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Gyan-pradipika

Pandit,.jyoti Achariya · 2012/08

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देवकुमार-ग्रन्थमाला का द्वितीय पुष्प (क)
ज्ञान-प्रदीपिका
अनुवादक अरि सम्पादक,
'ज्योतिषाचार्य पण्डित रामव्यास पाण्डेय
प्रकाशक,
निर्मलकुमार जैन
मन्त्री
श्रीजेन-सिदान्त-भवन, पारा ।
और संवत् २४६० (सन् १९३४)

ज्ञान-प्रदीपिका की विषय-सूची २ २० २३ मनुष्य काण्ड ... २५ ... २७ ३३ ३६ : १ ... (३) उपोद्घात काण्ड (२) आरूढ़ छत्र काण्ड (३) धातुचिन्ता काण्ड (४) मूल काण्ड (५) (६) चिन्तन काण्ड (७) धातु काण्ड (८) आरूढ काण्ड (8) नष्ट काण्ड (१०) रोग काण्ड (११) मरण काण्ड (१२) स्वर्ग काण्ड (१३) भोजन काण्ड (१४) स्वप्न काण्ड (१५) निमित्त काण्ड (१६) विवाह काण्ड (१७) तुरिका काण्ड (१८) काम काण्ड (१६) पुत्रोत्पत्ति काण्ड (२०) पुत्र प्रश्न काण्ड (२१) शल्य काण्ड ... (२२) कूप काण्ड (२३) मेना काण्ड (२४) यात्रा काण्ड (२५) वृष्टि काण्ड (२६) अर्घ्य काण्ड (२७) नौकाण्ड ... ४५ ... ... .. ... ... ... ... ... ७५ प्रस्तावना। प्रस्तुत (ज्ञान प्रदीपिका) पुस्तक जोतिष के उस भाग से सम्बन्ध रखती है जिसमे प्रश्न लग्न पर से फल बताया जाता है। उसे प्रश्नतन्त्र कहते हैं। नीलकण्ठ ने अपनी पुस्तक के अन्तिम अध्याय में इसी विषय का वर्णन किया है। और भी कई प्रश्नतन्त्र की पुस्तकें प्रचलित है प्रश्नतन्त्र के विषय में यह एक स्वतन्त्र और पूर्ण पुस्तक कही जा सकती है। इस प्रन्थ के रचयिता के नाम आदि के बारे मे जानने के लिये हमारे पास साधन नहीं है पर प्रारमिक मगलाचरण से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि वे जैन थे। अस्तुन जो प्रति हमारे सामने है यह अत्यन्त अशुद्ध है। पाठ शुद्ध करने का काई भो साधन नहीं है। इस विषय के अन्य ग्रन्थों से मिलान करने पर कुछ कुछ शुद्ध करने का प्रयत्न किया गया है। पर उसमे भी कठिनता यह है कि इस प्रन्य में फल कहने का प्रकार कहाँ कहाँ अन्य प्रन्यों से बिलकुल निराला है। यह बात एक प्रकार से मान ली गई है कि वर्षफल और प्रश्न फल इस देश मे यरनों के ससर्ग से प्रचलित हुये हैं। फिर भी इस ग्रन्थ में स्थान स्थान पर को विशेषताओ के देखने से जान पडता है कि इस शास्त्र का विकास भी अन्य शास्त्रों को तरह जेनो मे स्वतन्त्र और विलक्षण रूप से हुआ है। व्याकरण को अशुद्धियाँ ता प्रस्तुत प्रति में इतनी अधिक है कि उससे शायद ही कोई श्लोक बचा हो। उनके शुद्ध करने में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि प्रत्यकार का भार न बिगडने पावे। पदो के शुद्ध करने से जिस स्थान पर लाक को यन्दिश टूटती दिखाई दी वहां उसे वैसा ही छाड दिया गया। इसका कारण परम्परागत अशुद्धि समझो गई और उन्हें ज्या का त्यों विद्वानों के सम्मुख रखने का प्रयत किया गया। एक बात और। लग्न की जगह पर हर जगह प्रश्नलग्न समझना चाहिये। ग्रहों की स्थिति से प्रश्नकालिक प्रहों की स्थिति से प्राशय है जिस प्रकार इस बात को बार बार कहना ग्रन्यकार ने ठोक नहीं समझा उसी प्रकार अनुराद फता ने भी। कई स्थान पर लोक के श्लाक छूट और टूट गये हैं। यथासाध्य अन्य प्रन्यां से मिला कर उन्हें पूर्ण करने की चेष्टा की गई। फिर भी जा रह गये उन्हें विद्वान् पाठक सुधार लें। शीघ्रता, प्रमाद, आलस्य आदि कारणों से अशुद्धि रह जाने की समावना ही नहीं निश्चय है। गुणग्राही पाठक यदि सूचना देंगे ता सुधारने का प्रयत्न किया जायगा। । - I --अनुवादक विशेष-वक्तव्य। १-ज्योतिष-शास्त्र। जिस शास्त्र के द्वारा सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि ग्रहों को गति, स्थिति प्रादि एवं गणित जातक, हारा आदि का सम्यक् बोध हो उसे ज्योतिषशास्त्र कहते है। विद्वानो का मत है कि मिन्न भिन्न शास्त्री के समान यह शास्त्र भी मनुष्यजाति को प्रथमावस्था में अङ्कुरित हो ज्ञानोन्नति के साथ साथ क्रमश. संशोधित तथा परिवर्धित हाकर वर्तमान अवस्था को प्राप्त हुआ है। सूर्य चन्द्रादि अन्यान्य ग्रहों का स्वभाव ऐसौं अदभुत एवं अलौकिक है कि उनकी ओर प्राणिमात्र का मन आकर्षित हो जाता है। प्राचीन समय से हो इसको ओर सभी जातियों का ध्यान विशेषत आकृष्ट हुआ था और अपनी २ बुद्धि के अनुसार सभी लागां को इस लारोपयागो शास्त्र का यत्किञ्चिन् ज्ञान भी अवश्य था। इसी लिये चोन, प्रोक, मित्र आदि सभी जातियां अपने का ज्यातिषशास्त्र का प्रवर्तक मानती है। भारतीय प्राचीन विद्वानों ने ज्यातिष शास्त्र का सामान्यत दो रिभागा में विभक किया है। एक फलित और दूसरा सिद्धांत अयश गणित । फलित के द्वारा प्रह नक्षत्रादि की गति या सञ्चारादि देख कर प्राणियों की भावो दशा ( अवस्था) और कल्याण तथा अकल्याण का निर्णय किया जाता है। दूसरे सिद्धान्त अयया गणित के द्वारा स्पष्ट गणना कर के प्रह नक्षत्रादि को गति, एवं सस्थानादि क नियम, उनका स्वभाव और तजन्य फलाफलों का स्पष्टीकरण किया जाता है। आम्लेय विद्वान् फलित ज्यातिष को Astrology और गणित ज्यातिप को Astronomy कहते है। पर यहां एक बात में कद्दे देता हूँ, गणितज्ञ फलितज्ञों को सदा उपेक्षा दृष्टि से देखने आये है। इस धारणा की पुष्टि में भारतीय गणकशिरोमणि डाकर मणेशी जी का कथन है कि जन्मकालीन प्रहनत. नादि को स्थिति देख कर अनुक समय में हमें सुख और अनुक समय मे दुःख होगा इसको जानना न काई करसाध्य बात है और न उसमे कोई रिशेष लाम ही है। खेर, यह एक विहारविश्य है, प्रत यहाँ मै इस विषय में विशेष उलझना नहीं चाहता हूँ। अब सामुद्रिक शास्त्र को लीजिये। सामुद्रिक भी फलित ज्यातिष का एक सास विभाग है। इस शास्त्र के द्वारा हस, पाद, और ललाट को रेखा एवं मिन्न २ शरीरस्य विह देख कर मनुष्य का भूत, भविष्य और वर्तमान काल सम्बन्यो शुभाशुभ फल जाना (ख) जाता है। इस विद्या का अंग्रेजो में Palmispy अयया Chiromaney कहते हैं। मुख्यतया हस्ताड़ित रेखादि देख कर हो इस शास्त्र के द्वारा शुभाशुभ फलों का निर्देश किया जाता है। विद्वानों ने सामुद्रिक शास्त्र को अधिक महत्व क्यों दिया है, इसका खुलासा नीचे किया जाता है। यद्यपि शरीर के प्रत्येक अङ्ग में शुभाशुभयोधक चिह्न विद्यमान है। किन्तु वे चिह्न विशेष रूप से स्पष्ट हथेली में ही पाये जाते है। स्वभावतः हस्त का विशेष महत्व देने का हेतु एक और भा है। हमार सभा काम हाथ से हो हाते है। मगल और कार्यों का करनेवाला यहो है। अतः इसो हाथ पर शुभाशुभ विट्ठों का चित्रण करना उपयुक्त हो है। इसके साथ २ एक मोर भो बात है, अगर मनुष्य में इस विद्या का शान और अनुभा हा वह अपना हाथ स्वयं अन्य प्रगा को अपेक्षा आसानी से देख सकता है। यह कार्य अन्य किसी अड्डू से सुलभ नहीं हो सकता। इसो से हस्त का रेखा परिक्षान के लिये विशेष स्थान प्राप्त है। विद्वाना का मत है कि इसके आविष्कारक हाने का.सौभाग्य भारत को ही प्रात है। यहां से चीन भार प्रोक में इस विद्या का प्रचार हुमा। पथाउ प्रोक से यारप के अन्यान्य भागों में यह विद्या फैली। ऐतिहासिक विद्वानों का यह भी अनुमान है कि ईसा के लगभग ३००० वर्ष पूर्व चीन में एवं २००० वर्ष पूर्व प्रीक में इसका प्रवार हुआ। अतः निम्रान्तरूप से यह जाना जा सकता है कि भारत में इसके पहले से ही इसका प्रवार रहा हागा। हाथ में जितनो ही कम रेखायें हागो और हाथ साफ रहेगा यह पुर उतना ही अधिक भाग्यशाली समझा जाता है। हथेली के प्रधानतः सात रेखामा पर हो विचार हाता है। (१) पितृरेखा (२) मातृ- रेखा (३) भायूरेखा (६) भाग्यरेखा (५) चन्द्ररखा (६) स्वास्थ्यरेखा और (७) धनरेखा। इनमें आदि के चार प्रधान है। इनके अतिरिक सम्मान, श, मित, धर्म, अधर्म आदि और भी कई रेखायें होती है। अस्तु इस विषय को यहां अधिक बढ़ाना अप्रासंगिक होगा। अम मुझे यहां पर यह विचार करना है कि प्रहों के शुभाशुभ फलकथन के सम्बन्ध में लोगों की क्या धारणा है। वैज्ञानिकों का कथन है कि मनुष्य अपने अपने फर्मानुसार ही समय समय पर सुखो या दुःखी हुमा करते हैं। उनके उस सुख-दुख में सूर्य चन्द्रादि गोल के प्रह कारण नहीं है। हाँ, प्रहों की स्थिति के अनुसार प्राणियों के भावो कल्याय या भकल्याण का भनुमान किया जा सकता है। प्रहों के अनुसार भविष्य में विपति की सम्भावना होने पर उसको दूर करने के लिये शान्ति का अनुदान करने से प्राणियों को फिर उस विपत्ति का प्रास नहीं होना पड़ता मादि । प्रस्तु, हानिकों का प्रहालसमन्धी यह मन्तव्य जैनधर्म के प्रहालसम्बन्धी मन्तव्यों - ..

प्रत से सर्वथा मिलता है। विद्वानों का कथन है कि जैनधर्म एक वैज्ञानिक धर्म है। उल्लिखित मन्तव्य की पफता मुझे तो नितान्त ही उचित जचती है। किसी किसी ज्योतिषी का यह भी मत है कि अन्यान्य कारणो के समान प्रहों का अवस्थान भी मानव के सुख- दुख में अन्यतम कारण है। जो कुछ हो, ग्रहों की स्थिति से भी मनुष्यों को शुभाशुम फलों की प्राप्ति होती है इससे तो सभी सहमत होंगे। २-दिगम्बर जैन साहित्य में ज्योतिषशास्त्र का स्थान । प्रथमानुयोगादि अनुयोगों में ज्योतिषशास्त्र को उच्च स्थान प्राप्त है । गर्भाधानादि अन्यान्य सस्कार एवं प्रतिष्ठा, गृहारभ, गृहप्रवेश आदि सभी मांगलिक कार्यो के लिये शुभ मुहर्त का ही आश्रय लेना आरण्यक बतलाया है। तीर्थङ्करों के पांचों कल्याण एवं भिन्न भिन्न महापुरुषों के जन्मादि शुभमुहूर्त में ही प्रतिपादित है। जैन वैधक तथा मंतशास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थों में भी मंगल मुहूर्त में ही औषध सम्पन्न एव ग्रहण और शान्ति, पुष्टि, उच्चाटन आदि कर्मों का विधान है। कर्मकाण्ड सम्बन्धी प्रतिष्ठापाठ आराधनादि ग्रन्थों में भी इस शास्त्र का अधिक आदर दृष्टिगोचर होता है। यहीं तक नहीं प्राधाएकादि जो फुटकर स्तोत्र हैं उनमें भी ज्योतिष की जिक्र है। बल्कि नवप्रहपूजा अन्यान्य आराधना आदि अन्यों ने प्रहशान्त्यर्थ ही जन्म लिया है। मुद्रारातसादि प्रावीन हिंदू एवं बौद्ध मयों से भी जैनी ज्योतिष के विशेष विज्ञ थे यह बात सिद्ध होती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री हुवेनच्चांग के यानाविधरण से भी जैनियो की ज्योतिपशास्त्र की विशेषज्ञता प्रकटित होती है। उलिखित प्रमाणों से यह बात निग्विाद सिद्ध होती है कि जैन साहित्य में ज्योतिष- शास्त्र कुछ कम महत्व का नहीं समझा जाता था। ३--दिगम्बर जैन ज्योतिष ग्रन्थ,। मायहान तिलक आदि दो एक अन्य को छोड कर आज तक के उपलब्ध दिगम्बर जैन ज्योतिष प्रन्यों में मौलिक अन्य नहीं के बराबर है। हां, संख्यापूर्ति के लिये निनेन्द्रमाला, केवलज्ञानहोरा, अर्हन्तपासावली, चन्द्रोन्मीलन प्रश्न आदि कतिपय छोटी मोटी प्रतियाँ उपस्थित को जा सकती है। परन्तु इन उलिखित रचनाओं से न जैन ज्योतिष प्रन्यो की कमी की पूर्ति ही हो सकती है और न जैन साहित्य का महत्त्व एवं गौरव हो व्यक्त हो सकता है। यही बात जैन वेधक के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। सचमुव दर्शन, न्याय, व्याकरण, काव्य अलङ्कारादि विषयों से परिपूर्ण जैन साहित्य के लिये यह बुदि .

- (घ) विशेष सटकती है। हाँ, प्रारत एवं संस्कृत साहित्य की अपेक्षा जैन कन्नड साहित्य ने इस विषय में कुछ प्रागे पैर पढ़ाया है अवश्य। फिर भी यह सन्तोषप्रद नहीं है, क्योंकि तद्विषयक वे प्रन्य संस्कृत ग्रन्थों की छायामात्र है। अर्थात् यहां भी मौलिकता की मइफ नहीं है। इस त्रुटि का कारण मुझे तो और ही प्रतीत होता है। जैन साहित्य में मौलिक ग्रन्थों के लेखक ऋषि महर्षि ही हुए है। साथ ही साथ जैन धर्म निवृत्तिमार्ग को प्रतिपादक सर्वोच्च लक्ष्य को लियो हुआ एफ उत्कृष्ट धर्म है। इसी से झात होता है कि विषय-विरक्त एवं आध्यात्मिक रसिक उन ऋषि महर्षियों का ध्यान इन लौकिक अन्यों की ओर नहीं गया। या उन्होंने सोचा होगा कि हिन्दू धंधक तथा ज्योतिष प्रन्यों से भी जिज्ञासु जैनियों का कार्य चल सकता है। पयोंकि धर्मविरुद्ध पुछ बातों को याद कर हिन्दू एवं जैन वैद्यक तथा ज्योतिष प्रर्यों में विशेष अन्तर नहीं पाया जाता है। फन्नड़ माहित्य के लेखक अधिक संख्या में गृहस्य ही थे। अत: उनकी रूचि उस ओर अधिक भार हाना म्वाभाविक ही कहा जा सस्ता है। अन्तु फिर भी खोज करने पर इस विषय के मौरिफ प्रन्य अश्य हो उपरब्ध हो सकते है। अतः साहित्यमियों को इस कार्य की और अरश्य ध्यान देना चाहिये। ग्वास कर र्णाटक प्रांत के ग्रामों में खोज करने में इस सम्बन्ध में विशेष मारता मिल सकती है।

- ज्ञानप्रदीपिका के सम्बन्ध में पण्डित जी के प्रतिपादित उक्त विचारों के अतिरिक्त "जैन मित्र" वर्ष २४ अङ्क १२ में प्रकाशित 'केरल प्रश्नशास्त्र" शीर्षक लेख का कुछ अंश भी भन्वेषक विद्वानों के लामा निनादित किया जाता है इस लेख में लेखक ने सम्बत् १९३१ में काशी से मुद्रित "कैरल प्रश्नशास्त्र" नामक एफ पुस्तक के कुछ वाक्यों को उद्धत फर लिखा है कि ये वाक्य उमास्वामित तस्वार्थ सूत्र के है, अत: यह अन्य किसी जेनाचार्य का ही प्रणीत होना चाहिये। बल्कि अपनी इस धारणा को पुष्ट करने के लिये लेखक लिखते हैं कि इसी नाम का ( केरल प्रश्नशास्त्र ) एक और पुस्तक सम्बत् १९८० में वेक्टेश्वर रेस यम्बई में प्रकाशित हुआ है। इसके रचयिता पं० नन्दराम है। पण्डित जी ने अपनी कृति के प्रारंभ में लिखा है कि "यद्यपि मिथ्या पण्डिताभिमानी श्वेताम्बरों के द्वारा एतद्विषयक बहुत से प्रबन्ध रने गये हैं, परन्तु छन्द व्याकरणादि दोषों से दूषित वे प्रबन्ध अरम्य हैं। इसी लिये सक्षिप्त रूप में मै इस प्रन्य की रचना करता है।" यही पण्डित जी आगे फिर, लिखते हैं कि "श्वेतवस्त्रधारी एवं बद्धास्य (मुंहढके हुए ) ऐसे नास्तिक, कुज, अन्ध, बधिर, बन्च्या, विकलांग पर कुठादि रोगमस्त प्रादि व्यक्तियों को छोड कर ही अन्यान्य लोगों से पण्डित प्रश्न फहे।" पल्कि इन्होंने एक जगह यह भी लिखा है कि ""वेताम्बर जैनो ने जो चन्द्रोन्मीलन नामक ग्रन्थ रखा है वह छन्द व्याकरणादि से दूषित है, श्रत यह रिद्वन्मान्य नहीं हो सकता है" इस अन्य को समाप्ति इन्होंने १८२४ आश्विन शुक्ल सप्तमी को की है। जैन मित्र के लेखक अन्त में लिखते हैं कि उपर्युक्त कथन से इस "केरल प्रश्न शास्त्र" के मूल लेखक ग्वेताम्बर स्थानकवासी ही स्पष्ट सिद्ध होते है। मैंने इस गत का उल्लेख यहाँ पर इसलिये कर दिया है कि इस ज्ञानप्रदीपिकाको मैसोर की प्रति के प्रारम्भिक पृष्ठ में 'ज्ञानप्रदीपिका' इस नाम के नीचे कोष्ठक में "केरलप्रमग्रन्य" म मुद्रित है। परन्तु ज्ञानपदीपिका और जैनमित्र से उक लेखक के द्वारा प्रतिपादित केरल प्रश्न शास्त्र ये दोनों एक नहीं कहे जा सकते, क्योंकि इस मुद्रित भवन की 'ज्ञान प्रदीपिका' में कहीं भी तत्वार्थ सूत्र के सूत्र या उनके भाग नहीं पाये जाते। हो, इससे इतना अवस्य ज्ञात होता है कि जेन विद्वानों ने केरल प्रश्नशास्त्र के नाम से भी एतद्विषयक अन्य रचा है। उल्लिखित कथन से यह भी ज्ञात होता है कि भारतीय अन्यान्य ज्यातिधिदों के द्वारा फेरल प्रश्न शास्त्र के नाम से कई अन्य रचे गये हैं। उक्त लेख से यह भी मालूम होता है कि ज्ञानप्रदीपिका और चन्द्रामोलन इन दाना फे कर्ता श्वेताम्बर जैन है। किन्तु इस सम्बन्ध में जब तक कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता तब तक इसे श्वेताम्बर त निम्रान्त नहीं कहा जा सकता। क्योंकि दिगम्बर विद्वान् इसे दिगम्बर रचित हो मानते है। - " " " " " १८ M " खैर, श्वेताम्बर हो या दिगम्बर जैन साहित्य हो, इसे जैनीमात्र को अपनाना चाहये । परन्तु यहां पर यह प्रश्न उठ सकता है कि मुद्रित घे अन्य अगर जैन है तो मंगलाचरण का परिवर्तन कैसे ? मंगलावरण एवं अन्तरंग कलेवर को कुछ उलट-पुलट कर जैनेतर विद्वानों के द्वारा प्रकाशित त्रिविक्रमदेवकृत प्राप्तव्याकरणादि कुछ जैनग्रन्थ हमलोगों के सामने उपस्थित है, अतः संभव है कि उन्हों की तरह इसमें भी कुछ उलट पलट कर दी गयो हो। राय बहादुर होरालाल एम० ए० ने भी स्वसम्पादित "Catalogue of Sanskrit and Prakrit Manuscripts in the central province and Berar" नामक विस्तृत प्रन्यसूची में इस शानप्रदीपिका को जैन मन्थों में ही शामिल किया है। अब इस सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रन्यों के अन्दर भी स्थूलदृष्टि से एकबार नजर दौडाना आपल्या प्रतीत होता है। "निर्दिष्ट लक्षणं चैव सामुद्रवचनं यथा"। (सा शा०पू०१प्लोक ३) "शतवर्षाणि निर्दिष्टं नारदस्य बचो यथा"।। "पुरुषत्रितयं हत्वा चतुर्थे जायते सुखम्"। ( इसी प्रकार -"श्रादित्यारौ पुनर्भूः स्यात्प्रश्ने वैवाहिके वधूः (शा०प्र० पृ०४६ श्लोक १५ आदि ) मैं समझता है कि उक्त श्लोकान्तर्गत कुछ सिद्धान्तों से फतिपय जैन विद्वान प्रस्तुत प्रन्यों को जैनाचार्यों के द्वारा प्रणीत मानने का प्रायः तैयार नहीं होंगे। किन्तु इसीके उत्तर में अन्यान्य कई जैन विद्वानों का ही कहना है कि ज्योतिष, वैद्यक, मन्त, नीति आदि विषय लौकिक एका सार्वजनिक है। अतः तद्विषयक ये प्रन्दसर्यथा जैन दर्शन के अनुकूल ही नहीं हा सकते अर्थात् कुछ बातें प्रतिकूल भी हो सकती है। इस बातको पुष्ट करने के लिये ये विद्वान भद्रपाइसंहिता अर्हन्नीति आदि प्रन्यों को उपस्थित करते हैं। उन्हीं विद्वानों का यह भी कहना है कि एतद्विषयक इन लौकिक प्रन्यों में भिन्न भिन्न प्रहों के योग से पुरापान- पती, घेण्या, प्रथा, व्यभिचारिणी, परपुरुषगामिनी आदि होती है, पेसा मो उल्लेख मिलता है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि सार्वजनिक लौशिक प्रन्यों में ये सब पात उपलब्ध होना स्वाभाविक है। खैर, मतविमिन्नता सदा से चली या रही है और घलती ही रहेगी। इस विषय में मुझे नहीं पहना है। प्रब भन्येक विद्वानों से मेरो यही प्रार्थना है कि मेरे द्वारा उपस्थित को हुई प्रस्तुत ये सामप्रियाँ उक्त अन्य जैनाचार्य-प्रणोत निन्ति सिद्ध करने के लिये पर्यात नहीं है, प्रतः इस सम्बन्ध में विशेष साज करके सबल प्रमापों को विद्वानों के सामने उपरिपत कर इस विषय को हल कर दें।

५--मूल ग्रन्थ तथा अनुवाद । "श्रीजैन सिद्धान्त भवन" के सुयोग्य मंत्री एवं साहित्यसेवी जिनवाणीभक्त स्वगीय बाबू देवकुमार जी के आदर्श सुपुत्र श्रीमान् वावू निर्मल कुमार जी के द्वारा अपने पूज्य पिता जो के स्मारक रूप में संचालित "श्रीदेवकुमार प्रन्थ-माला" में कतिपय मौलिक एवं लुप्तप्राय जैन वैद्यक तथा ज्यातिप ग्रन्या का उद्धार करने को आप की उत्कट अभिलाषा चिरकाल से सञ्चित थी। किन्तु तत्सम्बन्धी कोई मौलिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होने से अपनी उस प्रबल शुभेच्छा का उन्हें कुछ समय तक दवा रखना पडा। विशेष अन्वेषण करने पर भी जब काई महत्वपूर्ण उद्दिष्ट प्रन्य प्राप्त नहीं हुआ। तब उन्होंने कहा कि इस समय भवन में रक्षित सामुद्रिक ज्ञानपुदीपिका और चन्द्रोन्मोलन प्रश्न सम्मिलित इन्हीं प्रन्थों का सानु वाद समाज के सामने समुपस्थित करना श्रेयस्कर होगा । बस, इसो निर्णयानुसार इन प्रथा के अनुवाद तथा संपादन का भार इस विषय के विशेषज्ञ एव सुयोग्य विद्वान् ज्याति- पाचार्य पडिर रामघास तो पापडेय अध्यापक हिंदू विश्वविद्यालय बनारस का सौंपा गया। अवकाशाभाव के हेतु उक्त वे ग्रंथ दीर्घकाल तक उन्हों के पास पड़े रहे। अंततोगत्वा 'चन्द्रामोलन' का छाडकर शेष दा ग्रंथ सानुवाद उनसे प्राप्त हा गये जा आप सबों के सम्मुख उपस्थित है। ज्योतिषाचार्य जी के कथनानुसार उक्त प्रथ उनसे विशेष अशुद्ध थे,अयश्य, फिर भी मैं यही कहूंगा कि पण्डित जी इनके सम्बन्ध में कुछ अधिक छानबीन करते तो ये प्रथ कुछ और ही आकार में आप सबों के सामने उपस्थित किये जाते। खेद की बात है कि मूल एवम् अनुवाद में बहुत सो त्रुटियां रह गयो है। अतु, जिस समय इन प्रन्यों को प्रकाशित करने का विचार पक्का हुमा तभी से इनको अन्यान्य प्रतियों की खोज ढूंढ करने का क्रम जारी रहा। परन्तु अनेक अन्य भागडरों की सूचियाँ टटोल ने पर भी इस सामुद्रिक शास्त्र का पता कहीं भी नहीं लगा। हाँ, सौभाग्य से कारंजा एवं मैसोर राजकीय पुस्तकालय को प्रन्यनामावली में ज्ञानप्रदीपिका का नाम दृष्टिगत हुआ। इसके बाद ही कारंजा के प्रन्यभाण्डार के प्रबन्धक को दो पन दिये गये। पर खेद को बात है कि प्राय भेजना ता दूर रहा पत्रात्तर तक नदारद । मेसोर से भी पहले कोई सन्तोषजनक पत्रोता नहीं मिला। किन्तु भवनस्थित इसी अशुद्ध प्रति को ज्यों स्यों कर छप जाने के उपरान्त श्रीमान् श्रद्वय न्यायतीर्थ ए० शान्तिराज शास्त्रीजी को रुपा से केवल दो सताह के लिये मौसार को प्रति प्रात हो सको। यह प्रति मुद्रित थी। इसो का मूल पाठ फिर पोछे छपाकर प्रारंभ में जाड दिया गया। मरन की प्रति से यह प्रति कुछ विशेष शुद्ध है। फिन्नु जहाँ पर मेतार को प्रति में भी सन्देह जान पड़ा वहाँ पर सन्दिप पाठ का छोड कर मान की प्रतिका या स्वतन्त्र शुद्ध पाठ रखने की ही चेष्टा की गयी है। इसी से मूल पाठ और अनुयाद में सर्वत्र एकीकरण होना असभव है। अस्तु मै अब विज्ञ पाठको फा विशेष समय नहीं लेना चाहता हूँ। आगे इस ग्रन्थ माला में श्रीमान् बाबू निर्मल कुमार जी की शुभभावनानुकूल हो वैघसार" "अकलङ्क संहिता" (वैद्यक) "आयज्ञान तिल्क" (ज्योतिष) ये अपूर्व मौलिक जेन अन्य क्रमश प्रकाशित होगे। संघसार का अनुवाद जारी है। इसके अनुवादक आयुवेदाचार्य पण्डित सत्पन्धर जीजैन काल्यतीर्थ छपारा है । श्राप का कहना है कि यह प्रन्य बडा ही महत्त्वपूर्ण है और इसम करोब डेढ सो प्रयोग प्रात स्मरणीय प्राचार्यप्रवर पूज्यपाद जी के हैं। इसका कुछ विशेष परिचय मुरादाबाद से प्रकाशित होने वाले सर्वमान्य पत्र "वैद्य" मैं शीघ्र ही प्रकाशित हागा। पूर्व निश्चयानुसार 'च द्रोन्मीलन प्रश्न ज्यातिष प्रन्थ का भी प्रकाशित करने का विचार पहले था। परन्तु इसकी शुद्ध प्रति के अभाव से इस विचार को अभी स्थगित करना पडा। अन्त में विज्ञ पाठकों से मेरा यहा नम्र निवेदन है कि इस साहित्यसेवा कार्य में समुचित सहायता प्रदान कर इस प्रथमाया के सचालफ श्रीमान् निमल युमारजी का उत्साह बढ़ायेंगे कि जिससे समय समय पर भवन से उत्तमातम प्रय रन प्रकाशित होता शान्ति ! शाति !! शान्ति !!! भपन-फाल्गुन कृष्ण पञ्चमी रविवार वि० स० १६१० घोर सं० २४० साहित्य संघक- के. भुजवली शास्त्री पुस्तकालयाध्यक्ष

ज्ञान-प्रदीपिका
(ज्योतिपशास्त्रम्)
श्रीमदवीरजिनाधीशं सर्वशं विजगदगुरुम् ।
प्रातीहार्याष्टकोपेतं प्रकृष्टं प्रणमाम्यहम् ॥१॥
त्रलोक्यनायक, सर्वज्ञ, अशोक वृक्षादि आट मातिदायों से युक्त, प्रकृष्ट श्रीमहावीर-
स्वामी को मैं प्रणाम करता है।
स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मीयां भारतीमाईती सतीम् ।
अतिपूतामद्वितीयामहर्निशमभिष्टुवे ॥२॥
स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयस्यापिणी, पूज्या सनी, अत्यन्त पनि और अद्वितीय
श्रोजिनवाणो देवी को मैं ( अन्यकार ) रातदिन स्तुति करता है।
ज्ञानप्रदीपकं नाम शास्त्रं लोकोपकारकम् ।
प्रश्नादर्श प्रवक्ष्यामि पूर्वशास्त्रानुसारतः ॥३॥
पहले के कहे हुए शास्त्रों के अनुसार लोक के उपकारक ज्ञानप्रदापिका नामक
प्रभतंत्र के मादर्श शास्त्र को कहूगा।
भूतं भव्यं वर्तमानं शुभाशुभनिरीक्षणम् ।
पंचप्रकारमार्ग च चतुप्केन्द्रवलावलम् ॥४॥
आरूढछत्रवर्ग चाभ्युदयादिबलाबलम् ।
क्षेत्रं दृष्टिं नरं नारी युग्मरूपं च वर्णकम् ॥५॥
मृगादिनररूपाणि किरणान्योजनानि च।
आयूरसोदयायञ्च परीक्ष्य कथयेद बुधः ॥६॥

ज्ञान-प्रदीपिका
भूत, भविष्य, वर्तमान, शुभाशुभ दृष्टि, पांच मार्ग, चार केन्द्र, यलादल, आरूढ़, छत्र,
घर्ग, उदय पलं, यस्तयल, क्षेत्र, दृष्टि, नर, नारी, नपुंसक, वर्ण, मृग तथा नर आदि रूप
किरण, योजन. आयु, रस, उदय आदि की परीक्षा करके बुद्धिमान् को फल कहना
चाहिये।
-
चरस्थिरोभयान् राशीन् तत्प्रदेशस्थलानि च ।
निशादिवससंध्याश्च कालदेशस्वभावतः ॥७॥
चर, खिर, द्विस्वभाव राशियां, उनके प्रदेश, दिन, रात, सन्ध्या का कालादेश, राशियों
का स्वमाय:-
धातुमूलं च जीवं च नप्टं मुष्टिं च चिन्तनम् ।
लाभालाभं गदं मृत्यु भुक्तं स्वप्नच शाकुनम् ।।८।।
धातु, मूल, जोर, नष्ट, मुष्टि, लाभ, हानि, रोग, मृत्यु, भोजन, शयन और शकुन
सम्बन्धी प्रश्न-
जातकर्मायुधं शल्यं कोपं सेनागमं तथा ।
सरिदागमनं वृष्टिमध्ययं नौसिद्धिमादितः ॥६॥
जन्म, फर्म, अस्त्र, शल्य (एडी), फोप, सेना का आगमन, नदियों की पाद, वर्षा,
अवर्षण नौकासिद्धि मादि,-
क्रमेण कथयिष्यामि शास्त्रे ज्ञानप्रदीपके ।
इन बातों को रस शानप्रदीपक शास्त्र में मामशः फहगा।
इत्युपोद्घातकाण्डः
अथ वक्ष्ये विशेषेण ग्रहाणां मित्रनिर्णयम् ॥१०॥
मय ग्रहों की मैत्री का वर्णन परेंगे।
भौमस्य मित्रे शुक्रज्ञो भृगोमरार्किमंत्रिणः ।
आदित्यस्य गुरुमिन्नं शनेविदगुरुभार्गवाः ॥१॥
भास्करण विना सर्वे बुधस्य सुहृदस्तथा ।
चन्द्रस्य मित्रे जीवज्ञो मित्रवर्गमुदाहृतमः ॥२॥

मोरमकर का मित्र गुराह! इस मार राशियार प्रहों को मंत्री बताई गयी। N ज्ञाप-प्रदीपिका। मंगल के मित्र शुक्र और बुध, शुक्रके वुध, मंगल, शनि और बृहस्पति; सूर्य के वृह- स्पति, शनि के घुघ, वृहस्पति और शुक्र, बुध के मित्र सूर्य को छोड कर समी तथा चन्द्रमा के मित्र वृहस्पति और धुध हैं। सिंहस्याधिपतिः सूर्यः कर्कटस्य निशाकरः । मेपवृश्चिकयोभौमः कन्यामिथुनयोर्बुधः ॥३॥ धनुमीनयोमंत्री तुलावृपभयो गुः । शनिर्मकरकुंभयोश्च राशीनामधिपा इमे ॥४॥ सिंह राशि का स्वामी सूर्य, कर्क का चन्द्रमा, मेप वृप का मंगल, कन्या और मिथुन का बुध, धनु और मीन का वृहस्पति, तुला और वृष का शुक्र, मकर और कुंभ का स्वामी धनुर्मिथुनपाठीनकन्योक्षाणां शनिः सुहृत् । रविश्चापान्त्ययोरारः तुलायुग्मोक्षयोपिताम् ॥५॥ धनु, मिथुन, मोन, कन्या, वृष राशियों का मित्र शनि है। धनु मौन का मित्र रवि है। तुला, मिथुन, वृप और कन्या को मित्र मंगल है । कोदण्डमीनमिथुनकन्यकानां शशी सुदृत् । वुधस्य चापनक्रालिकय॑जोक्षतुलाघटाः ॥६॥ धनु, मौन, मिथुन और कन्या का मित्र चन्द्रमा है । धनु, मकर, धिक, फर्क मेष, वृष, तुला और कुंभ का मित्र बुध है। क्रियामिथुनकोदण्डकुंभालिमकरा भृगोः । गुरोः कन्या तुला कुंभमिथुनोक्षमृगेश्वराः ॥७॥ राशिमै ग्रहाणां च मैत्रमेवमुदाहृतम् । मेष, मिथुन, धनु, कुंभ वृश्चिक, मकर पा मित्र एक तथा पन्या, तुला, कुंभ, मिथुन, सूर्येन्द्रोः परिधेर्जीवा धूमज्ञशनिभोगिनाम् ॥८॥ शरुचापकुजणानां शुकस्योच्चास्त्वजादयः ।

शान-प्रदीपिका। सूर्य का मेप, चन्द्रमा का वृष, परिधि का मिथुन, घृहस्पति का कर्फ, धूमका सिंह, घुध का कन्या, शनि का तुला, राहु का वृश्चिक, इन्द्र धनु का धन, मंगल का मकर, केतुका मोर शुक्र का मीन यह उच्च राशियां क्रमसे होती है। 'अत्युच्चं दर्शनं वह्निर्मनुयुक् युक च तिथीन्द्रियः ॥६॥ सप्तविंशतिकं विंशभागाः सप्तग्रहाः क्रमात् । सूर्य मेप में दश अंश पर, चन्द्रमा वृप में ? अंश पर, मंगल मकर में २८ अंश प', धुध कन्या में १५ अंश पर, वृहस्पति कर्क में ५ अंश पर, शुक्र भोन में २६ अंश पर, और शनि तुला में २० अंश पर उच्च के होते हैं। बुधस्य वैरी दिनकृत् चन्द्रादित्यौ भृगोररी ॥१०॥ बृहस्पते रिपुभीमः शुक्रसोमात्मजो विना । शनेश्च रिपवः सर्वे तेषां तत्तद्ग्रहाणि च ॥११॥ घुघ का धैरी सूर्य, शुक्र के शनु सूर्य और चन्द्र, वृहस्पति के मंगल, शनि के शत्रु बुध, शुक्र को छोडकर सभी प्रद है। खेर्वणिगलिस्त्विन्दोः कुलीरोंऽगारकस्य च । बुधस्य मीनोऽजः सौरेः कन्या शुक्रस्य कथ्यते ॥१२॥ सुराचार्यस्य मकरस्त्येतेषां नीचराशयः । रवि फी नीच राशि तुला, चन्द्रमा की वृधिफ, मंगल की फर्ष, बुध की मोन, घृह. स्पति की मार, शुक्र, की कन्या और शनि की मेप नीच राशि है। राहोईपयुगशक्रधनुप्केण मृगेश्वराः ॥१३॥ परिवेशस्य कोदण्डः कुंभो धृमस्य नीचभूः । मित्रस्तुला नककन्यायुग्मचापझपास्त्वहः ॥१॥ कुंभक्षेत्रमहेः शत्रुः कुलीशे नीचभूः क्रियाः । राहु या वृष, इन्द्र धनु पासिंद, परिवेशका धनु धृन का कुम्म पे नीच राशियां होती है। राष्ट्र के लिये तुला मपर चन्या मिथुन धनु योर मौन ये मित्र राशियां होती है और कुंभ राशि शक्क राशि पदो जाती है तथा पर्फ मेप ये नीच राशियां होती है। - - । - शान-प्रदीपिका। उदयादिचतुष्कं तु जलकेन्द्रमुदाहृतम् ॥१५॥ तच्चतुथं चास्तमयं तत्तुयं वियदुच्यते । तत्तुर्यमुदयं चैव चतुप्केन्द्रमुदाहृतम् ॥१६॥ लम से चौथे स्थान को जलकेन्द्र कहते हैं। चतुर्थ स्थान से जो स्थान चौथे हैं उसे मस्तमय कहते हैं। सप्तम स्थान से चतुर्थ स्थान को 'वियत्' यानी दशम कहते हैं उससे भी चौथे को उदय या लग्न कहा जाता है। ये चारों स्थान केन्द्र कहे जाते हैं। चिन्तनायां तु दशमे हिवुके स्वप्नचिन्तनम् । छत्रे मुष्टिं चयं नष्टमात्येश्वारूढतोऽपि वा ॥१७॥ : चिन्ता के कार्य में दशम स्थान से और स्वाचिन्तन में चतुर्थ स्थान से तथा छत्र मुष्टि वृद्धि नष्टपाप्ति इत्यादि यातों का ज्ञान लग्न से होता है। चापोक्षकर्किनकास्ते पृष्ठोदयराशयः। तिर्यदिनवलाः शेषा राशयो मस्तकोदयाः ॥१८॥ धनु, वृष, कर्क, मकर-ये राशियों पृष्ठोदय है। ओर दियावली अर्थात् सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और कुंभ ये शीर्षोदय है। शेष राशियां भी शीपर्योदय हैं (पृहना तक के अनुसार मीन और मिथुन उमयोदय हैं।) अर्काङ्गारकमन्दास्तु सन्ति पृष्ठोदया ग्रहाः । राहुजीवभृगुज्ञाश्च ग्रहाः स्युर्मस्तकोदयाः ॥१६॥ उद्यतस्तिर्यगेवेन्दुः केतुस्तत्र प्रकीर्तितः । मोर सूर्य, मंगल और शनि पृष्ठोदय प्रह, राहु, वृहस्पति, मस्तफोदप तया केतु और चंद्र तिर्यगुदय प्रद है । उदये वलिनी जीववुधौ तु पुरुषो स्मृतौ ॥२०॥ अन्ते चतुष्पदो भानुभूमिजो बलिनौ ततः। चतुर्थे शुकशशिनौ जलराशो बलोत्तरी ॥२॥ अर्यही घलिनो चास्ने कीटकाश्च भवन्ति हि । शुक्र युध ६ ज्ञान प्रदीपिका। । बुध और वृहस्पति पुरुष ग्रह है और लग्न में बलयान् होते है। सूर्य और मंगल चतुष्पद प्रह है और अन्त में बलवान होते हैं। शुभ और चन्द्र जलचर है और चतुर्थ तथा जल राशि में (कर्क मीन ) बलवान् होते हैं। शनि और राहु कीट ग्रह है और मस्त यानी सप्तम में बलवान् होते हैं। युग्मकन्याधनुःकुंभतुला मानुपराशयः ॥२२॥ अन्त्योदयौ मीनमृगौ अन्ये तत्तत्स्वभावतः। मिथुन, कन्या, धनु, कुम्भ और तुला ये मनुष्य राशि है । मकर और मीन अन्त्योदय राशि है। शेष अपने अपने स्वभाव के अनुसार चतुप्पादौ मेपवृपो सिहचापो भवंति हि ॥२३॥ कुलीशाली बहुपादौ प्रक्षीणो मृगमीनभो । द्विपादाः कुंभमिथुनतुलांकन्या भवंति हि ॥२४॥ मेष, वृष, सिंह और धनु ये चतुष्पद फर्क और वृश्चिक ये घहुपाद, मकर गौर मीन -ये क्षोण पाद तथा कुंभ, मिथुन, तुला और कन्या ये द्विपाद राशि है । द्विपादा जीववित्शुका शन्याराश्चतुष्पदाः । शशिसो बहुपादो शनिसौम्यौ च पक्षिणी ॥२५॥ शनिसो जानुगतो पदभ्यां यान्तीतरे ग्रहाः । बृहस्पति घुघ शुक इनकी द्विपद सहा है तथा शनि सूपं मंगल इन ग्रहों की चतुष्पद संझा कही गई है, चन्द्रमा राहु ये पहुपद तथा शनि घुध ये पक्षिसंज्ञफ यह जाते है। शनि और राहु की जानु गति होती है और इन से मिन्न प्रह पैर से चलते है । उदीयतेऽजवीथ्यां तु चत्वारो वृषभाठयः ॥२६॥ युग्मवोच्यामुदीर्यन्ते चत्वारो वृश्चिकादय । उक्षवीथ्यामुदोर्यन्ते मीनमेपतुलास्त्रियः ॥२७॥ पृप, मिथुन, पर्ष सिंह ये मेप पीथी में वृधिप, धन मपर शोर पुम मिषन पीयो में, मौर मीन, मेप तुला मोर कन्या पृष पीपी में पहे गये है।

शान-प्रदीपिका
राशिचक्र समालिख्य प्रागादि वृपादिकम् ।
प्रदक्षिणक्रमेणैव द्वादशारूढसंज्ञितम् ॥२८॥
वृषश्चैव वृश्चिकस्य मिथुनस्य शरासनम् ।
मकरश्च कुलीशस्य सिंहस्य,घट उच्यते ॥२६॥
मोनम्तु कन्यकायाश्च तुलाया मेप उच्यते ।
राशिचक्र लिख कर उसमें पूर्वादि क्रम से वृषादि गशियों को लिखे। वृष के
दाहिने मिथुन और मिथुन के दाहिने कुर्क इत्यादि। इस पर से कम से मानद इस प्रकार
समझे। वृष का वृश्चिक, मिथुन का धनु, कर्क का मकर, सिंह का कुंभ, कन्या का
मीन और तुला का मेप।
प्रतिसूत्रवशादेति परस्परनिरीक्षिताः ॥३०॥
गगनं भास्करः प्रोक्तो भूमिश्चन्द्र उदाहृतः।
ग्रह एक सूत्रस्य एक दूसरे को देखते हैं। सूर्य को आकाश और भूमि को चन्द्रमा
समझना चाहिये।
पुमान् भानुवधूश्चंद्रः खचकप्रणवादिभिः ॥३१॥
भूचकूदेहश्चन्द्रः स्यादिति शास्त्रविनिश्चयः ।
सूर्य पुरुष प्रह, चन्द्रमा स्री प्रह, सूर्य स्खचक्र गौर चन्द्रमा भूमिचक्र देह कहा जाता है,
पह निर्णय शाल का निर्णय है।
खेः शुकः कुजस्यार्कः गुरोरिन्दुरहिर्विदुः ॥३२॥
उदयादिकमेणैव तत्तत्कालं विनिर्दिशेत् ।
सूर्य के लिये शुक, मङ्गल के लिये सूर्य, वृहस्पति के लिये चन्द्रमा मौर गा के लिये
दुध समादि क्रम से तात्कालिक भाकद होते हैं, ऐसा आदेश फरना।
इत्यारूटच्त्राः
प्रष्टुरारूढभं ज्ञात्वा तद्विद्यामवलोक्य च ।
आरूढायावति विधिम्तावती रुदयादिका ॥१॥

झान-प्रदीपिका। पूंछने वाले फी आकढ़ राशि का शान कर के फिर उसकी विद्या का ज्ञान करना चाहिये, मारूढ़ पर से उदय आदि का यथोक्त फल कहना चाहिये। तद्राशिच्छत्रमित्युक्त शास्त्र ज्ञानप्रदीपके। आरूढां भानुगां वीथीं परिगण्योदयादिना ॥२॥ इसी को इस शास्त्र में राशि छत्र कहते हैं । 'लग्न ( उदय ) से सूर्य को जाने वाली यीपी की गणना फरफे- तावता राशिना छत्रमिति केचित् प्रचक्षते । जितनी राशि आये उसी को छत्र कहते हैं--ऐसा किसी किसी का मता है। मेषस्य वृपभं छत्र मेपच्छत्रं वृपस्य च ॥३॥ युग्मकर्कटसिंहानां मेपच्छत्रमुदाहृतम् । कन्यायाश्च परं छत्रं तुलाया वृपभस्तथा ॥४॥ वृषभस्य युगच्छवं धनुपो मिथुनं तथा । नक्रस्य मिथुनच्छन्नम् मेपः कुंभस्य कीर्तितम् ॥५॥ मीनस्य वृपभच्छत्रं छत्रमेवमुदाहृतम् । 'मेप का छत्र धूप, घृष का मेष, मिथुन, फक मोर सिंह पा मेप, फन्या और तुला का मेष, वृश्चिक और धनु फा मिथुन, मफर का मो मिथुन, कुंभ का मेष और मोन का पूप पर राशि उदयात् सप्तमे पूर्ण अधं पश्येतिकोणभे ॥६॥ चतुरस्त्रे त्रिपादं च दशमे पादएव च ॥ मपने से सातम पानीय प्रदको प्रद पूर्ण दृष्टि से देखता है, धनुएन पा भपं देखा है। पर, पहाँ केपल चतुर्थ मात्र में तात्पर्य है। तीन चरण से त्रिकोण (५,६)को माया पानी दो घरण से और दशम पो एफ दी परण से देखता है। एकादशे तृतीये च पदाधु वीक्षणं भवेत् ॥७॥ ग्यारह और तीसरे स्थान को प्रद पाधे वरण से देखना है।

६ - ज्ञानप्रदोपिका। रवीन्दुसितसौम्यास्तु बलिनः पूर्णवीक्षणे अर्धक्षणे सुराचार्यस्त्रिपादपादार्धयोः कुजः । ८॥ पादेक्षणे वली सौरिः वोक्षणे वलमीरितम् । सूर्य, चंद्र, शुक्र और बुध पूर्ण दृष्टि में यली होते हैं, वृहस्पति आधो में, मंगल त्रिपाद और अर्द्ध में तथा शनि पाद दृष्टि में वली. होते हैं -ऐसा दृष्टिबल कहा गया है। तिर्यक् पश्यन्ति तिर्यञ्चो मनुष्याः समदृष्टयः ॥६॥ ऊर्द्ध वेक्षणे पत्ररथाः अधोनेत्रं सरीसृपः । तियंग योनि के ग्रह तिरछे देखते हैं, मनुष्यसंज्ञक ग्रह समष्टि अर्थात् सामने देखने वाले होते हैं। पनरथ ऊपर की ओर देखते हैं और सरीसृप संशक ग्रह नीचे देखते हैं। ग्रहों की इस प्रकार की संज्ञायें पहले ही यता दी गयो है। अन्योऽन्यालोकिती जीवचन्द्रौ अर्द्ध वेक्षणो रविः ॥१०॥ पश्यत्यर कटाक्षेण पश्यतोऽथ कवीन्दुजौ। एकदृष्ट यार्कमन्दौ च ग्रहाणामवलोकनम् ॥११॥ वृहस्पति और चंद्र एक दूसरे को देखते हैं। सूर्य कार यो देपता है। मंगल, और बुध घटाक्ष से देखते हैं, सूर्य गोर शनि एक दृष्टि से देखते हैं-इस प्रकार प्रहों का अवलोकन है। मेपः प्राच्यां धनुःसिंहावग्नावुक्षश्च दक्षिणे। मृगकन्ये च नैऋत्यां मिथुनः पश्चिमे तथा ॥१२॥ वायुभागे तुलाकुम्भौ उदीच्या कर्क उच्यते । ईशभागेऽलिमीनौ च नष्टद्रव्यादिसूचकाः ॥१३॥ नष्ट द्रव्यादि के सूचन के लिये राशियों को दिशायें इस प्रकार। मेष पूर्व, धनु भोर सिंह अग्नि कोण, घृप दक्षिण, मकर और फया नात्य पोण में नियुन पश्चिम, तुला, कुंभ पायव्य पोण, पकं उत्तर तथा धिरु गोर मी में। अर्कशुकाररातर्किचन्द्रज्ञगुरवः क्रमात् । पूर्वादीनां दिशामीशाःक्रमान्नप्टादिसूचकाः ॥१४॥ सूर्य, शुर, मंगल, राष्ट्र, शनि, चंद्रमा, पुत्र और पृहस्पनि ये प्रः प्रमश पूदि. दिशामों के स्यामी।

ज्ञानप्रदीपिका। मेपयुग्मधनुःकुम्भतुलासिंहाश्च पुरुषाः ।। राशयोऽन्ये स्त्रियः प्रोक्ता ग्रहाणां भेद उच्यते ॥१५॥ मेप, मिथुन, धनु, कुंभ, तुला और सिंह ये पुरुपराशियाँ हैं याको स्त्रीराशि । पुमान्सोऽर्कारगुरवः शुकन्दुभुजगाः स्त्रियः । मन्दज्ञकेतवः क्लीवा प्रभेदाः प्रकीर्तिताः ॥१६॥ ग्रहों में सूर्य मंगल, वृहस्पति, ये पुरपग्रह, शुक्र, चंद्र और राहु स्त्रीग्रह तथा शनि बुध और केतु ये क्लीव ग्रह ६ तुलाकोदण्डमिथुना घटयुग्मं नराः स्मृताः । एकाकिनी मेषसिंही वृपकलिकन्यकाः ॥१७॥ एकाकिनः स्त्रियो प्रोक्ताः स्त्रीयुग्मो सकरान्तिमौ । एकाकिनोऽन्दुकुजाः शुक्रज्ञार्काहिमन्त्रिणः ॥१८॥ एते युग्मग्रहाः प्रोक्ताः शास्त्र ज्ञानप्रदीपके । तुला, धनु, मिथुन, कुंभ, मिथुन (?) ये पुरुषग्रह हैं, मेप सिंह ये एकाकी पुरुष हैं। यूप फर्फ पृश्चिक फन्या ये एकाची नोराशि हैं । सकर और मीन ये स्त्रीयुग्म कहे जाते हैं। सूर्य चन्द्रमा मंगल ये एकोबी प्रह है और शुभ बुध शनि राहु वृहस्पति ये ग्रहयुग्म 'ग्रह के नाम से इस ज्ञान प्रदीपक में पहे गये है। विप्राः कालिमीनाश्च धनुःसिंहकिया (2) नृपाः ॥१६॥ तुलायुग्मघटा वेश्याः शृद्रा नकोक्षकन्यकाः । फर्क, पृधिक, और मीन ये ब्राह्मण, धनुः सिंह और मेव ये क्षत्रिय, तुला मिथुन मौर फुम ये पैश्य तथा चुप मकर और पाया ये राशियां हैं। नृपो अर्ककुजो वित्री बृहस्पतिनिशाकरौ ॥२०॥ बुधा वैश्यो भृगुः शूद्रो नीचावर्कभुजङ्गमो । प्रहों में भी सूर्य मंगल क्षात्रय, गृहस्पति गौर चन्द्र प्राहाण, धुप घेश्य, शुक द्र मौर शनि सपा राहु नीच है।

. ज्ञानप्रदीपिका। खताः मेपधनुःसिंहाः कुलीरोक्षतुलास्सिताः ॥२१॥ कुम्भालिमीना. श्यामाः स्युः कृष्णयुग्मांगनामृगाः । मेष, धनु और सिंह ये लाल, कर्क वृष और तुला ये सफेद, कुंभ वृश्चिक और मोन ये श्याम तथा मिथुन कन्या और मकर ये कृष्ण वर्ण के हैं। शुकः सितः कुजो रक्तः पिङ्गलाङ्गो बृहस्पतिः ॥२२॥ बुधः श्यामः शशी श्वेतः रक्तः सूर्योऽसितः शनिः । राहुस्तु कृष्णवर्णः स्यात् वर्णभेदो उदाहृताः ॥२३॥ शुक्र का वर्ण श्वेत, मंगल का लाल, गुरु का पिंगल, बुध का श्याम, चंद्रका श्वेत, सूर्य का लाल, शनि फा कृष्ण, राहु का वर्ण काला है। चतुरस्त्र च वृत्तं च कृशमध्यंत्रिकोणतः । दीर्घवृत्तं तथाष्टान चतुरस्त्रायतं तथा ॥२४॥ दीर्घायेते क्रमादेते सूर्याद्याः क्रमशो मताः । सूर्य आदि नर ग्रहों का स्वरूप प्रमश: इस प्रकार है-चौकोना, घृत्ताकार, बीच में पतला, त्रिभुज, दीर्घवृत्त (अंडाकार ) अष्टभुत, चौकोना गायत और लंग। पञ्च कविंशयो दृष्टी नवदिक पोडशाब्धयः ॥२५॥ भास्करादिग्रहाणां च किरणाः परिकीर्तिताः । ५, २१, २, ६. १०, १६ और ४ ये फमश सूर्यादि ग्रहों की किरणें है। वसु रुद्राश्चरुद्राश्च वहिपटकं चतुर्दशम् ॥२६॥ विश्वाशा शतवेदाश्च चतुस्त्रिंशदजादिना । कुलीराजतुलाकुम्भकिरणो वसुसंख्यया ॥२७॥ मिथुनोक्षमृगाणां च किरणा पातुसंख्यया। सिंहस्य किरणाः सप्त कन्याकार्मुझयोस्तथा ॥२८॥ चत्वारो वृश्चिकस्योरताः सप्तविंशत् अपत्य च ।

ज्ञानप्रदीपिका। फिरणों की संख्या ८ हैं। मिथुन वृप और मकर को ६, सिंद फन्या और मकर को ० वृधिक फी ४ और मोन की किरणसंख्या २७ है। सप्ताष्टशरवह्नयबिरुद्रयुग्धान्धिपड्वसु ॥२६॥ सप्तविंशतिसंख्याञ्च मेषादीनां परे विदुः । कुछ याचार्य ऐसा भी मानते हैं कि मेपादि राशियों की संख्या क्रमशः, ७ ८५३ ७ १२४४६८ और २७ ये हैं। कुजेन्दुशनयो हस्वा दीर्घा जीवबुधोरगाः ॥३०॥ रविशुको समौ प्रोक्तौ शास्त्र ज्ञानप्रदीपके। मंगल चन्द्रमा और शनि ये हस्ख , वृहस्पति बुध राहु ये लंबे पदके तथा सूर्य शुक्र ये समान फदके इस ज्ञानप्रदीपक में कहे गये हैं। आदित्यशनिसौम्यानां योजनं चाप्टसंख्यया ॥३१॥ शुक्रस्य पोडशोक्तानि गुरोश्च नवयोजनम् । सूर्य, शनि मोर बुध इनके योजन की सख्या ८ होती है। शुक्र की योजन संख्या १६ और गुरु की ना है। भूमिजः पोडशवयाः शुक्रः सप्तवयारतथा ॥३२॥ विंशबयाश्चन्द्रसुतः गुरुस्त्रिंशद्वयाः स्मृतः । शशांकः सप्ततिवयाः पञ्चाशद भास्करस्यवै ॥३३॥ शनैश्चरस्य राहोश्च शतसंख्यं वयो भवेत् । मंगल को आया १६ वर्ष फो, शुक्र पो सात की, घुध पो योस फो, गुरु की तीस की, चन्द्रमा पो सत्तर पी, सूर्य को पचास की, शनि और राहु की भाषा सौ वर्ष की है। तिक्तो शनैश्चरो राहुः मधुरस्तु बृहस्पतिः ॥३॥ अम्लं भृगुर्विधुः क्षारं कुजस्य क्रूरजा रसाः । तवरः (१) सोमपुत्रस्य भास्करस्य कटुर्भवेत् ।।३५॥ शनि गौर राहु निक, यही मधुर, शुक अा, मंगल पाग बुध षमैला और रवि वने चापि कुलिरोक्षनक्रमीनाः जलस्थिताः ॥४॥ मेष, पृषिक, धनु मोर सिंद पन में राधा, फर्य पृर, मकर मार मीन पेबल में पते हैं। इस प्रकार शनि, मोम भोर सूर्य पन में, गुफ मोरचंद्रमा बल में- १३ ज्ञानप्रदीपिका। वृपसिंहालिकुंभाश्च तिष्ठन्ति स्थिरराशयः। कर्किनक्रतुलामेपाश्चरन्ति चरराशयः ॥३६॥ युग्मकन्याधनुर्मीनराशयो द्विस्वभावतः । वृष, सिंह, वृश्चिक ओर कुंम ये स्थिर राशियाँ हैं। वर्क, मकर, तुला और मेष ये चर राशियां हैं। मिथुन कन्या धनु और मीन ये द्विस्वभार हैं। धनुर्मेपवनं प्रोक्तं कन्यका मिथुनं पुरे ॥३७॥ हरिगिरी तुलामीनमकराः सलिलेषु च । धनु और मेप इनका स्थान वन है, पन्या और मिथुन का प्राम, सिंह का पर्वत और तुला मीन और मकर का स्थान जल में है। नद्यां कुलीरः कुल्यायां वृपः कुंभः पयोघटे ॥३८॥ वृश्चिकः कूपसलिले राशीनां स्थितिरीरिता । फर्फ का स्थान नदी में, धूप का कुल्या (क्षुद्रजलाशय ) में कुंभ का जल के घड़े में, वृश्चिक का स्थान कुए के पानी में है-यही राशियों की स्थिति है। वनकेदारकोद्यानकुल्याद्रिवनभूमयः ॥३६॥ आपगादिसरिद्वापि तटाकाः सरितस्तथा । धन, क्यारी, यगीचा, फुल्या (क्षद्रलाशय) पर्वत, घन, भूमि जलाशय या नदी, तहाग (तालाप ) तथा नदियां- जलकुंभश्च कृपश्च नष्टद्रव्यादिसूचकौ ॥४०॥ घटककन्या युग्मतुला ग्रामेऽजालिधनुर्हरिः। अल कुम, फूष, ये ऊपर के घनाये अनुसार स्थान नष्ट यस्तु के सूचफ है। कुम कन्या, मिथुन और तुला राशियों गाय में- विपिने शनिभौमार्कि भृगुचन्द्रो जले स्थितो।

१४ की शानप्रदीपिका। बुधजीवौ च नगरे नष्टद्रव्यादिसूचकौ ॥४२।। भौमे भूमिर्जलं काव्ये शशिनो सुधभागिनः । घुध और वृहस्पति नगर में नष्ठ द्रव्य के सूचक होते है । इसी तरह मगल के बलवान होने पर भूमि, शुक पे पली होने पर जल चंद्रमा और बुध के बलवान होने पर- निष्कुटश्चैव रंधश्च गुरुभास्करयोर्नभः ॥४३॥ मंदस्य युद्धभूमिश्च बलोत्तरखगे स्थिते (2)। गृहोद्यान वृहस्पति से छिद्र, सूर्य से आलमान, शनि के घरवान होने पर युद्ध भूमि-ये मष्ट द्रव्य के सूचक होते हैं । सूर्याारवले भूमौ गुरुशुक्रवले खगे ॥४॥ चंद्रसौम्यवले मध्ये कैश्चिदेवमुढाहताम् । सूर्य, मगल और शनि फे बलपान होने पर भूमि में गुरु और शुक्र के यली होने पर आकाश में चन्द्रमा और युध के वली होने पर धीर-ये विहीं किन्हीं का मत है। निशादिवससन्ध्याश्च भानुयुग्राशिमादितः ॥४५॥ चरराशिवशादेवमिति केचिताचक्षते । कुछ लोग चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों के पश से रात, दिन और साध्या पा फमश निर्देश करते है। ग्रहेषु बलवान्यस्तु तद्वशाहलमोरयेत् ॥१६॥ शनेपं तदधं रयाझानोर्मासदयं विदुः । ग्रहों का पल विचार करते समय जो यलगार हो उसी के अनुसार उसयल पहना चाहिये। शनि पा हद घर्ष पाल है, सूर्य या दो मास- शुक्रस्य पक्षो जीवस्य मासो भौमस्य वासरः ॥४७॥ इंदोर्मुहूर्तमित्युक्तं ग्रहाणां चलतो वढेत् । शुक पा एक पक्ष, वृहस्पति का एक माम, मगर पा एक दिक्ष चन्द्रमा का एक मात फाल है। प्रभाविवारते समय ग्रहों का परावल विचार पर तदनुसार फर पदना चाहिये। ८ तद्वशात्प्रष्टुरारुढं ज्ञात्वा चारुदकेश्चरात् ॥५५॥ + ज्ञानप्रदीपिका । एतेषां घटिका प्रोक्ता उच्चस्थानजुपां क्रमात् ॥४॥ स्वगृहेषु दिनं प्रोक्तं मित्रभे मासमादिशेत् । यदि ग्रह अपने उच्च के हों तो घटिका, स्वगृही हों तो दिन, मित्र गृह हों तो मास का आदेश फरना- शत्रुस्थानेषु नीचेषु वत्सरानाहुरुत्तमाः ॥४६॥ शत्रु गृही होने पर या नीच राशि में होने पर एक वर्ष होते हैं ऐसा उत्तमों का कहना है सूर्यारजीवविच्छुक्रशनिचन्द्रभुजंगमाः । प्रागादिदिक्षु क्रमशश्चरेयुर्यामसंख्यया ॥५०॥ प्रागादीशानपर्यन्तं वारेशाद्य तगा ग्रहाः । सूर्य, मंगल, बृहस्पति, बुध, शुक्र, शनि, चंद्र राहु ये आठ ग्रह क्रमशः पूर्वादि दिशाओं के स्वामी होते है। प्रभाते प्रहरे चान्ये द्वितीयेऽग्न्यादिकोणतः ॥५१॥ एवं याम्यतृतीये च क्रमेण परिकल्पयेत् । कुछ लोगों की राय में दिन के आठ पहरों में प्रथम प्रहर में पूर्व की ओर उसी दिन का वारेश रहता है, द्वितीय में अग्नि कोण में उससे दूसरा, तृतीय में दक्षिण में तीसरा इस प्रकार से दिगीश रहते हैं। भृतं भव्यं वर्तमानं वारशाद्या भवंति च ॥५२॥ तदिने चंद्रयुक्तक्षं यावद्भिरुदयादिकम् । तावद्भिर्वासरः सिद्ध केचिदंशाधिपाद विदुः ॥५३॥ उक्त प्रकार से भूत भविष्य और वर्तमान फल द्योतक पारश होते हैं। प्रश्न के दिन चांद नशम जितने अंशादि से उदित हुमा है उतने दो दिन में कार्य सिम होता है। पर दूसरों के मत से नाश के स्वामी के मंशादि पर से इसे निकालते हैं। सार्धहिनाडिपर्वतमंकलन प्रचक्षते । प्रश्ने निश्चित्य घटिकाः सार्धद्विघटिकाः कमात्या तद्यथाकाललन'तु तदा पूर्वा दिशा न्यसेत् । आरुढाधिपतिर्यन प्रभाते नष्टनिर्गमः।

ज्ञानप्रदीपिका। . मेपकर्कितुलानकाः धातुराशय ईरिताः ॥५६॥ कुंभसिंहालिवृषभाः श्रूयते मूलराशयः । धनुर्मीननृयुक्कन्या राशयो जीवसंज्ञका; ॥५७॥ मेष, फर्क, तुला और मकर ये धातुराशियाँ है। कुंभ, सिंह, वृश्चिक और वृष ये मूलराशियाँ हैं। धनु, मीन, मिथुन और कन्या ये जीवराशियाँ है । कुजंदुसौरिभुजगा धातवः परिकीर्तिताः । मूलं भृगुर्दिनाधीशी जीवौ धिपणसौम्यजौ ॥८॥ इसी प्रकार मंगल, चन्द्रमा शनि और राहु ये धातु ग्रह, शुक्र और सूर्य मूल ग्रह घुध और वृहस्पति ये जीव ग्रह है । स्वक्षेत्रभानुरुच्चंद्रो धातुरन्यश्च पूर्ववत् । स्वक्षेत्रभानुजो वल्ली स्वक्षेत्रधातुरिन्दुजः ॥५६॥ (2) विशेषता यह है कि, सूर्य अपने गृह का, और चन्द्रमा उच्च का धातु होते हैं। शनि स्वक्षेत्र में मूल और बुध पक्षेत्र में धातु होता है, शेष ग्रह पूर्ववत् ही रहते हैं। ताम्रो भौमस्त्रपुर्वाश्च कांचनं धिपणो भवेत् । रौप्यं शुकः शशी कांस्यः अयसं मंदभोगिनौ॥६॥ मंगल, तामा, युध्र प्रपु (पीतल ?), गुरु सोना, शुक्र चादी, चद्रमा फासा, शनि और राहु लोहे होते है। भौमार्कमंदशुकास्तु स्वस्वलोहस्वभावकाः । चन्द्रज्ञगुरवः स्वस्वलोहाः स्वक्षेत्रमित्रपाः ॥६१॥ मिश्रोमिनफलं ज्ञात्वा ग्रहाणां च फलं कमात् । मंगल सूर्य शनि शुमा ये अपने २ भाव में लोइकार के होते है, चन्द्रमा युध हरपति अपने क्षेत्र सपा मित्र क्षेत्र में होने से लोहमारप कहे गए। मिश्र में मिश्रित फल मा भादेशपम से करना चाहिये। - + . ।

नानप्रदोपिका। शिला भानोवुधस्याहुः मृत्पात्रं चोपरं विदुः ॥६२॥ सितस्य मुक्तास्फटिके प्रवालं भूसुतस्य च । अयसं भानुपुत्रस्य मंत्रिणः स्यान्मनःशिला ॥६॥ नीलं शनेश्च वैडूयं भृगोर्मरकतं विदुः । सूर्यकान्तो दिनेशस्य चंद्रकान्तो निशापतेः ॥६॥ तत्तद्ग्रहवशान्नित्यं तत्तदाशिवशादपि । सूर्य को शिला, बुध का मृत्पात्र और उपर, शुक्र का मोती और स्फटिक मणि, मगल का मूंगा, शनि का लोहा, गुरु का मन शिला, (धातु विशेष ) शनि का नीलम और वैडूर्य, शुक का मरकत. सूर्य का सूर्यकान्त, चंद्र का चद्रकात, ये रन प्रश्न विचारते समय तत्तद्राशि और ग्रह पर से बताने चाहिये। बलाबलविभागेन मिश्र मिश्रफलं भवेत् ॥६५॥ नृराशौ नृखगैष्टे युक्ने वा मर्त्यभूषणम् । तत्तद्राशिवशादन्यत् तत्तद्रूपं विनिर्दिशेत् ॥६६॥ बली, निर्मल का विचार करके गुढ गौर अदृढ फल बताना चाहिये। यदि मिश्रयल हो तो फल भी मित्र होता है। यदि नरराशि मनुष्यग्रह द्वारा गुट किंवा युक्त हो तो धातुसंबंधी प्रश्न में मानवभूषण बताना चाहिये। शेष राशि और ग्रह के स्वरूपयश इति धातुचिता मूलचिन्ताविधौ मूलान्युच्यन्ने पूर्वशास्त्रतः । क्षुद्रसस्यानि भौमस्य सस्यानि बुधजीवयोः ।।६७॥ कक्षाणि ज्ञस्य भानोश्च वृक्षश्चन्द्रस्य गुरोरिक्षु गोश्चिचा भूरुहाः परिकोर्तिताः ॥६॥ शनेरूरगस्यापि तीक्ष्णकण्टकभूरुहाः । चन्द्रमा कोलतायें, वृहस्पति की ईख,शुक्र की इमली, शनि पादारु, राहु के तीखे कोटेदार x अब वल्लरी। * सूर्य का वृक्षा x पूर्णशास्त्रानुसार मूलचिन्ता का वर्णन करते हैं। x x x मङ्गल के छोटे सस्य, बुध और वृहस्पति के पहे सस्य, इस येवृक्ष कहे गये हैं।

२.१८ भानप्रदीपिका। - . x xx। अजालिक्षुद्रसस्यानि-वृपकर्कितुलालता ॥६६॥ कन्यकामिथुने वृक्षे कण्टद्रुमघटे मृगे । इक्षुर्मानधनुःसिंहाः सस्यानि परिकीर्तिताः ॥७॥ मेष वृश्चिक इनके क्षुद्र सस्य, नृप कर्क और तुला इनकी लतायें, कन्या और मिथुन इनके वृक्ष, कुंभ और मकर इनके कोटेदार वृक्ष, मीन, धनु और सिंह इनके सस्य ईख है। अकंदंद्रुमः सौम्यस्य क्रूराः कण्टकभूरुहाः । । युग्मकण्टकमादित्ये भूमिजे 'ह्रखकण्टकोः ॥७१|| वक्राचं कण्टकाः प्रोक्ताः शनैश्चरभुजंगमौ ।' ? पापग्रहाणां क्षेत्राणि तथाकण्टकिनो द्रुमाः ॥७२॥11 बुध के बिना काँटे के वृक्ष, क्रूर ग्रहों के भी कांटेदार वृक्ष सूर्य का दो काटो घाला, मंगल या छोटे कांटों वाला, शनि राहु का टेढे कांटों वाला वृक्ष कहा गया है,x, सूक्ष्मकक्षाणि सौम्यस्य भृगोर्निष्कंटकद्रुमाः ।। कदली चौपधीशस्य गिरिवृक्षा विवस्वतः ॥७३॥ बृहत्पत्रयुता वृक्षा नारिकेलादयो गुरोः । ताला: शनेश्चराहोश्च सारसारौ तरू वदेत् ॥७॥ सारहीनशनीन्द्वर्कवन्तरसारो कपित्थको बहुसाराः खराशिस्थशनिशकुजपन्नगाः ॥७५।। बुध का मूक्ष्म वृक्ष, शुक्र का निष्कंटक वृक्ष चंद्र का कदली वृक्ष, सूर्य का पर्वन वृक्ष, वृदम्पनि का नारियल आदि बड़े पत्तों पाले वृक्ष, शनि का ताल वृक्ष भोर राहु का सारवान् वृक्ष कहा गया है ४ ४ ४ ४ अपने राशिस्थ शनि ,बुध मंगल और राहु के बहुसार वृक्ष हे गये है। .. अन्तस्सारो परिस्थाने वहिस्सारस्तु मित्रगे। स्खकन्दपुप्पछदनाः फलपक्वफलानि च ॥७॥ मूलं लता च सूर्यायाः स्वस्खक्षेनेपु ते तथा । शत्रुस्पानस्य गृह मन्तःसार घृक्ष और मित्रस्यानस्थ पहिसार वृक्ष यो पहते हैं। Sat अपनी राशि में स्थित सूर्य मादि ग्रह प्रमश त्व, मूल, पुष्प, छाल, फल, फल, मूल, और स्ता इनके पोधक होते हैं। 1 । F . प - ज्ञानप्रदीपिका। चन्द्रो माता पिताऽऽदित्यः सर्वेषां जगतामपि । गुरुशुक्रारमंदज्ञाः पंच भूतस्वरूपिणः ॥१॥ सारे जगत् को माता चन्द्रमा गोर पिता सूर्य हैं। वृहस्पति शुक्र मंगल प्रानि और घुध ये पांचो पंच महाभूत हैं। श्रोत्रत्वकचक्षुरसनाघाणाः पञ्चेद्रियाण्यमी । शब्दश्पर्शी रूपरसौ गंधश्च विषया अमी ॥२॥ श्रोत्र ( कान ) त्यक ( चर्म ) आख, जीम, घाण (नाक) ये पाव इन्द्रिय हैं। और शब्द स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये क्रमश इनके विषय है। ज्ञानं गुर्वादिपंचानां ग्रहाणां कथयेक्रमात् । गुरोः पञ्च भृगोश्चाब्धिः वयं हास्य कुजस्य द्वे ॥३॥ एक ज्ञानं शनेरुक्तं शास्त्र ज्ञानप्रदीपके । गुरु, शुक्र, मंगल, बुध और शनि इनका शान कमश ५४, २, १, और ३ हैं। ऐसा ज्ञान प्रदापक शास्त्र का कहना है। भौमवर्गा इमे प्रोक्ताः शंखशुक्तिवराटकाः॥४॥ मत्कुणाः शिथिलायूकक्षिकाच पिपोलिकाः । शंख, शुकि, पौडी, खटमल, जू, मपिपया, चीटिया-ये मोमवग अर्थात् मंगल के जीव हैं। बुधवर्गा इमे प्रोनाः पटपटा ये भृगोस्तथा ॥५॥ देवा मनुष्याः पशवो विहगाः गुरोः । (१) तथैकज्ञानिनो वृक्षाः शनिवृक्षा. प्रकीर्तिताः ॥६॥ एकहि त्रिचतु-पंचगगनादिगणाः स्मृताः । मोरे घुघर्ग में, देव मनुष्य शुक्र वर्ग में, पशु भोर पक्षी गुरु वर्ग में, और पृक्ष शनियर्ग में पहे गये ६४ . x x x ज्ञानप्रदीपिका। देहो जीवस्सितो जिह्वा वुधो नासेक्षणं कुजः ॥७॥ श्रोत्रं शनैश्चरश्चैव ग्रहावयवमीरितम् । बृहस्पति देह, शुक्र जीभ, बुध नाक, मगल आँख, और शनि कान ये ग्रहों के शारीरिक अवयव है। द्विपाच्चतुष्पाद वहुपादिहगो जानुगः क्रमात् ॥८॥ शंखशंबूकसंधश्च वाहुहीनान् विनिर्दिशेत् । दो पैर याला, चार पैर वाला, बहुत पैर वाला, पक्षो, जघा से चलने घाला, शंख, घोंघा संघ और बाहुहीन ये सूर्यादि प्रह के भेद हैं । यूकमत्कुणमुख्याश्च बुहुपादा उदाहृताः ॥६॥ गोधा. कमटसुख्याश्च बहुपादा उदाहृताः । यूक (जू) मत्कुण ( खटमल ) वगैरह ये यहुपाद यहे जाते हैं, सपिणो, कच्छा आदि भी इसा तरह स बहुपाद कहे जाते हैं। मृगमोनौ तु खचरौ नत्रस्थौ मंदभूमिजौ ॥१०॥ वनकुक्कुटकाको च चितिताविति कोर्तियेत् । तद्राशिस्थे भृगौ हंसः शुक. सौम्यो विधौ शिखी ॥११॥ वीक्षिते च तदा ब्रूयात् ग्रहे राही विचक्षण । प्रश्न लग्न यदि मकर या मोन हों और उस पर शनि या मगल हो तो क्रमश धनकुषकुट और काक कहना। अपने राशि पर शुक्र हो तो हस, बुध हो तो शुक, चद्रमा हो तो मोर तदाशिस्थे रवौ तेन दृष्टे वयात् खगेश्वरं ॥१२॥ अपने राशि पर सूर्य हो तो गरुड, वृहस्पनि हो तो श्वेत यक तथा राहु हो त्वं मरदूल पक्षो कहना। वुध अपनी राशि पर हो तो मुर्गा, मगल दोनो प्रहों के लिये उन राशियों का स्थल कहना चाहिये। २१ x॥ कहना चाहिये ४ मोर अन्य राशिल x x x x x x x x वृहस्पतौ सितवका भारद्वाजस्तु भोगिनि । कुक्कुटो ज्ञस्य भौमस्य दिवांधः परिकीर्तितः ॥१३॥ अन्यराशिस्थखेटेषु तत्तद्राशिस्थलं भवेत् पृच में शुम्दो तागाय, मंगदासोपामुग, पुपहतोपदर मोरकद पिगर,पद्र पर्णहो तो वारदसिंगा, निहोबास मोर राहो तोकीमत बताना चाहिये। 7 7 ज्ञानप्रदीपिका। राहोगरजचांडालस्तस्कराः परिकीर्तिताः । गहु से युक या दृष्ट होने पर जिप देने वाला चाण्डाल यताना x x x x ! शनेस्तरुच्छिदः प्रोक्तः राहो(वरनापितौ ॥२१॥ शंखच्छेदो नटः कारुनर्तकः शशिनस्तथा । इसके अतिरिक्त शनि से वृक्ष काटने वाला, राहु से धोरर या नाई, चंद्र से शवछेदो, कारोग, नर्तक आदि मंदना चाहिये। यह ग्रहों या यही होना बताया गया है। 'चूर्णकृन्मौक्तिकग्राही शुक्रस्य परिकोर्तित ॥२२॥ तत्तद्राशिवशातीततत्तद्राशिस्थितं ग्रहम् । तत्तद्राशिस्थखेटानां वलात्तु नष्टनिगमो ॥२३॥ इसी प्रकार शुक्र के यली होने से चूगा यनाने वाला, मोता का ग्रहण करने वाला "पainा चाहिये। लग्न को राशि रतनो धीन युकी हो तिनी याको हो, उस पर प्रह रेसा हो उसके अनुसार नाम का अनोत मादि पहना। इति मनुष्यकाण्ड मेपराशिस्थिते भौमे मेपमाहुर्मनीषिणः । तस्मिन्न स्थिते व्याघ्र गोलांगूलं बुधे स्थिने ॥२४॥ शुकण वृपभश्चन्द्रगुरवञ्च ततः परं । महिपीसूर्यतनये फ्णौ गपय उच्यते ॥२५॥ । मेष राशि में मंगल हो तो मेर सूर्प हो तो ध्यान, पुरा हो तो गोरगर, शुत्र हो तो । धूप (बैल), x x x x शनि हो तो मेंस, हो तो गाय (घोडपरास) माना l । वृषभस्थे भूगों धेनुः कुजन्यं कुल्टाहताः । (१) । बुधे कंपिगुरावञ्च (2) शशांके धेनुरुष्यते ॥२८॥ आदित्ये भरमः प्रोक्को महिपी शनिसर्पयोः ।। . १ , 44 होतोय, २४ झानप्रदीपिका। x x x x कर्किस्थे च करो भौमे महिपी नक्रगे कुजे ॥२७॥ वृपभस्थे हरियुग्मकन्ययोः वा च फेरवः । हरिस्थे भूमिजो व्याघो रवींद्यास्तत्र केसरी ॥२८॥ शुक्रो जीवा कटः सौम्ये त्वन्ये स्वाकृतयो मृगाः । मंगल यदि षर्क में हो तो कर, मकर में हो तो भैप, वृष में हो तो सिंह, मिथुन में हो तो कुत्ता, पन्यो में हो तो शृगाल, सिंह में हो तो व्याघ्र, उसी में रवि चन्द्र हों तो सिंह फहना चाहिये ४ तुलागते भृगोवत्सश्चंन्द्रे गौः परिकीर्तिता ॥२६॥ धनुस्थितेषु जीवेषु कुजेपु तुरगो भवेत् । शनौ वक्र स्थिते तत्र मत्तो गज उदाहृतः ॥३०॥ शुक तुला में तो पछडा और चन्द्रमा तुला में हो तो गाय, धनु में वृहस्पति या कुज हों तो घोडा और शनि यदि यत्रो होकर उसी में हो तो मत्त हस्ती बनाना चाहिये । सर्पस्थे सत्र महिपो वानरो बुधजीवयोः । शुक्रामृतांशुसौम्येषु स्थितेषु पशुरुच्यते ॥३१॥ जीवसूर्येक्षिते गर्भ बंध्यास्त्री च शनीक्षिते । अंगारकेक्षिते शुक्रस्तत्र ज्ञात्वा वदेत्सुधीः ॥३२॥ वक्ष्येऽहं चिंतनां सूक्ष्मजनेस्तु परिचिंतिताम् । उसी (धनु ) राशि में यदि राहु हो तो भैंस घुध और पृदापति हो तो पानर, शुन चन्द्र मोर बुध साथ ही हों तो पशु बनाना चाहिये । उक्त राशि को यदि पृहस्पति और सूर्य देखते हों तो गर्भ नया शनि देखता हो तो यन्ध्या बनाना ४ धिपणे कुंभराशिस्थे त्रिकोणस्थेवास पश्यति ।।३।। मृगराजे स्थिते सौम्ये धनुपि वीक्षिते शुभे । स्मृतः कपिउँपगते शनौ ब्यान्मतङ्गाजम् ॥३४॥ पुम्म राशि का वृहस्पति हो या त्रिशेण में पैठ पर देखता हो, राशि में बैठा हो और धनु राशिम्प शुम मह देखता है तो बानर और मप में शनि पठा दो तो दापी होता है। x xxx1 अधया चन्द्रमा पुग्म

२५
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ज्ञानप्रदोपित्रा।
कुजे मेपगते व्यंगं वुधे नर्तकगायको ।
गुरुशुक्रदिनेशेषु वणिजो वस्नजीवितः ॥३५।।
चन्द्रे तथागते मन्दे सिंहस्थे रिपुचितनम् ।
वृपस्थे महिपी तौले वक्रण वृश्चिके गतम् (१) ॥३६॥
मेप में कुज हो तो अगहीन, युध हो तो नर्तक और गायक, गुरु हो तो यणिक,
शुक है। तो वस्रजीधी, xxxxचन्द्र हो तौभी नही, शनि यदि सिंह में हो तो शत्रु, युप में
हो तो भैस, ४
मेषगे सूर्यतनये मृत्युः क्ल शादयस्तथा ।
मित्रादिपञ्चवर्गश्च ज्ञात्वा ब्रूयात्पुरोक्तित. ॥३७॥
शनि मेप में हो तो, मृत्यु तथा फप्ट होता है। ग्रहों का फठ मिनादि पचवर्ग
का बल यना के कहना चाहिये।
इति चिन्तनकाण्ड.
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धातुराशौ धातुखगे दृष्टे तच्छत्रतंयुते ।
धातुचिता भवेत्तद्वत् मूलजीनी तथा भवेत् ॥१॥
धात्वृक्षस्थे मूलखगे जीवमाहुर्विपश्चितः ।
जीवराशौ धातुखगे दृष्टे या यदि मूलिका ॥२॥
मूलराशौ जीवखगे धातुचिंता प्रकीर्तिता ।
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धातु राशि में यदि मूर ग्रह है। तो जीव, जीय राशि मे धातु ग्रह हो या उससे दृष्ट
हो तो मूल और मूल राशि में जीर ग्रह हो तो धातु को चिन्ता कहनी चाहिये
धातु राशि यदि धातु खग से दृष्ट हो और धातु छा से युक्त हो तो धातु दिता
फहनी चाहिये, इसी प्रकार जोर भौर मूल चिन्ता मी जाननी चाहिये।
निवर्गखेटकदृप्टे युक्त वलयशाहदेत् ।
पश्यन्ति चन्द्र चेद्दन्ये नदेत्तत्तद् हाकृतिम् ॥३॥

ज्ञानप्रदापिका। xxxx x x xxxx xx x xxxx धातुमूलश्च जीवञ्च वंशं वर्ण स्मृति वदेत् । कंटकादिचतुष्केषु स्याच्छत्रुनित्रग्रहयुत ॥४॥ दृप्टे वा सर्वकार्याणां सिद्धि वयाच चितनम् । धातु मूल और जीन राशियों पर से चश वर्ण और स्मृति बताना चाहिये। विवार करते समय फण्टकादिम चतुष्टय आदि तथा शत्रु मित्र राशि और ग्रह का पूर्ण विचार कर सिद्धि यजानी चाहिये। उदये धातुचिंता स्यादारूढे मूलचिंतनम् ॥५॥ छने तु जीवचिंता स्यादिति कैश्चिदुदाहृतम् । केन्द्र फणपरं प्रोक्तमापोलीवं क्रमात्रयम् ॥६॥ चिन्ता तु मुष्टिनप्यानि कथयेत्कार्यसिद्धये ॥ लग्न से धातु चिन्ता आन्ढ से मूल चिन्ता और छत्र से जीवचिन्ता की जाती है ऐसा फुछ लोग मानते है। केन्द्र, (१, ४, ७ १० ) पणफर (२,५ ५, ११ ) आपोक्लोर (३, ६, ६, १२,) ये क्रम से हैं, इन पर से नप्रमुष्टि गादि का विचार किया जाता है। इति धातुकाण्डः •c-- तत आरूढगे चन्द्रे न नष्टं रुक च शाम्यति । आरूढादशम वृद्धिश्चतुर्थे पूर्ववद्वदेत् ॥१॥ नष्टद्रव्यस्य लाभश्च सर्पहानिश्च सप्तमे । उदयाद्दादशे पप्ठे अप्टमारुढगे सति ॥२॥ चिंतितार्थो न भवति धनहानिईि पट्यलम् तनुं कुटुम्वं सहजं मातरं जन रिपुम् ॥३॥ कलनं निधनं चैव गुरु कर्म फलं व्ययम् । दृष्टे विधिक्रमादानं तस्य तस्य फलं वदेत् ॥ चन्द्रमा यदि गारद राशि में होतो उत्तर इस प्रकार देना-परतु नट नहीं हुई, रोग शाra है,-मारुढ से दशम में हो तो बढ़ गया है चतुर्थ में हो तो नए यस्तु गिल , या खिति २७ ज्ञानजदीपिया। पूर्ववत् है, सप्तम में हो तो सर नष्ट हो गया। यदि आरुढ नसे द्वादश, षष्ठ और अष्टम में हो तो-जिसकी चिता है वह नहीं होगा, धनहानि, शपुरल, अपना, पलत्र का माता का, पिना या, निधन अनिष्ट, व्यय भादि फल कहना । ग्रहों की शुभाशुम दृष्टि आदि का विचार भी करना । रवीन्दूशुक्रजीवज्ञा नृराशिपु यदि स्थिताः । महँचिन्ता ततः शौरिदृष्टेनाथं कुजे (?) तथा ॥५॥ कुजस्य कलहः शोरेस्तरकर गरलं भवेत् । रविदृष्टेऽथवा युक्ने चिंतनादेव भूपतेः ॥६॥ यदि, त्रि, चन्द्र, शुक्र, बृहस्पति और बुध मनुष्य राशि पर हों तो मत्य को चिंता, शनि यदि देवता हो तो अर्थ निन्ता पहना। मनुष्यराशि पर मंगल हो तो कलह, शनि हो तो चोर या जहर की चिन्ता, रवि से दूप अथवा यक हो तो राजा की चिन्ता फहनी चाहिये। इत्यारूडकाण्ड: द्वितीये द्वादशे छन्ने सर्वकार्य विनश्यति । गुरो पश्यति युक्ने वा तत्र कार्य शुभं वदेत् ।।१।। तस्मिन्पापयुते दृष्टे विनाशो भवति ध्रुवम् । तस्मिन्सौम्ययुते दृष्टे सर्व कार्य शुभं वदेत् ॥२॥ मिञ मिश्रफलं यात शास्त्र ज्ञानप्रदोपिके। यदि छत्र द्वितीय किंवा द्वादश हो तो सारा काय नष्ट होता है। किन्तु यदि वृहस्पति से युक्त किंवा दृष्ट हो तो सिद्धि होती है। पापग्रह से दूध पिया युक होने से विनाश तया सौम्य प्रह से दृष्प अथया युक्त होने पर शुभ कार्य होता है। पापमह से नाश शुम प्रह से सिद्धि होती है। दोनों हां तो मित्रफल होता है पञ्चमे नवमे छत्रे सर्वसिद्धिर्भत्रिप्यति । तस्मिन् शुभाशुभेदृष्टे मिग्रे मिश्रफलं वदेत् ॥३॥ पक्ष और नयम छत्र में सब पार्यों की सिद्धि होती है । शुम से दृष्ट या युफ होने पर शुभ, पाप ग्रह से अशुम गोर मिश्र से मिस फल होता है। चतुर्थे चाष्टमे पष्ठे द्वादशे छत्रमयुते । नष्टद्रव्यागमो नास्ति न व्याधिगमनं भरेत् ॥en X x x X x x x x ज्ञानप्रदीपिका। न कार्यसिद्धिः सर्वेषां शनिग्रहवशाद् वदेत् । वृहरपत्युदये स्वर्णाधनं विजयमागमः ॥५॥ पिशांतिः सर्वकार्यसिद्धिरेव न संशयः । यदि छा ४, ८६, या १२ वा हो तो नष्ट वस्तु नहीं मिली, रोग शान्त नहीं हुमा, फार्य सिद्धि नहीं हुई इत्यादि फल शनि से युक्त होने पर बताना। बृहस्पति के उदय होने पर स्वर्ण, धन, विजय, उपशान्ति एव सय कार्यों की सिद्धि नि सन्देह होती है। सौम्योदये रणोद्योगी जित्वा तद्धनमाहरेत् ॥६॥ पुनरेप्यति सिद्धिः स्यात् छत्रसंदर्शने तथा । व्यवहारस्य विजयं छत्रेऽप्येवमुदाहृतम् ॥७॥ छत्र यदि शुम युक्त या दृष्ट हो तो युद्ध में विज्य, फार्य की सिद्धि आदि शुभ फल फहना चाहिये। चन्द्रोदयेऽर्थलाभग्चेत् प्रयाणे गमने तथा । चिंतितार्थस्य लाभश्च चन्द्रारूढे स्थितेऽपि च ॥८॥ शुक्रोटये बुधोऽपि स्यात् स्त्रीलाभोव्याधिमोचनम् । जयो यान्त्यरयः स्नेहं चन्द्रेऽप्येवमुदाहृतम् ॥६॥ चंद्रमा रन में हो तो याना आदि में सोची हुई यस्तु मिल जाती हैं। यह यात तम भी संभव है जब चन्द्रमा आरुढ में हो। शुक्र या युध लग्न में हो तो नीलाम जय, च्याधि नाश एवं शत्रु धा स्नेहपात्र होना बताना चाहिये । लग्नस्थ चन्द्रमा होने पर भी यही पल कहना चाहिये। उन्यारूदछने शन्यकांगारका यदि । अ. नाशं मनरतापं मरणं व्याधिमादिशेत् ॥१०॥ उदय, भार" और छत्र में यदि शनि सूर्य भौर मगल हों तो अर्थ (धन) का नारा मानसिक व्यथा मरण और प्याधि यना चाहिये। एतेषु फणियुत्तेपु बुधश्चोरभयं ततः । मरणं चेव दैवज्ञा न संदिग्धो वदेत् सुधीः ॥११॥ इन्हीं पानो ( रग्न, आह और छत्र में ) में यदि राहु के साथ युध पेटा हो तो निर्णय होकर निमार ज्योनियो को वा का भय और मरण पनाना चादिय । और ज्ञानप्रदीपिका। २६ और निधनारिधनस्थेषु पापेश्वशुभमादिशेत् । तन्वादिभावः पापैस्तु युक्तो दृष्टो विनश्यति ॥१२॥ अष्टम, पठ, द्वितीय में पार पद हो तो फल अशुभ होता है। पापमहाकान्त तन्वादि भाष यशुम फल दायक है। शुभदृष्टो युतो वापि तत्तभावादि भूपणम् । मेपोदये तुलारूढ़े नष्टं द्रव्यं न सिध्यति ॥१३॥ शुभ से दृष्ट किंवा युक्त होने पर भाव शुम फलद होते हैं। मेप लग्न हो और तुला भारूढ़ हो तो नए द्रव्य की सिद्धि नहीं होती। तुलोदये क्रियारूढ़े नष्टसिद्धिन संशयः । विपरीते न नष्टातिवृषारूढ़े लिभोदये ॥१॥ किन्तु यदि तुला लग्न दौर मेष आरूढ़ हो तो अवश्य सिद्धि होती है । चूप भारद वृश्चिक लग्न हो तो मदा लाभ होता हैं । नष्टसिद्धिर्महालाभो विपरीते विपर्ययः । चापारूढ़ नष्टसिद्धिर्भविता मिथुनोदये ॥१५॥ विपरीते न सिद्धिः स्यात् कर्कारूढ़े मृगोदये । सिद्धिश्च विपरीते तु न सिध्यति न संशयः ॥१६॥ किन्तु यदि वृप लग्न और वृश्चिक माद हो तो सिद्धि नहीं होती। मिथुन लग्न में धनु मारूढ़ हो तो नए सिद्धि होती है। उल्टा होने से फल उल्टा होता है। कर्क भासद हो मकर का उदय हो तो सिद्धि होती है। उल्टा होने से सिद्धि नहीं होनी, सिंहोदये घटारूढे नष्टसिद्धिर्न संशयः । विपरीते न सिद्धिःस्यात् झपाख्ढेंगनोदये ॥१७॥ नष्टसिद्धिविपर्ये (2) स्यात् दृष्टादृष्टर्निरूपणम् । रन सिंद हो माद हो तो सिद्धि और उल्टा होने से प्रसिद्धि होती है। मोन भारद हो गौर पन्या ला हो तो गट सिदि नहीं होती है।

भानप्रदीपिका। स्थिरोदये स्थिरच्छन्ने स्थिरलग्नो भवेद्यदि । न मृतिर्न च नष्टं च न रोगशमनं तथा ॥१८॥ खिर लम हो और स्थिर छन हो और स्थिर उदय हो तो फल 'नहीं' फहना चाहिये । अर्थात् 'मृत्यु नहीं हुई ' 'नष्ट नहीं हुआ ' रेगशान्ति नहीं हुई इत्यादि इत्यादि पहना समुचित है। द्विदेहबोधया (2) रूढे छत्रे नष्टं न सिध्यति । न व्याधिशमनं शत्रुः सिद्धिविद्या न च स्थिरा ॥१६॥ द्विस्वभाव लग्न, द्विस्वभाव छन्न और द्विस्वभाव आढ़ हो तो 'नए सिद्धि नहीं हुई' व्याधि शमन नहीं हुआ' शादि निषेधात्मक उत्तर देना। चरराश्युदयारूढ़नपु स्यादिति स्थिता । नष्टसिद्धिर्न भवति व्याधिशांतिन विद्यते ॥२०॥ सर्वागमनकार्याणि भवन्त्येव न संशयः । ग्रहस्थितिवलेनैव एवं वृ यात शुभाशुभम् ॥२१॥ घर राशि हो रन, छत्र और मारूढ़ हो तो भो नहीं, अर्थात् नष्ट सिद्धि नहु, रोग- शान्ति नहीं हुई, आदि घताना । आगमन सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर में हो रहना चाहिये । इस प्रकार शुभाशुभ फल ग्रहों पर से पहना चाहिये। चरोभयस्थिताः सौम्याः सर्वकामार्थसाधकाः आरूढछनलग्नेषु करेण्वस्तं गतेषु च ॥२२॥ परेणापहृतं ब्रूयात तत सिध्यति शुभेपु च ॥२३॥ पर गौर द्विपमाघ राशियों पर यदि शुभ ग्रह हों तो कार्य सिद्ध होता है। छत्र गौर लग्न में यदि अस्त होकर फर प्रह पढे हों तो दूसरे ने चुराया है ऐसा फल फहना। पर, यदि शुभग्रह हों तो मिल जायगा, पंचमो नवमस्तेन नप्टलाभः शुभोदये येषु पापेन नष्टाप्ती रुट्यादित्रिकेषु च ॥२४॥ पंचम, नयम भोर सप्तम (१) शुम से युक्त हो तो नष्ट घस्तु मिलेगी, यशुम प्रा से युद्ध हों तो न मिगेगी। यहो दाल रन, चतुर्य और दशम का भी जानना । भारुड ऐसा पहना।

१
शनप्रदीपिका।
भ्रातृस्थानयुते पापे पंचमे वाऽशुभस्थिते
नष्टद्रव्याणि केनापि दीयन्ते स्वयमेव च ॥२५॥
तृतीय स्थान में पाप ग्रह हों या पंचम में हो पाप ग्रह हों तो कोई स्वयं नष्ट द्रव्य
दे जायगा।
प्रश्नकाले शकचापे धूमेन परिवेष्टिते।
ग्रहे द्रष्टुर्न भवति तत्तदाशासु तिष्ठति ॥२६॥
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पृष्ठोदये शशांकस्थे नष्टं द्रव्यं न गच्छति ।
तद्राशिःशनिदृष्टश्चेन्नप्टं व्योम्नि कुजे न तत् २७॥
पृष्टोदय राशि लग्न में हो, उसमें चंद्रमा दैठा दो तो नए द्रव्य कहीं गया नहीं है ऐसा
कहना । किन्तु वह पृष्ठोदय राशि यदि शनि से दृष्ट हो x
बृहस्पत्युदये स्वर्ण नष्टं नास्ति विनिर्दिशेत् ।
शुक्र चतुर्थके रौप्यं नष्टं नास्ति वदेध्रुवम् ॥२८॥
सप्तमस्थे शनौ कृष्णलौहं नष्टं न जायते ।
बुधोदये त्रपुर्नष्टं नास्ति चन्द्रे चतुर्थके ॥२६।।
लग्न में गुरु हो तो सोना नष्ट नहीं हुआ। चतुर्थ में शुक हो तो चान्दी नए नहीं हुई।
सप्तम में शनि हों तो लोहा नष्ट नहीं हुआ। लग्न में बुध हों ताया नष्ट नहीं हुआ। चंद्रमा
चतुर्थ में हो तो कांसा नष्ट नहीं हुआ ऐसा पताना चाहिये।
कांसं नष्टं न भवति वंगं राहौ च सप्तमे।
आरकूटं पंचमस्थे भानौ नष्टं न जायते ॥३०॥
राहु सप्तम में हो तो रागा गौर कासा नहीं नष्ट हुए। पंचम में सूर्य हो तो पित्तल
नष्ट नहीं हुआ।
दशमे पापसंयुक्ते न नष्टं च चतुष्पदं ।
बन्धनादि भवेयुः स्यात्तत्तद्विपदराशयः ॥३१॥

-- मसे विषम राशि में यदि पुपर प्रपदोनो चोर पुष्प होना। समाजिEE भानप्रदीपिका। पापग्रह दशम में हों तो पशु नष्ट नहीं हुआ। यदि यह राशि नरराशि हो तो स्तिो ने घाघ लिया है ऐसा ग्रहाना चाहिये। बहुपादुदये राशौ बहुपान्नष्टमादिशेत् । पक्षिराशौ तथा नष्टे एतेषां बंधमादिशेत् ॥३२|| बाहुपात् राशि यदि लग्न हो तो यहुपाद जीट हुआ है ऐसा बनाना। यदि ये पक्षि राशि में नष्ट हुए है तो फिसो फे वधन में पड गये हैं ऐसा बताना चाहिये। कर्कवृश्चिकयोलग्ने नष्टं सद्मनि कीर्तयेत् । मृगमीनोदये नष्ट कपोतान्तरयोर्वदेत् ॥३३॥ फर्क और वृश्चिक यदि लगा हो तो घर में ही नष्ट यस्तु है ऐसा बताना । मकर या मीन होते। चूतरों के पासस्थल के पास पहीं पडा है। कलशो भूमिजे सौम्ये घटे रक्तघटे गुरुः । शुक्रश्च करके भने घटे भास्करनन्दनः ॥३४॥ आरनालघटे भानुश्चन्द्रो लवणभाण्डके । नष्टद्रव्याश्रितरथानं सदमनीति विनिर्दिशेत् ॥३५|| मगलकारक होने से घटे में और युध पागो घढे ही में तथा हरपति का लाल घरे में, शुभ, होते। टेपूटे परफ में, शनिधर हो तो घढे में फमल घट में सूर्य पा, चन्द्रमास नमक के घर में अपने घर में नष्ट द्रव्य पाखान धिय परना। पुंग्रहे संयुते दृप्टे पुरुपस्तस्करो भवेत् । स्त्रीराशौ स्त्रीग्रहेदृप्टे तस्करी च पधूर्भपेत् ॥३६॥ लग पुराशि पा हो, पुरुष प्रद से युक्त और हुए हो तो चोर पुगप है। पा, पदि स्त्रीशिरन हो गोरखी प्रद सेयुत पोरदृष्ट हो तो रनी चोर है। उदयादोजराशिस्थे पुंग्रहे पुरुषो भवेत् । समराठ्युदये चोरी समस्तैः स्रोग्रहेषधः ॥३६॥ में दोमोर उस से समापान परलो प्रहा हो तोरतो चोर होगी।

ज्ञानप्रदीपिका रन और उदयारूढयोश्चैव बलावलवशाद वदेत् । कर्किनकपुरंधीषु नष्टद्रव्यं न सिध्यति ॥३७॥ भारूढ़ पासे जो फल कहा गया है उसे कहते समय बलोरल का विचार करके कहना। कके मका और कन्या में भूला माल नहीं मिलता। पश्यन्ति खे खगैश्चन्द्रः चौरास्तद्वतस्वरूपिणः द्रव्याणि च तथैव स्युरिति ज्ञात्वा वदेत सुधीः ॥३८॥ माकाश में जो ग्रह चन्द्र को पूर्ण दृष्टि से देखना हो उसी के स्वरूप का चोर बताना, द्रव्य भी वैसा ही होगा। यस्य आरूढभं याता तस्यां दिशि गतं वदेत । तत्तद्ग्रहांशुसंख्याभिस्तत्तदिनाधिकं वदेत् (?) ॥३६॥ जिसके आरूढ़ में यन्तु नष्ट हुई है उसी को दिशा में गई है और उस ग्रह की किरणों के बरार दिन भो बताना चाहिये। खभावकवशादेवं किंचिदृष्टिक्शाद वदेत् । चन्द्रः स्वर्भादुदयभं यावत्तावत् फलं भवेत् ॥१०॥ चरस्थिरोभयः पश्चादेकद्वित्रिगुणान् वदेत् । स्वभाव और दृष्टि का ध्यान रण कर पा रहना चाहिये। चन्द्रमा के अपनी राशि से जितनी दूर लग्न हो उतना ही पल होता है। वस्थिर और द्विस्वभाव राशियों से कमश: एक दो और नीन गुना काल आदि बनाना। इति नष्टकाण्डः सुवस्तुलाभं राज्यं चे राष्ट्र ग्रामं स्त्रियस्तथा । उपायनांशुकोधानलाभालाभान् वदेत् सुधीः ॥१॥ इस प्रकरण में कथित नियमों के अनुसार वस्तुलाभ, राज्य, राष्ट्र, प्राम, स्त्री, पत्र, लाम, मोर हानि को बुद्धिमान बतायें। है . भानप्रदीपिका। उदयादित्रिकान् खेटाः पश्यन्त्युच्चक्षगा यदि । शत्रुमित्रत्वमायाति रिपुः पश्यति चेद्रिपुम् ॥२॥ यदि उच्च ग्रह लग्न द्वितीय और तृतीय को देखते हों तो शत्रु मी मित्र हो जाता है । उदयं छत्रलग्नं च रिपुः पश्यति वा युतम् । आयुर्हानिः रिपुस्थानं गतश्चेद वन्धनं भवेत् ॥३॥ यदि शनुग्रह अपने शत्रु को देखना हो अथवा, लग्नेश का शत्रु लग्न या छत्र से युन या दूष्ट हो तो आयु का हानि होगी। रिपुस्थान गत होने से बन्धन भी होता है । गतो नायाति नष्टं चेहहिरेव गतिं वदेत् । गलवच्चन्द्रजीवाभ्यां खेन्देषु सहितेषु च ॥४॥ अथवा ( उसी परिस्थिति में ) गया हुआ धन नहों लोटता अधया बाहर,पी ही गति करनी चाहिये । पाप ग्रह से युक्त चन्द्रमा और सूरपनि का यह फल बनाना है । नष्टप्रउने न नष्टं स्यात् मृत्युप्रश्ने न नश्यति । पापदृष्टियुने खेन्द्र भानुयुक्तं विपर्ययः ॥५॥ खोये हुए प्रश्न में खोयाहुभा नहीं कहना एव मृत्युरे प्रश्न में भी मरता नहीं। यदि पाप मह का दृष्टियोग हो तो यह फर होता है, किन्तु सय दृष्टियोग में इसका उल्टा होता है। शत्रोगगमनं नास्ति चतुर्थे पापसंयुने । दशमेकादशे सौम्यः स्थितश्चेत्सवकार्यकृत् ।।६।। यदि लग्न से चौथे स्थान में पाप ग्रह वैठे हों तो शत्रु का आगमन नहीं दाता एवं और शुभ ग्रह स्थिन तो सब कामों को सिद्ध वरना है। विपपीडा प्रश्न तु रोगिणां मरण भवेत् । गमनं विद्यते प्राटुर्नास्तीलि कायेद बुधः ॥७॥ प्रारख्यकार्यहानिश्च धनस्यायतिरीहिता। पूर्वोक्त स्थिति में विपीडा हा तो रोगो या मरण हो जाता है और प्रश्नकर्ता भी यात्रा नहीं होती तथा प्रारम्भ किये हुए पार्य पोहागि तथा धनी न होनी है ऐसा पहा गया है। एकादश में जान्प्रदापिका। चन्द्राव्योनस्थिते शुक्र जोवादव्योमस्थित रखो। तल्लग्ने कार्यसिद्धिः स्यात् पृच्छतां नात्र संशयः । चन्द्र गशि से दशम में शुक्र हो और वृहस्पति की गशि से दशम में सूर्य हो तो ऊपर के बताये हुए लन में पूछने बारे सो निसन्देह सिद्धि होती है। उदयात्सप्तमे व्योन्नि शुक्रश्चेत् स्त्रीसमागमः ॥ धनागमं च सोम्ये च चन्द्रेऽप्येवं प्रकीर्तितम् । लग्न से सनम में शुरु हो तो झोममा, बुध हो तो धनागम और चन्द्रमा भी हों तो धनागम बनाना चाहिये। अन्य शुभागहों पर मे भी यही फल कहा जायगा। मित्रः स्वाम्युच्चमायाति नता खेटाश्च यप्टिका. ॥१०॥ शन्यारयोगवेलायां सर्वकार्यविनाशनम् ।। मित्र म्बामो उच्च का ज्योति ग्रह हो नो सीदता है. शनि मंगल योग वेला में हो तो सम्पूर्ण कार्यों का नाश करता है। पूर्वशास्त्रानुसारेण मृत्युव्याधिनिरूपणम् ॥११॥ पूर्व फथित शास्त्र के अनुसार मृत्यु और व्याधि का निरूपण करता है। उढयात् पष्टसे (?) व्याधिः अष्टने मृत्युसंयुतम् । तत्रारूडे व्याधिचिन्ता निधने (2) मृत्युचिन्तनम् ॥१२॥ लम से पष्ठ स्थान से व्याधि और अष्टम स्थान से मृत्यु का विचार परना चाहिये। इसी प्रकार आरुढ से भी क्रमश. पष्ट और अष्टम हो नो व्याधि मोर मृत्यु का विचार करना चाहिये। तत्तद्ग्रहयुने दृष्टे व्याधि मृत्यु वदेत् क्रमात् । पापनीचारयः खेटाः पश्यन्ति यदि संयुताः ॥१३॥ न व्याधिशमनं मृत्युं विचाय वदेत् क्रमात् । ध्याधि भोर मृत्यु को इस प्रकार बताना चाहिये-यदि षष्ट स्थान योर अष्टम स्थान पाप ग्रह, नोव ग्रह या रानु ग्रह से दृष्ट या युन हो तो व्याधि मोर मृत्यु मनाना चाहिये। इनका शमन नहीं हुमा यह विचार करके घनाना चाहिये।

शानप्रदापिका । . । एतयोश्चंद्रभुजगौ तिष्ठतो यदि चोदये ॥१४॥ गरादिना भवेदव्याधिः न शाम्यति न संशयः । पृष्ठोदये क्षेत्रछत्रे व्याधिमोक्षो न जायते ॥१५॥ यदि इन्हीं पष्ठ या अष्टम स्थान में चन्द्रमा और राहु या रन में एक हो और अन्य इन स्थानों में तो पिप देने से व्याधि हुई है और यह शान्त न होगी। पृष्ठोदय न हो और लग्नेश की राशि ही छत्र हो तो व्याधि का शमन नहीं हुआ है । व्याधिस्थानानि चैतानि मूर्धा वक्र भुजः करः । वक्षःस्थलं स्तनौ कुक्षि कक्ष मूलं च मेहनं ॥१६॥ उरू पादौ च मेषाद्या राशयः परिकीर्तितो. । मेषादि राशियों के लग्न होने से क्रमश इस प्रकार व्याधि स्था1 जानना चाहिये- सिर, मुह, बाहु, हाथ ( हथेली ), छाती, स्तन, कोख काख, मूल उपस्ध, Fधा मौर चरण। गएडस्थल कुजो मूर्ध्नि मुखे शुक्रो गण्डयोर्भुजयोर्बुध ॥१७॥ चन्द्रो वक्षसि कुक्षौ च हनौ नाभी रविर्गुरुः । उों शनिरहिः पादो यहाणां स्थानमीरितम् ॥१८॥ ग्रहों को स्थान इस प्रकार है-मंगल मूर्द्धा में शुभ मुह और भुज में बुध, चन्द्र वक्षस्थल में और कोख में, हनु (दोही) भोर नामि में क्रमश सूर्य भोर वृह स्पनि, जघों में शनि, चरणों में राहु । स्थानेष्वेतेषु नष्टं च भनेठेतेषु राशिपु । पापयुक्नेषु दृष्टेषु नीचसम्नेषु सम्भवः ॥१६॥ न स्थानों में अथवा इन राशियों में पाप ग्रहों का दृष्टियोग हो और उस समय में गष्ट हुमा हो तो तथा नोचासत में हो तो रोग का सम्भर जानना चाहिये । पश्यति चेटु ग्रहाश्चंद्र' व्याधिस्थानागलोकनम् । पूर्वोक्तमासवर्षाणि दिनानि च वठेत्सुधीः ॥२०॥ पदिव्याधि स्थान को देखने वाले छद्रमा पर प्रहों हरिदो तो पहले बताए दिन, मास मोर य पा निर्देश परना वादिया। .

ज्ञानप्रदीपिका। 1 पष्टाष्टमे पापयुते रोगशान्तिन जायत। पष्ठापटमे शुभयुते रोगः शाम्यति सर्वदा ॥२१॥ और र अपम स्थान यदि पापाकान्त हों तो रोगशान्ति नहीं होती पर, यदि शुभ युक हों तो होता है। किचित्तत्र विशेयोक्तो रोगमृत्युस्थलं शुभम् । यावद्भिर्दिवसान्ति तावद्धी रोगमोचनम् ॥२२॥ विशेषता यह है कि, पष्ठ या अष्टम स्थान में जितने दिनों में शुम ग्रह पहुनेगा उतने हो दिनों में रोग छूटेगा। रोगस्थानं भवेदस्ने पापखेटयुत तथा । तत्यष्ठचंद्रसंयुक्ते रोगिणां मरणं भवेत् ॥२३। यदि रोगस्थान अस्त लग्न पाप ग्रह से युक्त हो और उससे भी छठा स्थान चंद्रमा से युक्त हो तो रोगी की मृत्यु निश्चित होगी। रोगस्थानं कुज. पश्येत् शिरस्ताऽधो ज्वरं भवेत् । भृगुर्विसूची सौम्यश्चेत् कक्षपथिर्भविष्यति ॥२४॥ मंगल यदि पष्ठ स्थान को देखें तो शिर के नीचे घर, शुन देखे तो हैजा और बुध, देख तो कक्ष ग्रंथि (ग) होगा। राहुर्विपू शशी पश्येन्नेत्ररोगो भविष्यति । मूलव्याधिगुः पश्येच्च'द्रवत् स्याद भृगोः फलं ॥२५॥ राहु से हैजा, चद्रमा के देखने से नेत्ररोग और चंद्र को भृगु देखना हो तो शुक्र का भो फल चंद्रसा ही होगा। परिधौ चंद्रको दण्डहप्टिः प्रउने कृते सति । कुष्ठव्याधि मृतिं ब्रूयात् धमे भूताहतं भवेत् ॥२६॥ सर्वापस्मारमादित्ये पिशाचपरिपीड़नं । श्वासः कासश्च शुलश्च शनौ शीतवरं कुजे ॥२७॥ .

कानप्रदीपिका। 2 एतयोश्चंद्रभुजगौ तिष्ठतो यदि चोदये ॥१४॥ गरादिना भवेदव्याधिः न शाम्यति न संशयः। पृष्ठोदये क्षेत्रछत्रे व्याधिमोक्षो न जायते ॥१५॥ यदि इन्हीं पष्ठ या अष्टम स्थान में नन्द्रमा और राहु या रन में एक हो और अन्य इन स्थानों में तो विप देने से व्याधि हुई है और वह शान्त न होगी। पृष्ठोदय लग्न हो और लग्नेश की राशि ही छत्र हो तो व्याधि का शमन नहीं हुआ है। व्याधिस्थानानि चैतानि मूर्धा वक्र भुजः करः । वक्षःस्थलं स्तनौ कुक्षि को मूलं च मेहनं ॥१६॥ उरू पादौ च मेपाया राशयः परिकीर्तिताः। मेपादि राशियों के लग्न होने से क्रमश. इस प्रकार व्याधि स्थान जानना चाहिये- सिर, मुंह, बाहु, हाथ ( हथेली ), छाती, स्तन, कौंख, कान, मूल, उपस्थ, धा और चरण। में कुजो मूर्ध्नि मुखे शुक्रौ गण्डयोर्भुजयोर्बुधः ॥१७॥ चन्द्रो वक्षसि कुक्षौ च हनौ नाभी रविर्गुरुः । उवों. शनिरहिः पादौ ग्रहाणां स्थानमीरितम् ॥१८॥ ग्रहों को स्थान इस प्रकार है-मंगल मूर्धा में, शुभ मुह में, गएडस्पल और भुज बुध, चन्द्र वक्ष स्थल में और कोख में, हनु (ढोदी) और नामि में फमश. सूर्य और यह ..स्पति, अंधों में शामि, वरणों में राहु । स्थानेष्वेतेषु नष्टं च भवेदेतेषु राशिपु । पापयुक्तेषु दृष्टेषु नीचसम्नेषु सम्भवः ॥१६॥ एन स्थानों में अथवा इन राशियों में पाप ग्रहों का दाटयोग हो और उस समय में मष्ट हुमा हो तो तथा नोचासत में हो तो रोग पा सम्म जानना चाहिये । पश्यति चेट् ग्रहाश्चंद्र व्याधिस्थानावलोकनम् । पूर्वोक्तमासवर्षाणि दिनानि च वदेत्सुधीः ॥२०॥ पदिध्याधि स्थान को देखने वाले चंद्रमा पर महो पी दृष्टिदो तो पहले पता हुए, दिन, मास और धर्म का निर्देश पाना चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। पठाष्टमे पापयुते रोगशान्तिन जायते । पष्ठाण्टमे शुभयुते रोगः शाम्यति सर्वदा ॥२१॥ षष्ठ और अपम स्थान यदि पापाक्रान्त हों तो रोगशान्ति नहीं होती पा, यदि शुभ युक हों तो होता है। किचित्तत्र विशेषोक्तो रोगमृत्युस्थलं शुभम् । यावद्भिर्दिवसान्ति तावद्भी रोगमोचनम् ॥२२॥ विशेषता यह है कि, पष्ठ या अम स्थान में जितने दिनों में शुम ग्रह पहुचेगा उतने हो दिनों में रोग छूटेगा। रोगस्थानं भवेदस्ते पापखेटयुत तथा । तत्पष्ठचंद्रसंयुक्ते रोगिणां मरणं भवेत् ॥२३। यदि रोगस्यान अस्त लग्न पाप ग्रह से युक हो और उससे भी छठां स्थान चंद्रमा मृत्यु निश्चित होगी। रोगस्थानं कुजः पश्येत् शिरस्ताऽधो ज्वरं भवेत् । भृगुर्विसूची सौम्यश्चेत् कामथिर्भविष्यति ॥२४|| मंगल यदि पष्ठ स्थान को देखे नो शिर के नीचे उतर, शुक्र देखे तो हैजा और बुध, देखे तो कक्ष प्राधि (प्लग ) होगा। राहुर्विपू शशी पश्येन्नेत्ररोगो भविष्यति । मूलव्याधिर्मगुः पश्येञ्चंद्रवत् स्याद भृगोः फलं ॥२५॥ राहु से हैजा, चंद्रमा के देखने से नेत्ररोग और चंद्र को भृगु देखना हो तो शुक्र का भो फल चंद्रसा ही होगा। परिधौ चंद्रको दण्डदृष्टिः प्रश्ने कृने सति । कुष्ठव्याधि मृति यात् धृमे भूताहतं भवेत् ॥२६॥ सर्वापस्मारमादित्ये पिशाचपरिपीड़न । वासः कासश्च शुलश्न शनी शीतचरं कुजे ॥२७॥ युक्त हो तो रोगी की ज्ञानप्रदीपिका। परिधि चन्द्रमा धनुष की दृष्टि में प्रश्न हों तो कुष्ठ रोग किंचा मृत्यु बनाना । केतु से भूतबाधा और सूर्य से सब प्रकार की मिरगो या पिशाचयाधा, शनि से श्वास कास मौर माल तथा मंगल से शीत ज्वर यतामा इन्द्रकोदण्डपरिधौ दृष्टे प्रइने तु रोगिणां । नव्याधिशमनं किंचिदायं पश्यंति चेत् शुभा॥२८॥ इन्द्र धनुष परिधि दृष्टि में यदि रोगीका प्रश्न हा तो रोग यी कुछ भी शांति नहीं हो तो यदि स्थान को कभी रातु नहीं देखता हो यह स्थिति होनी है। (१) रोगशान्तिर्भवेच्छीघ्र मित्रस्वात्युच्चसंस्थिताः । यदि शुम नह उच्च मिन मोर स्वगृही हो तो रोगशांति शीघ्र बनाना चाहिये। शिरोललाटे भ्रनेत्रे नासानु त्यधराः स्मृताः ॥२६॥ चिबुकश्चांगुलिश्चैव कृत्तिकायु डवो नव । सिा, एलाट, मौं, आन, नार फोन होंट, चियुफ और अंगुलि ये कृतियादि ना नक्षत्रों के स्थान हैं। कंटवक्षः स्तनं चेव गुदमध्यनितंबकाः ॥३०॥ शिश्नमेद्रोरवः प्रोक्ता उत्तराया नवोडवः । कंठ, छाती, स्तन, गुदा, पटि, नितंभ, उपध, पेद्र और उसके उत्तरादि नय नक्षत्रों स्थान है। जानुजंघापादसंधिपृष्टान्तस्तलगुल्फकं ॥३१॥ : पादाम नाभिकांगुल्या विश्व द्या नवोडयः । जानु, जंघा पायसंघि, पोठ, भरतस्तर गुल्म, पैर फ. यागे हा भाग, नाभि, अंगुलि उत्तरांपादादि नर नक्षत्रों के म्यान हैं। उदयर्भवशादेवं ज्ञात्वा तत्र गदं वदेत् ॥३२॥ अंगनक्षत्रकं ज्ञात्वा नप्नद्रव्यं तथा वदेत के + . ।

३६ ज्ञानप्रदापिका। लग्न में जो नक्षत्र हो उसी के अनुसार इन अंगों में रोग बताना चाहिये। इसी प्रकार शारोर नक्षत्र नक्षत्र के पर मे नष्ट द्रव्य भी बताना चाहिये। त्रिकोणलग्नदशमे शुभश्चेदु व्याधयो नहि ॥३३॥ तेषु नीचारियुक्तेषु व्यधि-पोड़ा भवेन्नृणां । पंचम नरम, लग्न और दशम में यदि शुभ ग्रह हों तो व्याधि नहीं होती और पाप या शत्रु ग्रह हों तो होता है। इति रोगकाण्डः अथ मरणकाण्डः मरणस्य विधानानि ज्ञातव्यानि मनीपिभिः । वृषस्य वृपभच्छत्र सिंहच्छत्रं हरेभवेत् ॥१॥ अलिना वृश्चिकन्छनं कुंभच्छत्र घटस्य च । मरण का विधान भी चिदमानों का जाना चाहिये। वृप का उत्र वृष, सिंह का सिंह, वृश्चिक वृश्चिर और माछा चुभ है। उच्चस्थानमिति ज्ञात्वा उच्चः स्यादुदये यदि ॥२॥ मरणं न भवेत्तरय रोगिणो नात्र संशयः । यदि प्रश्न कान में लग्न ( लोग? ) उच्च का हो तो रोगी को मृत्यु नहीं हुई। तुलाया कार्मुकन्छन नोचमृत्युविपर्यये ॥३॥ मपरय मिथुनच्छन नीचमृत्युविपर्यये । नकस्य मिथुनन्छन नीचमृत्युविपर्यये ॥४॥ कन्याछत्र कुलोरस्य नीचमृत्युविपर्यये । तुला फा धन, मेप का मिथुन, मकर पा मिथुन और पन्या का पर्व छत्र होता है फिन्तु नीच मृत्युविर्य में ही उसका ही याम करता है। - ५. नानप्रदीपिका . नीचे चेद व्याधिमोक्षोन मृत्युर्मरणमादिशेत् ॥५॥ ग्रहेषु वलवान् भानुर्यदि मृत्युस्तदाग्निना । मंदः क्षुधा जलेनेन्दुः 'शीतेन कविरुच्यते ॥६॥ बुधस्तुपारवाताभ्यां शस्त्र णोरो बली दि । राहुर्विपेण जोवस्तु कुक्षिरोगेण नश्यति ।७। यदि लग्नेश नीच में हो तो मृत्यु यताना। यदि ग्रहों में यली सूर्य हो नो माग से, शनि हो तो भूव से बद्र हो तो जल से, शुक्र हो तो शोन से, बध हो तो तुपार और वातसे केतु हो तो हथियार से राहु होतो विषले और वृहस्पति हो तो कुक्षिराग मे मृत्यु होती है। विधोः पाठाप्टमे पापः सप्तमे वा यदि स्थितः । रोगमृत्युस्तलाभ्यां (2) वा रोगिणां मरणं भवेत् ॥८॥ यदि चद्र के छठे या भाउये स्थान में पाप ग्रह हो नो रोगी की मृत्यु होगी। आरूढान्मरणस्थानं तरमादप्टमगः शशी । पापाः पश्यति चेन्मृत्युं रोगिणां कथयेत्सुधीः ॥l आकढ से अष्टम स्थान को उससे अष्टम स्थान स्थित चंद्रमा और पाप ग्रह देखते हो, मोगेगी मरेगा। द्वितीये भानुसंयुक्त दशसे पापसंयुले । दशाहान्मरणं बृयात् शुक्रजीवौ तृतीयगौ ॥१०॥ सप्ताहान्मरणं बृयात् रोगिणामहि बुद्धिमान् । दिनीय में सर्य हो दशा में पाप हो तो दश दिन भीतर ही गेगी मरेगा । यदि शुक्र और वृहस्पति हों तो सात दिन गानर दिन में ही गेगी मरेगा। उदये चतुरस्र वा पापास्त्वष्टदिनान्मृतिः ॥११॥ लग्नद्वितीयगा. सापाश्चतुर्दशदिनान्मृतिः। त्रिटिनान् मरणं किन्तु दशने पापसंयुते ॥१२॥ तस्मात्सप्तगे पापे दशाहान्मरणं भवेत् । और ४१ ज्ञानप्रदीपिका। उदय या चतुरस्र में यदि पाप ग्रह हों तो आठ दिन में, लग और द्वितीय में हों तो १४ दिन में, दशम में पाप ग्रह स्थित हो तो ३ दिन में और चतुर्थ में हों तो दश दिन में मृत्यु होगी। निधनारूढगे पापडप्टे वा मरणं भवेत् । तत्तद्ग्रहदशादेव दिनमासादिनिर्णयम् ॥१३॥ मृत्यु और आरूढ स्थान यदि पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो मरण बताना। दिन महीने आदि का निर्णय नहीं पर से कर रेगा। इति मरणकाण्ड ग्रहोच्च स्वर्गमायाति रिपो मृगकुले भवः । नीचे नरकमायाति मित्रे मित्रकुलोद्भव ॥१॥ स्वक्षेत्रे स्वजने जन्म मित्रं ज्ञात्वा वदेत् सुधीः । मृत्यु के समय मृत प्राणी को ग्रहों के उम्र के रहो पर स्वर्ग होता है शत्रु स्थान में रहने पर पशुयोनि में जन्म मित्र गृह में रहने पर मिश्र कुल में जन्म और स्वक्षेत्र में रहने पर स्पजनों में जन्म घताना चाहिये। इति स्वर्गकाण्ड. कथयामि विशेषेण मूकद्रव्यरय लक्षणम् । पारुभाण्डानि भुम्नानि व्यंजनानि रसं तथा ॥१॥ भर में विशेष करके मूक हव्यों का निर्णय करता है। इस प्रकरण में पाक माण्ट भुक्त, व्यंजन भोर इमनावर्णीदोगा।

शानप्रदीपिका। सहभोक्ता भोजनानि तत्तथानुभवो रिपून् । (?) मेपराशौ भवेच्छाकं वृषभे गन्यमुच्यते ॥२॥ धनुमिथुनसिंहेषु मत्स्यमांसादिभोजनम् । नक्रालिकर्किमीनेषु फलभक्ष्यफलादिकम् ॥३॥ तुलायां कन्यकायाश्च शुद्धानमिति कीर्तयेत् । x x x x मेप रन यदि यली हो तो शाक भोजन घताना चाहिये। वृष हो तो दही दूध घो भादि धनु मिथुन और सिंह हों तो मछली मांस, गफर, वृश्चिक, पर्फ और मोन हो तो फलाहार और तुला कन्या हो तो शुद्ध अन्न बताना चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। ओजराशौ शुभैई प्टे स्वेच्छया भोजनं भवेत् । समराशौ पापदृष्टे भुंक्तेऽल्पं पापवीक्षिते ॥६॥ यदि विषम राशि को शुभ ग्रह देखते हों तो अधिकता से और सम राशि को पाप- ग्रह देखते हों और युक्त हों तो कमो के साथ भोजन यताना चाहिये। किंचित्पश्यति पापश्चेत् पुराणान् मधुभोजिनः । (१) अर्कारी मांसभोवतारौ उशनश्चन्द्रभोगिनां ॥१०॥ नवनीतघृतक्षीरदाधिभिभॊजनं भवेत् । पाप ग्रह की साधारण दृष्टि हो तो मधुर भोजन घताना। सूर्य और मंगल मास- भक्षी, शुक्र, चन्द्र और राहु मक्खन यी दूध और दही के साथ खाने वाले हैं। जलराशिपु पापेषु सौम्येषु च दिनेषु च ॥११॥ सतैलं भोजनं त्यादिति बात्वा विचक्षणः । पाप ग्रह जलराशि में हों और सौम्य ग्रह दिनयाला हो तो सतेल भोजन बताना चाहिये। पूर्वोक्तधातुवर्गेण भोजनानि विनिर्दिशेत ॥१२॥ मूलवर्गेण शाकादीनुपदेशाद् वदेद्बुधः । जीववर्गेण भुक्त्वा च मत्स्यमांसादिकानपि ॥१३॥ सर्वमालोक्य मनसा वदेन्नृणां विचक्षणः । पूर्व कथित धातुवर्ग से मोजन, मूल वर्ग से शाक सब्जी आदि, मोर जीवर्ग से मास मछली मादि का भोजन बुद्धिमान् पुरुष सब देख सुन के यताये। इति भोजनकाण्डः ४४ मानप्रदीपिणा । . स्वप्न यानि च पश्यन्ति तानि वक्ष्यामि सर्वदा । मेपोदये देवग्रहं प्रसादान् संवदंति च ॥१॥ वृपोदये दिनाधीशं ज्ञातिदेशस्य दर्शनम् । वृश्चिकस्योदये क्रूर व्याकुलं मृतदर्शनम् ॥२॥ स्वप्न में मनुष्य जो देखता है उसे भी बताता है-मेप रन में देवग्रह देखता है और प्रसन्नता की यातें सुनता है और कहता है । वृप में सूर्य को, जाति को देश को और वृश्चिक में कर, व्याकुल और मृतक को देखता है । मिथुनस्योदये विप्रान् तपस्विवदनानि च । कुलीरस्योदये क्षेत्रं ‘पुनः ॥३॥ तृणान्यादाय हस्ताभ्यां गच्छन्तीरिति निर्दिशेत । सिंहोदये किरातं च महिपीभिर्निपातितम् ।। मिथुन लग्न में विन और तपस्वियों के मुंह फर्क में खेत... तथा हाथों में तृण लेकर जते हुओं को देखा जाता है। सिंह में किरात को और भैस से अपने को निपातित या उसी किरात को निपातित देखा जाता है । कन्योदयेऽपि चारुद (2) मुण्डस्त्रीभिर्द्वि पादयः । तुलोदये नृपान् स्वणं वणिजञ्च स पश्यति ॥५।। वृश्चिकस्योदये स्वप्न पश्यन्त्यलिमृगादयः । वृपभश्च तथा ब्रूयात् स्वप्नदृष्टो न संशयः ॥६॥ उदये धनुपः पश्येत् पुप्पं पक्वफलं तथा। मृगोदये दिनेन्दुं च रिपुं स्वप्न षु पश्यति ॥७॥ कुंभोदये च मकरं मीनखप्ने जलाशयः । कम्या में स्वप्न देखे तो मुण्डित स्त्री हापी आदि, तुला में राजा, स्वर्ण, पनिया आदि वृधिक में भौरा मृग, बैल आदि, धनु में फूल, पक्क फल आदि, मकर में दिन का चाँद शानु, कुंभ में घडियाल ( मगर), मीन में जलाशय दिखाई देता है।

शानप्रदोषिका। - 4 चतुर्थे तिष्ठति भृगौ रजतं वस्तु पश्यति ॥८॥ कुजश्चेन्मांसरतांश्च सशुक्रफलमंगनाम् । चतुर्थ में शुक्र हो तो चांदी की चीज, मंगल हो तो मांस, रक और सफेद फल लिये हुई औरत दिखाई पड़ती है। मृगं शनिश्चेत् सौम्यश्चेत् शिलां स्वप्ने तु पश्यति hel आदित्यश्चेन्मृतान् पुंसः पतनं शुकशालिनाम् । चंद्रश्चेत् वदनं शीतं राहुमध्यविषं भवेत् ॥१०॥ शनि चतुर्थ में हो तो मृग, युध हो तो शिला, सूर्य हो तो मरे हुए मनुष्यों को अयया सूखे धान्यों को, चन्द्रमा हो तो शीतबदन और राहु हो तो मध्य विष का दर्शन स्वप्न में अत्र किंचित् विशेषोऽस्ति छत्रारूढोदयेषु च। छत्रस्थितश्चेत् सौम्यश्चेत्सोधसौम्यामरान् वदेत् ॥११॥ इस प्रश्नाध्याय में ला राशियों के पक्ष विशेष यह है कि शुभग्रह को छत्रामद हो तो "सुन्दर गृह अथवा देवतादिक का दर्शन होता है। चतुर्थभवनात् स्वप्नं ब्रूयात् ग्रहनिरीक्षकः । तत्रानुक्त यदखिलं ब्रूयात् पूर्वोक्तवस्तुना ॥१२॥ चतुर्थ भवन से ग्रहों को स्वप्न फल कहना चाहिये। जो कुछ न भी कहा गया है उसे भी पूर्व कथित वस्तु पर से समझ लेना चाहिये। इति स्वप्नकाण्डः अथोभयः पथिको दुर्निमित्तानि पश्यति । स्थिरोदये निमित्तानां निरोधेन ने गच्छति ॥१॥ चरोदये निमित्तानां समायातीति ईरयेत् ।

ज्ञानप्रदापिका। यात्री द्विस्वभाव लन में जाने से दुगवुन देता है। स्थिर लग्न में शकुनों के प्रभाव स यात्रा हो स्थगित कर देता है और चर रन में शुभ शकुनों के प्रभाव से सफ लतापूर्वक लौट आते हैं। चन्द्रोदये दिवाभीतचपपारावनादयः ॥२॥ शकुनं भविता दृष्ट (?) इति बृयाद्विचक्षण. ! ल्म में यदि चन्द्र हो तो गस्ते में उल्लू कबूतर आदि का शकुन होगा--यह बताना माहिये। राहृदये तथा काकभरद्वाजाटय. खगा. ॥३॥ मन्दोदये कुलिग स्यात् बोढये पिगलस्तथा । लन में राहु हो तो काक भरदूल अदि शनि हो तो नटक और युध हा तो बादर। सूर्योढये च गरुड. सव्यासव्यवशाद वदेत् ॥४॥ स्थिर राशी स्थिरान् पश्येत चरे तिर्यग्गता यदि । उभयेऽवनि वृत्तस्य ग्रहस्थितिवशादमी ।।५।। सूर्य लग्न में हो दाहिने याय को विचार के गरुड ता चाहिये । सिर में स्थिा यस्तु, घर में वर-पक्षो आदि-और द्विस्वमात्र में रास्ते से लौटते हुए आदमी दिखाई पड़ते है। यही बात ग्रहस्थिति क वश से इस प्रकार है। राहोगौलिविधोश्चात्र ज्ञस्य चुन्नधरी भवेत् । दधि शुक्रस्य जीवस्य क्षीरसर्पिरुदाहरेत् ॥६॥ भानोउच उमेतगरुड शिवा भौमस्य कीर्तिताः । शनैश्चरस्य वह्निश्च निमित्त दृष्टमादिशेत् ॥७॥ यात् गमने शरटा वका । जीवकाण्डप्रकारेण वीक्षणस्य विचारयेत् ॥ राहु का गौ और पिच्छी चन्द्रमा का बुध का चुनधरी (पशि मिशेष) शुक्र का दही, गृहस्पति का दूध घी, पूर्य का रथेन गरुड, मगल का शगालिया, शनि या शुक्रस्य पक्षिणी ज्ञानप्रदोपिया। आग, शुक्र का दो पक्षो शाट और थक-ये शकुन होते है। जीव काण्ड में कहे हुये प्रकार से शकुन दर्शन का विचार कर लेना चाहिये। इति निमित्तकाण्डः प्रश्ने वैवाहिके लग्ने कुजः स्यादुदये यदि । वैधव्यं शीधमायाति सा वधू नोंत संशयः ॥१॥ x x x x x x प्रश लग्न में, यदि विवाह सयधी प्रश्न हो तो, यदि मंगल हो तो शीघ्र विना सदेह के वधू विधश हो जायगी। उदये मन्दरे नारी रिकामृगसुता भवेत् । (2) चन्द्रोदये तु मरणं दम्पत्योः शोघ्रमेव च ॥२॥ शुक्रजीवबुधा लग्ने यदि तो दोर्घजीविनौ । x x x x x x । रूम में चन्द्रमा हो तो दोनों सो पुरुष शीघ्र मर जायगे, शुक्र वृहस्पति या बुध के लम मे रदने से वे दीर्घजीवो होंगे। द्वितीयस्थे निशानाथे बहुपुत्रवती भवेत् ॥३॥ स्थितिमध्यर्कमन्दाराः मनःशोको दरिद्रता । यदि द्वितीय में चंद्र हो तो बहु पुत्ररता और दशम में सूर्य मंगल और शनि हो तो मानसिक और दारिद्रय प्राप्त होता है। द्वितीये राहुसंयुक्ता सा भवेत् व्यभिचारिणी ॥४॥ शुभग्रहा द्वितीयस्था मांगल्यायुष्यवना । द्वितीय स्थान में राहु हो तो पन्या व्यमित्रारिणी और शुभ ग्रह हो तो मंगल और आयु से पूर्ण होती है।

४८ झानप्रदीपिका होगी। तृतीये राहुजीयो चेत्सा बन्ध्या भवति ध्रुवम् ॥५॥ अन्ये तृतीयराशिस्था धनसोभाग्यवर्द्ध ना । राहु और वृहस्पनि यदि तृतीय में हों नो स्त्री बन्ध्या होगी। उसी स्थान में अन्य मह हों तो धन गौर सोहाग से भरपूर नाथा दिनेशस्तिप्टंतो यदि तुर्ये ततोऽशुभः ॥६॥(?) शनिश्च स्तन्यहोना स्यादहिः सापत्न्यवत्यसो । बुधजीवारशुक्राश्चत् अल्पजीवनवत्यसौ ॥७॥ चतुर्थ में सूर्य हो तो ( अशुभ फल ), शनि हो तो सन्तानहीना, राहु हो सौत वाली होगी। वहीं धुध वृहस्पति, मंगल या शुक्र हो तो अल्पायु होगा। पंचमे यदि सौरिः : स्याद व्याधिभिः पोडिता भवेत्। शुक्रजीवबुधाश्चापि पशुउचेत बहुपुत्रवत् ॥८॥ चन्द्रादित्यौ तु बन्दी स्यात् अहिम्चेत मरणं भवेत् । आरश्चेत् पुत्रनाशः स्यात् प्रश्ने पाणिग्रहोचिने । पंचम में यदि शनि हो तो रोगिणी, शुरु, पृहस्पति और बुध हो तो बहुत पशु और पुत्र से युक्त, चन्द्रमा और सूर्य हो तो बन्दी, गहु हो तो मरण और मंगल हो तो पुत्रनाश यह चैवाहिक प्रश्न में बताना । पष्ठे शशो चेद्विधवा बुधः कलहकारिणी। पष्ठे तिष्ठति शुक्रश्चेदीर्घमांगल्यधारिणी ॥१०॥ अन्ये तिष्ठन्ति चेन्नारी सुखिनी वृद्धिमिच्छति । पा स्थान में चन्द्रमा हो तो विधवा युध हो मो काठहो, शुक्र हो तो सर्व मांगल्य धारिणी और अन्य ग्रह हों तो सुखा और वृद्धिमतो धन्या होती है। सप्तमस्थे शनी नारो तरमा विधया भवेत् ॥११॥ घरेणापता याति कुजे तिष्ठति सप्तमे । बुधजीवी सन्मतिःस्याबाहुश्चेद विधवा भवेत् ॥१२॥ व्याधिग्रस्ता भवेन्नारी सप्तमस्थो रविर्यदि।

शानप्रदीपिका गामिनी, सप्तमस्थे निशाधीशे ज्वरपीडावती भवेत् ॥१३॥ शुकश्चेत्सप्तमे स्थाने सा वधर्मरणं ब्रजेत् । सप्तम में यदि शनि हों तो शीघ विधवा मगल हों तो दूसरे से हरी जाकर अय- बुध और वृहस्पति हों तो सद्बुद्धि वाली, राहु हो तो विधा, सूर्य हो तो व्याधि प्रस्त, चन्द्रमा हो तो बुखार की पीहा से आकुल और शुक्र हो तो मृत्यु को प्राप्त ह तो है । अष्टमस्थाः शुक्रगुरुभुजगा नाशयंति च ॥१४॥ शनिझो वृद्धिदौ भोमचंद्रो नाशयतः स्त्रियम् । (2) आदित्यारौ पुनर्भूः स्यात्प्रश्ने वैवाहिके वधृ ॥१५॥ अष्टम में शुक्र गुरु और राहु नाश करने वाले शनि और बुध वृद्धि करने वाले, मंगल और चंद्र मारक, लय और मगल पुनर्विवाह कारक होते है । नवमे यदि सोमः स्यात् व्याधिहीना भवेद् वधूः । जीवचंद्रौ यदि स्याता बहुपुत्रवती वधू ॥१६॥ अन्ये तिष्ठन्ति नवमे यदि बंध्या न संशयः । नाम में यदि बुध हो तो वधू नीराग, वृहस्पति और चन्द्रमा हों तो बहु पुत्रमागे और अन्य प्रद हो तो क्या हाती है-इसमें सन्देह नहीं। दशमे स्थानके चंद्रो वन्ध्या भवति भामिनी ॥१७॥ भार्गवो यदि वेश्या स्यात् विधवाकिकुजादयः । रिक्ता गुरुश्चेजज्ञादित्यौ यदि तस्या. शुभं वदेत् ॥१८॥ दशम में चन्द्र हों तो बाम शुक्र हो तो वेश्या, शनि मगल यादि हो तो विधा, गुरु होतो रिका और बुध सूर्य हो तो अशुभ (1) फल वाली होती है। लाभस्थानगताः सर्वे पुत्रसौभाग्यवर्द्धकाः । लनद्वादशगउचंद्रो यदि स्यान्नाशमादिशेत् ॥१६॥ एकादश स्थान में सभी ग्रह पुत्र और सौभाग्य के वर्धक तथा लग्न और द्वादश में यदि चंद्रमा हो तो नाशकारक होता है।

५० ज्ञानप्रदीपिका। शनिभौमौ यदि स्यातां सुरापानवती भवेत् । सादित्यो स्थितौ वन्ध्या शुक्र सुखवती भवेत् ॥२०॥ द्वादश में यदि शनि और भौम हों तो मदिरा पान करने वालो, राहु और सूर्य हों तो पन्ध्या और शुक्र हो तो सुखो होगी। इति विवाहकाण्डः क्षुरिफालक्षणं सम्यक् प्रवक्ष्यामि यथा तथा । राहुणा रहिते चन्द्रे शत्रुभंगो भविष्यति ॥१॥ अप क्षुरिका-युद्ध संबन्धो-रक्षणों को कहता है यदि चंद्रमा राहु से रहित हो तो शत्रु अवश्य नष्ट होगा यही उत्तर प्रानिक को देना चाहिये । नीचारिक्तास्तु (2) पश्यति यदि खड़गस्य भंजनम् । शुभग्रहयुते चन्द्रे हप्टे चास्त्रशुभं वदेत् ( भवेत् ) ॥२। चन्द्रमा को यदि नीच और शत्रु ग्रह देखते हों तो तलघार का टूटना और शुभ प्रह के युन और दृष्ट होने पर उसकी सफलता घनानो चाहिये। पापग्रहसमेतेपु छत्रारूढादयेषु च । येषु प्रष्टा स्थितः किंतु तदत्रंण हतो भवेत् ॥३॥ छत्र, मास्ट और एन यह पाप प्रदा युग हो और जिसमें प्रदस्थित हो इसके शावानुसार उस पर पामरण पदना । अथवा कलहः खङ्गः परेणापहनो भवेत् । एषु स्थानेषु सौम्येषु खड्गस्तु शुभदो भवेत् ॥४॥ या पलह होगा पा सलपार पो दूमा पुरा ले जायगा इन्हीं प्यानों में गुम प्रह हतोपएम गुम फल तथा पिया दाना होगा।

ज्ञानप्रदीपिका। 562) प्रदेशे तस्य लग्नस्य लग्ने वा पापसंयुते । खड्गस्यादाणं ब्रूयात् त्रिकोणे पापसंयुने ॥५॥ (इस लोक के चौथे चरण का अर्थ नीचे के लोक की टोका में सम्मिलित है) लग्न में यदि पाप हों तो तलार के प्रारंभ में ऋण लेना पड़ा होगा। तस्करो भंगतो व्योन्नि चतुर्थे पापसंयुते। खड्गस्य भंगो मध्ये स्यादिति ज्ञात्वा वदेत्सुधीः॥६॥ यदि त्रिकोण ( १, ५, ६) पाप युत हो तो चारी हो जाती है,...."चतुर्थ में पापग्रह हो तो लडाई के घोच में ही तलवार के टूटने की संभावना रहती है। एकादशे तृतीये च पापे शस्त्रस्य भंजनम् । मित्रखाम्युचनीचादिवर्गेनादि (?) गताः ग्रहाः ॥७॥ एकादश और तृतीय में यदि पप ग्रह हों तो शन्न टूट जायगा। मित्र, स्वामी, उश, नीव आदि वर्गों में गत प्रह- तत्तद्वर्गस्थलायां तु शस्त्रमित्यभिधीयते । संमुखे यदि खड्गः स्यात्तत्तीर्यग्रहमुच्यते ॥८॥ उन उन वर्गों के स्थल के सापुत्र शत्रपान का मय करते हैं, यदि सन्मुख में तिमाह हों तो खड्डपात का भय करते है। तिर्यम्मुखश्चत्तच्छत्रं अन्यशन वदेत्सुधीः । अधोमुखश्चेत्संग्रामे च्युतमाहृतमुच्यते ॥६॥ तिर्यग् मुख की राशि हो बहुत चोटीला (?) हथियार है, यदि अधोमुन राशि हो तो संग्राम में वह पुरुष मारा आयगा ऐसा उपदेश करना चाहिये । तत्तच्चेष्टानुरूपेण तस्य वै मरण स्मृतम् । उनकी चेष्टा के अनुरूप हो उस पुरुष का संग्राम में मरण मयबा जय पराजय का निर्देश करना। इति क्षुरिका काण्डः ----- ५२ प्रकार शुभ से भानप्रदीपिका। स्त्रीपुंसो रतिभोगौ च रनेहोऽरनेहः पतित्रता। शुभाशुभी क्रमात्प्रोक्तौ शास्त्र ज्ञान-प्रदीपिके ॥१॥ इस ज्ञानभदीपक शास्त्र में स्त्री पुरुष का पारस्परिक प्रम पातिव्रत्य और द्रोह, इस और अशुभ होते है यह कहा गया ~~ तीव्रता (?) उदयारूढो (2) खेटेपु भुजगो यदि । तेषां दुष्टस्त्रियः साक्षाद्देवानामपि संशयः ॥२॥ लग्न, मारूद, दशम में यदि राह हो नो स्त्री दुए होगी चाहे यह देवता के घर ही पयों न हो। लग्नादेकादशस्थाने तृतीये दशमे शशी । जीवदृष्टियुतस्तिष्ठेत् यदि भार्या प्रतित्रता ॥३॥ एकादश तृतीय और दशम में यदि चद्र हो और गुरु की दटि से युक्त हो तो मार्या पतिव्रता होगी। चन्द्र पश्यन्ति पुंग्वेटारनेन युक्ता भांति चेत् । सदभाया दुर्जनां यादिलि शास्त्रविदो विदु. ॥४ चन्द्रमा को पुरष प्रह देवो दो या युत हो तो निश्चय हो भार्या दुजन होगो। यही शास्त्रों का कहना है। सप्तमस्थो द्विपत्वेटे नीचारिगशशी तथा। बंधुद्दिपिणी लाके भ्रष्टा मा तु शुभाशुभैः ।।५।। नीच विया शत्रुपात में यदि माम शत्रु प्रा से युत पिपाइए दोनो स्त्री भ्रश होगा। भानुजोगो निशाधीशं पश्यंती च युतो यदि । पतित्रता भन्नारी पिणाति वदेह बुध ॥६॥ सूर्य और गुरु यदि चद्रमा को देना या युन हो तो यह ना पापस्नो योर पतिम्रता दोगो।

शानप्रदीपिका। शुक्रण युक्तो दृष्टो वा भौमश्चेत्परगामिनी । बृहस्पतिर्बुधाराभ्यां युक्तश्चेत्कन्यका यदि ॥७॥ शुक से यदि भौम ( मंगल ) युत या दृष्ट हो तो परपुरुषगामिनो और गुरु यदि बुध और मंगल से युत दृष्ट हो तो कन्या भी स्वैरिणी होती है। शुक्रवर्गयुते भौमे भौमवर्गयुते भृगौ। पृथके (2) विधवा भर्ता तस्या दोपान्न विंदते ।।८।। शुक्र वर्ग से भौम या मोम वर्ग से यदि शुक्र युत हो तो पति से पृथक यह स्त्री विधवा की भांति रहती है और वह उसके दोष नहीं जानता। भानुवर्गयुते शुक्र राजस्त्रीणां रतिर्भवेत् । जीववर्गयुते चंद्रे स्नेहेन रतिमान्भवेत् ॥६॥ सूर्य धर्ग से यदि शुक्र हो तो राजत्रियों से ति बताना चाहिये। गुरुवर्ग से यदि चन्द्रमा युत हो तो प्रेम पूर्वक रतिमान् कहना चाहिये। चंद्रस्त्रिवर्गयुक्तश्चेत् स्त्री सुतजवती भवेत् । शनिश्चंद्रेण युक्तश्चेत् अतीवव्यभिचारिणो ॥१०॥ चन्द्र यदि त्रिवर्ग से युत हो तो स्त्री पुरवती ओर शनि चंद्र से युत हो तो अधिक व्यभिचारिणो होती है । पापवर्गयुते दृष्टे शुक्रश्चेत् व्यभिचारिणी। अरिवर्गयुतश्चन्द्रो यद्यमित्रं वधूनरः (?) ॥११॥ यदि शुक्र पाप वर्ग से युन या दृष्ट हो तो व्यभिचारिणी और शत्रु गमे यदि चंद्र- युन हो तो खी पुरुष में स्नेह नहीं होता। नाचवर्गयुतश्चंद्रो न च स्त्रीभोगकामुकः । मित्रवर्गयुतश्चंद्रः मित्रवर्गवधूरतः ॥१२॥ यदि चन्द्र नोव यग से युत को नो स्रोमोग से मनुष्य कामुक नहीं होता। मिश्र धर्म से यदि युत हो तो पुरुष मित्र की स्त्रो से रत है-यह पताना चाहिये। .

५४ ज्ञानप्रदापित । स्वक्षेत्रे यदि शीतांशुः स्वभार्यायां रतिर्भवेत् । उच्चवर्गयुतश्चंन्द्रः स्पच्छवंशस्त्रियां रतिः ॥१३॥ यदि चन्द्रमा अपने क्षेत्र में हो तो अपनी स्त्रा में रति रताना चाहिये । किन्तु यदि उच्च वर्ग से युन हो तो अपने से ऊचे खान्दान की स्त्रा में रति बतानी चाहिये। उदासीनग्रहयुतो दृष्टो वा चदि चन्द्रमाः । उदासीनवधूभोगमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥१४॥ यदि समग्रह ( न मिलन शत्रु ) से व द्र युत किया दृष्ट हो तो वधू से उदासीन प्रेम (न अत्यधिक न कम) होगा। लग्ने च दशमस्थेऽत्र पञ्चमे शनियुक शशी । चोररूपेण कथयेत् रात्री स्वर्गवधूरतिः ॥१५॥ लग्न में दशम में और पंचम में चन्द्रमा शनि स युक्त होना चोरा से घारागना गमन पताना चाहिये।

ज्ञानप्रदापिका। चतुर्थ, तृतीय, पंचम या सप्तम भाव में यदि चंद्र शुक्र योग हो तो स्वस्त्री से कलह बताना चाहिये। तटीयवसनच्छे (2) कलहं परिकीर्तयेत् । सप्तमे पापसंयुक्ते दशम भोमस्युने ॥२०॥ तृतीये बुधसंयुक्त स्त्रीविवादस्थले शयः । सप्तम में पाप ग्रह हो दशम में मंगल तथा तृतीय में युध हो (चन्द्रमा युत दृष्ट हो तो) स्त्री से विवादपूर्वक भूशयन यताना । लग्ने चन्द्रयुते भौमे द्वितीयस्थे तथा यदि ॥२१॥ जागरश्चोरभीत्या च राशिनक्षत्रसंधिपु । पृष्टश्चेद्विधवाभोगः संकटादिति कीर्तयेत् ॥२२॥ लग्न में या द्वितीय में यदि मंगल और चंद्र का योग हा तो जागरण चोर के डर आदि से संकटपूर्वक विधवा से रति बताना। यह फल राशिसधि और नक्षत्रसंधि में भी घटेगा। तत्संधौ शुक्रसौम्यौ चेत् तत्तज्ज्ञातिपतिं वदेत् यत्र कुत्रापि शशिनं पापाः पश्यन्ति चेत्तथा ॥२३॥ राशि संधि नक्षत्र संधि में शुक्र या चंद्र हो तो स्वजातीय स्त्री से रति तथा x x x x x x x x x नपुंसो (१) सेव्यति (१) वधूः शुभश्चेत्पुरुपप्रिया । सात्विकाश्चन्द्रजीशर्का राजसो भृगुस्तोमजो ॥२४॥ तामसो शनिभूपुत्रौ एवं स्त्रीपुंगणाः स्मृताः।।२५।। पही पर स्थित चन्द्रमा को यदि पापग्रह देनते हों तो रो पति की सेना नहीं करती। चंद्र पृहस्पति सूर्य ये सत्वगुणी शुम घुर रजोगुणी, शनि, मंगल तमोगुणी है। श्री पुरुष का गुणन्दी के पायल से विचार लेना चाहिये। इति कामकाण्डः ।

ज्ञानप्रदीपिका। पुत्रोत्पत्तिनिमित्ताय त्रयः प्रश्ना भवन्ति हि । उदयारूढछत्रेषु राहुश्चेद् गर्भमादिशेत् ॥१॥ पुत्रोत्पति के लिये तीन प्रश्नों का उत्तर वर्णन किया गया-रन आरूढ और छत्र में यदि राहु हो तो गर्भ बताना। लग्नाद्वा चन्द्रलनाद्वा त्रिकोणे सप्तमेऽपि वा। वृहस्पतिः स्थितो वापि यदि पश्यति गर्भिणी ॥२॥ लग्न किंवा चन्द्र से त्रिकोण (५६) या सप्तम में बृहस्पति स्थित होकर प्रश्न म को देखता हो तो गर्भिणी होगी। शुभवर्गेण युक्तश्चेत् सुखप्रसवमादिशेत् । अरिनीचग्रहाश्चेत् सुतारिप्टं भविष्यति ॥३॥ शुम वर्ग से युक्त हो नो प्रसर सुख से और नव और त्रु ग्रह से युत नष्ट हो ने पर बालारिष्ट होता है। प्रश्नकाले तु परिधी दृष्टे गर्भवती भवेत् । तदन्तस्थग्रहवसात् पुंस्त्रीभेदं वदेदबुध ॥४॥ प्रश्न लग्न परिधि ग्रह दृष्ट हो तो यह खा गर्भग्नी है ऐसा उपदेश करना और परिधि लग्न के बीच में स्वीकारप भयया पुरुष पारफ जो प्रह पलपान हों उनके अनुसार स्त्री पुरुष का जन्म यताना चाहिये। यत्र तत्र रिथतश्चन्द्र, शुभयुक्ते तु गर्भिणी । न लग्नानि न भूतेषु शुमादित्येन्दनः क्रमात् ।।५।। तिष्ठन्ति चेन्न गर्भ चेत्स्यादेक्त्रेते (2) स्थितेन वा । जहा पाही भी चन्द्रमा शुभ युग हो तो गम है ऐसा निर्देश पाना भोर रस भूतादि में अपने युक्त सर्प बन्दमा पृथप हो गया एरपदी जहां कहीं भी दो तो गर्म नहीं है ऐसा उपदेश परना चाहिये। स्त्रीपुरिलोके गर्भिण्य. प्रष्टुर्गा तत्र कालिके ॥६॥ परिवपाटिके दृष्टे तस्या गर्भ विनश्यति ।

ज्ञानप्रदीपिका प्रश्न काल में स्त्री-पुरुष ग्रहों में जो गलयान होका देखना है, उसी के अनुसार स्त्री अथवा पुरुष का जन्म कहना किन्तु लग्न यदि परिवेषादि दुष्ट ग्रहों से देखा जाना हो तो गर्म का नाश हो जाता है। लग्नादोजस्थिते चंद्रे पुत्रं सूते समे सुताम् । क्शान्नक्षत्रयोगानां तथा सूते सुतं सुतां ॥७॥ लम से विषम गृह में चंद हो तो पुत्र सम में हो तो युषी उत्पन्न होती है। नक्षत्र योग आदि के यश से भी पुत्र पुत्री का विचार किया जाता है । लग्नतृतीयनवमे दशमेकादशेऽपि वा । भानुः स्थितश्चेत् पुत्रः स्यात्तथैव च शनैश्चरः ॥८॥ कन, तृतीय, नयम, दशम, एकादश में यदि स्यं या शनि हो ता पुत्र पैदा होगा। ओजस्थानगताः सर्वे ग्रहाश्चेत्पुत्रसंभवः । समस्थानगताः सर्वे यदि पुत्री न संशयः ॥६॥ हम से विषम स्थान में यदि सभी प्रह हों तो पुत्र और सम स्थान में हो तो पुत्री इसमें सन्देद नहीं। आरूढात्सप्तमं राशिं यावतीं तां सुरेग्यति (?)॥१०॥ तावन्नक्षत्रसंख्याकः सुतःस्यादिवसः सुतम् । मारूद से सप्तम राशि पर्यन्न जितने नक्षत्र होंगे उतने ही दिनों में पुत्र उत्पन्न होगा। इति पुत्रोत्पत्तिकाण्डः - सुतारिष्टमथो वक्ष्ये सयः प्रत्ययकारणम् । लमपप्ले स्थिते चंद्र तदस्ते पापसंयुने ॥१॥ मातुः सुतस्य मरणं किंतु पंचमषष्ठगाः । पापाः तिष्ठन्ति चेन्मातुर्मरणं भवति ध्रुवम् ||२||

५८
15
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។
झानप्रदीपिका।
भय शीघ्र विश्वास दिलाने का कारणस्वरूप सुनारिष्ट को बनाता है। यदि हम
गौर पष्ट में चंद्रमा हो और उन से सप्तम मे पापग्रह हों तो माता और पुत्र दोनों का मरण
होता है। किंतु यदि पंचम और पष्ठ में पाप ग्रह हों तो माता का मरण निश्चय होगा।
द्वादशे चंद्रसंयुक्ते पुत्रवामाक्षिनाशनम् ।
व्ययस्थे भास्करे नश्येत् पुत्रदक्षिणलोचनम् ॥३॥
द्वादश में चंद्रमा हो तो पुत्र की घाई मान और सूर्य हो तो दाहिनी आख नष्ट होती है।
पापाः पश्यन्ति भानु चेत् पितुर्मरणमादिशेत् ।
चन्द्रादित्यो गुरुः पश्येत् पित्रोः स्थितिरितीरयेत् ॥४॥
पाप-प्रह यदि सूर्य को देखते हों तो पिना का मृत्यु और गुरु यदि चंद्र सूर्य को देख
ते हों तो मा-पाप को पिति बनाना चाहिये।
यदि लग्नगतो राहु वदृष्टिविवर्जितः ।
जातस्य मरणं शीघ्र भवेदन न संशयः ॥५॥
पदि लग्न में राहु यिना घृहस्पनि पो दृष्टि पे हो तो पुत्र शीघ्र दो मरेगा-इसमें सराय
महीं।
द्वादशस्थौ अर्किचंद्रो नेत्रयुग्मं विनश्यति ।
पप्ठे वा पंचमे पापाः पश्यन्तीन्दुदिवाकरो ॥६॥
पित्रोर्मरणमेवाम्ति तयामंटः स्थिता र्याद ।
भ्रातृनाशं तथा भौमे मातुलस्य मृति वदेत् ॥७॥
द्वादश पान में यदि ति मोर पंद्रों को जान से दानों धात मारी जाती।
यम बिकाप में यदि पाप-प्रद मोर पन्द्र सूप को दे और कम गौरया में
शनि मी पहा दो तो मा पाप मर जाएंगे। जनि पेटा दामो माईपा माग, मंगर दोनो
मामा की मृत्यु पनामा पाहिये।
उदयादिनिकस्थेषु कण्टकेपु शुभा यदि ।
मिनखात्युचनगंपु सारिष्टं विनश्यति ॥८॥

शानप्रदीपिका। लग्नं च चन्द्रलग्नं च, चन्द्रो यदि न पश्यति । पापाः पश्यन्ति चेत्पुत्रो व्यभिचारेण जायते ॥६॥ लन, पञ्चम नवम में यदि शुभ ग्रह हों और मित्र और उच्च तथा निज गृह में हो तो सब आरिण नष्ट होते हैं। लग्न और चन्द्र लग्न को पाप ग्रह तो देखते हो पा चन्द्र नहीं देखते हों तो पुत्र व्यभिचार से उत्पन्न होता है । इति पुत्रप्रश्नकाण्डः शल्यप्रश्ने तु तत्काले पादभावसुतेऽत्र युक् । अर्काभ्यस्तान्नपापं च शेषाणां फलमुच्यते ॥१॥ (१) शल्य के प्रश्न में प्रश्नकाल में प्रश्न लग्न से चतुर्थ में जो भार पडा हो उसको जो संख्या हो उसे १२ से गुणा कर नव को भाग देने से जो शेष बचे उपका फल जानना । कपालोस्तीष्टकालोष्ठा काटदेवविभूतयः । सवासारष्टधान्यानि धनपाषाणदुर्धराः ॥२॥ (2) सूर्यादि अंश में कम से कपाल ईटा चक्कर काट देवता की सामग्रो सबस्न मष्ट धान्य धन पाषाण ये दुर्धर से होते है। गोस्तित्वाचाचपेशामाधीक्रमात् पलानि पोडश । येषु शल्येषु मंडूकस्वर्णगोस्थिसुधादिकं ॥३॥ (?) दृष्टाश्चेदुत्तमं चान्ये सर्वेस्युरशुभस्थिताः । अष्टाविंशतिकोष्ठेषु वह्निदिष्टयादिकं न्यसेत् ॥४॥ यदि गृह उक्त स्थान में स्थित हों और अशुमान्चित हो तो पूर्व काल को कहते है। भर इस कोष्ठ में कृतिका नक्षत्रों को लिखना चाहिये। छत्रभे तिष्ठति शशी तत्र शल्यमुदाहृतम् । उद्यादिकं न्यस्येदष्टाविंशतिकोष्ठ के ॥५॥ x x x x x x x x ज्ञानप्रदीपिका। जिस नक्षत्र में चन्द्रमा हो वहा पर शल्य कहना चाहिये। उदय नक्षत्रादिक का न्यास २८ अठ्ठाइसों कोष्ठ में रखना चाहिये। गणयेञ्चन्द्रनक्षत्रं तत्र शल्यं प्रकोर्तितम् । शंकास्ति शल्यविस्तारयामावन्योन्यताडितम् ॥६॥ विशत्यापहृतं पष्ठमरनिरिति कीर्तितम् । यहा पर चन्द्रमा के नक्षत्र तक गणना करके शल्य का निर्देश करना चाहिये। इस रीति से जितने कोष्ठ के मातर शत्य की शशा हा उसगे ल्याई चौडाई का परस्पर गुणा करके बीस से भाग देकर फिर से भाग देना उसको सना कही गई है।

ज्ञानप्रदीपिका। यदि पाप ग्रह और शुभ ग्रह दोनों का योग केन्दु स्थान में हो तो अवश्य शल्य हैं ऐसा फहना चाहिये। यदि शनैश्चर देखता हो तो देवता का निवास पहना, मंगल देखता होतो राक्षस का और यदि वेन्द्र में चन्द्रमा मंगल के साथ मंगल कोष्ठ में पड़ा हो तो घोड़े का शल्य घहां पर है ऐसा कहना चाहिये। शुक्रस्थे तक्षके कोष्ठे रौप्यश्वेतशिला पिता (2)। पञ्चपड्वसुभूतानि सपादैकं तथैव च ॥१२॥ सार्धरूपाक्षोरवक्ष (?) सूर्यादीनां क्रमात् स्मृताः । स्वशल्यगादनैव (2) क्रूरेण कथयेत् सुधीः ॥१३॥ यदि केन्द्र में शुम चन्द्रमा संयुक्त होकर तक्षक कोष्ठ में शुम बैठा हो तो चांदी घा सफेद पत्थल उस भूमि में होता है। सूर्यादि ग्रहों के लिये क्रम से पांच छः आठ पांव सवा एक डेढ़ और चार यह अंक होते हैं। शल्प विचार में इतनी इतनी गहराई पर शल्य का निर्देश करना चाहिये। इति शल्यकाण्डः - अथ वक्ष्ये विशेषेण कुमकाण्डविनिर्णयम् । आयामे चाष्टरेखास्युस्तिर्यग्रेखास्तु पंच च ॥१॥ अब इसके बाद कूपकाण्ड के निर्णय को कहते है खडी माउ रेखा और पडी पांच रेखायें करनी चाहिये। एवं कृते भवेत् कोष्ठा अष्टाविंशतिसंख्यकोः । इस रीति से करने से अठाइस काष्ठ का एक चक्र बनाया जाता है। प्रभाते प्राङ्मुखो भूत्वा काष्ठेवेतेषु बुद्धिमान् । चक्रमालोकयेद्विद्वान् रात्रा दुत्तराननः ॥२॥ बुद्धिमान् को चाहिये कि प्रातः काल से आधो रात तक प्रश्न देखना हो तो चमाको पूर्वाभिमुख और आधा रात के बाद उत्तगभिमुख हो पर इस चक्र को देखना चाहिये।

ज्ञानप्रदीपिका। मध्येन्दुमुखमारभ्य मैत्रभाद भानिशामुखाः । (?( ईशकोष्ठद्दयं त्यक्त्वा तृतीयादित्रिपु क्रमात् ॥३॥ कृतिकादित्रयं न्यस्यं तदधो रौद्रभं न्यसेत् । तदुत्तरं त्रयेप्येव पुनर्वस्वादिकं त्रयम् ॥४॥ बीच से मृगशीप से लेकर लिखना और अनुराधा से तथा मामिमुख लिखना ईशान फोण में दो फोप्ठ छोडकर तीनों पङ्क्तयों में कम से कृतियादिनीन तीन न्यास कर उसके नीचे आा को लिखना उसके बाद तीनों में पुनयेस्गदि तीन नक्षत्रों को लिखना चाहिये। तत्पश्चिमादियाम्येषु मघाचित्रावसानकं । तत्पूर्वकाष्ठयोः स्वातीविशाखे न्यस्य तत्परम् ॥५॥ इससे पश्चिम दक्षिण क्रम में मघा से लेकर पिना नफ लिखना। उसके पूर्वपोष्ठों में स्याती और विशाखा को रचना ।

ज्ञानप्रदीपिका। यन्नक्षत्रं तथा सिद्ध प्रश्नकाले विशेषतः । कृतिकास्थानमारभ्य पूर्ववद्गणयेत्सुधोः ॥६॥ इस रीति से जो नक्षत्र आवे और प्रश्न घाल में विशेष कर इस रीति से देखकर कृतिका के स्थान से लेकर पहले कही हुई रीति में गणना करनी चाहिये। योन्दुईथते तत्र समृद्धिरुटकं भवेत् । शुक्रनक्षत्रकोष्ठेषु तत्तत्स्वर्णमुदाहरेत् ॥१०॥ जहा पर चन्द्रमा दाख पडं यहा पर बहुत ज्यादे जल होता हैं और शुक्रादि नक्षत्र कोष्ठक में वहा वहा पर स्वर्णादिक का कहना चाहिये। तुलोक्षनक्रकुंभालिमीनकालिराशयः । जलरूपास्तदुदये जलमस्तीति निर्दिशेत् ॥११॥ तुला, वृष, मकर कुंभ वृश्चिक मौन और कक ये जल राशियां हैं अतः इनके उदय में प्रचुर जल यहाना चाहिये। तत्रस्थौ शुक्रचंद्रौ चेदस्ति तत्र बहूदकम् । बुधजीवोदये तत्र किंचिजलमितीरयेत् ॥१२॥ उसमें यदि शुक्र और चन्द्र हों तो पानी ज्यादा और घुध वृहस्पति हों तो कुछ कुछ जल बताना चाहिये। एतान् राशोन् प्रपश्यंति यदि शन्यर्कमिजाः । जलं न विद्यते तत्र फणिदृष्टे वहृदकम् ॥१३॥ इन राशियों को यदि शनि सूय और मंगल देखते हों तो जल नहीं और राहु देखें तो बहुत जल होता है। अधस्तादुदयारूढं छत्रयोरुपरि स्थिते । जलग्रहयुते दृष्टे अधस्तात्पाढदो जलम् ॥१४॥ उदय लग्न से नीचे और छत्र से ऊपर यदि जल ग्रहों का दृष्टि योग हो तो नीचे देर तक हो जल बताना चाहिये।

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ज्ञानप्रदीपिका।
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उच्चे दृप्टे ग्रहे राशौ उच्चमेवोदकं भवेत् ।
ऊर्ध्वादधस्थलयोः तिष्ठति नोदमधोजलम् ॥१५॥
जल राशियां उच्च ग्रह से युत दृष्ट हो तो पानी उँचे और नीत्र प्रह से युत दृष्ट हो तो
नीचे होता है। (१)
चतुःस्थाननाधस्तान् नागमं वदेत् ।
दशमे नवमे वर्षे केचिदाहुर्मनीषिणः ॥१६॥ (?)
जलाजलग्रहवशात् जलनिर्णयमादिशेत् ।
केन्द्रपु तिष्ठतश्चन्द्रो जीवो यदि शुभोदकम् ॥१७॥
जल प्रह और मानल ग्रह गर से पानी का विचार करना चाहिये। केन्द्र में यदि चंद्र
थोर गुरु हों तो पानी अच्छा होगा।
चन्द्रशुक्रयुने केन्द्र पर्वतेऽपि जलं भवेत् ।
चन्द्रसौम्ययुते केन्द्र जीर्णालाधरणोदकम् ॥१८॥
पेन्द्र में यदि चन्द्र और शुम हो तो पर्वत में मो जल मिले। केन्द्र में यदि चंद्र बुध
हो तो पुराने पंडहरों में भी जल मिले ।
आरुदाकेन्द्रके चन्द्र परिध्यादिविवीक्षिने ।
अधो जलंततोऽगाधं पूर्वोत्तरहराशिभिः ॥१६॥
भारूद से कान पान में चन्द्र हों और वरिष्यादि से दृष्ट हो तो नीचे पहले बहे हुये
ग्रहों की राशि से भगाध जल जानना ।
शुक्रेण सौम्ययुक्त न कपायजलमादिशेत् ।
कन्यामिथुनगःसौम्या जलं स्यादन्तरालकम् ॥२०॥
पूर्षोंक जल प्रह मोर जल राशि में पुप शुम पा योग होतातो पानी पसेरा
होगा। पदि युध पन्या मोर मिपन में होना जर मार दी मोतर होगा।
भास्करे क्षारसलिलं पग्विषं धनुर्यदि।
राहुणा संयुने मंदे जलं स्वादतरालकम् ॥२१॥

1 ज + ज्ञानप्रदीपिका उन राशियों में सूर्य हो तो पानी खारा और परिधेष धनुराशियों में राहु शनैश्चर का योग होतो अन्तराल में जल होता है। बृहस्पतौ राहुयुते पाषाणो जायतेतराम् शुक्र चन्द्रयुते राहो अगाधजलमेधते ॥२॥ यदि वृहस्पति और राहु युक्त हो तो नीचे खोदने पर पत्थल निकलता है शुक्र (1) चन्द्रमा राहु का योग हो तो अगाध जल वहां पर होता है। अर्कस्योन्नतभूमिः स्यात् पापाणा कांडकस्थले । 1024taa नालिकेरादिपुन्नागपूगयुक्ताक्षमा गुरोः ॥२३॥ काण्डकस्थल-निर्जन स्थान में सूर्य की पापाण मयी उन्नत भूमि होती है। नारियल पान सुपारी इत्यादि से युक्त भूमि वृहस्पति की होती है। शुक्रस्य कदलीवल्ली बुधस्य फलिता वदेत् । ५ वल्लिका केतकी राहोरिति ज्ञात्वा वदेदवुधः ॥२४॥ शुक्र के लिये केले का वृक्ष मोर बुध के लिये फैली हुई लता होती है। केतकी की घल्लो राहु की होतो यह सब जान फर विद्वान् को मादेश करना चाहिये। शनिराहूदये कोष्ठे रङ्गवल्लीकदर्शनम् । स्वामिदृष्टियुते वाऽपि स्वक्षेत्रमिति कीर्तयेत् ॥२५॥ शनि राहु का उदय कोष्ठ में होतो रङ्ग यल्ली को दिखलाता है यदि लग्न स्यामी से इष्ट पा युत हो तो अपनी जमीन अपना वृक्ष फहना चाहिये। अन्ये (2) युक्तेऽथवा दृष्टे परकीयस्थलं वदेत् । पदि दूसरे का दृष्टि योग हो तो दूसरे की भूमि पनानी चाहिये। इति कूपकाण्डः सेनस्यागमनं चैव प्रवक्ष्याम्यरिभूभृताम् । चरोदये च सारुढे पापाः पञ्चगमा यदि ॥

भानप्रदीपिका सेना के भागमन के विषय में भी, जो शत्रु राजा समय समय पर आया करते है, कहता हू-घर रन हो चर पारद हो और पाप ग्रह यदि पञ्चम स्थान में हों। सेनागमनमस्तीति कथयेत् शास्त्रवित्तमः । चतुप्पादुदये जाने युग्मे राश्युदये पिता (2) ॥२॥ तो शास्त्रश को सेना का आगमन पताना चाहिये। चतुप्पद राशि का उदय या युग्म राशि का उदय हो, लग्नस्याधिपतौ वक्र सेना प्रतिनिवर्तते । चरोदये चरारूढे भौमार्किगुरवो रविः ॥३॥ और लग्नेश वक हो तो सेना लौट जायगी। यदि लम भी चर हो और मारून मी घर हो और उसमें मगल शनि और गुष एव सूर्य, तिष्ठति यदि पश्यति सेना याति महत्तरा । आरूढ़े स्वामिमित्रोच्चग्रहयुक्तेऽथ वीक्षिते ॥४॥ पढे हों या देखते हों तो यष्टी भारी सेना भी लौट जाती है। आरुढ यदि स्वामी, मित्र या सश्य ग्रह से युक हो अथवा दृष्ट हो, स्थायिनो विजयं वयात यायिनो रोगमादिशेत् । "एवं छत्रे विशेषोऽस्ति विपरीते जयो भवेत् ॥५।। तो स्थायी की जीत होगी और यायी रोगामान्त होगा। छत्र में भी यही विशेषता है। इसके विपरीत होने से यायो की जय होगी। आरूढे वलसंयुक्ते स्थायी विजयमाप्नुयात् । यायी धलं समायाति छने वलसमन्विते ॥६॥ मारूद यदि पली हो तो स्थायी थी और छत्र यदि यलो होतो यायी की जीत यतानी चाहिये। आरूढ नीचरिपुभिर्य हैर्युक्तेऽथ वीक्षिते । स्थायी परग्रहीतस्य छोप्येवं विपर्यये ॥७॥ भारुढ यदि शत्रु नीच आदि ग्रहों से युक्त किया दृप हो तो स्थायी दूसरे द्वारा गिर फ्तार कर लिया जाता है। इससे उल्टा अर्थात् उस आदि प्रदों से यदि उन युक्त दृष्ट हो तो भी यही फल होता है।

ज्ञानप्रदीपिका। शुभोदये तु पूर्वाह्न यायिनो विजयो भवेत् । शुभोदये तु साया स्थायी विजयमान यात् ॥८॥ लम में शुभ ग्रह हों तो पूर्वाह्न में आक्रमणकारी को विजय और शुम लग्न में ही अपराक में खापो की विजय बताना। छत्रारूढ़ोदये वापि पुराशौ ‘पापसंयुते । तत्काले पृच्छतां सद्यः कलहो जायते महान् ॥६॥ छत्र आरूढ के उदय में या पुरुष राशि के पापयुत होने पर यदि कोई पूछे तो शीघ्र हो फलाह बताना चाहिये। पृष्ठोदये तथारूढ़े पापैर्युक्तेऽथ वीक्षिते । दशमे पापसंयुक्ते चतुप्पादुदयेऽपि च ॥१०॥ कलहो जायते शीघ्र संधिः स्याच्छुभवीक्षिते । आरुढ यदि पृष्ठोदय राशि हो और पाप से युत या दृष्ट हो दशम में पाप ग्रह हों या लग्न में चतुष्पद राशि हा तो शोघ्र मलह होगा पर यदि शुभ ग्रह देखने हों तो संघि होती हैं। उदयादिषु पप्ठेषु शुभराशिपु चेत् स्थिताः ॥११॥, स्थायिनो विजयं ब्रूयात् तदूवं चेद्रिपोर्जयम् । .' लग्न से लेकर छ माों में शुम रोगियों में 'यदि ग्रह हों तो स्पायो को मन्यया माक्रमणकारी की विनय होतो है। पापग्रहयुते तदाग्मित्रे (2) संधिःप्रजायते ॥१२॥ उभयत्र स्थिताः पापाः बलवन्तः सतोजयम् । यदि उन्हीं ६ राशियों में पाप ग्रह हों तो संधि और यदि दोनों यलो पाप ग्रह हो तो यायो और स्थायी में जो सजन हो उसो को विजय यतानी चाहिये। तुर्यादिराशिभिः पड्भिःस्थायिनो बलमादिशेत्॥१३॥ एवं ग्रहस्थितिवशात् पूर्ववत्कथयेट् बुधः ।

10 ज्ञानप्रदीपिका। यदि चतुर्थ से लेकर नाम पर्यन्त ६ राशियों में शुम प्रह हों तो स्थायी की जय होती है, बुद्धिमान ग्रहों के यश से फल पहें। । ग्रहोदये विशेषोऽस्ति शन्यकांगारका यदि ॥१४॥ आगतस्य जयंत्यात् स्थायिनो भंगमादिशेत् । विशेषता यह है कि प्रश्न ला में शनि सूर्य या मंगल हो तो यायो को जय और स्थायी की हार होगी। बुधशुक्रोदये संधिः जय स्थायी (2) गुरूदये ॥१५॥ पंचाप्टलाभारिष्वेषु तृतीयेऽर्किः स्थितो यदि । आगतः स्त्रीधनादोनि हृत्वा वस्तूनि गच्छति ॥१६॥ उसो प्रश्न लग्न में यदि बुध और शुक्र हों तो सन्धि हो जाती है पर गुरु हों तो स्थायी की विजय होती है। ५ ८ ११ ६ इनमें या तृतीय में यदि शनि हो तो आगत राज्ञा स्त्री धन आदि ले कर चला जायगा। द्वितीये दशमे सौरिः यदि सेनासमागमः । यदि शुक्रः स्थितः पप्ठे योग्यसंधिर्भविष्यति ॥१७॥ यदि २, या १० में शनि हा तो सेना आयेगो पर यदि पष्ठ में शुक्र हो तो सन्धि हो जायगी। चतुर्थे पंचमे शुक्रो यदि तिष्ठति तत्क्षणात् । स्त्रीधनादीनि वस्तूनि यायो हृत्वा प्रयास्यति ॥१८॥ यदि ४ या ५चे स्थान में शुक्र हो तो शीघ्र ही यायो । नढाई परने घाला,)खी धन मादि को हरण परके चला जायगा। सप्तमे शुकसंयुक्त स्थायी भवति दुर्लभः । नवाण्टसप्तसहजान्वितान्यत्र कुजी यदि ॥१६॥ स्थायी विजयमातोति परसेनासमागमे । सप्तम में यदि शुक्र हो तो स्थाया मुश्किल से पचता है। यदि ६, ८,७, ३लसे भन्यत्र मंगल हो तो शत्रु की सेना का मागमण होगा पर स्थायी यो विजय होगी।

F
झामप्रदीपिका।
चतुर्थे पंचमे चन्द्रो यदि स्थायी जयो भवेत् ॥२०॥
तृतीये पंचमे भानुः यदि सेनासमागमः।
मित्रस्थानस्थितः संधिनोंचेत्स्थायी जयी भवेत् ॥२१॥
४, या ५ में यदि चन्द्रमा हो तो स्थायो को जय होगी, ३ या ५ में यदि सूर्य हो और
वह पदि मिन्न स्थान में हो तो सधि, अन्यथा स्थायी की जय बतानो चाहिये।
चतुर्थे वित्तदः स्थायी अप्टमे यायिनो मृतिः ।
यदि सूर्य धर्थ में हो तो स्थायी को धन और ८ में हो तो यायी की मृत्यु बतानी
चाहिये।
उदयात् सहजे सौम्यो द्वितीये यदि भास्करः ॥२२॥
स्थायिनो विजयं वयात व्यत्यये यायिनो जयं ।
ससौम्ये भास्करे युक्ते समं ब्रूयात द्वयोस्तयोः ॥२३॥
लम से तृतीय में यदि शुभ ग्रह हो द्वितीय में यदि सूर्य हो तो स्थायी को अन्यथा यायो
की विजय होती है। किन्तु यदि सूर्य शुभग्रहों से. युन हो तो दोनों को बरायर पहना
चाहिये।
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उदयात् पंचमे सौम्ये स्थायो भवति चार्तिकः ।
द्वित्रिस्थे सोमजे यायी विजयी भवति ध्रुवम् ॥२४॥
लम से यदि पंचम में बुध हो तो स्थायी कातर होगा। यदि घुध २ २, ३२ स्थान
मैं हो तो यायो निश्चय विजयी होता है।
एकादशे व्यये सौम्ये स्थायी विजयमेष्यति ।
एकादशे वो यायी हतस्त्रीपतिवांधवः ॥२५॥
पदि बुध ११, या १२ वें स्थान में हो तो स्थायी की विजय होती है। रवि यदि
११वें स्थान में हो तो यापी फा मी धन आदि सर्वस नष्ट होगा।
शत्रुनीचस्थिते सूर्ये स्थायिनो भंगमादिशेत् ।
उदयात्पंचमे शत्रुव्ययेपु विषये यदि ॥२६॥

ज्ञानप्रदीपिका। होगा। विपरीतेपु युद्ध स्यात् भानौ द्वादशके यदि । तत्र युद्ध न भवति शास्त्रे ज्ञानप्रदीपिके ॥२७॥ सूर्य यदि शत्रु या नीच राशि में हो तो स्थायी की हार होती है। हम से पचम, षष्ठ और १२ च में युद्ध होता है। यदि सूर्य द्वादश में हो तो युद्ध नहीं होता। चरराशिस्थिते चन्द्रे चरराश्युदयेऽपि वा । आगतारेहि सन्धान विपरीते विपर्ययः ॥२८॥ चन्द्रमा चर राशि में या चर लग्न में हो तो आगत शत्रु से सधि और अन्यथा युद्ध “युग्मराशिगते चन्द्रे स्थिरराश्युदयेऽपि वा । अर्द्धमार्ग समागत्य सेना प्रतिनिवर्तते ॥२६॥ चन्द्रमा यदि द्विस्वभान राशि में हो और लग्न में स्थिर राशि हो तो सेना आधे रास्ते से आकर लौट जायगी। सिंहाद्याः राशयः पटू च भास्करः स्थायिरूपिणः । कर्कायु क्रमेणैव चन्द्रो वै यायिरूपिका. ॥३०॥ सिंह से लेकर मिथुन तक ६ राशियां और सूर्य ये स्थायो के रूप है। और बाकी ६ राशि मोर चन्द्रमा यायो के स्वरूप स्थायी (2) यायी (2) क्रमेणैवं यादग्रहवशावलम् । इस प्रकार स्थायो,मोर यायो के यल की विवेचना प्रम से होनी चाहिये। इति सेनागमनकाण्ड । । यात्राकाण्डं प्रवक्ष्यामि सर्वेषां हितसाम्यया । गमनागमनं चैत्र लाभालाभौ शुभाशुभो ॥१॥ विचार्य कथयेद्विद्वान् पृच्छतां शास्त्रवित्तमः । A - - शानप्रदीपिका। सब के हितार्थ यात्रा काण्ड कहता है। इस फाण्ड से गमन आगमन लाम हानि, शुभ, अशुभ मादि बाते पियार कर पहनी चाहिये। मित्रक्षेत्राणि पश्यन्ति यदि मित्रग्रहास्तदा ॥२॥ , मित्राय गमनं ब्रूयात् नीचं नीचग्रहाणि (2) च । नीचाय गमनं ब्रूयात् उच्चानुञ्चग्रहाणि (?) च ॥३॥ यदि मित्रक्षेत्र को मित्रग्रह देखते हो तो मित्र के लिये गमन कहना चाहिये। योही यदि नीच ग्रह नीच स्थानों को देखते हों तो नीच के लिये और उच्च ग्रह देखते हों तो अपने से उच्च के पास यात्रा बतानी चाहिये। खाधिकाये(?)ऽतिगमनं पुराशिं पुंग्रहा यदि । स्त्रियो गमनमित्युक्तमन्येप्येवं. विचारयेत् ॥४॥ पुरुष राशि को यदि घुग्रह देखते हों तो स्त्री के लिये गमन होता है । ' अन्य परिस्थि- तियों में भी ऐसे ही विचार लेना चाहिये। चरराश्युदयारूढ़े तत्तद्ग्रहविलोकने । तत्तदाशासु तिष्ठन्ति पृच्छतां शास्त्रनिर्णयः ॥५॥ पर राशि यदि लग्न या आरूढ में हो तो जो ग्रह उन्हें देखता हो उसी को दिशा का प्रश्न कहना चाहिये ऐसा शास्त्रीय सिद्धान्त है। स्थिरराश्युदयारूढे शन्याहारकाः स्थिताः । अथवा दशमे वा चेद् गमनागमने न च ॥६॥ खिर राशि उदय या आरूढ़ में हों और शनि, सूर्य और मगल हो या दशम में भी ये हो तो गमन या श्रागमन नहीं होता। शुकसौम्येन्दुजीवाश्चेत् तिष्ठन्ति स्थिरराशिपु । विद्यते स्वेष्टसिद्धयर्थं गमनागमने तथा ॥७॥ यदि स्थिर राशि में शुक्र, बुध, चंद्र या वृहस्पति हों तो अपनी एसिद्धि के लिये गमनागमन बताना चाहिये।

शानमदीपिका। स्थितिप्रश्नेति (?) तं ब्रूयान्मस्तकोदयराशिषु । पृष्ठोदये तुगमन तथा गमनमेधते ॥ यदि ये शोर्पोदय राशि में हो तो प्रश्न मिति फा घताना चाहिये। पृष्ठोदय राशि में हो तो घृद्धिपूर्वक गमन बताना । द्वितीये च तृतीये च तिष्ठन्ति यदि पुंग्रहाः । त्रिदिनात्पत्रिका याति गोपितस्य च द्वितीय तृतीय में यदि पुरुष ग्रह हों तो दो या तीन दिन में. विदेशस्थ व्यक्ति का पर आता है।" '.. लग्नस्थसहजव्योमलाभेष्विंदुज्ञभार्गवाः । तिष्ठन्ति यदि तत्काले चावृतिः घोषितस्य च ॥१०॥ यदि चंद्र, बुध और शुक्र, १, ३, १० या ११ स्थान में हो तो प्रवामी शीघ्र ही लौटेगा। . चतुर्थे वारि वा पापाः तिष्ठन्ति चेत् शुभग्रहाः । पत्रिका प्रोपितस्याशु समायाति न संशयः ॥११॥ यदि धर्थ और पष्ठ में क्रमशः पाप प्रइ और शुम प्रद हो तो प्रवासी की पत्रिका निः सन्देश शीघ्र आवेगी। चापोक्षछागसिंहेषु यदि तिष्ठति चन्द्रमाः। '. चिन्तितस्तत्तदाऽऽयाति चतुर्थे चेत्तदागमः ॥१२॥ धनु, पृष, मेष योर सिंह में यदि चन्द्रमा हो तो चिन्तित आयेगा पर फर्फ में हो तो उसका पागमन हो गया है। स्वस्खक्षेत्रेषु तिष्ठन्ति शुक्रजीवेन्दुसोमजाः! प्रयाणे गमनं ब्रूयात् तत्चदाशासु-सर्वदा ॥१३॥ पदि शुमा, वृदस्पति, चंद्र भोर घुथ अपनी राशि में हो तो उनको दिशाओं में पात्रा पतानी चाहिये।

३ ज्ञानप्रदीपिका। ग्रहाः स्वक्षेत्रमायान्ति यावत्तावत् फलं वदेत । शुभग्रहवशात् सौख्यं पीडां पापग्रहैर्वदेत् ॥१४॥ प्रह जितने दिन में अपने क्षेत्र में आवें उतने दिन में स्माचार आना चाहिये । शुभ ग्रह हो तो और अशुभ ग्रह हो तो अशुभ फल बताना चाहिये। सप्तमाष्टमयोः पापास्तिष्ठन्ति यदि च ग्रहाः । प्रोपितो हृतसर्वस्वस्तत्रैव मरणं व्रजेत् ॥१५॥ यदि सप्तम और अष्टम में पापग्रह हों तो प्रवासो विदेश में ही हृतसर्वस्व हो फर मरवाता है। पष्ठे पापयुते मार्गगामी बद्धो भविष्यति । चरराशिस्थिते पापे चिरेणायाति निश्चितम् ॥१६॥ पाठ में यदि पाप ग्रह हो तो प्रवासी पुरुष मार्ग में ही बद्ध हो जाता है। यदि पाप प्रहघर राशि में स्थित हो तो वह चिरकाल में आयेगा। बलावलवशेनैव शुभाशुभनिरूपणम् । इस प्रकार ग्रहों में चलायल के विचार से शुभाशुभ फल का निरूपण होता है। इति यात्राकाण्डः ५ जलराशिपु लग्नेषु जलग्रहनिरीक्षणे कथयेटु वृष्टिरस्तीति विपरीते न वर्षति ॥१॥ रस में जल गशि हो मोर जलाह देखते हों तो पुष्टि होगी मन्यथा नहीं। जलराशिपु शुक्रन्दू तिष्ठतो वृष्टिरुत्तमा । जलराशिषु तिष्ठन्ति शुक्रजोवसुधाकराः ॥२॥ आरुढोदयराशि चेत् पश्यन्त्यधिकवृष्टयः । जनराशि में यदि यूफ, तथा चन्द्र हो तो अच्छी पृष्टि होगी । मोर जल राशि में शुक्र, बृहस्पति चन्द्र हो और एन और भारुद को देखते हो तो मधिक वृष्टि होगी। - ०४ शानप्रदीपिका। एते स्वक्षेत्रमुच्च वो पश्यन्ति यदि केन्द्रकम् ॥३॥ त्रिचतुर्दिवसादन्तमहावृष्टिर्भविष्यति । यदि शुक्र वृहस्पति और चन्द्रमा अपने क्षेत्र को उच्च राशि को या दशम एकादरा को देखते हों तो तीन ही चार दिनों के भीतर महावृष्टि होगी। लग्नाच्चतुर्थे शुक स्यात्तदिने वृष्टिरुत्तमा ॥४॥ चन्द्रे पृष्ठोदये जाने पृष्ठोदयमवोक्षिते । तत्काले परिवेषादिद्दष्टे वृष्टिमहत्तरा ॥५॥ यदि लग्न से चतुथ में चन्द्रमा हो तो उसी दिन उसम वृष्टि होगी चन्द्रमा यदि पृष्ठोदय राशि में हो और पृष्ठादय राशि को देखते हों और उस पर परिवेषादि उपग्रहों को दुष्टि हो तो पृष्टि अच्छी होगी। केन्द्रेषु मन्दभौमज्ञराहवो यदि संस्थिताः वृष्टिर्नास्तीति कथयेदथवा चण्डमारुतः ॥६॥ केन्द्र (१, ४ ० १०) में यदि शनि मंगल बुध और राहु स्थित हो तो दृष्टिन होगी पा प्रचपह घायु पहेगी। पापसौम्यविमिश्च अल्पवृष्टिः प्रजायते। पापश्चेन्मन्दराहुश्चेत् वृष्टिर्नास्तीति कीर्तयेत् ॥७॥ यदि उपर्युक्त स्थानों में पाप और शुभ दोनों प्रकार के प्रह हों तो वृष्टि पोहो होगो यदि शनि और राहु हो तो पृष्टि नहीं होगी। शुक्रकार्मुकसन्धिश्चेद्वारावृष्टिर्भविष्यति । पदि धनु में शुक्र पढे हो तो मूसलाधार पानो परसेगा । इति वृष्टिकाण्डः

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ज्ञानप्रदीपिका।
उच्चन दृष्टे युक्ते वा अर्ध्यवृद्धिर्भविष्यति ।
नीचेन युक्त दृष्टे वा अर्ध्यक्षयमितीरितम् ॥१॥
मित्रवामिवशात् सौम्यामित्रं ज्ञात्वा वदेसुधीः ।
शुभग्रहयुते दृष्टे वयवृद्धिर्भविष्यति ॥२॥
उच्च से दूष्ट किंग युक होने पर अर्य (भन्न का मार ) को वृद्धि और नीच से
पत वा दृष्ट होने पर क्षति होती है। इस विषय में विधान को मित्र, शत्रु, स्वामी,
शुम,
पाप का पूर्ण विचार करना चाहिये । शुभ ग्रह से युन दृष्ट होने पर अर्ध ( दर) की वृद्धि
पापग्रहयुने दृष्टे त्वयंवृद्धिक्षयो भवेत् ।
नीचशत्रुवशान्न्यूनमयनिर्णयमोरितम् ॥३॥
लम यदि पाप ग्रह से युन या दृष्ट हो तो दर को यहवारी घटेगो नीव भोर शत्र के
पश से इसकी न्यूनता का निर्णय कहा जाता है।
इत्यध्यकाण्डः
जलराशिपु लग्नेयु जोवशुकोदयो यदि ।
पोतस्यागमनं जयादशुनश्चन्न सिद्वयति ॥१॥
जल राशि हो और उसमें वृहस्पति और शुरु पटे हों तो जहाज योर लोटेगा।
यदि माम प्रह हो तो फाम सिद्ध नहीं होगा।
आरूढकेन्द्रलग्नेषु वीक्षिनेष्वशुभग्रहः ।
पोतभंगो भवति च शत्रुभिर्वा तथा वदेत् ॥२॥
मारत, (१, ४, ७, १०) को यदि माम प्रा देखते हो तो शत्रुओं ने प्रहार
हलिया है-ऐसा-ऐसा माना ।
अदृष्टस्योदये लग्ने शुभे नौका मजेत्स्वयम् ।
तद्महे तु यथा दृष्टे तथा नौदर्शनं भवेत् ॥३॥

ज्ञानप्रदीपिका। यदि लग्न शुभ ग्रह से दृष्ट पाप ग्रह से अदृष्ट हो तो नौका अनायास चलेगी। उन ग्रहों में जैसे प्रह पा दृष्टियोग हो वैसे ही नौका का श्न होगा। चरराशौ चरच्छत्रे दूत आयाति नौस्तथा । चतुर्थे पंचमे चन्द्रो यदि नौः शीघ्रमेष्यति ॥४॥ घर राशि में और चर छत्र में यदि चंद्रमा हो तो दूत नौका आ जाती है। चन्द्रमा यदि चौथे था पाचवे स्थान में हो तो नौवा शीघ्र आयेगी यह पहना चाहिये। द्वितीये वा तृतीये वो शुकवचेन्नौसमागमः । अनेनैव प्रकारेण सर्व वीक्ष्य वदेत्स्फुटम् ॥५॥ यदि द्वितीय तृतीय स्थान में शुक्र हो तो नौका का आगमन शोध ही होगा । इस प्रकार से सब देख भाल चाहिये। काण्डः इति ज्ञान तिपशास्त्रम् समाप्तम् ।

देवकुमार-ग्रन्थमाला का द्वितीय पुष्प (ख)
सामुद्रिक शास्त्र
(ज्योतिष शास्त्र)
अनुवादक और सम्पादक,
ज्योतिषाचार्य पण्डित रामव्यास पाण्डेय
प्रकाशक,
निर्मलकुमार जैन
मन्त्री
श्री जैन सिद्धान्त मशन, मारा।
पौर संवत् २४.० (सन् १९३४)

सामुद्रिक शास्त्र
की
विषय-सूची
पृष्ठ
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(१) आयुर्लक्षण पर्व
(२) पुरुषलक्षण पर्व
(३) नीलक्षण पर्व

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परिशिष्टम्
जिनेन्द्राय नमः
सामुद्रिका-शास्त्रम्
आदिदेवं नमस्कृत्य सर्वज्ञ सर्वदर्शिनम् ।
सामुद्रिकं प्रवक्ष्यामि शुभांगं पुरुपस्त्रियोः ॥१॥
सबके ज्ञाता, सब कुछ देखने वाले, आदि देव, (ऋषभदेव ) परमात्मा को नमस्कार'
करके, पुरुष और स्त्रियों के शुभ लक्षणों को बताने वाले सामुद्रिक शास्त्र को कहता है।
पूर्वमायुः परीक्षेत पश्चालक्षणमादिशेत् ।
आयुहीननराणां तु लक्षणैः किं प्रयोजनम् ॥२॥
सामुद्रिक शास्त्र के द्वारा शुभाशुभ फलों के विवेचन करने वाले पुरुष को पहले प्रश्न
कर्ता की आयु की परीक्षा कर अन्य लक्षणों का आदेश करना चाहिये। क्योंकि
आयु ही नहीं है वह अन्य लक्षण जान कर क्या करेगा ?
वामभागे तु नारीणां दक्षिणे पुरुपस्य च ।
निर्दिष्ट लक्षणं चैव सामुद्र-वचनं यथा ॥३॥
इस शास्त्र के वचन के अनुसार, पुरुष के दाहिने ओर सो को वांये अंग के लक्षण
का निर्देश करना चाहिये।
पंचदीर्घ चतुर्हस्वं पंचसूक्ष्म पडुन्नतम् ।
सप्तरक्त त्रिगम्भीरं त्रिविस्तीर्णमुदाहृतम् ॥४॥
जैसा कि मामे बताया है, मनुष्य के पांच अंगों में दीर्घता (बड़ा होना) चार
अंगों में हस्वता (छोटाई ), पांच में सूक्ष्मता ( बारीको) छ: अंगों में अचाई, सात में
ललाई, तीन में गंभीरता ( गहराई) और तीन में स्तिोर्णता (चौड़ाई) प्रशस्त कही
जिसकी
गई है।
वाहुनेत्रनखाश्चेव कर्णनासास्तथैव च।
स्तनयोरुन्नतिश्चैव पंचदीर्घ प्रशरयते ॥५॥

जन-
572
भुजाओं में, नेत्रो में, नपों में कानों में और नाक में दोधता होनी चाहिये। स्तनों में
दीर्घता के माय ही साथ कुछ ऊंचाई होनी चाहिये। इन्ही पाच अंगो को दीर्घता
प्रशस्त यताई गई है।
ग्रीवा प्रजननं पृष्ठं हस्वजंघे प्रपूरिते ।
हस्त्रानि यस्य चत्वारि पूज्यमानोति नित्यशः ॥६॥
गर्दन पीठ और भरी हुई जघा ये चार अग जिसके हस्थ (छोटे) होते हैं वह सदा
पूजा पाता है।
सूक्ष्मान्यंगुलिपाणि उन्तकेशनखत्वचः ।
पञ्च सूक्ष्माणि येषां स्युस्तेनरा दीर्घजीविनः ॥७॥
अंगुलों के पोर दांत, केश नख और त्वक् ( चमडा ) ये पांचों जिन पुरुषों के सूक्ष्म
(चारीफ) होते हैं वे दीर्घजीवी हाते हैं।
कक्षः कुक्षिश्च वक्षश्च घ्राणस्कन्धौ ललाटकम् ।
सर्वभूतेषु निर्दिष्टं पडुन्नतशुभं विदुः ॥८॥
कक्ष ( काख ) कुक्षि, ( कोस ) छाती, नारु कन्धे और ललाट, इन छ अगों का
उवा होना किसी भी जीव के लिये शुभ है।
पाणिपादतले रस्ते नेत्रान्तानि नवानि च ।
तालु जिह्वाधरोष्ठौ च सदा रक्तं प्रशस्यते ॥६॥
हथेली, चरणों के नीचे का भाग, नेत्रों के काने नख, तालु जीभ और निचले होंट
इन सात अगों का सदा राल रहना उत्तम है।
नाभिस्वरं सतमिति प्रशस्त गभीरमन्ने त्रितयं नराणाम् ।
उरोललाटो वदनं च पुंसां विस्तीर्णमेतत् त्रितयं प्रशस्तम्॥१०॥
नामि, स्वर और सतत ये तीन यदि पुरुषों के गम्मोर हों तो प्रशस्त कहे जाते है ।
इसी प्रकार छाती रहार भोर मुख का चौटा होना शुभ होता है ।
वर्णात् परतरं स्नेहं स्नेहा परतरं स्वरम ।
स्वरात् परतरं सत्वं स सत्ते प्रतिष्टितम् ॥११॥

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मनुष्य की देह में, रंग से उत्तम स्निग्धता (चिकनाई, माव ) है, स्निग्धता से
मी उत्तम स्वर है और स्वर ( आवाज़ ) से भी उत्तम सत्त्व है। (सत्त्व वह वस्तु है
जिसके कारण मनुष्य को सत्ता है, जिसके न रहने से मनुष्यत्व ही नहीं रहता)
इसी लिये सत्त्व ही सब का प्रतिष्ठा-सान हैं।
नेत्रतेजोऽतिरक्तच नातिपिच्छलपिंगलम् ।
दीर्घबाहुनिभैश्वयं विस्तीर्ण सुन्दरं मुखम् ॥१२॥
आखों में तेज और गाढ़ी लालिमा का होना तथा बहुत चिकनाई और पिंगल
धर्ण (मांजर-पन) फा न होना, भुजाओं का दीर्घ होना, और मुंह का विशाल
और सुन्दर होना, ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं।
उरोविशालो धनधान्यभोगी शिरोविशालो नृपपुंगवः स्यात् ।
कटेर्विशालो वहुपुत्रयुक्तो विशालपादो धनधान्ययुक्तः ।१३
जिसको छाती चौड़ी हो वह धन धान्य का भोक्ता, जिसका ललाट चौड़ा हो
वह राजा, जिसकी कमर विशाल हो यह बहुत पुराँवाला तथा जिसके चरण विशाल
हो वह धनधान्य से युक्त होना है।
वक्षस्नेहेन सौभाग्यं दन्तस्नेहेन भोजनम् ।
स्वचःस्नेहन शय्या च पादस्नेहेन वाहनम् ॥१४॥
वक्षःस्थल (छाती) को चिकनाई से सौभाग्य, दांत को चिकनाई से भोजन, चमड़े
की चिकनाई से शय्या और चरणों को चिकनाई से सबारी मिलती है।
अकर्मकठिनौ हस्तौ पादौ चाध्वानकोमलौ ।
तस्य राज्यं विनिर्दिष्ट सामुद्रवचनं यथा ॥१५॥
विना काम काज किये भी जिसका हाथ कठिन (कड़ा) हो, और मार्ग चलने पर
जिसके पैर कोमल रहते हों, उस मनुष्य को इस शास्त्र कधन के अनुसार, राज्य
मिलना चाहिये।
दीर्घलिंगेन दारिद्रयम् स्थूललिंगेन निर्धनम् ।
कृशलिंगेन सौभाग्यं हस्तलिंगेन भूपतिः ॥१६॥

( ४ ) जिस पुरुष पोलिंग (जननेन्द्रिय ) लंया हो वह दरिद्र, मोटा हो वह निर्धन, पतला हो यह सौभाग्यशाल एवं छोटा हो वह राजा होता है। कनिष्टिकाप्रदेशाद्या रेखा गच्छति तर्जनीम् । अविच्छिन्नानि वर्षाणि तस्य चायुविनिर्दिशेत् ॥१७॥ कनिष्ठा अगुली के नीचे से जो रंसा जाती है वह यदि तर्जनी तक चली गई हो तो समझना चाहिये कि इसपी थायु पूर्णायु अर्थात् १२० वर्ष को है। कनिष्ठिका प्रदेशाद्या रेखा गच्छति मध्यमाम् । अविच्छिन्नानि वर्षाणि अशीत्यायुर्विनिर्दिशेत् । घही रेखा यदि मध्यमा अंगुरा तक गई हो तो उसकी आयु विना बाधा के अस्सी घर्ष जानना हों तो ऐश्वर्ययान मोर मास हीन हो (पंखीरंदों) तो दुःषां जानना चाहिये। ललाटे दृश्यते यस्य रेखात्रयमनुत्तरम् पष्ठिवर्षाणि निर्दिष्टं नारदस्य वचो यथा ॥२३॥ ललाटे दृश्यते यस्य रेखाद्वयमनुत्तरम् वर्षविंशतिनिर्दिष्टं सामुद्रवचनं यथा ॥२४ जिसके ललाट में तीन रेखायें हों उसको साठ तथा जिसके ललाट पर दो रेखाये हो उसकी वीस वर्ष की आयु समझनी चाहिये-ऐसा नारद का वाक्य है । कुचैलिनं दन्तमलप्रपूरितम् बह्वाशिनं निष्ठुरखाक्यभाषिणम् । सूर्योदये चास्तमयेच शायिनं विमुञ्चतिश्रीरपि चक्र-पाणिनम् ॥२५॥ मैले वस्त्र को धारण करने वाले, दांत के मल को साफ न करने वाले, बहुत जाने वाले, कटु वाक्य बोलने वाले, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोने वाले पुरुष को-वे चाहे विष्णु ही क्यों न हों-लक्ष्मी छोड़ देती हैं। अंगुष्ठोदरमध्यस्थो यवो यस्य विराजते । उत्तमो भक्ष्यभोजी च नरस्स सुखमेधते ॥२६॥ जिसके अंगूठे के उदर (पीच) में जौ का चिन्ह हो उत्तम भोग को प्राप्त करता हुमा सुख की वृद्धि पाता है। अतिमेधातिकीर्तिश्च अतिक्रान्तसुखी तथा । अस्निग्धचैलि निर्दिष्टमल्पमायुर्विनिर्दिशेत् ॥२७॥ अत्यधिक घुद्धिमान, अतिशय कीर्तिमान और अत्यन्त मुखी तथा मलिन पखधारी रहता है-यह अल्पायु होता है ऐसा जानना चाहिये। रेखाभिर्बहुभिः क्लशी रेखाल्प-धनहीनता । रक्ताभिः सुखमाप्रोति कृष्णाभिश्च वने वसेत् ॥२८ हथेली में बहुत रेखायें हो तो मनुष्य दुःपी एवं पम हो सो निर्धन होता है। रेखायें यदि लाल हो तो सुख और फालो को तो यनवास होता है ॥२८॥ श्रीमान्नृपश्च रक्त्ताक्षो निरर्थः कोऽपि पिगलः । सुदीप बहुधश्वर्य निमासं न च व सुखम् ॥२६॥ जो व . मनुष्य पंचरेखा युगत्रीणि द्विरेखा च समास्थितं । नवत्यशीतिः पण्ठिश्च चत्वारिंशच्च विंशतिः ॥३८ जिसके क्रमश पांच, चार, तीन, और दो रेखायें हों क्रमशः ६०, ८०, ६०, ४० और २० वर्ष जीता है। इत्यायुर्लक्षणं नाम प्रथमं पर्व द्वितीयं पर्व अथ तत् सम्प्रवक्ष्यामि देहावयवलक्षणम् । उत्तमं मध्यमं हीनं समासेन हि कथ्यते ॥१॥ अप में संक्षेप में शरीर के उन लक्षणों को कहना हु जिन से उत्तम, मध्यम भौर अधम का हान होता है। पादौ समांसलो स्निग्धौ रक्तावर्तिमशोभनी। उन्नती स्वेदरहितो शिराहीनो प्रजापतिः ॥२॥ जिस पुरुष फे पर मासयुक्त, विकने, रक्तिमा लिये हुये, सुग्दा उन्नन और पसोना में देने वाले तथा शिराहीन ( ऊपर से शिरा न दिम्बाई द-ऐसे) हो यह बहुत मजा (सन्तामों ) का मालिक होता है। यस्य प्रदेशिनो दीर्घा अंगुष्ठाटतिबर्द्धिता । स्त्रीभोगं लभते नित्यं पुरुपो नात्र संशयः ॥३॥ जिसकी प्रदेशिनी (पैर के अंगठे के पास याला उंगली ) अंगूठे से भी बडी वह पुल निस्सन्देश नित्य ही नोभोग पाता है। तथा च विकृतरूक्षेनखारिद्र यमाप्नुयात् । पतिताच नग्मा नीला ब्रह्महत्यां विनिर्टिशेत् ॥४॥ प्ति, कप मपों पाला पुरुष दरिष्ठ होना है। गिरे हुए भार नील पणे मला माहत्या का निर्देश परना चाहिये।

वृपसिंहगजेन्द्राणां गतिभोंगवतां भवेत ॥१०॥
मृगवजह याने(?) च काकोलूकसमा गतिः।
श्वेतवर्णप्रभैः कान्त्या नखैर्वहुसुखाय च ।
ताम्रवर्णनखा यस्य धान्यपद्मानि भोजनम् ॥५॥
जिनके नख की कान्ति सफेद और प्रकाशमान हो उनको यहुत सुख होता है, जिनके
नल की कान्ति लाल ( तामे की तरह) हो उन्हें असंख्य धान्य और भोजन प्राप्त होता है।
सर्वरोमयुते जंघे नरोऽत्र दुःखभाग्भवेत् ।
मृगजंघे तु राजाह्वो (न्यः) जायते नात्र संशयः ॥६॥
जिसके अंघों में (घुटनों के नीचे और फोलों के ऊपर ) अधिक रोये हों वह मनुष्य
दुःखी होता है। जिसकी जंघा मृग के समान हो वह राजपुरुष ( राज कुमार) होता है
इसमें सन्देह नहीं ।
शृगालसमजंघेन लक्ष्मीशो न स जायते ।
मीनजंघं स्वयं लक्ष्मीः समाप्नोति न संशयः ॥७॥
स्थूलजंघनरा ये च अन्यभाग्यविवर्जिताः ।
मियार के समान जंघा वाला धनी नहीं होता, पर मछली के समान जंघा याला पूर्व
धनी होता है। मोटी जंघा वाला भाग्यहीन होता है।
एकरोमा लभेद्राज्यं द्विरोमा धनिको भवेत् ।
त्रिरोमा बहुरोमाणो नरास्ते भाग्यवर्जिताः ॥८॥
पुरुष के रोम कूपों से एक एक रोंयें निफ्ले दो यह राजा होता है, दो गेम पाला
धनिक मौर तीन या अधिक रोम पाला भाग्यहीन होता है।
हंसचक्रशुकानां च यस्य तदुर्गतिर्भवेत् ॥६॥
शुभदंगाढवन्तश्च (?) स्त्रीणामेभिः शुभा गतिः ।
यदि घाल ईस, यफया या सुग्गे पी तरह हो तो यद पुरम के लिये मग पर
यही चाल नियों के लिये शुभ होती है।
जिस
द्रव्यहीनस्तु विशेयो दुःखशोकभयकरः ॥११॥

घल, सिंह और मस्त हाथी को सो चाल वाले भोगवान होते हैं। मृग के समान गाल के समान तथा कौए और उल्लू के समान गति धाले मनुष्य द्रव्यहीन तथा भय. हुन दुःन शोक से ग्रस्त होते हैं। श्वानोष्ट्रमहिषाणां च (?) शुकरोष्ट्रधरास्ततः । गतिर्येषां समास्तेषां ते नरा भाग्यवर्जिताः ॥१२॥ कुत्ते, ऊंट, मैंसे और सूयर की तरह गतियाला पुरुष भाग्यहीन होता है । दक्षिणावर्तलिंगस्तु स नरो पुत्रवान् भवेत् । वामावर्ते तु लिंगानां नरः कन्याप्रजो भवेत् ॥१३॥ जिस पुरुष का शिश्न (जननेन्द्रिय ) दाहिनी ओर झुका हो वह पुनरान तथा जिसकी पांई ओर झुफा हो यह फन्याओं का जन्मदाता होता है। ताम्रवर्णमणिर्यस्य समरेखा विराजते । सुभगो धनसम्पन्नो नरो भवति तत्त्वतः ॥१४॥ जिसके लिंग के आगे था भाग (मणि } फी फान्ति लाल हो तथा रेखायें समान हो यह प्यकि सोमाग्यशील तथा धनपान होता है। सुवर्णरौप्यसदृशेर्मणियुक्तसमप्रभः । प्रवालसदृशैः स्निग्धैः मणिभिः पुण्यवान् भवेत् ॥१५॥ सोना, चांदी, मणि, प्रमाल (मूंगा) भादि के समान प्रमा घाले. विषने मणि (शिश्नाप्रमाग) पाले पुरष पुण्यवान् दोने हैं । समपादोपनिष्टस्य गृहे तिष्ठति मेदिनी। ईश्वरं तं विजानीयात्प्रमदाजनवल्लभं ॥१६॥ पद पुरुष सामप्यान तथा नियों पाप्यागोता। जिस पर पृथ्यो पर पाया पटने है। उसके घर पृष्पी भी रहा। द्विधारं पतते मृत्रं स्निग्धशब्दविवर्जितम् । स्त्रीभोगं लभते सौग्य स नरो भाग्यवान् भवेत् ॥१७॥ पेशाप पाते समय सिमराम्य दो धारो परनिर योर उनमें से करदन नियत सोपा पुरुष माग्य होता है चोर प्रोमोमाया गुण यो शान होना है। १ समासन नियम दिएर जान पहना , "श्गमदिवाणा' या गाथादिये था।

( .'' मीनगन्धं भवेद्रेतः स नरः पुत्रवान् भवेत् । मद्यगन्धं भवेद्रेतः स नरस्तस्करो भवेत् ॥१८॥ होमगन्धं भवेद्रेतः स नरः पार्थिवो भवेत् । कटुगन्धं भवेद्रेतः पुरुषो दुर्भगो भवेत् ॥१९॥ क्षारगन्धं भवेद्रेत. पुरुषा दारिद्र्यभोगिनः । मधुगंधं भवेद्रेतः पुमान्दारिद्र्यवान् भवेत् ॥२०॥ जिस पुरुष के वीर्य से मछली को गध आती हो वह पुत्रवान्, शरार की गंध आती हो वह चोर, होम की गध आती हो वह राजा, पडुई गंध थाता हो वह अमागा, पारी गन्ध आती हो यह दरिद एव मधु की गन्ध हो यह निधी होता है । किचिन्मिभं तथा पीतं भवेद्यस्य च शोणितम् । राजानं तं विजानीयात् पृथ्वशिं चक्रवर्तिनम् ॥२१॥ जिसका रक कुछ पोलापन लिये हुये हो उसे पृथ्यो का मालिक चायनी राजा जानना चाहिये। मृगोदरो नरो धन्यः मयूरोदरसन्निभ । व्याघोदरो नरः श्रीमान् भवेत् सिहोदरो नृप. ॥ २२ ॥ मृग और मोर की तरह पेट घाला मनुष्य भाग्यरान् , थाघ या तरह पेट पाला धम. पान और सिंह के पेट के समान पेट पाला मनुष्य राजा होता है। सिंहपृष्टो नरो यः स धनं धान्यं विवर्धयेत् । कूर्मपृष्ठो लभेद्राज्यं येन सौभाग्यभाग्भवेत् ॥ २३ ॥ सिंह जैसी पोठ पाला धन धान्य से मुन और पाहुये जैसी पाठ याला राज्य सौमा ग्प से युक होता है। पाण्डुरा विरला वृक्षरेखा या दृश्यने करे। चौरस्तु तेन विज्ञेयो दु सदारिद्र यभाजनम् ॥ २४ ॥ पाण्डुर पर्ष की, पिरल, पर दे मारार पारेगा जिसरे पाप में दो पद तप मोर दखिना से पुक्क पोर होता है।

यस्य मीनसमा रेखा दृश्यते करसंतले धर्मवान् भोगवॉश्च व बहुपुत्रश्च जायते ॥२५॥ जिसके हाथ में मछली की रेखा हो यह धर्मनिष्ठ, भोगवान् और अनेक पुत्रों पाला होता है। तुला यस्य तु दीर्घा च करमध्ये च दृश्यते । वाणिज्य सिध्यते तस्य पुरुषस्य न संशयः ॥ १६ ॥ जिसके हाथ में लंपी तराजू के आकार की रेखा हो वह पुरुष निश्चय ही उत्तम व्यापारी पोता है। अंकुशो वाऽथ चक्र वा पदमवज्रौ तथैव च । तिष्ठन्ति हि करे यस्य स नरः पृथिवी-पतिः ॥ २७ ॥ निसके हाथ में अकुश, चक्र, फमल अथवा घज़ का चिह्न हो यह मनुष्य पृथ्वी का मालिक (राजा) होता है। शक्तितोमरवाणञ्च यस्य करतले भवेत् । विज्ञेयो विग्रहे शुरः शस्त्रविद्येव भिद्यते ॥ २८ ॥ शक्ति, सोमर, वाण के चिह्नों से पंक्ति हाथ याला पुरष युद्ध में पूरा होता है, पर यस विधा को भेदने पाला होता है। रथो वा यदि वा उत्रं करमध्ये तु दृश्यते । राज्यं च जायते तस्य बलवान् विजयी भवेत् ॥ २६ ॥ जिसके दाप में , उनका यिह दो यद परपाम् घोर राज्य पा जीतने धारा होता है। वृक्षो वा यदि वा शक्तिः करमध्ये तु दृश्यते । अमात्यः स तु विडोयो राजभेष्टी च जायते ॥ ३० ॥ जिसफेदाप में वृक्ष या शक्ति पा चिहदो यात्री योर राजापाठोता है। ध्वज वा मथवा शंखं यस्य हस्ने प्रजायते । तस्य लक्ष्मीः समायाति सामुद्रस्य वचो यथा ॥ ३१ ॥ शिसके हाप में पर पा संपाहि हो उसके पास, सामुदापमानुसार ममो जाती। ।

११)
कोष्ठाकारस्तथा राशिस्तोरणं यस्य दृश्यते
कृषिभोगी भवेत् सोऽयं पुरुषो नात्र संशयः ॥ ३२ ॥
जिसके हाथ में कोले का आकार, राशि, किंवा तोरण (वन्दनवार ) का चिह हो
वह पुरुष, निस्सन्देह, कृषिजीवी होता हैं।
दीर्घबाहुनरो योग्यः स सर्वगुणसंयुतः ।
अल्पबाहुर्भवेद्योऽसौ परप्रेषणकारकः ॥३३॥
जिस पुरुष की बांहे लंबी हों यह योग्य तथा सर्वगुणसम्पन्न होता है इसी प्रकार
छोटी बांहुओं पाला दूसरे का नौकर होता है ।
वामावर्ती भुजो यस्य दीर्घायुष्यो भवेन्नरः ।
सम्पूर्णवाहवश्चैव स नरो धनवान् भवेत् ॥ ३४ ॥
जिसको भुनायें पाई भोर घुमी हों वह पुरुष दीर्घ आयु वाला तथा धनी होता है।
ग्रीवा तु वर्तुला यस्य कुंभाकारा सुशोभना ।
पार्थिवः स्यात् स विज्ञेयः पृथ्वीशो कान्तिसंयुतः ॥३५॥
जिसकी गर्दन घड़े की भांति गोल और सुन्दर हो वह सुन्दर स्वरूप पाला राजा होगा
ऐसा जानना चाहिये।
शशग्रीवा नरा ये ते भवेयुर्भाग्यवर्जिताः ।
कम्बुग्रीवा नरा ये च ते नराः सुखजीविनः ॥३६॥
जिनकी गर्दन खरगोश कोसी होवे अभागे होते हैं और जिनकी गर्दन शंख जैसा हो
वे मनुष्य सुखी होते हैं।
कदलीस्तंभसदृशं गजस्कंधसुवन्धुरम् ।
राजानं तं विजानीयात् सामुद्रवचनं यथा ॥ ३७॥
जिसका कन्धा केले के प्रभे की तरह अथवा हाथी के पाधे की तरह मरा पूरा स्यूल
होषद राजा होगा ऐसा इस शास्त्र का पचन है।
चन्द्रबिम्बसमं वक्त धर्मशीलं विनिर्दिशेत् ।
अश्ववक्त्रो नरो यस्तु दुःखदारिद्र्यभाजनम् ॥ ३८ ॥

मनुष्य करालवक्तवैरूपो स नरस्तस्करः स्मृतः । वकवानरवक्तश्च धनहीनः प्रकीर्तितः ॥ ३९ ॥ यदि मुंह चन्द्रमा के विम्य जैसा हो नो धर्मशील, घोडे के मुह जैसा हो तो दुःखी और दरिद्र, भयानक तथा रूपा हो तो चोर, यगुला या यानर जैसा हो तो निर्धन होता है यस्य गंडस्थलो पूर्णो पदमपत्रसमप्रभो । कृपिभोगी भवेत सोऽपि धनवान् मानवान् पुमान् । ४०॥ जिसफा गंडस्थल भरा हुमा तथा फमल के पत्ते के समान हो यह पुरुष धन तथा मान के सहित कृषिजीची होता है। सिंहव्याघ्रगजेन्द्राणां कपालसाशं भवेत् । भोगवन्तो नराश्चेव सर्वदक्षा विदुर्बुधाः ॥ ११॥ सिंह, बाघ, हाथी आदि के सदृश फापाल वाले पुरुष भोगी, चतुर शानी और । . होते हैं। रक्ताधरो नृपो होयो स्थूलोष्ठो न प्रशस्यते । शुष्काधरो भवेत्तस्य नुः सुसौभाग्यदायिनः ॥ ४२ ॥ लाल होठों घाला राजा होता है, मोटा होंठ अच्छा नहीं होता शुष्क अधर सौभाग्य के सूचक है। कुंदकुसुमसंकाशैः दशने गभागितैः । यावजीवेत् धनं सौख्यं भोगवान स नरो भवेत् ॥ ४३ ॥ कुन्द फी कोई के समान शुभ्र दानो याला मनुष्य जीवन भर सुख, भोग और धन आदि से युक्त रहता है। रुक्षपाण्डुरदन्ताउच ते क्षुधानित्यपीड़िताः । हस्तिदन्ता महादन्ना स्निग्धदन्ताः गुणान्विताः ॥ ४४ ॥ रुखे और पाले दातो घाले मनुष्य सदा भूव से सताये हुए होते हैं। हाथी जैसे रातो घाले, पडे बडे दातो घाले तथा चिकने दांतों वाले मनुष्य गुणी होते हैं । द्वात्रिंशद्दशन राजा एकत्रिंशञ्च भोगवान् । " ते भवन्ति नग नित्यं भोगवन्तो धनेश्वराः ॥५२॥ मागी और . .. त्रिशंदन्ता नरा ये च ते भवन्ति सुभोगिनः ।। ४५ ॥ एकोनत्रिंशद्दशनैः पुरुषाः दुःखजीविनः । ३२ दांतों वाला पुरुष राजा, ३१ दाँतों वाला सुखी, ३० दाँतों वाला २. दांतो वाला मनुष्य दुःखी होता है। कृष्णा जिह्वा भवेद्य षां ते नरा दुःखजीविनः ॥ ४६ ॥ श्यामजिह्वो नरो यः स्यात्स भवेत् पापकारकः । स्थूलजिह्वा प्रधातारो नराः परुपमापिणः ॥ ४७ ।। श्वेतजिह्वा नरा ये च शौचाचारसमन्विताः । पद्मपत्रसमा ये तु भोगवन्मिष्टभोजनाः ॥ ४८ ॥ कालो जोम वाले दुःखी, सांवली ( हल्की फालिमामयो ) जीभ वाले पापी, मोटी जीम वाले परुष ( कहा ) बोलने वाले सफेद जीम पाले पवित्र आचार शोल, तथा कमल पत्र के समान चिकनी जोम वाले मनुष्य भोगी तथा मिष्ट पदार्थ खाने पाले होते हैं। किंचित्तानं तथा स्निग्धं रक्तं यस्य च दृश्यते । सर्वविद्यासु चातुय्यं पुरुषस्य न संशयः ॥ ४६ ॥ जिसकी जीम कुछ लालिमा के साथ चिफनाई भी लिये हो वह पुरुष निःसन्देह सब काले तालुघाला पुष्पफुल फानाशक तथा कमल-पत्र के समान तालुयाला राजा यस्वरनरा ये च धनधान्यसुभोगिनः ॥५.१॥ विधाओं में चतुर होता है। कृष्णतालुनरा होता है। ये च संभवं कुलनाशम् । पद्मपत्रसमं तालु स नरो भूपतिर्भवेत् ॥ ५० ॥ खेततालुनरा ये च धनवंतो भवन्ति ते जिन मनुप्यों का तालु सफेद रंग का दोये धनयान होते है मेघगम्भीरनिर्घोपो भृगाणां च विशेषतः ।

, . हंसस्वरश्च राजा स्यात् चक्रवाकस्वरस्तथा । व्याघस्वरो भवेत् क्लेशी सामुद्रवचनं यथा ॥५३॥ जिनका स्वर घोड़े के समान होवे धनी होते हैं, मेघ के समान गम्भीर घोष पाले और घात करके भौग की गुजार सरखे स्वर पाले पुरुप नित्य भोगवान और बहे धन धान होते हैं, हंस की तरह स्वर; वाले और चकये की तरह म्वर पाले राजा होते हैं। पाय के समान स्वर वाले दुःखी होते हैं-ऐसा सामुद्रिक शास्त्र का कहना है पार्थिवः शुकनासा च दीर्घनासा च भोगभाक् । ह्रस्वनासा नरो यश्च धर्मशीलशते रतः ॥५४॥ स्थूलनासा नरो मान्यः निंद्याश्च हयनासिकाः । सिंहनासा नरो यश्च सेनाध्यक्षो भवेत्स च ॥५५॥ शुफ कीसी नाफ पाले राजा, लयी नाफ याले भोगी, पतली नाफ पाले धर्मनिष्ट, मोटी नाक पाले माननीय, घोडे की सी नाक पाले निंदनीय, मौर सिंह कीसी नाक धाले सेनापति होते हैं। त्रिशूलमंकुशं चापि ललाटे यस्य दृश्यते । धनिक तं विजानीयात् प्रमदाजीववल्लभः ॥५६॥ जिसके ललाट पर त्रिशल या अयुश फा चिह दिखाई दे उसे पनी समझना चाहिये। पहली का प्राण-प्यारा होता है। स्थूलशीर्पनरा ये च धनवंतः प्रकीर्तिताः। वर्तुलाकारशीण मनुजो मानवाधिपः ॥५७॥ घोडे सिर पाले मनुष्य धनी और गोलाकार सिरपाले राजा होते हैं। रुक्षनिर्वाणि वर्णानि स्नेहस्थूला च मूर्द्धजा । निस्तेजाः सः सदा शेयः कुटिलकेशदुःखितः ॥४८॥ जिसके बाल रूपे और विपर्ण हों तथा तेल यादि लगाने पर जबर पर म्यूल हो जा ते पह पुरुष निम्नज होता है। बुटिल मरने वाला मनुष्य दुखी होता है।

लक्षण माप कह सकते है। कृपोदरी च विम्बोष्ठी दीर्घकशी च या भवेत् । दीर्घमायुः समाप्नोति धनधान्यविवर्द्धिनो ॥३॥ जोत्री शोदरी ( कमर की परलो), पिपल के समान मघवाली मोरस पोवासीहोतीषद धन्यधाग्य को बढानेवालो होतो भोर पहुत दिनों तकनीती अङ्कुशं कुंडलं चक्र यस्य पाणितले भवेत् । विरलं मधुरं स्निग्धं तस्य राज्यं विनिर्दिशेत् ॥५६॥ जिसकी हथेली में मकुश, कुहल या चक्र हों उसको [निराले और उत्तम राज्य का पाने वाला बताना चाहिये। इति पुरुषलक्षणं नाम द्वितीयं पर्व ॥२॥ अथ स्त्रीलक्षणम् प्रणम्य परमानन्दं सर्वशं स्वामिनं जिनम् । सामुद्रिक प्रवक्ष्यामि स्त्रोणामपि शुभाशुभम् ॥१॥ परम आनन्द मय, सर्वश, श्री स्वामी जिनेश्वर को प्रणाम करके त्रियों के शुमाराम को ताने वाले सामुद्रिक शास्त्र को कहता है। कीदृशीं वरयेत्कन्यां कीदृशीं च विवर्जयेत् । किंचित्कुलस्य नारोणां लक्षणं वक्त मर्हसि ॥२॥ कैसी फन्या का वरण करना चाहिये, कैसी का त्याग करना चाहिये, कुलरियों का , पूर्णचन्द्रमुखी कन्यां वालसूर्यसमप्रभाम् । विशालनेत्रां रक्तोष्ठी तां कन्यां वरयेद् बुधः ॥४॥ पूर्णचन्द्र के समान मुंहवाली, सपेरे के उगते हुए सूर्य के समान कान्ति बाली, 'बडी आँखों वाली और लाल होंठोंवाली कन्या से विवाह करना चाहिये। अंकुशं कुण्डलं माला यस्याः करतले भवेत् । योग्यं जनयते नारी सुपुत्रं पृथिवीपतिम् ॥५॥ जिस स्त्री को हथेलो में अड्डश, कुण्डल या माला का चिन्ह हो वह राजा होने वाले योग्य सुपुत्र को पैदा करती है। यस्याः करतले रेखा प्राकारांस्तोरणं तथा । अपि दास-कुले जाता राजपत्नी भविष्यति ।।६।। जिस स्त्री के हाथ में प्राकार या तोरण या चिन्ह हो यदि दास कुल में भी उत्पन्न हो, तो भी परगनी होगी। यस्याः संकुचितं केशं मुखं च परिमण्डलम् । नाभिश्च दक्षिणावर्ती सा नारी रति-भामिनी ॥७॥ जिस स्त्री के पेश घुघराले हों, मुख गोला हा नामी दाहनी ओर घुमी हुई हो, पहली रति के समान है ऐसा समझना साहिये। यस्याः समतलौ पादौ भूमौ हि सुप्रतिष्ठितौ । रतिलक्षणसम्पन्ना सा कन्या सुखमेधते Ilatt जिसके घरण समतल हों और भूमि पर अच्छी तरह पहने हों, (अर्थात् कोई उंगली आदि पृथ्वी को छूने से रह न जाती हों) पह रनिलक्षण से सम्पन्न पन्या सुन पाती है। पीनस्तना च पोनोष्ठी पीनकुक्षी सुमध्यमा । प्रीतिभोगमवाप्नोति पुत्रश्च सह वर्धते ॥ पौन ( मोटे) स्तन फोन और होठयाली तथा सुन्दर पटियाली नो प्रोनि मोर भोग पाती हुई पुत्रों के साप बढती है। " जिस स्त्री के जंघों औरमुख मण्डल पर रोय हो तथा शरीर सूपा हुमो हो उससे जिस स्त्री के पैर के अंगूठे के पास पाली अंगुली अगूठे से यडी हो यद निस्य दो यस्यांस्त्वनामिका पोदे 'पृथिव्यां न प्रतिष्ठते । पतिनाशो भवेत् क्षिप्र स्वयं तत्र विनश्यति ॥१६॥ ( १७ ) कृष्णां श्यामा च या नारी स्निग्धा चम्पकसंनिभा । स्निग्धचंदनसंयुक्ता सा नारी सुखमेधते ॥१०॥ कृष्णवर्ण की श्यामा लो (जो शीतकाल में उष्ण और उष्ण काल में शीत रहे) मावदार, चम्पा के समान वर्ण वाली चन्दन गंध से युक्त हो यह सुख पाती है। अल्पस्वेदाल्पनिद्रा च अल्परोमाल्पभोजना। सुरूपं नेत्रगात्राणां स्त्रीणां लक्षणमुत्तमम् ॥११॥ पक्षीना का कम होना, थोडी मींद, थोड़े रोये, थोडा भोजन, नेत्रों तथा अन्य अंगों सुन्दरता,-यह स्त्री का उत्तम लक्षण है। स्निग्धकेशी विशालाक्षीं सुलोमां च सुशोभनाम् । सुमुखीं सुप्रभां चापि तां कन्यां वरयेद् वुधः ॥१२॥ चिकने फेशों वाली, बडी आंखों वाली, सुन्दर लोम, मुख और कान्ति बाली सुन्दरी कन्या का वरण करना चाहिये। यस्याः सरोमको पादौ उदरं च सरोमकम् । शीघ सा स्वपति हन्यात् तां कन्यां परिवर्जयेत् ॥१३॥ जिसके पैर सेयेदार हों तथा पेट में भी रोयें हों, यह स्त्री शीघ्र ही पति यो मारती हैं। अतः इसका वरण नहीं करना । यस्या रोमचये जंघे सरोममुखमण्डलम् । शुष्कगात्री च तां नारी सर्वदा परिवर्जयेत् ॥१४॥ सदा दूर ही रहना चाहिये। यस्याः प्रदेशिनी याति अंगुष्ठादतिवद्धिनी। दुष्कर्म कुरुते नित्यं विधव्यं भवेदिति ॥१५॥ उराचार करती है और विधवा होती है।

( १८ )
जिसकी भनामिका अंगुलो पृथ्वो को नहीं छुती ऊपर ही रहती है उस स्त्री के पति का
शोध ही नाश होता है और वह स्वयं नष्ट हो जाती है।
यस्याः प्रशस्तमानो यो ह्यावर्तो जायते मुखे ।
पुरुषत्रितयं हत्वो चतुर्थे जायते सुखम् ॥१७॥
जिसके मुख पर सुन्दर आवर्त (भंवरी) रहता है वह तीन पति को नष्ट कर
चौथी शादी करती है तप सुख पाती है।
उद्वाहे पिंडिता नारी रोमराजि-विराजिता ।
अपि राजकुले जाता दासीत्वमुपगच्छति ॥ १८ ॥
रोये से भरी हुई खो यदि राजकुल में भी उत्पन्न हों तो विवाहित होने पर यह दासी
की तरह मारी मारी फिरती है।
स्तनयोःस्तवके चेव रोमराजिविराजते।
वर्जयेत्तादृशीं कन्यां सामुद्रवचनं यथा ॥१६॥
जिस स्त्री के दोनों स्तनों के चारो मोर रोंये हो उसे इस शारत के कथनानुसार, छोड
देना चाहिये।
विवादशीला स्वयमर्थचारिणी परानुकूलां बहुपापपाकिनीम् ।
आकन्दिनीं चान्यगृहमवेशिनी त्यजेत्तु भायो दशपुत्रमातरं ॥२०॥
लखने पाली, अपने मन की पलने पालो, पूसरे के अनुकूल रहने पाली, अनेक पाप
कारिणी, रोने घाली, दूसरे के घर में घुसने वाली स्त्री अगर इस लरों की मां भी
हो तो भी उसे छोड देना चाहिये।
यस्यास्त्रीणि प्रलंबानि ललाटमुदरं कटिः ।
सा नारी मातुलं हन्ति श्वसुरं देवरं पतिम् ॥ २१ ॥
जिसके ललाट, पेट और कमर ये तीन जंग लये दो पद स्नी मामा, सापुर, ऐयर और
पति को मारने वाली दोती है।
यस्याः प्रादेशिनी शश्वत् भूमो न स्पृश्यते यदि ।
कुमारी रमने जारः योवने नात्र संशयः॥ २२ ॥

जिस स्त्री के हाथ की अंगुलियां छोटी हों, हाथ पर कोमल हों, शरीर और नख से
कृष्णजिह्वा च लंवोष्ठी पिंगलाक्षी खरस्वरा ।
( १६ )
जिसके अंगूठे के पास वाली अंगुली पृथ्वी को न छुए पह ली कुमारी तथा यौवमा-
वसा में दूसरे पुरुषों के साथ व्यभिवार करती है, इसमें सन्देह नहीं ।
पादमध्यमिका चैव यस्या गच्छति उन्नतिम् ।
वामहस्ते ध्रुवं जारं दक्षिणे च पतिं तथा ॥ २३ ॥
जिसके पैर की विवली अंगुली पृथ्वी से ऊपर रहे वह स्त्री, निश्चय ही, बांये हाथ
में जार को और दाहिने में पति को लिये रहती है।
उन्नता पिण्डिता चैव विरलांगुलिरोमशा।
स्थूलहस्ता च या नारी दासीत्वमुपगच्छति ॥ २४ ॥
उंची, सिमटी हुई घिरल अंगुलियों वाली, रोयें वालो तथा छोटे हाथों वाली औरत
दासी होती है।
अश्वत्थपत्रसंकाशं भगं यस्या भवेत्सदा ।
सा कन्या राजपत्नीत्वं लभते नात्र संशयः ॥२५ ॥
जिस स्त्री का जननेन्द्रिय पीपल के पत्ते के समान हो वह पटरानी पद को प्राप्त
होती है-इसमें सन्देह नहीं ।
पृष्टावर्ता च या नारी नाभिश्चापि विशेषतः।
भगं चापि विनिर्दिष्टा प्रसवश्रीविनिर्दिशेत् ॥ २६ ॥ (2)
मण्डूककुक्षिका नारी न्यग्रोधपरिमण्डला ।
एक जनयते पुत्रं सोऽपि राजा भविष्यति ॥ २७ ॥
मेढक के समान कोख बाली तथा घर के पत्ते के समान मण्डल वाली स्त्री एक ही
पुत्र पैदा करती हैं सोभी राजा।
स्थूला यस्याः करांगुल्यः* हस्तपादौ च कोमलो।
रक्तांगानि नखाश्चैव सा नारी सुखमेधते ॥२८॥
खन झलकता हो वह स्त्री सुख पाती है।
दशमासैः पतिं हन्यातां नारी परिवर्जयेत् ॥२६॥

( २० ) फालो जीम, ये होंठ मंजरी आँख और तीखे स्वर वाली स्त्री दस महीने में ही पति का नाश करती है। उसको छोड देना चाहिये। यस्याः सरोमको पादौ तथैव च पयोधरी। उत्तरोष्ठाधरोष्टौ च शीघ्र मारयते पतिम् ॥३०॥ जिस स्त्री के पैर, पयोधर, ऊपर या नीचे के होठ रोयेदार हों वह शीघ्र ही पति को मारती है। चन्द्रविम्बसमाकारो स्तनौ यस्यास्तु निर्मलो। बाला सा विधवा ज्ञया सामुद्रवचनं यथा ॥३१॥ जिसके स्तन निर्मल चन्द्रविश्य के समान हो वह घी विधवा होती है, ऐसा इस शास्त्र का पचन है। पूर्णचंद्रविभा नारी अतिरूपातिमानिनी । दीर्घकर्णा भवेद्याहि सा नारी सुखमेधते ॥३२॥ पूर्ण चन्द्रमा के समान प्रा पालो अति रूपशोला अनि मानिती तथा लरे कानों पाली खी सुखी होती है यस्याः पादतले रेखा प्रोकारइछत्रतोरणम् । अपि दासकुले जाता राजपत्नी भविति ॥३३॥ जिस स्त्री के पैर के तल्धे में प्राकार, छम या तोरण पी रेखा हो यह यदि दासल में उत्पन हो तो भी पटरनी होगी। रक्तोत्पलसुवर्णाभा या नारी रक्तपिंगला । नराणां गतिराहल्पा अलंकारप्रिया भवेत् ॥३४॥ साल, पमल, मोर सोगे की यानि पाली, रस और पिगल धर्ण फी भौरन तथा पुरुष के समा चरने या छोटी भुजाओं वाली औरत गहनों को बहुत चाहती हैं। अतिदीर्घा भां ह्रस्वां अतिस्थूलामतिरशाम् । अतिगौरां चातिकृष्णां पटेताः परिवर्जयेत ॥३५॥ अत्यन्त यो, अत्यन्त छोटा, अदान मोटी, शरय त पतली, अत्यन्त गोरी तथा गत्पन्त पाली ये ६ प्रकार पो गौरते छोट देतो चाहिये।

साध्वी और गुरुजनों की सेवा करने वाली है। कमल के पत्ते के समान हाथी जैसी माखों वाली सुन्दरी रमणी, सुवर्ण मणि और रक्षों के स्वामी की प्राणप्रिया होती है। (११) शुष्कहस्तौ च पादौ च शुष्कांगी विधवा भवेत् । अमंगला च सा नारी धृत्यधान्यक्षयंकरी ॥३६॥ एक हाथ, सखे पैर और सूखे शरीर पाली लो विधवा होती है। यह अमंगला धान्य को संहारिणी होती है। पिंगाक्षी कूपगंडा प्रविरलदशना दीर्घजंघोर्ध्वकेशी। लम्बोष्ठी दीर्घवत्रा खरपरुपरवा श्यामताम्रोष्ठजिह्वा । शुष्कांगी संगताधू स्तनयुगविषमा नासिकास्थूलरूपा। सा कन्या वर्जनीया पतिसुतरहिता शीलचारित्र्यदूरा ॥३७॥ जिस कन्या की आंखें पिंगल वर्ण की हों, कपोल घसे हुए हों; दांत सुसजित रूप से न हों, अंधा लंबी हो, केश खड़े हो; ओंठ लये हों; मुंह लंपा हो; बोली फर्कश हो, तालु, होठ और जीम काली हों, शरीर सूखा हो; बात बात पर आंसू गिरता हो; दोनों स्तन कमान न हो; नाफ चिपटी हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये। क्यों कि यह पति और पुत्र से रहित होगी, उसके चरित्र भी दूषित होंगे। शृगालाक्षी कृशांगी च सा नारी च सुलोचना । धनहीना भवेत्साध्वी गुरुसेवापरायणा ॥३८॥ सियार की तरह आँखों वाली, पतले शरीर पाली, सुलोचना ली धनहीन होती हुई भी , रक्तोत्पलदला नारी सुन्दरी गज-लोचना । हेमादिमणिरत्नानां भर्तुः प्राणप्रिया भवेत् ॥३६॥ दीर्घायली च या नारी दीर्घकेशी च या भवेत् । अमांगल्यकरी ज्ञया धनधान्यक्षयंकरी ॥४०॥ पली पड़ी,अंगुलियों घाली, और दीर्घ केशों,पाली औरत धन धान्य की नाशक तथा मंगलमयी है।

( २२ ) . शंखपद्मयवच्छत्रमालामत्स्यध्वजा च या। पादयोर्वा भवेद्यत्र राजपत्नी भविष्यति ॥४१॥ जिस स्त्री के दोनों पैर में शंख, पा, जौ, छन, माला, मछली, ध्वजा या वृक्ष चिद है वह राजपत्नी होगी। मार्जाराक्षी पिंगलाक्षी विपकन्येति कीर्तिता। सुवर्णपिंगलाक्षी च दुःखिनीति परे जगुः ॥४२॥ दिल्ली की तरह पिङ्गलवर्ण फो आखा वाली स्त्री को 'विषकन्या' कहा गया है। पर सोने के रंग के समान पिगलनेत्रा स्त्री दुखिनी होती है-ऐसा भी किसी आवाये का मत है। पृष्ठावर्ता पति हन्यात् ना-यावर्ता पतित्रता । कठ्यावर्ता तु स्वच्छन्दा स्कन्धावर्ताऽर्थभागिनी ॥४३॥ पीठ की भंगरी पाली स्त्री पति को मारने वाली, नामि की भंवरी पाली में पतिवता, कमर की मैरी वाली स्वच्छन्दचारिणी और कन्धे की भवरी वाली धनी होती है। मध्यांगुलिमणिवन्धनोर्ध्वरेखा करांगुलिम् । वामहस्ते गता यस्या. सा नारी सुखमेधते ॥४॥ पाए हाथ की फ्लाई से पिचली अगुली तक जाने वाली रेखा, जिसके हाथ में होती है, वह स्त्रो सुख प्राप्त करती है। अरेखा बहुरेखा च यस्या. करतले भवेत् । तस्या अल्पायुरित्युक्तं दुःखिता सा न संशयः ॥४५॥ जिस स्त्री पो हथेली में पहुत फम रेखायें या पहुत रेखायें हो पद नि सन्देश थो दिन नियेगी और दुगो रहेगी। भगोऽउवखुरपद शेयो विस्तीणं जघनं भवेत् । सा कन्या रतिपत्नी स्यात्सामुद्रयचनं यथा ॥४६॥ जिस फाया का जननेन्द्रिय घाटे के पुर के समान हो और जिसफा जघन खान (घुटने के ऊपर का भाग) चौहा हो यह साक्षात् रति के समान होगी-ऐसा इस शास्त्र का पचन।

मोर चित्रिणी का शब्द कोमा के समान होता है। पद्मगन्ध से पझिनो, मयगन्ध सेदस्तिनी, पारी गन्ध संशतिनी एवं ग्ध गन्ध से स्त्रीलक्षणकथनं नाम तृतीयं पर्व समाप्तम् । पद्मिनी बहुकेशी स्यादल्पकेशी च हस्तिनी । शंखिनी दीर्घकेशी च, वक्रकेशी च चित्रिणी ॥४७॥ बहुत केशों वाली स्त्री को पद्मिनी, कम केशोंवालो को हस्तिनो, लंबे फेशों घाली गनी, टेढ़े मेढ़े केशों वाली को चित्रिणी स्त्री कहते हैं। वृत्तस्तनौ च पदमिन्याः हस्तिनी विकटस्तनी । दीर्घस्तनौ च शंखिन्याः चित्रिणी च समस्तनी ॥४॥ पद्मिनी के स्तन गोल, हस्तिनी के विकट, शंखिनी के लंबे, और वित्रिणी के समान - पदमिनी दन्त-शोभा च उन्नता चैव हस्तिनी । शंखिनी दीर्घदन्ता च समदन्ता च चित्रिणी ॥४६॥ पद्मिनी के दांत शोभामय हस्तिनी के ऊंचे, शंखिनी के लंबे और चित्रिणी के मान होते हैं। पदिमनी हंसशब्दा च हस्तिनी च गजस्वरी । शंखिनी रूक्षशब्दा च काकशब्दा च चित्रिणी ॥५०॥ पमिनी का शब्द हंस के समान, हस्तिनो, का हाथी के समान, शंखि पद्मिनी पदमगन्धा च नद्यगन्धा च हस्तिनी । शंखिनी क्षारगन्धा च शून्यगन्धा च चित्रिणी ॥ वित्रिणी जानी जाती है। त सामुद्रिकाशास्त्र

BL-17
BHAVAN'S LIBRARY
BOMBAY-400 007
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This book should be returned within a fortnight
from the date last marked below
Date
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Date
27 DEC 1979

Gyan-pradipika

Author
Pandit,.jyoti Achariya
Title
Gyan-pradipika
File name
Gyan-pradipika
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2012/08
Publisher
Aara,.shri Jain-sidhantt
Language
Sanskrit
Pages
113
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405939
Barcode
99999990292961.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
K3UPreGiN0o
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