Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Shastravarta-samucchya Stavak-iii

Suri, Haribhadra · 2011/01

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(C (C) Com (CUD (C) Com ।। श्री शखेश्वरपार्श्वनाथाय नम ॥ (C) (OOD शास्त्रवार्ता-समुच्चय 의 और (COD C (का (G उसकी व्याख्या स्याद्वाद-कल्पलता (or) ( Cl (C) (90) (GO) का (O) Con हिन्दी विवेचन (स्वलाक ३० (Gen - (G मूल ग्रन्धकार- न्यान्याग्रन्थकार- १४ ४ ग्रन्यप्रणना विद्मूवन्य न्यायविशारद-न्यायाचार्य जैनशासनरत्न जैनाचार्य श्रीहरिभद्रसूरि महाराज महोपाध्याय श्रीयशोविजय महाराज हिन्दी विवेचनकार हिन्दी विवेचन अमिवीक्षक न्याय-वेदान्ताच य-पडितराज जैनाचार्य न्यायदर्शननत्त्वज्ञ-तपारत्नमहोदधि श्रीवदरोनाथशुक्ल श्रीमद् विजयभुवनभानुसूरिमहाराज [सचासलर-सपूर्णानदसंस्कृत विश्वविद्यालय] वाराणसी Con SIM MARI प्रकाशक दिव्यदर्शन ट्रस्ट कुमारपाल वि. शाह-गुलालवाडी-मुबई ४ (om ( काका (C) () (O) C COM

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म अहंभ * शास्त्रवार्तासमुच्चय तृतीयः स्तवकः ya के ( म ग ल ) (टी०)-मर्वः शास्त्रपरिश्रमः शमवतामाकालमेकोऽपि यत्- साक्षात्कारकते धृते हृदि तमो लीयेत यस्मिन्मनाक् ।। यस्यैश्वर्यमपङ्किलं च जगदुत्पाद-स्थिति-ध्वंसनैः । तं देव निरवग्रहग्रहमहाऽऽनन्दाय वन्दामहे ॥ १ ॥ [ निष्कलंक ईश्वर को प्रणाम ] जिस देव का प्रत्यक्ष दर्शन करने के उद्देश से शमसपन्न साधुपुरुषो का शास्त्रसंमत सपूर्ण परि- श्रम एकमात्र भगवन्मुख होकर आजीवन चलता रहता है, अर्थात् जिस के दर्शन के लिए शमसंपन्न साधुनो एकमात्र ईश्वरपरायण होकर शास्त्र की रीत से जीवन-पर्यन्त या अनेक जीवन-पर्यन्त कठोर परिश्रम करते रहते हैं और हृदय मे जिसका किञ्चिन्मात्र स्फुरण हो जाने पर हृदय का सपूर्ण अज्ञान-अधकार विलीन हो जाता है और जिसका ऐश्वर्य जगत् के उत्पादन-पालन और सहार व्यापार से कलुषित नही होता- -उस देव का हम निष्प्रतिबन्ध (निरावरण) ज्ञान युक्त महान् आनन्द के लिए अभिवादन करते हैं। इस मगल श्लोक से जैन दर्शन की कई महत्वपूर्ण दृष्टीया स्पष्ट होती हैं, जैसे-वीतराग भगवान का साक्षात्कार करने के लिए साधक को सर्व प्रथम शमसपन्न होना चाहिये । शम का अर्थ हे क्रोध- लोभादिकषायो का उपशम जिसमे समाविष्ट है ससार के विषयो मे आसक्ति का परित्याग । मनुष्य जब तक सासारिक भोगो से उदासीन न होगा-या सामारिक विषयो मे जब तक उस के मन का प्राक- र्षण शिथिल न होगा तब तक विषय जनित कषाय मद न होने से ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिए वह योग्य नहीं हो सकता। दूसरी बात यह है कि शमसपन्न होने पर भी उसे भगवन्मुख होना आवश्यक है क्योकि शम होने पर भी यदि मनुष्य भगवन्मुख न होगा तो उस का शम स्थायी न हो सकेगा । ससार का चाक- चिक्य एक दिन उसको अवश्य विचलित कर देगा, क्योकि मनुष्य का मन सदा कोई न कोई पालवन चाहता है । अत उसे भगवान का प्रालबन न दिया जायगा तो विवश होकर वह किसी ।

२] [ शा. वा. समुच्चय स्त० ३-उलो०१ मूलम्-ईश्वरः . सामग्र्यामीश्वरोऽपि निविशत इति वार्तान्तरमाह- प्रेरकत्वेन कर्ता कैश्चिदिहेप्यते । अचिन्त्यचिच्छक्तियुक्तोऽनादिसिद्धश्च सूरिभिः ॥१॥ इह-सामग्र्याम् , कैश्चित कश्चित् सूरिभिः पातज्जलाचायेंः, प्रेरकत्वेन परप्रवृत्तिजनकत्वेन सांमारिक पालवन को ग्रहण कर लेगा और फिर ईश्वर के दर्शन की प्राशा उसके लिए एक दिवा- स्वप्नमात्र रह जायगी । दूसरी बात यह है कि ईश्वर के दर्शनार्थ साधना करने वाले व्यक्ति का जीवन शास्त्र पर आधारित होना चाहिये और उसके समस्त व्यापार शास्त्र के विधि-निषेधो से निय- न्त्रित होना चाहिए। यदि साधक के पास शास्त्र का पालोक न रहेगा तो कभी नी वह मोह के अधकार मे गिर सकता है। तीसरी बात यह है कि साधक को अपने साधनामार्ग पर चलने के लिए वडा धैर्यवान् होना चाहिए । लक्ष्य की प्राप्ति मे विलम्ब होने पर भी उसे किञ्चित् विचलित न होना चाहिए । हो सकता है कि उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीवन भर अथवा कई जन्मो तक अपनी आध्यात्मिक यात्रा चालु रखनी पडे । चौथी बात और महत्व की है जो यह है कि वीतराग सर्वज्ञ भगवान का किञ्चित्मात्र स्मरण होने से ही साधक का हृदयाधकार दूर हो जाता है क्योकि उस से साधक की पाशा बलवत्तर होती । और विश्वास होता है कि अपने मार्ग पर चलने पर भगवान का आशिक दर्शन शीघ्र भी हो सकता है और उस दर्शन से ही उसके हृदय का अज्ञान तम दूर हो सकता है जो कि उस को अग्रिम यात्रा मे उसे भयप्रद हो सकता हे और निराशा के प्रादर्त मे उद्भ्रान्त भी कर सकता है। पाचवीं वात-जैन के महान सिद्धांत का अवद्योतन करती है । वह यह कि जैन शासन मे न्याय दर्शन के समान ईश्वर को जगत का कर्ता-मर्ता और हर्ता नहीं माना जाता । क्योकि जगत उत्पादन पालन और विनाश का कर्तृत्व यदि ईश्वर मे माना जायेगा तो उसमे राग द्वेषादि का सम्बन्ध अवश्य मानना होगा क्योकि जिस मे राग द्वेषादि का सवध नहीं होता वह जीव हिंसक प्रारंभ समारमादि कुछ भी व्यापार नहीं कर पाता और यदि राग द्वेष आदि होगा तो उसका ऐश्वय निश्चितरूप से कलकित हो जायगा क्योकि उस स्थिति मे उस मे सासारिक की अपेक्षा कोई वैशिष्टय न होगा। छट्ठी बात जो कही गई है उस से ईश्वर के अभिवादन का मुरय लाभ सूचित होता है । और वह हे निरावरण अनत ज्ञान युक्त विशुद्ध अक्षय आनद को निर्वाध प्राप्ति । इस कथन से यह संकेत किया गया प्रतीत होता है कि ईश्वर-अभिवादन से मनुष्य को यद्यपि उसके लौकिक अभीष्ट प्राप्त होते हैं किन्तु मनुष्य को उसे भगवान के अभिवादन का लक्ष्य नहीं रखना चाहिए। अन्यथा उस के मुख्य लक्ष्य अनंत ज्ञान व महान प्रानंद की प्राप्ति से मनुष्य वचित रह जायगा । अत. लौकिक अभीष्ट को उसे आनुषगिक रूप मे ही ग्रहण करना चाहिए । प्राद्य मूल कारिका मे अन्य शास्त्री के इस मत का उल्लेख किया गया है कि जगत् की उत्पत्ति जिस कारणसामग्री से होती हे उस मे ईश्वर का भी समावेश है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है- शासन स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचन] [३ । ईश्वरः कर्तेष्यते । कीदृशः १ इत्याह-अचिन्त्या इन्द्रियादिप्रणालिकां विनाऽपि यथावत्सर्ववि- पयावच्छिन्ना या चिच्छक्तिश्चेतना, तया युक्तः-तदाश्रयः, तथा अनादिसिद्धश्च कदापि बन्धा- भावात् । त्रिविधो हि तैर्वन्ध उच्यते, प्राकृतिक-वैकारिक दाक्षिणभेदात् । तत्र प्रकृतावात्मता- ज्ञानाद् ये प्रकृतिमुपास्ते तेपा प्राकृत्तिको वन्धः, यान् प्रतीदमुच्यते- "पूर्ण शतसहस्र तु तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः ।" इति । ये तु विकारानेव भूतेन्द्रियाऽहड्- कारबुद्धीः पुरुपवुद्ध्योपासते, तेषां वैकारिको बन्धः. यान् प्रतीदमुच्यते- "दश मन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः । भौतिकास्तु शतं पूर्ण, सहस्र वाभिमानिकाः ॥ १ ॥ बौद्धाः शतसहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः।" इति । इष्टापूर्ते दाक्षिणो बन्धः, पुरुषतत्त्वानभिज्ञो हीप्टापूर्तकारी कामोपहतमना वध्यत इति । इयं च त्रिविधापि बन्धकोटिरीश्वरस्य मुक्ति प्राप्यापि भवे पुनरेष्यतां प्रकृतिलीनत्वज्ञानानां [ पातञ्जल के मतानुसार ईश्वर का स्वरूप ] पातञ्जल दर्शन मे निष्ठा रखने वाले विद्वानो ने यह माना है कि जगत् उत्पादकसामग्री मे ईश्वर भी प्रविष्ट है क्योकि जगत के अन्य अचेतन कारणो का प्रेरक होने से वही जगत् का कर्ता है। उस की चेतना शक्ति अचिन्त्य है, क्योकि इन्द्रियादि ज्ञान साधनो के विना भी सपूर्ण विषयों से उस । अर्थात् ईश्वर साधननिरपेक्ष सर्वविषयक शाश्वतज्ञान का आश्रय है और अनादिसिद्ध नित्यमुक्त है क्योकि उस मे कभी भी बन्ध समवित नहीं है । कहने का प्राशय है कि बन्ध के तीन भेद होते हैं-(१)प्राकृतिक (२) वैकारिक दाक्षिण्य । ( तीन प्रकार का वन्ध ) जो लोग प्रकृति को ही प्रात्मा समझकर उसी को प्रात्मरूप मे उपासना करते है उन्हे प्राकृ- तिक बन्ध होता है और वे प्रकृति मे प्रात्मचिन्तन करने के फलस्वरूप पूरे शतसहस्र (१००,०००) वर्ष तक प्रकृति मे मुक्त कल्प होकर अवस्थित रहते हैं । जो प्रकृति के कार्यभूत-इन्द्रिय-अहकार और बुद्धि तत्त्व को प्रात्मा समझकर उन्हीं की प्रात्मभाव से उपासना करते है उन्हे वैकारिक बन्ध होता है। उन मे इन्द्रिय मे प्रात्मभाव का चिन्तन करने वाले दशमन्वन्तरकाल तक निर्दु ख रहते है । और भूतो का प्रात्मभाव से चिन्तन करने वाले भौतिक कहे जाते हैं । जो १०० सौ वर्ष तक निर्दु ख होकर रहते है । और अहकार को प्रात्मरूप से चिन्तन करने वाले प्राभिमानिक कहे जाते हैं । वे सहस्रवर्ष तक निर्दु ख रहते हैं। और जो बुद्धि तत्त्वको प्रात्मभाव से देखते हैं और उसी के प्रात्मरूप मे उपासक होते है वे सहस्र वर्ष तक दु खमुक्त रहते हैं । इस प्रकार अनात्मा मे प्रात्मशियो को मुक्तावस्था अनित्य होती है। १ बौद्धा -बुद्धिशब्दाच्छैषिकोऽण ।। का सवन्ध ४] [गा. वा. ममुच्चय स्त-३ श्लोक-१ योगिनामिव नोत्तरा न वा पूर्वा मंसारिमुक्तात्मनामिव, इति निर्वाधमनादिमिद्धत्वम् । तथा चाह पतञ्जलिः-"क्लेश-कर्मविपाका-ऽऽशयरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः(योगत्र २-४)" इति । क्लेशाः अविद्याऽस्मितारागद्वेपाऽभिनिवेशाः। कर्माणि शुमाऽशुभानि । तद्विपाको जात्यायुभोंगाः। आशया: नानाविधास्तदनुगुणाः संम्कागः । तेरपरामृष्टोऽसंस्पृष्टः मर्वजतया भेटाहनिमित्त- काऽविद्याऽभावात् , तस्या एव च भवहेतुर्वक्लेशमूलत्वात् । तथा च मृत्रम्-"अविद्या क्षेत्र- मुत्तरेषां प्रसुप्त-तनु-विच्छिन्नो दाराणाम्" (योगसूत्र २-४) इति । अनभिव्यक्तरूपेणावस्थान सुप्तावस्था, अभिव्यक्तम्यापि महकायेभावात् कार्याऽजननं तन्ववस्था, अभिव्यक्तम्य जनित- कार्यस्यापि केनचित् बलवता मजातीयेन विजातीयेन वा लब्धवृत्तिकेनाऽभिभवात् भविष्यद्- वृत्तिकत्वेनावस्थानं विच्छिन्नावस्था | अभिव्यक्तस्य प्राप्तमहकारिमंपत्तेरप्रतिवन्धन लब्धवृत्ति- कतया स्वकार्यकरत्वमुदारावस्था । तत्राद्यमवस्थाद्वयं प्रतिप्रमवाख्येन नि:जसमाधिना हीयते, अन्त्यं तु शुद्वमत्त्वमयेन भगवद्ध्यानेनेति । 'अविद्याऽभावात तन्नाशजन्यं कथं तत्त्वज्ञानं तम्य ?' इति चेत् । अत एव नित्यं तत् , नित्यज्ञानवत्त्वाटेव चायं कपिलप्रभृतिमहपीणामपि गुरुः ॥१॥ इष्ट और पूर्व को दक्षिरण वन्ध कहा जाता है । इप्ट का अर्थ है वेद मे वरिणत विविध यज्ञ और पूर्त का अर्थ है पुरानो ने वरिणत परोपकार के कार्य जैसे वाटिका वावडी कूप धर्मशाला आदि का निर्माण । जो प्रात्मा के वास्तव स्वरूप को नहीं जानता वह यज्ञ और परोपकारक कार्यों को अभिलापा से उन कार्यों मे मनोयोगपूर्वक व्याप्त होता है और बन्धनों से प्रावद्ध होता है । ये तीनो बन्यो को दो कोटि होती है-पूर्व कोटि और उत्तर कोटि । वे योगी जो प्रकृति यादि मे ग्रात्मचिन्तन कर प्रकृति मे लीन हो कर मुक्ति प्राप्त करते हैं उनको मुक्ति की अवधि समाप्ति होने पर ससार मै पुन पाना पडता है प्रत वह उक्त वन्धो को उत्तर कोटि को प्राप्त करते हैं और जो ससारी जीव प्रात्मा का वास्तव स्वरूप का साक्षात्कार करके मुन्त होते है उन्हें उन बन्धो की पूर्व कोटि होती है, उत्तर कोटि नहीं होती, क्योंकि मुक्ति के बाद उन्हें किसी प्रकार का बन्ध नहीं होता। ईश्वर मे बन्ध को ये दोनो हि कोटिया नहीं होती इसलिए वह निर्वाध रूप से नित्य मुक्त होता है। जैसा कि पतञ्जलि ने अपने योगदर्शन मे कहा है कि जो पुरुष क्लेश कर्म-विपाक और प्राशयो से कभी नी सयुक्त नहीं होता वह पुरषविशेष ही ईश्वर है ।' [ क्लेश-कर्म और विपाक का स्वरूप ] क्लेश का अर्थ है अविद्या-अस्मिता-राग-द्वेष और अभिनिवेश । कर्म का अर्थ है पुण्य और पाप । विपाक का अर्थ है जन्म-आयु और भोग ल्प कर्मफल । और प्राशय का अर्थ है जन्म आयु और भोग के प्रयोजक अनेक प्रकार के संस्कारो का निधि । ईश्वर मे इन वस्तुत्रो का सम्पर्क नहीं होता क्योकि वह सर्वज्ञ होता है इसलिए उस मे प्रात्मा और अनात्म के भेद का अज्ञान नहीं होता । इसीलिए अनात्मा मे आत्मा के तादात्म्य की बुद्धिल्प अविद्या भी उसमे नहीं रहती। और जब उस मे अविद्या ही नहीं होती तो उसमे अन्य क्लेशो के सम्पर्क की समावना कैसे हो सकती है ? क्योकि अविद्या ही जगत् के हेतुभूत सम्पूर्ण क्लेशो का मूल हे । जहा मूल ही नहीं है वहा उसके कार्य कैसे हो सकते हैं ? -- । स्या०० टीफा और हिन्दी विवेचना [५ तदिदमाह- मूलम्-ज्ञानमप्रतिघं यस्य वैराग्यं च जगत्पतेः । ऐश्वर्य चैव धर्मश्च सहसिद्ध चतुष्टयम् ॥२॥ यस्य जगत्पतेर्ज्ञानम् , अप्रतिधम् नित्यत्त्वेन सर्वविषयत्वात् क्वचिदप्यप्रतिहतम् । वैराग्यं च माध्यस्थ्यं च रागाभावादप्रतिघम् । चः समुच्चयो एवोऽवधारणे, ऐश्वर्य पारतन्त्र्या- ऽभावादप्रतिघम् , तचाप्टविधम्-अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्तिः, प्राकाम्यम् वशित्वम् , यह वात योगसूत्र मे इस प्रकार कही गई है कि "प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार ये सभी प्रकार के उत्तरभावि क्लेशो को जन्मभूमि अविद्या है। सुप्तावस्था का अर्थ है अप्रकटरूप मे क्लेश को अवस्थिति, तनु अवस्था का अर्थ है प्रकट होने पर भी सहकारी कारण का सनिधान न होने से कार्य को उत्पन्न करने की असमर्थता । और विच्छिन्न वस्था का अर्थ है अभिव्यक्त होकर और अपने कार्य को उत्पन्न करके भी किसी बलवान एव लब्धवृत्तिक सजातीय अथवा विजातीय पदार्थ से अभिभूत -वृत्तिहीन होकर भविष्य मे सवृत्तिक होने के लिए अवस्थित रहना । और उदार अवस्था का अर्थ है- अभिव्यक्त होकर एव सहकारियों का सनिधान प्राप्त कर एव कोई प्रतिवन्धक न होने से अपने कार्य को उत्पन्न करने का अवसर प्राप्त कर अपने कार्य का सम्पादन करना । इन अवस्थाओ मे पहली दो अवस्थाप्रो की निवृत्ति निर्बोज समाधि से होती है जिसे प्रतिप्रसव कहा जाता है । और अन्तिम दो अवस्थामओ को निवृत्ति भगवान के शुद्धसत्त्वमय ध्यान से होती है।" ईश्वर को तत्त्वज्ञ मानने पर प्रश्न होता है कि जब ईश्वर मे अविद्या ही नहीं होती तो उस मे तत्त्वज्ञान कैसे होता है ? क्योकि तत्वज्ञान अविद्या के नाश से होता है किन्तु ईश्वर मे अविद्या न होने से उस का नाश भी उसमे नहीं हो सकता और इसके फलस्वरूप तत्त्वज्ञान की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इस प्रश्न का उत्तर यह है कि ईश्वर मे अविद्या और अविद्या का नाश न होने के कारण ही उसका तत्त्वज्ञान नित्य होता है और नित्यज्ञान का प्राश्रय होने से ही वह कपिलादि महपियो का भी गुरु होता है। दूसरी कारिका मे पूर्व कारिका के कथन को ही पुष्ट किया गया है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है- [ ईश्वर का सहजसिद्ध चतुष्टय ] ईश्वर जगत् का स्वामी है। उसका ज्ञान नित्य एवं सर्वविषयक होने से किसी काल और किसी विषय में प्रतिहत नहीं है । उसका वैराग्य-माध्यस्थ्य भी उस मे राग न होने से कहीं भी प्रतिहत नहीं है । अर्थात् उसमे किसी भी चेतन अथवा अचेतन वस्तु के प्रति राग और द्वेष न होने से वह सबके प्रति तटस्थ है और उसमे किसी प्रकार की परतन्त्रता न होने से उस का ऐश्वर्य भी अप्रतिहत है। उसके ऐश्वर्य का पाठ प्रकार हैं-'अणिमा, लघिमा, उमहिमा, "प्राप्ति, "प्राकाम्य ६वशित्व ईशित्व यत्र कामावसायित्व ।

६] [ शा. वा, समुच्चय स्त०-३ ग्लोक-२ ईशित्वम् , यत्रकामावमायित्वं चेति । यतो महानणुर्भवति सर्वभूतानामप्यदृश्यः, सोऽणिमा । यतो लघुर्भवति सूर्यरश्मीनप्यालम्ब्य सूर्यलोकादिगमनसमर्थः, स लधिमा । यतोऽल्पोऽपि 'नाग-नगादिमानो भवति, स महिमा । यतो भूमिष्ठस्याप्यड्गुल्यग्रे गगनस्थादिवस्तुप्राप्तिः, सा प्राप्तिः । प्राकाम्यमिच्छानभिघातः, यत उदक इव भूमावुन्मज्जति निमज्जति च । वशित्वम्-यतो भूत-भौतिकेषु स्वातन्त्र्यम् । ईशित्वम्-यतस्तेषु प्रभव-स्थिति-व्ययानामीष्टे । यत्रकामावमायित्वम्-यतः सत्यसंकल्पता भवति, यथेश्वरसंकल्पमेव भूतभावादिति । धर्मश्च प्रयत्न-संस्काररूपोऽधर्माभावादप्रतिषः । एतचतुष्टयं सहसिद्धम्-अन्यानापेक्षतयाऽनादित्वेन व्यवस्थितम् । अत एव नेश्वरस्य कूटस्थताव्याघातः, जन्यधर्माऽनाश्रयत्वादिति बोध्यम् ॥२॥ तस्य कत्त्वे युक्तिमाह- (१) जिस शक्ति से महान वस्तु अणु हो कर अन्य प्राणियो के लिए अदृश्य ,वन जाती है वह शक्ति अणिमा कही जाती है। (२) जिस शक्ति से गुरु वस्तु लध हो कर सूर्य की किरणो के सहारे सूर्यलोक प्रादि तक जाने में समर्थ हो जाती है वह शक्ति लघिमा कही जाती हैं। (३) जिस शक्ति से लघु परिमारण की वस्तु हाथी और पर्वत आदि के समान विराट हो जाती हैं वह शक्ति महिमा कही जाती हैं। (४) जिस शक्ति से भूमि मे स्थित भी मनुष्य अपनी अंगुलो के अग्र भाग से आकाशस्थ वस्तु का स्पर्श कर सकता है वह शक्ति 'प्राप्ति' कही जाती हैं। (५) प्राकाम्य का अर्थ हे इच्छा का अभिघात न होना । इस शक्ति से मनुप्य जल के समान स्थल मे भी भीतर और बाहर पा जा सकता है। (६) वशित्व का अर्थ है भूत और भौतिक वस्तुओं के विषय मे स्वातन्त्र्य । इस शक्ति से मनुष्य भूत और भौतिक पदार्थों का यथेष्ट विनियोग कर सकता है। (७) ईशित्व का अर्थ है वह सामर्थ्य जिस से मनुष्य भूत और भौतिको के उत्पादन पालन और विनाश करने में समर्थ होता हैं। (८) यत्र कामावसायित्व का अर्थ है सत्य सकल्पता । इसी शक्ति के कारण जगत् के सम्पूर्ण भूत और भौतिक पदार्थ ईश्वर के संकल्पानुसार ही होते हैं । धर्म का अर्थ है प्रयत्नरूप सस्कार । ईश्वर मे अधर्म नहीं होने से उस का धर्म भी पूर्ण रूप से अप्रतिहत होता है। इस प्रकार ज्ञान वैराग्य ऐश्वयं और धर्म-ये चारो चीजें ईश्वर मे सहसिद्ध-नित्य सिद्ध हैं अर्थात् अन्य निरपेक्ष होने के कारण ये चारो अनादि हैं। इसीलिए ईश्वर की कूटस्थता मी व्याहत नहीं होती है, क्योकि वह जन्य धर्म का प्राश्रय नहीं होता। तीमरी कारिका मे ईश्वर के कर्तृत्व को साधक युक्ति बताई गई हैं । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- १ नागो-हस्ती, नगः-पर्वत । २ ‘स्मृत्यर्थदयेग." ॥ २॥२॥११॥ इति सूत्रेण कर्मसज्ञाया विकल्पेन पक्षे षष्ठी।

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना - - मूलम्-अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःग्वयोः । ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्ग वा श्वभ्रमेव वा ॥३॥ अयं-संसारी जन्तुः, आत्मनः सुख-दुःखयोर्जायमानयोः, अनीशः अकर्ता, यतोऽज्ञः =हिताऽहितप्रवृत्ति-निवृत्युपायानभिज्ञः, अतः स्वर्ग वा, श्वभ्रमेव वा नरकमेव वा, ईश्वरप्रे- रितो गच्छेत् , अज्ञानां प्रवृत्तौ परप्रेरणाया हेतुत्वावधारणात् , पश्वादिप्रवृत्तौ तथादर्शनात् , अचेतनस्यापि चेतनाधिष्टानेनैव व्यापाराच्च । अत एव- "मयाऽध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् तपाम्यहमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृजामि च ॥१॥" [गीता- ] इत्यागमेन सर्वाधिष्ठानत्वं भगवतः श्रूयते, इति पातन्जलाः । नैयायिकास्तु वदन्ति- "कार्या-ऽऽयोजन-धृत्यादेः पढात् प्रत्ययतः श्रुतेः । वाक्यात् संख्याविशेपाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः ॥१॥" [न्या०कु०५-१] इति । ( पातञ्जलमतानुसार ईश्वर का जगत्कर्तृत्व ) संसारी जीव को अपने सुखदु ख के उपाय का ज्ञान नहीं होता। 'क्या करने से उस का हित होगा और क्या करने से उस का अहित होगा ?' इस बात को वह स्वय नही सोच पाता । इसलिये अपने सुखदुख का वह कर्ता नहीं हो सकता । अत एव यह मानना आवश्यक है कि जीव ईश्वर की प्रेरणा से ही ऐसे कर्म करता है जिन से स्वर्ग अथवा नरक की प्राप्ति होती है, क्योकि अज्ञो की प्रवृत्ति मे यह प्रेरणा ही कारण होती है-यह सर्व विदित है । पशु आदि की प्रवृत्ति लोक मे प्रेरणा से ही देखी जाती है । यह भी नहीं कहा जा सकता कि-जीव अपने सुख-दुख का उपाय न जानने के कारण अपने सुख-दुख का सपादन स्वय भले न कर सके परन्तु प्रकृति अथवा बुद्धि के व्यापार से उसे सुख-दुख होने में कोई बाधा नहीं हो सकती'। यह कहना इसलिये सभव नहीं हैं कि प्रकृति एव बुद्धि स्वभावत अचेतन होती है, अत एव चेतन के सम्पर्क के विना वह भी सव्यापार नहीं हो सकती क्योकि लोक मे चेतन बढई आदि के सम्पर्क से ही अचेतन कुठारादि मे काण्ठच्छेदन के व्यापार का होना देखा जाता हैं । इसीलिए गीता मे श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा हैं कि-प्रकृति सर्वाध्यक्षभूत हमारे सम्पर्क से ही चराचरात्मक जगत् का सर्जन करती है । मै ही तापक हू और मै ही जल के अवर्षण और वर्षण का कारण हूँ।' ईश्वर के कर्तृत्व के सम्बन्ध मे पातञ्जलो का यही सक्षिप्त दृष्टिकोण है। ( जगत्कर्तृत्व मे नैयायिको का अभिगम ) नैयायिको का इस सम्बन्ध मे दृष्टिकोण दूसरा है । वह ईश्वर को परप्रेरक के रूप मे कर्ता न मानकर साक्षात् उसी को विश्व का कर्ता मानते हैं। उदयनाचार्य ने न्यायकुसुमाञ्जनिग्रन्थ मे 'कार्यायोजनधृत्यादे ०' इस कारिका से ईश्वर मे कर्तृत्व मे सिद्ध करने वाले अनेक अनुमानो का ] [ शा. वा समुच्चय स्त०-३श्लोक-३ अस्याऽर्थः कार्यादीश्वरसिद्धिः, 'कार्य सकळ कम् कार्यत्वात्' इत्यनुमानात् । न च कार्यत्वस्य कृतिसाध्यत्वलक्षणस्य क्षित्यादावसिद्धिरिति वाच्यम्, कालवृत्त्यत्यन्ताभावप्रति- योगित्वे सति, प्रागभावप्रतियोगित्वे सति, ध्वंसप्रतियोगित्वे सति वा सत्त्वस्य हेतुत्वात् । पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धेरुद्देश्यत्वाच्च न कार्यस्य घटादेः सककत्वसिद्दयांऽ- शतः मिद्धसाधनम्, न वा पक्षतावच्छेदकस्य हेतुत्वं दोपः, 'कार्यत्वं साध्यसमानाधिकरणम्' इति सहचारग्रहेऽपि 'कार्य सक कम्' इति बुद्धरभावाच्च । सकेत किया है। उन मे कार्य से ईश्वर का अनुमान पहला अनुमान है जिस का प्रयोग इस प्रकार होता है- [ कार्य-हेतुक अनुमान ] 'कार्य सकर्तृक होता है क्योकि यह कार्य है-इस अनुमानप्रयोग के द्वारा 'कार्य' हेतु से ईश्वर को सिद्धि होती है । इस पर यह शका हो सकती है कि-'कार्यत्व हेतु का अर्थ है कृतिसाव्यत्व और वह पक्ष के अन्तर्गत आनेवाले क्षित्यादि मे प्रसिद्ध है। इसलिए कार्यत्व हेतु के भागासिद्ध हो जाने से उससे सपूर्ण कार्य मे सकर्तृत्व का अनुमान नहीं किया जा सकता । क्योकि उसके लिये समस्त कार्य मे हेतु का होना आवश्यक है" । किन्तु यह शका कार्यत्व हेतु का निम्नोक्त रूप में निर्वचन कर देने पर निर्मूल हो जाती है । जैसे-कार्यत्व का अर्थ है कालवृत्ति-अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी होते हुए भावात्मक होना । इस प्रकार का कार्यत्व क्षित्यादि मे विद्यमान है क्योकि क्षित्यादि भावात्मक है और क्षित्यादि उत्पत्ति के पूर्वकाल मे और क्षित्यादिविनाशकाल मे उसका अत्यन्ताभाव होने से वह काल- वृत्ति अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। कार्यत्व के इस परिष्कृत स्वरूप मे सत्त्व-भावात्मकत्व का सनिवेश ध्वस मे व्यभिचार वारण करने के लिये आवश्यक है। यदि यह फहा जाय कि-"प्राचीन नैयायिक मत मे ध्वस और प्रागभाव के साथ अत्यन्ताभाव का विरोध होने से क्षित्यादि का अत्यन्ताभाव उस के उत्पत्ति के पूर्वकाल तथा विनाशकाल मे नही रह सकता क्वोकि पूर्वकाल मे उस के अत्यन्ताभाव का विरोधी उसका प्रागभाव और विनाशकाल मे अत्यन्ताभाव का विरोधो ध्वस विद्यमान होता है। क्षित्यादि के अस्तित्वकाल मे भी क्षित्यादि का अत्यन्तामाव नहीं रह सकता क्योकि उस समय क्षित्यादि स्वय ही अपने अत्यन्ताभाव का विरोधी विद्यमान होता है । अत. क्षित्यादि मे कालवृत्तिअत्यन्ताभावप्रति- योगित्व सभव न होने से उक्त कार्यत्व हेतु स्वरूपासिद्ध हो जाता है। नवीन नैयायिक मत मे भी उक्त कार्यत्व हेतु से सकर्तृत्व का अनुमान नहीं किया जा सकता क्योकि नित्यद्रव्य कालिक सम्बन्ध से किसी मे भी नहीं रहता' इस मत के अनुसार निस्यद्रव्य कालवृत्तियत्यन्ताभाव का प्रतियोगी भावात्मक वस्तु है किन्तु सफर्तृक नहीं है। इस प्रकार नित्यद्रव्यो मे उक्त कार्यत्व हेतु मे मकर्तृ कत्व का व्यभिचार स्पष्ट है। (कार्यत्व प्रागभावप्रतियोगिसत्त्व) इस दोष का परिहार करने के लिये कार्यत्व को 'प्रागभाव-प्रतियोगित्वे सति सत्व' के रूप मे परि- कृत करना आवश्यक है, किन्तु प्रागभाव न मानने वाले दीधितिकार मादि के मत मे प्रागभाव घटित हेतु असिद्ध हो जाने से उक्तानुमान के द्वारा नित्यादि सकर्तृकत्व की सिद्धि नहीं होती । तथापि ध्वस प्रतियोगित्वे सति सत्त्व' को कार्यत्व मानकर उस से सपूर्ण कार्य मे सकर्तृकत्व का अनुमान करने मे कोई " त्या० क० टीका-हिन्दी विवेचन ] [. - ननु तथापि सकत कत्वं यदि क साहित्यमात्रम् , तदाऽस्मदादिना सिद्धमाधनम् । यदि च क जन्यत्वम् तदा वाधोऽपि, ज्ञानादेरेव जनकतया कतु रजनकत्वादिति चेत् ? न, प्रत्यक्षजन्यत्वत्वेच्छाजन्यत्वत्वादिना साध्यतायामदोपात् । अदृष्टाऽद्वारा जन्यत्वस्य विशेष्यता- संवन्धावच्छिन्नकारणताप्रतियोगिकसमवायावच्छिन्नजन्यत्वस्य वा साध्यत्वाच्च नाऽदृष्टजनका- स्मदादिज्ञानजन्यत्वेन मिद्धसाधनम् , अर्थान्तरं वा वाधा नहीं हो सकती है । यद्यपि-पक्षान्तर्गत आनेवाले घटादि कार्यो मे सकर्तृत्व की सिद्धि होने से अशत सिद्धसाधन होता है अर्थात् कार्यत्वरूप पक्षतावच्छेदक के आश्रय विशेष मे सकर्तृत्वरूप साध्य को सिद्धि होने से कार्य मे सकर्तृकत्व अनुमान का प्रतिरोध प्रसक्त होता है-किन्तु प्रस्तुत अनुमान मे उसे दोष नहीं माना जाता है क्योकि प्रस्तुत अनुमान मे पक्षतावच्छेदक सामानाधिकरण्येन साध्या- नुमिति अर्थात् यावत् पक्ष मे साध्यानुमिति उद्दिष्ट है और यावत् पक्ष मे साध्यानुमिति के प्रति यावत पक्ष मे साध्य की सिद्धि ही प्रतिवन्धक होती है न कि यत्किञ्चित् पक्ष मे साध्य की सिद्धि । उक्तानुमान मे यह भी शफा हो सकती है कि-'पक्षतावच्छेदफ और हेतु एक है इस लिये हेतु मे साध्य का व्याप्तिज्ञान साध्यसिद्धि रूप हो जायगा क्योकि साध्य की व्याप्ति साध्यसामानाधिकरण्य से घटित होती है और पक्षतावच्छेदकात्मक हेतु मे साध्यसामानाधिकरण्य का ज्ञान पक्ष मे साध्यवत्त्व के ज्ञान होने पर ही सभव है अत. हेतु मे साध्य का व्याप्तिज्ञान साध्यसामानाधिकरण्य कुक्षि मे पक्ष मे साध्यप्रकारक होने से साध्यसिद्धि रूप हो जायगा। अत व्याप्तिज्ञान के द्वारा सिद्धसाधन की आपत्ति होगी" :-किन्तु विचार करने पर यह शका उचित नहीं प्रतीत होतो क्योकि साध्यसामा. नाधिकरण्य की कुक्षि मे पक्ष मे साध्य का ज्ञान निर्धमतावच्छेदक होता हैं अर्थात् पक्षतावच्छेदकरूप से पक्ष मे साध्यसम्बन्ध का भान नहीं होता है अत एव व्याप्तिज्ञानात्मक साध्यसिद्धि से पक्षतावच्छेदकाव- च्छिन्न मे साध्यानुमिति का प्रतिबन्ध नहीं हो सकता क्योकि तद्धर्मावच्छिन्न विशेष्यक साध्यानुमिति के प्रति तद्धर्मावच्छिन्नविशेष्यफसाध्यनिश्चय को ही सिद्धिविधया प्रतिवन्धकत्व न्यायप्राप्त हैं । । सकर्तृ कत्व-कर्तृ साहित्य या कर्तृ जन्यत्व ? ] प्रस्तुत अनुमान मे यह शका होती है कि-"सकर्तृ कत्व रूप साध्य का अर्थ यदि कर्तृ साहित्य किया जायगा तो जीवात्मा से सिद्ध साधन हो जायगा, क्योकि कर्ता शब्द से जीवात्मा का समान- कालिकत्व या समानदेशत्व ग्रहण करने पर भी कर्ता का उक्तस्वरुप कर्तृ साहित्य कार्यमात्र मे उपपन्न हो जाता है। और यदि सकर्तृ कत्व का अथ कर्तृ जन्यत्व माना जायगा तो कार्य के प्रति कर्तृ गतज्ञान आदि के ही कारण होने से कर्ता को कार्य का अजनक होने के कारण कर्तृजन्यन्वरूप साध्य की अप्र- सिद्धि हो जायगी। और यदि सकर्तृकत्व का अर्थ जन्यतासम्बन्ध से कर्तृमत्त्व किया जायगा तो कर्त्ता कार्य का अजनक होने के कारण जन्यस्व कर्ता का व्यधिकरण सम्बन्ध होगा इसलिए कार्य मे जन्यत्व- सम्बन्ध से कर्ता का अभाव होने से वाघ हो जायगा । अत प्रस्तुत अनुमान का समर्थन अशक्य है-" किन्तु यह शका अनवकाश है क्योकि प्रत्यक्षजन्यत्व, इच्छाजन्यत्व अथवा कृतिजन्यत्व को साध्य मान लेने पर उक्त दोष का परिहार हो सकता हैं। कार्यमात्र मे अदृष्ट द्वारा जीवात्मा के प्रत्यक्षजन्यत्व, इच्छाजन्यत्व अथवा कृतिजन्यत्व के द्वारा सिद्धसाधन का या जीवात्मा के प्रत्यक्षादि को कार्य मात्र के प्रति किसो साक्षात् सम्बन्ध - २ १० ] [ गावा० समुच्चय-स्त० ३-ग्लो०३ . अथात्र शरीरजन्यत्वमुपाधिः, अटकुरादी साध्यव्यापकतामंदेहे मंदिग्धोपाधिनासाम्रा- ज्यात् , तदाहितयभिचारमंशयेनाऽनुमानप्रतिरोधात् , लायवाद् व्यभिचारज्ञानत्वेनैव व्याप्तिधी- विरोधित्वात् , पक्ष-तत्समयोरपि व्यभिचारमंशयम्य दोपत्वादिति चेत् १ न, प्रकृते ज्ञानत्वादि- कार्यत्वाभ्यां हेतु-हेतुमद्भावनिश्चयात . लायवतर्कारतारे तदपाधिमंशयम्याऽविगेधित्वात् , अनु- कृलतर्कानवतार एव संदिग्धोपाधैर्व्यभिचारसशयाधायकत्वात् , अन्यथा पक्षेतरत्योपाधिशङ्कया प्रमिद्वानुमानस्याऽप्युच्छेदप्रसङ्गात् इत्येके । . से कारण मानकर मिद्धसाधन अथवा अर्थान्तर की आपत्ति का परिहार करने के लिये अदृष्टाद्वारक. प्रत्यक्षादिजन्यत्व को अथवा विशेष्यतासम्बन्धावच्छिन्न प्रत्यक्षादिनिष्ठकारणता निरूपितसमवाय. सम्बन्धावच्छिन्नजन्यत्व को साध्य मानना आवश्यक है। कहने का आशय यह है कि यदि सामान्यरूप से प्रत्यक्षादिजन्यत्व को साध्य माना जायगा तो जीवात्मा के प्रत्यक्षादि द्वारा सिद्धसाधन होगा, क्योकि जीवात्मा के अन्ष्ट से ही समस्त कार्य को उत्पत्ति होती है । और वह अ जीवात्मा के प्रत्यक्ष इच्छा और कृति मे होनेवाले विहित निषिद्ध कों से उत्पन्न होता है। अत कार्यमात्र मे पूर्वसृष्टि मे होनेवाले जीव के पत्यक्षादि को अदृष्ट द्वारा जन्यता सिद्ध होने से सिद्धमाधन होगा अदृष्टाऽद्वारक प्रत्यक्षादि जन्यत्व को साध्य मानने पर इस दोष का परिहार होने पर भी जीव के पूवसृष्टिगत प्रत्यक्षादि को स्यध्वस द्वारा नूतनसप्ट का कारण मान लेने पर कार्यमात्र मे जीव के अदृष्टाऽद्वारक प्रत्यक्षादिजन्यत्व सिद्ध हो जाने से अर्यान्तर हो सकता है। अत समवायसम्बन्ध से कार्य मात्र के प्रति विशेप्यतासम्बन्ध से कर्तृगत उपादान का प्रत्यक्ष. उपादान में कार्य को चिकीर्षा और उपादानविषयक कृति कारण होती है। इस कार्यकारणभाव के आधार पर विशेष्यत्वसम्बन्धावच्छिन्न- प्रत्यक्षादिनिष्ठकारणतानिरूपितसमवायसम्बन्धावच्छिन्न जन्यत्व को साध्य मानना आवश्यक है। ऐसा मानने पर पूर्वमृष्टिगत जीवात्मा के प्रत्यक्षादि के द्वारा सिद्धमाधन नहीं हो सकता, क्योकि यणुकादि के उपादानकारण परमाणु आदि का प्रत्यक्ष जीव को पूव सृष्टि मे मो नहीं होता और यदि फयश्चित् अलौकिक प्रत्यासत्ति से परमाणु आदि का प्रत्यक्ष जीव को माना जाय तो वह नवीन सृष्टि मे होनेवाले द्वचणुकादि का विशेष्यतासम्बन्ध से कारण न हो सकेगा क्योकि विशेष्यता ज्ञानसमान- कालोन होती है । अत नवीन सृष्टि के पहले पूर्वसृष्टि का जीवगतप्रत्यक्ष विशेष्यतासम्बन्ध से द्वयगु- कादि के उपादान कारणो मे नहीं रह सकता, इसलिये जीवात्मा के प्रत्यक्षादि को लेकर कार्यमात्र मे इस परिष्कृत प्रत्यक्षादिजन्यत्वरूप साध्य के सम्भव न होने से जीवात्मा के प्रत्यक्षादिद्वारा सिद्धसाधन या अर्थान्तर नहीं हो सकता। [शरीरजन्यत्व उपाधि शका का समाधान] इस सन्दर्भ मे यह शका हो सकती है-“कार्यत्व हेतु शरीरजन्यत्व रुप उपाधि से ग्रस्त है क्योंकि सकर्तृकत्वरूपसाध्य घटपटादि जिन कार्यों में सिद्ध है उन मे शरीरजन्यत्व भी सिद्ध है, अत शरीरजन्यत्त सकर्तृकत्व रूप साध्य का व्यापक है । एव कार्यत्व के आश्रय अडकुरादि मे शरीरजन्यत्व का अभाव होने से वह कार्यस्वरूप साधन का अव्यापक भी है। अतः उपाधिनस्त होने के कारण प्रस्तुत स्या० क० टीका-हिन्दी विवेचन ] [ ११ परे तु- स्वोपादानगोचरा स्वजनकाऽदृष्टाऽजनिका या कृतिस्तदजन्यं समवेतं जन्यं स्वोपादानगोचरस्वजनकादृष्टजनकान्याऽपरोक्षज्ञान-चिकीर्पाजन्यम् , कार्यत्वात् । घटादावंशतः अनुमान से वादि के अभिमत की सिद्धि नहीं हो सकती। यदि यह कहा जाय कि-'अङ्कुरादि मे सकर्तृ- कत्व का सन्देह है किन्तु शरीरजन्यत्व का अभाव निश्चित है अत शरीरजन्यत्व मे साध्यसकत कत्व की व्यापकता का निश्चय न हो सकने से शरीरजन्यत्व उपाधि नहीं हो सकता।' तो यह ठीक नहीं है क्योकि निश्चित उपाधि न होने पर भी अङ्कुरादि द्वारा शरीरजन्यत्व मे साध्य व्यापकता का सन्देह होने से सन्दिग्धोपाधि का होना अनिवाय है । यदि यह शफा की जाय-'सन्दिग्धोपाधि होने से भो कोई दोष नही हो सकता क्योकि सन्दिग्योपाधि के व्यभिचारसन्देह से हेतु मे साध्यव्यभिचार का सन्देह ही हो सकता है निश्चय नहीं हो सकता । और व्यभिचार सदेह व्याप्तिज्ञान विरोधी न होने से हेतु मे साध्यव्याप्ति का निश्चय हो कर अनुमिति के होने मे कोई बाधा नहीं हो सकती'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि व्याप्ति ज्ञान के प्रति व्यभिचारनिश्चयत्वरूप से व्यभिचारज्ञान को प्रतिवन्धक मानने मे गौरव है । अत लाघव को द्रष्टि से व्यभिचारज्ञानत्वरूप से ही व्यभिचारज्ञान व्याप्ति ज्ञान का प्रतिबन्धक है अत एव व्यभिचारसशय से भी व्याप्तिनिश्चय का प्रतिबन्ध हो जाने के कारण सन्दिग्धोपाधि का भी अनुमानविरोधित्व अपारहार्य हैं । यद्यपि सन्दिग्धोपाधि के व्यमिचार के सशय से हेतु मे साध्यव्यभिचार का सशय पक्ष मे ही होगा, तो भी कोई हानि नहीं है क्योकि पक्ष और पक्ष. सन्देह के द्वारा भी हेतु मे साध्यव्यभिचार का सशय अनुमान मे दोष रूप हो सकता है। यदि यह शङ्का को जाय “पक्ष मे साध्य का संशय होने के कारण पक्ष द्वारा सर्वत्र हो हेतु मे साध्यव्यभिचार का सन्देह हो सकता है. अत व्यभिचार सशय को अनुमान का दोष मानने पर अनुमान मात्र का उच्छेद हो जायगा" तो यह ठीक नहीं है, क्योकि पक्ष मे साध्यनिश्चय की दशा मे हेतु मे साध्यव्यभिचार का सशय न होने से सिषाधयिषा से पक्ष मे साध्यानुमान हो सकता है, क्योंकि अनु- मिति मे पक्षताविधया सिषाधयिषाविरहविशिष्टसियभाव ही कारण होता है । फलत शरीरजन्याव रूप उपाधि से ग्रस्त होने से प्रस्तुत अनुमान द्वारा ईश्वर को सिद्ध करने की आशा करना दुराशा मात्र है।" -किन्तु विचार करने पर इस अनुमान मे शरीरजन्यत्व को लेकर उपाधिग्रस्तता को औचित्य सिद्ध नहीं होता । क्योकि कायसामान्य और ज्ञानादिसामान्य मे कार्य-व और ज्ञानत्व आदि रूप से कार्य कारणभाव निश्चित है, क्योकि इस कार्य कारण भाव मे लाधव है। और इस लाधव तर्क के कारण उपाधिसशय कार्यत्व मे ज्ञानादिजन्यत्व की व्याप्ति के निश्चय मे वाधक नही हो सकता। सन्दिग्धोपाधि से हेतु मे साध्यव्यभिचार का सशय उसी दशा मे होता है जब हेतु मे साध्यव्याप्ति- का निश्चायक कोई अनुकूल तर्फ न हो। और यदि अनुकुल तर्क रहने पर भी सन्दिग्धोपाधि से हेतु मे साध्यव्यभिचार का सशय होगा तो पक्षेतरत्वरूप उपाधि की शङ्का होने से पवत मे वह्नि के प्रसिद्ध अनुमान का भी उच्छेद हो जायगा। इस प्रकार विचार करने से प्रस्तुत अनुमान के प्रयोग में कोई दोष नहीं है । ऐसा कितनेक विद्वान् कहते हैं । (सकर्तृ कत्व-स्वोपादानगोचरस्वजनकादृष्टाऽजनकप्रत्यक्षादिजन्यत्व) अन्य विद्वान् कार्य सकर्तृक, कार्यत्वात्' इस अनुमान की व्याख्या इस रूम मे करते हैं कि प्रकृत अनुमान में सपूर्ण कार्य पक्ष नहीं है किन्तु वह काय पक्ष है जो समवेत होता है और अपने शङ्का का १०] [शा०वा समुच्चय-म्न ३ ग्लो०३ . मिद्वमाधनधारणाय तदजन्यान्तम् , तादृशकृतिजन्यं यत् यत्स्वं तदिन्नन्यं तदर्थः; नातो द्वघ- गुकादरुपादानगोचरतादृशकृत्यप्रमिया पक्षत्वाभावप्रमड्गः । तत्र शब्द-फन्कागदेरपक्षत्वे संदिग्धमाध्यकत्वेन तवाऽनैकान्तिक्त्वमशयः स्यात , अतः प्रनियोगिकोटी गोचगन्तम् : शब्दादमृदङ्गादिगोचरताशकृतिजन्यत्वेऽपि न म्बोपादानगोचरतादृशकृतिजन्यत्वमिति न उपादान कारण विषयक ऐमो कृति मे अजन्य होता है जो उनके जनक मन्ट को उत्पादक नहीं होती । ऐसे कार्य को पक्ष बनाने के लिये स्वोपादानगोचर वजनकप्टाजनककृति अजन्य समवेतजन्यत्व को पक्षतावच्छेदक मानना आवश्यक होता है। और इस प्रकार के धर्म को पक्ष- तावच्छेदक बनाने पर मक कत्वत्प साक्ष्य के स्वस्प को भी बदलना होता है । फलत मस्र्तृ कत्व का प्रय हो जाता है स्वोपादान-गोचरस्वजनकाटाजनकप्रत्यक्षादिजन्यत्व । इम का आशय यह है कि जो कार्य स्योपादनगोचर और स्वजनकअदृष्टाऽजनक्कृति से अजन्य होते हुये समवेत होता है वह स्वोपादानगोचर और स्वजनकअष्टाजनक प्रत्यक्ष से जन्य होता है। उक्त मूल अनुमान की इस प्रकार व्यारया कर देने पर पक्षतावच्छेदक का जो म्वरप प्रस्तुत होता है उम मे तोन अश है जैसे स्वोपादानगोचरस्वजनकानप्टाजनककृत्यजन्यत्व, समवेतत्व और जन्यत्व । इन मे प्रथम अश का त्याग कर देने पर घटादि काय मा पक्षान्तर्गत हो जाता है और उन मे सकर्तृ कत्व सिद्ध है इसलिये अशत सिद्धप्ताधन अर्थात् पक्षनावच्छेदक सामानाधिकरप्येन साध्यमिद्धि रूप बाधक को उपस्थिति ने अनुमितिप्रतिरोध को प्रापत्ति होती है। इस दोष के परिहार के लिये अजन्यत्व-पर्यन्त अंश का पक्षतावच्छेदक कोटि मे सनिवेश आवश्यक है। इस प्रश का सनिवेश करने पर वटादि पक्षान्तर्गत नहीं होता है क्योंकि वे स्वोपादानगोदर स्वजनकअदृष्टाजनक कुलाल की कृति से जन्य होते हैं । अजन्यत्वान्त अश मे स्व पद से जन्य को ग्रहण करना अभीप्ट है अजन्य को नहीं । इसलिये अजन्यत्वान्तमाग का अर्थ है स्वोपादानगोचर-स्वजनक अदृप्टाजनक कृति से जन्य जो जो हैं तद् तद् भिन्नत्व । यदि स्व पद से अजन्य का ग्रहण किया जायगा तो व्यणुकादि पक्ष न हो सकेगा क्योकि व्यणुकादि के उपादान को विषय करनेवाली द्वयणुकादिजनकअनुप्ट को अजनक कोई कृति प्रसिद्ध नहीं है, इसलिये स्वपद से घ्यणुकादि का ग्रहण न हो सकने से वह स्वोपादान गोचर स्वजनक अदृष्टाजनक कृत्यजन्यशब्द से पक्षविधया उपन्यस्त नहीं हो सकता है। फलत उस के कर्ता रूप मे ईश्वर की सिद्धि असंभव हो जायेगी। ('उपादान गोचर' पदको सार्थकता) इस अंश मे भी कृति मे यदि स्वोपादानगोचर विशेषण न देकर स्व-जनक अनुप्टाजनक कृति- जन्य भिन्नत्व मात्र को ही पक्षतावच्छेदक को कोटि मे निवेश किया जायगा तो मृदङ्गादि को बजाने से उत्पन्न होने वाला शब्द और वायु का फुकार पक्षान्तगत न हो सकेगा। क्योंकि मृदङ्गादि बजाने से उत्पन्न होनेवाला शब्द स्वजनक अनुष्ट के अजनक मदडगादिगोचर मदडगादिवादक कृति से जन्य होने के कारण ताशकृतिजन्य भिन्न नहीं होगा। क्योंकि फुत्कार भी फुत्कार के निमित्त. भूत यन्त्र विषयक कृति से जन्य है जो कृति फूत्कारजनक अप्ट का अजनक है इसलिये वह भी स्वजनक अष्टाजनककृतिजन्य भिन्न नहीं है । जब शब्द और फुत्कार पक्ष से बहिर्भूत हो जायेंगे तो उन मे साध्य का सन्देह होने से हेतु मे साध्यव्यभिचार का सन्देह हो जायगा। किन्तु कृति मे स्वोपादानगोचरत्व का निवेश कर देने पर शब्द और फुत्कार को पक्षान्तर्गत होने में कोई वाघा - स्या० क० टीका-हिन्दी विवेचन ] १३ दोपः । मन्त्रविशेपपाठपूर्वकस्पर्शजन्यकांश्यादिगमनम्य स्पर्शजन्याऽदृष्टद्वारा स्वोपादनकाश्यगो- चरस्पर्शजनकजन्यकृतिजन्यस्याऽपक्षत्वे तत्र संदिग्धानेकान्तिकत्वं स्यात् , एवं स्वोपादानशरी- रगोचरोचरणादितपःकृतिजन्यकालशरीरीयगौररूपादौ तत् स्यात् । अतस्तरकोटौ 'स्वजनक०' इत्यादि, काश्यचालनादिकं तु स्वजनकाऽदृष्टजनकजन्यकृतिजन्यमेवेत्यदोपः । ध्वंस-गगनैक- त्यादिवारणाय 'समवेतम्' इति, 'जन्यमिति च । शब्द-फूत्कारादौ सिद्धसावनवारणाय साध्ये गोचरान्तम् । उक्तकांश्यचालनादौ तद्वारणाय 'स्वजनक०' इत्यादि । नहीं होगी, क्योकि उन के जनक अदृष्ट-अजनिका मृदङ्गादिगोचर कृति उन के उपादान आकाश और घायु को विषय नहीं करती। अत वे स्वोपादानगोचर स्वजनकअनुष्टाजनक कृति जन्य भिन्न हो जाते हैं। - [स्वजनकादृष्टाजनक-पद को सार्थकता इसी प्रकार यदि कृति मे स्वजनक अनुष्टाजनकत्व का सनिवेश न कर स्वोपादानगोचर कृति जन्यभिन्नत्व मात्र को पक्षतावच्छेदक का घटक माना जायगा तो काश्य पात्र को वह गति जो मन्त्र- विशेष के पाठ के साथ होनेवाले स्पर्श से उत्पन्न होती है-पक्षान्तगत न हो सकेगी। क्योकि वह भी अपर्ने उपादानभूत काश्यपात्र को विषय करने वाली स्पर्श जनक कृति से जन्य है । अत वह स्वोपादान गोचर-कृतिजन्यभिन्न नहीं हो सकती । इसी प्रकार कृष्णवर्ण के शरीर मे उत्पन्न होनेवाला वह गौर रूप भी पक्षान्तर्गत न हो सकेगा जो अधोमुख और ऊर्ध्व पाद की अवस्था मे शरीरस्थापनरूप तपश्चर्याको कृति से उत्पन्न होता है, क्योकि वह भी अपने उपादान कारण शरीर को विषय करने वाली ऊर्ध्व मुख अध पादादि-तप को कृति से जन्य होने के कारण स्वोपादान गोचर कृति जन्य भिन्न नही होता है । फलत. काश्य पात्र को उक्त गति और कृष्णशरीर के उक्त गौर रूप के द्वारा हेतु मे साध्य व्यभिचार का सन्देह होने से अनुमिति का प्रतिरोध हो जायगा और कृति मे जव स्वजनक अष्टाजनकत्व का निवेश करते हैं तव यह दोष नहीं हो सकता, क्योकि काश्यपात्र को गति काश्यपात्रगोचर स्पर्शजनक कृति से अदृष्ट द्वारा उत्पन्न होती है। और कृष्णशरोर गत उक्त गौर रूप भी स्वोपादानगोचर अधोमुख उर्ध्वपादादि रूप तप की कृति से अष्ट द्वारा हो उत्पन्न होता है । अत एव उक्त गति और उक्त रुप स्वोपादानगोचर स्वजनक अदृष्ट जनक कृति से ही जन्य होने के कारण स्वोपादानगोचर स्वजनकअष्टाजनककृतिजन्य भिन्न होने से पक्षान्तर्गत हो जाते हैं। (समवेतत्व और जन्यत्व का उचित निवेश) दूसरा अश है 'समवेतत्व' । इस अश का पक्षतावच्छेदक कोटि मे सनिवेश न करने पर ध्वस भी पक्षान्तर्गत हो जाता है । और उसमे साध्य का बाघ होने से पक्षतावच्छेदकाऽवच्छेदेन अनुमिति का प्रतिबन्ध हो जाता है। अत समवेतत्व अश का पक्षतावच्छेदक कोटि मे प्रवेश आवश्यक है। तीसरा अश है 'जन्यत्व'-इस अश का भी पक्षतावच्छेदक कोटि मे सनिवेश आवश्यक है अन्यथा आकाशगत एकत्व-परिमाणादि नित्य गुण भो पक्षान्तर्गत हो जायेंगे और उन मे साध्य का बाध होने से पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन अनुमिति का प्रतिरोध हो जायगा।

१४ [ शा०या० ममुच्चय स्त०३-लोक 3 . - न च माध्ये पक्षे च गोचगन्तद्वयं माऽस्तु, मृदङ्गादिगोचरकृतिजन्यशब्दादिम्तु पक्षवहि- भूत एव दृष्टान्तोऽस्त्विति वाच्यम् , अाटेतरव्यापारद्वाराऽम्मदादिकृतिजन्यन्वमिद्वयाऽर्थान्तर- प्रसङ्गवारणाय साध्ये तन्निवेशावश्यकत्वे, शब्दादावन कान्तिकत्वमंशयवारणाय पक्षेऽपि तदारश्यकत्वात् , तादृशशब्दादिक तयापि भगवत्मिद्धये पसे ननिवेशेऽशंतः मिद्रमाधनवार- णाय माध्ये तन्निवेशावश्यकत्वाच्च । एतेन 'म्बजनकाऽदृष्टजनकान्यत्वमप्युभयत्र माऽस्तु' इत्यपास्तम् , तादृशकाश्यचालनादिक तयाऽपि भगवत्मिद्धयर्थ पक्षे नदपादाने माध्येऽप्या- वश्यकत्वात् । यदि च 'स्वजनकादृष्टजनककृतेर्न स्वजनकत्वम् , मानाभावात्' इति विभा. व्यते, तढा पक्षे तद् नोपादेयम् ; माध्ये तु देयमेव, अन्यथा मर्गान्तरीयनानादीनां द्वयणुका- ग्रुपादानाऽगोचरत्वेन द्वयणुकादी सिद्बसाधनाभावेऽप्युक्तकाश्यचालनादावदृष्टजनककतिजन्य- त्वमिद्वयाऽर्थान्तगपत्तेर्वस्तुगत्या म्वोपाटानगोचरकृतिजन्य यत् तत्वावच्छिन्नभेटकूटवन्वेन काश्यचालनाटेरपि पक्षान्तर्गतत्वात्' इत्याहुः । (कृति मे स्वोपादानगोचरत्व का उचित निवेश) सफर्तृकत्वरूप साध्य को स्वोपादानगोचर स्वजनकप्टाजनक प्रत्यक्षादि जन्यत्व रूप मे प्रस्तुत किया गया है। यदि साध्य के इस प्रस्तुत रूप में कृति मे स्वोपादानगोचरत्व का सनिवेश न किया जायगा तो मृदगवादनजन्य शब्द और वायुगत फुत्कारादि मे स्वजनक अटप्ट का अजनक मृदङ्गादि गोचर प्रत्यक्षादिजन्यत्वके सिद्ध होने से अशन सिद्धसाधन होगा। अत उस के वारण के लिये साध्य के शरीर मे कृति अश मे स्वोपादान गोचरत्व का निवेश आवश्यक है । इसी प्रकार मन्त्रविशेष पाठपूर्वक स्पश से उत्पन्न होनेवाली काश्यपान की गति मे स्व के उपादान काश्यपात्र को विषय फरनेवालो स्पर्शजनक कृति का जन्यत्व रहने से और अधोमुख ऊर्य चरणादि रूप तप की कृति से उत्पन्न होनेवाले कृष्णशरीरगत गौरस्प मे स्वोपादान शरीर गोचर कृति जन्यत्व रहने से अशत सिद्धसाधन होगा। अत इस दोष के निवारणार्थ साध्य के शरीर मे कृति अश मे स्वजनक- अन्टाजनकत्व का निवेश आवश्यक है । इस निवेश से उक्त अशन मिद्ध साधन दोष का परिहार हो जाता है. क्योंकि कश्यपात्र की गति को उत्पन्न करनेवाली काश्यविपरिणी स्पशनिका कृति उस गति के जनक अदृष्ट का जनक होती है-अजनक नहीं होती है । और कृष्ण शरीर मे गौररुप उत्पन्न करनेवाले अधोमुख उर्वचरणादिरूप तप की कृति भी उक्त रुप के जनक अदृष्ट का जनक ही होती है अजनक नहीं होती है । अत: काश्य को उक्त गति और कृष्णशरीरगत उक्त गौररूप में स्वोपादानगोचरस्वजनफअदृष्टाजनक कृत्यादि जन्यत्व सिद्ध न होने से अशत सिद्धसाधन नहीं हो सकता है। इस सदभं मे यह प्रश्न हो सकता है कि-"साध्य और पक्ष दोनो ही के शरीर मे स्वोपादान. गोचरत्व का निवेश न किया जाय और उस निवेश के अभाव मे मृदडगादिगोचर कृति से उत्पन्न होनेवाले शब्दादि को पक्ष से बाह्य दृष्टान्त माना जाया, अत उस के द्वारा हेतु मे साध्य के व्यभिचार को शका कैसे हो सकती है" ?-किन्तु इस प्रश्न के उत्तर मे यह कहना पर्याप्त है कि १५] [ शास्त्रवार्तासमुच्चय स्त० ३-श्लो० ३ अन्ये तु द्रव्याणि ज्ञाने-च्छा-कृतिमन्ति, कार्यवत्त्वात् , , कपालवत् । साध्यता विशेष्यतया, हेतुता च समवायेन, पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यसिद्धेरुद्देश्यत्वाद् नांशतः पक्ष मे अदष्ट से भिन्न किसी व्यापार के द्वारा प्रस्मदादि की कृतिजन्यता मान लेने पर अर्थान्तर की प्रसक्ति होगी। अत. उस के वारण के लिये साध्य के शरीर मे स्वोपादानगोचरत्व का निवेश आवश्यक होगा। अस्मदादि की कृति द्वयणुक के उपादान को विषय नहीं करती इसलिये अर्थान्तर को आपत्ति नही हो सकती । इस प्रकार साध्य मे स्वोपादानगोचरत्व का सनिवेश प्रोवश्यक हो जाने पर पक्ष मे भी उस का निवेश करना आवश्यक होगा। अन्यथा मृदङ्गादिवादन से होने वाले शब्द के द्वारा हेतु मे शब्द व्यभिचार की शका को आपत्ति होगी। क्योकि पक्ष मे स्वोपादानगोचरत्व का निवेश न होने पर उक्त शब्द पक्ष बहिर्भूत हो जाता है और उस मे स्वोपादानगोचर स्वजनक अदृष्टाजनक कृतिजन्यत्वरूप साध्य का सन्देह होता है । इस के अतिरिक्त दूसरी बात यह है कि यदि मृदङ्गादि से उत्पन्न होनेवाले राब्दादि के कर्त्तारूप में भी परमेश्वर की सिद्धि करनी हो तो उसे पक्षान्तर्गत बनाने के लिये पक्ष मे स्वोपादान- गोचरत्व का निवेश करना होगा, और उस स्थिति मे उसमे स्वोपादान गोचरत्व से अघटित साध्य के सिद्ध होने से अशत सिद्धसाधन की आपत्ति होगी, अत उस के वारणाय साध्य मे भी स्वोपादानगो- चरत्व का निवेश आवश्यक होगा। इस प्रसग से यह सुझाव कि-'स्वजनक अदष्टाजनकत्व का सनिवेश साध्य और पक्ष दोनो मे न किया जाय'-उचित नहीं है। क्योकि काश्यपात्र को उक्त गति और कृष्ण शरीर से उत्पन्न होनेवाले उक्त गौर रूप के कर्त्तारूप मे भी ईश्वर की सिद्धि करने के लिये पक्ष मे कृत्यश मे स्वजनक- अदृष्टाजनकत्व का निवेश करना होगा और उस स्थिति मे साध्य मे भी उस अश के निवेश की आवश्यकता अपरिहार्य होगी। अन्यथा उक्त गति और उक्त रूप मे अशत सिद्धसाधन की प्रापत्ति होगी। यदि यह कहा जाय कि-'स्वजनक अटण्ट को उत्पन्न करनेवाली कृति स्व का जनक नहीं हो सकती है क्योकि उसे स्व का कारण मानने मे कोई प्रमाण नहीं है । उस दशा मे पक्ष मे स्वजनक अनुष्टाजनकत्व के निवेश की अावश्यकता न होगी। किन्तु शाब्द मे उस का निवेश करना ही होगा। क्योकि शाब्द मे उसका निवेश न करने पर पूर्व सर्ग के अस्मदादिके ज्ञानजन्यत्व को लेकर द्वयणुकादि मे सिद्धसाधन नहीं हो सकता क्योकि पूर्व सर्गका अस्मदादि का ज्ञान भी द्वयणुकादि के उपादान को विषय नहीं करता"-तब भी उक्त काश्यपात्र की गति मे और कृष्णशरीरगत गौर रूप मे अर्थान्तरको आपत्ति हो सकती है यदि उन्हें स्वजनक अदष्ट को उत्पन्न करनेवाली कृति से जन्य मान लिया जाय, क्योकि स्वोपादानगोचर कृषिजन्य जो जो वस्तु हैं वे सभी वस्तुओ का भेदकुट उक्त गति और उक्त रूप मे विद्यमान है। अत उक्त गति और उक्न रूप मी पक्षान्तर्गत हो जाते हैं। यह भी अन्य विद्वानो का मत है। [द्रव्यपक्षक कार्यवत्ताहेतुक अनुमान] अन्य विद्वान कार्य मे सकर्तृकत्व साधक अनुम न का इस रप मे प्रयोग करते हैं कि-'द्रव्य ज्ञानेच्छाकृतिमान होते हैं क्योकि वे कार्यवान् होते है जैसे कपाल ।" इस अनुमान मे द्रव्य पक्ष है और ।

१६ ] [ शास्त्रवार्तासमुच्चय स्त० ३ श्लो० ३ सिद्धसाधनम् । न च बहिरिन्द्रिग्राह्यत्वमुपाधिः, :, अनुकूलतर्केण हेतोर्व्याप्यतानिर्णये तदन- वकाशात् । न च त्रितयस्य मिलितस्य साध्यत्वेऽप्रयोजकत्वम् , मिलितत्वेनाऽहेतुत्वात् , प्रत्येक माध्यत्वे ज्ञाने-च्छावत्त्वेन साधने सर्गान्तरीयज्ञानादिना सिद्धमाधनमिति वाच्यम् , मिलितत्वेन साध्यत्वेऽपि कार्यकारणभावत्रयस्य प्रयोजकत्वात् । 'सर्गाद्यकालीनं द्रव्यं ज्ञान- वत्' कार्यत्वात् , पक्षतावच्छेदककालावच्छेदेन साध्यसिद्धेः-इत्यप्याहुः । ज्ञान इच्छा और कृति विशेष्यता सम्बन्ध से साध्य हे और कार्य समवाय सम्बन्ध से हेतु है । स्पष्ट है कि समवाय सम्बन्ध कोई भी कार्य द्रव्य मे ही होता है । और जो कार्य जिस द्रव्य मे होता है उस द्रव्य मे उस कार्य के उपादान भूत द्रव्य का ज्ञान और उस के उपादान भूत द्रव्य मे उस कार्य की चिकीर्षा और उस कार्य के उपादानभूत द्रव्य को विषय करनेवाली उस कार्य की विधायिका कृति विशेष्यता सम्बन्ध से रहती है । इस अनुमान मे अशत सिद्धसाधन की प्रसक्ति प्रतीत होती है क्योकि पक्ष के अन्तर्गत आनेवाले कपालादि द्रव्यो मे घट के उत्पादक ज्ञान इच्छा और प्रयत्न विशेष्यता सम्बन्ध से सिद्ध है। किन्तु यह अशत सिद्ध साधन इस अनुमान को दूषित नही कर सकता, क्योकि उस मे पक्षतावच्छेदकीभूतद्रव्यत्वावच्छेदेन साध्य की सिद्धि उद्देश्य है। इसलिये पक्षतावच्छेदक से प्राकान्त होने वाले द्रव्यो मे परमाणु और द्वचणुक भी आते हैं और उन मे कम से और उन मे कम से द्वयणुक और व्यणुक के उत्पादक ज्ञानेच्छाकृति विशेष्यता सम्बन्ध से सिद्ध नहीं है, क्योकि परमाणु और द्वयणुक अस्म- दादि के ज्ञान इच्छा प्रयत्न के विषय नहीं होते है। प्रत उन मे विशेष्यता सम्बन्ध से ज्ञानेच्छाकृति की सिद्धि ईश्वर के ज्ञानादि द्वारा ही हो सकती है। इस अनुमान मे बहिरिन्द्रियग्राह्यत्व को उपाधित्व समावित है, क्योकि ज्ञानेच्छाकृतिल्प साध्य विशेष्यतासम्बन्ध से जिन कपालादि द्रव्यो मे सिद्ध हे उन मे बहिरिन्द्रियग्राह्यत्व है। इसलिये वह साध्य का व्यापक है। और कार्यरूप साधन समवाय सम्बन्ध से परमाणु और द्वयणुकादि मे भी है किन्तु उस मे बहिरिन्द्रियग्राह्यत्व नहीं है इसलिये वह साधन का अव्यापक भी है । किन्तु इस उपाधि से प्रस्तुत अनुमान का विरोध नही हो सकता क्योकि कार्य को यदि ज्ञानेच्छाकृति का व्यभिचारी माना जायगा तो कार्य के प्रति ज्ञानादि की सर्वसम्मत कारणता का लोप हो जायगा। इस अनुकूल तर्क से कार्यात्मक हेतु मे ज्ञानेच्छाकृति रूप साध्य की व्याप्ति का निर्णय उक्त उपाधि के द्वारा अवरुद्ध नहीं हो सकता क्योकि अनुकुल तर्क के अभाव मे ही उपाधि-व्यभिचार से हेतु मे साध्य- व्यभिचार की अनुमिति होने से हेतु मे साध्य व्याप्ति के निर्णय का प्रतिरोध हो कर अनुमिति का अवरोध होता है जो प्रस्तुत अनुमान मे कार्यसामान्य के प्रति ज्ञानेच्छाकृति के सर्वसम्मत कारणता स्प अनुकूलतर्फ के नाते सभव नहीं है। (मोलित या पृथक् ज्ञानादि को साध्यता पर आक्षेप) इस अनुमान मे यह शका हो सकती है कि "ज्ञानेच्छाकृति इन तीनो को मीलितरुप मे साध्य माना जायगा तो अप्रयोजक व दोष होगा अर्थात् कार्यात्मक हेतु तीनो को मीलित रूप मे सिद्ध न कर सफेगा क्योकि कार्य के प्रति ज्ञानेच्छाकृति को मीलितरुपसे कारणता न मानकर पृथक् पृथक् ही कारगता मानी जाती है । और यदि ज्ञानेच्छाकृति को अलग अलग साध्य माना जाय तो द्रव्य मे विशेष्यता .

स्या० का टीका-हिन्दी विवेचन ] १७ । 'क्षित्यादिकं सकट कं, कार्यत्वात्' इत्येवाऽनुमानम् , प्रकृतविचारानुकुलविवाद- विषयत्वेन च क्षित्यादीनामनुगमः, सकदकत्वं च प्रतिनियतक निरूपितः संवन्धो व्यवहार- साक्षिको घटादिदृष्टान्तदृष्टो नित्यवर्गव्यावृत्त इति नानुपपत्तिः-इत्यपि केचित् । सम्बन्ध से ज्ञान और इच्छा का साधन करने पर पूर्व सर्ग के योगिज्ञान और इच्छा को लेकर सिद्ध- साधन हो जायगा। क्योकि पूर्व सर्ग मे सामान्य मनुष्यो को परमाणु और द्वयणुक का प्रत्यक्षज्ञान और उन मे द्वचणुक और व्यणुक रूप कार्य की चिकीर्षा न होने पर भी योगी को परमाणु और द्वयणुक का ज्ञान और उन मे द्वयणुक और व्यणुकरूप कार्य को चिकीर्षा योगबल से अवश्य हो सकती हैं। इस प्रकार पूर्व सर्ग के योगीजान और योगी की इच्छा को लेकर सिद्धसाधन की प्रसिद्धि होगी।" किन्तु विचार करने पर यह शका उचित नहीं प्रतीत होती है क्योकि ज्ञानेच्छाकृति को मिलितरूप से साध्य मानने पर भी अप्रयोजकत्व दोष नही हो सकता, क्योकि ज्ञानेच्छाकृति तीनो मे मीलित रूप से कार्य के प्रति एक कारणता न होने पर भी उन तीनो मे कार्य की जो पृथक पृथक् तीन कारणताएँ हैं यह ही प्रयोजक हो जायगी। क्योकि कार्य यदि मीलित तीनो का व्यभिचारी होगा तो भी उक्त तीनो कारणताओ के लोप की आपत्ति होगी। कुछ विद्वान उक्त आपत्ति के भय से प्रकृत अनुमान का अन्य रूप मे प्रयोग करते है। जैसे सृष्टि के प्रारभ काल मे स्थित द्रव्य विशेष्यता सम्बन्धसे ज्ञानवान है, क्योकि उस मे समवायसम्बन्ध से कार्य होता है।' इस प्रकार के अनुमान मे पूर्वसर्ग के योगीज्ञान के द्वारा सिद्धसाधन की आपत्ति नहीं हो सकती क्योकि इस अनुमान मे सृष्टि का प्रारमकाल पक्षतावच्छेदक है और तत्कालावच्छेदेन ज्ञान की सिद्धि उद्देश्य है । पूर्व सर्ग का ज्ञान परमाणु आदि द्रव्यो मे सृष्टिके प्रारम्भकालावच्छेदेन नहीं रह सकता क्योकि सष्टि के प्रारमकाल मे पूर्वसर्ग का ज्ञान विद्यमान नहीं होता। [क्षित्यादि-पक्षक अनुमान] कतिपय विद्वान 'कार्य सकर्तृक कार्यत्वात् -इस प्रकार के अनुमान का प्रयोग न कर 'क्षित्यादिक सकर्तृक कार्यत्वात्' इसी प्रकार के अनुमान का प्रयोग करते है । उनके अनुसार-क्षित्यड्कुरादि अनेक कार्यो का अनुगम, प्रकृत विचार का प्रयोजक जो विवाद, उस विवाद के विषयत्वरूप से हो जाता है। प्रत क्षिति प्रादि तादशविवादविषयत्वरूप एक अनुगत धर्म के द्वारा पक्ष बन जाते हैं। इसलिये क्षितित्व अडकुरत्वादि धर्मोके अननुगत होने पर भी उन सभी को पक्ष होने मे कोई बाधा नहीं होती। उन विद्वानोके अनुसार सकर्तृ कत्वरूप साध्य भी कर्तृजन्यत्व' या कृतिजन्यत्व रूप न होकर कर्तृ निरूपित सम्बन्धरूप होता है जो कि 'अमुक कार्य अमुककर्तृमान है' इस व्यवहार से सिद्ध है, और नित्य पदार्थों मे नहीं रहता क्योकि नित्यपदार्थो मे 'कर्तृ मान' इस प्रकार का व्यवहार नहीं होता । कर्ता का यह सम्बन्ध घट आदि दृष्टान्त मे सिद्ध है, क्योकि 'घट कर्तृमान-घट कर्तृमान' इस प्रकार का व्यवहार सर्वमान्य है । इस प्रकार 'क्षित्यादिक सकर्तृक' इस अनुमान से क्षिति अड्कुरादि कार्यो मे कर्ता का नियत सम्बन्ध सिद्ध होता है । और वह सम्बन्ध अस्मदादि को कर्ता मानकर नही उत्पन्न हो सकता। क्योकि 'क्षित्यादिक अस्मदादिकर्तृक' यह व्यवहार नहीं होता । अत उक्त अनुमान द्वारा क्षित्यादि मे कर्तृ सम्बन्ध की उत्पत्ति ईश्वरद्वारा ही की जा सकती है । फलत उक्त अनुमान द्वारा क्षित्यादि के कर्ता रूप मे ईश्वर की सिद्धि निर्विवाद है। ३

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[ ११ स्या० क० टीका-हिन्दी विवेचन ] त्तिप्रसङ्गात् । 'चेप्टात्वमुपाधि रिति चेत् १ किं तत् ? 'प्रयत्नजन्यक्रियात्वमिति चेत् ? न तत्रैव तस्यैवाऽनुपाधित्वात् । 'हिता-ऽहितप्राप्ति-परिहारफलत्वमिति चेत् १ न, विपभक्षणा-ऽहिलड्ध- नाद्यव्यापनात् । 'शरीरसमवायिक्रियात्वं तदिति चेत् ? न, मृतशरीरक्रियाया अतथात्वात् । 'जीवत' इति चेत् ? न, नेत्रस्पन्दादेरतथात्वात् । 'स्पर्शवद्र्व्यान्तराऽप्रेरणे सति शरीर- क्रियात्वं तत्, शरीरपदोपादानाद् न ज्वलन-पवनादिक्रियाऽतिव्याप्तिरिति चेत् ? न, शरीरत्वस्य चेष्टाघटितत्वात् । 'चेप्टात्वं सामान्यविशेपो, यत उन्नीयते प्रयत्नपूर्विकेयं क्रियेति चेत् १ न, क्रियामात्रेण तदुन्नयनात् । परमारणद्वय के सयोग के लिये अपेक्षित है वह सयोग सीधे अदृष्ट से ही उत्पन्न हो जायगा। बीच मे कर्म की कोई आवश्यकता न रह जायगो। अत उक्त परमारण कर्म को सीधे अदृष्ट से जन्य न मानकर प्रयत्न से जन्य मानना श्रावश्यक हैं। ( चेष्टात्व उपाधि को श्राशंका ) इस सदर्भ मे यह शका हो सकती है फि-'प्रकृत अनुमान चेष्टात्वरूप उपाधि से ग्रस्त श्योकि चेष्टात्व कर्मस्वरूप साधन से विशिष्ट प्रयत्नजन्यत्व साध्य का व्यापक है क्योकि प्रयत्नजन्य सभी कर्मो मे चेष्टात्व रहता है, और साधन का अव्यापक है क्योकि कर्मत्वरूप साधन घटादिगत कर्मः मे भी रहता है और चेप्टात्व उसमे नहीं रहता। प्रत चेष्टात्व साधनावच्छिन्नसाध्य का व्यापक और साधन का अव्यापक होने से उपाधि है-'। किन्तु चेष्टात्व का निर्वचन न होने के कारण चेष्टात्व को उपाधि कहना ठीक नहीं है। जसे चेष्टा का अर्थ यदि प्रयत्नजन्यक्रिया किया जायगा तो साध्य और उपाधि एक ही हो जायगा । क्योकि सृष्टि के आरम्भकाल मे उत्पन्न होनेवाले द्वयणुक के उत्पादक परमाणुद्वय सयोग के जनक परमाणु कर्म को प्रयत्नजन्य मानने पर फलत प्रयत्नजन्य क्रियात्व ही साध्य होता है और वही चेष्टात्व है। इसलिए चेष्टात्व अपने ही प्रति उपाधि नहीं हो सकता । साध्य साधन का व्यापक होता है अत साध्य से अभिन्न होने के कारण चेष्टात्व भी साधन का व्यापक ही होगा। जब फि उपाधि होने के लिये साधन का अव्यापक होना आवश्यक है । यदि यह कहा जाय फि-हित की प्राप्ति और अहित के परिहार की उत्पादक क्रिया चेष्टा है । अत साध्य और चेष्टात्व मे भेद हो जाने से चेष्टात्व के उपाधि होने मे कोई वाधा नहीं हो सकती।'-तो यह ठीक नहीं हैं, क्योकि विषमक्षण रूप क्रिया और सर्पलधन रूप क्रिया भी चेष्टा है । किन्तु चेष्टा का उक्त प्रकार से निर्वचन करने पर विषभक्षण और सर्पलधन रूप क्रियाएँ चेष्टा न हो सकेगी, क्योंकि विपभक्षण यादि क्रियाएँ मृत्यु का जनक होने से अहित परिहार की जनक नहीं है। शरीर मे समवाय सम्बन्ध से रहने वाली क्रिया का नाम चेष्टा है-' इस प्रकार भी चेष्टा का निर्वचन उचित नही हो सकता क्योकि मृत शरीर में किसी स्पर्शवान् वेगवान द्रव्य के सयोग से उत्पन्न होने वाली क्रिया भी चेष्टा के उक्त निर्व- चन को परिधि मे आ जाने से वह भी चेष्टा शब्द से व्यवहृत होने लगेगी। 'जीवित शरीर मे सम वाय सम्बन्ध से रहने वाली क्रिया चेष्टा है'-इस रूप मे भी चेष्टा का निर्वचन नहीं हो सकता क्योकि नेत्र का स्पन्दन और वातव्याधि से हस्तपादादि मे होने वाला कम्पन भी शरीरसमवेत क्रियारूप होने से चेष्टा हो जायगी। ।

२०] [ भा. या ममुच्चय न०-३लोक-३ धृतगप । 'बमाण्डादिपननाभाषः पतनप्रतिवन्धकप्रयुक्तः, धृतित्वात , उन्पनन्यनत्रि- पतनाभावयन् , तन्पतत्रिययुक्ततृणादिधृतिपदया' । एतनेन्द्रा-ग्नि-यमादिलोकपालप्रतिपादका आगमा अपि व्याख्यानाः, तेषां तदधिष्टानदेशानामीधगवगंनव पतनामाववचान । तथा व श्रुतिः "एतम्य चाक्षरस्य प्रशासने गार्गी द्यावापृथिवी विधृते तिष्ठनः" इति । प्रशासन दण्डभृतः प्रयन्नः, आवेशम्तन्छ गवन्छिन्नप्रयन्नवचमेर, नर्वावशनिवन्धन एव च मतादा- त्म्यव्यवहार इनि, "आत्मवेट मर्यम् , ब्रह्म वेदं मम्" इत्यादिकम् । यदि यह कहा जाय कि- स्पगन् अन्य द्रव्य ये मयोग के बिना उत्तन होने वाली शरीर को क्रिया चेप्टा है तो यह भी ठीक नहीं है क्योंकि इस नियंजन में शरीर पद का ग्रहण होने से यद्यपि ज्वलन और पवन आदि को क्रिया मे चेप्टात्य का कारण हो जाता है क्योंकि वह क्रिया सम्पर्णपान मन्य द्रव्य के मयोग में अनुत्पन्न होने पर भी शगेर समवेत नहीं होनो क्योकि ज्वलन और पयन किमी का शरीर नहीं है, तयापि चेष्टा के हम नियंचन में शरीर का शरीरत्वेन निवेश है और शरोरत्य चेष्टाश्रयत्वत्य है । इमलिये चेष्टा के लक्षण मे चटा का प्रवेश हो जाने से आत्माश्रय दोष लगेगा । यदि यह कहा जाय कि-'चेष्टाय एक सामान्ययिटोप-परम्पग जाति है, जिससे इस क्रिया प्रयत्नपूयिका यह क्रिया प्रयत्नजन्य हैं क्योंकि चेष्टास्प है। यह अनुमान होता है। -तो यह ठीक नहीं हैं पयोंकि क्रिया में प्रयत्नपूर्ववत्व का अनुमान क्रिया के सामान्य रूप कियात्व मे भी हो सकता है । मत क्रिया मे प्रयत्नपूर्वकत्व को अनुमापना के अयच्छेदकरप से भी चेष्ट्रात्य को मिद्धि मानकर मामान्य विशेष रूप में चेप्टात्य का निर्वचन नहीं हो सकता । मादाय यह है कि ईश्वर- वादो के मत मे सभी क्रिया मे ईश्वरप्रयत्नपूर्वकत्व होने से प्रियात्व भी प्रयत्नपूर्वकत्व का व्याप्य हो सकता है । इसलिये क्रियात्व मे हो प्रयत्नपूर्वकत्व का अनुमान हो मरने के कारण प्रयत्नपूर्वकत्व के अनुमापफतावच्छेदक स्प मे चेप्टात्व को मान्यता नहीं प्रदान की जा सकती। (ब्रह्माण्डधृति-पतनाभावपक्षक अनुमान) घृतेरपि-धृति से भी ईश्वर का अनुमान होता है। पति का अर्थ है पतन का प्रभाव । उस से होनेवाले अनुमान का प्रयोग इस प्रकार होता है जैसे-ग्रह्माण्ड आदि गुरुद्रव्यों के पतन का प्रभाव पतन के किसी प्रतिवन्धक से प्रयुक्त है क्योकि वह गुरु द्रव्यों के पतन का अनाव स्प है । गुरुद्रव्यों का जो पतनानाव होता है वह पतन के किमी प्रतिवन्धक से प्रयुक्त होता है जैसे उटने हुए पक्षी के पतन का प्रभाव उस पक्षी के प्रयत्नस्प प्रतिवन्धक से प्रयुक्त होता है। एवं उडते हुए पक्षी से पकडे हुए तृणादि के पतन का प्रभाव तृण के साथ उस पक्षी के सयोगस्प प्रतिबन्धक में प्रयुक्त है । प्राशय यह है कि जिस द्रव्य मे गुरुत्व होता है उस का पतन अर्थात् नीचे की ओर गमन अवश्य होता है, यदि स्थान- विशेष मे उस को रोक रसनेवाला कोई पदार्य न हो । इस रोकनेवाले पदार्थ को ही पतन का प्रतिवन्धक कहा जाता है जैसे वृक्ष की शाखा में लगे हुए फलो का गुरत्व होने पर नो पतन नहीं होता क्योंकि शाखाके साय फल का मयोग फलको रोक रसता है । यह उस मे पतनक्रिया उत्पन्न नहीं होने देता है । इसी प्रकार जव कोई पक्षी अाकाश मे उडता हुआ होता है तो उस उडते हुए पक्षी के शरीर मे भी गुरुत्व है। इसलिये उस गुरुत्व के कारण उस का पतन हो जाना चाहिये किन्तु उस का पतन - - स्था० का टीका-हिन्दीविवेचना ] २१ इसलिये नहीं होता कि पक्षी का शरीर पक्षी की आत्मा में विद्यमान प्रयत्न से धारित रहता है । अर्थात् पक्षी की आत्मा का प्रयत्न स्वाश्रयसंयोगसम्बन्ध से अथवा अवच्छेदकता सम्बन्ध से पतन का प्रतिबन्धक होता है। इसीप्रकार आकाश में उडते हुऐ पक्षी द्वारा चोच मे रखे हुए काण्टखण्ड अथवा फल श्रादि मे भी गुरुत्व है और गुरुत्व के कारण उस का भी पतन हो जाना चाहिये किन्तु उस का पतन इसलिये नहीं होता कि उन के पतन का कोई न कोई प्रतिवन्धक है । इसी प्रकार ब्रह्माण्डादि द्रव्य भी गुरु है, अत: गुरुत्व के कारण उनका भी अपने स्थान से पतन हो जाना चाहिए किन्तु ऐसा नहीं होता अपि तु वे अपने निश्चित स्थान मे अवस्थित रहते हैं। प्रत उन के पतन का भी विरोधी कोई न कोई होना चाहिये । ब्रह्माण्डादि किसी जीव का शरीर नहीं है इसलिये उडते हुए पक्षी के शरीर के समान उस का धारण सभव नहीं है। किन्तु जैसे उडते हुए पक्षी द्वारा पकडे गये तृणकाप्ट प्रादि का धारण प्रयत्नशील पक्षी के सयोग से होता है उसी प्रकार ब्रह्माण्ड प्रादि का भी धारण किसी प्रयत्नशील के संयोग से ही मानना होगा। वह प्रयत्नशील कोई जीव नहीं हो सकता क्योकि जीव मे प्रयत्न का उदय जीवके शरीर होने पर ही होता है और ब्रह्माण्ड तो जीव के सशरीर होने के भी रहता है। अत एव उसे किसी ऐसे ही पुरुष के सयोग से घारित मानना होगा जो पुरुष शरीर के विना भी प्रयत्नवान् हो सके । इस प्रकार जिस के प्रयत्न से ब्रह्माण्ड श्रादि का पतन नहीं हो पाता वह ईश्वर से अन्य कोई नहीं हो सकता। (इन्द्रादि देवताओ से सिद्धसाधनता को आशंका) श्रागमो-पुराणादिशास्त्रो मे इन्द्र, अग्नि, यम प्रादि देवताओ को लोकपाल कहा गया है। अर्थात् उन्हें भिन्न भिन्न लोक का धारक बताया गया है । ईश्वर को ब्रह्माण्डादि का धारक मानने पर यह समस्या ऊठती है कि-जिन लोको का धारक इन्द्रादि देवताग्रो को बताया गया है उन का धारण भी ईश्वर से ही हो जायगा । फिर उन लोको के धारणार्थ इन्द्रादि देवतायो की कल्पना अनावश्यक है, अथवा इस प्रकार की समस्या हो सकती है कि आगमो के अनुसार इन्द्रादि देवतानो के द्वारा ही सपूर्ण लोक का धारण होने से उनके सामूहिक प्रयत्न से ब्रह्माण्ड का मी धारण हो सकने के कारण ब्रह्माण्ड आदि के धारण के निमित्त ईश्वर की कल्पना अनावश्यक है ।'-किन्तु इन समस्याओ का समाधान अत्यत सरल है। और वह यह है कि इन्द्रादि देवतानो से धारण किये गये लोको का भी धारक ईश्वर ही है। इन्द्रादि मे उन लोको के धारण करने की जो बात कही गई है वह भी उन- देवताओ मे ईश्वर के प्रवेश पर निर्भर हैं । अभिप्राय यह है कि ईश्वर ही इन्द्रादि शरीर मे अन्विष्ट हो कर समस्त लोको का धारक होता है । यदि ईश्वर का अस्तित्व न हो तो इन्द्रादि मो उन उन लोको के धारण मे उसी प्रकार समर्थ नहीं होता। वेद भी ईश्वर को ही धुलोक पृथ्वीलोक आदि का धारक बताता है । जैसे एतस्य च अक्षरस्य प्रशासने गार्गी द्यावापृथिवी विधृते तिष्ठत ।' इस वेद वाक्य मे गार्गी नामक महिला को सम्बोधित कर यह कहा गया है कि कभी भी अपने स्वरूप से च्युत न होनेवाले परमेश्वर के प्रशासन मे हो धुलोक और पृथ्वी लोक अपने स्थल से पतित न होते हुए स्थित है। इस मे प्रशासन शब्द का अर्थ धारण करनेवाला प्रयत्न है। इस प्रकार वेद के अनुसार समस्त लोक ईश्वर के प्रयत्न से हि धारित है यह सिद्ध होता है। अभी जो यह बात कही गई कि इन्द्रादि देवता मे ईश्वर का प्रावेश होने से उन मे लोकधारकत्व माना जाता है। उस मे प्रावेश का अर्थ इन्द्रादि शरीर के द्वारा प्रयत्नवान् २० ] [ शा. बा. समुच्चय स्व०-३ श्लोक-३ आदिना नाशादपि, 'बलाण्डनाशः प्रयत्नजन्यः, नाशत्वात , पाव्यमानपटनाशवद इति । कहना सगत नहीं प्रतीत होता किन्तु कथन का यह पाराय है कि ईश्वर के प्रयल में इन्द्रादि शरीर में लोकचारक व्यापार का उदय होता है और उस व्यापार से लोक या धारण होता है । उस के अनुसार इन्द्रादि में ईश्वर का प्राविष्ट होने का अर्थ है इन्द्रादि के शरीर को अपने प्रयत्न मे सक्रिय बनाना। ईश्वर का प्रावेश केवल इन्द्रादि देवतायो में ही नहीं होता अपितु सपूर्ण पदार्थों में होता है। इसीलिये ईश्वर मे सपूर्ण पदार्यों के तादात्म्य का प्रयवा सपूर्ण पदार्यों मे ईश्वर के तादात्म्य का व्यवहार होता है । जैसा कि 'प्रात्मवेद सर्व'-यह सव कुर प्रात्मा ही है। 'ग्रहमवेद सर्व-यह सपूर्ण जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है इत्यादि शास्त्रवचनो से स्पष्ट है । अभिप्राय यह है कि जैसे शरीर में प्रात्म- प्रयत्न से क्रिया का उदय होने के कारण शरीर को प्रात्मा ने प्राविष्ट मानकर शरीर और प्रात्मा मे 'स्थूलोऽह करोमि' इत्यादि सम्बन्ध से तादात्म्यस्प व्यवहार होता है। उसी प्रकार ईश्वर के प्रयत्न से सपूर्ण जगत् मे अवस्थिति स्प क्रिया का उदय होने से सपूर्ण जगत में ईश्वर का प्रावेश होता है और उस से 'ब्रहमवेदं सर्व' इस प्रकार सपूर्ण जगत् मे ईश्वर के तादात्म्य का व्यवहार होता है। (ब्रह्माण्डप्रलय से इन्वर को सिद्धि का अनुमान) 'कार्यायोजनवृत्यादे'-इस पूर्व चचित कारिका में प्रति' शब्द के माय 'पादि' शब्द पठित है। उस प्रादि पद से नाशस्प प्रर्थ को सूचना होती है । इसलिये इस कारिका से यह नो ज्ञात होता है कि नाग के कर्तारप मे भी ईश्वर को प्रतीति होती है। जैसे घट पट प्रादि कानाश तो सामान्य मनुप्यो के प्रयत्न से भी हो जाता है। किन्तु ब्रह्माण्ड जिस मे अनेक विशाल लोक प्राश्रित है उस का नाग नो शास्त्रो मे वरिणत है, वह नाश सामान्य मनुष्य के प्रयत्न से नहीं हो सकता, क्योकि इतने बडे ब्रह्माण्ड की रचना की विधि जैसे सामान्य मनुष्य को ज्ञात नहीं होती उमी प्रकार उस के नाम की विधि नी सामान्य मनुष्य को ज्ञात नहीं हो सकती इलिये ब्रह्माण्ड के नाश के लिये प्रयत्नशील होने, का स्वप्न नी वह नहीं देख सकता। अत उस ब्रह्माण्ड का नाश जिस के प्रयत्न से हो सकता है वह ईश्वर से अतिरिक्त कोई नहीं हो सकता । ब्रह्माण्डनाश द्वारा होने वाले अनुमान का प्रयोग इस प्रकार होता है कि ब्रह्माण्डनाश प्रयत्न से जन्य है क्योकि वह नाश है । जो भी नाश होता है वह प्रयत्न से जन्य होता है । जैसे पट के टूकडे करने पर होनेवाला पट का नाश ।' इस अनुमान मे पक्षाऽसिद्धि की शका नहीं की जा सकती क्योकि ब्रह्माण्ड का नाश शास्त्रो मे वरिणत है । प्रथया 'ब्रह्माण्ड नाशप्रतियोगी, जन्यमावत्वान्' ब्रह्माण्ड भी नष्ट होता है क्योकि वह जन्य भाव है, जो भी जन्य भाव होता है वह नष्ट होता है-जैसे घटपटादि' । इस अनुमान से भी ब्रह्माण्ड का नाश सिद्ध है । अत एव पक्षाऽसिद्धि नहीं हो सकती। शंका-'पट समूह के ऊपर जलता हुआ अड्गारा पड जाने पर पट समूह का नाश हो जाता हैं, समुद्र मे तूफान या भूकप पाने पर सहस्रो भवन प्रादि का नाश हो जाता है । यह नाश किसी प्रयत्न से नहीं होता यह स्पष्ट है। इसलिये इस प्रकार के नाशो मे नागत्व प्रयत्नजन्यत्व का व्यभिचारी हो जाता है । अत. नाशत्व हेतु से ब्रह्माण्ड नाश में प्रयत्न जन्यत्व का अनुमान अशक्य है।"-इस प्रकार को शका नहीं की जा सकती क्योकि ईश्वरवादी ऐसे नाशो को भी ईश्वर प्रयत्न से ही सम्पन्न मानते हैं । अतः ऐसे नाश भी पक्षतुल्य होते है । अत एव उनके द्वारा नाशत्व को प्रयत्नजन्यत्व का व्यभिचारी नहीं कहा जा सकता।

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचन ] [ २३ पदादपि । पद्यते गम्यतेऽनेनेति पदं व्यवहारः, ततः 'घटादिव्यवहारः स्वतन्त्र- पुरुषप्रयोज्यः, व्यवहारत्वात् आधुनिककल्पितलियादिव्यवहारवत्' इत्यनुमानाद , न च पूर्व- पूर्वकुलालादिनैवाऽन्यथासिद्धिः, प्रलयेन तद्विच्छेदात् । [व्यवहार प्रवर्तक रूप मे ईश्वरसिद्धि] पद से भी ईश्वर का अनुमान होता है । पद शब्द की व्युत्पत्ति है 'पद्यते-गम्यते-ज्ञायते अनेनेति पदम् । अर्थात् जिस से पदार्थ ज्ञात हो उस का नाम है पद । इस व्युत्पत्ति के अनुसार पद शब्द का अर्थ है व्यवहार । और व्यवहार का अर्थ है तद् तद् अर्थो मे परम्परा से प्रयुक्त होनेवाला तद् तद् शब्द, जैसे घटरूप अर्थ मे सुदीर्घ परपरा से प्रयुक्त होनेवाला घट शब्द एव पट रूप अर्थ मे सुदीर्घ परपरा से प्रयुक्त होनेवाला पट शब्द आदि । इस व्यवहार के द्वारा जो ईश्वरानुमान अभिमत है उस का प्रयोग इस प्रकार होता है-"घट अादि अर्थो मे प्रयुक्त होनेवाला घट प्रादि शब्द- रूप व्यवहार किसी स्वतन्त्र पुरुष से प्रवर्तित हुआ है क्योकि वह व्यवहार है । जो भी व्यवहार होता है वह सब किसी स्वतत्र पुरुष से प्रवर्तित होता है । जैसे आधुनिक मनुष्यो द्वारा क-ख प्रादि वर्णो के लिये कल्पित लिपि"। प्राशय यह है कि जैसे क-ख आदि वर्गों के लिये विशेष प्रकार की लिपि का व्यवहार किसी अाधुनिक स्वतत्र पुरुष के द्वारा प्रचारित होता है उस प्रकार घट प्रादि अर्थो मे घट आदि शब्दो का प्रयोगरूप व्यवहार भी किसी स्वतन्त्र पुरुष के द्वारा प्रवर्तित होना चाहिये। और वह पुरुष कोई आधुनिक नहीं हो सकता, क्योकि यह व्यवहार प्रनादिकाल से चल रहा है । अतः इस अनादिकाल से प्रवृत्त व्यवहार के प्रारम मे जो पुरुष रहा हो वह ही उस का प्रवर्तक हो सकता है । आधुनिक पुरुष तो घट आदि अर्थो मे घट आदि शब्द का प्रयोग अपने पूर्ववर्ती पुरुषो से शीखकर करते हैं। वह उस के स्वतन्त्र प्रवर्तक नहीं होते हैं । उस का स्वतन्त्र प्रवर्तक वही कहा जायगा जिस को घट आदि अर्थों में घट आदि शब्द के प्रयोग करने की शिक्षा लेने की अपेक्षा नही होती किन्तु वह स्वय निर्धारित करता है कि घट आदि अर्थो को बताने के लिये घट आदि शब्दो का प्रयोग होना चाहिये। (कुलालादि से ही अन्यथासिद्धि की प्राशका) इस सदर्भ मे यह शका हो सकती है कि-'जो जिस वस्तु को बनाता है वही इस वस्तु का नाम निर्धारित करता है । जैसे अाधुनिक यन्त्रादि को बनानेवाला मनुष्य उस का कोई नाम निश्चित करता है । उसी प्रकार घट आदि वस्तुनो को निर्माण करनेवाला मनुष्य ही उन के घट आदि नामो को निर्धारित करता है इस प्रकार घट का निर्माण करनेवाला प्रथम कुम्हार ही घट व्यवहार का और पट का निर्माण करनेवाला प्रथम जुलाहा ही पट व्यवहार का मूल प्रवर्तक है । इस प्रकार कुलाल तन्तुवाय इत्यादि आधुनिक मनुष्यो द्वारा ही घटपटादि व्यवहार का प्रवर्तन सभव होने से उस के मूल प्रवर्तक के रूप मे ईश्वर को कल्पना नहीं हो सकती। किन्तु यह शका उचित नहीं है क्योकि शास्त्रो मे सृष्टि के निर्माण और प्रलय दोनो की चर्चा हे । और अनुमान से भी सृष्टि का प्रलय के वाद होना सिद्ध है। जैसे 'वर्तमान स्थूलद्रव्यात्मक जगत् दृश्यसन्तानशून्यै उपादानकारण उत्पन्नम् , स्थूलद्रव्यत्वात् प्रदीप्तज्वालावत् ।' इस से यह सिद्ध होता है कि प्रलय के बाद नई सृष्टि का निर्माण होता है। प्रत. एव उस मे घटपट आदि की प्रथम रचना प्राधुनिक कुलालादि से २४ ] [शा पा ममुन्चय स्त• ३-दलो०३ प्रत्ययतः-प्रमायाः, 'वेदजन्यप्रमा वक्तृयथार्थवाक्यार्थनानजन्या, शाब्दप्रमान्वात् , आधुनिकवाक्यजशाब्दप्रमावत् ।' श्रुतरपि । वेदोऽयमारिपुरुषप्रणीतः, वेदत्वात् , इति व्यतिरकिणः । न च परमते साध्यामिद्विः, 'आत्मत्वममारिवृत्ति, जातित्वात्' इत्यनुमानन पूर्व माध्यमाधनात् । सभव नहीं है क्योकि श्राधुनिक कुलालादि को घट प्रादि का निर्माण करने के लिये उन के निर्माण को विधि दूसरे से गोलनी होती है । प्रत सृष्टि के पारन मे घट प्रादि का प्रथम निर्माण करनेवाला वही पुरुप हो सकता है जिस को उस का निर्माण करने के लिये किमी दूमरे में शिक्षा लेने को आवश्यकता न हो। ऐसा पुरुष ईश्वर ही हो सकता है। इसलिये ईश्वर ही घट भादि का प्रथम निर्माता होने से घट आदि व्यवहार का मूल प्रवर्तक हो सकता है । [वेद के प्रमात्मक ज्ञान से वस्ता ईश्वर की सिद्धि] प्रत्ययत =प्रत्यय से भी ईश्वर का अनुमान हो सकता है। प्रत्यय का अर्थ है प्रमा अर्थात् यथार्थ ज्ञान-इस से होनेवाले अनुमान का प्रयोग इस प्रकार होता है जैसे-वेद से उत्पन्न होनेवाली प्रमा वक्ता के यथार्थ वाक्पार्यज्ञान से उत्पन्न होती है। क्योकि वह गन्द से उत्पन्न होनेवाली प्रमा है। जो प्रमा शब्द से उत्पन्न होती है वह वक्ता के ययार्य वाक्यार्यज्ञान मे ही उत्पन्न होती है। जैसे प्राधुनिकवाक्य से उत्पन्न होनेवाली प्रमा। प्रागय यह है कि मनुष्य को जब कोई ज्ञान उत्पन्न होता है तब उस ज्ञान का सङ्क्रमण करने के लिए अर्थात् उन ज्ञान को दूसरे मनुष्य तक पहुंचाने के लिये वह वाक्य का प्रयोग करता है और उस वाक्य से दूसरे को उसी प्रकार का ज्ञान उत्पन्न होता है जिस प्रकार के ज्ञान का सडकमरण करने के लिये वक्ता ने वाक्य प्रयोग किया हो। यदि वक्ता का ज्ञान अयथार्थ होता है तो उस ज्ञान का सक्रमण करने के लिये प्रयुक्त होनेवाले वाक्य से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान भी अयथार्थ होता है । और यदि वक्ता का ज्ञान यथार्थ होता है तो उस के वाक्य से श्रोता को उत्पन्न होनेवाला ज्ञान यथार्थ होता है। इस प्रकार वाक्य से यथार्यज्ञान का जन्म वक्ता के यथार्थ वाक्यार्थ- ज्ञानपर निर्भर है । वेद भी वारयस्वरूप है । प्रत. एव उस से उत्पन्न होनेवाला ज्ञान यथार्थ तनी हो सकता है जब वेदवक्ता को वेदार्य का यथार्य ज्ञान हो । यत. वेद से होनेवाला ज्ञान यथार्य ज्ञान माना जाता है अतः यह मानना आवश्यक है कि वेद वक्ता को वेदार्थ का यथार्य ज्ञान है । वह यथार्थज्ञान प्राधुनिक वक्ता को नहीं हो सकता। क्योकि प्राधुनिक वक्ता को जो ज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष अनुमान आदि प्रमाणो से हो होता है और स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वेदवाक्यो के अर्थ ज्ञान को प्रत्यक्ष अनुमान प्रादि से नहीं उत्पन्न किया जा सकता । अत: यह मानना प्रावश्यक है कि वेद का वक्ता कोई अंसा पुरुष है जिसे प्रत्यक्ष अनुमान आदि साधनो के विना ही वेदार्थ का यथार्थज्ञान हो जाता है। इस प्रकार जिस पुरुष के वेदार्य विषयक यथार्थज्ञान द्वारा वेद से होने वाली यथार्थ वुद्धि का उदय हो सकता है वह पुरुप ईश्वर से अन्य नहीं हो सकता। [वेद किसी अमंसारी पुरुष से जन्य है]] श्रुति-वेद से भो ईश्वर का अनुमान होता है । और वह अनुमान व्यतिरेको होता है । उस का प्रयोग इस प्रकार होता है-जैसे 'वेद प्रससारी पुरुष द्वारा रचित है, क्योकि वह वेद है । जो अससारी पुरुष से रचित नहीं होता वह वेद नहीं होता-जैसे मपनिक काव्यादि ।'-इस अनुमान मे यह शका हो सकती है कि 'अससारी पुरुष की सत्ता मे कोई प्रमाण न होने से 'प्रससारी पुरुष से रचित होना' - स्या० क० टीका और हिन्दी विवेचना ] वाक्यादपि । वेदः पौरुपेयः, वाक्यत्वात् , भारतवत् इत्यन्वयिनः सख्याविशेषाद्वयणुकपरिमाणजनिका संख्या, ततोऽपि । 'इयं संख्या, अपेक्षावुद्धिज- न्या, एकत्वान्यसंख्यात्वात् ,' इत्यस्मदाद्यपेक्षायुद्धथजन्यत्वादतिरिक्तापेक्षावुद्धिसिद्धौ तदाश्रय- तयेश्वरसिद्धः । न चाऽसिद्धिः, 'द्वयणुकपरिमाणं संख्याजन्यम , जन्यपरिमाणत्वात , घटादिपरि- माणवत् । न वा दृष्टान्तासिद्धिः, द्वि-कपालादिपरिमाणात् त्रिकपालादिघटपरिमाणो- त्कर्षादिति दिग् । रूप साध्य अप्रसिद्ध है ।'-किन्तु विचार करने से यह शडका उचित नहीं प्रतीत होती है क्योकि प्रससारी पुरुष अनुमान प्रमाण से सिद्ध हैं । जैसे-'प्रात्मत्व अससारी मे विद्यमान है, क्योकि वह जाति है । जो भी जाति होती है वह प्रससारी मे विद्यमान होती है जैसे घटत्व पटत्व प्रादि जाति ।' प्राशय यह है कि ससार का अर्थ है मिथ्याज्ञान या मिथ्याज्ञानजन्यचासना अथवा शुभाऽशुभ कर्मों का बन्ध । यह ससार चेतनगत होने से घटपटादि ने नहीं रह सकता । अत एव घटपटादि अससारी कहा जाता है । घटत्व पटत्व जाति प्रससारी घट आदि मे रहती है। तो जैसे घटत्व पटत्व जाति होने से प्रससारी मे विद्यमान होती है वैसे प्रात्मत्व-पुरुषत्व को भी जाति होने के कारण प्रससारी मे विद्यमान होना चाहिये । और यह तभी हो सकता है जब किसी पुरुष को अतसारी माना जाय । क्योकि प्रात्मत्व पुरुष का ही धर्म हे, अससारी घटपटादि का धर्म नही है । इस अनुमान से प्रससारी पुरुष सिद्ध है । अत. साध्याऽप्रसिद्धि की शड्का नही हो सकती है। (वाक्य पक्षक अनुमान] वाक्य से भी ईश्वर का अनुमान होता है और वह अनुमान अन्दयी होता है । जैसे, वेद पुरुप से रचित है क्योकि वह वाक्य है। जो भी वाक्य होता हे वह पुरुप से रचित होता हे जैसे महाभारत-रामायण आदि । इस अनुमान मे वाक्यत्व हेतु है । इसलिये उसे समझ लेना आवश्यक है अन्यथा उस मे इस आधार पर इस प्रकार के व्यभिचार को शड्का हो सकती है कि कोई ऐसा भी वाक्य हो सकता है जो पुरुष से रचित नहीं होता।' जिज्ञासा होती है कि वाक्य का ऐसा क्या अर्थ है कि जिस से पुरुष से अरचित वाक्य को समावना न हो । उत्तर यह है कि वाक्य ऐसे पदो के समूह को कहा जाता है जो पद परस्पर मे साकार हो, एकदूसरे से प्रासन्न हो, योग्यार्थक हो और किसी विशिष्ट अर्थ का बोध कराने को ईच्छा से प्रयुक्त हो। तो इसप्रकार वाक्य लक्षण के गर्भ मे वायार्थ वोधन की इच्छा के प्रविष्ट होने से विना पुरुष के कोई वाक्य नहीं हो सकता। क्योकि विशिष्टार्थ बोधन को इच्छा पुरुष मे ही सभव है और उस के बिना वाक्य की निप्पत्ति अशक्य है। (चरणकपरिमारणोत्पादकसंख्याजनक अपेक्षाबुद्धि से ईश्वरसिद्धि) सरयाविशेष से भी ईश्वर का अनुमान होता है और वह विशेष सख्या हैं यणुक में परिमाण को उत्पन्न करनेवाली परमाणुगत द्वित्व सख्या। उस सरया से होनेवाला अनुमान का प्रयोग इसप्रकार होता है जैसे "मणुक परिमारग को उत्सादिका परमाणुगत द्वित्वत्तस्या अपेक्षाबुद्धि से जन्य है, २६ [गावा० नमुन्चय न. ३-इलोक क्योकि वह एकत्व ने निन्न सस्या है। एकत्व से निन जो नी सस्या होती है वे मनी अपेक्षाबुद्धि ने जन्य होती है जैसे दो घटो मे रहने वाली द्वित्व माया 'अयमेक घट. अयमेक घट' इस अपेक्षावटि ने उत्सत होती है ।" इस अनुमान मे यह सिद्ध होता है कि परमाणु रो में भी 'अयमेक परमाणु अयमेकः परमाणु' इन प्रकार की अपेक्षावृद्धि होती है और उस से परमाणु में उत्पन होने वाला हित्व हमणक परिमाण को उत्पन्न करता है । परमाणुओ मे होने वाली यह अपेक्षायुद्धि जीवो में संनव नहीं है क्योंकि जीवो को परमाणुनो का प्रत्यक्ष नहीं होता। यदि अनुमान ग्रादि मे परमाणुओं में अपेक्षावृद्धि को कल्पना की जाय तो वह भी सृष्टि के प्रारमकाल में संभव नहीं है । क्योंकि सृष्टि के बारनकाल मे जो ट्यगुक उत्पन होगा उममे परिमाण उत्पन करने के लिये उन समय परमाणु में द्वित्व को श्रावश्यकता होगी और उसको उत्पत्ति के लिये उनी ममय परमाणुगों मे अपेक्षावृद्धि अपेक्षित है । और उन समय जीवो के शरीर न होने मे जोरों मे बुद्धि की उत्पत्ति नहीं मानी जा मस्ती। इसलिये परमाणुनो मे ईश्वर को ही अपेक्षाबुद्धि माननी होगी। ईश्वर के बिना परमाणुनो मे अपेक्षावुद्धि न होने से उन मे द्वित्व की उत्पत्ति हो सकेगी और द्वित्व के अनाव मे दृयगुक मे परिमाण न उत्पन्न हो सकेगा। [व्यणुकपरिमारग में संख्याजन्यत्व पर प्राशंका] इन अनुमान मे यह शड्का हो सकती है- "यणुकपरिमाण के मत्या के जन्यत्व मे पोई प्रम ण न होने से दृयणुकपरिमाणजनक परमाररागतहित्व सत्या स्प पक्ष अमिद्ध है"-पिन्तु यह ठीक नहीं है । क्योकि अनुमान ने उक्त सरया निद्ध है जैसे "यणुरु का परिमाण नयाजन्य है, क्योकि वह जन्यपरिमाण है । जो जन्य परिमाण होता है वह संख्या मे जन्य होता है जैसे घटादि का परिमाण । यदि यह कहा जाय-"इम अनुमान में दृष्टान्त अमिट्ट है क्योकि घट आदि का परिमारा कपाल प्रादि के परिमारण से उत्पन्न होने के कारण सस्याजन्य नहीं होता-" तो यह ठीक नहीं है क्योकि परि- मारगजन्य परिमाण को भी मख्याजन्य मानना यावश्यक है। अन्यथा समान परिमाणवाले दो पालों से उत्पन्न होने वाले घट के परिमाण ने समान परिमारण वाले तीन कपालो से उत्पन्न होने वाले घट- का परिमारण अधिक न हो सकेगा। क्योंकि दोनो घटों के परिमाण को उत्पन्न करने वाले कपाल परिमाण समान ही है । और जब परिमाण को सत्याजन्य माना जायगा तो पूर्वघट का परि- माण कपालगत द्वित्व संस्था से उत्पन्न होगा और दूसरा घट कपालगत नित्व सत्या में उत्पन्न होगा। वित्व सरया हित्व संख्या से बडी होती है । इसलिये त्रित्व मंत्या से उत्पन्न होनेवाले द्वितीयघट के परिमारण का द्वित्वसंस्या से उत्पन्न होनेवाले पूर्वघट के परिमाण की अपेक्षा अधिक होना युक्तिमङ्गत हो सकता है। इस प्रसङ्ग मे यह शङ्का हो सकती है-'यणुकपरिमारण संख्याजन्यम्' इस अनुमान मे पक्ष प्रसिद्ध है क्योकि यणुक के परिमाण होने में कोई प्रमाण नहीं है। परन्तु किन्चित् विचार करने से यह शङ्का निरस्त हो जाती है क्योंकि घ्यणुक मे परिमाण और उस परिमाण मे जन्यता दोनों ही अनुमान प्रमाण से सिद्ध है जैसे 'दृयणुकं परिमाणवत द्रव्यत्वात्' और दृयणकपरिमाण जन्य जन्यद्रव्य- परिमाणत्वात् । द्वयणुक मे जन्यद्रव्यत्व के प्रसिद्धि की शङ्का नहीं की जा सकती क्योकि 'यणुक जन्यद्रव्यं सावयवत्वात् इस अनुमान से जन्यद्रव्यत्व सिद्ध है। व्यणुक मे सावयवत्व की अनिद्धि की मो शङ्का नहीं की जा सकती क्योंकि वह भी 'व्यणुकं सावयव प्रत्यक्षद्रव्याश्रयत्वात् कपालादिवत् इत्यादि अनुमान से सिद्ध है।

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचन] [ २७ अथवा, कार्य तात्पर्य वेदे यस्य तत् , स एवेश्वरः । आयोजनं सद्याख्या, 'वेदाः केन- चिद् व्याख्याताः, महाजनपरिगृहीतवाक्यत्वात् । अव्याख्यातत्वे तदर्थानवगमेऽननुष्ठानापत्तेः, एकदेशदर्शिनोऽस्मदादेश्च व्याख्यायामविश्वासः, इति तद्वयाख्ययेश्वरमिद्धिः। धृतिर्धारणं मेधा- ख्यज्ञानम् , आदिपदार्थोऽनुष्ठानम् ततोऽपि । 'वेढा वेदविपयकजन्यधारणान्यधारणाविषयाः, धृतिवाक्यत्वात् , लौकिकवाक्यवत् ; यागादिकं यागादिविषयकजन्यज्ञानान्यज्ञानवदनुष्ठितम् , अनुष्ठितत्वात् गमनवत्' इति प्रयोगः । पदं प्रणवेश्वरादिपदम् , तत्सार्थक्यात् ग्वतन्त्रोच्चारयित- शक्त'श्रुत्यादिस्थाऽहंपदाद् वा । न चेश्वरादिपदस्य स्वपरता, "सर्वज्ञता तृप्तिरनादियोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च विभोविधिज्ञाः पडन्तरड्गाणि महेश्वरस्य ॥ 1 इत्यादिवाक्यशेपेण 'ईश्वरमुपासीत' इत्यादिविधिस्थेश्वगदिपदशक्तिग्रहात् , यथा ययादि- पदस्य वमन्ते सर्वसस्यानां." इत्यादिवाक्यशेपाच्छक्तिग्रहेण न कड्ग्वादिपरता । ['कार्यायोजन०' कारिका को अन्य प्रकार से योजना कार्यायोजन इत्यादि कारिका से ईश्वर अनुमान करने का दूसरा भी प्रकार सूचित होता जमे कार्य का अर्थ है तात्पर्य । उससे ईश्वर का अनुमान इस रूप से हो सकता है-'वेद' सता- त्पर्यक. (अर्थात्' अर्थविशेषवोधनेच्छाप्रयुक्तः, अर्थविशेषबोधकशब्दत्वात् अाधुनिकशब्दवत् ।' इस अनुमान से वेद का अर्थविशेष मे तात्पर्य सिद्ध होता है । तात्पर्य इच्छारूप होता है अत एव वह किसी प्राश्रय के बिना नहीं रह सकता। अतः उस का कोई प्राश्रय मानना आवश्यक है। जीव उस तात्पर्य का आश्रय नहीं हो सकता क्योकि वह वेद का श्राद्य वक्ता नहीं है। जिस शब्द का प्राद्यवक्ता होता है वह शब्द उसी के तात्पर्य से प्रयुक्त होता है अतः उस तात्पर्य के प्राश्रय रूप मे ईश्वर का स्वीकार प्रावश्यक है। [वेद को यथार्थव्याख्या ईश्वर प्रयुक्त है] प्रायोजन का अर्थ है यथार्थव्यारया । उस से भी ईश्वरानुमान होता है। जैसे वेद फिसी पुरुष से व्याख्यात है क्योकि वह महाजन से परिगृहीत वाक्य है । व्यारयात होने का अर्थ है सुगम वाक्यो से अर्थ का वोधन होना या अर्थ का वोधिन होना। और महाजनपरिगृहीत होने का अर्थ हे महाजनो द्वारा पढा जाना, अर्थ ज्ञान प्राप्न करना, और ज्ञात अर्थ का अनुष्ठान या वर्णन करना। महाजन का अर्थ है सत् और असत् की परीक्षा कर के सत् का ग्रहण और असत् का परित्याग करने को प्रवृति से सपन्न होना । यदि वेदो की व्याख्या न होती तो वेदार्थ का ज्ञान न होता और वेदार्थ के [१] "पिताऽहमन्य जगतो माता धाता पितामह."[भ.गी १७] इत्यादौ ।[२] 'पडाहुरङ्गानि' इत्यन्यत्र ग्रन्थे पाठ 1 [३] 'जायते पत्रशातनम, मोदमानाश्च तिष्ठन्ति, यवा कणीशशालिन' इति शेप पादत्रयम् । आदिना 'वराहं गावोऽनुधावन्ति' इत्यादि ।

२८ ] [गाया ममुच्चय-स्त. २-श्लोक जान के भाव मे वेद के अनुसार कर्मा का पनुनान प्रादि का प्रचलन न होता । प्रन. वेदार्थ का अनुष्ठान, वेदार्थ का ज्ञान और वेदो का अध्ययन महाजनो द्वारा होता है अतः रिमी वेदार्थज्ञ के द्वारा उस की धारया मानना नावश्यक है। यह व्याया तिमी जीव द्वारा सपन्न नहीं हो सस्ती है क्योकि वह अल्पज्ञ होता है और वेदार्थ प्रत्यन्त विस्तृत और व्यापक है । अतः एव अनेक प्रयों ने गनित वाक्य की अल्पज्ञ द्वारा की जाने वाली व्यारया मे महाजनो को विश्वास नहीं पहना । इसलिये वेदो का व्यारयाता ऐसे ही पुरप को मानना होगा जो सपूर्ण वेदाय को बिना किसी साधन के सहारे जानता हो । ऐमा पुरुष परमेश्वर मे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता । (वेदविषयक विशिष्टज्ञानरूप धृति से अनुमान) धृति का अर्थ है-धारण, धारण का अर्थ है विशेष प्रकार का ज्ञान । जिसे मेघा शब्द से व्यवहृत किया जाता है । और धृत्यादि मे प्रादि शब्द का अर्थ है अनुष्ठान । इस विशिष्ट जानात्मपति और अनुष्ठान ने भी ईश्वर का अनुमान होता है. जमे वृतिमूलक अनुमान का प्रयोग दम रुप मे पिया जा सकता है-वेद वेदविषयक जन्मति, से अन्य धृति का विषय है क्योंकि धृति का विषय नूत वाक्य है । जो नी घृति का विषयभूत वाक्य होता है यह सब वेदविषयफ जन्यवृति से अन्यवृति विष- यफ होता है जैसे लौकिकवाक्य महाभारत रामायण प्रमृति । श्राशय यह है कि नौफिक वाश्य की धृति वेदविषयकति ने अन्य है. क्योंकि वह जन्य घृति होते हुए भी वेदविषयक नहीं है । उसी प्रकार वेद जिन वृति का विषय है उसे भी वेदविषयकति से अन्य होना चाहिये और वह धूति वेदविषयक होतो है अन वेदविषयकति से अन्य धृति उमी दशा में हो सकती है जब उसे नित्य माना जाय । इस प्रकार यह भी सिद्ध होता है कि वेदविपयक नित्यज्ञान जो वेद को विषय करता है वह नित्यज्ञान जीव को हो नहीं सकता क्योकि जीव में ज्ञान का सम्बन्ध साधनो द्वारा ही सपन्न होता है प्रत उस ज्ञान के आश्रय स्प में ईश्वर को स्वीकार करना श्रावश्यक है। (यागानुष्ठान से अनुमान) अनुष्ठान से तीसरा अनुमान का प्रयोग इस प्रकार हो सकता है जैसे याग-यागर्म याग- विषयककर्म जन्यज्ञान से अन्य ज्ञानवाले पुरुषो से अनुप्ठित हुआ है। क्योकि वह अनुष्ठित होता है। जो अनुष्ठित होता है वह सर यागादि जन्यविषयक ज्ञान से अन्य ज्ञानवाले पुरषो से अनुष्ठित होता हैं जैसे गमन भोजनादि । प्राशय यह हैं गमनभोजनादि 'अस्माभिः गन्तव्य, अस्मानिः भोक्तव्य' इत्यादि ज्ञान से युक्त पुरुषो द्वारा अनुष्ठित होता हैं और यह ज्ञान जन्यज्ञानरुप होने पर भी यागा- दिविषयक न होने से यागादिविषयक जन्य ज्ञान से अन्य ज्ञान कहलाता है । उसी प्रकार यागादि जिस ज्ञान से होता है उसे भी यागादिविषयक जन्यज्ञान से अन्य होना चाहिये । और वह ज्ञान यत यागादिविषयक है अत उसे नित्य मानने पर ही वह यागादिविषयक जन्यज्ञान से अन्य ज्ञान हो सकता है । और वह ज्ञान जीव मे प्राश्रित नहीं होता इसलिये उस के आश्रयरूप मे ईश्वर की सिद्धि आवश्यक है। (ॐ-अहं-ईश्वर आदि पद से अनुमान] पद का अर्थ है 'प्रणव' नामक पद जिसे 'ॐ' कहा जाता है, और 'ईश्वर' आदि पद । इन पदो से भी ईश्वरानुमान होता है जैसे-'' यह प्रणव पद और ईश्वरादि पद सार्थक हैं क्योकि वह साध्य- म्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ २९ प्रत्ययो विधिप्रत्ययः, ततोऽपि, आ'ताभिप्रायस्यैच विध्यर्थत्वात् । न हीष्टसाधनत्वमेव - । पद है । जो साध्यपद होता है वह सार्थक होता हैं जैसे घट आदि पद ।' उन पदो की सार्थकता अन्य फिसी पदार्थ के द्वारा नही हो सकती क्योकि अन्य किसी भी पदार्थ को चाहे वह जीव हो या चाहे जीव से निम्न जड हो उसे ॐ या ईश्वर आदि पद से नहीं अनिहित किया जाता है । इसलिये उस की सार्थ- कता की उत्पत्ति के लिये ईश्वर को उन पदो का अर्थ मानना प्रावश्यक है । वेद मे उपलब्ध होनेवाले 'महम्' पद से भी ईश्वर का अनुमान होता हे जैसे-वेदस्थ 'अहम्' पद स्वतन्त्र उच्चारणकर्ता का वाचक हे पयोकि वह अहम् पद है । जो भी अहम् पद होता है वह सब स्वतन्त्र उच्चारण कर्ता का वाचक होता है जैसे 'ग्रह गच्छामि' 'अह इच्छामि' इत्यादि लौकिक वाक्यस्य 'अहम्' पद अपने भूत वक्ता का बोधक होता है। वेदस्थ 'अहम्' पद का स्वतन उच्चारण- कर्ता कोई जीव नहीं हो सकता क्योगि जो भी जीव 'अहम्' पद युक्त वैदिक वाफ्यो का उच्चारण करता है वह अन्य पुरष से उत्त वाक्य के उच्चारण को सीसकर ही करता है । अत एव कोई ऐसा पुरष मानना आवश्यक है जिसने वेदस्थ अहम पद का सर्व प्रथम प्रयोग किया, जिसे उस के प्रयोग के लिये किसी दूसरे से शिक्षा नहीं लेनी पडी। ऐसा वैदिक अहम् पद का स्वतत्र उच्चारणकर्ता ईश्वर ही हो सकता है । इस प्रसङ्ग मे यह शका हो सकती है-"ईश्वरादि पद अपने स्वरूप का ही वोधन करते हैं । इस प्रकार अपने स्वरूप के बोधन से भी उन पदो की सार्थकता उपपन्न हो जाने से उन पदो के अर्थ के रूप मे ईश्वर को स्वीकार करना यावश्यक नहीं है ।"-किन्तु विचार करने पर यह शका सबल नहीं है क्योकि 'ईश्वरमुपासीत' इस विधिवाक्य का श्रवण होने पर यह जिज्ञासा होती है- 'ईश्वर शब्द का क्या अर्थ है जिस की उपासना का इस वाक्य से विधान किया जा रहा है' ? इस जिज्ञासा के समाधान के लिये 'सर्वज्ञता तृप्ति०' श्रादि वचन प्रस्तुत होता है। उस के अनुसार 'ईश्वरमुपासीत' इस विधिवाक्य के ज्ञाता पुरुपो की द्रष्टि मे ईश्वर वह पुरूष है जो सर्वज्ञ हो, नित्य तृप्त हो अर्थात् जिसे कभी अपने सुख की कामना न हो, नित्यज्ञान से सपन्न हो, स्वतन्त्र हो अर्थात् जिस की इच्छा अन्य पुरुष की इच्छा को प्रधीन न हो और जिस की शक्ति का कमी लोप न हो और अनन्त हो । अर्थात् जिम का प्रयत्न नित्य और सर्वविषयक हो और जो विभु-व्यापक हो । इस प्रकार 'ईश्वर- मुपासीत' इस विधिवाक्य के पूरक 'सर्वज्ञतातृप्ति' प्रादि वाक्य से उक्त प्रकार का पुरष विशेष ईश्वर- पद का अर्थ है यह सिद्ध होता है। शब्दार्थ के निश्चय की यह रीति उसी प्रकार मान्य है जमे 'य यजेत' इस वाक्य के पूरक " वसन्ते सर्वशस्याना जायते पत्रशातनम् । मोदमानाश्च तिष्ठन्ति यवा फणीशशालिन" इस वाक्य से यव पद के अर्थ का निर्णय करने की रीति । इस वाक्य से यह निश्चय होता है कि म्लेच्छो द्वारा यव शब्द से व्यवहृत होने वाला कड्गु श्रादि यव शब्द का अर्थ नहीं है किन्तु वसन्त ऋतु मे अन्य सपूर्ण सस्यो के पत्ते गिर जाने पर भी जो अपने कणसभर पत्तो के साथ विद्यमान होता है ऐसा सस्य ही यव शब्द का अर्थ है । [यजेत इत्यादि मे अनुमान] प्रत्यय का अर्थ है विधि प्रत्यय । उस से भी ई || न होता है। क्योंकि 14 अर्थ होता है प्राप्ताभिप्राय । जैसे गुरु यदि शिष्य है 'मुक्तिकाम हरि . .

[ शा. या. ममुन्चयन-३ ग्लो-3 ३० ] तथा, 'अग्निकामो दारुणी मनीयात्' इत्युक्ती, 'कुतः ' दनि प्रग्ने 'यतो दान्मथनमग्नि- माधनम्' इत्युत्तरेऽग्निमाधनत्वेन विध्यर्थवत्वानुमानानुपपत्तः, अभेदे हेतुत्वेनोपन्यामाऽनी- चित्यात , 'नरति मृत्युम्०' इत्यादौ निधिवाश्यानुमानानुपपनेश्चेष्टमाधनतायाः प्रागेव बोधान् , 'कुर्याः, कुर्याम्' इत्यादी वस्तुमकल्पम्यैव बोधात् , आनाऽध्येपणा-ऽनुना-संप्रश्न-प्रार्थना- ऽऽशंमालिडीन्छाशक्तत्वम्यैव कल्पनाच्च । उल्लद्धने क्रोधादिभयजनिकेच्छाऽऽजा. अध्येय- णीये प्रयोस्तुग्नुग्रहद्योतिकाऽध्येपणा, निषेधाभावयञ्जिकाऽनुजा, प्रयोजनादिजिनामा प्रश्नः, प्राप्नीच्छा प्रार्थना, शुभेन्छाऽऽशंसा। निषेधानुपपत्तेश्च, दृष्टमाघनत्वनिषेधस्य वाघाद ; चलपदनिष्टाननुबन्धित्वम्यापि तदर्थन्वे 'श्यनेन.' टत्यादा अलमम्य यागादिदुःखेऽपि बलवद्- द्वेपेण 'यजेन' इत्यादी बाधात् । तत आप्ताभिप्रायम्यैव विध्यर्थत्वात् तादृशाभिप्रायवी- श्वामिद्धिः। चाहने वाले को भगवान का स्मरण करना चाहिये, तो शिष्य को इस विधिप्रत्ययघटितवाक्य मे यह बोध होता है-'भगवान का म्मरण यही मुमुक्षु का क्र्तव्य है-यह गुरदेव का अनिप्राय है ।' इस अभिप्राय को जान कर ही शिष्य भगवान के स्मरण में प्रवृत्त होता है, क्योकि गुरु जन के अनिप्राय को जान कर तदनुसार कार्य करना ही शिष्टाचार-प्राप्त कर्तव्य है। वेदवाक्य में भी विधिप्रत्यय होता है जैसे स्वर्गकामो यजेत मे यज् धातु के उत्तर मे श्रूयमाण लिड् प्रत्यय । इन लिड्प्रत्यय का मी अर्थ प्राप्त का अभिप्राय' मानना होगा । अर्थात् इन लिड प्रत्यय घटित वाक्य से भी इस प्रकार का हो वोध मानना होगा 'यज्ञ स्वर्गकाम पुरुप का कर्तव्य है यह "स्वर्गफामो यजेत" इस वाक्य के प्रयोग करने वाले प्राप्त का अभिप्राय हैं । यह अभिप्राय उसी पुरुष का हो सकता है जिसे यह सहज ज्ञान हो कि याग स्वर्ग का सायन होता है । अंसा पुरप कोई जीव न होगा. ईश्वर हो हो सकता है क्योकि याग मे स्वर्गसाधनता का सहज ज्ञान जीव को नहीं हो सकता, वह ईश्वर को ही सनवित है क्योकि वह सपूर्ण पदार्थों का साधननिरपेक्ष द्रष्टा होता है। इस प्रकार वेदस्थ विधिवाक्य मे सूचित होनेवाले प्राप्त के अभिप्राय के प्राश्रय रूप मे ईश्वर का अनुमान होता है । अनुमान का प्रयोग इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है जैसे 'वेदस्थ विधि प्रत्यय प्राप्ताभिप्राय का बोधक है, क्योकि वह दिधिप्रत्यय है, जो भी विधि प्रत्यय होता है वह सब प्राप्ताभिप्राय का बोधक होता है । जैसे 'मृत्य प्रापणम् गच्छेत् शिष्यः शास्त्रम् पठेत्' 'वत्सः दुग्ध पिवेत्' इत्यादि लौकिक वाक्यों मे सुनाई देनेवाला विधि प्रत्यय । [विधिप्रत्ययार्थ इष्टसाधनता या आप्ताभिप्राय ? इस प्रसङ्ग मे यह शङ्का हो सकती है-"विधिप्रत्यय चाहे लौकिकवाक्य हो चाहे वैदिकवाक्य हो, सर्वत्र उस का इष्टसाधनत्व ही अर्थ होता है न कि प्राप्तानिप्राय । क्योकि मनुष्य को प्रवृत्ति इष्ट- साधनताज्ञान से ही होती है, न कि प्राप्ताभिप्राय के ज्ञान से। प्रत. प्राप्ताभिप्राय को विधिप्रत्यय का अर्थ मानने पर मी यही मानना होगा कि विधि प्रत्यय से प्राप्ताभिप्राय का ज्ञान होता है और . स्या० का टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ३१ आप्ताभिप्राय से इष्टसाधनता का ज्ञान होता है और उस ज्ञान से मनुष्य को प्रवृत्ति होती हैं । जैसे, गुरु के 'मोक्षफाम हरि स्मरेत्' इस वाक्य से हरिस्मरणम् मोक्षफामर्तव्यतया गुरो अभिप्रेतम्' अर्थात ‘भगवान का स्मरण मुमुक्ष पुरुप के कर्तव्य रूप में गुरु को अभिप्रेत है' यह ज्ञान होने पर यह अनुमान होता है- भगवत् स्मरण मोक्ष का साधन है क्योकि मोक्षकाम के कर्तव्यल्प मे आप्त को अभिप्रेत है । जो जिस फल का साधन नहीं होता वह उस फल को चाहने वाले पुरूष के पर्तव्यरूप मे आप्ताभिप्रेत नहीं होता । जैसे द्यूतकोडा आदि मोक्ष का साधन न होने से किसी आप्तपुरुष को मोक्षकाम के कर्तव्यरूप मे अभिप्रेत नहीं होता'-इस प्रकार जब आप्ताभिप्राय के द्वारा इष्टसाधनता का बोध मनुप्य की प्रवृत्ति के लिये अपेक्षित है तो विधिप्रत्यय से आप्ताभिप्राय का बोध और आप्ता- मिप्राय से इष्ट साघनता का अनुमान मानने की अपेक्षा यही मानना उचित है-इष्ट साधनता ही विधिप्रत्यय का अर्थ है । विधिप्रत्यय-घटित वाक्य से इप्टसाधनता का हो सोधा बोध होता है, मध्य मे आप्ताभिप्राय के बोध को कल्पना अनावश्यक है। इसप्रकार जब इष्टमाघनता ही युक्तिद्वारा विधिप्रत्यय का अर्थ सिद्ध होता है तो उक्त रीति से विधि प्रत्यय को ईश्वर का अनुमापक नताना उचित नहीं हो सकता।"- (इष्टसाधनता पक्ष मे समस्या) किन्तु विचार फारने पर यह शङ्का उचित नहीं प्रतीत होती । क्योकि विधिप्रत्यय के अर्थ का अनुमान इप्टसाधनत्व से किया जाता है। यदि इप्टमाधनत्व ही विधिप्रत्यय का अर्थ होगा तो साध्य साधन मे ऐक्य हो जाने के कारण इष्टसाधनत्व विधिप्रत्ययार्थ का अनुमापक न हो सकेगा। जैसे 'अग्निकामो दारुणी मनीयात् =अग्नि चाहनेवाले मनुष्यो को दो काष्ठो का घर्षण करना चाहिये ।' इस विध्यर्थ का ज्ञान होने पर प्रश्न होता है-ऐसा क्यो । अर्थात् 'कुत अग्निकामो दारुणी मथ्नीयात् ?' इस प्रश्न के उत्तर मे यह कहा जाता है कि दारुमथन अग्नि का साधन है'। इसप्रकार उक्त वाक्य से विध्यर्थ का ज्ञान होने मे अग्निसाधनता को उसके हेतुरूप मे प्रसिद्ध किया जाता है । इसलिये यह मानना आवश्यक है कि विध्यर्थ इष्टसाधनता से भिन्न है और जब आप्तामिप्राय को विधिप्रत्यय का अर्थ माना जायगा तव 'अग्निकामो दारुणी मथ्नीयात्' इस वाक्य से दारु मथन अग्निकामी के कर्तव्य रप मे आप्त को अभिप्रेत है-यह ज्ञान होगा। और उस पर जव यह प्रश्न होगा कि 'दारु का मथन अग्निफामी के कर्तव्यरूप मे आप्त को क्यो अभिप्रेत है ? इस के उत्तर मे यह कहना सङ्गत होगा कि-यत दारुमथन अग्नि का साधन है इसलिये अग्निकामो के कर्तव्यरूप मे आप्त को अभिप्रेत है। (तरति से विधिवाक्य का अनुमान) इष्टसाधनता को विधि प्रत्यय का अर्थ मानने पर 'तरति मृत्युम् प्रात्मविद्' इत्यादि वाक्यो से विधिवाक्य का अनुमान न हो सकेगा क्योकि विधिवाक्यानुमान के पूर्व ही उन स्थलो मे इष्टसाधनता का बोध हो जाता है । आशय यह है कि 'आत्मज्ञो मृत्यु तरति' यह वाक्य इस अर्थ को बताता है कि 'आत्मज्ञानी मृत्यु का अतिक्रमण कर लेता है । इस अर्थबोध के बाद यह जिज्ञासा होती है कि आत्मज्ञान से मृत्यु का अतिक्रमण होता है इस मे क्या प्रमाण है? उस के उत्तर मे यह कहा जाता है कि 'आत्मज्ञो मृत्यु तरति' इस वाक्य से आत्मज्ञान के मृत्युतरणरूप फल का श्रवण होने पर इस विधिवाक्य का अनुमान होता है कि 'मृत्युतरणकाम आत्मान जानीयात्', यह विधिवाक्य ही आत्मज्ञान के मृत्युतरण मृत्यु ३२] [भाग ममुन्चय-म्न ३ श्लो०३ की साधनता मे प्रमाण है। किन्तु यदि विधिप्रत्यय का अर्थ इप्टसायनता को माना जाय तो 'आत्मजो मृत्यु तरति' इस वाक्य से ही आत्मज्ञान मे मृत्युतरण की माधनता का बोध हो जाने ने उस बोध के सपादनार्थ विधिवाक्य का अनुमान निरर्थक हो जायगा । और यदि विधि प्रत्यय का अर्थ प्राप्ताभिप्राय माना जायगा तय 'आत्मज्ञो मृत्यु तरति इस वाक्य से आत्मज्ञान मृत्युतरण का माधन हैं यही बोध होने के कारण आत्मज्ञान मृत्युतरण चाहने वाले के फर्तव्यस्प मे आप्ताभिप्रेत है इस विध्यर्थ का ज्ञान कराने के लिये विधिवाफ्य के अनुमान को सार्थकता हो सकेगी। क्योंकि यह दोच 'आत्मनो मत्यु तरति' इस वाक्य से नहीं होता। विधिप्रत्यय ते ईश्वरानुमान होने का एक और भी प्रकार है जैसे, वेदवाक्य मे मध्यम पुरपीय और उत्तम पुरुषीय विधि प्रत्यय भी उपलब्ध होते हैं । जैसे आत्मानम् विद्धि आत्मा का ज्ञान प्राप्त करो'। 'एकोऽह बहु स्याम् प्रजायेय-म एफ हूँ बहुत हो जाऊं और प्रकृष्टत्प मे प्रादुर्भूत होऊ ।' इन वाक्यो मे आये विधिप्रत्यय को उन से घटित वाक्य के वक्ता के मकल्प का बोधक मानना आवश्यक है क्योकि मध्यम और उत्तम पुरुषीय विधिप्रत्यय वक्ता के हो संघल्प का योधक होता है । जैसे इद कार्य कुर्या ।' इन लोकिक वाक्यो मे आये विधिप्रत्यय में वक्ता के ही सकल्प का बोय होता है। इमप्रकार वैदिक वाक्यो मे आये विधिप्रत्यय से जिस वक्ता में सफल्प फा बोध होगा वह जीव नहीं हो सकता किन्तु ईश्वर ही हो सकता है। क्योकि वेद फा आद्यवस्ता ईश्वर ही हो सकता है जीव नहीं हो सकता। इसी प्रकार आज्ञा अध्येपणा अनुज्ञा सप्रश्न प्रार्थना और आसा बोधक लिङ्गप्रत्यय भी इच्छारुप अर्थ का हो बोधक होता है और यह सभी प्रकार के लिटवेदो मे उपलब्ध होते हैं । अत एव उन से बोधित होनेवाली इच्छा के आश्रय रूप मे ईश्वर को स्वीकार करना आवश्यक है। लिङ् के आज्ञा आदि अर्थों के निवचन से लिए फी इच्छावाचफता स्पष्ट है। जैसे- आज्ञा का अर्थ वह इच्छा है जिस का उल्लङ्घन करने पर इच्छावान् पुरुष क्रुद्ध होने का सभव हो । अध्येषणा का अर्थ है वह इच्छा जिस से अध्येपणार्थक लिड का प्रयोग करने वाले पुरुष की अध्येषणीय पुरुष के प्रति कृपा का बोध हो । अनुज्ञा का अर्थ वह इच्छा है जिस से निषेध का अभाव सूचित हो । प्रयोजन अथवा हेतु आदि को जानने की इच्छा का नाम है प्रश्न । किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा का नाम है प्रार्थना । शुभ की इच्छा का नाम है आशसा । इस प्रकार आज्ञा आदि के इस निर्वचन के अनुसार आज्ञादि बोधक लिड को इच्छा की बोधकता स्पष्ट है। [निषेध को अनुपपत्ति] इष्टसाधनत्व को विधि प्रत्यय का अर्थ मानने मे एक और भी बाघा है और वह है निषेध की अनुपपत्ति । जसे 'सविषमन्न मा भुक्ष्व' इस निषेध वाक्य सविष अन्न के भोजन में विघ्यर्थ का निषेध करता है। यदि विध्यर्थ इप्टसाधनता' होगा तो इस वाक्य का अर्थ होगा 'सविष अन्न का भोजन इप्ट का साधन नहीं होता' जो असगत है क्योकि भोजनकर्ता को इष्ट होती है तृप्ति-भूख को निवृत्ति । वह सविष अन्न के भोजन से मी सपन्न होती है, इसलिये सविष अन्न के भोजन मे इष्ट- , स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ३३ श्रुतिः ईश्वरविषयो वेदः ततः, 'यज्ञो वै विष्णुः' इत्यादेविध्येकवाक्यतया यद् न दुःखेन संभिन्नम्' ० इत्यादिवत् तस्य स्वार्थ एव प्रामाण्यात् । वाक्यात वैदिकप्रशंगा-निन्दावाक्यात् , तस्य तदर्थज्ञानपूर्वकत्वात् । संख्या 'स्यामभूवम् , भविष्यामि' इत्याधुक्ता । ततोऽपि स्वत- न्त्रोच्चारयितुनिष्ठाया एव तस्या अभिधानादितिरहस्यम् । साधनता रहने के कारण उक्त वाक्य को इष्टसाधनता के अभाव का बोधफ मानना उचित नहीं हो सकता । यदि यह कहा जाय-केवल इण्टसाधनत्व को विधिप्रत्यय का अर्थ मानने पर यह दोष हो सकता है, किन्तु 'वलवदनिष्टाननुवन्धित्वविशिष्टइप्टसाधनता अर्थात् बलवान अनिष्ट का साधन न होते हुए इष्ट का साधन होना' इस को विधि प्रत्यय का अर्थ मानने मे उक्त दोष नहीं हो सकता क्योकि सविष अन्न का भोजन यद्यपि तृप्ति रूप इष्ट का साधन है किन्तु साथ ही वह मृत्यु रूप बलवान अनिष्ट का भी साधक है। इसलिये निषेध वाक्य से बलवदनिष्टाननुवन्धित्व विशिष्ट इष्ट साधनत्य के अभाव का बोध होने मे कोई बाधा नही हो सकतो'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि 'श्येनेन अभिचरन् यजेत' इस विधि वाक्य से श्येनयाग मे विधिप्रत्ययार्थ का बोध होता है, यदि विधप्रत्यय का अर्थ बलवदनिष्टाननुवन्धित्वविशिष्टइष्टसाधनत्व को माना जायगा तो श्येनयाग मे शत्रुवधजन्य पाप द्वारा नरकरूप बलवान अनिष्ट की साधनता होने के कारण इस मे विधिप्रत्यय से विध्यर्थ का बोध न हो सकेगा । इसी प्रकार 'स्वर्गकामो यजेत' इस वाक्य से यज्ञ मे उस पुरुष को विध्यर्थ का बोध न हो सकेगा जो यज्ञ के अनुष्ठान मे अवश्यभावी अल्प दु ख को भी बलवान समझ कर उससे द्वष करता है। इन सब बातो से यह निविवाद सिद्ध है कि विधिप्रत्यय का अर्थ आप्ताभिप्राय ही है अन्य कुछ नहीं । अत उस अभिप्राय के आश्रय रूप मे ईश्वर की सिद्धि आवश्यक है। (वेद गत इश्वर निरूपण से ईश्वर सिद्धि) श्रति का अर्थ है ईश्वरपरक वेद । इस से भी ईश्वर का अनुमान होता है। कहने का आशय यह है कि वेद मे ऐसे अनेक वचन प्राप्त होते है जिन मे ईश्वर का वर्णन होता है। ऐसे वचन यद्यपि विधिरूप नहीं होते क्योकि उन से किसी प्रकार के विधि या निषेध का उपदेश नहीं होता। जो विद्वान जैसे मीमांसकादि विधिनिषेध बोधक वाक्य को ही प्रमाण मानते हैं उन की दृष्टि मे भोसे वचन जो विधि-निषेध रूप नहीं होते अपने अर्थ मे प्रमाण होते हैं, क्योकि उन वाक्यो की विधि वाक्यो के साथ एकवाक्यता होती है । अर्थात् विधिवाश्य और विधि से भिन्न विधि के अङ्गभूत वाक्य मिलकर एक अर्थ का प्रत्यायन करते हैं । जसे 'विष्णु उपासीत' यह विधि वाक्य और यज्ञाव विष्णु.' यह विधिभिन्न वाक्य दोनो यज्ञस्वरूपम् विष्णुमुपासीत' इस अर्थ का बोधक होता है । यह बोध तभी हो सकता है जब 'यज्ञो वै विष्णु' इस विधिभिन्न वाक्य को भी अपने अर्थ मे प्रमाण माना जाय | इसी प्रकार स्वगकामो यजेत' यह विधिवाक्य और-'यन्न दुखेन समिन्न, न च ग्रस्तम् अनन्तरम् । अभिलाषोपनीत च तत्सुख स्व पदास्पदम'। यह विधिभिन्न वाक्य ये दोनों मिलकर इस अर्थ का बोधन करते हैं कि यज्ञ ऐसे स्वर्ग सुख का साधन है जो दुख से मित्र नहीं है, जिसे बाद में भी दुख से ग्रस्त होने की संभावना नहीं है और जो इच्छामात्र से हो प्राप्य है । यह वोध मो तभा सभव है जब ३४] [ गा.वा ममुच्चय स्त०-3 लोक-3 यावन् स्मरेताहेतीः। श्रुत्वैवं मकृदनमीश्वरपर माल्याऽनपादागमं, लोको विम्मयमातनोति न गिरो किं तावद्वदरीफनेऽपि न मुहर्माधुर्यमुन्नीयते, यावत्पीनरमा रमाद् ग्मनया हासा न माक्षात्कृता ! || * इत्थमभिहिना ईश्वरकत्वपूर्वपक्षवाना * - १ 'यन्न दु जेन मभिन्नः' यह विधिभिन्न यायय अपने अर्थ मे प्रमाण है । इन उदाहरणो से यह अत्यन्त स्पष्ट है कि वेद के ऐसे वचन जा विधि-निषेधरप न होते हुये भी ईश्वर का वर्णन करते हैं वे ईश्वर को सत्ता मे प्रमाण है । इस प्रकार श्रुति अर्थात् ईश्वर परक वेद से भी ईश्वर की सिद्धि होता है । (घुशंसापरक और निदापरक वेदवाक्यो से ईश्वरसिद्धि) वाक्य का मथ है वेद मे प्राप्त होने वाले प्रशसा और निन्दा का वाक्य । उन वाक्यों ने भी ईश्वर का अनुमान होता है जैसे, वैदिक प्रशसा और निन्दा क वाक्य स्वार्यज्ञानपूर्वक है क्योंकि वे वाक्य है, जो भी वाक्य होता है वह स्वायज्ञानपूर्वक होता है जैसे 'घटमानय पटमानय इत्यादि लौफिक काश्य ! कहने का आशय यह है कि किसी भी वाक्य का प्रयोग किमी विशेषमय को बनाने के लिये किया जाता है और वह विशेप अयं वही होता है जो वयता को ज्ञात हो और जिसे बताने मे प्रयुक्त होनेवाला वाक्य ममय हो । लोक में सारे वाक्य इमो ढग के होते हैं। इसलिये वेद के प्रशता-निन्दा वाक्य जिस को प्रशसा या निंदा का बोध कराने के लिये प्रयुक्त होते हैं-यह मानना आवश्यक है कि वक्ता को उन के गुण और दोष का ज्ञान रहता है। क्योकि वक्ता को जिस का गुण और दोष ज्ञात न होगा वह उस का प्रशसा या निन्दा के वाक्य का प्रयोग नहीं कर सकता । तो इस प्रकार जब यह मिद्ध है कि वैदिक प्रशसा और निन्दावाक्य भी स्वायज्ञानपूर्वक हाते है ता उस ज्ञान के आश्रय रूप मे जोव को स्वीकार करना संभव न होने से ईश्वर का अस्तित्व मानना आवश्यक है । उत्तम पुरुषीय आख्यात प्रत्यय से ईश्वर सिद्धि) सस्या का अर्थ है वेद मे प्राप्त होनेवाले उत्तमपुरुषीय तिड्-प्रास्यात प्रत्यय से वाच्य सख्या । प्रागय यह है कि उत्तम पुरपीय प्रास्यात अपने स्वतत्र उच्चारण कर्ता को संख्या का वोधक होता है। जैसे चैत्र कहता है कि विद्यालय गमिष्यामि' इस वाक्य मे गम् धातु के उत्तर उत्तम पुरुष का एकवचन पारयात जो मि' सुनाई देता है वह अपने स्वतत्र उच्चारणकर्ता चैत्र को एकत्वमस्या का वोधक होता है । वेद मे नो 'स्याम्-अभूवम्-मविष्यामि' इस प्रकार उत्तम पुरुषीय प्रास्यात के प्रयोग प्राप्त होते हैं । अत उन आख्यात पदों से सत्या का निधान उपपन्न करने के लिये उन का भी कोई स्वतत्र उच्चारणकर्ता मानना आवश्यक है जो ईश्वर से अन्य दूसरा नहीं हो सकता। इस प्रकार वेदस्थ उत्तमपुरुषीय प्रास्यात से वाच्य सस्या द्वारा ईश्वर का अनुमान होता है । अनुमान का प्रयोग इस प्रकार हो सकता है जैसे 'वेदस्य उत्तमपुरुषीय प्रारयातपद बोध्य सस्या ताशप्रारयात के स्वतत्रोच्चारणकर्तृ पुरुष गत है, उत्तम पुरुषोय आल्यातवाच्य सख्या होने से, जैसे लौकिक वाक्यस्थ उत्तम पुरुपीय प्रास्यात वाच्य सरया'।

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ३५ भावतः ॥४॥ अथ समाधानवार्तामाह- अन्ये त्वभिदधत्यत्र वीतरागस्य इत्थं प्रयोजनाऽभावात् कर्तृत्वं युज्यते कथम् ? अन्ये तु जैनाः, अत्र ईश्वरविचारे, अभिदधति परीक्षन्ते । किम् ? इत्याह बीत- रागस्य-वैराग्यवतः ईश्वरस्य पातञ्जलैरभ्युपगतस्य, इत्थं प्रेग्कत्वे, प्रयोजनाऽभावात् , भावतः इच्छातः, कर्तृत्वं कथं युज्यते १ यो हि परप्रेरको दृष्टः स स्वप्रयोजनमिच्छन्निष्टः, ततोऽत्र व्यापिकायाः फलेच्छाया अभावाद् व्याप्यस्य परप्रेरकत्वस्याऽभा एतदेव स्पष्टयन्नाह- नरकादिफले कांश्चित्कांश्चित्स्वर्गादिसाधने । कर्मणि प्रेरयत्याशु स जन्तून् केन हेतुना ? ॥ A ईश्वर की सिद्धि के विषय मे साख्ययोग और न्याय-वैशेषिक की उक्त युक्तियो के सम्बन्ध मे आलोचना करते हुए व्याख्याकार का कथन है कि मनुष्य जब तक ईश्वर के सम्बन्ध मे भगवान अर्हन के वचन को नहीं समझता तब तक वह साख्य-योग न्याय-वैशेषिक शास्त्रो के ईश्वर विपयक प्रनि- पादन को सुनकर यदि विस्मित और पानन्दित होता है तो यह अत्यन्त स्वाभाविक है क्योकि जिस मनुष्य को रस से भरी द्राक्षा का रसास्वाद करने का अवसर जब तक प्राप्त नहीं होता तब तक वह बैर जैसे निकृष्ट फल की मधुरिमा को भी मुक्त कठ से प्रशसा करते नहीं थकता ॥३॥ (वीतराग ईश्वर कर्ता नहीं हो सकता-उत्तरपक्षारम्भ) चौथी कारिका मे ईश्वर को सिद्ध करनेवाली साख्ययोग सम्मत युक्ति का निराकरण किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है-जैन विद्वानो का कहना है कि ईश्वर वीतराग होता है । साख्य योगदर्शन मे भी ईश्वर को वीतराग माना गया है, इसलिए वह जगत् कर्ता होना सगत नहीं हो सकता, क्योकि कर्तृत्व साक्षात् हो या दूसरे की प्रेरणा द्वारा हो, प्रयोजन की इच्छा होने पर ही समव होता है । अर्थात् जिसे किसी फल की इच्छा होती है वही साक्षात् या पर को प्रेरणा के द्वारा कर्ता होता है। वीतराग ईश्वर मे फलेच्छारूप व्यापक धर्म नहीं है इसलिए उस का व्याप्य होने से साक्षात् या परप्रेरणामूलक कर्तृत्व भी उसमे नहीं हो सकता। (नरकादिफलक कृत्य मे ईश्वर प्रेरणा का अनौचित्य) पांचवी कारिका मे पूर्व कारिका मे कही हुई वात को ही स्पष्ट किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है-ईश्वर कुछ जीवो को ब्रह्महत्या प्रादि ऐसे कार्यो मे प्रवृत्त करता है जिस से कर्ता को नरक की प्राप्ति होती है और कुछ जीवो को यम नियमादि कर्मों मे प्रवृत्त करता है जिस से कर्ता को स्वर्ग की प्राप्ति होती है । प्रश्न होता है-ईश्वर जीवो को इस प्रकार विभिन्न कर्मों मे क्यो प्रवृत्त करता है, इस प्रकार जीवो को प्रवृत्त करने मे उसका क्या प्रयोजन सिद्ध होता है ?

३६ ] [शा या. ममुनचय स्त-दलो०६ स-ईश्वरः, कांश्चिजन्तून नकाटिफन्ने-ब्रह्महन्यादा कर्मणि, काश्रित म्वर्गादिमाधने यम-नियमाढी वा, आशु-शीघ्रम् , केन हेतुना प्रेरयति ? क्रीडादिप्रयोजनाभ्युपगमे रागद्वेपाभ्यां वैराग्यव्याहतिः, प्रयोजनाऽनभ्युपगमे च नन्मूलकप्रेग्णाभावान सिद्वान्तव्याघातः, इत्युभयतः -पाशा रज्जुरिति भावः ||शा पगभिप्रायमाशय निराकरोति- स्वयमेव प्रवर्तन्ते सत्त्वाश्चेचित्रकर्मणि । निरर्थक मिहेशस्य कर्तृत्व गोयने कथम् ? चित्रकर्मणि प्रमहन्या-यम-नियमादी, स्वयमेव नमःमच्चोठेकेण तथावि- धबुद्धय शव्यापागवेशेनव, प्रवर्तन्तक त्वेनाऽभिमन्यन्तै, प्रयोजनतानार्थ परमीश्वग- पेक्षेति' चेत ? इह-कर्मणि, निरर्थकमीशम्य तं कथं गीयने ? प्रयोजनजानं हि प्रवर्त- नार्थमुपयुज्यते, प्रवृत्तिश्च यदि स्वत एवोपपन्ना, तदेश्वरमिद्विव्यसनं गृहलब्ध एव धने विदेश- गमनप्रायम् । ६॥ . 'मचाः, सुख के साधन यदि यह कहा जाय 'विभिन्न जीवो को प्रवृत्त करना यह उस का सेल है। खेल खेलने के लिए ही वह विभिन्न कर्ना मे जीवो को प्रवृत्त करता है तो यह ठीक नहीं, क्योकि सेल से भी यदि मनुष्य को फिसो प्रकार का सुख प्राप्त होता है तभी वह खेल भी सेलता है अन्यथा सेल से विरत हो जाता है । ग्राशय यह है कि ईश्वर यदि किसी प्रकार के मुख की ईच्छा से खेल खेलता है तो उसे सुस और के प्रति रागवान् मानना । यदि वह मनोविनोद के लिए अथवा यदि मानसिक कप्ट को दूर करने के लिए खेल खेलता हे तो कप्ट और कष्ट के माधन के प्रति द्वापदान् मानना पडेगा। फलतः ईश्वर को वीतराग कहना असभव हो जायगा । और यदि ईश्वर का खेल खेलने में कोई प्रयोजन न माना जायगा तो जीवो को विभिन्न कर्मों मे प्रवृत्त करना यह उस का खेल नहीं घट सकता क्योकि 'पर का प्रवर्तन भी किसी प्रयोजन से ही होता है। फ्लत 'ईश्वर परका प्रेरक होकर का होता है। इस सिद्धान्त की हानि हो जायगी। उक्त रूप से विचार करने पर सास्य और अन्य वादी के लिए दोनो ओर से वाधने वाली रस्सी तैयार रहती हैं, अर्थात् उसे वीतराग माना जायगा तो वह पर का प्रेरक नहीं हो सकता और यदि पर का प्रेरक होगा तो वीतराग नहीं हो सकता । अत पात्य और अन्य वादी को ईश्वर के सम्बन्ध मे वीतरागता और पर-प्रेरकत्व इन दोनो मे किसी एक का त्याग करना आवश्यक है (बुद्धिकर्तृत्वपक्ष मे भो ईश्वरकर्तृत्व निरर्थक) छट्ठी कारिका मे ईश्वर के सम्बन्ध मे साख्ययोग के एक और प्राशय को प्रस्तुत निराकरण किया गया है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है-जीव ब्रह्महत्या और यम नियमादि जैसे विभिन्न कर्मो मे स्वयं हि प्रवृत्त होते हैं। प्राशय यह है कि साख्यमतानुसार प्रवृत्त-निवृत्त होना पुरुष का काम नहीं है किन्तु उस को बुद्धि का काम है। वृद्धि त्रिगुणात्मिका होती है । बुद्धि के तीन गुण सत्त्व-रजस्-तमस कहे जाते हैं । कर उसका स्था० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ३७ अभिप्रायान्तरमाशक्य निगकुरुते- मूलम्-फलं ददाति चेत्सर्व तत्तेनेह प्रचोदितम् । अफले पूर्वदोषः स्यात् सफले भक्तिमात्रता ॥७॥ सर्व तत्-चित्रं कर्म, इह-जगति, तेन-ईश्वरेण, प्रचोदितम् अधिष्ठितं सत् , फलं- सुखदुःसादिकम् , ददाति-उपधत्ते, अचेतनस्य चेतनाधिष्ठितम्यैव कार्यजनकत्वादिति चेत् ? अफले स्वतश्चित्रफलदानाऽममर्थे कर्मण्यभ्युपगम्यमाने, पूर्वदोषा-पूर्वोक्तः स्वर्ग-नरकादि- फलाऽनियमदोपः स्यात् । सफलेम्वतश्चित्रफलदानसमर्थकर्मणि त्वभ्युपगम्यमाने, भक्ति- मात्रता ईश्वरे भक्तिमात्रं स्यात् , हरीतकीरेकन्यायात् । 'अचेतनं चेतनाधिष्ठितमेव जनकमिति नियमम्त्वताशस्यापि वनवीजस्याऽड्कुरजननत्वदर्शनादसिद्धः, तस्यापि पक्षतायाम् , अन्य- त्रापि व्यभिचारिणः पातायां निवेशऽनैकान्तिकोच्छेदप्रसङ्गादिति भावः ॥७॥ - - जव बुद्धि के सत्त्व गुण का उत्कर्ष होता हे तव उसे दया भक्ति-वैराग्यादि प्रशस्त सात्त्विक भाव जाग्रत होकर सत् कर्तव्यो को करने का सकल्प होता है और उन के अनुसार रजोगुण के सहकार से वह सत्कर्म करती है । जब बुद्धि के रजोगुण का उद्रेक होता है तब सत्त्व या तमो गुण से प्ररित हो सत् या असत् कर्मो करने का सकल्प होता है और उन के अनुसार वह सत् या असत् कर्मों को करतो है। जब बुद्धि के तमोगुण का आधिक्य होता है तब उस मे प्रवल राग द्वेष ईर्ष्या निर्दयतादि तामस भावो का प्राकट्य होता है । बुद्धि के इस कर्तृत्व का पुरुष को केवल अभिमान होता है और वह इसलिए होता है कि पुरुष अपने को बुद्धि से पृथक् नही समझता। विभिन्न कर्मों मे पुरष को स्वतः कर्तृत्व का अभिमान प्रवृत्त होता है । वृद्धि के विभिन्न कर्मो मे बुद्धि की प्रवृत्ति के लिए भा प्रयोजन का ज्ञान अपेक्षित होता है जो ईश्वर के सनिधान से ही सभव है अर्थात् ईश्वर बुद्धि को तद् तद् कर्मों के प्रयोजन का ज्ञान सपादित करता है और उसी से बुद्धि तत् तत् कर्मो मे प्रवृत्त होती है । ईश्वर को परप्रेरक मानने मे योगदर्शन का यह अभिप्राय है। किन्तु इस सबन्ध मे ग्रन्थकार को यह आलोचना है-त्रिगुणात्मिका बुद्धि स्वभाव से ही प्रवृत्तिशील है। अतः उस के प्रवर्तन के लिए प्रयोजन ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है और यदि है तो वह भी बुद्धि को स्वय ही सपन्न हो सकता है। प्रत उस के लिए ईश्वर को सिद्ध करने का प्रयास ठीक उसी प्रकार निरर्थक है जैसे घर मे ही धन की प्राप्ति संभव रहने पर धन कमाने के लिए विदेश की यात्रा निरर्थक होती है। (कर्म की ईश्वराधीनता का निरसन ७ वीं कारिका मे योग दर्शन के एक और अभिप्राय की चर्चा कर के उस का निराकरण किया गया है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है- सभी कर्म ईश्वर की प्रेरणा से ही फलप्रद होता है क्योकि अचेतन मे चेतन के सयोग से ही कार्य- जनकता होती है । अत कर्म की सफलता उपपन्न करने के लिए ईश्वर का अस्तित्व आवश्यक है । इस अभिप्राय के सम्बन्ध मे ग्रन्थकार को यह समीक्षा है कि यदि विभिन्न कर्म विभिन्न फलो को प्रदान करने मे स्वय समर्थ न हो तो ईश्वर का अस्तित्व मानने पर भी उन कर्मों से स्वर्ग नरकादि विभिन्न ३. ] गा या ममुन्षय नल-जलोक- आदिमर्ग तम्येव म्वातन्त्र्यमित्याशक्य निगरुने- आदिसर्गेऽपि नो हेतुः कृतकृत्यस्य विद्यते प्रतिज्ञातविरोषित्वात स्वभावोऽप्यप्रमाणकः ॥८॥ आदिमर्गऽपि कृतकृत्यस्य-वीतरागम्य, हेतुः प्रयोजनम् , न विद्यत, नतः कयमादि- सर्गमप्यय कुर्यात ? । अदृशः स्वभाव एवाऽम्य, यत्प्रयोजनाऽभावेऽप्याटिमग स्वातन्त्र्येणेव करोति, अन्यदा त्वदृष्टाद्यपेयं वेति । अत आह-यमावोऽपि' प्रागुक्तः 'अप्रमाणकः,' धर्मिण एव चाऽमिद्रौ कुत्र तादृशः म्वभावः कल्पनीयः ? इति भावः ॥८॥ फलो की सिद्धि न होगी। क्योकि यदि कमों में स्वयं तद् तद् फलप्रदान करने का सामयं न होगा तो ईश्वर का अस्तित्व दोनो प्रकार के कर्मों के लिये समान होने मे यह नियम नहीं हो सकता कि ब्रह्महत्यादि मे नही हो और यमनियमादि मे न्यग हो । और यदि इम दोष के परिहागर्थ उन कमों को तद् तद् फलो का प्रदान करने मे स्वय ममर्थ माना जायगा तो फिर ईश्वर को मानने को क्या श्रावश्यकता होगी? क्योकि धर्म तो स्वयं हो तद् तद् फ्लो को प्रदान कर देते हैं । अतः उस पक्ष मे भी ईश्वर को कर्म का महकारी मानना ईश्वर के प्रति भवन की भक्ति का प्रज्ञानपूर्वक प्रदर्शन मात्र है । यह ठीक उसी प्रकार जैसे किमी मनुप्य को स्वय रेच होने पर हरितको के मेवन को प्रवृत्ति । और यह जो बात कही गई कि अचेतन चेनन के महयोग ने ही कार्य का जनक होता है वह नो मार्वत्रिक नहीं है, क्योकि चेतन महायक के विना मी वनस्य बीज से अकुर की उत्पत्ति होती है। यदि यह कहा जाय-'वनम्य वीज नो पक्ष कोटि मे हो प्रविष्ट है अर्थात् जैसे कर्म की फ्लप्रदता को उपपन्न करने के लिये कर्म को सहकारी ईश्वर को आवश्यक्ता होती है उसी प्रकार वनस्य वीज में अंकुरजनकता को उत्पत्ति के लिये नी वनस्थवीज के सहकारीरुप में ईश्वर की कल्पना की जायगी। -किन्नु यह कहना ठीक नहीं है क्योकि ऐसा मानने पर जगत् मे अनेकान्तिक दोष का अस्तित्व ही समाप्त हो जायगा अर्थात् कोई भी हेतु कहीं भी माध्य का व्यभिचारी न हो सकेगा क्योंकि जहा भी हेतु मे साध्य का व्यभिचार प्रदर्शित होगा-उस का पक्ष मे अन्तर्भाव किया जा सकता है ॥७॥ (वीतराग ईश्वर को विश्वरचना मे प्रयोजनाभाव) प्राठवीं कारिका मे ईश्वर प्रथमसृष्टि का स्वतत्र कर्ता है इस मत का निराकरण किया गया है । ईश्वर के कर्तृत्व का समर्थन करनेवाले कुछ लोगो की यह मान्यता है कि जो सृष्टि जीव के कर्मों से सपन्न होती है वह तो ईश्वर के बिना जीव के कर्मों से ही उपपन्न हो जायगी किन्तु पहली सृष्टि जिस के पूर्व जीवकर्म विद्यमान नहीं है उस को उपपत्ति ईश्वर से ही हो सकती है। किन्तु यह मानना युक्तिमङ्गत नहीं प्रतीत होता क्योकि ईश्वर वीतराग है उसे किसी वस्तु की इच्छा नहीं है तो वह सृष्टि को उत्पन्न ही क्यों करेगा? अत सृष्टि के सम्बन्ध में भी यही मानना होगा कोई सृष्टि प्रथम सृष्टि नहीं है बल्कि सृष्टि का प्रवाह अनादि है । पूर्व मे ऐसा कोई काल नहीं था जिस में यह सृष्टि न रही हो । यदि ऐसा न माना जायगा तो सृष्टि का अस्तित्व रहना किसी भी प्रकार संभव न हो सकेगा।

म्या० २० टीका-हिन्दीविवेचना ] [३६ विश्वहेतुतया धर्मिग्राहकमानेन तादृशस्वभाव एव भगवान् माध्यते, इत्यभिप्रायादाह- मूलम् - कर्मादेस्तत्स्वभावत्वे न किञ्चिद् वाध्यते विभोः । विभोस्तु तत्स्वभावत्वे कृतकृत्यत्ववाधनम् ॥९॥ कर्मादेस्तत्स्वभावत्वे ईश्वरमनपेक्ष्य जगज्जननस्वभावत्वे, न किञ्चिद् विभोः परमे- श्वरस्य, बाध्यते । विमोस्तु तत्स्वभावत्वे-स्वातन्त्र्येण अन्यहेतुसापेक्षतया वा जगज्जननस्व- भावत्वे, कृतकृत्यत्ववाधनम् वीतरागत्वव्याहतेः, कारणतया प्रकृतित्वप्रसङ्गाच्च । अथ परिणामित्वाभावाद् न प्रकृतित्वम् , प्रयोजनाभावेन जन्येच्छाया अभावेऽपि नित्येच्छासत्त्वाद् न वैराग्यव्याहतिः, जन्येच्छाया एव रागपदार्थत्वात् । ऐश्वर्यमपि न जन्यम् , किन्तु तत्तत्फला- वच्छिन्नेच्छेच । सर्गादौ रजःप्रभृत्युदेकोऽपि तत्र तत्कार्यकारितयैव गीयत इति न कूटस्थत्व- हानिरिति चेत् ? जल्पता गिरिशसाधने गिरं न्यायदर्शननिवेशपेशलाम् । सांख्य ! संप्रति निजं कुलं त्वया हन्त ! हन्त ? सकलं कलङ्कितम् ।।1।। यत एवं कार्यजनकज्ञानादिसिद्धौ तदाश्रयतया बुद्धिरेव नित्या मिध्येत् , न त्वीश्वरः, बुद्वित्वस्यैव ज्ञानाद्याश्रयतावच्छेदकत्वात् । आत्मत्वस्य तदाश्रयतावच्छेदकत्वे तु जन्यज्ञाना- दीनामप्यात्माश्रिततया विलीनं प्रकृत्यादिप्रक्रियया इति किमजेन सह विचारप्रपञ्चेन १ । यदि यह कहा जाय-'नहीं, सृष्टि अपूर्व भी होती है जिसे प्रथम सृष्टि कहा जा सकता है । और उसे किसी प्रयोजन के विना भी परमेश्वर अपने स्वभाव से ही उत्पन्न करता है । किन्तु जव पहले सष्टि हो जाती है और उस मे जीव शुभाशुभ कर्म करने लगते हैं तब उस के बाद को सृष्टि उन कर्मो के अनुसार होती है । अर्थात् बाद की सृष्टि को ईश्वर कर्मानुसार सपन्न करता है-यह कहना भी ठीक नहीं है क्योकि यदि ईश्वर किसी प्रमाग से सिद्ध हो जाय तब उस मे बिना प्रयोजन के भी निर्माण करने के स्वभावरूप धर्म की कल्पना की जा सकती है किन्तु जब तक वह स्वय ही सिद्ध नहीं है तो उस मे स्वभाव को कल्पना कैसे हो सकती है ? यदि यह कहा जाय-'प्रथम सृष्टि के कर्ता रूप मे ईश्वर का अनुमान होता है और प्रथम सृष्टि का कर्तृत्व ईश्वर का उक्त स्वभाव मानने पर ही सभव है प्रत प्राद्यसृष्टि मूलक जिस अनुमान से ईश्वररूप धर्मीकी सिद्धि होगी उसी प्रमारण से उक्त स्व- भावविशिष्ट हो ईश्वर को सिद्धि होगी। अतः यह आवश्यक नहीं है कि ईश्वररूपधर्मों को पहले सिद्ध किया जाय और बाद मे उस मे उक्त स्वभावरूप धर्म की कल्पना की जाय ।'-किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है क्योकि प्राद्य सृष्टि मे ही कोई प्रमाण नहीं है । (निष्प्रयोजन चेष्टा से वीतरागता की हानि) ६ वी कारिका मे इस अभिप्राय की चर्चा और उसको आलोचना की गई हे-विश्व के कर्ता रूप मे जिस अनुमानप्रमारग से ईश्वररूप धर्मी की सिद्धि होगी उस प्रमारण से प्रयोजन विना N ४० 1 [गा. या. समुच्चय त -३ लोग - भी कार्य करने का उस का स्वभाव भी मिद्ध होगा। कारिका का अर्थ इस प्रकार है-कम ईश्वर की अपेक्षा न कर के म्वय ही जगत् का कारण होता है-कर्म का ऐमा स्वभाव मानने पर ईश्वर के सम्बन्ध में किमी प्रकार की बाधा नहीं होती। फिन्तु ईश्वर स्वावरम से अपवा किसी अन्य हेतु के महयोग से जगन् का निर्माण करता है-ईश्वर का ऐसा स्वभाव मानने पर उन की कृत्यता अर्थान् पूर्णता फी वाधा होती है । क्योकि उसे फर्ता मानने पर उम के वीतरागत्वकी हानि होती है और उसे जगत् का कारण मानने पर उम मे प्रकृतिस्पता को श्रापत्ति होती है। क्योंकि मारययोग- दर्शन में प्रकृति को ही जगत् का कारण माना गया है । इस प्रापत्ति को इप्टापत्ति नहीं कहा जा सकता क्योकि ईश्वर जब प्रतिस्प होगा तो उसे सविकार होना पडेगा। इस सन्दर्भ मे सारययोग की ओर से यह कहा जा सकता है कि ईश्वर को जगत का का मानने मे उपर्युक्त दोषो मे कोई भी दोष नहीं हो सकता । जैसे ईश्वर को जगत् का क्र्ता मानने पर भी उस मे प्रकृतिन्पता की आपत्ति नहीं हो सकती, क्योकि परिणामी फारण को ही प्रकृति कहा जाता । ईश्वर जगत् का परिणामी कारण न होने से प्रकृनिरप नहीं है । ईश्वर को जगत्पर्ता मानने पर उस की बोनरागता का विघटन नहीं हो सकता, क्योकि जन्य इच्छा को ही राग कहा जाता है। और ईश्वर को कोई प्रयोजन न होने मे उस मे जन्य इच्छा नहीं हो सकती। निन्य इच्छा होने पर भी उस की वीतरागता सुरक्षित रह सकती है क्योंकि जन्य इच्छा के अनाव को ही वोतगगता कहा जाता है। उस का ऐश्वर्य नी जन्य नहीं हो सकता क्योकि वह तद् तद् पत्तविषयक नित्य इच्छारप ही है । सृष्टि को प्रारम मे रजोगुण का उत्कर्ष होता है-इस कथन में ईश्वर मे मगुगता को भी प्राशसा नहीं की जा सकती क्योकि ममयानुसार उत्कृष्ट प्रौर अपकृप्ट होना यह गुणो का अपना ही बनाव है । ईश्वर की इच्छा गुणों के यथा समय होने वाले उत्कर्ष और अपनपं को विपय करती है। इसी से ईश्वर गुरगो मे वैषम्य का उत्पादक' कहा जाता है । अत ईश्वर को जगत् का पर्ता मानने पर उस को फूटस्थता अर्थात् निर्विकारता की हानि नहीं हो सकती'-किन्तु व्यारयाकार का कहना है कि यह कथन ठीक नहीं है । इस कथन पर उन्होंने यह कहते हुए मारय को नत्संना की है कि ईश्वर को सिद्ध करने के लिये जो बात अभी कही गई है वह न्यायदर्शन को मान्यता पर आधारित होने से समीचीन प्रतीत होती है । किन्तु उसे अपनी मान्यता के स्प मे यदि सारयवादी स्वीकार करते है तो इस से उन की पुरी परम्परा हो कलङ्कित हो जाती है । तात्पर्य यह है कि- (सांस्यमत में ज्ञानादि का आश्रय ईश्वर नहीं हो सकता) उक्त रीति से ईश्वर को मिद्ध करने का प्रयास सार्थक भी नहीं हो सकता क्योकि उक्त रोति से कार्य सामान्य के कारण रूप से ज्ञान इच्छा और प्रयत्न की सिद्धि होती है । ईश्वर को उक्त ज्ञान आदि के प्राश्रयस्प मे अङ्गीकार करना होता है जो सारय की दृष्टि से उचित नहीं है। क्योकि उनके मत मे ज्ञान आदि का प्राश्रय बुद्धि ही होती है ईश्वर नहीं होता । उस मत मे बुद्धित्व ही ज्ञान प्रादि की पाश्रयता का नियामक होता है । और यदि आत्मत्व को ज्ञान प्रादि की प्राश्रयता का नियामक माना जायगा तो जैसे कार्य सामान्य का कारणभूत नित्य ज्ञान प्रादि प्रात्माश्रित होगा इसी प्रकार जन्यज्ञान प्रादि भी श्रात्माश्रित ही होगा । इस प्रकार न्यायदर्शन के समान जीव और ईश्वर की पटाद्यर्थ प्रवृत्ति के प्रति पटादि के उपादान का तद् तद् पुरुषीय प्रत्यक्ष कारण है । फलत तद् तद् कार्यार्थी की प्रवृत्ति और तद् तद् कार्य के उपादान का प्रत्यक्ष इन्हीं के बीच कार्यकारणभाव प्रावश्यक स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [४१ । नैयायिकोक्तरीत्यापि नेश्वरमिद्धिः । तथाहि-कार्येण तत्साधने आद्यानुमाने नाऽनु- कूलस्तकः, तत्तत्पुरुपीयपटाद्यर्थिप्रवृत्तित्वावच्छिन्न प्रति तत्तत्पुरुषीयपटादिमत्त्वप्रकारकोपादान- प्रत्यक्षत्वेन हेतुत्वावश्यकत्वात् , प्रत्यक्षत्वेन कार्यसामान्यहेतुत्वे मानाभावात् , चिकीर्षाया अपि प्रवृत्तावेव हेतुत्वात् , कृतेरपि विलक्षणकृतित्वेनैव घटत्व-पटत्वाद्यवच्छिन्नहेतुत्वात् । , मान्यता साख्य शास्त्र मे भी आ जायगी । फलतः त्रिगुणात्मिका प्रकृति ही जगत् का मूल कारण है और उस से उत्पन्न बुद्धि हो ज्ञानादि गुणो का प्राश्रय और कर्ता है-यह सब सांख्य दर्शन की मान्यता समाप्त हो जायगी । तो इस प्रकार जो साख्यशास्त्र की मान्यता का अनभिज्ञ होते हुए साख्य की ओर से विचार करने को उद्यत होता है उसके साथ विचार करना अनुचित है । इसलिये इस चर्चा को इतने मे ही समाप्त कर देना ठीक है, क्योकि इतने से ही ईश्वर के सम्बन्ध मे सारययोग द्वारा प्रदर्शित युक्तिया निरर्थक सिद्ध हो जाती है । (कार्यसामान्य के प्रति उपादानप्रत्यक्ष कारणता की आलोचना) नैयायिको ने ईश्वर को सिद्ध करने की जो रीत बताई है उस से भी ईश्वर की सिद्धि नहीं हो सकती-जैसे उन्हो ने कार्य द्वारा ईश्वर को सिद्ध करने के लिये सर्व प्रथम इस अनुमान का प्रयोग किया है 'कार्य सकर्तृक कार्यत्वात्' = सपूर्ण कार्य कर्तृ सापेक्ष है क्योकि कार्य है ।' किन्तु यह अनुमान समीचीन नहीं हो सकता क्योकि-जो भी कार्य होता है वह सभी कर्तृ सापेक्ष होता है इस नियम का निश्चायक कोई तर्क नहीं है । कहने का प्राशय यह है कि कार्यसामान्य के प्रति सामान्यरूप से उपादान विषयक प्रत्यक्ष कारण है इस कार्यकारण भाव पर ही उक्त अनुमान निर्भर है किन्तु इस कार्य- कारण भाव मे कोई प्रमाण नही है । क्योकि इस कार्यकारणभाव को मानने पर भी यह प्रश्न होता है कि पट-उपादान के प्रत्यक्ष से घटार्थीकी और घटोपादान के प्रत्यक्ष से पटार्थो की प्रवृत्ति क्यो नहीं हाती ? क्योकि जव सामान्यरूप से उपादान का प्रत्यक्ष सामान्यरूप से कार्य मात्र का कारण है तो किसी भी उपादान के प्रत्यक्ष से किसी भी कार्य की उत्पत्ति होना युक्तिसङ्गत है । अत इस प्रश्न का स्माधान करने के लिये इस प्रकार का विशेष कार्यकारणभाव मानना होगा कि तत् तत् पुरुष की पटाद्यर्थ प्रवृत्ति के प्रति पटादि के उपादान का तद् तद् पुरुषीय प्रत्यक्ष कारण है । फलत. तत् तत् कार्यार्थी की प्रवृत्ति और तद् तद् कार्य के उपादान का प्रत्यक्ष इन्हीं के बीच कार्यकारणभाव अावश्यक है। इसी से उपादान प्रत्यक्ष के अभाव मे कार्योत्पत्ति की आपत्ति का परिहार हो जायगा अत 'कार्य सामान्य के प्रति उपादानप्रत्यक्ष कारण है' इस सामान्य कार्यकारणभाव की कोई आवश्यकता न रहेगी। तो जब इस प्रकार-कार्य सामान्य के प्रति उपादानप्रत्यक्ष या उस प्रत्यक्ष का प्राश्रयभूत क्र्ता कारण हे यह कार्यकारणभाव हो प्रसिद्ध है तो कार्य सामान्य से कर्तृ सामान्य का अनुमान फैसे हो सकेगा? (कृति और कार्य का भी सामान्यतः कार्य-कारण भाव नहीं हैं) जिस प्रकार उपादान का प्रत्यक्ष उपर्युक्त रीति से प्रवृत्ति का ही कारण है उसी प्रकार चिकीर्षा भी प्रवृत्ति का ही कारण है, कार्य सामान्य का कारण नहीं है। और कृतित्व रूप से कृति भी कार्यत्व रूप से कार्य सामान्य का कारण नहीं है किन्तु घटपटादि तद् तद् कार्य के प्रति कुलाल तन्नुवाय ४२ ] [शास्त्रातमिमुन्चय न्त ३-लो०९ न च प्रवृत्तात्रिय घटादावपि बानेन्छ्योरन्यय-व्यतिरेकाभ्या हेतुन्वमिद्वेः तत्र घटत्व-एट- वाढीनामानन्त्यात कार्यत्वमेव माधारण्यात कार्यतावच्छेदकम् , शगंग्लाघवमपेक्ष्य मग्राहकलाघ- वम्य न्याव्यत्वात , कृतम्तु 'यहिशेपयोः' इति न्यायातु मामान्यतोऽपि हेतुत्वमिति वाच्यम, - आदि की कृति विलक्षण कृतित्व रप में ही कारण है । बहन का प्राशय यह है कि कार्य सामान्य के प्रति कृति सामान्य को कारण मानने में घर के लिये होनेवाली कृति ने पट को और पट के लिये होनेवाली कृति से घट यो उत्पत्ति होने को प्रापत्ति हो सकती है। अन जिन कृतियों में घट उत्पन्न होता है उन मे विलक्षण जाति और जिन कृतियों मे पट उत्पन्न होता है उस मे दूसरी विलक्षण जाति मानकर-घट पट प्रादि कार्यों के प्रति भिन्न भिन्न बिजातीय कृतिया कारण है-यह कार्य-कारण- भाव मानना आवश्यक है । और इस कार्यकारणभाव को मान लेने पर कार्यमामान्य के प्रति कृति- सामान्य को कारण मानने की अावश्यकता नहीं रह जाती । इलिये कार्यमामान्य मे उपादान- प्रत्यक्ष या चिकीर्षा अथवा कृति का अनुमान नहीं हो सकता। और इसीलिये कार्य मामान्य के कारणभूत उपादानप्रत्यक्ष, चिकीर्षा और कृति के प्राश्रयस्प मे जगत् कर्ता ईश्वर सिद्ध नहीं हो सकता। [व्यापकरूप से कारणता की सिद्धि का प्रयास-पूर्वपक्ष] इस सन्दर्भ मे यह कहा जा सकता है कि- जैसे उपादान प्रत्यक्ष और चिकोर्पा रहने पर प्रवृत्ति होती है और उस के न रहने पर प्रवृत्ति नहीं होती है-इन अन्वय व्यतिरेक से उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्षा को प्रवृत्तिकासाररा माना जाता है उसी प्रकार उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्षा के अन्वय व्यतिरेक का अनुविधान घटादि मे भी है, इसलिये घटपटादि के प्रति उपादान प्रत्यक्ष और चिकी को कारण मानना आवश्यक है । तो इस प्रकार जद प्रवृत्ति के नमान अन्य कार्यों के प्रति उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्षा की कारणता सिद्ध होती है तब घटत्व पटत्व श्रादि अनन्त धर्मावच्छिन्न के प्रति उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्पा को कारण मानने की अपेक्षा कार्यत्व स्प सामान्य धर्मावच्छिन्न के प्रति उन्हें कारण मानना उचित है । यदि यह कहा जाय कि-'घटत्व पटत्यादि की अपेक्षा प्रागनावप्रतियोगित्वरूप कार्यत्व का शरीर गुरु है प्रत उम की अपेक्षा लघुशरीरी घटत्व पटत्वादि को ही उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्षा का कार्यतावच्छेदक होना उचित है -तो यह ठीक नहीं है, क्योकि घटत्व पटत्वादि धर्म सपूर्ण कार्यों का सग्राहक नहीं है और कार्यत्व सपूर्ण कार्यों का संग्राहक है। इसलिये उसी को उपादान प्रत्यक्ष और चिकोर्षा का कार्यतावच्छेदक मानना न्यायसङ्गत है क्योकि उसे कार्यतावच्छेदक मानने पर कार्य सामान्य के प्रति उपादान प्रत्यक्षादि मे एक एक कारणता की ही सिद्धि होगी और घटत्व पटत्व प्रादि धर्मों को कारणतावच्छेदक मानने पर तद् तद् धर्मावच्छिन्न के प्रति विजातीय उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्षा मे अनन्त कारणता माननी पडेगी। तो इस प्रकार जब कार्यसामान्य के प्रति उपादान प्रत्यक्ष और चिकीर्पा को कारणता सिद्ध हो जाती है तो कार्यसामान्य से कार्य सामान्य के उपादान प्रत्यक्ष और चिकोर्पा का अनुमान होने मे और उस के प्राश्रय रुप मे ईश्वर का अनुमान होने मे कोई वाधा नहीं हो सकती । इसी प्रकार घटपटादि कार्यों के प्रति पृथक रुप से विजातीय कृतियो को कारण मानने पर भी-कार्य सामान्य के प्रति कृतिसामान्य कारण है-यह सामान्य कार्यकारण भाव स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ४३ . कार्यत्वस्य कालिकेन घटत्व-पटत्वादिमत्त्वरूपम्य नानात्वात् , ध्वंसव्यावृत्त्यर्थं देयस्य सत्त्वस्य विशेषणविशेष्यभावे विनिगमनाविरहेणाऽतिगुरुत्वाच्च । न च द्रव्यजन्यतावच्छेदकतया सिद्धं जन्यसत्त्वम् अवच्छिन्नममवेतत्वं वा तज्जन्यतावच्छेदकम् , तथापि प्रत्येकं विनिगमना- विरहात् , 'यद्विशेषयोः' इति न्याये मानाभावात् । किञ्च, एवं प्रायोगिकत्वमेव शैलादि- व्यावृत्तं देवकुलाद्यनुवृत्तं मकलजनव्यवहारसिद्रं प्रयत्नजन्यतावच्छेदकमस्तु, व्याप्यधर्मत्वात् , इदमेवाऽभिप्रेत्य हेतुविशेषविकल्पने कार्ययमत्वं सम्मतिटीकाकृता निरस्तम् । भी सिद्ध होगा क्योकि-'यद्विशेषयो कार्यकारणभावः स तत्सामान्ययोरपि' यह सर्वमान्य नियम है। इस का प्राशय यह है कि जिन पदार्थो मे विशेषरूप से कार्यकारणभाव होता है उन पदार्थो मे सामान्यरूप से भी कार्यकारणभाव होता है। जैसे एक घट को उत्पन्न करनेवाले कपाल से अन्य घट की उत्पत्ति का वारण करने के लिये तद् तद् घट के प्रति तद् तद् कपाल को कारण मानने पर-घट सामान्य प्रति कपालसामान्य कारण है-यह भी कार्यकारणभाव माना जाता है, उसी प्रकार कार्य- विशेष और कृतिविशेष मे कार्यकारणभाव मानने पर कार्यसामान्य और कृतिसामान्य मे भी कार्य- कारणभाव मानना न्यायसङ्गत है । यदि यह कहा जाय कि-'विशेष कार्यकारणभाव से ही कार्य सिद्ध हो जाने से सामान्यरूप से कार्यकारणभाव की कल्पना कहीं भी मान्य नहीं है । अत: 'यद्विशेषयो कार्यकारणभाव. स तत्सामा- न्ययोरपि' यह नियम नियुक्तिक है।-' तो यह ठीक नहीं है। क्योकि जहा कोई कपाल नहीं है वहा यदि यह प्रश्न हो कि ऐसे स्थल मे घट की उत्पत्ति क्यो नही होती? तो इस का उत्तर यह नहीं दिया जा सकता कि तद् तद् कपाल का अभाव होने से घट की उत्पत्ति नही होती है, क्योकि तत्कपाल के अभाव मे भी अन्य कपाल से घट की उत्पत्ति होती है। प्रत तद् तद् कपाल का अभाव तद् तद् घट की ही अनुत्पत्ति का नियामक नहीं हो सकता है । अत: घटसामान्य की अनुत्पत्ति का नियामक कपाल- सामान्य के अभाव को ही मानना होगा और यह तभी सभव है जब घट और कपाल मे सामान्यरूप से भी कार्यकारणभाव हो । उसी प्रकार जहा कोई कृति नही है वहा कार्यमामान्य की अनुत्पत्ति का नियामक कृतिसामान्य का अभाव है-इस वातको उपपत्ति के लिये कार्यसामान्य के प्रति कृति- सामान्य को भी कारण मानना आवश्यक है। तो इस प्रकार जब कार्य सामान्य के प्रति कृतिसामान्य को कारणता युक्तिसिद्ध है तब उसके बलसे 'कार्य सकर्तृक कार्यत्वात्' यह अनुमान निर्वाध रूप से सपन्न हो सकता है"।- (व्यापक रूप से कारणता को सिद्धि का असम्भव-उत्तरपक्ष) किन्तु यह कथन विचार करने पर समोचीन नहीं प्रतीत होता है क्योकि कार्यत्व भी जो सपूर्ण कार्योका सग्राहक है एकधर्म रूप न होकर कालिक सम्बन्ध से घटत्व पटत्वादि रूप है । आशय यह है कि कार्यत्व को सकल कार्यों मे एक अनुगतधर्म के रूप मे तभी स्वीकार किया जा सकता है जब सपूर्ण कार्यो का अनुगम करने का कोई मार्ग न रहे किन्तु ऐसे मार्ग का अभाव नहीं है, क्योकि कालिक सम्बन्ध से घटत्व सभी कार्यों में रहने से समस्त कार्यों का अनुगमक हो सकता है, प्रत कालिकसम्बन्ध से घटत्व-पटत्वादि से भिन्न कार्यत्व नामक एक अतिरिक्त धर्म की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है।

४४ ] [ शा. वा. ममुनचय न. 3-दलो०९ (सामान्यकार्यकारणभावकरपना मे गौरव) फलत• 'कार्यसामान्य के प्रति कृतिमामान्य कारण है इम नियम का पर्यवसान 'कालिक सम्बन्धसे घटत्वादिमत् के प्रति कृतिसामान्य कारण है-इस कार्यकारणभाव मे होगा। और यह कार्यकारणभाव घटत्वपटत्वादि कार्यतावच्छेदक के भेद से अनन्त होगा । अत:-'घरपटादि तद् तद् कार्यों के प्रति पृथक् रूप से विजातीय कृति कारण है-इस कार्यकारणभाव से अतिरिक्त उक्त रप से 'कार्यसामान्य के प्रति कृतिसामान्य कारण है। इस कार्यकारणभाव की कल्पना गौरवग्रस्त है। इसके अतिरिक्त कार्य-कारण भाव मे गौरव का अन्य हेतु भी है जैसे कालिक सम्बन्ध से घटत्व पटत्वादि धर्म भावभूत वस्तु मे रहता है इसी प्रकार ध्वस में भी रहता है और ध्वस के प्रति उपादान प्रत्यक्षादि कारण नहीं होते क्योकि उसका कोई उपादान ही नहीं होता। अतः ध्वसस्प कार्य के प्रति उपादानप्रत्यक्षादि कारणो का व्यभिचार वारण करने के लिये ध्वस को उन के कार्यवर्ग से व्यावृत्त करने के लिये कार्यतावच्छेदककोटि मे सत्त्व-मादत्व का निवेश करना होगा। फलत भावत्व और घटत्व प्रादि के विशेषणविशेष्यमाव मे कोई विनिगमना न होने से 'घटस्वादि- विशिष्टनाव प्रति उपादानप्रत्यक्षादिक कारण' एव 'म.वत्वविशिष्ट घटादिक प्रति उपादानप्राय- क्षादिक कारण' इस प्रकार से गुरुतर कार्यकारणभाव को प्रापत्ति होगी। (जन्यत्व अथवा अवच्छिन्नत्व का निवेश व्यर्थ है। यदि यह कहा जाय कि- भावकार्य की उत्पत्ति द्रव्य मे ही होती है गुणादि मे नहीं होती इसलिए जन्यभाव के प्रति द्रव्य कारण है यह कार्यकारणभाव मानना आवश्यक होता है । इसके अनुसार जन्यसत्त्व द्रव्य का कार्यतावच्छेदक होता है। जन्यसत्त्व का अर्थ है जन्यत्वविशिष्टसत्त्व । इस मे जन्यत्व का निवेश नित्य भावपदार्थों की व्यावृत्ति के लिए दिया जाता है और सत्त्व का निवेश ध्वस को व्यावृत्ति के लिए किया जाता है । नित्य भावपदार्थों की व्यावृत्ति के लिए जन्यत्व के बदले अवच्छिन्नत्व का भी निवेश किया जा सकता है । अवच्छिन्नत्व का अर्थ है कालावच्छिन्नत्व अर्थात् किञ्चित्कालवृत्तित्व । इस प्रकार द्रव्य का जन्यतावच्छेदक जन्यसत्त्व या किञ्चिदकालवृत्ति समवेतत्व होता है । उसी को उपादान प्रत्यक्ष चिकीर्षा और कृति का कार्यतावच्छेदक मान कर जन्यभाव सामान्यके प्रति उपादान प्रत्यक्ष प्रादि को कारण माना जा सकता हैं'-तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि जन्यत्व के सबन्ध मे यह वात पूर्ववत् कही जा सकती है कि जन्यत्व अतिरिक्त धर्म न होकर विनिगमना विरह से कालिकसबधेन घटत्व-पटत्व आदिस्प ही है । इसीप्रकार अवच्छिन्नत्व के सबध मे भी कहा जा सकता है कि अवच्छिन्नत्व विनिगमनाविरह से तद् तद् घटादिस्प जो तत् तत् काल तनिरुपितवृत्तित्व रूप है इसलिए पूर्वोक्त दोष से निस्तार अशक्य है । (सामान्याभाव विशेषाभावकूट से अन्य नहीं है) इस सन्दर्भ मे 'यद्विशेषयोः कार्यकारणभाव स तत्सामान्ययोरपि' इस न्याय से कार्यसामान्य और कृतिसामान्य मे कार्यकारणभाव सिद्ध करने का जो प्रयास किया गया है वह भी सफल नहीं हो सकता क्योकि उस न्याय मे कोई प्रमाण नहीं है । उस न्याय के समर्थन मे जो यह बात कही गई है कि 'जिस स्थान मे कोई कपाल नहीं हैं उस स्थान मे कपालसामा य भाव को घट सामान्य की अनुत्पत्ति का नियामक सिद्ध करने के लिए एवं जब कोई कृति नहीं है उस समय कृतिसामान्याभाव को कार्यसामान्य की अनुत्पत्ति का नियामक सिद्ध करने के लिए 'घट सामान्य के प्रति कपालसामान्य स्या० का टीका-हिन्दीविवेचन ] [ ४५ यत्तु घटत्वाद्यवच्छिन्ने कृतित्वेन हेतुन्वेऽपि सण्डघटाद्युत्पत्तिकाले कुलालादिकृतेरस- स्वादीश्वरसिद्धिः, इति दीधितिकृतोक्तम् , तत्तुच्छम् , अम्माभिस्तत्र घटे खण्डत्वपर्यायस्यैवा- भ्युपगमात् । युक्तं चैतद् , प्रत्यभिज्ञोपपत्तेः । तत्र मादृश्यादिदोपेण भ्रमकल्पने गौरवात् । और कार्यसामान्य के प्रति कृतिसामान्य कारण है-यह कार्यकारणभाव मानना आवश्यक है-वह ठीक नहीं है क्योकि विशेषाभावकूट से ही सामान्यामाव की प्रतीति आदि उपपन्न हो जाने से विशेषाभावकट से भिन्न सामान्याभाव की कल्पना मे कोई प्रमाण नहीं हैं । अतः जहाँ कोई कपाल नहीं है वहाँ घट सामान्य की अनुत्पत्ति का प्रयोजक तत्तत्कपालाभावसमुदाय ही है । एव जहाँ कोई कृति नहीं है तब उस समय कार्यसामान्य की अनुत्पत्ति का प्रयोजक तत् तत् कृति का प्रभाव- समुदाय ही है यही मानना युक्ति सगत । प्रत. 'यद्विशेषयो.'० न्याय मे कोई युक्ति न होने से कार्यकारण के बीच सामान्य कार्य-कारणभाव नही सिद्ध हो सकता । अतः कार्यसामान्य से कर्तृ- सामान्य के अनुमान करने का प्रयास असभव है। इस से अतिरिक्त व्याख्याकार का कहना है कि प्रयत्न से प्रायोगिक कार्यों की ही उत्पत्ति होती हैं । प्रायोगिक उसे कहते है जो प्रयोग अर्थात् मनुष्य की चेष्टा से साध्य है। इसलिए प्रायोगिकत्व ही कार्यत्व का व्याप्य होने से प्रयत्न का जन्यतावच्छेदक है । और वह शैल आदि कर्तृहीन कार्यों से व्यावृत्त है और देवकुलादि कर्तृ सापेक्ष कार्यो मे अनुगत है । और उस के अस्तित्व मे 'गृहादिकार्यम् प्रायोगिकम्' और 'शैलादिकार्यम् न प्रायोगिकम्' यह सार्वजनिक व्यवहार ही प्रमाण है । इसी अभि- प्राय से सम्मतिग्रन्थ के टीकाकार ने हेतुसबन्धी विकल्प प्रस्तुत होने पर नैयायिक द्वारा उद्भावित कार्यसमत्व का निराकरण किया है । इस विषय को स्पष्टता के लिए सम्मतिटीका दृष्टव्य (खण्डघट का ईश्वर कर्ता है-दीधितिकार को युक्ति) तत्त्वचितामणि ग्रन्थ के उपर दीधिति नाम की व्याख्या करने वाले रघुनाथ शिरोमणि ने. ईश्वर की सिद्धि के सबन्ध में यह कहा हैं कि-कार्य सामान्य के प्रति कृतिसामान्य को कारणता न मानने पर भी घट आदि के प्रति कुलाल आदि को कृति कारण है' इस कार्यकारणभाव के बल पर भी ईश्वर को सिद्धि की जा सकती है । उदाहरण के रूप मे उन्होने खडघट को प्रस्तुत किया है । उन का अशय यह है कि घटमे से कुछ अश निकल जाने पर पूर्ववर्ती पूर्ण घट का नाश होकर नये अपूर्व घट को उत्पत्ति होती है उसे खडघट कहा जाता है । जब यह कार्यकारणभाव है कि घट सामान्य के प्रति कुलालकृति कारण है तो इस खडघट के भी घट सामान्य के अतर्गत होने से इसके लिए भी कुलालकृति का होना आवश्यक है । किन्तु वह कुलालकृति आधुनिक कुलाल की कृति नहीं हो सकती। क्योकि उस खडघट का निर्माण करने के लिए कोई आधुनिक कुलाल उपस्थित नहीं होता। अत यह मानना होगा-यह खडघट जिस कुलाल की कृति से उत्पन्न होता है वह कुलाल ईश्वर है । यही कारण है-वेदो मे 'नम कुलालेम्य ' कहकर कुलाल के रूप मे ईश्वर को वदना की गई है। (खडघट याने पूर्णतापर्याय की निवृत्ति व्याख्याकारने दीधितिकार के इस प्रयास को यह कहकर तुच्छ बताया है कि घट का कोई प्रश निकल जाने पर पूर्वघट का नाश होकर किसी नये खडघट की उत्पत्ति नहीं होती किन्तु पूर्व घट मे हो - .

४६ ] [शा. वा.समुच्चय स्त०-३ श्लोक । 1 अत एव पाकेनापि नान्यघटोत्पत्तिः, विशिष्टमामग्रीवशाद् विशिष्टवर्णम्य पदादेव्यम्य कथञ्चिविनाशेऽप्युत्पत्तिमंभवात , इति व्यक्तं सम्मतिटीकायाम् । परेपामपि स्वप्रयोज्य- विजातीयमंयोगसंबन्धेन तत्काले (कृलाल कृतेः) सत्चाच्च । न च वैशेषिकनये श्यामघटा- दिनाशोत्तर रक्तघटाद्युत्पत्तिकाले प्राक्तनपरमाणुद्वयमंयोगद्वथणुकादे शाद् नैवं संभवतीति पूर्णत्वपर्याय की निवृत्ति होकर व डत्व पर्याय की उत्पत्ति होती है । तो जब कोई नया घट उत्पन्न ही नहीं होता तब उस के कर्ता रूप मे किसी पुरुषविरोप की कल्पना कैसे की जाये ? व्याख्याकार ने अपने इस कथन के समर्थन में प्रत्यभिज्ञा को प्रमाणल्प मे प्रस्तुत किया है। उन का आशय यह है कि किसी घट मे से कुछ अश निकल जाने के बाद भी 'स एव अय घट =यह वही घट है' इसप्रकार वर्तमान घट मे पूर्वघट के तादात्म्य का दर्शन होता है । यदि पूर्व घट का नाश होकर नये घट की उत्पत्ति मानी जायेगी तो इस तादात्म्य दर्शनरूप प्रत्यभिज्ञान की उपपत्ति नहीं हो सकती। यदि यह कहा जाय कि- यह प्रत्यभिज्ञान यथार्थ नहीं है किन्तु भ्रमरूप है । अत इस से पूणघट और सडघट की एकता नहीं सिद्ध हो सकती'-तो यह ठीक नहीं है । क्योकि उक्त प्रत्यभिज्ञा को भ्रम मानने पर उस के कारणरूप मे सादृश्य आदि दोष को कल्पना करनी होगी। और जहाँ भी प्रत्यभिज्ञा होती है वहा सर्वत्र उसे भ्रम मानकर प्रत्यभिजात पदाथको पूर्व पदाथ से भिन्न मानने की स्थिति उत्पन्न होने से अनेक पदार्थों की कल्पना का गौरव भी हो सक्ता है। यदि यह कहा जाय-'कि-खण्डघट मे पूर्वघट के तादात्म्य का दर्शन भ्रम है जो दोनो मे भेदबुद्धि न होने पर सादृश्य के कारण होता है तो यह ठीक नहीं है, क्योकि इस कल्पना मे पूर्वघट का नाश और नवीन घट की उत्पत्ति तथा इन दोनो मे तादात्म्यदर्शन के लिए सादृश्य मे दोषत्व की कल्पना होने से अतीव गौरव है (पाकक्रिया से अन्यघट उत्पत्ति प्रक्रिया को समालोचना) इसीलिए सम्मति टीका मे भी यह बात स्पष्ट की गई है कि पाक से श्यामघट का नाश होने पर अन्य घट को उत्पत्ति नहीं होती। किन्तु विशिष्ट सामग्री के प्रभाव से पूर्ववर्ण से विलक्षण वर्णशाली उमी घटद्रव्य की उत्पत्ति होती है उस के पूर्ववर्ण की निवृत्ति होने परभी उसका नाश नहीं होता। क्योकि प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण मे पूर्द पर्यायके रूप मे नष्ट होते हुए और उत्तर पर्यायके रूप मे उत्पन्न होते हुए भी अपने मूल द्रव्य के रूप मे स्थिर रहती है। वशेषिक आदि के मत मे यद्यपि पाकस्थल मे पूर्वघट का नाश होकर नवीन घट की उत्पत्ति होती है, तथापि उस घटके कारणरूप मे ईश्वरीयकृति की कल्पना आवश्यक नहीं है क्योकि कृति घटके प्रति साक्षात् कारण न होकर स्वप्रयोज्य विजातीय सयोग सबध से ही कारण होती है। और उक्त सयोगसम्बन्ध से पाकस्थल मे भो कुलाल की पूर्वकृति होने मे कोई बाधा नहीं है । क्योकि उस समय जिस कपालद्वय सयोग से घटको उत्पति होती है उसे भी कुलाल की पूर्वकृति का प्रयोज्य माना जा सकता है, क्योकि कुलाल की पूर्वकृति से उसी प्रकार का सयोग होकर यदि पूर्वघट न होता तो उसके पाक और पाक से नये घट की उत्पति की स्थिति हो न होती । अत. यह कहा जाना सर्वथा सगत है कि नया घर जिस कपालद्वय सयोग से उत्पन्न होता है वह भी परपरा से पूर्वघट के उत्पा- दक कुलाल की पूर्वकृति का प्रयोज्य है। - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ४७ वाच्यम् ; पूर्वमंयोगादिध्वंमपूर्वद्वयणुकादिध्वंमानामुत्तरमंयोगद्यणुकादावन्ततः कालोपाधित- यापि जनकत्वात् , तत्कालेऽपि कुलालादिकृतेः स्वप्रयोज्यविजातीयसंयोगेन सत्यात; अन्यथा घटत्वावच्छिन्ने दण्डादिहेतुत्वमपि दुर्वचं स्यात् । 'दण्डादिजन्यतावच्छेदकं विलक्षणघटत्या- दिकमेवे' ति चेत् ? कृतिजन्यतावच्छेढकमपि तदेवेष्यताम् । 'कृतेलाधवाद् विशे यतयेव हेतु- त्वात् यत्र दण्डस्य स्वप्रयोज्यकपालद्वयसंयोगेन सत्त्वम् , न तु विशेष्यतया कुलालकृतिः, तत्रैव खण्डघटे तसिद्धिरिति चेत् ? न, कृतेरपि स्वप्रयोज्यसंवन्धेनैव हेतुत्वात् , विजा- तीयमंयोगत्वेन संवन्धत्वे गौरवात्, घटत्वावच्छिन्ने विजातीयकृतित्वेनैव हेतुत्वाच्चेति दिक् । [ वैशेषिकमतानुसारो पाकप्रक्रिया को आलोचना ] यदि यह कहा जाय कि-'वैशेषिक मत मे पाक से श्यामघट का नाश होने के बाद जब रक्त- घट की उत्पत्ति होती है तो उसके पूर्व श्यामघट का द्वयणुक पर्यन्त नाश हो जाता है । केवल विभक्त परमाणु रह जाते है और फिर परमाणुमो के सयोग से यणुक व्यणक आदि की उत्पत्ति होकर कपाल- द्वय के नये सयोग से नये घट की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार नये घट की उत्पत्ति के समय कुलाल की पूर्वकृति से होनेवाला सपूर्ण सयोग प्रादि का नाश हो जाने से उक्त कृति के स्वप्रयोज्य विजातीय- सयोग सम्बन्ध से अस्तित्व की कल्पना असभव है'-तो यह ठीक नहीं है। क्योकि पाक स्थल मे नये घट की उत्पत्ति के लिये जिन दृयणुक से लेकर कपाल पर्यन्त नये द्रव्यो को आवश्यकता होती है उनके प्रति पर्ववर्ती परमाणुसयोगादि और द्वयणुकादि का नाश कारण होता है। क्योकि किसी भी द्रव्य मे किसी कार्यद्रव्य के रहते नये द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होती एव दो द्रव्यो मे पूर्वोत्पन्न सयोग के रहते उन द्रव्यो मे नये सयोग की उत्पत्ति नहीं होती अत उत्तर द्रव्य के प्रति पूर्व द्रव्य का नाश और उत्तर सयोग के प्रति पूर्व सयोग के नाश को कारण मानना आवश्यक होता है और इसके अति- रिक्त कालोपाधिरूप में भी पूर्व सयोग और पूर्व द्वयरणकादि का नाश, उत्तर सयोग और उत्तर दयणु- कादि के नाश का कारण होता है । अत पाक स्थल मे नवीन घट की उत्पत्ति के समय दुलाल की पूर्वकृति के स्वप्रयोज्य विजातीय सयोग सम्बन्ध से रहने मे कोई बाधा नहीं हो सकती क्योकि नवीन घटके लिये अपेक्षित परमाण सयोग और व्यणुकादि पूर्व सयोग और पूर्व द्वयणकादि के नाश से जन्य है और उक्त नाश अपने प्रतियोगी से जन्य है और प्रतियोगी कुलाल की कृति से जन्य है। अन. कुनाल कृति से जन्य होनेवालो को परम्परा मे ही नवीन घट के उत्पादक कपालद्वय सयोग के होने से उसे कुलाल को पूर्व कृति से प्रयोज्य मानना सर्वथा सड्गत है। इस प्रसङ्ग मे यह बात ध्यान देने योग्य है कि परमाणुप्रो का सयोग और द्वयणकादि को उत्पत्ति कुलाल कृति से नहीं होती। कुलाल कृति से तो कपाल और कपालद्वय का सयोग ही उत्पन्न होता है, अत नवीन घट के उत्पादक नवीन कपालद्वय सयोग को कुलाल कृति से प्रयोज्य इसलिये मानना चाहिये कि वह कुलाल कृति से उत्पादित पूर्व कपाल और पूर्वकपालद्वय सयोग के नाश से उत्पन्न है । व्याख्याकार का कहना है कि पाक स्थल मे नवीन घट की उत्पत्ति के समय स्वप्रयोज्य विजातीय सयोग सबध से कुलाल की पूर्वकृति का अस्तित्व मानना आवश्यक है। यदि ऐसा न माना जायगा तो घट सामान्य के प्रति दण्ड आदि की कारणता का समर्थन न हो सकेगा । क्योकि पाक से नवीन घट की उत्पत्ति के समय दण्ड प्रादि भी नहीं रहते। अत: उस घट के लिये यदि ईश्वरीय कृति " [ श. या ममुच्चय स्त०-३ श्लोक : - ४८ ] फिच, उपादानप्रत्यक्षम्य लोकिकम्य हेतुन्यात क्यमीधरे तन्मिदिः १ अपि च, प्रणिधानाद्यर्थ मनौवहनाड्यादी प्रवृत्तिम्बीकागद् यद्रविछिन्ने यथिप्रवृत्तिः नद्धर्मायन्छिन्ने IA की कल्पना आवश्यक है तो उसी प्रकार ईश्वरीय दण्डादि की नीरल्पना करने की प्रावग्यस्ता पट सक्ती है जबकि यह बात ईश्वर कर्तृत्ववादी को नी मान्य नहीं है । प्रत पारम्थल मे नवीन घट के उत्पादक नवीन कपालद्वय मयोग को पूर्वदप्रयोज्य मानकर स्वप्रयोज्यविजातीय मयोग सम्बन्ध से दण्डादि का अस्तित्व मानफर उन घट मे दण्डादि जन्यता की उपपत्ति जिम प्रकार की जायगी उमी प्रकार कुलाल को पूर्वकृति जन्यता को भी उपपत्ति की जा सकती है। अतः पारस्थलीय घट की उत्पत्ति के अनुरोध से ईश्वरीय कृति की करपना नहीं हो मक्ती । यदि यह पहा जाय कि-'पटादि को घट सामान्य के प्रति कारण न मानकर विलक्षण घट के प्रति कारण माना जायगा प्रतः पाक स्थलीय घट के लिये दण्डादि की पावश्यक्ता नहीं होगी।- तो यह बात कृति के सम्बन्ध में नी कही जा सकती है । अर्थात् घट सामान्य के प्रति कृति को कारण न मानकर विलक्षण घट केही प्रति कृति को कारण माना जा मकता है। प्रत: पाकस्थलीय घट के लिये कृति को भी पल्पना अनावश्यक हो सकती है। यदि यह कहा जाय कि-'कृति को स्वप्रयोज्य विजातीय मयोग सम्बन्ध मे घट का कारण मानने मे गौरव है । अतः लाघव के लिये ममवाय सम्बन्ध से घट के प्रति विशेष्यता सम्बन्ध से ही कृति को कारण मानना उचित है । ऐसी स्थिति मे जिस पण्ड घट की उत्पत्ति के पूर्व दण्ड स्वप्रयोज्य कपालद्वय सयोग सम्बन्ध मे है किन्तु कुलालकृति विशेष्यता सम्बन्ध मे नहीं है- उम पडघट के लिये ईश्वरीय कृति को कल्पना प्रावश्यक है -तो यह ठीक नहीं है. क्योंकि कृति मी स्वप्रयोज्य सम्बन्ध से ही घट के प्रति कारण है न कि स्वप्रयोज्यविजातीयसयोगसम्बन्ध मे क्योकि विजातीयसंयोगत्व स्प से स्वप्रयोज्य को कारणतावच्छेदक सम्बन्ध मानने में गौरव है। और स्वप्रयोज्यसम्बन्ध से कारण मानने मे विशेप्यता सम्बन्ध से कृति को कारण मानने को अपेक्षा कोई गौरव नहीं है । क्योकि विशेष्यता सम्बन्ध से कारण मानने मे कारणतावच्छेदक सम्बन्धतावच्छेदक विशेप्यतात्व होगा और स्वप्रयोज्य सम्बन्ध से कारण मानने पर कारणतावच्छेदक सम्वन्धतावच्छेदक-प्रयोज्यत्व होगा। और प्रयोज्यत्व पीर विशेष्यतात्व मे कोई लाघव-गौरव नहीं है क्योकि दोनो ही म्वरूपसम्बन्धविशेषरूप है। उसके अतिरिक्त यह भी ज्ञातव्य है कि कृति को घट सामान्य के प्रति कारण न मानकर विजा- तीय घट के प्रति कारण मानना उचित है । जंसा कि अनी दण्डादि को विजातीय घट के प्रति कारण बताया गया है । तो इस प्रकार जब घट सामान्य के प्रति कृति कारण ही नहीं है तो कृति के बिना भी पाकस्थलीय घट को या खण्डघट की उत्पत्ति हो सकती है। प्रत. उसके अनुरोध मे ईश्वरीय कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। ईश्वर मे लौकिक प्रत्यक्षज्ञान का प्रभाव ] इस प्रसङ्ग मे यह भी विचारणीय है कि उपादान कारण का लौकिक प्रत्यक्ष ही कार्य का हेतु होता । क्योकि उपादान के अलौकिक प्रत्यक्ष के आधार पर अन्य देशस्थ या अन्य कालस्य उपादान मे कोई भी कर्ता कार्य को उत्पन्न करने का प्रयास नहीं करता और उपादान का लौकिक प्रत्यक्ष इन्द्रिय के लौकिक सनिकर्ष से ही सपन्न होता है । अतः ईश्वर मे दृषणकादि के उपादान पर- [४६ स्या० का टीका-हिन्दीविवेचना ] तत्प्रकारकज्ञानमात्रस्य हेतुत्वात् कथमुपादानप्रत्यक्षमीश्वरस्य ? तम्यानुमितित्वे जन्यानुमिति- त्वं व्याप्तिज्ञानजन्यतावच्छेदकमिति गौरवोद्भावन तु प्रत्यक्षत्वे जन्यप्रत्यक्षत्यस्येन्द्रियादिजन्य- तावच्छेदकत्वकल्पनागौग्वं नातिशेते । अपि च, तदुपादानप्रत्यक्षं निराश्रयमेवाऽस्तु, दृष्टविप- रीतकल्पनभिया तु नित्यज्ञानादिकमपि कथं कल्पनीयम् ? अभिहितश्चायमों 'बुद्धिश्चेश्वरस्य यदि नित्याव्यापिकवाऽभ्युपगम्यते, तदा मैवाऽचेतनपदार्थाधिष्ठात्री भविष्यनि, इति किमपरत- दाधारेश्वरपरिकल्पनया ?" इत्यादिना ग्रन्थेन सम्मतिटोकायामपि । माणु आदि का लौकिक प्रत्यक्ष सिद्ध नहीं हो सकता क्योकि ईश्वर इन्द्रियादि से रहित होता है। इसके अतिरिक्त दूसरी बात यह है कि जिस कार्य की इच्छा से जिस कारण मे मनुष्य की प्रवृत्ति होती है उस कारण मे उस कार्य का ज्ञान सामान्यरूप से हेतु होता है न कि उस कारण मे उस कार्य का प्रत्यक्षज्ञान । क्योकि यदि कारण मे कार्य के प्रत्यक्षज्ञान को ही हेतु माना जायगा तो मन का प्रणि- धान-मन की एकाग्रता करने के लिये मनुष्य की मनोवहनाडी मे प्रवृत्ति नहीं हो सकेगी क्योकि मनो वहनाडी का उसे प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता । तो कार्यकारणभाव की इस स्थिति मे ईश्वर मे द्वयणुकादि के उपादान का प्रत्यक्ष न सिद्ध होकर केवल इतना ही सिद्ध हो सकता है कि ईश्वर मे घ्यणुकादि के उपादान कारण का ज्ञान रहता है। अतः ईश्वर सर्वदृष्टा न सिद्ध होकर सर्वज्ञाता ही सिद्ध हो सकता है। सच बात तो यह है कि कार्य के प्रति उपादान कारण के ज्ञानसामान्य को कारण मानने पर द्वयणुकादि के उपादान कारण के ज्ञाता रूपमे भी ईश्वर की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योकि एक ब्रह्माण्ड को सृष्टि के समान अन्य पूर्वोत्पन्न ब्रह्माण्ड मे विद्यमान योगी को किसी नवीन उत्पन्न होने- वाले ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत विद्यमान परमाणुमो का योगजन्य ज्ञान हो सकता है और उसी ज्ञान से नये ब्रह्माण्ड मे व्यणुकादि की उत्पत्ति हो सकती है । अत ब्रह्माण्ड ईश्वरकर्तृक न होकर योगिकर्तृक हो सकता है । इसलिये विश्वकर्तारूप मे ईश्वर की सिद्धि की आशा दुराशा मात्र हे । यदि यह कहा जाय कि-सपूर्ण ब्रह्माण्ड का एक साथ खण्ड प्रलय होता है और खण्ड प्रलय की अवधि पूरी हो जाने पर नये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है । अत खण्ड प्रलयकाल मे कोई योगी नहीं रहता इसलिये नये ब्रह्माण्ड मे द्वयणुकादि की उत्पत्ति परमाणो के योगिज्ञान द्वारा समर्थित नहीं हो सकती। प्रत द्वयणुकादि के उपादानभून परमाणुओ का ज्ञान सृष्टि के प्रारम्भ समय मे ईश्वर मे ही मानना अावश्यक है और उसे प्रत्यक्ष रूप ही होना उचित है । क्योकि अनुमिति रूप मानने पर अनुमितित्व को व्याप्तिज्ञान का जन्यतावच्छेक नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह व्याप्ति ज्ञान से अजन्य ईश्वरीय अनुमिति मे रहने के कारण व्याप्तिज्ञानजन्यता का अतिप्रसक्त धर्म है । अत जन्यानुमितित्व को व्याप्ति- ज्ञान का जन्यतावच्छेदक मानना पडेगा और उसमे गौरव होगा।"- तो यह कथन ठीक नहीं क्योकि ईश्वर ज्ञान को प्रत्यक्षात क मानने पर भी, ईश्वरीयनित्यप्रत्यक्ष मे इन्द्रियजन्यता नहीं है अत: इन्द्रिय जन्यता के प्रतिप्रसक्त होने से प्रत्यक्षत्व को इन्द्रियजन्यता का अवच्छेदक न माना जा सकेगा किन्तु जन्यप्रत्यक्षत्व को ही इन्द्रिय का जन्यतावच्छेदक मानना होगा । अत. ईश्वरीयज्ञान की प्रत्यक्षरूपता का समर्थन उक्तरीति से नहीं किया जा सकता। ८ ५० ] [गा वा० समुन्चय-स्त०३-श्लोक ९ . किञ्च, एवं नानात्मम्वेव व्यामन्यवृत्ति तत्कल्प्यताम् , साश्रयमंयुक्नगंयोगसंबन्धन तेषु तत्कल्पनापेक्षया समवायेन तत्कल्पनाया एव तव न्याव्यन्वात् । न चव घटादिभ्रमो. च्छेदापत्तिः, वाधवुद्विसत्वादिति वाच्यम् , वायुट्टिप्रतिबन्धक्तायां चत्रीयत्वम्यावश्यं निवे- श्यत्वात् , तच समवेतत्वमवन्धेन चैत्रवत्वं, पर्याप्तन्वेन या, ति न किञ्चिद् वेपम्यम् । अपि च, 'देवतामंनिधानेन' इति पक्षण प्रतिष्ठादिना म्बाभेद-बीयत्वादिवानं नदा- हितसंस्काररूपं ब्रह्मादी स्वीकृतम् , न च ब्रह्मादीनामीश्वरभेटः, भगवद्गीताविरोधात् । एवं इस के अतिरिक्त यह भी ज्ञातव्य है कि 'कार्य प्रत्यक्षादिजन्य, कार्यत्वात्' इस अनुमान में द्वयमादि कार्यों के कारणभूत प्रत्यक्षादि सिद्ध होने पर भी उसके प्राश्यस्प में ईश्वर को सिद्धि मे कोई प्रमाण नहीं है । क्योकि यणुकादि के उपादानभूत परमाणुनो के प्रत्यक्षादि को निराश्रय माना जा सकता है। यदि यह कहा जाय कि- प्रत्यक्षादि किसी आश्रय मे ही रहता है । अत परमाणु के प्रत्यक्षादि मे निराश्रयत्व की कल्पना सप्टविरुद्ध होने के कारण नहीं की जा सरतो' तो यह ठीक नहीं है क्योकि तब तो जीव मे अनित्य ही ज्ञान प्रादि सिद्ध होने के कारण ईश्वर के ज्ञान आदि मे नित्यत्व को भी कल्पना इष्टविरोध के कारण नहीं की जा सकेगी। इस बात को मम्मति टीका मे यह कहते हुए स्पष्ट किया गया है कि यदि ईश्वर को बुद्धि निन्य और व्यापक है तो ईश्वर के विना भी बुद्धि को अचेतन पदार्थों की अधिष्ठात्री मान लेना चाहिए । उसके आधारभूत ईश्वर की कल्पना निरर्थक है। इस सन्दर्भ मे यह भी कहा जा सकता है कि-यणुकादि के उपादान कारणभूत परमाणुओ का ज्ञान ईश्वररूप किसी एक अतिरिक्त प्रात्मामे न रह फर सपूर्ण प्रात्मानो मे ही व्यासज्यवृत्ति- पर्याप्ति सम्बन्ध से रहता है क्योकि उस ज्ञान को प्रन्य आत्मानो का अधिष्ठाता बनाने के लिये उनके साय उन ज्ञान का स्वाश्रय-सयुक्त-सयोग सम्बन्ध मानना होगा जैसे स्व का अर्थ है ज्ञान, उसका प्राश्रय है ईश्वर, उस्से सयुक्त हे मूर्तद्रव्य और उसका सयोग है जीवात्मा मे तो इस स्थिति मे यही उचित प्रतीत होता है कि उस ज्ञान को स्वाश्रय सयुक्त सयोग सम्बन्ध से जीवात्मानो मे न मानकर समवायसम्बन्ध से हो माना जाय । यदि यह कहा जाय कि-'उस ज्ञान को समस्त जीवो मे मानने पर किसी को घटादि का भ्रम न हो सकेगा, क्योकि जिस देश मे घटादि का भ्रम होता है उस देश मे प्रत्येक मनुष्य को घटाऽभाव को बुद्धि विद्यमान है जिससे घटादि के भ्रम का प्रतिबन्ध हो जाना अनिवार्य है'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि एक पुरुष को वाधबुद्धि से अन्य पुरुष को विशिष्ट बुद्धि के प्रतिबन्धापत्ति के निवारणार्थ चैत्रादि तत्तपुरुषोय विशिष्टबुद्धि मे चैत्रादि तत्तपुरषीय वाधबुद्धि को प्रतिवन्धक' मानना आवश्यक होता है । जिस मे तत्तत्पुरुषीयत्व का अर्थ तत्तत्पुरषसमवेतत्व न कर तत्तत्पुरुष पर्याप्तत्व कर देने से जगत के कारणीभूत सर्वविषयक ज्ञान को सर्वात्मगत मानने पर होने वाली घटादि म्रम के उच्छेद को आपत्ति का परिहार सुकर हो जाता है क्योकि सर्वविषयकज्ञान किसी एक आत्मा में पर्याप्त न होकर सभी प्रात्मा मे पर्याप्त होता है । अतः तत्तत्पुरुष पर्याप्तवाघ- बुद्धि को प्रतिबन्धक मानने पर सर्वज्ञानात्मक वावबुद्धि से विशिष्टबुद्धि का प्रतिवन्ध नहीं हो सकता।

स्या० का टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ५१ - बैंपयिकसुख दुःखादिश्रवणाद् धर्मा-ऽधर्मावपि तप्राऽङ्गीकर्तव्यौ । न च विरोधः, ब्रह्मादिशरीराव- च्छेदेनाऽनित्यज्ञानादियत्वेऽप्यनवच्छिन्नज्ञानाऽविरोधात् । अत एवाऽन्ये तु 'स तपोऽतप्यत' इति श्रुतेः अणिमादिप्रतिपादकश्रुतेश्च धर्माऽधर्मावनित्यज्ञानादिकमपीश्वरे स्वीकुर्वन्ति, इति शशधरेऽभिहितम् । एतन्मते च बाधादिप्रतिवन्धकतायामवच्छिन्नममवेतत्वेन चैत्रवत्त्वादिलक्षण- चैत्रीयत्वादेवश्यं निवेश्यत्वाद् नातिरिक्तनित्यज्ञानाश्रयसिद्धिः । [ईश्वर मे जन्यज्ञान की आपत्ति इस प्रसङ्ग मे इस विषय पर ध्यान देना भी आवश्यक है कि न्यायशास्त्र मे ब्रह्मा प्रादि देवताश्री की प्रतिमानो मे शास्त्रोक्त प्रतिष्ठाविधि से देवताओ का सन्निधान माना गया है । देवताओ के सन्नि- धान का अर्थ है प्रतिमा मे देवता की अभेदबुद्धि या प्रात्मीयत्व बुद्धि । इसी को प्रतिमा का प्रतिष्ठाजन्य सस्कार कहा जाता है । इस प्रकार जब ब्रह्मादि देवताश्रो मे अपनी अभिन्नता याप्रात्मीयता का ज्ञान उत्पन्न होता है तब यह कैसे कहा जा सकता है कि ईश्वर मे जन्यज्ञान नहीं होता किन्तु नित्यज्ञान होता है | यदि यह कहा जाय कि 'ब्रह्मादि देवता ईश्वर से भिन्न है तो यह ठीक नहीं है क्योकि भगवद्गीता मे श्रीकृष्ण ने अपने को ही जगत् का स्रष्टा पालक और सहर्ता बताया है और अपने ही को ईश्वर कहा है । इसलिये ब्रह्मादि को ईश्वर से भिन्न मानना भगवद्गीता के विरोध के कारण उचित नहीं है । उसी प्रकार पुराणो मे यह भी सुनने को मीलता है- ब्रह्मादि देवताओं को अनायास उपलब्ध होने वाले विषयो से सुख और राक्षसो के अत्याचार से दु स भी होता है । अत ब्रह्मादि मे सुख और दुःख के कारणभूत धर्माऽधर्म को भी सत्ता माननी होगी और बह्मादि के ईश्वर से भिन्न न होने के कारण ईश्वर मे भी धर्माऽधर्म की सत्ता अनिवार्य होगी। इस प्रसङ्ग मे यह भी कहा जा सकता है कि-सृषटि के प्रारम्भ मे ह्यणुकादि की उत्पत्ति के के उपादान कारण परमाणु का ज्ञान ईश्वर को मानना आवश्यक होता है और उस समय कोई शरीर न होने से उस ज्ञान को शरीरादि से अनवच्छिन्न नित्य ही मानना पडेगा। तो फिर उसमे अनित्य ज्ञानादि की सत्ता मानना विरोधग्रस्त है'- किन्तु यह ठीक नहीं है क्योकि ब्रह्मादि के शरीर द्वारा अनित्य ज्ञानादि की सत्ता और किसी सशरीर प्रादि को द्वार बनाये बिना ही नित्यज्ञान वी सत्ता मानने मे कोई विरोध नहीं है । इसीलिये 'शशधर' नामक पक्तिने स्वस्थ मे यह रहा है कि अन्य विद्वान स तपोऽतप्यत' इस श्रुति के अनुसार और ईश्वर मे अणिमादि पाठ प्रकार के ऐश्चयों का प्रति- पादन करने वाली श्रुति के अनुसार ईश्वर मे धर्माधर्म और अनित्यज्ञानादि का अस्तित्व मानते है। इस मत मे विशिष्टबुद्धि के प्रति बाधबुद्धि को शरीरावच्छिन्न समवेतत्वरूप से या पर्याप्तत्वसम्बन्धेन चैत्र- निष्ठत्व रूप से प्रतिबन्धक मानकर भ्रम की अनुपपत्ति का परिहार किया जा सकता है क्योकि सर्व विषयक नित्यज्ञानात्मक बाधबुद्धि शरीरावच्छेदेन समवेत नहीं होती और न पर्याप्तत्व सम्बन्ध से चैत्रादि एक व्यक्ति मे ही विद्यमान होती है । अत. उससे भ्रमोत्पत्ति का प्रतिवन्ध नहीं हो सकता। इस प्रकार समस्त जीवो मे व्यणुकादि के उपादान कारणो के निरयज्ञान को व्यासज्यवृत्ति मान लेने से सपूर्ण आवश्यक उपपत्तिया हो जाने के कारण नित्यज्ञान के ईश्वररूप अतिरिक्त पाश्रय की सिद्धि नहीं हो सकती।

५२ [शा०या० ममुच्चय स्न० -इलोक ९ फिच, प्रवृत्तिविशेपे इन्छान्वय-व्यतिरेकरत, प्रवृत्तिविशेपे द्वेपाऽन्वय-व्यनिरंकायपि दृष्टी, दुपद्वेपेण तत्याधनद्वंये नन्नाशानुकलप्रवृत्तः कण्टकादी दर्शनान । न च जिहागयर द्वैपान्य- थामिद्धिः, 'तद्रुतोः' ० इति न्यायात् ; अन्यथा उपपदार्थ एब न म्यान , 'हेमि' इत्यनुभवे क्वचिदनिष्टमाघनतानानम्य, क्वचिच्चाऽनिष्टत्वनानम्यव उपपदेन तथाभिलापार । एवं च कार्यमामान्ये द्वेपस्याऽपि हेतुत्वमिद्धा नित्यद्वेपोऽपीश्वरे मिद्वय त् । 'देपवतः समाग्न्यिप्रमग' इति चेत् ? चिकीर्पावतोऽपि किं न मः १ 'द्वैप-चिकीर्पयोम्ना समानविपयन्वे करणा-ऽकरणप्रमद्गः, भिन्नविषयत्वे च तत्कार्य न कुर्यादेव, इति वाधकाद् द्वेषकल्पना त्यज्यन' इति चेत् ? एवधु- तरकालीपस्थितबाधकेन तद्वाधोपगमे, नित्यतानादिकल्पनागौरवादिवान बलप्तोऽपीश्वर- स्त्यज्यताम् [प्रवृत्ति से ईश्वर मे द्वेष का अतिप्रमंग] इस सदर्भ मे यह भी विचारणीय है कि जैसे प्रवृत्तिविशेष मे इच्छा का अन्वयव्यतिरेक होता है अर्थात् जिस विषय की इच्छा होती है उस विषय मे प्रवृत्ति होती है और जिस विषय मे इच्छा नहीं होती उस विषय मे प्रवृत्ति नहीं होती, उसीप्रकार प्रवृत्तिविशेष मे द्वेष या नी अन्दय-व्यतिरेक देखा जाता है । जैसे दुख के प्रति ढेप होने के कारण दु.स साधन कष्टकादि के प्रति हेप होने मे उन का नाश करने के लिये कण्टकादि मे प्रवृत्ति होती है, और जिस विषय मे द्वेष नहीं होता उन विषय के नाश के लिये उस मे प्रवृत्ति नहीं होती। जैसे पुत्रकलत्रादि । फलतः ईश्वर मे जगत् निर्माण की प्रवृत्ति मानने पर जैसे उस मे नित्य इच्छा मानी जाती है उसीप्रकार जगत् निर्माण के विरोधी वस्तु के नाश के लिये उस के पर ढेप मानना भी आवश्यक होगा। इस प्रकार ईश्वर का द्वेषी होना अनिवार्य हो जायगा जो न्यायशास्त्र की दृष्टि से मान्य नहीं है। यदि यह कहा जाय कि- "दु.असायनो के नाशार्य जो प्रवृत्ति होती है वह उन के प्रति द्वेष के कारण नहीं होती अपितु उन के परित्याग की इच्छा से होती है। क्योकि जिस वस्तु के प्रति द्वेष होता है उस वस्तु के त्यागको भी इच्छा अवश्य होती है अत एव त्याग को इन्छा से द्वेष प्रन्ययासिद्ध हो जाता है । अत: अनिष्ट साधनो के नाशार्थ होनेवाली प्रवृत्ति से द्वेष का अनुमान नहीं किया जा सकता, क्योकि उस को उपपत्ति जिहासा अर्थात त्याग की इच्छा से ही सम्पन्न हो जाती है." तो यह ठीक नहीं है क्योकि 'न तोरेवास्तु किं तेन ?' इस न्याय से नाशार्थ प्रवृत्ति के प्रति द्वेषजन्य जिहासा को हेतु मानने के बजाय सीधे द्वेष को हो हेतु मानने मे औचित्य है। और यदि जिहासा से द्वेष को अन्यथा- सिद्ध माना जायगा तो द्वेष पदार्थ हो सिद्ध न हो सकेगा। क्योकि दु.स स्वरूपतः अर्थात् विना द्वेष्य हुए और उम का साधन अनिष्ट का साधन होने से सोधे हो, जिहासित हो जायगा । जिहासा के पूर्व दुःख या दु.व के साधन प्रति द्वेष मानने की कोई आवश्यकता सिद्ध न होगी। यदि यह कहा जाय कि 'वेष्मि-मुझे इस विषय के प्रति द्वेष है-यह अनुभव ही द्वेष के अस्तित्व मे प्रमाण होगा'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि दु ख के साधन क्ण्टकादि मे अनिष्ट साघनता स्या० क० टीफा और हिन्दी विवेचना ] [५३ एतेन- 'पुरेषु पुरेशानामिव जगदीशज्ञानेच्छादित एव तत्तत्कार्याणां स्वल्पतमा ऽधम- देश-कालादिनियमः, वदन्ति हि पामरा अपि-'ईश्वरेच्छच नियामिका' इति । न चैवं के ज्ञान को तथा दु.ख मे अनिष्टत्व ज्ञान को ही द्वेष पद के व्यवहार का विषय मानकर उन ज्ञानो द्वारा हो 'द्वेषिम' इस अनुभव की उपपत्ति की जा सकती है । इस उपर्युक्त चर्चा का निष्कर्ष यह है कि जैसे घटपटादि कतिपय कार्यों में ज्ञान-इच्छा आदि का अन्वय-व्यतिरेक देखकर कार्य सामान्य के प्रति ज्ञान-इच्छा आदि को कारण माना जाता है और उस के आधार पर कार्य सामान्य मे ज्ञानादि जन्यत्व का अनुमान करके कार्य सामान्य के कारणीभूत ज्ञानादि को ईश्वरनिष्ठ माना जाता है। उसीप्रकार दु.खसाधनोभूत कण्टकादि के नाशरूप कार्य मे कण्टकादि के प्रति द्वेष का अन्वय- व्यतिरेक देखकर कार्यसामान्य के प्रति द्वेष को भी कारण माना जा सकता है और उस के आधार पर कार्य सामान्य मे द्वषजन्यत्व का अनुमान कर कार्य सामान्य के कारण भूत दोष को भी ईश्वरनिष्ठ मानना अनिवार्य हो सकता है । फलत ईश्वर मे नित्यज्ञानादि के समान नित्य द्वष की भी सिद्धि का परिहार नहीं किया जा सकता। यदि यह कहा जाय कि-'ईश्वर मे द्वेष मानने पर वह ईश्वर ही नहीं हो सकेगा अपितु मसारी हो जायगा'-तो यह आपत्ति तो ईश्वर मे चिकीर्षा मानने पर भी अपरिहार्य है । क्योकि चिकीर्षा भी ससारी मे ही देखी जाती है । यदि यह कहा जाय किटेप और चिकीर्षा को समानविषयक मान- ने पर एक ही समय एक हो कार्य के करने और न करने दोनो को ही आपत्ति होगी। अर्थात् चिकीर्षा से उस कार्य का उत्पादन और द्वष से उसी कार्य का अनुत्पादन भी प्रसक्त होगा । जो अत्यन्त विरुद्ध है और यदि दोष और चिकीर्षा को भिन्नविषयक माना जायगा तो जो देष का विषय होगा वह चिकीर्षा का विषय न होने से ईश्वर द्वारा उत्पाद्य न हो सकेगा। फलत ईश्वर मे सर्वकार्यक्र्तृत्व के सिद्धान्त की हानि होगी । अत ईश्वर मे द्वष की कल्पना नहीं का जा सकती'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि ईश्वर ने द्वष कल्पना का जो बाधक प्रस्तुत किया गया है वह ईश्वर मे द्वष की सिद्धि हो जाने पर उपस्थित होता है अत: उसे द्वेष कल्पना का बाधक नहीं माना जा सकता। और यदि किसी वस्तु की सिद्धि के बाद उपस्थित होने वाले बाधक से भी उस वस्तु की 'सद्धि का बाध माना जायगा तो ईश्वर को सिद्धि का भी प्रतिवन्ध उस वाधक से हो सकता है जो ईश्वर मानने के फलस्वरूप उपस्थित होता है जैसे, ज्ञान इच्छा और प्रयत्न मे नित्यत्व अर्थात् सपूर्णकाल के साथ सम्बन्ध की कल्पना एव ईश्वर मे सपूर्णकाल के सम्बन्ध की कल्पना और नित्य ज्ञान प्रादि मे सपूर्ण वस्तुप्रो के विषयत्व की कल्पना एव घटाभाव पटाभावादि अनन्त प्रभावो के सम्बन्धो की कल्पना से होनेवाला गौरव, तब कल्पित ईश्वर को भी छोड देना होगा। [ ईश्वर की इच्छा से देश-काल नियम को उपपत्ति का प्रयास ] इस सन्दर्भ मे कतिपय ईश्वर कर्तृत्ववादियो की ओर से यह कहा जाता है कि जिस प्रकार नगरो मे नगराधीश की ज्ञान इच्छा के अनुसार ही अल्प अथवा अधिक देश काल और परिमाण मे भिन्न भिन्न कार्यों के उत्पादन का नियन्त्रण होता है उसी प्रकार यह मानना भी आवश्यक है कि जगत का कोई अधीश्वर है और उसके ज्ञान-इच्छादि से ही जगत मे विभिन्न कार्यों के उत्पादन का नियन्त्रण होता है। यह मान्यता इतनी दृढमूल हैं कि अशिक्षित भी ऐसा कहा करते है कि 'ससार मे - ५४ ] {गा ग ममुन्चय न० ३-दलो-१ देश-कालनियततत्तकान्पित्तिज्ञानादित एवं तत्तत्कार्यनिर्वाह गर्ने दण्डादिकारणन्नति वाच्यम् , तदनुमतत्त्वेनेच दण्डादीनां घटादिहेतुत्वान । न हि 'दण्डादिन्य घटादर. नन्यथामिदनियतपूर्ववर्ती न वेमादिः' 'कपालादि ममाथि, न तन्याटियम्' इत्यत्राऽन्यद् नियामक पश्याम इति नदनुमत्याठिकमेव तया, तदनुमन्यादिकं न माझाव , चिन्नु तत्तकारण- द्वारा तत्तत्संपादकम् । न हि गजाजादिनोऽपि विनांशुक तन्वादि, विना तन्त्वाटिक पटाटि"-टति पामगशयानुमग्णसंक्रान्तपामर भावानां मतमपाम्नम्, गजावादिनुल्यनयेश्वरेच्छाया अनुन्धान मामग्रीमिट्टम्य नियनदेश कालवम्य तज्जन्यताघटकन्या ननियम्यवान , अन्यथा नवाला- जो कुछ होता है वह मव ईश्वर की हो इच्छा मे होता है। यदि यह कहा जाय कि-नद् तद् देश और तद् तद् कार्य को उत्पत्ति नियत है और इस नियतत्व के ज्ञान प्रादि मे ही तद् तद् देश और तद् तद् काल मे तद् तद् कार्य को उत्पत्ति का नियन्त्रण होता है-ऐमा मानने पर घटपटादि कार्यों के प्रति दण्ड-वेमादि की कारणता का हो लोप हो जायगा'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि दाद-वैमादि घटपटादि कार्यों के प्रति जो कारण होते है वह भी ईश्वर की अनुमति से ही होते है। यदि ऐमा न माना जायगा तो 'दण्डादि हो घटादि का अनन्यथासिद्ध नियतपूर्वनों होता है और ये दि नहीं होता, एव कपालादि ही घटादि का समवाय मम्बन्ध से प्राश्रय होता है तन्तु प्रादि नहीं होता' इसका ईश्वर को छोडकर दूसरा कोई नियामक नहीं हो सकता। और यह नो जानव्य है कि ईश्वर की अनु- मति भी तत्तत्कार्यों का साक्षात् उत्पादक न होकर तत्तकारणो द्वारा ही उत्पादक होती है। यह मानना लोकस्थिनि के अनुकूल भी है क्योंकि राजा को प्राज्ञायादि से नी तन्तु प्रादि का निर्माण संशु- कादि के बिना और पटादि का निर्माण तन्तु आदि के विना नहीं होता। अत जैसे किसी भी राज्य मे विभिन्न कार्यों का उत्पादन राजा को पाना अनुसार होने पर भी उस कार्य के लोकमिद कारणो के माध्यम से ही होता है उसी प्रकार जगत ने नी जगत् के राजा ईश्वर की इच्छा से भी तत्तत्कायों का उत्पादन तत्तत्कार्यों के लोक मिद्ध कारणो द्वारा ही होना उचित है. क्योकि परमेश्वर की वैनी हो अनुमति है। इस सम्बन्ध मे व्यारयाकार श्रीमद्यशोविजयजी महाराज का कहना है कि यह मत पामर्गे के अभिप्रायानुसार प्रवृत्त होने के कारण नकान्त पामरमाव वाले व्यक्तियो के लिये ही मान्य हो सकता है, बुद्धिमान मनुष्य इस मत को नहीं स्वीकार कर सकता, क्योंकि राजा की प्राज्ञादि के समान ईश्वर की इच्छा को कारण मानना प्रमाणसिद्ध नहीं है। क्योंकि इस मत मे ततद्देश और तत्तत्काल मे तत्तत्कार्य के नियतत्व को हो-जो तद् तद् कार्य की उत्पादक सामग्री से सपन्न होता है-तद् तद् देश और तद् तद् काल मे ततत्कार्य को उत्पत्ति का नियामक कहा गया है। किन्तु यह युक्तिसगत नहीं होता। क्योकि उक्त नियतत्व तत्तत्कार्यगतजन्यता का घटक होता है अत एव उससे तत्तत्यार्य की उत्पत्ति का नियमन नहीं हो सकता, क्योंकि तत्तत्कार्य की उत्पत्ति का नियमन उसीसे मनव है जो तत्तत्कार्य को उत्पत्ति के पूर्व उपस्थित हो सके, किन्तु जो तत्तकार्यगत जन्यता का घटक है यह तो तत्तत्कार्य के साथ ही उत्पन्न हो सकता है न कि तत्तकार्योत्पत्ति के पूर्व । प्रत उसे तत्तत्कार्य की उत्पत्ति का नियामक मानना सभव नहीं हो सकता।

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ५५ - - - पनिछन्नद्धटावच्छिन्नविशेष्यतयोपादाननिष्ठनयोपादानप्रत्यक्षादित्रयहेतुताकल्पने गौरवात् , सम- वेतत्वसंवन्धेनेश्वरीयत्वेन तत्त्रयानुगमेऽप्यममार्यात्मत्त्वलक्षणेश्वरत्वनिवेशे गौरवात् प्रत्येकमा- दाय विनिजमनाविरहाच्च तत्कालावच्छिन्नन्यमान्धेन नियतेरेव हेतुत्वकल्पनौचित्यात् , इत- रकारणवैयापत्तेश्च । तदनुमतदण्डत्वादिनाऽहेतुत्वात , दण्डादीनां हेतृत्वनियमम्य च स्वभावत एव मंभवान् न तदर्थमपीश्वगनुमरणम् , अन्यथा तज्ज्ञानादेस्तत्तत्कारणानुमतित्वेऽपि नियाम- कान्तरं गवेषणीयम् । 'धमिग्राहकमानेन तत् स्वतोनियतमेवेति' चेत् ? इनमपि तत एव कि न तथा ? व्यवस्थितश्चायमों 'न चाचेतनानामपि स्वहेतुसंनिधिसमासादितोत्पत्तीना चेतना- धिष्ठातव्यतिरेकेणापि देश काला ऽकारण नियमोऽनुपपन्नः, तन्नियमस्य स्वहेतुबलायातत्वात्' इत्यादिना ग्रन्थेन सम्मतिटीकायामपि । तत्तद्देश और तत्तत्काल मे तत्तत्कार्य के नियतत्व को तत्तत्कार्य की उत्प त्त का नियामक न मानने मे यह भी एक युक्ति है कि-यदि तत्तद्देश और तत्तत्काल मे तत्तत्कार्य से नियतत्व को ही कारण मान लिया जायगा तो तत्तत्काल मे और तत्तद्देश मे तत्तत्कार्य के प्रति तत्तत्कालीन तत्तत्कार्य के उपादान का प्रत्यक्ष और तत्तत्कार्य की चिकीर्षा तथा तत्तत्कार्य के लिये तत्तत्काय के उपादान मे होनेवाले प्रयत्न को तत्तत्कार्य के प्रति कारण मानना गौरव के कारण त्याज्य हो जायगा । यदि तीनो को ईश्वर मे समवेत होने के कारण समवेतत्व सम्बन्ध द्वारा ईश्वरीयत्व रूप से तीनो का अनुगम कर तीनो मे एक कारण ना मानी जायगी तो भी कारणतावच्छेदक के शरीर मे अससारी आत्मत्व लक्षण ईश्वरीयत्व का निवेश करने मे गौरव होगा । और यदि ईश्वरीयत्वरूप से अनुगम न कर आत्मसम- वेतत्वरूप से अनुगम किया जायगा तो तत्तद् आत्मा को लेकर विनिगमनाविरह होने से तत्तदात्मसम- बेतत्व रूप से ज्ञान-इच्छा प्रयत्न मे अनन्तकारणता की आपत्ति होगी । और उसके वारण के लिये तत्कालावच्छिन्नत्व सबन्ध से उक्त नियति को कारण मानने पर घट पटादि के अन्य कारणो का वैयर्थ्य भी होगा। इस प्रसङ्ग मे जो यह वात कही गई कि- घटपटादि कार्य के प्रति दण्ड वेमादि को कारण मानने के लिये ईश्वर की अनुमति आवश्यक हैं अन्यथा वेमा घट का और दण्ड पट का कारण होने लगेगा'-यह ठीक नहीं है । क्योकि दण्ड वेमादि मे घटपटादि को कारणता का नियम स्शभाविक है । अर्थात् दण्ड-घट का ही कारण हो पट का न हो और वेमा पट ही का कारण हो घट का न हो यह बात दण्ड और वेमा के स्वभाव पर ही निर्भर हैं। उस के लिये ईश्वरानुमति को फल्पना अनावश्यक हैं । और यदि तत्तद्काय को कारणता को ईश्वरानुमति के आधीन माना जायगा तो यह प्रश्न हो सकता है कि दण्ड मे ही घट को कारणता ईश्वरानुमत क्यो हैं वेमा मे घट को कारणता ईश्वरानुमत क्यो नहीं है ? अत तत्तद् वस्तु मे तत्तद्काय-कारणता को ईश्वर नुमति का भो कोई दूसरा नियामक अपेक्षणीय होगा । और इस प्रकार नियामको की कल्पना मे अनवस्था को प्रसक्ति होगी। यदि यह कहा जाय कि -दण्ड मे ही घट को कारणता ईश्वरानुमत है यह बात ईश्वर साधक प्रमाणो से ही सिद्ध है अन्यथा यदि ईश्वरानुमतत्व को भी अन्य नियामक की अपेक्षा होगी तो उसकी सिद्धि ही न हो सकेगी-तो यह कथन भी ठीक नहीं है क्योकि ऐसा मानने पर यह भी कहा जा सकता है कि दण्डादि मे घटादि को कारणता भी स्वत. हो नियत है । उस के लिये ईश्वरानुमति जैसे अन्य नियामक की आवश्यकता नहीं ५६ ] [शा या समुच्चय स्त-श्लोक-९ किञ्च, एतादृशनियामरत्वं भवस्थ सिद्धादिज्ञान एव, इति किं शिपिविष्टकल्पनाकप्टेन ? तदिदमुक्त हेमसरिभिः- "मर्वभावेषु क त्वं ज्ञातृत्वं यदि संमतम् । मतं नः, मन्ति सर्वज्ञा मुक्ताः कायभतोऽपि हि" || [वी०स्तो०७-७] ॥ इति । युक्तं चैतत् , "जं जहा भगवया दित तहा विपरिणामइ" * इति भगवद्वचनस्यापीत्थ- मेव व्यवस्थितत्वात । एवं च- "समालोच्य क्षुद्रेवपि भवननाथस्य भवने, नियोगाद् भूतानां मितसमय-देशस्थिति-लयम् । अये । कयं भ्रान्तिः मततमपि मीमांसनजुपां,व्यवस्थातःकार्ये जगति जगदीशाऽपरिचयः ॥१॥" - हैं। अन्यथा नियामक के नियामक का प्रश्न उठाने पर अनवस्था होने के कारण दण्डादि मे घटादि की कारणता ही नहीं सिद्द होगी। सम्मति टोका मे इस विषय को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि अचेतन पदार्यों को उत्पत्ति उन के हेतुओ के सन्निधान से ही सपन्न होती है । उनमे उनके देश, काल और आकार नियमन चेतनस्प अधिष्ठाता के विना नहीं हो सकता'यह बात नहीं कही जा सकती। क्योकि कार्यो के देश काल और आकार का नियमन उन के हेतुओ के ही सामथ्य से हो जाता है अर्थात् जो हेतु जिम कार्य का उत्पादक होता है वह उसे नियत आकार में ही उत्पन्न करने के सामथ्र्य से स्वभावत सपन्न होता है। [भवस्थित केवली के ज्ञान से नियमन का सम्भव] इस सन्दर्भ मे एक दूसरी बात यह भी ज्ञातव्य है कि तत्तत् देश और तत्तत् काल मे तत्तत् कार्य की उत्पत्ति का नियमन तथा दण्डादि मे घटादि की ही कारणता का नियमन भवस्थसिद्ध के ज्ञान से भी सभव हो सकता है अत उम के लिये महेश्वर को कष्टमय कल्पना आनावश्यक है । इस बात को श्रीहेमचन्द्रसूरिमहाराज ने यह कहकर समथन दिया है कि-यदि सपूर्ण भावों के प्रति कर्तृत्व ज्ञातृत्वस्व- स्प स्वीकार्य हो तब आहतोके मत मे जो अनेक शरीरधारी सर्वज्ञजीवन्मुक्त माने गये हैं उन्हीं मे सपूर्ण भावों का ज्ञातृत्व है ही तो उन्हीं मे सवभावकर्तृत्व मान लेना आवश्यक है । किसी नये सवज्ञ की कल्पना निरर्थक है-यही युक्तिसङ्गत भी है क्योकि 'भगवान ने जिस वस्तु को जिस रूप मे देखा है वह वस्तु उसी रूप मे निष्पन्न होती हैं। भगवान के इस वचन की भी व्यवस्था इसीप्रकार हो सकती है । इस प्रसङ्ग मे नैयायिक-मीमांसकों को और से कोई इस प्राशय का पद्य पढे कि-"सामान्य जनो को भी जब इस बात की जानकारी होती है कि किसी गृहपति के गृह मे नियत देश और नियत- काल मे ही भूतो को उत्पत्ति आदि को जो व्यवस्था देखी जाती है वह अकारण नहीं होती किन्तु गृहपति को इच्छा से ही होती है, तब वेदवचनों को निरतर मीमासा करनेवाले विद्वानो को यह कैसा भ्रम है कि व्यवस्था को देखते हुए भी वे अपने को जगदीश के सम्बन्ध मे परिचयशून्य बताते हैं ? और जगदीश का अस्तित्व विना माने ही कार्यों को व्यवस्था पर अपनी आस्था प्रगट करता है ।"- क यद् यथा मगवता दृष्ट तत् तथा विपरिणमते ।

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ५७ इति पद्येऽपि प्रतिपद्यमेवं मदीयम्- पिनष्टीयं पिष्टं भवनियमसिद्विव्यवसितिः स्वभावाद् भूतानां मितसमयदेशस्थितिरिति । अये । केयं भ्रान्तिः सततमपि तर्कव्यसनिनां वृथा यद्वयापारो जगति जगदीशस्य कथितः ॥२॥ इति दिग् । अत एवाऽग्रिमाण्यप्यनुमानान्यपान्तानि । किञ्च, द्वितीयानुमाने 'स्वोपादान' इत्यत्र स्वपदस्य द्वयणुकादिपरत्वे साध्याऽप्रसिद्धिः, घटा- दिपरत्वे पटादौ मंदिग्धानकान्तिकत्वम् , स्वोपादानगोचरत्वादिनाऽपाततोऽपि हेतुत्वाभावतोऽत्य- प्रयोजकत्वं च । तृतीये ज्ञानेच्छापदोपादानप्रयासः। चतुर्थे सर्गाऽसिद्धया परं प्रति पक्षाऽसिद्धिः । तो इस पद्यके विरोध मे नयायिक के प्रति व्याख्याकार पू० यशोविजयजी महाराज इस आशय का अपना पद्य प्रस्तुत करना चाहते है कि-नियत देश और नियतकाल मे भूनो के जन्मादि की व्यवस्था स्वामा वक है । अत जगत् मे होनेवाली कार्यों की उत्पत्ति आदि के नियमो की उपपत्ति के लिये ईश्वर को सिद्ध करने का आ.वसाय पिष्टपेषण मात्र है । अत निरन्तर तर्को का हो व्यसन करनेव ले नैयायिको को यह एक कमा भ्रम है कि वे स्वभाव सिद्ध व्यवस्था के लिये जगदीश के व्यर्थ व्यापार का समर्थन करते हैं।' [ ईश्वर साधक शेषानुमानो को दुर्बलता ] 'कार्य मकर्तृक कार्यत्वात् ईश्वर सिद्धि के इस प्रथम अनुमान मे जिस प्रकार के दोष बताये गये हैं उसी प्रकार के दोपो के कारण अग्रिम अनुमानो भी निरस्त हो जाते है। अग्रिम अनुमानो मे दूसरे नये दोष भी है । जसे स्वोपादानगोचर एव स्वजनकाट के अजनककृति से अजन्य समवेत जन्य मे-स्वापादान गोचर एव स्वजनकाटष्ट के अजनक अपरोक्ष ज्ञान चिकीर्षाजन्यत्व का अनुमान दूमग ईश्वरानुमान है । इस अनुमान मे यदि साध्य के शरीर मे स्वपद से द्वयणकादि का ग्रहण किया जायगा तो द्वयणुकादि के उपादान का अपरोक्ष ज्ञानादि सिद्ध न होने से साध्याऽप्रसिद्धि दोष होगा। यदि स्व पद से घटादिका ग्रहण किया जायगा तो पटादि मे कार्यत्व हेतु सन्दिग्ध अनेकान्तिक होगा, क्योकि पटादि मे घटादि के उपादान को विषय करने वाले अपरोक्ष आदि ज्ञान की जन्यता सन्दिग्ध है इस अनुमान मे अप्रयोजकत्व दोष भी है, क्योकि घटादि कार्यों के प्रति कपालादि के अपरोक्षजान को कपालादिगोचरत्व रूप से ही कारणता होती है स्वोपादानगोचरत्व रूप से नहीं। अत: स्वोपादान- गोचरत्व रूप से कारणता न होने से अप्रयोजकत्व दोष का होना अपरिहार्य है , क्योकि यह शडका निर्विवाद रूप से की जा सकती है कि जिन कार्यो मे प्रस्तुत साध्य का अनुमान करना हैं वे कार्य होते हुए भी स्वोपादान गोचरस्वरूप से अपरोक्षज्ञाानादि से जन्य-उसी प्रकार नहीं हो सकते जिस प्रकार घटादि ही स्वोपादान गोचरस्वरूप से अपरोक्ष ज्ञानादि से जन्य नहीं होते-और इस शड्का का कोई परिहार नहीं है। ईश्वर का तीसरा अनुमान यह है कि द्रव्य विशेष्यता सम्बन्ध से ज्ञान, इच्छा और कृति से युक्त है, क्य कि उन मे समवाय सम्बन्ध से कार्य होता है । जैसे कपाल मे समवाय सम्बन्ध से घटरूप कार्य के होने से वह विशेष्यता सम्बन्ध से कुलाल के ज्ञान, इच्छा और कृति से युक्त होता है । इस अनुमान मे साध्य बोधक विभाग मे ज्ञान और इच्छा पद का उपादान निरर्थक है क्योंकि विशेष्यता १ ५८ ] [शा वा ममुञ्चयम्न०३-रलो०१ पञ्चमे तु क्षिन्यादावक कत्वस्यैव व्यवहाराद् वाधः । 'विशेषान्वय व्यतिरेकाभ्यां कत - त्वेन कार्यमामान्य एव हेतुन्वग्रहान्न बाध' इति चेत् ? तर्हि शरीरचेष्टयोरग्यन्वयव्यनिरकाभ्यां कार्यमामान्यहेतुन्यात् तयोपि नित्ययोगीश्वरे नित्ययोगीश्वरे प्रमक्तिः । अथ 'नित्य शरीमियत एव भगवतः । तत्र 'परमाणव एव प्रयत्नवदीश्वगत्मसंयोगाधीनचेष्टावन्त ईश्वरस्य शरीराणि' सम्बन्ध से केवल कृति का अनुमान करने पर भी उसके आश्रयम्प मे ईश्वर को अभिमत मिद्वि हो सकती हैं क्योकि ईश्वर मे सपूर्ण कार्यों के उपादान को विषय फरने वालो कृति के मिद्ध हो जाने पर उसके द्वारा ज्ञान और इच्छा का पृथक् अनुमान हो जाने से सपूर्ण कार्य के कर्ता ईश्वर मे सपूर्ण कार्यों के उपादान का ज्ञान और उनके उपादानो मे चिकीरूिप इच्छा की सिद्धि होकर ईश्वर में सर्वज्ञतादि की सिद्धि हो सकती है । (४) सर्ग के आरम्भ काल मे विद्यमान द्रव्य विशेष्यता सम्बन्ध से ज्ञान- वान है क्योकि उममे समवायसम्बन्ध से काय होता है' यह पक्षतावच्छे मर्ग के आरम्भकाल मे द्रव्य मे ज्ञानस्प साध्य के साधन द्वारा ईश्वर का साधक चौथा अनुमान है । इस अनुमान मे मोनास- कादि की दृष्टि से पक्षाऽसिद्धि दोष है। क्योकि उनके मत मे सगं का आरम्भकाल असिद्ध है। [ पचम अनुमान मे वाध दोष ] 'क्षित्यादि कार्य सकतुं क हैं क्योकि वह कार्य है' यह अनुमान प्रकृत विचार के प्रयोजक विवाद के विषयत्व प से क्षित्यादि को पक्ष रुप मे विषय कर सकत कत्व के साधन द्वारा ईश्वर का साधक पाचवा अनुमान है । इस अनुमान मे बाघ दोप है क्योंकि क्षित्यादि मे लोकव्यवहार से अकर्तृत्व ही सिद्ध है । यदि यह कहा जाय कि-'घटादि विशेष कार्य और फुलालादिविशेष कर्ता के अन्वय-व्यतिरेक से घटादि विशेष कार्य के प्रति कुलालादि विशेप कर्ता कारण है, केवल इतना ही सिद्ध न होकर 'सामान्य रूप से कार्यमात्र के प्रति सामान्य रूप से कर्ता कारण होता है। यह नो सिद्ध होता है । अत इस कार्यकारणभाव के विरोधी क्षित्यादि मे अफर्तृ फत्य के व्यवहार को यथार्थ नहीं माना जाता । इसलिये इस अनुमान मे वाध दोष नहीं हो सकता'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि ऐसा मानने पर घटादि कार्य और कुलाल का शरीर एवं कुलाल की चेष्टा आदि के अन्वय व्यतिरेक से कार्य सामान्य के प्रति मामान्य रूप से शरीर और चेष्टा की भी कारणता सिद्ध होती है और इस कार्यकारणभाव के आधार पर ईश्वर मे नित्य शरीर और नित्य चेप्टा को भी प्रमक्ति हो सकती है । इस सम्बन्ध मे यदि यह कहा जाय कि-मगवान को नित्य शरीर होना इप्ट ही है। इसी लोगो को यह मान्यता है कि परमाणु ही ईश्वर के शरीर हैं क्योकि उनमे ईश्वर के प्रयत्न से चेष्टा उत्पन्न होती है और यह नियम है कि जिस पुरुष के प्रयत्न से जिसमे चेष्टा उत्पन्न होती है वह उस पुरुष का शरीर होता है । यह ज्ञातव्य है कि प्रयत्न समवाय सम्बन्ध से पुरुष मे कि शरीर मे । अत वह समवाय सम्बन्ध से शरीर मे चेष्टा का उत्पादक न होकर स्वाश्रय सयोग सम्बन्ध से चेष्टा का उत्पादक होता है । स्वका अर्थ है प्रयत्न-उसका आश्रय होता है आत्मा और उसका सयोग होता है शरीर मे, अत उस सयोग के द्वारा प्रयत्न को उस शरीर मे चेष्टा को उत्पन्न करने मे कोई बाधा नहीं होती। दूसरे विद्वानो का कहना है-केवल वायु शरीर है क्योकि उनमे ईश्वर प्रयत्न से क्रिया चेष्टा का उदय सदैव होता रहता है । अत एव उन्हें लिये कुछ रहता है न परमाणु हो ईश्वर के स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ५९ . इत्येके । 'वाय परमाणव एव नित्यक्रियावन्तस्तथा, अत एव तेषां सदागतित्वम्' इत्यन्ये । "आकाशशरीरं ब्रह्म' इति श्रुतेः 'आकाशस्तच्छरीरम्' इत्यपरे । चेष्टाया नित्यत्वे तु मानाभावः, नित्यज्ञानमिद्वौ तु श्रुतिरपि पक्षपातिनी "नित्यं विज्ञानं०" इत्यादिकाः, अत एव ज्ञानत्वावच्छे देनाऽऽत्म-मनोयोगजन्यत्वं न वाधकमिति चेत् ? न, ईश्वरसंवन्धस्य सर्वत्राऽविशेषेण 'इदमेव- श्वरशरीरम्' इति नियमाऽयोगात् , चेप्टाया अपि ज्ञानवदेकस्या नित्यायाश्च स्वीकारौचित्यात, उक्तश्रुतेस्त्वदभिमतेश्वरज्ञानाऽपक्षपातित्वाच्च, अन्यथाऽऽनन्दोऽपि तत्र मिध्येत ज्ञाना-ऽऽनन्द- भेदश्चेति दिग् । आयोजनादपि नेश्वरमिद्धिः, ईश्वराधिष्ठानम्य सर्वदा सत्त्वेऽप्यदृष्टविलम्बादेवाऽऽद्या- णुक्रियाविलम्बात् तत्र तद्धेतन्यावश्यकत्वात् । दृष्टकारणमत्त्व एवादृष्टविलम्बेन कार्याविलम्बात् , सदागतिशील भी कहा जाता है। कुछ विद्वानो का यह मत है कि 'आकाश शरीर ब्रह्म'इस श्रृति के अनु सार आकाश ही ईश्वर का शरीर है और वह नित्य है । इस प्रकार विद्वानो की दृष्टि मे ईश्वर का नित्य शरीर सयुक्न होना युक्तिसङ्गत ही है। हा, उसमें नित्य चेष्टा का अभ्युपगम नहीं किया जा सकता है क्योकि चेष्टा की नित्यता मे कोई प्रमाण नहीं है । चेष्टा के समान ज्ञान मे अनित्यता की सिद्धि नहीं बता जा सकती क्योकि ज्ञान को नित्यता 'नित्य विज्ञानमानन्द ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियो से सिद्ध है । इन श्रतियो के कारण ही सपूर्ण ज्ञान में आत्म मनोयोग को जन्यता को बाधक नहीं माना जा सकता, क्योकि सपूर्ण ज्ञान को आत्ममनोयोगजन्य मानने मे ये श्रुतिया हो बाधक है ' तो यह कथन भी ठीक नही है क्योकि ईश्वर के विभु होने से उसका सम्बन्ध सभी द्रव्या मे समान रूप से विद्यमान है अत यह कहना-परमाणु हो अथवा वायु परमाणु ही या आकाश हो ईश्वर का शरीर है-ठीक नहीं हो सकता । इसी प्रकार ज्ञान के समान एक नित्य चेष्टा की कल्पना भी उचित हो सकती है । क्योकि जैसे जीवो मे ज्ञान क अनित्य होने पर मो इश्कर मे लाघव की दृष्टि स एक नित्यज्ञान की कल्पना होती है उसी प्रकार जीवो के अनित्य शरीर मे अनित्य चेष्टा होने पर भी ईश्वर के नित्य शरीर मे एक नित्य चेष्टा मानने में कोई बाधा नहीं हो सकती । चेष्टा और ज्ञान को असमानता बताते हुए ज्ञान को नित्यता मे जो श्रुति प्रमाण रूपमे प्रसिद्ध की गइ है उम से ईश्वर मै नैयायिक के मतानुमार ज्ञान की सिद्धि नहीं हो सकती क्योकि वह श्रुति ईश्वर मे ज्ञान के अभेद का प्रतिपादन करती है न कि ज्ञान को आश्रयता का । यदि उसमे ईश्वर मे ज्ञान की सिद्धि होगी तो उसी से ईश्वर मे आनन्द की भी सिद्धि हो सकती हैं जो नयायिको को मान्य नहीं है। एव उस श्रुति मे ज्ञान और आनन्द शब्द का पृथक् उपादान होने से ज्ञान और आनन्द का भेद भो सिद्ध होगा । जब कि ईश्वर मे ज्ञान से भिन्न आनन्द को सत्ता नैयायिको को मान्य नहीं है । (अदृष्ट से ही आद्यपरमारण क्रिया को उपपत्ति) (६। आयोजन='प्रथम द्वयणुक के आरम्भक सयोरा को उत्पन्न करनेवाले परमाणुकम' से भी ईश्वर कि सिद्धि नहीं हो उसकती, क्योकि क्त फर्म मे प्रयत्नजन्यत्व का अनुमान कर उस प्रयत्न के आश्रयरूप मे ही ईश्वर की सिद्धि की जा सकती है । किन्तु उक्त कर्म मे ईश्वरप्रयत्नजन्यत्व मानना सभव नहीं ६.] [शा. वा. समुच्चय-स्त०३-श्लोक - अदृष्टस्य दृष्टाऽघातकत्वात् , चेष्टावस्याऽनुगतत्वेनोपाधित्वाच्च । तदवच्छिन्न एव हि जीवन- यत्नव्यावृत्तेन प्रवृत्तित्वेन गमनन्यादिव्या'यत्वे तु विलक्षणयत्नत्वेनैव हेतुत्वात् क्रियासामान्ये यत्नत्वेन हेतुत्वे मानाभावात , 'यद्विशेषयोः' इत्यादिन्याये मानाभावात् । है क्योकि उक्त फर्म को उत्पत्ति नियत समय मे ही होती हैं। यदि ईश्वर पयत्न से उमको उत्पत्ति मानी जाय तो उस मे प्रयत्नवान् ईश्वर का सदैव सयोग होने से नियतकाल मे ही उस की उत्पत्ति न होकर पूर्वकाल मे भी उस की उत्पत्ति को आपत्ति होगी । अत अदृष्ट के विलम्ब मे हो परमाणुगत आद्य कर्म की उत्पत्ति मे विलम्ब मानना होगा। और वह तभी हो सकता है कि जब अहष्ट को उस फर्म का कारण माना जाय । और जब अष्ट उस फर्म का कारण होगा तो उसोसे उसको उत्पत्ति सभव हो जाने के कारण उसके प्रति ईश्वर का प्रयत्न कारण न हो सकेगा। यदि यह कहा जाय कि-"अहण्ट के विलम्ब से कार्य का विलम्ब अप्रमाणिक है क्योकि कार्य के इष्टकारणो के उपस्थित होने पर अदृप्ट के विलम्ब से कभी भी कार्य मे विलम्ब नहीं देखा जाता'-तो यह ठोक नहीं है क्योकि जिस कार्य के जो जो दृष्ट कारण प्रमाणपिद्ध होते हैं उन सभी कारणों के रहने पर ही अनट के विलम्ब से कार्य में विलम्ब होना अप्रमाणिक है क्योंकि यदि उस दशा में भी अदृष्ट के विलम्ब से कार्य में विलम्ब होगा तो उस कार्य के प्रति अदृष्ट मात्र को कारण मान लेने से दृष्ट कारणो का विघात हो जायगा । जब कि अदृष्ट से दृष्ट कारणो का विघात किसी को भी मान्य नहीं है । अत जिस काय का कोई ऐसा वृष्टकारण सिद्ध नहीं है कि जिमके विलम्ब से उस कार्य को उत्पत्ति मे विलम्ब हो सके तव भी उस कार्य की उत्पत्ति मै भी यदि विलम्ब होता है तो उसे अदृष्ट के विलम्ब से ही उपपन्न करना होगा । परमाणु के आद्य कर्म का कोई ऐसा दृष्टकारण सिद्ध नहीं हैं कि जिस के विलम्ब से उस की उत्पत्ति में विलम्ब माना जाय । अत अवष्ट के विलम्ब से ही उम को उत्पत्ति मे बिलम्ब मानना होगा, इस प्रकार नियत समयमे कार्योन्मुख होने वाले अहाट से ही नियतकाल मे परमाणु के आद्य कर्म की उत्पत्ति का संभव होने से उसके कारणरूपमे ईश्वरप्रयत्न की सिद्धि नहीं हो सकती। इम के अतिरिक्त प्रस्तुत अनुमान मे चेष्टात्व उपाधि भी है क्योकि यत्नजन्य सभी कर्मों मे चेष्टात्वरूप एक अनुगत धर्म रहता है और कर्मत्वरूप साधन के आश्रयभूत ह्यणुकारम्भक परमाणु के आद्यकम मे नहीं रहता है अत वह कर्मभ्वरूप साधन से अवच्छिन्ना विशिष्ट प्रयत्नजन्यत्वरूप साध्य का व्यापक और कर्मस्वरूप साधन का अव्यापक उपाधि है। प्रस्तुत अनुमान इसलिए भी नहीं हो सकता कि वह क्रियासामान्य और प्रयन्नसामान्य के जिस कार्यकारणभाव को अघोन है उस कार्यकारणभाव मे कोई प्रमाण नहीं है क्योंकि क्रिया को दो वर्गों में बांटा जा सकता है, जैसे जोवनयोनियन जीवनाइष्टकारणक प्रयत्न' से होने वाली प्राण अपानादि की क्रियाएँ और अन्य प्रयत्लो से होनेवाली चेष्टात्मकक्रियाएँ उन मे प्रथमवर्ग की क्रिया के प्रति जीवन-योनि यत्न ही कारण है और द्वितीयवर्ग की क्रिया-चेष्टा के प्रति प्रवृत्ति कारण है । द्वितीयवर्ग की क्रिया को कारणता का अवच्छेदकभूत प्रवृत्तित्व जीवनयोनि से भिन्न सभी यत्नो का धर्म है। अत एवं प्रवृत्ति को द्वितीयवर्ग की समस्त क्रियाओं का कारण मानने पर पलायन आदि क्रियाओं मे उस का व्यभिचार नहीं हो सकता क्योकि पलायनादि क्रियाएं जिस प्रयत्न से होती है वह मी प्रवृत्ति नामक प्रयत्न के अन्तर्गत आ जाता है। यदि द्वितीय वर्ग की क्रियाओं को गमनादि - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ६१ - धृतेरपिं नेश्वरसिद्धिः, गुरुत्ववत्पतनाभावमात्रस्य गुरुत्वेतरहेयभावप्रयुक्तस्याऽऽम्रफला- दावेत्र व्यभिचारित्वात प्रतिवन्धकामावेतरमामग्रीकालीनत्वविशेषणेऽपि वेगवदिपुपत- अनेक व्याप्य क्रियाओ के रूप मे वर्गीकृत किया जाय तो गमनादि रूप तत्तत् क्रियाओ के प्रति विजाती- विजातीय रूप से जोवन योनिभिन्न प्रयत्न कारण होगा, अत क्रिया सामान्य के प्रति प्रयत्नसामान्य को कारणता नहीं सिद्ध होगी। 'जिन कार्यकारणो मे विशेष रूप से कार्यकारणभाव होता है उन मे सामान्यरूप से भी कार्यकारणभाव होता है। इस न्याय मे कोई प्रमाण नहीं होने से इस न्याय के वल से भी किया और प्रयत्न मे सामान्यरूप से कार्यकारणभाव नहीं माना जा सकता है, अत उसके आधार पर प्रस्तुत अनुमान का समर्थन अशक्य है । ( धृति हेतु ईश्वरांसद्धि में अनेकान्तिक) (6) धृति से भी ईश्वर की अनुमानिक सिद्धि नहीं हो सकती क्योकि धृति का अर्थ है गुरुत्व के आश्रयभूत द्रव्य के पतन का अभाव, और उस से ईश्वरानुमान तभी हो सकता है जब इस प्रकार को व्यास्ति बने कि गुरु द्रव्य के पतन का जो हो अभाव होता है वह गुरुत्व से इतर, पतन कारण के अमाव से प्रयुक्त होता है। किन्तु यह व्याप्ति नहीं बन सकती । क्योकि वृक्ष को शाखा मे लगे हुए आम्रफल मे व्यभिचार है। आशय यह है कि आम्रफल गुरुद्रव्य ह । किन्तु जब वह शाखान म लगा हुआ होता है तब उस मे पतन का अभाव होता है पर उसमे गुरुत्व से इतर पतन के किसो हेतु का अभाव नहीं है। यदि यह कहा जाय कि-"शाखाग्र वृन्त के साथ आम्रफल का संयोग ही आम्नफल के पतन का प्रतिवन्धक है-इसलिये गुरुत्व से इतर पतन का कारण हुआ 'वृन्त के साथ नफल के सयोग का अभाव और उसका अभाव हुआ वृन्त के साथ आम्रफल का सयोग, आम्रफल का पतनामाव' उस तयोग से प्रयुक्त है अत आम्नफल मे उक्त व्याप्ति का व्यभिचार बताना असङ्गत है." तो यह कथन ठीक नहीं कहा जा सकता, क्योकि वृन्तके साथ आम्रफल के सयोग को आम्रफल के पतन का प्रतिबन्धक नहीं कहा जा सकता, क्योकि वह यदि प्रतिबन्धक होगा तो उस का अभाव होने पर ही आम्रफल का पतन होना चाहीए किन्तु ऐसा नहीं होता अपितु आम्रफल मै पतनात्य कर्म पहले उत्पन्न होता है । तत्पश्चात् उस कर्म से वृन्त के साथ आन- फल का विभाग होकर वृन्त के साथ आनफल के सयोग का ध्वसात्मक प्रभाव निष्पन्न होता है । साराश, न्यायमतप्रक्रियानुसार पतनकर्म पहले हुआ, व सयोगाभाव बाद मे हुआ । तो पतन में सयोगाभाव कारण कहा बना यदि यह कहा जाय कि-'पाम्रफल मे जो पतनकर्म होगा वह वेगवान् वायु अथवा वेगवान् दण्डादिके अभिधात से उत्पन्न होगा। जिस समय यह अभिघात उपस्थित नहीं है उस समय मे पाम्र- फल का पतनाभाव गुरुत्व से इतर पतन के कारणभूत उस अभिघात के प्रभाव से ही प्रयुक्त होगा। प्रतः पाम्रफल के पतनामाव मे गुरुत्वेतर पतनकारण के प्रभाव का प्रयुक्तत्व होने के कारण प्राम्रफल मे व्यभिचार का प्रदर्शन फिर भी प्रसङ्गत है'-तो यह कथन भी ठीक नहीं है क्योकि उक्त अभिघात पतन का कारण नहीं, किन्तु सामान्य कर्म का कारण है, क्योकि वेगवान वायु या दण्डादि के अमि- घात से भूतल मे एक स्थान मे स्थित गुरुद्रव्य का स्थानान्तर मे अपसर्पण भी होता है, जिसे पतन नहीं कहा जा सकता। प्रत. उक्त अभिघात से पाम्रफल मे जो सामान्य कर्म उत्पन्न होता है वह माम्रफल .

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स्या० फ० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ६३ 'निरालम्बा निगधारा विश्वाधारा वसुन्धरा । यच्चावतिष्ठते तत्र धर्मादन्यद् न कारणम् ॥" युक्तं चैतत् , ईश्वरप्रयत्नस्य व्यापकत्वेन ममरेऽपि शरपाताऽनापत्तेः । पतनाभावाव- च्छिन्नेश्वरप्रयत्नस्य तथात्वे तादृशज्ञानेच्छाभ्यां विनिगमनाविरहात् क्लुप्तजातीयस्याऽ. दृष्टस्यैव ब्रह्माण्डधारकत्वकल्पनौचित्यात् । न चात्माऽविभुत्ववादिनः संवन्धानुपपत्तिः, अमवस्यापि तत्कार्यजननशक्तस्य तत्कार्यकारित्वात् , अयस्कान्तस्याऽयंबद्धस्यापि लोहाऽऽ- कर्पकत्वदर्शनादिति, अन्यत्र विस्तरः । प्रयत्नस्य तु विलक्षणप्रयत्नत्वेन पतनप्रतिबन्धकस्यो- गविशेप एव हेतुत्वम् । पतनकारणाभावप्रयुक्तत्व का अनुमान करके भी ईश्वर की सिद्धि नहीं की जा सकती क्योकि ब्रह्माण्ड की धृति मे भो अष्टप्रयुक्तत्व होने से उस मे अण्टाऽप्रयुक्तत्व विशेषणविशिष्ट उक्त धृतित्वरूपहेतु स्वरूपाऽसिद्ध हो जाता है । इसीलिये श्रीहेमचन्द्रसूरिने कहा है कि- विश्व को आधारभूत पृथ्वी विना किसी पालम्बन और श्राधार किसी एक निश्चित स्थान मे स्थिर रहती है, वहा से उसका पतन नही होता उस मे धर्म से अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है । इस प्रकार ब्रह्माण्ड धृति के धर्म रूप अटष्ट से प्रयुक्त होने के कारण उसमे अष्टाऽप्रयुक्तत्वविशिष्ट उक्त धृतिन्वरूप हेतु को स्वरूपाऽसिद्धि निविवाद है । यही युक्तिसड्गत भी है, क्योकि यदि ईश्वर प्रयत्न को ब्रह्माण्ड पतन का प्रतिवन्धक माना जायगा तो व्यापक होने के कारण वह सङ्ग्रामभूमि मे भी रहेगा । अत उस भूमि मे सैनिको द्वारा प्रक्षिप्त वाणो का पतन भी न हो सकेगा क्योकि ईश्वर का जो प्रयत्न ब्रह्माण्ड के पतन को रोक सकता है वह सामान्य बारग के पतन को क्यो न रोक सकेगा ? यदि यह कहा जाय कि-'प्रतियोगिव्यधिकरण पतनाभाव विशिष्ट ईश्वर प्रयत्न ही पतन का प्रतिबन्धक है । अतः ईश्वरप्रयत्न से वाण के पतन का प्रतिबन्धक नहीं हो सकता। क्योकि वाण मे प्रतियोगिव्यधिकरणपतनाभाव नहीं रहता । ब्रह्माण्ड का कभी भी पतन न होने से उस मे प्रतियोगिव्यधिकरणपतनाभाव रहता है। अत एव ब्रह्माण्ड मे प्रतियोगीव्यधिकरणपतनाभाव विशिष्ट ईश्वर प्रयत्न के रहने से वह ब्रह्माण्ड के पतन का प्रतिवन्धक हो सकता है'-तो यह ठीक नहीं है। क्योकि प्रतियोगिव्यधिकरणपतनाभावविशिष्ट प्रयत्न ही ब्रह्माण्ड के पतन का प्रतिबन्धक हो उस मे कोई विनिगमना न होने से प्रतियोगिव्यधिकरणपतनामावविशिष्ट ज्ञान और इच्छा को भी प्रतिबन्धक मानना आवश्यक होगा। इसलिये ज्ञान, इच्छा प्रयत्न ये तीन को ब्रह्माण्ड के पतन का प्रतिबन्धक मानने की अपेक्षा अदष्ट को ही ब्रह्माण्ड के पतन का प्रतिवन्धक मानना उचित है, क्योकि श्रदृष्ट मे जीवित शरीर के पतन की प्रतिबन्धकता सिद्ध है। अतः एव अन्ष्ट मे पतनप्रतिबन्धकतात्व की कल्पना अपूर्व नहीं है । यदि यह कहा जाय कि-'अगष्ट ब्रह्माण्ड का धारक नहीं हो सकता क्योकि अष्ट जीवात्मा मे रहता है। अत: जिस मत मे जीवात्मा विभु नहीं होता उस मत मे जीवात्मा मे रहनेव ले अन्ष्ट का सम्बन्ध ब्रह्माण्ड के साथ नहीं हो सकता और जब ब्रह्माण्ड से अदष्ट का सम्बन्ध नहीं बन सकता तब उसे ब्रह्माण्ड का धारक कैसे माना जा सकता?' तो यह ठीक नहीं है क्योकि जो जिस कार्य को उत्पन्न करने में समर्थ होता है वह उस कार्य के उत्पत्ति देश से असम्बद्ध होने पर भी - ६५ ] [ शा वा. समुच्चय स्त०३-श्लो०६ ब्रह्माण्डनाशकतयापि नेश्वरमिद्धिः, प्रलयाऽनभ्युपगमात , अहोगत्रस्याऽहोरात्रपूर्व- कन्वव्याप्यत्वात् । न च वर्षादिनत्वेनाऽव्यवहितवर्षादिनपूर्वकत्वे माध्ये राशिविशेपावच्छिन्नर- विपूर्वकत्ववदत्राऽव्यवहितमंमारपूर्वकत्वमुपाधिः, गशिविशेपे वर्षादिनम्य हेतुत्वेन तत्रानुकूलत- केणोपायः साध्यव्यापकत्वग्रहेऽप्यनुकूलतर्काभावेन प्रकृत उपाधेग्ममर्थत्वात्, कालत्वस्य भोग्यव्याप्यत्वाच्च । कर्मणां विपमविपाकतया युगपद् निरोधाऽमंभवात् , सुपुप्तौ कतिपयाऽदृष्ट- निरोधस्य दर्शनावरणरूपाऽदृष्टमामदिवोपपत्तलवताऽदृष्टान्तरप्रतिरोधदर्शनात् , प्रलये तु क्थं तादृशादृष्टं विनाऽदृष्टनिरोधः स्यात् ? अन्यथा त्वनायामसिद्धो मोक्षः इति किं ब्रह्मचर्यादिक्ले- शानुभवेन ? इत्यन्यत्र विस्तर । उस कार्य को उत्पन्न करता है । जैसे लोहखण्ड से असम्बद्ध जी अयस्कान्तमणि (लोहचुम्बक) लोहखण्ड में प्राकर्षग उत्पन्न करता है । अत. कार्य के उत्पत्ति देश से सम्बद्ध हो कारण कार्य का उत्पादक होता है इस नियम के सार्वत्रिक न होने के कारण ब्रह्माण्ड से असम्बद्ध भी जीव का अष्ट ब्रह्माण्ड का घारक हो सकता है। इस विषय का विस्तृत विचार ग्रन्थान्तर मे इप्टव्य है । यह भी ज्ञातव्य है कि प्रयत्न कहीं भी स्वय पतन का प्रतिबन्धक नहीं बनता। किन्तु विलक्षण प्रयत्न के रूप मे पतन के प्रतिबन्धक सयोग विशेष को ही उत्पन्न करता है । पतन का प्रतिवन्ध तो उस सयोग से ही होता है। जैसे आकाश में उडते हुए पक्षी के शरीर के पतन का प्रतिवन्ध पक्षी शरीर के साथ पसोको प्रात्मा के सपोग से होता है और वह सयोग पक्षी के प्रयत्न से उत्पन्न होता है । सभी प्रयत्न पनन के प्रतिबन्धक सोग को नहीं उत्पन्न करते किन्तु विलक्षण प्रयत्न हो उत्पन्न करता है। अन्यथा जीवित प्राणी का वृक्ष भवन पर्वन आदि से कमी भी पतन न होता। ईश्वर का प्रयत्न एक ही होता है । अतः उस मे वैजात्य को कल्पना नहीं हो सकती । श्रत एव उस से पतन के प्रतिबन्धक सयोग को उत्पत्ति समव नहीं हो सकती। इसलिये ईश्वरप्रयत्न को ब्रह्माण्ड का धारक मानना न्यायसङ्गत नहीं हो सकता। [प्रलय के अस्वीकार से इश्वरसिद्धि निरसन] ब्रह्माप्ड-नाशक के रूप मे मो ईश्वर को आनुमानिक मिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि ब्रह्माण्ड का नाश प्रलय को म न्यता पर निर्भर है और प्रलय अप्रामाणिक होने से असिद्ध है। अत: आश्रयासिद्धि दोष के कारण ब्रह्माण्डनाश को पक्ष बनाकर कोई अनुमान नहीं दिया जा सकता । यदि यह कहा जाय कि-'ब्रह्माण्ड का नाश अनुमान से सिद्ध है । जैसे 'ब्रह्माण्ड नश्वरन् । नाशप्रतियोगी) जन्यमाव- त्वात् घटादिवत्।' यह अनुमान ब्रह्माण्डनाश मे प्रमाण है। अत ब्रह्माण्डनाशपक्षक अनुमान में प्राश्रया- ऽसिद्धि नहीं हो सकतो"-तो यह ठीक नहीं है क्योकि ब्रह्माण्ड मे नाशप्रतियोगीरव के उक्त अनुमान का बाधक अनुमान विद्यमान है जैसे विवादास्पद अहोरात्र अव्यवहित अहोरात्र पूर्वक है । क्योकि जो भी अहोरात्र होता है वह सब अहोरात्रपूर्वक होता है । यदि ब्रह्माण्ड का नाश माना जायगा तो अग्रिम ब्रह्माण्डमे होनेवाले प्रथम अहोरात्र मे अव्यवहित अहोरात्र पूर्वकत्व न होने से सभी अहोरात्र अहोरात्रपूर्वक होते है इस व्याप्ति का मन हो जायगा । अतः किसी भी अहोरात्र को प्रथम - स्या० क० टी-हिन्दीविवेचना ] [६५ अहोरात्र नहीं माना जा सकता। और यह तभी हो सकता है जव अहारात्र की परपरा अविच्छिन बनी रहे और वह तभी बनी रहती है जब ब्रह्माण्ड का नाश न हो । अत. इस अनुमान से ब्रह्माण्ड के नाश का अनुमान बाधित हो जाता है । इसलिए आश्रयाऽसिद्धि के कारण ब्रह्माण्डनाशपक्षक अनुमान का होना सर्वथा असभव है। [ अव्यवहितसंसारपूर्वकत्व उपाधिको शंका ] यदि यह कहा जाय कि-जैसे वर्षादिनत्व हेतु से प्रथम कहे जाने वाले वर्षादिन मे अन्य- वहित वर्षादिन पूर्वकत्व का साधन करने पर राशिविशेष मे रविपूर्वकत्व'रूप उपाधि होने से वर्षा- दिनत्व मे अव्यवहितवर्षादिनपूर्वकत्व की व्याप्ति नहीं होती। उसी प्रकार अहोरात्रत्व हेतु से प्रथम कहे जाने वाले अहोरात्र मे व्यवहितग्रहोरात्रपूर्वकत्व का साधन करने पर भी अव्यवहितससारपूर्वक स्वरूप उपाधि होने से अहोरात्रत्व मे अव्यवहितअहोरात्रपूर्वकत्व की व्याप्ति नहीं हो सकती। प्राशय यह है कि राशिविशेष (सभवतः सिंहराशि) से सूर्य के सम्बन्ध के साथ वर्षादिन का प्रारम्भ होता है। अत एव प्रथम वर्षादिन के पूर्व रवि राशिविशेष से सम्बद्ध नहीं होता । अतः राशिविशेषावछिन्न रविपूर्वकत्व प्राद्यवर्षादिन मे वर्षादिनत्वरूप साधन का अव्यापक होता हे और द्वितीय-तृतीयादि वर्षादिन मे अव्यवहित वर्षादिनपूर्वकत्व तथा राशिविशेषावच्छिन्नपूर्वकत्व दोनो के रहने से राशि- विशेषावच्छिन्नपूर्वकत्व अव्यवहितवर्षादिनपूर्वकत्वरूप साध्य का व्यापक होता है । इसलिए वर्षा- दिनत्व मे अव्यवहितवर्षादिनपूर्वकत्व की व्याप्ति नहीं होती क्योकि वर्षादिनत्व अव्यवहितवर्षादिन- पूर्वकत्व के व्यापक राशिविशेषावच्छिन्नरविपूर्वकत्व का व्यभिचारी होने से अव्यवहितवर्षादिनपूर्वक- त्व का भी व्यभिचारी हो जाता है क्योकि व्यापक का व्यभिचार व्याप्य व्यभिचार से नियत होता है। इसी प्रकार जिन अहोरात्रो मे अव्यवहित अहोरात्र पूर्वकत्व सर्वसम्मत है उनमे अव्यवहितससार पूर्वकत्व है क्योकि उन अहोरात्रो के पूर्व अहोरात्र विद्यमान है और अहोरात्र ससार रहने पर ही होता है । अतः उन अहोरात्रो मे अव्यवहितससारपूर्वकत्व का होना अनिवार्य है अत. अव्यवहितससार- पूर्वकत्व अव्यवहित अहोरात्रपूर्वकत्व रूप साध्य का व्यापक होता है । अहोरात्रत्वरूप साधन अभिनव ब्रह्माण्ड के आद्य अहोरात्र मे भी है किन्तु उसके पूर्व ससार न होने से उसमे अव्यवहित संसारपूर्वकत्व नहीं है, अत एव अव्यवहितससारपूर्वकत्व अहोरात्रत्वरूप साधन का अव्यापक है । इसलिए अव्य- वहितग्रहोरात्रपूर्वकत्व के व्यापक अव्यवहितससारपूर्वकत्व का व्यभिचारी हो जाने के कारण अहो- रात्रत्वरूप साधन अव्यवहितअहोरात्रपूर्वकत्वरूप साध्य का व्यभिचारी हो जायगा । अतः अहोरात्र त्वहेतु से समस्त ग्रहोरात्र मे अव्यवहितअहोरात्रपूर्वकत्व का अनुमान करके प्रलय का खण्डन नहीं किया जा सकता। [ उपाधिको शका तर्क शून्य है ] किन्तु यह कथन भी ठीक नहीं है, राशि विशेष वर्षादिन का कारण होता है । अतः एव राशिविशेष के साथ सूर्य का सम्बन्ध और वर्षादिन की एक साथ प्रवृत्ति होती है। इसलिये अग्रिम वर्षादिन राशिविशेषावच्छिन्नरविपूर्वक हो जाता है। यदि किसी अव्यवहितवर्षादिनपूर्वक वर्षादिन को राशिविशेषावछिन्नरविपूर्वक न माना जायगा तो उस वर्षा दिन के अव्यवहित पूर्ववर्ती वर्षादिन राशिविशेष से अवच्छिन्न नहीं है यह मानना होगा और यह तब होगा जब उस वर्षादिन के पूर्व राशि. विष का प्रवेश न हो। और ऐसा मानने पर वर्षादिन के प्रति राशिविशेष की कारणता का भङ्ग

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म्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [६७ " . एतेन 'आद्यव्यवहारादीश्वरसिद्धिः, प्रतिसगं मन्त्रादीनां बहूनां व्यवहारप्रवर्तकानां कल्पने गौग्वादकस्यैव भगवतः सिद्धेः'इत्यपास्तम् , मर्गादेरेवाऽसिद्धेः, इदानीमिव सर्वदा पूर्वपूर्वव्यवहारेणैवोत्तरोत्तरव्यवहारोपपत्तेः । यदि तु सर्गादिरुपेयते, तदा तदानी प्रयोज्यप्रयो- जकवृद्धयोरभावात् कथं व्यवहारः ? मान लिया जायगा तो जीवमात्र को अनायास ही मोक्ष मील जायगा। फिर ब्रह्मचर्यादि पालन का कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं पडेगी। फलतः मोक्ष की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्यादि का उपदेश शास्त्रो में किया गया है वह निरर्थक हो जायगा। इस विषय का विस्तृत विचार ग्रन्थान्तर में दृष्टव्य है। [ सर्गादि की प्रसिद्वि से श्राद्य व्यवहारादिकथन को व्यर्थता ] घटपटादि अर्थो मे घटपट आदि शब्दो के प्रयोगरूप व्यवहार के प्रथमप्रवर्तक रूप में भी ईश्वर की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योकि 'भिन्नभिन्न सृष्टि में मनुप्रादि अनेक पुरषो को व्यवहार का प्रवर्तक मानने में गौरव होगा और सभी सृष्टि मे एकमात्र ईश्वर को ही प्रवर्तक मानने मे लाघव होगा' इस प्रकार ईश्वर की कल्पना का पापातत. औचित्य प्रतीत होने पर भी वास्तव दृष्टि से उक्तरीति से ईश्वर को कल्पना उचित नहीं हो सकती, क्योकि सृष्टि का प्रारम्भ ही किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं होता । अपितु यहो कल्पना उचित प्रतीत होती है कि जैसे इस समय के व्यवहार अपने पूर्व व्यवहारो से ही सम्पन्न होते है उसी प्रकार सपूर्ण समय के व्यवहार अपने पूर्व व्यवहारो से हो सम्पन्न होते हैं। और ऐसा मानने पर कोई प्राद्य व्यवहार सिद्ध न होने से व्यवहार के प्राद्य प्रवर्तक को कल्पना की समावना ही समाप्त हो जायगी। [ सर्ग के प्रारम्भ मे व्यवहार को प्रसिद्धि ] इस सदर्भ मे यह भी विचारणीय है कि यदि सृष्टि का प्रारम्भ माना जायेगा तो उस समय प्रयोज्य और प्रयोजक वृद्ध के न होने से व्यवहार कैसे प्रवर्तित हो सकेगा? कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टिकाल मे व्यवहार का प्रवर्तन प्रयोज्य और प्रयोजकवयस्थ पुरुषो द्वारा होता है, जैसे-जव कोई वयस्थ व्यक्ति किसी बालक को व्यवहार की शिक्षा देना चाहता है तब वह उस बालक को पास में बिठाकर अपने किसी कनिष्ठ वयस्थ व्यक्ति को प्रादेश देता है कि 'घडा ले पापो या घडा ले जाओ। कनिष्ठ वयस्थ व्यक्ति जिसे प्रयोज्य वृद्ध कहा जाता है, उस आदेश वाक्य को सुनकर घट को ले आता है या ले जाता है। पास मे बैठा हुआ वालक प्रयोज्यवृद्ध के घट मानयन को देखकर उसके कारणरूप मे प्रयोज्यवृद्ध के घटानयन मे कत्तव्यता के ज्ञान का अनुमान करता है और फिर उस वाक्य मे उस ज्ञान की कारणता का अनुमान करता है । उस के बाद ज्येष्ठ वयस्थ व्यक्ति जिसे प्रयोजकवृद्ध कहा जाता है यह आदेश देता है कि 'घट नय पटमानय' और प्रयोज्य वृद्ध घट को हठा कर पट का आनयन करता है तब बालक यह अनुमान करता है कि 'घटमानय' इस वाक्य के भीतर जो घट शब्द है वही घट ज्ञान का जनक है क्योंकि आनय' शब्द के साथ जब घट शब्द था तब प्रयो- ज्य वृद्ध को घटानयन मे क्तव्यता का ज्ञान हुआ और जब 'आनय' शब्द के साथ घट शब्द नहीं था किन्तु पट शब्द था तव घटानयन मे कर्तव्यता का ज्ञान नहीं हुमा । इस प्रकार वह घटशब्द के आवाप अर्थात् मानय शब्द के साथ उस का प्रयोग और घटशब्द के उद्वाप अर्थात् आनय शब्द के साथ उस ६८ ] [ शा- या० समुच्चयत -ग्लो० ९ . . अथ ' यथा मायावी मूत्रसंचागधिष्ठितदारपत्रक 'घटमानय' इत्यादि नियोज्य घटाऽऽनयन संपाद्य बालकम्य व्युत्पत्ती प्रयोजकः, तथेश्वरोऽपि प्रयोज्य-प्रयोजकद्वीभ्य व्यवहारं कृत्वाऽऽद्यव्युत्पत्ति कारयति । न चाऽत्र चेष्टया प्रवृत्तिम् , तया ज्ञानम् , तज्ज्ञाने उपस्थितवाक्यहेतुन्यम् , तज्ज्ञानविषयपदार्थ चाऽऽवापोद्वापाभ्यां तत्तत्पदज्ञानहेतुत्वमनुमाय तत्तत्पदे तत्तदर्थज्ञानानुकूलत्वेन तत्तदर्थमंबन्धयत्वमनुमेयम् , एवं चाऽयं संबन्धग्रहो भ्रमः स्याव , जनकनानम्य भ्रमत्वात् इति वाच्यम् , तऽपि विपयाऽबाधेन प्रमात्वात , चरम. पगमर्शम्य प्रमात्वमभवाच्च । एवमीश्वर एव कुलालादिशगैरं परिगृह्य घटादिसंप्रदायप्रवर्तकः । अत एव श्रुतिः (नमः) कुलालेभ्यो नमः कारभ्यः' इत्यादीति" चेत् ? के अप्रयोग से बालक यह अनुमान करता है कि घट शब्द घट का बोधक है और उस के बाद 'घट शब्द से ही घट का वीव होता है, पट शब्द से क्यो नहीं होता' ? ऐमा विचार करते हुए यह अनुमान करता है कि घटशब्द घटस्प अथ से सम्बद्ध है और पटशन्द घटस्प अर्य से सम्बद्ध नहीं है । इस निश्चय के अनन्तर वालक कालान्तर में स्वयं घट का बोध कराने के लिये स्वय घट शब्द का व्य- वहार करने लगता है और अन्य द्वारा घट शब्द का व्यवहार होने पर स्वय घट का ज्ञान प्राप्त फरने लगता है । इस प्रकार प्रयोज्य और प्रयोजक वृद्धो के द्वारा व्यवहार का प्रवर्तन होता है किन्तु यदि सृष्टि का आरम्भ माना जायेगा तो उस समय प्रयोज्य और प्रयोजक दृद्ध न होने से शब्द व्यवहार का प्रवर्तन नहीं हो मरेगा। [ मायाजालिक के समान ईश्वर को शिक्षा-पूर्वपक्ष ] यदि यह कहा जाय-क जमे मायावी पुरुष जब अकेला होता है उसके नाथ कोई कनिष्ठ वयत्य व्यक्ति नहीं होता और वह कोई किमी बालक को व्यवहार सिखाना चाहता है तव व्ह कनिष्ठदय- स्व के म्यान मे एक लकडी का मनुष्य बना लेता है और उसको सूत मे इस प्रकार बाघ लेता है कि वह उन सूत्र के द्वारा गतिगोल हो सके और तव वह 'घटमानय' इस शब्द का प्रयोग करके सूत्र के सचालन से उनकाप्ठ निमित्त पुत्प के द्वारा घटानयन का संपादन कर बालक को घट गन्द के व्यव- हार की शिक्षा देता है । तो जैसे मायावो काप्ठ से बने हुए मनुष्य को प्रयोज्य वृद्ध के स्थान मे रखकर व्यवहार की शिक्षा देता है, उसी प्रकार ईश्वर प्रयोज्य और प्रयोजकशरीरो की रचना कर प्रयोजक शरीर के द्वारा 'घटमानय' इस शब्द का प्रयोग कर और प्रयोज्य शरीर द्वारा घटानयन का सपादन कर सृष्टि के प्रारभ काल के मनुष्य को व्यवहार की शिक्षा दे सकता है। इस सन्दर्भ मे यह शडका हो कि-'उक्त क्रम से व्यवहार शिक्षा की जो पद्धति है उस के अनु- सार चेप्टा से प्रवृत्ति का और प्रवृत्ति से कर्तव्यताज्ञान का और ज्ञान के प्रति उपस्थित वाक्य मे कारणता का और उस ज्ञान के विषयभूत तत्तद् पदार्थज्ञान के प्रति यावाप और उद्वाप अर्थात् क्रिया- पद के साथ तत्तद् पद का प्रयोग और अप्रयोग से तत्तद् पद मे तत्तद् पदार्थ के सम्बन्ध का अनुमान किया जा सकता है। किन्तु इस स्थिति मे सृष्टि के प्रारम्भ मे प्रयोज्य और प्रयोजक शरीर का निर्माण कर उसके द्वारा ईश्वर को व्यवहार का प्रवर्तक मानने पर तत्तद् पदार्थ के सम्बन्ध का उक्तानुमान भ्रम होगा।

स्या० का टीका-हिन्दीविवेचना ] [६६ यदि कहा जाए न, अदृष्टाऽभावेन प्रयोज्यादिशरीरपरिग्रहस्यैव भगवतोऽयुक्तत्वाद् , अन्यादृष्टेनाऽन्यस्य शरीरपग्ग्रिहे चैत्राऽदृष्टाऽऽकृष्टं शरीरं मैत्रोऽपि परिगृणीयात् । 'प्राण्यदृप्टेन घटादिवत् तत्तच्छ- रीरोत्पत्तिः, तत्परिग्रहस्तु भगवतस्तदावेश एवेति न दोष' इति चेत् ? न, घटादावतथात्वे- ऽपि तदीयेशगैरे तदीयाऽदृष्टत्वेनैव हेतृत्वात . अन्यथाऽतिप्रमङ्गात् । क्योकि उस अनुमान के कारणदग मे प्रविष्ट होने वाली प्रवृत्ति से ज्ञान का अनुमान और उस ज्ञान के प्रति उपस्थित वाक्य मे कारणता का अनुमान प्रादि भ्रम है, क्योकि सृष्टि के प्रारम्भ मे प्रयोज्य प्रयोजक शरीर का प्रयत्न और ज्ञान नित्य होता है । अतः उन मे कारण की अपेक्षा न होने से उन. के कारणानुमान का भ्रम होना अनिवार्य है । और जब कारणभूत ज्ञान भ्रम है तब उसके कार्यभूत उक्तानुमान भ्रम होना स्वाभाविक हे और जब तत्तद् पद मे तत्तद् पदार्थ के सम्बन्ध का अनुमान भ्रम ह गा तब उससे ततद् पद में तत्तद पदार्थ के सम्बन्ध की सिद्धि नहीं हो सकती क्योकि भ्रम विषय का व्यभिचारी होता है । अत भ्रम से पदार्थ की सिद्धि नहीं होती।'-तो इसके उत्तर मे, कि- -यह शङ्का उचित नहीं क्योकि किसी ज्ञान का भ्रमात्मक होना उसके कारण गत दोष पर ही निर्भर नही है किन्तु ज्ञान जिस विषय को ग्रहण करता है उस विषय के वध पर निर्भर है इसीलिये वह्नि म घूमव्याप्ति का भ्रम होने पर वह्नि से यदि महानस में घूम की अनुमिति होती है तो वह अपने कारण उक्त व्याप्तिज्ञान के भ्रमरूप होने पर भी स्वय भ्रमरूप नही होती क्योकि महानस में वूम का बाध नही होता है, अत सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर के प्रयोज्य- प्रयोजक शरीर द्वारा उस काल के मनुष्य को जो तत्तद् पद में तत्तद् पदार्थ के सम्बन्ध की अनुमिति होगी वह भी भ्रम नहीं हो सकतो क्योकि तत्तद् पदमे तत्तद् पदार्थ का सम्बन्ध होने के कारण उस का बाध नहीं है । और दूसरी बात यह है कि अनुमिति का अन्तिम कारण तो पक्षमें साध्य व्याप्य हेतु का परामर्श' होता है जिसे चरम परामर्श कहा जाता है । प्रकृतस्थल में वह परामर्श तत्तद् पद में तत्तद् पदार्थ सम्बन्ध व्याप्यत्वरूप से तत्तद्पदार्थज्ञानानुकूलस्वरूपहेतु का निश्चयरूप है और वह निश्चय सर्वांश में प्रमात्मक ही है अत उक्तानुमिति का जो प्रधान एव अन्तिम कारण है उसके भ्रमरूप न होने से कारण दोष द्वारा ही तत्तद् पद में तत्तद् पदार्थ सम्बन्ध को अनुमिति को भ्रमात्मक नहीं कहा जा सकता । प्रत उस अनुमिति से तत्तद् पद में तत्तद् पदार्थ के सम्बन्ध की सिद्धि में कोई बाधा नहीं हो सकती, इसी प्रकार ईश्वर कुलालादि शरीर को धारणकर घटपटादि का प्रथम निर्माण कर के घटष्टादि के निर्माण की परपरारूप लप्रदाय का प्रवर्तक होता है । इसीलिये श्रुति में कुलाल शब्द से उस का अभिवादन किया है तो जैसे 'नमः कुलालेभ्य नम रिभ्यः' इत्यादि । [ ईश्वर के शरीर ग्रहण का असभव-उत्तरपक्ष ] सृष्टि के प्रारम्भ में ईश्वर द्वारा व्यवहार प्रवर्तित किये जाने का यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योकि ईश्वर मे अदृष्ट नहीं होता। अत एव उसके द्वारा प्रयोज्य और प्रयोजक के शरीर का ग्रहण भी युक्ति सङ्गत नही हो सकता क्योकि शरीर का ग्रहण अपने ही अदृष्ट से होता है। यदि अन्य के अदृष्ट से भी शरीर ग्रहण की स्वीकृति की जायगी तो चैत्र के अदृप्ट से निर्मित होने वाला शरीर मैत्र द्वारा भी गृहीत हो सकेगा और उस शरीर से मैत्र को भी सुखदुखादि भोग की प्रसक्ति होगी। जब कि यह बात कथमपि मान्य नहीं हो सकती। क्योकि ऐसा मानने पर तो मुक्त को भी शरीर ग्रहण का प्रसङ्ग हो सकता है। - ७.1 [गा. या.ममुच्चय स्त.-३ श्लोक- - किन, कोऽयमावेशः ? तदवच्छिन्नप्रयत्न एवेति चेत् १ न, तदजन्यम्य प्रयत्नम्य तदनवच्छिन्नन्वात् । अथैव भृताऽऽवेशानुपपत्तिः, तर हि भूनात्मन्येव चत्राद्यवन्छेदेन प्रवृत्तिग्गीक्रियते, अन्यथा मृतशगैरे नदावेशानापत्तैरिति चेत् १ इयमपि तवानुपपत्तिः, यदि यह कहा जाय कि-'शरीरग्रहण का प्रयं है शरीर के साथ मोग प्रयोजक सम्बन्ध को प्राप्ति । किन्तु इस प्रकार का शरीरग्रहण ईश्वर मे नहीं होता । अपितु जमे प्राणियों के अन्प्ट मे घटपटादि की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार प्राणियों के प्रप्ट मे ही मृष्टि के प्रारम्न मे तत्तत् सम्प्र- दाय के प्रवर्तनाथ विभिन्न शरीरो को भी उत्पत्ति होती है जिनके साथ ईश्वर का नोगप्रयोजक सम्बन्ध नहीं होता अपितु उन मे ईश्वर का प्रावेश होता है और उम प्रावेश मे ही उन गैरो मे चेष्टा होकर उनके द्वारा तत्तत् सम्प्रदाय का प्रवर्तन होता है । अतः मष्टि के प्रारम्भ मे उत्पन होने वाले शरीरों का ईश्वर द्वारा इस प्रकार का प्रण सभव होने मे उक्नदोष को प्रस क्त नहीं हो सानो'- तो यह कयन भी ठीक नहीं है । क्योकि घटादि पदार्यों और शरीगे मे वैषम्य होता है। घटादि पदार्थ किमी भी व्यक्ति के भोग के प्रायतन नहीं होते फिन्तु मोग के दूरस्थ माधन होते है । प्रत उन की उत्पत्ति प्राणियो के प्रष्ट से हो सकती है, उम को उत्पत्ति मे फिमो प्राणीविशेष के ही दृष्ट को अपेक्षा नहीं होती, जव कि शरीर भोग का प्रायतन होता है इसीलिये भिन्न मित्र प्राणी को पृथक पृथक शरीर की प्रावश्यकता होती है। जो शरीर जिस प्राणि विशेष के प्रप्ट से उत्पन्न होता है उस शरीर मे उसी प्राणी को मोग होता है, इसीलिये कोई भी शरीर किसी प्राणि विशेष के भोग का प्रायतन होने के लिये ही उत्पन्न होता है और इनीलिये तत्पुरुषीय शरीर में तत्पुरुपीय अन्प्ट को कारण माना जाता है । ऐमा न मानने पर शरीर सभी प्राणियो के मोग का प्रायतन हो सकने के कारण अव्यवस्था हो सकती है, अतः यह कल्पना उचित नहीं हैं कि-'सृष्टि के प्रारम्न मे तत्तद् सम्प्रदाय का प्रवर्तन करने के लिये प्राणियो के अदष्ट से कुछ शरीरो की उत्पत्ति होती है जो भोग का प्रायतन नहीं होते किन्तु तत्तत् सम्प्रदाय के प्रवर्तन मे ईश्वर के सहायकमात्र होते है। और ईश्वर उन शरीरो मे आविष्ट होकर उनके द्वारा तत्तद् सम्प्रदाय का प्रवर्तन करता है।' [आवेश' पदार्थ को समीक्षा) इस सन्दर्भ में यह भी विचारणीय है कि मृष्टि के प्रारम्भ मे प्राणियों मे प्रष्ट से उत्पन्न होनेवाले कतिपय शरीरो मे ईश्वर का जो भावेश होता है उस का क्या अर्थ है | यदि कहा जाय कि तत्तद् शरीर मे प्राविष्ट होने का अर्थ है तत्तद् शरीरावच्छेदेन प्रयत्नशील होना' तो इस प्रकार का प्रावेश ईश्वर में नहीं हो सकता क्योकि ईश्वर का प्रयत्न उन शरीरो से जन्य न होने के कारण उन शरीरो से अवच्छेद्य नहीं हो सकता। क्योकि यह नियम है कि जो प्रयत्न जिस शरीर से उत्पन्न होता है वह प्रयत्न उसी से अवच्छेद्य होता है । और कोई भी प्रयत्न उसी शरीर से उत्पन्न होता है जो शरीर उस प्रयत्न के प्राश्रयभूत प्रात्मा के अदृष्ट से उत्पन्न होता है । इसीलिये शरीरावच्छेदेन मैत्र-प्रयत्न की उत्पत्ति नहीं होती। यदि यह शड्का की जाय कि "इसप्रकार ईश्वरावेश की अनुत्पत्ति बताने पर प्राणियो के विभिन्न शरीरो मे भूतावेश (पिशाचावेश) को भी उपपत्ति न हो सकेगी, क्योकि वे शरीर भूतात्मा के प्रष्ट से नहीं उत्पन्न होते किन्तु चैत्रादि अन्य प्राणियों के प्रप्ट से ही उत्पन्न होते है। अतः उक्त स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचन ] [ ७१ अस्माकं तु नत्र सकोच-विकासस्वभावभूतात्मप्रदेशानुप्रवेशादुपपत्तेः । तव त्यवच्छेदकतया चैत्रप्रयत्नं प्रति चैत्रशरीरत्वेनाऽवश्यं हेतुना वक्तव्या , अन्यथा मैत्रशरीरावच्छेदेन चैत्रप्रवृ- च्यापत्तेः, पाण्यादिचालकप्रयत्नमच एव पुनम्तदापत्तिवारणायाऽवच्छेदकतया तत्प्रयत्ने व्यवस्था के अनुसार उन शरीरो द्वारा भूतात्मा मे प्रवृत्ति न हो सकेगी । जब कि उन शरीरो द्वारा भूतात्मा मे प्रवृत्ति तो होती है और इस प्रवृत्ति का होना ही उन शरीरो मे भूतात्मा का श्रावेश कहा जाता है। यदि यह कहा जाय कि- 'चैत्रादि के शरीर मे भूतावेश का यह अर्थ नहीं है कि चैत्रादि शरीरावच्छेदेन भूतात्मा मे प्रवृत्ति होती है किन्तु चैत्रात्मा के साथ भूतात्मा का एक विशेष प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है। जिस के कारण उन शरीरो के अधिष्ठाता प्राणियो के प्रयत्न से ही उन मे असाधारण प्रकार की चेष्टाएँ होने लगती है" तो यह ठीक नहीं है, क्योकि ऐसा मानने पर मृतशरीर मे भूमावेश की उपपत्ति न हो सकेगी। क्योकि मृतशरीर के साथ उस व्यक्ति का सम्बन्ध तूट जाता है जिस व्यक्ति के अष्ट से यह शरीर पूर्व मे उत्पन्न था। अत भूतावेश से उस शरीर मे होनेवाली चेष्टाएँ उस शरीर के अधिष्ठाता जीव के प्रयत्न से उत्पन्न नहीं मानी जा सकती। अतः उन्हें भूतात्मा से ही उत्पन्न मानना होगा और यह तब ही हो सकता है जब मृतशरीरावच्छेदेन भूतात्मा मे प्रयत्न की उत्पत्ति मानी जाय । अतः इस व्यवस्था का त्या करना होगा कि जो शरीर जिस के अष्ट से उत्पन्न होता है उसी शरीर से उस मे प्रयत्न को उत्पत्ति होती है । इसीलिये सृष्टि के प्रारम्भ मे जो शरीर उत्पन्न होते हैं वे यद्यपि भगवान के नहीं उत्पन्न होते तव भी भगवान मे तत्ता शरीरद्वारा प्रयत्न का उदय हो सकता है. जिस से उन शरीरो मे चेष्टा की उत्पत्ति हो कर उन के द्वारा व्यवहार का प्रवर्तन हो सकता है और यदि ईश्वर मे प्रयत्न की उत्पत्ति कथमपि अभीष्ट न हो तो ईश्वर का नित्य प्रयत्न ही तत्तद् शरीर से अवच्छेद्य हो सकता है । वह अवच्छेद्यत्व जन्यत्वरूप न होकर स्वरूपसम्बन्धविशेषरूप हो सकता है । जैसे नित्य प्राकाशमे घटावच्छेद्यत्व होता है। [प्रात्मा के संकोच-विकास से भूतावेश ] तो यह शडका ठीक नहीं है, क्योकि चैत्रशरीरावच्छेदेन मैत्रप्रयत्न की उत्पत्ति के परिहारार्थ यह नियम मानना अनिवार्य है कि जो शरीर जिस प्रारणी के अनष्ट से उत्पन्न होता है तत्शरीरावच्छेदेनैव उस प्राणी मे प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस नियम के मानने पर जो भूतावेश को अनुपपत्ति प्रदर्शित की गई है वह नैयायिक के ही मत मे प्रसक्त होती है, प्रार्हत मत मे वह अनुपपत्ति नहीं हो सकती, क्योकि प्रार्हतमत मे आत्मा प्रदेशवान होता है और उस के प्रदेश सड़कोच-विकासशाली होते है । इसलिये चैन्नादि के शरीरमे भी भूतात्मा के प्रवेश का उसीप्रकार अनुप्रवेश हो सकता है जैसे चैत्रादि के शरीर मे चैत्रादि के प्रात्मप्रवेश का अनुप्रवेश होता है । भूतात्मा के प्रदेश का चैत्रादि के शरीर मे यह अनुप्रवेश ही भूतावेश कहा जाता है। और इस अनुप्रवेश के कारण चैत्रादिशरीरावच्छेदेन भूतात्मा मे प्रवृत्ति हो सकती है क्योकि जिस शरीर मे जिस आत्मा का प्रदेश अनुप्रविष्ट होता है तत्शरीरावच्छेदेन उस आत्मा मे प्रयत्न होने का नियम है। भूतात्मा के प्रदेश का यह अनुप्रवेश तत्तत् शरीर मे अपने अदृष्ट से प्रविष्ट होनेवाले प्रात्माओ के अष्ट से होता । है । अत. यह भूतावेश उन प्रात्माओ के लिये दुःखप्रद होता है । चैत्र के शरीर मे मैत्रात्मा के प्रदेश का अनुप्रवेश नहीं हो सकता, क्योकि तदनुकूल कोई अदष्ट नहीं होता । अतः चैत्रशरीरावच्छेदेन मैत्रात्मा मे प्रवृत्ति की आपत्ति नहीं हो सकती। किन्तु नैया यिकमत मे मैत्र- ७२ ] [ शा. या, ममुच्चय म्न-३ श्लोक : तया तहावम्य हेतोगपादकम्य मन्चात् तत्तच्छीगत्वेन तत्तत्तवृत्यादिहेतुन्वं गौरवान् , काय. व्यहम्यलेऽपि योगजाऽदृष्टोपगृहीतन्यमंपन्धन तदात्मवचम्य गशगगनुगनन्यात । गरीरावच्छेदेन चैत्रप्रवृत्ति की उत्पत्ति के निवारणार्थ अवच्छेदकतासम्बन्ध से चन प्रयत्न के प्रति तादात्म्यत्सम्बन्ध मे चैत्र शरीर को कारण मानना पड़ता है। इमलिये चैत्रादि का मरीर चनादि की ही प्रवृत्ति का कारण हो सकता है भूतात्मा की प्रवृत्ति का कारण नहीं हो सकता । प्रत न्याय मत मे चत्रादि के शरीर मे भूतावेश की अनुपपति हो सकती है। [ नयायिक मान्य कार्यकारणभाव मे गौरव ] यदि यह कहा जाय कि-'अवच्छेदकतामम्बन्ध से चैत्र-प्रयत्न के प्रति चनशरीर तादात्म्य सम्बन्ध से कारण है यह कार्य-कारणनाव नैयायिफ को नी मान्य नहीं है । क्योंकि इसके मानने पर भी यह आपत्ति हो सकती है कि हम्त मे गति उत्पन्न प्रनेवाले प्रयत्न की प्रवच्छेदकतासम्बन्ध ने चरण मे नी उत्पत्ति होनी चाहिये । क्योकि चरण में प्रवच्देदकतासम्बन्ध से उस प्रयत्न का अनाव है और अवच्देदकता सम्बन्धेन तत्प्रयत्न का प्रभाव नत्प्रयत्न का कारण होता है । अत. इन प्रापत्ति के वार. णायं जो जो प्रवृत्ति जिन जिस शरीर या जिम जिस शरीरावयव हाग उत्पन्न होती है उम उन प्रवृत्ति के प्रति तत्तद् शरीर या तत्तद् शरीरावयव कारण होता है । और इस कार्यकारणभाव को मान लेने पर मंत्रगगेगवच्छेदेन चंत्रप्रवृत्ति को प्रापत्ति का नो वाग्ग हो जाता है। अत अवच्छेदकतामाबन्य से चत्र प्रयत्न के प्रति प्रवच्छेदकतासम्बन्ध मे चंद्रशरीर कारण है यह कार्यशासनाव अनावश्यक हो जाता है । इनीलिये चेनगरीरावच्छेदेन नूतात्मा मे प्रवृत्तिन्प नूकावेग और नृष्टि के प्रारम्न मे प्रयोज्य-प्रयोजक प्रादि शरीगवच्छेदेन प्रयत्नशालितास्प ईश्वरावेश की अनुमति नहीं हो सकती'- तो यह ठीक नहीं है क्योंकि हम्त मे गतिजनक प्रयत्न की चरण मे उत्पत्ति को प्रापत्ति का बारग करने के लिये जिम कार्यकारणभाव की कल्पना की गई है उस मे प्रवृत्ति एव शरीर तथा शरीरावयव के भेद से महान गौरव है । अत उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। चरण मे हस्तक्रियाजनक प्रयत्न को उत्पति को नापत्ति का वारण करने के लिये यह कार्यकारण- भाव मानना उचित है कि यवच्छेदक्तासम्बन्ध से प्रयत्न के प्रति गतिप्रकारप इच्छा विशेप्यतातमन्न से कारण है । हस्त मे गति का जनक प्रयत्न 'हस्तश्चलतु' इस इच्छा से उत्पन्न होता है । यह इच्छा विशेष्यता सम्बन्ध से हस्त मे रहती है । अत एव इम इच्छा से उत्पन्न होनेवाला प्रयत्न प्रवच्छेदपता सम्बन्ध से हम्त मे ही उत्पन्न हो सकता है न कि चरण मे । अयवा यह कहा जा सकता है कि कोई भी प्रयत्न अवच्छेदकतासम्बन्धेन किमी नी शरीरावयव में नहीं उत्पन्न हो मकता किन्तु अवच्छेदक्ता सम्बन्धेन शरीर में ही उत्पन्न होता है । और उस प्रयत्न से हस्त चरणादि मे जो सदा प्रवृत्ति नहीं होती है किन्तु व्यवस्थित रूप मे कभी हस्त मे कभी चरण में होती है उसका नियामक प्रयत्न को उत्पन्न करनेवाली 'हस्तश्चलनु, चरणश्चलतु इत्यादि इच्छा है । इसका प्राशय यह है कि सम्व व सम्बन्ध से चलनादिस्प चेप्टा के प्रति प्रयत्न 'स्वजनक चलनादि प्रकारक इच्छा विशेष्यत्व सम्बन्ध' से कारण है । अतः जब 'पाणिश्चलतु' इम इच्छा से शरीरावच्छेदेन प्रयत्न उत्पन्न होगा तब वह प्रयत्न उक्त सम्बन्ध से पाणि मे रहने के कारण पारिश मे चलन प्रिया को उत्पन्न करेगा । और जव 'चरणश्चलतु' इम इच्छा मे शरीरावच्टेदेन प्रयत्न उत्पन्न होगा तव वह प्रयत्न उयत सम्बध से चरण में रहने के कारण चरण मे चलन क्रिया को उत्पन्न करेगा।

स्या० का टीका और हिन्दी विवेचना ] [७३ अपि च, यथाकथञ्चिद् भृतावेशन्यायेन तच्छगरपरिग्रहे जगदप्यावेशेनैव प्रवर्तयेद [ योगी जनो द्वारा कायव्यूह की उपपत्ति ] अव इस पर यह प्रश्न हो सकता है कि 'यदि तत्तत् पुरुषीय प्रयत्न के प्रति तत्तत् पुरुषीय शरीर कारण है तब जब कोई योगी विभिन्न शरीरो से भोक्तव्य कर्मो को एक साथ ही भोग द्वारा समाप्त कर देने के लिय विभिन्न शरीरो की रचना करता है तो उस योगी मे विभिन्न शरीरावच्छेदेन प्रयत्न कसे उत्पन्न होगा ? क्योकि उस योगी को प्रारब्ध कर्म से जो शरीर प्राप्त रहता है वही उसका शरीर होता है । अत एव उसी शरीर के द्वारा उस से प्रयत्न होना उचित है'-किन्तु यह प्रश्न उचित नहीं है क्योकि जैसे उस का मातापितृजशरीर उस के अहष्ट से उसे उपलब्ध होता है उसी प्रकार सपूर्ण कर्मों का एक साथ भोग करने के लिये वह स्क्य जिन विभिन्न शरीरो को रचना करता है वे शरीर भी उसी के योगज प्रष्ट से उसे उपलब्ध होते हैं । अतः मातापितॄज शरीर के साथ वे शरीर भी उसी के शरीर है अतः तत्पुरुषीयप्रयत्न के प्रति तत्पुरुषीयशरीर-तत्पुरुषीय अष्टाकृष्ट शरीर को कारण मानने पर स्वनि मत कायव्यूह द्वारा योगी मे प्रवृत्ति की अनुत्पत्ति नहीं हो सकती। निष्कर्ष यह है कि एक पुरुष के शरीर से अन्य पुरुष मे प्रवृत्ति की उत्पत्ति के निवारणार्थ तत्तत् पुरुषीय प्रयत्न मे तत्तत् पुरुषीय शरीर को कारण मानना आवश्यक है । और जो शरीर जिस पुरुष के अदृष्ट से उत्पन्न होता है वही उस पुरुष का शरीर होता है । चैत्रादि का शरीर भूतात्मा के प्रष्ट से उत्पन्न नहीं होता । प्रत एव वह भूतात्मा का शरीर नहीं कहा जा सकता और सृष्टि के प्रारम्भ मे जो प्रयोज्य-प्रयोजक प्रादि शरीर उत्पन्न होता है वह ईश्वर के अदृष्ट से उत्पन्न नहीं होता प्रत वह ईश्वर का शरीर नहीं कहा जा सकता । अत तत्तद् शरीरगत प्रावेश को तत्तत् शरीरावच्छेदेन प्रयत्नवत्त्वरूप मानने पर न्याय मत मे भूतावेश और ईश्वरावेश की उपपत्ति नहीं हो सकती । किन्तु प्रार्हत मत मे उक्तरूप से भूतावेश की उपपत्ति हो सकती है और ईश्वरावेश की उपपत्ति की चिन्ता पाहतो को हो ही नहीं सकती क्योकि उन्हें ईश्वरावेश मानने की आवश्यकता नहीं है । (आवेश से प्रवृत्ति, वेदादिरचना को व्यर्थता) सृष्टि के प्रारम्भ मे ईश्वर द्वारा सम्प्रदाय प्रवर्तन की जो उपपत्ति बताई गई है उस सम्बन्ध मे यह भी विचारणीय हो जाता है कि- यदि यह मान भी लिया जाय कि भूतावेश के समान सृष्टि के प्रारम्भ मे कुछ शरीरो मे ईश्व- रावेश होता है और उस प्रावेश के कारण उन शरीरो द्वारा ईश्वर तत्तत्सम्प्रदाय का प्रवर्तन करता तो इस प्रश्न का क्या समाधान होगा कि-'वह कतिपय शरीरो मे आवेश द्वारा जैसे सम्प्रदाय का प्रव- तन करता है वैसे आवेश द्वारा ही समुचे जगत् का भी प्रवर्तन क्यो नहीं कर देता? अर्थात् यह क्यो न मान लिया जाय कि जगत् मे जिस किसी मे जो किया होती है वह उस मे ईश्वर का आवेश होने के कारण ही होती है, मनुष्य के विभिन्न शरीरों द्वारा जो वेदविहित कर्मों का अनुष्ठान होता हे वह उन शरीरो मे ईश्वर के प्रावेश से ही होता है । इस बात का सड्केत गीता-प्रादि के कुछ वचनो से भी मिलता है । जैसे 'ईश्वर. सर्वभूतानाम् हद्देशे अर्जुन ? तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारू. ढाणि मायया' ॥ एव- जानामि धर्म न च मे प्रवृत्ति ,जानाम्यधर्म न च मे निवृत्ति । केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि' । इस प्रकार ईश्वरावेश से ही जगत् को सम्पूर्ण प्रवृत्तिया निष्पन्न हो सकती है। प्रतः ईश्वर द्वारा वेदशास्त्रादि की रचना मानना निरर्थक है। । हे [ शा. वा. समुरचय स्त. ३-ठलो. इति व्यर्थमस्य वेदादिप्रणयनम् । 'कर्मवदस्याऽपि दृष्टेप्टाऽनतिलधन व प्रवर्तकत्वाद् नानुपपत्तिरिति चेत । तहिं परप्रवृत्तये वाक्यमुपदिशन स्वेष्टमाघनताज्ञानाटिकमपि कथम- तिपतेत् ? कथं वा चेष्टात्वावच्छिन्ने विलक्षणयत्नत्वेन हेतुत्वात् तवन्छिन्नस्य विजातीयमन:- मंयोगादिजन्यत्वात् तादृशप्रयत्नं विना ब्रह्मादिशरीग्चेष्टा ? 'विलक्षणचेष्टायां विलक्षणप्रयत्नम्य हेतुन्वात् अत्रेश्वरीययत्न एव हेतुरिति चेत ? तर्हि तम्य मर्वत्राऽविशिष्टत्वात सर्वत्रापीश्वरचेष्टा- पत्तिः । 'विलक्षणचेष्टावच्छिन्नविशेष्यतया तत्प्रयत्नम्य हेतुत्वाद् नानिप्रमग' इति चेत् ? तर्हि चेष्टावलक्षण्यमिद्वी तथाहेतुन्वम् , तथाहेतुत्वे च तद्वैलक्षण्यमिति परम्पराश्रयः । ? इस प्रश्न के उत्तर मे यदि यह कहा जाय कि-'जैसे पाहत मत मे कम ही सम्पूर्ण प्रवृत्तियों का मूल कारण होता है किन्तु वह सीधे उन प्रवृत्तियो का जनक न होकर जिम सप्ट-इष्ट कारण से प्रवृत्तियों का होना लोक मे देखा जाता है उस के द्वारा ही उसे उन प्रवृत्तियो का जनक माना जाता है । इसीलिये कर्म और प्रवृत्तियों के बीच गप्ट इप्ट तत्तत् कारणो को भी अपेक्षा होती है । उसी प्रकार ईश्वर यद्यपि जगत की सम्पूर्ण प्रवृत्तियों का कारण है किन्तु वह भी लोक मे जिस प्रवृत्तियो का जिस नष्ट-इष्ट कारण से उदय होना देखा जाता है उनके द्वारा ही उन प्रवृत्ति का कारण होता है। अतः वेदादि के द्वारा लोक प्रवृत्ति के सम्पादनार्य उसे वेदादि की रचना करनी पड़ती है। अत: वेदादि की रचना को व्यर्थ नहीं कहा जा सकता'-तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि यदि वह दूसरों की प्रवृत्ति के लिये वाक्य का उपदेश इसलिये फरता है कि वाक्य द्वारा ही पर का प्रवर्तन लोक मे इष्ट है तब तो उसे अपने इष्टसाधनताज्ञानादि की भी अपेक्षा करनी चाहिये क्योकि यह भी लोक मे देखा जाता है कि मनुष्य जिस कर्म को दूसरे द्वारा कराने मे अपना इष्ट समझता है उसी फर्म मे दूसरे को प्रवृत्त करता हैं । प्रत• ईश्वर को भी इसीप्रकार दूमरी का प्रवर्तन करना चाहिये । किन्तु ऐसा मानने पर ईश्वर ससारी मनुष्यो से श्रेष्ठ न हो सकेगा। क्योकि ससारो मनुष्य के समान वह भी अपूर्ण होगा और जिस वस्तु की उसे कमी होगी उसे पाने की वह इच्छा करेगा और उस की प्राप्ति जिस मनुष्य को क्रिया से समवित होगी उस मनुष्य को उस क्रिया में प्रवृत्त करेगा। [ ब्रह्मादि देवता के शरीर में चेप्टा कैसे ? ] इस सदर्भ मे यह भी विचारणीय है कि-ब्रह्मादि देवताओ के शगैरो मे चेष्टा कसे उत्पन्न हो सकती हैं और चेष्टा उत्पन्न न होने पर उनके द्वारा सृष्टि का निर्माण-रक्षण और संहार प्रादि कार्य फिस प्रकार हो सकेगा? वृद्मा आदि शरीरो मे चेप्टा नहो सकने का कारण यह है कि चेष्टा के प्रति विलक्षण प्रयत्न कारण होता है और विलक्षण प्रयत्न के प्रति विलक्षण प्रात्ममन संयोगादि कारण होता है, ब्रह्मा आदि मे विलक्षण आत्ममनःसंयोग न होने से विलक्षणप्रयत्न नहीं हो सकता है। और विलक्षण प्रयत्न के प्रभाव मे ब्रह्मा आदि के शरीर मे चेप्टा नहीं हो सकती है। यदि यह कहें कि -'विलक्षणप्रयत्न विलक्षणचेष्टा का कारण होता है प्रत विलक्षणप्रयत्न से होनेवाली विलक्षणचेष्टा ब्रह्मा प्रादि के शरीर मे भले न हो किन्तु ईश्वर प्रयत्न से चेप्टा होने में कोई बाधा नहीं हो सकती'- स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [७५ किञ्च, स्वाधिष्ठातरि भोगाऽजनकशरीरसंपादनमपि तस्यैश्वर्यमात्रमेव, इति दृष्टविरोधे- नैव जगत्प्रवृत्तिरायाता । एतेनैतत् प्रतिक्षिप्तम्- तो यह ठीक नहीं है क्योकि ईश्वर का प्रयत्न स्वाश्रयसयोग सम्बन्ध से जैसे ब्रह्मा प्रादि शरीर मे रहेगा उसी प्रकार अन्य सभी शरीरो और मूर्त द्रव्यो मे भी रहेगा, अत. ईश्वरप्रयत्न को उक्त सम्बन्ध से चेष्टा का कारण मानने पर केवल ब्रह्मादि शरीरो मे ही उस से चेष्टा की उत्पत्ति न होगी अपितु अन्य सभी शरीरो मे भी चेष्टा की आपत्ति होगी। [ ब्रह्मादिशरीरचेष्टा की उपपत्ति का व्यर्थ प्रयास ] इसके उत्तर मे यदि यह कहा जाय कि-"जैसे जीव के विलक्षणप्रयत्न से विलक्षणचेष्टा की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार ईश्वरप्रयत्न से भी विलक्षणचेष्टा की उत्पत्ति होती है और यह विलक्षण चेष्टा जीव के प्रयत्न से होने वाली विलक्षणचेष्टा से विलक्षण होती है और इस चेष्टा के प्रति ईश्वर प्रयत्न स्वाश्रयसयोग सम्बन्ध से कारण न होकर विलक्षण चेष्टात्वावच्छिन्न विशेष्यता सम्बन्ध से कारण होता है। यह विशेष्यता ब्रह्मा आदि शरीरो मे होने वाली चेष्टामो मे ही रहती है अत एव ईश्वर प्रयत्न से उसी चेष्टा का जन्म होताहै अन्य चेष्टायो का जन्म नहीं होता है,क्योकि उक्त विशेष्यता सम्बन्ध से ईश्वरप्रयत्न को कारण मानने पर कार्यतावच्छेदकसम्बन्ध तादात्म्य होता है और ब्रह्मादि शरीर मे उत्पन्न होनेवाली विलक्षण चेष्टा का तादात्म्य उसी चेष्टा मे होता है अन्य चेष्टायो मे नहीं होता है। वह चेष्टा ब्रह्मादि के शरीर मे ही समवेत होती है अन्य शरीरो मे नहीं क्योकि समवाय सम्बन्ध से उम चेष्टा के प्रति ब्रह्मादि शरीर भोगानायतनशरीरत्व रूप से कारण होता है । ब्रह्मादि का शरीर किसी भोक्ता का शरीर नहीं होता किन्तु प्रारिणयो के अहष्ट से उत्पन्न होने वाला ऐसा शरीर होता है जिस से किसी का भोग नहीं होता है किन्तु ईश्वर के प्रयत्न से चेष्टावान् होकर ईश्वर के कार्यो मे सहायक होता है, प्रारिणयो के अदष्ट से होनेवाले अन्य सभी शरीर प्राणियो के भोग का पायतन होते है अत एव उन म भोगानायतनशरीरत्व नहीं रहता है, इसीलिए ब्रह्मादि के शरीर मे ईश्वर प्रयत्न से उत्पन्न होनेवाली चेष्टा अन्य शरीरो मे समवेत नही होती है ।- तो यह कथन ठीक नहीं है क्योकि जब यह सिद्ध हो जाय कि ब्रह्मादि के शरीर मे होनेवाली चेष्टा अन्य चेष्टामो से विलक्षण होती है तभी तादात्म्यसम्बन्ध से विलक्षण चेष्टा के प्रति विलक्षण- चेष्टात्वावच्छिन्न विशेष्यता सम्बन्ध से ईश्वर प्रयत्न मे कारणता सिद्ध हो सकती है और जब उक्त कारणता सिद्ध हो जाय तभी ईश्वर प्रयत्न से ब्रह्मादि शरीर मे उत्पन्न होनेवाली चेष्टा मे लक्षण्य सिद्ध हो सकता है । अत अन्योन्याश्रय दोष होने के कारण उक्त कार्यकारणभाव की कल्पना नही हो सकती। (ईश्वरप्रवृत्ति मे दृष्टविरोध को आपत्तियाँ), सृष्टि के प्रारम्भ मे उत्पन्न कतिपय शरीरो में ईश्वरावेश द्वारा तत्तत् सम्प्रदायो का प्रवर्तन मानने मे नष्ट विरोध का उल्लेख अभी किया जा चुका है। वह आपत्ति इस बात से और स्पष्ट हो जाती है कि ईश्वर ऐसे भी शरीर का निर्माण करता है जो अपने अधिष्ठाता में-अपने को सचेष्ट बनानेवाले पुरुष में भोग नहीं उत्पन्न करता है। ऐसे शरीर की रचना उस के एकमात्र ऐश्वर्य का ही सूचन करती है क्योकि ऐसा कार्य जो लोकदृष्ट कार्यों से सर्वथा विचित्र हो निरकुश ईश्वर के बिना ] [शा०या० समुच्चय स्त०३ श्लोक ९ "हत्वभावे फलामावाद प्रमाणेऽसति न प्रमा । तदभावात प्रवृत्तिनों कर्मवादेऽप्ययं विधिः ॥२॥ (न्या. कु. ३-१८) इति, कर्मणः कादिमापेक्षत्वेनैव जगढेतुत्वान्' । समर्थितं च- "धर्माऽधौं गिना नाड्गं विनाऽगेन मुखं कुतः ? मुखाद् विना न वक्तृत्वं तच्छाम्तारः परे कथम् ? " (वी स्तोत्र ७-१) दति । शरीरम्य स्वोपात्तनामकर्महेतुन्वाद , तचित्र्येण तहचिच्यात्, अन्यथाऽङ्गो- पाइगवर्णादिप्रतिनियमानुपपत्तेरिति, अन्यत्र विस्तरः । तम्माद् मायावियत ममयग्राहकन्यम् , नहीं हो सकता और जब लोक-प्ट के विपरीत भी करना ही है तो वह अपने प्रावेश द्वारा हो जगत् को सम्पूर्ण प्रवृत्तियो को सम्पन्न कर सकता है । अतः उम के द्वारा वेद श्रादि की रचना का निरर्थक होना निविवाद है। इनी से उस कथन की मी निस्सारता समज लेनी चाहिए जो उदयनप्राचार्य को कुसुमाञ्जलि मे-'हेत्वमावे फलामावात्' इस कारीका से कहा गया है । कहने का तात्पर्य यह है कि उस कारिका मे जो यह बात कही गई है कि-'कारण के अभाव मे कार्य नहीं होता है यह सामान्य नियम है, प्रमाण प्रमा का कारण होता है, अतः उस के प्रभाव मे प्रमा को उत्पत्ति नहीं हो सकती है और प्रमा के विना प्रवृत्ति नहीं हो सकती है। अत एव लोकप्रवृत्ति के लिए प्रमा को उपस्थापित करने के हेतु वेद आदि प्रमाण को रचना प्रावश्यक है। यह प्रक्रिया कर्मवाद मे भी आवश्यक है क्योकि फर्म भी स्वय अकेले किसी कार्य को उत्पन न करके लोकमिद्ध कारणो द्वारा ही उत्पन्न करता है अत एव उसे भी कार्य के लोकसिद्ध कारग का सपादन करना पड़ता है। क्योकि कर्म भी कर्ता प्रादि की अपेक्षा से ही जगत का हेतु होता है।'-कारिका का यह कथन उक्तयुक्ति से निस्मार हो जाता है, क्योकि ईश्वर को जगत् कर्ता मानने पर उसे अपने अधिष्ठाता मे भाग न उत्पन्न करने वाले शरीर का निर्माता मानना पडता है जो दृष्टविरुद्ध है प्रत उसी के समान नष्टविरुद्ध अन्य कार्यों के सम्नव होने से वेद आदि की रचना का वैययं प्रसक्त होता है । कर्मवाद मे उक्तरीति से लोकप्टि से विरुद्ध कोई कल्पना नहीं करनी पड़ती है। वीतरागस्तोत्र के श्लोक से इस बात का समर्थन यह कह कर भी किया गया है कि-धर्म और अधर्म के बिना शरीर नहीं उत्पन्न हो सकता, शरीर के विना मुख नहीं हो सकता. तथा मुख के विना वक्तृत्व नहीं हो सकता। इसलिये अन्य लोग जो दृष्टविपरीत कल्पना करने के व्यमनी नहीं होते वे असे ईश्वर के अस्तित्व के उपदेप्टा कैसे हो सकते है जो विना मुस के ही महान् वेदराशि का उच्चारण कर डालता है ? अतः यह वस्तुस्थिति बुद्धिमान मनुष्यो को मान्य होनी चाहिये कि जोव को शरीर की प्राप्ति पूर्वोपाजित शरीरनामकर्म के उदय से ही होती है और उस के वैचित्र्य से शरीर मे वैचित्र्य होता है । अन्यथा एक जातीय ही शरीर मे अङ्गोपाङ्ग-वर्णादिपरिवार की नियत व्यवस्था नहीं हो सकती। इस विषय का विस्तृत विचार ग्रन्थान्तर मे दृष्टव्य है। उपर्युक्त विचार का निष्कर्ष यह है कि ईश्वर को मायावी के समान समय अर्थात् शब्दार्थ सम्बन्ध स्वस्प सकेत का ग्राहक वताना एवं घटपटादि की निर्माणपरम्परात्प सम्प्रदाय का प्रवतक कहना नी एक प्रकार को मायाविता ही है । अर्थात् कोई मायावी विद्याधर ही ऐसे ईश्वर को शब्दार्थ- स्या० का टीका-हिन्दीविवेचना ] [७७ घटादिसंप्रदायप्रवर्तकत्वं च पराभिमतेश्वरस्य मायावितामेव विद्याधरविशेषस्य व्यञ्जयति । पितुरिव पुत्रादेयुगादौ युगादीशस्य जगतः शिक्षया तु तथात्वं युक्तिमत् , स्वभावत एव तीर्थकृतां परोपकारित्वात् । अत एव 'कुलालेभ्यो नमः' इत्याद्या श्रुतिः सगच्छत इति युक्तं पश्यामः । अनुमानेऽपि सिद्धसाधनं वोध्यम् । प्रत्ययादिना तु वेदप्रामाण्यवादिनामाप्त-तद्वक्तृसिद्धावपि नेश्वरसिद्धिः, इति किमिह तदुपन्यासेन १ एतेन कार्यादिपदानामर्थान्तरमपि प्रयासमात्रम् । 'जन्यतत्प्रमासामान्ये तत्प्र- मात्वेन गुणतया हेतुत्वात् , आद्यप्रमाजनकप्रमाश्रयतयेश्वरसिद्धिः' इति तु मूढानां वचः, घट- स्वादिमवृत्तिविशेष्यतया तत्र घटत्यादिविषयत्वेनैव हेतुतया, संस्कारेणैव घटत्वादिसंबन्धहेतु- तयैव वा तवापि निर्वाहात् , अस्माकं तु सम्यग्दर्शनस्यैव गुणत्वात् । सम्बन्ध का ग्राहम और घटादि पदार्थ के व्यवहार का प्रवर्तक कह सकता है जो करचरणमुखकर्ण आदि से विहीन और अशरीरी होने से वस्तुत कुछ भी करने मे असमथ है। हा, यह युक्तिसङ्गत अवश्य हो सकता है कि जैसे पिता अपने पुत्र को शिक्षा देता है उसी प्रकार युगादि मे प्रारम्भिक युग का ईश प्रयमतीर्थकर जगत को शिक्षा देकर तत्तत् सम्प्रदाय का प्रवर्तन करता है क्योकि तीर्थकर ही युगादीश होते है और वह स्वभाव से ही सर्व जीवो का हितेच्छु होने से उन्हें उपदेश देते है। इसी प्रकार ताशंकर भी युगादि मे विना किसी निजी प्रयोजन के केवल स्वभाववश प्रजा को उपदेश देते है । इस प्रकार 'नम कुलालेभ्य ' प्रादि श्रुतिया भी सङ्गत हो सकती है । और इसी कारण तत्तत्सप्रदाय के स्वतंत्र प्रवर्तक के अनुमान मे सिद्धसाधन दोष भी हो सकता है क्योकि प्रत्येक युगादि मे उस युगका आदि तीर्थकर तत्तत्सप्रदाय के प्रवर्तक रूप से सिद्ध है। [ प्रत्ययादि प्रमाणो की निरर्थकता ] प्रत्यय-प्रमा, श्रुति-वेद और वाक्य द्वारा भी ईश्वर की सिद्धि नही हो सकती क्योकि जो वेद को प्रमाण मानते हैं उन के मत मे प्रमा वेद और वाक्य से होने वाले अनुमानो से वेदार्थ के प्रमाता वेद- कर्ता की सिद्धि हो सकती है किन्तु 'वह ईश्वर है' यह बात उन अनुमानो से नहीं सिद्ध हो सकती, क्योकि ईश्वर को सर्वकर्ता माना जाता है । और वे अनुमान जिस पुरुष को सिद्ध करते हैं उस की सर्वज्ञता और सर्वकर्तृता को सिद्ध करने मे उदासीन है । इसीलिये कार्य प्रायोजनादि पदो का अन्य अर्थ कर के जिन अनेक अनुमानो को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है उन अनुमानो से भी सर्वज्ञ सर्वकर्ता ईश्वर की सिद्धि नहीं होती, क्योकि वे अनुमान भी जिस पुरुष का साधन कर पाते उसे वेद वेदार्थविषयकतात्पर्य का धारक, यागादि का अनुष्ठाता, प्रणवादि पदो का बोध्य, वेदस्थ अह पद का स्वतत्र उच्चारण कर्ता, प्रादि ही सिद्ध कर पाते है किन्तु उस की सर्वज्ञता और स्वकर्तृता प्रमाणित करने मे वे सर्वथा असमर्थ रहते है । इसलिये कार्य आयोजन इत्यादि पदो के पूर्वोक्त अन्य अर्थों की कल्पना कर के अनुमान करने का प्रयास ही ईश्वर सिद्धि को दृष्टि से निरर्थक कप्टमात्र ही है। कुछ लोग ईश्वर को सिद्ध करने के लिये इस प्रकार के अनुमान का प्रयोग करते हैं कि 'विशेष्य- तासम्बन्ध से जन्य तत्प्रकारकप्रमासामान्य मे विशेष्यता सम्बन्ध से तत्कारक प्रमा गुणविधया कारण 15 ] [गा. या ममुन्चयग्नः-लोय-१ है । 'गुणविघया कारण' का अर्थ यह है कि 'गुण' इस प्रशमा सूचक शब्द से व्यवहत होनेवाला कारण । प्रमा अपने विषय का अव्यभिचारी ज्ञान होता है। उस मे मनुप्य को धोया नहीं होता। इमलिये उन के कारण को प्रशमा वोधक गुण शब्द से व्यवहत किया जाता है। इस कार्यकारण नाव का अभिप्राय यह है कि प्रमा उसी विषय की होती है जिस विषय की प्रमा फनी पहले हुई रहती है । और जो विषय पहले कभी नहीं प्रमित रहता उम को प्रमा नहीं होती। इसलिये प्रमन पदार्य की प्रमा कमी नहीं हो मकती क्योकि उस की प्रमा पहले कभी हुई रहनी नहीं है । इन कार्यकारण भाव से ईश्चर को सिद्धि इस अनुमान से होती है कि 'सृष्टि के प्रारम्भ में होनेवाली पहनी जन्यप्रमा अपने समान विषयक प्रमा से जन्य है ययोकि वह प्रमा है । जो भी प्रमा होती है वह ममानविषयक प्रमा मे जन्य होती है जैसे बाद मे होनेवाली घटत्यादि को प्रमा पूर्व में होने वाली घटत्यादि प्रमा से उत्पन्न होती है। इस अनुमान से प्राधप्रमा को जनक कोई ऐनी प्रमा माननी होगी जिम को समानरिपयक प्रन्य- प्रमा की प्रावश्यकता न हो और वह तब ही हो सकता है जब यह प्रमा निन्य हो । इन प्रकार की प्रमा मिद्ध हो जाने पर उस के प्राश्यप में ईश्वर की मिद्धि अनिवार्य हो जाती है । व्याख्याफार श्री यशोविजयजी महाराज ईश्वर मिद्धि के सम्बन्ध में इन कयन को मूटपावन भूचित करते है । क्योकि उनको दृष्टि में 'जन्य तत्प्रकारक प्रमा सामान्य में तत्प्रसारफ प्रमा कारण है' यह कार्यकारणभाव ही अनावश्यक है। उन का कहना है कि घटभिन्न में पटत्व प्रकारक प्रमा को प्रापत्ति का वारण करने के लिये नैयायिक को घटवृत्तिविशेष्यता सम्बन्ध से घटत्वप्रकार प्रमा के प्रति घटत्व को हो समवाय सम्बन्ध मे कारण मान लेना चाहिये । प्रयया घटत्यप्रकार प्रमा को ही सकार द्वारा कारण मान लेना चाहीये किंवा घटत्वसमवाय को स्वरुप नम्बन्ध से फारण मान लेना चाहोये । प्रयम और तृतीय पक्ष में प्रमा की उत्पत्ति में प्रमा की अपेक्षा ही नहीं होती । प्रतः प्राद्य प्रमा के लिये ईश्वरीय प्रमा को मिद्धि नहीं हो सकती । और द्वितीय पक्ष में प्रमा की उत्पत्ति में प्रमा की अपेक्षा होने पर भी उस के स्वय रहने की अपेक्षा नहीं होती किन्तु उम से उत्पादित सरकार को अपेक्षा होती है। अतः उस पक्ष में भी प्राद्य प्रमा के लिये ईश्वरीय प्रमा यी सिद्धि नहीं हो सकती, पोंकि उसको उत्पत्ति पूर्वसर्ग की प्रमा से उत्पादित सस्कार द्वारा हो सकती हैं। यद्यपि यह जितीयपक्षीय कार्य- कारणभाव उचित नहीं नहीं हो सकता क्योकि उस पक्ष में सस्वारजन्य होने से प्रमा मात्र में स्मृतित्व की आपत्ति होगी प्रथम पक्षमें घटत्व को कारण मानने पर घटदत्वको कारणतादच्छेफ मानना पटेगा और घटत्वत्व घटेतराऽसमवेतत्वे सति सफलघटसमवेतत्वस्प है अतः घटत्व को कारण मानने में गौरव होगा । अत एव प्रथम कार्यकारणभाव भी उचित नहीं हो सफ्ता। किन्तु तृतीय पक्ष हो रचित हो सकता हैं क्योकि घटत्व समवाय को कारण मानने पर समवायत्व प्रौर घटत्व दो धर्म कारणता के अवच्छेदक होगे। उन में समवायत्व प्रखप्उ उपाधि है और घटत्य समयायसम्बन्ध से अनुल्लिरयमान होने के कारण स्वरूपतः कारणतावच्छेदक होगा । इसलिये घटत्व समवाय को कारण मानने में गौरव नहीं होगा। इस प्रकार इस कार्यकारण भाव से हो घटभिन्न में घटत्व प्रकारक प्रमा की आपत्ति का वारण हो जायगा । अततत्प्रकारक जन्यप्रमा सामान्य में तत्तकारक मा को कारण मानने की आवश्यकता नहीं है श्रीयशोविजयजी महाराज ने इस प्रसङ्ग में यह भी कहा है कि पाहतो के मन में तो उक्त प्रकार के कार्यकारण भावो की कल्पना के प्रपञ्च में पड़ने को कोई प्रावश्यकता हो नहीं है । क्योकि उस मत में सम्यग् दर्शन ही प्रमा का गुणविधया कारण होता है । घटभिन्न में घट- - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ७E - . सख्याविशेषादपि नेश्वरसिद्धिः, तथापि लौक्किापेक्षावुद्धेरेव तद्धेतुन्वात् । ममाप्यपेक्षा- बुद्धेरेव तथाव्यवहारनिमित्तत्वात् तज्जन्यातिरिक्तसंख्याऽसिद्धेः । परिमाणेऽपि संघातभेदादि- कृतद्रव्यपरिणामविणेपरूपे संख्याया अहेतुत्वाच्च । द्वि-कपालात् त्रि-कपालघटपरिमाणोत्कर्पस्य दलोत्कर्षादेवोपपत्तेरिति । तत्त्वमत्रत्यमार्हतवार्तायां विवेचयिष्यते । तस्माद् नेश्वरमिद्धौ किमपि साधीयः प्रमाणम् , नवा तदभ्युपगमेनापि तस्य सर्वज्ञत्वम् , उपादानमात्रज्ञानमिदावप्यतिरिक्तज्ञानाऽसिद्धेः, कारणाभावाद , मानाभावाच्चेति दिग् ।।९।। त्वप्रकारक सम्यग् दर्शन नहीं होता, अतः घटभिन्न में घटत्वप्रकारक प्रमा की आपत्ति नहीं हो सकती। सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान में भेद होने से प्रमा के प्रति सम्यग्दर्शन की कारणता का पर्यवसान तत्प्रकारक प्रमा के प्रति तत्प्रकारक प्रमा की कारणता में नहीं हो सकता। [अपेक्षाबुद्धि से द्वित्वादि व्यवहार की उपपत्ति] संख्याविशेष से भी ईश्वर की सिद्धि नहीं हो सकती क्योकि न्यायमत मे भी लौकिक अपेक्षावुद्धि मे ही द्वित्वादि सख्या को कारणता सिद्ध है। ईश्वर को लौकिक अपेक्षावुद्धि नहीं होती, क्योकि ईश्वर की बुद्धि नित्य मानी जाती है । और लौकिकवुद्धि वही कहलाती हे जो इन्द्रिय के लौकिक सनिकर्प से उत्पन्न हो । अतः यह कहना कि-'यणुक में परिमारण की उत्पत्ति परमाणु मे एकत्व की ईश्वरीय अपेक्षाजुद्धि से होती है' यह उचित नहीं हो सकता । पाहत मत मे तो अपेक्षाबुद्धि से द्वित्वादि सरया की उत्पत्ति मान्य ही नहीं है। क्योकि उस मत मे अपेक्षाबुद्धि से ही द्वित्वादि के व्यवहार को उपपत्ति कर ली जाती है । तात्पर्य यह है कि न्यायमत मे जिस अपेक्षाबुद्धि को द्वित्वादि- सख्या का जनक माना जाता है, पाहत मत मे वह अपेक्षावुद्धि ही द्वित्वादि के व्यवहार मे कारण होती है । तात्पर्य, द्वित्वादि व्यवहार को ही द्वित्वके स्थान मे अभिषिक्त करदिया जाता है। उसी से द्वित्व का व्यवहार हो जाता है। अतः उस से अतिरिक्त द्वित्व सख्या की उत्पत्ति मानकर उसके द्वारा द्वित्वव्यवहार के उपपादन का प्रयास अनावश्यक है । अतः पाहतमत मे द्वित्वादिनाम की कोई सख्या न होने से जैन के प्रति द्वित्व सख्या द्वारा ईश्वरानुमान का प्रयोग सभव ही नहीं हो सकता, क्योकि वह प्रयोग प्राश्रयासिद्धि से ग्रस्त हो जायगा । पाहत मत मे परिमाण के उत्पादनार्थ भी द्वित्वादि सख्या को कल्पना नहीं को जाती. क्योकि पाहत मत में द्रव्य का परिमाण सङ्घात-भेद से निष्पन्न होता है। उस मे सख्या की अपेक्षा नहीं होती। द्विकपालक घट के परिमाण की अपेक्षा त्रिकपालक घट के परिमाण में जो उत्कर्ष होता है वह भी कपाल के सख्याधिक्य से नहीं होता बल्कि द्विकपालकसघात से त्रिकपालकसड्धात के उत्कर्ष से होता है। व्याख्याकार का कहना है कि इस विषय का तात्त्विक विवेचन पाहत वार्ता के प्रसग मे किया जायगा। इन समस्त विचारो का निष्कर्ष यही है कि ईश्वर की सिद्धि मे कोई उचित प्रमाण नहीं है और यदि पूर्वप्रदर्शित प्रमाणो के आधार पर ईश्वर को स्वीकार कर लिया जाय तो भी उन प्रमाणो से उनकी सर्वज्ञता नहीं सिद्ध हो सकती, जैसे कि पूर्वोक्त अनुमानो मे प्रथम अनुमान से ईश्वर जगत् का कर्ता सिद्ध किया जाता है. और कर्ता के लिये उपादान कारणो के ज्ञानमात्र की आवश्यकता होती है। अतः उक्तानुमान से ८०] [शाम्बमातांममुन्चय स्त० ३-रलो० १० : परानप्यनुलवृत्ती 4- - ''मंतुण्य नैयायिकमुख्य ! तम्मादम्माकमेवाऽऽत्रय पसमयम् । तबोच्चकरीश्वरक ताया मनोरथं सप्रति पृश्यामः ॥१॥ नयः प्रवर्तयन्येव जिनो विनोद । उक्तानुवाटेन पिता हितात् किं चालम्य नाऽऽलम्यमपागेति ? ॥२॥" तदिदमाह- ततश्चेघिरकर्तृत्ववादोऽयं युज्यने परम् । सम्यग्न्यायाऽविरोधेन यधातुः गृहयुदयः ॥१०॥ ततश्च पातञ्जल-नयायिकमानरामान्च, अयं-नथाविधलोकप्रमिद्धः - ईवा त्व- वादः. परम्-उक्तविपरीतरीत्या, सम्यग्न्यायाऽविरोधन-प्रनिताप्रतिहनतकानुसारेण युज्यते, यथा शुद्वयुद्वयः मिद्वान्तीपवृहितमतयः परमाय आहुः ॥१०॥ तद्वचनमेवाऽनुवदति- जगत् के उपादान कारणों का ही ज्ञान सिद्ध हो सकता है, उपादानसे निम्न पदार्थों का ज्ञान नहीं मिद्ध हो सकता है । क्योकि न उस के लिये कोई कारण है, न उत्त के लिये कोई प्रमाण ही है ।।६।। व्यारयाफार श्री यशोविजयजी महाराज ने न्यायदर्शन पी पद्धति से ईश्वर के स्र्तृत्व या पूर्णतया निराकरण कर देने के बाद नैयायिक सर्वथा हताश न हो इन लिए बडे सुन्दर ढंग से नैयायिक को यह कहते हुए प्राश्वासन दिया है कि नयायिक को उक्त रोति से ईश्वर के पर्तृत्व का सण्डन कर देने पर भी दुःसी होने को प्रावश्यकता नहीं है । पयोकि उम को सतुष्टि का औषध अव भी बना हुआ है । उसे केवल इतना ही परने को प्रावश्यकता है कि वह ईश्वर के पर्तृत्व को सिद्ध करने को अपनी पद्धति का मोह छोडकर हम आहंतो को श्रेष्ठ पद्धति को स्वीकार कर ले । क्योकि अपनी पाहत पद्धति से हम ईश्वर को कर्ता मिद्ध करके उस के महान मनोरच को पूर्ति कर सकते हैं। पाहतो का यह मत है कि नगवान जिनेश्वर देव नयो के माध्यम से अन्य मतोको संगत अर्थ मे प्रवाहित करके प्रतिवादी को मतुष्ट करते हैं । और यह उन के लिये उनो प्रकार स्वानाविक है जैसे ग्तिा वालक का हित करने की बुद्धि से उक्त का अनुवाद अर्थात् पुनः पुनःप्रेरक वचन का प्रयोग कर के उसके प्रमाद को दूर करता है। ( ईश्वरकर्तृत्ववाद का कयचित् औचित्य ) ४ से नव कारिका में प्रतिवादी की शैलीका निराकरण करके व दसवी कारिका में जैन दर्शन को शैलो से ईश्वर कर्तृत्व का समर्थन किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- पातञ्जल और नैयायिक को अभिप्रेत रीति से ईश्वर की कर्तृता का सडन हो जाने पर अगर नैयायिकादि लोको मे प्रसिद्ध ईश्वर कर्तृत्व का समर्थन करना है तव पातञ्जल-नयादिक ने जो प्रणाली अपनायी थी उससे विपरीत जैन प्रणाली के अनुसार विपरीत तक से बाधित न होवे ऐसी युक्तियो से उसको सगति कर सकते हैं-जैसा कि शुद्ध यानी सिद्धान्त से परिमित बुद्धि वाले परम भी अनुकूल - - ऋषियो ने कहा है ' स्या क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [८१ मूलम्-ईश्वरः परमात्मैव तदुक्तवतसेवनात् । यतो मुक्तिस्ततस्तस्याः कर्ता स्याद् गुणभावतः ॥११॥ ईश्वरः परमात्मैव-कायादेवहिरात्मनो ध्यातुभिन्नत्वेन ज्ञेयादन्तरात्मनश्च तदधिष्ठाय- कस्य ध्यातुर्ये येकस्वभावत्वेन भिन्नोऽनन्तज्ञान-दर्शनसंपदुपेतो वीतराग एव । अन्ये तु 'मिथ्यादर्शनादिभावपरिणतो वाह्यात्मा, सम्यग्दर्शनादिपरिणतस्त्वन्तरात्मा, केवलज्ञानादिपरि- णतस्तु परमात्मा । तत्र व्यक्त्या वाह्यात्मा, शक्त्या परमात्मा अन्तरात्मा च, व्यक्त्याऽन्त- रात्मा तु शक्त्या परमात्मा, भूतपूर्वनयेन च वाद्यात्मा, व्यक्त्या परमात्मा तु भूतपूर्वनयेनैव वाह्यात्मा अन्तरात्मा च' इत्याहुः । तदुक्तव्रतसेवनात्-परमाप्तप्रणीतागमविहितसंयम- मुक्तिः कर्मक्षयरूपा, भवति. ततस्तस्या गुणभावतः राजादिवदप्रसादा- भावेऽप्यचिन्त्यचिन्तामणिवद् वस्तुस्वभावबलात् फलदोपासनाकत्वेनोपचारात् , कर्ता स्यात् । पालनात् , यतो (आज्ञापालन द्वारा ईश्वरकर्तृत्व) ११ वीं कारिका मे जैन ऋषियो के उन वचन का ही अनुवाद है जिन का सकेत पूर्वकारिका मे किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- परमात्मा ही ईश्वर है । परमात्मा का अर्थ है वह वीतराग पुरुष जो अनन्तज्ञान और अनन्न दर्शन से सम्पन्न होता है, और जो कायादि के अधिष्ठायक ध्याता अन्तरात्मा के लिये स्वभिन्न रूप से ज्ञेयस्वरूप बहिरात्मा से भिन्न होता है और ध्याता अन्तरात्मा के लिये एकमात्र ध्येय- स्वरूप होने से भिन्न होता है ।' प्राशय यह है कि प्रात्मा के ही तीन स्वरूप समझा जा सकता है बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा । बहिरात्मा का अर्थ है कायादि मे हो प्रात्मबुद्धि रखनेवाली व्यक्ति । अन्तरात्मा उसे कहा जाता है जो अपने को कायादि से भिन्न और कायादि का अधिष्ठाता समझता है, किन्तु वह रागादि से ग्रस्त होता है । परमात्मा उन दोनो से भिन्न और वीतराग होता है। यह वीतराग परमात्मा ही ईश्वर है। कुछ अन्य प्राचार्यों ने इन तीनो आत्मानो का परिचय देते हुए यह कहा है कि-बहिरात्मा वह है जो मिथ्यादर्शनादि भावो मे परिणत हो । और अन्तरात्मा उसे कहा जाता है जो सम्यग्दर्शनादि भावो मे परिणत हो । और परमात्मा उसे कहा जाता है जो केवलज्ञानादि से सम्पन्न हो । इन तीनो मे ऐकान्तिक भेद नहीं है । जो व्यक्तिरूप मे बाह्यात्मा होता है वह भी शक्ति-प्रच्छन्न रूप मे अन्तरात्मा और परमात्मा भी होता है। और जो व्यक्ति रूप मे अन्तरात्मा होता है वह शक्तिरूप मे परमात्मा और भूतपूर्वदृष्टि से वाह्यात्मा होता है । एवं जो व्यक्ति रूप मे परमात्मा होता है वह भूतपूर्वदृष्टि से बाह्यात्मा और अन्तरात्मा भी होता है। परमात्मा द्वारा उपदिष्ट प्रागमो मे जिस सयमधर्म का वर्णन है उस के पालन से मुक्ति होती है, मुक्ति का अर्थ है. समग्र कर्मों का क्षय । इस मुक्ति का प्रादिमूल परमात्मा का उपदेश हो होता है इसलिए ही परमात्मा को उपचार से उन का कर्ता कहा जाता है । प्राशय यह है कि राजा आदि का - २] [शा वा. ममुच्चय स्त०३-लोक-१३ - - । अत एव भगवन्तमुद्दिश्याऽऽरोग्यादिप्रार्थना । सार्थका ऽनर्थकचिन्तायां तु भाज्यमेतन , चतुर्थभापारूपत्वात् , इति ग्रन्यकृतैव ललितविस्तरायामुक्तम् । अप्रार्थनीये कर्तरि प्रार्थनाया विधिपालनवलेन शुभाध्यवसायमात्रफलत्वादिति निगर्वः ॥११॥ अस्त्वेवं मुक्तिकत्वम्, भवकत्वं तु कय ?. अत आह- मूलम्-तदनासेवनादेव यत्संसारोऽपि तत्त्वतः तेन तस्यापि कर्तृत्वं कल्प्यमानं न दुप्यति ॥१२|| तदनासेवनात् तदुक्तवताऽपालनादेव, यत् यम्मान, तत्त्वतः परमार्थतः, संसारोऽपि नीवस्य भवति, अविरतिमूलत्वात् तस्येति भावः, तेन हेतुना, तस्यापि कठ त्वं कल्प्यमानम्-स्वहेतुक्रियाविरुद्धविधियोधितोपामनाकन्वपरेग कर्तृत्वपदेन बोध्यमानम् जैसे प्रसाद होता है तो प्रसाद से नियमवद्ध रोप-प्रप्रासाद नो होता है जिस से वह अन्यों के अनुग्रह और निग्रह का कर्ता होता है, ऐसा रोष अप्रासाद परमात्मा मे नहीं होता । तथापि जमे चिन्तामणि मे रोष और प्रसाद न होने पर भी स्वभाव से ही उससे मनुष्य के वादित की सिद्धि होती है उसी प्रकार परमेश्वर की उपासना परमेश्वर वस्तु के महज स्वभाववश मनुष्य के लिये फलप्रद होत है। इसलिए जैसे चिन्तामणी के सम्पर्क से याछित को प्राप्ति होने से चिन्तामणी वाछित का दाता कहा जाता है उसीप्रकार परमात्मा को उपासना से विभिन्न फलों की प्राप्ति से वह विभिन्न फलो का दाता या कर्ता कहा जाता है । और इसलिये भगवान से प्रारोग्यादि की प्रार्थना भी की जाती वह प्रार्थना सार्थक होती है या निरर्थक होती है इस प्रश्न का उत्तर नजना-अपेक्षाभेद से दिया जा सकता है जो चतुर्य मापा के रूप में प्रस्तुत होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि यदि यह समझा जाय कि प्रार्थना से परमात्मा प्रसन्न होकर प्रारोग्यादि को प्रदान करते हैं तो इस दृष्टि से प्रार्थना निरर्थक है। क्योंकि प्रार्थना से वीतराग परमात्मा के प्रसन्न होने की कल्पना प्रसङ्गत है। और यदि इस दृष्टि से विचार किया जाय कि परमात्मा की प्रार्थना मे ऐसी स्वाभाविक शक्ति है जिस से प्रारोग्यादि की प्राप्ति होती है तो इस दृष्टि से प्रार्थना सार्यक है। इसलिये भगवान से प्रारोग्यादि को प्रार्थना सार्थक है या निरर्थक है इस प्रश्न का उत्तर इस प्रकार दिया जा सकता कि प्रार्थना 'स्यात् साथिका, स्यात् अयिका' । इस विषय को मूल ग्रन्थकार हरिभद्रसूरिजीने 'ललित विस्तरा' मे स्पष्ट किया है। निष्कर्ष यह है कि कर्ता प्रार्थनीय न होने पर भी उसकी प्रार्थना का शास्त्र मे विधान होने से उस का पालन आवश्यक होता है और उस पालन से शुम अध्यवसाय को उपलब्धि होती है । इस रीति से शुमाव्यवसाय को उत्पादिका प्रार्थना का विषय होने के कारण परमात्मा को कर्ता कहा जाता है ।।११।। मापा ४ प्रकार की होती है-१ सत्यभापा, २, असत्यमाषा, सत्यासत्य मिश्रमाषा ४ भ-सत्या सत्य (व्यवहार)मापा । इन में से वीतराग के प्रति प्रार्थना, यह व्यवहार नाम की चतुर्थ भाषा स्वरूप ई-न सत्य न असत्य, किन्तु लाभप्रद प्रशस्ति अन्दव्यवहार ।

[८३ स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] न दुष्यति, "अगुल्यग्रे करिशतम्" इत्यादिवद् यथाकथश्चिदुपचारेण व्यवहारनिर्वाहादिति भावः ॥१२॥ नन्वीदृशकल्पनायां को गुणः १ इत्यत्राह- मूलम्-कर्तायमिति तद्वाक्ये यतः केषाञ्चिदादरः । अतस्तदानुगुण्येन तस्प कर्तृत्वदेशना ॥१३॥ 'अयम् ईश्वरः कर्ता' इति हेतोः तद्वाक्ये-ईश्वग्वाक्ये सिद्धान्ते । 'अयं कर्ता' इति तद्वा- क्ये प्रसिद्धवाक्ये वा, यतः केषांचित-तथाविधभद्रकविनेयानाम् , आदरः-स्वरसवाहिश्रद्धा- नात्मा भवति, अतस्तदानुगुण्येन-तथाविधविनेयश्रद्धाभिवृद्धये, तस्य परमात्मनः कर्तृत्वदे- शनाक वोपदेशः । श्रेठमावाभिवृद्धयर्थो हि गुरोरुपदेशः, सा च कल्पितोदाहरणेनापि निर्वाह्यते, किं पुनरुपचारेण १ इति भावः ॥१३॥ - [प्राज्ञाविलोपन द्वारा भवकर्तृता] पूर्व कारिका मे ईश्वर को मुक्ति कर्ता बताया गया है । और प्रस्तुत १२ वीं कारिका मे वह जगत् का कर्ता कैसे होता है इस बात का प्रतिपादन किया गया है । कारिका का अर्थ इसप्रकार है- परमेश्वर द्वारा उपदिष्ट व्रतो का सेवन न करने से ही जीव को वास्तवरूप मे ससार की प्राप्ति होती है, क्योकि ससार का मूल अविरति है । और उस का प्रतियोगीविधया प्रयोजक है विरति अदि प्रतः उक्तरीत्या ससार के प्रयोजक का उपदेष्टा होने से यदि ईश्वर मे ससार के कर्तृत्व की कल्पना की जाय तो कोई दोष नहीं हो सकता, क्योकि संसार का यह कर्तृत्व ससारजनककृतिरूप वास्तविक कर्तृत्व नहीं है, अपितु औपचारिक कर्तृत्व है । अतः 'ईश्वर ससार का कर्ता है' इस का अर्थ है कि ईश्वर ऐसे व्रतो का उपदेष्टा है जिस का सेवन न करने से ससार बनता है । ईश्वर मे ससारकर्तृत्व का यह प्रौपचारिक व्यवहार उसी प्रकार उपपन्न किया जा सकता है जिसप्रकार 'अड्गुल्यग्रे करि- शतम् अडगुल के अग्रभाग मे सौ हाथी खडे है' यह व्यवहार अड्गुली के अग्रभाग से सौ हाथी की गिनती होने के आधार पर उपपन्न किया जाता है ॥१२॥ (ईश्वर भक्ति में वृद्धि के लिये कर्तृत्व का उपदेश) १३ वीं कारिका मे इस जिज्ञासा का समाधान किया गया है कि ईश्वर मे संसार के प्रोप- चारिक कर्तृत्व की कल्पना का क्या प्रयोजन है ? कारिका का अर्थ इस प्रकार है- कतिपय मद्रशील शिष्यो को ईश्वर के वचन मे इसलिये प्रादर होता है कि वे 'ईश्वर कर्ता है' इस विश्वास से बद्ध होते है अथवा ईश्वर का है' इस प्रसिद्ध लोकोक्ति मे उन की श्रद्धा होती है। अत ऐसे शिष्यो को ईश्वर के प्रति श्रद्धा को अभिवृद्धि के अभिप्राय से परमात्मा के कर्तृत्व का प्रतिपादन आवश्यक होता है । माशय यह है कि श्रोता के भाव का सवर्धन ही गुरु के उपदेश का फल ।

८४ ] [ शा. या० समुच्चय-स्त० ३-ग्लो० १४ साक्षादपि क त्वं समर्थयति- मूलम्-परमैश्वर्ययुक्तत्वान्मत आत्मैव वेश्वरः । स च कति निर्दोपः कर्तृवादो व्यवस्थितः ॥१४॥ परमैश्वर्ययुक्तत्वात्= निश्चयतो घनाऽऽवृतम्यापि ग्वेः प्रकाशस्वभावत्ववत्त कर्मा- ऽऽवृतस्याऽप्यात्मनःशुद्ध-बुकम्वभावत्वेनोत्कृष्टकेवलनानाधतिशयशालित्वात , आत्मैव-जीव एव वा, ईश्वरो मतः ईश्वरपदैन मंकेतितः । स च-जीवश्च कर्ता-साक्षात्कर्ता इति हेतोः, निदोपः-उपचारेणाऽप्यकलङ्कितः, कर्तृवाद:- :-ईश्वरक वोपदेशः, व्यवस्थितः प्रमाणमिद्धः । अत एव "विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखः" इत्यादिका श्रुतिरप्युपपद्यते जीवस्य निश्चयतः सर्वज- अन्यथा रागाद्यावरणविलये तदाविर्भावानुपपत्तेः । "उत्तमः पुरुपस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य विमर्त्यव्यय ईश्वरः" ॥ [गीता अ.१५श्लो. १७] इत्यादिकमप्युपपद्यते, आवृतम्वरूपादनावृतस्वरूपस्य भिन्नत्वात् चैतन्यात्मकमहामामान्येन लोकत्रयावेशाद् ग्राह्याकारकोडीकृतत्वेन तद्भरणाच्च, इत्यादिरीत्या यथाऽऽगमं पराभिप्राय उपपादनीयः ॥१४॥ त्वात्, होता है। और यह कार्य जब फल्पित उदाहरण से भी सम्पन्न करना शास्त्रसम्मत है तब इस कार्य फो उपचार द्वारा सम्पन्न करना युक्त ही है इस मे क्या सदेह ? ॥१३॥ [प्रात्मा ही परमात्मा होने से निर्वाध कर्तृत्व] पूर्व कारिका तक ईश्वर मे कर्तृत्व का समर्थन उपचार द्वारा किया गया है किन्तु प्रस्तुत १४ वीं कारिका मे ईश्वर के वास्तव कर्तृत्व का समर्थन किया जाता है ।। कारिका का अयं इस प्रकार है- जिस प्रकार सूर्य मेघमाल से आच्छन्न होने पर भी निश्चय दृष्टि से स्वभावत प्रकाशात्मक ही रहता है उसी प्रकार विविधकर्मों मे आवृत भो मारमा स्वभावत शुद्धवृद्ध स्वरूप हो रहता है । अत एव उस समय भी उस मे केवलज्ञानादि के अतिशय अक्षुण्ण रहते हैं । और आत्मा की यह शुद्धबुद्धता एवं केवलज्ञानादि के अतिशयों को संपन्नता ही जीव का परमेश्वर्य से सम्पन्न होना है और इस निश्- चयष्टिसम्मत सार्वदिक परमेश्वयं के कारण लोव को ही ईश्वर माना जाता है एवं जीव निर्विवाद स्प से वास्तविक कर्ता है और जव जीव ही ईश्वर है, तो ईश्वर का वास्तव कर्तृत्व नी निविवाद है । अत ईश्वरकर्तृत्ववाद निर्दोष अर्थात् अनौपचारिक रूप मे प्रमाणसिद्ध है । जीव के निश्चय- दृष्ट्या सर्वत्र होने के कारण विश्वतश्चक्षु उत विश्वतो मुख' इत्यादि श्रुति द्वारा उसे सर्वदर्शी और सर्वोपदेष्टा आदि वताना मी उपपन्न हो जाता है । जीव को सार्वकालिक सर्वज्ञता स्वीकार करना परमावश्यक है क्योकि यदि उस मे सहज सर्वज्ञता न होगी तो रागादि आवरणों का विलय होने पर उस का मावि व न हो सकेगा। गीता मे परमात्मा को अन्य आत्माओ से भिन्न उत्तम पुरुष कहा गया है और तीनों लोक मे माविष्ट होकर उन का शाश्वत धारक कहा गया है । गीता का यह कथन भी जोवेश्वरत्व पक्ष मे निर्वाचस्प से उपपन्न हो सकता है, क्योंकि रागादि से आवृत आत्मस्वरूप से रागादि - स्या० का टीका और हिन्दी विवेचना ] ८५ - यत:- मूलम-शास्त्रकारा महात्मानः भायो वीतस्पृहा भवे सत्वार्थसंप्रवृत्ताश्च कथं तेऽयुक्तभाषिणः १ ॥१५॥ शास्त्रकाराः प्रायः लोकायतादीन् परलोकाऽभीरून विहाय, महात्मानः धर्मा- भिमुखाः भवे-संसारे, वीतस्पृहाः लोकमानख्याति-धनलिप्सादिरहिताः सत्त्वार्थसंप्र- त्ताश्च यथावोधं परोपकारप्रवृत्ताश्च, अन्यथेशप्रवृत्त्ययोगतः, ततः कथं तेऽयुक्तभापिणः-ज्ञात्वा विरुद्धभाषिणः १ विरोधः खलु जल-ज्वलनयोरिव परोपकारित्व-विरुद्धभापित्वयोरिति भावः ॥१५॥ ततः किम् ? इत्याह- मूलम्-अभिप्रायस्ततस्तेषां सम्यग् मृग्यो हितैषिणा न्यायशास्त्राऽविरोधेन यथाह मनुरप्यदः ॥१६॥ ततः-अविरुद्धभापित्वात् , तेषां-परोपकारार्थ प्रवृत्तानां शाम्बकाराणाम् , अभिप्रायः शब्दतात्पर्यात्मा, सम्यग् व्यासगपरिहारेण, मृग्या-उन्नेयः, हितैषिणा=मुमुक्षुणा, न्याय- से अनावृत आत्मस्वरूप भिन्न कहकर उसे उत्तम पुरुष और परमात्मा कहना उचित ही है और चैतन्यरूप महासामान्य के द्वारा लोकत्रय मे उस का आवेश और ग्राह्य आकार मे लोकत्रय को अङ्क- स्थित कर उन का भरण सभव होने से आवेश द्वारा उसे लोकत्रय का घारक कहना भी समीचीन ही है। इस प्रकार ईश्वर के सम्बन्ध मे जो नैयायिक का अभिप्राय है उस का समर्थन और उपपादन अपने शास्त्र की रीति से जीवेश्वरत्व पक्ष मे भी किया जा सकता है ॥१४॥ [ निःस्पृह शास्त्रकार अयुक्तभाषी नही होते ] १५ वीं कारिका मे उन सभी विद्वानो को विश्वसनीय बताया गया है जो परलोक के सम्बन्ध मे मीरु होने के कारण अनुचित बात कहना नहीं चाहते । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- प्राय सभी शास्त्रकार जो परलोक के सम्बन्ध मे निर्भय रहनेवाले चार्वाकादि की श्रेणी मे नहीं आते-महात्मा होते हैं । उन को सम्पूर्ण प्रवृत्ति धर्ममुखी होती है । संसार मे उन्हें मान-ख्याति धनादि किसी वस्तु की स्पृहा नहीं होती । वे अपनी मति के अनुसार परोपकार मे निरत होते है। इसीलिये वे निर्दोष कर्मों की शिक्षा देने के लिये शास्त्रो को रचना करते हैं, अत वे जान बुझकर कोई विरुद्ध बात नहीं कह सकते चूकि परोपकार को प्रवृत्ति और जानवुझार विरुद्ध बात का कथन इन दोनो मे पानी और अग्नि के समान परस्पर विरोध है ॥१५॥ [युक्ति और आगम से शास्त्रकाराभिप्राय का अन्वेषण पूर्व कारिका मे सभी शास्त्रकारो की प्रशसा की गयी है । इस प्रशसा को सुनकर यह जिज्ञासा हो सकती है कि क्या जैन शास्त्रकारो के समान ही अन्य शास्त्रकारो की बातें स्वीकार्य है ? १६ वीं कारिका मे इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है- कारिका का आशय यह है कि जब सभी शास्त्रकार परोपकार मे प्रवत होने के कारण अनुचित बात कहना नहीं पसन्द करते तो यह आवश्यक है कि उनके जो मी शब्द हैं उन के तात्पर्य को इस प्रकार ८६ ] [शास्त्रवासिमुच्चय स्त०३-रलो०१७ शास्त्राविरोधेन-युक्त्याऽऽगमबाधा यथा न स्यात् तथा, न तु यथाश्रुतग्रहणमात्रेणाऽऽध्ये मज्जनीयं मनः, अन्यथा 'ग्रावाणः प्लवन्ते' इत्यादिश्रुतिश्रवणेन गगनमेवाऽवलोकनीयं स्यात् । अत्र पराऽभियुक्तसंमतिमाह-यथा मनुरपि अदः-वक्ष्यमाणम् आह ॥१६॥ किम् १, इत्याह- मूलम्-आप॑ च धर्मशास्त्र च वेदशास्त्राऽविरोधिना । यस्तर्केणानुसपत्ते स धर्म वेद नेतरः ॥१॥ आप च-वेदादि, धर्मशास्त्रं च पुराणादि । 'आपं धर्मोपदेशं च इति क्वचित् पाठः, तत्राऽप्ययमेवार्थ:-आप-मन्वादिवाक्यम् , धर्मजनक उपदेशःधर्मोपदेशः, धर्मस्येश्वरम्य वोपदेशो धर्मोपदेशस्तं, 'वेदम्' इत्यन्ये । वेदशास्त्राविरोधिना--परस्परं तदुभयाऽविरोधिना तर्केण यः अनुसंधत्ते तदर्थमनुस्मरति, स धर्म वेद-जानाति, नेतरः-ऊहरहितः । तस्मादीश्वरक- समझने का प्रयत्न किया जाय जिस से मुमुक्षु के मार्ग मे कोई कठिनाई न हो और युक्ति तथा शास्त्र का कोई विरोध न हो । असा नहीं होना चाहिये कि उनके शब्दों से जो भी अयं आपाततः प्रतीत हो उसे ही परमार्थ मानकर उसी मे अपने मन को अभिनिविष्ट कर दिया जाय, क्योंकि ऐसा होने पर 'प्रावाण प्लवन्ते पत्थर तैरते हैं। ऐसे वेदवचनों को सुनकर आश्चयचकित हो आकाश के प्रति देखने को स्थिति उत्पन्न हो सकती है । इस विषय मे आहतो की ही सम्मति है इतना ही नहीं अपितु अन्य मतावलम्बियों के सम्मान्य पुरुष को भी सम्मति है । उदाहरणार्थ मनु के इस आशय का वचन प्रस्तुत किया जा सकता है- (धर्म तत्त्व के वोघ का उपाय तर्कानुसंधान-मनुवचन) पूर्व कारिका मे मनु के जिस वचन का सकेत किया गया है, १७ वी कारिका उस वचन के रूप मे ही अवतरित की गई हैं । कारिका का अर्थ यह है- जो व्यक्ति ऋषि वेदादि शास्त्रों को और पुराणादि धर्मशास्त्रों को वेद और शास्त्र के अवि- रोधी (शास्त्र से विरुद्ध न पडने.वाले) तक के द्वारा समझता है अर्याद ऐसे तर्क मे वेद और धर्मशास्त्र के अर्थ का निर्धारण करता है जो तर्क वेद और शास्त्रों से विरुद्ध न हो, वही व्यक्ति धर्म के तत्त्व को जान पाता है । और जो तर्क की सहायता नहीं लेता वह धर्म के तत्त्व को नहीं समझ सकता। व्यास्या- कार ने इस कारिका की व्याम्या करते हुये 'आषं धर्मोपदेश च' इस मनुवचन के पाठान्तर का भी उल्लेख किया है और उस का भी वही अर्थ किया है जो आप च धर्मशास्त्र च' इस पाट से अभि- मत है । कुछ अन्य लोगों द्वारा 'आपं धर्मोपदेश च' उस पाठ का दूसरा अर्थ किया गया है उस का उल्लेख व्यारयाकार ने इस प्रकार किया है कि आर्ष शब्द का अर्थ है मनुमादि ऋषियों का वाक्य जैसे 'मनुस्मृति' आदि ग्रन्य, और 'धर्मोपदेश' शब्द का अर्थ है वेद, क्योंकि वेदके पाठ धर्म होता है, और वेद से धर्म और ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान होता है शास्त्र के तात्पर्य का निर्णय करने के लिये शास्त्राऽविरोधी तर्क के अबलम्बन की आवश्यकता के सम्बन्ध में प्रास्तों और पराभिमत मनु आदि शिष्टपुरुषों को सम्मति बताकर व्याख्याकार ने स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचन ] त्वप्रतिपादकपरागमस्याऽप्ययमेवाऽऽशयो युक्तः, इति सम्यग्दृष्टिपरिगृहीतत्वेन तत्प्रमाण्यमुपपाद- नीयम् । द्रव्यासत्याभिधानं चेदं ग्रन्थकारस्य तत्प्रमाण्याभ्युपगन्तश्रोतृपरिवोधार्थम् । इत्येवं पटुरीश्वरव्यतिकरः सत्तर्कसंपर्कभाग, येषां विस्मितमातनोति न मनस्ते नाम वामाशयाः । अस्माकंतु स एक एव शरणं देवाधिदेवः सुखाम्भोधौ यस्य भवन्ति विन्दव इव स्वः समनां संपदः ॥१७॥ कारिकाकार का यह आशय बताया है कि ईश्वर मे जगत्कर्तृत्व का प्रतिपादन करने वाले अन्य शास्त्री का भी अभिप्राय शास्त्राऽविरोधी तों से ही निश्चित करना उचित है । ऐसा करने से सम्यग्दृष्टि से परिगृहीत होने के कारण अन्यशास्त्रों का भी प्रामाण्य सिद्ध हो सकता है । व्याख्याकार यशोविजयजी का कहना है कि 'तर्क की सहायता से वेद और भी धर्म का ज्ञान होता है' इस द्रव्याऽसत्य का अभिधान ग्रन्थकार ने इस दृष्टि से किया है जिस से वेद और पुराण को प्रमाण माननेवाले श्रोताओ को भी शुद्ध धर्म ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मील सके । ईश्वर कर्तृत्व के सम्बन्ध मे अब तक के सम्पूर्ण विचारो का उपसंहार करते हुए व्याख्याकार ने अपना अन्तिम अभिमत प्रकट किया है कि-'समीचीन तर्कों के सम्पके से ईश्वर के कर्तृत्व के सम्बन्ध मे जो आर्हत सम्मत प्रभावपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है, उस से जिन मनुष्यो का मन हर्ष और विस्मय से उत्फुल्ल नहीं होता वे निःसदेह हृदय को मलीनता से ग्रस्त है अर्थात् उनका हृदय यथार्थ वस्तु को ग्रहण करने के अयोग्य है। हम आहतो के तो एकमात्र वही देवाधिदेव आश्रय है-स्वर्गस्थ देवताओ, की सम्पत्ति जिन के सुख समुद्र के आगे बिन्दु के समान है ॥१७॥ [ ईश्वरकर्तृत्ववाद समाप्त ] पुराण आदि से ८] [ शा. वा. समुच्चय स्त०-३ ग्लोक-१८ . - वार्तान्तरमाह- मूलम्-प्रधानोद्भवमन्ये तु मन्यन्ते सर्वमेव हि । महदादिक्रमेणेह कार्यजातं विपश्चितः ॥१८॥ अन्ये तु विपश्चितः सांख्याः इह सामग्रीविचारे, सर्वमेव हि कार्यजानं महदादि- क्रमेण प्रधानोद्भवं मन्यन्ते । तथाहि-तेषां पञ्चविंशतिस्तत्त्वानि, तत्राऽकारणं अकार्य' च कूटम्यनित्यचैतन्यरूप आत्मा । प्रकृतिरचेतना, महदाद्युत्पादकाऽगेपशक्तिप्रचिता, आदिकारणम् , परिणानिनी च । तदमावे हि परिमितं व्यक्तं न स्यात् , तथोत्पादकत्वभावात् । न च स्याद् मेदा- नामन्वयः, तन्मयकारणप्रभवत्वं विना तज्जातिमत्कार्यानुपलब्धेः । न च बुद्धिरेव कार्यधर्मानु- विधायिनी, अमाधारणत्वात् अनित्यत्वाच्च । न च महदादिहेतुशक्तिप्रवृत्तिः म्याद । न हि पटादिजननी शक्तिस्तन्तुवायादिकमाधारं विना प्रवर्तते । तथा, कारण-कार्यविभागोऽपि न स्यात् , महदादी कार्यत्वव्यवहारम्य संवन्धिसापेक्षत्वात् । न च स्यात् क्षीरावस्थायां क्षीरं दध्न इव प्रलये भृतादीनां तन्मात्रादिक्रमेणाऽविवेकरूपोऽविभाग इति प्रकृतिसिद्धिः । तदुक्तम्- १८ वी फारिका से सारयदर्शन के सिद्धान्त का विचार प्रस्तुत किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- सांख्यदर्शन के सिद्धान्त सात्य शास्त्र के वेत्ता अन्य विद्वान् सम्पूर्ण कार्यों को महत् तत्त्व आदि के क्रम से प्रकृति से उत्पन्न मानते हैं । उन का कहना है-जिन तत्वो से जगत् का विस्तार होता है उन की संख्या पच्चीश है। उन मे दो तत्त्व सर्वापक्षया मुख्य हैं । जिन मे एक तत्त्व वह है जिसे आत्मा कहा जाता है, वह कूटस्य निर्विकार नित्य चैतन्यरूप है । वह न किसी का कारण होता है और न किसी का कार्य होता है । और दूसरा तत्त्व वह है जिसे प्रकृति कहा जाता है, वह अचेतन होती है और महत् तत्त्वादि अन्य २३ तत्वो को उत्पन्न करने की शक्ति से सम्पन्न होती है। वह सब का आदि कारण है और उस मे महत्तत्त्व आदि रूपों में परिणत होने को योग्यता रहती है। उसे मानना अति आवश्यक है क्योकि (१) उस के अभाव मे परिमित एव व्यक्त जगत की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि उसे उत्पन्न करनेवाला दूसरा कोई हेतु नहीं है । (२) उसे मानने को आवश्यकता इसलिए भी है जिस से विभिन्न कार्यो मे एकल्पता हो सके, क्योकि कार्यों की उत्पत्ति यदि एक सन्श कारण से न होगी तो कार्या मे कारण के द्वारा एफजातीयता को उपलब्धि न हो सकेगी। यहां एकरुपता का कार्य बुद्धि यानी महत् तत्त्व से नहीं सम्पन्न हो सकता है चू कि वह वृद्धि सम्पूर्ण कार्यों का अनुविधान नहीं कर सकती, इसका कारण- वह सर्वसाधारण नहीं होती और स्वयं अनित्य होती है । (३) प्रकृति तत्त्व मानने का यह भी आधार है कि प्रकृति के अभाव मे महत्तत्त्व आदि कारण शक्तियो की प्रवृत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि कारण शक्तियों को प्रवृत्ति किसी एक सामान्य आधार द्वारा ही होती है। जैसे पट आदि को उत्पन्न करने वाली तुरी वेमा आदि शक्तियां तन्तुवाय रूपी आधार के बिना नहीं प्रवृत्त होती । (४) यह मो कारण - स्पा० ० टीका-हिन्दीविवेचना ] [E . "भेदानां परिमाणात् समन्वयाच्छक्तिसंप्रवृत्तेश्च । कारण-कार्यविभागादविभागाद् वैश्वरूप्यस्य ॥१॥" (सांख्यकारिका १५ ) इति । न चाऽसदेव महदादिकमुत्पद्यताम् , किं तत्समन्वयार्थ प्रकृत्यनुसरणेन ? इति वाच्यम्, असतोऽनुत्पत्तेः । तदुक्तम्- "असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत् कार्यम् ॥" [सां० का० ९] असतः शशविपाणादेः सत्त्वस्य कत्तु मशक्यत्वात् सत एव हि सत्कारणम् , तद्धर्मत्वात् , दृष्टं च तिलेषु सत एव तैलस्य निष्पीडनेन करणम् , असतस्तु करणे न निदर्शनम् । न च विद्यमानप्रागभावप्रतियोगित्वरूपस्याऽसत्त्वस्य विद्यमानत्वरूपस्य च सत्त्वस्य न विरोध इति साम्प्रतम् , लाघवादविद्यमानत्वस्यैवाऽसन्वरूपत्वात् , तेनैव सर्वत्राऽनुगताऽमत्त्वव्यवहारात् । है कि प्रकृति के अभाव मे कार्य और कारण का विभाग भी नहीं हो सकता क्योंकि कार्यत्व का व्य- वहार कारण-सापेक्ष होता है । अत: यदि महत् तत्त्व आदि का कोई कारण न होगा तो उन मे कार्यत्व का व्यवहार नहीं हो सकेगा। (६) प्रकृतितत्त्वसमर्थक यह भी एक तर्फ है कि प्रकृति के अभाव मे प्रलयावस्था मे भूत आदि कार्यों का तन्मात्र आदि के क्रम से एक कारणावस्था में अविमाग-अविवेक -अपार्थक्य न हो सकेगा जिस का होना, ठीक उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार दुग्ध को अवस्था मे दुग्ध और दघि का अविभाग होता है। प्रकृति के अस्तित्व के समर्थन मे कहे गये इन समस्त हेतुओ को ईश्वर कृष्ण ने अपने 'साख्य- कारिका' नामक ग्रन्थ मे १५ वी कारिका से अभिहित किया है। जिस का यह अथ है कि कार्यों के परि- मित होने से और कारण के साथ अन्वय होने से और कारण शक्तियो की प्रवृत्ति होने से तथा कारण- कार्य का विभाग होने से और संपूर्ण कार्यों का एक कारणावस्था मे अविभाग होने से प्रकृति का अस्तित्व सिद्ध होता है। [सत्कार्यवाद में हेतुपञ्चक] यह शका हो सकती है कि-महत्तत्त्वादि कार्यों की उत्पत्ति के पूर्व असत् की ही उत्पत्ति मानी जाय तो कारण मे पूर्व से ही उस के अन्षय की आवश्यकता न होगी । अत उस के लिये प्रकृति के अस्तित्व की कल्पना अनावश्यक है। किन्तु यह शङ्का उचित नहीं है क्योंकि असत् की उत्पत्ति नहीं होती, जैसा कि ईश्वरकृष्ण ने 'असदकरणात०' इस कारिका मे स्पष्ट किया है । कारिका का आशय यह है कि जो असत् पदार्थ हैं उन को अस्तित्व मे आते हुए आज तक कभी नहीं देखा गया । इसलिये प्रथमत. सस्पवा ही होता है । अत: असत्पदार्थ न कारण ही होता, न कार्य ही होता है। कार्य कारण का धम होता हैं । असत् मानने पर वह कारण का धर्म नहीं हो सकता । अत. उसे उत्पत्ति पूर्व में भी कारण मे सत् मानना आवश्यक है । यह देखा मी जाता है कि तिल मे प्रथमतः विद्यमान हो तेल का तिल- पेषण करने पर प्रादुर्भाव होता है । असत्पदार्थ की उत्पत्ति होने का कोई भी दृष्टान्त नहीं है । यदि यह कहा जाय कि-'कार्य का उत्पत्ति क पूर्व मे जो असत्त्व होता है वह विद्यमान प्रागभाव का प्रतियोगित्वरूप होता है और उत्पत्ति होने पर जो उस का सत्त्व होता है वह विद्यमानत्वरूप होता है । अत: इस प्रकार के असत्व और सत्व मे कोई विरोध नहीं है । पूर्वकाल मे जिस का प्राग. .

१०] [शा०या० ममुच्चय स्त० 3-श्लोक १८ तथा, उपादानग्रहणादपि सत कार्यम् , अन्यथा 'शालिफलार्थिनः शालिवीजम्येवोपादानम् , न कोद्रवीजादेरि ति प्रतिनियमानुपपत्तेः, फलाऽयोगस्योभयत्राऽविशेषात् । 'उपादानेन ग्रहण मंबन्धस्ततोऽसतः मंबन्धामावाद' ! इत्यन्ये । तथा, मर्वयंभवाऽभावात सन कार्यम् , अगतः कारणेऽमंबद्धाऽविशेपे सर्व सर्वस्माद मवेत् , न चैवम् , तस्माद कार्य प्रागुत्पत्तः कारगणेन सह संवद्धम् | यथाः- "असत्त्वाद् नास्ति संबन्धः कारणः सत्वमङ्गिमिः । असंबद्धेपु चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥१॥" इति ।[ ] भाव रहा उत्तरकाल मे उस का भाव मानने मे कोई असङ्गति नहीं है। एक काल में ही किसी वस्तु का भावाभाव विरुद्ध हो सकता है, भिन्नकाल में नहीं । शशसींग का दृष्टान्त असत् को अनुत्पत्ति बताने मे उचित नहीं हो सकता । पयोकि शशसींग का प्रागभाव न होकर मादिक अभाव होता है, प्रागभाव उसी का होता है-बाद मे कमी जिम फा भाव सम्भव हो।'-तो यह कथन भी ठीक नहीं है पयोंकि असत्व को विद्यमान प्रागभाय प्रतियोगित्वस्प मानने मे गौरव है मत. अविद्यमानत्व अर्थान सपूर्णकाल मे अभाव को हो असत्वरूप मानना लाघव के कारण उचित है. उसी से सर्वत्र अमत्त अनुगत व्यवहार की उपपत्ति हो सकती हैं । अत शशसींग मे सादिक अनाव से असत्व व्यवहार का और कार्यों में प्रागभावप्रतियोगत्वरूप असत्त्व से असत्त्व व्यवहार का उपपादन करना उचित नहीं है चयोंकि ऐमा मानने पर व्यवहार को अनुगतस्पता का भङ्ग हो जाता है। कार्यविशेष के लिये कारणविशेष को हो नियमित रूप से ग्रहण किया जाता है. इसलिये भी उत्पत्ति के पूर्व कार्य का अस्तित्व मानना आवश्यक है । यदि कार्य उत्पत्ति के पूर्व असत् होगा तो काय के लिये सारे पदार्य समान होगे। और इस का फल यह होगा कि शालि-उत्तमकोटि का धान्य जिस से उत्कृष्ट कोटि का चावल प्राप्त होता है-उसके लाम के लिये किसान शालि बीज का ही नियम से उपादान न कर सकेगा। कोद्रव यानी निकृष्ट धान्य के बीज को ग्रहण करने मे भी उस की प्रवृत्ति फो प्रसक्ति हो सकती है । क्योकि उत्पत्ति के पूर्व शक्ति का असत्त्व शालिवीज और कोद्रव के बीज दोनो मे समान है । तो फिर क्या कारण है कि किसान शालि के लाभ के लिये शालि बीज का ही उपादान करे और कोद्रव के बीज का उपादान न करे । उत्पत्ति के पूर्व कारण मे कार्य का अस्तित्व मानने पर इस प्रश्न का समाधान तुकर होता है। वह इस प्रकार कि शालि शालिबोज मे प्रथमतः रहता है और कोद्रव के बोज मे नहीं रहता है इसलिये किसान समझता है कि शालिवोज से ही शालि का लाभ हो सकता है कोद्रव के बीज से नहीं । अत. वह शालि लाभ के लिये शालि बीज को ही ग्रहण करता है न कि कोदवबीज को। [ उपादान और कार्य के सम्बन्ध को अनुपपत्ति अन्य विद्वान कारिका मे आये 'उपादानग्रहण' शब्द का अर्थ उपादान के साथ कार्यसम्बन्ध बताकर उससे यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यदि कार्य की उत्पत्ति के पूर्व असत् माना जायगा तो कारण के साथ उस का सम्बन्ध न हो सकेगा । क्योकि सम्बन्ध सत्पदार्थों मे ही होता है । असत् और सत् का सम्बन्ध नहीं होता । कार्य को उत्पत्ति के पहले सत् मानना इसलिये भी आवश्यक है स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [. तथा, अशक्तस्य जनकत्वेऽतिप्रसङ्गमाच्छक्तस्य जनकत्वं वाच्यम् , शक्तिश्चास्य न सर्वत्र, तथैवाऽतिप्रसङ्गाद , किन्तु क्वचिदेव, इति कथमसति कार्ये कारणस्य शक्तिर्नियता स्यात् , असतो विषयत्वाऽयोगात् १ तस्मात् , कारणात् प्रागपि शक्यं सदेव । तथा कारणभावात् कारणतादात्म्यादपि सत् कार्य, नाऽवयवी अवयवेभ्यो भिद्यते, तथाप्रतीत्यमावात्; 'कपालं घटीभूतम् , तन्तुः पटीभूतः, स्वर्ण कुण्डलीभूतम् ' इत्यादिप्रतीतेः । तस्माद् महदादिकार्यस्यो- त्पत्तेः प्रागपि यत्र माचं सा प्रकृतिः । कि किसी भी कार्य की उत्पत्ति नियत पदार्थ से ही होती है सब पदार्थों से उत्पत्ति नहीं होती। किन्तु यदि पदार्थ से असत्कार्य की उत्पत्ति होगी तो यह मानना होगा कि पदार्थ अपने से अम्सबद्ध वस्तु का उत्पारन करता है, ऐसी स्थिति मे फिसी नियत पदार्थ से ही कार्य की उत्पत्ति न होकर तपूण पदार्थों से सभी कार्य की उत्पत्ति का प्रसङ्ग हागा, क्योकि कार्य जैसे किसी एफ नियत पदार्थ से अपम्बद्ध होता है उसोप्रकार सभी पदार्थों से असम्बद्ध होता है । इसलिये इस बात मे कोई व्यवस्था न हो सकेगी कि अमुफ कार्य अमुक पदार्थ से ही उत्पन्न हो और अन्य से न हो । किन्तु कार्य फो उ पत्ति के पूर्व सत् मानने पर यह सङ्कट नहीं उपस्थित हो सकता, क्योकि तब कहा जा सकता है- सत्तत्कार्य का तत्तत्पदाथ के हो साथ सम्बन्ध होता है सब पदार्थों के साथ नहीं होता और पदार्थ का यह स्वभाव है कि वह सम्बद्ध कार्य का हो उत्पादक होता है असम्वद्ध का नहीं, अत. सव पदार्थो से सब कार्यों की उत्पत्ति का आपादन नहीं हो सकता । जैसा कि कहा गया है कि- 'उत्पत्ति के पूर्व कार्य का असत्व मानने पर सत् कारणो के साथ असत कार्य का सम्बन्ध न हो सकेगा । और यदि असम्बद्ध पदार्थों मे हो कार्य की उत्पत्ति मानी जायगी तो अमुक पदार्थ ही मे अमुक कार्य की उत्पत्ति हो अन्य में न हो यह व्यवस्था नहीं बन सकती।' उत्पत्ति के पूर्व कार्य को सत् इसलिये भी मानना आवश्यक है कि जो पदार्थ जिस कार्य के उत्पा- दन की शक्ति से शून्य होता है उस से उस कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है किन्तु जिस पदार्थ मे जिस कार्य के उत्पादन की शक्ति होती है उसी से उसकी उत्पत्ति होती है, और तत्तत्कार्य के उत्पादन की शक्ति सर्वत्र न होकर नियत पदार्थो मे हो होती है। किन्तु यह बात उत्पत्ति के पूर्व कार्य को सत् मानने पर ही बन सकती है अमत् ।मानने पर नहीं, क्योकि असत वस्तु किसी पदार्थ का शक्य नहीं हो सकती है । क्योकि शश्य-शक्तभाव भी एक प्रकार का सम्बन्ध ही हैं । अन एव वह सत् पदार्थो के हो बीच सम्भव हो सकता है, सत् और असत् के वीच सम्भव नहीं हो सकता । उत्पत्ति के पूर्व कार्य को स्त् मानना इमलिये भी आवश्यक है कि उस मे कारण का तादात्म्य होता है। यदि वह अमत् होगा तो उस मे कारण का तादात्म्य न हो सकेगा क्योकि सत् और असत् प्रकाश और अन्धकार के समान अत्यन्त चिलक्षण है, अत एव उन मे तादात्म्य कथमपि सभव नहीं हो सकता। यदि यह कहा जाय कि-कार्य अवयषी होता है और कारण उस का अवयव होता है अत कार्य मे कारण का तादात्म्य मानना असगत है । अतः कार्य मे कारण का तादात्म्य बता कर उसके द्वारा उत्पत्ति के पूर्व कार्य के सत् होने का समर्थन करना उचित नहीं हो सकता'-तो यह ठीक नहीं है प्योकि अवयव-अवयवी मे अवयवो की भिन्नता की प्रतीति न होने से अवयवी मे अवयवो का भेद ९२] [ शा.वा.समुच्चय स्त०-३श्लोकएक ततो बुद्धयपरनामकं महत्तत्त्वमुन्पद्यते, न हि चैतन्यस्य स्वभावतो विषयावच्छिन्नत्वम् , अनिर्मोक्षापत्तेः । नापि प्रकृत्यधीनं तत् , तस्या अपि नित्यतया तद्दोपानुद्धारात् । नापि घटादि- रेवाऽऽहत्य चैतन्यावछिन्नः, दृष्टाऽदृष्टतत्त्वानुपपत्तेः । न चेन्द्रियमात्रापेक्षो घटादिचैतन्यावच्छेदः, स्वीकार्य नहीं हो सकता। अपितु 'कपाल घट हो गया, तन्तु पट हो गया, सुवर्ण कुण्डल हो गया' इन सार्वजनिक प्रतीतियो के अनुरोध से अवयव और अवयवी का तादात्म्य हो सिद्ध होता है । इन सब युक्तियो का निष्कर्ष यह है कि महत्तत्त्वादि पदार्य कार्य है अत एव उत्पत्ति के पहले उनका अस्तित्व मानना आवश्यक है और यह अस्तित्व किती प्राधार मे ही हो सकता है । अत महदादि कार्य अपनी उत्पत्ति से पूर्व जिस आधार में विद्यमान होंगे उसी का नाम प्रकृति है। इस प्रकार सत्कार्यवाद को उपपत्ति के लिये प्रकृति का अस्तित्व मानना अनिवार्य है। [ महत्तत्त्व से चैतन्यावच्छेद और श्वासादि का नियमन ] प्रकृति से महवतन्त्र की उत्पत्ति होती है जिसका दूसरा नाम बुद्धि है। इसी के द्वारा चैतन्य- स्वरुप पुरुष के साथ विषयावच्छिन्नत्व लक्षण विषय का सम्बन्ध बनता है । यदि उस का अस्तित्व न माना जायगा तो पुरुष के साथ विषय का सम्बन्ध स्वाभाविक मानना होगा और उस स्थिति मे विषय और पुरुष का सम्बन्ध विच्छेद न हो सकने से पुरुष का कमी मोक्ष न हो सकेगा । और अनित्यवृद्धि को सत्ता स्वीकार कर उसके द्वारा पुरुष के साथ विषय का सम्बन्ध मानने पर वृद्धि को निवृत्ति होने पर विषय के साथ पुरुष के सम्बन्ध का विच्छेद संभव होने से पुरुष के मोक्ष मे कोई वाधा नहीं हो सकती। बुद्धि का अस्तित्व न मानकर पुरुष के साथ विषय का सम्बन्ध यदि प्रकृति- द्वारा माना जाय तो पुरुष और विषय का सम्बन्ध स्वाभाविक तो नहीं होगा किन्तु उसका उच्छेद इस पक्ष मे भी न हो सकेगा, क्योकि प्रकृति नित्य है । अत: उसकी निवृत्ति कभी भी समवित न होने से उसके द्वारा पुरुष के साथ विषय का जो सम्बन्ध होगा उसकी भी कमी निवृत्ति न हो सकेगी । फलत. इस पक्षमे भी पुरुष का मोक्ष न हो सकेगा। यदि यह कहा जाय कि-'चैतन्यस्वरुप पुत्प के साथ घटादि विषयो के सम्बन्ध को किसी अन्य के द्वारा न मानकर सीधे विषयप्रयुक्त ही माना जाय तो यह प्रापत्ति नहीं हो सकती क्योकि विषयो के अनित्य होने से पुरुष के साथ उसका सम्बन्ध नी अनित्य होगा और विषयो की निवृत्ति होने पर उस सम्बन्ध को निवृत्ति हो जाने से पुरुष का मोक्ष होने मे कोई बाधा न होगी-। किन्तु यह ठीक नहीं है क्योकि चैतन्य के साथ विषयो का अन्यनिरपेक्ष सम्बन्ध मानने पर सभी विषय चैतन्य से सम्बद्ध होंगे, अतः विषयो मे इष्ट-अदृष्ट का भेद न हो सकेगा । अर्थात् जितने विषय एक काल मे विद्यमान होगे वे सब चैतन्य से स्वत.सम्बद्ध होने के कारण दृष्ट ही होंगे। उनमे कोई प्रष्ट न हो सकेगा जबकि स्थिति यह है कि जब एक वस्तु हष्ट होती है तब दूसरी वस्तु अदृष्ट रहती है। जैसे घटादि के दर्शनकाल मे पटादि अदृष्ट रहता है । यदि यह कहा जाय कि-'चैतन्य के साथ घटादि विषयो का सम्बन्ध इन्द्रिय द्वारा मानने से इस आपत्ति का परिहार हो सकता है, क्योकि इन्द्रिय के अध्यापक होने से उसके द्वारा सभी विषयो का चैतन्य के साथ एकसाथ सम्बन्ध न हो सकेगा। अतः जिस समय जो विषय इन्द्रिय द्वारा चैतन्य से सम्बद्ध होगा उस समय वही विषय दृष्ट १ स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [६३ व्यासङ्गानुपपत्तेः । अतो यत्संवद्वेन्द्रियस्य विपयचैतन्यावच्छेदनियामकत्वम् , यद्वयापाराच्च सुपुप्ताविन्द्रियादिव्यापारविरतावपि श्वास-प्रश्वासादि, तद् महत्तत्त्वम् । तस्य धर्मा ज्ञाना-ऽज्ञान- श्वर्या-ऽनैश्वर्य-वैराग्या-ऽवैराग्य-धर्मा-ऽधर्मरूपा अष्टौ, बुद्धि-सुखदुखेच्छा-द्वेप-प्रयत्ना अपि, भावनायास्तैरनङ्गीकारात् , अनुभवस्यैव स्मृतिपर्यन्तं सूक्ष्मरूपतयाऽनस्थानात् । तस्य ज्ञानरूप- परिणामेन संबद्धो विपयः, पुरुपस्य स्वरूपतिरोधायकः । एवं च बुद्धितत्त्वनाशादेव पुसो विषयावच्छेदाभावाद् मोक्षः । भेदाऽग्रहाच्च 'चेतनोऽहं करोमि' इत्यभ्यवसायः, अचेतनप्रकृति- कार्याया बुद्धेश्चैतन्याभिमानानुपपत्त्यैव स्वाभाविकचैतन्यरूपस्य पुसः सिद्धेः । आलोचनं व्या- होगा अन्य विषय दृष्ट नहीं होगा-' तो यह ठीक नहीं है, क्योकि ऐसा मानने पर जब किसी इन्द्रिय द्वारा किसी एक विषय का चैतन्य के साथ सम्बन्ध हो जायगा तब विषयान्तर का उस इन्द्रिय द्वारा चैतन्य के साथ सम्बन्ध न हो सकेगा । क्योंकि उस विषय के साथ उस इन्द्रिय के सम्बन्ध का कोई विच्छेदक न होगा। फलत विभिन्न विषयो मे विभिन्न विषयो के साथ इन्द्रिय सपर्क रूप इन्द्रिय का व्यासङ्ग न हो सकेगा। जिप्तका फल यह होगा कि जब एक वस्तु दृष्ट होगी तो वह अकेली ही सदा दृष्ट होतो रहेगी । अन्य वस्तु के दृष्ट होने का अवसर ही न हो सकेगा । और जब वृद्धि द्वारा इन्द्रिय और विषय का एव विषय और पुरुष का सम्बन्ध माना जायगा तब ये आपत्तियां न होगी ।, क्योकि बुद्धि का इन्द्रिय के साथ सम्बन्ध और इन्द्रिय का विषय के साथ एक विषय का चैतन्य के साथ सम्बन्ध होने पर विषय का दर्शन मान्य होगा। प्रतः इन्द्रिय और विषय तथा इन्द्रिय द्वारा विषय और पुरुष का सम्बन्ध बुद्धि के अधीन होगा। इसलिये बुद्धि के व्यापार से व्यासन की उत्पत्ति हो सकेगी और उसी का सपर्क न पाने के कारण इन्द्रिय का व्यापार न हो सकने से सुषुप्ति हो सकेगी और उस समय उसी के व्यापार से श्वास-प्रश्वास आदि क्रियाएं भी हो सकेगी। इसलिए विषयो की दृष्टता और अदृष्टता तथा सुषुप्ति एव सुषुप्ति के समय श्वासप्रश्वासादि और पुरुष के मोक्ष की उपपत्ति के लिये बुद्धि-महत् तत्त्व को मानना अनिवार्य है। [ बुद्धिगत धर्मों का निरूपण ] इस बुद्धि मे पाठ धर्म रहते हैं। जैसे ज्ञान-प्रज्ञान, ऐश्वर्य-अनश्वर्य, वैराग्य-प्रवैराग्य, धर्म- अधर्म । इनके अतिरिक्त बुद्धि मे सुख-दु.ख इच्छा, द्वेष और प्रयत्न भी होते है । भावना पदार्थ सावय दर्शनो के विद्वानो द्वारा मान्य नहीं है । अत. बुद्धि महत्तत्व मे भावना का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। साइख्य मत मे अनुमव ही सूक्ष्मरूप से स्मृति पर्यन्त रहता है । अतः सूक्ष्मावस्थापन्न अनु- भव से अतिरिक्त भावना-सस्कार मानने की कोई प्रावश्यकता नहीं होती। महत्तत्त्व का इन्द्रियादि द्वारा विषयो के साथ सम्बन्ध होने पर उसका विषयाकार परिणाम होता है जिसे ज्ञान तथा बुद्धि की वृत्ति कहा जाता है । इस ज्ञान के द्वारा ही विषय पुरुष से सम्बद्ध होकर पुरुष के स्वरूप को प्रावृत करता है । विषयो द्वारा इस प्रकार होनेवाला पुरुष का प्रावरण ही उसका बन्धन है । एव महत्तत्त्व का नाश होने पर अर्थात् महत्तत्त्व का मूलप्रकृति मे तिरोधान होने पर बुद्धि के विषयाकार परि- णामरूप ज्ञान की निवृत्ति होने से पुरुष के साथ विषयो का सम्बन्ध बन्द हो जाता है । इस प्रकार विषयो से पुरुष के स्वरूप का तिरोधान बन्द हो जाने से पुरुष का मोक्ष सम्पन्न होता है।

९४ ] [शा.पा समुच्चय स्त०-३ श्लोक-१८ पार इन्द्रियाणाम् , विकल्पस्तु मानसः, अभिमानोऽहङ्कारम्य कृत्यध्यवमाये बुद्धः, सा हि बुद्विरंशत्रयवती, पुरुषोपरागः, विषयोपरागः, व्यापागवेशश्च इत्यंशाः । भवति हि 'ममेदं फर्तव्यम्' इति युधेरध्यवसायः । तत्र 'मम' इति पुरुषोपरागः दपणस्येव मुखोपरागः, भेटा- ऽग्रहादताविकः । 'इदम्' इति विपयोपरागः, इन्द्रियप्रणालीकया परिणतिमंदो दर्पणम्येव मुखनिश्वामहतम्य मलिनिमोपरागम्ताचिकः । तदुभयोपपनी व्यापारावेशोऽपि । तत्र विषयो- परागलक्षणबाने पुरुपोपरागम्याऽतात्त्विकर्मबन्धो दर्पणप्रतिविम्बितस्येव मुखम्य तन्मलिनिम्नेति । [ पुरुष और बुद्धि का तात्त्विक भेद ] बुद्धि और पुरप मे अत्यन्त भेद है । किन्तु उसका प्रज्ञान अनादिकाल से चला आ रहा है और उसी कारण वृद्धि को चेतनोऽह करोमि में चेतन करता हूँ' इस प्रकार का प्रध्यवसाय होता है । सच वात यह है कि इस अध्यवसाय की उपपत्ति के लिये ही स्यामाविक चतन्यरूप पुरप फा अस्तित्व मानना प्रावश्यक होता है । यदि उने न माना जायेगा तो उक्त प्रध्यवनाय के रूप मे बुद्धि मे चैतन्य का अनिमान न हो सकेगा क्योकि बुद्धि प्रचेतन प्रकृति से उद्भूत होने के कारण स्वय अचेतन होती है । उक्त अध्यवसाय तीन व्यापारो से सम्पन्न होता है-इन्द्रिय व्यापार, मनोव्यापार और अहङ्कार व्यापार । इन्द्रिय व्यापार का नाम है आलोचन और मनोव्यापार का नाम है विकल्प एव अहकार व्यापार का नाम है अमिलान । पाराय यह है कि इन्द्रिय से वस्तु का पालोचन होता है । और मन से उसका विकल्पन यानी विशिष्टयोघ एव अहकार से उसके कर्तृत्व का अभिमान होता है । और इन तीनो के सम्पन्न होने पर बुद्धि मे 'चेतनोऽह करोमि' इस प्रकार कृनि का अध्यवसाय उत्पन्न होता है । ( पुरुष-विषय व्यापार का बुद्धि सम्बन्ध ) बुद्धि में तीन अश होते हैं। जिन्हें पुरपोपराग, विपयोपराग और व्यापारावेश कहा जाता है । पुरुषोपराग का अर्थ हे पुरुषसम्बन्ध, विषयोपराग का अर्थ है विषयसम्बन्ध एव व्यापारावेश का अर्थ है व्यापार सम्बन्ध । जैसे 'ममेद कर्तव्यम् यह मेरा कर्तव्य है। इस प्रकार का अध्यवसाय वृद्धि को होता है । इस अध्यवसाय से वृद्धि के उक्त तीनो अशो का स्पष्ट परिचय प्राप्त होता है । जैसे 'मम' से पुरुषोपराग तूचित होता है । यह उपराग बुद्धि और पुरुष मे भेदज्ञान न होने से ठीक उसी प्रकार मिथ्या होता है जैसे दर्पण मे मुस का प्रतिबिम्ब पड़ने के समय दर्परा के साथ मुख का सम्बन्ध मिथ्या होता है । 'इद' से बुद्धि के साथ विषयोपराग सूचिन होता है। बुद्धि के साथ विषय का यह सन्बन्ध इन्द्रिय द्वारा विषयाकार बुद्धि का परिणाम रुप है यह ठीक उसी प्रकार सत्य होता है जैसे दर्पण पर मुख के नि.श्वास का प्राघात होने पर उसके साथ मलिनताका सम्बन्ध । यह सर्व विदित है कि दर्पण मे प्रतिबिम्बित मुख का नि श्वास जव दर्पण पर पड़ता है तो दर्पण वास्तदरप मे मलिन हो जाता है । बुद्धि के साथ पुरुष और विषय का उपराग होने पर उस मे व्यापारावेश अर्थात् कृति का सम्बन्ध मो नम्पन्न हो जाता है । अभी यह कहा गया है, कि विषयोपराग विषयाकार वृद्धि का परिणाम स्प है जिसे ज्ञान कहा जाता है। वृद्धि के साथ उसका सम्बन्ध सत्य है । बुद्धि का पुरष के साथ भेदतान न होने से बुद्धिगत इस ज्ञानात्मक विषयोपराग का पुरुष के साथ भी सम्बन्ध होता है किन्तु यह सम्बन्ध तत्य न होकर यह ठीक उसी प्रकार मिय्या होता है जैसे मुख के नि.श्वास से दर्पण मे उत्पन्न नलिनता का दर्पण मे प्रतिबिम्बिन मुख के साय सम्बन्ध मिथ्या होता है । - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [१५ ततो महत्तत्त्वादहकारोत्पत्तिः । भवति हि स्वप्नावस्थायां 'व्याघ्रोऽहम् . वराहोऽहम्' इत्यभिमानः, न तु 'नरोऽहम् ' इत्यभिमानः । अस्ति च तत्र नरत्वं संनिहितमिन्द्रिय मन:- संबन्धश्च । अतो नियतविपयाभिमानव्यापारकाऽहङ्कारसिद्धिः । ततः पञ्च तन्मात्राणि, एकादशेन्द्रियाणि च । पञ्च तन्मात्राणि शब्द रूप-रस-गन्ध- स्पर्शाः सूक्ष्मा उदात्तादिविशेषरहिताः । एकादशेन्द्रियाणि च-चक्षुः, श्रोत्रम् , घ्राणम् , रसनम् , त्वगिति पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि; वाक्-पाणि पाद पायूपस्थाः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि मनश्चेति । पञ्च- [स्वप्न मे "मै वाघ हूँ" इस प्रतीति का उपपादक अहंकार] महत् तत्त्व का 'चेतनोऽह करोमि' एवं 'ममेद कर्तव्य' इन अध्यवसायो द्वारा परिचय दिया गया है। और प्रकृति से उस की उत्पत्ति का भी युक्तिपूर्वक समर्थन किया गया है । अभी यह बताना है कि महत्तत्व से अहङ्कारनामक तीसरे तत्त्व की उत्पत्ति होती है। इस अहङ्कार का भी अस्तित्व मानना अत्यन्त आवश्यक है क्योकि स्वप्न की अवस्था मे मनुष्य को यदा कदा इस प्रकार का अभि- मान होता है 'अह व्याघ्र प्रह वराह न तु नर' में व्याघ्र हूँ, मै शूकर हूँ मनुष्य नहीं हूँ। इस अनु- मान के समय नरत्व सन्निहित रहता है और इन्द्रिय-मन का सम्बन्ध भी सन्निहित रहता है । किन्तु व्याघ्रत्व या वराहत्व असन्निहित रहता है और उस के साथ इन्द्रिय और मन का सम्बन्ध भी नहीं रहता फिर भी उस का अभिमान होता है इसको उपपत्ति इन्द्रिय और मन के द्वारा नहीं हो सकती, क्योकि व्याघ्रत्व एव वराहत्व के असनिहित होने से उस के साथ इन्द्रिय और मन का सम्बन्ध हो नहीं रहता फिर भी उस का अभिमान होता है । इस की उपपत्ति इन्द्रिय और मन के द्वारा नहीं हो सकती, क्योकि व्याघ्रत्व एव वराहत्व के असंनिहित होने से उस के साथ इन्द्रिय और मन का सम्बन्ध ही नहीं रहता । और यह नियम है कि 'इन्द्रिय और मन सम्बद्धवस्तु का ही ग्रहण कराने मे समर्थ होते हैं। अतः इस अभिमान को उपपन्न करने के लिये अहङ्कार का अस्तित्व मानने पर अमि- मान की उत्पत्ति सुकर हो जाती है क्योकि जाग्रतकाल मे मनुष्य को व्याव्रत्व वराहत्वादि का अनुभव होता है वह सूक्ष्मावस्था मे अहङ्कार मे स्थित हो जाता है । स्वप्नावस्था द्वारा उस सूक्ष्मरूप से स्थित अनुभव का उद्बोधन होने से व्याघ्रत्व वराहत्व के उक्त अभिमान का उदय होता है । जाग्रत- कालिन उक्त अनुभव का बुद्धि मे सूक्ष्मावस्थान मान कर स्वप्नावस्था मे उस का उद्बोधन होकर बुद्धि मे ही उक्त अभिमान रूप व्यापार का उदय नहीं माना जा सकता क्योकि वृद्धि इन्द्रिय आदि द्वारा विषयो से सम्बद्ध होकर ही ज्ञानात्मक परिणाम को उत्पन्न करती हैं किन्तु अहङ्कार को अपने उक्त अभिमानात्मक व्यापार को उत्पन्न करने के लिये इन्द्रिय एव विषयादि की अपेक्षा नहीं होती। अतः स्वप्नावस्था मे अहङ्कार द्वारा ही उक्त अभिमान की उपपत्ति हो सकती है । अतः उक्त अभिमान के निर्वाहार्थ अहङ्कार का अस्तित्व मानना अनिवार्य है। इस अहङ्कारनामक तीसरे तत्त्व से पञ्च तन्मात्रा और ग्यारह इन्द्रिय इन सोलह तत्वो की उत्पत्ति होती है । तन्मात्रा का अर्थ 'तदेव इति तन्मात्र' इस व्युत्पत्ति से इस प्रकार की वस्तु है जिस का एक ही स्वरूप होता है । जिस मे अवान्तर धर्मों का नहीं होता जैसे सूक्ष्म शब्द-रूप-रस-गन्ध- स्पर्श। सूक्ष्मशब्द मे उदात्त-अनुदात्तादि का भेद वह शुद्धशब्द मात्र स्वरूप होने से शब्द- तन्मात्र कहा जाता है । सूक्ष्म रूप भी नीलत्व से शून्य होने के कारण ६] [ शा. वा. ममुच्चय न. ३-उलो०१८ तन्मात्रेभ्यः पञ्चमहाभूतान्युत्पद्यन्ते । तथाहि-शब्दतन्मात्रादाकाशं शन्दगुणम् , शब्दतन्मात्रमहि- तात् स्पर्शतन्मात्राद्वायुः शन्द-म्पर्शगुणः, शब्द-स्पर्शतन्मात्रमहितापतन्मात्रात्तेजः शब्द-म्पर्श- रूपगुणं, शब्दस्पर्शरूपतन्मात्रमहिताद्रमतन्मात्रादापः शब्दम्पर्शरूपग्मगुणाः, शब्द-म्पर्श रूप. रमतन्मात्रमहिताद् गन्धतन्मात्रात् शब्द-स्पर्शरूप-रस-गन्धगुणा पृथिवीति । तदुक्तमीश्वरकृष्णन- "प्रकृतेर्महांस्ततोऽहकारम्तस्माद् गणश्च पोडशकः । तस्मादपि पोरशकात् पञ्चेभ्यः पञ्च भूतानि ।। [मां० का० २२] ॥ मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृति-विकृतयः सप्त । पोडशकस्तु निकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥ [मां. का. ३] इति । जाता है। सूदम रम मधुरता स्टुता अम्लता प्रादि नेदो से शून्य होने के कारण रसतन्मात्र कहा जाता है। सूक्ष्म गन्ध सुरमित्वाऽसुरमित्व नेदों से रहित होने के कारण गन्धतन्मात्र कहा जाता है एव सूक्ष्म स्पर्श शीतत्व उष्णत्वादि नेदो से रहित होने के कारण स्पगंतन्मात्र कहा जाता है । अहङ्कार से ग्यारह इन्द्रियों को उत्पत्ति होती है, इन के तीन वर्ग है। ज्ञानेन्द्रिय, २क्मेन्द्रिय और उनयेन्द्रिय। चक्ष, श्रोत्र, घ्राण, रसन और त्वक् ये पांच ज्ञानेन्द्रिय है। वाक्, पाणि, पाद, पायु (मलेन्द्रिय) उपस्य (मूत्रेन्द्रिय) ये पांच कर्मेन्द्रिय है । एवं मन उभयेन्द्रिय है, क्योकि ज्ञान और फर्म दोनों को उत्पत्ति में इस को प्रावश्यकता होती है । पंच तन्मात्रो से पच महाभूतों की उत्पत्ति होती है-जैसे गन्द तन्मात्र से गन्दगुणवाले प्राफाश को, एव शब्दतन्मात्र से सहित स्पर्शतन्मात्र से शब्द और स्पर्श गुरगवाले वायु को, शब्दतन्मात्र मौरम्पर्शतन्मात्र सहित स्पतन्मात्र से शब्द-स्पर्ण-स्पगुण वाले तेज को, गन्द-स्पर्श-रप-रत तन्मात्र से शम्द, स्परा, रूप और रस ये चार गुरगवाले जल की तया शब्द, स्पर्श, स्प और रम तन्मात्र ने सहित गन्धतन्मात्र मे शब्द, स्पर्श, रूप रस और गध ये पांच गुणवाली पृथ्वी की। जैसा कि ईश्वरकृष्णने अपनी 'प्रकृते महान् एव 'मूलप्रकृति०' प्रादि कारिकाओं मे कहा है, कारिकाओं का प्रर्य इस प्रकार है- प्रकृति से महत् को पौर महत् से अहङ्कार की, अहंकार से पञ्चतन्मात्र एवं ग्यारह इन्द्रिय' इन पोडश की, इन पोडश मे पांच तन्मात्रो से आकाश प्रादि पंच महाभूतों की उत्पत्ति होती है । इन चौवीस मे प्रकृति को मूल प्रकृति कहा जाता है । यह किसी की विकृति नहीं होती अर्थात् उस की किमी मे उत्पत्ति नहीं होती। महत् , अहड्डार और पञ्चतन्मात्र ये सात तत्त्व प्रकृति और विकृति दोनो हैं, अर्थात् ये मूलप्रकृति के कार्य होते हैं और इन मे महत्तत्त्व अहंकार का, और अहकार पंचतन्मात्र और ग्यारह इन्द्रियो का, और पञ्च तन्मात्र पञ्च महाभूतों का क रण होता है। पंच महा- भूत और ग्यारह इन्द्रिया ये सोलह कार्य ही होते हैं। ये किसी तत्त्वान्तर का कारण नहीं होते। इन चौबीस तत्त्वों से निन्न एक पुरुषतत्त्व है जिसे प्रात्मा कहा जाता है, जो प्रकृति और विकृति दोनों से मन्न होता है । अर्थात् वह न किसी का कारण होता है, और न किसी का कार्य होता है। इस प्रकार इन पच्चीश तत्त्वों को चार वर्ग मे विभक्त किया जा सकता है। 'अविकृति-केवल कारणमात्र प्रकृति विकृति- कारण कार्य उमयात्मक, विकृतिमात्र केवल कार्यरूप और प्रकृतिविकृतिमिन्न यानी कारणकानिन्न । -- - - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [१७ - %3D पूर्व पोडशकपदेन पञ्चतन्मात्रै-कादशेन्द्रियग्रहणम् , अग्रे तु पञ्चमहाभूतेन्द्रियग्रहणमिति विशेषः ॥१८॥ इममेव क्रममाह- मूलम्-प्रधानान्महतो भावोऽहंकारस्य ततोऽपि च । अक्षतन्मात्रवर्गस्य तन्मात्राद् भूतसंहतिः ॥१९॥ प्रधानात्-प्रकृतितत्त्वात् , महतः=बुद्धितत्वस्य, भाव: उत्पत्तिः अभिव्यक्तिर्वा, ततोऽपि च, अहङ्कारस्य 'भाव' इत्युत्तरत्राप्यनुपज्यते । 'ततोऽपि' इत्युत्तरत्राऽऽवय॑ते, ततोऽपि अहङ्काग- दपि, अक्ष-तन्मात्रवर्गस्य-एकादशेन्द्रिय-पञ्चमहाभूतानां (१ तन्मात्राणां) भावः, तन्मात्रात्- जात्यपेक्षयकवचनात् पञ्चभ्यस्तन्मात्रेभ्यः भूतसंहतिः पञ्चमहाभूतानां भावः ॥१६॥ स्थूलकार्यमधिकृत्याह- मूलम्-घटाद्यपि पृथिव्यादिपरिणामसमुद्भवम् । नात्मव्यापारजं किञ्चित्तेषां लोकेऽपि विद्यते ॥२०॥ घटाद्यपि स्थूलकार्यजातम् , पृथिव्यादीनां मृदात्मिकानां परिणामाद्-विलक्षणसयो- गादिपरिणामात् समुद्भव उत्पत्तिर्यस्य तत् , परिणामान्तराभ्युपगमात् । विशेपमाह-तेपां- प्रथमवर्ग मे केवल मूल प्रकृति का समावेश होता है । द्वितीयवर्ग मे महत्तत्त्व, अहंकार एव पचतन्मात्र का समावेश होता है । तृतीय वर्ग मे पचमहाभूत एव ग्यारह इन्द्रियो का समावेश होता है। चतुर्थ वर्ग मे केवल पुरुष का समावेश होता है। 'प्रकृतेर्महान्' इस कारिका मे पाये षोडशक शब्द से पञ्चतन्मात्र और एकादश इन्द्रिय का ग्रहण एव 'मूलप्रकृति०' इस कारिफा मे पाये षोडशक शब्द से पञ्चमहाभूत और ग्यारह इन्द्रिय का ग्रहण अभीष्ट है यह ध्यान मे रहना चाहिये ।।१८।। [प्रधान-महत्-अहमार-इन्द्रियतन्मात्र-पञ्चभूत का क्रम] कारिका १६ मे महन आदि तेईस तत्वो को उत्पत्ति का वही क्रम स्फुट किया गया है जिसका सकेत ईश्वरकृष्ण ने अपनी 'प्रकृतेर्महान्' इस कारिका मे किया है । इस कारिका का अर्थ अति सुगम है जैसे-प्रधान प्रकृतितत्त्व से महत्-बुद्धितत्त्व को उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति होती है, और महत् तत्त्व से अहकार की, अहकार से प्रक्ष-ग्यारह इन्द्रिय और पचतन्मात्र को एव पचतन्मात्र से पचमहाभूतो को उत्पत्ति या अभिव्यक्ति होती है । कारिका मे 'तन्मात्र' शब्द से एकवचन विभक्ति का प्रयोग हुआ है । वह तन्मात्र संख्या की ष्टि से उचित न होने पर भी, तन्मात्रत्व जाति की दृष्टि से उचित है क्योकि पांचो तन्मात्रो मे तन्मात्रत्व नाम को एक जाति-एक अनुगत धर्म रहता है ।।१६॥ [ सांस्यमत मे प्रात्मा व्यापारशून्य है ] कारिका २० मे स्थूल कार्य की उत्पत्ति और आत्मा के अकारणत्व का उल्लेख है । कारिका का प्रर्थ इस प्रकार है- - - १८] [शा वा समुच्चय स्त०३-लो० २१-२२ परम् ॥२२॥ सांख्यानाम् , लोकेऽपि-जगत्यपि, आत्मव्यापारजं किश्चित् किमपि कार्य नास्ति, आत्म- व्यापारस्यैवाऽभावात् सुतरां तज्जन्यत्वाभावः । इति सांख्याशयवार्ता ॥२०॥ अत्र प्रतिक्षेपवार्तामाह- मूलम्-अन्ये तु ब्रुवते येतत्प्रक्रियामात्रवर्णनम् । अविचार्यैव तद्युक्त्या, अडया गम्यते अन्ये तु-असत्कार्यवादिनः : ब्रुवते, हि-यतः, एतत् अनुपदभिहितम् , प्रक्रिया- मानवर्णनम् यदृच्छाक्लृप्तपरिभापामात्रोपदर्शनम् , न तात्त्विकमेव । तत् तस्माद् हेतोः, युक्त्याऽविचार्यैच, परं-केवलम् , परं केवलम् , श्रद्धया-वृद्वोक्तभक्त्या, गम्यते-उपाढीयते ॥२१॥ कुतः ? इत्याह- मूलम्-युक्त्या तु बाध्यते यस्मात्प्रधान नित्यमिष्यते । तथात्वाऽप्रच्युतौ चास्य महदादि कथं भवेत् १ ॥२२॥ घट अादि जितने भी स्थूल कार्य दृष्टिगोचर होते हैं वे सब पृथ्वी आदि पचमहाभूतो के मिट्टी प्रादि परिणामो के विलक्षणसयोगादिरूप परिणाम से समुद्भूत होते हैं । उन के लिए वित्ती अन्यतत्त्व को आवश्यकता नहीं होती । यह स्वीकार किया गया है कि महाभूतो के हो एक परिणाम से दूसरे परिणाम की उत्पत्ति होती रहती है, पृथ्वी आदि परिणाम भी तत्त्वरूप नहीं होते, क्योकि वे किसी कार्य के उपादान नहीं होते, जो किसी कार्य का उपादान होता है वही तत्त्व कहा जाता है । पृथ्वी श्रादि के साक्षात् या परम्परया जितने परिणाम हाते हैं उन सबो का उपादान पृथ्वी ग्रादि तत्त्व ही होता है । उन परिणामो मे परस्पर मे उपादान-उपादेय भाव न हो कर निमित्त-नैमितिक भाव ही होता है । जैसे मृत्तिका घट का उपादान न होकर निमित्त है, उपादान तो दोनो का पृथ्वीतत्त्व ही है। सांस्यमत मे पुरे जगत मे कहीं भी आत्मा के व्यापार से किसी कार्य की उत्पत्ति नही होती है, क्योकि आत्मा मे कोई व्यापार ही नहीं होता है और जब उस में कोई व्यापार हो नहीं होता तो उस का किसी वस्तु का जनक होना किसी भी प्रकार सभव नहीं हो सकता, क्योकि किसी भी कार्य का जनन करने के लिए कारण को कुछ व्यापार करना पडता है अत जो किसो प्रकार का व्यापार नहीं कर सकता वह किसी कार्य का कारण नहीं हो सकता । इसीलिए सॉख्य सिद्धात में पुरुष को अकारण माना गया है-यह साख्यमत का प्रतिपादन हुआ ॥२०॥ [ युक्ति से सांख्यमत को आलोचना-उत्तरपक्ष] २१ वीं कारिका मे पूर्ववणित सास्यमत के खण्डन का उपक्रम किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- असत् कार्यवादी विद्वानो का यह कहना है कि सांख्यशास्त्र के अनुसार जगत् और पुरुष के सम्बन्ध मे जो कुछ कहा गया है वह स्वेच्छा से स्वीकार की गई परिभाषा का प्रदर्शनमात्र है, उस मे कोई प्रामाणिकता नहीं है इस लिये युक्तिपूर्वक विचार न कर केवल उपदेश के प्रति शुद्धश्रद्धा- मात्र से ही वह उपादेय हो सकता है ॥२१॥ , स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचन ] [ ९९ युक्त्या तु बाध्यते, यस्मात् प्रधानं नित्यम्=अप्रच्युताऽनुत्पन्न-स्थिरैकस्वभावम् इष्यते सांख्यैरङ्गीक्रियते अस्य-प्रधानस्य, तथात्वाऽप्रच्युतौ च प्रधानत्वाऽप्रच्युतौ च, महदादि कथं भवेत् $ १ पूर्वस्वभावपरित्यागाऽपूर्वस्वभावोपादानाभ्यामेव हेतु-हेतुमद्भावनिय- मात् , अगदादिपरिणाम नाशेनैव कुण्डलादिपरिणामोत्पाददर्शनादिति भावः ॥२२॥ २२ वीं कारिका मे 'साख्यवणित मत कोरी श्रद्धामात्र से ही क्यो उपादेय है' इस को स्पष्ट किया गया है । कारिका का अथ इस प्रकार है- युक्तिपूर्वक विचार करने पर साख्य का मत प्रमाण से बाधित हो जाता है क्योकि सास्य शास्त्र के विद्वानो ने प्रधान-प्रकृति को नित्य माना है और नित्य उसी वस्तु को कहा जाता है जो सदा एक रूप मे स्थिर रहे , जिस का कभी भी न किसी रूप मे स्खलन हो और न किसी रूप मे उत्पादन हो जैसे साख्यसम्मत पुरुष । अत. प्रधान भी इसी रूप मे नित्य होगा। फलत. प्रधानत्व रूप से उस का स्खलन न होने के कारण उस से महत् आदि तत्वो की उत्पत्ति न हो सकेगी, क्योकि कारण होने के लिए पूर्वस्वरूप का त्याग और कार्य होने के लिए अपूर्व स्वरूप का ग्रहण आवश्यक होता है, जैसे अङ्गद बाजूवद आदि के रूप मे स्थित सुवर्ण को कुण्डल'दि का कारण होने के लिए अङ्गदादि स्वरूप का परित्याग और कुण्डलादि स्वल्प का ग्रहण करना पड़ता है। अतः प्रधान को भी महत् एक आधुनिक विद्वान इम पर लिखता है-"हरिभद्र की आपत्ति किसी गलतफहमी पर आधारित प्रतीत होती है. क्योंकि वस्तुत साख्य दार्शनिक की 'प्रकृति' नित्य होते हुए मी रूपान्तरण- शील ठीक उसी प्रकार है जैसे कि जैन-दर्शन की गन्यतानुमार विश्व की समी जड-चेतन वस्तुएँ नित्य होते हुए मो रूपान्तरणशोल है ।" वस्तुत आ. श्री हरिमद्रसूरि की कोई गलतफहमी नहीं है चूंकि उन को यहाँ नित्यता का नहीं एकान्तनित्यना का खडन अभिप्रेन है जो २४ वीं कारिका में स्पष्ट है। इतनी सरल वात को न समझ पाना यही तो गलतफहमी है। इसी प्रकार उम विद्वान ने शास्त्रया समुच्चय के हिन्दी अनुवाद की प्रस्तावना में अपनी चेनमून विद्वत्ता का जो प्रदर्शन किया है उस का एक यह मी उदाहरण है-वह लिखता है-"हरिमद्र ने साख्य दार्शनिक को छूट दी है कि यदि वह अपनी प्रकृति का वर्णन ठीक उसी प्रकार करे जैसे कि जैन दर्शन मे कर्म प्रकृति का (अर्थात् 'कर्म' नाम वाले मौतिक तत्त्व का) किया गया है तो उसका प्रस्तुत मत निर्दोष बन जायेगा, लेकिन यह एक विचारणीय बात है कि सांख्य दार्शनिक की 'प्रकृति' एक है तथा उसके रुपान्तरण की परिधि समूचा जड जगत् है, जब कि जैन दर्शन की 'कमें प्रकृतिया' अनेक है। तथा उनके रुपान्तरण की परिधि जड जगत का एक माग मात्र है।" सज्जनों को सोचना चाहिये कि-आ. श्री हरिमद्र सूरि का अमिप्राय यह है कि 'साख्य' प्रकृति को सारे जगत् का उपादान कारण मानता है उस के स्थान मे निमित्त कारण मान लिया जाय तो जैन मत यानी वास्तविकता के साथ उसका मी मेल हो जाय । इस ऋजु अभिप्राय न समझ कर उम विद्वान ने जो अट सट लिख दिया है वह केवल शब्दाडंबर के सिवा और क्या है ? इस विद्वान ने तो ऐसे अनेक अममजस विधान उस की प्रस्तावना में कर डाले हैं । वास्तव मे तो अल्पज्ञ होने पर भी घमंडी और, महामहीम पूर्वाचार्यों के गौरव को गिराने की धृष्टता करना ही जिनका जीवनव्रत है उन आधुनिक पडितों से भारत के उज्जवल भावि की क्या आशा करना। .

१०] [ शास्त्रातांममुच्चय स्त-३-लो० २३ - अथ "नाऽस्माभिरपूर्वस्वभावोत्पत्त्या हेतु हेतुमद्रावोऽभ्युपगम्यते यतो रूपमेदादनित्यता प्रसज्येत, किन्त्यपरित्यक्तसर्पभावस्य सर्पस्य कुण्डलावस्थावदपरित्यक्तप्रधानमावयव प्रधानम्य महदादिपरिणामाभ्युपगम इति को दोपः, युवत्व-वृद्धत्वादिपरिणामयोरप्यवस्थित एव धर्मिणि पूर्वोत्तरभावनियमेनाऽवस्थासांकर्यात् ?" इत्यभिप्रायमुक्य निगकृरते- मूलम्-तस्यैव तत्स्वभावत्वादितिचेकिं न सर्वदा । अत एवेति चेत्तस्य तथात्वे ननु तत्कृत' ? ॥२३॥ 'तस्यैव प्रधानस्यैव, एवकारेण स्वभावान्तग्व्यवच्छेदः, तत्स्वभावत्वात्-महदादि. अननस्वभावत्वात् , तथात्वाऽप्रच्युतावपि महदायत्पत्तिरित्युपस्कारः' इति चेत् १ नदा सर्वदा किं न भवति महदादिकम् १ प्रकृतिर्मनिधानस्य सर्वदा मचादेकहेलयैव जगत् म्यात् , ममर्थम्य कालक्षेपाऽयोगादित्याशयः। परः प्राह-अत एव-कदाचिज्जननम्बभावत्वादेव न मर्वदोत्पत्ति- प्रादि का कारण होने के लिए अपने पूर्वस्वरप का त्याग और नये स्वरूप का ग्रहण करना होगा और यह होने पर उस की नित्यता समाप्त हो जायगी । अतः नित्यप्रकृति मे अनित्य महत् प्रादि की उत्पत्ति युक्तिसंगत न हो कर उपदेप्टा के प्रति प्रतूट श्रद्धाभाव होने के कारण ही मानी जा सकती है।॥२३॥ (प्रकृति को नित्यता के बचाव मे आशंका) २३ वी कारिका सारयों के एक विशेष अभिप्राय के निराकरणार्थ प्रस्तुत हुई है । वह अभिप्राय यह है कि-कार्यकारणभाव के लिए नये रूप की उत्पत्ति और पूर्वत्प का परित्याग आवश्यक नहीं है जिस से रूपभेद से प्रकृति मे अनित्यता को प्रापत्ति हो । किन्तु सर्प जैसे अपने सपनाव का परित्याग विना किये ही कुण्डलावस्था का जनक हो जाता है, उसी प्रकार प्रकृति अपनी प्रधान अवस्था का परित्याग विना किये भी महत् प्रादि का कारण हो सकती है ऐसा मानने मे कोई दोष नहीं हो सकता। इस बात को अन्य प्रकार से भी समझा जा सकता है-व्यक्ति मे यौवन, वार्धक्य इत्यादि परिणाम व्यक्तिरुप धर्मों की स्थिरता का घात न करके ही उस मे क्रम से उत्पन्न होते हैं और उन मे पूर्वोत्तर- भाव का नियम होने के कारण साकर्य नहीं होता । उसी प्रकार प्रधान मे भी उस की नित्यता को बाधित किये बिना ही महत् प्रादि असकीर्ण परिणामो का उदय यदि माना जाय, तो कोई हानि नहीं हो सकती। इस अभिप्राय को जिस रूप मे प्रस्तुत किया गया है और उस के निराकरणार्थ जो बात कही गयी है वह कारिका की व्याख्या मे स्पष्ट है व्याख्या इस प्रकार है- "प्रधान स्वयं ही (-अपने पूर्व स्वभाव का परित्याग बिना किये ही ) महत् प्रादि के उत्पादक स्वभाव से सपन्न है, अतः प्रधान अपने सहज स्वरूप मे ज्यो का त्यो स्थित रहते हुए भी उस से महत् प्रादि को उत्पत्ति हो सकती है।" सांस्यो को प्रोर से महत् प्रादि तत्त्वों और कार्य-कारण भाव के विषय मे ऐसा अभिप्राय व्यक्त किया जा सकता है, किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योकि महत

स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ]
[१०१
रित्याशयः । वाद्याह-इति चेत् , 'ननु'
इत्याक्षेपे,
तम्य-प्रधानस्य तथात्वे-नियतस्वरूपाऽ-
विकृतत्वे तत्कदाचिज्जननस्वभावत्वम् कुतः १ एकरूपा हि प्रकृतिः सदैव महदादि जनयेत् ,
कदापि वा न जनयेत् । 'तत्तकालावच्छिन्नजनना-ऽजननोभयनिरूपितै कस्वभाववादयमदोष'
इति चेत् १ जनना-जननयोस्तत्कालावच्छिन्नत्वे तत्स्वभावत्वम् , तत्स्वभावत्वे च तयोस्त-
त्वमित्यन्योन्याश्रयः । स्वस्वभावादेव तयोस्तत्त्वे च विलीनं प्रकृत्यादिप्रक्रिययेति भावः ॥२३॥
आदि को उत्पन्न करने के लिए यदि प्रधान मे कोई नई घटना प्रावश्यक न होगी तो उस से नियत
समय मे हो महत आदि की उत्पत्ति न होकर सर्वदा उस की उत्पत्ति की आपत्ति होगी । अतः
प्रकृति से एक साथ ही समुचे जगत के जन्म की प्रसक्ति होगी क्योकि प्रधान मे यदि जगत् को उत्पन्न
करने का सामर्थ्य है, तो जगत् की उत्पत्ति का विलम्ब नहीं हो सकता, क्योकि जो जिस कार्य को
उत्पन्न करने में समर्थ होता है वह उस की उपस्थिति होने पर कार्य के उत्पादन मे विलम्ब नहीं
करता जैसे न्यायमत मे कर्म विभाग को उत्पन्न करने में समर्थ होता है तो कर्म से विभाग की उत्पा
मे विलब नहीं होता। कर्म के दूसरे क्षण मे ही विभाग का जन्म हो जाता है
यदि यह कहा जाय कि-'प्रधान मे महत आदि को नियतकाल मे ही उत्पन्न करने का सामर्थ्य है
अतः सर्वदा उस की उत्पत्ति का प्रसग नहीं हो सकता'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि प्रधान यदि अपने
सहज स्वरूप मे कुछ भी विकृत हुए बिना ही महत् प्रादि को उत्पन्न करेगा तो नियतक ल मे भी वह
महत् प्रादि को उत्पन्न न कर सकेगा । कहने का प्राशय यह है कि प्रकृति यदि सर्वदा एक रूप ही
रहेगी उसमे किचित् भी कोई नई बात नहीं होगी वह अपने सहज सदातन रूप मे ही रह कर महत
प्रादि का जनक मानी जायगी तो उस से या तो सर्वदा महत आदि की उत्पत्ति होगी अथवा कमी
भी नहीं होगी 'क्योकि कमी उत्पन्न करना और कभी उत्पन्न न करना' यह बात किसी आगन्तुक
निमित्त की अपेक्षा के विना नहीं बन सकती।
[ जनन प्रजनन उभयस्वभाव में अन्योन्याश्रय ]
यदि यह कहा जाय- प्रकृति का यह सहज स्वभाव है कि किसी काल मे महत् आदि का जनन
करें और कालान्तर मे उस का जनन न करे । अतः प्रधान से महत् प्रादि की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे
उक्त आपत्ति नहीं हो सकती है तो यह ठीक नहीं है । क्योकि महत् प्रादि के जनन और प्रजनन में
तत्तत्कालावच्छिन्नत्व सिद्ध हो जाने पर ही प्रकृति मे तत्तत्कालावच्छेदेन महत् का जनन और अजनन
करने के स्वभाव की कल्पना हो सकेगी और इस प्रकार का स्वभाव सिद्ध हो जाने पर ही उसके बल
से महत् प्रादि के जनन और प्रजनन मे तत्तत्कालावच्छिन्नत्व सिद्ध हो सकता है इस मे अन्योन्या-
श्रय है। इस अन्योन्याश्रय दोष के कारण यह कल्पना समय नहीं हो सकती। यदि इस प्रन्यो-
न्याय का परिहार करने के लिए महत् प्रादि के जनन और प्रजनन मे तत्तत्कालावच्छिन्नत्य को
मी स्वाभाविक मान लिया जायगा तो प्रकृति से महत् और महत् से अहकारादि की उत्पत्ति की जी
प्रक्रिया सांख्य मे वर्णित है वह अनावश्यक होने से समाप्त होजायगी, क्योकि सभी कार्य अपने स्वभाव
से ही तत्तत्काल में सपन्न हो जायेंगे ॥२३॥

१०२ 1 {शा या समुन्चय म्त० ३-इलोम-२४ . उपचयमाह- मूलम-नानुपादान मन्यस्य 'मावेऽन्यज्जातुचिद्भवेत् । तनुपादानतायां च न तस्यैकान्तनित्यता ॥२४॥ अनुपादान तथाभाविकारणविकलम् , अन्यस्यथा तथाभाविव्यतिरिक्तम्य प्रधा. भाव-मनिधाने, अन्यत-एकान्ताऽविद्यमानं महदादि; जातुचित् कदाचित , न भवेत् । सर्वथाऽमतः सत्ताऽयोगात् । तदुपाटानताया च महदाढेग्युपगम्यमानायां न तस्य प्रधानम्य, एकान्तनित्यता, अनित्य महदामिन्नत्यान् । महदाद्यपि महामन्चाद् निन्यमेवेति चेत ? गता नहिं प्रकृति-विकृत्यादिप्रक्रिया, मुक्तावपि तत्मत्वेऽपदर्शनं च । 'महढादेः प्रकृतिपरिणामित्वेन प्रकृत्यमिन्नन्वेऽप्यनित्यत्वादिना भेद एवेति चेन् ? नर्हि भेदाऽभेदप्रसङ्ग इति दिग् ॥२४॥ (प्रकृति को महत् का उपादान मानने मे अनित्यता को आपत्ति) २४ वीं कारिका में पूर्व कारिका में कहे गये अर्थ को ही सपुष्टि की गई है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- महत् आदि कार्यों को यदि उपादानहीन माना जायगा अर्थात यदि उस का कोई ऐसा कारण नहीं माना जायगा जिस मे महत् यादि की उत्पत्ति के पूर्व मे भी मात् प्रादि का अस्तित्व होता हो, तो कारण मे अविद्यमान ही ग्रत् की उत्पत्ति माननी होगी। फलतःप्रधान का नन्निधान होने पर भी उस ने प्रथमतः अविद्यमान होने के कारण महत् प्रादि की उत्पत्ति न हो नकेगी क्योकि जो सर्वथा असत् होता है वह कभी सत् नहीं हो सकता है । और यदि प्रधान को महत् आदि कार्यों का उपादान कारण माना जायगा, और कारणत्प मे उस मे महत् प्रादि का अस्तित्व माना जायगा तो प्रधान की एकान्त नित्यता का भग हो जायगा क्योकि उपादानकारण और कार्य में अमेद का नियम होने से प्रधानत्प उपादान कारण भी अपने कार्य अनित्य महत् आदि से अभिन्न होने के कारण कार्यात्मना अनित्य हो जायगा। यदि कहें कि-'महात् आदि भी सर्वदा सत् होने से नित्य ही होता है-तो महत आदि तत्त्व और प्रकृति में कार्य कारण भाव की मान्यता समाप्त हो जायगी । और महत् प्रादि नित्य होने पर मोक्षकाल में उस का अस्तित्व मानने पर सिद्धान्त की हानि होगी। इसप्रकार मारयदर्शन अपदर्शन बन जायगा -'महत् आदि प्रकृति का परिणाम है और परिणाम परिणामी से अभिन्न होते हुए भी अनित्य होता है इसलिए महदादि प्रकृति से अभिन्न होने पर भी अनित्य होने से प्रकृति से भिन्न होगा, अत एव महान् प्रादि का अपने अभिव्यक्तरूप में सर्वदा सत् न होने से न तो उसे प्रकृति का कार्य होने में कोई बाधा होगी और न मोक्ष काल में उस के अस्तित्व का प्रसग होकर साँस्य सिद्धान्त की। हानि होगी-तो यह कथन ठीक नहीं है क्योकि ऐसा मानने पर एक ही वस्तु में भेद और अभेद का प्रसग होने से सांख्य को स्यावाद वा अनेकान्तवाद के द्वार पर दौवारिक वनना पडेगा ॥२४॥ । १ स्या० का टीका और हिन्दी विवेचना ] स्थूलकार्यमधिकृत्याऽप्याह- मूलम्-घटायपि कुलालादिसापेक्ष दृश्यते भवत् । अतो न तत्पृथिव्यादिपरिणामैकहेतुकम् ॥२५॥ घटाद्यपि=म्थूलकायजातम् , कुलालादिसापेक्षं भवद् दृश्यते, कुलालादीनां तत्राऽ- न्वयव्यतिरेकानुविधानदर्शनात् । अनम्तत् पृथिव्यादिपरिणामक हेतुकं न भवति, नियतान्वय- व्यतिरेको विना तादृशपरिणामेऽपि हेतुताग्रहाभावात् . तयोश्च कुलालाढावविशेषात् । 'कार्य- गतयावर्मानुविधायित्वात् हेतोः कुलालादीनां न घटादिहेतुत्वमिति चेत् १ तर्हि बुद्धिगता रागादयोऽपि प्रकृती स्पीकर्तव्याः, इति मैव बुद्धिः भावाष्टकमपनत्वात् , न तु प्रकृतिः । 'म्थूलरूपतामपहाय सूक्ष्मरूपतया ते तत्र सन्तीति चेत् ? लयाद्यवस्थायां मौषम्यं बुद्धावपि समानम् , सूक्ष्मतया घटादिगतधर्माणां कुलालादो कल्पने बाधकामावश्च ॥२५॥ [घटादि कार्य पृथ्वो आदि के परिणाम मात्र से जन्य नही) २५ वीं कारिका मे स्थूलकार्यो मे कर्तृ सापेक्षता बताते हुए कार्य मे क निरपेक्षता के खण्डन का सकेत किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है - घटादि कार्य फुलालादि कर्ता की अपेक्षा से उत्पन्न होता है यह बात देखने मे आती है क्योकि घटादि में कुलालादि के अन्वय-व्यतिरेक का अनुविधान देखा जाता है । अर्थात् कुलाल आदि के एने पर घटादि का जन्म होता है और कुलालादि के अभाव मे घटादि का जन्म नही होता है । इसलिये यह कहना उचित नहीं हो सकता कि 'घटादि कार्य पृथ्वीनादि के परिणाममात्र से ही उत्पन्न होते है, क्यो कि पृथ्वीमादि के परिणाम मे भी अन्वयव्यतिरेक के बिना घटादि को कारणता का ज्ञान नहीं होता है किन्तु अन्वय-व्यतिरेक से ही होता है और जब अन्वय-व्यतिरेक के नाते पृथ्वी आदि के परिणाम को घटादि का कारण माना जाता है तो पृथ्वीआदि के परिणाम के समान हो दुलालादि मे भी अन्व व्यतिरेक होने के नाते कुलालादि मे भो घटादि की कारणता मानना आवश्यक है । यदि यह कहें कि 'हेतु मे कार्य के सभी धर्मो का सम्बन्ध होना आवश्यक होता है किन्तु कुलालादि मे घटादि के सभी धर्मो का सम्बन्ध नहीं होता । अत कुलालादि घटादि का कारण नहीं हो सकता' तो यह ठीक नही है क्योकि हेतु मे कार्य के सभी धर्मों के सम्बन्ध का होना आवश्यक नहीं माना जा सकता । यदि ऐसा माना जायगा तो प्रकृति मे बुद्धि के रागादि धर्मों का भो अस्तित्व मानना होगा और उस दशा मे धर्म-अधर्मादि पाठ मावो से सपन्न होने के कारण प्रकृति ही बुद्धि बन जायगी। यदि यह कहा जाय कि 'धर्म-अधर्मादि पाठ भाव अपने स्थूल रूप का परित्याग कर सूक्ष्मरूप से प्रकृति मे रहते है । अत वह बुद्धि नहीं हो सकती । क्योकि स्थूल रूप से भावाष्टकसम्पन्न को ही बुद्धि कहा जाता है'-तो यह ठीक नहीं है क्योकि ऐसा मानने पर लयादि की अवस्था मे बुद्धि भी बुद्धि न हो सकेगी, क्योकि उस समय उस मे भी भावाष्टक स्थूलरूप से न रह कर सूक्ष्मरूप से ही रहते है। और दूसरी बात यह है कि यदि कारण मे कार्यगत सभी धर्मो का होना आवश्यक हो तब भी कुला- ।

१०४ ] [ शा० घा० समुच्चय-स्त० ३.श्लो००६-०७ . चेतनेऽचेतनधर्मसंक्रमे परिणामित्वादिबाधकम् , कुलालादिदेहम्तु घटादिकर्तेप्यत एवे- त्याशङ्कयाह- मृलम्- 'तत्रापि देहः कर्ता चेन्नवासावात्मनः पृथक् । पृथगेवेति चेझोन आत्मनो युज्यते कथम् ? ॥२६॥ 'तत्रापि-घटादावपि, देहः कर्ता, स्थूलम्पावच्छिन्नन्य तम्य कुलालादिचेष्टयवोत्पा- दात्' इति चेत् ? नैव अमी-देहः, आत्मनः पृथक्-भिन्नः मगतत्वात निष्क्रियन्वाच्च । 'आत्माऽमर्यगत सक्रियदेहात पृथगेवेति चेत् ? तर्हि भोगः कथं युज्यते, मर्वथा देहाद् भेटे तस्य मुक्तकल्पत्वात ? क्षीर-नीरन्यायेन देहाऽभिन्नम्यवाऽऽत्मनो देहोपनीतमोगमभवादिति भाव: ॥२६॥ नास्त्येव तत्वत आत्मनो भोग इतीप्टापत्त्या परः स्वाभिप्रायमाह-- मृलम्-देहभागेन नेवास्य भावतो भोग इष्यते । प्रतिबिम्बोदयात्किन्तु यथोक्त पूर्वसूरिभिः ॥२७॥ ? -- लादि मे घटादि को कारणता सम्भव हो सकती है। क्योंकि कुलालादि में घटादि के सभी धर्मों को सूक्ष्मरूप से स्वीकार कर लेने में कोई बाधा नहीं हो सकती ॥२५।। [ प्रात्मा क्षीर-नोरन्याय से देहाभिन्न है २६ वीं कारिका में चेतन में अचेतनधर्म का संक्रमण होने में परिणामित्व का बाध बताते हुए कुला. लादि के देह में घटादि के कर्तृत्व को शङ्का का समाधान किया गया है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है 'कुलालादि का प्रात्मा घट का फर्ता नहीं है किन्तु उस का देह कर्ता है । क्योकि घटादि के स्थूल रूप को रचना कुलालादि की चेष्टा से होती है और चेष्टा प्रात्मगत न होकर शरीरगत होती है।' कन्तु ऐमा कहने पर भी घटादि के प्रति कुलालादि के प्रात्मा के कत्व का परिहार नहीं हो सकता। क्योकि जब कुलालादि का देह घटादि का कर्ता होगा तो उस को प्रात्मा भी घटादि का कर्ता होना आवश्यक हो जायगा क्योकि देह प्रात्मा से पृथक् नहीं होता । यदि यह कहा जाय कि 'प्रात्मा सर्व- त और निष्क्रिय होती है, एव देह असर्वगत और सक्रिय होती है प्रत प्रात्मा का देह से पार्थक्य अनिवार्य है'-नो यह ठीक नहीं है क्योकि प्रात्मा को देह से सर्वथा भिन्न मानने पर वह प्रात्मा मुक्त- कल्प हो जायगा और ससार दशा में भी उस में भोग न हो सकेगा क्योकि क्षीरनीर के समान प्रात्मा देहाभिन्न होने पर ही उस में देह द्वारा भोग का उपपादन हो सकता है, अन्यथा नहीं ॥२६॥ ( वुद्धि पुरुष का प्रतिबिम्ब होने से भोग उपचार ) २७ वी कारिका मे साक्ष्य के इस अभिप्राय का उल्लेख किया गया है कि प्रात्मा मे मोगाभाव का पापादान इष्ट ही है, क्योकि प्रात्मा वास्तविक दृष्टि से भोग का आश्रय नहीं होता । ११ देहस्तापि कर्ता चेत्' यह पाठ उचित हो सकता है किन्तु टोकानुसारेण मूल में 'दे' १६ के अनन्तर विसग का प्रश्नप प्रतीत होता है ।

ग्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ १०५ देहेन भोगो देहभोगस्तेन, 'धान्येन धनम्' इतिवदभेदे तृतीया, देहभोगेन-देहद्वारेति वाऽर्थ', जैद, अस्य-आत्मनः, भावतः तत्त्वतः, भावतः तत्वतः, इष्यते भोगः, किन्तु प्रतिविम्बोदयात् । यद्यप्येवमपि सुख-दुःखाद्यन्तःकरणधर्मानुविद्धस्य महत एव स्वतोऽचेतनस्य चेतनोपरागेण 'चेतनोऽहं सुखी' त्याद्यभिमानरूपश्चैतन्यांशेऽतात्विको भोगः, न तु पुरुपस्य, तथापि भोक्तृबुद्धिमनिधानात् तत्र भोक्तृत्त्वव्यवहारः । तदाह पतञ्जलिः-'शुद्धोऽपि पुरुपः प्रत्ययं बौद्वमनुपश्यति, तमनुपश्यन्नतदात्मापि तदात्मक इव प्रतिभासते' इति । केचित्तु वुद्वौ पुरुपो- परागवत् पुरुपेऽपि बुद्धय परागं वर्णयन्ति, न चैवं विकृतत्वापत्तिः, अतात्विकोपरागेण तदयो- ७ । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- कारिता के अन्तर्गत प्राये देहभोग शब्द को 'देहेन भोग.'इस प्रकार व्युत्पत्ति होती है । इस व्युत्पत्ति मे देह शब्द के उत्तर विद्यमान तृतीयाविभक्ति का अर्थ अभेद हो सकता है जैसे 'धान्येन धनम्' इस वाक्य मे धान्य शब्दोत्तर तृतीया का अभेद अर्थ होता है। अत देहभोग शब्द का अर्थ होता है देहा- त्मको भोगः । ऐसा अर्थ करने पर भोग शब्द को भुज् धातु से करण अर्थ मे घम् प्रत्यय द्वारा निष्पन्न मानना होगा । और ऐसा होने पर देहभोग शब्द का अर्थ होगा भोग का देहात्मक साधन । उक्त व्युत्पत्ति मे भोग शब्द को भावार्थक घम् प्रत्यय से निष्पन्न मानने पर देहशब्दोत्तर तृतीया का 'द्वार' अर्थ करना होगा । और तब देहभोग शब्द का अर्थ होगा-देह द्वारा होनेवाला भोग । देहमोग शब्द के उक्त दोनो अर्थो मे कोई भी अर्थ लेने पर यही तथ्य उपलब्ध होता है कि भोग के देहाभिन्न साधन से अथवा देहद्वारा होनेवाले भोग से प्रात्ना मे वास्तविक भोग नहीं उपपन्न होता । क्योकि प्रात्मा पूर्णरूप से कूटस्थ है । अत विन्ध्यवामी प्रादि पूर्ववर्ती साख्यवेत्ता विद्वानो ने यह कहा है कि भोग के वास्तव आश्रयभूत बुद्धितत्त्व मे पुरुष का प्रतिविम्ब होने से बुद्धिगत भोग का प्रात्मा में प्राभास मात्र होता है । यह ज्ञातव्य है कि प्रतिबिम्ब द्वारा भी आत्मा मे भोग की उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योकि 'चेतनोऽह सुखी' इस अभिमान को ही चैतन्यस्वरूप प्रात्मा मे सुख का अतात्त्विक भोग कहा जा सकता है । किन्तु यह अभिमान भी सुखदुःखादि अन्तःकरणधर्मों से अनुद्धि एव स्वत: अचेतन महत्तत्त्व मे ही चेतनोपरागवश होता है । अत इस से प्रात्मा भोग का प्राश्रय सिद्ध नहीं हो सकता । यथार्थ मे भोग का प्राश्रय तो बुद्धि ही होती है । अत उस के सन्निधान से पुरुप मे भोवतृत्व का व्यवहार मात्र होता है । जैसा कि पतञ्जलि ने योगसूत्र के भाग्य मे कहा है-'पुरुष नितान्तशुद्ध होता है । वह बुद्विगत ज्ञान का अनुष्टा मात्र होता है । और अनुद्रष्टा होने के कारण ही ज्ञानात्मक न होने पर भी ज्ञानात्मक जैसा प्रतीत होता है ' । पतञ्जलि के इस वचन का तात्पर्य पुरुष मे भोवतृ- त्व न होने पर भी मोक्तृत्व व्यवहार के प्रदर्शन मे ही है। ( पुरुष मे बुद्धि के प्रतिबिम्ब से विकृति का प्रसग ) कुछ विद्वान बुद्धि पुरुष के उपराग के समान पुरुष मे भी वृद्धि का उपराग बताते हैं । उन का प्राशय यह है कि जैसे बुद्धि मे पुरुष का प्रतिविम्ब पडता है उसीप्रकार पुरुष मे भी बुद्धि का प्रति- विम्ब पडता है। ऐसा माननेपर यह शङ्का नहीं की जा सकती कि-'पुरुष यदि वृद्धि के प्रतिबिम्ब १०६ ] [ शा. वा समुच्चय न-३ लोक- गात् । तथा चाह वादमहार्णवः-'बुद्विदर्पणमंक्रान्तमर्थप्रतिबिम्बक द्विनीयटपणकन्पं पुम्य- ध्यारोहति, तदेव भोक्तृत्वमस्य, न तु विकारोपपत्ति.' इति । 'द्विगनप्रतिबिम्ब त्मन्येव बुद्धि- गतभोगोपसंक्रमः, विम्बात्मनि तु न किञ्चित्' इत्यपरे। स्त्रोक्तेऽर्थेऽमियुक्तममनिमाह-यथोक्तं पूर्व सूरिभिः विन्ध्यवास्यादिभिः ॥२५॥ किमुक्तम् ? इत्याह- मूलम्-पुम्पोऽविकृतात्मैव स्वनिर्भासमचेननम् । मनः करोति सांनिध्यादपाधिः स्फटिकं यथा ॥२८॥ पुरपः-आत्मा, अविकृन्मात्मैव अग्रन्युतम्बमाव एव, अचेतनं मनः, मानिन्यानु सामीप्याद् हेतोः, स्वनिर्भास-स्त्रोपरक्तम् करोति । निदर्शनमाह-योपाधिः पद्मगगादिः म्फटिक स्वधर्मसंक्रमेण स्वोपरक्तं करोति । न चैतावता म विकोति, स्न्तुि म्फटिक एव विक्री- यते, तथाऽऽत्मापि वुद्ध्युपगगं जनयन् न मिकरोति, फिन्तु बुद्धिरेका विक्रीयत इनि भावः ॥२८॥ को ग्रहण करेगा तो विकारी हो जायगा-' क्योंकि पुरष मे वृद्धि का जो प्रतिविन्वात्मक उपराग होता है वह तात्त्विक नहीं होता। अत एव वह पुरष को विकारयुक्त नहीं कर सकता । वादमहा- गंव नामक ग्रन्थ मे यह बात इस प्रकार स्फुट की गई है कि जैसे एक दर्पण मे पडा हुना किमी वस्तु का प्रतिविम्ब उस दूसरे दर्पण मे भी संक्रान्त होता है जिसमे वस्तु के प्रतिविम्ब मे युक्त पहला दर्पण प्रतिविम्वित होता है। उसी प्रकार वस्तु का प्रतिबिम्ब बुद्धि मे पड़ता है और उस प्रतिविम्ब से युक्त वृद्धि का प्रतिविम्ब पुरुष मे पडता है । अत: बुद्धिगत वस्तुप्रतिविम्ब पुरष मे मानित होता है। बुद्धि के प्रतिविम्व द्वारा पुरुष मे वृद्धिगत वस्तुप्रतिबिम्ब का भासित होना ही पुरप का भोक्तृत्व है । इस प्रकार का भोक्तृत्व होने पर नी पुरुष मे कोई विकार नहीं होता। अन्य विद्वानो का इस सम्बन्ध मे यह कहना है कि वृद्धि मे पुरुष-मात्मा का प्रतिविम्ब होने पर प्रात्मा के दो स्प हो जाते हैं । एक प्रतिविम्ब प्रात्मा और दूसरा विम्बात्मा । इन मे बुद्धिगतमोग का सम्बन्ध प्रतिविम्बात्मा मे ही होता है बिम्बात्मा मे नहीं होता। अतः प्रतिविम्बात्मा के विकृत होने पर भी विम्बात्मा को निर्विकारता यथापूर्व बनी रहती है ॥२७॥ (प्रात्मसंनिधान से अन्तःकरण मे औपाधिक चैतन्य) २८ वी कारिका मे पूर्व सकेतित साख्यवेत्ताओं के कथन को स्पष्ट किया गया है। कारिका अर्थ इसप्रकार है- आत्मा अपने सन्निधान से अचेतन मन को उपरक्त करता है अर्थात् उसमे अपने चैतन्य को प्रतीति कराता है और ऐसा करने पर भी वह अपने स्वरूप से अविकृत ही रहता है । यह बात स्फटिक के दृष्टान्त से बताई गई है। प्राशय यह है कि जैसे पद्मरागमरिण प्रादि उपाधि समीपस्य स्फटिक मरिण को अपने वर्ण के सक्रमण द्वारा उपरक्त करती है किन्तु ऐसा करने पर भी वह

स्या० का टीका और हिन्दी विवेचना ]
[ १०७
ततः किम् ? इत्याह-
मूलम्-विभक्तेदृक्परिणतौ वुद्धौ भोगोऽस्य कथ्यते ।
प्रतिबिम्बोदयः स्वच्छे यथा चन्द्रमसोऽम्भसि ॥२९॥
विभक्ता-आत्मभिन्ना, ईदृक्परिणतिः अभिहितपुरुपोपरागपरिणामा च, इति
कर्मधारयः, तस्यां, वुडौ अन्तःकरणलक्षणायाम् , अस्य आत्मनः, भोगः कथ्यते, आसुरि-
प्रभृतिभिः । किवत् ? इत्याह-यथा चन्द्रमसः वास्तवस्य चन्द्रस्य, प्रतिविम्बोदय:-प्रति-
विम्बपरिणामः, स्वच्छे-निर्मले, अम्भसिजले ॥२६॥
तदिदमखिलमपाकुर्वन्नाह-
मूलम्-प्रतिविम्बोदयोऽप्यस्य नामूर्त्तत्वेन युज्यते
मुक्तेरतिप्रसड्गाच्च न वै भोगः कदाचन ॥३०॥
प्रतिबिम्बोदयोऽपि, अस्य अमूर्तत्वेन न युज्यते, छायावन्मूर्तद्रव्येणैव हि प्रतिविम्बा-
ख्यं स्वाकारं भास्वरद्रव्योपादानं द्रव्यमारभ्यते, तथा चाईम्-[प्र. म. टीका वृ० ३०५/२]
'सामा उ दिया छाया अभासुरगया णिसिं तु कालाभा ।
सच्चेह भासुरगया सदेहवण्णा मुणेयव्या ॥१॥ इति ।
-
।
स्वय विकृत नहीं होता अपितु उस के उपराग-सम्बन्ध से स्फटिक ही विकृत होता है उसी प्रकार
प्रात्मा भी बुद्धि मे अपने उपराग का जनक होकर भी स्वय नहीं विकृत होता, किन्तु उस के उपराग
से बुद्धि ही विकृत होती है ॥२८॥
(बुद्धि मे पुरुषोपराग हो आत्मा का भोग है-आसुरि)
२६ वी कारिका मे पूर्व कारिका के कथन का निष्कर्ष बताया गया है।
कारिका का अर्थ इस प्रकार है-
बुद्धि अन्त करण रूप है और पूर्वकारिका मे वर्णित पुरुषोपरागरूप परिणाम से युक्त है एव
प्रात्मा से विभकन-भिन्न है, वास्तव मे भोग उसी मे होता है । साख्यशास्त्र के प्रासुरि प्रादि विद्वानो
ने आत्मा मे जो भोग का उल्लेख किया है वह भोगयुक्त बुद्धि मे प्रात्मा के उपराग के कारण ही है,
एव अवास्तव है । यह बात जल मे चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब के दृष्टान्त से स्फुट होती है । जैसे अविकृत
चन्द्रमा का निर्मल जल मे प्रतिविम्बात्मक परिणाम होता है उसी प्रकार सूक्ष्म बुद्धितत्त्व मे अविकृत
प्रात्मा का भी प्रतिबिम्बपरिणामात्मक उपराग हो सकता है ॥२६॥
[अमूर्त आत्मा का प्रतिबिम्ब असंगत है]
३० वों कारिका मे पूर्वकारिकातक साख्य की ओर से प्रकट किये गये सम्पूर्ण विचार का निराकरण
किया गया है। कारिका का अर्थ इस प्रकार है-
(१) श्यामा तु दिवा छायामास्वरगता निशि तु कालामा । सा चेह मास्वरगता स्वदेहवर्णा ज्ञातव्या ॥१॥

१०८] [शा. या ममुग्चय न०३-ग्लो०३० युक्तं चैतत्, अन्यथेदंत्वावच्छेदैन मुसभेदग्रहाऽभागात् । 'इटं मुसम्' इनि प्रतीनेः कथञ्चिदुपपादनेऽपि 'इदं मुखप्रतिनिम्बम्' इनि प्रतीतः कथमप्युपपादयितुमशक्यत्वात् । मुस- भ्रमाधिष्ठानत्वरूपमुग्यप्रतिविम्बन्धम्य प्रागेवाऽग्रहाद , 'आदर्श मृसप्रतिबिम्बम्' इत्याधागऽऽधेय- भावाध्यवमायानुपपत्तश्च । एतेन 'मुखे विम्बत्वमिवाऽऽदर्श एवं प्रतिविम्वत्वं मुखमांनिध्य- दोपाऽभावादिसामग्र्याऽभिव्यज्यते' इति निरस्तम् , बिम्बोत्कर्षानुपपत्तेः, प्रतिविम्वन्वाऽ- ग्राहक्रमामय्या एवादर्शमेदभ्रमहेतुत्वेन 'अय नाऽऽदर्शः, किन्तु मुगप्रतिविम्बम्' इति माई- प्रारमा अमूर्त है । इसलिये बुद्धि तत्त्व में उसके प्रतिविम्ब का उदय युक्तिमङ्गत नहीं हो सकता क्योकि जो द्रव्य मूर्त एव छायावान होता है वही किमी नाम्बर में अपने प्राकार का प्रतिविम्बक द्रव्य को उत्पन्न कर सकता है जैसा कि 'सामा उदीयाः' इस ऋषिप्रणीत गाया मे कहा गया है। गाया पाप्रर्य यह है कि-' दिन मे किमी प्रमास्वरद्रव्य मे श्यामवर्णा और रात्रि के समय कृपयादा छाया होती हैं। वही जब नास्वरद्रव्य मे प्रतिविम्बित होती है । तब अपने द्रव्य के ही वर्ण मे दिखाई देती है। इस गाया से स्पष्ट है कि छायावान् मूर्त द्रव्य का ही मास्वर द्रव्य में प्रतिबिम्ब होता है । अतः छायाहीन प्रमूर्त प्रात्मा का बुद्धि में प्रतिबिम्ब मानना मद्त नहीं हो मकता।'यायावान् मूतं द्रव्य नास्वरद्रव्य में अपने समान प्रतिविम्ब द्रव्य को उत्पन्न करता है। यह मानना हो युक्तिमगत है क्योकि यदि छायावान् मूर्त द्रव्य से भास्वर द्रव्य में उस के सन्श नये प्रतिविन्य द्रव्य की उत्पत्ति न मानी जायगी किन्तु माम्वर द्रव्य को विम्बभूत द्रव्य के भ्रम का अधिष्ठान मात्र माना जायगा तो दर्पण में मुस का प्रतिविम्ब होने पर जो 'इद मुसम्' यह प्रतीति होती है उसको उपपत्ति तो हो सकती है, क्योंकि 'इद न मुखम्' इस प्रकार भेदग्रह न रहने के कारण 'इद मुखम्' इस प्रतीति के होने में कोई बाधक नहीं हो मकता, किन्तु दर्पग में मुस का प्रतिविम्ब होने पर 'इद मुसप्रतिविम्बम्' यह भी प्रतीति होती है जिसका उपपादन नहीं हो सकेगा। क्योकि यदि दर्पण में प्रतिबिम्ब मुस को उत्पत्ति न मानी जायगी तो मुख का प्रति- विम्बत्व जो मुसभ्रम का अधिष्ठानत्वत्प है वह प्रतिविम्ब काल में गृहीत नहीं है प्रतः 'इद मुखप्रति- विम्बम्' प्रतीति का होना अशक्य है। और यदि प्रतिबिम्ब को द्रव्यात्मक न माना जायगा तो 'प्रादर्श मुखप्रतिविम्बम्' इस प्रकार दर्पण और मुसप्रतिविम्व में प्राधार प्राधेयमाव की प्रतीति भी न हो सकेगी, क्योकि प्राधेय के अनाव में केवल प्राधार मात्र से आधार-प्राधेय भाव को प्रतीति नहीं हो सकती है। इस सम्बन्ध में कुछ लोगों का यह कहना है कि-दर्पण मे मुख का प्रतिबिम्ब पटते समय प्रति- विम्बात्मक किसी नये द्रव्य की उत्पत्ति नहीं होतो किन्तु मुससान्निध्य और दोषानावादि सामग्री से मुखमे विम्बत्व और 'दर्पण में प्रतिविम्बत्व की अभिव्यक्ति होती है-किन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योकि इस पक्ष में प्रादर्श ही प्रतिविम्ब कहा जायगा । अत प्रादर्श और प्रतिबिम्ब में आधार प्राधेय भाव की उक्त प्रतीति की उपपत्ति इस मत में भी न हो सकेगी। एवं विम्ब के उत्कर्ष से प्रतिबिम्ब का उत्कर्ष भी न हो सकेगा। प्राशय यह है कि दर्पण में छोटे मुख का छोटा प्रतिबिम्ब दीखता है और वडे मुख का वडा प्रतिविम्ब दीखता है। यदि प्रतिविम्ब नाम के नये द्रव्य की उत्पत्त नहीं होगी किन्तु प्रादर्श में ही प्रतिबिम्बत्व की अभिव्यक्ति मानी जायगी तो प्रतिबिम्ब में बिम्बाधीन अपकर्ष- उत्कर्ष को उपपत्ति न हो सकेगी। और प्रतिविम्ब के समय 'प्रय न प्रादर्श'-यह दर्पण नहीं हैं किन्तु स्या० १० टीका और हिन्दी विवेचना ] [ १०१ जनीनानुभवानुपपत्तेश्च । न च प्रतिबिम्बस्य द्रव्यत्वे सावधिकत्वानुपपत्तिः, प्रतिविम्वधर्मम्यव महत्त्ववत् सावधिकत्वात् । न चाश्रयनाशे तन्नाशानुपपत्तिः, विम्बनिधाननिमित्तनितम्य तस्य तन्नाशेनैव नाशमभवात् । न चैवमनन्तप्रतिविम्बोत्पत्तिनाशादिकल्पने गौरवम् , सादृश्यातिरि- क्तानन्तदोषादिकल्पने तवैव गौरवात् , अनुभवापलापाच्चेति, अधिकमाकरे । स्फटिकादौ लौहित्यादिकमपि पद्मगगादिमूर्तसंनिधिजन्य एच परिणामविशेषः, साक्षात्मबन्धेन तत्प्रतीती परम्परासंबन्धस्याऽतिप्रसक्तत्वात् । स्फटिकादिनिष्ठतया लोहिताश्रयमंमर्गम्य साक्षात्संवन्धेन लोहित्यभ्रमजनकत्वे तत्र विशेषदर्शनादेरुत्तेजकत्वे, परंपरामबन्धेन लोहित्यप्रमानियामक- त्वादिकल्पने चातिगौरवात् लौहित्यमात्रजनकत्वकल्पनाया एव न्याय्यत्वात् , अभिभूता- ऽनभिभृतरूपयोः समावेशस्याऽनुभवसिद्धत्वेनाऽविरुद्धवात् , नियतारम्भनिरासाच्चेति, अन्यत्र विस्तरः। मुखका प्रतिविम्ब है' यह सार्वजनीन अनुभव होता है । इस अनुभव को नो उपपत्ति न हो सकेगी। क्योकि प्रतिविम्बत्व की अग्राहक सामग्री ही प्रादर्श के भेदभ्रम का हेतु होती है। अत. आदर्श के भेदभ्रम के साथ प्रतिबिम्बत्व का ज्ञान होना सभव नहीं हो सकता।-'प्रतिविम्ब को अतिरिक्त द्रव्य मानने पर उस मे विम्बावधिकत्व न हो सकेगा अर्थात् जब तक विम्ब रहे तब तक उसका अस्तित्व न होकर बिम्ब के अभाव मे भी उस के अस्तित्व की प्रसक्ति होगी-यह नहीं कहा जा सकता क्योकि प्रतिबिम्ब बिम्बावधिक नहीं होता किन्तु उस का प्रतिबिम्बत्वरूप धर्म ही सावधिक होता है । अर्थात् बिम्ब के न होने पर प्रतिबिम्ब का प्रभाव नहीं होता । किन्तु प्रतिविम्बत्व की बुद्धि निरुद्ध हो जाती है, क्योकि प्रतिबिम्बत्व के ग्रहण मे बिम्ब का सन्निधान कारण होता है । इसे महत्त्व (=महत्परिमाण) के नष्टान्त से समझा जा सकता है । जैसे, जिस द्रव्य मे जिस द्रव्य की अपेक्षा महत्त्व की प्रतीति होती है उस द्रव्य के अभाव मे महत्त्वेन प्रतीत होनेवाला द्रव्य का अभाव नहीं होता अपितु महत्त्व को प्रतीति का निरोध मात्र होता है। अत. जैसे महत्त्व का प्राश्रयभूत द्रव्य लघु- द्रव्य से सावधिक नहीं होता किन्तु उस का महत्व ही उस से सावधिक होता है उसी प्रकार प्रतिविम्बा- त्मक द्रव्य बिम्बावधिक नहीं होता किन्तु उस का प्रतिबिम्नत्व रूप धर्म ही बिम्बावधिक होता है। आश्रय नाश से प्रतिविम्बक द्रव्य के नाश की अनुपपत्ति भी नहीं हो सकती, क्योकि प्रति- विम्बक द्रव्य बिम्बसनिधान रूप निमित्त से उत्पन्न होता है अतः पाश्रयनाश होने पर उस निमित्त का नाश होने के कारण प्रतिविम्बक द्रव्य का नाश हो सकता है क्योकि निमित्त का नाश नैमित्तक के नाश का कारण होता है। अतिरिक्त प्रतिबिम्बक द्रव्य की उत्पत्ति मानने पर अनन्त प्रतिबिम्बो की उत्पत्ति और उन के नाश आदि की कल्पना मे गौरव होगा' यह भी नहीं कहा जा सकता क्योकि प्रतिविम्ब को बिम्बभ्रम माननेवाले साख्य को सातश्य से अतिरिक्त भ्रमजनक अनत दोष की कल्पना आवश्यक होने से सास्यमत मे ही गौरव है । और उस मत मे बिम्बभूत मुख से भिन्न प्रतिविम्बमुख देखने के सर्वजनसिद्ध अनुभव का साख्यमत मे अपलाप भी होता है। इस विषय का अधिक विचार आकर ग्रन्थ में द्रष्टव्य है। स्फटिकादि में जो लौहित्यादि प्रतीत होता है वह भी पद्मरागादि मूर्त द्रव्य के सनिधान से उत्पन्न होनेवाला स्फटिकादि का परिणामविशेष ही है । और स्फटिक में उस की प्रतीति साक्षात

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स्या० का टीका और हिन्दी विवेचना ] [ १११ . अथ 'न पुरुपजन्यः पुरुपोपरागः, किन्तु पुरुषभेदाऽग्रहादसत एव तम्योत्पत्तिः, सदुपरागेण भानाच्च नाऽसत्ख्याति'रिति चेत् १ गतं तर्हि मत्कार्यवादेन । 'बुद्वौ मन्नेव पुरुषोपरागः कदाचिदाविर्भवतीति चेत् ? तर्हि बुद्रा न्यत्तेः पूर्व पुरुषस्यानुपरक्ततया मोक्षः स्यात् , प्रकृतेः साधारणत्वेनाऽनुपरञ्जफत्वात्' । 'पूर्वबुद्रुिवामनानुवृत्तेः माधारण्येऽप्यसाधारणी प्रकृति'रिति चेत् १ न, 'बुद्धिनिवृत्तावपि तद्धर्मवासनानुवृत्तिः' इत्युपदर्शनम् । 'सोक्षम्याद न टोप इति' चेत् ? मुक्तावपि तत्प्रमङ्गः । 'निरधिकारित्वाद् नैवमिति चेत् ? तहिं साधिकारा प्रसुप्तस्वभावा बुद्धिरेव प्रकृतिरस्तु, कृतमन्तरा प्रकृत्य-ऽहकार मनः-शब्दानामर्थान्तरकल्पनया, सेव हि तत्तद्वयापारयोगात् तेन तेन शब्देन व्यपदिश्यते शरीरवायुवत् , इत्यागमम्यापि न विरोध इति । स्वीक्रियता वा यथा कथश्चिद् तस्याऽतात्त्विको भोगः तथाप्यन्यदूषणमित्याह- मुक्तेरतिप्रसङ्गाच्च-तेषां प्रतिविम्घाभावात् समारिणामपि मुक्तकम्वभावत्वाद , वै--निश्चितम् , कदाचन कदाचिदपि, भोगो न स्यात् ॥३०॥ आत्मा का प्रतिबिम्ब माना जायगा तो आत्मा को उस प्रतिविम्ब का कारण मानना होगा । और ऐसा मानने पर प्रात्मा के साख्य सम्मत अकारणत्व सिद्धान्त का भङ्ग हो जायगा। [ असत् पुरुषोपराग कि उत्पत्ति मे सत्कार्यवाद विलय ] यदि यह कहा जाय कि- वृद्धि मे पुरुष का प्रतिबिम्बाख्य उपराग पुरुषजन्य नही होता अपितु वुद्धि पुरुष के भेद का ज्ञान न होने से प्रथमतः अविद्यमान हो पुरुषोपराग की उत्पत्ति होती है। बुद्धि पुरुष इन दो सत्पदार्थों के सम्पर्क से असत् भी पुरुषोपराग का मान होता है । ऐसा मानने पर बौद्ध को असतस्याति का यहा प्रवेश नहीं हो सकता, क्योकि उन मत मे सत् वस्तु का सर्वथा अभाव होने से सत् के सम्बन्ध से असत् का ज्ञान नहीं माना जा सकता किन्तु यह ठीक नहीं है क्योकि अरत् पुरुपोपराग की उत्पत्ति मानने पर 'कार्य उत्पत्ति के पूर्व कारण मे सत् होता है इस साख्य के सुप्रसिद्ध स्त् कार्य सिद्धान्त का भड्ग हो जायगा । 'वह बुद्धि मे पहले से ही विद्यमान रहता है समय विशेष मे उसका आविर्भाव होता है-यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योकि एसा मानने पर बुद्धि की उत्पत्ति के पूर्व पुरुष मे किसी प्रकार को उपरक्तता-ससृष्टता नहीं रहने से प्रकृतिव्याप र से पहले ही पुरुष मुक्त हो जायगा 'बुद्धि की उत्पत्ति के पूर्व प्रकृति से उपरक्त होने के कारण उस समय मी पुरष की मुक्तता नहीं हो सकती'-यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योकि प्रकृति प्रात्मा मात्र के प्रति साधारण होने से किसी को उपराग द्वारा नहीं बांध सकती। अगर कहें 'प्रकृति सर्वसाधारण होने पर भी पूर्ववृद्धि की वासना का अनुवर्तन होने के कारण असाधारण हो सकती है अत उस से भी पुरुष का उपरञ्जन-वन्धन हो सकता है तो यह ठीक नहीं है क्योकि प्रलयावस्था मे बुद्धि की निवृत्ति हो जाने पर भी बुद्धि के वासनात्मक धर्म की अनुवृत्ति मानने मे साख्य का अपसिद्धान्त हो जाता है । 'प्रलयावस्था मे बुद्धि की और उसके धर्मभूत वासना को सूक्ष्मरूप से स्थिति होने के कारण यह दोष नहीं हो सकता'-यह कथन भी ठीक नहीं है क्योकि ऐसा मानने पर मोक्षदशा मे भी बुद्धि और वृद्धिगत वासना का सूक्ष्मरूप मे प्रस्थान मानना होगा, अतः और - ११. ] [ शा.वा समुच्चय ल०३-३चो० ३१ अथ यदि मंमारिणां प्रतिविम्वोदयस्वभावः, तदाह- मूलम्-न च पूर्वस्वभावत्वात्स मुक्तानामसंगतः । स्वभावान्तरभाव च परिणामोऽनिवारितः ॥३॥ नच-नवा सः = प्रतिविम्मोदयस्वभावः, पूर्वस्वभावत्वात् समार्यवस्थैकम्वभावत्वात् , मुक्तानाममगतः किन्तु मंगत एव, अन्यथा नित्यत्वक्षते', एवमपि कदाचन न भोगः किन्तु सर्वदेव स्याद , इति योजना । स्वभावान्तरभावे च अमुक्तस्वभावपरित्यागेन मुक्तस्वभावो- त्पादे च मुक्तानामिण्यमाणे अनिवारितः परिमाणः, म्वभावान्यथात्वस्यैव तल्लक्षणत्वात् । मोक्ष की उपपत्ति न हो सकेगी। यदि कहा जाय कि-मोक्षदशा में वृद्धि अधिकारहीन हो जाती है। अत एव उत का बन्धन सामर्थ्य समाप्त हो जाने से उस के रहने पर नी मोक्ष की अनुपपत्ति नहीं हो सकती-तो यह कहना भी ठीक नहीं है। क्योकि ऐसा मानने पर अधिकारयुक्त प्रसुप्त स्वभाववालो वृद्धि को हो प्रकृति माना जा सकता है। और इस प्रकार प्रकृति-अहङ्कार-मन ये सभी शब्दों के मर्थनेद की कल्पना अनावश्यक और अप्रामाणिक हो जायगी, क्योकि बुद्धि प्रकृति, महकार और मन के व्यापारो के सम्बन्ध से प्रकृति आदि शब्दो से उसी प्रकार व्यपदिष्ट हो सकेगी जैसे शरीरस्य एक ही वायु व्यापार भेद से प्राण-अपान आदि विभिन्न शब्दो से व्यपदिष्ट होता है। इस प्रकार प्रकृति अहङ्कारादि विभिन्न शब्दो से तत्त्व का निरूपण करनेवाले सारपशास्त्र का विरोध नहीं होगा और यदि किसी प्रकार आत्मा मे अतात्त्विकभोग मान भी लिया जाय तो उक्त दोषों का कश्चित् निराकरण हो मकने पर भी समारदशा मे मोक्ष का अतिप्रसङ्ग होगा क्योंकि अमूर्तद्रव्य का प्रतिबिम्ब न मानने पर ससारी आत्मा नो मुक्तकल्प ही होगा । और आत्मा का प्रतिविम्ब न मानने पर आत्मा मे कभो भो भोग न हो सकेगा ॥३॥ (अपरिणामो आत्मा प्रतिविम्बोदय स्वभाव नहीं हो सकता) ३१ वी कारिका मे संसारी आत्मा मे प्रतिविम्बजनन स्वभाव होता है' इस मत की समीक्षा की गई है कारिका अथ इस प्रकार है- समारी आत्मा को प्रतिविम्बजनन के स्वभाव से सम्पन्न मानकर मी सतारावस्था मे आत्मा मुक्तता को आपत्ति का परिहार हो सकता है। किन्तु ससारी आत्मा मे प्रतिविम्बजनन स्वभाव जानने पर मुक्तात्मा को उस स्वभाव से विधुर कहना सङ्गत नहीं हो सकता। क्योंकि ससारावस्था मे आत्मा ने जो प्रतिबिम्बजननस्वभाव रहता है-मोक्षावस्था मे उस को निवृत्ति मानने पर आत्मा की निन्यता का मग हो जायगा और यदि मुक्तावस्था मे भी उस स्वभाव का अनुवर्तन माना जायगा तो आत्मा मे भोग केवल ससार दशा मे ही न होकर सव काल मे होने लगेगा। जिसका दुष्परिणाम यह होगा कि आमा कभी मुक्त न हो सकेगो इस दोष का परिहार करने के लिये यदि यह माना जाय कि 'मोक्षदशा मे आत्मा के ससारकालीन अमुक्तस्वभाव की निवृत्ति हो जाती है और मुक्त स्वभाव को उत्पत्ति हो जाती है तो आत्मा मे परिणामित्व को आपत्ति होगी। क्योकि एक स्वभाव को छोड़कर स्वभावान्तर को ग्रह्ण करना हो परिगामी का लक्षण होता है । मे स्या क० टीका और हिन्दी विवेचना ] [ ११३ 'घटनाशे घटावच्छिन्नस्याकाशस्य घटानवच्छिन्नत्वेऽपि स्वभावाऽपरित्यागवत् सवासनबुद्धिनाशे विषयावच्छिन्नस्य चैतन्यस्य विपयानवच्छिन्नत्वेऽपि स्वभावाऽपरित्याग एवेति चेत् १ अहो ! असिद्धमसिद्धेन साधयति भवान् , घटनाशेऽप्याकाशस्य घटावच्छिन्नत्वस्वभावाऽपरित्यागे घटाका- शव्यवहारप्रसङ्गात् । किञ्च ‘सा वुद्धिस्तमेवात्मानं विपयेणावच्छिनत्ति' इत्यत्र न किमपि निया- मकं पश्यामः । तस्मात् बुद्धिरेव रागादिपरिणताऽऽत्मस्थानेऽभिपिच्यताम् । तस्या लयश्च रागा- दिलय एव, इति तत्रैव मुक्तिरिति युक्तम् ।।३१॥ देहात् पृथक्त्व आत्मनो दोपान्तरमाह दोहात्पृथक्त्व एवास्य न च हिसादयः क्वचित् । तदभावेऽनिमित्तत्वाकथं बन्ध, शुभाशुभः ? ॥३२॥ देहात् पृथक्त्व एव-एकान्ततो देहपृथक्त्वे, अस्य-आत्मनः स्वीक्रियमाणे, न च हिं- 'सादयः क्वचिद् भवेयुः । न हि ब्राह्मणशरीरहत्यैव ब्रह्महत्या, मृतघ्राह्मणशरीरदाहेऽपि तत्प्र- सङ्गात् । न च मरणोद्देशाभावादयमदोपः, तदुद्देशेनापि तत्प्रसङ्गात् । ब्राह्मणात्मनस्तु नाश एव न, इति ब्राह्मणं धनतोऽपि सा न स्यात् । 'ब्राह्मणशरीरावच्छिन्नज्ञानजनकमनःसंयोग- यदि यह कहा जाय कि-'जसे घट का नाश होने पर घटावच्छिन्न आकाश घट से अनवच्छिन्न तो हो जाता है किन्तु वह अपने स्वभाव का परित्याग नहीं करता। उसी प्रकार वासानायुक्त वृद्धि का नाश होने पर विपयवावच्छिन्न चतन्य मे विषयानवच्छिन्नत्व हो जाने पर भी उसके स्वभाव का परित्याग नहीं हो सकता । अत विषयानवच्छिन्नत्व हो जाने से आत्मा को मुक्तता और स्वभाव का परित्याग न होने से उस को मुक्तता और अपरिणामिता दोनो की रक्षा हो सकती है ।' तो यह ठीक नहीं है क्योकि यह कथन तो असिद्ध से असिद्ध को सिद्ध करने का प्रयास है । आय यह है कि 'घटनाश होने पर घटावच्छिन्न आकाश के स्वभाव का परित्याग नहीं होता' यह बात असिद्ध है, क्योकि घटनाश होने पर भी यदि आकाश का धटावच्छिन्नत्व स्वभाव बना रहेगा तो घटनाश हो जाने पर भी घटाकाश' इस व्यवहार को आपत्ति होगी। इसके अतिरिक्त यह भी विचारणीय है कि 'कोई एक निश्चित बुद्धि किसी एक निश्चित अात्मा को हो विषयोपरक्त कर सकती है, दूसरे को नहीं' इस बात का कोई नियामक ही नहीं है, क्योकि आत्मा परिच्छिन्न न होने से सभी बुद्धि मे सभी आत्मा का सामोप्य सुलभ होता है । अत. उचित यह होगा कि रागादिरूप मे परिणतबुद्धि को ही आत्मा के स्थान मे अभिषिक्त किया जाय और आत्मा के अस्तित्व का अस्वीकार कर दिया जाय । ऐसा मानने पर यह निष्कर्ष होगा कि रागाद्यात्मक परिणाम ही बद्धि स्वरूप आत्मा का बन्धन, और रागादिलयरूप सरागबुद्धि का लय ही बुद्धिस् प प्रात्मा की मुक्ति है। अत बुद्धि से मिन्न आत्मा का अस्तित्व साख्य प्रक्रिया के अनुसार नहीं सिद्ध किया जा सकता ॥३१॥ [देह-आत्म मे ब्रह्महत्या की अनुपपत्ति] ३२ वीं कारिका मे आत्मा को देह से भिन्न मानने पर एक और अतिरिक्त दोष बताया गया हे जो कारिका की व्याख्या करने से म्फुट होता है, कारिका को व्याख्या इस प्रकार है- - -- भेद पक्ष ११४ ] [ शा० वा० समुच्चय स्त० ३-श्लो० ३२ विशेषनाशानुकूलो व्यापार एव ब्रह्महत्ये' ति चेत् १ न, तादृशमनःसंयोगम्य स्वत एव नश्वरत्वात् , साक्षाद्घातानुपपत्तेश्च । 'ब्राह्मणशरीरावच्छिन्नदुःखविणेपानुकूलव्यापार एव ब्रह्महत्ये' ति चेत् ? शरीराच्छरीरिणः सर्वथा भेदे तच्छेदादिना तस्य दुःसमपि कथम् ? 'परम्परासम्बन्धेन तदात्मसंबन्धादि' ति चेत् ? साक्षादेव कथं न नत्मबन्धः १ शरीरावय- वच्छेदे एव हि शरीरात् पृथग्भूतावयवस्य कम्पोपलब्धिरुपपद्यते, नाऽन्यथा, प्राणक्रियाया अपि तन्मात्रोपग्रहं विनाऽभावात् । आत्मा को देह से एकान्ततः (पूर्णतया) भिन्न मानने पर हिंसादि की उपपत्ति नहीं हो सकती, क्योकि ब्राह्मण के शरीर की हत्या ब्रह्महत्या नहीं होती, अन्यथा मृतब्राह्मण के शरीर का दाह करने पर भी दाहर्ता को ब्राह्मणहत्या को आपत्ति होगी। ' मरण के उद्देश से को जानेवाली हत्या हो वास्तविक हत्या होती है, मृत ब्राह्मण के शरीर का दाह मरण के उद्देश से नहीं होता क्योकि दाहके पहले ही ब्राह्मण मृत रहता है । अत मृतव्राह्मण के शरीर का वाह हत्यारूप नहीं हो सकता" यह कथन भी पर्याप्त नहीं है, क्योकि ब्राह्मण के प्रथमत मृत होने पर भी यदि मरण के उद्देश से उस के शरीर का दाह किया जाय तव भी उक्त दाह हत्या नहीं कहा जाता किन्तु यदि शरीर की हत्या को ही हत्या माना जायगा तो उक्त दाह मे भी हत्यात्व का परिहार नहीं हो सकता । ब्राह्मणात्मा के नाश को हत्या नहीं कहा जा सकता, क्योकि आत्मा के नित्य होने से उस का नाश होता ही नहीं है । अत ब्राह्मणात्मा के नाश को हत्या मानने पर ब्राह्मणघाती भो ब्रह्महत्या से मुक्त हो जायगा । यदि यह कहा जाय कि-'जिस प्रात्ममन सयोग से ब्राह्मणशरीरावच्छेदेन ज्ञान उत्पन्न होता है उस आत्ममनःसंयोग का नाशव्यापार ही ब्रह्महत्या है तो यह ठीक नहीं है । क्योकि ज्ञान उत्पन्न करनेवाला आत्मसयोग घातक व्यापार न होने पर भी स्वय ही नष्ट हो जाता है । और उस का साक्षात् घात हो भी नहीं सकता। 'ब्राह्मणशरीरावच्छेदेन दुःखविशेष का जनक व्यापार ही ब्रह्महत्या है- यह भी नहीं कहा जाता है, क्योकि शरीर से प्रात्मा को अत्यन्त भिन्न मानने पर शरीर के छेदन आदि से प्रात्मा मे दु.ख का होना सगत नहीं हो सकता है। यदि यह कहा जाय कि 'देह के छेदन आदि का आत्मा मे परम्परासम्बन्ध होने से आत्मा मे भी उस से दुःख का उदय हो सकता है- तो यह कहने की अपेक्षा यह मानना अधिक उचित है कि प्रात्मा के साथ देह के छेदन आदि का साक्षात् ही सम्बन्ध होता है, इसलिए ही प्रात्मा को देह से पूर्णतया भिन्न नहीं माना जाता है । देह और आत्मा मे अत्यन्त भेद न मानकर कथञ्चित् अभेद मानना इसलिए भी आवश्यक कि शरीर के किसी अवयव का छेद होने पर जव अवयव शरीर से अलग हो जाता है तब भी कुछ समय तक छिन्न अवयव मे कम्प होता है । यह कम्प तभी हो सकता है जव शरीर के अवयव का छेद होने पर आत्मा के अवयव का भी छेद हो और आत्मा का छिन्न अवयव शरीर के छिन्न अवयव मे विद्यमान हो। ऐसा न मानने पर शरीर के छिन्न अवयव मे आत्मा का सम्बन्ध न होने से इस मे कम्प नहीं हो सकता। 'प्रात्मसम्बन्ध के अभाव मे भी प्रारण की क्रिया से भी शरीर के छिन्न अवयव मे कम्प की उत्पत्ति नहीं की जासकती'-क्योकि प्राण की क्रिया भी शरीर या शरीर के अवयव मे तभी होती है जब उस मे आत्मा प स्या० का टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ११५ नन्वेवं छिन्नावयवानुप्रविष्टस्य पृथगात्मत्वप्रसक्तिः स्यादिति चेत् १ न, तत्रैव पश्चा- दनुप्रवेशात् । छिन्ने हस्तादो कम्पादितल्लिङ्गादर्शनादित्थं कल्पनात् । न चैकत्वादात्मनो विभागाऽभावाच्छेदाभाव इति वाच्यम् , शरीरद्वारेण तस्यापि सविभागत्वात् , अन्यथा सावयवशरीरव्यापिता तस्य न स्यात् । तथा च तच्छेदनान्तरीयकरच्छेदो न स्यात् । छिन्ना- ऽच्छिन्नयोः कथं पश्चात् संघटनम् ?' इति चेत् १ न, एकान्तेनाच्छिन्नत्वात् , पद्मनालतन्तुव- च्छेदेऽपि च्छेदाभ्युपगमात् । संघटनमपि तथाभूताऽदृष्टवशादविरुद्धमेव । 'हन्त ! एवं शरीर- दाहेऽप्यात्मदाहः स्यादि' ति चेत् ? न, क्षीर नीरयोरिचाऽभिन्नत्वेऽपि भिन्नलक्षणत्वेन तद्दोपा- भावादिति, अन्यत्र विस्तरः । तस्माद् देहादात्मन एकान्तपृथक्त्वे हिंसाद्यभावः, तदभावे हिंसाद्यभावे, अनिमि- तत्वात-निमित्तसंनिधानाऽभावात् , कथं शुभाऽशुभो बन्धः १ अत्र शुभश्वाऽशुभश्चेति विग्रहे द्विवचनापत्तिः, कर्मधारये च बाध इति शुभेन सहितोऽशुम इति व्याख्येयम् ॥३२॥ का सम्बन्ध हो अत. देह और प्रात्मा मे अभेद मानकर देहावयव का छेद होने पर आत्म-अवयव का छेद मानना और प्रात्म-अवयव के सम्पर्क से ही छिन्न देहावयव मे कम्प की उपपत्ति करना प्रावश्यक है। [छिन्न अवयव मे पृथक् आत्म प्रसंग का निवारण 'देह और आत्मा का अभेद होने से देहावयव के छेद से आत्म-अवयव का छेद होता है ऐसा मानने पर देहके छिन्न अवयव मे आत्मा का जो भाग अनुप्रविष्ट रहेगा वह एक पृथक् आत्मा ही हो जायगा'-यह शका नहीं की जा सकती, क्योकि आत्मा का जो भाग छिन्न देहावयव के साथ वाहर आता है वह थोडे समय बाद पूर्व शरीर मे ही प्रविष्ट हो जाता है । यह कल्पना इसलिए की जाती है, कि दह के छिन्न अवयव मे कुछ समय तक कम्प होता है और बाद मे कम्प नहीं होता है, अत बाद मे भी छिन्न अवयव मे आत्मभाग का सम्बन्ध बना रहता है'-यह मानने मे कोई युक्ति नहीं है -'आत्मा एक होता है अत इस मे विभाग सभव न हो सकने से उस का छेद नहीं हो सकता'-यह शका भी उचित नहीं है क्योकि देह और आत्मा मे ऐक्य मानने पर देह मे विभाग सभव होने के कारण देह के द्वारा आत्मा मे भी विभाग मानना युक्तिसगत हो सकता है। यदि आत्मा को सावयव न माना जायगा तो वह सायव शरीर मे व्यापक नहीं हो सकेगा और देह छेद के साथ आत्म छेद की अनि- धार्यता भी न हो सकेगी। 'छिन्न देहावयव का शेष शरीर के साथ बाद मे जैमे सघट्टन नहीं हो पाता उसी प्रकार छिन्न आत्म-अवयवो का भी शरीरस्थ शेष प्रात्मा के साथ संघट्टन नहीं हो सकता'- यह शफा भी उवित नहीं होती, क्योकि आत्मा का जो भाग देहके छिन्नावयव के साथ छिन्न होता है वह पूर्ण रूप से शरीरस्थ आत्मा से पृथग नहीं होता । अत उस का संघट्टन हो सकता है किन्तु देहका जो हस्तादि अवयव देह से पृथग होता है वह देह से पूर्णतया पृथग हो जाता है अत देह के साथ उसका सं. घट्टन नहीं होता। छिन्न मश का अपने अशी के साथ सघट्टित होना कोई अद्भुत बात नहीं है।

११६ ] [गाया० मन्चम०३-सो० ३३ ततः को दोपः ? इत्याह- मूलम्-पन्धात न संसारो मुक्तिस्योपपद्यने । यमादि तदभावे च सर्वमेव घपार्यकम् ॥३३॥ पन्धाहतबन्धं विना, देव-नारकादिरूपः समागे न । नयाऽम्य-आत्मनः मुक्तिम्पपद्यते, बद्वानां कर्मणां क्षय एव हि मुक्तिरिति । तदभाव च-मुक्त्यमावे च, गर्वमेव हि निश्चितम् , यमादि यमनियमादिकं योगानुष्ठानम् अपार्थकम विपरीनप्रयोजनम् । कः खलु फल- मनमिलपन्नेत्र दुप्फरक्लेशगत्मानमयमादयेन १ ॥३३॥ क्योकि फमलनाल के छिन ततु का छिन नान के साथ सघट्टन गर्वानुनय मिद्ध है। 'विना कारण सघट्टन फंसे हो सकता है ? इस शका को नो अवमर नहीं प्राप्त हो सकता क्योंकि अब यहा शक्ति- शाली कारण होता है । अत एव जिम छिन अा का छिन्न अशी के माय नरहनकारी अन्य रहता है उस का अशो के साथ सघट्टन होने में कोई बाधा नहीं हो सकती। यदि यह शाका को जाय कि 'देह और आत्मा मे ऐक्य मानने पर शरीर का दाह होने पर आत्मा का भी दाह हो जायगा तो यह ठीक नहीं है पयोफि क्षीर और नीर के समान अभिन्नता हने पर भी देह और आत्मा मे कुछ भिन्नता भी होती है । उस भिन्नता के कारण हो शरीरदाह होने पर भी आत्मदाह नहीं होना जमे नीर को वाप्प हो जाने पर उस के साथ ही सोर का विनाश नहीं हो जाता । इस विषय का विस्तृत विचार अन्यत्र दृष्टव्य है । निष्कर्ष यह है कि-आन्मा को देह मे अत्यन्त भिन मानने पर हिमादि का अभाव हो जायगा और हिंसादि का अभाव होने पर शुभाशुभ बन्ध का कोई निमित्त न होने में शुभाशुभ बन्ध भी न हो सकेगा। फारिका मे आये शुभाशुन शब्द का 'शुभश्च अशुभश्च ऐसी व्युत्पत्ति मानकर द्वन्द्व समान द्वारा साघुपन नहीं हो सकता क्योकि उक्त व्युत्पत्ति से द्वन्द्व मानने पर द्विवचन विभक्ति की आपत्ति होगी। फर्मधारय समास से भी साधुपन नहीं माना जा सकता क्योकि शुभ और अशुभ मे ऐक्य नहीं होता और कर्मधारय के लिए पूर्व और उत्तर पद के अर्थों में अभेद आवश्यक होता है, इसलिए 'शुभेन सहित अशुभ ' यह व्युत्पत्ति कर मध्यमपदलोपोसमास से ही उसका माधुपन समझना चाहिए। [ बन्ध न होने पर मुक्त और ससारी के भेद की अनुपपत्ति ] ३३ वी कारिका मे शुभाशुभ बन्ध के अभाव मे क्या दोष हो सकता है इस बात का प्रतिपा हुए कहा गया है कि यदि शुमाशुन वन्ध न होगा तो प्रात्मा ससारी न हो सकेगा, क्योंकि देव-नरक, मृत्युलोक आदि के साथ प्रात्मा का सम्बन्ध हो ससार कहलाता है पोर शुभाशुभ बन्ध ही उसका निमत माना जाता है । अत: उसके अनाव मे निमित्त का प्रभाव हो जाने से ससार का होना असमव हो जायगा । शुभाशुभ बन्ध के अभाव मे प्रात्मा का मोक्ष भी नहीं हो सकता क्योकि कर्मबन्ध के क्षय को ही मोक्ष कहा जाता है । जब प्रात्मा मे कर्मबन्ध ही नहीं होगा तो फिर उसका क्षय कसे समव हो सकेगा ? यदि 'प्रात्मा का मोक्ष नहीं होता है। यह मान लिया जाय तो यम नियम आदि का कष्टसाध्य पालन निरर्थक हो जायगा क्योकि कोई भी मनुष्य बिना किसी फल को कामना किये दु.सह क्लेशो से अपने आपको पोडित करने का कष्टमय व्यापार नहीं करता ॥३३॥ दन करते स्या० क० टीका हिन्दीविवेचना ] [११७ पराभिप्रायमाह- मूलम्-आत्मा न बध्यते नापि मुच्यतेऽसौ कदाचन । वध्यते मुच्यते चापि प्रकृति. स्वात्मनेति चेत् ॥३४॥ असौ-प्रत्यक्षसिद्धः आत्मा, न बध्यतेन प्राकृतिकाटिबन्धपरिणतो भवति, सवा- सनक्लेशकर्माशयानां वन्धत्वेन समाम्नातानां पुरुपेऽपरिणामिन्यसंभवात् । नापि कदाचन मुच्यते, मुचेर्वन्धनविश्लेपार्थत्वात् तस्य च सर्वदाऽबद्धत्वात् कुत्र तहि बन्ध-मोक्षौ ? इत्यत आह-बध्यते प्रकृतिरेव स्वात्मनास्वपरिणामलक्षणेन बन्धेन, मुच्यते चापि तेन प्रकृति- रेव, तत्रैव बन्धविश्लेपात् । पुरुषे तु तावुपचर्येते, भृत्यगताविव जय-पराजयो स्वामिनीति । तदुक्तम्- - 'तस्माद् न वध्यते नापि मुच्यते नापि समरति कश्चित् । संसरति बध्यते मुच्यते च नानाश्रया प्रकृतिः ॥११॥[मां का. ६२]इति । (ममाधत्ते) इति चेत ? हो सकता, [ प्रकृति के बन्ध और मोक्ष को आशंका ] ३४ वीं कारिका मे वन्धमोक्ष के सम्बन्ध मे साख्यशास्त्र का मत प्रदर्शित किया है जो इस प्रकार है-प्रात्मा यथार्थ रूपमे न कभी बद्ध ही होता है न कभी मुक्त होता है। बद्ध इसलिए नही होता है कि प्रात्मा अपरिणामी होता है अत. वासना क्लेश और कशियरूपी वन्ध उसको नहीं क्योकि यह बन्ध परिणामात्मक है, अतः प्राकृतिकमादि के रूप मे अपरिणामी प्रात्मा मे उसका होना असभव है । प्रात्मा का मोक्ष इसलिए नहीं हो सकता कि वह सर्वदा बन्धनहीन होता है अतः उसमे बन्धननिवतिस्प मोक्ष की सम्भावना ही नहीं हो सकती । इसलिये प्रात्मा मे बन्छ प्रौर मोक्ष को अनुपपत्ति बनाना असङ्गत है । वस्तु स्थिति यह है कि वन्ध और मोक्ष प्रकृति मे होते है । और प्रकृति मे उनकी उपपत्ति होने में कोई बाधा नहीं है क्योकि प्रकृति परिणा- मिनी होती है, अतः अपने परिणामो से वाधाजान उसके लिये स्वाभाटिक है । और जब उसमे वन्ध होता है तो निमित्त उपस्थित होने पर उसमे बन्धनिवृत्तिरूप मोक्ष का होना भी युदित सङ्गत है । 'प्रकृति मे बन्ध और मोक्ष मानने पर प्रात्मा मे बन्ध मोक्ष का व्यवहार कैसे होगा ?' इस प्रश्न का उत्तर यह है कि जैसे युद्ध मे जयपराजय वस्तुत. राजा के सेवक सैनिको का होता है किन्तु उसका औपचारिक व्यवहार राजा मे माना जाता है, उसी प्रकार प्रकृति मे होने वाले बन्धमोक्ष का उसके अधिष्ठाता प्रात्मा मे प्रौपचारिक व्यवहार माना जा सकता है । जैसा कि ईश्वरकृष्ण ने 'तस्मात् न बध्यते' अपनी इस कारिका मे कहा है कि-प्रात्मा के कूटस्थ नित्य होने के कारण कोई भी प्रात्मा न कभी ससारी होता है न कभी बद्ध होता है और न कभी मुक्त होता है किन्तु अनेक रूपो मे परिणत होने की योग्यता रखने के कारण प्रकृति मे ही ससार, बन्ध और मोक्ष होते हैं पुरुष मे उनका व्यवहार मात्र होता है जो पूर्णरूप से प्रौपचारिक-गौण है ।

११] [ शा० वा० समुन्चय त०३-ग्लोक ३५ अत्रोत्तरम् ---- मूलम-एकान्तेनैकरूपाया नित्यायाश्च न सर्वधा । तस्याः क्रियान्तराऽभावायाधमोक्षी सयुक्तितः ॥३५॥ एकान्नेनैकरूपायाः मथकम्बमावायाः, सर्वथा नित्यायाश्च-मः प्रकारैः प्रवृत्ति- रूपैकक्रियायाच, तस्याः प्रकृतेः, क्रियान्तराभावात-निवृत्तिक्रियाया अमावात् , सुयु. क्तितः सन्यायात् , बन्ध मोक्षौ न । प्रकृति-पृरुपान्यतास्यातिरूपो हि व्यापारः पुरुषम्यव, इति तस्यैव मोक्ष उचितः, न तु प्रकृतः, तस्याः प्रत्येकरूपत्वात , पुरुषार्थमचेतनत्वेन व्यापाराऽयोगाच्च । किश्च प्रकृतेमुक्ती पुरुषस्य स्वरूपावस्थाने तस्याः माधारणत्वाटेकमुक्ती समारोच्छेदः, प्रक्रतिवदात्मनोऽपि सर्वगतत्वेन 'एकावच्छेदेन मुक्तिः, नान्यावच्छेदन' इत्यपि वमशक्य- त्वात् । तद्बुद्धयवच्छेदेन मुक्तत्वम् , नान्ययुद्धयवच्छेदेन इत्यपि क्षीणायायुद्धेश्नवच्छेदक- त्वादनुद्घोप्यम् , बुद्धियोगेन पुरुपस्य मंमारित्वे तस्यैव मोक्षग्रसङ्गाच्च ||३५|| - [ नित्य एक स्वरूप प्रकृति मे चन्ध मोक्ष असभव ] ३५ वी कारिका मे पूर्वकारिकाणित सारयमत का समाधान करते हुए यह कहा गया है कि प्रकृति सर्दया एकरुप और नित्य है । सदा प्रवृत्तिशोल रहना ही उनका स्वभाव है । प्रत उस मे निवृत्तिरूप अन्यक्रिया नहीं हो सकती । इसीलिये उसमे बन्ध और मोक्ष न्यायसङ्गत नहीं हो सकते । 'प्रकृतेरह पृया-मै प्रकृति से पृथक् हू' वंसा प्रकृति और पुरुष मे भेद का ज्ञान पुरुष का ही काय है और वही मोक्ष का साधन है इसलिये पुरुष मे ही मोक्ष हो सकता है प्रकृति में नहीं, क्योकि प्रवृत्तिशील रहना हो उसका सहज स्वभाव है । यह कहना कि- 'प्रकृति हो पुरुप के मोग और मोक्ष दोनो प्रयोजन का सम्पादन करने के लिये व्यापारग्त होती । प्रत वे दोनो प्रयोजन प्रकृति के हो व्यापार से सम्पन्न होने के कारण प्रकृति के ही धर्म हो सक्ते हैं । प्रकृति हो उन मे पुरुषप्रयोजनत्व उपपन्न करती है।'-ठीक नहीं हो सकता । क्योकि पृथ्वी अचेतन होती है अन एव पुरुष के लिये उसका व्यापाररत होना सम्भव नहीं है । व्यापाररत होने के लिये चैतन्य का होना आवश्यक है, क्योकि ससार में किसी भी जडपदार्थ मे स्वतन्त्ररूप से सक्रियता नहीं देखी जाती । यह भी ज्ञातव्य है कि पुरुष का मोक्ष न मानकर यदि प्रकृति का ही मोक्ष माना जायगा और प्रकृति के मोक्ष से ही पुरप का अपने सहज स्वरूप मे अवस्थान होगा तो प्रकृति के सर्वसाधारण होने के कारण एक की मुक्ति होने पर समस्त ससार का उच्छेद हो जायगा, क्योकि प्रकृति जब किसी एक प्रात्मा के लिये अपना व्यापार बन्ध करेगी तो उसका वह व्यापार निरोध प्रात्मा मात्र के लिये हो जायगा, क्योकि यह सम्भव नहीं है कि एक ही समय मे प्रकृति नियापार भी हो और मव्यापार भी हो. चकि सन्यापारत्व और निर्व्यापारत्व मे विरोध है । यदि यह कहा स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ ११६ दोपान्तरमप्याह- मूलम्-मोक्षः प्रकृत्ययोगो यदतोऽस्याः स कथं भवेत् । स्वरूपविगमापत्तेस्तथा तन्त्रविरोधनः । मोक्षः प्रकृत्ययोगः, यत्-यस्मात् कारणात् , 'प्रकृतिवियोगो मोक्षः' इति वचनात् , अतो हेतोः, अस्थाः प्रकृतेः, सः मोक्षः, कथं भवेत् ? कुन इत्याह स्वरूपविगमापत्तेः-प्रकृति- स्वरूपनिवृत्तिप्रसङ्गात् , पुरुपे तु तव्यापारनिवृत्तिद्वारा तन्निवृत्तियुज्येतापि न तु स्वस्मिन् स्व- निवृत्तिः संभवति, घटे घटनिवृत्यदर्शनात् अप्रसक्तस्याऽप्रतिपेधात् । तथा, तन्त्रविरोधतोऽपि प्रकृतेर्मोक्षः कथम् १ ॥३३॥ जाय कि-'सव्यापारता और निर्यापारता मे विरोध होने पर भी भिन्न भिन्न प्रात्मा के प्रति उन दोनो का समावेश प्रकृति मे एक काल मे भी हो सकता है । अतः प्रकृति मे एकपुरुषावच्छे- देन मुक्ति और अन्यपुरुषावच्छेदेन मुक्ति का अभाव होने से मुक्ति को प्रकृतिगत मानने पर भी ससार के उच्छेद को आपत्ति नहीं हो सकती ।' तो यह ठीक नहीं है क्योकि प्रकृति जैसे सर्वगत है उसी प्रकार प्रात्मा भी सर्वगत है । अत: यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति का एक भाग एक ही आत्मा से सम्बद्ध होता है और अन्य प्रात्मा से सम्बद्ध नहीं होता । और जव ऐसा नहीं हो सकता तब यह बात कैसे युक्ति सगत हो सकती है कि प्रकृति मे एक आत्मावच्छेदेन मुक्ति और अन्यात्मावच्छेदेन मुक्ति का प्रभाव होता है । यदि यह कहा जाय कि-'पुरुष के सर्वगत होने के कारण पुरुष से प्रकृति का अवच्छेद सम्भव नही हो सकता किन्तु बुद्धि के असर्वगत होने के नाते बुद्धि से अवच्छेद हो सकता है । अतः यह मानना सम्भव है कि प्रकृति जब एकद्वयवच्छेदेन मुक्त होती है तब अन्यवुद्धचवच्छेदेन अमुक्त भी रह सकती है'- तो यह ठीक नहीं है क्योकि बुद्धि का क्षय होने पर ही यह मोक्ष होता है तो फिर क्षीण- बुद्धि को मोक्ष का अवच्छेदक कैसे कहा जा सकता है ? और मुख्य बात तो यह है कि यदि पुरुष मे समार का वास्तविक सम्बन्ध न होता किन्तु ससार का वास्तविक सम्बन्ध बुद्धि मे ही होता है तो फिर बुद्धि का ही मोक्ष मानना युक्तिसङ्गत हो सकता है, क्योकि जो वास्तव रूप मे ससारो हो-वास्तवरूप मे वही मोक्ष का अधिकारी हो सकता है । अत पुरुष को ससारो और मुक्त कहना प्रसङ्गत है ॥३५॥ [ प्रकृतिवियोगात्मक मोक्ष प्रात्मा का ही संभवित है ] ३६ वीं कारिका मे मोक्ष को प्रकृतिगत मानने मे एक अन्य दोष बताते हुए कहा गया है कि 'प्रकृतिवियोगो मोक्ष' इस साख्यशास्त्रीय वचन के अनुसार प्रकृति के साथ सम्बन्ध का प्रभाव होना ही मोक्ष है । इसलिये वह प्रकृति में नहीं हो सकता, क्योकि प्रकृति मे प्रकृति का असम्बन्ध मानने पर प्रकृति के स्वरूप की ही निवृत्ति हो जायगी । पुरुष मे तो प्रकृति का असम्बन्ध माना जा सकता है, क्योकि पुरुष के साथ प्रकृति का सम्बन्ध प्रकृति के व्यापार से ही होता प्रतः प्रकृति के व्यापार को निवृत्ति होने पर प्रकृति के सम्बन्ध को निवृत्ति हो सकती १० [शावाममुच्चय स्त०३-लोर ३७-३८ 'एतदेवोपदर्शयन्नाह- मृलम्-पञ्चविशतितत्त्वज्ञो यत्र नवाश्रमे रतः जटी मुण्डी जिग्वी वापि मुच्यते नात्र संशयः । ७: पश्चविशतितत्त्वज्ञः प्रकृति-महादादिपञ्चविंशतितत्वरहस्यपरिनाना, यत्र तत्र-गृह- म्यादी आश्रम, रतः तत्त्वज्ञानाभ्यासवान , जटी-जटावान , मुण्डो-मुण्डिनशिगः, शिखी वापि-शिसावानपि, मुच्यते-प्रकृति-विकागेपधानविलयन मध्यावस्थितो भवति, वाद्यलिङ्ग- मत्राऽकारणम् । नात्र संशयः इदमित्यमेव, यवनप्रामाण्यात् ॥३७॥ निगमयति- मृलम्-पुरुषस्योंदिता मुक्तिरिति तन्त्रे चिरंतनः । इन्थं न घटते चेयमिनि सर्वमयुक्तिमत् ॥३८|| इति एतत्प्रकारे तन्त्रे शास्त्रे, चिरंतनैः पूर्वाचार्यः, चिरंतनैः पूर्वाचार्यः, पुरुषस्य मुक्तिरुक्ता । न चेय=पुरुपम्य मुक्ति', इत्य उक्तप्रकारेण विचार्यमाणा, घटनं इति हेतोः, सर्व माख्योक्तम् , अयुक्तिमत्-क्तिरहितम् ॥३८ । हैं । जैसे, घटादि किसी भी वस्तु मे उस वस्तु की निवृत्ति नहीं देखी जाती । क्योंकि ब मे स्व को प्रसक्ति नहीं होती, प्रत स्व मे स्व का प्रतिषेध नी नहीं हो सकता, और प्रसक्न का ही प्रतिषेध होता है अप्रसक्त का नहीं । प्रकृति में मोक्ष मानना शास्त्रविरुद्ध भी है जो सारयमतमान्य अग्रिम कारिका मे स्पष्ट है ॥३६॥ [सास्यसिद्धान्त मे पुरुष का ही मोक्ष कहा गया है] ३७ वी कारिका मे पूर्वकारिका मे कथित शास्त्रविरोध का प्रदर्शन करते हुए कहा गया है कि- प्रकृति-महत्-ग्रादि पचीस तत्त्वो का रहस्य जान्नेवाला मनुष्य गृहस्यादि किनी नी आश्रम में रहने पर मुक्त हो सकता है, चाहे वह जटा रखता हो या शिर का मुण्डन कराना हो अथवा चाहे वह शिखा धारण कन्ता हो । प्रकृति प्रादि के तत्त्वज्ञान का अन्यातद्वारा तत्त्वदर्शन हो जाने पर प्रकृति के विकारो का विलय होने से प्रात्मा अपने स्वस्प मे अवस्थित हो कर मुक्त हो सकता है। मोक्ष के लिये किनी भी प्रकार का बाह्य चिह्न अपेक्षित नहीं है । तत्त्वज्ञान से किसी भी स्थिति मे पुत्व होने मे कोई समय नही है-यह तथ्य शास्त्रवचनो से सिद्ध है । इस स्थिति मे यह स्पष्ट है कि ज्ञाता पुरुष हो मुक्त हो सकता है । अचेतना प्रकृति तत्ववेत्ता नहीं हो सकती है, अत एव उसको मुक्ति नहीं मानी जा सकतो ॥३७, ३८ वी कारिका मे निष्कप बताया जा रहा है- शास्त्र में पूर्वाचार्यों ने पुरुष की ही मुक्ति होती है ऐसा कहा है किन्तु सारयमत मे पुरप की मुक्ति नहीं हो सकती। जैसा कि विचार-विमर्श द्वारा सिद्ध हो चुका है । अत: सास्य ने जो कुछ नो कहा है वह सब युक्तिहीन होने के कारण प्रामान्य है ।।.८॥ . के मुक्त [१, एतन्त्रम-प्रकृन माड्स्यसिद्धान्त इति यावत् ।

स्या क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [१२१ अत्रापि यावद् यथोपपन्नं तावतस्तथावार्तामाह- मूलम् -अत्रापि पुरुषस्यान्ये मुक्तिमिच्छन्ति वादिनः । प्रकृति चापि सन्न्यायात्कर्मप्रकृतिमेव हि ॥३६॥ अत्रापि सांख्यवादे, अन्ये वादिनः जनाः, पुरुषस्य मुक्तिमिच्छन्ति प्रकृतिवियोगलक्ष- णाम् । प्रकृति चापि सन्यायात्-सत्तात् , हि-निश्चितम् , कर्मप्रकृतिमेवेच्छन्ति, बुद्धया- दीनां निमित्तत्वात् । तत्ममन्ययश्च कथञ्चिदात्मादावेवोपपद्यते । सर्वथा सत्कार्यवादे तु सतः मिद्धत्वेनाऽकरणात , साध्यार्थितयैवोपादानग्रहणात् , नियतादेव क्षीरादेः सामग्र्या दध्या- दिदर्शनात् , सिद्धे शक्त्यव्यापारात् , तादात्म्ये स्वस्मिन्निव कार्य कारण त्वा]भावाद् [इति] विपरीतं हेतुपञ्चकम् । - ( साख्यमत मे तथ्यांश का निरूपण ) ३६ वी कारिका मे साख्योक्त विषयो मे जिस रीति से उपपत्ति हो सकती है उस रीति से उस की उपपत्ति बताई गई है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है- साख्यसिद्धान्त मे पुरुष को मुक्ति और प्रकृति का प्रतिपादन किया गया है । इस प्रकार जैन विद्वानो ने पुरुष की मुक्ति व प्रकृति मान ली है और उनका कहना है कि पुरुष की प्रकृतिवियोगरूप मुक्ति होती है यह ठीक है किन्तु प्रकृति का जो स्वरूप साख्य ने माना है वह न्यायपूर्वक विचार करने पर जैन शासन मे वणित कर्मप्रकृति से भिन्न नहीं सिद्ध होती । अत. कर्मप्रकृति के रूप मे ही प्रकृति मान्य हो सकती है, क्योकि वही बुद्धि प्रादि सम्पूर्ण जगत् की निमित्त कारण होती है। उसका सम्बन्ध भी कश्चित् आत्मा मे उपपन्न हो जाता है । [ सत्कार्यवाद विरोधी हेतुपञ्चक ] सांख्यशास्त्र मे सत्कार्यवाद का वर्णन किया गया है, वह भी यथावणित रूप मे जैन विद्वानो को स्वीकार्य नहीं है क्योकि कार्य को सर्वथा सत् मानने पर सत्कार्यवाद को सिद्ध करने के लिये साख्यविद्वानो द्वारा प्रयोग मे लाये गये पाँचो हेतु विपरीत हो जाते हैं । अर्थात् (१) जैसे असत् का करण-जन्म नहीं हो सकता उसी प्रकार सर्वथा सत् का भी स्वत सिद्ध होने के कारण-जन्म हो सकता । (२) एव जो सिद्ध है उसके लिये उपादान का ग्रहण भी नहीं हो सकता है, क्योकि सर्वथा सिद्ध मे कुछ साधनीय नहीं होता और उपादान का ग्रहण साधनीय के लिये ही होता है । (३) सभी पदार्थो से सभी कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती' यह हेतु भी सर्वथा सिद्धवस्तु के सम्बन्ध मे उपपन्न नहीं होता, क्योकि नियत दुग्धादिसामग्री से दधि के रूप मे पूर्व प्रसिद्ध का ही सपादन होता है । (४) 'शक्य द्वारा शक्य का ही करण होता है-' यह हेतु भी सर्वथा सिद्धवस्तु के सम्बन्ध मे युक्त नहीं हो सकता, । क्योकि शक्ति का व्यापार भी सिद्ध मे नही देखा जाता। (५) कार्य और कारण के तादात्म्य को भी सत्कार्यवाद का समर्थक नही किया जा सकता, क्योकि कार्य और कारण मे सर्वथा तादात्म्य मानने पर कार्यकारण भाव ही नहीं हो सकता-जैसे वही वस्तु उस का कार्य और कारण नहीं होती। अतः १२] [ शा.वा.समुच्चय स्त०-३श्लोक 38 ? 'यदि कारणव्यापारात् प्रागपि पटस्तन्तुपु सन्नेव, तदा किमित्युपलब्धिकारणेषु मत्सु सत्यामपि जिजामायां नोपलभ्यते ? 'अनाविर्भावादिति चेत् । कोऽयमनाविर्भावः १ उप- लब्धेरभावश्चेत् । मैच कथम् इत्याक्षेपे तदेवोत्तरम् , इति घट्टकुट्टयां प्रभातम् । अथोपलब्धि- योग्यस्यार्थक्रियाकारिरूपस्य विग्होऽनाविर्भाव इति चेत् १ अमत्कार्यवादः, तादृशरूपस्य प्राग- सतः पश्चाद्भावात् । 'विजातीयमयोगस्य तदवच्छेदेन सन्निकर्पस्य वा व्यञ्जकस्याऽभावाद् न प्रागुपलब्धिरिति चेत् १ तर्हि तस्यैव प्रागसत्त्वेऽसत्कार्यापातः । 'प्राक् सन्नेवाविभूतो व्यञ्जक' इति चेत् ? न, आविर्भावस्यापि सदसद्विकल्पग्रासात् । 'स्थूलरूपावच्छिन्नस्य प्रागसत्वाद् नोप- लब्धिः, धर्म-धर्मिणोः सौक्ष्म्यस्थौल्ययोश्चैकत्वाद् नानवस्थेति चेत् ? तर्हि सूक्ष्मरूपावच्छिन्न- स्याऽहेतुकत्वेऽतिप्रसङ्गः । प्रकृतिमात्रहेतुकत्वे च स्थूलतादशायामपि तदापत्तिः, अनिर्मोक्षश्च इति न किञ्चिदेतत् । तस्माच्छ्चलस्यैव वस्तुनः कथञ्चित् सत्त्वम् असत्व चोपपत्तिमत् । तथा च बुद्धयादीनामहत्वसामानाधिकरण्येनाऽध्यवसीयमानत्वात् तद्धर्मतया तत्रैव समन्वयः, कर्मप्रकृ- तिस्तु तत्र निमित्तमात्रमिति प्रतिपत्तव्यम् ॥३९॥ इन हेतुप्रो से उत्पत्ति के पूर्व कार्य की एकान्त सत्ता नहीं सिद्ध हो सकती अपितु यह सिद्ध होता है कि कार्य उत्पत्ति के पूर्व कारणपर्याय के रुप मे सत् होता है और कार्य पर्याय के रूप मे असत होता है । पट अपने कारणों के व्यापार के पूर्व भी तन्तुनो मे यदि सर्वात्मना सत् होगा तो इस प्रश्न का कोई उत्तर दिया जाना कठिन होगा कि कारण व्यापार के पूर्व भी पट की उपलब्धि के समस्त कारणो के रहने पर और पट को उपलब्ध करने की इच्छा होने पर भी-पट की उपलब्धि क्यो नहीं होती ? 'उस समय पट का आविर्भाव न होने से पट की उपलब्धि नहीं होती' यह नहीं कहा जा सकता। क्योकि प्राविर्भाव न होने का अर्थ है उपलब्धि का अभाव । अतः कारणव्यापार के पहले कार्य की उपलब्धि नहीं क्यो होतो ? इस प्रश्न का उत्तर यह नहीं दिया जा सकता कि कार्य की उपलब्धि का प्रभाव है, क्योकि जिस उपलब्धि के प्रभाव से काय की अनुपलब्धि मानी जायगी वह उपलब्धि क्यो नहीं होती ?' यह प्रश्न भी उठेगा। प्रत. यह उत्तर नदी के घाट पर नदी पार करने का कर ग्रहण करने के लिये बनी हुई कुटी मे ही प्रभात होने के समान होगा। प्राशय यह है कि जैसे कोई व्यक्ति रात्रि के समय नदी पार कर नदी और कुटी के बीच ही किसी रास्ते से इस अभि- प्राय से नीकले कि जिससे कुटी पर उसे न जाना पडे और वह करदान से मुक्त हो जाय किन्तु रात के अन्धेरे मे चलते चलते उस कुटी पर ही पहुचने पर प्रभात हो जाय और वह कर ग्रहण करने वालो के घेरे मे प्रा जाय उसी प्रकार कार्य को उत्पत्ति के पहले सर्वथा सत् मानने पर कारण व्यापार के पूर्व कार्य- को उपलब्धि क्यों नहीं होती' इस प्रश्न का उक्त उत्तर देने पर उत्तरकर्ता पूर्वप्रश्न की परिधि मे ही फेंस जाता है। यदि यह कहा जाय कि-प्राविर्भाव न होने का अर्थ है उपलब्धि योग्य वस्तु को उपलब्धि का विषय बनाने वाले रूप का अनाव । तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर असत्कार्यवाद सिर पर सग हो जाता है। क्योंकि उपलब्धि योग्य को उपलब्धि विषय बनाने वाले रूप का पहले - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] एवं च न पूर्वोक्तदोष इत्याह- मूलम्-तस्याश्वानेकरूपत्वात् परिणामित्वयोगतः आत्मनो बन्धनत्वाच्च नोक्तदोषसमुद्भवः ॥ठना तस्याश्च कर्मप्रकृतेः अनेकरूपत्वात् एकानेकशवलस्वभावत्वात् , परिणामित्वयो- गतः ज्ञानावरणादिविपाकपरिणामोपपत्तेः, एकरूपत्व एवाऽनेककार्यजनकत्वाऽसंभवात् । आत्मनोऽन्योन्यानुप्रवेशेन वन्धनत्वात् स्वरूपतिरोधायकत्वात् , कर्माऽऽत्मनोईयोरपि बन्धन- वध्यस्वभावपरिणामात् तथोपपत्तेः, नोक्तदोपस्याऽनिर्मोक्षादेः समुद्भवोऽवकाशः ॥४०॥ जाय प्रभाव और बाद मे उस का भाव मानने पर ही उक्त बात कही जा सकती है । यदि यदि यह कहा कि-'पट व्यापार के पूर्व कार्य के साथ इन्द्रिय का विजातीय सयोग अथवा जिस स्थान मे कार्य को उपलब्धि होती है तत्स्थानावच्छेदेन इन्द्रियसन्निकर्षरूप व्यञ्जक का अभाव होने से कारण व्यापार के पूर्व कार्य की उपलब्धि नहीं होती-'तो यह भी ठीक नहीं है, क्योकि इस उत्तर मे भी उक्त सयोग या सन्निकर्ष का पहले प्रभाव और बाद मे भाव मानने से असत्कार्यवाद की आपत्ति होती है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि-'उक्त सयोग या सन्निकर्ष पहले भी सत् रहता है किन्तु व्यञ्जक प्राविर्भूत होने पर व्यक्त होता है क्योकि उसके अविर्भाव के विषय मे भी सत् और असत् का विकल्प उठ सकता है। यदि यह कहा जाय कि-कार्य स्थूल रूप से अवच्छिन्न होकर पहले नही रहता इसलिये पहले उसकी उपलब्धि नहीं होती और धर्म और धर्मी मे ऐक्य होने से कार्य के सूक्ष्म और स्थूल रूप मे ऐक्य होने से अनवस्था भी नहीं होती-तो यह कहना भी ठीक नहीं हो सकता, क्योकि सूक्ष्मरूपावच्छिन्नकार्य को यदि अहेतुक माना जायगा तो कार्य सूक्ष्मरूप से किसी नियत देश ही मे न रह कर अन्य देश मे भी उसके अस्तित्व की प्रापत्ति होगी और यदि प्रकृतिमात्र को ही उसका हेतु माना जायगा तो कार्य की स्थलत्व दशा मे भी कार्य मे सूक्ष्मता को आपत्ति होगी और उस सूक्ष्मता के कारण पहले के समान कारणव्यापार के बाद भी कार्य की उपलब्धि न हो सकेगी और सूक्ष्मरूपावच्छिन्न कार्य को अहेतुक या प्रकृतिमात्र हेतुक मानने पर उसका कभी भी प्रभाव न हो सकने से उसका बन्धन बने रहने के कारण मोक्ष का प्रभाव हो जायगा इसलिये वस्तु को अनेकान्तात्मक मानकर ही उसके सत्त्व और असत्त्व का कथञ्चित् उपपादन युक्तिसगत हो सकता है । निष्कर्ष यह है कि बुद्धयादि का अध्यवसाय अहमर्थ आत्मा मे होता है, अत एव उसे अहमर्थ का धर्म मानकर अहमर्थ मे ही उसका समन्वय मानना उचित है । कर्म प्रकृति तो उस मे निमित्त मात्र है ॥३६॥ [प्रकृतिस्थानीय कर्म से बन्ध और मोक्ष का सम्भव ] ४० वी कारिका मे यह बताया गया है कि-सांख्यमत मे प्रात्मा मे ससारित्व और मुक्तत्व को अनुपपत्तिरूप दोष जैन मत मे नहीं हो सकता है । इस बात का उपपादन करते हुए कहा गया है कि कर्मप्रकृति अनेकरूप है अर्थात् एक अनेक स्थिर क्षणिक सत् असत् प्रादि रूपो से उस का स्वभाव शवल-बहुविध है । अतः उस मे ज्ञानावरणादि के विपाकात्मक परिणामों की उप- १२४ ] [शा. या ममुच्चय म्तः-३ रलोक-४१-५२ - परः शङ्कते- मूलम्-नामूर्त मूर्ततां याति मूर्त्त नायात्यमृर्तताम् । यतो पन्धाद्यतो न्यायादात्मनोऽसंगतं तया ॥४१॥ न अमूर्त रूपादिसनिवेशरहितम् , मूर्ततां रूपादिमत्परिणतिम् , याति-आश्रयति, आका- शादौ तथाऽदर्शनात् । तथा मूर्त रूपादिमत् , अमूर्तनां अमूर्तपरिणतिम् न आयाति पर- माण्वादिषु तत्सद्भावाऽसिद्धेः, यतः यस्मादेचं न स्वरूपविपर्ययो भवति, अतः अस्मात् , न्यायात-नियमात् तया-कर्मप्रकृत्या आत्मनो बन्धाद्यसंगतम् ॥४१॥ अनोत्तरम्- मूलम्-देहस्पर्शादिसंविच्या न यात्येवेत्ययुक्तिमत् । अन्योन्यव्याप्तिजा चेयमिति बन्धादि संगतम् ॥४२॥ देहे स्पर्शः कण्टकादिस्पर्शः उपघातहेतूपनिपातोपलक्षणमेतत् , आदिनाऽनुग्रह-हेतूप- निपातसंग्रहः, तत्संवित्त्या-तज्जनितसुखदुखानुभूत्या, 'न यात्येव अमृतं मूर्तताम्' इति प्राक्त- पत्ति हो सकती है । यदि उस का कोई एक ही रूप माना जाता तब वह अनेक कार्यों की जन्नी न होतो । कर्मप्रकृति और प्रात्मा का एक दूसरे मे अनुप्रवेश होने के कारण कर्मप्रकृति के द्वारा आत्मा का बधन प्रात्मा के सत्स्वरूप का तिरोधान भी हो सकता है, क्योकि पर्म में बन्धन स्वभावात्मक परिणाम और आत्मा मे बद्धस्वभावात्मक परिणाम होता है । अतः कर्म को आत्मा का वधन और प्रात्मा को कर्म का वध्य होने मे कोई वाधा नहीं हो सकती, इसलिये जैन मत मे प्रात्मा मे ससार और मोक्ष के प्रभाव का प्रसग नहीं हो सकता ॥४॥ [ मूर्त और अमूर्त के अन्योन्य अपरिवर्तन की आशका ] ४१ वी कारिका मे कर्म और आत्मा के जैन सम्मत अन्योन्यानुप्रवेश सम्बन्ध मे साक्ष्यवेत्ताओं की यह शंका प्रदर्शित की गई है कि- जो पदार्थ अमूर्त होता है, जिसमे रूप स्पर्शादि का अस्तित्व नहीं होता वह पदार्य मूर्त नहीं हो सकता। रूप स्पर्श आदि के आश्रयरुप मे उसका परिणाम नहीं हो सकता जैसा कि आकाशादि मे देखा जाता है । यह सर्वमान्य है कि प्राकाश आदि अमूर्त रूपस्पर्शादिहीनपदार्थ कभी भी मूर्त रूप- स्पर्शादि से युक्त नहीं होता। इसी प्रकार जो पदार्थ मूर्त होता है. रूपस्पर्शादि से युक्त होता है उसका कभी अमूर्त परिणाम नहीं होता जैसे मूर्त परमाणु प्रादि मे अमूर्त परिणाम कभी नहीं होता। इस प्रकार जब यह सिद्ध है कि वस्तु के स्वरूप मे वैपरीत्य नहीं होता तव प्रात्मा के स्वरूप मे भी वैपरीत्य को सभावना कैसे हो सकती है ? अतः कर्मप्रकृति से प्रात्मा का बधनादि होना असगत है ॥४१॥ [ मूर्त-अमूर्त परिवर्तन की उपपत्ति ] ४२ वीं कारिका मे साख्य को पूर्वोक्त शका का उत्तर दिया गया है जो इस प्रकार है-देह मे उपघातक कण्टक आदि का स्पर्श होने पर दुःखको एवं अनुग्रह हेतुभूत माला चन्दन आदि के स्पर्श से सुखको अनुभूति होती है, जिससे अमूर्त आत्मा का मूर्त होना सिद्ध है । अतः यह कथन कि-'अमूर्त - स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [१२५ नानुपङ्गः, इति-एतत् अयुक्तिमत्-अनुभववाधितम् । 'घटादिमंवित्तिवद् देहस्पर्शादिगंवि- त्तिरात्मनोऽतन्मयत्वेऽप्युपपत्स्यत' इत्यत आह-इय च-देहस्पर्शादिसंवित्तिश्च अन्योन्यव्याप्तिजा गुड शुण्ठीद्रव्ययोरिव शरीरा ऽऽत्मनोर्जात्यन्तरतापत्तिप्रभवा, प्रतिप्रतिक तदनुभवात् , एका- भावेऽप्यभावाच्च । युक्त चैतत् , अविभागदर्शनात् , नरत्वादेरेकनिष्ठत्वेऽतिप्रमझात्, व्या- सज्यवृत्तित्वे च परस्यापसिद्धान्तः, व्यासज्यवृत्तिजात्यनभ्युपगमात् , एकाश्रयत्वानुभववि- रोधात् , शरीराऽप्रत्यक्षेप्यन्धकारे नरत्वप्रतीत्यनुपपत्तेश्च । तदिदमाह भगवान् सम्मतिकार:- 'अण्णोण्णाणुगयाणं इमं व तं वत्ति विभयणमजुत्तं । जह दुद्ध-पाणियाणं जावंत विसेसपज्जाया ॥ [सन्मति० गाथा ४७J ।। अन्योन्यानुगतयोरात्म-कर्मणोदुग्ध-पानीययोरिव यावन्तो विशेषपयार्यास्तावत्सु 'इदं वा तद् वा इति' विभजनमयुवतम् , प्रमाणाभावात् । ‘एवं तर्हि ज्ञानादयोऽपि देहे स्युः, देहरूपा- कभी मूर्त नहीं होता' अनुभव से बाधित होने के कारण प्रयुक्त है । यदि यह कहा जाय-'जैसे प्रात्मा मे घटादिरूपता न होने पर भी उसको घटादि का अनुभव होता है, उसी प्रकार देह स्पर्शादि न होने पर भी देहस्पर्शादि का अनुभव आत्मा को हो सकता है। प्रत प्रात्मा को देहस्पर्शादिमय मानकर अमूर्त को मूर्त के रूप मे परिणत होने की सिद्धि नहीं की जा सकती-तो यह ठीक नहीं है, क्योकि आत्मा को देहस्पर्शादि की अनुभूति होती है वह देह और प्रात्मा की एक दूसरे मे व्याप्ति होने से ही होती है अत जैसे गुड और सूठ इन दोनो द्रव्यो का परस्पर मे मिश्रण हो जाने पर ही एक मे दूसरे के धर्म की अनुभूति होती है उसी प्रकार देह और प्रात्मा का परस्पर मे मिश्रण हो जाने पर ही एक मे दूसरे के धर्म की अनुभूति होती है, देह और आत्मा का परस्पर मे मिश्रण अर्थात् आत्मा मे देह रूपता और देह मे प्रात्मरूपता होने पर ही प्रात्मा मे देहस्पर्शादि की अनुभूति हो सकती है। [ सांख्यमत मे देहात्म अविभाग को अनुपपत्ति ] यह इसलिये मानना आवश्यक है कि दोनो मे दोनो के धर्मों की अनुभूति होती है और एक के अभाव मे दूसरे की अनुभूति नहीं होती और यही युक्तिसंगत भी है--क्योकि देह और आत्मा मे अविभाग देखा जाता है । सांख्य मतमे देह और आत्मा का यह अविभाग नहीं उपपन्न हो सकता है क्योकि नरत्व आदि धर्मो को एकमात्रगत मानने पर दूसरे मे उसका अनुभव मानने पर प्रतिप्रसङ्ग होगा और उभयवृत्ति अर्थात् देह-यात्म उभयगत मानने पर अपसिद्धान्त होगा, क्योकि साख्य मत्त मे व्यासज्यवृत्ति जाति नही मानी जाती है। नरत्व और प्रात्मत्व में 'अह नरः' इस प्रकार एकाधिकरणता का अनुभव होता है साख्यमत में इसकी उपपत्ति नही हो सकती। एव अन्धकार में शरीर का प्रत्यक्ष न होने पर भी नर- त्व को प्रतीति होती है, सांख्यमत में इसकी भी उपपत्ति नहीं हो सकती । जैनमत मे इन त्रुटियो की सभावना नहीं होती क्योकि देह और श्रात्मा का अन्योन्य मिश्रण होने के कारण प्रात्मा में देह धर्म और देह में प्रात्मधर्म की अनुभूति होने में कोई वाधा नहीं होती । भगवान् सन्मतिकार ने इस बात को 'अण्णोणा०' इस गाथा से स्पष्ट किया है । गाथा का अर्थ इस प्रकार है- १ अन्योन्यानुगतयोरिद वा तद् वेति विमजनमयुक्तम् । यथा दुग्धपानीययोर्यावन्तो विशेषपर्यायाः। , १०६ ] [शास्त्रवार्तासमुच्चय-स्त० ३ श्लो०४२ दयोऽप्यात्मनीति चेत् ? इप्टापत्तिः । तदाह- 'रूवाइपज्जवा जे देहे जीवदवियम्मि सुम्मि । ते अण्णोण्णाणुगया पण्णवणिज्जा भवथम्मि ॥१॥ इति । [मन्मति० ४८] 'गोरोऽहं जानामि' इत्यादिधियस्तथैवोपपत्तः, रूपादि-ज्ञानादीनामन्योऽन्यानुप्रवेशेन कञ्चदेकत्वा-ऽनेकत्व-मृतत्वादिसमावेशात् । अत एव दण्डात्मादीनामेकत्वं अनेकत्वं च स्थानाड्गे व्यवस्थितम् । तदाह- " एवं एगे आया, एगे ढडे अ होड किरिया य । करणविसेसेण य तिविहजोगसिद्धी वि अविरुद्धा ॥ १ ॥ [मन्मति० ४६] नन्वेवमन्तहर्ष-विपादाद्यनेकविवर्त्तात्मकमेकं चैतन्यम् , यहिाल कुमार-यौवनायनेका- ( अन्योन्यानुगत मे विभाग की अयुक्तता ) 'जो द्रव्य परस्पर में अनुगत होते हैं अर्थात् जिनमें परस्पर तादात्म्य होता है उनमें यह और वह एव ये धर्म इसके और वे धर्म उसके इस प्रकार का विभाग युक्तिसगत नहीं होता। जैसे दूध और पानी मे जितने ही विशेष पर्याय होते हैं उन्हें दुग्ध पर्याय और जलपर्याय इन दो वर्ग में विभक्त नहीं किया जाता है उसी प्रकार प्रात्मा और कर्म प्रन्योन्यानुगत होते हैं अतः उनके पर्यायो को भी देह पर्याय और प्रात्मपर्याय के रूप में विभक्त नहीं किया जा सकता है, क्योकि इस प्रकार के विभाजन मे कोई प्रमाण नहीं होता।' इस प्रसग में यह आपत्ति उठाना कि-'ऐसा मानने पर ज्ञान प्रादि देह के धर्म हो जायेंगे और स्पर्शादि प्रात्मा के धर्म हो जायेंगे-'यह ठीक नहीं है क्योकि जैन मत में यह बात मान्य ही है जैसा कि 'रूपादिपर्यवा०' प्रादि गाथा में स्पष्ट कहा गया है वि-देह के रूप आदि पर्याय एव जीवद्रव्य के पर्याय देह और जीवद्रव्य के अन्योन्य अनुगत होने से जीवको भवस्थ दशा मे एक दूसरे के धर्म रूप में मान्य है।' ऐसा मानने पर 'गौरोऽह जानामि' इस स्प में देह के धर्म गौररूप और आत्मा के धर्म ज्ञानका एक प्राश्रय में अनुभव हो सकता है । और यदि देह और आत्मा का अन्योन्यानुवेध-परस्पर तादात्म्य न माना जायगा तो इस अनुभव की उत्पत्ति नहीं हो सकती। देह और प्रात्मा मे अन्यो- न्यानुप्रवेश होने से रूप आदि देह धर्म और ज्ञान प्रादि प्रात्मधर्मो मे भी अन्योन्यानुप्रवेश तादात्म्यस्प होता है और उनके धर्म का अनुप्रवेश सामानाधिकरण्य यानी एकाश्रयनिष्ठत्व रूप होता है । अन्योन्या- नुप्रवेश के कारण हो एक वस्तु में एकत्व अनेकत्व तथा मूर्तत्व अमूर्तत्व आदि धर्मों का कथञ्चित् समा- वेश होता है । इसलिए ठाणांग सूत्र में भी आत्मा और दण्ड आदि में एकत्व और अनेकत्व का समावेश बताया गया है। जैसा कि "एवं एगे प्रायाः" इस सम्मति सूत्र से भी स्पष्ट होता है । सूत्र का अर्थ यह है कि प्रात्मा स्वरूपदृष्टि से एक होता है और दण्ड तथा क्रियामी सामान्य की दृष्टि से एक होता है किन्तु करण विशेष से तीन प्रकार के योग की सिद्धि में कोई विरोध नहीं होता इसलिये एक ही प्रात्मा और दण्ड आदि त्रितयात्मक हो जाता है । १ रुपादिपयवा ये दह जीवद्रव्ये शुद्धे । तेऽन्योन्यानुगताः प्रज्ञापनीया मवस्थे ।। २ एवमेक आत्मा एको दण्डश्व मवति क्रियाऽपि । करणविशेपेण त्रिविधयोगसिद्धिरप्यविरुद्धा ।।

[ १२७ स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] ~ , वस्थात्मकमेकशरारमध्यक्षतः संवेद्यत इत्यस्य विरोधः, वाह्या-ऽभ्यन्तरविभागाभावादिति चेत् ? सत्यम् , आत्मभिन्नत्वाभ्यां तद्व्यपदेशाद् । तदाह- 'ण य बाहिरओ भावो अभंतरओ अ अत्थि समयम्मि । जोडदियं पुण पडुच्च होड अभंतरविसेमो ॥ [सन्मति ५०] सर्वस्यैव मृर्ताऽ मूर्त्तादिरूपतयाऽनेकान्तात्मकत्वात् 'अयं वाह्यः, अयं चाभ्यन्तरः' इति समये न वास्तवो विभागः । अभ्यन्तर इति व्यपदेशस्तु नोडन्द्रियं मनः प्रतीत्य, तस्याऽऽत्मपरिणति- रूपस्य पराऽप्रत्यक्षत्वात् , शरीर-बाचोश्चि । न च तद्वदेव तस्य परप्रत्यक्षत्वापत्तिः, इन्द्रिय- ज्ञानस्याशेपपदार्थस्वरूपग्राहकत्वाऽयोगात् । एवं च स्याद्वादोक्तिरेव युक्ता न तु परस्परनिरपेक्ष- नयोक्तिविना श्रोतृधीपरिकर्मणानिमित्तम् , वस्तुनोऽनेकान्तात्मकत्वात् । तदाह- ( विवर्तों के बाह्याभ्यन्तरविभाग अनुपपत्ति की प्राशका ) देह और आत्मा मे अन्योन्यानुवेध मानने पर यह शडका हो सकती है कि- 'हपं विषादादि अनेक आभ्यन्तर विवों से अभिन्न एक चैतन्य है, और बाल्य-फौमार्य, यौवनादि अनेकविधावस्थानो से अभिन्न एक शरीर है यह जो प्रत्यक्ष अनुभव होता है वह नहीं हो सकेगा । क्योकि देह और आत्मा एव उनके विवर्त्त और अवस्थाओ मे अन्योन्यानुवेध मानने पर बाह्य और आभ्यन्तर का विभाग नहीं हो सकता। किन्तु यह शका केवल आपातत उचित हो सकती है, क्योकि आत्मा के भेदाऽभेद के कारण चैतन्यस्वरूप आत्मा के उक्त विवर्त्त और देह को उक्तावस्थाओ मे बाह्य और आभ्यन्तर के अनुभाग न होने पर भी मनोग्राह्यत्व और मनोग्राह्यत्वाभाव रूप से बाह्याभ्यन्तर का व्यवहार हो सकता है । कहने का आशय यह है कि देह और आत्मा के अन्योन्यानुवेध होने से आत्मधर्म भी देह- गत होने से बाह्य और देहधर्म आत्मगत होने से आभ्यन्तर हो जाते हैं । अत देह और आत्मधर्म को बाह्य और प्राभ्यन्तररूप मे विभक्त नही किया जा सकता । किन्तु हर्ष-विषादादि चैतन्य के विवर्ती का मानसज्ञान होता है और देह की बाल कौमारादि अवस्थाप्रो का मानसज्ञान नहीं होता। अत एव मानसत्वरूप से उनका विभाग हो सकता है। और उस विभाग के आधार पर चैतन्य और देह के उक्त प्रत्यक्षानुभव की उपपत्ति भी हो सकती है। जैसा कि--'रण य बाहिरो०' इस गाथा मे स्पष्ट किया गया है । गाथा का अर्थ यह है कि जैन प्रवचन मे देह और आत्मा के भावो का बाह्य और ग्राभ्यन्तर इस प्रकार भेद नहीं होता है किन्तु नोइन्द्रिय-मनसे होने वाली प्रतीति और अप्रतीति के आधार पर उनमे भी बाह्य और प्राभ्यन्तर का व्यवहार होता है । जैन मत में सभी वस्तु मूर्त और अमूर्त आदि स्पसे अनेकान्त स्वरूप है। यह बाह्य भाव है, यह आभ्यन्तर भाव है-यह भावो का विभाग केवल प्रवचन का विषय है, वास्तव नहीं है । हर्षविषादादि प्रात्मधर्मो में जो प्राभ्यन्तर का व्यवहार होता है वह उनको मनोग्राह्यता के कारण होता है । वे धर्म प्रात्मा के परिणाम रूप होने से शरीर और वाणी की तरह दूसरे को प्रत्यक्ष नहीं होते। दूसरो को उनका प्रत्यक्ष न होना ही उन्हे बाह्य व्यवहार से वचित कर प्राभ्यन्तर व्यवहार का पात्र बना देता । शरीर और वारणी के समान हर्ष-विषा- दादि मे परप्रत्यक्षत्व की आपत्ति नहीं दी जा सकती है क्योंकि परप्रत्यक्ष इन्द्रिय से होता है १ न प बायको मावोऽभ्यन्तरकश्वास्ति समये । नोइन्द्रिय पुनः प्रतीत्य भवत्यभ्यन्तरविशेष. ॥

१८] [फा० या० समुन्चय स्त० ३.श्लोक ४२ ण 'ढव्यट्ठियस्स आया बंधइ कम्मं फलं च वैएड । पिहयस्स भावमेतं कुण ण य कोह वेएइ ।। [० ५१] दव्याट्ठियम्म जो चेत्र कुणड मो चेव वेयए नियमा। अण्णो करेह अण्णो परिभुजह पज्जवणयस्स ॥ [मं०.५२]] जे वयणिज्जविअप्पा संजुज्जनेमु होति एमु । सयमयपण्णवणा तित्थयगमायणा अण्णा ॥ [i०-५३] पुरिसज्जायं तु पडुच्च जाणओ पण्णविज्ज अण्णय । परिकम्मणानिमित्तं दाएहा मो विमेमपि ।। [म०-५४] तस्माद् देहात्मनोऽन्योन्यव्याप्तिजव देहस्पर्शादिनवित्तिरिति मिद्धम् । इति हेतोः, वन्धादि संगतं युक्तम् कार्यान्यथानुपपत्तेः ॥४२॥ सा और इन्द्रियजन्यज्ञान प्रशेषपदार्थ का ग्राहक नहीं होता है। इस प्रकार स्यावाद का मत हो युक्ति सगत है । जो कयन परस्पर निरपेक्ष नयमूलक होता है वह श्रोता की वृद्धि को व्युत्पत्याधान स्प निमित्त के बिना ग्राह्य नहीं हो सकता । क्योकि वस्तु अनेकान्ति होती है और नय एकान्तष्टि- रूप होता है अत वह अन्यनय से निरपेक्ष होकर वस्तु के यथार्थवरप यो प्रस्तुत नहीं कर सकता। जमा कि 'दाटुअम्म.' आदि कारिकाम्रो मे स्पष्ट है । कारिकाओ का अर्थ इस प्रकार है-द्रव्यास्तिक नय पी -ष्टि से प्रात्मा कर्मबन्ध को उत्पन्न करता है और उसके फल का अनुभव भी करता है किन्तु पर्यायास्तिक नय की दृष्टि से प्रात्मा भावमात्र होता है वह अत्पकालिक होने से न चिरस्थायी कर्मवन्ध को उत्पन्न करता है न वही उसके फल का अनुभव करता है । द्रव्यास्तिक नय की दृष्टि से जोपर्म करता है नियम से वही फल का भोक्ता होता है, किन्तु पर्यायास्तिक नय की नप्टि से कर्म करने वाला प्रात्मा दूसरा होता है और फल का भोक्ता दूसरा होता है क्योकि कर्मकाल का प्रादिमपर्याय भोगकाल मे नहीं रहता इसीलिये पर्यायभेद से प्रात्मभेद हो जाता है । द्रव्यास्तिक और पर्यायास्तिक दोनो का प्राश्रय लेकर जो विकल्पदचन कहे जाते हैं उससे अपने सम्यक प्रवचन का परिज्ञापन होता है, तीर्थकर का अवमान नहीं होता। उपदेष्टा को उपदेश्य पुरुष के प्रति उपर्युक्त नयो मे किसी भी नय के आधार पर वस्तु के स्वरूप का ज्ञापन करना १ द्रव्यास्तिकस्याऽऽत्मा बध्नाति कर्म फलं च वेदयति । द्वितीयस्य मायमात्र, न करोति न च कोऽपि वेदयति ॥५१॥ द्रव्यास्तिकस्य य एव करोति स एव वेदयति नियमात् । अन्य. करोत्यन्यः परिभुड़क्ते पर्यवनयस्य ॥५२॥ ये वचनीयविकल्पा संयुज्यमानयोर्भवन्त्येतयो । सा स्वसमयप्रतापना तीर्थक्राशातनाऽन्या ५३|| पुरुषजात तु प्रतीत्य हायक प्रज्ञापयेदन्यतरत् । परिकर्मणानिमित्त दर्शयेत् स विशेषमपि ॥५४|| - रा10 क० टीका-हिन्दीविवेचना ] [ १२६ न च सहचारमात्रदर्शनादुक्तनियमोऽपीत्याह- मूलम्-मूर्तयाऽप्यात्मनो योगो घटेन नभसो यथा । उपघातादिभावश्च ज्ञानस्येव सुरादिना ॥४३॥ मूतयापि-प्रकृत्या आत्मनो योगः 'संभवति' इति शेषः । दृष्टान्तमाह-यथा घटेन नभमः । 'घटेन संयुक्तमपि नभो न घटस्वभावतां यातीति न दोप' इति चेत् ? स संयोगः किं घटस्वभावः, नभःस्वभावः, उभयस्वभावः, अनुभयस्वभावो वा ? आधयोरुभयनिरूप्य- त्वानुपपत्तिः । तृतीये च वदतो व्याघातः, घटस्वभावसंयोगवत्तया नभसो घटस्वभावत्वात् । चतुर्थे त्वनुपाख्यत्वापत्तिः, इति न किञ्चिदेतत् । चाहिये किन्तु उत्पादनीय ज्ञान मे सम्यक्त्व का सपादन करने के लिये उसे विशेष-अन्यनय सम्मत बात का भी उपदेश करना चाहिये । इस प्रकार यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि प्रात्मा को देह स्पर्शादि की अनुभूति देह और प्रात्मा की अन्योन्यव्याप्ति-एक मे दूसरे के अनुप्रवेश से हो होती है । अतः कार्य को प्रका- रान्तर से उपपत्ति न होने के कारण जैनशास्त्रोक्त प्रकार से ही आत्मा मे बन्ध और मोक्ष का होना युक्तिसगत है। (मूर्त और अमूर्त के सम्बन्ध की उपपत्ति) ४३ वी कारिका मे यह बताया गया है कि-दो वस्तुप्रो के केवल सहचारमात्र से उनके धर्मों की एक दूसरे मे अनुभूति का नियम नहीं बन सकता। किन्तु उसके लिये वस्तुओ का अन्योन्यात्मकत्व आवश्यक है- कारिका का अर्थ इस प्रकार है-अमूर्त आत्मा का भी मूर्त प्रकृति के साथ सम्बन्ध हो सकता है, जैसे अमूर्त श्राकाश का घटके साथ । यदि कहा जाय कि-'आकाश घट से सयुक्त होकर भी घटस्वभाव नहीं होता इसलिये उनका सम्बन्ध तो बुद्धिगम्य है किन्तु प्रकृति और प्रात्मा का सम्बन्ध तो आप ऐसा मानते हैं जिस से आत्मा प्रकृतिस्वभाव बन जाता है। प्रत प्रकृति और प्रात्मा के बीच अभिमत सम्बन्ध के अनुकूल यह टष्टान्त नहीं हो सकता'-तो यह ठीक नहीं हैं क्योकि दृष्टान्त और दान्तिक मे पूर्णतया साम्य नही अपेक्षित होता । अत प्रकृति सौर प्रात्मा मे घट और आकाश का पूर्ण साम्य न होने पर भी 'मूर्त के साथ अमूर्त का सम्बन्ध सभव है इस बात को अवगत कराने के लिये तो यह दृष्टान्त हो ही सकता है । घट आकाश के सयोग से जो प्राकाश को घटस्वभावता या घट को आकाशस्वभावता नहीं होती उसका कारण यह है कि उन दोनो का संयोग इसके लिये समर्थ नहीं है, जैसे घटाकाश सयोग के सम्बन्ध मे यह प्रश्न उठता है कि वह सयोग घटस्वभाव है या आकाशस्वभाव है अथवा घट-अाकाश उभय स्वभाव हैं कि वा अनुभय स्वभाव है ? पहले दो पक्ष मान्य नहीं हो सकते क्योकि उन पक्षो मे वह सयोग घट-आकाश उभय से निरूप्य न हो सकेगा, क्योकि घटस्वभाव आकाश से और प्राकाशस्वभाव घट से निरूप्य नहीं होता। और तृतीय पक्ष तो कथन मात्र से ही व्याहत हो जाता है, क्योकि यदि वह सयोग उभय स्वभाव होगा तो आकाश मे घटस्वभावात्मक सयोग रहने से आकाश घट स्वभाव हो जायगा फिर घटाकाश के अभिन्न हो जाने से उभय का अस्तित्व ही नहीं सिद्ध होगा। अतः सयोग को उमय स्वभाव कहना उपपन्न न हो १३० ] [ गाया० समुन्नयन्त०३-लो०५३ - 'अस्तु तर्हि नभयो घटादिनेव कर्मणा जीवम्य संबन्धः, ततोऽनुग्रहोपघाती तु तम्य नमस्यदेव न' इत्यत आह-उपघातादिभावश्च-उपघाताऽनुग्रहभावश्च मृष्या अपि कर्म- प्रकृतेः सकाशात् सुरादिना-सुरा वाली घृतादिना ज्ञानस्येव युक्तः, अङ्गाऽगिभाव- लक्षणमंन्धप्रयोज्यत्वात् तस्येति भावः । ननु 'सर्वमिदमात्मनोऽविभुन्वे मभवति, नदेव चाद्यापि न मिद्धिमिति चेतन शरीरनियतपरिमाणवत्वेनैवाऽऽन्मनोऽनुभवात् , मूर्त्तत्वगंशयस्य ज्ञानप्रामाण्यवंशयादिनोपपत्तेः । न च द्रव्यप्रत्यशत्वावच्छिन्ने हेतोर्महत्वम्याऽऽत्मनि मिट्ठा तम्पायययमहत्त्वाधजन्यत्वेन निन्यन्ये 'आत्मा विभुः, नित्यमहत्त्वाद , आकाशवत्' इत्यनुमानात् तम्य विभुत्वमेव युक्तमिति वाच्यम् ; नित्यमहत्त्वेऽप्यपकृष्टपरिमाणवत्तेचे बाधकामावेनाऽप्रयोजकत्वात । 'अपकृष्टत्वे तम्य सकेगा। चौथा पक्ष भी ग्राह्य न हो सकेगा, क्योंकि घट पोर प्राकाश का सयोग यदि घटत्वमाव एव अाकाश स्वभाव न होगा तो उस मे किसी अन्य स्वभाव होने की यल्पना भी शक्य न होने के कारण वह असत् हो जायगा । इस प्रसङ्ग मे शङ्का हो सकती है कि-जसे घटादि के साथ प्राकारा का सम्बन्ध होने पर भी घटादि के अनुग्रह और उपघात का आकाश मे कोई प्रभाव नहीं होता उसी प्रकार कर्मकृति ते जोव का सम्बन्ध होने पर भी उससे अात्मा मे कोई अनुग्रह एव उपधात नहीं होना चाहिये-तो यह ठीक नहीं है क्योकि कर्मप्रकृति के मूर्त होने पर भी उस मे उपघात और अनुग्रह होता है इसलिये उसके सम्बन्ध से श्रात्मा मे उपघात और अनुग्रह हो सकता है । इसको समझने के लिये मद्यादि का दृष्टान्त उपादेय है। प्राशय यह है कि जैसे मनुष्य मे मद्य-एव ग्राही घृत यादि के सम्पर्क मे उस का ज्ञान मद्य और घृत के दोष और गुणो से विकृत और सस्कृत होता है उस प्रकार मंप्रकृति के सम्बन्ध से प्रात्मा भी उस के उपघात और अनुग्रह से उपहत और अनुगृहीत हो सकता है । यह उपघात और अनुग्रह प्रकृति और प्रात्मा मे अङ्गागोमावत्प सम्बन्ध के नाते होता है और मूल प्रकृति उस का अङ्ग होती है । घटादि और आकाश मे अङ्गाङ्गी माय सम्बन्ध नहीं होता । अतः घटादि के उपघात और अनुग्रह से आकाश मे उपघात और अनुग्रह नहीं होता। ऐसा मानने पर शङ्का हो सकती है कि- यह वात तभी युक्तिसङ्गत हो सकती है जब प्रात्मा को प्रविभु माना जाय, किन्तु अविभुत्व उस में सिद्ध नहीं होता अतः मूल प्रकृति और प्रात्मा के बीच विवक्षित सम्बन्ध नहीं हो सकता' तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि प्रात्मा मे शरीर के समानपरिमाणता का अनुभव होता है। इसलिये प्रात्मा का अविभुत्व अनुभवसिद्ध है। इस अनुभव के होने पर भी जो कभी किसी को प्रात्मा के मूर्त्तत्व विषय में सन्देह होता है वह इस अनुभव मे प्रामाण्य का सन्देह होने के कारण होता है । वस्तुत उस मे कोई मूर्तत्व का सशयापादक धर्म नहीं है । [आत्मविभुत्व की शंका का परिहार] शङ्का हो सकती है कि-'द्रव्य प्रत्यक्ष के प्रति महत्त्व कारण होता है अतः प्रात्मा के प्रत्यक्ष के अनुरोध से उस मे भी महत्त्व मानना होगा। और वह महत्त्व अवयवगत महत्त्वादि से उत्पन्न न होने के कारण नित्य होगा। प्रतः नित्य महत्त्व से प्रात्मा मे विभुत्व का इस प्रकार अनुमान हो जायगा - । १३१ स्या० क० टीका-हिन्दीविवेचना ] जन्यत्वापत्तिाधिका, गगनमहत्त्वावधिकापकर्पस्य बहुत्वजन्यतावच्छेदकत्वादिति चेत् १ न, परमाणुपरिमाणसाधारणतयाऽस्य कार्यताऽनवच्छेदकत्वात् , त्रुटिमहत्त्वावधिकोत्कर्षेण' समं साकर्यात् तादृशजात्यसिद्धश्च, वस्तुतः प्रदीपप्रभाया इवात्मनः संकोच विकाशाभ्यां परिमाण- भेदस्याऽभ्युपगमेन मवथा नित्यमहत्त्वाऽसिद्धश्च । कथं चात्मनो विभुत्वे स्वस्मिन् क्रियादिप्रतीतिः, तीर्थगमनादेग्दृष्टहेतुत्वश्रवणादिक चोपपादनीयम् १ । कथं वात्मनः सर्वगतत्वात् स्वशरीगढन्यत्रापि न ज्ञानाद्युत्पादः १ 'शरीरा- कि- प्रात्मा विभु हे क्योकि वह नित्य महत्त्व का आश्रय है। जो नित्य महत्त्व का प्राश्रय है वह विभु होता है जैसे आकाश ।'अतआत्मा को विभु मानना हो युक्त है। और इसी कारण आत्मा मे शरीर के समानपरिमाणता का अनुभव भ्रम है । भ्रम से विषय की सिद्धि नहीं होती श्रत प्रात्मा का मूर्त्तत्व असभव है-' किन्तु यह शङ्का ठीक नहीं है क्योकि प्रात्मा मे नित्य महत्त्व होने पर भी उस मे अपकृष्ट परिमाण मानने मे कोई बाधा न होने से नित्य महत्त्व से विभुत्व का अनुमान अप्रयोजक है। 'प्रात्मा के परिमाण को अपकृष्ट मानने पर उसे जन्य मानना होगा, क्योकि गगन के महत्त्व से अपकृष्ट परिमाण अवयवगत बहुत्व से जन्य होते हैं यह नहीं कहा जा सकता क्योकि प्राफाश के महत्त्व से अपकृष्ट परमाणु के परिमाण मे अवयवगत बहुत्व के जन्यत्व का व्यभिचार है। और आकाशगत महत्त्व से घटादिगत महत्त्व मे जो अपकर्ष होता है उसे जातिस्वरूप न मान सकने के कारण वह आकाशगत महत्त्व से अपकृष्ट सभी परिमाणो मे अवयव बहुत्व की जन्यता का अवच्छेदक नही हो सकता। उक्त अपकर्ष को जातिस्वरूप इसलिये भी नहीं माना जा सकता कि-उस मे व्यणु- फगत महत्त्वावधिक उत्कर्ष के साथ साकर्य हो जाता है । जैसे व्यणुकगत महत्त्वावधिक उत्कर्ष प्राकाश परिमाण मे है किन्तु उस मे आकाशगत महत्वावधिक अपक्ष नहीं है । एव यह अपकर्ष परमाणु और द्वयणुक के परिमाण मे है किन्तु उस मे ज्यणुक महत्त्वावधिक उत्कर्ष नहीं है और घटादि मे व्यणुक महत्त्वावधिक उत्कर्ष और प्राकाशमहत्वावधिक अपकर्ष दोनो विद्यमान है । अतः साकर्य होने के कारण उक्त अपकर्ष के जातिरूप न हो सकने से उसे अवयवगत बहुत्व की जन्यता का अवच्छेदक मानना असभव है । और सच बात तो यह है कि आत्मा का महत्त्व एकान्तरूप से नित्य हो भी नहीं सकना क्योकि प्रात्मा प्रदीप की प्रभा के समान संकोच-विकाशशील है अतः उसका परिणाम परिवत्तित होता रहता हैं । और परिवत्तित होनेवाली वस्तु एकान्तनित्य हो नहीं सकती। प्रात्मा को विभु मानने मे बाधक भी है और वह है प्रात्मा मे क्रियादि की प्रतीति, जो प्रात्मा को विभु मानने पर नहीं उपपन्न हो सकती। इस के अतिरिक्त तीर्थगमनादि मे शास्त्र जो पुण्यजनवता का प्रतिपादन करता है उस को भी उपपत्ति नहीं हो सकती, क्योकि विभु का तीर्थगमन कैसे हो सकता है ? आत्मा अपने शरीर को छोड कर अन्य द्रव्य मे ज्ञानादिमान् नहीं होता। किन्तु यदि उसे सर्वगत माना जायगा तो यह बात न बन सकेगी क्योकि जैसे अपने शरीर के साथ उसका सम्बन्ध होता है उसी प्रकार अन्य द्रव्यो के साथ भी उसका सम्बन्ध होता है। यदि यह कहा जाय कि 'ज्ञानादि के प्रति शरीर कारण होता है अत शरोर भिन्न द्रव्य मे प्रात्मा ज्ञानादिमान् नहीं होता तो यह ठीक नहीं है, क्योकि ऐसा मानने पर भी प्रात्मा को अन्य शरीर मे - १३२ ] [शास्त्रात्तासमुच्चय न० ३-ग्लो०१४ भावादिति चेत् १ न, अन्यशरीरम्य मचात् । 'स्वशगंगभावादिनि' चेत ? न, बसंयुक्त- त्वेन तस्याऽपि स्वीयत्वात् । 'स्वादृष्टोपगृहीनशगंगभाषादि' ति चेत् ? तर्हि उपजीव्यन्वान् अदृष्टम्यैव तद्नानादिहेतुन्वान तम्य शगाव्यापितयाऽऽत्मनलयात्त्रमितिः । तदुक्तम्- के “यत्रैव यो दृष्टगुणः स तत्र." ? इन्यादि । अपि च, आत्मविभुन्यवाद ज्ञानादीनामव्याप्य- वृत्तित्वादिकल्पने गाग्वमिति न किञ्चिदेनन् । अधिकं न्यायालांकादी ॥४३॥ उपमंहरन्नाह- एवं प्रकृतिवादोऽपि विजेयः सत्य एव हि । कपिलोक्तत्वतश्चैव दिव्यो हि स महामुनिः ॥४४॥ ज्ञानादिमान होने को आपत्ति का परिहार नहीं हो सकता। यदि यह कहा जाय मि-तत्तद् प्रान्मा के ज्ञानादि मे तत्तद् आत्मा का ही शरीर कारण है- तो यह भी ठीक नहीं है क्योंकि प्रात्मा के विनु होने से सभी शरीरो मे उसका सम्बन्ध होने के कारण शरीर का तत्तद् प्रात्मा के स्यगरीर और पर शरीर के रूप मे विभाग नहीं हो सकता । यदि यह कहा जाय फि-'स्वशरीर का अर्थ है स्व के अनप्ट से प्राप्त शरीर और परशरीर का अर्थ है स्व के प्रप्ट मे प्रप्राप्त शरीर, इन रूप मे विनु प्रात्मा का भी शरीरविमाग हो सकता है तो यह भी ठीक नहीं हो सकता। क्योकि ऐसा मानने पर प्रभाट शरीर के विमाग' का उपजोव्य होने के कारण तत्तद् प्रात्मा के प्रनष्ट को ही तत्तद् प्रात्मा के जानादि का कारण मानना उचित होगा । और उस अदष्ट एफ शरीर मात्र मे ही व्याप्त होने के कारण आत्मा का नी एक शरीर मान मे ही व्याप्त होना उचित होगा। प्रतः प्रात्मा शरीर का समपरिमाण हो सकता है, विभु नहीं हो सकता। पू हेमचन्द्राचार्य महाराज ने अपनी अन्ययोग- व्यवच्छेद द्वात्रिशिका स्तुतिमे "यत्रैव यो नष्टगुण' इस कारिफा से इस बात का समर्थन करते हुए कहा है कि-"जितने देश मे जिसका गुण देखा जाता है उतने देश मे ही उस का अस्तित्व होता है। उससे अतिरिक्त देश मे उस का अस्तित्व मानने मे कोई युक्ति नहीं होती"। इन के अतिरिक्त प्रात्मा के विभुत्व पक्ष मे यह भी दोष है कि यदि प्रात्मा विभु होगा तो उनके ज्ञानादि मे अव्याप्यवृत्तित्व को कल्पना करनी होगी। क्योकि विभु प्रात्मा के पूरे नाग मे ज्ञानादि की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। और यदि मानी जायगी तो प्रात्मा से सम्बद्ध समम्त द्रव्यो मे उसके फलाs- फल को आपत्ति होगी। प्रत. प्रात्मा के विभुत्व के सम्बन्ध में जो कुछ कहा जाता है वह सब नगण्य है । इस विषय का विस्तृत विचार न्यायालोक प्रादि ग्रन्यों मे दृष्टव्य है ।।४३।। (प्रकृतिवाद की सापेक्ष सत्यता का अनुमोदन) प्रस्तुत विचार का उपसहार करते हुए ४४ वी कारिका मे यह बताया गया है कि पाहतो की अनेकांत दृष्टि से विचार करने पर सास्य का प्रकृतिवाद भी सत्य सिद्ध होता है, मिथ्या नहीं। वह मिथ्या हो भी नहीं सकता क्योकि द्रव्यायिक नय का अवलवन कर कपिल मुनि ने प्रकृतिवाद के 8 'कुम्मादिवनिष्प्रतिक्षमेतत् । तथापि देहावहिरात्मतत्त्वमतत्त्ववादोपहताः पठन्ति ।। इति शेषपादत्रय हेमचन्द्राचार्यविरचितायामन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकाया श्लो.. ।

स्या का टीका और हिन्दी विवेचना ] [ १३३ एवम् उक्तप्रकारेण, हि-निश्चितम् , प्रकृतिवादोऽपि सत्य एव विज्ञेयः नानृतः, उपपत्त्यन्तरमाह-कपिलोक्तत्वतश्चैव-द्रव्याथिकनयावलम्बिकपिलप्रणीत्वाच्चैव । तेनाs- नृत एवायं वाद उक्तो भविष्यतीत्यत आह-हि-यतः स महामुनिः दिव्यः अनशीला. चरणशाली, अतो नानृतं ब्रूयात् , इति तस्याऽप्ययमेवाऽभिप्राय इति भावः ॥४४॥ सांख्य ! सख्यमिदमेव केवलं मन्यसे प्रकृतिजन्म यज्जगत् । आत्मनस्तु भणितौ विधर्मणः संख्यमेव भजदेवमावयोः ॥१॥ आत्मानं भवभोगयोगसुभगं विस्पष्टमाचष्ट यो यः कर्मप्रकृति जगाद जगतां बीजं जगच्छर्मणे । नद्योऽधाविव दर्शनानि निखिलान्यायान्ति यदर्शने तं देवं शरणं भजन्तु भविनः स्याद्वादविद्यानिधिम् ॥२॥ इति पण्डित श्री पद्मविजयसोदरन्यायविशारदपण्डितयशोविजयविरचितायां स्याद्वादकल्पलताभिधानायां शास्रवार्तासमुच्चयटीकायां तृतीयः स्तवकः संपूर्णः ॥ अभिप्रायः सूरेरिह हि गहनो दर्शनततिनिरस्या दुर्धर्षा निजमतममाधानविधिना । तथाप्यन्तः श्रीमन्नयविजयविज्ञाहिभजने । न भग्नाचेद्भक्तिन नियतमसाध्यं किमपि मे ॥१॥ यस्यायन गुरवोऽत्र जीतविजयप्राज्ञाः प्रकृष्टाशया भ्राजन्ते सनया नयादिविजयप्राज्ञाश्च विद्याप्रदाः । प्रेम्णां यस्य च मद्म पद्मविजयो जातः सुधीः सोदर- स्तेन न्यायविशारदेन रचिते ग्रन्थे मतिर्दीयताम् ।।२।। समर्थक साख्य शास्त्र की रचना की है । कपिल एक महान् मुनि है और अद्भून शोल ओर आचरण से सपन्न है अतः वे मिथ्या नहीं कह सकते। इसलिए प्रकृतिवाद के सबन्ध मे उन्हो ने जो कुछ कहा है उसका भी वही अभि यि मानना चाहिए जो कर्मप्रकृतिवादी पाहत महर्षियो का है । व्याख्याकार पू उपा. यशोविजयजी ने इस विचार का यह कहते हुए उपसहार किया है कि-सांस्य से उनको मित्रता केवल इस कारण है कि सांख्य भी उन्हीं के समान जगत् को प्रकृतिजन्य मानता है। किन्तु प्रात्मा के सबन्ध मे उसने जो यह कहा है कि आत्मा निर्धर्मक होता है । उस विषय मे उसके साथ हमारा वैचारिक सग्राम सदा चलता रहेगा ॥१॥ व्याख्याकार ने इस विचार के पर्यवसान में अपनी यह आकांक्षा प्रकट की है कि जिस देव ने प्रात्मा को अत्यत स्पष्ट रूप में सासारिक भोग के याग्य बताया है और जिस देव ने जीवमात्र के कल्याण मार्ग के उद्घाटनार्थ कर्मप्रकृति को जगत् का बीज बताया है एवं जिसके दर्शन में समुद्र मे नदीयो के समान अन्य सभी दर्शन समाविष्ट हो जाते हैं-स्यावाद विद्या के महान् पाश्रय उस देव को ही शरण में ससार के भव्य मनुष्य को उपस्थित होना चाहिये ॥२॥ अभिप्राय:० 'इनको व्याख्या पहले स्तबक में आ गयी है । तृतीय ..

परिशिष्ट १-तृतीयस्तयकश्लोकाकारादिक्रमः श्लो०/पृ० श्लोकाश. श्लो/पृष्ठ इलोकांश ३/७ अनो जन्तुरनीशोय ३९/१२१ अत्रापि पुरुपम्यान्ये २१/९८ अन्ये तु वते ४/३५ अन्ये त्वभिद वत्यत्र १६/८५ अमिप्रायन्तनम्नेपा २४/११७ आत्मा न बध्यते ८/३८ मादिसर्गेऽपि नो हेतु १७/८६ माप च धर्मशास्त्र च ११/८१ ईश्वर परमात्मैव १/२ प्रेरकत्वेन ३५/११८ एकान्त करूगया १४/१३२ एप प्रकृतिवादोऽपि १३/८३ कर्ताऽयमिति तदाक्ये १/३६ का देस्तत्वमावत्वे २५/१०३ घटाद्यपि फुलालादि २०१७ घटाद्यपि पृथिव्यादि २/५ जानमप्रतिघं यम्य १०/८० ततश्चेवरकर्तृत्व २६/१०४ तत्रापि देहकर्ता चेद् • २/८२ तदनासेवनादेव ४०/१२३ तस्याश्चानेकरूपत्वाद् २३/१०० तस्यैव तत्स्वमावत्वाद २७/१०४ देहमोगेन नेवास्य ४२/१२४ देहम्पर्शादिमवित्त्या ३२/११३ देहात्पृथक्त्वे एवास्य ३१/११२ न च पूर्वम्त्रमावत्वात् ५/३५ नरकादिफले काश्चित २४/१०० नानुपादानमन्यम्य ४१/१२४ नामूत्तं मूर्त्तता याति ७/१२० पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो उलो०/पृष्ठ ग्लोकाग १४/८४ परमध्यययुक्त बाद ३८/१२० पुरूपन्योदिता मुक्तिरिति २८/१०६ पुरुषोऽविचनात्मैव ३०/१०७ प्रतिविम्बोदयोऽप्यस्य १९/९७ प्रवानान्महतो मावो 1८/८८ प्रधानोद्भवमन्ये तु ७/३७ फल ददानि चेन मर्न ३३/११६ धन्धारते न समारो ४३/१२६ मूर्तयाप्यात्मनो ३६/११९ मोक्ष प्रकृन्ययोगो ०२/६८ युक्त्या नु बाध्यते २६/१०७ विभक्तेक्परिणती १५/-५ शास्त्रकारा महात्मान ६/३६ स्वयमेव प्रवर्तन्ते परिशिष्ट २-तृतीयस्तबकटीकायामुद्धृतवाक्याशाकारादिक्रमः [सन्मति-४७] [योगसूत्र २-४] पृष्ठाक वाक्याग १२५ अण्णण्णाणुगयाण उम ४ अविद्या क्षेत्रमुत्तरेपा० १० अमत्त्यान्नास्ति सम्बन्धः ८६ असदकरणाद् ५४ याकाशशरीरं ब्रह्म २० आत्मवेद सर्व [साल्यकारिका-] لب [छान्दोग्य उपनिषद ७-२५-२] [न सिंहोत्तरतापनीय उपनिपद् ७-३] [ १३५ परिशिष्ट २-तृतीयस्तवकटीकायामुद्धनवाक्याशाकारादिक्रम' [गीता १५-१७] [बहारण्यक० ३-८-६] [मन्मति०-४६] [न्यायकुसुमाञ्जलि ५-१] [योगसूत्र १-२३] - [सम्मनिसूत्र-५३] [सन्मतिसूत्र-५०) [ [सांख्यकारिका-६२] [मन्मतिसूत्र-५१] -५२] " نسا पृष्ठांक ८४ उत्तम पुरुषस्त्वन्य एतस्य चाक्षरस्य १२६ एवं एगे आया ७ कार्याऽऽयोजनधृत्यादेः ४ क्लेशकर्मविपाका ५६ ज जहा मगषया० १२८ जे वयणिजवियप्पा १२७ णय बाहिरओ भावो० ३० तरति मृत्यु ११८ तस्मान्न बध्यते नापि १२७ दव्वटियम्य आया जो चेव ३ वश मन्वन्तराणीह ५४ नित्यं विज्ञान ६३ निरालम्बा निराधारा १६ प्रकृतेमहांस्ततो १२८ पुरिसजाय तु पडुच्च० ३ पूर्ण शतसहस्रंतु ३ बौद्धाः शनसहस्राणि ८९ भेदाना परिणामात् ७ मयाध्यक्षेण प्रकृति. ६६ मूलप्रकृतिरविकृतिः ३३ यज्ञो व विष्णु १३२ यत्रैव यो दृष्टगुण' ३३ यन्न दुखेन सभिन्न १२६ रूबाइपज्जवा जे देहे ५१ स तपोऽतप्यत ५६ समालोच्य क्षद्रेध्वपि २७ सर्वज्ञता तृप्तिक ५६ सर्वभावेपु कतृत्व १०७ सामा उ दिया छाया ७६ हेत्वमावे फलाभावात् [योगशास्त्र ४.१८] [साख्यकारिका-२०] [सन्मतिसूत्र-५४) [ (सांख्यकारिका-१५] [गीता ९-१०] [साख्यकारिका-३] अन्य व्यद्वा०४] [ सिन्मति० ४८] - [वीतरागस्तोत्र ७-७[ [निशीथभाष्य, प्रज्ञापना-मलयगिरिटीका] [न्या०कु०३-१८] तृतीयस्तवके शुद्धिपत्रकम् पत्रापक्ति अशुद्ध शुद्धं पत्र/पक्ति ४/२ ८/२१ अशुद्ध शुद्ध योगत्र (२-४) योगमूत्र (१-२३) क्योंकि क्योंकि ईयर मे तो मे के नहीं आत्मप्रवेश, के अनष्ट सेन वा आत्मप्रदेश ना ६५/२२ ६९/७ ७१/१६ ७२/२८ ७४/२६ ७६/१२ ८२/२ ०/१३ :/२६ ८०/३१ कारीका चतुर्थ होन कारिका 'चतुर्य होती (१) मापा भापा प्रशस्त द्वारा द्वारा सष्टि सृष्टि जसे जमे उन्ह उन्हें इश्वर ईश्वर निम्पण निरुपण याजन योजन नित्याच्याधि० नित्या व्यापि ईश्वरेच्चव ईश्वरेन्छेत्र तत्तकारण तत्तत्कारण वच्छिन्नद्धo यन्दिन्नतद्ध ०लाकारणान० लाSSकारनिक नुमति अनुमति उसकती सकती प्रशस्ति लोकोक्ति ९/३४ १७/१६ १६/१७ २१/१८ २०/१४ ३३/२० ३९/२० ४६/५ ५३/२ ५४/४ ५५/१ ५५/- ५५/२६ ५१/३१ ५६/३१ कोकोक्ति पाठ धर्म पाठ से धर्म प्रधान प्रधान बुद्धि चुद्धि में ८६/२१ ९८/१० १०४/२७ ११३/१ १२०/१० १२३/२ घ.घ, बन्धः का रचा क्त कर्म उक्तकर्म

Shastravarta-samucchya Stavak-iii

Author
Suri, Haribhadra
Title
Wrtika, Sudharma Bdrbahu Silalink Wrtika, Sudharma Bdrbahu Silalink Wrtika, Sudharma Bdrbahu Silalink
File name
Shastravarta-samucchya Stavak-iii
Text
OCR done
Citation
1982
Published
2011/01
Publisher
Ahamdabaad., Pra. Jeevraj Thailabhai,naya Darwaja
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
446196
Barcode
99999990027816.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
K6gSxjFIrkf
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