Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Kadumba
Front matter
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श्री॥
कदम्ब
प्रणेता
आशुफपि ५० जगमोहननाथ अवस्थी साहित्य-मनीपी
प्रकाशक
पुस्तक-भवन,
अनारस
मुद्रक
श्रीनापास अग्रवाल,
प्रकाशक
दिलदासगुप्त,
प्यार पर, पुस्तक-नपन,
बनारस
टाइम टेबुल प्रेस,
बनारस
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ܚܝܚܪ
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आदरणीय रायबहादुर प० श्रीनारायणजी पार्षदी "भीर"
५४. ५, frst-ATY भरमा ए.टी.
है
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-
भूमिका
भारी माय भीवन का पाप है। इसी की RRE
মনুল ৪ টা বাশ খীয়া ভাষা , মে ৬ বি মানা যায়
भारसास से पोसत समाइरा हमा, बद्दी मा पार
. । । J - * कराता है। इसी विचार से भानन्दस्वरूप परमात्मा को ही कवि कहा गया है। इस प्रकार काव्य का उद्देश्य या प्रयोजन केवल भारमानन्द ठहरता है, किन्तु इस ससार में आत्मा का सम्पर्क मनश्चतुष्टय से होने पर उसे मन के कारण उसके सुख दुःख के भी भाव से प्रभावित होना पड़ता है। मन प्रकृति का माया का एक विकार होकर तजेन्य सुख दुखादि का अनुभव किया करता है इसलिये मानसिक सुख को भी उद्देश्य के रूप में लेकर काव्य की रचना की गई है। मानसिक सुख भी काव्य का दूसरा मुख्य प्रयोजन माना गया है। अतएव कहना चाहिये कि काव्य यह रम्य रचना है जिसके द्वारा मानसिक सुरा तथा मान द की प्राप्ति होती है और जिस्से मन की तीनों वृत्तियों या शक्तियों-बोध-वृत्ति, भावना-वृत्ति और इच्छा (काम) वृत्ति को सर्वथा सत्तोप मिल सके। यह भी ठीक है कि इनमें से किसी एक या दो को भी सन्तुष्ट करनेवाली रमणीयार्थक रचना काव्य कही जा सकती है। ऐद्रिक तृष्णाओं की सन्तुष्टि से उत्पन्न मन का स्वस्थ साफल्य-बोध ही सुख है, वह भी दो प्रमुख प्रकार का होता है-प्रथम तो भौतिक-वास्तु-सुख, जो इंद्रियों के विषयों तथा तत्सम्बधी सांसारिक पदार्थों से सम्बध रखता और इसलिये यास तथा केवल ऐदिक सुख कहा जाता है, दूसरा यह है जिसका सम्पध ऐंद्रिक विषयों के फेवल मनोगत भावों से है और इसीलिये जी । मान्तरिक भाव-सम्बधी तथा काल्पनिक है, इसके लिये इन्द्रियों की आवश्यकता नहीं, परन् मन ही, जिसमें समस्त इनियों के मूल तथा सूक्ष्म विषय-सस्कार भाव रूप में रहते हैं इसका सृजन तथा अनुभव करता है। चाहे ऐद्रिक विषय सम्बधी सुसद पदार्थ उपस्थित हो या न हों, कल्पना के द्वारा मन उन सब पदार्थों का अनुभव कर देता है। काव्य इसी कल्पना को उत्तेजित कर मन को ऐद्रिक सुखोत्पादक पदार्थों की भाव रूप में उत्पत्ति कर सुख का सृजन करता है। इसीलिये फरि-सपल और सिद्ध कवि-केवल भाव-पूर्ण शब्दों के द्वारा मन को सुख देने में समर्थ होता है-कहा मी है "कविहिं भरथ-यात्रा "-तुकाकवि के समक्ष भी, जैसे काव्य श्रोताओं और पाठकों के समक्ष- चाहे ऐद्रिक विषय सम्बन्धी पदार्थ हों या न हो वह उनकी भाव रूप में उत्पत्ति अपने भदर करके उनको व्यक्षित करनेवाले तया उमको समूर्त और साकार पनानेवाले प्राब्दों में स्पान्तरित करके काव्य की सृष्टि करता है। इस प्रकार कवि-कल्पना जन्य शन्द बल म्यजित, रुचिराग-रस-रजित, गुण-गठित, सुपठित भाव-मधि का वर विवि है। इसीलिये कवि पद का अर्थ ईश्वर भी है। बल साँचा" । सूक्ष्म दि से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि ससार वास्तव में विधार माग और विधार शब्द से परे तथा पृयक नहीं है। शन्द भौर विचार या भाव एक, कहने के लिये दो है। इसलिये जगत शब्द है, जो उतने ही भाव प्रकट करता है जितने भावों से उसे कोई देखता, सुनता यासमतवा है । अतएप कहना चाहिये कि शन्द रचित काम्य भी यही है जिसे जिस भाप से देखें उसी भाव में यह दिखलाई पड़े। शान्य का सौंदर्य भी यही है जिसे शितोही कट से, गिवने ही बार देखा जाय उतने ही मार यह नया सा होर निसरा हुआ भौर समाकर्षक प्रतीत हो। उत्सुक उत्यसा को प्रत्येक भार वह और मी भाभा उल्लसित कर सके। कान्य की ऐसी संक्षिप्त, मामिक और साकतिक म्यास्या परके रप हम भाग पढ़ते हैं और कुछ थोड़ा सा कयन कवि तथा कविता के सम्पन्ध में भी कर देते है।विशन्दके उप विशिष्टार्थ को छोडकर प्राय हम इस शब्दकाया साधारण अर्य लेते हैं जिसके साथ इस शब्द का प्रयोगसाधारणतया किया जाता है, अर्थात् कवि हम उसे मानते हैं जो रचना-कला-धुशल मनीपी है और जो अपनी प्रतिभा के प्रभाव से ऐसे काम्य जगत की रचना करता है जिसमें पहुंचकर मायुके पाठक या श्रोता का सरस हदय लोकोचरानन्द-सहोदर एक विचित्रकार के नेतरिक सुन की अनुभूति करता हुभा इस गद जगत को भूलकर आत्म विभोर हो जाता है। कास्य विश्व राजन का यह कार्य कवि अपनी उस प्रविभा शक्ति के द्वारा करता - है, जो कल्पना शक्ति के साथ उसे उस भगन्त शफिशाली से प्रास हुई है। इस प्रकार के रचयिताकोनिसापित मावान्तस्विकारक है, प्रकृति प्रदर प्रतिमा प्राप्त वपि करते है, या इसे स्वाभाविक या जन्मजात कवि कहते हैं। ऐसे कवि के लिये पिता की रचना केवल एक कुतूहलझारी कौतुर कौशल है और जिस समय यह चाहता है, किसी भी विषय पर ऐसी रचा पर लेता है, जिसे सहदय समाज स्वभावत पाहता-सराता है। ऐसे फदि की ऐसी प्रतिभा अभ्यास जीत और भ्रमहन नहीं होती। यह भी मारपुष्पहन तथा अन्मान्तर व तपसादिक-सिद सिद्धि सी होती है भयवा यों कहें कि यह उसे उसके मासु-कम प्रसा परमाम प्रसाद के रूप में मिलती है। किन्तु इस प्रतिमा विकास और प्रकाश ये लिये ज्ञानाबुमय की भावपस्ता होती है। यद्यपि उस भनन्त शक्तिशाली उदार इंदर से रचना कार्य के लिये प्रतिमा विक रूस में प्रत्येक मनुष्य को मिलती है, किन्तु मात्रा भेद में पसीना में अनार रहता है। कुछ मनुष्यों में यही प्रतिभा रहते हुए भी मिले भ - .
विखरने के लिये अध्यवसाय, प्रयत्न और श्रम की अपेक्षा करती है। ऐसी प्रतिभा को प्रमाभ्यासोद्दीप्त प्रतिभा कहते हैं। इस प्रकार साधारणतया कवियों के दो मुख्य वर्ग पाए जाते हैं। प्रथम तो स्वाभाविक कवित्व-शक्तिशाली जमजात कवि और दूसरे यनाम्यासकृत श्रमसाध्य कवि । प्रथम प्रकार के कवियों को बहुधा आशुकवि भी कहते हैं, क्योंकि वे बहुत शीन ही स्वभाव. जन्य रचना-क्षमता के कारण कवि होकर ऐसे सिद्ध और प्रसिद्ध से हो जाते हैं कि किसी समय पर किसी भी विषय पर धारावाहिकता के साथ कितने ही अनवरत रूप से ऐसी रचना करते चले जाते हैं जिसमें काव्य के प्राय सभी प्रमुख लक्षण और गुण मिलते हैं। उनको ऐसा करने के लिए पहले कोई विशेष परिश्रम या अभ्यास नहीं करना पड़ता। साथ ही वे सभी रसों, विषयों और चमत्कारों में समान सफलता पाते हैं। द्वितीय श्रेणीवाले कवियों के रस सिद्ध आदि कतिपय भेद होते हैं। भाज जिस कवि का हम परिचय यहाँ- देना चाहते हैं वह प्रथम श्रेणी का आशुकवि है। कहना चाहिये कि वह कविता सिद्ध कवि है। विशेषता यह और भी है कि उसकी स्वाभाविक प्रतिभा को ज्ञाना नुभव से पूरा सहयोग मिल रहा है। इसीलिए कवि-सम्मेलनों में जैसा हमारे पाठकों में से बहुतों ने अनुभव भी किया होगा, उन्हें चकित कर देनेवाली सफलता मिलती है और श्रोता मण्डली उनकी कविता धारा के प्रवाह में निमन्त होकर मन्त्र मुग्ध-सी हुई मोद-मन हो जाती है। कुछ भाशुकवि भी ऐसे हैं जिन्हें शानानुभव का विशेष सहयोग नहीं मिला, वे केवल भपरिष्कृत प्रकृति प्रदत्त प्रतिभाके कारण अविरल कविता-कड़ियाँ अवश्यमेव रचते घरते हैं किन्तु उन रचना लाड़ियों में जवाहर जड़ियों की-सी साहित्य-सुन्दरता और कला-कुशलता बहुत कम दिखाई पड़ती है। भावोत्कर्ष, कोमल-कान्त वाक्य विन्यास, शब्द सगटन सौटव आदि कान्य के उत्कृष्ट गुणों का यदि अभाव नहीं तो बहुत न्यूनप्रभाव रहता है। हाँ छन्दवदता और साधारण विचारावलि अवश्यमेव साधारण जनता के लिए चित्तचकित-कारिणी होती है। प्रस्तुत सग्रह के सुकवि अवस्थी जी में, कहना न होगा, भगवत्कृपया उक्त सभी सरकवि विशेषताएँ अच्छे रूप में मिलती है और उनकी रचनाएँ सुपठित तथा साधारण दोनों श्रेणी के लोगों के लिए सुखदायिनी होती हैं। अर्थात साधारण और उत्कृष्ट दोनों प्रकार की कविता की रचना में उर्ह अभीष्ट सफलता मिली है। अधिक कथन की अब इसलिए विशेष आवश्यकता नहीं कि हिदी जनता इस समय बहुत-कुछ उन्नत और सासमालोचना की भक्ति सम्पन्न 1 हो चुकी है और उसे पथ प्रदर्शक शम्य-गुण दोष चिनी तथा की प्रतिभा परिचायक आलोचों की अधिक मायापकता नहीं। इसीलिए इम फेवल सकेत रूप से दो शब्द कहकर इस समेह की भोर पाटकों का ध्यान भाकर्षित करते हैं और इसकी बालोचना करने का कार्य उही पर छोरते हैं। कहना होगा कि इस प्रकार के कितने ही समा भवस्थी जी प्रस्तुत कर सकते है क्योंकि ये भाशुकवि है। प्राय से सायं तक और साय से प्रात तक यदि कह दिया जाय तो वे भयाघ, रूप,मैं रचनाएँ कर सकते है, धौर घे प्रतिदिन साहों के रूप में प्रकाशित की जा सकती है। यदि सच कहा जाय तो सची करि प्रतिभा यही है और इसी के शोधार पर कवि की परख भी होती । यह अवश्यमेर सत्य है और इसकी भोर हमने पहले संकेत नहीं किया कि भागुकविता में सस्काम्य-क्षमना को अच्छी मात्रा में रहना ही किसी भाशुकवि और भाशुकविता को साहित्यिक क्षेत्र में सफलता भौर सराहना देता है। यहाँ यह कहना भी समीचीन है कि अवस्थी जी की प्रतिभा बहुमुखी है। ये भगभाषा और सदी पोली (उसके उत्कृष्ट साहित्यिक और साधारण दोनों स्पों) में समान सपलासे रचना करते हैं। साथ ही,माचीन और अर्वाचीन दोनों प्रकार की रचना शैलियों में कुशल हैं, यह प्रस्तुत संग्रह से स्पष्ट 'द्रो जायगा । अब तक हि दी के क्षेत्र में केवल यमाभ्यासकृत कवियों की कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं, यह कदाचित एक भाशुकपि की आशुकविताओं का पहला दी समद है, इस विचार से धासुकवि अवर्थी जी को तो नहीं, क्योंकि उनका तो यह एक कौशल कौतुक मात्र है, संग्रहकार और प्रकाशक को हम हार्दिक बधाई अवश्य देते हैं और हिन्दी ससार से आमह करते है कि इन भाशुकविताओं का भवरोन करके हमारे साथ, हमारे प्रिय आशुकवि अवस्थी जी की भाव प्रतिमा की चाहना और सराहा करे । जय प्रकाश महोदय के साथ भपस्यीजी ने हमसे इस पर भूमिका लिम्बने को कहा, तभी हमने उनसे अपना यह विचार प्रकट किया था कि वे अपनी इसी प्रतिमा के द्वारा एक सय काव्य और एक महाकाव्य लिखवा दे,गतो अधिक उपयुक्त हो और हिन्दी सदन में मासु महाकाम्य अथवा खण्डकाव्य के दो नए रस-या जाय। देखें कप-तक यह कार्य सम्पन्न होता है। अन्त में रीत्यानुसार भवस्यीजी को भी उनकी सर्वसम्मानित और सर्प प्रशसित आशु प्रतिभा की इस सुन्दर सफल मागी के लिए हम मुक्तक्छ से शार्दिक बधाई देते हैं। , विद्वान पाकोशी र प्रयाग विश्वविद्यालय रामशंकर शुक्न रसाल' एम ५, 4 ही लिट् दो शब्द काव्य किसे कहते हैं, इसका यथा-तथ्य विवेचन अद्यावधि नहीं हो सका है। इसका कारण यह है कि विद्वानों का बहुधा किसी एक विषय पर मतैक्य बहुत कम होता है। जिसमें जितनी ही प्रखर प्रतिमा होती है वह विषय की उतनी ही गम्भीर गवेषणा एव मार्मिक मीमांसा करता है। फ्लत ज्यों ज्यों काल बीतता गया त्यो त्यों साहित्य शास्त्र के निष्णात पण्डितगण इसकी गम्भीर गवेषणा करते गये और आपतत कान्य शास्त्रके क्षेत्र को जटिल बनाते गये। यों तो 'कवि' एव उसकी रचना 'काव्य' भन्दा के प्रयोग आर्ष साहित्य में भी मिलते हैं, पर उस समय काव्य का रूप, वैसा परिष्कृत न था जैसा कि बाद में देखा गया। आचार्य दण्डी ने छठी शताब्दी में इसे "इष्टार्थ व्यवन्छिन्न पदावली का" नाम दिया । उसके बाद से काव्य की परिभाषा का रूप निखरता हो गया। यहाँ तक कि भीमग्मटाचार्य ने "तददोषौ शब्दार्थी सगुणावनस्कृती पुन कापि" की कसौटी रखी। कालान्तर में श्रीमदानन्द वर्धनाचार्य ने ध्वनि को काव्य की आत्मा मानकर उसी का प्रतिपादन किया ] धाराधराधीश श्रीमद्भोजराज के समय में भी काव्य शास्त्र की विशेष चर्चा रही, और काव्य की परिभाषा में कुछ थोडासा हेर फेर किया गया। चौदहवीं शतान्दी में पिर आचार्यप्रवर श्रीविश्वनाथजी ने "वाक्य रसात्मक काव्यम्" कहकर काव्य की परिभाषा की। उसी काल के श्री जयदेवमी-ने- निर्दोषालक्षणवती सरीतिगुणाभूर्षिता । सोलंकाररसानेक वृतिस्थात् प्राव्य ' नाममा ।। कहकर काव्य की परिभाषा न जाने कितनी जटिल एवं व्यापक कर दी। अन्त में पण्डितराज जगन्नाथ ने काव्य के लिये "रमणीयार्थ प्रतिपादक शब्द काव्य" का प्रतिबंध लगाकर जयदेव की जटिलता से कान्य को पुछ मुक्ति तो अवश्य दी। पर आपकी रमणीयार्थता का क्षेत्र ही इतना विस्तीर्ण हो गया कि उसमें न जाने कितने विषयों का समावेश हो सकता है । कोही का १ . . -- . . 1 7 - 4 निष्कर्ष यह कि ज्यों ज्यों समय बीतता गया त्यों-स्यों काव्य की परिभाषा में यथेष्ट परिवर्तन, परिवर्धन एव संशोधन होते गये, और उसका रूप उत्तरोतर निखरता हो गया। यही कारण है सस्कृत के पूर्ववर्ती कवियों की रचनाभी की अपेक्षा उत्तरवर्ती रचनायें अधिक परिष्कृत हैं। काव्य के विषय में अधिक न लिखकर अब हम ग्याल कृषि की कसौटी पर ही विश्राम करेंगे, क्योंकि हमारे कवि ने कदाचित भीजयदेवजी एव ग्यालजी की कसौटी पर ही अपनी रचनाओं को कसा है। ग्वालजी कहते हैं, 'हाव' 'भाव' दावनिसयुक्त 'उक्ति 'युक्तिन' सौ, नि 'पुनरुकि' आदि दोपनि गये गये। 'माधुरज' 'ओज' 'परसाद' गुनसो पलित, 'गति' अति पाजिवीसे परन ठये ठये । "ग्वाल कवि" 'रस' 'धुनि' 'गुन' 'व्यअना' सौं युक्त, 'भूषन' ललित 'अनुप्रासनि' छये छये । सरसुति मैया, कृपा छत्रनि छवैया, जासौं चित के हरैया क् करित नये नये । करना न होगा कि ग्वालजी की पतलाई हुई सभी साहित्यिक सामग्री श्रीमोहनजी की कविता में उपलब्ध होती है। जब हम काव्य की पूर्व' आचार्य निर्दिष्ट कसौटी पर भीमोहनजी की कविता को कसते हैं तो वह खरी उतरती है। आपसी रचनाओं से काव्य के समी अगों के उदाहरण दिये जा सकते हैं। ध्वनि, रस, माव, अलकार, गुण, धृत्ति, रीति, आदि सभी काव्यगों का यया स्थान मनोरम सन्निवेश प्राप्त है। भीमोहनजी आशुकवि हैं। आशुषवि उसे कहते हैं जो अपनी परम प्रखर प्रतिमा के प्रभाव से तत्काल किसी निर्दिष्ट समस्या अथवा विषय पर रिना किसी पूर्व तैयारी के छन्द मुना सके। हमारे बहुत से, अग्रेजी शिक्षा दीक्षित पावू लोगों को तथा ठात् दो चार पदों को माथापच्ची करके रिसनेवाले तुकडों को यह बात कुछ असत्य सो प्रतीत होगी, परन्तु यह ध्रुव सत्य है, और जिन लोगों को इसमें कोई सन्देह हो, वे प्रयाग में धीमोइननी से मिलकर अपनी शका का निराकरण कर लें। -- - --- म -- * कुछ समय हुआ जब आशुकविता का क्षेत्र समस्या मृति तक ही सीमित या और।इस काव्य क्षेत्र के एक मात्र सम्राट ये कविवर भल्देवप्रसाद जी अवस्थी, आप हमारे ग्राम के निकटवर्ती दासापुर के निवासी थे। आप अपनी दर्पोक्ति में कहा करते थे "दीजिये समस्या तापे कवित बनाऊँ चट, कलम 'रुकै तो कर कलम कराइये।" जिन लोगों ने भी० बलदेवजी को देखा है उन्हें भलीभाँति ज्ञात होगा कि अवस्थीजी पलक मारते ही छन्द चनाते थे। इसी आशुकवित्व के द्वारा उन्होंने धन और मान दोनों ही उपार्जन किये थे, और अवध के तो प्राय सभी राजाओं और ताल्लुकेदारों के दरवारों में उनका निवाध प्रवेश था । अवस्थीजी के दिवगत होने पर उनके मध्यम पुर श्रीपद्मघरजी पर भी आशुकविता का कुछ कुछ, प्रभाव था और आधा थी कि किसी न किसी दिन वे भी अपने पिता के समान ही यशस्वी आशुरवि होंगे पर वे तरुण अवस्था ही में अपने अग्रज कविवर गग के अनुगामी हुये और तर से आशुकविता का क्षेत्र कुछ दिनों तक रुका रहा । पाठको के मनोविनोदाथ इस रिक्त काल के एक और आशुकवि का उल्लेख करना अप्रासगिक न होगा। आपका नाम है श्री 'बच्चूसूर' आप प्रज्ञा चक्षु है, संगीताचार्य होने का भी दम भरते हैं और आशुकवि होने का भी दावा करते हैं। मूर्खानुजन करने में आप बडे ही पटु हैं । समस्या पूर्ति आप भी तत्काल ही करते हैं चाहे वह पूति पिलमुल वेढगी ही क्यों न हो । हरदोई जिले के आप एकमात्र प्रतिनिधि आशुकवि माने जाते हैं। हमको भी एक पार हाबाद में आपकी आशुकविता सुनने का सौभाग्य अथवा दुमाग्य प्राप्त हो चुका है। हम तो सूरदासजी की एक पृति मुनकर अरार रह गये । सवैये के चारो चरणों की प्रत्येक पकि चार मिन भिन दिशाओं से सींचकर लाई हुर प्रतीत होती थी, जिनमें कोर पारस्परिक सामञ्जस्य न या और माय का तो कोई ठिकाना ही न था । इस पर भी जर सूरदासजी ने उक्त पूर्ति सुनाई तो शहापाद फे काव्यानुरागी उनकी भूरि भरे प्रशमा करने लगे। अस्त, श्रीमोहनजी की भाशुकविता के विषय में जैसा हमारा व्यतिगत 1 - - . अनुमय हुआ है उसका दिग्दर्शन करा देना हम उचित समझते हैं। हमने श्री बलदेवप्रसादजी अवस्थी के दान किये हैं, उनकी पीयूष स्यन्दिनी कविता भी सुनी है और एक बार कसमण्डाधीश महाराज सूर्यबक्ससिंह जी के दरबार में उनकी आशुकविता का भी रसास्वादन किया था। उनका आशुकवि होने. का दावा सर्वथा सत्य था। वे अपने काल के सीतापुर जिले के प्रतिनिधि कवि थे । अवस्थीजी मुक्तक काव्यं सुनावे थे। किसी किसी समस्या की एक अथवा दो या कभी कभी तीन पर्तियाँ तक करके सुना दिया करते थे, और इतने ही पर, उनकी भूरि भूरि प्रशता होने लगती थी। पर श्रीमोहनजी उनसे मी आगे बढ गये हैं। 'आप किसी भी विषय पर छन्दों की लडी बाँध सकते हैं। इसके उदाहरण स्वरूप हम यहाँ पर दो एक घटनाओं का उल्लेख करेंगे, जहाँ हमने श्रीमोहननी की आशुकविता के प्रत्यक्ष प्रमाण देखे हैं। यस् १९३९ की बात है कि फरवरी मास में हम लोग ५० श्रीनारायणजी चतुर्वेदी की कया के विवाह में इटावे गये,कवि मण्डली इकही थी । 'पौन छक के लिये बूट छोली जा रही थी कि कविता का प्रसग छिडा। किसी मित्रने कहा कि अच्छा “बूट" पर ही कविता सुनाई जाय । श्री चतुर्वेदीजी का सकेत पाकर मोहनजी ने वीणापाणि की वन्दना करके छद सुनाना आरम्भ किया और लगभग बीस मिनट तक इसी प्रकार वे सवैयों की लडी बाँधते रहे। सन् १९४० में हमलोगों को सुस्तापुर कवि सम्मेलन में जाना पड़ा। सभा मण्डपमं जर अन्य कवि अपनी अपनी रचनायें सुना चुके और भीमोदनजी की बारी आई तो सम्मेलन की अधिष्ठात्री कुडवार की रानी के प्राइवेट सेक्रेटरी श्री जोशीजी ने मोहनजी के सामने एक गुलदस्ता लाकर रख दिया और उस पर कविता सुनाने का अनुरोध किया । फिर क्या था पूर्ववत् सरस्वती का स्मरण फरके हो रद सुनाना आरम्भ किया, जिसे सुनकर समग्र श्रोता मण्डली मन-मुग्ध सी हो गई। हमलोगों को प्रीष्मावकाश में पण्डित श्री पारायणाजी चतुर्वेदी के साथ धिमा एव नैनीताल जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। यहा के कवि सम्मेलनों में कविवर मोहनजी ने जैसे-जैसे नौहर दिखाये, ये वर्णनानीत हैं। श्री मोहनजी मै पवित्र शक्ति एक ईश्वरदत विभूति है। वे भ्यावसायिक कवि नहीं हैं। । .
(1) - शिक्षा प्रभार विभाग म एक अन्छे पद पर नियुक्त है। एक व्यवसाय की कठिनता का जिहें कुछ भी अनुभव है वे ही उसकी व्यस्तता को समझ सकते है। फिर मोहनजी को Camp clerk की हैसियत से दौरे पर भी जाना पड़ता है। पर वहाँ भी उनके नैतिक धम्माचरण में कोई विन नहीं पडने पाता। इमने देखा है कि शिमला एव नैनीताल की सदी में भी भाप सूर्योदय से पहिले ही स्नान कर लिया करते थे, बम हम लोगों को टिहार से मुह निका लने का भी साहस नहीं होता था। मायः हमारी निद्रा उनका स्तोत्र पाठ सुनकर ही मग हुआ करता थी, और आँस सोलते ही बिजली के प्रकाश में,इमें उनके रोरी विदुवलित मुखारविन्द के दा होते थे। श्री मोहनजी के अध्ययन का मी एफ अनूठा ढग है । रात्रि को जब अन्य लोग सो जाते हैं तब आप पढना आरम्भ करते हैं। उनके निजी पुस्त कालय में कविता की upto date पुस्तकों का सग्रह है । ये पुस्तकें उनके पुस्तकालय की शोभा ही नहीं प्रत्युत उनका शन भी बनाती हैं। अलकार, छन्द सम्पधी प्रथों का भी उनका अध्ययन है। हमने इन पुलकों पर उनके Marginal Notes मी देखे हैं। सम्भव है कि मोहनजी की गति इन प्रयों में किसी व्यावसायिक अलंकारिक के समान न हो क्योंकि हरएक आदमी में सेठ कन्हैयालाल पोद्दार या स्व० ५० शालिग्राम साहित्याचार्य जैसी साहित्यक क्षमता तो नहीं हो सकती, पर श्री मोहनजी को रस अलकार का यथेष्ठ शान है, जिसके सुन्दर प्रयोगों के अनन्त उदाहरण उनकी रचनाओं से उकलित किये जा सकते हैं । फिर मोहनजी कवि हैं, आचार्य होने का तो थे दावा नहीं करते । फलत उनकी कवित्व शक्ति की तुलना किसी कवि की रचना से करनी होगी न कि किसी आचार्य से। श्री मोहनजी की स्मरण शक्ति भी बडी ही तीव्र है। हमलोग नैनीताल से लौट रहे थे। साथ में थी कान्तानाथ पाण्डेय काव्यतीय एम० ए० और १० श्यामनारायण देव पुरस्कार विजेता भी थे। श्लोक पाठ का प्रसंग छिडा । श्री। मोहनजी ने माघ के श्लोक सुनाना आरम्भ किये, और समी मार्मिक स्थलों के सुंदर सुन्दर लोक सुनाये, यह क्रम पीलीभीत तक जारी रश 1 कुछ विराम के अनतर कविता पाठ की पारी आई। इस बार श्री मोहनजी ने ब्रजभाषा के , - (१७) - सम्पप्रतिष्ठ कवियों की रचनाओं से ऐसे ऐसे टकसाली इद गाये कि हम लोगों को भाग्य हुआ । परसों तक साथ रहकर जिस यात का अनुभव न हो पाया था उसका अनुभव आन हुआ। सीतापुर से आगे तक मोहनजी की कविता का तांता बंधा रहा। इससे यद्यपि अरसिक यात्रियों को पास कष्ट भी हुआ पर हमलोगों को विशेष आनन्द आया । उसी दिन हमारी समझ में यह पात आई कि मोहनजी के खड़ी बोली के वित्त और सरये इतने सरस एव सष्ट क्यों होते हैं । वास्तव में उसकी पृष्ठ भूमि उनका प्रजभाषा एव संस्कृत पायों एवं गैति म यों का विशाल अध्ययन है। मेरे विचार से मोदनजी वर्तमान कालके सर्वश्रेष्ठ आशुकवि हैं, पर उहैं भभिमान छू तक नहीं गया है। उनका स्वभाव एक बालक के समार सरल है निरालाजी जैसी उनमें अहम्मन्यता नहीं है। पर उनमें स्वाभिमान की मात्रा महुत ही अधिक है । यहाँ पर प्रसगवश एक सस्मरण और लिख देते हैं । श्री चतुर्वेदीजी की आग मानकर हमलोग सुलतानपुर कवि सम्मेलन में गये । कवियों को ठहराने का प्राय एक डिप्टी कलेक्टर को सौंपा गया था। पर उन्होंने कवियों को भोजन कराते समय कुछ ऐसी बात कह दी कि मोहन जी का कोष-कृयान प्रज्वलित हो उठा और उहोंने उन्हे ऐसी धुरी तरह फट- फारना आरम्भ किया कि डिप्टी साहब ने स्वय मोइनजी से बहुत कुछ धमा याचना की तब उनका प्रोधे शान्त हुआ। यो तो श्री मोहनजी को कवि सम्मेलनों में जाने का कोई आमह नहीं है, पर मित्रों का प्रबल अनुरोध एवं श्री चतुर्वेदीजी की आग मानकर उहें जाना हो पडता है। महमूदाबाद जैसे तुच्छ'सम्मेलनों में वे मित्रोंका आप्रद मानकर गये हैं ----पर कवियों के कल्पतरु भी वोरसिंह देव ओड़छाधीश तक के दरबार में कभी प्रार्थी के रूप से नहीं गये। गये तो उनकी कन्या के विवाह में बराती की हैसियत से गये । इसका कारण उनकी निमिता है। एक तो ईश्वर की कृपा से वे यों ही सम्पन्न ब्राह्मण कुल को विमति हैं दूसरे उन्हें पय्याप्त वेतन भी मिलता है, कवि सम्मेलनों में भी उन्हें कहीं कहीं से यथेष्ठ दक्षिणा भी मिल जाया करती है, इसीलिये वे इतने मस्त रहते हैं। उनकी निर्लभता का एक उदाहरण यहाँ देना पुचित न होगा। - (१८) । सुलतानपुर के ट्रेजरी आफिसर उनकी कविता पर मुग्ध होकर ५०) मैंट टेने लगे। मोइनजी बड़े असमजस में पड गये। आग्रह पूर्वक दी हुई भेट को लौटाना लक्ष्मी और व्यक्ति दोनों ही का प्रत्यक्ष अपमान करना था, अत' उन्होंने डिपटी साहब की गौरव रक्षा के लिये उसे न लौटाकर ५०), की मूल्य का महाभारत का एक सेट इण्डियन प्रेस से लेकर एक , माम पुस्तकालय को दाता महोदय के नाम से सौंप दिया। यह है उनकी उदारता और निस्पृहता । मोहनजी सदा निश्चिन्त रहते हैं। हम उनसे शिक्षा प्रसार दफ्तर में भी कई बार ल्खनऊ में मिले हैं और ऐसे समय मिले हैं जब उनके सामने पाइलों के ढेर के ढेर लगे थे। पर ऐसे समय में ही हमने उहे पूर्ववत् मुसकाले और पान खाते ही देखा है। उनके मजुल मुखापर हमने विषाद या चिता की मुद्रा अक्ति होते कभी नहीं देसी। जहॉ श्रीमोहनजी को काव्य क्षेत्र से इतना प्रेम है वहाँ समाचारपत्र क्षेत्र से उहें पूर्ण विराग है, और आत्म विज्ञापन क्षेत्र से तो वे सर्वथा दूर रहते हैं। उहोंने अपनी रचनाओं को पुस्तकाकार छपाने का कभी उद्योग नहीं किया नहीं तो अब तक उनके कइ संग्रह प्रकाशित हो जाते। इस बार न जाने प्रकाशक के किस आग्रह को मायर वे प्रस्तुत रचना को छपाने को तैयार हुये। इण्डियन प्रेस जैसे पूष्व परिचित प्रवाशों को उन्होंने अपनी , कोइ रचना प्रकाशनार्य नहीं दी, पर प्रस्तुत प्रकाशक का स्नेह एव अनुरोध मानकर हो उन्हें अनुग्रहीत किया। प्रस्तुत पुस्तक के नामकरण के सम्बध में भी कुछ कद देना आवश्यक है। कवि ने इसका नाम 'सहित्य सरोज' या काव्य कुसुमाकर' इत्यादि न रखकर कदम्ब' ही क्यों रखा। कवियों की सूझ यही पैनी होती है। मोहनजी ने इस नामकरण में भी कोई रहस्य रस्सा है, जिसकी यथाथता से वे ही परिचित हो सकते हैं। हमारे विचार से तो जिस प्रकार, मुरलीमनोहर 'मोहन को फालिन्दी कू के कदमों से विशेष प्रेम है वैसे ही हमारे मोहन को काव्य कालिन्दी कूल के प्रस्तुवा कदम्ब से प्रेम है ।। 'क्दम्य' समूहको भी कहते हैं । मनुत पुस्तक में श्रीमोहनजी की फुट रचनाओं का प्रकापवर से समूह ही है। अत इस अप से भी यह नाम निात उमीचीन है।. दाप का अर्थ - 1 - . - . । - चरण भी होता है। श्रीराधामाघर के चरण परजों में कवि का अनन्य भाव है । पदाचित दम्प शब्द के इसी व्यापक अर्थ को समझकर कवि ने प्रस्तुत सग्रह का नाम 'कदम्प' रस्सा है। प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमोहनजी की स्फुट रचनाओं का साह है। वतमान युग की प्रेरणा के अनुसार, यह खड़ी बोली में लिपी गई है, पर न जाने क्यों कवि ने इसमें खड़ी बोली के तथोक्त छन्दों का प्रयोग न करके घनाक्षरी एवं सवैये लिसने का भगीरय प्रयत्न किया। यह न तो खण्ड काव्य ही है और न मुच ही है, परतु इन दोनों के अतर्गत अग्रेजी के ढग पर अमूर्त विपयों पर सुट रचना है। कवि ने जनता की रुचि देखकर इस ढग की रचना करने का प्रयास किया। श्रीमोहनजी के समान प्रतिमाशाली कवि के लिये खण्ड काव्य लिस दालना कोइ बही यात न थी, पर वे उसे लिखकर करते हो क्या । भला आजकल की आर्थिक सघर्ष-जनित चिन्ताओं से व्यस्त रहनेवाली जनता खण्ड ।। काव्य अपरा महाकाव्य का स्वागत कैसे करती । न तो उसके पास इसके लिये अवकाश है, न क्षमता है और न अनुराग ही है। प्रस्तुत कविता के प्राय अधिकाश विषय अमृत हैं, अत इसमें प्रका रान्तर से वर्णन की छटा दिखाने का अवकाश तो नहीं है, पर उचकोटि की भाव प्रवणता के समावेश करने का अवसर अवश्य है, और यह बडे सन्तोष की यात है कि कवि ने नसको अपने हाथ से नहीं जाने दिया है। इस रचना में 'कवि ने ब्रजभाषा के पेटेण्ट छन्द घनाक्षरी एव सवैये को लिखने का प्रयास किया है। कहना न शेगा कि ये छन्द ब्रजभाषा ही में सिल्ते हैं, सही बोली की रचना में वैसे सुदर नहीं जमते। यदि किसी प्रकार किसी कवि ने ठोक पीटकर लिख भी लिया तो उसे कृत कार्य होना कठिन हो जाता है । पर प्रत्येक व्यापक नियम का एव अपवाद भी होता है। हमारे कवि को इस प्रयन में पूर्ण रूप से सफलता मिली है। आपकी धनाक्षरियों एव सवैयों में ठाकुर गोपालशरणसिंह एव अनूप शर्मा पे छन्दों का सा ओज, प्रवाह एव स्वारस्य उपल ध होता है, और आपके गीता में श्री० निराला, पन्त एव महादेवी वम्मा के गीतों जैसी त मराा, मागीतात्मकता एव कमनीयता है। हमारे विचार से यदि श्रीमोहाजी गीत काव्य न लिखते तो भी कोई हानि १८ " -- P है 1 . ४ न थी। उहें तो यह क्षेत्र का नूतन कवियों के लिये छोर देना चाहिये या जो छन्द, अलकार और रस के बधनों से सर्वथा मुक्त रहना चाहते हैं । अपने प्रथ की निर्विन समाप्ति के लिये कवि ने पहिले भगवती वीणापाणि वाग्देवता का ध्यान किया है। कवि सरस्वती का वरद पुत्र होता है, अत उसके स्मरण करते ही उसका आना भी स्वाभाविक है। भले ही हमें इन चर्म चक्षुओं से भगवती के प्रत्यक्ष दशन न हो सकें। हमारे गोस्वामी बी इसके पूर्ण रूप से समर्थक हैं। देखिये- भगत हेतु विधि सदन बिहाई । सुमिरत शारद अायत धाई ।। कविवर रक्षाकरजी की रसीली कविता को सुनकर शारदा ने अपनी दीली पड़ी हुई वीणा को सुरीली किया हो या ! । यदि ऐसा न होता तो कवि ऐसे ऐसे सरस प्रसगों की अवतारणा सथा ऐसे ललित छदों की रचना में कैसे समर्थ होते। हमारा कवि नूतनयुग का होते हुऐ मी प्राचीन आदी का पुजारी प्रतीत होता है। अपनी आस्तिस्य युद्धि के कारण ही काव्यक्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिये वह सरस्वती से सहा यता चाहता है । फलत उसी के प्रसाद से कवि की प्राथमिक स्चा होते हुए भी प्रस्तुत मदिरा सवैया सवथा सुन्दर है। कज-मुखी, कर-कज विराजत, बीन सदा छनि छाजति है। लोचन कज, शुभासन कज, सुहस, के बाहन राजति है। छन्द - निवध - मरी कविता, रस सिद्धि तुही नित साजति है। मजुल - मूरति , 'मोहन' के, मन-मन्दिर मध्य विराजति है ।। अपने आराध्य देव का आवाइन करने पह पोडशोपचार से उसकी पूजा करता है । उस पूजन सामग्री में कवि ने आरती का मुख्यरूप से उल्लेख इस प्रकार पिया है " .
1 - - . * . - -- ले वृत-वृन्द की 'दूब ; हरी हरी, थाल उर-स्थल में घर लाया। चाय का चन्दन, अक्षर-अक्षत, काव्य-नदी-जल हूँ भर लाया ॥ भाव - प्रसून, रसादिक - रोचन, केरल सचित मैं कर पाया। माँ प्रतिभा का प्रदीप जगा यह, भारती 'मोहन' लेकर आया । मत्तगयन्द सवैये में रूपक की छटा अपव ही है । इसे पढते ही हमें मधुरा निवासी स्वर्गीय नवनीतजी के कित छन्द का स्मरण आगया, और साथ ही स्मरण आया सोमनाथजी के एक छन्द का जिहें इम पाठकों के मनोविनोदार्थ- यहाँ लिख देते हैं "अच्छत भानद फूल के फूल, सुचाह को चन्दन चोपि चढावन । त्यो “नवनीत जू" लाग की लौंग, उमग सिन्दूर को रग रचावा। धावन धूप सयोग सुगघि ले, केलि कपूर की जोति जरासन | कान्ह, दिवारी की रैनि चले, परसाने मनोज की मच जगावन । -नवनौत चारु निहारि तरैननि की छरि, लाग्यो महा विरहा तन तापन । ये , “ससिनाथ जू" नेह नहे, मग सूरा गिने नहीं परुज पावन । पीत दुकूल में फूलनि ले अलबेली के प्रेम की सिद्धि बढ़ापन। काह दिवारी की रेनि चले, घरसाने मनोज को पत्र जगाउन । -सोमनाथ . - । . 1 यहॉ पर कोई महानुभाव यह 7 समझ बैठें कि श्रीमोहनजी ने अपने छद का भाव श्रीनवनीतजी के उपर्युक् छन्द से सकलित किया है। ऐसा अनुमान भारी भ्रम होगा। हमारे विचार से मोहनजी को कभी नवनीतजी के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त ही नहीं हुआ और न यह छद ही उहे याद है । वास्तव में भाव किसी की व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं है । सरस्वती के सभी पुत्रों का उन पर समानाधिकार रहता है। भावों के इस विभाट वायुमण्डल में जो कवि जितनी ऊँची उडान भरता है वह तो ही अच्छे भाव लाता है, पर उनके प्रकट करने का ढग अवश्य अपना अपना होता है। जिसका भाव व्यक्तीकरण सुदर होता है वे उसी के कहलाते हैं। पर यह सरका काम नहीं है। अपना भाव तो सुदरता पूर्वक व्यक्त करते बनता नहीं, दूसरे भाव को पल्लवित अथवा परिष्कृत करना तो और भी दुष्कर है। हमारे विचार से जो लोग इस प्रयास में सफल होते हैं वस्तुत उनका उद्योग नितान्त सराहनीय है। मौलिक रचना करना नदी के प्रवाह में बहने के समान सरल है, परतु अनुवाद करना था किसी के भाव को लेकर पल्लवित या परिष्कृत करना कुये में तैरने के समान कठिन है, जिसमें कवि को अपनी क्षमता एव प्रतिभा दिखलाने का अवकाश मिलना तो दूर रहा पदपद पर पतित होने की आशका लगी रहती है। अपने आराध्य देव को अनुक्ल पाकर कवि उस्मे कुछ कामना भी करता है, और ऐसा करना उसके लिये सवथा स्वाभाविक है। देखिये वरदे । वर दे, दर दे दुस तू भरदे सव-भाव, दया कर दे। कर दे, कर देकर, पार तुही जय क्रीट शिरोपरि तू घर दे ।। घर दे फिर रान इपान में अम्ब ! • उमग गई मत में भरदे । भर दे फिर भगरतर रिक्तभंडार, घने जी विश्च यही पर दे। दुर्भिल सवैये में वैसी उद्दात भाग्ना अन्तर्निहित है। यह सरस्वती से जय तो चाहता है, पर अपने यश के लिये है, प्रतिद्वदियों को काव्य - . .
4 , - - । ॥ - स क्षेत्र में परास्त करने के लिये नीं। यह भारत के रिक्त भण्डार को फिर से भर दो की, और विश्व को कपि बनाने की प्रार्थना करता है । प्रस्तुत कविता पर्षि का पाथमिक प्रयास है, अत. इसमें यमक अनुप्रास एव सिंहावलोकन का इतना प्रबल आमह है। कविता के लिये हमारे कवि ने जो कसोटी सी है उसपर कसने से बहुतेरी कवितायें वो व्यर्थ हो जायेंगी । पर यह तो स्वतनता का पुनारी है, अब उसकी कसौटी पर कसो ही कवितायें खरी उतरेंगी जिनमें उद्दात राष्ट्रीय भावना अन्तर्निहित हो। और यदि उनमें पूर्व आचार्य निर्दिष्ट काव्य गुण भी पाये जाय तो मणिकाञ्चन सयोग समझना चाहिये। कहना न होगा कि हमारे शनि की रचनाओं में दोनों ही गुण प्रचुरमाना में उपलब्ध हैं, देखिये जिससे न प्रकाशित विश्व हुना, प्रतिभा की प्रभा का प्रभान ही क्या ? जिससे न अजीव सजीव हुए, कविता-सुर्धा का सरसाव ही क्या ? । जिसका न चराचर चेरा हुना, , पह चाहना क्या वह चार ही क्या? जिससे 7 स्वदेश स्थता हुआ वह भागाक्या,यह भाव ही क्या? बात भी यथाथ है। जिस उमेषशालिनी बुद्धि ने अपना चमत्कार न दिखलाया उसकी प्रमानितात नगण्य है। इसी प्रकार जिस कविता से मृतप्राय आत्माओं में नवजीवा सचार न हुआ उसका कोई मूल्य नी । और अन्न मे निष्प स्वरूप उहाँने यहाँ कर कह डाला है कि जिससे देश की सतरता न प्राप्त हुई वह कोइ कविता ही नहीं। वास्तव में श्री मोहनजी के काव्य का यही देश हे ।। 'वीणापाणि की आराधना करने के अननार हमारा कवि महाशक्ति का स्मरण करता है और उपरों प्राथना भी करता है। पर उसकी प्रार्थना में सार्थपरता का कहीं नाम भी नहीं है। उसका हृदय इस समय राष्ट्रीय भावनाओं १८६x. - B- - १ - - , से भरा है, पर तु कवियर भूपण के समान उसी तत्कालीन राजेश्वर को विजय देने की, या किसी विधर्मी विजातीय विपक्षी को विध्वस करने की प्रार्थना नहीं की है, परतु उसकी याचा लोकहितपणा की माना अन्तर्निहित है, और यह देश के व्यापक शत्रु "दे यदैत्य" का विनाश चाहता है। साथ ही साथ वह इस "मावभरी देशतरी को समयसागर को पार" निर्विन पहुँची हुई देसो के लिये सलाहत है। इसके लिये वह भगवती से प्रार्थना करता है कि यह देश के किसी भी वतमान कर्णधार को यथेष्ठ शक्ति प्रदान कर दे । यह कर्णधार चाहे महात्मा गाधी हो, या मि० जिन्ना, या राज . गोपालाचार्य, या सर स्टैपर्ड निप्स या वीर सावरकर में से कोई भी क्यों न हो। कवि के विशाल हृदय में साम्प्रदायिकता की सकीर्णता को छोडकर सपके लिये समान • सम्मान है । देखिये देश तरी भव भार भरी, इस समय सिन्धु में डोले । कर्णधार बन पार लगावो, जग फिर से जय बोले। दल दो दैन्य-दैत्य, कल्याणी, प्रय-ताप मिटाओ। अपने मानदण्ड के अनुसार कविता की कसौटी निर्धारित करके श्रीमोहनजी ने कवि कर्तव्य की भी मीमामा की है, और यही मीमांसा सर्वथा यथार्य भी है। वास्तव में कवि का काय्य वैसा ही गहन है। भारती सुपुत्र की मजुल काव्य- धारा में एक लोकोत्तर शकि अन्तर्निहित रहा करती है, और इसी के बल पर उसमें सदियों से प्रसुप्त देश में नवजीवन : सचार करने एवं राष्ट्रीय भावो को जानन करने की क्षमता रहती है। भारतीय साहित्य में ऐसे राष्ट्र कवियों की फमी नहीं है। चन्द और भूषण तो इस बात के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं । कवि धास्तव में स्वतत्रता का पुजारी होने के कारण सदा परोपकार पारायण ही रहता है। उसके सारे कार्यस्लाप देश के कल्याण के लिये ही शेते हैं । देखिये मकरन्द सरोज-सरों में लुटा, अपने मा से ही खिला करते हैं।
निज जीवन- जीवन-साथ लिये र • : ', सुषमा-सने मत्त हिला करते हैं ।। फिर क्यों यह स्वारथी मूढ मलिन्द, न मानते, दौड मिला करते हैं। कवि-कज, सुगन्ध के ततुओं से, यश चादरें यों ही सिला करते है ।। 1 A. करता है प्रकाश प्रदान जहान को, दीपक-सा जो जला करता है। उस ओर क्यों जीवन का परवाना, लिये परवाना चला करता है? कवितामय विच के आंगन में, जो कलाधर की-सी कला करता है। कवि ऐसा स्वतत्र पुजारी बना, सदा दूसरों का ही भला करता है। सिंच आपसे आप ही आता निलोक, अशोक हो "शोक भगाते हमी है। सदियों के प्रसुप्त प्रदेश में जागृति- भाग सदा सुलगाते ,हमी हैं। भवन्य धन मुक्त बने प्रहरी, जगरोता जहाँ, यहां गाते हमी है। बन 'चन्द' कहीं, कहीं 'भूपण' हो, निज प्राण की बाजी लगाते हमी हैं । कवि अपने देशवाल का प्रतिनिधि होता है, और अपने समय की महत्व पूर्ण घटनाओं को बैग अथवा प्रत्यक्षरूप से अपने मान्य में अपश्य अनि करता है। इसी आन्तय साक्ष्य के आधार पर आगे चलकर आगेनकगण उसके फारफाल का निर्णय करते हैं। फार के सत्याग्रह सग्राम बी उस महत्वपूर्ण भटना का उल्लेख किया है जिसमें महात्मा गाली ने गढ़ी भर नित्ये सत्तामदिरों- J भीमोदनी ने भी आने है . . । . को लेकर धरसाने पर धरना देने के लिये दाण्डी से प्रयाण किया था ।। वीररस की कविता के लिये महात्माजी से बढकर और पौन उत्कृष्टतम आलम्बन मिल सक्ता या । यह तो युग की प्रेरणा ही है। वीरगाथा काल के कार्यों का नायक धीरोदात गुणान्वित कोई न कोई सवशीय क्षनिय ही हुआ करता था। भचि काल की रचनाओं के आलम्पन भगवान रामकृष्ण ही होते थे। इसी बात को ध्यान में रखकर धीमोहनजी ने अपनी कविता का आरम्बा महात्मा गाधी को चुना, और धरसाने के धरने के समय में इस प्रकार निम्नासित ओजस्वी छन्द लिसे साध स्वत्व-साधन का सार सत्याग्रह शरा, साहसी-सुधीर समराङ्गण में पाया है। समता न सम दृष्टि शान्ति-सीख सुधा सी है, सत्य-साधना से शौर्य सबको सिसाया है। शासन-समुद्र से स्वदेश-तरणी 'को सींच, शक्ति से स्वराज्य-कृल-तक शीघ्र लाया है। शत्रु-शिर शक-यज, सेवक समाज का हे । गान्धी ने स्वतंत्रता का सुस' सरसाया है ।। । धरना परत ही घरनि धसकन लागी, ध्यान ,धरि धर्म धुनि धरै मर जाने की। धीर धरि ताखन में, धीर घर धाये संब, धारना धरे हैं धरा धीस सममाने की। ध्येय-धुनि धारी घरकाये घुमधुकी देत, धूम-धाम से ही धाक धारे वीर पाने की। धूरि । धूसरित धाराधर ओ धरातल हैं, धन्य-धन्य गाधी धन्य धूरि धरसाने की ।। रस के अनुकूल गुण, वृति, अलसर एवछन्द का कैसा मनोरम सामञ्जस्य है। भाषा मावों का बराबर साथ देती जाती है। साथ ही साथ गुण एव वृति उपका उत्कप बढा रहे है । अन्तिम छद के सादय्य पर मुग्ध होकर हम तो यहाँ तक कहने को तैयार हैं कि यदि विधि विडम्बना वश मोहनजी की सभी . स्ननाये टप्त हो जाती और केवल ऐसे ही ऐसे दो चार इद उपलब्ध होते, सो भी . है - कवियों की गणना में उनका नाम अनामिका पर आता, और काव्यक्षेत्र में उनके लिये यही स्थान सुरक्षित रहता जो आज है। जप देश के कोने कोने से सत्याग्रह सग्राम की ज्याला धधक रही थी, तय भला भारतीय वीरागणाये कैसे पीछे रह सकती थी। यह कैसे सम्भव था कि पद्मिनी पर लक्ष्मीबाई की, प्रतिनिधियाँ मदासमर यज्ञ से पराङ्गमुख रहतौ । फलत इन चीरप्रम् ललनाओं ने अपने कमल कोमल वक्षस्थल पर दारण दुनालिका के प्रहार सहर्ष सह लिये पस्तु पीछे पैर न डाला | भारतीय ललनायें धन्य हैं। यह कार्य उनके अनुरूप हो था। ऐसी धीरागणाओं का यथोगान करने में मला कवि कैसे सकोच कर सकता था। पल्त उसने अपनी भोजस्थिनी भाषा में इनका यशोगान इस प्रकार किया है। देखिये दासता के बादल को चचला-सी चीड चली, सुखद स्वराज्य की प्रथा सी बन निकली। धोने को स्वदेश की कलक-कालिमा को मानो, भोजमयी वीर-प्रतिमा-सी वन निकली। दल दुष्ट-द्रोहियों के, दुर्ग दुराचारों के भी, दलने को देवी दुरगा सी बन निकली। दिन फेर अब लाएँ, रिद्धि-सिद्धि सब लाएँ, क्योंकि अबलाएँ, सबला वन निकली। मनो सुमनों से तन सुमन तुलाएँ वहीं, शक्ति की कलाएँ ले, बलाएँ वन निकली। चला कहीं चला, प्रजन अचलों में भरे, जालिमों को पन की शिलाएँ बन निकली। पमिनी कहीं तो, लक्ष्मी बाई बन जाती कहीं, दुख-धन फाड ' चपलाएँ बन निकली। पन्य रण-चडी-सी प्रचड अबलाएँ आज, देशद्रोहियों की है चिताए वन निकली। कवि को जहाँ परमारमा विशेष शक्ति देता है वह विशेष दृष्टि मी देता है। जनाधारण जहाँ नैतिक घटना के निरीक्षण अधिक महस नहीं देता यहाँ मावि उन्हीं पटनाओं को अपने टिकोण से देखता है और उनके समय में १ विशेष पात भी माना है। पुष्यतोया भगवती भागीरथी की धारा में कितने ही धर्म प्राण लोग नित्य प्रतिमा फरते हैं और अमापूर्वक पुष्पाजलि भी एमर्पित परवे ६, पर क्या किसी ने धारा में उपेक्षा पूर्वप पहाये हुये इन प्रमों को भी देखा है और उसका कारण सोचो का भी कष्ट उठाया है। इन दुभाग्य पर हमारे कवि को दया तो आह है, पर जब उसने कठिा कवि पन्य पर ध्यान दिया है तब उसकी दया सहानुभूति मात्र रह गई है। देखिये- मोस के लोचन-विदु से फूल, नहा के शृगार सजाया न होता। हार हो प्रेमियों के मिलते उर, भिन्नता-मीति बनाया न होता। या मकरन्द • प्रलोभी सदा, भ्रमरावली को भरमाया न होता । में, प्रसून किसी ने बहाया न होता। बे-परवाह, प्राह - नदी बर-चन्द्र-मरीचियों का धरा छत्र, घरा के नक्षत्र समान रहे। वह शेष न क्षत्र, नक्षत्र बुरे, दिल के दिल में अरमान रहे । तुम लाडिले लाल वन स्थली के, जग में कर के उपमान रहे। अव जीवन - जीवन साथ रहा, कहाँ शान के शेष निशान रहे ? कवि की दृष्टि क्तिनी पैनी है। इन प्रवाहित प्रसूनों ने यास्तव में गुरुतम अपराध किया है । इन्होंने सण्डिता विभावरी के लोचन वारि विदुओं से मान वरखे शृगार किया है, अत्यन्त अभिलाषा पूण दो प्रेमी हृदयों को कभी मिलने नहीं दिया है और सबसे बड़ी विश्वासघात की बात तो यह है कि इहोने मधुलोभी मधुकरों को व्यय ही भ्रम मे टाल रक्खा है। ऐसे घोर अपराध के लिये इन प्रसूनों का बेपरवाही के साथ जल प्रवाह करा देना ही नितात समी ।
। आसन, चीन था। यहाँ पर कवि ने Pootic justice का पूर्णरूप से निवाह किया है । घरकर्मा चाहे जितनी लावण्यमइ सुषमा धारण कर ले पर अन्त में यह भृणा की दृष्टि से ही देखा जाता है। हमारे कवि के हृदय सागरमें राष्ट्रीयता के भावों की उत्ताल तरगे उठती ही रहती हैं, और इन्हीं उदात्तभावों से प्रेरित होकर वह राष्ट्रीय वीरों का यशो गान करता रहता है। देखिये पाके प्रताप-सा पल्लव कटक-ताज ले शाद न होता। में भी शिवाजी - समान कभी, बरबाद तथैवे अपाद न होता ।। शीश सदा सरदार जगबधन से भी अजाद न होता। होता स्वदेश • सनेह न तो, वह जीवन में बरबाद न होता। प्रस्तुत कविता में कवि ने प्रत्यक्षरूप से क्षत्रियकुल कुमुद कलाधर महाराणा प्रताप और मुद्रा कार के द्वारा सरदार भगतसिह एर चन्द्रशेखर आजाद की और सकेत करके अपनी वीर पूजा प्रवृत्ति का परिचय दिया है । देश, जाति एक राष्ट्र के हित पर मर मिटनेवाले पीरों की स्मृति को चिरस्थायी बनाना हो चाहिये। प्रवाहित प्रसून का अभ पतन भी कवि ने बढी मामिक्ता के साथ दिखाया है। मार शरासन से गिरकर यद्यपि वह देववि की धीणापर गिरा, पर यहा रहार भी उससे कोह पुण्यकार्य न हुआ। यहाँ से गिरकर उसने पिर दुमती का मात किया। इसी महापाप जनित का वातिमा को धोने के लिये ही बदतरगों में छिप रहा है। और अन्त में चिर शान्ति दूदने के लिये यह ऐसे प्रशान्त प्रदेश में जा रहार नहाँ पर मुव शान्ति का शासन निवास है, वहाँ पर अनव परान्त पा रहता है, जहाँ पर उसके रधुओं की एर चद्रमा की भी मान्न शी होती, जहाँ शान्ति तथा भ्रान्ति का कहीं नाम भी नहीं है । इस अद मसार यो गदर है। देखिये 4. तुम मार-शरासन से सरके, सरके, सर के बल जा रहे हो। उस नारद-वीरा से या कि गिरे, अज-भामिनी-घातक शा रहे हो। अमवा छिप बीच में बीचियों के, जि-पक-कलक घुला रहे हो। बस,खोजने शान्ति,प्रसून शाति से, प्रात प्रशान्त को जा रहे हो। डती परछाई किसी की नहीं, यसती में बसी सुस-शान्ति वहीं है। घसता है अनत वसत दिगत में, बधुओं की क्षय काति नहीं है। अभिलाप-विहीन है बाटिका जो, शशि की जहाँ धूमिल कान्ति नहीं है । उत्त शात-प्रदेश को जा रहा हूँ, जिसमें कहीं नाति प्रोभान्ति नहीं है। आशा पाश कितना जटिल होता है इसकी हदता को यद्यपि हमारे पूर्ववर्ती कवियों ने भलीभाँति प्रदर्शित किया है पर श्रीमोहनजी ने भी इस पर बहुत ही बाच्छा लिखा है । पहिले हम यहाँ पर सस्कृत कवियों के भावों का उल्लेख करते हैं, और फिर उनकी तुलना श्रीमोहनजी की रचना से करेंगे । पाठक देखेंगे कि इसमें भी कमनीयता है। प्राशावध कुसुमसदृश प्रायशीह्यगानाम् । सद्यपाति प्रएयि हदय विप्रयोगे रूराद्धि || कालिदास - হাবলুণ कथयता सोप्यनुतेदनीयः। प्राणत्राण कथमपि करोत्याथताक्ष्या स एक ॥ भवति भाशा पाशै सलिनवनवे झुर्वीती भारावध ।
A इन महाकवियों के आधा पाश ने अबलाओं के कमल कोगल हदय को वियोग में जिला रस्सा है पर भीमोहनजी के आसपास के खेल देखिये :- प्रीपम-ताप में दीन किसान, तपा करता जिसका लिये भार है। जानते नेत्र - विहीन जिसे निधि, और अपा-अनाथ-अधार है। जीवन-पथ- निराश दुखी - जग मानव का तू सदा उपहार है। आपति - अम्बुधि - जीवन - पोत की, पाशा हमारी बनी पतवार है। फोमल-कामना की कलियाँ चुन, गूंधती प्रेम का तार लगा कर । कीट- कलक लगे न कही, रखती उर-अचल ही में छिपा कर ।। साज सयोग की टोकरी में रखा, फाल ने कितु दिया उलटा कर । पार करेगी मुझे भवा- सिधु से, भासा - सहेली सुमार्ग दिसाकर । कहीं वन्द हो पन्दिया के सँग तु, पर मुक्ति की युक्ति सुझा रही है। जग जीवन - मोह - समस्या कहीं, उलझी उसे सुलझा रही है। सुत से बिछुडे पिता के उर की, कहीं बाडव-यहि बुझा रही है भव-भीर में भूले अभीष्ट उन्हें, यह आशा सुमार्ग सुझा रही है। प्रसगयश कवि ने भाशा की आलेचना भी की है, लोक दी है। आगे पक का गुरुतर उत्तरदायित्व यही है कि गुरु के दोषों और शत्रु के मी गुणों फी प्रशंसा करे । देखिये- + मजु - मयफ कलक लिए, तुम श्राशे । कलक से खाली नहीं। नित पीकर हो तुम में लय विश्व सॅयोग - सुरा मृदु ढाली नहीं । कर तृप्ति हुई किसी की तुमस, तुमने भरी जीवन-प्याली नहीं ? मतवाली हुई दुनिया तुम पे, तुम तो! किसी की मतवाली नहीं ।। वास्तविक बात तो यह है कि ससार की कोई कृति एव कोई भी पौरुषमय निमाण गुण दोष के समवय से वचित नहीं है । जब सिधु जैसे विशाल हृदय पिता का यशस्वी पुत्र वास्तविक फ्लक से मुक्त नहीं है, तो मला आशा थी क्या बात है। आशा की सबसे बडी यात तो यह है कि इस पर सारा ससार तो मतवाला है, पर यह किसी पर मतवाली नहीं है। आँसू शीर्षक कविता भी अपने ठाठ को एक ही है। इस विषय पर यद्यपि श्री. जयशकरमसाद एव हृदयेशजी अच्छे से अच्छा लिख चुके हैं, पर इसके रहते हुए भी हमारे कवि के आँसुओं मे एक अपूर्व स्वारस्य है देखिये- ज्यों कलियों में सुगध सना, शुचि जीवन में सुविकाश छिपा है । ज्यों मधु में छिपी माधुरी है, उसमें छवि-सा मधु-मास छिपा है ॥ एक छिपी, तम में जिस भाँति प्रकाश छिपा है। त्यों इन लोचन आँसू छिपे अरु आँसुओं में इतिहास छिपा है ।। मूक वियोग में जप लाज-लगाम लगी रसना, वन मूस नहीं कुछ बोल सकी। 'अथरों पे कोन के ताले पड़ पर वेदा गद न खोल मकी ।। १
( ५ )
उर-कोप-शनत का वाणी कभी,
सुल के न लगा कुछ मोल सकी।
तत्र प्रभु की ही अनमोल लडी,
उर की छिपी पातें टटोल सकी ।।
और भी वास्तव में अपा महत्व अलग ही रखते हैं। जहाँ लजा की
लगाम लगी शो के कारण पाणी मूस हो जाती है, सोच के कारण सेठों
पर ताले पट जाते हैं, जहाँ वाणी भी नि शक होकर हृदय कोष को अनन्त
मावों का मूल्य रगाने में असमर्थ हो जाती है वहाँ आँसू हृदय के गुप्ततम
रहस्य को समझ लेता है। कैग मार्मिक छद कवि ने कहा है।
भारतीय पर्वो पर भी कवि ने अच्छे-अच्छे छन्द लिसे हैं । यों तो सभी
त्यौहार किसी न किसी महत्वपूर्ण घटना को चिरस्थायी बनाने के लिये मनाये
जाते हैं पर उनमें दशहरा एव दीपमालिका अपना निजी स्थान रखते हैं ।
भीमोहनजी ने रामराज्यवाले दशहरे या चिन नहीं खींचा है। उदोंने वतमान
काल के दीन हीन दशहरे का चित्र अक्षित किया है, जहाँ विषमता का राज्य
है। एक ओर तो किसानों को रूखी सूखी रोटी भी नहीं मिलती और दूसरी
ओर पूजीपति विलासिता से मन है। अर्थ के इस विषम विभाजन पर हमारे
सवि के हृदय में भी क्षोभ उत्पन्न हो उठता है, पर वह रूस जैसी किसी
करणी के करने का उपदेश नहीं देता पर परमात्मा से इसको दूर करने की
प्रार्थना करता है।
कहीं आयु भर, भर पेट है न रूसा अन्न,
रम्भा-मजु-घोपा रही सारी कहीं राहा।
कही दी। पानी के लिये हैं रिलसाते किन्तु,
कहीं तो बरडी का नशा है चढा गहरा ।।
चाहक नजर के, न जर के हैं रचफ भी,
कहीं नजराने के लिये है लगा पहरा।
रक्षक बने हैं हाय ! भक्षक, विषमता है,
दीनों का दशहरा क्या, उनका दशहरा।
दीपावली पर भी आप ने वदा मुदर द का है कि इसमें कपि ने
।
रइसी ठाठ बाँध रखा है। सन्देहालवार फी पुट देकर इसके वर्णन में अपूर्व
सौन्दर्य उपस्थित कर दिया है देखिये
धूर चूर हो के चद्र विसरा मही पै या कि,
हीरक-प्रवालों की ही अवली सजाई है।
मूमि पर माके मुसकाई कमला है या कि,
मेदनी ने माला गज-मोतियों की पाई है ।।
होली अधकार की जली है द्वार-दार या कि,
दीन-जाला माला दीप माला बन आई है।
हो गया दिवाना हेम-कोष का कुपैर के या,
दीपित दिवालों में दिवाली धनि छाई है ।।
ससार की विषमता का भी कवि बडा ही सुदर चित्र खींचा है । लोग
दूसरों की किसी भी गतिविधि का निरीक्षण अपने दृष्टिकोण से करते
है। और उनका मनमाना अर्थ लगाते हैं, जो पास्तविक्ता से कोसों दूर रहता
है। जनता के इस दूपित ष्टिकोण की पटु आलोचना है । देखिये
मोह-मुरा पिगे, कांच के भाव में,
माय ने मणि तोल दिया है।
अगुलियो जग की उठने लगी,
भूल से जो दिल सोल दिया है।
क्यों न यहाँ मन मारे हैं,
मन पा किमने कर मोल दिया है।
फस्ट घो लिया जीपन में,
हँस के किसी से यदि घोल दिया है।
हमारे कार का पोराणिमगन भी कम ही है। प्रस्तुत कविता में गिन
मिन्दर कपायों का समाध किया गया है उनसे उसके पिम्पयन
कापडपटालिये :-
(1) माटिपा में रपुराय का हाय,
पट्टा कि चीरा दाया।
(1) नाय । जिस भारत की भावमयी मूमि पर, भक-भावनाएँ भरने को दिया पहरा । (मकमास) (u) लाखों ललनाओं का सतीत्व हरा जाता वहीं एक के लिये ही जहाँ रण किया गहरा ॥ (मामारत) न, शेष- (17) होता अनग अनग घरा अपने शिर यों घर लेते। (कुमार सम्मव) (7) श्री रघुनाथ भी शंकर-चाप के, तो युग खड न यों कर देते ॥ (वाल्मीकि श्री तुलसी शप काठ प्रमान के, सर्प की रज्जु न यो घर लेते । (गोसाइ) भाश का प्रअन आँख में अजित, आहत प्रेमी न जो कर लेते ।। (1) अज-मामिनी-घातक पा रहे हो-खरा) (a) दल दुष्ट-द्रोहियों के, दुर्ग दुराचारों के भी, दलने को देवी दुरगा सी पन निकली। दिगोपुराण) (vi) जब मजु-मयक कलक लिये, तुम आशे। कलक से खाली नहीं।-(मोमबागपत्र) इस प्रकार की बहुतेरी अन्तर कयामों का समावेश कपि फी सर्व प्राचीन प्रखर प्रतिमा एव पहुशता का परिचायक है जहां भी मोहनजी ने वीररस के सुन्दर छन्द कहे हैं यहां करुण रस के भी मुन्दरतम छन्द कहे हैं। प्रस्तुत छन्द में एक सय विवाहिता विधवा का चित्र अंकित किया गया है । कितना हदयस्पर्शी भाव है इसे पढकर प्रीतम प्रेम • सुहाग • सिन्दूर, अभी भरपूर न जो भर पाई। दर्पण-सा जिसपर मुस देस, सिगार-सुधार न को कर पाई। -- .
(५) हाथ में हाथ धरा जिसका, उसका फिर हाथ न जो धर पाई। । थी उर आशा मिले मर के, मरने पली, किन्तु न जो मर पाई ॥ प्रेम-सुरा चख-प्यालियों में भर, जो नित मजु पिया करती है। कल्पित-सीमित से में, सुख-स्वप्न-समाधि लिया करती है। ढारिक लोचन-वारि के मोतिन, निर्मित हार किया करती है। जीवन की चलि-वेदिका में, तुम्हें देख के श्राशे। जिया करती है ।। जग अपिमायारोदितिदलति रविवज्ञस्यहृदय -उत्तर रामचरित - यहा पर हम फरुणरस के दो छन्द और उद्धृत करते हैं कछू भेद “फनीस" लखान्यो नही गहि मारे ही ताल में चोरी गई। मही मैया विहाल मरी सी परी, यह चूनरी लाल चोरी न गई। पर एतेमे कोउ सखी तह प्राय के, घोय सुभाल की रोरी गई। नहि नेकहू कारन जानि पन्यो, गहि चरी चराक ६ फोरी गई । "स" घर व्याह रच्यो फिरती ललना, सिनिमाके मनौ पट पे परछाई। पुरिहारिन आई लिये चुरिया सहसा सपना उती उठिपाई।
विधवा नवसाल की रोय कयौ,
मोहि फाहे नहीं चुरियो पहिराई।
बडी भोली सी जानि न चोली कछु,
मनिहारिन की असियां भरि आई।
-अशात
अन्त में दम परम पिता परमात्मा से प्रार्थना करते हैं कि वे श्री मोहनजी
की प्रतिमा को घैसा ही उत्तरोत्तर उत्कप प्रदान करते हैं जिससे हमारे कृषि
अपनी सुललित रचनाओं से भारती के भण्डार को भरते रहे और साथ ही साथ
मातृभाषा के गौरव एव हिन्दी के अभिमानी बने रहें। परमात्मा ऐसे उदीय
मान माशुकवि को दीर्घ नीवन प्रदान करे।
सेन्ट्रल ट्रेनिङ्ग स्कूल, भूसी
प्रयाग
श्री हरदयालुसिह,
अभ्यापक
.
दन्या पाणी मेरे द्वारा कहे, उसे, या मित्र लिपि मद कर ले और फिर वा मुझे न दिखा कर, जिससे मैं फिर परिवर्तन न कर सक, छपा दे। यही हुमा भी भौर यह सग्रह भाप लोगों के सम्मुख आ गया। अतएव, इसके समुपस्थित होने का श्रेय, पस्तुत मुझे न होकर, प्रथम तो भगवती भारती को है और फिर मेरे मित्र श्री महाकवि पचनेश जी के सुपुत्र कविवर पं० रामकुमार जी मिर "मानस" को है, जिन्होंने इन रचनाओं को, जिस समय यह मेरी रसनासे निकलीं, सनी से नहीं, समाहीत किया और इनके प्रकाशक महोदय को है जिन्होने श्रीमार्को छान जी के सहयोग से प्रकाशित कर भाप लोगों के सम्मुख उपस्थित किया। मुझे भी इन्हें देख कर कुतूहल और आंशिक सुख होता है। भोषिक इस लिये कि यह कोई कार्य विशेष नहीं हुआ। साहित्य के सदन में कोई रुचिर रत्नावली न भाई, लेकिन मेरा यह ऐसा विचार भी न था। यह यदि मित्रों के रुच्यानुकूल हो गया तो मुझे सतोप ही है। मैं तो इसे के लिये एक साधारण प्रणति ही समझता हूँ। कुल पदे प्रिय मित्रों ने मुझसे यह ग्रह किया है कि मैं इस प्राधा प्रसाद के द्वारा हिन्दी साहित्य सदन में कम से कम एक महाकाम्य, एक खण्डकाव्य, एक गीतकान्य और एक मुकावली रच कर रखें। यह विचार मुझे भी अंधा भौर भाशा है कि निकट भविष्य में ही भाप महानुभावों के सम्मुख, यह विचार कार्य रूप में परिणत होकर भा बायगा। दो शब्द मुझे अपने सुयोग्य आलोचकों से भी कहो है। पहिले तो यह कि प्राय भालोचकों को भालोचना के लिए काव्य की चे पुस्तकें मिलती है, जिहें कवियों ने विचार-पूर्वक लिखा है। ये पुस्तकें उन्हें नहीं मिलती, जिन्ह वाणी के प्रसाद-स्वरूप प्रतिभामाठ सुकवियो ने लिखा नहीं, किन्तु देवी की कृपा से केवल कहा और सुनाया है। इसलिये भालोचकों को इसका व्या रखना चाहिये। किसी के लिये काम्य कोई बड़ी कला, कष्टसाध्यवस्तु तथा प्रयत्न प्राप्त प्रतिभाकी अभिम्याप्ति होगी। मेरे लिए विरचि वल्लभा की कृपा से, यह एक फुतूहल कौतुक की वस्तु है। सम्भव है, कोई इसे अतिशयोकि कहे, किन्तु पह स्पष्ट कथन है। मैं भतिशयोकि जानता ही नहीं। यह भहमन्योकि मी नहीं, क्योंकि मैं अपने लिये नहीं कहता। यह सत्य स्वभावोति है, क्योंकि विद्या की भपिठात्री के लिये कही गई है। अधिक और मैं क्या हा भाखोधक एक जीव ही दूसरा है। जैसे कवि एक दूसरा देवता है मालोचक भी अधिकार रखता है, किन्तु फेवल मनुचर कासा, खो ८ । - ( ) . भपने स्वामी या स्यामिनी की भाषा, उसके भाव, और उसकी रवि आदि के समझने की चेष्टा करता है। उसका कर्तव्य है कि यह सरस्वती के, जो कवियों की रसना पर रहती है, भाव आदि समन्नने का प्रयत्न करे। तम कुर उस पर अपगी भोर से दृष्टिपात करे। कहा जागा हे कि, मालोचक कवि और कान्य का, उत्कषक अथवा अपकर्षक हुआ करता है। होता होगा, हम इससे क्या प्रयोजन ! हम यह समझते हैं कि कवि और काम्य पीणावादिनि की कृपा से सदेव उत्कृष्ट है। उन्हें कौन क्या बना सकता है। यह केवल कल्पना है, दम्भ है। पर्तमान समय में, कुछ नये कवियों ने काम्य को खेल घना डाला है और उनके ऐसा करने से साहित्य-सदन की श्री, हतश्री हो रही है। वाणी को मेश पहुँच रहा है। प्राचीन काव्यकारों पर, इन पछवमाहि पाण्डित्य पूर्ण, प्रास्त कवियों के यशके आकाक्षी नवयुवकों के द्वारा अनर्गल आक्षेप किये जाते हैं। उनसे मेरा यह कहा है कि वे पूज्य प्राचीन कवियों का अपवाद करके यश की इच्छा छोर, सब भोर से मुँह मोद, भगवती से नाता जोड । देखें, घे वस्तुत यशस्वी कवि हो सकेंगे। जैसी वे रचनायें करते हैं, यदि वे शान्त रह कर और कुत्सित प्रलाप न करके, सत्कवियों के विचार उन रचनाओं के सम्बन्ध मे सुनें, तो उन्हें ज्ञात होगा कि ये कविता से कितनी दूर है। यह दूसरी मात्र है कि वे यह मान लें कि जो हम लिखते हैं, गाते हैं, वही कविता है। अगर यह भी है, वो भी गाने के कुछ नियम है। गावें, किन्तु, गावे ये नियमानुसार। मैं तो यही समझता हूँ। जैसा कहा है, "शायरी सेल नहीं जिसको कि लड़का खेले"। श्न नवयुयक करियों ने, बहुत से वाद, अथवा प्रवाद कहें तो ठीक है, उठा कर काम्य के सुसद क्षेत्र में विवाद का बवन्दर उठा रखा है। हम इन वाद पियादों को याद करके, निर्विवाद यह मानते है, कि काम्य वास्तव में पाणीवाद है, और पिना पाणी की सदुपासना के प्राप्त नहीं हो सकता । यह गर्वोक्ति नहीं, गुर स्वभावोधि है, जिस वाद विवाद पर जो कोई कहे, उस पाद पर, उस पाड के सर फयियों के फह सुकने के बाद यहुत अधिक सम्वाद, भनुवाद नहीं, मेरी छाटो प्रतिभा सी पीणापादिनि के कारण आवाद कर सकती है। इसका कदापि भपवाद नहीं हो सकता। एक नहीं, अनेक कवि-सम्मेलनों में, ऐसा विवाद लिय कर निर्विवाद रूप में सिद्ध हो चुका है। मैंने यह इसलिये कहा कि इस समर में अगर इस प्रकार की रचनाओं के देखने वाले भानन्द न पाये तो मेरा दोप नशे में वो पहो कहता है, जो माँ काळाती है।
- भन्स में मुझे अपने उन गुणमाही महानुभावों को धन्यवाद देना है जो वस्तुत सरस्वती सेवक, कवि-काम्य-कमा प्रेमी तमा सक्साहिस्यानुशोलन के मेमी है। सर्व प्रथम भादरणीय काम्य कला-प्रवीण डाक्टर रमाशकरजी शहरसा एम ए,डीलिट ने इस सग्रह की भूमिका लिखने का जो कष्ट उठाया है, उसके लिए मैं उनका इदय से आभारी हूँ। साथ ही मैं अपने स्नेही ठाकुर दलजीतसिह जी राठौर डिप्टी कलेक्टर, ठाकुर जमुनाप्रसाद सिंह जी इनकमटैक्स भाफिसर तथा पं० योगेन्द्रनाथराय का जिहोंने समय समय पर मुझे प्रोत्साहम दिया है, उनझे उस कृपापूर्ण प्रोत्साहन के लिये कृताई। इस संग्रह से यदि भगवती भारती के किसी भी भक को कुछ भानन्द प्राप्त होगा, तो मैं सममगा कि मेरा यह कार्य सार्थक है। साथ ही, भविष्य में माता की आराधना के लिये, और भी कुछ अल काय सुमों से सुसमित एनोपधार के लाने का प्रयत्न करूगा। पिनयायनत- - पसंत पचमी, प्रयाग "मोहन"
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अनुक्रमणिका . ३ ४ ६ ११ 6 २६ १ सरस्वती-स्मरण २ भारती ३ कामना ४ अभिलाषा ५ कविता १ महाशक्ति के प्रति ७ कवि की कविता का महत्व - कवि हैं भारत की देवियों १० विजया दशमी ११ दीपावली १२ प्रवादित प्रसून १३ भाशा १४ कवि की भाशा १५ महात्मा गांधी २६ भार १७ मानव १८ दुनिया १६ घण-भगुरता २० जीवन-चादर २१ मनमोहन पामि दया न रही २२ धाम २३ जगाभो मत २४ सन्देश २५ माया २६ मभिलाषा २७ मुख-दुख २८ मामी से २१ चेतावनी ३. एक गीत--तुमसे मिलूँ की मै कैसे ? ३१ पुछ मुझसे कहने पाये थे! २६ ३२ ३७ १४०
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कदम्ब
५
सरस्वती-स्मरण
कर-कज विराजत,
वीन सदा छवि छाजति है।
शुभासन कज,
सुहस के बाहन राजति है।
लोचन कज,
कविता,
छन्द - निरन्ध - भरी
रस-सिद्धि तुही नित साजति है
मजुल-मूरति 'मोहन
मन-मन्दिर-मध्य विराजति है।
के,
-काव्य-जगत की मेरी पहली कृति
مدوممعمم
دلیج
منكم خيانه
خياشهرها
لوله های
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گرم.
سا
ممممم
عد
مع عمه
هد
مه
कदम्ब
आरती
ले वृत-वृन्द की दूब हरी हरी,
थाल उर-स्थल में घर लाया।
चाव का चन्दन, अक्षर-अक्षत,
काव्य-नदी-जल हूँ भर लाया ।
भाव- प्रसून,
रसादिक-रोचन,
केवल सचित मैं कर पाया ।
माँ। प्रतिभा का प्रदीप जगा यह,
आरती 'मोहन' लेकर आया ।।
तीन
।
--
कामना
वरदे ! वर दे, दर दे दुख तू
भरदे नव-भाव, दया कर दे।
कर दे, कर देकर, पार तुही,
जय-कीट शिरोपरि तू धर दे ।
-
,
घर दे फिर शान कृपान में अम्व!
उमग नई' मन में भरदे।
भर दे फिर भारत-रिक्त-मॅहार,
वने कवि-विश्व यही पर दे॥
+
-we- अभिनापा उर पाच मारक र स्वार पोय करें। R-1 से परमानी नता, मुंगानगर दो सा हम पोय परं।। पांच
कविता
जिससे न प्रकशित विच हुआ ,
प्रतिभा की प्रभा का प्रभाव ही क्या ?
जिससे न अजीव सजीव हुए ,
कविता-सुधा का सरसाव ही क्या ?
-
जिसका न चराचर चेरा हुआ
वह चाहना क्या वह चावही क्या ?
जिससे न स्वदेश स्वतत्र हुआ,
वह भावना क्या, वह भाव ही क्या।
कदम्ब महाशक्ति के प्रति महा शक्ति दे महाशक्ति माँ, फिर से सुप्त जगायो । नव स्फूति दे मुक्ति मूर्ति अब भक्ति - भाव उमगायो । देश-तरी भव-भार-भरी इस , समय सिन्यु में डोले । कर्णधार वन पार लगानो, जग फिर से जय बोले ।। x x ज्ञान मार्ग-शुभ-कर्म-मार्ग वर , भक्ति - मार्ग दरसायो । जागरुकता हो अणु-अणु में, सुधा • धार सरसाओ ॥ दल दो दैन्य-दैत्य, कल्याणी ।, प्रय ताप मिटाओ। अप-क्षालिनी, शान्ति-शालिनी , यह हटाओ ॥ x ग्रन ५ तम - तोम x x फैलानो ॥ शोक-हारिणी, धर्म-धारिणी , भय - निवारिणी आओ। सत्य - शिव - सुन्दरमय अब , वरद - हस्त हम भूलें, भव-चक-चालिनी!, पर तुम यो न भुलायो । विजयसारिणी ! विजय-हिंडोले, हमको पुन झुलानो ॥ x x X X जय ऐश्वर्य-शालिनी माता , विध - पालिनी कार्यकारिणी, लोक-तारिणी जय काली करालिनी माता जगततपरिणी, विभवचारिणी, 'वर ब्रूहि" कह जानी ॥ भव - विहारिणी मुड - मालिनी प्रायो । पात्रो ॥ प्रायो । , सात
कदम्ब
कवि की कविता का महत्व
गीता के अधार में न, मेरु के प्रसार में न,
विश्व - विसतार में न सुरसरि - धार में ।
विद्युत के तार में न, शेप-फुफकार में न,
बाडव - बगार में"न प्रलय - प्रसार में ||
चाप-चक्र-वार में न, शिवा-तलवार में न,
गज की गुहार मे न हरि-अवतार में।
आती है विचार में न, शक्ति क्या भरी है देव ।
भारती-सपूत मजु. तेरी काव्य-धार में ।
4
T
-
कवि
(१)
मकरन्द सरोज - सरों में स्टा,
५ अपने मन से ही खिला करते है।
निज जीवन जीवन-साथ लिये,
सुपमा-सने मत हिला करते है।
फिर क्यों यह स्वारथी मूढ मलिन्द,
न मानते, दोड़ मिला करते है।
कवि-कज, सुगन्ध के तन्तुओं से,
यश-चादरें यो ही सिला करते हैं।
(२)
करता है प्रकाश प्रदान जहान को,
दीपक सा जो “रा करता है।
उस योर क्यों जीवन का परवाना,
लिये परवाना चला करता है ?
कवितामय विश्व के
' जो कलाधर को-मी कल्य करता है।
कवि ऐसा स्वतन्त्र पुजारी बना,
सदा दूसरों का ही भला करता है।
आँगन म,
२
1
-
खिंच आप से आप ही आता त्रिलोक,
अशोक हो शोक भगाते हमी हैं।
सदियों के प्रसुप्त प्रदेश में जागृति-
आग सदा सुलगाते हमीं है ।
भव-बन्धन मुक्त
चने प्रहरी,
जग रोता जहाँ, वहाँ गाते हगी हैं।
वन 'चन्द कहीं, कहीं 'भूपण' हो,
निज प्राण की बाजी लगाते हमी है ।।
A
.
(१)
कवि एक क्ला दिखला दे जहाँ,
वहाँ शीश अनेक झुका करते है।
रवि-चन्द्र विमोहित हो दिन-रात ही,
भाँवरी भूरि भरा करते है ॥
इस विश्व-विमोहिनी वीण-तले ही,
चराचर आके लुफा करते है ।
यह मानना होगा कि वैभर भी,
यहाँ नित्य बना ओ फुका करते हैं ।।
फ६
भारत की देवियाँ
दासता के बादल को चचला-सी चीड चली,
सुखद स्वराज्य की प्रमा सी वन निकली।
धोने को स्वदेश की कलक-कालिमा को मानो,
ओजमयी वीर-प्रतिमा-सी बन निकलीं ॥
दल दुष्ट-द्रोहियो के, दुर्ग दुराचारो के भी,
दल्ने को देवी दुरगा सी बन निकला ।
दिन फेर अब लाएँ, रिद्धि-सिद्धि सन गएँ,
क्योकि जमलाएँ, मालाएँ वन निकला ।।
.
(२)
मनो सुमनों से तन सुमन तुलाएं वही,
शक्ति की कलाएं ले, चलाएँ वन निकली ।
चला कही जचरा, अजल अचलों में भरे,
जालिमों को वज की शिलाएँ वन निकली ।।
पद्मिनी कहीं तो, लक्ष्मीनाई बन जाती कही,
दुख-घन फाड चपलाएँ बन निकला ।
धन्य रण-बडी-सी प्रचडी अपलाएँ आज,
देश-द्रोहियों की है चिंताएँ बन निकली।
कदम्य
विजया दशमी
.
(-१)
आई थी असुर-आतताइयों की सेना जब,
देव-द्विज-वृन्द शीश द्वन्द्व-घटा छाई थी ।
छाई थी निराशा अघ-ओघ के-सु गर्भ ही में,
महारात्रि रावण-निधा की छिपाई । यी ॥
पाई थी शरण अशरण हो विभीषण ने,
सीता-सम्पदा के मिलने की घडी आई थी।
आई थी, यही थी दर्शनीय दशमी की तिथि,
दैत्य-दलने में दीनबन्धु की दुहाई थी।
(२)
कोमल-कलेवर-कपट-परिधान सजे,
बुद्धि में विनाश-तम कैसा घिरा गहरा !
बान्धव-विरोध-क्रोध-अनुरोध-बीड़ा . लिये,
भीषण विभीपणपने का केतु फहरा ॥
भायप भरत का न भारत मही में मूल,
फूट-फूट फूट का विपैला जल छहरा ।
माथ दासता से भारतीयों के झुके है नाय !
खाली हाथ दलित मनावें क्या दशहरा ।
फहीं आयु भर, भर पेट है न रूखा अन्न, रम्भा-मजु-घोपा रहा सारी कहीं लहरा। कहीं दीन पानी के लिये है बिलखाते किन्तु, कहीं तो बरडी का नशा है चढा गहरा ।। चाहक नजर के, न जर के है रचक भी, कहीं नजराने के लिये है लगा पहरा । रक्षक बने हैं हाय ! भक्षक, विपमता है, दीनों का दशहरा क्या, उनका दशहरा ॥ नाय! जिस भारत की भावमयी भूमि पर, भक्त-भावनाएँ भरने को दिया पहरा । राखो ललनाओं का सतीत्व हरा जाता वहीं, एक के लिये ही जहाँ रण किया गहरा ॥ छात्र-तेज-हीन, छत्र-हीन, शस्त्र-हीन वही, जिनका प्रताप-केतु व्योम तक फहरा । श्रावें आप फिर तो मनायेंगे दशहरा भी, काल ने विपत्ति-सिन्धु क्योंकि दिया लहरा ॥ -- Audia- तेरह .
--
-
दीपावली
-
चूर चूर हो के चन्द्र विखरा मही पे या कि,
हीरक-प्रवालों की ही अवली सजाई है।
भूमि पर आके मुसकाई कमला है या कि,
मेदनी ने माला गज-मोतियो की पाई है।
होली अन्धकार की जली है द्वार-द्वार या कि,
दीन-ज्वाल माला दीप माला बन आई है।
हो गया दिवाला हेम-कोप का कुबेर के या,
दीपित-दिवालो में दिवाली छवि छाई है।
--
प्रवाहित प्रश्न
(१)
ओस के लोचन-विन्दु से फूल,
नहा के गार सजाया न होता।
हार हो प्रेमियों के मिलते उर,
भिन्नता-भीति बनाया न होता ॥
मकरन्द - प्रलोभी
सदा,
अमरावली को भरमाया न होता।
प्रवाह-नदी
मे,
प्रसून किसी ने बहाया न होता ॥
या
-
बे- परवाह,
रहे ।
वर चद्र-मरीचियो का धरा छन,
धरा के
नक्षत्र समान
वह शेष न क्षत्र, नक्षत्र बुरे,
दिर के दिल में अरमान रहे ।
तुम लडिले लाल चन-स्थली के,
जग में कवि के उपमान रहे।
अब जीवन जीवन साथ रहा,
यहाँ शान के शेष निशान रहे ।
वसुधा पर रूप-सुधाकर-पुप्प,
तुम्हीं अमरों से उतारे गये।
फिर वृन्त के दोले में दोतित हो,
सिर माली-करी से उतारे गये ॥
शिव-शीश चढे, न मिली क्षण शान्ति,
पुजारी-करों से
उतारे गये।
सरिता में बहाये गये जन, तो,
भव की लहरों से उतारे गये।
!
नल
तुम मार-शरासन से सरके, सरके,
सर के जा रहे हो।
उस नारद-वीण से या कि गिरे,
अज-भामिनि-घातक आ रहे हो।
अथवा छिप पीच में पीचियों के,
निज-पर-कलक धुला रहे हो।
वस, खोजने शान्ति, प्रसून! अशान्ति से,
प्रान्त प्रशान्त को जा रहे हो ।
सोलह
(५)
जन वाटिका में रघुनाथ का हाथ,
वढा निज जीवन दान किया।
जय-माल बना उर-मध्य बसे,
बस जीवन-सगर टान दिया ॥
पहिले कर सीय ने दूत मुझे,
हरि का फिर माल दे मान किया।
जय - माल - विहीन - स्वदेश - दशा,
लखि जीवन - साथ पयान दिया ।
पाके प्रताप-सा पल्लव गासन,
कटक - ताज ले शाद न होता ।
में भी शिवाजी - समान
बरसाद तथैव अबाद न होता ॥
फभी,
शीश सदा सरदार
जग-बन्धन से भी अनाद न होता।
होता स्वदेश - मोह न तो,
पर जीवन में परवाद न होता ॥
है
1
सह
कदम्ब
पडती परछाई किसी की नहीं,
वसती मे वसी सुख-शान्ति वहीं है।
बसता है अनन्त वसन्त दिगन्त में,
वन्धुओं की क्षय कान्ति नहीं है।
अभिलाप-विहीन है वाटिका जो,
शशि की जहाँ धूमिल कान्ति नहीं है ।
उस शान्त-प्रदेश को जा रहा हूँ,
जिसमें कहीं क्रान्ति श्री भ्रान्ति नहीं है ।।
-
नद्यारह
फदव অাসা। (२) निश्चल नाव विरचि के विश्व की, भीति में जो कि अनित्य रही है। आदि से अन्त का मेल मिला, सुर-मानव सगति नित्य गही है।। भाग्य के सीप की मुक्ता अनूपम, सम्बल पन्थ का माने मही है। गर्भ में आके निराशा इस श्राशा महान अनित्य वही है । छिपी, (२) प्रोपम-ताप म दीन किसान, तपा करता जिसका लिये भार है। जानते नेत्र-विहीन जिसे निधि, नोर अपग-अनार-अधार है। जीवन - पन्थ-निराश दुखी-जग- मानन का तू सदा उपहार है। आपति - अम्बुधि-जीवन - पोत की, आशा हमारी बनी पतवार है ।। * TRA-
कदम्ब
(३)
भानु - मयक - मरीचियों
में,
कभी वारिद-बूंद से झुमती आवे ।
फेनिल सागर के उर में कभी
निर्जन कानन लूमती
श्रावे ॥
कटकों से घिरे पाटल में,
अलि की अवली सँग झूमती आवै ।
बेठ कभी
मन - मन्दिर मे,
शशि से शिशु को तुही चूमती आवै ।।
से,
(४)
शेल-शिला शिखरों पर
शिलाजीत के रूप में तु बहती है ।
होके
कुरग - मरीचिका - सी,
मरु-भूमि में मस्त कहा रहती है ।
२
तू तप से तप तापसी के,
उर में नित ही हिम हो बहती है।
मोह में जीव किये अवगुटित,
तू सँग छाया बनी रहती है।
-
कद म्य
भार लिये जिसका तितली,
पनी यावली फेरे दिया करती है।
कोकिला कठ से कूक के कानन,
आप पुकार लिया करती है।
क्यों चकवी भी फटे उर को,
निशि में चुपचाप सिया करती है ?
आशे ! तुही सबके उर साहस,
देकर पार किया करती है।
क्यो मधुपी भी कली-दल की,
ध्वनि-गान में लोरियाँ-सी भरती है ?
क्यों मकडी नया आल ग्छिा हो,
पुजारिनी भाँवरी-सी भरती है ॥
2
क्यों क्न दारे पिपीलिका भी,
नित भूधर-मापरे-सी भरती है।
आश ही मूक उर-स्थल मे,
अनुराग का राग सदा भरती है।
एकांस
.
(७)
जर भाल में पैठी, तिजारती के,
तप जारति । तूही दरिद्रता है।
फिर सैनिक-ढाल में ढालती साहस,
घालती
शत्रु,
विचित्रता है।
-
अरु वैद्य की भेषज में बस के,
नित रोगियों से किये मित्रता है।
गुचि साधु की धूनी में धूलि हुई,
धनि आशे । तुम्हारी पवित्रता है।
(८)
मजु-मयक
कलक लिये,
तुम आशे ! कलक से खाली नहीं।
नित पीकर हो तुम में लय विश्व,
संयोग-सुरा मृदु ढाली नहीं ॥
-
कर तृप्ति हुई किसी की तुमसे,
तुमने भरी जीवन-प्याली नहीं ?
मतवाली हुई दुनिया
तुम तो। किसी की मतवाली नहीं ।
पाइस
कदम्ब
।
.
।
प्रीतम प्रेम
सुहाग - सिदूर,
अभी भरपूर न जो भर पाई ।
दर्पण-सा जिसका
मुख देख,
सिंगार-सुधार न जो कर पाई।।
हाथ मे हाथ धरा जिसमा,
उसका फिर हाथ न जो धर पाई।
थी उर आशा मिले मर के,
मरने चली, किन्तु न जो मर पाई ॥
(१०)
प्रेम-सुरा चख-प्यालियों में 'भर,
जो नित मजु पिया करती है।
करिपत-सीमित जग में,
सुन्व-स्वम-समाधि लिया करती है ।
दारिक लोचन - वारि के मोतिन,
निमित हार किया करती है ।
नीवन की बलि-येदिका में,
तुम्हें टेम्व के आशे । जिया करती है।
कदम्ब
।
कोमल-कामना की कलियाँ चुन,
Dथती प्रेम का तार लगा कर ।
कीट-कलक लगे न
कीं,
रखती उर-अचल ही में छिपा कर ।
साज सयोग की टोकरी में रखा,
काल ने कितु दिया उलटा कर।
पार करेगी मुझे भव-सिंधु से,
आशा-सहेली
सुमार्ग दिखाकर ॥ ,
(१२)
कहीं बन्द हो बन्दियों के सँग तू,
दर मुक्ति की युक्ति सुझा रही है।
जग-जीवन - मोह - समस्या कही,
उलझी है उसे सुलझा रही है।
मुत से बिछुडे पिता के र की,
कहाँ बाडव-बहि बुझा रही है
भव-भीर में भूले अभीष्ट उहें,
यह आशा सुमार्ग सुझा रही है।
चौबीस
-- (१३) होता अनग अनग न, शेष- धरा अपने शिर यो घर लेते । श्री रघुनाथ भी शकर-चाप के, तो युग खड न यो कर देते ।। श्री तुलसी शव काठ प्रमान के, सर्प की रजु न यो घर लेते। , आश का अञ्जन आँख में अजित, आहत प्रेमी न जो कर लेते ॥ । - women ५ पजीभ
क ६ म्ब
कवि की आशा
कल्पना जाह्नवी सी कवि के,
उर-स्रोत ही से अविराम बहा कर ।
विश्व
नहाया
करे जिसमें,
अगणादि के पातक्-पुज दहा कर ॥
.
दे अमरत्व
हितैपियों को,
फिर भक्ति-समुद्र में शान्ति ल्हा कर ।
आशे । हमारी ' हमारे लिये,
इसी रूप में साथ हमारे रहा कर ॥
महात्मा गान्धी
,
1
' साध स्वत्व-साधन का सार सत्याग्रह-शस्त्र,
साहसी-सुधीर समराङ्गण में आया है।
समता न सम दृष्टि शान्ति-सीख सुधा-सी है,
सत्य-साधना से शोर्य सबको सिखाया है ।।
शासन-समुद्र से स्वदेश-तरणी को खींच,
शक्ति से स्वराज्य-कूल-तक शीघ्र लाया है।
शत्रु-शिर-शक-वज्र, सेवक समाज का है,
गान्धी ने स्वतन्त्रता का सुख सरसाया है ।।
.
सुख सरसात सूल-सम सर सत्रुन को,
सानी सुर-राज सिरताज सन जानते ।
मुर-वर सरवर सपने न करि सके,
सरदार सर दार सगर मै मानते ॥
सासन मै सम सेर समसेर-हीन सूर,
सोमन के सोपन-करन पहिचानते ।
साका सब भूमि में सनाका सब देश साधे,
सान्तिमूर्ति गान्धी को देवावतार मानते ॥
सचाइस
.
-
मन्द होत मुकता मतगन के मस्तकन,
चारु मुख-चन्द्र की मरीचिका निहारिक।
मार-सान्ति मारते महान मार मारते जो,
मर्म-एकता'का मत्र मजुल बिचारिक ।
मोहनाढ-मर्दन, महातमा महान मजु,
अरि-मान मोचे मित्र सम तेज धारिकै ।
मोहन न मोहन से कम मनमोहन में,
मानो महाभारत मचाइयो सँभारिकै ।
.
।
धरना धरत ही धरनि धसकन लागी,
ध्यान धरि धर्म-धुनि धरे मर जाने की।
धीर धरि ताखन में, धीर धर धाये सन,
धारना घरे हैं धरा धीस समझाने की ॥
ध्येय-धुनि धारी धरकाये धुकधुकी देत,
धूम-धाम से ही धाक धारे बीर बाने की।
धूरि - धूसरित धाराधर औ धरा-तल
हैं,
धन्य-धन्य गान्धी धन्य धूरि धरसाने की ॥
अठाइस
प्रात
ज्यों कलियों में सुगन्ध सना,
शुचि जीवन में सुविकाश छिपा है।
ज्यों मधु में छिपी माधुरी है,
उसमे छवि-सा मधु-मास छिपा है।
मूक वियोग में इक छिपी,
तम में जिस भाँति प्रकाश लिया है।
त्यों इन लोचन आँसू छिपे,
अरु आँसुओं में इतिहास छिपा है।
(२)
लाज-लगाम लगी रसना,
बन भूक नहीं कुछ बोल सकी।
अधरों पै संकोच के ताले पडे,
अरु वेदना मैद न खोल सकी।
उर-कोप-अनन्त का वाणी कभी,
खुल के न लगा कुछ मोल सकी।
तर अनु की ही अनमोल लड़ी,
उर की छिपी बातें टटोल सकी।
--
उन्तीस
F
मानव
(१)
हर्प - विपाद को नाव
बना,
पतवार बिना वहता ही रहा है।
चाह की दाह में आह बिना,
नित यातनाएँ सहता ही रहा है।
काल - प्रवाह
को जाना नहीं,
तन का तरु भी ढहता ही रहा है।
जान सका अपने को नहीं,
अपना-अपना कहता ही रहा है ।।
--
-
(२)
बन्धन - मुक्ति न निर्मलता मिली,
सत्य के साँचे नहीं ढल पाया।
मानव
चाहना मे जग की,
जलता रहा तो भी नहीं जल पाया ।।
वैभव
जो
कलपाता रहा,
कल पाया परन्तु नहीं कल पाया।
मोह - वन - खली मे भटवा नर,
जीवन - पन्थ नहीं चल पाया।
तीस
-
दुनिया
-
7
मोह-सुरा पिये, काँच के भाव में,
मानव ने मणि तोल दिया है।
अगुलियाँ जग की उठने लगी,
भूल से जो दिल खोल दिया है।
क्यों न यहाँ मन मारे हैं,
मन का किसने का मोल दिया है
कटक वो लिया जीवन
हँस के किसी से यदि बोल दिया है।
इकतीस
सण-भंगुरता
आदि में अन्त, छिपा दुख में सुख,
भूत भविष्य बना करता है ।
राग - विराग में, आह में गान,
कहीं तम तेज धना करता है ।
पाप में पुण्य, विकास में हास का,
नित्य 'वितान तना
करता है।
मानव यों ही बना - विगडा,
जग-जाल में खेल धना करता है ।।
,
(२)
सर-ताज बने जो रहे जग में,
जिनके बडे ठान जाये गये ।
वस तत्व-महत्व प्रमाण के जन्म औ,
मृत्यु के पर्व मनाये गये ।
वर मानव मानवों के स्वर से,
सुरों की गणना में गिनाये गये ।
कत्र अन्त में जान सका उन्हें कोई,
मिटे कहाँ, कैसे बनाये गये ।
पत्तीस
क्यो क्षण-मगुर से जग में,
अभिमान में ऐसे हुजूमते जाते।
नित्य ही आशा-धनावली के,
कल कल्पित बूंद को चूमते जाते ।।
मोह के मजुल तत्र में आ,
परतत्र बने पर झूमते जाते।
काल कुचक्री के चक्कर मे है,
कुम्हार के चक्र से घूमते जाते ॥
(४)
सरिता-सुख धार में मान की नौका,
लिये कोई गोते लगाते गये।
कुछ स्वार्थ-शिला से कभी टकरा,
जग जीवन में उमगाते गये।
निज डाँड-कुबुद्धि से नीर-विवेक,
कोई खुद दूर भगाते गये।
जब डूर चले तब ऊन ही क्या,
जो अथाह में थाह लगाते गये।।
तेंतीस
(५)
शान्ति न पा सका कोई यहाँ,
जितने भी गये दुख झेले चले गये।
धूप ओ छोह में दीन-धनी,
जग प्रांगण में खुल खेले चले गये ।
,
जान न मुक्ति विधान बना सके,
सैक्डों ही, गुरु-चेले चले गये ।
केवल नेकी-बदी' यहाँ छोड के,
मेल मिलाये अकेले चले गये ।।
कदम्ब
जीवन-चादर
(१)
सबने जीवन-चादर अपनी आप यहाँ कुन डाली।
ज्यों उपवन की खुद ही छोटे माली डाली-डाली ॥
लगा दिये निर्बल स्वासो के सुन्दर ताने-बाने ।
कर्म-यन्त्र से कसता जाता फिर भी तू दीवाने ॥
पश्चात्ताप-आँसुओं से कर कोना-कोना गीला ।
माया-माडी के छोटी से करके उसे सजीला ॥
ओढ चला इस नघर जग में ओ। मतवाले पापी।
सुनने से पहिले काया से चादर कभी न नापी ।
इधर दॉकता खींच, उधर खुलती जाती है काया ।
जिसने ढंकना चाहा सब तन, नम उसी को पाया ।।
अपनी चादर अपने हाथी क्यो छोटी पर डाली।
निज हाथो से ही निज घर में कसे आग लगा ली।
पंतीस
कदम्य
(४)
है झीनो छोटी फिर भी तू इसमें छिपने आया ।
जग-क्ल्मप-सम्पन कहाँ छिप सकती कालो-काया ॥
अब तो खुला भविष्य जिसे तू बन्द यहाँ कर लाया ।
नेकी ओर बदी का केवल शेष रह गया साया ॥
(५)
इस चादर का छोड़ भरोमा खींच न, फट जायेगी।
तेरी करणी-कण की ढेरी । यही छिटक जायेगी।
फाड चुका खुद जिस जीवन-चादर का कोना-कोना ।
जो अपना है नहीं भला क्या उसका रोना रोना ।
छोडो, इस नधर चादर को भक्ति-वितान तना लो।
माया-हीन जगत अपना कवि तुम एकान्त बना लो ।।
वहीं चिता चिर-चिन्ताओं की तुम बस एक बना दो।
इस जीवन-चादर का घर-घर गीत अतीत सुना दो॥
-आलइदिया रेडियो स्टेशन, लसनऊ से पटिन
७-१०-३७
छत्तीस
4
मनमोहन गादिया न रही।
शेर मा पर पानी
in दा रहो !
पाने । कमाएकर दो।
ने रिक्षार बदा।
पद नमी दामादो।
मागोदा याहि दया रही।
मुख ही सुख या घर-कानन में,
मुरली-ध्वनि कानन कानन में,
नम नाप सर्के वल बामन में,
वसता वरदान सुआनन में,
यह भारत है अब क्या न वही ।
मामोहन याकि दया न रही?
वर हम-लता सम कामिनियाँ,
तर पूछ पता गजगामिनियाँ,
भरता भ्रमरी ब्रज-भामिनियाँ,
रह नाय कहाँ दिन-यामिनियाँ ।
जननी-जन है अब क्या न रही।
मनमोहन याकि दया न रही।
शुचि गागरियाँ दधि-क्षीर-भरी,
नव नागरियाँ पर - पीर - भरा,
मिलता नवनीत-पुनीत नहीं,
सुनते वह गीत-अतीत नहीं,
हम वे न सही, तुम क्या न वही ।
मनमोहन याकि दया न रही।
कदम्ब
1
गत गोरव ही उर चीर रहा,
कब द्रोपदी का वह चोर रहा,
वह चोर न तो वह चीर रहा,
वही उर-चीर रहा,
सस्ता यह है फिर क्या नही।
मनमोहन याकि त्या न रही ।
अर शेष
अवतार धरो, मत देर करो,
जन - धेनु पुकारते, कान करो,
रविजा-रज की कुछ राज का
महि-भार हरो, पतबार तो
मुरली बुनि दी र क्या कमी।
ननेहन पाकि दया न रही।
-Raat writrarent
~
-
-
+
स
ग्राम
१
.
हे। स्वाभिमान-सकेत ग्राम !,
आडम्बर • अम्बर - हीन सदा,
कोपीन - दीनता - दिव्य पार,
कण-कण में ही प्रतिविम्बित है,
प्राचीन - सभ्यता - चिह्न - सार ।
तुम श्रमिकों के पुण्य-स्थल हो,
एकान्त बसे शोभा ललाम,
तुम ग्राम ! राम के प्यारे हो,
तुमको है प्यारे सदा राम ।
है छिपे यहीं नयनाभिराम,
हे स्वाभिमान - सकेत । ग्राम !
-
"
चालिस
भव्य
५
(२)
यमुना के ललित निज वही,
गमा-सरयू के
घाट,
हो चुकी अवधि, हो अवध कहाँ,
हूँढे अपने गत टाठ - चाट !
है सस्स-श्यामला मही वहीं,
खोया सोया गोरव ललान,
हे देव । बताओ तुम्ही मला,
किम भाँति सजा प्राम-धाम |
लाओ फिर त्रेता और राम ।
हे स्वाभिमान - सकेत ! प्राम !
-
-
३
है गोकुल * पर गोपाल नहीं,
गलियाँ पालिनियाँ वही घेनु,
है बहुत : वेसुरी वासुरियाँ,
नहि मोन की मोहनी बेनु ।
ले मही पूछती बालिनियाँ,
होती' चिलम्ब, है वहाँ श्याम ।
घर-घर जन यहाँ सुदामा है,
सकोच फौन तर मला श्याम ||
जब दोनों के तुम दया-धाम,
है ! स्वाभिमान - सकेत १ ग्राम ।
इकतालिस
६
(४)
तेरे अतीत के गीत अभी,
गाता है बुद्ध-चरित्र देख,
मम भी अपने उर खोल खडे,
आघात दिखाते शिला लेख ।।
वह भम-भाग-चित्तोड खडा,
राणा प्रताप का लिये नाम ।
हो स्वतत्रता की शुचि समाधि,
तुम वीरों के बलिदान धाम ।
तुम वीराने पर, स्वर्ग-धाम,
है। स्वाभिमान - सकेत ग्राम !
तुलसी - कबीर - श्री सूर सभी,
हैं यहीं किया करते विनोद,
सारल्य-शान्ति गलियों-गलियों,
देता फेरी घर-घर प्रमोद ।
स्वणिम-प्रभात ले कर ऊपा,
है यहीं लिया करती विराम,.
जन-मोर नचाने दुखियों के,
आ जाते है झुक मेघ श्याम ॥
तुम हो प्रमाण तुमको प्रणाम ।
हे स्वाभिमान - सकेत ग्राम !
ययालिस
कद व H - नूतन परिवर्तन ऋतुओं का, नर्तन - वैषम्य - अकाल काल, थे कौन पूछता कौन आज, हे कर-काल की यही चाल। किस्मत का प्याला तोड़ चुके, मर्यादा की हम तो लगाम, अब बहुत हो चुका आ जाओ, फिर माम माम धनश्याम-राम | हा उजड़ गये वे भन्य धाम, है, स्वाभिमान - सकेत ग्राम । . है. यह सजीव-कसाल किन्तु, गाते हैं अपना अलग राग, यह पूर्व भीम गाँवो के है, इनमें न जगी। अनुराग-आग । इनकी हो नाश अविद्या तो, लक्ष्मी नाचेगी धाम • धाम, खेतों-खलियानो में चुपके, छेड़ेंगे यशी मधुर श्याम ॥ भूलो न हमें अब व्या-धाम । हे स्वाभिमान - सकेत प्राम । . . - तेतालित है
कदम्ब
(८)
हे । वर्तमान ! तुम भूत बनो,
यह तम-सागर हो जाय धूर,
भाई - भाई का द्वेष मिटे,
वैभव भारत में भरे भूर ।
हों सत्य कहानी पुन सभी,
सीता - सावित्री घाम धाम,
दुख-सिन्धु नाथ ! हम तैर चुके,
तव-पग-समीप अब लें विराम ।
बन जाय काम, हो जाय-नाम,
हे स्वाभिमान - सकेत 'ग्राम।
'प्रज्ज्वलित - प्रभाकर
होवेगा,
फिर से प्रताप का इनके जव,
यह विन्ध्य-हिमालय-सागर भी,
यश-गान इन्हीं का गारे तर,
जफित पहिले विधि-पुस्तक म,
है तीन - तालिका - मध्य - नाम,
इस बार हमारी बारी है,
पाइए याग है मार-धान,
हो घर-गर भारत - वाम भाग,
है गभिमा-संच माTI
पसर १६
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ありそう
としてはくまい。
ふ
いくら
いて
ない
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कदम
जगाग्रो मत
-
अभी अभी सोई है पगली,
पीडा, इने जगाओ मत !
स्वर-भारों से शिथिल तार,
वीणा में हाथ लगाओ मत !
१
मिलन-निशा अवशेप अभी है,
सुख-परिमल बिग्वराओ मत !
पलको का मीना करुणा - पट, ।
इसका अभी उठाओ
T
मत ।
h
-
निश्वासों के मलय - पवन से,
आशा-कली हिलाओ मत !
यह सुस्मृति-अलि-अवली रोको,
क्षण भर और जगात्रो मत !
पैतालिस
-
सहा,
वृन्तहीन-नभ-सुमन
रुक जाओ तारक, जानो मत !
मयूरी-विरही-चातक,
हृदय थाम लो, गायो मत ।
मत्त
।
(५)
श्रीप-सुमन से कोमल सपने,
सुग्व दुख से उलझाओ मत !
ऊपा कुकुम-थाल सजा निज,
मगल-फल्श उपओ मत ।
द्युतिमय-प्रथम-रश्मि-कचन के,
म्यन्दन-चन चराओ मत !
रविजा-रज सोती, न जगानो,
चदी श्याम मजाम्रो मत
बियालिस
कदम्ब
जावक रुचिर फोकनद से ले,
हिम कण अभी गिराओ मत !
रुको पररा-धाराधर दोनों,
हेम - नीर नहलायो मत !
M
(८)
कोलेंगे द्रुम, जेंगे खग,
सचित फोप स्टायो मत !
जगकर गोना, सोकर पाना,
है, यदि, इसे जगायो मत !
-
-मत १९९१
तालिम
संदेश
(१)
।
अप सोने का समय नहीं है,
यह सोने का समय न खोना ।
हस्ती तक दुनियाँ हँसती है,
फिर न रहेगा हँसना - रोना ।
(२)
मुट्ठी भर कुरबानी के कण,
कर्म-क्षेत्र
मे होगा बोना।
मन-घट भर भर जग-पनघा से,
हमें सींचना कोना कोना ॥
.
-
(३)
में
प्राण - भारती हृदय-याल पर,
रह-रह ' हमें सजानी , होगी ।
प्रण-दीयट पर घर आशा की,
दीपक-गिता जलानी होगी ।
+
अतालिम
(४)
अस्थि-चूर-चावल-रोचन
रक्त-धार भी लानी
महा मत्र पढ रण-चण्डी को,
विजय-माल पहिनानी होगी।
हित,
होगी।
(५)
त्याग-कुड में शक्ति-अमि के,
ज्वाला - जाल खोलना होगा।
पराधीनता
व्य
स्वाहा साथ बोलना होगा।
बनाकर,
(६)
बलिदानों की छाप लगाकर,
दर-दर मुदित डोलना होगा।
श्रो! दीवानो । महा यज्ञ कर,
विजय-पियूष घोलना
होगा।
प्राणों
(७)
सजीवन देकर,
अगणित प्राण बचाने होंगे।
छिन-भिन्न कटकमय पथ पर,
सिद्धि-सुमन विकसाने होंगे ॥
७
उनचास
(८)
परिवर्तन के सपने अपने,
साकार बनाने
पच तत्व-जग रचकर अपना,
अणु-अणु मुप्त जगाने होंगे ॥
होंगे।
अपने बल से ही ठठरी की,
गठरी हमें उठानी होगी।
इसी पार
पार,
यह नया हमें लगानी होगी ।
या उसी
(१०)
जहाँ घिरी अत्याचारों की,
सघन घटा मन-मानी होगी।
दुख गोवर्द्धन जहाँ तर्जनी,
अपनी वहाँ उटानी होगी ।
-सितम्बर १६, ११४.]
3-
पचास
---
माया
जीने वालों को जीवन में,
सदा मृत्यु आहान मिला ।
नधर स्वर में नित्य अनन्धर,
श्वर का गीला गान मिला ॥
हार विजय में मानव को,
परिधान कफन का मान मिला।
इस पगली दुनिया में प्रेमी,
पागल को अपमान मिला ॥
(२)
लक्ष अलख नित अाशा में,
होकर निराश वरदान मिला।
दिन को काली रात, रात को,
ऊपा का अभिमान मिला।
नभ-पन्थी रवि-शशि दोना को,
नित ही पतनोत्थान मिला।
लोल लता में लिपटा विप-धर,
स्याल छिपा अनजान मिला !!
इक्यावन
सब
परिवर्तन के सपने
सपने अपने,
साकार बनाने होंगे।
तत्व-जग रचकर अपना,
अणु-अणु सुप्त जगाने होगे ।।
पच
अपने बल से ही ठठरी की,
गठरी हमें उठानी होगी।
इसी पार
पार,
यह नैया हमें लगानी होगी ॥
या उसी
(१०)
जहाँ घिरी अत्याचारों
की,
सघन घटा मन-मानी होगी।
दुख गोवर्द्धन जहाँ तर्जनी,
अपनी वहाँ उटानी होगी।
-सितबर १५, १६४.
पपास
-
माया
मिला ।
जीने वालों को जीवन में,
सदा
मृत्यु आदान
नवर स्वर में नित्य अनवर,
श्वर का गीला गान मिला ||
हार विजय में मानव को,
परिधान कफन का मान मिला।
इस पगली दुनिया में प्रेमी,
पागल को अपमान
मिला।
(२)
लक्ष अलख नित आशा में,
होकर निराश वरदान मिला।
दिन को काली रात, रात को,
का अभिमान मिला।
कर
नभ-पन्धी रवि-शशि दोनो
नित ही पतनोत्थान मिला।
लोल लता म लिपटा विष-धर,
च्याल छिपा अनजान मिला।
इक्यावन
रुवन हाम्य में, घृणा प्रेम में,
भिक्षा में ही दान मिला।
मृत्यु-मुक्ति से युद्धशील को,
यो ही बस
कल्यान, मिला ॥
-
।
धूलि फणों से सदा सुमन,
सचय का अनुसधान मिला।
मुरझाने में ही, विकास,
थिरता में जन्त पयान मिला |
है फलक में कीर्ति यहाँ पर
उलटा
प्रमान मिला।
दुनिया के मरघट-तट पर ही,
उन्मादों को
मिरा॥
चलते चलते रुक जाने मे,
विधि का यहाँ विधान मिला।
मूक
इगितियों में,
बलिदानो में बरदान मिला ।।
-लखनऊ १९४०
बापा
-
अभिलाषा
लिख दूँ माँ वह छन्द कि जिससे,
बन्द चन्द बन्दी के तड़कें।
गतिमय शिथिल धमनियाँ हो,
भालस - बलित बीर भुज फड़कें ।
भैरव स्वर भर जाय विश्व मे,
मानव मानव से मिल जाये।
चरण चरण की ध्वनि से अब तो,
यह ब्रह्माण्ड दहल हिल जाये।
(३)
क्षण में वरण वरण के सुबरण,
चमक ॐ बन ज्वाल-माल से।
धरा-धाराधर खेलें,
फाग दौड़
ककाल काल से॥
मिले
तिरपन
--
कदम्ब
(४)
फूल फूल मिल जॉय जलधि के,
नाश और निर्माण साथ हों।
आग ओर पानी भी,
पाप-पुण्य सब एक हाथ हों।
परसें
-
कायरता
के काले भू-धर,
कॉपे मोर पिघल यह जायें।
रुद्र सिंहासन होले,
कधा - वाँध सभी दह जायें।
तथा
-
जीवन-मृत्यु
प्रलय
महाकाल
ने
(६)
खुल , खेलें,
काल का लेखा भी हो।
पहिले,
न ऐसा देखा भी हो।।
1
सन्देशों के सरगम से ही,
चण्डो इधर पुकार रही है।
विजय - वधू - वर फीति - माल ले,
म्वागत उपर नगर रही है।
(८)
मगर गीत सुन अमर रोक ने,
अमर
समर
जा
घरमा-रास्ति सी,
जालि र
जाएँगे।
जा
--
फदम्ब
सुख-दृख
क्या कल था, क्या आज हुआ है, कल होगा क्या जाने ।
व्यर्थ विवाद भरा सुम्प-दुख का, क्यों, हम मानव टार्ने ?
छाया से छू कर हट जाते, माया दिखलाते हैं।
काया को कलपित करने ही, यह सुग्व-दुख आते हैं
(२)
जो दुस्प दोपदि-चीर बना था, महा-सिन्धु माने थे।
शेष कहानी केवल जिसको, अपनी निधि जाने थे ।
सुख-दुख में अतृप्त रहता मन, स्यों कातर बन धूमें ?
कायरता से ही दुख होता, क्यों मानव पग चूमें
-
सॉझ सवेरे से श्राते हैं, धूप-छाँह से मिटते ।
अथ-इति लिये काल-कम से ही, दुख-सुख-जाल सिमिटते ।।
ले उत्थान-पतन लहरों
सा, बनना - मिटना आया।
सुख-दुख जीवा, सरि के दो तट, इनको कटते पाया ॥
ले सतोप तरणि चल आगे, वह गन्तव्य दिखाता ।
वहाँ न सुग्व-दुख-जीवन-जग का, रहता मिथ्या नाता ॥
प्रयाग,
१२-१-४१
छप्पन
才 보
कम्प
।
है
माझी से
.
मत हाथ लगानो तुम माँझी, 'यह नैया यों ही रहने दो।
कुचल चली' लहरें चिर परिचित,
छोड़ चली अनुकूल कूल-हित,
श्राघातों पर ही है जीवित,
कर न सकी अपना 44 सीमित,
.
पतवारो से जर्जर न करो, है जैसी वैसी रहने दो।
मत हाथ लगानो तुम मांझी, यह नैया यों ही रहने दो।
-
शुक-युक जाता है जलज-जाल,
घिर-घिर रुकती है
जलद-माल,
झोकों से झुकता, जीर्ण पाल,
सारे डर पर लगर कराल,
.
.
-
श्रातय-वर्षा के अनाचार, सहती है चुपके सहने दो।
मत हाथ लगानो तुम माँझी, यह नैया यों ही रहने दो।।
सत्तावन
कदम्ब
--
(३)
-
है कल-कल ध्वनि ही सजल स्वास,
चलना ही है इसका विकास,
तट से न प्रीति, जल में निवास,
माँझी की इगिति में विलास,
4
A
है कभी चिता के निकट कभी, मदिर-तट रहती, रहने दो।
मत हाथ लगाओ तुम माँझी, यह नैया यों ही रहने दो ।
-
-
नगरों से भी अनुराग नहीं,
वन से भी इसे विराग नहीं,
मरघट का इसको त्याग नहीं,
थिर रहने का सौभाग्य नहीं
यह मूक-मीन जल प्रीति किये, जैसे बहती है बहने दो।
मत हाथ लगाओ तुम माँमी, यह नैया यों ही रहने दो ।
अद्वाचन
कम्य
मतवाली है यह मीरा सी,
चलती है प्रेम - अधीरा सी,
उर लिये प्रेम की पीरा सी,
गौतम - चारा मण - वीरा सी,
वनवासी-पभु-पद-रज-आशा, उर में ले बहती बहने दो।
मत हाय लाओ तुम माँझी, यह नेया यों ही रहने दो !!
"दुखिया निपाद की आशा सी,
जगती की परिभाषा सी,
जीवन-चोपड़ की
शिशु की तुतली मृदु भाषा सी,
पासा सी,
यदि जीवन में रहना ही है, मत छेडो इसको बहने दो।
मत हाथ लगायो तुम मॉमी, यह नैया यों ही रहने दो।
प्रयाग १४-५-४11
M
उनसठ
--
सावनी
-
खयर नहीं कब चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता ।
नगानों .
कहता,
को अपना
स्वासो की नैया
पर बहता,
• जग की विषम वेदना सहता,
सदा कल्पना के गर गढकर, क्यों तू फूला नहीं समाता।
स्वपर नहीं कब चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता।
-
दुख को सुख, मुस को दुख माना,
पीतल, हेम, काच, मणि जाना,
जग रहस्य को कब पहिचाना?
क्यों अपनी डफली लेसर तू, अपना वैमुर राग
खबर नहीं कर चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता ।
पजाता।
माम
पर-हत-चिन्तक बना न जग में
रोड़ा बन श्रटका
पग-पग में,
अजानाल-खन सा इस जग में,
भाज और कल के झूले में, पंग मारता फिर रह जाता।
खबर नहीं कर चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता है
H
,
-
कलित कलेवर कामिनि कचन,
थिरक उड़ेंगे जैसे खजन,
लोचनों मैं जानाञ्जन,
।
तब दोखेगा जन-मन-रजन, बाता जो सब को न दिखाता।
बार नहीं कब चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता ।
-
"
-
५
सौख्य-शान्ति से स्नेह जोड कर,
क्रोध-मोह का मान तोड कर,
मद से भी मुँह शीघ्र, मोड कर,
आओगे तब देख सकोगे, जग का सगा भाग्य-विधाता।
ग्वधर नहीं कब चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता !
।
4
कदम्ब
,
आज मिलो, फल मिल न सकोगे,
माया-सर में
हिल न सकोगे,
खिले अभी, फिर खिल न सकोगे,
भूल, महात्वाकाक्षाओं को, कुछ भी जब न साथ में जाता।
खबर नहीं कर चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता है
-
(७),
मिल:
T
जायेगा तत्व- तत्त्व से,
मतलप क्या फिर' है महत्त्व, से,
भिक्षा क्या, अमरत्व-स्वत्त्व से,
बन्धन-मुक्त-बिहारी होंगे, छूटेगा मिथ्या जग-नाता ।
खबर नहीं कब चल देना है, क्यों फिर इतने साज सजाता ।
+
।
-
-प्रयाग,००-१-४१
।
एक गीत
तुमसे मिल कहाँ मै कैसे।
लोक-लान-बन्धन में जकडा
बेबस प्रेमी वन्दी जैसे।
,
उमडे जलद लिये ना-जीवन,
पर न मरा बिरही-चातक मन,
करती । आश-मयूरी नर्तन,
है निश्चय, होगा परिवर्तन,
देख लिया करता हूँ मैं भी,
मिलन स्वप्न ही जैसे-तैसे।
तुमसे मिलूँ कहाँ मैं कैसे?
।
२)
यहाँ स्वर्ण के दीप नहीं है,
आँखें धन बन बरस रही है,
आडम्बर
ऋगार नहीं है,
और ज्योति सचार नहीं है,
भेंट परे दुखिया कुटिया में ,
इटे अक्षत जैसे - तेसे।
तुमसे मिल कहाँ मै केसे
,
तिरसट
ग
भूल कभी यदि आ जाओगे,
फिर न टूटकर जा पाओगे,
सु-मन समर्पण. 'पा जाओगे,
निर्धन के धन बन जाओगे।
मुम वन्दी के सँग पन्दी वन ,
रहना तुम भी , जैसे-तैसे।
तुमसे मिलँ कहाँ मैं कैसे
.
मन्दिर, मसजिद, गिरजा देखा,
राम, खुटा, ईश्वर कह देखा,
तप कर देखा, जप कर देखा,
जी कर देखा, मर • कर देखा,
"
1
सब कर देखा, किन्तु न जाना
मोहन तुम हो सचमुच कैसे ।।
तुमसे मिलूँ कहाँ मैं कैसे।
-प्रयाग ३-४-४१
1
चौसठ
कदम्ब .
कुछ मुझसे कहने याये थे।
दीन - अपावन पावन करने,
उर-तम मे प्रकाश निज भरने,
पल को युग, युग को पल करने,
यस क्षण भर रहने आये थे।
(२)
चाणी में स्वर-रस साधन दे,
रस में जीवन - आराधन दे,
आराधन में निज दर्शन दे,
तुम भूल बताने आये थे।
इस ममता की अधियारी में,
मेरी जीवन - फुलवारी में,
निज कान्ति-किरण-उजियारी में,
चन अस्ण बाल-रवि आये थे।
पैसठ
- (५) पापों की चाल शान्ति किये, मेरे मन की सब भ्रान्ति लिये, निज इगिति में ही क्रान्ति लिये, उर-आँगन-धन बन आये थे (५) सोते से मुझे जगाने को, मेरे गीतों के गाने को, इस कर्म-क्षेत्र में लाने को, तुम मोहन बनकर आये थे। सूर्यप्रण- प्रयाग १५-१-४१ यापन
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