Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jain Tatav Parkash-2
Front matter
प्रथम ऋषभ जिन स्तवन । ( ऐसे गुरु किम पाचिये ए देशो) वन्दु बेकर जोड़ने, जुग आदि जिनेन्दा । कम रिपु गज ऊपरै, मृगगन मुनिन्दा ॥ प्रणालू प्रथम जिन्दने जय जय जिन चन्दा ॥ ए आंकड़ो॥१॥ अनुकूल प्रति- प्रतिकूल सम सही, तप विविध तमिन्दा। चेतन तनु भिन्न लेखवी, ध्यान शुक्ल ध्यावंदा ॥ २ ॥ पुद्गल सुख अरि पेखिया, दुःख हेतु भयाला। विरक्त चित विगट्यो दूसो, जाण्या प्रत्यक्ष जाला ॥३॥ संवेग सरवर भूलतां, उपशम रस लौना । निन्दा स्तुति सुख दुःखे, समभाव सुचौना ॥ ४ ॥ बांसौ चन्दन सम पणे, धिर चित्त जिन ध्याया। इम तन सार तजौ करो, प्रमु केवल पाया ॥ ५ हू बलिहारी तांहरौ, वाह वाह जिनराया । उवा दशा किण दिन आवसौ, मुझ मन उमाया ॥ ६ ॥ उगणोसै सुदि भाद्रवे, दशमी दौतवारं ऋषभदेव रटवे करी, हुश्रो हर्ष अपारं ॥ ७॥ श्री अजित जिन स्तवन । ( अहो प्रिय तुम वट पाडो ए देशो) हो प्रभु अजित जिनेश्वर आपरो, ध्या ध्यान हमेश हो । यही प्रभु अशरण शरण तूंही सही, मेटण समान कै ॥ संभव साहिव समरिये ॥ ए आंकड़ी ॥१॥ तन चंचलता मेटने, हुआ हे जग थी उदासीन के। धर्म शुक्ल थिर चित्त धरै, उपशम रस में होय रहालौन के ॥ सं० ॥२॥ सुख इन्द्रादिक ना सहु, जाण्या हे प्रभु अनित्य असार के। भोग भयङ्कर कटुक फल, देख्या हे टुर्गति दातार कै ॥ सं० ॥ ३ ॥ सुधा संवेग से भस्या, पेख्या हे पुद्गल मोहपाश के । अरुचि अनादर आण ने, अात्म ध्याने करता विलास कै ॥ स० ॥ ४ ॥ संग छांड मन वश कगै, इन्द्रिय दमन करी दुर्दन्त के। विविध तपे करी स्वामीजी, घातौ कर्म नो कौधो अन्त कै॥ सं० ॥ ५ ॥ तुज शरणे आवियो, कर्म विदारन तू प्रभु वौर के। तै तन मन वच वश किया, दुःकर करणी करण महा धौर कै ॥ स० ॥६॥ संवत उगणीसे भाद्रवै, सुदि इग्यारस आण विनोद कै । संभव साहिब समरिया, पाम्यो है मन अधिक प्रमोद के ॥ सं०॥७॥ ॥ श्री अभिनन्दन जिन स्तवन ( सतो कलूजी हो हुआ संजम नै त्यार एदेशी ) तीर्थंकर हो चोथा जग भागा, छांडि गृहवास करी मति निरमली। विषय विटम्वण हो तजिया विष फल जाण ॥ अभिनन्दन वान्न नित्य मनरलौ ॥१॥ए रस निर्मल ध्यायने, पाम्या केवल नाग । बागा सरस वर जन बहु तारिया, तिमिर हरण जग भाण ॥ सु० ॥२॥ फटिक सिंहासगा जिनजौ फावता, तरु अशोक उदार। छत्र चामर भामडल भलकतो, सुर दुन्दुभि झिणकार ॥ सु० ॥३॥ पुष्प वृष्टि वर सुर ध्वनि दौमती, साहिब जग शिणगार । अनन्त जान दर्शन सुख बल घD, ए द्वादश गुण श्रीकार ॥ सु० ॥४॥ बागी अमौसम उपशम रस भरी, दुर्गति सूल कषाय । शिव सुख ना अरि शब्दादिक कद्या, जग तारक जिनराय ॥ सु० ॥ ५ ॥ अन्तरजामौ रे शरण आप रे, हूं आयो अवधार । जाप तुमारो रे निश दिन सभरूं, शरणागत सुखकार ॥सु०॥ ६ ॥ सवत उगणीसै रे सुदि पक्ष भाद्रव, बारस मंगल- वार। सुमति जिनेश्वर तन मन स्यूं ग्या, आनन्द उपनो अपार ॥ सु० ॥७॥ + श्रीपदम जिन स्तवन । (जन्दवे री देशी छै सुण भगते भगवन्त के एदेशी) निर्लेप पद्म जिसा प्रभु, पद्म प्रभु पिछाण २ । सयम लोधो तिण समै, पाया चौथो नाण ॥ पद्म प्रभु नित्य समरिये ॥१॥ ए आंकड़ो ॥ ध्यान शुक्ल प्रभु ध्याय ने, पाया केवल सोय २। दीन दयाल तपो दिशा, समुद्र नो नौर ए। एहथौ तुम वच अधिक विमास ए ॥ भ० ॥४॥ सांभल ने जन हन्द ए, रोम रोम में पामें आनन्द ए। ज्यांरो मिटै नरकादिक वास ए॥ भ० ॥ ५ ॥ तूंप्रभु दीन दयाल ए, तूंही अशरण शरण निहाल ए। ईछ तुमारो दास ए॥ भ० ॥ ६ ॥ संवत उग- गोसै सोय ए, भाद्रवा सुदि तेरस जोय ए। पहुंची मन नी आश ए॥ भ० ॥७॥ श्री चन्द्रप्रभ जिन स्तवन । शिवपुर नगर सुहामणो ए. देशी) हो प्रभु चन्द जिनेश्वर चन्द जिस्या, वागी शीतल चन्दसौ न्हाल हो । प्रभु उपशम रस जन सांभलै, मिटै कर्म भ्रम मोह जाल हो ॥ प्रभु० ॥ १॥ ए आंकड़ी। हो प्रसु सूरत मुद्रा सोहनी, बारु रूप अनूप विशाल हो। प्रभु इन्द्र शचि जिन निरखती, ते तो सप्त न होवे निहाल हो ॥ प्र० ॥ २ ॥ अहो वीतराग प्रभु तूं सही, तुम ध्यान ध्यावै चित्त रोक हो। प्रभु तुम तुल्य ते हुवै ध्यान स्यू, मन पाया परम सन्तोष हो ॥ प्र० ॥३॥ हो प्रभु लौन पणै तुम ध्यावियां, मामै इन्द्रादिक नी ऋद्धि हो। बले विविध भोग सुख सपदा, लहे आमोसही आदि लब्धि हो ॥ प्र० ॥ ४ ॥ हो प्रभु नरेन्द्र पद मामै हरामी हो ॥ सु० ॥ ५ ॥ जे जोधा जग में घणा, सिंह साये संग्रामौ हो। ते मन इन्द्रिय वश कगे, जोड़ी, केवल पामो हो ॥ सु० ॥ ६ ॥ उगणीसै पुनम भाद्रवी, प्रणमं सिरनामी हो। मन चिन्तित वस्तु मिले, रटियां जिन खामी हो ॥ सु० ॥७॥ श्री शीतल जिन स्तवन । ( देवा आई ओलंभड़ो सासुजी पदेशी) शीतल जिन शिवदायका। साहेबजो। शीतल चंद समान हो। निस्नेही। शीतल अमृत सारिखा। साहेबजी। तप्त मिटै तुम ध्यान हो । निस्नेहौ । सूरत धांरी मन बसी। साहेबजी ॥१॥ वन्दे निन्दे तो भणी। साहेबजी राग द्वेष नही ताम हो । निस्नेही। मोह दावानल तैं मेटियो । साहेबजी। गुण निष्पन्न तुम नाम हो ॥ निस्नेही । सू० ॥ २॥ नृत्य करै तुज पागले । साहेवजी । इन्द्राणी सुर नार हो। निस्नेही। राग भाव नहौं उपजै । साहेवजी। ते अन्तर तप्त निवार हो ॥निस्नेही ॥ सू० ॥ ३ ॥ क्रोध मान माया लोभ ए। साहेबजौ। अग्नि सू अधिकी आग हो । निस्नेही । शुल ध्यान रूप जलकरौ । साहेबजौ । थया शौतलिभूत महा भाग्य हो । निस्नेही ।। सू० ॥ ४॥ इन्द्रिय नोडू- ( १३ ) सलियो जीव रे। किंपाक फल नी उपमा, रहिये दूर थी टूर सदीव रे ॥ श्रे० ॥ ४ ॥ संयम तप जप शौल ए, शिव साधन महा सुखकार रे। अनित्य अशरण अनन्त ए, ध्यायो निर्मल ध्यान उदार रे ॥ श्रे० ॥५॥ स्त्रिया- दिक ना संग ते, आलम्बन दुःख दातार रे। अशुद्ध आलम्बन छोडने, धयो ध्यान आलम्वन सार रे ॥ श्रे० ॥ ६॥ शरणे आयो तुझ साहिवा, करूं बारम्बार नम- स्कार रे । उगणौसै पूनम भाद्रवी, मुझ वा जय जय- कार रे ॥श्रे० ॥७॥ श्री बासुपूज्य जिन स्तवन । ( इम जाण जपो श्री नवकार एदेशी द्वादशमा जिनवर भजिये, राग द्वेष मच्छर माया तजिये। प्रभु लाल बरण तन छिव जागौ, प्रभु वासु पूज्य भज ले प्राणी ॥ १ ॥ बनिता जाणो बैतरणी, शिव सुन्दर बरवा हूंस घणौ। काम भोग तज्या किम्याक जाणी ॥ प्र० ॥ २॥ अञ्जन मञ्जन स्यं अलगा, वलि पुष्य विलेपन नहीं बिलगा। कर्म काय्या ध्यान मुद्रा ठाणौ ॥ प्र० ॥३॥ इन्द्र थकी अधिका ओपै, करुणा- गार कदेई नही कोपे। वर शाकर दूध जिसी वाणी ॥ प्र० ॥४॥ स्त्रौ स्नेह पाशा दुर्दन्ता, कह्या नरक निगोद ( १५ ) पूरन आश ॥ सा० ॥ ५ ॥ तूं ही कृपाल दयाल तूं साहेब, शिवदायक तूं जगनाथ । निश्चल ध्यान करै तुझ ओलख, ते मिलै तुझ संघात ॥ सा० ॥६॥ अन्तर- जामी आप उजागर, मैं तुम शरणो लौध । सबत उगणीसै भाद्रवी पूनम, बछित कार्य सिद्ध ॥ सा० ॥७॥ श्री अनन्त जिन स्तवन । ( पायो युगराज पद मुनि एदेशी ) अनन्त नाम जिन चउदमा रे, द्रव्य चोथे गुगाठाण । भलांजी काई द्रव्य० । भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतले द्रव्य जिन जागा । भलां० । इतले द्रव्य जिन जाण, पायो पद जिन राजनुं रे, शुद्द ध्यान निरमल ध्याय । भला. • । पायो पद ॥ १ ॥ जिन चक्रो सुर जुगलिया रे, बासूदेव बलदेव भलां• बा० । ए पंचम गुण पावै नहीं रे, ए गैत अनादि खमेव भला १० ॥ पा० ॥२|| संयम लौधो तिमा समै रे, आया सात मे गुण ठाण • आ० । अन्तर मुहर्त तिहां रही रे, छठे बहु स्थिति जाण भलां. छ. ।। पा० ॥३॥ पाठमां थी दोय श्रेणी के रे, उपशम खपक पिछाण । भलां० उ०। उपशम जाय इग्यारसे रे, मोह दवावतो जाण भलां० मो० ॥ पा० ॥ ४॥ श्रेणौ उपशम जिन ना लहै रे, . । उपशम खपक पिछाण । उपशम जाय इग्यारसे, मोह # दबावतो जाण ॥ ४ ॥ श्रेणी उपशम जिन ना लहै, १ खपक श्रेणी धर खन्त। चारित मोह खपावतां, चढ़िया ध्यान अत्यन्त ॥ ५ ॥ नवमें आदि संजल चिहूं, अन्त इक लोभ । दश में सूक्ष्म मात्र ते, सागार उपयोग शोभ ॥६॥ एकादशमो उलघंन ने, बारसे मोह खपाय। विकर्म एक समै तोड़ता, तेरमें केवल पाय ॥ ७ ॥ तीर्थ स्थापी योग सधि ने, चउदमी थी शिव पाय । उगणीसै पूनम भाद्रवे, अनन्त रय्या हरषाय ॥८॥ श्री धर्म जिन स्तवन । ( भिक्षु पट भारोमाल भलकै ए देशी ) धर्म जिन धर्म तणा धोरी, घटक मोह-पाश नाख्या तोड़ी। चरण धर्म आत्म स्यूं जोड़ो, अहो प्रभु धर्म देव प्यारा ॥ १॥ शुक्ल ध्यान अमृत रस लौना, संवेग-रसे करी जिन भौना। प्याला प्रभु उपशम ना पौना ॥ प्रा० ॥ २॥ जाण्या शब्दादिक मोह जाला, रमणि सुख किंपाक सम काला। हेतु नरकादिक दुःख आला ॥ अ० ॥ ३॥ पुगल शिव अरि जाण्या खामी, ध्यान थिर चित्त आत्म धामौ। जोड़ो युग फेवल नी पामौ ४॥ थाप्या प्रभु, च्यार तौरथ तायो, आख्यो धर्म रे। प्रभु को समरण कर नौको रे ॥ १॥ अद्भुत रूप अनुपम कुंथु जिन, दर्शन जग मौय को रे ॥ प्र० ॥२॥ वाणी-सुधा सम उपशम रस नौ, बालहो जग बौकोरे॥ प्र० ॥३॥ अनुकम्पा दोय श्री जिन दाखौ, मर्म प्रो. समदृष्टि को रे॥ प्र० ॥४॥ असंयती रो जौवणो बांछे। ते सावध तहतोको रे॥ प्र० ॥ ५॥ निरवद्य करुणा. करी जन ताया, धर्म ए जिनजी को रे॥ प्र० ॥ ६ ॥ सम्बत् उगणौसै भासू बदि एकम। शरणो साहिबजी : को रे ॥प्र० ॥ ७॥ श्री अर जिन स्तवन । • ( देखो सहियां बनड़ो ए नेमकुमार एदेशी) अर जिन कर्म अरी नां हन्ता, जगत उद्धारण जिहाज। मोने प्यारा लागै छै जी। अर जिनरान । मोने वालाह लागै छ जी, अर महाराज ॥ १॥ परोषह उपसर्ग रूप अरि हण पाया केवल माज मो० ॥२॥ नयण न धापै निरखतां जौ, इन्द्राणी सुरराज ॥ मो. ॥ ३॥ बाफरे जिनेश्वर रूम अनुपम, तूं सुगुणा शिरं- ताज ॥ मो० ॥ ४॥ बागी विशाल दयाल पुरुष नौ, भूख टषा जावै भाज । मो० ॥ शरण आयो खाम रे जौ, अविचल सुखने काज ॥ मो० ॥ ६॥ उगणोसे भासू बदि एकम, मानन्द उपनो आज मो०॥७॥ . - -- बाणौ रा॥ प्रभुजी आप प्रवल बड़ भागौ ॥१॥ त्रिभु- वन दीपक सागौ रा ॥ प्र० ॥ आ० ॥ ए आंकड़ो। चौबीस अतिशय पैंतीस बाणो, निरखत सुर इन्द्राणी। संवेग रस नौ वाणी सांभल, हर्ष स्युं आंख्यां भराणी रा ॥ प्र० ॥ प्रा० ॥२॥ शब्द रूप रस गन्ध अने स्पर्श, प्रतिकूल न हुवै तुम प्रागै। ज्यूं पंच दर्शन थास्यूं मग नही मांडे, तिम अशुभ शब्दादिक भागै रा ॥ प्र० ॥ आ० ॥ ३॥ सुर-कृत जल स्थल पुष्प पुंजवर, ते छांडी चित्त दोनो। तुम निश्वास सुगन्ध मुख परिमल, मन भ्रमर महा लौनो राप्र०॥ आ० ॥४॥ पंचेन्द्री सुर नर तिरि तुम स्यूं, किम हुवै टुखदायो। एकेन्द्री अनिल तजै प्रतिकूल पा, बाजै गमतो वायो रा॥प्र०॥ मा० ॥ ५ ॥ राग द्वेष दुरदन्त ते दमिया, जौत्या विषय विकारो। दीन दयाल आयो तुझ शरणे, तूं गति मति दातारोरा ॥ प्र० ॥ आ० ॥ ६ ॥ सम्वत् उगणीसै आसोज तीज कृष्णा, श्री मुनि सुब्रत गाया । लाडनूं शहर मांहि रूड़ी रीते, मानन्द अधिको पाया राप्र॥ था० ॥७॥ श्री नमि जिन स्तवन । । ( परम गुरु पूज्यजी मुझ प्यारा रे एदेशी नमिनाथ अनाथां ग नाथो रे, नित्य नमण करूं t ( २३ ) ध्यान वर ध्याय, इन्द्र शची निरखे हर्षाय ॥ प्र. ॥३॥ नेरिया पिगा पामै मन मोद, तुझ कल्याण मुर करत विनोद ॥ प्र० ॥ ४ ॥ राग रयित शिव सुख स्यं प्रोत, कर्म हो बलि इष रहित ॥ प्र० ॥ ५ ॥ अचरिजकारी प्रभु थारो चरित्र, हूं प्रणमं करजोड़ी नित्य ॥ प्र० ॥६॥ उगणीसै बदि चीथ कुमार, नेमि जप्यां पायो सुखसार ॥ प्र० ॥७॥ श्री पाश्र्व जिन स्तवन । ( पूज्य भीषणजी तुम्हारा दर्शन एदेशी ) लोह कञ्चन करै पारस काचो, ते कहो कर कुग्ण लेवै हो। पारस तूं प्रभु साचो पारस, आप समो कर देवै हो ॥ पारस देव तुमारा दर्शन ॥ भाग भला सोडू पावै हो ॥ १॥ तुझ मुख कमल पासे चमरावलि, चन्द्र कान्ति वत सोहे हो। हंस श्रेणि जाणे पंकज सेवे, देखत जन मन.मोहै हो । पारस० ॥२॥ फटिक सिंहासण सिंह आकारे, बैठ देशना देवै हो । बन मृग आवै वाणी सुगणवा, जाण के सिंह ने सेवै हो । पारस ॥३॥ चन्द समो तुज मुख महा शीतल, नयण चकोर हर्षावै हो। इन्द्र नरेन्द्र सुगसुर रमणी, निरखत प्ति न पावै हो ॥ पारस० ॥ ४ ।। पाखण्डी सरागी आप तणा दातार, छाडि रमणी किम्पाक वेलि। संवेग संयम धार ॥ नहीं ॥ ५ ॥ निन्दा स्तुति सम पणै रे, मान भने अपमान । हर्ष शोक मोह परिहयां रे। मामै पद निर्वाण ॥ नहीं ॥ ६॥ इम बहुजन प्रभु तारिया रे, प्रणमुं चरम जिनेन्द। उगणीसै पासोन चौथ हुमो अधिक पानन्द ॥ नहौं ॥७॥ बदि, .
( २७ ) ५ मिथ्याती ने भली करणी लेखै सुनती कधो है। (साख सूत्र उत्तराध्ययन भ०, ७ गा० २० ) ६ क्रियावादी सम्यग्दृष्टि ( मनुष्य तिर्यच) एक वैमाणिक टाल और आऊषो न बांधे ( साख सूत्र भगवती ३० उ. १) मिथ्यातो मास २ खमण तप करे, तथा सुई नो धन पै आवै तेतलाज अन्न नो पारयो करे, पिण सम्याटि ना चारित्र धर्म नी सोलमी कला पिण नावै तेहनो न्याय । ( उत्तराध्ययन अ०६ गा० ४४) मिथ्याती मास २ खमण तप करे, पिण माया थी अनन्त संसार रुले । (सूयगडांग श्रुतस्कन्ध १ अ० २ उ० १ गा०६) है जीव अजीव जागे नहीं तेहना पचखाण टुपञ्च- खागा कद्या तेहनो न्याय । (भगवती श० ७ उ०२) १०. भगवत दीक्षा लियां पहली, २ वर्ष भामा ( अधिका) घर से विरक्त पणे रद्या तथा काची पाणी न भोगव्यो। ( प्रथम आचारांग अ०६उ० १ गा० ११) २१ जे तत्त्व ना अजाण मिथ्याती, त्यांगे अशुद्ध
( २६ )
.
--
--
१
१६ अप्रमादौ साधु ने अणारम्भी कहा।
(भगवती श० १ उ. १)
१७ असोचा फेवली अधिकारे इम कह्यो-तपस्या-
दिक थौ समदृष्ट पामै।
(भगवती श० ६ उ० ३१ )
१८ सूरियाम ना अभियोगिया देवता भगवान ने
वांद्या तिवारे भगवान कह्यो-ए वन्दना रूप
तुम्हारो पूराणो आचार के १ ए तुम्हारो जीत
आचार छै २ ए तुम्हारो कार्य छै ३ ए वंदना
करवा योग्य छै ४ ए तुम्हारो आचरण छै ५ ए
वंदनानी म्हारी आज्ञा छै। ६ ।
( रायप्रसेगी देवताधिकार)
१६ खंधक सन्यासी, गोतम ने पूछो, हे गोतम !
तुम्हारा धर्माचार्य महावीर ने वादां यावत् सेवा
करां। तिवारे गोतम कह्यो, हे देवासुप्रिय !
जिम सुख होवे तिम करो पिण विलम्ब मत
.
करो।
(भगवती श० २ उ० १)
(क) दीक्षा नौ भाजा पर भगवत पार्श्वनाथ
'अहं सुह' पाठ कह्यो।
(पुप्फ चूलिया)
।
७ भन्य दर्शणी पिण सत्य बंचन मे भादस्यो।
( प्रश्न व्याकरणा संवरद्वार २)
१८ वाण व्यन्तर ना देवता देवी बनखंड ने विषे
बैसे, सूवै जाव क्रौड़ा करै। पूर्व भवे भला
प्राकम फोडव्या तेहना फल भोगवै।
( जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति)
२६ मिथ्याती प्रकृति भद्रादि गुण थी वोणव्यन्तर
देवता थाय।
( उववाई प्रश्न ७)
दानाधिकारः।
है
.१ असंयती ने दोधां पुन्य पाप को न्याय ।
२ श्रागान्द' श्रावक इह विधि अभिग्रह लौधो-जे
हूं आज थको ,अन्य तीर्थोंने अन्य तीर्थों देवने
तथा अन्य तीर्थोना ग्रह्या अरिहन्तना चैत्य साधु
भष्ट थया। ए तौना प्रति वांटूनहौ, नमस्कार
करूं नही, अशनादिक देऊनही देवाऊ नहौं,
विना बतलायां एकवार तथा घणी वार वोला
( नहीं, तथा अशनादिक च्यार आहार देऊनहीं।
।
५ साधुनी हेला निन्दा करतो अशनादि देवै तिहां
"पडिलाभित्ता" पाठ कह्यो ।
(भगवती श० ५ उ० ६)
(क) तथा साधु ने पंदना नमस्कार करतो थको
यशनादिक देवै तिहां पिग्म “पडिलाभित्ता"
पाठ कहो।
( भगवती श० ५ उ० ६ )
६ पोट्टिला आर्या महासती ने अशनादिक दीधा
तिहां “पडिलामे" पाठ कायो। ते माटे "मडि-
लाभेदू” नाम देवा नो छै मिण साधु प्रसाधु
जासावा रो नही।
(जाता अध्ययन १४)
साधु ने अशनादिक वहिरावै तिहां "दलएज्जा"
पाठ कह्यो छ। ते साटे "दलएज्जा" कहो भावे
"पडिलाभेज्जा" कहो दोनों एक अर्थ छै ।
( आचारांग शु० २ अ० १ उ० ७)
८ सुदर्शगा सेठ शुकदेव सन्यासी ने अशनादिक
माप्यो तिहां “पडिलाभमाणे" पाठ कह्यो।
(ज्ञाता अ. ५)
है पडिलाभ' नाम देवा नो हिज छै।
(सूयगडांग श्रु० २ अ० ५ गा० ३३ )
( ३५ )
११ भग्गु मे पुत्रां कह्यो, वेद भण्या वाण . शरण न
हुवै तथा ब्राह्मण जिमायां. तमतमा जाय ।
(तमतमा ते अंधारा मे अंधागे ) एहवी नर्क ।
(उत्तराध्ययन अ० १४ गा० १२२.)
१२ श्रावक पिण विप्र जिमाई तेहनो न्याय च्यार
प्रकारे नर्कायु बांधे तिणे कसे ओलखायो ।
( भगवती शतक ८ उ०६)
(क) बलि श्रावक पिगा विप्र जिमाई तिमा
ऊपर बालमर्ग थी अनन्ता नर्क ना भाव।
तेहमो न्याय । (भगवती श० २ उ० १)
१३ जे सावद्य दान प्रशसै तेहने छः काय नो बध
नो बंछणहार कयो। अने वर्तमान काले निषेधे
त्यांने अंतराय नो पाइनहार कह्यो। ते माठे
साधु ने वर्तमान में मौन राखिवे कही।
(सूयगडांग श्रु० १ अ० ११ गा० २०, २१)
१४ दान देवै लेवै, इसो वर्तमान देखौ गुण दूषण
कहणो नहीं ।
(सूयगडांग २० २ अ० ५ गा० ३३ )
१५ नन्दा मणिहारो दानशालादिक नो घणो प्रारम्भ
करी मरी ने पोता री बावड़ी सेज डेडको थयो।
(जाता अ० १३,
.
१
।
मांसादि भोगव्या ? तेहना फल ए नर्क समान टुःख भोगवै छै। तो जोवो नौ कुपात्र दान चौड़े भारी कुकर्म कह्यो। ( दुःखविपाक अव १) १२ ब्राह्मणांने पापकारी क्षेत्र कहा। (उत्तराध्ययन अ० १२ गा० १४) २३ पन्द्रह कर्मादान ने व्यापार कह्या । ( उपासकदशा अ० १) भात पाणी थौ पोष्यां धर्माधर्म नो न्याय । ( उपासकदशा अ. १) २५ तुंगिया नगरौ ना श्रावकां नो उघाड़ा बारगारो २४ न्याय । २७ ( भगवतौ श० २ उ० ५ टौका में) २६ श्रावका ना त्याग ते ब्रत अने आगार ते अब्रत । ( उववाई प्रश्न २० तथा सूयषडांग श्रु० २ अ० २) दश प्रकार ना शस्त्र कह्या तिणने अव्रतने भाव शस्त्र काह्यो। ( ठाणाग ठाणे १०) २८ जे श्रावक देशथको निवौं अने देशथको पच्च- खाण कौधा तिगो करी देवता थाय। मिण अब्रत घौ देवता न हुवै। (भगवती श० १ उ०८) १
नथौ।
गृहस्थी नौ व्यावच कियां, करायां, बलि अनु-
मोद्यां २८ मो अणाचार कह्यो।
( दशवैकालिक अ० ३ गा० ६ )
इग्यारमी पङिमामें पिण प्रेम बंधा तथ्यो
( दशा श्रुतस्कंध अ० ६)
पडिमाधारौ रे कल्प ऊपर अम्बड़ सन्यासौ ना
कल्प नो न्याय।
( उववाई प्रश्न १४)
अनेरा सन्यासी नो कल्प।
( उववाई प्रश्न १२)
वर्ण नाग नतुओ सग्राम मे गयो तिहां एहवी
अभिग्रह धारयो-कल्यै मुझने जे पूर्व हणे तेहने
हगावो। जे न हौ तेहने न हणवो।
( भगवती श० ७ उ०६)
जे एकक अन्यतीर्थों थको गृहस्थ श्रावक देश
ब्रते करौ प्रधान अने सर्व श्रावक थको साधु सर्व
ब्रते करी प्रधान ।
(उत्तराध्ययन अ० ५ गा० २०)
श्रावक नौ भात्मा अधिकरण कही छै। अधि-
करण ते छवकायनो शस्त्र जागावो।
(शगवती श० ७ उ० १)
( ४१ ).
पोताना पाप टालवा भणी मेमनाथ भगवान
पाछा फिया।
( उत्तराध्ययन भ० २२ गा० १८-१६)
मेवकुमार नो' जीव हाथीने 'भवे. सुसलानी
अनुकम्पा वौधौ सुसला ने च्यार नामे करी
बोलायो।
( जाता ०१)
(क) तथा मढाई निग्रन्थे ने छः नामे करी
बोलायो।
(भगवती श० २ उ० १)
पडिमाधारी नो कल्प ‘बहाय गहाय' पाठ नो
अर्थ।
( दशाश्रुत स्कंध अ० ७)
रागद्वेष आणी 'मार तथा मत मार' इम कहिवों
वर्यो।
( सूयगडांग श्रुतस्कन्ध २ ५० ५गा. ३०)
गृहस्थां ने मांहो मांही लड़ता देखी--एहने
हग. तथा एहने मत हण एहवो मन में मिय
विचार न करें।
(आचारांग श्रु० २ अ० २ उ० १)
संयम जीवितव्य वधारवी कह्यो।
(उत्तराध्ययन प० ४ उ. ७)
संयम जीवितव्य टुर्लभ कन्यो ।
( सूयगडांग श्रु० १ अ०२ उ. २ गा० १)
मिथिला नगरी वलती देखौ, नमोगजर्षि साहमी
न जोयो। बलि कधी म्हारै गग वेष करवा
माटै बाहलो दुबाहलो एक पिण नहौं। ए
मिथिलापुरी बलतां थकां मांहगे किचित् मात्र
पिण वलै नथी। मैं तो (संयम मे सुख से
जौवू अने सुख से बसू छु ।
(उत्तगध्ययन अ० ६ गा० १२.१३-१४-१५)
देवता, मनुष्य. तिथंच ए तीनां नुं मांहो मांही
विग्रह देखी अमुक नी जय होवो अने अमुक
नौ अजय होवो एहवो बचन साधु ने बोलणो
नहौं।
( दशवकालिक प० ७ गा० ५०)
वायरो, वर्षा, शीत, तावड़ो. राज विरोध रहित,
सुभिक्ष पणो, उपद्रव रहित पणो, ए सात बोल
हुवो इम साधु ने कहिवो नही।
( दशवैकालिक अ०७ गा• ५१)
समुद्रपाली चोर ने मरतो देखो वैराग्य पामी
( ४५ )
नावी में पाणी पावती देखी साधु ने गृहस्थ
प्रते बतावणो नहौं।
( आचारांग श्रु० २ अ० ३ उ० १)
साधु अनुकम्पा आणी वस जीव ने वांधे बंधावे
तथा बांधते प्रते भलो जाणे तथा बंधिया जीवां
ने अनुकम्पा आगी छोडे, छुड़ावै छोड़ते ने भलो
नाणे तो प्रायश्चित कह्यो।
( निशीथ उ० १२ बोल १.२)
साधु कुतूहल निमित्त वस जीव ने वांधै बंधावै
अने छोड़े छुड़ावै तो प्रायश्चित कह्यो ।
(निशीथ उ. १७ बोल १-२)
जे साधु पञ्चखाण भांगै अने भांगता ने अनुमोदै
तो दण्ड कयो।
( निशीथ उ० १२ बोल ३-४ )
गृहस्थ साधु नी अनुकम्पा याणी तैलादि मर्दन
करै तिहां कोलुण वडियाए' पाठ कयो ।
( आचारांग श्रु० २ ० २ उ० १)
हरिणगवेषी सुलसांनी अनुकम्पा कोधी।
( अन्तगढ़ वर्ग ३ अ.८).
कृषाजी डोकरानी अनुकम्पा करो ईट उपाड़ी।
( अन्तगढ़ वर्ग• ३ भ०८)
-
( ४७ )
भगवान शीतल तेजू लब्धि करी गोशाले में
बचायो तिहां 'अणुकम्पणट्ठाए' पाठ कयो।
( भगवती श० १५)
लब्धि अधिकार।
वैक्रिय तथा तेजस लब्धि फोड्यां जघन्य ३
उत्कृष्टौ ५ क्रिया कही।
(मन्नवणा पद ३६)
२ पाहारिक लब्धि फोद्यां जघन्य ३ उत्कृष्टी ५
क्रिया कही।
(पन्नवणा पद ३६)
३ पाहारिक लब्धि फोड़े तिण ने प्रमाद पाश्री
अधिकरण कयो।
( भगवती श० १६ उ. १)
४ जंघाचारण अथवा विद्याचारण लब्धि फोड़ी
बिना पालोयां मरै, तो विराधक कयो।
(भगवती श० २० उ०६)
५ वैक्रिय लब्धि फोड़े तिण ने मायौ कह्यो भने
पालोयां विना मरै, तो विराधक कह्यो।
(भगवती श० ३ उ० ४)
( ४६ )
४ धर्म घोषना साधा नागश्री ब्राह्मणी ने बाजार
मे हेलो निन्दी।
( ज्ञाता अध्ययन १६)
५ सेलक ऋषि ने उसन्नो पासत्यो कह्यो।
( ज्ञाता अ०५)
६ : गोशाला नो जौव विमलवाहन राजा ने सुमंगल
नामे अणगार, तेजू लब्धि करी हणस्थे ।
। (भगवती श० १५)
खन्धक नामे अणगार संथारो कौधो विहां
'आलोय पडिकन्ते' माठ कह्यो।
(भगवती श० २ उ० १)
८ तिसक मुनि ने छेहडै तिहां 'आलोइय पडिकन्ते'
पाठ कचो।
(भगवती श० ३ उ० १)
६ कार्तिक सेठ ने छहडै तिहां 'आलोइय पडिक्कन्ते'
पाठ कयो।
(भगवती शा० १८ उ० २
१० कषाय कुशौल नियण्ठा नो वर्णन ।।
( भगवती श० २५ उ० ६)
१.१. दृष्टिवाद नो धणी पिणा वचन खलावै।।
( दशवकालिक प०८ गो० ५.)
-
4
.
wr
( ५१ )
वान प्रवर्या दोधी। तोने शिष्य कियो। सोने
सिखायो अने तोने बहुश्रुति कियो । तूं भगवान
सूं इज मिथ्यात्व पडिवज्जै छ ?
(भगवती श० १५)
३ भगवान पिण कधो-हे गोशाला। मैं तोने
प्रवयों दोधी।
(भगवती श• १५)
४ गोशाला ने कुशिष्य कह्यो।
(भगवती श० १५)
A
गुणवर्णनाऽधिकार
N
-
१ गणधरां भगवान ना गुण किया।
( आचारांग श्रु० १ अ० ६ उ. ४ गा०८)
२ भगवान, साधां ना अनेक गुण किया।
(उववाई प्रश्न २१)
३ कोणक ने माता पिता नो विनीत कह्यो।
(उपवाई)
४ श्रावकां ने धर्म ना करमहार कया।
( उववाई प्रश्न २०)
--
७ कृष्णादिक तीन लेश्या प्रमादी साधु में हुवै।
( भगवती श० १ उ. १)
८ तेज पन लेण्या सरागी में हुवै।
( भगवती श. १ उ.
१ उ. २)
है संयती में मिण कृषा लेश्या हुवै ।
(पन्नवणा पद १७ उ० १)
H
यावृत्ति अधिकार
१ 'यने छात्रों ने उन्धा पाया ते हरकेशौ नौ व्या-
वर्च कही।
(उत्तराध्ययन अ० १२ गा० ३२)
'२ सूर्याभदेव नौ नाटक रूप भक्ति कही।
( रायप्रसणी)
भगवान ना अङ्गोपाङ्ग ना हाड भक्ति करी
देवता ग्रहण करै।
( जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति)
४ . वीस बोल करी तीर्थंकर गोत्र बंधे।
(जाता अ०८)
५. साता दियां साता हुवै इम कहै ते मार्य मार्ग
३
4
तथा कोई अनेरा साधुनी अर्श छेदतां अनुमोदै
तो मासिक प्रायश्चित आवै।
(निशीथ उ० १५ बोल ३१)
१३ साधुरो गूमड़ो गृहस्थ छेदै तो साधुने. मने करी
अनुमोदनी नहौं तथा वचन अने काया करी
करावै नहीं।
(आचारांग श्रु० २ अ० १३)
.
.
विनयाऽधिकार
4
धर्म अने
विनयमूल धर्म
१ दोय प्रकार नो विनय सूल धर्म कह्यो साधुना
पंच महाव्रत ते साधु नो विनय
सूल
श्रावकना १२ व्रत तथा ११ पडिमा तेश्रावक नो
( ज्ञाता अ० ५)
२ पाण्डुराजा अने पांच पाण्डव माता कुन्तां सहित
नारदसै विप्रदक्षिणा देई वन्दना नमस्कार किया।
घयो विनय कियो।
(जाता अ० १६)
३ जिम पाण्डु नारद नो विनय कियो तिमहिन
कृष्ण मिण नारद नो विनय कियो।
(जाता १६)
.
-7
-
१२ सर्वानुभूति पणगार गोशाले ने श्रमस माहमा नो
हिज विनय करवा कहो।
। (भगवती श• १५.)
१३ पठारह पाम सू निवते वहने माहण कयो ।
(सूयगडांग श्रु० १५. १६)
१४ माहण नाम साधु रो हिज कह्यो।
(सूयगडांग शु० २ ० १)
१५ वसं स्थावर विविध २ न हणे तेहने माइल
कयो। तथा और भी अनेक लक्षण माहय ना
वताया।
(उत्तराध्ययन अ० २५ गा० १६ से २८ )
१६ समय माहण सर्व अतिथि नो नाम कयो।
(अनुयोग द्वार)
श्रावक ने एतला नामे करी बोलाणो कयो-है
श्रावक ! हे उमाशक ! हे धार्मिक ! हे धर्मप्रिय!
एहवा नामा करी बोलावणो कयो।
( भाचारांग २०२ भ० ४ उ. १)
"
१७
M
3
.
८
आखकाधिकार
.
,
।
१ पंच पासव हार कया।' .
(ठाणांग ठा• ५ तथा समवायांग स. ५)
(क) तथा मिथ्यादृष्टि ने भरूपी कही।
(भगवती श० १२ उ०५)
२ पंच पासवाने कृष्ण लेश्या ना लक्षण कया।
( उत्तराध्ययन प० ३४ गा० २१-२२)
३ सम्यक् पने मिथ्यात्व ने जीव क्रिया,कही।
(मणाग ठा० २ उ. १
४ दश प्रकार नो मिथ्यात्व कयो।
(ठाणांगठाणे १०)
(५ अठारह पाम में वर्ते तेहिज जीव भने तेहिज
जीवात्मा कही।
( भगवती श० १७ उ० २)
जीव अजीव परिणामी रा दश २ भेद कया।
(ठाणाङ्ग ठा. १०)
कषाय, जोग दर्शण ए पात्मा कही।
(भगवती श० १७ उ०२)
८ उदय निष्पन्न रा तैतीस बोलां ने नौव कया।
(अनुयोग हार)
७
५ पाणी में डूबती थकी साध्वी ने साधु बाहिर
काढे तो पाता उलंघे नहीं।
(वृहत्कल्प उ० ६)
६ - रावि में सिझायदिक ने अर्थ बाहिर जावगी
.
कल्यै।
-
(बृहत्कल्प उ. १)
.
..
शीतल आहाराऽधिकारः ।
१ ठण्डो आहार भोगवणी कह्यो ।
(उत्तराध्ययन प० ८ गा• १२)
२ भगवन्त ठण्डो माहार लोधी कयो।
(भाचारांग श्रु• १ प ६ उ. ४)
३ धन्न अणगार न्हाखितो पाहार लियो
ट
-
.
अनुत्तर उववाई)
४
परस निरस तथा शीतलादिक पाहार भोगयो।
साधु ने ढेष न करिवो।
(प्रश्न व्याकरण प० १०.)
&
अभाजन ने सूब सिखावै त्यांने अरिहन्त नौ
आजा ना उलङ्घनहार कहा।
( सूर्य प्रज्ञप्ति पाद. २०)
१० अर्थ'ने मिण 'सूय धम्मे' कह्यो।
( ठाणांग ठा० २ उ. १)
११ सूव पाश्री तीन प्रत्यनीक कह्या ।
(भगवती श० ८ उ०८)
१२ पंचेन्द्रिय ना उपयोग ने श्रुत कयो।
(मनवणा पद २३ उ० २)
१३ भावश्रुत ना १० नाम पर्यायवाची कह्या।
( अनुयोग हार)
।
.
१.
तिरक्य क्रियाऽधिकारः ।
-
२
अठारह पाप तूं निवां कल्याणकारी कर्म बंधे ।
(भगवती श० ७ ० १०)
वन्दणा करतां नौच गोत्र खपावै।
(उत्तराध्ययन भ० २६ वोल १.)
।३ धर्मकथा सूं शुभ कर्म बंधै
(-उत्तराध्ययन अ० २६ बोल २३)
२३। गुरु नी आजा आराधै तिणने विनीत कह्यो।
(उत्तराध्ययन भ० १ गा० २ २)
निराळ्याहाराऽधिकार
साधु प्राशुक आहार भोगावे तो ७ कर्म टोला
पाई।
( भगवती श० १.उ०६)
२ ज्ञान दर्शण चारित्र बहवाने अर्थे साधु आहार
-
करे।
(जाता अ० २)
३ साधु मोक्ष ने अर्थ आहार करै।
(जाता अ० १८)
: ४ : साधु जयणा तूं आहार करैः तो पाप कर्म बंधे
नहीं।
८-
.
( दशवैकालिका अ० ४ गा०८)
५ साधु ना आहार नौ वृत्ति असावद्य कही।
( दशवैकालिक अ० ५ उ० १ गा० ६२)
६. निर्दोष आहार लेवणहार तथा देवणहार दोनों
शुद्ध गति में जावै।
(दशवकालिक अ० ५ उ० १ गा० १०.)
(६६ )
१७ साधु ने भाव निद्राई करी जागतो कह्यो।
(आचारांग श्रु० १ अ० ३ उ०१)
(.
।
एकष्कि साधु-
-अधिकार
-
.
-
१ ग्रामादिक का घणा निकाल पैसार हुवै तिहां
घणा भागमना जाण बहुश्रुति ने पिण एकाकि
1. पणे न कल्यै।
( व्यवहार उ०६)
२ . ग्रामादिक तथा सरायादिक ने विषै धगम निकाल
(· पैसार हुवै तिहां अगडसुया ते निशीथ ना
भजाण त्यांने एकाकि पणे न कल्प।
(व्यवहार उ०६)
(३ गामादिक ना जुदा २ निकाल हुवै तिहां साधु
साध्वी ने भेलो रहिवो कल्प।
(बहत्कल्प उ• १ वोल ११)
( ४ एकलो रहै तिण मे आठ दोष कहा।
(आचारांग श्रु० १ ० ५ उ. १)
५ सूत्र अने वय करी भव्यता तेहने एकाकि पणो
कल्यै नहीं। तथा सूव भने वय करी व्यक्त
-
( ७१ )
। राग द्वेष ने अभाव एकलो कयो।
( उत्तराध्ययन अ० १ गा० १० .)
ने हूं रागद्वेष ने अभावे ज्ञानादि सहित एकलो
विचरस्यूं इम विचारी दीक्षा लेवे।
(सूयगडांग श्रु० १ अ० ४ उ० १ गा० १)
घर छांडी रागद्वेष ने अमावे एकालो विचरै।
(उत्तराध्ययन अ० १५ गा० १६ )
'तौन मनोरथ में चिन्तवै जे किंवारे हूं एकलो थई
दशविधि यति धर्म धारी विचरस्यूँ तेहनो न्याय।
गुरु कह्यो-हे शिष्य ! तोने एकलपणो म
होज्यो
(आचाराङ्ग शु. १ अ० ५ उ.
५ उ०४)
•
-
उभार पासवणाऽधिकार:
। बड़ी नौति या लघु नीति परठी ने वस्त्रे करी
पूंछ नही तथा.पूंछता ने अनुमोदै नहीं, तो
प्रायश्चित कह्यो।
(निशीथ उ० ४ बोल ३७ )
Pr
( ३ ) २ मतिज्ञान ना दोय मेद १ श्रुत निश्चित २ अश्रुत निश्चित । तिहां जे सूत्र विना ही ४ बुद्धि करी सूत्र सं मिलतो अर्थ ग्रहण करै, सूत्र विना ही बुद्धि फैलावै ते अश्रुत निश्चित मतिज्ञान नोभेद कह्यो छै। बलौ कह्यो पूर्वे दौठो नहीं सुण्यो नहीं ते अर्थ तत्काल ग्रहण करै ते उत्पात नौ बुद्धि अशुल निश्चित मतिजान नो भेद कह्यो। (साखसूव नन्दी) ३ जे भारत रामायणादिक मिथ्याहष्टि ना कौधा ते मिथ्यादृष्टिरे मिथ्यात्व पणे ग्रह्या अने सम्य. ग्दृष्टिरे सम्यक्त पणे ग्रहा। ( साख सूत्र नन्दी) च्चार प्रकार ना काव्य कह्या १ गद्यवंध २ पद्य- वन्ध ३ कथा कगै ४ गायवेकरी। (ठाणाङ्ग ठा० ४ उ० ४) ५ गाथाई करी वाणी करी, बाणी कथौ एहवं -- . कयो। ( उत्तगध्ययन अ० १३ गा० १२) ६ बाजारै लारै ताल मेलो गायां दण्ड कह्यो। ( निशीथ उ० १७ वोल १४० ) . - १०
साधु ने देई समाधि उपजावे, तो माछो
समाधि पावै। (भगवती श० ७ उ० १)
६ शुद्ध व्यवहार करी ने आधाकर्मी लियो निर्दोष
जाणी ने तो पाप न लागे ।
( सूयगडांग शु० २ उ० ५ गा० ८-६)
(क) वीतराग जोयर चाले तेहथौ कुक्कुटादिक
ना अण्डादिक जीव हणौजे तेहने पिण
पाप न लागै । पुण्य नौ क्रिया लागै शुद्ध
उपयोग माटे।
( भगवती श० १८ उ०८)
(ख) साधु ईर्याई करी चालतां जीव हणी
तो तेहने पिण पाप न लागे। हगवारी
कामी नहीं ते माट।
अल्प ( नहीं ) वर्षा में भगवान बिहार कौधो।
(भगवती श० १५)
अल्प प्राणी वौज छै जिहा ते स्थानक साधु ने
आहार करवो।
(उत्तराध्ययन अ० १ गा० ३५)
अल्प प्राण बीजादिक होवै तिण स्थान के शुद्ध
करी आहार करवो।
(आचारांग शु. २ अ. १ उ० १)
७
--
७७ )
-
बारणो ढक्यो हुवै तो धनी नी आजा मांगी ने
पूंजकर दार उघाड़णो।
( आचारांग श्रु० २ ० १ उ० ५)
५ एहवो स्थानक साधु ने रहिवो नही जे उपाश्रय
माहौं लघु नीति तथा बड़ी नौति परठण री
जागा न हुवै अने गृहस्थ बारला किमाड़ जड़ता
हुवै तिवारे रावि ने विषै अवाधा पौड़ता किमाइ
खोलना पड़े ते खुला देखि माहें तस्कर आने
बतायां न बतायां अवगुण उपजता कदा
दोष में प्रथम दोष किमाड़ खोलने को कई
तिण कारण साधु ने किमाड़ खोलवो पड़े शाई
स्थानक रहिवो नहीं।
( आचारांग श्रु० २ अ २३८ ।
६ साध्वी ने उघाड़े बारने रहिवो नहीं मिल
हुवै तो पोता नौ पछेवड़ी बांधी ने
पर
उघाड़े बारने रहिवो नहीं कर
किमाड़ जड़वो अने साधु ने कमाई करने
रहिवो कल्यै।
ठाण ॥ ५ ॥ च० ॥ चोरी करै तिणने कह्योजी,
पासव अदत्तादान। आय लागे तिके अशुभ कर्म छै
जौ, सात आठ टुख खान ॥ ६ ॥च० ॥ जिण कर्मने
उदय करोजी, मैथुन सेवै को अजाण । ति कर्मने
कहिये सहौजी मैथुन चौथो पाप ठाण ॥७॥ मैथुन सेवे
तिणने कह्योजौ, आस्रव चौथो पाप ठाण । आय लागै
ते अशुभ कर्म है जौ, सात आठ दुख खाण ॥८||च०॥
जिगा कर्मने उदय करौजी, परिग्रहो सवै अयाण ।
तिण कर्मने कहिये सहौजी, परिग्रह पंचम पाम
ठाण ॥ च० ॥ ममताभाव परिग्रह घकोजी,
परिग्रहै आस्रवजाण ।
कर्म छै जी, सात आठ टुख खाण ॥१०॥ च०॥
निण कर्मने उदय करौजी, क्रोध
प्रदेश । तिण कर्मने कहिये सहीजी, छठो पाप ठाणो
रंस ॥११॥ च०॥ क्रोध स्यं विगद्या प्रदेशने जी, ते
आस्रव कहिये कषाय । आय लागैतिक अशुभ कर्म
छै जी, बुद्धिवंत जाणे न्याय ॥ १२ ॥ च० ॥ उदेरी
क्रोध करै तसुनी, अशुभ जोग कहिवाय । निरंतर
विगद्या प्रदेशने नौ, कहिये आस्रव कषाय ॥
नवमे अष्टम गुण ठाण छै जो, शुभ लेण्या
पिण क्रोधादिक स्यूं विगद्या प्रदेशनेनौ,
घाय लागै
तिक अशुभ
तप्त जौवरा
ठाण ॥ ५ ॥ च० ॥ चोरी करै तिणने कह्योजी,
पासव अदत्तादान । आय लागे तिके अशुभ कर्म छै
जौ, सात आठ दुख खान ॥ ६॥चः ॥ जिण कर्मने
उदय करौजी, मैथुन सेवै को अजाण । तिण कर्मने
कहिये सहौजी मैथुन चौथो पाप ठाण ॥७॥ मैथुन सेवे
तिणने कह्योजी, आसव चौथो पाप ठाण । आय लागे
ते अशुभ कर्म छै जौ, सात आठ दुख खाण ॥८॥च०॥
निगा कर्मने उदय करौजी, परिग्रहो सेवै अयाण ।
तिण कर्मने कहिये सहौजी, परिग्रह पंचम पाप
ठाण ॥ ॥ च० ॥ ममताभाव परिग्रह थकौजी,
परिग्रहै आस्रवजाण ।
आय लागै तिके अशुभ
कर्म के जी, सात आठ दुख खाण ॥१०॥ च०॥
जिण कर्मने उदय करौजी, क्रोध तप्त जीवरा
प्रदेश । तिण कर्मने कहिये सहौजी, छठी माप ठाणो
रेंस ॥११॥ च०॥ क्रोध स्यूं विगद्या प्रदेशने जौ, ते
आस्रव कहिये कषाय । आय लागैतिक अशुभ कर्म
छै जी, बुद्धिवंत जाणे न्याय ॥ १२ ॥ च० ॥ उदेरौ
क्रोध करै तसुजी, अशुभ जोग कहिवाय । निरंतर
विगद्या प्रदेशने जी, कहिये आस्रव कषाय ॥१३॥ च०॥
नवमे अष्टम गुण ठाण छै जौ, शुभ लेण्या शुभ जोग ।
पिण क्रोधादिक स्यूं विगद्या प्रदेशनेजी, कषाय आसव
। ८१ .) ---- --- । । जी, च्यार फरश संपेख ॥२३॥ च० । भगवती शतक । बारमें जी, पंचम उदेश मझार । ते सहु पाम ठाणा अ जी, तिणस्यूं वर्णादिक कह्या बिचार ॥२४॥ च० । लोभ तणा नाममे कह्याजी, इच्छा मूर्छा बंछा जाण । तृष्णा भोगासा आदि दे, ए सगलाई छै पाप ठाण ॥ २५ ॥ च० । कर्म उदयथी जीवना, भाव आशा बंछादिक नाम, तेहिज नाम पाप ठाणा तणा, तिणस्यूं कह्या वर्णादिक ताम, ॥२६॥ च० । क्रोध मान माया लोभ सर्वथा जी, उपशमाया इग्यारसे गुगठाण । उद- यनो किरतब मिट गयो जौ, जब अकषाय संबर जाण ॥२७॥ च० । अप्रमाद संबर आवा न दे, जे कर्म उदय थी ताय । अण उछाह आलस भावने नौ, ते प्रमाद आस्रव जगाय ॥ २८ ॥ च० । मन वचन कायारा व्यापारस्यूं जी, तोजो आस्रव जूदो जणाय, जोग आस्रव छै पांचमोजी, प्रमाद तीनो ताहि ॥२६॥ च० । असं- ख्याता जीवरा प्रदेशमें, अणउछाहपणो अधिकाय । ते दोसै तीन जोगां स्यूं जुदोजी, प्रमाद आसव ताय ॥३०॥ च० । ते कर्म उदय बह मिट गया जी, जबर आवै शुभ जोग। तिण वेल्यां गुणठाणो सातमो जी, अंतर मुहूर्त प्रयोग ॥३१॥ च० । छठे प्रमाद आस्रव थकां नौ, लेण्या जोग शुभ आय । अधिक शुभजोग ॥ ढाल तेहिज ॥ स्थित उत्कृष्ट संजत तणोजी, प्रमाद पणे वर्तमान। सर्व काल प्रमाद तणोजी, देश अंगौ पूर्व कोड़ जाण ॥३०॥ च०। तौजे शतक भगवतीसे कडोजी, तौजा उदेशा माय । तिणस्यूं अणउछाह रूप आलस भणीजी, प्रमाद पासव जणाय ॥३८॥ च० । ते असंख्यात जीवरा प्रदेश में जौ, अणउछाह रूप प्रसाद। ते केवल जानी गम्य छै जी, वलि बहुश्रुत कहै ते समाध ॥३६॥ च० । चारित्र मोह उदय थकौजी, अब्रत आसव अत्याग भाव, ते कर्म क्षयोपशम हुवां छतांजौ, प्रथम सबै ब्रत नांव ॥४०॥च०। अशुभ जोग आवै छै साधू तणाजी, उत्कृष्ट छ:मासी दोष। तो पिण अत्याग भाव आश्री नहीं जी, चणरपालण परिणाम निरदोष ॥४१॥ च० । दोष तणो प्राछित लिये जौ, पिण अबत आसव नाहि, तिण स्यूं छठो गुणठाणे छै जो, षट नियंठा कह्या जिनराय ॥४२॥ च । चारित्र पालणरो मन नहीं जी, तथा दीक्षा आवे जिसो दोष। छठो गुणठाणी जावै तरेजौ, ब्रत संबर हुवै फोक ॥४३॥ च० । पहिले तौजे मिथ्यात निरंतरै, चौथा लग सर्व इब्रत व्याप, निरंतर देश अबत पञ्चमें, तिण सूं समय २ लागै पाप ॥४४॥ च० । छठे प्रमाद पासव निरन्तरे, दशमा लग निरन्तर कषाय । निरन्तर पाप लागे तेहने, तीनूं जोगां स्यू जुदो कहाय ॥४५॥ च० ।
-- माराधना पत Meantra muvi ॥ दोहा॥ महावीर प्रणमी करी, भाराधना अधिकार । अन्त्य समय ने जोग्य ए, भाखू तसु दश द्वार ॥ १ ॥ प्रथम आलोयण मन शुद्ध, करवी तज कपटाय । व्रत अतिचार आलोवियां, आतम निरमल थाय ॥ २ ॥ उच्चरवा वली ब्रत शुद्ध, ऊँचै शब्द, उचार । अन्तकरण हर्ष आण ने, शांति मगो मनधार ॥ ३ ॥ सगला जीव खमोवणा, प्रतिकूल जे नरनार । जूजा नाम लेई करी, कलुष भाव परिहार ॥ ४ ॥ अष्टादश ने पाप प्रति, वोसिरावै धर प्रौत। चौथो बार कह्यो इसो, छांडे सर्व अनौत ॥ ५ ॥ अरिहंत सिद्ध साधु तणो, केवली भाषित धर्म। पडिवजवा ए शरण चिहुं, : पञ्चम द्वार सु मर्म ॥ ६ ॥ दुःकृत, नौ करवी निन्दा,. छट्ठा हार मझार। अशुभ कार्य पोते किया, तसु निंदा दिल धार ॥ ७ ॥ . - । मिच्छामि दुकडं दौडेरा ॥ मुः ॥२॥ आ०॥ सूत्रपाठ अर्थ विरुद्ध कह्यो हुवै, अक्षर होणाधिक भाख्योजोग घोष होश खोट तणो सहु, मिच्छामि दुक्कडं भाष्योरा ॥ मु० ॥ ३॥ आ० ॥ विनय करौ ने रहित जाम भणियो, सूत्र प्रकाले गुणियो । · मसिझाइ में सझाय करी हुवै, तो मिच्छामि टुक्कड धुणियोरा । मु॥ ४॥ था ॥ जानतणौ तथा जानवन्त नो. अवज्ञा प्राशा- तना कौधौ। तेहनो पिसा मुझ मिच्छामि टुकडं, हिव निन्दा तज दौधौरा ॥ मु० ॥ ५ ॥ प्रा० ॥ ते ज्ञान सगा पंच भेद कह्या छै, त्यांरा करी निषेधणा जाणो..। ज्ञान तणो बलि उपहास्य कौधो तो, मिच्छामि टुकडं पिछाणीरा, ॥ मु.॥ ६ ॥ मा० ॥ जान निन्हवियों ने जान गोपवियो, इम जानातिचार चालोवै। बले दर्शण ना अतिचार पालोबी, कर्मरूप मल धोवैरा ।मु०॥ ७ ॥ मा० ॥ दर्शन प्राचार निःशक्ता प्रमुख, अठगुण सहित कहौजै। ते गुण सम्यक् प्रकार न धाया तो, मिच्छामि टुक्कड दौरा ॥ मु० ॥८॥ प्रा० ॥ सूत्र साधु ने छःकाय मांहे, जे काई शङ्का आणी । वेहनो पिग सहु मिच्छामि दुक्कड । विविध २ कर जागीरा ॥ मु० ॥ ६ ॥ भा० ॥ गहन वात साई देखी सिद्धन्त नी; शद्धा मम मन पाण्यो। तेहूनो पिण सह मिच्छामि www - . ( ८६ ) मुझ मिच्छामि दुक्कडं । हिय म्हें शङ्क निवारीराः ।मु० १८॥ पा० ॥ कंखा ते अन्य मत नी बांका। तथा पासस्था बुगल ध्यानी ॥ वाद्य क्रिया देखी त्यांरी बंश किधी तो। मिच्छामि दुक्कडं पिछाणीरा ॥ मु० ॥१८॥ मा० वितिगिंछो ते सदेह फलनों। प्रशंसा पाषंडी नी कोधी । प्रौत भाव परचो कियो तेहनो। मिच्छामि दुक्कडं प्रसिद्धिरा । मु० ॥ ॥ २० ॥ ॥ ॥ इम. दर्शण । अतिचार बालोवै। हिव चारित्र भतिचारो ॥ समिति गुप्त सहित व्रत. न माल्या तो। मिच्छामि दुक्कड विचारोरा ॥ मु० ॥ २१ ॥ आ० । व्या समिति पूरी नहीं सोधी । 'चालता चिन्तवणा कोधी॥ अथवा चालतां वातावारी हुवे। तो मिच्छामि टुक्कड प्रसिद्धिरा ॥ मु०॥ २२॥ श्रा० ॥ क्रोध मान माया लोभ तग बश । वचन काढ्यो मुख-बारै ॥ हास कितोल , करी हुवै किण सूं तो । मिच्छामि दुक्कड' :म्हारैरा ॥ मु. ॥ २३ ॥मा० ॥ भय वश बोल्यो नें मुख, नो परिपयो। बलि करौ ' विकया विवादो ॥ तेहनोः पिण 'मुझ मिच्छामि टुक्कड हिव मुझ हुइः समाधोरा ॥ मु०॥ २४ ॥भा०॥ एषणां न समिति गवेषणा न करी। शङ्का सहित माहार लोधो ॥ राग द्वेष आण्यो सरस निरस पर । मिच्छामि दुक्कड दोधारा । मु०॥ २५ ॥ मा० ॥ - - .
।।मु० ॥३३॥ श० ॥ क्रोध लोभ, भय, हास परवश
पण। सूर्ख पणे मृषावादो ॥ शशाकारी भाषा निश्चय
कही हुवै। तो, मिच्छामि टुकड समाधोरा ॥ मु० ॥
३४ ॥ आ० ॥ देव १ गुरु २ साधर्मोंनी ३ चोरी।
गज ४ गाथामति ५ अदत्तो॥ माता लोपो कोई
कारज कौधो तो।
मिच्छामि, टुकड सुदत्तोरा
H.मु. १ ३५ । आ. ॥ भाजा मिना पाहार पासी
वस्वादिक । लियो दियो हुझे कोई॥ प्राचार्य नी
शाजा चिराधी तो मिच्छामि ढुक्कड' होगरा ॥ मु० ॥
३६ प्रा० । आचार्य नौ राजा विना दीक्षा दीधी
हुवे। दिन आना दोचा नो उपदेशो। विविध २
विण दोष: निन्दू। मिच्छामि दुक्कड विशेषोरा
॥ मु० ३७॥ मा० ॥ देव मनुष्य तिर्यंच ना मैथुन।
काम स्नेह हष्टि रागे। मन वचन काया कर सेव्या
तो। मिच्छामि, टुक्कड सागैरा । मु० ॥ ३८॥ पा० ॥
थाल जञ्चाल सुपन स्त्रियादिक ना। हस्त कर्मादिक
कौधा। हांस रामत ख्याल सर्व लइरनो। मिच्छामि
टुक्कड दोधारा । मु० ॥ ३८ ॥भा० ॥ सचित्त अचित्त
मिश्र दव्यनौ लूछ। वस्त्र पाव पाहार पाणी ॥
साध एहस्थ कपर ममत भावनी । मिशमि दुक्कड
पिकापोरा । मु० ॥४०॥ प्रा०॥ मर्यादा उपरन्त वस्वा-
-
( ३ ) 'मिच्छामि टुझड ताह्योरा ॥.मु० ॥ ४८ ॥ आ० ॥ गगापतिनै वा संत सत्यारा। अथवा गणना कोई॥ अवर्णवाद बोल्या हुवै तो।, मिच्छामि टुक्कड जोईरा ॥ मु. ॥ ४६ ॥ आ० `खार्थ अणपूगां गणपति सूं। पाण्या कलुष परिणामो॥ उतरतो जो वचन कधी 'हुवे तो। मिच्छामि टुक्कड तोमोरा ॥ मु.॥ ५० ॥ प्रा० ॥ समकितनें चारित्र ना दाता। गणपति महा उपगारी॥ अणगमती ज्यो त्यांसुं प्रवौँ । तो मिच्छा- मि दुक्कड' विचारोरा । मु० ॥ ५१ ॥ आ० ॥ भिक्षु गण श्री जिन शोसण म्हें। आस्था -तास उतारी॥ शङ्का कंदा घाली ओररैतो। मिच्छामि टुकड' विचा- रौरा ॥ मु० ॥ ५२॥ आ०॥ माम अठारै, भाजाणे । सेव्यो सेवाया होई॥ सेवतांने अनुमोद्या हुवै तो। मिच्छामि टुक्काड जोईरा ॥ मु० ॥ ५३॥ पा० ॥ अतिचार सूल- उत्तर गुणसे । लाग्यो, ते संभारी संभारी॥ माया रहित आलोई, लिये दण्ड। कपट प्रपञ्च -निवारी रा ॥.मु० ॥५४ ॥ प्रा० ॥ भोला बालक जेम आलोवै। प्राचार्यादिक पासो॥ नहाय धोयनें निर्मल हुवै, जिम । आतम उज्जल जासोरा ॥ मु० ॥ ५५ ॥ पा०॥ इह विधी आलोवा करै मुनि। ते उत्तम जीव सधीरा ॥ परसव री अति जागा .
* दोहा * प्रथम द्वार पाख्यो प्रवर, पालोयण अधिकार । ब्रत उच्चरवो नो हिवै, दाखू टूजो दार ॥ १ ॥ - है २॥ . ॥ ढाल २॥ (माथो धोइ माल सुमारे । दरपणमें मुख देखंजीरे ॥ एदेशी) पूर्व गणि आजा थी धास्या । पञ्च महाबत जाणी जौरे ॥ हिवड़ा पिण सिद्ध - अरिहंत गणिनी। शोख करी पहिछाणोरे ॥ सैणां थईयैजौरे ॥१॥ सर्व प्राणा- तिपात प्रति पचखू । बस थावरना प्राणोजौरे ॥ मन बचन काय कगै हणवाना। जाव जीव पचखाणोरे ॥ सै० ॥ २॥ इमन हणवा तणां त्याग मुझ । वलि हगती हुवै कोईजोर॥ ते अनुमोदण तणा त्याग बलि । नाव जीव ,अवलोईरे ॥ सै० ॥ ३ ॥ मृषावाद सर्वथा पचखू । क्रोधादिक दिल माणोजीरे ॥ मन वच काय करौ मृषा वच । बोलणरा पचखायोरे ॥ सै०॥ ४ ॥ मज बोलावण तणा त्याग मुझ। अनुमोदन ना एमोजीर॥ विविध २ वच 'भलिक तया इम। जाव जौव लग मेमोरे ॥ सै० ॥ ५॥ सर्व अदत्ता दानज पचखू । पदत्त लेवणरा त्यागोजीरे ॥ पादत्त
॥दोहा॥
इम ब्रत उच्चरिवा तणो, पाख्यो दूजो हार ।
टतीय द्वार कहिये हिवै, खमायवू तज खार । १ ॥
॥ ढाल ३॥
(सीता आवरे धर राग एदेशी)
सप्त लक्ष ने जाति पृथ्वीनी । सप्त लच भपकाय॥
सूत्यादिक चउरासी लक्ष जे। नौवायोनि खमाय ।।
॥ १॥ सुगुणां खमाविये तज खार ॥ एमां ॥ गण
में संत सती गुणवंता। सगला भनी खमाय ॥ निज
पातम प्रति नरम करौने। मच्छर भाव मिटाय
।। सु० ॥ २ ॥ किणहिक संत सती सुं पाया। कलुष
भाव जो ताम || कठण बचन तमु कह्या हुवै तो।
खामै लेले नाम ।। सु० ॥३॥ इमहिज श्रावक भनें
प्राविका । सगलां भी खमाय ॥ कलुष भाव करि
कटु वच भाख्या। तो नाम लेडूनें ताहि ।। सु० ॥
॥४॥ द्रव्यलिंगी वा अन्य दर्शगी। खामें सरल
पणेह ॥ क्रोधादिक करी कटु वच भाख्यातो। नाम लेई
पभमोह ॥ सु० ॥ ५॥ वडा संतनी करी भाशातन ।
विई जोगे करौ ताम ॥ सर्व खमावै उजल भावे ।
१३
॥दोहा॥ खंमते खामणानो कह्यो, तीजो दार उदार। हिव अष्टादश अध प्रतै, 'वोसिरावै अणगारं"। ... . . . Y . 1-'. (5.:- - -॥ दाल ४॥ - .:. सिले (नीकी सीखडलिरे लहिये एदेशी), प्रागातीपात. प्रथम अघ भाख्यो। -टूजी :मृषा- बाद 11. अदत्वा हान तोजो अघ कहिये । चोथो मिथुन विषाद। सुगुणा पाम पर परहरिये । पाप पंक पर हरिये दिलसुं ।। बोसिरावै अध भार । इहविधि निज आतम निस्तार ।। सु० ॥१॥ पञ्चम पाप परिग्रह ममता । क्रोध मान माया लोभः॥ दशमो राग इकाद- शमो फुन । द्वेष करै चित क्षोभ ॥ सु०॥२॥ वारमो कहल अभ्याष्यांन तेरम । ते पर शिर आल विषाद। चवदमो पिशुन तिको खाय चुगली। पनरमा पर परिवाद ।। सु० ॥३॥ जेह असंयम में रति पामे। अरति संयम रै मांय ।। रति अरति ए पाप सोलमो। दाख्यो श्री जिनगय | सु ४॥ सेतरमो कपट परसू परना मैववाद पोले ।' अने समभाव सू के जिसी बस्तु भोलखावे ले परे परिवाद पानहीं।
- शोभे रह्या। ते देव जिनेन्द्र सु पार्य हो । मुभा शरणी मुझ शरणो थावो। मरिहंत नो, सुख करणं भव तरणं शरण भगवंत मो ॥१॥ च्यार कषाय सनी तिणे । चिहुं दिशी मुख दीसंत हो ॥ तसु अति- भय वर भतिशय श्री जिनराजना। चिहुविधौ धर्म कथा कही । करै चिहु गति दुःखनो अंत हो । मुझ शरणो २ एहवा मरिहत नो । मुख करणं भव तरणं शरण भगवंतनो ।मु०॥२॥ दग्ध बीज जिम तरु तणो। अंकुर प्रकट न होयहो ॥ तिम स्वामी तिम० कर्म बौन दग्धही। भव अंकुर प्रकट हुवै नहौं। तिणसुं भाहत कहिये सोयहो ।। मुझ शरणी २ थावी भरु- हंतनो। शिववरणं भव तरण शरण भगवंतनो ।मु०॥३॥ अंतरंग परि जीपये करि। परिहत कहिये तासहो। मुझ शरमो मुझ शरण थावो ते परिहंत नो । पूनम जोग्य विण जगतने ॥ वाम महंत कहिये विमास हो मुझ शरणो मुझ शरण यावो ते महंत नी सुखकरणं शिव वरण शरण भगवंतनो मु०॥४॥ टुलंध्य संसार समुद्र तिरी । लिके शिव सुख पाम्या सारहो ।। भविनासी २ लही गति पञ्चमी। सुख प्रातमीक पति भीमता। रद्या आवागमण निवारहो ॥ मुझ शरणं मुझ शरण घावो ते सिद्धां तणी । सुख शाश्वत सुख. २ सुर थी
.
%3D
शोभता।
पञ्चमं गतिः अनुक्त पिछागाहो ॥ मुं० ॥ ११ ॥ छोड्या
सर्व संग स्त्रियादिक तणां । ज्यारे शनु ने 'मित्र
समानहो ॥ गामणी. सम २: सुख. दुःख सस बली ।
ज्यारे निन्दा प्रशंसा समानही
सम मान अने
अपमानहो ॥ मु० ॥ १२ ॥ सप्तबोस गुणे करौ
समता दमता निश दोहहो ॥ श्रुद्ध
किरिया २ मुक्ति पन्थ साधता डरिया नरक
निर्माद ना दुःख धको ॥
मुनि लोमै नही
जिन लिहहो ॥ मु० ॥ १३ ॥ केवलज्ञानी परूपियो।
बारू तेहिज धर्म विचारहो
॥ हितकारी सुखकारी
मुगति तेघौ लहै। बले दुर्गति पड़ता जौवनें ।
धार राखे ते धर्म उदारहो ॥ मुझ० मुझ शरण
जिनाजा धर्मनो । भवतरण भवतरण बरण शिव शर्मनी
॥ १४॥ वौस भेद मंबर तगा। बले. निर्जरा ना
भेद बारहो। जिन आगो २ जि० विषै ए सर्वहौ।
कम रुकै कटै तेहथौ ॥ आख्यो तेहिज धर्म उदारहो
॥ मु०॥ १५॥ सूत्र धर्म प्रभु भाखियो। बलि चारित
धर्म उदार हो॥ हलुकर्मों २ जीव तमु ओलदै ।.ए
दोनूं ही जिन अाना मझे ॥ तिणस्युं धर्म कहीजे
सारहो ॥ मु०॥ १६ ॥ संयमनें तप शोभता । बर
जम थौ सकै कर्म हो॥ तप सेती २ वंधै अध
-
( १०५ ) ॥ ६ ॥ यन्त्र घरटी ऊखल । मूसल घाणो आदि । कौधा ने कराव्या। ते निन्दु तज व्याधि ॥ ७ ॥ बलि कुटम्ब पोष्या। दियो कुपात्रे दान ॥ सहु साख निन्दु । पाप हेतु पहिछान ॥ ८ ॥ इत्यादिक दुकृत । विहुं जोगे करि कौध ॥ वेहनौ करै निन्दा । ए छट्ठो हार प्रसिद्ध । ॥ इति छट्ठो हारम् ॥ ॥दोहा॥ दुकृत नौ निन्दा कहौ, छट्ठा द्वार मझार । हवै सुकृत अनुमोदना, दाखू सप्तम द्वार ॥ ॥ ढाल ७॥ (प्रभवो मन में चितवै, सोता सती सुत जनमिया एदेशी) जान दर्शण चारित तप भला । भव दधि मांहीं जिहाज ॥ सम्यक् प्रकार सेविया । ते अनुमोदूं आज ॥१॥ अरिहंत सिद्ध में आयरिया । उवझाया अण- गार ॥ तसु नमस्कार बंदना करौ। ते अनुमोटुं मार ॥ २ ॥ सामायिकादिक जे भला । छउं पाव- म्यक सार उद्यम तेह विष कियो । अनुमोढुं इहवार ॥३॥ सूत्र सझाय कौधौ वलो । ध्यायो वारू ध्यान ।
( १०७ ) मिण पन्य जन नहीं। दूम करै विचारगरे ॥ भावै भावना ।। १॥ पूरव कृत अघ जे। भोगवियां मु- काईरे ॥ पिण वैद्यां विनां। नहीं छुटको थाईरे । भा० ॥ २ ॥ जे नरक विष म्हैं। दुःख सह्यो धनंतोरे ॥ तो ए मनुष्य नो । किञ्चित दुःख हुँतोरे ॥ भा० ॥३॥जे समकित विगा म्हैं। चारित्र नी किरि. यारे ।। बार अनंत करौ। पिण काज न सरिया रे ॥ मा० ॥ ४ ॥ हिव समकित चारिख । दोनुं गुण मायोरे ॥ वेदन सम पणे । सह्यां लाभ सवायोरे ॥भा. ॥ ५ ॥ श्रोतो अल्प काल में। तूटे अघ जालोरे ।। भगवती सूवमें। कच्च् परम कृपालोरे ॥ भा० ॥ ६ ॥ 'सूको त्रिगा पूलो । जिम अग्नि विषेहो रे ॥ शीघ्र भस्म हुवै। तिम कर्म दहेहोरे ॥ भा० ॥ ७॥ जिम सप्त तवै जल । बिंदु विललावैरे ॥ तिस दुःख समचित्ते सह्या। अघ क्षय घावैरे ॥ मो० ॥८॥ दुःख अल्प काल में। मुनि गनसुकमालो रे । सम भावे कगै। लही शिव पट्ट शालोरे ॥ भा० ॥६॥ अति तीब्र वेदना । बहु वर्ष विचारोरे । सही शिव संचम्या । चको सनतकुामोरोरे ॥ भा० ॥ १० ॥ जिन कल्पिक साधु । लियै कष्ट उदौरोरे ॥ तो आव्यां उदय । किम थाय अधौगेरे ॥ भा० ॥ ११॥ सही चरम जिनेश्वर ।
में राम थावरे ॥ तो अघ संचो हुवे। अधिको दुःख
पावैरे ॥ भा० ॥ २३ ॥ नर इन्द सुरिन्द ना। काम
भोग कंटालार ॥ तसु बांछा कियां । दुःख परम पया-
लार ।। भा०॥ २४ ॥ तिणसुमुनि बेदन सहै। शिव-
सुख
कामौर
॥
धर्म शुकल भलो।
ध्यावै चित्त धामोरे
॥ भा० ॥ २५ ॥ बहु कर्म निर्जरा। तिण ऊपर
दृष्टिरे ॥ राखै महामुनि । समता अति श्रेष्टौरे ॥भा०॥
२६ ॥ खजनादिक ऊपर। छांडे स्नेह पाशारे ॥
अति निर्मल चिते । शिवपुर नौ आशारे । भा०॥२७॥
संग स्त्रियादिक ना जाणे भुयग समागणारे ॥ समभावे
रहै। मुनिवर महा स्याणारे ॥ भा० २८ ॥ क्रोधादिक
टालौ। सम भावन सारो रे ॥ दृढ़ चित्त करि धरै।
ए अष्टम हारोरे ॥ भा० ॥ २६ ॥
॥ इति अष्टम द्वारम् ॥
anane
॥दोहा॥
अष्टम द्वारे भावना,
आखी अधिक उदार।
नवमा हार विषै हिवै, अगसण नो अधिकार ॥१॥
सिद्ध ॥ १०॥६॥ तौसक मुनिवर ने भलो । मास संथारी न्हाल ॥ सामानिक थयो शक नो। अष्ट वर्ष चरण पाल ॥ ध० ॥ १० ॥ कुरुदत्त चरण छमास हो। अठम २ तप जागा ॥ संथारो अईमास नो। पाम्यो कल्प ईशान ॥ ध० ॥ ११॥ मदन संव' महिमा निलो। वली अनिरुद्ध कुमार ॥ अधिक हर्ष अणसण करी। पोहता मोक्ष मझार ॥ ध० ॥ १२ ॥ पाळु अग्रमहे- षियां। कृष्णा तगौ चरण धार॥ अति तप करी अगा- सा ग्रही। पहुँती मोक्ष मार ॥ ध० ॥ १३ ॥ नंदा- दिक तेरै वलौ। नृप श्रेणिक नौ नार ।। चरण ग्रहो भणसण करी। पामी शिव सुख सार ॥ ध० ॥ १४ ॥ इत्यादिक मुनि महा सती। याद करै मन मांय ॥ भूख ढषादिक पौड़िया। दृढ़ चित्त अधिक सवाय ॥ ध० ॥१५॥ शूर चढे संग्राम में । तिम मुनि भणसण मांय ॥ कर्म रिपु हणवा भणो। शूरवीर अधिकाय ॥ ध• ॥ १६ ॥ जन्म मरण दुःख थी डया । शिव सुख बांछा सार ॥ ते अणसण मे सैंठा रहै । ए का नवमुं द्वार॥ध. ॥ १७॥. । इति नवम बारम् ॥
( १९३ ) देवा । कियो कनक सिंघासण तनखेवा ॥ ऊपर अमर कुमर प्रति वैसार। इ० ॥८॥ नवकार मंत्र सेठ संभलायो । सुण जाप जप्यो तिण सुखदायो॥ लह्यो मावत सुर नो अवतार ॥ इ० ॥६॥ वाल बछड़ा चरावतो जिह वोरं । नदौ पूर बायां गुण्यो नवकारं ॥ थई ततक्षिण सरिता दोय डारं ॥ दु० ॥ १० ॥ सेठ समुद्र में डूबतो । नवकार गुण्यो घर चित्त शांतो।। सुर जिहाज उठाय म्ह लौ पारं । दू० ॥ ११ ॥ तो चारित्र सहित जौको नाणी। पञ्च परमेष्टौ ओलख जपे जागी ।। तो स्युं कहिये तसु फल सारं ॥ इ० ॥ १२॥ शुद्ध एकाग्र चित्त तन मन सेती। पार पुगावै निपजाई खतौ ॥ ध्यान सुधारस दिल धारं ।। दू० ॥ १३ ॥ ओ तो चरण अमोलक कर बायो। पद आराधक जे मुनि पायो । करै सर्व टुखा रो छुटकारं ।।इ०॥ १४ ॥ मरणांत आराधनां दूह रौतं । करै दश विधि तन मन धर प्रोतं ॥ ते संसार समुद्र तिरै पारं ।।इ० ॥१५॥संवत उगणीसे वर्ष पणतीसं। रची जोड़ श्रावण विद छ? दिवसं ॥ पायो शहर बीदासर सुखसारं ॥ इ॥१६॥ भिक्षु भारौमाल गणि ऋषिरायो । शुद्ध तास प्रसाद सुख पायो । बाम जय जश सम्पति जयकारं॥ दूम ॥११॥ ॥ इति भाराधना री १० दाल सम्पूर्णम् ॥
. ( ११५ ). ब्रतो, पले भारंभौ भणारंभी आयो। ते ब्रा आश्री तो अणारंभी आर्य, ते मुक्तरो मारग निर्मल ठाणो॥ आ॥ ४ ॥ ए दोनूई स्थानक जू जवा छै, ते धर्म अधर्म दीयां मे तायो। साध श्रावक नत आश्री धर्म आर्य, असंजतौ अबत मात्रौ अधर्म मांयो॥ आ॥५॥ अधर्म पक्ष ने अनार्य कयो छै, मिण सम्यक्त निर्जरा अधर्म नाही । ज्यूं श्रावक ने धर्म भार्य कह्यो छ, मिण अबत नहौ धर्म आर्य मांहो । आ॥ ६ ॥ जिन आता लोपी याप रै छांदै चाले, विण ने जान-रहित कह्यो भग- वंत। आचारांग टूजा अध्ययन रे छठे उदेशै, तो आत्ता बारै धर्म काहै नहीं संत ॥ आ॥७॥ केवली आचयो ते छद्मसत आचरै, केवलौ भणाचयो ते आचरै नाही, आचारांग दूजा अध्ये न रे छ? उदेशै, ए दोयां रो एक आचार छै ताही ॥ आ॥८॥ वीर कह्यो आज्ञा माहिलो धर्म मांहरो, ओजा बारै बोल वोलवो युत्तो नांही। ए उतकाष्टी चरचा काही प्राचा- रगे,छ? अध्यन टूजा उदेशा माहौं ॥८॥ प्राण भूत जीव ने दुख नही देणो. ए तीन काल रा तीर्थकर नी ए सुध धर्म पाचारंग चौथे, पहिला उदेशा सूं लोज्यो पिछाणौ ॥ आ॥ १० ॥ प्रमादौ द्रव्यलिंगी पासत्यादिक, सगला छै जिणाज्ञा वारै। चौथे वाणो।
पाचारंग पांचमांध्ये न रे छठे उदेशै, तो जिन- श्राजा
ने लौजो आराध ॥ आ ॥ १८॥ उन्मार्ग खोटो सर्वधा
छाडू, मुक्ति मारग ने करू अंगीकारो। चौथा अध्येन
यावसग रे माहौ, साधां छोयो ते जिगा वाजा बारो॥
पा॥ १६ ॥ ठागा अंग सूत्र रे नवसे ठाणे, नव
प्रकारे
पुन्य
समचे बतायो। पिण असंजती ने दोधां
पुन्य नांहो, तिगरो थे न्याय मुणो चित्तलायो । आ॥
२० ॥ असंजती ने निरदोषण दौधां, एकंत पाप भग:
वतौ रे मांद्यो। पाठमां शतक रे छठे उदेश, पुन्य
कहै ते तो खूसावायो ॥ आ॥ २१ ॥ अन्चतीर्थों ने
च्यार आहार देवारा,आणन्दनौ सूंस किया जिन आगे।
उपासकदशा रे पहिले अध्येने, तो तिण ने दोधां पुन्य
किसी पर लागै ॥ पा ॥ २२ ॥ पात्र ने देवे कुपात्र ने
देव, ए चौरंगी कही ठाणाङ्ग मांय । चौथे ठाणे-
कुपात्र कुक्षेत्र कह्या छ, तिण ने पौष्यां सू पुन्य किसी
पर थाय ॥ आ॥ २३ ॥ अन्यतीर्थों गृहस्त ने देवो
छोयो, ते ससार भिमवा नो हेतु जाणौ। सूयगडा
अंग ने नवमाध्येन, तेवीसमौ गाथा वीर वखागी ।
आ ॥ २४ ॥ उत्तराध्य न चबदमारी बारमी गाथा,
भगु मोहित गे वेटा वोल्या विमासी। विन जीमायां
तमतमा जावै, तो पुन्य वाहै ते घणो दुःख पासौ ॥
1-
ने खून ( ११६ ) कौधा, तिण ने चोर कह्यो ? दशमा अंगे। तिगाने . अन पोगो देवै ते पिण चोर. तौजे अध्ये न जोबो मन- रंगे ॥ आ॥ ३३ ॥ सचित खवायां उत्कृष्टे भांग, च्यार चोरी ठाणाअंग अर्थ मांय । तो वौर नौ प्राजा विण । सरब चोरी छ, पहिले ठोणा में भोख्यो जिनराय ॥ आ ॥ ३४ ॥ लोकिक गे दान माठो जागो छोडवो, निरवद्य दान परूपयो सार। आचारग छठाध्ये न रे पांचमै उदेश, वर्तमान मौन साझ अगागोर ॥ आ ॥ ३५ ॥ देता लेता इसी वर्तमान देखी, साधु कहौ तिण कालो। सूगडाभंग इकवीसमध्ये न, छत्तौसमी गाथा जोय संभालो ॥ प्रा० ॥ ३६ ॥ सावद्य दान प्रसंथ्या छःकाय रौ हिंसा, वर्तमानकाल निषेध्यां अंतराय । सूयगड़ानंग रै दृग्यारमाध्ये ने,बौसमी गाथा भाखौ जिनराय ॥ आ० ॥ ३७॥ ठाणा अंगसूत्र रे दशमै ठाणे, दश शास्त्रों में अव्रत शस्त्र जागो। ते. शस्त्र तीखो कियां पुन्य परूपै, त्यांने पुन्य धर्म, रौ नही छै पिछाणरे ॥ आ॥ ३८॥ कर्मा ने मुकावा ने जीव हणे ते, नरक तणा' फल पोमै विशेष । तो धर्म हेते जीव हणे तो, आचारंग दूजाध्ये न रे दूजे उदेश ॥ आ ॥ ३६ ॥ जन्म मरण मुकावाने जीव हणे तो, सम- कित जावै ने आवै मिथ्यान। आचारंग 'पहिला
। १२१ )
देखौ ने पूछ्यो, हगा वावगा दियो अपान दान । विपाक
रे पहिते अध्यन गौतम पूछ्यो, तिणरा सांप्रत पाल
भोगवै छै अज्ञान ॥ आ० ॥ ४८॥ धर्स ना अवगुगा
अधर्म ना गुगा बोले, निशीथ इग्यारमें दंड चौमासौ।
शाजा मांहि पाप पाजा बारै धर्म कहै ते, चिहुं गति
माहिं घणो दुख पासो ॥ आ० ॥ ४६॥ जिण आता
मिले तिम तिम धर्म कहो, सूयगडाअंग रे चवदमा
मांय । सतावौसमी गाथा श्री जिण भाषौ, आज्ञा बारे
धर्स न कहै मुनिराय ॥ आ० ॥ ५० ॥ वारै ब्रत पा-
दया ते पहिलो विसरामो, १ सामाई २ पोसो ३ ने
करै संथारो ४ ए च्यार विधामा ठाणा अंग चौथे, पिण
आजा विण धर्म नहीं है लिगार ॥ प्रा० ॥ ५१॥ तौन
चाल्या श्रावक रा मनोरथ, ठाणा अंग सून रे तौजै
ठाणे । परिग्रह छाड री भावना भावे, पिण धन दोधां
मे पुन्य अज्ञानौ ताणे ॥ आ० ॥ ५२ ॥ दश दान सह्या
ठाणा अंग दशसे, दश धर्स कह्या तिणरौ कीजै पि-
छाण । दश स्थविर कह्या ते पिम ओलख लेणा, यांने
न्याग न्यारा औलखै बुद्धिवान ॥ आ० ॥ ५३ ॥ हिरया
करो जागौ ने झूठ बोले, साधु ने असणादिक अशुद्ध
वहिरावै । भगवती पांचने शतक रे छठे उद्देशै, जिगा
कह्यो अल्प आउपो बंधावै ॥ प्रा० ॥ ५४ ॥ अफासु
देखी ने पूछ्यो, दूग वावंगा दियो जपान दान । विपाका
हे पहिले अध्ये न गौतम पूच्यो, तिणरा सांप्रत माल
भोगवै छै अज्ञान ।। बा० ॥४८॥ धर्स ना अवगुगा
अधर्म ना सुण बोले, निशीथ इग्यारमें दंड चौमासौ।
थाज्ञा मांहि पाप बाजा बारै धर्म कहै ते, चिहुं गति
माहिं घणो दुख पासी ॥ आ० ॥ ६॥ जिण आज्ञा
मिले तिम तिम धर्म कहणो, सूयगडाग रे चवदमा
मांय । सतावौसमी गाथा श्री जिण भाषौ, आजा नारै
धर्म न कहै मुनिराय ॥ आ० ॥ ५० ॥ वारै ब्रत बा-
दया ते पहिलो विसरामो, १ सामाई २ पोसो ३ ने
करै संथारो ४ ए च्यार विश्रामा ठाणा अंग चौथे, पिय
चाजा विण धर्म नहीं है लिगार ॥ पा० ॥ ५१ ॥ तीन
चाल्या श्रावक रा मनोरथ, ठाणा अंग सूत्र रे तो
ठाणे । परिग्रह छाड री भावना भावे, पिण धन दीधा
से पुन्य अज्ञानी ताणे ।। या० ॥ ५२ ॥ दश दान कह्या
ठाणा अंग दशमें, दश धर्म कह्या तिणरी 'कीजै पि-
छागा । दश स्थविर कह्या ते पिण ओलख लेणा, यांने
न्यारा न्यारा औलखै बुद्धिवान ॥ मा० ॥ ५३ ॥ हिस्सा
करौ जाणो ने झूठ बोले, साधु ने असणादिक अशुद्ध
वहिरावै । भगवती पांचले शतक रे छठे उद्देशै, जिण
नयो अल्प आउषो बंधावै ॥ त्रा० ॥ ५४॥ अफासु
,
- दोहा। हिवे निर्वद्य करणी मोलखायवा, संक्षेप कह विस्तार । ते करणी करतां पुन्य नीपजे, पिण साक्य सूं नही पुन्य लिगाम जिण भागन्यां माहिली करणी करै, शुभ जोग व तिणवार। तिहां फर्म फट पुन्य नीपज, देखो सिद्धांत मझार ॥२॥ फेई अज्ञानी इम फहै , आशा धारली फरणी तूं पुन्य । त्यांने खबर नहीं जिण धर्मनी, त्यांरी जायक बात जवून्य । ३२ कर्म बंध जीवरे, ते आज्ञा माहिली फरणी सू जाण । ठाम ठाम सिद्धांत में जिण कह्यो, ते सुणज्यो सुमता बाण मटर ॥ ढाल २ जी॥ भवियण जिण आशा सुखकारी॥ए देशी॥ साधु ने सूझता च्यासं माहार बहिरावै, तो एकंत निर्जरा जारठ। भगवती पाठमें शतक छठे उदेशै, शुद्ध निर्वद्य करगी पिछाण रे ॥ भवियण जोवो रे हृदय विचारी ॥ या निरवद्य करगी सुखकारौ रे भवियण, तिण सूं पामै भवपारौ ॥ १ ॥ हिंस्या झूठ दोन न सेवै, साधां ने शुद्ध आहार वहिरावै। भगवती पांचमें शतक छ? उदेशै, दीर्घ भाउखो बंधावै रे ॥ भवि ॥ २॥ बले साधां ने वंदणा नमस्कार करौ ने, मनोगम शुद्ध आहार वहिरावै । भगवती पांच में शतक छठे उदेश, शुभ लांबो आउखो बंधावे रे ॥ भवि ॥ ३ ॥ वंदगा कर नौच गोत्र खपावै, ऊंच गोत्र कर्म वधायो।
( १२५ ) । भवि ॥ ११ ॥ गृहस्व रौ व्यावच करै करावे, करै तेगा ने भलो जागो तायो। निशीथ रे इग्यारमें उदेश, चौमासौ प्रायश्चित प्रायोरे ॥ भवि ॥ १२॥ विगने नलो जाणै तो हौ डड कह्यो छै, तो पुन्य कहै किण न्याय । ए सावध काम संसार नो मारग, तिण में श्री जिण आता नांयरे ॥ भवि ॥ १३ ॥ बलौ सातमा श- तक रे दशमें उदेशे, अठारै माप सेव्या सूं पाप । अ- ठारै पाप न सेव्या सू पुन्य बंधे, ओ कह्यो जिणेश्वर आप रे ॥ भवि ॥ १४ ॥ ठाणाअंग रे दशमे ठाणे, दश बोल थको पुन्य बंधे, त्यां दशाई वोलां रौ श्री निण अाज्ञा, इम भाख्यो वीर जिणंद रे ॥ भवि ॥ १५ ॥ भगवती सातमे शतक रे छठे उदेशै, अठारै पाप न सबै कोय । तिण रे अकरकश वेदनौ कर्म बंधै के, संध्यां करकश वेदनौ होय रे ॥ भवि ॥ १६ ॥ तौथैकर नास कम बधै वौस बोला, ज्ञाता आठमाध्य न माह्यो। ते महावल अणगार सेव्या ?, तिण तूं घया तीर्थंकर ताद्यो रे ॥ भवि ॥ १७॥ तिण मे सतरमो वोल समा- हिय भाख्यो, दूण वोल ने लौनो आराध । गुरुरो कार्य करौ समाधि उपजावै, बले ज्ञानादि भाव समाध रे ॥ भवि ॥ १८॥ कोई कहै सगला जीवां ने, द्रव्य साता उमजावै । श्रावक ने असणादिक खवावै, तो तीर्थंक- ( १२७ ) कह्यो बंध । भगवती सातमें शतक रे छठे उदेप्रो, गरौ पिण आजा देवै जिणंदरे ॥ भवि ॥ २७ ॥ भग. वतो आठौं शतक रे नवमें उदेश, आठ वार्म बधगा रो न्याय । तिगमें पाठांई पाप कर्म गै करणी, माठी कही जिनगय रे ॥ भवि ॥ २८॥ वेदनी आउखी नास गोत ए च्यारू, शुभ कर्म तणो शुद्ध करणी। निरवद्य ने आजा सांह कही है, तिगा जौवने आदरणौ रे ।। भवि ॥ २६ ॥ कोई कहै साधु आहार का नौंद लेवे, वले भोगवै उपधि अनेक । त्यांने आता है तोहि पाप बंधै छै, इस बोलै ते विना विवेक रे ॥ अवि ॥ ३० ॥ कोई कहै पच प्रमाद कह्या के, निद्गा लेवे ते प्रसाद माय । इस कही बाजा मान्हें पाप थामै छै, तिगारो जाब सुगो चितलाय रे ॥ भवि ॥ ३१ ॥ निद्रा प्रमाद माहें ते तो भाव निद्रा, द्रव्य निद्रा प्रमाद नांय । मिध्यात अज्ञान रूप मोह वाम उदा सं, भाव निद्रा कहो जिणराय रे ॥ भवि ॥ ३२॥ आचारला तीजा- ध्यन रे पहिले उदेशै, द्रव्य भाव निद्रा कही दोय । मिथ्यादृष्टि भाव निद्रा से सूता, साधु, सदा जागता सोयरे ॥ भवि ॥ ३३ ॥ द्रव्य निद्रा दर्शगावर्गी कर्म उदै सू, तिण सूं पाप न वधै कोय। पाप बंधै एक मोह कर्म उदै तूं, अवरां सं पाप न होय रे ॥भवि ॥
H (१२६ १२६ ) भाखो। सुध लेवै देवे ते सुध गति जावे, ते दशवें- कालिक साखी रे॥ भवि॥ ४२ ॥ भगवती पहिले शतक रे नवमें उदेश, आहार करतां तोड़े सात कम। बलि कयो सातमा शतक रे पहिले उदेश, पाहार करै चलावाने धर्म रे॥ मवि ॥ ४३ ।। साधु आहार करै संजम यावा निभावा, बले करणो कह्यो ठंटो आहार। उत्तराध्येने रे आठमें भाख्यो, इग्यारमी बारमी गाथा सार२॥ भवि ॥ ४४ ।। सूळ रहित संजम यात्रा निभावा, साधु ने करणो आहार । उत्तरा- ध्येन पैंतीसमें सतरमो गाथा, पिण प्रमाद न कयो लिगार रे ॥ भवि ॥ ४५ ॥ आचारंग तीजा ध्येन रे टूने उदेश, संजम पोलवा करणो आहार। प्रमाद सूं तो संजम यावा विणसै छै, बले हुवै संजम रो बिगार रे॥ भवि ॥ ४६॥ ठाणामंग रे नवमें ठाणे, पहिला छेहला तीर्थंकर रो धर्म। मानीपत उपधि ने पांच महाबत, तिल सूं लागे नहीं पाप कर्म रे ॥ भवि ।। ४७ ॥ साधु ने परिग्रह रहित कयो छै, धर्म उपधि ने परिग्रह कयो नाहौं। दशमा मंग रे दशमें मध्येने, पिण पाप नहीं तिण माहौं २॥ भवि॥ ४६॥राग- हेष रहित उपधि भोगवै,तिण ने परिग्रह कयो नाहीं। दशमाअंग रे दशमध्ये ने, परिग्रह कहै ते मूरख माहौँ कयो है, पिण नहीं सावा माहौं रे । भवि ॥ ५७ ॥ प्रमाद र फल तो कडुवा कहा है, प्रमाद में जिन. पाता नाय । बले फवल जानी पिला आहार करै छै, से तो अपमादी जिनराय रे ॥ भवि ॥ ५८ । संजम से गुणा तो कर्म रोलवा रो, तपस्या सुं कर्म मोदा पार । उत्तराध्य ने गुगतोस में पाख्यो, सताबीसमा बोल मझार रे ॥ भवि५८ उपधि तणा पचखाम कियां सूं सभाष नो पलिमंथ न घाय। उत्तराध्य न गुणतोस में ध्येने, चौतोसमा बोल माय रे भविस ६० ॥ उ- पधि पडिलेहतां समायनो पलिमंथ, तिणसं पाम न लागै कोय । पडिलेहमा करै जब पडिलेहता रो धर्म, ससाय से धर्म न होय रे ॥ भवि ६१ ॥ ज्य आहार करै ते प्रमाद तपस्या रो, तिम्स तूं पाप न लागै कोय। थाहार करै ति वेलां धर्म माहार गे,पिग तपस्या से धर्म न होय रे भवि ६२ पडिलेपणा करै ते समाय नो पलिमंथ, पिन तिण ने सावध कहिले नाही! पलिमंथ रो नाम मुणी ने, न थापणो सावदा माहौं रे १ मवि । ६३ ॥ ज्य आहार करै ते तो प्रमाद तपरो, पिख सावध नहीं ले लिगार। तपस्या तमो प्रमोद सुगी ने योलमो नहीं विना विचार रे ॥ भवि ॥ ६४ । ठाणायंग रे पांच में ठाणे, पांच अचेल याह्या परिस्त ( १३ ) कचा जिनराय के। झीणो ज्ञान जिनराज नो॥ १॥ सिंह बाघ हिंसक जीव देखने, मार न कहिणो तिण सू द्वेष भाण के। मत मार न कहिणी राग भागने, सूयगडाअंग एकवीसमें पिछाण के॥२॥ दश बांछा करवी नहीं, दशमें ठाणे ठाणाभंग मांय के। तिणमें जीवगो मरणो न बांछणो, तो पारको किम वांछ मुनि- राय के । ३ ॥ वाल अन्जानी बांछे घणो नौवणो, से पंडित नहीं वांछ ताम के। प्राचारंगध्ये ने पांचमें, पहिले उदेशे प्रभु कह्यो पाम के ॥ ४ ॥ दशमें पध्ये न सूयगडाभंग में, चौवौसमी गाथा रे मांय के। साधु जीवग्मो मरणो बांछे नहीं, ते पसंजम जीतव्य वाल मरण के ताय कै ॥५॥ सूयगडाचंग रे तेरमें, वौसमी गाथा में विस्तार के। जीवणो मरणो न वाद साधजी ए पिण असंजम जीतव्य धार कै ॥६॥ असंजम जीतव्य उपरांठो करे, तिणने आदर नहीं देवै अणगार के। सूयगडाअंग रे पनरमे, दशमी गाथा रो करी विचार कै॥७॥ असंजम जौतव्य नही वांछणो, बाल मरण न बांछे धौर कै । सूयगडाचंगध्ये ने तीसरे, टूजै उदेश कयो महावीर के ॥ ८॥ वाल अज्ञानी जीवड़ा, असं- जम जीतव्य ना अर्थी जाण के। सूयगडाअंग रे पांच- मे, पहिले उदेशै तीजी गाथा पिछाण के ॥ ६ ॥ साधु ।
( १३५ ). सी, तावडो, कलह, उपद्रव रहित मुकाल क। ए साधु ने महौं वांछणा, दशवकालिक सातमें संभाल कै ॥ नौ ॥ १८ ॥ ॥ केई भेषधारी दूसड़ी कहै, म्हे दरा ने बचावां मिनको ने हसाय कती उपद्रव रहित नहीं बांणो, तो उपद्रव सहित किम करणी जाय के ॥जी॥१६॥ टूजै आचारंग ध्ये न दूसरे, पहिले उदेशे गृहस्थ लड़े मांहों मांय के। तो मार मतमार कहिणो नहीं, गग वेष करणो नहौ ताय के । जी। २० ॥ दूजै प्राचारंगध्ये न दूसरे, पहिले उदेशी ग.. इस्थ हण तेजसाय के। ती पम्नि लगावा रोक- हिणो नहीं, बुझावा रो पिण न कहै मुनिराय के ॥जी॥ २१॥ सूयगड़ाग श्रुतखंध दूसरे, छठे भ. ध्ये ने कह्यो यार्द्र कुमार के। वौर धर्म कहै कर्म काटवा, वलि अनेरा ना तारण हार के ॥ २२ ॥ 3. पदेश देई समझावणी, आ पैला गै अणुकंपा जागा के। चौथे ठाणे ठाणाअंग में, ए चउभंगी 'लोज्यो पि- छाण के । ॥ २३ ॥ हरणगवेषी देवता, देवकी रा पुत्रा ने म्ह ल्या भागा के । मुलसांरी मणुक मा मामने, अंतगढ़ सूत्र में जिन बाण के ॥ २४॥ ईट उपाड़ी, कृष्ण जौ, तिण पुरुष तगी अणुक पा माण के । मंस गढ़ सूत्र माहें कयो, ए पिण सावध माहे बाण के । , -- -- -- -
रेमाह
भगवती मांह कै॥ ३३ ॥ ए सावज अगाकंपा कही,
तिगरी आता नही दे जिनराय के। हिवै निरवद्य
अणुकंपा कहू, ते सांभलज्यो भवियण चित्तल्याय के
॥ ३४ ॥ सुसला प्राण भूत जीव नौ. हाथौ अणुकंपा कर
कियो प्रत ससार के। ज्ञाता रा पहिला अध्येन में, ते
मग्ने हुवो के मेधकुमार के ॥ ३५ ॥ चित्त कह्यो केशी
खाम ने, आप धर्म कहो तो प्रदेशौ रे गुण थाय के
घणा दौपद चौपद पशुपंखियां भणी, राय प्रसणी उपंग
के ॥ ३६ ॥ कोई कहै गुगा नौवां तगो, पिण
जोवारे तो भाव गुणा नहीं थाय के। भाव गुगा तो न
जौवां तणो, इण द्रव्य गुण सूं तो मोक्ष नही जाय के
॥ जौ ॥ ३७॥ नमोथुणं कह्यो आवसग सझ, तिण में
कयो संजस जौतव्य ना दातार कै। पिण असंनम
जौतव्य कह्यो नही, असंजम में नहीं धर्म लिगार कै॥
जौ ॥३८॥ समदपोल चोरने देखने, संनम लौधो वैराग
मन आण कै। उत्तराध्य न रे इकवीस में, पिण
ग्रथ देई न छोडायो जाण के ॥ जी ॥ ३६॥ गृहस्थ
मारग सुलो उजाड़ में, तिणने जो मारग बतावै मुनि-
राय के। निशोथ उदेशै तेरसे, चौमासी डंड कह्यो
जिनराय के॥ ४० ॥ भगवती शतक सात में, दश में
उदेशै कयो दीन दयाल के। घणो आरंभ अग्नि
।
( १३६ ) रेहलाणा सभार को । समत् अठारा असौये, बैशाख विद तौज शुक्रवार के ॥ ४६ ॥ दोहा। नव तत्व ओलख्या, पिना, सम्यक्त आच नाय । ठाम ठाम सिद्धात में जिनकह्यो, ते सुणज्यो चित्तलाय ॥१॥ ॥ ढाल ४ थी॥ (देशी-पालएड वधसी आर पचमे रे ) च्चार सघ कद्या ठागाअंग सूत्रसे रे, ते च्चालं हो गुगारनारौ खाण रे। त्यांग गुण ओलख ने निरणय करोरे, साचौ सरध्यां सूं सम्यक्त जागा रे ॥ नव तत्व ओलखियां विन समकित नहीं रे॥१॥ तौजे ॥ तौजै ठागौ ठाणा अंग सूत्र मे रे, पहिला ते भणवो नव तत्व जान रे। तपस्या ने ध्यान दोनें भणियां पछै रे, भणियां बिग निरफल तपस्या ध्यान रे ॥ २॥ उत्तराध्ययन अध्ययन अठावीससे रे, नव तत्व जाण्यां विमा सम्यक्त नाय रे । भावे करो सरध्यां सं समकितौ हुवै रे, पन- रमी गाथा कहो जिनराय रे ॥३॥ जान पहली ने दया पार कहौ रे, दशवेकालिक २ चौथे जाण रे। दशमी गाथा देखो दिल खोलने रे, जान विन सम्यता नही पिछाण रे ॥ ४ ॥ जीव भजौर दोन ही जागे
No text on this page.
रे पच- M (r ने (१४३ ) आवै ते कर्म छै रे, यां दोयां ने बुद्धिवन्त सरधो न्यार ॥ २७ ॥ उत्तराध्य न अध्यन गुणातौससे रे, खाण सं आसवहार संधाय रे । बलौ उत्तराध्य न गुण- तौसमें रे, ब्रतांरा छिद्र कद्या पासवहार रे । तिगहार माहे आवै ते कर्म है ये, यां दीयांने बुद्धिवन्त सम्धी न्चार ॥ २७॥ उत्तराध्ययन अध्ययन गुणतीममें रे, पचखाण सं आसवहार संधाय रे । वली उत्तराध्ययन गुणतोसमांध्ययनमें रे, अप्रशस्तदार आस्रव कह्यो ताय ॥ २८॥ उत्तराध्ययन अध्ययन तौसमें रे, पासव रुपौया नाला सोय रे। बलौ उत्तराध्ययन अध्ययन चौतीसमें रे, कृष्ण लेण्यारा लक्षगा आसव जोय रे ॥ २६ ॥ भाव लेण्याने तो कहै जौव छ रे, तो त्यांरा लक्षण किम हुवै अजीव रे । त्यां जौव अजीव दोनें नही ओलख्या रे, त्यांरे मोटौ मिथ्यात तणो के नौंव रे ॥ ३० ॥ छः भाव लेश्या संज्ञा दर्शण दिष्टने रे, यां ने अरूपी कह्या भगवती माय रे । बारमे शतक उदेशै पांचसे रे, कोई बुद्धिवन्त जोय विचारी न्याय रे ॥ ३१ ॥ प्राणातिपातमे वर्ते तेहने रे, भगवतीमें जीव कधी जगनाथ रे। सातमें शतक उदेश दूसरै रे, तिणने अजीव कहै ते जड़ मिथ्यात रे॥ ३२ ॥ प्राणातिपोत वेरमण तेहने रे, भगवतीमें ,
No text on this page.
( १४७ ) कल्यै साधु भयो, साधां काजे नहीं कौधा रे॥ ए मारग है साधु रो ॥ ७॥ टूजे श्रुतखंध आचारंग पध्ये न. टूसरे, छ? उदेशै तायो रे। एक काय हण्यां हिंसा छः कायरी, एक ब्रत भांगां छह जायो रे ॥८॥ अठारा ठाणा माहिलो, एक सेव्यां सूं भिष्ट थायो रे। दशवै.' कालिक छट्ठा ध्येन मे, सातमी गाथा मायो रे ॥६॥ आचारंग रे आठ में, पहिले उदेशै मायो रे। अकल्प तो लेवै तेहने, चोर कह्यो जिनरायो रे ॥ १० ॥ पूती- क्रम नो अंश भोगवे, तिणने कधो ग्रहस्थ भेषधारी रे। पहिला अध्येन सूयगड़ा अंग में, तौजा उदेशा मझा- रौरे ॥ ११ ॥ कारण अशुद्ध लेणो कहै, तिणने कयो वहुल संसारी रे । आचारंग छट्ठा ध्ये नमें, चौथे उदेशै विस्तारौ रे ॥ १२ ॥ शरीर छोड धर्म कारणे, पिण भाधाक्रम्यादि लेणी नाही रे। आचारंग छट्ठा ध्ये न मे, चौथा उदेशा मांही रे ॥ १३ ॥ पांचमा भारा रो नाम ले, दोष लगावै ते दुःख पासौ रे। प्राचारंग छट्टा ध्ये न मे, जोवो चौथो उदेशो विमासौ रे ॥ १४ ॥ क्रय विक्रय में वर्ते तेहने, कयो साधां तगी पांत वारो रे। उत्तराध्य न पैंतीसमे, देखौ करो निस्तारो रे ॥१५॥ अचित वस्तु मोन लिरावियां, चौमासी दण्ड पिछा- गोरी । निशीथ उदेशै उगणीसमे, तिणने निश्चेई ( १४६ ) गाढ कारण पडियां थकां, महिला पहोर रो आण्यो आहारो रे । छहले पहोर भोगवगो कह्यो, वृहत्कल्प मझारो रे ॥ २५ ॥ चौमामी प्रायश्चित वालो कारगा पद्यां, लियां दोष नही एमोरे। ते मासिक दण्ड नितपिण्ड तणो, ते कारण पड्यां लियां दोष केमोरे ॥ २६ ॥ वले मास कल्ये रहिणो शेषे कालमें, मिण कारण पद्यां दोष नाही रे। ज्यूं कारण पड्यां नित- पिण्ड लौये, तिण रो दोष नही दिसै काई रे ॥ २७ ॥ ए तो वो ढौला पड़ता जागने, तिणसूं कारण पयां दोष न कोयोरे, आधाक्रम्यांदिका कारण पडयां, लेणो नहीं है सोयोरे ॥ २८॥ ग्रहस्थ ने साता पृळियां, दशवकालिक में अणाचारो रे । तीजै अध्ये न गाथा तीसरी, तो साता वंशां न धर्म लिगारो रे॥ २६ ॥ ग्रहस्थरौ वियावच कियां, अठाबीसमो अणाचारो रे । दशवकालिक रे तीसरे, छट्ठौ गाथामे न्याय विचारो रे ॥ ३० ॥ ग्रहस्थने साधु कहै नहौ, भाव जाव वेस कर कामो रे। दशवकालिक सात मे, सेतालौसमी गाथा में तामोरे ॥ ३१ ॥ ज्ञान दर्शण चारित्र सहित छै, तिणने साधु कह्यो जिनरायो रे। ते पिण थोड़ा लोकमे, दशवैकालिक सातमां मांयो रे ॥ ३२ ॥ पहिले उदेशै वृहत्कल्प में, साधु ने रहिणो उघाड़े हारो रे।
रे . (१५१ ) पहिला ध्ययनमें, पांचमे उद्देशै पिछागो रे । कांटारी डालो अलगौ करो, आज्ञा मांग गृहस्थ घर जाणो ॥ ४२ ॥ साधु रहै तिहां श्रावक भगी, आधौ श्राखौ रात वसावै रे । निशीथ उद्देशै आठमे, चौमासी प्रायश्चित आवै रे ॥ ४३ ॥ जोरौदावे रहतां ने बरजे नही, तो पिण चौमासौ प्रायश्चित पावै रे। तौजो प्राय- वित जोरौ दावे रयां, तिण साथे बारै जावै पाको पावै रे । ॥ ४४ ॥ प्रमाण अधिको उपगरण धरै, तो चौमामी दण्ड पिछायो रे। निशीथ उद्देश सोलमे, गुणाचालौसमी बोल नाणो रे ॥ ४५ ॥ शंख दांत नहीं राखणो, काच मणि पाषाणो रे। प्रश्न व्याकरगा दशसे कहो, चशमो राखे ते सूद अयागो रे ॥ ४६ ॥ थोड़ोई उपधि पडिलेहै नहौं, तो मासिक प्रायश्चित आयो रे । दूजे उद्देशै निशीथ मे, छेहलो बोल कयो जिनरायो रे ॥४७॥, छतौ शक्ति कल्प स्यूं अधिका रहै, तो मासिक दण्ड विचारो रे। दूजा उद्देशा माहे कह्यो, सेतो- समो बोल सारो रे ॥४८॥ टूजै श्रुतखन्ध आचारङ्ग टूसरे, दूजे उद्देशे कह्यो भगवन्तो रे। तो कल्प लोपौ ने भधिको रहै, क्रिया लागै काला इकतो रे ॥ ४६ ॥ वस्तु बन्ध ग्रह्या पाट पाटला, ऋतु वन्ध जो देव नाहीं रे । मासिक दण्ड निशीथ मे, दूजा उदेशै माहौ रे ।
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
। (१६३ ) भेदन शोग। सूयगडाअंग अठारमें पाख्यो, चाल्होंगे पड़सौ विजोग रे ॥ कु० ॥ २ ॥ प्राचारंगरे चौथे अध्येन, दूजे उदेशै प्रमागो। धर्म हेत हण्या दोष नहीं कै, मा अनारजरौ पागोरे ॥ कु० ॥ ३ ॥ आचारंगरे चौथे अध्येन, दूजे उदेशै जानो। धर्म हेत कोई जौव नही हणनो, ओ पारज बचन प्रमाणोरे ।। कु० ॥ ४ ॥ जीव हरी जन्म मरगा मुकायवा, पामै अहेत अबोध । पाचारंगरे पहले अध्येन, पहले उदेशै शोघरे ॥ कु. १५॥ आचारंग रे चौथे अध्येन, पहलो उदेशो पिछागो । धर्म हेत जीव नहौं हसनो, तीन काल जिन बाणोरे ॥ कु० ॥ ६ ॥ प्रश्न व्याकरणरे पांच में अध्ये न, प्रतिमा परिग्रह में चाली। परिग्रह सेवी धर्म कहोने, कुमति हिये काई' घालौरे । कु. ॥ ७॥ तौन मनोरथ श्रावक ना चाल्या, ठाणांग तौजै ठायो। भारम्भ परिग्रह शेडण री भावना, ते सेव्यां धर्म किम जाग्रे । कु० ॥८॥ दशवैकालिक धर्म अहिंसा, दया ज्ञान रो सारो। सूयगडांग पहले अध्ययन, चौथे उदेशे मारो ॥ कु० ॥ ८ ॥ अठाइसमे उतराध्ययन में, मोक्ष नो मारग अमोल । थे देवगुरु धर्म मोलरा थापो, पाहिज मोटौ पोलरे ॥ कु० ॥१०॥ धर्म ठिकागो जौव हगो तो, दया किसो ठौड़ पालो। कुगुरां ना । द्रौपदी प्रतिमा पुजौ, एक थयां सम्यता पाई। गन्ध हस्त आचारज कयो छे, योधनियुक्ति हत्ति माई रे ॥ कु० ॥२०॥ अभवौ संगमादिक प्रतिमा पूजे, तेहिज प्रतिमा सूर्याभ पूजै ते जीतव्यवहार लौकिक रौत के, ओघ नियुक्ति हत्ति न सूझे रे ॥ कु० ॥ २१ ॥ भगवन्त ने वंदतां तथा दीक्षा लेता, कह्यो पेच्चा हियाए सुहाए ताय । तथा परलोक हियाए सुहाए, राय प्रसणी भगवती मां रे ॥ कु० ॥ २२ ॥ प्रतिमा पूज तया लाय धन काढतां, कह्यो पछा हियाए सुहाय । गय प्रसेगी भगवती माहि, विहां पच्चा पाठ कयो नहौरे ॥ कु० ॥ ॥ २३ ॥ प्रतिमा पूजे लाय सूं धन काढे, तिहां पञ्चा हियाए नहीं कांहो। भगवन्त ने वान्दतां दीक्षा लेतां, किहांई पच्छा पाठ के नाहौं २॥ कु० ॥ २४ ॥ पच्छा हियाए ते इणभव मांही, लौकिक खाते मंगलौक । पेच्चा हियाए ते परभव माहौ, लोकोत्तर खातो तह- तौकर ॥ कु • ॥ २५ ॥ कोई कहै जिन प्रतिमा पूजे, तेतो निस्साय पाठ मोक्ष जागो। तो खन्धक ने अधिकारे लाय तूं धन काढ़े, त्यां पिगण निस्साय पाठ पिछामोरे ॥ कु. ॥ २६ ॥ पच्छा पाठ लारे निसे. स्साय कयो , ते इगण भव मांहे द्रव्य मोन जोय । लाय थको धन बारै काट्यां, दरिद्र ते मुकावो होयरे 4 ( १६७ ) शास्त्र में कयो है, कुलथा मास ना भेद उदारे ॥ ॥ कु० ॥ ३५ ब्राह्मण रा मत महावीर न माने, पिगा त्यारै मतरी साख दिखाई। ज्यूं थाने प्रकरण रौ पिण साख बताई, भव जीव समभावगण ताईरे ॥कु०॥ ॥ ३६ ॥ मुख सूं कहै प्रकरण सहु मानां, तो इतरा वोल न मानो किरा लेखै। अभिन्तर अांख हिया गे फूटी, भाप भाख्यो सामो नही देखै रे ॥ कु ॥३७॥ बले मुख सूं कहै जिन आज्ञा मानां, पिण प्राज्ञा रो नहीं ठौक । आज्ञा रो नाम लेई झूठ बोले, ओ प्रत्यक्ष पाखण्डीकरे ॥ कु० ॥ ३८ ॥ सुर्याभ ने वांदन रौ भाजा, पिगण नाटकरी माजा नहीं दीध । मन माहिं नाटक ने नहीं अनुमोद्यो, रायप्रसेगी प्रमिवर ॥कु० ॥ ॥ ३९ ॥ वईमान जिण आगै नाटकरी, आजा न दौधौ तहतौक । तो प्रतिमा भागै आजा किम देसी, भो पिण आंधां ने नहीं छै ठोकरे ॥ कु० ॥ ४० ॥ आजा आजा कर रहा सूरख, भाजारा सूढ़ भजाण । भोला ने भरम मे पाड विगोया, ते पिण डूबै कर कर ताणरे ॥ कु० ॥ ४१ ॥ जिन आज्ञा माहिं धर्म कयो, जिन माजा बारै नहो अश। ए समयक्त रा सूल मूढ़ अजाण । हप रधा जीव निधंसरे ॥ कु० ॥ ४२ ॥ कही कही में कितरोयक कहू, भाजा दया एक । --- दाल ।। PA शिव घट जातां चोरटार, शंक कंख , दोयजी । खाम वचन ने साथे लियारे भाई पूज पचनने साथे लियां, थारै विक्ष कदे नहीं होय ॥ सुगणजन स्वाम पचन पवलोयजी । वाम वचन गै चासतारधागे सफल जमारो होय ॥ सु० ॥ १ ॥ परम आसता गणि तणोरे, समकित दीपक जोयजौ। सुध सरध्यां हुवे समगतौर भाई सुध० वैराग तेल समोय ॥ सु० ॥ २ ॥ भगवती गतक पचोसमे रे छ? उदेशै जोयजी। को नियंठा कहा जुवा जुवार भाई छ. चै तो छ? सू चवदमें होय ॥ सु० ॥ ३ ॥ पडिसेवी मूल उत्तर तणोरे, डांडे तूं सेन्या भगोय जौ। पुलाक नियंठो तसु कधोरे अ तो छ? गुणा ठाणे होय । सु० ॥ ४ ॥ पड़िसेवो उत्तर गुण तणोरे, बुक्कस बोजो जोयजी। जगन दोय से कोड़ सूं रे भाई ज०, पोछा कदे नहीं होय ॥ सु० ॥ ५ ॥ पडिसेवी मूल उत्तर तयोरे, पडि- सेवणा अवलोयजौ। च्यार से कोड़ अघन्य कद्यार भाई च्या०, त्यांरो विरहो कदी नहीं होय ॥ सु० ॥६॥ कषाय कुशील चौषो कधोरे, छ? तूं दशमें जोयजी । छ: लेग्या पांच शरीर छैरे भाई छः०, बले समुदघात भाई पु०, २२ ( १७१) १५ ॥ हय रूपकरी बहु जोजन जावे, तास मुनि कह्यों सोयजौ । निश्चय अव कयो नहोरे भाई नि०, तेपिगा दण्डे लियां सुध होय ।सु० ॥ १६ ॥ मासौ चौमासी निशौघमें रे. पाठ सैकड़ा जोयजी। विराधक कह्यो दण्ड लियां घिनारे भाई वि०, भागधक हुवै पालोय ।। सु० ॥ १७ ॥ एकम पूनम चंद जिसारे, वद पख चंद सुजोयजौ। ज्ञाता अध्येन दशमे जिन कद्यारे भाई जा. म्हारा साध माधवी होय ।। सु० ॥ १८ ॥ छट्ठो गुगाठागो जावै नहोरे, बोर वचन अवलोयजौ । खामौ देख छद्मस्थनौरे भाई खा०, कांई समकित तुं मत खोय ।। सु० ।। १८ ।। नई दीक्षा यावै जिमोर, दोषगा सेवै कोयजी। अथवा थाप करै दोष नीर भाई प.. फिरै छट्ठो गुणठागी सोय ।। सु० ।। २० ।। छ? गुण्ठायो माधु छ रे, असाधु सरधले कोयजौ र मिथ्यात आवै तेहनेरे भाई मि०. तूं दश बोलांमे जोय ।। मु० ॥ २१ ॥ मासौ चौमासौ दण्ड थकौरे, छट्ठो गुणाठागो नहिं फिरै सोयजौ। फिरै अंधी सरधा तथा थरपथौरे भाई फि०, तथा जवर दोष थी जोय ॥ सु० ॥ २३ ॥ सूत्र तगी नहीं धारणाजी, विमल विवेक न होय जौ। खासौ देख छद्मस्थनौरे में सवा.. सूरख देवै गेय ।। सु. ॥ २३ ॥ सां.
त्रि लख छतीस सहस्र सुर। भात्म रक्षक अधिकार ॥
सहस्र सहु । एक लाख पठावीस हजार ॥३ सुर सहु
अथ मोहजीत राजारो व्याख्यान .
॥ दोहा॥
सुधर्म खरगे सुधर्मी। सभा मांय शक्रेद ॥ सहस्र
सामानिक सुखकंद ॥ १ ॥
चौरासी सुर भला।
तीन पुरुषदा परवगै। लोक पाल वले च्यार ॥ २ ॥
पग्रमहषौ आठ वर । एक २ नो परिवार । सोलह २
सुणतां अमरपति । भाखै वैण उदार ॥ मोहजीत राजा
तणो। निरमोही परिवार ॥४॥ इन्द्र प्रशंसा करी
घणौ। सांभलने इक देव ॥ श्रायो नृप छलवा भणी।
प्राणी अति महमेव ॥ ५ ॥ राय कुमर प्रच्छन कियो।
धारयो योगी भेष ॥ कुमर किहां लाधो नहौं । जोय
रह्या सुविशेष ॥ ६ ॥ एक दासी फिरती थकी। भाई
नगरौ बाहार ॥ योगी होइनें गल गलो। पाखे वयगा
तिवार ॥७॥
( १७५ )
गेगी योगी कहगारो। निज प्रात्म स्वभावगै अजागा ।
कुमर. गे मरण देख टुमणो थयो । थारे मोटो रोग
पिछागा ॥ सां ॥६॥ में जिवणसें हर्ष प्रमोद होवे घणो ।
मरणमें होवे दिलगौर ॥ गग द्वेषमे खूता मानयो । ते
किम पामै भवजल तौर । सां ॥ ॥ पसयती जौवरो
व जौवगो । ते प्रत्यक्ष राग पहिचान ॥ गग छै तेतो
दशमो पापछे। राग ने दया कहैते अजाण ॥ सां ॥
॥८॥ मरगो बंछ तेती द्वेषछ । ते भोलखगो सोरो
जगमाय ॥ राग भोलखगी दोरी तेहथौ । श्री वीतराग
कहै वाय ॥
सांजे राग, द्वेष तणे वश मानवी।
ज्यारे हर्ष शोक रह्यो व्याप ॥ तेभ्रमण करसी चिहुंगत
संसारमे । सहसौ नरक निगोद सन्ताप ॥ सां ॥ १० ॥
एह फल मोह कर्म नां जिन कया। ते टाले राग
वेषनौ ताप ॥ निज प्रात्म जान स्वभावे रम रद्या।
सम भावे चित्त थाप ॥सां ॥ ११॥ जीव अनंता
नित्य ही मर रह्या। मच्छ गला गल पेख ॥ तूं सोच
करमौर किण किगण नीवरी । तिग्म स्युं सम भाव रहयो
विशेष ॥ सां ॥ १२ ॥ योगी तो सुण ने रह्यो जोबतो ।
दूणरे तो मूल न दाह ॥ भद्भुत रचना देखो एहनौ ।
मन हद बोले अथाह ॥ सां ॥ १३ ॥
॥ रात्रैरै ॥ मोहजाल तन पहरने । वीव नटवा लिम मारे ॥ सूर्ख नर माचेरे ॥ यो ॥ ४॥ बाप मरौ बेटो हुवे । माता मर हुवे नारौरे ॥ इत्यादिक सगपण घग्णा। कर्म तणो गत भारीर । भामो सांग पारीरे ॥ यो । हैं. ५ ॥ भो वार मनन्ती पुत्र हुवो । हू वाप अनन्ती कारोरे ॥मोह तर प्रताप स्यु । सद्या दुःख अपारोरे ॥ नरक निगौद मझारोरे ॥ यो॥६॥ नान दर्शण गुमा निरमला। ए सुखदायक म्हारारे । भौर वस्तु म्हारौ नहौ । ए तो सर्व निकारारे ॥ दुःख दायक सारारे ॥ यो॥ ७॥ निज स्वभाव भूली रह्यो । मोह वशे मतवालोरे ॥ बुद्ध होण जौव बापड़ा। पामै दुःख मसरालोरे ।। नरक निगोद विचालोरे ॥ यो ॥८॥ सोच करे गई बस्तुनो। महा सूर्ख बालारे ॥ समझाया समझे नहौं । दृढ़ कर्मा' ना तालारे ॥ जौव पड़े जंजालारे ॥ यो॥६॥ हर्ष नहीं सम्पति विषै। वि- पत्ति पड़यां नहीं विषवादोरे । धौरपणे स्थिर आत्मां धर्म अमोलख लाधोरे ॥ ज्यांरे सदा समाधोरे ॥यो। ।॥ १० ॥ कष्ट पड़यां कायम रहै। शूरा रहै सम भावैरे ॥ निश्चल मन स्थिर भात्मा । चित्त विमन नहीं थावैरे।ते स्थाणां सुख पावैरे ॥ यो ॥ ११ ॥ निन्दा स्तुति सुख दुःख । लाभ पलाम मझारोरे । सम चित्त २३ ढाल ३ जी - ( देशी-मुनी पलभद्र यसरे वैरागमें ) रे भोला भ्रम में क्यों भमै ( ए पांकडी,)। क्यों तुझ झालज ऊठौरे ॥ किगरौ माता सुत कहनां । ए सहु वातब झूठौरे ॥ रे भोला भ्रम में क्यों भमै ॥१॥ ज्ञान दर्शण चरण तांहरा। ते तो कोइय न लूटेरे । निरमल गुण शुद्ध भात्मा। कहो किग विध खूटेरे ।२॥ सम्पत्ति सहु स्वपनां जिसी । योहो कर रह्या आशारे ॥ दिन थोड़ा में बिललावसी । पाणी ना पतासारे ॥२॥३॥ लाखां मनुष्य भेला हुवे । देश २ नां आई रे॥ मास ताई भेला रहै पिछा आवै जिण दिश जाईरे ॥ ॥ ४ ॥ मनुष्य विछड़िया बहनो । इचरज मूल न भावैरे ॥ ते मास ताई भेला रह्या । इचरज तेह कुहावैरे ॥५॥ अनन्ता प्रमाणु भेला थई । कुमर नो भरौर बधाणो रे॥ इतरा वर्ष रया एकठा। हिव विछड़िया पिछाणो रे ।। रे ॥६॥ पुद्गल विकड़िया तेहनो। दूचरज नहीं लिगारोरे।। एता वर्ष रह्या एकठा। इचरज एह अवधासेरे ॥ ७॥ एह बार भनन्तो पुत्र हुवो। ई बार अनन्ती हुई मातारे।। मोह तणे प्रतापस्युं । किया नया नया ( १८१ ) ॥१॥ कुमर अवर ही सम्पजे। माताने युगमाय ॥ जाय कई हिव नारने । ते दुःख धरै प्रथाय ॥२॥ एहवौ करी विचारणा । आयो नारी पास ॥ थर हर लाग्यो धजया। बोले थई उदास ॥३॥ ॥ सोरठा ॥ सांभल बहनी बातरे। तुज वल्लभ मुझ मठ कन्हे ॥ सिंह हण्यो साक्षातरे। कहतां हिवड़ो थर . हरे ॥१॥ ढाल ४ थी जावो के फरो सहिया यैठो जाजम विछाय एदेशो। मुझ वल्लभ मुझ मांय बिराजै । ज्ञान चरण गुगा धौर ॥ अवर सहु खपनारौ माया । तूं क्युं हुवो दिल- गौर ॥ तूं क्युं हुबो दिलगीर ॥ योगेश्वर ॥ तूं क्युं हुवो दिलगीर ॥ आत्म स्वरूप. भोलख करणौस्युं ज्युं पामों भव जल तौर ॥१॥ स्थिति अनुसार परिवार सहु जन। मात तात सुत बौर ॥ पिड तिरिया वहनि भतीजी भाणेजी। कोइय न भांजे भौर ॥ को. यो. को. ॥ २ ॥ तूं क्युं योगी थर हर कंप्यो । कम हुवो दिल- गौर ॥ भस्म लगाय भ्रम नहीं भाग्यो। नहीं जाण्यो निज गुण और न. यो० न०॥ भात्म ॥ ३॥ मुझ ( १८३ ) सभिल तूं मुझ बौर ॥ सां० यो० सां० ॥ आत्म ॥११॥ तूं योगेश्वर धूजण लागो, न आयो जान सधौर । जान दर्शण घर है पति अंडो , तू फसियो मोह जंजौर ॥ तं. यो० तूं० ॥ आत्म ॥ १२॥ योगौ सुण मन मांय विमास, महो अहो वचन अमौर । धन २ सुन्दर घधिक प्रमौलक, धन २ जान गम्भौर ॥ ध० यो० ध० ॥ भात्म ॥ १३ ॥ ॥दोहा॥ योगी सुग हष्यों घगो, मनसे करै विचार । मोहजीत राजा तणो, निरमोही परिवार ॥ १॥ इन्द्र प्रशंसा करो, ते सहु साची जाण । योगी रूप फेरि कियो देव रूप पहिचाण ॥ २॥ ढाल मी. ५ धीजकरेसोतासतीरे लाल कानां कुण्डल झल हले रे लाल, हिवड़े शोभै हारहो । राजेश्वर । पांगुलियां दश मुद्रिका रे लाल, मस्तक मुकट उदार हो। राजेश्वर । धन २ करणी तांहरी रे लाल ॥ १ ॥ धन २ तुन परिवार हो, रा० देव गुम धन थांहरा रे लाल। धन तुम जान उदार हो। राजेश्वर ॥२॥ ध० ॥ रन तिलक भति भल इले ( ५ ) शोसै साते समय रे लाल, जेठ सुद बीज रविवार हो। रा० जोड़ कौधी सोहजोतनी रे लाल, शहर सुजाण गढ़ मझार हो || रा.स ११ । ॥ उपदेशिक ढालें ॥ ढाल १ ली लाल हजारी रो जामो विराज चढवा तुरंगी घोडारे एदेशी। सुख खि मात्र कथा जिन खामी, दाख्या टुःख बहु कालोरे । अनर्घ खान मुक्तिना बैरी, काम भोग मोह जालोरे । काम किम्पाक समा जिन भाख्या । दुःख अनन्ता ना दातारे। परिचय काम बंच्छा मरह- रिये, जो चहिये सुख सातरि ।। का० ॥ १ ॥ घोर नरकने विषे पड़े जे, पाप कर्म करतागैरे। भारज उत्तम धर्म आचरे, सुर शिवगत सुख भारौरे ।। का ॥ २ ॥ अघ उपलेप लगै भोगौरे, अभोगौ तो नाहीं लेपायोरे । भोगौ संसार में भ्रमण करै छ, भाग तजे थी मुकायोरे ।। का० ॥३॥ न करै कंठ छेदन परि जेहु, अनरथ तेहु विशेषोरे । करै पोतानी दुष्ट पातम कर, तेम तुमे जाणेसोरे ॥ का० ॥४॥ अष्टमा बारमो षट खण्डाधिप लक्ष्मण कृष्ण मुरागरे। विषय
( १८७)
ढाल २ दूजी
(देशी बीस बहरमान सदा शाश्वता)
गब्द रूप गंध रस फास पनें, इन्द्रिय विषय
विकारी। फुन क्रोधादिक टुष्ट भासव मन से दश शत्रु
भारी ॥ गुणोजन तो काम विषकारी, विषय तज्यां
यो लहिये गु० भविचल सम्पत्ति सारौ ॥ गु० ॥१॥
रागद्देष फुन स्त्रिय माना, परम भयङ्कर भागै । जात
एकेन्द्रीय आदि तगला पन्च, कयो सिद्धान्त मझारौ ।
गु० ॥२ असंख्य कालचक्र च्यार थावर में,
उत्कृष्ट पणे विचारी। अनन्तकाल चक्र वनस्पति मे,
काय स्थित अवधारौ ॥ ३ असंख्यात ले लोक
भाकाशे, प्रदेश प्रमाण विचारौ॥ काल चक्र दुःख सह्या
काम थी, थावर च्यार मभागै॥४॥ पांगुल क्षेत्र नभ
प्रदेश प्रति, दूक २ समय मझारी । दूक २ समय
प्रदेश काढतां, असंख्य काल चक्र धारौ ॥५॥ बले
अनन्ता लोक भाकाशे, प्रदेश प्रयोग विचारी। काल-
चकतनु स्थिति काम पौ, बनस्पतिमें धारी ॥६॥
खेतीस सागर ब्रह्मदत्त फुन संभूमिदत्त विचारौ। पर-
सरामने बसु काम थी. सप्तमी नरक मझारी ||७॥
लक्ष्मगा रावण कालौ कुमर फुन, दशसागर लग धारी।
राग द्वेषने काम थको टुम्ब, चौथौ नर्क मझारी ॥८॥
( १८६ ) चक्रीनी, उत्कृष्टौ छट्ठौ पड़ी है ॥८॥ तू तो जाणे कुण मो सम सुन्दर, पुन्यवान पूरौ हे ॥६॥ पिण इकदिन पाप उदै हुवां परभव, परबश जमार पाने पड़ी हे ॥१०॥ वैतरणौ प्रमुख बहुं वेदन, तू सहसौ भाक्रन्द करौ हे ॥११॥ सम्यत देशव्रत धारयां, थारो दुख वेदना सर्व टलौ हे ॥१२॥ नन्दन वन भिक्षु गण भाराध्यां, तू पामसी अमरपुरौ हे ॥१३॥ निन्दक टालोकड़ तू मत बंदै, तू सौख हियामें धरौ हे ॥१४॥ ए धाड़वी सम- कित ना लूटारा, ज्यांगै संगत दूर करी.हे ॥१५॥ वार २ स्यूं कहिये. तोने, तू गणमें स्थिर पद धरौं हे ॥१६॥ गणपतिनो पक्की बंछा राख्यां, थारा मन बछित कारज सरी हे ॥१०॥ उगगोसै गुगातौस चैत्र सुद, जय जश शिक्षा उचरौ है ॥१८॥ ढाल ४ थीं (महला में बैठी हो राणी कमलावती) ओछी तो जमर जिगामे दुःख घणा, व्याध रोगा- दिक जाग। विविध प्रकार संयोग वियोगनो, शरीर मानसौक पिछाण || सांभल रे भविजन वारु तो बागौ हो श्रीजिनराजनी ॥१॥ काम किम्पाक कटुक फल पाड़वा, दुःगा बहु सुख खिगमात्र । शिव सुख केरा बैरौ जिन कड्या, अनरथ खान विख्यात ॥ सां० ॥२॥ APN जी ॥ से० ॥२॥ दूजे शतक भगवतो मांयो, पर पंचमु- देश वायोजो ॥ से. ॥ ३॥ मुनि सेव कियाई पावै, दश बोलांरी प्राप्त थावैजी ॥ से• ॥ ४ मुनि सेव्यां सुगवा पावै, पछै ज्ञान विज्ञानज थावेजो ॥ से. ॥५॥ पचखाणं संयम सुखदाई, तमु फल पनपासव थाईजौ ॥ से० ॥ ॥६॥ तपने बले कर्म बोदाणी, पक्रियाने सिद्धि निर- वाणोजी ।। से० ॥ ७॥ सेवा थी मिटै कुलच्छन, जडनर मिण होय विचक्षणजी ॥ से० ॥८॥ शुभ लंच्छन सेवा- थौ पावे, इण भव पिण आणन्द थानौ ॥ से० ॥६॥ परभव में शिवसुख राचे, सेवायो गहगट माचैजौ ॥से. ॥ १० ॥ गौतम जिण संगत कौधौ, गणधर थया प्रथम प्रसिद्धिजी ॥ से० ॥११॥ उवाई दशमे अगो, आख्या- पर पाठ उमंगोजौ ॥ से० ॥१२॥ मुनिसेव्यां सु प्रसन्न थावे, तसु जय जयकार जगावैजौ ॥ से० ॥१३॥ अशा- सना अबोधी पावै, दूण भव पिण मँडो थावैजौ ॥से• ॥ ॥१४॥ महामुनि पतिशयधारी, सेहना गुण अधिकारी जौ ॥ से० ॥ १५ ॥ इम जाण मुनिने सेवो, बारु सौख हियामे बेबोजो ॥ से. ॥ १६ ॥ उगणौसै सतरे उदारु, बद फागुन अष्टमी वारुजौ ॥ से० ॥१७॥ जयनगरी जोड़ जगाची, जय जश सुख सम्पति जागोनी ॥ १८॥ ॥
॥
( १६१ )
जो ॥ से० ॥२॥ दजै शतक भगवतो मांयो, वर पंचमु-
देशै वायोजौ ॥ से. ॥ ३॥ मुनि सेव कियाई पावै, दश
बोलांरी प्राप्त थावैजी ॥ से. ॥ ४ मुनि सेव्यां सुगवा
पावै, पछै ज्ञान विज्ञानज थावैजौ ॥ से• ॥५॥ पचखागा
संयम सुखदाई, तमु फल पनपासव थाईजौ ॥ से० ॥
॥६॥ तपने बले कर्म बोदाग्यो, पक्रियाने सिद्धि निर-
वाणोजौ । से० ॥ ७॥ सेवा थी मिटै कुलच्छन, जडनर
पिण होय विचक्षणजी ॥से० ॥८॥ शुभ लंछन सेवा-
थौ पावे, दूण भव पिण पागन्द थानौ ॥ से० ॥६॥
परभव में शिवमुख राचे, सेवायो गहगट माचैजौ ॥से०
॥ १० ॥ गौतम जिथ संगत कौधौ, गणधर थया प्रथम
प्रसिद्धिजी ॥ से० ॥११॥ उवाई दशमें अगो, आख्या-
वर पाठ उमंगोजी ॥ से. ॥१२॥ मुनिसेव्यां सु प्रसन्न
थावे, तसु जय जयकार जणावैजौ ॥ से० ॥१३॥ अशा-
सना अबोधी पावै, दूण भव पिण मँडो थावैजौ ॥से. ॥
॥१४॥ महामुनि पतिशयधारी, रोहना गुगा अधिकारी
जौ ॥ से० ॥ १५ ॥ इम जाण मुनिने सेयो, बास
सौख हियामें वेवोजी ॥ से. ॥ १६ ॥ उगणीसै सतरे
उदारु, बद फागुन अष्टमी वारुजी ॥ से० ॥ १७॥
जयनगरी जोड़ जणायौ, जय जश सुख सम्पति
नागोजी ॥ १८॥
( १६३ ) भार । भधिकही भणियोजी है। जान ध्यान गलतान, तप रस थुणियोजी ॥ ६॥ भाजा ले सतगुरुं तणी है, मुनिवर करता उग्र विहार । वणारसौ प्रायोजी है। कथा तणे अनुसार, एम कुहायोजौ ॥ १० ॥ ॥ढाल॥ - अनित्य सहु दूगा लोकसें रे, केम. करीजै पाम। अधिर जीतब जग जीवनोरे, आगे बहोत संताप । करी धर्म बहु प्राणियारे पो संसार असार ॥१॥ जावै परभवने विषै रे, हुई ने निपट निराश । जोर कोई लागे नही रे, जब हुवै बहोत उदास ॥ करो० ॥२॥ नरक तणा दुःख सांभलोरे, पाम्यो अतही वास ( पश्चा- ताम करै घणोरे, मैं धर्म कियो नही तास । क० ॥३॥ कम काम भोगां मझेरे, मुरझ रह्यो सूढ़ होय । नहीं धाप्यो न धामसौरे, ए अटप्त कर सोय ॥ क. ॥४॥ पाऊखो आयां थकारे, जावै सरब छिटकाय । धन सज्जन परिवारनोरे, वाण शरम नहीं थाय ॥ का० ५॥ मूरख सूढ़ जाणे नहोरे, पर भवनो अर्थ काय । तिण सुं पाप करै घणोरे, डरे नही मन मांय ॥ क० ॥६॥ चेजा करवावै घणारे, संचय करै धन धान । मांस खावै मदिरा पिवैरे, सूरख निपट अजाण ॥ क० ॥॥ घररो ॥ ॥ मानसीक औषध की ढाल ॥ '( राग प्रभाती) मोह उपशम उपाय समपणो, ए आलम्बन सुख. तारी। नित प्रते हृदय निरन्तर साध्या, आणन्द होय प्रपारौ ॥ चेतन बेर वेर समभाऊ', मान तूं सौख हमारी॥१॥ क्रोध मान माया ने लोभ अरि, राग देष दुःखकागे। यां सहुनो उपशम को कारण, समे भाव सुखकारी ॥ चेतन ॥२॥ अष्टावीस प्रकृति मांहेलो, ए अति क्रूर अनारी। यां सहु को उपशम जिन भाख्यो, ते कारण चित्तधारी ॥३॥ शान्ति दान्ति समचित दायक, तज मतवाल विकारौ। ए मतवाल महाटुखदायक, नरकादिक दातारौ ॥ ४ ॥ मोह मतवाल मिटै समताकर, मननी लहर निवारी। एह बातनो हेतु जाणे, तो हुवै सुख अपारी ॥५॥ अव- गुण पोता ना अवलोकी, ध्यान निरंतरधारी। समचित कर अवगुण ने छोड़े, ते सयमा नर नारी ॥६॥ क्रोध मान माया ने लोभनी, लहर तणो परिहारी। खिण २ उपयोग देई ने, पोलखै समचित धारी ॥७॥ अवसर तिरण सामग्री, ते पामी इहवारी। खिपमात्र पिण प्रमाद मत कर, तज मतवाल विकारी ॥४॥ सात कर्म नो उपशम न हुवै, इम भाख्यो जगतारी। उपशम ( १६९ ) खाम भिक्षु प्रगटे। जग मांहे कीरत थईरे ॥ श्रीजिन आणा शिर धरी । बर न्याय ' बातां कहोरे कहोरे स्वाम साचा अद्भुत वाचा कहौरे ॥१॥ आगुंच उत्तराध्येनमें। दूण पार पंचम महौरे । जिन विना शिवपंथ होसी । संत तंत सहौरे ॥ सहोरे ॥ खा० ॥२॥ समत अठाग तेपना पछ। सूत्र संग वृद्धि धईरे । बंक चुलिया मांहि बारता । तूं जोय प्रत्यक्ष सहौरे ॥ सहीरे ॥ खा० ॥ ३॥ द्वादश संत आगै हुता, त्यां प? वृद्धि थई। हेम चरण सु वृद्धि कारण, प्रत्यक्ष वैण मिलई रे । मिलई रे ॥ खा० ॥ ४ ॥ खाम पारश सारिषा। चिन्तामणि कर लहौरे ॥ भवधि पोत उद्योत करवा । खाम सूरज सहौरे ॥ सहोरे॥ स्वा० ॥५॥ खाम भिक्षु समरिया। उगणीस चवदे महौर। बौदासर चौमासमे जय जश कौरत थईर ॥ थईरे ॥ खा. ॥ ६ ॥ ॥ मर्याद की ढाल ॥ (देशी--पखवाड़े को) खाम भिक्षु भजले भाई। स्वाम समरण है शिव साई ॥ ए आंकडो॥ प्राचार्य जबर माम जाणी। बुद्ध उत्पतिया अति ठाणी ॥ समय रस पेख वीर वागौ। प्रगट मग कियोज पैछायो। अष्टादश सोलै समै । सुदि पूनम आषाढ ॥ संनम खाम समाचयोस काई।
No text on this page.