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Shri Siddha - Chakra - Mandal - Vidhan

Shubhchandra · 2010/05

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(सिद्ध छ मंडलं विधान 4. १ भारतीgir-मन मा श्रावक के अनेक धार्मिक कृत्यों में से पूजा और दान को आगम मे मुख्य बताया है । इसके लिये आचार्यप्रवर श्री कुन्दकुन्दस्वामीने रयणसार में कहा है कि:- दायां पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेण विणा । झाणाझयगा मुक्खं जइधम्म ण तं विणा तहा सोवि ॥१॥ अर्थात्-श्रावक धर्म में दान और पूजा मुख्य हैं, इनके विना वह श्रावक नहीं है। यति धर्म में ध्यान और अध्ययन प्रधान है। इनके बिना वह यति नहीं है। श्री सोमदेवसूरी कहते हैं किः- भारतीय श्रुति-दर्शन केन्द्र पुरतका ...86 देवपूजामनिर्माय मुनीननुपचर्य च यो भुञ्जीत गृहस्थः सन् स भुञ्जीत परं तमः ॥ यश. प्रा. ८ मूल्य: जयपुर - सञ्च . . । हलविज्ञान) - . भगवान् जिनमेन - भावार्थ:-- जो गृहस्थ होकर बिना देवपूजा किये और मुनियों को दान दिये बिना ही यदि भोजन करले तो वह घोर अन्धकार का भागी होता है। स्वामीने भी देवपूजा को आर्यपटक गिनाकर वह आर्योंका मुख्य एवं श्रावश्यक कार्य बताया है। - न प्रसन्नता की बात है कि स्व एव परका यह परम मगलकारक कार्य सदा से अब तक बराबर चला आ रहा है । यद्यपि यह सत्य है कि ज्यों ज्यों समाज का वास होता गया है और उसके वैभव मे अन्तर पड़ना गया है त्या त्यो उसके अन्य धार्मिक कार्यों के साथ २ इस विषय मे भी पर्याप्त न्यूनता आगई है, फिर भी दि. जैन समाज में यह अभी तक चला आरहा है और प्रायः सर्वत्र ही न्यूनाधिक रूप में पाया जाता है यह अत्यन्त हर्ष का विपय है। M P प्रायः भारत के सभी भागो मे विखरी पड़ी या पाई जाने वालो मूर्तियों आदि ऐतिहासिक एव पुरातत्त्व सम्बन्धी सामग्री का सूक्ष्मेक्षिका के द्वारा पर्याप्त पर्यवेक्षण करने पर यह विदित हुए बिना नहीं सकता कि दि. जैन धर्म का यह देव पूजन से सम्बन्ध रखने वाला विषय प्राचीनतम होने के सिवाय भारत में नहुत कालतक व्यापक रूप से सम्मान्य रह चुका है जिसकी कि तथ्यता को अच्छी तरह सिद्ध कर सकने वाले प्रमाणो का दैव दुर्विपाक अथवा तद्विषयक रुचिमान् श्रीमानो और धीमानों सिद्ध चक्र । more मडलावध्यान प S की विरलता के कारण भूगर्भ से बाहर दृश्य जगत् में आना भी असभव नहीं तो असमव सरीखा अवश्य दिखाई दे रहा है। फिर भी जो कुछ दिखाई में आ चुका है या आ रहा है उससे यह स्पष्ट हुए बिना नही रहता कि जिन भक्ति और पूजा का मार्ग सदा चला जाय इसके लिये अनेका श्रीमानों और भूपतियोने प्राचीन समय में अपरिमित व्यय करके उसके आयतनों-मूर्तियो और मन्दिरा का निर्माण किया था। वास्तव में जिनेन्द्र भगवान् की पूजा, भाक्ति, आराधना या उपासना ऐसी ही वस्तु है जो कि परिणामा मे वीतरागता के साथ २ परम शान्ति का प्रदान तो करती ही है साथ ही विशिष्ट पुण्यवन्ध के द्वारा इस भव तथा पर भव में महान् कल्याणों एव अभ्युदयों का भी प्रसव किया करती है । मे के पाच भेद बताये गये है:-नित्य, आष्टाह्निक, चतुर्मुख, कल्पद्रुम, और इन्द्रध्वज । प्रस्तुत " सिद्ध चक्र मडल विधान " नित्य पूजा के ही एक प्रकार से सम्बन्ध रखता है । यद्यपि यह विधान प्राय आष्टाह्निक पर्व के दिनो में ही किया जाता है किन्तु इसका विषय- सम्बन्ध आष्टाह्निक पूजा के विषय भूत नन्दीश्वर द्वीप सम्बन्धी ५२ चैत्यालयों से सर्वथा भिन्न सिद्ध भगवान् के गुणो से है जो कि नित्य पूजा से सम्बन्धित है। आष्टाहिक पर्व के दिनो मे कालकृत पवित्रता के सिवाय इसके किये जाने का सभवतः कारण यह भी है कि मैनासुन्दरी ने इन्ही दिनो मे इस विधान को करके रके महान् फल प्राप्त किया था । शास्त्रा am --- सिद्ध चक्र मंडल विधान . ल . ४ प्राय भारत वर्ष में इस विधान का सर्वत्र जैन समाज में प्रचार पाया जाता है। भालवा तथा खासकर इन्दौर मे तो प्रतिवर्ष ही प्रायः यह होता रहता है और कभी २ तो बहुत ही उच्च समारोह के साथ हुआ करता है । इसी वर्ष के आषाढ मास में दि. जैन समाज के अनभिषिक्त सम्राट श्रीमन्त सेठ दा. वी. ती. शि. रा. ब. रा. भू. रा. रा. रा र. जैन दिवाकर श्रीमान् सर सेठ हुकमचन्द्रजी सा. की तरफ से कितने बड़े और सुन्दर समारोह के साथ यह विधान मनाया गया था उसकी महत्ता का अनुभव प्रत्यक्ष दृष्टा ही कर सकते है जिसको कि देखने के लिये बाहर की भी जनता करीब १५ हजार की संख्या में उपस्थित हुई थी और जब कि उपस्थित समाज के सिवाय दि. जैन समाज की सभी भोजनशालाओं तथा स्थानीय जैन अजैन सभी भोजनालयों में आप की तरफ से भोजन कराया गया था। यह तो एक असाधारण समारोह था परन्तु भन्य श्रीमानों के द्वारा भी बहुत कुछ ममारोह पूर्वक यहां यह विधान होता ही रहता है । ऐसे अवसरों पर इस विधान की शुद्ध मुद्रित प्रतियो की आवश्यकता का अनेक बार अनुभव किया गया है । अतएव इस को मुद्रित कराकर प्रकाशित किया जा रहा है । IA यद्यपि कुछ वर्ष पहले सूरत से स्व. कविवर सतलालजी कृत एक सिद्ध चक्र मंडल विधान छप कर प्रकाशित हो चुका है. परंतु वह सस्कृत नहीं, हिन्दी है । संस्कृत का यह विधान जहां तक हम समझते है अभीतक कहीं से प्रकाशित नहीं हुआ है ।

मंडल विधान क यह विधान उपर्युक्त अनेकोपाधि विभूपित रावराजा पर श्रीमन्त मेठ हुकमचन्द्रजी सा. के पौत्र एव मशीर बहादुर जैनरत्न श्रीमन्त सेठ राजकुमारसिदजी सा M A., L. L B के पुत्र म्व वीरेन्द्रकुमारसिहजी की स्मृति में उनके माता-पिता द्वारा प्रकाशित हो रहा है. जोकि इस विषय के खास रुचिमान् है । क्योंकि श्रीमान् भैया सा ( राजकुमारसिहजी सा.) पूजन के खास प्रेमी है। इतनाही नहीं बल्कि आपका यह नियम है कि किसी खास प्रतिबन्ध के बिना इन्दौर में रहते हुए विना पूजन किये कभी भोजन नहीं करते । आपने अपने गृह चैत्यालय में अपनी रुचि के अनुसार विशालकाय एव अत्यन्त मनोहर श्री १००८ चन्द्रप्रभु भगवान् की तथा एक सिद्ध भगवान् की प्रतिमा भी विराजमान करवाई है । और आप वहां नित्य ही पूजन किया करते है । आपके ही समान आपकी धर्मपन्नी [ लाडी सा. ] श्रीमती साहित्य- विशारदा सौ. प्रेमकुमारीजी सा भी सभी गृहस्थी के कार्यों में कुशल एव बुद्धिमती होने के सिवाय धर्म- रोचिष्णु है । आप दोनो ही की रुचि और इच्छा के अनुसार यह विधान प्रकाशित हो रहा है ra. स्व. चि. वीरेन्द्रकुमारसिंहजी का जन्म श्रावण कृ. ४ स. १६६१ ता ३०-७-३४ और म्वर्गवास आषाढ शु. २ सं. १९९८ को हुआ। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि आपका इलाज अच्छे से अच्छा और अपरिमित व्यय करके जो कुछ भी हो सकता था किया गया, किन्तु अत्यन्त दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि वैद्यों, हकीमों और डॉक्टरों के सभी उपाय चिर प्रयत्न करने पर भी व्यर्थ ही गये और आपने सबके - - म माडल विमान A ग सामने देखते २ ता. २६-६-४१ की काल रात्रि में इन्द्रभवन को सदाके लिये सूना कर दिया। दादी रोती रहगई, बाबा हताश होकर हा हा करते ही रह गये, माता कुछ क्षण तक निश्चेष्ट और स्तब्ध रही और उसके बाद मूर्छित होकर गिरगई, पिता दहाड मारकर गिरगये और गुणों को याद कर २ के रोते ही रह गये, भाई वन्धु और दूसरे सभी स्नेही किकर्तव्य विमूढ हो गये । मतलब यह कि यह मर्त्यलोक का इन्द्रभवन क्षणभर में शोक का सागर बन गया और हाहाकार से सर्वत्र क्षुब्ध होगया । परन्तु क्या किया जा सकता था । बाल युवा वृद्ध. सरोग नीरोग, राजा रक, सज्जन दुर्जन आदि सभी को समान दृष्टि से देखने वाले अर्थतः विषमदृष्टि किन्तु नाम से समदृष्टि-यमराज की वक्र दृष्टि मे रच मात्र. भी अंतर डाल सकने वाला उपाय, क्या अनन्तबल के धारक, सम्पूर्ण नरों सुरों और असुरों के द्वारा वन्द्य, त्रिलोकी पति तीर्थकर भगवान् भी प्राप्त कर सके है ? नही । अतएव इस अवसरपर भी सबको हाथ मलते ही रह जाना पड़ा और वह इन्द्रभवन की कली असमय-अत्यल्प काल मे ही सदा के लिये मुरझागई । जिनको जिस तरह भी मालुम हुआ उन सभीने तार चिठ्ठी या समाचार पत्रों के द्वारा कुटुम्बियोंके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए स्वर्गीय आत्मा की सद्गति के लिये सद्भावना प्रकट की। बहुत से सज्जनाने प्रत्यक्ष उपस्थित होकर और बहुतसोने परोक्षरूप से तारों या चिट्ठियों के द्वारा शोकाश्रुओ प्रवाहित किया । परन्तु इससे क्या हो सकता था । घटित दुर्घटना का विघटन तो असभव ही था । -- - om ( الماسفم L . - . मंडल विधान सिद्धचक्र . . म्व. वीरेन्द्रकुमार बालक होने पर भी सभी भाइयों में बुद्धिमान स्नेही सरलपरिणामी मृदुभाषी अत्यन्त सुन्दर उदारहृदय भाग्यशाली और होनहार थे। उनकी स्मृति के लिये ही यह पूजनग्रन्थ प्रकाशित किया जा रहा है जो कि स्वय मगलरूप है और इसके अनुसार पूजन में प्रवृत्ति करने वालों के अनन्त पापका विध्वस एव पुण्यराशि का संचय करने वाला है। प्रस्तुत विधान की प्रेस कापी एक ही प्रति पर से की गई है जो कि इन्दौर के दि. जैन उदासीना- श्रम में स्थित अमर ग्रन्थालय से हमको प्राप्त हो सकी थी। इन्दौर के अन्य मन्दिरों में भी इसकी प्रतियां परन्तु वे सब अमर ग्रन्थालय की पुस्तक पर से ही लिखी गई है। जिमपर से हमने प्रेस कापी की है, यद्यपि वह जगह २ शुद्ध भी कीगई है, फिर भी पर्याप्त अशुद्ध है । हमसे जहांतक भी हो सका उसको शुद्ध करके ही प्रेस कापी करने का प्रयत्न किया है फिर भी इसमें जो कुछ अशुद्धियां रहगई है या हमसे ठीक नहीं हो सकी है हम उनके लिये पाठकों से क्षमा चाहते है; और विद्वानों से प्रार्थना करते है कि वे उनको शुद्ध एवं ठीक करलेने की कृपा करें । पाठक महानुभाव विधान का पढकर स्वय समझ सकेंगे कि वह किसी एक विद्वान् की सम्पूर्ण ऋत्ति न होकर एक संग्रहीत पाठ है। जिसके कि कर्ता मट्टारक श्री शुभचन्दजी है। 5 AR - - LINK विधा प्रस्तुत पाठ में एक ही जयमाला दो पूजनों में पाई जाती थी हमने वैसा न करके श्री १०८ आचार्य प्रवर पूज्यपाद स्वामी कृत सिद्धस्तोत्र को उस जयमाला की जगह रख दिया है। और उसका हिन्दी आशय भी अन्य जयमालाओकी तरह हमने नहीं लिखा है। उसकी जगह हमने उक्त सिद्धस्तोत्र का बा. जुगलकिशोरजी सा. मुख्तार कृत पद्यानुवाद ही रखदिया है जो कि प्रायः सुन्दर है । इसके लिये हम मुख्तार सा. के आभारी है। आठवी पूजा के जितने मत्र है वे सब महापण्डित आशाधरजी कृत सहस्त्रनाम के आधार पर है. इन नामों का अर्थ समझने में प्रायः विद्वानो को भी कठिनता प्रतीत होती थी, अतएव बम्बई के श्री १०५ ऐलक पन्नालाल दि.. जैन सरस्वती भवन से प्राप्त श्री श्रुतसागर सूारकृत प्राचीन संस्कृत टीका के आधार पर हमने ऐसे शब्दों की निरुक्ति और अर्थ देदिया है। कुछ महानुभावों की इच्छा थी कि आठवी पूजा के मत्रों को भगवज्जिनसेनाचार्यकृत सहस्रनाम के द्वारा परिवर्तित करदेना चाहिये. उनके सतोष के लिये भ. जिनसेनाचार्य के सहस्रनामगर्भित मत्र भी अन्त मे देदिये गये है। अतएव इस पाठ मे आठवीं पूजा का मत्र भाग दुहरा हो गया है। पूजन करने वाले सज्जनों को इनमें से यथारुचि किसी भी एक पाठ का उपयोग करलेना चाहिये । --- न - सि मंडल विधान -- Sant ------- -- . Sarah "," - यद्यपि सशोधन करने में हमने पूरी सावधानी रक्खी है फिर भी कहीं ३ हमने सदेहवश जैसा का तैसा भी पाठ छोड़ दिया है। इसके सिवाय हमारे अज्ञान, प्रमाद, अथवा दृष्टिदोप से भी जो अशुद्धिया रहगई हों या गलतियां होगई हो उनके लिये पाठकों से हम पुनः क्षमा मागते है और विद्वानों से नम्रतापूर्वक उनका संशेधन करलेने की प्रार्थना भी करते है । प्रकृत पाठ के सम्पादन मे ऊपर लिखे अनुसार बम्बई के श्री. १०५ ऐ. प. दि. जैन सरस्वती भवन के सिवाय इन्दौर के उदासीनाश्रम के अमर ग्रन्थालय तथा श्री सेठ माणिकचन्द मगनीरामजी को गोट के श्री १००८ शान्तिनाथ चैत्यालय दीतवारा के ग्रन्थगडार से भी हमको यथावश्यक ग्रन्थसामग्री प्राप्त हुई है. अतएव हम उन प्रथभंडारों और उनके अधिकारियों के अत्यन्त आभारी है। पूजन का कुछ भाग बम्बई में भी छपा है वहांपर प्रेस की सुव्यवस्था करानेमें श्रीयुत पं. नाथूरागजी प्रेमी से हमको बहुत सहायता प्राप्त हुई तथा श्रीयुत पं. रामप्रसादजी शास्त्री से हमको पूजन के कुछ अन्तिम भाग के संशोधन आदि के लिये सहयोग प्राप्त हुआ है क्योंकि हमारे बम्बई से इन्दौर चले आने पर उस भाग का संशोधन आपने ही किया है, अतएव दोनों सज्जनों के भी हम अत्यन्त आभारी है। A-- 6 -- RAN --- 44 महलायाना । -- -1 -- . मंडल की रचना के सम्बन्ध में इतना कहदेना ही पर्याप्त है कि इन्दौर में अनेक प्रकार से इसकी रचना हुआ करती है, उनमसे यहांपर स्थानीय मारवाड़ी मन्दिर के अधिकारियों के सौजन्य से प्राप्त चित्र के आधार पर एक शिखराकार रचना का ब्लाक तयार कराकर चित्र दिया जारहा है. फिर भी जो सज्जन परिमंडल- -गोल आकार में चाहें उन्हे वैसा बना लेना चाहिये और यथाविधि पू पूजन करना चाहिये। -- P- पूजन की सामग्री में एक व्यक्ति के लिये कम से कम लगभग तीस सर अक्षत और करीब २ उतने ही पुष्प तथा दो हजार चालीस श्रीफल लगते है. दूसरी सामग्री भी इसो अनुमान से समझलेनी चाहिये। हम यहापर प्रकाशक महोदय की उस तीव्र पुण्यानुवन्धिनी सद्भावना की हार्दिक सराहना करते हैं जिसके कि कारण आजकल कागज की असाधारण महंगाई ही नहीं दुर्मिलता के होते हुए भी यह प्रकाशित हो रहा है। हम आशा करते हैं कि धर्मात्मा भव्य पुरुष इससे यथेष्ट लाभ लेकर प्रकाशक महोदय की भावना को सफल करते हुए अनन्त पुण्य का सचय करेगे । AR IN खूबचन्द जैन. 6 N Y 9.

----- सिद्ध चोक গ্রিল - T- - श्रीशुभचन्द्राचार्यकृतम् . श्रीसिद्धचक्रसहस्रगुणीपूजामंडलविधानम् । प्रणम्य श्रीजिनाधीशं लब्धिसाम्राज्यसंयुतम् । श्रीसिद्धचक्रयंत्रस्यार्चा सहस्रगुणां ब्रुवे ॥१॥ प्रथ यजनानलक्षगाम्, 1 - विदीतो बुद्धिमान् प्रीतो, न्यायोपात्तधनो महान् । शीलादिगुणसम्पन्नो, यष्टा सोऽत्र प्रशस्यते ॥ २ ॥ अर्थ-विनयशील, बुद्धिमान् , प्रीतियुक्त, न्याय से धन उपार्जन करने वाला, शील श्रादि गुणों से सयुक्त, महान् पुरुष ही जिनागम मे विधान करने वाला यजमान प्रशसायोग्य कहा गया है। अथ याजकलक्षणम्, देशकालादिभावज्ञो, निर्मलो बुद्धिमान् वरः । सद्वाण्यादिगुणोपेतो, याजकोऽत्र प्रशस्यते ॥३॥ अर्थ-देश काल आदि के भावको जाननेवाला, निर्मल, बुद्धिमान, श्रेष्ठ, समीचीन वाणी आदि गुणो से युक्त याजक जिन शास्त्र मे प्रशंसा योग्य माना गया है । १ मूलप्रति में 'निर्मलो बुद्धिमान्' का निर्मल बुद्धिवाला अर्थ किया गया है। २ मूतप्रति में 'सत्य वचन बोलना', एसा अर्थ किया गया है। वह भी ठीक है। 4+ --- 44 P44----- Maratram लिया जा 4. थान -- - . -- - - - अथ प्राचायनमगाम, । है * पृ० दशनबानचारित्रमंयुनो ममनातिगः । प्रानःप्रश्नमंहश्चात्र गुमः म्यान् नानिनिष्ठितः ।। ४ ।। अथ-जा सम्यग्दर्शन मम्यग्जान मग्यक नाग्नि म युक्त, ममता में रहित, विद्वान् . प्रश्न का महन करन वाला-प्रश्न सुनकर बवदाने वाला नहीं है. क्षमा युक्त- कोध गग्नि है. वह जिन शान्य में गुरु- प्राचार्य माना गया है। MAY H श्रय मंडनक्षम. निमलं पृथुलं घंटानारिकातोरणान्निनम् । प्रलंबपुष्पमालाढ्यं चतुर्दाकुंभसंयुतम् ॥ ५ ॥ भेगपटहकमालतालमादननिम्वनः । श्रीकुलीनत्रीगीताव्यं मंडपं कारयद् बुधः ॥ ६॥ अथ-मडल जिस में मांटा जाय कह मदप विद्वान् पुरुष का ऐसा बनवाना चाहिये जो निर्मल- म्वच्छ हो, मंकुचित न हो-पर्याप्त बडा हो, घटा पनाका तारणाम युक्त हो, बी २ पुष्प मालाओ से पूर्ण PAN aat + m 1 मृलप्रति में इसका श्रय 'प्रश्न गहित उभर जानने वाला' ऐगा किया गया है। • इसका अर्थ 'निमन्न नंदीया' ग युक्त किया गया है । यहा पर चढोगा मा बाना कोई गम नहीं है। मंटन पर नंगेरा होना यावश्यक है। - ५ MAP मंडल विधान - पू० । साथ १ हो, तथा जिसके चारो कोणो मे कुभ रक्खे गये हो, एवं भेरी पटह कसाल माझ मजीरा के शब्दो के सुदर कुलीन स्त्रियो के गीतो से जो परिपूर्ण है। अथ सामग्रीलक्षणम् । स्वभावोत्कर्षणी पूजा नेत्रमानसहारिणी । सामग्री शस्यते सद्भिनिरिवलानंदकारिणी ॥७॥ अर्थ—पूजा अपने भावो-परिणामोको बढानेवाली-उनमे उत्कर्ष लानेवाली है। अतएव सत्पुरुषोके द्वारा उसकी सामग्री वही प्रशसनीय मानी जाती है जो हर्ष मे उत्कर्ष करनेवाली हो, नेत्र और मन हरण करनेवाली हो, सभी को आनन्द के देने वाली अथवा सम्पूर्ण आनन्द का प्रदान करने वाली हो । अथ यंत्रोद्धारः । ऊर्ध्वाधारयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् , वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्संघितत्वान्वितम् । अन्तःपत्रतटेष्वनाहतयुतं हींकारसंवेष्टितम्, देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकंठीरवः ॥ ८ ॥ अर्थ-इस विधि के अनुसार सिद्ध यंत्र का उद्धार करे। उसकी रचना करे अथवा किसी बने हुए यत्र की स्थापना करे। . ( - -- ---------- क- LATHI - S TE अथ प्रथमपरिधौ कर्णिकाकारयंत्रैः सहाष्टकोष्टकपूजा। निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् । वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥ १॥ सकलामरेन्द्रसेव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिदूं कर्मानलदावमेघौघम् ॥ २ ॥ ॐ हीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर सवौषट् ॐ ह्रीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ २ ठ ठ. ॐ ही णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् हलां चयो विना यैस्तु सुप्रसिद्बोर्धमातृकः । तैः स्वरैः महितं पूर्वदिश्यनाहतमर्चये ॥१॥ ॐ हीं अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल प ऐ ओ औ अ अ. अनाहतविद्यायै नमः पूर्वदिशि अर्घ निर्वपामीति स्वाहाः आग्नेय्यां कादिसद्वर्णरुपेतानाहतं यजे । सुगन्धैः सुभगैरुद्धैर्जलगंधाक्षतादिभिः ॥२॥ १-मूल्य प्रति में “सुभगै" की जगह सर्वत्र “सुरभै" तथा "उद्धैः' की जगह "उधै" पाठ है । एक जगह "द्रव्य" ऐसा संशोधित पाठ भी है । “सुभगै " की जगह "मुरसे " भी टीक मालुम होता है। -- - -- THIS -- * - - सिद्ध বিদ্যাল -- - । ॐ हीं क ख ग घ ड अनाहतविद्यायै नमः अग्निदिशि अघ निर्वपामीति स्वाहा । दक्षिणस्यां चवर्गण युतानाहतमचये । सुगन्धैः सुभगैरुद्वैर्जलगंधाक्षतादिभिः ॥ ३ ॥ ॐ ह्री च छ ज झ ञ अनाहतविद्यायै नम दक्षिणदिशि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । दक्षिणोत्तरकोणे वा टवर्गाद्यमनाहतम् । सुगन्धैः सुभगेरुद्वैजेलगंधाक्षतादिभिः ॥ ४ ॥ ॐ ही ट ठ ढ ण अनाहतविद्यायै नमः नैऋतदिशि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अनाहतं च वारुण्यां तवर्गोपेतमर्चये । सुगन्धैः सुभगैरुद्वैर्जलगंधाक्षतादिभिः ॥ ५ ॥ ॐ ही त थ द ध न अनाहतविद्यायै नमः पश्चिमदिशि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । पवर्गोपेतमामि वायव्यायामनाहतम् । सुगन्धैः सुभगैरुद्धैर्जलगंधाक्षतादिभिः ॥ ६ ॥ ॐ ही प फ ब भ म अनाहतविद्यायै नमः वायत्र्यदिशि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । -- MUPyawwwwne-- --itmm- का -- प्राधान्य -- पू० ग यजे यरलवोपेतं कौवेयाँ दिश्यनाहतम् । सुगन्धैः सुभगैरुद्धैर्जलगंधाक्षतादिभिः ॥ ७ ॥ ॐ ही य र ल व अनाहतविद्यायै नम. उत्तरदिश्यर्घ निर्वपामीति स्वाहा । यजेऽनाहतमैशान्यां युतं शषसहाक्षरैः । सुगन्धैः सुभगैरुद्धैर्जलगंधाक्षतादिभिः॥८॥ ॐ ही श प स ह अनाहतविद्यायै नमः ऐशानदिशि अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । P अत्र, “ॐ ह्री अर्ह अ सि आ उ सा नमः" इति मत्रस्याष्टोतर शतं जाप्य देयम् । AMI .www अथाएकोष्टकजा । ऊर्धाधोरयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् । वग्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितत्वान्वितम् ।। अन्तः पत्रतटेष्वनाहतयुतं ह्रींकारसंवेष्टितम् । देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकण्ठीरवः ।। इतिपठित्वा कोष्टकानामुपरि पुष्पाञ्जलि क्षिपेत् । mom H 7 - meurse- 4 . Kummarparamwwwwww PAurg Tom ONE । ------- --- गल 4 - द अथ स्थापना। Salil AM - . निरस्तकमसम्बन्धं मूक्ष्मं नित्यं निरामयम् । वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ।। सकलामरेन्द्रसेव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्धं कर्मानलदावमेघौघम् ।। ॐ ही णमो सिद्वाणं सिद्धपरमष्ठितन् अत्रावतरावतर संवौषट्, ॐ ह्री णमो सिद्धाण सिद्धपर- मष्ठिन् अन तिष्ठ २ ठ. ठः, ॐ ह्री णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् । 7 and प्रथाटकम । . । DARPAN P4 ACE TH सिद्धौ निवासमनुगं परमात्मगम्यम् । हीनादिभावरहितं भववीतकायम् ।। खापगावरसरोयमुनोद्भवानाम् । नीरैर्यजे कलशगैर्वरसिद्धचक्रम् ॥ १॥ १ ॐ ही सम्यत्वगुणसहितानाहतपराक्रमाय सकलकर्ममुक्तसिद्धाधिपतये नमः जल नि. स्वाहा । २ ॐ ह्रीं ज्ञानगुणसहितानाहतपराक्रमाय सकलकर्ममुक्तसिद्धाधिपतये नमः जलं नि. स्वाहा । Shant Amrmirma G --.. AMA word ,

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চ্ছি স্মৃটি
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३ ॐ ही दर्शनगुणसहितानाहनपगक्रमाय मकलक्रममुक्तसिद्धाधिपतय नम जलं नि. म्वाहा ।
४ ॐ ह्री वीर्यगुणसहितानाह्नपराक्रमाय सकन्नकर्ममुक्तसिद्वाधिपतय नम. जल नि. स्वाहा ।
५. ॐ ही सूक्ष्मगुणसहितानाहनपराक्रमाय मकलकर्ममुक्तमिद्वाधिपतये नमः जल नि. म्बाहा ।
६ ॐ ह्रीं अवगाहनगुणसहितानाहतपगक्रमाय सकलकर्ममुक्तमिद्धाधिपतये नम जल नि. म्वाहा ।
9 ॐ ही अगुरुलघुगुणसहिनानाहनपराक्रमाय सकलकर्ममुक्तमिद्धाधिपतये नम जल नि. म्वाहा ।
८ ॐ ह्री अन्यावाधगुणमहितानाहनपराक्रमाय मकलकर्ममक्तमिद्वाधिपतये नम जल नि स्वाहा ।
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( अाग चन्दनादिक भी इन्ही पाठ मत्रा बालकर आठ २ बार चढाना चाहिय । केवल
"जल' की जगह “चन्दन, अक्षतान् , पुप्पाणि " आदि शन बदल देना चाहिये।
आनन्दकन्दजनकं धनकममुक्तम् ।
सम्यकशमगरिमं जननार्तिबीतम् ।।
मौरभ्यवासितभुवं हरिचन्दनायै ।-
गन्धेयजे परिमलवमिद्धचक्रम् ॥ २ ॥ चन्दनम्
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सर्वावगाहनगुणं म्बममाधिनिष्ठम् ।
सिद्धस्वरूपनिपुणं कमलं विशालम् ।।
सौगन्ध्यशालिवनशालिवराक्षतानाम् ।
पुजैर्यजे शशिनिभैवरसिद्धचक्रम् ॥ ३ ॥ अक्षतान
नित्यं स्वदेहपरिमाणमनादिसंज्ञम् ।
द्रव्यानपेनममृतं मरणव्यतीतम् ।।
मन्दारकुन्दकमलादिवनस्पतीनाम् ।
पुष्पैर्यजे शुभतमैर्वरमिद्धचक्रम् ।। ४ ।। पुष्पाणि
ऊर्ध्वस्वभावगमनं सुमनोव्यपतं ।
ब्रह्मादिवीजसहितं गगनावभासम् ॥
क्षीरान्नमाज्यवटकै रसपूर्णगमः ।
नित्यं यजे चरुवरैर्वरसिद्धचक्रम् ।। ५ ।। नैवद्यम्
आतंकशोकभयरोगमदप्रशान्तं ।
निर्द्वन्द्वभावधरणं महिमानिवेशम्
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मंडल विधान
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कर्पूरवर्तिबहुमिः कनकावदातै ।-
दापर्यजे रुचिवरैर्वरसिद्धचक्रम् ॥ ६ ॥ दीपम्
पश्यन् समस्तभुवनं युगपनितान्तम् ।
त्रैकाल्यवस्तुविषये निविडप्रदीपम् ।।
सद्व्यगंधधनसारविमिश्रितानां ।
धूपैर्यजे परिमलैर्वरसिद्धचक्रम् ॥ ७ ॥ धूपम्
सिद्धासुराधिपतियक्षनरेन्द्रचक्रे ।-
येयं शिवं सकलभव्यजनैश्च वन्धम् ।।
नारंगपूगकदलीफलमातुलिंगै'।
सोऽहं यजे वरफलैर्बरसिद्धचक्रम् ॥ ८॥ फलम्
गंधाढ्यं मुपयोमधुव्रतगणैः संग बरं चन्दनम् ।
पुष्पौघं विमलं सदक्षतचयं रम्यं चरुं दीपकम् ॥
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१-कहीं २ "नारिकेले." ऐसा भी पाठ है।
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विधान - । - - . . १० while धूपं गन्धयुतं ददामि विविधं श्रेष्ठं फलं लब्धये । सिद्धानां युगपत्क्रमाय विमलं सेनोतरं वाञ्छितम् ॥ ६ ॥ अर्धम् ज्ञानोपयोगविमलं विशदात्मरूपम् । सूक्ष्मस्वभावपरमं यदनन्तवीर्यम् ।। कौंधकक्षदहनं सुरक्शस्यबीजम् । वन्दे सदा निरुपमं वरसिद्धचक्रम् ॥ १० ॥ पुष्पांजलिः 'ॐ हीं अहं असि आ उ सा, इति मंत्रस्य पूर्ववदष्टोतरं शतं जाप्पं देयम् । , IA प्रथ जयमाला। --- . पणविपि परमेसुर णौमि जिणेसुर । नासियदुकियकम्ममलु ॥ पुण अक्खिभि भत्तिय णियमणसत्तिय । सिद्धचकजयमालपलु ॥ घता तमालासमासंपडाशीसकेशा । खरा दारुणा लोयणारत्तवेषा ॥ - - ----- -का बद्ध ORE निशाना ------ . -th ra गहाभूयवेदाल णासंति चकम् । वरं भावयंणे मणो सिद्धचकम् ॥१॥ ततो भीसणोच्छंकदाढा कराला । चलालोयणा दीहजीहा विशाला || वमीढुति सिंहाइ दाढीनचकं । वरंभावयंणेमणो सिद्धचकं ॥ २ ॥ सरोसा मघोरा महाकालरूवा । जनूगरि आशीविया दुट्ठभावा । मकोहा ण डंकति होणायचक्कं । वरंभावयंणे मणो सिद्धचकं ॥ ३ ॥ जरो खेय रोगावली गंडमाला । पमेहाइ रुवावना कुट्ठसूला ॥ विनाशंति सासानिला वाहिचकं । वरं भावयंणे मणोमिद्धचक्कं ॥ ४ ॥ ---- 5) +MH-- सिद्ध व ভঙ্গল 4- ia - . १० " k - . सधूमावलीभीसणासंजलंता । फुलिंगाइ मेलति चंडा दिगंता ॥ न डाहंति देही सिहीजालचक्कं । वरं भावयंणे मणो सिद्धचक्कं ।। ५ ।। सकल्लोललोलावहोलातरंगा। अपारा य घोपावदी सिंधुगंगा ॥ अगाधा सुतारंति हो णीरचक्कं । वरं भावयंणे मणो सिद्धचक्कं ॥ ६ ॥ " - कसापासकुतासभल्लायमला। सकोदंडवाणा करे भिंडमाला || न मारंति तं संगरे चोरचक्कं । वरं भावयंणे मणो सिद्धचक्कं ॥ ७॥ सगाढा विवंधा घना घोरबंधा। असेसानियंगा उबंगा विवंधा ।। । -- ------ m - --- गडलवामान MGARH m विमुंचंति सासुंखलायं सचक्कं । वरं भावयंणे मणो सिद्धचक्कं ॥ ८ ॥ सुणीसग्गिझाणेण कम्मट्ठणासं । ललाटे सुवीयं करे मोक्खवासं ।। कुणेदी यकी दिहि भाणं पहायो । सुलंदोवि एसो भुयंगप्पयाओ ॥६॥ स इयवरजयमाला परमरसाला। विधुसेणेन वि कहियथुहिं ॥ जो पढइ पढावइ नियमणि भावइ । सो णरु पावइ सिद्धसुहं ॥ १० ॥ न । ॐ हीं सम्मत्त णाण दंसण वीरिय सुहम अवग्गहण अगुरुलघु अव्वाह अनाहतपराक्रमाय सकलकर्ममुक्तसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा ॥ पूर्णार्धम् ॥ - w- PM - -- ..

'। ---- रानडलाराधान । . पू० प्रथम जयमाला का अर्थ दुष्कृत-पापरूपी कर्ममलो को जिन्होने सर्वथा नष्ट कर दिया है ऐसे परमेश्वर जिनेश्वर भगवान को प्रणाम और नमस्कार करके भक्तिपूर्वक और अपनी मनःशक्ति के द्वारा सिद्धचक्र की जयमाला का वर्णन करता हूं ॥१॥ मन मे अच्छी तरह से जो सिद्धचक्र का ध्यान करता है उसका; काले बिखरे हुए ओर भयंकर है शिर के केश जिसके, रूक्ष और दारुण है नेत्र जिसके, ऐसी रक्तवर्ण वाली व्यन्तरीका अथवा ग्रह तथा मूत वेताल आदि का भय नष्ट होजाया करता है ॥ १ ॥ भीषण है उत्सग-क्रोड-बाहुमध्य और दाढ जिसकी तथा उनके कारण जो विकराल है, जिसके नेत्र चलायमान है, जिह्वा अत्यन्त दीर्घ है, ऐसे विशाल सिंह और दाढवाले सभी जीवों का समूह सिद्धचक्र की भावना करने वाले के वश मे होजाया करता है ॥ २ ॥ रोषयुक्त घोर महाकाल रूप दुष्ट भावों वाले क्रुद्ध आशीविष जाति के सर्प भी उसको नहीं काटते जो मनमे सिद्धचक्र की भले प्रकार भावना किया करता है ॥ ३ ॥ -- -- 1 -- ह লাল --- - ३ ज्वर क्षय गडमाला कुष्ट शूल आदि रोग अथवा श्वास और वातादि व्याधियां उनकी नष्ट होजाया करती है जो मन में सिद्वचक्र का अच्छी तरह चिन्तवन किया करते हैं ॥ ४ ॥ इस सिद्धचक्र की भावना करने वाले को धूमसहित भीषण जलती हुई, जिसके प्रचण्ड स्फुलिंग सब तरफ उड रहे है, अग्नि की ज्वालाओ का समूह दग्ध नहीं कर सकता ॥ ५ ॥ कल्लोलो से चचल बहुत तरंगवाली अपार शब्द करती हुई अगाध गगा सिंधु आदि नदिया उस मनुष्य को पार कर देती है जो इस सिद्धचक्र का मन में चिन्तवन किया करता है ॥ ६ ॥ कशा पाश कुत-बर्थी भाला शूल आदि धारण करने वाले या जिनके हाथ में धनुष-बाण मिंउमाल है, ऐसे व्यक्ति और चोरों का समूह युद्ध मे उस व्यक्ति को नहीं मार सकते जो सिद्धचक्र का मन मे भले प्रकार चिन्तवन करता है ॥ ७ ॥ अत्यन्त गाढ ओर सधन भी बंधन जिन्होने कि समस्त अगउपांगो को जकड़ रक्खा है खुल जाते है और उन व्यक्तियो की शंखलाएं टूट जाती है जो कि इस सिद्धचक्र का मन मे करते है ॥ उस सिद्धचक्र का निःसग ध्यान करने स आठो ही कर्मोंका विनाश होता है, ललाट में सुवीर्य प्रकट होता और हाथ में मोक्ष लक्षमी का निवास हुआ करता, तथा जिसके दृष्टि पात से सूर्य के समान स्मरण %D -- APP- -- मडल विधान . . M (1. पृ० तेज प्राप्त हुआ करता है, जिसका कि यहा भुजंगप्रयातछन्द के द्वारा वर्णन किया गया है ॥ ६ ॥ इस प्रकार चन्द्रसेन के द्वारा जिस अत्यन्त रसाल-रसवती उत्तम जय माला का वर्णन किया गया है उसको जो पढेंगे, पदावेंगे, या अपने मन में धारण करेगे वे मनुष्य सिद्धि सुखको प्राप्त करेगे ॥ १० ॥ * अथ द्वितीय परिधिषोडशदलपूजा ऊर्ध्वाधारयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् । वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितत्वान्वितम् ।। अन्तः पत्रतटेष्वनाहतयुतं हींकारसंवेष्टितम् । देवं ध्यायति यः समुक्तिसुभगो वैरीभकण्ठीरवः ।। पुष्पाजलिम् 17 अथ स्थापना निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्म 'नित्यं निरामयं । वन्देऽहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥ १॥ । -- सिद्ध चक्र --- हा मंडल विधान पृ० सकलामरेन्द्रसेव्यं, ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्ध कर्मानलदावमेघौधम् ॥ २ ॥ ॐ ही णमोसिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर सवौषट् । ॐ ह्री णमोसिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ २ ठः ठः । ॐ ही णमोसिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् । 2 अथाष्टमः रम्यैजलैमिश्रितचन्दनौधैः, संसारतापाहतये सुशान्त्यै । जलांजलिप्राप्तरजोभिशान्त्य, तत्कर्मदाहार्थमजं यजेऽहम् ॥ १ ॥ ही अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविप्रमुक्ताय सिद्धाधिपतये नम. जल निर्वपामीति स्वाहा, इति समुच्चयमत्र । . १ ॐ ह्री अनन्तदर्शनाय नम. जल नि स्वाहा, २ ॐ ह्री अनंतज्ञानाय नम. जल नि स्वाहा । ३ ॐ ह्रीं अनन्तवीर्याय नमः जल नि स्वाहा, ४ ॐ ह्री अनन्तसुखाय नमः जल नि स्वाहा ।, ही अनन्तसम्यक्त्वाय नम जलं नि. स्वाहा, ६ ॐ ह्री अनन्तसूक्ष्मायनमः जल नि. स्वाहा । ५ G Sasa , . - सिद्ध चक्र मंडल विधान , 4 पृ० . - 1 ७ ॐ ह्रीं अव्यावाधाय नमः जल नि. स्वाहा, ८ ॐ ही अवगाहनाय नमः जल नि. स्वाहा । ६ ॐ ह्री अक्षोभाय नम. जल नि. स्वाहा,' १. ॐ ह्रीं अचलाय नम' जल नि स्वाहा । ११ ॐ ह्रीं अच्छेद्याय नम. जल नि. स्वाहा, १२ ॐ ह्री अभेद्याय नम. जलं नि. स्वाहा । १३ ॐ ही अजराय नम जलं नि स्वाहा, १४ ॐ ह्री अमराय नमः जल नि. स्वाहा । १५ ॐ ही अप्रमेयाय नमः जल नि. स्वाहा, १६ ॐ ह्री अविलीनाय नम जल नि. म्वाहा । सन्कुंकुमैः सज्जतरैः सुगन्धैः, संतप्तहेग्नश्च रसैरिद्धैः । सच्चन्दनैनन्दित,गवृन्दैस्तत्कर्मदाहार्थमजं यजेऽहम् ॥ २॥ चन्दनम् पुजैरिवाखण्डवृषस्य दीधैः स्वच्छसुनीनां मनप्ता समानैः । रम्यैरखण्डाक्षतनव्यपुंजैस्तत्कर्मदाहार्थमजं यजेऽहम् ॥ ३॥ अक्षतान् गन्धावलुब्धाखिलपुष्पलिभिः, सत्पुष्पवाणाहतये सुपुष्पैः । राजीवजातीशतपत्रकायैस्तत्कर्मदाहार्थमजयजेऽहम् ॥ ४ ॥ पुष्पाणि माज्यैः समृद्धवरशिष्टसिद्धैः, नैवेद्यकैनव्यरसात्तभावः । वाष्पायमानैर्हृदयावभासैस्तत्कर्मदाहार्थमजयजेऽहम् ॥ ५ ॥ नैवद्यम् . Raate - चंडलचिशान Com -- पृ ० दीप्रैः सुदीपैदलितान्धकारैः, चन्द्राज्यरत्नोत्तमरतीद्वैः । अज्ञानतामस्यनिवारणाय, तत्कर्मदाहार्थमज यजेऽहम् ॥ ६॥ दीपम् एनःसमूहाहतये नितान्तं ज्ञानादिदाहोद्भवधूमकैर्वा । सद्धृपधूमैधृतधर्मसिद्धथै तत्कर्मदाहार्थमजयजेहम् ।। ७॥ धूपम घाटासुनारंगसुलांगलीभिर्द्राक्षासुराजादनदाडिमाद्यैः । फलैनिराशाफलभावलब्ध्यैतत्कर्मदाहार्थमजयजेऽहम् ।। ८ ॥ फलम् दृग्ज्ञानसम्यकसुवीर्यमूक्ष्मं सद्गाहसत्सप्तममव्यबाधम् । विकर्मभावं कुसुमांजलीभिस्तत्कर्मदाहार्थमजयजेऽहम् ।। ६ ।। अर्धम् सिद्धान् सिद्धमहोदयान्गुणगणाधीशानहं तोप्टवी,- म्याकारेण हि किंचिदूनवपुपः पूर्वाच्छरीराद्धृवम् । अष्टानिष्टमहारिकर्मनिगडैमुक्तांश्चिदानन्दका,- त्रैलोक्याग्रनिवासिनःश्रितवतो मुक्तथंगनां साश्वतीम् -पुप्पांजलिः ॐ ही असिआउसा नमः, इतिमंत्रेणाष्टोतरशत जाप्यम् । - --- free --- --- PAF- PATH me- सद्ध महलविधान पू० अथ जयमाला- अपनीतविकल्पसमूहरणं, भुविभस्मितकर्मघनाग्निगणम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ १॥ धृतचिन्मयरूपमरूपयुतं सुरराजनराधिपशेपनुतम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ २ ॥ विगतातपसादविषादरर्ति गुरुशान्तिगतं हतपापमतिम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ ३ ॥ मदरवेदमहीधरनाशपविं भयभीमनिशाचरचारुरविम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ ४ ॥ वरमुक्तिवधूरमणं विरणं चिदनंतगुणं जितकामकणम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ ५॥ वरघीक्षणसौख्यसुवीर्यमयं निजबोधविलोकितवस्तुचयम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ ६॥ + m सिद्ध मा -- महल वाशान - . m S गतसंसृतिसागरपारमरं हतदोपकपायकलंकभरम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ ७॥ शुचिकेवलदर्शनबोधधरं हतसंभवजातिविनाशजरम् | गुणगजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ ८ ॥ स्वरसामृतमंथररूपम भुवनत्रयमस्तकबारगजम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुमिद्धगणेशमहम् ।। ६ ॥ समभावविभासितजीवगुणं परमाचलनित्यगुणाभरणम् । गुणराजिविराजितभावमहं प्रणमामि सुसिद्धगणेशमहम् ॥ १० ॥ बत्ता- यन्नामग्रहणादरेपु जगतीपृष्ठे फणीभारयो,- भीमा वारिचरा मृगेशशरभाः सौख्याय यान्ति क्षणात् । प्राप्यन्ते स्मरणेन दिव्यविपयाचा हि तस्मै ददे । वश्या सिद्धगणाय सिद्धिग्मणी यध्यानतो जायते ॥ पूर्णार्धम् Pa- - . सिद्ध वा KORMNAUTY খালে डलाबधान -- - । - पू० २३ चिदूपं सिद्धचक्रं यो यायजेद्भक्तिमानसः । पद्मकीर्तिसमो भूत्वा लभते सिद्धिसंगतिम् । आशीर्वादः द्वितीय जयमाला का अर्थ दूर कर दिया है विकल्प समूह-अनेक तरह के सकल्प विकल्पों के रण-कोलाहल को जिन्होने, लोक में कर्मरूपी सघन अग्नि के समूह को जिन्होने भस्म-शांत कर दिया है, और जिनके भाव अनेक गुणो से शोभित है ऐसे परमात्मरूप सिद्धों के समूह को मै नमस्कार करता हू ॥ १ ॥ चैतन्यस्वरूप को जो प्राप्त होगये है, देवेन्द्र नरेन्द्र और घरणीन्द्र के द्वारा भी जिनको नमस्कार किया गया है, आतप साद-खेद विषाद और रति से जो रहित हैं, महान् शान्ति को प्राप्त, नष्ट कर दिया है पापरूप मति को जिन्होने, मद और खेद-रूपी पर्वत का नाश करने के लिये जो वज्र के समान है, भयरूपी भयकर निशाचर के लिये जो सुन्दर सूर्य के समान है, जो उत्तम मुक्तिरूपी वधू के रमण, शब्द अथवा गति से रहित, तथा चित्स्वरूप अनतं गुणों के धारक है, जिन्होने काम के अंश को भी जीत लिया है; जो उत्तम ज्ञान दर्शन सुख और वीर्य, इस तरह अनन्त चतुष्टय स्वरूप है, जिन्होने अपने ज्ञान के द्वारा समस्त वस्तुओं को देख लिया है, जो ससाररूपी समुद्र के पार को भले प्रकार प्राप्त होगये है, जिन्होने . - CLARIES माडलवियाना AP के समान , सर्वसाधारण संसारी जीवों में पाये जाने वाले दोष-तुधा-पिपासा-चिन्ता आश्चर्य आदि तथा कपायरूपी कलंक के भार को नष्ट कर दिया है, पवित्र केवल ज्ञान और दर्शन को जो धारण करने वाले है, जिन्होने संसार जन्म मरण और जरा रूप क्लेश का नाश कर दिया है, आल्म रस रूपी अमृत से जो मथर हैं; पुनः जन्म धारण करने वाले नहीं है, भुवनत्रय के मस्तकरूपी द्वार का उद्घाटन करने के लिये गज हैं, समभाव के द्वारा जिन्होने जीव के-अपनी आत्मा के या जीवों के गुणो को प्रकाशित कर दिया है, उत्कृष्ट निश्चल और नित्य गुण ही हैं आभरण जिनके, ऐसे अनेक गुणो से शोभायमान परमात्मा सिद्ध परमेष्ठियों को मेरा नमस्कार हो. इस जगत में जिनके नाम मात्र का स्मरण करने में आदरभाव रखने वाले व्यक्तियों को सर्प हाथी आदि घात करने वाले तथा भयकर जलचर जीव या सिंह अष्टापद आदि क्षणभर मे उल्टे सुखशांति के निमित्त बनजाते है, जिनका चितवन करने से दिव्य विषयों की प्राप्ति हुआ करती है, एवं जिनका ध्यान करने से सिद्धिरूपी रमणी वशीभूत होजाया करती है, उन सिद्ध परमेष्ठियों को मै अर्ध-पूर्णार्घ अर्पण करता हू॥ भक्ति से परिपूर्ण है मन जिसका ऐसा जो व्यक्ति चिद्रूप सिद्ध भगवान का अतिशय करके और पुनः २ पूजन करता है वह " पद्मकीर्ति " के समान होकर सिद्धि को प्राप्त किया करता है । - - . x -- ܢ मंडल विधान -- । पू० २५ अथ तृतीयपरिधिद्वात्रिंशत्कमलदलपूजा। ३ + उर्ध्वाधोरयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम्, वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितचान्वितम् । अन्तः पत्रतटेवनाहतयुतं हींकारसंवेष्टितम्, देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकंठीरवः ॥ १॥ पुष्पाञ्जलिः निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् । वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥१॥ सकलामरेन्द्रसेव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्ध कर्मानलदावमेघौधम् ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर संवौषट् ॐ ही णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ२ ठाठः ॐ ही णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भवरवषद् U ভিড় --- मंडल विधाना Healataka - २६ अथाष्टकम्- निजमनोमणिभाजनमारया शमरसैकसुधारसधारया । सकलबोधकलारमणीयकं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥१॥ ॐ अनाहतपराक्रमाय सकलकर्मविप्रमुक्ताय सिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । जलम् ॥ इति समुच्चयमंत्रः । - अथ प्रत्येक मंत्राः-१ ॐ ह्रीं परमशुद्धचैतन्याय नमः स्वाहा । २ ॐ ह्रीं शुद्धचैतन्याय नमः स्वाहा । ३ ॐ ह्रीं शुद्धज्ञानाय नमः स्वाहा । ४ ॐ ह्रीं शुद्वचिद्रूपाय नमः स्वाहा । ५ ॐ हीं शुद्धस्वरूपाय नमः स्वाहा । ६ ॐ ही शुद्धस्वभावाय नमः स्वाहा । ७ ॐ हीं शुद्धावलोकिने नमः स्वाहा । - ॐ हीं शुद्धदृढाय नमः स्वाहा । । ॐ ह्रीं शुद्धस्वयभुवे नमः स्वाहा। १० ॐ ह्रीं शुद्धयोगिने नमः स्वाहा । ११ ॐ ही शुद्धजाताय नमः स्वाहा । १२ ॐ ह्रीं शुद्धतपसे नमः स्वाहा । १३ ॐ ह्रीं शुद्धमूर्तये नमः स्वाहा । १४ ॐ ह्रीं शुद्धसुखाय नमः स्वाहा । १५ ॐ ह्रीं शुद्धपावनाय नमः स्वाहा । १६ ॐ ह्रीं शुद्ध- शरीराय नमः स्वाहा । १७ ॐ ह्रीं शुद्धप्रमेयाय नमः स्वाहा । १८ ॐ ह्रीं शुद्धोपयोगाय नमः स्वाहा । १६ ॐ ह्रीं शुद्धभोगाय नमः स्वाह्य । २० ॐ हीं शुद्धात्मने नमः स्वाहा । २१ ॐ ह्री शुद्धार्हज्जाताय नमः स्वाहा । २२ ॐ ह्रीं अशुद्धिनिपाताय नम म्वाहा । २३ ॐ ह्रीं शुद्धार्हगर्भवासाय नमः स्वाहा । २४ G -- -- -- hin 4 -- ३ . --- --- सिद्ध चलन অজ্ঞাত - २७ • ही शुद्धसिद्धवासाय नमः स्वाहा । २५ ॐ ह्री शुद्धपरमवासाय नमः स्वाहा । २६ शुद्धपरमवासाय नमः स्वाहा । २६ ॐ ह्रीं शुद्धसिद्ध- परमात्मने नमः स्वाहा ! २७ ॐ ह्रीं शुद्धानन्ताय नमः स्वाहा । २८ ॐ ह्रीं शुद्धशान्ताय नमः स्वाहा । २६ ॐ ही शुद्धभदन्ताय नमः स्वाहा । ३० ॐ ह्रीं शुद्धनीरूपाय नमः स्वाहा । ३१ ॐ हीं शुद्धनिर्वाणाय नमः स्वाहा । ३२ ॐ ह्रीं शुद्धसदर्भगर्भाय नम स्वाहा ॥ जलम् ॥ सहजकर्मकलंकविनाशनैरमलभावसुवासितचन्दनैः । अनुपमानगुणावलिनायकं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥२॥ चन्दनम् सहजभावसुनिर्मलतन्दुलैः सकलदोपविशालविशोधनैः । अनुपरोवसुवोधनिधानकम् सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ३ ॥ अक्षतान् समयसारसुपुष्पसुमालया सहजकर्मकरण विशोधया । परमयोगबलेन वशीकृतम् सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ४ ॥ पुष्पम् अकृतबोधसुदिव्यनैवेद्यकविहितजातिजरामरणान्तकैः। निरवधिप्रचुरात्मगुणालयं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ५ ॥ नैवेद्यम् सहजरत्नरुचिप्रतिदीपकैः रुचिविभूतितमःप्रविनाशनैः । निरवधि सुविकाशप्रकाशनैः सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ६ ॥ दीपम् . क

द्ध
माइलाविधान
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'२८
निजगुणाक्षयरूपसुधुपकैः स्वगुणघातिमलप्रविनाशनैः ।
विशदबोधसुदीर्घसुखात्मकं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ७॥ धूपम्
परमभावफलावलिसंपदा सहजभावविभावविशोधया ।
निजगुणास्फुरणात्मनिरंजनं सहजसिद्धमहं परिपूजये ॥ ८॥ फलम्
नेत्रोन्मीलविकाशभावनिवहैरत्यन्तबोधाय वै,
सद्गन्धाक्षतपुष्पदामचरुकैः सद्दीपधूपैः फलै ।-
यश्चिन्तामणिशुद्धभावपरमज्ञानात्मकरचयेत्,
सिद्धःस्यात्तमगाधबोधममलं संचर्चयामो
वयम् ।। ६ ॥ अर्धम्
त्रैलोक्येश्वरवन्दनीयचरणाः प्रापुःश्रियं शास्वतीम्,
यानाराध्य निरुद्धचएडमनसः सन्तोपि तीर्थकराः ।
सत्सम्यत्कविबोधवीर्यविशदाव्याबाधताधैर्गुणै,-
युक्तांस्तानिह तोष्टवीमि सततं सिद्धान् विशुद्धोदयान् ॥ १० ॥ पुष्पांजलिः
ॐ ह्री असिआउसा नमः, इतिमत्रेणाष्टोतरशतं जाप्यं देयम् ।
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मइलावधान हा . अथ जयमाला - विराग सनातन शांत निरंश, निरामय निर्भय निर्मल हंस । सुधाम विबोधनिधान विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥१॥ विदुरितसंसृतिभाव निरंग, शमामृतपूरित देव विसंग । अबंध कषायविहीन विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥२॥ निवारितदुष्कृतकमविपाश, सदामलकेवलकेलिनिवास । भवोदधिपारग शांत विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ३॥ अनंतसुखामृतसागर धीर, कलंकरजोभरभूरिसमीर । विरवण्डितकाम विराम विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ४ ॥ विकारविवर्जित तर्जितशोक, विबोधसुनेत्रविलोकितलोक । विहार विराव विरंग विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ५ ॥ रजोमलखेदविमुक्त विगात्र, निरंतरनित्यसुखामृतपात्र । सुदर्शनराजित नाथ विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ६॥ ..7 -nA LA -N---- ---- सिद्ध मक पोशान पू० ३ नरामरवन्दितनिर्मलभाव, अनन्तमुनीश्वरपूज्य विहाव । सदोदय विश्वमहेश विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ७॥ विदंभ वितृष्ण विदोप विनिद्र, परापरशंकरसार वितंद्र । विकोप विरूप विशंक विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥ ८॥ जरामरणोज्झित वीतविहार, विचिंतित निर्मल निरहंकार । अचिन्त्यचरित्र विदर्प विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसमूह ॥६॥ विवर्ण विगंध विमान विलोभ, विमाय विकाय विशब्द विशोभ | अनाकुल केवल सार्व विमोह, प्रसीद विशुद्ध सुसिद्धसम्रह ॥ १० ॥ पत्ता-असमसमयसारं चारुचैतन्यचिन्हम्, परपरणतिमुक्तं पद्मनन्दीन्द्रवन्धम् । निरिवलगुणनिकेतं सिद्धचक्रं विशुद्धं, स्मरति नमति यो वा स्तौति सोभ्येति मुक्निम् ॥ ११ ॥ ॐ हीं परमशुद्धचैतन्यादिगुणयुक्तसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा ॥ इतिपूर्णाघम् । . - Ad है सद्ध चक्र , मंडल विधान तीसरी जयमाला का अर्थ . . M- - appam y रागरहित, सदारहनेवाले, शान्त-क्रोधादिरहित, निरश-विभागरहित-अखण्ड, रोगरहित, निर्भय, निर्मल, भेदविज्ञानपूर्ण आत्मस्वरूप, उत्तम तेज स्वरूप, उत्कृष्टज्ञान के निधान-खजाने हे मोहरहित विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ १ ॥ सासारिक भावो से दूर, अगरहित, शम परिणामरूपी अमृत से पूर्ण, देव, सगरहित, निबंध और कषायरहित निर्मोह विशुद्ध सिद्ध समूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ २ ॥ पाप कर्म के पाश-जाल का जिन्होने निवारण कर दिया है, जो सदा निर्मल केवल ज्ञान की क्रीडा के निवास स्थान है, ससार समुद्र के पार को प्राप्त हो चुके है, ऐसे शांत निर्मोह विशुद्ध सिद्ध समूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ ३ ॥ अनन्त सुख रूपी अमृत के समुद्र, धीर, पापरूपी धूलि के भार को उडादेने के लिये प्रबल समीर-वायु के समान, कामदेव की अन्तिम सीमा को भी खण्डित करने वाले निर्मोह विशुद्ध सिद्ध समूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ ४ ॥ विकार भाव से रहित, शोक को ताडित करने वाले, विशिष्ट ज्ञानरूपी नेत्र के द्वारा देख लिया है लोक को जिन्होने, जिनका कोई हरण नहीं कर सकता, ऐसे शब्दरहित, विरंग- संसाररूपी नाटक के रगस्थल अथवा कषायोंके युद्ध स्थल से विगत, निर्मोह विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो । ॥ ५ ॥ अज्ञान और अदर्शनरूप मल के खेद से रहित, अशरीर, विच्छेदरहित नित्य सुख के 4 --- सडर मंडलावशाना . 22 पात्र, सम्यग्दर्शन के द्वारा शोभायमान, नाथ निर्मोह विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ ६ ॥ मनुष्यों और देवोंके द्वारा वन्दित है निर्मल भाव जिनके, अनन्त मुनीश्वरों के द्वारा पूज्य, मुख के विकार से रहित, सदा रहनेवाला है उदय जिनका, पूर्ण तेज के स्वामी, निर्मोह विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ ७ ॥ दंभरहित, तृष्णा से शून्य, विगत दोष, निद्रा रहित, पर 'और अपर कल्याण के करने वाले, साररूप, निरालस्य, कोप रहित, रूप रहित और शंका रहित निर्मोह विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ ८ ॥ जरा और मरण से रहित, तथा गमनागमन से भी रहित, विशिष्ट चिन्ता-ध्यानादिके विषय, निर्मल, अहंकार रहित, अचिन्त्य है चरित्र जिनका ऐसे, हे दर्परहित' निर्मोह विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ ६ ॥ वर्ण रहित, गध रहित, मान-लोभ-माया-शरीर-शब्द और शोभा से रहित, आकुलतासे रहित, केवल-एकाकिन्-शुद्धात्मन् , सबके लिये हितकर, निर्मोह विशुद्ध सिद्धसमूह मेरे ऊपर प्रसन्न हो ॥ १० ॥ इस तरह अनुपम समयसाररूप, सुन्दर चैतन्य ही है चिन्ह जिनका, पुद्गलकेनिमित से होने वाली परिणतिसे मुक्त, पद्मनन्दा आचार्य के द्वारा बन्ध, सम्पूर्ण गुणों के निवासस्थान, विशुद्ध सिद्धचक्र का जो स्मरण करता है, उनको नमस्कार करता है, या उसकी स्तुति करता है, वह मुक्ति को प्राप्त हुआ करता ------ है --- -- P FISशान - - 15 . " ३३ 2 पृ० । अथ चतुर्थपरिधौ चतुःषष्ठि दल पूजा । उ धोरयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् । घर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलतत्संधितचान्वितम् ।। अन्तःपत्रतटेष्वनाहतयुतं हींकारसंवेष्टितम् । देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकएठीरवः ।। पुष्पं दत्वा स्थापनां कुर्यात् ।। tommenwirasat निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् । चन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥ १॥ सकलामरेन्द्रसेव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्धं कर्मानलदावमेघौघम् ॥ २॥ ही णमोसिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर संवौषट् 4. - सिद्ध मडलविद्यान) XK4 . ३४ पून ॐ ह्रीं णमोसिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र तिष्ठ २ ठः ठः ॐ ह्रीं णमोसिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् अथाष्टकम NIAY जयति जयति यस्य प्राभवं सम्यगात्मो,- दयविजितविपक्षं विश्वकल्याणवीजम् । सुरसरिदमलाम्भोधारयाऽऽराधनीयम्, गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीं है असिना उसा अप्रतिचक्रे फट् विचक्राय झौ झौ जल म्वाहा, इतिसमुच्चयमंत्रः . . । ---- D PM m ---- सिद्धचक्र । मंडल विधान)- ह्रीं - -३५ । अथ प्रत्येक मंत्रा १ ॐ ह्रीं अहं जिनसिद्धेभ्यो नम स्वाहा, २ ॐ हीं अर्ह केवलर्द्धिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, ३ ॐ हीं अवधिबुद्धिऋद्धिप्राप्तेभ्यो नमः स्वाहा, ४ ॐ ह्रीं अहं मनःपर्ययबुद्धिऋद्धिसिद्धेभ्योनमः स्वाहा, ५ ॐ ह्रीं अर्हवीजबुद्धिसिद्वेभ्योनमः स्वाहा, ६ ॐ ह्री अर्ह कोष्ठबुद्धिजिनसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा ७ ॐ ही अर्ह पादानु- सारिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, ८ ॐ ह्री अर्ह सभिन्नसश्रोतृसिद्धेभ्यो नम स्वाहा, ६ ॐ ह्रीं अर्ह दूरास्वादन- दर्शनम्पर्शनघ्राणश्रवर्द्धिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १० ॐ ह्रीं अर्ह दशपूर्वित्वसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, ११ ॐ ह्रीं अहं चतुर्दशपूर्वित्वसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १२ ॐ ह्रीं अर्ह अष्टागमहानिमितबुद्धिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १३ ॐ ही अहं प्रज्ञाश्रमणद्धिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १४ ॐ ही अर्ह प्रत्येकबुद्धसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १५ ॐ ही अर्ह वादित्वर्द्धिप्राप्तेभ्यो नमः स्वाहा, १६ ॐ ह्रीं अर्ह णमोविज्जाहराण स्वाहा, १७ ॐ ह्रीं अर्ह जलजंघातंतुपुष्पपत्रश्रेण्यग्निशिखाचारणसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १८ ॐ ह्रीं अर्ह आकाश गामित्वर्द्धिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा, १६ ॐ ह्रीं अर्ह विक्रियार्द्धिसिद्धिप्राप्तेभ्यो नमः स्वाहा, २० ॐ हीं अर्ह णमो उग्गतवाणं स्वाहा, २१ ॐ हीं अर्ह णमो दीत्तितवाण स्वाहा, २२ ॐ ह्रीं अहं णमो तत्ततवाण स्वाहा, २३ ॐ ह्रीं अहं णमो महातवाणं स्वाहा, २४ ॐ हीं अर्ह णमो घोरतवाण स्वाहा, २५ ॐ हीं अर्ह --- ५ 4- .

N ----- - Carror शिक TAMNN Metrnamam . न ३६ mom -na ४ 4 D णमो घोरपरकमाण स्वाहा, २६ ॐ ही अहं घोरवभयारीण स्वाहा, २७ ॐ ह्रीं अहं णमो मणोवलीणं स्वाहा, २८ ॐ ह्रीं अहं णमो वाचवलीणं स्वाहा, २६ ॐ हीं अहं णमो कायवलीणं स्वाहा, ३० ॐ ह्रीं अहं णमो आमोसहिपत्ताण स्वाहा, ३१ ॐ ह्रीं अहं णमो खिल्लोसहपत्ताणं स्वाहा, ३२ ॐ ह्रीं अहं णमो जैल्लोसहिपत्ताण स्वाहा, ३३ ॐ ह्रीं अहं णमो मैलोसहिसिद्धाणं स्वाहा ३४ ॐ हीं अहं णमो विडोसहिपत्ताणं स्वाहा, ३५ ॐ हीं अहं णमो सघोसहिपत्ताण स्वाहा, ३६ ॐ ह्रीं अहं णमो ओसीविसाण स्वाहा, ३७ ॐ हीं अहं दिठिविसाणं स्वाहा, ३८ ॐ हीं अहं णमो आसीविसरसर्द्धिसिद्धाणं स्वाहा, ३६ ॐ हीं अहं णमो दिठिविपसिद्धाणं स्वाहा, ४० ॐ ही अहं णमो क्षीरसवणिं स्वाहा, ४१ ॐ ह्री अहं णमो महुसवीण स्वाहा, ४२ ॐ ही अहं णमो सप्पिसवीणं म्वाहा, ४३ ॐ ह्रीं अहं णमो अमिय सवीणं स्वाहा, ४४ ॐ ह्रीं अहं णमो अक्षीणमहानसाणं स्वाहा, ४५ ॐ ही अर्ह णमो अक्षीणमहालयाणं स्वाहा, ४६ ॐ हीं अहं णमो सत्ताढिपत्ताण स्वाहा, ४७ ॐ हीं अहं विपहरणार्द्धप्राप्तेभ्योनमः स्वाहा, ४८ ॐ ह्रीं अहं णमो वड्ढमाणाणं स्वाहा, ४६ ॐ ह्रीं अहं णमो लोए सघसिद्धाण म्वाहा, ५० ॐ ह्रीं A १ श्रामर्श-हस्तपादादिना सस्पर्श.। २ क्षल-निष्ठीवनम् । ३ जान-स्वेदालम्बनं रजः । ४ मल -कर्णदन्तादि- समुद्भव. । विदुगार । ६ अंगप्रत्यंगनरवद-तादिरवयवः तत्सस्पशी वाप्यादि सर्व । ७ पास्याविपा -उपविषसंपृक्तो ऽप्याहारो येवामास्यगतो निर्विषी भवति, यदीपास्यनिर्गतवच अवणात महाविपपरीता अपि निर्विपा भवन्ति । र येवामालोग्नमात्रेणातितीविषदूपिता अपि विगतविषा भवन्ति । * ये रमर्द्धिप्रामा यतय यं ब्रुवते " नियस्व " स तत्क्षरगण्य महाविपरीत. सन मियते ते आस्यविषा । . mardar - Pos - । - A है --- CATE মন্ত্রী . ३७ पू० ४ अहं रामो भयवदो महदिमहावीर वढमाण बुद्धिरिसीण स्वाहा, ५१ ॐ ह्रीं अहं णमो सिद्धाण स्वाहा, ५२ ॐ ह्रीं अहं णमो ध्येयसिद्धाणं स्वाहा, ५३ ॐ ही अहं णमो वस्तुबुद्धाणं स्वाहा, ५४ ॐ ह्रीं अहं णमो स्वस्तिसिद्धाणं स्वाहा, ५५ ॐ ह्रीं अई णमो अर्हत्सिद्धाण स्वाहा, ५६ ॐ हीं अहं णमो परमात्मसिद्धाण स्वाहा, ५७ ॐ ही अहं णमो परब्रह्मसिद्धाण स्वाहा, ५८ ॐ ह्रीं अहं णमो परमग्ग- सिद्धाण स्वाहा, ५६ ॐ हीं अहं णमो प्रकाशसिद्धाणं स्वाहा, ६० ॐ ह्रीं अई णमो स्वयंभूसिद्धाण स्वाहा, ६१ ॐ ही अहं णमो अनन्तगुणसिद्धाण स्वाहा, ६२ ॐ ह्रीं अर्ह णमो परमानन्तगुणसिद्धाण स्वाहा, ६३ ॐ हीं अहं णमो लोकवासिसिद्धाण स्वाहा, ६४ ॐ ह्रीं अहं णमो अनाद्यनुपमसिद्धाण स्वाहा. उदयति परमात्मज्योतिरुद्योति यस्मात् । विशदविनययुक्तया ध्वस्तमोहान्धकारम् । शुचितरघनसारोल्लासिभिश्चन्दनौधै,- गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ २॥ चन्दनम् ॥ अहमहमिकयोच्चैः सम्यगाराधनायाम् । सुरनरखचरेन्द्राः यस्य भक्तया यतन्ते ।। ललितसदकपुंजैः केवलज्ञानहेतो,- गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ३॥ अक्षतान् ।। 5 44. A म namah -- - -- anwr सिद्ध चल मंडल विधान बेधाना) *HANA--- กร์ पू० 10 . भवभयगुरुपारावारपारं लभन्ते, विहितशिवसमृद्धः सेवया यस्य सन्तः । कमलवकुलकुंदोदारमंदार पुष्पै-, गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ४ ॥ पुष्पाणि ।। जननवनहुताशं छिन्नसन्मोहपाशम्, शमितमदनमानं विश्वविद्यानिदानम् । चरुभिरुरुगुणोघं प्रीणितप्राणिसंघम् । गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ५ ॥ नैवेद्यम् ॥ चिदचिदरिवलजीवाजीवभेदादिवेद्यम्, सकलभुवननेत्रं ज्ञानमाविष्करोति । स्मरणमपि यदीयं दीपदीप्रप्रभौधैः, गणधरवलयं तमिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ६ ॥ दीपम् ।। भवति न भवभाजां ध्यानतो यस्य पीडा, ग्रहदितिशितिरक्ष प्रेतभूतप्रसूता । - - -- . - - - - mins - -- AAMA--

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हा
मंडलबिधान
पृ०
४
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अगुरुतुहिनभास्वच्चन्दनोद्भतधूपैः,
गणपरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ७॥ धूपम् ।।
फलमतुलमनंतं मुक्तिसौख्यं प्रदीप्तम्,
फलति विपुलसेवा सम्यगाविःकृतोच्चैः ।
असदृशमहिमश्रीमंदिरं मातुर्लिंगै,-
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ८ ॥ फलानि ॥
अभिनवजलगंधामंदमंदारमाला,-
ललितममलमचे संददाम्यादरेण ।
गणधरवलयाय श्रीयुजे पद्मनन्दी,
सुरहरिमहितायाः प्राप्तये मुक्तिलक्ष्म्याः ॥ ६ ॥ अर्धम् ।।
ॐ हीं असिआउसानमः एतन्मंत्रेणाष्टोतर शतं जाप्यं देयम् ।
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अथ जयमाला-
योगीन्द्रर्निजमानसे प्रतिदिन संचिन्तनीयाः स्वयम्,
देवा इन्द्रनरेन्द्रपूजितपदा दुष्कर्मविच्छितये ।
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। मंडलानिभान Esmom पू० ४० ४ - कर्मावद्यविवर्जिता वसुगुणालंकरभूताः सदा, सिद्धान्तान् जयमालया विमलया भक्त्या स्तवीमि श्रिये ॥ १ ॥ महादृढमोहविधेः परमुक्त, स्वकीयगुणद्रविणधुतिरक्क । चिदात्मरुचे निजजात विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥२॥ चिदावरणक्षयनिश्चितवास, स्वनंतपदार्थविभेदसमास | चिदात्मचितो निजीतनिकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥ ३ । स्वकातमवर्जित दर्शनधार, स्वलेपितदर्शनलोपकभार । सुकेवलदर्शनतोय विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥ ४ ॥ सुदृचिदनंतसुशक्तिकदेह, क्षयंकृतविघ्नकरब्रजगेह । चिदात्मसुवीर्यगुणेन विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥ ५ ॥ क्षयंगतनाम चिरंघृतसूक्ष्म, समीपविनिर्मिततद्गुणलक्ष्म । चिदात्मकसूक्ष्मगुणेन विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥ ६ ॥ अरूप्यवगाहनभावसुपूर, चतुर्विधपापविकर्दमदूर । ततस्त्वमनंतगुणेन विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥ ७ ॥ --- JA- 11 - - ENA -- - %3D4- -- AM ------ - । -- on----- লি मडल विधान . ४१' पू० ४ . प्र निरस्तगुरुत्वलघुत्वकभाव, तथा भवकाननदुःसहदाव । द्विधातुलकर्मगतेन विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥८॥ द्विधाहतदुःखदवेदनपक्ष, स्वकात्मसमर्पितशास्वतसौख्य । अबाधकदेवगुणेन विकाय, पुनातु सदा मम सिद्धनिकाय ॥ ९॥ ॐ ह्रीं अर्ह असिआ उसा अप्रतिचक्रे फट् विचक्राय झौ झौ नमः पूर्णाम् स्वाहा । पत्ता-विधुतकुविधिपाशं मुक्तिलीलाविलासम्, परमगुणनिवासं चित्सरोराजहंसम् । विनुतनृपसुचकैः संस्तुतं सिद्धचक्र ।- मतनु च निजभक्त्या वन्दते शौभचन्द्रः॥१०॥ इत्याशीर्वादः , 3. चतुर्थ जयमालाका अर्थ मै उन सिद्ध भगवान्की, मोक्षलक्ष्मीकी प्राप्ति के लिये भक्तिपूर्वक विमल जयमालाके द्वारा स्तुति करता जिनका अपने मनमें स्वयं योगीन्द्र भी दुष्कर्मोकी व्युच्छित्तिके लिये चिन्तवन करते है, जिनके चरण कमल इन्द्र तथा नरेन्द्रोंके द्वारा भी पूजित है, कर्मरूप अवद्यसे जो रहित, और सदा अष्ट गुणोके अलंकारभूत है ॥१॥ - - - सिद्ध चक्र ह्रीं मंडल विधान पू० ...... T ........ महान् दृढ मोहकर्मसे सर्वथा,रहित, अपने गुणरूपी सुवर्णकी कांतिसे रंजित, चित्स्वरूप रुचिके धारक, अपने स्वरूपमे ही उत्पन्न, शरीर रहित, सिद्धसमूह, सदा मुझे पवित्र करो. ॥ २ ॥, चेतनाके आवरण करनेवाले-ज्ञानावरण दर्शनावरमाके क्षयसे निश्चित है वास जिनका, अनन्त पदार्थीका भेद करके भले प्रकार रहनेवाले, हे सिद्धसमूह सदा मुझे पवित्र करो ॥ ३ ॥.... ॥ ४ ॥ सम्यग्दर्शनज्ञानरूप अनंत शक्तिके पिंड, नष्ट कर दिया है विघ्न करनेवाले कर्म समूहको जिन्होने, चिस्वरूप अनन्त वीर्य गुणके स्वामी अशरीर सिद्धसमूह मुझे सदा पवित्र करो ॥ ५ ॥ क्षयको प्राप्त हो गया है नाम कर्म जिनका, सूक्ष्मत्व गुणको धारण करनेवाले, अपने निर्मितगुण ही हैं चिन्ह जिनका, चित्स्वरूप सूक्ष्मगुणके स्वामी अशरीर सिद्ध निकाय मुझे सदा पवित्र करो ॥ ६ ॥ अरूपी, अवगाहन गुणसे पूर्ण, चार तरहके आयु कर्मरूप कीचड़से दूर, अनंतगुणोके स्वामी अशरीर सिद्ध निकाय मुझे सदा पवित्र करो ॥ ७ ॥ गुरुत्वलधुत्वभावसे रहित, संसार रूपी वनकी दुःसह अग्निका जिन्होंने निरसन कर दिया है, दो प्रकारके अतुल गोत्रकर्मसे राहत स्वामी अशरीर सिद्धनिकाय सदा मुझे पवित्र करो ॥ ८ ॥ दोनोही तरहके दुःख देनेवाले वेदनीय कर्मके पक्षका जिन्होंने घात कर दिया है, स्वयंका प्राप्त कर लिया है शास्वत सुख जिनने ऐसे बाधारहित गुणोके स्वामी देव अशरीर सिद्धनिकाय सदा मुझे पवित्र करों ॥९॥ M १-२-इनका अर्थ ठीक २ हमारी समझमें नहीं आ सका । ३-इस जयमालाके दूसरे आदि पद्यमे क्रमसे मोह भानावरण-दर्शनावरण-अन्तराय-नाम-आयु-गोत्र-और वेदनीय इन आठ कमाके अभावसे प्राप्त गुणोंकी अपेक्षा सिद्धोंकी महिमाका वर्णन किया गया है। --- 3 %3DL- -- -- . --- प ( A . ---- सिद्ध चक्र ह्रीं मंडल विधान अथ पंचमपरिधिगताप्टविंशोत्तरशतदलपूजा । ऊर्वाधारयुतं सबिन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् । वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्संधितत्त्वान्वितम् ।। अन्तः पत्रतटेष्वनाहतयुतं ह्रींकारसंवेष्टितम् । देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकंठीरवः ॥१॥ ( पुष्पं दत्वा स्थापनां कुर्यात् ) निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् । वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥१॥ सकलामरेन्द्रसव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्धं कर्मानलदावमेघौघम् ॥२॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर संवौषट् अत्र तिष्ठ २ ठः ठः अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् --- दु म ম্ভ থ্রিাল - अथाष्टकम्- विमलशीतलसज्जलधारया, सविधबंधुरकेशरसारया । प्रथमवोधकसत्कजिनेश्वरम् , प्रवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥१॥ ॐ ह्रीं स्वस्थानमाश्रितातीतानागतसिद्धाधिपतिभ्यो नमः स्वाहा, जलम् । इति समुच्चयमंत्रः । अथ प्रत्येकमंत्राः ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यो नमः स्वाहा ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं अस्तित्वधर्माय नमः स्वाहा ।२। ॐ ही वस्तुत्वधर्माय नमः स्वाहा । ३। ॐ ह्रीं प्रमेयत्वधर्माय नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं चेतनत्वधर्माय नमः स्वाहा । ५। ॐ ह्रीं अगुरुलघुत्वधर्माय नमः स्वाहा । ६ । ॐ ह्रीं अमूर्तत्वधर्माय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्रीं प्रदेशवत्वधर्माय नमः स्वाहा । ८ । ॐ ह्रीं सम्यक्त्वधर्माय नमः स्वाहा । ९ । ॐ हीं ज्ञानधर्माय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं वीर्यधर्माय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं सूक्ष्मधर्माय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं अवगाहनधर्माय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं अव्यावाधगुणाय नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं स्वसंवेदनशानाय नमः स्वाहा । १५। ॐ ह्रीं अनन्तदर्शनादिचतुष्टयात्मकार्हद्भ्यो नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं सम्यक्त्वादिगुणात्मकसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्रीं पंचाचाराचार्येभ्यो नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्री रत्नत्रयप्रकाशपाठकेभ्यो नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्रीं स्वस्वरूपसाधकसर्वसाधुभ्यो नमः स्वाहा । २० ।

अंडल विधान 11 ४५ पू अकृतमनःक्रोधसरम्भमनोगुप्तये नमः स्वाहा । २१। ॐ ह्रीं अकारितमन.क्रोधसंरम्भसानन्द- वर्माय नमः स्वाहा।२२। ॐ ह्री नानुमोदितमन क्रोधसरम्भानन्दधर्माय नम स्वाहा।२३। ॐ ह्रीं अकृतमनः बोध- समारम्भपरमानन्दाय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं अकारित मन' अकारित मन क्रोधसमारम्भसंतुष्टधर्माय नमः स्वाहा । २५ । ॐ हीं नानुमोदितमन क्रोधसमारम्भसंतोपधर्माय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्रीं अकृतमनः क्रोधारम्भस्थानाय नम. स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं अकारितमनः क्रोबारम्भस्थानाय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनः क्रोधारम्भस्थानाय नमः स्वाहा । २९ । ॐ अकृतमनोमानसंरम्भधर्माय नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्रीं अकारितमनोमानसरम्भानन्यशरणाय नम स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनोमानसंरम्भसुगतभावाय नमः स्वाहा ।३२। ॐ ह्रीं अकृतमनोमानसमारम्भसुखात्मगुणाय नमः स्वाहा ।३३। ॐ ह्रीं अकारितमनोमानसमा- रम्भानन्यगताय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनोमानसमारम्भानन्यशरणाय नमः स्वाहा । ३५। ॐ ह्रीं अकृतमनोमानारम्भानन्तज्ञानाय नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं अकारितमनोमानारम्भानन्तगुणाय नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनोमानारम्भानन्तगुणय नमः स्वाहा ३८॥ॐ हीं अकृतमनोमायासरम्भब्रह्मस्वरू- पाय नमः स्वाहा । ३९ । ॐ ह्री अकारितमनोमायासरम्भचैतन्यस्वभावाय नमः स्वाहा । ४०। ॐ ह्रीं नानु- मोदितमनोमायासंरम्भानन्यस्वभावाय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री अकृतमनोमायासमारम्भस्वानुभूतिरत्नाय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्रीं अकारितमनोमायासमारम्भसाम्यधर्माय नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनो- मायासमारम्भाय नमः स्वाहा । ४४ । ॐ ह्रीं अकृतमनोमायारम्भपरमशातभावाय नमः स्वाहा । ४५। ॐ ह्रीं अकारितमनोमायारम्भनिराकुलस्वभावाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनोमायारम्भानन्यत्वाय G ...." RAA -ne - MA- -- PON- -Romam --- Ent सिद्ध हो मडल शिक्षा . na ४ lub AR नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्रीं अकृतमनोलोभसंरम्भानन्तभावाय नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं अकारितमनो- लोभसरम्भपरमानन्दभावाय नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ही नानुमोदितमनोलोभसंरम्भभावायः नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्रीं अकृतमनोलोभसमारम्भविदाकाराय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्रीं अकारितमनोलोभसमारम्भा- नन्ताकाराय नम. स्वाहा । ५२। ॐ ह्रीं नानुमोदितमनोलोभसमारम्भाकारभावाय नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्रीं अकृतमनोलोभारम्भचिदाकाराय नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ह्री अकारितमनोलोभारम्भचिन्मयस्वरूपाय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ ह्रीं नानुमोदितमनोलोभारम्भस्वरूपाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्रीं अकृतवचन- क्रोवसरम्भवाग्गुप्तये नमः स्वाहा । ५७| ॐ ह्री अकारितवचनक्रोधसंरम्भसिद्धस्वरूपाय नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनक्रोधसंरम्भस्वात्मोपलब्धिप्राप्ताय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्रीं अकृतवचनक्रोधसमारम्भ- स्वानुभूतिरताय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं अकारितवचनक्रोधसमारम्भासावारणवर्माय नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनक्रोधसमारम्भपरमशान्तिस्वभावाय नमः स्वाहा । ६२ । ॐ ह्री अकृतवचनक्रोधारम्भपर- मामृततुष्टाय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्रीं अकारितवचनक्रोधारम्भसमरसरसिकाय नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनक्रोधारम्भपरमगातये नमः स्वाहा । ६५। ॐ ह्रीं अकृतवचनमानसंरम्भस्वधर्माय नमः स्वाहा । ६६ ॐ ह्री अकारितवचनमानसंरम्भाव्यक्तस्त्रभावाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचन- मानसंम्भदुर्लभाय नमः स्वाहा । ६८॥ ॐ ह्री अकृतवचनमानसमारम्भपरमसंगमनिराकरणाय नमः स्वाहा ।६९। ॐ ह्रीं अकारितवचनमानसमारम्भपरमस्वभावाय नमः स्वाहा । ७० । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनमानसमारम्भैकत्व- गतपरमसुखाय नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्रीं अकृतवचनमानारम्भपरमात्मराजपरमधर्माय नमः स्वाहा । ७२ । Arane मंडल विधान्त - । ३ ॐ ह्रीं अकारितवचनमानारम्भशास्त्रतानन्दाय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्री नानुमोदितवचनमानारम्भामृतपूर्णाय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्रीं अकृतवचनमायासंरम्भानन्तधर्मैकरूपाय नमः स्वाहा । ७५ । ॐ ह्रीं अकारितवचनमायासरम्भामृतचन्द्राय नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनमायासंरम्भानेकान्तमयमूर्तये नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्री अकृतवचनमायासमारम्भसत्तालोकगुणाय नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ही अकारितचनमायासमारम्भसत्तालोकगुणाय नमः स्वाहा । ७९ । ॐ ह्रीं नानुमोदि नवचनमायासमारम्भानेका- न्तमयमूर्तये नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं अकृतवचनमायारम्भातुलज्ञानाय नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री अकारितवचनमायारम्भानुलज्ञानाय नमः स्वाहा । ८२ । ॐ ह्रीं नानुमोदितवचनमायारम्भनिरवधिसुखाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्रीं अकृतवचनलोभसंरम्भव्यापकधर्माय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्रीं अकारितवचनलोभ. संरम्भव्यापकगुणाय नमः स्वाहा । ८५ । ॐ ह्री नानुमोदितवचनलोभसंरम्भाचलाय नमः स्वाहा । ८६ । ॐ ह्रीं अकृतवचनलोभसमारम्भनिरालम्बाय नमः स्वाहा । ८७ । ॐ ह्री अकारितवचनलोभसमारम्भनिरालम्बाय नमः स्वाहा । ८८1 ॐ ह्रीं नानुमोदिनवचनलोभममारम्भाखण्डाय नमः स्वाहा। ८९। ॐ ह्रीं अकृतवचनलोभा रम्भसमयसाराय नमः स्वाहा । ९० | ॐ ह्री अकारितवचनलोभारम्भसमयसाराय नमः स्वाहा । ९१ । ॐ ही नानुमोदितवचनलोभारम्भनिरंजनाय नमः स्वाहा । ५२ । ॐ ह्रीं अकृतकायक्रोवसंरम्भकायगुप्तये नमः स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं अकारितकायक्रोधसंरम्भाकायाय नमः स्वाहा । ९४ । ॐ ह्री नानुमोदितकाय- क्रोव-सरम्भशुद्धकायाय नमः स्वाहा । ९५ । ॐ ह्रीं अकृतकायक्रोधसमारम्भसत्त्वगुणाय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं अकारिकायक्रोधसमारम्भानन्यशरणाय नमः स्वाहा । ९७ । ॐ ह्रीं नानुमोदितकायक्रोवसमारम्मान- - ITRA LF- স্বল্প স্বল্প मंडल विधान M . ४८ - - न्यारणाय नमः स्वाहा १९८ । ॐ ह्री अकृतकायक्रोवारम्भशुद्धद्रव्याय नमः स्वाहा ।१०। ॐ ही अकारितकायक्रोधारम्भासंसाराय नमः स्वाहा । १००। ॐ ह्रीं नानुमोदितकायक्रोधारम्भजैनधर्माय नमः स्वाहा । १०१ । ॐ ह्रीं अकृतकायमानसंरम्भस्वरसगुप्तये नमः स्वाहा । १०२ । ॐ ह्रीं अकारिनकायमानसरम्भ- म्वरूपगुप्तये नमः स्वाहा । १०३ । ॐ हीं नानुमोदितकायमानसंरम्भध्येयभावाय नमः स्वाहा । १०४ । ॐ ह्रीं अकृतकायमानसमारम्भपरमारान्याय नमः स्वाहा । १०५। ॐ ह्रीं अकारितकायमानसमारम्भानन्द- गुणाय नमः स्वाहा । १०६ । ॐ ह्री नानुमोदितकायमानसमारम्भस्वानन्दनन्दिताय नमः स्वाहा । १०७ । ॐ ह्रीं अकृतकायमानारम्भपरमसंतोपाय नमः स्वाहा । १०८ । ॐ ह्रीं अकारितकायमानारम्भम्वभावाय नमः म्वाहा । १०९ । ॐ ह्रीं नानुमोदितकायमानारम्भशुद्धपर्यायधर्माय नमः स्वाहा । ११० । ॐ हीं अकृत कायमायासरम्भामृतगर्भाय नमः स्वाहा । १११ । ॐ ही अकारितकायमायासरम्भचैतन्यात्मकाय नमः स्वाहा । ११२ । ॐ ह्री नानुमोदित कायमायासंरम्भसमरसभावाय नमः स्वाहा । ११३ । ॐ अकृतकायमाया समारम्भाच्छेदनाय नमः स्वाहा । ११४ । ॐ ह्रीं अकारितकायमायासमारम्भस्वतन्त्रधर्माय नमः म्वाहा ।११५॥ ॐ ह्रीं नानुमोदितकायमायासमारम्भधर्मसमूहाय नम. स्वाहा । ११६ । ॐ ह्रीं अकृतकायमायारम्भपरमात्मभुवे नमः स्वाहा । ११७ | ॐ ह्री अकारितकायमायारम्भात्मकाय नमः स्वाहा । ११८ । ॐ ही नानुमोदितकाय- मायारम्भात्मनिष्टाय नमः स्वाहा । ११०। ॐ ह्री अकृतकायलोभसंरम्भातोभाय नमः स्वाहा । १२०। ॐ ही अकारितकायलोभसंरम्भस्वभावाय नम स्वाहा । १२१ । ॐ ही नानुमोदितकायलोभसंरम्भभावाय नमः म्याहा । १२२ । ॐ ह्रीं अकृतकायलोभसमारम्भपरमचित्यरिणताय नमः स्वाहा । १२३ । *ही अकारितकाय- ----- .

.wai Massemom -A- पडलाधान्त । par m . ४९ लोभसमारम्भस्वधर्मरताय नमः स्वाहा । १२४ । ॐ ह्रीं नानुमोदितकायलोभसमारम्भाव्यक्तधर्माय नमः स्वाहा । १२५ । ॐ ह्रीं अकृतकायलोभारम्भसुखाय नमः स्वाहा । १२६ । ॐ ह्रीं अकारितकायलोभारम्भाकषायाय नमः स्वाहा । १२७ । ॐ ह्री नानुमोदितकायलोभारम्भशौचगुणाय नमः स्वाहा । १२८ । 2 घुमृणकुंकुमचन्दसनद्भवैः, बहुसुगंधितनिर्मलपासुकैः । प्रथमवोधकसत्कजिनेश्वरम् , भवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥ २ ॥ चन्दनम् । विमलतन्दुलनिर्मलसंचयैः, कृतसुमौक्तिककल्पमुनिश्चयैः। प्रथमबोधकसत्कजिनेश्वरम्, प्रवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥ ३ ॥ अक्षतान् कुसुमचंपकपंकर दकैः, सहजजातसुगंधविमोदकैः। प्रथमवोधकसत्कजिनेश्वरम्, प्रवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥ ४॥ पुष्पाणि । .

- प्रधान थाना पू० . ५० " सकललोकविमोदनकारकैः, चरुवरैश्वसुधाकृतिधारकैः । प्रथमबोधकसत्कजिनेश्वरम्, प्रवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥ ५ ॥ नैवेद्यम् , तरलवार सुकांतसुमंडनैः, सदनरत्नचयैरघरवण्डनैः। प्रथमवोधकसत्कजिनेश्वरम्, प्रवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥ ६॥ दीपम् ।। अगुरुधूपभवेन सुगन्धिना। भ्रमरकोटिसमिन्द्रियवन्धुना। प्रथमवोधकसत्कजिनेश्वरम्, प्रवियजे नुतनाकनरेश्वरम् ॥ ७॥ धूपम् । मुखदपकसुशोभनसत्फलैः, क्रमुकनिम्बुकमोचमुलांगलैः। r . SM- - N น सिद्धचक्र मंडल विधान है Prastri . प्रथमवोधकसकजिनेश्वरम्, प्रवियजे नुतनांकनरेश्वरम् ॥ ८॥ फलम् ।। जिनवरागमसद्गुरुमुख्यकान्, प्रवियजे गुरुसद्गुणमुख्यकान् । सुशुभचन्द्रतरान् कुसुमाकरान्, समयसारपरान् सुरवसागरे ॥ ९ ॥ अर्घम् ।। ॐ ह्रीं असिग्राउसानमः, इतिमंत्रेण जपः करणीयः । ये ज्ञानावरणादिकानतितरां निर्मूल्य दोपान् बलात्, संसारोरुसरिद्विशोषकमहः संदर्शनादीन् गताः । सिद्धस्तोत्रविबुद्धज्ञानमहसां कुर्वन्तु सिद्धाः श्रियम् , चक्रिमहसुरेन्द्रपूजिपदा भक्तात्मनां सर्वदा ॥१॥ पुष्पांजलिः॥ - M ** F 14 3 Aama Lovie --- onama %3- न mrvernmeneupan ---- pay v । विदा -- पाहा ५२ अथ जयमाला ER " . चिदानन्दमानन्दलीलानिवासम् , अखण्डस्वभावं जिनं सिद्धराशिम् । विषादोज्झितं वीतराग विचक्रम् , सदा तोष्टपीति स्फुटं सिद्धचक्रम् ॥१॥ विशुद्धोदयं प्राप्तसंसारपारम् , सुसंविन्निधानं परं निर्विकारम् । विमायं विभायं विनायं विचक्रम् , सदा तोष्टवीमि स्फुटं सिद्धचक्रम् ॥ २॥ विमुक्ताशयादित्यविज्ञाननेत्रम्, विमोहं समस्कारपीयूषगात्रम् । अमेयप्रभावं विदर्प विचक्रम् । सदा तोष्टवीमि स्फुटं सिद्धचक्रम् ॥३॥ . -- ---- -- r Fran । शिम न -~ 4- - 1 ५० - विविक्तं कलं निष्कलंक कविस्थम् , सुसेव्यं विपाकं विशंकं पारम् विकालं विकायं विकार्म विचक्रम् , सदा तोष्टवीमि स्फुटं सिद्धचक्रम् ।। ४ ।। त्रिलोकातिशायिमभं विश्वरूपम् , गृह तेजसा चीतवर्ण विरूपम् । सदा दृङ्मयं ध्येयरूपं विचक्रम् , सदा तोटवीमि स्फुट सिद्धचक्रम् ॥ ५॥ अगम्यं मुनीनामपि सुमवोधम् , कृताहंकृतिक्रोधचिन्तानिरोधम् । अपारं जरामृत्युमुक्तं विचक्रम् , सदा तोटवीमि स्फुट सिद्धचक्रम् ॥ ६॥ अनंतं विराम विकारावमुक्तम् , विमुक्तस्फुरत्कामिनीरंगरक्तम् । Hunt K 11 - -- मंडल निशान Me 41. का - -- । --- . । ५४ पृ० r निरीहापघातं विहीनं विचक्रम् , सदा तोष्टवीमि स्फुटं सिद्धचक्रम् ॥ ७॥ प्रदुष्टाष्टकर्मन्धनेभ्यो हुताशम् , सुसिद्धाष्टकं चिद्गुणं चिद्विलासम् । उदासीनमीशानमीशं विचक्रम् , सदा तोष्टवीमि स्फुटं सिद्धचक्रम् ॥ ८॥ अजं शास्वतं निर्जरं देवदेवम् , विलोभं कृतानेकभूपालसेवम् । वषबैकृतं वा विपाशं विचकम् , सदा तोटवीमि स्फुट सिद्धचक्रम् ॥ ९॥ प्रयाति क्षयं कर्म यद्ध्यानयोगात्, समत्वं गतानां मुनीनां क्षणेन ।' प्रसिद्धं विशुद्धं तथानन्दरूपम् , सदा तोटवीमि स्फुट सिद्धचक्रम् ॥ १० ॥ 7 - -- ५ ------ . शिद को हाडा . ----- --- - -- ३ - ५५ पू० - 3 ५ . विगतमदनभेदं दोपसंदोहरोधम् , स्मरति विरसपूर्ण शंकरं सारभूतम् । अजरममरवन्धं पद्मनन्धादिदेवम् , मुनिनिवहनिपव्यं सिद्धचक्र सुदेवम् ॥ ११ ॥ इत्थं सिद्धमुपास्य शर्मसहितं संसारवाधापहम् , नौद्रव्याशुभभावकर्मरहितम् संपन्नपर्यापहम् । यो ध्यायेत्फलमश्नुते शिवमयं सौमं स हित्वाऽशिवम् , संभुक्त्वाखिलमंडलेशविबुधस्वामिस्थितिं सर्वतः ॥ १२ ।। इत्याशीर्वादः S tra 1 + - --- New ETTE स अंडल निशान -- - । पू ० पंचम जयमालाका अर्थ aira जो ज्ञानावरणादि दोषोंका बलपूर्वक और अच्छी तरहसे निर्मूलन कर ससाररूपी नदीके शोषण करने वाले सम्यग्दर्शनाटिकको प्राप्त हो चुके है, चक्रवर्तिप्रमुख अथवा सुरेन्द्रोके द्वारा पूजित है चरण जिनके ऐसे सिद्ध भगवान् सिद्धस्तोत्रके द्वारा प्रकट हो गया है ज्ञानरूप तेज जिनका ऐसे भक्तात्माओंको मोक्षलक्ष्मी प्रदान करे ॥ १ ॥ चिदानन्दस्वरूप, सुखके लीलास्थल, अखण्ड है स्वभाव जिनका, कर्मोके विजेता, सिद्धात्मायोके समूहरूप, विपादरहित, वीतराग, चक्र—पारवण्ड अथवा सांसारिक परिवर्तनसे दूर सिद्धसमूहका भै सदा अच्छी तरह स्तवन करता हूँ। २ । विशुद्ध है उदय जिनका, जो ससारके पारको प्राप्त हो चुके है, सम्य- ग्ज्ञानके निधान, उत्कृष्ट, निर्विकार, मायारहित, विभा - अलौकिक प्रभाको प्राप्त, उत्कृष्ट नेतृत्वके धारक संसाररहित सिद्धसमूहका मै स्तवन करता हूँ ॥ ३ ॥ आशय-सकल्पविकल्पसे रहित मर्यके समान ज्ञान ही है नेत्र जिनका, मोहरहित, समतारूपी महान्अमृत ही है शरीर जिनका, अप्रमाण प्रभावके धारक, दर्परहित, अशरीर सिद्धसमूहका मै सदा स्तवन करता हूँ। ॥ ४ ॥ एकान्तरूप, मनोज्ञ, कलकरहित, विद्वानो या कवियोंके हृदयमे स्थित, भलेप्रकार सेव्य, विपाक अवस्थाको प्राप्त, शकारहित, अपार, काल-काय-काम और ससारचक्रसे रहित सिद्वसमूहका मै सदा अच्छी तरह स्तवन करता हूँ। ॥ ५॥ तीन लोकमे सर्वोत्कृष्ट है प्रभा जिनकी, ज्ञानकी अपेक्षा जो विश्वरूप । . T hd ----- Precar A S इशान aar rama - -- मैं है, प्रकाशोंके निवासस्थान, वर्णनरहित, विशिष्ट स्वरूपके धारक, सदा दर्शनमय, ध्येयरूप, संसाररहित सिद्ध- समूहका मै सदा स्तवन करता हूँ॥ ६ ॥ मुनियोंके लिये भी अगम्य, समीचीन उत्कृष्ट बोधरूप, कर दिया है अहंकार क्रोव और चिन्ताका निरोध जिन्होने, अपार, जरा मृत्युसे रहित, ससार चक्रसे दूर सिद्ध समूहका सदा स्तवन करता हूँ ॥ ७ ॥ अनन्त, विश्रामरूप, विकारोंसे रहित, छोड़ दिया है स्फुरायमान कामिनियोंका रग राग जिनने, इच्छा और अपघातसे रहित, उत्कृष्ट, ससाररहित सिद्धसमूहका मै सदा स्तवन करता हूँ ॥ ८ ॥ अत्यन्त दुष्ट अष्ट कर्मरूपी इन्धनके लिये अग्निसमान, सिद्ध कर लिया है गुणाष्टकको जिनने, चिद्गुणके बारक, चेतनाका ही है विलास जिनमे, उदासीन- वीतराग, ईशान-परमेश्वर, परमात्मा, संसाररहित सिद्धसमूहका मै सदा स्तवन करता हूँ ॥ ९ ॥ जन्मरहित, शास्त्रत, जरा रहित, देवोके भी देव, लोभरहित, की है अनेक मूपालोने सेवा जिनकी, विकारोके समूहको जिन्होने आहुतिका विषय बना दिया है, ससारके पाशसे रहित, विचक्र सिद्धचक्रका मै सदा स्तवन करता हूँ ॥ १०॥.. ॥११॥ समस्त कामदेवके भेदोसे रहित, दोपोके समूहका निरोव करनेवाले, रसरहित अवस्थासे पूर्ण, कल्याणकारी, सारभूत, अजर-कभी जीर्ण न होने वाले, देवोके द्वारा बन्ध, पचपरमेष्ठियोंमे प्रथम देव, मुनिसमूहके द्वारा सेव्य, समीचीन देवरूप सिद्धचक्रका पद्मनन्दी आचार्य स्मरण करते है ॥ १२॥ इस तरह कर्मरहित, ससारकी वाधाको दूर करनेवाले, नोकर्म द्रव्यकर्म और अशुभ भावकर्मसे रहित, नवीन अवस्थाको प्राप्त सिद्ध परमेष्ठीका जो ध्यान करता है वह समस्त अशुभका परित्याग करके और सम्पूर्ण माडलिक गजाओं तथा देवोके स्वामित्वको भले प्रकार भोग करके अमृतरूप शिवमय-कल्याणमय फलको प्राप्त हुआ करता है ॥१३॥ - -- and- -- Mpmad nam 443 चन्द्रमा ਉਲਝੇ I --------- ५८ अथ षष्ठपरिधिपूजा। Rad Mainme air उर्ध्वाधारयुतं सबिन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् , वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सन्धितत्वान्वितम् । अन्तःपत्रतटेण्वनाहतयुतं ह्रींकारसंवेष्टितम् , देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकण्ठीरवः ॥१॥ (पुष्पं दत्वा स्थापनां कुर्यात् ) निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्म नित्यं निरामयम् , वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥१॥ सकलामरेन्द्रसव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्ध कर्मानलदावमेघौघम् ।। २ ॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर संवौषट् अत्र तिष्ठ २ ठः ठः अत्र मम सन्निहितो भव २ वपट् 6 PITAL wh 4. - A -- - --." ब MIC . - AR- - 43---- है । ५९ iube अथाष्टकम् -- शुचिविमलपवित्रैस्तीर्थसंभूततोयैः सुरभिवरसुमिरैः सेवितः पट्पदोषैः । कनककृतमुपूजादत्त गारनालैः, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ॥ १॥ ॐ ह्री चिरतरसंसारकारणाज्ञाननिर्वृतोद्भूतकेवलज्ञानातिशयसम्पन्नसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा, जलम् , इति समुच्चयमत्रः । अथ पृथक् २ मंत्रा:- ॐ ह्रीं अभिनिबोधवारकविनाशकसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । १। ॐ ह्रीं द्वादशश्रुतावरणीय कर्मविमुक्ताय सिद्धाधिपतये नमः स्वाहा ।२। ॐ ह्रीं असंख्येयलोकभेदविभिन्नावविज्ञानावरणविमुक्ताय सिद्धाविपतये नमः स्वाहा । ३। ॐ ह्रीं मनःपर्ययज्ञानावरणरहितसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्री निरिबलद्रव्यगुणपर्यायावबोधककेवलज्ञानावरणियविमुक्ताय सिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । ५। ॐ ह्रीं सकलदर्श नावरणविनाशकसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । ६। ॐ ह्रीं सर्वकर्ममुक्तसिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । ७। ॐ ह्रीं दर्शनावरणीयकर्मरहिताय सिद्धाधिपतये नमः स्वाहा । ८। ॐ ह्रीं चक्षुर्दर्शनावरणकर्मरजोमुक्ताय नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्रीं अचक्षुर्दर्शनावरणविमुक्ताय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं अवधिदर्शनावरणविमुक्ताय - HAR - A .

- Erry make -- ---- ----- ५० ६ KAHAN aapan नमः स्वाहा । ११ ॐ ह्रीं केवलदर्शनावरणविमुक्ताय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं निद्राकर्मविमुक्ताय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं निद्रानिद्राकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं प्रचलकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्रीं प्रचलो प्रचलाकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १६ । ॐ हीं स्त्यानगृद्धिकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्रीं वेदनीयकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्री असातावेदनीयकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्रीं सातावेदनीयकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । २० । ॐ हीं प्रबलतरमहामोहकर्मविप्रमुक्ताय नमः स्वाहा । २१ । ॐ ही मिथ्यात्वकर्ममुक्ताय नमः म्वाहा । २२ । ॐ ह्रीं सम्याड्मिश्यात्वकर्मरहिताय नमः स्वाहा । २३ । ॐ हीं सम्यक्त्वकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं अनन्तानुवन्धिकोवविमुक्ताय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्रीं अनन्तानुबन्धिमानमुक्ताय नमः स्वाहा । २६ । ॐ हीं अनन्तानुवन्धिमायाविमुक्ताय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं अनन्तानुवन्धिलोभमुक्ताय नमः स्वाहा । २८ । ॐ हीं अप्रत्याख्यानावरणक्रोध- रहिताय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्रीं अप्रत्याख्यानावरणमानमुक्ताय नमः स्वाहा । ३० । ॐ ही अप्रत्याख्यानावरणमायामुक्ताय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं अप्रत्याख्यानावरणलोभरहिताय नमः स्वाहा ।३२॥ ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानावरणकोवमुक्ताय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ही प्रत्याख्यानमानमुक्ताय नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्रीं प्रत्याख्यानमायामुक्ताय नमः स्वाहा । ३५ । ॐ ही प्रत्याख्यानलोभलघकाय नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्री संज्वलनक्रोवरहिताय नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ही सचलनमानरहिताय नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ह्रीं संघलनमायामुक्ताय नम स्वाहा । ३९ । ॐ ही संचलनलोभरहिताय नमः स्वाहा । ४० । ॐ ह्री हास्यहिंसकाय नमः स्वाहा । ४१ | ॐ ह्री रतिरहिताय नम. स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री अरतिद्वेपकाय नमः a - ५ 7 . . In 2-44 M - X Mar --- उस विज्ञान - ----- । 9 • - , . १ ॐ स्वाहा । ४३ | ॐ ह्रीं शोकशंकानिवारकाय नमः स्वाहा । ४४ । ॐ ह्री भयकर्मभंजकाय नमः स्वाहा ।।५। ॐ ह्री जुगुप्सारोगचिकित्सकाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्रीं सीवेदकर्मरहिताय नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्रीं पुवेदमारकाय नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं नपुंसकवेदविनाशकाय नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ह्रीं आयुप्यकर्म- मुक्ताय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्री नरकायुष्कर्मरहिताय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री तिर्यगायुण्यकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । ५२ । ॐ ही मनुष्यायुष्कर्मकृतान्तकाय नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री देवायुष्कर्मरहिताय नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री नामकर्मरहिताय नमः स्वाहा । ५५। ॐ ह्री नारकगतिनिवारकाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्री तिर्यग्गतिछेदकाय नमः स्वाहा । ५७ । ॐ ही मनुष्यगतिनामकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा ।५८ ह्री देवगतिनामकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ स्वाहा । ५९ । ॐ ह्रीं एकेन्द्रियजातिजयप्राप्ताय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं द्वीन्द्रियजातिनाममंथकाय नम. स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री त्रीन्द्रियजातिनामकर्मनाशकाय नमः स्वाहा । ६२ । ॐ ह्रीं चतुरिन्द्रियजातिविध्वसकाय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्रीं पचेन्द्रियजाति- रहिताय नमः स्वाहा। ६४ । ॐ ह्री औदारिककर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । ६५। ॐ ह्रीं वैक्रियिककर्मविध्वंसकाय नमः स्वाहा । ६६ । ॐ ह्रीं आहारकशरीररहिताय नम. स्वाहा । ६७ । ॐ ह्रीं तैजसकर्मविध्वंसकाय नमः स्वाहा । ६८ । ॐ ह्रीं कार्मणपिंडछेदकाय नमः स्वाहा । ६९ । ॐ ह्री औदारिकबंधनरहिताय नमः स्वाहा । ७०।ॐ ह्रीं वैक्रियिकवधनरहिताय नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्रीं आहारकबंधनरहिताय नमः स्वाहा ।७२। ॐ ह्रीं तैजसबंधनरहिताय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्रीं कार्मणबंधनमुक्ताय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्रीं औदारिकसंघातरहिताय नमः स्वाहा । ७५ । ॐ ह्री क्रियिकसंघातरहिताय नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं -- , maameraman ----M4A -- Roman / E --- Dam- - . मा com पू ० ६२ द - . T T EMA: TA आहारकसंघातरहिताय नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्रीं तैजससघातरहिताय नमः स्वाहा |७८ ॥ ॐ ही कार्मण- सघातरहिताय नमः म्वाहा । ७९ । ॐ ह्रीं समचतुरस्रसंस्थानरहिताय नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं न्यग्रोधप- रिमंडलसस्थानविनाशकाय नमः म्वाहा । ८१ । ॐ ह्रीं वल्मीकसंस्थानकृतान्तकाय नमः स्वाहा । ८२ । ॐ हीं कुञ्जकसंस्थानरहिताय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ही वामनसंस्थाननामकर्ममुक्ताय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ही हुडकसंस्थानगांतकाय नमः स्वाहा । ८५। ॐ ह्रीं औदारिकशरीरांगोपागमुक्ताय नम. स्वाहा । ८६ । ॐ हीं वक्रियिकागोपागघातकाय नम. स्वाहा । ८७ । ॐ ही आहारफागोपागविनाशकाय नमः स्वाहा । ८८ । ॐ ह्रीं वज्रवृपभनाराचसहननशातकाय नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री बननाराचसंहननरहिताय नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्रीं नाराचसहननस्फोटकाय नमः स्वाहा । ९१ । ॐ ही अर्द्धनाराचसंहननशातकाय नम. स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं कीलकसहननमुक्ताय नम. स्वाहा । ९३ । ॐ ही असंप्राप्तस्फाटिकसंहननभेदकाय नमः स्वाहा । ९४ | ॐ ह्रीं श्वेतनगमकर्मकृतातकाय नमः स्वाहा ।९५॥ ॐ ह्रीं पीतनामकर्मकृतातकाय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं हरितकर्महिताय नमः स्वाहा । ९७| ॐ ही रक्तनामकर्मरहिताय नमः स्वाहा । ९८ । ॐ ह्रीं कृष्णकर्मविभेदकाय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्रीं सुगंधनामकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १००। ॐ ह्रीं दुर्गन्धनामदूरीकारकाय नमः स्वाहा । १०१। ॐ ही तिक्तरसरहितोय नमः स्वाहा । १०२ । ॐ हीं कटुरसरहिताय नमः स्वाहा । १०३ । ॐ ह्रीं कपायग्सकर्मखण्डकाय नमः स्वाहा । १०४ । ॐ हीं अम्ल रसरहिताय नमः स्वाहां। १०५ । ॐ ह्रीं मधुररसविनाशकाय नमः स्वाहा । १०६ । ॐ ह्रीं मृदुत्वमुक्ताय नमः स्वाहा । १०७ । ॐ ह्रीं कर्कशस्पर्शहिंसकाय नमः स्वाहा । १०८। ॐ ह्रौं गुरुस्पर्शशातकाय नमः M - M Con R ब RAM 2pxn04 wala विधान a MAHR EMA rama MIF - T है पू० rama PIC स्वाहा । १०९ । ॐ ह्रीं लघुस्पर्शत्यक्ताय नमः स्वाहा । ११०। ॐ ह्रीं शीतस्पर्शछेदकाय नमः स्वाहा । १११ । ॐ ह्रीं उप्णस्पर्शभ्रसकाय नमः स्वाहा । ११२ । ॐ ह्रीं स्निग्ध स्पर्शध्वंसकाय नमः स्वाहा । ११३ । ॐ ह्रीं रूक्षस्पर्शरोवकाय नमः स्वाहा । ११४ । ॐ ह्रीं सर्वस्पर्शरहिताय नमः स्वाहा । ११५ | ॐ ह्रीं नरकगत्यानुपूर्विविनाशकाय नमः स्वाहा । ११६ । ॐ ह्रीं तिर्यग्गत्यानु- पूर्विप्रतारकाय नमः स्वाहा । ११७ । ॐ ह्री मनुष्यगत्यानुपूर्विविध्वंसकाय नमः स्वाहा । ११८ । ॐ ह्रीं देवगत्यानुपूर्षिछेदकाय नमः स्वाहा । ११९ । ॐ ह्रीं अगुरुलघुत्वलंघकाय नम स्वाहा । १२० । ॐ ह्रीं उपधातघातकाय नमः स्वाहा । १२१ । ॐ ह्री परघातनामकर्मविकर्मकाय नमः स्वाहा । १२२ । ॐ ह्रीं आतपघातकाय नमः स्वाहा । १२३ । ॐ ह्रीं उद्योतकर्मदाहकाय नमः स्वाहा । १२४ । ॐ ह्रीं श्वासनिः- श्वासविमुक्ताय नमः स्वाहा । १२५ । ॐ ह्रीं प्रशस्तविहायोगतिप्रमुक्ताय नम. स्वाहा । १२६ । ॐ ह्रीं अप्रशस्तविहायोगतिनिर्णाशकाय नम. स्वाहा । १२७ । ॐ ह्रीं त्रसकर्मविनाशकाय नमः स्वाहा । १२८ । ॐ ह्रीं स्थावरकर्मविशारकाय नमः स्वाहा । १२९ । ॐ ह्रीं वाढरनामप्रवासकाय नमः स्वाहा । १३० । ॐ ह्रीं सूक्ष्मकर्मशोषकाय नमः स्वाहा । १३१ । ॐ ह्रीं पर्याप्तिकर्मरहिताय नमः स्वाहा । १३२ । ॐ ह्रीं अपर्याप्तिकर्मनिषेधकाय नमः स्वाहा । १३३ । ॐ ह्रीं प्रत्येकशरीरहिंसकाय नमः स्वाहा । १३४ । ॐ ह्रीं साधारणशरीरनिर्णाशकाय नमः स्वाहा । १३५ । ॐ ह्री स्थिरनामकर्मछेदकाय नमः स्वाहा । १३६ । ॐ ह्रीं अस्थिरनामकर्मनिर्ग्रन्थकाय नमः स्वाहा । १३७ । ॐ ह्रीं शुभकर्मपाशकाय नमः स्वाहा । १३८ । ॐ ह्रीं अशुभकर्मनिरसकाय नमः स्वाहा । १३९। ॐ ह्रीं शुभगकर्मनिवारकाय नमः स्वाहा । १४०। ॐ ह्रीं अशुभगwwewar - RECE किसान 4 पू० 7 नमः कर्मनिरसकाय नमः स्वाहा । १४१ । ॐ ह्रीं सुस्वरपरिवर्जकाय नमः स्वाहा । १४२ । ॐ ह्री दुःस्वर- निवारकाय नमः स्वाहा । १४३ । ॐ ह्रीं श्रादेयप्रकृतिविनाशकाय नमः स्वाहा । १४४ । ॐ ही अनादेय- कर्मसारकाय नमः स्वाहा । १४५ । ॐ ह्री निर्माणनामकर्मकृतातकाय नमः स्वाहा । १४६ । ॐ ह्रीं यश:- कीर्तिछेदकाय नमः स्वाहा । १५७ । ह्रीं अयशःकार्तिछेदकाय नमः स्वाहा । १४८ । ॐ ह्रीं पंच- कल्याणचतुर्विंशदतिशयाटप्रातिहार्यसमवसरणादिविभूतियुक्ताहत्यलक्ष्मीहेतुतीर्थकरनामकर्मोझासकाय स्वाहाः । १४९ । ॐ ह्रीं उच्चगोत्रकर्मपिंजकाय नमः स्वाहा । १५० । ॐ ह्री नीचगोत्रकर्मविनाशकाय नमः स्वाहा । १५१ । ॐ ह्री दानान्तरायदाहकाय नमः स्वाहा । १५२ ॐ ह्रीं लाभान्तरायकर्मोन्मन्थकाय नमः स्वाहा । १५३ । ॐ ह्रीं भोगान्तरायरहिताय नमः स्वाहा । १५४ । ॐ ह्रीं उपभोगान्तरायविनाशकाय नमः स्वाहा । १५५ । ॐ ह्री वीर्यान्तरायवारकाय नमः स्वाहा । १५६ । ॐ ह्री कर्माष्टकमुक्ताय नमः स्वाहा । १५७। ॐ ह्री कर्मशताष्टचत्वारिंशनिवारकाय नमः स्वाहा । १५८ । ॐ ही सख्यातकर्मनिवारकाय नमः स्वाहा। १५९ । ॐ ह्रीं असख्यातकर्मविदारकाय नमः स्वाहा । १६० । ॐ ह्री अनन्तानन्तकर्मनिवारकाय नमः स्वाहा । १६१ । ॐ ह्रीं सत्यातलोककर्मविश्वसकाय नमः स्वाहा । १६२ । ॐ ह्री आनन्दस्वभावाय नमः स्वाहा १६३ । ॐ ह्री आनन्दवर्माय नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ह्रीं अानन्दस्वरूपाय नमः स्वाहा । १६५ । ॐ ही परमानन्दधर्माय नम : स्वाहा । १६६ । ॐ ह्री अनन्तगुणाय नमः स्वाहा । १६७ । ॐ हीं अनन्त- गुणस्वरूपाय नमः स्वाहा । १६८ । ॐ ह्री अनन्तवर्माय नमः स्वाहा । १६२ । ॐ ही शमस्वभावाय नमः स्वाहा । १७० । ॐ ह्री शमसन्तुष्टाय नमः स्वाहा । १७१ । ॐ ह्र। शमसतोपाय नमः स्वाहा । १७२ । AM -A dee dan 15 Jabar "- -------- त --- S - । AM- 41 पडलााधान INE TAMA -- -- Pok-aute bil A ॐ ह्रीं साम्यस्थानाय नमः स्वाहा । १७३ । ॐ ह्रीं साम्यगुणाय नम. स्वाहा । १७४ । ॐ ह्रीं साम्यकृत- कृत्याय नम. स्वाहा । १७५ । ॐ ह्रीं अनन्यशरणाय नमः स्वाहा । १७६ । ॐ ह्री अनन्यगुणाय नमः साहा । १७७ । ॐ ह्रीं अनन्यप्रमाणाय नमः स्वाहा । १७८ । ॐ ह्री प्रमाणमुक्ताय नमः स्वाहा । १७९ । ॐ ह्री ब्रह्मस्वरूपाय नमः स्वाहा । १८० । ॐ ह्रीं ब्रह्मगुणाय नमः स्वाहा । १८१ । ॐ ह्रीं ब्रह्मचैतन्याय नमः स्वाहा । १८२ | ॐ ह्री शुद्धपरिणामकाय नमः स्वाहा । १८३ । ॐ ह्रीं शुद्धस्वभा- बाय नमः स्वाहा । १८४ । ॐ ह्रीं अनन्तदृशे नमः स्वाहा । १८५ । ॐ ह्रीं अशुद्धिरहिताय नमः स्वाहा । १८६ । ॐ ह्रीं शुद्धयशुद्धिरहिताय नमः स्वाहा । १८७। ॐ ह्रीं अनन्तक्त्वरूपाय नम• स्वाहा । १८८ । ॐ ही अनन्तद्गानन्दाय नमः स्वाहा । १८९ । ॐ ह्री अनन्तगुत्पादाय नमः स्वाहा । १९० । ॐ ह्रीं अनन्तध्रुवाय नमः स्वाहा । १९१ । ॐ ह्रीं अनन्तव्ययभावाय नम. स्याहा । १९२ । ॐ ह्री अनन्तविलयाय नम. स्वाहा । १९३ । ॐ ह्रीं अनन्ताकाराय नमः स्वाहा । १९४ । ॐ ह्रीं अनन्तभावाय नमः स्वाहा । १९५ । ॐ ह्री चिन्मयस्वरूपाय नमः स्वाहा । १९६ । ॐ ह्रीं चिद्रूपधर्माय नमः स्वाहा । १९७ । ॐ ही चिद्रूपस्वरूपाय नम. स्वाहा । १९८ । ॐ ह्री स्वात्मोपलब्धिरसाय नमः स्वाहा । १९९ । ॐ ह्री स्त्रानु- भूतिरताय नमः स्वाहा । २०० । ॐ ह्री परमामृताय नमः स्वाहा । २०१ । ॐ ह्रीं परमामृततुष्टाय नमः स्वाहा । २०२ । ॐ ह्रीं परमप्रीतये नमः स्वाहा । २०३ । ॐ ह्रीं परमवल्लभभावाय नमः स्वाहा । २०४ । ॐ ह्रीं व्यक्तस्वभावाय नमः स्वाहा । २०५। ॐ ह्रीं एकत्वभावाय नम स्वाहा । २०६ । ॐ ह्रीं एकत्वस्वरू- पाय नमः स्वाहा । २०७। ॐ ह्री द्वित्वविनाशकाय नमः स्वाहा । २०८ । ॐ ह्रीं शास्वतप्रकाशाय नमः G ne - - -- romanar - सिद्ध चक्र मंडल विधान Shali स्वाहा । २०९ । ॐ ह्री शास्वतद्योताय नमः स्वाहा । २२० । ॐ ही शास्वताष्टचन्द्राय नमः स्वाहा।२११॥ॐ ही शास्त्रतामृतमूर्तये नमः स्वाहा । २१२ । ॐ ह्री परमसूदमाय नमः स्वाहा । २१३ । ॐ ह्रीं सूक्ष्मावकाशाय नमः स्वाहा । २१४ । ॐ ह्रीं मूक्ष्मगुणाय नमः स्वाहा । २१५। ॐ ह्रीं परमसूक्ष्मावकाशाय नमः स्वाहा । २१६ । ॐ ह्रीं निरवधिसुखाय नमः स्वाहा । २१७ । ॐ ह्रीं निरवधिगुणाय नमः स्वाहा । २१८ । ॐ ह्री निरवधिस्वरूपाय नमः स्वाहा । २५९ । ॐ ही अतुलज्ञानाय नमः स्वाहा । २२० । ॐ ह्रीं अतुलसुखाय नमः स्वाहा । २२१ । ॐ ह्री अतुलभावाय नमः स्वाहा । २२२ । ॐ ह्री अतुलगुणाय नमः स्वाहा । २२३ । ॐ ह्री अतुलप्रकाशाय नमः स्वाहा। २२४ । ॐ ह्री अचलाय नमः स्वाहा ।२२५। ॐ ही अचलगुणाय नमः स्वाहा । २२६ । ॐ ह्री अचलस्वभावाय नमः स्वाहा । २२७ । ॐ ह्रीं स्वरूपाय नमः स्वाहा । २२८ । ॐ ह्री निरालंबाय नमः स्वाहा । २२९ । ॐ ह्री आलम्बरहिताय नमः स्वाहा । २३० । ॐ ह्री निर्लेपाय नमः स्वाहा । २३१ । ॐ ही निष्फलंकाय नमः स्वाहा । २३२ । ॐ ह्री नित्यालो काय नमः स्वाहा । २३३ । ॐ ह्रीं प्रात्मरतये नमः स्वाहा । २३४ । ॐ ह्रीं म्वरूपगुप्ताय नमः स्वाहा । २३५ । ॐ ह्रीं शुद्रव्याय नमः स्वाहा ।२३६। ॐ ह्री असंसाराय नमः स्वाहा । २३७। ॐ ह्री सानन्दानन्दिताय नमः स्वाहा । २३८ । ॐ ह्रीं स्वानन्दभावाय नमः स्वाहा । २३९ । ॐ ह्रीं स्वानन्द- स्वरूपाय नमः स्वाहा । २४० । ॐ ह्री स्वानन्दगुणाय नमः स्वाहा । २४१ । ॐ ह्री स्वानन्दसतोपाय नमः स्वाहा । २४२ । ॐ ह्रीं शुद्भावपर्यायाय नमः स्वाहा । २४३ । ॐ ह्री स्वातन्त्र्यधर्माय नमः स्वाहा । २४४। ॐ ही आत्मस्वभावाय नमः स्वाहा । २४५। ॐ ह्रीं परमचित्परिणताय नमः स्वाहा । २४६। ------ RAN -- ट -4 सिद्ध चक्र ह्रीं मंडल विधान ॐ ह्रीं चिद्रूपगुणाय नमः स्वाहा । २४७ । ॐ ह्रीं परमन्नातकाय नमः स्वाहा । २५८ । ॐ ह्रीं नानक- वर्माय नम. स्वाहा । २४९ । ॐ ह्रीं सर्वावलोकनाय नम. स्वाहा । २५० । ॐ ह्रीं लोकाग्रस्थिताय नमः स्वाहा । २५१ । ॐ ह्री लोकव्यापकाय नम. स्वाहा । २५२ । ॐ ह्री अनादिनिवनाय नम. स्वाहा । २५३ । ॐ हीं अनादिस्वरूपाय नमः स्वाहा । २५४ । ॐ ह्रीं अनायनुपमसिद्धाय नम. स्वाहा । २५५ । ॐ ह्री अनादिगुणपग्पूिर्णाय नमः स्वाहा । २५६ । परिमलबहुलीद्वैश्चन्दनैः कुंकुमौर्यैः, विविधसुरभिद्रव्यश्चारु कर्पूरपुष्टैः। अलिकुलमिलितैस्तैणयुक्तैरमीभिः, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ।। २ ।। चन्दनम् शशिकरनिकराभै सितैरक्षतीयः, कलितविमलशोभैः शुभ्रडिंडीरपिंडैः। हसितहरिसितैस्तैः पुंजितैरक्षतीयैः, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ।। ३ ।। अक्षतान् कंमलबकुलमालामालतीमल्लिकाभिः, परिमलबहलाभिीमरीसंभ्रमाभिः , . ----------- - MAR - स्पृहलालापा य पू० ६८ सुरतरुवरपुप्पैस्तैरनकैरमीभिः, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ॥ ४॥ पुष्पाणि ॥ मृदुललितसुसिद्धैः सालिसंभूतपूतैः हिमकरधवलैस्तैस्तन्दुलव्यंजनान्यैः। घृतमधुरमुपकैश्चारुपकानशोभैः, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ।। ५ ।। नैवेद्यम् । कनकमणिमुरत्ननिर्मितैदीप्तदाफ,- रुडुगणकृतकांतित्रासितांहस्तमौवैः । विकसितवरवोधैः प्रातिहारातिकेन, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ॥ ६॥ दीपम् । अगुरुतगरशुष्कैः शुद्धकर्पूरपूरैः, मिलितमुरभिद्रव्यैश्चन्दनायैरनेकैः । दहनदहितधूपैर्निनरानन्दभूतैः, तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ।। ७॥ धूपम् । R Ind AN- --- PAN

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द्ध वाक
विधा
डलाधन
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काकफलकपित्थैः श्रीफलायैश्च मोचैः ।
पनसबदरचोचैर्दाडिमैः पुंजपुरैः।
सरससुरभिगंधैर्भूतयेत्मानितैस्तैः,
तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ॥ ८॥ फलम् ।
वरजलफलपुष्पैश्चन्दनैरक्षतौधैः,
विरचित्तकृतभक्त्या शुक्लपुष्पांजलीश्च ।
मनवचनतन्त्याकर्मनिर्मूलनेच्छु,
तमहमपि यजे शं निर्मलं सिद्धचक्रम् ॥ ९॥ अर्घम् ॥
ॐ ह्रीं असिआ उसा नमः, इतिमंत्रेणाष्टोत्तरं शतं जाप्य देयम् ।
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স্ব স্ব - -- साइलाधान ७ अथ जयमाला In T हेतुद्वैतवलादुदीर्णसुदृशः सर्वसहाः सर्वश,- स्त्यक्त्वा संगमजससुश्रुतपराः संयम्य साक्षं मनः। व्यात्वा स्वं शमिनः स्वयं स्वममलं निर्मूल्य कर्मारिवलम्, ये शर्मप्रगुणैश्वकाशति शुभैस्ते भान्तु सिद्धा मयि ॥ १ ॥ पुष्पांजलिः। सिद्धानुद्भुतकर्मप्रकृतिसमुदयान् साधितात्मस्वभावान्, बन्द सिद्धिमसिद्धयै तदनुपमगुणप्रग्रहाकृष्टितुष्टः। सिद्धिः स्वात्मोपलब्धिः प्रगुणगुणगणो (णा) च्छादिदोपापहारान्, योग्योपादानयुक्त्या दृपद इह यथा हेमभावोपलब्धिः ॥१॥ नाभावः सिद्धिरिष्टा न निजगुणहतिस्तत्तपोभिर्न युक्तः, अस्त्यात्मानादिवद्धः स्वकृनजफलभुक् तत्क्षयान्मोक्षभागी । ज्ञाता दृष्टा स्वदेहमितिल्पसमाहारविस्तारधर्मा, धौव्योत्पत्तिव्ययात्मा स्वगुणयुत इतोनान्यथा साध्यसिद्धिः ॥ २ ॥ । 1.1 d and . .

डल विधान Ke , ७१ - . सत्त्वन्तर्वाद्यहंतुमभवविमलसदर्शनज्ञानचर्या,- सम्पद्धतिपयातक्षतदुरिततया व्यजिताचिन्त्यसारैः । कैवल्यज्ञानदृष्टिप्रवरसुरवमहावीर्यसम्यक्त्वलन्धि, ज्योतिर्वातायनादिस्थिरपरमगुणैरझुनै समानः ॥ ३ ॥ जानन् पश्यन् समस्तं सममनुपरतं सम्मतृप्यन् वितन्वन् , धुन्वन् ध्वांतं नितान्तं निचितमनुसभं प्रीणयन्नीशभावम् । कुर्वन् सर्वमजानामपरमार्भभवन् ज्योतिरात्मानमात्मा, आत्मन्येवात्मनासौ क्षणमुपजनयन् सत् (न्) स्वयम्भूः प्रवृत्तः ॥ ४ ॥ • छिन्दन् शेषानशंपान्निगलबलकलींस्तैरनन्तस्वभावैः, सूक्ष्मत्वाग्राऽवगहागुरुलघुकगुणैः क्षायिकैः गोभमानः । अन्यैश्चान्यव्यपाहमवणविषयसंप्राप्तिलब्धिप्रभावै,- रुचं व्रज्यास्वभावात्समयमुपगतो धान्नि संतिष्ठतेऽप्रये ॥ ५॥ अन्याकाराप्तिहेतुर्नच भवति परी येन तेनाल्पहीनः । पागात्मोपात्तदेहमतिकृतिरुचिराकार एव ह्यमूर्तः । क्षुत्तृष्णाश्वासकासज्वरमरणजराऽनिष्टयोगप्रमोह, व्यापत्यायुप्रदुःखमभवभवहतः कोऽस्य सौख्यस्य माता ॥६॥ A ---- -- पडलाशना ૭૨ आत्मोपादानसिद्धं स्वयमतिशयबदीतबाघ विशालम्, बृद्धिहासव्यपेतं विषयविरहितं निम्मतिद्वन्द्वभावम् । अन्यद्रव्यानपेक्षं निरुपमममितं शास्वतं सर्वकालम् , उत्कृष्टानन्तसारं परमसुखमतस्तस्य सिद्धस्य जातम् ।। ७ ॥ नार्थः क्षुत्तृविनाशाद्विविधरसयुतैरनपानरशुच्या,- नास्पृष्टगंधमाल्यै हिमृदुशयनैग्लानिनिद्रायभावात् । आतंकारभावे तदुपशमनसभेपजानर्थतावत् , दीपानार्थक्यवद्वा व्यपगततिमिरे दृश्यमाने समस्ते ।। ८॥ तादृक्सम्पत्समेता विविधनयतपःसंयमज्ञानदृष्टि, चर्यासिद्धासमन्तात्मविततयशसो विश्वदेवाधिदेवा । भूता भव्या भवन्तः सकलजगति ये स्तूयामाना विशिष्टैः । तान्सन्निौम्यनन्तानिजिगमिपुररं तत्स्वरूपं त्रिसन्ध्यम् ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं निर्दूतचिरतरसंसारकारणाज्ञानोद्भूतकेवलज्ञानातिशयसम्पन्नासद्धाधिपतये नमः स्वाहा, पूर्णार्धम् । ------ ----

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सिद्ध
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७३
छट्ठी जयमालाका हिन्दी पद्यानुवाद
( रचयिता-वा. जुगलकिशोरनी मुखतार )
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(१)
जिन वीरोन कर्म पृकृतियों, का सब मूलीच्छेद किया,
पूर्ण तपश्चर्याके वलपर, स्वात्मभावको साध लिया ।
उन सिद्धोको सिद्धि अर्थ मैं, वन्दं अतिसन्तुष्ट हुआ,
उनके अनुपम गुणाकर्षसे, भक्तिभावको प्राप्त हुआ।
(२)
स्वात्मभावकी लब्धि सिद्धि है, होती वह उन दोषोक,
उच्छेदन से आच्छादक जो, ज्ञानादिक गुणवृन्दो के ।
योग्य साधनोंकी सुयुक्तिसे, अग्निप्रयोगादिक द्वारा,
हेम शिलासे जगमे जैसे, हेम किया जाना न्यारा ।।
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मडलबधान
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७४
(३)
नहिं अभावमय सिद्धि इष्ट है, नहिं निजगुणविनाशवाली,
सत् का कभी नाश नहिं होता, रहता गुणी न गुण खाली ।
जिनकी ऐसी सिद्धि न उनका, तप विधान कुछ बनता है,
आत्मनाश निजगुणविनाशका, कौन यत्न बुध करता है ।।
(४)
अस्तु; अनादिवद्ध आत्मा है, स्वकृत-कर्म-फलका भोगी,
कर्मवन्ध-फलभोग-नाशसे, होता मुक्ति-रमा-योगी।
ज्ञाता, द्रष्टा, निजतनु-परिमित, संकोचैतर-धर्मा है,
स्वगुण-युक्त रहता है, हरदम धौव्योत्पत्ति-व्ययात्मा है ।।
(५)
इस सिद्धान्त-मान्यताके विन साध्य-सिद्धि नहिं घटती है-
स्वात्मरूप की लब्धि न होती, नहिं व्रत-चर्या बनती है
बन्ध-मोक्ष-फलकी कथनी सब कथनमात्र रह जाती है,
अन्त न आता भव-भ्रमण का, सत्य-शान्ति नहिं मिलती है ।।
१०
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सिद्धचक्र
मंडल विधान
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(६)
जब वह आत्मा मोहादिक के उपशमादिको पाकर के,
बाहरमें गुरु-उपदेशादिक श्रेष्ठ निमित्त मिलाकरके ।
विमल-सुदर्शन-ज्ञान-चरणमय अपनी ज्योति जगाता है,
उस मुशक्ति के प्रबल-घात से घाति-चतुष्क नशाता है ।।
(७)
तव वह भासमान होता स्थिर-अद्भुत-परम-सुगुण-गणसे-
प्रकटित हुआ अचिन्त्य सार है जिनका दुरित-विनाशनसे।-
केवलज्ञान-सुदर्शनसे, अति-वीर्य-प्रवर सुख-समकित से,
शेषलब्धिस, भामण्डल से, चामरादि की सम्पत् से ।।
(८)
सबको सदा जानता-लखता युगपत्, व्याप्त-सुदृप्त हुआ,
घन-अज्ञान-मोह-तम धुनता-सवका सब, निःरवेद हुआ ।
करता तृप्त सुवचनामृतसे-सभाजनों को औ करता
ईश्वरता सब प्रजाजनोंकी, अन्य-ज्योति फीकी करता ॥
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दा महलविधान ---- ७६ पू० M (९) आत्माको, आत्म-स्वरूपसे, आत्मामें प्रतिक्षण ध्याता- हुआ सातिशय वह आत्मा यों, सत्य-स्वयम्भू-पद पाता। वीतराग-अहेतु-परमेष्ठी-आप्त-सार्व-जिन कहलाता, परंज्योति-सर्वज्ञ-कृती-प्रभु-जीवन्मुक्त नाम पाता ॥ (१०) शेप निगड-सम अन्य प्रकृतियाँ फिर छेदता हुआ सारी, आयु-वेदनी-नाम-गोत्र है मूल प्रकृतियाँ जो भारी । उन अनन्तहग्-बोध-वीर्य-सुख-सहित शेष क्षायिक गुणस- अव्यावाध-अगुरुलघुसे औ सूक्ष्मपना-अवगाहनसे-॥ . • ។ शोभमान होता, तैसे ही अन्य गुणोंके समुदयसे- प्रभवित हुए उत्तरोत्तर जो-कर्मप्रकृतिक संक्षयसे । क्षणमें ऊर्ध्वगमन-स्वभावसे, शुद्ध-कर्ममलहीन हुआ, जा बसता है अग्रधाममें, निरुपद्रव-स्वाधीन हुआ । (G

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(१२)
मूलीच्छेद हुआ कमौका, बन्ध-उदय-सत्ता न रही,
अन्याकार-ग्रहण का कारण रहा न तव, इससे कुछ ही-
न्यून, चरम-तनु-प्रतिमाके सम रुचिराकृति ही रह जाता
और अमूर्तिक वह सिद्धात्मा, निर्विकार-पद को पाता ॥
(१३)
क्षुधा-तृपा-श्वासादिकामज्वर, जरा मरण के दुःखों का,
इष्ट वियोग-प्रमोह आपदा,-दिकके भारी कष्टोंका,
जन्महेतु जो, उस भवके क्षय, से उत्पन्न सिद्ध सुखका,
कर सकता परिमाण कौन है ? लेश नहीं जिसमें दुःखका ।
(१४)
सिद्ध हुआ निज उपादानसे, खुद अतिशयको प्राप्त हुआ,
वाधारहित, विशाल, इन्द्रियों के विषयोंसे रिक्त हुआ।
बढ़ता और न घटता जो है, प्रतिपक्षीसे रहित सदा,
उपमारहित अन्य द्रव्योंकी, नहीं अपेक्षा जिसे कदा ॥

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(१५)
सुख उत्कृष्ट अमित शाश्वत वह, सर्वकाल में व्याप्त हुआ।
निरवधि सार परममुख इससे, उस सुसिद्धको प्राप्त हुआ।
जो परमेश्वरपरमात्मा औ, देहविमुक्त कहा जाता,
स्वात्मस्थित कृतकृत्य हुआ, निज, पूर्ण स्वार्थको अपनाता ॥
(१६)
कर्म नाशसे उस मुसिद्धके, क्षुधा तृषाका लेश नहीं,
नाना रसयुत अन्नपानका, अतः प्रयोजन शेष नहीं ।
नहीं प्रयोजन गन्धमाल्यका, अशुचि योग जव नहीं कहीं,
नहीं काम मृदु शय्याका जब, निद्रादिकका नाम नहीं ।।
(१७)
रोग विना तत्शमनी उत्तम, औषधि जैसे व्यर्थ कही,
तम विन दृश्यमान होते सब, दीपशिखा ज्यों व्यर्थ कही।
त्यों सांसारिक विषय सौख्यका, सिद्ध हुए कुछ काम नहीं,
बाधित, विपम, पराश्रित, भंगुर, बंध हेतु जो अदुःख नहीं ।
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(१८)
यो अनन्त ज्ञानादि गुणोंकी, सम्पत्से जो युक्त सदा,
विविध सुनय तप संयमसे हो, सिद्ध, न भजते विकृति कदा ।
सम्यग्दर्शनज्ञानचरणसे, तथा सिद्धपदको पाते,
पूर्ण यशस्वी हुए, विश्व-देवाधिदेव जो कहलाते ।।
(१९)
आवागमन विमुक्त हुए, जिनको करना कुछ शेप नहीं।
आत्मलीन, सब दोप हीन, जिनके विमावका लेश नहीं।
राग द्वेप भयमुक्त निरंजन, अजर अमरपदके स्वामी,
मंगलभूत पूर्ण विकसित, सत् चिदानन्द जो निष्कामी ॥
(२०)
ऐसे हुए अनन्त सिद्ध औ, वर्तमान हैं संप्रति जो।
आगे होंगे सकल जगतमें, विबुध जनोंसे संस्तुत जो ।
उन सबको नतमस्तक हो मैं, वन्दू तीनों काल सदा,
तत्स्वरूपको शीघ्र प्राप्तिका, इच्छुक होकर, सहित मुदा ॥
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(२१),
कारण, उनका जो स्वरूप है, वही रूप सब अपना है।
उसही तरह सु विकसित होता, इसमें लेश न कहना है ।
उनके चिन्तन वन्दन से निज, रूप सामने आता है,
भूली निज निधिका दर्शन यों, प्राप्ति प्रेम उपजाता है ।।
(२२)
इससे सिद्ध भक्ति है सच्ची, जननी सब कल्याणों की,
श्रेयो मार्ग सुलभ करती, वन हेतु कुशल परिणामों की,
कही “सिद्धि सोपान" इसीसे, प्रौढ़ सुधीजन अपनाते,
पूज्यपादकी सिद्धभक्ति लख, युग मुमुक्षु अति होते ।।
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EVENT . . 1 - - ८१ - अथ सप्तमपंक्तिस्थितद्वादशोतरपंचशत्तकमलोपरिपूजा । पू० . AMES ऊर्ध्वाधारयुतं सविन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावष्टितम् । वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्सेंधितत्त्वान्वितम् ॥ अन्तःपत्रतंटेष्वनाहतयुतं हींकारसंवेष्टितम् । देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकंठीरवः ।। ----पुप्प दत्वा स्थापना कुर्यात् निरस्तकर्मसम्बन्ध मूक्ष्म नित्यं निरामयम् । वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥ १ ॥ सकलामरेन्द्रसेव्यं, ज्ञानामृतपानप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्धं कर्मानलदावमेघौघम् ।। २ ।। ॐ ह्रीं णमो सिद्धाण सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर संवौषट् अत्र तिष्ठ २ ठः ठः अत्र मम सन्निहितो भव २ वषट् -- इलाहोद्यान - ૮૨ . अथाष्टकम्- जयत्ति जगति यस्य माभवं सम्यगात्मो,- दयविजितविपक्षं विश्वकल्याणवीजम् । सुरसरिदमलांभोधारयाराधनीयम् , गणधरवलयं तं सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ।। १ ।। जलम् । ॐ हाँ ही हूँ हौं हः आसियाउसा नमः स्वाहा. इति समुच्चयमंत्रः । अथ पृथक् २ मंत्राणि- ॐ ह्री अर्हद्भ्यो नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्रीं अर्हज्जाताय नमः स्वाहा । २। ॐ ह्रीं अर्हद्रूपाय नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्रीं अर्हद्गुणाय नम. स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं अर्हद्दर्शनाय नम स्वाहा । ५। ॐ ह्री अर्हज्ञानाय नमः स्वाहा । ६ । ॐ ही अर्हत्सुखाय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्रीं अर्हवीर्याय नमः स्वाहा । ८ । ॐ ही अर्हद्दर्शनगुणाय नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्रीं अर्हद्ज्ञानगुणाय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं अर्हत्सुखगुणाय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं अर्हद्वीर्यगुणाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ही अर्हत्सभ्यक्तगुणाय नम. स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं अर्हत्स्वगुणाय नम. स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं अर्हवशागाय नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्रीं अर्हदाभिनिबोधाय नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं अर्हच्छतबोधगुणाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्रीं अर्ह- दवविगुणाय नमः स्वाहा। १८। ॐ ह्रीं अर्हन्मनःपर्ययगुणाय नम. स्वाहा ।१९। ॐ ही अर्हत्केवलगुणाय नमः MAM ।

-- 45- मंडलबिधान ॥ ८३ पृ० स्वाहा । २०ॐ ह्री अर्हत्केवलस्वरूपाय नमः स्वाहा ।२१। ॐ हीं अर्हत्केवलदर्शनाय नमः स्वाहा।२२ॐ ह्रीं अर्हत्केवलज्ञानाय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्रीं अर्हत्केवलवीर्याय नम. स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलाय नमः स्वाहा । २५। ॐ ह्री अर्हन्मगलदर्शनाय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्री अर्हन्मगलज्ञानाय नमः स्वाहा २७) ॐ ह्रीं अर्हन्मगलवीर्याय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्री अर्हन्मगलद्वादशागाय नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्रीं अर्हन्मगलाभिनिबोधकाय नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलश्रुताय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलावधिज्ञानाय नमः स्वाहा । ३२ । ॐ ह्रीं अर्हन्मगलमन.पर्ययज्ञानाय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्रीं अर्हन्मगलकेवलज्ञानाय नम. स्वाहा । ३४ । ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलकेवलस्वरूपाय नम स्वाहा । ३५। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलकेवलदर्शनाय नम. स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं अर्हन्मगलकेवलगुणाय नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्रीं अर्हन्मगलकेवलधर्माय नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलकेवलधर्मस्वरूपाय नम. स्वाहा । ३९ । ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमाय नमः स्वाहा । ४० । ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमचिद्रूपाय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्रीं अर्हल्लो- कोत्तमगुणाय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमकेवलदर्शनाय नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ह्रीं अर्ह- केवललोकोत्तमज्ञानाय नमः स्वाहा । ४४ । ॐ ह्री अर्हत्कंवललोकोत्तमवीर्याय नमः स्वाहा । ४५ । ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमद्वादशागाय नम. स्वाहा । ४६। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमाभिनिवोदकाय नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ही अहल्लोकोत्तमावधिबोधाय नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं अल्लोकोत्तममनःपर्ययज्ञानाय नम. स्वाहा । ४९। ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलज्ञानाय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्री अहल्लोकोत्तमकेवलस्वरूपाय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमकेवलपर्यायाय नमः स्वाहा । ५२ । ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तमकेवलद्रव्याय -- mpan -- पश्चादाना -- TI ---- -- । ८४ - नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमकेवलभावाय नमः न्वाहा ।५४ । ॐ ही अईल्लोकोत्तमनौव्यभा- वाय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ ह्रीं अहेल्लोकोत्तमोत्पादभावाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्रीं अहेल्लोकोत्तम स्थिरभावाय नमः म्वाहा । ५७ । ॐ ह्रीं अईन्छरणाय नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्रीं ग्रहपशरणाय नम म्बाहा । ५९ । ॐ ह्रीं अर्हद्गुणशरणाय नमः म्वाहा । ६० । ॐ ही अर्हज्ञानशरणाय नमः म्वाहा । ६१। ॐ ह्रीं अहदर्शनशरणाय नमः म्वाहा । ६२ । ॐ ह्रीं अहीर्यशग्गाय नमः म्वाहा । ६३ । ॐ हीं अर्हदभिनित्रोवशरणाय नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ही अर्हद्द्वादशागाय नम म्वाहा । ६५ । ॐ ही अहंदवधि गरणाय नमः स्वाहा । ६६ । ॐ हीं अईन्मन.पर्ययशरगाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ही ग्रहल्केवलशरणाय नमः स्वाहा । ६८।ॐ ह्रीं अहत्केवलशरणनपार नम स्वाहा ।६९। ॐ ही ईत्केवलधर्मशरणाय नम स्वाहा 1७० । ॐ ह्रीं अर्हकेवलमगलगरगाय नम स्वाहा ।७१। ॐ ही अर्हन्मगलगुणशरणाय नम स्वाहा [७२। ॐ ह्रीं अर्हन्मगलज्ञानगुणशरणाय नम म्वाहा । ७३ । ॐ हीं आर्हन्मंगलदृष्टिशरगाय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ही अर्हन्मंगलबोधशरणाय नम. म्वाहा । ७५। ॐ ही अर्हन्मगलमन पर्ययशरणाय नम स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं अर्हन्मंगलकेवलशरणाय नम. म्वाहा । ७७ । ॐ ही अहन्नगल केवलगुणगरणाय नम न्याहा । ७८ । ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमशरणाय नम. म्वाहा । ७२ । ॐ ही अल्लोकोत्तमगुण मरणाय नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं अर्ह लोकोत्तमज्ञानशरणाय नम. स्वाहा । ८१ । ॐ ही अहल्लोकोत्तमदर्शनशरणाय नमः स्वाहा ।८२॥ ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमवीर्यधारणाय नम ग्वाहा । ८३ ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमवीगगुणशरगाय नमः स्वाहा ।८४१ ॐ ह्रीं अहल्लोकोत्तमद्वादशागशरणाय नम स्वाहा । ८५। ॐ ह्रीं अहलोकोत्तमाभिनिबोरशरणाय नमः mane - -3 --- - Wi ---- -- ANH4 was 4- . - marwasc. ... ..ल. -- . R --- ka मंडल विधान (न ল্পি স্বল্প THE ८५ ५०. स्वाहा । ८६ । ॐ ह्री अहल्लोकोत्तमावधिशरणाय नमः स्वाहा । ८७ । ॐ ह्रीं अर्हल्लोकोत्तममनःपर्ययशर- णाय नमः स्वाहा । ८८ । ॐ ह्रीं अल्लोकोत्तमकेवलज्ञानशरणाय नम स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं अर्हद्विभूति- प्रवानाय नमः स्वाहा ।२.०। ॐ ह्री अर्हद्विभूतिवर्मस्वरूपाय नमः स्वाहा । ९.१ । ॐ ह्रीं अर्हढनन्तचतुष्टयाय नम. स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं र्हदनन्तचतुष्टयस्वरूपगुणाय नमः स्वाहा । ०३ । ॐ ह्रीं अर्हत्रिज्ञानस्वयंभुवे नमः स्वाहा । ९४ । ॐ हीं अर्हद्दशातिशयस्त्रयभुवे नम. स्वाहा । ९५ । ॐ ह्रीं अर्हद्दशातिशयघातिक्षयाय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं अर्हचतुर्दशदेवकृतातिशयाय नमः म्वाहा । ९७ । ॐ ह्रीं अर्हद्ज्ञानानंतन्यानाय नम. स्वाहा । ९८ । ॐ ह्रीं अर्हत्तपोऽनतगुणाय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्रीं अर्हद्ध्यानानंतध्येयाय नम स्वाहा । १०० । ॐ ह्री अहदनन्तज्ञानगुणात्मने नम स्वाहा । १०१ । ॐ ह्रीं अर्हत्परमात्मने नमः स्वाहा । १०२ । ॐ ह्रीं अर्हदनन्तगुणात्मने नमः स्वाहा । १०३ । ॐ ह्रीं अर्हत्स्वरूपगुप्तये नम. स्वाहा । १०४ । ॐ ह्री सिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १०५ । ॐ ह्रीं सिद्धस्वरूपेभ्यो नम साहा । १०६ । सिद्धगुणेभ्यो नमः स्वाहा । १०७ । ॐ स्वाहा । १०७ । ॐ ह्री सिद्धज्ञानेभ्यो नमः स्वाहा । १०८ । ॐ ह्रीं सिद्धदर्शनेभ्यो नमः स्वाहा । १०९ । ॐ ह्री सिद्धसम्यक्त्वेभ्यो नमः स्वाहा । ११० । ॐ ह्री सिद्धवीर्येभ्यो नम स्वाहा । १११ । ॐ ह्री सिद्धपादुकेभ्यो नमः स्वाहा । ११२ । ॐ ह्रीं सख्यातसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । ११३ । ॐ ह्रीं असख्यातसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । ११४ । ॐ ह्री अनंतसिद्धेभ्यो नम स्वाहा ११५ ॐ ह्रीं असंख्यातलोकसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । ११६ । ॐ ह्रीं अनन्तानतसिद्धेभ्यो नम स्वाहा । ११७ । ॐ ह्री अनन्तलोकसिद्वेभ्यो नमः स्वाहा । ११८ । -- -- - - -- -.- हिद च माडल विधान . 11 - पू० ७ ८६ ॐ ह्री अनन्तानन्तलोकसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । ११९ । ॐ ह्री तिर्यग्लोकसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२० । ॐ ह्रीं सर्वमुखसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२१ । ॐ ह्री स्थलसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२२ । ॐ ह्री गगन- सिद्धभ्यो नमः स्वाहा । १२३ । ॐ ह्री समुद्घातसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२४ । ॐ ह्रीं असमुद्धातसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२५ । ॐ ह्री साधारणसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२६ । ॐ ह्रीं असाधारणसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२७ । ॐ ह्रीं निराभरणसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२८ । ॐ ह्री तीर्थकरसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १२९ । ॐ ह्रीं तीर्थेतरसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३० । ॐ ह्रीं उत्कृष्टावगाहसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा ।१३१॥ ॐ ह्रीं मध्यमावगाहसिद्धेभ्यो नम स्वाहा ।१३२। ॐ ह्रीं जघन्यावगाहसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा ।१३३। ॐ ह्रीं उपसर्गसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३४ । ॐ ह्री पड्विधकालसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३५ । ॐ ह्री निरुप- सर्गसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३६ । ॐ ह्री द्वीपसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३७ । ॐ ह्रीं उदपिसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३८ । ॐ ही स्वस्थित्यासनसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १३९ । ॐ ह्री पर्यकासनसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १४० । ॐ ह्री पुवेदसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १४१ । ॐ ह्री क्षपकश्रेण्यारूढसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १४२ । ॐ ह्रीं एकसमयसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १४३ । ॐ ह्री द्विसमयसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १४४ । ॐ ह्रीं त्रिनमयसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १५५ । ॐ ह्रीं त्रिकालसिद्धेभ्यो नम' स्वाहा । १४६ । ॐ ह्रीं त्रिलोकसिद्धेभ्यो नमः स्वाहा । १४७ । ॐ ह्री सिद्धमगलेभ्यो नमः स्वाहा । १४८ । ॐ ह्रीं सिद्धमंगलरूपेभ्यो नमः स्वाहा । १४९ । ॐ ह्रीं सिद्धमगलज्ञानेभ्यो नमः स्वाहा । १५० । ॐ ह्री सिद्धमंगलदर्शनेभ्यो नमः स्वाहा । १५१ । ॐ ह्री सिद्धमंगलवीर्येभ्यो A - - Road NE सिद्ध ना मंडल विधान) . - । ८७ नमः स्वाहा । १५२ । ॐ ह्रीं सिद्धमंगलसम्यक्त्वेभ्यो नमः स्वाहा । १५३ । ॐ ह्रीं सिद्धमगलमूक्ष्मत्वेभ्यो नम. स्वाहा । १५४ । ॐ ह्रीं सिद्धमगलावगाहनेभ्यो नम. स्वाहा । १५५ । ॐ ह्रीं सिद्धमंगलागुरुलघुभ्यो नमः स्वाहा । १५६ । ॐ ह्रीं सिद्धमंगलाव्याबाधेभ्यो नमः स्याहा । १५७ । ॐ ही सिद्धाष्टगुणेभ्यो नमः स्वाहा । १५८ । ॐ ह्रीं सिद्धाष्टस्वरूपेभ्यो नमः स्वाहा । १५९ । ॐ ह्रीं सिद्धाष्टप्रकाशकेभ्यो नम. स्वाहा। १६० । ॐ ह्रीं मगलसिद्धधर्मेभ्यो नम. स्वाहा । १६१ । ॐ ह्रीं सिद्धलोकोत्तमेभ्यो नमः स्वाहा । १६२ । ॐ ह्रीं सिद्वलोकोतमचिद्रूपाय नमः स्वाहा । १६३ । ॐ ह्रीं सिद्धलोकोत्तमगुणाय नमः, स्वाहा । १६४ । ॐ ह्री सिद्धलोकोत्तमज्ञानाय नमः स्वाहा । १६५ । ॐ ह्री सिद्धलोकोत्तमदर्शनाय नमः स्वाहा । । १६६ । ॐ ह्रीं सिद्वलोकोत्तमवीर्याय नम. स्वाहा । १६७ । ॐ ह्रीं सिद्धशरणाय नमः स्वाहा । १६८ । ॐ ह्रीं सिद्धस्वरूपशरणाय नमः स्वाहा । १६९ । ॐ ह्रीं सिद्धदर्शनशरणाय नम स्वाहा । १७० । ॐ ह्रीं सिद्धज्ञानशरणाय नमः स्वाहा । १७१ । ॐ ह्रीं सिद्धसम्यक्त्वशरणाय नम. स्वाहा । १७२ । ॐ ह्रीं सिद्व- वीर्यशरणाय नमः स्वाहा । १७३ । ॐ ह्रीं सिद्धानन्तशरणाय नम. स्वाहा । १७४ । ॐ ह्रीं सिद्धानन्ता- नन्तगुणशरणाय नम. स्वाहा । १७५ । ॐ ह्रीं सिद्धत्रिकालशरणाय नमः स्वाहा । १७६ । ॐ ह्रीं सिद्ध- त्रिलोकशरणाय नमः स्वाहा । १७७ । ॐ ह्रीं सिद्धसंख्यातलोकारणाय नम. स्वाहा । १७८ । ॐ ह्री सिद्धध्रौव्यगुणशरणाय नमः स्वाहा । १७९ । ॐ ह्रीं सिद्धोत्पाढगुणशरणाय नमः स्वाहा । १८० । ॐ ह्रीं सिद्धसाम्यगुणशरणाय नम स्वाहा । १८१ । ॐ ह्रीं सिद्धस्वच्छगुणगरणाय नम स्वाहा । १८२ । ॐ ह्री सिद्धसमाविगुणशरणाय नम स्वाहा । १८३ । ॐ ह्री सिद्धव्यक्तगुणशरणाय नम. स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं . m C सद शव गहलविवाद । -- ८८ - सिद्धाव्यक्तगुणशरणाय नमः स्वाहा । १८५। ॐ ह्रीं सिद्धव्यक्ताव्यक्तगुणशरणाय नमः स्वाहा । १८६ । ॐ ही सिद्धगुणगणशरणाय नमः स्वाहा । १८७ । ॐ ह्रीं सिद्धपरमात्मरूपाय नमः स्वाहा । १८८ । ॐ ह्रीं सिद्धाखण्डरूपाय नमः स्वाहा । १८९ । ॐ ह्रीं सिद्धचिदानन्दरूपाय नमः स्वाहा । १९० । ॐ ह्री सिद्ध- सहजानन्दाय नमः स्वाहा । १९१ । ॐ ह्रीं सिद्धाच्छेद्यस्वरूपाय नम• स्वाहा । १९२ । ॐ ह्रीं सिद्धाभेद्य- गुणाय नमः स्वाहा । १९३ । ॐ ह्रीं सिद्धानौपम्यधर्माय नमः स्वाहा । १९४ । ॐ ह्रीं सिद्धामृततत्त्वाय नमः स्वाहा । १९५ । ॐ ह्रीं सिद्धश्रुतप्राप्ताय नम. स्वाहा । १९६ । ॐ ह्रीं सिद्धकेवलप्राप्ताय नमः स्वाहा । १९७ । ॐ ह्रीं सिद्धसाकारनिराकाराय नमः स्वाहा । १९८ । ॐ ह्री सिद्धनिरालवाय नम. स्वाहा १९९। ॐ ह्रीं सिद्धनिष्कलंकाय नमः स्वाहा ।२००।ॐ ह्री सिद्धात्मसपन्नाय नमः स्वाहा ।२०१॥ ॐ ह्रीं सिद्वतेजसे नमः स्वाहा । २०२ । ॐ ह्रीं सिद्धागर्भवासाय नमः स्वाहा । २०३ । ॐ ह्रीं सिद्धलक्ष्मीसंतर्पकाय नमः स्वाहा ।२०४॥ ॐ ह्री सिद्धान्तरंगाय नमः स्वाहा ।२०५/ ॐ ही मिद्धस्वारसिकाय नमः स्वाहा ।२०६। ॐ ह्रीं सिद्धशिखरमडनाय नम. स्वाहा । २०७ । ॐ ह्रीं त्रिकालासिद्धानन्तानन्ताय नमः स्वाहा । २०८ । ॐ ह्रीं - सूरिभ्यो नम. स्वाहा । २०९ । ॐ ह्रीं मूरिगुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१० । ह्रीं सूरिस्वरूपगुणेभ्यो नम स्वाहा । २११ । ॐ ह्रीं सूरिसम्यक्त्वगुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१२ । ॐ ह्रीं सूरिज्ञानगुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१३ । ॐ ह्रीं सूरिदर्शनगुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१४ । ॐ ह्रीं सूरिवीर्य- गुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१५ । ॐ ह्रीं सूरिपत्रिंगद्गुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१ स्वाहा । २१६ । ॐ ह्री सूरि- पचाचाररतेभ्यो । २१७ । ॐ ह्रीं मूरिद्रव्यगुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१८ । SHA नमः स्वाहा = Main मंडल निशान) ८२ पृ० M - n ॐ ह्रीं सूरिपर्यायगुणेभ्यो नमः स्वाहा । २१९ । ॐ ह्री सूरिमगलेभ्यो नमः स्वाहा। २२० । ॐ ह्रीं मूरिज्ञान मगलेभ्यो नमः स्वाहा । २२१ । ॐ ही सूरिदर्शनमगलेभ्यो नमः स्वाहा । २२२ । ॐ ह्रीं मूरिमंगलवीर्येभ्यो नम. स्वाहा । २२३ । ॐ ह्री सूरिमगलवर्माय नमः स्वाहा । २२४ । ॐ ह्रीं सूरिलोकोत्तमेभ्यो नम. स्वाहा । २२५ । ॐ ह्रीं सूरिलोकोत्तमज्ञानाय नम स्वाहा । २२६ । ॐ ह्रीं मूरिलोकोत्तमदर्शनाय नमः स्वाहा । २२७ । ॐ ह्रीं सूरिलोकोत्तमवीर्याय नमः स्वाहा । २२८ । ॐ ह्रीं सूरिकेवलधर्माय नमः स्वाहा । २२९॥ ॐ ह्रीं सूरितपेभ्यो नमः म्वाहा । २३० । ॐ ह्रीं सूरिपरमतपेभ्यो नमः स्वाहा । २३१ । ॐ ह्रीं सूरितप- घोरगुणेभ्यो नम स्वाहा । २३२ । ॐ ह्रीं सूरिवोरगुणपराक्रमेभ्यो नमः स्वाहा । २३३ । ॐ ह्रीं सूरि- समृद्धिभ्यो नमः स्वाहा । २३४ । ॐ ह्रीं सूरियोगिभ्यो नमः स्वाहा । २३५ । ॐ ह्रीं मूरिध्यानेभ्यो नमः स्वाहा । २३६ । ॐ ह्रीं सूरिधातृभ्यो नम. स्वाहा । २३७ । ॐ ह्रीं मूरिपात्रेभ्यो नमः स्वाहा ।२३८। ॐ ह्रीं सूरिशरणाय नमः स्वाहा । २३९ । ॐ ह्रीं सूरिगुणशरणाय नमः स्वाहा । २४० । ॐ ह्रीं सूरिधर्म- स्वरूपशरणाय नमः स्वाहा । २४१ । ॐ ह्रीं सूरिसुखस्वरूपशरणाय नमः स्वाहा । २४२ । ॐ ह्रीं मूरि- ज्ञानशरणाय नमः स्वाहा । २४३ । ॐ ह्रीं सूरिदर्शनशरणाय नमः स्वाहा । २४४ । ॐ ह्री मूरिवार्यशर- णाय नम स्वाहा । २४५ । ॐ ह्रीं सूरिमगलशरणाय नम. स्वाहा । २४६ । ॐ ह्रीं मूरितपशरणाय नमः स्वाहा । २४७ । ॐ ह्रीं सूरिचारित्रशरणाय नमः स्वाहा । २४८ । ॐ ह्रीं मूरिध्यानशरणाय नमः स्वाहा । २४९ । ॐ ह्री सूरिझद्धिशरणाय नम. स्वाहा । २५० । ॐ ह्रीं सूरित्रिलोकशरणाय नमः स्वाहा ।२५१। ॐ ह्री सूरित्रिकालशरणाय नमः स्वाहा । २५२ । ॐ ह्रीं मूरित्रिजगन्मगलशरणाय नमः स्वाहा । २५३ । . 4- - ANGI ललियान 9.- 11 पूर्ण ९० ७ 1 wn ॐ ह्रीं सूरित्रिलोकमंगलशरणाय नमः स्वाहा । २५४ । ॐ ह्रीं सूरित्रिलोकमंडनशरणाय नमः स्वाहा । २५५ । ॐ ह्री सूरिऋद्धिमंगलशरणाय नमः स्वाहा । २५६ । ॐ ह्री सूरिमत्रस्वरूपाय नमः स्वाहा । २५७ । ॐ ह्रीं सूरिधर्ममंत्रस्वरूपाय नमः स्वाहा । २५८ । ॐ ह्रीं सूरिचैतन्यगुणस्वरूपाय नमः स्वाहा । २५९ । ॐ ह्रीं सूरिचिदानन्दाय नमः स्वाहा । २६० । ॐ ह्री सूरिसहजानन्दाय नमः स्वाहा । २६१ । ॐ ह्रीं सूरिज्ञानानन्दाय नमः स्वाहा । २६२ । ॐ ह्रीं मूरिगानन्दाय नमः स्वाहा । २६३ । ॐ ह्रीं सूरि- तपत्रानन्दाय नमः स्वाहा । २६४ । ॐ ही सूरिहक्स्वरूपानन्दाय नमः स्वाहा । २६५ । ॐ ही मूरितप- गुणानन्दाय नमः स्वाहा । २६६ । ॐ ह्रीं सूरितपगुणस्वरूपाय नमः स्वाहा । २६७ । ॐ ह्री सूरिहंसा- नन्दाय नम. स्वाहा । २६८ । ॐ ह्री सूरिहंसगुणानन्दाय नमः स्वाहा । २६९ । ॐ ह्रीं सूरिमंत्रगुणा- नन्दाय नमः स्वाहा । २७० । ॐ ह्रीं सूरिसयानानन्दाय नमः स्वाहा । २७१ । ॐ ही सूरिअमृत- चन्द्राय नम. स्वाहा । २७२ । ॐ ह्री सूरिअमृतचन्द्रस्वरूपाय नमः स्वाहा । २७३ । ॐ ह्री सूरिअमृत- गुणाय नमः स्वाहा । २७४ । ॐ ह्रीं सूरिअमृतधनदाय नमः स्वाहा । २७५ । ॐ ह्रीं सूरिअमृतघनस्वरूपाय नमः स्वाहा । २७६ । ॐ ह्रीं सूरिद्रव्याय नमः स्वाहा । २७७ । ॐ ह्री सूरिगुणद्रव्याय नमः स्वाहा ।२७८। ॐ ह्री सूरिद्रव्यस्वरूपाय नमः स्वाहा । २७९ । ॐ ह्रीं सूरिगुणपर्यायाय नमः स्वाहा । २८० । ॐ ह्रीं सूरिपर्या- यस्वरूपाय नमः स्वाहा । २८१ । ॐ ह्री सूरिगुणपर्यायद्रव्याय नमः स्वाहा । २८२। ॐ ह्री सूरिगुणोत्पाढाय नमः स्वाहा । २८३। ॐ ह्रीं मूरिनौव्यगुणोत्पादाय नमः स्वाहा । २८४ । ॐ ह्रीं सूरिव्ययगुणोत्पादाय नमः स्वाहा । २८५। ॐ ह्रीं मूरिजीवतत्त्वाय नमः स्वाहा ।२८६॥ ॐ ह्री मूरिजीवतत्त्वगुणाय नमः स्वाहा । २८७ ॥ G M -- স্বল্প স্বল্প मंडल विधान TA - S ५० ७ ॐ ह्रीं सूरिनिजस्वभावाय नमः स्वाहा ।२८८। ॐ ह्रीं सूरिआश्रवलियाय नमः स्वाहा ।२८९। ॐ ह्रीं सूविध- विनाशाय नमः स्वाहा । २९० । ॐ ह्रीं सूरिसवरतत्त्वाय नमः स्वाहा । २९१ । ॐ ह्रीं सूरिसंवरतत्व- स्वरूपाय नमः स्वाहा । २९२ । ॐ हीं सूरिसंवरगुणाय नमः स्वाहा । २९३ । ॐ ह्रीं सूरिसंवरधर्माय नमः स्वाहा । २९४ । ॐ ह्रीं सूरिनिर्जरातत्त्वाय नमः स्वाहा । २९५ । ॐ ह्रीं सूरिनिर्जरागुणाय नमः स्वाहा । २९६ । ॐ ह्रीं सूरिनिर्जरागुणरूपाय नमः स्वाहा । २९७ । ॐ ह्रीं सूरिपरमनिर्जराधर्माय नमः स्वाहा । २९८ । ॐ ह्रीं सूरिनिर्जरानुवंवाय नमः स्वाहा । २९९ । ॐ ही सूरिनिर्जरास्वरूपाय नमः स्वाहा । ३०० । ॐ ह्रीं सूरिनिर्जराप्रतापाय नमः स्वाहा । ३०१ । ॐ ह्रीं सूरिमोक्षाय नमः स्वाहा । ३०२ । ॐ ह्रीं सूरिमोक्षस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३०३ । ॐ ह्री सूरिबंधमोक्षाय नमः स्वाहा । ३०४ । ॐ ह्रीं सूरिमोक्षगुणाय नमः स्वाहा । ३०५। ॐ ह्री सूरिमोक्षानुबंधाय नमः स्वाहा । ३०६ । ॐ ह्रीं सूरि- मोक्षप्रकाशकाय नमः स्वाहा । ३०७ । ॐ ह्रीं सूरिमोक्षविमंडनाय नमः स्वाहा । ३०८ । ॐ ह्रीं सूरिपर- मात्मस्वरूपरताय नमः स्वाहा । ३०९ । ॐ ह्रीं सूरिमोक्षप्राप्ताय नमः स्वाहा । ३१० । ॐ ह्रीं पाठकेभ्यो नमः स्वाहा । ३११ । ॐ ह्रीं पाठकगुणेभ्यो नमः स्वाहा । ३१२ । ॐ ह्री पाठकगुणस्वरूपेभ्यो नम स्वाहा । ३१३ । ॐ ह्रीं पाठकपर्यायाय नमः स्वाहा । ३१४ । ॐ ह्रीं पाठक- गुणपर्यायाय नमः स्वाहा । ३१५ । ॐ ह्रीं पाठकगुणपर्यायस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३१६ । ॐ ह्रीं पाठक- द्रव्याय नमः स्वाहा । ३१७ । ॐ ह्रीं पाठकगुणद्रव्याय नमः स्वाहा । ३१८ । ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यस्वरूपाय नम. स्वाहा । ३१९ । ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यपर्यायाय नमः स्वाहा । ३२० ॐ ह्रीं पाठकपर्यायस्वरूपाय नमः स्वाहा 6. 12 -- . 1 - Tm in 44 1Aawan 14-atmum----- + -- M ६.८२ m ST M -on-- -nment-ram-na , । । ९२ पू० -- +mar ३२१।ॐ ह्री पाठकमगलाय नमः स्वाहा । ३२२ । ॐ ह्रीं पाठकमंगलगुणाय नमः स्वाहा ।३२३। ॐ ह्री पाठक- मगलगुणस्वरूपाय नम. स्वाहा ।३२४॥ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यमंगलाय नमः स्वाहा ।३२५/ ॐ ह्रीं पाठकमंगलद्रव्य- गुणाय नमः स्वाहा । ३२६ । ॐ ह्री पाठकमंगलद्रव्यगुणस्त्ररूपाय नमः स्वाहा । ३२७॥ॐ ह्रीं पाठकमंगल- पर्यायाय नमः स्वाहा ।३२८। ॐ ह्री पाठकद्रव्यमंगलपर्यायाय नमः स्वाहा ।३२९। ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यगुणपर्या- याय नमः स्वाहा । ३३० । ॐ ह्रीं पाठकस्वरूपमंगलरूपाय नमः स्वाहा । ३३१ । ॐ ह्री पाठकलोकोत्त- माय नमः स्वाहा । ३३२ । ॐ ह्रीं पाठकगुणलोकोत्तमाय नमः स्वाहा । ३३३ । ॐ ह्रीं पाठकद्रव्यलोको- त्तमाय नमः स्वाहा । ३३४ । ॐ ह्रीं पाठकज्ञानाय नमः स्वाहा । ३३५ । ॐ ह्री पाठकज्ञानलोकोत्तमाय नमः स्वाहा । ३३६ । ॐ ह्रीं पाठकदर्शनाय नमः म्वाहा । ३३७ । ॐ ह्री पाठकदर्शनलोकोत्तमाय नम. स्वाहा । ३३८ । ॐ ह्री पाठकदर्शनस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३३९ । ॐ ह्री पाठकसम्यक्त्वस्वरूपाय नमः म्वाहा। ३४० । ॐ ह्रीं पाठकसम्यक्त्वगुणस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३४१ । ॐ ह्री पाठकवीर्याय नमः स्वाहा । ३४२ । ॐ ह्री पाठकवीर्थगुणाय नमः स्वाहा । ३४३ । ॐ ह्रीं पाठकवीर्यपर्यायाय नमः स्वाहा 1 ३४४ । ॐ ह्रीं पाठकवीर्यद्रव्याय नमः म्वाहा । ३४५। ॐ ह्री पाठकवीर्यगुणपर्यायाय नमः स्वाहा । ३४६। ॐ ह्रीं पाठकदर्शनपर्यायाय नमः म्वाहा । ३४७ । ॐ ह्रीं पाठकदर्शनस्वरूपपर्यायाय नमः स्वाहा । ३४८ । ॐ ही पाठकज्ञानद्रव्याय नमः स्वाहा । ३४९ । ॐ ह्रीं पाठकगरणाय नमः स्वाहा । ३५० । ॐ ह्रीं पाठकगुणगरणाय नमः स्वाहा । ३५१ । ॐ ह्रीं पाठकज्ञानगुणशरणाय नमः स्वाहा । ३५२ । ॐ ह्रीं पाठकदर्शनशरणाय नम. स्वाहा । ३५३ । ॐ ह्रीं पाठकदर्शनस्वरूपारणाय नमः स्वाहा KAA S 4-4 सा R मंडल विधान हा . - । ३५४ । ॐ ह्रीं पाठकसम्यक्त्वशरणाय नमः स्वाहा । ३५५ । ॐ ह्रीं पाठकसम्यक्त्वस्वरूपशरणाय नमः म्वाहा । ३५६ । ॐ ह्रीं पाठकवीर्यशरणाय नमः स्वाहा । ३५७ । ॐ ह्री पाठकवीर्यस्वरूपशरणाय नमः स्वाहा । ३५८ । ॐ ह्रीं पाठकवीर्यपरमात्मशरणाय नम. स्वाहा । ३५९ । ॐ ह्रीं पाठकद्वादशागाय नमः स्वाहा । ३६० । ॐ ह्रीं पाठकदशपूर्वाय नमः स्वाहा । ३६१ । ॐ ह्रीं पाठकचतुर्दशपूर्वाय नम स्वाहा | ३६२ । ॐ ह्रीं पाठकाचारागाय नमः स्वाहा । ३६३ । ॐ ह्रीं पाठकज्ञानाचारागाय नम. स्वाहा ।३६४। ॐ ह्रीं पाठकतपाचाराय नमः स्वाहा । ३६५ । ॐ ह्रीं पाठकरत्नत्रयाय नमः स्वाहा । ३६६ । ॐ ह्रीं पाठकरत्नत्रयस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३६७ । ॐ ह्रीं पाठकध्रुवससाराय नमः स्वाहा। ३६८ । ॐ हीं पाठक- एकत्त्वरूपाय नम. स्वाहा । ३६९ | ॐ ह्रीं पाठकएकत्त्वगुणाय नमः स्वाहा । ३७० । ॐ ह्रीं पाठकएकत्त्व - परात्मने नमः स्वाहा । ३७१ । ॐ ह्रीं पाठकधर्माय नमः स्वाहा । ३७२ । ॐ ह्रीं पाठकएकत्त्वचैतन्याय नमः स्वाहा ।३७३। ॐ ह्रीं पाठकएकत्त्वचैतन्यस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३७४। ॐ ह्रीं पाठकएकत्वद्रव्याय नमः स्वाहा ।३७५/ ॐ ह्री पाठकचिदानन्दाय नमः स्वाहा ।३७६। ॐ ह्रीं पाठकसिद्धिसाधकाय नमः स्वाहा ।३७७) ॐ ह्रीं पाठकसमृद्धिसपूर्णाय नम. स्वाहा ३७८ । ॐ ह्रीं पाठकनिग्रंथाय नमः स्वाहा । ३७९ । ॐ ह्रीं पाठक- अर्थनिवानाय नमः स्वाहा । ३८० । ॐ ह्रीं पाठकससारनिधनाय नमः स्वाहा । ३८१ । ॐ ह्री पाटक- कल्याणाय नमः स्वाहा । ३८२ । ॐ ह्री पाठककल्याणगुणाय नमः स्वाहा । ३८३ । ॐ ह्रीं पाठक- कल्याणस्वरूपाय नमः स्वाहा । ३८४ । ॐ ह्री पाठककल्याणद्रव्याय नमः स्वाहा । ३८५। ॐ ह्रीं पाठकतत्त्वगुणाय नम. स्वाहा । ३८६ । ॐ ह्रीं पाठकतत्त्वचिद्रूपाय नम स्वाहा । ३८७॥ ॐ ह्रीं पाठकड़ि- ! " -- मइल बयाना SHIKARE - ९४ 4. पूर्णाय नमः स्वाहा । ३८: । ॐ ह्रीं पाठकगुणचैतन्याय नमः स्वाहा । ३८९ । ॐ ह्रीं पाठकज्योति:- प्रकाशाय नमः स्वाहा । ३९० । ॐ ह्रीं पाठकज्ञानचैतन्याय नमः स्वाहा । ३९१ । ॐ ह्रीं पाठकदर्शन- चैतन्याय नमः स्वाहा । ३९२ । ॐ ह्रीं पाठकवीर्यचैतन्याय नमः स्वाहा । ३९३ । ॐ ह्री पाटकजीवविदे नमः स्वाहा । ३९४ । ॐ ह्री पाठकसकलशरणाय नमः स्वाहा । ३९५ । ॐ ह्रीं पाठकत्रिलोकशरणाय नमः स्वाहा । ३९६ । ॐ ह्रीं पाठकत्रिकालशरणाय नमः स्वाहा । ३९७ । ॐ ह्री पाठकमंगलशरणाय नमः स्वाहा । ३९८ । ॐ ह्री पाठकलोकशरणाय नमः स्वाहा । ३९९ । ॐ ह्रीं पाठकावविनाशाय नमः स्वाहा ४०० । ॐ हीं पाठकाश्रवोच्छेदकाय नमः स्वाहा । ४०१ । ॐ ह्रीं पाठकबवकृतातकाय नमः स्वाहा । ४०२। ॐ ह्रीं पाठकबंधमुक्ताय नमः स्वाहा । ४०३ । ॐ पाठकसंवराय नमः स्वाहा । ४०४ । ॐ ही पाठकसंवररूपाय नमः स्वाहा । ४०५ । ॐ ह्रीं पाठकसबरकारणाय नमः स्वाहा । ४०६ । ॐ ह्री ठककन्दर्पच्छेदकाय नमः स्वाहा । ४०७ । ॐ ह्रीं पाठककर्मविस्फोटकाय नमः स्वाहा । ४०८ । ॐ ह्री पाठकनिर्जरास्वरूपाय नमः स्वाहा । ४०९। ॐ ह्री पाठकमोक्षाय नमः स्वाहा । ४१० । ॐ ह्रीं पाठक- मोक्षस्वरूपाय नमः स्वाहा । ४११ । ॐ ह्री पाठकात्मने नमः स्वाहा । ४१२ । ॐ ह्रीं सर्वसाधुभ्यो नम. स्वाहा । ४१३ । ॐ ह्रीं साधुगुणेभ्यो नमः स्वाहा । ४१४ । ॐ ह्री साधुगुणस्वरूपेभ्यो नमः स्वाहा । ४१५ । ॐ ह्री साधुद्रव्याय नमः स्वाहा । ४१६ । ॐ ह्रीं साधु- द्रव्यगुणाय नमः स्वाहा । ४१७ । ॐ ह्रीं साधुमोक्षाय नमः स्वाहा । ४१८ । ॐ ह्री साधुदर्शनाय नमः स्वाहा । ४१९ । ॐ ह्रीं साधुज्ञानाय नमः स्वाहा । ४२० । ॐ ह्री साधुवीर्याय नमः स्वाहा पाठक -- G ht --- 3- - - -- --- सिद्ध मंडलविधान . पू० - - । ४२१ । ॐ ही सावुज्ञानद्रव्याय नमः स्वाहा । ४२२ । ॐ ह्रीं साधुद्रव्यस्वरूपाय नमः स्वाहा । ४२३ । ॐ ही साधुद्रव्यपर्यायाय नमः स्वाहा । ४२४ । ॐ ह्रीं साधुदर्शनपर्यायाय नमः स्वाहा । ४२५ । ॐ ह्रो साधुमगलाय नमः स्वाहा । ४२६ । ॐ ह्रीं साधुमगलस्वरूपाय नमः स्वाहा । १२७ । ॐ ह्रीं साधुमंगलशरणाय नमः स्वाहा । ४२८ । ॐ ह्रीं साधुदर्शनमगलाय नमः स्वाहा । ४२९ । ॐ ह्रीं सावुज्ञानमंगलाय नम. स्वाहा । ४३० । ॐ ह्रीं साधुवीर्यमंगलाय नमः स्वाहा । ४३१ । ॐ ह्रीं साधुवीर्य- द्रव्याय नमः स्वाहा । ४३२ । ॐ ह्रीं साधुवीर्यद्रव्यस्वरूपाय नमः स्वाहा । ४३३ । ॐ ह्रीं साधुलोको- तमाय नमः स्वाहा । ४३४ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमगुणाय नमः स्वाहा । ४३५। ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तम- गुणस्वरूपाय नमः स्वाहा । ४३६ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमद्रव्याय नमः स्वाहा । ४३७ । ॐ ह्रीं सावुलोकोत्तमज्ञानाय नमः स्वाहा । ४३८ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमज्ञानस्वरूपाय नमः स्वाहा । ४३९ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमदर्शनाय नमः स्वाहा । ४४० । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमवर्माय नमः स्वाहा । ४४१ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमवर्मस्वरूपाय नमः स्वाहा । ४४२ । ॐ ह्री साधुलोकोत्तमवीर्याय नमः स्वाहा । ४४३ । ॐ ह्रीं सावुलोकोत्तमवीर्यस्वरूपाय नमः स्वाहा । १४४ । ॐ ह्री साधुलोकोत्तमातिशयसम्पन्नाय नमः स्वाहा । ४४५ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमब्रह्मज्ञानाय नमः स्वाहा । ४४६ । ॐ ह्री साधुलोकोत्तमब्रह्मज्ञान स्वरूपाय नमः स्वाहा । ४४७ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमजिनाय नम. स्वाहा । ४४८ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तम जिनगुणसम्पन्नाय नम. स्वाहा । ४४९ । ॐ ह्रीं साधुलोकोत्तमपुरुषाय नमः स्वाहा । ४५० । ॐ ह्रीं माधुशरणाय नमः स्वाहा । ४५१ । ॐ ह्रीं साधुअर्हत्स्त्ररूपाय नमः स्वाहा । ४५२ । ॐ ह्रीं साधुगुण- » A N -- - M..

पर -- - मडाबासा ३० ७ Wabu ९६ शरणाय नमः स्वाहा । ४५३ । ॐ ह्रीं साधुदर्शनशरणाय नमः स्वाहा । ४५४ । ॐ हीं साबुदर्शनस्वरूप- शरणाय नमः स्वाहा । ४५५ । ॐ हीं साधुज्ञानशरणाय नमः स्वाहा । ४५६ । ॐ ह्रीं साधुज्ञानस्वरूप- शरणाय नमः स्वाहा । ४५७ । ॐ ह्री साधुआत्मशरणाय नमः स्वाहा । ४५८ । ॐ ही साधुपरमात्म- शरणाय नम. स्वाहा । ४५९ । ॐ ह्रीं साधुजिनान्मशरणाय नमः स्वाहा । ४६० । ॐ ही साधुवीर्यशरणाय नमः स्वाहा । ४६१ । ॐ ह्रीं साधुवीर्यामशरणाय नम स्वाहा । ४६२ । ॐ हीं साधुलक्ष्यलंकृताय नमः स्वाहा । ४६३ । ॐ ह्रीं सावुलमीपरिणताय नमः स्वाहा । १६४ । ॐ ह्री साबुलक्ष्मीरूपाय नमः स्वाहा । ४६५ । ॐ ह्रीं साधुध्रुवाय नमः स्वाहा । ४६६ । ॐ ह्रीं साधुगुणवाय नमः स्वाहा । ४६७ । ॐ ह्रीं साधुद्रव्यध्रुवाय नमः स्वाहा । ४६८ । ॐ ह्रीं साबुद्रव्यगुणोत्पादाय नमः स्वाहा । ४६९ । ॐ ही साधुद्रव्योत्पाढाय नमः स्वाहा । ४७० । ॐ ह्री साबुजीवाय नम. म्वाहा । ४७१ । ॐ ह्रीं साधुजीवगुणाय नमः स्वाहा । ४७२ । ॐ ह्रीं साधुचैतन्याय नमः स्वाहा । ४७३ । ॐ हीं साधु- चैतन्यस्वरूपाय नम. स्वाहा । ४७४ । ॐ ह्रीं सावुचैतन्यगुणाय नमः स्वाहा । ४७५ ॐ ही साधुपरमात्म- प्रकाशाय नमः स्वाहा । ४७६ । ॐ ह्रीं साधुज्योतीरूपाय नमः स्वाहा । ४७७ । ॐ ह्री साधुज्योति प्रदी- पाय नम. स्वाहा । ४७८ । ॐ हीं साधुज्ञानदीपाय नमः स्वाहा । ४७९ । ॐ ही साधुदर्शनप्रदीपाय नमः स्वाहा । ४८० । ॐ ह्रीं साधुसर्वशरणाय नमः स्वाहा । ४८१ । ॐ ह्रीं साधुलोकशरणाय नमः स्वाहा। ४८२ । ॐ ही सावुत्रिलोकशरणाय नमः स्वाहा । ४८३ । ॐ ह्रीं सावुससारच्छेदकाय नम स्वाहा ।४८४। ॐ ह्रीं साधुत्रिकालशरणाय नमः स्वाहा । ४८५ । ॐ ह्रीं साधुएकत्वगुणाय नमः स्वाहा । ४८६ । ॐ है। M- -- N 2 मंडल विधान पू० साधुएकत्वद्रव्याय नमः स्वाहा । ४८७ । ॐ ह्रीं साधुएकत्वस्वभावाय नमः स्वाहा । ४८८ । ॐ ह्रीं साधु- स्याद्वादाय नमः स्वाहा ।। ४८९ । ॐ ह्री साधुशब्दब्रह्मणे नमः स्वाहा । ४९० । ॐ ह्रीं साधुपरब्रह्मणे नमः स्वाहा । ४९१ । ॐ ही साधुपरमागमाय नमः स्वाहा । ४९२ । ॐ ह्रीं साधुजिनागमाय नमः स्वाहा । ४९३ । ॐ ह्रीं साधुअनेकार्थाय नमः स्वाहा । ४९४ । ॐ ह्रीं साधुपरमशुचित्वगुणाय नमः स्वाहा ।४९५/ ॐ ह्रीं साधुपरमपवित्राय नमः स्वाहा । ४९६ । ॐ ह्रीं साधु बंधविविक्ताय नमः स्वाहा । ४९७ । ॐ ह्रीं साधुबंधप्रतिबंधकाय नमः स्वाहा । ४९८ । ॐ ह्रीं साधुसवरकाय नम. स्वाहा । ४९९ । ॐ ह्रीं साधुनिर्जरद्रव्याय नमः स्वाहा | ५०० । ॐ ह्रीं साधुनिर्जरगुणाय नमः स्वाहा । ५०१ । ॐ ह्रीं साधुबोव- गुणधर्माय नम. स्वाहा । ५०२ । ॐ ह्रीं साधुसुगतभावाय नमः स्वाहा । ५०३ । ॐ ह्रीं साधुपरमगत- भावाय नमः स्वाहा । ५०४ । ॐ ह्रीं साधुविभावरहिताय नमः स्वाहा । ५०५। ॐ ह्रीं साधुस्वभावसहिताय नमः स्वाहा । ५०६ । ॐ ह्रीं साधुसिद्धस्वरूपाय नमः स्वाहा । ५०७ । ॐ ह्रीं साधुसूरिप्रकाशाय नमः स्वाहा ।५०८। ॐ ह्रीं साधूपाध्यायपरमोष्ठने नमः स्वाहा । ५०९ ह्रीं साधुआत्मरतये नमः स्वाहा ।५१०॥ ॐ ह्रीं अर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसावुभ्यो नमः स्वाहा । ५११ । ॐ ह्रीं अर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधु- रत्नत्रयात्मकानन्तगुणभ्यो नमः स्वाहा । ५१२ । NEL -

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गहलविद्याना
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उदयति परमात्मज्योतिरुद्योति यस्माद्,-
विशदविनययुक्त्या ध्वस्तमोहान्धकारम् ।
शुचितरघनसारोल्लासिभिश्चन्दनौघै,-
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥२॥ चन्दनम् ।
अहमहमिकयोच्चैः सम्यगाराधनायाम्,
सुरनरखचरेन्द्राः यस्य भत्त्या यतन्ते ।
ललितसदकपुंजैः केवलज्ञानहेतो,-
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ३॥ अक्षतान् ।
भवभयगुरुपारावारपारं लभन्त,
विहितशिवसमृद्धः सेवया यस्य संतः।
कमलबकुलकुंदोदारमंदारपूरैः,
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ४ ॥ पुष्पाणि ।
जननवनहुताशं छिन्नसन्मोहपाशम्,
शमितमदनमान विश्वविद्यानिदानम् ।
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গুলিস্থল
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चरुभिरुरुगुणीचं प्रीणितप्राणिसंघम्,
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ५ ॥ नैवेद्यम् ।
चिदचिदखिलजीवाजीवभेदादिवेद्यम्,
सकलभुवननेत्रम् ज्ञानमाविष्करोति ।
स्मरणमपि यदीयं दीपदीपप्रभौघैः,
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ।। ६ ॥ धूपम् ।
भवति न भवभाजां ध्यानतो यस्य पीडा,
ग्रहदितिसुतरक्षम्मेतभूतप्रसूता ।
अगुरुतुहिनभास्वचन्दनोद्भूतधूपैः,
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ।। ७॥ दीपम् ।
फळमतुलमनन्तं मुक्तिसौख्यप्रतीपम्,
फलति विपुलसंवा सम्यगाविष्कृतोचै ।
असदृशमहिमश्रीमन्दिरं मातुलिंगा,
गणधरवलयं तत्सिद्धयेऽभ्यर्चयामि ॥ ८॥ फलम् ।
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राय उमडलविधान - U १२०० । अभिनवजलगंधामंदमन्दारमाला- ललितममलमर्घ संददाम्यादरेण । गणधरवलयाय श्रीयुजे पद्मनन्दी, सुरहरिमहिताय प्राप्तये मुक्तिलक्ष्भ्याः ॥९॥ अर्घम् । ॐ ह्रीं असिग्राउसा नमः, एतन्मत्रेणाष्टोतरं शतम् जाप्यं देयम् - अथ जयमाला। देवाधीशैर्महीशैः फणपतिभिरिह प्रत्यहं पूज्यपादा,- नहत्सिद्धानदेहांस्त्रिविधमुनिवरान् सूर्युपाध्यायसाधून् । दोपतैिस्तैगरिष्ठान् निजसुगुणवरैर्भूषणैर्भूषितांश्च, नत्वा दृग्वाधबृतादिभिरपि सहितान् संस्तुवे तद्गुणाप्त्यै ॥१॥ सदनंतचतुष्टयगुणविलास, हतघातिचतुष्टयकर्मपाश । सकलातिशयादिसुगुणसमृद्ध, लं हेऽर्हन् जिन जय जय समृद्ध ॥ २॥ RAM मा NA - --- % 3ER- MAA ---- --- -- प ---------- --- . पब- AM स्थित चाक RSE नि महलविधान U । १० पू जय कृतकर्माष्टकवैरिदूर, जय विश्वालोकनपरमसूर | जय सर्वोत्तम वसुगुणसमृद्ध, त्वं सिद्धदेव जय जय समृद्ध ॥३॥ जय पंचाचारमुचरणधीर जय शिष्यानुग्रहकरणवीर । स्थितिकल्पदशाऽऽदिशगुणसमृद्ध, त्वं सूरे जिन जयरसमृद्ध ॥४॥ एकादशांगकृतकंठहार, जय लब्धचतुर्दशपूर्वपार । सर्व श्रुतजलनिधिगुणसमृद्ध, त्वं पाठक जयरसुतपबृद्ध ॥ ५॥ आरंभपरिग्रहनिखिलमुक्त, सद्दर्शनबोधचरित्ररक्त । जय मूलोत्तरगुणनिधिसमृद्ध, साधो जयरसततं प्रबुद्ध ॥ ६॥ सम्यग्दर्शनसंविच्चरित्र-, तपसाञ्चित रत्नत्रयपवित्र । व्यवहारपरमगुणभेदपूर्ण, त्वं जय मुनिवर कुतकर्मचूर्ण ॥ ७॥ पंचतान् परमेष्ठिनः सुतपसा रत्नत्रयेणान्वितान्, संसाराम्बुधितारकान् भविजना ध्यायन्ति ये नित्यशः । ते देवेन्द्रपदं नरेन्द्रपदवी संपाप्य, भद्रगुणैः-, साधं, जन्मजरादिदुःखरहितं पश्चाल्लभते शिवम् ।।८॥ पूर्णार्धम्"। स 6 L- -- + - ঘূচ্ছিষ্ট্র - - ---- विधान - पू ० ७ सप्तम जयमालाका अर्थ - . देवेन्द्रो, नरेद्रो और भवनवासियोके अधिपतियों-असुरेद्रोंके द्वारा जिनके चरण प्रतिदिन पूजे जाते है, ऐसे अर्हन् परमेष्ठी तथा अशरीर सिद्धपरमात्मा और आचार्य उपाध्याय साधु इस तरह तीन प्रकारके मुनिवरोको जो कि दोपोंके विनाशसे महान् , अपने २ समीचीन गुणरूपी भूषणोसे भूपित, और दर्शनज्ञान चारित्र आदिसे युक्त हैं, नमस्कार करके मै उनके गुणोकी प्राप्तिके लिये उनका स्तवन करता हूं ॥ १ ॥ अनन्त चतुष्टयरूप गुण जिनमे विलास कर रहे है, चार घातिया कर्मोंका जाल जिन्होने तोड़ दिया है, समस्त अतिशय आदि सद्गुणोसे समृद्ध है ऐसे हे अर्हन् जिन भगवन् आप सदा जयवन्त रहें ॥२॥ आठ कर्मरूपी शत्रुओको जिन्होने दूर कर दिया है, विश्व मात्रको देखनेमे जो उत्कृष्ट सूर्यके समान है, जो सबसे उत्तम आठ गुणोसे पूर्ण है ऐसे हे सिद्धदेव आप जयवन्त रहे ॥ ३ ॥ पंचाचारका पालन करनेमे घोर, शिष्योका अनुग्रह करनेमें वीर, और स्थितिकल्प नामक दश गुणोका उपदेश करनेवाले गुणोसे समृद्ध हे आचार्य परमेष्ठिन् आप सदा जयवन्त रहे ॥ ४ ॥ ग्यारह अगोको जिन्होने अपने कण्ठका हार बना लिया है, और जिन्होने चतुर्दश पूर्वोका पार प्राप्त कर लिया है, तथा समस्त श्रुतसमुद्ररूपीगुणसे समृद्ध है ऐसे हे उपाध्याय परमेष्ठिन् आप सदा जयवन्त रहें ॥ ५॥ - - - - सिद्ध मंडल विधान the- ७ आरम्भ और परिग्रहसे सर्वथा रहित, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रमे अनुरक्त, मूलगुण और उत्तरगुण रूप निधिसे समृद्ध निरंतर प्रवुद्ध रहनेवाले हे साधु परमेष्ठिन् आप सदा जयवन्त रहें ॥ ६ ॥ सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र और तपरूप आराधनाअोसे युक्त और रत्नत्रयसे पवित्र, व्यवहाररूप परम गुणोके भेदोसे पूर्ण कर्माको चूर्ण करनेवाले हे मुनिवर आप सदा जयवन्त रहे ॥ ७ ॥ समीचीन तप और रत्नत्रयसे युक्त, संसारसमुद्रसे तारनेवाले इन पंचपरमेष्ठियोंका जो प्राणी नित्य ध्यान करते है वे देवेन्द्र और नरेन्द्रपदको प्राप्त कर भद्र-समीचीन गुणोके साथ जन्मजरादिके दुःखोसे रहित शिवपदको अंतमे प्राप्त किया करते है ॥८॥ १ --- -- --- गुडलाधान ----- ३ पू० १०४ अथ चतुर्विंशत्यधिकसहस्रकमलोपर्यष्टमी पूजा त जोधोरयुतं सबिन्दु सपरं ब्रह्मस्वरावेष्टितम् , वर्गापूरितदिग्गताम्बुजदलं तत्संधितत्त्वान्वितम् । अंतःपत्रतटेष्वनाहतयुतं ह्रींकारसंवेष्टिम् , देवं ध्यायति यः स मुक्तिसुभगो वैरीभकंठीरवः ॥१॥ (पुप्पं दत्वा स्थापनां कुर्यात् ) निरस्तकर्मसम्बन्धं सूक्ष्मं नित्यं निरामयम् । वन्देहं परमात्मानममूर्तमनुपद्रवम् ॥१॥ सकलामरेन्द्रसेव्यं ज्ञानामृतपानतृप्तनिजभावम् । संस्थापयामि सिद्ध कर्मानलदावमेघौघम् ॥ २॥ ॐ ह्रीं णमो सिद्धाणं सिद्धपरमेष्ठिन् अत्रावतरावतर संवौषट् अत्र तिष्ठ २ ठः ठः अत्र मम सन्निहितो भव २ वपट् 44 - " Hin -- -~- - --- - SMama माडलबिधान । । पू० १०१ अथाष्टकम् । सकलजनकलंक क्षालयद्भिः सुनीरै,- स्त्रिदिवसरितिजातैजैनवाक्योपमानैः । शिवसदननिविष्टं नाद्यनंतं प्रमुक्तम् , दशशतजिनवारं पूजये सिद्धचक्रम् ॥१॥ ॐ ह्रीं सिद्धाविपतिभ्यो नमः स्वाहा, जलम् । अथ प्रत्येकमंत्राणि । - CONOM 5 ॐ ह्रीं जिनाय नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्रीं जिनेन्द्राय नमः स्वाहा । २। ॐ ह्रीं जिनाधिपाय नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्रीं जिनराजे नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं जिनप्रष्ठाय नम. स्वाहा । ५। ॐ ह्रीं जिनो. त्तमाय नमः स्वाहा । ६ । ॐ ह्रीं जिनाधीशाय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्रीं जिनस्वामिने नमः स्वाहा । ८ । ह्रीं जिनेश्वराय नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्रीं जिननाथाय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं जिनपतये नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं जिनराजाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्री जिनाधिराजे नमः स्वाहा ॥ १३ ॥ ॐ ह्री जिनप्रभवे नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं जिनविभवे नमः स्वाहा ।१५। ॐ ह्रीं जिनभर्त्रे नमः स्वाहा।१६ --- लाद्ध या संहलविधान))- U - पू० ११०६ ॐ ह्रीं जिनाधिभुवे नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्रीं जिननेत्रे नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं जिनेशानाय नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्रीं जिनेनाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्रीं जिननायकाय नमः स्वाहा । २१ । ॐ ह्रीं जिनेशे नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्री जिनपरिवढाय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्रीं जिनदेवाय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं जिनेशित्रे नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्री जिनाधिराजाय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्रीं जिन- पाय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं जिनेशिने नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रीं जिनशासित्रे नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्रीं जिनाधिनाथाय नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्रीं जिनाधिपतये नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं जिनपालकाय नमः स्वाहा । ३२ । ॐ ह्रीं जिनचन्द्राय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्रीं जिनादित्याय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ह्रीं जिनार्काय नमः स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं जिनकुंजराय नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं जिनेन्दवे नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्री जिनधौरेयाय नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ह्री जिनधुर्याय नमः स्वाहा । ३९ । ॐ ह्री जिनोत्तराय नमः स्वाहा । ४० । ॐ ही जिनवर्याय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ही जिनवराय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री जिनसिंहाय नमः स्वाहा । ४३। ॐ ह्रीं जिनोद्वहाय नमः स्वाहा । ४४ ॐ ह्री जिनर्पभाय नमः स्वाहा । ४५ । ॐ ह्रीं जिनबृपाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्री जिनरत्नाय नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्रीं जिनोरसे नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्री जिनेशाय नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ह्री जिनशा- लाय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्रीं जिनाग्याय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्रीं जिनपुंगवाय नमः स्वाहा IA - - - . १-इनः स्वामी, २–ईटे इति ईट् तस्मै । ३–परिवृढ.-प्रमुः। ४-जिनान् पातीति जिनपः । ५. जिना' उदहाः-पुत्रा यस्य सः अथवा जिनान् उद्वहति-ऊर्ध्व नयतीति जिनोहः तस्मै । ६-उर.-प्रधानः । - W- 24- --- ----- -- -- 24 -- SIN- Pre - ত্ব স্ব मंडलाविधान . १०॥ । ५२ । ॐ ह्री जिनहसाय नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री जिनोत्तंसाय नमः स्वाहा । ५४ ॐ ही जिननागाय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ ह्रीं जिनापण्यै नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्रीं जिनप्रवेकाय नमः स्वाहा । ५७ । ॐ ह्रीं जिनग्रामण्यै नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्री जिनसत्तमाय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्रीं जिनप्रवर्हाय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं परमजिर्नाय नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ह्रीं जिनपुगेगमाय नमः स्वाहा । ६२ । ॐ ही जिनश्रेष्ठाय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्रीं जिनज्येष्ठाय नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ह्रीं जिनमुख्याय नमः स्वाहा । ६५ । ॐ ह्री जिनानिमाय नमः स्वाहा । ६६ । ॐ ह्रीं श्रीजिनाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री उतमजिनाय नम स्वाहा । ६८ । ॐ ह्री जिनवृन्दारकाय नमः स्वाहा । ६९ । ॐ ह्रीं अरिजिते नम. स्वाहा। ७० । ॐ ह्रीं निर्विघ्नाय नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्रीं विरजसे नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्रीं शुद्धाय नम. स्वाहा । ७३ । ॐ ह्रीं निस्तरस्काय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्रीं निरजनाय नमः स्वाहा । ७५। ॐ ह्रीं घातिकर्मान्तकाय नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं कर्ममर्माविधे नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्रीं कर्मन्ने नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ह्रीं अनघाय नम स्वाहा । ७९ ॐ ह्रीं वीतरागाय नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं अक्षुधे नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्रीं अद्वेषाय नमः स्वाहा । ८२ । ॐ ह्रीं निर्मोहाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्री निर्म- ढाय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्री अगदाय नमः स्वाहा । ८५ । ॐ ह्री वितृष्णाय नमः स्वाहा । ८६ । - th १-हसो भास्करः। २-उत्तसो-मुकुटः। ३-प्रवेक.-प्रधानः । ४-परया-उत्कृष्टया, मया-लक्ष्म्या, उपलक्षितः परमः सचासौ जिनश्च तस्मै । ५-कर्मणा मर्म-जीवस्थानम् आ समन्तात् वि व्यति इति स, तस्मै । ५ --- - सिद्ध चक्र मंडलविधान १० ॐ ह्रीं निर्ममाय नमः स्वाहा । ८७ । ॐ ह्रीं असंगाय नमः स्वाहा । ८८ । ॐ ह्रीं निर्भयाय नमः स्वाहा। ८९ । ॐ ह्रीं बीतविस्मयोय नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्रीं अस्वप्नाय नमः स्वाहा । ९१। ॐ-हीं निश्रमाये नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं अजन्मने नमः स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं निःस्वेदार्य नमः स्वाहा । ९४ । ॐ 'ह्रीं निर्जराय नमः स्वाहा । ९५। ॐ ह्रीं अमराय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं अरत्यतीताय नमः स्वाहा । ९७ । ॐ ह्रीं निश्चिताय नमः स्वाहा । ९८ । ॐ ह्रीं निर्विषादाय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्री त्रिपष्ठि- जिते नमः स्वाहा । १०० । ॐ ह्रीं सर्वज्ञाय नमः स्वाहा । १०१ । ॐ ह्रीं सर्वविदे नमः स्वाहा । १०२ । ॐ ह्रीं सर्व- दर्शिने नमः स्वाहा । १०३ । ॐ ह्रीं सर्वावलोकनाय नमः स्वाहा । १०४ । ॐ ह्रीं अनन्तविक्रमाय नमः स्वाहा । १०५ । ॐ ह्रीं अनन्तवीर्याय नमः स्वाहा । १०६ । ॐ ह्रीं अनन्तसुखात्मकाय नमः स्वाहा । १-निर्गत मम यस्य स, अथवा निः-निश्चितं मा-प्रमाणं यस्य स एवंभूतः सन् यः पदार्थान् माति- मिनोतीति निर्ममः । २-निर्मत भयं यस्य, वा भव्याना यस्मात् स, यद्वा निश्चिता भा दीप्तिर्यस्य तन्निर्भ-केवलाख्य ज्योतिः तत् याति-प्राप्नोति इति निर्भयः। ३-वीतो विनष्टोऽद्भुतरसो मदो वा यस्य, अथवा वीतो वेर्गरुडस्य स्मयो-गर्वोयस्मात् , गरुडादग्यधिकतर विपहरणसामर्थ्यवत्वाद्भगवतः। ४-अविद्यमानः स्वमः निद्रा प्रमादो वा यस्य, अथवा असून प्राणिनोऽपो जीवन नयतीति अस्वप्नः । ५-निर्गतः श्रमात्-खेदात् , निश्चितः श्रमस्तपो यस्येति वा। ६-स्वेदरहितः, निःस्वाना-दरिद्राणामिम् काम ढदातीति वा । ७ पश्चात्तापरहितः, निर्विष पापरहितं सुखमानन्दामृतमत्तीति वा निर्विषादः। ८-त्रिषष्ठिकर्मणा जेता। ९-अनन्तपराक्रमः,, अनते अलोके विक्रमो जानद्वारा गमनं यस्य, अनन्ताः शेषनागा धरणीन्द्रादयो विशेषेण क्रमयोर्नम्रीभूता यस्येति वा १०-अनंतसुखमात्मा यस्य, अनन्तसुरवमात्मानं कायति-कथयति । (G - ------ - सिद्ध घटक , -- । १०७ । ॐ ह्रीं अनन्तसौख्याय नमः स्वाहा । १.८ । ॐ ह्रीं विश्वज्ञाय नम. स्वाहा । १०९। ॐ ह्रीं विश्वदृश्यने नमः स्वाहा । ११० । ॐ ह्रीं अरिबलार्थदृशे नमः स्वाहा । १११ । ॐ ह्रीं न्यक्षदृशे नमः स्वाहा । ११२ । ॐ ह्रीं विश्वतश्चक्षुपे नमः स्वाहा । ११३ । ॐ ह्रीं विश्वचक्षुषे नमः स्वाहा । ११४ । ॐ ह्रीं अशेषविदे नमः स्वाहा । ११५। ॐ आनन्दाय नमः स्वाहा । ११६ । ॐ ह्रीं परमानन्दाय नमः स्वाहा ।११७। ॐ ह्रीं सदानन्दाय नम स्वाहा । ११८ । ॐ ह्रीं सदोदयाय नमः स्वाहा । ११९ । ॐ ह्री नित्यानन्दाय नमः स्वाहा । १२० । ॐ ह्रीं महानन्दाय नम. स्वाहा । १२१ । ॐ ह्रीं परानन्दाय नमः स्वाहा । १२२ । ॐ ह्री परोदयाय नमः स्वाहा । १२३ । ॐ ह्रीं परमोजसे नमः स्वाहा। १२४ । ॐ ह्रीं परंतेजसे नमः स्वाहा । १२५ । ॐ ह्रीं परधाम्ने नमः स्वाहा । १२६ । ॐ ह्री परंमहसे नमः स्वाहा । १२७ । ॐ ह्रीं प्रत्यग्ज्योतिषे नमः स्वाहा । १२८ । ॐ ह्रीं परज्योतिषे नम. स्वाहा । १२९ । ॐ ह्री परंब्रह्मणे नम. स्वाहा । १३० । ॐ ह्रीं परंरहसे नम. स्वाहा । १३१ । ॐ ह्रीं प्रत्यगात्मने नम स्वाहा । १३२ । ॐ ह्रीं प्रबुद्धात्मने नमः स्वाहा । १३३ । ॐ ह्रीं महात्मने नमः स्वाहा ।१३४। ॐ ही आत्ममहो- दयाय नमः स्वाहा । १३५ । ॐ ह्रीं परमात्मने नम. स्वाहा । १३६ । ॐ ह्रीं प्रशान्तात्मने नमः स्वाहा।१३७ ॐ ह्रीं परात्मने नम स्वाहा । १३८ । ॐ ह्रीं आत्मनिकेतनाय नमः स्वाहा । १३९ । ॐ ह्रीं परमेष्ठिने नम स्वाहा । १४० । ॐ ह्रीं महिष्ठात्मने नमः स्वाहा । १४१ । ॐ ह्रीं श्रेष्ठात्मने नमः स्वाहा । १४२ । १-अतीन्द्रियदृष्टा । २-सदा उदयो यस्य, सदाउत्-उत्कृष्टम् अयः शुभावहो विधिर्यस्येति वा । ३-महान् आनन्दः सौख्यं यस्य, महेन-पूजया आनन्दः यस्मादिति वा।

. E माइललिशाना न है ॐ ह्रीं स्वात्मनिष्ठिताय नमः स्वाहा । १४३ । ॐ ह्री ब्रह्मनिष्ठाय नमः स्वाहा । १४४ । ॐ ह्रीं महानि- ठाय नमः स्वाहा । १४५ । ॐ ह्री निरूढात्मने नमः स्वाहा । १४६ । ॐ ह्री दृढात्मदृशे नमः स्वाहा । १४७ । ॐ ह्रीं एकविद्याय नमः । १४८ । ॐ ह्रीं महाविद्याय नमः स्वाहा । १४९ । ॐ ह्रीं महाब्रह्म- पदेश्वराय नमः स्वाहा । १५० । ॐ ह्रीं पचब्रह्ममयाय नमः स्वाहा । १५१ । ॐ ह्रीं सार्वाय नमः स्वाहा । १५२ । ॐ ह्रीं सर्वविद्येश्वराय नमः स्वाहा । १५३ । ॐ ह्रीं सुभुवे नमः स्वाहा । १५४ । ॐ ह्रीं अनन्तधिये नमः स्वाहा । १५५ । ॐ ह्रीं अनन्तात्मने नमः स्वाहा । १५६ । ॐ ह्री अनन्तशक्तये नमः स्वाहा । १५७ । ॐ ह्री अनन्तदृशे नमः स्वाहा । १५८ । ॐ ह्रीं अनन्तानन्तधीशक्तये नमः स्वाहा । १५९ । ॐ ह्रीं अनन्तविदे नमः स्वाहा । १६० । ॐ ह्रीं अनन्तमुदे नमः स्वाहा । १६१ । ॐ ह्रीं सदाप्रकाशाय नम स्वाहा । १६२ । ॐ ह्री सर्वार्थसाक्षात्कारिणे नमः स्वाहा । १६३ । ॐ ह्रीं समग्रधिये नमः स्वाहा । १६४ । ॐ ह्रीं कर्मसाक्षिणे नम. स्वाहा । १६५ । ॐ ह्रीं जगच्चक्षुपे नमः स्वाहा । १६६ । ॐ ह्रीं अलक्ष्यात्मने नमः स्वाहा । १६७ । ॐ ह्रीं अचलस्थितये नमः स्वाहा । १६८ । ॐ हीं निरा- बाधाय नमः स्वाहा । १६९ । ॐ ह्रीं अप्रतात्मने नम. स्वाहा । १७० । ॐ ह्रीं धर्मचक्रिणे नमः स्वाहा । १७१ । ॐ ह्रीं विदावराय नमः स्वाहा । १७२ । ॐ ह्रीं भूतात्मने नमः स्वाहा । १७३ । ॐ ह्रीं सहजज्योतिषे नमः स्वाहा । १७४ । ॐ ह्रीं विश्वज्योतिषे नमः स्वाहा। १७५ । ॐ ह्रीं अती- न्द्रियाय नमः स्वाहा । १७६ । ॐ ह्री केवलिने नमः स्वाहा । १७७ । ॐ ह्रीं केवलालोकाय नमः स्वाहा । १--गोभना-ममवसरणरूपा, मोक्षरूपा, ईपत्भाग्मारनाम्नी भूः स्थान यस्य । 3.

मंडलविधान ) पूर्ण ." REAL १७८ । ॐ ह्रीं लोकालोकविलोकनाय नम. स्वाहा । १७९ । ॐ ह्रीं विविक्ताय नमः स्वाहा । १८० । ॐ ह्रीं केवलाय नमः स्वाहा । १८१ । ॐ ह्रीं अव्यक्ताय नमः स्वाहा । १८२ । ॐ ह्रीं शरण्याय नमः स्वाहा । १८३ । ॐ ह्रीं अचिन्त्यवैभवाय नमः स्वाहा । १८४ । ॐ ह्रीं विश्वभृते नमः स्वाहा । १८५ । ॐ ह्रीं विश्वरूपात्मने नम स्वाहा । १८६ । ॐ ह्रीं विश्वात्मने नमः स्वाहा। १८७ । ॐ ह्री विश्वतो- मुखाय नमः स्वाहा । १८८ । ॐ ह्रीं विश्वव्यापिने नमः स्वाहा । १८९ । ॐ ह्रीं स्वयंज्योतिषे नमः स्वाहा। १९० । ॐ ह्रीं अचिन्त्यान्मने नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्रीं अमितप्रभाय नमः स्वाहा । १९२ । ॐ ह्रीं महौदार्याय नम. स्वाहा । १९५ । ॐ ह्रीं महाबोधये नमः स्वाहा । १९४ ॐ ह्री महालाभाय नमः स्वाहा । १९५ । ॐ ह्रीं महोदयाय नम. स्वाहा । १९६ । ॐ ह्रीं महोपभोगाय नम स्वाहा । १९७ । ॐ ह्रीं सुगतये नमः स्वाहा । १९८॥ॐ ह्रीं महाभोगाय नमः स्वाहा। १९९। ॐ ह्रीं महावलाय नमः स्वाहा ।२००। ॐ ह्रीं यज्ञार्हाय नम. स्वाहा । २०१। ॐ ह्रीं भगवते नम स्वाहा । २०२ । ॐ ह्रीं अर्हते नमः स्वाहा । २०३ । ॐ ह्रीं महार्हाय नमः स्वाहा । २०४ । ॐ ह्रीं मघवार्चिताय नमः स्वाहा । २०५। ॐ ह्रीं भूतार्थयज्ञपुरुपाय नमः स्वाहा । २०६ । ॐ ह्रीं भूतार्थक्रतुपुरुषाय नमः स्वाहा । २०७ । ॐ . १-असहायः-सर्वथा स्वतन्त्रः, के-आत्मनि बल यस्येतिवा । २-विश्वतः-चतुर्दिक्षु मुख यस्य, अथवा विश्वतोमुख जलमुच्यते तद्धर्म साधर्म्यात् भगवानपि विश्वतोमुखः अमितपातकप्रक्षालनात् विषयसुखदाहनिवारकत्वात् प्रसत्तिरूपत्वाच्च, विश्व तस्यति स्वर्मोनयोर्नयति मुखं यस्य, विश्वतः सर्वागेषु मुख यस्येतिवा, सहस्रगीर्पः सहस्रपा- दित्यभिधानात् । ne Anmona

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REY -- ঞ্জি অ CAMPCAT माइलाजधान) । ११३ स्वाहा । २४० । ॐ ह्रीं सर्वशक्रनमस्कृताय नमः स्वाहा । २४१ । ॐ ह्रीं हर्षाकुलामरखगाय नमः स्वाहा । २५२ । ॐ ह्रीं चारणार्षिमतोत्सवाय नमः स्वाहा । २४३ । ॐ ह्रीं व्यवाय नमः स्वाहा । २४४ । ॐ ह्रीं विष्णुपदारनाय नमः स्वाहो । २४५। अॅ ह्रीं स्नानपीठायिताद्रिराजे नमः स्वाहा । २४६ । ॐ ह्रीं तीर्थ- शंमन्यदुग्धाब्धये नमः स्वाहा । २४७ । ॐ ह्रीं स्नानाम्बुस्नातवासवाय नमः स्वाहा । २४८ । ॐ ह्रीं गंधाम्बुपूत- त्रैलोक्याय नमः स्वाहा ।२४९। ॐ ह्रीं वज्रसूचीशुचिश्रवसे नमः स्वाहा ।२५०। ॐ ह्रीं कृतार्यिंतशचीहस्ताय नम स्वाहा । २५१ । ॐ ह्रीं शक्रो ष्टेष्टनीमकाय नमः स्वाहा । २५२ । ॐ ह्रीं शक्रारब्धानन्दनृत्याय नमः स्वाहा । २५३ । ॐ ह्रीं शचीविस्मापितान्त्रिकाय नमः स्वाहा । २५४ । ॐ ह्रीं इन्द्रनृत्यन्तैपितृकाय नम. स्वाहा । २५५ । ॐ ह्रीं रैदॆपूर्णमनोरथाय नमः, स्वाहा, । २५६ । ॐ ही आज्ञार्थीन्द्रकृतासाय १-श्रुतसागरटीकाया " व्योम" शब्द उपलभ्यते, तैः स, विशेषेण अवति-रक्षति प्राणिगणानिति व्योम इति निरुक्तश्च । किन्तु विपूर्वकादव् धातोर्व्यवशब्द एव भवितुमर्हति न व्योम इति । अतएवेह व्यवशब्द एव व्यवहृत. । " इति मूलपाठे तु एव निरुक्ति. संभवति-"व्यो" इति वीजार्थकोऽव्ययः, त-ससारमोक्षयोर्मूल मन्यते जानातीति व्योम इति । २ अस्य, “ विष्णुपदा रक्षा " इत्यग्निमशब्दस्य च श्रुतसागरैराविष्ट लिंगत्व सूचितम् । वेवेष्टि-व्याप्नोति लोकमिति विष्णु'-प्राणिवर्ग. तेपा पदानि-गुणस्थानाति मार्गणास्थानानि वा तेपामासमन्ताद् रक्षा, करुणारूपत्वाद्भगवतः । ३-गणोऽष्टमुच्चरितम् इष्ट-सर्वमानित नाम यस्य । ४–इन्द्रस्य नृतिर्नर्तनम् अन्ते अग्रे पितुर्यस्य । यस्य भगवतः पितुरग्रे इन्द्र. नृत्यति तस्मै इत्यर्थः । भगवतोऽभिषेकात्याक् पश्चाचेति वारद्वयं पितुरग्रे इन्द्रः नृत्य करोतीति सूचनार्थ नामद्वयेनेह स्मरणम् । ५- रैदेन-कुबेरनामकेन यक्षेन्द्रेण पूर्णाः-पूर्तिनीता मनोरथाः (भोगोपभोगसम्बनिधनः) यस्य । ६-आजाया अर्थी-अभिलाषकः सचासौ इन्द्रश्च तेन कृता-विहिता आ-ममन्तात् सेवा-पर्युपासन यस्य स । - स ---- Paiwasi- Post -- , चिलमा उलयाना योजाना --- --- - . . -- । +Nway- नमः स्वाहा । २५७ | अहो देवाशिमाय नमः । २५८ । . सीमा-गन्धजगते नम म्यादा । २५० । ॐ भून नादिनार नम था । २६० । ही निर्मिनापानाव नमः स्वाहा । २६१ । श्री श्रीयुने नर बाला । २१२। सो योगाध्यमनिगा नग. ET । २६३ 1 ही बने गाय नमः पाहा । २६४ ही नामन्दि ना. मा। २६५ | दी गाय नम म्वाहा । २६६ | गायाय नमः । २३७ । २०ी मापन नम, म्यादा । २६८ । अंही नातवे नमः पाहा । २६९ मायागार नग यारा | २७७ 10 प्रकार नम, स्वाहा । २७१ । ॐही यताय नमः पहा । २७२ । नील नम बा ! २७३ । लोगार नम स्याहा । २७१ | बानुनीगर ना माता । २७५। ii. | २७६ । अंदी मगमापन नम' नारा | २७८ | दी मा ना मा । २७८ 1 3 जगपात- काय नमः म्याहा । २७०. 1 दी दायागाय म. माया 1 २८० । मनाय नम हा । २८१ । ही प्ताह य नमः स्वाहा । २८२ । सी चिनाय नम: AIEET ! २८३ । दी देवानिदेयाग नम. म्यादा २८ प्रका-यांग नम । २८५। ॐदी र नम. मग । २८६ । 2ी नगगुरवे नमः स्याहा । २.८७ । ही मंशा याग नगः माहा । २८८ । १ रिलानाfam! २. गि-योनिमनटीको::.-" निमानियाको मनस्तु न । आमा नया गाना HEALTI Rankinetमागी मान भारतः प्रकीर्नि..! -IITir मागोमोना। पीनियति, सानोति, दहातीति भार ।अर बालोग्ना | 41 ATO me v --- --- শক্তির HINDI मंडल विधाना) --- । MMA --- ॐ ह्रीं पायानाय नमः स्वाहा । २८९ । ॐ ह्रीं जयध्वजिने नमः स्वाहा । २९० । ॐ ह्रीं भामण्डलिने नम. स्वाहा । २९१ । ॐ ह्रीं चतुःपष्टिचामराय नमः स्वाहा । २९२ । ॐ ह्रीं देवदुन्दुभये नमः स्वाहा । २९३ । ॐ ह्री वागस्पृष्टासनाय नम. स्वाहा । २९४ । ॐ ह्रीं छत्रत्रयराजे नमः स्वाहा । २९५ । ॐ ह्रीं पुष्पवृष्टिभाजे नमः स्वाहा । २९६ । ॐ ह्रीं दिव्याशोकाय नमः स्वाहा । २९७ । ॐ ह्रीं मानमर्दिने नमः स्वाहा । २९८ । ॐ ह्रीं संगीतार्हाय नमः स्वाहा । २९९ । ॐ ह्री अष्टमगलाय नमः स्वाहा । ३००। ॐ ह्रीं तीर्थकृते नम. म्वाहा । ३०१। ॐ ह्रीं तीर्थसृजे नमः स्वाहा । ३०२ । ॐ ह्रीं तीर्थकराय नमः स्वाहा । ३०३ । ॐ ह्रीं तीर्थंकराय नमः स्वाहा । ३०४ । ॐ ह्रीं सुदृशे नमः स्वाहा । ३०५ । ॐ ह्री तीर्थकर्त्रे नमः स्वाहा ३०६ । ॐ ह्रीं तीर्थभर्ने नम स्वाहा । ३०७ । ॐ ह्रीं तीर्थेशाय नमः स्वाहा । ३०८ । ॐ ह्रीं तीर्थनायकाय नमः स्वाहा । ३०९ । ॐ ह्रीं वर्मतीर्थकराय नमः स्वाहा । ३१० । ॐ ह्रीं तीर्थप्रणेत्रे नमः स्वाहा । ३११ । ॐ ह्रीं तीर्थकारकाय नमः स्वाहा । ३१२ । ॐ ह्रीं तीर्थप्रवर्तकाय नमः स्वाहा । ३१३ । ॐ ह्रीं तीर्थवेधसे नमः स्वाहा । ३१४ । ॐ ह्री तीर्थविधायकाय नमः स्वाहा । ३१५। ॐ ह्रीं सत्यतीर्थकराय नमः स्वाहा । ३१६ । ॐ ह्रीं तीर्थसेव्याय नम स्वाहा । ३१७ । ॐ ह्रीं तैर्थिकतारकाय नमः स्वाहा । ३१८ । ॐ ह्रीं सत्यवाक्याधिपाय नम स्वाहा । ३१९ । ॐ ह्रीं १-वाग्भिरस्पृष्टमासनमुर. प्रभृत्युच्चारणस्थान यस्य ( अष्टौ स्थानानि ) वर्णानामुर' कण्ठ शिरस्तथा जिह्वामूलं- चदन्ताश्च नासिकोष्ठौच तालुच "। २-ये तीर्थ-शास्त्रे नियुक्ताः, ये च तीर्थ-गुरौ नियुक्ताः सेवापरा., यद्वा तीर्थे-जिनपूजने नियुक्ताः अथवा तीर्थे-पुण्यक्षेत्रे नियुक्ता-यात्राकारकाः, तथैव तीर्थ-पात्रं तस्य दानादिकर्मणि ये नियुक्ता' ते सर्वे तैर्थिका उच्यन्ते । तेषा तारकस्तस्मै । - -- - ------ बलवाद का पडल्ल विशाना । ११६ पू० सत्यशासनाय नमः स्वाहा । ३२० । ॐ ह्रीं अप्रतिशासकाय नमः स्वाहा । ३२१ । ॐ ह्रीं स्याद्वादिने नमः स्वाहा । ३२२ । ॐ ह्रीं दिव्यगिरे नमः स्वाहा । ३२३ । ॐ ह्रीं दिव्यध्वनये नमः स्वाहा । ३२४ । ॐ ह्रीं अव्याहतार्थवाचे नमः स्वाहा । ३२५ । ॐ ह्रीं पुण्यवाचे नमः स्वाहा । ३२६ । ॐ ह्री अर्ध्यवाचे नमः स्वाहा । ३२७ । ॐ ह्रीं अर्द्धमागधीयोक्तये नमः स्वाहा । ३२८ । ॐ ह्रीं इद्धवाचे नमः स्वाहा । ३२९ । ॐ ह्रीं अनेकान्तदिशे नमः स्वाहा । ३३० । ॐ ह्रीं एकान्तध्वान्तभिदे नमः स्वाहा । ३३१ । ॐ ह्रीं दुर्नयान्तकृते नमः स्वाहा । ३३२ । ह्री. सार्थवाचे नमः स्वाहा । ३३३ । ॐ ह्रीं अप्रयत्नोक्तये नमः स्वाहा । ३३४ । ॐ ह्रीं प्रतितीर्थमदनवाचे नमः स्वाहा । ३३५। ॐ ह्री स्यात्कारध्वजवाचे नमः स्वाहा । ३३६ । ॐ ह्रीं ईहापेतवाचे नमः स्वाहा । ३३७ । ॐ ह्रीं अचलौष्ठवाचे नमः स्वाहा । ३३८ । ॐ ह्री अपौरुषेयवाक्छास्त्रे नमः स्वाहा । ३३९ । ॐ ह्रीं रुद्धवाचे नमः स्वाहा । ३४० । ॐ ह्रीं सप्तभंगि- वाचे नमः स्वाहा । ३४१ । ॐ ह्री अवर्णगिरे नमः स्वाहा । ३४२ । ॐ ह्रीं सर्वभापामयगिरे नमः स्वाहा । ३४३ । ॐ ह्री व्यक्तवर्णगिरे नमः स्वाहा । ३४४ । ॐ ह्रीं अमोघवाचे नमः स्वाहा । ३४५ । ॐ अक्रमवाचे नमः स्वाहा । ३४६ । ॐ ह्रीं अवाच्यानन्तवाचे नमः स्वाहा । ३४७ ।. ॐ ह्रीं अवाचे नमः स्वाहा । ३४८ । ॐ ह्रीं अद्वैतगिरे नमः' 'स्वाहा । ३४९-1 ॐ ह्रीं सूनृतगिरे नमः स्वाहा । ३५० । सत्यानुभयगिरे नमः स्वाहा । ३५१ । ॐ ह्रीं सुगिरे नमः स्वाहा । ३५२ । ॐ ही योजनव्यापि-, गिरे नमः स्वाहा । ३५३ । ॐ ह्रीं क्षीरगौरगिरे नमः स्वाहा । ३५४ । ॐ ह्रीं तीर्थकृत्वगिरे नमः, स्वाहा, । ३५५ । ॐ ह्रीं भव्यैकश्रव्यगवे नमः स्वाहा । ३५६ । ॐ ह्रीं सद्गवे नमः स्वाहा । ३५७ । ॐ ह्रीं - dream ..

PAARI Someter १९७ I F चित्रगवे नमः स्वाहा | ३५८ । ॐ ह्रीं परमार्थगवे नमः स्वाहा । ३५९ । ॐ ह्रीं प्रशातगवे नमः स्वाहा । ३६० । ॐ ह्री प्राश्निकगये नमः स्वाहा । ३६१ । ॐ ह्रीं सुगवे नमः स्वाहा । ३६२। ॐ ह्रीं नियत- कालगवे नमः स्वाहा । ३६३ । ॐ ह्रीं सुश्रुतये नमः स्वाहा । ३६४ । ॐ ह्रीं सुश्रुताय नमः स्वाहा ।३६५/ ॐ ह्रीं याज्यश्रुतये नमः स्वाहा ।३६६। ॐ ह्रीं सुश्रुते नमः स्वाहा । ३६७ ।ॐ ह्रीं महाश्रुतये नमः स्वाहा । ३६८ । ॐ ह्रीं वर्मश्रुतये नमः स्वाहा । ३६९ । ॐ ह्रीं श्रुतिपतये नमः स्वाहा । ३७० । ॐ ह्रीं श्रुत्युद्धत्रै नम स्वाहा । ३७१। ॐ ह्रीं ध्रुवश्रुतये नम स्वाहा । ३७२ ।ॐ ह्रीं निर्वाणमार्गेदिशे नमः स्वाहा । ३७३ । ॐ ह्रीं मार्गदेशकाय नमः स्वाहा । ३७४ । ॐ ह्री सर्वमार्गदिशे नमः स्वाहा । । ३७५ । ॐ ह्रीं सारस्वतपथाय नमः स्वाहा ।३७६। ॐ ह्रीं तीर्थपरमोत्तमतीर्थकृते नमः स्वाहा ।३७७॥ ॐ ह्री देष्ट्रे नमः स्वाहा । ३७८ । ॐ ह्रीं वाग्मीश्वराय नमः स्वाहा । ३७९ । ॐ ह्रीं धर्मशासकाय नमः स्वाहा । ३८० । ॐ ह्रीं धर्मदेशकाय नमः स्वाहा। ३८१ । ॐ ह्रीं वागीश्वराय नमः स्वाहा । ३८२। ॐ ह्रीं त्रयीनाथाय नम. स्वाहा । ३८३ । ॐ ह्रीं त्रिभंगीशाय नमः स्वाहा । ३८४ । ॐ ह्रीं गिरापतये नमः स्वाहा । ३८५ । ॐ ह्रीं सिद्धाज्ञाय नमः स्वाहा । ३८६ । ॐ ह्रीं सिद्धवाचे नम. स्वाहा । ३८७ । ॐ ह्रीं आज्ञासिद्धाय नमः स्वाहा । ३८८ॐ ह्रीं सिद्धैकशासनाय नम स्वाहा । ३८९ । ॐ ह्रीं जगत्प्रसि- द्धसिद्धान्ताय नमः स्वाहा । ३९० । ॐ ह्रीं सिद्धमंत्राय नमः स्वाहा । ३९१ । ॐ ह्रीं सुसिद्धवाचे नमः स्वाहा । ३९२ । ॐ ह्रीं शुचिश्रवसे नम स्वाहा । ३९३ । ॐ ह्रीं निरुक्तये नम. स्वाहा । ३९४ । ॐ ह्रीं तत्रकृते नमः स्वाहा । ३९५ । ॐ ह्रीं न्यायशास्त्रकृते नमः स्वाहा । ३९६ । ॐ ह्रीं महिष्ठवाचे नमः --PARANJAN 4 44 AA NARAwaa-nemamalnite- Lmla 4.manish-14-- प -dana - --- H IN .. * t-num RE * 13) !" +. M- - PAadmaaki --- w . ३० " WAwaala . स्वाहा माहा । ३९७ । ॐ ह्रीं महानाटाय नमः स्वाहा । ३९.८ । ॐ ही कवीन्द्राय नमः स्वाहा । ३९० । ही दुंदुभिस्वनाय नम. स्वाहा । ४०० । ही नादया(ना)य नमः स्वाहा । ४०१ । ॐ हीं पतये नमः स्वाहा । ४०२ । ॐ हीं परिहाय नम. स्वाहा । ४०३ । ॐ ही स्वामिने नमः स्वाहा । ४०४ । ॐ ह्रीं भर्ते नम । ४०५। ॐ ही विभने नमः स्वाहा । ४०६ । ॐ हीं प्रभवे नमः स्वाहा । ४०७ । ॐ ही ईश्वराय नमः माहा । ५०८ । " ही अशीश्वराय नमः स्वाहा । ४०९ । ॐ हीं प्रधीशाय नम' स्वाहा । ४१० । ॐ की अधीशानाय नमः म्वाहा । ४११ । ॐ हीं अधीशिने नमः स्वाहा । ११२ । ॐ ही ईशित्रे नम. स्वाहा । ११३ । ॐ ही ईशाय नमः स्वाहा । ४१४ । ॐ हीं अधिपतये नमः स्वाहा । ४१५ । ॐ हीं ईशानाय नम वादा । ४१६ । ॐ हीं इनाय नमः स्वाहा । ४१७ । ॐ हीं इन्द्राय नमः स्वाहा । ४५८ । अनी अधिपाय नमः स्वाहा । ४१९ । ॐ हीं अधिभुवे नमः स्वाहा । ४२० । ॐ ह्रीं मोराय नमः माहा। ५२१ । ॐ हीं महेशानाय नमः स्वाहा । ४२२ । ॐ ह्रीं महेशाय नमः स्वाहा 1 ४२३ । ॐ ही परमेशिने नम स्वाहा । ४२४ । ॐ ह्रीं अधिदेवाय नमः स्वाहा । ४२५ । ॐ ह्रीं महादेवाय नम. याहा । १२६ । ही देवाय नम स्वाहा । ४२७ । ॐ हीं त्रिभुवनेश्वराय नमः स्वाहा । ५२८ । ॐ ही निवेशाय नमः म्वाहा । ४२९ । ॐ ही विश्वभूतेशाय नमः स्वाहा । ४३० । ॐ की विनेो नग. बाहा। ४३१ । ॐ ह्रीं विश्वेश्वराय नम. स्वाहा । ४३२ । ॐ ही अधिराजे नम पाहा । ४३३ । ॐही लोकेश्वगय नमः स्वाहा । ४३४ । ॐ ही लोकपतये नमः म्याहा १ -- M ----- কন্তু লিঙল सिद्ध यह . माइलाल , । HTRA मा । ४३५। ॐ ही लोकनाथाय नम, स्वाहा । ४३६ । ॐ ह्रीं जगत्पतये नमः स्वाहा । ४३७। ॐ ह्रीं त्रैलोक्यनाथाय नमः स्वाहा । ४३८ । ॐ ह्रीं लोकेशाय नमः स्वाहा । ४३९ । ॐ ह्रीं जगन्नाथाय नमः स्वाहा । ४४० । ॐ ह्रीं जगत्प्रभवे नमः स्वाहा । ४४१ । ॐ ह्रीं पित्रे नमः स्वाहा । ४४२ । ॐ ह्रीं पराय नमः स्वाहा । ४४३ । ॐ ह्रीं परतराय नमः स्वाहा । ४४४ । ॐ ह्रीं जेत्रे नमः स्वाहा । ४४५ । ही जिष्णवे नम स्वाहा । ४४६ । ॐ ह्रीं अनीश्वराय नमः स्वाहा । ४४७। ॐ ह्रीं कत्रे नमः स्वाहा। ४४८ । ॐ ह्रीं प्रभूष्णवे नमः स्वाहा । ४४९ । ॐ ह्रीं भ्राजिष्णवे नमः स्वाहा । ४५० । ॐ ह्रीं प्रभ- विष्णवे नम. स्वाहा । ४५१ । ॐ ह्री स्वयंप्रभवे नमः स्वाहा । ४५२ । ॐ ह्रीं लोकजिते नमः स्वाहा । ४५३ । ॐ ह्री विश्वजिते नमः स्वाहा । ४५४ । ॐ ह्रीं विश्वविजेत्रे नमः स्वाहा । ४५५ । ॐ ह्रीं विश्वजित्वराय नमः स्वाहा । ४५६ । ॐ ह्रीं जगज्जेत्रे नमः स्वाहा । ४५७ । ॐ ह्रीं जगज्जैत्राय नमः स्वाहा। ४५८ । ॐ ह्रीं जगजिप्णवे नमः स्वाहा । ४५९ । ॐ ह्रीं जगज्जयिने नमः स्वाहा । ४६०। ॐ ह्रीं अग्रण्यै नमः स्वाहा । ४६१ । ॐ ह्रीं ग्रामण्यै नम. स्वाहा । ४६२ । ॐ ह्रीं नेत्रे नमः स्वाहा । ४६३ । ॐ ह्रीं भूर्भुवःस्वरधीश्वराय नमः स्वाहा | ४६४ । ॐ ह्रीं धर्मनायकाय नमः स्वाहा । ४६५। ॐ ह्रीं ऋद्धीशाय नमः स्वाहा । ४६६ । ॐ ह्रीं भूतनाथाय नमः स्वाहा । ४६७ । ॐ ह्रीं भूतभृते नमः स्वाहा । ५६८ । ॐ ह्रीं गतये नमः स्वाहा । ४६९ । ॐ ह्रीं पात्रे नमः स्वाहा । ४७० । ॐ ह्री बृषाय नमः १-ग्राम-सिद्धसमूह नमतौति ग्रामणीः । २-गमन, जानमात्र, सर्वेषामर्तिहरणसमर्थों वा गतिः । आविष्टलिंग गतिः-शरणम् । ३.-पानि-रक्षतिदु खातिपाता तस्मै । १२ Mum 4 wap M-

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- ফাল্লাল) --- १२१ पू० साम्यारोहणतत्पराय नम स्वाहा । ५०३ । ॐ ह्री सामायिकिने नमः स्वाहा । ५०४ । ॐ ह्रीं सामायिकाय नमः स्वाहा । ५०५। ॐ ह्रीं निःप्रमादाय नमः स्वाहा । ५०६ । ॐ ह्रीं अप्रतिक्रमाय नमः स्वाहा । ५०७ । ॐ ह्री यमाय नमः स्वाहा । ५०८ । ॐ ह्रीं प्रधाननियमाय नम. स्वाहा । ५०९ । ॐ स्वभ्यस्तपरमासनाय नमः स्वाहा । ५१० । ॐ ह्रीं प्राणायामचरणाय नमः स्वाहा । ५११। ॐ हीं सिद्ध- प्रत्याहाराय नमः स्वाहा । ५१२ । ॐ ह्रीं जितेन्द्रियाय नमः स्वाहा । ५१३ । ॐ ह्रीं वारणावीश्वराय नमः स्वाहा । ५१४ । ॐ ह्री धर्मव्याननिष्टाय नमः स्वाहा । ५१५ । ॐ ह्रीं समाधिराजे नम. स्वाहा । ५१६ । ॐ ह्रीं स्फुरत्समरसीभावाय नमः स्वाहा । ५१७ । ॐ ह्रीं एकिने नमः स्वाहा । ५१८। ॐ ह्रीं करणनायकाय नमः स्वाहा । ५१९ । ॐ ह्री निर्ग्रन्थनाथाय नमः स्वाहा । ५२० । ॐ ह्री योगीन्द्राय नम. म्वाहा । ५२१ । ॐ ह्रीं ऋषये नमः स्वाहा । ५२२ । ॐ ह्रीं साधये नमः स्वाहा । ५२३ ॐ ह्रीं यतये नमः स्वाहा । ५२४ । ॐ ह्रीं मुनये नमः स्वाहा । ५२५ । ॐ ह्रीं महर्पये नमः स्वाहा । ५२६ । ॐ ह्रीं साधुधौरेयाय नमः स्वाहा । ५२७ । ॐ ह्रीं यतिनाथाय नमः स्वाहा । ५२८ । ॐ ह्रीं मुनीश्वराय नमः स्वाहा । ५२९ । ॐ ह्रीं महामुनये नमः स्वाहा । ५३० । ॐ ह्रीं महामौनिने नमः स्वाहा '। ५३१ । ॐ ह्रीं महाध्यानिने नमः स्वाहा । ५३२ । ॐ ह्रीं महानतिने नमः स्वाहा । ५३३ । ॐ ह्रीं महाक्षमाय नमः स्वाहा । ५३४ । ॐ ह्रीं महाशीलाय नमः स्वाहा । ५३५। ॐ ह्रीं महाशान्ताय नमः स्वाहा । ५३६ । ॐ ह्रीं महादमाय नमः स्वाहा । ५३७ । ॐ ह्रीं निर्लेपाय नमः स्वाहा । ५३८ । ॐ ह्री --- १-हस्तलिखित कापीमें 'चणाय' ऐसा पाठ है।

बाद्ध बहाल संदुलविधान) - E- - १२२ पूर्ण निर्धमस्वान्ताय नमः स्वाहा । ५३९ । ॐ ह्रीं धर्माध्यक्षाय नमः स्वाहा । ५४० । ॐ ह्रीं ढया वजाय नमः स्वाहा । ५४१ । ॐ ह्रीं ब्रह्मयोनये नम स्वाहा । ५४२ । ॐ ह्रीं स्वयंवुद्धाय नम स्वाहा । ५४३ । ॐ ह्रीं ब्रह्मज्ञाय नमः स्वाहा । ५४४ । ॐ ह्रीं ब्रह्मतत्त्वविद नमः स्वाहा । ५४५। ॐ ह्रीं पूतात्मने नमः स्वाहा। ५४६ । ॐ ह्रीं स्नातकाय नमः स्वाहा । ५४७ । ॐ ह्रीं दान्ताय नमः स्वाहा । ५४८ । ॐ ह्रीं भद- न्ताय नमः स्वाहा । ५४९ । ॐ ह्रीं बीतमत्सराय नमः स्वाहा । ५५० । ॐ ह्रीं धर्मवृक्षायुधाय नमः स्वाहा । ५५१ । ॐ ह्रीं अक्षोभ्याय नमः स्वाहा । ५५२ । ॐ ह्रीं प्रपूतात्मने नमः स्वाहा । ५५३ । ॐ ह्री अमृतोद्भवाय नमः स्वाहा । ५५४ । ॐ ह्रीं मंत्रमूर्तये नमः स्वाहा । ५५५। ॐ ह्रीं स्वसौभ्यात्मने नमः स्वाहा । ५५६ । ॐ ह्रीं स्वतंत्राय नमः स्वाहा । ५५७ । ॐ ह्रीं ब्रह्मसंभवाय नम म्वाहा । ५५८ । ॐ ह्रीं सुप्रसन्नाय नमः स्वाहा । ५५९ । ॐ ह्रीं गुणाभोधये नमः स्वाहा । ५६० । ॐ ह्रीं पुण्यापुण्य- विरोधकाय नमः स्वाहा। ५६१ । ॐ ही सुसवृत्ताय नमः स्वाहा । ५६२ । ॐ हीं सुगुप्तात्मने नमः स्वाहा। ५६३ । ॐ ह्रीं सिद्धात्मने नमः म्वाहा । ५६४ । ॐ हीं निरुपाठवाय नमः स्वाहा। ५६५। ॐ हीं महोदर्काय नम स्वाहा । ५६६ ॐ ह्रीं महोपायाय नमः स्वाहा । ५६७ । ॐ ह्री जगदेकपितामहाथ नमः स्वाहा । ५६८ । ॐ ह्रीं महाकारुणिकाय नमः स्वाहा । ५६९ । ॐ ह्रीं गुण्याय नमः स्वाहा । ५७० । ॐ ह्रीं महालेगाकुशाय नमः स्वाहा । ५७१ । ॐ ह्रीं शुचये नमः स्वाहा । ५७२ । ॐ ह्रीं अरिंजयाय नमः स्वाहा । ५७३ । ॐ ह्रीं सदायोगाय नमः म्वाहा । ५७४ । ॐ ह्री सहाभोगाय नमः स्वाहा । ५७५। ॐ ह्रीं सदाधृतये नम. स्वाहा । ५७६ । ॐ ही परमोटासिने +MAN- --- THAN सिद्ध के मंडल विधान १२३ पू० नमः स्वाहा । ५७७ । ॐ ह्रीं अनायुषे नमः स्वाहा । ५७८ । ॐ ह्रीं सत्याशिषे नमः स्वाहा । ५७९ । ॐ ह्रीं शातनायकाय नमः स्वाहा । ५८० । ॐ ह्रीं अपूर्ववैद्याय नमः स्वाहा । ५८१ । ॐ ह्रीं योगज्ञाय नमः स्वाहा । ५८२ । ॐ ह्रीं धर्ममूर्तये नमः स्वाहा । ५८३ । ॐ हीं अधर्मदहे नमः स्वाहा । ५८४ । ॐ ह्रीं ब्रह्मेशे नमः स्वाहा । ५८५ | ॐ ह्रीं महाब्रह्मपतये नम. स्वाहा । ५८६ । ॐ ह्रीं कृतकृत्याय नमः स्वाहा । ५८७ । ॐ ह्रीं कृतकृतवे नमः स्वाहा । ५८८ । ॐ ह्रीं गुणाकराय नमः स्वाहा । ५८२। ॐ ह्रीं गुणोच्छेदिने नमः स्वाहा । ५९० । ॐ ह्रीं निर्निमेषाय नमः स्वाहा । ५९१ । ॐ ह्रीं निराश्रयाय नम. स्वाहा । ५९२ । ॐ ह्रीं सूरये नमः स्वाहा । ५९३ । ॐ ह्रीं सुनयतत्त्वज्ञाय नमः स्वाहा । ५९४ । ह्रीं महामैत्रीमयाय नम. स्वाहा । ५९५ । ॐ ह्रीं शमिने नमः स्वाहा । ५९६ । ॐ ह्रीं प्रक्षीणबन्धाय नमः स्वाहा । ५९७ । ॐ ह्रीं निर्द्वन्दाय नमः स्वाहा । ५९८ । ॐ ह्रीं परमर्पये नमः स्वाहा । ५९९ । ॐ ह्रीं अनन्तगाय नमः स्वाहा । ६०० । ॐ ह्रीं निर्वाणाय नमः स्वाहा । ६०१ । ॐ ह्रीं सागरीय नमः स्वाहा । ६०२ । ॐ ह्रीं महा- साधवे नमः स्वाहा । ६०३ । ॐ ह्रीं विमलामाय नम. स्वाहा । ६०४ । ॐ ह्रीं शुद्धाभाय नमः स्वाहा । ६०५। ॐ ह्रीं श्रीधराय नमः स्वाहा । ६०६ । ॐ ह्रीं दत्ताय नम: स्वाहा । ६०७ । ॐ ह्रीं अमला- १--सुखीभूतः, कामवाणरहितः, आयुधरहितः, निश्चितो वन एव निवासोपस्य स जिनकल्पित्वात्। २-सा- लक्ष्मी गरः विषसगी यस्य, सगरो घरणेन्द्रस्तेनोत्सगे घृत., सया लक्ष्म्योपलक्षितोऽगः-मेरुस्तराति गृह्णाति, सागा दरिद्रास्तान् राति । ३-विमला-कर्ममलरहिता आमा यस्य, वि-विशिष्टा मा-लक्ष्मीर्यत्र स एवंभूतो लामोयस्य, उपराग- र हिता आ समंतात् मा-दीप्तिर्यस्य स ।

--- सद्धा damadud . मह विशाल --- पू० १२१ माय नमः स्वाहा । ६०८ । ॐ ह्री उद्धराय नमः स्वाहा । ६०९ । ॐ ह्री अग्नेये नमः स्वाहा । ६१० । ॐ ह्रीं संयमाय नमः स्वाहा । ६११ । ॐ ही शिवाय नमः स्वाहा । ६१२ । ॐ हीं पुप्पाजलये नमः स्वाहा । ६१३ । ॐ ह्री शिवगणाय नमः स्वाहा । ६१४ । ॐ ह्री उत्साहाय नमः स्वाहा । ६१५ । ॐ ह्री ज्ञानसंज्ञकाय नमः स्वाहा। ६१६ । ॐ ह्री परमेश्वराय नम स्वाहा । ६१७ । ॐ ह्री विमलेशाय नमः स्वाहा । ६१८ । ॐ ह्रीं यशोधराय नमः स्वाहा । ६१९ । ॐ ही कृष्णार्य नमः स्वाहा । ६२० । ॐ ह्रीं ज्ञानमतये नमः स्वाहा । ६२१ । ॐ ह्री शुद्धमतये नमः स्वाहा । ६२२ । ॐ श्रीभद्राय नमः स्वाहा । ६२३ । ॐ ह्रीं शान्ताय नमः स्वाहा । ६२४ । ॐ ह्रीं वृषभाय नम म्वाहा । ६२५ । ॐ ह्रीं अजिताय नमः स्वाहा । ६२६ । ॐ हीं सभवॉय नमः स्वाहा । ६२७ । ॐ ह्री अभिनन्दनाय नम स्वाहा । ६२८ । ॐ ह्रीं सुमतये नमः स्वाहा । ६२०. । ॐ ह्रीं पद्मप्रभाय नमः म्वाहा । ६३० । ॐ ह्री सुपार्वाय नमः स्वाहा । ६३१ । ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभाय नम: म्वाहा। ६३२ । ॐ ह्रीं पुप्पटन्ताय नमः म्वाहा । १३३ । ॐ ही शीतलाय नम. स्वाहा । ६३४ । ॐ ह्रीं श्रेयसे नमः स्वाहा । ६३५। ॐ हीं वासु- पूर्याय नमः स्वाहा । ६३६ । ॐ ह्री विमलाय नमः म्याहा । ६३७ । ॐ ह्रीं अनन्तजिते नमः स्वाहा १-अविद्यमानः मलस्य-पापस्यामा-अगोपियस्य, अमा दीनास्तेषा लाभो यन्मात्, अमान्-निग्रयान् मनीनलाति-स्वीकुर्वन्ति तैर्गणघोयानि-गोभते । २~अगति-अव्वबजतीति अमिः। ३-पुष्पवत्-कमलवत् अजलि:- इन्द्रादीना करसपुटो य प्रति म, पुण्याणामजलय. यन्मिन्-द्वादशयोजनप्रमाणपुष्पवृष्टिः । ४-कपति-धानिकमाणि नलादुन्मूलयति । ५-म-समीचीनो भवो-जन्म यस्य, गमव इत्यापि पाटस्तत्र म-मुसभवति यस्मात् इति । ६-~~-यो- मत्र ॐ ह्रीं श्री वासुपूज्याय नमः इति मंत्रण सुण्ड पून्यः । । om -- -- T-I- 1 --- ---- 1 सुमंडलानिधान । --- . १२५ . पू० । ६३८ । ॐ ह्रीं वर्माय नमः स्वाहा । ६३९ । ॐ ह्रीं शातये नमः स्वाहा । ६४० । ॐ ह्रीं कुंर्थवे नमः स्वाहा । ६४१ । ॐ ह्रीं अराय नमः स्वाहा । ६४२ । ॐ ह्री मल्लये नम. स्वाहा । ६४३ । ॐ ह्रीं सुव्रताय नमः स्वाहा । ६४४ । ॐ ह्रीं नैमये नमः स्वाहा । ६४५ । ॐ ह्रीं नेमये नमः स्वाहा । ६४६ । ह्रीं पार्थाय नमः स्वाहा । ६४७ । ॐ ह्रीं बर्धमानाय नमः स्वाहा । ६४८ । ॐ ह्रीं महावीराय नमः स्वाहा । ६४९ । ॐ ह्रीं वीराय नमः स्वाहा । ६५० । ॐ ह्रीं सन्मतये नमः स्वाहा । ६५१ । ॐ ही महेंतिमहावीराय नमः स्वाहा । ६५२ । ॐ ह्रीं महापद्माय नमः स्वाहा । ६१३ । ॐ ह्रीं सूरदेवाय नमः स्वाहा । ६५४ । ॐ ह्रीं सुप्रभाय नमः स्वाहा । ६५५ । ॐ ह्रीं स्वयंप्रभाय नमः स्वाहा । ६५६ । ॐ ह्रीं सर्वायुवाय नम स्वाहा । ६५७ । ॐ ह्रीं जयदेवाय नमः स्वाहा । ६५८ ॥ ॐ ह्री उदयदेवाय नमः स्वाहा । ६५९ । ॐ ह्रीं प्रभादेवाय नमः स्वाहा । ६६० । ॐ ह्रीं उदंकाय नमः स्वाहा । ६६१ ॐ ह्रीं प्रश्नकीर्तये नमः स्वाहा । ६६२ । ह्रीं जयाय नमः स्वाहा । ६६३ । ॐ ह्री पूर्णबुद्धये नमः स्वाहा । ६६४ । ॐ ह्रीं नि.कषायाय नमः स्वाहा । ६६५। ॐ ह्रीं विमलप्रभाय नमः स्वाहा । ६६६ । ॐ ह्रीं वहँलाय नमः स्वाहा । ६६७ । ॐ ह्रीं निर्मलाय नमः स्वाहा । ६६८ । ॐ ह्रीं १-कुंथति-तपः करोतीति कुथु. । २ अरति-लोकालोक जानाति इयर्ति-त्रैलोक्यशिखरमारहतीति, अर्यते- मोक्षार्थिभिः प्राप्यते इतिवाअर । धर्मरथप्रवृत्तिहेतुत्वादरश्चक्रागभूतोवा । ३-मल्लते-भव्यजीवान् धारयति, मोक्षे स्थापयतीतिवा मल्लिः। देवेद्रादिभिर्मल्ल्यते-धार्यते इतिवा । ४-नम्यते देवेन्द्राभिरिति नमिः। ५-मस्य-मलस्य पापस्य वा हतिर्विध्वसनतत्र महावीर.-महासुभटः । ६-सूराणा देवः आराध्यः । शूरदेव इत्यपि पाठः । ७-यह-स्कन्ध- देशलाति-ददाति इतिवल:-सयममारोद्धरणे शक्तः। बहति-मोक्ष प्रापयति इतिवा।

-- सिद्ध Maratna Commendme महागान A पू ० १२५ चित्रगुप्ताय नमः स्वाहा । ६६९ । ॐ ह्रीं समाधिगुप्ताय नमः स्वाहा । ६७० । ॐ ह्रीं स्वयभुवे नमः स्वाहा 1६७१ । ॐ ह्रीं कन्दर्पाय नमः स्वाहा । ६७२ । ॐ ह्रीं जयनाथाय नमः स्वाहा । ६७३ । ॐ ह्रीं श्रीविमलाय नमः स्वाहा । ६७४ । ॐ ह्रीं दिव्यवादीय नम स्वाहा । ६७५ । ॐ ह्रीं अनन्तवीराय नम स्वाहा ।६७६। ॐ ह्रीं पुरुदेवाय नमः स्वाहा । ६७७ । ॐ ह्रीं सुविधये नमः स्वाहा । ६७८ । ॐ ह्रीं प्रज्ञापारमिताय नमः स्वाहा । ६७९ । ॐ ह्रीं अव्ययाय नमः स्वाहा । ६८० । ॐ ह्रीं पुराणपुरुषाय नमः स्वाहा । ६८१ । ॐ धर्मसारथये नमः स्वाहा । ६८२ । ॐ ह्रीं शिवकीर्तनाय नम स्वाहा । ६८३ । ॐ ह्रीं विश्वकर्मणे नमः स्वाहा । ६८४ । ॐ ह्रीं अक्षराय नमः स्वाहा । ६८५ । ॐ ह्रीं अच्छमने नमः स्वाहा । ६८६ । ॐ ह्रीं विश्वभुवे नम स्वाहा । ६८७ । ॐ ह्रीं विश्वनायकाय नम. स्वाहा । ६८८ । ॐ ह्रीं दिगम्बराय नमः स्वाहा । ६८९ । ॐ ह्रीं निरातकाय नमः स्वाहा । ६९० । ॐ ह्रीं निरारेकाय नम स्वाहा । ६११ । ॐ ह्रीं भवान्तकाय नमः स्वाहा । ६९२ । ॐ ह्रीं दृढव्रताय नमः स्वाहा । ६९३ । १-चित्रवत्-आकाशवत् गुप्तः-अलक्ष्यः । चित्राः-विचित्रा:-मुनीनामथाश्चर्यकारिण्योगुप्तयो यस्य सा । चित्रं-तिलकदान प्रतिष्ठावसरे गुप्त-गुरूपदेशप्राप्यं यस्य स, चित्रा आश्चर्यकरा गुप्तयः सवसरणेत्रिनः प्राकारा यत्य स इति वा । २-दिव्यः-अमानुपः वादो-वनिर्यस्य, दिव्या-देवानामपि वा-वेदना अति-खण्डयति, दिव्यं वा मंत्रंददाति- इति वा दिव्यवादः । ३-पुरुर्महान् देवानामग्याराध्यो देवः, पुरवः-प्रचुरा देवा यस्य-असख्यातदेवसेवितः, पुरो:- स्वर्गस्यदेवः इति वा । ४-धर्मस्याहिंसालक्षणस्य सारथिः-प्रवर्तकः, धर्माणा मध्ये सार:-उत्कृष्टस्तत्र तिष्ठति स्थाधातोः मकारलोपः कि प्रत्ययश्च । ५-विश्वं कृच्छ्र कष्टमेव कर्म यस्य मते, विश्वेसु-देवविशेषेसु कर्म-सेवा यत्य, विश्वस्मिन- कर्म-लोकजीवनकरी क्रिया यस्येति वा । ६-विश्वस्मिन्भवति-विश्वभूः । सत्ताया मगले वृत्ती निवासे व्याप्तिसंपदोः। अभिप्राये च गन्नौच प्रादुर्भावे गती च भूः SA- জ্ঞথ্রিম্বল म -- ૨૨૭ पू० ॐ ह्री नयोगाय नमः स्वाहा । ६९४ । ॐ ह्रीं निःकलंकाय नमः स्वाहा । ६०५ । ॐ ह्रीं अकलावराय नमः स्वाहा, । ६९६ । ॐ ह्रीं सर्वक्लेशापहाय नमः स्वाहा । ६९७ । ॐ ह्रीं अक्षय्याय नमः स्वाहाः । ६९८ । ॐ ह्रीं क्षान्ताय नमः स्वाहा । ७९९ । ॐ ह्रीं श्रीवृक्षलक्षणाय नमः स्वाहा । ७०० । ॐ ह्रीं ब्रह्मणे नमः स्वाहा । ७०१ । ॐ ह्रीं चतुर्मुखाय नमः स्वाहा । ७०२ । ॐ ह्री धात्रे नमः स्वाहा । ७०३ । ॐ ह्रीं विधात्रे नम स्वाहा । ७०४ । ॐ ह्रीं कमलासनाय नमः स्वाहा । ७०५। ॐ ह्री अब्जभुवे नमः स्वाहा । ७०६ । ॐ ह्रीं आत्मभुवे नमः स्वाहा । ७०७ । ॐ ह्रीं स्रष्ट्रे नम. स्वाहा । ७०८ । ॐ ह्रीं सुरज्येष्ठाय नमः स्वाहा । ७०९ । ॐ ह्रीं प्रजापतये नमः स्वाहा । ७१० । ॐ ह्रीं हिरण्यागर्भाय नमः स्वाहा । ७११ । ॐ ह्रीं वेदज्ञाय नमः स्वाहा । ७१२ । ॐ ह्रीं वेदागाय नमः स्वाहा । ७१३ । ॐ ह्रीं वेदपारगाय नमः स्वाहा । ७१४ । ॐ ह्रीं अजाय नमः स्वाहा । ७१५ । ॐ ह्रीं मनवे नमः स्वाहा । ७१६ । ॐ ह्रीं शतानन्दाय नमः स्वाहा । ७१७ । ॐ ह्रीं हंसयौनाय नमः स्वाहा । ७१८। ॐ ह्रीं त्रयीमयाय नमः स्वाहा । ७१९ । ॐ ह्रीं विष्णवे नमः स्वाहा | ७२० । ॐ ह्री त्रिविक्रमाय नमः १-न कला धारयति-केनापि य कलयितु न शक्यः। अक-दुःख लाति-ददाति अकल:-ससार त न परति अकल:-ससारो-अधरो नीचो यस्य, न कल-शरीरम् आ समतात् धरति, न कला-चन्द्रकला शिरसि धरति । २-अजै:- कमलैरुपलक्षिता भू-जन्म भूमिर्यस्य, मातुरुदरे योनिमायस्पृष्वा अष्टदलकमलकर्णिकाया नवमासान् स्थित्वा वृद्धिंगत इति अब्जभू , अन्जस्य,-चन्द्रस्य भूः-सेवास्थान, अञ्जस्य-धन्वन्तरे भूः स्थानमायुर्वेदगुरुत्वात् । ३-इसे-परमात्मनि यान-गमन यस्य, हसैः-श्रेष्ठैः सह यान-विहारो यस्य, इस:-श्रेष्ठं यानं यस्य, हंसः सूर्यस्तद्वत् यान विहारोयस्य, हंसवत्-मद गमन यस्य। - Mum..- -mope बाद Tee महलविशाना पूर्ण १२८ -- म्वाहा । ७२१ । ॐ ह्रीं सौरये नमः स्वाहा । ७२२ । ॐ ह्रीं श्रीपतये नम. म्वाहा । ७२३ | ॐ ही पुरुषोत्तमाय नमः स्वाहा । ७२४ । ॐ ह्रीं वैकुंठाय नमः स्वाहा । ७२५ । ॐ ह्री पुंडरीकाक्षाय नम स्वाहा । ७२६ । ॐ ह्रीं हृषीकेशाय नमः स्वाहा । ७२७ । ॐ ह्रीं हरये नमः स्वाहा । ७२८ । ॐ ह्रीं स्वभुवे नमः स्वाहा । ७२० । ॐ ह्रीं विश्वंभराय नमः स्वाहा । ७३० । ॐ ह्रीं असुरध्यसिने नमः स्वाहा ।७३१॥ ॐ ह्रीं माधवाय नमः स्वाहा । ७३२ । ॐ ह्री बलिवंधनाय नमः स्वाहा । ७३३ । ॐ ह्रीं अबोनजाय नमः स्वाहा । ७३४ । ॐ ह्री मधुपिणे नमः स्वाहा । ७३५ । ॐ ह्रीं केशवाय नमः स्वाहा । ७३६ । ॐ ह्रीं विटंरश्रवसे नमः स्वाहा । ७३७ । ॐ ही श्रीवत्सलाछनाय नमः स्वाहा । ७३८ । ॐ ह्री श्रीमते नमः स्वाहा । ७३९ । ॐ ह्रीं अच्युताय नमः स्वाहा । ७४० । ॐ ह्रीं नरकातकाय नम• स्वाहा । ७४१ । ॐ ह्रीं विश्वक्सेनाय नमः स्वाहा । ७४२ । ॐ ह्रीं चक्रपाणये नम स्वाहा । ७४३ । ॐ ह्रीं १- सूरस्य-सुभटस्य-वत्रियस्यापत्य सौरिः।२-विकुंठा-तीर्थकरमाता तस्याअसत्य, ३-पुडरिकवत् अक्षिणी यस्य, पुडरीकः-प्रधानभूत अक्ष आत्मा यस्य । ५- जितेन्द्रियः। ४-असुरोमोहस्त लमने, अमून्-प्राणान् राति- गृह्णाति असुरोयमस्तं बसते। ६-यस्य मते जीवस्य बले:-कर्मणः बधन भवतीति प्रतिपादितम् । नलिन -बलवत्तरत्य- त्रैलोक्यनोभकारिण तीर्थकरास्योगोत्रकर्मणश्च बंधन यस्य, बलिनुपदेयकरस्तस्य बंधन-निधारण यस्यावसरे । ७-- अक्षज जानमधोमस्य । ८-प्रशस्ताकेशा यस्य केशाहोऽन्यतरस्यामिति व प्रत्ययः, के-परमवहाणि इंगते महामुनयन्तेषा वो वासो यत्र । ९-विष्टर इव शृवसी-कर्णी यस्य, विस्तरे-सफलश्रुतजाने श्रवसी यस्य । १०--विश्यक-ममंतात् सेना-- द्वादशविन्यो गणो यस्य, विश्वममंतात् मा-लोकत्रयवर्णीनी ल मीस्तस्या इनः । ११-चक्र-लक्षगविशेष उपलक्षणत्वाद्रवी- न्द्रुकुलियादिनि लक्षणानि च पाणी यस्य, चक्रपाणि-चक्ररा राजानस्तेषामणि.सीमा, चक्रपान भणनि-धर्मापदेश कगेति। T -- ------ . -- . पू० पद्मनाभाय नमः स्वाहा । ७४४ । ॐ ह्री जनार्दनाय नमः स्वाहा । ७४५ । ॐ ह्रीं श्रीकंठाय नमः स्वाहा । ७४६ । ॐ ह्रीं शकराय नमः स्वाहा । ७४७ । ॐ ह्रीं शंभवे नमः स्वाहा । ७४८ । ॐ ह्रीं कपालिने नमः स्वाहा । ७४९ । ॐ ह्रीं वृषकेतनाय नमः स्वाहा । ७५० । ॐ ह्रीं मृत्युंजयाय नमः स्वाहा । ७५१ । ॐ ह्रीं विरूपाक्षाय नमः स्वाहा । ७५२ । ॐ ह्री वामदेवाय नमः स्वाहा । ७५३ । ह्रीं त्रिलोचनाय नमः स्वाहा । ७५४ । ॐ ह्री उमापतये नमः स्वाहा । ७५५ । ॐ ह्रीं पशुपतये नमः स्वाहा । ७५६ । ॐ ह्रीं स्मरारये नमः स्वाहा । ७५७ । ॐ ह्रीं त्रिपुरातकाय नमः स्वाहा । ७५. । - ट - - १-जनान्-जनपदलोकान् अर्दति-सबोधनार्थ गच्छति, जना-भव्या अर्दना मोक्षयाचका यस्य, जनान् अर्द- यति-मोक्ष गमयति । २-कम्-आत्मानं पालयति, क-ब्रह्मस्वरूपमात्मान पाति-रक्षन्ति ससारपतनादितिकपास्तानासमतात् लाति-भूषयतीति कपाली । ३-विरूप-सूक्ष्मस्वभावम्-अक्षि-केवलज्ञानलक्षणलोचनं यस्य " सक्थ्यटणीस्वागे" इत्यत् प्रत्ययः, विशिष्टरूपे-कर्णीतविश्राते अक्षिणी यस्य, विरूपः केवलनानगम्यः अक्ष,-आत्मा यस्य । विर्गरुड़स्तस्य रूप, ससार- विपनिषेधक एवंभूतोऽक्ष, आत्मा यस्य । ४-वामो-मनोहरो देवः, वामस्य-प्रतिकूलस्य-शत्रोरपिदेव आराध्यः, इत्यादि । ५-त्रयाणालोकत्रयवर्तिभव्याना नेत्रस्थानीयः, त्रिपुलोकेषुलोचने-जानदर्शनरूपे नेत्रे यस्य, जन्मारम्य मतिश्रुतावधिज्ञानानि- त्रीणिलोचनानि यस्य, त्रिषु-मनोवचनकायेषु त्रिकरणशुद्ध वा लोचन-केशोत्पाटो यस्य, इत्यादि । ६-उमा-कान्तिः कीर्तिश्च अथवा उ:-क्षीरसागरो मेरुर्वा तयोर्मा-लक्ष्मीः तस्या पतिः। ७-पदयन्तिकर्मबन्धनैरिति पशवः ससारिणो जीवा वा पशवस्तेषापतिः । ८-तिसणा-जन्मजरामरणरूपाणा पुरामन्तको-विनाशकः, परमौदारिकतैजसकामणगरीराणा- मन्तकः, त्रिपुरं-त्रैलोक्यं तस्याते क आत्मा यस्य । - - - H - --- हा উক্তি मुहकाशान DO--- पू० ॐ ह्रीं अर्धनारीश्वराय नमः स्वाहा । ७५९ । ॐ ही रुद्राय नमः स्वाहा । ७६० । ॐ ह्रीं भवाय नमः स्वाहा । ७६१ । ॐ ह्रीं भर्गाय नमः स्वाहा । ७६२ । ॐ ह्रीं सदाशिर्वाय नम. स्वाहा । ७६३ । ॐ ह्री जगत्कर्ने नमः स्वाहा । ७६४ । ॐ ह्रीं अंधकारांतये नमः स्वाहा । ७६५ । ॐ ह्रीं अनादिनिधनाय नमः स्वाहा । ७६६ । ॐ ह्रीं हराय नमः स्वाहा । ७६७ । ॐ ह्रीं महासेनाय नमः स्वाहा । ७६८ । ॐ ह्रीं तारकजिते नमः स्वाहा । ७६९ । ॐ ह्रीं गणनाथाय नम. स्वाहा । ७७० । ॐ हीं विनायकाय नमः स्वाहा । ७७१ । ॐ ह्रीं विरोचनाय नमः स्वाहा । ७७२ । ॐ ही वियद्रनाय नमः स्वाहा । ७७३। ॐ ह्रीं द्वादशान्मने नमः स्वाहा । ७७४ । ॐ ह्रीं विभावसत्रे नमः स्वाहा । ७७५ । ॐ ह्री द्विजाराध्याय mpan - AR -- १-अर्द्ध न अरयो घातिकर्माणि यस्य सचासौ ईश्वरः । २ कर्मणा रौद्रमूर्तित्वाद्रौद्रः, आत्मदर्शने सति रोदिति-आनदाश्रूणिमुचति स । ३-भृज्यंते कामक्रोधादयो येन, विभति-चारयति पोपयतीति वा भर्गः " स्वसूत्यागः इति औणादिकः गप्रत्ययः । ४-सदा-मर्वकालं शिव परमकल्याण यस्य, सदा-दिवा रात्री चारनंतिते सदाशिनः तेषा वः समुद्र.-संसारः पतनमितिवचन यस्य । ५-जगता कर्ता-मर्यादाकारकः, जगतः कंसुखमियतिजानाति। ६-अंधः- सम्यग्दर्शनरहितः कः स्वरूपं यस्य तत् मोहकर्म तस्यारानिः शत्रु.। ७----अनतभवोरार्जितानिपापानिजीवाना हरति, हं- हर्षमनन्तसुखं हारविशेवं राति-ददाति धारयति वा, हस्य-हिमायाः २:-निरोधक. । ८-महनी-द्वादशलक्षगा सेना यस्य, महस्य-पूजाया आसमंतात् सा-लक्ष्मीस्तस्या इनःस्वामी, मक्ष आस-आसनं तत्र इनः । ९-तारकान्-गणधरादीन् जितवान् , तारमत्युच्चैः शब्द कायति-ध्वनति स मेवोऽथवा सगर्जनः सागरः तान् निजेन ध्वनिना जितवान् । इत्यादि १०-विशिष्टाना गणधरादीना नायकः । विगतोनायको यस्य । ११--विशिष्ट रोचनसम्यस्त्वं यस्य, विशिष्टारोचना-- मुक्तिस्त्री यस्य, विगत गेचन ससारप्रीतिर्यस्य । १२-कर्मन्धनदहनत्यादमि., मोहाधकारविनाशितत्वसूर्यः, नैत्रामृतवर्षि- "त्वाद्विभावसुश्चन्द्रः, केवलज्ञानधन इत्यादि । - M मा ६५३ (सिद्ध व्य FAMOH महलविधान -~- 9 11 -- . नमः स्वाहा । ७७६ । ॐ ह्रीं बृहद्भानये नमः स्वाहा । ७७७ । ॐ ह्रीं चित्रमानवे नमः स्वाहा । ७७८। ॐ ह्रीं तनपाते नमः स्वाहा । ७७९ । ॐ ह्री द्विजराजाय नम स्वाहा । ७८० । ॐ ह्री सुवाशोचये नमः स्वाहा । ७८१ । ॐ ही औषधोशाय नमः ७८२ । ॐ ह्रीं कलानिधये नमः स्वाहा । ७८३ । ॐ ह्री नक्षत्रनाथाय नमः स्वाहा । ७८४ । ॐ ह्रीं शुभ्राशवे नमः स्वाहा । । ७८५ । ॐ ह्रीं सोमाय नमः स्वाहा । ७८६ । ॐ ह्रीं कुमुदबाधर्वाय नमः स्वाहा । ७८७ । ॐ लेखर्षभाय नमः स्वाहा । ७८८ । ॐ ह्रीं अनिलीय नमः स्वाहा । ७८९ । ॐ ह्रीं पुण्यजनाय नमः स्वाहा । ७९० । ॐ ह्रीं पुण्यजनेश्वराय नमः स्वाहा । ७९१ । ॐ ह्रीं धर्मराजाय नमः स्वाहा । ७९२ । ॐ ह्रीं भोगिरीजाय नमः स्वाहा । ७९३ । ॐ ह्रीं प्रचेतसे नमः स्वाहा । ७९४ । ॐ ह्रीं भूमिनन्दनाय मMA १-बृहत्-महत्तरोभानुः दिन पुण्यं यस्य, इत्यादि । २-आश्चर्यकारिणो मानवः-ज्ञानकिरणा यस्य । ३-त-काय न पातयति-छद्मस्थावस्थायामनुपवासात् केवलजाने जाते तु आहारमगृहीत्वापि न पातयति । ४-शारीरादिरोगनिवारण समर्थः । दुर्मरणहेतून् श्यति-इति वा । ५-सूतेऽमृतं-मोक्षमिति, सूयते मेरुमस्तकेऽभिषिच्यते इति वा सोमः, सा-लक्ष्मी सरस्वती च ताभ्यामुमा कीर्तिर्यस्य, उमया-कान्त्या सहवर्तमानः सोम इतिवा।६-भव्यकैर- वाणामुपकारकः, कुपु-तिसूषु पृथिवीषु मुदा होयेषा ते कुमुदाइन्द्रादयस्तेषामुपकारकः, कुत्सितकर्मणि मुत् हर्षोयेषाते- घामबाधवः । ७–लेखेसु-देवेषु ऋषभ. श्रेष्ठः ८-न विद्यते इला-भूमिर्यस्य त्यक्तराज्यः तनुवातवलये निराधार स्थायी। ९-पुण्या जनाः सेवका यस्य, पुण्यजनमयतीतिवा। १०-भोगिनामिन्द्राणाचक्रिणा वा राजा। ११-प्रकृष्टं सर्वेषा- दारियादिनाशनपरचेतो यस्य, प्रणष्टचेता-विकल्परहितो वा । १२-भूमी-लोकत्रयवर्तिजनान् नदयति । -- A - . मिस कहा G विमान ----- . पू० ८ नमः स्वाहा । ७९५ ॐ ह्रीं सिंहिकातनयाय नमः स्वाहा । ७९६ । ॐ ह्री छायानन्दनाय नमः स्वाहा । ७९७ । ॐ ह्री बृहतापतये नम स्वाहा । ७९८ । ॐ ह्री पूर्वदेवोपैटेप्टे नमम्वाहा । ७९९। ॐ ह्रीं द्विजराजसमुद्भवाय नमः स्वाहा । ८०० । ॐ ह्रीं बुद्धाय नमः स्वाहा । ८०१ ॐ ह्रीं दशवलाय नमः स्वाहा । ८०२ । ॐ ह्री शाक्याय नमः स्वाहा । ८०३ । ॐ ह्री पडभिज्ञाय नमः स्वाहा । ८०४ । ॐ ह्री तथागताय नमः स्वाहा ।८०५/ ह्रीं समन्तभद्राय नमः स्वाहा । ८०६ । ॐ ह्री मुगताय नमः स्वाहा । ८०७ । ॐ ह्रीं श्रीवनाय नमः स्वाहा । ८०८ । ॐ ह्रीं भूतकोटिदिशे नमः स्वाहा । ८०९ । ॐ ह्रीं सिद्वार्थाय नमः स्वाहा । ८१० । s- 1 RAMA १-सिंहिका-तीर्थकर-जननीस्तस्याम्तनय । सिंहिकातनयो गहुरिति वा-पापकर्मसु क्रूरचित्तत्वात् । २-छाया- शोभा नन्दयति-वर्धयति, अशोकतरुछायायालोकनन्दयति । ३-वृहता-नरेन्द्रसुरेन्द्रमुनीन्द्राणा पतिः । ४ - पूर्वदेवानाम्- असुराणामुपदेष्टा-सक्लेगनिषेधकः, पूर्वेश्चतुर्दशभिः-श्रुतार्थविशेषैरुपदेष्टा, पूर्व-प्रथमदेवानामिन्द्रियाणा मुपदेष्टा--तद्विपय- निवर्तकः, गणधराणामुपदेष्टा इतिया । ५-द्विजाना राजा च समुत्-सहयों भवोजन्म यस्य, द्विजेपुराजन्ते तानि मम्यग्दर्शनशानचारित्राणि तेभ्य. समुद्भयो यस्य-रत्नत्रययोनि:-अयोनिमभवः इत्यर्थः। ६-दशाना धर्माणामुत्तमक्षमादीना बलं यस्य, दः-दया बोधश्चतेन शवल:-समर्थः । ७-ठानोतीति भकः-तीर्थकरपिता तस्यापत्यम् , शम्-अनन्तसुग्वम् आकः केवलजानंतयोर्नियुक्तः । ८-पट्-द्रव्यसजान् अभितो जानाति । :-तथा-सत्यभूनं गतं-जान यस्य । १०-भूताना प्राणिना कोटीः दिशति, भूतानामतीतभवान्तराणा कोटीः दिशति, भूतान-जीवान् कोटयन्तिकुटिलान् कुर्वन्ति-मिथ्यात्वं कारयन्ति ते जैमिनिकपिलादयस्तान् दिशति, भूतकोटीना विश्रामस्थान, भूताना-जीयाना कोटिं- परमप्रकर्ष गुणातिशयं दिशति । भार --- . +AN ENA . . - A M माडल STRA - क- है १३३ पू० ॐ ह्रीं मारजिते नमः स्वाहा । ८११ । ॐ ह्रीं शास्त्रे नम. स्वाहा । ८१२ । ॐ ह्री क्षणिकैकसुलक्षणाय नम. स्वाहा ।८१३। ॐ ह्रीं बोधिसत्वाय नमः स्वाहा ।८१४। ॐ ह्रीं निर्विकल्पदर्शनाय नमः स्वाहा ।८१५॥ ॐ ह्रीं अद्वयवादिने नमः स्वाहा । ८१६ । ॐ ह्रीं महाकृपालवे नमः स्वाहा । ८१७ । ॐ ह्रीं नैरात्म्यवादिने नमः स्वाहा । ८१८ । ॐ ह्रीं संतानशासकाय नमः स्वाहा । ८१९ । ॐ ह्रीं सामन्य- लक्षणचणाय नमः स्वाहा । ८२० । ॐ ह्रीं पंचस्कन्धमयात्मदृशे नमः स्वाहा । ८२१ । ॐ ह्री भूतार्थ- भावनासिद्धाय नमः स्वाहा । ८२२ । ॐ ह्रीं चतुर्भूमिकशासनाय नमः स्वाहा । ८२३ । ॐ ही चतुरार्य सत्यवक्त्रे नमः स्वाहा । ८२४ । ॐ ह्रीं निराश्रयचिते नमः स्वाहा । ८२५। ॐ ह्री अन्वयाय नमः स्वाहा । ८२६ । ॐ ह्रीं योर्गीय नमः स्वाहा । ८२७ । ॐ ह्री वैशेपिकोय नमः स्वाहा । ८२८ । ॐ ह्रीं तुच्छाभावभिदे नमः स्वाहा । ८२९ । ॐ ह्री पट्पदार्थदृशे नमः स्वाहा । ८३० । ॐ ह्रीं नैयायिकाय नमः १-सर्वे पदार्था एकस्मिन् क्षणे उत्पादव्ययध्रौवालक्षणेनयुक्ताः क्षणिकाश्च इति मतं यस्य, क्षणिक एकमद्वितीय शोभन लक्षणं यस्येतिवा २-निर्विकल्प दर्शनं यस्य, निर्विकल्पानि दर्शनानि-अपरमतानि यस्य । ३-मोक्षप्राप्तये रागद्वेषयोद्धयन वदति, "बद्यमोक्षावितिद्वेषौ कर्मात्मानौ शुभाशुभौ, इति द्वैताश्रिताबुद्धिरसिद्धिरभिधीयते । ४-नीरस्य-जलस्य मावो नैर-तत्र उपलक्षणात्स्थावरेषु शक्तिरूपतया केवलज्ञानादिलक्षण आत्मास्ति-इति वदतीति ५-अनादि सतानवान् जीव इति शास्ति । ६-निश्चयनयेन सामान्यलक्षणेचणः-विचक्षणः । ७-अनु-पृष्ठतोलन, अयः पुण्य यस्य । ८-व्यानयोगात् मनोवाकाययोगाद्वा योगः, याः सूर्यचन्द्रादयः उ:-शकर एते य गच्छन्तिइतिवा । ९-विशेपेण-केवलज्ञानेन ( ऐन्द्रियजानस्यसामान्यात्मकत्वात् ) ससृष्टो भगवान् वैशेषिकः। १०-न्याये-स्याद्वादे नियुक्तः। -- ---- হু: jb लियान माइक्लाशाना esari पू० ३३ suh ८ स्वाहा । ८३१ । ॐ ह्री पोडशार्थवादिने नमः स्वाहा । ८३२ । ॐ ह्रीं पंचार्थवर्णकाय नमः स्वाहा । ८३३ । ॐ ह्रीं ज्ञानान्तराध्यक्षबोधाय नमः स्वाहा ।८३४॥ ॐ ह्री समवायवशार्थभिदे नमः स्वाहा ।८३५/ ॐ ह्री भुक्तकसाव्यकर्मान्ताय नमः स्वाहा । ८३६ । ॐ ह्री निर्विशेर्पगुणामृताय नमः स्वाहा । ८३७ । ॐ ह्री साख्याये नमः स्वाहा । ८३८ । ॐ ह्रीं समीक्ष्याय नम. म्वाहा । ८३९ । ॐ ह्री कपिलाय नमः स्वाहा । ८४० । ॐ ह्री पंचविंशतितत्वविवे नमः स्वाहा । ८४१। ॐ ह्रीं व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानिते नमः स्वाहा । ८४२ । ॐ ह्री ज्ञानचैतन्यभेददृशे नमः स्वाहा । ८४३ । ॐ ह्री अस्वसविदितज्ञानवादिने नमः - १- दर्शनविशुद्वयादीन् शोडपार्थान् यो वदति । २–कुदादिकः शुभ्रः नीलमण्यादिः कृष्ण' बन्धूकपुष्यादी रक्तः प्रियंगुपरिणतादिर्नीलः सतप्तकनकच पचमोऽर्य इति पंचायः समानो वर्णो यस्य, पचानामर्थानामस्तिकायाना वर्णक' प्रतिपादकः, पचाना नैयायिकादिमिथ्यादर्शनानामपिवर्णक. । ३-भुक्तेन-अनुभवनेन एकेन-अद्वितीयेन साव्यः कर्मणामन्तः स्वभावो यस्य । यद्वा अनादौ ससारे कर्मफलं मुजानो जीव कदाचित्सामग्रीविशेष प्राय कर्मणामन्त करोतीति मत यस्य । ४-तीर्थकराणामन्येपाचकेवलिना निर्विोपा गुणाएव अमृतं यस्य जरामरणादिनिवार- कत्वात् । ५-सख्यायानियुक्त' सारख्यः " स साख्यो यः प्रसंख्यावान् " इति निमक्तिः सख्याते प्रथमोमध्यमोऽन्त्यो भगवानेव । ६-सम्यक्-ईक्षितु योग्यः, समिनामीश्य इति वा । ७-कपिरिव कपि--मनोमर्कटस्तलाति-कपायेगच्छन्त निश्चलीकरोति यः, क-परमब्रहास्वरूपमपिलाति गृह्णाति इति वा अपरलोप• ८-अहिसादिमहाव्रते प्रत्येकस्यपचरइति मिलितः पंचविशतिभावना', त्रयोदशक्रिया (पडावश्यकानि पंच नमस्कारा निसही असहीचेति ) द्वादश तपासि इतिवा, तासा पचविंशतिक्रियाणा वा य. तत्व वेति । ९-व्यक्ता. ससारिणः अव्यक्ताः केवलजानगम्याः जा जीवातेपा विशिष्ट जान यस्य । १०-चेतना त्रिविवा-जानकर्मकर्मफलभेदात्, तत्र ज्ञानस्य चैतन्यस्वच यः मेद पश्यति, उभयत्र सामान्यविशेपा- दिकृतं मेदं यः पश्यतीत्यादि वा । ११-न स्वो विदितो येन (निर्विकल्पसमाधिदगापन्नेनजानेन) एवंभूत जान यः वदति । HTT nis -- - क- ------- gon मंडल विमान " . पू० ८ T स्वाहा । ८४४ । सत्कार्यवादसात् नमः स्वाहा । ८४५ । ॐ ८४५ । ॐ ह्री त्रिप्रमाणाय नमः स्वाहा । ८४६ । ॐ ह्री अध्यक्षप्रमाणाय नमः स्वाहा । ८४७ । ॐ ह्री स्याहाहंकारिका- क्षदिशै नमः स्वाहा । ८४८। ॐ ह्रीं क्षेत्रज्ञाय नमः स्वाहा । ८४९ । ॐ ह्रीं आत्मने नमः स्वाहा । ८५० । ॐ ह्री पुरुपाय नमः स्वाहा । ८५१ । ॐ ह्री नरॊय नमः स्वाहा । ८५२ । ॐ ह्री "ब्रे नमः स्वाहा । ८५३ ॐ ह्रीं चेतनाय नमः स्वाहा । ८५४ । ॐ हीं पुसे नमः स्वाहा । ८५५ । ॐ ह्री अकर्ने नमः स्वाहा । ८५६ । ॐ ह्री निर्गुणाय नमः स्वाहा । ८५७ । ॐ ह्री अमूर्ताय नमः स्वाहा । ८५८ । ह्रीं भोक्रे नम. स्वाहा । ८५९ । ॐ ह्रीं सर्वगताय नम. स्वाहा । ८६० । ॐ ह्री प्रक्रियाय नमः स्वाहा । ८६१ । ॐ ह्री द्रष्टे नमः स्वाहा । ८६२ । ॐ ह्री तटस्थाय नमः स्वाहा । ८६३ । ॐ कूटस्थाय नमः स्वाहा । ८६४ । ॐ ह्री ज्ञात्रे नमः स्वाहा । ८६५। ॐ ह्रीं निर्बवनाय नमः स्वाहा । ८६६ । ॐ ह्री अभवाय नमः स्वाहा । ८६७ । ॐ ह्री बहिर्विकाराय नमः स्वाहा । ८६८। ॐ ह्रीं निर्मोक्षाय नमः स्वाहा । ८६९ । ॐ ह्री प्रधानाय नमः स्वाहा । ८७० । ॐ ही बहुधानकाय नम. स्वाहा १----सत् समीचीन कार्य-सवरादि लक्षण तस्य वादः शास्त्र यस्य । असत्कार्यवाद' सन् सत्कार्यवादोभवतीति सत्कार्यवादसात् भगवान् । सात् प्रत्ययान्तत्वेनाव्यपत्वम् । २-स्याद्वाहकारिकमक्षमात्मान य दिशति । ( स्याच्छन्दपूर्व- कमहमहमित्याकारणान्तर्मुखजानेन वेद्य अक्ष या दिशति । ) ३-पुरुणि-महति--इन्द्रादिपूजिते पदे शेते । ४-नृणाति- नयकरोति, न राति-न किमपि गृह्णाति प्रतिहार्येष्वपि निरतत्वात्, न रा-रमणीया यस्येतिवा। ५- नयति-समर्थतया भव्य जीव मोक्षमिति ना । ६-निश्चितोमोक्षोयस्य-स्तद्भव एव मोक्ष्यमाणः । ७-बहु-प्रचुरनिर्जरोपलक्षित धानक शुक्लध्यानम् तद्योगात् भगवानपि तथोच्यते, बहुधा-बहुप्रकारा आनकाः पटहा यन समवसरणे, तद्योगाद्भगवानपि तथा, इत्यादि । का Hal S Anem- AWAN . rim पदक विमान - " १३६ 1 स्वाहा ra । ८७१ । ॐ ह्री प्रकृतये नमः स्वाहा ।८७२। ॐ ही त्यातये नमः स्वाहा ।८७३। ॐ हीं प्रारूढप्रकृतये नमः स्वाहा । ८७४ । ॐ ह्री प्रकृतिप्रियाय नमः स्वाहा । ८७५ | ॐ ही प्रवानभोज्याय नम स्वाहा । ८७६ । ॐ ही अप्रकृतये नमः स्वाहा । ८७७। 30 ही विम्याय नमः स्वाहा । ८७८ ! ॐ ही विकृतये नम स्वाहा । ८७९ । ॐ ही कृतिने नमः स्वाहा । ८८० । ॐ हीं मीमासंकाय नम । ८८१ । ॐ ह्रीं अस्तसर्वज्ञाय नमः स्वाहा । ८८२ । सही श्रुतिपूताय नमः स्वाहा । ८८३ | ॐ ह्रीं सदोत्सवाय नमः स्वाहा । ८८४ | ॐ ह्रीं परोक्षज्ञानवादिने नमः स्वाहा । ८८५। ॐ ही दष्टपावकार नमः स्वाहा । ८८६ | ॐ ही सिकर्मकाय नमः स्वाहा । ८८७ । ॐ दी चार्वाकाय नम स्वाहा १-प्रकृष्टा-त्रैलोकालोकहितकारिणो कृति. नीर्थप्रवर्तन यस्येशादि। ----स्थान-प्रकृष्ट कान-यथावत्त-च- स्वरूपनिरूपण ख्याति , आविष्टलिंगमिद नाम । ३ -आ-ममतात् कदा-विभवन प्रसिदा प्रकृति -तीर्थकरनामार्म वन्य। ४-प्रकृत्या-स्वभावेन प्रिय., प्रकृतीना-सर्वलोकाना प्रिय ,-निजगदलभ. । ५-प्रतट धानसाचितन भोज्यमास्त्रा यस्य । ६-दुष्टाना त्रिपष्ठिप्रकृतीनाक्षयात् अघातिप्रकृतीना च मच्चे समर्थचात् सनपा प्रभुत्वाहा भगरानप्रकृति । ७-विशेषेण रम्यः । ८-विशिष्टा कृतियत्य, विनष्टा कृति. कर्म यन्गेति वा कामय इसय. । ९---समयपरसमय- तत्वानि मीभासते इति मीमामक (पद्व्याणि पंचास्तिकाया. ममतत्वानि नवादायां प्रतिस्थनमयतत्वानि, नैयायिकमते प्रमाणप्रमेयादिपोडशतत्वानि-योद्धमते चत्वार्यिसन्यनामानितत्त्वानि-काणादे-द्रव्यगुणादिषट् तत्त्वानि-अभिनीये नोदना- लक्षणो धर्मस्तत्त्व, साख्ये प्रकृयादिपंचविंगनिनत्यानि-नास्तिके चत्वारि भतानि)। १०-सानते गा -सर्वगाः सर्व- विद्वान्सः । अस्ता.-प्रत्युक्ताः सर्वशा:--मर्वविद्वान्स:-कपिलकणनगदयो येन । १२-इन्द्रियाणा पर पंगेन कालगान वदतीति । १२-इटा:-अभीष्टाः पावका--पवित्रताकारका. गणवरादयो देवा यस्य, अथरा भगाने?. मन् पावरु.। १३-सिद्ध-समातिं गतं कम-क्रिया-चारित्र यस्य । १४-नाम-मलापहर:-मभव्य चितानद कारको वा आक.- केवलनान यस्य (अकनमाक. -वादिगणे गत्यर्थकादम् धातो.)। P --- का " EMA . . पू० । ८८८ ॥ ॐ ह्रीं भौतिकज्ञानाय नमः स्वाहा । ८८९ । ॐ ही भूताभिव्यक्तचेतनाय नमः स्वाहा । ८९० । ॐ ह्रीं प्रत्यक्षकप्रमाणाय नम. स्वाहा ।८९१॥ ॐ ह्रीं अस्तपरलोकाय नमः स्वाहा ।८९२। ॐ ह्रीं गुरुश्रुतये नमः स्वाहा । ८९३ । ॐ ह्रीं पुरंदरविद्धकर्णाय नमः स्वाहा ।८९४। ॐ ह्रीं वेदान्तिने नम. स्वाहा ।८९५॥ ॐ ह्रीं सविदद्वायने नम. स्वाहा ।८९६। ॐ ह्रीं शब्दोद्वतिने नमः स्वाहा ।८९७। ॐ ह्रीं स्फोर्टेवादिने नमः स्वाहा । ८९८ । ॐ ह्रीं पाषंडनाय नमः स्वाहा । ८९९ । ॐ ह्रीं नयौघयुजे नमः स्वाहा । ९०० । ॐ ह्री अन्तकृते नमः स्वाहा । ९०१ । ॐ ह्रीं पारकृते नमः स्वाहा । ९०२ । ॐ ह्रीं तीर- प्राप्ताय नमः स्वाहा । ९०३ । ॐ ह्रीं पारेतमःस्थिताय नमः स्वाहा । ९०४। ॐ ह्रीं त्रिदंडिने नमः स्वाहा । ९०५ । ॐ ह्रीं दडितारातये नमः स्वाहा । ९०६ । ॐ ह्रीं ज्ञानकर्मसमुञ्चयिने नमः स्वाहा । ९०७ । ॐ ह्रीं संहृतध्वनये नमः स्वाहा । ९०८ । ॐ ह्रीं उत्सन्नयोगाय नमः स्वाहा । ९०९ । ॐ ह्री सुप्तार्णवोप- माय नमः स्वाहा । ९१० । ॐ ह्रीं योगस्तेहापहाय नमः स्वाहा । ९११ । ॐ ह्रीं योगकिट्टिनिर्लेपनोद्यताय नमः स्वाहा । ९१२ । ॐ ह्रीं स्थितस्थूलवपुर्योगाय नमः स्वाहा । ९१३ । ॐ ह्रीं गीर्मनोयोगकार्यकाय १-भौतिक समवसरणादिविभूतियुक्त ज्ञान यस्य । २-भूतेषु अभिव्यक्ता प्रकटीकृताचेतना येन । ३-सर्वमपि पुद्गलद्रव्य शब्द एवेति यो वदति । शक्तिरूपतयागन्दहेतुत्वात्तस्य । ४-स्फुटति-प्रकटीभवति केवलजान यस्मादिति शुद्धबुद्धकस्वभावतयात्मानमेव यो मोक्षहेतुतया वदति । ५-त्रीणि शल्याति ( योगत्रय वा ) दण्डयति । ६-ज्ञानस्य यथाख्यातचारित्रत्य च समुच्चयो विद्यते यस्य । ७-सुप्तः-कल्लोलरहितः सचासौ अर्णवः-समुद्रस्तस्योपमा यस्य मनोवाकायव्यापाररहित्वात् । -- --- ----run. . -- - 4 ---Amar म -PM-MAR •rmed मिना ना A -- । । . ---- . wen- A . 7 N . - Ande । नमः स्वाहा । ९१४ । ॐ ह्रीं मृक्ष्मवाकचित्तयोगस्थाय नमः स्वाहा । १.१५ । ॐ ह्रीं सूक्ष्मीकृतयपुःक्रियाय नमः स्वाहा । ९१६ । ॐ ही मूमकायक्रियास्थायिने नमः स्वाहा । ९१७ । ॐ ह्रीं मूक्ष्मवाञ्चित्तयोगन्ने नमः म्वाहा । ९१८ । ॐ ही ऐकदाडिने नमः स्वाहा । ९१९ । ॐ ह्रीं परमहंसाय नमः स्वाहा । ९२० । ॐ ही परमसंबराय नमः स्वाहा । १२१ । ॐ ह्री नैष्क सिद्धाय नमः म्याहा । ९२२। ॐ ह्रीं परम- निर्जराय नमः स्वाहा । १.२३ । ॐ ही प्रज्वलत्प्रभाय नमः स्वाहा । १२४ । ॐ हीं मोधकर्मणे नमः म्वाहा । ९२५ । ॐ ही त्रुटत्कर्मपाशाय नमः स्वाहा । ९२६ । ॐ ही शैलेझ्यलंकृताय नमः स्वाहा ।९२७। ॐ हीं एकाकाररमास्त्रादाय नमः स्वाहा । ९२८ । ॐ ह्रीं विश्वाकाररसाकुलाय नमः स्वाहा । २२९ । ॐ ही जीवते नमः म्वाहा । ९३० । ॐ ह्रीं अमृताय नमः म्वाहा । ९३१ । ॐ ह्री अजानते नमः म्वाहा । १३२ । ॐ ही असुप्ताय नमः स्वाहा । ९३३ । ॐ ही शून्यतामयाय नम. म्वाहा । ९३४ । * ही प्रेयसे नम स्वाहा । १३५ । ॐ ह्रीं अयोगिने नमः स्वाहा । ९३६ । ॐ ह्रीं चतुरशीतिलनगुणाय नमः स्वाहा । ९३७ । ॐ ह्रीं अगुणाय नमः म्वाहा नमः स्वाहा । १३८ । ॐ हीं नि.पीतानन्तपर्याय नमः म्वाहा । ९३९ । ॐ ह्रीं अविद्यासस्कोरनाशकाय नम. म्वाहा । ९४० । १-एक अमहाय. दण्ड:--मूल्मकाययोगो यस्य । २- मोघानि-फलदानासमर्थानि कर्माणि-अमद्वेद्यादीनि अन्य । ३. जीवनाधार प्राणवायुरहितत्वात् । ४-न जागर्ति-योगनिद्रास्थितत्वात् । ५----आत्मम्मम्पेमावधानत्वात् यो नमोहनिद्रा प्रास. । ६-अतिगयन प्रियः । ७-न विद्यन्ते गुणा:-विभावपरिणतिरूपारागादयो यस्य । ८-नि पीताः केवलगाने प्रवेशिता अनन्तपर्याया येन। ९-अनिता अजानं तस्य सन्कारः अनुभवन तस्य नाशकः । (अविद्यानाशकाः नम्भाग अपि टीकायामश्चत्वारिंभदिवाया)। aM 5. - 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------ ( শঙ্খ विधान । ग , । पू० ॐ ह्रीं बृद्धाय नमः स्वाहा । ९४१ । ॐ ह्रीं निर्वचनीयाय नमः स्वाहा । ९४२। ॐ ह्रीं अणवे नमः स्वाहा । ९४३ । ॐ ह्रीं अणीयसे नमः स्वाहा । ९४४ । ॐ ह्रीं अनणुप्रियाय नमः स्वाहा । ९४५। ॐ ह्रीं प्रेष्ठाय नमः स्वाहा । ९४६ । ॐ ह्रीं स्थेयसे नमः स्वाहा । ९४७ । ॐ ह्रीं स्थिराय नमः स्वाहा । ९४८ । ॐ ह्रीं निष्ठाय नमः स्वाहा । ९४९ । ॐ ह्रीं श्रेष्ठाय नमः स्वाहा । ९५० । ॐ ह्रीं ज्येष्टाय नमः स्वाहा । ९५१ । ॐ ह्रीं सुनिष्ठिताय नमः स्वाहा । ९५२ ॐ ह्रीं भूतार्थशूराय नमः स्वाहा । ९५३ । ॐ ह्रीं भूतार्थदूराय नमः स्वाहा । ९५४ : ॐ ह्रीं परमनिर्गुणाय नमः स्वाहा । ९५५ । ॐ ह्रीं व्यवहार- सुषुप्ताय नमः स्वाहा । ९५६ । ॐ ह्रीं अतिजागरूकाय नमः स्वाहा । ९५७ । ॐ ह्रीं अतिसुस्थिताय नमः म्वाहा । ९५८ । ॐ ह्रीं उदितोदितमाहात्म्याय नमः स्वाहा । ९५९ । ॐ ह्रीं निरुपाधये नमः स्वाहा । । ९६० । ॐ ह्रीं अकृत्रिमाय नमः स्वाहा । ९६१ । ॐ ह्रीं अमेयमहिम्ने नम स्वाहा । ९६२। ॐ ह्री अत्यन्तशुद्धाय नमः स्वाहा । ९६३ । ॐ ह्री सिद्भिस्वयवराय नमः स्वाहा । ९६४ । ॐ ह्रीं सिद्धानुजाय १-केवलजानापेक्षया लोकालोक व्या'य व्यानोति स्म, समुद्धातापेक्षया लोकप्रमाण यो बर्द्धते स। २-- निर्वक्त-निरुक्तिमानेतु गक्यः, निर्गतंवचनीयमपकीर्तिर्यस्येति वा । ३-अणति-शब्द करोति इति अणुः, अणुसहश- स्वाद् वा अणु. -अविभागित्व परमसूक्ष्मत्वाद्योगिनामप्यगम्यत्व सादृश्यम् । ४-अनणवो महान्तः इन्द्रादयस्तेपा प्रियोs भीष्टः । अथवा न अणुः-पुद्गलकर्माणुः प्रियो यस्य परमनिर्जरकत्वात् । ५-अतिशयेन प्रियः-प्रेष्ठः ६-अतिशयेन स्थिरः स्थेयान् । ७-नि-नितरामतिशयेन वा तिष्ठति । ८-भूता-अतीता ये अर्था.-पचेन्द्रियविषयास्तेभ्योदूरः। ९-निर्गताः गुणा रागद्वेषादयोऽशुद्धपरिणामा यस्मात् , परमश्चासौ निर्गुणश्चेति परा उत्कृष्टा मा लक्ष्मी यस्य-निश्चिता निर्धारिता वा गुणाः केवलजानादयो यस्य-परमश्वासौ निर्गुणश्चेति ।

Amaranwermwakarma arRamayawamarindave How - 4NORAM- सिद्ध माइलोचना २१ नमः AV नमः स्वाहा । १६५ । ॐ ह्री सिद्धपुरीपाथाय नमः स्वाहा । ९६६ । ॐ ह्री सिद्धगणातिथये नमः स्वाहा । ९६७ । ॐ ह्री सिद्धसंगोन्मुखाय नमः स्वाहा । ९६८ । ॐ ह्रीं सिद्धालिंग्याय नमः स्वाहा । ९६९ । ॐ ह्रीं सिद्धोपगृहकाय नमः स्वाहा । ९७० । ॐ ह्री पुष्टाय नमः स्वाहा । ९७१ । ॐ ह्री अष्टादशसहस्रशालाश्वाय नमः स्वाहा । ९७२ । ॐ ह्रीं पुण्यसंवलाय नमः स्वाहा । ९७३ । ॐ ह्रीं व्रतान- युग्याय नमः स्वाहा । ९७४ । ॐ ह्रीं परमशुक्ललेश्याय नमः स्वाहा । ९७५। ॐ ह्रीं अपचारकृते नम. स्वाहा । ९७६ । ॐ ह्रीं क्षेपिष्ठाय नम. स्वाहा । ९७७ । ॐ ह्रीं अन्त्यक्षणसखाय नमः स्वाहा । ९७८ । ॐ ह्रीं पंचलवक्षरस्थितये नमः स्वाहा । ९७९ । ॐ ह्रीं द्विसप्ततिप्रकृत्यासिने म्वाहा । ९८० । ॐ ह्रीं त्रयोदशकलिप्रणुते नमः स्वाहा । ९८१ । ॐ ह्री 'अवेदाय नमः स्वाहा । ९८२ । ॐ ह्रीं अयाजकाय नमः स्वाहा । ९८३ । ॐ ह्रीं अयज्याय नमः स्वाहा । ९८४ । ॐ हीं अयाज्याय नमः स्वाहा । ९८५। ॐ ही अनग्निपरिहाय नम. स्वाहा ।९८६ । १-अनुवते-क्षणेन स्वामिनमभीष्टस्थान नयन्तीति अवाः अष्टादशसहस्त्रशीलान्येव अश्वा यस्य । २-गुण्य सटे यादि एव सवलप यदन यस्य । ३-वृत्तं चारित्रमग्र मुख्य युग्यं वाहन यस्य । ४-अपचरणमपचारो मारण यः कर्मशत्रूणा मारणाध्यानमत्रविषप्रयोगेण मारणमकरोत् । ५-अतिगयेन विप्रः-शीघ्रतर. क्षणमात्रेण त्रैलोक्य शिवरगामित्वात् । ६--अन्त्यक्षण.--मसारत्यपश्चिमः ममयस्तस्य सखा-सहगामुकः अन्त्यक्षणः सखा-मित्र यस्य । 3- यानकः-यो निजा पूजा न कारयति । ८-याटु अस्यो यज्यः न यज्यः अयज्य:-अलक्ष्यरूपत्वात्स्वामिनः । २-३च्यते इति याज्य. न याज्यः अयाज्यः । शक्याथै विना सामान्ये ध्यण् । हेतुस्तु अलभ्यरूपत्वमेव । १०-कर्मस- मिधा भस्मीनरणे न अमे परिग्रहो यस्य, अग्मिदच परिग्रहइच (स्त्रीच) इति अमिपरिग्रही न अग्नि परिग्रहौ यस्य । अन्यपी- सामने भाऊयाइच परिग्रहो भवति । भगवालुन तथा केवल व्यानाग्निनिर्दग्धकर्मेन्धनत्वात्तस्य । ma M (२ . New १ L S पya & - AM বিশ্ব 2 . " . स . U १४२ - । ॐ ह्री अनग्निहोत्रिो नमः स्वाहा । ९८७ । ॐ ह्रीं परमनिःस्पृहाय नमः स्वाहा । ९८८ । ॐ ह्रीं अत्य- न्तनिईयाय नमः स्वाहा । ९८९ । ॐ ह्रीं अशिष्याय नमः स्वाहा ९९० । ॐ ह्री अशासकाय नमः स्वाहा । ९९१ । ॐ ह्रीं अदीक्ष्याय नमः स्वाहा । ९९२ । ॐ ह्रीं अदीक्षकाय नमः स्वाहा । ९९३ । ॐ ह्रीं अदीक्षिताय नमः स्वाहा । ९०४ । ॐ ह्री अक्षमाय नमः स्वाहा । ९९५ । ॐ ह्री अगम्याय नमः स्वाहा । ९९६ । ॐ ह्रीं अगमकाय नमः स्वाहा । ९९७ | ॐ ह्रीं अरम्याय नमः स्वाहा । ९१८ । ॐ ह्रीं अरम- काय नमः स्वाहा । ९९९ । ॐ ह्रीं ज्ञाननिर्भगय नमः स्वाहा । १०००। ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्धाय नमः स्वाहा । १००१। ॐ ह्रीं आभीक्ष्णज्ञानोपयोगाय नमः स्वाहा । १००२ । ॐ ह्रीं व्यावृत्तिरूपाय नमः स्वाहा । १००३ । ॐ ह्रीं साधुसमाधये नमः स्वाहा । १००४ । ॐ ह्रीं सन्मार्गप्रभावकाय नमः स्वाहा । १००५। ॐ ही उत्तमतमारूपाय नमः स्वाहा । १००६ । ॐ ही मार्दवाय नमः स्वाहा । १००७ । ॐ ह्री आर्जवाय नमः स्वाहा । १००८ । ॐ ह्री शुचिस्वरूपाय नमः स्वाहा । १००९ । ॐ ह्रीं सत्याय नमः स्वाहा । १०१० । ॐ ह्रीं संयमाय नम स्वाहा । १७११। ॐ ह्री तपाय नमः स्वाहा । १०१२ । ॐ ह्रीं त्यागाय नमः स्वाहा । १०१३ । ॐ ह्री आकिञ्चन्याय १-परमकारुणिकत्वाद्भागवतः कथ निर्दयत्वमितिचेत् परिहियते-अतिगतो-विनष्टोऽन्तो विनायो यस्ये. त्यत्यन्तः-निश्चिता दया (सगुणनिर्गुण प्राणिवर्गरक्षणलक्षणा करुणा) यस्येति निर्दय'-अत्यन्तहचासौ निर्दयश्चेत्य त्यन्तनिर्दयः । अथवा अति-अतिशयेन अन्ते-अन्तके यमे निर्दयः । यद्वा अतिशयेन अन्त विनाश प्राप्ता निर्दया यस्मात् । अथवा-अतिगयेन अन्ते मोक्षगमने निश्चिता दया यस्य । २-दर्शनविशुव्यादिसमन्तभद्रान्तानि पोडगनामानि पूजापाठे उपरिष्टात् संग्रहीतानि। -- And Pramin P-1 H N -torrentiamromerannon- M --- का शिव का -e --- WAT 30m . . 1 ११४२ F Mw RAN - नमः माना । १०२४ । ३० ही नामचर्याय नमः स्वाहा । १०१५ | ॐ हीं समन्तभदाय नमः स्वाहा 1 १७१६13 महायोगीशराय नमः स्वाहा । १०१७ । ॐ ही द्रव्यसिजाय नम. स्वाहा १०१८ । सनी देहाय नमः स्वाहा । १०१९ । ॐ ही अपुनर्भवाय नमः स्वाहा । १०२० । ही ज्ञानेक- लिने नमः माहा । १.०२१ । ही जीवननाय नमः स्वाहा । १०२२ । ॐ ही सिद्वाय नमः स्वाहा । १०२३ । ३० ही तोकाग्रगामुकाय नमः स्वाहा । १०२४ । M woman . PARA Merry . परिमलविमलाढयैरिन्दुकाश्मीरमि- निखिलमिलितद्रव्यश्चन्दनाणपैयैः । शिवसदननिविष्टं नायनन्तं प्रमुक्तम् , दशशतजिनचारं चर्चये सिद्धचक्रम् ॥ २॥ चन्दनम् ।। मुरभितहरितानिस्तुपैःशालिजातः, रजतसदृशवणरक्षतरक्षताः। शिवसदननिविष्टं नायनन्तं ममुक्तम् , दशशतजिनचारं चर्चये सिद्धचक्रम् ।। ३ ।। अक्षतान् ।। सरसिजकुसुमोद्यः शिञ्जयत्पट्पदोघैः, वरवकुलमुपुप्पैः वाल्लभूजातजातैः। २ CY घ . r . m (८ r 1 -- L (हिया मंडल विधान ग . - १४३ पू० ८ - ल शिवसदननिविष्टं नाद्यनन्तं प्रमुक्तम्, दशशतजिनचारं चर्चये सिद्धचक्रम् ॥ ४॥ पुष्पाणि ॥ रजतगिरिनिकामैः शारदाब्जापमानः, चरुभिरमृतमित्रैर्वाष्पपूरैरुदारैः। शिवसदननिविष्टं नाद्यनन्तं प्रमुक्तम् , दशशतजिनचारं चर्चये सिद्धचक्रम् ।। ५ ।। नैवेद्यम् ।। रविभिरिवसुदीप्तैः स्वर्णकान्तः प्रदीपैः, रविकुकुभविलोपि त्रासितं यैस्तमौषम् । शिवसदननिविष्टं नाघनन्तं प्रमुक्तम् , दशशतजिनचारं चर्चये चिद्धचक्रम् ॥ ६॥ दीपम् ॥ सुरभिरचितगंधै व्योमनीव्याप्तधूपैः मिलितसुरभिद्रव्यैर्नासिकामीणयद्भिः । शिवसदननिविष्टं नाद्यनन्तं प्रमुक्तम् , दशशतजिनचारं चचेंये सिद्धचक्रम् ॥ ७॥ धूपम् ।। -- SAY --- --- --

गचिरकनकवणीचमाः फलाय,
रभिनवफलपनी जितं मोदयद्भिः।
शिवसदननिविष्टं नागनन्तं प्रमुक्तम् ।
दशशतजिनचारं चर्चये सिद्धचक्रम् ।। ८ ।। फलम् ॥
घरजलफलपुष्पैश्चन्दनरक्षनाथै,-
निरनितकृतभक्त्यायुक्तपुप्पांजलीभिः ।
शिवसदननिविष्टं नावनन्तं प्रमुक्तम् ,
दशशतजिनचारं चनये सिद्धचक्रम् ॥ ९॥ अर्घम् ।।
.30 यासिला उसा नमः
' अतिमगाटोनरशतप्रमाण जायदे गम्
इत्यं सिद्धमुपास्य शर्मसहितं संसारवाधिपह,
नोद्रव्याशुभभावकर्मकलितं सन्नव्यपर्यापहम् ।
योध्यायेत्फलमश्नुते शिवमयंसौमं स हित्वाऽशिवम् ,
संभुक्त्वाखिलमंडलेशविबुधस्वामिस्थितिं सर्वतः ।। १० ।। पूर्णायम् ।।

T Peo gramme --- -gamrpan + ---- ८ नट दे- विधान अथ जयमाला। - PAN १ mamme त्रिभुवनपतिपूज्यं पुण्यपापाद्विमुक्तं, विगतकलुपमा छिन्नसंसारभावम् । जगतिपतिसुसेव्यं संयजे भक्तिपूर्वम् , वरशिवसुगुणं तं लोकमूर्धावभासम् ॥१॥ अपारजवजवजीवनकर्मप्रभेदविदारणकेशरिधर्म । त्रिलोकशिरोयुतपुण्यविबुद्ध महासुखमनमहो जयरिद्ध ॥ २ ॥ अखण्डितचिन्मयशांतिकरण्ड घनकपरोन्नतशक्तिसुपिंड । समुद्भवभीतिविमुक्त समृद्ध, महासुखमनमहोजयरिद्ध ॥ ३॥ सुरासुरमानुपनागपरीज, सुदूरितदुर्भरभावसमीज । मुकेवलवोध मुदृष्टिसमृद्ध, महासुखमग्न महो जयरिद्ध ॥ ४ ॥ दिवारविचन्द्रविमृष्टविकाश, महोभरभूषित सहजनिरास । विपत्कुलकंदकुठार विक्रुद्ध, महासुखमग्न महो जयरिद्ध ॥ ५॥ जिनाधिपमाननिरूपितभाव सुसूक्ष्मगुणेश विरूप विराव । विवाध विकस्वरदूरविरुद्ध, महासुखमन महो जयरिद्ध ॥६॥ ra- -- - -- ------ माया दोडकोशान १४६ पू० ८ तपातरमूपितनिर्मलयोग, समाप्तविवाध विशोक विरांग । प्रदुःखदवानलमेघ विरुद्ध, महासुखमग्न महो जयरिद्ध ॥ ७ ॥ चिरंतनकालकलाकृतवास, भवोदधिसातनशुद्धसमास । मनोऽतिहषीकविमुक्त विशुद्ध, महामुखमग्न महो जयरिद्ध ॥ ८॥ अनादिनिरंतपदस्थितरूप, रसादिविमुक्त विविक्त विधूप । जरादिदशादलनार्थविशुद्ध, महामुखमग्न महो जयरिद्ध ।। ९॥ महेश सुशंकर निर्जर शक्र, मुनीन्द्र सुचन्द्र सुभास्करचक्र । पराच्युतभाव सुशीतलबुद्ध, महामुखमनमहोजयरिद्ध ।। १० ॥ समयरससमग्नं पूर्णभाव विभावम् , जनितशिवसुसारं यःस्मरेत् सिद्धचक्रम् । अखिलनरसुपूज्यं शौभचन्द्रादिसंव्यम् , भजति शिवसुशान्ति संविभुज्याखिलार्थम् ॥ ११ ॥ इतिश्रीशुभचन्द्रकृतसहस्त्रनामगुणितपूजा संपूर्णा ।। ।। भद्रं भूयात् ॥ NAAM ना- - -- New PM " . 04- -- A H স্থির मंडल विधान . " है . . १४७ आठवीं जयमालाका अर्थ । Wrina मै उनकी भक्तिपूर्वक पूजा-स्तुति करता हूँ जो कि त्रिभुवनके पतियों-सुरेन्द्रों व असुरेन्द्रो के द्वारापूज्य हैं, पुण्य और पाप दोनो हीसे रहित है, कलुषता जिनकी नष्ट हो चुकी है, संसार पर्यायको जिन्होने छेद डाला है, जगतीपतियों नरेन्द्रोके द्वारा जो सेव्य है, उत्तम कल्याणरूप सभीचीनगुणो से युक्त और लोकके शिरोभागापर प्रकाशमान है ।। १ ॥ अपार ससारके जीवनरूप कर्मोके समस्त भेदोंका विदारण करनेमे सिंहसमान, तीन लोकके शिग्वरपर विराजमान, पवित्र, विबुद्ध, महान्सुखमे निमग्न तेजःस्वरूप सिद्धपरमेष्ठिन् आप जयवन्त रहे ॥ २॥ कभी भी खण्डित न होनेवाली चित्स्वरूप शातिके करण्ड-पिटारे, घनरूप अद्वितीय सर्वोत्कृष्ट शक्तिके पिंड, उत्पत्तिके भयसे रहित, महासुखमे मग्न तेज' स्वरूप समृद्ध सिद्धदेव आप जयवत रहे ॥ ३ ॥ सुर असुर मनुष्य और वरणद्रिोके द्वारा पूज्य, दुर्भरभावोंसे दूर, भलेप्रकार पूज्य, सम्यक् केवलज्ञान दर्शनसे समृद्ध, महानसु- ग्वमें निमग्न तेज स्वरूप सिद्धभगवन् आपजयवत रहे ॥ ४ ॥ दिनमे दिखाई पड़नेवाले सूर्य और चन्द्रमाके समान या उससे भी अधिक विशुद्ध है विकाश जिनका, तेजोभारसे भूषित, स्वभावसे ही स्थिर, क्रोधरहित होकर भी विपत्तिरूपी वृक्षोके कन्द-तनेका उच्छेदन करनेके लिए कुठारके समान महान् सुखमें निमग्न तेजः स्वरूप सिद्ध परमेष्ठिन् आप जयवत रहे ॥ ५॥ जिनाधिप अर्हन्तके ज्ञानके द्वारा जिनके भावका निरूपण किया गया है, अतिशय मूक्ष्मत्वगुणके स्वामी, नीरूप, शब्दरहित, वाधारहित, विकस्वर-दुष्प्राप्ति या थकावट 4- . - h 'टाटा मंडला शियाना -- 0 २४८ पू ० के विरुद्ध, महान्सुखमें निमग्न तेजोरूप सिद्ध भगवान् श्राप जयवंत रहें ॥ ६ ॥ विभिन्नतपश्चरणोके द्वारा भूपित हो चुका है योग जिनका, समाप्त हो गई हैं बाधाएँ जिनकी, बीतशोक, रोगरहित, महान्दुःखस्वरूप दावानलके लिये मेधके समान, महासुखमें निमग्न तेजोरूप सिद्धदेव आप जयवंत रहें ॥ ७ ॥ शास्वतिक कालकलामें निवास करनेवाले संसाररूप समुद्रको सुखादेनेवाले शुद्ध, प्रकाशयुक्त, मन और इन्द्रियोसे रहित, विशुद्ध महानसुखमें निमग्न तेजोरूप सिद्ध भगवन् अाप जयवंत रहें ॥ ८ ॥ अनादि और अनन्त पदमें स्थित रूप-आकृति जिनकी, रसादिसैरहित, समस्त अन्यपढार्थासे पृथग्भूत, सब पदार्थोको विशेषरूपसे प्रकाशित करनेवाले अथवा सम्पूर्ण विभावभावों या दोपोंको कम्पितकर देनेवाले जरा जीर्णता-वृद्धत्व आदि अवस्थाओंका ढलन करनेवाले, विशुद्ध महासुखमें निमग्न तेजोरूप सिद्धदेव आप जयवन्त रहे ॥८॥ हे महेश-महान् ऐश्वर्ययुक्त, हे मुशकर-समीचीन कल्याणके कर्ता, हे निर्जर-कभी जीर्ण न होनेवाले, हे गक्र-अनन्तशक्ति युक्त, हे मुनीन्द्र-मुनियोके नाथ, हे सुचन्द्र-भले प्रकार सबको चन्द्रमाके समान आल्हादित करनेवाले, हे सुभास्करचक्र-कोटिसूर्यसमान तेजके वारक, हे पराच्युतभाव-उत्कृष्ट और कभी भी च्युत न होनेवाले है भाव जिनके, हे अत्यन्तशीतल ज्ञानस्वरूप, महान् सुखमे निमग्न तेजोरूप सिद्धपरमेष्टिन् पाप जयवत रहे ॥ १० ॥ इस तरह आत्मरससे पूर्णभावरूप, पुनरुत्पत्तिसे रहित, प्राप्त कर लिया है कल्याणरूप समीचीन सार जिन्होंने सम्पूर्ण मनुष्योंके द्वारा पूज्य तथा शुभचन्द्रादिकेद्वारा सेव्य ऐसे सिद्ध परमेष्ठियोके समूहका जो भव्य स्मरण करता है वह समस्त अभ्युदयोको भोगकर अन्तमे मुक्तिरूप समीचीन शान्तिको भी प्राप्त किया करता है ॥११॥ --- -- ----- 4 -- Ng .

- -- -- R । . - U AN-H----- -- Aamana - -dana- -now-. -ume 1 A -------- पू० श्रीभगवज्जिनसेनाचार्यकृत- सहस्रनामगर्भितमन्त्राणि. ११४९ ॐ ह्रीं श्रीमते नमः स्वाहा । १। ॐ ह्रीं स्वंयभुवे नमः स्वाहा ।२। ॐ ह्री बृषभाय नम: स्वाहा । ३ । ॐ ह्री सभवाय नम स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं शभवे नमः स्वाहा । ५। ॐ ह्रीं आत्मभुवे नमः स्वाहा । ६ । ॐ ह्री स्वयप्रभाय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ही प्रभवे नम स्वाहा । ८ । ॐ ह्रीं भोक्के नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्रीं विश्वभुवे नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं अपुनर्भवाय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं विश्वात्मने नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं विश्वलोकेशाय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्री विश्वतश्चक्षुषे नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्री अक्षराय नम. स्वाहा । १५। ॐ ह्रीं विश्वविदे नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं विश्वविद्येशाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री विश्वयोनये नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं अनश्वराय नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्रीं विश्वदृश्वने नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्री विभवे नम स्वाहा । २१ । ॐ ही धात्रे नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्रीं विश्वेशाय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्रीं विश्वलोचनाय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं विश्वव्यापिने नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्रीं विधये नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्रीं वेधसे नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं शास्त्रताय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रीं विश्वतोमुखाय नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्री विश्वकर्मणे नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्रीं जगज्येष्ठाय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं विश्वमूर्तये नमः स्वाहा । ३२ । " . -- - 4...

--- -- ator-54---- BAR Ram- मा डराजा .Rnlm. . पू० । ८ ॐ ह्री जिनेश्वराय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्रीं विश्वदृशे नमै स्वाहा । ३४ । ॐ ह्री विश्वभूतेशाय नमः स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं विश्वज्योतिषे नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्री अनीश्वराय नमः स्वाहा । । ३७ । ॐ ह्री जिनाय नमः स्वाहा । ३८ | ॐ ह्री जिष्णवे नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्री अमेयात्मने नम स्वाहा । ४०। ॐ ह्रीं विश्वरीशाय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री जगत्पतये नम. स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री अनन्तजिते नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ह्रीं अचिन्त्यात्मने नमः स्वाहा । ४४ । ॐ ह्रीं भव्यबन्धवे नमः स्वाहा । ४५ । ॐ ही अबन्धनाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ही युगादिपुरुपाय नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्री ब्रह्मणे नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं पर्चब्रह्ममयाय नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ह्री शिवाय नमः स्वाहा । ५० ॐ ह्री पराय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री परतराय नमः स्वाहा । ५२ । ॐ ह्रीं सूक्ष्माय नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्रीं परमेष्ठिने नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ह्री सनातनाय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ ह्री स्वयज्योतिषे नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्रीं अजाय नमः स्वाहा । ५७ । ॐ ह्री अजन्मने नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्री ब्रह्मयोनये नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्रीं अयोनिजाय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं मोहारिविजयिने नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री जत्रे नमः स्वाहा । ६२ । ॐ ह्रीं धर्मचक्रिणे नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्री दयाध्वजाय नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ही प्रशान्तारये नमः स्वाहा । ६५ । ॐ ह्री अनन्तात्मने नमः स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री योगिने नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री योगीश्वरार्चिताय नमः स्वाहा । ६८ । ॐ ह्री ब्रह्मविदे नम. स्वाहा । ६९ । ॐ ब्रह्मतत्वज्ञाय नम. स्वाहा । ७० | ॐ ह्री ब्रह्मोद्याविदे नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्रीं यतीश्वराय नमः स्वाहा । ७२ शुद्धाय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्रीं D . A- -- -for-4-on-m write-AWA More--+ - दिन m RA है . ० वुद्वाय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्री प्रवुद्रान्मने नम, स्वाहा । ७५ । ॐ ह्रीं सिद्वार्थाय नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्री सिद्वशासनाय नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्री सिद्धाय नम. स्वाहा । ७८ । ॐ ह्रीं सिद्धान्तविटे नम स्वाहा । ७९ । ॐ ह्री ध्येयाय नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्री सिद्धसाध्याय नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री जगद्धिताय नम. स्वाहा । ८२ । ॐ ह्रीं सहिाणवे नम स्वाहा । ८३ । ॐ ह्री अच्युताय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्रीं अनन्ताय नम स्वाहा । ८५ । ॐ ह्रीं प्रभविष्णवे नमः स्वाहा । ८६ । ॐ ह्री भवोद्भवाय नम. स्वाहा । ८७ । ॐ ह्री प्रभूप्णवे नम. प्रभूप्णवे नम. स्वाहा । ८८ । ॐ ह्री अजराय नम. स्वाहा । ८९ । ॐ ह्री अजय्याय नम स्वाहा । १० । ॐ ह्री भ्राजिष्णवे नम स्वाहा । ९१ । ॐ ह्रीं धीश्वराय नम स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं अव्ययाय नम. स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं विभावसवे नम त्वाहा । ९४ । ॐ ह्री असभूष्णवे नम स्वाहा । ९५ । ॐ ह्री स्वयभूप्णवे नम स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं पुरातनाय नमः स्वाहा । ९७ । ॐ ह्रीं परमात्मने नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्री परज्योतिषे नम स्वाहा । ९९ । ॐ त्रिजगत्परमेश्वराय नम स्वाहा । १०० । । १०२ । ॐ ह्री दिव्यभापापतये नमः स्वाहा । १०१ । ॐ ह्रीं दिव्याय नमः स्वाहा । पूतवाचे नम स्वाहा । १०३ । ॐ ह्रीं पूतशासनाय नमः स्वाहा । १०४ । ॐ ह्रीं पूतात्मने नमः स्वाहा । १०५ । ॐ ह्री परमज्योतिषे नमः स्वाहा । १०६ । ॐ ह्री वर्माध्यक्षाय नमः स्वाहा । १०७ । ॐ ह्री दमीश्वराय नमः स्वाहा । १०८ । ॐ ह्रीं श्रीपतये नमः स्वाहा । १०९ । ॐ ह्री भगवते नमः स्वाहा me --- 24 wat- ----- PRANI - - -- न arma --- इल्लनिशाना . क गा । ११० । ॐ ह्रीं अर्हते नमः स्वाहा । १११ । ॐ ह्रीं अरजसे नमः स्वाहा । ११२ । ॐ ह्रीं विरजसे नमः स्वाहा । ११३ । ॐ ह्रीं शुचये नमः स्वाहा । ११४ । ॐ ह्री तीर्थकृते नम. स्वाहा । ११५ । ॐ ह्रीं केवलिने नमः स्वाहा । ११६ । ॐ हीं ईशानाय नमः स्वाहा । ११७ । ॐ ह्रीं पूजाहाय नमः स्वाहा । ११८ । ॐ ह्रीं स्नातकाय नमः स्वाहा । ११९ । ॐ ह्रीं अमलाय नमः स्वाहा । १२० । ॐ ह्रीं अनन्तदीप्तये नम. स्वाहा । १२१ । ॐ ह्री ज्ञानात्मने नम स्वाहा । १२२ । ॐ ह्री स्वयबुद्धाय नम. स्वाहा । १२३ । ॐ ह्रीं प्रजापतये नमः स्वाहा । १२४ । ॐ ह्रीं मुक्ताय नमः स्वाहा । १२५ । ॐ ह्रीं शक्ताय नम. स्वाहा । १२६ । ॐ ह्रीं निगबाधाय नमः स्वाहा । १२७ । ॐ ह्री निष्कलाय नमः स्वाहा । १२८ । ॐ ह्री भुवनेश्वरार्चिताय नमः स्वाहा । १२९ । ॐ ह्री निरजनाय नम. स्वाहा । १३० । ॐ ह्रीं जगज्ज्योतिपे नम. स्वाहा । १३१ । ॐ ह्री निरुक्तोक्तये नमः स्वाहा । १३२ । ॐ ह्री अनामयाय नमः स्वाहा । १३३ । ॐ ह्रीं अचलस्थितये नमः स्वाहा । १३४ । ॐ ह्रा अक्षोभ्याय नम. स्वाहा । १३५ । ॐ ह्री कूटस्थाय नमः स्वाहा । १३६ । ॐ ह्री स्थाणये नमः स्वाहा । १३७ । ॐ ह्री अक्षयाय नमः स्वाहा । १३८ । ॐ ह्री अग्रण्यै नमः स्वाहा । १३९ । ॐ ह्रीं ग्रामण्यै नमः स्वाहा । १४० । ॐ ह्री नेत्रे नम. स्वाहा । ४१ । ॐ ह्रीं प्रणेत्र नम. स्वाहा । १४२ । ॐ ह्रीं न्यायशास्त्रकृने नमः स्वाहा । १४३ । ॐ ह्रीं शास्त्रे नम. स्वाहा । १४४ । ॐ ह्रीं धर्मपतये नम स्वाहा । १४५ । ॐ ह्री धाय नम. स्वाहा । १४६ । ॐ ह्री धर्मात्मने नमः स्वाहा । १४७ । ॐ ह्रीं वर्मतीर्थकृत नमः स्वाहा । १४८ । ॐ ह्रीं वृषध्वजाय नमः स्वाहा । १४० । ॐ ह्रीं बृशाधीशाय नमः स्वाहा । १५० । Mam स न H है. ---.. JAPAN -- PR --- . - पू० PIT ॐ ह्री बृपकेतवे नम स्वाहा । १५१ । ॐ ह्री वृपायुधाय नम स्वाहा । १५२ । ॐ ह्री बृपाय नमः स्वाहा । १५३ । ॐ ह्रा वृपपतये नम. स्वाहा । १५४ । ॐ ह्री भत्रे नम स्वाहा । १५५ । ॐ ह्री वृषभाकाय नम स्वाहा । १५६ । ॐ ह्री बृपोद्भवाय नमः स्वाहा । १५७ । ॐ ह्री हिरण्यनाभये नम. स्वाहा । १५८ । ॐ ह्री भृतात्मने नम स्वाहा । १५९ । ॐ ह्री भूतभृते नमः स्वाहा । १६० । ॐ ह्रीं भूतभावनाय नम स्वाहा । १६१ । ॐ ह्रीं प्रभवाय नम. स्वाहा । १६२ । ॐ ह्री विभवाय नमः स्वाहा । । १६३ । ॐ ह्री भास्ते नमः स्वाहा । १६४ । ॐ ह्री, भवाय नम स्वाहा । १६५ । ॐ ह्री भावाय नमः स्वाहा । १६६ । ॐ ह्री भवान्तकाय नमः स्वाहा । १६७ । ॐ ह्री हिरण्यगर्भाय नमः स्वाहा । १६८ । ॐ ह्री श्रीगर्भाय नमः स्वाहा । १६९ । ॐ ह्रा प्रभूतविभवाय नमः स्वाहा । १७० । ॐ है। अभवाय नमः स्वाहा । १७१ । ॐ ह्री स्वयंप्रभवे नमः स्वाहा । १७२ । ॐ ह्री प्रभूतात्मने नमः स्वाहा । १७३ । ॐ ह्री भूतनाथाय नमः स्वाहा । १७४ । ॐ ह्री जगत्त्रभवे नमः स्वाहा । १७५ । ॐ ह्रीं ‘साढये नम. स्वाहा । १७६ । ॐ ह्रीं सर्वदृशे नमः स्वाहा । १७७ । ॐ ह्री सार्वाय नमः स्वाहा । १७८ । ॐ ही सर्वज्ञाय नमः स्वाहा । १७९ । ॐ ह्रीं सर्वदर्शनाय नमः स्वाहा । १८० । ॐ ही सर्वात्मने नमः स्वाहा । १८१ । ॐ ह्री सर्वलोकेशाय नमः स्वाहा । १८२ । ॐ ह्री सर्वविदे, नमः स्वाहा । १८३ । ॐ ह्री सर्वलोकजिते नमः स्वाहा । १८४ । ॐ ह्रीं सुगतये नम. स्वाहा । १८५ । ॐ ह्री सुश्रुताय नमः स्वाहा । १८६ । ॐ ह्रीं सुश्रुते नमः स्वाहा । १८७ । ॐ ह्रीं सुवाचे नमः स्वाहा । १८८ । ॐ ह्रीं मूरये नम, स्वाहा । १८९ । ॐ ह्रा बहुश्रुताय नमः स्वाहा । १९० । ॐ ह्रीं विश्रुताय नम स्वाहा ---- --- - --- S इलाधान पृ० । १९१ । ॐ ह्री विश्वन.पादाय नम विश्वत.पादाय नम स्वाहा । १०२ । ॐ ह्री विश्वशीर्षाय नम स्वाहा । १९.३ । ह्रीं शुचिश्रवसे नम. स्वाहा । १९४ । ॐ ह्रीं सहस्त्रशीपीय नमः स्वाहा । १९५ । ॐ ह्री क्षेत्रज्ञाय नम. स्वाहा । १९६ । ॐ ह्री सहस्त्राक्षाय नमः स्वाहा । १९.७ । ॐ ह्री सहस्त्रपाढे नम. स्वाहा । १९८ । ॐ ह्रीं मूतभव्यभवत्रे नम• स्वाहा । १९ । ॐ ह्री विश्वविद्यामहेश्वराय नमः स्वाहा । २०० । ॐ ह्री स्थाविष्ठाय नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्रीं स्थविगय नम. स्वाहा । २ । ॐ ह्री ज्येष्ठाय नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्री पृष्टाय नम. स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं प्रेष्ठाय नम. स्वाहा । ५ । ॐ ह्री वरिष्ठधिये नम स्वाहा । ६ । ॐ ह्री स्थेष्टाय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्री गरिष्टाय नमः स्वाहा । ८ । ॐ ह्री वहिष्टाय नम. स्वाहा । ९ । ॐ ह्री श्रेष्ठाय नम स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं अणिष्ठाय नम. स्वाहा । ११ । ॐ ह्री गरिष्ठगिरे नम. स्वाहा । १२ । ॐ हूँ। विश्वमुपे नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्री विश्वसृजे नम स्वाहा । १४ । ॐ ह्री विश्वेशे नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्री विश्वभुजे नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं विश्वनायकाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री विश्वासिने नम. स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं विश्वरूपात्मने नमः स्वाहा । १९ । ॐ ही विश्वजिते नम. स्वाहा । २० । ॐ ह्रीं विजितान्तकाय नमः स्वाहा । २१ । ॐ ह्री विभावाय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्री विभयाय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्री वीराय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्री विशोकाय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ही विजराय नम स्वाहा । २६ । ॐ ह्रीं जरते नम स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं विरागाय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ही विरताय नम. स्वाहा । २९ । ॐ ह्रीं असङ्गाय नम. स्वाहा --- Mix MARWNnVHA- HAPre- मला विधान -- पू० । ३० । ॐ ह्रीं विविक्ताय नम स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं वीतमन्सराय नम. स्वाहा । ३२ । ॐ ह्रीं विनेयजनताबन्धवे नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्रीं विलीनाशेपकल्मपाय नम स्वाहा । ३४ । ॐ ह्रीं वियोगाय नम. स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं योगविदे नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं विदुपे नम स्वाहा । ३७ । ॐ ही विधात्रे नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ह्रीं सुविधये नमः स्वाहा । ३९ ॐ ह्रीं सुविये नमः स्वाहा । ४० । ॐ ह्रीं क्षाविभाजे नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ही पृथिवीमूर्तये नम. स्वाहा । ४२ । ॐ ह्रीं शातिभाजे नम स्वाहा । ४३ ॐ ह्रीं सलिलात्मकाय नम स्वाहा । ४४ । ॐ ह्रीं वायुमूर्तये नम स्वाहा । ४५। ॐ असङ्गात्मने नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्रीं वह्निमूर्तये नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ही अधर्मदहे नम. स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं सुयज्वने नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ह्रीं यजमानात्मने नम स्वाहा । ५० । ॐ ह्रीं सुत्वने नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्रीं सुत्रामपूजिताय नमः स्वाहा । ५२ । ॐ ह्रीं ऋत्विजे नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्रीं यज्ञपतये नम. स्वाहा । ५४ । ॐ ह्रीं यज्याय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ हीं यज्ञागाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्रीं अमृताय नम. स्वाहा । ५७ । ॐ ह्रीं हविषे नम स्वाहा । ५८ । ॐ ह्रीं व्योममूर्तये नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ही अमूर्तात्मने नम. स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं निर्लेयाय नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ही निर्मलाय नम. स्वाहा । ६२ । ॐ ह्रीं अचलाय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्री सोममूतये नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ह्रीं सुसौम्यात्मने नम स्वाहा । ६५ । ॐ ह्रीं मूर्यभूतये नम स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री महाप्रभाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री मत्रविढे नमः स्वाहा । ६८ । ॐ ह्रीं मत्रकृते नमः स्वाहा । ६९ । ह्री मत्रिणे नम स्वाह । ७० । ॐ ह्री मत्रमूर्तये नम स्वाहा । ७१ । ॐ ह्रीं अनन्तगाय नम. स्वाहा --- SC- --- M- -"MALANM- Par- - alukra A - "- शक मंडल विधान १० नम । ७२ । ॐ ह्रीं स्वतत्राय नम स्वाहा । ७३ । ॐ ह्री तन्त्रकृत नम. स्वाहा । ७४ । ॐ ह्रीं स्वान्ताय नम म्वाहा । ७५ | ॐ ह्री कृतान्तान्ताय नम. स्वाहा । ७६ । ॐ ह्री कृतान्तकृते नम. स्वाहा । ७७ । ॐ ह्रीं कृतिने नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं कृतार्थाय नम. स्वाहा । ७९ । ॐ ह्री सत्कृत्याय नम स्वाहा | ८० | ॐ ह्रीं कृतकृत्याय नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री कृतकतवे नम स्वाहा । ८२ । ॐ ह्री नित्याय स्वाहा । ८३ । ॐ । ८३ । ॐ ह्रीं मृत्युंजयाय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्री अमृत्यवे नमः स्वाहा । ८५ । ॐ ह्री अमृतात्मने नम स्वाहा । ८६ ॥ ॐ ह्रीं अमृतोद्भवाय नम स्वाहा । ८७ । ॐ । ८७ । ॐ ह्रीं ब्रह्मनिष्ठाय नम स्वाहा । ८८ । ॐ ह्री परब्रह्मणे नम. स्वाहा । ८९ । ॐ ह्री ब्रह्मात्मने नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्रीं ब्रह्मसभवाय नम स्वाहा ।९१ । ॐ ह्रीं महाब्रह्मपतये नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ह्री ब्रह्मेश नमः स्वाहा 1०३ । ॐ ह्रीं महाब्रह्मपदेश्वराय नमः स्वाहा । ९४ । ॐ ह्री सुत्रसन्नाय नमः स्वाहा । ९५ । ॐ ह्री प्रसन्नात्मने नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्री ज्ञानवर्मदमप्रभवे नम स्वाहा । ९७ । ॐ ह्री प्रशमात्मने नम. स्वहा । २८ । ॐ ह्री प्रशान्तात्मने नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्री पुराणपुरूपोत्तमाय नमः स्वाहा । ३०० । । १ ॐ ह्री महाशोकध्वजाय नम स्वाहा । २ । ॐ ह्री अशोकाय नमः स्वाहा । ३। ॐ ह्री काय नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्री स्रष्टे नम स्वाहा ।५ | ॐ ह्री पनविष्टराय नम. स्वाहा । ६ । ॐ ह्री पनेशाय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्री पद्मसभूतये नमः स्वाहा । ८ । ॐ ह्री पद्मनाभये नमः स्वाहा । २ । ॐ ही अनुत्तराय नम स्वाहा । १० । ॐ ह्री पद्मयोनये नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्री जगद्योनये नम. -- Praan N Indre- Pawa --- - -- - Amale---- " इलाबयान ------- -- पू० स्वाहा । १२ । ॐ ह्री इत्याय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्री स्तुत्याय नम. स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं स्तुती- स्वराय नम. स्वाहा । १५ । ॐ ही स्तवनाहीय नम स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं हृषीकेशाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री जितजेयाय नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्री कृतक्रियाय नमः स्वाहा । १०। ॐ ह्री गणा- धिपाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्री गणज्येष्ठाय नम स्वाहा । २१ । ॐ ह्री गण्याय नम स्वाहा । २२ । ॐ ह्री पुण्याय नम स्वाहा । २३ । ॐ ह्री गणाग्रण्यै नम. स्वाहा । २४ । ॐ ह्री गुणाकराय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्री गुणाम्भावये नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्र। गुणज्ञाय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्री गुणनायकाय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रा गुणाढरिणे नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्रीं गुणोच्छेदिने नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्री निर्गुणाय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्री पुण्यगिरे नमः स्वाहा । ३२ । ॐ ह्री गुणाय नम स्वाहा । ३३ । ॐ ह्री शरण्याय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ह्री पुण्यवाचे नमः स्वाहा । ३५ । ॐ पूताय नम. स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं वरेण्याय नम स्वाहा । ३७ । ॐ ह्री पुण्यनायकाय नम स्वाहा । ३८ । ॐ ह्री अगण्याय नमः स्वाहा । ३९ । ॐ ह्रीं पुण्यधिये नम. स्वाहा । ४० । ॐ ह्रीं गुण्याय नम. स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री पुण्यकृते नम. स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री पुण्यशासनाय नम स्वाहा । ४३ । ॐ ही धर्मारामाय नम स्वाहा । ४४ । ॐ ह्री गुणग्रामाय नम स्वाहा । ४५ । ॐ ह्री पुण्यापुण्य- निरोक्काय नम स्वाहा । ४६ । ॐ ह्रीं पापापेताय नम. स्वाहा । ४७ । ॐ ह्रीं विपापात्मने नम स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं विपाप्मने नम स्वाहा । ४९ । ॐ ह्रीं बीतकल्मपाय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्रीं स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री निर्मदाय नम स्वाहा । ५२ । ॐ ह्री शाताय नम. स्वाहा निन्द्राय नम 2mNam 1 - RAMAPANm1 AAMAN म MAma Pawa--- Anon-------- Pramarsh rogram नडलधान -- Lromart H + -- पृ० - । । । ५३ । ॐ ह्री निर्मोहाय नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ही निरूपद्रवाय नमः स्वाहा । '५५ । ॐ ह्रीं निर्निमेपाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्री निराहागय नमः स्वाहा । ५७ | ॐ ह्रीं नि:क्रियाय नमः स्वाहा ।५८ । ॐ ह्री निरुपलवाय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ही निकाल काय नमः रवाहा । ६० । ॐ ही निम्म्तैन। नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री निधूतागमे नमः स्वाहा । ६२ । ॐ हूं। निरालवाय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्रीं विशालाय नमः ग्वाहा । ६४ । ॐ ह्री विपुलच्योतिषे नमः स्वाहा । ६५ । ॐ ही अतुलाय नम. रवाहा । ६६ । ॐ ह्रीं अचित्यवैभवाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ही सुसंवृत्ताय नमः स्वाहा । ६८ । ही सुगुप्तात्मने नमः स्वाहा । ६० । ॐ ही मुभूत नमः स्वाहा । ७० । ॐ ही मुनयतत्वविद नग रवाहा । ७१ । ॐ ही एकविद्याय नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ही गहाविमाय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ही मुनये नगः म्बाला । ७४ । ॐ ह्री परिवृद्धाय नगः स्वाहा । ७५ | ॐ ही गन्ग नमः रवाला । ७६ । ॐ ह्रीं चीशाय नमः स्वाहा । ७७ । ॐ है। विधानिय नमः रवाहा । ७८ । ॐ ही गान्तिण नमः स्वाहा । ७० । ॐ ही विनेत्रे नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं निहतान्तकाय नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री पित्रे नग स्वाहा । ८२ । ॐ ह्रीं पितामहाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्री पात्रं नमः ग्वाहा । ८४ । ॐ ही पवित्राय नमः स्वाहा । ८५ । ॐ ह्री पावनाय नमः स्वाहा । ८६ । ॐ ही गतय नमः रवाहा । ८७ । ॐ ही त्रात्रे नमः स्वाहा । ८८ । ॐ ही मिपावगम नगः म्वाहा । ८० । ॐ ही पर्याय नमः रवाना । १० । ॐ ह्री बग्दाय नम रवाहा । २१ । ॐ ह्री पगाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ही घुरो नगः रवाहा । १३ । ॐ है। कवये नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्री पुगणपुरुषाय नमः स्वाहा ।१५। ॐ ही वयस HIS Anmol IAN 4 H TA . A +4 7 . . . 12 - PA - amarpNTS 4 N ra --- स ह विधान ivarma kaitpawar ४ - , . नमः स्वाहा । ०६ । ॐ ह्री वृषभाय नम. स्वाहा । ९७ । ॐ ह्री पुरवे नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्री प्रतिष्ठाप्रमवाय नमः स्वाहा । ०१ । ॐ ह्री हेतवे नम. स्वाहा । १०० | ॐ ह्री भुवनैकपितामहाय नमः स्वाहा । ४०० । ॐ ह्री श्रीवृत्तलक्षणाय नमः स्वाहा । १। ॐ ह्रीं श्लदणाय नम स्वाहा । २ । ॐ ही लक्षण्याय नम. स्वाहा । ३ । ॐ ह्री शुभलक्षणाय नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं निरक्षाय नम स्वाहा ।५। ॐ ह्री पुडरीकाक्षाय नम स्वाहा । ६ । ॐ ह्रीं पुकलाय नम स्वाहा । ७ । ॐ ह्री पुप्फरेक्षणाय नम स्वाहा । ८ । ॐ ह्री सिद्धिदाय नम स्वाहा । ९ । ॐ ह्री सिद्धसङ्कल्पाय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्री सिद्वान्मने नम स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं मिद्धशासनाय नम स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं बुद्धबोव्याय नम स्वाहा । १३ । ॐ ह्री महावोवये नम. स्वाहा । १४ । ॐ ह्री बर्वमानाय नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्री महद्धिकाय नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्री वेढागाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री वेदविदे नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं वेयाय नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्री जातरूपाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्री विदावराय नम, स्वाहा । २१ । ॐ ह्री वेढवेद्याय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्रीं स्वसवेद्याय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्री विवेढाय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं बढतावराय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्री अनादिनिधनाय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्री अव्यक्ताय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्री अव्यक्तवाचे नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रीं व्यक्तशासनाय नम स्वाहा । २९ । ॐ ह्री. युगादिकृते नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्री युगाबाराय नम न्वाहा । ३१ । ॐ ही युगादरे नमः स्वाहा । ३२ । ॐ ह्री जगदादि जाय नमः स्वाहा । ३३ । 4ra man w S -------- - --- mmaa m दू राहा माडल धियाना पू० MAR ॐ ह्री अतीन्द्राय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ह्रीं अतीन्द्रियाय नम. स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं वीन्द्राय नम स्वाहा । ३६ । ॐ ही महेन्द्राय नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्री अतीन्द्रियार्थदृशे नम स्वाहा । ३८ । ॐ अनिन्द्रियाय नम स्वाहा । ३९ । ॐ ह्री अहमिन्द्राव्य नम. स्वाहा । ४० । ॐ ह्री महेन्द्रमहिताय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्रीं महते नम. स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री उद्भवाय नम. स्वाहा । ४३ । ॐ ह्री कारणाय नम. स्वाहा । ४४ । ॐ ह्रीं कत्रे नमः स्वाहा । ४५ । ॐ ह्री पारगाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्री भवतारकाय नम स्वाहा । ४७ । ॐ ह्री अगाह्याय नम. स्वाहा । ४८ । ॐ ह्री गहनाय नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्री गुह्याय नम स्वाहा । ५० । ॐ ह्री पगाय नम. स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री परमेश्वराय नम. स्वाहा । ५२ । ॐ ह्री अनन्तव्ये नम. स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री अमेयये नम स्वाहा । ५४ । ॐ ह्री अचिन्त्यर्द्धये नम. स्वाहा । ५५ । ॐ ह्री समग्रविये नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्री प्राग्रयाय नम स्वाहा । ५७ । ॐ ह्री प्राग्रहगय नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्री अभ्यग्रयाय नम स्वाहा । ५९ । ॐ ह्री प्रत्यग्राय नम स्वाहा । ६० । ॐ ह्री अग्र्याय नम. स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री अग्रिमाय नम स्वाहा । ६२ । ॐ ह्र। अग्रजाय नम. स्वाहा । ६३ । ॐ ह्री महातपसे नम. स्वाहा । ६४ । ॐ ह्री महातेजसे नम. स्वाहा । ६५ । ॐ ही महोढर्काय नम स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री महोदयाय नम. स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री महायशसे नमः स्वाहा । ६८ । ॐ ह्री महाधाम्ने नमः स्वाहा । ६९ । ॐ ह्री महासत्त्वाय नम स्वाहा । ७० । ॐ ह्री महावृतये नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्री महावैर्याय नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्री महावीर्याय नम. स्वाहा । ७३ । ॐ ह्री महासम्पद नम स्वाहा । ७४ । ॐ ह्रीं महाबलाय नम स्वाहा । S - - -* -- ক্তি স্থেগ্রিল स पू० [ ७५ । ॐ ह्री महाशक्तये नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं महान्योतिषे नमः म्वाहा । ७७ । ॐ ह्रीं महाभूतये नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ह्री महाद्युतये नम. स्वाहा । ७९ । ॐ ह्रीं महामतये नम स्वाहा । ८० । ॐ ह्री महानीतये नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री महाक्षान्तये नमः स्वाहा । ८२ । महाढयाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्री महाप्राज्ञाय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्रीं महाभागाय नमः स्वाहा 1 ८५ । ॐ ह्री महानन्दाय नम स्वाहा । ८६ । ॐ ह्री महाकवये नम स्वाहा । ८७ | ॐ महामहसे नम स्वाहा । ८८ । ॐ ह्री महाकीतये नमः स्वाहा । ८९ । ॐ ह्रीं महाकान्तये नम स्वाहा ।९० । ॐ ह्री महावपुषे नम स्वाहा । ९१ । ॐ ह्री महादानाय नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं महाज्ञानाय नम स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रा महायोगाय नम स्वाहा । ९४ । ॐ ह्रीं महागुणाय नमः स्वाहा । ९५ । ॐ ह्री महामहपतये नम. स्वाहा । ९६ । ॐ ह्री प्राप्तमहाकल्याणपच काय नम स्वाहा । १७ । ॐ ह्रीं महाप्रभवे नम स्वाहा । २८ । ॐ ह्री महाप्रातिहार्यावीशाय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्री महेश्वराय नमः स्वाहा । १०० ।-५०० । . ॐ ह्रीं महामुनये नमः स्वाहा । १। ॐ ह्रीं महामौनिने नमः स्वाहा । २ । ॐ ह्रीं महाध्यानिन नम स्वाहा । ३ । ॐ ह्री महादमाय नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्री महाक्षमाय नमः स्वाहा । ५ । ॐ महाशीलाय नम स्वाहा । ६ । ॐ ह्री महायज्ञाय नम स्वाहा । ७ ॐ ह्रीं महामखाय नम स्वाहा । ८ । ॐ ह्री महाव्रतपतये नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्री मह्याय नम. स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं महाकान्तिधराय . rrent - ܫܪ . - लिलाद्ध मक स् গ্রিল 18. पूर्व नमः नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्री अधिपाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं महामैत्रीमयाय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्री अमेयाय नम. स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं महोपायाय नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्रीं महोमयाय नमः स्वाहा ।१६। ॐ ह्रीं महाकारुणिकाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री मत्रे नम, स्वाहा । १८ । ॐ ह्री महामत्राय रवाहा । १९ । ॐ ह्री महायतये नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्री महानादाय नमः स्वाहा । २१ । ॐ हूं। महायोपाय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्रीं महेज्याय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्रीं महसांपतये नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्री महावरवराय नम. स्वाहा । २५ । ॐ ह्री धुर्याय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्रीं महौढायर्याय नम. स्वाहा । २७ । ॐ ह्री महिष्टवाचे नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्री महान्मने नम. स्वाहा । २९ । ॐ ह्री महसावाने नमः स्वाहा । ३० । ॐ ह्रीं महपये नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्री महितोढयाय नम. स्वाहा । ३२ । ॐ ह्री महाक्लेशाकुशाय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्री शूराय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ही महाभूतपतये नम. स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं गुरवे नम. स्वाहा । ३६ । ॐ ह्री महापराक्रमाय नमः स्वाहा । ३७ | ॐ ह्री अनन्ताय नम. स्वाहा । ३८ । ॐ ह्री महाक्रोवरिपवे नमः .स्वाहा । ३९ । ॐ ही वशिने नमः स्वाहा । ४० । ॐ ह्री महाभवाब्धिसतारिणे नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री महामोहाद्रि- सूदनाय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्रीं महागुणाकराय नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ही क्षान्ताय नम स्वाहा । ४४ । ॐ ह्री महायोगीश्वराय नम. स्वाहा । १५। ॐ ह्री शमिने नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्री महाव्यानपतये नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्री व्यातमहावर्माय नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्रीं महाव्रताय नम. स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री महाकारिने नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्री प्रान्मज्ञाय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री -- Aime . । ru+ -- है T . सिद्ध चक्र मंडलविधान , महादेवाय नम. स्वाहा । ५२ । ॐ ह्रीं महेशित्र नम स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री सर्वक्लेगापहाय नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ह्रीं सायवे नम स्वाहा । ५५ । ॐ ह्रीं मर्वदोपहराय नम स्वाहा । ५६ । ॐ ही हगय नम. स्वाहा । ५७ । ॐ ह्री असम्व्येयाय नम. स्वाहा । ५८ । ॐ ह्रीं अप्रमेयात्मने नम स्वाहा । ५९ । ॐ ह्री शमात्मने नम, स्वाहा । ६० । ॐ ह्री प्रशमाकराय नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री सवयोगीश्वराय नम. स्वाहा । ६२ । ॐ ह्र। अचिन्त्याय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्र। श्रुतात्मने नम, स्वाहा । ६४ । ॐ ह्री विष्टर श्रवम नम स्वाहा । ६५ । ॐ ह्री दान्तात्मने नम, स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री दमतार्थेशाय नम. स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री योगात्मने नमः स्वाहा । ६८। ॐ ह्रीं ज्ञानसर्वगाय नमः स्वाहा । ६९ । ॐ ह्री प्रवानाय नम. स्वाहा । ७० । ॐ ह्री आत्मने नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्री प्रकृतये नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्री परमाय नम. स्वाहा । ७३ । ॐ हूं। पग्मोदयाय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्री प्रक्षीणवन्यगय नम स्वाहा । ७५ । ॐ ह्रीं कारये नम. स्वाहा । ७६ । ॐ ह्री क्षेमकृते नमः स्वाहा । ७७ | ॐ ह्री क्षेमशासनाय नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ह्री प्रणवाय नमः स्वाहा | ७९ । ॐ ह्रीं प्रणयाय नमः स्वाहा । ८० | ॐ ह्री प्राणाय नम. स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री प्राणदाय नमः स्वाहा । ८२ । ॐ ह्री प्रणतेश्वराय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्री प्रमाणाय नम. स्वाहा । ८४ । ॐ ह्री प्रणधये नमः स्वाहा । ८५। ॐ ह्रीं दक्षाय नमः स्वाहा । ८६ । ॐ ह्री दक्षिणाय नमः स्वाहा । ८७ । ॐ ह्रीं अचयवे नम. स्वाहा । ८८ । ॐ ह्री अब्वगय नम. स्वाहा । ८९ । ॐ आनन्दाय नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्री नन्दनाय नम. स्वाहा । ९१ । ॐ ह्रीं नन्दाय नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं वन्द्याय नम. स्वाहा । ९३ । Sta -- 0- ARTAIRST -- विर मंडलाहीशान) क - - पृ० ॐ ह्री अनिन्द्याय नमः स्वाहा । ९४ । ॐ ह्रीं अभिनन्दनाय नमः स्वाहा । ९५ । ॐ ही कामने नम. स्वाहा । ९६ । ॐ ह्री कामदाय नमः स्वाहा । ९७। ॐ ह्री काम्याय नम. स्वाहा । ९८ । ॐ ह्री कामधेनवे नम स्वाहा । ९९ । ॐ ह्र। अरिंजयाय नमः स्वाहा । १०० ६०० ६४ ॐ ह्री असंस्कृतसुसस्काराय नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्री अप्राकृताय नम. स्वाहा । २ । ॐ ह्री वैकृतान्तकृते नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्री अनन्तकृते नम. स्वाहा । ४ । ॐ ह्री कान्तगवे नम. स्वाहा । ५ । ॐ ह्री कान्ताय नमः स्वाहा । ६ । ॐ ह्रीं चिन्तामणये नम. स्वाहा । ७ । ॐ ह्री अभीटदाय नमः स्वाहा । ८ । ॐ ह्री अजिताय नमः स्वाहा । ९। ॐ ह्र। जितकामारये नम. स्वाहा । १० । ॐ ही अमिताय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्री अभितशासनाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्री जितक्रोधाय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं जितामित्राय नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं जितक्लेशाय नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्री जितान्तकाय नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्री जिनेन्द्राय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री परमानन्दाय नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं मुनीन्द्राय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्री दुन्दुभिस्वनाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्री महेन्द्रवन्याय नमः स्वाहा । २१ । ॐ ह्रीं योगीन्द्राय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्री यतीन्द्राय ' नमः स्वाहा । २३ । ह्री नाभिनन्दनाय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्रीं नामेयाय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्री नाभिजाय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्री अजाताय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्री सुव्रताय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्री मनः नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्री उत्तमाय नम स्वाहा । ३० । ॐ ह्री अभेद्याय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्री ॥ ------ - SWERS Pareer १६५ पू० अनत्ययाय नमः स्वाहा । ३२। ॐ ही अनाश्वते नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्री अधिकाय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ह्री अविगुरवे नमः स्वाहा । ३५ । ॐ ह्री सुगिरे नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं सुमेवसे नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्री विक्रामिणे नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ह्रीं स्वामिने नम स्वाहा । ३९। ॐ ह्रीं दुराधर्षाय नमः स्वाहा । ४० । ॐ ह्रीं निरुत्सुकाय नम स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री विशिष्टाय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री शिष्टभुजे नम. स्वाहा । ४३ । ॐ ह्री शिष्टाय नमः स्वाहा । ४४। ॐ ही प्रत्ययाय नम. स्वाहा । ४५ । ॐ ह्री कामनाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्री अनेवाय नम स्वाहा । ४७ । ॐ ह्री क्षेमिणे नम स्वाहा । १८ । ॐ ह्री क्षेमकराय नम स्वाहा । ४९ । ॐ ह्री अक्षय्याय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्री क्षेमवर्मपतये नम स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री क्षमिणे नम, स्वाहा । ५२ । ॐ ह्री अग्राह्याय नम., स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री ज्ञाननिग्राह्याय नम. स्वाहा । ५४ । ॐ ह्री व्यानगम्याय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ ह्री निरुत्तराय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्री सुकृतिने नमः स्वाहा । ५७ । ॐ ह्रीं धातवे नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्री इज्यायि नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्री सुनयाय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्री चतुराननाय नमः स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री श्रीनिवासाय नमः स्वाहा । ६२ ।। ॐ ह्रीं चतुर्वक्ताय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्री चतुरास्याय नमः स्वाहा । ६४ । ॐ ही चतुर्मुग्वाय नमः स्वाहा । ६५ । ॐ ह्री सत्यात्मने नमः स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री सन्यविज्ञानाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री सत्यवाचे नमः स्वाहा । ६८ । ॐ ह्रीं " पाठ पाया जाता है। १ सहस्त्रनाम पूजनमे " अनघाय " की जगह नयाय ---- - -- - . r -- A - + - m- सिद्धचक्र मंडल विधान Lou पृ० ॐ IARY मत्यशासनाय नमः स्वाहा । ६९ । ॐ ह्रीं सत्याशिष नमः स्वाहा । ७० । ॐ ह्रीं सत्यसंधानाय नम स्वाहा । ७१ । ॐ ह्रीं सत्याय नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्रीं सत्यपरायणाय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्रीं स्थेयसे नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्रीं स्थवीयसे नमः स्वाहा । ७५। ॐ ह्रीं नेदीयसे नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं दवीयसे नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्रीं दूरदर्शनाय नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ह्रीं अणोरणीयसे नमः म्वाहा । ७९ । ॐ ह्रीं अनणवे नमः स्वाहा । ८०। ॐ ह्री गरीयसामाद्यगुरवे नमः स्वाहा । ८१ । ह्रीं सदायोगाय नमः स्वाहा । ८२ । ॐ ह्री सदाभोगाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्रीं सदातृप्ताय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्री सदाशिवाय नमः स्वाहा । ८५। ॐ ह्रीं सदागतये नमः स्वाहा । ८६ ।। ॐ ह्रीं सदासौख्याय नमः स्वाहा । ८७ । ॐ ह्रीं सदाविद्याय नमः स्वाहा । ८८ | ॐ ह्री सदोदयाय नमः स्वाहा । ८९ । ॐ ह्रीं सुघोपाय नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्री सुमुखाय नमः स्वाहा । ९१ । ॐ ह्री सोम्याय नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं सुखदाय नमः स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं सुहिताय नमः स्वाहा । ९४ । ॐ ह्रीं सुहृद नमः स्वाहा । ९५ । ॐ ह्रीं सुगुप्ताय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं गुप्तिभृते नमः स्वाहा । ९७ । ॐ ह्री गोपत्रे नमः स्वाहा । ९८ । ॐ ह्रीं लोकाध्यक्षाय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्रीं दमेश्वराय नमः स्वाहा । १०० ७०० ॐ ह्रीं वृहद्वृहस्पतये नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्रीं वाग्मिने नमः स्वाहा । २ । ॐ ही वाचस्पतये १ स पूजा में बृहते और बृहस्पतये अलहदा २ नाम हैं और आगे चलकर निर्मलामोघशासनाय एकही नाम रख्खा हैं परन्तु आदि पुराण का हिदी टीका वृहदबृहस्पतये एक और निर्मलाय तया अमोघशासनाय भिन्न २ नाम हैं। 'ms. - FA -- RA- AN जाडलाधान सिद्ध बहुधा m--- ----- न नम स्वाहा । ३। ॐ ह्रीं उदारविये नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं मनीपिणे नमः स्वाहा । ५। ॐ ह्रीं विषणाय नमः स्वाहा । ६। ॐ ॐ ह्री धीमते नमः स्वाहा । ७। ॐ ह्री शेमुपीशाय नमः स्वाहा । ८ । ॐ ह्रीं गिरॉपतये नमः स्वाहा । ९। ॐ ह्रीं नैकरूपाय नम. स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं नयोत्तुगाय नम. स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं नैकात्मने नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्री नैकधर्मकृते नम. स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं अविज्ञेयाय नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं अप्रतक्यात्मने नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्रीं कृतज्ञाय नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं कृतलक्षणाय नम. स्वाहा । १७ । ॐ ह्री ज्ञानगर्भाय नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं दयागर्भाय नम. स्वाहा । १९ । ॐ ह्रीं रत्नगर्भाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्रीं प्रभास्वराय नमः स्वाहा । २१ । ॐ ह्रीं पद्मगर्भाय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्री जगद्गर्भाय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्री हमगर्भाय नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्री सुदर्शनाय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्री लक्ष्मीवते नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्रीं त्रिदशाध्यक्षाय नम स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं, दृढीयसे नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रीं इनाय नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्री ईशित्रे नमः स्वाहा ३० । ॐ ह्रीं मनोहराय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं मनोज्ञागाय नमः स्वाहा । ३२ । ॐ ह्रीं वीराय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्रीं गभीरशासनाय नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ही वर्मयूपाय नमः स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं दयायागाय नमः स्वाहा । ३६ । ॐ ह्रीं धर्मनेमये नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्रीं मुनीश्वराय नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ही धर्मचक्रायुधाय नमः स्वाहा । ३९ । ॐ ह्रीं देवाय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं कमन्ने नमः स्वाहा । ४१। ॐ ह्रीं वर्मघोषणाय नमः स्वाहा । ४२। ॐ ह्रीं अमोधवाचे नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ह्रीं अमोघाज्ञाय नमः स्वाहा । ४४ । ॐ ह्रीं D - - Prama - . aree Mrue -- Pap ne Jad- बान SH । eSaate - पू० १६८ ॐ ह्री याणा makar निर्मलाय नम स्वाहा । ४५। ॐ ह्री अमोघशासनाय नमः स्वाहा । ४६ । ॐ ह्रीं मुरूपाय नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्री मुभगाय नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्री न्यागिने नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ही समयज्ञाय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ही समाहिताय नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री मुस्थिताय नम. स्वाहा । ५२ । ॐ ह्री स्वास्यभाजे नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री स्वस्थाय नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ह्री नी'जस्काय नमः स्वाहा । ५५ । ॐ ह्री निरुद्भवाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्री अलेपाय नम स्वाहा । ५७ । निष्कलङ्कात्मने नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्री वीतरागाय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्री गतस्पृहाय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्री वश्येन्द्रियाय नम स्वाहा । ६१ । ॐ ह्रीं विमुक्तात्मने नमः स्वाहा । ६२ । ॐ ह्री निःसपनाय नम. स्वाहा । ६३ । ॐ ह्री जितेन्द्रियाय नमः स्वाहा । ६४ | ॐ ह्री प्रशान्ताय नमः स्वाहा । ६५ । ॐ हीं अनन्तधामपये नमः स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री मंगलाय नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री मलघ्न नमः स्वाहा । ६८ । ॐ ह्री अनघाय नमः स्वाहा । ६९ । ॐ ह्री अनीदृशे नमः स्वाहा । ७० । ॐ ह्री उपमाभूताय नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्री दिष्टये नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्री देवाय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्री अगोचगय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्री अमूर्तीय नमः स्वाहा । ७५ । ॐ ही मूर्तिमने नम. स्वाहा । ७६ । ॐ ह्री एकम्मै नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्री नैकम्मै नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ही नानकतत्त्वहशे १ म पूजा में इसके दो नाम पृया है। आदि पुराण मे एकही नाम रक्खा है. आगे चलकर या पु. मे " मगल नाम भी दिया है जो कि स पूजा में नहीं है। - 7 M PRA- 52 -- . -- - MPAN- 2001 A . ---- । - १६९. १० नमः स्वाहा । ७९ । ॐ ह्रीं अव्यात्मगम्याय नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्री अगम्यात्मने नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्रीं योगविद नम स्वाहा । ८२ । ॐ ह्रीं योगिवन्दिताय नमः स्वाहा । ८३ | ॐ ह्रीं सर्वत्रगाय नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्रीं सदामाविने नम. स्वाहा । ८५ । ॐ ह्री त्रिकालविषयादृशे नमः स्वाहा । ८६ । ॐ ह्रीं शकराय नम स्वाहा । ८७ । ॐ ह्रीं शवदाय नमः स्वाहा । ८८ । ॐ ही दान्ताय नमः स्वाहा । ८९ । ॐ ह्रीं दमिने नम. स्वाहा । ९० । ॐ ह्रीं क्षान्तिपरायणाय नमः स्वाहा । ९१ । ॐ ह्रीं अधिपाय नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ॐ ह्रीं परमानन्दाय नमः स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं परात्मज्ञाय नमः स्वाहा । ९४ । ॐ ह्री परात्पराय नम. स्वाहा । ९५ । ॐ ह्रीं त्रिजगद्वल्लभाय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ही अभ्या नम. स्वाहा । ९७ । ॐ ह्रीं त्रिजगत्मगलोदयाय नमः स्वाहा । ९८ । ॐ ह्रीं त्रिजगत्पतिज्याघ्रये नम. स्वाहा । ९९ । ॐ ह्रीं त्रिलोकाग्रशिखामणये नमः स्वाहा । १००%८०० an . ॐ ह्रीं त्रिकालदर्शिने नम. स्वाहा । १। ॐ ह्रीं लोकेशाय नमः स्वाहः । २। ॐ ह्रीं लोकयात्र नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्रीं दृढव्रताय नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं सर्वलोकातिगाय नमः स्वाहा । ५ । ॐ ह्रीं पूज्याय नम स्वाहा । ६ । ॐ ह्रीं सर्वलोकैकसारथये नमः स्वाहा । ७। ॐ ह्रीं पुराणाय नम. स्वाहा । ८ । ॐ ह्रीं पुरुपाय नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्रीं पूर्वस्मै नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं कृतपूर्वाङ्ग- विस्तराय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं आदिदेवाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं पुराणाद्याय नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्र। पुरुदेवाय नम. स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं अधिदेवतायै नमः स्वाहा । १५ । ॐ हीं युगमुरव्याय CA --- --- -- - T n -- धाना इNT -- అes . पृ० ११७० १७० नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्री युगज्येष्ठाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री युगादिस्थितिदेशकाय नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्री कल्याणवर्णाय नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्री कल्याणाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्री कल्याय नमः स्वाहा । २१ । ॐ ह्री कल्याणलक्षणाय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्री कल्याणप्रकृतये नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्री दीप्तकल्याणात्मने नमः स्वाहा । २४ । ॐ ह्री विकल्मपाय नमः स्वाहा । २५ । ॐ ह्री विकलङ्काय नमः स्वाहा । २६ । ॐ ह्री कलातीताय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्री कलिलनाय नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्री कलावराय नम स्वाहा । २९ । स्वाहा । २९ । ॐ ह्रीं देवदेवाय नमः स्वाहा । ३० । ह्री जगन्नाथाय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्री जगद्वन्धवे नमः स्वाहा । ३२ । ॐ ह्री जगद्विभवे नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ही जगद्धितैपिणे नमः स्वाहा । ३४ । ॐ ह्री लोकनाय नम. स्वाहा । ३५ । ॐ ह्री सर्वगाय नम स्वाहा । ३६ । ॐ ह्री जगढग्रजाय नमः स्वाहा । ३७। ॐ ह्री चराचग्गुरवे नमः स्वाहा । ३८ । ॐ ह्री गोप्याय नमः स्वाहा । ३९ । गूढात्मने नमः स्वाहा । ४० । ॐ ह्री गूढगोचराय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री सद्योजाताय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्री प्रकाशात्मने नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ह्री ज्वलज्ज्वलनसप्रभाय नम. स्वाहा । ४१ । ॐ ह्री आदित्यवर्णाय नमः स्वाहा । ४५ । ॐ ह्री मर्माभाय नम स्वाहा । ४६ । ॐ ह्री सुप्रभाय नमः स्वाहा । ४७ | ॐ ह्री कनकप्रभाय नमः स्वाहा । ४८ । ॐ ह्री सुवर्णवर्णाय नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ह्रीं रुक्माभाय नमः स्वाहा । ५० । ॐ ही मर्यकोटिसमप्रभाय नम स्वाहा । ५१ । ॐ ह्री तपनीयनिभाय नमः स्वाहा । ५२ । ॐ ह्री तुगाय नम स्वाहा । ५३ । ॐ ह्री बाला भाय नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ह्री अनलप्रभाय नमः स्वाहा | ५५ । ॐ ह्री 13 HWA - -- O-06- डलरधान) -- --..- - -- TOP--- - . पू० ८ ॐ हूं। सन्ध्याघ्रभवे नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्री हेमाभाय नमः स्वाहा । ५७ । ॐ ह्री तप्तचामीकरच्छत्रये नम. स्वाहा । ५८ । ॐ ह्री निष्टप्तकनकच्छायाय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्रीं कनत्काञ्चनसन्निभाय नमः स्वाहा । ६० । ॐ ह्री हिरण्यवर्णाय नम. स्वाहा । ६१ । ॐ ह्री स्वर्णाभाय नम. स्वाहा । ६२ । ॐ ह्री शातकुम्भनिभप्रभाय नम. स्वाहा । ६३ । ॐ ह्री घुम्नाभाय नम. स्वाहा । ६४ । ॐ हूं। जातरूपाभाय नमः स्वाहा । ६५ । ॐ ह्री दीप्तजाम्बूनदद्यतये नमः स्वाहा । ६६ । ॐ हूं। सुबौतकलवोनश्रिये नम. स्वाहा । ६७ । ॐ ह्री प्रदीप्ताय नम. स्वाहा । ६८ | ॐ ह्री हाटकद्युतये नम. स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं शिष्टेष्टाय नमः स्वाहा । ७० । ॐ ह्री पुष्टिदाय नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्री पुष्टाय नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्री स्पष्टाय नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्री स्पटाक्षराय नमः स्वाहा । ७४ । ॐ ह्री क्षमाय नमः स्वाहा । ७५ । ॐ ह्रीं शत्रुघ्नाय नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं अप्रतिघाय नमः स्वाहा । ७७ | ॐ ह्री अमोघाय नम. स्वाहा । ७८ । ॐ ह्री प्रशास्त्रे नमः स्वाहा । ७९ । ॐ ह्री शासित्रे नमः स्वाहा । ८० | ॐ ह्रीं स्वभुवे नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्री शान्तिनिष्टाय नमः स्वाहा । ८२।। ॐ ह्रीं मुनिज्येष्ठाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्री शिवतातये नम. स्वाहा । ८४ । ॐ ह्रीं शिवप्रदाय नम. स्वाहा । ८५। ॐ ह्रीं शान्तिदाय नम. स्वाहा । ८६ । ॐ ह्रीं शान्तिकृते नमः स्वाहा । ८७ | ॐ ह्रीं शान्तये नम स्वाहा । ८८ । कान्तिमते नमः स्वाहा । ८९ । ॐ ह्री कामितप्रदाप नमः स्वाहा । १० । ॐ ही श्रेयोनिधये नमः स्वाहा १ मुद्रितादिपुराणेनु “ नप्तचामीकरप्रभ ", " तप्तजाम्बूनदद्युति इतिपाठ। -- nr ঞ্জুি অঙ্গুষ্ট ह्रीं ভক্ত লিগ্রাম ० । ९१ । ॐ ह्रीं अधिष्ठानाय नमः स्वाहा । ९२ | ॐ ह्री अप्रतिष्ठाय नमः स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं प्रतिष्ठिताय नमः स्वाहा । ९४ । ॐ ह्रीं सुस्थिताय नमः स्वाहा । ९५ । ॐ ह्रीं स्थावराय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं स्थाणवे नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं प्रथीयमे नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं प्रथिताय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्री पृथव नमः स्वाहा । १०० ९०० ॐ हूं। दिग्वाससे नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्रीं वातरशनाय नम. स्वाहा । २ । ॐ ह्रीं निर्ग्रन्थेशाय नमः स्वाहा । ३ । ॐ ह्रीं निरम्बराय नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्री निष्किञ्चनाय नमः स्वाहा । ५। ॐ ह्री निराशसाय नमः स्वाहा । ६ । ॐ ह्री ज्ञानचक्षुषे नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्री अमोमुहाय नमः स्वाहा । ८ । ॐ ह्रीं तजोराशये नमः स्वाहा । ९। ॐ ह्री अनन्तौजसे नम स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं ज्ञानाब्धये नम स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं शीलसागराय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्री तेजोमयाय नम. स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं अमितव्यानिपे नम. स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं ज्योतिर्मूर्तये नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्रीं तमोपहाय नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्रीं जगन्चूडामणये नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्री दीप्ताय नम स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं शवते नमः स्वाहा । १९ । ॐ ह्री विघ्नविनायकाय नमः स्वाहा । २० | ॐ ह्रीं कलिनाय नम. स्वाहा । २१ । ॐ ही कर्मशत्रुघ्नाय नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्रीं लोकालोकप्रकाशकाय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्रीं अनिन्द्रालवे नमः स्वाहा । २४ । ॐ अतन्द्रालवे नमः स्वाहा । २५। ॐ ह्रीं जागरूकाय नम. स्वाहा । २६ । ॐ ह्री प्रामामयाय नमः स्वाहा । २७ । ॐ ह्रीं लक्ष्नीपतये नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्रीं O क. -- গুল - १ पू० जगज्ज्योतिषे नमः स्वाहा । २९ । ॐ ह्रीं वर्मराजाय नम. स्वाहा । ३० । ॐ ह्रीं प्रजाहिताय नमः स्वाहा । ३१ । ॐ ह्रीं मुमुक्षवे नम स्वाहा । ३२ । ॐ ह्रीं बन्धमोक्षज्ञाय नमः स्वाहा । ३३ । ॐ ह्रीं जिताक्षाय नम. स्वाहा । ३४ । ॐ हैं। जितमन्मयाय नमः स्वाहा । ३५ । ॐ ह्रीं प्रशान्तरसशैलूपाय नम. स्वाहा । ३६ । ॐ ह्री भव्यपेटकनायकाय नमः स्वाहा । ३७ । ॐ ह्रीं मूलकत्रे नम. स्वाहा । ३८। ॐ ह्रीं अखिलज्योतिषे नम स्वाहा । ३९ । ॐ ह्रीं मलघ्नाय नमः स्वाहा । ४० | ॐ ह्रीं मूलकारणाय नमः स्वाहा । ४१ । ॐ ह्रीं आप्ताय नमः स्वाहा । ४२ । ॐ ह्रीं वागीश्वराय नमः स्वाहा । ४३ । ॐ ह्रीं श्रेयसे नम. स्वाहा । ४४ । ॐ ह्रीं श्रायसक्तिये नमः स्वाहा । ४५। ॐ ह्रीं निरुक्तवाचे नम स्वाहा । ४६ । ॐ ह्रीं प्रवक्के नमः स्वाहा । ४७ । ॐ ह्रीं वचसामीशाय नमः स्वाहा । ४८। ॐ ह्रीं मारजिते नमः स्वाहा । ४९ । ॐ ह्रीं विश्वभावविढे नमः स्वाहा । ५० । ॐ ह्रीं सुतनवे नमः स्वाहा । ५१ । ॐ ही तनुनिर्मुक्ताय नम स्वाहा । ५२ । ॐ ह्रीं सुगताय नमः स्वाहा । ५३ । ॐ ह्रीं हतदुर्नयाय नमः स्वाहा । ५४ । ॐ ह्रीं श्रीशाय नम स्वाहा । ५५ । ॐ ह्रीं श्रीश्रितपादाजाय नमः स्वाहा । ५६ । ॐ ह्रीं बीतभिये नमः स्वाहा । ५७ । ॐ ह्रीं अभयकराय नमः स्वाहा । ५८ । ॐ ह्रीं उत्सन्नदोपाय नमः स्वाहा । ५९ । ॐ ह्री निर्विघ्नाय नम. स्वाहा । ६० । ॐ ह्रीं निश्चलाय नमः स्वाहा । ६१ । ॐ हीं लोकवत्सलाय नमः स्वाहा । ६२ । ॐ ह्रीं लोकोत्तराय नमः स्वाहा । ६३ । ॐ ह्रीं लोकपतये नम. स्वाहा । ६४ । ॐ ही लोकचक्षुषे नमः स्वाहा । ६५। ॐ ह्रीं अपारधिये नमः स्वाहा । ६६ । ॐ ह्री धीरविये नमः स्वाहा । ६७ । ॐ ह्रीं बुद्धसन्मार्गाय नमः स्वाहा । ६८। ॐ ह्रीं शुद्धाय नमः G - -- . M -- ------ मंडल विधान ५० ८ १७४ स्वाहा । ६९ । ॐ ह्रीं मनृतपूतवाचे नम. स्वाहा । ७० । ॐ ह्रीं प्रज्ञापारमिताय नमः स्वाहा । ७१ । ॐ ह्री प्राज्ञाय नमः स्वाहा । ७२ । ॐ ह्रीं यतये नमः स्वाहा । ७३ । ॐ ह्रीं नियमितेन्द्रियाय नम. स्वाहा । ७४ । ॐ ह्री भदन्ताय नमः स्वाहा । ७५ । ॐ ह्रीं भद्रकृते नमः स्वाहा । ७६ । ॐ ह्रीं भद्राय नमः स्वाहा । ७७ । ॐ ह्री कल्पवृक्षाय नमः स्वाहा । ७८ । ॐ ह्रीं वरप्रदाय नमः स्वाहा । ७९ । ॐ ह्री समुन्मूलितकमाये नमः स्वाहा । ८० । ॐ ह्रीं कर्मकाष्ठाशुशुक्षणये नमः स्वाहा । ८१ । ॐ ह्रीं कर्मण्याय नमः स्वाहा । ८२ । ॐ ह्री कर्मठाय नमः स्वाहा । ८३ । ॐ ह्रीं प्राशवे नमः स्वाहा । ८४ । ॐ ह्री हेयादेयविचक्षणाय नम. स्वाहा । ८५। ॐ ह्री अनन्तशक्तये नम. स्वाहा । ८६ । ॐ ही अच्छेद्याय नमः स्वाहा । ८७ | ॐ त्रिपुरारये नमः स्वाहा । ८८ । त्रिलोचनाय नमः स्वाहा । ८९ । ॐ ह्री त्रिनेत्राय नमः स्वाहा । ९० । ॐ ह्रीं त्र्यम्बकाय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्रीं त्र्यक्षाय नमः स्वाहा । ९२ । ॐ ह्रीं केवलज्ञानवीक्षणाय नमः स्वाहा । ९३ । ॐ ह्रीं समन्तभद्राय नमः स्वाहा । ९४ | ॐ ह्री शान्तारये नमः स्वाहा । ९५। ॐ ह्री धर्माचार्याय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ॐ ह्री धर्माचार्याय नमः स्वाहा । ९६ । ॐ ह्रीं दयानिवये नमः स्वाहा | ९७। ॐ ह्री सूक्ष्मदर्शिने नमः स्वाहा । २८ । ॐ ह्री जितानङ्गाय नमः स्वाहा । ९९ । ॐ ह्री कृपालवे नमः स्वाहा । १०० %D१००० ॐ हीं वर्मदेशकाय नमः स्वाहा । १ । ॐ ह्रीं शुभयवे नमः स्वाहा । २ । ॐ ह्रीं सुखसाद्भूताय नगः स्वाहा । ३ । ॐ ह्रीं पुण्यराशये नमः स्वाहा । ४ । ॐ ह्रीं अनामयाय नमः स्वाहा । ५। ॐ ह्रीं XTIA द 18 (सिद्ध चक्र मंडल विधान ही -- . - धर्मपालाय नम स्वाहा । ६ । ॐ ह्रीं जगत्पालाय नमः स्वाहा । ७ । ॐ ह्रीं धर्मसाम्राज्यनायकाय नम: स्वाहा । ८ । ॐ ह्रीं उदिनोदितमाहात्म्याय नमः स्वाहा । ९ । ॐ ह्री व्यवहारसुपुप्ताय नमः स्वाहा । १० । ॐ ह्रीं चतुरशीतिलक्षगुणाय नमः स्वाहा । ११ । ॐ ह्री सिद्धिपुरीपान्थाय नमः स्वाहा । १२ । ॐ ह्रीं सहृतध्वनये नमः स्वाहा । १३ । ॐ ह्रीं योगकिट्टिनिर्लेपनोद्यताय नमः स्वाहा । १४ । ॐ ह्रीं त्रुटत्कर्मपाशाय नमः स्वाहा । १५ । ॐ ह्रीं परमनिर्जराय नमः स्वाहा । १६ । ॐ ह्री निष्पीतानन्तपर्यायाय नमः स्वाहा । १७ । ॐ ह्रीं अष्टादशसहस्रशालेशाय नमः स्वाहा । १८ । ॐ ह्रीं पचलवक्षरस्थितये नमः स्वाहा । १९। ॐ ह्रीं द्रव्यसिद्धाय नमः स्वाहा । २० । ॐ ह्रीं द्वासप्ततिप्रकृत्याशिये नमः स्वाहा । २१ । ॐ ह्रीं त्रयोदशप्रकृतिप्रणुते नमः स्वाहा । २२ । ॐ ह्रीं ज्ञाननिर्भराय नमः स्वाहा । २३ । ॐ ह्रीं ज्ञानकचिज्जीवघनाय नमः स्वाहा । २४ १०२४ इत्यष्टमदले चतुर्विंशत्युत्तरसहस्रनामपूजा संपूर्णा ।

4
मंडल विधान
स
मान
द्र
जर 0
मच्या
भारती :-माल केन्द्र
अपच

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Shri Siddha - Chakra - Mandal - Vidhan

Author
Shubhchandra
Title
Shri Siddha - Chakra - Mandal - Vidhan
File name
Shri Siddha - Chakra - Mandal - Vidhan
Text
OCR done
Citation
1943
Published
2010/05
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Bhartiya Shruti Darshan Kendra
DLI number
327157
Barcode
99999990002644.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
JwMFg6k5H3P
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