Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Gramay Arth Shastr
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ग्राम्य अर्थ-शास्त्र
(युस्मान्त के हाइम्यून और इटरमीडिरेट वार्ड की
हाईस्कुल पराक्षा के ग्राम्य अर्थशास्त्र के
लिये स्वीकृत)
लेखर
पडित दयाशकर दुवे, एम० ए०, एल-एल वो०
अर्थशास्त्र अध्यापक, प्रयाग विश्वविद्यालय
और
श्री शकरसहाय सम्सेना एम० ए०,
प्रिंसिपल, महाराणा कालेज, उदयपुर
ची० काम
प्रकाशर
नेशनल प्रेस
इलाहाबाद
१६४८
Printed by
RAMZAN ALI SHAH at the National Press,
Allahabad
717-948
1 भूमिका म उन व्यधयों में से हूँ ना अयशास्त्र ये पान या प्रचार टोटे दर्ने रे विद्यार्थियों में भी चाहते हैं । इमलिये मने अर्थशास्त्र मम्बधी कइ विषयों पर पाट अपनी 'बालवाच' पुस्तक में दिये। यह पुस्ता चार भागों में प्रका शित हुई और कई वर्षों तक युक्तमान्त र प्रारम्भिक पाठशालाग्रा के लिये पाट्यमय रे रूप म सीरत रही। मुझे यह सूचित करते हर्ष होता है कि इस पुस्तक के अर्थशास्त्र-सम्बधी पाठा का अ यापा और विद्यार्थियों ने बहुत पस द किया । दममे यह भी प्रसिद्ध गया कि अर्थशास्त्र ऐसा भरल विषय है, जिसका ज्ञान छाटे बचों को भी प्रारम्भिक पाठशालाओं में प्रासानी से कराया जा सकता है। अर्थशास्त्र का विषय सरल और महत्वपूर्ण दाने पर मी उसे प्रारम्भिक पाठशालायाचे पात्यायों म अमा तक म्यान नहा मिला । सन् १९१७ तक ता, निस बघ मैंने वी० ए० परीक्षा उत्तीर्ण की, यशान का बी० ए. से नाचे दर्जे की परीक्षा के पाठ्य विषयों में स्थान नहीं दिया गया था। उन दिनी अर्थशास्त्र के विषय का पढना बी० ए० क्लाम से ही श्रारम्भ होता या। इटरमीडियट तक पढने वाला को तो इस विषय रे ज्ञान प्रात करने का अवसर हो नहीं मिलता था। कुछ वप वाद श्रर्थशास्त्र को दटरमीडियट ये पाख्य विषयों की सूची में स्थान मिला और सन् १६४० से ग्राम्प ময়ম का युक्तपात की हाईस्कूल परीक्षा वे पाख्य विषयां की सूची म भी स्थान मिल गया है । इस ग्राम्य अर्थशास्त्र रे पाख्य क्रम पे अनुसार ही यह पुस्ता तैयार की गई है । पुस्तर का तृतीय सस्करण इसी वर्ष।
प्रस्तुन चतुप सस्करण इसकी उपयोगिता तथा प्रचार का द्योता है । इसमें
यथोचित मुधार तथा सशाधन मिया गया है।
इसमें जमीदारी प्रथा की बुरादयो को रोक्ने तथा सत में उममा त
कर देने पे लिए सरकार की तो योजनाएँ हैं उनका यथा स्थान उल्लेख
पर दिया गया है। महसारी ममिति सम्बधीश्रयायों में भी उचित मुधार
किया गया है।
महाराणा कालेन उदयपुर के प्रिंमिपा श्रीशार महाय जी सक्मेना फे
सहयोग से यह पुस्तम तयार की गई है। हम लोग प्राथा करते हैं कि इस
पुम्नर से हाइम्पल य वद्यार्थियों का ग्राम्य पार्यशास्त्र का विश्य समझने
म पहले से अधिक सहायता मिलेगी।
इस पुस्तक ये लिपने म मुझे श्री महेशचन्द्र श्रमपाल एम० ए०
वी० एस-सी धानस 'विशारद' लेक्चरर, प्रयाग विश्वविशलय, से जो सहायत
मिली है उसपे लिये में उना कृतश हूँ।
यदि फोर सजन इस पुरनक को घटियों की तरस मेग प्यान याकर्षित
परेंग या इसको और अधिा उपयोगी बनाने पे उपाय बतलायेंगे तो
उना बहुत आभारी होऊगा।
श्री दुर निवाग
दयाराकर दुवे
दाराग (प्रयाग)
শল্প খােব
१५ सितम्बर १६४-
प्रयाग विश्वविद्यालय
विपय-सूची पहला अध्याय अर्थशास्त्र विभाग मनुष्य की श्रावश्यक्तायें--प्रकृति देने वाला है-अय शास्त्र-अर्थ शाम के विभाग- अयशास्त्र क्या है ?--उत्पत्ति-उपभोग-विनिमय-वितरण - साराश-अर्थशास्त्र के अपयन से लाभ--अभ्यास के प्रश्न दुसरा अध्याय परिभाषाएँ धन या सपत्ति-केवल रुपया पैसा ही धन नहा-~-सम्पत्ति-वृद्धि- सम्पत्ति और मुग-उपयागिता-मीमात उपयागिता-मूल्य - कीमत- पाय-अभ्यास रे प्रश्न १४-२० तीसरा अध्याय उत्पत्ति उपयोगितावृद्धि- भूमि -श्रम-श्रम की उपयागिता-श्रम विभाग- पूजा- प्रवध-माहस या जोसिम-अभ्यास के प्रश्न २४-३६ चौथा अध्याय खती भारतीय गोवा की सास पैदावार--भारतीय भूमि की पैदावार की कमी- पैदावार की कमी के कार--मेता का छाटे काटे मोर दूर दूर होना--ग्येती म क्या करना पडता है ?- ग्रामीण उद्योग धधे--अभ्यास पे प्रश्न ३०--४७ पाँचौं अध्याय घरलू उद्योग पधे घरेलू उद्योग धधे की प्रायश्यक्ता-कुछ हि दोस्तानी उद्योग धधे वरतन वना-चटाइ और टोकरी बनाना-गुड़ बनाना-चर्खा कावना - - और कपड़ा बुनना-पशु पालना नाम --मापन और घी-रस्सी बना-लकड़ी का काम - लोहार का साम-लेली का काम जूते वाना-पल, फूल और तरकारी पैदा करना -शहद राधा -अयउयोग धधे -घरेलू उद्याग धथे और सरकार-अभ्यास ये प्रश्न-- छठवाँ अध्याय श्रावश्यस्तायें श्रावश्यक्ता ग महत्य-श्रावश्यक्ता और इच्छा-यावश्याता और उद्योग-श्रावश्यस्ता लक्षण ~~-यावश्यक्ता पे भेद-भावश्यक्ता की पति - श्रायव्यय-~वचत-अभ्यास र मश- सात अध्याय भारतीय रहन मान का जा रहा-महापादना-भारतीय रहन मद्दन 1 दजा-रहन महन का हा ऊँचा पाने का उपार~पारिवारिक वाट -विमान का सच-गाँव ये मजदूर और उस पर गौर र कारीगर या व्यय -अम्पाग पे प्रश्न-- थाठवाँ अध्याय भानन जितना सौर पैसा? भामा की यावश्यक्ताची पाटी, चीनी, और विरामिन- माना पेभेद-उपयुध मानाTI मात्रा -अभ्याग र प्रश्न नयाँ अध्याप विनिमय यात्रा की अगवानी -मान पी गदोर विक्री -यासार- बजार का घेर ~ की किंग प्रश्चिय हाती-गेमे पदापों का कोमल-नगरे ---१६ दसवाँ अध्याय प्रामीण फमल की विकी प्रकायन--विक्री गोवा-मडी में फगल को विको गाँव में कला वस्तुओं की विक्री~ग्रामीण -- मदारी मस्यायें और विक्री-प्रामीण बाजार-शराय का मेलाहाट और मेले महाय-हार और रेल पा सगठन- अभ्यास रे प्रशा-~ १००-१० ग्यारहवाँ अध्याय पितरण वितरण क्या है ?-खेतो में वितरण लगान-~मनदूरी --- मुनापा-अभ्याम ये प्रश्न- १०६-११६ यारहवाँ अध्याय पटाई प्रथा विश्य प्रवेश-पटाइ प्रया क्या है ?-इटाई को दर-वाइ प्रयापे पुथ दोष-मरदूरी सम्बधी बटाइ-वराई और राति-रिवाज अभ्याट छ प्रश्न- ११६-१०० तेरहवाँ अध्याय जमीदार और क्सिान स्थायी बन्दोवस्त--यगार काफ्नादरमीशन-प्रत्यायी वदोक्ल--- अर्मादार भोर किसान-नगार और नाराना-समीदार रे व्यपटपारी पे कागजात-शनरा मिलान-खमरा-स्याहा-बदीसाता निसवाR--- सतौनी-खेवट- पटवारी के श्रय कार्य-अभ्यास ये प्रश्न-~१२४-१५ चौदहवाँ अध्याय ग्रामों की समस्याश्रो सदिग्दर्शन पन्द्रहवाँ अध्याय किसानों का निराशावादी -ष्टिकोण निराशावादी दृष्टिका ए-अभ्याम चे प्रश्न- सोलहवाँ अध्याय गौर की सफाई ताल व पासरे--साद के गाहे-- शौचम्यान-नावदान तथा नालियां की समस्या--घरों में हया और रोश का प्रयध- गाय की सड़क- गांव में घुशल दाइयां की समस्या-गाँव म सपाई और स्वास्थ्य रक्षा की योजना-अभ्याम थे प्रश्न-- १४६-१७ सत्रहवाँ अध्याय प्रामाण शिक्षा मामाण शक्षा- मानेंट रिपोर-- तालीमा सघ-अभ्यास प्रश्न-- प्रठारहयाँ अध्याय मरान प मापन गाँवों का मेल-हटता। गेन -गाँव का माउट ट्रेप--मनन तपा मजन महादा-नाटय वा प्रमन- रतिया-~मतिले तया गिोमा सा---प्राम सेवादन-परा का यधर यापपर बनाता-अम्माम ५ उन्नीसयौँ अध्याय पीसों अध्याय पशुपालन गौर में गाय और पैन का महत्व -गोया की प्रतहीन दशा--- वश की हीन दशार सारण प्रापशाला से अधिक येन-चारे की मी- साईलेज याने का उपाय -पशु रोग -~-गाय और रेलो की नस्त- निता बोद द्वाग सहायता--महारी नाल-मुहार ममितिया--माम मुधार विभाग- गाला-गो सेवा सुध - अभ्याम य प्रश- १८१--१६३ इक्कीसवाँ अध्याय मेनी की उन्नति ये उपाय पिकी गिरी दुइ दशा-पि रे श्रावश्या माधन- -मूनि-पूजी-- श्रम तथा रागटा-छाटे हाट विसर हुए सतोको समस्या-साद की समस्या - दी की रसद हर सादर की साद-पसलों का देर मेर - पशुधन--रोतारे 47-~वानसिचाइवा का जन-जुश्राचे द्वारा सिंचाइ-सयुत्तमात में ट्युव वेल-हर के द्वारा सिचाइ-तालाय .....साय-श्रम और मगटन पमलो पे शन-सेती ॥ पैदावार यचने की समम्पा--गांवों की सह-मटिया का पुनसँगटा-frum को मत तथा परिश्रमी हाना चाहिये~~-अभ्याम ये प्रश्न---- १६३-०१६ चाद्दसौं अध्याय मुस्दमेगानी मुक्दगे बानी--पारपर गृह-मगटिन गाय पचायत--अभ्यास ये प्रश्न- १६-२९६ तेइसौं अध्याय प्रामवामियों से मुक्त करना ग्रामवामियोस ऋणमुक्त वग्ना-महायुद्ध पार ऋणु-कानदार हाने ऐ कारण अनिश्चित सेतो-ला को मृत्यु --सामाजिक तथा धार्मिक मृत्यों में अधिक एप परना--मुस्दमेवानी -~-ATTE और मालगुजारी सरकार द्वारा ऋण की समस्या का हल करने का प्रयन-मण परिशोध- - - - महाजन लायसेंस कानून-अभ्याम पे प्रश्न-परिशिष्ट -प्रामीण धधे-ग्राम उद्योग सघ---गाँव मनाने जाने मी अमुविधा-अभ्याम रे प्रश्न- २२०-२३३ चौबीसवाँ अध्याय कृपि-विभाग के कार्य सपि विभाग कासगटन और उमका काय श्रभ्याम से प्रश्न- २३३---२३८ पच्चीसवाँ अध्याय ग्राम घोर जित का शासन माम शागन, ग्राम मुख्य कम पाग-मुपिया-पायारी-चौकीदार -तहसीलदार--देहावी यार्ड योर जिला मिल--निगाचय और सदस्य निला चोह ये कार्य-पिला वार्डो मी श्राय-~-गरकारी नियन्त्रण नागरिक भावों की पावरपरता--पिले पा शामन--शामा व्यवस्था में जिले या स्थान -जिला मनिस्ट्रट पे याय -निले र अप रर्मचारी -कमिश्नर- अभ्याम पे प्रश- छपीसौं अध्याय गाय याला या पारम्परिक मगध मादार और रिमानों या मम्य प-महानन और किमा--गाँर वाला मापारमा मायाप की गाथाएँ और उघ महच -पचायते-- पंचायती रयागायुमें पचायने -यतो पयरने हा-पनायत की मानता य आय -युलमान का पराया राज्य एट-- गमा-गर पागप पाप-कर- पगया अदाना- मत्ताईसौं अध्याय ( . ) कार्य-ममित का पूजी-ममिति थे गातांत्रों का अवैतनिक होना- - मति का पावनिधारित करना समिति द्वारा ऋण देने रा- मितियों का प्रार-अय निराधा-पि महकारी मान्य समितियां दी मिना हुई मुविधाये या सपि साप ममितियां साल हा रही है। श्रभ्याग र प्रश्न- २५३-२६६ अट्ठाईसवाँ अध्याय गैर-सास कृषि सहकारी मातियों सहकारी कर विक्रय समिति---ऋय समिनियो-रिक्रय समितियों- झिप ममिनियों का सगठन-- न--भूमि की चावदी कग्ने याली समितियाँ -- चकवादी ममिति की स्थापना--रहन-सहन सुधार समितियो-उपभोका सहकारी स्टोस-~सहकारी मगर्स , मुरर नियम-भारत में उपमाकर स्टार--मद्रास म स्टार्स की अमाता रे मुख्य कारण-मद्रास का ट्रिपली बेन स्वार--महायुद्ध और स्टोर्स--अभ्यास रे प्रश्न- २६६२८८ उन्तीसौं अध्याय महकारी ममितिया के यूनियन गारटी युनियन-नुपरवाइजिंग यूनियन -प्रान्तीय महमारा यूनियन -अभ्यास ये प्रग्न- २८९-२६२ तीसवाँ अध्याय सैन्टल सहकारी बैंक गधारण सभा -वाई श्राr डायरेक्टर्स कायगीन पूँजी-अभ्यास के प्रश्न- २६२--०६७ इकतीसवाँ अध्याय प्रान्तीय महकारी बैंक प्रातीय सहकारी बैं-अभ्यास रे प्रश्न २६७०-३०० बत्तीसवाँ अध्याय उहकारिता यादोलन की दशा । ३००-३०० CLASSIFIED CONTENTS (According to the Syllabus of Rural Economics and Co-operation for the High School Examination of 1949 and subsequent year prescribed by the Borrd of High School and Intermediate Lducation, UP ) विपय सूची, स्वीकृत पाठ्यगाम के अनुसार Introl uction ( विषय प्रवेश १-२३) Subject-matter of Economics अर्थशास्त्र का विषय)१ १३ Wealth (धा या सपत्ति) Wealth and prosperity (गपत्तिशीर गुप सवृद्धि । १६१८ Utility (उपयागता) Value (मूत्य) Price (कीमत ) Income (प्राय) ३ Production (उत्पत्ति) ४६' Essentials of Production (उत्पति र श्रावश्यक श्रग) Their nuturo and function in agriculture anal handicraft industrins ( ITT TT TT 6711 घरेलू उमा पो में पाय) A surioy of the principal crogiu of an localits (रिसा या मुर पता या यणा) Los veld of the intl anrl nt 10६६५ । मूमि की शापार की कमी और उमर पाग) Sub 111 111011 2010 frontation of holdings गोगो टुन दूर पर Important Cott in Industry Products ( Tr परेलू ilो । 1....hinni Raपाल) ४.६० (11) Rope making (RE: वाना) Cotton-spinning and weaving ( चसा पातना और कपड़ा उनना) ५१-१२ 'Panning and shoe-making ( चमड़ा रमाना पोर जूने बनाना) ५८५८ Wood work ( लाड़ी का काम ) Ghee and milk-production (घी और दूध काम) १२-१८ Methods of agricu ture, uquipment, agricul tural technique and rural industries (wat watt सेता का विशेषताएँ और ग्रामीण उद्याग घधे ) Consumption ( उपयोग) ५८२ Wanıs, Income, Satisfaction of wants (7197- यकताएँ, श्राय, श्रावश्यकताओं का पूर्ति ) ६२७३ Classification of wants (आवश्यक्ता रा वर्गीकरण ) ६६६६ Savings (उचत) ७०७३ Budgets of consumption of farmer, village artisan and village labourer(क्सिान, ग्रामीण कारीगर और ग्रामीण मजदूर का बजट) ७७-८२ Standard of living (रहन सहन का दजा) ७४-७६ Essentials of a balanced diet (उपयुक्त भोजन की श्रावश्यर यस्तुएँ) ८३८७ Excharge ( विनिमय) ८८-१०८ Barter( वस्तुओं की अदला बदली) Purchase and sale ( वस्तुओं की सरीद और विका ८EET Market and extent of a Market (वाजार और बाजार का क्षेत्र) ६१६३ Determination of price in the existing rural condition ( वागार में वस्तुओं ये मूल्य का निर्धारण) ६३६८ ( 1 ) Marheting of agricultural produce and dispo. srl of village handicrafts (मामीण पसल और घरेलु उद्योग- पधो पे पदार्यों की विकी) १००१०६ Its draw-bachs and iniprovements (THT 417 vite उसकी उमति Village markets, hats and fairs (ग्रामीण बानार, हार और मेने) १०४ १०७ Thoir utility and organisation (3471 JT 771 और रोगटन) Distribution ( वितरण) ११० १३८ Shring of Agricultural income (पेतो की याय का वितरण) Ront (लगा) Interest (पद) Wages (मादूरी) Profit (मुनगा) Barter system and abuses of batar (गर प्रमा और उगरा दुरुपयोग) System of payments to villngo workers (ग्रामीण वाम पर पानी की मादूरी गुगाोया तरीस) Customs and traditions and their effects on ccononue condition (राति रिवा पा प्रार्षिक दशायापर प्रभार) Land tenure (मानगुनारी गा) Relation between 21mindır and ten ility (नगर घोरगान का गय) Patwari papers(पायारी पकान ) १३४१३७ Village Leonony ( प्रामीण ममस्यायें): ६ Villige problems ( FIFT PRETTIG Sat stion (मरार) (1) Education (शिक्षा) Recreation ( मनोरजन) १६५७० Personal hygiene and its principles (स्वास्थ्य-रक्षा और मर सिद्धान्त) २७२८, Cattle problems ( पशु पालन) Agricultural and cattle inprovements (at श्रोर पशु की उनति ८३२.५ Disputes (मुस्दमेवानी) १६००६ Indebtedness and its causes and remedies (प्रामाण कर्ज, उमर कारण और उगरे कम करने 7 उपाय ) २०२३० Village and district administration (ग्राम और निला शासन) २२८०४१ Relation of the village people between them. selves (गोर यालों का पारमारित सवध) ०४२०५६ With the administrative officers (गाव वालों का सरकारी ग्राम से सवध) २३८२४: Ausociations and their importance in curul areas ( गाँव की मुम्याएँ और उनका महत्व ) २४६ Punchayats and their functions ( पचायत और उनकाय) २४६-२५६ Cooperation ( सहकारिता ) २५७-३०० Co operative Credit Societies (DEFRI arginaal) २५८२५६ Primary Agricultural Credit Co-operative Societies, their organisation and working and effects in India (प्रारम्मिा पि सहकारी साप समितियां, उनकी व्यवस्था और कार्य) २५६२६६.
( 7 )
Agricultural and Non-credit Societies (HC 877
अपि महकारी समितियों)
२६६-२८७
Co-operative Silo Ind Purchase Socioties
(सहारी कर-विक्रय ममितियाँ)
२७१२७६
Cooperative Better Living Societies ( रहन सहन
मुधार समितिया)
२७६-२८१
Consumers Cooperative Stores ( उपमाता सहकारी
मोस)
२०१२८७
Union of Co oporative Societies (HEFII siaradi
पे पूनियन)
२८६२६२
District or Central Banks (निला या पेन्द्रल महकारी
बर)
६.०६६
Provincial Cooperative Banks (प्रातीय राहारी
-६७३००
मारिता था दालन की दशा
३०. ३.२
4)
ग्राम्य अर्थ-शास्त्र . पहला अध्याय अर्थ-शास्त्र के विभाग मनुष्य की आवश्यकताएँ (Human wants) मनुष्य को दूसरे जीवधारियों की तरह हा छ श्रावश्यकताएँ (wants) होती जि है पूरा किये बिना वह जीवित हा नहा रह उक्ता । उसको ग्वाने के लिए मानन, पाने के लिये पाती, साम लेन के लिए हवा, शरीर रक्षा करने के लिए मान और पपड़ा चाहिये नहीं ता उमका जीवित रहना कठिन हो जाएगा । यह ऐसी अनिवार्य आवश्यकताएँ (Necessary wants) है जिनको पूरा किये बिना मनुष्य जीचिन हा नहीं रह सकता । इनको मुरप श्रावश्यक्ताए (Primary wants) भी कहते है। परतु पशु और मनुष्य में यहा भेद है कि पशु इन अनिवार्य श्रावश्यक तायो (Necessary wants) का पूरा करन रे उपरान्त और कुछ नहाँ चाहते । किन्तु मनुष्य केवल इन श्रावश्यक्तानो मे ही पूरा करके रुक नहीं आता । जहाँ यह अनिवाय अावश्यकताएं पूरी हुई कि मनुष्य को और नई श्रावश्यकदाएँ अनुभव होने लगती हैं और वह उनका पूरा करने की चिन्ता में लग जाता है। उदाहरण के लिए मनुष्य को कुछ माजन जीवित रहन के लिए आवश्यक है परन्तु जब मनुष्य भाजन करता है तो वह पटिया बढिया मियन और अच्छे भोजन की इच्छा रखता है । केवल रूवा सूग्वा भोजन ही उसकी हाप्त नहीं करता । इसी प्रकार पुछ वपना शरार का रक्षा के लिए नितात श्रावश्यक है पर तु मनुष्य केवल अपना ता ही नहीं ढक्ता वह , बटिया-बढिया डिजाइन के पैशनेरिल वस्तु मा चाहता है । कहने का मतलब यह कि मनुष्य की प्रापश्यकताएँ असीमित है ! उनकी कोई सीमा नहीं है।
प्रकृति (Nature) देने वाली है। मनुष्य को प्रावश्यम्दानों को पूरा करन के लिए जिन वस्तुग्रो की बरूरत हाती है वे हमें प्रति से मिलती हैं। जिन्नु प्रानि कुछ वस्तुयो को इतनी उदारता स हमें देती है कि उनके लिए मनुष्य को कोइ प्रयत्न नहीं करना पड़ता। उदाहरण के लिए. हवा, धूर श्रार पाना हमें इतना अधिक राशि में मिनती है कि उसर लिए हमें कोई कोशिश नहीं करनी पटती। परतु अप वस्तुओं को पर हम प्रकृति स हा पाते हैं परन्तु उन निय हमें प्रयत्न करना पड़ता है। बिना प्रयन पिये प्रति हमें उनको नहीं देगी । इसी लिए हम देखते है कि मनुष्य वगर अरनी श्रावश्यकतानां का पूरा करन के लिय प्रयत्न करता रहता है। उसका यावश्यक्ताओं का कमा श्रत नहीं होता है । इस कारण यह लगातार प्रयत्न करता रहता है और अपनी प्राध्यापिका उपाजन करता है। यही कारण है कि हम प्रत्यक्ष मनुष्य को धन दुधमा काम करते देखते हैं मिनिसते व अपना और अग्न परिवार का पालन पोषण कर मर । कोई डाक्टर है तो कोई वकीन, कोइ इ का डाम करता है ता का मिट्टी के बवन बनाता है। मनुष्य जिन वस्त्रों का उग्न करता है उनको बदल कर वह उन पम्नुयों को लेता है जिनकी उन श्रापश्यकता होती है। उदाहरण के लिए कुम्हार किमान म गहूँ लकर अपने मिट्टी के पतन देता है इत्यादि । श्रशाम्र (Economics) अब अयशास्त्र क्या है इसको हम ममम सस्ते है। अयशास्त्र वह शान है निममें हम मनुष्य के उन प्रयनों का अपयन करते हैं जो वह अपनी पारश्यकताया को पूरा करने लिए करता है। यदि कोई मनुष्य अधिक प्रगल करना है तो वह अपना यहुन मी श्राव रनामों (vants) को पूरा कर लेता है और यदि वद थाहा प्रयत्न करता है ता को कम श्रापश्यनाएँ ही पूरी हो सकेंगी। दूसरे शब्दों में पहला श्रादमा अमार हागा और दमरा रार होगा । यहा दया एक देश की होती है अगर किमी देश के लोग अधिक प्रयत्न करे प्रात 1 बटन मी वस्तर प्राप्त नहीं करते तो वह देश निल्न रहेगा । अथशास्त्र में मनुष्य के इन प्रयत्नों का ही अध्यया दिया जाता है । इसलिए अर्थशास्त्र के अध्ययन से हमें यह भी मालूम हो साता है कि हम निधन क्यों हैं और किस प्रकार घना बन सकते है। सर म हम कह सक्त है हि "अर्यशान यह शाम्बी है जिसमें हम मनुष्य के अपने पानन-पोषण के लिए किये गये प्रयत्नों का अध्ययन करते हैं। अर्थशास्त्र के विभाग यह तो हम पहले ही कह चुरे है कि मनुष्य अपने और अपने परिवार वालो के भरण औरण के लिए जो प्रयत्न करता है उनका प्रथशास्त्र में अपयन दिया नाग है। यह प्रयत्न चार विभागां में औटा ना सकता है- (१) धन (wealth) की उत्पत्ति करना (Production),२ घन का उपमांग करना । (किमी चाज का वर्च करना) (Consumption), ३ विनिमय (Exchange) अथात् किमी वलु का मोन लेना, ४ पितरण (Distribution) श्रयात उत्पत्ति का बटवारा करना । उदाहरण व लिए विद्यार्थियों में से ऐसे बहुत से होंगे निनो पितानी नौकरा करने, वकालत वा डाक्टरी मे धन उत्सन्न करते हैं । अर्य-धास्त्र (Economics) क्या है ? क्या कभी तुमने यह भी सोचा है कि तुम्हारे पिता की इन पो को से पैदा करते हैं और इनको रेसे ग्वय करना चादिए । क्या यह अच्छा होगा कि तुम्हारे पिता जी, तनाह पाते ही मर रूपयों को खच कर दें। नहीं, क्योंकि ऐसा करने से महीने भर का ग्वच कैसे चनेगा ? क्या तुम्हारे पिता जी सर को मुफ्त में ही बॉर देते हैं । क्या वे रपये के बदले में कुछ नहीं लेते ? र नुस् मही में अनान खरीदने नाते हो ता सये के बदले में गेहूँ, चना, मटर, चायन श्रादि चाजे वरीदते हो। तुम लागों में से बहुत मे गोंडा के रहने वाले हैं। वा विमान सेती र अनान की उत्पत्ति करते है। नव पसन क्ट कर खलिहान में श्रा नाता है तो अन का योडा सा हिस्सा तो साने के लिए पर में रख लिया जाता है और एक बहुत बड़ा हिस्सा व्यापारी के क्षय के. दिया जाता है बेकन एक बात और है। रन सपदे पदने वलिहान पर-नाज धोनी, मालगुनार, महाजन यादि का घावा होता है। शहर को तरह गांव में राऊ, घोचो, बढइ वगैरह को नकद पैसा तो मिलता नहीं । घर पीछे उनका हिस्सा बघा रहता है। फसल क्ट जाने पर अनाज में से पहले उनका हिस्सा निकाल देना पड़ता है। महाजन जिनसे किसान रुपया उधार लेते है सूद की जगह अनाज ही ले लेते हैं। ऊपर दिये हुए उदाहरण से यह साफ हो जाता है कि हर एक मनुष्य जो अपने भरण-पोषण घे लिए प्रयत्न करता है अपात् कोई धधा या पेशा करता है उसको सर से पहले घन पैदा करना पड़ता है फिर यह उसके बदले उन चाजों को मोल लेता है जिनकी उसको नारश्यकता है पिर वह उनका उपभोग करता है अर्थात् काम में लाता है या वचं करता है और यदि उसने कुछ और लोगों की मदद से धन की उत्पत्ति की है तो उनका हिस्सा बाँटना पड़ता है । साराश यह है कि श्रथशास्त्र के अध्ययन के लिए हमें उसको चार विभागों में बाँट लेन चाहिए- १ उत्पत्ति (Production) २ उपभोग (Consumption) ३ विनिमय (Exchange) ४ विनरण (Distribution) अप हम आगे इन चार विभागों के सम्बंध में विचार करेंग। उत्पत्ति (Production) हम ऊपर यह श्राए र अर्थशास्त्र हमें उ पास के बारे में बहुत कुछ रतलाता है, पर यह उत्पत्ति है क्या क्ला १ क्या देवल किसान ही का सम्बध उत्पत्ति से है ? नहीं, दर्जी, मुन्नाहा, बटई, हलवाइ, सबके सब उत्पत्ति कार्य करते हैं। जुलाहा क्या करता है ! वह रुइ रेशों को इस प्रकार मिनाता है कि कपड़ा तैयार हो जाता है । दर्जी उस कपड़े को क्या करता है ? वह श्रापके बदन का नाप लेकर उस कपड़े को काट छाँट पर इस प्रकार से सा देता है कि उसका बनाई हुई कमीज व कोट श्रापके बदन पर ठीक जिट कर जाती है । इसी प्रकार हलवाइ मैदा, खोवा, चीनी वगैरह को इस प्रकार मिला कर भाग पर भून कर तैयार करता है कि मिठाइ यन जाती है। बढइ लकडी और कुछ कीलों को इस प्रकार मिला देता है कि हमारा इल, साट, कुर्मी या मैज बन जाती है। कुम्हार गीली मिट्टी को चाक पर इस प्रकार से संवारता है कि सोरा, फाइव हाँडी तैयार हो जाती है । किसान को ही ले लो। यह थोड़े से बीजो से मनो अनाज पैदा करता है। परतु कैसे ! यह बीज को एक ग्यास ढग से खेत में रमता है। फिर इस प्रकार से खाद व पानी डालता है कि बीज उनके तथा हवा के श्रशों को लेकर अपना घेष बदल डालता है। उसमें से एक छोटा सा पौधा फूट निकलता है और यह पौधा अन्त में अन्न पे सैक्डो दाने पैदा करता है । कहने का मतनार यह है कि कोई भी अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता । विमान से लेकर, जुनाहे श्रीर दी तक सय के सर पहिले से प्राप्त किसी वस्तु को हम प्रकार से रयते है कि उस वस्तु की उपयोगिता बढ जाती है। जहाँ पहले ग्इ हमारे यहुन कम काम की रहती है, वहीं रुई की कमीज या कोट कोम अपना बदन ढकने में उपयोग करते हैं। इसलिए किसी वस्तु की उत्पति से हमरा मतलब होता है उसे और उपयोगी यनाना । मान लोगिए अापरे खेन के छोर पर प्रापका एक पुराना सूवा पेट खड़ा है। श्रार उसे चना चाहते हैं और श्याम श्रापको चीस रुपए देने को तैयार है। श्रापको दाम कम जंचता है और श्राप स्वय पेड़ काट पर उसके तरने बना डालते हैं । इन तरलों को श्राप तीस तीस रूपए में बैंच सकते हैं । पर यदि आप इन तख्तों से चौसट, कुर्सी, चारपाई श्रादि बना डालिये तो श्रापको पचास रुपए भी मिल जाएँ तो कोद श्राश्चय नहीं। लेकिन श्रापने इतने समय तक किया क्या? उस पेड़ की लकड़ी का वो बढा ही नहीं दी । उल्टा श्राप उसे काटते छौटते रहे। हाँ, अापने उस लकड़ी की उपयोगिता अवश्य बढा दो । यहाँ पर पिसा प्रकृति से प्राप्त की हुई वस्तु की उपयोगिता पड़ाते रहे हैं। लेकिन अब यकील साहर हमारा मुकद्दमा जीत जाते हैं, जब बाह्मण महाराज हमारे लिए कोई पूजा कर देते हैं अथवा जब पुलिस का श्रादमी हमारे जान माल का रखवाली करता है, तब तो शायद किसी वस्तु के रूप में परिवर्तन नहीं होता। उपयोगी तो ये सेवाएँ भी होती है परन्तु यह ऊपर से बताइ वस्तुत्रों से मिन है। इनसे हमारी विविध प्रावश्यक्ताएं सीधी सीपी पूरी होती है। पहले दिये गए उदाहरण अथात् किसान का अनाज पैदा करना, दजी का कोट सीना, AZT #1 Eat aarar hf 114 (material-production) उत्पत्ति पे उदाहरण हैं। लेकिन वकील, पुलिस, मास्टर वगैरह के काय श्रमौतिक उत्सत्ति (Immaterial production ) के अन्तर्गत शामिल किये जाते हैं । भौतिक उत्पत्ति करते समय किसी वस्तु का रूप, स्थान आदि बदल कर उपयोगिता की वृद्धि की जाती है। अभौतिक उत्पत्ति के लिये सेवाकार्य किये जाते हैं कि जिससे मनुष्य की आवश्यकता सीधे सोये पूरी हो जाती है । उत्पत्ति किस प्रकार होती है । उत्पत्ति करने में को। कौन मदद करता है, किस क्सि शक्ति की जरूरत पड़ती है इत्यादि सवालों का जवाब मा इमें अर्थ शास्त्र से ही मिन जाता है । यह तो सब काई जानता है कि प्रत्येर काम के करने म मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मेहनत किम वस्तु पर की जाती है ? महनत करने का सब से सीधा उदाहरण है-घूमना या दोड़ना । घूमते या दौडते समय श्राप हवा में तो चलते ही नहीं। चलते हैं जमीन पर ही । श्रतएव यदि यह कहा जाय कि किसी भी कार्य में महनत श्रोर भूमि दोनों की आवश्यकता पड़ती है तो गलत न होगा । बहुधा यह देखा गया है कि काम करने में श्रादमी किसी चीज की मदद लेता है और वह भी इसलिये कि काम करने में मुभीता होता है । लक्हारा जगलों में जाकर उन लकडियों को बटोर कर बैंचने ला सकता है जो भूमि पर टूट पड़ी हो। पास बचने वाला हाथ से घास उखाड़ उग्वाड़ कर जमा कर सकता है। लेकिन यह वाहता है कि पास छोलने में श्रासानी हो जाय, अथात जल्दा जल्दी घास छीलने लगे और इसी कारण से वह खुपों का प्रयोग करता है । इसी प्रकार से लकड़ी याला कुल्हाड़े से काम लेता है । सुर्षी और चुल्हाडा मोल लेन के लिए रुपया खच करना पड़ा है। इसलिए ये दोनों चीजें धन के रूप है। सेती करने में भी इसी प्रकार भूमि, श्रम और पूंजी की जरूरत पड़ती है। यदि खेत की जमीन न हो तो किसान बीज कहाँ बोवेगा ! वह इल, बैल, पावड़, हसिया, खुरपा के रूप में धन लगाता है और स्वय मेहनत करता है। पर तु इन तीनों के अलावा उत्पत्ति के किसी कार्य में प्राय व साहस मी स्थान रखते हैं। हमारा खेतिहर यह निश्चय करता है कि खेत में कितना पानी डाला नाय । खेत को कितना गहरा खोदा जाय । क्या बरसात में बेत का पानी बह कर निकल जाने दे अथवा उसे खेत ही में रहने दें कौनसी फमुन योना ठोक होगा। इन सब बातों का प्रबंध तो किसान करता ही है परन्तु किसी किसी समय वह किसी बात का निश्चय नहीं कर सकता । मान लाजिये कोइ जमीन रामू किसान के पास नहीं थी और इस साल उसने उसे माल ले ली । उस भूमि के बारे में रामू सब बातें नहीं जानता। क्या यह उस टुकड़े को जमीन के और टुकड़ों से अधिक गहरा ग्बोदे ! क्या वह उस सेत में अधिक खाद व पानी डाले या कोई नद पसल पैदा करेजा उम+ पहले कभी पैदा नहीं की है। इन सब बातों में रामू को साहस से काम लेना पड़ना है । इस तरह से उत्पत्ति (Production), में मि (Land), श्रम (Labour), धन अयान पूजी (Capital) प्रबार (Organisation) और माइस (Enterprise) नामक पॉच शक्तियाँ काम करती है। उपभोग (Consumption) उत्पत्ति का अर्थ समझ लेने पर अब हम उपभाग समय में पिचार करते है । रामू किसी त में क्या योगा, इससे अब हममे चिनकुल मतलब नहीं । वह स्वतंत्र है। चाहे वह गेहूँ यावे, चाहे चना, चाहे जो या याजरा । मान लीजिये यह गेहूँ पाता है। पसल के पक जाने पर किसान गेहूँ को काट- माड़ कर घर में लाता है। घर वाले उसको पीस कर रोटियों पाते हैं और सब कोई उसे ग्वाते हैं। खाने से किसान की भाव मिट जाती है। उसे एक तरह का सतोर मिलता है और हम कहते हैं कि मिसान ने रोटी का उपभोग किया। आमतौर पर उपभोग से रिसी वस्तु का उपयोग करने या सेवन करने का मतलब निकाला जाता है । लेकिन अर्थ शास्त्र में उपभोग के मतलब कुछ और ही होते हैं । मान लो तुम्हारे पास रोटी का एक टुकड़ा है। उसे तुम सा मी सकते हो और श्राग में डाल कर जना भी सकते हो। दोनों हालत में कहा जाता है कि रोटी का उपभोग हो गया लेकिन अथ शास्त्र के मत देवल जव रोटी पाई जाती है तभी उसका उपभोग समझा जाता है अपथा नहीं । रोटी खाने से तो मनुष्य को एक प्रकार का सतार मिलता लेकिन यदि रोयो भाग में जला दी जाय तो किसी की भारश्यकता पूरी नहीं होती और इसलिए किसी को सन्तोष नहीं मिलता । रोटी खाइ जाय अपना जलाई जाय दोनों हालत में उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाती है। अतएव श्रर्थ शास्त्र के प्रतगत जर किमी मेवा या चातु का इस प्रकार से उपयोग किया जाता है कि मनुष्य की कोई श्रावश्यक्ता पूरी होती हो अथात् जिससे मनुष्य को किसी प्रकार का सतोष मिलता है तभी हम कहते है कि उस सेवा या वस्तु का उपभोग दिया गया। एक बात और, कभी कभी किसी वस्तु का उपयोग किसी अन्य वस्तु के पैदा करो म किया जाता है जैसे किसी कारखाने में कोयले का उपयोग । यहाँ पर देखना चाहिये कि कारले से जलने से किसी श्रादमी को कोई इच्छा पूरी हुई या नहीं। उत्तर है कि हमारे देखते तो कोई इच्छा पूरी होती रियाई नहीं देती। और जब यह हाल है तो अथ शास्त्री ऐसी वस्तु के इस तरह जलने को उप नही कहेंगे । हो, अगर जाड़े का दिन हो और आप कोरला जला कर श्राग ता मो हम कहेंगे कि श्रापन कोयले का उपभोग किया, क्योंकि इस बार कोयला जलाने से श्रापकी टटक दूर करने की इच्छा पूरी हो गई। उम्भोग के समय में यह जानना जरूरी है कि इसी के लिए श्रादमी सब चीजें पैदा करता है और जितनी चीजे पैदा की जाती हैं उन सब का उपमोग किया जाता है। परन्तु किसी श्रादमी की एक समय में एक इदा तो होती नहीं । हर पल पहुन सा या उसके दिमाग में घूमा करती है और सब से वहा प्रश्न य उ न होता है कि कौन सी इच्छा पहले पूरी की जाय । इसका साधारण सा उत्सर है उस इला को जिसको पूरा करने से सबसे अधिक संतोष या उपयोगिता (Utility) मान हो। लेकिन आमतौर पर प्रादमी करा करते हैं । कौन मी वस्तुएँ पारश्यक (Necessaries) होती है, कौन श्रारामदायक (Comfort) और कौन गुलहरें उगने के लिये या जाती है। पिजूलखी किसे कहते हैं । उपभोग में इन सर प्रश्नों पर विचार होता है। उससे यह भी पता लगता है जो वस्तु किसी गरीय निसान के लिए पारामदामा (Comfort) और विलासपूर्ण (Luxurres) हो यही जमी दार के लिए प्रावश्यक हो सकती है। अपनी आमदनी का विचार कर जी गरीय किसान रोज हलवा पूरी उड़ाता है उसे दुनिया मोग विलासी कहती है । लेकिन जमोदार हलवा पूरी श्रावश्यक समझते हैं। उनके हिसाय से अमीरी ठाट के अन्दर रेडियो, बिजली, मोटर श्रादि स्थान रखते हैं। इस बात से रहन-सहन के दर्जे की समस्या उठती है। एक मजदूर किस तरह की निन्दगा बसर करता है पचास माठ रुपया मासिक तनख्वाह पाने वाले क्लर्क साहय किस प्रकार रहते हैं महीने में ही दो सौ रुपए पैदा कर लेने वाले दूकानदार तथा उद्योग धंधे वाले कैसा जीवन व्यतात परत है और हजार पाँच सौ रुपये माहवारी पटकारने वाले जमीदार, डाक्टर या कलक्टर साहब किस मौज से रहते हैं, इन सब बातों का वर्णन व विवेचन रहन-सहन के दर्ज (Standard of living) के अन्तगत किया जाता है। जैसे जैसे श्राय बढती है वैस ही वैस मनुष्य अच्छी जिदगी वशर करने की कोशिश करता है और उसके रहन सहन का दर्जा कार को उठता जाता है। इतना ही नहीं क्सिा देश के रहने वाले को किस प्रकार रहना चाहिये, वहाँ की सरकार को उपभोग (Consumption) के सम्दघ में किन किन बातों में दखन देना चाहिये इत्यादि और भी बहुत सी बातें हमें उपभोग के अन्तर्गत ही माननी पड़ती है । अस्तु हम जान गए कि अय-शास्त्र में उपभोग (Consumption) का मतलब किसी चीज़ थे ऐसे उपभोग से होता है जिससे किसी अादमी को सताप हो । अय-शास्त्र के इस भाग में यह विचार किया जाता है कि मनुष्य जो तरह तरह की वस्तुओं का उपभोग करता है कहाँ तक उसके और देश के लिये लामायक है और किस हालत में वह हानिकर होता है । लगे हाय इस यात का भी विचार किया जाता है कि मनुष्य कैसा रहता है और उसका रहन सहन का दजा क्या होना चाहिये तथा उस दर्जे को बनाए रखने के लिये देश को सरकार का क्या करना चाहिये ? विनिमय (Exchange) लेकिन सोचने की बात है कि श्राजकल कोइशादमी अपने श्राप मत. लय की सारी वस्तुयें नहीं उत्पन करता । कोइ वेवल क्सिानी करता है तो काई नौरा, कोइ मजदूर है तो को बटइ, कोइ घोरी है वो कोई चमार । चमार के लिए यह रिलबुल ज़रूरी है कि जूते वेचो से आने वाले पैसों से . .
(१०) श्राटा खरीदे और मज़दूर मजदूरी की रकम से दाल-चावल मोन ले । ऐसा क्यों होता है ? वनिये के पास पाटा इतनो अधिक मात्रा में रहता है यह श्राटे से पैसों को अधिक उपयोगी समझता है और हमारे चमार के पेट में लिए तो थाटा जरूरी है हो । कहने का मतलब यह है कि दानों ओर वाला को कुछ पायदा होता है तमी अदल बदन होना है। और जब दो वस्तुनों फा अदना बदला होता है तो एक वस्तु के कुछ वजन के लिए थाड़ी सी दुसरा वस्तु दो जाती है । उदाहरण के लिए हो सकता है कि बीस सेर गेहूँ के लिए दस सेर चारन मिल । इस प्रकार अथ शास्त्र (Economics) को दृष्टि से दो सेर गहूँ का मूल्य हुया एक सेर चावन । श्राफल गोवा को छाड कर शहर में तो ऐम उदाहरण बडो मुश्किल से मिलते हैं। श्राधस्तर पैस देकर हम तुम बाजार से नरकारी, मसाला श्राद खरीद लाते हैं। अब प्रागर सेर भर गेहूँ का मूल्य दो अाना है तो हम कहगे कि गेहूँ की कीमत दो श्राने सेर है । वस्तुयों को इस तरह से लेने देन का नाम विनिमय है। पहले जमाने में जब रुपये पस का चलन नहीं था तो वस्तु का वस्तु से ही विनिमय होना या । विनिमय के साथ प्रश्न उठता है कि विनिमय रे दर के सम्बन्ध में किस प्रकार यह निश्चित किया जाय दि एक रुपये के बदले में क्तिने सेर ग. बेचा जाय अपना एक मिजई को बनाने के लिए रामू किसान गाजी दरजी को कितना चना देवे । इसके अलावा विनिमय के अध्ययन से हमें पता चलता है कि गाँव के किसान अथवा श्रय कारीगर अपने अपने माल को वाज़ार में लाकर फिस प्रकार बेचते हैं ? गाँवों के हाट और मेले-तमाशे कितना महत्व रखते हैं। वितरण (Distribution) उपभोग करने वाले की दृष्टि से तो हमने देख लिया कि वह किस प्रकार विनिमय करके किसी वस्तु का उपभोग करता है। अब हमें देखना चाहिये कि देने वाला विकास श्राने वाले धन में से किस प्रकार अपना हिस्सा लेता है। क्या सारी रकम उसी की होती है अथवा कोई दूसरा भी उसमें साझीदार होता है। मान लीजिये किसान अपने अनाज को शहर वाले व्यापारी को दे देता है और यह उसे शहर के बाजार में जाकर बेचता है। बेचने से जो दाम पाएगा उसका किस प्रकार बँटवारा किया जाय । सोचने पर मालूम पड़ता है कि उत्पत्ति में जो शक्तियाँ मिल कर काम करती हैं उनमें मालिश अनाज को बेचकर पाने वाली रकम थे उदार हैं । इसलिए हमारी समस्या यह हो जाती है कि किस प्रकार से निपटारा किया जाय कि भूमि मालिक को कितना लगान, मजदूर को क्तिनी मजदूरी व महाजन को कितना सूद मिले ! पातु या पर हम एक यात भूल जाने हैं। उसे सrr करने के लिए योग देर के लिए मिन मालिक को ले लीजिय । यद मिल पायामा पराए रहता है और हर साल बीम पो रकम देता है । इसके अलावा हर साल उसकी मयाने कुछ न कुछ घिस जाती है । उमरे लिए भी उसे धान बाली रकम में से कुछ निकाल कर अलग रप देना चाहिय । इन सयका पार कर जो बचता है यह जमीन के मालक, मेहनत करावाले मजदूर, धन लगाने वाले महा- जन, प्रयधकता व साहस प्रदान करने वाले मनुष्य के बीच बाँटा जाना चाहिए । परतु यह कोई जरूरी नहीं है किपाँची काय मिन व्यक्ति करें। हम जानते हैं कि मिन्न मालिक रुपया भी लगाता है, प्रबय भी करता है और माहस भी दिग्वाता है । इस तरह किसान अधिकतर मेहनन भी करता है और अनाज पैदा करने कालिए पूजा भी लगाता है । अब प्रश्न यह उठता है कि इन शो के बीच किस हिसाव से रकम का बटवारा हो । इसका उसर हमें अम शास्त्र के वितरण विभाग से मिलता है। यही नहीं, इस भाग में यद भी विचार किया जाता है कि कही भूमि वाला इतना अधिक माग तो नहीं ले लेता कि मजदूरों के पास बहुत कम रह जाता हो और उनका हालत खराब हो जाए । इस अलवा हमें यह भी मालूम होता है कि जमीदारों और किसानों के बीच में वैमा सम्बध होना चाहिये । धन का वितरण इस प्रकार न होना चाहिये कि जमीदार भी गिनती में किसानों से बहुत कम है, गुनहरें उड़ावें ओर मर मर कर अनाज पैटा करने वाले किसान भग्वों मरें और यगार भुगते । किसानों के पास कितना धन पहुँचना चाहिये ? क्या उनके लिए इतना रकम कापी होगी जिससे उनके कुटुम्ब का काम चल जावे | कहा जा सका है कि देश की उन्नति के लिए (१२) यह ज़रूरी है कि हर एक देशवासी उन्नति करे श्रयात् प्रत्येक श्रादमी इतना धन पावे जिससे वह दूसरों को कम से कम हानि पहुँचाते हुए अधिक से अधिक लाभ उठाये। साराश अस्तु, हम जान गए कि अर्थशास्त्र उस विद्या का नाम है जो मिलजुल कर रहने वाले मनुष्यों के उन प्रयत्नों के बारे में विचार करता है जिनसे वे अपनी अपनी इच्छाओं और मावश्यकताओं को पूरी करते और अर्थ (अर्थात् धन)या अय सामग्रियाँ उत्पन्न करते है। यादमियों के धन सम्बधी उपायों का पूर्ण रूप से विचार करने के अलावा अय शास्त्र में देशों की धार्षिक दशा और उनति का भी ध्यान रकवा जाता है। अर्थ शास्त्र का अध्ययन अधिकतर उत्पत्ति, उपमोग, विनिमय और वितरण नामक चार मुरय भागों में बाँट कर किया जाता है। अर्थ-शास्त्र के अध्ययन से लाम श्रय शास्त्र के अध्ययन से हमें बहुत लाभ होता है । उसके अध्ययन से हम जान मक्ते हैं कि हमारा देश जिसको प्रकृति ने भरा पूरा बनाया है. यहाँ की मिट्टी जलवायु पैदावार के लिए अच्छी है। यहाँ की सानों में खनिज पदार्थ मरा है । जगलों में कीमती लकड़ी है। नदियों के जल से बिजली पैदा हो सकती है लेकिन फिर भी हमारा देश गरीय क्या है ? उसकी गरीबी के क्या कारण है। यहाँ के अधिकाश निवासियों को भरपेट भोजन मी नहीं मिलता । पहिनने को कपड़े नहीं मिलते, रहने के लिए मकान नहीं मिलते और बीमारी में उनका इलाज नहीं हो पाता। ऐसा क्यों है? इस गरीबी को कैसे दूर किया जा सकता विम प्रकार हमारा देश धनी बन सकता है? जिसमे हमारे देशवासी मुखी जीवन व्यतीत कर सकें। अर्य-शास्त्र के अध्ययन से हमें यह बहुत बड़ा लाभ होता है। अभ्यास के प्रश्न १-अर्थशास्त्र क्या है इसके अ तगत किन बातों का अध्ययन किया जाता है?
२-अर्थशास्त्र की परिभाषा लिखिए । व्यायहारिक जीवन में इसके श्रध्यपन से क्या लाम है? १-आपके गाँव में या मुहल्ले में कितो अमीर और क्तिने गरीय कुटुम्ब रहते हैं? १-अपने विछी परिचित अमीर मित्र स यह जानने का प्रयत्न कीजिये कि भूतकाल में उनका युटुम्ब कमी गरीर से अमीर किस प्रकार हुधा ५--अपने किसी परिचित गरीय मिन से यह जानने का प्रयत्न कीजिये कि भूतकाल में उसका युटुम्ब कभी अमीर से गरीव किस प्रकार हश्रा ? ६-अपने गाँव या मोल्ले के भिन्न भिन पेशे के ऐसे व्यक्तियों की सूची तैयार कीजिये जो परिश्रम करसे अपनी जीविका प्राप्त करते हैं। इस सूची में उनका पेशा मी यतलाइये। -ऐसी २० वस्तुओं की सूची तैयार कीजिये जिनका उपयोग आरके मकान में प्रति सप्ताह होता है। ८-यापके गाँव के साप्ताहिक हाट में अथवा श्रापके मोहल्ले के बाजार में जो वस्तुएँ विकता है उनको सतिप्त सूनी तैयार कीजिये। ९-विसी गाँव में जाकर यह जानने का प्रयत्न कीजिये कि पसल के तयार होने पर किसी एक किसान को बढई, लोहार, नाऊ इत्यादि को कितना अनाज देना पड़ा। १.-अपने कुटुम्ब की एक मास की श्रामदनी थोर खचं का पूरा हिसाय रखिये और यद बतलाइये कि भोजन, कपड़ा, किराया, शिक्षा, दान, धर्म इत्यादि में कितनी रकम उस मास में बच हुई ? ११-याद तुम्हारे गाँव में किसी को रुपये उधार लेने की जरूरत पड़ती है तो म्पया किससे उधार लिया जाता है और किस दर पर सूद दिया जाता है ? १२--तुम्हारे गाँव में जमींदार और किसानों का संबंध कैसा है ? क्या किसान जमींदार से प्रेम करते हैं १ याद मम नहीं करते तो उसके प्रधान कारण क्या है? - दूसरा अध्याय aftararu (Definitions) धन या सम्पचि (Wealth) पिछले अध्याय में हम बतला पाए है कि अर्थ शास्त्र में धन सवयो वार्ता फा शिवपन रहता है। श्रर हम धन का श्रथ ममभाने का प्रयत्न करते हैं। ससार में मवत्र रुपये की ही माया है । पिना रुपया के किमी का गुजर नहीं हो सकता । तुम शहर में जरूर गये होगे। हाँ तुमने देखा होगा कि लोग अच्छे अच्छे कपड़े पहन कर धूप रहे हैं। फ्टिन, टमटम, मोर, साइक्लि दौड़ रही है। वही बड़ी दुकानों और कोठियों में लाखों रुपए के माल भरा हुपा है । अमीर आदमियों के ऊचे ऊँचे मकान बने हुए है । श्रमौर कौन कहलाता है ? वह जिसके पास सूव घा दोलत होती है, जो बड़ी घटिया शानदार योठो में रहता है, तथा जिसके यहाँ यहुन से नौकर चाकर होते हैं । लेकिन क्या अमीर श्रादनी की तमाम दोलन रुपए के रूप में ही रहती है ? उत्तर है नहीं । सी मनुष्य के धन से उमका रुपया, जेवर, मकान, जमीन इत्यादि कीमती वस्तुओं का बोध होता है और वही मनुष्य धनवान कहलाता है जिसके पास ये सब चीजें अधिक तादाद में होती है। लेकिन श्रय-शास्त्र देवल इन चाजों को ही धन नहीं कहते । अर्थ शास्त्र में हम उन वस्तुओं को धन ये नाम से पुकारते है जिनको हम काम में ला सकते है और जो बेची जा सकती हैं। उदाहरण के लिए गेहूँ को ले लो इसको पोस पर हम पाटे की रोटियाँ पका मक्ते हैं और रोटियों का खाने से हमारी भूख मिट जायगी । श्रतएव गेहूँ उपयोगी है। गेहूँ को हम घेच भी सकते है । जम्रत होने पर हम गहूँ देकर धोनी का एक जोड़ा खरीद मकने है। या रु"ए के बदले में हम गेहूँ दे सकते हैं और बाती के बदले में रुपया । श्रतएव गेहूँ विनिमय साध्य वस्तु है । इसलिए अर्थ शास्त्र के हिसाब से गेहुँ भी धन (Wealth) है। हम बात को श्रीर सार करने के लिए दवा को ले लो। यह सबको मालूम है शिवायु हमारे लिए कितनी जरूरी है। इसके पिना हम एक घग भी नहीं जी ।
मक्ते । इसलिए वायु की उपयोगिता (Utility) यहुत ज्यादा है । परन्तु क्या .यह विनिमय साध्य है क्या श्राप वायु के बदले कोद वन्नु ले सकते है ? वायु घर जगह मौन रहता है । इमनिए पियो का मौन न लेने की जरूरत नहीं पड़ती । यह ईश्वर की देन है और हम इसे घन में नहीं गिन सक्ते। इसी तरह यदि धार नदी या तालाब मे दो चार घड़ा पानी मर कर किसी यस्तु से बदला करना चाहेंगे तो कोई बदला नही करेगा। क्योंकि नदी और तालाब का पानी यासानी से अधिक मात्रा में प्रात पिया जा सकता है। जिस व्यक्ति को जिला पानी की जरूरत होती है उतना पानी या प्रासानी मे नदी मे ले लेता है । इसलिए पानी हमारे लिए उपयोगी होते हुए भी घन नहीं पहला सकता । परतु यही जल रानपूताना के रेगिस्तान में धन पहला लगगा, क्योति जन की कमी के कारण यहाँ पर तो सर कोई इसे मोल लेने के लिए तैयार हो जायँगे । गाय, चैन, मान, लकड़ी, कडा, कोयला, पथन, पेड़, पल, फूल श्रादि सय वस्तुएं सम्पत्ति या धा के स्वरूप हैं। और जय ऐसी चीर समत्ति हो सकता है तो इस हिमाय से हम कूदा, रसट, गोरर, राख, हनी प्रादि तक की गिनती सम्पत्ति में कर सकते हैं। फेवल रपया पैसा (Money) ही धन (Wealth) नहीं हम ऊपर कह श्राए हैं कि कुछ लोगों के हिसार से रुपया पैसा व सोना- चाँदी या हा नाम समति है । यह विलकुन गलत है । विस्ताा म अब भी कितने गाँध मिल जाते है जहाँ पर लोगों के पास रुपए नहीं है, लग्नि क्या उन गाँवों में श्रमोर और गरीद नहीं बसते ? नुम पूछ सकते ६ कि फिर रुपया मा श्राया मे । इसकी क्यों जरूरत पड़ी ? असली बात यह है कि चिना ए पैसे के सम्पत्ति की अदला बदला करने में बड़ा म झट करना पड़ता है । मान लो तुम्हारे पास चना है और उन्हें मिजई की जारन है। अब तुम्ह रिसी ऐसे यादमी को तलाश करना पड़ेगा जिसने पास मिनई हो। रयाल रा कि ऐसा मनुष्य मिल गया लेकिन वह मिनई के बदल म जूता माँगता है । अब दोनों शादमियों को एक तीमरे श्रादमी का टूटना पडेगा निसा पास जता हो और जो जूते के बदले में बना लेना चाहता हो। इन्हीं सब झ झों को दूर करने पे लिए पर पैसे का रिवाज चला है 1 Burd के चलन से हम जान सकते हैं कि राम और श्याम में कौन अमीर है। हम क्या करेंगे? हम इस बात का पता लगावेंगे कि राम का घर वार, खेत-पात, कपड़ा-लत्ता श्रादि का क्या दाम है ! मान लो सष मिला कर चार हजार रुपया हुश्रा और श्याम के पास इस तरह से 2 हजार का माल निकला तो हम कहेंगे कि श्याम राम से अमीर है। श्रस्तु, यह त हो गया कि कठिनाइयों को करने के लिए ही रुपए-पैसे चलाए गए और फेवन यही धन स्वरूप नहीं है। पर इस रुपए-पैसे द्वारा हम कोई वस्तु कब खरीदते हैं। तुम कब गेहूँ खरीदते हो अथवा का तुम्हारे पिता गाँव के चमार से जूता मोन लेते हैं? उस समय जब कि उहे जूते की ज़रूरत मालूम पड़ती है। वह जूने फे दाम क्यों देत है क्योंकि जूता हवा या जल की तरह ईश्वर की देन होकर कापी परिमाण में श्रासानी से नहीं मिल सकता अपात् जूतों की सरया परिमित है । इस अलावा एक बात और है। जूता बनाने के लिए चमार को मेहनत करनी पड़ती है । उस मेहनत के बदले में कुछ देना ज़रूरी है। इसलिए वह दाम देवर चमार से जूता मोर ले पाते हैं । तो अब तुम जान गए कि अर्थ शास्त्र में सम्पत्ति किसे कहते हैं। प्रत्येक वस्तु जो उपयोगी होती है, जिसकी सरया परिमित होतो हो व जिसके प्राप्त करने के लिए श्रम करने को श्राश्यकता पडती है अथात् जो वस्तु विनिमय साध्य है, उस वस्तु की गणना हम सम्पत्ति में करते हैं । सम्पत्ति वृद्धि ( Increase of wealth ) यह तो तुम जान गए कि सम्पत्ति किसे कहते हैं पर क्या तुम बता सकते होकि सम्पत्ति कैसे इकट्ठो की जा सकती है ? अर्थात् किसी प्रकार से एक मनुष्य अमीर बन सकता है । यह तो हमको मालूम है कि श्रमीर के पास वस्तुएँ अधिक मात्रा में होतो हैं । अब हमको देखना चाहिए कि वह कैसे श्रमौर बना होगा या हम तुम कैसे उसकी तरह धन इकट्ठा कर सक्ते हैं। लोग तरह तरह के तरीकों से धन पैदा करते हैं। एक श्रादमी दिन भर परि- भ्रम करके ज गन से पास या लकड़ी लाता है, दूसरा किसी के पास अथवा परिवार या सस्था में नौकरी करता है, तीसरा दुकानदारी करता है, चौपा किसान है। ये सब अपना काम अकमर इसीलिए तो करते हैं कि हे धन पैदा करना रहता है। परन्तु हम जानते है कि धन की उत्पत्ति के लिए मुख्य शलिया है-भूमि, मेहनत और स्वयं धन भी। मान लो तुम्हारे पास दस चीचा खेत है और तुम उमसे अधिक से अधिक अनान पैदा कर रहे हो । यदि तुमको और अधिक माल का जरूरत है तो इसका उपाय यही है कि तुम दस को लगह बारह पन्द्रह वीघे जमीन में सेती करो । उपत्ति वढाने का दूसरा साधन है श्रम बढाना । अगर येत में काम करने वाले पाठो मजदूर पूरी मेहनत के साथ काम कर रहे है तो यह नारा है कि उनकी सरया बढा कर दस या बारह कर दी जाय । धन या पूजा का भी यही हाल है । जय श्राप धनोत्पत्ति की दो शक्तियों को पटा रहे हैं तो श्रापको तीसरे को भी जरूर ही पटाना पड़ेगा अयथा श्रापका काम नहीं बनेगा। श्रतएव धनी व समृद्धि शाली बनने प लिए यह नरूरो कि आप अधिक पोत्र में काम कर, अधिक मेहनत लगावे व अधिक पूंजी का उपयोग करें। सम्पत्ति और मुख (Wealth nd welfare) वस्तु ये उपभोग से सतोष होता है और सुख की प्राप्ति होती है । गरीव मनुष्य के पास वस्तु ग्रों की कमी रहती है, उसके पास सुग्व प्राप्त करने के साधनों का प्रभाव सा रहता है । गरीय को अधिक मुन्वी बनाने के लिए यह यावश्यक है कि उसके धन का परिमाण रटाया जाय, उसकी आमदनी में वृद्धि की जाय । इसी प्रकार प्राधिक उन्नति की जा सकती है । परतु धनी बनने और सुनी उनने में महान अतर है । यह बात ठोक है कि धनी मनुष्य जो चाहे सो कर सकता है। वह मोटर सरोद सकता है। दो चार लटेत और अन्य व्यक्तियों को नौकर रख सकता है। श्रच्छा अछा खाना सा समता है। परतु अमीर श्रादमी बदमाश और बदचलन भी हो सक्ते हैं। बुरे कार्मा में रुपया भी लुगा सकते है । समृद्धिशाली और सुखी बनने के लिए यह जानना जरूरी है कि रुपया किस, प्रकार खच किया जाता है। सुखी जीवन बिताने के लिये थोड़ी सी सादगी अस्तियार करनी पड़ेगी । यही नहीं, शान की भी जरूरत पड़ती है। क्या हुश्रा यदि श्रापको यकायक एक लाख प्रा० ०शा०-२ डपी की लाटरी मिन गइ । यदि श्रार मूग है, यदि श्राप लिये काला अक्षर भैंस चरार है तो श्राप बड़ी जल्दी सब रूपया उड़ा देगें । दूसरो और अगर शार पढे लग्वे है, अगर आपको अथ शास्त्र की याते मालूम है तो आप उस धन का उपयोग इस प्रकार से कर सकते हैं कि जिससे आपकी और देश को भी दशा सुधरने लगे। उपयोगिता (Utility अब प्रश्न उठता है कि आपको किस प्रकार रुपया खच करना चाहिये । श्रापका कौन कौन सी वस्तुएं खरीदनी चाहिए और कितनी ? इससे भी मुरय सवाल है कि भार क्यों किसी चीज को परीदते हैं क्योंकि थापको उसको जरूरत रहती है क्योंकि वह घोज प्रारक लिए उपयोगी है। मान लीजिए श्राप अपने गाँव के हाट म गए । यहाँ पर बहुत सी चीन विक्ने के लिए पाती है । कोई कपड़ा खरीदता है, कोई गेहूँ चना खरीदता है, कोई कुछ खरीदता है तो कोई कुछ आप भी कोई वस्तु पसन्द करक खरीद लेते हैं। परतु क्या श्राप यता सकते हैं कि आपने उसको क्यों खरीदा १ इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए यह जानना जरूरी है कि किसी वस्तु की उपयोगिता क्या होती है ? कहा जाता है कि उपयोगिता किसी वस्तु का वह गुण है जिससे उस वस्तु को चाह होती है। इसका सम्घ व मन से होता है। प्रत्येक मनुष्य की इच्या या रुचि में कुछ न कुछ पक जरूर रहता है। इसीलिए किसी एक चीज की उपयोगिता प्रत्येक श्रादमी के लिये बराबर नहीं होती और हम उपयोगिता वणन किसी नाप या तौल से नहीं कर सात । लोग किसी वस्तु का मूल्य तय करने में उस वस्तु को उपयोगिता का विचार जरूर करते हैं। मान लीजिये गमू किसान के सामने हल, पाबड़ा, पुर्षी श्रादि रखी है और उससे कहा गया फ वह कुछ मोल ले ले । रामू सोचेगा कि मेरे पास इतना रुपया तो है नहीं कि दो वैन पोर परी । इसलिये इल को मोल लेना ठीक नही पावडा भी रामू ने पास का है इसीलिये वह फावड़े की भी जरूरत नहीं समझता। लेकिन उसके पास खुी नहीं है। और खेत से घास-फूस उखाद घर पेंकने के लिये उसे खुरों की जरूरत है। अतएव वह खुर्वी को मोल ले लेगा।
(१६) इसी तरह हम उत्पत्ति में भा करते हैं। हम किमी वस्तु विशेष को उत्सन या नष्ट नहीं कर मरते। हम वन उपयागिता को ही उत्पन करते हैं। उदाहरण लिये हल को ले लाजिये । पर अपने यिोनारों का मदद से लाही को कार डॉट कर उसे हल का रूप देता है। ऐमा करने से लकडी की उपयोगिता बढ गई। गम याते पाते या वो के बाद हल टूट जाता है। उसकी उपयोगिता माता रहती है। लाड़ो पड़ा रहती है पर हल काम का नहीं रहता। सीमान्त उपयोगिता (Marginal Utility) हम ऊपर कह पाये हैं कि क्मिा वातु की उपयोगिता मिन मनुष्यो लिये भिन मित्र होती । अब हम यह बतलाना चाहते हैं कि उसी मनुष्यों के लिये एक वस्तु की उपयोगिता एक दशा में कुछ और हो सकती तो दूसरी दशा में कुछ और। उदाहरण के लिये मान लो तुमको गर जोर से भाव लग रही है । उम ममय रोटी नुम्हारे लिये बहुत बड़ी उपयोगिता रखती है। पर एक रोटी खा लेने के बाद तुम्हारी मुख कुछ कम हो जाती है और दूसरी रोटी का उपयोगिता उतनी नहीं रह जाती जितनी कि पहली रोटी की यो । तीमरी रोटी को उपयोगिता दूसरी से भी कम होती है। अब अगर तीन रोगी से तुम्हारा पेट भर चना हो तो तुम सोचोगे कि चीपी रोटी ली जाय या नहीं। मान लिया तुमने चौथो रोटा ले ली। इसको खाने में तुम्हारा पेट बिराल मर गया। अब अगर कोई तुम्हारे श्रागे दो चार रोटियाँ और डाल दे तो तुम्हारे लिए उनका मूल्य नहीं के बराबर है। चूंकि पहनी चार रोटियों से तुम्हारे पेट को पूरा सतोष मिल चुका इसलिए तुम पाँची व_छटों राटी को बिल्कुल नहीं खायोगे । उपयोगिता के घटने का एक बहा अच्छा उदाहरण मिलता है नर कोइ मयुरा का चौवे मोजन करने रेटता है। जब वह बाकर उटने लगता है तो श्राप कहते हैं कि चौथे जो एक लट्ट और से लीजिए । चौवे महाराज सिर हिना देते हैं। इस पर श्रारका दोस्त हरा कह उठना है कि चौधे जो एक लड्ड् खा लो तो एक श्राना पेठा देंगे पैसे के लोम में चौवे लड्डू लेकर खा जाते हैं। जब वह उठन लगते हैं ता अबकी वार पारका दूसरा मित्र श्याम कहता है कि महाराज एक लड्डू 1 थ ( २० ) और ले लो तो म अापको एक दुनो दू । महाराज रानी हो जाते हैं। इसी प्रकार तीसरे लड्डू पर चौब जी को चार श्राने और चौथे पर श्राट श्राने दिये जाते हैं । पाँचवे लडडू के लिये एक रुपया इनाम रक्पा जाता है लेकिन इस बार पेट जवाब दे देता है । चौरे जा ने अब तक जो चार लड्इ साए उसकी उपरोगिता पग्ले ग्वाए मोनन मे कहीं कम थी। पर तु उनकी उपयोगिता में जा कमी होती वह पैनों का उपयोगिता के कारण पूरी हो जाती थी और चौथ महाराज का पट किमो तरद ठूस ठाम कर लड्डू को स्थान दे देता था। लेकिन अब पर एक दम भर गया । और चौबे महाराज उम बिल्कुल नहों सा सस्तै । इसलिए एक छोड अगर उहे दस रुपया भी दिया जाय तो वे उस पाँच लड्डू को न खायेंगे । अर्थशास्त्र के हिसाब से ऊपर दिए गए उदाहरण में रोटी खाने वाले से लिए रोटयों की सीमा त उपयागिता चौथा रोटी को उपयोगिता के बराबर है। इसी प्रकार यदि मनोहर के पास बास श्राम हा तो प्रामों को सीमान्त उपयो- गिता बीसवें ग्राम की उपयोगिता के बराबर होगी। परतु ध्यान देने की बात यह है मिश्रामों की सीमा 1 उपयागिता (marginal utility)ोर कुल उपयोगिता म पक्र है । कुल उपयोगिता तो चीसो आमों की उपयोगिता के जाड़ के बराबर है, लेकिन मीमान्त उपयोगिता क्वल अन्तिम श्राम की उपयोगिता के बराबर होती है। अगर मनोहर के पास एक ही ग्राम होता ता कुन उपयोगिता सीमान्त उपयोगिता के पराबर हो जाती। परन्तु जैसे जैसे वस्तु की सरया या परिमाण बटता जायगा वैसे उनकी सीमात तथा कुन उपयोगिता के बीच का पक भी बटता जायगा। मूल्य (Value) मान लो बाजार में तुमने गहूँ और चना दोनों बिकते हुए देखे । और नुम दोनों को खरीदना चाहते हो। अब अगर तुम्हारे हिसाब से गेहूँ की उपयो. गिता चने से दुगुनी है तो तुम एक कम्य में जितना गेहूँ लोगे उसी रूपए में उसमे दुगुना चना माँगोगे । उदाहरण के लिए अगर तुम एक रुपए में दस सेर गहूँ लोगे तो बीस सेर चना मांगगे । यदि कही तुम गेहूँ बेचने वाले होते और श्याम चने वाला तो तुम श्याम से पी सेर मर गेहूँ की जगह दो सेर चने मांगते । और यदि श्याम भी एक मे गहूँ के बदले दो सेर चना देने को राजी हो जाय तो दो मेर चना का मूल्य एक सेर गेहूँ मममा नायगा । - इसी तरह अगर तुम अपनी गाय को बैंच बकरियाँ बरीदना चाहो और अगर तुम्हारी निगाह में गाय की उपयोगिता यकरियों से तिगुनी हो तो तुम एक गाय के बदले में तीन बकरियां मांगोगे । जय विसा वस्तु को किसी अन्य वस्तु से अदला बदला की जाती है तब पहली वस्तु के पदले में दूसरी वस्तु कितनी दी जाय इसका निश्चय उपयोगिता द्वारा ही होता है । ऐमी हालत म श्रथशास्त्र अनुनार एक गाय का मूल्य तीन बकरियाँ हुइ और एक सेर गहूँ का मूल्य हुश्रा दो सेर चना । मूल्य (Value) का नो अर्थ ऊपर दिया गया है उससे क्या नतीना निकलता है ? इसके मतलव होते हैं कि यदि एक चीन का मूल्य पट जायगा तो दूमरी का कम हो जायगा । मान लीजिये कि पहिले दो श्राम का मूल्य होता था एक खरबूजा । श्रर यदि किसी तरह श्राम कि पसल श्राधा हो तो श्राम का मूरप दुगुना हो जायगा यानी दा श्राम के पहले दो मरसूने मिलेंग या एक आम के बदले एक खरबूजा मिलेगा। श्राम का दुगुना हो गया पर खरबूजे के मूल्य का क्या हाल है। जहाँ पहले एक खरबूजे के लिये दो ग्राम मिलते थे वहाँ अव एक ही ग्राम मिलता है अथात खरबूजे का मूल्य श्राधा हो गया। एक बात और । यदि कहीं श्राम की अमल न विंगड़ती पर खरवूनों को सख्या टुगुनी हो जाती तब भी वही बात होती जो ग्रामों के श्राधे रह नाने पर हुइ थी । अयात् एक म्वरबूजे के लिये एक ही श्राम मिनता। मूल्य तो कीमत (Price) पुराने जमाने में जब-रूपये-पैसे का चलन नहीं था तर एक वस्तु दूसरी वस्तु से यदली जाती थी । उस समय मूल्य का बोलवाला था। परन्तु उसमें कठिनाई होती यो। श्रगर सुमेर को किसी वस्तु की जरूरत है तो उसे ऐसे मनुष्य को हूँ ना पड़ता था निसरे पास वह चीज़ हो जिमकी मुमेर को अावश्यकता है। इतना ही नहीं उस मनुष्य को ऐसी वस्तु को श्रावश्यक्ता होनी चाहिए जो सुमेर के पास है । इसके अलावा यह भी झगडा रहता कि हर एक ।
- . ( २२ ) अपनी अपनी चीजे पदलने को तैयार हो । मान लो मुमेर को एक कम्बल की जरूरत थी और कुवेर जिसरे पास कम्बल है सुमेर का गम काट लना चाहता है। लेकिन अगर सुमेर कोट देने को राजी नहीं हो तो अदला बदली हाना असभव है । जच से रुपर पैसे का उपयोग होने लगा तर से ये सय वाचाए हट गइ । अगर तुम अपना सेर मर घो वेच कर चार सेर शक्कर सरीदना चाहते हो, तो रेवल इस बात को ज़रूरत है कि तुम किसी के हाथ अपने घी को एक रुपए में बेच दो। और उस रुपये को जाकर शार खरीद लो। ऐसी हालत में सेर भर घी का मूल्य हुया एक रुपया और सेर भर शक्कर के चार पाने । जय क्रिमी वस्तु को इकाइ का मूल्य इस प्रकार रुपये पेसों में लगाया जाता है, तो वह मूल्य वस्तु को इकाई की कीमत कहलाता है। अगर हम एक गाय साठ रुपये में वेचते हैं तो गाय का कीमत हुइ साठ रुपया । लेकिन अगर हम उसको तीन बकरियां य एवज में वेवते हैं तो तीनों बकरिया कीमत न कहला कर गाय का मूल्य कहलाती है । तो मोटी बात यह है कि किसी चीज के बदल में जो चीज मिले वह उसका मूल्य है और उस बदल में जो रुपया मिले वह उसकी कीमत है। थाय (Income) अब तक हम और किसी वस्तु की उपयोगिता, मूल्य और कीमत के बारे में बातें कर रहे थे। मान लो मुरनी अनाज को दूतान रमता है । वह हर समय रुपये के बदले गेहूँ, चना, मटर, जौ, चालरा, अरहर, मूग, चायन आदि अन वेवा करता है । चेचने से जो काये श्राने हैं उन्हें यह एक कापी पर लिखता जाता है। महीने के आखिर में कोड़ लगाने से उस मालूप पड़ जाता है कि महाने भर में उसे कितने रुपये मिले । इस अामइनो - याग से अगर हम वह रकम निकाल दें जिसका वि मुरली ने अनान वरीदा था तो बची हुई रकम मुरला को श्राय कहलाएगी । इसी प्रसार कनक गाहन महीने भर काम करने के बाद पहली तारीख को अपना वेतन लेकर घर आते हैं। परतु यह वेतन है क्या ? यह है फ्लक साहव की महीने भर के काम की कीमत और अर्थशास्त्र में ऐसी कीमत को प्राय कहते हैं । मजदूरों को अपनी मजदूरी रोजाना, हर हफ्ते, पन्द्रह दिन अथवा महीने पर मिलती है।
( २३ ) महीने भर में बहे कुन जिनना रुपया मिलता है वही उनका माहवारा श्राय होती है । श्राप रावाना से लेकर मालाना तक हो सकती है । श्रशारन से उम रस्म का नाम होता है बो को मनुष्य किती निश्चित ममय में कमाता है । ममय ये स्मिा परिमाण को प्राय निसानी जाप यर श्राय निकालने वाले का इच्छा पर निर्भर रहती है। ऋविस्तर श्राय से लोगों का मतलय माहवारी प्राय मे रहता है । लेकिन कहीं कहीं सालाना श्राव रिपोर्ट करनी पता है । तुम्हें मालूम है कि भारत को मरवार तुम्हारी श्राय के कार प्रायमर या हकमटेक्म लगाती है। इस श्राय व निकालने में मकान के किराय और में जमा सूद से लेकर वारवार का मुनाफा तक इस श्राय में जोड़ लिये जाते हैं। प्रभ्याम के प्रश्न १-'विनिमय साम्य वस्तु किसे कहते हैं ? उदाहरणो सहित सममाइये। स्या ज्ञान विनिमय साध्य है ? २-निग्नलिम्वित्र पस्तुर किन दशाओं में धन सममी जावेगी ? गगा जल, यनमानी, रेल का टिकर, घर का कूड़ा-कचरा, कागजी मुद्रा, नोट, मनुष्य का शरार, अस्पताल सार्वजनिक पुस्तकालय । ३-च ऐमा पस्तुत्रों का उदाहरण दीजिये निनका उपयोगिता किसी मनुष्य के लिये समय ये साय बदलती जाता है। ४-निम्नलिपिन वाक्यों की गलतिरों को कीजिये (श्र) २० सर गेहूँ की कामत) है । (ब)पाच सेर चावल की कीमत दम सेर गेहूँ है। (स)५ गायों की कामन १२५ रुपया है। (ड) एक सेर चना का मूरय ६ पैसे है। (क) एफ गर पड़े का मूल्य तीन श्राना है । ५-अपने युटुम्ब की नामदनी का एक माम का हिसाव लिविये और यह बतलाइये कि फिन किन जरियों से कितनी ग्रामदनी प्राप्त हुई ? ६- यदि कोई मनुष्य अपने निजा मकान में रहता है तो उसको अपने मशन से वर भर में क्या प्रामदनी होती है ?
भार्थिक उन्नति क्या माधन है ? गरीब लोग अधिक सुयो कैसे हो सकते है। धनी लोग भी कभी दुसी पाये जाते हैं । "सवे क्या कारण है ? Em-मादगी जीवन का मुख की वृद्धि से क्या सम्पन्न है ? तीसरा अध्याय उत्पत्ति (Production) उपयोगिता वृद्धि (Increase in utility) प्रत्येक मनुष्य को भोनन, पहा श्रादि की जरूरत परती है। इनके बिना उसका काम ही नहीं बन सकता । शरनी इन धारश्यक्तायों को पूरा करने के लिए उसे तरह तरह की वस्तुओं को पनाना या तैयार करना पड़ता है। मिल-जुल कर रहने वाले किसी मा मनुष्य का देर लो। यह हर समय इस बात का उपाय करता है कि उसे विमी प्रसार घन मिले। धन की उत्पत्ति करने के लिय श्रादमी दिन भर महनत करक जगल से लकड़ी या घास काट कर लाता है, दूसरा किमी के यहाँ नौकरी करता है, तीसरा दूकानदार है तो चौथा डाकार। यह तो हम श्रापको पहले दो श्रध्याय में पता चुके है कि अर्थशास्त्र में उत्पत्ति का क्या मतलब होता है। और यह भी कह चुरे हैं कि उत्पत्ति किस प्रकार की जा सकती है। कोई वस्तु उत्पन्न करने ये मतलब होते हैं मिली प्रकार की उपयोगिता को बनाना । कुम्हार मिट्टी के रतन मना कर मिट्टी की उपयोगिता में वृद्धि करता है ? बढई लकदी को कार छोट वर मेज़ कुसी बनाता है। ऐसे करने से लकडी की और उपयोगित यन जाती है। इसी प्रकार के रूप परिवर्तन द्वारा चना, मटर, गेहूँ शादि अनाज खेती से पैदा किये जाते हैं । सेती धारा में श्रन पैदा करने का काम तो स्वयं प्रकृति परती है। मनुश्य नो वेवन योज, पाद, मी वगैरह का इतजाम करता है। परन्तः स्थान और अधिकार बदल देने से भी किसी का उपयोगिता बढाई जा सकती है। जहाँ ना सामान अधिक मात्रा में । ( २५ ) होता है वहाँ से जाउ है उन जगहों में ले जाया जाता है जहाँ उस सामान को मात्रा कम है, तो उसकी उपयोगिता बढ़ जाती है । लोहे, कोयले या पत्थर को अपा सान के पास या लकडियो की जगन में उपयोगिता बहुत कम होती है। लेकिन जब यही चीजें रेल या मोटर द्वारा बाजार में पहुँना दी जाती तो इनकी उपयोगिता पट जाती है । इसी प्रकार अन्न, साग, पलों को खेतो वा बागों से बाजार में पहुंना पर उनकी उपयोगिता बटाई जा रही है। जब हम किसानों स अनाज मोल लेकर गाजार में किसी घर गृहस्थी वाले श्वादमी के हाथ उसे रेच देते हैं तब भा उपयोगिता पद्धती है । क्योकि किसान ये अधिकार में तो इतना अनाज है उसके लिये उसकी उपयोगिता कम है लक्नि पर गृहस्थी वाला श्रादमी खाने के लिए अनाज चाहता है और इसलिए उसरे अधिकार में पहुँच जाने से अन अधिक उपयोगी बन जाता है । उसकी उपयोगिता बढ़ जाती है । उपयोगिता वृद्धि में समय भी सहायता करता है । नये चावल को प्राप बहुत कम दर होती है। लेकिन अगर नया चावल साल दो माल रप छोड़ा जाय तो उसमें कुछ सास गुए या जाता है और उसकी कदर या उपयोगिता बढ़ जाती है। इसी तरह माघ पूम में घरप को कोई नहीं पूछेगा। अगर उसे किसी तरह गर्मियों तक रख सच तो उसकी बड़ी कदर होगी। यह तो हमने देख लिया कि रूप, काल, स्थान या अधिकार परिवर्तन 4 द्वारा उत्पत्ति या उपयोगिता वृद्धि की जा सकती है । परतु इन परिवर्तनों के करन में हमको किसी शक्ति का सहारा लूंदना पड़ता है ? कुछ समय पहले तर धन की उत्पत्ति के लिए तीन चीजा की जरूरत माना जाती थी भूमि, (Land) मेहनत (श्रम) (Labour) और पूजी (धन) (Capital) चाहे जिस ढग से धन उत्पन्न या पैदा किया जाय इन तीनों साधनों की श्राव श्पक्ता पड़ेगी। इनरे अलावा श्रान क्ल दो शक्तियाँ और मानी जाती है - प्रवर, साहस (Organisation and Enterprise) इसके पहले कि हम इन शक्तियों पर विचार करें, हमें यह देख लेना चाहिए कि कुछ चुने हुए उदाहरणों में कार शक्तियाँ किस प्रशर भाग लेती है। पहले रूप परिवर्तन दाग होने वाली उपयोगिता वृद्धि (Increase) । १ २६ ) in utility) के साधनों को ही लीजिए, इस रीति से क्चा माल पैदा किया जाता है । कच्चा माल बहुधा सेती से होता है । हमारे भारत से ज्यादा- तर लोग सेती करके ही अपना पेट पालते हैं। अच्छा, इनमें ऊपर बताए साधन या शक्तियाँ किस प्रकार काम थाती है १ विना भूमि के सेती नहीं हो सकती, और मेहनत करो वाले मनुष्य विना खेती करेगा ही कौन ? लेकिन जमीन और मनुष्य के होने से मी तो खेती नहीं हो सकती। उसके लिए चीन, हल,बैल, खाद श्रादि की मी श्रावश्यक्ता होती है । ये चार्जे मनुष्य का धन है, लेकिन अब ज्यादा घन उत्पन्न करने के लिए काम में श्राने के कारण इनका नाम पूंजी हो जाता है। इससे साफ प्रकट है कि खेती करने के लिये भूमि,श्रम और पूनी की आवश्यकता पडती है। अब कारीगरी का एक उदाहरण लानिये । तैयार माल भी म्प परिपतन द्वारा ही बनाया जाता है । दर्जी का काम ले लीजिये । वह कपडे की काट- छाँट करक पोट सीता है । इसमें उसे सोने के लिये बैठने को स्या। (दुकान या मकान) चाहिए, यह भूमि है। उन पर बैठ कर वह सिलाई का काम करता है, इसमें उसे श्रम करना होता है। पर उसे काटा, सुई, डोरा श्रादि चाहिये, तभी तो वह कोट तैयार कर सरगा। ये चाजै वह पहले कमाये हुए धन में बचत करक बचाता है और ये उसकी पूजी है। इसी तरह से वढइ, लोहार, जुलाहे श्रादि के कार्य पर विचार किया जा सकता है। अतएव तैयार माल में भूमि, श्रम और पूजी तीनों को श्रावश्यक्ता पड़ती है। श्रवतक हमने प्रबन्ध और साहस (Enterprise) का विचार नहीं किया है। पानकल के मशीन युग में अरला दुकेला श्रादमी धन पैदा करने का काम नहीं करता । सैक्ड़ों हजारों श्रादमी एक ही कारखाने में काम करते नजर आते हैं। ऐसी हालत में इस बात की बडी ज़रूरत होती है कि कोई श्रादमी इन हजारों श्रादमियों के काम को देख रेप करे और यह निश्चय करे कि कितने श्रादमी कौन सा काम करे, किस प्रकार की भूमि, श्रम और पंजी लगाई जाय और कहाँ से क्या माल मँगाया जाय इत्यादि इन सब बातों के लिये प्रबध करते की आवश्यकता परती है। इसी प्रकार श्राज कल अमेरिका प्रादि देश में खूब देब खेतों म सेती की जाती है। वहाँ पर मी यह देखना पड़ता है कि स्वाद कहाँ से मगाई जाय । तिनी खाद की ब्रहरत है। पानी का वैसे इन्तजाम दिया जाय इत्यादि । इसरे अलावा एक ऐसे व्यक्ति-समूह की जरूरत परती है जो कारवाने में होने वाले या बड़े परिमाण में की जाने वाली पेता से पाने पाल लाम- हानि को महा का बीड़ा उठाये । मजदूर अपना वेतन ले लेते हैं। प्रबंध करने वाला भी अपना तनरवाद लेता है। भूमि का मालिक वल लगान मात्र नाता है और नीदने वाला सूद । इनमें से किसी को हानि-लाभ से कार मतना नही रहता । यारवान के चलने या हूबने का जोखिम उस आदमी या कम्पनी पर रहता है जो उसका चनाने का साहस करती है तथा बोखिम उठाती है। भूमि (Land) यह तो हमने देख लिया कि उत्ति के पॉन मावन होते हैं, भूमि, श्रम, पूंजी, प्रबर और साहस । श्रय इन पाँचों पर अलग अलग विचार करना मी जरूरी है। पहले भूमि का ले लाजिये । आमतौर पर इससे पृथ्वा सल का मनलय निकाला जाता है, पर अपशास्त्र में भूमि से हमारा मतलब उन सब शक्तियों से रहता है जो प्रकृति से प्राप्त होती है । इस तरह से ग्वान मे निकलने वाले पत्यर, लोहा, सोना, श्रादि, जन, मटनी, मोती, वायु, मदी, गर्मी, रोशनी, जलवायु श्रादि मय चा इमके अतर्गत श्रा जाती हैं । याद रखने लायक दुमरी गत यह है कि प्रकृति का वही हिस्सा भूमि कहलाता है जिसका उत्पत्ति में प्रयोग होना है। सब अमीन एक भी नहीं होती । कोइ बहुत उपजाऊ होती है, काइ कम और कोइ विकुन हो नहीं । किमी जमीन की मिट्टी चिकनी होता है श्रयात् उसमें बहुत पाराक करए होते है, किसी पृप्या में बड़े कण रहते है । वह बालूदार कहलाता है । चिकनी और बालूदार मिट्टी के अधिक या कम होने से हा खेतो की मिट्टी कइ तरह की हो जाती है। जहाँ तीन माग चिकनी मिट्टा और एक भाग चालू हो वहाँ खेता अच्छा होती है। बालू का हिस्सा जैसे जैसे बटता जाता है नमोन कम उपजाऊ होती जाती है। नदी या तालाब ( २८ ) के किनारे उम जमोन में जहाँ परसात में पानी भर जाता है और फिर सूप जाता है, खेती अच्छी हती है । धान तो ऐमी जमोन म बहुत ही होता है। गाँव के किनारे की जमीन में जिसमें प्राय जूडा-करकट पंगा जाता है या साद डाली जाती है, बहुत अच्छी पसल होती है । लेकिन जमीन की उपजाऊ शक्ति की सीमा होती है। अगर हम किसी उपजाऊ भूमि में खाद वगैरह दिए विना हो खेती करते चने जाये तो दो तान साल के बाद वह कम उपजाऊ हो जायगी । जिस प्रकार मनुश्य को श्राराम की जरूरत होती है और जिस प्रकार विना खाने के वह काम करने द लायक नहीं रह जाता उसी तरह जमीन को भी सूराफ तन्ना श्राराम की जरूरत पड़ती है । सूराक पहुँचाने के लिए यह बड़ी जरूरी है कि जमीन सूप गहरी खादी जाय तथा उसमें साद वगैरह खूब डाली जाय । खाद की मदद से जमीन अपनी सूराक वायुमडल से अच्छी तरह से खींच लेती है। इसके अलावा एक ही समय में किसी खेत में बहुत सी पूंजी तथा मेहनत लगा कर उस खेत की उपज बहुत अधिक नहीं बटाई जा सकती। इसकी भी एक सीमा होती है । जिस तेजी प साथ पूँजी व श्रम बढाया जाता है उस तेजी के साथ उपज नदा बढती अतएव स्मिो जमीन में पूजी व मेहनत लगाने की भी हद्द होती है । व्यापार और कारखानों के काम में भूमि की उपजाऊ शक्ति का रयाल नहीं किया जाता। कारीगर या कारखाने का मालिक यह देवता है कि जमीन किस जगह है। कारीगर अपनी दुकान पाजार के करीव खोनना चाहता है। मिन मालिक कारखाने को ऐसे स्थान पर चलावेगा जहाँ से खान और बाजार दोनों पाम हो। मान लो तुम लोहे का कारखाना खोलना चाहते हो। तुम ऐसी जगह दूदोगे जहाँ से लोहे की खान भी पास हो और तैयार माल को बाजार में पहुँचाने का मुभीता भी हो। इन्हीं कारणों से बड़े बड़े शहरों में भूमि का मूल्य या किराया बहुत अधिक होता है। श्रम (Labour) यह तो हुइ भूमि की बात ! अव भम को लीजिए। किसान खेती करने में स्वय मी मेहनत करता है और चैन से भी काम लेता है। लेशिन श्रय- ( २६ ) यास्त्र अतगत वैन के कार्य को प्रग में नहीं गिनते । श्रम में हमारा मतनव मनुष्य द्वारा की हुइ मेहनन में रहता है। मनुष्य अपने मनोरजन के लिए फुटवान, हाकी वगैरह वेन मेनना है । एमे सेना में की गई मेहनत किसी का धन नहाँ पैदा करती। अतएव इसको गिनती भी श्रम में नहीं का बाती। अब अगर अापने काइपछे कि श्रम से क्या समझते हो तो श्राररा करना नाहिए कि यम ने हमारा मननव मनुष्य द्वारा की गई उम महनत से रहता है जो किसी धन को उपत्ति में लगाई जाती है। श्रम दो तरह के होते है --शारारिक व मानसिक । कुनी, मजदूर, लोर, वटइ आदि शारीरिक श्रम करते हैं लेकिन डाक्टर, वकील, जज, मास्टर वगैरह मानसिक श्रम करते हैं। कुछ लोग दोनों तरह व श्रम करते हैं परन्तु अर्थशास्त्र में श्रम के इस भेद को महर नहीं दिया जाता । श्रगर कोई भेद माना जाता है तो वह उत्पादक और अनुत्पादक श्रम के बीच में होता है। मनुष्य किमा इन्श की पूर्ति के लिए जो मेहनत करता है वह उत्पादक कहलाती है। उत्पादक और अनुरगदक मे नव को साफ करने के लिए मान लीनिए की को श्रादमा बिना मतलब हा एक स्थान की मिट्टी खोद कर दूसरे स्थान पर जमा करता है । ऐसा अम अनुसादक कहलाएगा। हा, अगर पहले स्थान पर मिट्टी का कॅधा देर लगा हो और दूसरे पर गदा हो तो वह श्रम उत्पादक गिना नायगा क्योंकि ऐसा करने से गड्ढा पट गया और किसी के उसमें गिर आने का हर जाता रहा । अस्तु, उादक प्रम के दो भाग किए जाते हैं। वह लकड़ी से हन बनाता है किसान गेत में अनान पैदा करता है और लोहार लोहे से चाक् बनाता है। इस प्रकार का श्रम प्रत्यक्ष उत्सादक श्रम कहलाता है। लेकिन जगलो से लकडी लाने में जो श्रम लगता है अथवा पडित नी चेलों को पटाने में लो मेहनत करते हैं वह परोक्ष उत्पादन कहलाता है क्योकि उमसे किसी वस्तु विशेष की उत्पत्ति नहीं होती। श्रम की उपयोगिव (Utility of labour) जिस प्रकार सब भूमि ऐमी उदादक नहीं होती उमा तरह सब एक-मे उसादक नहीं होते । श्रम की उत्पादकता वह बातों के कार निर्भर रहती है । मेहनत करने वाला अगर मजबूत, शिक्षित और ट्रेनिग पाए हुए है तो उसकी उत्पादक शक्ति अधिक होगी । कार्यक्षमता अादमी को मिलने वाले खाने, उसके रहने के स्थान की पायवा श्रादि बातों से सम्बध रण्वती है, इसके अलावा यदि मजदूर गुलाम की तरह काम करते हैं तो उनका श्रम कम उत्पादक हो जाता है । इसीलिए कारखानों में अचे कारागरों और मजदूरों को हिम्मेदार बना लेते हैं । इसी प्रकार खेती में हिस्मेदार होते हैं। अर्थात् पेत में काम करने वालों का हिस्सा पॅध जाना है इसमे काम करने गले मन लगाकर काम करते हैं और अधिक से अधिक माल उत्पन करने का प्रयरन करते हैं । चतुरता और बुद्धिमानी भी श्रम को श्रोर उत्पादक बनाती है । एक मामूली बढई जिस लकड़ी से एक महा-सा बक्स बना पर तीन चार रुपये को बेचता है एक चतुर पढई उसी से एक अच्छी वालमारी चना कर वेचो से दस पद्रर रूपए प्राप्त कर लेता है । जो श्रमजीवी बुद्धिमान नहीं है, जिन्हें इस पात का शान नहीं है कि किस प्रकार सपत्ति की वृद्धि करनी चाहिए, उनका अम बहुत कम उत्पादक होता है। उदाहरण के लिए इस देश के पूर्व और कम बुद्धि वाले बढई लोहार, कुम्हार और जुलाहे को ले लीजिए। ये पर भी उसी प्रकार काम करते है जिस प्रकार हजारो वर्ष पहले हाता था। यदि ये बुद्धिमान् तथा पढे लिखे होते तो दूसरे देशों की बना हुई अच्छी अच्छी चीजों को देख कर ये भी वैसे ही वस्तुएँ बनाने उपाय सोचते । श्रम विभाग (Division of Labour) श्रम की उत्पादकता के सबध में एक बात और जानने याम्य है। पुराने अमान में श्रादमी अपनी सारी श्रावश्यकताओं को पुरा करने के लिए स्वय ही सब काम करता था। वही भोपडी यनाता, वही मछली मारता, वही तीर और धनुप बनाता और वही पहनने के लिए जानवरों को मार कर उनकी साल खीचता । लेकिन समय के परिवतन के साथ मनुष्य ने परिवार वसा लिया और कई परिवार मिल कर गोवों में रहने लगे। इसके साथ ही इस वात का रयाल पारि यदि एक यादमी एक ही काम करे तो और भी अच्छा हो । अतएव एक श्रादमा देवल अन्न पैदा करता है, एक केवल कपडा तैयार करता है इत्यादि । इस प्रकार गाँव के किसान, लकड़हारे और नुनाहे आदि का काम अलग अलग हो जाता है । जैसे जैसे उन्नति हुई एक एक पेसे के कई कई माग हाा लगे । पा पार करन पे निये एवं श्रादमी केवल काास पैदा करता है, दुमरा कगस को श्रोटवा है अथात् रुइ स बिनौल अलग करता है, तासरा सूत कातना है और चौथा केवल कपड़ा. बुनता है। इस बाद इन भागों के मी माग किये जाते हैं। इस प्रकार से हो। वाले श्रम 4 बटवारे को श्रम विभाग कहते हैं। श्रम विभाग हा जाने से पहले तो कोई श्रादमी बड़ी जल्दी किसी विभाग का काम सीख सकता है । इसके अलावा श्रम विभाग के अन्तर्गत एक ही काम करते श्रादमी खूष होशयार हो जाता है । पिर प्रत्येक विभाग में की जाने वाली मिया इतनी सरल हो जाती हैं कि उनके करने के लिये मशीन का मली माति प्रयोग किया जा सकता है। इन सबका नतीजा यह होता है कि किसी वस्तु की उत्पत्ति करने में खच कम पड़ने लगता है। परतु श्रम विभाग से कुछ नुक्सान भी है । एक ही काम को करते करते यह काम नीरस सा लगने लगता है। टम काम करने में पिर मन नहीं लगता ! यही नहीं यदि वह चाहे कि श्रर किसी दूसरे के पशे को अस्तियार कर ले तो वह एमा नहीं कर सकता । तीसरे इसक कारण उसे अपने शरीर के किसी एक अग का ही श्राधा उपयोग करना पड़ता है । पनत उसका स्वास्थ्य गिर जाता है । कुछ भी हो श्रम विभाग के कारण श्रमी भारी और दुखदायक कामों से करने से यच जाते हैं भार उहे श्रव समाह में देवल ५६० घंटे तक काम करना पड़ता है। बाकी समय वे अपनी शिक्षा, मनोरजन और उनति के लिये लगा सकते हैं। पूंजी (Capital) हम कह पाए हैं कि किसी वस्तु की उत्पत्ति में धन की भी जरूरत पड़ती है। के कार्य में जो धन लगाया जाता है उसे हम पूजी कहते हैं । नोट करने लायक बात यह है कि सय धन पूँजी नहीं कहलाता । उसका यही हिस्सा पूँजी के नाम से पुकारा जायगा लो और समत्ति पैदा करने के बाम म अावेगा । उदाहरण के लिये यदि कोई किसान धेटा पैठा अनाज सर्च करता है लेकिा काम नहीं करता, तो उसका अनाज रूपी घर पूजी नहीं कहा जा सकता। लेकिन अगर वह साने के साथ खेती भी करता जाता है तो जी अन वह साता है वह पूँजी स्वरूप है। सेत में वीज बोने के दिन और जब अनाज क्ट वर किसान के घर में श्रता है इस बीच में कई महीने गुजर जाते हैं । तब तक रिसान 41 खाने पीने को चाहिये। मजदूरी चाहिये, हल, चैन श्रादि चाहिये । पहनो को कपडे, रहने को घर तथा अौजार वगैरह भी चाहिये । ये सब चौमें पहले से ही इकट्ठी करनी पड़ती है । इनमें श्रन, वस्त्र, बैल बधिया, हल फाल, घर द्वार सब कुछ श्रागया और इन सबकी गिनती पूंजी में करनी चाहिए । यह स्पष्ट है कि सम्पत्ति पैदा करने के पहले पूँजी लगानी या खच करनी पड़ेगी । पूँजी दो तरह से खच की जाती है। किसान जो बाज बोने के काम में लाता है वह एक ही बार में खच हो जाता है। वह जिस पानी से खेत को सींचता है उसका वह दूसरी बार उपयोग नहीं कर सकता । वढइ जिस लकडी का हल बनाता है वह फिर उसके काम की नहीं रहती। लोहार जिस लाहे को खुी गटता है वह विना तोडे दुसरी चीज बनाने के लिए काम में नहीं लाई जा सकती । करने का मतलब यह है कि कुछ पूजो का एक हिस्सा हमेशा के लिये एक दम खच हो जाता है । इस हिस्से का चल पूजा कहते हैं। दूसरी ओर किसान बार बार उहाँ लो, हल, पावटा, कुदाली, खुर्मा आदि से काम लेता है । बढई चीजें बनाने के लिए खानी, बसूना, पारी श्रादि से काम लेता है । इसी तरद लोहार का हयोडा, घन, धौकनी वगैरह बहुत दिन तक चलते हैं । इन वस्तुओं में खर्च की हुई पूजी को अचल पूँजी कहत हैं। पूजी के उपयोग करने के ढग पर उसको उत्पादक शक्ति निर्भर रहती है। यदि बुद्धिमानी के साथ पूंजी लगाई जाती है तो अधिक सम्पचि पैदा होगी अन्यथा कम । यदि कोइ जमीन बलुई है तो उसम आप चाहे जितनी खाद डालिए और चाहे जितना पानी दीजिए, गेहूँ की पैदावार कभी अच्छी न होगी । और आपने जो पूजी उसमें लगाई है उसका श्रापको पूरा पूरा पदला नहीं मिलेगा । परन्तु उसी पूजी को अगर बार किसी उपजाऊ जमीन में लगाते तो उसकी उत्पादक शक्ति अवश्य बढ जाती। कहने का मतलब * काय और यह कि नो या व्यापार में जो पूँजी लगाद जाता है, उसरे लगाने में यदि बुद्धिमाना, तनुरवे और दुरन्देशा से काम लिया जाता है तो जा की उपादक शक्ति पट जाती है। 9774 ( Management) जैसा कि पहले का आ चुका है प्रानफल के जमाने में भूमि, श्रम और पूंनी र कर प्रब घ करने वाले का हाय रहता है । प्रचार प्रम में अंतर है । श्रमा थपिन शारीरिक मेहनत करता है और प्राधक को दिमाग म न्यादा काम लेना पहता है । प्रव पक उत्पत्ति के लिये मयसे उपयुक्त भूमि को ग्यानकर उस पर श्रावश्या याग्यता वाले मजदूरों को प्रम- विभाग के नियमों के अनुमार लगाता है । उमे नए नए लाभदायक श्रीनारों को कहा करना पड़ता है । वह समय 7 रिमाय ने कच्चे माल को सस्ते से सस्ते दामों में परीदता है। बाजार में लोगों का रुचि के मुतावित मान पनया कर वह उम माल का अच्छे से अच्छे दामों में बेचता है। कहने का मननब यह की प्रथा पत्ता लोगो को लाने का ररान रग्बकर, भूम, तम और पूँजी को इस हिसार भोर रूस ने लगाता है कि कम से कम लागत में अधिक से अधिक वस्तु तैयार हो जाती है और इसको वह सबमे अधिक मुनाफ के हिसाब से बाजार में बेच देता है। इसम शक नहीं कि जो मनु य प्रयय करता है । उममें रन से गुण होने चाहिए। वह पढा लिवा हो, होशियार हो, दृरदेश हा, लोगों में मिला नुनता हो । चानार के मार व लोगा की यदना हुइ चाह से याकि रहे तथा ऐमा पिचित्र फैशन का मान तैयार करावे जिसमें मनुष्य उस मान का सबसे अधिक मात्रा में खच दें । प्रवक्ता प्राजकन के मनवेसिंग तरीको स जानकारी रखता है और उपयोगी तरारे से अपने मान का विज्ञा- पन छपाता है। इसके अतिरिक्त वह अपने मान को देशो और विदेशा यानारों में पहुँचाने के लिए सबसे सस्ते और शीघ्र पहुँचाने वाली सवारा का प्रब करता है। प्रब घर का एक उश्य रहता है कि सपम क्म चखा में R से अधिक लाम करते रहना । यदि किसी मशीन का प्रयोग करने से प्रा.ग्र० शा०३ सर्च में कमी होती है तो वह मजदूरों का पाल किये बिना ही मजदूरों को घटा कर उस मशीन को कारखाने में मॅगावेगा। HIGH 91 Gifan (Enterprise ) मान लो उत्पत्ति र उपरोक्त चारों साधन मौजा है पर तु सबको इम बात का शक है कि कार्य शुरू कर देने के बाद उनकी भूमि का लगान, श्रम की मजदूरी, पँनी पर सूद व प्रबधक का घेतन मिलेगा या नहीं। ऐसी हालत में उस समय तक उत्पत्ति का काय शुरू ही नहीं हो सम्प्ता जर तक कोई व्यक्ति साहस न करले सयको इस बात का विश्वास न दिला दे कि काम यस पन हो जाने पर भी वह लगान, मजदूरी, वेतन, सूद श्रादि चुस्ता कर देगा। लेकिन खाली विश्वासवाना हाने से काम नहीं चलता। विश्वास दिलाने गले की हालत ऐमी होनी चाहिए निमसे सब लोग उसकी बातों का विश्वास कर लें। इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि विश्वास दिनाने वाला साहसी मनुष्य धन तथा अपनी बात दानों का धनी हो । इसके अलावा साहसी को बुद्धिमान तथा दक्ष होना चाहिए, जिसमे वह योग्य सहायक व प्रावक को ढूँढ सके । यह वा हुए साहसी के गुण । अब देखना चाहिए कि साहसी और उत्पत्ति में हाय गने वाले अन्य व्यक्तियों में कोइ भिन्नता है या नहीं। सबसे बड़ा पर्क यह है भूमि के मालिक का लगान, श्रमिक की मजदूरी, महाजन का सूद और प्रबधक का वेतन बॅधा हुश्रा होता है लेकिन साहसी को श्राने वाली रकम म यह सब काट कर जो बचता है उसी से सतोष करना पड़ता है । यदि कुछ कमी पटती है, तो उसे स्थय अपनी गॉट से लगाना पड़ता है । यह सब ठीक है लेकिन तिस पर भी किसी मनुष्य या कम्पनी को साहस का बाड़ा उठाना ही पड़ता है। क्योंकि पिना साहस न कोई व्यापार चालू किया जा सकता है और न चालू “यापार बटाया ही जा सकता है । अभ्यास प्रश्न १-उदाहरणों सहित समभाइये कि स्थान परिवर्तन से उपयोगिता की वृद्धि क्मि प्रकार होती है? २-दुकानदार और यापारी वस्तुओं की उपयोगिता, वृद्धि किस प्रकार करते हैं?
३--समय परिवर्तन ने उपयोगिता मृदिय उदाहरण दाजिये। ४-क्या किमी वस्तु के विशारन स मो उपयागिता की वृद्धि होता है ? १-या कोई ऐसी वस्तु है जिसक अधिक उपयोग करने से उसकी उपयोगिता की वृद्धि होती है? ६--यह समभाइये किनिम्नलिग्गिन व्यवसायों में उत्पत्ति पे साधनों का किस प्रकार उपयाग पिया गया है इनवाइ का दूकान, कपड़े की दुकान, सूत काता, काहे बुनना, गौशाना ७-श्रम और मनोरजन अन्तर समझाइये। यदि कोई व्यक्ति कनिता करता है या गाता है तो उसका कविता करना या गाना अम कहलायेगा या मारजन ? --उत्सादक और अनुपादक श्रम के भेद यतलाइये । यदि कोई विद्यार्थी परिश्रम करने पर भी अपनी परीक्षा म अनुत्तीण हो जाता है, ता उसका प्रम उत्पादक कहलायेगा या अनुत्सादा । ६-पडा, जमीदार, डाक्टर, पुराहित, साधु, सिपाही इत्यादि के श्रम किन दशाश्रो में उमादक माने जा सकते हैं? १०~मारतीय मजदूरों की कायक्षमता किस प्रकार स्टाइ जा सकती है ? १.-प्रथशास्त्र की दृष्टि से भूमि की विशेषताएं तथा महत्व समभाइये । १२-क्या आप के गाँव में भूमि मिसानों को कापी परिमाण में मिल जाती है ? यदि नहीं तो कमी के प्रधान कारण क्या हैं ? १३--चल और श्रवल पूंजी के भेद समझाइये । निम्नलिखित उद्योग- घयों की चन और अचल पूँजी लिग्विये गन की वेती, कपास का वारसाना, मिठाइ यनाना, खिलौने बनाना । १४-प्रव घर के काय का महान समभाइये। उसमें किन गुणों को श्रावश्यक्ता है। १५-उत्सत्ति में जोखिम का क्या स्थान है निम्नलिखित व्यवसायों में जोग्विम कौन उठाता है घटाइ पर की जाने वाली खेती, मिश्रित पूजा बाला कपनी, कपड़े का पारवाना, चीना का कारसाना।
१६- उत्पत्ति के अर्थ समभाइये । त्यत्ति र साधन बताइये । गाव के उद्योग वर्षों में इन सायनों के महत्व को तुला कीजिए। -- चोथा अध्याय भारतीय गाँवों की खास पैदावार पिछले अध्याय में हम यह देख चुके कि उत्पत्ति करने में विन पिन शक्तियों से काम लेना पड़ता है । अब इन शाक्तया के सहयोग से उत्पन होन वाली वस्तुओं के बारे में कुछ जानना श्रावश्यक मालूम पड़ता है । भारत में नब्बे प्रतिशत से अधिक लाग गाँवों म रहत हैं और मत्तर प्रतिशत से कार मनुष्य खेती करने अपना पेट पालते हैं। श्रस्तु, या. सन के उपज के बारे में ही पहल कुछ विचारा जाय तो अनुचित र होगा । भारत में अधिकतर दो पमलें होता है । एक खरोप कहलाती है और दूसरी रवी । खरीफ की फसल जेठ मास मे लकर कातिक तक चलता है और याका 2 महीनों में श्रथात् कातिक से पैमान तक रवी का मन होती है। सयुक्त प्रात के इलाहाबाद जिले म खरीप का ५सल वोने पाले पेन में खाद डाल देते है । पानी बरसन राद मेत एक बार जोत दिया जाता है । सरीप की पसल में वः ज्वार, याजग, मका, सारा और कोदो, चावल, अरहर, मूंग, उरद, निल व तिलो वद जाती है । मका थौर बार के लिए येत अक्सर दो बार जाते नात हैं । वानरे के लिए एक ही बार हल चलाने से काम निकल जाता है । चार और मका को तो किमान टी बनाकर बोते हैं । बाजरा, उरद और मग व वीन को बसेर र घोत है । जब वपा नहीं होता तब सराफ में एक दो बार सेना को सचिन की जरूरत पड़ती है और नहीं ता परीफ की फ्मल प लिए सिंचाइकाइ खाम जरूरी नही है । अरहर शो की पमल के साथ चैमाग में काटा जाती है, पानी सय चा भादा योर कुमार में काट ला जाता है । रवी पो पसन में गेहूँ, चना, जौ, मटर, मसूर, अनमी, सरसो, मा और कर बोया जाता है। जिन सेतों में गेहूँ, जौ, मरमों इत्यादि चीजें बोई जाती है उनमें खरीफ को मन नहीं पैदा की जाती बल्कि उन मेना को एक बार जोन पर पासात के पहले छोड़ देते हैं। परमात में उनमें पूर पानी भरता है। गहूँ वगैरह बोने के पहले पिर ये मेत दो नान यार जोन दिए जाते है । सी में चना, मटर को तो बखेर का बात है वाको सर अनाज कडी द्वारा बोए जाते हैं। रखी की सबसने ठाव अमीर तक कट जाता है। अस्तु इस प्रकार से बाद जिले में पैदा होन बाल अजों में चापल, गेह, चना, बार, बाजरा, नी, मद मुस्प है। दानों में मूग, उड़द, अरहर, मटर, मसूर प्रादि पैदा होता है। तेलहन की वस्तुओं में तिल, मरमों, व अलसी प्रधान हैं। इस अलावा गना श्रार शालू की रोती होती है । भारतीय भूमि की पैदावार की कमी नादावाद निले में जो उपन यदा होती है, उनमें मत्रा, मसाला, कपास, ज्य, सन, चाय, तमाखू व पशुश्रा के चार का नाम जोड़ दिया जाय ता भारत की सारो मुर। उपज गिनती में श्रा जाती है । सेती से उत्पन पैदायो की दृष्टि से हिन्दुस्तान समार RR में तासर गिना जाता है । ससार भर की सन की माग तो माल ही पूरी करता है लक्नि गेहूँ, कपास, चावल प्रादि की पैदावार में ना यह अब स्थान रखता है। लेकिन यहाँ के निवासियों की आवश्यक्ताओं का ध्यान में रपर सोचने से यहाँ की उपज कम मालूम पड़ता है। यहा नहीं, तुलना करने से पता चलता है कि पनि एक हम मितना गेहूँ, जौ, कपास, ने श्रादि को उत्पत्ति करते हैं उतनी ही जमीन में उससे कइ इ गुना उपज अमेरिका और समकाले पैदा करते है । हमारे यहाँ की एक नितना गहूँ पैदा होता है उसका चौगुना अमेरिका में और इसमे भी अधिक रूम में पैदा किया जाता है क्योंकि वहाँ पर तो मोल मोल दो दो मील र सेतों में खेता की जाती है । इस प्रकार हमारे यहाँ से श्राठ से दस गुना और बाढया गना जाना और हवाई दीप में उगाया जाता है। हमारे यहाँ की रुह की रोती से भी अधिक माल अमेरिका वाले पैदा कर लेते हैं। चाहे जो उपन ले. लीजिए हर एक में हम और देशों से छिडे हुए पाये जाते हैं । यह बात नहीं कि हमसे भी पिछड़े हुए, देश नहीं है लेकिन ऐसे देश अभी लाने ताजे ढूँढ निकाले गए हैं अथवा यहाँ भारत की तरह को उपनाऊ जमीन नहीं है । और हमें तो अपने यहाँ की तुलना उन देशों में करनी चाहिए जो हमारी ही तरह के है। पैदावार की कमी के कारण स्वभात प्रश्न उठता है कि प्रापिर किस कारण से भारत में और देशों की अपेक्षा उपज इतनी कम होती है। यह हम जानते हैं कि रत में उत्तम खाद देनी चाहिए, अच्छ पीज बोने चाहिए, उत्तम श्री नारों से संत को नोनना बोना चाहिये तथा खेत की सिंचाई का पूरा प्रवन्ध रसना चाहिए । हमारे किसानों को पहले तो पर्यात नद मिलती नदी । यह कुछ श्राम रिवाज सा हो गया है कि गोवर की उपली पाय दी जाती है। ये उपती या कडे इंधन की जगह बलाने के काम में लाए जाते हैं। यदि इस गोवर से उपली पायने की जगह बाद बनाई जाए तो बहुन अधिक पायदाहा। इसके अलावा साद डालने के पहले किमान खाद को खेतों में पहले से देरी लगा कर धूप में छोट देते हैं जिससे बाद का बहुन सा तत्व नष्ट हो जाता है। खाद के अलावा किसान जिन बीजों को बोते हैं वे स्वप और अच्छी हालत में ही होते । पलस्वरूप उपज कम होती है । पिर किसान के बैल और श्रीजारों का हो लाजिए । चैल मरियल तथा रोगी होते हैं, उनसे खूब पसार काम नहीं लिया जा सस्ता । इसी प्रकार की भारी हलो से काम लिया जाता है तो कहीं हल्के हल से । इसके अलावा हल में खेत खोदन लिए जा मोह का पल लगा रहता है यह वहीं प्राधक नुकीला होता है और कही साधारण । सबसे बड़ों पुराह तो यह है कि हमारे हल ज्यादा गहराई तक नहीं खोद सस्ते और न मिट्टी को ही अच्छी तरह पलट सश्ते है । इसलिए जो पौधे उगते हैं उन्हें ऊपर को ही सतह से अपनी यूगक पचनी पड़ती है। नीचे की जमीन ऐमी ही पड़ी रहती है । इससे भी पैदावार अच्छी नहीं होती है ! यदि दिया और उन्मन दग के इलों से काम लिया जाय तो खेत अधिक गहरे सोदे जा सकते हैं। ऐसा करने से नीचे की बतिया मिट्टी ऊरर मा आयगा और पैदावार अच्छी हो सकती है।
पैसी करने के काम में सिचाइ का स्थान भी वारी कॅचा है। लेकिन हमारे देश के कितने मागों में तो मिचाई र पयास साधन ही नहीं है। हमारे मयुक्त प्रान में नहरों का इनाम है। नहरों में प्रापायी करने लिए हिमानों को मेन हिमाय म दाम चुकाने पड़ते हैं। यहाँ पर पानी का बड़ा नुकमान होता है परले किमान बो में पानी पहुँचाने के लिए जो नाजिया बनाने है वे इतनी बुरी हालत म होती है कि पानार-पूट कर बाहर निकल जाता है। सेना में क्यारयाँ नही बनाई जाती तथा मिचा- टोक सरदम नहीं होती है । चूमि नहर से श्रावपाशी करने की कीमत का पानी परमाय ने कोई मायाय नहीं रहना इमलिए मत से जादा पनी गेताम दिया जाता है जिससे वेता का पमन का बड़ा धक्का पहुँचता है। निपु प्रसार कम मिचाइ मे पन को धक्का पहुँचता है वैसे हा अधिक मिचाह मे मो उपन खराब हो जाती है। यदि उचिम परमाय में छोड़ी- कम सिचार की जाय तो पपन बहुत अच्छी होवे । और यह जम्त्री है कि किमान इस धान का पान प्राप्त करें कि किस पसन लिए कितने पानी की समग्न है। निस तरह ने मनुष्य निना श्रागम किए लगातार काम नहीं कर सकता उमौ प्रकार जमीनों ने भी लगातार येते ही पसन नहीं पैदा का नामकती। प्राय अब एक पसल पैदा हो चुकती है तो जमीन में कुछ तत्वों की कमी पड़ जाता है । इस कमा को पूरा करने के लिए समय का पारश्यकता होती है प्रयात् पौरन ही यह कमी ठीक नहीं की जा सकती । इसलिए कितने ही ए मन के याद उन खेत में कुछ नहीं बोते अथात उसे परती छोड़ देते हैं । एमारने से कुछ महीने में जमीन उन पदापों को, जो उसस निकल नाते हैं, वायु मडल द्वारा रि से बीच कर जमा घर लती है । यह कार्य तो टोक है लेकिन इससे जमीन बार/पडा एती है । दूसरे भूमि का देवन परती हो देने से ही बोर हुए मर तव चाप नहीं था आते । अगर खाद दी जाय तो इन तत्वों को उचित पूर्ति हो सकती है। पाद देने का उचित तराका तो यह होगा की परता दाहा हुइ भूमि में वरावर दुरा पर पुर डेट पुट गहरे गड्ढे खोद कर उनमें बड़ा-करट-गोरर मर मर कर अ ढक देवे। इससे साल भर में खाद न कर जमीन में मिल जायगी। लेकिन अब ता विज्ञान के धुरंधर विद्वाना ने यह ट्रॅट निकाला है कि किस फसल के बाद कौन कौन से तब नर हो जाते हैं। इसका सम्बध पसलों के हेर फर से जोड़ा जा सकता है। प्राय किमान फमलो को हेरफर से याने हैं लेकिन वे उपरोक बताए सिद्धात को अच्छी तरह से नहीं मममते । किसी पमल सद जमीन के सब तब तो निकल ही नहीं जाते और न हर एक फसन से यहा तब नर होते हैं। इसलिए अगर किसी पमल बाद ऐमी पसल बोई जाए जिसमें उता को मस्रत पड़े जो कि अभी जमीन में मौजूद है तो यहुन अच्छा हो । चकि खोए हुए तत्वों से अब हमारा कोई मतलब नहीं रहता इमलिये जमीन उनको प्रयी तरह से वायु महल के द्वारा सोच सकती है इससे तीसरी बार हम फिर पहला पसल कोचो सकेंगे। उदाहरण के लिये मकर थे याद गेहूँ, ज्वार के सद, मसूर, मटर वा अलसी, कपास के बाद माह बोई जा सकती है। गेहूँ के माय माय दालें या तेलहन वस्तुए, बाई जा सकती हैं। उन में कमी होने का दूसरा कारण है किसानों में शिक्षा का श्रयाय इसके अलावा वे निधन हैं। श्रतएव अच्छी बात के ऊपर खच नहीं कर मकते। पैमा हो भी तो क्या करें । विना उपयुक्त शिक्षा पाए, वह अच्छी तरह व्यय नहीं कर सकता। यदि किमान पा लिखा हो तो उसे यह मली भाति सम्माया जा सकता है कि कैसो खाद हानी चाहिये, कैसे पसलों के हेर फर से परती भूमि छोड़ने की अावश्यक्ता हटाइ जा सकती है या अति पानी डालने से कौन से नुकसान होते है । खेतों का छोटे छोटे और दूर-दूर होना (Fragmentation of Land Holdings) रन गइयों के अलावा एक और कमी है। भारत में बहुत से रश्तों का प्रपल एक एक दोदा पकड़ भी नहीं है। कितन किसानो के खेत इससे भी छोटे होते हैं। किसी किसी का क्षेत्रपल तो भाषा ही एक होता है। अथवा इसस भी कम । इसके अलावा अनेक किसानों के पास बा से सेव दाते हैं। लेरिन यह दूर दूर होते हैं। इससे किसानों को बहुत हानि होती है। छोटे मेलों में अच्छे अच्छे हलो और श्रीनारों से काम नहीं लिया ना मरता ।लो को ग्वेन में उमाने में हो रहुत सी भूमि देकार चली जाती है। इन सब बातो से किमानों में लड़ाइ भगड़ा पूर होता है और श्रार दिन अदालत २ दशन दिए जाते हैं। करर इस यात का निध श्राया है कि सेनो का दूर दूर होना पुरा है । सेनों के एक जगह न होने के कारण एक खेत से टूमरे खेत में पानी ले जाने म यहुत सा समय व्यय जाता है। जोनाइ-दोगद अवसर पर दो चार घटे की देर होने से ही नुक सान का घर रहता है। याद खेत एक जगह पर हो तो ऐमे समय में देर होने का उर नहीं रहता रिसिचाई के समय एक ही समय में सर खेतों में पानी नहीं दिया जा सस्ता । अगर की नहरों से पानी लेकर कोई किसान अपन खन सींचता है तो नहर से पानी लन में पड़ा खर्च और अमुविधा पड़ती है। पदि सेल एक जगह हो और कुएँ से सिचाइ की जाय तो एक दो बार में सब जगह पानी पहुँच जाय । खेनो के दूर रहने से एक ही कुओं काम नहीं देता और दूर दूर म पानी लाने में बड़ा कठिनाइ पड़ती है। पर यह सपको मालूम है कि जब पसल तैयार होने लगती है तो उसकी रखवाला को वडा जरूरत पड़ती है। यदि रखपाली नही जाय तो चिड़ियाँ, तोते, गाय, वकरी चरह पशु और पदो खेत को साफ करदें। लेकिन श्रग रक्सिान का कोई खेत गोरे इस कोने पर है और कोई उस फोने पर तो रयाली डाक तौर पर नहीं की जा सस्ती। सेना के एक जगह होने से एक ही श्रादमी मारे खेत की देख रेख कर सकता है और बहुत से रवालों को श्रावश्यक्ता नहीं पड़ती तथा पैदावार के मारे जान का डर मा कम होता है। इस अलावा खेत पास हो तो एक ही श्रादमी खेता के यहुत काम समान लेवे । हरवाहे श्रादि काम करते रहते है, अला प्रादमी सब देख माल कर लेता है। दूर दूर खेत होने से नौकर ठीक काम नहीं करते और अवेला श्रादमी सब जगह समय से ठाक देख नहीं पाता है। इससे सच भा अधिक हो जाता है और पैदावार को भी हानि होती है। फिर दूर दूर की दौड़ धूप में शरीर को भी कष्ट होता है। एक जगह खेत होने से शरीर को ( ४२ ) मी आराम मिलता है। श्रादमी ही नहीं थैलों को भी श्राराम मिलता तथा कटाइ, ढोगाई इत्यादि में भी श्रासानी रहती है। और पारस में दूसरे किसानों से होने वाली लड़ाइयाँ मा कम हो जाती है। अगर कहे बुराइयों के कारण यह जरूरी है कि ये हानियाँ दर को जायें इसका साया सा उपाय यह है कि हरेक गाँव में या कई गाँव में मिलाकर मध खेतों का मूल्य श्रदाजा जाय और एक किसान के सेनों का नितना मूल्य हो उतने उतने मूल्य क सेन एक स्थान में एक में कर दिए जाय और मविष्य के लिये उनका छोटे छोटे टुकड़ों में बाँटा जाना बद कर दिया जाय । ज एक ही परिवार के दो तोन श्रादमियों के पास वह बाटे घाटे खेन हो, वहाँ पर बेहतर होगा यदि उनमें समझौता करा कर वे सेत एक ही श्रादमी को दिन दिए जाम । दूसरे श्रादमियों को उनके हिस्से का रुपया मिल आयगा । कई जग ऐमा प्रयन सफलतापूर्वक किया जा चुका है और दूपरी जगह भी ऐसा ही उशय किया जा सकता है। सहमारी ममितियों द्वारा सैता की चादी देसी की जा मक्ता है यह किमी अगले अध्याय में बनलाया जायगा। गोगों में बहुत से किसान ऐसे हैं जिसरे स मर सतो का हाल इतना कम है कि यदि वे चवदी द्वारा एक चद में भी कर लिये जाणे तो भी मंत्री से हानि होना निश्चत है। जिन पिसानों के पास ती चार एण्ड मे कम मिल के पेत है उनको सेती से इतनी अामदनी नहीं हो मरती कि वे उममे अपने मुटु व का जीवन निवाह कर सफे। ऐसे विधानों पी सरया प्रत्येक गाँव में काफी अधिक रहती है। इनकी दशा तो तब हो सुधर सकती है जब गाँव के सब किसान मिलकर एक सहकारी समिति बना लें और मामूहिक रूप से खेती क। इस प्रकार की महकारी समिति का मगठन से किया जा सकता है, यह विसो अगले अध्याय में यतलाया अगा। खेती में क्या करना पड़ता है। श्रार शिदोस्तान के रानों की खास पसल, उनके कम होने के कारण और इन कारणों को दूर करने के उपाय को जान गए । अब हम आपको (४३) सदर में मह भी ना देना चाहते है कि प्रातिर सतो करने के लिए परना क्या क्या पड़ता है अपर, भारत के विमान किस प्रकार सेती करते है। यह हम गुरू में ही बता चुरे है कि भारत में अधिकतर दोपमुले होती है । एक सरी की पसन कालाला है और दूसरी रवी की। पहली परसात चल कर दिवानी तक जाती है और दूसरी दिवाली से हालो तक में तैयार होता है । अानु, वां श्रारम्म होने से पहले किसान म्वेत म जगह जगह पाद की देरियों लगा देता है । रिजव पानी दा तीन दिन बग्स का रुक जाता है तव पौरन नकाजात दिया जाता है और स्वाद को पावड़े से ना कर पटना चला पर सेत बराबर कर देते हैं। इससे बाज मिट में दर जान है - और निष्ट्रिया इन्हें चुग नहीं सकती। प्राशन की पसन पानी रमने ये चार- पाँच दिन में ही वो दी जाती है ताकि की जमीन पूख न जाय अपना पानी फिर बरसने लगाइम पमन में माइ, बाजरा, कराम, उरद, मूग, अरहर, अडी, तिल, मन, धान इत्यादि चीजें बोई जाती है । मह व ज्वार थे खेत अक्मर दो बार जोते जाते हैं । कपास का बीज बोने पहले खत तीन चार पार नोरा नाता है। श्रय पसन वोने के पहले एक दो बार जोतकर नों को छोड़ देते हैं। रवी का पसल में बीज बोने से पहले पेना को दो तीन चार जोतना और उन पर पाटा चलाना पड़ता है। सी में गहूँ, जौ, चना, मटर, सामों, अलती यादि चीन बोई जाती है। बीज चाने के दो तरीके हैं। कुछ फसलों के बीज हाय से खेत में हितरा कर के आते है जैसे बाजरा, उद, मूग, चना, मटर श्रादि के बीज । मक्का, पार, पास श्रादि के बीज डों में नरिए या नली के जरिए गए आते हैं। इंड की बोवाई में हल के द्वारा जो क्ड खुदता जाता है, उसमें एक अदमी दाना छोड़ता जाता है । ननो की बोवाई में हल के पाछे एक लिम्मा पनानी दार बोन वधा रहता है । एक आदमी हल चलाता जाता है और दूसरा पोले बॉस में दाने दादता चलता है जिन खेतों की मिट्टी भुरभुरी होती है उसमें फैड की गोपाइ की जाती है । जिस जमीन में नीचे नमो और ऊपर खुश्का होता है उसमें नली की बोवाइ होनी है। बोवाद के बाद सिचाइ की बारी बातो है । अगर पोषों को पानी मिले .
तो वे सूप जाय श्रौर उरज मारी जाय । यों तो स्वरोप को पसल में सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ता क्योंकि बोवाई के बाद कई महान तक परमात होती है। लेकिन जिम गार वपा नहीं होती उस गर सरीफ की पमन मनौर सी को पमल में तो हमेशा ही तिचाद करनी होती । जहाँ नदियों है यहाँ पर तो मिचाई के लिए नहरे ग्बोद दी गई है । लेकिन सब जगह तो नदियाँ होती नहीं। वहाँ पर अधिकतर कुनों से सिचाइ को जाती है । मोट द्वारा कुत्रों से पानी निकालते तो सब ने देखा होगा। इसमें चमड़े का वड़ा डोला होता है जा कुएँ में रस्मी वाँच कर डाला जाता है। इस मोट को कुएँ से खींचने का काम पैनों से लिया जाता है । एक अादमी चैनों को हाँक्ता हुश्रा दूर तक ले जाता है जिससे मोट कार लिच. अाता है । एक दूसरा श्रादमी कुएँ पर रहता है जो मोट के कार श्रा जाने पर उसमें से पानी उड़ेल लेता है। पानी नानियों के द्वारा खेत में पहुँच जाता है । जहाँ किमी तालाब से किसी ऊचे खेत में पानी पहुँचाना होता है, वहाँ दो आदमी एक दोरी में पानी भर कर कार पंकते हैं, कहीं कहीं रहट से सिचाई होती है। इसम एक चरखी खम्भों के सहारे कुएँ की जगत पर लगाई जाती है । चरसी पर बंधी हुई एक रस्सी में बहुत से दोन वधे रहते हैं । एक डान भर पर ऊपर पाता है तो दूसरा कुएं में जाता है । इसम एक ही श्रादमी बैन हाँकने को रहता है । सिचाई के अलाश किसान को खुपों से पौधों के श्रासपाम उगने वाली घास को सोदकर पंकना पड़ता है। इसको निराइ कहते हैं । यदि एमा न किया जाय तो फमल के पौधों का खाना घास वगैरह पा ले क्योकि वह भी पीयों की तरह जमीन से खाना लेती है । बरसात में तो बड़ी जल्दी घास फूस जम जाती है। इसलिए किसान दस पन्द्रह दिन में निराई मरता है । रबी की फसल में निराई को कम जरूरत पड़ती है। जव कमल ये 11 १ र तेयार हा जाते है तो किसान हसिया मे काट कर गेहूँ, चना श्रादि को सलिहान में ले पाता है । खलिहान उम लिपी पुती जगह को कहते हैं, जहाँ पमल साप की जाती है । पमन के ऊपर चैन चला कर पहले पौधों को माडा जाता है जिससे भूमा और अनाज के दाने अलग हो जाय । माड़ो के पश्चात् हवा चलने पर उड़ौनी की जाती .
है। एए ऊरी निपाद पर से दौरों में भरकर माड़े हुए अनाज को नीचे निगते है जिसमे हलग होने वार कर भुम दामे अन्नग ग गिरती है। याद किसान प्रमाज और मुम का अमोघाटो ले जादा है। স্বামীর স্বাম- चला सच महान और सप पानों पर विचार र निया, पातु पा नही पान च्यिा किती करन में किसान पारदों महाने काम करता रहता है अथवा उमे कमीपाला ना रेटना परता है। भारत में विमानों को श्राप वौर पर चार महीने 1 लेकर हे तायार रहना पड़ता है। दूसरे महीने में सा उगुका किमी तरह काम चन जाना है पर करो ममय के लिये दे । उपचार नदी रम्य सक्ने । श्रत उ ह किमी ऐमे उद्योग यथे का प्रावश्य कता रहती है ना या तो पती करने में सहायता पहुँनावे अथवा जो पती पर निमर हो । उद्योग पर्थ न तो ऐमे हाने चाहिये कि उहें छोड़ने पर उनमें लगी दुइ पूँजी जकड़ा पड़ी रहे और न ऐसे हा जिनमें रिमा प्रकार की विशेष शिक्षा रूरत पड़े , उद्योग-धंधे ऐसे होने चाहिए जो मौक मोके पर चालू किये जा सके जैसे चम्वा कातना, लकड़ी व मिट्टी के खिलौने बनाना,तार के पिन्हे बनाना, मागुन बनाना, हाथ का माग साना, चावल कटना, ह बनाना, दाल दलना सादि । इस दृष्टि से किसानों के लिए एक मुरर उद्योग पशुगलन का है। गाय मम पानने से न केवन दूध पी-दही का च्यापार हाता है, बतिक माप हो साथ गाय स क बच्चे सेवा के काम में पाते हैं और गाय का गोवर और मून बाद के काम माना है। करी भा पाना जा सकता है। यारी का दूध पी लिया जाय और यकरे करी बेचे नाय । काश्मीर, नाव, राजपूताना वया अन्य टही जगह में भेट पालने तथा उन उत्पादन का काम किया जा सकता है। मुगा गलन 'और वरचे तथा हे चेनने का काम भी अच्छा है। घेवा के मार्च में कम स्वच माय एक छोरा सा बगाचा लगया जा सकता है जिसमें तरकारी, माजी या परमून पैदा किय जा सकते हैं। याद किसान पाका ने येच मुरे ता वह याग को ठेस र उठा सकता है। यदि गुनाय के पून लगाए ना तो गुनार रन और गुनाद बनाना बहिन - नहीं होना चाहिये । शहद की मक्वी को पाल कर श द उसन क्यिा जा सकता है । शहता पे वृक्ष लगा कर रेशम के कीड़े पाल जा सकते है। श्रडी को पैदावार वाले प्रदेश म घडी के कीड़े पाले जा सकते हैं। इनमे माप्त रेशम मी बेचा जा सकता है और उससे धागे भी बुने । सकते हैं। खेती के अयोग्य जमीन पर पेड़ लगा देने से लकड़ी मिल सकती है। इसके अलावा विसान रम्सी बाटने, टोकरी बनाने, चटाई धुनने, पखा युनने यादि का काम भी खूबी कर सकते हैं। अगर गाँवों में बिजली पहुँच जाय और उपयुक्त छाटो मात्रा के उद्योग धधे पोल दिए जाय तो किसान अपने वेकारी के समय म इन धर्या में भी काम कर सकता है। अगर उ है कुछ शिक्षा तथा सहायता व सनाह मिले तो वे सयं भी मिन- कर ऐसे धधे कर सकते हैं। ऊपर हमने केवन सक्षेप में यह बताया है कि सिIT अपनी बेकारी के दिनों में कौन से काम कर सकता है। अगले अध्याय में हम इन घर्धा तथा जूता बनाने का काम, लकहो के काम, लाहे के काम, मिट्टी के बर्तन बनाने के धधे श्रादि के बारे में और खुनकर बतायेंगे। अभ्यास के प्रश्न १-शहर में रहने वाले अपने एक मित्र का पन लिखो और उसमें अपन गाँव की वरी को पमलों का वणन करी । २-तुम्हारे गाँव में इम वप रयो की कौन सी पसन क्तिमे रकवे में चाई गई हैं १ अपना उत्तर देने में पटवारी पे फागजो से सहायता ले सकते हो। ३-तुरे गाँव में इस वर्ष गेहूँ की सबसे अच्छी पसल क्सि किमान वेपन में हुई ? उम किमान से यह जानने का प्रयत्न करा मि एक एकड़े में कितना गेहूँ इस वर्ष उपन्न हुआ। ४-तुम्हारे गाँव में इम वय गहे की सास खराव फ्मल कस किसान के सेत में हुई ! उसकी पसल खराप हान के क्या कारण थे। ५-तुम्हारे गाँव में जिन इला का उपयोग किया जाता है उसका सचित्र वगन करो। ये हल कितनी गहराई तक जमीन खोदते हैं ।
६-माहरा जोताह लाम समभाइय और पा रतनाट्य कि प्रार
गो में कौन म नए दन का उपयोग रिशर करने लाभदायक होगा।
-रागारे सिचाइ तराशे का वन कारय। उनमें दिन
मुचारों की आवश्यक्ता है!
र कामाद का महत्व समभाइये। गोवर की अनी बार
बनाने में जा हान हो रही है, उनको यतलाइये।
-प्रापर में पसनो का इरफर किस प्रकार का जाता है। इस
प्रया में क्या कोई मुधार की श्रावश्यकता है।
१.ग्वेनों व दूर-दूर पर कोटे छोटे टुङ्गों में बटे हुए पाने से जो हानिया
होती है उनका दिग्दशन दीनिये।
१--पार गोर में सब से रहे मेतका रकम भोर सबसे छटे खेत का
रकवा लि.ये । साधारएन क्तिन एक रकर ५ गत श्रापक गाँव में
अधिक है।
१२-अरने गौर में ऐसे किमाना का पता लगाइये जिन पाम
४ एकड़ से कम सच के मंत्र हो । उनकी एक वर्ष की श्रामदनी
का पता लगाये धार यह जानन का प्रयन कीनिये कि वे अपना जीवन
निवाह यराबर कर पाते हैं या नहीं।
१५-यार गाँव किमान उत्तम रोज प्राप्त करने के लिय मि प्रकार
और कितना प्रया रन है । यदि सर किसान उत्तम वाज बोने लगें ता
धारर गाँव की मला का उपस में मिसनो वृद्धि हो सकती है?
२४-अपने गांव की किसी मन की मंडाइका वपन कीजिये।
२५-यापर गाँव में कृषि की दशा क्यों रराव है ? उस मुधारने लिये
धार क्या उगर करेंगे !
६-ग्रारक गाँव शिान प्रति वर्ष साधारणतया स्तिने दिन
देकर रहत है। इन दिनों में क्या काम करते हैं ।
७-अपन गरें ये घरेलू उद्योग वा पा वणन कीजिए। गाँव वालो
के लिए उनका क्या महत्व है।
पांचवा अध्याय घरेलू उद्योग-धधे ( Cottage Industries ) घरलू उद्योग धधं की आवश्यकता सेती र ना हम पूरी तरह विचार कर चु) कि तु पवन नेगी से सन बस्तुनो से हमारा काम न कभी चला धीर न लगा पाले मार देश के उद्योगों का मान योर तक रिना या । पर इस्ट बिडया कम्पनी की उल्टी नीति तय इाले हम बड़े बड़े कारखाने ग्युन जाने के कारण हमारे कारीगरों को धक्का पहुँचा । श्रतएव गाँव और वेनी की श्रार अपडे। अधिक सेती य द्वारा हसन अधिक लोगों का पालन न हो मकर और उनका रहन सदा गिर गया। तभी से बराबर अय उद्योग घ) और खासकर गामीण घरेलू उद्योग धधा को श्रावश्कता बनी रहती है। वैसे तो हमको अनेक तरह का श्रय मान तयार परना पड़ा है अथात् दस्तकारी और उद्योगधों का काय प्रलियार करना पड़ता है। भारत में कुछ बड़े बड़े कारखाने पुले हैं। कुछ लोगों का कहना है कि अगर इन कारवान का सख्या घटाई आय तो लोगों को काम मा मिल और देश में मिनो से तयार मान भी मिले 1 पर पिछले सौ सान म जितन बड़ा उद्योग यथे खुले है उनम बीस लाप मे अधिक मजदूर काम न करते । इन उद्योग धयों को बढाने के रास्तों में अनेकौं कठिनाइयों है और अगर थे मल मा हो जाय तो हमारा मतलब पूरा नहीं होगा। पती सी कर किसी तरह रोजी कमाने वाल बहुत स किसान की इन वा में काम नही मिन सपगा। इसलिए छोरी मात्रा र नौर वामकर घरेलू उद्योग धधे हा उन के लिए उपयुक्त है। इनके अलावा कारपनों में मिलन वाली मागे इत अधिक नहीं है कि गौर व लोग शहर की ताली पोर पच का सहन क जिए तेशर हो जायें और पिर परदा प्रथा 7 पारण सभी औरत बाहर जाकर काम नहीं कर सकता । उन लिए घरेलू उपाय थे हा सब से उत्तम है।
( ४६ ) जात-पात के भेद के कारण सुनारे, कुम्हार, चमार, लोहार प्रादि अपने पुरखों का ही काम करते है। और जैसा कि पिछले अध्याय में बताया था, चार महीने निठल्न बैठे रहन वाले पिसानों के लिये यही मंधे ठाक हैं। कुछ हिन्दोस्तानी उद्योग-धधे दिदोस्तान में प्रचलित घरेलू उद्योग वधे श्वना है। लाद जो कि एक प्रकार के वृक्ष का गौद है तथा जा पारनिश करन और मोहर लगा के काम में श्राता है श्रर बड़े पैमाने में तैयार होने लगी है । पहले यह घरी में दो साफ की तया बनाइ जाती थी। शहद और मोम को तर लोगवा अधिक ध्यान न गया है तब भी कुछ जगनी श्रीर पहादी को इस दम को करती है । मायुन पैटरी में भी बनता है और घरों में भी बनाया जा है। बाजार म प्रारको घरलू बन हुए बहुत से सातुन मिल मा हायो रात का कारीगरी में तो भारत के शिली मशहूर हैं। धी-- जितना ढिया और उत्तम काम होता है वह प्राय अमीषा - पर होता है। दिल्ली, मुर्शिदाबाद, मैसूर, ट्रायनकोर वगैरद दाग कारीगरी के लिये मशहूर है । रेशमी कपड़े का काम अब . गया है । जागनी और बनावटी रेशम ६ कारण भारत विपुल मारा गया । तप भी भागलपुर श्रादि स्थान - ITA पड़ा हाय से तैयार किया जाता है। उत्तरी हिदुस्तान काश्मीर में उम्दा श्रार रडिया ऊना काड़े पनत 1 कारवान दुल गये है तर मी मोटे कमन, दरियों, । है। काश्मार के शान बहुत मशहर है । कारचोया , उचर में बडी उन्नत दशा में है। तम्बाकू, कानी rrr. करना, सिरका डानना, सत निकालना, डवनरोटो श्रा. वगैरह काम घरेलू उद्याग धयों में गिन जात है। उद्योग वाघों का वर्णन करते है। वरतन नाना इस प्रान्त में बरतन बनाने का काम । . मा००शा०-४ ( ५० ) सकुट और लोदा के बड़े अच्छे अच्छे वरतन बनाए जाते है । परतन बनाने का काम करने वालों को टठेरा कहते है । मुरादाबाद के कलइ के बरतन बड़े मशहर है । अव तो परतन समान का काम पहुन बड़े पैमाने पर किया जाने लगा है । धनी श्रादयो सैकड़ों बरतन बनाने वालों का नौकर रख लेते हैं और खूब तादाद में उरतन तैयार करते हैं । यह तो हुना पातु के वरतनों का दान । श्रर मिट्टी न बरतन के बारे में सुनये । कुम्हार और कुम्हार व चाक से तो हर कोई वाकिफ होगा । तुमने कुम्हार को अपना पत्थर की I धुमा र उम पर रक्खी मिट्टी से समारा, पर, हॉडया, मटको, घड़ा बनाते तो देखा ही हागा | वह किस सफाई ६ साथ अपनी उंगलियों को नचा कर अली अच्छी ची बना लेता है। हर एक गाँव में कुम्हार होता है। बनारस की तरफ मिट्टो प चिकन काल बरतन बनाए, आते हैं जो बड़े नपीठ हात है। चटाई और टोकरा बनाना बरतन पे अलावा क्लक्त्त का तप बड़ी उम्दा चटाइयों चिनी जाती है। ये चटाइयाँ खूब पतली चिनी रहती है । सपुत प्रान्त म अकसर ताइवे पचों को चटाइयाँ दुनी जाती हैं। ये कुछ मदो और कमजोर होती है । च के इस समय चिनाई का जिक्र ा गया है तो गायों म टोकरी, दलिया आदि बनाने का हाल मो बता देना चाहिये । ये हलवे, टोकरी माज के पेड़ों से, सरकहो तथा बाँस की तीनियों से बनाई जाती हैं। मनदर * टोकरे, भूमा उपली रखने टकरे झाक और सरक डा से बनाए जाते हैं । पतले-पतले झाऊ इटन भिगो कर लवकदार बना लिए जाते है। इन्हीं से इलिया वनात हैं। बॉस की करी बनाने में पास मां को चीर कर चोड़ी पतली पतना वपाचें बना हैं। पहल कुछ मीठी और चौड़ी ग्यपाचियों को श्राा समझ पर रख लेते हैं उस पाद दूसरे इस्लों को चारों श्रार घुमा कर उसे इस तरह कसते जाते हैं कि वे अना अलग न हो सके। सरफड से टारी तथा मोटे आदि बनाए जाते हैं। गुड़ बनाना म में किरमाने या अन से रस निकालने है। इस वा गुद एक चनाया जाता है | गुड बनाने पे लिये रस को पड़े र कड़ाही में उबालते है। हमारे यहाँ रे रिसा गुड़ बनाने में माद का रयान नहीं रखते। तिन पत्तियाँ प्राद सब रम साप गुड़ म रहन देन है। इनपे अलावा जोरम के कर या मैन होता है उसे भी टीक से ना निकालते । मरट, चनारम और कानपुर का गुह यूय असा और छाप उमभा जाता है। चखा कातना और कपदा युनना विमान परिवारों का एक दूसरा महायक धया है सून की कमाई और करड़े को बुनाइ । महामा गरी का कहना है कि चने से हम स्वराज्य मान कर सकते हैं। इस काम में श्रप भी बोस लाख जुनाहो और सूत काती चाला को काम मिलता है। सूत कातने का काम ऐसा है कि किमान को जब पुरमत हो तभी फर सस्ता है । एक चरसे में कोई ज्यादा पूँजी भा नहीं लगता । यदि चरखे पर साद थाठ घटे काम किया जाय तो कातने वाला अच्छी तरह ८ श्राने रोग कमा सकता है । सून कातने से श्लोर प्रायदा यह है कि इसी सूत से किमान अपने घरवाला पे पहनने के लिए कपड़े सुना सकता है । सचमुच सून की कताइ श्रोर कपड़े की बुनाई या काम ऐमा है कि दरिद्र विमानों की दरिद्रता यहुन पद तक कम हो सकती है। पुराने समय में तो डाका की तरफ ऐसा पतला सूत काता जाता यानि उसके बिने हुए मलमन का पान एक छोरी हिबिया में श्रा जाते थे। कहते हैं कि जहाँगीर को किसी ने एक छोटी अँगूठी में नग की जगह पान रख कर भेंट किया था। कुछ लोगों का कहना है कि हाथ पर काडा बुनने का पधा मिलों के मुकाविले में नहीं टहर सकता कि तु हैं यह जान कर पाश्चर्य होगा कि हम गिरी हुई अवरया में भी हायक लगमा २५ लाख बुनकर को काम देते है और देश में जितने कपड़े की खपत होती है उसका एक चौथाइ कपड़ा हापया पर तैयार होता है। फिर भी इस घचे की दशा अच्छी नहीं है इस मुरय कारण यह हैं-१-जुलाहे निधन है। उनके पास पूजी नहीं होती, उमे सूत इत्यादि उपार लेना पड़ता है और इस कारण यामहाजन के चगल में फस जाता है। (२) उसके 5 उथा अन्य औजार - उनमें उन्नति होने की प्रापश्यता है (३) जुलाहा अधिकतर पुरानी हिजा. इमें ही तयार करता है। नये डिजाइन जिनकी बाजार में मार है उससे सीखने की मारत है। (४) जुनाहे को अपने माल को बेचने को न तो कला ही पाती है और 7 उसके पास विज्ञापन देने तथा क्लवैधर इत्याद रखने की मुविधायें ही हैं। श्रावश्यकता इस बात की है कि सहकारी समितियों के द्वारा उसने तैयार माल को विकराने का प्रबंध किया जाये। पशु-पालन जैमा कि पिछले अध्याय में बताया गया या किसानों के लिए एक पडे मात्र का उद्योग है पशु सनन । गाँव में बहुत से लाग गार पालते और दूध पी बेचते हैं, लेकिन न ता वे रोजगार के द्वैग से जानवरों की सेवा परते हैं और न रोजगार र ढग से अपना माल ही मेंच पाते हैं। इसीस देखा जाता है कि पिसान को अक्सर गाय के पालन मे कोई लाभ नहीं हाता । कइन को हम लोग गाय को गो माता करते हैं, लेकिन हमारे सा न तो उ है अपनी माँ की तरह खाना देते हैं और न अच्छी जगह में उ है रखते ही है । इसके अलावा गाय-भैना की साई नही रवी जाती, पनस्व. रूप दोर में अनेक रोग फैल जाते हैं और बहनों की अकाल मौत हो जाती है। इही कारणों में दो की नसन कमजोर होती जा रही है। पहले तो क्सिान गाय खरीदने में गलती करते हैं । गाय दुधार होनी चाहिये । इस लिए यह जरूरी नहीं है कि गाय मोटी हा। गाय की खाल पतलो तथा रोए रम और चिकने होने चाहिए । यन सीधे हो, न बहुत छोटे होने महुत बड़े । कानी, लान भोर भूरे ग की गायें अरसर अच्छी होती है । दूध का काम गाय पालने से बहुत पायदे होत है। गाय का ग्ला बडा होरर मत जोतने के काम आता है। गाय का गोबर, उपलो, पाद और घर लीरने में वाम भाता है ! गाय दूध के बगैर तो हमारा काम नहीं चल सकता। कोई दुध पाता है। कोई उमका दो, मक्सन या मनाइ-बड़ी बनाकर स्वाता है। दूध का साया बनाया जाता है। हम धागे सिा अध्याय में पतावेंगे दखिये अध्याय २० पशुपालन - कि । स्यों ताकतवर होता है। ताकतवर होने के कारर हो वो छोटे बचों को गय का दूध पिलाया जाता है, लेकिन दूब मे बीमारिया मा बहुत सी पैनवा है । दूध की साद में बस मी लापरवाही करने से वह बराव हा नाना है । जरा भी साई की कमी होने ने पैरगरिया नाम का एक कोड़ा दय में पैदा हो जाता है हमने दूध पोरन बीमारी का घर बन जाता है। हमारे ग्बाले दूध दुहन में बहो लाररगही दिखाते हैं। न तो वे कभी यन को धोते हैं, न अपने हाथों का टुहाने के पहले मार करते हैं और न मान्नुपरे करडे हा पहनते हैं । इसके अलावा यहड़े रे दुध पी चुकने के बाद मी यन का पाना श्रावश्यक है। दुहने वाले को न तो वामने होने की आदत होना चाहिये और न कोई दूत का हो राग हो । दुहने को बाह पर गर्द गुबार न उडना चाहिये । दुध का बरतन मार मना हुअा हावे और नव दूध बचने के लिये ले जाया जावे ता बरतन को हमेशा सार पर लेना चाहिए । यह तो हुई टुइने २ मम्मच की बातें । श्रय दूध बेचने का तरीका मुनिए । हमारे देहाती माइ अगर सेर मर दूर होता है तो पात्र हेड पार पानी मिना देते हैं। यही नहीं विचारन के विद्वानों ने एक ऐसी मशान निकाली है जिसमें डालकर घुमाने से कच्चे दूध में मे मम्म्बन अलग निकल जाता है । बचे हुए दूध को मक्पनिया दूध कहते हैं। अाजकल देहाती इस प्रकार पहले मे हो मम्वन निकाल कर तय दूध को बेचने लाते हैं। ऐसा दूध किमी काम का नहीं होता । हमारे हलवाई इसी दूध का म्वराद कर बेचत है। इसा का दही जमाते हैं । चूकि मक्पनिया दूध पतला और सार रहित सा मालूम पड़ता है इसलिए उसको गाढा यनाने के लिए योड़ा सा अरारोट या तीखुर हान् देते हैं। श्रगरोट पड़े दूध के दहो वे ऊरर मोटी मनाई नम नावो है। यह काम शहर में काफी किया जाता है, अगर हम चाहते है कि अधिक किसान दूध बेच कर कुछ पैसे कमा सके तो उहें दूर स्थित शहरों और नगरों बिना बिगड़ा दूध ले जाने की मुविधा नम्रा है। मक्खन और घी दूध से मक्खन और घी भी बनाया जाता है। कार हमने मम्वनि - दूध का हाल बताते समय कन्चे दूध से मापन निकालने को एक तरकीय बताद है । कच्चे दूध से मक्सन निकालने की जिस मशीन का जिक्र ऊपर श्राया है यह श्रमी हमारे गाँवों तक नहीं पहुंची है। शहर में ही उनका उपयोग किया जाता है । तुमन पिछली बार को मक्खन मोल लिया होगा वह इसी तरह बनाया गया था। दूध का पाग पर पका कर मथने से भी मक्खन निकल पाता है, लेकिन शहर वाले पकाने पे झगडे में नहीं पड़ते । गाँवों में जो भी तैयार दिया जाता है उसके लिए पहले दूध को उबालते अथवा पकाते हैं । पर हुए दूध में थोड़ा सा पहले का रक्खा हुआ दही बाल कर रख दो से सात श्राव घटे में दूध जम कर दही पन जाता है । इस दूध को भयानी से सूब मयते है । मथने से मक्सन कर तैरने लगता है और निकाल लिया जाता है । मावन निकालने के बाद जो दूध सा पदार्थ बघ रहता है उसे मट्ठा कहते हैं । मय कर निकाले मक्खन को नैनू मी कहते हैं । नेनू कच्चे दूध से निकाले मक्खन से कहीं अधिक अच्छा और स्वादिष्ट होता है। मक्खन का अच्छी तरद गरम करके घी पनाया जाता है। मम्वन दूध का कुछ भाग बना रहता है । श्रौटाने पर वह जन जाता है और घी तैयार हो जाता है । मक्खन एक दो दिन से अधिक नहीं ठहरता । दूध का भाग रहने से उसमें बदबू आने लगती है और यह खराब हो जाता है। इसलिए मक्खन ताजा खाया जाता है। घी बनाने म खराब होने वाला भाग पहले ही जल जाता है । इसलिए घी बहुत दिनों तक रहता है। घी और मक्खन दोनों शरीर को ताकत पहुँचाते हैं । लेकिन ये बहुत अधिक इजम नहीं किए जा सकते। मक्खन को लोग घी से अधिक लाभदायक मानते हैं । अाजकल बेचने वाले घी में नारियल या दूसरी चीजो का तेल भी मिना देत है। इसके अलावा अाजकल सरह तरह के बनावटी घो चल निम्ले है । जैसे घास का घो, कोकोजम इत्यादि । बहुत से लोग मायन को अच्छी तरह नहीं तपाते हैं बल्कि प्राधा पका आधा कचा ही बेचते हैं। इसलिए तुमने कभी किसी को घी के बारे में कहते सुना होगा कि घी में मटा है। श्राजाल शहर में अच्छा घो मिनता ही नहीं। हा गाँवों में श्रधा घी मिल जाता है। इसलिए श्राजक्ल घो मोल लेते समय उसे अच्छी तरह देख कर लेना चाहिए। रस्सी मनाना तुमने देना होगा कि गाय दुहते ममय बाला अक्सर गाय के मिले पर बार देता है। पर जिस चीज़ मे पैर पाये जाते है इसरे अनाया ये से पानी किसमे निकाला जाता है ? मेतो की सिंचाई के लिये जो मोट चलाई जाती है वह किससे खोया बाती है। इस तरह थे सवालों के जवार में तुम पौरन १६ दागे कि ये सब काम स्से से होते हैं। किसी में रस्सी लगी होती है किसा में रमसा परजी होर का रन्सी कहते है और मोगको रस्सा। विमानों का नाविना मासे के काम ही नहीं चल सकता । घर में, रोन में, गाड़ी की जानी बनाने म, बोम बारने में उसे रस्सी की जरत पड़ता है। क्या तुम यता सकने हो कि ये रहमो-रस्से किसी धनते हैं और कैसे बनते हैं ? अच्छा मुनो, मैंज , पाठ ये, नारियल के जगमों , मन फे, सरपन के गया और और चीज़ों ये मी रस्से बनाए आते हैं। मन की मदीन वटो रस्सी को बाध कहते हैं और बटिया बुनने के काम में आता है। घास और मन का रस्सी बनाने के पहले उसे पानी में भिगोते हैं। श्रच्छी वरद माग जाने पर रहे सूप टते हैं। अब उनके हारे होरे अलग हो जाते हैं व उनमें मे चारचार छैन्छ रेरो हायों में लेकर ऐंटते और शापस में मिलात चलते है। एक लम्बो रस्सी तैयार हो जान पर टसे दोहरा तहरा परक और मोटा व मानून बना लेते है। सन की रस्सी बनाने पे लिए पहले मन पोषो को खड़ा कर मुम्वाया जाता है, तब सन अलग कर लेते हैं । और उसे पट र रस्मी तैयार करते हैं। हमारे यहाँ निणन मन का गदे पानी में सड़ाते हैं जिससे यह मैना हो जाता है। इसके अलावा हमारे यहाँ के सन में कूड़ा भी होता है। फिर ये योदी सन के लच्चे बना डालते है जिससे रेशो य उलम जाने पर उई मुनमाने में बड़ी मेहनत पड़ती है । मद का रही मज़बूत होती है और पानी पड़ने पर बिगड़ती नहीं। लेकिन उन को रख से ठीक नहीं रहती । नावों को बाँधने के लिए जो बड़े बड़े रस्से बनाए जाते हैं वे मज के ही होते हैं। लकड़ी का काम रस्मी के अलावा दूसरी चीज़ है जिमक बिना किसानों का काम नहीं चल सकता । गाँव में बढई का होना जरूरी है । इल, जुया, पालकी, खिड़की, दरवाजाय ढई द्वारा ही तैयार होते हैं । डोवट, सडास और खुरपा, कुल्हाड़ी व बाना के केंट भी वही बनाता है । लकड़ी के जो कुछ भी काम वन सक्त हैं वे बट- को हो दस्तकारी के नमूने हैं । लेकिन बढई एक ही दो चीनो प बनाने में अपना हुनर दिवाते हैं । जा सब बातों में अपनी टॉग अडाते वे किसी बात में निपुण नहीं हो पात । गाँव के बढइ को हल तथा बैलगाडियाँ तो जरूर ही बनानी पड़ती । कोई बदई हल बनाने में होशियार होता है, कोई गाडी बनाने में । इसरे अनावा उसरी हिदोस्तान में लकड़ी पर चिताई का काम देखने में शाता है कारीगर लक्धी पर ऐसे उम्दा उम्दा बेल-बूटे बनाते हैं तथा ऐमी नफाशी करते हैं कि देखत ही बनता है। इसमें शीशम, शाल व वनूस की लकड़ी अधिकतर काम में लाते हैं। नागपुर तथा अन्य जगहों में बिताई का काम बहुत अच्छा होता है। बनारस की तरफ लकड़ी के बिनौने बनारर उस पर हल्के रंग से चित्रकारी की जाती है और फिर एक खास किस्म की पारनिश कर दी जाती है। ये सिलौने काफी अच्छे होते हैं। लोहार का काम बढई के बाद गाँव के लोहार का नम्बर पाता है। इल का पाल, शुल्हाडी का लोहा, खुरपा, बसूना प्रादि चीजों के बनाने ३ लिये प्रत्येक गाव में एक लोहार पारहना जरी रहता है। लोहार लोहे को श्राग में तगता है। फिर उसे लाहे के चौड़े ऊ चे टुकड़े पर जिसे धन कहते है हयोड़े से पीट कर जिस शक्म का चाहता है बना लेता है। लेकिन अब तो लोदे के बड़े-बड़े कारखानों पे खुल जाने से लोहार का बहुत काम घट गया है । तर भी लोहार देशाव में अपना स्थान रखता है।
तेली का काम लाहार की तरह ही देना का हाल है। गांव में तेल बनाने के काम में प्राता है। विरली का तेन नलाया भी जाता है और पाया मी मरतो, अनमी, महुअा श्रादि और भी कितना चौगो का तेल निकलता है। कार में एक वेला प्राश्य होता है। तेल पेरना और वेचना ही उसका काम हा है। तिल्नी कल्ट में परा जाती है । परयर का एक बहो मा श्रोपनी जमीन में गड़ी होना है। प्रोदना के पास ही एक लकड़ी या गम्भा रहता है। उसमें लकदी का पासा पोल्टू यॉप देते है जिसमें य६ मथा रहे। श्रागनी में तिल्ला डानकर चैन को कोल्हू ये माय भोवली दे चारों ओर घुमाते है । ऐसा करने से रिनो को ये नीचे रिसती है और उसमें से तेन निमलता है। पत्पर में छेद होता है। तेल उम हेर में जमीन में रखते हुये एक बरतन में गिरता जाता है। तेल निकल जाने पर दिल्ली को बनी हो आती है । खली जानारों को मिलाइ जाता है जिससे वे दूध अधिक दें। अब तो कही कहीं पायल- एजिन मशीनो द्वारा तेल निकाला जाता है। इसरे चालू करने में पच तो ज्यादा जरूर होता है लेकिन देथा कोन्ह में विना देल दिन मर में निम्नता है उतना तेन ए जिन के जरिये श्राधा घटे में निश्ल पाता है। जूते बनाना निम तरह गाँव में सुनाहा, बदा, लुदार प्रादि रहते हैं, वैसे ही चमार मी रहता है। अगर इनमें सं का भी गाव सोड दे तो सब लोगों को तकली होगी। चमार हमारे लिए नए-नए जने बनाता है और पटे पुराने जूना की मरम्मत करता है । गाँव का चमार खेती भी करता है और खेता से फुरसत मिलन पर जूना बनाने का काम कर लेता है। यो ता गाँव का चमार पाटो पर की काठी और पैन हारने के लिये चमड़े के तस्में वगैरह भी बनाता है। शहरी में चमड़े पे बम और मराक वगेरह बनाए जाते हैं। लेकिन गाँव का चमार अधिकतर जूने ही बनाता है। दुग्ने देहाती वृता ता देखा ही होगा। शहरों में अब पश्चिमी ढग वे पेशनदार जने क धन नाने से को कोई नहीं हवा । लेकिन अग्रेजों के पाने के पहले सर कोई पहनते थे । हमारा देहाती जूता यडा मजबूत तथा अच्छा होता है । इससे पहले से पैर म गर्मी नहीं पहुँचती । सिर यह जल्दा पहना और उतारा जा सकता है । चमडा को खून से हाथ खराब हो जाते हैं और हायों को धोना पहता है। ये विचार पहले ५ और अब उठते जाते है, इसीलिए ये जूते ऐसे नाए जाते है कि इसे पहनने और उतारने में हाय न लगाना पड़े। जूता गाय, बैन आदि जानवरों को ग्वाल का बनाया जाता है । जानवर के मर जान पर चमार उमकी साल को निकाल लाने हैं, खाल को पहले धूप में अच्छी तरह सुखाते हैं जिससे वह खूब कड़ी हो जाती है । इमरे बाद खान करोएँ सा कर दिए जाते है । पर खाल को चमकाते हैं। जूता बनाते समय पैर का नार लेकर चमार उसी तरह हमारे पैर का जूदा तैयार कर देता है जिस तरह कि दर्जी नाप लेकर हमारा कोट या क्मोज सा देता है। अब तो जूता बनाने के वदे-बडे कारखाने खुन गए हैं, जिनमें बड़े उम्दा उम्दा सस्त जूने बनाए जाते हैं। भारताय कारवाना में बने जूतों में कानपुर, श्रागरा या वाटर कम्पा (कलकत्ता) के जूते मशहूर है । अब हम कुछ ऐसे उद्योग धयों का चयन करेंगे जो गात्रों में खोले जा सकते है। फलफूल और तरकारी पैदा करना हमने पिछले अध्याय में पान, फूल और तरकारी भाजी के बाग लगाने के काम की चचा की यो। यदि किसान उपज की खेती के साथ एक छोटा सा बाग लगा ले तो उसे पल और तरकारी तो खाने को मिलेंगी हो, उहे वेच कर के कुछ पैसे भी पा सकेंगे। फूलो से किसान का घर तो महक हो उठेगा उससे खुशबूदार जन, इत्र तथा गुलाब से गुनकद बनाया जा सकता है। अत्र इन के पेड़ मजर भूमि में भी पृन सकते है और तरकारी की वाटिका में किसान के घर का गन्दा पानी काम पा सकता है। परतु यदि बारिका किसान के घर से मिली नहीं है तो गदे पानी को बाटिका तक ढोना पड़ेगा। पूला से पूर्ण लाम उठाने लिए किसान को उचित शिक्षा, ट्रेनिग तथा सहायता देने की आवश्यकता पड़ेगी। परतु किसान गाँव में फल व तरकारी किसके हाय रेचेगा ! अगर यह किसी शहर के पास है तब वह उसे शहर ( ५ ) चाकर अथवा शहर के विक्रेतायों के हाथ उई बेच देगा । अगर ऐसा नहीं है तब विना यातायात के प्रदरये यह पैसे नहीं कमा सक्वा । शहद का धन्या ऊर पूनों का निम पाया या । फूलों के बीच अगर शहद की मापी पान कर चा लगवाया जाय ता शहद पैदा किया जमकता है। लेकिन छने के निये पून की बाटिका प्रावश्यक नहीं है। पर नो लकड़ी क एमे बम्म मिलते हैं कि उनमें शहद को मक्त्यियाँ पाल कर शहद निकालने लिए न ता मक्खियों को उड़ाना पड़ता है और न छचे को तोड़ना । इस पंधे में झमट मा कम हाता है, पूजा मी कम लगती है और लगह मी कम पिरती है। शहद अति पौगिक भोजन भी है । परन्तु इस घधे को सपनता के लिए मी किमान को कुछ शिक्षा तथा चित्रो में सहायता श्रावश्यक है। रचरा मारत में डाक्टर स्पेसर हैच तथा दूसरे ईसाई मरदय वालो की मेहनत के कारण गांवों में इस घरे का कापी प्रचार हुआ है। अन्य उद्योग-धन्य कर बताए गए कुछ पा उद्याग-यचो व अलावा अभी बहुत से और पंधे है। मध्यप्रान्त में वर्षा नगर में एक "अम्विन मारत माम उद्योग सर" है। उसका उद्दश्य गांवों की हालत सुपारना है। उसकी देगरेम्व में नीचे लिम्बे ग्राम उद्याप चल रहे हैं धान से चापन निकालना, बाटा पासना, गुड़ बनाना, तेल निकालना, राहद का मरिचयाँ पालना, मछली पालना, दुर का काम, कवन बनाना, रेशम का मान बनाना, सन का कताई और बुनाइ, कागज बनाना, चाइ बनाना, कपियाँ बनाना, पत्थर की कारागरी, सानुन बनाना, चमडा तैयार करके उसने तरह-तरह की वस्तुएं बनाना इत्याद। घरेलू स्योग-धर्व भार सरकार हमने इस अध्याय में कुछ खास उद्योग थयों के बारे में वो खुन कर बताया है और कुछ के बारे में सहर में हाल कह दिया है। निन धोने अच्छी तरह बताया है उनका गाँव से अधिक मुम्बव है।
इसका पद मतलर नहीं है कि गाँव में गाँव से अधिक सम्बध रखने चाले धषों की ही उनति की जाय । अगर सरकार प.ले से योजना बना कर गाँवों में कृषि के साथ उan क्यों की व्यवस्था और उन्नति करे तो घरेलू उद्योग घो द्वारा साबुन, कागज, कधी, चटन, सुरक्षित चिले पल, हाय के दिने कपडे श्रादि अनेकों पदाप तैयार किये जा सकते हैं । वह गाँवों के लिए, उपयुक्त यधे चुन सक्नी है । उनको चालू करने की व्यवस्था कर सकती है। किसानों को उनमें शामिन हाने के लिए प्रोसादन, शिक्षा, और आर्थिक सहायता दे सकती है। घों क लिए यातायात के साधनों की उन्नति र सकती है और माल की रिका सुलभ कर सस्ती है। अगर गांवों में बिजली भी पहुँच जाय तो कार्य क्षमता और काय क्षेत्र अधिक बढ़ जाय । सरकार दी यह काय सम्पन कर सकती है। प्रातीय तथा दिल्ली की केंद्रीय सरकार ऐसी कोशिश कर रही है। अम्नु, हम येती और घरेलू उद्योग धयों के बारे में राफी जान गए, इनके जरिए बहुत गो वस्तुएँ उत्पन होती है। अब प्रश्न उठता है कि जो वस्तुएँ उत्पन की गई हैं उनको काम में किस प्रकार लिया जाय । अर्थात् वस्तुओं का किस तरह से उपभोग क्यिा ताप ! उफ साच यो सारी बातों पर हम 'अय अर्थशार उपभोग विभाग ये दर विचार करते हैं। अभ्यास के प्रश्न १-~-अपने गाँव के किसी किसान से पूछकर लिग्विये की प्रति मास उसे ग्वेनी सबधी कौन कौन से काम करने पड़ते हैं । नि महोनी में उसे सबसे अधिक काम रहता है और किन महीनों में उसे सपसे क्म ! २...अापरे गाँव किसान माघारगत वर्ष भर में कितने महीने बेकार रहते हैं। हम वेवारी के समय में श्राप उनको कौन सा काम करने की सलाइ देंगे? ३-बापरे गाँव में श्रानक्ल प्रति मास किनना चूत काता जाता है। यदि गाँव के सब बेकार स्त्री पुरुष प्रति दिन चार घटा सूत कातने लगे तो एक मास में कितना सूत तैयार हे सकता है ?
- ४-मार के गांव में या ग्रामपास के गावों में सुनाहों को क्या सख्या है। ये जुलाहे हाय पकते सून फा कहाँ तक उपयोग करते हैं। ५--गुनाहों की प्रार्थिक दशा का वर्णन कीजिये और उनको दशा मुधारने के उपाय पलाये। ६-प्राधिक दृष्टि में बदर प्रचार की आवश्यकता समभाइये । ७-अग्ने गरि य कुम्हार की आर्थिक दशा का चयन कीजिये वर अपना आमदनी किस प्रकार बढा सकता है ? ८-युक्तपात में पीतल के बरता किन स्थानों में अच्छे और सस्ते मिन्नते हैं। मुरादाबाद किस प्रकार प यतना के लिये प्रसिद्ध है और उस उद्योग का वर्तमान दशा केसी है? -पार क जिले में गुड़ किस प्रकार बनाया जाता है । इस प्रात में गुहा कहाँ अच्छा और सस्ता बनता है ? १०- शहर में दूध का क्या भार है ! गावों में दूध किम दर पर मिलता है। दोनों दरों में अंतर ये क्या कारण है। ११-शुद्ध दुव की पहिचान लिलिये । शहर शुद्ध व सस्ते भाव देने के लिए योजना तैयार कीजिये। १२-धीम कौन सी वस्तुए प्राय मिनाई जाता है ? शुद्ध घी को क्या पहिचान है? १४-मारके गांव में चमारों की स्या दशा है ! उनका दशा किस प्रकार मुघारी जा सकती है? १४-अपने गांव के मुख्य घरेलू धयों का वर्णन कीजिए । उनमें कौन- कौन सा बुराइयाँ है ? उहे श्रा- वैसे दूर करिएगा ? १५-यदि आपको ५००) दे दिया जाय तो आप से अपने गावों के घरेलू उद्योग धयों को सुधारन के लिए किस प्रकार खर्च करेंग। १६-सरकार योजना बना कर किस प्रकार घरेलू उपाग-वों की उन्नति कर सकती है। उदाहरण देकर समझाये।
(६६ ) हो पर मेरे लिए नहीं। हाँ कुछ देर के बाद वह मेरे लिए भी जरूरी बन सकती है । मान ली, मैं खा चुका हूँ और तुमने अभी ग्वाना नहीं खाया है इसलिए तुमको अभी साना साने के लिए भोजन चाहिये । कुछ घों के बाद जब मुझे फिर से भाग लगेगी तब मुझे भी भोजन की जरूरत पड़ेगी। किसी धारश्यकता को तृप्ति के लिए एक से अधिक साधन होते है। श्रगर श्राप कोधूम्ररान की इच्छा है तो श्रार तम्माक्, सिगरेट, सिगार और बीही इनम से कोई भी नीर पी सकते हैं। इसी से ये चाजे एक दूसरे की जगह लेने की कोशिश करती है । अकाल के दिनों में गरीब लोग गेहूँ की रोटा के बदले चना, ज्वार, वानरा इत्यादि की रोटो साते हैं। इसी तरह श्राजक्ल किसी वस्तु को एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए रेलगाड़ी और माटर लारियों में लाग डॉट चल रही है। जब हम किसी श्रावश्यक्ता को कभी कभी पूरी करते हैं तो वह श्रावश्यकता हमारे लिए अनिवार्य पनो की कोशिश करता है। मे कोई मनुष्य क्सिी के कहने से कभी शराब पी ले तो फिर वाद को उसका शराब पीने का चमरा लग जाता है और यह पूरा पियक्कड़ बन जाता है। उसकी शराब पीने की श्रादत ऐमी जवरदस्त हो जाती है कि वह श्रासानी से उम श्रादत का नहीं छोड सकता, इस प्रकार और धावश्यक्ताओं को भी पादत पड जाता है। श्रावश्यकता के भेद (Kinds of Wants) यह तो हम जान गये कि श्रावश्यकता किसे कहते हैं और उमर लक्षण क्या है, अब यजानना जरूरी है कि श्रावश्यकताएँ कितने प्रकार की होती हैं। यों तो हम अावश्यक्ता के लक्षणों के मुताबिक यह मक्ते हैं कि कुछ जरूरतो को शीघ्र पूरा करना पता है, किसी का देर में | जैसे पहनने के लिए क्पा चाहे नामले लेकित व लगने पर साना अवश्य मिनना चाहिए । युष श्रावश्यक्ताएँ ऐसी होती है कि उसको पूरा करने के लिए बहुत से साधन होते हैं जैसे धूम्रपान के लिए हम योगी, सिगरेट, तम्बाइ, या सिगार पी रास्ते हैं। इसी प्रकार नशा करो के लिए हम मग, अफीम, तानी, शराब वगैरह पी सकते हैं। ठीक, लेकिन इस तरह के तो शायद सैकड़ी विभाग बनाए जाय तय मा काम न चलेगा। मन से अच्छा तरीका यह है निम में प्रावश्यकताओं को तीन हिस्से में बाँटते हैं। पहले तो ये अावश्यकताएं पाती हैं जिनको हग यावश्यक (Necessaries) समझने है । अधा अपाहिज कैसा ही मनुष्य क्यों न हो, या अपने शरीर को नाश होो से बचाने को हमेशा कोशिश करता है, पेट भरने के लिए सब को भोजन और पीने को पानी चाहिए। पहनने के लिए कपने को प्रारश्यक्ता पडतो है । यहाँ पर एक यात नाटने लायक है । राम माधारण मोजन करता है, फटा पुराना कपडा पहनता है और दूरी-पूरी झापड़ी में रहता है। इसरे विपरीत श्याम या अनान, दूर, पन इत्यादि खाता है । वह साप-मुघरे करड़े पहनता है और हवादार मसन में रहता है । एक तरह से राम और शाम दोनों ही जीवन रक्षा के लिए जरूरा पस्तुओं का उरभाग करते है, परतु कुछ वर्षों में गम काजोर शोर रोगी पन जायगा श्रोर श्याम मजवून य तदा । कहने का मतनर यह कि श्रावश्यक वस्तुओं में से कुछ तो वैवल मनुष्य को जिंदा बनाए रपता है और कुल श्रादमी की जीवन-रक्षा के अलावा तदुरस्ती भी प्रदान करती हैं । जीवन रक्षा ( Necessaries for existence) के लिए आवश्यक वस्तुओं के अागत उन चानों को भी शुमार किया जाता है जो मनुष्य को श्रादत ई शरण जग पड आती हैं । उदाहरण के लिए विमान तम्बार पीते हैं । परतु क्या जोपन निवाह के लिए जरूरी है ? क्या इस रिना किसान जिन्दा नहीं रह सकते हैं ? उत्तर है रह सकते हैं। परतु शुरू से ही तम्बाकू पीते पीते उनकी श्रादत ऐमी हो गई है कि अब वे विना तम्या पिर बुध काम ही नहीं कर सकते । अतएव कुछ वस्तुयो की अावश्यकता तो श्रादमी को जिन्दा रापने के लिए पढ़ता है, कुछ मनुष्य का सस्य और निपुण बनाए रखती है और क्व हमारा श्रादता के कारण अनिकाय बन गई है। इस प्रकार श्रावश्यः यस्तुओं के नान भेद हुए-- जीवन रक्षा, निपुणतादायक और कृत्रिम थावश्यक (Conventional necessaries) दूसरे हिस्से मवे श्रावश्यक्ताए रखी चिली मनुष्य को प्रातम करने के लिए जरत (६८) को धम्तुश्चों (Comfrts) से शरीर को सुरा मिलता है और काम करने की ताकत भी यस्ती है । लेकिन पर जितना पर्च किया जाना है उस हिसाब से कार्य कुशलता नहीं चढती । जैसे किमी गरीन श्रादमी के लिए घोतो, कुता और चप्पल उनकी कार्य-पुरानता स्टाते हैं लेकिन अगर वह रदिया महीन घोती, रेशमा कमीज घ कपड़े का उम्दा जूता पहने तो ये वस्तुएँ उसके लिए श्राराम की यातुएँ कही जावेगी । इसी तरह से गरीय किसान के लिए साइक्लि, पडी, पक्का मकान, इत्यादि भी श्राराम की सामग्री में शामिल किए ला सकते हैं। श्रत में उन श्रावश्यक्तानी का बारा आती है जिनको पूरा करने के लिए मनध्य विलासिता की वस्तुमा(Luxuries) का उपभोग करता है। इस पार तो इन चीजों पर जो रकम वर्च की जाती है उससे बहुत कम कार्य कुशलता मिलती है । कभी कभी तो इन वस्तुओं पे उम्भोग से कार्य-कुशलता बढरे की जगह घटने लगती है। उदाहरण स्वर व वढिया पालीशान मकान, बहुत कीमतो भड़कीली पोशा व विनायती हिम्को और अगरी शराब स्यादि गिनाई जा सकती है। विलासिता की प्रस्तुओं सेवन करने से श्रादमी को प्रालस घेर लेता है और काम करने को जी नहीं चाहता । शराब इत्यादि के सेवन से तो श्रादमो मिलकुल कमजोर नाकाम और रोगी बन जाता है। यह बात ध्याा देने योग्य है कि श्रावश्यकतामा के ये मेद एक दूसरे से मित नहीं है। दरअसल इनका भेद यादमी की परिस्थिति के अनुसार समझा जाता है। मनुष्यों की प्रकृति, श्रादत, पैशन श्रादि पर श्रावश्यक्ताओं के भेद में पड़ जाता है । एक डाक्टर के लिए माटरकार अावश्यक मालूम पड़ती है क्योकि उसकी सहायता से वह कम समय में बहुत से मरीजो को देख सकता है, लेकिन कालेज प्राफेमर के लिए मोटरकार धाराम या विलासिता की ही वस्तु समभी जायेगी ! अमोर यादमी ₹ लिए पहल, विजनी के लेम इत्यादि श्राराम को वानुएँ हो, लेकिन एक गरीब किसान प लिए ये वस्तुएँ एक्दम ग्लिासिता को वस्तुए समझी जायेंगी।
आवश्यकता की पूर्ति ( Satisfaction of want) श्रर प्रश्न उठता है कि श्रावश्यकता पूरी रिम प्रकार की जाती है। यह तो सब। मालूम है कि हर श्रादमी पहले अग्ने खाने पाने का वस्तुए ग्वरीदता है । अर्थशास्त्र के नियमों क अनुमान भी यह ननीजा निकलता है कि मनुष्य अधिस्तर जावन रक्षक वस्तुओं श उपभोग करें और धाराम य विलासिता की चाजो का उपभोग करने में रुपया पैसा की फिजूल ग्वीन करे। परतु इस बात पर हम बाद में ख्याल करेंगे। यहां पर पहले यह जानना श्रावश्यक है कि बहुन मी श्रावश्यक्तायों को तो श्रादमी साधे सीधे पूरा कर लेता है । मान लिया आपको पानी पीना है। श्राप नदी या वाताव पर जाकर पानी पी लेते है । अगर श्रारको जाड़े वे दिन में नहाने के लिए गरम पानी करना है तो आप बटनोई में पानी भर कर भाग पर चढा देते हैं । जब कोद श्रावश्यक्ता साधे-माथे पूरी की जाती है वो किसी मचि का उपभोग सीधे प्राधे किया जाता है। जैसे यहाँ पर बटनोई में काम लिया गया था। परतु अधिकतर अावश्यकता पूर्ति के लिए पहले रुपए-पमे कमाए जाते है और तब उन करयां स श्रावश्यक वस्तु मोल ली नाती है । पढइ हल, मी, मेज श्रादि चाने बनाकर वेचता है, लोहार पाल, खुपा, फावड़ा वगैरह लोहे ८ सामान बनाता है। इन वस्तुकों को घेचने मे ना पैसे बढइ या लोहार को मिलते हैं उनमे वे अपनी श्रावश्यकताओं को पूरा करने के लिए जरूरी वस्तुए, सरोदते हैं। कहने का मतलब यह है कि श्रावश्यक्तात्रों के पूरा करने के प्रश्न की जगह हमें यह सोचना चाहिए कि कोई मनुष्य अपनी आमदनी के रुपए पैसों को किस प्रकार खर्च करता है तथा वच करने का कौन सा ठरीका सरसे उत्तम होगा। आय-व्यय (Income and Expenditure) हा कि कार कहा जा चुका है जीवन रक्षक पदार्थ तो सब लोगों को सेवन करना चाहिए। इन पर किया गया व हमेशा है। श्रायम की वस्तुओं पर किया गया सच (७०) कार्य-दुशलता बढ़ती है । लेकिन ऐशो नाराम और पिलासिता की वस्तुओं पर तपा मादक वस्तुओं पर किया गया व अमर फिजूलपची म समभा जाता है। लेकिन सबसे बड़ी कठिनाई ता यह है कि आमतौर पर यह नहीं कहा जा साता कि और सी वस्तु जीवन रक्षक है, कोन सी पाराम की और कौन सी नीज विलासिता की है । क्योकि मनुष्य को प्रकृति, श्रादत, पैशन व समय के मुताबिक एक यस्तु श्रावश्यक भी हो सकती है और श्राराम य विलासिता की सामग्री भान माती है । तब भी अगर कोई विमान एक घड़ी सरीदे तो उसरा यह पच मिनूलखर्ची में गिना जायगा । लेकिन यदि एर विद्यार्थी पड़ी सरीदता है तो शायद रसको परीद न्यायपूर्ण मानी जा सकती है। हमारा गरीब मीनल किमान अगर अपने और अपने बच्चों को भूखा रस पर या कर्ज लेकर घडी परीदता है नो वह जरूर विलासिता की चीन परीदता है । क्योंकि उसी काये मे वह ऐमो वस्तुएं मोन ले सकता था जिसमे उसे अधिक उपयोगिता प्राप्त होती। मान लागिए पद घड़ी की जगह ग्याने के लिए चना और जवा परीदता तो इससे वह अपना व अपने बच्चों या पेट भर सकता था। पर भरे रहने पर यह मेहनत करके कुल कमा सकता था। लेकिन अगर कोई श्रमौर मनुष्य ऐसा करे तो वह विचन खर्ची नहीं कहलाएगी। क्योंकि उसके पास इता रुपया रहना है कि वह अपनी जरूरी आवश्यक्तायों को अच्छा तरद पूरी कर सकता है। कहा जाता है कि जीवन रक्षा सम्म या श्रावश्यकताए. गिनी गिनाइ है और यदि उही को पूरा करने पर अधिक जोर डाला जायगा तो मनुष्य को श्राधक उद्योग नहीं करना पगा! और मनुष्य जाति असम्म बन जायगी । अधिक सभ्य बनने के लिए यह श्रावश्यक है कि हम नई गावों का प्राविकार करें और नई नई बस्तु धना, जमे रेडियो, टेलीपान, हवाई जहाज । यह मानी हुद बात है कि ये सर पिलासिता भी चाा है। अतपय दमो पिलाशिता की वस्तुओं का उपभोग करना चाहिए । लेकिन हमारे गरीय भारत पे लिए, यह बात कहाँ तक ठीक है ? हमारे किसानों की क्या हालत है ? क्या उहें जीवन रक्षा पदार्य ही प्रासह १ श्रदान लगाया गया है कि जेल के अादर पेदियों को जो भोजन मिलता है वह भी गहर 4 प्रकिाश मनुष्यों को नसीय नहीं होता। ऐसी हालत में विनामिना की यमुत्रो पर किया गया खर्च दिनकुल मिजून है। इसके अलावा हम रता चुके हैं कि हमारे मनदर और छाटे शिल्पकार अपनी ग्रामदनी का अधिकाय भाग तम्बाकू, शराय, अफीम इत्याद मादक वशुनों के सेवन में उड़ा देते हैं । एसा हालत में हमारे बच्चों को कहा से घो दूध मिला सकता है जिसमे रे भविष्य में बदुरुन्त और कार्य पुशन याता पिर धन को किस प्रकार मे खच करना चाहिए ? उत्तर है इस तरह मे निससे न केवन हमको अधिक से अधिक सुख मिले पल जिससे देश में रहने वाले यादा से ज्यादा जनसमूह को जानन-रक्षक वस्तुएँ मिले। जब ता यह धालत न हो जाय तब तक पाराम व विलासिता का वस्तुओं यो वरीदना पिलखों में गिना जाना चाहिए । इसके बाद नव इन चीजों की भी यारी पाये तब ऐसी वस्तुओं का उपभोग न करना चाहिये निनमे थोड़ी देर के अानन्द पे सिवा और कुछ न मिले, जैसे नाच, गेल- तमाशा, श्रातिशबानी । इनम तो जो मामग्री उसके बनाने में लगाई जाती है यह मिनटों में जल कर ग्याक हो जाता है अयात देश का उतना धन नष्ट हो जाता है। वचत (Saving) एक बात और क्या मनुष्य को अपनी प्रामदनी का एक माग भविष्य के लिए निकाल पर अलग नहीं रख दना चाहिए । कौन नानता है कि जो मनुष्य पार सम्पनशाली है वह भविष्य म भी वैसा हा बना रहेगा। क्तिनी बार अचान ऐमे कारण श्रावर उपस्थित हो जाते हैं कि लम्पपनी मनुष्य भी रोटियों का माहतान हो जाते है । इसके अलावा जब श्रादमी युद्दा हो जाता या चारपाइ पकड़ लेता है तब अपनी ति दगी को पुराने हो तरी में बिताने के लिए उससे पहले मे रुपए बचाने पड़ते हैं । इस अलारा बहुत से सज्जन अपन पुत्रों को पटा कर क्मा याग्य बनाना चाहते हैं और पदाद के लिए है पेसा संचय करना पड़ता है। बहुत से मनुष्य अपनी मृत्यु के बाद लड़कों को कुछ धन-दौलत छोड जाना चाहते हैं। कुछ श्रादी बाद में तीर्थयात्रा करना चाहते हैं । कितने तो दान-पुण्य के लिए धन इवट्ठा करना चाहते हैं । इन सब यातों के लिए धन इकट्ठा करना अयातू बचाना पड़ता है । वचाई हुई रकम बचत कहलाती है। बचत स्तिनी करनी चाहिए और कैसे? इस सम्बय में ध्यान देने योग्य यह बात है कि भविष्य के महरा १ बारे में श्रादमी श्रादमी की राय में फक रहता है। कोई भविष्य को मानते हा ही उनका उद्देश्य खा चाट सव वरावर कर दना रहता है क्योंकि कौन जानता है कि कर यमदेव का बुलावा या पहुँचे। परतु ऐस लोग अपनी साय का अधिकाश भाग थोड़ी देर तक मना देने वाली चीज़ों पर सच करते हैं। लेकिन जो दूर देश होते हैं वे ऐसे खर्च को ताक पर रख कर रुपये को भविष्य के लिए बचा परतु बचाना कैसे चाहिये ? क्या यह सब से अच्छा होगा कि रुपए को या उन रुपयों से सोना चाँदी मोल लेकर उनको धरती में गाड देवें। हमारे भारत में गहनों के रूप में बहुत सा धन बेकार पड़ा हुआ है । और चूंकि यहाँ पर हर एक आदमी की इतनी भी श्रामदमी नहीं है कि वह जीवन रक्षक पदार्य भी प्राप्त कर सके, इस बात को बड़ी जरूरत है कि वचत की रकम ऐसे काम में लगाई जाय जिससे देश की पूँजी बढे । लेकिन यह ता बहुत दूर की बात है। श्राप यों ही देविर । यचत रुपयों को गहने के रूप में रखने से श्रापको उम रकम पर कोई सूद तक नहीं मिलता। इस तरह रकम रसो और गाड़ कर रुपया पैसा रखने में कोई अधिक फक नहीं मालूम पड़ना और यह साफ है कि यह तरीका ठाक नहीं । अस्तु सब से श्रद्धा तरीका तो यह होगा कि जैसे जैसे वचत होती जाय वह डाकघर या किसी अच्छे बैंक के सेविग बैंक के हिसाव में जमा कर दा जाय । इससे कुछ सूद मिलने के अलावा रुपया मुरक्षित रहता है । दूसरा तरीका, जमोर खरीदना या मकान बनवाना है । इससे भो रकम मुरक्षित रहती है और ग्रामदनी अच्छी होती है । कुछ मनुष्य अपने दुलापे ५ लिए अथवा श्राने सहारे रहने वाले श्रादमियों को मदद करने क लिए जीवन बीमा करवा लेते हैं । इसके लिए बुद्ध साल तक हरान एक निश्चित रकम योमा कमनी को देनी पड़ती है।
की वनर (७३) अवधि पत्म हो जाने पर थामा का रकम बीमा करने वाले वुड्ढे को या उसको मत्यु पर उसके आश्रितों को मिल जाती है। का नाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को निम अन्न और कपड़े नचे का दुम्न नही हेअरना आप में से कम से कम दसों हिम्मा हर सन बचाने का हट प्रपन करना चाहिए। यदि वह ऐसा करने में सरत होगा तो हम वचत मे मुसाबन प पुरे दिनों में वजदार हाने से पर जायगा और हमेशा मुखा बना रहेगा। अभ्यास के प्रश्न १---उपमाग की परिभाषा लिग्विए और उसका महत्व समभाइये । २-पापश्यक्तायों का विशनाए निन्दिये और उन पर नियत्रण का जरूरत मममाइये। ३-यावश्यक वस्तुओं के भेद उदाहरणों सहित सममाइये । अपने निपुणादायत पारश्यक पदाथ और कृत्रिम श्रावश्यक पदायें। की सूची दीजिए। ४--आराम का वस्तुएँ और विलासिता कि वस्तुओं पे मेद वतन्नाइय। किधी किमान को पिलासिता को वखत्रों की सूची तैयार कीनिये। ५-पादक वस्तुओं के उपभोग से क्या हानियाँ होती है ? ६-गाँवों में तम्बाकू का उपयाग बहुत होता है । क्या श्रार इसे अहा समझते है? ७-कुछ स्थानों में चाय का उपभोग वट रहा है। क्या इसका प्रचार करना आवश्यक है ? ८-सिद्ध कौनिये कि मादा जीवन और उच विचार हो आर्थिक दृष्टि से मा सर्वोत्तम ध्येय है। -विना श्रामदनी रे बनाए सतोष की मात्रा से बदाइ जा सकता है ? १०-वर्च में बचत की श्रावश्यक्ता सममाइये । साधारण परिम्पिति के व्यक्तियों को कम से कम प्रतिमास कितनी बचत करनी चाहिए ! ११-श्रार्थिक दृष्टि मे दानयम का सोचम प्रणाली कौन सा है ? भारत में इस प्रणाली के अनुसार दान कहाँ तक होता है ?
१२-अपनी बचत के धन से सोने-चादी के गहना बनवा लेना कहाँ तक उचित है? -- सातवा अध्याय भारतीय रहन-सहन का दर्जा रहन-सहन का दर्जा (Standard of Living) पिछले अध्याय में हम देख चुके है कि मनुष्य को अावश्यकताएँ अपरिमित होती हैं। फिर भी श्रादमी अपनी प्रामदनी अपनी दशा और परिस्थिति अनुसार कुछ यस्तुनो का उपयोग करने लगता है। इन चीजों * उपभोग का जो ढरा पड़ जाना है वह बहुत कम बदलता है और यदि बदलता है तो बहुत धीरे धीरे । जितनी ग्रामदनी होगी उतना ही सच भी किया जा सकगा। आमतौर पर ए सी श्रामदनी याले मनुष्य या परिवार करीव र एक ही समान रहते हैं। श्रयात् उनका रहन सहन का दर्जा एक सा ही होता है । और बौसे जैसे श्रामदनी में कमी देशो होगी से हो से रहन महन के दर्जे में मिलना पाई जाती है। यों तो एक तरह से प्रत्येक मनुष्य अथवा प्रत्येक परिवार एक दूसरे से सभी थानों में कभी भी मिलता जुलता नहीं है, इसलिए जितने परिवार है उतने रहन सहन क दर्जे हो सकते हैं। लेकिन साधारणत रहन सहन के न चार भागों में बाटे जाते हैं। पहले दर्जे में वे लोग शामिल रहते हैं नि है जीवन रक्षक पदाय मी प्राप्त नहीं होते तथा जि है यह कह दिन तक उपरार करना पडता है। इस दजे के मनुष्य मीप माँगते हैं और कर्ज मी लेत है । इहै दरिद्र कहा जाय तो गलत न होगा । हमारे गरीब मजदूर व क्सिान इसी दजे में रखे जा सकते है । दुमरा दजा उन लोगों का है जिहे जीवा रक्षा सम्ब घो साधारण पदार्थ ही प्राप्त हो सकते है । दोनो वक रूखापा भोजन , फटा पुरामा कपड़ा पहनना व टूटे-फूटे मकार में रहना हो इन लोगो का काम रहता है। तीसरे ने वाले मनुष्यों को जीवन-रदक वस्तुओं के अलावा (७५) श्राराम की भी वस्तुएँ मिल जाती है। दफ्तरों में काम करने वाले हमारे हेडक्लर्फ साहय सूब अच्छा साना खाते हैं, साफ सुथरा पड़ा पहनते हैं तथा खुले हुए हवादार मकान में रहते हैं। ये श्राराम को वस्तुओं का भी सेवन करते हैं। चौथे दजे में रइस और अमीर, श्रादमी श्राते हैं निनो पास धन की कमी नहीं रहती। वे जो चाहे सरोद सकते हैं। उनम जीयन पूरी तरह से विनासिता पूर्ण होता है। परन्तु यह कोई जरूरी नहीं कि जो लखरती है उसरे रहन-महान का दर्ना सब से ऊंचा हो। अगर रइस मनुष्य का स्वास्थ्य खराब रहता है और उमे कोई चीज़ नहीं पचती, तो उसका रहन-सहन सुख देने लायक नहीं होगा। इसी तरह से श्रादमियों का ऐसा राग पकड़ लेता है कि उसका असर उसर रहन सहन पर बहुत पड़ता है। मेवालाल की घास खराब हो, हीरा चहरा हो, मेम की गाँतों में कीड़े पड़ गये हों तो ये लोग उपभोग की चीजों से प्रापूरा सतोष श्रीर आनन्द नहीं उठा सकते । इसी तरह बहुत से त दुरुस्त और तगड़े आदमी शराब, ताही वगैरह पीकर या अनाप शनार खा कर या चुरी साहबत में पड़ जाने के कारण अपने को याद कर देते हैं । फ्लस्वरूप उनका रहन सहन का दर्जा गिर जाता है। भारतीय रहन-सहन का दर्जा ऊपर बताइ बातें हमारे भारत पर कुछ लागू हाती हैं । यहाँ पर पहले तो ग्रामदना की कमी है, अदाजा लगाया गया है कि हिंदुस्तान के राजा महाराना, सेठ माहूकार, रइस वगैरह का मिनाकर भी हर एक भारताय की दैनिक आमदनी का औसत छ सात पैसे पड़ता है। इसर अलावा उपभोग की मी कमा मालूम पड़ती है। सरकार की ओर से यह कहा जाता है। हिन्दुस्तानियों का रहन-महान का दजा बढ़ता जा रहा है, क्योंकि पहले यहाँ श्राराम की जितनी सामग्री पाती थी उनसे कहीं अधिक वस्तुएँ पाजाल पाती है। देहातों में पक्क मकान बनने जाते हैं । साइकिन का प्रचार बहुत अधिक हो गया है। चाय और सिगरेट की सपत अधिक हो गई है, इत्यादि । पर तु इस तरह पहने वाले एक बात भूल जाते हैं कि यह मनुष्य की स्वाभाविक यादत है कि वह मोगविलास के पदायों का सेवन चाता ( ७८ ) किस प्रकार खर्च करता है । रहन-सहन का दर्जा निश्चय करने के लिए मनुष्यों के आय-व्यय का अध्ययन करना अनिवार्य है। अग्रेजी में थाय व्यय सम्बधी लेखे को बजट कहते हैं । इस शब्द का श्रव दिदी में भी प्रयोग होने लग गया है। किसी मनुष्य या परिवार के बजट के अदर यह देखा जाता है कि उस परिवार में कितने मनुष्य है, तिने कमाइ परते हैं, वे कैसे मकान में रहते हैं, उनकी उम्र, योग्य, शिक्षा यादि क्या है ? परिवार की होने वाली श्राय स्या है, वह किस प्रकार पर की जाती है? अन्त में कुछ बचत भी होती है अथवा परिवार वालों को कर्ज लेना पड़ता है ? रहन सहन का दर्जा निश्चय परो ने लिए व्यय सम्म यी ग्रहों से घड़ी सहायता मिलती है। पारिवारिक बजट से ये वल रहा गहन का दर्जा ही नहीं निश्चित होता । इसका अय महार भी है । उनमें से दो पा उल्लेख किया जाता है। प्रथम, पारिवारिक बजट को ठीक से इकट्ठा करने पर यह मालूम किया जा सकता है कि परिवार का व्यय अनावश्यक कामों में व्यय तो नहीं हो रहा है। उदाहरणार्य श्राजाल के जमाने में यह सभव है कि किसी परिवार में अच्छा भोजन न किया जाता हो श्रोर नीमारी पर अधिक खा होना हा! इन मातों का पता लगाने से सरकार शिक्षा द्वारा जानता की शादत सुधारने का प्रयत्न पर साती है। द्वितीय, यदि पारिवारिक वेट ऐमा हो कि उससे मालूम पड़ जाय मिपारिवारिक श्राय पिन स्नि वस्तुओं की खरीदने पर्च की गई तो मरकार तथा उत्पादक उन घस्तुओं की उत्पत्ति करने का प्रयत करेंगे। भारत की प्रार्थिक उसति हो रहा है । भौति भाति के उद्योग धी खोले जा रहे हैं। कृषि पदार्या की उत्पत्ति घटाई घटाई जा रही है। यह प्रश्न उठता है कि यौन से उद्योग र धै खोले जाय? किस वस्तु की उत्पत्ति हाँ तक बटाइ जाय ? यदि पारिवारिक बजट का उपयुक्त प्राकडे प्राप्त हो तारा प्रश्नो पा उत्तर दिया जा सकता है। विरिघ व्यय मुम्ब धो श्रङ्कों अध्ययन परो से यह निश्चय हुधा है किनिस दर से एक कुटुम्ब को श्रामदनी बढती है, भोजा का यय उसी दर से नहीं बढता । लेकिन बस्ट मकान माई का खर्च उसी दर से ( ६ ) बढता है। शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरजन को साममी वे यय की वृद्धि का दर प्रामदनी की वृद्धि की दर से अधिक बढ़ जाता है। नर्मन निवासा टास्टर ए,जिल हजारों परिवार के बजट को देर कर हम नतीजे पर पहुंचे है कि फम श्रामदनी वाले परिवार का अधिकाश माग नोवन निवाद में सच हो जाता है। लेकिन वस्त्र पर प्रत्येक परिवार में प्रतिशत सर्च लगभग बराबर होता है अथात् यदि पचास रुपये ग्रामदनी वाले का परन में करीब श्राठ रुपये वर्च होते हैं ता सौ सय ग्रामदनी वाले का सोलह और हजार रुपया श्रामदनी वाले का करीर एक सौ अाठ म्पया पन होता है। इसी तरह किराये में, रोशनी और ईधन में भी प्रत्येक परिवार में प्रतिशत खच राबर होता है। लेकिन यह गत जरूर है कि अधिक ग्रामदना वाले परिवार की शिक्षा, स्वास्थ्य रक्षा इत्यादि में प्रतिशत खर्च घट जाता है। किसान का खर्च कार कही बातों को और स्पष्ट करने के लिए दो-तीन परिवारों के बनट का विवेचन करना श्रावश्यर मालूम पड़ता है। और चूंकि मारतवर्ष कृप प्रधान देश है इमलिए पहले किसानों की श्रोर ही दृष्टि डालना उचित जान पड़ता है। यो तो श्रापको मुम्बी पिसा मा शायद कही नही मिल जायेंगे। हम उनसे अधिक मतलव नहीं क्योंकि उनका सख्या रहुत कम है। श्रस्तु मारतीय किसान य रहन-सहन का दना चिलुल नोचा है । उमरे कुटुम्ब की मासिक श्रामदना पद्रह रुपए से कम हो रहती है। यह पता लगाया गया है कि संयुक्त प्रात में किसानों की वार्षिक आमदनी सत्तर से नये रुपये के बीच रहता है। इसी से हम इन रहन-महन के दर्जे का अनुमान लगा सकते हैं। इन बेचारों को मान भर हमेशा दोना वक्त ससा सूखा भोजन भी नहीं मिलता। पहनने का कपड़ा बहुत ही मामूली, पा और मैला रहता है। अक्सर ये लोग एक साधारण छपर में ही गुनर करते हैं। अधिकतर यह पाया गया है कि जो परिवार बहुत गरच होता है उम जनमरया बहुत अधिक होती है। इन गायों के बच्चे सानी एक कपड़ पहिने या कमी कमी नगै हो घूमा करते हैं। इन बच्चों को दोनों का घी या अच्छा पाना तक नहीं मिलता । उनको पढाइ लिसाडू की तो कोई परवाह ही नहीं करता । भारत में शायद ही कोई विमान ऐमा होगा जो फजदार न हो । किसी का तो यह मत है कि वह बज लेकर पृषी-पर श्राता है, जिन्दगी भर महाजन के यहाँ रुपया भरता है और अंत में कन छोड। पर ही मर जाता है । बिना कज के तो इनका काम ही नहीं चलता । पोज, पशु, श्रीनार या व्याह शादो को तो छोड दीजिए, वेचारा किसान अपो' रोज रे बच के लिए भी कर्ज लेता है। उसो सरकारी लगान भी देना पड़ता है। इसी म उनकी आमदनी का काफी बड़ा हिस्सा निकल जावा है। फिर कन' की रकम को कौन कहे वह उसका व्याज तक नहीं चुका पाता। नीचे एफ गरीब और एक मामूली किमान के सालाना पारिवारिक सच काव्योग दिखाया गया है मामूली विमान गरीय किसान का खर्च (रुपये म) (रूपये म) भीनन ६८ पश १३ घर रोशनी वनड़ी दवा १ शिक्षा यात्रादानादि ७३ गसब किसान की वार्षिक आमदनी तिहचर रुपए थी। मामूली किसान की श्रामदनी एक सौ चौबीस रूपए थी । गरीव किसान का दश पर अधिक खर्च हुा । मामूली स्मिानो तो शिक्षा पर चार करए सच किए परतु गररच किसान ने कुछ नहीं वर्च किया । गरीब किसान की आमदनी का ६०/ का पर्च' ५ २ १२ ७ श्रयात् लगभग २/५ वा भाग भोजन पर वर्च हुअा परन्तु मामूली किसान ने विल लगमग प्रापी ग्रामदनी भोजन पर खर्च की। दोनों परिवारों की आमदनी वा लगभग १६%अपात् छटा माग कपड़े पर सर्च हुअा। दान धर्म, यात्रादि पर भी दोनों परिवारो ने अपनी प्रामदनी का लगमग रही माग अथात् वच किया। शिक्षा, दवा श्रादि की अपेक्षा न धम, ग्रादि पर अधिक पर्च हुआ। इससे मारतीय किसानों की धार्मिक प्रवृति का जान होता है। गाँव के मजदूर और उनका खर्च श्रतएव यह तो सिद्ध हो गया कि भारतीय किसान बड़े कष्ट और श्रम से अपा जीवन निवाह करता है। किसान का दूसरा भाइ है गॉव का मजदूर । कुछ मामा का कहना है कि इनकी हालत तो स्मिानो मे भी खराब है। किसान इन लोगों पर जमीदारी हुकुम चलाते हैं अथात् जैसे जमोदार किसानों से वेगार लेते हैं तथा उहै क्प्ट पहुँचाते हैं, वैसे हो किसान लोग इन मजदूरों क साप व्यवहार करते हैं । लेकिन ध्यान देने की बात तो यह है कि इससे और मनदूर व पारिवारिक व्यय विशेष सम्म ध नही है पर यह जरूर है कि इससे मजदूरी का आप कम हो जाती है। मजदूरों और किसनों के बाच केवल एफ फर्क पाया गया है और यह यह कि किसानों की आय प्रशात थे ऊपर निर्भर रहनी है लकिन मजदूरों को मजदूरी छ न कुछ नियमित होती है । परन्तु भाचने लायक बात तो यह है कि अक्सर मजदूरों का हिस्सा बॉय दिया जाता है । किमान के पास नो श्रनार रहता है वह स्वय ठसक परिवार के लिए पाप्त नहीं होता। इमी मे से उसको मजदूर की मजदूरी देनी पड़ती है श्रतएव मजदूर को मजदूरी के रूप में कम से कम यनान देने का प्रयत्न करता है । ऐसी दशा में मनदूर तो सचमुच किसानों से मी गए बीते बन जाते हैं तब भी हम हे बिना प्रापक गलती किए किसानों के रहन-सहन के नै में रख सकते हैं। गाँव के कारीगर का व्यय भारतीय गो में यदि किसी की हालत किमान्य और मजदूरों से मा०प्र०ा.- (८२ ही जा सकती है तो वह है गौर के शिल्पी या कारीगर की हालत । न तो प्रकृति पर निर्भर रहा पड़ता है और न मजदूरो की तर- उनकी बुटिया किमानों के हाथ दबी रहती है। यदि कहा जाप कि गाँव के कारीगर की मामिक ग्रामदनी पद्र रूपये के ऊपर पहुँच जाती है तो कोई गलत बात न होगी । बहुत से परिवारों के बजट को देखने के बाद पता चलता है कि या तो ये लोग भी साने को चा। पर श्राधी से अधिक रका उच कर देते हैं। रोशना और ईवन पर हनी प्रामदनी का बोसयाँ हिस्सा खर्च होता है और कपडे लत्त पर लगभग दस प्रतिशत । मकान का किराया, रोगनों और ईधन के सच २ बराबर होता है। श्रामदनी का बचा हुआ पाँचवाँ भाग श्रय वस्तुमा पर खर्च कर दिया जाता है । हलाकि घी दूध तो हे भी नहीं क बराबर हो मिलता है। सफाई और रानी का भी इतजाम खराव रहता है और किसान की तरह इनमें भी शराय या ताड़ी पीने की चुरी पादत पाई जाती है । यह गत भी नहीं है कि ये कर लेते हा श्रीर सूद की दर तो हमेशा की तरह पचहत्तर अस्सी प्रतिशत सालाना स कम नहीं होता। शिक्षा और स्वास्थ्य के सम्म य म ये लाग भी बहुत कम खर्च करते हैं। अभ्यास के प्रश्न १-रहन-सहन के दजे का श्रदाजा किन किन याना से लगाया जाता है। २-अपने गाँव के साधारण किसान की रहन सहन क दर्जे की तुलना उसी गाँव में मजदूर की रहन सहन के दर्जे से कीजिए । ३-मार ला किन यस्तुदों पर थाना रया अधिक बच करते है। ४-अपने गाँव के कम से कम एक साधारण किसान, एक अमीर किसान और एक गरीब किसान के श्राय-व्यय का एक मास का हिसाब लगाइये और यह सतनाइये कि निम्नलिखित मदों पर क्तिमा प्रतिशत खर्च प्रत्येक दजे के विमान किया (अ) भोजन (4)पड़ा (1) मकान भाड़ा (3) शिक्षा (क) मुकदमेबाजी (ख) मादक वस्तु (ग) दानघम (घ) अन्य खर्च।
( १ ) ५-क्सिी कुटुम्ब के माठिक आय-व्यय का हिसाब देख कर हम यह विस प्रकार बता सकते हैं कि व्यय अच्छे तरीके से किया जा रहा है या नहीं? ६-६न सहन का ना ऊँचा कर दन के क्या तराने हैं। उनका अयोग भारत में कहाँ तक दिया जा रहा है। पारिवारिक अाय व्यय रसने की श्रावश्यकता समभाइये। ८-प्रान कुटुम्ब क मामिक व्यय की धानाचना कीजिये। ६-यात्रा का रहन सहन क द पर करा प्रभाव पड़ता है। १.रहन पहन का दा बटान में शिक्षा का महत्त्व समभाइये। ११-रदन बहन के दर्जे का अर्थ समझाइये । गाँव में रहन सहन का दर्जा क्यों नोचा है। उमे किस प्रकार ऊंचा किया जा सकता है! , आठवां अध्याय भोजन कितना और केसा हो' भोजन की आवश्यकता अब तुम जान गए होगे कि हमारी रहन-मदन में मोतन बड़े महत्व का स्थान रहा है । अतएव यद बहुन नी है कि हम यह जान लें कि हमको वैसा भोजन करना चाहिए । पहले यही बगश्ये किश्याप भोजन क्यों करते है। हम जो वस्तुएँ पाते हैं उनम का मतलब निकलता है ? उत्तर में कहा जा सकता है कि हमें दो बात की श्रावश्यकता रहता है एक तो गर्मी की और दूसरे चर्चा की। श्राप प्रभा दिनों दिन लग्वे चौड़े होते जा रहे है और श्रापका होल होल बढाने के लिए यह धारश्यक है कि आप स्वाना खायें। मोजन करने से करीब पचीठ साल की उम्र तक हमारे शरीर और दिमाग की वृद्धि होती है ताकि वे मजदून यन सकें । दूसरे काम करने से शरीर और दिमाग में जा कमी होती है उसकी भी श्राहार से पूर्ति होती है। ना - । वस्तु हम पाते है उनमें से कोई घटन को गम रपती है और किसी से गोश्त बनता है। बदन को चणा रखने के लिये यह जरूरी है कि हम दोनों तरह की चीन साया करें! हमको जिमनी गोश्त बनान बनी चीज़ों की रूरत पड़ती है उससे चार गुना ज्यादा गर्म रखने वालो ना को है। अगर हम एक तरह का खाना जरूस स सादा पाने और दूमरों तरह का परत से क्म, तो हमारा पट तो मर जायगा लेकिन हमारी सरुरता को नुकसान पहुंचे। च, प्रोटीन (Protein, चीनी और विटामिन (Bitamin) ऊपर बनाई हुई याता से यह ता स हो जाता है कि मका वास खास वस्तुएँ पानी चाहिये परन्तु अव यह ये से सममा जाय कि कौन कौन सी चीज अरश्य खानी चाहिए और कितनी । इस पहले यह बताना जरूरी है कि प्रत्येक भोजन की वस्तु से हमको तान पदाथ मिलते हैं चर्चा, प्रोटोन और चीनी । दही, घी, ममवन तथा नारियल प तेल श्रादि में चर्चा की मात्रा अधिक होती है । प्रोटीन एक पदार्थ का अंग्रेजी नाम है। मिच, बदाम, मॅगनी, दान, सूजी, बिमा कुटे व पालिस किए हुए चावल और गश्त में प्रोटीन काफी होती है । इस तरह शक्कर, शहद, गना, श्राटा, चावल, जौ व मुरम्य वगैरह में चीनी यात हाती है । च:, प्राटीन और चीनी अलावा हमको विरामिन नाम के एक तत्व की अावश्यकता पड़ती है । विरामिन कई तरह के होत है जैसे विटामिन A, रिटामिन B, विटामिन C, विटामिन Deयादि हमको इनको भी श्रावश्यक्ता पड़ता है। दूध और पनों में पानी की मात्रा अधिक हानी है, ची, प्रोटीन व चीनी कम रहती है। लेकिन तय भी उनकी कदर इसी लिये की जाती है कि उनमें विटामिन होता है। में ऊपर बताए चारों विटामिन हाते हैं लेकिन विटामिन A सबसे अधिक होता है। यह जरुरी नहीं कि हर एक चीज में ये सारे विटामिन हो जैसे मिच, चाय, कहवा में विटामिन होता ही नहीं । गोभी, टमाटर आदि में पहले तीन विटामिन खूप होते हैं। पलों में विटामिन Cी थपिक्ता रहती है। गाय मोमन के मेद - श्रस्तु, शाजाल में प्रचलित मोबन नौन हिस्मों में बांटे जा सकते हैं स, अन और ममापन का आहार सपने मठ मममा जाता है। पलों के कार रहने वाले प्राति देको के पशु-पता किनने मुन्दर, मा मदक, २० विरगे और मधुर वट वाले हाते हैं । यारप रे विद्वानों ने यह हूँढ निशाना है किनों में एक तरह का विश्लो होना है जिसमे रागर अच्छी तरह गठ जाता है। पनों के गद अन का नम्बर पाता है। रोटा, दान, मात इन मच की गिनता अन म को जाता है। अन जितना मादा होता है उतना ही अच्छा होता है। हमारे पूर्वजों का उद्देश्य रहवा या 'सादा जीवन व ऊँचे विचार" । बो मना तथा फायदा गेहूँ की बानियों में हना है वह गहूँ में नहीं होता । गहूँ मे उतर कर गेटो का गुण होता है, उमरे तर कर पूड़ा का और अन्त में पक्वानो का । श्राग जितना मोटा हो उतना ही अच्छा होता है । पानकन ची में पिमो वाले प्राटे को पहुन मी चीन गरमा के कारण जन नाता है । चारन र पकान में उमका पाना अंगात माह नहीं पंकना चाहिए। परे हुये चारन में कुछ नहीं होता, सर गुण ता माँड़ में उतर पाते हैं। हम लोगों में कुटे हुए चावन ग्वाने की प्रादन है। कुटने मे चावल का बहुन मा अश अलग हा जाता है। इसी तरह से दान को उस हिना के साथ म्वाना चाहिये । मा की हिनवेदार दाल में जो गुण होता है वह घुन्ना मैंग का दाल में बिलकुल नहीं रहता । तरकारियाँ बन व पट को साध करता है । इसलिए हमारे मानन में तरकारियों का होना नगरी है। पेट क हानमा को कभी बिगड़ने नहीं देती। इमरे अलाना इनमें विटामिन, A, B, C, खूब हने हैं । डार लोग अनाहार में दूर को श्रावश्यक बताते हैं और थोड़ा सा घा मी । माँप खाने वाले के शरीर में श्रकार एक तरह का विष पैदा हो जाता है तथा मामाहारी का मन उतना वश में नहीं रहता । सूप तया पश्चिम के अन्य देशों में मौमाहारियों का नम्बर घरता जाता है और पनाहार और अमादार करने वाले मनुष्य तादाद में बढ़ते उपयुक्त भोजन की माना हमारे पुरखे पहले तो खाना खाते ये श्रयवा उन्होंने रोटी, दाल, भान, तरकारी, घी, दूध का जो सादा ग्वाना ठीक किया था उसमें हमें मव चीजें मिल जाती है। रोटी और भात म चोनी की मरमार है, दाल और दृव से प्रोटीन मिलता है और श्रय पाचक पदार्थ मिल जाते हैं । श्राप कहेंगे कि यह तो पुराने जमाने की बात है । श्रापका भायो राम पूछ सकता है कि क्या रोटो ज्यादा खाई जाग और दूसरी वस्तुएँ कम । श्याम कह सस्ता है कि मैं दूध तो सूप पिऊँगा मगर और चौजे केवन नाम फरसे को खा लूगा। इसलिए यह जानना जरूरी है कि कौन सी वस्तु क्तिनी खानी चाहिए । रोटी या दूध से हमको जितनी चाहिए उतनी गोश्त बनाने वाली चीन नहीं मिल मक्ता और शकर, चावल, पों, मापन तो इमको सिफ गरम रख सकते है। जो लोग गोश्त खाते हैं उनको तो गर्मी पैदा करने वाली और गोश्त बनाने वाली चीजें उसी से मिन जाती है। मगर बहुत से लोग ऐसे हैं जो गोश्त नहीं खाते । हि दुनों में तो गोश्त खाो का रिवrr कम है। उनको इसके बदले क्या खाना चाहिए। मूग, मटर, अरहर और इसी तरह की जितनी दाने हैं इन मर में गरमी पैदा करने वानी और गोश्त बनाने वाली दोनो तरह की चीज होती हैं । सेर भर मास में गोश्त बनाने वाली जितनी चीने होती है उससे की ज्यादा सेर भर दाल में होती है । किसी ने सच कहा है हमारे प्रहार म माम, मछली और अड़े रहने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। हमें पयाप्त मात्रा में प्रतिदिन दूर, दही, मट्ठा मिलना चाहिए। इसके अलावा हमारे भोजन मरोन कुछ न कुछ बच्चे (विना थाँच पर पकाए हुए) पदाथों का रहना बहुत ज़रूरी है। इसके लिए हरा मटर, हग नना, टमाटर ,मूली, गाजर, ताने पन, घर, ककड़ी, खरबूला, वह घ मोठे नाबू का रोज सेवन करना चाहिए। इससे स्वास्थ्य बनने के अलावा हमारी श्रायु भी बढ़ जाती है। हमारे भोजन में गुड़ और शक्कर का रहना बिल्कुल श्रावश्यक नहीं है। इहें यदि थोडा सा पाया नाय तो कोई हानि नहीं होती पर ज्यादा पाने मे ये नुक्मान पहुँचाते हैं। बाजार की मिठाइयाँ तो भूल करीमा साना चाहिए । अस्तु हिसार लगा 1 कर निकाला गया है कि स्वस्थ रहने के लिए एक युषा पुरुष को २४ घटों में निम्नलिखित भोजन करना चाहिए घर का पीसा श्राटा छटाँक, दाल १ छटा, चावन्न र घरोंक, पी आधी छटोंक, तरकारी ६ घटाँक, पल १ घर, दृध प्राधा सेर और थोदर मा मिक, जाकि खाना पचाने के लिए बहुत जरूरी है। भोनन उसी ममय करना चाहिए ना सूख मुग लगी हो। यह न होना चाहिए कि करी की तरह र ममय मुह चलना रहे । यद उसी ममय हो मकना है की वह राना साया जाय। पाने के अलावा पानी पीना भी बहुत जरूरी है । लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि पानी हमेशा खाना पाने के चटा श्राधा घटा बाद पिया जाय । यदि पाना पीने की इच्छा बहुत तेज हो तो राने र साथ दो चार घूट पानी पी ले। चौरास घटे में दा सेर य लगभग पाना जरूर पीना चादिए । गरमी के दिनों में पानी का माना ग्ला देना चाहिए। श्रभ्यास के प्रश्न १-एक युवा मनुष्य के लिए प्रति दिन कितना भोजन स्वस्थ रहने के लिए यावश्यक है। २-यापक भोजन में कौन सी बातों का विस परिमाण में होना थाव. ज्यक है। ३-किसानों और मजदूरी के भोजन म किन रातों की कमी रहती है र यह विना खच चटाये कैसे दूर की जा सस्ती है? ४ शहर में रहने वाले और गायों में रहने वालों पे भोजन में क्या तर है! ५-जैसे जैस श्रामदनी बढ़ने लगती है, भोजन म किस प्रकार तर दोन लगता है। ६.-प्रोटीन, चवीं और विटामिन किन पदार्थों में अधिक हाने है ? । ७-~मोजन में दूध, पन और हरो तरकारी का महत्व समझाइये । ८-साविक भोजन के लिये दिन वस्तुओं का उपभोग कितने परिमाण में करना चाहिये।
(८) E-तामसिक भोजन के पदार्थों की सूची दोजिये । १०-मानसिक परिश्रम के करो वाले व्यक्तियों को अपने भोजन में किन वस्तुयो का अधिक परिमाण में उपयोग करना चाहिये ? नवा अध्याय विनिमय (Exchanges) वस्तुओं की अदला बदली (Earter) लकडी वा काम करने वाले वटई को बिना मोन लिए ग्वाने को अनाज नहीं मिल मक्ता । वह कुपी मेज़, खिडकी, हल, गाड़ी आदि बना कर बेचता है। बेचने से ना दाम आता है उससे मडो में जाकर यह अनाज खीदता है। परतु क्या यह जरूरी है कि घटई माल को रुपये पैसे के बदले वेचे १ हमारे गाँव में अधिस्तर यह होता है कि किसान अनाज देकर अपने मतलय की वस्तु दूसरे से ले लेते हैं। अगर गमू को एक जोड़ा धोती लेना होता है तो वह पदह बीस सेर अनाज देकर बागान से उम धोती को ले लेता है। लोहार को जय श्रनान की जरूरत पड़ती है तो वह किसी किसान को जिसे फावड़े श्रादि की जरूरत होती है वे श्रीनार देकर अनाज ले लेता है। पुराने समय में रुपया पैसा ता चलता नहीं था। उस समय इसी तरह की अदला-बदली होती थी। हमारे गाँवों की तरह ही अफ्रीका, आस्ट्रेलिया श्रादि देशों के असभ्य जगली पर भी हाथी दाँत, गोद, मोम, शुनुमुर्स के पर वगैरह देकर उनके बदले में हथियार, श्रोार और खाने पीने की चीजें लते हैं। पदले के लिए से कम दो चीजें जरूर दरकार होतो है । जब हम यह कहते हैं कि किसी का बदला हो सकता है, तो हमारा मननय यह रहता है कि उस चाज का बदला किसी और चीन से हो सकता है। लेकिन एक बात है। मान लो किसी बढई ने एक हल तैयार किया और वह उसके बदले (८६) अनान लेना चाहता है। पर अनार पैदा करने वाले विमान को उस समय इल की दरकार नहीं है। या अगर उमे दूल की जरूरत है तो हो सकता है विन्तु उसके पास बदले में देने के लिये कापी अनाज न हो। यह भी हो सकता है कि किसान हन्न की जगह अनाज ज्यादा काम को वस्तु सममना हो और इस लिये वह हल की जगह अनाज न देना चाहता हो। ऐमा हालत में बेचारे रदद को किसी ऐम किसान का दू ढना पड़ेगा जिसे हल की जरूरत हो, जिम पाम अनाज भी काफी मात्रा में हो और जो हल को अनार मे अधिक उपयोगो समझना हो । श्रदना वदनी हो जाने में दोनों को लाभ होता है। किमान का अनान का अपेक्षा अधिक काम का नोज मिल जाती है।हमी तरह पढई को भी हन य बदले अनान मिल जाने में लाभ होता है। अगर यदई को ऐमा कोर निभान नहीं मिलेगा तो यह मूनो मरने लगेगा और पिर पाली अनार से बढई का काम नहीं चलना । उमे निमक, मिर्च, तेन, स्टाइ श्राद भी चादर मान ला उमे हल के बदले अनार मिल मी गया तो उसे ऐसे श्रादिमियों की तलाश करनी पड़ेगी जानमक, मिच, ममाला श्राद देवर अनाज ले ले । सा तरह दूसरे पशे वालों को भी तग होना पड़ेगा क्योंकि सव का चीज बदमन की जरूरत होती है। लेकिन अगर इसी तरह मा लोग अपनी चोरें लेने वालों का पता लगाने लगे तो बहा बसेड़ा पैदा हो जाय । इन कटिनाइयो का दूर करने के लिये रुपये पैसे चलाए गए । वीर अाजकल हमें जब किसी वस्तु की श्रावश्यक्ता पदनी है ताम सागर जाकर उसे मोन लेते हैं। अमात् निस मनुष्य के पाम यह बानु रहती है से कुछ पैसे या रुपये देकर बदले में उम वस्तु को ले लते हैं। किसा वस्तु को विक्री से सरीदने और बेचने वालो को लाम हो होता है, नुक्मान नामरीदार रूपये की बगह उस वस्तु को ज्यादा काम को समझना है और धेचने वाल को रुपये की जरूरत रती है। माल की खरीद और रिकी (Sale and Purchase) हम किस मनुष्य के पास से चीन मोल लेते हैं वह सौदागर या व्यापारी कहलाता है लेकिन सौदागर और व्यापारी में एक पक रहता है । व्यापारी थोक माल खरीदता है और जरूरत के मुताबिक बेचता है। सौदागर व्यापारियों से माल खरीद कर खाने या उपभोग करने वालों के हाय वेचता है। व्यापारी एक फसल को एक जगह इक्ट्ठा करता है पिर उनको साफ फरार फुटकर वेचने वालों के हाथ बेच देता है। व्यापारी कम से कम दामों में अनाज को मोल लेकर अधिक दाम पर बेचता है। किमान पसल तयार होते ही वेच देते हैं। उस समय अनान का भाव सस्ता रहता है। किसानों का यह विचार नहीं होता कि अगर अनान रवा रहेगा तो भागे चल कर उससे काफी लाभ होगा । लेकिन दरश्रमल पात तो यह है कि हमारे विमानों की हालत ऐसी बुरी है भोर वे इतने कसदार रहते है कि वे अनाज को घर में रख नहीं सकते । व्यापारी उम सस्ते अनाज को मान ले लेकर बढे भर लेता है श्रोर जर भार वर तेन होता है तब उसे बेचता है। फसल तैयार होने के समय तो किमारा प्राय सव अनाज बेच देते हैं । पर थोड़े दिन बाद उनकी रम्द चुरु जातो है । तर वे बनिए को शरण जाते हैं । निया उस समय अनाज किसानों को बाँटता है और उनसे वादा कर लेता है कि पसन पर वे उसका साया दे देंग। इसी तरह बोवाई क ममय वह किमानों को तेज भाव पर अनाज देता है। श्राप हिसाब लगा सकते है कि वानए को क्या लाभ होता है । मान ला पमल पर वह एक रुपये का पीस सेर गेहूँ खरीदता है। और बाद म पारश्यकता पड़ने पर यह पन्द्रह सेर का अनाज वेचता है और वादा करा लेता है कि दूसरी पाल पर यार सहित इन रुपयों का अनाज लेगा । फमल पर 2 सात महीन में व्याज सहित रुपये का पिर बीस सेर ये भाव से गेहूँ ले लेता है । इस तरह एक हा साल में दोगुना पायदा उठाता है। कमल की बिनो में लाभ-हानि, दर-सवर, तेजी म दो का ध्यान रपने से यहा लाभ होता है । इस परोद और विक्री से बनिए व्यापारों का ही पायदा होता है । चेचारे किसान को तो नुकसान हो रहता है । अगर उपज कम होती है तो किसानों को अधिक दाम तो मिलते नहीं। हाँ, बनियाराम रूरी माल को अधिक ऊँचे भाव पर बेचकर सरीदारों से ज्यादा पायदा घटा लेते हैं। किसानों को लाम पहुँचाने के लिए, उहै इन बनियों के हथकडे से बचाने