान मिाहै।

मन मपास से एक में प्रतिभा यहा। समय- पितमपमाद' इतादि मनाय कामचो रामाला अपामय लायकी मनमान। प्रविधित यी है। रिस माल प्रजा। वरल बीवनसचा है। ही विनाम मानना पाता है। मिस प्रकार मन सलान में यह एकमेव अन्न का मापार समान (अपिली) मन रमता। गा होगा का भनुपचन कर्म पुगेबानुगध यण है। रण सारस से मिलान मन्को मन वा रोताको वा मान मिा मावा है। विना मन के पालापार प्रतिवायत है। उसी मन प्रतिमाप्ति के पिता मनास्लानी मन्नुभय। मनी- पाका परसर अभियान की इस का माना सम्मानन्तर का होता मोरीया-माय पत्रिी भाग पामभ भरभ राधि' इस मास प्रमा भनुनार मा मे सम्म रमने पाण मोर भाग्नेवता रानिये सापाला पान्द्र सौम्प वास, गेही उपाय। इन रोकेवाम कित्ता पहा समीकरण हुभा है। महाका मान बरामी भरा पाम से नाम रे गरि भारत भाल। मान ली - मीनी प्रमिह । पाप प्रत में पापा। एप उप निमा (ऐ मा ९01) ल भुति : अनुमा मनपरीर को पारम भने पार विना मात्र ही पार है। भग्नान नारा ही हम पी गरीर में प्रति गती है। (माग्न ) भम गे मी सग या गता है। पानिगा परिषी' निम्नानुगार बनना पपिपीर बाना भग्नि है। पाति प्रमाला पपिपी पर भिर मान की पाप्ति है ! पानी का भी तो भमान नहीना नामा गन् । बागमा मात्र मी रित पपा माम पिन' भनुमार पार| भागारीमापामि होगा। इन । भोली नाममा 1 मात्र - भाण - प्रसरणाम को यस में रमन हुए अति ने इने 'उरों' परा। निम के लिए ये भी पर्व भगुइस गते हैं पर भी किसी भी प्रकार का ए नहीं पा मम्वा । वो इसी देशमशानुमायाति की कामना करता है ।। २२] मान ससस्पफ्नार्म समाप्ति के भनन्तर होवा भपने सिप नियत रोमपदन' नामक भपन बेटने क रपान की भोर मोर भावा है। यहाँ भाकर अपने दर्मासन से एक पत्र निकाय पर फवा हुमा रोवा-निरस्तः परायमु मत्र मोता है। रिम की उपपति प्रति ने यह पतलाई कि परापसु नामक भमुर भमुरों का होता था। सुगनिकामन पार से वसी को इस देवपलमारत से बाहिर फेका बाता है। ऐतिहासिक तप्प की रिस बाहुन सम्म दो मौम रक्ताभों की माति भमुरों ने भी यज्ञ किया दो एप उनके किमी पत्र में 'परापमु' नामक ममुर गामात्र होता ना है। परन्तु तताप्पा पर तमामप गोकि मान सामाणिक भामुग्माप से देवपक्ष से सम्बन्ध रमन पाले पमु (नपति) को परमर से पराग करन माडगो 'पराक्म' । इभी र लिए सदरा' , प्रयुक्त हुभा है। मा —ि सहरमा इत्पमुरमा पूत भास इत्यादि प स पुत्र र दिवाखाम' में विस्तार से क्तसारा वा पुश है। रिम्पप्रामाग्नि परदेषवाभी क होना है। इसी के लिए मम्मि दूत भीम रातार विसरमम्' इस्पादि पहा गया भनि व मन्ये पमु इस्पा ६ अनुसार बमु ( सम्पत्) प्रवचा प प्नि दी 'भामु नामा देवदेवताओं होता है। दोनों से मापारमा वून भान्तरित मासु मपात रन । पस्य पत्रमण्डल में दोनों का सम्बन्ध भनिताप है। रानों में पपपमु का नाम पपिपाता है। मत्रपति रा सुगनिमनन उस ता निकाम बाहिर पर दिया गाता है एक-एमामपिमा मदने नीमि' पर मात्र पोपमा हुमा सपा में कार भानु नामर भिग्नि होता क नम्पप को एम बनाता है। २३-२८ पगियों में भी उपपति ना सीकरण हुभारे ।। २३ २४॥ इम प्रकार वादन स्पान में बेन : मनम्तर राना गाना - पिनाम्ममनूग भनि मा मोगपिपं मा मा हिनिएमर या मार एम मन्मा पारत्र पाताभा रोना उपर पी भार पाना पता माहै। सदन स्पान गाम्ना भा म

क्नीकदोनों पाचिन ममियोमबऐनी माला
पिरो भनाय तो समिधन से भाव मिड-मालामा
गया। माल ना इनकी मनुस्मातिमा रोग समाज
माएक होता स्तुविवाय इसका मन प्राप्त सारे २५ ॥
अनतर मारनामाग्नि दी मोर देना मा-कोरेगा लाल
मन मोनालिका सीरव मगनगाव गरे ।
इति चिनाप्रमाला
इति-नोवारमा समातम्।

•मो वन सद् प्रमणे नम.. अथ शतपथब्राह्मणविज्ञानभाष्ये पबमाप्याये द्वितीय, चतुर्थ प्रपाठके घ वृतीय प्रापणम् (शश।) (१।४।३।) क्रमप्रासश्च २१ मामणम् 'मुगमाहाणाम" - -निमुबपाठ' ( पारायणपाठ (भव प्रपमका पक्षमाप्या दितीयं चतुर्थप्रपाठप हवीर्य प्रामम् ) श्रामिहोता ब्बेत्त्वग्नहोत्रमिति । अग्निरिवछहोता वेत्रित्येपेतदाहाग्नहोत्रमिति तस्यो हि होत्रं वेत्तु पावित्रमिति यज्ञो वे पावित्रं वेत्तु यज्ञमित्येवेतदाह साधु ते यजमान देवतेति साधु ते यजमान देवता यस्य तेऽग्निहोत्येतदाह घृतवतीममयों स्लचमास्य- स्वति तदवयु प्रसाति स यदेकामिवाह ॥१॥ यजमान एव जुहूमनु । योऽस्मा ऽश्ररातीयति म ऽउपभूतमनु स यद्धे इव ज्या जमानाय दिपन्त भातृव्यं प्रत्युषामन रममाण गमतमा स पद् देशल श्याश्च पापं वासिन मर्मात तस्माउकामिदेवाह ॥२॥ वेषयुव पिरमारामिति - पस्तोसवेनामेतन्मार त्येव यदाद देवयुर्व विश्ववारामितीसमो खात दिल्यान् नमस्याम नमस्पान जाम य ियानितीरामहे तान् देवान्य न्यिा नमस्याय ताने नमूस्या यजाम पणियानिति मनुष्या वा अन्याः पितरो नमस्या देश यरिया ॥३॥ या बे प्रजा योऽनन्नामका ।-पुरासमता ऽएवमेवेतया हाम। ,प्रनाउ प्रयमतास्ता मा भाम जति ममप्याननु पयो देवाननु ब्युपायस्पोराने वनस्पतयो गदिदं कियेवम् तत्सर्व या प्रामकर।। । ता वा एता । नव व्यातियो मान्ति, नयेमे पुरुष प्रामा एताने गस्मितालाति तस्माधव न्ण हनयो भवन्ति ॥५॥ यो हदेवेभ्योऽपचकाम । तं देवा मन्त्र यन्ता नः शृणपनि आवर्तस्वति मोऽस्तु -तरेत्येक शुगवान देवानुपाववर्त तनोणावनेन देवा ऽश्रयजन्त तेनेतद- मवन्यदिदं देवा ॥६॥ स यदायाव्यति । यसमवेतदनुमन्त्रयत ऽमा नः शृणूप न भावतस्वेत्यथ यत्प्रत्याभावपति या ऽषेत- दुपावर्ततेऽस्तु तथेति तनोपासेन रेतसा भूतेन विज सम्प्रदाय परन्ति यजमानेन परोक्ष यथा पूर्णपात्रेण सम्प्रदाय चरेयुरेवमनेनजि सम्प्रदाय चरन्ति तदातत्सम्प्रदाय चरान्त बाग्घि यज्ञो वाठ हि रतस्तुदतनवतत्सम्प्रदाय चरान्त ॥७॥ सोऽनुबूहीत्येवोक्त्वाध्वर्यु । नापव्याहरेनो एन होतापल्याहरेदाधापयत्यार्पुस्तदर्मा, या उपा- वर्तत ॥८॥ सोऽमीनापन्याहरेत । मा प्रत्याभाषणात् प्रत्या यावयत्समीत् तत्पुनरवयु या उपावर्तते ॥६॥ सोऽधर्पओपन्याहरेत् । श यजेति वृक्तोर्यजेत्ये- वावयुहोंने ग्रम सम्प्रयच्छति ||१०|| स होता नापव्याहरेत् । भावपट्कारात् त वपट् कारगाग्नावेव योनौ ग्तोमतः सिवयग्निब्बे गनि मस एक अपामाशीपासणी घरे ॥११॥ For मवेशीखायानामहोपावस्था दुणपमित्येवाममापम्पोरामपPAR|| तऽउदातारो नापन्यारेयु- । प्रोत्तमाया ऽपोतमेत्य पोदातारी होने या समयन्वन्ति ॥५॥ इस होता नापन्याइस्त् । वटकास मन्द कारबाग्नाष गोनो होममा विनियोमिर्च स्य सतत प्रजायते ॥१॥ से यद सोमबाहरेत् । पात पण पूर्णपात्रे परासिञ्चदेव इस यजमान पुलिस पत्र हेवमविज सषिवाना मन मन्ति-समेत तत्र कल्पते न मुसति तस्मादेवमेव यो मर्सव्या, १५॥ ठग वा एता । पत्र-व्यारसयो मवृन्त्यो श्रावणस्तु श्रौपम्पज ये यजामहे वोपरिति पाएको यन पाएका पशु पबर्तव सवत्सरस्यका यगम्य मनपा सम्पत् ॥१६॥ F छाप । A तासाथ सप्तदशातराणि । 'सप्तदशो वे प्रजापति , प्रजापतिर्यमाएका यस्य मात्रेपा सम्पत् ॥१७॥ श्रो श्रावयेति वे देवा । पुरोवातु ससृजिरेऽस्तु श्रीपहित्यमाणि समप्लापयन्यजेति" विलुतं ये यजा- मह प्रति सनयित्नु बपटुकारेगाव प्रावर्पन ॥१८॥ स यदि पुष्टिकाम स्यात् । यढीष्टपा वा यजेत दर्शपूर्णमासयोःव याद पष्टिकामो वा 'अस्मीति तत्रो ऽध्वर्यु ज्यात पुरोवातञ्च विद्युतश्च मनसा प्याय- त्यग्नीधस्तनयित्नुञ्च अर्पञ्च मनसा ध्यायेति होतार सर्वाग्येतानि मनसा घ्यायेति, ब्रह्माणं वर्षति हेव तत्र यत्रेवमृत्विज सविदाना योन चरन्ति १६ श्रो श्रावयेति । देवा । विराजमभ्याजुहपुरस्तु श्रोपडिति वत्समुपावासृजन्यजेसुदनयन्ये यजामह इत्युपासीदन् वपट्कारगेव विराजमदुइतेय वै बिप हस्यै वा एप दोह एव हवा उस्मा द्वेष विराद मुन्धान कामान बुहे सऽएवमेत ब्धिगजो टोह दरिंगार इति चतुर्थप्रपाठके तृतीय ब्राह्मणम् [५ २] ॥ इति पथमाप्पा द्वितीय पतुपप्रपाठके च वीय मामणम् (१UAR)-1) इति-निर्स उपाठ (क) 1 1 7 A + + IR "अग्निहोता मी वि। बलिया हामिपिता इस्वोतदा । " सामना ! इति पस्स ते अग्निहोता-लेता। "तीयों का इति । बम प्रसौति । स परेअपितात ॥ (१) ॥E मद्ध, गोऽस्मा बरावीपति-स उत्सनमा । सोलपुर-- मानाब शिन्त भाव प्रसपामिन बाद । बामद, बाया- मनु । स प समादका भाव प्रचालित तस्मादेश- मिपार ॥ (२)॥ "देकर ' इति । गतीमान्द, मास्वेष, बाह-देव मिलाकर इति। “सामोरेवापान, नमस्साम नवसान, क्याम पति" इति। यी सवार ईम्पाः, नमस्ताम वाले नता, स्याम परिसर-पति। पाना, पितरो बमस्था, देवा पत्रिपाः ॥ (३)atm अनन्यामला:-परापता रेवाः । एपमेला-बाबा मारा- पायबामति । ममान बारा, देपाल नुमति-चीख: बनस्पता-पविर किया, पान बामम् ।। (५) ॥वा पा एता नप पाहतयो मनन्ति । नमे इसे पाला । रताने अस्मिन् एखद् वपाति । तस्मान्नव मालपो मपन्ति ।। (1) पदोहरेवेम्पोऽपपकाम । तं देवा बनमन्वन्त-"मा नाम, जनभाव" इति । तस्या इत्तेर देवानुपावर्चत । सनोपारपन देवा पर अन्त । तेनेप्ट्या एवम् अमबन्-परिद देवा ।। (६) ॥ स पदामालपति, २-भामालमस्यामापनिगाद:- म.ममामा पझमेवैतदनुमन्वयते-आ-नमृणु,विपन आपस्वगाइति। अप पद प्रत्याभविपतिअम एसदपावत । अस्तु वयो" इति । तेनोविचन रेतसा भूतेन रखिम सम्प्रदाय घरन्ति, परमानेन परोधम् । यथा पूर्ण पत्रिण सम्प्रदाय घरेय -एषमनेन चिज सम्प्रदाय चरन्ति। सावन सम्प्रदाय परन्ति । षाग् हि या , पाग ठ रेत । तदेतेनैवद सम्प्रदाय परन्ति ॥ (७)॥ स 'अनुम् हि इस्पेमोक्त्वा मम पिम्पाहरव, ना एव होतापम्पाहरेत् । आधावयति अध्ययु'- सदस्नीघ या उपाधते ।। (८)n मोम्नोन्नापम्पाइरेद-भा प्रत्याभाषणान् । प्रत्याभीनयस्पन्नाव- सन् पुनरम्यषु यस उपावर्तते । (६) | सोचनपिम्पाहरे-भा 'पंज' इति पतो । 'यज' इत्पयामपुत्रि था 'सम्प्रयच्छति ॥ (26)॥स पहोवा नापम्पारेल-या पट्कीरीत् । षषट्कारेणीग्नावेव यांनी रतो । मूत सिम्पति । अग्नि योनिर्यक्षस्य म सित प्रजायते इति 'नु हषिर्पन । अप सौम्यऽचरे ॥ (११) 1 से 2 पद गीत्वा अप्पप्नापम्पाहर आ उपाकरमान् । 'उपाचर्चचम् । इस्पेयावर्गलगातृम्यो पल'सम्प्रयच्छति ।। (१३)॥ उगातारी'नीपम्पाहर-श्रा उत्तमामा पोचमा" इत्ये मागातारो होत्र या सम्प्रयच्छन्ति ।। (१३)॥ महराया मापम्पाह रेव-आ पपकारान् । व चपट्कारणाग्नाश्य यानी रेतोभूत सिम्नति । अग्नि पोनिर्यनस्प-स तत प्रवायत ॥ (१४) ॥ स प मोऽपम्पा हरेत्- प पम उपावर्सत, पथा पूर्णपात्र परीसिम्पत्-एव ह स पजमान परासिम्यम् -एप . स यजमान परासिम् । स यत्र देवमचिज समि दाना पान परन्ति-सर्वमय सत्र कल्पत, न सुपति । तस्मादेरमेव पो माम्य ॥ (१५)॥

OM
वात रमतीत-ची
'ब' पयानो,' पोर इति ।
सम्मत्सरस । एम यस मना, इस सन्तु ।। (१
सतरावरामि । सो प्रावि। प्रवासविधानमा
माना, एसा सम्पद ॥ (१७) । 'गो भावव' इति वा रोग
ससृजिरे। 'अस्तु भीषद इति बमाथि सबकावरन् । 'विधि
र 'ये पलामो इति स्तनक्किम् । पामरे व मार्गम् ।। (८)||
मदिरालिमा स्वावपरिवा-बाना
'पटिकामो पा बस्मि' इति । प्रयोग पार-सेवात व नियत
प मनसा माप' इति । 'ममापि सक्सा पाच इति भनी।
पिस्न वा मनसा माप इति होवारम् । 'सानानि मस्यामा
इति प्रमालम् । पति -पौर निवः सविता
परन्ति ।। ( १९), 'यो भावप' इति है देश विमान
'वस्तु भौक्ट्' इति बस्सापालासमन् । 'पर' इति ममा । कथा
मो' इति उपासीइन् । 'पादकारने शिममार। इप- पिता,
अस्पै प्रा एक दोहः। एवमा बस्मै, विराष्ट्र सनि मनान करे
एषमेत विराबो हरे॥ (१२१)
पति पचमानाने दितीय चतुर्वप्रपाठ व वीर्य
-
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'सुगवासव' समाप्तम्
T
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इति-प्रवचपाठ (स)
-
-

" म.मनापन -मखानुवाद परिव मध्याय में दूसरा, पौष प्रपाठक में तीसरा प्रापण "मुगबाहरण" १-सगाढापननिगद (पूर्व + प्रबग्ग्राम' में भप राम माल पम्मान दिम्प भमि, एष माप रोता पण कर्म की प्रतिसत्पता तथाई गर है। भत्र प्रान मुगवामन' में सगा पान' सम्मापारीकरण किया जाता है। पहा गया है कि, मणमु नारा होतस्पेन मन 'रोता' नाम शक्विक मपने दोष सम्म भी निमिम परितमाप्ति के लिए, मस्पान- तपान में प्रतिष्टित होर-एतत् सा देव सपिता मते' इत्यादि माप लाम मम्पकनवर' म करता है। इम कर्म क भनन्तर ही भगा पन अप्म विस्ति । बिमकी ठिकम्यता प्रमप्राप्त भारग्म करती हु प्रति पाती है) - (सम्पपनमायर के अन्तर का नाम तिम्)-- भमितता स्वप्नहोत्रम्' (प्रागमिटर रिम्प होता त मनुष्टम मपन होत्र फर्म को आम) मा मात्र दोमवा इम ( मनुष्टय फर्म)ो दिम्पामिम्प पर होना गम मन्त्रमाग से यही परा है। मनोरम' एम मन्त्रमाग का यह सत्यम्पो कि मात्र मर्म निभपेन ममि पारी । ( भनन्तर )- येच प्रारित्रम्' (रिम्पामिरप होता पायो बाने) पर मन्त्रमाग गरता है। प्रापित निभवन–(प्रम भवति एम प्रति से)मा पारे। (ग मात्र माग से ) रोता रम का गान यही का है। (भनन्दर) मापु ने परमान ! रेला' (म्मान ! बिम नुमाए दवा टिम्म मि पर मारा बना मुम्हारे सिप-कम्मसिरिए साधु-पोम्प)पा मनोधारण पखा। मम्प स पदी का गा ।। (मन्ना)- पुतीमापों ! म घमास्पस्प” (हे भषयु ! भार वर्ग म प प्रदान कीपिए) र मायोपारण पला । (स मन्त्र द्वारा रोना) भाप (प गााग्न सम्म डिए') पग्नि रखा है। वो हो कि होवा (माको मन सपा) परा, समाच) मामी . (एव) (Atyapatr(मान म उपस मेस मावा है (माया मकान की प्रकिति)। (ऐगी स्थिति में ) पावन सेवा (ब)ो (. उपपत् रोनी) रेजिमेantarमामले पाने को सम्मान की प्रतिमा में साम देना (मात् पी बनने पांग खिोया मा एक हीलिए प्रेरित या पित)। (भाग की एक ली समाचि मार गो)( मोरा) मा माता है एवं माप (मौम्म) उपयत् मत माग (माद निदान मचा की, वम उपस्त् माप की मजिति) (देवी लिपि में ) परिवार के लिए मेरित करेगा वो मचारिभाष की प्रतिमानेगा (मात् मौला मोचीना में मीनको बनायेगा। पेग न हो। सfe एकम (एक सपके लिए) मन मोख्या है ॥२॥ मनातर) 'प्रेमग विचारा" (रेक्तामोरेमयोग कीलनेपाली व्यापली ऐसी बरे लिए मैं मई मेलि nt) मोबायला लाव की प्रस्नहरवा भवा व (भार) सामी देगाव, सलाम बम पशितान्' (खति करने मोम मनुचों की महिमा नमार भने पितरों को मैं नमस्कार करवा । एक पल में माप नेपा-मागितले गाते- मतएप मशिन' प्रगने बारे रेखाओं का मन करणा) मनोबारमण मनुम्म निभान राति भणे बोम्म फिकर नमस, एक रेता पनि tim गोमबार पा में माग गीत ( किस में मोर प्रगर नियन परानित | इसी प्रकार (ठीक इसके विपरीत) बो प्रयाएँ माचित मी कोपर में उमावि मता। (भात् माइति कर में दिन मानाने भाग नही मिमा वे परत दुरी, निोन माग बिा, २ मिनी -

१२१
खुपाय
प्रात यह में उन विपिनी प्रबाी काही समावेश पिया बाता है)। मनुप्मों
को मिल र पापना, रेषनामों को अमित र पभी, मोपपियों पनसहियों, दया
(बिन का सरिफम्म में उपयोग है) यह सब कुछ पत्र में समाविरn (v)॥
इस प्रकार (पूर्व अपनानुसार म गागरन फर्म मे सम्बाप रखने पासे 'सगापननिगद)
मन्त्री र माइतिपा (मास ) रोगाती १ . । पुरुष (माप्यास्मिया ) मं नौ (मात
सीपम्प, दो मनाममा सम्भूग १) मा ।। (नगपाहत्यामा इस मु मादापनमा
से)मा वा अपने इस रेप भाषिभौतिक पल में हनी प्रामों को स्थापित रखा।
इसी (मवप्रामापानसम्पचि रे सिर ) सगागपनमन्त्र की ९ माहसियाँ होती है ।(HI
गादापननिगइसमाम
--
२-आभाषण-प्रत्याभाषणनिगद
( मनिता पम्नहोत्रम् ' इस्पादि नपम्पारस्पारमक होता 'मगागफ्न'
कर्म के मनम्तर-भषयु रोता उद्गाता प्रमा इन पाप अत्तियों के सहयोग से
भाभाषन-प्रपाभारत-अमेतिरंम्पना सम्पम रोती है। एक तो ऋषिक का एक
दूसरे ऋतिक क मवि पसरप की महिमा का वर्णन-मनानदी भाभारत-प्रत्याभाग्य
पर्म प्रसागरसम्म सिमा पाता। इम प्रनाउचर में प्रपम एक
पेशानिक माम्मान उसनदया। जिसका पारिता विश्पा मिषना-भारत में
-- भनिहाव।
f-मन साम्।
.-पत्तन प्रम् ।
-गमा परम्यान्।
1-बेतु प्रावित्रम् ।
नमस्पाम ममस्यम् ।
-- सापुत पर।
९- ययम परियार।
- पनामभया! घुममाप्य'।
दहीमा निगमता ()
॥

पोगा। मोति उपधि से सम्म नेपाली हानिकभासाता गवी भुति करती है)(सी में) समोर (गेशान्तर में पाक्ति म्स) सप्रेक्यामाने बोलिमाया लिाकि (सदेव म स्माय मो (मामा), स्मारी मोर मानो । ( दाभों की मनुनम किस पुल बानी से प्रभावित होम गेमभर में मना) का तादी हो' (कसीइति कन) मणमा गभीर गैर मारा मेटे हुए उस पा से रेबीने माना मालाम्मे समान रिमा (कोकिलावा पूरी)। इस मा से मान के (देवरेक्वा )सर बोकि (बाच समन) सम्म (सोममा सम्मान मप में मार्ग)। (भात रेवदेवामाने मन नब निम पारा पापस टोटे हुए फार्म से ही माना रेकर मत रममा देखों का देवत्व ना ॥ (4)॥ हो कि मनु (नामा पनि भोमान रत्तारि कम से ) आभापकर्म क्या है (भपने हर मामा के प्रति रेक्वामी की मावि )स को ही माल विनय पुगवान, भाप हमारी पुनो हमारी भोर गैर-भाभो । (तापर्ण भनुम भाषाकर्म गेडाम्बर में मत पा- सम्म सम्पारण यह को लपेपमा में पापन गरि nat)। (मन- पुरुत मामान के मनाकर मामीण नामक पति- भय भीम' इलाकारको प्रत्याभाचन कर्म खाद-उस प्रस्तावाचन कर्म सेमक्ति-गोइत स्वीकृति के साप ओर भाग। (वात्पर्य मानी प्रवामान फर्म सती कति पूषक बापत और माने के स्थान में विरो)। (इस प्रकार भासमानाल भाग्नीमा प्रत्लाभाषन से समीप भाए हुए या सेम्मान को (इस मावा पसम्मान कर्म में ) परोप रखते हुए कृतितोग सम्प्रदाय का मनुगमन करते है- (परस्पर एक दूसरे के प्रति मोष तिर्गमता का विमावन करते हुए मोतिमा पूर्व करते हैं)। (तात्पप-भाभाषन प्रत्याभावन कप पाहमय निगद धर्म से या का सम्प सम्पन्न होता । इस में पायें भूतियों का प्रमए खयोग या है। समय- मान रत निगद कामे में भाग नहीं सेवा) सि प्रकार (गेस में किसी बात् पान को पूर्व करने + पिए समवेत मने) मनि मपने मागे आगे की मतिनों को मापूर्वक मुम्मन पात्र मोपने हुए महत्तात्र पूर्ण प्रते हैं तपेष परसर प्रान कम से इस पहारा ये स्तिक सम्प्रभाव का अनुगमन प्रसे। (मत पारस्परिक सम्पदान किसी मौखिक रम्प का नहीं होता भपिनु पर बार प्रयोग मात्र निगदमन-प्रयोग सेती सम्प्रदापासुगमन होवा । इसी मभिप्राय को म्पक्त करती हुई मुक्ति प्रती कि) इस माझ (पामप निगरमनप्रयोग ) रा री सम्प्रदान पूषा ऋषिक डोग भनुमान मात । पाही या। भोर पाही निममेन पात्रा रेत है। भतः बागद्वारा ही सम्प्रदानपूर्वक कक्षा नमान परत ॥ (.)|| (भामापत्र प्रसाभाकम कर्म के पारस्परिक सम्परान से समी ऋतियों का म्पपसितम्प से शान्त-महिम्न चि में एना भावापरी। इस निगदकर्म में उगे उतना ही कुछ बोसमा है मिल्ने का निगदसम्म से सम्बन्ध है। प्रयतानुपरोगिनी होरिमाचा सपा निफिर! सो पिरोगदे का स्पीकरण करती हुई भूवि मती कि) या भपयु (मपने मुख से रोता मामा स्विम् * मति मनुवास्पा के लिए प्रेप परा हुमा) 'मनुवरि [ मनुबरन मो] इतना मर पर ममासशिल मोर कुछ न पासे । नाही वादी भोर कुछ ममाक्षिक उम्पारन करे। [क्योंकि भवपुल प्रेप स भनुपचनशारा रोता में भी बागस फा का नमावेण ॥ माता है ]। [ मनन्तर ] भषयु [ भाग्नोम को सप नाम 'भो भापर इस्पादिप से ] भाभाव प्रता है। इस भाभापत्र से या भानीभ के समीप ठोर मातभाप्नीम परततान से मुक हो माता ] [८]॥ [षि मा. पुल मामाप से भाग्नी में पहमायत् का समावेश होगा भवएप माता भाम्नीम [ भस्तु भोपर' रत्पादिरूप से प्रत्याभापत्र न प्रते, तबतक पा निष्प्रयोजन कुछ बोले। [भपमुक्त माभाषय मम्तर ही मम्प निप्पोन पासपमप्र का भा] माप्नीम [ भस्तु मोर' म्प से मपपुरे प्रति] प्रत्याभाषण परता है। [माग्नीमा त प्रतापावन से याममत् पुन भषयु की भोर ठोर भाठी है। [मॉरि प्रापाभाव पर्म मपयुक्त मानापम पम पदी मापन[]|| [भाग्नीमान प्रवाभाषर पनपन से मुरू होता हुभा पा भषमु यावा [रोठा पनि यस [ पम परो] इन निगद कार न बरस तस्तक मम्य छ निपयो पन न मा । भरने पर इन मेष दी मरमु होगा दिए परानमा समर्पित र

देता [लप का भार होता मी मारवा]IEngl
[ मनु निगराउपत्र वा हुना] -
गौम्' निरा बारव न मानो
उल से पोम्नने गप ही पाप मारली
[नित पनि हििमकप रेत की मावि देवा है। मान लिया
है। रती में [तात हगि प्रदान से - [त्मamrtml
उत्पन होग है। हर्षि के समय में पाममा भी (गाने
माता है । म प्रमोपाय होमपान में [ोले
पालन
में मी पाते। ] ॥ (११) ॥ (मसाल में) मन (सोमरसते पार
कामय) (ोमपात्र ) का प्राव रागगावाम वो पान उपाय
फर्म न रखें सक्दक मत न बसे। (अपात्र-अलाम ममावालो के
मति अब उपाययम्' (मीपर मारप) सवालोवारकमाल कामा
उतामों के लिए समफ्ति देवा ।। ( गाता गेग मतपत से
पुल हो पात १)॥ (१२) ॥ (मन 'पावर' निगद से पास
से पुक हो गाने वाले ) ये उद्गाता गे सतक (अपनी स्तोमाभो म से) अन्तिम
स्तोनिया का ठगान न भयो, म मनन यो। ( स्वोपिया स्मारकावर
ठरावा होग मन्त में होगा कोम नाम-योमा - मन्जम बोमिना -
इस निगद का उमारण करते हैं। अति प्रती है कि) गमावा मेग 'पोमा'
इस उम्पारण से ही रोवा के पिए पम्तमा समर्पित है-(प्रवास होता मी
मुख हो गाता है)॥(११)॥ ( उमाता र स्वोषियोगान कर्म
की मन्तिम नोरिया से सम्बन्ध रमने वा एपाचमा त निगम से सतपत् से पुक
रोगामे दाग) गोता पता ग पोस्ट स्म से पाहार न करते + मालत
छन बोले। (रोमनावपळरानम्वर प्रकार के साभ ही)मन्स परकायारा मार
बनीपारिनम्यान पोनि में उस (नियत मा नाम सोमरूप ) रेत ही माइतिरे देता।
भनि निमन बस की योनि है। इसी में (रेतोमूता मावि से ) ( सातिय
बिस • मायाम से सम्मान को मानुषाम्मा गगेकि मापुमागानन्तर मिनारियलमा
पातम्पत्

" मुगणमन में प्रविम्ति होगा ) उत्पन्न होता है। ( सोमबाग क सम्बन्ध में पावरमकर्म की पही माय मीमांसा )॥ १४ ) ॥ (मामार प्रस्पाभाममनिगर पर्म में पदि शत्तिा लोग अप्रस्तुतवामा उम्पारण करई, वो स्पा मनिष्ट हो । इसी प्रश्न का समापान मती दुई भुति प्रती किपरिमा सिमालवा उनारन र देगा वो (बा परमरया) मिस फातम्मत् को प्राप्त करता है (मप्रसव पागुम्पारण से उत पातम्तान वा विपदे दक बनता हुमा दावा ) उसी प्रकार पबमान को पासपत से पुपा कर देगा से कि ( स्वस्पानों से परमात्र को परिपून मन बाठे ममि भतापपानी से ) उस पूर्णगान को रिक्त पर देते है (रन देते हैं )। तात्पप्य-मोरिस कम्म से मपति से मपूर गरमाता है एवमेव ममस्म पागुम्पारण से याम्म स्पसन्धानपारा मोता मा अपूर्ण य गागा एवं पी अप्रस्तुत गुप्पारण से माान् मनि रोगा)। (डीक म गिरीन) सिम परमान + या के (मामात्र प्रत्पामाक्लनिगम में ) लिए भाग ( भमत पाएका सयम करने हुए ) परस्सर एक दूसरे के प्रति परसम्पत् समर्पित करते हुए निग धर्म 7 मनुगमन करते । उस कर्म में समी का (पातम्मलिया) सम्पम रोगाती है इन सारपानी से कोई भी अत्तिा भपने स्क्य से प्मुत नहीं रोका । इस लिग (अप्तियों को पारिप कि) रे मी प्रकार (विरित नियमानुसार) डी ( योति- नम्पवा पूरी करते हुए ) या दो पुए ( परिपून ) । (१५) ।। ( मत निग प्रम में पाप मातियां होती है। इस पा सस्माली मौप्तिक उपपत्ति पलपाती ति पाती है)(स माभाषम प्रयाभापत्र मर्म में ) निधन 4 [निम्न मिमित ] पांच पादतियों रोती है-'भो भाषा-भतु भोर-पर -'पे पनाम बोपर । (प्राकृतिक समत्तर पा सम्मरमरपामारेम पिताम्मान मानिक पापि पर पे रानी ) पर पाप है [पर से उत्तम ] पर [ मी ] पसार [प्राकृतिक सम्मलर [] [ मी ] पाच [] ऋतर है। पहा माफी म प की सीमित [प्रारिक समत् है। [रची माविक नमत् समाएि पहो पार पाइवियाँ पिरित ]॥ [] || [उन पापी मातियों की मार १० होते हैं । ल ARCO नभ्या की उपाधि पतलाती हुई भवि पहनी है - उन पाबमातियों ( भी भा-८-य म-स-श्री पर --

O
।
सरमाल) । मगाव (हो)। (मी) सील
नि) नीमा , (मी रसी) सका।। (इस प्रकार -
समय भार लागला प्रामालमत् भी प्राप्त हो जाती है
(उच पांच प्रालि महलों समावि मR प्रान रेस्तामोपाय
बर्म भी महानि। रक्तः इस मेष मानुषा में मी और यबमान TNA
रमाता उस को एक मित्र पति के मनुस्मन
सेना मी पूरी हो -
है। उनी प्राकृतिक चि पनि were wait मुक्षि गणेm
ल) रेक्तामोंने भोगावा इस मावि से (ल) पुजा (पुतार
पा-माम्न ) उटयन की। मन भोम्स मामिरे (भाग)मा
र गि। बहन माल मा ।
मान से मार उपना की। एक समय पानी मला दिवा । (
पार पाच मालिनी के समय से समर्म पूरा परिका एष मत १८)
पर पबमान परिसर की वामना रस्ता रो. ही सम्मान प्रारमामला
तोरी भादि से बम ने पांग दो दो से (प्रतिमास)+
मामार में ही (पत्रिों के मना चाहिए कि, माजरा।
में उन पबमान को मन मे गे मला परिमा
मानन सास से पुरोवान भोर पिए त्वा मार मो। भागीर मामा परिवार
या पाना बाहिर नि म मन त परा मान ज्ये। रोना नामा पनि
परपरला पाहिए कि हम सन्ति भौर पाली मा म्ये।
(पिए पनि ते या प्रना चाहिए कि, मार पुरोगादिना का मन में बात
गौर। मप ( पबमान *) उन या में पानी रानिया में (उ
गि माने (उतनामों मनपसपहनाभिराम मनोम भापान
1॥ (२९) ( भग्न प्राइदिक पारि सम में प्रामदेवता पाम्पानामा
भाभारत, प्रत्याभारम सम्म स मानी गागर यासामना रािर गो पानी की
म दौर पाते। मीर और
मानसिप रती पति मी
गणनामा

घुमापन १२. । क) 'भोभावर समावि से रेयरेस्वामीने विराट ( गौरमपरागी) भान किया। 'भन्नु भोप रत माति से (सनगनार्म ) पल्म को पाप से मुक दिया। पर्व' इस म्पादवि से करन को पुषा किया। ये मामरे' इस म्यारवि से (दोरलार्म उप-पन ) के समीप बेठ गए। एस-बोरर इस बजटवागरिमा पाइति से ही उस विराट का पोस्न म मिपा ! पा पृषियी ही निमयेन विराट् है । इसी कायर (उत्त लतप ) पोर है। (मिस प्रकार प्राकृतिक प्राग देवता इस विगटरूपपरा-गोरपपरा- पपिपी के दोहन से मानी सम्पूत्र कामनाएं पूरी किया करते हैं ) रती प्रकार पर निरा रगो रस मधमान < सिए पे सणून कामनाएँ प्रदान कर देवी पो रमान विरागी के रफम्मन मारुविक दोहका यस्प बानता (२.)॥ भामाबम प्रस्पामावणनिगदसमास २ - पाच मप्याय में दूसरा पोपे प्रपाठक में तीसरा 'म गुमायण' समाप्त मनानुवादसमाप्त (ग) -सूमानुगतपसविसमा १, २-म गावापन, सया आश्रावण प्रत्याभावमकर्म परगाम्म समाति के मनन्तर शेवा' नामक सि मप मोर भाभीयो भंत देश में सपना है। सोतम सम्मन (सर्ग) सम्मानन्तर भएं भोर मानी दोनों पपारवान बेठ माते -चेमा कि--- सस्मृमा उपविधता' (T भी सू. ३।२।१५) इस्पादि स्त्र म्पापान में सा र दिया गया-(रेपिए पनि मा ५ वर्ष २ मा पर)। सूत्रानुगता हन परवि के भनन्तर प्रमप्रास 'म गा- पान' पर्म की रविचम्ममा प्रारम्भ रोती है। भम्पब मा तप्पी मिना मयप्रयोग केस गापामार्म होता है यहाँ प्रल में मनोधारणमा स गाटारन पिरित है। परणाम से मत रोवा मनिहाता येतानोत्रम्' इस्पारि मरम्मन सगाराम्ननिग" पापाठपखा। पर रोता मवार भारम्भ पता है। उपर भापर्यु समत् नामा एकका परम करता है। पही समया मगादान' पर्म है। रोशन १२८ निगरमा- भनिहाँवा रोष पेच पापि गते पवमाना, होवारमामा पस्तीमभयो । सुषमाला किनारामीराम जी utam नमस्लाम नमसान् पयाम मनिम्" इस सम्म के सबारम में मी पोखeth भारम्म पबमान देवता' पर्पन्त रोचा उप-मम्मी-पाच भाऽनि. मे भारम्म म पयाम परिवार पर्मन्त उपर बाल ti क्ति समय होवा के मुख से-'भूतक्तीमतो! हुमालल' मन्नमान म्बनिक है उसी समय ( एतम्मन्त्रमागो पारम भाव में ही ) भागमा रोखर निगदपार कार में भनु समान ही सुमारान' की पम्प झावान् कालापन हते कि, सुगाफार्म प्रमाणार्म के माप को विस्ति है। मतपण मन्बोचारपूर्वक दी सुमादाफार्म करना चाहिए । निगमत्रोताम्' माग उपरित होने पर मन (नामागे का प्राप र पदियों से पूर्व परिधियों में पश्चिममा बामपार से बेरिके पति में --पति' प्रवेश माना गमा) के नाभिमुल समारोपाठा बहो सका शेर - मो भाषम' समाति (-प्रापौर वि) गोता प्रस्मुर में भाप्नील- मनोर र पावि भ प्रयोग करता है। पुन मणयुनोगा कोस बना र-पमियो पर मका पारण करता है। प्रत्एम में होता- क्यामरे इस माहतिका उम्पारण प्रवा। नयन्ति में मन को प्रामुक नाग हुमा 'चोपर इस सरकारात्मिका माति के उम्पारन के वाप नाप स्क्ति माम्म तृतीनाथ की माहुति देता है। नगा आपन तर भावावर कर्म की पी चिमता का स्पीभम परते ए एमवार (१) मम्मितिति एगाराफ्न प्रयायत सन्निधे । नौ ।।१५। (९) प्रवक्तीमिपके सुपापादाब, मक्किम, मागरम भार-समियो को ति' का मौ ॥२।१७ । इवि-सूत्रानुगतपतिसमर (1) -- ~ --- पगपाय १२५ - -प्रशानिकविवेपना- १- गादापनफम्र्मोपपचि अध्ययुक्त परण काम में घुस हात स्वस्स्पयनाप- कर्मानन्धर-अमिता पस्यमहोत्रम् -इस्पादि माझप्पपठिस गावापन कम्म फा पाठ करता है। परणफम्म से पृस या ममुप्प होघा भपन स्यामाविक-मोत्पासिक-माइम सिट भनृत माय से प्रयापराप का मदम पात्र । भसावधानी पर 4ठना मनुप्यत्वन इराका स्पभाय है। यशफम्म पह प्राकृतिक काम, दिमम हो जानपारी पोड़ी भी अमावधानी यशस्वरूप विस्तार देखा ह फलस्वरूप "मनक यज्ञ पनिष्टमनक पन सफता है। हम अनिम्मनकवायत्तक मानुपदोपक निराकरण क लिप याद मनुप्प दोवा अपन हात्र कर्म का उत्तरदायिस्य मन्य राफि द्वारा प्राकृतिक प्राणा स्मक दिग्यामि पर ही राष्ट गा है। प्राकृतिक विम्यामिसक्षण दिश्यहोता को सत्य पनासा हुया यह कहना है कि, "मैं इस यन फा होता नहीं है। हम तो दिपाम्नि है। मो वास्तविक शेवा है, वही अपन मात्रकम्मे का इतिकत्तव्यता का ध्यान बन्न। मुझसे दो मसायधानी होगी पद उन्हीं की अमावधानी मानी गापगी। सोफिककाम हो, अथवा पविफ (शास्त्रीय ) कम्म, पानक पिये प्रेरणा पम दम माविक प्रामदेवताओं से मिलता है। होता सन मुख हे प्राणप वामां की प्रेरणा से हम करते सम एम-प्राकृतिक वा प्रेरणा सेगी। परन्तु मागमाया क पन्धन स भइन्वाभिमान हमें दावा है। हम यह मान पेठत है कि दम दी सप अमर रह हैं सपफि तस्सव - Tणस्य पुरशीचरमध्यराका सिद्धान्तानुसार सन माइतिक शक्ति भागे हमारी स्पसन्य सत्ता का पुष मी मुन्य नही है। फनापि पयन इदिग्धितेन पपानियुका रिम, तमा परामि* अमुमार रयापरिटन्न दिम्पप्रामशकिपन मन्तामी फी प्ररणा से दी हमारा मम्पूम कम्मपसाप समाधित है। जोम्पति अपन पम्मा म साथ पमाण मूर्ति इस अन्वामो का सामी बनाप रहता है मिश्ययन इस भाम्पास्मिक मायना मात्र से रमका फम्म मानुएमाव से प्रपर रहता हुआ सफल हा भावा। यही मारलीय भक्तिकाण्ट का सुप्रमिद 'मारमममपम सभण महिपाग है मिमा अनुगामी मक सरा शिद्वन्त बन गए हैं। टीकासर पिपरीन अन्तर्यामी की मर शमांग विम्यप्रामानिया की सभा मा ममुप्य अपमे पठ का भमि - - । मान परते पकी में प्रात रोवे है अपश्यमेव नसे प्रशालामा फारम्वरूप जना कर्म बपून गवा मा बनिएमनक बम माना। किक मम्मों में ममुग्ण अपनी शक्ति के भरोसे पर भी यदि प्राप्त करके। परन्तु न कि मम्मी की समता-पो निमम मिलना प्राकृतिक कठों को सराई -न प्रानि प्रामदेवताको पास्मसमपण से ही सम्भव है। किस कम्मों में यहां पानविय कर रेवा है, यहाँ बलोकित पैविक परोध कामों में हमारी पाटी बम मतएव इनके सम्बन्ध में हमारा शक्त्पमिमान सवा निरर्थक ही बिरोबार है। अतएव मावा कि हम अपने वाहात्मक वैदिक कामाचा भार पनि प्रापदेवतामों पर ही हैं। अवश्य ही इस यात्मसमर्पन से हमारा दिन कर्म बिना किसी विश्वापारे साजोपाल सम्पन्न हो बाचगा। एमात्र ली मावना को म्पत करने के किनेही, मावना पराखाधिमान निराकरण पूरा प्रा प्राप्ति के मिनीषा प्रवाई कि-बोगा अनि पो गर्मो माने। इसी मावना का सारव करते मुरिहाई-बम्मिगि वा तु इत्येवेतबार। मन्त्र का अगला माग-प्राषिश्न । बमुख होम की सा सेही मास्वरूपसिरि सम्मन है। अत प्रमम बनाने की समस्या समोर है। म्सी के लिये भनिहोना लिने पर भा गया है। मनुफेन रोष सम्मानन्धर पुप्सरा सन्न गाहै। इसके नि मी सी प्रामाग्निको साथी बनाना भाषनको। बाप ही पा से पवित्र कर्म का वरदापित भी भम्नि मपश्य ही प्रण करगे। निन्ध पातकचनम् असामान्ममा पिम्मान मादा से परिणत है, महा पुष्पाविराबबनक- सत्कर्म (प-पो-बानापि सामीपकम्म, बापूर्व-पत्तागि मौखिक पर्म) पिम्पप्राचनलागो बन्तव माने गये है। पवित्रतम मापदेवता समावीप पवित्रस्म कम्मोही साथी पवा करते हैं। मामुर अपवित्र कम्मों के सिमे वहाँ भासुर-मकिन प्राणों से प्रेरणा बल मिडवा पहा रिम्प-पवित्र कम्मों के मि पिम्म पवित्र मानों से प्रेरणा मिलती है। इस पह से भम्म मोर कौन सा कर्म बलिरावस्पेन रिम्प, एवं पवित्र कम होगा, जिसके मापार पर प्रजापति का पवित्राम सक्षिक प्रति है, प्रजापति में प्रमा का जीवन मुरधितो। शामभुक अपने प्रधान म.पम्मम दो अवसयों से अन्य पवित्र कर्मों की तुष्टना में विशप रूप से पषित्र बना हुमा है। मग्नि और सोम दोनों सत्वों क रासायनिक सम्मिमण से उत्पन्न उमया स्मक अपूर्व माप ही प्यम है। भग्नि की पवित्रता सोक में मी प्रत्यक्षो। दूपिन मलिन-मनुरि-माषों को नष्टर एना भम्नि का मुख्य काम है। इसी आधार पर दो पात्रादि की भमुचि भग्निताप से गोफ में दूर की बाती है। अबतक गरीर में अग्निदेवता परमया या पल्पीति' (प्रम्वसित रते है, मी तक अध्यास्मसंस्था (भारमयुक्त शरीर ) पवित्र गता है। मग्निरेब के गतकान्त होते दीपासुर मसीय पारुममाण का प्रमुख दो माता के फलस्वरूप शपथरीर सबंधा अशुषि-मुसिग धयुक्त पन जाता है। मग्नि का पद पायक पर्म दापसोमाहुवि पर दी निमर है। अब तक दामसोम राइक अग्नि में बाहुत हावा यवाद, वमीवक मनादाम्नि प्रममित यवा है। अतएव पवित्र धर्म का मूल प्रवर्तक पारमेप्थ्य भम्भ' मामक सोमवात ही माना गया पिसका पवित्र पिक्स प्राणसते.' इत्यादि हरमन्त्र से विश्लपन हुमा है। पवित्र अग्नि, अग्निस्वरूप रमक पवित्र समनपति-मम्म-मामक पारमेप्ठ्य मोम, रोनों पवित्र वस्त्रों के समन्वित रूप का ही नाम पूग कयनानुसार या है। जिसका स्पस्प मित्र के सम्मेष्ठ यो पवित्र वस्यों के सम्मिश्रण से निप्पम हुआ दो से (पा को) हम मन्य पवित्र वस्पों की अपेक्षा माश्य ही पविशय रूप से पवित्र कर सकते है। इसीसिपे वो भेष्ठकम्मे परिगणना में इसे- पदो बेमेष्ठतम कर्म इन्यादि हपसे भेष्ठतम बसाया माता है। यह की पदी अग्नि-मोममपी-रमयपम्मास्मिका मविशय पवित्रता सूचित करन सिये मुवि ने इसे पावित्र' (प्रकण अपति) पारे। प्रापित्र शाप से पपपि प्रकट में मा धर्म ही अभिप्रेत है। पापि रमात्मक पापकर्म कि पवित्रतम हैभवण्य प्रमापात परम्परपा प्रावित्र से यह पनिावम धर्म का भी विज्ञापण कर दिया गया है। भम्नीपोमात्मक यम की अग्निसोमास्मिका पवित्रता ही रमासम्म का प्रधान निमित्त पनवी है। एकमात्र इसी भापार पर प्रावित्र से पवित्रतम रूप फसिताम मी निकासा मा सम्वाहै। प्रासम्म पाम वो पा का सष्ट की है। भाप्यात्मिक, भाभिमोतिफ, बाधि रेषिक धीनों ही सस्पाभों की रक्षा मानीसामास्मक पद पर निर्भर है। ममा रानात्मक यक्ष माध्यास्मिक संस्था का राम, भाषानषिसगझिपास्मक पक्ष सप . भाभिमौतिक संस्था का रामक है, एमं पारमेप्ठ्य सोमाहुत्यास्मक पा माफिीविक मौरसंस्था का स्वरूपरमक है। सर्वरमहा दी यन का बन्परामकापेझया प्रश्न मा पम्म रे-भतपष पद प्रावित है। प्राषित्रया का पचानुम्प स्वरूप मान दी दोत्रकम्म-सफम्पया का मूल है। भप्तमष मनुप्ठय अग्निकम्मात्मक होत्रकर्म परिमान के माप साय पक्षासहप परिमान भी भावश्यक रूप से अपमित हो खासा है। मतपय दोत्रम्म माम साय बेतु प्रापिप्रम् से यहफर्म की भोर मी टिम्याग्नि का म्यान माकर्पित किया गया है। पथकानुगता इसी मावना का स्पष्टीकरण करते हुर भुति ने मारे- यो वै प्रावित्रम् । पैतु यममिस्येवैतवाद । समय पाप निष्कप यही है कि मेरा । (मानुप होता का ) होत्रकर्म, क्या तारा मम्पन्न होने पाठा यमकम्म दोनों के प्राणाग्निदेव साधी मने रें। नदी से इन योनी की सफलता क लिए प्ररणापस मिसता रहे। मन्त्र का भगमा माग - साधु ते गजमान देवता' (पोऽम्नि दोगरम पूषा)। देवपासामुसहप्राप्त्यनन्तर होता का माप धारमविपास दो नावारे विषय नियमन यजमान का पाकर्म निर्विन सुसम्पन्न हो मायगा। अपने इसी मारममाम फा कर पमान + प्रति इन शमों में प्रकट कर गारे कि- परमान । सुमने किमी सामान्य व्यक्ति का होत्रम्म मिये पण नहीं किया है। मपितु मर म्याम से तुमने उस रिम्यप्राणाग्नि का हाय काम के लिये परण किया है मिसक अनुपद प्राप्त हो जानपर भवाग्मय परकम सफल हो गामा परता। सुमने मिस मनिस्वना का बाप्रय रियारे तुम्हारे व भग्निदेयवा सहाय फर्म सिय साधु, पूणे समय है। यह तुम्हारा सौभाम्प है कि, अग्नि जस प्रप्ट सपा का दुई सहयाग मिस रहा है। स्वामाविक पत्रपति के साथ साथ ही इम पिदयपण से भूति सतरूपण दम पर छोकरिमा भी दे रही है कि, दमे अपने मौकिक मम्मों में ही सामागियों का सहयोग सना पाहिये, मो सर्य भी प्रम कम्म म पि रम्पते माप ही समर्म उसे सफल बनाने की योग्यता भी। स पाय-प्रामामिप-समय-मापागियांक मिय ठोक में भी यही सूछि म्यास nts- उनका काम्प भवाय सम्म हो आपणा पोधि भमुफ माम्म सामागिर पति ने उसका मार डा टियारे । प्राय में दावा-सापुर श्यारि मन्दाग यममान को धर्मनिष्ण का ही प्ररणाबप्ठ प्रदान कर पाई। + पुगणाम यन्नमान का नामविनास मी सा या सफलता के अन्यान्य कारणों में से एफ अन्यमम कारण है। इसी मापना फा स्पीकरण करमी हुइ भूमि हसी रे- माधु से यजमान दवता यस्य तऽग्निहोना इस्पदेसदाइ । मन्त्र का अगला भाग -- पनपतीमम्पर्यो घमास्पस्त्र । यह वाक्य भपर्यु को सत्य यना कर कहा जाता है। अप्पिक मनुप्राह प्राप्ति का भय है- अमि देवसा का यासीमा में प्रमिष्ट दा साना ! हाम फर्म को आप क्ष्य पात्र या का एश्य यनाय, यवमान । हुम्दाग यह कार्य सफल हुमा समझा, जहाँ अ िमसे दाता न भनुमा फर दिया' उम भावना को व्यक्त करन पाल निगर मन्त्र भाग में अषयमन प्राणानि पामणाल में प्रविष्ट हो जाता। आगत भनिदूध की परिचा ठमी म्यवहारमम्पावा को माति आवश्यफ है, उस धागध सम्मान्य अतिथि का वायदानादि से पम्मान किया करते है। भनिदष की परिसृप्ति स सम्पन्ध ररन यानी बाध्याहुति है। यह भातिकम्म भषय से सम्बन्ध रस्मना है। अतण्व अनुमड प्राप्न्यानर हावा का पह मी भावश्यक कतथ्य जाता है कि, पद मागत सम्मान्य अतिथि स्वागत से मम्बन्ध रयन या भाम्यामि फर्म की मार बाहुतिप्रगता अप्पर्य फा प्यान आकापत फर द। एफनाय मी ममिप्राप से 'अप्पर्यो । श्राप पृतवती का प्रण कर (क्याकि आहुति प्राइक मग्निदेव पपार पाए हैं) पर प्रेरणागक मन्य भाग प्रयुक्त हुआ है पिमफा तापम्प-तप्वयु' प्रसौति दम प्राग्रम पवन से स्पष्ट हुआ है। पद्धतिप्रकरण में यह कहा जा चुका है कि दावा मुन्म से पूर्वषताम' म्पादवि के उचरित होते ही मम्प छा पाने मामफ दाना यषों को बाहुति के लिए हाय में 8 सतारे। प्रदंग दावा है उपत होना का। परन्तु वा दारा प्राण की प्रेरणा पानी :-कपर एक (घर) सफपीरी। एमा पयों ?। मम परति में पानी का पक्षण विदित है, सो मन्त्रमाग में भी पृथवत्यो सपो इटारि प स विषयम का ही प्रयोग होना पाहिए या इमी विप्रविपत्तिका निराकरण फरसाई भुति परती है कि-११)-निदानविपा के भनुमार र मामक ग्र पधमानापानीया है उपस नामफ मन पममान ८ शत्रु पी प्रतिकृति है। इसी असिरित जा मचा की प्रतिकृति वा पम्म पाप (भाग्य) की। प्रेमी स्थिति में पदि दाना उपमतावास्यम्ब' यादिकप से विषपान का प्रयाग करेगा । - तो यजमान का शत्रु पममान के पिये प्रतिस्पर्दा रनेवाला पन बारगा। इसके अतिरिठ मोग्य सम्पचि भी मोठा यवमान के लिये प्रतिकूल बन जायगी। भावनास्मिका पाहप्रक्रियामों का फळापस एकमात्र मावना पर ही अवम्बित है। एवं इन भावनाओं के मूसाधार उसी प्रकार पाविमौविक पक्षिय दम्म है, मैसेकि उपासनाकाग में प्पास्म प्राप्ति के रिये उपास्म के पविचित सममम्मों से सम इम्ति माधिमौविक पापों में बाहाारोपपिपा से उपास्य की कम्पना की माती है। इसी पाहाय्यारोपविमा के श्रापार पर उपमृत् को रानुभाषना से, एवं भोम्पमाषमा से युक्त समझा जाता है। मो यसमान भावना से, या मोक्ता मावना से युक्त मान सिपा जाता है। परन् को शुरू की तुम्ना में रखना राव को समान पम्यापी बनाना है, मोग्ब को प्रतिकूल बनाना है। पर मानना पबमान के लिये भनिएर बमती है। अव पकवचन का ही प्रयोग किया जाता है। प्राण होता पोनों का, प्रेरणा मिण्वीरे एक के प्राण की। पही-भसस्पे मर्मनि स्थित्वा तत. सर्व समीर' सक्षण माझाारोपमा प्रत्ययासम्बनता सेविसका गीताविहानमाध्यान्तर्गत तृतीय क्षण के विभागास्मक उपास मोत्तर सण-उपासनामेदनिर्मचम नामक प्रकरण में निम्तार से विश्लेपम माहै। इसी भावना को म्पत्त परती भुति करती है-'तस्मादेवामि बबाह III मन्त्र का भगग भाग -पेषमुना विश्वबाराम्' । मप्पास्म गत प्राण तामों का भाधिभौतिक क्तसम पदायों के माध्यम से वाश्दैिविक प्राणरेपवाबों के साप पिविण्पण मन्ताम सम्बन्म करा देना ही बाका फमिवाब होतूकतक निगद पाठ से प्राणाग्मि का पामगार में समायरा वो हो गया है। परन्तु अभीतक इनका पम्मान के भाप्पास्मिक प्रापदेवताओं के साथ मन्धि पन्धन सम्बम्प नहीं माहै। यह काम मप्पस्था पापिमौविकी बाम्पति १ पूरा करती है। र नामक प्रपात्री मी मापिमौतिक पदार्थ है, माहुति के लिग सा में प्रतिष्ठित माम्पमात्रा मी प्राभिमौविक ही है। इन रोनों बाधि मोतिक इम्पो पर पाकर्ता यबमान का सत्व, ममत्त है। दोनों पर यममाम की मुतारमसत्ता भारान्तरे प्रिम विचानुगता मास्मसचाम्पेि-यावश्चि नावारमा या मिद्धान्त स्पापित हुमा है। निष्पत आम्पपूस सार में पत्रमाम के प्रामदेवता प्रविपित है। पर माहवनीय पुगस्य मेमिट् अग्नि में पुगेक मुगवामन से मागत वापिषिक प्राणाग्नि प्रतिष्ठित हैं। इनमें भाम्याहुति दोगी है। परिणाम यह होता है कि, भाम्पानुगत पलमान के प्राणदेवतामों का आम्पाहुति द्वारा माननीयस्प प्राणाग्नि के साथ प्रन्थिमन्पन हो जाता है। इस प्रकार माम्यपूर्ण च यजमान प्राण का प्राकृतिक प्राणदेवताओं के साथ योग करानेवारी पन ही है। यही देवपुषा रूप पहिला धर्म है। यभ्ययावत् (१) प्रामदेषवाओं के द्वारा पर सर (भाम्प सम्बन्प से ) बरणीय है। समी प्रामदेव इसकी इच्छा. रखते हैं। देवप्रिया, रेषयुवा, छा वास्तव में पत्रकाओं के लिये स्तुत्या , प्रशंसनीया है। मन्त्रमाग द्वारा बडू के रक दोनों पम्मों का विश्लेषण हुमा है, साप ही इस की स्तुति, एव प्रशंसा हुई है। सर्वत्र चैतन्य का साक्षात्कार करन पासी मूपिष्टि के लिए छडू की स्तुति प्रशंसा अपपमेष वत्त्वविज्ञान सम्मत है। मन्त्र का भगमा भाग नाम देवा ॥ ईडन्याम्, नमस्याम नमस्पाम्, यजाम पक्षियान्" । म्पोविम्मय वस्व ही देवता है। यह म्पोतिर्भाग प्रपिषी, अन्तरिम यो, इन दीन छोकों के भेद से तीन स्थानों में विभक्त होता हुआ विमिन्न वीन नाम रूप-गुण-कम्मों में परिणत हो याहै। वीनों में मूख्वस्त्र गुटोप सौरप्राणदि देवतव ही है। सौरम्पोतिर्माग (प्रकाश) पर्वप्रथम मन्तरिक्ष सोकोपासमिस सौम्पचान्द्रपिण में मुक्त होता है। चान्द्रमसी म्योति बस्तुगस्पा मारू सोरी म्योति दी है। द्वितीयस्थान प्रधिषी लोक। पहा भाकर भूतमाग भात्यन्तिक भावरण से सौरम्पोविका सम्पोविर्माग, तपा चान्द्र म्पोवि का परम्पोतिर्माग दोनों अभिभूत हो जाते । भवएष पार्थिवीम्योति यस कपम्पोति प्रसाई है। स्पयोति में (पापिंथी म्योति में ) स पापिष पापालिका समावेश है बोकि-पानर नाम से प्रसिद्ध है, जिसे कि यह संदिवाने विरारपुरप' या मिससे कि, "पुरुप-मच-गौ भरि जम' इन पांच पक्षियपामों का स्वरूप निर्माण हुमायो कि पुरुप (मनुप्य) पशु में अपनी पूरी मात्रा से विकसित है। पही वानरनि भूतामिमय से मासस सम्प माम है। अतएर पग्मोरयासरे इत्यादि रूप से इस पार्थिव पग्नि को रममग माम से मी म्पयात मिया माताहै। इमामृगामि की सहयोगिनी सपम्पोति मर राणों में पापियाणाप्रियुक्त रिम्पपूल म्योतिर्भाग ही पापिपरपवा है। मान्तरिय पाम्मामापछि विगुद म्पोतिम्पप भाग तिपय माते हैं साप ही यज्ञ में भन्यामछ प्रमाध्यवहारों में भी उनका विरोप उप पोग नहीं होता। मनुप्य यदि यक्षिय वो किंपुरुप भयशिय है। एवमेव अप, गौ, पनि, अज, पारों यशियप्रशाभों के प्रतिकूल क्रमरा गौर गवय न्द्र रारम पे पार जयनिय प्रजा है। परमेव बना, पगपा, परपावा, या प्रजात्रयी भी प्रमा रविना बरयायमीपु २ मनुसार पराभूता है, यह नन्यामता है। मापादि भापभियो मयभिप है। इन भयधिय, अतपद पराभूत पदार्थों के अतिरिक्त जितने भी स्थिर पर यझिय पदाप है छ सगरमी से रुन सप का प्रहण हो जाता है। इस प्रकार म मानब सग से भश्मास यझिय पक्षुओं का यत्रिय देयसर्ग से पियमादि पमियों का मीदि पवादि भौषधियों का पलाश फार्म- पारि बनस्पतियों का भोर मोर भी जिवन पशिय पार्थ पाते हैं, उन सप का प्राण हो पाता है। इस प्रकार-जायमानो जायते सम्मो पताभ्यो पव पताम्य निगमामुमार यबयापम् यपिय पदापों का यह से प्राण हो जावा है। फमत पत्र का इसकामघुपत्य सस्मिना परिताप हो जाता है। पही पनकी पा महामहीयता अप्ठतम कर्मस्वरे मिसे सस्य बनाते हुए पानिक सोग इस में प्रातभा करते हैं। शिमन यज्ञ का अनुगमन किया है मय पुष मिन भी गया माथी उन का पगमप भी म हुमा। गिनोन पा का निरस्कार किया इनकी मचा दी सहित दो गई॥४॥ पन पद्धति में पिरित प्रस्पेक भाभिमौनिक फर्म से पममान के मामुपारमा पाईन पार पसाविशय पान किया जाता है। यज्ञकम्मममष्टि से पर यशा निराप मांगीण बनता हुभा यजमान 'मानुपारमा साप मम्माम ममाम्प करता हुआ उम आपिविक फसामुगामी पमाता है। पही यतातिशय देवारमा पहनाया जिम का साप पिपण पूर्व प्रामणों में भमक्या दो कारे। मता सम्मदिरापों से इस यतानिरायरमण देवारमा में सत्तन शारीर स्वपारादि भरपारी बापित सि जाते हैं। प्रम दावा है कि, मप प्पान्यात्मक इम य गापापन कम्मर (मिन नौ म्यादनिया न ममानुपार में भी पल्प फिया मा गुप) मा में कौन से शारीगरपर स्थापित किया हासे?।की पणिसामी प्रश्न का ममापान र गही है। हमारी भप्यारमसंम्पा फे पाच भानिए शरिभाग में उप्प, भाव भर से मोर पाथिप पाजाति प्राण - । - घुगमन प्रतिष्ठित है। मोर प्राण का केन्द्र प्रधरन्त्र है पार्थिव भपान प्राण का केन्द्रमा पन्थि है। अमरन्ध्र में प्रतिष्ठित मौर प्राण गमावस्थापन है। इससे अई मप जो सात पवान्तर प्राण निकम है, वही माकज (माय रहने वाले ) प्मन शीपण्य प्राण पदमाए हैं। दो मात्रप्राम दो पनुप्राण, दो नामाप्राण, मक मुखप्राण, इस प्रकार सातों में प्राण तो पमप्राप्प , बोड़ल सासवा मन्यप्राण पकाकी है। इसी प्रकार असमन्धि में प्रतिष्ठित पार्मिष षपान प्राण परे। इस से निपने पाले मर्मत्मक प्राण दो भागों में विभक्त हैं। ये ही कमरा भपस्व प्राण गुरुपाम नामक भवाध प्राण + । सम्भय वारे भवान्तर नो प्राण हा माते हैं। पगादापन निगर में पठिन नौ ज्यादतियों से निगइमन्त्रमागानुगता पम्पा मम्पन के समसुमन से पारमा में मप्तशार्पण्य मोर माण दो माग पानिवप्राण इन नौ पाणों का दो मापान होता है। क्यों नौ ग्याहतियां होती ११ प्रमी पही समिम पपत्ति ॥५॥ - इति-स गादापनकपिपत्ति २-यापाषण प्रत्याभावणम्मापपति होतात यगाद पन सम्म अनन्मा अप्पर्यु मानो रासा प्रया भावि मुस्यि के महमोग से भाप्रावण प्रस्पामादम कम्म की तिफत्तव्यमा मम्पन्न होती है। एक वानिकी भाध्यापिका द्वारा मी कम्म की सपत्ति का ( 1 टी पणिया मे) स्पीकरण हुभा । पमन्त प्रीप्म-अप शरत मन्सगिगिर- (इमन्नगिशिरया समासन ) इन पाच मनुआ का सहप पानीपोमारमा माना * माझाना मणयमादरकर्म परिषमा मृपया मजा इति । सपामिप्रानि विदिनानि पामरा स्पाने रमन्त वितानि स्परा ॥

r -- गया। अमिसाम माम निप्राम (पहाव-उतार ) से ही पचर्तु का स्वरूप सम्पन्न हुआ। बनीपोममयी पर्चाि भूतुमों की ममष्ठि ही सम्पत्सरशी पार पाहो मिसके द्वारा सम्यफेनस्प हिरण्यगर्भ प्रजापसि रोदमी पैसोध में प्रतिटिस पर अपर प्रमा का स्वरूप निर्माण किया करसे है। इस मामापता- मनीपाममया यमात्रा का प्रमासर्ग से प्रविधण विन सन हुआ करता है। प्रजा स्वरूप निर्माण में साम्पत्मरिक भनि-साम मात्रामों का सपान कारपवारे सम्बन्ध मे सच दाना मनिवार्म है। पड़ी व्ययभाव 'विन सन पालामा इसी विग्न एन को एस्य में पभा कर यह मा गासकता है कि सौरमण्डलस्म विमरवमाभों का अमीषाममय या सौरमणस से भप्रकान्त हो गया। वात्सा, पाधिष प्रशामर्ग निर्माण के सिप सौर ऐनया की अपक्रान्ति स्वाभाविक या मनापकान्ति नियतापक्रान्ति, पनियतापक्रान्सि, भर से दो मागों में विमत मानी मा मती है। सौरसम्पस्सरमण्यसाबपिम्न ग्याविर्मागरी अपीमोमामक । प्रत्याप्ट सोर प्रकारा दी इम मन का बाम शरीर है। पाहक पनि म दाम पार मेप्टय सोम माहुत होगा। इमी सोमाहुवि प्रक्रिया से इम रमयात्मक पक्ष का बाप मम्पन्न हुमारे। इसी पा से (मोमाहुति से) व पासिपा गितमा पप इत्यादि वर्णनानुसार प्रकाश का जन्म हुमा है। प्रकाश में अग्नि माम दोनाका समन्वय है, मग अवश्य ही सौर प्रकाश मणस को पाया जा सकता है। चा सौर म्पोतिर्भाग सपत्र (ोकाकोक- पर्यन्स ) म्याप्त यता हुमा इमार पिण की मोर मी मा यारे। भूपिण पिफम्म (प्यास ) की उमय परिधियों से सम्बन्म रखनेवासा सौर ज्याविर्माग पन शर से ध्यान हुमा है। भूपिण्ड-परिधि को काटकर पस (प्रकारा) मूपिण से भाग नि बावा है। इसी सौर प्रकाश वियोग से सरिस नामक पायामम-तमामय राहू का जन्म हुमा है। मूपिण की भोर सोरमास स निपत रूप से भार अपमा निमवाकार मनाने वाले या की पप कान्ति दी निपनापशान्ति मानी जापगी। पर इस नियमापकात हप काही माम प्रमोदन है निमसे किसी भी पार्थिव पदार्य की उत्पत्ति सम्मब नही। "मी नियवापाक्रान्त यज्ञ से मम्मस्सर का स्वरूप निप्पन्न हमा है। जिसकी कानोग्यादि उपनिषदा म भइस' प से स्तुति है। सौर प्रकाश पाता है, 1 टीमल + मुगमन १४१ भूपिण्ड से टकराकर पापम सोट मावा है। दूसरे शब्दों में पान पाता, मूपिण्ड से सस्पष्ट होकर वापस लौट जाता है। रापस गोटे टुप प्रकाराष्टमण इस यम का भाकार भूम्यामा (२) से समतुलित है। सूचीमुमा राष्ट्र क भाकार से समतुग्मित भूपृष्ठ से सूर्य पम्पन्त म्याप्त (वापस मोटकर म्यान दान पाला) सौर प्रकार की परमश्व', जिसका पपा मस्तक माना गया है। इस नियमापकान्ति से सम्बद पुनर्गमन से सम्पन्प रखने वाला यहारमा धव, किंवा मबारमक पात्र मन पाल्पान में भभिप्रेत नाहै। अपितु यहां अनियतापक्रान्ति से सम्प रखने वाले यज्ञ का ही प्राण हुमारें। निपसापकान्त-पुनयत रिपर प्रौदनमण (सूम्प के स्वमाग्य एमण ) सम्प सरपन से यममात्रा का विस सन होता गया है जिसका पापोत्सर्ग से प्रत्यक्ष किंपा गा सकता है। सूर्य मस्त हो जाता है फिर मी इषों में गर्मी बनी रहती है। यह गर्मी (भनि मिमक गम में अग्नि स्वरुपरमक सोम भी प्रतिष्ठित है) विपन्द्रा पर यज्ञमात्रा मिसे प्रबम्प (स्टि) छा गया है। विटा-अहिर मम्' इस आपण सिद्धान्तानुसार इस विमान प्रपम्प माग से ही पार्थिव प्रमा की स्वस्म निप्पत्ति होती है। पाविध पान परिप्रमण के अनुसार-उचा मृत निरोपों में प्राक्त तत्वपक्षमात्रामों के प्रवर्पमाग से सत्तरिसेप पार्थिव पदार्य म्पस हुवा करते है। बम यो प्रबर्म्यभाग सत्ततिसेपमावोत्पत्ति में तत्ततममपविरोपों से सम्बन्ध रखता है वही उस सौराक्ष की भनियतापक्रान्ति है। पं प्राम पापायिका में भनियतापक्रान्तिमपण मी प्रबग्य पद का प्रण हुमा है। अपना कौथिए यदि प्राकृतिक सौर सम्मम्मर यन्न की मर्ण मात्रा पार्थिपप्रमा- सगे में ही उपयुक्त होगाप तो सम्बत्सरमणम, एवं उसमें गने पोखिम्मस पिम्प देववालों की म्या पशा हो । प्रपना पही पर रंगी पि, पम विष्ट सन से वो पफ दिन पा समप भासमताकि सम्बस्सर का ही सरदानाय । मानना पड़गा कि मपश्य ही विषमभागको प्रविधि भी मी अनुपाव से दाती पसी है। परिसौर पदाप पापियसग निर्माण में मचहावे यवे, दो-त. प्रदानाप-(रेरा नपजीवन्ति) इस्पारि मौत सिद्धान्तानुसार पानिए पदायों विमत माग गमन से पर कमी पूरी भी हारी यी है। परि पपिसी मे वावी, तोपर मी पथिली को बाता रहता है। परसरानुगत पबारान महान, श्रमामाइमाव ही वोमसोग किंवा सरस्पर प्रविश बम हारे। ।

सौरेषताओं के स्वरूपम्पक या की प्रवर्प द्वारा भपश्नन्ति समश्य होती यी है। परन्तु सपि नियमानुसार भपकान्त यह पापस मी छोर माया रखा है। प्यो मा पराठि सहदेवमावत् सिट्रान्सानुसार सो हमें देवा है, वही बनत में में बा मी माता है। प्राणामिल्प होता प्राणवायुम्क्षण मम्पर्यु धादिस्पप्राणा त्मक रवावा, पान्द्रसोमास्मकप्रथा, इस्पादि प्राकृतिक देवारमक भूस्तियों के म्यापार से अपकान्त यम पुनः स्वप्रम देवमास की मोर छोट मावा है। इसीसे देख स्वरूप-रामा दो रही है। पझपुनर्गमन ही देवतामों का देवत्व है। इस प्रकार ससससस्परिमति के लिए मुस्लिमों के सहयोग से सम्पत्सरमुक्त प्राणीवता भिषी की अोर मपनन्त पह को वापस पुसा मिपा करते हैं। पुनरागत स पा से पवन पर अपना रमत्त्व मुरमिव रसने में समर्थ हो जाते है। स भाम्पान प्राकृतिक परम प्राकृतिक गमनागमनमाव का ही स्पष्टीकरण पर याद ।।।। महत प प का विवान उस प्राइविक निस्य पद की गिमा पर ही हुमा है। जैसा, बो कम पहा हा सा पदी मब कम पहा फरिपक्ष मैसा कि- रेवाननु पिपा रे मनुष्या' गोवा मयस्वत करवाणि इस्पादि निगम पोसे प्रमाणित है। जिस प्रकार सौरमणमस्व देववर्ग की अपेक्षा से परमात्रा प्रमिषी की भोर भपाहान्त हो रही है एवमेव इम पाधि प्रजाओं को अपेक्षा से पहमात्रा सौरमणड की मोर भपक्रान्त हो रही है। जैसे इन्हें अपने स्मरूपनिर्माण ग्भा के लिए इस भपानन्त पापिन मन की अपेपा , पबमेष में पबमाम के रममाणमय देवास्मा स्वम्पनिम्माण रक्षा के लिए मपाकान्त सौरपा की अपेक्षा है। भामाबप इस्पारि मन्यवाहारा मनुप्पविष हरिवन स अपमान्त दिस्य यशसम्पत का स्प-वैध भौतिक पन में समावेश करने के सिप ही मामावण प्रयाभाषणम्म करते हैं। भवश्य ही इस मन्त्रमा से भपकान्त पिम्पमामात्रा का इस बैप पक्ष में समाग दो गाता है। पाकि, भोमावय' इत्यादिममण गिन म्मातियों का पहा प्रपाग होतारे नस माविक दिम्प पर ही मत्य पन हा है। मामीघ्र को समय बनाकर मप्पई के मुख से निप मोभावप का तासम्म है-देवताओं के लिए पत्र मुनायो । अनि बता इस पहनी भार सस्प में एमी भावना करा। भानीघ्र भस्तुभोपद' से पही म्पक रहा fr देवताभों ने मुन सिया'। जिसका वासम्प यही है कि रेषतामों का । मुगमन १४३ (दवारमक अपहात्त या का) यहां पुनरागमन हो गया। इस प्रकार 'भोभाषय' इन्याकारक भाभाषण दिम्यरेवास्मफया का माहान र गहरे अस्तु भोपद इयाफार प्रत्याभाषणकम्म नमका धागमन सुपित कर रहा है। फतिमार्य पडी निता है कि भा० प्र० कर्म भपक्रान्त दिष्पयन की मानिमिपदी विहित । मन्त्रमावनाहाग आगत मावात्मक देवप्राणमप पान दी इस बैधपा की भूमप्रतिष्ठा है। उमो प्राकृतिक सिम्पसमकाल के आधार पर सम्मान का या या यशातिशयप देवास्मम्पत्ति प्राम करने में ममय होसा है। मृत्तिा सहायक पनते हैं। मृत्तिा मी तमी इम प्रामिकम्म में सहायक बन सकते हैं मा किये इम गायत्त यारत को अपनी माषना में प्रतिष्ठित कर लेते हैं। भूतियों की भावना ही वा मुख्य है। यममान दो सम्भूग उत्तरदायिस्त पनी पर डाल देता है। अतएव पनसम्पम संप्रहम्मक बामावण प्रत्याभायणकम्म में यममान का ममावेश करना मनावश्यक है। मृस्विर ही भावनाद्वारा प्राप्त पापी माप दवा क सिम पर मयम से मम्प्रदायपूर्ण भाभावम-मत्पाभाषण पमा भनुगमन करते हैं। सम्बरसम्प्रजापति स्वय इस मामा कर्म में परोम गाव है। सरपयबभूव वद्रस से परिपुष्ट अम्न्यादि रेवना ही हम कम्म को पनि उत्तम्यता पूरी है। पत प्रमापतिस्थानीय यप्रमान भी यहा (इस कर्म में ) परोन दी रहता है। भम्न्यादि के प्रतिनिधि मुस्विको इम फर्म का मनु गमन करता है। जैसा पहा हा हा वैमा ही यहां दाताई। इमी समीक्रिया भी मार हमारा ध्यान भाकर्षित करते हुए मुनि नछा t-- नोपापचेन रतमा मूतनऽस्पिन सम्प्रदाय परन्ति यजमानन परामम् । मुसियों भावनात्मक मानम गंगा में मप्रकान्म विध्य यममम्पन समाइरा हा गया। गुमाम्म महामहनीय समाण म पनमगवान का भागमन दा गया। जब यह मायापक है कि भपन इम मापनात्मक रिम्पयश दितान ८ मिए मरिसकमाग पारस्परिक मयाग स पार मम्मदान द्वारा बाबमस्व का भाभय त । भायनाम्मा मनाग भव प्राणमन यमका प्राविस्सिा स्वाप है। यह मनागभिन प्राणया मनामिका पाक भाधार पर दी प्रतिष्ठित गवा। इम भार मन है ग्म मार बारे मप में राना स परिगृहीत प्राण है। प्राण पक्ष, मनापार पनाधार है। भवाष मनो । - पर से मनः वा को मा की पत्नी मा बाता है। इम मोर कृत्रिपों की मानना (मन) हेम्स मार मन्त्रप्रयोग (बा) है। दोनों से मप्यस्य माणात्मक पार समीति परिगृहीव हो माता है। यपपि पद का मोहिक स्वस्प माणसपापि एक विशप इस से वार को ही पक्ष का मौलिक रूप मान लिया जाता है। यह विशेष सु यही रे' प्राण विमा मनो वाफ के नहीं राम पर बाद प्राण पाक, पानों का प्रण हो जाता है जमा कि बारामनिपन से सुप्रमा णित है। उभ-भच से मा शम्प मिष्पा हुआ है। कार प्राण का, मकार मन का मारक है। उकार प्रकार ( प्राण-मन ) की सस्वापरया. पिए कामना करने वाला तस्वविशप दी मन' से विध भा है। इस प्रकार पाम् (बाद) से वीमों का समाो पाता है। मनोगभिंत प्राणात्मक पक्ष मपने फेमस मनोमग प्रापरूप से तब सक म्यापार करने में असमर्थ बना यवा सबक किया भूतमयी भाक् को भी मपणी बनी नहीं पना सता है। मूव ही प्राणम्मापार का भारम्पन बनता है। मूवापारेमेव प्राण, स्वबल प्रयोग में समय होता है। मत एष मुक्ति ने मनोमिच प्राणात्मक पज का रस (वसप्रयोगसाधन ) मो पाएको दी माना है एवं परिवरप भी बारमय ही माना है। पास्वरूपसम्पारिका बार में भाभिमोविक मस्यमाग, आधिदेविक ममृतमाग वानों का ममायो । मयां बाप भापार अमवापार है। अमृतापारकर ही विवान होता है। इसी पिवान से मूतयः भूमोफ से पुमोकपर्यन्त, प्रठ से रवन्तर सामपर्यम्त विवत रोता है। मारिधी पाक ममूववागगर्मिता मा पारे। मौकिकम्पपदारमा सन इमी पा से होता है। बोकिली वाफ मत्यमागगर्मिता ममवापारे। रिकाम्ममधामन इमी पाक से हराया है। मां बाप से म्यजनास्मि अनु प्टुप्पार समतुरित है। अमृता पार से पात्त भनुपातादि स्वरामिका एती- नाममनुमित है। भतपत्र दिने मन्यबाक में वत्स्वानुगत स्परा के भनुसार ही पाचारि स्मर्ग का समिोश हुभा है। या तरपान ही फि सामास्मिका बनसी एर यसवितान का कारण बनती है। इमम्मि मी पाहो ही यम पना भन्दर्भ बमना है। वानस्य रे मी यापप्रनिधारमा मात्र रहस्य बनाकर भूमि न पहारेपाटनिया पागु रत. । - मुमनामन १४५ देवाहानरमणा भोभापयेत्यादिस्वरूपा मन्त्रबाक के द्वारा भाग भूस्पिा को भपामन्त यशसम्पत का सम्पादन करना। माहसिक सम्बस्मरपा के सत्रह षषयप माने गप है। अमिक या इस निगमपचन के अनुसार सोमगर्मित ममि ही पन है, मैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है। भूपेन से भारम्मकर भूमहिमा $ १५ पहाणपर्मान्त यह पसाग्नि म्याप्त है। सहयो स्थान ही बाइपनोमणा माना गया है। इसमें प्रतिष्ठित प्राणाग्नि में १५ से २३ पम्पन्त म्याप्त रहने वाले सोम की माहुवि दाती है। यज्ञाम्नि प्रसारित हो पाता है। मम्मलित होकर यह पज्ञाम्नि २१ में महोणपर्यन्त म्पाप्त हो मावा है। २१ वक ग्यास पनाग्नि 56-१५२१-ये वीन विक्रम मान लिये बाते हैं। शिस (E) स्सोमात्मक प्रयम विक्रम पाभिव है, पचपरा (१५) स्वोमात्मक द्वितीय विहम मा परिश्य है, एवं एकनिश (२१) स्तामारमक वृवीय विक्रम दिम्प है। पदी विष्णु है। पही त्रिविक्रम विष्णु है। बकम्य यही है कि, पज्ञाग्नि पपपि भाहुति सम्बन्ध से २१ क (सूर्यतक, क्योंकि-पकविशा पा इस भापित्य' इत्यादि मुति के मनु सार सम्मेसचा भूपिण से २१ भदगम पर ही मानी गा) व्यास हो जावारे क्यापि इसका मौलिक रूप ११ माहगण पर्यन्त दी म्याप्त माना गया है। सप्त पराम्तोमावपिन पानि क १७ महगण ही १० भवया है। ये १० हो बारमय बापन बिमा किसी विपार के परस्पर पकल्पपत सम्तत है। सप्तदशाषयमों के मपिपिपन्न सन्तान माव से सम्पर पहाग्नि काही पहा समह अपक्षित है। भव पप आवश्यक है कि, इतम्तव मिपाव न करते हुए, अन्य भप्रस्तुत पा का प्रयोग मदरते हुए फेवस मन्त्रबाक मण भामाषण, प्रत्याभाषण कर्म करदी भवपान पूर्वक एक दूसरे के प्रति यज्ञमात्रा समर्पित करते हुए पस १७ भपयों का भवि चिन्न रूप से सम्पादन किया जाय। अपिपिपन्न-सन्तान परम्परा से सम्बन्ध रखने वाला समवशावयप रिम्प पर ममिरियम भावात्मक मम्प्रदानपरम्परा से रसी प्रकार परिपूर्ण -समर-सम्मान प्रावा, जैसे कि अपिप्पिन्न सम्मान से सपाय अलपरिपूर्ण हो जाता है। भगवान राम के सिम सतत मठ पारा अपेभिव है। इस फम्म को सवा मनुष्य बनाए रखने के सिप शिवप्रतिमा के सान्निप्प में पास भपया अपंपरा में एक पापाणमप असफोरा (नेस) ममा रिय' गाता है। सम्मिरिम १.- ग्यक्ति भसामाप से उसे मर दिया परते हैं। रमों म्पतिस प्रदेश से बसोपपर्पस्व नियमित रूप से समाते हैं। पूर्व १४६ पम्प पर एक लौकिक पर मृदुपटों को व्यय में रखते हुए तन्मयता से मळ भरना प्रारम्भ कर देते हैं। क दूसरे को क्रम पार मविछिन्नम्प से पट सांपता मावा है। बकाश परिपूर्ण हो पाता है। पारस्परिक अविपिन मम्मदान का मास्वपूर्ण उदाहरण है। भपपा तो--प्पमा पूमपात्र परासियत का यह वात्सम्य भी मगाया जामकता है कि, बलमम पात्र का निरव प्रदेश में मसे शठना है जैसे ही मप्रस्तुत पा से पक्ष की परिपूम सा नष्ट करनी है। सिद काम्ब को विगाहना भोर माभावण-प्रत्याभाषण कम्म में मप्रान्त बाणी का प्रयोग करना ममतुरित है। तान् ही यहाँ भी समोरा-परिपूरक सप्तकरामात्राओं का मषि चिन्नरूप से ही अनुगमन करना पाहिए, यही फसिवार्य है।.॥ ८६१११, इन चार कणिकाओं में सी मविषिम-वासयमानुगव-पार सरिक मम्प्रदान गर्म की इविकचम्पदा का स्पष्टीकरण हुमा हे। १२.१३ १४, इन तीन मणिकामों में सामयाग से सम्बन्प रखने बाई पासपम का प्रासनिक निरूपण हुमा । १५ वी कणिचा में उस बाप का विश्ठपप्प हुमाया मम्परानपाराविपारस पर भप्रस्तुत बाप्रयोग से हुमा करता है। भसापपानी करन से मसे पट विनष्टि, पादयता भादि दोपों के कारण असफोरा नपूर्ण य नावारे पयमा यदि पारस्परिक सम्पदाम में मृत्तिा छाग भन्यमनस्कता, भन्म मसायिक पार का प्रयाग कर गमगे तो पपमन्दान विप्टिम हो जायगी। फमतः पावरप न केवल साहोपा ही न बनगा अपितु सम्मान का महान अनिष्ट मी दा मापगा। अपर इस भम्पपरिबन्ना सम्प्रदानपरम्परा साब पानी से अनुगमम करना चाहिए। यह भरपानता रेषम मानाषण फम्म के मिप ही भावायदो, पर बात नहीं है। अपितु पुरपापेरमण पर कर्म से मम्मन्प रपन बास मोर मोर भी जाप कम हैं इन सब का मी पपारिभि भनन्यमनस्कतास दी अमुगमन करना चाहिए। संच विधि से हमें हमार भोषिक सम्मों क समय में मी अति पर भाररा रे रहो है कि यदि हमें कोई काम करना दस मारमना सा बना देना ,तो मनन्यमाय से उसी फोहमय में रखना पारिपाम भपने प्रतापराप से मनागम्य की परमता अनुमत्र से संकल्पित धर्म साप सापसी मम्पान्य संकल्प भी रिया मरते हैं। पदी बह पपपान रोग सिकारण प्रपमसंकलित धनुगममीय सम्म में मपेभित पारेत (बड) मुनमय नहीं गाने पासा । फसस अधिकांश में हमें निराश ही होना पड़ता है। यो काम पवार साय पर पड़ा लिया परिह अनन्यमनस्कता के साप यायावत अप्रस्तुत माषों का परित्याग करते हुए-सी में भूट जाना चाहिए । भव्यपदासा-माय ही पारस्परिक मम्प्रदानास्मक सहयोगमा ऐकमत्यमावास्मिका (संविदाना ) ऐमी अनन्यमनस्कताही कम्मसिटि अन्यतमहार है मिस का -एवमेव यत्रो मर्च म्य इत्यादि मादेश से विशेषण हुआ। । (६,१०,११,१२,१३,१४,१५) मामावण प्रस्पामावण कर्म से सम्बन्ध रखने वाले निगद मन्य को पांच म्या विपारे। पर्ण, स्वर, पर, वाक्य मद से राध्यामिका पार के पार विवस मान गए है, जैसा कि 'पस्वारि वा परिमिप्ता पदानि' इस्पादि पतरय मुति से प्रमाणिव है। इन्दी चारों माविषों के लिए वन में क्रमश भर (वर्ण), अक्षर (स्वर), म्पादति (प) पुरुप [वाक्या ये शम्य म्पवास हुए हैं। पैस्याकरण मम्प्रदाय म जिसके लिए 'भवणवाक्प्पोट पाक्य म्पपात दुमा है वही वैरिक सम्पय पुरप है। प्रत्येक वाक्य में वर्ण, स्वर पर, मीनों विपत्तों का समा रा यया है। ऐसा कोई भी धारण नहीं हो पाय न माना मासकसा हो। एसा कई मी बाप नही मिसमें वर्ण-स्वर पद का समन्वय न हो। यदि किसी ग्पतिरेक्या देवदत्त यहाँ है? इस प्रश्नोत्तर में इम फेवल न इस एक अमर का प्रयोग करते हैं तो यहा मी कामर पाक्य विधमान है। 'न कार में वण सर पर अनिता है प्रसपव उनकी प्रतीसि नहीं होती। प्रतीति हो रही है- पौधी देवरी पाक की गिस फाइम प्रयोग किया करते हैं-'पुरीयं वाचो मनुष्या पदन्सि । पारों विवों में पर विवादी ठयाहसि है। प्रस्त निगा मन्त्र के कि पाप पर अपम्पाति नाम से म्यवान करना अन्वर्य बनता है यही बचम्प है। दिस्य यह अग्निमय है एब-तस्प पा एतस्याम्ने गदापनिपत (शत० १०॥ २०१०१६) इन्पाति भात मिदान्तानुमार यह मम्नितत्व बारमय है। पारमप बम्निराण या सरूप निर्माण के लिए पचम्पास्यास्मक निगरमन्त्र का माग हुआ है। प्रश्न स्वामाविको कि, राम प्राकृतिक पारमप पत्र मंपदर सिम पषम्यारत्यारमाही पामय मन्त्र क्या पिहिन हुमा । प्रश्न सभनेक रमिकामों से समन्वय किया बासमता है। :-स्म (१) पहिले भान्यात्मिकपा की रष्टि से ही समन्वय कीथिए। अध्यात्म संम्पा की उत्पत्ति अधिदेवतगर्मित अधिभूत से है। अपिषत लमम सर्वदुत पाही सम्पूर्ण विश्व की मप्रविष्ठा है। विश्वजनक यह पा प्राप, भाप, me भन्न, भमाद मद से पपप है। पचपर्वा इस भाभिषिक यह से उत्पन्न भाभिमौतिक विश्वमा कम्बयम्म् (माकारा) परमेष्ठी (वामु ), सम्म (वेज), चन्द्रमा ( जस, प्रथिवी, मे पांच महापारे। इस प्रकार बनक सर्पत मानद तजन्म विश्पयन की मी पचावयषता सहै। इस पचावया विस पाह (माधिभौतिक यह) स समुत्पन्न भध्यात्मसंस्था भास्मा शरीर इन्द्रिपबग, ये वीन विषय है। भारमा महापार रे यही अपसत्य है। इसके मम्मक, महान् विमान, प्रधान भूतात्मा से पाप विषय है। गरीर मूषसस्प है। इस कभियारि पानों पर प्रसिद्ध ही हैं। इन्द्रियबगषसस्प है। इसके भी बा-माण-प-प्रोत्र-मन, ये पांच ही विषय है। इस प्रकार अभिनव पम मविभूतयम वं उमपयन से सम्पन्न अप्पास्मय भास्मा-रारीर--- इन्तिम तीनों रिवर्स ममी प्रहरमा पात बन हुए हैं। प्रकृविवादिकति पम्मा माय से इस बैप पत्र में भी पही प्राकृतिक पक्षपाच्या जमित है। इस माध्यारिमा से भी आ एम में पांच म्यातियों का प्रयोग करना भन्यमापन हा है। - म (२) दूमरी रष्टि से पाक्सा प ममन्वय प्रीमिए। प्रस्तुत पा सोमयाग का माहै। मोमयाग का सौम्म निमाकी से समय। पापि स्वोम्प त्रि मोसी पारा शि विणा अपशि [E-१५-११-२४--२३] म पनि स्तोम मान गापापा में कमरा भनि वायु बारित्प, मास्वरसोम रिकमाम ये पाच रेवता प्रतिष्ठिप है। इनदी पानी से भमरा वा भिग्नि ], प्राण [भायु 18 [मादित्य , मन [ भास्वरसोम मात्र [विमाम इन पाच भाप्यारिमा इन्द्रियरेवताओं का सहप निर्माण हुआ है। पांचों स्तोम्प पवा में भारम्भ के तीम देवता (अग्नि-पापु-मादित्य) स्निप्रपाम है। ००दी भाग्नि को प्रव~-पत्र-पठण (पन-वरम 3-बिर) अबरपाए कमरा: भग्नि, पामु भारिप रे । भन्त रोपवाभादी (रिमाम, मास्वरसोम की) सामता पण दी है। परत पाच मम्मि साम में पर्णवमान सिद्ध हो जाता म.गरपान है। अग्निसोमसमन्वितस्परी पहो। इसके एवं विष पांच अपातरविर्स है। इम पाळ सोमगाग भाभूत (अतएव प्राक्सौमिक' नाम से प्रसिर ) मात के इस इष्टिपस में मी वही सोमपाग के पार धर्म का सम्बन्ध अपमित हो जाता है। एक-पचम्पावि-सम्बन्प से बई अपेक्षाभी सफल होगी। (१) तीसरे एष्टिकोण से समन्वय कीभिए। यह को पूर्व में बाश्मय पठठाया गया है। पामय यशका रेत माइतस्त्र ही है। मून्द्रसे भारम्मका महिमा पम्पस इस पाप फे भवान्तर २३ दिवस ही बाते बोधिस्विराचन्तवो पित स्निरे इस्पारि मन्त्र वर्षमानुमार सन्सुदेवता' ठाएँ है। इन २३ भागमात्मक सन्म देवताओं में ३-श्रहगणारमक तीन ऐपता (अमा-विष्णु इन्)। शेष" गगते हैं। इनके 'स्तूप से पांच विभाग हो । ३५ सौ का कन्द्र-मम्मीपाम का विमानक '१० वा पहाण है। ये की बिमार्गी इस प्रकार एक ही बार के गौरूप मतम १००० विवो 'पहिले ३०-३० गो समन से ३३ सूक्ष्म पिमाग होते हैं, अन्त में द स्पूफ विमांग माने 'लिप गावे हैं। भासी वाद तत्व का पद्माकरण सण वपट्कार है। पार पदकार ही पर्पकार है पदकार मणदीपा का प्राविस्तिक स्वरूपाइमझायो। पार्गमारी अम्नीपोमारमक पापिग पर दी मन्तिम सीमा है। इस वोप हता पपदारया (बागय) की अन्तिम सीमा २ (१) गर्म में कमरा २७ १-१-पे पांच पर्व मतिष्ठित हैं। ठास्वर्पया। पामम्पकाम 4ठेवफ्टकारपर्व से ही सम्बम्प है, जिसके गम में पोच पाहिमित पर इन पांचों पर सभा के लिए भी पांच म्याइदियों का माप अन्पर्षे बन सा है। 'यो मावय' से त्रिवृत्{१), वस्तु मोपट् से पचरा (१५) का, से सप्सरा (१७)का प्ये पसामरे से कविरा का, चौपटू से सप्तर्राि २017 पर्ष समष्टिरूप दबफ्टकार आप प्रतिश (२२) का महण होगाता है। इस प्रकार अनेक रष्टियों से महकी पारण्या का समर्थन किया बासमता पारत पा से उत्पन्न पशुमग मी पुरुष, मश्व, गो, मावि अज, भेद से पांच विवों में ही विमनरे। पासोमपाग से सम्पप रखने वाले सम्वत्सर पासहप भी सम्त, गीष्म, रो, शरत् इमन्त, भेद से पचपळ ही बना 'एमा है। भोराव, पह, तु भयन, सम्वत्सर, मेद से भी सम्मत्सरपक्ष की पात्रता स्त्र १५ पम्पय 1 , है। इसी पाहता के भाभार पर अम्निहोत्र (महोगत्र) पर्शपूण मास (पर। चातुम्मास्य (मृत), पशुपन्म (अयन ), प्रयाग (सम्वत्सर ), इस प्रकार रेप मानुप पान के पांच पर प्रवित्ति है। प्राकृतिक पक्ष की इमी पारक-मम्पात प्रालि के सिम प्राय फम्म 'सम्पादक निगामन्त्र में पांच पाहमियों न समावेश है सपसापक याही प्रमापति है। प्रयापविस्तये सब यदि कि इस निगम के भनुमार यात्मक प्रभापति ही अपने विवस्व माग से सपएम बना हुमा है। इस प्रमापति + स्पिति भेव से बनिरुत गीभ, सर्म, ये वीन विपर्च गाते हैं। पिण भोर पिणमहिमा, प्रत्येक वस्तुवल मै ये दो मुम्य पर्वमाने गए है। पिण पश्य है, पिण्डमहिमा परे। पिण-फेनापष्ठिन्न वस्व भनिरुक प्रमापति? महिमा-कन्द्रापश्चिन्न तत्व एगीय प्रजापति है। एवं मदिम मगसकी रपन्तरसामाश्मिका सप नाम्नी मन्तिम परिपिसे सम्बन्ध रखने मामा तस्प सपनापति है। पिण्डापारण प्रतिष्ठित महिमामण वही पूपिरिचित पप कार मण जिस * ३३ अागण पावलाप गए हैं। वहीं पर मी स्पष्ट किया गया है कि --३. गौ का एक एक पगण होता है। फलतः १० . ३०-३० विभाग से (१०६० में दी)मार्गण पूर्ण हो जाते . १ गौ रोप गावाती है। पहरी अन्तिम चौतीसमा सम्प्रादापत्परपान माना गया है। इमी कहिण चतुस्विरा प्रमापतिः' रागावा। मिस कर्म मे पेन न पप्प ३४ संख्या का समारा हा भापगा पर कर्म सम्या-समतुपनमात्र से सांप्रामा पप सम्पत्तिसपुत सायगा। शिस काम में सर्वमा पशुमाष का समापरा होगा माता सम बनिरहरप (पिणन्द्रावपिन्न) प्रमापति का अमुपार माम दो मापगा। पर जिस सम्म में सतरा (3) संख्या का समन्वय दोगा, पदो सत पर ममतुमित भूगीयममापति' को पग्नियमसम्पत का महण दो गापगा। भगतारमा मदिमामण गरेन्द्र १० को भागण है। यही मारपी मागण इस नपारयप की पाहममृमिरे गिम पुराणपरिमापामुमार रदीप निवामो मस्पनारायण विष्णुमायाता है। १५स बारम्म कर २५ भगम पम्पन्न । पानी की म्यामि में मोम्मातिर्मय मपूर या प्रतिष्ठित ८ पदी नपाइप पनाया है। इस नवापान २१ पो भर्गण। .

सम्ममण पही भगवान धर्मनारायन प्रविपित है। इन्नों के मान्य से यह यहारमा विष्णु सत्यनारायण पलाए है, या पूर्वपतिपारित त्रिविक्रम विष्नु मे पुष मस्त है।, 'क्य वद सत्पमसौ स आविस्प अनुसार सूम्म सत्य की प्रतिमा है। मापामय पारमष्ठ्य समर क यमे में प्रविपित रहने के कारण यही नारायण है। प्रतिमास की पूर्णिमा तिमि में तव पास प्रतप्रक्रियाद्वारा इसी सत्र को भारममान किया रते हैं। १-२१ य तीन भागण कमरा प्रभविम्प् विष्णु विमुप् इन्द्रविण्य , कहलाए। यही विषिष्टप् त्वग है जिसका मन्पत्र मिरादी । रममा है। तीनों में से १५ १ का पापित उस याविशु (त्रिविक्रम बामन विम) से सम्मन्पो मिसी सम्पन प्रक्ल यज्ञ में अपशिव। इसका अन्तिम सीमा कि १७ वा महसम्म है, असपर इस सप्तदशो प्रजापति' इत्यादि रूप सप्सतरश माम से म्याद किया जाता है। भूपृष्ठ से भारम्म कर सत्रदय मरगय पम्मत म्माप्त १७ बरयों से ही इस पहप्रजापति का सम्पनिम्माण हुभा है। पारम्पादतियों से ही यहीप नामक सप्तपराप्रापति पचायम है, बदौ महर्गनात्मक १० मवयों से यह सप्तदशवयव भी पन रहा है। पखावयम संपरागशिरूप इसी यत्रारमा का म्याइवि के सप्तदश अक्षरों से संमस हो वासा है। वही पचण्याइतिसमष्टि १५ अमर्रा की मौसिक उपपति मिसका निम मिस्मिन् स्मार्चवपन मी स्पष्टीकरण कर रहा है चतुर्मिय -चतुभिष -द्वाभ्या-अमिरव च ।।। (शाबा-व-प)----(बस्तु प्रो-पद) (प ) (ये T-म-१) --18-1.)-(१११० १३१४१२) ४- १ ४ हपत प पुनहास्या- तस्मै यसाम्मन नम ॥ नीधप्रयापनय 7 ११-१. - ५ दपम वृष्टिविद्रामम् ( १८, १९ अमिरका)- सप्तदरास्तोमारमक मापनीय प्रदेश ही-जिसे हमने प्राविक भाई- नापित आम्नेय स्वर्ग समाया है। सुप्रसिद्ध स्वग्यामि का-मिमका नरिता द्वारा प्रभ हुभारे वं पम द्वारा इष्टकाचितिरूप से समापान हुमा है-इसी सा- परास्पान से सम्बन्ध है। प्राइमौमिक परमा-समविरूपण सोमयाग से सा मगमापक पास्मा इसी सारा स्थान में प्रतिहित होता है। दूसरे शमों में रममासम्पनुगत सामयागापरपायकम्पोसिष्ठोम से प्राप्तम्य सर्ग सप्तपरा- स्तोमाषटिम पही नापिका स्वर्ग है जिसके रिए कहा गपा है-पपूर्व- मासाभ्यो गकामो ममेकाम्योतिष्टोमेम स्वर्गकामो पगेत । पार्षयमा सप्तर- कमास्मिका स्वामियमणा प्रामापसमम्पत्ति इस रष्टिकोण से बाधिदैनिक सम्मान मानी या सच्ची है, जिस की वापिभौतिक शरीर के निपनानन्तर प्राप्ति होती है। माननीय मन परोमफवारूपण की अपेक्षा प्रत्य मौतिक फसापण की कर मिराप रूप से भापित गरता है। इम की बामष्टि पदिळ सोफिक-फसकामना की अपेक्षा रखती है। सब उसे किसी कर्म के प्रति पर निधास हो जाता है कि मुम ममुरु फम्म से प्रत्यन में भी इसी जीवन में भी कार मोनिक मिस सकता , तो परम कर्म में अपेमाबुद्धिषक प्रवृत्त हो जाता है। पही क्यों माधिभौतिक मापम-साम्यों से मम्पा कर्मकाणाको बधिकारी भी नही माना गया है जिमकी प्रापमिक मत्पभूमि माधिभौविकही बमवी पीठिका में मविष्ठित भो माधिकारी कंपस परोम-भाधिदैविक संपप्राप्ति के लिए कर्म में प्रपत्त रहता है उनका बदम्म ना उपासना विमा हानमोगही बन जाता है। मात्तिसमण सम्मकाण (पाजणा)का सामान्य पिकारी तो प्रस्पेक पगा में माविकणेमोरियल की पश्यमब कामना करेगा। प्रात भाजीवण प्रसा- भाषण सम्म कस मत्सम भौविकास की १८, १९, २०, इन वीन कणिकामों में स्परीण हुभाहै। तापम्य परिष्मासम्म बस पारोमिवाधिदैविक स्मर्गादि फोदीजनक मी, भपितु परोक्षफस साप साप इनसे -मस्वय भौतिक योग-समसंवादापारिस मी प्रात हा खाते हैं। इन प्रत्यय फा को हम म्योतिभाक (पगार-माकारा), मुषनकोप (भूगा- पपिषी) भर सभागों में विमल कर सपते है। हमारी परपावत भौगो माम १५१ कि पापि कामनामों की प्रतिष्ठा मृतु मनुएला व निकामे निकामे न पर्मन्यो अपतु इस्यादि पमुम्मन्तवफ्नानुसार समप समय पर पर्जन्य देवता के ननु मह (म्मापार ) से होने वाली वर्षा ही भोपधि-वनस्पति के रूपादन द्वारा पार्थिव पोग-क्षेम का संचाछन कर रही है। हमारी समस्त ऐलौकिक कामनाओं का, पापिय मौगोरिक कामनामोंका, रेन्द्रीकरण सम्पम परी अवसम्विध है। एवं इस की मूलप्रविष्ठा खगोलीय बर्षा हो। वर्पा प्रकृति का प्रथम प्रस्पन अनुमह , पार्थिव भोपपि-वनस्पति-चम्-पशु विचादि दितीयामुपा है। प्रथमानुपा (वर्मा) मापार पर द्वितीयानुपा प्रतिष्ठित है। १७, १८, इन दो कणिकामों में पहिले लगोसीय प्रयमानुप्रा का, एव २० वीं कणिका में द्वितीय भौगोलिक पार्थिव अनु या विश्छपण करतो हुई मुधि प्रान्त सनों की इस प्रान्ति का भामूला सणन कर दी है, मिस भान्ति में पार कर वे प्रान्त_मनुष्य पर प्रते सुने गए हैं कि, "शामीम कर्मकाण पक्षम्म को मरने क पनात ही फर देते हैं। हमारा पहिला मम मम स है। पर चिन्ता शास्त्रीय कम्मकाण निवृत्त नही हो सकती। मवश्य ही भारतीय पत्रकाण न केवल पारलौकिक परोक्ष फार्मे का ही प्रवचक है, मपितु परोमातिशय के साथ साप प्राकृतिक यस्पपूर्ण वैज्ञानिक-शिक्षणपूपर्क भाभि मोतिकी समस्त प्रत्यक्ष काममाएं भी इमी याकाण से सम्पन्न की जा सकती हैं। पही वा यह के कामपु' विरापण का फरिवार्य है, जिसे म समझ कर भाग्य प्रान्त मन शासानुगत भारतीय पैदिक कम्मकाण की उपेक्षा से अपना सर्वनाश करा रहे। 1 पुरोवाव मप्र, मिगुन्, सनपिनु इन चारों सहयागियों के एकत्र समन्वय से दी वर्पाकम्म की प्रवृत्ति मानी गई है। मुप्रसिद्ध पुरवाईला पुरोवाव है। प्रत्यक्ष प्ट वम म्पोति-ससिस-मल् (पाप्म ममि-पानी-बावबापु) भी समष्ठिम्प परम मनरे। प्रत्यभय चापिय विन है एवं प्रस्पा भुव गम्मम तमम ही 'सनपिस्नु है। सर्वप्रथम पुराबाद का सधार होता है। पुगाव मधार से श्वस्त मृवभाव (मणभाष ) से पिपर हुए भागों का निपवारामदेरा में एकच समन्वय हो जाता है। अपनता से समुत्पन्न वायु मामि-प्रसीपपपण से विगुन त्या दो गाती है, साथ ही गाजन तामनक्षप सनयित्नु भी। इम सम्पूर्ण साममी सम्भार के समस्त दावेरीफा-ना प्रविप्पनि रे साप पर्पा होने । २ , 1 में - बररोहणम् )-"तस्मिन् यावत् सम्पातपित्लाऽतमेषाचाल पुननिवर्घत-यपेतम् । आकाशादाय, पापुच्चा घूमो भवति, भूमो- भूत्वाऽम माति, अघ्र भूत्वा मेपो भवति, मेपो मृत्वा प्रवपति। व इद पीहि यवा-ओपषि-वनस्पतप तिल-मापा इति जायन्त । जता खल दुर्निम्प्रपतर यो यो पभमपि, यो रत सिञ्चन्ति, समूग एष मति"। --आन्दोम्योपनिषत् ५ ।।। गुहोस्थ महावस्त सोम द्वारा राष्टिरूप में परिणत होता है इस प्रथम - कोण से एवं भवरोहण प्रम में श्रीवारमा पृष्टिम्प में परिणत होता है, इस द्वितीय रष्टिकाप से हमें इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पर हारे कि, पुलोकस्म लगानीय तस्वपिशप ही ष्टि का जनक । मापक दोनों दृष्टिकोणों से सचा विभिन्न तीसरे दृष्टिकोण को मन मनाइए। मिस प्रकार पुसोकापियामा पूर्ण्य से रश्मिया द्वारा सौर सावित्रापि (मादित्यानि) भयम से भूहाक की भोर माया रहता , पबमेव मूलोकाधिष्ठाता पार्षिक निरोऽमि अपने मानरूप से भूपिया से निकल कर भवमप से गुसोक की बोर पापा करता है। पुछोक से माते हुप माविन्यामि से जहां सुप्रसिद्ध “मावित्यानामयनम्" नामक यज्ञ का स्वरूप निम्पन्न से रहा रे महा भूम गाते हुए पहिरोऽमि से सुप्रसिद्ध मदिरसामयनम्या सम्पन्न हो रहा है। मुसोकस निकम हुमा प्राणम्पण पहिरोऽमि को पुगोक की मोर बा ही या है। साथ ही पुष्पोक मे प्रप्ट पर भार मारिमाणि मी मसिफमित होकर भय रूप में परिणत होता हुआ पुलोक कीमोर ही वाया है। दानों के इमी सागमम सच दोनों भयनसनों का स्वरूप सम्पमा । सुप्रसिद्ध महिरा भादित्य-सर्दा या स्पष्टीकरण करने वाले भाम्पान ने इसी सा- पिमान का प्रतिपादन दिया है। बसम्म पो कि पाकिमि (मानारमक *म पिन कति नापनरम मामि-भरमगति- सिनोपनिन् माया तटीय सम में देना चाहिए। +- मरिमाप परसप रभवे प्रयम्मा मरमम्त-से में मोम्मेवामी, पर पूर्व मति । (पत 11111)- रिमायमरणम् एमपिरमम्मम्मम्' (पत 1५111)।

सुखान T 7 - मगिरोऽमि) भूपिण से निकल कर पाङ्मय स्वोमों के मापार पर ममिय रुप से, एक पल्प से निरन्तर पुरोक की ओर जाया करता है। स्वोमसम्पा पहिरोऽमि का यह पु-नामनमार्ग सर्वपा नियम है। पहिरोऽमिक इसी पुर्ण गमन का स्पष्टीकरण करती र मन्त्रमति प्रती हे इत एत उदाहन दिषसप्यान्यासन । प्र मर्जया यया पपा पामगिरसो ययु ॥ -भवर्षस १८11101 भूध पर म्यास सम्मान पापरूप में परिप्पत होकर घुष्ठोक की भोर र एप पनिऽमिमे में प्रतिष्ठित हो जाती है । अभिगमन के साथ माय बाप्पसार परिणत पावि सम्माचा मी भन्तरिम में बसी माती है। अन्तरिक्ष में प्रति महल नामक पामुदिराप क भरातम पर पह बळमात्रा गर्मीभूस मन माती पही पाविमल का गर्मपारणो। जातक सौररश्मियां तीव नहीं पन ब पराकमा पार्षिष नसमात्रा उमी वायुगर्म में प्रतिष्ठिव गती है। अब (पा मिक प्रीमकायोपमित निदापकासापमान में ) सौररश्मियों अपने निममा परिपत दो बासी है, तत्काल वायुपरातटस्प पानी भूपिण पर गिर पाता है। मगर पार्थिव पहिरो निद्वारा मखपरातल में गत पानी ही कासान्तर में पी पर परस पाता है। इस एटिकोण के अनुसार पार्थिव अस ही गुसोक में ज पृष्टि का कारण बन रहा है। हम सममाते हैं प्टिकमा भूपिण में ही हावी परन्तु पपाय परिस्थिति तो पाहै कि, भू-पू, दानों में समानरूप से वृष्टि हो है। भन्तर बस यही है कि पुमाक में पार्विन अङ्गिरोऽपि वृष्टि के प्रपत्रक पर मूगर में मान्तरिस्म पर्जन्य देवता दृष्टि के प्रपौ। पहा से यहाँ पानी पहा बरसता है-पन्य दाग। यहाँ से पहां पानी बरमता है- माहिरा मि द्वारा। पार्थिवाष्टि में पापिय महगण निमिच पन्ते , पिम्प' में सोर महर्गम निमित्त बनते हैं। निम्न सिलिस मन्त्रमुखियाँ इसी दृष्टिकोण - समर्थन कर रही (१) 'मपिता इता टिमदीरपति, मस्त स्टो नयन्ति । यदा उषा अमावादिस्यो न्म मिमिः पय्यापति, भय पपति -स. 1४ ।।

स्वप न्तरों में गमन करता है-(प्रमनिरूपणाम्पाम् )। *--पम-निरूपण भावापर्व यही है कि भवरोइ (पति) मम में अपतत्व से ही पुरप की उत्पचि है। परि आरामम में अपवस्व का पुनगमन न माना मायगा तो अष्टिम भागे. मिप भारद हो मायगा। कारण सप्टरे। पार्पिद सष्टिनिर्माण में प्राकृतिक पुमोस्य ) अपमात्रा का यदि म्यय ही हावा रहेगा, तो एक न एक दिन का नि:- शप हो पायगो। फमत निम्मोणक्रम पर हो बायगा। उपर (~सपम्भूगोवा- वम्यतोऽर्भाम् परमान्छाश्वतोम्प समाम्य'-पाता पयापूर्णमासमन्' इत्यादि मुतिप्रामाण्यानुसार सप्टिकम सापत माना गमारे। इसकी यह शासम्ता तमो अनुग्म बनी रह सस्ती है जब किमीवापरोहणमत जीवाराइम में भी भए उस का गमन माना माय । इसी भापार पर-प्ता एव पपच' इत्यारिके मनुसार मानना पहला कि- "मोवारमा भूतस्मै सम्परिमल एक सामान्तरे गाउति । मित्रपक्ष से समतुमित इस पचामिविपात्मक अग्निकर्म से ही पुउपसी म भाषिर्माव हुमा है। मार प ( मनुष्यपममानास) अग्निहोत्र में मम्नि, समित भहार गिरफुल्लिङ्गा विद्रम्प, इत्यादि भौतिक सामनों का समन्वय रावा है। इन सब भौतिक सापनों का मन्नाइम्झन भम्नि, मम्नम्म्मम सोम इन रा ही सापनों में भन्तर्भाव माना सासकता है। क्योंकि प्राकृतिक निस्साग्निहोत्र में पपासापन ( मुरूप माने गये है। रासीमापविपासा,"नेवोरेवा, मास्त मता मम्मे एकप एक स्पाता"-"हद तस्यौ-अपनेपन्य परमानो दरित मानि बरा -"सूप्यों परतीमप्यास्ववि' इस्पारिपनों के भनुसार रोदसी प्रमाण फन्द्र विपदाच मामक रवीमन मप्पस्मान में प्रतिष्ठित सूपरेनया सावित्रा- म्निमम । मग्निसन पर निरन्तर सो प्रकार ममान को ना किया करते सकिहमारा शरीराग्नि साल्पा पुमचा परामरे मिसायं प्राव भन्न तान्तस्याविषयमेतत्-पतर परिव निम्। म प्राय जीव परवावमाड़ो सीटितो गति भूपामः॥ -न बामगाम सूचनममम पिपरि नियन्तगत त्म- FPारमा प्रथम नगरेमा।

(मोबन ) की इच्छा किया करता है। इस स्वामाविक अन्नादानेशा से ही यह 'भन्नमचीति निरचन से 'अन्नाद कहलाया है। कुल्पना कीधिए इस प्रमाण माएक मोर पनि के महामहनीय प्रवृतम भन्नादमाव की, जिसकी महिमा के गर्म में वसम्म भस्मादि व अन्नाव प्रतिष्ठित है, जिरें अपन स्वरूप मापटन को पूर्षिक सिप प्रतिदिन सायं प्रात अन्नादान को युममा पनी राती है। अवश्य ही यह मानना पागा कि, घिसने ब्रह्माण के प्रति अपने बाप को अन्नात्मस्वन समर्पित कर दिया है। हमारे रोदमी पाण से मी पूरलायतन काम को भन्न निरन्तर म विवाद की पहली मुभा शान्स करता रहता है। उम महसन्नाहुति ही पर प्रभाव है कि, आरम्मसे आग पुर्य्यन्त सटिनिर्माण प्रक्रिया में अपनी मात्रामों का समर्पण करता हुआ भी सूर्य स्वशरीर से मनुष्णबत् बना हुआ है। जिम म मान्न की इम सौर माविवाग्नि में निरन्तर आहुति होती रहती हैं धिम बन्लाइसिस भान रसायतमानो निश्शयन्नमत मस्य च' इत्यादि मन्दानानुसार मो सोरमापिसे हष्ण रहता एमआ भी म्पोधिम्मय पूना मा है, वही सौराग्नि का अन्न उस महामहिम पारमेथ्य मणाछ में बने पामा मार्गव स्नेहवत जिन परमेष्ठी मणत के सामने सूर्मा एक मुद्युत् के सारा सपना महत्व रखता है। बही पारमेय भन्नसोम प्रामणस्पति परमाया है, जिसका मौमिक स्वरुप धामण प्रदातस्व माना गया है। इसी प्रक्षास्मिको सोमाति से सूर्य है। मोरप्रामाग्नि अग्नि है, मुस्मिक मृतपिण पहार हे सूर्य से प्रवर्यसम्बन्ध द्वारा इतस्तत विनिःसव धूम मोहित हरित माम्नेमपुत विस्कृमि र भस्मदादि समस्त प्राणिवर्ग समित है, पारमेप्ठ्य साम इपिम्प है। इन सब के समय से ही प्राकृतिक निस्य अग्निहोत्र सदोलित है, जिसके मापार पर रास HINDI दिक पग्निहोत्रपिपा मापार पर मानुस बनिहातिभिषा का भापिकार या जिस का याशिक प्रामण सौर्य प्रति भनुगमन किया करते हैं। अग्नि इसी यस्यारम बप का स्पष्टीकरण परसे हुए मुवि ने माई- । "पर्यो हवा अग्निहोत्रम् । तपस्या अग्रवाहुतेम, तस्मान्- पोऽग्निहोत्रम् । स यत् सापमस्तमित होति, य इद घस्मिन ..

पदाच न्वरों में गमन करता है-(प्रमनिरपमान्यान्)। * -पम-निहरम का ससम या कि, यवगा (प्रसचि) घ्म में मप्तरण सरा पुरुप की सचिो। परिमाराम में मजाल का पुनगमन न माना वायग, ता सटिकम- लिप भवन्टर मायगा। कारण सर। पार्मिष समिनिाम में प्रातिक पुपाम) अपमात्रा का यदि म्पप दाहावा या तो मकन एक दिन यानि शरस नायगा। फरय निम्नामका पारा जायगा। उपर-सपम्नमाया सम्पनाऽभाम् व्यापारासदाम्य समाम्य'-'पाना यथावमास्पयन सारी भनिग्राम ग्यानुमार यकिन शायद माना गया है। इसकी यह शायदता समा अनुग्म बना ग मला बा कि गावावरागवत जीपायल्स में मोम वस्त्र प्रगमन माना माय। इसी माधार पर--सा एक म.पपचे इत्यादि । भमुमार मानना पाकि-'भावारमा मनमनै सम्परिप्पत एव टोकान्तर गति। मित्रम से ममतुलित इस पचामिविपरमक मग्निसम्म से हा पुरुपी प्रभाधिमान हुभा है। हमार बैप ( मनुप्पयममानाल) भनिहाय में मग्नि समित, अङ्गार विरति रविद्रष्य इत्यादि गतिक साधनों प्र समन्वय गवा है। इन मग मतिप साधनों का धम्नाइलमान अम्नि मन्नमाम साम इनरा ही मायनों में मन्नार माना वाममारे। क्योंकि प्राकृतिक नियाम्बिार में यदा मापन मुम्प मान गम है। राइसोपाम्पपिपाता, चोरेवा, मता, मम्म एप पर स्पाला-पट तस्पो-मुवनप्यन्तः परमाना हरित मारि परा-सप्पो पुतानप्पूरस्वति' इस्पादिसपनों बनुसार रापसी प्रभाग पन्न विणच नाम वादन मप्पस्पान में प्रतिक्षित स्परेषा सानिध- म्निमप है। मम्निसन पर निरन्तर असा प्रकार मनादान को का किया करते समिारा शरीराग्नि सापला युमभामराम मिसाप मात. मन्न नास्व- •वान्तादिकम्ममता-पाय परिवरिन्। म पार जगा परतावमा सीता गाउनि मनमाम ॥ - मरस समयमा रम प्रस्ताव मम म्तिमा प्रससमय में देना।

१९ मुगुमान सम्पन्न हुमा है, एवमेव ए रसानुगत पुरुष (पिता), पथियो रसानुगवा योप [माता] पाम्पस्प से प्राणीविध पत्र सम्पन्न होता है। पोपा प्रतिषी की प्रसिदि है पुरुप ए मोक की प्रकिति है। भवपपइम प्राणिविध पक्ष को भी पाबाणिम् ही माना जापगा। प्रामविप याबापूपिम्य पन में प्रधिषी, भन्सरिम, पौ., पीन का सर्वमा पाक्य है। इधर प्राणिविप पावाप्रथिम्प या में अम्मारिष का प्रमि पी-प्रतिकृतिलपा योपा के गर्भाशयरूम मान्सरिस्य भाषा में ही भन्सर्भाव हो रहा है। षपद यहां प्रामविप पावापृषिम्य पान की वीन संम्भा हाती है, पर माणिविष पावापृथिम्प यज्ञ की पुरुप, योपानप से दो ही सस्याए र माती सम्भूय ३-२ म स पावापृथिम्प पन की पाच संस्था हो जाती ६ मिनका पचाग्निविया द्वारा क्रमिक विपत्र हुया है। एवं जिस विम्सपण की ए, मन्तरिम पृथिवी, पुरुष, योपा, ये पांव पृषक विपा है। (१) सर्वप्रपम प्रमप्राप्त पुविधा का ही समन्वय कीजिए । गुलोक अमिरे मादित्य समित है, रमियां धूम है श्राकास अधिरे चन्द्रमा बजार है नमत्र विमसिहा है। इन्द्रम्येष्ठ देवदेवता स्वम्यापार से ग मोकाग्नि में मटा' पदवि दम्य की बाहुति देत है। माहुन भदातत्व और प्राहुतिपादक अम्नितस्त्र गोनों के मन्तम्याम (मिति ) मममन्यात्मक रासापनिक इस मम्मिमण से-जिसमें दो पाग से दोनों के पूर्वम्बम्पोपमताग तीमरा भपूषमाव प्रपन हो पाता है-सोग पामा समान्तर सन्न होता है। भाजप का सपान्तर यही मोम भान्तरिय यज्ञ में भारतिव्रम्प पन्ने पाया है। सोमोत्पत्ति ही इस गु-पर का मघाम पास है। मोक सोक पत्र प्रनिटिन मौरप्राणाग्नि (मावित्राग्नि) मोकी है। सम्प पिण भूताग्नि है, पिणाल को मालम्पन पनाकर सौर प.माको अन्तिम सीमा में व्याप्त इन मामा माणाग्नि ऐबाम्नि है। साक-साफी का अभव मान पर दो या-मसौ पाप बाको गौतम ! पग्निः बहरिया गया है। मनानि पिण्टाप भारिस्प (सम्पपिण) अभ्यरित सा पिण्याइ रहा है। (मी से माग्नप पाप्ममण पूम समय होता है। इसी समिन्धन स मूम्पपिण पसमि' माना गया है। कार प्राथमिक ममित (काष्ठ) सपूम निमा मतादे प्यमेष प्राप गारमा ममिना गम पनागर म स गर भार समोर 1 सताव - " । न्निा सति जुहषानि-इति । जय यन प्रासरनुदिते जुहोति, य इदं तस्मिन्निह सति जुयानि--ति, तस्मादयोऽग्निहोत्रम् ।" -शा०२३११२, । त साग्निहोत्र में भम्निहोत्रसापक अग्नि, बहारादि, जिन सापनों का पसल किपा गया सब भम्नि सोम, इन दो स्मों पर ही विमान्त हैं। अम्नि, पूम, समित बहार, विस्फुमिता इन का तो अग्नि में अन्तर्मान रोप सोममात्र र माता है। अतएव अवश्य ही इस मनेकमापनानुगव भी पार का भनी सोमाहुविर्यक. यह घमण किया जासकता है। पचाग्निविया का वात्सम्य पही कि, एकही यह स्पान भेद से पांच संस्थामों में विभक होगा। सौर संस्था माफिीषिक, पार्मिवसस्वा वाभिमोतिक, पुरुपसंस्था भाप्यास्मिक है। पाधि विकसस्पा का २ विपामों से बाधिभौप्तिकसंस्था का १ विमा से, एवं भाम्पारिमासस्था का विभाओं से सम्बन्यो। कारण इस संम्मा विपर्वका यही किमापिदैविक, दबा भाप्पास्मिक महों के दाम्पत्यमाप से महा धम्म पाम्पस्पयन (प्रया ) उत्पन्न होवा पहा भापिभौविक पापाण छोप्यादि पनों से भन्म या उत्पन्न नहीं होता। संतबिमा से यही रहस्म पूपित करने के पिए पाधिोषिक, पाप्यात्मिक पों के लिए २-२ विधाभों का पत्र मापस्न पाधिमोतिक पाम्पिक ही विमा का स्पष्टीकरण हुआ है। दोनों के पाच भषयम-प का ही पचाम्निविधा मारा विश्पण हुमा है। मत पचावयव मन पावाभिम्प है। पापापनिम्म यसरे प्राणरक्षण-यम, माणीसभण-पत्र, भेर से दो विषच माने जासकते हैं। प्रारुविक प्राणों के समम्मय स समन्ध पलने मामा गावापपिम्प या प्राणायाप्प पा रमायेगा एवं प्राकृतिक मरमारि प्राणियों समन्वय से सम्बन्ध रखने वामा पापापपिम्म यज्ञ प्राणिस- भण पन माना मापगा । प्रामाण या प्रथिमी भन्दग्निम्, यो,, ये तीन पर्व है। प्राणिमण या पुरुष पोपा (स्त्री) ये दो पहे। पुपोकापिष्ठाता मद मीन राय भकाशानुगत मोर भानप प्राण से पुरुपसधि का भाषिर्माण तुमारे। भूमोकापिठाता (रिस में भारतरिम्स प्राणवायु का मी समन्वय रे) रात्रिकालीन वदप माशानुगत बान्न सौम्पप्राण से पोपासृष्टि का भाषिर्भाव हुआ है। प.म्प्राण पिता पूभित्री सपिणी मावा वाम्पस्य से पैसे प्राणपिप पन्न - म.मम्मान सम्पन्न हुमा है, एवमेव प रसानुगत पुरुष (पिता), प्रविधी रसानुगता पोपा [माता के पाम्पस्म से प्राणीविष यान सम्पन्न होता है। पापा पृथिवी की प्रतिकृति है, पुरुप ए मोर की प्रतिकति है। भवस्व इम प्राणिपिघ यज्ञ को भी पाबापूपिम्प ही माना जायगा। प्राणविध पाषाषिभ्य यन में पृथिवी, अन्तरिम, पो, तीना का मर्पया पायषय है। इपर प्राणिविष पावापथिम्प पत्र में अन्तरिक्ष का प्रपि पी-प्रतिकविरूपा योपा के गर्भाशयस्प भान्तरित्य भाकाश में ही अन्तर्भाव हो रहा। भवएप यहां प्राणपिघ पापापविम्य यज्ञ की तीन संस्पा होता है पदा प्राणिविध पावापृथिम्प यह की पुरुप, यापासप स दो ही संस्थाए रह जाती है। सम्भूय ३-२ म स पावापृथिम्प यज्ञ की पचि संस्था हो वाती ६ मिनका पचाग्निविपा द्वारा क्रमिक विशेपण हुआ है। पूर्व मिस विश्लपण की ए. भन्तरिम पृथिवी, पुरुष पोपा, ये पांच पृथक् विपा हैं। (१) सर्वप्रथम क्रममाम पु विपा का ही समन्वय कीभिए । पुलोक भामि है आदित्य समित है, रश्मिया पूम है मह काम अपि पन्द्रमा भकारो नमत्र विपुनिहरें। इन्द्र म्येष्ठ सदेवता स्वम्पापार से गशोकामि में 'भदा' कप गि रम्य की बाहुति देता है। माहुत अदावत, मोर माहुतिमाहक अम्निवस्त्र दोनों के अन्तर्याम (रिवि) सम्मन्पारमक रासायनिक उस सम्मिभण से-जिममें रोक पाग से रानों के बस्वम्पोपमरेदाग तीसरा अपूपमाव उत्पम दो भाता है- नामक तत्त्वान्तर उत्पन्न होता है। महातस्त्र का रूपान्तर यही सोम भान्तरिक्ष्य या में माहुतिव्रम्प बनने भाग है। सोमासत्ति ही इम पु-या का प्रधान पर है। सुमोक मोकवत्र मविठिन सौरमाणाग्नि (सापियाम्नि) मोदी। सूम्प पिण भूताग्नि है, पिणन्द्र का मासम्पन पनाकर सौर प.सोफको मन्तिम सीमा में व्याप्त यन बामा प्रामाग्नि रेखाग्नि है। छोफ-साकी का भमर मान करी पदा-भसो पाव टाको गौतम । अग्नि पहप दिया गया है। भूताम्नि पिणाप माहित्य (एप्पपिण) प्रवन्ति सा दिया।रता है। इसी स भाग्नय वाध्यममण धूम का उपय हाता है। इमी समिधन स मूम्पपिण समिन माना गया है। जिस प्रकार प्रामसिम ममित (पाप) से पूम मिम्मा रातारे एपमेव प्रार मित सूप्पपिणात्मक ममिन का गभ पनाकर इम स ग भार गरिमा का -साग स्वपप - पिवान होता है। रश्मिा मानेप पाप्म की प्रकृितियाँ। भवनपत ही पूम मा मासकता है। जिस प्रकार पूम युक्त समित से निपटने बागी अम्निम्माषा से भोर प्रकाश हो जाता है एवमेष रश्मियुट सम्य से निकलने वाली रश्मियों के समय पिवान से सम्म लोम प्रकाशित हो पाता है। प्रभारी बर्षि (नाग) है। पहा प्रकाशात्मक माही भर्पि है। मातक माला (भर्षि) बनी रहती है ववक समित महाररूप में परिक्स नहीं होता। मालाके शान्त हो जाने पर ही मजार की अभिम्मधि ऐठी है। वापसमणा पर वारा यहाँ पार्टपमा मर्षि (प्रका) है। अबतक पा एवी रे सबतक चन्द्रमा प्रकाशित नही होता (ममिव्यक्ति नहीं होती, अपित अभिमा राणा है)। भा के भन्तसीन होगाने पर चन्नमा इसी प्रकार मामिम्पत होजावा है, मैसे कि, स्वासोपशम पर महार भमिम्यक्त होमाता है। इसी सारण) चन्द्रमा बझार माना मासकता है। चन्द्रमा सोममय है। सोममा चन्द्रमा की पत्ति इसी दिम्प पावित्ययाह से। इससिप मी चन्द्रमा को भादिस्य पा का घरया माना सिकया है। चन्द्रमा का प्रकाराम मी फोरमग का ही प्रबम्परूप। प्रतिफमित सौर प्रकारा ही चान्द्रम्मोति का नमक पमता है, मेसा कि--प्रत्वा चन्द्रमसा गर--स्वरणिधिरणसगारेप पामीपपिणा-पितकर रिशिषपन्द्रिकाभिधास्ते'इ न्यादि रचनों से स्पष्ट है। इस लिए भी चन्द्रमा को भगापमेव भारिस्पयवावयन माना जासकता है। चन्द्रमा अपसवरा सुपर्णो पागवे दिगि प्रत्याविमन्वपणनानुसार चन्द्रमा भपिणारे। नमन मप्तस्वरेदी प्रबम्बाप, नस्पक इन-35 (पानी- पपिण)माम म्पपात किया जाता है। नामधिक भाप्पप्राण मा गणास्मक बहा पान्द्रमस भाष्यप्राण भविष्ठावा। मपयन, भवपी का सो सम्बन्ध यही चन्द्रमा मौर नपत्रों का सम्बम्प है। मतपम भग्नि पायु, मादिस्य, पनमा इन चारों भविसावा ऐपदार्मा के कमरा बसु -मारिस्प-ममत्र, ये पार गणदेवता प्रसार शिसमकार बङ्गी भार से पनात्मक विकृति पिनिगत पबमेष भणी बाप्य चन्द्रमा से भहारमा बाप्प भाभविक रोगा विकास हुमा है। मतपव ममत्रों को अवश्य ही महार पन्द्रमापक्षपा पिक- गितमा जामतारी न शुमान पार्षिप, भान्तरिम्प, विम्य, तीनों में क्रमश अग्नि, वायु, इन्ट, इन मीन भनि छावा देवताओं का प्रमुख है। अवाग्य पार्थिव देषनाओ का आग्नेय प्रान्त रिक्ष्म रक्तामों का पायम्य, ब दिथ्य मयदवसा का पन्द्र कहा मा ममता है। मुक्त विम्पयनसंग्या में ये पन्द्रदयता दी भूस्विफ हैं सूम्यफलम्प दिरण्यगम प्रजापति दी इम पन पजमान हैं। विलय पन्द्रप्रताओं के द्वाग प्रदातस्य की सावित्राग्नि में आहुमि हो रही है। इस प्रकार निरिमननरिमन्नग्ना दपा' में पान रिम्प रेगुवा दी गृहोप है। भप राप य माता दखल मटा वस्व । पूर्वमायण भाप्पा म भनकमा मटा मास्विक सप्प फा विशयपण किया माधुका है। मयप पिम्पपण अना वश्यक है। प्रमणमाति फे मिग पह मान सना मात्र पर्याप्त जागा फि, पार मेप्टर भपतत्त्वानुगम चानमोम से मम्मन्य गबन बाप्पा, भम् (मत्य) का पारण पुन पासा, मनागस म्नेहनत्त्व ही 'मटा है। 'मटा, रता, परा' इन तान पान्द्र मनोवाभा का प्रमश बारमय शरीगडभुक, मन, इन मीन आ परिमक पोस मममन्य है। तीनों ही प्राकृतिक मनुमर है। मिन क मन, मुक, शरीर में पान्द्र भदा रन-परा का प्रात्या ममापरा राना वही भदास रताधा यशस्या पोव । मनामयी घटा पितृमाण की शुरुमय रल मानपप्राप्म फी, ई मामय यरा वपदफार मम्पन्ध मे देवमाण की प्रमिष्ठा पनता है। भटालस्पानुगत पिनकम्म उम भटावस्व सम्पप सही पार प्रसाया है। प्रदाया आप (80410 म) भनुमार भन्दा पाम्मप में भापामय तस्यविशपदी मिमा उपमम्प भाप्यों में तसरया ममन्वय नहीं हुआ है। मपनर पटा का प्रथम रूप है मामवस्प भटा का उत्तरम्प है। सम्मिन्ना मानरिया पानि (शाप निपर)-- आरा बदिगम्पमापा भृग्य निगमयम' (गापथ-मामाग) त्यादि भूतियों फ भनुमार गुपनग मानस भनिगरमग घराना दी भापः ।। भण्प भापामयी भटामि-सेज अदा (गत mm) पर भी एरिया आना। जनर आपामपी भटा परमेधी में मुन मला या महा। भापियामि में नहाती भारिस्पानि ममा भटाग्म दार्मा मम - पर हार भामसन ता पथ । नाप से पूर्वस्वरूपोपमलारा पा सोम' रूप में परिणत हो पाती है। भापोमयी मटा में माप्पप्राण की प्रधानता रखी है। परन्तु रूपान्तरमूत सोम भाग्य प्राण से सवा बहिफा है। पह विशुद्ध रेवान्न पन बावा हे। पही पुसोको पसमित-माभिषिक यासंस्था के पु-परिमक प्रथमपर्व का संभित निदर्शन है जिस का निम सिसित भूति से सष्टीकरण हो या है- पी (1) "अप्ती पाप लोको गौतम ! भनि । तस्य आदित्य एष समित, रम्मयो घूम , बहरर्षि, चन्द्रमा बहारा , नषत्राणि विस्फ लिङ्गा । तस्मिन्नेतस्मिन्नपी दया भहां हरति । तस्या आहुत सोमो रामा सम्भवति"। (दिम्यया) - (२) दूसरा भामिविक पझपर्व अन्तरिम से सम्बन्ध रखता है। जिस प्रकार परिषी का मतिष्ठावा प्पयामिमा पपिपी के अनुसार भप्ति पुलोकाति पापा प्राविस्म (इन्व), एवमेव मन्तरिक भविष्ठावा पायुरेषता माने गए है। इस पायुवत र मनक विपर्य है। उनमें से सोमवस्त्र का भमुयोगी प्रवत्वका प्रवियागी बाप्यप्राणानुगत बाषिरोप ही मात की समष्टि में अमि प्रेत है।बहीबान्तरिय पायुविष पमन्य महाया है। पहीस पुडोकानु गत सोम को अपने गर्भ में रखने कारण भनि (माप्यापि) पापा है। बाप्प अमि-सम्बन्ध से ही इस—पमन्यो वा भग्निः (शव० १४६।१।१५) इस्पारि रूप से ममि का गपा है। वर्षा से पहिल यो सनसनाला पूर्णगापु (पुरपारपा) प्रचारित दातारे, पही पर्जन्य मसाया है। इसी पमिप्राप से पर्मस्पा यसीबपिमन्य' (रात AR) पर ष्मण किया गया है। मट मूर्ति शिवस्व परिमापा में पड़ी पमन्य मब' माम से हपपातमा । पर्जन्य दो पतियारा साप्रपा ममप बनता है। अतएप पम्पादीई सय पति' भनुमार भवाय ही इसे 'म'मा सासता है (ऐलिए राव० ५।१२।१५) । बाप्प अग्निरमण मायम्म वस्त्रात्मक पर्मन्य के पत पसुस्वस्पास्मक मौत निरू पण शिपमान एते मी परि इस का पमन्यो नाम पृष्य पफरपाभिमानी मुगमामल समाविशप' (शारमाम्य) यह नये किया जाता है तो माधम्म इस लिए मही रोता कि मेरा का तत्त्वविज्ञान गत सामाग्विां से सबमा स्मृसिगर्म में विलीन पारे। भाप्पप्राणास्मक षायु (पमन्म) पृष्टि फा उपकरण मी, प्राणपम्म चन इसे देवता मी व्हा शसकता है। परन्तु पह-'ममिमानिम्पपदरास्तु विरापानुगविम्याम वासा मभिमानी दमा नहीं , जैमा कि-रावपभमाप्प प्रयम पपेके - अष्टविपदेशवाविधान' प्रकरण में स्पष्ट किया जाता है। अमिमानी देवता का समन्य एकमात्र उपासनाकाह से ही माना गया है। फम्मकाणानुगत ऐपवा का ता विशुद्ध तस्ववाद से हो सम्मन्न है। घिस प्रकार पुलोकोपछशिव भारित्याग्नि प्राणमिष या,पपमेष या मान्तरिय भाप्पप्रामाग्नि (पर्जन्य ) मी प्राविध दाने से देनाग्नि ही माना नायगा । मनन पा प्रत्यक्षानुमत पुरोयात इसी पजन्य का मौतिकप माना जापगा। पी मूतबापु प्रागात्मक पर्जन्यवायु का पंजा यनवा है, मतपम इसे पमन्याम्नि की समिन माना मासकता है। पन्याग्नि, मूतषायु, भान्तरिक्ष्य भसतव, अम्निसम्बन्पेन सन्पम बाष्प (सूम), इन समन्वय से मन का स्वरुप सम्पन्न होता है। इन सपकरणों में बाप्प से मपान है। भवएम वाइन्याय से अध्र को पूमास्मक कर दना भनार्थ बन पाया है। पर पाप्प स्वरूप से अन्तरिम में सवत्र व्याप्त है। पमन्यामुगव समिनम्पानीय मौतिक वायु (मान्सून ) . म्पापार से दी इतस्ततः मृतरूप से विसर हुप पाप्म एकत्र पूीभूत होता है। बही वाप्यपुष्ट म' मसापा जिस की रचरापरया मेप रष्टा है। कि समिन से पूम का निगम होता है, इसर समिफ्लक्षण मूतमापुरी बाप्पपुल का मनक (समाइक)। इससिप मी भध को भूम कदा नासम्वाद। भान्तरिम्प म्याति विपुल है। पही पाम्पाम्नि की भर्षि (प्रचारा) है। पतपय अवश्य ही पिपुरको मान्तरित्याग्नि म्याताप मषिमा बामपता है। पम महार है, गमन सर्वन विस्फसिज, भैसाफि मागे विस्तार से पापा बाने वाला है। एवंदिप पमन्पानि में मान्तरिक्ष्य पापम्परपवाभों दाग माम पी धाति हती है। पान्याम्नि, सोम दामों के रामायनिक सम्मिमम से पृष्टि का मातुर्मान उत्पथ हुआ। यही मापिदिक यज्ञ की दूसरी विधा है, जिसका निम्न लिखित मां में स्पष्टीकरण'हुआ है। अन्तरिमम् (५) "पर्जन्यो पाव गौतम ! अम्नि । सस्प यायुरेव समित्, अन धूम , विधु दर्षि , अवनिरङ्गारा, इंदिनयो विस्फ लिका । सस्मिन्नेतस्मिन्नग्नी देया सोम राजान जाहति । तस्या आहुतेष सम्भवति" ( आन्तरित्ययश )। . - । (३)-पिणात्मिका (भूतास्मिका) पपिपी भूमि कहला, एवं मदिमात्मिका (प्राणात्मिका ) पबिवी पूपिणी प्रसा। भूपिण मापार पर विवत प्राणाम्नि ही प्राव में पिवी शेप से गृहीत है। यही प्राणाग्नि पार्षिय भौतिक या की मूरपतिष्ठा पनवा है। यही मौतिक पक्ष की पोनि जिम के लिए--- मनि योनियास्प पाया जाता है। मूपिणानुगत प्राणाग्नि भूपेन से निकल कर १० पहाण पर्म्यन्त म्पाप्त राता है। मैसा कि, पूष: -सप्तदशो वै प्रजापतिइत्मादि निगरम्पाम्मान में सर कर दिया गया है। सपप्तरा मंदगणारमा माग्नेय मण्डल दीपा पार्थिव सम्बस्सर जिस का सार सावित्रमाणाग्निमसाप दिम्म सम्बस्तर के साप १७१ महगम में अधिमान होगा। सप्तरा मिन्दु ही उभरसम्बासर की मूसपविष्ठा मानी गई है। पर मम्वत्सर मणाम वामप है। पाकवत्व ही भूतपिप का मन पर वस्व । बम प्राणाग्नि नहा वाग्नि पहा या सकता है, बहा धागम्निम्प मम्बस्मर को मूताग्नि कहा जा सकता है। इसी पूबसमतुलन से सम्पासरमण्डल दम पाभिर प्राणाग्नि यही ममित माना मामला है। परमाकाश पुराणाकाश शरोगकारा पहराकाश (रमाकाश, श्यादि भेद से भाकाश मर्नेक विवध माने गए हैं। स्थायम्भुष परमेम्पोमन् दी परमाकारा है। सारमणम (मोररोहमीप) से सम्बन्प रम्पने पाला भगवसमुहाशिम भाकारा पुगणारा है। शरीर -पदराकारा भाम्पास्मिक भाकारा है। पुराणा फाराममा मर ग्रिपाकी में पापियाफारालाण सम्पस्सर मगस प्रविमिन है।

- घुमापन सम्बस्सर के मम्पत्मिकलिात्मक योनापास्मक मेसे"वीन पिवंच है। बम्न्यात्मक सम्वत्सर वो समिव है। कागास्मक सम्वत्सर माविर्सिद पनतामा म्पनहार की प्रविष्ठा बन रहा है। पयोनापास्मक सम्पस्सर दी पापिय भाकारा है। । मापरिमामास्मिका सम्बत्सरमणसीमा ही वयोनापास्मक सम्पत्सर है। पही म्पोमात्मक सम्मत्सर कामापा, मैसा कि-योमा दि सम्वत्सरः (रात. ८११११) श्यारिपचन से प्रमाणित है । पर प्रतिष्ठित अस्मदारि पाभिष प्रमावर्ग मिस भाकाश का सम्झात्कार किया करते हैंमा यही पापियाकारा है बिस का वाम स्वस्म पापियाम्नि से परिपत पाष्प से निप्पन्न हुआ। इसी बाप्प सम्बन्ध से भाकारा को प्रख्य भूवयन का धूम' माना जासकवारे। सौर दिम्याम्नि म्योतिर्मय है। वही पहों हरेवेभ्यो पपपकाम । स रुप्पो मृता पचार' इत्यादि सिद्धान्तानुसार प्रचार्यसम्बन्ध से पार्षियजगत् में मुकदोवा हुमा प्रारूप में परिणत दोरहा है। मापाठ में पासिस्था वहाँ सौर भ्योविप्माम् सावित्राम्नि से मनाहीत यता, यहाँ रात्रि में पाभिव कप्याग्नि का स्थामायिक विकास गवारे। मतपय कृष्णभावारिमका वयोमपी गत्रि ही इस पार्थिव पदाग्नि की मर्षि मानी गई है। अग्नि के अनुरूप ही वो 'वी है। पार्मिक भग्नि परिहण है तो पिकासारिमका रुपमा रात्रि भी भर्षश्य ही कृष्णाग्मि पी रुप्माधि है। राविरूप बर्षि मातक रहती है दिशामों का पोप नही दोसा। रात्रि मासान पर पिसाएँ परिवात होती है। बर्षि नपशाम्त होने से ही दो बहार का मन्म होता है। इसी समतुलन से दिशामों को मार माना जा मस्सा है। मगर वषयपीरे वो पिसुभिषयप है भने, सर्ववो म्यान हैं। "मवत इव दीमा भबोतरपिस' (शव ) भनुसार समी मान्त बनान्तर दिशाएँ है। इसी समनुपन से भरपवारिमका भवान्तर रिसानों का विमुगि माना जा सध्यारे। ज्य परिमह युक्त पापिंग ममि में पार्मिग मामेय देवताओं के द्वारा पुष्टि की माहुति होती है। पार्थिव मृण्मय मुखामियुत प्रापापि, त्या भान्तरिक्ष्प इणि (स) दोनों रासायनिक सम्मिश्रम से प्रीहि-सवारिया पता । । ..

पक्ष है। पही मम्पस्य भाभिमौतिक पार्षिष पक्ष की मात्र एक विषा, बिसकागों विश्लेषण हुबा है- प्रथिवी (1) पूपियी पाव गौसम ! अमिः। तस्सा सम्मत्सर एव समित्, आकाशो धूमः, रात्रिरर्षि:, दिशोऽनाराः, अपान्तरदियो विस्फलिङ्गा । सस्मिन्नतस्मिमयो देमा पर्प शाहति । तस्मा आहुवेरन्न सम्मवति" | (पाविमः। 7 M (४)-विविध पापिय पिक या तथा एकस बाधिभौतिक पार्षिष यात स्वरूप विश्ोपण मनन्तर माभिवविक पापिमौविक मासे स्वरूप पाम्मास्मिक पा के पासण पुरुपय विपर्च का निरूपण परवी ई मुति प्रती है कि गौतम । पुरुष निप्पेम (इस बाम्पात्मिक पा) भनि। पहा पुरुप शाप से बर वाम्मास्मिक पा पानर भमि ममिवो यो सम्पूर्ण प्रापिवर्ग की प्रविष्ठा ममा हुभा है। पर्व मिसका मा पानरो भूस्वा प्राणिना दमाभित । भाषापानसमायुक्तः (गीवा १५।१४। ) स्मादि रूप से विशेषण मा । पचामि- पिपोपक्रम में पा स्पष्ट किया गया कि पापा प्राणपत्र प्राणिपा, भेर से दो भागों में विभक। पापिय प्राण अपाम , प्रान्तरिक्ष्य प्राण म्यान है रिम्म प्राण प्राण है। विम्ममाणमण प्राण पापि मपानम्मण प्राण इन दोमो प्राणा पानों से मप्यस्व म्बाममण माम्तरिक्ष्य प्राण का नसी प्रकार प्रान गाता है, मैसे कि पापापपिवी राप से पुपविषीरे मम्मस्व मन्तिरिम का समय पक्तिस्तवमारणेन एम पाप से प्राण हो जाता है। पापिष भपानामि पार्षिष नर (नावमग्यप)ो मन्तिरिक्ष्म पापम्मानि माम्यरिस्म र पिम्प प्राप्पाम्नि पिम्ब नर है। प्रविधी अन्तरिम यौन वीनों गोर्चे के अपानाप्मक भग्मि पानात्मक पायु प्राणात्मक पाविस्व टीमों मरों पारस्परिक भन्दम्याम सम्पन्म से अपम दोने पाणा-मोम-नमाम-मागों को बोरर (बा मोमम्मा, पा ममाम्बा) साह शरीर में मास पने बाला तापपर्मा भाप्पास्मिक भाग्मि मानर प्रमाया। इस की माध्यामिक पापा को सत्य में रमन म.गुममम , - - भुति ने माई-पक्षियो वै पुरुप (पैश्वानरः) परम (ऐत मा० गहा)। वैश्वानरमाण माध्यामिक पाह अग्नि में कि डोक्याग्नि का समावेश भतएव इसके लिये- पैमानरो सर्वे भम्नप (शत १३५) यह कहा गावा। शरीर में मस्तक माग प लोक, नामि पर्यन्त माग अन्तरिम है। गुर-माम्पन्ठर माग प्रभवी-झोक है, पही लाप्यास्मिक-टोक्य है। इन पीन छोकात्मक तीन पुरों की समाहिप शरीरपुर में सीमित गने से ही-स एपोऽम्निवैश्यामरो-यत पुरुप (शत० १०६||११) यह प्रामण किया जाता है। मायोमि के मेव से प्रत्येक पप्पात्मसंस्था (प्राणिशरीर) का वैश्वानर प्रपा पर शरीराकारों में विभक्त होता मा पुपगुवा पना हुमा मैसा कि आपने पस ग्वा वानरः' (शत० प्रा० १६१५) इत्यादि पपन से प्रमाणित है। एवं विष सर्वामि (सोश्चयाग्नि ) ठमण इस भाम्यात्मिक अनि त वैश्वानर'- पुष' भावों का ही निम्न सिसिव परनों से स्पष्टीकरण हो रहा है- (१)-" स य स वानर -इमे स लोका । इयमेन प्रथिषी विश्व, अग्निनर । अन्तरिक्षमेष विश्व, पापर्नरः । पौरेप पिश्य, थादित्या नर । (मिश्वेम्पो नरेम्या जावोऽग्निश्वानर " (शत०६२।१।३)। (२)-"इमे पे लोका पू। अपमेष पुरुषः, योऽय पवते । सोऽस्सा परि क्षेत, तस्मात् पुरुष " ( स० १२६।५।१)। (३)-"प्राण स पुरि शेत । व परि शेव-दति परिशप सन्तं प्राण 'पुरुष' इस्याषषत (परोधम् । परोषप्रिया सहि देपा, प्रस्पधाधिप")-गा० प्रा० पू० ॥३९ । पाचमौतिक शरीर पित्यामिमय है भूताम्निमय है। यही वामप मामि है। वही शरीरपरिदिन्न सामर मामक पुपानि की समित है। इसी शरीर पररूप वागम्नि (शरीर) से पा समिद यता है। वासप्रश्वासारमा प्राणी इम समिट शारीराग्नि से भगतरूप से निकलने पामा पूम है। निदोपभित अपय चिन्यात्मक सम्पदी (बारीबारहीस की मषिरभाविमप्राणामा ही मन्पकार में महारबत' प्रतीयमान (बिस स्विशिका पानुषों की बालों में रात्रि में परम पिया मासक्ता एप ही भारदरा-मागम्निविकारमूव रान मुदि कामपिठाता प्रोत्र ही निस्फुभिरे।ऐसे इसाक्षायास्मिक पुरपामि में माम्मास्मिक इन्द्रियरेषवामी के पारा वििवकारमूवर मनमम प्रिमी माहुति होती है। मुताम्न रस-मममिका पिराकम से कमरा रम बसर मामामा बस्पि, मम्मा 'इन प्रारूपों में परिपव होता हुषा मन्ततोगत्ला-रवो 'हपामे परिपत हो गावाटरपही धाम्बात्मिकायाकी प्रयमविपाभिस का निम्न निसित रायों में स्पष्टीकरण मारे- पुरुप (पा )-४---पुंरुपा पा गौतम ! अग्नि । तस्य पागेप समिद, प्राणो धूमः बिहा अघि पारणारा , भात्र विस्था लिङ्गा । तस्मिन्नेतस्मिन्नम्नौ दवा अन्न ग्रहति । तस्पा माइते रेत- सम्मवति" (पापक्ष )। - - ()-माप्यास्मिकपा का दूसरा पर्व है--पोषा-पह। पाप्राण गहा पुरुपसर्ग की प्रट्रिया, पहा पोपाप्राण ग्रीसर्ग की प्रतिष्ठा परता । पृपाप्राण भानेय पोपाप्राण सोम्यो। भाम्नेय पा का रश्म सौर भर्दाकारा से सम्बन्ध है, मोम्पा योपा कानप पान सहारा से सम्बम्प है। योपामामास्मिता स्त्री शोणित में प्रविपित निम्मितस्य दी पोपा बन की प्रतिष्ठा है। गारापगत शोणित में प्रतिष्ठित माइमिक (महम्प्रामापास्मक) मानेवप्राण की इम प का आविप्राइक भग्नि है। इस पोपानि कान्सक मस्प ही समित् पायसमित संयोग से सम्न पापानिम-सोम दी प्रम। मन्तस्व रकवर्ग नसापानि हैनपदी अधि। इत्यादि रमण इस मापारिम में पुरुभारीरस्थ प्रापरेवापारा रेत की नाति होती है। पदी व रेत मागता में गर्मल्प मापरिमत हो पाता है। पथपस्मिक पहले सीमन्तिम भाम्बारिमकपणाम जगिर्राम परावी भूतिपदवी- सपना - स्त्री(गोपा-"योपा पाव गौतम ! अग्नि । तस्या उपस्य एव समि। पदपमन्यपवे, स म । योनिरपि । यदन्त करावि, वहारा । अमिनन्दा विस्फुलिङ्गा । सस्मिन्नेतस्मि न्नम्नौ देपा रखो हति। वस्या आहुवर्म सम्मपति" छान्दोग्योपनिपत्-५ प्र ।४,५,६,७,८ खण्डा । * * * पल पग्निविया त्मक पथपर्वात्मक पा का निष्कर्ष पही हुमा कि.पुमो पसभिव मादित्याग्नि, भन्तरिमटोकोपलधित पापम्प पर्जन्पाम्नि, मूलोकोपस- भिध पार्षिक मम्नि पुरुषात्मक तूपासमप वैश्वानराग्नि (शरीराम्नि ), पोपापा- पात्मक रक्तम्नि इन पांच अम्नियों में मरा. भदा, सोम, इष्टि अन्न, रेत इन पार विद्रा की आहुति होती है। वरी प्रदानक्षम भाप (अपवत्व) उच्च गेत्तर प्रतिष्ठित मम्निसम्पन्म से सोम-ष्टि अन्न-रेवारूप में परिणत होता हुआ मन्तिम पषिदी रतो आहुति से पुरुपस्वरूप ( गमस्वरप) का भारम्भक ( सपा- पान ) पन रहा है। इसी लिए यह निम्न का मासाहारे- "पति तु पशम्पामाइतावाप पुरुषगषमो भवन्ति । -----मस्मि (मसातो.) --अभिविष्या २-1-मम्तरिक्षम् -बापुः (परम) --मोम ३-३-(१) पुभित्री- 1-मि (एपिसी --माधिभौतिमा १-१-१)पा--र (पुरुष) --- यस्मिन] पिर ५-२(२) पोषा---मानी (मोश). पचाम्भिविषामक पथम दिनीय पत्रपरको (पम्पयामे) सोमा इति द्वारा पुष्टि का प्रवर्तक मतमाया गपाई गति-मनितो इष्टिमुरीग्पति' इस्पारि पूर्वोक्त वृवीयररियोग से मर्पया विरुद्ध पाता है। पाकिमनि पापिय पामी को वापरूप में परिणत र अान्तरिय पापुपात में मचित रहता -प्रायः पशानिय प्रपत्र -- । है। अम्निधरा पागर्म में सचित वही पार्षिष पानी कान्तर में बरस पाया २ या कमन मवश्यमेव पर्जन्ययनमीमांसा का मछिन्द्री प्रवीण दो यारे। पभदा सोमरूप में, सोम पर्जन्याम्नि में माहुत हो पृष्टिरूप में परिणत होता भपश्यमेव पर सिदान्त दृतीयष्टिकोण में म्पापात स्त्पन्न र याहै। कौनसा सिद्धान्त प्रामाणिक मामा पाप कि दोनों ही भुति-सम्मत सिद्धान्त। मार्पसम्प्रदाय उत्तर देती है-वहां परस्पर भावसिदान्यों में विरोम प्रवीत होवा हा पहा पानों ही प्रमाण हैं। इसस्थि किपर विरोप कपल स्पूनष्टि से सम्बम्प रजवारे। तत्सरि मापार पर सव समन्वय किया जाता है वो विरोध का साया भन्मूलन हो जाता है। केवल निरूपणीया रोसी-मेव स विरोध की प्रतीत होता है। बस्तुत. पिरोप है नीं। शुष्टिकमारम्मविज्ञानाठि सयाँ पजन्यपवानुगत दृष्टिसिद्धान्त प्रामाणिक, बहा रिपविक्रमानुगतमिहानरप्ठि से भनिर्वा पारि वीमष्टिकोण मुसमन्त्रित है। सपिफमसे सम्बन्प रमन दामोपचाम्निविपा म मभिदैवत-अधिमूत अप्पा स्मरूप से जिस पथपस्मिक पत्र का विश्लपण हुभा , मी का एवरय आरण्यक में पायविधा कप से पहरण हुमा है। वहाँ योपारमा पापों को बोग दिया गया। बस भारम्भ प्राणयास्पर पिनी-अन्तरिम- पोन तीन पों का चोने पुरुष पर्व का संमा करते हुए पपयत (प्राणियम) में वीनों प्राण पों ा समन्वय बसाया गया? (लिए-एत. भा.२ मा । १मा । २.)। इसी समयषिपाका माग गाकर हतीययण में रेवस सष्टि रूप से मोविश्लेषण हुमा वामपमा एक सवन्त्र ही रष्टिकोण गल याहै। पहा दूसरे दी प्रम से सष्टिपमा विसान हुमा है। रेसिप! "मपाता रतस सृष्टि -प्रमापत रता दवा , दबाना रेता पं, पर्पस्य रत आपपप , आपधीना रेवोन्न, अन्नम्प रेता रेत , रसपा रत प्रजा, प्रशानां रखो दप, दपस्प रखो मन मनमा रवा वाफ, मानो रत फर्म । सदिदं कर्म रुतमप पुरमा प्रक्षमा सोफ:"-(एन० मा० २ आ० । १० । ३ स०)।

गमापन -- उस सब रष्टिकोणों के वैज्ञानिक समन्वय के भापार पर हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना परवा कि-पार्विव सस्याग्नि, भान्तरिम सत्य पापु दिव्य सत्येन्द्र, पमम्प भूत पायु, सोम एप॑रश्मियो, पुरोषास, मन, पिपुत, स्वनयिल्लु, भादि मावि उपादान निमित्त कारणों के समन्वय से होष्टि होती है। निम्न सिक्षित मौत स्मार्च कम ही पुष्टि के मल कारणों का समर्थन कर रहे हैं- १-'भग्नि इवा पष्टिमुदीरपवि-अग्नि - सत्यम्- पार्पियाग्नि २- बापु पुण्या ।' -वायुः--सत्यम् --बाययोग्मि ३-मादित्याग्यापते पुष्टि --मादित्य-सत्यम्- सारिवाग्नि ५-पान्यार्पामु पमते' पमन्य-मुखम--- आप्याग्नि ५-सामापं सम्मति -सोम-मृतम् -- पान्नसाम' 1- रश्मिभिा समपात'- रश्मय-सत्यम्- प्राणाग्नि "पुरोगात ससूमिर' -पुरोबात:--मुखम्-~वातवायु '-मभाद् पृष्टिः- -भत्रम्-मृवसत्यम् अम्भि-साम्माविमपर्मम्मारिपाठ 1-पृर्षि पाम्या पिपुर -विपुल-सुवसत्यम् --म्पाठिरम्नि । - स्तनपिस्नुर्पोपोन्वसम्पद -स्वमपिस्नु -सत्पम् रामाग्नि मुष्मदिवान्तर्गत 'मस्य वामीयम्' के तीम मन्त्रों का टिपिपा के साथ पिराप सम्बन्प है। इम के अतिरिकामपज-संदिता का कारीरीष्ठि प्रकरण मी भशत इष्ठिविधा पर प्रकाश राम पारे। परमेष शतपथ-गोपब-तापपारि भाषणों के बायोमय-सारण्यकादि पनिपावहिरोप स्पों में भी प्रदीर्म- कम्प से इस विधा का सटीकरण इक्षा है। रामविपारिष समी बिपा अषि वस्वपिसानों के सम्बन्ध में पदो पफ ऐमी मापन जिसके कारण ग्न विपाभी का हम मीमाठिवता समय नहीं पाते सकिन्न प्रकी पर प्रकरणों का पत्र समन्वय मही कर लिया गावा। पर समन्बय निपपेन महाममारम्म-सापस । भनन्यनिष्ठा से समर्म सानो गया पत्य मी पमा लिपा मावा, तबतक उन प्रबीमारियों का संपामसम्मको। एवं समर इन का संपामही दो बाता तबतक वनपाभों का पानी से परिमान असम्भव है। भाश्य ही इम मटिमवारे सिरण सम्परप में भी पुरापुग में पास्प, पक्पष - निगद, गापा, म्या' बादि वैसे म्पयन्त्र प्रत्यरोहोंगे, बिम में उन प्रकीर्मक मावों का, बिपाओं का एकत्र सपा या होगा। परन्तु दुर्भाग्य से भाव वो ये यस्पात्मक परिमापाप्रन्य हमारे रष्टिपथ से धर्वया विस्मृत ही होचुके हैं। पदार्प की एक महान् बतिस्ता है, जिसका निराकरण दो पारम्पत्तियों के स्वास शान से यमपि सम्भव नहीं। रोना यर पाहिम कि, बहुसंम्मा में योग विज्ञान मसम्म मन्त्रमासणारमकपणान-मन्मों तत्तस-विपातिपापक चलिगों का पृयक प्रवक रूप से संपर करें। सब का पत संप्रा करते हुए इन का समन्वय करें। अपाय ही इस दिशा में मटिमता दूर की बासकती है। बाहरण के सिमष्टिविधा को ही लीजिए। भस्पवामीपसूक के ५२ मन्त्रों में से कम मन्त्र ऐसे है बिम से पि पिणा के इस एक सिद्धान्तों का विश्पण हुमारे। तीनों मन्त्र मी एक साप पठित नहीं है। भपितु दीनों का क्रमशः ३६४०५१ पा सम्मा क्रम है। पड़ी स्थिति नन्य स्वमों की है। पही बह पटिलता बिस के बमुपा से मात ब्रामण के प्रत्येक प्रकरण में हमें अनावश्यक निस्वारदोफ पुनहन्तिोप का पिपरा हो कर भमुग न परमा पदहा है। परिणाम स्वरूप पाठकों के लिए हमारा पा सम्पपस्थित प्रयास सुविधा के स्मान में जटिलता का बनक मनवा बाया है। इस सम्पन्ध में हम अपनी भोर से इस से परिकथा निवेदन कर सकते है कि बाधक राके विद्वाम् सम्मिमित रूप से क पति अनुसार पदार्थ का समय नही कर पगे, तबतक एक दम्पचिपा की स्वस्पत्ति मात्र भाभार पर इस दिशा में सफलता पाप्त कर सना भसम्मपदी रोगा। इमार सम्पस्थित प्रकरण तो बस यह पुरपान सकते कि मिन Ele में भारतीय शास्त्र म मापा भनुमप ने मांग कि वरशास्त्र एक विमानशास्त्र, म्स में प्रतिपादित विधाएं प्राकृतिक नित्पशिान का विशेषण कर रही है। मिन कतिपय प्रतीच्य विद्वानों की पामरधि में मारतीय शास्त्र भपिक से ममिक भास्मनार का समर्थक, तमनुपायी टिमोगी बर्मानीन मा प्राम्य विम अपनी मिपि के वास्तविक स्पस्पशाम से बधित ते दुम इस प्रति म यस उदासीन ही रेवपितु इस का उपहास करना भी निम रे मीपन का पफ प्रधान पुरुषार्थ पना हुआ है अपश्य ही उनकी प्रान्तिकाये पम्पन स्थित प्रकरण भी मस्मिना मही दो मशत निराम्रण कर सकगे। एकमात्र इसी समाग 1. लक्ष्म से जान बूझ कर इस पद्धति का अनुगमन करना मेय पन्या सममा है। पिने पस्तुगत्या पिया को यस्पज्ञान प्राप्त करना है उन से धो हम यही निवे पन करगे कि क्षणिक का मिटाने वाले प्रस्तुत प्रयासों का एक ओर रखतेप भानुपूर्वी से स्वयं मूलपन्यों को ही पने स्वाध्याय का विषय बनायें। इस प्राम गिक निवेदन के साथ ही दृष्टिविधा के प्रतीक मों का दिग्दर्शन कराने पाठ निम्न रिसिव मन्त्र पाठकों के सम्मुम्न उपस्थित हो रहै-- 1-सप्ताई गर्मा मुमनस्य रतो विष्णाविष्ठन्ति प्रदिशा पिधर्मणि । ते धीतिभिर्मनसा व पिपमित परिमुवः परिमरन्ति विश्वव ॥ मुस १११५४१३५। १-कृष्ण नियान हरय सुपणा अपा बसाना दिवमुत्पन्ति । त आवश्यन्त्मदनारतस्यादिद् घृतन प्रथिवी म्युपते ॥ भूस० ११११४ ३-समानमतदफमधेत्यय पाहमि । मृमि पर्जन्या जिन्यन्ति दिव जिन्वन्त्यग्नय ॥ भूकस० ११२५४५१ पाही देर के पिए यह मान मीभिए कि भाकाशस्थ मेपा से मूपिण पर दो पानी बरसता है, यह पस्तुत प्रधिनी की ही दन है। भनिगम-मूपिण्डो केन्द्र से पहिरोऽग्नि ( माणाग्नि ) गुणोक (भावारा ) को मार निरम्वर गाया जाता हे पर प्रकरण मारम्म में स्पष्ट किया मा चुकारे । 'मग्निर्श इवा इष्टिमुदीर पति मिद्धान्त इसी सिदाम्त का स्पष्टीकरण कर रहा है। इस प्रकार पार्थिव बसमात्रा ( समुद्र मर मदिया, उप पापी ताग भोपपि-पनसति पार्थिव मामिरारीर भारि बादि में राने वाली असमा) पर की मार जाते हुए भनि रोऽग्निरे सम्पन्ध से पापाप में परिणत होकर ऊपर की थार मापा परती है। म प्रकार पापित भग्नि पार्धिष ममात्रको गुटोरकी मारल्यान में एक मिमिव पना दुभा ।

सम्पय दूसरा निमिच है-चा। पापिय मृण्ममय परमाणुओं का गुरुत्वाकरण भूपिणके निस नियमित अर्यप्रदेश पर्यन्त व्याप्त सवारे यहां तक दो पापि अग्नि ही पार्थिव परमात्रा को ऊपर लंच मेगावा है। म्यों म्यों असमात्रा उपर चरने लगती है, त्या त्या वा पारिप गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होती जाती है। पापियार्पण विमुक्ता पही मात्रा माम' है। उपर मान्तरिम्स बायु मी एक प्रकार का पाप्प दी है। मागे जान असमात्रा के अगमम का प्रेरक पही नाम वायु पनवा है। पपिपी से पुलोक पर्यन्त सप्तविष एम्पेनादियो विवत है। यही 'महापब कछापा है। नाडोल्प इसी महापम से सौर पदापों का प्रबम्ब- माग पपिपी में, पार्थिव पदापों का प्रबम्यमाग पूर्प में मुक्त होता रहता है। यही नाहीमाग उमय प्रजापतियों के विस्त भाग की पारसरिक सादान पदान हारा पूर्ति किया करता है। सौरपदार्थ, पार्षिकपदार्य, दोनों ही गदिशून्प है। इन का गमनागमन होता है नाड़ी मार्ग से ही, परन्तु निमिच पनवारे-वायु । सपागति मातरिशस नमक पायु ही भपने गति धर्म से दोनों का संचारक बनता है। दूसरे शम्मों में वायु-परातस पर प्रविष्ठित होकर ही मात्रा नाहीमार्ग से पुसोक की मोर मावी है। वीसरा निमित्त रश्मिया। सूपरश्मियां पार्षिक तलों का निरन्तर भादान किया करती है। इस बादान पम्मे से दी सूर्पमस्या में भुत इन्द्र- पावा-मग-पूपा–मावि १२ सौर प्राण बार-भाववाना' इत्यादि निर्वचनों से 'भाविरम पाए। समरसादानस्वदी भारिप का भाविस्पस्व-है। मारिस्परस्मियां ही नही है। मानप रश्मियो भूपाः पर संयम्न होती है। अपने स्वामाशिक सत्सपर्म के कारण मृतपस्मिक बम्पदि की मावि इस्वत न मार य रश्मियां इसी नियठ मार्ग से वापस पुगोक की भोर छोट बाती है। बाता मा सम्पपश्चिम सौर ते महा सावित्री कइसाया है, वहीं प्रविफरिख, साप ही पापिष अङ्गिगे ग्नि से समवेत पही सौरतेज पायत्री • प्रमेयम्मेण्यात. रपमेष प्रयोगलत पितमेव पुस्ससात परैर पालामारत. मामेव कनमम परतापरत-यस्मादिक-सव मा ११.१।

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Shatpath Khand-5 Bhag-2

Author
Sharma, Motilal
Title
Shatpath Khand-5 Bhag-2
File name
Shatpath Khand-5 Bhag-2
Text
OCR done
Citation
1942
Published
2011/08
Publisher
Jaipur City, Shribalchandra Electrike Press
Language
Sanskrit
Pages
94
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314048
Barcode
99999990312200.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
JoRV3nXEK8F
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