Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Charuduttam
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॥श्री॥ विद्याभवन-सस्कृत-ग्रन्थमाला ४६ भासनाटकचक चारुदत्तम् 'प्रकाश' संस्कृत हिन्दीव्याख्योपेतम् ब्याध्याकार- साहित्यशास्त्राचाय श्री प० कपिलदेवगिरिः चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-१
प्रकाशक -चौखम्बा विद्याभवन, धाराणसी
मुद्रक-विद्याक्लिास प्रेस, वाराणसी
प्रथम सस्करण, सवत् २०१६
मूल्य २-५०
सर्वेऽधिकारा प्रकाशकाधीना
The Chowkhamba Vidya Bhawan
Chowk, Varanasi.
( INDIA )
1960
आत्म-निषेदन प्रस्तुत पुस्तक की प्याव्या करते समय छात्रय धुनों च ममस्याओं को ध्यान में रखकर लम्य व रिल शब्दों का ममाम विधि में ही अथ बोध परान का प्रयास यिा गया। यथासम्भव भाषा को मरल और शेलीका माय बनान की चश की गई है। प्याथ्या लिखन में जिन प्रयों में महायता मिलरीह उनके लखकों व प्रकाशकों का म परम कृतन हूँ। "मक अतिरिक्त गुरुदेव श्री ५ महादेव गाना ( भूतपूर्व प्रधानाचाय म महाविद्यालय का हि वि वि ) श्री प. कान्तानार ना गात्री तैलग श्राप राममूर्ति निपाठी जी जैसे महानुभावों मै ममम ममय पर जो मकिय महयोग मिला है उमक लिए आमारपशन मात्र करना ना होगी। श्री तेलंगजी ने अपने आप परिचय में हा अमित प्ररणाओं क माय जिन तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक सामग्री का शान कराया है पर सनक स्नहगम श्राशी का प्रतीक हा वधुवर श्री शकरदेव जा अवनर न अपन प्रास्त समय में भी जिस मतर्कता के माप हिन्दी पाण्डु लिपि को प्रायन्त पहा नमक लिय उन्हें पयवाद देना उपचारमान होगा। प्रकाशक महोदय जी को बहुश धन्यवाद है जिनको प्ररणा एव दी हुई मविया म इस पाठ्मा की रचना की जा सकी है। अन्त में निवदन है कि महदय एव विज पाठक अपने मत्परामर्थ द्वारा लपक को अनुगृहीत करेंग। फाल्गुनी पूर्णिमा ग २०१६ } कपिलदेव गिरि । भूमिका महाकवि भास ख्याति-महाकवि भास संस्कृत साहित्य के प्रख्यात एव सम्मानित महा- कवियों में से हैं। कालिदास ने अपने 'मालविकाग्निमित्र' नामक नाटक की प्रस्तावना मे सूत्रधार(१) के मुख से स्पष्ट ही प्रश्न करवाया है कि प्रसिद्ध यशवाले भास, सौमिल, कविपुत्र आदि महाकवियों के प्रवन्धों का अतिक्रमण कर कालिदास की कृति का इतना अधिक सम्मान क्यों हो रहा है ? इस कथन से भलीभाति प्रतीत होता है कि कालिदास के समय में भास के नाटक अत्यन्त लोकप्रिय थे। कालिदास के बाद के कवियों ने भी भास के नाटकों का अत्यन्त सम्मान किया है। बाणभट्ट ने 'हर्षचरित' में इनके नाटकों की उत्कृष्टता बतलाते हुए कहा है कि भास ने सूत्रधार से आरम्भ किये गये, बहुत भूमिका वाले तथा पताका (रूपक की मुख्य अवान्तर घटना तथा ध्वजा) से शोभायमान देवकुलों की भांति अपने नाटकों से साहित्य-जगत् में अच्छी प्रतिष्ठा पाई। (२) राजशेखर ने 'काव्य- भीमासा' मे भास के नाटकों की अग्नि-परीक्षा तथा 'स्वप्नवासवदत्तम्' को सर्वोत्तम नाटक स्वीकार किया है। वाक्पतिराज ने अपने 'गडउवहो' नामक प्राकृतभाषा के महाकाव्य में 'जल- णमित्ते'-ज्वलनमित्र (अग्नि का मित्र) यताया है(१)। प्रख्यात मालकारिक जय- देव ने भास को प्रसन्जराधव' की प्रस्तावना में कविताकामिनी का हासमाना है(५)। (१) प्रथितयशसा भाससौमिविपुमादीना प्रबन्धानतिकम्य कथ वर्तमानस्य कवे कालिदासस्य रुती बहुमान (मालविकासिभित्रम् ) (२) सूत्रधारकतारम्भैर्नाटकै भूमिकै । सपतार्यशो लेभे भासो देवकुलैरिव ॥ (हर्षचरितम् ) (३) भासनाटकचकेऽस्मिन्छेकै क्षिप्ते परीक्षितुम् । स्वप्नवासवदत्तस्य दाएकोऽभूम पावक ॥ (काव्यमीमासा) (४) भासम्मि जलणमित्ते कन्तीदेवे तदावि रहुआरे। सोपन्धवे अ बन्धन्मि हारि भन्दे अ आगन्दो ॥ (गटउवदो.) (५) यस्याश्चौरविकुरनिकर- कर्णपूरो मयूरो भासो हास कविकुलगुरु कालिदातो विलास । एपो हो हदगवसति पश्चराण स बाण केषा नेपा कथय कविताकामिनी कौतुकाय ॥ (प्रसाराघव) - उपयुष विशपों में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि भनीन कार में मवमाधारण कधीच भाम कम्पकों की अधिस गयानि ज्वं प्रचार था और उनक पृहद नाटक घर में स्वप्नयामबदत्तम् प्रधान था। मंस्कृत माहिरप क कविण्यात परिहाने पर भी बहुत दिनों नक विद्वानों क मध्य भाम का केवल नाम ही मुना जाता था। इनक समय, प्रयतथा जीवनपुत्र करिषय में ऐनमान भी ज्ञान नहीं था। कयल अनेक मम्कृत काम्या और नाटकों में उना भामोलण्य उरण पर ही अनुमान किया जाता याकिमतीतकार में भाम नामर काई प्रग्यान नाटककार हो गया है। पुनी रिथनि अनक काम्यों की है जिनका कपए नाममात्र ही प्रवगोचर होता जम कामरण' 'जाम्बवती विजय आदि परन्तु महामामाग्य की बात है कि १९१२ ० में ट्रावनकोर क ५० श्री टी० गणपनि पानी ने एवप्नवासवदत्तम् आदि तेरह माटका का अन्वेषण कर अनन्तगायनप्रथमाला में प्रकाशित कराया भार उहमाम का मंदिग्ध कृमि यतलाई । उनी ममय स माम और उनक रूपरों की चर्चा माहिरय मसार वं मादय विद्वानों में होने लगी। श्री शास्त्री जी द्वारा अनुमधान किए गए सरह नाटकों में कवर स्वप्नवासवद्वत्तम् भामरुन हो नरना, क्योंकि राजनगर क पूर्वाण निदशक अतिरिन आघाय अभिनय गुप्त ने भी 'अभिनयभारती म इस नाटक का उल्लेग दिया है। किन्तु सप म्पकों को माम की रचना स्वीकार करने में कोई भी उत्कृष्ट प्रमाण नहीं ण्मा कुछ दिनों का मन है। मितु श्री शास्त्री जी ने इन स्पों की प्रामाणिकना मिद करने क लिय जो अकाटय युनियाँ दी। उनमें काका रेशमात्र भी कारण नहीं है। प्रारणामुमार इसकी चर्चा धागे का जायगी। भास का समय महारुषि कालिदास न अपने नाटक मालविकाग्निमिय में भाम का यह मम्मान मे नामोल्लेख किया है जैसा कि उपर निर्देश दिया जा चुका है। इससे यह सिद्ध एव मुस्पष्ट हो जाना है कि भाम कालिदास में प्राचीन थे। कालिदास कममय के विषय में विद्वानों में मताय नहीं है। कुछ लोग महाकवि का समय 1800 ई० यताते है। उनक कथनानुमार मास ४००ई० मे प्राचीन होते है। कुछ विद्वान् कालिदाम की स्थिति प्रथम शतर निधिन करते हा उन भाधार पर भाम ईमा प्रथम शतक स प्राचीन होते हैं। भाम को इतना सबमाय हाने में कि कालिदाम जये महाकवि भी उनका नाम गौरय प्यं प्रतिष्ठा से लें, अवश्यमेव एक निश्चित समय लगा होगा। भास के १३ नाटकों के आविष्कारक एव आश्रयदाता श्री गणपति शास्त्री ने भास को पाणिनि और चाणक्य से भी प्राचीन बतलाने का प्रयत्न किया है। सैनिको को लडाई के लिये प्रोत्साहित करने के प्रसङ्ग में चाणक्य ने अपने 'अर्थशास्त्र' नामक ग्रन्थ में 'अपीह श्लोको भवत' का उल्लेख कर जिन दो श्लोकों को प्रमाणकोटि में स्थापित किया है उनमें से एक भास के प्राप्त प्रतिज्ञायोगन्धरायणम्' में उपलब्ध होता है। ऐसा ज्ञात होता है कि उक्त श्लोक को चाणक्य ने भास के नाटक से लिया है। इतिहासकारों ने चाणक्य का समय ई० पू० ४०० निश्चित किया है। एतदर्थ भास ई० पू० ४०० से अर्वाचीन कदापि नही स्वीकार किए जा सकते। भाल के द्वारा रचित 'प्रतिमानाटक' में रावण के बृहस्पति(२)कृत अर्थशास्त्र में दक्षता प्राप्त करने का उल्लेख किया गया है। बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र चाणक्य से भी पहले का है। यदि वे कौटिल्य से बाद के होते तो बृहस्पतिरचित अर्थशास्त्र की जगह चाणक्यरचित अर्थशास्त्र का नामोल्लेख मिलता। वाहस्पत्य अर्थशास्त्र यह निर्देश करता है कि भास चाणक्य से भी प्राचीन थे। प्रयोगों की अपाणि- नीयता यह बतलाती है कि पाणिनि के सर्वसम्मानित पद पर प्रतिष्ठित होने के पूर्व इन नाटकों का निर्माण हुआ था। कालिदास के प्राकृतों की अपेक्षा भास के प्राकृत अतीव प्राचीन प्रतीत होते हैं। भास के रूपको से प्रतिभासित होनेवाली सामाजिक दशा मौर्यकालीन सामाजिक दशा के अनुरूप है। उक्त प्रमाणों के आधार पर भास का समय कम से कम ई० पू० पाँचवीं शताब्दी निश्चित होता है किन्तु अधिकाश समीक्षक इस सिद्धान्त से सहमत नहीं है। वे भास तथा चाणक्य के पद्य को किसी दूसरे ग्रन्थ का सङ्कलन बतलाते हुए उक्त मत को अप्रामाणिक सिद्ध करते हैं। प्राकृतभाषा की आलोचना के आधार पर ढा० लेस्नी, सुखथनकर इत्यादि पाश्चात्य और पौरस्त्य विद्वानों ने भास को कालिदास से तो प्राचीन बतलाया है, पर अश्वघोष से अर्वाचीन। साथ ही वे यह भी कहते है कि अश्वघोष की प्राकृत की छाया भास के रूपकों में पाई जाती है। उक्त विद्वानों की निजी धारणा के अनुसार कालिदास का समय पञ्चम शताब्दी था और वे अश्वघोप से बाद के कवि थे। अतएव वे कालिदास और अश्वघोष के मध्यकाल में (१) नव शराव सलिले सुपूर्ण सुसस्कृत दर्भहनोत्तरीयम् । तत्तस्य मा भून्नरक च गच्छेत् यो भर्तृपिण्डस्य कृते न युध्येत् ।। (२) मो कश्यपगोत्रोऽस्मि, सागवेदमधोये, मानवीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर योगशास्त्र, बाईस्पत्यमर्थशास्त्र, प्राचेतस श्राद्धकल्पञ्च ।
(४) भाम की स्थिति मानकर उनका समय नृतीय शताब्दी स्वीकार करते हैं। माम के नाम के माय जिन नाश का उल्लेख किया गया है उनका रेषक कोई भज्ञात दक्षिणी कवि होना चाहिय जिमफी स्थिति ईमा के याद सप्तम नाम्दी में दहाती हा मायान्ताह पर इस मन म भी विरजन रपि नहीं देते। श्री री० गणपति तानाजी ने अनक प्रमाणा से यह प्रमाणित किया है कि मासकर ६० पू० चौथी सादी म हुए थे और जय शास्त्री जी कशरा दिय गय प्रमाणों का पण्डन करन के लिए कोई प्रयल प्रमाण उपल ध नहीं है ता. पोथी शनादी का ही स्वीकार करना पुतियुक्त होगा। जीवनी भामक द्वारा रचित नाटकों क आदि या अन्त में कहीं भी ऐयक का नाम निर्देश नहीं ह। एमी स्थिति म महारवि भास क जीवन का रहस्योद्घाटन करना सहज काय नहीं। पर उनक प्रयों का पर्यवेक्षण करने से जो निष्कर निकरताह उमीक आधार पर कवि की जीयनसम्पधी घटना पर किचित् प्रकाश डाला जा सकता है। श्री एमालकर जी की शादायली में 'भास धमभीर दाह्मण था। दक्षिण क नहीं यक्षिक उत्तर भारत के अधिवासी थे। इसक प्रमाण म स्वप्नवासवदत्तम् और 'बालचरित का भरतवाक्य प्रस्मत इमां सागरपय तो हिमवध्यिकुण्डलाम् । महामझातपात राजसिंह प्रधान न । प्रस्तुत भरतवाक्य में कवि परमात्मा से प्राथना करता है कि जिम पृथ्वी के धानो हिरमों में हिमालय तथा विध्य पर्वत दो कुण्डलों की भांति सुशोमित है, हमारे राजा समागरा उस वसुधराक मभ्य एकछत्र राज्य करें। प्रकृत श्लोक में हिमालय तथा विध्य पवत को भगवती वमुघरा के फ्ण कुण्डलों उपमा दी है। भाम मे दक्षिण कण (कान) विध्य तथा वाम कर्ण हिमगिरि कल्पित किया है। माम की घसुधरा का विस्तार पूर्व से पश्रिम पय्यन्त है। उनकी पृप्वी उत्तर में हिमालय पर दक्षिण में विनय पय्यन्त है। यही पृथ्वी भास की पृथ्वी थी। इसी सीमा क अदर कहीं कवि का स्थान था। भास वर्णाश्रम-धर्म क पक्षपाती या देवता तथा इसे सम्बन्धित स्तोत्रों में उनकी आस्था थी। गीको मी घे सम्मान की रटिसे देखते थे। वे किसी राजा के रामपण्डित थे। भास न अपने राजा को 'राजसिंह शम से अभिहित किया है। यह शब्द किसी व्यक्ति की सजा या साधरणत राजमात्र का योधक यह बात नहीं है। भास राजघराना व राजकीय जीवन से सुपरिचित थे। वे हास्यप्रिय तथा नन्न प्रकृति कथे। वे धावचीत की कला में निपुण मानव स्वभाव सपा प्राकृतिक मुदरता के प्रेमी एवं चतुर पारखी थे। सम्भव है कवि का पारिवारिक जीवन आनन्दपूर्ण एवं सुख-शान्तिदायक रहा हो। वे कर्तव्यपरायण पुत्र के पिता, साध्वी पत्नी के पति तथा सतानप्रिय पिता थे । अविभाजित कुटुम्बप्रणाली के परिपोषक एवं गुरुजनों की प्रतिष्ठा करनेवाले थे। कवि के जीवन में आशा का प्रतिबिम्ब तथा राष्ट्रीय भावनाओं की अभिव्यक्ति उपलब्ध होती है। वे स्वतन्त्रता तथा न्याय- परायणता के पक्षपाती एवं वैष्णवधर्मावलम्बी थे। इन विशेषणों के आधार पर यही कहना पडता है कि भास सस्कृत साहित्य के एक विशिष्ट अध्येता एवं सर्वतोमुखी प्रतिभासम्पन्न कवि थे। ग्रन्थ महामहोपाध्याय गणपतिशास्त्री जी ने भास के जिन तेरह रूपकों की खोज की है वे निम्नलिखित हैं १ प्रतिज्ञायौगन्धरायणम् , २ स्वप्नवासवदत्तम् , ३ प्रतिमानाटकम् , ४ रानम् , ५ अभिषेकनाटकम् , ६ मध्यमन्यायोगः, ७ अविमारकम् । ८ चारुदत्तम् , ९ कर्णभारम् , ३० दूतवाक्यम् , ११ दूतघटोत्कचम् , १२ अरुभङ्गम तथा १३ बाल- चरितम् । प्रतिज्ञायौगन्धरायण-प्रतिज्ञायौगन्धरायण में कौशाम्बी के राजा पत्सराज उदयन द्वारा उज्जयिनी के राजा प्रयोत की पुत्री वासवदत्ता के हरण की कथा है। आखेट के प्रेमी राजा उदयन के कृत्रिम हाथी के छल से महासेन द्वारा पकडे जाने पर उदयन का मन्त्री यौगन्धरायण राजा को वन्धन से मुक्ति दिलाने और कुमारी वासवदत्ता के साथ उनका पाणिग्रहण कराने की प्रतिज्ञा करता है। मन्त्री की दृढ प्रतिज्ञा तथा कुटिल नीति का यह सर्वोत्कृष्ट निदर्शन है। इसी के आधार पर इस रूपक का नाम 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण' पड़ा है। ७५ स्वप्नवासवदत्तम्-भास की सभी कृतियों में यह सर्वोत्तम रचना है। इसे प्रतिज्ञानाटिका' का उत्तरार्ध ही समझना सगत एव उचित होगा। इस रूपक में राजा उदयन का वासवदत्ता के साथ स्वप्नावस्था में योग होता है। इसी आधार पर इस रूपक का नाम 'स्वप्नवासवदत्तम्' रखा गया है। प्रद्योत के राजमहल से वासवदत्ता का हरण कर लाने के बाद राजा उदयन विषयवासना में लिप्त हो जाता है और राजकीय कर्तव्यों में किसी प्रकार की रुचि नहीं लेता। ऐसी दशा में विरोधियों का होना स्वाभाविक ही है। राजो अरुणि को आक्रमण करने का सुअवसर मिल जाता है। उदयन को अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिये मगधनरेश दर्शक की सहायता लेना अत्यावश्यक होता है। यौगन्धरायण वासवदत्ता के अग्नि में जल मरने का मिथ्या समाचार फैलाता है, परन्तु वास्तव में उमरे जार मगध के रामादाम की भगिनी पनापती में संरक्षण में रण भामाहाकालान्तर में पामराज का पावनी माप शुम विवाद हो जाता। एक दिन राजा यामयदना को स्वप्नायम्पा में पता है और उममे मिलन के लिप अग्यन्त उस्मुक हो जाता है। उसके जीवित होने में विधि विधान होने गना है। बाद में वामयदना मा के समय साइ जाती है और दोनों का भानन्द मिलन होता है। इस विधि मे हमरपक का मुगमय पपवमान होता है। भनिमानाटक-म म्पक का आधार रामायण की कया है। इसमें राम बनगमन मीताहरण आदि अयोध्याकाण्ड से प्रारम्भ होकर रायशवध पर्यन्स को घटनाका बनाया गया हा इस नाटक के आधार पर भसीन भारत मलरितकलासम्बन्धी नना चहा मल्यान किया जा सकता है। अतीत काल में भारतीय नाकाकुल हाले । जिनमें मानव शरीर पलनक बाद राजाना की प्रग्गर का यही मूर्तियारली जाती थीं। इवाकुवश क नर' का भी दवा या निममें दिवगत पार्भा की प्रतिमायें रखी जाती का राजा राय की भी मूनि दषपुर में रखी गई है। भरत ने अपने मामा क घर में खाटते समय नगर से बाहर देवकुल में रेपी दुई अपने पिता दारथ की प्रतिमा को दमकर उनकी मृत्यु का अनुमान स्चय ही कर लिया। इसी प्रतिमा के आधार पर इस रूप का नाम प्रतिमानाटक है। पराम-महाभारत की कथा की एक घटना का लकर इस नाटक की रचना हुई दुर्योधन यज्ञ में गढ द्रोणाचाय को मनोवाछित वक्षिणा दनक लिय उचन होता है। दाणाचार्य न पाण्डवों के निमित्त भाषा राज्य देने के लिए कहा-इस शन पर मिपाच रानियों के भीतर पांडव मिल जायगे तो वह उहरायव दगा । द्रोणाचार्य इस प्रतिमा को स्वीकार करते हैं। चार में गोहरण क उपलक्ष्य में कारय राजा विराट की राजधानी पर आक्रमण करते हैं। रानमार उत्तर कोरयों में युद्ध करने के लिए चल दता है। ऐसी स्थिति म अमानावस्था में स्थित अजुम की महायता पाकर उसर की विजय होती है। पाण्डस समय के साथ प्रकाश में आते है। द्रोणाचाय दुर्योधन को पुचकृत प्रतिभा का स्मरण दिलाते हैं। दुर्योधन उन्हें बाधा राग्य दे दना है। महाभारत की कथा में कोई मगति म मिलने में यह घटना बशत कविप्रतिमा की उपन प्रतीत होती है। अभिषेक-इस नाटक म किष्कि धाकाण्ड मुदरकाण्ड लकाकाण्ड तथा राम करायाभिषेक पयन्स की कथा घणित है। इसा राज्याभिषेक के कारण उपत नाटक का नामवभिषेक' पदाहा मध्यमस्यायोग-इस नाटक में पादुपुत्रों क बनवास के समय घटोत्कच के ७ हाथों से भीम द्वारा एक ब्राह्मणबालक की सुरक्षा की कथा वर्णित है। व्यायोग शब्द नाटकों का एक भेद है। मध्यम शब्द भीम और उस ब्राह्मण बालक के लिये प्रयुक्त हुआ है, जिसे भीम ने घटोत्कच के क्रूर हाथों से बचाया था। अतएव इसका नाम 'मध्यमव्यायोग' रखा गया है। अविमारक- इस रूपक में सौवीर राजा के पुत्र विष्णुसेन, जो अविमारक के नाम से प्रख्यात है तथा राजा कुन्तिभोज की लड़की कुरङ्गी के विवाह और प्रणय की घटना का उल्लेख किया गया है। सम्भव है किसी अतीत परम्परागत आख्यायिका को प्रकृत नाटक का रूप दिया गया है, जिसका निर्देश कामसूत्र में पाया जाता है। विष्णुसेन ने भेडरूपधारी 'अवि' नामक दैत्य को मारा था। इसलिये इस नाटक का नाम 'अविमारक' रखा गया है। दरिद्वचारुदत्त इस रूपक में ऐश्वर्यहीन पर चरित्रवान् विप्र चारुदत्त और गुणग्राहिणी चाराङ्गना बसन्तसेना की प्रेमलीला वर्णित है। कर्णभार, दूतवाक्य, दूतघटोत्कच तथा अरुभङ्ग महाभारत के महत्वपूर्ण तत्तत् घटनाचक्रों से उक्त नाटक सम्बन्ध रखते हैं। भास की कृतियों को विषयानुसार पाच भागों में वाटा जा सकता है- रामायण पर आधारित नाटक, महाभारत पर आधारित नाटक, भागवत- कथाश्रित रूपक, लोकप्रचलित कथा पर आश्रित नाटक और उदयन की कथा से सम्बन्धित नाटक । प्रामाणिकता म०म० श्रीगणपति शास्त्रीजी द्वारा अनुसन्धान किये गये तेरह नाटकों की प्रामाणिकता में विद्वानों में मतभेद है। कुछ लोग भासकृत प्रचलित नाटकों को उनकी वास्तविक कृति न मानकर उनके नाटकों का संक्षित रूप मानते हैं। कुछ लोग उपलब्ध नाटकों के कुछ भागों को तो भास की रचना और कुछ अश को किसी अन्य की कृति वसलाते हैं। साथ ही साथ यह भी कहते है कि भास के नाटक अपूर्ण अवस्था में मिले थे; सभव है किसी अन्य कवि ने उन्हें पूरा किया हो। कुछ विद्वान् 'स्वप्नवासवदत्तम्' को तो भासकृत मानते है, पर शेष नाटकों को, जो भास के नाम पर प्रचलित है, उनकी कृति मानने के लिये कदापि सहमत नहीं हैं। परन्तु इन बातों का उचित उत्तर देने के लिये (शास्त्रीजी, पूज्यपाद श्री वलदेव जी उपाध्याय तथा (8)श्री कान्तानाथ जी (१) देखिये-~म म गणपति जा शास्त्री कृत 'स्वप्नवासवदचन्' आदि नाटकों की भूमिका । (२) देखिये-सस्कृत साहित्य का इतिहास (उपाध्याय जी कृत)। (३) देखिये-स्वप्नवासवदत्तन की भूमिका (श्री तैलगशास्त्रीजी कृत)।
तेहग आदि विद्वानों ने अनेक प्रमाण वं युलिया प्रस्तुत की है। उनका कहना है कि नाटकों क रखनासारय भाषावि यास तथा कुछ विशेषताओं पानि पर दिरात करने से यह प्रतीत होता है कि इन तेरह माटका का निर्माता पर ही कविह। इन विद्वानों ने प्रामाणिकता क पा में जो युतिया एवं सम्मितियां दी ह उनका सारांश निम्नलिगित ह- () भास के नाम पर प्ररयात एवं प्रचरित सब नाटक 'नान्यन्ते तत प्रविशति सुप्रधार से भारम्भ होते ह । अनन्तर सूत्रधार रामश्च पर भाता है और मालगान करताहा (आ) भाम के नाटकों में सवत्र प्रस्तावना के स्थान पर स्थापना' का प्रयोग किया गया है परतुन तो उनमें कवि का नामोल्लेख है भार न नाटक काही विशेषतायें भारतीय नाटपान की परम्परा की प्रसिद्धि होने से पूर्व काल की ओर सकेत करती है। (स) प्रत्येक प्राय की समाठि में भरतवाक्य के माध्यम से प्रार्थना म 'महीमेकासपत्राका राजसिह प्रथास्तुन या बय किसी तत्सम पय का प्रयोग किया गया है। नाटक का आयरत एक सा है। पहुत से नाटकों के भारम्भ में मुद्रालार के माध्यम से प्रमुख प्रमुख पात्रों का नामनिर्देश किया गया है। (१) भाषा छन्द पद्य भाव कस्पना और घटना आदि प्राप' सब नाटको में समान है। बहुत से अलकार-शास्त्र के रचयिताओं ने भी भास के माटकों से पद्य उद्धत करके अपने प्रयांकी प्रतिष्ठा बढ़ाई है। वामन, दण्डी, आचाय अभिनव गुप्त आदि कवियों ने उनके किसी न किसी श्लोक आदि को उखरण की कोटिम रखा है। (3) भासकृत नाटकों में प्रयुक्त अनेक अपाणिनीय प्रयोग भी इनकी रचनामों की प्रामाणिकता एष प्राचीनता में सहयोग देते है। डामेक्स जीनोनेव यदि का कथन है कि प्रचलित नाटकों में भरतमनिप्रणीत भाव्यशास में वर्णित माटक के नियमों का उएलधन किया गया है जैसे - ऊभा में पांघन की मृत्यु मञ्च के ऊपर दिसलाना प्रतिमा' म राम के द्वारा याली का वध बमच के ऊपर दिखलाना आदि घात शास्त्रीय परम्परा के विरुद्ध हा उक्त प्रथा उस युग की ओर संकेत करती है जब कि भरतमुनि का यह नाटषशास्त्र साहित्य समाज में पर्णस्पेण प्रतिक्षित एवं विकसित नहीं हो सका था। इस आधार पर यह भी कहना उचित होगा कि उक्त नाटकों का निर्माता एक ही कवि रहा होगा और वह मास के अतिरिक्त दूसरा नहीं है।
नाट्यकला भास के नाटकों में मनुष्य जीवन के विविध रूपों का पर्यवेक्षण करने का भरपूर अवसर उपलब्ध होता है। अतएव उनके रूपों में विविधता एवं सर्वतो. मुखी प्रतिभा की झलक विशेषत दिखाई पड़ती हैं। दूतवाक्य, मध्यमन्यायोग, दूतघटोत्कच, कर्णभार और उरुभा 'एकाकी' नाटक की श्रेणी में आते हैं, पर प्रतिज्ञायौगन्धरायण, स्वप्नवासवदत्तम् , प्रतिमा इत्यादि पूर्ण विकसित नाटक माने जाते हैं। इनके सव नाटक बदी सरलता से रङ्गमञ्च पर खेले जाने योग्य बने है। अभिनेयता इन रूपकों को सबसे बड़ी विशेषता है। इन नाटकों में न तो वर्णन की प्रचुरता पायी जाती, न अनावश्यक कथावस्तु का विस्तार ही, जो अभिनेताओं की अभिनय-कला की गतिविधि के प्रतिरोधक है। भिन्न-भिन्न अवस्था में भिन्न-भिन्न भावों और विषयों के सूक्ष्म वर्णन मे भास सिद्धहस्त हैं । वाग्वाहुल्य से मानों उनका स्पर्श ही नहीं है। इनका नाटक सुव्यवस्थित, सुसङ्घटित और चुस्त है। पान्नों के सवाद भी नपे-तुले शब्दों में हैं। पात्र उपयुक्त वातों को चुने हुए शब्दों में कहना अधिक पसन्द करते हैं। वे अनुपयुक्त बकवाद नहीं करते। भास सवादकला के विशेषज्ञ हैं। ये भली-भाति जानते हैं कि कौन ज्यक्ति किस परिस्थिति में क्या कहेगा या कहना चाहेगा। वे मनुष्य के अन्तर्द्वन्द्र को सीधी भाषा में सरलता से व्यक्त कर देते हैं। अतएव भास के नाटक शास्त्र की दृष्टि से सुबोध, अभिनेय और सरल हैं। शैली भास की शैली अपने ढग की निराली है। भाषा प्रभावोत्पादक और मुहाव रेदार है। इनकी भाषा में जगह-जगह स्वभावोक्ति का पुट भरा मिलता है। इन्हें लम्बे लम्बे समस्त पदों का प्रयोग पसन्द्र नहीं है। यद्यपि गद्यकाच्यों और महाकाव्यों में क्लिष्ट भाषा एव समासयुक्त पदों की प्रचुरता दृष्टिगोचर होती है तथापि नाटक के लिये वह सर्वथा अनुपयुक्त है। नाट्यशास्त्र के लिये भाषा की सरलता, सरसता, स्फुटता, प्रसन्नता, गम्भीरता, मधुरता, मनोरञ्जकता आदि अपेक्षित हैं। भास के विचार और भाव उच्च तथा हृदयङ्गम करने योग्य है। इनकी भाषा में सरलता है। कथोपकथन और कवित्व की दृष्टि से भी इनके नाटक सस्कृतसाहित्य के किसी भी सर्वसम्मानित कवि और नाटककार से कम नहीं है। कालिदास जैसे प्रख्यात महाकवियों में भी, माधुर्य, प्रसाद आदि गुण उपलब्ध होते हैं, पर भास की रचना में ये गुण पूर्णरूपेण विकसित हुए है। इनके पद्य और गद्य दोनों प्रशसनीय है। इनकी शैली और भाषा उस युग की ओर निर्देश करती है, जब सस्कृत जनसाधारण की भाषा थी। - - (१०) भास की धणनकला यड़ी मोर और अपने वा की भनोती है। जैम नाटक कामा भाषा है वैसे ही उक्तिमकार भी। भाम का उक्तिमकार भी विचित्र है, जैम स्वीकृपया आम तथा 'यादम' का प्रयोग 'पदि तथा 'घेत का प्रयोग, पुवाल प्रश्न के रिय सुरमायस्य' आदि का प्रयोग । कालिदास, भवभूति भादि कवियों ने इनके प्रर्या की छाया से स्वस्त्र प्रन्यों की प्रतिमा यहाईहा भास रचित 'अविमारक' नाटक म पर्णित मध्याह में भगवान भास्कर के अपर तापस तपे हुए संसार को देखिये- भयुष्णा चरितेव भास्करकरेरापीतसारामही परमार्ता इव पादपा प्रमुपितच्छाया दवाग्न्याश्रयात् । विक्रोशनयवशादियोतिगृहाण्यासानना पयता लोकोऽय रविपाकनष्टहदयः संयाति मूर्षामिय ॥ इस मध्याहकालीन घणन की 'मालविकाग्निमित्र' के पत्र छायासुहसा भादि कालिदास के मध्याह्नवणन से समता कीजिए। अन्तर इतना ही है कि कालिदास राजा के उद्यान में पदे है और भास जगल में। भास ने अपने स्वप्नवासवदत्तम् में तपोभूमि का पणन निम्नलिखित प्रकार से किया है- विसम्ध हरिणावर त्यचकिता ऐशागतप्रत्यया पृक्षा पुष्पफलः समृद्धविटपा सर्व दयारक्षिता । भूयिष्ठ कपिलानि गोकुलधनान्य क्षेत्रवत्यो दिशो निसदिधमिद सपोषनमय धूमो हि यहषाश्रय ॥ भासक द्वारा रचित तपोवन के घणन को पाकर 'अभिज्ञानशाकुन्तल में वर्णित कालिदास के तपोवन के भाभोग की स्मृति जागृत हो जाती है। स्वेच्छया इतस्तत विचरण करनेवाले हरिण दोनों को भाकर्पित कर रहे है। भवभूतिरचित उत्तररामचरित' के दूसरे भर का भात्रेयी सवाद 'स्वप्न वासवदत्तम्' के प्रथम मद के विद्याधरसवाद की प्रतिकृते या छाया कहा जात सकता है। भास यहिजगत् और अन्तर्जगत् के चित्रों को चित्रित करने में सिद्ध हस्त हैं। उदाहरणाय स्वप्न नाटक का प्रयाक मष्टम्य है। भास के रूपक अनस मनोरम चिन्नों से चित्रित एव सुसज्जित है। अस्तु इस लघु निबन्ध म महाकवि की बहुमुखी प्रतिमा एवं गुणों को लिपिवन करना माश जन के लिये मशरय है।
। पात्र-चरित्र-चित्रण भास के पात्र आकारमात्र नहीं, अपितु सजीव प्राणी हैं। उनका चरित्र इतना विशद एवं उत्कृष्ट है कि वे साहित्यसंसार में सदैव अमर रहेंगे। चारुदत्त चारुदत्त प्रस्तुत रूपक का नायक है, जो एक उज्जयिनी के ब्यावसायिक ब्राह्मण के रूप में उपस्थापित किया गया है। यह अपनी परोपकारी प्रवृत्ति एव असाधारण गुणों के कारण सवको प्रभावित करता है। वह जात्या तो ब्राह्मण है पर कर्म से वैश्य है। वह सार्थवाह का पुत्र और स्वय भी सार्थवाह (व्यापारियों के काफिले का मुखिया या नेता) है। एतदर्थ दूसरे अङ्क में जव चेटी वसन्तसेना से यह जानने के लिए अभिलाषा प्रकट करती है कि 'क्या विद्याविशेष से रमणीय किसी ब्राह्मण को चाहती हो? तो वह उत्तर देती है 'पूजनीय खलु स जन' अर्थात् नहीं (पृ० ५३)। तथापि वह ब्राह्मणपुत्र चारुदत्त से अपना प्रणय-सूत्र जोडती है। I एकमात्र कारण यही है कि वह किसी ऐसे विन से अनुराग नहीं करती जो जाति तथा कर्म दोनों प्रकार से ब्राह्मण है । उसके हृदय में ऐसे पुरुष की प्रतिमा विराज रही है जो जन्म से ब्राह्मण है पर कर्मणा वैश्य । वह रूपवान् एव गुणसम्पन्न ब्यक्ति है। दूसरे अङ्क में संवाहक आर्य चारुदत्त का परिचय देते हुए वसन्तसेना से कहता है 'आकृतिमान् अविभ्रमन् अनुस्सिको ललित.' इत्यादि (पृ०६१)। वह सगीत विद्या का प्रेमी एव चतुर पारखी भी है। इसीलिये तीसरे अङ्क के आरम्भ में वह विदूषक से वीणा की भूरि-भूरि प्रशसा करता है, वह शरणागत-वत्सल है। वह वसन्तसेना को जो राजश्यालक (शकार) से त्रस्त है सुरक्षा का वचन देता है (पृ०५८)। चारुदत्त पहले धनवान् था। पर वह अपनी असीमित उदारता एव, चूत (जुआ) की प्रवृत्ति के फलस्वरूप शीघ्र ही धनहीन हो जाता है। वह इतना निर्धन हो जाता है कि वह अपने महल की आवश्यक सफाई भी नहीं करवा पाता । उसके घर की देहली पर तृण एव यव के अङ्कुर तक निकल आये हैं (पृ०१२)। उसे अपनी गरीवी पर पश्चात्ताप होता है। फिर भी अपनी इस दरिद्रमयी परिस्थिति में पार्श्ववर्ती वायुमण्डल का सूक्ष्म निरीक्षक वना रहता है। इस उजाड परिस्थिति में उसे मित्रों में अपनी उपेक्षा का कटु अनुभव होता है (१४)। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि 'पाप कर्म च यत् परैरपि कृत तत्तस्य सम्भाव्यते', 'दारिद्रय पष्ठ महापातकम्' और 'सर्व शून्य दरिद्रस्य' इत्यादि । लेकिन इतने पर भी उसे सन्तोष इस बात पर है () कि यह हम दीनहीन दशा में अपन बोरिक सन्तुलम को पा नहीं दिया:- 'माधम परिप्रष्ट पद्दरिदपु दुखमम्'। धादत स्वमावन गम्भीर तथा उदार है। जब भी उस कोई मकाय ज्य मनोरम मवा की सूचना दताह तो यह उसे पुरस्कार देता हा कणपूर उसका स्तहा पहिररयामा वस्तु की वह एक पवित्र ज्य मरवणीय दम्प ममाना है। वम तमना क पास प्रपित की गई 'मुक्तापली इस बात की माली हा वाग्दत्त अपनी रिद्रावस्था में भी मित्रों का क्यन या अपराधों पर सुझलाना नहीं अपितु उसको सहन कर लेता है। विदूषक (मैत्रय) अकार की चारी का उत्तरदायित्व उसी क माये माता है और अपन यह कह कर बगहा जाता है कि माछा किया कि अलकार आपको व दिया' (पृ०९७)। परनु चारदत्त उमक उपर कोधिस हाने की अपमा कपडइतना ही कहकर मन्नाप करताह-इन्त हतं भुषणमाण्डम् । पारदस बीर स्वभाव का व्यक्ति है। जब विदूषक रस सूचित करता है कि कार घमतमना को घर म निकालन की धमकी ६ गया है तो वह उस कपल उपहा भाव से मुन एता ह । इस प्रकार अनेकानेक यनिक गुणों के माम माप दी-इवनाओं में निष्ठा की भी मात्रा पर्याप्त रूपम पाते है। जब विदूषक मान कामादि दवताओं की अर्चना में अथवापर करता है तो यह कहता है-मून! ययाविभवनाप्यताम् । भक्या मुप्यन्ति देवतानि' इत्यादि (पृ. ३३)। यह माग्यवादी है। प्रथम अंक में विदूषक क साथ बातचीत करते हुए यह कहता है कि पन भाग्य कमनुमार हाते रहते हैं (५)। चारुदत्त विलामप्रिय व्यक्ति है। यह प्राह्मणी' जैसी पानी को पाकर भी रूप एव यौवन म मम्पन्न घमन्तसेना को हृदय से प्यार करता प्रस्तु पाह स्मरणीय है कि यह वमन्ससेना पर मोहिन होने पर भी अपने गार्हस्थ्य जीवन एवं धम को भूली नहीं देता। उसे ब्राह्मणी जैमी पानी तथा विदपक जैन मित्र का विनय गौरव पास है। वह स्वयं इसकी प्रशंसा करता है-किसाह वरित यस्य मम-विभवानु दशा मार्या -इत्यादि (१७)चारवत्त में एक धनुर नागरिक का गुण है। उसे मालम है कि अपनी प्रेयसी को किस मांति अनुकूल बनाया जा सकता है। यह ज्ञात होने पर कि जिसे बह रनिका ममझ रहा था वह यमन्समेना है वह उससे कहता ह यदवमहमपि सायद विजातमयुगेन प्रेयसमुदाचारेण सापराधो भवती प्रसादयामि (१०१)। घमन्तसेना भी उसको हृदय से चाहती थी इसका स्थय उसे पता है। विदूषक घमन्तमना के समक्ष ही उसे कहता है-भो चारुदत्त । वमन्न मेमा बस्वियं या भवता कामदवानुवानप्रति नयनमानमस्ता सन्निहित मनोमग सपनोसते । सपरमलिमाम ( He sy) पसनालेना TIT बासना कोई परमही ऐसी मरिक सारथी भोलि यह भी नहीं पल्लो है कि-लसूभिपवेशनापराबारमार्ग शीर्षण प्रसाशामि' () इस प्रकार हम देखते है कि पारा शिलासमय जीमन में भी नैतिक नियमों का অব দল ভারি হয়। ই। पाबा के परितो का मूल्यांकन भरते हुए हमे नही कहना पड़ता है कि उस परिष भगेश वैवाहिक एवं नैतिक गुणों से परिपूर्ण है। इसमे दोष है सो भली है जिपर एर सामान्य श्री (गणिका) पसनासेना से अपना रागास सम्मन्न स्थिर करता है और दूसरा गट है कि उससे पूसालीडा (असा)ीति है। बसन्तसेना पसरतसेना पात पति की मारिया के रूप में उपस्थापित की गई है। म जमिनी की एक गणिका है। मजपि यह एक सामान्य मानिश है, जिसने अपने आपको पाबारे साथ रागाम सूत्र जोर दिया है। फिर भी उसी सार गिरा सा गहरी है। यह भी एक सभिजात की महिरप होने का दम भरती है 'एष से अभिनिवेशालभिजनेन सोल्प (पु.२०)। इस पार पापा भी भाति वसन्तसेना में भी सावश्यक गुणधमान है। पर एस पास से भरती तर परिचित है कि अपने रेमी के पर-सरपण सपहार का रिस तरह पारण करना चाहिए। पहले से जम पारस उससे उसके साथ अमवश परि- पारिश की तरह पवहार करने में सपा की एमा-गापना करता है तो पर भी अपने अपराभ शीरमा की मांग करते हुए बत्ती है- भूमिपोशनापराशरमा शीर्षण प्रसारमाभि (४)। सन्तलेना पापा TAL Tणो से मुग्भ होकर उसे पप से मारती है। इस माल पीपधि पगम में कार के कान से हो जाती है (पू. २९)। इसमें सारस की वृति सम दिखाई पड़ती है यह अपने आपको बहार से मनाने हाल करती है मामलामा रपितमा पापा की भांति सन्त- सेगा भी TREATहै। लभ सान जसरे पर रक्षा है तो यह परागत माले स्थान तो ऐसी ही है साथ ही सार संपादक के पार परित यो पर पर सशनिशेष सरार रती है। पापाशी परिता से पर सजी सरर परिचित है। सिर भीगर से पाहती है। अन्य स्थानो की भांति उसका प्रेम पर एक सीन नहीं है। गा तो उसके मोसे सापित है। सेयर गली मातीदित है कि अति दरिन पुरुप पर लासर गशिपति कसे सरपिस रहती है। उससे मिलाया पापा (४) मिलने का है। द्वितीय अङ्क में मदनिका धसन्तसेना स कहती है कि जब चारदात क प्रति तुम्हारा बहुत बड़ा सम्मान हसा स्वय क्यों नहीं चली जाती? इसपर यह तयुक्त उत्तर देती ह किम तो जाउंगी ही पर ऐसा करने पर दरिद्रता के कारण अपन भापको प्रत्युपकार करने में असमय पार कहीं बह फिर मरे लिये दुलम न बन जाय । प्तदय म बिलम्ब कर रही है। उस पातों से यह मिद होता ह कि यह उससे चिरस्थायी प्रणय-सम्पय स्थापित करना चाहती है। चारुदस के समाम उसमें भी ललित कला की प्रवृत्ति निहित है। यही कारण है कि विदूपक उसकी इस कल पर मुन्ध हो जाता है 'अहो गणिका घाटस्य सश्रीकता इत्यादि । वसन्तसेना में कृपणता का रथमान भी स्थान नहीं ह। षह स्वभावत परोपकारी प्रवृत्ति की महिला है। उमकी उदारता सवाहक कसरपण में रएिगोचर होती है। वह संवाहक को विजयी जुभादियों मे मुक्ति पाने के लिये धाशुतोप वन्य प्रदान करती है। वह भी यह कह करक किवाय चारुदत्त ही रह ह ऐसा समझे। वह मह कभी नहीं चाहती कि लोग उसका (परोपकारी प्रवृत्ति के उपलक्ष्य में) गुणानुवाद करें। वह उपकृत व्यकिस उपकार का बदला भी नहीं चाहती। सवाहक जघ उपकी उदारतास मुग्ध होकर यह कहना है कि मेरी यह मालिश की कला आपके परिजन में उपयुक्त हो जाय तो म आपरा बड़ा ही आभार मानूंगा। इस पर वसन्तसेना उत्तर देतो है-निसा निमिच तुमने इस कला की शिक्षा पाई है इसस उसी की सेवा करनी चाहिए। यह अपनी दासी के साथ अच्छा व्यवहार करती है और जब उसे ज्ञात होता है कि सज्जटक यास्तव में मदनिका से प्रेमसूत्र जोपसा है तो वह उसे गुलामी से मुक ही नहीं करती बल्कि अपने आभूपों से । अलकृत करके परिणय भी करा दत्ती है। यह इसके उदारता की पराकाष्ठा है। चारुदत्त के प्रति सम्मान अदा करने के लिये हा विदूपक के द्वारा भेजी हुई सुकायली हार को सहर्ष महण कर लेती है। वह एक गम्भीर प्रकृति का नायिका है और यह सदा प्रयत्न करती है कि समाज में उपहासास्पद न हा सक सम्बीजनेनापहसनीयस्वम् भारमन परिहरामि । चारुदत क प्रति उसका प्रेम पवित्र है। इस प्रकार हम देखते हैं कि वह बारदत्त के अनुरूप अपना कतम्य प्रदर्शित करती है। सजलकsanade सम्जटक मदनिका का प्रेमी है। यह चौयकला में परम प्रवीण है। यह चोरी करने के लिये उपयोगी सभी सामग्रियों से सजधज कर चारुदत्त के घर चोरी करने जाता है। यह उज्जयिनी का नागरिक नहीं है। सम्भवत कहीं बाहर से भाकर उजयिनी में रहने लगा हो। यह मदनिका के प्रेम में इतना पागल हो २चा भू० (१६) धापस करने को कहती है। मदनिका समय के अनुसार काय करने की भी समता रखती है। वह सजलक से कहती है कि आय चारदत्त की ओर से वसन्तसेना को अलंकार देखो। ऐसा करने से तुम यच जाओगे आर्य चारुदत्त भी खिन नहीं होंगे और मेरे पक्ष में भी हित होगा। मदनिका गाकानी क जीवन की अपेक्षा एक भादश गृहिणी के जीवन को प्रेयस्कर समझती है। इसीलिये सजलक के साथ घसन्तसेना के द्वारा सम्पादित बैवाहिक जीवन के प्रति भरचि व्यक्त नहीं करती। बिदूपक पाल्दस के विदपक का नाम मैत्रेय है। यह जमना माझंग है। परन्तु यह चारुदत्त का ब्यक्तिगत साथी एवं प्रनिष्ठ मित्र तथा प्रधान सहायक के रूप में उपस्थित होता है। जब पारुदत्त एक श्रीसम्पन व्यक्ति था उस समय वह उसके घर व साता पीता था और भान दमय जीवन व्यतीत करता था। पर पय से चारुदत अपनी उदार प्रवृत्ति के कारण दरिद्रमय जीवन व्यतीत करने लगा था तब से वह पत्तियों की भांति इधर-उधर सा-पीकर कमात्र रहने के लिय उसके घर जाता है (पृ.)। वह व्यबहार से कभी नहीं बताना चाहता | कि किसी तरह से चारुदच को मानसिक कष्ट पहुंचे। अतएव यह रदनिका के अपमान का संदेश उसे अवगत नहीं कराता। विदूषक कट्टर धार्मिक नहीं है। उसकी देवी देवताओं के प्रति श्रद्धा नहीं है (पू०३४)। यह भीर प्रकृति का है। यही कारण है कि यह अधर में चतुप्पथ पर घलि अपण करने जाने म असमथता दिखलाता है। अब रदनिका साथ में भेजी जाती है तब कहीं स्वय भी जाने को तैयार होता है (पृ ३३)। वह भूखड़ भी है। जब यह अलङ्कारों के यवले मुकायली देने जाता है तप पसन्तसेना उसे केवल मौखिक आदर करके विदा करने लगती है इस पर वह स्वयं कहता है-कोऽप्युपचारोअप नतया भगित राय यह ठिठोलिया भी है। कभी-कभी ऐसी बातें करता है कि इसी आ जाती है। प्रथम भा में जय घस तसेना और चारुदत स्व-स्व अपराधों के निमित्त एक दूसरे से जमा याचना करते हैं वो उस समय वह कहता है भो विवहन्ताविव शकटिका दुर्षिनीतवलीवविन्योर्य सम्लेशयत' इयादि (पृ० १७)। उसे गणिका- प्रसग अच्छा नहीं लगता है। वह भली भांति जानता है कि वेश्याएँ कुटिल स्वभाव की होती हैं। समवत बसन्तसेना के प्रति ऐसी ही कुछ धारणा रखता हो। इसलिये जय चारुदत्त मुकाबली' को वसम्तसेना के पास ले जाने को कहता है तब वह पाश्चय के साथ कहता है-अहो अल्पमूल्यस्य सुषणभाण्डस्थ कृते शतसहसमूल्या मुक्तावली निर्यातम्या' (पृ० १०२)।
(१) के मुख में सुखी और दुय में दुमी रहना पसन्द करती है। इतना ही नहीं यक्कि चारुदत्त के सबविध प्रसन्नता और सुस सुविधा का सपया ध्यान स्पती है। यही कारण है कि वह अपना एक विशिष्ट भाभूपग (मुक्तावली) चमन्तमेवा को देने के लिय पारदत्त के पास भेजती है। ऐसा उसे तय करना पड़ता है जय चारुदत्त की सुरक्षा में पड़ हुए वमन्तसेना के आभूपण सजलक, द्वारा चुरा लिय जाते है । वह विचारती है कि जनता कहगी कि दरिद्र धारदत्तने भटफार हसकर चोरी का बहाना कर लिया है। ऐसी परिस्थिति में इसे चारस के वैभव और अरिप-चममय देह की अपेक्षा सुपश की बहुत बड़ी भूर है। मुक्तावली का प्रदान इमका उदाहरण है। पर इसका श्रेय अपने उपर लेना नहीं चाहती। हमे यह विदित है कि ऐसा कहकर मुक्तावली भेजने से पादत को हार्दिक कष्ट होगा और यह शायद लेने से भस्वीकार कर दे। एलिय पटी के दान के बहाने विदूषक के हाथ भेजती है। चारुदत्त की भाति यह भी धार्मिक विचार की महिला है । पटी का दान इसका प्रयास प्रमाण है। मागी यह अच्छी तरह जानती है कि पाल्दत घम तसेना के प्रति रागारमक और असामाजिक सम्बध रखता है। फिर भी उसमें इसनी धैर्यशीलता हकि इस दुर्भाव को व्यक्त होने नहीं देती। इस तरह हम देखते है कि यह उत्तम श्रेणी की भारतीय गृहिणी वं धीरा नायिका का भादर स्थापित करती है। शकार शकार प्रस्तुत रूपक का प्रतिनापुकहा यह राजा का साला है। सम्मवत इसकी बहन राजा की परिणीता या रखली हो। इसी आधार पर इसे राजा का साला (राजश्माल) कहते हा यह स्वयं भी मत पुग्न' प्य राजश्याल' शब्द से सूषित करता है। यह महान भूल है। इसे बातचीत करने का भी उग मही यह पौराणिक कथाओं को सुन चुका है। पर इसका शाम असतुलित है। यह वमन्तसेना को धमकी दसे हुए कहता है अहं वो गृहीरवा केशहस्ते दुशासन सीतामिवाहरामि गुणोमि गध श्रवणाभ्याम्' 'बधकारपूरिताभ्याम् नासापुटाभ्यां सुछुन पश्यामि'। यह वसम्ससेना के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। पर वह उसे हेय एवं उपेक्षा की अधि से देखती थी। यह बलप्रयोग के द्वारा उसे आत्मसात करना चाहता है । पर इसे असफलता ही मिलती हायह हटधमाह पर स्थिर विचार का व्यक्ति नहीं है। प्रथम बार में विदूषक (मैत्रेय) से चाखच के पास वसन्तसेना को घर से निकाल देने का भरणान्तिक सन्देश तो मेजशाता है। पर अक्षरशः अन्त तक इसका निर्वाह नहीं करता। विट के चले जाने पर स्वय भी वहां से खिसक जाता है। यह अपने सहयोगियों में न विश्वास ही करता हैन प्रेम | विट के साथ भी सभवत .
( १ ) यही बात हो । तभी तो रदनिका को आती हुई देखकर यह स्वय क्हता है 'अनया बराक वञ्चयामि' (पृ० ३५)। विट आर्य चारुदत्त के व्यक्तित्व एव गुण से प्रभावित है और उसकी दानशीलता एव त्याग की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करता है (पृ०४०)। पर शकार चारुदत्त के गुणों से डाह करते हुए प्रतिद्वन्द्वी का पाठ अदा करता है। उक्त विशेषताओं के माधार पर यह कहा जा सकता है कि भास कथाविन्यास तथा पात्रों के व्यक्तित्व एव वास्तविक स्वरूपोद्घाटन में अद्वितीय प्रतिभावान् रूपककार है । इसमें विवाद का लेशमात्र भी स्थान नहीं है।
कथास्रोत प्रस्तुत इतिवृत्त 'वासवदत्ता के समान ही सभय है कि रिसी एतिहासिक या परम्परागत एव सारकालिक प्रचलित पहानी स लिया गया हो। यही कहानी इसी रूप में गुणात्य की 'हत्कथा में भी उपलब्ध होती है। गुदय ने अपने मुछकार के द्वारा भी इस कहानी क्वाल म घुछ अधिक रफमास भरने का प्रयास किया है। भास द्वारा रचित चारुदत्त' सम्भवत अपूर्ण है अपेक्षाकृत राहक के मृच्छकटिक के । म एटिक का इतिवृत्त अपने श में पूर्ण है क्योंकि उसम सामाजिक राजनीति का पूरा पर उपस्थापित किया गया है। यह कथानोस की निश्चित निम्नतम सीमा की बात हुई। इसे उपरिराम सीमा पर भी लाया जा सकता है। प्रयवर श्री फान्तानायी शास्त्री 'तैलग का कहना है कि मृफटिक के कर्ता सोमदेव और दण्डी दोनों से पुराने हैं। हो गुणाढय की यह यथा' को मृच्छकटिक का उपजीव्य कहा पाय तो सभव हो माता है। भूतभाषा में लिया हुआ यह अतिप्राचीन प्रथ क्यालरित सागर का आधार है । अत' उसने भी ऐसी फ्थाएं रही होगी। परतु हम तो भास के दरिद चारदत्त को मृछकटिक' का आधार मानना उचित समझते हैं । महाकवि मास के रूपकों के आलोक म आ जाने के कारण 'गच्छकटिक' के मूल विषय में विद्वानों के विचारों में बहुत थड़ा परिवतन आ गया है। ऐसी स्थिति में भी भय विद्वत्समाज भास के चाइस' को ही गृपकरिक का भाधार स्वीकार करते हैं। भास का प्रस्तुत रप चार गो म विभाजित है। चतुथ क्षङ्क के अन्त में यसन्तसेना अपनी प्रियदासी मदनिका को अलकारों से सुसजित करक सज्जलक (मुच्छकटिक का शर्विरक) के साथ विदा कर देती ६। सदनन्तर वह अपनी चेटी (चतुरिका) को बुलाकर कहती ह-हल! पश्य आप्रया मया स्वप्नो इष्ट एवम् । इस पर चेटी प्रसन्न मुद्रा में उत्तर देती है-प्रिय मे अमृताई नाटक सवृत्तम् । तदुपरान्त वस तसेमा अलहारों से भलकृत होकर भाय चावत के घर अमिसरण का प्रस्ताव रसती है। चेटी उसका अनुमोदन करती हुई रहती है कि- अडके तथा । एतत् पुनरमिसारिका सहायभूतं दुर्दिनमुममितम् । इस पर वसन्तसेना इसी की मुद्रा में उपट १ विशेर विवचन के लिए सिये-श्रीका नानाप शनी मम्पादिन पृच्छ कटिकदी समान पू ११।
(२१ ) कर उससे कहती है-'हताशे। मा सलु वर्धय । तव चेटी कहती है.-'एस्वे- स्वज्जुका' । इसी स्थल पर रूपक का पर्यवसान हो जाता है। भास के 'चारुदत्त' की हस्तलिखित प्रतियों में से एक में चत्तुर्य अङ्क के अन्त में 'अवसित चारुदत्तमु ऐसा उल्लेख मिलता है । इस धरातल पर कुछ आलोचक वर्ग 'चारुदत्त' को वहाँ पूर्ण मानता है जहा वह उपरत होता है। कुछ विद्वान् इस रूपक को अपूर्ण बतलाते है। उनका कथन है कि इसमें कम से कम एक अर (अर्थात् पञ्चम अक जिसमें नायिका का मिलन रूप प्रयास संभावित है) अवश्यमेव होना चाहिए था। अस्तु, लेखक की धारणा है कि 'चारदत्त 'मृच्छकटिक' की कथा का उद्गम स्थल है। उसकी कथा शद्धक अपनी कल्पना प्रसूत शैली का परिचय दिया है अथवा 'बृहत्कथा' के आधार पर राज्यविप्लव वाले अंश को जोड़ दिया है। इस परिस्थिति में भी 'चारुदत्त' की कथा में उदासीनता की अपेक्षा एक नये रग का समावेश हो गया है।
कथासार प्रथम अक 'नादी के बाद स्थापना प्रारम्भ होती है। सूत्रधार प्रात काल घर से बाहर निवख्ता है पर भूख के कारण अधिक देर तक ठहर नहीं पाता। यह हीटकर अपने घर में ( भोजन सम्बधी) विशेष प्रवध का पयवेक्षण कर स्वय सन्देह में पा जाता है। धूछ साध करने पर नटी के द्वारा विदित होता है कि अमिरूपपति भामक उपवास (प्रत) के लिये यह प्रबन्ध किया जा रहा है। इसपर यह जानकर कि वर्णगोष्ठक के द्वारा उपवास का विधान नियत किया गया है वह उसे पयवाद देता है। मटी उसे किसी प्राह्मण को निमन्त्रित करने के लिये अमिलापा व्यक्त करती है। यह प्राण की खोज में चल देता है। अचानक उसे मैत्रेय (विदूषक) दिखाई देता है। यह उसे निमत्रित करता है। मेय ( भोजन के निमित्त) आमन्त्रण को अस्वीकार कर देता है। सूत्रधार उत्तम सुपरिपक भोजन और दक्षिणा की लालच देता है। पर मैत्रेय पुन भस्वीकार कर देता है। इसपर सूत्रधार फिर से अनुराध करते हुए धी गुड़ श्रादि की चर्चा चलाकर चला जाता है। यहीं पर स्थापना समाप्त हो जाती है। प्रथम अङ्क के प्रथम हरप के प्रारम्भ में मैत्रेय मनपर भाता है। यह सूत्रधार की कही हुई यातों की पुनरावृत्ति करते हुए कहता है कि किसी अन्य को निमन्त्रित करो। मैं व्यस्त हूँ। इसी प्रसा में यह चारुदत्त के पैमव काल के सुखमय जीवन और दरिद्रता के कारण क्तमान दुःखमय स्थिति का भी वर्णन एव विश्लेष करते जाता है। फिर भी उसे सन्तोष है और इसी सन्तुष्टि के कारण पछी तिथि पर देवकाष को सम्पादन करने वाले आय चारवन के निमित्त पुष्प और परिधेय (पहनने योग्म)बल को लेकर चारुदत्त के समीप चल देता है। तय तक उसे पूजा से लौटते हुए भाप पारुदत्त रक्षिशोचर होते हैं। प्रथम भट्ट के द्वितीय पश्य में बलि लिए हुए नायक (चारुदत्त) विदूषक पेटी (रदनिका)का प्रवेवा होता है। चारुदत्त अपनी दरिद्रता पर अपार सोम प्रकट करता है। विदूषक र सान्त्वना देता है। प्रथम महके कृतीय श्य में किट और शकार से पीछा की गई सम्मान्त प्रय ध्याकल गणिका (बसन्तसेना) का प्रवेश दिखाया गया है। शकार कथन से सन्तसेना का प्रवेश दिखाया गया है। कार के कपन से पसन्तसेना को विदित हो जाता है कि समीप में ही आर्य चान्दत्त का निवास स्थान है। इसमें वह अपमा सौभाग्य तथा भारमरता की अनुभूभी करती है। वसतसेना अंधेरे में ( २३ ) अपना निगाह बचाकर खसक जाती है। यह चारुदत्त के घर के द्वार के समीप जाकर वढी होती है । चारुदत्त विदूपक को मातृदेवियों को बलि अर्पण करने के निमित्त चतुष्पथ (चौराहे) पर जाने को वाध्य करता है। विदूपक एकाकी चौराहे पर जाने में भयभीत होता है। पर रदनिका के साथ जाने पर वह तैयार हो जाता है। विदूपक रदनिका को द्वार (दरवाजा) खोलने को कहता है। रदनिका दरवाजा खोलती है। बाहर खडी वसन्तसेना भाचल की छोर से हवा मारकर दीपक को वुझा देती है। विदूपक रदनिका को चतुप्पथ पर चलने के लिये कहकर स्वयं फिर से दीपक जलाने अन्दर चला जाता है। इसी बीच में वसन्ससेना भी घर में प्रवेश कर जाती है। वाहर विट शकार को उत्तेजित करता है और वह रदनिका को वसन्तसेना समझकर को पकड़ लेता है। इतने में विदूपक दीपक लेकर बाहर भाता है और शकार तथा विट द्वारा प्रताडित होती हुई रदनिका को बचाता है। विट विदूषक से अपने किए अनुचित व्यवहार की क्षमा याचना करता है और आर्य चारुदत्त के व्यक्तित्व का भय मानकर चला जाता है। पर शकार वसन्तसेना को वापस मागता है और इस विषय पर विदूषक से कुछ देर तक वाद-विवाद करता है। इसी प्रसग में वसन्तसेना को वापस न करने पर मरणान्तिक वैर-भाव की आशङ्का देकर चला जाता है । देवकार्य की समाप्ति की सूचना देने के लिये विदूपक तथा रदनिका चल देते है । प्रथम अह में चतुर्थ दृश्य में चारुदत्त वसन्तसेना को रदनिका समझकर देवकार्य के विषय में पूछता है। वह अपना उत्तरीय (आवारक) देता है और उसे भीतर ले जाने को कहता है । वसन्तसेना मौन रहती है। इस पर चारुदत्त कहता है 'रदनिके, क्यों विलम्ब कर रही हो। इतने में विदूपक ओर रदनिका अन्दर जाते हैं । विदूपक शकार का सन्देश देता है । वसन्त- मेना पहचानी जाती है। वह चारुदत्त के पास अपने आभूपण धरोहर (न्यास) रखकर विदूपक की सुरक्षा-पूर्ण देख-रेख में अपने घर चली जाती है। द्वितीय अङ्क द्वितीय अद्ध के प्रथम दृश्य में गणिका और चेटी (मदनिका) मञ्च पर आती है। वसन्तसेना अपनी दासी के समक्ष चारुदत्त के प्रति अपना स्नेह व्यक्त करती है। मदनिका चारुदत्त की दरिद्रता की ओर उसका ध्यान आकपित करती है । परन्तु उसले उसका स्नेह घटता नहीं। द्वितीय अङ्क के द्वितीय दृश्य में सवाहक जो स्वय जुआदी भी था वसन्नसेना के घर में प्रवेश करता है। वह विजयी जुआडियों के भय से अपनी सुरक्षा मुख शरण की याचना करता है। यह जानकर कि वह चारुदत्त का पुराना (२४) भृत्य पसन्तसेना उसकी कपल रक्षा ही नहीं करती, अपिनु वह उसे चटी द्वारा उचित द्रव्य कर उसका ऋण धुका दी है। इस प्रकार बसन्तसेना क चारसत्य-पूण व्यवहार से प्रभावित हो जाता है और अपन दैनिक जीवा प्रति विरतिक कारण 'प्रवज्या' (सयास) ग्रहण करन की अभिलाषा “यर करक चला जाता है। द्वितीय पक तृतीय एय में चेट (कणपूर) प्रवेश करता है। यह अपन धीरसापूण काय की प्रशसा में विशेषरूप से मतबागे हाथी क पान से गवाहन भितु (सयामी) की रक्षा और आय चारपत्त के द्वारा उक्त काय उपलक्ष्य में मिले प्रापारक (उत्तरराय) का वृत्तात मुनाता है। यह घटना वमन्तसेना तथा पटरी (मदनिका) दोनों क मानम मन्दिर में एक विपिन कौनुहल पैदा करती है। इसके पाव, वसन्तसेना चादत का पपन की रालसा यच का उम्साहित करती है। पखवय दोनों (पस तसेना और मनिका) घट क साथ चारुदत्त को देखने के लिय महल की छत की ओर चलदेती है। तृतीय अङ्क - । तृतीय भF प्रथम प्य में चादत और विदूप मज पर आते है। चारुदत्त विदूपक से वीणा की प्रशंसा करता है। परन्तु विदूपक को उममें विशेष अभिरचि नही । हम बाद चारुवच तथा चिपक पर (वधमानन)को पुकारते है। पेट दरवाजा खोलता है। भीतर पाकर दोनों पैर घोर सान की तयारी करते है। अटमी तिथि को सुवशमाव की सुरक्षा का भार विदूषक अपन उपर लिया था । एनन्थ घेटी विदूपक को सुवणभाण्ड देना चाहती है। विदूपक तो पहर रालमटोल करता है पर बारुदच की माज्ञा से उसे ले छाता है। चारदत्त सो जाता है। विदूषक भी मुयणमाण्ड हाथ म लिए हुए सो जाता है तृतीय पके दिसीय दृश्य म सज्मलक प्रवश करता है। वह सुरह बनाकर चावत के घर में घुस जाता है। विदूषक निद्रा में चारुन को पुकारकर कहता है कि मुझे नींद ना बा रही है। चाईबास फरक रही है। ऐसा लगता है चार संघ लगा रहा हो। पदिधन की यही हालत है सो म दारिद्रयमय जीवन को ही पसब करगा। इस पर पारुदत्त डार देता ह । तदुपरान्त सजलक क द्वारा दीपक घुला दिया जाता है। ऐसी दशा में विदूषक करताह मैं हर लिया गया। यह चोरी जाने क भय से चारुवन को पुकारकर अलकार की पटी दना घातानने पर माप का भय दिखाता है। सन्जलक उसे ले लेता है। इसके बाद मपथ्य में हुए नगाड़े के शब्द से भयभीत होकर भाग जाता है।
( २५ ) तृतीय अझ के तृतीय दृश्य में चेटी (रदनिका) प्रवेश करती है। वह विदूपक को इस बात से अवगत कराती है कि सेंध बनाकर चोर घुस गया। बाद में दोनों चारुदत्त के पास जाकर चोर के घुसने की बात बता देते हैं। यह सुनकर चारुदत्त आश्चर्यित होता है। विदूपक उससे कहता है कि अच्छा हुआ कि मैंने सुवर्णभाण्ड आपको दे दिया। यह सुनकर चारुदत्त पूछता है कि क्या आपने दे दिया? कब दिया था ? विदूपक उत्तर देता है भाधीरात को। इसपर चारुदत्त कहता है खेद की बात है कि सुवर्णभाण्ड चुरा लिया गया। उसे इस वात की चिन्ता भी होती है कि लोग चोरी की वातपर विश्वास न करके दरिद्रता के कारण उलटे मुझे ही बदनाम करेंगे। इसी बीच में चारुदत्त की पत्नी पाणी प्रवेश करती है। चेटी बाह्मणी को अलंकार की चोरी की बात बता देती है। इस वृत्तान्त को सुनकर मामणी चकित होती है। वह अपने पतिदेव को लोकापवाद से बचाने के लिये अपनी सतसहस्र मूल्यवाली मुक्तावली विदूषक के हाथ भेजती है। चारुदत्त सुवर्णभाण्ड के बदले मुक्तावली देने के लिए बिदूपक को वसन्तसेना के घर भेजता है । चतुर्थ अंक चतुर्थ भय के प्रथम दृश्य में वसन्तसेना और मदनिका चित्रफलक हाथ में लिए हुए प्रवेश करती हैं। वसन्तसेना चित्रगत प्रतिमा में आर्य चारुदत्त की प्रतिकृति का भारोप करती हुई मदनिका से कुछ क्षण तर्कपूर्ण बात करती है। इसी बीच में एक दूसरी चेटी आकर वसन्तसेना की माता का आदेश सुनाती है। वह कहती है कि राजश्याल संस्थान (शकार) की गादी (प्रवहण) दरवाजे पर लगी है। माता भाज्ञा देती है कि तुम अलंकृत होकर जागो। इस पर वसन्तसेना रक्ष हो जाती है। वह जाने से अस्वीकार कर देती है। चमुर्थ भर के द्वितीय दृश्य में सज्जलक वसन्तसेना के घर में प्रवेश करता है। मदनिका भी गुप्त रूप से उससे प्रेम करती है। इसी प्रेम में पागल होकर सज्जलक अपनी प्रेयसी मदनिका को वसन्तसेना की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए चारदत्त के घर से वसन्तसेना के अलहारों को चुराकर लाया है। तदनन्तर वाह इन भाभूपों के साथ मदनिका से मिलता है और उन्हें भेंट के रूप में उसे प्रदान करता है। मदनिका आभूपगों को पहचान लेती है। वह पूछती है कि इसे तुम कहाँ से लाए हो? सज्जला उसे चारुदत्त के घर चोरी की बात बतला देता है। रदनिका और सज्जलक के बीच हो रहे बातचीत को वसन्तसेना भी छिपकर सुनने लगती है। वह उसे चारुदत्त की ओर से वसन्तसेना के पास जाकर भलार समर्पण करने का उचित परामर्श देतो है। सज्जक उसको यात मान लेता है।
घमुय बफ ननीय सय में एक धर्ग धमतमेना को चारुदत्त पर से एक माझग क आगमन की सूचना दी ह। यस तमेना उने शोध दर खाने का मादा नी । घटी विदूषक को शहर अदर जाती है। विदूषक वमन्त भना म कहता है कि चारुदत्त मुम्हारे अवारको जुए में हार गया है। इसलिए उमके यदा यह मुक्तावली महण करें। यह कहकर घस तसेना को मुकाबला दे दता है । यमन्तमना मुनावली लेकर विदूपक को विदा कर देती है। तदुपरान्त मनिस चमतसना को मूधिन करती है कि आप चारुदत के यहाँ म कोई व्यक्ति भाया हुआ ह जो आप मे मिलना चाहता है। बसन्तमेना उसे अदर न की भाभा दती है। घनुय बरक अनुष श्य में मदनिका सजलक के साथ प्रवेश करती है। मजलक बम तमना से कहता है कि मुझे आप चारुदा मे भेगा और यह मदा कहलवाया कि नो अलार मापन धरोहर के रूप में रखा था उसकी रखा करना कटिन काम है क्योंकि घर की मपदी आदि नहीं हो पा रही है और कुटुम्य क लोग भी पास नहीं है। ऐसी हालत में आप इसे रख लें। इस पर वमन्तमना उम पुन छोटा इन की बात कहती है। सम्जलक जान सेरकार कर दता है। बाद में धमावसेना मदनिका को अपने भारी स भूपित करके परिणीता नायिका के रूप में अपनी गाड़ी में बैठाकर सजलक के माय विदा कर यम तमना चारदत्तक द्वारा भजी हुई मुकारली पहनकर उमा घर अभिसरण करन का प्रतुन हासी ।। एमी परिस्थिति में आकाश में पुर्विन (काले धादल) उमड़ परते।
पात्र-परिचय पुरुष पात्र नायक-दरिद्र सार्थवाह पुत्र चारुदत्त । विदूषक (मैत्रेय ) चारुदत्त का मित्र । शकार-('सस्थानक ) राजा का श्यालक प्रतिनायक । चिट-शकार का सहचर । संवाहक-चारुदत्त का भूतपूर्व भृत्य ( मालिश करनेवाला) जुग्राडी । चेट-(कर्णपूर ) वसन्तसेना का दाम । सजलक-मदनिका का प्रेमी । चेट-(वर्धमानक ) चारुदत्त का घरेलू अनुचर । सूत्रधार--रूपक का प्रधान नट । खी पात्र गणिका नायिका बसन्तसेना । ब्राह्मणी-चारुदत्त की भार्या । रदनिका-चारुदत्त की दासी ( चेटी)। मदनिका-वसन्तसेना की विश्वस्त दासी सज्जलक की प्रेमिका । विच्छित्तिका-बसन्तसेना की परिचारिका । चतुरिका- नटी-स -सूत्रधार की स्त्री। " " -odooper- ॥ श्री ॥ मासनाटकवक्रे चारुदत्तम् 'प्रकाश' सस्कृत हिन्दीव्याख्योपेतम् प्रथमोऽ (नान्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधार 1) मूलधार -किण्णु खु अज्ज पन्चूम एव्व गेहादा णिक्यन्तस्स नाद्यते इति नान्या'-पूवरणीभूताया मगलक्रियाया आशीर्वाद रूपाया वा अते = समाप्ती नान्दीविधानानन्तरमित्यय । श्रारम्भे हि विघ्न विधातादिप्रयोनन मगल नितरामावश्यक नाटकीयरचनानियमप्राप्त च कर्तव्य प्रथममुदिशन् कवि नान्दी ति समारघवान् । देषद्विजनृपादीनां स्तुत्याशीरन्य तरपर चचो नादी भवति । तस्याश्च लक्षणमुक्वान् भरतमुनि-आशीर्वचन मयुत्ता स्तुतिर्यस्मात्प्रयुज्यते । देवद्विजनृपानीना तस्मानाति सज्ञिता' इति । तत इति-मान्यां च नेपथ्य एषावसितायां तत तस्मात् स्थलाद् नेपथ्यादिति यावत् । अथवा ततो नाम ना दीविधानाव्यवहितोत्तरकाल इति । तसिलप्रत्ययस्य सावविभक्तिकचात् सप्तम्याधयणम् । प्रविशति = रगमच समागच्छति । कस्यात्र प्रवेश इत्याकाक्षायामाह-सूत्रधार इति । सत्रधार प्रधाननट------ नाव्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयत । अथवा सूत्रम् नाटक्वाज तद् धारयति पहसि उपन्यस्यतीत्यर्य। (माल गानवाद के बाद सूत्रधार भाता है।) सूत्रधार-यो आज उपाकाल में घर से बाहर होते ही मेरी भातें भूख के २ चारुदत्तम् । Maa M बुभुक्खाए पुक्खरपन्तपडिदजलबिन्दू विअ चनलाअन्ति अि मे अक्खीणि । ( परिक्रम्य ) जाव गेहं गन्छिा जाणामि किण्णु खु सविधा विहिदा ण वेत्ति । (परिकम्य) एट अम्हाणं गेहं । जाय पचिसामि । ( प्रविश्यावलोक्य ) जह लोहीपरिवट्टणकालसारा भूमी, उन्भामणसुगन्धो विअ गन्धो, सुणिमित्तं विअ परिभमन्तो वडिवरसअजणो, किण्णु खु राविधा विहिदा । आदु बुभुक्खा ओदणमध्यं विअ जीवलोअ पेक्खामि । जाव अश्या सदामि । अय्ये | इदो दाच । [ किन्नु राल्वय प्रत्यूष एव महानिकान्तस्य बुभुक्षया पुष्करपत्रपतितजलविन्दू व चालायते एव मेऽक्षिणी । यावद गेर गत्वा जानामि किन्तु सलु सविधा चिहिता न वेति । एतदस्माक गेरम् । यावत प्रपिशामि । यया लोहपरिवर्तनकालसारा भूमि, स्नेहोगायनमुगन्ध श्व गन्ध , सुनिमित्तमिव परिभ्रमन परिवस्यकजन , किन्नु रालु सचिधा विहिता । प्रत्यूप एच = उप-काले एव । अक्षिणी = लोचने, बुभुक्षया = क्षुधया । पुप्फरपत्रपतितजलबिन्दू श्व-पुष्करस्य = कमलस्य पत्रम् तत्र पतिती ति पुप्फरपत्रपतिती जलबिन्द एव इत्यर्य । गर = भवनम् , गत्वा%Dप्रविश्य, सविधा = शक्षणव्यवस्था, लोहीपरिवर्तन कालराारा-'लौह अति पदेन लोहनि- मितरन्धनदण्ड पाक्षिप्यते, तो लोया परिवर्तनन = 'अचघर्पणेन हेतुना कालसारा = अतीव कृष्णवर्णा प्रत्यर्भ । स्नेहोसावनगुगन्ध -रमेहरय = एतादि- स्नेहयुरूपदार्थस्य उद्भायनम् = उद्गमनम् इति स्नेहावगम् अर्थात उद्भूतस्ना- स्तेन मुगन्ध इत्यर्य । मुनिमित्तम् - शोभन निमिना, मुन्दर झारण या परिवस्या जन-परिवस् इति अव्ययपदम् 'शुश्रूपा, पूजा' ति यो गवति, वरिवस्यक- जन - शुश्रूपहजन , प्रतानुष्टापा, पजनजनो पा "ति भाव । मनिषा विनिता कारण फमल के पत्ते पर पदे हुए जल पिन्ट फी भाति चचल हो रही है। तय ना घर के अन्दर जाकर यह पता लगाता किग्याने-पीने का कोई प्रयन्ध है या नहीं। यह रहा मेरा घर । तो प्रवेश करता हूँ। (प्रयंका कर और चारों तरफ देख फर) लोहे के बर्तनों के चार-पार घर्पण करन से भूमि काली सी पागा, गन्ध ऐसी आरही है जैसे पृतादि स्नेह नव्यों की भावना (फोक) दन में उत्पन्न होती है। किसी मनोरम निमित्त के उद्देश्य से ही धार्मिक ग (इधर उधर) घूमते हुए दिखाई पपरहे हैं। तय था कोई (भोजन की) व्यवस्था प्रथमोऽङ्क। अपना घुभुक्षयादनमयमिव जीयलोक पश्यामि । यावदायर्या शब्दापयामि । प्राय । इतस्तावन् । (प्रविश्य) नग-अग्य । अम्हि । अग्य लिहिआ मुसि आअो। [आर्य । इयमस्मि ! थाय ! दिया सबस्यागत ।] मनधार-अय्य । कि अस्थि अम्हाण गहे को यि पानरामो। [पाय । किमल्यस्माक गह गोऽपि प्रातराश ।] नगे-अस्थि । [अस्ति ।] मूत्रधार -घिर जीय । य मोमणाणि भाषणाणि दन्तिआ हाहि । चिरजीव । व शोमनानि भोगनानि दात्री मव ।। नली-अय्य | तुय पत्र पडियालन्ती चिट्ठामि । [ार्य । त्वामेव प्रतिपाळयन्ती निष्ठामि ।] dau भोजनव्यवस्या कृता इत्यय । जावलोम् - समग्र जगत् इत्यप । श्रादनमय मिव = मिदानमयमिष शब्दापयामि = शब्देन थायामि त्यर्थः । प्रातराश-पात प्रात काले अश्यत = भोज्यत "ति प्रातराश-कर्मणि पण प्रभातमी यम् (रपान)"ति लोभापायाम् । -- -- अथवा बुधा के कारण ही में इस मसार के सब पदार्थो को अवमय देख रहा हूँ। सब सक भार्या को पुलाता हूँ। आप यहां बाभो। (प्रवश कर) नटी-गाय ! म यहाँ हूँ। आय सौभाग्य से भाप भी भा गए। सूत्र -आय ! क्या घर में कोह क्लेया की व्यवस्था है। नी-है। -तुम चिरजीपी हो और इसी तरह सुन्दर मौजन देवी रहो। नो-भाय! मैं तो बैठी भाप को ही प्रतीक्षा कर रही हूँ। . सूब- चारुदत्तम् । MIMMom सूत्रधार ----अय्ये | कि अस्थि अब्भत्थिदं । [भायें । गिमस्त्यमय- सितम्।] नटी-अस्थि । [ अस्ति । सूत्रधार एव्यं देवा तुम अस्सासअन्तु । अय्ये । कि किं । एवं देवास्त्वागाश्वारागन्तु । 'पायें ! जिकिम् । ] नटी-घिदं गुलं दहि तण्डुला अ सव्वं अस्थि । [ धृतं गुणे दधि सण्ड लाम रामस्ति । सूत्रधार -एद सव्य अम्हाण गेहे अस्थि । [ एतत् सर्गमस्मार गेहेऽस्ति । नटी- णहि णहि । अन्तलावणे । [ नहि नहि । अन्तरापरी । ] सूनधार -( रारोपम् ) आ अणयये । पव्व दे आसा छिन्दीअदु अभाय च गमिस्ससि । अह चण्डप्पवादलण्डिओ विअ वरण्डी पव्वदा दूर आरोविअ पाडिदो म्हि I [आ अनायें ! एग ते श्राशा छियताम प्रभाव श गमिष्यसि । 'पा चण्उप्रवासलण्डित ऽच परण्ड पर्वताद दूरमारो पातितोऽस्मि ।] ] . 41611 JRAH 'अभ्यर्थितम् = प्राणितम वस्तु पति भाव । एवम् = अनेक प्रकारेण, ते = तन याशा- अभिलाप, छियताम् = भज्यताम् , अगायण गगिगरि अगिलपित- प्रन्गाणा क्षण प्रास्गशिरा । अप्रवातलण्डित -चण्ड - उदगार प्रपात 3 गायु तेन लण्डित = उसक्षिप्त "गर्ग । गरड = तृणरामूर इन इयण । पर्व- PR०--भायें । सप कौन सी प्राणित यस्सु है ? नी-है। ro-यदि ऐसा है तो वेपता तुग अाश्चायन दें। आर्य । क्या क्या (भोज्यवस्त) है? नटी-पी, गुरु पदी और चायल ह । सूप--पया ये सय हमारे घर में ही हैं। नटी-नहीं-नहीं, याजार में है। स१०--(कोधित होकर) आह अनायें। यदि ऐसा है तो तुम्हारी भी आशा भाजाय, गोर तुम भी अभावग्रस्त हो जाओ। में प्रचण्यायु के हा
प्रथमोऽ।
नटी-मा भाआहि मा भाआहि । मुहुत्तम पडियालेदु अग्यो । मव्य
मग्न भयिस्मदि। लद्ध णाम पद । अनि मम उपवासस्म अग्यो
महायो होदु। [मा विभीहि मा विभीहि । मुर्तिक प्रतिपालमत्वार्य । गर्व
गग्ज भविष्यति । स प नामत । अद्य ममोपयासस्यार्य सहायो भवतु । ]
भूप्रधार -किण्णामहओ अय्या उपयासो। [विनामधेय पायाया
उपवास ।]
मी-अमिानवदी णाम | [ अभिम्पपतिनाम।]
गूषधार'-किं अण्णनाती [ किमन्यतान्याम् । ]
नी-आम [पाम् ।
सूत्रधार -सव्व गाव चिहृदु । को णु नाणिं अग्याए उबवामस्म
उपसिओ । [ सर्व तावन् तिनु । को विदानीमायाया उपवासस्योपदेशिक ।]
तात् - अायुनतमनोरयान् स्थानाच्चेति वा पातित = प्रशित (एषमेव त्वयाऽपि
भोजनम्पामा दत्वा निराश कृत "ति शाशय)।
अमिल्पपतिर्नाम-अभिरूप - मुन्दर पतियन यस्मात् यातनाममुप
थामामा प्रतम् अनन प्रतेन पति मुदरो भवतीति भाव ।
अन्यजात्याम्--अन्या जाति ( नन्म) तस्याम् इत्यय ।
अस्तित तृण-समूह की भांति पवत से भी दूर स्टार नीचे गिरा दिया गया हूँ।
(अर्थात् जैसे मृण समूह तूफानी हया के द्वारा परत मे भी उचे फेंक दिया
जाता है और प्रमश नीचे गिर जाता है वैसे ही मेरी (भोजनसम्प्रधी) HIMIL
पहले तो उच्च से उन पल्पना में दूधी रही फिर याद में निराशा से चकनाथर
हो गइ।)
नटी-ग्रस्त एष भयभीत न हो। गभर माय प्रतीक्षा करें। सब कुछ प्रस्तुत
होगा। सब कुछ मौजूद है। आज मेरे उपयास के बाय सहायक बनें।
सूत्रधार-भार्या के उपवास का नाम क्या है।
नी-भभिरूप पति माम है।
मूत्र -श्या अन्य जन्म में भी है।
सूत्र -भच्या पह सप रहने हो। इस समय आर्या के उपवास का उपदेशक
चारुदत्तम् । पापा नटी-इमिणा वडिवस्सएण चुण्णगोठेण । [अनेन चरिवस्यकेन चूर्णगोष्ठेन।] सूत्रधार -साहु चुण्णगोट्ट । साहु । [ साधु चूर्णगोष्ठ | साधु । ] नटी-जइ अय्यस्स अणुग्गहो, तदो इच्छेअ अम्हारिसजणजोगं कञ्चि बम्हण निमन्तेदु । [यद्यार्यस्यानुग्रह , तत इच्छेयमस्माशजनयोग्य कचिद् ब्राह्मण निमन्त्रयितुम् । ] सूत्रधार -धम्मिट्ठो खु णिओओ। तेण पादरासो वि मे भवि- स्सदि । जइ एव्व, पविसदु अय्या । अह वि अम्हारिसजणजोग्गं कञ्चि बम्हण अण्णेसामि । [धर्मिष्ठ खलु नियोग । तेन प्रातराशोऽपि मे भविष्यति । यद्येव प्रविशत्वार्या । अहमप्यस्मादृशजनयोग्य कश्चिद् ब्राह्मणमन्वेषे । ] नटीज अय्यो आणवेदि । (निष्कान्त ) [यदार्य प्राज्ञापयति । ] सूत्रधार -कहि ण्णु खु दरिद्दबम्हण लभेत्र। (विलोक्य) एसो अय्य- चारुदत्तस्स वअस्सो अय्यमेत्तेओ णाम बम्हणो इदो एव्व आअच्छदि । जाव उवणिमन्तेमि । ( परिक्रम्य ) अय्य । णिमन्तिदो सि । आमन्तणस्स मा दरिइ ति म अवमण्णेहि । सम्पण्ण अलिटव्य भविस्सदि । घिद वरिवस्यकेन-परिवस्यक = देवभक्त, प्रतधारको वा तेन । नटी- इसी वरिवस्यक (धार्मिक) चूर्णगोष्ठकने मुझे ऐसा उपदेश दिया है। सूर०-साधु चूर्णगोष्ठक, साधु । नटी-यदि भार्य की भनुकम्पा हो, तो मैं चाहूंगी कि अपने योग्य किसी आमण को निमन्नित करें। सन०- यह अत्यन्त धर्मसङ्गत कार्य एव सङ्कल्प है। इस तरह से मेरा प्रात कालीन भोजन भी उपलब्ध होगा। तय तुम (घर के अन्दर)जाभो। मैं भी अपने योग्य किसी ब्राह्मण की खोज करता है। ना-जो आर्य की भाज्ञा हो। (निकल जाती है।) सन-कहाँ मे दरिद्र ब्राह्मण पाऊँगा" (चारों भोर देखकर) यह चारुदत्त का समवयस्क भार्य मैत्रेय-नामधारी ब्राह्मण इधर ही आरहा है। तय तक (एक ही को) निमन्त्रित करता हूँ। (घूमकर) आर्य । आपको निमन्त्रण देता हूँ। निमन्त्रण का परित्याग न करें तथा मुले दरिद्र जानकर अपमानित भी प्रथमोऽङ्का ७ गुल नहि नण्डला अ मध्य अत्यि | अपिअ रिपणामामआणि मरिम्मन्ति। [कुन नु गनु दरिद्रयामण भय । प ायचारदमस्य वयम्य प्रायमेत्रया नाम प्राणन यागनि । यावटुप मन्त्रयामि । प्राय ! निमन्त्रितोऽमि । धामन्त्रणस्य मा रिट इति मामयमन्यम्द । मम्पन्नमशितव्य भविष्यनि । धुन गुना दधि तण्डलाच सबमस्ति । अपि च दक्षिणामापका भविश्यन्ति । (नपथ्य) अण्ण अण्ण णिमतदु नार भय ! अरित्ता नगर अह । [अन्य मन्य निमयनु तावद् मवान । परिषरस्तावदहम् । ] मूत्रधार घिदगुलदहिमुममिद्ध विमसूथायदमसम्मिण्ण । सकारदचमिट्ट भुझीअदु भत्तमयेण ॥१॥ मानान्तर प्रामणेभ्या यय्यमव दक्षिमाशन गरे व्यवाहियते श्रत पार-दक्षिणामापका = दक्षिणाम्बम्पा मापका - मुद्रा कापापणविशपा भवि प्यताम्याशय" नपप्प = घशपरिप्रहस्यान अननवनिमाहुर्नेपथ्यम् । पचितु मदिन:- कारानराधन नपथ्य मिग्यश्रमाहुः । अरिका - अमावरहित अरिद्रा वा अयात भार्यचारुन दरिद्र परि हाय मामपिन तथा मयम्वन्यागब । म करें। मन कुछ मोग्यवस्तु सपल यहागी1 घी, गुड दधि और पायल मप कुछ (मिर घर) तथा दक्षिणा के निमित्त मापक मुमा (सोग की गिनी या निश्का)भी प्रम्मुन की जायगी। (नेपथ्य में) तब तक किसी दूसरे को निमन्निन करें। म अमावग्रस्न पारित नहीं है। घी गुरु एवं दधिम मुसंस्कृत मुगधित द्रव्य से मुवासित, व्यंजन मत्र ६ चारुदत्तम् । । नामिणा गरिनस्सएण शुष्णगोठेण । [भोग गणित के गोर सूधार:-साहु तुण्णगोड । साg || साप पूर्णगोत ! सा । ] Easi- जप अध्यक्ष अणग्नहो. तदो लोणं अन्दारिसजणजोर माधि पर निमन्तेदं । [वामा: (ki ममस्मानमोर कति मानिमितम् ।। सूपधारक मिहो खुणिमोलो। तेण पादरासो लि मे मति सादि । जय एवं परिसद रोया। नि अम्हारिसजणजोर तिम अण्णेसामि। (गर्मि रानु निमोल । Nोsपि भविष्यति । भरोष पविशमार्ग भानसमाजमोम्म पसिनामामाले । Hot & मल्यो भाणवेदि। (AIN) [ सदा भाज्ञापयति । साधार-पाति पण खु परिमाणं लगे । ( निस) एसो र शारदरास बास्सो बस्योगो णाम बमणो यो एमालपादि जाब जाणियोगि। (परिसम्म ) जय । णिमन्तिदोसि । बामन्तण मा दरिद ति मं अषमण्योति । सम्पvणं अनिदर भविस्तादि । पिर हारमा परिधरना देगा . भारतात iat सी परिक्षमा (धार्मिक) पूर्णगोन मे ससे ऐसा उपदेश दिया है। सू०-- साधु पूर्णगो. साधु । 7-AR ला की नापा हो. तो भै पाएंगी नि लपने भोग विली को निमनिर मारे। १.९ या या सात कार्य एवं साप है। इस पर से मेरा HI सन भोजन भी होगा। सम गुम (परदे पर) जाओ। भी अपने गोम्म नि सो माहा मोसोज भरता हूँ। ..!-- शोभा की लाशा।(निाती है।) २१. यहाँ से दरिम HIT पागा! (धारों ओर देतार) गा गारवा Rt समयमस्य मार्य भीम नामसारी जाह्मण भर ही मारहा है। (ही यो) Hिसा हैं। (पूमार) मा ! आपको निम देता है। निगमका परिमाग म रे सा मुझे दरिम जागनर अपमानित भी ।
प्रथमोऽङ्क। गुल नहिं तण्डुला अ मन्य अस्थि । अविअ दक्सिणामासआणि भरिस्मन्ति। [कत्र नु खलु दरिदबामण लभेय । एप ायचारुदत्तस्य वयस्य श्रायमैत्रयो नाम प्रामण इन एवाग छति । यावदुपनिमन्त्रयामि । आर्य । निमन्वितोऽमि। मणस्य मा दरिद्र इति मामवमा यस्व । मम्पन्नमशितव्य भविष्यति । घृत गुढो दधि तण्डुलाथ मर्षमस्ति । अपि च दक्षिणायला भवियन्ति । (नपथ्य) अण्ण अण्ण णिमतदु नार भव | अरित्तओ दाव अह । [अन्य मय निम जयतु तावद् भवान । श्ररिक्तकस्तावदहम् । सूत्रधार- घिदगुलदहिसुसमिद्ध धूयिनसूयोयदमसम्मिण। सकारदत्तमिठ्ठ भुजीअदु भत्तमय्येण ॥१॥ भानना तर ब्राह्मणेभ्यो दय प्रय्यमय दक्षिणाशब्देन लोके व्यवहियते अत आर-दक्षिणामापका = दक्षिणास्वम्पा मापका = मुटा कापणविरोपा भवि प्यन्तीयाशय । नपथ्य - वेशपरिप्रहस्थान अन्तनवनिमार्नेपथ्यम् । केचितु मेदिनी- कारानुराधन नेपथ्य रसमित्ययमा। अरिचक = अभावरहित अदरिद्रो वा अर्यात थार्यचारुदत्त दरिद्र परि ज्ञाय मामपि न तथा मन्वस्वन्याशय । न करें। मय कुछ भोग्यवस्तु उपलब्ध होगी। धी गुरु, दधि और चायक सब कुछ (मेरे घर) है तथा पक्षिणा के निमित्त मापक मुद्रा (= सोने की गिनी पा सिक्का) भी प्रस्तुत की जायगी। (नेपथ्य में) तप तक किसी दूसरे को निमन्त्रित करें। म अभावग्रस्त या दरिद्रमही हूं। घी गुरु एवं दधिस सुसंस्कृत, सुगधित दम्य से सुवासित भ्यमन मत्र प्रथमोऽङ्क। ६ विदूषक -अण्ण अण्ण णिमन्तेदु दाव भव | अरिस्तओ गाव अह । ण भणामि अह अरित्तो सि। किंभणासि-सम्पण्ण असण अहिदव्य भविस्सदिति । अह पुण जाणामि । अहिअमहुरस्स अम्बस्स असो गदाए अहिण भक्खीअदि ति । किं दाणि म उल्लालिअ उल्लाल्सि मणासि । भणामि पावुदो ति । किं भणासि-दस्त्रिणामासआणि भविस्सदि त्ति। एसो याआ पञ्चाचविखटो हिअएण अणुबन्धीअमाणो गच्छीअदि। अहो अचाहिद । अह वि णाम परस्त आमन्तणाणि ति तक्के मि। जो अह तत्तहोदो चामत्तस्स गहे अहोरत्तपय्यत्तसिद्धेहि णाणाविधेहि हिगुपिजेहि ओग्गारणसुगन्धेहि भूक्खषमत्तपडिच्छिदेहि अन्तरन्तरपाणीएहि अमणप्पआरेहि चित्सअरो विम बहुमल्लापहि परिखुदो आअण्ठमत्त अजिअ चचरवुसहो विअ मोटअखन्नएहि रोम या अमाणो दिवस खेवेमि, सो एव दाणि अह तत्तहोदो चारुदत्तस्स नरिहदाए सम पारावदेहि माहारणवुत्तिं उपजीयन्तो अण्णहि चरित्र चरिअ तस्स आयास एव्य गच्छामि। अण्ण च अन्छरिन । मम ग्र अवस्थाविसेस जाणादि । अप्पेणावि तुस्सदि । बहुअ वि ओदणभर भरिस्सदि दीअमाण। ण आएदि अदीअमाण, ण पञ्चाधिक्खदि । ण खु अह एरिसेण ण सन्तुट्ठो। ता सट्ठीकिरदेवकय्यस्स तत्तहोदो चारुदत्तस्स कारणादो गहीदो सुमणो अन्तलिक्सवासो अ। जाव से पस्सपरिनत्ती होमि । (परिकम्यावलोक्य) एसो तत्तभर घारुदत्तो पभाटच दो विक्ष सकरुणप्पिअदसणो जहाविभवेण गिहन्यदाणि अचअन्तो इदो पत्र आअच्छदि । जाव ण उयसप्पामि । (निष्कान्त ।) [अयमय निमन 'यतु तावद् भवान् । भरिपरस्तावदहम् । ननु भणाम्यहमरिकक इति । कि भणसि-सम्पनमशनमशितव्य भविष्यतीति । श्रह पुनर्जानामि । अधिकमधुरस्य अरिक्तक = धनादिसपन' नेपथ्य पुनराहान श्रुत्वा इव विदूषक कथयति कि भणसि-सम्पन्नम् = सुपकम् अशनम् - भोपनम् अशितव्यम् - भक्षणीयम् तवाथै भविष्यति । श्रावस्य- ाम्रफ्लस्य अस्थि-बीनरोष विदूषक सबसक किसी दूसरे को निमन्त्रित करें। में सबसम्पन्न हूँ। निश्रम पूषक कहना है कि मैं सवसम्पत्र है। क्या कहते हो, सब कुछ स्वादयुक्त चारुदत्तम् %3D अानत्य अयोग्यता अस्थि न भक्ष्यत इति । किमिदानी मामुल्लाल्योल्लाल्य भणनि । मणामि व्याहत इति । कि भणनि-दक्षिणा मापका भविष्यन्तीति । एष वात्रा प्रन्याख्यातो हृदयनानुवध्यमानो गम्यते । अहो अत्याहितम् । अमपि 'नाम परत्यानन्त्रणानीति तयामि । चोष्ट तत्रभवतश्चारुदत्तत्व गेहेऽहोरात्रंपर्याप्त- तिनानाविधेनिविद्धरुद्वारसुगन्धिभि क्षेपमात्रप्रतीष्टेरान्तरान्तरापानीयरशन- गुली ) इति लोके प्रसिद्ध . अयोग्यतया = भक्षणाचोग्यतयेत्यर्थ , उल्लाल्य उन्लान्य = अच्छन्य (प्रलोभन दत्वा इति शेष ) व्यापृत = कार्यान्तरे व्यस्त , अत एव विलन्वितु वा अन्यत्र गन्नु न समर्थोऽस्मि, (तेन हेतुना उन मया 'अन्यमन्य = अन्य ब्राह्मण, निमन्त्रयनु = भोजनार्थनानयनु तावद् भवान् इति भेर ) । प्रचाख्यात = निन्दित अस्वाहतो वा, अनुबध्यमान = अनुनियमाण, गम्यते - गन्तुमिष्यते इत्यर्थः । अहो अत्याहितम् = दुर्भाग्य दुर्घटन वा आपतिनम् । तत्रभवत' = मान्यस्य, अहोरात्रम् = दिवानिशम् , पर्याप्तसिद्ध पर्यात्मेण पर्व, हिहुविद्ध-हिंगुना वि? = मिनित, उद्गारसुगन्धिभि = उद्गारकाले मनोरमगन्धयुक्त, नेपमात्रप्रतीष्ट बालनमात्रेण प्रतीष्ट = उतने आनीत , अन्तरान्तरपानीय -अन्तरे अन्तरे प्रत्येक्भोजनमध्यकाले नहीं खाता । अर्थात् मै भी शारुदत्त के घर अतिमधुर पदार्थ खा चुका हूँ। अब उसकी अपेक्षा हीन अन्य के अनादि को खाना नहीं चाहता। फिर भी वाप मुझे ही फुमलाकर चा लोभ दिखाकर क्यों कहते हैं ? मैं दूसरे कार्य में लगा हूँ। क्या कहते हो, दक्षिणा स्वरूप मुदा भी है। यह वेवर वाणी से ही प्रत्याख्यान किया गया है पर हृदय से तो सर्वया अनुमोदन किया गया है। अहो । यह क्या हुआ? मै भी दूम्रे के आमन्त्रण की कल्पना करता हूँ। एक समय था जब कि मैं बहुविध वा (रङ्गों) में सुमति पात्रों से विरे हुए चित्रकार की भांनि नायं माल्टत्त के घरमै रात दिन पर्याप्त रूप से पके हुए नानाविध हिरवाद पदार्थों से मिश्रित एव सुगन्धित उधार ( उदार) लाने वाले, आँखों के प्रन्नुन हो जाने वाले एक भोजन के सनय ने पीने योग्य तथा अनेक प्रकार के विशिष्ट भोज्य पहायों से विरा हुमा नै भावश्यकता से अधिक खाकर सांगन बैल की तरह मोदक खाद्यों से पागुरी करत हुए सारा दिन पतीत कर देना था, बट्टी ने इस समय पूज्य बालदत्त की दरिद्रता के कारण कबूनरों के साथ साधारण दृत्ति को वहन करते हुए अन्य जगह चरकर (अर्थात् भन्नणार्थ नाना स्थान को जार) पुन उन्हीं के निवास स्थान को (ोट) जाना हूँ। सकेत पर पात्र प्रथमोऽङ्का AMAN प्रकारचित्रकर इव यहुमल्लकै परिरात प्राण्ठमात्रमशिवा चत्वरथुपम इव मोदक पाय रोमथायमानी दिवम निपामि स एवेदानीमह तत्रभवतथारुदत्तस्य दरिद्रतया सम पारावते साधारणत्तिमुपजीवन् अन्यत्र चरित्या चरित्वा तस्या यासमव गच्छामि । अन्यचाययम् । ममोदरमवस्थाविशप नानाति । अपेनापि नुप्यति । बहुकमप्योदनभर भरिष्यति दीयमानम् । न याचते अदीयमान न प्रयाचटे। न सम्बहमीशन न मन्तुए' । तत् पष्ठीकृत वकार्यन्य तत्रभवतथा रु नस्य कारणाद् गृहीतानि मुमनमोऽन्तरीयवामश्च । यावदस्य पार्श्वपरिवर्ती । भवामि । एप तत्रभवांधारुदत्त प्रभातचन्द्र इद मररुणप्रियदशनी यथाविमवेन गृहदवता यर्चयन, इत एवागच्छति । यापटेनमुपमामि । ] पानीयम् = मध्यकालीनपानीयम् यपु त अशनप्रकारे = भीनप्रकारे बह- मर - बहुवणकमाने पाकण्ठम् % कण्ठपयन्तम् चत्वररूपम इव- अगनस्पमुसलालित वृषभ "ब रोमन्यायमान = चर्वितस्य पुनरपि चर्वण पनयन सन् दिवस क्षिपामिकाउक्षेप करोमि अवस्थाविशेषम् = वतमानावस्या दारिद्रयमियर्थ पष्ठीकृतदेवकायस्य-पष्ठयाम् = पठीतिया कृतम् देवकार्य यन तस्य (चारुदत्तस्येति शेष ) अतरीयवास = परिधान वस्त्रम् सरुणप्रियदर्शन --सकरुणश्चासौ प्रियदर्शनश्च इति सकरुणप्रियदर्शन एवभूत चारुदत्त इत एवं पा छातीति भाव । भोजन उपलब्ध होगा ? में सब कुछ जानता हूँ (अर्थात् इन सब से मैं सतक हूँ)। अत्यन्त मधुर भाम के उपलब्ध न होने पर उसकी गुठली कोई दूसरा भाक्षय यह है कि मेरा उदर (पेट) अवस्था-विशेप को जानता है, जो थोद में ही सम्राट हो जाता है। यदि देने वाले हों तो अधिक से अधिक भन्नको प्रहण करता ह। न देने वाले से नहीं मांगता और न उसकी निदा ही करता है। इस प्रकार के अवस्था विशेष से म सन्तुष्ट नहीं हूँ ऐसा नहीं है अपितु सन्तुष्ट हूँ। इम सन्तोप के कारण पहा विधि पर देव काय को सम्पादन करने वाले मान्य पारुदत्त के निमित्त पुष्प एव परिचय (पहनने योग्य) वस्तु छाया हूँ। तब तक इनकसमीप जाता हूँ। (घूम कर और देख कर) यह मा र चारुदत्त इधर ही भारह हैं। ये प्रातकालीन चन्द्रमा की मांति सुन्दर एव मलिन दिसाई पर रहे हैं। विभव के अनुसार गृह के देवताओं की अचना करते हुए घर ही भारह है। सय तक म भी इनके समीप जाता है। । - चारुदतम् । फूलो मी sien (तत प्रविशति बलिमुपहरन्नायको विद्यकश्चङ्गेरिकाहस्ता चेटी च ।) नायक – ( दीर्घ निश्वम्य ) भोः । बारिद्रयं खलु नाम मनस्विनः पुस्पस्य मोच्वासं मरणम् । कुत , यासां वलिर्भवति मद्गृहदेहलीनां हसैश्च सारसगणैश्च विभक्तपुप्पा । नास्वेव पूर्ववलिरूढयवाङ्कुरासु नत इनि-वलिम्जाद्रव्यम् , उपहर-गृहन् , चङ्गेरिकाहस्ता-चझे. रिका - पुष्पावारपाठविशेप हस्ते यस्या मा एवभूता बेटी दासी (रदनिका), विदूपक (मैत्र्य ), नायक (बारुढनश्च ) प्रविशतीति भाव । यासामिति ! यामाम् मद्गृह्देहीनाम् = मम गृहाणि मद्गृहाणि तेपा या देहल्ब द्वारपिण्डिका वहिारस्य झाष्टखण्डविशेषा तासा 'गृहावग्रहणी देहली' इन्यमर । अत्र लक्षणया दहलीमीपस्य चत्रराणा 'वलि' तत्र प्रक्षिप्त प्रचुर अवधान्यादिचलि, अक्षतादिजोपहारो वा, हम = मराल, च = पुन , मारम- गणश्च = मारनाख्यपक्षिविशेषश्च, विभक्तपुष्प ---विभक्तानि पृथक् कृतानि पुष्पाणि अस्मिन वा यस्य तादृश , भवति = अभूदित्यर्थ । पर्ववलिटबवावगमु-पूर्व चलि = पूजोपहार नस्मान स्टानि = उद्गतानि, इति पूर्वबलि हानि यबाराणि , (निकल जाता है।) (इसके बाद पूजा द्रव्य लिए हुए नायक (चारदत्त) विदूषक तथा चढ्नेरिक (चगेरी = फूल रखने की इलिया) हाथ में लिए दुई चेटी का प्रवेश) नावक-(दीर्घ उच्छाम लेकर) भो । दरिद्रता (नि सन्देह) मनर्व पुस्पों के लिये उच्वास युक्त मरण है। क्योंकि- हमारे गृह की जिन देहलियों पर बलि पडी रहा करती थी और जिसे RE तथा सारस खाया करते थे। आज उसी देहली पर जहाँ पहले के बलि कर्म में १. 'विमुकपूर्व पनि पाठ समीचीनः ।
प्रथमोऽङ्क। पोजाअलि पतति कीटमुखावलीट ॥२॥ विदूषक -अल दाणि भव अदिमत्त सन्तप्पिदु । पुरुसजोवणाणि विअ गिहजोवणाणि खु दसाविसेस अणुहोन्ति । आसमुहआणविपण्ण विभवस्स बहुलपक्खचन्दस्स जोहापरिक्सओ विभ भवदो एव्य रमणीओ अअ दरिदभावो । [ अलमिदानी भवानतिमात्र सन्तप्तुम् । पुरुषयौवनानीव गृहयौवनानि खलु दशाविशेषमनुभवन्ति । श्रासमुद्रदानविपन विमवस्य बहुलपक्षच इस्य ज्योत्स्नापरिक्षय इव भवत एव रमणीयोऽय दरिदभाव । नायक-नसल्वह नष्टा नियमनुशोचामि । गुणरसशस्य तु पुरुपस्य व्यसन दारुणतर मा प्रतिभाति । कुत , यासु तासु एव गृहदेहलीषु कीटमुसावलीट-कीटाना मुखै अवलीड = खण्डित अर्द्धभुक्त इति वा बीजाजलि -बोजाना यवादियोजानामजलि अर्थात् अलिपरिमितधाग्यादि इत्यर्थ पतति अनेन अननुभूतपूर्वमिद दाखियदु खम् ध्वनित । अपरच दयादात्र विधाने च पलि द्वारे गृहस्य चेति माकण्डेयपुराण वचनाद् गृहद्वारे बलिप्रदानवर्णन भारतीयप्राचीनसभ्यता सूचयति ॥ २॥ भासमुद्रदानविपनाविभवस्य-आसमुद्रम् यया स्यात् तथा दानम् तेन विपन क्षीणभावयुक्त एवभूत विभव = घनम् यस्य तस्य बहुलपक्षचवस्य = कृष्णपक्षच द्रस्येत्यर्थः। गुणरसशस्य-गुणश्च रसच हात गुणरसौ तो जानातीति गुणरसज्ञ' तस्य गुणरसङ्गस्य - अनुभूतविभवफलसारस्पत्यर्य । व्यसनम् = दारिद्रयम् । रिस पत्र के अडर निकल आए हैं इन कीटों क द्वारा खण्डित (चारी हुई) बीजाअलि पड़ी हुई ह॥२॥ विदूषक-इस समय भापको अत्यन्त सन्ताप करना उचित नहीं है। पुरुष की युवावस्था की भाति गृह का पौधन दशाविशेष को प्राप्त करता है। समुद्र पयन्त की सम्पत्ति को दान में विनष्ट करने वाले आपकी यह दरिद्रावस्था कृष्णपक्ष में प्रय हुई चन्द्रमा की कक्षा की तरह रमणीय ही लगती है। नायक-मैं विनाश होने वाली सम्पदा की चिता नहीं करता। योग्यता आदि गुण एव कारुण्यादि रसके अनुभवी सहृदय पुरुष की विपचि मुझे असम प्रतीत होता है। क्योंकि-
प्रथमोऽङ्क
Arthun
एनत्तु मे प्रत्ययदत्तमूल्य
1
मरन सबै !न क्षयमभ्युपैति ॥४॥
(चित नाटयति ।)
विपक-कि भय अत्यविमर चिन्तेदि। [किं भवालयविश्व
चिन्तयति।
न्यू
सय न मे धनविनाशगता विचिन्ता
भाग्यप्रमेण हि धनानि पुनभवन्ति ।
एतत्तु मा दहति नयनश्रिया में
यत् सौहदानि सुजने शिथिलीभवन्ति ॥५॥
नायक-
अपमानितम् नव स्मरामि । हे सखे ! एतत्तु ग्रन्ययदत्तमूल्यम्-प्रत्ययन = दान
अयस्करमिति विधान दत्त मूल्यम्-धन यन एतादृश इट में सात्वम् - मम मन
सत्यसबक मन इति चरक । न क्षयम् अभ्युपतिन्न कदापि भय प्राप्नोति ॥४॥
सत्यमिति-सत्यमेव धनविनाशगता- वित्तवसोपना विचिन्ता दन्य
में मम नास्ति न यतते क्थमित्याशकामामाह-हि = यत भाग्यक्मेण =
अदृशानुसारेण धनानि पुनर्भवति = पुनरप्यायाति । तहि चिन्ताबीपदिमित्याह-
एतदिति एतत्तु = एसप मा दहति - मश पीडयति दु साकरोति यत् नष्टयन
श्रियाना धनधी - वैभवश्री यस्य एषभूतस्य मे- मम साहदानि - फुट
म्बादय मित्रवर्गा वा मुजने = मा सुजने सत्यपि शिथिलीभवति अर्थ
(अन्य किसी भी याचक को) असन्तुष्ट नहीं किया। हे मित्र! दान दना उत्तम
काय है इसी विधास से सम्पूर्ण सम्पसि एव ऐश्वय को लुटा दमे पाहा सच्च
पाली मेरा मन कमी भी इय भाव को नहीं प्राप्त हाता ॥४॥
(चिन्ता युक्त अभिनय करना है।)
विदूषक-क्या भाप ऐनय की चिता करते हैं।
नायक-मित्र! यह सत्य है कि मुझे धम के भाव की गिोप चिता नहीं है।
क्योंकि भाग्य के क्रम से धन पुन हो जाते हैं। परत पड़ी तो मझे विशेष
मतीत होता है कि निधन होने पर मेरे पन्धुषा मेरे जैसे सुजन व्यक्ति में
भी निरादर की भावना रखते है॥५॥
१६ चारुदत्तम् । ला! ' अपि च-- दारिद्यात् पुरुषस्या वान्धवजनो वाक्ये न सन्तिष्ठते सत्त्वं हास्यमुपैति शीलशशिनः कान्तिः परिम्लायते । 'निर्वैरा विमुखीभवन्ति सुहृद स्फीता भवन्त्यापदः पापं कर्म च यत् परैरपि कृतं तत्तस्य सम्भाव्यते ॥ ६ ॥ विदूषक -एदे दाणि दासीएपुत्ता अस्थवावारा गोवदारआ विक्ष मसअभीदा गिहादो णिग्गच्छन्ति | धणविणासढुक्खस्स उण चिन्तिअ- चैकल्यप्रयुक्तवन्धुतामपि त्यजन्ति, हतादराणि भवन्ति वा, एतदेव दु खाकरोति मामित्याशय ॥ ५ ॥ दारिद्रयादिति-दारिद्रयात् = बनाभावात् , पुरुषस्य = लोकस्य, वाक्ये वान्धवजन = सुहृज्जन , कुटुम्ववर्ग 'सगोत्रवान्धवज्ञातिवन्धुस्वस्वजना समा इन्यमर । वाक्ये न सतिष्ठते = वचने न प्रत्येतीति भाव | 'समवप्रविभ्य स्थ' इत्यनेन सन्तिष्ठत इत्यत्रात्मनेपदम् । सत्त्वम् = वलम् , मनस्विता का हास्यम्-हासविषयम् उपेति-प्राप्नोति, शीलशशिन = चारित्र्यचन्द्रस्य, कान्ति = दीप्ति शरीरसौन्दर्यम् , वा, परिम्लायते = सर्वतो ग्लानिं, म्लान वा गच्छति । निचरा = अत्यनुरक्ता , मुहृद = मित्राणि, विमुखीभवन्ति = प्रातिकूल्यमाचरन्ति, दरिद्र प्रति न गच्छन्ति कार्याभावान् वा ( दरिद्रपुरुपस्य), श्रापद - विपत्तय , स्फीता = विशाला , बहुला वा, भवन्ति = जायन्ते, यत् पाप कर्म = निन्दित म, चौर्यादिकमिति यावन् । परै सामान्यजने अपि, कृतम्-आचरितम् भवेत् तन् कर्म = पापजनक कुत्सित कर्म, नस्य = दरिद्रपुरुषस्य, मभाव्यने अनुमीयते अर्याभावात् इदमनेनैव कृतमिति जन निर्णीयत इति भाव ॥ ॥ और भी दरिद्रता के कारण, पुरुष का कुटुम्ब य यन्वर्ग वाणी में आस्था नहीं रखता, मनस्विता हास्यमा विपय बन जाती है, शीलयुक्त (पुरुष) की कान्ति भी मरिन हो जाती है। विना शत्रुता के ही मित्ररोग विमुग्व हो जाते हैं, आपत्तियाँ बड़ी हो जाती है और जो पाप न साधारण जन के द्वारा घटित होता है, उसे भी दरिद्रता (अर्थाभाव) के कारण लोग उसीका किया हुआ मानने लगते है।॥६॥ विदपक-इस समय ये कम्बरन रुपया-पैसा, मशक (मच्छड) से भयभीत गडेरियों के बच्चों की तरह अपने घर से बाहर निकलते हैं। वसन्त ऋतु में सरकण्डे प्रथमोऽङ्क। 4 माणस्स वसन्ते वुढ्ढस्स सरत्थम्बस्स विभ अल्फरपुरा ७७ममान्त । वा अल भवदो सन्दावेण। [एत इदानी दास्या पुत्रा अर्यध्यापारा गोप दारका इन मशकमीता गृहाद् निर्गच्छति। धनविनाशदुसस्य पुनश्चिन्त्यमानस्य वमन्त वृद्धस्य शरस्तम्वस्यवाऽधुराडरा उद्ममन्ति । तदल भवत सन्तापेन । ] नायकः-षयस्य । किमर्थ सन्ताप करिष्ये । किञ्चाह दरिद्र, यस्य मम, विभवानुषशा भार्या समतु खसुलो भवान् । सत्व च न परिभ्रष्ट यदू दरिद्रेषु दुर्लभम् ॥७॥ Y6 - (यथा) वसन्ते = वसन्तमासे वृद्धस्य % परिपकस्य शरस्तम्बस्य - शर गुच्छस्य (शरपत' शरकण्डा' इति लोकभाषायाम् ) रात् अकरा उद्ममन्ति = उच्चलन्ति निर्गच्छन्ति पा (सयैव ) घनविनाश दु खस्य चिन्त्यमानस्य (जनस्येति भाव ) नानाविधाश्चिन्ताहरा उद्ममन्ति: प्रादुर्भवन्तीत्यर्थः । विमति । यस्य मम विभवानुवशा-प्रचुरविभववशात् सवदा अनुवशा- अनुकूलकार्यकारिणी भार्या = पत्नी अस्ति (तथा) समदु खसुख - सम्पत्ती विपत्ती च एकमाव इत्यर्थः भवान् = मैत्रय (विदूषक-) अस्ति सत्त्वम् = मन च न परिप्रष्टम् । यत्-सत्त्वादिरक्षणम् दरिद्रषु - अस्मादृशेषु माग्यहीनेषु दुलभम् के जैसे भकुरों में से आकर निकलते है वैसे ही धन विनाश से दुखी एवं चिन्तित (व्यक्ति)को और भी नाना प्रकार की चिन्ता के अंकुर पैदा होते रहते हैं। इसलिये बापको साताप नहीं करना चाहिए । नायक-मिन्न। मैं क्यों धा के लिये सन्ताप करू! क्या मैं दरिद्र है। जिस मेरे- विपुक विमव के कारण सवदा पास रहने वाली भाषा तथा सुख एव पुस में समान रूप से भाप जैसे सहदय मधु (मित्र) साथ है और सत्वशाली मन भी पथभ्रष्ट नहीं हुभा है जबकि ये तीनों धरिदावस्था में दुलम हैं। (भावाथ यह है कि चारुदत को ऐसी दशा में भी गुण प्राहिणी परनी, सहृदय मित्र तथा सम्माग गामी मन कानप सानिध्य उपल ध है तो वह सबसे धनवान है।) २चा चारुदत्तम् । wwwwwww 1 (तत प्रविशति गणिका सम्भ्रान्ता विटेन शकारेण चानुगम्यमाना।) शकारचिट्ठ चिठ्ठ वशञ्चशेणिए । चिठ्ठ, किं याशि धावशि पधावशि पक्खलन्ती शाहु प्पशीद ण मलीअशि चिठ्ठ दाव । कामेण शम्पदि हि उज्झइ मे शलील अङ्गालमज्झपडिदे विचम्मखण्डे ॥ ८॥ [तिष्ठ तिष्ठ वसन्तसेने तिष्ठ, किं यासि धावसि प्रधावसि प्रस्खलन्ती साधु प्रसीद न मार्यसे तिष्ठ तावत् । कामेन सम्प्रति हि दह्यते मे शरीर- मगारमध्यपतितमिव चर्मखण्डम् ॥ ८॥] अस्ति, अत एतद्-दुर्लभत्रयसान्निध्यात् अह सर्वसम्पन्न अस्मि नाह दरिद्र इत्याशय ॥७॥ 'तिष्ठ तिष्ठ' इति श्रावेगे द्विरुक्तम् । 'शकारो राष्ट्रिय स्मृत' इति वचनात् शकारस्य भाषा राष्ट्रिया विज्ञेया । शकार पलायनपरा वसन्तसेनामनुसरन् कथयति-किमिति-( त्वम् ) प्रस्त- लन्ती = स्खलितचरणा, कि = कथ यासि, धावसि, प्रधावसि-अति वेग गच्छसीति भाव । साधु प्रसीद = मयि प्रसन्ना भव, न मार्यसे = नाह त्वा हन्मोत्यर्थ , तिष्ठ = शीघ्रगमनात् विरता भव, तावदिति वाक्यालकारे, किंवा यावत्काल वय ब्रूम तावदिति कालनिर्देश , अङ्गारमध्यपतितम् = प्रज्वलिताग्निमध्ये पतितम् (तव विट और शकार से पोया की गई सम्भ्रान्त एव व्याकुल गणिका का प्रवेश ।) शकार (= राजा का साला)-ठहरो, ठहरो वसन्तसेना, ठहरो। क्यों जा रही हो, (क्यों) दौड रही हो ? नीचे ऊँचे मार्ग में लढखडाती हुई भी (अत्यन्त वेग से) दौड रही हो। मेरे ऊपर प्रसन्न हो ओ। ठहरो, मैं तुम्हें नहीं मारूगा। इस समय मेरा शरीर आग में पठे हुए चर्म खण्ड की तरह काम- पी अग्नि से जल रहा है।८॥
im . प्रथमोऽङ्क। १६ विट-चसन्तसेने। कित्य भयेन परिवर्तितसौकुमार्या वृत्तोपदेशविशदौ चरणौ क्षिपन्ती । उद्विग्नश्चलकटाक्षनिषिष्टष्टि ध्यानानुसारचकिता हरिणीव यासि ॥९॥ शकारः-भावे । एशा गच्छद यशश्चशेणिआ, चर्मखण्डमिव = मासखण्डमिव सम्प्रति = अधुना हि मे - मम शरीरम् कामेन- पदनाग्निना दह्यते-सन्तप्यते पीव्यते इति भाव ॥८॥ भूदुमन्दगामिनी वसन्तसेना भीसिविहुलतया द्रुतगामिनीमवलोक्य तदनु गामी विट पाह-किमिति-त्वम् - घसन्तसेने भयेन = भीत्या परितितसा कुमार्या-परिवर्तितः वृततमगमनाय परित्यक सौकुमार्य = गमनमूदुता मन्पर गमनमिति यावत् यया सा एषभूता सती नृतोपदेशविशदा-नृत्तस्य - माषा । यस्य इत्यर्थः भवेद् भावाश्रय नृत्त भृत्य ताललयाश्रयम्' इति दशरूपके । उपदेश = शिक्षणम् सत्र विशदो-भूरिदशी निदाफ्नर्तनादिकलाभिशी इति यावत् एताशी चरणो लिपन्ती- क्षिप्र पातयन्ती पहन्ती का (तया) उद्विग्नचधल- कपक्षनिविदृष्टि - उद्विग्नश्च = अत्यन्तव्यग्रश्च अतएव चचलन = चपलथ एता दश क्ग - अपष्टि कामोपाङ्गदशने' इत्यमरः । तेन निविष्ठा एवभूता दृष्टिर्यस्या सा तादृशी (सती) अर्थात् कियद् दूरे पापिष्ठी स्त इत्याननमीपत् परावत्य तिर्य नयनेन समीतिमवलोम्यतीत्यभिप्राय । ध्यानानुसारचकिता- ध्यानस्य अनुसार अनुगमन पश्चाद्धावन पा तेन चकिता भयभीता चला वा एवभूता हरिणी इव - मृगीव किं- कय केन हेतुना वा मासि-गच्छसि । वस्नेहसूधनिबद्धौ ( विटशकारी)दा भीतिनव विधेयति मार ॥९॥ विट-अयि धसम्ससेने! तुम मय के कारण अपनी सुकुमार गति को परयर्तित करती हुई एव नृत्त फलामेंदा (धोनों) धरणों को रखती हुई अग्नि एवं चबल कटानों से हमारे ऊपर आघात करती हुई तथा व्याघ्र के द्वारा पीछा की गई अतएव हरी हुई हरिणी की तरह क्यों जा रही हो?॥९॥ शकार-भाव ! यह वसवसेना जा रही है।
चारुदत्तम्। दुधि अम्हाणुवन्धयन्ती जहा शिगाली विस कुषालेहि। शण पुला मंदलणाददाशा शट्टणं मे हल हलन्ती ॥ १० ॥ [भाषा गच्छति घसन्तगेना, छान्यामावास्यागनुवध्यमाना यथा गालीय पुक्कुराभ्याम् । रानूपुरा गलानामहासा सन्चेष्टन मे हदय हरन्ती ।। १० ॥] चिट.-चगन्तरोने । किं त्वं पदात् पदशतानि निवेशयन्ती नागीच यासि पतंगन्द्रभयाभिभूता। वेगाव प्रचालितः पचनोपमेयः - शकार इति-माय !-भावगति चिन्तयति गूढतत्त्वमिति भावो विद्वान , तत्गम्बोधन गाय | = चिन , 'भावो विद्वान' इत्यमर । द्वाभ्यामिति-माभ्यामन्यापाभ्याम् (चिटश काराभ्याम् ), अनुयायमानान अनुगम्यमाना एपा बसन्तरोना गणराम्गाम अनुगम्यमाना गालीच गच्छति %D धायति ( तथा) गनपुरा = पुरण मा वर्तमाना इत्यर्थ । मेरालानादादासा-- मेराला = काची तस्या नाद - शब्द स ग = उद्वारा. यस्या राा एपा मे = मग, गवेपनम् = सायरण नदिवर्णम् , गानयुसग सदगम् हरन्ती (गच्छति इति शेष )॥१०॥ तगापि वेगापलागगाना तां विलीगग विटा पुनरपि पदति-किमिति स्यम् परात - परमपदार शतपदानि निवेशगन्तीपदशवदरे द्वितीयचरण निशिपन्ती अति भाया, पतगन्द्रनगाभिमा-पतगानाग इन्द्र : श्रेष्ठ (गरु तस्मान भन्यम तेन 'अभिभूता = प्राकानमा नागीय - गर्पिणीव किग का गामि गन्द्रगि। पानोपमेग' परनेन तरय श्राम गात प्रचलित 'अपि किला जमघोनों से पीछा की गई यह पसन्तसेना, श्वान (गो) से पीछा की गई शृगाली की भांति भाग रही है, तथा नपुर के महिरा मैगला (फाशी) के शान्ट भापयुक्त मेरे हदय (गन) को एरण कर ॥10॥ विट-यागमनबना, राम पो गर भय से प्रग्स मागिन की सराहशीच, एक पर मैं सैकड़ों पैर रसती mammi ' बाय के समान में शीना से पाठ कर पया वर्ग प्रथमोडल २१ किंस्थां ग्रहीतुमथया न हि मेऽस्ति शतिः ॥१५॥ गणिका (समन्तादवलोक्य ) पल्लव | पल्लया । परहुदिए । परदिए । महुअरअ । महुअर | सारिए । सारिए । हद्धि, णटो मे परिजणो। पथ सभ ण्य अप्पा रक्सिदव्यो। [ पल्लवका पल्लषक ! परभृतिके' परतिके। मधुकरक ! मधुकरक ! शारिक ! शारिके!। हा धिक नटो मे परिजन । अव स्वयमेवात्मा रक्षितव्य ।] शकार'-विलय विलय णाए। विलय पल्लव वा, परहुदिक्ष वा, महुअर या, शालिस या, शव्य यशश्चमाश वा। पे के तुम परित्तअशि । किं वाशुदेवे राषपणे कुन्तीशुदे वाजणमेजर वा। Hauns अह तुम गाहिम केशहत्ये दुशाशले शीदमिवाहलामि ॥१२॥ [विलप विलप हाते! विलप पल्लव वा परमृति वा मधुकर वा शारिका या सर्व घस तमास या । क कस्त्वा परिनास्यते । कि वासुदेव शवपत्तनेश कुन्तीस्तो वा जनमेजयो वा । प्रीतुम् (समर्थ) अथवा त्वां प्रहीतु मेमम शक्ति न अस्ति हि-नास्त्यव ॥११॥ पल्लव इति–पञ्जब इव पल्लवक स्तरसम्बुद्धी हे पल्लवक ! नूतनकिसलय तुल्यरकवर्णशरीरत्वात् पूर्वोकनामधेयो पस तसेनामृत्य' परतिका नाम्नी दासी तत्सम्बोधने परमतिके। समायाम् कन् एव मधुकरच ! शारिक इत्युभयत्रापि विवेचनीयम् सहदय । मेमम परिजन = रक्षक नष्ट' अत्र - अस्या परि स्थिता स्वयमेव प्रात्मा रक्षितव्य स्वक्रीमा रक्षामह क्याम् इति भाव । शकारी लोकविद्युतवीराणामपि रक्षणासामय प्रदर्शयति-फिमिति। वासुदेव - पकड़ने के लिये समर्थ हैं। अयवा सुई पकड़ने के लिये मुझमें सामथ्र्य नहीं है ॥३॥ गगिका-(चारों भोर देखकर) पक्षक ! पपश्वक! परमृतिके परतिके! मधुकरक! मधुकरक ! शारिके । शारिके! हा धिक्! मेरा परिजन नष्ट हो गया। ऐसी दशा में मैं स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। शकार-को भीरता विलाप करो पल्लवक परमृतिका मधुफरक शारिका इन्हीं को क्यों (थलिक) इकट्ठे यस तमास को भी पुलाओ। (देखता हूँ, कौन तुम्हारी रजा एवं सहायता करता है। बमा यासुदेव (श्रीकृष्ण) पाश्मशान के स्वामी (पमराज) या कुन्तीपुत्र (अजुन) या जयमेश्य तुम्हारी रक्षा करेंगे। (अर्थात् कोई नहीं हारी रज २२ चारुदत्तम्। . तस्य ईश अह त्वा गृहीत्वा केशहस्ते दुशासन सीतामिवाहरामि ॥ १२॥] विट -वसन्तसेने । सर्वत्र भयानभिज्ञहृदयं मां कुरु । पश्य, परिचिततिमिरा मे शीलदोषेण रात्रि- श्रीकृष्ण कि त्वा परित्रास्यते इति अध्याहार , एवमग्रेऽपि यथोचित पदे एतभिर्व शनीयम् । वा शवपत्तनेश-शवानाम् पत्तनम् = स्थानम् , नगर वा श्मशानम् = यमराज, वा = अथवा कुन्तीपुत्र = कर्णोऽर्जुनी वा तयोरेव धनुर्ध रत्वेन प्रसिद्धत्वादिति आशय । कुत्रचित् युधिष्ठिर इति पर्यायोऽपि भवितुमर्हीं। युधिष्ठिरस्य धार्मिकत्वाद् धार्मिकस्यैव पुरुषस्य परनारीरक्षणसम्भवात् इत्याशय जनमेजय = परिक्षितपुत्र अर्थात् न कोऽपि परित्रास्यत इति भाव , अह (त्वा केशहस्त = केशसमूहमित्यर्थ 'पाश पक्षस्य हस्तश्च कलापार्था कचात्परे इत्यमर, (तव इति शेष ) गृहीत्वा = धृत्वा दु शासन सीतामिव श्राहरामि आकृष्य नयामीत्यर्थ । वस्तुतस्तु दु शासन द्रौपदीमिव इत्येव समुचित पाठ परन्तु शकारस्य अविवेकपूर्णोक्ति उपमा श्रेण्या असत्पक्ष नावगाहते, यथोक्त- मभियुक्त –'अपार्थमक्रम व्ययं पुनरुक्त हतोपमम् । लोकन्यायविरुद्धच शकार- वचन विदु । अपरम, 'पागमलिगविहीन देशकालन्यायसमयविपरीतम् । व्यर्थ कार्यमपार्थं भवति हि वचन शकारस्य ॥ एवमेवोत्तरोत्तग्मपि विवेचनीयम् सहृदय ॥ १२॥ सर्वन = सर्वस्मिन् काले भयानभिज्ञहृदयम् = भयशून्यमिति भाव , जानीहि, धातूनामनेकार्थत्वात् इत्यर्थो भवति । परिचितेति-शीलदोषेण-स्वभावदोषेण, चौर्यादिदोषेण वा में रात्रि परि- कर पायेगा) मैं तुम्हारे केशों को पकड़कर दुःशासन, जैसे सीता को बलात् खींचकर (समा के बीच)लाया था, वैसे ही खींचकर लाता हूँ ॥ १२॥ पिट-भयि घसन्तसेने ! मुझे सय परिस्थिति में भयरहित जानो । देखो, मेरे स्वभाव दोष के कारण, राग्नि समय (मेरे लिये) विशेष परिचित है १ 'केशहस्ते' इत्यत्र केशइस्तम् एतदेव पाठो रमणीय स्यात् । २. यए शकार लोगों को योग्यता पर फमती हैं जिन्हें ऐतिहासिक एव पौराणिक जानकारी नहीं के बराबर होती थी और जिनकी अर्थपोजना भौंटी एव मनगढ चला करती थी। यही बात प्रस्तुत शकार में मी इष्टिगोचर हो रही है। कुरु- प्रथमोऽ। २३ hui यहुलतिमिरकालास्तीणपूर्ण विघट्टा। युवतिजनसमक्ष काममेतन वाच्य विपणिपु हतशेपा रक्षिण साक्षिणो मे ॥ १३॥ गणिका-आत्मगतम्): इदाणि संसइदा सवुत्ता, जो अप्पगुणाणि सअ एव्य मन्तेदि । कह एदे अकय्य ण करिस्सन्ति । [अहम् इदानी सश यिता महत्ता य प्रात्मगुणान् स्वयमेव मन्त्रयत । क्यमेतेऽकार्य न करिष्यन्ति । विट'-भवति । क्रियतामस्माकमनुनयप्रग्रह । पश्य, चिततिमिरा-परिचित तिमिर यस्या सा (आसीत् ) तथा बहुलतिमिरकाला कृष्णपक्षानुकारकालवर्णा विघटामा तीर्णपूर्वा = पूर्व प्रान्ता एतत् = कुकर्म वा कम युवतिजनसमक्षम् कामम् = यथेष्टम् न वाच्यम् = कयनीयम् । परन्तु हतया-इतेभ्य शेषा इत्यर्थ । विपणिपु - पापणेथु (बाजार) इति लोकभाषायाम् रक्षिण = प्रहरिण मे = मम साक्षिण = पधादिकर्मसाक्षिण प्रत्यक्षद्रष्टार' अर्थात् राजपुरुष परिकीर्णेऽपि राजमार्ग राजश्यालादिवन्धुसत्यात मे बधादिसाहसकमसु स्वेच्छाचारित्वम् जानीहि इति भाष ॥ १५॥ सयिता = सदेहयुक्ता सरता = कृता अनेनेति शेष आत्मगुणान् = स्वर कार्याणि मत्रयते - ख्यापयति अकार्य = पापकम । विट इति-अनुनयप्रग्रहः-अनुनयस्य प्रग्रह = प्रवाह अनुबन्धोवेति (तात्पर्य यह है कि मैं रात्रि में ही कुकम करता हूँ) और मने पहले कृष्ण पक्ष में अधकार पूर्ण टेड़ी मेदी गलियों का भ्रमण भी किया है। मैं इन सब बातों को युवतिमन के समय निर्देश (चर्चा) करना नहीं चाहता किन्तु यचे हुए पामार के जो रसक हैं घे ही मेरे (वादिर) कम के साथी भी हैं॥३॥ गणिका-(स्वगत) में (पूर्वोक चान्त) से इस समय सदेह में पड़ गई हूँ, जो स्वयं अपने गुणों को प्रकाशित करता है क्या निन्दित काय को महीं करेगा। अपितु करेगा ही। विट-हे माननीये! आप हमारे अनुनय को स्वीकार कीजिए। देखें- anMahamaMaremMwammam माया। anhiwana जागतिमा भी प्रश्रयो भियगामा किमि मिशान कर मशिधागाम् । "नाशिमर्थ समाधीन करोऽयं यमतिसञपणाया गां शरीरंप रक्ष ॥ १४ ॥ Alt (नाग) जपणजो पिरो भादि। अनुगमोऽपि र पर inty-fa 1 सकार:-राप्रwि | शु मारे गणादि । पण्णिादि र व पतिला जाणाणपस पाशु ! 10.2 शिकरण fer शिहिगीसमेत नियेमिशीशंजय माल था | "पालिकाणि शोशिश गरे खु जो कोहणणाग जीप ।। १५॥ जागयतीति- लिया मिलमा - प्रललाम्नायगानः शा रोपा। Hity ila Part : Kawal, गतिमा-1 सानाम् निमिष ५५ करम arrai मारणम् गाविति गान'। अगम् रामः समाविकूर मशिगा। मगदी-गना पी १.१ . तमाम भानगति - मायाति माता (परिपसा) मा शाप शुपतिमाया था ! नणारा - पि. rial War निभिता पति तिभात भागमति . मगमुत्पाद गत मा । in tour oा अनुगम निक्षम my को UKER कर देता है। और मित लिन पुकाम र म | (Ayat) गर्थ, यी हार को भार मि. M (आप) गिषम पारसा है कि (अनुगमको PHER ARR) मुशेलार मेरे शरीर को पति पभ की प्रणा से मान | मानि--(HI) TARE MEETE सी शुशे भाग है। MAIE सरोगे ! मममी नि तित माह हैं। महापार गन से जो आगम निता है ne पुरसंग होने के का या कम रखता है। तो पारा । ગd प्रथमोऽङ्क । २५ - [सन्तसेने । मुष्ठ भावो भणति । बहुमान्यते खलु सावदु बलबज्जन दुर्लभोऽनुनम । पश्य पासु! श्रमि खलु तीक्ष्ण शिखिप्रीवामेचक क्षिपामि शीर्ष तव मारयेऽथवा । अल त्वस्मादृशान् रोषयित्वा मृत' सलु यो भवति न नाम जीवति ॥५u] गणिका-अव्य । कुलउत्तरणस्स सीलपरितोसोवजीविणी गणिआ खु अह । [ प्राय ! फुलपुत्रजनस्य शीलपरितोषोपजीविनी गणिका सल्वहम् ।। विर.-अत खलु प्रार्थ्यसे। बलवज्जनदुलभोऽनुनय -बलवज्जनात् दुर्लभ यदा कदा लभ्या अनुनयः अपि लोके बहुमान्यते = शिरोधार्यते परिमास्यते इत्यय । तस्मान् अस्माकम् प्रार्थनां स्वीकुरु इति पलितार्य । हेवासु ! = हे बाले ! बाला स्याईसु इत्यमरः । अत्र वासू शब्द कोमलामन्त्रणे प्रयुक्त । तस्येव वासू शदस्य सम्बुद्धी वा' इति रूपम् भवति । पश्य = विचारय इति भाव । असिरिति-शिखिग्रीवामेचक -शिखिन = मयूरस्य ग्रीवा तद्वत् मेचक- श्याम तीक्ष्ण = निशित प्रसि'- कुपाण मे मम (हस्ते अस्ति इति शेष अनेन) तव शीर्षम् = मस्तक क्षिपामि भूमो पातयामीति नाच श्रथना स्वाम् मारये प्राणविनाश करोमि । अस्मादृशकान = मविधान बनान् रोषयित्वा अलम् = व्यर्थ न किमपि फल सेत्स्यतीति भाष । कुत = इत्याह-मृतरिति । यो जनी मृत भवति स जनी खलु निश्चयेन न जीवति नाम - प्राणान् धारयति । अत अस्मदस्तगतत्वेन तव मरणस्य अनिवार्यतया पलायन निरर्यक- मिति भाव ॥ १५॥ शीलपरितोषोपजीविनी-शीलेन परितोष इति शीलपरितोष तेन जोवतीति शीलपरितोषजीविनी गणिका%D वैश्या । मयूर के कठ के समान श्याम मेरा तीक्ष्ण (ज) सहधार है। (इसलिये) तुम्हारे सिर को काट लगा अथवा तुम्हें मार दूंगा। मेरे जैसे जन को क्रोधित करना उचित नहीं है। और तो मर जाता है वह जीवित भी नहीं होता॥१५॥ गणिका-भाग, मैं फुलपुत्रजन के पीलरूपी परितोष से जीवित रहनेवाली वेश्या हूँ। वि-इसीलिए तो मैं तुम्हारी प्रार्थना करता हूँ।
प्रथमोऽ। इत्युक्ते अान्तभिनयात घचासि सधणा विटा-(आत्मगतम्) आमुष्टमात्मान न जानाति मूख । ध्वस इत्यवगच्छति । अपि च, B. किमपि किमप्यनवेक्षितार्थमाह । . . अनुचितगतिरप्रगल्भयाक्य पुरुषमयस्य पशोर्नवावतार ॥ १६॥ (प्रकाशम् ) यसन्तसेने । किमिद मत्सनिधी यशपासविरुद्धम मिहितम् । पश्य, आकुटम् - निन्दितम् इत्यर्थः । अमिनयतीति-(एप ) सर्वगाने बासि अभिनयति शरीरावयव महिमि मनोभाव प्रकटयतीति भाव किमपि किमपि अनवेक्षितार्यम्- अनवेक्षित इति अनवेशित = अनालोचित अथ = प्रयोजन यस्मिन् तत्तया आह- कथयति । पुरुषमयस्य पुरुषल्पस्य पशो - जीवस्य (एप) अनुचित गति-अनुचिता गति अस्य तथा अर्थात् निन्दितव्यवहार इत्यर्थ पप्रगल्भवास्य'-अप्रगल्म= प्रतिभाशूल्यम् माम्य यस्य स नवावतार - नवीनोत्पत्ति इत्यथ ॥१६॥ वेशपासविरुद्धम्-वेशे = गणिकाभवने पाम - स्थितिस्तस्य वेश्या भावस्येतिमाया विरुदम् - अनुचितम् विपरीतम् शान्त इत्युक्तवचन विट-(स्वगत)यह मूर्ख (शकार) अपने को निदित नहीं समझता। (वस त सेना के द्वारा) ध्यस (=विमाश एवं घृणा सूचक) कहे जाने पर भी श्रात' (=यका हुआ)ऐसा समझ रहा है। और भी- यह सम्पूण अद्रों (की भाव भगिमा) के द्वारा मनोगत माय को प्रकट कर रहा है प्रथा कुप कुछ अस्पष्ट अभिप्राय को कह रहा है। यह पुरुप रूपी पशु (बीप) का एक नया अवतार है, जिसका व्यवहार निदित एष पाक्य प्रतिमा शूप है। । (प्रकाश रूप से)सात सेने! तुमने क्यों मेरे सामने पेशवाओं के विस्त वाक्य कहा देखो- प्रथमोऽङ्क । -- नायक -मूख | यथाविमवेनाच्यताम् । भक्त्या तुन्यन्ति देवतानि । 'तद् गम्यताम् । विपक-एआइ अह कह गमिस्म । [ एकाक्यह कय गमिप्यामि । नायक-रटानिके । अनुगच्छानभवन्तम् । रदनिका-ज भट्टा आणदि। [य भाज्ञापयति । ] विपक-भोदिनीय अह णहस्स। [भवति । दीपमह नेष्यामि ।] नायक-यथा मवान् मन्यते तथास्तु । विदूषक -(दीप गृहीन्या) मो रदणिए । अवावुद पक्सदुवाल । भो रदनिके। अपाणु पक्षद्वारम् ।] रदनिका-तह । (नाटयेन द्वारमपारणोति) [तया।] (गणिा पत्रान्तेन दीप निर्वापयति ।) विदूपक-अविहा । अविहा ।।[अविहा ! अविहा!।] 17 नायक-ययस्य । क्रिमेतत् । नायक इति-यथाविभवम् -विभवमनतिक्रम्प यया स्यात्तथेति भाव । अविहा 1 इति खे थव्ययम्। -मू। अपनी वार्षिक स्थिति के अनुरूप पूजा करो। मकि से ही । देवता सन्तुष्ट होते हैं। अत जाओ। विदूपक-मैं अकेला कैसे जाऊँगा? नाय-पदनिके। इनके साथ जाओ। रदनिका-जो महाराज की आज्ञा । विदूषक-माननीय मदीपलूंगा। नायक-जो आपकी इछा हो वही कीजिए। विदूषक-(दीप हाथ में लेकर ) अयि रदनिके । पारद्वार खोलो। ग्दनिवा-मनी यास है । (मिनय द्वारा पारवादार (दरवाजा) को खोलती है।) (इसी बीच में हार के रास्ते हो यही बैठी हुइ गणिका सन्तसेना पक्षा शल के द्वारा दीप को थुझा देती है।) मिषक-हाय! हाय! नायक-मित्र क्या हुआ? ३चा नायक- .
चारुदत्तम् । विदूषक–अवावुदपक्खदुवारपिण्डीकिदप्पविद्रेण राअमग्गसङ्कि ण्णेण वादेण सहसा णिग्गच्छन्तस्स मम हत्थे णिव्वावुदो दीयो। [अपावृतपक्षद्वारपिण्डीकृतप्रविष्टेन राजमार्गसङ्कीर्णेन चातेन सहसा निर्गच्छतो मम हस्ते निर्वापितो दीप ।] नायक'-मूर्ख । धिक् त्वाम् । विदूषक -अप्पं खु मे अवरद्ध ! रदणिए । गच्छ, चउप्पहे म पडि Jबालेहि । जाव अह वि अन्भन्तरचउस्सालादो दीवं गहिम आज च्छामि । (निष्क्रान्त ।) [अल्प खलु मेऽपराद्धम् । रदनिके । गच्छ, चतुष्पये | मा प्रतिपालय । यावदहमप्यभ्यन्तरचतुश्शालाद् दीप गृहीत्वाऽगच्छामि। चेटी-अय्य तह । (परिकामति । ) [ आर्य । तथा । ] गणिका-दिहिआ मम पवेसणिमित्तं अवावुदं पक्खदुवालं | अलं चारित्तभएण | जाव पविसामि । (अभ्यन्तर प्रविश्य तिष्ठति । ) [दिष्टया मम प्रवेशनिमित्तमपात पक्षद्वारम् । अल चारित्रमयेन । यावत् प्रविशामि । ] अभ्यन्तरचतु शालात्-चतसृणा शालानाम् समाहार इति चतु शालम्। अभ्यन्तरस्य, अभ्यन्तरस्थ वा चतुशालम् तस्मात् तथा । प्रवेशनिमित्तम् = प्रवेशस्य निमित्तम् अथवा प्रवेश निमित्त कारणम् यस्मिन् तत्तथा, अपावृतम् = उद्घाटितम् । विदूषक-ज्योंही मैं शीघ्रता से दीपक लिए हुए वाहर हो रहा था, उसी समय सङ्कीर्ण राजमार्ग से अचानक आया हुआ वायु खुले हुए पार्श्व द्वार में एकत्रित हो गया और उसने दीप को बुझा दिया। नायक-मूर्ख ! तुम्हें धिक्कार है। विदृषक-सचमुच में, मेरा बहुत थोडा अपराध है। रदनिके। चलो, चौराहे पर मेरी प्रतीक्षा करना । तब तक मैं भी दीप लेकर आता हूँ। (निकल जाता है।) चेरी (रदनिका)-आर्य, ऐसा ही हो। (घूमती है।) गणिका सौभाग्य से मेरे प्रवेश के निमित्त चारुदत्त के घर का पार्श्वद्वार खोल दिया गया। चरित्र का भय करना अनुपयुक्त है। (अर्थात् ऐसी परिस्थित में चरित्र का भय करने से कार्य नहीं चलेगा।) तब तक प्रवेश करता हूँ। (भीतर प्रवेश कर बैठ जाती है।).
लेपन प्रथमोऽङ्कः। ३५ दिन--(विलोक्यान्मगतम् ) भरनानिर्गत्य काचिदियमागच्छति । भवतु, अनया घराक यश्चयामि । (प्रकाशम् ) सुरमिस्नानपानुषिद्ध इय गघ । Mig शकार-आम भावे । गुणामि गप शरण । अपआलपूलि हिं णाशापुडहिं गुहु ण पेक्खामि । [माम भाष! शृणोमि गध श्रवणाभ्याम् । अधमरपूरिताभ्या नासापुराभ्यां मुष्ठ न पश्यामि ।] निट-तिष्ट तिष्ठ । क यास्यसि । (ची गृहाति ।) (चटी समय भूमी पतिता।) शकारगण्ह भाव | गण्ह । [गृहाण भाव ! गृहाण ।] - - एपा हि यसो दर्पात् कुलपुमाघमानिनी । परामम् - हतमाग्यम् (शकारम् इति शेष )। मुरभिस्नानपानुविद्ध- -स्नानस्य धूप = गामानुलेपनद्रव्यविशेष इति स्नानधूप मुरभि स्नानधूप' तिन अनुविन इन गध इति भाव । अधकारपूरिताभ्याम्-अधकारण पूरिते ताभ्याम् (नासापुटाभ्याम् इति भाव )। प्पा इति-पयस = यौवनस्य दांत - अभिमानान् (हेतो ) पुलपुत्राव मानिनी --पुलपुत्राणाम् - अस्मद्विधानां कुरुपुत्राणाम् अपमानिनी-अवमानकारि विट-(देवकर अपने आप) भवन से निकलकर यह कोई भा रही है। अरसा में इमी के द्वारा (शकार को) पलगा। (प्रकाश रूम से) सुगधित स्नान दप्य सेण्यात यह गध है। शकार हा (बिवाल टीक) भाव! मकानों के द्वारा गध सुमता है एवं अधकार से परिपूण मासिका के द्वारा कुछ भी नहीं देता है। विर-हरो, हो कहाँ भाभोगी ! (बेटी को पकड़ता है।) (पेटी मय के कारण भूमि पर गिर पड़ती है।) शुकार--भाव पका, पकड़ो। MAAmmm विर-मैंने पुष्प के विम्यास से भूगल पम्प केशों के द्वारा (इसे) बलात् www चारुदत्तम् । केशेषु कु न्यासैः सेवितव्येषु धर्षिता ॥ २२॥ शकार-भावे । किं गहीदा । [ भाव ! किं गृहीता।] विट -अथ किम् । एषा गन्धानुसारेण गृहीता। शकार -दाशीए पुत्तीए शीशं दाव छिन्दिअ पञ्चा मालइश्शं। [दास्या पुन्या शीर्ष तावच्छित्त्वा पश्चान्मारयिष्यामि । विट-गृह्यता तावत् । शकार -(चेटी गृहीत्वा) पशा हि वाशू शिलशि ग्गहीदा केशेशु वालेशु शिलोलुहेशु । कूजाहि कन्दाहि लवाहि वात्तं महेश्शलं शङ्कल मिश्शलं वा ॥२३॥ [ एषा हि वासू शिरसि गृहीता केशेषु वालेषु शिरोरुहेषु । णीति भाव अथवा कुलपुत्रम् अवमन्यते या सा इति यावत् । एषा = वसन्त सेनेति भाव , कुसुमन्यासै-कुसुमाना = पुष्पाणा न्यासै = विन्यासै स्थापना, सेवितव्येषु = भूषणोपेतेषु केशेषु धर्षिता = बलाद् गृहीता ॥ २२ ॥ शीर्षम् = 'शीर्षस्थकेशम्' इति लक्षणया अर्थो बोद्धव्य इति श्रीकुमुदरमन । एषा हीति-एषा वासू = बाला शिरसि केशेषु = कचेषु, बालेषु, शिरो- रुहेषु इत्यधिक केशापरपर्यायत्वात् तथाहि-'चिकुर कुन्तलो बाल कच केश शिरोरुह ' इत्यमर । एवमेवाऽपि शिवादिपदानामधिकपदत्व ज्ञेयम् । गृहीता (असि ) साम्प्रतम् शङ्करम् ईश्वर = विष्णु महेश्वर वा पार्तम् = कातरभावन पकड़ लिया है, (क्योंकि) यह तरुणावस्था के अभिमान से हमारे जैसे कुलपुत्रों को अपमानित कर रही है ॥२२॥ शकार-भाव, क्या वह पकड़ ली गई? विट-और क्या? यह केशों में लगाए हुए गन्धयुक्त प्रसाधन द्रव्यों के प्रभाव से पकड़ी गई है। शकार--सर्वप्रथम इस दासीपुत्री (दोगली) का शिर काटुंगा तदनन्तर मारूंगा। विट-तब तक पकडो। शकार-मैंने इस बाला को सिर से, केशों से तथा सिर के वालों द्वारा प्रथमोऽङ्का www MAM . - क्न कन्द लय वा महेश्वर शहरमीश्वर पा ॥ २३ ॥] (चेटी बलादाकर्षति ।) चेटी-कि अय्यमिस्सेहि यरसिद ! [ किमार्यमियवसितम्।] शकार-भावे जाणामि शलयोगेण ण होइ यशश्चशेणिया। [ भाव । जानामि स्वरयोगन न भवति वसन्तसेना।" वि"-न मोक्तव्या । वसन्तसेनैवैपा। एपा रहप्रवेशेन फलाना चैव शिक्षया । स्थपतरेण दक्षा हि ब्याहतु तन मुच्यताम् ।। २४ ॥ (प्रविश्य) विदूषकः-(दीप गृहीत्वा) राममग्गसविण्णेण सीअसुउमारेण वाण एप उक्तदेवमुहिश्य विलाप कुरु कद फूज का तयापि वा गृहामि इति भाव ॥ पार्यमिये = पूज्यवर्य' व्यवसितम् - प्रारयम् । शकार इति-पास बस तसेना रहप्रवेशेन = नाट्यागारप्रवेशेन बहुविध वाचिकाभिनयसम्पादनेन ( हेतुना) इति यावत् कलाना = विविधगानभहीना शिक्षया = अभ्यासेन चैव स्वरान्तरेण = मिन्नस्वरेण व्याहत्तुम् = आदितु मित्यय । वक्षा- चतुरा तस्मात् ( एपा) मुच्यताम् त्वया इति शेप ॥२४॥ पकड़ा है। (जेटी को लक्ष्य करके) तुम विलाप करो चिल्लाओ या कातरभाष से र ईश्पर या महेश्वर को पुलायो तथापि मैं तुम्हारे केशों को पकड़े रहूँगा। (चेरीको बलपूरक खीचना है।) टी-आर्य लोगों के द्वारा यह क्या किया जा रहा है। नकार-भाव ! स्वर के योग से (पाणी से) मैं समझ रहा है कि यह पसन्त सना नहीं है। निर-चोदना नहीं। यह घसन्तसेना ही है। क्योंकि यह रंगशाला में नाटकीय से प्रवेश करने क कारण तथा नानाविध धोखा ने की कलाओं के भन्यास के कारण विभिन स्वरों के माध्यम से पोलने में प्रवीण है। भक्त इसे बोपना नहीं ॥२॥ (प्रवेश कर) विदूषक-(दीपक लेकर) राममार्ग की संकीगता के कारण, शीत पर - - - चारुदत्तम् । आला Traingh पदे पदे विक्खोहिअमाणजणिअतरनतेल्लपुण्णमाअणं दीवं कहं वि रक्खिअ गहिअ आअदो म्हि | [ राजमार्गसङ्कीर्णेन शीतसुकुमारेण वातेन पटे पदे विक्षोभ्यमाणजनिततरगतैलपूर्णभाजन दीप कथमपि रक्षित्वा गृहीत्वा- गतोऽस्मि I] 16 GANA चेटी-(शकार पादेन ताडयन्ती रुदित्वा) अय्य । मेत्तेअ । अय परिभवो आदु अवलेवो । [आर्य | मैत्रेय ! अय परिभवोऽथवावऽलेप । ] विदूषकमा टाव, मा दाव । (सखा विट शकार च दृष्ट्वा शक्षित- स्तिष्ठति ।) [मा तावद, मा तावत् ।। विट-अये आर्यचारुदत्तस्य वयस्यो मैत्रेय' खल्वयम । नेयमपि वसन्तसेना | महाब्राह्मण । अन्यशङ्कया खल्विदमरमाभिरनुष्ठित, न दर्पात् । पश्यतु भवान् , शीतसुकुमारेण = शीतस्निग्धेन इति भाव । वातेन = वायुना विक्षोभ्यमाण जनिततरगतैलपूर्णमाजनम् - विक्षोभ्यमाणम् = श्रालोटितम् अत एव जनिततरणम तैलपूर्ण भाजन = तैलाधार यस्य एवभूत दीप गृहीत्वा = आदाय इति भाव । अतएच एतादृश दीपक गृहीत्वा रक्षित्वा च आगमने में विलम्ब सात इत्यभिप्रायः। अवलेप = दर्प । Arimina महाबाह्मण ! ब्राह्मणाधम ! 'असिजीवी 4 किसी तरह र चेटी- सुकुमार वार के द्वारा पग-पग पर हिलने उठती थी। पैर से मारती हुई है अथवा का घमण्ड । विदूप २, ऐसा मत 1) विर- नहीं है। हे लोगों ने न किया है, दर्प देखें- देखकर शो आर्य चारुदत्त प्रथमोऽ ३६ - अकामा हियतेऽम्मामि काचिन म्याधीमयौवना। धी nn सा भ्रष्टा शया नस्याः प्राय शीलवञ्चना ॥ २५|| शकार:-अपिहा दलित्यवाहपुत्तरश चालुत्तबहुअरश घेडी बु, ण होह यशश्वरोणिआ । शाह, यशश्चशेणिए शाहु । अन्धाल फलिम अन्तला यश्चिरे भावे, आहफे नगर पश्चिने कृडकापडशीलए । शायहा दुक्खहे क्डे । [अपिहा दरिद्रमायवाहपुत्रस्य चारुदत्तवटुकस्य घेटी वन्यय न भवति वमन्तमेना । माधु वमन्तमेने ! साधु । अधिकार कृन्वाऽन्तरा वचितो भाव । श्रह तादद् बक्षित घटकपशीलया । मया तुटकर कृतम् ।। विक पावस्येतान् पवित्रा नाभिवादयन् इति स्मृत्युपदिशा हितकानुविधा बामहावामणग्वेन मम्बोधन परोपजीषिन्चादिति हरिदासमचाया । अपर । शुन्य तेल तथा मासे वो ज्यातिपिके द्वित । यात्रायां पथि निहाया महच्छब्दी । दीयत म्युजमहच्छर प्रयोगाद् महामायणपदस्य नोचायग्रन्यायकत्वम् इति चित भवति । अयशया-अयस्य शहा धारणा तया । अकामेति-अकामा यस्मामुकामरहिता निरमिलपिता "ति भाव स्वाधीन बना स्वाधान योयन यस्या या अर्थान् स्वेच्छानुचरितयौवनव्यवहारा न तु पत्य गानस्यभिप्राय । काचिन् - बसन्तमेना नाम्नी रमणी अस्माभि हियते - नीयते पनु । गावाधार मा घटा - अश्या पलायिता च जाता तस्या एव शाया - पात्या अथात् इय सा एव इति श्रमयुद्धपेम्यर्थ । इय रदनिकामहणजनिता शीलवश्वना = शीलस्य स्वभावस्य पश्चना - स्पलन मदाचारनटसम्भावना प्राप्ता अस्माभिरिति शेप ) २५ ॥ कम्पनशीलया-फूट च- माया च कपर च ते शालम् -स्वभाव यस्या हम लोग ऐमी मी का पाछा कर रह थे जो हम से प्यार नहीं करती थी और जिम अपनी जपानी का मिमान था। पर वह सो हमारे हाथ से निकल गई उसके पासे मैं इस यचारी की यइजती हो गई ॥२५॥ शमर हाय! यह परिद पगिकपुन चारलस की पटरी यसतसेना नहीं। साधु यम ससेनेसा ! समने (माया मे अधकार करके विट को पछा है। पाया हमने मुझे माधीश किया मतानुमने सवया दुष्कर (अर्थात् प्रसनीय)काय किया है।
1.MAN
TARA
भारतसम् ।
पद परे विमोहिमाणजमातरजातYAषणे दी मह नि
रविना महिला मामती हि । ( माकलन शीतगार दातात
पद पर निशानामनिततरशाला दीप ARAN रशिला सहला-
गती
नी- ( शापादन ताबमती रुदिना ) Art ! जेल! शे
परिनो सातु समतोलो। [थार्थ ! शेम ! अमे परिमोvaasik
निन नाम मा दाम। ( समानिसकारमा शक्ति
रितति ।मा ताना मा तानः ।।
faatसाय भाभारतत्तय संपरयो मेरमा समाधि
राता । महामासा ! ११ मा सरियाभिsti. .
सन्ति । पातु भवा.
शीतपशारण -- शीतरियत ति शान। मातन - मायुन निको पण
जनिततरपूर्णमाजना माहित Arr मनितात
तल्ल तलामा म प हमाम हति माना।
तए पता राहीना जिला में भागने में विसात
मा
भना-
मा पसिनीनी सीजीमी देवली नमन।
ससारमा मा UNAR हिलने से पूर्ण HD ARMerital
uantuीप को किसी तरह RTR तमा न हो शाया है।
4. (मी से मारती हुई शेर ) मा नेम ! यह मेरा अपमान
है HTERोगी को भी
far A . ऐसा मत करो। (Ength. नितानो
देख नित हो जाता है।)
(२३-भरे ! तो भारी पालनात शैनेय मी Hशतना
नही है। है ATTERIलोगो में आपसी (मशतना)की सा
दिया है. दो मही । शाप --
प्रथमोऽङ्का अकामा हियतेऽस्मामि काचित् स्याधीनयोयना। धोबtarun साभ्रटा शड्या तस्या प्राप्तय शीलवञ्चना ।। २५|MAL शकार -अपिहा दलिगशत्थवाहपुत्तररा चालुदत्तवडुअरश चेडी/ खु इअ, होह यशश्शेणिआ। शाहु, यशश्चशेणिए। शाहु अन्धाल कलिअ अन्तला पश्चिदे मावे, अहके द्वार वञ्चिदे फूडकावडशीलए । शीरहा दुक्खडे कडे । [अविहा दरिद्रसार्थवाहपुत्रस्य चारुदत्तबदकस्य घेटी खस्विय न भवति घमन्तसेना । साधु वमन्तसेने ! साधु । अधकार कृत्वाऽन्तरा पश्चितो भाव । अह तावद् चवित कपाशीलया । सर्वथा दुष्कर कृवम् I LAL धावक पाचकयेतान् पड्विप्रा नाभिवादयत् इति स्मृत्युक्तदिशा गहितकर्मानुविधा पिन्वा महाबामणत्वेन सम्बोधन परोपजीवित्वादिति हरिदासमाचार्या । अपर च 'रास तेले तथा मासे व ज्यातिपिके दिन । यात्रायां पथि निद्राया महच्छब्दो न दीयते इत्युकर्महछन्दप्रयोगाद् महावाणिपदस्य नोचार्यप्रन्यायकत्वम् इति सचित भवति । अन्यशया-अन्यस्य शहा धारणा तया । मकामेति-अकामा-अस्मामुकामरहिता निरमिलपिता इति भावः स्वाधीन यौवना स्वाधीन यौवन यस्या' सा अर्थात् स्वेच्छानुचरितयौवनव्यवहारा न तु पत्य धोनेत्यभिप्राय । काचित् =षमन्तसेना नाम्नी रमणी अस्माभि हियते नीयते पलु । गाढा पकारे सा भ्रटा: अश्या पलायिता च जाता तस्या एव शहया प्रान्त्या अर्थात् इय सा एव इति भ्रमयुद्धपेत्यर्थ । इय रदनिकायहणजनिता शीलबननाशीलस्य स्वभावस्य पश्चना-स्सलन सदाचारनष्टसम्भावना प्राप्ता (अस्माभिरिति शेष)॥२५॥ कूटकपाशीलया 1-कूट च-माया च क्पट च ते शीलम् -स्वभाव यस्या हम लोग ऐसीखी का पीछा कर रह थे जो हम से प्यार नहीं करती थी और जिये अपनी मवानी का अमिमान मारपर यह बोहमारे हाथ से निकल गई उसके घोसे में इस येचारी की बेइजती हो गई ॥ २५ ॥ समार-हाय! पह दरिद्र पगिकपुत्र चालत्त की बेटी, बस सेना नहीं। साधा पसन्तसेने! सा! तुमने (माया भन्धकार करके विट को पता है। कपरलीटयाली तुमने मुझे मी पषित किया। मत मुमने सवथा दुकर (अर्थात् प्रशंसनीय) काय किया है।
चारुदत्तम् । wwwMAN wwwanm विदूषक -मा दाव | ण जुत्तमिदं । [मा तावत् । न युक्तमिदम् । ] विट-भो महाब्राह्मण । अयमनुनयसर्वस्वमञ्जलिः । विदूषक -- भोदु, भोदु । अणवरद्धो भवं । अणुणीदो अहं एव्व एत्थ अवरद्धो। [भवतु, भवतु । अनपराद्धो भवान् । अनुनीतोऽहमेवात्रापराद्ध । शकार-भावे । दिढ खु भाआशि तं दलिद्दशत्थवाहपुत्तं चालुदत्त- बडुअ । [ भाव ! दृढ खलु विभेषि त दरिद्रसार्थवाहपुत्र चारुदत्तबटुकम् । विट -सत्यं भीतोऽस्मि । शकार -किश्श भावे । किश्श । [ कस्माद् भाव । कस्मात् । ] विट -तस्य गुणेभ्य । पश्यतु भवान् , स मद्विधानां प्रणयैः कृशीकृतो न तस्य कश्चिद् विभवैरमण्डितः। . सा एषभूतया त्वयेति शेष । अनुनयस्य = आदरातिशयस्य सर्चस्व-परमप्रधानम् अयम् अञ्जलि प्रणामा अलिरिति भाव । स इति स - चारुदत्त मद्विधानाम् = मादृशाना याचकाना प्रणय प्रार्थनादिमि कृशीकृत = दरिद्रीकृत , क्षीणकोषता नीत इति भाव । तस्य :- आर्यचारुदत्तस्य विभवै = धनें कश्चित् = सामान्योऽपि न श्रमण्डित - असत्कृत अर्थात् धनवितरणेन सर्व एव सत्कृता इति भाव । तु किन्तु साम्प्रत स विदूषकः-ऐसा मत कहो। यह असगत है। विट-भो महाब्राह्मण, यह मेरी अनुनयरूपी अञ्जलि है। विदूषक-अच्छा, अच्छा, आप अपराधी नहीं है। आपसे अकारण अनुनय कराने के कारण मैं ही अपराधी हूँ। शकार-भाव । दरिद्र वणिकपुत्र से निश्चय ही आप डर रहे हैं। विट-मै सचमुच में (उससे) डरता हूँ। शकार क्यों महाशय, क्यों (आप उससे डर रहे हैं ?) विट-उसके गुणों से । आप देखें- वह मुझ जैसे जनों की याचना के हेतु शोण काय हो गया है। उसके वैभव से कोई भी व्यक्ति असस्कृत नहीं हुआ (अर्थात् उसके ऐश्वर्य से सब ही सत्कृत प्रथमोऽङ्क । निदाघसशुष्क इय ह्रदो महान् नृणां तु तृष्णामपनीय शुष्यति ॥२६॥ । महाब्राह्मण अयमथ साथवाहपुनस्य न कथयितव्य । (निष्क्रान्तो विट ।) शकार-मालिश बहुअ । मालिश । भणेहि त पलिद्दशत्यवाह पुत्त चालुदत्तवलु मम पणेण-लाअशाले शण्ठाणे शवण शीशेण अणुगन्दिअ मणादि-णाडअइत्थिा वशञ्चरोणिआ णाम गणिआदारिआ शुवण्णषण्णा दुवेहि अम्मेहि बलक्कारेण णीअमाणा महन्तेण शुषण्णा लबारेण तव गेह पविट्ठा। शा शुवे णिय्याअइदव्या मा दाव तव अ मम अ दालुणो खोहो होदि ति। बडुम । मालिश। इद च भणाहि-मा दाशीएपुत्त । पारावदगलप्पविठ्ठ विज मूलकन्द शीशकवाल मडम डाइश । मा खु कवाडशम्पुडप्पषि विअ पक्ककवित्थ शीश दे चुण्णचुण्ण मडमडाइश्श ति । [मारिष! षटुक ! मारिप! मण त दरिद्र सार्थबारपुत्र चारुदत्तबटुक मम पचनेन-राजश्याल' सस्थानक सपटन शीणा AMAN चारुदत्त निदाघे - भीष्मता शुष्क - सशुष्क' महान् हृद इस - नलाशयमाश नृणा = याचकवर्गाणाम् (दपचे) पिपासूनां जनानां तृष्णा = धनामिलापा जलपानाभिलाषाच अपनीय = दूरीकृत्य शुष्यति = धनामावमाप्नोति ॥ २६ ॥ एवं संतुष्ट हुए) ग्रीष्मकाल में सबकी प्यास बुझाने में ही स्वय सूखे हुए एक महान सरोवर की भांति वह सब (पापकों) की तृष्णा को शाम्त करके निधन हो गया है॥२५॥ महामाह्मण साथवाहपुत्र को यह कथा नहीं कहनी चाहिये । (विट का निष्क्रमण) शकार-मारिप! घटुक! मारिष! दरिद्र साथवाहपुत्र चाहत को मेरी ओर से पहना कि राजश्याल सस्थानक पगदी घाँधे हुए सिर से प्रणाम करक कहता है कि-सुवाकी सरह कान्तिवाली नटी बेश्यापुत्री वसन्तसेना को हम दोनों छाए थे जो सहसा पहुरुप सुवर्णालदार के साथ आपके घर में प्रवेश कर गई। कल प्रात उस घर से निकाल दें। जिससे मेरे और भापके बीच धारणतर मनोमालियम हो जाय। षटुक! मारिप! और यह भी कहो कि हे दाखापुत्र ४२ चारुदत्तम् । WWM AMMAR नुवन्ध भणति-नाटकस्त्री वसन्तसेना नाम गणिकादारिका सुवर्णवर्णा द्वाभ्या- भावाभ्या बलात्कारेण नीयमाना महता सुवर्णालङ्कारेण तव गेहं प्रविष्टा । सा श्ची निर्यातयितव्या। मा तावत् तव च मम च दारुण क्षोमो भवतीति । चुटुक । मारिष ! इद च भण-मा दास्या पुत्र ! पारावतगलप्रविष्टमिव मूलकन्द शीर्षकपाल मडमडायिष्यामि । मा खलु कपाटसम्पुटप्रविष्टमिव पक्ककपित्य शीर्ष ते चूर्णचूर्ण मडमडायिष्यामि इति । ] विदूषक --भो । तह । (शकार दीपेनोद्वेजयति ।) [भो ! तथा।। शकार --(सर्वतो विलोक्य ) कहि भावे । गद्दे भावे । अविहा भावे ।। [क्व भाव । गतो भाव । अविहा भाव !1] (निष्कान्त शकार ।) विदूषक -किद देवकय्यं ति तत्तहोदो णिवेदइस्सामो। भोदि अवणीअदु दे हिअअमण्णू | अअ वुन्तन्तो अब्भन्तर ण पेसिदव्यो । [कृतं देवकार्यमिति तत्रभवतो निवेदयिघ्याव' । भवति । अपनीयता ते हृदय- मन्यु । अय वृत्तान्तोऽभ्यन्तर न प्रेषयितव्य ।] चेटी-अय्य | रदणिआ खु अहं । [ आर्य ! रदनिका खल्वहम् । ] सुवर्णवर्णा सुवर्णस्य वर्ण इव वर्ण कान्ति श्राभा वा यस्या सा। मैं कपोत के कण्ठ में पढ़े हुए मूलकन्द की भाति तुम्हारे सिर तथा कपाल को नहीं फोडूंगा, अथवा दरवाजा के मध्य में गिरे हुए पक्के कैथ की तरह सुम्हारे सिर को चूर चूर करके नहीं खाऊगा । विदूषक-भो । ऐसा ही हो । (शकार को दीप दिखाकर व्याकुल करता है।) शकार-(चारों ओर देखकर) महाशय, भाप कहाँ है, भाप कहाँ चले गए, हाय महाशय! (शकार निकल जाता है।) विदूषक-देव कार्य समाप्त हुआ। यह (सबाद इमलोग) सम्माननीय चारु- दत्त से निवेदन करेंगे। माननीये, हृदयगत दुख को दूर कीजिए । मै भी इस वृत्तान्त अन्त.पुर में नहीं कहूँगा। चेटी-आर्य, मैं रदनिका हूँ।
प्रथमोऽङ्क।
विदूषक-एहि गच्छामो । [एहि गच्छाव 1]
(उभौ परिकामत ।)
नायक –भद्रे । कृत देवकायम् ।
गणिका-(आमगतम्) परिजणत्ति म सदावेदि । भोदु, रक्सि
दम्हि । [ परिजन इति मां शब्दापयति । भवनु रक्षितास्मि ।]
नायक-मारुतामिलापी प्रदोष । तद् गृह्यता प्रावारकम् । (I
गणिका-(प्रावारक गृहीत्वा सहर्पमात्मगतम्) अणुदासीण जोव्यण से
पहषासगन्धो सूएति । अनुदासीन यौवनमस्य पन्चासगघ सूचयति ।
नायक ननिके । प्रवेश्यतामभ्यन्तरचतुशालय |
मणिका-(प्रास्मगतम् ) अमाइणी अह अन्भन्तरम्पवेसस्स ।
[अभागिन्यहमभ्यन्तरप्रवेशस्य । ]
नायक -किमिदानी न प्रविशसि ।
गणिका-(प्रात्मगतम् ) इदाणिं अह किं भणिस्स | [इदानीमह
कि भणियामि।
नायक-दनिके । किं विलम्बसे।
प्रावारकम् = उत्तरीयवनम् दुपटा इति लोकभाषायाम् ।
विदूषक-पाओ चलें। (दोमी धूमते हैं।)
नायक-मदे! या आपने देवकृत्य को पूरा कर लिया।
गगिका-(स्वगत) मुझे परिचारिका समझकर पुला रहे हैं। जो कुछ हो,
मेरी रत हुई है।
नायक-सध्या समय ठही हवा चल रही है। बता दुपटा ले हो।
गणिका-(सहप दुपटा ग्रहण करके) इस पल का सुगध सूचित करता है
कि इसका पीयनकाल उदासीन नहीं है।
नायक-दनिके इसे (घसको) अतापुर के चतु भाला में रसदो।
गनिमा-(स्वगत) में भतापुर के प्रयेा के सम्बध में भनधिकारिणी हूँ।
नायक-क्याभव भो भम्पर नही जा रही हो।
गरिका-(स्यगत) में इस समय क्या कहूंगी।
नायक-दमिक श्यों विलम्पसरही हो।
४४ चारुदत्तम् । MM aWiM . (रदनिकाविदूषकावुपसृत्य) चेटी-भट्टिदारअ । इअंम्हि । भर्तृदारक ! इयमस्मि । ] नायक --इयमिदानी का। अविज्ञातप्रयुक्तेन धर्षिता मम वाससा । संवृत्ता शरभ्रेण चन्द्रलेखेव शोभते ॥ २७ ॥ -णिका-(प्रात्मगतम् ) दीवालोअसूइदरूवो सो एव्व दाणि एसो, जस्स किदे अहं णिस्सासमत्तलक्खिदं सरीर उव्वहामि। [ दीपालोक- सूचितरूप स एवेदानीमेष , यस्य कृतेऽह नि श्वासमात्ररक्षित शरीरमुद्हामि । ] विदूषक --भो चारुदत्त | राअसालो सण्ठाणो सवदेण सीसेण अणुवन्दिअ विण्णवेदि-णाडअइत्थिआ वसन्त सेणिआ णाम गणि- आदारिआ अम्हेहि बलक्कारेण णीअमाणा- महन्तेण सुवण्णालङ्कारेण अविज्ञात इति-अविज्ञातप्रयुक्तेन-न विज्ञातम् इति अविज्ञातम् अविज्ञातेन- अज्ञानेन प्रयुक्तम् = दत्तम् तेन, मम वाससा-वस्त्रेण धर्षिता-सयोजिता पीडिताचा इति भाव । शरदभ्रेण = शरत्कालीनमेघेन इत्यर्थ । सवृत्ता- सछन्ना, आवृता वा चन्द्रलेखा इव शोभते - राजते ॥ २७ ॥ दीपालोकसूचितरूप = दीपस्य आलोक = प्रकाश तेन सूचित तादृश रूपम्- आकृति यस्य स , नि श्वासमात्ररक्षितम् = नि श्वासमात्रेण धृतम् इति भाव । उद्वहामि धारयामि । (रदनिका और विदूषक समीप जाकर ) चेटी-भर्तृदारक, मैं यहाँ हूँ। नायक-इस समय यह (महिला) कौन है जिसे मैने अपनी अज्ञानता के कारण वस्त्र दे दिया है। इसे ओदर यह शरत्कालीन मेघ से आच्छन्न चन्द्रमा की रेखा की तरह शोभा पा रही है ॥ २७ ॥ गणिका-(स्वगत) दीप के प्रकाश से सूचित्त भाकृति वाले यह चारुदत्त हैं, जिसके निमित्त केवल मै श्वासों में जीवित हूँ। विदूषर्क-भो चारुदत्त । रानश्याल, सस्थानक (शकार) सवस्त्र सिर से वंदना करके आपसे निवेदन करते हैं कि नटी युवती वेश्यापुत्री वसन्तसेना को प्रथमोऽङ्क - तुम्हाण गेह परिहा। सा सुवे णिय्याअइदव्यत्ति । [ भी चारुदत्त ! राजस्याल सस्थान मपटेन शोषणानुवन्ध विज्ञापयति-नाटकली बसन्तसेना नाम गणिकादारिकास्माभिर्वलात्कारेण नीयमाना महता मुवर्णालधारेण युप्माक गह प्रविष्टा । सा वो निर्यातयितष्यति ।] गणिका-(आत्मगतम् ) हबलक्कारेण णीअमाणत्ति ण भणादि । मोदु, अअ पत्तकालो । (प्रकाशम् ) अव्य । सरणागदम्हि । [ह बलात्कारेण नीयमानेति ननु भणति । भवतु अय प्राप्तकाल | थार्य । शरणागतास्मि।] नायक-न भेतव्य, न भेतव्यम् । किं यसन्तसेनेपा। विषक-अविहा वसन्तसेणा । (अपवार्य) भो चारुदत्त घसन्त- सेणा खु इअ, जा भवना कामदेवाणुआणप्पहुदि णअणमत्तसरथुदा सण्णिहिदमणोभवेण हिअएण उव्यहीअदि । सा पेक्खदु इभ । [ अविहा । परा तसेना । भी चारुदत्त । बसन्तसेना सरिषय या भवता कामदेषानुयानप्रमृति नयनमात्रसस्तुता सनिहितमनोभवेन हृदयनोदुयते । तत् पश्यत्तिमाम् । ] नायक- ययस्य । पश्याम्येना, की Hamar नयनमात्रसस्तुता-नयनमात्रेण सस्तुता = परिचिता न तु बालपनसम्भा पणादिनेति भाव समिहितमनोभवेन-मनसि भव उत्पत्तियस्य स मनोमव काम' समिहित = समात मनोभव यस्य तेन अर्थात् उपचितकामेनेत्यर्य । एषमतेन (हृदयनेति भाव ) उदुखते = उद्वाहस्वरपेण धार्यते । हमलोग पलास्कार करके लाये थे। घह प्रचुर मलद्वार के साथ आपके महल में प्रवेश कर गई है। उसे कल प्रात अपने यहां से निकाल दीजिये। गणिका-(स्वगत) भरे ! यह कहता है कि यह बलाकार से लाई गई है। मच्या पह समय तो आ हो गया । (प्रकाशरूप से) भार्य में शरणागत हूँ। नायक-डरो मत डरो मत क्या यह बस ससेना है। सिदूपम-हाय अयम्ससेमा। (अलग करके) भोपाल। यह पस तसेना ही है जिसका मापने कामदेव के उत्सयारम्भ के दिन मयनमात्र से ही परिचय किया था, तथापि भापको प्रीतिपूर्ण हुदय से स्वागत करती है। अत इसे भापदलें। 7 नापा-मित्र! मैं इसे देखता हूँ- -- चारुदत्तम् । Miwwwwwwwww या मे पतितः कामाक्षीणे विभवसञ्चये। रोपः पुपुरपस्येव स्वामेष्वेवायसीदति ।। २८ ।। गणिगा-अदिण्णशूमिप्पवेरापधरिसणेण अबरद्धा अहं अय्यं सीसेण पसादेगि। [ अपरामिप्रवेशप्रमाणे नापरावागाथै शीर्षण प्रसादशामि । ] गोगग-योधमहमपि तावदविज्ञातप्रयुक्न प्रेष्यसमुदाचारेण साप- राधो भयती प्रसादयामि । Mamta विदूषकः --भो ! विधान्ता श्व सअटिसं दुब्बिणीदवलीवहा अण्णोण्णं महिलेसन्ति । आई दाणि क पसादेमि । भोदु, दाणि रदणि यति-जिगघरामागे धारो = निनाटे सति राम = रास्गो (परान्त- सेनागाम् ) पति = राजात मे = मम कागः = गालावराग', सम्भोगपारामा पा কgষপ = মা, বাটুলস বা নীঃ = ঘি (ঘ নীন্তু খুব = ল शरीरेणु पप अगसीपति = अन्तलीनो गगति नत घनिभूग मनोरमपूरणादिना হাতঘরি স্মথ, vীসহা= অ নু'মা বা মুগ যদি अपफारम फरोति अपितु कोषमा रेस हामिरित्यभिप्रागः ॥ २८ ॥ अपत्तभूगिप्रवेशप्रयोग - 'आपत्त' भूमिप्रवेश - भूमिप्रवेशानुगति प्रचणम् = पीयनग रोग यररोनेत्यर्थ । ঈoালয়খানাসমা = भत्गरय सगुदाचार - योग्यध्यमार सेन हेतुनेति भाग । MAN niraurayrana Sty Ma( 3Agar And Horeframerika अलपि मेरा भय नष्ट हो गया है तथापि इसके (पसमासेगा फे) प्रति मेरी कामना (ECIनुराग) पनी हुई है। (कामना का स्थान पर जैसे बलादीन नयम पुरुष फा कोध उसके शरीर में ही पिलीन हो जाता ॥२८॥ गगा-मैं गृप-प्रपेश की अनुमति के बिना शापके घर में गपर्वस्ती प्रवेश करने के कारण अपराधी राधा इसके लिये कार्य को मस्राय नपाकर प्रार्थना करती। नाम- यदि ऐसी घास है सब पो मै भी धनगाने में आपके साथ भृत्यपर प्यपहार करगे गो कारण अपराधी है और इसके लिये आपसे प्रार्थना करता है। नgy--गाणी को खीचने में लगे हुए यो दुर्धिनीस पलों की सरह ये परस्पर एक दूसरे को शनुमय प्रार्थना द्वारा पालेश पाटुंगा रहे हैं। में इस समय किसको HP- प्रथमोऽङ्का Amwww. Beginin तबादी पसादेमि। रणिए । पसीददु, पमीन्दु होती। [भो ! विवहन्ताविक शनिस दुविनीतबलीवदापन्यो य सक्लशयत । अहमिदानी र प्रमादयामि । भवतु दानी रदनिका प्रयादयामि । रनिके। प्रसीदनु प्रसीदतु भवता] नायक-भवति । परवानस्मि । क्मिनुविधति स्नेह । गणिका-(आमगतम्) महुर ग्खु इच्छिन्न्य। अदक्सिण खु पढम दसणे जइच्छागदाए इह पसिद्ध । ता एव करिस्स । (प्रकाशम् ) जड मे अय्यो पसण्णो, अर्थ मे अलङ्कारो इह एव्य चिहृदु । अलवारणिमित्त पावा म अणुसरन्ति । अह पि अय्येण रक्रिसदा गेह गन्तुमिच्छामि । [मधुर राल्वेटव्यम् । अदक्षिण सलु प्रथमदराने याच्छागतयह वलम् । तप करिष्यामि । यदि म थाय' प्रसान अय मलद्वार इहव तिए । अलवारनिमित्त पापा मामनुसरन्ति । अहमप्यार्येण रक्षिता गेह गन्तुमिच्छामि।] यत परवान् = श्रह लतिपयकानुगगण तयाधीन अस्मीति भाष मदीयस्नेह - अनुराग किमनुतिष्ठति - किम् तव विधास्यतीति स्वमेव घरे त्यभिप्राय । मधुरम् बस्नुवासनाजिनादिरूपम् एएव्यम् एपितु योग्य प्रार्थनयोग्य । मधुना । रितु प्रयमदराने तरकाले यहच्छागतया अनक्तिीपस्थितया मया ' चारागृहे वस्तुम् स्थातुम् अदक्षिणम् अयोग्य स्यात् तदा अपराधी भवे दिति श्री कुमुदरअनमहो या । पापा - पुटा इत्यथ । प्रसन करू ! बड़ा इस समय रदनिका को मनाता हूँ। अपि रदनिके। तुम प्रसन होमो प्रसा होलो। नायक-माननीये में (भआपके प्रति प्रेम के कारण) पराधीन । ममा यह मेरा रमेह आपको क्या देगा? गणिका-(सात) मधुर पस्नु प्राप्त करने योग्य समय है। बिना एक बार इस लेने पर ही स्वप्नया यहां लाकर रहना अनुचित है। तय ऐसा करूगी । (प्रकार) परिधाप मेर ऊपर प्रसन्न है त र यही रहें। भलर के निमित्त पापोजन (विर एवं शका)मरा पीछा कर रहे है और म भी आप के बारा रहिस होकर आना चाहती है।
४८ ammam । चारुदत्तम् । नायक ---अन्वर्थमुपदिशति । मैत्रेय | गृह्यताम् । विदूषक -ण मे सद्धा। [न मे श्रद्धा।] नायक -मूर्खगृह्यताम् । विदूषक -ज भवं आणवेदि | आणेदु भोदी। [ यद् भवानाशापयति । आनयतु भवती।] (गणिका विमुच्यालङ्कार प्रयच्छति ।) विदूषक - (गृहीत्वा ) रदणिए । गढ़ एद सुवण्णालङ्कारं तुवं । सट्ठीए सत्तमीए अधारहि । अहं अट्ठमीए अणद्धाए धारइस्स। [रदनिके ! गृहाणैत सुवर्णालकार त्वम् । षष्ठया सप्तम्या च धारय । अहमष्टम्या- मनध्याये धारयिष्यामि । चेटी-( विहस्य ) सत्थं वक्खाणअन्तस्स भट्टिपुत्तस्स तदाणि अवसरो होदि । आणेदु अय्यो । (गृहीत्वा निष्क्रान्ता।) (शास्त्र व्याचक्षाणस्य भर्तृपुत्रस्य तदानीमवसरो भवति । पानयत्वार्य 1] नायक -कोऽत्र भो । दीपिका तावत् । विदूषक ----भोः । दीविआ गणिका विअ णिस्सिणेहा संवुत्ता । [भो । दीपिका गणिकेव नि स्नेहा सत्ता।] अन्वर्थम् = प्रयोजनमिति भाव । नि स्नेहा-(दीपिकापक्षे ) निर्गत स्नेह (तैलम् ) यस्या सा. (गणिका- नायक-उचित कह रही हैं । मैत्रेय, इसे ले लो। विदूषका-मेरी श्रद्धा नहीं है। नायक-मूर्ख (क्रोध के साथ) ग्रहण करो। विदूषक-जो भापकी आज्ञा । महाशया लाइये। (गणिका अलमार को उतार कर देती है) विदूपफ-(ग्रहण करके) रदनिके, तुम इस सुवर्णालङ्कार को रखो। पष्ठी और सप्तमी को धारण करना । मैं अष्टमी तिथि को अनध्याय होने पर धारण करूंगा। चेटी-(हंसकर) शास्त्रों के व्याख्यान में व्यस्त आपको उसी दिन अवसर मिलता है । आर्य, लाइये । (ग्रहण करके निकल जाती है।) नायक-अरे । यहाँ कौन है ? दीप लामो । विदूषक-यह दीपक गणिका की भाति निस्नेह (तेलहीन और प्रेमहीन) हो गया है।
प्रथमोऽङ्क । नायक व दीपिकया। (विलोक्य ) उदितो भगवान् सर्वजन सामान्यप्रदीपश्चन्द्र । अत खलु, उदयति हि शशाङ्का क्लिनखजूरपाण्डु- त्र युवतिजनसहायो राजमागमदाप । तिमिरनिचयमध्ये रश्मयो यस्य गौरा हृतजल इय पङ्के क्षीरधारा पतन्ति ॥ ५९॥ (५) अनि (NON पने) निर्गत स्नेह - अनुराग यस्या सा सत्ता = सजाता (दीपिकेति भाव)। कृतम् = व्यर्थ पर्याप्तमिति यावत् युगपर्याप्तयो कृतम्' इत्यमरः दीपकस्य तेलामावरत प्रज्वालनायोग्यस्व वसन्तसेनामविवक्षुधारुदत्त अधुना प्रकृतिनिर्मित स्थत मिद्धप्रकाशमयच इकिरणैरेष कार्यस्य सम्पादनीयत्व पक्ति । उदयतीति-हि-यत क्लिन्नसर्जूरपाण्ड-क्लिन्नक्लेदयुक्त खर्पूर । ताफलविशेष तद्वत् पाण्डु = श्वेत हरिण पाण्डर पाण्डु इत्यमर समु ग्ज्वल इत्यय युवतिजनसहाय = अभिसारविषय युवतिपनानाम् सहाय = पथप्रदर्शक राजमागस्य प्रीप-प्रकाशक शशा-चन्द्र उदयति आकाशमुद्गच्छति । तिमिरनियमध्य-तिमिराणाम् = अघकाराणी निचय = ममूह तस्य मध्ये यस्य चद्रस्य गोरा - शुत्रवर्णा गौर पीतेऽणे रवते विशुद्ध चाभिधेयवन् इति मेदिनी ररमय' किरणा किरणोतमयूखाशुग भस्तिपूणिरश्मय इत्यमर । इतजले-हृत निगत वा अल यस्मात् यस्य वा - नायक-दीप की कोई भावश्यकता नहीं है। (राकर)मबके लिये सामाय प्रदीप स्वरूप भगवान् चन्द्रमा का उदय हो गया है। इसी लिए यह ऐसा कहा जाता है- भामर की तरह एक युवतिजन के (अभिमरणकाल में) सहायक राजमाग का प्रदीप चन्द्रमा उदय हो रहा है निमकी शुभ रश्मियां घनाधशार में जएग्य पर में दूध की धारा की तरह गिर रही है (अर्थात् माह भर में एन सन्दमा की किरणें काले फक में दूध की सरह प्रतीत हो रही ह।) ४पा० - चारुदत्तम् । भवति ! राजमार्ग निष्क्रमण' क्रियताम् । सखे। अनुगच्छान भवतीम् । विदूषक --जं भवं आणवेदि । एदु एदु भोदी । [ यद् भवानाज्ञापयति । एत्वेतु भवती।] (निष्कान्ता सर्वे ।) प्रथमोऽङ्कः। -aokaro तादृशे पके = कर्दमे 'पक्षोऽस्त्री शादकर्दमौ' इत्यमर , क्षीरधारा इच = दुग्धधारा इव पतन्ति । श्रथमत्राशय --धनान्धकारे शुभ्रा चन्द्रकिरणा कृष्णवर्णपक्षमध्ये दुग्धधारा इव प्रतीयन्ते ॥ २९॥ इति प्रथम अङ्क -अकयते वर्ण्यते लोकचरितम् एव रूप अङ्क समाप्त इति । प्रथमोऽ समाप्त । आप राजमार्ग पर चलें। मित्र आपके पीछे-पीछे (साथ) जायो । विषय---जो आपकी धाज्ञा । माननीया इधर से आइये । (सबके सब निकर जाते है)। । प्रधम असमाप्त। -ockador-
अथ द्वितीयोऽक
(तत प्रविशति गणिका चेटीचा)
गणिका-तदो तो। ततस्तत 1]
धेरी-अम्महे ण किञ्चि मा भणित | कितदो तदो ति। [अम्मह
विधिमया मणितम् । किं ततस्तत इति ।]
गणिका-हले कि मए मतिद । हो । किं मया मत्रितम् ।।
घटी-अजुए । सिणेदो पुच्छदि, ण पुरोभाइना । किं चिन्ती
अनि । [अजुके । स्नेह पृच्छति न पुरोभागिता । किंचिन्त्यते । HEAL
गणिका-हजे। तुम दाय किं ति तक्वेसि । [हले । स्व तावन्
किमिति तस्यसि ।
कि ततस्तत =न मया विश्चित् उफम् । तथापि कय श्रीमती तत किं
भूतम्' इति केन हनुना घूते इति भाव ।
हण्ड हब्जे हला हान नीचर्चा चटी मसी प्रती स्यमरवचनान् हब्ने । इति
इति चरी प्रति सम्बोधनम् । मन्त्रितम् = भणितम् ।
अम्जुके! इति राम्बोधनपदम् गणिके! इयर्थं प्रयुक्त यथोषम् अमर
गोरे-नाट्योती गणिकाऽज्जुका इति । स्नेह पृच्छति-स्वो प्रति मदीय स्नेह
पछति अर्यात मोकययितु प्रेरयति न मे पुरोभागिता = अवगुणक्दर्शिता
मौरस्य वा दोष कहा पुरोभागी इत्यमर ।
(इसके बार गणिका मोरगका प्रवक्ष)
गणिका-सय फिर क्या हुभा'
चा-मैन कुछ भी नहीं कहा तब भाप क्यों पूछ रही हो कि सब पिर
'या हुआ
मणिका-प्रिय दाम्मी मने क्या कहा?
श-माननीय। भाएक प्रनि जो मेरा स्नेह है यही पपने को पाप कर
रक्षामक उपसाराभापण्या सोच रही।
मणिका-प्रियदासी!(इस विषय में) तुम क्या अनुमान कर रही हो।
'पुगेमाहार।
चारुदत्तम् । AMAMMw AMMAMMAN चेटी-अप्पओअणदाए गणिआभावस्स अज्जुआ क पि कामेदि त्ति तक्केमि । [अप्रयोजनतया गणिकाभावस्याज्जुका कमपि कामयत इति तर्कयामि । hen गणिका-सुटठ तुए किद । अवञ्चिदा दे दिट्ठी। ईदिसवण्णय्येव । [ सुष्टु त्वया कृतम् । अवश्चिता ते दृष्टि । ईदृशवर्णैव । ] ५५ चेटी–अणलकिद पि अज्जु मण्डिदं विअ पेक्खामि | कामो हि भअवं अणवगीदो सुवो तरुणजणस्स । [अनलड्कृतामप्यज्जुका मण्डिता- मिव पश्यामि । कामो हि भगवाननवगीत उत्सवस्तरुणजनस्य । ] 2min गणिका-हदासे । उक्कण्ठिदव्वे का दे रदी। { हताशे । उत्कण्ठितव्ये का ते रति । , गणिकाभावस्य-गणिकाया = वैश्याया भावस्य धनोपार्जनवृत्ते त्वद्विषये अप्रयोजनतया - प्रयोजनाभावात् , यतः वा धनाढ्या एव अर्थात् बारागना सम्बन्धे यत् प्रयोजनम् धनोपार्जनलक्षणं भवति तस्य अनावश्यकत्वात् अह अनुमिनोमि यत् श्रीमती क्मपि प्रियजनम् अभिलषत्ति इति श्राशय । कृतम् = तर्कितम् , पालोचितम् वा, ईदृशवर्णा-ईदृशो वर्ण स्वरूप यस्या सा एवभूता अहम् अस्मि इत्यर्थ । अनवगीत-न अवगीत इति अनवगीत = अनिन्दित काम-काम- देव , उत्सव = शोभादायक । उत्कण्ठितव्ये = प्राप्तव्ये इष्टवस्तुनि अप्राप्ते ते का रति = सतोष प्राप्त हि तस्मिन् स युक्त इत्यभिप्राय इति गनपतिशास्त्री । १ चेरी-जव आपको गणिकावृत्ति (धनोपार्जन वृत्ति) की आवश्यकता नहीं है तब मैं कल्पना करती हूँ कि आप किसी 'प्रेमी' को चाहती है। गभिका-तुमने अच्छा अनुमान किया। तुम्हारी दृष्टि अचूक है। मेरी अवस्था सचमुच ऐसी ही है। चेटी-यद्यपि आप अलङ्कार से रहित है, फिर भी मैं आपको सुसज्जित एवं अलकृत (नारी) की भाति देख रही हूँ। भगवान् कामदेव तरुणजन के उत्सव स्वरूप एवं शोभादायक (आनन्दस्वरूप) हैं। गणिका-हाय रे । आमातित एव भभीष्ट वस्तु की अनुपलब्धि के पहले है (तुमको) मानन्द कैसे हो सकता है? .
द्वितीयोऽ। ५३ चेटी-अज्जुए। इच्छामि पुच्छिदु बहुमाणो विअ रमणीओ कोच्चि रामकुमारो । [ अज्जुके । इच्छामि प्रष्ट बहुमान इब रमणीय' कविद् राजकुमार ।] गणिका-रमिदु इच्छामि, ण सेविदु । [ रतुमिच्छामि न सोवतुम् ।। चेटी-किण्णु खु विजाविसेसरमणीओ कोचि घम्हणदारओ । (किन्नु खलु विद्याविशेषरमणीय कश्चिद् ब्राह्मणदारक ।] गणिका-अस्थि अदिबहुमदो विस्सम्भो । पूअणीओ खु सो जणो। [अत्यतिबहुमतो विभ्रम्भ । पूजनीय' खलु स जन ।] घेटी-किण्णु हु वणिजदारओ कोचि आगन्तुओ। [फिन्नु खलु चणिग्दारकः कक्षिदागन्तुक । ANAON विद्याविशेषरमणीय -विद्याया विशेषेण रमणीय गुणवान् एवभूत कश्चित माअणदारक प्राह्मणपुत्र कामयते किम् । अतिबहुमत' = मम प्रामणपुत्रे बहुसमादरयुक्त विनम्भ = प्रणय अस्ति । पनु = नियमेन स जन पूजनीय' - भोजनवनादिदानसम्मानाभ्यामहणीम अत एव पूजाई न खलु रमणाह । अपर च पूजनीया बिलासमुख्य भजते इत्यभिप्राया। कचित् भाग तुक - वैदेशिक वणिगदारक = वणिकपुत्र कामयते किम् । वेग-माननीये । मे यह पक्षमा चाहता है कि क्या भाप रमणीय एवं पहु मानित किसी राजकुमार को चाहती है। गणिका-म किसी सुन्दर सुकुमार की मेवा करना नहीं चाहती कि प्रेमी के साथ रमण करना चाहती हैं। बेटी-श्या विद्या विशेष से रमणीय (गुणी) किसी माहाण मुमार को तो मही चाहती। गिरा-(मेरा माग पुष में) पास पहा अनुराग है, परन्तु वह पूता के योग्य (अर्थात् उपभोग एव भानरक योग्प नहीं है। पेटरी-तब क्या कोई आगन्तुक (पनिक) पगिकपुत्र को चाहती है!
चारुदत्तम् ।
MAN
गणिका-उम्मत्तिए ! आसाच्छेदं उत्कण्ठन्ता का सहेदि । [उन्म
त्तिके ! श्राशाच्छेदमुत्कण्ठमाना का सहते।]
चेटी-किं ण सक्क सोढुं । को अम्हाणं मणोरहाउत्तो। [किं:
शक्य श्रोतुम् । कोऽस्माक मनोवृत्त !] HIMAAY
गणिका-कि तुव कामदेवाणुयाणे ण आअदा सि । [कि व काम
देवानुयाने नागतासि ।]
चेटी-ण आअदम्हि । [ नन्वागतास्मि । ]
गणिका-केण उदासीण मन्तेसि ! [ केनोदासीन मन्त्रयसे । ] *
चेटो-भणादु, भणादु अज्जुआ, भणादु | [ भणतु, भणत्वज्जुना
भणतु।
गणिका-हले । सुणाहि दाव । अस्थि सत्यवाहपुत्तो चारुदत्तो
णाम ! [ हजे ! णु तावत् । अस्ति सार्थवाहपुत्रश्वारुदत्तो नाम । ]
-
उत्कण्ठमाना अभीष्ट कामयमाना, भोगकामा वा का नाम स्त्री वैदेशिके प्रीति
सस्थाप्य वैदेशिस्य अन्यत्र गमनात् श्राशाच्छेदम् - श्राशाभा सहते, न काचि
दपि तत् सहते इत्यर्थ । अतस्तै मम अभीष्टविषये तादृश वणिक पुत्रस्य अनुमान
चित्तविभ्रमप्रसूतम् एव, तस्मात् त्वम् उन्मत्तिका असि ।
मनोरयावुत्त - मनोरयस्य श्रावुत्त = भगिनीपति ।
कामदेवानुयाने कामदेवस्य अनुयाने - उत्सवे समागमे वा।
गणिक --उन्मत्तिके। क्या उत्कण्ठित एव भोगे की कामना करनेवाली कोई
नारी वैदेशिक में प्रीति करके (उसके अन्यत्र घले जाने के कारण) माशाभग को
सहन कर सकती है ? अर्थात् कोई नही सहन कर सकती।
बेटी-क्या मैं नहीं सुन सकती कि कौन हमारे जीजा साहव हैं।
गणिका-क्या तुम कामदेव के उरसर में नहीं आई थी?
चेटी-हाँ, मै भाई थी।
गणिका-क्यों उदासीन होकर बोलती हो?
चेटी-आप कह लीजिए।
गणिका-भरी तय तुम सुनो । वणिकपुत्र चारुदत्त है।
द्वितीयोऽङ्क । MWWW -- चटी- JU09 चेटी-जेण सरणागा तुप रक्सिदा । [यन शरणागता व रक्षिता ।। गणिका-सो एव्य । [ स एव । ] चटी-इद्धि दरिहो क्खु सो। [हा धिक् दरिद्र पलुस ।] गणिका-अदो क्खु कामीअदि । अदिदरिहपुरुससत्ता गणिआ अवअणीआ होइ । [अत खलु काम्यते । अतिदरिद्रपुरुषसका गणिका अडचनीया भपति। MAANI -अन्जुए. उधूदपुप्फ सहआर महुअरा व्यासन्ति । [अज्जुकै ! उधूतपुष्प सहकार मधुकरा उपासते ।। गणिका-हम्जे । एव, उयासन्ति । दे महुअरा त्ति पुच्छीअन्ति । हिम! एवम् उपासते । ते मधुकरा इति पृच्छयते।] ५Ma अवचनीया-न पचनीया अवचनीया - अनिदनीया इत्यर्थ । उतपुष्पम्-उद्धृतानि - उद्गतानि पुष्पाणि यस्य तत् एवभूतम् सह कारम् - श्रामवृक्षम् रसाल वा मधुकरा मधुप्रहणशीला भ्रमरा (मधुहरा) उपामते। लोकेऽपि मधुवन धनरता गणिका अस्ति इति ख्याति । करोतेरने कायत्वात् अन्न ग्रहणायें हरणार्या व्यवहियते । अन्न वसन्तसेना स्वीयदास्या कपनस्य प्रतिवाद पुष त्याह-एवमिति । अत एव ते एवमुपासीना प्रमर मधुरा मधुग्रहणशीला इति पृच्छयन्ते - | उपालभ्य ते इति भावः। वेग-जिसने भापकीरता की थी। गणित-बाही। चेग-दाधिक! यास्तव में वह दरिद्र है। गमिका-इसीलिये तो उसे नाहती है। अति दरिद्र पुरुप में मासक्त परया किसीस यचनीयामही होती। 1-माननीये। जिसमें मारी निकर भाई हो उसा मामयूष की उपासना मधुकर किया करते हैं। मकासपिये परते है इसीलिए तो (लेग) उमको मधुकर (मधु धारक था धमदारक) ऐमा कहकर उपालम्भ दते है।
५६ चारुदत्तम् । aaamaMamam चेटी-किं, विहवमन्ददाए वेसवासप्पसङ्गकादरो दुक्खं त्ति जइण आअच्छे । [ कि, विभवमन्दतथा वेशवासप्रसजकातरो दु समिति यदि नागच्छेत् ।] याम: Higehre गणिका-णं अहं त कामेमि । [ नन्वह त कामये । ] चेटी-जइ एत्तओ बहुमाणो, कि णाभिसरीअदि । [ यद्येतावान् बहुमान , किं नाभिलियते ।] गणिका-ण हुण गच्छामि । किन्तु सहसा अभिसरिदो पच्चुअ आरदुल्लभदाए पुणो मे दुल्लभो भवे त्ति विलम्बेमि ! [ न खलु न गच्छामि । किन्तु सहसाभिसृत प्रत्युपकारदुर्लभतया पुनमें दुर्लभी भवेदिति विलम्बे। विभवमन्दतया-विभवस्य = ऐश्वर्यस्य मन्दता = क्षीणता इति विभवमन्दता तया । वेश (वेश्याजनसमाश्रय ) वेशे चास , तस्य प्रसङ्ग प्रसक्ति, आसक्ति वा तस्मिन् कातर ( स चारुदत्त), एताश चारुदत्त वेशवास दु खम् - दुखजनकम् इति मत्वा यदि नागच्छेत् तदा किं करिष्यामि इति शाशय । तदा विभवक्षीणतादु खस्य स यथा विषयो न भवेत् तथा करिष्यामि त कामयमाना च तादृशम् आचरेयम् अत श्राह-'नन्वह त कामये' इति । अभिस्रियते - स किं न अभित्रियते त्वया इति शेष । न खलु न गच्छामि-सह न खलु गच्छामि इति न, अपि तु गच्छाम्येव । किन्तु सहसा = हठात् इदानीमेव अभिस्त सन् प्रत्युपकारदुर्लभतया---प्रत्युपकारे दुर्लभ = असमर्थ चारुदत्त तद्भावतया, 'अह प्रत्युपकर्तुं न समर्थोऽस्मि' इति चेटी-यदि वेश्याजन में अनुराग होने से कातर (चारदत्त) वैभव के विनाश के कारण यहाँ पेशवास में (वेश्यागृह मान भाये, तय आप क्या करेंगी? गणिका-मैं तो वास्तव में उसे ही चाहती है। चेटी-यदि उसके प्रति लापका चदा माफर्पण एवं समादर है तो क्यों नही आप स्वयं चली जाती" गणिका-मैं अवश्य जाऊगी। किन्तु इस समय मेरा सहसा भभिसरण पाद में उसे अनुपयोगी (दुर्लभ ) घना देगा, क्योंकि यह इस समय प्रत्युपकार करने में असमर्थ है। इसीलिये, मैं विलम्ब कर रही है।
- '। - auranM . द्वितीयोऽ चेनी-ह, कि एतणिमित्त तहि एव्व सो अलवारो ठापिदो। [ह किमेतलिमित्त तत्र सोडलद्वार स्थापित ।] गणिका-ईदिस एव्य । [दृशमेव । ] (सत प्रविशत्यपटीक्षेपेण सवाहक-अय्ये । सरणागदो म्हि । प्राय शरणागतोऽस्मि । ] गणिका अल अय्यस्स सम्भमेण। [अलमार्यस्य सम्प्रमेण ।] हतो स पुन' मे मम मम्बधे दुर्लभ = अप्राप्य भधैत् यदि अर्थात् मम ममीप नागच्छेत् इति हेतो अहम् इदानी विलम्य - विलम्प करोमि इत्यथ । 'अपटीतेपेण-पच्या पटस्य या जवनिकाया क्षेप - निरसनम् इति पटीक्षेप जवनिकापमारणम् , न पटीक्षेप तेन, जवनिकामनपसार्य एवं प्रविशति मवाहक - कवित, भामर्दनफलाजीबी स्यर्थ । पत्र पटीक्षेपो न कर्तव्य पात । राजप्रवेशने इति नियमबलात् श्रार्तस्य भयातस्य पा सवाहकस्य अपटीक्षपेण प्रवेशी न असहत । नाम' इति प्राकाश्यमा सम्भावनायामव्ययम् माहसेन परतीति साहमिक। सुलभचारित्रवचना-चरित्रमेव चारित्रम् चारित्रस्य वचनम् = अश मुलम चारित्रवचन यपाम् ते तया । अपराधयितुम् अपराध तुमित्यप । अभिमनेन --जन्मना गणिका न तु शीलेन चारित्रण इत्याशय । सवाहक इति-निगत् = धनिशे घूतविजयी प्रत तत् सकाशात् मम । भयम् अस्ति इति भाय । अयस्य इत्यत्र सम्बन्धविवक्षया षष्टी वस्तुतस्तु पी एव उपयुला। गहा पाएमी उद्देश्य से भाप अपने भलरों का उनके (चारुदस के)पास रख पाई है। गगिता-सचमुच यही बात है। (सबकरिना गिराये ही सराइक (पैर दरानेवासपी) संा-भाय! मैं रणागत है। गावा-आपकोण्यापुष्ट होने की भापश्यकता नहीं है। मीप गणपनि शीवारा मानिन्ध में पटाक्षरेय यह पाठ विस्मार M AN vie चारुदत्तम्। womenwww अप --- मना बेटी-ह, को दाणि एसो। [ ह क इदानीमेषः । ] गणिका उम्मत्तिए । किं सरणाअदो पुच्छीअदि। [ उन्मत्तिके । किं शरणागत पृच्छयते ।] चेटी-अवि णाम साहसिओ भवे 1 [ अपि नाम साहसिको भवेत् ।] गणिका-उम्मत्तिए ! गुणवन्तो रक्खियो होदि । [ उन्मत्तिक । गुणवान् रक्षितव्यो भवति ।] सवाहक --अय्ये ! ण भएण उवआरो विस्सरिदो, ण परिभवेण । पेक्खदु अय्या, भीदाहवा परिसिदाहवा आवण्णाहवा सुलभचा रित्तवञ्चणाहवा अवराहेदु समत्था होन्ति | [आियें । ननु भयेनोपचारो वस्मृत , न परिभवेन । पश्यत्वार्या भीता अथवा प्रधर्षिता अथवा आपन्ना अथवा सुलभचारित्रवञ्चना वा अपराधयितु समर्था भवन्ति ।] Puri गणिका-भोदु, भोदु । विस्सत्थो भोदु अय्यो | गणिआ क्खु अहं । भवतु, भवतु 1-विश्वस्तो भवत्वार्य । गणिका खल्वहम् । ] सवाहक -~-अभिजणेण, ण सीलेण 1 [ अभिजनेन, न शीलेन । ] गर्णिका-हल्ले । एव विहिजे । एवमिव । ] १५ चेटी-अज्जुआ अय्य पुच्छदि, कुदो अय्यस्स मअंति' [ अज्जु- का आर्य पृच्छति, कुत आर्यस्य भयमिति । चेटी-हाँ, यह कौन है? गणिका- उन्मत्तिके ! शरणागत के विषय में क्या पूछती हो? चेटी-हो सकता है कोई साहसी (अपराधी) हो । गणिका-उन्मत्तिके । गुणवान् की रक्षा होनी चाहिये । सवाहक-मैं सचमुच में भय के कारण उपचार (भद्रता) भूल ही गया था, न कि अपमान से । महाशया देखें-भयभीत, तिरस्कृत, विपद्ग्रस्त तथा चरित्र- भ्रष्ट (जन) शिष्टता के व्यवहार में अपराध कर जाता है। गणिका- अच्छा, अच्छा। आर्य आश्वस्त हो। मैं वास्तव में गणिका हूँ। अतएव यहाँ शिष्टाचार के अश को लेकर कुछ भी नहीं कहूँगी। सवाहक-आप जन्म से 'गणिका' हैं व्यवहार से नहीं। गणिका-- भरी। यह ऐसा ही है। चेटी-माननीया आपसे पूछ रही हैं कि, आपको किसका भय है। . - द्वितीयोऽङ्क। - 1 -- सबाहक अय्ये धणिआदो। [आयें ! धनिकात् ] गणिका-जइ एव, आसण देदु अय्यस्स। यद्येवम् श्रासन दीय तामायस्य । घेटी-तह । (आसन ददाति।) तों।] गणिका-उपषिसदु अय्यो । [ उपपिशवार्य । सवाहक-(स्वगतम् ) पूआविसेंसेण 'जाणामि कय्य ति। (उप विशति ।)। पूजाविशेषेण जानामि कार्यमिति । ] गणिका हज्जे । एव विध।[हले | एवमिव । ] । चेटी-अज्जुए । तह । अय्य ! राअमग्गे विस्सत्यसम्पाद अख्य का? इच्छदि अजुआ। कस्स कि कत्तव्य । [अजुके ! तथा। आर्य राजमार्ग विवस्वसम्पातमार्य कर्तुमिच्छत्यङ्घका । कस्म किं तव्यम् । सवाहक-सुणादु अय्या। [गोस्वार्या । ] पूजाविशेषण = पूजाया' विशेषेण = बहुसमादरेण इसि भाव । जानामि = अनुमिनोमि यत् मम कायम् = प्रयोजनम् ' इष्टकार्यम् का अन्न सिद्धपेत् इति भाष । श्रीगणपतिशास्त्री महोदयस्तु कार्यम्-धनिकोपद्रवपरिहारलक्षण मदी सितम् अनया सम्पादयितु शक्यम् एव कथयति । विश्वस्तसम्पातम्-विश्वस्त सम्पात यस्य तम् । संवाहक-मार्य ! मुझे धनिक से भय है। गमिका- यदि ऐसा है तो इन्हें शासन दो। ग-ऐसा ही हो (भामम देती है।) 'गणिका-भाय (इस बासन पाए। सबाहक-(स्वगत) म पूजा विशेष के द्वारा अनुमान करता है सिद्धि होगी। (बैठता है।) गगिरा--भरी! ऐसा ही होने दो। (चेटो के प्रति) पेटी-मामनीये ऐसा ही हो।(संवाहक के प्रतिभाय! माननीया भापको राजमाग में भयरहित करना चाहती हैं। कोई क्या कर सकता है। सबारक-भार्या सुनें। . ~ कायको www प्रHिAMI चारुदत्तम् । गणिका-अवहिदम्हि ! [ अवहितास्मि । ] net - सवाहक --पाटलिपुत्त मे जम्मभूमी। पकिदीए वणिजओ अह । तदो भाअधेअपरिवुत्तदाए दसाए सवाहअवृत्तिं उबजीवामी ! [ पाटलिपुत्र मे जन्मभूमि । प्रकृत्या चणिगहम् । ततो भागधेयपरिवृत्ततया दशया सवाहक वृत्तिमुपजीवामि ।] गाणिका सवाहओ अय्यो। सुउमारा कला सिक्खिदा अय्येण । { सवाहक प्रार्य । सुकुमारा कला शिक्षितार्येण । ] सवाहक कलेत्ति सिक्खिदा | आजीविकं दाणि संवुत्तं- [ कलेति शिक्षिता । आजीविकेदानीं सवृत्ता।] गणिका-णिव्वेदसूअभं विअ वअणं अय्यस्स । तदो तदो। [निर्वेद- सूचकमिव वचनमार्यस्य । ततस्तत । ] सवाहक ---अज्जुए 1 सो दाणिं अहं आअन्तुआण सुणिअ -पुरुस. अवहितास्मि = श्रोतु सावधानास्मि । भागधेयस्य 4--भाग एव इति स्वार्थे धेय-प्रत्यय -भागधेयम् , परिवृत्तम् 'तस्य भाव' इति भावे तल् प्रत्यय , भागधेयस्य परिवृत्तता प्रतिकूलता यस्याम तया एवभूतया दशया = अवस्थया या भाग्यदशा चक्रारपतिरिव परिभ्रमति । सवाहकत्तिम्-सवाहकस्य - अङ्गमर्दकस्य वृत्तिम् = उपजीविकाम् उपजीवामि । निर्वेदसूचकम् = दु खसूचकम् । गणिका-मैं सावधान हूँ। सवाइक--पाटलिपुत्र (पटना) मेरी जन्मभूमि है। मैं स्वभावत वणिक् (चनिया) हूँ। इसके बाद, मैं भाग्य के परिवर्तन होने के कारण सवाहक की वृत्ति को ग्रहण किये हुए है। गणिका-आप सवाहक है। आपने सुकुमार कला की शिक्षा ली है। मबाहक-मैने इसे कला के रूप में तो सीखा था पर साथ ही साथ इस समय मेरे लिये यही जीविका भी है। गणिका-आर्य का यह वचन निर्वेदसूचक है। तर सवाहम-आयें। सवाहकवृत्ति के उपयुक्त पदे में - Sangam । 1 : आगन्तुकाना' द्वितीयोऽङ्का विसमकोदूहलेण आअटो म्हि इम उज्जवणिं । [अनुफे ! स इदानीमहमा गन्नुकानां श्रुत्ला पुरुषविशेषकोतूहलेनागतोऽस्मीमामुज्जयनीम् ।। गणिका-तटो तदो। [ततस्तत ।] Muy-प्राधी मवाहक-तटो इह आअदमत्त एव्य कोधि सस्थवाहपुत्तो समासा । दिदी । । तत हागतमात्र एष कथित् सायवाहपुत्र गमासादित 1] गणिका-केरिमो[कीदृश ।] मवाहक-आइन्मितो अनिममन्तो अणुच्छित्तो ललिदो ललिददाए अबिम्हओ चउरो महुरो दक्सो सदक्सिमोअभिमदोआइदो तुहोहोदि। । दय्य ण विकत्येदि । अप्प वि सुमरदि, बहुम पि अयइद यिसुमरदि। अज्जुए। किं बहुणा, तस्स फुलपुत्तस्स गुणाण चउन्माअ पि सुदिग्घेण वि गिम्हढिअहण पण्णिदु ण मक। किं बहुणा, दक्सिन्मदाए परफेरम अि अत्तणो सरीर धारेदि। [प्राकृतिमान् अविभ्रमन अनसिको ललितो ललि सवाल- सम्पयसामाय षष्ठी प्रागन्तुषेभ्य इति रम णीय पाठ । पुरुषविशेषकोतूहलेन-पुरुषाणाम् विशेष अर्थात विशिष्ट पुरुष इत्यथ पुरुषविरोषस्य पा तस्मिन् कौतूहलम् तेन हेतुना अर्थात्, सवाहक- वृत्युपजीव्या पुरुपविरोपा उज्जयिया मुलमा इति आगन्तुकमुखात, विज्ञाय पुरुषविशेपकोहलेन = मेव्यपुरुषविरोपलिप्पया इति शास्त्रिणोऽभिप्राय । भागसमान -श्रागतम् आगमनम् मात्रा परिमाणम् यस्य तस्मिन् गतमात्र एव समामादित = प्राप्त । अनुस्तिका -न मिच गयरहित । अविस्मय -विस्मय = गयअवि पहयात मागकी के मुग से सुनकर यहा (उजविनी में)भाया। गणिक -तब क्या हुआ? गवाहम-तप यहां आते ही एक घणिकपुत्र से मेरी भेट हुई। गणिया-यह माह। मवार-यह रूपवान् विद्वान् मदरहित ललित एवं अपने सौदय पर अभिमान म मरने गाम्न चतुर मपुर १ महदप प्रतिष्ठित और याचको मतुए करने पायदान देकर किमी में कहता नहीं। आप उपकार भी एमरण करता है। बम भएकार को भी विस्मृत कर देता है। माननीचे, अधिक घि चारदत्तम् । ततयाविस्मयश्चतुरो मधुरो दक्षः सदारिण्योऽभिमत आचितत्तुष्टो भवति । दत्वा न विकन्यते । अल्पनपि स्मरति, बहुकमप्यपकृत विस्मरति । अझुके । किं बहुना, तत्व कुल्पुत्रत्व गुणाना चतुर्भागमपि सुदीर्घणापि ग्रीष्मदिवत्न वर्णयितु न शक्यम् । किं बहुना, दक्षिणतचा परकीयनिवालन शरीर धारयति । ] गणिका-(अपवार्य) ले । कोणु क्खु सो अय्यचारुदत्तस्स गुणाणं अणुक्रेदि ! [ हजे' को नु खलु म आर्यचारुदत्तस्य गुणानाननुक्रोति । चेटी-मम वि कोदूहलं सोढुं। -को णु हु उजअणि अत्तणो गुणेहिं मण्डेदि । ममापि कौतूहल श्रोतुम् ' को नु सलूजयिनीमात्मनो गुणेर्नण्डयति । ] गणिकातदो तदो। [ ततस्तत] मवाहक -तदो तस्स गुणविक्किणिदसरीरो विस्सरिदकलत्तो ज्व- जीविओ संवुत्तो । ततस्तस्य गुणविक्रीतशरीरो विस्मृतक्लन्न उपजीवी सवृत्त 1] गणिश-किं सो दरिहो। कि स दरिद्र।] द्यमान विस्मय यस्य स तयोक । सदाक्षिण्य दाक्षिण्येन सह वर्तमान' सदाक्षिण्य । किं बहुना = कथितेन किं स्यात् , न किमपि स्यान् । दक्षिणतया = सहृदयत्या। गुणविक्रीतशरीर-गुणेन विनीत वशीकृत तादृश शरीरं यस्य स विस्तृतक्लन-विस्तृत क्लत्रं भार्या येन स। क्या कहूँ ? उस गुणवान् कुलपुत्र के गुर्गों का वर्णन करने के लिये नीमकाल का रम्बा दिन भी अपर्याप्त है। सहेप में, दया दाक्षिण्यादि गुगों में वह ऐमा जान पहता है कि मानो अपना शरीर दूसरों के लिये हो धारण करता है। गगिका-(वीच में रोककर) प्रिय दासी' सचमुच में कौन है, जो आर्य चारुदत्त के गुणों का अनुकरण कर सक' अर्थात् काई नहीं। चो-मुझे भी सुनने से कौतूहल हो रहा है। वास्तव में कौन है जो अपने गुणों से उजयिनी को भूपत करता है। गनिका-वच क्या हुआ? सवाहर-तब उसके गुणों के वशीभूत हो मै उसका सेवक बन गया और अपनी पत्री को भी भुला दिया। गणिका-क्या वह दरिद्र है।
द्वितीयोऽ। r - सवाहक-कह अणाचविखदे अय्या जाणादि। [ कथमनाख्यात मायाँ बानावि 1] गणिका- एअस्सि दुल्लहो गुणविभयो त्ति । तदो तदो। [ एकस्मिन् दुर्लभी गुणविभय इति । ततस्तत । ] चेटी-कोणाम'सो अय्यो को नाम सार्य 1] सवाहक -अय्यचारुदत्तो णाम । [ार्यचारुदत्तो नाम । ] गणिका-जुन्जइ । तदो तो। [युज्यते ततस्ततः ।। सबाहक -तदो सो विभषमन्ददाए अस्माहीणपरिजणो विसजिअकु- हुम्पमरणो चारित्तमत्तावसेसो सत्ययाहकुले पडियसिदि । अह पि तेण : भय्येण अब्मणुरुआढो-अण्ण उवधि त्ति । कह अण्ण एरिस मणु । स्सरअण लभेभ त्ति, कह च तस्स कोमलललिवमहुरसरीरप्परिसकिदत्य मे हत्य साहारणसरीरसम्मदेण सोअणीअ करिस्स त्ति जादणिब्वेदो पदसरीररक्षणस्थ जुदोयजीची सवुत्तो। [ तत स विमवम दतया स्वाधीन परिजनो विसर्जितकुटुम्यमरणचारित्रमात्रावशेष सार्थवाहाले प्रतिवसति ।। अस्वाधीनपरिजन -न स्वाधीन आत्माधीन परिजन यस्य स । विस जिंतकुटुम्बभरण -विसर्जितम् - दूरीकृत परित्यक्त वा कुटुम्बभरण - परिवार पालन येन स । चारित्रमात्रावशेष -चारित्रमात्रम् स्वकीयव्यतित्वमात्रम् अवशेष यस्य स । अभ्यनुज्ञात = आशित । उपतिष्ठताम्-सैवताम् अन्यम् समादक-बिना कही बात को भी बाप कैसे जान जाती है। गमिका-एक व्यक्ति में यह मम्पूण गुण दुलम हैं (इसीलिये मैं ऐसा कह रही हूँ)तिय फिर क्या हुआ? चरी-उस भाय का नाम क्या है। संवाहक-उसका नाम आप चाहा है। गणिका-उपयुक्त ही है। लय यथा हुआ। मवाहक-इसक बाद वह अपहीनता के कारण अपने परिजनों छट गया भीर कुटुम्य का भरण-पोषण स्यागकर एकमात्र अपने चरित्र की रक्षा करते पगिया में रहने लगा। उस महामा ने मुझे भी भादा दिया कि तुम भी किसी दूसरे की सेवा करो। ऐसा ही भय पुपरस्म कैसे उपलब्ध हो सकेगा - ६४ चारुदत्तम्। wwwm WAM HIMS M अहमपि तेनार्येणाभ्यनुज्ञातोऽन्यमुपतिष्ठतामिति । कथमन्यमीदृश ' मनुायरल लभेयेति, कथ च तस्य कोमलललितमबुरशरीरस्पर्शकृतार्थ मे हस्त : साधारण शरीरसमर्दैन शोचनीय करिष्यामीति जातनिवेदो दग्धशरीररक्षणार्थ यूतो पजीवी सवृत्त ।] ज (गणिका सहर्षवाष्प चेटीमवलोकयति । ) चेटी-तदो तदो। [ ततस्ततः ।] , संवाहक --तदो बहूणि दिणाणि मए पराइदेण पुरुसेण कदाइ अहं पि दहसु सुवण्णेसु पराइदो म्हि । [ ततो बहूनि दिनानि मया पराजितेन पुरुषेण कदाचिदहमपि दशसु सुवर्णेषु पराजितोऽस्मि 1] गणिका-तदो तदो। । ततस्तत ।] सवाहक -तदो अज्ज वेसमग्गे जइच्छोवणदो समासादिदो म्हि । जनम् इति शेष । कोमलललितमधुरशरीरस्पर्शकृतार्थम्-कोमल च तत, ललित च इति कोमलललित च मधुर च इति कोमलललितमधुरम् एवभूत शरीर तस्य स्पर्शेन कृतार्थम् = कृतकृत्यम् एवरूप हस्तमित्यर्थ , साधारणशरीर समर्दनेन-साधारणशरीरस्य = सामान्यजमशरीरस्य समर्दनेन । दग्धशरीररक्ष- णार्थम्-दग्ध शरीर तस्य रक्षणार्थम् द्यूतोपजीवी-यूतेन उपजीवति आत्मनिर्वाह करोतीत्यर्थ । और उसके कोमल, मधुर, एव ललित शरीर के स्पर्श से कृतार्थ एव अभ्यस्त यह मेरा हाथ सर्वसाधारण शरीर के सम्मर्दन से कैसे सन्तुष्ट होगा ? यही शोचनीय हो गया। उसी दुख से दुग्वी में इस कम्बख्त शरीर की रक्षा के लिये 'जुभारी' हो गया हूँ (गणिका आनन्द की औसू के माथ महप चेटी को देखती है) चेटी-तच फिर क्या हुभा? मवाहक-तब मैने जिसे बहुत दिनों तक पराजित क्यिा उसी ने एक दिन जुए में मुक्षको दश स्वर्ण मुद्रा से पराजित कर दिया। गणिका-तब क्या हुआ? संवाहक-इसके बाद आज, भाग्य के उलटा होने के कारण यहाँ मुझको इसी .
- 2 Verti . द्वितीयोऽक्षा तस्स भएण इह पविट्ठो। पर अय्या जाणादु । ततोऽय वेशमागे यदृच्छोपनत समामादितोऽस्मि । तस्य भयनेह प्रविष्ट । एषमार्या जानातु । ] गणिका-(आत्मगतम् ) अहो अच्चाहिद | ण्य खु मण्णे यासपाद परिणासेण पक्सिणो आहिण्डन्ति ति। (प्रकाशम् ) एय गदे अत्तरओ अन्यो। हला। एहि त जण विसजेहि। [अहो अत्याहितम् । एव सलु माय वासपादपविनाशेन पक्षिण आहिण्डन्त इति । एव गत आत्मीय आय । । हला! एहि त जन विराजय । ] चरी-सह । (निष्पान्ता।) [तथा।] गणिका-ण म्यु अग्येणअथािमत्ता चिन्ता पादच्या। अय्यचार नतो ग्य देनि ति अय्यो जाणादु । [न खल्याणार्थनिमित्ता चिन्ता तम्या । भार्यवारुदस एव ददातीया जानानु । (प्रविश्य) शमाग-धेशस्य = वेश्याग्रहस्य मार्ग तस्मिन् अर्थात् यत्र गणिका निवमन्ति इति भाव । यहच्छीपनत -यदृच्छया उपनत -भागत अहम् ते । ममामादित =प्रास । अत्याहितम्-अति अधिकम् अतिशयन वा माहितम् = महारयम् समुप स्थितम् अत्याहित महद्भयम् त्यमरः । पासपादपविनाशेन = निवासरक्षविनाशेन हतुना पाहिण्डते व्याकूलीभूय तस्तत जीयते पक्षिण इति शेष । यश्यालय (की गली) के समीप म वह धनिक (विजयी हुभारी) मिट गया। उसी के भय से भ पहा भाया हूँ । मरी कहानी भाप इस रूप से जानें। गणिका-(स्वगत) आह । यात यभापति है । आवामा विनाशके कारण असे पसीधर उधर आश्रयहामहार घूमस फिरते हैं वसा म समझती है। (प्रमाा रूप मे)मा थिति में आप नो मो मारमाय (सम्यधी) है। (घटी के प्रति) हा जाभो रिमयी भारी का (उपद्रम्प दकर) विदा करा । बेटी-मादी हो(निक्ष नानी ६।) निस-मायरियमविकास का आयात ही घनदारद -- । . है,एमा भाप मम। (प्रवेशकर) चारुदत्तम् । AMM n. n Mad चेटी--अन्जुए ! विसज्जिदो सो जणो, परितुट्ठो गदो अ। [अबुके । विसर्जित स जन', परितुष्टो गतश्च । ] सवाहक -अणुग्गहिदो म्हि । [ अनुगृहीतोऽस्मि । ] गणिका गच्छदु अय्यो सुहिज्जणदसणेण पीदि णिवत्तेढुं । [गच्छत्वार्य सुहृज्जनदर्शनेन प्रीति निवर्तयितुम् । ] _rung" सवाहक -अन्ज एव कदाइ णिव्वेदेण पव्वजेअं! जई अं परिअणे सकता कला भवे, तदो अय्याए अणुग्गहिदो भवे। [अद्यैव कदा- चिन्निदेन प्रवजेयम् । यदीय परिजने सकान्ता कला भवेत् , तत श्रार्यया- नुगृहीतो भवेयम् ।] गणिका--जस्स किदे इझं कला सिक्खिदा, सो एव्व अय्येण उवचिद्विद्व्वो भविस्सदि। [ यस्य कृते इय कला शिक्षिता, स एवार्येणोप- स्थातव्यो भविष्यति । सवाहक (स्वगतम् ) णिउणं खु पञ्चाचक्खिदो म्हि । को हि णाम सुहृजनदर्शनेन सुहृज्जनानाम् दर्शनेन प्रीति निर्वर्तयितुम् = सम्पादयितुम् गच्छतु आर्य इति भाव । निदेन = वैराग्येण हेतुना। सेवितव्य पूजयितव्यश्च । चेटी-माननीये । उसको द्रव्य दे दिया है और वह सन्तुष्ट होकर चला भी गया। मवाहक-मै अनुगृहीत हूं। गणिका--कृपया आप जाय, अपने वन्धुओं को दर्शन देकर प्रसन्न करें। सवाहक-- मै आज ही उद्वेग के कारण 'सन्यास' या प्रवज्या ले लेगा। किन्तु यदि आप अनुग्रह करके अनुमति दें तो अभ्यस्त मम्मर्दन कला को आपके परिवार के लोगों को सिखा दे। गणिका-जिसके लिये आपने इस कला का अभ्यास किया उसी की आप सेवा करें। सवाहक-(स्वगत) गणिका ने घड़ी निपुणता के साथ मेरी बात का प्रत्या- उपस्थातव्य- । द्वितीयोऽङ्क। ६७ अप्पणा किद पच्चुअआरेण विणासेदि। (प्रकाशम् ) अय्ये । गच्छामि दाय अह । [निपुण खनु प्रत्याख्यातोऽस्मि । कोहि नामात्मना कृत प्रत्युप कारेण पिनारामति । आय 1 गच्छामि तावदहम् ।। an. गणिका गच्छदु अय्यो पुणोदसणाम । [ गच्छत्वार्य पुनदर्शनाय ।] प्रवाहक-अय्ये तह । (निष्कान्त)[पायें । तथा।] गणिका-ह, सदो वि[ह शब्द इव ।] (प्रविश्य) चेट-विच्छित्तिए । विच्छित्तिए । कहिं कर्हि अज्जुआ। [विरिछ- सिके । विच्छित्तिके ! कुन कुत्राज्जुका ।) गणिका-इछे । किं एद । [हजे किमेतत् । ] निपुणम् सुस्पष्ट यया स्यात् तथा प्रत्याख्यात = अस्वीकृत निदितो वा गणिकया इति शेष । दर्शनाय - दर्शन दातुम् इत्यर्थ । तथा तथा अस्तु । एवं तावत् नायविषया रति परिपोषिता इति तात्पर्य । विपिछत्तिका इति तपस्या काचित् परिचारिका अस्ति तस्या इय सज्ञा अत एष सम्बोधयति विच्छित्तिके इति । किमेता: स्मितत आपतितम् इत्यर्थ । ख्यान किया। कौन यहि अपने रिए उपकार को उपकार के द्वारा विनाश करना चाहता है ?(प्रकार रूप से) भायें । य में जाता हूँ। गा-आर्य जाइये और फिर दर्शन दीनिपगा। सबार-ऐमा ही हो। (निम्ल जाता है।) गमिका-हाँ किसी को भागनभा रही है। (प्रवेशपर) (ममन्नरोना । सेवक)-गिरितिक विरितिके। मामनीषा गनिमा (यसन्तलेना) कहा। गणिया-मायया पात है।
V AM woman wn चारुदत्तम् । चेट –ह, विप्पलद्धो म्हि, वादाअणणिक्खामिदपुव्वकाआए ओण मिअपओहराए कण्णऊरस्स परिप्फन्दो अज्जुआए जेण ण दिहो । [ह, विप्रलब्धोऽस्मि, वातायननिष्कामितपूर्वकाययाऽवनमितपयोधरया कर्णपूरस्य परिस्पन्दोऽज्जुकया येन न दृष्ट ! ] ANIMAL गणिका लहुजणस्स सुलहो विम्हओ । कि दे उस्सेअस्स कारणम् । [ लघुजनस्य सुलभो विस्मय । कि ते उत्सेकस्य कारणम् । ] Indant चेट -सुणादु अज्जुआ-एसो उग्गवेगेण · ओगाहणणिव्वत्तिदेण पस्सुदमदगन्धं राअमग्गं करन्तेण मङ्गलहत्थिणा भद्दकवोदएण अणे- अपुरुससङ्गुलेसु राअमग्गेसु उत्तरिअपडविराअदाए अहिअलक्खणीओ कोच्चि प्पव्वइदो समासादिदो । [ शृणोत्वज्जुकाएष उप्रवेगेनावगाहननिवर्तितेन * प्रसुतमदगन्ध राजमार्ग कुर्वता मङ्गलहस्तिना भद्रकपोतकेनानेकपुरुषसङ्कुलेषु रान मार्गेषत्तरीयपटविरागतयाऽधिकलक्षणीय कश्चित् प्रव्रजित समासादित ।] विप्रलब्धोस्मि = अहं वञ्चित , अकृतार्थो वा अस्मि यत वातायननिष्का मितपूर्वकायया-वातायने = गवाक्षे निष्कामित = सक्रामित पूर्वकायो यस्या तया, अवनमितपयोधरया-धरतीति धर, पयसा वर इति पयोधर, अवनमित पयोधर यस्या तया, एव भूतया अज्जुकया (भवत्या) कर्णपूरस्य = 'वसन्त- सेनाया भृत्यविशेष सुधामधुरशब्देन श्रोतु कर्णों पूरयतीत्यर्थक' (एचभूतस्य मम ) परिस्पन्द = बीरतापूर्णकर्म न दृष्ट तेन हेतुना अह वचित । उत्सेकस्य = गर्वस्य । भद्रकपोतकेन-दशवर्ष भवेत पोत स एव पोतक स्वार्ये क, भद्रकशासौ चेट-मेरा दुर्भाग्य है क्योंकि गवाक्षके बाहर अपने शरीर का ऊपरी भाग निकालकर और नवने के कारण झुक हुए स्तनों के साथ आपने मेरा (कर्णपूरका) वीर कर्म नहीं देखा। गणिका-साधारणजन में सहज ही विस्मय होता है । तुम्हारे गर्व का चेट-आर्या सुनिये मगल कार्य के योग्य भद्रक नामक हाथी के बच्चा जब कि स्नान करके वडी तेजी से राजमार्ग को अपने मदगन्ध से आमोदित करते हुए लौट रहा था तब उसने भनेक पुरुषों से व्याप्त राजमार्ग में उत्तरीय चख से युक्क एक परिवाजक को पकड़ लिया। क्या कारण है।
द्वितीयोऽद्ध । गणिका-ह, तदो तटो।[ह ततस्तत ।] चेट'-तदो मए हस्थिहत्यामिद्दताडिअमाणो दन्तन्तरपरिवत्तमाणो हत्यिहत्यपडिदचरणो तटो हा हा विपाडिदो हा हा हदो त्ति जणवाने सवुत्ते तदो दिण्णक्रप्पहारेण परियत्ति हस्थि करिअ मोइदो सो परि ध्यानो। [ ततो मया हस्तिहस्तामदुताब्यमानो दन्तान्तरपरिवर्तमानी हस्ति .. हस्तपतितचरण ततो हा हा विपाटितो हा हा हत इति जनवादे सवृत्ते ततो दत्तकरप्रहारेण परिवर्तित हस्तिन कृत्वा मोचित स परिमाट् ।। 14M. गणिया-पिर्थ मे । तढो तदो। [प्रिय मे । ततस्तत ।] पोतक्श्च तेन मगलहस्तिना = माङ्गलिफर्ममु उपयुक्तन हेतुना प्रश्नुतमदग धम् प्रत्रतेन मन गधम्-गधयुक्तम् राजमार्गम् राजनीयपयम् इत्यर्य एषभूतेन भद्रकपोतकेन प्रवनित = परिपाट समासादित प्राप्त । हस्तिहस्तामर्दताज्यमान -हस्तिन = गजस्य हस्त शुण्डादण्ड तस्य धाम दन = पापातेन ताज्यमान द तातरपरिवतमान -दन्तयो अन्तरम् = मभ्यम् तत्र परिवर्तमान हस्तिहस्तपतितचरण-हस्तिहस्ते पतित ताश चरण यस्य य करिफरगृहीतपाद इत्यर्थ । विपारित = विदलित (परिमान इति शेष ) जनवादे जनानाम् पार =रख तस्मिन् प्रत्ते = उस्थिते सति दत्तकरप्रहारेण-दत्त फरमहार यन तेन (मयति शेप ) मे प्रियम् - मम प्रिय (वस्तु ) जातम् इति भाव । पणिया-हो । तथ पिर क्या हुआ? दू 4-जय वह हाथी कांकि आघात से पीड़ित होकर उसक दाता भीतर आ गया। जय नाथी ने उसे मुंह के सहारे धरण से दयाना चाहा तय नताका हाय! हाय! फार दिया गया हाय हाय मारा गया-यह राय (द) हुा । मै अपने दापों क प्रहार के द्वारा उनकी स्थिति में परिवतन लया भीर उस सन्यासी को पचापा। गा-मरे हिय अगदा हुमा (अर्थान् मेरा प्रिय ही हुआ)। सपरि या भा ।
७० चारुदत्तम् । rum चैट -तदो सव्वो जणो भणादि-अहो चेडस्स कम्म ति। ण उण कोच्चि किं पि इच्छइ दाउं। तदो अज्जुए । केण वि कुलवुत्तेण उइदाणि आभरणठाणाणि विलोइअ अड्डठेणाणिअ वि उण अलद्ध पेक्खिा दव्वं उवालभिभ दिग्ध णिस्ससि एत्तओ मे विभवो ति करिअ परिजणहत्थे अअ पावरओ पेसिदो। [तत स! जनो भणति-अहो चेटस्य कर्मेति । न पुन कश्चित् किमपीच्छति दातुम् । ततोऽज्जुके ! केनापि फुलपुत्रेणोचितान्याभरणस्थानानि विलोक्यामुष्ठेनानीयापि पुनरलब्ध प्रेक्ष्य देव मुपालभ्य दीर्घ निश्वस्यैतावान् मे विभव इति कृत्वा परिजनहस्तेऽय प्राचारक प्रेषित ।] 119 भणति = कथयति, चेटस्य = वरान्तसेनाश्त्यस्य कर्म = चीरकर्म एतत् भवति, यत् परिवाजक हस्तिहस्तात् रक्षित तत = तदनन्तरम् कुलपुत्रेण - कुलीनेन जनेन (मार्यचारुदत्तेन इति शेप ) उचितान्याभरणस्थानानि-उचितानि, 'अभ्यस्तानि, चिरपरिचितानि श्रात्मन बहुमणिबन्धनानि आभरणस्थानानि = अलमारधारणस्थानानि विलोयग = तानि श्राभरणशून्यानि दृष्ट्वा अष्ठेन%D दक्षिणहस्ताछेन ( करणे तृतीया) 'कर्णादिस्थानानि' अलझार अस्ति न वा इति शातुम् भानीय = सगलम् प्राकृष्य पुन पाभरणम् अलब्धम् = अप्राप्त प्रेक्ष्य विशाय दैवम् उपालभ्य = तिरस्कृत्य दु खात् दीर्घ निश्वस्य = दीर्घश्वास परित्यज्य 'एतानान् मे विभव इति कृत्वा' इति मत्वा परिजनहस्ते ( अधिकरणविवक्षया सप्तमी परतुतस्तु तृतीया एव भवितुमर्हति ) साधारणचस्तुदाने स्वय सकुचित त्यहस्तेन प्रायारक = आत्मन उत्तरीगवस्त्रम् प्रेषित = चीरकर्मण पुरस्काररूप वसराण्डम् प्रेषितवान् । चेट-तय सघ लोग एकत्रित हो गये और कहने लगे कि 'चेट का यह (भद्भुत) वीरतापूर्ण कार्य है'। किन्तु कोई कुछ देना नहीं चाहता था। तय माननीये। किसी कुलीन महानुभाष ने अन्य भाभरणों के सुपरिचित स्थानों को शृय देखकर भगूठे के द्वारा अहट कर्णादिगत स्थानों को भूषण है या नहीं गए जानने के लिये खींचा, पर कुछ भी नही उपलब्ध हुआ। ता देय को उपारम्भ देकर और लम्बी सांस लेते हुए मेरा भव इतना ही है-ऐसा कहकर परिजन के हाथ में (सामान्य प्रप्य के दाग देने में स्वयं सकुचित भाव से) देकर यह उत्तरीय पस भेज दिया।
dew द्वितीयोऽङ्का गणिकाको शु खु अय्यचारुदत्तस्स गुणाण अणुकरेदि । [को नु खल्वार्यचारुदत्तस्य गुणाननुकरोति ।] चेटी-अन्जुए । मम वि कोदूहल अस्थि । को हु खु एसो। [अजुके ! ममापि कौतूहलमस्ति । को नु खल्वेप ।] गणिका-केण वि साहुणा पुरुसेण होदव्य । [ केनापि साधुना पुरुपेण भवितम्यम् । 'चेग-साहु पुच्छीअदु दाव । साधु पृच्छपता तावत् ।। गणिका-हम्जे । एकपुरुसपक्सवादिदा सव्वगुणाण हन्ति । । हजे! एक्पुरुषपक्षपातिता सर्वगुणान् हन्ति ।] घेटी-भह 1 से णाम तुष जाणासि। [ भर ! अस्प नाम व जानासि ।] यत :-ण हु जाणामि । [न खलु जानामि । ] गणिका-अदिलहु तुए किद । [अतिलघु स्वया कृतम् । एकसुरुषपक्षपातिता-एकपुरुषः चारुदत्तरूपे स्नेहविषयीभूते तारो एक- पुरुपे पक्षपातिता = गुणपक्षपातिता अर्यात को न खल्वार्यचारुदत्य गुणान अनुकरोति इति कयनेन गुणपक्षपातिता सिद्धपति अत एव सदगुणाय नान्य इति गुणविषय एकानिरटिदोपता सर्वगुणान् अन्यषो सर्वगुणान् हन्ति = असहनन न मपयति। अतिलघु - लया अतिशयन लघु-हीन पर्म कृतम् - पाचरितम् त्व तस्य नाम जिज्ञासयापि न जानासि । गणिका-(बेटी की ओर देखकर)समुच में यह कोन है जो भाय चावच क गुणों का अनुकरण करता है। चेरी-माननीये ! मुझे भी कौतूहल हो रहा है। यह कौन है? गांगरा-यह निश्चय ही कोई सापुरुषह। पेटी-बड़ा सब पूछना चाहिए गणिका-मानमीये ! एक पुरप क गुणों क प्रति परुपात दूसरों क गुणों को सहम नहीं करता। घटी (प्रति-भा! या भाप उमका नाम जानते है। पे-मैं नहीं जानता। गणिका-भापन टीम भी पिया।
www જે ઘર્ષ, # H in fજ જા ! ને , it વગા in firity 11 આ પાત્રાધા વિકલા fu 1 [ શહ- તાવન નાના વાળ 0 , ', પવન પણ વાળ trinii. ઇ નાના શાક | ના નિત. 'ના ! છો ! | જગત શ્ય* 10 Tu | બાપન (વાળાના વિવા) Efe જાનni જન વળાવનજાવ" | ગીત - it up a re , વન નાવ | ! A B (થાવર ઘન કtion નાના ગત I tત બાવન ની i irગવ, ગાળHI નીના 1 | (111/-નn ) જિળી': ! a – ના વાળ , , બે ભાન ન ત ત મા #f-moto Correarea બત – ગાંarળા પળા નાણ જ , ાનિ પામી છે IIનાત : પાનાનાના ત વા ! શilવીતા-શ્રાના- ગામ નાના ન પામી ને ડાતળા પાનામાં ( 11 ) HI તન- છાતા બનાના d a for IT રો] બાવળ , જે બાળી નાગવા ના ! (nો ગવળ નાનતા વિના માતા પણ જો બાપુ ! લભ ન મi toળ T - વરાળ ના, ના ! (બાવાવ ને નાર) અને તે કોઈ જ વા એ છે વિ ાજપનr da પત્તી લા લ મા વાવ થી ન રા તા તા - વો મત કે તેમાં પણ બાળા ) | gn : htt | .. ६: -- एव इति अथ तृतीयोऽङ्कः (सत प्रविशति नायको विदूषकश्च ।) नायक-वयस्य । वीणा नामासमुद्रोत्थित रत्नम् । कुत, उत्कण्ठितस्य हृदयानुगता सखीव सङ्कीर्णदोपरहिता विपयेषु गोष्ठी। कीहारसेपु मदनन्यसनेषु कान्ता स्त्रीणां तु का तरतिविघ्नकरी सपत्नी ॥१॥ असमुद्रोत्थिाम्-समुद्रात उत्थितम् इति समुद्रोत्थितम् न तथा इति असमु द्रोत्थितम् । अर्थात् वीगा नाम' रत्नमिव उत्तमवस्तु समुद्रस्तु रलाकर अस्त्यष परन्तु तत्प्रामरलात् अन्यत् रत्न भुवने अस्ति चेत् ततु वीणा सात्पर्यम् । कुत = कस्मात् हेतो एव वच्मि इति चेन् । तर्हि वीणाया । गुणान् शृणु। उत्कण्ठितस्येति-वीणा उरण्ठितस्य - इष्टप्रायै व्याकुलोमतस्य एवं कृतनिश्चयस्य (जनस्य) हृदयानुगता-हृदस्य हृदय षा अनुगता इति हृदयानु गता = मनोनुकूला सखीध विनोदकरी भवतीति भाव विषय = भोग्यवस्तुपु सकीर्णदीपेण रहिता गोष्टी - सगीतपरिषद् इव अस्ति मदनव्यसनेषु-मदनस्य व्यसनानि तेषु अर्थात कामव्यापारेषु इत्यथ कोहारसेपु = कामलक्षणामु की कान्ता हब - स्वकीयवनिता इव रागपिनी अस्ति तथैव श्रीणाम् का तरति (सके बार नायक मौर रिदपक का प्रवेश) नायक-अपस्य वीणा एक ऐमा रान है जो से उत्पन्न नहीं हुआ है (समुद से चौदह रत्न उरप न माने जाते हैं)। क्योहि-(वीगा) समण्ठित जन के रिये मनोनुकूल मपी की भानि भोग्य विषय में सोण दोषरहित (वरणा पर में कमसुरा दोष से रहित) गोष्ठी पर में रिपपान्तरम्भस्पष्टता दोषरहित ) गोधा की तरह काम की रसली श्री श्री में करता की भांति और पति के प्रति निषोंक प्रम में निवाग्ने पाली समान है(धोगप्रति पुरलोभापम परिनयों को दुसद होता है इसलिये पीणा मे उनकी सपानी जैसी ईयां होती).॥
चारुदत्तम् । whemam- स्था भावान Risornai विदूषक-भो वचस्स ! को जालो क्रिदपरिघोसणदाए णिस्तनपाना राअमगा । कुक्कुरा वि ओसुत्ता ! वनं णि ण लभामो । अएणं च नणि अच्छरीनं| इम हवीणं ण रमामि । अहिअदिढत्याणे विच्छि- एणतन्तिआ हो। [भो वयस्य ' क काल कृतपरिघोषणतया नि सम्पाता राजमार्गा । सुखरा अप्यता । वय न्द्रिा न लभानहे। अन्यच्चेदानी- माश्चर्यम् । इना हतवीण न रने । अविन्टस्याने विच्छिनतन्त्रीका भवतु ।] नायक -बयस्य ! भावशावलेन बहुश. खल्वद्य मधुरं गीतम् । न च भवान रमते। विदूषक'-अदो एञ्च एवं अहं ण रमामि । महुरं पि बहु खादित्र विक्री = स्वामिप्रगयवाधिका सपत्नी इव भवति (य- सा पुरुषाणाम् परना र्पणी इय॑ )॥१॥ क. काल = + काल व्याप्येति भावः । कृतपरिघोषणतया कृता परिघो- पणा येषु, तेया भाव तया । निमन्याना'-निर्गत सन्पात = गमनागमन्न् स्नान ते । अर्थात् गमनागमनशून्य राजमार्गा' - राजपया इत्यर्थः । अधिक हटस्थाने - निरापदस्थाने इति भावः । विच्छिन्नतन्त्रीका-विच्छिन्ना श्ल्याकृता तन्त्री यस्य मा, अर्यान् श्ल्यतन्त्रीयुता भवतु = तिष्टनु इति प्राशय । भावशावलेन-भावाना भावलेन - वैचित्र्येण । बहुश: बहुवारमित्यर्थः । दिपक-हे मित्र । बहुत देर हुई, नगरपाल ही घोषणा के हेतु इस समय राजमार्ग जन-सनागम मे शून्य है। कुक्कुर भी सो गये हैं, किन्तु हम लोग आनन्द (अव भी) नहीं ले रहे हैं। दूसरा आश्चर्य यह है कि मैं इस वीणा में भी आनन्द नहीं ले रहा हूँ। अतएव इमे किसी निरापदस्थान में स्वतन्त्रीयुक्त बनाम रख दिया जाय (भावार्थ यह है कि पिसी परवी जगह पर पटककर इसकी तान तोड़ दी जार)। नमक-मित्र वीणा ने अनेक मावों के कारण नाज कई बार मधुर गान किया। विन्तु आप क्यों नहीं आनन्दित हो रहे हैं? विपर- इसीलिये तो मै इसमे आनन्दित नहीं है। (क्योंकि) मधुर १ --im । नायक- . -- . - तृतीयोऽ। अजिण्ण होइ 1 [अत एवैतामह न रमें । मधुरमपि बहु खादितमजीर्ण भवति । -सर्वथा सुव्यक्त गीतम् । कुत, रक्तच तारमधुर सम स्फुट ब भावार्पिन च न च साभिनयप्रयोगम् । किंया प्रशस्य विविधैर्वहु तत्तदुफ्त्या मित्यन्तर यदि मवेद् युवतीति विद्याम् ॥२॥ विदूषकः-काम पससेदु भव । मम खु दाप गाअन्तो मणुस्सो इस्थिआ वि पठन्ती उमअ आदर ण देदि । गाअन्तो दाव मणुस्सो रवेति-(तथा = वीणया) रक्तम् - अनुरागपूणम् च तारमधुरम्- तारम् = उच्चैव च मधुरम् -श्रुतिसुखम् च इति तारमधुरम् अर्थात् उच्च तथा शोभनम् इत्यय' च समम् = वैपम्याभावम् स्वरतालसामजस्यसवलितम् । वास्फुट च - प्रसन्न मुख्यक व भावार्पितम्-भावेन = अनुरूपभावेन अर्पितम्- युफम् इत्यय अथवा अर्पित -प्रदत्त भाव = अनुरूपयारादिभाव यन अय च न साभिनयप्रयोगम् = अभिनयसयुकभावमित्यर्थ गीतम् या तनन् बहुविध = नानाप्रकार उक्त्वा किं भवेत् यदि मा मित्यन्तर या तरित यथा स्यात् तथा भवेत् तर्हि अहम् ताम् युवती इति विद्याम् - जानीयाम् । (यत सामान्यत पुष्पगीते स्वरकाश्य जायते रमणीगीते तु समधिक्मधुरता भवतीति भाव ।)॥३॥ पदार्थ भी अधिक प्रा लेने पर अजीज कर देता है। (सारण्य यह कि भनेकों पार का गाया हुभा अस्पात मधुर गीत भी उग को पढ़ा देता है।) नापन-धीणा ने सब महार से सुस्पष्ट गान किया है क्योंकि- रागयुत उरच एवं मचा वैषम्परहित परिरपु भाषपूण तथा भमिमय प्रयाग मे यह (गान किया है)। उपयुक्त स्परों को नाना प्रकार से कह-परकर मगर मामा की नाप । पेमा मालम पड़ता कि मानों दीवार की भाम कोई तिहीगारदी ॥२॥ ar-भाप भले ही प्रशला। किन्तु गाते हुए पुल पा पाती हुई नी । दोनों ही में अनुराग को भी यहा सरता सरमाला को धारण लिए हुए ७६ चारुदत्तम् । IMMMA 34fun. मा रत्तसुमणावेहिदो विअ पुरोहिदो दिदं ण सोहइ । इस्थिआ वि पठन्ती छिण्णणासिआ विअ घेणुआ अदिविरुवा होइ । [ काम प्रशसतु भवान् । भम खलु तावद् गायन मनुष्य स्न्यपि पठन्त्युभयमादर न ददाति । गायस्ताव न्मनुप्यो रक्तसुमनोवेष्टित इव पुरोहितो दृढ न शोभते । त्यपि पठन्ती छिन्नना सिकेच धेनुरतिविरूपा भवति । ] नायक -सखे । उपासूढोऽर्धरात्रः । स्थिरतिमिरा राजमार्गाः । निस्सम्पातपुरुपत्वात् प्रसुवोजयिनी प्रतिभाति । कुत', असौ हि दत्त्वा तिमिरावकाशमस्तं गतो ह्यष्टमपक्षचन्द्रः। तोयावगाढस्य वनद्विपस्य विषाणकोटीव निमजमाना ॥३॥ श्रादरम् = प्रीतिम् । रक्तसुमनोवेष्टित -रक्ताश्च ते सुमनसच तामि वेटित , रक्तपुप्पभूषित इत्यर्थ । छिन्ननासिका-छिन्ना नासिका यस्या सा तथा । अर्धरात्र-रात्रे अर्धम् इति अर्धरात्र । उपाहढ' = सजात , उपस्थिती चा। स्थिरतिमिरा-स्थिरम् = घन तिमिरम् = अन्धकारम् यत्र एचभूता राज मार्गा सन्ति । नि सम्पातपुरुपत्वात-निरस्त सम्पात गमनागमन यस्मात् । एवभूत पुरुष यत्र, तेषा भाव तस्मात् , अर्थात् सर्वन पुरुषसंचारा- भावात् इत्यर्थ । असावितितोयावगाढस्य-तोये जले, अवगाह - स्थित तस्य, जल मग्नस्येत्यर्थ , चनद्विपस्य = वनगजस्य, निमज्जमाना=मज्जनप्राया विषाणकोटीव- दन्ताप्रभाग इव, 'विपाण स्यात्पशुभदन्तयो' इत्यमर । असी हि अष्टम पुरोहित की भाति गाता हुमा मनुप्य शोभा का पात्र नहीं होता और पाठ करती स्त्री भी क्टी नासिका वाली गाय की तरह रूपहीन दिपाई पड़ती है। नायब-मित्र आधी रात हो गई। राजमार्ग में घोर अन्धकार का साम्राज्य है। पुरुषों के गमनागमन के अभाव के हेतु मानों उज्जयिनी सोई हुई की तरह प्रतिभासित हो रही है। क्योंकि- वह भष्टमी का चन्द्रमा अन्धकार को अवकाश देकर अस्त हो रहा है। लगता है जैसे जल के भीतर दुनकी गाये हुए बनेले हाथी के दातों को कोरियों भी डूब गई हों ( भष्टमी के चन्द्रमा की भी दो फोटियां होती है)॥३॥ .
-- . - कृतीयोऽ । विदूषक -सुन भर भणानि | अन्तदिअमाणचन्दलखावआमो 'आदरदी विक्ष पासालानो अघआरो। [सुष्टु भवान् मणति । अन्तर्दधा नबदलल्यावकाशोऽवतरतीव प्रासादायकार । नायक-(परिक्रम्प ) इत्मस्मदीय गृहम् । यधमानक । वधमानक ! विदूषकः-यखमाणअ । वद्धमाणअ ' दुवार अगागुन । [पर्धमानक ! पर्धमानक द्वारमपाणु ।] (प्रविश्य) चेट.-अम्मो अग्यमेत्तेओ । [अम्मो पार्यमंत्र्य ।] नायक-वधमानव । वर-अम्मो भट्टिदारओ। भट्टिदार वन्दामि। (अम्मी भर्तृदा रक । भर्तृदारक बने। नायक'-पादोन्कमानय । पक्षचद्र-शुक्रपक्षाटम्या क्षीणचन्द्र तिमिरावकाश अधिकारप्रसारस्था नम् दत्या अस्त-तिरोहित गत ॥ ३ ॥ अतधानवदल धावाश-अतदधानथासी चन्द (अस्तगतचा हम्पर्य ) तस्मात् लए प्राप्त अवकाश यन स तया । पादोदकम् = चरणोदकम् । विषा-आपने टीक कहा। अन्धकार मानों इम प्रासाद मे उतर रहा हो क्योकि चन्द्रमा के भरत होने में उसे अयमा उपलब्ध हो गया। -(घूम करक) यह हमलोगों का घर है।६ पदमानक । पदमामक । पापा-मामक यक्ष्मामका दरवाजा पोहो। (प्रबार) र-भाय मैत्रय पाहा गापर-परमान! -भगुबारक भी यहाँ ६ । मनुवारक म भापती पदना करना। मापा-धाम लिए जर नापक- 1 तृतीयोऽद विदूपक-सुठु भष भणादि । अन्तदिअमाणचन्दलखावासो भोदरदी विक्ष पासादादो अन्धआरो। सुष्ठ भवान भणति । अन्तर्दषा नचन्द्रलम्यावकाशोऽवतरतीव प्रासादादन्धकार ।] नायक'-(परिक्रम्य ) इदमस्मदीय गृहम् । वर्धमानक ! वर्धमानक । विदूषक-बदमाण | धद्धमाण ! दुवार अषावुद् । [ वर्षमानक ! वर्धमानक द्वारमपाणु ।] (प्रविश्य) चेट'-अम्मो अय्यमेत्तेओ। [अम्मी आर्यमैत्रेयः ।] नायक-वधमानवक। चेट-अम्मो भट्टिदारओ। भट्टिदारा चन्दामि। [अम्मो भर्तृदा रक । भर्तृदारक! पदे।] नाम-पादोदकमानय । - पक्षवद्र शुक्लपक्षाष्टम्या क्षीणचन्द्र तिमिरावकाश-अधकारप्रमारस्या नम् दत्त्वा अस्त-तिरोहित गत ॥३॥ अतर्दधानच द्रलथावकाश-अतर्दधानश्वासी चद्रव (अस्तगतचन इत्यर्थ ) तस्मात् लर = प्राप्त अवकाश यन स तया। पादोदकम् = चरणोदकम् । विपर-मापने ठीक कहा । अधकार मानों इस प्रासाद मे उसर रहा हो क्योंकि चन्द्रमा के भक्त होने से उसे अवसा उपाय हो गया है। -घूम करके) पर हमलोगों का घर है। परमानक बदमानक पदपर-हवनमामक पदमामका दरवाजा पोलो। (प्रबार) थे-भाय मैग्य पाई। गायक-पमानक! भर-भरक भी यही हा मनवारक म भारती पन्दना करता हूँ। नायष-रधान कहिए जर सामी। नायक- - ७८ चारुदत्तम् । wwwmAWN चेट-(परिक्रम्य ) इदं पादोद। ( नायकस्य पादौ प्रक्षालयति ।) [ इद पादोदकम् 1] विदूषक -वड्ढमाणवअ । मम वि पादं पक्खालेहि । [अर्धमानवक । ममापि पादं प्रक्षालय 1] चेट-सुहोदेसु पादेसु भूमीए पलोहिदव्वं । उदअं विणासेहि। अब आणेहि । पक्खालइस्स। (नाटयेन विदूषकस्य पादौ प्रक्षालयति ।) [ सुधौतयो पादयोभूम्या प्रलोठितव्यम् । उदक विनाशय । अथवानय । प्रक्षालयिष्यामि ।] विदूषकः --ण केवलं दासीएपुत्तेण पादा धोदा, मुहं वि धोदं [ न केवल दास्या पुत्रेण पादौ धौती, मुखमपि धौतम् । ] नायक-वयस्य । इयं हि निद्रा नयनावलम्विनी ललाटदेशादुपसर्पतीव माम् । अदृश्यमाना चपला जरेव या मनुष्यवीर्य परिभूय वर्धते ॥४॥ सुधौतयो -सुप्ठ चौतौ सुधौती तयो पादयो = चरणयो सुधौतयो (सतो; भूम्या प्रलोठितव्यम् । उदकम् = जलम् । इयमिति-हि - यत नयनावलम्विनी-नयने अवलम्वते या सा इयं निद्रा ललाटदेशात मस्तकस्थानात् , माम् उपसर्पति इवन्हठात् आगत्य परिभवति इच, अदृश्यमाना चपला = कतिक्षणस्थायित्वेन चञ्चला, दुर्विनीता, अजेया इत्यर्थ, चट-(घूम करके) यह चरणोदक है । (नायक के चरणों को धोता है।) विदूपक-वर्षमानक 1 मेरा भी पैर प्रक्षालन करो। चेट-(चारुदत्त का सेवक) अच्छी तरह धुले हुए पैरों को तो भूमिपर ही लोटना होगा। पानी सराव करो अथवा लाओ,पैरों को धो दें। (नाटकीय ढङ्ग से विदूपक के पैरों को धोता है।) विदृपका-दासीपुत्र ने केवल पैर ही नहीं धोए, अपितु मुख भी धो दिया। नायक-मिन्न । यह निद्रा भाखों में लटकती हुई ललाट प्रदेश से उतरकर उसी प्रकार सत्ता रही है जैसे अदृश्य और चजल वृद्धावस्था मनुष्य की शकिको परास्त करके बढ़ जाती है।
तृतीयोऽ1 मैत्रेय सुप्यताम्। oldini on (निष्कान्तम्वेट ।) (प्रविश्यामरणसमुदहस्ता) मेरी घंटी-अय्यमेत्तेभ । उटठेहि उटठेहि। [प्रार्यमैत्रेय ! असिटोसिष्ठ । ] विदूषकः-भोनि । किं एPI [ भवति । यिमेतत् ।। बेटी-इभ सुवण्णमण्ड सहीए सत्तमीए परिवेद्यामि । अट्टमी खु अन्न सुवर्णमाण्ड पठो सप्तम्या परिवर्तयामि । अष्टमी खल्यद्य । ] नायक-इद तद् वसन्तसेनाया स्यकम् । चेटी-आम | मणादु मणादु भट्टिदारओ, गण्हदु ति। [श्राम । भणनु भणतु मदारका ग्रहास्थिति। नायक-मैत्रेय । गृह्यताम् । विपककि णिमित्त अअ अलक्षारो अन्मन्तरघउस्साल ण पवे सीअदि । [किनिमित्तमयमलद्वारोऽभ्यन्तरचनु शाल न प्रवेश्यते । ] जरा इववावस्था व या मनुष्यवीयम् = मनुष्यबलम् भूय - अभिभूय पर्दते ण्य वृद्धि प्राप्नोत्यक्ष ॥४॥ भाभरणसमुद्रहस्ता-आभरणस्य - अलद्वारस्य रामुद्गम् "पेटी पति लोक प्रसिदम् तन् हस्ते यस्या मा तथा। अभ्य तरच शालम्-चतमणाम् शालानाम् ममाहार इति चनु शालम् (A)मैत्रेय । मो जाओ। (घर थादर चा जाता है।) Parnरीदेगको समलियेप्रक, ग-आप मैग्रेथ उठो उठी। पिक-माननीय। यह क्या है। ग-पर पुषण भाण्ड पी तथा मामी सिधि पतीन हान पर में दम परिषरान पर देना पार्हगी कोशि मा अष्टमा। नायक-पया यह पमम्तमेनाबी मापति? रंग-हा भसदारक(यिषक से)कि इसमें हैं। आपब-मंत्रय मेला RATE-पाशा है कि यह शा भगतपुरीचना में मही प्रभावम् वा परि - पपा गया?
पनी
चारुदत्तम् ।
Fromanim
नायक मूर्ख ! बाह्यजनधारितमलङ्कारं गृहजनो न द्रश्यति ।
विदूषक -का गई। आणेहि गण्हामि चोरेहिं गण्हिअमाणं | [
गति । आनय गृह्णामि चोरेशमाणम् । ]
(चेटी दत्त्वा निष्क्रान्ता।)
विदूषक -भो! किंणिमित्तं सो पावरओ तस्स गणिआपरिआ
अस्स दिण्णो । [ भो । क्रिनिमित्तं स प्रावारकस्तस्मै गणिकापरिच
रकाय दत्त ।]
नायक -सानुकोशतया । 'KHAunt
विदूषक -इह वि साणुकोसदा ! [ इहापि सानुक्रोशता । ]
नायक वयस्य । मा मैवम् ।
अभ्यन्तरे अभ्यन्तरस्य वा चतु शालम् इति तथा।
'बाह्यजन' इति पदेन 'गणिका' (वसन्तसेना) ध्वन्यते । 'गृहजन' इति
पदेन चारुदत्तस्य पत्नी 'ब्राह्मणी' पाक्षिप्यते । अत एव आह-बाह्यजनेन पारि
तम् एचभूतम् अलङ्कार गृहजन = मम भार्या यथा न द्रक्ष्यति, (अत एव श्राभ्यः
न्तरचतु शालम् न प्रवेश्यते इति भाव )।
सानुक्रोशतया-अनुक्रोशेन = अनुकम्पया सह वर्तमान इति सानुक्रोश,
तस्य भाव तया, दयाभावेन इत्यर्थ ।
नायक-मूर्ख । बाह्यजन (वेश्या) के द्वारा धारण किए जानेवाले अलङ्कार को
मेरी पत्नी नहीं देख सकेंगी।
विदूषक-दूसरा रास्ता ही क्या है (अर्थात् दूसरा उपाय क्या है ?)। लाओ,
चोरों के द्वारा ग्रहण करने योग्य इस अलकार को ग्रहण करता हूँ। (चेटी आभू-
पण देकर चली जाती है।)
विदृक-भो । वह उत्तरीय गणिका के भृत्य ( कर्णपूरक ) को क्यों
दिया गया।
नायक-दया भाव से।
विदृषक-क्या इसमें भी दया भाव है।
नायर-मिन्न । ऐसा न कहो।
तृतीयोऽङ्क ।
Madalal
सुर"
विदूषक'-अह भरिदगदमो विअ भूमीए पलोहामि। [अह मरित
गर्दभ इव भूम्यां प्रलुठामि ।]
नायक-निद्रा मा बाघते । तूष्णीं भव ।
विदूषक -सअदु भव सुहप्पबोहाअ | जाव आह पि सुविस्स ।
[शेतां भवान् सुखप्रवोधाय । यावदहमपि स्वप्स्यामि
(द्वावपि स्वपित ।)
(तत प्रविशति सज्जलक ।)
सरजलक-एप भो ।
छत्वा शरीरपरिणाहमुखप्रवेश
शिक्षायलेन च यलेन च कममार्गम् ।
भरितगदम इव--भर सात अस्य इति भरित' मरितश्चासौ गर्दभय
इति भरितगर्दभ तद्वत् भूम्याम् प्रलुठामि ।
मुसप्रयोपाय = सुतर्वक यया स्यात् तथा जागरणाय इत्ययः ।
भो! इति विस्मयसूचक्मव्ययम् ।
पत्वेति-(एपोऽहम् ) शिक्षायलेन-शिक्षाया' बलेन - सामध्येन चातु
र्यण वा घलेन = शरीरबलेन च शरीरपरिणाहमुखप्रवेशम् शरीरस्य-देहस्य
परिणाह = विशालता परिणाही विशास्ता इत्यमर इति शरीरपरिणाह तस्य
गुराप्रवेश मुखेन प्रवेश यस्मात् तम् (अनायासैन निगमप्रवेशयोग्यम् इत्यर्य )
एताम् फर्ममागम्-धर्मण = चौयम्मण मागम् = सचिच्छेदम् मुरणम् पा
गिरम योहा लिए हुए गधे की भाति भूमि पर लोट रहा हूँ।
नायक-नी- मुश सता रही है। गुप रहो।
-आप सरपूर मागमे क लिए सो जाय । तया में भी सो जाता
है(दोनों सो जाते है।)
(रसरकारे)
गाय-भो।
विवाह में तथा कि पल द्वारा विशाल र कप पोग्य
मुराबनाकर भूमि पर परिसपण राने मे स्थर पारयमागवाटा में गुमसे
म२ चारुदत्तम् । M viwww गच्छामि भूमिपरिसर्पणघृष्टपार्यो निर्मुच्यमान इव जीर्णतनुर्भुजङ्गः ॥५॥ भोः । वृक्षवाटिकापक्षद्वारे सन्धि छित्त्वा प्रविष्टोऽस्मि । यावदि- दानी चतुःशालमुपसामि । ( सनिर्वेद विचिन्त्य ) भोः SHAR: कामं नीचमिदं वदन्तु विबुधाः सुप्तेषु यद्वर्तते विश्वस्तेषु हि वञ्चनापरिभव शौर्य न कार्कश्यता । कृत्वा = विधाय भूमिपरिसर्पणघृष्टपार्श्व-भूमौ = मुरजभूमौ परिसर्पणम्-शयित सन् अने गमनम् इत्यर्थ , तेन पृष्टौ = प्राप्तपर्पणौ पाचौं यस्य स । निर्मुच्यमान कचुकेन कबुकात् वा हीयमान सन् अतएव जीर्णतनु = जीर्णा = जराजर्जरा तनु शरीरम् यस्य स भुजङ्ग इव = सर्प इव गच्छामि = धीर यथा स्यात् तथा प्रविशामि इत्यर्थ ॥ ५॥ सन्धि छित्त्वा = छेदनकर्मणा सुरङ्गादिमार्ग सम्पाद्य अहम् प्रविष्टोऽस्मि इति भाव । सनिर्वेदम्-निदेन = दु खेन सह वर्तमान यया स्यात् तथा विचिन्त्य चिन्तयित्वा ( सजलक आह) काममिति यत् = चौर्यादिकम् मुप्तेषु = निद्रावस्या गतेपु जनेषु वर्तते : क्रियते इत्यर्थ , इदम् = कर्म विवुधा = पण्डिता कामम् = यद्यपि, यथे-- नीचम् = निकृष्टम् , पातक वा वदन्ति = कथयन्ति । हि = यत वित्र स्निग्धेपु, विश्नम्भयुक्तेषु चा वचनापरिभव-वचनया = कपटरीत्या, अनादर धर्पण चा शौर्यम् = वीरस्य कर्म न = नास्ति । अपितु कार्य मुक्त जीर्ण शरीरवाले (वृद्ध) सर्प (आगे)जाता हूँ॥५॥ भो। मेंने वृक्षवाटिका वाले द्वार में इस समय चतु शाला में प्रवेश करता लोगों के सो जाने पर जो (चौरा। निकृष्ट (कर्म) कहते हैं। क्योंकि वि. जाता है वह वीर कार्य नहीं, अपितु २ ammam Jan चारुदत्तम्। माहेर गच्छामि भूमिपरिसर्पणघृष्टपावों निर्मुच्यमान इव जीर्णतनुर्भुजङ्गः ॥५॥ भोः । वृक्षवाटिकापक्षद्वारे सन्धि छित्त्वा प्रविष्टोऽस्मि | यावदि दानी चतुशालमुपसामि । ( सनिवेद विचिन्त्य ) भोः ना: कामं नीचमिदं वदन्तु विबुधाः सुप्तेषु यद्वर्तते विश्वस्तेषु हि वञ्चनापरिभव शौर्य न कार्कश्यता । F कृत्वा = विधाय भूमिपरिसर्पणघृष्टपार्श्व --भूमौ = सुरङ्गभूमौ परिसर्पणम्-शयित सन् अप्रे गमनम् इत्यर्थ , तेन पृष्टौ = प्राप्तघर्षणौ पावौं यस्य स । निर्मुच्यमान कधुकेन कक्षुकात् वा हीयमान सन् अतएव जीर्णतनु = जीर्णा = अराजर्जर तनु शरीरम् यस्य स भुजङ्ग इच = सर्प इव गच्छामि = धीर यथा स्यात् तर प्रविशामि इत्यर्थ ॥ ५ ॥ सन्धि छित्त्वा = छेदनकर्मणा सुरङ्गादिमार्ग सम्पाय अहम् प्रविष्टोऽस्मि हो भाव । सनिर्वेदम्-निदेन दु खेन सह वर्तमान यथा स्यात् तथा विचिन्त्य : चिन्तयित्वा ( सज्जलक आह) काममिति -~यत् = चौर्यादिकम् मुनेषु = निद्रावस्था गतेषु जनेषु वर्तते : क्रियते इत्यर्थ , इदम् = कर्म विवुधा = पण्डिता कामम् = यद्यपि, यथेष्ट । नीवम् = निकृष्टम् , पातक वा वदन्ति = कथयन्ति । हि = यत विश्वस्तेषु - स्निग्धेषु, विश्रम्भयुक्तेषु वा वञ्चनापरिमव-वचनया = कपटरीत्या, परिभव : अनादर घर्षण वा शौर्यम् = वीरस्य कर्म न = नास्ति । अपितु कार्कश्य-ना मुक्त जीर्ण शरीरवाले (वृद्ध) सर्प की भाति (धीरे-धीरे) प्रवेश करता (आगे)जाता हूँ ॥५॥ भो । मैंने वृक्षवाटिका वाले द्वार में सुरन बनाकर प्रवेश किया है। तच त इस समय चतु शाला ने प्रवेश करता है। (हु खपूर्वक सोचकर ) भो।- लोगों के सो जाने पर जो (चौरादि म) स्यिा जाता है, उसे पण्डित लो निकृष्ट (कर्म) कहते हैं। क्योंकि विश्वस्तजन का छल द्वारा जो अपमान किर जाता है वह वीर-कार्य नहीं, अपितु क्रूरकर्म ही कहा जाता है। तथापि निन्दनी तृतीयोऽ। ३ Tarathiasini 환선행 ज्यने । म्वाधीना पचनीयतापि तु पर यद्धीन सपारित मागश्चय नरद्वमोतिक्वये पूर्य ना हीणिना ॥ ॥. (विचिय) लश्वाऽथयान् माधुजनापमानी यणिक म्यवृत्तावतिक्कशश्च । यम्नम्य गह यदि नाम लप्म्ये मधामि दु ग्यापहना न चित्ते ॥.. कम ण्य भयनि । (तयापि) पचनीयतापि - निन्दा अपि स्वाधीना = स्वातन्त्र्य गुणयोगिना वरम् = मना प्रिया भवति तु किनु यर मेधाजलि = दास्य भायन मवाय रस्तापलि प्रणामाद्याचारग्नु न बर म्यान् = मनागपि न श्रयान परमाग्योपनीवनापेक्षया चोयादिनीचक्मनीषन स्वातन्त्र्यण प्रशस्नम् इनि प्राशय । पृषम् -द्वापरयुग एष महाभारतराल वा प माग = वधादिनित्यम्ममाग नर-मोतिषय मप्त भव इति मौलिक नराणां मौलिक अयवा नान्द्राय ते मोनिकाय तेपाम बघ तस्मिन अयात् विश्वस्त निद्राकाल घटाम्नाग्नृिपाणाम् वध यथ द्रोणिना द्रोणपुषण अश्व नाम्ना कृत = अनुमन श्रावरित । (अतण्य अहमपि चौर्यस्म करिष्य मेणियनिमि आचरिनन्चात् ॥६॥ लव्य इति । य लुब्ध = पदव्यलोमी अथवान = धनवान अप च माधु जनाबमानी यथ वणिक - व्यवमापी स्वानापतिशय-स्वरत्तो - प्रत्यविक्रय व्यापार अतिक्रमणयअमाधुग्वान् कोरथ तस्य = एतयो यो एकतरस्य गहम् = गृहम् यदि नाम एप्स्य = यनिषा प्रविशामि तदा चित्त = मनगि दुगोपहती न मवामि ॥ ७ ॥ मषा म्याथान पायर्यानि पुति, मया के निमित्त हाथ मारम की अपना कुछ अरक्षा अनामकाल (महामारतकाल) में दाणपुर अश्वग्थामा न विश्वस्न पय निद्रामग्न दोपदी पाची पूर्ण क वध करन म इमी फरकम का अनुसरण किया था nan (बीयांविषय में रिप चिन्ना रूके) यतिमामी धनी अथवा शिष्टजनक हुपी (ध्यान) पानिज व्यवसाय में कार अमार पणिक के घर में प्रवेश करता है तो अपने मन में कभी भा दुग्गी मदीहोउंगाno॥ इत्यथ चारुदत्तम् । ॥ N स यद्वा तवा भवतु । कि वा न कारयति मन्मथ. 1 यावदारमे कर्म । भोः। देशः को नु जलावसेकशिथिलश्छेदादशब्दो भवेद भित्तीनां क नु दर्शितान्तरसुख सन्धिः करालो भवेत् । क्षारक्षीणतया चलेष्टककृशं हर्य क जीर्ण भवेत् Anil कुत्र सीजनदर्शनं च न भवेत् स्वन्तश्च यत्नो भवेत् ।।८।। (परिक्रम्य) इय वास्तविभागक्रिया । सोपस्नेहतया गृहविशिष्ट- देश इति-भित्तीनाम् = प्राकाराणाम् क नु देश = स्थानम् जलावसेकशि- थिल'–जलानाम् = वृष्टयादिजलानाम् भवसेक = पतनम् तेन शिथिल = कोमल' सन् छेदात् सुरजादिनिर्माणसमये अशब्द = खटखटाशब्दरहित भवेत् , कनु सन्धि - रन्ध्रम् ( सेंध इति लोकभाषायाम् ) दर्शितान्तरसुख–दर्शितम् अन्तरम् अभ्यन्तर येन, तादृशच सुखकरच सन् कराल =अभूतपूर्वदर्शनीयत्वेन विशाल', भयहरो वा भवेत् । क्षारक्षीणतया-क्षारेण = क्षारमृदा, लपणेन वा क्षीणतया = क्षीणताहेतो. शिथिलतया वा चलेष्टकलशम्-चलम् इष्टकम् , तेन कृशम् = हासप्राप्तम् अर्थात् कश च क्षीण च एवभूतं हर्म्यम् = भवनम् - कुत्र जीर्णम् भवेत् = भग्नप्रायम् श्रतएव सुखपूर्वक छेदनयोग्य च भवेत् , पनभिप्रेतम् सीजनदर्शनम्तीजनानाम् दर्शनम् = साक्षात्कार च न भवेत् तथा मम यत्न = चौर्यरुपोपाय , स्वन्त = फलप्रद भवेत् ॥ ८॥ वास्तविभागनिया-वास्तु' इति पदेन वास्तुगृहं परामृश्यते अत वास्तुन = कुछ भी हो । कामदेव मनुप्य से क्या नहीं करा लेता ? तब तक कार्यभारम्भ करता हूँ। सज्जलव-यहाँ दीवार का कौन स्थान वर्ग आदि जल से नरम हो गया है जिससे छेदन के समय शब्द न हो सके, अथवा कहाँ पर छेद (सुरज) विशार होगा जिसके द्वारा भीतर की सारी चीजें सरलता से दिखाई पढे भवन की किस स्थान पर भित्ति जीर्ण एवं हार (लौना) लगने के कारण नष्ट होकर शिथिल पड़ गई है, कहाँ पर सियों देख न सकेंगी। और (इसी बीच में) मेरा यान भी सफल हो जाय ॥८॥ (घूमकर)यहाँ मकान की दर्ज है (रहों के या ईटों के यीच का अवकाश)। . अपना बाव 300 तृतीयोऽ। इवाय भवनाविन्यास'। इह वायत् प्रवेशावकाशं करिष्ये । भो। कीरश इदानी सन्धिच्छेद कर्तव्य स्यात् । सिंहाकान्त पूर्णचन्द्र झपास्य पदार्थ पा व्याघ्रवक्त्र विकोणम् । सचिच्छेदः पीठिका वा गजास्यमस्मत्पक्ष्या विस्मितास्तेकथ स्युः ॥९॥ भवतु, सिंहाकान्तमेव च्छेदयिष्ये । विदूषक -भो । जागत्ति खु भवं, पहि। [ भो ! जागति खलु भवान् , नहि। नायक-किमर्थम् । विदूषक -अह खु दाव कत्तव्यकरत्थीकिदसङ्केदो विअ सकिस वास्तुरहस्य विभागक्रिया इयमन हरयत इति भाव' । सोपस्नेहतसा-स्निग्ध तया इत्यर्थ । भवनाविन्यास भवनस्य विन्याम सनिवेश गृहविशिष्ट इव विशिष्ट गृह यत्र ताश अपि सूचयति इति भाव। सिंहेति-सिंहाका त, पूर्णचन्द्र झषास्य चन्द्राय वा व्याघ्रवक्त्र निकोण पीठिका गजास्यम् इति पा (कतम) सपिच्छेद स्यात् कय या अस्म सक्ष्या ते (जना ) विस्मिताच यु (अर्थात् सुरमादिमार्गनिर्माणविधी मम कर्मकोशलदशनात् भाषर्यान्विता पास्युः।)॥९॥ कतव्यकरनीकृतसकेता-कतव्य करोतीति कर्तव्यकर सस्य श्री तया कृत्त ममी के कारण इस घर का बनाव कुछ विशेष प्रकार का है। यहीं पर प्रवेश के उपयुक सुरज बनाऊगा। भो। यहाँ कैसा सुरज बनाना उचित होगा। सिंह की उछाक के समान वक्रगति की या पूर्णपद्राकार जैसी मकर के मुख की तरह की अयथा अपच द्राकार सरीखा व्याघ्र के मुख की भांति अथवा तिकोनी चौकोनी (पीरिका) या गज क मुख की भाकृति वाली सुराहो जिससे चौरकाय में 4 लोग मा (मो मुगल-बिर्माण की क्लासे) भाश्चर्षित हो जायें ॥९॥ अच्छा मिहाकान नामक मुरङ्ग काही निर्माण करूंगा। विदूषक-मोक्याभा जाग रहा है या नहीं। नायक-मिडिया विषम-नमकीपाद्वारा मंजरपट पर बुलाये गये पौद संन्यासी . । APNA Kanay ५६ चारुदतम् ।- मणओ णि ण लभामि । वाम खु.मे अक्सि फन्देदि | चोरो सन्धि छिन्ददी विअ पेक्खामि | जइ ईदिसी अवस्था अत्थाण, जादीए दरिदो एव्य होमि। श्रह खलु तावत् कर्तव्यकरस्त्रीकृतसङ्केत इव शाक्य- श्रमणको निद्रा न लभे । वाम खलु मेक्षि, स्पन्दते । चोर सन्धि छिनत्तीव पश्यामि । यदीदृश्यवस्थाऽर्थाना, जात्या दरिद्र एव भवामि । ] नायक – मूर्ख ! धिक् त्वाम् ! दारिद्रयमभिलषसि । सज्जालक -अथ केनेदानी सन्धिच्छेदमार्ग सूचयितव्य' स्यात् । नन्विद दिवा ब्रह्मसूत्र रात्रौ कर्मसूत्र भविष्यति । 4inner रा अद्यास्य भित्तिषु मया निशि पाटितासु छेदात् समासु सकृदर्पितकाकलीपु । काल्यं विषादविमुख. प्रतिवेशवर्गो दोपांश्च मे वदतु कर्मसु कौशलं च ।। १०।। तादृश सकेत -समयनिर्देश यस्य यस्मै वा तथा । शाक्यभ्रमण = बौद्धश्रमणक । सूचयितव्य = परिमातव्य स्यात् । ब्रह्मसूत्रम् = उपवीतम् । अद्येति-अद्य अस्य = गृहस्य भित्तिषु निशि = रात्रौ मया पाटितासु, छेदात् = छेद प्राप्य अपि सकृदर्पितकाकलीयु-सकृत् अर्पिता काफली यत्र तासु अर्थात् सकृत् काकलीयन्त्रेण पाहतासु अतश्च, समासु = रम्यासु सतीपु काल्यम् = कल्यमित्यर्थ । विषादविमुख -विषादेन विमुख = विवर्णमुख , प्रति- वेशवर्ग शत्रुवेश्यावर्ग मे = मम दोषान् वदतु कर्मसु कौशल व वदतु ॥ १० ॥ की भांति निद्रा का भानन्द नहीं ले रहा हूँ और मेरी चाई आँख फडक रही है। मुझे ऐसा लगता है कि चोर ( मेरे घर में ) सुरङ्ग बना रहा हो। यदि धन की यही हालच है, तब तो में जन्मना या स्वभावत दरिद्र ही होना चाहूँगा। मूर्ख ! तुम्हें धिक्कार है । क्यों तुम दरिद्रता को पसन्द करते हो? सज्जलय-इस समय मै किससे सुरङ्गमार्ग की माप करूगा । अथवा यह ब्रह्मसूत्र रात्रि में कर्मसूत्र होगा (अर्थात् यज्ञोपवीत द्वारा माप करूंगा)। आज रात्रि में इस घर के दिवाल में छेद कर दिया, काकलीयन्त्र (सनी) के एक ही बार के आघात से यह मनोरम सुरङ्ग बन गया। प्रात काल प्रसन्न होकर पडासी लोग मेरे दोपों का तो वखान करेंगे ही साथ ही साथ मेरे कार्य- कौशल की भी प्रशसा करेंगे ॥३०॥ नायक- । तृतीयोऽह। नम खरपदाय। नमो रानिगोचरेभ्यो देवेभ्य । (तथा करोति।) हन्त अवसित कर्म । प्रविशामस्वायत् । (प्रविश्य ) अये । अवलति दीप 1 अपसरामि वायत् । धिक् , सन्जलक खल्यहम् । Anan-rem मार्जारा पलने वृकोऽपसरणे श्येनो गृहालोकने निद्रा सुप्तमगुण्यवीयतुलने ससर्पणे पन्नगः । माया पणशरीरभेदकरणे चार देशभाषान्तरे दीपो रात्रिपु सङ्कटेच तिमिर घायु स्थले नौजले ॥११॥ 426 ลัทฯ 7 - हत इति हर्षे। कर्म = छेदनकर्म अवसितम् = समाप्तम् । अतएव रहे प्रविशाम इत्यय मार्जार इति-(अहम् ) प्लवने = उत्प्लुस्य पलायनविषये मार्जार = विडालनुस्य ओतुर्विडाल मापार' इत्यमर' अपसरणे - द्रुतगमने घृक गृहाव लोक्ने - गृहस्यवस्तुदर्शनविषय श्येन (वाजपक्षी) तद्वत् खरदृष्टि मनुष्यचीयतुलने-सुप्तमनुष्याणाम् वीयम् तस्य तुलने-परिमापने निद्रा यत सा हि मनुष्यवीर्यम् कीटक इति जानाति इति भाव । देशभाषान्तरे = विभिन्न देशभापाविषये चाक = वाग्देवी सरस्वती भवामि (कथा) अह रात्रिषु : रजनीपु दीप आलोक अर्थात् दीपतुल्य वस्तुदशनसमर्थ सङ्कटे - विप त्काल तिमिरम् = लौकिपदार्याना तिरोधानसामर्थ्यात् अधकार इस स्थले भूमी घायु = तत्तुल्य सर्वत्रंग दक्ष दक्ष जले च नौ नौका इव भवामि ॥११॥ खरपट को नमस्कार । रात्रि के देवता को नमस्कार । (बैसा घद करता है।) चाह । घेदन कम समाप्त हो गया। तब प्रवेश करता हूँ। (प्रवेश करके) अरे! दीपक मल रहा है। तब तक हट जाता हूं। मुझे विकार है मैं सचमुच में सजलक हूँ। मैं कूदकर भागने में मार्जार, दुत गमन में घूक गृह के वस्तुओं को अवलोकन करने में वाज सुसमनुष्य के पीय (बल) को मापने में निद्रादेवी चलने में सप के तुल्य स्थूल धारीर के विश्लेषण करन में माया देश देशाम्सर की विभिन्न भाषा का विषय में विधायी र सरस्वती) रात्रि में दीप आपत्तिकाल में मधकार तुल्य (भाश्य) स्थूल (पृथ्वी) पर चायु और 78 में मौका की भांति हूँum
पन
Mun
चारुदत्तम् ।
(सर्वतो विलोक्य ) आगन्तुकत्वादविदितसमृद्धिविस्तर केवलं भवन-
प्रत्ययादिह प्रविष्टोऽस्मि । न चेदानी कञ्चित् परिच्छदविशेष पश्यामि ।
किन्नु खलु ,दरिद्र एवायम् । उताहो अयं सयमननिरर्थक द्रष्टव्य
'धारयति । अथवा, अभिजातोऽयं भवनविन्यासः । उपभुक्तप्रनष्टविभवे-
नानेन भवितव्यम् ।
आ42107
तथा विभवमन्दोऽपि जन्मभूमिव्यपेक्षया । HROAN
गृहं विक्रयकालेऽपि नीलस्नेहेन रक्षति ॥ १२॥
1314
आगन्तुकत्वात् 3
वैदेशिकत्वात् अविदितसमृद्धिविस्तर -अविदित
अज्ञात समृद्धिविस्तर
ऐश्वर्यप्रसर येन । किन्तु भवनप्रत्ययात् = रमणीय-
भवनदर्शनात् अत्र ईप्सितम् , अस्ति इति हेतो प्रविष्टोऽस्मि । सयमननिरर्थ-
कम्-सयमनेन = भूमौ स्थापनादिना निरर्थकम् = निष्प्रयोजनम् अभिजात =
मनोरम उपभुक्तप्रनष्टविभव -पूर्वमुपभुक्त पश्चात् प्रनष्ट इति उपभुक्तप्रनष्ट
विभवः यस्य तादृशेन भवितव्यमित्यर्थ ।
तथेति-तया = अनेन नष्टविभवप्रकारेण श्रय गृहस्वामी विभवमन्द अपि-
क्षीणविभवोऽपि विक्रयकाले = दारिद्रयात् गृहविक्रयकाले समुपस्थितेऽपि जन्मभूमि-
व्यपेक्षया-स्वकीयजन्मभूमौ व्यपेक्षया = अनुरागेण इत्यर्थ । गृह नीलस्नेहेन =
गाढस्नेहेन "नीलीराग स्थिरप्रेमा' इति यादव, रक्षति ॥ १२ ॥
(चारों ओर देखकर) आगन्तुक होने के नाते मुझे इस घर की सम्पत्ति के
विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं है। केवल सुन्दर भवन को देखकर मैने प्रवेश
किया है। परन्तु कोई विशेष पोशाक नहीं देख रहा हूँ। क्या यह सचमुच में
दरिद्र है ? अथवा यह सयम के द्वारा (बहुमूल्यवान वस्तुओं को भूमि में गाड़कर)
निरर्थक वस्तु को ही वाहर रखकर रक्षा करता है। अथवा यह रमणीय भवन
विन्यास, इस बात का साक्षी है कि यह (व्यक्ति) किसी समय धन का उपभोग
कर चुका है, बाद में विभवहीन हो गया है।
इस प्रकार निर्धन होकर भी यह गृहस्वामी केवल जन्मभूमि की ममता से
इस घर की रक्षा कर रहा है अन्यथा ऐसी हालत में उसे यह घर बेच देना
चाहिये था ॥ १२॥
AUTARA तृतीयोऽद। मवतु पश्यामस्तावत् । अथवा, न खलु मे मुल्यावस्थ' कुलपुन पीडयितव्य गच्छामि सावत्। विदूषक---भो। गण्ह एद सुवण्णभण्डमा [भो ! गृहाणतत् सुवर्ण माण्डम् ।] सज्जलक -कथ सुवर्णमाण्डमित्याह । किं मा दृष्ट्वामिभापते । आहोस्वित् सत्त्वलाघयात् स्यप्नायते । भवतु पश्यामस्तावत् । (दृष्ट्या : भूताय सुम एयायम् । तथाहि, तन्तु સીબમનવા ૪ नि श्यासोऽस्य न शङ्कितो न विपमस्तुल्यान्तर जायते गाव सन्धिपु दीर्घतामुपगत शय्याप्रमाणाधिकम् । . दृष्टिाढनिमीलिता न चपल पक्ष्मान्तर जायते सत्त्वलापवाद-सत्त्वस्य = मनस' लापवम् दीर्वस्यम् तस्मात् क्षीणबलत्वात् इत्यर्थः। निश्वास इति-अस्य निश्वास न शक्ति' = न शकाव्यजक शङ्काहेतु (जागरणस्यति भाव ) न विषम' परन्तु तुल्या तर= तुल्यरूप यया स्यान् सया जायते गात्र सन्धिषु = जान्वादिसन्धिषु दीर्घतामुपगतम् = सुप्रसारणात् दीर्घ सत् । शय्याप्रमाणाधिस्म्-शय्याया प्रमाणम् इति शय्याप्रमाणम् तस्मात अधिकम् = पहिर्भूतम् च प्रतीयते दृष्टि = नेत्रम् गाढम् = अत्यन्तम् निमीलिता = ५. - अच्छा तब तक देखता हूँ। भयका मेरे समान दरिद्र इस कुलीन व्यक्ति को कष्ट नहीं दूंगा। तब मै माता है। विदूषय-भो! इस सुषणभाण्ड को ग्रहण करो। मजय--पयों सुवणभाण्ट की (स ) करता है क्या मुझे देखकर कह रहा ह! अथवा दुर्घक मन के कारण स्वप्न देख रहा है अच्छा तब तक देखता है। (देखकर)यह सचमुच में सोया है। क्योंकि इसका श्वास निशा होकर सम एष पुष्यरूप से चल रहा है। शरीर की सम्धियों में फैलाव के कारण दीयता भा गई है एव शय्या के प्रमाण से वे अधिक लम्बी हो गई हैं। बाखें धन्द है एव पलकें भी निमल हैं। पदि चारुदत्तम् । दीपं चैव न मयेदभिमुखः स्थालक्षसुप्तो यदि ॥ १३ ॥ क नु खलु तत् । अये जर्जरप्रावरणैकदेशे दीपप्रभाव्यक्तीकृतरूपं दृश्यते । सुपरिगृहीतमनेन । अयमत्र प्राप्तकालः । इमे मया गृहीताः शलभाः। दीपनिर्वापणार्थमेकं मुञ्चामि । ( भ्रमरकरण्डकादेक मुञ्चति । ) अये एष दीप निर्वाप्य पतति । ? विदूषक-अविहा णिव्वाविदो दीवो दाणिं | मुसिदो म्हि । भो, चारुदत्त । गण्ह एवं सुवण्णालङ्कार । अह खु भीदीए उप्पहप्पवुत्तो विअ वणिजो णि ण लभामि । मम बम्हत्तणेण साविदो सि, जइ ण गण्हसि । [ अविहा निर्वापितो टीप इदानीम् । मुषितोऽस्मि । भोचारुदत्त । । सम्पुटिता पक्ष्मान्तरम् = नेत्रलोमस्थानम् चपल न जायते, यदि एष लक्ष- सुप्त = व्याजसुप्त भवेत् तदा अभिमुखम् = पुरोवर्तमानम् स दीपम् न मर्षयेत् = न सहेत (एतेन गाढा निद्रा व्यज्यते । अत अनुमीयते यत् अय सत्यमेव सुप्त ॥ १३ ॥ जर्जरप्रावरणैकदेशे जर्जर जीणं प्रावरणम् = आच्छादनवलं तस्य एक, देश तस्मिन् । दीपप्रभाव्यक्तीकृतरूपम्-दीप्तस्य प्रभया व्यक्तीकृत रुप यस्य तत् । प्राप्तकाल = अपहरणस्य समुचितसमय । मुषित अस्मि-अहम् हुतसुवर्णभाण्ड अस्मि । भीत्या-भयेन उत्पथप्रवृत्त = विमार्गे प्रवृत्त । अर्थात् वाणिज्यमार्गमुल्लङ्घय गमनशील इत्यर्थ । यह सोने का वहाना कर रहा होता तो सामने दीपक की रोशनी को बर्दास्त न करता (अर्थात् दीपक की भार सुह करके न सोता) ॥ १३॥ वह (सुवर्णभाण्ड) कहाँ है? अये। पुराने वस्त्र के भीतर दीप के प्रकाश में इसका रूप दिखाई पड़ रहा है। इसने अच्छी तरह पकड लिया है। यही उपयुक्त समय है। मैंने इन शलमों को पकड़ लिया है। दीपक बुझाने के लिए एक को छोड देता हूँ । (भ्रमर-पेटिका से एक को छोडता है।) अये। यह दीप को बुझाकर गिर जाता है (अर्थात् स्वय नष्ट हो जाता है)। विदूपझ--आह ! खेद की बात है कि इस समय दीपा बुन्ना दिया गया। मैं चर्चाद हो गया । भो! चारुदत्त । इस सुवर्णालवार को ग्रहण करो। मुझे Rel -- तृतीयोऽक । daugum ६१ गृहाणेम सुवर्णालद्वारम् । अह खलु भीस्योत्पथप्ररत्त इष चणिम् निद्रा न लभे। मम मनत्वेन शापितोऽसि यदि न गृह्णासि ।। सबलक-किमत शपथपरिग्रहेण | एप प्रतिगृह्णामि । (गृहाति।) विदूषक-(दवा) अह विकिणिदभण्डओ विअ वणिजओ सुह सइस्स । [ अह विक्रीतभाण्डक इव वणिक् सुख शयिष्य । ] सज्जलक-सुख स्यपिहि महाब्राह्मण । (विचित्य ) भो । प्राणेन विश्वासाद् दीयमान मया हतव्यमासीत् । धिगस्तु खलु दारिद्रयमनिर्धेद च यौवनम् । यदिद दारुण कर्म निन्दामि च करोमि व ॥१४॥ शपथपरिग्रहेण = शपथस्य परिग्रहेण किं स्यात् इत्यथ । विक्रीतभाण्डक-विक्रीत भाण्डक येन स । शयिष्य निदा लो। विगिति-दारिद्रयम् = अविश्चनत्वम् चिक-धिकार अस्तु अनिर्वेदम्- अविद्यमान निर्वेद =वृप्ति यस्मिन् भोगेन अतृप्तम् इत्यय यौवनम्-मम यौवनम् खलु = निधयेन (धिगस्तु) यत् = यस्मात् कारणात् (अहम् ) इदम् दारुणम् = चीयरूपनिन्दितम् फर्म निन्दामि घ (तथापि ) करोमि च ॥ १४ ॥ उसी प्रकार मप से नौद भा रही जैसे रास्ता भूले हुए व्यापारी को। यदि राम नहीं लेते हो तो मैं प्राह्मण के नाते तुम्हें शपथ दे दूंगा। सच्नकष -इसमें शपथ लेने की आवश्यकता ही क्या है। मैं इसे ग्रहण करता हूँ।(ग्रहण करता है।) विदूषय -(देखकर)में भाण्ड की बिक्री करनेवाले वणिक की भौति सुख पूर्वक सो रहा है। सजलक-भो ! महामाहाण ! सुखपूर्वक सोओ। (चिता करके) भो। मैंने चुरा लिया जो माझग के विश्वास पर दिया गया था (अर्थात् यह चारुदत को दिया जा रहा है उसे मैने हरण शिया)। FIRUAARATRE मेरी दरिद्रता को धिक्कार ह तथा इस यौवन को धिक्कार है जो प्रायशित में Mu रहिस (अतृक्ष)है। क्योंकि मैं पुरे काय की मिना भी कर रहा है और फिर भी इसे कर रहाई॥५॥ T चारुदत्तम्। N mamimaramam al (नेपथ्ये पटहशब्द क्रियते।) सज्जलक -(कर्ण दत्त्वा) अये प्रभातसमयः संवृत्तः । अपसरामि तावत् । (निष्कान्त सज्जलक।) (प्रविश्य) चेटी-(सामन्दम् ) अय्यमेत्तेअ । अम्हाणं रुक्खवाडिआपक्ख- दुवाले सन्धि छिन्दिअ चोरो पविट्ठो। [आर्यमैत्रेय ! अस्माक वृक्षवाटिका- पक्षद्वारे सन्धि छित्त्वा चोर प्रविष्ट ।] विदूषक'-(सहसोत्थाय ) किं भणादि होदी | [ किं भणति भवती।] (चेटी रुक्सवाडिपत्ति पठति ।) विदूषक -चोर छिन्दिअ सन्धी पविठ्ठो । चोर छित्वा सन्धि प्रविष्ट'।] चेटी-हदास । सन्धि छिन्दिअ चोरो पविट्ठो। [ हताश | सन्धि छित्वा चोर प्रविष्ट । विदूषकः-आअच्छ णं दसेहि । [आगच्छ ननु दर्शय । ] चेटी-[परिक्रम्य ) एदं । [ एतत् । ] (नेपथ्य में नगाडे का शन्द होता है।) मज्जलक-(ध्यान देकर) अरे । सबेरा हो गया। तब मैं भाग जाता है। (सज्जलक निकल जाता है)। (प्रवेश कर) बेटी-(जोर से चिल्लाकर) आर्य मैत्रेय । मेरी वृक्षवाटिका के पक्ष द्वार में चोर सुरङ्ग बनाकर घुस गया। विदूषक-(सहसा उठकर) भाप क्या कह रही हैं ? (चेटी फिर उसी को दुहराती है) विदूषक-सुरज बनाकर चोर घुस गया। बेटी-हाय । सुरङ्ग बनाकर चोर घुस गया। विदूपक-भाइये और मुझे दिखाइये। चेटी-(घूमकर) यह है।
तृतीयोऽङ्का ६३ विदूषकः-अविहा दासीएकुत्तेण कुक्कुरेण पवेसो किदो। भोदि । आअच्छ, चारुदत्तस्स पि णिवेदेमि । ( अविहा दास्या पुत्रेण रेण प्रवेश कृत । भवति ! आगच्छ वारुदत्तस्य प्रिय निवेदयामि । (उमानुपगम्य) भो चारुदत्त । पित्र दे णिवेदेमि । भौथारुदत्त ! प्रिय ते निवेदयामि । नायक -(बुवा) किं मे प्रियम् । ननु वसन्तसेना प्राप्ता। विदूषक - खु वसन्तसेणा, वसन्तसेणो पचो । [ न खलु पसन्त- सेना वसन्तसेन प्रास] नायक-दनिके किमेतत। चेटी-भट्टिदारम | अम्हाण रुक्सवाडिआपक्खदुधारे सन्धि छिन्दिा चोरो पविहो। [भर्तृदारक ! अस्माक वृक्षवाटिकापक्षद्वारे सन्धि छित्त्वा चोर प्रविष्ट ।] नायक -कि चोर प्रविष्ट । विदूषकः--भो यअस्स । सव्वहा तुष भणासि, मुक्खो मेत्तेओ अपण्डिदो मेन्तेओ त्ति | ण भए सोमण किद् त सुवण्णमण्डअ तप हत्थे समप्पा तेण । [ भी वयस्य ! सर्वया व भणसि मूों मैत्रेयोऽपण्डिती मैत्रेय इति । ननु मया शोमन कृत तत् सुवर्णमाण्डक तव हस्ते समर्पयता।] विदूषक -माह ! दासीपुत्र कुमार ने प्रवेश किया था। चलो चलें और यह प्रिय सन्देश भाय चारुदत्त को निवेदन करदें। (दोनों समीप जाकर) भो सादर ! में वापसे कुछ प्रिय संदेश निवेदन करना चाहूँगा। -(वठकर) मेरे लिए क्या प्रिय संदेश है। क्या वास्तव में पसत सेना भा गई। विदूषक-बसन्त सेना नहीं बहिक पसन्तसेन माया है। नायक-रदनिके! यह क्या है। चेटी-महाशय ! मेरी पवाटिका के पचद्वार में चोर सुरत पनाकर घुस गया। नायक-क्या चोर घुस गया। विदूषक-मो मित्र | आप हमेशा कहा करते थे कि मैत्रेय मूर्ख है भपण्डित है। परन्तु मैंने भच्छा किया कि सुवर्णभाण्ड आपके हाथ में दे दिया। नायव- ६४ चारुदत्तम् । wriMom , dami SMARud नायक -कि भवता दत्तम् । विदूषक -अहई। [अथ किम् । ] नायक -कस्यां वेलायाम् । विदूषक -अद्धरत्ते । [अर्धरात्रे।] नायक –किमर्धरात्रे । बाढ दत्तम् । विदूषक –भो चारुदत्त ! ज वेलं पडिबुद्धो आसि, तस्सि वेलाअ खु दिण्णं | [ भोश्चारुदत्त । यस्या वेलाया प्रतिबुद्ध श्रासी, तस्या वेलाया खलु दत्तम् ।। नायक –हन्त हृत सुवर्णभाण्डकम् | विदूषक -दाणिं मे हत्थे पडिच्छिदु अत्तभवं 1 [ इदानीं मम हस्ते प्रयच्छत्वत्रभवान् ।] नायक -(आत्मगतम्) क श्रद्धास्यति भूतार्थ सर्वो मां तूलयिष्यति । शङ्कनीया हि दोषेषु निष्प्रभावा दरिद्रता ।। १५ ॥ "क इति-क = सत्य. अर्थ = चौरकर्तृकस्वर्णभाण्डापहरण रूपा घटना तम् श्रद्धास्यति = विश्वसिष्यति (अपितु ) सर्व जन माम् = दरिद्र चारुदत्तम् तुलयिष्यति शठो वा तस्करो वा इति तुलया निर्णेष्यति, अर्थात् यथार्थवृत्तान्तेऽविश्वासतया स्वयमेवापहृतमिति अपवादोत्पादनेन' तूलवत् लघु करिष्यति इत्याशय । हि = यत मयि दोषे असति अपि दोषेषु = दोषविषयेषु नायक-क्या आपने दे दिया। विदूपक-और क्या? नायक-किस समय? विदूषक-भोधी रात को। नायक-क्या आधी रात में क्या आपने सचमुच मुझे दे दिया? विदूपक--- भो चारुदत्त । जिस समय आप जगे हुए थे, उसी समय दिया था । नायक-हाय । सुवर्णभाण्ड की चोरी हो गई। विदूपक-इस समय भाप मेरे हाथ में दें। नायक-(मन में) इस सही बात का कौन विश्वास करेगा, सब लोग मुझे ही चोर बतायेंगे। मुझमें दोप न होने पर भी प्रभाव मिटानेवाली दरिद्रता के कारण मुझे ही (दोपी) लगाया जायगा ॥ १५ ॥ - लोक भूत तृतीयो। (प्रविरम) प्रामणी-णिए । र-णिए । आअच्छा णहि सुणानि क्याडसह दाय करिस्स। (तया क्रोति ।) [रदनिके। रदनिक! पागच्छ । नहि शणोति । ऋघाटशब्द तावत् करिष्यामि । ] ची-ह, फयाडसही विश्र । मट्टिदारिआ म सहावेनि । (परिक्रम्य) महिनारिए । अम्हि । [ह कवाटशब्द इव । भदारिका मा श दापयति । भन्दारिक ! इयमस्मि । मामणी-ण परिषसमोण घायादिदो अव्यउत्तो अय्यमेत्तेओ पा। [न परिक्षती न व्यापादित आर्यपुत्र आर्यमैत्रयो था।] चटी-कुसली भट्टिारओ अय्यमेत्तेओ । जो तस्स जणस्स अलवारो चौरेण गहीनो। [कुशली भर्तृदारक आर्यमैत्रेयथ । यस्तस्य जनस्या लद्वारपोरेण गृहीत । ब्राह्मणी-कि मणासि चोरेण गही ति। [किं भणसि चौरेण गृहीत इति ।] चेग-अह ! [अथ कि।] निष्प्रभावा = निगत प्रभाव यस्या सा एवमता दरिद्रता - दैन्यम् शनीया इवाणीया प्रथात समस्य शङ्का स्थानम् भवतीति माव ॥१५॥ - (प्रवेश कर) मामणी-पदमिक ! रनिक। भाभी। नहीं सुनती हो। सय म दरवाजा पटपटाऊँगी। (घसा ही करती है।) वेग-यह पाट क श की वरह (धावाज आ रही ह)। भर्तृवारिका मुसो पुला रही हैं ? (घूमर) मतदारिकमैं यहाँ हूँ। मागे-भायपुत्र अथवा मैत्रय आहत या मार तो नहीं गए। M-भायपुत्र और मैत्रेय जानी सकुशल है। केवल उनक भूपण चोर चुरा ले गया। प्राग-बमा पहरही है और है गया है। वेग-हाँ चारुदत्तम् । ww MMM . ब्राह्मणी-किंणु खु तस्स जणस्स दादव्वं भविस्सदि। अहब एवं दइस्सं । (कर्णी स्पृष्ट्वा ) हद्धि तालीपत्त खु एद । सो दाणिं परिअओ म विलम्बेदि । किं दाणिं करिस्सं। (विचिन्त्य) मोदु, दिटुं। मम ज्यादिकुलादो लद्धा सदसहस्समुल्ला मुत्तावली । तं पि अय्यउत्तो सोढीरदाए पडिच्छदि। मोदु, एवं दाव करिस्सं (निष्कान्ता) [ किन्नु खलु तस्मै जनाय दातव्य भविष्यति । अथचैतद् दास्यामि । हा धिक् तालीपत्र खल्वेतत् । स इदानी परिचयो मा विडम्बयति । किमिदानी करिष्यामि । भवतु, दृष्टम् । मम ज्ञातिकुलाद् लब्धा शतसहस्रमूल्या मुक्तावली । तामप्यार्यपुत्र' शिौटीरतया प्रतीच्छति । भवतु, एच तावत् करिष्यामि । ] विदूषक -इमस्स अन्धआरप्पादिदस्स अवराहस्स किदे भवन्तं 'सीसेण पसादेमि। दाणि मे हत्थे पडिच्छदु अत्तभव । [ अस्यान्धकारी- त्पादितस्यापराधस्य कृते भवन्त शीर्षण प्रसादयामि । इदानी मे हस्ते प्रयच्छ- त्वत्रभवान् । नायक ---किं भवानिदानी मा बाधते । भवांस्तावदविश्वासी शीलज्ञो मम नित्यश । शौटीरतया = अभिमानेन, आभिजात्येन हेतुना वा प्रतीच्छति किम् = ग्रहीष्यति किम् ? इति प्रश्नकाकु अर्थात् स्त्रीधनत्वात् न प्रहीष्यति इति भाव । अन्धकारोत्पादितस्य = अन्धकारे उत्पादितस्य इत्यर्थ । भवानिति-यदि मम शील-शील स्वभाव जानाति इति शील , प्रामणी--अब उस वसन्तसेना को क्या दिया जायगा ? अथा इसको दे दूंगी। (कानों को स्पर्श करके) हाय । यह तो तालपत्र का कर्णभूपण है। भाभूपणों के पुराने परिचय मुझे कष्ट दे रहे हैं। तब मै इस समय च्या कलं! (चिन्ता करके) अच्छा, मैने उपाय सोच लिया। मुझे अपने सम्बन्धियों से सहस्रमूल्य वाली 'मुक्तावली' मिली है। क्या उसे भार्यपुत्र स्वकुल के अभिमान से चाहेंगे (अर्थात् लेंगे) अच्छा, तब ऐसा ही करूगी। (निकल जाती है।) विदूपक- मैने अधेरे में भापको अलकार देकर जो अपराध किया उसके लिए सिर नवाकर आपको प्रसन्न करता है। इस समय आप उसे मेरे हाथ में दें। नायक-आप मुझे ( इन शब्दों से) क्यों पीडित कर रहे है ? भाप मेरे दैनिक फर्म एव स्वभाव से सुपरिचित हैं तथापि मेरे उपर भविश्वास तृतीयोऽद्ध। किं पुन स कलाजीवी वञ्चनापण्डिता जन ॥ १६॥ ५५५ विष्यक -मण्णे मग मन्मग्गण कुम्भालस्म हत्य निण्ण । विषण्ण स्तिष्ठति । [मय मया मदभाग्यन कुम्मीलस्य हस्त दप्तम् ।। dinth (प्रविश्य) घाह्मणी-रणिए । अश्यमेत्तेअ सहारहि । [रदनिक ! आयमैत्रय शब्दापय । चेग-अयमेत्तेअ | भट्टिदारिआ तुम सदावति । [आर्यमैत्रय ! मर्तृदारिका वा श दापयति । ] विपर-भोलि किंम। [भवति किमाम् ।] चेटा-आम् । [ पाम् ।] विदूषर --एम आअच्छामि । [ एष पागच्छामि । (उपसर्पति ।) बामणी-अय्यमेत्ते । इम पडिग्गह, पतिगण्ह । [आयमैत्रेय ! हम प्रतिग्रह प्रतिगृहाण । ] Ann नियन = नित्यमा भवान् (मयि) अविश्वासा तावत् (वदा) कलामीवी अमिनमादिकलीपजीवी वञ्चनापण्डित = परवानायां पणिन्त =प्रवीण जन- घमन्तमेनारूप वेश्यानन कि पुन विश्वामी भवन् । न कदाचिदपि मा विश्वसैन् ति भाव ॥१॥ प्रतिप्रहम् दानम् । कर रहे हैं तो अभिमयारिकला की मम तथा पबना कला में पण्डिन वसन्तसेना मरा कैसे विश्वास करेगी 11 विदूषक-सव मानता हूँ कि मुझ कम्यहा ने उसे चोर के हाथ में देदिया। (दुनी होकर बैठ जाता है।) (प्रवेगकर) साक्षी-रनिके। वायं मय को थुलामी। -आपमेय भतृदारिका भापका शुभा रही है। बिदूपर-भो माननीया क्या मुझको घुटा रही हैं। वेग-ह। विदूषक पाहम माना है। (समीप जाता है।) मागे-भायमग्रेय! यह दान ग्रहण करें। ७चा चारुदत्तम् । NAMA विदूषक -अवस्थाविरुद्धो खु अ पदाणविभवो । कुटो एदस्स आगमो । [अवस्थाविरुद्ध वल्वय प्रदानविभव । कुत एतस्यागम ।। ब्राह्मणी-ण सहि उववसामि । सव्यसारविभवेण बम्हणेण सोस्थि वाअइदव्य त्ति एसो इसस्स आगमो। [ ननु षष्ठीमुपवसामि । सर्वसार- विभवेन ब्राह्मणेन स्वस्ति वाचयितमित्येषोऽस्यागम । ] AATHA विदूपक ---अट्ठमी खु अञ्ज । [ अष्टमी खल्वछ । ] nary ब्राह्मणी-पमादादो अदिक्कमो किटो! अज्ज पूआ णिवत्तीअदि | [प्रमादाद अतिक्म कृत । अद्य पूजा निर्वयते ।] विदूषक -अणणुरूवदाए पढाणस्स अणुक्कोसो विअ पडिभादि । (जनान्तिकम् ) रदणिए । कि करिस्सं । [अननुरूपतया प्रदानस्यानुक्रोश इव प्रतिभाति । रदनिके ! किं करिष्यामि । ] MATAFroin am' चेटी-( अपवार्य ) किणु खु तस्स जणस्स दादव्य भविस्सदि त्ति प्रदानविभव प्रदानस्य विभव = सपत तथा । सर्वसारविभवेन सर्वेपा सार एवभूत विभव तेन । जनान्तिकम्-जनान्ते = पात्रगणमध्ये यदन्योन्यामन्त्रण परस्परमालाप- स्तन्जनान्तिक भवति, यथोक्त दर्पणे-'अन्योन्यामन्त्रण यत् स्याज्जनान्ते तजनान्तिकम्' इति अननुस्पतया = प्रदानस्य अवस्थाविरुद्धतया इत्यर्थ । अनु- क्रोश = दया। विदूषक-दान की यह सपत्ति इस अवस्था के अनुकूल नहीं है। यह कहा से मिली है। A111 एव ब्राह्मणी-मैं पष्टी के दिन उपवास रहती हूँ। ऐसी परिस्थिति में मैं अपने सर्वश्रेष्ठ विभव के द्वारा ब्राह्मण मे स्वन्ति पाट कराना चाहती । यही इम (उपहार) का कारण है। बिदृष-आज तो अष्टमी है। याक्षणी-प्रमाद के कारण दिन का घान नहीं रहा हो। भाज पूजा करनी है। विदूषक अवस्था विरुद्ध होने के कारण यह दान दया की भाति मालूम हो रहा है। (जनान्तिक में) रदनिके क्या करूं? चेटी-(मत्रको न सुनाकर) बसन्तसेना को क्या दूंगा-इमी निमित्त मे तृतीयोऽ! ६६ लणिमित्त मट्टिदारओ सन्तप्पनि ति मट्टितारिआ तय हत्ये दडा अय्यउत्त अणिरिण करिस्सामि त्ति एव करदि । ता गण्ड एद । [ किन्नु सलु तस्मै जनाय दातव्य भविष्यतीग्यतनिमित्त भनुदारक मतप्यत इति भदारिका तव हस्ते दत्त्वाऽर्यपुत्रमनृण परिप्यामीत्यक करोति । तद् गृहाणतत् 1] ब्राह्मणी-उन्मसम्भनदाए मुत्तावलीए तच अदुल्लहदाए उवआरो चिस्सरिदो | गण्ह एद । (ददाति ।) [ उदक्सम्भवतया मुक्कावल्यास्तव च लेभतयोपचारी विस्मृत । गृहाणेतत् ।] विदूषक --(गृहीत्वा) सव्व दाय चिहृदु | रोदिनी विभ होदीए दिट्टी। [म तावत् तिछतु । रोदितीव भवत्या दृष्टि । ] प्रामणी-देवउलधूमेण रोदाविदा । [ देवालधूमेन रोदिता।] विदूषक -साविदासि तत्तहोदा चारदत्तेण, जइ अलिअ भणासि । [शापितासि तनभवता चारुदत्तेन यथलीक मणसि ।] अनृणम् = प्रणरहितम् इत्यर्थ । उदकसम्भवतया-उदकात् - सलिलात् सम्भव = उत्पतिर्यस्या सा तस्या भाष तया। देवकुलधुमेन-देवपुलस्य-मन्दिरस्य धूमेन अह रोदिता इति भाव । स्वामी सतह हो रहे हैं इसीलिए मतदारिका आपके हाथ में यह (मुक्तावली) पर स्वामी को प्रणमुक्त करना चाहती हैं । अत भाप इसे ले लें। गाह्मणी-भुक्तावली की उत्पत्ति जल से हुई तिस पर भी भापके दर्शन चित समय पर महा सके। इसलिये इम मेंट द्वारा आपका सगर करना भूल गई थी। इस ग्रहण करें। (दे देती है।) विदूषकः-(ग्रहण करके) ये सथ रहने दीजिए। आपकी आँखें मानो रो रही हो। प्राणी-देव-मदिर का धुभा मुझे हटा रहा है। विपा-आय पास के माम की शपथ है पविभाष हुए बोलोगी।
चारुदत्तम् । ब्राह्मणी-हद्धि । (निष्कान्ता ।) [हा धिक् ।] विदूषक -एसा वाआए दुक्खं रक्खिअ अस्सूहि सूइअ गआ। (उपगम्य ) भो। इदं । [ एषा वाचा दुस रक्षित्वाऽश्रुभि सूचयित्वा गता। भो । इदम् ।] नायक --किमेतत् । विदूषक - सरिसकुलदारसङ्गहस्स फलं | [ सदृशलदारसग्रहस्त । फलम् ।] नायक –कि ब्राह्मणी मामनुकम्पते । विदूषक -एवं विअ ।। एवमिव । ] नायक - धिगात्मानम् । अद्य हतोऽस्मि । मयि द्रव्यक्षयक्षीणे स्त्रीद्रव्येणानुकम्पितः। सदृशकुलदारसग्रहस्य-सदृशम् = समान योग्य वा कुलम् इति सदृश कुलम् दाराणा = सीणा सग्रह इति दारसग्रह सदृशकुलात् दारसग्रह दति सदृशकुलदारसग्रह तस्य । मयि इति-मयि द्रव्यक्षयक्षीणे-द्रव्यक्षयेण = धननाशेन क्षीण = दुर्बल एवभूते सति सीद्रव्येण = स्वकीयभार्याया मुक्तावलीरपद्रव्येण = धनेन अनु कम्पित = यथाकाले माहाय्यप्रदानेन दयाविषयीकृत । पुरुष = पौरुपगुणामय प्रामण-हा धिक् । (निकल जाती है।) विटपर-इस वाक्य से दु ख का सवरण करके और भाँसुओं द्वारा सूचन देकर चली गई। (नायक के समीप जाकर) भो। यह देखिये । नाय-यह क्या है। विदपा-उपयुक्त कुल की पानी मिलने का यह फल है। नायक-क्या ब्राह्मणी ने मेरे ऊपर दया की है। विपर-ऐसा ही है। - मुझे धिक्कार है । भाज मर गया। मै धन के नाश होने से दुर्वल दशा में खीरूप दम्य से अनुकम्पित हुआ है। नायनd तृतीयोऽङ्का १०१ साथथत- अथत पुरषो नारी या नारी साऽर्थत पुमान् ॥ १७ ॥ विदूषक-तत्तहोदी हिअएण तुम याचेदि । अह सीसेण याचेमि । ण्ह एन | [तत्रभवती हृदयन त्वां याचते । अह शायण याचे । गृहाणतन् । नायक-तथा । (गृहीत्वा) वयस्य । इमा मुकावली गृहीत्या यमन्तसेनाया सकाश गच्छ। अर्थेषु काममुपलभ्य मनोरयो मे स्त्रीणा धनेप्यनुचित प्रणय करोति । भाने व कार्यकरणे च विलम्बमाना घिगमा कुल व पुरुषस्य दरिद्रता च ॥ १८॥ विपक-अहो अप्पमुल्लस्म सुरण्णभण्डअस्स किदे सदसहस्स अपत वस्तुतः नारीकायबछान सम्पाते। एद या माहाप्यविधायिनी. नारी धर्मत' पुमान् = पुरुपमदशी कार्यकाले पुरुपवन कायमरणात् ॥१७॥ अर्येषु इति- = मम मनोरथ' अर्येषु = धनविपमा बामम् = यथेष्टम् सनुष्टिम् अर्य उपलभ्यप्राप्य अधुना माने = स्वयीयमानरक्षणे च कर्तव्य करणे = यासप्रत्यपणरूपकतन्यकरणे विलम्बमान सन् = कालक्षेप पुर्वन स्त्रीण धनेषु अनुचितम् - अयोग्यम् प्रणयम् = श्रामसिम् परोतिशयति इति थाशय । अत पुरुषस्य थुलम् - उच्चतुल दरिद्रता च पिक्॥१८॥ सचमुच यहाँ पुरुप नारीतुल्य हो गया और नारी पास्तव में पुरप हो गई ॥१७॥ रदूषक- माननीया ब्राह्मणी हुदय से भापको चाहती ह और में नत मस्तक द्वारा भता इसे भाप ग्रहण करें। नायक-ऐसा ही हो। (ग्रहण कर) मित्र! इस मुक्तायली को लेकर यस व सेना के पास जाओ। धन के विषय में मेरा मनोरय अस्यास सुति को पाकर इस समय (स्वकीय) मानरक्षा करने में और कतम्य (म्यास प्रायपण रूप) काय को करने में विलय होता दुभा दखफर वियों के धन में अनुचित अनुराग दिपा रहा है। भत इस मर्यादा से बद उपकुल तथा दरिद्रता (दोनों)को धिक्कार है | 6n विदूपा-अहो । भरुपमूल्यवाले सुपणमाण्ड क लिए शत सहस्त्र (एक हास) चारुदत्तम् । मुल्ला मुत्तावली णीआदइदव्या | [ अहो अल्पमूल्यस्य सुवर्णभाण्डका कृते शतमहसमूल्या मुक्तावली निर्यातयितव्या । नायक –चयस्य ! मा मैवम् । यं समालक्ष्य विश्वासं न्यासोऽस्मासु कृतस्तया। तस्यैतन्महतो मूल्यं प्रत्ययस्य प्रदीयताम् ॥ १९ ॥ (निष्क्रान्ता सर्वे ।) तृतीयोऽङ्कः । यमिति । तया = वमन्तमेनया यम् = दृढम् विश्वासम् = प्रत्ययम् ममा लक्ष्य = मनसि उद्भाव्य, उद्दिश्य वा अस्मासु = धनहीनजनेषु न्यास = स्वर्ण भाण्टनिक्षेप कृत तस्य = पूर्वोत्तस्य महत = प्रधानभूतस्य प्रन्ययस्य = विश्वासस्त्र मूल्यम = मूल्यस्वरूपम् एतत =मुक्तावलीरूपम् द्रव्यम् प्रदीयताम् ॥१९॥ तृतीयोऽद्ध समाप्त । मूल्यवाली यह मुक्तावली क्यों जानी चाहिये? नगया-मित्र । ऐसी बात मत कहो । जिस विधाम के ऊपर उसने (वसन्तसेना) मेरे पास धरोहर रवा, उस महान् विश्वास का मूल्यस्वरूप यह 'मुक्तावली' तुम उसे टो ।। १९ ॥ (मबके सब चले जाने है ।" । तीसरा असमात ॥
१०४ चारुदत्तम् । - NMAN चेटी-कि एद वेसवासजणो सन्यो दक्षिणो होइ ति। पेख्खदु अज्जुआ, चम्पआरामे पिचुमन्दा जाअन्ति । अदिसरिस त्ति मम हिअअ अहिरमदि । परमत्थदो एव पसंसीअदि, णं कामदेवो । [किमेतद् वेशवासजन सर्वो दक्षिणी भवतीति । पश्यत्वज्जुका, चम्पकारामे पिचुमन्दा जायन्ते । अतिसदृश इति मम हृदयमभिग्मते । परमार्थत एव प्रशस्यते, ननु कामदेव ।] PARAN ५॥ गणिका-इब्जे। सहीजणेण अवहसणीअत्तण अत्तणो परिहरामि । [ हजे ! सखीजनेनापहसनोयत्वमात्मन परिहरामि । EMAIrelan चेटी-एद जुज्जइ । सहीजणसपत्तिओ गणिआजणो णाम । [ एतद् युज्यते सखीजनसपत्नीको गणिकाजनो नाम । ] (तत प्रविशत्याभरणहस्ताऽपरा चेटी।) चेटी-सुह अज्जुआए । [ सुखमज्जुकाया ।] प्रवाद, पूरयन्ती = सार्थक कुर्वती, त्वम् , अलोक - मिया ("प्रलोक त्वप्रिगेड नृते' इत्यमर ) भणसि । चम्पाकारामे = चम्पकोद्याने । पिचुमन्दा = निम्वरक्षा इत्यर्थ । अपरसनीयत्वम् = उपहास्यत्वम् । सतीजनसपत्नीक -समान पतिर्यस्या पति मपत्नी, सीजन सपत्नी यस्यस। 'चेटी-यया सय वेश्याएं दक्ष हुमा करती है। माननीये, देखिये । धम्पको. लान में निम्रत भी उत्पन्न हो गया है। यह चिग्रगत व्यक्ति उसके (चारुदत के अत्यन्त अनुरूप है। एतदर्थ इस चित्र में मुसे बड़ा भानन्द मिल रहा . अर्थात् मेरा मन इसमें रम रहा है। वास्तव में में इसकी प्रशसा करती है। सचमुच में इसका रूप प्रशसा के योग्य है, लगता है जसे कामदेव ही दो। गणिका-भरी मैं ससीजनों के द्वारा अपना उपहास नही चाहती। चेटो-ठीक कह रही है । सखीजन तो गणिकाजन के सपरनी स्वरूप ही है। (सके बाद भ ER में लिप मगामी का प्रवेश:) टी-श्रीमतीजी, (बसन्तसेने!) आप मुशल से तो है?
चतुर्थोऽ।
Jintan-Hin
गणिका-हजे । साअद दे।[हजे! स्वागत है। ]
चेटो-अन्जुए । अत्ता आणवेदि-इद दुधार पविटठ पोक्सर
उवावत्तिद पवण । ता तुवरमाणमण्डणा गहीदावउण्ठणा आअच्छदु
त्ति । इह अलङ्कार अलङ्करेदु अज्जुआ। [ अज्जुके ! अम्बाज्ञापयति-
इद द्वार प्रविष्ट पौष्करमुपावर्तित प्रवहणम । तत् त्वरमाणमण्डना गृहीतावगुण्ठ-,
नाऽऽगच्छत्विति । इहालङ्कारमलारोत्वज्जुका।]
गणिका-किं अय्यचारुदत्तो मण्डइस्सिदि। [किमार्यचारुदत्तो भण्ड
यिष्यति । ]
चेटी-पहि, जेण अलङ्कारो पेसिने सो राअसालो सण्ठाणो।
[न हि यनालङ्कार प्रेषित स राजस्याल सस्थान ।]
गणिका-अवेहि अविणीदे अपेचिनीते । ] .
पौष्करम् = पद्माकरसग्निवेशम् इति भाव 7 उपावर्तितम् = आगतम्
मुसज्जितम् वा प्रवहणम् = गोशक्टम् श्रीजनोचितगोयानम् इत्यर्थः । त्वरमाण
मण्डना त्वरमाण मण्डन यस्या सा। गृहीतावगुण्ठना-गृहीतम् = धृतम् अव
गुण्ठन-बाधापरणम् यया सा।
सस्यान =(कामवासनादिदोषै) स्थीयतेऽस्मिन् इति अधिकरणे ल्युट
सस्थानमस्त्यस्मिमिति अादित्वादच सस्थान एत नामक ।
अपेहि = रमपसर इति भाव । कुत्सित संस्थान संस्थानक (कुसायो
कप्रत्यय ) राज्ञ श्याल इति भाव ।
गणिका-री । म्हारा स्वागत हो।
चेग-माममीये अम्या आज्ञा दे रही हैं कि तुम्हारे द्वार पर कमलयज से
अकित प्रवहण (बैलगादा) भाया हुआ ह । अतः भापको शीघ्र ही अलकृत
हो जाना चाहिए और घूघट करके इस पर (यार होर) चला जाना चाहिए ।
यरहे बलकार भाप इन्ह धारण कर लें।
गणि-क्या भाय चारुदध मुझे भीकृत करेंगे!
री-नहीं जिसने सरकार भेजा। यह राजा का साला सस्थान है।
गणित-लो भविमान दूर हटो!
१०६
चारुदत्तम् ।
चेटी-पसीददु पसीददु अन्जुआ । सन्देसं खु अहं मन्तेमि ।
(पादयो पतति । ) [प्रसीदतु प्रसीदत्वज्जुका । सन्देश खल्बह मन्त्रये ।]
गणिका-उठेहि उठेहि । कुसन्देस असूआमि, ण तुवं । [ उत्तिष्टो-
त्तिष्ठ । कुसन्देशमसूयामि, न त्वाम् । ]
Benfone
चेटी-किं अह अत्त भणामि || क्मिहमम्वा भणामि । ]
गणिका-भणेहि अत्त-जदा अय्यचारुदत्तो अभिसारइदव्यो तदा
मण्डेमि त्ति | [ भणाम्बा-यदाऽऽर्यचारुदत्तोऽभिसारयितव्यस्तदा मण्ड
यामीति ।]
चेटी-तह । (निष्कान्ता । ) [ तथा।]
(तत प्रविशति सज्जलक 1)
A.L
R0
सनलक-
कृत्वा निशायां वचनीयदोघं निद्रां च हित्वा तिमिरं भयं च ।
स एव सूर्योदयमन्दवीर्य शनैर्दिवाचन्द्र इवास्मि भीतः ॥ १॥
छत्वेति-निशायाम् = रात्री, निद्रा, तिमिरम् = अन्धकारम् , भय च,
हिन्वा = त्याचा, वचनीयदोपम् = चौर्यम् पदोपम , कृत्वा र एवान, शन =
मन्द मन्दमित्यर्थ , सूर्योदयमन्दवीर्य (मन)-सूर्यस्य उदयन मन्दम् क्षीणम् ,
चेटा-माननीये, प्रसन्न हो प्रसन्न हो । में केवल सन्देश दे रही है। (पैरों पर
गिर जाती है)।
गणिका-उठो, उठो । म सन्देश को ही बुरा भला कह रही हूँ, न कि तुमको ।
चेटा-म अन्या से क्या कहूँगी ?
गणिया-माता से कहो कि जब में चारुदत्त के पास जाऊँगी उस समय अपने
आपको अलकृत करुंगी।
बेटा- अच्छी बात है। (निकल जाती है।)
{ नब मजा का प्रवेश!)
माजलर-राशि में निद्रा, अन्धकार और भय को छोदकर नया वीर्यरूप
दोप करके यही में इस समय सूर्योदय के कारण शन गर्न मन्दान्ति बाले
दिन के चन्द्रमा की भानि भयभीत हो रहा है (दिन में चोर गण निस्तेज ण्य
असहार हो जाते है)॥१॥
चतुर्थोऽङ्क । १०७ दिष्टया कर्मान्ते प्रभातम् । यावदिदानी वसन्तसेनाया परिचारि काया मदनिकाया निक्रयाथ मयेद् कृतम् । (परिक्रम्य) इद बसन्त सेनाया गृहम् । यायत् प्रविशामि । (प्रविश्य ) किन्नु खल्पभ्यन्तरस्था मदनिका । अथवा, पूषाहे गणिकानामभ्य तरे सान्निध्यम् । अतस्तत्रैव तया भवितव्यम् । यारन्छब्दापयामि । मदनिके मदनिके|| mart चटी-(आवर्ण्य ) सज्जलअस्स विअ सरो। घाबुदा अज्जुआ। ता उपसप्पिस्स । (उपगम्य ] अम्हि । [ सजलकत्यव स्वर । व्यापताऽग्नुका । तदुपसर्पियामि । इयमस्मि ।] सब्बलक-इतस्तावत् । आ चेटी-कि तुब सहिदवण्णो विभ। किं त्व शहितषण इव । ] दुषल्म् पा पार्यम् = पराक्रमम् सामयम् यस्य स । दिवाचन्द्र - दिवा कालीन चद्र इव भीत अस्मिन् ॥१॥ दिष्टया भाग्यक्रमेण मीभाग्यन इत्यय । कमाते = मम चौर्यरूपम्मसमाप्ती सत्या प्रभातम् जातम् इयर्थ । निष्क्रयायम्-निष्क्रयाय इदम् इति निष्कयाथम्। दासीनवधनान्मोचयितुमिति भाव । (Deliverance By paying morn ey sensom) पूर्वाह्न - पूषम् अह' इति पूर्वाद्ध तस्मिन् । ध्यापृता= कायें व्यस्ता इत्यथ । शक्षितवण इव-शक्षित षण : प्राकृति यस्य स तद्वदिति भाव । सौभाग्यवशय कम के समास होते ही सबेरा हो गया । इस समय घसतमेमा की परिचारिका मदनिका जिसको मैं प्यार करता हूँ के उदार के लिय (अर्थात् गुलामी के अधम से छुड़ाने के लिये) यह काय मैंने दिया है। (घूम करके) यह पसतसेना का घर है। तव प्रवेश करता है। (प्रवेश कर) क्या मदनिका गदर है? अथवा पूर्वान (=दिन के पहा पहर) में (वह) गगिमाओं के पास ही रहती है। अत यह वहीं होगी। तब उसे बुलासा हूँ। मदनिका मनिके। सी-(सुनार)सजलक की सी भागान है। आया तो भग्य काय में परत । सय में ही जाऊगी । (समीप जाकर) में यहाँ हूँ। सा-एछ यहाभा। 1-पयों तुम शैकित की भांति दीख रहे हो।
१०६ चारुदत्तम् । चेटी-पसीददु पसीददु अज्जुआ | सन्देसं खु अह मन्तेमि । (पादयो पतति 1)[प्रसीदतु प्रसीदत्वज्जुका । सन्देश खल्वह मन्त्रये ।। गणिका~-उठेहि उठेहि ! कुसन्टेसं असूआमि, ण तुवं । [ उत्तिष्टो- तिष्ठ । कुसन्देशमसूयामि, न त्वाम् । ] Barfine चैटी-कि अहं अत्त भणामि । ( किमहमम्वा भणामि 1] गणिका-भणेहि अत्त-जदा अय्यचारुदत्तो अभिसारइदव्यो तदा मण्डेमि त्ति । [ भणाम्बा [यदाऽऽर्यचारुदत्तोऽभिसारयितव्यस्तदा मण्ड यामीति । चेदी-तह । (निष्कान्ता । ) [ तथा।] (तत प्रविशति सज्जलक ।) समलक- कृत्वा निशायां वचनीयदोष निद्रां च हित्वा तिमिरं भयं च । स एव सूर्योदयमन्दवीर्य शनैर्दिवाचन्द्र इचास्मि भीतः॥१॥ कृत्वेति-निशायाम् = रात्री, निद्रा, निमिरम् = अन्धकारम् , भय च, हिवा - त्यकवा, वचनीयदोपम् = चौर्यम् पदोपम , कृत्वा स एचा, शनै: मन्द मन्दमित्यर्थ , सूर्योदयमन्दवीर्य ( मन )-सूर्यस्य उदयन मन्दम् क्षीणम् , चेटा- माननीये, प्रसन्न हों प्रसन्न हो । मे केवल सन्देश दे रही हूँ। (पैरों पर गिर जाती है)। गणिका- उटो, उठो मे सन्देश को ही बुरा भला कह रही हूँ, न कि तुमको । चेटा- में अम्बा से क्या कहूँगी? गणिक'-माता से कहो कि जब में चारुदत्त के पास जाऊँगी उस समय अपने आपको अलकृत करुंगी। चेगा- अच्छी बात है। (निपल जाती है।) ( मज्जर का प्रवेश मजलर-रान में निद्रा, अन्धकार और भय से छोदकर नया चोर्यरुप दोष करके वही में इस समय स्योटग के कारण शन, शग मन्दशन्ति नाले दिन के चन्द्रमा की भारि भयभीत हो रहा हूँ (दिन में चोर गण निस्तेज पर असहाय हो जाते है)।
आत चतुर्थोऽङ्का १०७ दिष्टया कर्मान्ते प्रभातम् । यान्दिानी घसन्तसेनाया परिचारि काया मदनिकाया नियाथ मयेद कृतम! (परिक्रम्य ) इद यसन्त सेनाया गृहम् । यावत् प्रविशामि । (प्रविश्य ) किन्नु खल्वभ्यन्तरस्था मदनिका । अथवा, प्याहे गणिकानामभ्यन्तरे सानिध्यम् । अतस्तत्रेय तया भयितव्यम् । यारन्छब्दापयामि । मदनिके । मदनिके।। Has चटी-(पारण्य ) सजलअस्स विअ सरो। वावुदा अज्जुआ। ता उपसप्पिस्स । (उपगम्य ] इम्हि । [ राजलक्स्यप स्वर । व्याप्ताऽज्जुका। तदुपपिप्यामि । इयमस्मि । सबलक-इतस्तायन् । चेटी-कि तुय सङ्कितवण्णो विअ । [किं त्व शरितवर्ण इव ।। दुयलम् या वीर्यम् = पराममम् सामर्थ्यम् यस्य स । दिषाचन्द्र - दिवा कागेन चदइव भीत पास्मन् ॥१॥ दिष्टया भाग्यक्रमेण मीभाग्यन इत्यय । कमाते - मम चीर्यस्पर्मसमाप्ती सत्या प्रभातम् जातम् श्यय । निष्क्रयाथम्-निक्रयाय इन्म् इति निष्क्रयायम्- दासीन्वय धना मोचयिनुमिात भाव । (Delivenance By paying mon ey sansom) पूर्वाह्न - -पूषम् अह' इति पूर्वा तस्मिन् । ध्याता= काय ब्यस्ता इत्यय । शक्तिषण दव-शक्ति वर्ण = प्रारूति यस्य स तदिति भाव । सौभाग्यवश चौय कम के समाप्त होते ही सबेरा हो गया। इस समय घससमेना की परिचारिका मदनिका जिसको मैं प्यार करता है के उदार के लिये (अर्थात् गुलामी क पधन से छुपाने के लिय) यह काय मैंने किया है। (घूम करके) यह बस तसेना का घर है। तय प्रवेश करता हूँ। (प्रवेश कर) क्या मदनिश भादरअथवा पूर्वाड (-दिन के पहला पहर) में (वह) गणिकाओं के पास ही रहती है। अत यह वहीं होगी। सथ उसे घुलाता हूँ। मदनिके। मदनि! वेग-(सुनकर) सजलक की सी मात्रा है। आर्या तो आप काम में व्यस्त है । तप में ही जाऊगी। (समीप भाकर) म यहाँ हूँ। सम-ब पहचाओ। पे-पयों शक्षित की भांति दीस रहे हो।
१०८
चारुदत्तम् ।
सज्जलक-न खलु, किञ्चित् कथयितुकामः ।
गणिका-हजे । इम चित्तफलअ सअणीए ठावेहि । (विलोक्य)
कहिं गआ हदासा । अहव अदूरगआए होदव्यं । जाव ण पेक्सिस्स
परिक्रम्यावलोक्य ) अम्मो इअं सा अदिसिणिद्धाए दिट्ठीए केण वि
मगुस्सेण पिवन्ती विअ सह मन्तअन्ती चिट्ठइ । तक्केमि एसो जो
कोवि करण म याचेदि । [हजे । इद चित्रफलक शयनीये स्थापय । कुत्र गता
हताशा । अथवा अदूरगतया भवितव्यम् । यावदेना प्रेक्षिष्ये । अम्मो इय
माऽतिस्निग्धया दृष्टया केनापि मनुष्येण पिबन्तीव सह मन्त्रयमाणा तिष्ठति ।
तर्कयाम्येप य कोऽपि क्रयेण मा याचते।]
सज्जलक-श्रूयता रहस्यम् ।
गणिका-अजुत्त पररहस्स सोदु, अह गमिस्स | [ प्रयुक्त पररहस्य
श्रीतुम् , अह गमिष्यामि ।
मज्जलक -अपि वसन्तसेना (इत्य/क्त)।
गणिका-अह अहिइटा एटाअ कहाअा होदु, सुणिस्सं दाव भवि-
कथयितुकाम-कथयितु काम = अभिलापो यस्य स ।
हताशा = हता- विनष्टा श्राशा यस्या मा। प्रेक्षिप्ये = पश्यामि इत्यर्थ ।
कयेण = मूल्येन ।
सम्जलक-वस्तुत ऐसा नहीं है, में कुछ कहना चाहता है ।
गणिका-भरी । यह चित्रफलक पाय्या पर रख दो। (इधर उधर देवकर)
चह कम्बरत कहाँ चली गई । अथवा यही वहीं पास में ही है। तब नक हमे
देखती हूँ। (घूमकर और देखकर) भो। यह तो यहीं स्नेहभरी आगों में
देखती हुई किसी पुरुष से बात कर रही है। मैं भनुमान करती है कि यह मुने
पैसों से खरीदना चाहता है।
सजाक-रहस्य नो सुनो।
गणिका-दूसरे का रहस्य सुनना असगत है । इमलिय में घरी जाती है।
माजरक--वसन्त मेना भी होगी
(इम प्रसार अधूरा रहने पर)
गणिक-इस यात-चीत से तो में भी सबन्धित है। अच्छा, म भी मुनंगी
Mma SUNIA चतुर्याऽद्ध। १०६ स्नदि । (पुन प्रतिनिाय स्थिता।) [अहमधिकृततस्या व्यायाम् । भवनु प्रोग्यामि तावद् भविश्यति । ] MMAR मनाक -कि नास्यति त्या निक्रयेण । SATAMA गणित-सो एन एसो। होद, सुणिस्स! [ स एवेष । भवतु श्रीप्यामि।] ची-सज्जलअ । मम पदाण पुढम एव अजुआए उत्त। [ सज्ज ला । मम प्रदान प्रथममवारजुकयोक्तम् ।] मजला-तेन हीममस्यै प्रयच्छ, एष वक्तव्या च- भय तथ शरीरम्य प्रमाणादिय निर्मित । अप्रकाश्या बलङ्कारी मत्म्नेहाद् धार्यतामिति ॥२॥ चरी-पेक्खामि गय । [ पश्यामि तावत् । ] सबल-गृह्यताम् । (रायति ।) निष्क्रयण = द्रव्यविनिमयन । भयमिति-अयम् अप्रकारम = चौर्यप्राप्तस्वात् । जनसमीपे प्रकाशयितुम् अयोग्य गोपनीय इति भाव अलद्वार तब = वसन्तसेनाया शरीरस्य प्रमाणात इव प्रमाण कृ वैवेति भाव (यलोपे एपा पञ्चमी बोद्धया) निमित = स्वर्ण कारण विनिमित मस्नेहान्-मयि स्नेहहेतो त्वया धायताम् = धारण क्रिय ताम् गृयताम् इति ।। २ ॥ (यह धार्तालाप चाह जिस ढग की हो) [फिर घूमकर स्थित होती है। सम्बलक-पया (वसन्तसेना) पैसे से तुम्हें देगी! गणिवा-यह तो बहा (व्यकि) है। अच्छा मैं सुनूगी। १-सजलक, आर्या मुझे पहले ही देने को कह रक्खा है। सजग-तब इसे उन्हें दे दो और कहो कि-गुप्त रखने योग्य यह भलाकार सम्हारे शरीर क प्रमाण सही मानों निर्मित हुभा है। अतः मुक्ष में प्रेम होने के कारण तुम्हें इसे धारण करना चाहिए ॥२॥ वेग-सय इसे में देगी। सजक-लो। (भकार को दिखाता है।
११० चारुदत्तम् । सज्जलक An Hin चेटी-दिट्ठपुरुषो विअ अअ अलङ्कारो। [दृषपूर्व इवायमलकार ।] गणिका-ममकेरओ विअ अअ अलङ्कारो । [मदीय इवायमलकार ।] चेटी-भणाहि भणाहि । को इमस्स आअमो। [भण भण । कोऽस्या- गम ।] -त्वत्स्तेहात् साहस कृतम् । उभे-ह. साहसिओ । [ह, साहसिक ।] चेटी-(आत्मगतम् ) आ, अज्जुआए खु इसस्स आइदी कम्मरण- दाए उन्वेअणीआ सवुत्ता । (प्रकाशम् ) हद्धि मम किडे उभअ लमइदं सवुत्त--तव सरीर चारित्त च । [ 'प्रा, अज्ज गया सल्वस्याकृति धर्म- दारुणतयोजिनीया सत्ता। हा थिग मम लते नभन सशयित सरत्त--तर शारीर गारिन च । त्वत्स्नेहात्तव त्वयि चा स्नेह = पनुराग तस्मात् रेतो । साहसम् चौर्यरूपरम् इत्यर्थः । हम् (हुम् ) इति स्वीकारार्थयमव्ययम् । अस्य % सज्जलकस्य प्राकृति = श्राकार अज्जुकाया गणिकाया, यन्त- सेनागा इति भाव (समुखे ) यर्मदारुणतना = नोर्यादिकूरकर्महेतो , उद्वेजनीगा= उहे जयतीत्युरेजनीया ( वर्तरि अनोगर् ) उगसम्पाभिमा, क्षोभणीया रति गायत् । राहत्ता-सजाता । उभयम्द्वम् , शरीर चारित्रमिति उभग मरते सशगितम् राशययुफम् सत्तम् = जातम् । Sona Hinrn . चेटा- यह (अलफार ) पहले देग्ना गया हो ऐसा मालम हो रहा है। गणिका-यह आभूपण मेरे भलकार की भांति प्रतीत हो रहा है। टी-माहो, कहो। यह बलकार तुम्हें कहां से उपलब्ध हुए हैं। •ला- सुम्हारे स्ने कारण ऐसा माहस किया। गनी-गहरे साहसी । चेटी-(म्यगत) भहा, इसकी आकृति चोर्यरूप दारण कर्म करने के कारण माननीया ( वसन्तसेना) के समरा उद्विग्न-सी हो गई। (प्रकाश रूप में) हाय धि । मेरे लिये तुम्हारे शरीर एव परिन दोनों महयुम हो गए।
-
41
Marg
बसल्प
चतुर्थोऽ।
सबला-उन्मत्तिके । साहसे सलु श्रीवसति ।
पी-अपण्डिदो खुसि | को हि णाम जीविरेण सरीर विकीणि
स्मदि । अह क्स्स गेहे इस रिस्सामवञ्चणा क्दिा। [अपण्डित सवमि ।
कोहि नाम जीवितेन शरीर विप्रायति । अय पश्य गहे इय विश्वामवचना कृता।]
रानलक-यथा प्रमाते मया श्रुत-श्रेष्टिचत्वरे प्रतिवसति साथवाह
पुनश्चारुदत्तो नाम ।
MDM
उमे-हुम् ।
सन्जला-अयि,
विपादनम्तसर्याली सम्भ्रमोत्कुललोचना ।
मृगीय शरविद्धानी कम्पसे चानुकम्पसे ॥३॥
पिचत्वरे-रेटिना-वणिजाना चवरे निवासस्थाने (लभणया अय
मर्या चौसष्य )। साथवाहपुत्र-पणिसुन चैहक साथवाही नेगमी वणिजी
चणिक इत्यमर ।
विपादेति-विपात्यस्तसङ्गी-विपादन = दुखेन घस्तानि - शिथिली
भूतानि सर्वाष्यङ्गानि यस्या सा सम्ध्रमेण - चच्च तया उत्फुले - विमिते
तारशे लोचने = नयने यस्या सा शरविदाही-शरेण = बाणेन विद्धम् तादृशम्
आज यस्या एवभूता मृगीव = हरिणीव (भयान ) त्वम् कम्पसे वेपसे (मा)
च अनुकम्पसे = दयसे च ॥ ३ ॥
सब्जएक-उम्मसिके । साहस (उद्योग) में ही लक्ष्मी का निवास होता है।
ची-तुम मूख हो । कौन है जो जीते जी अपने शरीर को येच देगा।
विश्वासघात किया है।
मना-प्रत गल जैसा मने सुना कि सेठों के महल्ले में सायचाइ पुन
चारुदत्त नामक व्यक्ति रहता है।
दोनों-हाँ।
सजलक-प्रिये विपाद से अस्त घशलता के कारण विकसित नयनों पाली
तथा शर (थाण) से वि शरीर पाली मृगी की तरह (भय से) तुम काप
रही हो और दया भी कर रही हो ॥३॥
-wim शारीर चारिन च । RAMAINA ११० चारुदत्तम् । चेटी-दिद्वपुरुषो विक्ष अअ अलङ्कारो । [दृष्टपूर्व इवायमलझार । ] गणिका-ममकेरओ विअ अ अलङ्कारो। [ मदीय स्वायमलकार ।] बेटी-भणाहि भणाहि । को इमस्स आअमो। [ भण भण । कोऽस्या- गम ।] सजलक -त्वत्स्नेहात् साहस कृतम् । उभे-ह. साहसिओ । [ह, साहसिक।] नेटो-(पात्मगतम् ) आ अन्जुआए खु इमस्स आइदी फम्मदारुण- दाए उव्वेअणीआ सवुत्ता । ( प्रकाशम् ) हद्धि मम किदे उभअ तसइदं संवुत्त-तव सरीर चारित्त च । [शा. अज्जकामा सल्वस्याकति धर्म- दारुणतयोरेजनीवा सत्ता। हा धिग् मम मते उभन सशचित सरत-तन 4s ราเมน 4 เรี MMM P1 त्वत्स्नेहात-तव त्वरि वा स्नेह - अनुराग तस्मात् रेतो । साहसम्= चौर्यरूपम् एत्यर्थ । हम् (हुम् ) इति स्वीकारार्थकमव्ययम् । अस्य = सज्जल रुस्य आकृति - साकार सज्जुकायागणिकाया. ननन्त- सेनाया इति भाव (समुले) पर्मदारुणतया = चौर्यादिकूरकर्महेतो , उद्वेजनीगा- उरेजयतीत्युरेजनीगा ( तरि अनीयर् ) उगसम्पादिका, क्षोभणीया रति गावत् । सत्ता-सजाता । उभयम् सम् , शरीर चारित्रमिति उभर मत्लते सशयितम् सशययुक्तम् सवृत्तम् - जातम् । मेटी-यह (अलंकार ) पहले देखा गया हो ऐसा मालूम हो रहा है। गणिका-यह आभूषण मेरे खलकार की भाति प्रतीत हो रहा है। घरी-कहो, कहो। यह अलमार तुम्हे कहो से उपलब्ध हुए हैं। • -- तुम्हारे स्नेह के कारण ऐसा साहस किया। दोनों--वाहरे । साहसी। चेटी-(स्वगत) महा, इसकी भाति चौर्यरूप दारुण कर्म करने के कारण माननीया ( वसन्तसेना) के समप उद्विग्न-सी हो गई । (प्रकाश रूप से) हाय धि। मेरे लिये सुम्हारे शरीर एवं चरिम दोनों सदेश्युम हो गए।
। चतुर्थोऽ! १११ सजला-उमत्तिवे । साहसे सलु श्रीरसति । चेगे-अपण्डिदो खुसि । को हि णाम जीविरेण सरीर विक्कीणि स्मदि। अह कस्म गह इअ मिस्सामयञ्चणा पिन। [अपरित सवमि । कोहि नाम जीवितेन शरीर विक्ष्यति । अथ क्स्य गह इय विधामवचनाता।] सजलकन्यथा प्रभाते मया श्रुत-श्रेष्टिचत्वरे प्रतिवनति साथमाह पुनश्वारुदत्तो नाम । MA उमे-हुम् । सबलर -अयि, ran विपादनम्तसर्वाङ्गी सम्भ्रमोत्कुललोचना । मृगीय शरविवागी कम्पसे चानुकम्पले ॥३॥ उष्टिच बरे-प्रष्टिना-पणिजाना चन्वर = निवासस्थाने (लपणया अम मयों योद्धव्य )। मायवाहपुत्र-वणिक्पुत्र बैंकहर मायवाही नेगमो वणिजो चणिक इत्यमर। विषादेति-विपादनस्तसर्वाता-विपादन = दुःखेन बस्तानि = शिथिली भूनानि सवाण्यहानि यस्मा सा मम्ध्रमेण = चञ्चलतया उन्फुल्ले - विकमिते तारी लोचने - नयने यस्या' सा शरविद्वानी-शरेण = घाणेन विडम् ताशम् श्रा यस्या एवभूता मृगीव = हरिणीय (भयान ) त्वम् फम्पसे घेपसे (मा) च अनुक्म्पसे - दयसे च ॥३॥ सनलक-मत्तिके! साहस (उयोग)मैं ही सचमीका निवास होता है। बैग-सुम भूस हो । कौन है जो जीते भी अपने शरीर को बेच देगा। विश्वासघात किया है। मजक--प्रस काल जैमा ममे सुना कि सेठों के महरले म साथवाह पुन चारुदत्त नामक व्यक्ति रहता है। नो-हाँ। सनलक-प्रिये विषाद से प्रस्त घालता के कारण विमित भयनों घाली वथा शर (याण)से विद शरीर वाली मृगी की तरह (भय से)म काप रही हो और दया भी कर रही हो चाम्दतमा Marwww बटी-पच्च भणादि । मन्थवाहकुल माहम करन्तण नुप कांधि कुनघुना मायण अन्थि परिकानदी नावादिदा वा [ गय मग । गार्थवाह- अंदगाहम कुर्वना बया बिन र गणास्ति परिक्षता व्यापाटिनी बा1] गणिका-सुदछ, मग चि पुच्छिद्रव्य पटा पुच्छिदं । गाल, मयापि प्रमगया पृटम । गजल-मटनिक ! पतायन किं न पर्याय, द्वितीयमायकार्य कांग्ग्यामि । नसल्यत्र शत्रण कश्चित परिक्षना व्यापादिता वा। चटी-मजलबागच्च मला ! गन्यम ।] गजलका-सत्यम् । चटी-माह मजलब ! पिब में | [ गार्थ गनलक । प्रिय में 1] मला ---किं कि निर्णमत्याह । ईश मदनिक। स्यत्म्नवदन्हढयाँ हि कगंग्यकार्य सन्तुष्टपूर्वघुम्पेऽपि कुलं प्रमून, । नानक न पांगम = अयान मया अपहन वन तय नावाय किन पर्यातमान, तदा विनायमपि श्रमाय = गम्प्रेण मारणरूप ऋगकम अपि करि- ध्यामिकदापि नेय। न्यत्म्नेहनि-गणपूर्वपुणे - गन्तुष्ट पूर्वपुरुष यस्मिन बभूने टीम हो। यणिकण में माहम बग्ने हुए तुमने किया कुलपुत्र को प्रहार घायटनी नही किया है। गगा--अच्छा, मुझे भी यही पुछना था, जो हमने पूछा है। मन-मदनि! या (तुम्हारी प्रसन्नता के लिय) इतना पर्याप्त नही है? या दुसरा अकार्य (मन मे मारण रूप कर्म) भी कगा? मेर बीयरूप । धर्म में कमीशनअन घायल नाही बेटा-सा क्या यह माय है? म-विपद मय है। टी- साथ मनाटक या । यह मेरे छिये माहीमा। मन्ना, गया, क्या 'प्रियामा का रही। क्या पेमी याग है? जिग्न कुद्र में पुरप पर्वनामावन गंतुष्ट ५ प यग में पन हर भी नुमार नीमन में चौगटिम करता है और काम में अभिमृन अपने - आ है। 1 .
चतुर्थोऽक्षा १५0 रक्षामि ममयगृहीतमिद शरीर मित्र घमा व्यपदिशस्यपरच यासि ॥४॥ चेटी-सजलअ । सुणाहि । अज्जुआए अअ अलकारो। एव नि। [ सज्जल शणु । श्रग्जुकाया अयमलद्वार । एषमिव A หมอน सनलक-एवम् । मशानाद या भया पूर्व शाखा पत्रैवियोजिता । डायार्थी प्रीष्मसन्तमस्तामेव पुनराश्रित ॥५॥ पुले = वशे प्रस्त - उत्पन्न अपि वस्नेहबद्धहृदय-तव लयि वा स्नहेन- प्रणा बदम् = वशीभूतम् तत् ताश हृदय-मनो यस्य स हि-निश्चयन अकार्यम् = चार्यादिनिन्दित कर्म करोमि । मामयगृहीतम्-मामयेन = काम दवेन गृहीतम् = अभिभूतम् इद शरीर रक्षामि (परतु त्वम् ) माम् = सजल कम् मिन- प्रियम् म्यपदिशसि = वाचा व्यवहरसि अपर च । (चारुदत्तम) यासि = हृदयन प्रियतमम् अङ्गीकरोपि॥४॥ मज्ञानादिति-अज्ञानात् = भ्रमवशात् मया या शाया पूर्वम् पत्र - पण वियोनिता = रिकीकृता पत्रवियोजनेन स्थाणुता गमिता इति भाव अर्थात् दुर्भा ग्यन वमन्तसेनाया एवायमित्यनमिझोऽहम् अलाारम् अपहृतवान् प्रीष्मस तप्त- प्रीमगलन पीडित (मत एष) छायार्थी छायाज यशैत्यलाभार्थी (सोऽहम्) तामेव शरीर की भी रक्षा करता हूँ। सामने तो तुम मुझे मित्र (वाम) कहती हो फिर भी मन से किसी दूसो (चाकदच) के साम सपध जोड़ती हो ॥४॥ चटा-सजलक ! सुनो। माननीया (वस तसेना) का यह भलवार है। (कान म)यह ऐसी बात है। सनलक-ऐसा है। अज्ञानवश मैने जिस शाखा को पहले पत्रों से रहित किया उसी का ग्रीष्म से समाप्त होकर छाया की खोज करते हुए मैंने आश्रय लिया है भावार्य यह है किम नाग्नि से सन्तत होरा मैं जिम बस तसेना से मदनिका को मुकि दिलाना चाहा उसी वसन्तसेना का मैने अलकार अपहरण किया ॥५॥ १ यहाँ पर शाखा' शब्द से बसन्तसेना भौर पण शससे पन की तुलना की गह है।
११४ चारुदत्तम् । ११॥ Raut राजालक- 1 गणिका-सन्तप्पटि नि तक्केमि पण अकय्यं किटं ति | [ रातागत उति तयागि एतेनाकार्य समिति । ] -मदनिके । चं गते कि कर्तव्यम् । चेटीतहिण्य णिय्यादेहि, णहि मण्टरसदि अजुआ। [तच निर्मातय, मटि गायिष्णन्यजनुका । ] Policeinen राज्जालग-अथेदानी मोऽमन्मिां चोर इति रक्षिपुरुपैययिष्यति चेदन कि करिप्यामि। पेटी-गा भाआहि गा भाआधि ] कुलवृत्तो खु सो गुणाणं परितु- रसदि । [गा यिनीति मा विभाति । गुलपुन रालु रा गुणानां परितुष्यति । ] गणिका-गाह भद्दे । अवत्तव्यासि, अलशिदा विध पदेण वअणेण | [गाव गद्रे | अपाच्यागि, 'अल फरोचन पननेन । ] राजालफरार्वथा न शक्ष्याम्यहं तत्र गन्तुम । (शानाम् ) पुन याश्रित प्राश्रितचाग । अर्यात घरान्तसेनापरिचारिकामा मनिकायागनुरीन गया न्गारारूपालारापहरोन परान्तरोना वियोजिताति तो सारा गाय गदनि नय रामयिायति यति गाव. ॥ ५ ॥ रान्तप्यते = गन्तको गति । अकार्यम् = असत्कार्यम् सत्ग । रक्षिपुरुष = रहिणिया ते पुरुपात राजपुरुष (सिपाही ति भापागाम् ) गगिता-उसने अपमानित कार्य किया है। इसीलिये पश्चाताप कर रहा ऐसा अनुमान करती है। रामा-मदनिक। ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिये? 12-मेघाही (धारुटस के पास) ले जाक्षा, मानमीया (पसन्तसेना) अपने पापको भरपूरा नहीं करेंगी। सार--यदि इस समय गुरने के कारण रशिप्स-पुरुप (पुलिस) के द्वारा चोर समाफर में पफर लिया गया, तब पया करूंगा? -राम डरो मत । चारुदत कुलीन, अराएय गुणों से सना होगे। गणित-साधुमारे ! तुम आलोचना नहीं कर रही हो, थरिक सुम्हारे गधन मे हम दोनों अलंगरा ही हुये हैं। सन्जला-मे मर्पया यहाँ (पारदरा के पास) जाने में समर्थ नहीं होगा।
चतुर्थोऽ। १६५ चेरी-अथ अण्णो उपाओ। [अयमन्य उणय ।] गमिश-एदे गुणा वसवासस्स । [ एते गुणा वेशवासस्य । ] सग्नलक-कोऽय उपाय | ची-ण तर रूपन्ना अज्नुआ अवि सत्यवाहपुत्तो अ। [ ननु तव स्पताज्जुवाऽपि साथवाहपुत्रश्च । ] सनलका-न सलु। चैी-तेण हि इम दाय अलकार तस्स सस्थवाहपुत्तस्स घअणादो अजुमाए णिय्यादेहि । एर च किदे तुन रक्खिदो, सो अय्यो भ अणिविण्णो भविस्सनि । अह च पीडिदा ण मविस्स | आदु अजुम च पुणो यचित्र पुणो एव्व दासमावो भव । [ तेन हीम तावदलद्वार तस्य सार्थवाहपुत्रस्य वचनादज्जुकायै निर्यातय । एव च कृते स्व रक्षित' स मायबानिर्विणो भविष्यति । अह च पीडिता न भविष्यामि । अथवा अज्जुका व पुनश्चयित्वा पुनरेव दासभाषो भवेत् । ] ५५. सार्यवाहपुत्र-सार्यवाहस्य = वणिज पुत्र चारुदत्त इत्यय' तथा अज्जुका च= गणिका बसन्तसेनेति भाव तव रूपड़ा-रूपम् आकृति गुणव जानातीति स्पहा। तेन = तेन कारणेन सार्यवाहपुत्रस्य - चारुदत्तस्य वचनातू-वचनमा चेटी-यह दूसरा उपाय है। गणिका-ये वेश्याओं के गुण हैं। सजक-दूसरा उपाय क्या है? चटी-निश्चय ही तुम्हारे रूप एवं गुणों को भाय चाहत और श्रीमती बसतसेना भी जानती है। सम्जलक-महीं। चटी-इसलिये सापवाहपुत्र (चारुदत्त)क वचनों का बाय करके भार्या (पस तसेना) क लिये इस भलंकार को ले जाभो। इस प्रकार तुम मी बध जानोगे और यह (चारदस) भी अलकारों के खो जाने क हेतु दुखी नहीं होगा और मैं भी दुखी नहीं होऊगी। पदि ऐसा न किया तो स्वामिनी की पना करने में दासी होना पड़ेगा। EMAIL OM D A चारदत्तम् । women नचला-मदनिका प्रीतोऽस्मि । गणिका-भोदु अन्भन्तरं पविसित्र उवविसामि । (तथा क्रोति ।) [ भवन्वभ्यन्तर प्रविश्योपदिशामि। बेटी-सजलअ ! आअच्छ, कामदेवउले म पडिबालेहि । अहं ओसर जाणिअ अजुआए णिवदेमि । [ मज्जलक | आगच्छ, कामदेव- छले मा प्रतिपालय । ग्रहह्मवसर नान्चाऽजुकार्य निवेदयामि मनलक-बाढम् । (निष्क्रान्त ।) (तत प्रविशत्यपरा चेटी।) चेटी-सुहं अन्जुआए ! एसो सत्यवाहपुत्तस्स सआसादो कोच्चि बम्हणो आअदो अजुनं पेक्खिदु । [ मुखमज्जुकाया । एप सार्थवाहपुत्रस्य मनाशान् अश्चिद् ब्राह्मण अागतोऽज्जुन द्रष्टुम् । ] गणिका-(आदरम् ) गच्छ, सिग्घ पवेसेहि णं । [गच्छ, शीघ्र प्रवेशयनम् ।] चेटी-तह । (उपसत्य ) एदु एदु अथ्यो । [ तथा । एत्वेत्वार्य।] श्रित्य इति भाव , वचनादिन्यत्र ल्यव्योगे कर्मणि पञ्चमी । 'अज्जुकाय' इत्यत्र सम्प्रदाने चतुर्थी, निर्यातय = मनर्यच, अनिर्विण अमन्न । कामदेवकुले-कामस्य मदनस्य ठन्सवाय निर्मिते देवकुले मन्दिरे इत्याशय । सकागात् मनीपात् । सज्जलव-मदनिके मैं नुमसे प्रसन्न हूँ। गणिक-अच्छा, भीतर घुमर वैट जाती हूँ। (वैसा ही करती है।) बेटी-सजलक आओ और कामटेच के मन्दिर में मेरी प्रतीक्षा करो। म अवमर तानकर आर्या से निवेदन कर दूंगी। सब्बलब-बिगुल नी । (निक्ल जाता है।) (सके बाद दरी दान का प्रबंश) चेटी-लार्या का मगल हो। यह ब्राह्मग मार्यबाहपुन (चारुदत्त)के यहाँ से भाया है, जो आपसे मिलना चाहता है। गमिका-(आटर के माय)जाओ में शीघ्र ही अन्दर लाओ। त्री-ऐसा ही हो। (नमीप जाकर) आर्य! भाइये! आइये ।
चतुर्थोऽद्ध । M । वाणा (प्रविश्य) विदूषक -(सर्वतो विरोश्य ) अहो गणिआगडस्म सस्मिरीअदा । णाणापट्टणसमाग हि आअमिएहि पुत्थआ वाइअन्ति | सओजअन्ति अ आहारप्पआराणि। घीणा वानीअन्ति । सुवण्णारा अलकारप्पा राणि आदरेण जोजअन्ति । [अहो गणिकावाटस्य मधीकता। नानापरण ममागतैरागमिर पुस्तकानि बाच्यन्त । सयोज्यन्ते चाहारप्रकारा वायन्ते । मुवर्णकारा अलङ्कारप्रकारानादरेण योजयन्ति । ] चेटी-एसा अजुआ। उयसप्पदु अय्यो। [एपाग्नुका । उपमर्प खार्य .] विषक-(उपगम्य) सोस्थि होदीए । [स्वस्ति भवत्यै।] गणिका-साअद अय्यस्स । हो । आसण अय्यस्स, पादोदअ च | [ स्वागतमायस्य । हजे! श्रासनमायस्य पादोदक च।] गणिकावाटस्य = वेश्यागृहस्य सश्रीकतानिया = लक्ष्म्या शोभया था सह पर्तमानम् इति सधीकम् तस्य भाव सधीकता रमणीयता इति भाव । नानापट्टनसमागते.-नानाविधानि पहनानि = पत्तनानि नगराणि वा तभ्य समागता से आगमिक पागम = भागमरूपशान त विदन्ति इति आगमिका ते । अर्थात् निगमागमशास्त्रस्य वेतार पुस्तकानि वाच्यन्ते = पठ्यते इत्यर्थ । (प्रवेश कर) विदूषक-(अपने आप चारों ओर देखकर) अहो। गणिका के घर का यह भाकपण एख सौन्दर्य! विभिन्न नगरों से माए हुए शास्त्रों के वेता लोग शास्त्रों का पाठ कर रहे हैं। नाना प्रकार के भोजनों का प्रवन्ध किया जा रहा है। वीणा यमाई जा रही है। सुनार ध्यान से मानाविध महदारों का निर्माण चेटी-बायर्या यहाँ हैं।ाय स्वय समीप बायें। विदूषक-(समीप जाकर) आपका मगळ हो। गणिका-भाय का स्वागत है। चेटी । श्रीमान जी के लिए भासन और पादाभ्य दो।
गणिका-( उपविश्य ) अवहिदम्हि 1 [ अवहितास्मि । ] सा ११८ चारुदत्तम् । विदूषक -(आत्मगतम् ) सव्वं आणेदु वज्जिअ भोअणं 1 [ सर्व- मानयतु वर्जयित्वा भोजनम् ।] चेटी-जं अन्जुआ आणवेदि । (श्रासन ददाति पादोदक च ।) उवविसदु अय्यो । [ यदज्जुकाज्ञापयति । उपविशत्वार्य ।] विषक -(उपविश्य ) पडिच्छदु आसणं भोदी | अह किञ्चि भणिदुं आअदो । [ प्रतीच्छत्वासन भवती । अह किश्चिद् भणितुमागत ।] विदूषक --केत्तिअमत्तं खु तस्स अलङ्कारस्स मुल्लप्पमाणं । [ किय- मान खलु तस्यालड्वारस्य मूल्यप्रमाणम् । ] गणिका-किणिमित्तं खु अय्यो पुच्छदि । [ किन्निमित्त खल्वार्य- पृच्छति । विदूषक -सुणादु मोदी | तत्तहोदो चारुदत्तस्स गुणप्पच्चाअण- णिमित्तं खु तुए अलङ्कारो तहिं णिक्खिती। सो तेण जूदे हारिदो । [शृणोतु भवती। तत्रभवतश्चारुदत्तस्य गुणप्रत्यायननिमित्त खलु त्वयालङ्कारस्त- स्मिन् निक्षिप्त । स तेन छूते हारित ।] yadnya men प्रतीच्छतु = गृह्णातु । अवहितास्मि = अवहिता-निविष्टचित्ता, सावधाना अस्मि । कि निमित्तम् = केन निमित्तेन इति भाव । गुणप्रत्यायननिमित्तम् गुणाना गुणेषु वा प्रत्यायनम् -प्रतीति इति गुण- विदूषक-(स्वगत) के भोजन को छोडकर और सब कुछ ले भाभो । टी-आर्या की जो आज्ञा । (भासन और पैर धोने का जल देती है) आर्य यहां बैठे। विदूषक -आप भी एक भासन पर बैठ जायें । मै कुछ कहने के लिए भाया हूँ। गणिक -(वैठकर) मै सुन रही हूँ। विदूपक-उन अलकारों का कितना मूत्य हो सकता था? गणिका-भाप किस लिये पूछ रहे हैं। विदूषक-आप सुने । समाननीय चारुदत्त के गुणों से प्रभावित होकर भापने उनके पास अपने भाभूपणों को धरोहर के रूप में रख दिया था, परन्तु वे उसे जुभा में हार गये।
AMMAM.M. चतुर्थोऽङ्क । गणिका-जर्दे । जुन्नइ । तदो तदो। [यूते । युज्यते । ततस्ततः । ] विदूपर -तदो तस्स अलङ्कारस्स मुल्लमूद इम मुत्तावलि पडि च्छदु भोदी। [ ततस्तस्यालद्वारस्य मूल्यभूतामिमा मुक्तावली प्रतीच्छतु भवती। गणिका-(आत्मगतम् ) धिक् खु गणिआभाव | लुद्धत्ति म तुल अदि । जइ ण पडिच्छे, सो एव दोसो भविस्सदि। (प्रकाशम् ) आणेदु अय्यो। [धिक सलु गणिकामावम् । लु धेति मा तुलयति । यदि न प्रतीच्छामि स एव दोषो भविष्यति । श्रानयत्वार्य ।] विदूषकः इद गण्हदु मोदी । [इद गृहातु भवती । गणिका (गृहीत्वा ) पहिच्छिद नए त्ति अय्यो णिवेदेदु । [ प्रतीष्ट तयेस्यार्यों निवेदयतु ।] विदूषक -(आत्मगतम् ) कोयि उवआरों विण एदाए भणिदो। (प्रकाशम् । ) एव होदु । (दत्वा निष्कान्त ।) [कोऽप्युपचारोऽपि नेतया मणित । एव भवतु । ] + प्रत्यायनम् तदेव निमित्तम् यस्मिन् कमणि तत् यथा तथा । निक्षिप्त न्यास पेण स्थापित इति भाव । यूर्ते = पाशकोडायाम् हारित - जित । तुलयति = तुलया योजयति इति भाव । प्रतीष्टम् - स्वीकृतम् इत्यर्थः। गणिका-शुभा में ! ठीक है। सब क्या हुमा ? विदूषक-तप भाप उम अलकारों के मूल्य में इस मुक्तावली को ग्रहण करें। गणिका-(स्वगत) इस गणिकावृत्ति को धिक्कार है । जनसा तो मुझे लालचो कहेगी। यदि न लगी तब भी वही अपराध लगेगा। (प्रकाश) अच्छा दोजिये। विदूषक-बाप इसे ग्रहण करें। गणिका-(महण कर) कृपया माय चारुदत से निवेदन कर दीजियेगा कि यह मैंने इच्छापूर्वक स्वीकृत कर लिया है। विदूषक-(स्वगत) इसने कुछ उपचार के रूप में भी नहीं कहा। (प्रकाश) ऐसा ही हो।(देकर निकल जाता है।)
१२० चारुदत्तम् । MMMM FASHIA गणिका-साहु चारुदत्त साहु । भाअधेअपरिचुत्तदाए दसाए माणावमाणं रक्खिदं । [साधु चारुदत्त । साधु । भागधेयपरिवृत्तताया दशाया मानावमान रक्षितम् । ] (प्रविश्य) मदनिका-अज्जुए। सत्यवाहपुत्तस्स सआसादो कोच्चि मणुस्सो आअदो इच्छइ अज्जुनं पेक्खि । [अज्जुके! सार्थवाहपुत्रस्य सकाशात कश्चिद् मनुष्य आगत इच्छत्यज्जुका द्रष्टुम् ।] गणिका-किं दिठ्ठपुरुषो णवदसणो वा । [ किं दृष्टपूर्वो नवदर्शनी वा । ] मदनिका-अज्जुए! णहि, तस्सकेरओ त्ति से पडिभादि । [ अज्जुके! नहि, तदीय इति मे प्रतिभाति । ] गणिका-गच्छ, पवेसेहि ण | ] गच्छ, प्रवेशयैनम् ।] मदनिका तह । ( निष्कान्ता।) [ तथा।] गणिका-अहो रमणिज्जदा अज्ज दिवसस्स । [ हो रमणीयताऽय दिवसस्य । ] (तत प्रविशति मदनिका सज्जलकेन सह ।) यस्याम् भागधेयपरिवृत्ततायाम् भागधेयस्य परिवृत्तता प्रतिकूलता तस्याम् तथा। गणिका-वाह । चारुदत्त, वाह । भाग्य के विपरीत दशा में भी नापने मानवता की रक्षा की। (प्रवेश कर) मदनिका-आर्ये ! सार्थवाहपुत्र के यहाँ से कोई व्यक्ति भाया है और आपसे मिलना चाहता है। गणिका-वही है, अर्थात् पहले जो देखा गया था या दूसरा । मदनिका-माननीये ! ऐसा लगता है कि वह उसका निजी भादमी नहीं है। गणिका-जामो और उसे अन्दर लानो । मदनिका- ऐसा ही हो।(निकल जाती है।) गणिका-महो! नाज का दिन तो बडा ही मनोरम है। (तब तज्जलक के साथ मदनिकाका प्रवेश) चतुर्थोऽका * सदर मग्नलम-पष्ट खल्वात्मशङ्का नाम, य कधिचकितगतिनिरीक्षते मा सम्भ्रान्तो द्रुतमुपसर्पनि स्थिनो था। सोम्ताम्तुलयति दापता मनो मे स्वैदोषैर्भवति हि शहिता मनुष्यः ॥ ६॥ मदनिका-एसा अजुआ | उयसप्पदु अय्यो । [ एपाग्नुका । उपमर्पत्वार्य'1) सजलक -(उपसत्य ) सुख भवत्यै । गणिका-साअट अय्यस्स । इब्जे । आसण देदु अय्यस्स । [स्वागतमार्यस्य । हज्ने 'प्रामन दीयतामार्याय ।। सझलक -मवतु मयतु । गृहीतमामनम् । त्वरिततरमनुष्छेय किञ्चित् कायमस्ति । प्रान्मशारा मन शहा भीरुता खलु - निधयेन कटा नाम = कष्ट दायिका एव । य कश्चिदिति-य कश्चिन् चक्तिगति सन् चकिता - चवला प्रस्ता षा गति' यस्य म मा निरीक्षत = पश्यति मन्त्रान्तो दुतमुपसपति वा समीपे स्थिती भवति दोषत = चौयदोपहेतो मे = मम मन सवान् तान् तुलयति अर्थात् मम दोषान् मा प्रहीनुमागता इति मन निर्णयति । हि= यत' मनुष्य व दोष = अपरा शक्तिी भवति ॥en मजला-आम्मका ही तो कष्ट देनेवाली वस्तु है। जो व्यक्ति चकित होकर मुझे देखताह था मेरे समीप खड़ा होता है तो चीयरूप अपराध कारण मेरा मन सबको इस रूप से तोलता है कि कहीं पकड़ने न पा रहा हो। क्योंकि मनुष्य अपने ही दोषों से शारित हुआ करता है। मनिका माननीया यही है। माय स्वय समीप में जाय । सज्जलप-(समीप भाकर) भाप करपाण हो। गरिका-भाय का स्वागत है। भायें। श्रीमान् को शासन हो। मजला-अच्छा अग्ला । भासन ग्रहण कर लिया परन्तु नीघ्र सम्पादन योग्य छुप काय है।
१२० चारुदत्तम् । MAMM MMwww स्वाGHIA गणिका-साहु चारुदत्त । साहु । भाअधेअपरिवुत्तदाए दसाए माणावमाणं रक्खिदं । [साधु चारुदत्त । साधु । भागधेयपरिवृत्तताया दशाया मानावमान रक्षितम् । ] (प्रविश्य) मदनिका-अज्जुए । सत्थवाहपुत्तस्स सआसादो कोच्चि मणुस्सो आअदो इच्छइ अज्जुब पेक्खिउं। [अज्जुके । सार्थवाहपुत्रस्य सकाशात् कश्चिद् मनुष्य आगत इच्छत्यज्जुका द्रष्टुम् । गणिका-किं दिट्ठपुरुषो णवदंसणो वा ! [ किं दृष्टपूर्वो नवदर्शनी वा । मदनिका-अज्जुए! णहि, तस्सकेरओत्ति मे पडिभादि । [ अजुके । नहि, तदीय इति में प्रतिभाति । ] गणिका-गच्छ, पवेसेहि ण | ] गच्छ, प्रवेशयैनम् । ] मदनिका-तह । (निष्कान्ता।) [तया।] गणिका-अहो रमणिज्जदा अज्ज दिवसस्स। | अहो रमणीयताऽद्य दिवसस्य ।] (तत प्रविशति मदनिका सज्जलकेन सह ।) भागधेयपरिवृत्ततायाम्-भागधेयस्य परिवृत्तता = प्रतिकूलता तस्याम् तथा। यस्याम् गणिका-वाह चारुदत्त, वाह । भाग्य के विपरीत दशा में भी नापने मानवता की रक्षा की। (प्रवेश कर) मदनिका-भार्ये । सार्थवाहपुत्र के यहाँ से कोई व्यक्ति आया है और मापसे मिलना चाहता है। गणिका-वही है, अर्थात् पहले जो देखा गया था या दूसरा । मदनिका माननीये ! ऐसा लगता है कि वह उसका निजी आदमी नहीं है। गणिका-जामो और उसे अन्दर लाओ। मदनिका-ऐसा ही हो । (निकल जाती है।) गणिका-भहो! माज का दिन तो बड़ा ही मनोरम है। (तब सजलक के साथ मदनिकाका प्रवेश) चतुर्थोऽद्ध। wwanima Hai4 HAL M५० मनरक कष्टा सत्यात्मराका नाम, यश्चियकितगतिनिरीक्षते मा सम्मान्दा द्रुतमुपसर्पनि स्थितो पा। सौम्ताम्तुलयति दोपता मनो मे म्वदपियति हि शहिता मनुष्य ॥ ६ ॥ मदनिकासा अजुआ । उयसप्पटु अथ्यो । [ एमाग्नुका । उपमर्पवाय । मज्जल -(उपसाय ) सुस भनत्ये । गणिका-सा- अय्यस्स । हम्जे । आसण दुषव्यस्म । (स्वागतमार्यस्य । हन' मामन दीयतामायाय ।। मजरक-मयतु भवतु । गृहीतमाम । त्वरिततरमनुष्य विञ्चित कायस्ति। भामरारा प्रारमन शहा भारुता सलु-नियमन का नामकर दायिका एव। य कधिदितिय प्रथिन् चकितगति मन् चकिताचा परता या गति यस्य म' मी निरीपतपश्यति मम्ातो हुतमुपमपनि वा ममीले (स्थती भवति दोन चीयदोपहतो मे मम मन सपान तान् तुलपति भयात् मम दोशन मा प्रहीतुमागता इति मन निर्णयति । दियत मनुष्य स्वदो - अपराध शक्तिी भवति ॥ ६॥ मन्जला-मामका ही वो कष्ट देनेवाली पर है। जो व्यक्ति चकित होकर मुझे दबता ६ या मो समीप खड़ा हासा हो श्रीयम्य अपराध के कारण मेरा मन सबको इस रूप में होता है कि कही पकड़ने न पा साहा। क्योंकि मनुष्य अपने ही दोषों से सिवा करता है। मदनिका माननाया यहाँ हैं। माय स्वम समीप में जाय। समजला-(समाप जाकर वापशकल्याण हो। गणिका-बाय का स्वागत है । भायें । श्रीमान को भासन दो। पटन-अण्डा भाडा । भासन ग्रहण कर लिया, परन्तु शीघ्र सम्पादन यो एपाय।
१२२ AtEO चारुदत्तम् । wwwww LAXMental- गणिका-एव भणादु अय्यो 1 [ एव, भणत्वार्य 1 ] सज्जलक –आर्यचारुदत्तेनास्मि प्रेपित -यस्तावदलङ्कारो मम हस्ते निक्षिप्त , स त्वसभोगमलिनतया गृहस्यासान्निध्यात् कौटुम्विकाना दुरारक्ष । तद् गृह्यताम् इति । गणिका-इमं तस्स चारुदत्तस्स देदु अय्यो। [इम तस्मै चारुदत्ताय ददात्वार्य।] सज्जलक-भवति । न खल्वह गच्छामि । गणिका-अह जाणामि तस्स गेहे साहसं करिअ आणीदो अब अलङ्कारो | तस्स गुणाणि अणुकम्पेदु अय्यो। [ अह जानामि तस्य गेहे साहस कृत्वानीतोऽयमलङ्कार । तस्य गुणाननुकम्पतामार्य ।] सजला -(आत्मगतम् ) कथं विदितोऽस्म्यनया। असम्भोगमलिनतयान सम्भोग = सस्कार, व्यवहारात् समार्जनादिकम् इत्यर्थ , तेन मलिनं = धूलिधूसरित तस्य भाव तया तथोक्तया । कौटुम्बिकानाम्= परिवाराणाम् असान्निध्यात्-न सान्निध्यम् इति असान्निध्यम् तस्मात् हेतो, अनुपस्थिते इत्यर्थ । दुरारक्ष = दु खेन रक्षितु योग्य इत्यर्थ । .RJAR TRAIL , गणिका-तव भार्य उसे कहें। मज्जलक -मुझे आर्य चारुदत्त ने भेजा है और यह सन्देश कहलवाया है कि जो अलङ्कार मेरे हाथ में धरोहर रूप में दिया गया था उसकी रक्षा करना कठिन है क्योंकि घर का ठीक से उपयोग न होने के कारण वह टूटी फूटी दशा में है (चोर आसानी से प्रवेश कर सकते हैं) और कुटुम्बी लोग भी पास नहीं रहते (जिनसे चीजों की रक्षा हो पाती)। गणिका-आर्य इसे चारुदत्त को दे दें। सनलक-माननीये । मैं नहीं जाऊगा। गणिका-मै जानती हूँ कि आर्य उनके घर में चौर्यरूप साहस कार्य करके इस अलकार को लाये हैं। आपको उनके गुणों के साथ सहानुभूति तो दिखानी ही चाहिये। सनलक-(स्वगत) क्या इसने मुझे जान लिया है ?
चतुर्थोऽङ्क
गणिका--को एस्थ, पयहण दाय अय्यस्स । [ कोऽत्र प्रवहण वाप
दार्यस्य ।
गणिका-मिसदो विल सुणीअनि | आअदेण पवहणेण होदव्य
[नैमिशब्द व श्रूयते । आगतेन प्रवहणेन भवितव्यम् । ] ५MsoN
(
गणिका-( स्वैराभरणैर्मदनिकामल कृत्य ) आरुहदु अय्यो अय्याएं
सह पवहण ! [आरोहत्वाय आर्यया सह प्रवहणम् ।]
मदनिका-अजुए । किं एद । [अजुके! किमेतत् ।।
गणिका-मा खु मा खु एष मतिअ | अय्या खुसि दाणि सवुचा ।
गण्हदु अय्यो ।। (मदनिका गृहीत्वा सज्जलकाय प्रयच्छति । ) [मा चलु
मा खल्वेव मन्त्रयित्वा । भार्या पल्वसीदानी सरत्ता । गृहात्वार्य ।]
सज्मलक'-(आत्मगतम्) मो । कदा खल्वस्या प्रतिकतन्य भवि
प्यति । अथवा, शान्त शान्त पापम् ।
नर प्रत्युपकारार्थी विपत्तौ लमते फलम् ।
प्रवहण ताप आर्यस्य = आर्यस्य (सम्बधे) तावत् प्रवहणम् = शक्टम्
श्रानीयताम् इत्ययः।
नेमिशब्द = नेमे शब्द इत्यर्थ । चक्रधारा प्रधिनमि इति यादव ।
नर इति-प्रत्युपकारार्थी = प्रत्युपकारमययते इति प्रत्युपकारार्थी = उपका
गणिका-यहाँ कोई है ? आय (सजलक) के लिए गादी हाए ।
गणिका-मी या साश सुनाई पड रहा है। शायद कोई गारी भा रही है।
गणिका-(अपने अलंकारों से मदनिका को अलंकृत करके) नाम (भार्या -
मदनिका)के साथ इस गाड़ी पर सवार होइये।
मदनिका-बायें। यह क्या है।
गणिका-ऐसी थास मत कहो। तुम इस समय श्रीमती हो गई हो। भाय
(मनिका को लेकर सजलक को देती है।)
सजए-(स्वगत) मो! हमके (घसन्ससेमा के) उपकारों का बदला
कय चुकाउगा। अथवा पाप शान्त हो।
प्रत्युपकार करनेवाला प्राणी भापत्ति में फल का उपभोग करता है। किन्तु
ग्रहण करें।
१२४ चारुदत्तम् । M द्विषतामेव ऽस्तु योऽस्या भवतु तस्य वा ।।७।। (तया सह निष्क्रान्त सज्जलक ।) गणिका-चउरिए ।। [चतुरिके ! ] (प्रविश्य) चेटी-अज्जुए ! इअम्हि । [अज्जुके । इयमस्मि । ] गणिका-हजे । पेक्ख जागरन्तीए मए सिविणो दिट्टो एव्वं । [ हो । पश्य जाग्रत्या मया स्वप्नो दृष्ट एवम् । ) Ingrat niin on चेटी-पिअ मे, अमुदकणाडअ सवुत्तं । [प्रिय मे, अमृताकनाटक सवृत्तम् ।। गणिका-एहि इम अलङ्कार गहिअ अय्यचारुदत्त अभिसरि- स्सामो। [ एहीममलकार गृहीत्वार्यचारुदत्तमभिसरिष्याव ।] रिण प्रत्युपकारेच्छु , नर विपत्तौ = आपकाले, फलम् = प्रत्युपकाररुपफलम् , सुयोगम् वा लभते प्राप्नोति । परन्तु य = यादृश अस्या = वसन्तसेनाया, अस्य = चारुदत्तस्य वा विपत्काल अस्ति स द्विपताम् एव अस्तु अनयो शत्रूणामेव (शकारादीनाम् ) अस्तु मा भवतु-तस्य, तस्या वा मा भवतु इत्यर्थ ॥७॥ अमृताड़नाटकम्-अमृतम् = अनृतवत् सुखप्रद अ यस्मिन नाटके तत् उसका (चारुदत्त का) और इसका (वसन्त सेना का) जो विपत्ति काल है, वह शत्रु को ही हो ॥ ७॥ ( मदनिका के साथ सज्जलक का निष्क्रमण) गणिका-चतुरिके। ( प्रवेश कर) चेटी-माननीये । मै यहा हूँ। गणिका-आर्ये । देखो, जागती हुई मैने ऐसा स्वप्न देखा है। चेटी-प्यारी बात है। बहुत अच्छा। यह मेरे लिए अमृत से भरा नाटक जैसा सिद्ध हुआ। गणिका--आओ। अलकार को पहन कर मार्य चारुदत्त के पास भभिसरण करेंगे।
चतुर्थोऽङ्का
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चेग-अजुए। तह । एद पुण अभिसारिआसहाअभूद दुहिण
उण्णमि । [ अज्जुके ! तथा । एतत् पुनरमिमारिकामहायभूत दुर्दिन
मुन्नमितम् ।
गणिका-हतासे । मा हु वड्ढावहि । ( हताश ! मा पनु वर्षय । ]
चा-दुग्दु अजुआ। [एवंपग्नुका । ]
(निपाते।)
चतुर्थोऽ।
अमृताम् अमृताच तत् नाटकच इति अमृताइनारक मवृत्तम् = समाप्तम् ।
पनेन महतनाउक्स्य सुसमाप्ति अपि सूच्यते ।
अभिमारिका सहायभूतम्-अभिगारिकाया सहायभूतम् - राहायनु यम्
दुर्दिनम् - धनाभकारो वृष्टिवा (धना धमारे वृष्टी च दुर्दिन कवयो बिट नि
मिदान्त ) सममितम् = प्रादुर्भूतमुथित वा।
इति चतुर्योसमाप्त ।
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चरी-भायें। ऐसा ही हो तो, फिर अमिसारिकाओं का सहायक यह दुर्दिन
- काहे बादल से घिरा हुआ दिम तथा घुरा दिन) उमड़ भाया।
गणिका-अमागिन मेरे काम को अधिक उत्तजित मत करो।
टी-मामनीपे । भाइये, भाइये।
निकल आती है।
चीधा म समाप्त
श्लोकानुक्रमणिका अ० श्लो १ १२ ४ १७ ४ ४ १ १ ६ अकामा हियते मज्ञानाद्या अद्यास्य भित्तिषु अभिनयति भय तव शरीर अर्थेषु काम अविज्ञातपयुक्तन अशि क्खु तिक्खे ४ १ १० ३ ३ १४ १ १ ७ भलो हि दरवा ३ १ १ ३ ३ ३ ३ ३ १ अ० श्लो तथा विभव तरुणजनसहाय ३ स्वस्नेहबद्धहृदयो १६. दारिद्रयात् पुरुषस्य २/ दुवेहि अम्हेहि ३ १८ / देश को नु जला १ २७ | धिगस्तु खलु १५ नर. प्रत्युपकारार्थी ३ ३ निश्वासोऽस्य २१ परिचिततिमिरा ३ ४ | भवांस्तावत् १ मयि व्यक्षयक्षीणे २९ मार्जार प्लवने २३ यसमालक्ष्य य कश्चिच्चकित २२ यन्त्र में पतितः ३ १५. यासां वलिर्भवति ३ रक्तचतारमधुर १८[ लिम्पतीव तमो १५ लुब्धोऽर्थवान् ९ / विभवानुवशा ८ विपादसस्तसर्वाङ्गी सत्य न मे धन समद्विधाना सिंहाक्रान्त | सुस हि दुखा १४ सुलमशरणमायो १ १९ आलोकविशाला इय हि निद्रा उत्कण्ठितस्य उदयति हि शशा एशा हि वाशू एपा रङ्गप्रवेशेन एपा हि वयसो क. श्रद्धास्थति काम नीचमिद काम प्रदोष . १ २४ ४ ६ १ 5 १ २८ २ २ B १ १ १९ कि स्व पदात् १ ३ १ १ ७ १ ४ ३ १ १ ५ किं स्व भयेन किं याशिधावशि किं वाशुजेवे कृत्वा निशाया कृत्वा शरीर क्षीणा ममार्था घिदगुलदहि ४ ५ १ ४ १ ३ जनयति खलु १ २०