Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sansar Ka Nari Itihaas

Devi,yasodha · 2011/01

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JGGO.CGG संसार का नारी इतिहास UGDOŠ दूसरा भाग भारत का- - नारी इतिहास . FRixfff 200000 भारत वर्षकी ५०० पांच भौ पतियता, सुशीला, बीर, विदुषी, उदार हृदया, धार्मिका, बुद्धिमती, मचरित्रा, गृह- लक्ष्मी, पौर सती प्राचीन स्त्रियों क.. जीवन चरित्र सतीत्व की भांकी එබැබ තාම මං මේලෝබමාසලrasa जिमम्। श्रीमती यशोदादेवी सम्पादिका स्लीधर्म-शिक्षक कर्नलग-प्रयाग ने जी-जाति के उपकारार्थ सग्रह कर सरल मापा में छपाया प्रथम २००० सम सिरप दानोमूत शायरी मोजागर।

(४) आद पडा भारी लाम पहुँका है। ऐसे नोधनवरित्रों की इतनी अधिक आवश्यकता है कि जितनी किसी अन्य प्रकारको पुस्तकों की नहीं, क्योंकि जोधन चरित्रो ने भी प्रकार को शिक्षा मिलता है ऐसे जावन चरित्रोंको कमीका पूरा करने के लिये कई पोंके कठिन परिश्रम से ५०० पाच सो खिया के जीवन चरिमों का पठी 'स्पोज और सच कर इकट्ठा किया है यह एक अपूर्व सपा है. इस सम्पूर्ण, पुस्तक के प्रकाशित हो जाने पर एक घही भारी कमी पूरी होगी पुस्तक कैला उपयोगी होगो और इससे सो जातिका कितना अविस उपकार होगा से। पुस्तक को पढ सुनकर हा पता लगेगा। जिनके पढने और सुनने से स्त्रियों और कन्याओं के वित्तपर कैमा असर दागा, इस पुस्तक की भाषा ऐसी सरल और" माहर है जिसको पढना भारम्भ फरके छोड़ने का इच्छा न होगी। हर एक श्री कपास एक ए प्रति अपश्य रहना चाहिये इस पुस्तक के पढने और सुगने, से जिन उपयोगी शिक्षाओं का मूखसे मूख लिया और कन्याओं के ह दयपर उत्तम प्रभाव पड़ेगा व अन्य प्रकारको सैकडो पुस्नकै पढने और सुननसे मी न पड़ेगा इसलिये बहुत सो पुस्तका को न पढाकर एक यही पुस्तफ पढाइये इसमें समी प्रकार की गुणवती प्राचीन स्त्रियों के अपूर्व चरित्रों का . यणन है जिसे पढ सुनफर स्त्रिया हो क्या पुरुष भी प्रसन्न होगे। इस दुर्लभ प्रन्थ के संग्रह करने में जितना अधिक समय व्यतीत हुआ तथा जिन बड़े बड़े बहुमूल्य प्राचीन ग्रन्थों का मधन कर यह लिखा गया है उसका हिसाब लगाकर यदि इसका मूल्य २५) रुपया रखा जाचै तो भी अधिक न होगा परन्तु इस पारश्रम और खचं का घिनार न फर मूल्य पूरे ग्रन्थ का भी लागत मात्र हो कम,रक्खा जावैगा जिससे सव, साधारण स्त्रिया। । भीमगाकर लाभ उठासके । फई मागों मे ५०० सौ जोधन चरितु पूरे होंगे शीघहो पत भेज कर सम्पूर्ण पुस्तक के ग्राहक बन जाइये जिस प्रकार जो भाग प्रकाशित होगा,बो पो० द्वारा उपहारा मूल्य में भेजा जावेगा। पता:-श्रीमती यशोदादेवो पोस्ट यकस न० ४ कर्नलगञ्ज इलाहाबाद -- I-

श्रीमती यशोदादेवी
सम्पादिका स्त्रीधर्म-शिक्षक
कर्नलगन्ज प्रयाग का
स्त्री-शिक्षा,पुस्तकालय
।
श्रामती यशोदादेवी कृत स्त्राशिक्षा का
६०८ पुस्तक छपकर तैय्यार हो पचासे
हजार प्रतियां हाथोहाथ विक गई और
धिक रहो हैं।
यदि आप अपने घरको स्त्रियों पुत्रियो और
पुत्र अधुरो को आदर्श गृहिणी, सच्ची माता,
सुशीला बहू चतुर कन्या धनाना चाहते हैं
उन्हे मर्वगुण सम्पन्ना बनाने की इच्छा है
और आप उनके सच्चे हितैषी हैं तो श्रीमता
यशोदादेवो कृत खो शिक्षा की कुल पुस्तके,
या जितनी सामर्थ हो उतनी पुस्तकै मगा-
कर पढ़ाइये और
सुनाइये । स्त्रो उपयोगी

1
कुछ थोड़ हो
का
खी-शिक्षा की पुस्तके।
कोई विषय ऐसा नहीं जिस विषय को
पुस्तके, इन , पुस्तकों में मौजूद न हों।
पुस्तकों की भाषा सरल और मनाहारिणो
अक्षर बहे और साफ है गूढ से गूढ विषय भी
ऐसी सरल भाषा मे समझाया गया है कि
मूर्ख से मूर्ख स्त्रियां भी सरलता से ही समझ
लेती है और पुस्तकों से अनेक प्रकार के
गुण सोख जाती हैं थे।डे ही परिश्रम और
खर्च से हजारों रुपये
फायदा उठाती हैं।
इधर देखिये
स्त्रिया और बालिकाओं के सुधार के
लिये जिन अंत्यन्त उपयोगी पुस्तकों की
श्रावश्यकता थो वे ही पुस्तके छपकर
तैयार है।
पुस्तके कैसी हैं-
इसके लिये बहे घडे विद्वान पंडित,
स्कूल्स . इस्पेक्टर, विटुपी रानी महारानी
पौर सर्व साधारण खो पुरुष, सभा सुसाइटी,
सभी ने प्रशंसा की है। हम इन उपयोगो
।
ܝ ܝܽ-
1
,
।
-

पुस्तक . स्त्री-शिक्षा की पुस्तकों की सक्षिप्त सूची पुस्तको की प्रशंसा न कर केवल पुस्तक के नाम और दाम इस सूची में प्रकाशित करती है साशा है पाठक पाठिका गण पुस्तकों के नामसे ही उनके गुणों का पता लगालँगी। यह हैं। १-गर्भरक्षा विधान m) २४.३६ आदर्श कुमारिया २-पाकशास्त्र दोन भाग -२) २५. सतीत्वको भाका ३- नारी नीत शिक्षा, 1) २६ -खो सँगीत सागर ४.. बालापत्र व्यवहार 1) २७ चाला म्मृति शास्त्र ५-घर का वैद्य 1. 1) २८ घर की दजिन 1) ६.पातित्रत धममाला 1) '२६ बाला मनरञ्जन धात्री विद्या : ३०. सच्चा पतिप्रम ८. भजन वाटिका ३) ३१ पत्नीकी मनोहर विडिंया i) -जीवन रक्षा 18) ३२- आदर्श हन्दू विधवा १०. सन्तान पालम 1) :) ३३ पत्नीपत्र दर्पण 1) ११--रनसंग्रह प्रथम भाग ३) ३४. शिशु रक्षा विधान १२. रखसग्रह दुसरा भाग ॥) ३५ मुखी कुटुग्य २३ रत्नसग्रह ती. भा. ॥) ३६- पाठशाला को कन्याए २४-रतसंग्रह चौथा भाग 1) ३७ अचार की कोठरी १५ रनसग्रह पाचवा भाग 1) :३८.शिक्षा कुसुम 1) १६. रत्नस प्रह छठवा माग ॥) ३६ पनी पत्रादर्श ) " रतस प्रह सामवामाग u) ४०- अमृत का यूद १८ रतसग्रह माठया भाग 1) ४१.नगर यह १६. रसग्रदानया माग ॥) ४२. सुचरित्र गठन २० रनस ग्रह दमया माग। ५).४३ नारीसगीत शिक्षा २१-रतसग्रहग्यारहया भाग।) ४४. गुणों की पिटारी २०.रलमंग्रह बारहवा भाग 1) ४५ आदश रसोईया '२३ 'रक्षस ग्रह तेरहवां माग) ४६. सती भूषण . " । - । 1 - . - . i. ८, स्त्री-शिक्षा को पुस्तकों की संक्षिप्त सूनों। ४७ -आदर्श गृहगो १) ७८-स्त्रीचिकित्सा शाल ४८. घर की बात 1) ७६-कथा कहानी ४६--लडकियों के खेल 1) ८०. सुशीला कन्या i) ५०..निता पत्र दर्पण 1) •लक्ष्मी कन्या: 1) ५१-द्वार दान 1) ८२ तिथि पयं व्रत कथाए " ५२-पतिकोमनोहारणीचिठ्ठयां।) ८३-पनि की मर्यादा ५३. महिला हस्तभूषण 1) ८५-गृहस्थ जीवन 1) ५.--सच्चो सहेली १) ८५.-पतिवता ५५. वीर पत्नी 1) ८.नव कुलुम हार ५६--सन्तति सुधार ॥) ८७ सदाचारणी ५७. कन्याभजन भएडार. 1)८८ -सुशोला.कमला । ५८ लीलावती जयानीहिसाव I) RE-दवरानी जेठानी 515): ५६ सुघड रंगरेज 1) १०. सती सर्वस्व ६०. नारी नीति कु डल ६१. सती विधवा ६१. गृहियो गृह चर्या ६.सुशीला विधया ६२-शास्त्र शिक्षा 10) ६३-मारतकीमादर्श विधवाएं ।) ६३ नारी शान मुद्रिका 12) १४. वै व्य वृत कथाए ६४-पनियत धर्ममाला 1) ६५-पत्ना बन ६५. मादश सखिया १) १६-खा चिकित्मा रत - नव वधू रहस्य ६७ हरिश्चन्द्र तारामता १७ पातिव्रत धर्म रहस्य 1) ९८--सच्ची माता १) ६८-सती सावित्री ॥) ६- पाल स्मृति 7) ६- सती सीता ॥) १००-शिल्प शिक्षा ७० दमयती फया ॥) ११०१-त प्रेम की झाकी ७), ०१ भारत की पोर नयाँ 1) '१०२--सनी सुकुमारिया ७२-.आदर्श जननी " २०३- कन्या शिक्षावली, ওঃ •ামি কথা ॥) १०४ सुघड कन्या 1) ७. विधवा धर्म दर्पण 1) १०५-धर्म की पूजी ७५-विधवा ज्ञान माला ॥ १०६-शिल्प ज्ञान ७६--विधवा कायशास्त्र -1) १०७. स्त्री घेद्यविद्या । २॥ ৩৪ বগল মর্ম মৃত 1), १०८ मारतका नारोइतिहास) पता:-यशोदादेवी पावसान० ४ कर्नलगंज प्रयाग , - --- - 1 . संसार का नारी इतिहास । दूसरा भाग- भारत का नारी इतिहास हरिशचन्द्र तारामती। शतायुगमें राजर्षि राजा हरिश्चन्द्र त्रे हुये थे। यह पडे धर्मात्मा पृथ्वी के पालने वाले राजाओं में प्रधान थे। उनके राज्य में घनका प्रकाल नहीं पड़ता था । किसी को रोग न होता था । प्रजा मे अकाल मृत्यु , नहीं होती थी न कोई पाप , करता था कोई धन तप का अभिमान नहीं करता था। स्त्रियां सदा युवती हो रहती थी उस राजा ने किसी समय हरिण के शिकार के खिये दोढते हुये "रक्षा करो बचाओ" आदि स्त्रियों के मुंह से निकले हुये शब्द सुने । - वह धार्मिक राजा उस हरिण को छोड़कर "मत डरो मत डरा" कहता हुप्रा लोट पड़ा और बोला कि कौन ऐसा दुष्ट है जो मेरे पहले ।" न . ५ -

१०
।
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग:
ऐसी नीति कररहा है यह चिल्लाहट मिटाने
के लिये राजा उसी ओर दौड़े जिघर से वह :
रोने की आवाज बारही थी। इसी बीच में
शिव के प्रिय
पुत्र गणेश सोचने लगे- कि
वीर्यवान और ब्रसी विश्वामित्र बडे भारी
तप करते हुये उन विद्याओं
का साधन करते
हैं । जिन्हे शिव धादि योगी न ताघे सकें
क्षमा मान चित्त आदि को अपने नशमें रख
कर यह उन्हें साधन करते हैं और यह
चिल्लाकर रोरही है तो मैं इस समय कौन
उपाय करू । जिस से यह सिद्ध न ही यह
महातपेश्वरी विश्वामित्र बढ़े तेजस्वी है
एम निर्वल हैं और यह डर से चिल्ला रहीं
हैं। इस का उपाय कठिन जान पड़ता है।
अथवा मत 'डरी कहता हुवा यह, राजा
आता है तो इसके शरीर में घुस कर तुरन्त
अपना कार्य साधन कर लू गा ऐसा सोचकर
विघ्नराज गणेश राजाके शरीर में घुस गये;
उन के प्रभाव से राजा हरिश्चन्द्र क्रोधकर
बोले बल और प्रताप से तपते हुये मेरे ऐसे
.

- . 4 जा ܝܢܒ - - L हरिश्चन्द्र तारामती। राजा के रहते कौन ऐसा' पापी धधकती हुई पाग कपड़े में बांध रहा है कॉन ऐसा है जो मेरे धनुष से निकलकर', धागे दिशाओं को 'प्रकाशित करने वाले याणां से अंग अंग विच कर 'महानिद्रा में सेना चाहता है । गजा की यह बात सुन कर विश्वामित्र ने क्रोध किया। उनके क्रोध करते ही सय विद्यायें एक पल में नष्ट हो गई राजा तपोनिधि विश्वामित्र को देखकर डर से पीपल के पत्ते की तरह कांपने लगे जय मुनि ने पुकारा रे दुष्ट खडा रह ! सत्र राजा हाथ जोड़ कर उन के , पावों पर गिरकर यही नम्रतासे वोले हे भगवन् ! यह मेरा धर्म कुछ अपराध नहीं किया। मैं अपने धर्म पर हूं। इस कारण मुझ पर क्रोध करना उचित नहीं है । न्यायकारी धार्मिक राजाश्रों को उचित है कि धर्मशास्त्र के अनुसार दान दें रक्षा करें और धनुष उठाकर युद्ध करें वित्रा- मित्र ने कहा, हे राजन ! यदि तुम्हें पाप का, अय है तो तुम्ही बतायो दान किसे देना , - -- । - - - 1 , १२ . - . -- है - , - भारत का पारी इतिहास दुसरा भाग- ५ चाहिये, किस की रक्षा करनी चाहिये और किस के लंग लड़ना चाहिये । हरिश्चन्द्र ने उत्तर दिया अच्छे 'ब्राह्मणों को दान देना चाहिये डरे हुये की रक्षा करनी चाहिये और शत्रुनों से लड़ना चाहिये विश्वामित्र ने कहा राजन् यदि श्राप राज धर्म अच्छी तरह जानते है . तो मै यज्ञ करना चाहता हूं आप मुझे ब्राह्मण समझकर मनमानी दक्षिणा दीजिये । राजा यह सुनकर मन में बहुत प्रसन्न हुये और ऐसा समझने लगे मानो उन का फिर से जन्म हुआ है वह विश्वामित्र से घोले । हे भगवान् । प्राप क्या चाहते हैं सा : मय छोडकर मागिये। यदि दुर्लभ वस्तु भी छाप मागेंगे तो वह दी हुई समझिये । सोना चांदी पुत्र स्त्री शरीर प्राण राज्य पुर, लक्षमी जो इच्छा हो मागिये । विश्वामित्र ने कहा वे राजन् ! यदि आप देने की प्रतिज्ञों फरते हैं तो मैं मांगता हूं। आप मुझे , पहिले जो राजसूययज्ञ की दक्षिणा ( सर्वस्व ) है यह दीजिये । राजा ने + । - " . - 1 ঘমা - - --

--
--
-
॥
-
-
हरिश्चन्द्र-तारामती।
कहा हे भगवन् । मैं राजसूय यज्ञ की दक्षिणा
आपको दूंगा कितनी और क्या दक्षिणा प्राप
चाहते है। विश्वामित्र ने जयान दिया-
हे सथ धम्मोंके जानने वाले राजन् । सागर,
पर्वत, गांव नगर से परिपूर्णा समूची पृथ्वी
रथ घोड़े ओर हाधियों से भरा हुधा · समस्त
राज्य प्रवसे भरे हुये कोठे और खजाने प्रवा'
जो कुछ तुम्हारा है सब मुझे दे दीजिये और
अपना धर्म भी दे दीजिये जो भरने के पीछे
मी संग हो रहता है। अधिक कहां तक कहें
". खो पुत्र और शरीर को छोहकर अपनी सद
यस्तुए दे दीजिये। राजा मुनिका बचन सुन
कर कुछ भी उदास न हुए। प्रसन्न चित्तहा
हृदय से हाथ जोड़ कर बोले . "अच्छा"
विश्वामित्र ने कहा, यदि आपने अपना
राज्य पृथ्वी सेना और धन आदि सघ पदार्थ
देदिये श्रीर मैं तपस्वी इस राज्य का
मालिक बन गया तो अब प्राज्ञा किप्त की.
चलेगी।, हरिश्चन्द्र ने कहा मगन् जिस
समय मैंने, संपूर्णा सम्पत्ति से मरी हुई पृथयो
-
-

-- १४ -- 1 पुत्र भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। शाप को नहीं दी थी, उस समय मी प्राप ही स्वामी थे। प्रय ता प्रापही राजा हुये सच पूछना हो क्या है। विश्वामित्र ने कहा राजन् ! यदि तुमने मुझे समूची पृथ्वो वेदी तो अप करधनो कुण्डल प्रादि गहने उतार कर पेड़ की छाल पहना और लेकर जहा तक मेरा राज्य है उस के बाहर निकल जायो। राजा मच्छा कहकर अपनी रानी तारामतो थोर छोटे , बालक पुत्र को लेकर चलने लगे। तब, विश्वामित्रने उनको राह झिकर कहा कि इस महायज्ञ की दक्षिणा दिये मिना कहां चले जाते है।। हरि- श्चन्द्र ने कहा भगवन । मैने निकण्टक समस्त राज्य प्राप को दे दिया अब यह तीन शरीर बच गये है । विश्वामित्र ने कहा कुछ हो मेरी यज्ञकी दक्षिणा अवश्य देनी पड़ेगी। जो कहीं हुई, दक्षिणा ब्राह्मण को नहीं देता उस का नाश होजाता है। राजसूययज्ञ में उचित है कि जब तक ब्राह्मण दक्षिणा से तृप्त न हो जाय सब सक्ष उसे देता हो जाय श 1 । 1 -- ܝ ܀ , 1 हरिश्चन्द्र-तारामती। देने की प्रतिज्ञा करके देनाही उचित है जो अपने को मारने के लिये प्रावै उससे युद्ध करना चाहिये और भयभीत को रक्षा करना चाहिये यह पाते' तुम्हीने तो कही हैं। राजाने कहा भगवन् । इस समय मेरे पास कुछ नहीं है । मै समय पाकर भापको देदूंगा।' प्रापं दयाकर इस समय प्रसन होकर क्षमा कीजिये मुनि ने कहा हे राजन् ! तुम यतादो कितने दिनों में दोगे? मैं उतने दिनों तक तुम्हारी बाट देखूगा यदि उस समय तुम न दोगे तो शाप की आग से तुम्हे जलाकर भस्म कर दूंगा। राजाने कहा हे विप्र ! मैं , एक महीने के भीतर प्रापको दक्षिणा देदूगा। आप इस समय मुझे उस का उपाय करने के लिये जाने की प्राज्ञा दीजिये । मुनि ने कहा हे राजन् ! तुम जावो और अपने धर्म का पालन करो। मार्ग मे तुम्हारा, तुम्हारा, कल्याण हो किसी प्रकार का विघ्न न हो। विश्वामित्र के मुह राजा 'प्रचभे मे डूबे हुये तुरन्त ही वहांसे चल - 1 - . -- से "जाओ" ' सुनकर --

।।
.
-
-
भारत का मारी इतिहास द्रा भाग।
दिये उनकी प्यारी रानी जो कभी पैदल नहीं,
चली उन के पीछे चलो राजा को पुत्र और
स्त्री के साथ इस प्रकार जाते हुए देखकर
नगर के लोग रोने लगे । हा नाथ !
दुःख से निकलते देख कर उस के दास
दासी तथा नगर के लोग रोने लगे। दुःख से।
पीडित हम लोगों को छोड़ कर कहां-घले,
जाते हो। तुम बड़े धर्मात्मा राजा हो अपनी :
प्रजा पर बड़ी कृपा रखते हो। हे राजन यदि .
धर्म की भोर तुम्हारा ध्यान है तो हम
लोगों को अपने साथ लेते, 'चला हे
राजेन्द्र ! 'थोडी देर ठहरे हम अपने नेत्र
रूपी भोरों से तुम्हारे मुख कमल का मधुपान
करें न जाने फिर 'कय तुम्हारा मुख देखने
को मिलेगा जिस को सवारी के साथ घड़े २
शाजा चलते थे वह अब केवल स्त्री पुत्र
का
लेकर चला जाता है। जिस को यात्रा के
समय दासलोग हाथियों पर चढ़कर आगे
चलते थे वह महाराज हरिश्चन्द्र आज पैदल
चले जाते हैं. हा राजा! यह तुम्हारा सुकुवार;
-
-
-
- 1

त . । देर हरिश्चन्द्र-तारमती। कोमल शरीर बालक जिसकी भैहे टेढी और, काली है । और शरीर बहुत कोमल है । मार्म को धूल में लिपट कर कैसा हो जायगा । हे नृपवर ठहरो ठहरो ! अपने धर्म का पालन करो मनुष्य का प्रधान धर्म ही है। कि सब पर दया करे । स्त्री पुत्र धन तथा अक्ष से क्या यह सब छोडकर हम लोग तुम्हारे पीछे छाया की तरह चलेंगे । हे नाथ ! हा महाराज ! हे स्वामिन् । क्यों हम लोगों को छोडकर चले जाते हो । जहां तुम रहोगे बहीं हम लेगोंको सुख मिलेगा वही स्वर्ग है। जहां तुम रहा वही नगर है। जहां तुम रही "वही हमारा स्वर्ग है। नगर निवासियोको ऐसी शोक भरी वाणी सुनकर राजा शोकाकुल हो कर प्रजापर दया करके मार्ग में तक ठहरे। विश्वामित्र भी नगर निवासियों की वातसे राजा को 'घवराया देखकर क्रोध कर और मय दिलाकर अांखे लाल करके राजासे वाले। रे नीच-चरित्रवाले ! टेढो बातें बोलने वाले ! झूठे ! तुझे धिक्कार मुझे राज्य देकर कुछ का - । - - -- - - । पवित्र मन्त्र से दिया हझा और विधि से । बना हुआ सोम पीकर तृप्त होंगे। १८, भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। तू फिर लौटा लेना चाहता है। विश्वामित्र की यह कठोर वात सुनकर राजा , कपिउठे। और मैं जाता हूं यह कहकर अपनी रानी का हाथ पकड कर खीचते हुये चले गये। परिश्रम से थकी हुई तुकुमारी प्यारी रानी को राजा खींच हो रहे थे कि विश्वामित्र ने झट लाठी उठाकर रानी को मारा । यह देखकर राजा बहुत दुःखी हुये पर शान्त' रहे । केवल यह कहा मैं तो जाही, 'रहा हूं। राजा हरिश्चन्द्रको यह दुर्दशा देखकर परम दयालु विश्व देवा बोलउठे यह पापी विश्वा- मित्र न जाने किस लोक मे जायगा। इसने यज्ञ करनेवाले राजाछो में प्रधान राजा हरिश्चन्द्र को इस प्रकार राज्य से उतारा प्रय हमलोग किंच के महायज्ञ में श्रद्धा यह बात सुनकर 'विश्वामित्र ने बड़े, क्रोध, . से शाप दिया कि तुम सब मनुष्य हो जाओ, जब उन्हो ने बहुत बिनती कि त विश्वा- - a । . - ! । - " -- १६ h - । - -- , . हरिश्चन्द्र-तारामती। मित्र ने प्रसन्न होकर कहा कि मनुष्य होने पर मी तुम्हारे लडके लडकियां न होंगी। विवाह न होंगे, अभिमान न होगा, काम क्रोध न होगा और फिर तुम देवता हो जाधोगे। , विश्वामित्र के शाप से वही देवता अपने अपने अंशों के कुरु - के घर में पाण्डवों की स्त्री द्रौपदी के गर्भ से पांच पुत्र हुए यही कारण है पांचो महारथी पाण्डव पुत्रों का उस, शाप के यश विवाह न हुधा । राजा विश्वामित्र की बात सुनकर बहुत दुःखी हुये और अपनी रानी तथा छोटे पालक को लेकर धीरें,२ चले। काशीशिव- । पुरी है इस पर मनुष्यका कुछ, · भी अधि- , कार नहीं है। ऐसा, जानकर परम पवित्र काशीपुरी मे, पहुचे । अपनी स्त्री तथा पुत्र को लिये काशी में घुसते हो राजा ने विश्वा. मित्र को आगे खडा देखा राजा। विश्वा- मित्र को देखते. को प्रणाम कर हाथ जोड़ कर बोले हे मुने ! यह मेरे प्राण यह मेरी स्त्री और यह मेरा खड़का तैय्यार है इन में + -- - + 1 । - 14 11 - -- । . 1 २० भारत का नारी इतिहास दृशरा भाग । जिससे प्रापका कुछ मला हो उसे ले लीजिये। अथवा और कोई मापके मन के योग्य काम हो वह कहिये । विश्वामित्र ने कहा है राजर्षि ! एक महीना पूरा हो गया यदि तुझे अपनी बात याद हो तो मुझे राजसूय यज्ञ वाली दक्षिणा देदे । हरिश्चन्द्रने कहा है.. उग्रतपोधन विप्र ! महीना आज पूरा होता श्रमी प्राधा दिन बाकी है। संध्या तक' ठहरिये मैं दक्षिणा चुका देता हूं विश्वा- मित्र ने कहा अच्छ। महाराज ऐसा ही सही मैं फिर प्राता हूं यदि माज दक्षिणा न दोगे तो मैं तुम्हे शाप दूंगा। विश्वामित्र' के चले जाने के बाद राजा अपने मन में सोचने लगे कि कैसे कही हुई दक्षिणा इस ब्राह्मण को हूँ। मेरे पाले हुये मित्र कहां गये मेरा धन इस समय, कहां चला गया । ऐसा न हो कि इस कठिग दक्षिणा' 'के लिए मुझे नरक में जाना पड़े। मैं इस समय- महा दरिद्र होकर · क्या प्राण छोड दूं। अथवा कहां जा ! यदि मै दक्षिणा ब्राह्मण 4 - - - । - - 1 --

।
1
।
।
हरिश्चन्द्र-तारामती
को धिना दिथे ही मर जाऊंगा तो अधम से
मी प्रधम पापी होकर ब्राह्मण का धन लेने
वाले क्रोडे यनूगा । अपनी देह वेधकर दास
होना अच्छा है राजा शिर झुकाये का तर.
होकर यह बात सोच हो रहे थे कि राना
राती हुई लडखडाती आवाज से बोली हे
महाराज ! चिन्ता छोह कर अपने सत्य का
पालन कीजिये । झूठे आदमी को स्मशान
के समान छोड देना चाहिये । हे पुरुपसिंह !
पुरुष के लिये सत्य पालन के समान दूसरा
कोई धर्म नही है। उस का अग्नि हात्र
वेदपाठ दान तथा और दूसरी पवित्र क्रियायें
व्यर्थ हो जाती हैं । जिस का बचन झूठा हो
जाता है धर्म शास्त्रो मे पंडिता ने कहा
है कि सत्य घाक्य जिस प्रकार तारने के
लिये हैं मिथ्या वाक्य उसी प्रकार डवोता है
हे महाराज ! आपने सात अश्वमेधयज्ञ कर
के राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया । अब
- क्या एक छोटे से असत्य वाक्य के लिये स्वर्ग
भ्रष्ट होगे । हे राजन् ! अब तो मेरे पुत्र हो
1

1
२२
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
गया है। यह कहकर रानो रोने लगी. राजा
हरिश्चन्द्र ने डबडवाई मांखों से रानोसे कहा
हे सौभाग्यवती ! गज गामिनी देखो यह
लड़का तुम्हारी ओर देख रहा है । जो तुम्हे
कहने की इच्छा हो कहो। रानी ने कहा
नाथ ! मेरे पुत्र हो ही गया है अच्छे लोगों
का मत है कि स्त्री पुत्र पैदा करने के लिये
है इससे आप मुझे वेचकर ब्राह्मणको दक्षिणा:
दे सकते है । यह बात सुनतेही राजा, मूर्छित
होगए फिर होश में आकर बहुत दुःखी है।
कर विलाप करने लगे। प्यारो । यह बहे
दुःख की बात है कि तुम्ही ऐसी बातें मुझ
से कहती हो क्या तुम्हारी मुसकान भरी
प्यारी बातें पाशको भूल गई है हे मन्द
मुसकान करने वाली प्यारी, हा ! क्या तुम्हे
यह धात कहनो उचित ऐसी
मुह.
से कभी न निकालो
नहीं कर
धिक्कार
-
।
-
मुझ.
कर पृथ्वी

-
-
हरिश्चन्द्र-तारामती।
पृथ्वी में मूर्छित पड़ा देखकर विलाप करती
हुई रानी वाली । हाय',!' महाराज । यह
.' मूर्छा तुम्हे क्यों आई । तुम रेशमी विछाने
पर सेाने वाले हो, इस समय पृथ्वी मे क्यों
गिर गये! जिसने करोडों गाये और करोड़ों
रुपये ब्राह्मणों को दान दिये वही मेरे पति
पृथ्वीनाथ आज भूमिपर सो रहे है। हा
भाग्य ! इसने क्या तुम्हारा अपराध किया
था कि तुमने इस विष्णु तथा इन्द्र के समान
राजा को इस दशा मे पहुंचा दिया । ऐसा
कहकर वह सुन्दर नितम्बों से शोभा पाने
वालो महारानी मो पति के प्रसाध्य महा
दुःख के बोझ से दबकर मूर्छित होगई।
पिता माता दोनों को प्रनाथ की तरह'
जमीन पर' पडे हुये देखकर वह घालक
भूख से घबराकर योला । हे पिता! हे तात !
'अन्न दो परी माता अम्मा मुझे भोजनं
दे। मुझे पाही जोर से भूख लग रही है।
इसी बीच में महातपस्वी विश्वामित्र प्रा
पहुंचे राजा हरिश्चन्द्र को मूर्छित होकर
-
1

२२ -- म - - । भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। गया है। यह कहकर रानो रोने लगी राजा हरिश्चन्द्र ने डबडवाई मांखों से रानीसे कहा हे सौभाग्यवती ! गज गामिनी , देखो यह लडका तुम्हारी ओर देख रहा है । जो तुम्हे कहने की इच्छा हो कहा। रानी ने कहा नाथ ! मेरे पुत्र हो ही गया है अच्छे लोगों का मत है कि स्त्रों पुत्र पैदा करने के लिये है इससे आप मुझे वेचकर ब्राह्मणको दक्षिणा दे सकते है । यह बात सुनतेही राजा मूर्छित होगए फिर होश में आकर बहुत दुःखी है। कर विलाप करने लगे। प्यारो । यह बड़े दुःख की बात है कि तुम्ही ऐसी बातें मुझ, से कहती हो क्या. तुम्हारी मुसकाने 'मरी प्यारी बातें मुझ पापीको भूल गई हैं हे,मन्द मुसकान करने वाली प्यारी, हाँ ! क्या तुम्हे यह घात कहनी उचित थी। ऐसी बात मुह से कभी न निकालो,मै यह बात कभी नही कर सकता। यह कहकर राजा मुझे धिक्कार है ! मुझे धिक्कार है ! कहते मूर्छितही कर पृथ्वीपर गिरपदे । राजा हरिश्चन्द्र को L - । । । " , २६ । -- ।। - हरिश्चन्द्र-तारामती । पृथ्वी में मूर्छित पड़ा देखकर विलाप करती हुई रानी वाली । हाय ! महाराज । यह मूर्छा तुम्हें क्यों आई । तुम रेशमी विछाने पर सोने वाले हो इस समय पृथ्वी मे क्यों गिर गये! जिसने करोड़ों गाये शोर करोड़ों रुपये 'ब्राह्मणों को दान दिये वही मेरे पति पृथ्वीनाथ आज भूमिपर सो रहे हैं। हा माग्य ! इसने क्या तुम्हारा अपराध किया 'था कि तुमने इस विष्णु तथा इन्द्रके समान राजा को इस दशा में पहुंचा दिया। ऐसा कहकर वह सुन्दर नितम्वो से शोभा पाने वाली महारानी भी पति के 'असहय 'महा दुख के बोझ से दधकर मूर्छित होगई। पिता माता दोनों को अनाथ की तरह जमीन पर पड़े हुये देखकर वह बालक भूख से घबराकर, वोला । हे पिता! हे तात ! । अन्न दो परी माता अम्मा 'मुझे भोजन 'दे । मुझे पड़ी जोर से भूख लग रही है। इसी बीच में महातपस्वी विश्वामित्र श्रा पहुचे राजा · हरिश्चन्द्र को मूर्छित होकर -- . - .

। - A . - म - भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। पृथ्वी में पहा देखकर ठण्ढा जल छिड़क कर राजा को होश में लाकर वाले है राजा उठा, उठो, वह मेरी दक्षिणा दो, जो दूसरे ; का ऋण अपने ऊपर रखता है । उसका दुःख दिन २ बढता जाता है। ठंढे जल के पड़ने से. राजा होश में प्राये, पर सामने विश्वामित्र ने क्रोधकर के फिर राजा को मूर्छा छुड़ाई और राजा से वोले कि यदि तुम्हें धर्म का कुछ भी ध्यान है तो मेरी दक्षिणा दैदो। सत्य ही से सूर्य तपता है । सत्य ही. से पृथ्वी ठहरी है सत्य ही परम घर्म है सत्य ही से स्वर्ग मिलता है । हजार अश्वमेध यज्ञ एक सत्य के साथ तुलापर रखकर ताला गया तघ हजार अंश्वमेघ से एक सत्य हो भारी हुवा अथवा हमे इस' धर्मोपदेश करने से क्या मतलब रे अनार्य ! पापी ! कर'! झूठे राजा ! तेरे सामने मैं कहता हूं यदि तू आज मेरी दक्षिणा न देगा तो मैं सूर्य के अस्त होने पर तुझे अवश्य शाप दूंगा यह कहकर विश्वामित्र चले गये । उनके ऐसे - - - २५ - - - . 1 . - हरिश्चन्द्र-तारामती। कठोर वचनों से दुःखित होकर गरीय और अधम बने हुये राजा. शहुत ही डरगये । रानी ने फिर कहा महाराज ! मेरा कहना करी! नहीं ता ब्राह्मण के शाप की आग से जल कर मर जानोगे। जम रालो ने राजा से पार घार कहकर बहुत प्राग्रह किया तो उसने कहा प्यारी ! तुम्हारे कहने से मैं निर्दय होकर यह , काम करूंगा । बडे २ निर्दय भी यह काम नहीं कर सझते । देखू ऐसे बचन मेरे मुह से निकल सकेंगे या नहीं। राजा अपनी रानो से ऐसा कहकर घबराये हुये नगरमे चले गये और नेत्रों में 'अणु प्रागये । गला रुक गया था.! जी रोककर राजा अ चे स्वर से कहने लगे हे नगर निवासियो ! मेरी बात सुनो !'मुझे ध्या पूछते हो कि कोन हो सुना ! मैं कसाई निर्दय राक्षस हूं बडा कठोर हूं। घड़ा पापी हूँ। और एखी को बेचने के लिये यहां आया हूं। पर निर्लज्जतासे मर नहीं जाता हूं यदि किसी को उसे दासो बनाने को इच्छा हो तो मेरे प्राण रहते बोलो . - - --- - २४ T -- . भारत का नारी इतिहास दुसरा भाग। पृथवी में पड़ा देखकर ठण्ढा जल छिडक कर राजा को होश में लाकर बोले हे राजा उठो, उठो, वह मेरी दक्षिणा दो, जो दूसरे. का ऋण अपने ऊपर रखता है । उसका दुःख दिन २ बढता जाता है। ठंढे जल के पडने से. राजा होश में आये, पर सामने विश्वामित्र ने क्रोधकर के फिर राजा की मूर्छा छुड़ाई और राजा से बोले कि यदि तुम्हें धर्म का कुछ भी ध्यान है तो मेरी दक्षिणा दैदो। सत्य हो से सूर्य तपता है । सत्य हो से पृथवी ठहरी है सत्य ही परम धर्म है सत्य ही से स्वर्ग मिलता है। हजार अश्वमेध यज्ञ एक सत्य के साथ तुलापर रखकर ताला गया तब हजार अश्वमेघ से एक सत्य हो भारी हुवा अथवा हमे इस धर्मोपदेश करने से क्या मसलय रे अनार्य ! पापी ! कर ! झूठे राजा ! तेरे सामने मैं कहता हूं यदि तू आज मेरी दक्षिणा न देगा तो मैं सूर्य के अस्त हेनि पर तुझे अवश्य शाप दूंगा यह कहकर विश्वामित्र चले गये । उनके ऐसे - -- ।

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-
हरिश्चन्द्र तारामती
ऐ राजपुत्र ! मुझे मत छू मैं आप छूने
लायक नहीं हूं। यह प्यालक माता को जाते
देखकर मामा छहता पीछे दौसा । उसको
माता देखकर ब्राह्मण ने उसे लात से मारा
तो मी उस बालक ने पीछा न छोडा। रानी
ने ब्राह्मण से कहा हे नाथ ! खाप कृपाकर
'इस बालक को भी खरीद लीजिये मै बिक-.,
चुकी हूं तो मो इस के बिना कोई काम नहीं
कर सकती ! मुझ जी' प्रमागिनी दासी पर ,
छपाकर इस लड़के को मेरे साथ करदीजिये
जिस प्रकार गाय को अपना बछडा प्यारा
होता है उसी प्रकार मुझ छामागिनी को यह
। यह धन लो मुझे घाणक दे
दो। धर्मशाल जानने वाले मनुष्यों ने खो
पुरुप का दाम सौ हजार लाख घा कोर तक
ठहराया है। ऐसा कहकर वह धन राजा के
बलकलको छोरमें धाँधकर 'रानो सौर बालक
'दानों को लेकर वह ब्राह्मण बलदिया छापनी
स्त्री और पुत्र को जाते देखकर राजा बड़े
दुःख से विलाप करने लगा । जिसे वायु सूर्य'
।
"
-
बालक प्यारा
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।

-
ब भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
इतने में एक बूढा ब्राह्मण आकर राजा
बोला अपनी वो मुझे दो मैं दासी पनाऊंगा
शोर तुम्हें रुपये दंशा मेरे पास बहुत धन है
मेरी ली बहुत ही सुकुमार है घर को कोई
काम नहीं कर सकती इससे इसे मुझे देदो ।
सपनी स्त्री के काम करने को, योग्यता उमर
रूप और स्वभाव अनुसार उचित मूल्य लेकर
अपनी यो मुझे वेदो। ब्राह्मण को ऐसी यात'
सुनकर राजा हरिश्चन्द्र की छाती दुःस्व' से
फटने लगी पर वह प्रालण से कुछ न बोछ
सके । वह ब्राह्मण राजा के पलवल की छोर
में रुपये की गठडी बांधकर रानी की चोटी
पकड़कर खीचर ले चला। अपनो माता
को जाते देखकर चालक रोहिताश्व अपनी
मा का ध्याचल पफरकर रोने लगा। दोनो
मोर की खेंचा लेधी से उसके सिर के बाल
बिखर गये। रानी ने ब्राह्मण से कहा ! हे
भगवन् ! मेरी 'चोटी छोड़ दीजिये एक बार
मैं अपने बच्चे को फिर देखलू फिर इसका
दर्शन दुर्लभ हो जायगा । ऐ बच्चा मा इधर .
देख मैं तुम्हारी माता इस ब्राह्मण की
टासी बन गई
.
-
-

२६ - कुछ न सनू गा। - हरिश्चन्द्र तारामती। हरिश्चन्द्र ने कहा 'भगवन् ! मैं और भी दक्षिणा दूंगा कुछ समय तक धैर्य रखिये इस समय मेरे पास धन नहीं है । यह रुपये तो स्त्रो शोर पुत्र का घेचकर मैंने आप को दिये है। देखो एक पहर रह गया है। उतनी ही देर तेरी बाट देखूगा फिर ऐसी कठोर याते पाजा से कहकर विश्वामित्र वह धन लेकर तुरन्त ही वहाँ से चले गये। उनके चले जाने पर राजा भय सथा शोकके समुद्र में डू गया। फिर सय की ओर देख कर गर्दन नीची करके पड़ें जोर से चिल्लाशर कहने लगा। जो मुझे खरीदकर दास बनाना चाहे वह सूर्य के रहते २ कहे । इतने मे धर्म चाण्डाल झा रूप धरकर घाया। उसकी देह से दुर्गन्धि निकल रही थी। अङ्ग अङ्ग में विकार था देह का चमडा बहुस रूखा था दाढो मेछि बहुत बढ़ गई थो बड़े 'बहे दात . बाहर निकल आये थे। उसे देख घृणा होती थी । वह काला और उसका पेट बहुत लम्बा था। पीली और डरावनी माँखे थी - ५ । - .

1 1 7 • भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। चन्द्रमा तथा और कोई बाहर के मनुष्य देख पाते थे वही आज दूसरे को दासी 'धन गई । सूर्यवंश में उत्पन्न और प्रत्यन्त सुख- मार मेरा बालक साज विक गया। मेरे जैसे नीच को धिक्कार है, हा प्यारी ! हा पुत्र ! मेरी नीचता थे तुम दोनों इस दशा को पहुंच गये और मैसर नहीं गया । इससे मुझे धिक्कार है । राजा इस तरह विलाप करर हे थे कि वह नालण दोनों को लेकर शीघ्र बड़े बड़े वृक्षों और घरों मादि को नोट मे होकर राजाकी दृष्टि से बाहर होगया पीछे विश्वामित्र साकर राजा से रुपये मांगने लगे हरिश्चन्द्र ने वह धन उन्हें दे दिया। खी को बेचकर पाया हुवा धन विश्वामित्र की समझ में बहुत थोडा था इस कारण वह कोधकर के शोकाकुल राजा से बोले । हे, क्षत्रिय ! यदि तू इतनी ही दक्षिणा को हमारी पूरी दक्षिणा एसकता है तो तुरन्त हो तू हमारा बल देख . मेरे किये हुये तप, असल ब्राह्मणत्व । उग्र प्रभाव और शुद्ध वेद पाठ का तेज देख । - १.

,
हरिश्चन्द्र तारामती।
રદ
। हरिश्चन्द्र ने कहा भगवन् ! मैं और भी
दक्षिणा दूंगा कुछ समय तक धैर्य रखिये इस
समय मेरे पास धन नहीं है। यह रुपये तो
स्त्री और पुत्र में बेचकर मैंने आप को दिये
है। देखो एक पहर रह गया है। उननी ही
दर तेरी घाट देखूगा फिर कुछ न सुनू गा।
ऐसी कठोर बातें राजा से कहकर विश्वामित्र
'वह धन लेकर तुरन्त ही वहाँ से चले गये ।
उनके चले जाने पर राजा भय तथा शेकके
समुद्र में डूप गया। फिर · सय की ओर देख
कर गर्दन नीधी करके घडे जोर से चिल्लाक्षर
कहने लगा। जो मुझे खरीदकर दास बनाना
चाहे वह सूर्य के रहते २ कहे। इतने मे धर्म
'चाण्डाल का रूप धरकर छाया । उस ही देह
से दुर्गन्धि निकल नहीं थी। अङ्ग अङ्ग में
विकार था देह का चमडा बहस रूखा था
दाढो मेछि बहुत बढ़ गई थो बड़े बड़े दांत
मुंह से बाहर निकल आये थे। 'उसे देख
घृणा होती थी। वह काला और उसका पेट
बहुत लम्मा था। पीली और डरावनी आँखे यी
।
,
7
-
-
។

-
२६
.
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
चन्द्रमा तथा और कोई बाहर के मनुध्य न
देख पाते थे वही आज दूसरे को दासी धन
गई । सूर्यवंश से उत्पन और अत्यन्त सुकु-
मार मेरा बालक साज विक्ष गया। मेरे जैसे
नीच को धिक्कार है, हा प्यार ! हा पुत्र !'
मेरी नीचता से तुम दोनों इस दशा को पहुंच
गये और मैं मर नहीं गया | इस से मुझे
धिकार है । राजा इस तरह विलाप कर रहे
थे कि वह नाम्हण दोनों को लेकर शीघ्र बड़े
बड़े वृक्षो और घरों शादि की ओट मे होकर
राजाको दृष्टिरो बाहर होगया पीछे विश्वामित्र'
भाकर राजा से रुपये मांगने लगे हरिश्चन्द्र
ने वह धन उन्हें दे दिया। स्त्री को बेचकर
पाया हुवा धन , विश्वामित्र की समझ में
बहुत थोडा था इस कारण वह क्रोधकर के
शेषकाकुल राजा से बोले । हे क्षत्रिय ! यदि
तू इतमो ही दक्षिणा को हमारी पूरी दक्षिणा
समझाता है तो तुरन्त हो तू हमारा धल देख
मेरे किये हुये तप असल ब्राह्मणत्व उग्र
प्रभाव और शुद्ध वेद पाठ का तेज देख ।
-
J

।
३१
1
।
-
-हरिश्चन्द्र.तारामती।
जल जाना अच्छा पर चाण्डाल के वश में
रहना अच्छा नहीं इस प्रकार दोनेा से बात
पीत हो ही रही थी कि विश्वामित्र आ
पहुंचे। वह महान क्रोध से आंखे लाल करके
राजा से वाले। यह चाण्डाल यदि तुम्हे
खरीदने के लिये पूरा धन देना है तो क्यों
नही इस के हाथ बिककर मेरी सारो दक्षिणा
चुकाते। हरिश्चन्द्र ने कहा-भगवन ! मैं
अपने को सूर्यवश में उत्पन्न समझनाहूं तो
कैसे धन के लालच से चाण्डाल की नौकरी
करू । विश्वामित्र ने कहा कि यदि तू इसी
समय चाण्डाल के हाथ पिककर मेरी दक्षिणा
नहीं चुका देगा तो मैं तुरन्तहो अवश्य शाप
दे दूंगा। यह बात सुनकर राजा चिन्ता में
डूब गये। और घबराकर प्रसन्न हूजिये
प्रसन्न हूजिये कहते हुये विश्वामित्र के पैरों
पर गिर पड़े। और बोले कि हे षिप्रर्पि ! मैं
आपका दास हूं आर्त हूं। मय से कातर हूं।
और विशेष कर आपका सब काम करने
घाला सेवक हूं। भाप मुझ पर प्रसन्न हों।
-
1
-

३० - 1 १ । মন জ্বা লা নিছা দুম্বা মান उसको बोली धडो कठोर थी बहुत से पक्षी मारकर एक हाथ में खटकाये हुये था उस के गले मे मुण्डों की माला लटक रही थी दूसरे हाथ में आदमी को खोपडी थी उसका मुंह पहुत बड़ा था सूरत डरावनी थी. उस का मुंह बहुत उम्या था यह बहुत जोर जोर से बोलता था साथ में वहुन से कुत्ते थे हाथ मे बढो भारी लाठो थी।', अत्यन्त विकराल भयावना वह चाण्डाल' राजा के पास जाकर बोला मैं तुम्हे खरीदना चाहता हूं तुम तुरन्त ही अपना दाम बताओ धोडा यो कितना देने से तुम मिलेागे। उस डरावनी, मूर्ति और कठोर बचन वाले चांडाल को देखकर राजा ने पूछा तुम कौन हो । चाण्डाल ने जवाब दिया कि मैं चाण्डाल हूं मुझे काशो के लोग "प्रधीर", कहते हैं। में वध्य का वध करने वाला और मरे हुये प्रादमियों का कफन लेने वाला हूं, हरिशचन्द्र ने कहा मैं चाण्डाल का दास नहीं बनूगा यह यात बड़ी निन्दा की है । शाप को माग से - - क -- T हरिश्चन्द्र-सारामती। - का दास होकर पाप दशा में पहा हूं। राज्य नाश हुमा, मित्र छूट, स्त्री पुत्र बिकगये और अन्त' को मै चाण्डाल हुप्रा । हाय ! दुःख पर दुःख पड़ते है । राजा दरिद्र होकर इस तरह नित्य हो अपने प्रिय पुत्र तथा प्राणप्यारो यी 'की याद,करते रहे पीछे राजा हरिचन्द्र स्मशान मे मुझे का। कफन लेने के लिये रखे गये । चाण्डाल ने उन्हे प्राज्ञा दी तुम कफन लेने के लिये उस मरघट मे सदा रहकर मुर्दो की ओर देखते रहो । मुर्दो के कफन भादि से , जो धन मिले उसका, छटा हिस्सा राजा को देना होगा । तीन हिस्से 'मुझे, शेप दो भाग तुम्हारे वेतन में तुम्हें मिलेंगे। इस प्रकार समझाकर राजा को काशी के दक्षिण दिशा के मरघट मे भेज दिया वहां हजारों गीदड डरावनी चिल्लाहट मचा रहे थे । मुरदों की, खोपडियां पड़ी थीं दुर्गन्ध फैल रही थी। चारो ओर घुमा छारहा था। पिशाच भूत वैताल ढाकिनी और यक्ष नाच रहे थे, गिद्ध चील और 4 म 4 - - 7 ।

- ३२ . . . भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग । चाण्डाल के संग रहना बहा दुःबदायो मालूम पहता है। शेष रुपयो के लिये मैं आपका दासः अनूगा ! आपकी .प्राज्ञा में रहूंगा आपका सथ काम करूंगा विश्वामित्र ने कहा यदि तू मेरा दास बन गया तो मैं तुझे इसो चाण्डाल के हाथः एक अरमा रुपये लेकर वेष 'देता हूं। उस डोम ने बहुत ही प्रसन्न मन से रुपये विश्वामित्र को देश राजा को पांच लिया और अपने घर को चला ! राजा स्त्री पुत्र के वियोग से माहुत ही फातर था। बड़ा ही दुःखी था। चाण्डाल ने, उसके लकडी मारी इस वह और भी व्याकुल है। गया। पीछे हरिश्चन्द्र चाण्डाल के घर रहने लगे। वह सवेरे दोपहर और सन्ध्या को सोचता मेरो दीन रानी अपने दोन पुत्र के सामने बैठकर , सोचतो होगो कि राजा धन उपार्जन करके ब्राह्मण को इससे अधिक धन देकर हम दोनों को छुडालेंगे ! पर हाय मृगनयनी नहीं जानतो है कि मैं मो चाण्डाल ऊपर से उस से । -

।
हरिश्चन्द्र-तारामती।
कर सिमसिमकर रही थी। कहीं चिता में
मुर्दै भाधे जलकर काले हो गये थे। उनके
दांत विखर गये थे मानों वह अपनी देह को
दशा देख कर चिता में पड़े. हस रहे हैं। प्राग
की चरचराहट गिटु की चीख कुटुम्बियों
की रुलाई और गालो का आनन्द बढ़
रहा था । भूत वैताल पिशाच और राक्षसों
के गाने का शब्द प्रलय की भॉति घोर गर्जन
करता था भै स गायों के गोवर की ढेरी लगी
घी कही चिता की राख को देरी मे प्राग
धुक धुंसकर रहो ' यो । अनेक प्रकार के
घलिदान माला दीप आदि खाने को घिरे
हुये काध्वों के डरावने कोलाहल से यह
स्मशान ठोक नरक ही बन रहा था। जाग
की घरघराहट गीदडों का अमङ्गल शब्द
और अनेक प्रकार के अशुभ कोलाहल से
वहां भय को भी भय होता था।
राजा हरिश्चन्द्र वहां रहकर दुखी मन ते
सोचने लगे हा मेरे दासा ! मेरे मन्त्रियो !
मेरे ब्राह्मणो ! वह मेरा राज्य कहां चला।
-
-

.
-
भारत का नारी इतिहास दुसरा भाग ।
कुले इधर उधर घूम रहे थे। हड्डियों की
ढेरो लगी थी जहा जाते ही मय शोक महा
मोह और कई तरह की शंकायें होने लगती
थी। चारों ओर हाहाकार मच रहा था,
जिस के सुनते ही करूणा हो पाती थी
विराग का क्षय और ज्ञान का नाश हो जाता
था। ब्रह्मा ने पापियों के लिये प्रगट, दण्ड
का स्थान ही मानां धना रखा था लोक गुरू
विधाता ने लोककी शिक्षा के लिये यह कराल
काल का क्रीड़ा घन गया था। जहां, मूखों
को डर होता था ज्ञानियों को शान्ति मिलती
थी वहाँ शोक दुःख और सुख सब का नाश
हो जाता है । मरे हुये आदमियों के परिवार
के लोगों की रुलाई सुन पडतो थी। हा
वेटा ! हा मित्र ! हा भाई। हा.' प्यारे ! हा
प्रिय ! हा पति ! हा प्यागे! हा बहिन!
हा माता ! हा पिता! हा पोते ! कहाँ
चले गये।
इल प्रकार रोने की अवनि कानों में पढ़
रही थी। कहीं चिता में मांस मेद मज्जा जल
!
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।
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-
।
-
हरिश्चन्द्र-तारामती।
कर सिमसिमकर रही थीं। कही चिता में
मुर्दै प्राधे जलकर काले हो गये थे। उनके
दांत विखर गये थे मानो वह अपनो देह की
दशा देखकर चिता मे पडे हस रहे हैं। प्राग
को चरचनहट गिद्ध की चीख कुटुम्चियों
की रुलाई और गालों का आनन्द बढ़
रहा था । भून वैताल पिशाय और राक्षस
के गाने का शब्द प्रलय की भाँति घोर गर्जन
करता था मैं गायों के गोवर की देरी लगी।
भी कही चिता को राख को ढेरी मे भाग
धुक धुंशकर रही थी। अनेक प्रज्ञार के
धलिदान माला दीप आदि खाने को घिरे,
हुये काव्वों के डरावने कोलाहल से वह
स्मशान ठोस नरक ही बन रहा था। माग
की घरघराहट गीदडों का अमङ्गल, शब्द
और अनेक प्रकार के अशुभ कोलाहल से
यहां भय को भो भय होता था।
राजा हरिश्चन्द्र वहा रहकर दुखी मन से
सोचने लगे हा मेरे दासा ! मेरे मन्त्रियो !
मेरे ब्राह्मणो ! वह मेरा राज्य कहां चला
.
+

हुए रहने लगे,
-
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।
२६ । भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।।
गया। हा प्यारी तारा ! हा पुत्र रोहताश्व !
'विश्वामित्र के दोष से मुझ मन्दभागी को
छोडकर कहां गये । इस तरह सोचते और
चाण्डाल की बात याद रखते
उनका रूपमलिन हो गया समूची देह रूखो हो'
गई घाल घढ़गये दुर्गन्ध आने लगी हड्डियां
निकल आई। हाथ लाठी लेकर काल को,
मूर्ति धारण कर मरघट में इघर उधर दौडने
लगे और कहने लगे कि इस मुर्दै से इतने
रुपये मिले, इस मुर्दैसे इतने मिलते है । और
इस मुर्दै से इतने मिलेंगे। इस में इतना मेरा
माग है इतना राजा को देना होगा और
इतना मेरे स्वामी चाण्डाल का है ! इस तरह
मुर्दो का कर लेते देते उन का जीवन बीतने
लगा। कुछ दिनों में राजा चाण्डाल ही धन
गये। पुराने कपड़ों को गुदडी बनाकर मोढे
। हुये रहते थे और अपने शरीर में चिता की
शाख लपेटते थे। अनेक तरह चर्बी मेद मज्जा
यादि का लेप हाथ पैरों में लगाते थे। मुर्दो
के साथ आये हुये चावलों का मात बना
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।

11 - - । - हरिश्चन्द्र-तारमती। र पेट भरते थे मुद्दों के शरीर से मालायें कर अपने सिर पर लपेटने थे। रात दिन नागते थे और हाय हाय करते इधर उधर दे फिरते थे । यो धारह महीने बीत गये तो सौ वर्ष के समान कटे, ' महाराज एक देन अपने घर के लोगों के लिये शोक करते थे. रुक्ष शरीर भूखे प्यासे दुःख से सो गये। और पड़े पडे स्वप्न देखने लगे। चाहे स्मशान मे सोने का अभ्यास होने के कारण चाहे देवपलसे उन्होंने देखा कि अन्य ड धारण कर के गुरु को दक्षिणा देके धारह प दुःख भाग के मुक्ति होगी। पीछे उन्हो । देखा कि मानों स्वयं चाण्डाली के गर्भ में - वहां सोचने लगे कि इस पाएटाली के र्म से निकल कर मै दान धर्म करूंगा। छे वह चाण्डालो के गर्भ से जन्मे तय मशान के मुर्दो को जलाने मे निरन्तर रस ये। जब वह चाण्डाल बालक के वेश में गत वर्ष के हुये तो एक गुणथान ब्राह्मणकी आश उस के कुटुम्पी स्मशान में लाये । उम्र - ve A - भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। सात साल के चाण्डाल घालक ने मुर्दै जाने, का कर न देने के कारण उन ब्राह्मणों का बड़ा अपमान किया। उन्होंने कहा कि विश्वामित्र ने कैमा अशुभ पाप भरा काम किया। रे पापो ! तू इसी प्रकार के अशुभ । काम किया कर! तू पूर्व जन्म में राजा हरि- श्चन्द्र था ब्राह्मण का ऋग न देने से तेरा पुण्य नाश हुधा । और विश्शमित्र के शाप से तूने चाडाल के घर मे जन्म लिया जय वह ब्राह्मण मुों का कर देने में असमर्थ होकर श दाह न कर सके ते उन्हे ने बिगड़ कर शाप दिया कि रे नराधम ! तू 'प्रभो घेर नर्क मे चला जा । ब्राह्मण के मुई से यह वाक्य निकलते हो, राजाने देखा कि अत्यन्त भयङ्कर यमदून हाथ मे पाश लिये पाते हैं। ओर भी देखा कि उन, यमटूनों ने राजा को पकड लिया । तब वह बहुत दुःख से पुकारने लगा कि हा माता ! हा पिता। 'आज मेरी यह दशा हुई इस प्रकार पुकारते हो थे यम- दूतों ने उन्हें पकड़ कर गर्म तेल के कढ़ाई में है +- .

- ३८ रूपी मृत - है । हरिश्चन्द्र-तारामती। डाल दिया फिर तीखे कुल्हाडे से मारने लगे घोर अन्धेरे मे दुःखित चित्त से पीप और स्हू का भोजन करना पड़ा । अपने चाण्डाली के गर्भ के उत्पन्न हुये सात वर्ष के बालक शरीर की यह दशा , राजा स्वप्न में देखने लगे मान दिन दिन नही में भी जलना पड़ता है कमो पकना पड़ता है। कभी खिन्न और मोक्षध रहना पडता है कभी मारे जाते है कमी काटे जाते है कभी घोटे जाते है। कहीं गर्मी कहों शीत और कहीं धायु से पाहत होते है । वहां एक एक दिन सो सै। वर्ष के घराबर बीतने लगा। इस प्रकार कष्ट भोगते २ नर्क के मुह से राजा ने सुना कि उसके सौ वर्ष पूरे हो गये। लंब यमटूता ने उन्हें पृथ्वी पर पटक दिया और वहां मिष्ठा मोजी कुत्ता बने अन्त में विष्टा और उलटी खाते २ शीत से अत्यन्त क्रान्त होकर एक महोना मे प्राण त्याग दिया। तब राजा ने देखा कि उन्हें गधे की योनि मिली है। पीछे कम से हाथी बन्दर - । १ 14 4

-
है
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भारत का नारी इतिहास दूसरा-भागे ।
धकरी बिल्ली गाय भेड़ पक्षी कोड़े मछली
कछुये मुर्गे शुक सारिका और अजगर आदि
नाना प्रकार के जीवों को योनि में जन्म
लिया। इस प्रकार क्लेश भोगते हुये एक एक
दिन सो सौ वर्ष की भाँति बीतने लगा।
यो नाना प्रकार की इतर योनियों में जन्म
लेकर क्लश भोगते हुये पूरे सौ वर्ष बीतगवे
तब राजा ने देखा कि अपने कुल में जन्म
लिया और फिर राजा हुये हैं । वहां एक
खेला उसमें स्त्री पुत्र' सघ हारकर
अकेले बन के। जाना पड़ा। यहाँ देखा कि
एक सिह मुंह फैलाये उन्हें खाने को प्रोता
है । पोछे उस सिंह ने राजा को पकड़ लिया
और फाड़कर खाने लगा, ! राजा पुकारने
लगे हा रानो तारा मुझ दुःखित को छोड कर
तुम कहां जाती हो । जय राजा इस प्रकार
विलाप करने लगे तो देखा कि रानी तारा
कहती है हा 'महाराज हरिश्चन्द्र ! हमारी
रक्षा कीजिये । प्रमो ! पाप का जुये से क्या'
प्रयोजन देखि प्रापको रानी तारा पुत्र
वार जुत्रा
८
*-

। इरिश्चन्द्र-तारामती। सहित कैसी शोचनीय दशा मे पडी है। यह सुनकर राजा इधर उधर दौडने लगे और उन्हें कुछ दिखाई न दिया। राजा हरिश्चन्द्र ने देखा कि मानों स्वर्ग मे हैं । वहा म्हते रहते देखा कि दीन हीन वस्त हीन बिखरे हुये बालों वालो तारामती को कोई बल पूर्वक छीने लिये जाता है। और रानी "हा महाराज रक्षा करे।" कहती हुई पुकारती है । राजा ने और देखा यमदूत : यमराज हे शासन से प्राकाश मे स्थित हो कर कहरहे हैं कि राजा ! विश्वामित्र ने यम- राज' को कह दिया है कि आप को नर्क में बुलावे से आपको बुला रहे हैं। चलिये, यह बात सुनकर राजा इसपर रोने लगे फिर देखा कि यमदूतोंने सर्पपाशसे राजाको घांध लिया और घमोटकर ले चले यमराज कहता है कि यह विश्वामित्र का चरित्र है । स्वप्न मे राजा हरिश्चन्द्र इस प्रकार बहुत से कष्ट भागते हैं । तथापि उनके मन में किसी का अधर्म भरा विकार नहीं उठत्ता है इस प्रकार ६ - । - .

--- ३२. - 4 । भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। के क्लेश भोगते भोगते ,स्वप्न में बारह वर्ष बीत गये । तब यम के दूत उन्हें घर पूर्वक बांधकर यमराज के पास खेंच ले गये। यमराज ने उन्हें देखकर कहा हे महाराज ! यह महारमा विश्वामित्र के दुर्निवार्य कोप फा फल है । अधिक क्या वही कौशिक मुनि आपके पुत्र को भी मरवा देंगे। इस से आप मनुष्य लोक मे जाकर शेषः दुःख ‘भागिये। वहां बारह वर्ष बीतने पर आपके दुःखों की समाप्ति होगी और तुम्हारा महल होगा। यम को यह बात सुनकर दूतों ने राजा को नीचे गिरा दिया । वहां से गिरकर राजा 'भय और घघराहट से जागे। मनमें विचारने लगे कि कटे पर नमक लगाने की भाँति यह और क्या हुवा । स्वप्न में दुःख देखे उनकी तो सीमा नहीं ! मैंने जो स्वपन में बारह वर्ष बीते देखे तो क्या सचमुच बारह वर्ष बीत गये। '', राजा ने 'घबराकर पास के चाण्डाला. से पूछा क्या मेरे धारह वर्ष बीत गये किसी -- 1 7 - . . + -- ३ की ~ हरिश्चन्द्र-तारामती। १६ ने कहा नहीं प्रमी थारह वर्ष नहीं बीते । किसी ने कहा पीत गये होंगे राजा उनके ऐसे कठोर वाक्य सुनकर पहुत दुःखित हुये । 'देवताओं को शरण जाफर- कहने लगे हे देव- गण ! आप मेरी रानी तारा और मेरे पुत्र रक्षा करें सर्व प्रकार घर्म को नमस्कार विधाता स्वरूप कृष्ण को नमस्कार । जो सध से प्रष्ट पवित्र अव्यय है । उन पुराण पुरुष को नमस्कार ! हे वृहस्पति ! तुम्हें नमस्कार इन्द्र तुम्हें नमस्कार । इतना कहकर राजा हरिश्चन्द्र फिर नष्ठ स्मृति होकर रहने लगे। फिर वैसे ही मलिन -वेशी जटाधारी कृष्ण वर्ण हाथ में लाठो लिये" विहुल हो गये। स्त्री पुत्र किसी की सुध न रही। क्योंकि वह उस समय राज नष्ट होने से हतोत्साह होकर स्मशान,मे रहते थे। पीछे, हरिशचन्द्र की रानी तारामतो सांप के काटने से मरे हुये अपने पुत्र रोहिताश्व को लेकर रोती हुई उस मरघट मे आई। वहां हा बच्चा हा बेटा ! हा ! पुत्र इत्यादि 1 १ ।

१ . । HY ''. भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। कहकर चिल्लाती हुई शिर पीट पीटकर रोरही थी उसका.. মাহী सूखा हुआ हुवा, मुंह बिगड़ा हुआ ! मन बहुत घश्वराया हुवा और सिर के बाल धूलि से भरे हुये धे रानी बिलाप करती हुई बोली, 'हे राजा ! माज तुम आकर देखा जो पालक तुमने सदा चन्द्रमासा चमकता और खेलता देखा था बह कराल विषघर सांप के काटने से मर कर भूमि में पड़ा है । राजा उसकी रुलाई सुनकर दौड़े कि इछ से कफन मिलेगा। वह रोती हुई रानी को न पहिचान सके । क्योंकि वह बहुत दिनों के वियोग से इतनी दुबली होगई थी मानो उसका दूसरा जन्म हुवा 'था । रानी भी राजा को न पहचान, सकी क्योंकि पहले रानो ने भी राजा को लटकते हुये घुघुगले बालों तथा सुन्दर 'मुखले देखा था! अब राजा सूखे पेड़ के समान 'नीरस होकर कुरूप हो गये थे। राजा उस सर्प दंशिता बालक को काले कपड़े से ढका देख कर और राजाओं लक्षण उसके, शरीर मे पहचानकर सोचने लगे। जिस राजा के । - . - - -- - के - ।

। . ४५ 11 - - 1 . . हरिश्चन्द्र तारामती। कुल में यह उडका पैदा हुआ होगा वह राजा आज बहुत ही कष्ट में पड़ा होगा। हा!, कालने इसे भी मारकर उसकी सय पाशा नष्ट करदो । इसे देख अपनी भाको गोद मे पडा हुवा कमल के समान प्रांख वाला मेराघाल फ रोहिताश्व याद आता है। यदि वह जीता है तो घह मेरा प्रियपुत्र भी इतनी ही उमर का हुआ होगा । रानी विलाप करके कहने लगी हा बेटा! किस पाप से यह भयानक दुःख आकर पड़ा जिस का अन्त नही मिलता है। हा नाथ! हा गजा' मुझ दुखिया की भिना सुध लिये ही कहां चले गये है। हा देव ! राज्य का नाश हुमा, मित्रों का संग छूटा ली पुत्र 'धिक गये, राजर्षि हरिश्चन्द्र के नाश में तुम ने क्या कसर छोडी। रानी के यह वचन सुनते ही राजा उठ खडे हुये। वह समझ गये कि मेरा लहका मर गया और मेरो तो रो रही है। निश्चय यह मेरी रानी है। और यह मेरा लडका रोहिताश्व ही मरा है । । ।

- ४६ - . - - । . भारत का नारी इतिहास दुसरा भाग। ऐसे कहते हुये वहां पहुंचकर दुःखित चिससे रोने लगे और मूर्छि हो गिर पड़े। वह रानी भी अपने प्राण प्यारे पति को पहचान गई और उनको वह दुर्दशा देख विलाप करती हुई मूर्छित हो गई घोड़ी, देर पोछे दोनों को सुध हुई। वह मारे शोक के विलाप करने लगी। राजा बोले 'हा बेटा तुम्हारे नेत्र भौंहें नासिका पाठकों के विभू- षित सुकुमार मुख इस प्रकार मलिन, देख कर मेरो छाती फटती है। हा बेटा ! अब मधुर स्वरसे पिता कहता हुआ कान मेरे पास आवैगा और मैं झिसे गोदी में लेकर बेटा बेटा कहकर पुकारूँगा कौन अपनो देह में धूलि लपेटे खेलता हुवा मेरो गोद में, आकर मेरो चादर देह तथा कपड़े मैले करेगा। हा! अङ्ग २ से उतपत्र और मन तथा - हृदय को श्रानन्दित करने वाले लड़के को मैंने कुवस्तु की भांति बेच दिया। हा बेटा मैं तुम्हारा पिता घड़ा ही नोच हूं। हा ! 'देवरूपी दुष्ट सांप ने धन धान्य सहित मेरा बड़ा भारी - १३ - + 1 - --- T -- हरिश्चन्द्र-तारामती। संपूर्ण राज्य नष्ट कर के अन्त में मेरे प्यारे लडके को भी स्वालिया। प्रतिकूल माग्यरूपी सांप के काटे हुए इस छडके का मुख देख कर मैं भी घोर, हलाहल से अन्धा हो गया हूं: ऐसा कहकर उस बालक को गोद में लेकर लडखडाते स्वर से रोने लगे। और मूर्छित होकर गिर पड़े गनी ने कहा ! वाली से जान पडता है कि यह वही पुरुप सिंह विद्वानों के चित्त को प्रानन्द देने वाला हरिश्चन्द्र है इसमें सन्देह नहीं इस पवित्र कीर्ति राजा की नाक ऊचो और मागे को कुछ की हुई सी है। दांत फूल को कलियाँ के समान सुन्दर हैं। यह राजा मरघट मे क्यों माया है ! रान 'पुत्र शेक मूर्छित पति को देखने लगी प्राश्चर्यमें पड़ी हुई दोन हो पति को देखने लगी तथा पुत्र के शोक से दुःखिनी विशाल नयनी रानी अपने पति के हाथमें चाण्डाल की छडी देखकर "मैं चाण्डालिनी होगई" कहकर वेसुध होगई फिर धीरे २ होश मे - भूलकर अपने । 1 अत्यन्त - - -

४८
।
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग
आकर गद्गद् स्वरसे कहने लगी अरे मर्यादा
रहित नीच निर्दय दैव तुझ को धिक्कार है
तू ने देवता समान राजा को निय' देव
चाण्डाल बना दिया । तू राज्य का नाश करा
के मित्रो का सग छुड़ाकर खी पुत्रको विकंवा
कर भी प्रसन्न न हुवा तूने राजाको चाण्डाल
बना कर छोडा । हे राजा ! मैं क्या ' कहूं मैं
दुःख से निकल भूमि में पड़ी हूं मुझे उठाकर
पलंग पर विठाम्रो। हे राजा ! आज क्या
भाग्य बदल, गया । आज तुम्हारा छन
चवर कहां है। व्यञ्जन कहां है जिसके
चलते समय धड़े २ राजा दास बनकर अपनी
चादर से मार्ग को धूलि हटाते थे। वही
हरिशचन्द्र आज स्मशान में पडे. हैं । जहां
आदमियों की छोटी बड़ी खोपडियो के ढेर
पडे हैं मुर्दो के सिर मे लिपटी हुई मालाओं
में केश विखर कर लटकते हैं । मुर्दो की
चरबी पिघलकर भूमि पर चमड़े की चादर
सी बन गई है अधजली हुई हड्डियां जगह
जगह पड़ी है । गिद्ध सियारों की डरावनी
1
-
-

हरिश्चन्द्र-तारापती।
चिटालाहट से छोटी छोटी चिडियां उड गई
हैं । चिता के 'धुंये से चारो , शोर कालिमा
छागई है। खून और मेद मज्जा पीकर
निशाचर मानन्द से नाच रहे है ऐडी शुद्ध
भूमि मे राजा अकेले भटकते फिरते हैं ऐसा
कहकर सैकडों शोक से भरी हुई रानी राजा
फी : गरदन से लगकर छड़ी करुणासे
रोने लगी।
हे राजा ! यह मै स्वप्न देखत्तों हूं पा सत्य
आप कृपाकर ठो ठो बताइये मेरी तो
बुद्धि ठिकाने नही। यदि यह सत्य है तो हे
धर्मज्ञ ! मै जान गई कि धर्म कुछ सहायता
नही करना और देवता तथा ब्राह्मणो की
पूजा एवं धर्म पूर्वक पृथ्वो का पालन करना
व्यर्थ ही है । न धर्म है न सत्य है न दया
और न क्षमा है कुछ भी काम नही छाता है
हा ! तुम से धर्मात्मा का राज्य गया ! रानी
सुनकर लप्त सांस लेकर
अपने चाण्डाल होने की सघ बातें सुनाई।
पुत्र शोक मिहला रानी ने भी उत्तप्त साँसे
यह बात
राजा ने
-

। - %D । 1 ५०, भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। लेकर दुःख भरी दोन वाणो से पुत्र मरण की धात कहीं। राजा ने कहा हे प्यारी! 'प्रयं यह कठिन दुःख सहा नहीं, जाता । हा.कष्ट मैं कैसा प्रभागा हूं कि मेरों देह भी अपने वश नहीं है यदि मैं चाण्डाल की आज्ञा लिये बिना चिता में जल . जाऊ तो फिर चाण्डाल के घर में पैदा होकर चाण्डाल का दास धनना पडेगा अथवा नरक मे पडकर: कीडे खाने वाला, जीव 'बनूगा । पीव मज्जा चर्या मेद आदि से भरे नरक या वैतर्णी में डूब जाऊंगा । या महा गैरव में डालकर सपाया जाऊंगा या प्रसिपत्रवन में जाकर बडी कठोरता से काटा जाऊंगा। ऐसे' दुःख, समुद्र में पड़कर मर जाना ही पार होना है यह एक लड़का हम लोगों का वंश चलाने वाला था वह भी मेरे अमाग्यरूपी जल के वेग से उसी दुःख समुद्र मे डूग्न गया मैं ऐसा दुःख पाकर भी पराधीन होने के कारण प्राण भी नहीं त्याग सकता। अथवा जब आदमी बड़ा दुःखित हो जाता हैं तध पाप को कुछ । । , -- 1 - । । - - हरिश्चन्द्र-तारामती। ना भी नहीं गिनता । पक्षी होने में वह दुःख । नहीं है और अखिपत्रपन में मी वह कष्ट । नहीं है, बैतरणी मे भो वह दुःख नहीं हैं। जेो दु.ख पुत्र के मरने में है । मैं अवश्य अपने पुत्र की पुत्र को घधकती हुई घचकती हुई चिता में जल कर मर जाऊगा । प्यारी! मेरे अपराध को- क्षमा करना। हे मन्द मुसुझाने वाली प्यारी, मै तुम्हें प्राज्ञा देता हूं, तुम ब्राह्मण के घर लोट जाओ मेरा बघन माना । यदि मैने दान हवन किया हो और अपने पड़ों को प्रसन्न किया हो तो अवश्य ही स्वर्ग मे तुम से और पुत्र मिलूगा । इस जन्म मे इम अभिप्राय की सिद्धि की सम्भावना नहीं रही । अथवा तुम भो मेरे साथ उसी मार्ग को चलो जिस से पुत्र गया' है । हे पवित्र हास करने वालो ! मैने यदि कमी हसी मे भी तुम्हे अनुचित धारा कही हो तो उसे क्षमा करना यहो प्रार्थना है ! हे कल्याण ! अपने को रानी समझकर उस ब्राह्मण का, भी' अनादर मत करना। से - - - - - L - -- - । M भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। खध्य तरह 'देवता की भांति उसको सेवा करना। रानी ने कहा महाराज मुझ से भी घर दुःख सहा नहीं जाता इससे मैं भी तुम्हारे ही साथ अपने पुत्र की चिता में जल जाऊंगी। दोनों एक हो', साथ रहकर स्वर्ग और नर्क भोगे । राजाने कहाच्छा पीछे राजा ने 'चित्ता नाकर उसपर अपने लड़के को रक्खा और रानी सहित हाथ जोर कर परमात्मा ईश्वर वालुदेव, परमेश्वर, को स्लरण किया । उस समय इन्द्र धादि देव धर्म को नागे करके वहां कटपट मा पहुंचे वह सब बोले हे राजेन्द्र सुना यह · साक्षात् पितामह है यह भगवाल, धर्म है । यह साधय- माण है और अनेक देवताला माहित वह विश्वामित्र जी मो पधारे है । जिनका तीनों लोकों में कोई मित्र नहीं है । प्राज यह सच तुम से मित्रता करने और तुम्हारा मनोरथ पूरा करने साये है । पोछे धर्म इन्द्र और विश्वामित्र राजा के समीप पाये धर्म ने कहा. राजन ! ऐसा साहस मत करो । - १ 1

तुम्हारा स्नो
हरिचन्द्र-तारामती।
मैं धर्म हूं तुम्हारी सहन शीलता इन्द्रिय
दमन सत्य प्रादि गुणसे प्रसन्न होकर तुम्हारे
पास आया हूं। इन्द्र ने कहा है महाभाग
राजा हरिश्चन्द्र ! मै इन्द्र हूं तुम्हारे पास
प्राया,हूं तुम
और
नेतात
लोक जात लिये। हे राजा ! अपनी स्त्री
श्रीर
पुत्र के सग अपने कर्म से जीने हुये
स्वर्ग मे चलो जो दूसरे के लिये दुर्लभ है ।
फिर इन्द्रदेव ने चिता के पास खड़े होकर
मृत्यु का नाश करने वाले अमृत' को वर्षा
की, फूलो' को वर्षा होने लगी देवतागण
दुन्दुभी' यजाने लगे। तब सब से देखते २
सुकुमार रोहिताशा स्वस्थ होकर चिसा से।
उठ खडा हुवा । उसका शरीर खिला
हुवा
था सब इन्द्रियां सथा मन प्रसन या । राजा
शानी नेहप से को उठाशन गले लगाया
और दिव्य वख छोर मालाये धारण कर के
पत्नी सहित शोमा पाने लगे। और स्वस्थ
होकर अत्यन्त मानन्दित्त हुये। फिर इन्द्र,
ने कहा कि महाभागे' हरिश्चन्द्र ! आप स्वी

- V भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग पुत्र सहित परम सद्गति लाम करेगें इससे अपने कर्मों से जोते हुये स्वर्ग में स्त्री पुत्र सहित चले। इस प्रकार सत्य और धर्म से हरिश्चन्द्र को स्वर्ग मिला । प्यारी बहिनों ! देखो इस प्रकार धर्म की रक्षाकर सत्य को अपना हितू समझकर हरिश्चन्द्र और उन की प्यारी स्त्री ने कैसे कैसे कष्ट सहकरे स्वर्ग ध्राम पाया अतएव मनुष्य मात्र को इसी. प्रकार अपने इस लेाक और परलोक सुधार के लिये धर्म पर दृढ़ रहना चाहिये । . - १ - 11 जरुरी बात। भारत का नारी इतिहास । इस पुस्तक का तीसरा भाग भी शीघ्रही छप- कर तैयार होगा जो अमी से ग्राहकों में नाम लिखालेगे, उन्हीं को मिलेगा क्योंकि पुस्तक थोड़ी ही छापी जावेगी। पता:-यशोदादेवी पोस्ट धक्स नं० ४ कर्नलगञ्ज इलाहाबाद 1 म .

1
लोपामुद्रा
में
-
-
.
(२)
ह विदुषी सतो प्राचीन समय
य विदर्भराज के घर जन्मी थी
Rang प्राचीन समय में पढ़नेयोग्य अवस्था
होने पर पुत्र ध पुनी दोनों, लोपामुद्रा को
भी उसके पित्ताने विद्याध्यन कराया वह घडी
विदुपी और सदगुणी हो गई । लोपामुद्रा के
पिता को · स्मृद्धि और शक्ति बहुत थी
परन्तु वह अन्य राजकन्याओं को मांति न
तो अपने पास बहुत सी, दासी, रखती थी
और न अपना शरीर हीरे मोती जढे सुवर्ण
के, अलंकारों और रेशमी वस्त्रों से मासूपित
रखती थी। उसको विशेष रुचि सदैव विद्या
पर रहती थी। यह अपना अधिक समय
विद्या की वृद्धि मे हो व्यतीत करती थी और
अपना जन्म इसी से सफल समझती थी।
1
,
--

५४ - भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। पुत्र सहित परम सद्गति लाम , करैगें इससे अपने कर्मों से जोते हुये स्वर्ग में स्त्री पुत्र सहित चला। इस प्रकार सत्य और धर्म हरिश्चन्द्र को स्वर्ग मिला। प्यारी बहिनों! देखा इस प्रकार धर्म की अपना हितू समझकर हरिश्चन्द्र और उन की प्यारो स्त्री ने कैसे कैसे कष्ट सहकर स्वर्ग धाम पाया अतएव मनुष्य मात्र को इसी प्रकार अपने इस लोक और परलोक सुधार' के लिये धर्म पर दृढ़ रहना चाहिये । रक्षाकर, सत्य को " -- - - का S - जरूरी बात ।। भारत का नारी इतिहास । इस पुस्तक का तीसरा भाग भी शीघ्रही छप- कर तैयार होगा जो अभी से ग्राहकों में नाम लिखालेंगे उन्ही को मिलेगा धयोंकि पुस्तक थोड़ी ही छापी जावेगी। पता:-यशोदादेवी पोस्ट बक्स नं० ४ कर्न जगञ्ज इलाहाबाद F , - लोपा मुद्रा - - + प . + सती. लोपामुद्रा पसि को आज्ञानुसार चलती थी। उनकी छाया की सरह सदैव साथ रहमी मीर अपनो इच्छा से कोई काम नहीं करती थी पतिको भोजन करा देती तथ पीछे आप करती, पति से जाता तब भाप सेती जीर'उससे पहिले उठ बैठती । पति कोई बात फहमा तो धैर्य के साय सुनती प्रोर विचार पूर्वक उचित उत्तर देती। पति का योग्य सम्मति और सहायता देती रहती। कमी असन्तुष्ट नहीं होती । उन लौर कर्म से पति सेवा का जो ब्रत धारण किया उस का पालन, जीवन पर्यन्त करती रही। उस के धयान, ज्ञान का विषय ईश्वर और पति ही था। उस ने अपने पति से सत्यज्ञान प्राप्त किया या श्रीरं घेर 'सपश्चर्या की थी। यह वेदों की पूरी जानने वाली थी और वेदोंक प्राचार्यों में उसकी भी गणना है।' सती लोपामुद्रा के दृढस्यु नाम का एक महातेजस्वी पुत्र जन्मा था। बालकपन मे ईधन इक्ट्ठा किया करता था इस से उसका नाम-इध्मवाह पड़ा था। रामायण से पता लगता है कि अगस्त ऋपि का प्राश्नम -- - * - । ८

-
॥
भारत' का नारी इतिहास हमरा भाग।
वह विक्षासम्बन्धी ही विचार करती रहती
थी। लोपामुद्रा ने राजस्मृति बाले बर से
विवाह न करके विद्या और तपस्मृद्धि वाले
महाविद्वाल, तेजस्वी, सद्गुणो, और तपस्वी
महात्मा मित्रावरुण के पुत्र गस्त्य ऋषि
के साथ विवाह किया उस ऋषि के पास
कुछ स्मृद्धि यो वह पलाश की लकड़ी का
दण्ड, पानी पीने का कमण्डलु, एक घनमें
झोपड़ी और पहरने के लिये लफल · वस्त्र
थे तो मी लोपामुद्रा ने राज जैसवको तुच्छ
समझ कर इसी में सुख माना । अपने पिता
से लोपामुद्रा को जो घढियो २ बस्नालकार
आदि मिले थे उनको दूर फेंककर अपने पति
के समान घलकल बच धारण किये। सिंह,
चीते, रीछ और भेडिये प्रादि हिसक पशुओं
से परिपूर्ण बनमे अपने पति के साथ रहने
में पूर्ण सुख और प्रानन्द समझकर उसके
पीछे पीछे चलो और वहां पहुंच कर अपने
स्वामी की सेवा में एक रूप से दिन रात
'रहने लगो।
।
।
।
1
--

। লাহাই १ - । (३) राधाई तथा पृथ्वीराजको शूरता ता भीर बीरता की प्रशसा राजपूत से गाये जाते हुए - कितनेही एक गीता तथा कहानियों में प्रसिद्ध है । इसका जन्म सोलहवी शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ था । ताराबाई राय सूरतान बिदनौर बाले को पुनी थी, कि जो राजपूताने में के एक छोटे राज्य का राजा था। गुजरात की राज- घानी अनहल, पाडा के सोलंकी घंश के, राजामों का शह एक वक्षर था । इसके पुरुषा तेरहयीं शतादो मे अलाउद्दीन से हारकर मध्यदेशमें आय टोंक नाम का जात से टॉक तथा बनास नदी के किनारे का देश छीनकर यहा के अधिकारी हे स्वयं स्वाधीन हो गये थे। किन्तु राजा सूरतानसे अफगान - - ।

. । - - - - - भारत का नारी इतिहास दुसरा भाग दण्डकारण्य में था परन्तु महा मारत से उनका मायम गया, मे. मालूम होता है। सती लोपामुद्रा ने अपने पति के साथ देश विदेश में बहुत श्रमण शिया था। समुंद्र पर्यठन भी पहुस किया था । एसके पति अग- स्त्य ऋपिने समुद्र विषयक घड़ी शोध की थी कदाचित् संभुग विषय शोध करने कारणही यह कहा जाता है। शास्त्य समुद्र पो गये”। देखिये प्राचीन समय फी राजपुत्री कैसी कैसी 'बल्लबादिन हुई हैं जो कि आत्मज्ञाने के सामने राजपक्षमी. 'न समझी। थों। यदि लोपामुद्रा राज्यवैमन को चाहती तो किसी राजकुमार के साथ विवाह करके : सांसारिक ऐश्वर्य भोगती परन्तु उसने ब्रह्म विद्या के सामने धन सम्पत्ति के। तुच्छ समझ कर एक ऋषि के साथ विवाह किया और ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करती हुई परमानन्द को प्राप्त हुई। प्यागे पहिनों विद्याक्षाल को माघर दूसरा कोई घाभूपण और धन नहीं है इस लिये व्यर्थ के नकली भूषणों को छोड़कर विद्यारूपी भूपण धारण करो को कुछ 1 -- নাই - - - ॥ - - (३) रा बाई तथा पृथनोराजको शूरता ता और मोरता की प्रशसा राजपूतों เลคละ से गाये जाते हुए कितनेही एक गोता तथा कहानियों में प्रसिद्ध है। इसका जन्म सोलहवी शताब्दी के ग्राम में हुआ था । ताराबाई राय सूरतान घिदलोर पाले को पुनी थी, कि जो राजपूताने में के एक छोटे राज्य का राजा था। गुजरात को राज- पानी अनहल बाडा के सालं को घंश के राजामो' का यह एक वशधर था। इसके पुरुषा तेरहवीं शताब्दी मे अलाउद्दीन से 'हारकर मध्यदेश, माय टोंक नाम का जात से टॉक तथा धनास नदी के किनारे का देश छीनकर यहा के अधिकारी हो स्वयं स्वाधीन हो गये थे। किन्तु राजा सूरतानसे अफगान - P T - र - , . - भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। राजा ने कितने एक देश छोन लिये 'थे। अन्त में केवल बिदनौर जो कि प्रवली पर्वत की तलहट में मेवाड राजय की सीमापर शेप रहगया अपने पिता का राज्य क्षीण होने से दुःखित तथा यलोन देख और पूर्व, पुरुषों से-ऐश्वर्य को सुन ताराबाई ने स्त्रियों का लीजाति का पहिरावा पहिरना, छोड दिया वह योग्य किसी भी बल प्राभूषण को धारण नहीं करतो थो, पुरुषों के बल पहिल, शत्र धारण कर बाल्यकाल से ही घेढे पर चढनेछनो प्रोर साय २ धनुष विद्याका मी मध्यान करती थी यही समय में, अपने बल के ट्वारा अफगानों से पिला. ले लिये- हुए देशों को छीन लिया और उसने अपनी- ही विजय पताका गढ़वादी । थोडे, ही समय. के अभ्यास में यह धनुष दिया, में इतनी निपुण होगई कि थे।डे पर चढ़ी हुई निशान (लक्ष्य ) भारती परन्तु कभी भी न चूझसी. थी । एक समय उसके पिता ने नफगानां के ऊपर साक्रमण किया, तच्च, एक काटिया- - 1 -- نه - -- F ।

प
+
ताराबाई।
हो घोडेपर चढकर तारा बाई भी साथ
ई थी, परन्तु शत्रु के धनवान होने से
नके सामने उसका कुछ मी पौरुष व परा-
म काम न पाया । उसही समय रानी
यमल के तीसरे पुत्र राना. जयमल ने सारा
ई से अपने व्याह करने का संदेशा कहला ।।
जा । तागवाई ने उसके उत्तर में निवेदन
कया कि जो मेरे पिता के शत्रुषों को रण
पराजित करेगा उसहोसे मेग धियाह होगा।
जयमल ने प्रतिज्ञा की अफगाना को
राजय कर के 'ताराबाई से विवाह करूंगा।
छे यह मर्यादा । रयागछर उसके मिलने
र तत्पर हुमा । इतने में बाजाने क्रोधित ।
। उसका शिर काट डाला, सदनन्सर उसके
ई पृथ्वीराज ने प्रतिज्ञा पूर्ण करने का
ड़ा उठाया और उस कार्य के पूर्ण करने
को अपनी कमर कसी पृथ्वीराज की प्रशसा
| सुनकर तारांयाई ने निश्चयकर लिया था
क मेरे योग्य यही वर है। और इसही से
बबाह करूगी । पिता ने भी इस सम्बन्ध
1
-
L
A
Part

। ।। 1 - 11 घुसवार २ भारत का नाही इतिहास दूसरा भाग। की ओर से प्रक्षता प्रगट को और अन्त में उस हो प्रतिज्ञा के पूर्ण करने पर विवाई होना लियर हो गया। पृथ्वीराज ने अफ गानों पर आक्रमण करने को मुहर्रम का महीना अच्छा समझा क्योंकि यवनलोग इस महोने में साजिया बनाने सपा उसही के व्यवसाय मे लिपटे रहते हैं । तइन तर मुहर मका महीना धानेपर वह पांच सै। चतुर नीर साहसी ले उसष्ठी समय उन की राजधानी पर पहुंचा कि जिस समय घर ताजियों को बाहर चौक में निकाल लाये थे। रानो ताराबाई भी. उस समय अपने होनहार पति के सग पुरुषों के वन्हा धारण- किये घेडे पर सवार हो प्रजश धारण किये उपस्थित थी। ताराबाई ' और पृथ्वीराज एक बडे साहसी सर को साथ ले अत्यन्त पौरुष व पराक्रम से शहर में घुसे और शेष सेना को स्थिर मात्र से खड़े रहने को प्राज्ञा हे किले के बाहर हो रक्खा। यह तीनों घाई दौड़ाते ताजियों की भीडमान में घुसते

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7
।
-
।
।
ताराबाई।
गाल सर के महलतक चले गये। हनने
में उस मरि ने नीचे आकर पूछा कि
तीनां विदेशी सिपाही कहां जाते हो ?"
'उसने पूछा ही था कि इतने में पृथ्वीराज
ने उसके माता मारा और ताराबाई के
समीप खडे हुए जरने उसे उठाकर पृथ्वी
पर दे मारा सदर के मारे जानेका समाचार
'ममुप्यों मे प्रगट, नहीं किया और शीघ्रता
पूर्वक अपने २-घे हों को दौडाय यात' की
पात में किले के मनाटक पर जा पहुंचे। परन्तु
द्वारपर पहुंचते ही उन्होंने देखा कि एक
,मसवाणा हाधी राह' रोके हुए खहा है।
ताराबाई ने यह देखते हो एक प्रचण्ड खड
घुमाय घस पूर्वक उस हाथी की सूद पर
मारा, सूट कटकर नीचे प्रापही और हाथो
चिंघाड मारता हुप्रा
मार्ग छेडकर पागा ।
मार्ग खुलते ही ये तीनों अपनी सेना में जा
मिले और उस सावधान हो सेनाको एकसाय
ही आक्रमण करने की माज्ञा दी। सार के
मारे जाने से शत्रुओं को दिल टूट गया था
-
1

N । प - - - - भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। इस कारण कोई भी उनके सामने न दटसका बरन अपने २ ग्राण बचाय चारों ओर छिन मिल होकर 'मागगये । जो फितने एक भागते २ शहर में पच गये थे ये समी राज- पूलों को नोक्षण सलवार से काटे गये। इस प्रकार पृथ्वीराज ने अपने श्वशुर को गया हुधा देख अफगानों के पजों से छुटाया फिर उनको हो अर्पित किया। देश जीत लेने के उपरांस साराबाई का घिषाह पड़ो धूमधाम से पृथ्वीराज के संग हुला। पृथ्वीराज ने इस प्रकार की वीरता कर शत्रु से देशको छुड़ाया । कारण वा बहनोई से पृथ्वीराज को .. लागडांट, हो गई धो । सुखवसर पायं अपने अपमान के बदला लेने की इच्छा से मिठाई में विष मिलाकर, पृथ्वीराज भोजन करनेको लाया इस प्रकार के कपट भाव को न जानकर आई हुई मिठाई को प्रोनि पूर्वक खा गये । परन्तु वह हलाहल विष अत्यन्त हो सोक्षण' था, इस कारण थोड़े ही समय में रोम रोम में - . - - ।'

1
-
ताराबाई।
याप्त हो गया, प्राण सूबने लगा गले में
काँटे पहने लगे जोम खिचने और पैर उड़-
बहाने लगे। अन्त में यह जानकर कि मैं
अश्च विप के बश मे होगया हूं प्राण न
पचेगे रानी ताराबाई को अपने महल में से
बुलवाया और कला भेजा कि "मेरे साथ
छल किया गया है। प्राण का अन्तिम समय
आगया, इस कारण शीघ्रता पूर्वक मुझ से
पाकर मिले।" रानी 'ताराबाई महल से
नीचे उतरी, परन्तु समीप भो न माने पाई
पी फि उनका प्राण देह छोड़कर निकल
गाया। रानी ने राजाके
मृतक
शरीर को
गोद मे ले सती होने को चदन की, चिता
सजवाय' श्राप भी उसमे बैठकर स्वर्ग को
पयान झिया । इन दोनों घीरों के घोरत्व
को प्रशसा पाजता राजपूताने में प्रसिद्ध
है, इतना नहीं वरन् वह इतिहातों में भी
अजर अमर है।
-

।
জাহাড়
.
य
1
(१)
न् १५३३ ई० में गुजरात के बादशाह
बहादुर शाहने प्रचण्ड सेना को
ताश लेकर चितौड़ पर झाक्रमण
किया। इस समय हायर और विषयी राणा
विक्रमादित्य चित्तोड की गद्दी पर था इस
लिये सब को चिन्ता, हुई कि चितोड का
उद्धार कैसे होगा ! सिसोदिया कुलके गरिव
की रक्षा कैसे होगी। किस रीति ले राजपूत
वीर स्वदेशकी रक्षा कर सकेंगे ऐसी चिन्तामों
से सब लोग चिन्तित थे कि देवलिया प्रताप
गढ़ के रावल अपनी राजधानी से धाकर
राणा के स्थान मे मरने मारने को तयार
हुये उनकी प्राधान
मानता मे सब राजपूत
'वीरता
साथ युद्ध के लिये सब होगये मुसलमान
सेना राजपूतों की अपेक्षा बहुत परन्तु
फिर भी राजपूत विचलित न हुये ।
।
.
--
धी.
.

।
बीर रमणी-जवाहर पाई।
सयने शपथ खाई कि या तो पूर्ण परा.
क्रम से लहकर विजय प्राप्त करेंगे या युद्ध में
, प्राण देकर घोर गति प्राप्त करेगे। युद्ध के
प्रारम्भ होते हो बहादुरशाह ने पहले अपनो
तोपों से ही काम लिया परन्तु राजपूत तोपों ..
को गर्जन सुनकर द्विगुण उत्साह से उत्साहित
होकर जिधर से गोला' प्राता था उधर
वही फुर्ती से, अपने तीक्ष्ण बाण चलाने लगे
उस समय तोपों से न तो बहुत दूरकी मारही
होती यो और न बहुत जल्द २ चेलती थीं।
इस लिये नापों के साथ २ बन्टूकें भी मुसल.
मान सेना को चलानी पडो अन्दूकों के धुधा
से रणस्थल मे अन्धकार हो गया दोनो पक्ष
के बहुत सैनिक मारेगये परन्तु बहादुरशाह
किसी रीति से चित्तौड़ पर अधिकार न
-
।
कर सका।
छान्त में
1
बहादुरशाह
एक अोरके किले
भी दोबार बारूद को, सुमन से उड़ाने का
विचार किया और जो स्थल सुरङ्गसे उडाया
गया वह हाडा घोर अर्जुनराव ने अपने ५००
,
--

-
भारत का नारी इतिहास दूभरा भाग।
योद्वानों के साथ युद्ध कर रहेथे इसलिये
अपने समस्त सैनिकों के सहित मारे गये.
वैरियों ने इस समय भने दुर्ग के भीतर घुमने
के लिये धावा किया परन्तु चित्तौड़ अभी
वीर शून्य न था । बोरवर राव दुर्गादास,
उनके मुख्य सुभट सन्ताजी और दूदाजी
तथा कितने एक सामन्त और सैनिक शत्रुओं''
के सामने अचरल और अटल रूपले, डटे रहे।
देह में प्राण रहते कोई उनको हटा ; न
मळे । भीम विक्रम से वे मुसलमानो के. घावे.
थोड़े से राजपूत कवत
प्रमगड पवन सेनाका प्रतिरोध कर सकते थे।
बीरत्व के
साथ युद्ध
करते रहने के पीछे
जब वे मरते २ कम रह गये तो रणनमत्त
भुसलमान अली अली कहते हुये किले में
घुसने लगे । अकस्म त् फिर उनको गति का
থাৎ
अपने चेकिन होकर देखा कि
चे दावेश में एक रनणी प्रचण्ड (ण तुरङ्ग पर
चढी हुई और हाथ में माला लिये हुये बड़ी
हुई है। यह बीर महिला राज माता जवाहर
को हटाते रहे परन्तु
-
--

-- वीर रमणी-जवाहर याई । ट बाई थी जवाहराई ने जन हाडाओ के - 'मारे जाने का समाचार' सुना तो उसका विचार हुमा कि अय , यदि कही राजपूत निराश भोर साहस होत होगये तो चित्तौड ' का याचना कठिन है इस लिये कवच धारण झर पौर शल ले स्वय वहां पहुची जहाँ - घमसान युद्ध हारहा था योद्धो को + लिये उत्साहित करती हुई आप भी लड़ने लगी रानी की बीरता को देखकर राजपूतों ने ऐसा पराक्रम दिखलाया कि यवनों को - पोछे हटना पड़ा। यह बीर नारी सघ राजपूतों के आगे रंधपध रोके खही थी जो यवन आगे को पढता था यही इस के भाले से माराजाता. था, माले के दारुण प्रहार से बहुत से यवन । । . 1 सैनिक मारेगये। - कई यवन धीर एक साथ आनेलगे. परन्तु फिर भी वीर क्षत्राणी निरुत्साहित न प्रासीम साहस से रोनमत्त यवनों से युद्ध करती रही। दूसरे गजारूढ़ बहादुरशाह विस्मयापन होकर देख रहा था। - - t মা - - - भारत का नारी इतिहास हमरा भाग। रमणी का प्रबुत रणकौशल देखकर वीरत्वाभिमानी 'यवन वीर माश्चर्य मे, बीर महिषी जवाहरवाई जहां यघनदल की प्रबलता देखतो वहीं तोन वेग से अपने चेहे को लाकर युद्ध करने लगती थी, जय कि राजपूनों और मुसलमानों में घोर युद्ध होरहा 'या घड से सिर अलग गिर २ कर लड़ रहे थे लेाथों के ऊपर लेाथे। गिर रही थी उमी समय में रानी के शरीर में तापका गोला प्राकर लगा और वह जगत् मे अपनी वोरता का अपूर्व, दृष्टान्त अपूर्व, दृष्टान्त और प्रात्मोत्सर्ग का ज्वलन्त उदाहरण छोडकर स्वर्गलोक को सिधार गई । मेघाड की ऐसी २ शूरवीर और सती पतिव्रता रानियों के कारण मेवाड़ को और भी अधिक यश प्राप्त हुआ है। हमारे देश को प्राचीन स्त्रियां ऐसी धीर और साहसिन होनी थी अब तो रातको चूहों की खडखडाहट सुनकर सहम जानेवाली स्त्रियां है। । । । है - - ܚܕ

7
महाराणी दुर्गा
।
चीन समय की स्त्रियों को धीरता
प्रा धीरता सतीत्व का प्रभाव सुनकर
एक बार हृदय, में चपलासी चमक
जाती है । महाराणी दुर्गा का साहस पढ़ सुन
कर एक बार रोंगटे खडे हो जाते है उन्हीं
माताओं की पुत्रियाँ हम है जिन मे घोर
मूर्खता छाई हुई है । प्यारी बहिनों प्राज मै
महारागी दुर्गा की धीरता की कथा सुनाती
हूं जिनको इस संसार से घिदा हुए सैकडो
वर्ष होगये पर इतिहास में अच तक देवी
दुर्गा के साहस की कथा आदर पारहो है ।
.' यह महाराणी दुर्गा जयपुर नरेश की
कन्या तथा बूदी के राणाको प्रिय धर्म-पत्नी
थो दुर्गा अपने रूप और गुण के कारण बडी
हो प्रासद्ध हो रही थी चारों ओर इस के रूप
गुण की प्रशसा विख्यात होरही था। महा-
.
-

11
-
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग
छापमान का बदला अवश्य लेंगे जो पवित्र
बूंदी को स्त्रिया पर पुरुप का. मुख
देखना
पाप समझती है उन्हों बूंदो महारानी को
इस दुष्ट ने सपमान किया है. माता मै अध
यापकी पुत्री नहीं छिन्तु वू दी की लाज
"यह कहकर सपनो सखी को कटार लाने
की प्राज्ञा दी किसी का साहस न हुधा कि
कटार लाकर दे यह देखकर क्रोध से कांपत्ती,
हुई दुर्गा काली "सखियों, तुम्हें कठार ला
देना होगा मेरे हाथ में जल्द कटार दर में
शाच इस आये हाथ को अपने तन सेन
पहने टूगी यह हाथ दुरात्मा का छुमा हुमा
अपवित्र है यह अब दो नरेश की सेवा के
योग्य नहीवहा प्रब्य मेरा यहां एक पल ठहरना.
हराम है बल्द बूदी चलने का प्रबन्ध करो"
सखी ने कठार लाकर कांपते हुए
हुए हाथ से
रालो के हाथ में दिया किसी का 'साहस' न
पड़ा कि दुर्गा के साहस को रोकना पात की
बात मे दुर्गा ने अपना बांया हाथ - दहिने
हाथ से काट गिराया। घोड़ा सजाकर लाया
.
।
-
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७५
--
.
~
है
महाराणी दुर्गा
गया रानी के हाथ से रुधिर बह रहा था
घोडे पर कूदकर चढ़गई सश्न दास दासी
साथ चले, रास्ते में दो नरेश से भेंट हो
गई रानी का यह हाल देखकर ग्रोध को
सीमा न रही अपने सहारे से नीचे उतारा
उत्तरतेही ' रानी बेसुध होगई । दासियों से
सारा हाल विदिस हुभा वह दुर्गाको पालकी
में लेटाकर सबके साथ बूदी की ओर भेज
दिया और आप नङ्गो तलवार ले जयपुर
की
ओर घोड़े को एह लगाई। उधर अमरसिंह
"नववधू के साथ खुशी में उदयपुर जारहा था
मार्ग मे घाजीतसिह रो भेंट होगई, अमर ने
ममझा कि इन्हें वह सब घटना तो छाभी
विदित नहीं हुई होगी यह सोचकर छादर
के
साथ भेट करने का मागे बढा पर अजी.
तसिह की विकराल मूर्ति देखकर सहम गया
राणा ने कहा कर कहा “ो बूदो के प.
मान करने वाले दुष्ट ! मैं तेरा शत्रु आपहुंचा
ले सम्भल जा यह कह छामरसिंह के ऊपर
माला चलाया अमर सम्मल न सका और
.
1

--
.
-4
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग ।
भूमि पर गिर पड़ा अजीतसिह अमर को
घर बून्दोकी शोर पलदिया समरके साथियों
में से किसी का साहस न हुमा झिं जीत
सिंह को रोके । जब यह खपर जयपुर
कुमारी अमर को नवधू के कान तक पहुंची
तव पालकी उत्तरकर उसी स्थान, पर,
आई जहां उसके पति देवथे नवधू ले चिता
बनाने को शाज्ञादी और पति को गोद में
लेकर शान्त पाश्च, से बैठकर मुखावलोकन
हमने उगो और पति को हृदय से लगाकर
शुजन
किया और बोली "प्राणनाथ मैं क्या
किसी से कम सुन्दरी यी हि भाप पर स्त्री
पर भन्न चलाते ! यह मेरे भाग्य का दे
था कि धापका दर्शन पहिले पहिल मुझे मृत्यु,
हुमा नाथ ! मुझे शोक है तो इसी
EST शापसे दो २ घालमो न होने पाई" इतने
में चित्ता तैयार होगई लत्ती दुर्गा की बहन
पति को गोद में लिए जलकर राख होगई।
धन्य सत्सी पन्य दुर्गा का साहस और सती
का उतीर साहनीय है।
शैय्या मे
--
.

--
पृथ्वीराजभी रानी
ज
1
(६)
सलमान पादशाहों के अत्याचारों
मु को सुनकर हृदय कम्पायमान
होता है परन्तु उस समय की
लिया भी ऐसी पतिव्रता मोर बोर, थी कि
' जिनके चरित्रों को सुनकर हमारा हृदय
प्रफुलियत हो जाता है अकबर बादशाह
ने स्त्रियों के लिये एक मोना बाजार स्थापित
किया था जिसमे स्त्रियां देखने पाया करती
धीं। एक दिन पृथ्वीराज* की रानी देखने
आई प्रकार ने एक दूता को भेजकर रानी
को बहाने से भुलावा देकर अपने पास बुलाना
चाहा, बडे २ दांध पेच और महानों से वह
दूती रानी को महल मे ले आई।
अकयर रानीको देखकर कहने लगा प्यारी !
*पृथ्वीराज महाराजा बाकानर के भाई ।

-
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
इधर प्राणो मेरे पास बैठो माराम के
रानी धर को देखकर अवाक रहगई कि
यहां कहां आगई मालूम होता है उस बुढ़िया
ने घड़ा धोखा दिया, अफघर ने रानी को
चिन्ता में देख कर कहा, क्या सोचती हो ?
देखो मैं हम समय इसना या प्रतापी
बादशाह हूं जिसको निगाष्ट्र की ओर को
दुनियां भरके बादशाह देखते रहते हैं। वही
आज तुम्हारा ताबेदार घनने को तैयार
बैठा है
प्रमर की बात सुनकर, रानी 'क्रोधित
हो बोली, देख अकमर तू बहुत बडे लिहासन
पर बैठा है. ऐसे दुष्ट कर्मों से इस राज्य
सिहासन को कलुषित न कर और मुझे अभी
। अकबर ने उठकर रानी
का हाथ पकहना चाहा, रानी हाथ झटक
कर बाली, रे दुष्ट क्या तूने मुझे इस महल. मे
अकेला समझा है भै तुझे बतलाये ,देती
कि
तू
अभी अपने जीवन से हाथ धे बैठेगा !
अकक्षर हाथ जोड़कर नहीं नहीं देंखेो. यह
मेरे घर
पहुचा
दे
hes
--
1

st -- पृथ्वीराज की रानी। नौलखा हार यह अमूरघ चम्पाकली यह रत्नजडित गहने यह सच्चे मातियो का सतलहा हार संघ तुम्हारो- नजर है और सदा के लिये मै तुम्हारा तावेदार श्गा । रानो क्रोध से कांपने लगी लाल २ आंखें निकालकर बोली-क्यों रे अधमी ! नर- पिशाच ! तूने मेरी बात न मानी ! क्या तू अभी अपने काल को धुलाना चाहता है ? क्या तू वीरा बोराङ्गनाओं को लाल व से वश मे किया चाहता है ! मानो स्यार होकर सिंह. का सामना करना चाहता है, सूर्य की प्रभा को कोई नही छू सकता, जैसे कोई निर्धन मनुष्य अपने घर में सोने का वृक्ष लगाना चाहता है, माना तू मन्दराचल पवत को हाथो से उखाहना चाहता है।' २ दुष्ट ! क्या तू सुई से अपने नेत्र खुज- याया चाहता है, क्या जोम से छुरे की धार चाटना चाहता है, क्या सूर्यको हाथ से पकड़ना चाहता है, या प्रज्वलित अग्नि को ,पख में बांधकर ले जाना चाहता है, क्या लोहे के . -- - । । 1 भारत का नारी इतिहास हसरा भाग। त्रिशूल पर चलना चाहता है, देख अवर ! जितना अन्तर सिंह और गाल मे है छोटो नदी और समुद्र मे है हाथो और बिलार में है गरुड और काल में है उतना ही मुझ मे शोर तुझमे है। मै तेरी दुष्टता “ सघ सुन चुकी हूं। आज तुझे इस दुष्ट कर्म करने से सचेत करने भाई हूं अब भी तूं अपने घृणित : कम्र्मों को छोड़, अकबर हँसकर ! जरा बैठा तो लहो, रानी छोर भी कोच में नाकर निर्लज्ज मात्र से बोली-क्यारे अधर्म !. क्या तेरा काल हो तेरे खिर नाच रहा हि ? बया प्राभ नुको को नरपति हत्यासे अपना हाथ' पवित्र करना होगा? देख मलयर ! तू मेरे सामने से हटजा । भाज: मै तेरे हाथ से निर्वाध राजपूत घालानों के सतीत्व रक्षार्थ घर से कटिबद्ध होकर पाई हूं तुझ से फिर भी यही कही हूं कि अपनी इस नीचता की इच्छा को छोड और अपने कर्तव्य की ओर देखें ! अकबर ने रानी का हाथ पकड़ना चाहा, रानी ने - - - 1 - - .

- . पृथ्वीराज की रानी झपटकर छाकघर को घरतीपर पटक दिया अपनी कमरसे छिपाधे हुए झटारको निकाल अकबर की छाती पर बैठ कोष से 'हांपती हुई बोली। ले नराधम ! जो तू नही मानता है तो मै श्री आज तुझे यमपुर पहुंधायें देती हूं और तेरे चोझेसे पृथ्वीको हलको कर तुझे इस नोचता का प्रानन्द विश्वाती हूं। कटार को धानबर की छाती पर रखकर कहने लगो-देन प्रक- यर ! मैंने तुझे बहुत समझाया परन्तु तू ने मेरी बात न मानी । राजा को सब प्रजा सपनी सन्तान को समान पालनी चाहिये और सबको धन दुष्ठि से देखना ही राजा का धर्म है, तू नहीं जानता झि भारतवर्ष की वीर मालायें धर्म के लिये प्राण और कुछ नही समझती। जहां धर्म जाने की बात प्रामाती है लाखों के धन पर लान मार देती है छोर प्राणो को हथेली पर रखकर संसार के राम सुखो को तिलाञ्जली देकर एक धर्म को ही रक्षा करतो h - - धन को - -

भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग ।
हैं। दूसरे जन्म मे माता पिता फिर से मिल
जाते हैं पाई अष्टिन मिल जाते हैं कुटुम्ब
परिवार और साँखोरिक सथ सुख मिलते है
परन्तु धर्म फिर से नहीं मिलता अर्थात्
जिसने अपने धर्म की रक्षा नहीं की वह
कई जन्मो सक नरक चाल करती है क्योंकि
मनुष्य जन्म फिर फिर से मिलना धड़ा,
कठिन है।
रानी ने ज्योंही कटार अकबर के गले पर
रखना चाहा अकबर मार्तस्वर से हाथ जोड़
कर कहने लगा, जरा मेरी बात सुनो, मुझे
न मारना मेरी एक बात सुने। मेरा छपराध
क्षमा करो ! रानो-कह क्या कहता है ?
प्रकवर ! मै अपने किये हुए अपराध
पर लज्जित होता हूं और वापसे अपराध
की क्षमा मांगता हूं। मुझे जीवदान दीजिये
मैं ईश्वर की सपथ ( कसम). खाकर श्रीर
उसे साक्षी देकर कहता हूं कि अब कभी
भूल कर भी ऐसा अपराध मुझ से न होगा,
मुझे बड़ा भारी धोखा
हुआ
मेरी
.
-
इस तरुण

7
-
पृथ्वीराज की रानी।
अवस्था ने मुझे भूल में डाला मैं अब तक
यह नहीं जानता था कि भारत वर्ष में ऐसी
पतिव्रता, वीरा धर्म की रक्षा करने वाली
लियां उपस्थिस (मौजूद.) है, मैं इस बात
को स्वप्न में भी न सोच सका था कि धर्म
पर चलने वाली स्त्रियों के लिये यदि संसार
की सम्पूर्ण सम्पत्ति मिलती हो तो भी ने
उसे अपने धर्म के सामने मिट्टी को समान
समझती हैं, वास्तव मे धर्म ऐसी ही अमूल्य
वस्तु है । मैं समझता था कि किसो सुन्दरी
को घनके लालच से अपने आधीन कर ।
लेना कुछ कठिन नहीं है परन्तु आज यह
अभिमान जाता रहा और ऐसी उत्तम शिक्षा
मिली कि मैं जीवन पर्यत न · भूलूगा और
प्रापको घडा कृतज्ञ ( एहसानमन्द ) हूंगा।
रानी ! मुझे मेरो घात का विश्वास कैसे
हो ? हाय ! जिन राजपूत पीरों को सहा-
यता से आज तुझे यह प्रताप प्राप्त हुआ है,
हे कुलांगार ! उन्हो को बहू बेटियों पर हाथ
डालते 'तुझे लज्जा नहीं पाती धिक्कार है ।
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-
-

- । भारत का नारी इतिहास दृमरा भाग', प्रकार-आप मुझे जितना धिक्कार दें थोड़ा है परन्तु स्मरण स्क्वै कि यदि मैं हुमायूं के वीर्य से उत्पन हुदा हूं, और ईश्वर की सपथ खाकर प्रतिक्षा करता हूं ते मुझसे ऐसा अपराध भय कमो न होगा। रानी देख अकबर ! तू बड़ा बादशाह है मेरे स्वाग ने तेरा नमक खाया है इसलिये तुझे आज छोड़े देती हूं परन्तु , स्मरण रखा यदि मै अब्ब कमी तेरी ऐसो दुष्टता सुन, पाजंगी तो सेना संख भेद, उमस्त राजपूताने ने खालटूगी छोर एक दिन राजपूत मात्र ले तेरा शत्रु बना दूंगो । तेरी' इस दुष्टता जौर पर पर मुझे क्रोध आता है रे मदान्ध ! तले बादशाहत अभिमान में भाकर धन के घमंड मे उन्मत्त होकर पति- नतामों का धर्म नष्ट करने का विचार किया है परन्तु देख जिस प्रकार काले सांप के सामने दीपक का प्रकार लोप हो जाता है। उसी प्रकार धर्ममार्ग पर चलने वाली अध. लामो के सन्मुख पढ़े पीर छोर साहसी आध- मी जनों के शस्त्र" हाथ से गिर जाते हैं। इस प्रकार घाबरको होचा दिखाकर रानी अपने गृहको पली गई। 1 . ।

य लीलावती - १७) लावती चिरजोव शर्मा भट्टाचार्य ली. की कन्या थी इसका प्रिवाह धीरेन्द्रनाथ के साथ हुघा था। नदिया से ३० केसि हरीपुर गात्र में घिरंजीव शर्मा के हो 'कन्याएं घी,, बडो का नाम लीलापती और छोटी का नाम मालती था लोलोवनी बडे धनाढ्य के घर याही गई थी, धोरेन्द्रनाथ अपने धन ढय पिता का इक- लौता -पुत्र था इसकी माता बाल्यावस्था में ही अपने प्यारे पुत्र को छोड स्वर्ग को सिधार गई; 'कुछ दिन में धीरेन्द्रनाथ का पिता भी इस प्रसार संसार से सदैव के लिये कूच कर गया। माता के न रहने पर लीला का पति कुसंगति में पड़ पिता का घड़े परिश्रम से पी

भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
इक्ट्ठा किया हुआ धन उड़ाने लगा,
कि बहुधा धनधानों के पुत्र जो, लाड़ प्यार
के कारण उत्तम प्रकार से शिक्षा नहीं पाते
और माता पिता के मर जाने पर 'कुसंगति
पड़कर दुःख भोगते हैं इसी प्रकार लोला
का पति भी चुरों के संग मे पड दुष्ट कम
करने लगा। उसे रात दिन इधर उधर फिरने
हंसी ठट्ठा के और कुछ काम न था ।
कुमार्गी जन ही उसके मित्र परम मित्र
सलाहकार बन गये, और उसने अपना सारा
धन ठिकाने लगा दिया। लीलावती मही
सुशीला पतिव्रता धार्मिका और सरल स्व.
भाध की स्त्री थी
बहुत
समझाने , पर भी,
पति ने उसका कहना नहीं माना। एक दिन,
उसके पति ने उसे घर से निकाल दिया।
लोला को इस दशा ले भी पति का साथ
छोड़ना अच्छा नहीं लगा । वह पति के चों
पर शिर रख कर रोने लगी और अपना
अपराध क्षमा करने को प्रार्थना करने लगी
यद्यपि लीला का कोई अपराध नहीं था।'
-
A
7

लीलावती।
CU
रोने और प्रार्थना करने पर भी
उस कठोर हृदय पति ने नहीं मानी और
लीला को अपने घर से निकाल दिया लीला
साचार होकर अपने पिता के यहां चली गई
पिता ने बहे स्नेह से लोला को रक्खा पति
के यहां से दुःखी निकाली हुई समझकर ।
लीला का पिता घडे प्रेम से उसे रखता कि
जिससे लीला के चित्त से कुछ दुःख न हो
पदापि लीला को पिता के यहां कुछ
मी
दुःख
नहीं था परन्तु, सती
सती पतिप्राणा खियों को
पति से अलग रह कर संसार का कोई सुम्ब
सुम्बी, नहीं कर सकता।
प्यारी पहिलो ! आप जानती ही है पति-
प्राणा पतिव्रता स्त्रियां मोहन भोग में भी
यह धान्द नही पाती जो पति के पास सूखी
रोटिया मे उन्हे मिलता है
रेशमो वस्ती में वे अपने शरीर की
शोभा नहीं समझती किन्तु पति के पास
रहकर एक फटो पुरानी और मैली धोती
में ही इन्द्र की अप्सरामो की समान अपने
-
"
11

-
पति ने उसकी कुछ भा ख घर नहीं ली।,
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग,,।
को शोभायमान समझती हैं मखमली गददे
और जडाज पलंग पर उन्हें निद्रा नही पाती
शिन्तु पति के यहां से पृथ्वी पर पड रहना
हो इन्द्र के इन्द्रासन का सुख समझती हैं ।
यही दशापिसा के घर लोला झी हो गई,
किसी ने बहुत कहा तो उसे प्रसन करने के
लिये कुछ खाफर पेट मर लिया करती।
रात में एक क्षण को भी उसे निद्रा नहीं
माती, पायल की भाँति रात दिन कहीं इधर
कही उधर घर मे बैठा करती किसी के पास
बैठना मी उसे बुरा लगता है। इसी प्रकार
बहुस दिन व्यतीत हो गये परन्तु लीला के
-
इधर लीला का पति खराध संगति मे
अपना सारा धन फूक कर सूखों मरने लगा,
एक दिन उसे डाकू पझह ले गये। धीरेन्द्र
ने कहा मै 'भूखों मरता हूं मेरे पास क्या धरा
है मुझे छोड़ दो त डाकुओ ने कहा तू
अपनो स्वो हमे देदे उसमें से एक दे। डाकू
छाला को सुन्दरता की, प्रशंसा सुन । रक्सी
।
न
१

गोलायती।
-
P
-
गी। सघ डाकुओं ने कहा यदि तू अपनी
जान बचाना चाहता है तो अपनी रखी को
इमें देदे।
धीरेन्द्र को यह विश्वास था कि लीला
बाण मले ही दे परन्तु इनके पास रहना
स्वीकार कदापि न करैगी, उसने डाकुओं
ने कहा लोला पसिनता साधवी स्त्री है वह
कदापि इस पात को रोकार न करेगी।
शकुमो ने कहा तो हम लोग , भो तुम्है
जन्दा नहीं छोडैगे इस प्रकार धीरेन्द्र को
कुलो ने अपने कुड में कैद करके रक्खा
व, धीरेन्द्र को यहा दुःख हुआ वह लीला
को याद करके रोने लगा पीर पश्चाताप
करने लगा कि यदि मैं अपनी लो का कहना
नानता तो मेरी गाज क्या ऐसी दशा होती ।
'मैन उसे बहुत दुख दिया है कदाचित
उसी के नापं से मेरी यह दशा हुई है
यदि परमात्मा मेरी जान घचावै तो अब
में उसे बुलाकर प्रसन्न रक्खू गा । इंस
चकार धीरेन्द्र 'पने मनमे लीला की
यशसा करने लगा। एक दिन एक बुढ़िया
भखारिन भीख मांगते मांगते उन्हीं हाकुभो'
+
है

।
-
।
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
इस प्रकार बिलाप करती हुई, लीला
अपने पति की खोज में फिरने लगी। उधर
डाकुओं ने अपने दो
मनुष्य विमला और
रामदास लीला को पकड घर लाने के लिये
भेजे दोनों भेष बदल कर लीला के पिता के
यहाँ जाकर नौकरी के बहाने रहने लगे जब
उन्हें पता लगा कि लीला धापने पति की
खाज मे योगिनि होकर निकली है. लीला का
पातिव्रत धर्म और साहस देखकर वे दोनों
अपना सध कर्तव्यः भूल गये और खोला की
सेवा के रहने लगे।
पातिव्रत धर्म के तेज के प्रागे वे दोनों
साहसहीन हो गये, और उन्होंने डाकुत्रों का
साथ छोड़ दिया । लीलाने पड़े बडे कष्ट
उठाकर अपने पतिी' पाया फिर 'उसका
पति उसको सलाह से चलने लगा और वे
दोनों मानन्दपूर्वक' रहने लगे। घन्य
लोला तेरा पतिप्रेम और धार्मिक साहस
तेरे हो समान हमारे देशको सभी खियां
ज्ञानवती मोर पतिभक्ता हो।
-
-
-

सुलोचना
(८)
लोचना रावण के वीर
पुत्र
मेघनाथ
सु से बिवाही हुई थो यह शान्त
स्वभाघ दयालु घोर पतिव्रता थी।
सास की सेवा इस प्रकार करतो यो, मानों
उसकी पुत्री थो उस समय पतिव्रता धर्म मे
'भापहो अपना दृष्टान्त थी जिस समय
रावण महारानी सीता जो हा हरकर ले प्राया
सुलोचना ने
बहुन शेक किया इसने अपने
जीस मेवनाथ से कहा ।
पिता ने प्रडा उपद्रव किया है । श्रीरामचन्द्र
जी को बी महारानी सीता जी पतिव्रता हैं
और उत्तम पर्ताय और
सौन्दर्य में अपने
समान दूसरा नहीं रखती हैं पति के पास न
होने से पर स्त्री को इस प्रकार हर ले प्राना
बड़ा पाप है यद्यपि मुझे यहो को निन्दा
पति इन्द्र
प्राप के

કેર
-
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
इस प्रकार बिलाप झरसी हुई, लीला
अपने पति की खोज में फिरने लगी। उधर
डाकुछो ने अपने दो मनुष्य विमला और
रामदास लीला को पकहर लाने के लिये
भेजे दोनों भेष बदल कर लीला के पिता के
यहाँ जाकर नौकरी के बहाने सहने , लगे जन्म
उन्हें पता लगा कि लीला आपने पति
खोज में योगिनि होकर निकली है, लीला का
पातिव्रत धर्म और साहस देखकर वे दोनों
अपना संघ कर्तव्य भूल गये और खोला की
सेवा में रहने लगे।
पातिवत धर्म के तेज के प्रागे वे दोनों
साहसहीन हो गये, और उन्होंने डाकुओं को
साथ छोड़ दिया। लीलाने बड़े बड़े कष्ट
उठाकर अपने पति को पाया फिर उसका
पति उत्सही सलाह से चलने
दोना छानन्दपूर्वक रहने लगे।
लोला तेरा पतिप्रभ और धार्मिक साहस ।
तेरे, ही समान हमारे देशको सभी खियां
ज्ञानवती. छीन-पतिभक्ता हों।
।
लगा और वे
घन्य है
.
1

। -- ८५ । ॥ सुलोचना। इसका बुरा प्रभाव पडेगा यदि चुप रहता हूं तो भी नहीं बनता मन्त्री दीवान सभ समझा चुके मेरी माताने भी बहुत समझाया पर सन का कहना व्यर्थ हो गया मै उसका पुत्र हूं नीति चाहती है कि पिता और राजा को भूल में भी सहायता दीजावे इस लिये मैं ईश्वर इच्छानुसार जान बूझकर उसके हट के अनुसार काम कर रहा हूं। यह शरीर अभी जाय चाहे रहे परन्तु से काम न होगा सुख दुख শিল্প ন্তু अपने कर्मके फल है तू कुछ चिन्ता न कर जो होने वाला है यह होकर रहैगा इस पर किसी का वश नही चलता। पुरुष को ईश्वररेच्छा पर प्रसन रहना चाहिये रावणकी इस भूलका परिणाम लडाई हुई भगवान रामचन्द्र जी के समुद्र पर पुलं 'बांध कर लंका में पयान किया और बानर रीछों की सेना ने रण मे वह कर्तव्य दिखाए कि राक्षस के छक्के छुहा दिवे रावण के कई पुत्र मारे गये जघ कुम्मश्रण भी नीति के विरुद्ध मुझ - 1 .

। - - । - स + - । दूसरे को ४. भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग करना उचित नहीं परन्तु मुझे जान पड़ता है. कि इस देश व इस वश'' का नाश- होगा क्योंकि वृद्धों का पचन है। पर स्त्री की कुल का नाश हो जाता है। लोक परलोक दोनों बिगड़, जाते हैं जो साधुओं से लडाई करे गुरु की प्राज्ञा को माने जीवों की हिसा करे, ईश्वर की निन्दा में प्रसन्न हो सत् ग्रन्थों का त्याग', करे और बहू बेटी को चुरो दृष्टि से देखे धहः इस ससार मे मनुष्य के आकार का पशुः पृथ्वो उसका भार नही सहार. संकतो! प्राण पति ! क्या लंका में बुद्धिमान मन्त्रों नहीं रहा है जो रावण को समझा कर धर्म मार्ग पर चलावे। मेघनाथ ने अपनी स्त्री की बात सुनकर कहा कि तू सच कहती है तेरी यात सत्य मैं अच्छी तरह से समझाता हूं परन्तु क्या करू पिता पुत्र का सम्बन्ध शिलक्षण है पर यही नहीं मै रावण को 'प्रजा भी हूं यदि उसकी आज्ञा न मानू तेो राजा के और लोगों पर, - . 1 .

១
सुलोचना।
मांखें खोलदों और अपने पति की कृपाओं
और उसकी बीरता को स्मरण करके रोने
गो प्राणनाथ तुमने कैसे शीघ्र प्राण त्याग
किया तुम्हारी तो संसार में कोई परावरो
नही कर सकता था तुमने सहस्रो राजाओं
को नीचे किया था तुम कहने थे मुझे मारने
वाला ससार में कोई नहीं मुझको वह पुरुष
मार सकेगा जिसने अखण्ड ब्रह्मचर्य का
पालन किया हो. रामचन्द्र जी की सेना में
तो कोई ब्रह्म धारी नहीं है वहां तो सब
विवाहित मनुष्य हैं, पति क्या तुम्हारी यात
मिथ्या थो सामने से एक माझाश वाणी
हुई इन्द्रजीत को लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्रने
मारा है वह धर्मात्मा
पुरुप
जिसने विवाह
होने पर भो कभी स्त्रों का मुख नहीं देखा
निद्रा क्षुधा तृष्णा उसके वश मे है जिसका
मन व वाणी सच्चाई पर त्रासकती है यह
सरुवा इंद्रियों को, जीतने वाला इन्द्रजीत
को मारने का कारण हुशा यह सुनकर सुला-
चना फिर रोने लगी सारे महल मे कोलाहल
-

। वान एक
ट भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग ।
मारा गया तो मेघनाथ इन्द्रजोत की यारी,
आई यह बहा छलिया मीर' वीर था इघर
उधर के वीर योधा इसका नाम सुनकर
कांप उठते थे माते हो इस ने कई बेर
अयोध्या पसि की सेना को पीछे हटा दिया",
निदान वीर लक्ष्मण के तीर ने इथंके सिर
को धड़ से अलग कर दिया यह लका के
दीपक था राधण जानता था कि रामचद्रजी
की सेना में इस के बाहुबल के समान घल
भी पुरुप नहीं है। परन्तु लक्ष्मण
ब्रह्मचारी ने इनको मिही मे मिला दिया।
सुलोना अपने रग महल में अपनी
सखियों के साथ बात चीत कर रही थी उस
को भी निजपति के याहुघल पर पूरा विश्वास
था और कहती थी कि आज मेघनाथ
अपने पौरुष के गुण को दिखा रहा होगा
इतने मे खबर आई कि 'वह मारा गया
सुलोचना उसी समय हिंडोले से पृथ्वी पर
गिर पड़ी और 'वेसुध · हो गई सखियों ने
मुखपर जल छिड़कः पंखा. किया इसने
।
.
1.
-
-
--
-

स्ट
मुलोचना।
इ.मने, राषण, की ओर से
मुख
फेर लिया
और मन्दोदरी, की ओर देखने लगी मन्दो-
दरी उसके अभिप्राय को समझ' गई उसने
बहू से कहा प्यारी पुत्री मैं क्या करू ।
.. 'तू माप नीरामचन्द्र जी के पास जा
और उनसे ध्यपने पति का सिर मोगला बह
सज्जन सुभापो, स्त्रो व्रत और नीतज्ञ है तेरा
कभी अपमान नहीं करेंगे इसके सिवाय
विभीपण तेरा ससुर वहां है, यह सम्मति
सुनकर, रावण दंग होगया धौर सुलोचना
उस को सिर झुकाकर रामचन्द्र के शिविर
तम्बू) की ओर चली मेघनाथ के मारे
जाने के अनन्तर दोना मोर की सेनाये
अपने २ स्थानों में जाचुकी थीं केवल एक
ही आघा घंटा व्यतीत हुआ था कि सुला.
चना निर्भयता से रामचन्द्र जी के पास गई
गुप्तचरों ने पहिले से ही खबर दे रक्खी थी
जय वह सन्मुख नाकर प्रणाम करने के
अनन्तर रोने लगो ता रामचन्द्र जी ने कहा
पुत्री ! तू क्या चाहती है जिस बात की
(
1
--

11
टर
।
१
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
मंच गया पशु पक्षी नेत्रों से अनुपात करने
लगे और महल शून्य दिखाई देने लगा अन
में सहेलियों ने ये संसार छातार है कहकर
उसको तसल्ली दो श्रीर सुलोचना धैर्य धारण
छर उठी और सखियों को साथ लेकर 'रावण
की सभा मे गाई मंदोदरी उसकी सांस भी
साथ थी सुलोचनाने ससुर का पांव छूकर
कहा महाराज साज ईश्वर ने मेरा सौभाग्य
छीन लिया मेरा प्राणपति संसार से चला
गया साज्ञा हो तो मै भी-परलोक गमन
तय्यारी करू।
बिलाप करती हुई अधू को देखकर रावण
के सिर पर शोक का पहाड़ टूट पड़ा धंह
शोक से कहने लगा,बहू ! तू शाम मत कर
अभी तेरे पति का बदला लेता हूं परन्तु
सुलोचना मलीभाति जानती थी कि यह
धचन उसके लिये कहां तक' शान्ति दायक
थे वह पहिलेही से जानती थी कि महारानी
"सीता की माह ने लङ्का के नाश की सामग्री
एकत्र करदी है"और रावण की मृत्यु
नागई है।
"
1
+
.

1
सुलोचना।
१०१
रख दिया फिर चिता तैयार की गई और
वह सतो पसि के सिर को गोद में लेकर उस
में जा बैठी प्राण महकने लगो, यह घोरा
स्त्री धारता से बैठी रही सबसे पहिले कपड़ों
में भाग लगी फिर उसके केश जलनं लगे
हाय पधि से लपटें निकलने लगों ओर उसी
तरह बैठी रही और सबके देखते २ पति के
शरीर के साथ जलकर भस्म हो गई।
प्यारी पाठिकानो! प्राचीन समय में
गक्षसी की स्त्रियों में भी पातिव्रत धर्म का
इतना प्रमात्र था जिनकी जीवन कथाएं
उसी धर्म के प्रभाव से अब तक मिल रही है
वे सती खियां 'मरों - नही
फिन्तु अप तक
जीवित हैं जिसका नाम संसार में अमर है
वही जीवित है।
A
-
-
जसूरी बात।
भारत का नारी इतिहास कई भागों में पूरा
होगा इस सम्पूर्ण पुस्तक में ५०० पांच सौ क्षियों
के जीवन चरित्र रहेंगे।

- १०० ! 1 . भारत का नारी इतिहास हसरा भाग। आवशयकत्ता हो. मेरे से कहो, उसने कहा महाराज मैं अपने पति का सिर चाहती. कि उसको गोद में लेकर से भी संसार से सरुवान करू रामचन्द्रजो ने कहा पुनो तू घन्य है तू स्त्रियों मे शिरोमणि है तेरे पति-'' आता धर्म शो कया सर्वदा लोग खुशी,से 'सुना करेंगे और उनकी माज्ञा 'पाते ही, सुग्रीव दौड़ा और ढूढकर मिर उठा लाया पति 'का सिर देखते ही सुलोचना मुक्त कंठ से रोने लगी प्राणनाथ यह तुम्हारी, क्या दुशा अभागी सुलोचना को यह भी देखना था। यह कहना था कि मेघनाथ के सिर में चेष्टा उत्पन्न हुई उसने नेत्र खोले ओर खिलखिला, पर हंस पडा। लोगो को बड़ा माश्चर्य हुधा जिन्होंने सुलोचना की दीनताफो. और दृष्टि रही सबके नेत्रों मे से 'छत्रुधारा बह निकली उन तमय रामचन्द्रजो ने सुलाचना को कुछ उपदेश किया सुलोचना सिर को गोद में लेकर समुद्र के किनारे गई मेघनाथ का बढ़ वहां था सिर को घई से मिलाकर - - L 1 १०३ 'मिधा। जीवन में प्रात्मोत्सर्ग, स्वार्थपरित्याग और परोपकार के निमित्त जोवन की घलिदान करने का साहस नही यह संस्था 'एकमात्र शुष्क और नोरस है। उसके फलो ओर फूलों में मनुष्यों को आकर्षण करने की शक्ति नहीं प्रत्येकधार्मिक 'सस्था के इतिहास मे क्षात्म समर्पण के उदाहरण मिलते है और किसी संस्था की उन्नति और उपयोगिता का मूल्य भी उन्ही यात्मात्रां के चरित्रों द्वारा देखा जाता है जिन्होंने उस संस्था को उपयोगी समझ कर स्वीकार किया है वौद्ध धर्म का इतिहास ऐसे निष्प्रोह नर नारियो के जीवनों से परिपूरित है । " उन महात्मामो मे मगधराज महाराज को फेन्या सवमित्रा का प्रातःस्मरणीय जीवन प्रातः काल के उज्ज्वल तारे के समान इसि- हाँस' के पृष्टो पर चमक रहा है। इस धर्म- परायणा, कोमल हृदया, परदुखकातरा, मधु. रभाषिणां भिक्ष णा ने अनेक बजादेपि कठोर मात्माओ को धर्म पथ पर आरूढ़ करदिया। . 1 ।

संघमित्रा
न
(६)
र्म के प्रचार एवं छाज्ञानेग्रस्त
धध নন্য ভূক্ত চেম্বাব ইতিষ্ট
RARAS इस पुण्य भूमिमे अनेक प्रात्मा प्रो
अमूल्य जीवनों का बलिदान किया
। उन्होंने पार्थिव विलास तयाँ सांसाद
रिम ऐश्त्रयं को जलांजली दी और
केवल मात्र धर्मोनति तथा परहितार्थ अपने
जीवन का उत्सर्ग किया।' धर्म के उच्च
और पवित्र भाव ही मनुष्य को परोपकार
के पथ पर चलाने और स्वार्थ को पाहुनी,
से धार्मिकाग्नि को देदोप्यमान करने का
अवसर प्रदान करते हैं। एक जीवित प्राणी
की छाहुनी अनेक धात्माओ को 'धर्म,
के रस को मास्वादन करने के निमित्त प्रेरित
करती है। जिस संस्था के संचालकों के
-
.

। सच मित्रा। 1 १०३ जीवन में आत्मोत्सर्ग, स्वार्थपरित्याग और परोपकार के निमित्त जीवन को बलिदान करने का साहस नहीं वह सस्था एकमात्र शुष्क और नोरंस है। उसके फलां और फूलों में मनुष्यों को प्राकर्षण करने की शक्ति नहीं प्रत्येकधार्मिक संस्था के इतिहास 'मे सात्म समर्पण के उदाहरण मिलते हैं और किसी संस्था की उतति और , उपयोगिता, का मूल्य भी उन्ही प्रात्माा के चरित्रों द्वारा देखा जाता है जिन्होंने उस संस्था को उपयोगी समझ कर स्वाकार किया है बौद्ध धर्म का इतिहास ऐसे निष्प्रीह नर नारियों के जीधना से परिपूरित है। उन महात्मा ओ मे मगधराज महाराज की कन्या सहुमित्रा का प्रातःस्मरणीय जीवन प्रातः काल के उज्ज्वल'तारे के समान इसि- हीस के पृष्टो" पर 'चमक रहा है। इस धर्म- "परायणा, कोमल हृदया, परदुखकातरा, मधु. रभाषिणी भिक्षु णा ने अनेक बजादपि कठोर मात्माओ को धर्म पंथ पर मारूढ़ करदिया। । । । । क

hu
१०४
।
-
)
।
1
भारत का नारी इंतिहास दूसरा भाग ।
मंगधाधिपति महाराज अशेक अपने पिता,
विन्दसार के समय में प्रवन्ति प्रदेश मे शासन
करता था। उज्जयिनी नगरी की "देवी"
नाम्नी परम रूपवती राजकुमारी से अशोक
ने विवाह किया । इनके यहाँ राजकुमार
महिन्द ( महेन्द्र ) और राजकुमारी सिद्ध
मित्रा' इन दोधालको ने जन्म धारण किया
इस समय महाराज प्रकि स्वयम् दीक्षा ले
चुके थे। उनके जीवन में क्रमशः बुद्धधर्म
की शिक्षा, अपना स्थान कर चुकी घो। सोते,
उठते, बैठते, जागते उन्हें बैद्धि धर्म के प्रचार '
को लग्न थी। उन्होंने क्रमशः' मांस भक्षण
का परित्याग, करदिया था। परित्याग ही
नहीं वरन् प्रजा में भी इस निन्दनीय प्रणाली
के बन्द करने के अनेक उपाय सोचे थे।
उन्हें धर्म में इसनी अगाध श्रद्धा होगई
थी कि उन्होंने राजकुमारी का नाम भो'
सङ्घमित्रा हो रखना परान्द किया ।
सिंघलेश्वर - ( लङ्कापति ) पाण्डूकचाहू
का पौत्र 'तिरस" इन दिनों लंका में राज्य
-
1

संघमित्रा। १०५ - " - करता था। जय महाराज अशोक ने मगध- देश पर अपना शासन प्रारम्भ किया, तब सिघलेश महाराज तिरस ने बहुमूल्ययान नया उत्कृष्ट मेोती और अनेक अन्य पदार्थ मगधाधिपा की सेवा मे समर्पण किये थे। जो चार दूत इनकी भेट के पदार्थो को लाये थे, मगर में उनका बडा सत्कार किया गया और बहे आदर तथा सम्मान से उन्हें शिक्षा किया गया था। इधर महाराज अशोक ने अपने राजकर्मचारियों द्वारा महानुभाव निस्स को प्रसन्नता के लिये उपहार के स्वरूप बहुमूल्य कुछ सामग्रो भेजी । उनमे एक अति सुन्दर मणिमय किरीट भोर मणिमुक्ता विमण्डित, तलबारादि वस्तुए थीं । इन वस्तुओं के साथ एक समपत्र भी भेजा जिसमें उपदेश था कि "बुद्धदेव और उन कधित धर्म को ग्रहण करने से अवश्यमेत्र श्रापका और आपकी प्रजा का कल्याण होगा” । दूतों के प्रस्थान करने पर महाराज प्रशोक ने सिंघल देश में धर्म के प्रचार करने के उपायों में - .

- । . . । १०४, भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। मगधाधिपति महाराज अकि अपने पिता विन्दसार के समय में प्रवन्ति प्रदेश मे शासन करता था। उज्जयिनी नगरी की "देवी, नाम्नी परम रूपवती राजकुमारी से अशोक ने विवाह किया । इनके यहाँ राजकुमार महिन्द ( महेन्द्र ) और राजकुमारी 'लड्ड- मित्रा' इन दो बालको ने जन्म धारण किया। इस समय महाराज शेकि स्वयम् दीक्षा ले चुके थे। उनके जीवन में क्रमशः बुद्धधर्म की शिला अपना स्थान कर चुकी थी। सेाते, उठते, बैठते, जागते उन्हें बैंद्विः धर्म के प्रचार की लग्न थी। उन्होंने क्रमशः मांस मक्षण का परित्याग कर दिया था। परित्याग ही नहीं वरन् प्रजा में भी इस निन्दनीय प्रणाली के बन्द करने के अनेक उपाय सोचे थे। उन्हें धर्म में इतनी अगाधं ब्रहा होगई थी कि उन्होंने राजकुमारी का नाम भी सद्यमित्रा हो रखना पसन्द किया । सिंघलेश्वर ( लङ्कापत्ति') पाण्डूकबाहू का पौत्र 'तिस्स” इन दिनों लंका मे राज्य - -- । - " संघमिक्षा। १०५ AL करता था। जय महाराज अशोक ने मगध- देश पर अपना शासन प्रारम्भ किया, तब सिघलेश महाराज तिरस ने पहुमूल्यवान लथा उत्कृष्ट माती और अनेक अन्य पदार्थ मगधाधिपाली सेना में समर्पया किये थे। जो, चार दूत इनकी भेट के पदार्थों को लाये थे, मगध में उनका बडा सत्कार किया गया और बडे चादर लथा सम्मान ने उन्हे विदा किया गया था। इधर महाराज अशोश ने अपने , राजकर्मचारियों द्वारा महानुभाव निस्स को प्रसन्नता के लिये उपहार के स्वरूप 1 , - में - अंति :- बहुमूल्य कुछ - सामग्री भेजी । उनमें एक मणिमय किरोट और मणिमुक्ता विमण्डित तलवारादि वस्तुएं थीं । इन -वस्तुओं के साथ एक प्रेमपत्र भी भेजा जिसमें उपदेश था कि "बुद्धदेव और उनके कथित धर्म को ग्रहण करने से अवश्यमेत्र प्रापमा और शापको प्रजा का कल्याण होगा"। दूतो के प्रस्थान करने पर संहाराज प्रशोक ने सिंघलदेश में धर्म के प्रचार करने के उपायों ।

१ 1 -- १०६ भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। पर विचार किया । इन्ही दिनों ममघाधि. पति : भाता राजकुमार ने भिक्षरूर से बौद्ध धर्म मे दीक्षा ली। चना की धर्म में श्रद्धा और रुचि को देखकर राजकुमार महिन्द तथा राजकुमारी सिंघमित्रा में भी दीक्षा लेली । यह महाराज के शासन का. सोलहवां वर्ष धा । धड़े समारोह से धर्मोत्सव सुसंपन्न हुआ। अशोकनन्दन महिन्द की प्रायु इस समय २० वर्ष और राजकुमारी सघमित्रा की प्रायु १८ वर्ष की थी। दोनों अविवाहित थे। राजकुमार महिन्द को प्राज्ञा मिली कि यह सिंघलेश्वर के यहां जाकर धर्म का प्रचा करें। कुमार महिन्द निज दल के साथ लंक पहुचा । देवानाम् प्रिय महाराज 'तिरूम : परमादर के साथ राजकुमार का स्वागा किया। महिन्दराज्य को सहायता से, सा द्वीप से भूमण करने लगा। उसके से विनिसृत मधुरासिमधुर धर्म कथा व सुनकर आघालवृद्ध मुग्ध होने लगे। महारा - मुख कमा ] -

१००
संचमित्रा।
तिस्स अपने ४० हजार साथियों सहित
दोक्षित हो गया । राजा के अनुकरण से
हजारों लोग - दीक्षित होने लगे । अनेक
देवियों ने महिन्द के अमृतमय उपदेशों को
श्रवण किया। देवानाम् प्रिय महाराज तिरस,
की राजमहिषी अनूला अपनी सखियों के
साघ एक दिन महिन्द के समीप समुपस्थित
हुई और मिक्षिणी ( संन्यासिनी) पनने के
लिये प्रार्थना की । परमधार्मिक महामना
महिन्द ने विनीतभाव से उत्तर दिया कि यह
कार्य
मुझ से निष्पादन न होगा । मेरी
धार्मिका भगिनी भिक्षणी भवमित्राने संन्यार
ग्रहण कर लिया है। प्राप कृपाकर उसे यहां
मगवालें वह यहां उपस्थित होकर प्राप
देवियों को मनोवाञ्छा को अवश्यमेव
पूर्ण करेगी।
ने तरकाल एक राजदूत
संघमित्रा केो सिंहलद्वीप मे लाने के निमित्त
देवानाम् प्रिय महाराज
के पास भेज
।
-
राज्ञी अनूला
प्रक
दिया ।
सन्यासिनी राजदुलारी संघमित्रा
।

१२० -- 1 भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग । अनेक महिलाओं के सङ्ग संन्यासिनो बनगई इस समय सिंघलद्वीप के नाना स्थान में अनेक विहार और उत्तमोत्तम मन्दिर निर्मित होने लगे। पर्वतों को काटकर, बनो , को जलाकर और समतल भूमि के सुरम्य स्थडो मे भिक्षु भो तया भिक्ष झनियों के निवासार्थ विहार बनने प्रारम्भ होगये। महापौधि वृक्ष की शाखा को एक विशाल और सुरम्य उद्यान में रोपन किया गया और उस प्रमोद उद्यान नाम मामेव धन रखा गया। इसी महामेव धन में महास्थिवर महिन्द, भिक्ष तिस्स प्रभृति भिक्षु सङ्ग रहते थे इन्हीं दिनों महाराज शेकि के पास से महात्मा बुद्धदेव को “अस्थि" सिघलेश्वर ने मगाई थी। इस प्रकार राजकुमार महिन्द और राज- दुलारो संघमित्रा के उद्योग से सिंघलद्वीप मे बैधि धर्म का अतिशय प्रचार होगया। राजसन्तान हाने. 'प पर भी इन दोनो ने राजय, राजभोग, स्वदेश सम्बन्धो, माता पिता, -- संघमित्रा। - । मित्र, धन, मान, सद्भम आदि समस्त सुखों की जलाजलि दी और बैटु धर्म प्रचारार्थ अपना समग्र जोवन सिघल द्वीप मे ही व्यतीत करदिया । इन दोनों के आदेशानु- सार' सिंघलेश्वर ने ४० वर्ष पर्यन्त परम सुख से 'राज्यशासन, प्रजापालन और बौद्ध धर्म को परम उन्नति के साधनों को निष्पा- दन किया और खोष्ट सन से २६६ वर्ष पूर्व अपने नश्वर'कलेवर का परित्याग किया। इस घटना के चार वर्ष पश्चात् अर्थात् सन् इस्थी, से २६२ वर्ष पूर्व महास्थिया ने देह त्याग किया और एक वर्ष के पश्चात् परम भिक्षुणी संघमित्रा ने इस पचाभातिक शरीर का परित्याग किया। महिन्द तथा संघमित्रा दोनों ने "महिन्तल पर्वत" मे माण 'दिये थे। ' इसी स्थान पर आज भी अनुराधपुरा के दिव्य मन्दिर और बिहार दृष्टि गोचर होते है। बाटुनमण अतीव प्रशसनीय है। उसको भगिनी राज- । J महिन्द का स्वार्थ परित्याग 1 --

११२
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
कुमारी संघमित्रा ने स्त्री होकर जिस प्रकार
से अपने स्वार्थ को भस्मसात छर के परहित
मे जीवन को दान कर दिया वह एक प्रतु.
लनीय उदाहरण है। जब तक जगत में सत्य
का मान होता रहेगा, तब सक बौद्ध धर्म
का इतिहास उपस्थित रहेगा, जभ तर पुण्य,
निस्वार्थ और परोपकार को महिमा मे
मनुष्य गाया करेंगे एवं लय तक जगत् में
पवित्र जोबन का सादर रहेगा, तब तक
धर्मपरायणा, त्यागशीला, अनन्तगुण सम्पन्न
मधुरमापिणी, दया की मूर्ति संघमिनां का
सुनाम देदीप्यमान रहेगा, सनतक संघ-"
मित्रा का जीवन, अनेक, नरनारियों के देही
मे धर्म पर बलिदान हेाने के निमित्त शुद्ध
रक्त का संचार करता रहेगा। सब नाम को।
नाश कर देने वाला काल भी पवित्र देवी को
अचल कीर्ति को मिटाने में कभी भी समर्थ
न होगा। माता भारतभूमि! क्या तुम प्रश्न
सधमित्रा के रद्धश कोई धार्मिका पुत्रो और
प्रसव न करोगी?
.
1

। - 1 उभय कुमारी पुत्री थी -- (१०) भय कुमारी मालवा देश के चन्देरी नगरी के राजा प्रतापसिंह की Baan सुन्दरी और धर्मात्मा सुशोल वह हृदय की उदार पीर दयालु धी इंका-वियाह सूरसेन' नामी सैनिकपुर के राजा के साथ हुआ था, यह भी बड़ा नेक पीर पुरुप था। जब से उसयकुमारी इसके यहा विवाहित होकर आई थी वह दिन प्रति दिन निरन्तर सूरसेन की सेवाको अपना परमधर्म समझती थो, कहने को तो यह दोनों पति पत्नी थे, परन्तु यह दोनों बड़े धर्मात्मा थे उभयकुमारी पति से दो चार दिनके लिये मो पृथक रहना नहीं चाहती थी। कहते है सूरसेन किसी कारण से श्रीवस्ती नगरी के राजा के अधीन था, साल में कभी - ६ । १५ -~- । ३ १ - ९१६ भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। शत्रु पर जय लाम करके शीघ्र तेरे पास आ जाऊंगा। उभयकुमारी बोली नेत्रमणी ! जो तुम कहते हो सत्य है जिस सरह तुम को अपने स्वामीको आज्ञा माननी आवश्यक है मैं भी पति परायणा हूं कभी तुम्हारी इच्छा विरुद्ध काम करना नहीं चाहतो किन्तु एक घर छाप से मांगतो । वह यह है कि तीज भादी के दिन आप अवश्य यहां आजादै शाकि मै आपकी पूजा करू पाज से चार मास पीछे तीज का दिन पावेगा मै उस समय तक आपको प्रतीक्षा कर सकती हूं। यदि आप तीज को न आये तो फिर ईश्वर जाने मेरो क्या दशा होगी सूरसेन ने हंसकर उत्तर दिया।', प्रिये ! तू तीज कहती है मैं उससे पहले ही प्राजाऊगा और तीजको त प्रव- श्यमेव यहा रहूंगा तू खातिर जमा रख 'मैं अश्य और हानि उठाकर भी यहां पहुंच जागा इसमे सन्देह न पड़ेगा तू उस दिन अवश्य मेरी प्रतीक्षा करना। 1 -- 1 - -

११७
उभयकुमारी
इस प्रकार धैर्घ्य देकर सूरसेन अपनी
सेनाको साप लेकर उभयकुमारी से घिदा
होकर- चला गया। उमयकुमारी ने उत्तम
वस्त्र व प्राभूपण उतार कर रख दिये साधा.
रण वन धारण कर लिये और अपने पति
के स्थान मे रियासत का प्रबन्ध स्वयम करने
गी। रात दिन उसे अपने पति का ध्यान
रहता था। जैसे योगी परमात्माके ध्यान में
मग्न रहते है वैसे ही इस पतिव्रता की दशा
थी, दो मास बीत गये और सूरसेन नहीं
माया । किन्तु सतीके हृदय
में धैर्य था ।
वह जानतीधी तीज के दिन अवश्य प्रावेंगे।
हिन्दू खियों मे भादों को तीज बहुत पवित्र
त्योहार समझा जाता है । इस को यथार्थता
चाहे कुछ ही हो परन्तु इस दिन सुहागिन
स्त्रियां अवश्य व्रत रहती है और पति की
कुशलता के लिये प्रार्थना करती है। यह
पति
पूजा का दिन समझा जाता है। उम.
'यकमारी को
पूरा
निश्चय धो कि मेरा
पति इस दिन अवश्य प्रावैगा क्योंकि यह
प्रतिज्ञा करके गये थे।

200 । ११६ भारत का नारी इतिहाम दूसरा भागा । शत्रु पर जय लाम करके शीघ्र तेरे पास आ जाऊंगा। उभयकुमारो बोलो नेत्रमणी ! जो तुम कहते हो सत्य जिस सरह तुम को अपने स्वामीकी साज्ञा माननी मावश्यक है, मैं भी एति परायणा हूं कभी तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध काम करना नहीं चाहती किन्तु एक घर माप से मांगती हूं। वह यह है कि तीज भादी के दिन प्राप प्रवश्य यहां प्राजाव लाकि मैं आपकी पूजा करू श्राज से चार मात्र पीछे तीज का दिन आवेगा में उस समय तक प्रापको प्रतीक्षा कर सकती हैं। यदि आप तीज को न आये तो फिर ईश्वर जाने मेरी क्या दशा होगी सूरसेन ने हँसकर उत्तर दिया। प्रिये ! तू तोजो कहती है मैं उससे पहले ही प्राजाऊगा,और तीजको तो प्रव. श्यगेध यहा रहूंगा तू खातिर जमा रख 'मैं अवश्य और हानि उठाकर मो. यहां पहुंच जाऊंगा इसमे सन्देह न पड़ेगा तू उस दिन अवश्य मेरी प्रतीक्षा करना। - - प 4

-
.
समयकुमारी।
में व्यतीत हुआ सन्ध्या होगई सूरसेन नहीं
माया अथ इस · को चिन्ता होने लगी कई
युद्ध में गया था ईश्वर जाने क्या हुअा हो
समाचार भी कुछ नहीं मिले थे उसकी
चिन्ता क्षण प्रति क्षण घढती गई अघ नक
उसने क छ सोच विचार नहीं किया था अब
पर इस प्रकार सेोचने लगी, क्या कारण है
अब तक स्वामी जी नही आये भईरात्रि के
लगमग बीत गई कुछ पता नहीं ईश्वर
क्या हुआ स्वामी क्यों न आये। क्षत्रि का
वचन भो मिथ्या नहीं होता फिर कारण
क्या है इस के हृदय मे चिन्ता की भाग
प्रज्वलित हुई वह रह २ कर व्याकुल होती
'घी
हृदय में चैन नही पड़ता था।
", उसको यह निश्चय होगया कि स्वामी
अवश्य युद्ध में स्वर्ग को सिधारे अब मुझे
भी यहीं चलना चाहिये क्योंकि पति के
बिना इस संसार में स्त्री का दूसरा कान है
स्वामी स्त्री को नर्क मे छोड़ कर स्वर्ग का
पयान, करै तो फिर स्त्री को यहां और
कामसी प्यारी प्रस्तु है जिसके लिये यहां
अथ संसार कुछ नहीं है उसको यह
.
-

। 3 11 - ११९ भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। इस काल में सूरसेन निरन्तर शत्रुओं से लड़सा रहा इस प्रकाश नहीं मिला कि घर को प्रादमी रवाना करता। इसने विजय प्राप्त कर लो। शत्रुओं को जीतकर नोबस्तो नगरी में पहुंचा। तीज, के त्यौहार मे. केवल दो दिन बाकी थे। श्रोत्र स्ती के राजा ने उसका बड़ा सन्मान किया और चाहा कि वह तीन चार दिन वहां अतिथि रहे उसने • कर जोह कर कहा महाराज ! मेरो स्त्री प्रतीक्षा में होगी। यदि मैं सोज झो न पहुंचा तो कुशल न होगो राजा ने रोकना उचित न समझा सूरसेन तेज सांडिनी पर चढ़कर चल पड़ा। उभयकुमारी झा,हाल सुनिये यह दिम- प्रति दिन प्रतीक्षा करती रही निदान तीज का दिन प्रा पहुंचा इस दिन वह बढी मान- न्दित थी क्योंकि पति के मिलने की प्राशा थी उसने नहा धोकर 'अच्छे वक्ष और भाभूषण पहने पुष्पों की वेणी अपने बालों में लगाई सारा दिन पूजा, त्यौहार को रोति" । - कृष्णा कुमारी 1 पैकण्ठवास हो जाने पर कुमारी का विवाह (११) भी थे हा ही समय व्यतोन हुआ' अ है अधिक दिन नहीं दिन नहीं हुए। हिन्दूपति चिन्तोर लरेश महाराणा भीमदेव के. एक कन्या कृष्णाकुमारी यो उसके रूप को प्ररा सा सारे भारत- वर्ष मे फैल रही था, उस · सुकुमारी को -सुन्दरता का वर्णन अभी तक कोई कवि मली माति नही कर सका है। वह मृगलो. जनी वास्तव मे लक्षणो का अवतार थी। महाराणा ने उसका विवाह मारवाड नरेश से ठहराया था पर विवाह होने से पहिले हो मारवाह नरेश स्वर्गको सिधारे, उनको - अम्बर नरेश प्रसिद्ध जगतसिंह के संग नियत हुमान पर नये मारवाडकं राजा महाराजा मानसिंह ने भी अपना स्वत्व जमाया भला व - - १२० भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। *चिन्ता यहाँ तक बढ़ी कि उसका शरीरांत हो गया । जप सूरसेन लौट कर पाया और पूछा रानी कहाँ है एक दासी ने कर जोडकर कहा महाराज., रानीजीने आज व्रत रक्खा था दिन मर प्राप के मिलने के हर्ष में मग्न थीं शाम तक आपकी प्रतीक्षा को फिर जाकर चिन्ता में पड रहीं। सूरसेन ने जाकर देखा तो उसके प्राण शरीर को छोह चुके थे सूरसेन के लिये दुनियाँ को अंधेरा कर गई, सूरसेन को जो दुःख हुआ उस को मारी लेग्वनी नहीं लिख सकती उसने यांदियोको पुकारा वह सब दोडकर भाई और गानो को दशा देखकर रोने लगी। सूरसेन को भी बड़ा ही दुःख हुप्रा उसने दासियों से कहा अथ धाहर जामो जय सथ बाहर गई उत्तने एक बार अपनी पत्नी को दृष्टि मर कर देखा ऐसा जान पड़ता था मानो अभी साई है सूर तेनने धडा विलाप किया। उभयकुमारी धन्य थो परमात्मा करै हमारे देश की सभी खियां ऐसी हो पतिभक्ता हो कि पति और दुख संसार में पति कोही अपना सर्वस्व समझे। - - । - t के सुखमे सुख दुःख मानकर T -- -- । 1 1 1 - 'कृष्णा कुमारी। इस समय मैं उस गद्दी पर हूं इस से कुमारी का विवाह मुझ ही से होना चाहिये। महा- राना जी अम्घर नरेश को बचन दे चुके थे प्रय वह किं कर्त्तव्य विमूढ हो रहे थे । हाय जिस चित्तोर नरेश की ओर सारे भारत के नृपतिगण ताकते थे हाय जिस चित्तौर नरेश की टेढ़ी दृष्टि से सारा संसार कंपाय- मान हो जाता था, जिस चित्तौर नरेश , आगे सब राजे महाराजे छापना मस्तक झुकाने थे, जिसकी सेवा करने में वे अपना गौरव मानते थे आज उसीज्ञी यह दशा हो रही है कि अपनी राज कन्याका विवाह 'अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता हाय हाय मगवान रामचन्द्र, वापारावल धोरयल सांगा, स्वदेश प्रमो समरसिह महाराणा, जगत प्रसिद्ध राजसिह के वंशधरकी प्राज यह दशा, राजपूत राजाभो को वह चित्तौर से नहीं हटा सका । जिनके पूर्व पुरुषों ने अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान तक अपनी विजय पताका फहराई थी जो बंश भारत -- -

अमूल्य रत्न को
-
.
।
-
રર भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
ऐसे
कान नहीं चाहता
सेंधिया किसी कारण जगतसिह के विरुद्ध
हो गया था और उसने मानसिंह का पक्ष
लिया। पहिले तो ये दोनों महाराजे आपस
में भली भांति लडे, रक्त की नदियां बहाई
और असंख्य बीर राजपून उन लडाइयों मे
काम आये । राजपूनाने में प्रलय मच रही
थी इस समय मेगाड को जैमी बुरी दशा धी
वैसी कभी किसी ने स्वप्न में भी नही देखी
होगी मरहठों ने उसकी दुर्दशा कर रखी.
थो । स्वर्ग समान मेवाड प्रान्त माना जगल
हो रहा था । हिन्दू पनि का तेज नष्ट हो
चुका था । अब उन दोनों महाराजाओं ने
चित्तोर के पास अपने डेरे डाले श्रार यदि
कुमारी का विवाह किसी एक के साथ हो
दूसरा केवल- उसी को नाश करने
को नहीं चित्तौर को भी उलटा देने को
प्रस्तुत था। महाराजा मानसिंह ने कहला
भेजा कि कुमारी का विवाह मारवाड़ नरेश
से ठहरा था-न कि किसी विशेष व्यक्ति से
.
.
जाय तो

। 1 कृष्णा कुमारी । १२३ इस समय मैं उस गद्दी पर हूं इस से कुमारी का विवाह मुझ ही से होना चाहिये। महा- राना जी अम्पर नरेश को बचन दे चुके थे प्रब वह किं कर्तव्य विमूढ़ हो रहे थे । हाय जिस चित्तोर नरेश की और सारे भारत के नृपतिगण ताकते थे हाय जिस चित्तौर नरेश की टेढी दृष्टि से सारा संसार कंपाय- मान हो जाता था, जिस चित्तार नरेश के प्रागे सत्र राजे महाराजे अपना मस्तक झुकाने थे, जिसकी सेवा करने मे वे अपना गौरव मानते थे आज उसीकी यह दशा हो रही है कि अपनी राज कन्याका विवाह अपनी इच्छानुसार नहीं कर सकता हाय हाय भगवान रामचन्द्र, वापारावल धोरपल सांगा, स्वदेश प्रमो अमरसिंह महाराणा,, ' जगत प्रसिद्ध राजसिंह के वंशधरकी आज यह दशा, राजपूत राजाभो को वह चित्तौर से नहीं हटा सका । जिनके पूर्व पुरुषों ने अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान तक अपनी विजय पताका फहराई थी जो वंश भारत - In १२४ " 1 २ भारत का नारी इतिहा दुसरा भाग का सरताज माना जाता था, जिसने अकेले अकबर ऐसे' प्रचल शत्रु के दांत खट्टे कर दिये थे । जिसने औरंगजेच' ऐसे बादशाह को नीचा दिखाया था, जिसने सदा भारत वर्ष को संकट से बचाया था, जिसने अपना मान कठिन से कठिन समय पर भी नहीं गंवाया था आज वही वंश प्रनाथ की भाति इधर उधर देख रहा है ऊंटको किसी स्थान में अपनी नाक , मर रखने का स्थान मिले फिर तो वह गर्दन भी डाल देता है। जैचंद और पृथ्वीराज आपस से लडे, पौर फर पामर जैचंदने मुहम्मद गोरी को बुलाकर अपनी प्यारी जन्मभूमि को पराधीन धना दिया। केवल पीरबल एथवीराज का हो नहीं किन्तु अपने वंश और जीवन के नाश का मी मूल कारण हुआ। रापोवा और नाना- फरनवीस ने इसी प्रकार लडकर सहाराजा- धिराज श्रीमहाराज शिवाजी के सारे उद्योग निष्फल कर दिये । उसी प्रकार मेवाड़ राज- वंश को २ मूल शाखायें चन्द्रावत और सक्ता- " - + . 1 १२५ - - । । कृष्णा कुमारी। वस आपस मे लही पोर मरहठों को बुल- वाया । उन्होंने आकर भलो मांति लूटमार मचाई और मेवाड उजाड दिया। हा कौन जाति ऐसी वीर ससार से उत्पन्न हुई है जो राजपूतों का सामना कर सके, उनको ओर मांख उठाकर देख सके। उधर तो मरहठे सब कुछ लूट गए, इघर धापस मे फूट पडी है और प्रय बाहर से चढाई हुई सा भी किसी और सामान्य जातिकी नहीं योर राजपूता ही की । केवल मेवाड ही की बुरी दशा नहीं है । सारे भारत में किसी न किसी प्रकार की खलबली मची हुई है। जय हिन्दू पति की यह दशा थी तब भारतवर्ष किसका मुह देख कर जीता रहता ऐसे संकट से मला भारत और हिन्दूपति को कैान सम्हालता। कान स्वदेश प्रम के पवित्र मत्र से उत्साहित हो शत्रुओं पर टूट पड़े और उनको दूर हटावे । कोई नहीं प्रकृति चिल्ला कर कहती है कोई नहीं। भारत को प्रार्य - . -

।
1
१२६ - भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग ।
लक्ष्मी शत्रुओं के यहां वड़ियों में जकड़ी
हुई बोली "कोई नहीं" हाय ! प्यारी भारत
भूमि आज अनाधिनी है। पतिपुत्र विहीना
है। आज वह दुष्ट विश्वासघाती बेईमान
शत्रुओं के कठिन कारागार में कैद है।
अब महाराणाजा को क्या उपाय करना था।
बहादुरी से लड कर प्राण देना परन्तु वह
तेज तो आपस में फूट पड़ने से पहले
ही नष्ट हो चुका था। फिर कैसे इस डूबे
हुए मेवाह को रक्षा करते। अब केवल एक
यही उपाय था कि इस
झगडे को,
कुमारी के रक्त से बुझायो जाय। महाराज
दौलतसिह राणाजी के एक नातेदार इस
कार्य मे नियत किये गए उनसे कहा गया
कि आप प्यारी, कृष्णा का प्राणाघात कर
मेवाड के मान' को रक्षा कीजिये 1 उस वीर
ने कानों पर हाथ रखे और बिगह कर
कहा,
से, ऐसे बचन निकले यह
फट न गया, जिम मनुष्य का ऐसा विधार
हुधा' वह पहले ही मर न गया । राणा जी
अग्नि
-
जिस मुख
+

-- - । कृष्णा कुमारी। १२० का साथ देने का यह अर्थ है तो मै उनका 'सायी नहीं ' यदि ऐसा कर्म करने से उनके सावन्तो मे गिनती हो तो मै बाज माया तष महाराजा , जीवनदास की सहायता मांगो गई। यह एक प्रकार से महाराना जी के भाई थे । उनको उस कार्य की आवश्य- कता समझाई गई, और कहा गया कि यह काम साधारण पुरुप से नहीं कराया जा सकता । उन्होंने ऐसा करना स्वीकार किया 'ओर खड्ग ले प्यारो कृष्णा के ले प्यारो कृष्णाके राजभवन मे गये परन्तु जय ' वह भोली सुन्दरी उनके सामने आई तो खड्ग हाथ से छूट पड़ा और जीवनदासजी बुरो अवस्था मे दहां से लौटे परन्तु इससे उनके आने का अर्थ प्रका- *शित हो गया कृष्णा की माता ने सारे महल हाहाकार मचा दिया । परन्तु सम्म निष्फल हुआ यदि लोहे ने काम पूरा न किया तो क्या विष सहायक न होगा विपका कटोरा पिताको भोर से उसो दियागया स्नेह और आदर से उसने उसको लकर पी लिया और परमात्मा 1 -- में ।

-
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
से अपने पिता की आयु वृद्धि और बलको
प्रार्थना की। उसकी मातााणाजी को
धिक्कारती थो पर कुमारी प्रसन चित्त
उसका यों समझाती धो 'माताजी ! प्राप
क्यों क्लेश करतो हैं । इस संसार की विपत्तो
का सहन करने का समय हमारे लिये और
कम होगया मुझे मृत्यु का कुछ मी, मय
नहीं। क्या मैं आपकी पुत्री नहीं हूं। फिर
मुझे मौत का क्या भय ?' .राजपूत, बालाओं
का तो सदा प्राण त्याग करने का प्रस्तुत
पहुना ही चाहिये । मला राजपूतों को मात
का मय ! आप यह क्या अनर्थ करती
राजपूतों के नाम केर न हंसाइये मै सेलिह
वर्ष तक जीवित रही, इसके लिये मुझे अपने
पिता को धन्यवाद देना चाहिये । आप में
लिये अपने चित्त को उदास न करें-
मेरा अन्तिम प्रणाम स्वीकार कीजिये
माताजी प्रसन्न होकर मुझे बिदा कीजिये
मेरे मरने से मेरे देश की रक्षा होती है।
घड़ी भाग्यवती हूं। अहा ! अपना प्राए
.
1

१२८
.
-
कृष्णा कुमारी।
त्यागकर मैं अपने देश को बचाऊंगी।
माताजी मुझे विदा कीजिये मेरे अपराधों
को क्षमा कीजिये प्रण मेरी श्राप से भेंट न
होगी कुमारी अपनी माता को इसी प्रकार
समझाती रही। घढी देर हो गई पर विपने
कुछ असर न किया दूसरा कटोरा दियागया
वह उसको मी पी गई, यह
मो निष्फल
हुमा
ऐसे मेले और प्यारे स्वरूप पर लोहा, तथा
'विष के लिये किसी का, हाथ नहीं उठता,
संसार को ऐसी देवी रहित करने का अपयश
अपने ऊपर कौन लेता? सीसरा विष का
केटोरा दिया गया उसका भी कुछ प्रभाव
हुमा
कटोरा और महा विकट
विष का बनाया गया,
प्यारी कृष्णा
ने
भोरों की मांति प्रसन्नता पूर्वक उसको भी
पान करलिया परन्तु सब विष कहांतक
मना' करता अन्त मे उसने अपना काम
किया । कृष्णा कुमारी गई सदा के लिये,
हाय ! आज ऐसी देवी ससार से उठगई।
कोई क्या करे ईश्वरेच्छा प्रवल है । कृष्णा
। चौधा

१६० भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। की माता ने मी खाना पीना छोड़ दिया। और कुछ ही दिनों में अपनी प्यारी पुत्रो का साथ दिया । प्यारी कृष्णा ! तू धन्य थी .तेरे साहस को घन्य है परमात्मा करे हमारे देश की सभी कन्याए अपने बड़ों की मान मर्यादा, का सदैव ध्यान रक्खें। , 7 भारत का नारी इतिहास । प्रथल भाग कई वर्ष का समय व्यतीत हुभा तब भारत का नारी इतिहास प्रथम भाग छापा या उसे पाठिकानों बहुत पसन्द किया और उसकी बीस हजार प्रतियां बहुत घोडे समय में ही धिकगई उन्हें पढ़ सुनकर दूसरे भाग के लिये कई हजार चिट्ठियां भाई इस लिये हमने इस दूसरे भाग को छपाकर सबकी सेवा में भेजा है। तीसरा भाग भी शीघ्रही छपेगा अभी से होने घाले ग्राहकों को १) में ही मिलेगा। इसके कई भाग होंगे। कई भागों में ५००.पांच सौ जीवन चरित्र पूरे किये जायेंगे। यशोदादेवी.. - - .

- -- C कर्मदेवी प - (१२) चीन समय में कन्याए घड़ी घोर प्रा मोर साहसिन होती थीं जिनका नाम अब भी इतिहास में चला मारहा है प्यारी पाठिकाणी आजमै तुम्हें जिस साहसिन वाटिका की कथा सुनाती हूं -उसका नाम नर्मदेवी था यह माहल राज के सेनापति की, कन्या थी कर्मदेवो बड़ो तुर, पढी लिखी वीर और साहसिन थी इसके गुणो को चर्चा देश भर में फैली हुई घो। इसके गुणो को देखकर बडे बडे राजा अपने पुत्र का विवाह इसके साथ करने का चित्रार कर रहे थे सभी को इच्छा इस गुण- वती हो। पुत्रवधू बनाने के लिये हर समय रहती थी परन्तु इसके माता पिता मो यही चाहते थे कि पुत्री की समान हो . कन्या 7 - । । १२२ भारत का मारी इतिहास दूसरा भाग। गुणवान वर मिलने पर विवाह कियाजावेगा। बड़े सोच विचार के साथ कर्मदेवी का विषाह साधु नामक गुणवान घर के साथ हुवा विवाह निश्चय हो जाने पर जो राजा पहिले से ही इस गुणवती को अपनी पुत्र- धधू बनाकर अपने ग्रहस्थ को स्वर्गधाम घनाना बहते थे उनको दुःख हुमा । मन्दार के राजा को तो यह बात बहुत ही पुरी लगी उसने अपनी फौज को प्राज्ञा, दी कि साधु को उसकी स्त्री : कर्मदेवी सहिन पकर लामो और उनके साथ जो धाराती, प्रायो हो सयको पकड़ लो यह विचार कर चार हजार सेना लेकर बारात'प्राने मार्गको घेर लिया कर्मदेवी की विक्षा करा साधु वहां से चल दिया मार्ग मे यह दशा देखकर बड़ा दुःखी हुमा उसने मन्दौर के राजा से कहा। आपकी इच्छा यदि लड़ने की है तो अकेले आप मेरे साथ लड़िये अधिक हत्याएं करने से क्या लाभ होगा। दोनों ओर से यह बात मान ली गई साधु ने प्राकर अपनी स्त्री - * 1 । r- - कर्मदेवी। 'कर्मदेवी से लड़ने की सलाह ली उसने बढे 'उत्साह से कहा आप जाइये मैं भी आतो हूं हम लोग शत्रु से घिना किये निश्चि- 'तता से न रह , सकेंगे इसलिये लडना ही परेगा। धर्मदेवी ने पति की युद्ध के लिये सजा कर तैय्यार किया और कहा स्वामी ! आज मैं तुम्हारी वीरता देखूगी यदि आपने शत्रु जीत लिया तो हम लोग प्रानन्द पूर्वक हंगे और यदि शत्रु की जीत हुई तो मैं भी प्रापके माथ ही प्राण त्याग करूंगी। इस प्रकार कर्मदेवीने अपने पति का उत्साह डाकर युद्ध मे भेजा। रणभूमि में जाकर युद्ध प्रारम्भ होगया कर्मदेवी का पति बड़ी धीरता से लड़ा अन्त वह ऐसा घायल हुमा. कि बचने की भागा न रही, कर्मदेवी यह समाचार सुन मदाने कपडे पहिन अस्त्र शबसे सुसज्जिनही आई के मैदान में आई उसने शत्रु सेना के छुटा दिये । उसका पति मूर्छित हो - 3 --

।
-
११४ भारत का नारी इतिहान दूसरा भाग।
पृथ्वी पर गिर पडा नम सेना में खलबली
मच गई परन्तु कर्मदेवी साहस किये हुए
लडाई के मैदान में डटी रही और शत्र
सेनाको मार भगाग फिर उसने अपनी एक
हाथ काटकर अपने
पास
भेजवा
दिया और
दूसरा हाथ अपनी सेना के
एक
मरदार से पटवा कर माता पिता के पास
भेज दिया । बर्मदेवी की बीरता साहस और
पति भक्ति को सुनकर माता पिता सास
ससुर दोनों घरो से कोलाहल मच गया सक
उसकी प्रशंसा करने लगे।
धर्मदेवी भी पत्ति के साथ ही साथ स्वर्ग
को सिधारी प्यारी पाठिानो' ! क्या तुम
कर्मदेवी के वीरता और साहस तथा पातिव्रत
धर्मकी सराहना न करोगी जिसने पति पत्नी
के सच्चे धर्मका पालन किया जिसकी कीर्ति
पताका प्रण तक हमारे देश के इतिहास मे
फहरा रही है, यदि उसमें यह अपूर्व गुण न
होते तो आज उसको यह कथा तुमको क्यों
सुनाई जाती प्राज उसका नाम कौन जानता
-

में
भाग का मूल्य २) होगा परन्तु पहिले से ही ग्राहकां
कागज महंगा होने के कारण पुस्तक अधिक नहीं
नाम न लिखावेंगे उनको किसी मूल्य में भी ,
कर्मदेवी।
मनुष्य मात्र, की क्या सी क्या पुरुष
मनुष्य जन्म लेकेर अवश्य ऐसे गुण प्राप्त
करने चाहिये जिससे मरने पर भी ससार
प्रादर सहिन उसका नाम लिया जावे
और दूसरों के लिये उसका चरित्र आदर्श
कटावै।
कर्मदेवी तू वास्तव में देवी थो तेरा
साहस तेरी घोरता तेरो बाल्यावस्था की
शिक्षा और तेरी माता को धन्य है ।
इधर देखिये।
भारत का नारी इतिहास कई भागो में ५००
जीयन चरित्र पूरे होगे और प्रत्येक (हर एक)
यशोदादेवी
मिलेगी
1
1
में
नाम लिखालेने से १) में ही दिया जावेगा
।
पी जाती इस लिये जो पहिले मे ही ग्राहकों में

-
C
झांसी की रानी
संक्षिप्त वृतान्त ।
(१३)
SUरतवर्ष की प्रसिद्ध बीर स्त्रियों में
भा
झांसी की रानी लक्ष्मा याई गत
ผลลล
उनीसवीं शताब्दी में तारा चन्दा
के पीछे अर्थात सब से अंतिम रानी, हो
गई है झासी नगर बुदेलखंड के पहादी
प्रदेश मे असा हुआ है जहां के राजा गंगा-
धर राव की
यह
गानी थी।
इसमें असाधरण धैर्य शौर्य और वृद्धि
की कैशलता थी, जिसका प्रशंसा मे बड़े बड़े
विद्वानों ने अपने उच्च अभिप्राय को प्रगढ़
किया है । परन्तु तो भी उसके चरित्रों से
इतना तो जानना ही चाहिये कि उसने
अधिधारी माहस से अंग्रेजों के विरुद्ध जो
पागलपन किया; वह ठीक नहीं किया क्योकि
अन्त में सम विपत्ति उसके. ही ऊपर पापही
और अपयश पाया।
3
-

.
झांसी की रानी।
१३७
सन् १८५३ ई० में रानी लक्ष्मीबाई के
स्वामी ने मानन्दराव नामक लडका गोद
लिया और पुत्र , के छह परलोक गमन
किया । राजा ने पाहिले. ब्रिटिश रेजीडेण्ट
का जता दिया था कि जो कदाचित् ईश्वर
की इच्छा से..मेरा मरण हो जावै तो मेरे
इस बालक के ऊपर तथा मेरी विधवा ली
पर'
कृपा दृष्टि रखना । दैवयोग से इस ही
समय मे नागपुर तथा सतारे के राजा भी
परला घात) हुये और उनका राज्य मर्कारी
राजन ने मिला दिया गया इस कारण
कितने ही एक रजवाहो मे खलवली पड़
गई कि सथ पुराने रजवाड़े चले जायगे ।
इतने में अर्थात् सन् १८५७ ई० में बड़ा भारी
घलया
हुआ
जिसने अलमान ब्रिटिश राजध
का यह बात, प्रगट करदी कि आपत्ति के
समय पर एक निष्टता से ' देशी रजवाडे ही
सहायता देने वाले हैं और वही राज्य के
स्तम्भ है।
गगाधरराव का परलोकधास
पानी लक्ष्मीबाई ने अपने गोद ,
।
राजा

झांसी की रानी
संक्षिप्त वृतान्त ।
५
aaand
(१३)
रतवर्ष की प्रसिद्ध धीर स्त्रियों में
झासी की रानी लक्ष्मा बाई गत.
ARRAO
उनोसवीं शताब्दी मे ताग धन्दा
के पीछे अर्थात सब से अंतिम रानी हो
गई है झासी नगर बुदेलखंड के पहाडी
प्रदेश में प्रसा हुश्रा है जहां के राजा गंगा-
घर राव की
यह रानी थी।
इसमे असाधरण धैर्य शौर्य और वृद्धि
की काशलता थी, जिसका प्रशंसा में पड़े, ब...
विद्वानों ने अपने उच्च अभिप्राय को 'प्रगट
किया है । परन्तु तो भो उसके चरित्रों से
इतना तो जानना ही चाहिये कि उसने,
अधिधारी साहस से अंग्रेजों के विरुद्ध जो
पागलपन किया, वह ठीक नहीं किया क्योकि
अन्त में सम विपत्ति उसके ही ऊपर पापड़ी
और अपयश पाया।
.
.
।
+

झांसी की रानी। - स्वामी ने (H . - मन् १८५३ ई० में रानी लक्ष्मीबाई के प्रानन्दराव' नामक लड़का गोद लिया मोर पुत्र को छोह परलोक गमन किया । राजा ने पहिले.ी ब्रिटिश रेजोडेण्ट को जता दिया था कि जो कदाचित् ईश्वर की इच्छा से.मेग मरण हो जावै तो मेरे इस बालक के ऊपर तथा मेरी विधवा स्त्री पर कृरा दृष्टि रखना । दैवयोग से इस ही समय मे नागपुर तथा सतारे के राजा भी परलोकवासा हुये और उनका राज्य सर्कारी गाजर में मिला दिया गया इस कारण कितने हो एक रजवाडो मे खलवली पड गई कि संघ पुराने रजवाडे चले जायगे । इतने मे अर्थात् सन् १८५७ ई० में बडा भारी अलवा हुआ। जिसने बलवान ब्रिटिश राजप को यह बात प्रगट करदो कि मापत्ति के समय पर एक 'निष्टता से देशी रजवाड़े ही सहायता देने वाले हैं और वही राज्य के । । . - . राजा. हाते हो, रानी गङ्गाधररावा का लक्ष्मीबाई ने परलोकवास अपने गे' ।

अंग्रेजी - L १५८ भारत का नारी इतिहाम दप्तरा भाग। लिये हुये पुत्र को गद्दो पर बिठाने की इच्छा की, परन्तु लार्ड, डैल हासो ने यह बात नहीं मानी और राजय राज्य में मिला दिया । इस कारण रानी निराश होकर अत्यन्त दुःखित होगई। कहा जाता कि उसको नित्य के आवश्यकीय व्यय के निमित्त भी कठिनता होने लगी थी परन् उसके ऊपर ऋण भी हो गया था, जेष ऋण देनेवाले महाजन ने रानी के ऋण- के व्याज की सार में सूचना दो तब उसकी पिंशन से रुपया काठकर महाजनों को चुकाये जाने का निश्चय किया गया। पर- तंत्र रानी ने इस बात से दुःखित हो गधर्नर- जनरल से प्रार्थना की, कि वर्तमान में मेरा राज्य सार के प्राधीन है प्रतएवं सार से ही मेरे ऋण का व्याज चुकाया जावै। मेरी तुच्छ पिशन से कैसे पूरा पड़ेगा, पहिले 'तो मेरी पिंशन हो इतनी थोडी " है कि मेरा खर्च उससे पूरा नहीं पड़ता फिर उसमें से व्याज' का रुपया काट, कर. महार्जनों को । H । म १ - - - । L झांसी की रानी। १५६ दिया जायगा तो फिर मैं अपने दिन किस 'प्रकार से काट सकूँगो परन्तु इस प्रार्थना का कोई, सोषकारक उत्तर न मिला। तीन वर्ष बीतने पर सिपाहियों ने अलवा किया। झांसी की सेना के सिपाहियों को हका कर , उसने आगे किया और उनको सहायता से ता० ४ जुलाई सन १८५७ ई० को जिस किले मे अंग्रेजो ने अपने कुटुम्भ सहित शरण ली थी उसको जा घेरा। इतनी 'मारी, मीड के सन्मुख लडना व्यर्थ जान, प्राण बचाने की प्राशा से उन्होने किले का द्वार खोला, कि बाहर निकल जावै परन्तु रुधिर के प्यासे सिपाहियों ने धर्म तथा न्याय का घिना विचार किये पहा भारी अनर्थ । कहा जाना है कि इस भय कर उत्पात में केवल एक ही पुरुष जीवित निकला था। इन निरपराधियों के वध का अपराध रानी सक्ष्मीबाई पर लगाया जाता है और उसको ही धाज्ञा से इस घोर युद्ध का होना मो माना जाता है किया 7 । -

१४०
-
,
है।
A
-
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग ।।
तदनन्तर · रानी लक्ष्मीधाई ने पुनर्वार
झांसी झा राज्य स्थापित किया और फिर
युद्ध का होना विचार कर रामचन्द्र के समय
की घीस ता पृथ्वी में से निकाली सपा
लगभग चौदह' सहल मनुष्यों की सेना
इकट्ठी को इस बात को हुये एक वर्ष श्री
पूरा न बीतने पाया अिंग्रेजो को फिर
से जय होने लगी। सरहराज की सेना ने
ता० २५ बी समेल सन् १८५८ ई. के दिन
झांसी को चारो ओर से घेर लिया और
गे.ली श्री वो बाहर से होने लगो, झांसी
के सिपाही दिल खोलकर मारी सेना छे
लके और उनकी स्तियों ने भी तोपखाना
में रहकर उनका अगला भाग लिया । इस
समय तीन हजार सिपाही रानी लक्ष्मीबाई
ने अपने महान की रक्षा के निमित्त बडे कर
रखे थे,
परन्तु बलवान ब्रिटिशराज्य के
प्रतिदिन बढ़ते हुये बल' ऐश्वर्य और
प्रताप के सामने उनकी वीरता, पैरुप,
साहस तथा वृद्धि कुछ भी काम न आई।
.

१४१
-
झांसी की रानी।
दूसरे दिन झाना नगर को और तीसरे दिन
गढ' मीन लिया गया। तै। भी थेह से
स्वामिभक्त सवारो की सहायता से रानी प्राण
लेकर माग गई । देह हजार सैनिक सिपाहियो
के साथ वह काली का सडक के ऊपर
उतरी भोर ता० २६ बी मई को यहां से चल
कर ग्वालियर में पाई और बहा, की बिगडी
हुई सेना से जा मिली, ग्वालियर विजय होने
में पोछे वहां से भागकर शिप्रा नदी के
किनारे की घोर गई परन्तु
अग्रेजी सेना से युद्ध हुआ अन्त में ता० १७ वीं
जन सन् १८५८ के दिन गरी अत्यन्त
से बढकर क्टमरी और उसकी
सब सेना विखर गई। उस दिन चार तापे
'अग्रेजो के हाथ में प्राई। कहा जाता है कि
इस युद्ध में लक्ष्मीबाई के साथ उसकी
यहिन भी लड़ाई में मारी गई थी और वह
मी उसकी ही समान पराक्रमी थी।
निःसन्देह रानी लक्ष्मीबाई, इम शताब्दी
में भारतवर्ष के बीच माहायोर और बुद्धि-
मार्ग मे एक
-
धानता
4
-
।

१५२, 'भारत का मारो इतिहास दूसरा भाग। मनी हो गई है। उसके राज्य का प्रयास सब प्रकार से मला था परन्तु बलवाकर- याने तथा सेना धिगडवाने का कलंक उस के ऊपर माया इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है, इतिहासो मे उसका यह अपयश सदैव चला हो जायगा उसकी बीरता साहस और चतुराई भारत के इतिहास की शोभा घढ़ा रही है। 1 - नारो इतिहास का प्रथम भाग इसके प्रथम भाग की हमारे पास इस समय एक भी प्रति नहीं है इसकी बीस हजार प्रतियां छपी यो सय यानकी बात में बिक गई सब अगले सम्पूर्ण भाग छपजाने पर प्रथम भाग फिरसे छपैगा इस लिये जिनका प्रथम भाग लेना हो वे सभी पत्र भेजकर ग्राहक वनजावै । पताः-श्रीमती यशोदादेवी ली-शिक्षा, पुस्तकालय • पोस्ट 'प्रवस नं.४ कर्नलगज इलाहाबाद J

1
पन्नावाई
:-
-
।
मे
.
(१४)
वाड के प्रतापी महाराना बच्चा-
राव के वशधर राना सग्रामसिह
SARAS का जब परलोक हुआ, तब उनकी
; गद्दी का अधिकारी कुमार उदयसिह केवल
उ. वर्ष का था
इस समय उसके लालन पालन करने
का काम पनाबाई नामक एक स्त्री को सौपा
गया। वह पुत्र
से भी अधिक प्रेम कुमार
'पर रखती थी, यह मिथ्या नहीं वरन यथार्थ
ही में सत्य था, कि जो उसके चमत्कारिक
वृत्तान्ता से स्वयं ही समझ मे आजायगा ।
कुमार को 'बालक देख क्तिने एक नोच
राजद्वारी स्वयं गद्दी पर बैठने का प्रयत्न
करने लगे।
सग्रामसिह का सवास (दास) पन धीर
स्वय गद्दीपति होने का प्रयत्न करता हुमा
1
-

14 १४४ -- । 19 भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। कितने ही चखेडों को करने लगा । जय, उसका कोई भी यत्न काम न मायां तब अन्त में उस दुष्ट ने राजकुमार के मार डालने की चेष्टा की. परन्तु दैवेच्छा से उसकी चेष्टा को एक नाई जान गया । वह ' शीघ्रता से पन्नावाई के समीप जाय कहने लगा, धन- धीर खवास राजकुमार के मार डालने का यत्न कर रहा है, वह आज ही पाकर तुम से राजकुमार को मांगेगा, अतए, मै तुम्हें सावधान करने आया हूं। इस रिचर्या कारक बात से पनावाई के राम २ मे विष फैल गया और क्रोध से उसका रुधिर भीतर ही भीतर उगलने लगा । तथापि मन मार' सार्व- धान हो विचार करने लगी, विचार करते करते उसने राजकुमार को फूला के एक बडे दोरे में छिपाय गुप्त स्थान मे ले जाने के निमित्त उस नाई के। सैंपा। थोडी ही देर में वह उपद्रवो भनवीन वहाँ, प्राकर पूछने लगा कु घर उदयसिह कहां है । पनावाई ने पिना कुछ घबड़ाये जिस पालने में उदयसिंह के . - । L- " L अपना मुत्र म . - - । 'पन्नावाई। समानही लेटा था उस पालने को और उंगलो दिखादो, हिंसक बनवीर ने एक साथ ही कमर से तलवार निकाल कुंबर को गर्दन पर प्राघात किया और अपने कार्य मे सफलता मान कर चला गया । पापी बनवीर को उसके घोर पाप का पूरा २ फल मिल गया तथा उसको प्रात्यन्त अंधम दशा हुई, क्योकि न्यायी ईश्वर बिना पाप पुण्य का बदला दिये नही रहता। पुत्र, को कटा हुआ देख पनावाई प्रांसू वहाकर रोने लगी। थोडी देर मे हो वह नाई जिस स्थान पर राजकुमार को रख प्राया धा वहां गई और उसको देख आपने जलते हुये हृदय को धैर्य दिया। परोपकारी पन्ना- चाई ने इस प्रकार अपने कोल्टवाय अपनी राज्यभक्ति प्रकाशित को, वरन एक होनहार राजा के प्राण बचाकर अनिद्राम में अपना नाम अमर कर गई। धन्य है ऐशी परोपकारिणी और धैर्यश्ती तथा नागिन स्त्रियों को धन्य है। L रानी भवानी (१५) महारानी छातिम गांव के चौधरी य आरमाराम की पुत्री थी इसका RAAJ ध्याइ नाठौर के जमोदार राजा रामजीवनराय के पुत्र रामकांतवेरे से हुआ धा, रानी मघानी रूपवान, सुदरता, धर्म- शील और परोपकारिणो धी। राजा रामजीवनराय का दयाराम नामक एक प्राचीन नौकर था। वह एक वार राज- कुमार रामकान्त को कुछ भूल करता हुआ देख शिक्षा देने आया परन्तु. रामकान्त ने अविचार से उसको अलग कर दिया। दया• राम वहां से चला गया और बंगाल के सूत्रे. दार मटवाय अलोधर्दी खां के यहां पहुंचा कि जिसका उस राज्य पर बहुत कुछ कर चढ़ा था दयाराम ने वहाँ जाकर प्रगट किया कि - 7 ।

। - रानी मपानी राजा रामकान्त से बत्तीस लाख रुपया इक्ट्ठा किया है पीर दो लाख रूपये का तो वह शिरपेच पहिने हुये है। फिर क्या कारण है जो आपको कर नहीं देता। इस बात से, नधान ने सेना भेज राम- कान्त को मिस्कियत लूट ली, वरन् राजकाज के निमित्त उसे अयोग्य ठहराया, इस कारण देवीप्रसाद नामक उसके मतीजे को समस्त अधिकार साप दिया राजा रामकान्त इस घटना से इतना दुःखी हुमा कि रानी मवानी को साथ ले वहां से चलागया। यद्यपि रानी गर्भवती थी तथापि मिना कुछ कहे सुने पति को प्राज्ञानुसार वहां से चल परी । चलते २ वह गङ्गा के किनारे प्राय माव पर बैठ मुर्शिदाबाद भाई और एक घर लेकर वहा रहने लगी। देवयोग से एक बार रामकान्त और दया- राम का मिलाप हुप्रा । दयाराम ने राम- कान्त से कहा कि पचास हजार रुपया हो तो तीन दिन में तुम को हमारा "जय . . - --

-
दुःख दूर हो जावै।
१४७, भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग।
दिलवा टू
और सप
रामकान्त का मन धन के कारण छात्यन्त
ही दुःखो हुआ वह दोन वचनों से अघीनी
करता था कि रानी भवानी बोल उठो
प्राणनाथ ! प जिस कारण दुःखी होते
है। और अर्थ लाख देकर ही प्राप, को राज्य
पाट मिलता हो श्रापका मन 'प्रमलबहता
है। तो मेरे यह सब प्राभूषण ले जाकर उसे
दे दो। ऐमा कह रानी ने संत्र प्राभूषण,
निकाल दिये। दयाराम ने वह सब नव्वाप
को दे रामकान्त' को यहाई. की और अन्त
में समरत राज्याधिकार उसी को 'दिलयां
दिये । राजा, रामकान्त और रानी भवानी
के पवित्र प्रेम में निरन्तर वृद्धि होती रही।
पीछे उसके दो पुत्र हुये, देवेच्छा से यह
दोनों पुत्र मर गये और राजा रामकान्त भी
भोग, परलोकवासो
हुभा । रानी, भवानी ने वैधव्य धर्म का पालन
कर धर्म शील लियों मे अपनी कीर्ति फैलाई,
और इतिहासमे अपना नाम अमर करगई।
-
सोलह
वर्ष राजगद्दी

--
कलावती
M
।
।
.
(१६)
र्णसिंह राजपूताना के किसी प्रान्त
क का राजा था, कलावनी उमकी
रानी थी, जिस समय अलाउद्दान
खिलजा जैसलमोर का विनाश कर पित्तोड
की भोर बार बार युद्ध करने के लिये भारहा
था तो कर्णसिह के प्रान्त से होकर बह गया
'घाअलाउद्दीन पाप हो प्रचण्डाग्नि स्वरूप
था, जिधर मुख करता उसी ओर देश को
मानो विध्वंस करता जाता था, जिधर से उस
को सेना जाती थी, समस्त ग्राम नगर जलाये
जाते थे, खेत उजाड़ दिये जाते थे और सहस्रो'
जोवो के सिर गाजर मूलो की माति काटते
थे दो तीन मुगलिये पादशाहों के सिवाय
'- समस्त मुसलमान बादशाह वह अन्धेर कर,
गये है जिनको याद करने से रामटे खड़े हो
।
।
।।
.
।
.

.
1
।
से याद
भारत का नारी इतिहास दुसरा भाग
जाते हैं परन्तु वह जो काम कर गये हैं
धर्मको आड़ में कर गये हैं। अलाउद्दीन को
यवन धर्म से इतना प्रेम नहीं था । वह
थाहता था कि किसी और धर्म को अपने
माम से प्रचलित करे इसने मा ऐसे, उपद्रव
किये हैं कि इतिहास पढ़ने वाले सदा इस
के नाम को
घृणा
करते रहेंगे, यह
घड़ा घोर बादशाह हुआ है इसने अपनी
लूटमार केवल मध्यप्रदेश व राजपूताना हो
सक प्रवृत नहीं रखी थी वग्न इसकी सेना
चारों ओर युद्ध व खून करती हुई टिडो दल
की भाँति सेतवन्ध रामेश्वर चली गई थी
और वहां भी अन्याय के प्रस्मरणार्थ सैकडो
मन्दिर तोडकर एक मसजिद बनाई थी,
जिस समय अलाउद्वेदोन लूट मार करता
हुमा कर्णसिंह के राज्य से निकला सो
राजपून राजा इसके साम्हने को उचित
समझकर सन्मुख हुआ। यही लढाई हुई
राजा दुर्बल था सेना भी बहुत घोडी थी.
यद्यपि वीरता घूटी में पड़ी थी , परन्तु
-
।।

J 1 विस्मय हुआ कशावती। राजपुत यदि एकताई के गुणों के अनभिज्ञा हुये चले जाते थे, और इसी लिये इतनी सेना भी इक्ट्ठी नहीं कर सकते थे, जो समय पर शत्रुओं का साम्हना करती है। मी कर्णसिंह ने अपनी वीरता व धैर्य से शत्रु के.छक्के छुहा दिये। अलाउद्दीन को घोडे से राजपूतों से एक चढ़ाई के राह में पराजय होकर बहा उसने निशाना ताक कर कर्ण- सिंह को वाण' मारा । तीर के लगते हो कर्णसिंह पृथ्वी पर आ गिरा। आज कल की तरह सेना का जय पराजय केवल सर- दार के ऊपर ही निर्भर होता था। कर्ण- सिंह के खाली घोडे को देख कर कोलाहल मच गया था प्यादे सवार सघ निरउत्सा- हित हो गये, विचारे कर्णसिंह को तो सुध हो नहीं थी। मुसलमान सी , घात में थे, कि किसी तरह जखमी राजा प्रकदा जावे - -

4
१५० भारत का नारी इतिहास दुसरा भाग।
जाने हैं परन्तु वह जो काम कर गये हैं.
धर्मको
माज में कर गये हैं। अलाउद्दीन को
पवन धर्म से इतना प्रेम नहीं था। वह
चाहता था कि किसी और धर्म को अपने
माम से प्रचलित करे इसने मा ऐसे उपद्रव
किये हैं कि इतिहास पढ़ने वाले सदा इस
के नाम को घृणा से याद करते रहेंगे, यह
घडा घोर बादशाह हुआ है इसने अपनी
लूटमार केवल मध्यप्रदेश व राजपूताना हो
सक प्रवृते नहीं रखी थी वग्न इसकी सेना
चारों प्रोर युद्ध व खून करती हुई
की भाँति सेतवन्ध रामेश्वर चली गई थी
और वहां भी अन्याय के प्रस्मरणार्थ सैक्दों
मन्दिर तारकर एक मसजिद बनाई थी,
जिस समय अलाउद्दीन लूठ मार करता
हुआ कर्णसिंह के राज्य से निकला तो
राजपूत राजा इसके साम्हने , को उचित.
समझकर सन्मुख हुआ। बढी लढाई हुई.
राजा दुर्बल था सेना भी बहुत थोड़ी, पी.
यद्यपि बीरसा घूटी में, पड़ी थी परन्तु
हुई टिही
।
।
T

- कशावती। । - दिये। - । - 'राजपूत यदि एकताई के गुणों के अनभिज्ञा हुये चले जाते थे, और इसी लिये इतनी सेना मी इक्ट्ठी नहीं कर सकते थे, जो समय ' पर शत्रुओं का साम्हना करती से '. मी कर्णसिंह ने अपनी वीरता व धैर्य से যন্ত के छक्के छुडा अलाउद्दीन को थोडे से राजपूतों से एक चढ़ाई के राह में पराजय होकर पहा विस्मय हुआ उसने निशाना ताक कर कर्ण- सिंह को वाण मारा । तीर के लगते हो कर्णसिंह पृथ्वी पर आ गिरा। आज कल की तरह सेना का जय पराजय केवल सर. । दार के ऊपर ही निर्भर होता था। कर्ण- सिंह के खाली घोडे को देख कर कोलाहल मच गया था प्यादे सवार सब निरउत्सा- हित हो गये, विचारे कर्णसिंह को तो सुघ हो नहीं थी। मुसलमान इसी घास में थे, कि किसी तरह जखमी राजा पकडा जावे इस लिये यह निर्दयता से आगे बढ़े भारहे " थे, परन्तु शुम काम यह था कि उसकी , । . -

1
7
14
भारत का नारी हातिहास दूसरा भाग ।
रानी कलायती साथ रणभूमि में आई हुई
थी उसने अपने पति को तो उसी समर
डोली मे सवार किया । पाप उसके स्थान
पर आकर सिपाहियों को उत्साहित करने
और लाने के लिये तैय्यार करने लगी
वह साप शस्न धारण किये हुये थो
और उसके
धनुष से जो वाण निकलते थे।
एक दो का काम करके छूटले थे, कान भीरु
पुरुष था, जो ऐसो वीर स्त्री के प्राधीन रह
कर पोठ दिग्वलाता र सप्राय होने लगा।
क्षणमात्र में दोनों ओर के सहवो वीर पुरुष
पृथ्वी पर लेट गये।
६ ई एक मुपलमान डोली को प्रोर के
रानी ने तलवार हाथ में लेकर उन सब को
मार गिराया और इसो प्रकार सायंकाल
तक धरायर लहती रही सन्ध्या समय ' जब
लहाई बन्द हो चुकी तो अलाउद्दीन की
फैज ने ते। ठहरने के बाजे बजाये राजपूतों
के भय से प्रागे प्रस्थान किया और वहां के
राजपूनों ने अपनी राजधानी मे आकर
-
-
.
-

। " - " - कलावती। १५३ कर्णसिह के शरीर से तर निकाला गया. परन्तु वह महालश में था वैदों को .उपाय के लिये बुलाया उन सघ ने मिल कर कहा कि सीर विष भरा हुमा था, अन्न कोई उपाय नही हो सकसा, हा यदि किसी तरह कोई पुरुष राजा के विप को चूसले तो यह बच जावे परन्तु विप चूसने वाला अवश्य ही मर जावैगा, कर्णसिंह को स्वीकार न था कि कोई उसके लिये प्राण न जाने उस समय में विष चूसने का शस्त्र न होता होगा। धोसी रात जाने पर जय राजा सो रहा, कालावनी ने उस को दबा सुंघाकर बेसुध कर दिया और आप अपने मुख से उस का विध चूसने लगी। कर्णसिंह को स्वबर तक नहीं हुई और उसने थोडे समय में उस का सारा विष चूम । कर फेंक दिया राजा तो यच गया परन्तु प्रातःकाल को दो तीन घही दिन चढ़ने के , 'पीछे कलावती की दशा घिगड़ने लगी जब । - - -

१५४
LA
111
4
--
भारत का नारी इतिहाम दूसरा भाग ।
देखा कि समय समीप है कर्णसिंह से कहा
राजन् ! मैं प्रापको स्त्री और प्रजा हूं मेरे
जैसे सहलो जीव प्राप पर न्यौछावर हो,
मुझे स्वीकार न था कि मेरे जीते जी मेरा"
प्राणपति इस संसार से कूच करे, मैने आपको
विष चूस लिया है, और अध उस के 'प्रासरे
से थोड़ी देर मे मेरा इस संसार से कूध होगा,
आप अपने घरण मुझे दीजिये, जिससे
मैं 'पाप का चरण पकड़े हुये इस शरीर को
ज्याग सकू।
सती पतिव्रता रानी का समय पाचुका
था, कोई ऐसा उपाय नहीं था जो इस को,
मृत्यु के हाथ से बचा सके, इस के पतिव्रता
'भाव को देखकर दुर्घल कर्णसिंह ने धरण
आगे बढाया उसने दोनों हाथों से पकड़
'फेर मस्तक से लगाया, और इसी प्रकार
थोड़ी देर में प्राण त्याग दिये "कर्णसिंह
तो अच्छा हो गया परन्तु अपनी 'प्यारी
रानी के वियोग से रुदैव चिन्तातुर रहा कुछ
तो विष का असर था और कुछ इस बात
-
A
।
H

१५५
'परन्तु लोगों के
कलायती ।
ने उस के मन को अधिक दुःख पहुंचाया
जिससे राजा के होटों पर मुसकराहट कभी
देखो नही गई उसे कोई सन्तति नहीं थी,
बहुत कहने पर भी इसने
विवाह नहीं किया और वृद्धावस्या पाकर
संसार से विदा होगया भारत में इस प्रकार
की तेजवती देषियां थीं जिनके कारण भारत
उन्नत पदवी पर प्रारूढ़ था।
-
यशोदादेवी धर्नलगंज प्रयाग का
स्त्री औषधालय
किसी स्त्री को किसी प्रकार का भी कोई
रोग हो हमे अपना पूरा हाल लिखें हम
, उनका रोग दूर करदेंगी। हमारी ओषधियाँ
का यहा सूचीपत्र मगाकर देखो।
पता:-श्रीमती यशोदादेवी
पोस्ट वस नं.४ कर्नलगंज इलाहाबाद
-
--
.

C
रुपनगर की
राजकुमारी
परन्तु हिन्दू
(१७)
ल्ली के बादशाह औरंगजेब ने रूप
दिनगर को जो मेवाड की एक
PRAS (शाखा
( शाखा है ) की राजकुमारी को
अत्यन्त रूपवती सुत्त उत्ससे विवाह करने
को इच्छा प्रगट की और उसके । यहाँ
विवाह का संदेशा भेजा। परन्तुः;
नारियों ने मलेच्छ के घर जाना लोकार'न
किया बरन् उसने अपनी घृणा दिखाई
पाजकुल का अभिमान जताया और उसके
पाये
दूल को फटकार कर निकलवा दिया,
इससे औरंगजेब ने क्रोधित होकर रूपनगर
पर आक्रमण करने का दो हजार घुड समार
सेजे और मेनापति को प्राज्ञा दी कि जे
यह मुझले विवाह करने में प्रसन्न न हो ते
--
--

१५७ - + - रूप नगर की राजकुमारी । प्राता हुआ सुन राजकुमारी ने राजसिह से कहला भेजा कि कसाई के' हाथ से गाय का छुडाना, क्षत्रियों का काम है, इस कारण श्राप सहायता, करके मेरी रक्षा करे। 'यदि धाप प्रयत्न करके इस दुष्ट के पंजे मे से छुडावेंगे तो मै सदैव के निमित्त प्राप को होकर रहूंगी। आप को अपनी वीरता दिखाने का यथार्थ समय मिला है। इस अवसर को न खोना चाहिये । फिर पत्र के अन्त मे यह भी लिख दिया था, जो राज- सिंहनी हूं तो कभी घगला को स्वी न हूंगी। क्या उच्चकुल को राजकुमारी नीच म्लेच्छ की स्त्री हो सकती है साथ ही यह, मी धमकी लिखी थी कि जो क्दाचित पाकर 'मेरी रक्षा न करेंगे तो मैं इस दुष्ट से बचने के निमित्त प्रात्महत्या करके प्राणी को छोड़ दूंगी। इस प्रकारके पत्र को यांचते ही राजसिह अपने साहसी सवारों को संगले चुपचार रात दिन परायर चलकर अवली पहाडके नीचे - २ ।

। १५ भारत का मारी इतिहास दुसरा भाग। हो अचानक रूपनगर : में आ पहुंचा उसके भाने के पश्चात् ही बादशाही लश्कर भी श्रा पहुंधा वह उसके साथ अत्यन्त ही शूरता से लहे और पराजित कर पीछे को मार हटाया इस जय के होतेहो राजसिंह ने राज- कुमारी को अपने साथ ले अपने, गजय में जाय उससे विवाह किया । हिन्दू कुल राज कुल की स्त्रिया कैसी कुलामिमानो तथा धर्माभिमानी थीं और क्षत्री उमका कितना आदर सत्कार करते थे वह इस वर्षान से भली प्रकार ज्ञात हो जाता है। । . हमारे यहां स्त्री शिक्षाको सय प्रकार की पुस्तके छपकर तैयार हैं वड़ा सूचीपत्र, मगाकर दखिये। पता:-श्रीमती यशोदादेवी खी-शिक्षा पुस्तकालय 18 1 गुन्नौर की रानी (१८) क समय भूपाल के समीपस्थ ए गुन्नीर नामक स्थान को मुसलaan मानां ने छल से अपने अधिकार मैं कर लिया था, वरन वहां की राना के धर्म 'प प्रतिष्ठाको नष्ट करने पर भी वे सत्पर होगये थे। दीनता और नम्रता का अनादर कर महल के नीचे खड़े होकर एक मुसल- “मान ने वहां की रानी से कहा, हमारे साथ शादी करना कबूल है या नहीं। समय ऐसा कठिन आगया था अश्वीकार करना कठिन था यह तो प्रकटही था कि जो स्वीकार किया जायगा तो बल पूर्वक पकड़ कर उसे अनेक प्रकार के दुःख देते थे । रानी ने जब माख फैलो कर देखा कि अब किसी प्रकार से छूटने का उपाय नहीं है । वध चित्त मे कोई r , १० । भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। दूसरा ही विचार स्थिर कर खां साहब से कहला भेजा कि आप के साथ विवाह करन स्वीकार है परन्तु दो घटे का अवकाश मिलना चाहिये कि इतनी देर में विवाह सम्न्धी सब सामग्री प्रस्तुत करलू। तदनन्तर तत्काल ही महल का चौक भारा बुहारा गया, वहां पर खांसाहब रानी के वस्त्र भेजे हुये और भाभूषणों को धारप कर माला तया पगडी' पर बहुमूल्यवान रत्न जटित तुर्ग पहिन नियत समय में वहां पाकर विराजमान हुये । रंग महल से रानी का मुख देखते ही खांसाहब तो मोहित है। गये और मन ही मन कहने लगे कि बाह वाह ! जैसी इस मानो के बदन और जवानी को तारीफ सुनो थी उससे भी बढ़कर पाया। या परवरदिगार !- आज मेरे ऊपर बड़ी मिहर- बानी की है रानो ने खांसाहा को सत्कार पूर्वक बिठाया तो खांसाहन मन में इतना अधिक फल गये कि , मानों इस समय उनको - - ।

गुन्नौर की रानी। बहिश्त मिल गई । वह धारम्बार दाढ़ी फट- कारने और मूछों पर ताव देने लगे । उन की प्रसन्नता इतनी पढगई कि उस समय यह मय था कि कहीं मारे हर्ष के सन्निपात न हो जाय । प्रसन्न होकर बारग्शार मग्न होरहे थे और प्रसवता पूर्वक रानी से वाता- लाप कररहे थे। मिलने में थोड़े समय का विलम्ब देख अत्यन्त व्याकुल हो मन ही मन अपनी बड़ाई मार रहे थे। परन्तु घोड़ी ही देर के उपरान्त रंग में भंग होगया। खांसा- इय का मुख नीला पीला होने लगा, गर्मी से मूर्छा भाने लगी और प्यास के मारे लगे पानी पानी पुकारने । घबडाहट से सारे वस्त्र ' फाड़कर दूर फेझने लगे कि तत्काल ही उन पर पंखा झलाजाने और गुलाब जल, छिडका जाने लगा परन्तु इस समय कुछ मो उपाय न हो सका, जो होना था वह तो हो, हो गया। जब रानी ने 'खांसाहब को ' ऐसी दशा देखी तय अपना घूघट हटाकर कहने लगी। अजी खांसाहब तो आपका अन्य समय आगया ! हमारी तुम्हारी पिका - - १4 २१

-
१६२:
भारत का नारो तिहास दूसरा भांग ।
विधि और मृत्यु क्रिया साथ हो होवेगी।'
जोबन आप पहिरे हुये हैं। वह दिल में रंगे
हुये है हमारा धर्म और प्रतिष्ठा नष्ट करने के
लिये समाप ने कुछ उपाय नहीं छोड़ा इजही
कारण धाप की दशा यह हुई है। खांसाहब
अपने कर्मोपर पड़े पडे पछता रहे थे।
रानी का इतना
कहना था कि सब
सुनने वाले भयभीत हो गये । उस समय
रानी भी अपने अपर आपत्ति का खाना
विचार कर महल के बुर्ज (गुमठी) से नर्मदा
नदी में कि जो महल के नीचे बहती धी
कूदपढ़ो और उसी मे
को गई। उसके स्मरणार्थ एक समाधि भूपाठ'
की सडक पर बनाई गई है, कि जिस में उस
की प्रतिमा स्थापित है । सर्वसाधारण मनुष्य
का इस प्रतिमा पर इतना विश्वास है कि
उसके दर्शन करते ही तत्काल उमर बला
जाता है। वर्षाऋतु के उपरान्त इस प्रान्त
में शीतज्वर , अधिकता से फैल जाता
परन्तु इस देवी के दर्शन करने वालों को
फिर से उबर का डर नहीं रहता है और
रोगी भला बँगा होजाता है।
डूमकर 'स्वर्गधाम
~
-

मीनलदेवी
।
.
(१६)
न्द्रपुर का राजय कर्नाटक प्रान्त
में है यहां के राजा जयकेशी
की पुत्री यह मीनउदेवी थी।
अठारह वर्ष की अवस्था में उसका विवाह
गुजरात के राजा करण के साथ राजपूतरीति
के
अनुसार • खांडे से
हुश्रा था । इस समय
यह एक कुलीन कुल वधू के योग्य ही अनेक
उत्तम गुणों से शेोभित थो, और देखाव मी
साधारण रीति से मिला था। जब वह विवा-
हिता हो पाटन में आई, तब उस के स्वरूप
का वर्णन जैसा माट
के से करण ने
सुना था वैसा उक्त को न समझ कर अत्यन्त
हुप्रा और क्षणभर में ही उस से विमुख
रहने लगा । इस कारण रानो मोनलदेवो सथा
भाजपमाता 'उदयमति को भी अति संताप
.
मुह
शाक

-- का कुछ ५ भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग। हुआ और वह कुमारो प्रेम और मर्यादा पूर्वक समझाने उगी, परन्तु करण के मन में उस मी प्रभाव न हुमा। उसने न तो दूसरा विवाह ही किया और न किसी दूसरो खी के प्रेम पाश में ही पडा । संसार से विरक्त होगया, उस को सैकड़ों मनुष्यों ने विवाह करने को कहा परन्तु उस ने किसी की भी बात न मानी। कुमार की ऐसी दशा से निर्दोष मोनलदेवी को महासंताप' होने लगा । वह रात दिन पड़ी हुई, बार बार. ठंढो श्वास लिया करती और भाग्य पर हाथ रख मनही मन में सुलखा करती । खान पान या वख मलद्वार कुछ भी उसे मला न लगता. था। राज्य सुख वैभव विप के समान छगते थे और वित्त कही भी न लगता था । किसी प्रकार से. मी कुमार करण विचार में परिवर्तन न होता देख कर मोनाल- देवो तथा राज्यमाता उदयमतिने भाग में जर मरजाने का, विचार किया। उनके इस विचार को सुनते ही योग्य प्रधाना ने , -- - ।

--
-
गुन्नौर की रानी।
समझा बुझाकर निषेध किया और इस
घोर कृत्य से रोलिया और कोई यत्न
करके खो पुरुष के बीच में प्रेम करादिया ।
यद्यपि मोनलदेवो बहुत रूपधान न थी परन्तु
शिक्षित विद्वान बुद्धिमान शौर राज्यमन्दिर
की शोभा बढ़ाने वाली लक्ष्मी देवी के समान
थी, इन गुणों का ' कुमार कर ण को पूर्ण
अनुमष हुआ और दैवयोग से या मोनलदेवी
हे प्रारब्धवाल से स्त्री पुरुषों में ऐसा प्रेम
उत्पन हुधा कि जैसा अनन्य प्रेम कुछ
ही
* एक भाग्यशाली मनुष्यों को प्राप्त होता है।
गुणवती सती मीनलदेवी नित्य मधुर मधुर
मान 'गागाकर नवीन २ मानन्द उत्पन्न
कराने लगी और करण के वैरागी चित्त को
'शुद्ध टङ्कारी बना डाला। राजनीति और
‘राज काज का मोनलदेवी को अच्छा अनु-
मव था इस कारण राज्यसम्बन्धी इतिहास
सुन्दर
वार्ता से पति को प्रसव रखती;
इसी प्रकार'' उसके हृदय
में प्रत्यन्त दया।
मो घों इस कारण नित्य दान धर्म कामों का
-
1

,
भारत का नारी इतिहास दूसरा भाग
कार्य कर जनहितकारी होने में महारानी
मीनल क्षेत्री धर्म पत्नियों तथा राज्य पत्नियों
में भी दृष्टान्त रूप हो गई है। विद्वराज क्री
उदारता और धार्मिक वृत्ति को, देख अनुवभी
मनुष्य दानेश्वरी राजा करण की उपमा देने
लगे और माता मीनलदेवो की स्तुति के
गीत गाये जाने लगे।
भारत का-
-
नारी इतिहास
.
दूसरा भाग समाप्त।
-
इससे भागे तीसरा भाग माफर देखिये इपरहा है शीघही
तैय्यार होगा।
मिलने का पता:-
पता:-श्रीमती यशोदादेवी
पोस्ट ववस नं.१
कर्नलगंज इलाहाबाद

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Sansar Ka Nari Itihaas

Author
Devi,yasodha
Title
Sansar Ka Nari Itihaas
File name
Sansar Ka Nari Itihaas
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2011/01
Publisher
Vanita Hiteshi Yantralya Karnal Prayag
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546304
Barcode
4990010024793.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
KMc5lVWyzB0
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