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गगा पुस्तकमाता का इकतालीसवा पुष्प
हिंदी
-
- यदरीनाथ मह
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४१
नार
दी
श्रीदुलारेलाल मार्ग,
(माधुरी-सपादक)
1 हिंदी-साहित्य की उत्तमोत्तम पुस्तकें का हिंदी-नवरत ४॥ हिंदी-साहित्य-विमर्श भापा-विज्ञान मिथवधु-विनोद (छप रही है) हिंदी-भाषा का विकास 1) शिवसिह सरोज 91) साहित्यालोचन नागरा-अक और अक्षर हिंदी-साहित्य का सक्षिप्त हस्त-लिखित हिंदी पुस्तकों इतिहास सक्षिप्त विवरण हिंदी का संक्षिप्त इतिहास ) ( भाग पहला) हिंदी-मापा की उत्पत्ति भारतीय प्राचीन लिपि- हिंदी-मापा (भारतेंदु) साला २१) हिंदी-मापा (बालमुकुद)" "साहित्य सिद्धांत २॥ मातृभापा साहित्य-दर्पण कविता-कौमुदी ( भाग काव्य निर्णय पहला और दूसरा) काव्य-प्रभाकर 50 प्रजभापा बनाम खड़ी बोली) काव्य-कुसुमाकर (दोनों लेखक और नागरी लेखक ) भाग) हिंदी-लेक्चर हिंदी निबंध-माला (दोनों विश्व-साहित्य १॥), २) भाग) २) सन प्रकार की पुस्तकों के मिलने का पता--- गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय २१-३०, अमीनाबाद-पार्क, लखनऊ
गगा-पुस्तकमाला का इकतालीसवाँ पुष्प
हिंदी
लेखक
बदरीनाथ भट्ट बी० ए०
हिंदी श्रध्यापक, लखनऊ विश्वविद्यालय
+-
प्रकाशक
गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
२६-३०, अमीनाबाद-पार्क
लग्वनऊ
मथमावृत्ति
रेशमी जिद 5D] स. १६८१ वि० [सादी ॥
.4
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प्रकाशक
श्रीछोटेलाल नार्गव बी० एस-सी०, एल-एल. पी.
गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय
लखनऊ
मुद्रक
श्रीकेसरीदास सेठ
नवलकिशोर-प्रेस
लखनऊ
भूमिका
ससार में प्रत्येक भाषा का विकास, मुख्य रूप से, किसी
एक भापा से हुआ करता है : परतु निकास होते-होते
पडोस की दूसरी भापाओं तथा परिवर्तनशील परिस्थितियों
का उस पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ जाता है कि शारीरिक
‘गठन में माता से बहुत कुछ समता रखती हुई भी मुखाकृति
में वह भिन्न दिखलाई देने लगती है। प्रत्येक भाषा के
विकास-क्रम में एफ सधिकाल आता है जब माता और पुत्री
का अलग-अलग पहचानना कठिन हो जाता है । पुष्प
और चद के बीच की कितनी ही रचनाएँ ऐसी हैं जिनके
विषय में निश्चय-पूर्वफ यह कह सकना कठिन है कि ये
अपनश को हैं या पुरानी हिंदी की । ये सधिकाल की
रचनाएँ हैं जब अपभ्रश हिंदी का रूप धारण कर रही थी।
हिंदी की कितनी ही रचना ऐसी है जो अपभ्रश की रचना
फे साथ रख दी जाय तो उसमें बिलकुल खप जायगे । इसी
प्रकार अपभ्रश की भी कितनी ही रचना पुरानी हिंदी में खप
जाती है । अपभ्रश की प्रणाली निश्चित हो चुकी थी। उसी
पर से हिंदी-प्रणाली का जन्म हो गया था—दोनों में बहुत
फम भेद है । एक, पुनर्जन्म लेकर दूसरी का रूप धारण
कर रही थी।
-
+
५
प्रकाशक
श्रीछोटेलाल नार्गय यी० एस्-मी०, एल-एल्. वी.
गगा-पुस्तकमाला कार्यालय
लखनऊ
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श्रीकेसरीदास सेठ
नवलकिशोर-प्रेस
। लखनऊ
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भूमिका
ससार में प्रत्येक भाषा का विकास, मुख्य रूप से, किसी
एक भाषा से हुआ करता है। परतु विकास होते-होते
पड़ोस की दूसरी भाषाओं तथा परिवर्तनशील परिस्थितियों
का उस पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ जाता है कि शारीरिक
गठन में माता से बहुत कुछ समता रखती हुई भी मुखाकृति
में वह मिन्न दिखलाई देने लगती है । प्रत्येक भापा के
विकास-क्रम में एक संधिकाल आता है जब माता और पुत्री
का अलग-अलग पहचानना कठिन हो जाता है । पुष्प
और चद के बीच की कितनी ही रचनाएँ ऐसी है जिनके
विषय में निश्चय-पूर्वफ यह कह सकना कठिन है कि ये
अपभ्रश की हैं या पुरानी हिंदी की। ये सधिकाल की
रचनाएँ हैं जब अपभ्रश हिंदी का रूप धारण कर रही थी।
हिंदी की कितनी ही रचना ऐसी है जो अपभ्रश की रचना
के साथ रख दी जाय तो उसमें बिलकुल खप जायगे । इसी
प्रकार अपभ्रश की भी कितनी ही रचना पुरानी हिंदी में खप
जाती है । अपभ्रश की प्रणाली निश्चित हो चुकी थी, उसी
पर से हिंदी-प्रणाली का जन्म हो गया या-दोनों में बहुत
फम भेद है ।।एफ, पुनर्जन्म लेकर दूसरी का रूप धारण
कर रही थी।
भापा का विकास बहुत दिनों के लगातार परिवर्तन का
परिणाम हुआ करता है । कब, फिस समय, किस ओर से,
किस प्रकार के प्रभाव के पड़ने से, भाषा में कौन-सी नई
बात आ गई, जो उसकी जननी में नहीं थी, अथवा कौन-सा
परिवर्तन हो गया, इसका लेखा न तो है और न हो सकता
है । अतएव जब हम किसी भाषा के सोत की खोज
करने बैठते हैं तो हमे अनुमान के दीपक का सहारा लेना
पड़ता है। यह दीपक सर्वथा विश्वसनीय नहीं होता।
इसलिये मैं यह नहीं कह सकता कि इस दीपक ने मुझे
कहीं भी धोखा नहीं दिया होगा। सभव है, जिन परिणामों
पर म या वे लोग पहुँचे हैं, जिनके ग्रथों या लेखों के आधार
पर मैं यह पुस्तक लिखने बैठा हूँ, वे ठीक न हों । प्राकृत
से सस्कृत निकली, या सस्कृत से प्राकृत, इस विषय पर
पहले-जैमा-ही मतभेद बना हुया है। मेरी मति या रुचि
जिस ओर मुझे, खीच ले गई उसी ओर मैं हो गया । समन
है, वह भ्रात हो किंतु जब तक यह बात, हठधर्मी, दुरा-
ग्रह तथा अधभक्ति छोडकर, अकाव्य रूप से सिद्ध नहीं
कर दी जायगी तब तक कोई भी अपना मत बदलने के
लिये बाध्य न होगा।
प्रस्तुत पुस्तक सन् १९२२ ईसवी में लिखी गई थी।
हिंदी-भापा तथा उसके साहित्य से परिचय प्राप्त करने के
.
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(७) लिये बड़ी-बड़ी पुस्तकों क पढने का समय जिन सज्जनों के पास नहीं है विशेषकर उन्हीं के लिये यह प्रयास किया गया है। पुस्तक वहुत छोटी है, और बहुत-सी बाते इसमे कहने को रह गई हैं, परतु यह एक विशेष लक्ष्य को सामने रखकर लिखी गई है । इसके लिखने में मैने हिंदी-साहित्य- सम्मेलन की रिपोटों, मिश्रबधु-विनोद, शिवसिंह-सरोज तथा उस समय तक और भी जो पुस्तकें मेरे पास थीं उन सनका सहारा लिया है, इसलिये उन सबके लेखकों का मैं ऋणी हूँ। इधर हिंदी के परम हितैषी रेवरेंड मि० ग्रीन की एक छोटी-सी किंतु बडी अच्छी पुस्तक इसी विषय पर, अँगरेजी में, प्रकाशित हुई है । खेद है, जिस समय मैं इस पुस्तक को लिखने बैठा उस समय तक वह प्रकाशित नहीं हुई थी, कम से कम मेरे देखने में नहीं आई थी, वरना मैं उससे भी अवश्य लाम उठाता । परतु तो भी मुझे यह देखकर सतोष होता है कि उनके और मेरे विचार प्राय मिलते हैं। लखनऊ: बदरीनाथ भट्ट २७२२५ --
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सूची
पृष्ठ
1 हिंदी की उत्पत्ति
२. हिंदी-साहित्य का विकास
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हिंदी १. हिंदी की उत्पत्ति शब्द-शास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हमको अपनी पुरानी भाषा और दूसरे देशों की पुरानी भापाओं के शब्दों में जो समता दिखलाई देती है उससे यही अनुमान होता है कि कभी हममें ओर कुछ उन जातियों में, जो अब हमारी दृष्टि में बिलकुल हमसे भिन्न है, घना सपर्क था, और इस शब्द-सपत्ति पर सबका समान अधिकार था। नित्य- प्रति व्यवहार में आनेवाले माता, पिता, स्वसा, दुहित और गिनती के एक, दो, तीन, चार आदि शब्द ही नहीं, क्तिने ही और शब्द भी ऊपर कहे हुए अनुमान की पुष्टि करते है। एक क्रिया का रूप है 'भरति'। ग्रीक का 'फेराइ' (pherel ), लैटिन का 'फर्ट' ( fert), गॉथिक का 'बरिथ' (Uurith ) और अँगरेजी का 'बेयरॅथ' (Herreth) भी वही अर्थ देता है। संस्कृत में जिसको 'हृद' कहते हैं, उसी को ग्रीक में ( 'ह' का 'क' हो जाने के कारण) 'कर्दिया' ( Hardia), लैटिन में 'कार्डिस' (conds), गॉथिक में 'हार्टो' ( htarto ), अंगरेजी में 'हार्ट' ( heart ) और जर्मन में 'हर्ट्स' (hers) सस्कृत में हिंदी कहा जाता है । संस्कृत में जिसको 'हस' कहा जाता है को ग्रीक मे 'चैन' ( chen ), लटिन में हैसर' ( hanse ऐंग्लो-सैक्सन में गोस' (gos), अँगरेजी मे 'गूज' (goo- और जर्मन में गॅन्स (gans ) कहते है। इस प्रकार और चनि की समता रखनेवाले अनेक शब्द, शब्द-शास्त्र तुलनात्मक अध्ययन करनेवाले विद्वानो ने, खोज निकाले यद्यपि आर्यों के आदिम निवास स्थान के विषय में मतभेद बना हुआ है, किंतु यदि बहुमत पर ब्यान । जाय तो यह स्थान मध्य-एशिया के आसपास कहीं ठह है । सभव है, यह मध्य-एशिया के प्रासपास न होकर ही कही रहा हो, और वहां से फिर यह जाति मध्य-एशि में आई हो, किंतु इसमें कोई सदेह नहीं कि पीछे से वहाँ जाति की दो शाखाएँ हो गई । कुछ लोग पश्चिम की । बढ़कर योरप मे बसे, ओर कुछ पूर्व की ओर बढकर दो में बँट गए । एक जथे ने फारिस तथा आसपास के देशो में । डाल दिया, और दूसरा बोर भी यागे बढकर भारतवर्ष मे गया। धीरे-धीरे और भी लोग आते गए, और बढते-बढ विंध्याचल की तलहटी तक जा पहुंचे । आजकल 'पार्याव शब्दसपूर्ण भारतवर्ष के लिये प्रयुक्त किया जाता है। परत पर यह बात नहीं थी। पहले हिमालय तथा विंध्याचल के बीचन देश कोही यह नाम दिया गया था। यातिने लिखा है- हिंदी . 'ग्रासमुद्राय ये पूर्वादासमुद्राच पश्चिमात्, हिमनहि प्ययोमप्य धावित विदुषुधा ।' भार्यों के फारिसमाले उपनिवेश में परजिक और मीडिक मापायों का विकास हुधा । भारतवर्ष में अड्डा जमानेवाली शाखा की सबसे पहली भापा जिसका पता चलता है, ऋग्वेद की भाषा है । पारसियों का धर्म-अथ 'अस्ता' मीडिक भाषा में है । यह मीडिक भाषा यहाँ की प्राचीन भापा से कितनी समता रखती है इसका कुछ नमूना यही दिवाना अनुचित न होगा । वैदिक शब्द 'मित्र' को अयस्ता में 'मिथ', 'अर्यमन्' को एर्यमन्', 'वायु' को 'क्यु' और 'मत्र' को 'मधू' कहा गया है। वैदिक शब्द 'नर' अवस्ता में 'नरेम्', 'देव' शब्द 'दएव', 'शत' शब्द 'सत' और 'पशु' शब्द 'पसु' रूप में देखा जाता है । कुछ ऐसे भी शब्द हैं जिनका रूप तनिक भी नहला हुआ दिखलाई नहीं देता, जैसे गाथा, मे, मम, त्वम्, अस्ति श्रादि । इन सब बातों से यह परिणाम निकलता है कि घेदिक तरा मीडिक भाषाओं से पहले कोई एक भापा और थी जो इनकी तथा इनकी योरपियन बहनो की जननी थी । योरपियन भाषाओ से हमारा तात्पर्य उन अपभ्रश भाषाओं से ह जिनका, मूल भाषा से अलग होने पर, स्वतत्र विकास योरप के अलग- अलग भागों में अलग-अलग हुप्रा । तात्पर्य यह कि मांडिक तथा वेदिक भापा को भी उसी मूल भाषा का अपभ्रश समझना चाहिए। - ४ हिंदी - वेद' की ऋचाओं से इस बात का पता लगता है कि प्राचीन आर्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की क्षमता तथा वृद्धि करने की प्रवृत्ति रखते थे। चे विद्वान् ही न थे, किमान और शिल्प-विद्याविशारद कारीगर---भी थे। वे तरह-तरह के यत्र बनाते थे, युद्ध करते थे और कविता भी करते थे। अपनी-अपनी प्रवृत्ति के अनुसार जो काम जिसको रुचता था उसी काम को वह करता था। परंतु यह कब संभव है कि पडितों और किसानों की बोली सदा अथवा बहुत काल तक. एक रह सके । आज भी पढ़े-लिखें और बेपढे लोगों की भाषा में उनकी शिक्षा अशिक्षा, कुशिक्षा अथवा सगति और देश-काल के अनुसार भेद दिखलाई देता है। प्रकृति का जो नियम अब है वही पहले भी था । आजकल जिन देशो में शिक्षा का समुचित रूप से , प्रचार है उनमें भी शिक्षित, अशिक्षित तथा अशिक्षित जन- समूहों की बोलचाल की भाषा में भेद दिखलाई देता है । अस्तु, उस वैदिक भाषा के जिस लोग बोलचाल के भी काम मे लाते ये, शीघ्र ही दो रूप हो गए-~-एक तो वह जिसका विकास पढे-लिखे विद्वानों मे हुआ और दूसरा वह जो अपढ जनों में प्रचलित रहा । विद्वानो में जिस रूप का विकास अथवा अत में जिसकी स्थिति हुई वह भी वैदिक,भाषा से कुछ भिन्नता रखने लगा। यदि वैदिक भाषा में विप्रास.' और 'विप्रा', 'देवास - . 7
हिंदी
५
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"
'और 'देवा' इस प्रकार के दोनों रूप प्रचलित ये तो विद्वानों
की भाषा में केवल 'विप्रा' और 'देवा'लप ही रह गए।
'यह सब उसी प्रकार हुआ जिस प्रकार हिंदी-क्रियाओ के
'जाय है', 'जाता है-सरीखे दो रूपों में से केवल 'जाता है'-
सरीखे रूप ही रह गए हैं। यों धीरे-धीरे कई प्रकार के भेद
पड़ते गए, और लौकिक तथा वैदिक भाषा के, एक के पीछे
दूसग, यों कितने ही छोटे-बड़े व्याकरण भी बन गए, जैसे
कि नाम, ऐशान, ऐद्र, प्राजापत्य, आशिल, पाणिनीय,
चाद्र, शाकटायन आदि । इन व्याकरणों का ताला लगाकर
उस समय के विद्वानों ने वेदिक तथा अपनी सस्कार की हुई
भापा को तग कोठरियों में बद कर दिया जिसमें उनको
परिवर्तन की छूत न लगने पाए । पाणिनि ने 'लोके वेदे च'
कहकर चैदिक तथा लोकिक भाषा का पार्यक्य स्पष्ट रूप से
स्वीकार किया है। किंतु भाषा को क्षयी और मृत्यु से बचाने
की जगह इस व्याकरण-रूपी सजीवनी बूटी ने ठीक उलटा
असर दिखाया, जैसा कि कालांतर में ज्ञात हुया, अर्थात्
दोनों भाषाओं की गति सीमाबद्ध हो गई । भापा को अछूता
रखने की चिंता करनेवाले निद्वान् केवल व्याकरण बनाकर
ही चुप नहीं रहे। भिन्न-भिन्न भाषा-भापियों से जवं मार्यों का
व्यापारिक, राजनीतिक तथा सामाजिक सपर्क यदा तय दूसरी
भाषायों के शब्दों को अपने घर में घुसता देखकर उन
हिंदी - . 'हो', 'होऊँ' का 'है' आदि रूप हिंदी में प्रचलित हो गए हैं, और बड़े-बडे आचार्यों-द्वारा ठीक माने जाते हैं। हमारे देखते- देखते 'ती' का 'तो' हो गया है। दो बार किसी शब्द को लिखने की आवश्यकता पडती थी तो दो का अक (२) लिखकर काम निकाल लिया जाता था। यह प्रथा बड़ी पुरानी थी। किंतु यह भी धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। कुछ दिनों बाद यह दो का अक विलकुल ही न दिखलाई देगा । इधर शब्द-शुद्धि के कुछ पक्षपातियों ने- 'राजनैतिक' को 'राजनीतिक' करके एकेक, हरेक आदि को एक-एक, हरएक आदि रूप में फिर लिखना प्रारभ कर दिया है,क्योंकि 'एकेक', 'हरेक', राजनैतिक' आदि शब्द सस्कृत-ज्याकरण के अनुसार शुद्ध नहीं हैं । हमारे विचार मे इन शब्दो का रूप-परिवर्तन फारसी-लिपि में लिखने- वालों की कृपा से हुआ था । अस्तु । संस्कृत-व्याकरण का अनुसरण करनेवालों ने 'सामर्थ्य' शब्द को, जो हिंदी में स्त्रीलिंग समझा जाता था, पुल्लिंग बना डाला है । यह शब्द त्रिशक की भाँति लटक रहा है, और दोनों लिंगों में इसका व्यवहार होने लगा है। इन्हीं सब बातों से प्रमाणित होता है कि हिंदी- भाषा एक जीवित भाषा है। मधुपरी मधुरा-मथुरा, वाराणसी बनारस आदि भी इसी प्रकार के परिवर्तन के साक्षी है । 'मधुरा' को 'मटा', 'कलकत्ते' को 'कैलकटा'! कहना देश-भेदजय निहा-दोष का प्रत्यक्ष उदाहरण है। सदा से ही शब्दों का रूप -
हिंदी
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इसी प्रकार बिगड़ता अथवा वदलता रहा है । यह रोग बड़ा
पुराना है। इसकी रोक-थाम करने के लिये 'स्फोटकचद्रिका'
में लिखा है कि असाधु शब्द बोलने से पाप और साधु
शब्द बोलने से पुण्य होता है । यही नहीं, एक वार ऐसा
भी हुमा कि 'हेरय हेरय' की जगह 'हेलय हेलय'
कहने के कारण ही दैत्यों को युद्ध में देवों से हारना पडा
(दैत्येयेहेरयो हेरय इति वक्तव्य हेलयो हेलय इति प्रयुआना
पराबभूव )। इद्र को मारने के लिये त्वष्टा ने वृत्रासुर की सृष्टि
की थी, किंतु उसको प्राशीर्वाद देते समय उसने 'इद्रशत्रो-
निगर्दस्व' को तत्पुरुष की जगह कहीं बहुव्रीहि के ढग से कह
दिया । बम, पॉसा पलट गया. -उलटा बेचारा वृत्रासुर इद्र
के हाथ से मारा गया। प्राचीन वार्य विद्वानों ने अपभ्रशों से
घड़ाकर ऐसी-ऐसी बातें कहीं है कि जिनसे यही अनुमान
होता है कि उस समय भी कई बार भाषा-विषयक क्रातियाँ
हुई, और तरह-तरह की कितनी ही रोक थाम करने पर भी
केनल लोक-भाषा का परिवर्तनशील प्रवाह ही न रुका, बल्कि
सात नालों मे बद की गई सस्कृत-भाषा में भी बाहर के
कितने ही शब्द पाते रहे, और भाज भी-जब कि सस्कृत
को मृत भाषा समझा जा रहा है-आवश्यकतानुसार पाते
रहते हैं । फुटवाल, बेतार की नारवी, गैम प्रादि के लिये
नए शब्द गहना व्यर्थ लिए कल्पना करना है।
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१० हिंदी - . दूसरे देशों की भाषाएँ न पढ़ने का जो उपदेश पहले दिया गया था उसका भी वही परिणाम हुआ जो अँगरेजी शासन कं प्रारभिक काल में अंगरेजी-भापा के प्रति, अथवा पहले-पहल जब पानी के लिये नल लगाए गए तब उनके प्रति, घृणा करने का हुआ था, अर्थात् सर्वसाधारण में विरोधियों की यात न मानी, और निषेधो का विचार न करके लोग अन्य देशो का भाषाएँ पढते रहे । यदि ऐसा न किया जाता तो राजधर्म और व्यापार कैसे चलता ? महाभारत में हम पढते है कि लाक्षागृह के विषय में सचेत करते समय विदुर ने युवि- ष्ठिर से म्लेच्छ-भाषा मे सभाषण किया है । तात्पर्य यह कि हजार रोक-थाम करने पर भी भाषाओं का प्रभाव एक दूसरी पर पड़ ही जाता है । इस भाषा-सघर्प के समय कितने ही शब्द अपना देश छोड़कर दूसरी जगह जा बसते हैं, कुछ दोनों देशों में अड्डा जमाए रहते है, लडाई में घायल हो जाने के कारण कुछ का रूप बदल जाता है, और कुछ बेचारे अपनी जान से ही हाथ धो बैठते हैं । इसी नियम के अनुसार प्राकृत में भी बहुत-से शब्द ऐसे पाए जाते है जिनका पता देव-वाणी मे नहीं मिलता। ये दूसरे देशों के, रूप बदले हुए, शब्द हो सकते हैं, अथवा उस भाषा के हो सकते हैं जो उन लोगों मे बोली जाती थी जो पार्यों के यहाँ आने के समय बसे हुए थे। किंतु प्राकृत का भी सब जगह एक ही रूप प्रच- हिंदी 4 R लित न था । जिन कारणों से बगाल के निवासी आज 'मौम्य को 'शैम्म' और पजाब के निवासी 'स्कूल' को 'सकूल' कहते है उन्हीं, अथा उनसे मिलते-जुलते किन्हीं दूसरे, कारणों से प्राकृत के भी कई रूप दिखलाई देने लगे थे, यद्यपि उनमें समानता ही अधिक थी। जाप्राकृत में साहित्य- रचना होने लगी तब फिर बोलचाल की भाषा में और उसमे भेद हो गया । इसी प्रकार प्राकृत ने कई रूप वढले । उसका दूसरा व्यापक रूप पाली है जो गौतम बुद्ध के सध के कारण सबसे महत्व का माना जाता है । पाली में भी बहुत कुछ साहित्य-रचना हुई। उस समय के जो शिला-लेख और ताम्र- पत्र आदि मिलते हैं उनसे पाली के, भिन्न भिन्न रूपों का कल हाल ज्ञात हो सकता है । यहाँ हम पहली प्राकृत से दूसरी प्राकृत अर्थात् पाली का सबध दिसलाकर व्यय आपका समय नहीं लिया चाहते । हाँ, इतना अरण्य कह देना चाहते हैं कि बोलचाल की भाषा होने पर भी और साहित्य- रचना के लिये बहुत पुरानी न होने पर भी प्राकृत किसी समय, अनगिनती अलकारो से सजी हुई सस्कृत से अधिक मधुर समझी जाती थी, और सो भी मूखों में नहीं, उद्भट विद्वानों में । राजशेखर ने 'करमजरी' में लिखा है- परसा सप आधा पाउं अधो विहोइ मुउमारो, पुरुस महिलाय न्ति अमिह थर सचिय मिमाण । - १२ हिंदी इसका भावार्थ यह है कि सस्कृत की रचना कठोर और प्राकृत की सुकुमार होती है। इन दोनों भाषाओं में पुरुष और स्त्री के बराबर अंतर है ।" आगे चलकर विद्वानों ने देश-भेद से प्राकृत के शौरसेनी, मागधी और महाराष्ट्री ये तीन मुख्य अपभ्रश माने । उस समय दक्षिण-पश्चिम में प्रचलित 'नागर' नाम का भी एक अपभ्रश माना जाता है जिससे कुछ लोगों की राय में महा- राष्ट्री और शोरसेनी की उत्पत्ति हुई। कोई मागधी को शौर- सेनी का अपभ्रश बतलाते है, तो कोई मागधी को मूल प्राकृत वतलाते है । कोई महाराष्ट्री को मूल प्राकृत बतलाते हैं। शौरसेनी और मागधी के मेल से उत्पन्न एक अर्द्धमागधी नाम की अपभ्रंश भाषा थी जिससे पूर्वा हिंदा का विकास हुआ। हमारे विचार में तो यह भी एक क्राति का युग था, और इन अपभ्रशों को पारस्परिक समानता और अस- मानता देखकर ही विद्वानों ने अपनी-अपनी डफली और अपने- अपने रागवाली कहावत चरितार्थ की है। यदि मागधी (जिससे विहारी की सृष्टि हुई है) के पूर्व रूप को बौद्ध-धर्म के कारण निशेप महत्व मिला तो अर्द्धमागधी को महावीर स्वामी मोर दूसरे जैन-तीर्थंकरों के कारण उतना ही महत्त्व मिल गया । हिंदी-ससार में मैथिली का भी स्थान है, यद्यपि प्राच्य प्राकृत से उत्पन्न होने के कारण यह बैंगला-भाषा की सगी बहन है। .
हिदी - डॉ० ग्रियर्सन साहब की राय में शौरसेनी तथा अर्द्धमागधी के मेल से ही वर्तमान हिंदी की सृष्टि हुई है । उनको यह सम्मति और भी कितने ही विद्वान् लेसकों ने मान ला है। परतु हमारा विश्वास है कि वर्तमान हिंदी पर पजाबी का पूरा प्रभाव पड़ा है । इस विश्वास की पुष्टि में कितने ही उदाहरण दिए जा सकते है। सस्कृत की 'यास्यति' मिया का प्राकृत रूप 'जाएजा' है । पजावी में इसका अपभ्रश 'जाएगा' अथवा 'जावेगा है जो कि आजकल बोलचाल की हिंदी में प्राता है। शौरसेनी से विकसित प्रज-भाषा में 'जायगो' कहेंगे, और अर्द्धमागधी के विकसित रूप मे जह' या 'जईहे' । व्रज- भाषा म जहाँ 'घोडा' कहा जाता है वहाँ पजाबी में घोड़ा: और इसी रूप में आधुनिक हिंदी मे भी बोला जाता है । पजाबी का प्रभाव हिंदी पर 'चाँगटू' बोली की कृपा से पडा जो दिल्ली और पजार तथा दिल्ली और राजस्थान के बीच की भाषा है । जिस प्रात में यह बोती जाती है उसे हरियाणा कहते हैं । इस पर राजस्थानी का भी प्रभाव पड़ा है। डॉ० प्रियर्सन साहब के 'Linguistre Snrres of India'- नाम के प्रथ मे से इसका एक उदाहरण दिया जाता है- "एक माणस के दो दोरे थे। उनमे ते छोटे छोरे ने वाप्पू ते कया अक बाप्पू हो धन का जौणसा हिस्सा मेरे बॉडे आने से मन्ने दे दे।" .
हिंदी , इसी से मिलती-जुलती भाषा दिल्ली के आसपास ओर भी कई जगह बोली जाती है । इधर आगरे की बोलचाल की भापा पर ध्यान देने से भी खडी बोली की उत्पत्ति शौरसेनी+ अर्द्धमागवी तथा पजारी+पशाची के गडबड़ा अपभ्रश से सिद्ध हो जाती है। पंजाबी के सबव में यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि उसकी उत्पत्ति पजाबी प्राकृत तथा पैशाची के मेल से हुई है ! पैशाची जिसे भूत-भाषा भी कहते थे, उत्तर-पजाब में, काश्मीर का ओर, बोली जाती थी। कुछ विद्वानो की राय में, वह मध्य-प्रदेश और राजपूताने के आसपास बोली जाती थी, परतु प्रमाणो से यह बात सिद्ध नहीं होती । सस्कृत तथा प्राकृत से उसका क्या सबंध था, यह दिखाने के लिये कुछ उदाहरण देना अनुचित न होगा- सस्कृत पेशाची दुछ दुसट । कष्ट कछ कसट सहते सहइ सहदे इन उदाहरणां से सूचित होता है कि पैशाची का लगाव सस्कृत से अधिक है, प्राकृत से कम । ऊपर के उदाहरण में 'सहदे दिया हुआ है, इसी अर्थ में आधुनिक हिंदी में 'सहते' (है) कहेंगे । 'सहई',जो प्राकृत का रूप है, वज-भाषा में 'सहहि प्राकृत । -
हिंदी
।
का रूप धारण कर लेगा। हाँ, यागरे की बोली के प्रभाव क
कारण 'सह है' सरीखे रूप भी उसमे भाते रहे हैं। इस उदाहरण
से यह प्रमाणित हो जाता है कि सडी वोली की क्रियाए
किवर से आई हैं। इनमें से एक रूप (सहता करता आदि)
का यश-वृक्ष देखने से अर्द्धमागधी योग शौरसेनी का कहीं पता
भी नहीं मिलता । ऐसे और भी उदाहरण दिए जा सकते है।
प्राकृत का जो रूप प्राती में प्रचलित था उसी से कुछ
सजन राजस्थानी की ओर उनी से मिलते जुलते एक और रूप
( गौर्जरी ) से गुजराती की उत्पत्ति मानते हैं । इसमे सदेह
नहीं कि राजस्थानी और गुजराती का तुलनात्मक अध्ययन
करने से दोनों का निकास एक ही स्थान मे हुआ दीखता है ।
राजपूताने के कुछ भागो की बोली तथा इधर मालवा-प्रात की
गोली से गुजराती की बहुत अधिक समता है । इससे उपयुक्त
सिद्धात की भोर भी पुष्टि होती है । ब्रज-भाषा और राजस्थानी
में जो समता दीखती है उसका कारण इन दोनों ही का
नागर अपभ्रश से उत्पन्न होना हो सकता है, क्योंकि
शौरसेनी को भी कुछ विद्वानों ने नागर अपभ्रश का ही एक
भेद माना है। इसी तरह प्राकृत का अवतीराला रूप भी
(जिससे राजस्थानी की उत्पत्ति हुई बनलाई जाती है ) नागर
अपभ्रश का ही एक भेद कहा जाता है । पूर्वी हिंदी-
त्रैमवाडी (निसको अवधी भी कहते है) और वघेलखड
हिंदी . . - , तथा छत्तीसगढ़ प्रात में बोली जानेवाली भापायों की उत्पत्ति अर्द्धमागधी से है जो कि मागवी और शौरसेनी का घोटाला है। भाषाओं के इस पचडे पर विचार करते समय यह बात न भूलनी चाहिए कि इन सनकी मूल भाया एक ही थी, और इसी कारण अनेक अपभ्रश हो जाने पर भी सबमें समानता की एक लहर बहा की जो कि अब भी देखी जा सकती है। उदाहरणार्थ 'करता हूँ के अर्थ में 'करवा हॉ', 'करत हो', 'करूँहूँ', 'कर ', 'करि' आदि एक ही से या एक दूसरे से बहुत कुछ मिलते-जुलते रूप सब प्रातीय बोलियों में मिलेगे। इसी प्रकार और भी कितनी ही सज्ञाओं, सर्वनामों तथा क्रियाओं के उदाहरण दिए जा सकते है। अब हम अपभ्रश से हिंदी का सबध दिखलाने के लिये कुछ उदाहरण देते हैं- प्राकृत सामलो सामलो सामलो, सॉवगे, सॉवमा घोडो घोडो घोडा जत्थ जहि जहँ, जहाँ तत्थ तह, तहाँ कत्थ कहि कह, कहाँ एसो एहो एह, इह, यह को कवण कौन हूँ, हौं ('मैं' के अर्थ में) अपभ्रश , घोडौं, , कवन, A हिंदी शब्दों के इन कोरे उदाहरणों को छोडकर अब साहित्य के सरस स्रोत की खोज करनी चाहिए- (१) 'शिवसिंहसरोज' के आधार पर हिंदी-भाषा के इतिहास लिखनेवाले सजनों ने हिंदी का जन्म-काल सवत् ७०० के लगभग माना है । इसकी पुष्टि में ये 'पुष्प' नाम के एक कवि का उल्लेस करते हैं जिसने दोहों में अलकार- विषयक एक अथ की रचना की थी । खेद है, यह प्रय अन नहीं मिलता: किंतु, हमारे विचार में, जिस भापा में यह अथ लिखा गया होगा उसे अपभ्ररा कहना अधिक युक्ति- सगत है । क्योंकि पुष्प कपि ने प्रसिद्ध राजा भोज के पूर्व- पुरुप राजा मान से अलकार-शास्त्र पढ़ा था । राजा भोज के चचा मुज ने अपने भाई अर्थात् भोज के पिता की हत्या करके सिंहासन हडप लिया था । यह वाक्पतिराज मुज जैसा पराक्रमी था, वैसा ही उच्च कोटि का कवि भी था । इसकी कविता के कुछ उदाहरण आगे दिए जायँगे । अनहिलवाड़े के महाराज सिद्धराज जयसिंह के यहाँ आश्रय पानेवाले श्राचार्य हेमचन्द्र ने, जिसका जन्म सवत् ११४५ में हुआ था, अपने 'प्राकृत-व्याकरण' म, जो सवत् ११६८ में लिखा गया है, अपभ्रश-भापा के जो उदाहरण दिए है उनमें मुज की भी रचना है । जन सत् १०२५ के पीछे की मुज की रचना अपभ्रश में समझी जाती है, तो उससे ३०० वर्ष पहले की - हिंदी क *- पुष्प की रचना भी अपभ्रश ही में क्यों न समझी जाय उस समय अपभ्रश का दोरदौरा भी था, यापि पीछे से यही अपनाश-भाषा पुरानी हिंदी में बदल गई। । (२) प्रथम हिंदी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति की हैसियत से प० मदनमोहननी मालवीय ने सरत् १९६७ मे.. जो भाषण दिया था उसमे उन्होंने सवत् ८०२ मे होनेवाले किसी कवि के विषय में कहा था । परतु उसका नाम तथा उसके प्रथ का कुछ भी हाल ज्ञात नहीं है । इस- लिये उसके विषय मे कुछ भी. कहने में हम असमर्थ हैं । (३) इसके बाद 'खुमानरासा का हाल मिलता है । यह, सवत् १०. के कुछ पीछे की रचना हो सकती है, क्योंकि चित्तौर के रावल खुमान का राज्य काल ,समत् ८६६ से ८२० तक है। खेद है, यह अब भी नहीं मिलता, कितु ऊपर दिए हुए कारणों से इसका भी अपभ्रश में ही होना अधिक, सभा है, (४) सवत् १९०के लगभग श्रीदेवसेन सूरि ने 'नयचक्र' नाम का प्रथ दोहों में लिखा, जिसको, पीछे से, 'माइल धवल'' नाम के एक और विद्वान् ने प्राकृत में किया। यह भी, हमारी, समझ मे, अपभ्रश में ही रचा गया होगा। (५) विक्रम सरत् से, कोई ५०० वर्ष पहले, मगध में प्रसेनजित्' नाम का एक राजा था जिसकी राजधानी राजगृह, में,थी। किसी कति ने अपभ्रंश भाषा में,उसका चरित्र, लिखा है - 1
हिंदी
जिसमे से कितने ही दोहे शुभशील गणि ने अपने 'कथा-कोष'
में, जो उन्होंने सवत् १०५६ में लिखा है, दिए है। उनमें से
हम केवल एक दोहा उदाहरण के लिये यहाँ देते हैं । राजा ने
सभा में अपने पुत्र को किसी बात पर अप्रसन्न होकर कुछ
कठोर वचन कह दिए जिसस रूठकर वह घर से निकल गया
और कहीं जाकर किसी का घर-जमाई होकर रहने लगा। राजा
ने उसे बुलाने के लिये एक श्लेप-युक्त दोहा लिखा । पुत्र ने उमका
उत्तर दिया । राजा ने फिर तीन दोहे लिखे। पुत्र ने फिर उत्तर
दिया । राजा ने फिर दो दोहे लिखे जिनमें से एक यह है-
जे मि समा, मह बोलिऊँ ते अपमान कि मान ,
सोजि सभारि बिचारि करितो धाराग उधान ।
इसमें पुरानी हिंदी का ही नहीं, और भी कितनी ही
प्रातीय बोलियों का स्वरूप स्पष्ट झलक रहा है।
(६.) मुज के विषय में ऊपर कहा जा चुका है । उसका
शासन-काल विक्रम की ग्यारहवी शताब्दी के प्रथम चरण के
अत में अनुमान किया जाता है। अतिम युद्ध मे वह कल्याण
के सोलकी राजा तैलप द्वितीय के हाथों कैद कर लिया गया ।
कैद में तैलप की बहनामृणालवती से उसका प्रेम हो गया, और
उसने सुरग में होकर निकल,भागने की जो युक्ति सोची थी
वह मृणालवती को बतला दी। मृणालमती ने मुज का मसूना
अपने भाई से कह दिया जिससे मुज पर और भी कड़ाई
हिंदी 1 पुष्प की रचना भी अपभ्रश ही मे क्यो न समझी जाय। उस समय अपभ्रश का दोरदोग भी था, यज्ञपि पीछे से यही अपभ्रश-भाषा पुरानी हिंदी में बदल गई। (२) प्रथम हिंदी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति की हैसियत से प० मदनमोहनजी मालाय ने सवत् १९६७ में- जो भाषण दिया था, उसमें उन्होंने सवत् ८०२ होनेवाले किसी कवि के विषय में कहा था। परतु उसका नाम तथा उसके प्रथ का कुछ भी हाल ज्ञात नहीं है । इस- लिये उसके विषय में कुछ भी, कहने मे हम असमर्थ हैं। (३) इसके बाद 'खुमानरासा' का हाल मिलता है । यह सवत् ८९० के कुछ, पीछे की रचना हो सकती है क्योंकि चित्तौर के रावल खुमान का राज्य काल सात्.८६६ से ८९० तक है। खेद है, यह प्रथ भी नहीं मिलता, किंतु ऊपर दिए हुए कारणों से इसका भी अपभ्रश में ही होना अधिक सभव है। (४) सनत् १६०के लगभग श्रीदेवसेन सरि ने 'नयचक्र' नाम,का प्रथ दोहा में लिखा, जिसको, पीछे से,-'माइल धवल नाम के एक और विद्वान् ने प्राकृत में किया। यह भी, हमारी समझ मे, अपभ्रश में ही रचा गया-होगा। (५.) विक्रम सवत् से कोई ५०० वर्ष - पहले, मगध 'प्रसेनजित्' नाम का एक राजा था जिसकी राजधानी-राजगृह में थी-, किसी कनि ने अपभ्रश-भाषा में, उसका चरित्र लिखा, . M
हिंदी
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जिसम से कितने ही दोहे शुभशील गणि ने अपने 'कथा-कोष'
में, जो उन्होंने सनत् १०५६ में लिखा है, दिए हैं। उनमें से
हम केवल एक दोहा उदाहरण के लिये यहाँ देते हैं। राजा ने
सभा में अपने पुत्र को किसी बात पर अप्रसन्न होकर कुछ
कठोर वचन कह दिए जिससे रूठकर वह घर से निकल गया
और कहीं जाकर किसी का घर-जमाई होकर रहने लगा । राजा
ने उमे बुलाने के लिये एक श्लेप-युक्त दोहा लिखा । पुत्र ने उसका
उत्तर दिया । राजा ने फिर तीन दोहे लिखे। पुत्र ने फिर उत्तर
दिया। राजा ने फिर दो दोहे लिखे जिनमें से एक यह है
जै मि समा महँ बोलिऊँ ते अपमान कि मान ,
सोजिसमारि पिचारि करि-तो धारोग उधान |
इसमें पुरानी हिंदी का ही नहीं, और भी कितनी ही
प्रातीय बोलियों का स्वरूप स्पष्ट झलक रहा है।
(६) मुज के विषय में ऊपर कहा जा चुका है । उसका
शासन-काल विक्रम की ग्यारहवी शताब्दी के प्रथम चरण के
अनुमान
किया जाता है । अतिम युद्ध में वह कल्याण
के सोलकी राजा तैलप द्वितीय के हाथो केद कर लिया गया ।
कैद में तैलप की बहन मृणालवती से उसका प्रेमाहो गया, और
उसनेासुरग में होकर निकल भागने की जो युक्ति सोची थी
वह मृणालवती को बतला दी। मृणालनती ने मुज का मसूबा
अपने भाई. से कह दिया जिससे मुज पर और भी कडाई
थत में
।
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हिंदी - F पुष्प की रचना भी अपभ्रश ही में क्यों न समझी जाय ? उस समय अपभ्रश का, दौरदौरा भी था, यपि पीछे से यही अपाश-भाषा पुरानी हिंदी में बदल गई। (२) प्रथम हिंदी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति की हैसियत से प० मदनमोहनजी मालवीय ने सवत्-१९६७ मे जो- भाषण दिया था, उसमे उन्होंने सवत् ८०२ में होनेवाले किसी कवि के विषय में कहा था। परतु उसका नाम तथा उसके ग्रय का कुछ भी हाल ज्ञात नहीं है । इस- लिये उसके विषय मे कुछ भी कहने मे हम असमर्थ है। (३) इसके बाद 'खुमानरासा' का हाल मिलता है । यह सवत् --१० के कुछ पीछे की रचना हो सकती है क्योंकि चित्तौर के रावल खुमान का राज्य काल सरत् ८६६ से ८६० तक है । खेद है, यह प्रथ भी नहीं मिलता, किंतु ऊपर दिए हुए कारणों से इसका भी अपभ्रश में ही होना अधिक समय है। (४) सवत् ११०के लगभग श्रीदेवसेन सूरि ने 'नयचक्र' नाम,का प्रथ दोहों में लिखा, जिसको, पीछे से, 'माइल-धवल' नाम के एक और विद्वान् ने, प्राकृत मे किया । यह भी हमारी समझ मे, अपभ्रश में ही रचा गया, होगा । (५) विक्रम समत् से.कोई ५०० वर्ष पहले मगध 'प्रसेनजित्' नाम का एक राजा था जिसकी राजधानी राजगृह में थी-, किसी कवि ने अपभ्रश भाषा में, उसका चरित्र लिखा, है . ना
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हिंदी
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जिसमे से कितने ही दोहे शुभशील गणि ने अपने 'कथान्कोष'
में, जो उन्होंने सवत् १०५६ मे लिखा है, दिए हैं। उनमें से
हम केवल एक दोहा उदाहरण के लिये यहाँ देते हैं । राजा ने
सभा में अपने पुत्र को किसी बात पर अप्रसन्न होकर कुछ
कठोर वचन कह दिए जिससे रूठकर वह घर से निकल गया
और कहीं जाकर किसी का घर-जमाई होकर रहने लगा । राजा
ने उसे बुलाने के लिये एक श्लेप-युक्त दोहा लिखा। पुत्र ने उसका
उत्तर दिया । राजा ने फिर तीन दोहे: लिखे। पुत्र ने फिर उत्तर
दिया। राजा ने फिर दो दोहे लिखे जिनमें से एक यह है-
जे मि समा,मह बोलिऊँ ते अपमान कि मान
साजि संभारि बिचारि करि-तो धारोग उधान ।
इसमे पुरानी हिंदी का ही नही,, और भी कितनी ही
प्रातीय बोलियों का स्वरूप स्पष्ट झलक रहा है।
(६) मुजा के विषय मे ऊपर कहा जा चुका है। उसका
शासन-काल विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी के प्रथम चरण के
अत में अनुमान किया जाता है । अतिम युद्ध मे वह कल्याण
के सोलकी राजा तैलप द्वितीय के हाथों कैद कर लिया गया ।
कैन्द में तैलप की वहन मृणालवती से उसका प्रेम हो गया, और
उसने सुरग में होकर निकलाभागने की जो युक्ति सोची थी
वह मृणालवता को बतला दी । मृणालवती ने मुज का मसूना
अपने भाई से कह दिया जिससे मुन पर ओर भी कडाई
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हिंदी 1 1 H पुष्प की रचना भी अपभ्रश ही में क्यों न समझी जाय। उस समय अपभ्रश का दौरदारा भी था, यदापि पीछे से यही अपभ्रश-भाषा पुरानी हिंदी में बदल गई । (२) प्रथम हिंदी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति की हैसियत से प० मदनमोहनजी मालर्चाय, ने , सवत् १९६७ में जो भाषण दिया था, उसमे उन्होंने संवत् ८०२ में होनेवाले किसी कवि के विषय मे कहा था। परतु उसका नाम तथा उसके प्रथ का कुछ भी हाल ज्ञात नहीं है । इस- लिये उसके विषय मे कुछ भी कहने मे हम असमर्थ है । (३ ) इसके बाद 'घुमानरासो' का हाल मिलता है । यह सवत् ८९० के कुन्छ, पीछे की रचना हो सकती है। क्योंकि चित्तौर के रावल खुमान का राज्य काल सनत्-८६६ से-८९० तक है। खेद है, यह प्रथ भी नहीं मिलता, कितु ऊपर दिए हुए कारणों से इसका भी अपभ्रश में ही होना अधिक संभव है। (४.) सरत् २२० के लगभग श्रीदेवसेन सूरि ने 'नयचक्र नाम,का अथ दोहों में लिखा, जिसको, पीछे से, ‘माइल धवल' नाम के एक और विद्वान् ने, प्राकृत में किया । यह भी, हमारी, समझ मे, अपभ्रश में ही रचा गया होगा। (५.) विक्रम संवत् से कोई ५०० वर्ष पहले मगध में 'प्रसेनजित्' नाम का एक राजा था जिसकी राजधानी राजगृह में थी। किसी कवि ने अपभ्रश-मापा,में, उसका चरित्र लिखा है। , - . 4
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जिसम से कितने ही दोहे शुभशील गणि ने अपने 'कथा-कोष'
i, जो उन्होंने सरत् १०५६ में लिखा है, दिए हैं। उनमें से
हम केवल एक दोहा उदाहरण के लिये यहाँ देते हैं। राजा ने
सभा में अपने पुत्र को किमी वात पर अप्रसन्न होकर कुछ
कठोर ज्चन कह दिए जिससे रूठकर वह घर से निकल गया
और कहीं जाकर किसी का घर-जमाई होकर रहने लगा। राजा
ने उसे बुलाने के लिये एक श्लेप-युक्त दोहा लिखा । पुत्र ने उसका
उत्तर दिया । राजा ने फिर तीन दोहे, लिखे। पुत्र ने फिर उत्तर
दिया। राजा ने फिर दो दोहे लिखे, जिनमें से एक यह है-
जे मि समा मह बोलिऊँ ते अपमान कि मान ,
साजि सँभारि विचारि करि तो थारोग उधान |
इसमें पुरानी हिंदी का ही नही,, और भी कितनी ही
प्रातीय बोलियो का स्वरूप स्पष्ट झलक रहा है।
(६) मुज के विषय में ऊपर कहा जा चुका है । उसका
शासन-काल विक्रम की ग्यारहवी शताब्दी के प्रथम चरण के
में
अनुमान
किया जाता है। अतिम युद्ध में वह कल्याण
के सोलकी राजा तैलप द्वितीय के हाथों कैद कर लिया गया।
कैद में तैलप की बहनामृणालवत्ती से उसका प्रेम हो गया, और
उसने सुरग, में होकर- निकलाभागने की जो यक्ति सोची थी
वहा मृणालवती को बतला दी । मृणालवती ने मुज का मसूबा
अपने भाई से कह दिया जिससे मुन पर और भी कड़ाई
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पत
२०
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के क्षय होने पर टूट गया, इसलिये हे मुज, विपाद मत कर।
अर्थात् रावण के कपाल में एक सौ आठ वुद्धियाँ थीं, कित
(७) कहा जाता है कि सवत् १०८० के लगभग बार
हिंदी
होने लगी। ये दोहे, जो उदाहरण में दिए जाते हैं, मुज की,
उसी समय की, रचना हैं-
जा मति पच्छह सपजह सा मति पहिली होइ,
मुज मणइ मुणालवइ विषन न वेढइ कोइ ।
अर्थात् जो बुद्धि पीछे से, यानी कछ खोकर, पैदा होती
है वह यदि पहले ही से हो जाय तो, मुज कहता है,
हे मृणालवती, कोई विन्न न अडे ।
(२)
सायर खाई लक्गढ गदवा दससिरि राउ,
मगक्तय सो मशिगय मुज न करि निसाउ ।
अथात् सागर जिसकी खाई है और जिसका गढ़पति
दस सिरवाला राव अर्थात् रावण है, वह लकगढ़ भी मान्य
अट्ठोतर सु युद्धडी रावण तणइ पालि
एकू इद्धि न सापडी लका भजण पालि।
लका क टूटने के समय एक भी न चली, अर्थात् कारगर न दुई
S
-
1
मात्मद गजनवी ने कालिंजर के राजा नद पर चढ़ाई करने के
हिंदी , विचार किया तब राजा नदने एकजुट लिखकर सुलतान के पास भेजा, जिसका मतलब सुनकर सुक्षतान इतना प्रसन हुआ कि उसने न केनल कालिंजर पर चढाई करने का विचार छोड दिया, बल्कि १५ किले राजा को और दिए। खेद है, यह छद देखने में नहीं आता। (८) श्राचार्य हेमचद्र के सबध मे अनहिलवाड़े के महा- राज सिद्धराज जयसिंह का नाम ऊपर लिया जा चुका है। उनके राज में कुतुनअली नाम का एक मुसलमान कवि बसता था, जिसकी ममजिद कुछ लोगों ने खोद डाली थी । इस पर कुतुस्थली ने महाराज से छदबद्ध प्रार्थना की । महाराज ने प्रसन्न होकर न केवल मसजिद फिर से बनना दी, बल्कि खोद डालनेवालों का उचित दड भी दिया । खेद है, कुतुब- अली की भी कोई रचना नहीं मिलती। किंतु यह घटना सबत् ११५० से १२०० तक कभी हो गई होगी, क्योंकि इन महाराज का शासन-काल यही माना जाता है। (६) सपत् ११८० के लगमग साद का बेटा मसऊद भी हिंदी का करि था। खेद है, इसकी रचना भी नहीं मिलनी। (१०) बीकानेर के साईदान चारण-द्वारा सात् ११९१ में लिखे गए 'समतसार' नाम के प्रथ का पता चलता है । (११) डीडवाणा (मारवाड़) के अकरमफैज का जन्म सबत् ११७६ में दुआ कहा जाता है । यह जयपुर के महा-
।
२२
'हिंदी
राज माधवसिंहजी का आश्रित था। इसने विर्तमाल' मान्य
की रचना की, और 'वृत्तरत्नाकर' का अनुवाद किया। ।
यद्यपि इस समय की भी कितनी ही रचना अपनश (जिसको
उस समय पुरानी चाल की हिंदी समझा जाता रहा होगा)-म
मिलती है, किंतु हमारी राय में अब तक हिंदी को स्वतन्त्र रूप
प्राप्त हो गया था। चद और जगनिक की रचना पर ध्यान देने
से इस अनुमान के सत्य होने मे तनिक भी सदेह नहीं रहता ।
चद का जन्म सवत् ११८३ में लाहौर में हुआ था। वह
पृथ्वीराज का आश्रित था। उसका समकालीन जगनिक महोवे
के परमाल राजा का आश्रित 'या । चदाकी रचना में सभी
प्रातीय भाषाओं की झलक दिसलाई देती है। उसने फ़ारसी
और अरबी के भी शब्दों का वेधडक प्रयोग किया है।
'पृथ्वीराज रासो' की भाषा के विषय में वह स्त्रय कहता है-
उकधविशालस्य राजनीति नव रसम्,
पदमाषा पुराण च कुरान कथित मया ।
यहाँ कुरान से मतलब अरबी-फारसी के शब्दों से है।
चद के पहले तथा उसके समय मे भी कितने ही और कनि
रहे होंगे; परंतु खेद है, दो-एक को छोड़कर बाकी का
पना नहीं चलता पृथ्वीराज का जन्म सत्. १२०५
हुआ था, और सबत् १२४६ में वह मोहम्मद गोरी-द्वारा मारे
गए थे । कहा जाता है, "चंद को मृत्यु भी उन्हीं के साथ
में
हिंदी
२३
-
दुई। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इस'समय'भी कोई-कोई
कवि अपभ्रश-भाषा मे रचना करते थे किंतु उनकी भाषा भी
पुरानी हिंदी से बहुन-कुछ मिलती-जुलती है । उदाहरण के तिये
अनहिलवाडे के सोमप्रभ सूरि के लिखे 'कुमारपाल-प्रतिबोध'
का'नाम लिया जा सकता है जो सवत् १२४१ में रचा गया।
इसमें से केवल दो उदाहरण दिए जाते हैं-
-
-
।
अम्हें थोड़ा रिउ बहुय इयु कायर चित्तति
मुद्धि निहालहि गयण यलु कइ उन्जोउ बरीमा
अर्थात् 'हम थोडे हैं, रिप बहुत है', यो फायर गाय
हैं। हे 'मुग्धे, देख, आकाश में कितने (नक्षत्र मी
उजाला करते हैं ?
.
ज मगु मुटह माणुसह वक्षा
त समिमटल गहण विहि गयग्ण पगार
अर्थात् जो मनुष्य का मूढ मन 'दृत्तम पातु की या
करे तो वह ( मानो ) शशिमडल को ग्रहण करने का लिय
गगन में हाथ पसारता है।
चद ने जो रासो में छ भाषापा के व्यवहार करने की
बात कही है उससे, और उसकी रचना दार भी, यहां
प्रतीत होता है कि इस समय तक थोड़ा-बहरा मट रखने
२४ हिंदी . - , वाले हिंदी के कितने ही रूप प्रचलित हो गए थे, जैसे कि आजकल भी देखने में आते है। किंतु जो रूप, कुछ विशेप कारणों से, ऊपर आ गए वे आ गए, शेष इस जीवन- सघर्ष में या तो लुप्त हो गए या दव गए। चद ने पृथ्वीराज रासो लिखा या नहीं, और यदि लिखा तो कितना लिखा, इस विषय मे विद्वानों में मतभेद है । कुछ सज्जनों का मत है कि उसमें बहुत-सा गडबडझाला पीछे से मिलाया गया है। जो हो, उसकी रचना में से कितनी ही ऐसी है जो अपभ्रश और राजस्थानी तथा अपभ्रश और ब्रजभाषा के बीच के गड्ढे को भरती हुई इतिहास-प्रेमियों के लिये खोज की प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करती है। आगे इसकी रचना मे से केवल दो उदाहरण दिए जाते है जिनसे आप स्वय अनुमान कर लेंगे कि इसने किस प्रकार कहीं तो कितनी ही भाषाओं की चटनी कर दी है, और कहीं शुद्ध ब्रजभाषा मे लिखा है- , -- 4 - गुरासान मुलतान स्वधार मार बलक सोवल तेग अचक तार रहगी फिरगी ली समानी ठटी ठह बलोच ढाल निसानी मैंजारी चखी मुक्व जबफ लारी हजारी हजारी, इक जोध मारी ।
हिंदी । तिन पप्पर पीठ हय जीन साल फिरगी कती पास मुकतात लाल तहाँ बाप दार मुरूरी रिचोरी धनसार समूह अरु चार भोरी एराफी परवा पटी तेज ताजी तुरकी महापान क्म्मान वाजी ऐसे असिव प्रसवार अग्गेल गोल मिरे जून जेते सतत्ते अमोल तिन मद्धि मुलतान साहाब याप इसे रूप सौं फौज बरनाय जाप तिन घेरिय राज प्रथिराज राज चिहीं और धनचौर नौसान याज अब ब्रजभाषा का शुद्ध रूप देखिए- (२) पूरा सफल बिलास रस सरस पुत्र फलदान । प्रत होय सहगामिनी नेह नारि को मान ! समदरसी ते निकट हैं भुगात मुवति भरपूर , विषम दरस ग नरन ते सदा सरवदा दूर। पर योपित परमे नहीं ते जाते जग बीच , परतिय तान रेनदिन ते हारे जग नाच । इसमें 'तान को छोड़कर और सत्र शुद्ध प्रजभाया है। - +
२६
हिंदी
इस समय अपभ्रश की भॉति किसी एक भाषा का
साम्राज्य न होने पर भी भिन्न-भिन्न प्रदेशो में बोली जानेवाली
भाषाओ में बहुत समता पाई जाती है । इसका कारण उन
सबका एक ही घर की बेटियाँ अथवा भतीजियॉ होना है।
कहावत है कि हर बारह कोस पर भाषा बदल जाती है, किंतु
रूप-रग की समता देखकर पहचाना जा सकता है कि कौन किस
कटव की है । ऊपर के उदाहरणों को ध्यान से देखने पर
अनुमान किया जाता है कि हिंदी के भिन्न-भिन्न रूपों का
ढाँचा विक्रम की तेरहवीं शताब्दी से पहले ही तैयार हो
गया था।
अब हम हिंदी के उस रूप के विषय मे कुछ कहना
चाहते हैं जिसमें यह पुस्तक लिखी गई है। यह रूप घागरा,
दिल्ली, मेरठ, सहारनपुर आदि के आसपास भाषाओं
के उसी तुमुल युद्ध के समय से प्रचलित है जब वे
अपभ्रश से अलग हुई थीं। चंद की कविता में हमें इसकी
झलक दिखाई देती है। किंतु सबसे पुरानी क्रम-बद रचना,
जो इसमें मिलती है, अमीर खुसरो की है । संवत् १३१२ में
अमौर सुसरो का जन्म हुआ था । यह फारसी के अतिरिक्त
हिंदी के भी विद्वान् थे, और मनचले खूब थे । इनकी रचना
पढ़ने से सहज में ज्ञात हो सकता है कि इनके समय तक हिंदी
का यह रूप कहाँ तक विकसित र स्वतत्र हो चुका था।
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हिंदी
२७
'इनकी रचना के कुछ नमूने यहाँ दिए जाते हैं-
-
--
एक थाल मोती से भरा, सत्रके सिर पर श्रीधा धरा,
चारों योर वह धाली फिरे, मोती उससे एक न करे।
यह 'आकाश' की पहेली है।
--
बाला था जब समो माया, 'बढा हुश्रा कृछ पाम न पाया,
सुसरो कह दिया उमका नाम, अर्थ परो नहीं छोड़ो गाम ।
यह 'दीए' की पहेली है।
सिर पर जटा गले मे भोली किसी गुरू या चेला है,
मर-भर भोली घर को धाव उसका नाम पहेला है।
यह 'भुट्टे' की पहेली है।
एक पहानी में रहूँ, सुन ले मेरे पून,
विना परा उड़ गया, बाँध गले म सूत ।
यह 'कनकोरे' की पहेली है।
लाल बाली एक पहेली के अंत में खुसरो ने कहा है.
'परमी हिंदी फारसी तानी परो सगन'
इससे प्रमाणित होता है कि इस भाषा का नाम 'हिंदी'
दुसरो के समय तक पड़ चुका था। में 'हिंदू', 'हिंद' आदि
३२ हिंदी . रूप उससे पहले भी बोलचाल में खूब आता था, और उसमे पद्य-रचनाएँ भी होती थी । खुसरो की भाषा में नएपन या फौजीपन का नाम भी नहीं है, उसमें, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, वह स्वतत्रता और सामर्थ्य दिखाई देती है जो किसी ठेठ भाषा में होनी चाहिए। फिर भी 'प्रेमसागर' की भाषा को लेकर डॉक्टर प्रियर्सन साहब 'लालचदिका वाली अपनी विद्वत्ता-पूर्ण भूमिका में एक स्थान पर कहने - - -- - "Such a lunguage did not cxist in India before When, therefore, Lului Lal wote his Preusagara in Hindi, he was inventing in altogether new language" अर्थात् ऐसी भापा भारतवर्ष में कहीं बोली नहीं जाती थी . अतएव जब लल्लूजीलाल ने प्रेमसागर लिखा तब वह " एक विलकुल ही नई भाषा गढ़ रहे थे। इसी पुस्तक की भूमिका में आगे, थाप एक स्थान पर लिखते हैं- * When the Prensagam is written Hindus discosered thnt they had been speaking prose all their lace without knowing it" अर्थात् जब प्रेमसागर लिखा गया तब हिंदुओं को ज्ञात हुआ कि ये, विना जाने, जन्म-भर गद्य में बातचीन करते रहे हैं। -
हिंदी
-
अपराध क्षमा हो, हम-मरीखे अन्य बुद्धिवाले व्यक्ति को
सो इन दोनों कानों में परस्पर विरोध' दीखता है।
जिस समय लल्लूजीलाल ने फोर्ट पिलियम कॉलेज में प्रेमसागर
की रचना की उसी समय सदल मिश्र ने नासिकेतोपाख्यान'
और मीर अम्मन ने उर्दू मे 'बागोवहार' की रचना की ।
डॉ० प्रियर्सन साब उर्दू और हिंदी-गद्य के जन्म के विषय
मे स्वय ही अपने 'Linguistic Survey of India' नाम के
अथ में लिखते है-
-
• Urdu prose care into existence, asa literary metliuni,
at the beginning of the last century ju cilcutta
Lik. Hindi plow it was due to Lnglish influence and
to the need of text boobs in both forms of Hindogtını
You the College of Fort (Vilkının. The Bagh ( Bahu
of Jr Amni un and the Chri ffure of Gafiz ud din
Ahiul are fımııir clamples of thic onllter of these
voks in Urdu is the alıcıly inentional Prem Sagar
untten by Lallu Lal is an example of those in Hindi"
-
इसका खुलासा यह हे~"पिछली शताब्दी के प्रारभ में
उर्दू-गध पहले-पहल कलकत्ते में माहित्य-रचना के काम में
साया गया। हिंदी-गद्य की भॉति यह भी अँगरेजो के प्रमान से
-ही उद्भत हुआ, और इसलिये भी कि 'हिंदोस्तानी' भाषा के
३४
हिंदी
दोनों रूपों में पाठ्य पुस्तको की आवश्यकता थी-फोर्ट विलियम
कॉलेज के लिये । मीर अम्मन का 'बायोबहार और हाफिजुदीन
अहमद का 'खिराद-इ-अफरोज' उर्दू के प्रारभिक गद्य के
नमूने है, जैसे कि लनुलाल का 'प्रेमसागर' हिंदी गद्य का
नमूना है।"
.
.
इससे यह साबित होता है कि हिंदी तथा उर्दू-गद्य में
पुस्तके पहले-पहल फोर्ट विलियम कॉलेज में लिखी गई।
इस मत के विरुद्ध हम मशी सदासुखसिंह ( जिनका जन्म ।
सवत् १८०३ मे दिल्ली में हुआ तथा मृत्यु सवत् १८०१
में प्रयाग में हुई ) और सैयद इशाअल्लाहखॉ (जो दिल्ली के
रहनेवाले थे, किंत वहाँ से लखनऊ के नवाब सश्रादतअलीखों
के यहाँ आकर रहे थे, और जिनकी मृत्यु सवत् १८७४ में
हुई ) को पेश करते हैं । लल्लजीलाल की नौकरी पोर्ट
विलियम कॉलेज मे सवत् १८५७ में लगी थी, और इसके १२
वर्ष बाद उन्होंने लाल-चद्रिका' लिखी, जैसा कि स्वय उन्ही क
कहने से ज्ञात होता है । इस हिसाब से प्रेमसागर का रचना-
काल सवत् १८५७ और १८७६ के बीच में कभी मान
जा सकता है । मुशी सदासुखसिंह और सैयद इशाअल्लाहरख
की रचना 'प्रेमसागर' से कुछ पहले की हो सकती है।
। हमारा विश्वास है कि खडी बोली के कई गद्य-लेखक मुन
सदासुखसिंह से भी पहले हो गए होंगे। सभर है, उनकी रचन
.
हिंदी Pa- खोज में मिलें, यो दो-एक रुक्के-परचे तो हमारे पास भी हैं। सैयद इशाअल्लाहसी की पुस्तक रानी केतकी की कहानी' को डॉक्टर ग्रियर्सन साहब स्वय समत् १८५७ के लगभग की अनुमान करते हैं । मुशी सदासुखसिंह का गद्य अभी कहीं छपा नही । उसका परिचय हिंदी-ससार को लाला भगनानदीन और श्रीयुत रामदास गौड़ की 'हिंदीभापासार' नाम की पुस्तक से मिलता है । अब हम यहाँ चारों की शैली का थोडायोडा नमूना दिखाते हैं- (१) मुशी सदासुखसिंह- कितने जन्माध किसी गाँव में वसते थे। वहाँ हाथी श्राय निकला । जितने अधे थे यह बात सुनकर बहुत फूले और मुदित हुए। सब मिलकर कहने लगे कि चलो हाथी देखिए। सब मिलकर आए । आँखों से तो अधे थे । किसी ने सूंद पकड़ी हाथ से, उसने कहा हाथी अजगर के बराबर है। (२) सैयद इशाअल्लाहखाँ- एक दिन बैठे-बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ पाई कोई कहानी ऐसी कहिए जिसमें हिंदुई छुट और किसी बोली पुट न मिले । तब जाके मेरा जी फल की कली के रूप से खिले । (३) लावू लाल- महाराज. सब रानियाँ तो देवी के द्वार पर धरना देयों
३६
हिंदी
मनाय रही थीं और उग्रसेन वसुदेव आदि . सब यादव महा-
चिंता में बैठे थे कि इस बीच श्रीकृष्ण आविनासरी द्वारकावासी
इंसते-हँसते जाबवता को लिए आय राजसभा में खडे हुए।
(४) मढल मिश्र---
इस प्रकार से यमपुरी का दक्षिण द्वार अति डरावना है
कि जहाँ दूतों के बस होकर पापी लोग एस महानरक
में
पड़ते वो नाना भॉति के दुख को सहते हैं।
अव इन चारों उदाहरणों को देखकर पाठक स्वय ही
निश्चय कर सकते हैं कि पिछले दो उदाहरणों की भाषा
कोर्ट विलियम में गही गई है अथवा, उस पुरानी बोली का
विकसित रूप है जिसमें अमीर खुसरो ने रचना की थी।
'पहले दो उदाहरण पाठकों को अपना मत स्थिर करने में बहुत
सहायता देंगे, क्योंकि एक तो उनका फोर्ट विलियम कॉलेज
से कोई संबंध नहीं, दूसरे कुछ लोगों की राय मे वे इतने
पहले के लिखे हुए हैं कि जब उर्दू-गद्य का जन्म भी नहीं
हुया था।
डा०प्रियर्सन साहब उर्दू और हिंदी( खडी बोली )-गद्य
का जन्म एकसाथ मानते हैं, परतु स्वर्गीय पं० चद्रवर शर्मा
-गुलेरी 'पुरानी हिंदी' शीर्षक अपने लेख में कहते हैं-"हिंदी-
गप की भाषा लल्लूलाल के समय से आरम होती है । उर्दू-
गव उससे पुराना है। खड़ी बोली-कविता हिंदी में नई है.
...
हिंदी
उर्दू-पद्य-मापा उसके बहुत पहले हो गई है । हिंदू कवियों
का यह सप्रदाय रहा है कि हिंदू पात्रों से प्रादेशिक भाषा
कहलवाते थे और मुसलमान पात्रों से खड़ी बोली।" इसी लेख
में एक जगह आप कहते हैं-"मुसलमानो में बहुतो की घर
की वाली खड़ी बोली है।"
भला सोचने की बात है कि जो भाषा दुनिया के परदे
पर कहीं बोली ही नहीं जाती थी उसमें चौदहवीं सदी में
पद्य-रचना कैसे कर डाली जाती थी । फिर आप ही के
कथनानुसार चौदहवीं शताब्दी मे लिखी गई शाहूवर-पद्धति
में श्रीकठ के लिखे हिंदी और सस्कृत के गड़बड रलोक में
खड़ी बोली कहाँ से आ घुसी ? वह रलोक यों है-~-
नुन बादल छाइ वह पसरी नि श्राण शब्द सर
शशुपाडि' लुटालि तोटि हनिसों एव मयन्त्युद्भटा ,
झूठे गई भरा मघालि सहसा रे कत मेरे कहे
कठ पाग निवेश जाइ शरण श्रीमसदैव विभुम् ।
इस श्लोक को देकर गुलेगजी स्वय ही कहते हैं..-"इन
अवतरणों से जान पड़ता है कि उस समय हिंदी के दाना
रूप प्रचलित थे, खड़ा ओर पड़ा।"
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे तो यही साबित होता है
कि हिंदी-गद्य की भाषा लल्लुजीलाल से पहले से चली प्राती -
है, और उर्दू-गद्य उससे पराना नहीं है । खड़ी बोली की
हिंदी
.
-
,
।
कविता भी हिंदी में नई नहीं साबित होती। सभव है, गुलेरीजी
ने अमीर खुसरो की रचना को, उनके मुसलमान होने के
कारण ही, उर्दू मान लिया हो, हालाँकि 'उर्दू का तब तक
कहीं नाम-निशान भी नहीं था । जिस रचना को स्वय खुसरो
ने हिंदी बतलाया है उसे हिंदी छोडकर कुछ और क्यों मान
लिया जाय, यह समझ में नहीं आता । स० १९६८ में प्रयाग
मे होनेवाले हिंदी-साहित्य सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन
के लिये खडी बोली की कविता के सबध में जो निबध हमने
लिखा था, उसमे भी हमने इस विषय पर बहुत कुछ लिखा है।
उर्दू-पद्य-भाषा को खड़ी बोली का फारसी-अरवी-शब्द-मिश्रित
रूप न बतलाकर यह कहना कि उर्दू-पद्य-भाषा खडी बोली
से पहले की है, ऐसा ही है जैसा बेटी की उत्पत्ति माँ से
पहले मान लेना । हिंदी-कवियों ने यदि मुसलमान पात्रों से
खडी बोली में बातचीत कराई तो क्या इसी से यह साबित
हो गया कि खड़ी बोली मुसलमानी भाषा है, जैसा कि गुलेरी-
जी ने कहा है ? इसका कारण तो केवल यह था कि यह
भाषा आगरे और दिल्ली-जैसे शहरी की थी जो उस समय'
सभ्यता और वैभव के केंद्र समझे जाते थे। हिंदी में अरबी-
झारसी के शब्द देखकर ही उसे मुसलमानी भाषा ठहराना
भी ठीक नहीं, क्योंकि इन भाषामों के शब्द सभी हिंदी-
कानियों की करिता में पाए जाते है। यहाँ तक कि तुलसी
,
.
"
हिंदी
मार सूर की कविता में भी अनगिनती ऐसे शब्द हैं ।
और यह भी बात नहीं कि खड़ी बोली को मुसलमान पात्रों
से ही बुलवाया गया हो । कबीर, नानक, दादू आदि सतों
की कितनी ही रचनाएँ खड़ी बोली में हैं । ब्रजभापा के
प्रसिद्ध कवि आनदघन ने अपनी 'विरह-लीला' खड़ी बोली
में ही लिखी है, और भी कितने ही भक्त करियों की
कविता खडी बोली में है । इन बातों से गुलेरीजी की
युक्ति की निस्सारता प्रकट हो जाती है । आगे चलकर
गुलरीजो का यह कहना कि मुसलमानों में बहुतों के घर
की बोली खडी बोली है, हमें अचरज में डालता है।
आगरा, दिल्ली, मेरठ आदि स्थानों को छोडकर, जहाँ हिंदी
का यह स्वरूप अपभ्रश-काल के पीछे से ही प्रचलित है,
आप प्रयाग, काशी, पटना चाहे जहाँ निकल जाइए, सभी
पढ़े मुसलमान, और कितने ही पढ़े-लिखे मुसलमान भी
अपने घरों में प्रातीय भाषा बोलते हैं। हमने स्वय बोलते सुना
है, मोर जो मजन चाहें सुन सकते हैं। हाँ, यह यवश्य कहा
जा सकता है कि खडी वोली का प्रचार शिक्षा के साथ ही
दिन-पर-दिन बढ़ रहा है, पार सो भी दोनों ही जातियों में । प्राचीन
भाषामों के विद्वानों का बोलचाल की हिंदी को म्लेच्छ-भाषा
बतलाना उतना ही अनुचित है जितना कि हिंदू सभ्यता से
परिचय प्राप्त करने की परवा न करनेवाले अरवी-फारसी के
हिंदी - - - विद्वानों का यह कहना कि हिंदी तो कोई भाषा ही नहीं है, वह तो कहीं वोली ही नहीं जाती। खेद है, अपने एक स्वर्गीय मित्र के मत के विरुद्ध, जिनको वियोग के ऑसू हमारी आँखो में अभी तक नहीं सुख पाए है हमें इतना लिखना पड़ा। आज कितने ही अगरेजी-पढे व्यक्ति कुछ इस प्रकार की भाषा बोलते हुए सुने जाते है-"मैं इस पॉइट (pount) पर ईल्ड ( sield ) नहीं कर सकता, मेरा फुल कन्विक्शन ( full consuction ) है कि मेरा स्टेटमेट ( Statement )टुय ( truth ) पर वेज्ड ( based ) है । शायद कहीं सम्- थिंग बेटर इन् स्टोर फॉर मी ( something better in store for mc ) हो।" इधर पढे-लिखों का यह हाल है उधर तकिया और तौलिया बेचनेवाला अँगरेजी फौजो में यो कहकर आवाज लगाता है-"माहब पिलुआ, गुदडी तौल बाई (buy)" जवाब मे साहब धमकाता है-"वेल, चला जाओ,अदरवाइज ( otherwise ') हम तुमको पुलिम को हैड-ओवर ( hindiscr) कर देगा।" - हिंदी की ठीक यही दशा उस समय हुई थी जब मुसल- मानों ने इस देश को जीता, और यहाँ अपना प्रभाव फैलाया था। हिंदी का ज्ञान न होने के कारण अपना हिंदी " - . मतलब समझाने के लिये उन्हें फारसी, अरबी, तुर्की आदि के शब्द प्रयोग में लाने पडते थे। ठेठ हिंदी में इन शब्दों के फैल जाने के कारण ही पिछले दिनो में इसको रेसता की बोली कहा गया। अधिकतर मुसलमान यहाँ फौजियों की हैसियत से आए थे, इसलिये फारसी-अरबी शब्द मिली हुई हिंदी को उर्दू-हिंदी अर्थात् फौजी हिंदी भी कहते थे जिस प्रकार बुदेलखडी हिंदी, बैसवाड़ी हिंदी, बाबू-इँगलिश आदि कहा जाता है । अब वैसवाडी हिंदी अथवा बुदेल- खडी हिंदी अथवा राजस्थानी हिदी कहने का कष्ट न उठा- कर लोग जैसे वैसनाडी, बुदेलखडी और राजस्थानी कहते है, उसी प्रकार हमारा अनुमान-नही विश्वास है कि उर्दू-हिंदी में से भी हिंदी लुप्त होकर उर्दू ही नाम रह गया । उर्दू के जबर्दस्त लेखक स्वर्गीय शम्सुलउलमा मौलाना मोहम्मदहुसेन साहव आजाद अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'आबे- हयात' में लिखते हैं- 'इतनी बात हर शख्स जानता है कि हमारी उर्दू जुबान प्रजभाषा से निकली है और व्रजभाषा सास हिंदोस्तानी . - जुनान है। । आजाद साहब की देखा-देखी स्वर्गीय बाबू बालमुकुद गुप्त भी ऐसा ही कहते है । सभर है ब्रजभापा के उत्कृष्ट काव्य को देखकर अथवा अपभ्रश तक पहुँच न होने के कारण ४२ हिंदी , । श्रद्धेय मौलाना साहब ने ऐसा लिख दिया हो, पर गुप्तजी ने क्यो उनमे सहमत होना उचित समझा,, यह समझ में नहीं आता । आधुनिक हिंदी की उत्पत्ति शौरसेनी, अर्द्ध मागधी और पजाबी के मेल से हुई है, यह बात हम ऊपर दिखा चुके हैं । व्रजभापा तो बहुत कुछ शौरसेनी का अप- भ्रश है-उससे खडी बोली की उत्पत्ति होना असभव है। हिंदी-भाषा पर एक बहुत ही विचार-पूर्ण लेख झालावाड के विद्वान् महाराणा श्रीसर भवानीसिंहजी ने, कुछ समय हुआ, लिखा था । इधर मिस्टर कीज ने हिंदी साहित्य का छोटा-सा, किंतु बहुत ही सुदर इतिहास हाल में लिखा है । इन सज्जनों। ने जो मत स्थिर-किए है उनकी आलोचना भी टॉप्रियर्सन ओर गुलेरीजी के मत की आलोचना के साथ ही हो जाती है, अतएव उनकी अलग आलोचना करने की आवश्यकता नहीं । केवल दूसरी भाषाओं के कुछ शब्द आ जाने से ही किसी भापा का नाम नहीं बदल सकता । भला सोचने की बात है कि मीटिक भाषा के कुछ शब्द मिलाकर भी पारसी लोग जिस मापा को बोलते हैं क्या वह गुजराती नहीं कहलाती ? भाषा कौन-सी है और कौन-सी नहीं, इसका पता उसकी विशेषताओं से अथवा उसके व्याकरण के सहारे लगाया जा सकता है। कुछ उर्दू-लेखक फारमी-अरबी के शब्दों की भरमार करके भोर फारसी-व्याकरण तक का कहीं-कहीं अनुकरण करके - हिंदी ३ मापा के रूप को बिगाड़ने म सदा से तत्पर रहते आए हैं, यह उनकी भूल है । उनकी इस करतूत से हिंदी का ढाँचा तनिक भी नहीं बिगड़ सकता, वे अपना मन समझाने के लिये इसे भले ही विदेशी पोशक से सजा लें, परतु शरीर को नहीं बदल सकते । हिंदी ही उर्दू है, यह बात हम अपने मन से नहीं कह रहे हैं। डॉ. राजेंद्रलाल मित्र और मि० चीम्स-सरीखे निद्वानों की भी यही राय है। पुराने समय के मुसलमान लेखक भी ऐसा ही मानते रहे हैं, यह बात हम पहले दिखा चुके हैं । उर्दू नाम पुराना नहीं, नया है । ईसवी सन् १६७३ में फायर नाम के एक विदेशी सजन ने वाद- गही दरवार की भाषा को फारसी और सर्वसाधारण की मापा को 'इडोस्टान' बतलाया है। हमारा विश्वास है कि यात्री ने 'हिंदी' की जगह 'इडोस्टान' लिखा है । पादौडैलाल' नाम के यात्री का यात्रा-विवरण ईसवी सन् १६६३ में प्रका- शित हुआ था। उसने एक ऐसी भाषा के विषय में कहा है जो सारे भारतवर्ष में प्रचलित थी, और नागरी-लिपि में लिखी जाती थी। यह मापा हिंदी के अतिरिक्त और कौन हो सकती है? जॉन मागिलवी ने सन् १६७३ ईसवी में एक बड़ी पुस्तक एशिया के समय में लिखी है, जिसमें उसने नागरी को लिपि तथा भापा दोनों बतलाया है और लिखा है कि मधुर
ܝܕ
हिदी
-
धर्म
।
हिंदोस्तानी भाषा वाई और से सीधी ओर को लिखी जाती
है। भला सोचने की बात है कि क्या यह भाषा हिंदी के
अतिरिक्त कोई दूसरी हो सकती है 2. विदेशी यात्रियों की ये
सृचनाएँ हमने डॉ. प्रियर्सन साहब के 'Linguistic Surrey
of Indin' नाम के प्रथ से ली है । वैसे भी उर्दू की
उत्पनि शाहजहाँ के समय से मानी जाती है । विजंत
मुसलमान हमारे घरों से दूर कोठियो में नहीं रहते थे और
न ये यहाँ से लौटकर चले जाने की इच्छा से यहाँ आर
थे । वे हमारे मोहल्लों और गलियों में रहते थे, बाजारों में
दूकानें करते थे, यहाँ के करोडो हिंदुओं ने भी उनका
स्वीकार कर लिया था, और उन्ही में
घुल-मिल गए
थे।
बहुत-से हिंदुओं ने उनके यहाँ नौकरी कर ली थी,
बहुत
उनके यहाँ पिलुश्रा गुदड़ी तौल वाई करने जाया कर
थे। इन्हीं सब कारणों से फारसी-अरबी के शब्दवालं
हिंदी की जड़ जम गई । अगर अँगरेज लोग भी इसी तर
हिंदोस्तानियो से घुल-मिल जाते तो ऐंग्लो-हिंदोस्तानी भाषा में
जड जमना असभव नहीं था, न है । वह उर्दू-हिंदी पहा
मुमलमानों और हिंदुओं में पारस्परिक भाव प्रकट करने के
काम में आई । मनचले लोग इसमें कविता करने लगे। उसमें
कुछ ढग था, कुछ बात थी । वह कविता पसद को जाने
लगी । बादशाहों और नवाबों ने उसे अपनाया । उन्नति का
है
हिंदी ४५ . . अवसर उसके हाथ आया। धीरे-धीरे उसने साड़ी उतारकर पाजामा पहन लिया । दरबारों में उसका जिक्र होने लगा ! सच- मुच ऐसा ही फिर हो, यदि अंगरेज लोग भी मुसलमानों की तरह यहाँ अपना घर बना लें, और ऐंग्लो-हिंदोस्तानी की कविता को प्रोत्साहन दें । बोलचाल की ठेठ भाषा में भी रचना हुआ की, किंतु उसमें कोई समर्म कवि न हुआ। हुया भी तो चमकने न पाया, क्योंकि उसकी पहुँच बड़े- बड़े आदमियों तक न थी। उस समय नई अर्थात् फारसी- अरबी शब्दोंगाली की यों पूछ हुई, पुरानी का कोई धनी- धोरी न रहा । इसमें सुदरता की कमी न थी, मधुरता भी बहुत थी, लोच भी था; पर अवसर न मिला । किंतु जन- साधारण की भाषा होने के कारण यह जीवित रही। यह रूप अमर है, योर सदा जीवित रहेगा । अब इस पर से साढे- साती सनीचर की दशा निकल गई है । और भापाओं की तरह इसका साहित्य भी दिन दूना और रात चौगुनी उन्नति कर रहा है । इसमें प्रथ बनते हैं-सरस पद्य-रचनाएँ होती हैं। इसने सस्कृत के शब्द-रत्नों से अपने को सजाया है, पुरानी लकीर के फकीर इसके रूप और सिंगार से चिढते हैं। उन्हें इसमें कुछ भी नहीं दीखता । अपनी-अपनी समझ रे-अपनी-अपनी रुचि है। पर
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२ हिंदी-साहित्य का विकास
हिंदी-साहित्य की उत्पत्ति की खोज करने के लिये जब
हम अपनी दृष्टि बहुत दूर फेकते हैं तब हमको दिखलाई देता
है कि उधर अपभ्रश अपना रूप बदल रही है और इधर,
उसके साथ-ही-साथ, पुरानी हिंदी का साहित्य तैयार हो रहा
है। हिंदी का साहित्य कोई बाजीगर का पेड नहीं है जिसके
कल्ले थोडा-सा पानी देने से थोड़ी ही देर मे फूट आए हों।
यह, धीरे-धीरे, सैकडों बरसों में, अपनी इस सुरत को पा
सका है। किसी जाति को-जीवित रहने में--साहित्य कहाँ
तक सहायता पहुँचा सकता है, कहाँ तक उसे मरने से बचा
सकता है, इस बात की जाँच यदि कोई करना चाहे तो
हिंदी के साहित्य को देखे । हिंदी की बहुत पुरानी कितनी ही
रचनाएँ हमे एक ऐसी भाषा में मिलती हैं जो अपभ्रश भी
कही जा सकती है, और पुरानी हिंदी मी । इन रचनाओं के
अनेक उदाहरण पहले परिच्छेद में दिए जा चुके है, और यह
भी बनलाया जा चुका है कि प्राचार्य हेमचद्र ने उन उदाहरणों
को अपभ्रश का माना है। यह भी कहा जा चुका ह कि उन
उदाहरणों में पुरानी हिंदी और कुछ दूसरे प्रातों की भाषाओं
के रूप साफ झलक रहे हैं, इसलिये उस भाषा को जिसको
,
.
हिदा
N
हेमचद्र ने अपभ्रश माना है, और जो पुरानी विकसित हिंदी
की माँ थी, हम आजकल की हिंदी की दादी कह सकते हैं।
ऊपर पुष्प खुमान, राजानद, मसऊद, कुतुबप्रली, साई
दान, अकरमफ़ैज़ और दूसरे कुछ ऐसे कवियों का, जिन्होंने उस
समय की भाषा में रचना की है, उल्लेख किया जा चुका है।
इनमें से कई कवि भाट या चारण थे। संस्कृत के पुराने प्रथा
में हमें चारण जाति का नाम मिलता है । जहाँ कहीं यश गाने
का प्रसग आया है वहीं गधों और अप्सराओं के साः
चारणजी भी डटे हुए हैं। संस्कृत के प्रथों में चारणों को मनुष्य
न मानकर चाहे भले ही आधा या चौथाई देवता या और कुछ
माना गया हो, किंतु हम देखते हैं कि राजपूताने की चारद
जाति हजारों वरस से वही काम करती आई है जिसका उल्लेख
सस्कृत के प्रथों में है । इनको तथा भाटों को, 'कवि के प्रति
रिक्त, पुराने समय का इतिहास-लेखक या इतिहास-रक्षक कहा
जाय तो अनुचित न होगा । हाँ, अपने वर्णनों में जो गरन
मसाला इन्होंने मिला दिया है, वह अवश्य अधिक है । सद
से ये लोग राजाओं के आसरे रहते रहे हैं, और इनको बड़ी
बड़ी जागीरें मिलती रही हैं। लड़ाई के समय ये सिपाहिक
को उत्साह दिलाने के लिये उनके साथ रखे जाते थे,
यदि कभी आवश्यकता आ पडती, तो उनमें से कोई-को
जवान
के साथ तलवार भी चला दिया करते थे। तलब
.
हिंदी . चलाने के अतिरिक्त और सत्र काम ये कविता में ही करते थे। हाँ, यह अवश्य कहा जा सकता है कि कभी-कभी इनकी कनिता तलवार की धार से भी पैनी होती थी । कविता के मंदिर में जन हम दर्शन करने जाते हैं, तो अपभ्रश काल से ही कविता के पुजारियों में इनको पाते हैं । राजा लोगों ने जो सम्मान इन लोगों का किया उसका बदला इन्होने उनकी कीर्ति को अमर करके और उनकी बुराइयों पर सदा के लिये परदा डालकर बिलकुल चुका दिया । । गद्य के पीछे पथ का जन्म होना स्वाभाविक है। किंतु ससार के लगभग सभी साहित्यों में जो पहली कृति हमको मिलती है वह पद्य में । कविता क्यों लिखी जाती है, यह प्रश्न दूसरा है । किसी कारण मनुष्य के हृदय में जब कुछ आनंद उमड़ता या ठेस लगती है तब उसके हृदय की दशा कुछ विचित्र ही हो जाती है । इसी दशा को हम कविता की जननी कह सकते हैं। चारणों और भाटों के अलावा न- जाने कितने लोगों ने हिंदी में ईश्वर के गुण गाए होगे, उसको धन्यवाद दिए होंगे, उसके सामने थपना दुखड़ा रोया होगा, लोगों को नीति के मार्ग पर चलाने के लिये उपदेश किए होंगे, अपनी-अपनी समझ के अनुसार संसार की असा- रता या सारता दिखाई होगी, सुदर प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन किया होगा, परतु खोज करने पर भी उनकी रचनाओं का -
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हिंदी
-
.
-
पता अभी तक नहीं चला । इसलिये जो कुछ हमारी आँखों
के सामने है उसी को देखकर कहना पडता है कि जो रचना
हमारे यहाँ सबसे पुरानी मिलती है उसमें से, अधिकतर
भाटो और चारणों की हैं। शोक है तो, यह कि इनकी रचना
भी पूरी नहीं मिलती, समय के फेर से, राज्यों के ध्यस होने
से और दूसरे अनेक कारणों से जितनी सामग्री नष्ट हो गई
उसका सौवाँ हिस्सा भी आज हमको नहीं मिलता।
पुष्प की अलकारपाली-पुस्तक और राजा नंद. कुतुबअली
आदि की रचनाएँ न मिलने के कारण बरबम हमको विक्रम की
तेरहवीं शताब्दी में, चद् कवि ही अपने सामने दीखता है।
चद की रचना-शैली से यह बात टपकती है कि इसके पहले
भी बडी अच्छी-अच्छी रचनाएँ हिंदी में हो चुकी थीं, हमारी।
भापा को-यद्यपि वह मिश्रित-सी दीखती है-कुछ-न-कुछ
प्रौढ़ता प्राप्त हो चुकी थी, और उसकी शैली में स्थिरता
आ गई थी। भाटों और चारणों के संबंध में जो बात पहले
कही गई है चद का जीवन उसका एक नमूना है । लाहौर
का रहनेवाला यह भाट राजा पृथ्वीराज के दरबार में
आकर रहा । जैसा असर पड़ा इसने, लेखनी और खड्ग
दोनों से काम लिया और अत में पृथ्वीराज के साथ ही
शरीर छोड़ दिया । उसको अमर करने की धुन में आप भी
हो गया । अगर चद ने पृथ्वीराज-रासो (जिसमें पीछे
-
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हिंदी
५१
से बहुत कुछ ऊटपटौंग मिलाया गया है) न लिखा होता
तो दाहिर की तरह आज पृथ्वीराज का भी हमको बस नाम
हा नाम मिलता । इसका समकालीन जगनिक कवि महोवे
के परमाल राजा के यहाँ था जिसने पाल्हा लिखा । शोक है
कि जगनिक का भी असली प्रथ नहीं मिलता । जगनिक की
रचना के नाम से जो कुछ मिलता है उसमें भी ऊटपटांग की
कमी नहीं है । चद् का बेटा 'जल्हण' भी अच्छा कवि था ।
पृथ्वीराज रासो का कुछ हिस्सा इसका भी लिखा हुआ है।
इसका रहना अधिकतर चित्तौड़ में हुआ । चद की रचना
के उदाहरण पहले दिए जा चुके हैं। यहाँ जल्हण की
रचना का एक नमूना दिया जाता है जिससे पाठको को
ज्ञात हो जाय कि बाप की रचना-शैली से बेटे की रचना-
शैली कहाँ तक मिलती है-
प्रथम वैद उदार बम मछहचन चिनो ,
दुतिय चीर वाराह घरनि उद्धरि जस लिनी ,
'कौमारक नम देस धरम उद्धरि सुर सम्पिय
कूरम सूर नरेस हिंद हद उद्धरि रस्थिय ,
रघुनाथ चरित हनुमत कृत भूप भोज उद्धरिय जिमि ,
पृथिराज सुजस पविचद कृत चद नद उद्धरिय तिमि ।
मतलब यह कि हनुमान्-कृत रघुनाथजी के चरित का उद्धार
जैसे राजा भोज ने किया, उसी प्रकार चदकरि के वर्णन
1
५२ हिदा किए हुए पृथ्वीराज के सुयश का उद्धार चद के बेटे ने किया। इसी समय केदार कवि. ने.योरी के सुल्तानों के.वर्णन में एक अथ बनाया था। यह समय वह था जब हिंदू राजा इधर तो आपस में लड़कर क्षीण हो रहे थे और उधर मुसलमानों के हमले उन्हें दुर्वल कर रहे थे । इसलिये इस समय की जो रचना हमें मिलती है उसमें लड़ाई-भिड़ाई का ही वर्णन अधिक दीखता है । अचरज तो इस बात का है कि इसके साथ ही और-और बातों का वर्णन-और सो भी इतना अच्छा- मिलता ही क्यों है ? यह समय राजपूताने और उत्तरी भारत के लिये, बडी भारी उथल-पुथल और ऊधम-दगे का था । तेरहवीं की भाँति विक्रम की चौदहवीं शताब्दी भी लड़ाई- भिड़ाई में ही बीती, परतु इसमें भी रासाओं को छोड़कर मौर कई प्रकार की रचनाएँ मिलती हैं । रासाओं में हम्मीररासा, विजयपालरासा. और वीसलदेवरासा विशेष महत्व के हैं। पिछले दो के लेखन-काल के विषय में मतभेद है । हम्मीररातो में हम एक ठेठ राजपूत को देखते हैं जो शरण आए हुए एक विदेशी और विधर्मी की रक्षा के लिये घूल में मिल जाता है। पीछे से हम्मीर पर और भी दो-एक पुस्तक लिखी गई । हम्मीररासा शारगधर नाम के एक कवि
'
.
का लिखा हुया है जिसने और भी कई पुस्तके लिखी
थी। इसी शताब्दी में अमीर खुसरो ने रचना की जिसके
विषय में पहले बहुत कुछ कहा जा चुका है, और जिसके
कई उदाहरण भी दिए जा चुके है । अमीर खुसरो की रचना
में हमें उस समय की अपनी सामाजिक दशा का एक धुंधला-
सा चित्र दीख सकता है, और सो भी बड़े ध्यान से देखने
पर । कई कारणों से खुसरो की रचना बड़े महत्त्व की समझी
जाती है। सबसे अधिक महत्त्व की बात यह है कि यह १३..
खड़ी बोली के उस स्वरूप को दिखलाती है जो उस समय
प्रचलित था और जिसमें उतनी सुदर रचना हो सकती
थी। उस समय की भाषा पर पड़ोसी भाषाओं का जो प्रभाव
पड़ा था वह भी क्यों सखि साजन ना सखि दीया' की
मोति उसमें स्पष्ट चमकता है। जैसे घद करि मिश्रित हिंदी
का पहला कवि नहीं था, उसी तरह खुसरो भी खड़ी बोली
का पहला कवि नहीं था, जिन कारणों से चद कवि को
मिश्रित हिंदी का पहता कवि कहना पड़ता है, उन्हीं
कारणों से खुमरो को भी खड़ी बोली का पहला कति ।
इसी समय मुल्ला दाऊद नाम का एक और भी हिंदी-लेखक
था। और भी बहुत-से लेखक रहे होंगे, किंतु सरकी रचनाएँ
मिलती नहीं।
विक्रम की पद्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ही हमें एक
-
५४ हिंदी महात्मा के दर्शन होते हैं। यह महात्मा है बाबा गोरखनाथजी । आडबर और छुआछूत से भरे हिंदू-धर्म की मुठभेड़ जब एक हाथ में कुरान शरीफ और दूसरे में तलवार लिए हुए इस्लाम से हुई तब ऐसे सिद्धातों का आविर्भाव होना स्वाभाविक या जैसे कबीर और उनके गुरु रामानद आदि सतों ने फैलाए। इस सतमत के विषय में आगे कुछ कहा जायगा । यहाँ केवल इतना ही कहना है कि संतमत से गोरखनाथजी का कोई सीधा संबंध नहीं था, यद्यपि इसमें तनिक भी सदेह नहीं कि गोरखनाथजी की शिक्षाओ का बड़ा भारी प्रभाव सत- मत पर पड़ा है । गोरखनाथजी मुछ्दरनाथजी के शिष्य ये जिनका नाम हठयोग की पुस्तकों में मत्स्येंद्रनाथ लिखा मिलता है । गोरखनाथजी हठयोग में पूरे थे, इसलिये भाँति- भॉति के चमत्कार इन्होंने दिखलाए, और शैवमत का उद्धार किया जो आजकल भी गोरख-पथ कहाता है । सभव है, यदि गोरखनाथ-सरीखे महात्मा शैवमत का उद्धार न करते तो इधर सतमत और उधर वैष्णवधर्म की चपेट से यह कैलास-वास ही कर जाता । गोरखनाथजी का मदिर अब भी गोरखपुर में बना हुआ है। इन्होने कोई पचास-पुस्तके-सस्कृत- और हिंदी में लिखीं। इनकी हिंदी-कविता का नमूना लीजिऐ- अवधू रहिया हाटे बाटे रूप विरष की छाया , नतिनो मोडममार की माया ।
हिंदी - श्राप सगुसरियनत विचार, पडित निद्रा अलप महार। अब इनके गद्य की भी बानगी देखिए- "मैं जु हौं गोरिष सो मदरनाथ को दडवत करत हौं । है कैसे वै मदरनाथ । आत्मा जोति निश्चल है अतह- करन जिनिकौ अरु मूल द्वार से छह चक्र जिनि नीकी तरह जानै ॥ धर्म के नाम पर अनगिनती ढोगों को अपने जीवन का श्राधार बनानेवाली हिंदू-जाति को, समानता और भ्रातृभाव का झडा उडानेपाली मुसलमान-जाति के धक्के से जो आघात पहुँचता उसको आज कोई कहनेयाला भी न होता, यदि इस समय भक्त और सत करियो ने, इस गिरती हुई छत को, सहनशीलता, समझदारी और श्रद्धा से भरे हुए नए सिद्धानों की धरन लगाकर, न रोका होता । वैदिक और पौराणिक धर्म की सस्कृत में व्याल्या करने और बात-बात पर शास्त्रार्थ करनेवाले पडित लोग बेपढ़े या केवल हिंदी-पढ़े हिंदुओं के किस काम के थे ! निश्चय था कि हजारों बरसों से जिन नातियों पर अत्याचार किया जा रहा था वे अपना धर्म छोड चैठती , किंतु इस समय एक बात ऐसी हो गई जिससे यह ड्वती नार किनारे लग गई । इस समय कम पदी या वेपदी ऊँची जातियों को प्रेम और भक्ति का तत्त्व समझाने के लिये यदि सूर और तुलसी सरीखे महाकवि पैदा - ५६ हिंदी -- . मानो हो गए, तो वेपढ़ी, गँवार और सामाजिक - अत्याचार से कुचली हुई शूद्र जाति को.धर्म-पर दृढ-रखने के लिये रैदास.. चमार, नामदेव दरजी, सेना नाई आदि महात्मा पैदा हो गए जिनके सिद्धात, निर्मलता, स्वाभाविकता और. सत्य- प्रतिपादन में, किसी भी धर्म के सिद्धातों से कम नहीं हैं। इस समय जगह-जगह सत और भक्त पैदा हो गए, हिंदू-धर्म की रक्षा के लिये कई शरीर धारण करके भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मान सृजाम्यहम्'-वाली अपनी प्रतिज्ञा को पूरा' मिथिला के कोकिल -विद्यापति ठाकुर---का भी यही समय है । आपका आसन, भक्त कवियों में, बहुत ऊँचा है। आपकी रचना मे शृगाररस भी भरपूर है। मापने नाटक भी लिखे हैं। मिथिला में आपके गीतों को वही स्थान प्राप्त है जो इन प्रातों में मारा, तुलसी-या सूर के गाँतो. को । वग-भाषा के विद्वान् 'आपकी रचनाओं का उतना ही आदर करते हैं जितना हिंदीवाले । मिथिला में आपकी शैली का आपके समय से ही, बहुत कुछ अनुकरण- किया। । -- किया जाता रहा। । १ स्वामी रामानद को लीजिए.। यह वैष्णवमत के चलाने- वाले श्रीरामानुजाचार्यजी के सप्रदाय में थे । इन्होंने उत्तरीय हिंदी भारत में रामानदी मत फैलाया । कबीर, सेना नाई, पीपाजी (जिन्होंने अपना राजपाट छोड़कर फीरी ले ली थी), धना जाट, रैदास चमार आदि सत इहीं के शिष्य थे । हिंदी- काव्य-ससार के सूर्य गोस्वामी तुलसीदासजी भी रामानदी ही ये। जिन सतों के नाम लिए जा चुके हैं उनके तथा उनके दूसरे गुरुभाइयों के हृदय-रूपी खेत मे स्वामी रामानदी का उपदेश-रूपी बीज भूमि और जल-वायु के अनुसार, तरह- तरह से उगा ओर फूला-फला । यह इसा का परिणाम है कि कीरपथी और रैदासी एक ही सप्रदाय के होते हुए भी एक नहीं है, अर्थात् कुछ थोड़ा-बहुत भेद इनमें और इन-जैसे दूसरे सप्रदायों में पाया जाता है। यह भेद उतना सिद्धांतों में नहीं है जितना ऊपरी बातों में । इन सतों के कारण हिंदी-साहित्य की अच्छी उन्नति हुई । इनके अनेक शिष्यों भारत-भर में धूम-घूमकर इनके सिद्धातों का प्रचार किया, ओर यो प्रात प्रात के निवासियों का हिंदी से परिचय हुआ, और हिंदी का मान बढ़ा । इनके वचनों में खरापन, भाक्त और प्रेम कूट-कूटकर भरा था । रैदास का एक पद देखिए- श्रा से छुटै नाम-नट लागी । 'प्रभुजी तुम चदन हम पानी, जाकी अँग-या वास समाना , प्रभुजी तुम घन मन हम मौरा, जैसे चितवत चद चकोरा प्रभुजी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति जगै दिन रातो ने - , +
के पेड़ को भक्ति के जल से सींच रहे थे, और दूसरी भोर
दासजी हिंदू थे, किंतु जन्म से ही एक मुसलमान जुला-
से जो सुना तो स्वामीजी के मुख से नियमानुसार मत्र
नीच जाति के होने के कारण उन तक इनकी पहुँच कह
परतु कहा है कि 'उतावला सो बावला । कबीर ने
उपाय किया, और वह यह कि काशी के मणिकर्णिका
'पर, जहाँ बड़े सबेरे-वरे ही रामानदजी स्नान करने छ
करते थे, जा डटे । जय स्वामीजी गगास्नान करके लो
लगे तब यह वहीं उनका रास्ता रोककर लेट गए। स्वाम
हिंदी
"
प्रभुजी तुम मोती हम धागा, जैसे सोनाह मिलत मुहागा ।
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा, ऐमी भक्ति करै रैदासा ।
इन सतों ने न केवल शूद्रों ही को बल्कि अपने ऊँचेपन की
ऐंठ में रहनेवाली दूसरी जातियों को भी ईश्वर से मिलने का
सीधा मार्ग बतलाया है । ये महात्मा एक ओर तो सच्चे धर्म
-
।
।
उस पेड़ की बेतरह बढ़ी हुई और रास्ता चलतों को व्यर्थ
कष्ट देनेवाली डालों की काट-छॉट में लगे हुए थे।
इन सतों में कबीरदास का आसन सबसे ऊँचा है। कबीर
के घर पले थे । स्वामी रामानदजी के उपदेशों को दूसरे लोग
नि
दीक्षा लेकर शिष्य होने के लिये उतावले हो गए।
.
को अँधेरे में कुछ दीखा-भाला नहीं । उनका पैर इन पर
गया । स्वामीजी ने यह सोचकर कि न-जाने किस पर
हिंदी - . ह गया 'राम राम राम राम' कहा । वस कवीरजी उसी देन से स्वामीजी के सिद्धाों का प्रचार करने और अपने को खुल्लमखुल्ला उनका शिष्य बतलाने लगे। कबीर के मसल- सान सवधियों ने रामानदजी को उलाहना दिया । रामानदजी ते कबीर यो बुलाकर पूछा कि क्यो रे, हमने का तुझो मत्र दिया है जो तु अपने को हमारा शिष्य बतलाता है । कबीर ने जवाब दिया कि महाराज, और लोग तो कान में मत्र देते हैं, परतु आपने तो मेरे सिर पर पैर रखकर मुझे मत्र दिया है। कबीर की इतनी भक्ति देखकर स्वामीजी ने इन्हें अपनी पाती से लगा लिया, और अपना शिष्य स्वीकार किया । रामानदी सप्रदाय के सतों के विचारों में एक दूसरे से जो मोडा- हा-बहुत भेद इस समय दीखता है वह आगे जाकर और बढ़ जाता है । उदाहरणार्थ, देखिए, तुलसीदासजी और बीर के विचारों में कितना भेद है । गुसाईजी अवतार के जननेवाले और सगुण ब्रह्म की उपासना के प्रचारक है, रंतु कबीरजी मूर्ति-पूजा और अफ्तार का बेतरह खडन करते हैं ! तुलसीदास धर्म-पथ से डिगती दुई हिंदू-जाति की जव को साकार-मक्ति के डॉड से खेकर किनारे लगाना चाहते - कबीर ससार के धर्मों में से ढोंग को दूर करके निर्गुण ब्रह्मा सामने सबको एक किया चाहते हैं जिससे न तो नाव बोदापन रह जाय और न सर्वनाश की नदी में उस नाव - - ।
1
.
राम और रहीम को वह एक ही रूप में सारे ससार
कहलानेवाले पाखडियों की उन्होंने वह' धज्जियाँ उड़ा
हिंदी
को डुवा लेने के योग्य गहराई । कबीर वड़े भारी ,सुधारक
हुए हैं। उन्होंने सब बातें निडरपन के माथ साफ-साफ कही
हैं । घट-घटव्यापी ब्रह्म को मूर्तियो मे पूजना उनकी समझ
में मूर्खता थी । इसीलिये उन्होंने कहा है--
दुनिया ऐमी बावरी पत्थर पूजन जाय ।
घर की चकिया काहे न पूजै जिसका पीना खाय ।
मुसलमानों के धर्म में भी उन्हे ढोंग दीखा, 'इसलिये
उनको भी उन्होंने फटकारा है-
कॉकर पाथर जोरिकै मसजिद लई बनाय ,
ता चढ़ेि मुला बाँग दे क्या बहिरा हुआ स्युदार?
इस समय धर्म क नाम पर जो अशाति फैली हुई
उसको उन्होंने बेमतलब का माय-झाय समझा-
साधो देसो जग बौराना,
साँचि कहो तो मारन धारे मूठ जग पतियाना ।
हिंदू कहत हे राम हमारा ' मुसलमान रहमाना
श्रापस में दोऊ लड़े मरत हैं मरम कोई नहीं जाना |
व्यापक देखते हैं । हिंदू-धर्म के गडबडझाले की और पा
कि जिसका नाम ।
अच्छा तो अब हम विक्रम की सोलहवीं शताब्दी में
.
हिंदी 1 इस शताब्दी में भी चरणदास, धरमदास, भगोदास आदि अनेक सत और भक्त ससार को सुधारने और से भक्ति और प्रेम का पाठ पढ़ाने में लगे हुए दिख- गई देते हैं | कवीर का पुत्र कमाल था । इसका मत अपने ता से नहीं मिलता था । तुलसीदासजी की भॉति यह भी हेदू-अवतारों भाटि पर श्रद्धा रखता था, जब कि कबीर 'ब' मझटों से दूर थे । इसके विषय में कबीरजी स्वयं - १ - चूडा बस पनीर या उपजा पूत कमाल हार का सुमिरन छाइक घर ले याया माल । है इसी शताब्दी में आना नानक हुए हैं जिन्होंने हिंदू-मुसल- -'मानों को मिलाने के लिये अपना पथ चलाया जो पीछे से सिक्ख-मत कहलाया । इन्होंने हिंदुओं के तीर्थों के साथ ही मका शरीफ की भी यात्रा की थी । इनकी रचनाएँ प्रथसाहब.. में हैं जो कि सिक्खों का वेद है । इन्होंने तथा इनके शिष्यों ने बहुत कुछ हिंदी मेवा की है। इनकी रचना का एक नमूना लीजिए- साधो मन या मान तिवागउ फाम मोध मगनि दुरजन का तात पहिनिसि मागउ । मुख दुप दोनों सम पारे जाने पर मान अपमाना हरप सोते रहे थतीता तिन मानव पिमाना। 1 . ।
, . -- - १ तो मानो सूरज को दीपक से दिखाना है। इन आठ को छोड़कर और भी अनेक शिष्य थे जिन्होंने अपनी सुदर रचनाओं से, घोकर पवित्र कर दिया । सच पूछिए तो इन्हीं की। ६२ हिंदी असतुति निंदा दोउ तित्रागै खोजै पद निरवाना जन नानक इह खेल कठिन है किन गुरमुख जाना। प्रथसाहब में नानकजी को ही नहीं, और भी कितने ही ऐसे सतों की रचनाएँ पाई जाती हैं जिनके सिद्धात नानक- जी के सिद्धातों से मिलते-जुलते हैं। इसी शताब्दी में श्रीवल्लभाचार्यजी-भी. हुए हैं जो वैष्णव मत के वल्लभीय सप्रदाय के सस्थापक थे । हिंदी का जो उपकार रामानदजी और उनके शिष्यों द्वार हुआ है वही वल्लभाचार्यजी और उनकी शिष्यपरपरा-द्वारा हुआ है । उनके और उनके पुत्र विट्ठलनाथजी के आठ शिष्य मुस्य थे जो अष्टछाप के कवि कहलाते हैं । ये सूरदास, कुंभनदास, गोविंददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी, नददास, कृष्णदास और परमानंददास थे। इनमें से लगभग सभी का रचना-काल सत्रहवी शताब्दी के प्रारभ तक चला जाता है। ये सभी बहुत अच्छे कवि थे । सूरदास के विषय में कुछ कहना हिंदी को सजाया है। इन सबने वल्लभीय सिद्धातों की धूम मचाकर श्रीकृष्ण की उपासना की एक गगा बहा दीप जिसने, समय के प्रभाव से मलीन हुए हिंदुनों के हृदयों को . .
हिंदी से हिंदी-काव्य-ससार में प्रजभाषा को वह ऊँचा श्रासन मिला कि आज तक भी लोग देखते हैं। अनन्य सप्रदाय के सस्थापक गोस्वामी श्रीहितहरिवश- जी का जन्म सवत् १५५६ में हुया था । ये अपनी जन्म- भूमि देववृद से वृदावन-में -वसे थे । इनकी कविता, मधु- रता और भावों में, कहीं-कहीं सूरदासजी की भी कविता को मात करती है । इनके भी सैकड़ों-हजारों ही शिष्य कवि थे जिन्होंने हिंदी-साहित्य के भडार को खूब ही भरा । वह भाषा ही क्या जो विदेशियों के चक्कर में पड़कर नष्ट हो जाय, और वह कविता ही क्या जो उदासीनों को भी बस में न कर ले । हिंदी-भाषा की दृढ़ता और उसकी कविता की मोहिनी शक्ति सेकड़ों बरसों प्रमाणित होती रही है। चद कवि के भी पहले से मुमलमान इसमें कविता करते थे। उसके पीछे भी कितने ही मुसलमान कवि हुए। किंतु इस समय तक जितने हुए उनमें मलिक मोहम्मद जायसी का आसन सबसे ऊँचा है । इस मुसलमान सत ने पद्मावत और अखरावट नाम की दो पुस्तकें लिखीं। पद्मावत में सिंहलद्वीप के राजा गधर्वसेन की कन्या पद्मिनी का विवाह चित्तौड़ के राजा रतनसेन के साथ होना, फिर उसके लिये सुलतान अलाउद्दीन का चित्तौड़ को घेरना, किला न टूटने पर धोखा देकर राजा रतनसेन को कैद कर ले जाना, गोरा और वादल - - . फकीरी की धुन लगी थी। कम-से-कम गुजरात, राजपूताने करने के लिये भेष बदलकर वृदावन गए थे। वैसे शायद हिंदी. की चतुरता से रतनसेन का कैद से छूटना, लड़ाई में गोरा का मारा जाना, फिर राजा देवपाल से युद्ध होना और दोनों राजों का मारा जाना, पद्मिनी का सती हो जाना आदि घटनाएँ वर्णित हैं । लेखक ने, मुसलमान होने पर भी, अपने धर्मवालों का कहीं अनुचित पक्षपात नहीं किया है, और न कहीं खरेपन को हाथ से जाने दिया है। इस पुस्तक की रचना दोहे-चौपाइयों में की गई है। बैस "" बाड़ी हिंदी के, जो पीछे तुलसीदासजी की रचनाओं के कारण अमर हो गई, मलिक मोहम्मद पहले महाकवि थे जिनकी रचना उपलब्ध है। यही समय मीराबाई का था जिसको रानीपन छोड़कर और इन प्रातों में ऐसा कोई हिंदू-घर न होगा जहाँ मीरा के गीत आज भी भक्ति और श्रद्धा के साथ न गाए जाते हों । हमारा तो विश्वास है कि हमारे यहा स्त्रियों में जो धर्म की लगन दिखाई देती है उसका एक मुख्य कारण मीरा'क जीवन है । यही समय 'ट्टियोवाली' वैष्णवं. सप्रदाय के सस्थापक हरिदास स्वामी का भी है, जो मानविद्या में तान- सेन के गुरु थे, और स्त्रय बादशाह अकबर जिनके दर्शन स्वामीजी अकबर को गाना न सुनाते, इसलिये तानसेन ने इनके हिंदी . सामने गाते समय जान-बूझकर कुछ भूल कर दी जिसको सुधारने के लिये स्वामीजी ने स्वय गाया, और अकर सुनकर अपने को धन्य समझा। इनके भी सैकड़ों ही शिष्य हुए जो बड़े अच्छे कवि थे। उनकी रचनाओ से भी हिंदी-साहित्य की खूब वृद्धि हुई । उनका रचना-काल विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी तक चला जाता है। अकबर के ही समय मे गग कवि भी उपस्थित था जिसका रचना-काल जहाँगीर के समय तक चला जाता है। यह बड़ा नामी कवि था, यहाँ तक कि प्रसिद्ध कवि दास ने यह कह डाला है कि 'तुलसी गग दुवौ भए सुकविन के सर- दार।' परतु खेद है कि इस 'सुकरिन के सरदार' की बहुत ही कम रचना अन तक मिली है। इसी शताब्दी के प्रतिम चरण में गोस्वामी तुलसीदासजी का जन्म हुआ जिनके विषय में जो कुछ कहा जाय थोडा है। गोस्वामीजी की सभी रचना विक्रम की सत्रहवीं शतान्दी में हुई। सवत् १६८० में उन्होंने शरीर छोड़ दिया । गोस्वामीजी की रचना बैसवाड़ी हिंदी में है। उसकी प्रशसा देशी-विदेशी सभी करते हैं। उन्होंने पुस्तकें तो अनंक लिली, परतु 'विनय-पत्रिका' भार 'रामचरित-मानस' के बराबर लोक- प्रियता किसी को प्राप्त नहीं हुई। जैम भाजफल देश-भक्ति की हवा चल रही है उसी प्रकार
-
हिंदी
उस समय ईश्वर-भक्ति या यो कहिए' कि अवतार-भक्ति का
हवा चली थी, और कोई भी सुफवि उसके प्रभाव से बचने
न पाया था, चाहे उसका सबध वैष्णव धर्म के किसी संप्रदाय
से हो या न हो। दूसरे प्रातों में भी उस समय भक्ति का
मागर उमड पडा था । शृगार और भक्ति के सगम में स्नान
फरके लोग कृतकृत्य होते थे। इन दिनों की रचना का नमूना
दिखाने के लिये नरोत्तम, कवि.के. सुदामा-चरित्र में से दो
संवैए दिए जाते हैं-
-
(१) स्त्री के बहुत कुछ कहने-सुनने पर मुदामाता
अपने पुराने मित्र श्रीकृष्णजी के दर्शन करने द्वारिका याए।
बेचारे इतना वडा नगर देखकर चकरा गए। काई किमी
की बात नहीं पूछता । सब अपने-अपने कामों में लग र
हैं । सुदामाजी इधर-उधर पूछते-पाछते श्रीकृष्ण की डयोदिय
मिलना चाहते है। पहले तो उन्होंने इन्हें खून बनाया
फिर बडी कठिनाई से उनमें से एक द्वारपाल श्रीकृष्णाजी
सीस पगान भंगा तन म प्रभु जान को चाहि चमे पहिगामा।
धोती फटी-नी लटी दुपटी अन पाय उपानह पी नार सामा
तार खड़ा द्विज दुर्वल एक रक्षा चदि सो नसुवा अभिरामा ।
६६
पूमत दानदयाख
तक आ पहुँचे । द्वारपालों से कहा कि हम श्रीकृष्णजी
पास जाकर सुदामाजी का हुलिया बतलाता हुआ बोला-
यो
धाम,
पतात पापनो नाम सुदामा ।
.
हिंदी
श्रीकृष्णजी सुदामा के पुराने सहपाठी थे-बचपन मे एक
ही गुरु के यहाँ पढ़े थे । परतु दोनों के भाग्य एक-से न थे।
एक राजों के राजा थे, तो दूसरे कगालो के कगाल और
महा दिवालिए । फिर भी जब श्रीकृष्ण ने सुदामा का नाम
द्वारपाल के मुख से सुना तन पुरानी बातों को याद करके
उनसे मिलने को बेचैन हो गए । जब सुदामाजी उनके
सामने आए तब उन्होंने क्या देखा कि सुदामाजी के पैर
विवाइयों से फट रहे हैं और उनके पैरों में दो,चार, दस, बीस
काँटे नहीं, बल्कि काँटो के जाल-के-जाल गड़े हुए हैं। दरि-
द्रता के ये सब चिह्न देखकर भगवान् को बडा दुख हुमा।
उन्होंने कहा कि अरे मित्र, तुमने बडे दु ख पाए। तुम अन
तक यहाँ क्यों नहीं आए अन तक कहाँ दिन खोए ।
करुणा के भडार श्रीकृष्णजी सुदामा की दुर्दशा देखकर करणा
के मारे इतने रोए कि पैर धोने के लिये परात में जो पानी चरा
या यह वैसे का पैसा ही धरा रह गया, और सुदामाजी के पैर
भगवान् के आँसुओ से ही धुल गए । कवि कहना है-
पायें निवाइन सा जुटे पर कटर जाल लगे पुनि जोए ,
राय महादुस पायो सम्बा तुम चार इतै न नि दिा सोए।
दखि सुदामा यी दान दसा करुना पारकै यानानिधि रोए ,
पानी परात को एसो नहिं नान जल मो पा धोए।
एक नो से ही कविता को हवा चल रही थी, दूसर
.
ने सजाया तो हिंदी-साहित्य को भी तुलसीदास आदि जग
हिंदी-करिता की बडी धूम थी । बादशाह स्त्रय करिता करते
के एक ही छद पर रीझकर खानखाना ने उसे ३६ लाख
रुपए दे डाले थे । खानखाना जैसे उदार थे वैसे ही उत्तम
इन्होने हिंदी मे कई पुस्तकें बनाई जिनमें सतसई बड़े
महत्त्व की है । इनका झुकाव हिंदू-धर्म की ओर विशेष था
इनकी रचना में सादगी थी, और सीधी बात थी, पर मैं
निकलती थी हृदय से । अत म यह साधु हो गए, जैसा
हिंदी
अकबर-सरीखे बादशाह का राज, वस सोने से मानो सुगध
का मेल हो गया। यह समय हिंदी की उन्नति के लिये वैसा
ही था जैसा कि अगरेजी की उन्नति के लिये 1 इंग्रलिस्तान
में इस समय महारानी ऐलीज़ेबेथ का राज था । इस समय
अँगरेजी-साहित्य को यदि शेक्सपियर आदि जगत्प्रसिद्ध कविये
सिद्ध कवियो ने अलकृत किया । अकवरशाह के दरबार में
थे, और उनके मुसाहब और सरदार ( वीरबल, मानसिंह
अन्दुर्रहीम खानखाना आदि ) भी कविता करते थे। गरी
आदि कवियों का वडा सम्मान था। कहा जाता है कि गग
कवि भी थे । तुलसीदासजी से भी इनकी बडी मित्रता थी
।
इनके इस दोहे से सूचित होता है-
ए रहाम दर-दर फिरें, मॉगि मधुकरी साहिं
यारो यारी छादिए, वे रहीम पर नाहि ।
हिंदी "फितु जर चित्रकूट में भ्रमण करते समय भगतों ने पीछा न छोड़ा तो इन्होंने रीलॉ के महाराज को यह दोहा लिख - - T मजा- चिनार में रमि रहे, रहिमा अवध-नरेस , जा प पिता पध्त है, सो प्रावत यहि देस । 'इस दोहे पर ' प्रसन्न होकर महाराज ने एक लाख रुपए नके अर्पण किए जो इन्होंने भूखों-नगों को बाँट दिए । मुसलमान बादशाहों के दफ्तरों का सब काम इस समय तक हिंदी में होता था; किंतु टोडरमल ने हिंदुओं को उस समय की राजभाषा पढ़ने को बाध्य करने के लिये, या न जाने क्यों, हिंदी की जगह फारसी को विठला दिया । बप्त, दफ्तरों में फारसी-अक्षरों और फारसी-भाषा का दोर- दौरा हो गया, और प्राजकल कचहरियों की भाषा में जिन अपरिचित शब्दों मार प्रस्वाभाविक वाक्यों की भरमार दीखती है उनकी जड़ जमी । ये सब बातें सत्रहवी शताब्दी की हैं। गप इस समय तक प्रातीय भाषामों में लिखा जाता था। 'चौरासी वैष्णवों की वार्ता' और 'दो सौ बावन वैष्णवों को वार्ता' नाम की पुस्तकें इसका उदाहरण हैं | केशपदात्तजी का जन्म सत्रह्वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही या था। केशवदासजी का हाल तो पहले ही दे दिया नाना चाहिए था, फिनु रोट है, बेचारा धक्का-मुक्की में पिछड़ - हिंदी ७० गया । केशवदासजी का स्थान हिंदी-कवियों में कितना ऊंचा है यह बात इस दोहे से प्रकट हो जाती है- सूर सर, तुलसी ससी, उडुगन कैसत्रदास, (अत्र के कवि सद्योत सम जहँ तहँ करत प्रकाम । यह ओड़छे के रहनेवाले थे । अकबर के प्रसिद्ध मुसाहब बीरतल इनका बडा आदर करते थे । सुनते है कि केवल एक ही छद पर रीझकर एक बार उन्होने केशन को छ लाख रुपए दे डाले थे । अब तक हिंदी-काव्य में शृगार और भक्ति का-मेल किया जाता था. परतु रसिकप्रिया, नख- शिख आदि पुस्तक लिखकर केशवदास ने शृगार रस की चर्चा भाक्ति से अलग भी की, और काव्य-विज्ञान के प्रथों का बीज-सा डाल दिया जिससे, साहित्य के खेत में जड की ओर से सरस और ऊपर की ओर से सूखा सा एक अजीब पेड खडा हो गया जिसमें पीछे से अनगिनती देखने में सुदर किंतु नीरस फल लगे जो आज भी देखे जा सकते हैं। केशव की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक रामचद्रिका है जिसमें कई तरह के छदो मे रामचरित्र लिखा गया है। जैसे सूरदास आदि के कारण हिंदी का व्रजभापा-रूप और तुलसीदास के कारण बैसवाडी-रूप काव्य-रचना के लिये टकसाली हो गया, उसी प्रकार केशवदास के कारण बुदेलखडी-रुप भी हो गया। दादूपथ के प्रवर्तक दादूदयालजी का भी जन्म विक्रम की
हिदी
७१
सत्रहवीं शताब्दी के प्रारभ में ही हुया । इनके विषय में भी
कुछ पहले ही कह देना चाहिए था, किंतु सच्चे साधु होने के
कारण इन्होंने आगे थाने के लिये धक्का-मुक्की नहीं की, और
पीछे रह गए । हमारा इसमें कुछ दोप नहीं-आप स्वयं
सोच सकते हैं।
-
,
-
हिंदुओं को अपने धर्म पर दृढ रखने के लिये जो भक्ति-
मार्ग निकला था उसका प्रभार विचित्र हुआ, और वह यह
कि कितने ही विधर्मी लोग भी हिंदुओं के धर्म की बातों को
मानने लगे, बल्कि कहीं-कहीं वे इन बातों में हिंदुओं से भी
बढ़ गए । देखिए तमाशा ! दिल्ली का रहनेवाला पठान
रुस्तमखाँ प्राज गोवर्धन, गोकुल और वृदावन की गलियों
श्रीकृष्ण के दर्शन करने आया है, और उनकी सेवा किया
चाहता है । किंतु जब मदिरों में नहीं घुसने दिया जाता तब
गोविंदकुड पर तीन दिन तक बिना कुछ खाए-पिए पड़ा
रहता है ! अत में गोस्वामी विट्ठलनाथजी को दया आती है।
वह इसे अपना शिष्य कर लेते है, और हमारी हिदुयो
को नीचा दिखाकर यह उनके २५२ मुख्य शिष्यों में भासन
पाता है । रुस्तमसाँ आज भक्ति के रस में पगकर रसखान
हो जाता है । उसको रचना हमें इस स्वार्थमपी पृषी पर से
उठाकर प्रेम और भक्ति के दिव्य लोक में ले जाकर कदी
रख देती है। बडे-बड़े महात्माओ की रचना में जो धारा
हिंदी 1 . - होनी चाहिए वही इसकी रचना में भी देख लीजिए । ब्रज की भूमि इसे ऐसी सुदर लगती है कि अगले जन्म में मनुष्य हो तो गोकुल के ग्वालों में, पशु हो तो नदजी की गायों में, पत्थर हो तो-गोवर्धन पहाड में, और चिड़िया हो तो यमुना के तीर पर खडे हुए कटब के पेड की डाल , पर वसेरा करने । के लिये यह लालायित है। देखिए- मानस हो तो वही रसखान बसौं मज गोकुल गाँव के ग्वारन,' जो पसु ही तो यहा बम मेरों चरौं नित नद की धेनु मैंभारन, :' पाहन हो तो वही गिरि को जो भयौ प्रजघन पुरदर वारा, जो सग हों तो बमेरो रौं उन कालिंदी पल कदन की डारन । ग्वालों की 'लकुटी' और 'कामरी' पर यह तीनों लोकों का राज छोड वैठने को, प्रस्तुत है. 'या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिई पुर को तजि डारौं, पाठहुँ सिद्धि नवौ निधि को मुख नद की गाय चराय विसारी, रससान,क्चौ इन आँखिन सौं ब्रज के बन नाग तहाग निहारों, पोटिन हूँ कलधौत के धाम करील ये पुजन उपर वारौं । बस कुछ पूछिए मत, ऐसे ही ऐसे भावों से इसकी रचना गुथी पड़ी है। इसे कोरा अध भक्त भी न समझिएगा, इसकी रचना में हिंदू-धर्म के भीतरी तत्त्व भी मिलते हैं । जहाँ दस भक्त इकडे होते हैं, जहाँ हिंदी-साहित्य की चर्चा होती है वहॉ रसखान का नाम बडे भादर से लिया जाता है । सूरदास, तुलसीदास, - . । . , , . हिंदी मीराबाई मोर नरसी मेहता को जो पद प्राप्त हुआ है, और जिसके लिये हजारों हिंदू करि ललचते रह गए, उसे इस जन्म के मुसल- मान ने अपनी दृद श्रद्धा के प्रताप से प्राप्त कर लिया। जिस भक्ति-मार्ग ने मैदान में तलवार लेकर लड़ने का व्यवसाय करने- वाले विधमा पुरुषों को यो मोह लिया वह भला कोमल चित्तवाली त्रियों को क्यों न मोहता । अस्तु, इस समय हमें ताज नाम की एक मुसलमान स्त्री की, जो श्रीकृष्ण की बड़ी भक्त थी, कविता मिलती है। इसकी रचना का एक उदाहरण दिया जाता है-- छैल जो छवीला, सम रंग में रंगाला, बड़ा चिच का अढीला रहूँ देवतों से यारा है, माल गले सोहै, ना मोती सेत सोहै, गान मोहै मन दुडल मुकुट सोस धारा है, दुष्ट जन मार, सत जन रखवारे 'ताज , चित हितवारे प्रेम प्रीति कर वारा ही नद का प्यारा, जिन क्स को पधारा, वह वृंदावनवारा कृष्ण साहेब इमारा है। जाति-पाति को छुआछूत को भक्ति के मत्र ने बहुत कुछ भगा दिया था, इसी कारण इस समय हमें ऐसे कितने ही कवि दिखलाई पड़ते हैं जिन्होंने ऊँची जाति के न होने पर भी अपनी सच्ची और दृढ़ भक्ति के कारण ऊँचा भासन पाया । इस समय सैयद इब्राहीम, कादिरवख्श, के भूत हिंदी - ७४ में . मुबारक, उसमान, ताहिर आदि कितने ही मुसलमान अच्छे कवि हो गए हैं । बनारसीदास, और महात्मा सुदरदास भी इसी समय हुए । जटमल ने 'गोरा-बादल' की कथा गद्य में लिखी । इसकी भापा शुद्ध खडी बोली नहीं है, यद्यपि चेष्टा उसी में लिखने की की गई है। इसी सत्रहवीं शताब्दी में सेनापति, ध्रुवदास, चिंतामाण, मतिराम, भूषण, नीलकड़, बेनी, वनवारी, महाराजा जसातसिंह, बिहारी आदि प्रसिद्ध कवि हुए जिनमे से कई का रचना-काल विक्रम की अठार- हवीं शताब्दी तक चला जाता है । इस समय कवियों का आदर खूब था, और हरएक जागीरदार, राजा और महाराजा उनको अपने यहा रखकर मनमाने प्रय लिखनाता था। इस समय शुद्ध भक्तिमय शृगार रस का स्थान लौकिक शृगार रस ने लेना प्रारभ कर दिया था । या यों कहे कि साहित्य के मैदान में से लौकिक शृगार रस ने अलौकिक शृगार रस को परलोकगामी बना दिया था। दूध को पानी से अलग रखने की जो विधि केशवदास ने निकाली थी उस विधि से इस समय के कवि दूध की परवा न करके शब्दा- लकारों की खॉड मिलाकर पानी ही पानी लोगों को पिल रहे थे, और लोग भी इस शर्बत के नए स्वाद से 'प्रसर होकर दूध की याद भूल चले थे। केशवदास के पीछे जिन करियों ने बड़ा भारी नाम पाय . .
७५
हिंदी
उनमें बिहारी का आसन बहुत ऊँचा है । यह बिहारीजी
विक्रम की सत्रहवीं शताब्दी के पिछले प्राधे भाग में हुए ।
इन्होंने अपने दोहों में शृगार रस के भाव बड़ी बारीकी के
साथ दिरालाए हैं जिसकी प्रशसा हिंदू, मुसलमान और अंगरेज
सभी कर रहे हैं । इनकी सतसई के दोहों का क्रम ठीक
कराने और टीका करने कराने म काव्य-मर्मज्ञ मुसलमान
सजनों का बहुत कुछ हाथ है। इनकी सतसई पर कितनी ही
टीकाएँ निकल चुकी है, और अत्र भी निकलती जाती हैं |
सत्रहवीं शताब्दी के कवियों में मतिराम भी बडे समर्थ
कानि हुए हैं । रसराज,
ललितललाम आदि इनके प्रथ
साहित्य के
भूपण
समझे जाते हैं। किंतु शृगार रस के और
कवियों की भाँति, इनके गढ़े हुए भूपण भी ऐसे हैं जो देखने
सुदर हैं, किंतु जिनसे यदि देखा जाय तो सामाजिक
लाभ नहीं के बराबर है। हमारी यह बात कितने ही
साहित्य-रसिको को बुरी लगेगी परतु हमारा मतलब यह
है कि जिस ढग की कविता करने पर उस- समय के
बहुत-मे कावि पिल पड़े थे उससे पराधीन और विलासी
राजों को दिलास-प्रियता बढने और जन-साधारण के हृदय
कलुपित होने के अतिरिक्त जाति या देश को कुछ भी लाभ
"निहारी रवाकर" नाम की अपूर्व और सर्वश्रेष्ठ टीश शाध हो गगा
पुस्तामाला-कार्यालय से निकलनेवाली है।-सपादक
में
हिंदी
न पहुँचा । रचना-चातुर्य या शेली की दृष्टि से की
कविता साधारण है, उसमें बहुत-से अनूठे भाव भी दिखलाई
नहीं देते. परतु स्वराज प्राप्त करने की चेत्र में लगी हुई हिंदू-
जाति को उठाने के लिये जो काम भूषण की कविता ने
किया क्या वह काम इन इतने सारे शृगारवादी कवियों की
रचनाएँ मिलकर भी कर सकी । आज जो जगह भूपण
के
लिये हमारे हृदय में है का वही जगह "चतुर चलाक चित्त
चपला-सी चद्रमुखी" के नखरो का वर्णन करने में वाल
की खाल निकालनेवाले और बेचारे सुनने या पढ़नेवाले
लोगों के चित्त को बेठेठाले नायिकाओं के हाव-भाव-कटाक्षों
का शिकार बनानेवाले कवियों के लिये है ? गिरी हुई हिंदू-
जाति को कोक-शास्त्र पढ़ाना ऐसा ही समझिए जैसा किसी
निमोनिया के पुराने बीमार को विना काठी और लगाम के
मस्त घोड़े पर चढाकर घोड़े को चाबुक मार देना । इसलिये हमारे
विचार में तो इस ढग के कवियो से जहाँ हिंदी-साहित्य का
उपकार हुआ, वहाँ हिंदू-समाज का अपकार भी हुआ
ये
बातें हमने प्रसगवश कह दी है, केवल मतिराम के लिये नहीं
कहीं-मतिराम बेचारे ने तो कृपा करके वीर रस की भी कुछ
कविता लिखी है।
भूपण का नाम वीर रस की कविता के लिये उतना ही
है जितना शृगार रस की कविता के लिये बिहारी या देव
.
.
.
हिंदी का । भूषण का रहना विशेषकर शिवाजी के यहाँ हुआ। बुदेलखड के राजा छत्रसाल ने भी इनका बड़ा सम्मान किया-यहाँ तक कि इनकी पालकी अपने कंधे पर उठाई । पहले यह औरगजेब के यहाँ गए थे। परतु उसने शिवाजी के साथ जो व्यवहार किया उसे देखकर इनका मन उसकी ओर से एकदम फिर गया, और शिवाजी के गहाँ जाफर हिंदुओं के स्लतत्रता के युद्ध में इन्होंने अपनी सारी शक्ति लगा दी । इनकी रचना से इनके स्वभाव का परिचय मिलता है । उससे मुरदों की भी बोटी फडकने लगती है । सबत् १७१८ से १७८१ तक सबलसिंह चौहान ने महाभारत का अनुवाद पद्य में किया । सात् १७२७ में कुल- पति मिश्र ने 'रस-रहस्य' प्रथ पूर्ण किया । यह मम्मट के लिखे सस्कृत के प्रसिद्ध पथ 'काव्यप्रकाश' के ढग पर लिखा गया है। यही समय सुखदेव मिश्र का है । कालिदास का समय इनके कुछ पीछे भाता है। पन्ना के महागज छत्रसाल और दानी थे बेसे ही कवि भी थे। इनका जन्म सनत् १७०६ में हुआ था। अान्य कवि का जन्म १७१० में हुआ था। यद्यपि इस समय नायिका-भेद और अलकारों पर ही प्रथ अधिक लिरो गए । परतु शृगार रस की इस छटा मे भी वीर रस की बिजली दिखलाई दे जाती है । इस शताब्दी में धनश्याम राम, बैताल । जैसे वीर वृद, शृगार रस में बिहारी के भी कान काटनेनाले देव, हिंदी . - , . चंदीजन, गुरु गोविंदसिंह, लाल, सूरति मिश्र, वनमानद, महा- राजा विश्वनाथसिंह, खडी बोली में लिखनेवाले सीतल, कृष्ण- गढ़ के महाराजा सावतसिंह उपनाम नागरीदास, भिखारीदास, भूपति, सोमनाथ, स्वामी श्रीहित वृदावन्दासजी, ठाकुर यादि और भी अनेक समर्थ कवि हो गए है जिनमें से एक-एक के ऊपर एक-एक निबध अलग-अलग लिखा जा सकता है। इनके अतिरिक्त सहस्रों ही कवि और हैं जिनकी रचना अवश्य कुछ-न-कुछ आकर्षण रखती है, और जिन्होंने अपनी समझ के अनुसार भोर उस समय के दूसरे कवियों का रुख देखकर हिंदी-साहित्य की वृद्धि की । खडी वोली में इस समय तक किस ढग की रचना होने लगी थी, यह दिखलाने के लिये सीतल का एक हंद दिया जाता है- मुख सरद चन्द्र पर सम माकर जगमग नखत गन जोती से । से दल गुलाब पर शबनम के है पनवे रूप उटौती से , हीरे की कनियाँ मद लगे हैं सुधा किरन के गीती में, पाया है मदन भारती या घर पनव थाल में मोती से। मुसलमान कवियों ने भी विक्रम की इस अठारहवीं शताब्दी में अच्छी रचनाएँ कौं। 'थगदर्पण' और 'रसप्रनोध' का लेखक सैयद गुलामननी बिलग्रामी 'रसलीन' भी इमी शताब्दी फे अत में हुश्रा। शुद्ध ब्रजभाषा में इसने अनोखी रचना को है । इसका यह दोहा बहुत प्रसिद्ध है- -- -
-
धमी, हलाहल, मद भरे, स्खेत, स्याम, रतनार ,
जियत, मरत, झुकि कि परत, जेहि चितवत इफ पार |
यह आँखों की प्रशसा है। नायिका की आँग्व फैसी हैं
कि उनमें अमृत, विप और शराव तीनों चीजें भरी है, जिससे
उनमें सफेदी है (जो कि अमृत का रग है), कालापन है
(जो कि विप का रंग है ) और लाली है (जो कि मदिरा
का रंग है)। परिणाम क्या होता है कि जिसकी ओर बह
एक बार देख लेती है यह जीता है ( क्योंकि जीवित रखना
अमृत का गुण है ), मरता है ( क्योंकि मारना विष का गुण
है) और नशे के मारे मुक-मुक भी पड़ता है.---यह मदिरा
के कारण । 'नमरते हे न जीते है अजव हालत हमारी है'-वाला
भार कैसी सुदरता और बारीकी से दरसाया गया है !
'पद्मावत' के ढग पर लिखी गई प्रसिद्ध पुस्तक 'इद्रावती' का
लेखक नूरमुहम्मद' भी इसी शताब्दी के पिछले चरण
मैडमा । यह कवि ऐसे थे कि हिंदी-ससार को आज तक इनके
लिये धमड है । इनके अतिरिक्त साधारण कनि भी मुसलमानों
में
बहुत हुए है । आजकल जिधर देखिए उधर खटमलों की
धूम है। इसलिये, सवत् १७८७ के लगभग लिखी गई
आगरे के अलीमुहिमखाँ 'प्रीतम' की 'खटमलगाईसी' नाम
की पुस्तक में से एक छद यहाँ देना मनुचित न होगा।
खटमलों से धवडाकर कवि कहता है-
.
हिंदी ८० - बाघन पै गयो देखि मन में रहे हैं लिपि, साँपन पे गयो तो पताल ठौर, पाई है, गजन पै गयौ धूलि डारत है सीस पर , चैदन पै गयौ काहू दारू न बताई है । जम हहराय हम हरी के निकट गए, हरी मोसों कहौ तेरी मति भूल, छाई है , कोऊ न उपाय मटकत जिन डॉले-सुने , खाट के नगर खटमल की दुहाई है। सो बेचारे कवि को विष्णु भगवान् भी खटमलो से बचने का कोई उपाय न बता सके, उलटा' उससे यह कह दिया कि तेरे मस्तिष्क मे कुछ गडबडी मालूम होती है ! ऐसी दशा में यदि हम लोग बराबर बारहों महीने खटमलों की जान को रोया करें तो अचरज की कौन-सी बात हे ? गुरु गोविंदसिंहजी की कविता वैसी ही है जसे फि गुरु महाराज स्वय थे। उसमें वीरता और निडरपन कूट-कूट- कर भरा हुआ है । कही-कहीं तो पढ़ते समय ऐसा अनुमान होता है, मानो हम ऐसी जगह से निकल रहे हैं जहाँ अभी मार काट हो चुकी है। देखिए, गुरु महाराज ने पारसनाथ- चरित्र में तलवारो से कैसी होली खिलाई है- इहि विधि फाग कृपानन खेले, सोमत ढाल माल - उदमालै मूठ गुलालन सेले । . - 1 हिदी ८१ -- . । जान तुरग मरत पिचकारी सूरन अंग लगावत , निक्सत भोण अधिक बिष उपजत पेसर जान सहायत। भोणत-भरी जटा पति सीमत घनिहि नजारा पनी, मानहुँ परम प्रेम सों डारपो ईगुर लागि रयो। जह-तहें गिरत मए नाना निधि माँगन सन्नु परोए , जानुक खेल धमार पसार क अधिक धमित सोए । गुरु महाराज ने स्वय कितने ही प्रथ लिखे, और करियों को पुरस्कार देकर कितने ही लिसाए । भुपण या गुरु महाराज-सरीखे कारियों की रचनाएँ, हृदय से निकली हुई होने के कारण, मन पर वडा प्रभाव डालती हैं, और टका- पथी कनियों की रचना से बहुत भिन्नता रखती हैं। अब विक्रम की १९वीं शताब्दी का हाल सुनिए । इसमें गुमान, दूलह, भगातराय खीची, सूदन, सहजोबाई, बज- वासीदास, पद्माकर, दीनदयाल गिरि, ग्वाल, महाराजा मानसिंह, महाराजा रघुराजसिंह, सरदार, बाबा रघुनाथदास, ललितकिशोरी, मुरारिदान, लछिराम, बलदेव आदि अनगिनती कवि हो गए हैं जिनमें से कई का समय वीसवीं शताब्दी तक चला गया है। अठारहवीं शताब्दी के कवियों ने जो मार्ग पकड़ लिया था इस शताब्दी के कवियों ने भी अधिक- तर उसी पर चलना उचित समझा । तो भी भक्ति-विषयव रचना भी इस शताब्दी में हुई । सहजोबाई, सुदरकुंवरवाई ८२ हिंदी - व्रजवासीदास, बाबा रघुनाथदास, महाराजा रघुराजसिंह आदि की रचना ऐसी ही है । इस शताब्दी में वीर रस के कहने में सूदन ने सबसे, बाजी मार ली । यह कवि भरतपुर के सस्थापक राजा सूरजमल के यहाँ था।' हमारी राय में इसकी रचना भूपण की रचना में किसी तरह कम नहीं है, केवल परिस्थिति की भिन्नता के कारण कुछ हलकी भले ही दिखलाई देती हो । इस कवि मे बहुत-से सजन अपरिनित है, इसलिये इसके 'सुजान-चरित' नाम के प्रथ में से दो-एक उदाहरण देना अनुचित न होगा । मल्हारराव ने जब सूरजमल पर चढाई की तव का हाल सनिए- (छट की पहली दो पक्तियो मे मल्हारराव की प्रशसा है) हारे देखि हाडा मनमारे कमधुन बस पुरम पसारे पाय मुनत नगारे के, ते पुर जारे कते नृपति नहारे तेई जोरि दक्ष भारे प्रजभूमि पे हँकार के.- बड़े-बड़े राजपूत राजा जिसके डर से थर-थर काँपते थे ऐसा प्रतापी मल्हारराव अनेक नगरों को जलाता और राजें को मारता बडे भारी दल को लेकर जब ब्रजभूमि पर चद आया तव पया इमा- रारे मधुमदन सँवारे बदनेश पार। अन रखवारे निज बरा अवमारे के, हिंदी ३ - होन ललकारे सूर सूरज प्रताप मारे तारे से छिपेंगे सत्र सुमर सितारे के । सितारे के सुभट अर्थात् मराठे वीरों को तारे और सूरज- मल को सूरज बनाफर वीर रस को स्वामिभक्ति के साथ एक आसन पर क्या अच्छा विठलाया है । लडने के लिये जाते समय सूरजमल ने जब अपने को सजाया उस समय का वर्णन कैसा सुदर है-~- एठि नाघ्यो मुकुट ममेटि घुघरारे बार, पुडल चढ़ाए कान फलॅगी सुभट की, जाँघिया जकरिकै अकरि अगराग करि, कटि में लपेटी कमि पेटी पीन पट की, भृगुपति या दाल सपति श्रिया को चिह, सूदन सनाह बनमाल लाल टटकी, कोटिन सुमट की निहारि मत सटकी यों सुदर गोपाल की धरनि मेप मटयो । अपने स्वामी को कैसा श्रीकृष्ण बनाया है। और लीजिए- मेला एक्ला त पठान मुख मेला होत, केने भट मैला है मजाए भुव भग में, नग के से ते तुरकानी मब तग कानी, दग पीनी दिल्ली यो' दुहाई देत बग मैं, - ।
हिंदी
न
-
-
सूदन सराहत सुजान पिरवान गहि,
धायो धार धार वीरताई की उमग में,
दक्खिनी पछेला परि सेला ते अजर खेल,
हेला मारि, गग में रहेला मारे जग में ।
भूपण और सुदन-भूपण एक ऐसे राजा के यहाँ था जो
हिंदुओं का गया हुमा राज, बड़ी भारी विरोधी शक्तियों के
चगुल से, वल-पूर्वक छीनना चाहता था, सदन एक ऐसे
राजा के यहाँ था जिसने मुगल-बादशाहत और इधर-उधर
के गजों के टूटे-फूटे महलों में से, जिनकी रक्षा करने में वे
बादशाह या राजा लोग अशक्त थे, लुट-खसोट और छीना-
झपटी करके वीरता-पूर्वक अपना राज स्थापित किया और
अपने शत्रुओ को हराया था। शिवाजी का काम सारी हिंदू-
जाति के लिये था। सूरजमल का काम अपने ही लिये था।
यही इन दोनों राजों में भेद है । जमे सूरज के पास रहने
से ज्योति अधिक प्रकाशमान होती है, चद्रमा के पास रहने
से उतनी नहीं होती, उसी प्रकार शिवाजा के सवध के कारण
भूपण को जो कीर्ति मिली, वह सूदन को
सूरजमल
के साथ
रहने से न मिल सकी यद्यपि दोनों एक ही विषय के और
एक ही श्रेणी के कवि थे।
इस शताब्दी में पद्माकर भी वडा नामी. कवि हो गया
है। इसने कुछ वीर रस की भी कविता की है। पाकर
हिंदी
सितारा, जयपुर, उदयपुर, गालियर आदि के महाराजों तथा
और भी कितने ही राजों के यहाँ रहा । इसने भक्ति-विषय
पर रचना की है। इसका यह कवित्त बहुत प्रसिद्ध है--
च्याप हु ते विद प्रसाधु हाँ अजामिल लो,
माह ते गुनाही कहो किनमे गिनानोगे ,
स्योरी हो, न मुद्र हा, न फेर पडू की,
नपै गौतमी तिया हो जाप पग धर जाओगे,
राम मो रह्त पदमाकर पुकार तुम
मेरे महापापन यो पार इ न पाओगे,
मूठे ही कलक मुनि सीता ऐसी सती तजी,
साँचा हा क्ली मोहि केमे अपनायागे ।
पद्माकर ने नायिका-भेद पर 'जगद्विनोद' और अलकारों
पर 'पमाभरण' नाम का प्रथ बनाया । और भी कई प्रय बनाए।
इतने उत्तमोत्तम कवियों के होते हुए भी इस शताब्दी की
कविता में यह चमत्कार नहीं दिखलाई देता जो सोलहवीं या
सत्रहवीं शताब्दी की कविता में है । सच तो यह है कि
उस समय में जो रचना हो गई, बस यही हो गई । खड़ी
बोली के नाम से चिढनेवाले आजकल के कुछ लोग कहा
करते हैं कि खड़ी बोली में सर पोर तुलसी को-जैसी रचना
नहीं है। वे यह सोचने का कष्ट नहीं उठाने कि ब्रजभाषा
आर बैसवाडी को कितने सूर और तुलसी प्राप्त हुए हैं।
।
4
८४
हिंदी
।
सूदन सराहत सुजान फिरवान गहि,
धायौ धीर धार वीरताई की उमग मैं,
दक्खिनी पटेला परि ऐलाते जब खेल,
हेला मारि, गग में रहेला मारे जग में ।
भूपण और सुदन-भूषण एक ऐसे राजा के यहाँ था जो
हिंदुओं का गया हुआ राज, बड़ी भारी विरोधी शक्तियों के
चगुल से, बल-पूर्वक छीनना चाहता था , सूदन एक ऐसे
राजा के यहाँ था जिसने मुगल-बादशाहत और इधर-उधर
के गजों के टूटे-फूटे महलों में से, जिनकी रक्षा करने में वे
बादशाह या राजा लोग अशक्त य, लुट-खसोट और छीना-
झपटी करके वीरता-पूर्वक अपना राज स्थापित किया और
अपने शत्रुओ को हराया था । शिवाजी का काम सारी हिंदू-
जाति के लिये था। सूरजमल का काम अपने ही लिये था ।
यही इन दोनों राजों मे भेद है । जसे सूरज के पास रहने
से ज्योति अधिक प्रकाशमान होती है, चंद्रमा के पास रहने
से उतनी नहीं होती, उसी प्रकार शिवाजी के सबध के कारण
भूपण को जो कीर्ति मिली, वह सदन को सूरजमल के साथ
रहने से न मिल सकी, यद्यपि दोनों एक ही नियय के और
एक ही श्रेणी के कवि थे।
इस शताब्दी मे पाकर भी बडा नामी कवि हो गया
है । इसने कुछ वीर रस की भी कविता की है। पद्माकर
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हिंदी था । यह हिंदी में फारसी-अरबी के शब्द खूब मिलाते थे। इन्होंने इतिहास-तिमिर-नाशक, गुटका इत्यादि अनेक पुस्तके लिखी जिनमें से कितनी ही बहुत दिनों तक स्कृतों में पढाई जाती रहीं । प० वशीधर वाजपेयी ने भी कई पुस्तकें इसी ढग की लिखीं । जगह-जगह स्कूलो के खुल जाने के कारण इस समय हिंदी में स्कूली पुस्तके सूत्र लिखी जाने लगी थी। स्वामी दयानदजी का जन्म सनत् १८८१ मे हुमा या । लल्लूनीलाल की तरह आप भी गुजराती ब्राह्मण थे । पहले आपका नाम मूलशकर था । आपने आर्यसमाज की स्थापना की, ओर अनेक पुस्तकें हिंदी में लिखी । आपकी और आपकी समाज की कृपा से हिंदी में वार्मिक साहित्य की- विशेषकर खडन-मडन की पुस्तको की-ख्व वृद्धि हुई । पजाब में आज हिंदी की जो कुछ चर्चा सुन पड़ती है उसका बहुत कुछ श्रेय प्राप ही को है । प्रागरा-निवामी राजा लक्ष्मण- सिंहजी का जन्म सवत् १८८३ मे हुया था । स्फुट रचना के अतिरिक्त आपने रघुपश, शकुतला और मेघदूत के अनुवाद किए । लालूजीलाल के पीछे आगरे की टकसाली भाषा की झलक राजा साहब की ही पुस्तको म दीखती है बीसवीं शताब्दी अभी चल रही है । इसमें हिंदी की बहुत कुछ उन्नति हुई है, और आगे ओर भी होने की आशा है । यह थाशा और भी बलवती हो जाती है जब हम देखते हैं कि - 1 - हिंदी - अस्तु, इस शताब्दी के कवियों में से कई कवि अनूठी बातें कह गए हैं, परतु तो भी शोक के साथ कहना पड़ता है कि ये लकीर के फकीर ये। इन्होंने बात कहने का कोई नया ढग नहीं निकाला । इनका अनूठापन भी हमे तो झूठा जॅचता है। ये लोग गोड़े हुए शृगार ग्स के खेत को ही गोडने में अपनी शक्तियों को स्वाहा कर गए । कितने ही कवि शब्दालकारो के ही फेर में पड़े रह गए । यही बात पाकर के विषय में भी कही जाती है। पर हमारी राय मे यह उस पर पूरी लगती नहीं । इन कवियों की रचनाओं में चमत्कार या चुभन न होने का कारण यह समझ में आता है कि या तो इन्होंने पुरानी ही बातें कही है, और या यदि कभी कुछ नई बात कही भी है तो वही पुराने ढग से । वैसे तो इस समय सभी विषयों पर रचना मिलती है : परतु यह बात वेध- ड़क कही जा सकती है कि दौरदौरा शृगार रस का ही था। इस शताब्दी के गद्य-लेखकों में से लल्लुजीलाल. सदल मिश्र, इशाअल्लाहखाँ और मुशी सदासुखलाल के विषय मे पहले ही कुछ कहा जा चुका है । इनके अतिरिक्त राजा शिवप्रसाद सितारे- । हिंद, महर्पि स्वामी दयानट, राजा लक्ष्मणसिंह आदि और भी कितने ही लैग्वक हो गए है जिनकी रचना का समय । विक्रम की बीसवीं शताब्दी तक चला जाता है । काशी- निवासी राजा शिवपमाती - u 1 - ~ T हिंदी ८७ था । यह हिंदी में फारसी-अरबी के शब्द खूब मिलाते थे। इन्होंने इतिहास-तिमिर-नाशक, गुटका इत्यादि अनेक पुस्तके लिखी जिनमें से कितनी ही बहुत दिनों तक स्कूलों में पढाई जाती रहीं । पं० वशीधर वाजपेयी ने भी कई पुस्तकें इसी ढग की लिखीं । जगह-जगह स्कूलो के खुल जाने के कारण इस समय हिंदी में स्कूली पुस्तकें खूब लिखी जाने लगी थीं। स्वामी दयानदजी का जन्म सरत् १८८१ में हुआ था । लल्लूजीलाल की तरह पाप भी गुजराती ब्राह्मण थे । पहले आपका नाम मूलशकर था । अापने आर्यसमाज की स्थापना की, और अनेक पुस्तके हिंदी में लिखी । आपकी योग आपकी समाज की कृपा से हिंदी में वार्मिक साहित्य की- विशेपकर खडन-मडन की पुस्तको की-खूब वृद्धि हुई । पजाव में आज हिंदी की जो कुछ चर्चा सुन पड़ती है उनका बहुत कुछ श्रेय आप ही फो है । आगरा-निवासी राजा लक्ष्मण- सिंहजी का जन्म सवत् १८८३ में हुआ था। स्फुट रचना के अतिरिक्त आपने रघुरश, शकुतला और मेघदूत के अनुवाद किए । लालूजीलाल के पीछे प्रागरे को टकसाली भाषा की मलक राजा साहन की ही पुस्तको म दीखती है। बीसौं शताब्दी अभी चल रही है । इसमें हिंदी की चुत कुछ उन्नति हुई है, और धागे मार भी होने की प्राशा है। यह आशा और भी बनवत्ती हो जाना है जब हम देखते है कि हिंदी --- । - - । आदरों को ग्रहण करने में आजकल के हिंदी-लेखक से पीछे नहीं रहना चाहते। इस शताब्दी में एक बात बड़े की हुई है । वह यह कि काव्य की भाषा व्रज, वैसवाड़ी चा बुदेलखडी न रहकर खड़ी बोली हो गई है । काव्य- ना के लिये और भाषाओ को दबाकर किसी एक भाषा ऊपर आ जाना ससार के साहित्य में कुछ नई या अनहोनी न नही है। इस खडे जमाने मे खड़ी बोली का, अब तक दबी हुई थी, ऊपर या खडा होना स्वाभाविक है। यो जिनका जी चाहता है वे अब भी पूर्वी, पहाडी हरियाणी भाषा तक में रचना करते हैं , किंतु पद्य-ससार साम्राज्य खडी वोली का ही है। सोलहवीं और सत्रहवीं ताब्दी के कवियों की लकीर पीटने के कारण पिछले नियों की रचना उतनी चित्ताकर्षक नहीं हो सकी, परतु जकल भाषा के साथ भावो मे भी वह परिवर्तन हुआ है जिधर देखिए उधर नई-नई बातें ओर नए-नए ढग दिख- हाई देते है। गद्य और पद्य के प्रसिद्ध स्वर्गीय लेखकों में ० बालकृष्ण भट्ट, प० अनिफादत्त व्यास, भारतेंदु वाबू हरिश्चद्र, ठा० जगन्मोहनमिंह, लाला श्रीनिवासदास, काला- कॉफर के राजा रामपालसिंह तथा रमेशसिंह, शिवसिंह सेंगर, अयोध्याप्रसाद खत्री,प० रुद्रदत्त शर्मा, फ्रेडरिक पिकाट, पं० सुधाकर द्विवेदी, प० रामशकर व्यास, प० प्रतापनारायण , हिंदी - - श्र, बा० बालमुकुद गुप्त, वा० देवकीनदन खत्री, बा० राधाकृष्णदास, वा० रामकृष्ण वर्मा, प० सालाप्रसाद मिश्र, १० रामेश्वर भट्ट,प० बदरीनारायण चौधरी, जानी बिहारीलाल- जी, प० मोहनलाल-विष्णुलाल पड्या, प० चद्रधर गुलेरी, १० मनन द्विवेदी, ५० गोविंदनारायण मिश्र आदि हैं जिन्होंने अनेक मौलिक पुस्तकें लिखकर अथवा पुरानीपुस्तकों के अनुवाद करके हिंदी-साहित्य की जैसी कुछ वृद्धि की है वह आँखों के सामने है । इन लेखको में बाबू हरिश्चद्र सबसे नामी हुए हैं। इन्होंने जहाँ शृगार और कृष्ण-भक्ति की कविता की है, वहाँ देश-भाक्ति और सामाजिक सुधार पर भी बहुत कुछ कहा है। सच पूछिए तो हिंदी-साहित्य के दुर्ग पर नए ढग का झडा पहले पहल इन्हीं ने गादा । अपने समय के लेखकों में वायू हरिश्चद्र राचमुच चद्रमा थे जिनके चारों और बहुत-से लेखक तारों की तरह बैठे दिखलाई देते हैं । खेद है, इन्होंने बहुत थोडी ही अवस्था में ससार छोड़ दिया । इनके और इनके साथियों के ही कारण काशी हिंदी का एक मुख्य स्थान बन गई । खेद है, राजा-रईसों में पर वह साहित्य-प्रेम ना रश । हाँ, सर्वसाधारण में वह बहुत बह गया है जिस अमाण साहित्य सम्मेलन का स्थापित होना और जगह-ज पर नागरी-प्रचारिणी मभागों का बनना है। इन तमा १० हिंदी + काशी की सभा बहुत कुछ काम कर रही है । सम्मेलन का ध्यान प्रचार की ओर अधिक है । इससे भी बड़ा उपकार हुआ है । लेखकों और कवियों की संख्या दिन-दिन बढ़ती ही जाती है। अगरेजी की उच्च शिक्षा पाए हुए लोग भी इस ओर झुक रहे हैं। हर्ष की बात है कि हिंदी में लिखना या बोलना अब फैशन के विरुद्ध नहीं समझा जाता । प्रतीत होता है कि मातृभापा से घृणा करने की हानियों लोगों की समझ मे आ गई है। डॉक्टर सर जॉर्ज प्रियर्सन और रेवरेंड प्रोज- सरीखे विदेशी विद्वानों से हिंदी की बहुत कुछ भलाई हुई है। और आगे भी होने की आशा है। भाजकल की कविता की ओर देखिए तो हमारे यहाँ अपभ्रश काल के पुराने छ्दों ही में नहीं, सस्कृत, फारसी और कुछ दूसरे प्रातो के छदों में भी रचना होती दिखाई देती है। कुछ लोग नए छदा की भी सृष्टि कर रहे है । कविता का प्राण भाव है, अनूठे भाव के विना रचना करना कोरी तुकबदी करना है। व्रजमापा में भावशून्य और समय की गति के विरुद्ध रचना होने लगी थी, इसीलिये खड़ी बोली उसके ऊपर आ गई। यद्यपि पुराने ढर्रे के लोग इस बात से चिढ गए पर तो भी हमें यह कहते हर्प होता है कि खड़ी बोली में अनूठे भावों- वाली रचनाएँ दिखलाई देने लगी हैं। आज 'चटाक चित्त चोरिक कपाट पट्ट' दे जानेवाली नायिका की चिंता कोई , न कि भाषा। --
नहीं करता, आज अपने देश और जाति को जगाने की चिंता
है। नए आदशों के साथ नए भावो, नए ढगो का स्वागत.
किया जा रहा है। विशेषकर ईसवी सन् १९०६-०७ से,
जब स्वदेशी प्राढोलन चला था, इधर विशेष जागृति दिखाई
देती है। पिछले समय में हिंदी के फारसी-अरवी शब्दों से
भरे रूप को बादशाहो और नवाबों ने अपनाया था, जिसके
कारण, हिंदी से अलग रहकर, उमने ख़ब उन्नति की है,
और अब भी करता जा रहा है। हिंदी के बगनर पुराना और अधिक
साहित्य, एकाध द्राविड़ी भाषा को छोडकर, भारत के और
किसी भी प्रात की भाषा में नहीं। हिंदी का यह साहित्य
हिंदुस्तान-भर के ही लिये नहीं, एशिया-भर के लिये गौरव
की वस्तु है। क्योंकि एक पराधीन जाति की लेखनी से
निकला है । रहा आधुनिक या अप-टु-डेट साहित्य, सो
जिस गति से आजकल उसकी वृद्धि हो रही है उसमे श्राशा
होती है कि हमारा यह माहित्य भी किसी और प्रातीय भाषा
के साहित्य से कम न रहेगा । यह शुभ तक्षण है। कई
विश्वविद्यालयों में हिंदी को स्थान मिल गया है,' कुछ में
मिलता जाता है । इससे अंगरेजी पढ़े लिखों का ध्यान अपनी
मातृभाषा की सेवा की पोर और भी खिचेगा, जिससे साहित्य
को और भी वृद्धि होगी। पुराने समय में मुसलमानों ने हिंदी की
बहुत कुछ मेना की है। दो-चार अच्छे लेखक अव भी मौजूद
.
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हैं। परंतु अधिकतर मुसलमान अब हिंदी-द्वेषी ही है । इससे
उन्हें जो कुछ लाभ होगा उसे वही जान सकते है. हम नहीं ।
दूसरे प्रात के लोग भी हिंदी का उतना ही आदर कर रहे हैं
जितना पहले करते थे-भेद इतना ही है कि पहले यह
आदर धार्मिक कारणों से होता था, अब राजनीतिक कारणे
से । सिंध और मदरास तक मे आज हिंदी की चर्चा हो
रही है।
गान-विद्या की कृपा से भी हिंदी का प्रचार और
उसके साहित्य की वृद्धि बहुत कुछ होनी रही है । पहले
कभी यह विद्या केवल हिदुयो के ही हाथ में थी।
वैष्णव सप्रदायो ने इसको बहुत कुछ जीवित रखता ।
जव मुसलमान इस देश में आए तब उन्होंने 'इस क्ला
को सीखा, और इसका प्रचार किया । मुमलमान
बात जाने दीजिए, स्वय बादशाहों और ननावों तक ने हिंदी
में ठुमरियॉ, दादरे प्रादि वनाए है । प्रकवर, सलीम प्रार
शाहजादे खुसरो के बनाए हुए गीत हमने एक बहुत पुगनी,
हाथ की लिखी पोथी मे, एक सजन के पास, देखे है । एक
नामी कत्थक ने एक बार हमसे कहा था कि लखनऊ के नवाब
वाजिदअली शाह को भैरवी की रागिनी सिद्ध थी अर्थात् जिस
“समय ननाव अपने कमरे में बैठकर भैरखी अलापते थे उस
समय सफेद साड़ी पहनें और फूल हाथ मे लिए ( जैसा कि
गया की
,
हिंदी १३ . । सस्कृत की पुरानी पुस्तकों में भैरवी का स्वरूप कहा गया है) एक स्त्री उस कमरे में ताल पर नाचनी हुई दिखलाई दे जाया फरती थी। यह बात भले ही कल्पित हो, परतु इससे यह प्रकट हो जाता है कि नवाबो ने गान-विद्या का कितना आदर किया था। आज भी हमारे मदिरों में ठाकुरजी के सामने मोहम्मदशाह रँगीले, सनद, कदर आदि के बनाए हुए गाने गाए जाते हैं । दूसरी जातियों के लोग भी हिंदी की चीजें बहुत पसद करते है-दूसरे प्रातों के हिंदुओं का तो कहना ही क्या ! मथुरा-वृदावन के मदिरों में दूसरे प्रातों के तीर्थयात्री गाना सुनकर अपना जन्म सफल समझते हैं । सदा से यही होता पाया है कि जिस मक्त को एक वार इसकी हसा लग गई, वह इसी का हो रहा । पुराने समय में बंगाल में 'प्रजलि' में रचना की गई, गुजरात में प्रजभापा और खड़ी बोली में । इसी तरह महाराष्ट्र और मद- राम तक मे भक्त कवियों ने रचनाएँ की । दूसरे प्रांतों की पुरानी रचनाओं में सूर और तुलसी की प्रशसा मिलती है। गुजरात में नरसी महता, हीराचद कानजी, दयाराम आदि ने हिंदी मे बहुत कुछ रचना की है । दयाराम ने तो बिहारी के ढग पर एक सतसई तक लिख डाली है । कोई चार सौ वर्ष पुरानी, गोपालभ नाम के एक मदरासी सज्जन को, रचना की बानगी देखिए- । -
हिंदी
हैं। परंतु अधिकतर मुसलमान अव हिंदी-द्वेपी ही है। इससे
उन्हें जो कुछ लाभ होगा उसे वही जान सकते है, हम नहीं।
दूसरे प्रात के लोग भी हिंदी का उतना ही आदर कर रहे हे
जितना पहले करते थे-भेद इतना ही है कि पहले यह
आदर धार्मिक कारणों से होता था, अब राजनीतिक कारणों
से । सिंध और मदरास तक में आज हिंदी की चर्चा हो
रही है।
-
गान-विद्या की कृपा से भी हिंदी का प्रचार और
उसके साहित्य की वृद्धि बहुत कुछ होती रही है । पहले
कभी यह विद्या केवल हिंदुओ के ही हाथ में थी।
वैष्णव सप्रदायो ने इसको बहुत कुछ जीवित रखा ।
जब मुसलमान इस देश में आए तब उन्होंने इस कला
को सीखा, और इसका प्रचार किया । मुसलमान गवैयों की
बात जाने दीजिए, म्बय बादशाहों और नवाबों तक ने हिंदी
में ठुमरियॉ, दादरे आदि वनाए है । अकबर, सलीम और
शाहजादे खुमरो के बनाए हुए गीत हमने एक बहुत पुरानी,
हाथ की लिखी पोथी मे, एक सज्जन के पास, देखे हैं । एक
नामी कत्थक ने एक बार हमसे कहा था कि लखनऊ के नवाब
वाजिदअली शाह को भैरवी की रागिनी सिद्ध यी अर्थात् जिस
समय ननाव अपने कमरे में बैठकर भैरवी अलापते ये उस
समय सफेद साड़ी पहने और फूल हाथ में लिए (जैसा कि
।
- हिंदी २३ । संस्कृत की पुरानी पुस्तकों में भरवी का स्वरूप कहा गया है ) एक स्त्री उस कमरे में ताल पर नाचनी हुई दिखलाई दे जाया फरती थी । यह बात भले ही कल्पित हो, परतु इससे यह प्रकट हो जाता है कि नवायो ने गान-विद्या का कितना आदर किया था। आज भी हमारे मदिरों में ठाकुरजी के सामने मोहम्मदशाह रँगीले, सनद, कदर आदि के बनाए हुए गाने गाए जाते है । दूसरी जातियों के लोग भी हिंदी की चीजें बहुत पसद करते है-दूसरे प्रातों के हिंदुओं का तो कहना ही क्या । मथुरा-वृदावन के मदिरों में दूसरे प्रातों के तीर्थयानी गाना सुनकर अपना जन्म सफल समझते हैं । सदा से यही होता आया है कि जिस भक्त को एक वार इसकी ही लग गई, वह इसी का हो रहा । पुराने समय में गाल में 'ब्रजबुलि' में रचना की गई, गुजरात में प्रजभाषा और खड़ी बोली में । इसी तरह महाराष्ट्र और मद- राम तक में भक्त कवियों ने रचनाएँ की । दूसरे प्रातों की पुरानी रचनाओं में सूर और तुलसी की प्रशसा मिलती है । गुजरात में नरसी महता, हीराचद कानजी, दयाराम आदि ने | हिंदी में बहुत कुछ रचना की है । दयाराम ने तो विहारी के ढग पर एक सतसई तक लिख डाली है । कोई चार सौ वर्ष पुरानी, गोपालभट्ट नाम के एक मदरासी सज्जन की, रचना की वानगी देखिए- --
हिंदी
,
दिखाई देते ह । हमारे यहाँ दूसरे प्रातों की भाषाओं से
उपन्यासो के अनुवाद यावश्यकता से अधिक हो रहे हैं।
परतु हर्प की बात है कि मौलिक उपन्यास भी लिखे जा रहे
हैं, और अच्छे लिखे जा रहे हैं।
हमारे यहाँ जैसी सुदर मासिक पत्रिकाएँ निकल रही हैं वैसी
एकाध प्रातीय भाषा को छोडकर और किसी में मी नही
निकल रही हैं। कहने का मतलब यह कि जिधर देखिए उधर
उन्नति के चिह्न दिखलाई देते हैं । आशा है, वह समय शीघ्र ही
आवेगा जब ससार की भाषाओं के सामने हमारी हिंदी की
वह प्रतिष्टा होगी जो इतने बड़े देश की राष्ट्रभाषा की होनी
चाहिए । काम हो रहा है, यह सच है परतु अभी बहुत
कुछ करने को वाकी है । आशा है, उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जन
और वे, जिनको ईश्वर ने सूझ दी है, इस ओर विशेष रूप
से ध्यान देंगे, और जो कुछ कमी है उसे पूरा करेंगे ।
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