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Sanatanjain Dharm

Jain, Champatray · 2009/11

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भूमिका। प्रिय पाठकगण ! यह हमारे परम सौभाग्यका अवसर है किइम ऐतिहासिक और शास्त्रीय उद्यानके अपूर्व सुमनको लेकर मैं आपके समक्ष आज उपस्थित होता। यद्यपि में न कोई प्रसिद्ध लेखक अथवा विद्वान ही हूं, तथापि इस शास्त्रीय उद्यान में एक सुमनकी सुचारु गन्धने मेरे हृदय में एक अभिनष उल्लास उत्पन्न किश, यह कृति उसीकी फल स्वरूप है। मैंने इसे उस उधानसे चुन- कर धर्म के प्रशस्त उद्यानको सुसजित करके इसको शोमा वृद्धि करने के लिये प्रयत्न किया है। हां, सुसजित करनेकी प्रशंसनीय प्रणाली एक दूसरे विण्यात एवं स्वनामधन्य विद्वान् लेखककी है। केवल कुशल कारागरकी कुदरती करामातकी खूबी दिखानेवाला मैं । भाशा है, इस सुमनके सौरमसे शास्त्रीय उद्यानके रसिया भौरोंका मन यथेट लुग्र मुग्ध होगा। इस सुमनके नव विकासले जो नूतन सुगंधि हर ओर फैलेगी, विश्वास है कि उस वका विनाश और सत्य तथा अहिंसा का यथेच्छ प्रचार होगा और भारत माताकी पुनोत आत्माको दिव्य ज्योति भ्रम और शंकाकी अधियारो दूर कर देगी। में नहीं समझता कि इस सुमनको नया रूप रंग टेनेमें मुझे कहा सक सफलता है।

(२)
अन्तमें मैं जैनधर्म के अभ्युदयके काव्यमें तल्लीन रहनेवाले,
हिन्दो माताके गौरववद्ध सुपूत मरने परम प्रिय भ्राता स्व.
कुमार देवेन्द्रप्रसाद जैनकी पवित्र आत्माका स्मरण किये तयापि
अन्धवाद की सुमनांजलो समर्पण किये बिना नहीं रह सका,
जिनकी कृपासे अनेक सुमन धर्म के उद्यान में आरोपित और पल्ल
वित होकर विकसित रूपमें प्रकट हुए हैं। इस मुमनके प्रकाश
भी
बहुत कुछ
श्रेय उन्ही की आत्माको प्राप्त है।
मेरी आशा है कि सभी धमनिष्ट मनन इम पन्त प्रमाणों
वाली निराली पुस्तकको पका यार ध्यानपूरक नया नियत
पूर्वक पढ़कर मेरे परिश्रमको सार्थक करेंगे।
का
७-८-२३ ]
के. पी. जैन.

शुद्धाशुद्ध सूची। पृष्ठ शुद्ध सतर अशुद्ध २ ४ ३ १३ ४ १ ur विवर विचार होगी होगा जन जैन को, मानघ को मानष इसस इससे उनकी उनके तप जो मनुष्य तप मनुष्य देवनाओंको फल देवताओं को ८ १४ ५ ६ १० है ११ १४ ३ असम्भव है आत्माका १५ करीय ६ १६ मसम्भव है। मात्माके करीब २ अनीलोग, मानव प्राचीन है। अनोलोग। ३ " भावका प्राचीन ।

(२) पृष्ठ सतर २३ १ अशुद्ध मिला इश्वरकी शुद्ध मिलता ईश्वर भोजन भाजन ३० असम्भव सम्भव w १२ २२ ४३ . ४६ हिन्दू धर्मकी आयात आयत प्राणों प्रणों १० की लहर की उस लहर १३ की के वर्णन है. वर्णन ७ फूलों कोनों ५ धमकी कलि कील दीयेंगे। दर्शायेंगे अमरको अमरके कि २० अप्रवल प्रयल समय समयवाली १७ उनको उनकी अतिरिक्त, अतिरिक्त कुछ १५.. . वर्णन न करेंगे, वर्णन करेंगे १६ ४७ " ४८ (३) पृष्ठ सतर अशुद्ध शब्दों शुद्ध जिन शन्दों ६२ ८ है और है । ६४ १६ घायुम आयु कम कम २० उस ६५ ૧૬ इम जाजेन होते है, होते हैं संस्था अपने जो जैन होते हैं। रहते हैं ६७ ६ सत्या १२ ६८ ७१ पन द दूर नहीं दूर ही नहीं १० ११ ७३ ३ - दृश्य दिखलाती दृश्य भी दिखलाती प्रारधोका प्राराघों की उसकी उनको प्रमाणिक प्रमाणित तुल्ला तुलना (Gifto) (Gifts ) ( boulble ) ( double ) जावात्मा जीवाम्मा जोकि गौकि वगैरह बगैर १६ ७९ ६ ८० ८१

।
.
सतर
८२
५४
१६
८५
७
७
अशुद्ध
शुद्ध
माइका
माद्दे के
शिष्योंका शिष्योंको
सकपाल एकूवाल
तातियाका अंगरेजी तातियाका
अनुवाद प्रकाश
प्रकाश
तत्वों में
तत्वोंमें न
शरार
शरीर
अपनावश्यकीय अनावश्यकीय
८६
११
८६
८
२०

ॐ श्रीवीतरागाय नमः । जैनधर्मकी प्राचीनता। श्रीतीर्थकरप्रणीत मत अथवा जैनधर्मको उत्पत्तिका विषय पूवीं भापायोके विद्वानों के लिये जिन्होंने इसके विकाश प्रति अनेक मनमानी कल्पनाये रची हैं, म्रम और भूलका एक मुख्य कारण रहा है। कुछ समय पूर्व यह अनुमान किया जाता था कि ईमाकी छठी शताब्दी में जैन धर्म बौद्ध धर्मको शाग्वालपमे प्रस्फुटित हुआ था और भारतीय इतिहासमें भी जो हमार स्कूलोंमें कुछ समय पूर्वतक पढ़ाया जाता था यही शिक्षा दीजानी थी। परन्तु नई खोजने यह पूर्णतया प्रमाणित कर दिया है कि “यह (जैन) धर्म महात्मा बुद्धसे कम से कम तीन ३०० सौ वर्ष पूर्व विद्यमान था और आधुनिक पूर्वी मापामापी विद्वान अब इस बात पर सहमत हो गये है कि २३ तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ स्वामी कोई काल्पनिक व्यक्ति न थे यतिक एक ऐतिहासिक पुरुष हुये हैं।" इस पाप्याके मत्य होने के

(२)
हेतुमें विशेष प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है । केवल
निम्न लिखित विद्वानोंके वाक्य ही यह पूर्णतया दर्शा देंगे कि
"चौद्ध धर्म जैन धर्मका निकासस्थान किसी प्रकार नहीं हो
सक्ता।
डा० टी० के० लड्डका कथन है कि “वर्द्धमान महावीर
स्वामी से पूर्व जैन समयके इतिहास की कोई
विश्वसनीय खोज हम नहीं कर सक्ते, परन्तु यह निश्चय
है कि जैनधर्म बौद्धधर्म से पहलेका है और उसको महा-
वीर स्वामीके पूर्व पार्श्वनाथ या किसी और तीर्थकरने
स्थापित किया था."
महामहोपाध्याय डा० सतीशचन्द्र विद्याभूपणका + भी
इस विषयमें दृढ़ विश्वास है और वह लिखते हैं कि यह निश्चित
समझा जा सकता है कि-
"इन्द्रभूति गौतम जो महावीर स्वामीके गणधर थे और
जिन्होंने उनकी शिक्षाओंको एकत्रित किया था, वौद्धधर्म
के प्रचारक गौतमबुद्ध, और ब्राह्मण न्यायसूत्रों के रचयिता
अक्षपाद गौतमके समकालीन थे।"
योरुपीय विद्वानोंकी और दृष्टि डालते हुये इन्साइक्लोपीडिया
* देखो-
डाक्टर लड्ड्साहवका सपूर्ण व्याख्यान अंग्रेजी भाषामें जिसको मंत्री
स्याद्वाद महाविद्यालय काशीने प्रकाशित किया है।
+ अंगरेजी जैनगजट भाग १० अंक १ देखो।

(३) आफ़ रिलीजन पेराड इंपिक्स ( भाग ७ पृष्ट ४.५) के निम्न लिखित वाक्यको सर्वोपरि अन्तिम सम्मति समझनी चाहिये । बावजूद उस पूर्ण मत-भेदके जी उन के सिद्धान्तोमें पाया जाता है जनमत व बुद्धमत जो दोनों अपने प्रारंभिक समयों में ब्राह्मण धर्मकी मीमाके बाहर थे वाह्य स्वरूपमें कुछ कुछ एफ दूसरेसे मिलते है। जिसके कारण भारतीय लेखक भी उनके सम्बधमें कमी कभी मम में पड़ गये है। गये है । अतएव यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि कतिपय पाश्चात्य विद्वानों ने जिनका जैन धर्मका परिचय जैन साहित्यके अपूर्ण दृष्टिपात पर ही निर्भर था स्वयं सहजही में यह मत स्थिर कर लिया कि वह बुद्धमत की शाखा है। लेकिन तवसे यह निस्सन्देह सिद्ध हो. गया है कि उनका विवर असत्य है और जनमत कम से कम उतना ही प्राचीन है जितना बुद्धमत । म्योंकि बुद्ध- मतके शास्त्र जैन धर्म का उल्लेख उनके प्राचीन नाम "निग्रन्थ" से एक समकालीन विपक्षो मतके ममान फर• ते हैं ......व उनके प्रचारफ नातपुत्र (नात और नाती पुत्र जैन मतके अन्तिम तीर्थंकर बर्द्धमान महावीरका उपनाम था )का वर्णन करते है और वह जैनियोंके कथना. नुसार 'पावा' को उक्त तीर्थंकरका निर्वाणक्षत्र पतलाने हैं और दूसरी और जैनियोंके शास्त्र उन्हीं राजाओंको पहा. वीरका समकालीन बताते हैं जो उनके विपत्नी मनके प्रचा-

(४)
रक बुद्ध के समयमें राज्य करते थे। इससे यह सिद्ध होता
है कि महावीर, वुद्धकै समकालीन थे और अनुमानतः वुद्ध
से जो उनके 'पावा' पुरीमें निर्वाणको प्राप्त होने के पश्चात्
भी जीवित रहा, कुछ पहिले हुए थे । परन्तु महावीर
वुद्ध की भांति उस मतके व्यवस्थापक न ये जो तीर्थकरके
समान उनका सम्मान करता है और न उस मतके प्रारं.
भिक संचालक थे . ..... उनके पूर्वके पाश्र्व नामक २३ वे
तीर्थकर जैन धर्मको संस्थापक कहे जानेके अधिक योग्य
जान पड़ते है... ... ........परन्तु ऐतिहासिक प्रमाणों के
अभावमें हम अनुमानसे आगे बढ़नेका साहस नहीं कर
सके।"
हम डाजोन्न जार्ज व्युहलर C. 1. EL.L.B. Ph.D.
का भी प्रमाण देते हैं जो अपनी 'दि जैन्स' नामक पुस्तकके पृष्ठ
२२-२३ पर लिखते हैं कि-
बौद्धधर्मावलम्बी स्वतः ही जैनियोंके तीर्थकरसंबन्धी
कथनकी पुष्टि करते हैं । प्राचीन ऐतिहासिक व्याख्याएं
व शिलालेख भी बुद्धको मृत्युको पश्चातको प्रथम पांच
शताब्दियोंमें जैन धर्मकी स्वतन्त्रताको सिद्ध करते हैं और
शिलालेखोंमें कुछ ऐसे हैं जो जैन पुराणोंको केवल कपोल
कल्पित गढन्ते ( Fraud ) होनेके कलझसे ही मुक
नहीं कर देते हैं वरन् उनकी सत्यताके दृढ साक्षी हैं।"
अब इस विषयपर केवल एक दूसरे विद्वान, मेजर

(५)
जेनरल जे०जी० प्रार० फारलांग, एफ-आर-एस-ई, एफ
प्रार-ए-एस एम० ए० भाई इत्यादि को सम्मति मोर्टस्ट.
डीज इन दि साहनत ग्राफ कम्परेटिउ रेलीजन्स' के पृष्ट २५३-
२४४ से उधृत करना ही पर्याप्त होगी।
अनुमानतः ईसासे पूर्वके ११०० मे ८०० वर्ष तक बलिक
अमात समयसे सर्व ऊपरी, पश्चिमीय, उत्तरीय मध्यभारतम
तरानियोंका, जो आवश्यक्तानुसार द्राविट कहलाने थे और
जो वृत्त, सर्प और लिंगकी पूजा करते थे, गासन था
......परन्तु उस ही समयमें मर्च ऊपरी भारतमें पक
प्राचीन सभ्य, दार्शनिक और विशेषतया नतिक सदाचार
व कठिन तपस्यावाला धर्म अर्थात् जैनधर्म भी विद्यमान
था। जिसमें से स्पष्टतया ब्राह्मण और वौद्धधर्मा प्रारंभिक
संन्यास भावोंकी उत्पत्ति हुई।"
"आर्योक गंगा क्या सरस्वती तक पहुंचनेके भी बहुन
समय पूर्व जैनी अपने २२ बौद्धों संतों अथवा तीर्य करें
द्वारा जो ईसासे पूर्व की ८ वी वी शतान्दोके ऐतिहासिक
२३ वें तीर्थंकर श्रीपाश्वनाथसे पहिले हुए थे, शिक्षा पा चुके
थे और श्रोपाय अपने से पूर्वके सव तीर्यकरोंसे अर्गन
उन धर्मात्मा मृपियोंसे जो दीर्घ २ कालान्तर मे हुयेगे,
जानकारी रखते थे और उनको बहुतसे अन्य जो उमसमय
भी 'पूर्वो' या पुराणों अर्थात् प्राचीन के तौर पर प्रमिड ये
और जो युगान्तरोंसे विख्यात व वाणप्रस्यों के द्वारा कगठस्प

६) चले पाते थे, मालूम थे। यह विशेषतया एक जन स. म्प्रदाय था जिसको उनके समस्त बौद्धों और विशेषकर ईसाके पूर्वको ६ ठी शताब्दीके २४और अन्तिम तीर्यकर महावीरने जो सन् ५६८-५२६ ईसाके पूर्व हुये, है नियमवद्ध रक्खा था । यह तपस्वियों (साधु)मा मत दूरस्थ वैकट्रिया और डेसिया (Bakti ia and Dacia) के ब्राह्मण और वौद्ध धर्मोमें जारी रहा जैसे हमारी स्टडी न०१ और संक्रड वुक्स आफ दि ईस्ट भाग २२ और ४. (Study I and S. Books E. Vols AIIS XEY) मे ज्ञात होता है।" अजैन लेखकोंकी, जो प्रथमके २२ तीर्थकरोंको ऐतिहासिक पुरुष नहीं मानते हैं, उपर्युक्त सम्मतिया इस वातको पूर्ण तौरसे निश्चय कर देती हैं कि जैनधर्म कमसे कम २८०० वर्षसे संसा- रमें प्रचलित है, अर्थात् महात्मा बुद्धसे ३०० वर्ष पूर्वसे। इससे यह सिद्ध होता है कि जैनधर्म किसी प्रकार वौद्ध धर्मकी शाखा नहीं कहा जा सकता। अब इन उक्त सिद्ध की हुई वातोंसे यह प्रश्न अवश्य हो. सका है कि 'पाया जैनधर्मका निकासस्थान हिन्दूधर्म है या नहीं?' कुछ वर्तमान लेखकगण इस धर्मका, ब्राह्मण धर्मसे उसकी वर्णव्यवस्थाके विरोधौ पुत्रीरूपसे स्थापित होना मानते हैं(देखो दि हार्ट आफ डेनिज्म पृष्ठ ५) ।.यह सम्मति इस विचारके - धार पर है कि ऋग्वेदको; मानव जातिके प्रारम्भिक शैशव काल 'के भावोंका संग्रह होनेके कारण, उन सव धर्मोले, जिनमें वुद्धिम- (७) त्ताका अधिक अंश है, अधिक प्राचीन होना चाहिये । इसी वात को मानकर यह कहा जाता है कि प्राचीन धर्मके विरोधमें जैन धर्म स्थापित हुया और इस लिये इसको मूल धर्म (प्राचीन हि- न्दु धर्म) की उद्दण्ड पुत्री समझना चाहिये। जिससे उसकी व. हुत गहरी सदृशता है। दुर्भाग्यवश इस संबंध कोई वाह्य प्रमाण उपलब्ध नहीं क्योंकि न तो कोई प्राचीन स्मारक ही और न कोई ऐतिहासिक चिन्ह ही मिलते हैं जो इस प्रश्न पर प्रकाश डाल सके । इस बातका निर्णय केवल स्वयम् दोनों धर्माके शा. स्त्रोंको प्रातरिक साक्षोसे, विना किली वाह्य महायनाके ही क. रना है। अतः हम दोनों धर्माक सिद्धान्तोंका साथ साथ अध्य. यन करेंगे जिससे हम यह जान सके कि दोनोंमें अधिक प्राचीन कौन है ? प्रथम हिन्दू धर्मके ऊपर दृष्टि डालते हुये उस 'शास्त्रों में वेद, ब्राह्मण, उपनिषद् और पुराण शामिल हैं। इनमें वेद सव से प्राचीन हैं। दूसरा नम्बर प्राचीनतामें ब्राह्मण शास्त्रोंका है। उसके पश्चात् क्रमसे उपनिपदोंका प्रौ: फिर सबसे अन्तमें पुराणोका है। सव वेद भी एक ही समयके निर्मित नहीं हैं। ऋग्वेद सबसे प्राचीन है। इस प्रकार हिन्दू मत उन धर्मोमेंसे है जो समय समय पर वृद्धि व उन्नतिको प्राप्त होते रहे हैं। यह वात स्वयं अपनी साक्षी है, और इसस यह परिणाम जैन पुराण वास्तवमें जैनमतकी असीम प्राचीनताको सिद्ध करते हैं, लेकिन चूंकि वर्तमान इतिहासवेत्ता सिवाय इतिहासिक प्रन्योंके आर प्रन्धों पर अविश्वासके साथ दृष्टिपात करता है इस कारण हम इस लेखमें उनका प्रमाण नहीं देंगे।

(८) निकलता है कि हिन्दु धर्म जैसा प्राज है वैसा सदैव नहीं रहा और यह स्पष्ट है कि उसमें समय समय पर वृद्धि होती रही है ताकि उसमें पूर्णताका वह दृश्य आजाय जो निस्सन्देह वेदोंमें उनके पूज्य मंत्रोंकी रहस्यमयी भाषाके होते हुए भी नहीं पाया जाता है। जब यह विचारते हैं कि वेदोके समय अथवा वेदोंके पूर्व हिन्दु धर्मके सिद्धान्त ( Teachings ) क्या रहे होंगे तव वही कठिनाई पाकर पड़ती है जिसको उपनिपदके ले. खक भी पूर्णतया तय नहीं कर सके क्योंकि वेदों में किसी वै- शानिक अथवा व्यवस्थित धर्मका वर्णन नहीं है. सुतरां केवल देवताओंको समर्पितमंत्रोंका संग्रह है जो अब सबके सब विविध प्राकृतिक शक्तियोंके ही रूपक (अलंकार) माने जाते हैं । ब्राह्मण शास्त्र तो स्वयं ही वैज्ञानिक होनेका दावा नहीं करते बल्कि वे यज्ञ विषयक क्रियाकाण्डसे परिपूर्ण है। और उपनिषदोंकी बावजूद उनकी दार्शनिक प्रवृतिके भी समझनेकेलिए लम्बी व भारी टो- काओंकी आवश्यकता है। और वे ऐसी कथानों आदिसे भी परि- पूर्ण हैं जैसे ब्रह्माके स्वयं अपनी ही कुमारी पुत्री सद्र पासे वार- बार बलात्कार सयोग करनेसे सृष्टि उत्पन्न होना (वृहद भारण्यक उपनिषद् १।४।४। षट्दर्शनों में भी जिनमें धर्म को कायदेसे तरतीव देनेका प्रयत्न है एक दूसरेका खण्डन ही किया गया है। तात्पर्य यह है कि आज भी कोई,मनुष्य इस वातको नहीं जानता कि हिन्दु धर्मका असली स्वरूप क्या है यद्यपि ईश्वरशून्य सांख्यमतावलम्बी भी वैसा ही हिन्दू कहलाता है जैसा कि विष्णुका भक्त या शीतलाका उपासक जो चेचककी देवी हैं ! याचसंवन्धी विषयमें, इसमें कोई ।

(१) । संदेह नहीं है कि ऋग्वेदको वास्तविक पवित्रतामें पशु बलिदानका प्रतिवाद है और अजमेध अश्वमेध गोमेध और नरमेघ जैसे स- स्कार पीछेसे किसी दुरसमयमें शामिल हुये हैं। यह वात वैटिक अलंकारोंके वास्तविकस्वरूपसे साफ मालूम होती है । विशेषतया 'अग्नि के स्वरूपसे, जो तपका रूपक है क्योंकि तप जो मनुष्य व पशुमेधका पूग विरोधी है, और वेदोंके ऐसे वाक्य भी जैसे "भक्षकगण सन्तानरहित हों।" (देखो ऋग्वेद १२१.५) और वे वाक्य भी जिनमें राक्षसों व मांसभक्षकोंको श्राप दिया गया (देखो विलकिन्स हिन्दु माइथालोजी पृष्ट २७। इस मतकी प्रवल पुष्टि करते हैं । इन यज्ञविषयक वेद विवरणको प्रतिरूपक भा षान्तर करनेका जो घोर प्रयत्न हिन्दुओंने स्वय पीछेसे किया है वह यही दर्शाता है कि हिन्दुओंका हृदय पशुवधसे किस कदर घृणा करता था। यह वात अंधकारमें है कि यज्ञ संपन्धी (वलि- दान) विषय वेटोंमें कैसे मिलाया गया । हां! केवल यह वात स्पष्ट है कि यह विषय हिन्दू धर्मके यथार्थ भावके विरुद्ध है। और इसलिये किसी बुरे प्रभावके कारण पीछेसे मिला दिया गया है। क्यों कि यह वात वुद्धिगम्य नहीं है कि कोई पवित्र धर्म ऐसे हिंसापूर्ण और कुमाग की ओर लेजानेवाले वाक्योंका प्रचार करे। इस प्रकार हमारा हिन्दू धर्मका दिग्दर्शन पूरा होता है जिससे हमको यह कहनेका अधिकार है कि विचार और भाषा की स्पष्टता ( Precision ) किसी समयमें भी इस धर्मके (१०) प्रसिद्ध चिन्ह नहीं रहे हैं। भावार्य-कि यह विचारों की अस्पष्टता और गडबडोसे जो धार्मिक काव्यका मुख्य चिन्ह है, कभी असंयुक्त नहीं रहा और इसकी जड एक चिन्हरूपी मन्त्रों के संग्रह परही मुख्यतया निर्भर है, जो व्यक्तिगत मानी हुई शक्तियों गुणों आदिको अर्पित हैं-अतः उन काल्पनिक देवताओंका फज जो भूतकालके ऋपि कवियों की मानसिक उलझनों में मगन रहने वाली कल्पना शत्तिसे उत्पन्न हुये है। जब हम जैन धर्मकी ओर देखते हैं तो हमको इससे एक विल्कुल विलक्षण वान दिखाई पड़ती है । जन धर्म एक केवल वैज्ञानिक धर्म है और प्रात्मा अथवा जीवनके सिद्धान्तको पूर्ण- तया समझने पर असरार करता है। इसमें समयानुकूल परि- वर्तन न होनेसे यह हमको अपने प्राचीन रूप में मिलना है । यद्यपि गत १८०० सौ वर्षोमें इसकी सामाजिक व्यवस्थामें कुछ मतभेद अवश्य होगया है। परन्तु इसके सिद्धान्तोंमें न तो कोई भावश्यक दात मिलाई गई है और न कोई वान घटाई ही गई है जैनधर्म की अपूर्व पूर्णताको समझनेके लिये यह आवश्यक है कि इसके सिद्धान्तोंका वर्णन संक्षेपसे किया जाय । जैन धर्म वताता है कि श्रात्माका मुख्य उद्देश्य परम सुख अर्थात् परमात्मापनकी अवस्थाका प्राप्त करता है यद्यपि आत्मा प्रत्येक अवस्थामें इस उद्देशसे अभिक्ष नहीं रहता है। जैन धर्म यह और भी बतलाता है कि आत्मा अपनी ही कृतिसे इस परमपदको पा सका है, कभी किसी दुसरेकी कृपा (११) या दयासे नहीं। इसका मुख्य कारण यह है कि सिद्धात्मा(परमा- स्मा का सर्वोच्च पद आत्माका ही निज सत्यस्वरूप है। जिसको वह अशुद्ध अथवा अपूर्ण अवस्थामें विविध कर्मोके बंधनोंके कारण प्रकट नहीं कर सकता है। यह कर्म विविध प्रकारकी शक्तियां हैं जिनकी उत्पत्ति आत्मा और माई ( पुद्गल) के मेलसे होती है और जो केवल स्वयम् आत्माको ही कृतियों- से नाश भी की जा सकती है। जब तक आत्मा अपने सत्य स्वभावसे अनभिज्ञ रहता है तब तक वह अपना स्वाभाविक स्वरूप और सुखको प्राप्त करने का प्रयत्न नहीं कर सकता है। अतः आत्माके स्वभाव और अन्य पदार्थोका और उन शक्ति- योका ज्ञान जो प्रात्माके स्वाभाविक गुणोंको घात करती हैं कर्मों के बंधनसे छुटकारा पानेके लिये नितांत आवश्यक है वह यथार्थ अथवा सत्य ज्ञान है जो सात नियमों या तत्वों के सत्य श्रद्धानसे उत्पन्न होता है। जिसकी, आत्मा को उसके सुख-स्थान अथवा मुक्तिधाममें पहुंचानेको, आवश्यकता है। और इस सम्यक् ज्ञानके साथ साथ सम्यक्चारित्र अर्थात् ठोक मार्गपर चलनेको भी नितांत आवश्यकता है। जिससे कर्म वंधनोका नाश होकर संसारके आवागमन अथवा जन्म मरण के दुःखसे निवृत्ति मिले। इस प्रकार सामान्य रोनिसे जैन धर्मकी यह उपर्युक्त शिक्षा है। और यह प्रत्यक्ष है कि यह सर्व शिक्षा लडी रूपमें है जो 'कारण कार्य के सिद्धान्त पर निर्भर है। अथवा यह एक पूर्ण (१२) वैज्ञानिक दर्शन है और इस शृंखलाकी सबसे बड़ी बात यह है कि इसमेंसे एक कड़ीका निकलना भी विना कुलकी कुल लड़ी के तोड़नेके असम्भव है अतः यह सिद्ध होता है कि जैन धर्म कोई ऐसा धर्म नहीं है जिसको समयके अनुसार सुधारों अथवा उन्नति श्रादिकी आवश्यक्ता हो। क्योंकि जो प्रारम्भसे ही अपूर्ण होता है केवल वह हो अनुभव द्वारा उन्नति पा सक्का है। वैदिक समयके हिन्धर्मको देखनेसे हम जैन धर्मके सदृश क्रमवद्ध पूर्णता न तो ऋग्वेदमें ही और न अवशेप तीनों वेदों- में ही पाते हैं। जिनके रचयिता केवल अग्नि. इन्द्र, सदृश कथा नक देवताओंकी प्रशंसा करके सन्तुष्ट हो गये हैं । सुतरां पुन- जन्मका सिद्धान्त ही जो सत्य धर्मका मुख्य अङ्ग है वेदोंके कथा- नकोंमें कठिनतासे मिलता है और जैसा कि योरुपीय विद्वानोंका कहना है वेदोंमें केवल एक स्थानपर ही उसका उल्लेख पाया है, जहां 'प्रात्माका जल वनस्पतिमें स्थानांतर होने का वर्णन इस प्रकार हम सिवाय इसके अपनी और कोई सम्मति स्थिर नहीं कर सक्ते हैं कि प्रारम्भिक हिन्दूधर्मका अर्थ यदि उसके बाह्य (स्थूल ) भावमें लगाया जावे तो वह जैन धर्मसे उसी प्रकार भिन्नता रखता है जिस प्रकार कि दो असदृश और निन्न वस्तुएं रखती हैं और वेदोंको जैन धर्म का निकास- स्थान कहना असम्भव हो जाता है। यथार्थमें वास्तविकता (१३) इसके विलकुल विरुद्ध है क्योंकि यदि हम इस ख्यालको दिलसे निकाल दें कि वेद ईश्वरकृत हैं और किसी प्रकार उनके अल- कृत मंत्रोंमें छिपे हुये सिद्धान्तोंको समझ सके तो हम हिन्दू धर्मकी गुप्त रहस्यमयी शिक्षाको आसानीसे एक वाहरी निकाल से निकलते हुये देख सके हैं यह वात पहिले ही सिद्ध हो चुकी है कि न तो निर्वाणका महान उद्देश और न आवागवनका सिद्धा- न्त जिसमें कर्मका नियम भी शामिल है प्रारम्भिक हिंदु शास्त्रों मे उनको स्थूल दृष्टिसे पढ़ने पर पाये जाते हैं। और यदि यह नियम वेदोंके कथानकोंमेंसे निकाले भी जा सके तो भी उनका वर्णन वेदोंमें उस वैज्ञानिक ढंग पर नहीं मिलता है जैसा कि जैनशास्त्रोंमें । इस लिहाजसे प्रारम्भका हिन्दु मत बौद्ध मतसे सदृशता रखता है जो आवागमनके सिद्धान्त और कर्म के फिल्सफेके उसूलको तो मानता है परन्तु बंध और पुनर्जन्मका वर्णन उस वैज्ञानिक तरह पर नहीं करता है जिस प्रकार कि जैनमतमें किया गया है। इन वातोंसे जो अर्थ निकलता है वह प्रत्यक्ष है और स्पष्टतया उसका भाव यह ठहरता है कि कर्म, आवागमन और मोक्षके सिद्धान्त हिन्दुओं में बौद्ध दार्श- निकोंने नहीं दर्याप्त किये थे और न वह उनको किसी सर्वत्र यानी सर्वज्ञानी गुरु या ईश्वरके द्वारा प्राप्त हुये थे। इस युक्ति (विषय )की श्रेष्ठताको समझने के लिये यह याद रखना आवश्यक है कि कर्म सिद्धान्त रुहानी फिल्सफे (अध्या- स्मिकहान) का एक बहुत ठीक और वैज्ञानिक प्रकाश है और

(१४)
यह कि वह जीव और पुद्गल [माहे ] के संयोगके नियमों
और कारणों पर निर्भर हैं जिनमेंसे एकका अभाव भी उसकी
सत्ताको विल्कुल नष्ट कर देने के लिये काफी है क्योंकि यह
असम्भव है कि किसी निषेधरूपी सत्ताको किसी प्रकार
बांधा जा सके और यह भी असम्भव है कि किसी अनित्य
पदार्थको कल्पित, सत्ता न रखनेवाली जंजीरोंसे वांध सकें।
वौद्ध मत आत्माकी सत्ता (नित्यता ) का विरोधी है और
-कोके वन्धनका किसो द्रव्यके आधार पर होना नहीं मानता
है जव कि प्रारम्भिक हिन्दु धर्म आत्मिक पूर्णताके विज्ञानके
विषयमें कुछ नहीं बताता है। यह वाक्य स्वतः अपने भावोंको
प्रगट करते हैं और इस विचारका विरोध करते हैं कि जैनियों
ने अपने विस्तृत सिद्धान्तको इनमेंसे किसीसे लिया हो। यह
भी संभव नहीं है कि हम ऐसा कहें कि जैनियोंने हिन्दु धोके
या किसी और मतके सिद्धान्तोंके आधार पर अपनी प्रणाली
स्थापित की । इस किस्मके विचारोंका पूर्णतया खण्डन इन्सा
इक्लोपीडिया आफ रिजोजन ऐन्ड एथिक्स भाग ७ सात
पृष्ठ ४७२ से उद्धृत निम्न लिखित वाक्योंसे होता है-
अष एक प्रश्नका उत्तर देना श्रावश्यकीय है जो ध्यान
पूर्वक पठन करनेवाले प्रत्येकके मनमें पैदा होगा यानी कर्म
फलास्फीका सिद्धान्त जैसा कि ऊपर उसका वर्णन किया
गया है जैनमतका प्रारम्भिक और मुख्य अंश है या
नही? यह प्रत्यक्षमें इतना गूढ़ और वनावटी जान पड़ता है

(१५) तत्पर कि दिल इस घातके मानने पर हो जाता है कि यह एक ऐसा फल्सफा है जिसको किसी ऐसे प्रारम्भिक मतके ऊपर, जिसमें सव पदार्थोमें जान मानी गई हो और जो सब प्रकारके जीवोंकी रक्षा करनेपर तुला हुआ हो, पीछेसे गढ़ कर लगा दिया गया हो। परन्तु ऐसा विचार इस वातसे विरुद्धता पड़ेगा कि यह फर्म सिद्धान्त अगर पूर्णतया विस्तारपूर्वक नहीं, तो भी विशे- पतया अपने मुख्य स्वरूप में पुरानेसे पुराने शास्त्रोमें उप- लब्ध है और उनमें जो भाव दिखलाये गये हैं उनके उद्देश्य में पहिले ही से सम्मिलित हैं। और न हम यह अनुमान कर सकते है कि कर्म सिद्धान्तके विषयमें शास्त्र प्रारम्भिक "कालके पश्चात्को दार्शनिक उन्नति को प्रगट करते है। इस कारणमे कि श्रास्त्रव, सवर और निर्जरा आदिके यथार्थ भाव इसी मानीमें समझे जा सकते है कि कर्म एक प्रकारका सूक्ष्म माद्दा है जो प्रात्मामें आता है । आस्वर) उसका आना रोका जा सक्ता है अर्थात् उसके आनेके द्वारे बंद किये जा सक्ते है ( सवर ) और जो कर्मोका माहा आत्मामें सम्मिलित है वह उससे अलग किया जा सका है (निर्जरा ) जैन लोग इन परिभाषाओंका अर्थ शब्दार्थमें लगाते हैं और इनका प्रयोग मोक्षसिद्धान्तके समझाने में करते हैं (आसवोंका संवर और निजरा मोक्षके कारण है ) अब यह परिभाषायें इतनी ही पुरानी हैं जितना

(१६)
कि जैन मत, क्योंकि बौद्धमत वालोंने जैन मतसे निहायत
सार्थक शब्द प्रानवको ले लिया है वह उसका प्रयोग
करीव उसी मानोंमें करते हैं जैसा कि जैनी लोग।
परन्तु उसके शब्दार्थमें नहीं, क्योंकि वह कर्म को सूक्ष्म
माद्दा नहीं मानते हैं और आत्मा की सत्ताको नहीं मानते
जिसमें कर्मोका पास्तव हो सके । संवरके स्थान पर वे
असवक्खय ( प्रास्रवक्षय ) अर्थात् प्रास्त्रवका नाश, का
व्यवहार करते हैं जिसको वह मग (मार्ग ) बताते हैं।
यह प्रत्यक्ष है कि उनके यहां आस्रवके शब्दार्थका लोप
हो गया है और इस लिये उन्होंने इस परिभापाको किसी
ऐसे मतसे लिया होगा कि जिसमें उसके शब्दार्थ कायम
थे। अर्थात् अन्य शब्दोंमें, जैनियोंसे । वौद्ध संवर शब्दका
भी प्रयोग करते हैं जैसे शील-संवर (सदाचारके वमो-
जिव अपने मन वचन कायको कावूमें रखना) और क्रिया
रूपमें संवुत अर्थात् 'वशमें रक्खा' का प्रयोग करते हैं जो
ऐसे शब्द हैं जिनका ब्राह्मण लेखकों ने इस अर्थमे इस्तेमाल
नहीं किया है, और इस कारण अनुमानतः जैन मतसे
लिये गये है जहां वह अपने शब्दार्थमें पूर्णतया अपने भाव
को प्रगट करते हैं। इस प्रकार एक ही युक्ति इस वातके
पुष्ट करनेके लिये उपयोगी है कि जैनियों का कर्म सिद्धान्त
उनके मतका आवश्यकीय और अखण्ड अंश है। और
साथहीमें इस बातके सावित करनेके लिये भी कि जैन मत,
वौद्ध मतके प्रारम्भमे बहुत ज्यादा प्राचीन है ।

(१७) जब हम हिन्दु मतको ओर इस वातके जांचने के लिये दृष्टिः पात करते हैं कि पाया कर्म सिद्धान्त हिन्दु ऋपियोंकी खोज का नतीजा है तो हमको उसका एक अनिश्चित और अपूर्ण भाव हिन्दू धर्मके प्रारंभिक शास्त्र में मिलता है। परिणाम यहां भी वही निकलता है अर्थात् यह कर्मसिद्धान्त हिन्दुओंने किसी अन्य धर्मसे लिया है, क्योकि यदि वह हिन्दू ऋषियोकी मेहनत का फल होता तो वह अपने रचयिताओंके हाथोंमे भी अपने उसी वैज्ञानिक ढंग पर होता जैसा कि वह निःसन्देह जैन मतम पाया जाता है। कर्म, बन्धन, मुक्ति और निर्वाणके स्वरूप क्या है, यह एक ऐसा विषय है जिसकी निस्चत हिन्दुप्रोके विचार बहुत ही विरुद्ध और अवैधानिक पाये जाते हैं। वास्तव में प्राधव, संबर निजरा ऐसे शब्दोमें से हैं जिनसे ब्राह्मणोका मत करीय करीव विल्कुल ही अनमिन है बावजूद उपनिषदों के लेखकोंकी वुद्धमत्ताके जिन्होंने अपने पूर्वजोंक धर्मको दार्शनिक विचारों की पुष्ट नीव पर आधारित करने की कोशिश की । पस! जो परिणाम निकालनेके अब हम अधिकारी हैं वह यह है कि हिन्दू मतने स्वयं उस विषयको किसी अन्य निकास प्राप्त किया है जिस को अव वाज लोग उसीकी कृति मानते है। दूसरा प्रश्न यह है कि हिंदुअोने कर्मके सिद्धांतको कहां से प्राप्त किया? वौद्धोंसे तो नहीं, क्योकि बौद्धमत पीछेको कायम हुआ। तब सिवाय जैनमतके और अन्य किसी मजहबसे नहीं, जो श्रावागमनके माननेवाले धर्मा में और सबसे प्राचीन धर्म है और २ (१८) जो इस ममलेको वैज्ञानिक ढग पर सिखानेवाला अकेला ही धर्म है। यह युक्तियां इस असत्य ख्यालको दूर करदेती हैं कि जैन मत हिंदू मतकी पुत्री है, परंतु चूंकि घेढोकी उत्पत्तिके विचार से बहुत प्रकाश इस व्याख्या पर पड़ सकता है इसलिये लव हम विधि अनुकूल वेटोंके निकासकी खोज लगायेंगे। वर्तमान खोजने वेदोंको उस कालके मानिसक भावोका सग्रह माना है जब कि मनुष्य-बच्चेपनकी दशामें पौदगलिक चमत्का. रोसे भयभीत रहता था और सब प्रकारको प्राकृतिक शक्तियों को देवी देवता मानकर उनके प्रसन्न करने के लिये दंडवत् करता था परन्तु उस समयकी हिन्दू सभ्यतासे, जो स्वयं वेदोंको प्रा. न्तरिक साक्षीसे स्पष्ट है यह ख्याल झूठा ठहरता है , क्योंकि पवित्र मन्त्रोके रचयिता किसी माने मे भी प्रारंभिक अपक्व बुद्धि वाले मनुष्य या जगलो न थे और उनके बारेमें यह नहीं कहा जा सकता है कि वह अग्नि और अन्य प्राकृतिक शक्तियोके स- मक्ष आश्चर्यवान् और भयभीत होकर दडवत् करते थे। एक योपियन लेखकके अनुसार:- 'पार्योका देश अनेक विभिन्न जातियोका निवासस्थान था और बहुत से प्रांतों में बंटा था। वेढोमे वहुतसे गजाओं के नाम लिखे हैं. पुरपति, शहरोंके हाकिमों चक्ले- दारों, जमींदारोका जिक्र है। ....... सुवसधारी लियों और अच्छे बने हुये वस्त्रों का उल्लेख है। इन हवालोंसे

( १६ )
'और औरोले जिनमें मणि माणिकका जिक्र है यह नतीजा
निकाला जा सक्ता है कि उस समयमें भी शारीरिक आभू.
'घणोंकी और अधिक ध्यान दिया जाता था। वस्त्र ननु.
मानत' रूई और ऊनके वनाए जाते थे, और वे करीव २ इसी
प्रकारके थे जैसे वर्तमान काल में हैं। पगड़ीका उल्लेख है।
सुई और तागेका वर्णन इस बातका सूचक है के सिले
हुए कपडे नामालूम न थे।...... ..लोहेसे सुरक्षित शहरो
और दुर्गोका वर्णन है पीने वाले मादक पदार्थों का
'भी मंत्रो मे वर्णन है। करीव २ ऋग्वेदका एक कुल मंडल
सोमरसकी प्रशंसासे भरा हुआ है । मदिरा या सुराका भी
च्योहार था।
आर्योके मुख्य उद्यम संग्राम और कृषि थे। जो युद्ध करने
मे सूर ठहरे उन्होंने धीरे २ प्रतिष्ठा और उच्च पदको प्राप्त
किया, और उनके मुखिया राजा हो गये। जिन्होंने रणमें
भाग नहीं लिया वह विश वा वैश्य या गृहस्थ कहलाये।"
चैदिक समय हिंदू समाजका वर्णन करते हुये डाक्टर
विल्सन साहव लिखते हैं:-
यह वात कि आय्यं लोग केवल एक जगलोमें फिरनेवाली
जाति न थी बहुत स्पष्ट है। उनके शत्रुओंके भांति उनके
गांव, शहर, और पशुशालायें थीं, और उनके पास बहुत
तरहके यन्त उपयोगी सामिग्री, व सुखके साधन, दुरा.
चारके उपकरण जो मनुष्य जातिकी एकत्रित मण्डलियों में
1

( २० ) पाये जाते हैं, थे। वे पुनने व कातनेकी विधि भी जानत थ, जिस पर वे मुख्यतया निर्भर थे । वे लोहेले व्योहारसे भी अनभिज्ञ न थे और न लोहार, ठठेरे, बढ़ई व अन्य शिल्प- कारों के कार्योंसे। वे कुल्हाडियोसे जङ्गलोके वृत्त काटते थे। और अपनी गाड़ियोंको साफ व चिकना करनेके लिये रन्दे काममें लाते थे । युद्धके लिये जिसके वास्ते कभी २ वे शंख. ध्वनि परएकत्रित होते थे, वेवख्तर,गदा, कमान, तीर, वी तलवार या तबर और चक्र बनाते थे । उन्होने अपने घरेलू व्यवहार और देवोंकी पूजाके लिये कटोरे, कल्ले, छोटे बड़े चम्चे बनाये थे। नाईका उद्यम करनेवालोंसे वे बाल कटवाते थे वे बहुमूल्य पाषाणों व जवाहिरातोका उपयोग करते थे, क्योंकि उनके पास सोनेको वालियों, सोने के कटोरे और जवाहिरातकी मालायें थीं। उनके पास युद्ध के लिये रथ थे और साधारण व्योहारके लिये घोडो तथा वैलोकी गाड़ियां थीं। उनके पास जङ्गी घोडे थे और उनके वास्ते साईस भी थे। उनकी समाजमें खोजे हिजडे ) भी थे। •भाति २ की नावें वेड़े व जहाज भी वह लोग बनाते थे । वे अपने निवासस्थानोंसे कुछ दूर देशोंमें च्यापार भी किया करते थे। कहीं २ इन मन्त्रों में समुद्रका भी उल्लेख है जिस तक के अनुमानतः सिन्ध नदोके किनारे किनारे पहुंचे होंगे । उनमें से मनुष्योकी मण्डलियोका अर्थलाभके लिये जहाजों पर एकत्रित होकर जाना लिखा है . ।

(२१) . 'एक सामुद्रिक सेनाकी चढ़ाई के बारेमें उल्लेख है कि वह वेड़े के इव जानेके कारण निष्फल हुई।" आर्यलोग अपने मनोविनोदके लिये नाचना, गाना तथा नाट्य करना जानते थे। वेदोंमे मृदंगका भी उल्लेख है और अधर्व वेढमें एक मंत्र विशेषतया मृदंगके लिये निर्मित है। ऐसा वर्णन उन आर्योका है जो वेदोंके निर्माण समयमें हुये हैं। हम उन्हें असभ्य तभी कह सक्ते हैं जब हम उनके गुणों की पोरसे, जिनकी कि एक यथेष्ट सूची उपर्युक्त दोनों लेखोमें दी गई है, आंख मीच लें । तो फिर उस बच्चेपनकोसी उपासनाका जो अग्नि इन्द्र श्रादि देवताप्रोकी की जाती थी, जिनके लिये ऋग्वेदके मन्त्र नियमित हैं, क्या अभिप्राय है ? यह बात अक्ल के विपरीत है कि ऐसे घडे बुद्धिमान प्रादमियोंको, जैसे कि वेदोंको आन्तरगिक साक्षियोले हिन्दु सावित हुये हैं, यह मान ले किवह अलके बारे में इतने कमजोर थे कि आगको देखकर आश्चर्य वान और भयभीत हो जाते थे और यह कि उन्होने एक ऐसी प्राकृतिक शक्तिके प्रसन्नार्थ, जिसको वह स्वयं बड़ी ही आसानी से पैदा कर सक्ते थे, बहुतसे मजन बना डाले। वात यह है कि वेदोंके देवता प्राकृतिक शक्तियों के रूपक नहीं है बल्कि जीवकी आत्मिक शक्तियोंके । चूकि आत्माके स्वाभाविक गुणोका भजना शामाको कर्मों की निद्रासे जगाने का एक मुख्य कारगह है। इसनिये ऋग्वेदके ऋषि कवियोने बहुमसे मन्त्रोको आत्मक शक्तियोके लिये नियत करके बनाया। ताकि वह आत्मिक गुण - ( २२) ऐसे जीवमें जो उनके अर्थको, समझ कर,जाप करे, प्रगट हो जावें। उन्होंने जीवकी बहुतसी क्रियाओ-जैसे स्वासोच्छ्वासको भी अलं- कृत कर डाला जैसा हम प्रागे दिखायेगे। मगर इस सवमें यह यात गर्मित है। कि ऋषियोको आत्मिक विद्याका प्रगाढ बोध था और यह सब वैदिक समयके आर्योकी उच्चसभ्यताके अनुकूल है। परन्तु जव कि ऋग्वेदके मन्त्रोके बनानेवालोमें आत्मिक ज्ञानके वोधका होना जरूरी मानना पड़ता है तो इन पात्मिकज्ञानका अस्तित्व स्पष्ट वैज्ञानिक ढंग पर होनाभी लाजमी मानना पडता है। लेकिन इस सत्य ज्ञानको हम अगर जैनमतमें नहीं तो और कहां ढूढ़े, जो हिन्दुस्थानके और सब मतों में सबसे प्राचीन हैं। इससे यह नतीजा निकलता है कि जैन-दर्शन वास्तवमें ऋग्वेद के पवित्र मंत्रोंकी, जिनके रचनेवालोने जीवकी विविध क्रियाओ और स्वाभाविक आत्मिक गुणोको कल्पित व्यक्तित्व ( देवी देव. ताओके ) रूपमें बांधा, नीव है। वाकई यह ख्याल हो सकता है कि सांख्य दर्शन, न कि किसी दूसरे मतका कोई और शास्त्र ऋग्वेदकी नीव है क्योकि वेदोके काल्पनिक व्यक्तिगण एक ऐसे विचारके आधार पर हैं जो यथार्थ में सांख्य नहीं हैं तो भी वह सांख्यमतसे इतना मिलता है कि वह सांख्यमतसे बहुत कम विरुद्ध होगा। मगर सत्य यह है कि वर्तमानका साख्य दर्शन वेदों के बहुत पश्चात् कालका वह वेदोके प्रमाणको मानता है और समयके लिहाजसे वेदोंके. पहलेका नहीं हो सका। . - (२३) इसलिये यह विदित होता है कि सांख्य दर्शनमे मिला हुआ कोई और मत रहा होगा जो गुप्त शिक्षाकी अस्पष्टना ( Inddefintteness) और अनिश्चितपनसे भरा होगा। यह वात कि इस प्रकारका एक मत था जैन पुराणोमें पाई जाती है जिनके कथनानुसार अनभिक्ष लोग जैनधर्मके प्रथम तीर्थकर श्रीकृषभ देव भगवान के समयही में नाना प्रकारकी धर्म शिक्षा समारम फैलाने लगे थे और स्वयम् पूज्य तीर्यकरका पोता मरीचि नामी जिसने परिषहजयमे असफलता प्राप्त होने के कारण अपने प्राप को योग क्रियामें ऋद्धियो सिद्धियोंके हेतु संलग्न किया था एक ऐसे धर्मका संस्थापक हो गया जो सांख्य और योग दर्शनोके मध्य दर्जेका था । इस प्रकार यह जान पड़ता है कि मरीचिका स्थापितं धर्म जो पूज्य तीर्थकरोके मतसे प्रान किये सत्यके अंशके आधार परगुप्त रहसवादके ढंगका निर्माण किया गयथा, वेदोंकी अलंकृत देवमाला और पश्चातके पुराणोकी असली व प्रारम्भिक बुनियाद है। इस कथनकी प्रबलता कि वेदोंकी कल्पित देवमाला जैन मतसे प्राप्त हुए सत्यके अंश पर निर्धारित है, प्रत्येक व्यक्ति- को विदित हो जायगी, जो आवागवनके नियम और उसके अाधारभून कर्मसिद्धान्तके निकास पर विचार करेगा । यह बात कि यह नियम, वेदोके रचयिता या रचयिताप्रोको #मरीचि ऋषिका नाम वैदिक मंत्रोंके बनानेवाले ऋषि कवियों में ऋग्वेदमें वाकई दिया हुआ है।

( २४ ) मालूम था, ऋग्वेदके उस वाफ्यसे विदित है, जिसमें जीवके जज व वनस्पतिमें प्रवेश कर जानेका वर्णन है ( देखो डी० ए० मैक्यन्जी साहवका इन्डियन मिथ ऐन्ड लोज्यन्ड पृष्ट ११६ । और वैदिक गुप्त रहस्यमयी शिक्षाके आधारभूत सिद्धान्त के सामान्य स्वरूपसे भी विदित है। अगर हम यास्कके साथ, जो वेदोंके टीकाकारोंमें बहुत प्रसिद्ध गुजरा है यद्यपि वह सबसे पहिला टीकाकार न था, सहमत होकर यह मानले कि वेदों में तीन बडे देवता है, यानी अग्नि, जिसमा स्थान पृथ्वी है, वायु, या इन्द्र जिसका मुकाम वायु है, और सूर्य, जिसका स्थान प्राकाश है, तो यह बान महजहीमे समझमें आजायगी कि यह देवता अपने विभिन्न कर्तव्योंके कारण भिन्न भिन्न नामोंसे प्रसिद्ध है ( देखो डब्लू • जे० बिल- किन्न साहयकी हिन्दू मेधोलोजी पृष्ठ ६) हमने इन्द्रका असली स्वरूप 'दि की औफ नोलेज मे बताया है और पश्चातमें उसका यहां भी वर्णन करेंगे, लेकिन सूर्य केवलज्ञान अथवा सर्वज्ञता का चिह्न है और अग्निसे मतलव तपाग्निसे हैं। इस प्रकार वैदिक ऋषियोंके तीन मुख्य देवता प्रात्माकी तोन दशाओके चिन्ह है, सूर्य उसकी स्वाभाविक दिव्य छविका प्रकाशक है, इन्द्र उसको पुद्गल द्रव्यके स्वामी और भोगताके रूपमें दर्शाता है और अग्नि जो तपसे उत्पन्न होती है उसके पापोंके भस्म करने वाले गुणोंकी सूचक है। अग्निके तीन पाँव तपके तीन आधारों, अर्थात् मन, वचन और कायको जाहिर करते हैं और ( २५ ). उसके सात ७ हाथ सात प्रकारकी ऋद्धियोंके सूचक है। जो शरीरके सात मुख्य चक्रोंमें सुपुप्ति अवस्थामें पड़ी है। मेंढा जो इस देवताका मच (प्रिय ) वाहन है, वाह्य आत्माका चिह्न है । देखो दि की औफनालेज, अध्याय आ४८) जिसका बलिदान अस्ती व्यक्तिकी उन्नतिके लिये करना होता है। लकडीके तख्ते जिनसे अग्नि पैदा होती है वह पौगलिक गरीर और द्रव्य मन हैं जो दोनो मोक्षके, पहिले भस्म ( आत्मासे पृथक् ) हो जाते हैं। चूंकि आत्माके शुद्ध परमात्मिक गुण तपस्या करनेसे अर्थात् तपके द्वारा प्रगट होते हैं, इसलिये अग्नि को देवताओका पुरोहित कट्टा गा है जिसके निमन्त्रण पर वह आते है । अन्ततः तपानि आत्माको पूर्वजोके स्थान (निर्वाण क्षेत्र ) पर पहुंचाता है जहां वह सदैवके लिये शान्ति, ज्ञान और आनन्दको भोगता है। देवताओं के युवक पुरोहित अग्निका ऐसा स्वरूप है। यह कोई पुरुष नहीं है बल्कि एक काल्पनिक व्यक्ति है और काल्प- 'निक व्यक्ति भी आगका सूचक नहीं है जैसा कि वेदोंके योरोपियन अनुवाद करनेवालोंने ख्यान किया है वलिक श्रात्माके कर्मों के भस्म करनेवाली अग्निका जो तपश्चरणमें प्रगट होती है। एक यही रूपक इस घातके जाहिर करनेके लिये यथेष्ट है कि जिस बुद्धिने उसको जन्म दिया वह आवागमन और कर्मके सिद्धांत से जरूर जानकारी रखती थी, और यह बात कि इस मसलेको (अलंकारकी भाषा ) विपाकर न्यान किया है इसकी सूचक है कियानी इन शायनिक कि रचनेवाने अपने प्रापको इन शिनाक गानिक ढग पर वरन करनेके यंन्य नहीं समझा या कम जन यह कि उन्को बैगनिक दंग पर खोजकरने इन्चा या वावश्यकता न थी। इन न्यि यई माविन है कि उसने इस सिद्धांतो किसी और जरियेसे प्रान किया था, जो जैन मत के बाहर दुनिया कहीं नहीं मिलता है। यहां यह बात नी कहने योग्य है कि हिन्दू मठ सदैव जैन गत और उसके स्मारक भगवान श्री यमदेवजीको जिन- पो उन्होंने विन्गुका अवतार माना है, प्राचीनताको न्वीकार दिया है और शा. उन विन्डू नी का वराहपुराम और निपुगण में श्री ऋषभदेवजीता बरीन है जिन्होंने उनके ऐतिहासिर व्यक्ति होनको संशरकी सीमाके पर पहुंचा दिया है और जो उनकी मा नदेवो और उन पुरे भरना, जिन के नाम पर हिन्दुलान भारतवर्ष नदन्ताया. वर्णन करते हैं। भागवन पुगग में भी प्रश्न नायरका वर्ग है और उनको जैन नतका संस्थापक माना है ! इस अन्तिम उल्लिखित पुगाके अनुसार ऋषभदेवजी विष्णु के अवतारामने नर्वे अवतार थे, और वामन, राम, कृष्ण, बुद्ध से, जिनको भी विष्णका अवतार माना है, पहिले हुर थे। अब कि गमन अवतारका जो सिलसिलने पन्द्रहां है, ऋग्वेदमें स्ट रीतिन्ले वर्णन है इस लिये. यह नतीजा निकलता है कि वह उस मन्त्रसे जिसमें उनका वर्णन है. पहिले हुए होंगे और . (२७) चूंकि श्री ऋषभदेवजी वामन औतारसे भी पूर्व हुए है। इस लिये वह ऋग्वेदके मन्त्रसे बहुत पहिले समय में गुजरे होंगे । इस प्रकार यह वात संशयरहित है कि वेढोंकी रचना वर्तमान कालमें जैन मतके स्थापन होनेके बहुत काल के पश्चान हुई। हिन्दु लोग स्वभावतः वेदोको ईश्वरेको कृति मानते हैं परन्तु उसके मन्त्रोसे यह वात अप्रमाणित पाई जाती है, यथार्थ भावमे सत्यज्ञानका प्रकाश दाही तरहसे होता है (अ) या तो प्रात्मा स्वयम् जान द्वारा सत्यको जान लेता है या (घ) सर्वन गुरु (तीर्थकर ) निर्वाण प्राप्तिके पहिले सत्य ज्ञानका दूसरो को उपदेश देने है । वेट इस दूसरी संज्ञामें आते हैं क्यो कि उनको श्रुति, जिसका अर्थ 'सुना गया है' है, कहते हैं । इस दिये यह आवश्यकीय हुआ कि हम अंसली श्रुति या शास्त्रके * यह वात कि वेदोंका भाव गुप्त है इस प्रमाणकी सत्यताम वाधा नहीं डालती है क्योंकि रामायण और महाभारतको पद्यों और पुराणों की भाति वेदोंके रहस्यमयी काल्पनिक प्रकियों अलकारों और कथानकांके बनाने में, इतिहासके मशहूरब मारुफ, वाक्यात और घटनाओंका प्रयोग किया गया है । जैनपुराणोंसे यह सावित है कि श्रीऋषभदेव भगवान और विष्णु ऋपि, जो वामन अववारके नामसे प्रसिद्ध हुये, इस कारणले कि उन्होंने एक दफा तपस्यासे प्राप्त हुई बैंक्रियिक ऋद्धि द्वारा अपने शारीरको यौनेके कदका बनाकर और फिर पश्चातको अविश्वसनीय विस्तार दिवाकर कुछ साधुओंका ऋष्ट दूर किया था, दोनों ऐतिहासिक व्यक्ति थे।

(२८ ) निकाशका स्वरूप दर्याप्त करें। इस सिलसिले में पहिली बात जो जानने योग्य है वह यह है कि वचन चाहे वह किसी रूपमें हो और चाहे वह इरादतन बोला गया हो या नहीं, एक प्रकार की पौद्गलिक क्रिया (श्रान्दोलन ) है जो मानसिक या जाजुल्ल (कपाय ) वृत्तियोफे प्रभावके ( एक प्रकारके ) सूक्ष्म माद्दे पर पड़नेसे पैदा होती है। यह क्रियायें ( आन्दोलन) फिर बाहरी हवामें प्रवेश करती है जिसके द्वारा वह सुनने वालोके काम तक पहुंच जाती है। मनकी वृत्तियां जो वचन की उत्प- त्तिमें उपर्युक्त मुख्य भाग लेनी है सूक्ष्म आन्दोलन है जो श्रात्माके दो भीतरी शरीरोमे उत्पन्न होती है और जो उन शरीरोके अभावमे असम्भव है । इसलिये जिस किसी गमा में पौद्गलिक लेश नहीं रहा है उसके लिये वचन असम्भव है इससे यह परिणाम निकलता है कि शरीसहित श्रात्मा अर्थात् सामान्य रीतिसे शुद्ध जीव, लोगोंसे वाक्य द्वारा बचा व्यवहार नहीं कर सक्ता है। इसके अतिरिक्त चूकि पुद्गलके वंधतसे वाकई रूपसे मुक्ति उसी समय मुमकिन है कि जब स्व-प्रात्मधान पूर्णताको प्राप्त हो इसलिये शुद्ध आत्माके लिये असंभव है कि वह दुसरेके मामिलातमे दिलचस्पी ले । अतः यह निश्चित है कि युतिका निकास सिद्धारमा, जैसा कि धर्म- शास्त्रोका रचयिता ईश्वर कहा जाता है, नहीं हो सकता। यह बात भी याद रखने योग्य है कि सत्य देववाणी स्पष्ट भावमे ही हो सकती है क्योंकि तीर्थकर भगवानको सत्यके r ( २६ ) छिपानेकी कोई आवश्यकता नहीं है और इस वजहसे उनमें, यह इच्छा नहीं मानी जा सकती है कि वह ऐसी भाषामा प्रयोग फरें जिसके अर्थमें भूल पड़े अर्थात् जो मटकानेवाली हो । देव. वाणी बड़े पुजारियों या पुरोहितों का रहस्यमय कवियों या सन्तों द्वारा नहीं हो सक्ती है। इस विषयमें विविध मतोंके शास्त्रोंका पढ़ना यथेष्ट रीतिसे हमको इस बातके मागमेपर वाध्य कर देगा कि वह वाक्य या हुक्म या श्राज्ञा जो ईश्वरीय कही जाती है कभी २ उसी शाला के किसी दूसरे वायसे खंडित हो जाती है और बहुधा किसी दूसरे मतकी आमाझे। यह दरअस्ल । ईश्वरीय प्रेरणा नहीं है बल्कि किसी विचार में उन्मादके दर्जे तक मुग्ध हो जाना है और इसका भेट यह है कि पुरोहित या भविष्यवाणी कहनेवाला व्यक्ति अपने आपको रोजा, दान, भनि श्रादिके कानान्तरिक अभ्यासमे एक प्रकारको अनियमित समाधि अवस्था में प्रवेश करने की आदत डाल लेता है जिसमें उसके प्रात्माकी कुछ शक्तियां थोडी या बहुत प्रगट हो जाती हैं। लो। इनको ईश्वरीय प्रकाशका चिन्ह समझ लेने हैं और सब प्रकारको वाहियात धोर कपोल कहित सम्मांतयां उनके प्राचार पर गढ़ डालते हैं। मगर यथाथ यह है कि विवेक करनेवाली बुद्धि के कार्यहीन हो जाने के कारा मनमे उपस्थित विचारोंमसे जो सबसे अधिक प्रचल मव) होता है उसका भविष्यत् वक्ताके चित्त क्षेत्र पर शासन हो जाता है जिससे उसकी वाणी उसके व्यक्तिगत विचारों

(३० )
-
.
और पक्षपातसे रंग जाती है, तथापि वह यही मानता है कि
- उसकी क्रिया (वास्य) ईश्वरीय प्रवेशका नतीजा है। एक
पोलिनेशिशके भविष्यद्वक्ताके ईश्वरीय प्रवेशका निम्नलिखित
वर्णन; पढ़ने पर लाभदायक ठहरेगा। (देखो टी० एच० हक्सली
साहबकी बनाई हुई साइन्स एन्ड होवूट्रडीशन, पृष्ठ ३२४):-
एक सुअर मारा गया और पकाकर रातको रक्खा
गया और दूसरे दिन केलों और याम ( जिमीकन्द के सदृश
'पल ) और टांगन जातिकी निजी सुरा 'कावा' की
' सामग्रीके साथ ( जो,उनको बहुत प्रिय है ) पादरी (स्याने
के पास लाया गया। फिर सघ लोग गेरा बांध कर जैसे
मामूली कावा पोनेके लिये बैठा करते थे, वैठ गये, परन्तु
पादरी, ईश्वरका प्रतिरूपक होने के कारण,सबसे उच्च स्थान
पर बैठा जव कि टांगियोका लार नम्रतापूर्वक ईश्वर के
प्रसन्नार्थ घेरेके बाहर बैठाइन सबके बैठते ही पादरीकी प्रेरित
: अवस्था मानी जानी है क्योकि उस ही क्षणसे ईश्वरका प्रवेश
उसमे माना गया है वह बहुत देर तक चुप चाप हाथों को अपने
सामने पड हुये बैठा रहता है, उनकी अखि नीचेकी ओर
; होती हैं और वह विल्कुन शान्त, क्रियारहित होता है उससमय
जव क भाजन करता है और कावा तैयार होता है कभी २
मेतावूल लोग उससे पूछ ताछ आरम्भ करते हैं । बाज दफा
“चह उत्तर देता है और बाज दफ़ा नहीं मगर दोनोंही दशा-
ओंमें उसको चि बन्द रहती हैं। -बहुधा वह खाने और
.

(.३१)
शरावके वन्द होने तक एक शब्द भी मुहसे नहीं निका-
लता है। जब वह वोलता है तो वह साधारण रीतिसे
धीमी और वहुन चढली हुई भावाजमें बोलना प्रारम्भ
करता है जो धीरे धीरे मसती स्वामाविक पिव (आवाज)
तक पहुंच जाती है और कभी कभी उससे उच्च स्वर भी हो
जाता है। जो कुछ वह कहता है वह सब ईश्वरीय कथन
समझा जाता है और इसी लिये वह उत्तम पुरुष सर्वनाम
में बोलता है, मानो वह स्वयं ईश्वर है। यह सब साधा-
• रण रीनिसे विना किसी आन्तरिक आकुलता या-शारीरिक
हिलन जुलनके होता है, लेकिन कभी उसका मुख भया.
नक रूप- धारण कर लेता है और भड़क उठने मरीखा
होता है और उसका -तमाम शरीर मानसिक शोकसे
कम्पायमान हो जाता है, उस पर कंपकंपी चढ़ जाती है,
उसके मस्ये पर पसीना आ जाता है, उसके होठ काले पड़
कर एंठ जाते है, अन्नमे उसकी श्राखोले आंसुओंकी धा.
राये वहने लगती हैं गम्भीर कषायो से उसकी छाती उभरने
लगनी है, उसकी आवाज रुक जाती है। धीरे धीरे यह हाल
दूर हो जाती हैं।
इस वेगके पहिले और उसके उपरान्त
वह वहुधा इतना खाना खा जाता है जितना चार भूखे
पुरुष साधारणतया खा सके हैं।
इस उदाहरण पर विचार करते हुए प्रोफेसर टी० एस०
हक्ली साहब फरमाते है-
-

- (३२) "यह अद्भुत घटनायें जो ऐसे शब्दोमें वर्णन की गई है जिनको पढ़ कर हर मनुष्य जो हम लोगों की विल- क्षण मानसिक अवस्थानोंसे जानकारी रखता है, तुरन्त उनको सत्य मान लेगा. रनडोरकी भविष्यवका स्त्री की कथा पर बहुत बड़ी रोशनी डालती है। जैसा कि इस स्त्रीको कथामें पाया है वैसे यहां भी भूत या देवका श्राना वाणीका बदल जाना व उत्तम पुरुष सर्वनाममें बोलना पाया जाता है। अभाग्यवश (नोरकी चिल्लोके अतिरिक्त ) एनडोरकी उस पैगम्बरिया ( भविष्यद्वका स्त्री) के दशाका कुछ वर्णन नहीं है । परन्तु जो कुछ हमको दूसरे जरायोसे ( उदाहरण के तौर पर १-समवेल अध्याय १०-प्रायन २० ता २४ ) इसराइलों में ईश्वरी प्रवेशकी सहचर शारीरिक अवस्थामा हाल मालूम होता है उसकी ठीक समानता पालीनेशियाके भविष्यद- वक्ताओंकी इस कथा और दूसरी कथाओमें पाई जाता है।" इसी प्रकारके दृश्य मोरासाय के मवर पर हिन्दुस्तान में अमरोहाके स्थान पर देखे जासक्ते हैं और माधारण स्याने भी इस प्रकारके कुछ न कुछ कृत्य विना विशेष परि श्रमके दिखा सक्त हैं। जैसा कि हमने ऊपर कहा है यह ईश्वरीय प्रवेश नहीं है परन्तु मन पर' विचारके विशेष प्रभाव का परिणाम है। श्रुतिके सच्चे लक्षण रत्नकरण्डश्रावकाचार में वर्णन किये गये हैं और संक्षेपसे इस प्रकार हैं-

( ३ )
(१) वह सर्वज्ञ तीर्थंकर भगवान द्वारा उत्पन्न होती है।
(२) वह तर्क वितर्की किसी प्रकार खण्डन नहीं हो
सक्ती, अर्थात् न्याय ( मन्तक ) उसका विरोध नहीं
कर सत्ता।
३) वह प्रत्यत्त, अनुमान और शब्दसे (साक्षी)
मुताविक होती है।
(४) वह सर्व जीवोंकी हितकारी होती है, अर्थात् वह
किसी प्रकार भी किसी प्राणोके दुःख या कष्टका कारण
नहीं हो सकी-जानवरोको भी दुःख
और कटका
नहीं।
(५) वह वस्तु के यथार्थ स्वरूपकी सूचक है। और:-
(६) उसमें धार्मिक विषयमें भून और भ्रमके दूर करने
की योग्यता होती है।
समे शास्त्रोके उपर्युक्त लक्षणोंको ध्यानमें रखते हुए यह
एक निगाहमें साफ होजाता है कि वेदोंके वारेमें यह दावा
करना कि वह श्रुति होने के कारख ईश्वरीय वाक्य है, समझ
दार अकलके लिये नामुमकिन है । अगचें यह बात पहिले
पहिल नागधार मालूम होती है तो भी उससे गुरेज़ नामुमकिन
है, क्योंकि स्वयं हिन्दुओंने अपने वेदोंसे कई वानोंमें विरोध कर
लिया है। उदाहरणके तौर पर वह इन्द्र, मित्र, वरुण व अन्य
वैदिक देवतामोंमेंसे बडुनोंकी अब पूजा उपासना नहीं करते है
इस विरुद्धताका क्या अभिप्राय हो सका है ? अगर यह नहीं कि
३

(३४) वैदिक देवतायोका वास्तविक भाव कि उनका व्यक्तित्व केवल काल्पनिक है, लोगोंको मालूम हो गया और इस कारण उनकी उपासनाका प्रचलित रहना असम्भव पाया गया। इस बात भी कि वर्तमान हिन्दु प्रथा वेदोंमें कहे हुए जानवरों और मनु- ज्योके वलिदानको पाशविक और नीच कर्म समझती है वही परिणाम उधृत होता है । वास्तवमें वलिदानके नियमके सम्बंध में पीछेके लेखकोंने शालोय वाक्यका भाव बदल कर गृह अर्थ लगाने का प्रयत्न किया है, परन्तु प्राचीन रश्मो और रवाजोंसे जो आज तक चले आये हैं यह बात स्पष्ट है कि भारम्भमें उस का अर्थ ऐसा न था। यह बात कि उसके रचयिता मांसभक्षी ऋषी ही होंगे विल्कुल प्रत्यक्ष है, क्योंकि कोई सबा शुद्ध माहारी साधु कभी ख्यालमें भी अपने लेखको रक्तवमांसके अलंकारसे से, जिनके केवल अर्थहीके वारेमें भ्रम नही होसका है वरिक जो उसकी स्वाभाविक मनोवृत्तिको भी अवश्य घृणित मालूम होंगे, गन्दा नहीं बनायगा। इस लिये वेदोंका वह अङ्ग, जिस में जीवोंके बलिदानका वर्णन है उन व्यक्तियोका बनाया हुमा नहीं हो सकता है जो तप (अग्नि) को मुक्तिका कारण जानते थे, वलिक वह पीछेसे किसी बुरे प्रभावसे शामिल हुआ होगा। अब हिन्दुमतके विकासका बहुत स्पष्टनाके साथ उपर्युक युक्तियोंके लिहाजसे जल्द पता चल सकती है ।। अलंकारिक शिक्षाके जन्मदाता ऋषियोंकी कपना शक्तिमें आत्मिक पूर्णता के प्राप्तिके उपायके तौर पर, जो उसके दैविक गुणोंकी प्रशंसा (३५) करनेसे प्राप्त होती है, उत्पन्न होकर वह पश्चात्को सन्तानोंमें एक सुन्दर भजनोंके संग्रहके समान चला आया, जो कुछ समय व्यतीत होने पर श्रुतिके तौर पर माने गये, और फिर उनके भावार्थके भुला दिये जाने पर एक नये एक नये मतके वीज (मूल ) बन गये। सवसे प्राचीन मन्त्र अनुमानतः वे थे जो अव ऋगवेदमे शामिल हैं, सिवाय उनके जो जीवोंको बलिदान की आज्ञा देते हैं या किसी प्रकार उसका अनुमोदन करते है। उनका असली अर्थ अनुमानतः, उनके रचनेके समयमें बहुतसे मनुष्योंको मालूम था और चूंकि वह केवल लेखकी कुशलताके लिहाजसे ही सुन्दर नहीं गिने गये थे वरन् आत्मिक शुद्धताकी प्राप्तिके हेतु भी मुख्य कारण थे, इसलिये वह तुरन्त कंठस्थ कर लिये गये थे, और नित्य प्रति पूजापाठमें उनका व्यवहार रहस्यमयी शिक्षामें लवलीन ऋषि कवियों द्वारा होता था। समय के साथ उनकी प्रतिष्ठाके बढ़ते रहनेसे कुछ काल पश्चात् वह श्रुतिकी भांति पूर्णतया पूज्य माने गये और रहस्यवादको उल्झन में पड़ कर हर्ष माननेवाली रुमान (बुद्धि ) के द्वारा उनमे सव प्रकारके अद्भुत गुण माने गये। इस कारण पश्चातके लोगों ने उन मंत्रोंको, उनके भावार्थको, पूर्णतया न समझे हुये भी भाक्तपूर्वक स्वीकार किया, और इनको अपने धर्मका ईश्वरीय प्रमाण माना । ईश्वरकृत शास्त्रकी भांति कायम होकर पूज्य मन्त्रों का संग्रह रहस्यवादका भाधार हो गया और समय २ पर उसमें हेर फेर और वृद्धि हुई। सबसे पहली वृद्धि जो उसमें

( ३६ )
की गई, वह सब संबंध रखनेवालोके लिये किसी बुरे प्रभाव*
वश हुई, क्योंकि जय कि उसका फल उन निरपराध प्राणियों
के लिये, जिनका वलिदान देवताघो को देना उस समय नियत
हुमा, दुख और कष्ट था। उमने धलि चढ़ानेवाले और उन
सबको जो धर्मके नाम पर प्राणिघात करने में तत्पर हुये, दुर्गति
और नरकगामी ठहराया, और अन्नतः असली और सत्यवेद
पो प्रतिष्ठाको भी गौरवहीन कर दिया।
लेकिन अधिक समझयाले मनुष्य शीघ्र ही इस बातको
आन गये कि नलिदानका प्रभाव वास्तविक नहीं वरन् असत्य
है, और उन्होंने इस वातको निश्चित कर लिया कि रक्तका
बहाना नपनी या बलि-प्राणीको मुचिका कारण कभी नहीं हो
सक्ता । परन्तु इस प्रथाको जड़े फैल गई थी और एक दिन में
नष्ट नहीं हो सक्ती थों। यह बहुत समय व्यतीत हो जानेके
पश्चात् हुमा कि बलिदानकी प्रथाके विरोधमें जो लहर उठी थी
उसमें इतनी शक्ति पैदा हो गई कि शास्त्रीय लेखका बदलना
प्रावश्यकाय समझा गया। लेशिन यह कोई सहज वात नहीं थी
क्योंझियदि हम एकश्लोकके वारेमें भीशास्त्रीय अखण्ड सत्यताको
अस्वीकार कर दें तो रहस्यवादके सिद्धान्तोकी, जिनकी श्राझाका
प्रभाव ईश्वरीय वाक्य पर निर्भर है, नीव विल्कुल खोखती हो
जाती है। इसलिये वेदों में कांट छांट करना असम्भव था, और
* देसो फुट नोट न १ पुस्तकके भाखीरमें ।

( ३७ ) चुद्धिमान सुधारकको चिन्हबादकी, जो कांट छोटको छोड़ कर एक ही उपाय ईश्वरीय प्रमाण संबंधी आशामे सुधार करनेका है सहायता लेनी पड़ी। चुनांचे एक चिन्हाधिन यानी भावार्थका श्राधार वेदवाक्यके अर्थके हेतु ढूढ़ा गया, और मुख्य जातिके चलि पशुओंके लक्षणों और उनके नामोंका युक्तिक मावोंके गुप्तार्थ कायम करनेके लिये प्रयोग किया गया। इस प्रकार मेढ़ा, वकरा, व सांड जो बनि पशुप्रो नीन मुख्य जातिके जीव हैं, आत्माकी कुछ घातक शक्तियोंके, जिनका नाश करना आत्मिक शुद्धताको वृद्धि व मोक्षके हेतु प्रारभ्यकीय है, चिन्ह ठहराये गय । यह युक्ति सफल हुई, क्योकि एक थोर तो उसने वेदोंकी आज्ञाको ईश्वरीय पाक्यकी भांति अखरिडत छोडा और दूसरी ओर वलिदानको अमानुपिक प्रथाको बन्द कर दिया और मनुष्यों के विचारोंको इस विषयमें लत्य मार्गकी अोर लगा दिया। लेनिन पायके वीजम जी बोया गया था इतना अधिक फूटकर फैलने शक्ति थी कि वह वलिदान सिद्धान्तके भावार्थ के बदल जानेसे नष्ट न हो सकी। क्योकि तमाम गुप्त शिक्षावाले मोने, जो जान पडता है कि धार्मिक विषयों में सदैव भारतवर्ष में उपस्थित रहस्यवादी मूल शिक्षा पर चलते थे, (यहा उस समय भारतवर्षकी सीमायें कितनी क्यो न हों) वलिके खून * देखो 'दि की आफ नालेज' अध्याय आठ ८ देखो दि फाउटेन ह्यड औफ क्लिीनन वा गंगाप्रसाद एम. ए. कृत ।

(३८ ) द्वारा स्वर्गम जा पहुंचनेकी नवीन पृथाको स्वीकार कर लिया था और वह सहजमेंही एक ऐसी रीतिके छोड़नेके लिये, जिसमें उनको प्रिय भोजन अर्थात् जानवरोका मांस खानेकी करीब २ माफ तौरसे माता थी, प्रस्तुत नहीं किये जा सके। इस समय हमारे लिये जव कि इतना दीर्घकाल गुजर चुका है, यह सदैव असम्भव नहीं है कि हम प्रवृत्ति और निवृत्तिकी लहरोंका, जो हिन्दुओके विचारों के परिवर्तनसे वाय संसारमें उत्पन्न हुई, पता लगा सकें, परन्तु यह भी नहीं है कि हमारे पास वास्तव में उसके सदृश कोई सबल उदाहरण न हो। यह उदाहरण यह- दियोके मतकी शिक्षामें पाया जाता है जिसके बलिदान संबंधी विचारोंमें जान पड़ता है कि हिन्दुओके भांति परिवर्तन हुये। १ सैमवेल अध्याय १५ श्रायात २२: "क्या खुदावन्दको सोखतनी कुरवानियो और जवीहों में उतनी ही खुशी होती है जितनी कि खुदावन्दकी आवाजकी सुनवाईमे ? देख ! प्राशा पालन करना वलिदान करनेसे अच्छा है और शुनवा होना मेंढोंकी चरवीसे।" एक प्रचलित रीतिका प्रवल खंडन शास्त्रके भावार्थके बदलनेका प्रयत इस वाक्यसे स्पष्ट हो जाता है:- "मैं तेरे घरसे कोई वैल नहीं लूंगा और न तेरे वाडेमेंसे चकरा......... अगर मैं भूखा होता तो तुझसे न कहता ... ......क्या मैं बैलोंका मांस खाऊंगा और चकरोंका खून 'पीऊंगा? ईश्वरको धन्यवाद दे और अपने प्राणोंको परमा- - (३९) स्माके समक्ष पूरा कर" (जदूर ५. आयात ६ ता २५ ) जरोमिया नवो इस विचारकी और पुष्टि करता है और इस प्रकार ईश्वरीय वाक्य घतलाता है कि:- ....... मैंने तुम्हारे पुरुषाओंको नहीं कहा, न उनको आशा दी भुनी हुई बलि और जवीहोके लिये, परन्तु इस बातकी मैंने उनको आशा दी कि मेरी वातको सुनो...... और तुम उन सव रीतियों पर चलो जो कि मैंने तुमको बतलायी है ताकि तुम्हारे लिये लाभदायक हो" (जरीमिया नवीकी किताव अध्याय ७ श्रायात २१ ता २३)। इन वाक्योंमें हिन्दूमतके परिवर्तनसे इतनी गहरी सहशता पाई जाती है कि यह आकस्मिक बात नहीं हो सकती और इस में उसी कर्ताका हाथ पाया जाता है जिसको प्रोफेसर ड्वाय- स्सनने वृहदारण्यको बलिदान सिद्धांतको धार्मिक भावमें परि- घर्तन करते हुये पाया ( देखो दी सिस्टम श्राफ घेदान्त पृष्ठ ८) परन्तु यह कुरीति अव तक चली आई है। परिणाम यह है कि हिन्दूमत अपनी ही सन्तानको जिसका एक दूरके देशमें पालन पोषण दुपा है अपने ही सन्मुख उपस्थित और अपनी प्राक्षाका उल्लंघन करते हुये पाता है, और अपने ही शास्त्रोको गोमेधके विषयमें जो अव पूर्णतया घृणित हो गया है अपने विरोधियों के सिद्धांतोकी पुष्टि करते हुये पाता है। कुछ थोड़ा समय हुप्रा स्वामी दयानन्द सरस्वती संस्थापक आर्यसमाजने जो ज्याक. रणके मच्छे शाता थे, इस बातसे एककलम (एकदम ) इन्कार (४०) करके कि वेदोंमें पशु वधका वर्णन है और योरुपियन विद्वानों के अनुवादोंकी सत्यताको भी अस्वीकार करके इस कठिनाईसे वचना चाहा। परन्तु इस प्रकारकाप्रयत्न स्वयम् साती देनेवाली वातोकी उपस्थितिमें कारगर नहीं हुआ करता है। प्राचीन प्रचलित रीति रिवाज स्वयं इस यातका प्रमाण है कि वेदोंके अनुयायो बलिदान करते थे। प्राज भी उन वर्णके हिन्दू पाये नाते है जो पशुप्रोंका बलिदान करते हैं और जिनमे ब्राह्मण यज्ञ करनेवाले ( होता ) होते है। यह बात खुल्लमखुल्ला शाक भोजी मतमे सहन नहीं की जा सकती पोर इस अमरको सिद्ध करती है कि वर्तमान समयले पूर्वकालमें बलिदानकी रस्म अधिक प्रचलित थी। हिन्दूश्रो ओर ब्राह्मगोंमें मांस का खाना कोई असाधारण बात नहीं है, और वह स्वतः ही प्रामाणिक वान है । यह बात नहीं है कि वह लोग मासको छिपा कर खाते है, वरन् जो उसको खाते हैं, वह उसके खाने के कारण किसी अशमे भी अन्य हिन्दुधोंले कम नहीं नमके शाते है, गोकि वहुतमे उसको अपनी इच्छा नहीं भी खाते हैं। इस प्रकार गत समयमें सर्व साधारणके मोज्यके तौर पर मांसका स्वीकार किया जाना असम्भव था। मुख्यतया सदाचारके नियमोके कडे पालन और सब प्रकारके हिन्दुरोके जाति व्यवहार के लिहाजसे सिवाय उस हालतके कि वह किसी पूज्य माता द्वारा जो यज्ञशास्त्रोंके अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकतो, प्रचलित किया गया हो। हम इसलिये नतीजा निकालते हैं कि मार्य- ( ४१ ) समाजका निर्वाचित भयं वेदोंका सचा अर्थ नहीं है। जहां तक कि अंग्रेजी अनुवादोंका संवन्ध है यह करीन कयास नहीं है कि चह विस्कुल ही असत्य हों, कारगा कि वे भी प्रसिद्ध हिन्दु वृत्तिकारो आधार पर बने हैं और न सर्व साधारण हिन्दुअोंने ही उनको असत्य माना है हिन्दूमत के विकामनो घोर ध्यान देते हुये हमारे निगायोंकी शुद्धता प्रत्येक व्यक्तिको विदित हो जावेगी जो निम्नलिखित वाक्यों पर पूरी तरहसे विचार करेगा। (१) शामे वेढ पशु व पुरुष बलिदानका प्रचार करने हैं । (२) हिन्दू लोग अव गऊ और मनुष्यके वलिदानके सख्न विरोधी है जो दोनों उनके पूज्य शास्त्रोंन गोमेध व पुरुषमेधक पवित्र नामोंसे प्रसिद्ध हैं। (३) अश्वमेध अब विन्फुल बन्द हो गया है और श्रज- मेधका भी यही हाल है गोफि वरेका मांस अर मी कुछ मूढ़ विश्वासी मनुष्यो द्वारा देवी देवताओंके प्रमन्नार्थ अर्माण किया जाता है। (४) यासंबन्धी मन अभी तक हिन्दू शास्त्रोंमे शामिल है गोकि यह साफ है कि उनका भाव शदान वटल कर भावार्थ में लगा दिया गया है। देखो फुट नोट नं. २ पुस्तक अतमें। देखो फुट नोट नं. ३ पुस्तककै अतमें।

। ४२ )
(५) इन मंत्रोकी भाषा किसी सिद्ध भगवान (श्वर)
कृत नहीं हो सकती और न शुद्धाहारी (शाकमती ) ऋषियों की
हो सकती है क्योंकि अग्रिम (ईश्वर) तो किसी पापमयी प्रथा
की स्पष्ट या अस्पष्ट तौरसे पुष्टि नहीं करेगा और न मममंडालने
वाली भाषाका प्रयोग करेगा और अन्तिम मांस और रकके
अलंकारोकी रचना कभी नहीं करेंगे।
इन वाक्योंके साथ यह वातमी ध्यान रखनी चाहिये कि
वेदोंकी भापाका अर्थ इसी प्रकार समझमें पा सका है कि उसके
शब्दोके चाहा अर्थके नीचे छिपा हुआ एक गुप्त ज्ञानका
सिद्धान्त माना जावे, गोकि हम तमाम रूपक अलङ्कारोंके भावको
जिनका ऋपियोंने पविन मन्त्रोमें प्रयोग किया है, न समझ
पावें । बहुनसे रूपक तो पुराणों में दिये हुरहवा तोंकी सहायतासे
समझमें आ जाते है, और यद्यपि किसी पश्चात्के प्रन्य
की व्याख्याओंका उसमे पहिलो ग्रन्थमे पढ़ना न्यायसंगत
नहीं है तथापि इस वातसे इनकार नहीं किया जा सकता है
कि पुराणोंकी कथायें वेदोके देवी देवतामोका सुविस्तर वर्णम
* देखो.
"जैसा कि निम्न लेखसे विदित है, पुराणोको भी..."यथार्यमें वेदों
से पूर्वका कहा जा सका है:-
प्रथम सर्वशास्त्राणा पुराणं ब्रह्मणा श्रुतम् ,
अनन्तरं च वक्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिमुनाः ।
अगानि धर्मशास्त्रं च व्रतानि नियमास्तथा ॥
ब्रह्माण्डपुगणम् ॥"

(४३) है। यह बात भी ध्यानमें रखने के योग्य है कि इन्द्र वरुण आदिक वैदिक देवताजोंकी पूजाका बन्द हो जाना इसकी दलील है कि यह लोगोको उनके मुख्य स्वरूपके पता लग जानेके कारण हुप्रा. इसलिये जब लोगोंको यह मालूम होगया कि वह केवल मानसिक कल्पनाके व्यक्तिगत रूपक हैं तो उन्होंने उस पूजा- को जो उनके प्रसन्नार्थ किया करते थे, बन्द कर दिया । अनु- मानतः वेदोंके और वैदिक देवताओंके गुप्तार्थकी फुजी कमी बिल्कुल नष्ट नहीं हो गई थी, सेवक गण, साधारण ब्राह्मगा और साधु भी चाहे कितने ही उससे अनभित्र क्यों न रहे हों। बुद्धि- मत्ताकीलहरके अन्तमें जो ब्राह्मणोंके समयके वलिदानकी निवृ. त्तिके पश्चात् उठी, मालूम होता है इस कुञ्जीका बहुत अधिक प्रयोग किया गया । इस प्रकार महाभारत और रामायण की पद्यों और पुराणोंके रचे जानेके समयमें देवी देवना- ओंका एक बड़ा समूह जिसकी संख्या ३३ करोड है उम प्रार- म्भिक ओर सीमित देवी देवताओं के कुटुम्बमें से जिनका वर्णन है, वेदोमे है, निकल पड़ा । इनके अतिरिक्त कुछ और काल्पनिक व्यक्तियो जैसे कृष्णकीरचनाभी हिंदू पुराणों के रचयि- । - (दि परमानेन्ट हिस्ट्री ओफ भारतवर्ष जिल्द ; २. पृ.८ ) अर्थ:-"ब्रह्माने सव शास्त्रोंमें सबसे पहिले पुराणको सुनाया और तत्पश्चात् उनके मुखसे वेद, अग, धर्म, शास्त्र, प्रत और नियम निकते।"

(४४)
तामोंने रच डाली। मगर यह कहना न्याययुक्त होगा कि
यद्यपि रामायण, महाभारत और पुराणोंने सच्चे ऐतिहासिक
'घटनाओंका रहस्यपूर्ण और मनंकृत * पोशाक पहना कर
इतिहांसमें बडी गडबड उत्पन्न कर दो तो भी उसके साथ
ही उन्होंने अपने देवताओं के कल्पितस्वरूपको दिखा कर
धार्मिक उपासनामें बहुत कुछ सुधार किया ! यद्यपि यह
सुधार निस्सन्देह गम्भीर था तथापि यह अपने उद्देश्यकी
पूर्तिमें असफल रहा, क्योकि केवल कल्पित देवतासमूहकी
रवानगीने अर्ध काल्पनिक अर्ध ऐतिहासिक व्यक्तियोगी पूजा.
के लिये द्वार खोल दिया, और साथमे ही कुछ नबीम समय
के मगर प्राचीन प्रकारके देवतागण भी पूजा और प्रतिष्ठाक
"पात्र माने गये।
राम और कृष्ण प्रथम प्रकारके और निव
पिछले प्रकारके देवता है। इनमें से वेटोमे किलीका भी वर्णन
नहीं है जो एक ऐसी बात है जिससे योरुपियन समालोचकों
की इस रायकी पुष्टि होती है कि हिन्दुओंने अपने देवताओ
को बदल दिया है। मगर इस दोपके हिन्दू इतने अपराधी
नहीं है जितमा वह रहस्यवाटका रुझान है जो उनके मतमें
व्याप्त है क्योंकि जहाँ कुल धर्म शिक्षा ऐसी भाषामें दी गई है
लिजिसका शब्दार्थ तो कुछ और है और भावार्य कुछ और ही
"है, वहां मनुष्य चक्कर में पड सक्ते है और क्षमाके पात्र हैं अगर
उनसे भूल हो जावे। उपनिषदोंने इस रहस्य व अन्धकारमई
* देखो फुट वोट नं. ४ पुस्तकके अन्तमें।

(४५)
अनिश्चितपनको अपने धर्मसे दूर करनेकी कोशिश की और
अशान और मिथ्या विश्वासके अन्ध पोंको बहुत कुछ तोड़ा,
परन्तु बुद्धिमत्ताकी मशाल, जिसको उन्होंने प्रज्वलित किया-
उसकी प्रभा, मालूम होता है कि केवल टिमटिमाइटके तौर
पर ही रही। उपनिषद भी गुप्त चिन्हवादसे विल्कुन्त वञ्चित
नहीं है और उनका प्रकाश न तो उन मतके सर्व अन्धेरे
में ही पहुंचता है और न वह सदैव अन्धकारसे भिन्न ही
पाया जाता है । षट् प्रसिद्ध दर्शन भी नो उपनिषदोंके कालके
पश्चात् पने, परस्पर एक दूसरेके खरासन करने में ही अपनी
शक्तिको नष्ट कर देते हैं और संसारसम्बन्धी वातोंकी
मुख्तलिफ और मुखालिफ व्याख्या करते हैं । केवल एक बात,
जिसमें वह सब सहमत है, वेदोकी ईश्वकृत होनेके कारण
अखण्ड सत्यता है । इस प्रकार अपने रहस्यवाए शास्त्रको
ईश्वरकृत मान लेनेसे खोजके विशालक्षेत्रसे यञ्चित रहने
और दृरिक्षेत्रके संकुचित होनेके कारण वह सत्य दार्शनिक
नयवादको भी न समझ सके और एफरुखो एकान्तवादके
जालमे फंस गये जो असावधानोंको फंसानेके लिये तैयार
रहता है।
इसका परिणाम यह हुआ कि मानय कामों
और कठिनाइयोंके दूर करनेके स्थानमें जो तत्व भानका सञ्चा
उद्देश्य है उन्होंने अपने ही धर्मको पहिलेसे अधिक अनिश्चित
* देखो किताबके भंतमें फुट नोट नं. ५।

(४६) बना दिया, और उनका वास्तविक उपयोग उस व्यर्थ वाद- विवाद पर सीमित है जो वेदोंके अनुयाइयों में बरावर जारी है। सत्य यह है कि एक पूर्व स्थापित वैज्ञानिक धर्मसे जन्म पानेके पश्चात् ऋग्वेदके रहस्यपूर्ण काव्यमें, जो आधुनिक धमकी नीव है, भूत कालमें इतनी वृद्धियां व तब्दीलियां हुई हैं कि लोग उसकी इन्तदाको भूल गये हैं जिनमेंसे एक फिर्के को जो आज कल विद्या कोर्तिके पात्र हो रहे हैं, उसमें एक वानर जातिसे विकसित मस्तिष्कके विचारोके सिवाय और कुछ नहीं देखता है और दूसरेको जो धर्मके अंधश्रद्धानी है हरएक अक्षर और शब्दमें ईश्वरीय वाक्य हो दिखाई देता है। अगर वह परिणाम जो इन पृष्टोमें निकाला गया है, सही है तो इन दोनों विचारोंमसे कोई भी सत्य नहीं है, क्योंकि ऋषि कवि शिक्षित बालक न थे, जैसा कि वे समझे जाते हैं, और न वह किसी दैवी वाणीसे उत्तेजित ही थे। जन्मसे ही हिन्दू धर्म जैनधर्मकी एक शाखा थी, गोकि उसने अपने आपको शीघ्र ही एक स्वतन्त्र धर्मके रूपमें स्थापित कर लिया। समयके व्यतीत होने पर वह किसी राक्षमी प्रभावमें आगया। जिसका 'विरोधीप्रान्दोलन उपनिषदोकी बुद्धिमत्ता और जगत प्रसिद्ध दर्शनों, न्याय, वेदांत श्रादिकी कलि व कालका लक्ष्य है। अपने श्रापको एक स्वतन्त्रमत स्थापित कर देनेके कारण स्वाभाविकही वह जैन मतको अपना विरोधी समझने पर वाध्य हुआ, और दर्शनोंमेंसे कुछमें जैन सिद्धान्तके खण्डनार्थ सूत्र भी लिखे गये हैं, यद्यपि (४७) लिस वस्तुका वह वाकई खण्डन करते है वह वास्तवमें जैन सि. द्वान्त नहीं है जैसा कि जैनी लोग समझते हैं बल्कि स्वयं उन- की मनमानी कल्पनायें है जो जैनमतके घारेमें उन्होंने गढ़ की है। इम इस प्रकार यह परिणाम निकालते हैं कि दोनो थर्मा में अधिक प्राचीनताका प्रश्न जैनमतके हफमें फैसला होना चाहिये, और यह कि पूज्य तीर्थंकरोंका मत हिन्दु मतकी पुत्री या झगड़ालू संतान होनेके बजाय वास्तवमें स्वयं उन निस्स. * यह आशका कि वेदोंकी भाषा जैन शास्त्रोंकी मापासे शताब्दियों पहिलेकी जान पटती है, व्यर्थ हैं क्योंकि प्राचीन काल में मनुष्य अपने शास्त्रोंको कण्ठस्थ करके सुरक्षित रखते थे। जैनमत और हिन्दू मतके शास्त्र भी प्रथम इसी विधिसे सुरक्षित थे. और लेखनकलाका प्रयोग अभी कुछ काल पूर्वके ऐतिहासिक समयमें हुआ है परतु वेद कवितामें लिखे गये है जिसका अभिप्राय यह है कि वेदोंकी भाषा सदैवके लिये नियत हो गई, जिसमें परिवर्तन नहीं हो सकता इसलिये वे सदैव अपने रचनेके समयको ही दर्शायेंगे । विला लिहाज इस अमरको, वह कर लिखे जायें । यह पात जैनमतमें नहीं पाई जाती है, जिसके शास्त्रोंकी भाषा सदैवके लिये नियत नहीं है। अतएव जिस मापा जैनतिद्धात लिये गये हैं वह वही भाषा है जो उनके लेखनसमयमें प्रचलित श्री। जैनमतके सम्बध में भाषाकी जांच इस कारण असफल होती है और उसकी प्राचीमताका अनुमान विपक्षी धोके शास्त्रोंकी आंतरिक साक्षी द्वारा ही हो सका है।

(४८) देह प्राचीन धर्मका प्राधार है । खुलासा यह है कि हिंदू धर्म अपनी उत्पत्ति के लिये उन तीन कुशलताबाले कवियोका कृतज्ञ है जिन्होंने अपनी अपरिमित उत्तेजना जागमे प्रात्मा की अप्रगट और दैवी शक्तियोको काव्यविचारमें व्यक्तिगत चांधा। यह वहशी न थे और न उनके लेखोंमें कोई पेनी शानल्य या वहशियाना बेअलीकी बात पाई जाती है जि- सके कारण यह कहा जासके कि उस समयके मनुष्य अशो वधापनमें मुन्तिला थे। इसके विपरीत उनका बान जेनमत के अखण्ड सिद्धान्त पर निर्भर था जो तीर्थकरों से निकली हुई शुतिके श्राधार पर स्थापित है। समयकी गतिने माता और पुत्रीमें पूरा वियोग पदा कर दिया। पोर पुत्रो पचात् को दुष्टोंके हाथमें पड़ गई। उसका परिणाम नाना प्रकारको पापकी संतान (योंकी रीति) हुए जिप्तको उपने किमी भया- नक प्रभावके कारण जना । इसके बाद वह उपनिपट के रचनेवाले ऋषियोंकी रक्षामें जगजोंको तनहाई में पश्चात्ताप करती हुई मिलती है, और फिर इसके बाद हम उसको बुद्धिमत्ताके विश्वविद्यालयमें अपने ये नये और मुख्तलिफ़ मगर Ill fitting (अयोग्य ) गौनो (चीरों) को सम्भालते हुए पाते हैं । और अब जब कि आधुनिक खोजको X-ray अप्रवल बुद्धिमत्ता उमके निहायत अमूल्य और मनभावने प्राभूषणोंको प्रारम्भिक मनुष्य के हनुमान * जातिसे निकलनेके *'संसारकी प्रहेलिका विकासवादियोंको सदैव उस समय तक हतो- ( ४९ ) थोड़े ही पश्चात्का काम सावित कर रही है तो वह अपने उस त्साह करेगी जब तक कि वे आत्माकी जो अपने स्वभावसे सर्वज्ञ है, जैसा कि "फी आफ नॉलेज" और "साइन्स आफ थोट में पूर्ण रीतिसे सावित किया गया है शक्तियों और गुणों के स्वरूपका यथोचित ज्ञान प्राप्त न फर लें। इस सम्पूर्ण ज्ञानकी शक्तिको स्वयं पूरे तौरसे अनुभवमें प्रगट करने के लिये किसी वस्तुको बाहरसे प्राप्त करने की भावश्यकता नहीं है, किन्तु केवल उस वाह्य पुद्गलके अंशको जो आत्माके साथ लगा हुआ है, दूर करनेकी है। इस प्रकार जितना ही सादा ( वैराग्यरूप ) जीवन होगा, उतने ही अधिक उच प्रकार के ज्ञानकी प्राप्तिके अवसर मिलेंगे। इसलिये हमारे पूर्वज जिनका जीवन बहुत सादा था और जिनके विचार बहुत उन थे सची बुद्धिमत्ता प्राप्त करनेके हेतु उससे अधिक योग्य थे जसा उनकी वर्तमान समय दूरको सतान ख्याल करती है। यह बात कि वास्तवमें भी यही हाल है, प्राचीन कथाओं (पुराणों आदिसे ) सिद्ध है, जिसका अनुमोदन सामान्य रूपसे धर्मसबंधी विचारों और विशेष रूपसे जनसिद्धातकी अद्भुत पूर्णताकी आतरिक सालीसे होता है । इस प्रकार विरित होगा के अपने अधिकतर वैज्ञानिक गुणों से अपने पूर्वजोंको चकाचौंध कर देनेकी बजाय हमने उनको छोदी हुई शिक्षानिधिको भी बहुत कुछ नष्ट कर दिया है और अब गर्व करनेके लिये हमारे पास परिवर्तन शील फैशनों और कार्य-होन पौद्गलिकताके अतिरिक्त नहीं है। नि:सदेह यह उन्नति और विकाशके मार्गकी ओर चलना नहीं हैं परंतु इसके विपरीत पथपर पग धरना है।

। ५० )
भूले हुए भूत कालको जिसके कारण उसको बहुत दुःख
मिला है फिर स्मरण करनेकी चेष्टा कर रही है । स्वयम्
एक सर्व विख्यात माताको संतान होनेके कारण हम उसको
अपने पिछले ममयके, जब कि उसके बडे प्रशंसक कवि उस
की तत्व शिक्षाके भावोको पालंकारिक माषामें परिवर्तन करके
सहज बना दिया करते थे, कुछ कुछ सुमिरन करनेसे हर्षसे
प्रफुल्लित होते हुए ध्यान कर सक्त है । उसकी माता अब भी
उसे हाथ पसारे हुए वापस लेनेको प्रस्तुत है, और यद्यपि
घह श्रव वृद्धा हो गई है तथापि वह प्रेम और क्षमासे आज भी
वसी ही पूर्ण है जैसी कि वह सदैव रही है । निस्सन्देह वह
एक शुभ समय होगा जब कि हिंदू और जैनधर्मका पारस्प.
परिक संबंध पूर्णतया जान लिया जावेगा, और आशा है कि
माता और पुत्रीका शुभसम्मेलन सव सम्वन्धियोंको शान्ति
और आनन्द प्रदान करेगा।
पति

( ५१ )
फुट नोट नम्बर १
इस क्रूरताके नवीन परिवर्तनका निन्न वृत्तान्त जन पुराणों
की सहायतासे इस प्रकार पाया जाता है।
एक समय राजा वसुके राजमें जिसको बहुत काल ध्यतीत
हुआ एक शख्स नारद और उसके गुरु भाई परबतमें 'राज'
के अर्थ पर जिसका प्रयोग देव-पूजामें होता था, विवाद
हुआ। इस शब्दके वर्तमान समयमें दो अर्थ हैं, एक नो तीन
वर्षके पुराने धान जिनमें ग्रंखुया (अंकुरा ) नहीं निकल
सक्ता है और दूमरा 'वकरा'। पर्वतने, जो अनुमानतः मांस
भक्षणका विलासी था इस बात पर जोर दिया कि इस शब्द
का अर्थ बकरा ही है, मगर नारदने पुराने अर्थको पुष्टि की ।
सर्व जनताकी सम्मति, सनातन रीति और प्रतिवादीकी
युक्तियोंसे परवतकी पराजय हुई, मगर उसने राजाके समक्ष
इस घटनाको उपस्थित किया, जो स्वयम् उसके पिताका शिष्य
था। राजाकी सम्मति परवतके अनुकूल प्राप्त करनेके हेतु परव.
-तकी मा छिप कर महलोंमें गई और उससे अपने पतिकी
गुरुदक्षिणा मांगी और इस पातकी इच्छुक हुई कि मुंह-मांगा
पर पावे। धसुने, जिसको इस वातका क्या गुमग्न हो सकता
था कि उससे क्या मांगा जायगा, अपना पचन दे दिया।
तव परवतकी माने उसको पतलाया कि वह परवतके अनुकूल
फैसला करे और यद्यपि वसुने अपनी प्रतिक्षासे हटनेका प्रयत्न
किया। मगर पर्वतकी माने उसको ऐसा करनेसे रोका और

( ५२ ) प्रतिक्षासे न हटने दिया। दूसरे दिन मामला राजाके सामने उपस्थित हुआ जिसने अपनी सम्मति परवतके अनुकूल दी। इस पर वसु मार डाला गया और परवत राजधानीसे दुर्गतिके साथ निकाल दिया गया। परन्तु उसने अपनी शक्ति भर अपनी शिक्षाके फलानेका प्रणा कर लिया। पर्वत अभी सोच ही रहा था कि उसको क्या करना चाहिये कि इतनेमे एक पिशाच पातालले ब्राह्मगा ऋषिका भेप बना कर उस के पास आया। यह पिशाच, जिसने अपना सांडिल्य मृपिके तौर पर परवतको परिचय दिया। अपने पूर्व जन्ममें मधुपिङ्गल नामी गजकुमार हुआ था जो अपने वैरी ( रकी) द्वारा धोखा खाकर अपनी भावी स्त्रीसे वञ्चित रक्खा गया था। इसका विवरण यो है कि मधुपिंगलको राजकुमारी सुस्साके स्वयम्बर वरमाला द्वारा स्वीकार किये जानेका पूरा मौका था क्योकि उसकी माने उसको पहले निजी तौरसे स्वीकार कर लिया था। उसके कीव सगरको इस गुप्त प्रवन्धका हाल मालूम हो गया और सुल्साके प्रेममें अन्धा होकर उसने अपने मंत्रीसे इस बात की इच्छा प्रगट की कि वह कोई यत्त राजकुमारीकी प्राप्तिका करे। इस दुष्ट मंत्रीने एक बनावटी सामुद्रिक शास्त्र रचा और उसको गुप्त रीतिले स्वयम्बर मण्डपके नीचे गाड दिया और जब स्वयम्बरमें आये हुये राजकुमारोंने अपने अपने प्रासन ग्रहण कर लिये तो उसने छलपूर्वक ज्योतिष द्वारा एक प्राचीन शास्त्रका स्वयम्घरके मण्डपके नीचे गड़ा होना बतलाया। किस्ता मुख्त- में

(५३)
सर जाली दस्तावेज खोद कर निकाला गया और समाने मंत्री
से उसके पढ़ने का अनुरोध किया।
उसने शास्त्र पढ़ना प्रारम्भ किया और शीघ्र ही आखोके
वर्णन पर पाया जिसके कारण मधुपिङ्गल विशेषतया प्रसिद्ध
था बड़े हर्प सहित मधुपिङ्गलके उस शत्रुने बनावटी सामुद्रिक
शास्त्र के एक एक शब्दको, जिसमें मधुपिंगलके ऐसी आंखोकी
चुराई की गई थी, जोर दे दे कर पढ़ा, कि वह दुर्भाग्यकी सूचक
होनी है और उनका स्वामी कमहीन, अभागा, मित्र ओर कुटु
स्त्रियों के लिये अशुभ है। वेचारे मधुपिंगलके आंसू निकल
छाये और वह सभासे उठ गया। इस कपट-क्रियाके द्वारा
परास्त, दुःखित और लजित हो कर उसने अपने कपड़े फाड़
डाले और संसारको त्याग सन्यासीका जीवन व्यतीत करना
आरम्भ किया । इस समय सुसाने स्वयम्बरमें प्रवेश किया
और सगरको अपना पति स्वीकार किया।
इसके कुछ काल पश्चात् मधुपिंगलने एक सामुद्रिक
जानकारसे सुना कि उसके साथ छल किया गया और
धोखा हुआ तथा अन्याय युक्त विधियोंसे- उसको भावी
स्त्रीसे उसको प्रथक् किया गया। उसने उसी क्रोधकी हालतमें
जो धोखेके हालके खुल जानेसे उत्पन्न हुआ था, अपने प्राण तज
दिये । मरकर वह पातालमें पिशाच योनिमें उत्पन्न हुआ जहाँ
उसको अपने पूर्व जन्मके धोखा खानेका वोध हो गया और
यह वहांसे अपने शत्रुमोसे बदला लेनेको चला। वह तुरन्त

(५४)
मनुष्योंके देशमें आया और परवतसे उस समय उसका समागम
हुआ जब कि वह वसुके राज्यसे निकाला गया था और सोच
विचारमें था कि वह 'ज' शब्दके अपने (नवीन)अर्थको
किस प्रकार संसारमें फैलावे । उसने परवनको अपने शत्रुसे
बदला लेने में योग्य और प्रस्तुत सहायक जानकर उसके दुष्ट
कार्यकी पूर्तिमें सहायता देने को प्रतिज्ञा की ,मनुष्य और पिशाच
की इस अशुभ प्रतिज्ञाके अनुसार यह निश्चय हुआ कि परवा
सगरके नगरको जाय जहां पर महाकाल ( यह उस पिशाचका
वास्तविक नाम था) सब प्रकारके ववा (रोग) और मरी
फैलायेगा जो पर्वतके उपायोसे दूर हो जायेंगी ताकि इस
प्रकार परवतकी प्रतिष्ठा वहांके लोगोकी निगाहमें हो जाय जिन
में वह अपने भावोंका प्रचार करना चाहता था। पिशाचने
अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और परवनने समस्त प्राणियोको बुरे बुरे
रोगोंमें ग्रसित पाया जिनका वह मन्त्रों द्वारा सफलता पूर्वक
इलाज करने लगा। परन्तु उस अभागे राज्यमें हर रोगकी
जगह पर जो अच्छा हो जाता था, दो नये और रोग उत्पन्न हो
जाते थे। यहां तक कि लोगोंको इस बातका विश्वास हो गया
कि उन पर देवताओंका कोप है और उन्होने परवतसे, जिसको
वह अब अपना मुख्य रक्षक समझने लगे थे, इस बारे में सम्मति ली।
इस प्रकार कुछ समय व्यतीत हो गया और अन्तमें यह विचारा
गया कि अब वलिदानको नवीन प्रथाके प्रारम्भके लिये समय
अनुकूल है । आरम्भ काल में प्राणियोके बलिदान की 'सख्त
.
-
।

विरोध हुआ, परन्तु वहुत काल तक मेले हुये असा दुःखो और पर्वतकी अतुल प्रतिष्ठाने जो पूजाके दर्जे तक पहुंच गई थी, और मुख्यतः उस श्रद्धाने जो उसकी अद्भुत शक्तिके कारण लोगोंमें उत्पन्न हो गई थी और जो वास्तवमै उसकी कार्य सफलताके अनुभव पर निर्धारित थी, मन्द साहसवाले हृदयोंको उसको आज्ञापालनक लिए प्रस्तुत कर दिया। सबसे पहले मांस याज़ वाज़ रोगोंमे दवाईक तौर पर दिया गया और वह कभी आशाजनक परिणामके उत्पन्न करने में निष्फल नहीं हुआ। जिस पातको परवत वादविवादसे साबित नहीं कर पाया था उसीको वह अपने पिशाच मित्रकी सहायतासे इस कार्य परिगित युक्ति द्वारा साबित करने में फलीभूत हुआ। धीरे धीरे उसके शिष्योंकी संख्या वरावर बढ़ती गई। यहा तक कि परक्त के इस घातके विश्वास दिलाने पर कि वलिसे पशुको कष्ट नहीं होता है वरन् वह सीधा स्वर्गको पहुंच जाता है, 'श्रज'-मेध (यक्ष) किया गयो । यहां भी महाकालको शक्तियो पर भरोसा किया गया था जो कार्य हीन नहीं हुई, क्योंकि ज्यो ही वलिपशुने पवित्रं छुरीके नीचे तड़पना व कराहना प्रारम्भ किया, त्योही महा. कालने अपनी माया-शक्तिसे एक विमानमें एक बकरेको हर्पित वा प्रसन्न स्वर्गसी और जाते हुये बना कर दिखा दिया। सगरके राज्यके बुद्धि भ्रष्ट लोगोंको विश्वास दिलानेके लिये पर किसी चीजकी आवश्यकता नहीं रह गई । श्रज मेधके पश्चात् गौमेय हुना, गोमेधके शद अश्वमेध और अन्ततः पुरयमेध भी बडे

( ५६ )
समारोहके साथ मनाया गया जिनमेसे हर एकने अपना पाजा.
जनक फल दिखलाया । हर यज्ञमें पलि-पशु या मनुष्यको स्वर्ग
जाते हुये भी दिखाया गया। जैसे जैसे समय व्यतीत होते गया
लोगोके हदयोसे मांसभत्तण व जीव हिंसाकी वृणा जो उनमें प्रारं
भिक धावस्थामें थी निकलती गई, यहां तक कि अन्नमें वलिदान
वलि-प्राणीके लिये स्वर्गके निकटस्थ मार्ग माना जाने लगा।
इस प्रथाकी एक व्याख्या वास्तवमें वलिदानके शास्त्रोमें जो उस
समयमें रचे गये थे कर दी गई और लोगोंके दिलोंमें इन
रीतियोंके लिये इतनी श्रद्धा हो गई कि बहुतसे आदमी हर्षपूर्वक
यह विश्वास करके कि वे इस प्रकार तुरन्त स्वर्ग पहुंच जायेंगे
स्वयम् अरनी वलि चढ़ानेके लिये तत्पर हो गये। अन्त में सुल्ता
और उसका कपटी वाहनेवाला मगर भी देवताओंके प्रसन्नार्य
अपना अपना बलिदान कराने पाये और वेदी पर काट डाले
गये।
पिशाचका प्रण अब पूर्ण हो गया। उसने अपना बदला
ले लिया और पाताललोकको चला गया। उसके चले जाने
से बलिदानका धनावटी प्रभाव बहुत कुछ जाता रहा परन्तु
चूंकि वह अपने साथ वयाओं और महामारियोंका भी लेता
गया, इस कारणवश उसकी ओर प्रारम्भमें लोगोंका ध्यान
नहीं गया । नवीन रचे गये वाक्यके कि 'वलिप्राणी सीधा
वर्गको पहुच जाता है। अप्रमाणित होनेको अब लोग इस
प्रकार,समझाने लगे कि यह पवित्र मन्त्रों के उच्चारण या शुद्ध

( ५७ )
अनुवाचनमें जो वलिदानके समय पढ़े जाते थे, किसी
त्रुटिके रह जानेके कारणसे अथवा किसी प्रकारके किसी और
कारण है। इसी बीच में यज्ञ करानेवाले होताओंके निमित्त
यक्षकी पूरी विधि भी तयार कर ली गई थी और प्राचारिक
पद्धतिका एक सम्पूर्ण नीति शास्त्र भी तय्यार हो गया था
जिसमें छोटे छोटे यिमों पर भी अच्छी तरहसे विचार
किया गया था। अनुमानतः प्राचीन (ऋग्वेटके ) समय के
कुछ मन्त्रोमें भी परवत और उसके मातहत शिष्योंके अनु.
सार परिवर्तन कर दिया गया था । मगरकी राजधानीसे यह
कर यह नई शिक्षा दूर तक फेल गई और पिशाव के अपने
निवास स्थानको प्रस्थान करने के पश्चात् भी होनाओंकी
शक्तियां, जो उनको मिस्मरेजम, योगविद्या इत्यादिके अभ्यास
से जिनमे मालूम होना है कि उनका भली प्रकार प्रवेश कराया
गया था, प्राप्त हुई थी; लोगोको परवतके दुष्ट-मनकी ओर
प्राकर्षण करनेमे पर्याप्त रहीं।
इस कथनकी पुष्टि जव हम स्वयं हिंदु शास्त्रोके वाक्योंसे
पाते हैं तो हमारा विचार उपर्युक्त जैन शास्त्रोमें वर्णित हिंसाके
कारणकी सत्यता पर दृढ़ हो जाता है। देखिये--भारत गांति
पर्वके ३३६ अध्यायमे लिखा है कि-
चंद्रवंशीय कृति राजाके वसु नामके पुत्र थे जो परम वैष्णव
और स्वर्गगज इन्द्र के परम प्यारे मित्र थे।
इन्द्रने इन्हें एक श्राकाशगामी रथ प्रदान किया था। इसी
-

पशु
(५८)
पर चढ़ करके ये प्रायः सर्वदा उपरिदेश ( श्राकाश) को जाया
करते थे। इसी कारण इनका नाम उपरिचर हुआ था। सत्य.
युगके किसी समयमें याजक ऋपि और देवतायोके बीच एक
भयानक विवाद उपस्थित हुआ। विवाद होने का कारण यह था
कि ऋषिगण पशु हिमाको पाप समझ केवल धान्यादि वीज
समूह द्वारा याग करते थे। देवगण ऋषियोंके इस व्यवहारसे
सन्तुष्ट न हो कर एक दिन उनके निकट आ कर बोले-"याजक
महाशय! आप यह क्या कर रहे है ? 'अजेन यष्टव्यं इस
शास्त्रानुसार काग पशु द्वारा याग करना उचित है।" मुनियोने
उत्तर दिया, "ऐसा नहीं हो सकती है, हिंसा करनेसे ही
पाप होता है । 'वीर्जयैज्ञेषु यष्टव्य' इस वैदिकी अतिके अनुसार
वीज द्वारा ही याग करना उचित है। आप लोगोने जिस शास्त्र
का वचन कहा उसमें भी अज शब्दसे वीजहीका उल्लेख किया
गया है वह पशुवाचक नहीं है।" किन्तु देवताओंने इसे स्वीकार
करना न चाहा। वे बहुतसी युक्ति और प्रमाण दिखा कर
अपना ही मत प्रवल करने की चेष्टा करने लगे। ऋपि भी उन
लोगोंसे कम न थे। वे भी अनेक युक्ति और प्रमाणके पलसे
देवताओंका मत खण्डन करने और अपने मतके प्रतिपादनमें
यत्नवान् हुए। इसका विचार बहुत दिन तक चलता रहा,
वाक्ययुद्ध भी बहुत हुआ, किन्तु कौनसा मत उत्तम है इसका
कोई निर्णय न हो सका। ऐसे समय में उपरिचर राजा जा रहे
थे। दोनों पक्षोने दोनो मतमें कौनसा मत उत्तम है, इसके निर्णय

। ( ५६ ) करनेका भार उन्हीं पर सौंपा । राजाने देवताओंका पक्षपात कर उन्हींके मतका अनुमोदन किया। इस पर ऋपियोंने क्रुद्ध हो राजा को शाप दिया। इस शापसे ही महाराज उसी विमानके साथ अधोविचार (भूगर्भ ) को जा रहे हैं, ऐसा देख देवताओं को वडी लजा मालूम हुई। उन्होंने राजाको विष्णुको आगधना करने का उपदेश दिया और 'शुभ कर्ममें इसोर्धारा देना होगा ऐमा ही विधान किया। इसीसे ही भूगर्भस्थित वसुको प्रोति होती है। प्राजकाल भी विवाह इत्यादि शुभकर्मो में वसोरा देनेकी नीति प्रचलित है । कालक्रमसे विष्णु ने उन्हें मुक्त कर दिया । (हिंदी-विश्वकोष, सप्तम भाग, पृष्ठ ४९३) फुट नोट नं० २ उनके वेदार्थकी उत्तमता और मोलका और भी ठीक २. अनुमान करने के लिये हम धार्य समाजियों में अग्नि और इन्द्रके स्वरूपकी जो-स्वामी दयानन्दजीके अनुयायी और टर्मिनालोजी श्रौफ दि वेट्ज के प्रसिद्ध रचयिता मि० गुरुदत्तके कथनानुसार उपणता या घोडोंके सिखानेकी विद्या और शासनकर्ता जाति क्रमानुसार है, जांच करेगे। गि• गुरुदत्त मैक्समूलर आदि पश्चिमी विद्वानोंकी जुगलनाको चैलेज ( अस्वीकार ) करते है और बस करते हैं कि उन लोगों के अनुमाढोंमें माधारण शब्दों को व्यकिवाचक मज्ञायें मान लेनेने अशुद्धियां हो गई हैं । यह सात रहे कि योरुपीय विद्वानोंने हिन्दू टोनाकागें, नहीधर, मेन, आदिकी वृत्तिों की सहायताले ही अपने अनुवाद रचे हैं

(६.)
परन्तु मि० गुरुदत्त निरुतके कर्ता यस्कके मत पर जो हर शब्दको
केवल उसके योगिक अर्थ में प्रयोग करता है, आरद है। हम
योरुपीय अर्थकी यथेष्ट समालोचना कर चुके है और इसलिये
अव मि० गुरुदत्तकी वृत्तिकी कुशलताका अन्दाजा उसको
प्रोफेसर मैक्समूजरके अनुवादसे तुलना करके करगे। जिन
वाक्योसो हम तुलनात्मक निर्णयके लिये तजवीज करते
हैं वह ही है जिसकी मि० गुरुदत्तने स्वतः हो मुकाविलाके लिये
पसन्द किया है और वे ऋग्वेदके १६२वें सुक्तके प्रथमके तीन
मन्त्र है। मि० गुरुदत्त और प्रोफेसर मैक्समूलर दोनोके अर्थ
'टर्मिनालोजी औफ दि वेदज़ में दिये हुये है और निन्न प्रकार हैं।
प्रो मैक्समूलर
२१-"हम तेजस्वी गुणोंसे
"प्राशा है कि मित्र, वरुण,
सुसज्जित फुर्तीले घोडेके
आर्यमन, आयु, इन्द्र, ऋतुओं
चल उत्पन्न करनेवाले के स्वामी और मारत हमको
स्वभावोका वर्णन न करेंगे न झिड़कें क्योंकि हम यक्षके
या राताकी प्रबल शक्ति समय देवताओं से उत्पन्न हुये
का वर्णन करेंगे जिस
तेज घोड़ोंके गुणका वर्णन
को वुद्धिमान या विज्ञानमें
में प्रवीण लोग अपने
उपायोंमें ( यक्षमें नहीं)
"काममें लाते.
मि० गुरुदत
करेंगे।

वकरा ( ६१ ) २-"वह लोग जो यह शिक्षा, २-"अब वे घोडेके आगे जो देते हैं कि केवलसत कों खलिस सोवरणके आभूः से उपार्मित धन ही संग्रह पणोंले विभूपित है वलिको और व्यय करना चाहिये मजवून पकड़े हुये ले चलते और वह जो बुद्धिमत्ता है तव चितला (धन्वेदार) प्रवेश हो चुके हैं जो दूसरों अगाडी चलते से पदार्थ विज्ञान के विषय वक्त मिमियाता हुआ में शास्त्रार्थ करने में और चलता है, वह इन्द्र और मूर्खाको सुधारने में निपुण पूपणके प्रिय मार्ग पर हैं, केवल वे और ऐसे ही चलता है। शक्ति और बलके रसको शासनार्थ पीते हैं। ३---"उपकारी गुणों से पूर्ण-"वह बकरा जो कि समस्त बकरी दूध देती है देवतानोंके लिये अर्पित जो घाडोंके वास्ते है पूषण के मागके तौर पर प्रथम तेज घोड़े के साथ एक पुष्टिकारक मोजन निकाला कारण कि त्वत्रि स्वत. उसी समय उपयोगी ही मन-भावन भेटको जो होता है जब कि चतुर घोडेके साथ लाई जाती है रसोइया द्वारा मोज्य कीर्ति प्रदान करती है।" वस्तुओंके गुण संवन्धी जाता that है सर्वोत्तम अनाज (६२) ज्ञानकी रोतियोंके अनु. सार स्वादिष्ट भोज-के रूपमें बनाया जाय।" शब्दोको बड़े हरूफोमें हमने लिखा है और उनका प्रभाव हर एकको स्वीकृत होगा जो स्वामी दयानन्दके इस कथनको ध्यानमे रक्खेगा कि उपरोक्त सुक्त 'अश्व विद्या का वर्णन है जो घोडोंके लिखाने और विजलीकी भांति विश्व व्यापी उष्णताके विज्ञानसे संबंध रखता है" (देखो टर्मि नालोजी आफ दि वेदज़ पृष्ठ ३८)। दुर्भाग्य घश इस अर्यकी अश्व विद्या अर्थात् भोजन सबंधी कुशलतासे प्रसग योग्यता किसी प्रकार युक्ति द्वारा प्रगट वा प्रामाणिक नहीं की गई। विपक्षी अर्थमे भी वास्तवमे कोई कुशलता नहीं है यदि उस को शब्दार्थमें पढ़ा जावे। परन्तु उसकी प्रसंग योग्यता उसके एक विद्यमान चालू रीतिले जो निःसन्देह बहुत प्राचीन कालसे 'चली आई है, अनुकूलता रखनेके कारण स्पष्ट है। निस्सन्देह यह वात सत्य है कि वैदिक परिभाषाओंके अर्थ करीव २ सभी योगिक है जो रुढ़िसे, जिसका भाव इच्छानुसार रख लिया जाता है, भिन्न जाती है । परन्तु यह भी इतना ही सत्य है कि अनुमानतः संस्कृत भाषाका तमाम कोप ऐसे शब्दोंसे परिपूर्ण है जो मूल धातुओंसे मुख्य मुख्य नियमोंके अनुसार निकलते है। यह विशेषत व्यक्ति वाचक शब्दों तक पहुंच गई है, विशेषकर व्यक्तियों के नामोमें पाई जाती है, जैसे राम यह है (६३) जो हर्प पहुंचावे या जो प्रानन्द 'पूर्ण और हर्षदायक हो। इस प्रकार हर वृत्तिके विषयमें किसी न किसी दृष्टिले सन्देह करना सदैवसंभव है परन्तु यह विदित है कि इस तरीके से कोई संतोप- जनक फल प्राप्त नहीं हो सस्ता है। बहुतसी दशाओमें धातु घाद शब्दोंके अर्थको यथेष्ट रीनिसे प्रकाश कर देगा, परन्तु प्रायः यथार्थ माय प्राप्ति के कारण टोंका प्रचालिन या प्रसिद्ध भावका भी प्रयोग करना अवश्यकीय होगा । यद्यपि इस चातको दृटिगोचर रखना होगा कि हन प्रसंग योग्यताको अपनी प्रिय सम्मतिकी पुष्टिके कारण हठपूर्वक नष्ट न कर दें। इसलिये यह कहना सत्य न ठहरेगा कि इन्द्र सदैव शासनस्र्ता जाति है और शासनकर्ता जातिके अतिरिक्त और कुछ भाव नहीं रखता है, और अग्नि अव विद्या या उग्णताके अतिरिक्त कभी और कुछ नहीं है, इत्यादि । उष्णताके भावमे अग्नि और शासनकर्ता जातिके भावमें इन्द्र विला शुबहा इस बात के योग्य नहीं है कि वेदके मन्त्रोमेंसे बहुत अधिक मन्त्र उनके लिये नियत किये जाय, मुख्यतया जय उनके विरोधी क्रमा. नुसार शीत और ऐसी जातिको जिस पर दूसरा शासन जमाये हो वैदिक देवालयमें कहीं स्थान नहीं मिला है। बहुतसी विद्यायें, उद्यम, गुण और जानवरों के सिखानेकी रीतियां और भी है जो मि० गुरुदत्तके भावके लिहाजमे अग्नि और इन्द्रसे कम प्रावश्यक या उपयोगी नहीं है, मगर हमको वेदों में कोई मन्त्र उनके लिये नहीं मिलता है। तो अश्व विद्या और न शासन विषय उपयोगी पदार्थोके उन छह विभागों अर्थात् (१) काल, (२) स्थान, (३) शक्ति, (४) मनुष्य-प्रात्मा, (५) इच्छा पूर्वक कार्य, (६) जीवन क्रियायोमें जो रमि- नालोजी औफ दि वेदज ( देखो पृष्ठ ५३-५४ मे वर्णन पाया आता है। बावजूद इसके किमि० गुरुदत्तने यह विमाग बन्दी वैदिक देवताओं के निर्णय परनेके लिये विशेपतरा बनाई थी, जो न वैज्ञानिक ढग पर न दार्शनिक विचारसे किसी प्रकार निर्दोष हो सक्ती है । उपणता वास्तवमें शक्तियों के विभागमें सम्मिलित हो सक्ती है जैसे कि वह वाकई है परन्तु उसका अपनी पांतिकी अन्य प्राकृतिक शक्तियोंसे अग्रगामी होनेका अधिकार अभी प्रमाणित होनेको शेप है। इस प्रकार हम अपने आपको इस वातके मानने के लिये बाध्य पाते है कि वेदोके मन्त्रोमें देवतायोके तौर पर वर्णित अग्नि और इन्द्र उपणता या अश्व विद्या और शासनपर्ता जाति का अर्थ नहीं रखते हैं, वरन् आत्माके कतिपय गुणों या पर्या- योंके वाचक हैं। इसी प्रकार श्रायु और पृथ्वी, श्राकाश और भूतल नहीं है परन्तु क्रमानुसार प्रात्मा और पुनल है। पुष्टि दाता पूषण इसी प्रकार आयुका (जो जीवन शक्तिका नियत करनेवाला है' ) रूपक है । यद्वा कभी यह प्रकाशके देवताओं में भी गिना जाता है कारण कि प्रायु कमकी स्थिति तक ही शारीरिक बलका होना संभव है। यह बात कि पूषनका वर्णन यात्रीके तौर पर आया है उसके यथार्थ भावका एक और सूचक है, (६५) क्योंकि आयु वरावर कम होती रहती है अर्थात् गुजरती रहती है और अलकारमें पथिक रूपसे यांधी जा सकती है । पूपनके दांतोंका गिरना जिसका वर्णन पुराणों में आया है अनुमानतः इस. लिये है कि उसके स्वरूपको निस्सन्देह सावित कर दे क्योंकि यह वृद्धावस्थाका लक्षण है । इसलिये बलिदानमें पूपणुके भाग का अर्थ पुण्य कर्मोले उत्पन्न होनेवाला आयुकम होगा। यहां भी हम जैन सिद्धातको इस घातकी व्याख्या करते हुये पाते है जो हिन्दू शास्त्रोंमें भ्रम पूर्ण है क्योकि हिन्दू शास्त्रों में कोई निश्चित नियम पावत्र और बंध संबंधी दर्ज नहीं है और इस कारणवश वह व्योरा रहित अस्पष्ट विचारों पर संतुष्ट रहने लिये बाध्य है। वास्तव में कर्म बंधन चार दशाओमें पाया जाना है और इसलिये उसके समझने में निम्न लिखित वातोके जानने की आवश्यकता है-(१) १४८ कर्मप्रकृतियोंका स्वरूर जा जेन सिद्धान्त ग्रन्थों में वणित है (२) कर्म प्रकृतियोंकी मर्यादा । ३) बंधकी नीव्रता और (४ ) मिकदार अर्थात् पुगलकी मिकदार जो आत्मानं शामिल हो। यह चारो प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, और प्रदेश बंध क्रियानुसार कहलाते हैं और इनके ज्ञान विना यह नहीं कहा जा सका है कि कर्म के नियमले जानकारी प्रात हुई । अब जहा तक श्रायुका संबंध है वह शेषके सात कमाने इस घात विलक्षण है कि उसका बंध जीवन पर्यंत एक ही दफा होता है जब कि और शेष कर्माका हर समय होता रहता है मानवमे जो पौद्गलिक माहा आता है उसको यों कह सकते हैं (६६) कि वह वंधनके लिहाजसे कर्मके विभिन्न भागों में भाजित जाता है और उसमे कर्म प्रतियां बनती है और इस विभाजित होने में विद्यमान, आन्तरिक भावोका बडा प्रभाव पहता है। यह भाव स्वयम् व्यक्तिगत विचारों पर निर्भर है । पुण्य और वैराग्य प्रात्माका बल और वीग्नाको बढ़ाते हैं और पाप उसको निर्वल और अधोगति अवस्थामें डालता है। इन उपरोक विचारों के लिहाजसे वेदोंमें वर्णन किये गये देवताओंके बलिदानका अर्थ उन कृतियोंसे समझना चाहिये जिनसे जीवन क्रियाओंका जो देवी देवताओंके रूप में वर्णित हैं पालन पोषण होता है, और किसी भावमें भी प्राणियोंका रक्त- पात नहीं समझना चाहिये । विशेष करके वलिदानका संबंध आत्माके स्वाभाविक शुद्ध गुणोंसे है जो इच्छाओं के मारने और तपस्याले प्रगट होते हैं। पौगलिक प्रास्रव जो निःस्वार्थ कर्मसे होता है शुभ बंधनका कारण है और इस 'भेट' (पुण्य प्रास्त्रव) का विविध प्रकारकी शुभ कर्म प्रकृतियों में विभाग होता है जो देवताओंका भाग कहा गया है। ऋग्वेदके १६२ वें मुक्तके प्रथम तीन मन्त्रोंके भावार्थका समझना अव कठिन नहीं है। उनका सबंध मन (अश्व ) के वशमें करने (नष्ट करने अत. एव मार डालने वा बलि चढ़ाने ) से है जिसके पूर्व काम वासन का (जिसका अनुरूपक बकरा है) स्वभावतः नाश करना आव- श्यक है। यह विदित होगा कि. यह यज्ञ देवताओंसे सीधा संबंध रखता है और उनकी पुष्टिका तत्कारण है जब कि ( ६७ ) प्राणियोका किसी दूरवर्ती देवताके प्रसन्नार्थ घात करना न्याय व विज्ञान दोनों में से किसीके भी प्राश्रय नहीं है। अन्य देवताओंकी ओर ध्यान करने पर युगल अश्विनी कुमार स्वांनकी दो नाडियों, क्रमानुसार इड़ा व पिङ्गलाके रूप प्रतीत होते है ) उनके बारे में यह माना गया है कि वह बराबर चलते होते हैं। कारण कि प्राणका स्वभाव सदैव चलते रहने का है। और वह वैद्य रूपमें भी माने गये हैं इस कारणले कि स्वासो. च्छ्वास नाड़ियोके अपवित्रताको दूर कर देता है और इस कारणसे मो कि योगियो द्वारा यह बात मानी गई है कि मनुष्य के शरीरके बहुतसे रोग जीवनझी मुख्य शक्ति अर्थात् प्रागका जिसका संबंध स्वांससे बहुत घनिष्ट : उचित प्रयोग करनेसे दूर हो जाते हैं । सधारण रूपमे स्वांसको व्यक्तिगत पायुके प्रतिरूपमें जिसका एक नाम अनिल ( स्वांस ) है वाधा है। परन्तु देवताओंमें सबसे अधिक मुख्य ३३ है जिनमें ११ रुद्र ८ वसु १२ आदित्य, इन्द्र और प्रजापति शामिल हैं। रुद्र जीवनके उन कर्तव्योंके रूपान्तर है जिन का जाना मृत्यु है। वह रुद्र ( रुद्र यानो रोना ' मृत्यु समय रोदन होने के कारण कहलाते हैं, इसलिये कि मृतक पुरुषके मित्र और कुटुम्बी जन उसकी मृत्यु पर आंसू बहाते हुये देखे जाते हैं । वह आत्माकी भिन्न २ जीवन शक्तियों को सूचित करते हैं । ८ वसु अनुमानतः शरीरके ८ मुख्य भागोंके जो अङ्गकहलाने हैं कर्तव्यों के चिन्ह हैं। कुछ लेखकोंके मतानुसार ८ यमुनओंका (६८) अभिप्राय ८ स्थानोंसे है, अर्थात् (१) पित्तज शरीर (२) ग्रह (३) वायुमण्डल (४) अलौकिक स्थान (५) सूर्य (5) आकाशकी किरणें (७) उपग्रह और (८) तारागण (देखो दि टामिनालोजी औफ दि वेद्ज़ पृष्ठ ५५)। मगर यह अधिक संभव है कि शारीरिक अङ्गोंके विद्यमान कर्तव्य हों क्योंकि वे जीवको शक्तियों के विविध स्वरूप हैं। अथर्ववेदके एक वाक्यमें (देखो दि टर्मिनालोजी औफ दि वेदज़ पृष्ठ ५३) उनका उल्लेख विविध शारीरिक कर्तव्योंकी भांति किया गया है ओर वृहदारण्यक उप. निषदके अनुसार ३३ देवताओंके यतलानेवाला मार्ग* हृदय. मोकाशके भीतर है ( देखो दि परमान्यन्ट हिस्ट्री ऑफ भारतवर्ष भाग १ पृष्ठ ३२)। अव हम आदित्योंकी ओर ध्यान देंगे जिनको संख्या १२ कही जाती है। मगर यह विदित है कि वह सदैव इतने नहीं माने गये हैं। इन्ल्यू-जे बिलकिज साहबके मतानुसार देखो दि हिन्दु मेथालोजी पृष्ठ १८):- यह नाम ( आदित्य) केवल आदित्यके वंशजोंका हो वाचक है। ऋग्वेदेके एक वाक्यमें छ के नाम वर्णित है। अर्थात् (१) मित्र (२) आर्यमन, (३) भाग, (४) वरुण (५) दत्त 4 r * लूई जैकोलियट साहले अपनी पुस्तक दि औकल्ट साइन्स इन इण्डियाके पृष्ठ १८ पर मनुके आधार पर बतलाते हैं कि जीव स्वयम् देवताओं का संग्रह है।

. " (६६) और (६) अंश। और एक दूसरे मन्त्रमें उनकी संख्या सात कही गई है, यद्यपि उनके नाम वहां नहीं दिये गये है। एक "तीसरी जगह आठका वर्णन है मगर अदिति अपने पाठ पुत्रों में से जो उसके उदरसे उत्पन्न हुए थे देवताओं के समक्ष सानको लेकर पाई और मार्तण्ड (आठवे) को अलग कर दिया। चूंकि इन पुत्रोंके नाम जो चेदोंके मिन्न २ मागोंमें दिये हुये हैं एक दूसरेसे नहीं मिलते हैं इसलिये इस वातका जानना कि प्रादित्य कौन कौन थे कठिन है । शतपथ ब्राह्मण और पुराणोंमे आदित्योकी संख्या १२ चारह तक बढ़ा दी गई है। भविष्य-पुराणका कथन है (देखो दि पर्मान्यन्ट हिस्ट्री औफ भारतवर्ष, भाग १ पृष्ठ ४८३ व ४८६) कि आदित्यों को देवताओं में सबसे पहिले होने के कारण प्रादित्य कहने हैं। कुछ और लेखकों के मतानुसार प्रादित्य शम्शी साल के बारह महीने है ( देखो दि टर्मिनालोजी औफ टि वेदज पृष्ट ५५) और उनको श्रादित्य इस कारण कहते हैं कि वह संसारमेंसे प्रत्येक वस्तुको स्त्रीच लेते हैं। इस बात का कि इस कथनका ठीक अर्थ क्या है समझना सहज नहीं है, परन्तु यह ज्यादा करीन अयास है कि आदित्य आत्माके, जिसकी शुद्ध अवस्या का रूपक सूर्य, जो ज्ञानका एक उत्तम चिह है, मुख्य ( या प्रारम्भिक ) गुणोंके सूचक है। इसलिये आदित्य जिनकी संज्ञा चाहे कितनी हीक्यों न हो, क्योंकि वह मनुप्यकी विमागन्दी (७०) पर निर्भर है आत्माकी उसके मुख्य उपयोग अर्थात् कानसे सम्बन्ध रखनेवाली क्रियायें हैं। इस प्रकार वरुण जिसका भेष शम्शी वर्षके महीनेके तौर पर हास्यजनक है कर्म शक्ति का प्रतिरूपक है क्योंकि यह मनुष्योंके सत्य और मूंठको देखता है (हिन्दू मेथोलोजी पृष्ठ ३६ ) । एक दूसरे स्थानमे वरुण का शासनक्षेप विशाल करके समस्त संसारको कायम किया है, क्योंकि यह आकाशमें पक्षियोंके उड़ने दूर चलने पाली वायुफे मार्ग, समुद्रोंमें चलनेवाले जहाजोंके पथको जानता है और तमाम पदार्थों को जो हुये हैं या होंगे देखता है। वरुणको समुद्रका अधिपति माना है, अनुमानतः इस कारण कि समुद्र संसार (अावागमन) का चिह्न है। अन्य आदित्य इसी प्रकार वर्पके मास नहीं हो सके हैं परन्तु जीवके भिन्न भिन्न गुण हो सके हैं। अब केवल इन्द्र और प्रजापतिका उल्लेख वाकी है, इनमें से पहिलेका वर्णन तो 'हम अन्य स्थान * पर कर चुके हैं परंतु पिछला प्रजाओं (वंशों श्रतः जीवनके अनेक कार्यों ) का पति अर्थात् मालिक है, और हृदयके प्रभाविक कर्तव्यका चिन्ह है, ( देखो दि पर्मान्यन्ट हिस्ट्री औफ भारतवर्ष भाग १, पृष्ठ ४९२-४९)। उपरोक्त वर्णन समस्त हिंदू देवालयोंकी व्याख्याके लिये * देखो दि की औफ नालेज और दि कानफ्लुएन्स औफ ओप्पोजिट्स "(वा असहमत संगम)। ३ (७१) वस्तुत: ययेष्ट है, यद्वा उसके देवताओं की संख्या ३३ करोड़ से कम नहीं मानी गई है क्योंकि इस देववंशके शेष देवता मुख्य ३३ तेतिसको हो, जो तीनमें और अन्ततः एक ही यानी स्वयम् भक्तकी परम पूज्य परमात्मा स्वरूप आत्मामें ही गर्मित हो जाते है, मानसिक सन्तान हैं। यह विदित होगा कि हमारी व्याख्या केरल उस अप्रसंगताको जो मि० गुरुदत्तके अर्थमें पाई जाती है और उस प्रतिरोधी अपनेको जो योरुपियन दार्शनिकोंके भावमें विदित है, दूर नहीं करती है वरन् हमको अपने देवताओंकी जनसंख्यामें सलग्न हिन्दू काल्पनिक शक्तिका पूरा दृश्य दिख जाती है। इन देवतायोकी वशावलीके सम्बन्धमें वहुतसी उलझने और पेंच, जिन्होंने अाधुनिक खोजी विद्वानों के गांत खट्टे कर दिये हैं, उनकी काल्पनिक उत्पत्तिके आधार पर सहजमें ही सुलझ जाते हैं, क्योकि जीवनकी विविध क्रियाओं के एक प्रकारले एक दूमरीमें गर्मित होनेके कारण यह समय समय पर अवश्य होगा कि उनकी उत्पत्तिके विचारोके प्रतिरूपक अपने पारस्परिक सम्बन्धियों ऐसे नामुताविक लक्षणों से परिपूर्ण हों जो अमर्मज्ञ मनुष्यको असध्य और इसलिये झूठे प्रतीत हों। यह विदन होगा कि कुछ देवता स्वतः अपने पिताआंके पिता माने गये हैं और कोई अपने जन्मदाताओंके समकालीन, इस तरहती धावेमें डालने. वाली कथायें केवल हिन्दूमतके ही विशेष लक्षण नहीं हैं वरन् मह रहस्यवाद और गुम शिक्षा तमाम मतोंमें पाई जाती है, ( ७२ ) जैसे ईसाई मतमें बाप और बेटे ( खुदा और ईसू ) का समका. लीन होना। इनका भाव उनके स्वरूपोकी दार्शनिक मूल ( निकास ) का पता लग जाने पर सुलभ और सहज होता है वरना भूलमें पड़ने और भटकने का कारण है ! उस मनुष्यको, जो अमरीय शासन और देवाधिपत्यके भेदका पता लगाना चाहती है, चाहिये कि सबसे पहिले नयवादका प्राभ्यञ्जन घृत, जिसके बिना बुद्धिमत्ताकी कुञ्जी रहस्यवादके मुर्चा लगे हुये तालों में जो शताब्दियोंसे वन्द पड़े हुये हैं नहीं फिरती है, प्राप्त करे। फिर उसको चाहिये कि वह अपने निजी विश्वासों और प्रिय विचारोंकी गठरी बांध कर अपनेसे दूर फेक दे, तब उन शक्तियों के पूज्य स्थानमें प्रवेश करे जो तमाम प्राणीमातकी प्रारब्धोका निर्माता हैं। केवल इसी प्रकार वह वास्तविक वस्तुस्वरूपमय सत्यको पा सकेगा और भ्रम व पक्षपातका शिकार होनेसे बचेगा। तीव्र बुद्धिवाले पाठक अब इस वातको समझ लेगे कि प्रात्मा जो इन्द्रियों द्वारा पौद्गलिक पदार्थोका भोगता है इन्द्रके काल्पनिक रूपान्तरमै द्यायुस और पृथ्वी (जीवद्रव्य और पुद्गल) की संतान है और तिस पर भी वह अपने पिताटीका पिता इस मानी (अर्थ)में है कि सिद्धात्मन् स्वयम् अपवित्र जीवका अपवित्रता रहत शेषभाग है। यह बात कि यह विचार सदैव * विविध अपेक्षाओं या दार्शनिक दृष्टियों के ध्यानमें रखनेको नयवाद कहते हैं। - . ( ७३ ) विल्कुल ठीकर वैज्ञानिक नहीं है व्याख्याकी सत्यताको कमजोर नहीं करता है क्योंकि हमारा अभिप्राय केवन्त रहस्यवादके भावार्यके दर्शानेसे है न कि उसकी घटनाप्रोके विपरीत वैज्ञानिक सत्य प्रमाणिक करनेसे। साधारण रीतिसे यह विदित होगा कि रहस्यवादमें विरोधता और असंगतिका अंश इस वातका दृढ़ सूचक है कि विविध अपेक्षाओंसे प्राप्त किये हुये परिणामोको नयवादकी आशाका उलंघन करके मिश्रित कर दिया है । इसलिये इस कहने में विरोध होना संभव नहीं है कि जो कुछ वुद्धि और बुद्धिमत्ता के विपरीत धर्ममें पाया जाता है वह किसी सत्य वातका वर्णन नहीं है चाहे वह सत्य वात कोई व्यकि हो या प्राकृतिक घटना परन्तु यथार्थ और वास्तवमें एक मानसिक कल्पना है जो एक बहु प्रज कल्पना शक्तिके कारखानेमे किसी साधारण नियमके अाधार पर गढ़ी गई है। वेदोके पश्चातकी कहानाओंमेंसे वह करपना जो अब केवल हिन्दुओंहीमें नहीं घरन् तीन चौथाई मानव जातिमें प्रचलित है अर्थात् क सृष्टिकती और शासक ईश्वरको कल्पना इस नियमका सर्वोत्तम उदाहरण दे रही है। अनुमानन· विचारका वह अंश जिसके आधार पर यह कल्पना स्थापित हुई है विश्वकर्माको स्वरूप है जो देवतायोका शिलाकार और ऋषि करियों के आकार रचनासबंधी विचारों अर्थात् वस्तुओं के प्राकृतिक स्वभावका रूपक है । ऐसा जान पडता है कि हिन्दु मस्तिष्कने द्रव्योंकी स्वाभाविक क्रियाके भेदसे चकराकर अन्ततः (७) यह परिणाम निकाला कि द्रव्य कर्तव्यका भी कोई कारण अवश्य होगा, और अपनी इस अस्पष्ट और धुंधलो कल्पनाका कोई युक्तियुक्त आधार न पा कर एक नई प्रकारकी शकि अटूट (म नहीं + दृष्ट = दृष्टिगोचर, अतः अनजान ) को जल्दोमें कायम कर दिया। कधि-कल्पनाके उनी रुझान वश जो देवालय के और देवताओंकी उत्पत्तिका कारण हुई, अदुए भी समया. नुसार दैविक गुणों से सुसज्जित हो गया और चूंकि वह आरम्भ हीले और सब देवताओंके कर्तव्यका निकास और इसलिये उन सबसे अधिक बलवान अर्थात् ईश्वर (ईश्वर वह है, जो ऐश्वयं रखता हो अर्थात् वलसाम्राज्य या स्वामोपन ) माना गया था, इसलिये अन्ततः वह अप्रगट महेश्वरके सदृश संमारमें प्रसिद्ध हो गया। हिन्दू देवालयमें सर्वोच्चस्थान पा कर इस अदृष्टने अपना गज हिन्दू दुनियाके आगे फैलाना बारम्भ किया और अपने कुछ पूर्वाधिकारी मित्रादि की भांति शीघ्र ही अन्य देशों में जहां वह सब प्रकारके अच्छे और बुरे पदार्थाका कर्ता माना गया, अपना सिका जमा लिया। चुनांचे 'इसीयह' नवी अपने ईश्वरको पुण्य व पाप दोनोंका कर्ता ठहगता है (देखो इजीलकी इसीयह नवीकी किताय अध्याय ४५ आयात ६ व ७)। मुहम्मदने भी इसोयह' की सम्मतिके स्वीकार करने पर संतोष किया और इस बातको कह दिया कि नेकी और बदी दोनों ईश्वर कृत हैं, क्योंकि और कोई कर्ता दुनिया नहीं है। पुण्य और पापके कर्त्ताके रूपमें सीधा सादा अदष्ट जिसकी उत्पत्ति कदा.

( ७५ ) चित एक ऐसे वान:प्रस्तके मस्तिष्कमें हुई जो दार्शनिक विवेकके लिये विशेष विख्यात न था, अब जब कि लोग उसकी मानसिक उत्पत्तिको सृष्टिकर्ता सम्बन्धी वादविवादके तीव्र कोलाहलके कारण भूल गये हैं, तो वह सब प्रकारको विरोधता और असं- गतिका भण्डार हो गया है। इसका विरोध होना मी असम्मष था क्योंकि मनुष्यके मस्तिष्क में समस्त क्रिया और कर्तव्य के एक मात्र कारणके रूपमें कल्पित हो कर इसके लिये यह सम्भव न था कि वह किसी प्रकारके (कर्मजनित, स्वाभाविक इत्यादि) कृतियोंकी जिम्मेवारीको अस्वीकार कर सकता । अधिकांश निकट कालमें यह रूपक आत्माके आदर्शस भी जो ईश्वरमें लय होना समझा गया है, संवधित हो गया है । इस प्रकार अन्तिम शकि का प्रारम्मिक मानसिक विचार अर कमसे कम चार मिन्न वस्तुओंको गर्मित करता है, अर्थात् (१) प्रकृनिकी कार्य कारिणी शक्ति (२) जीव द्रव्य और अन्य द्रव्योंके कर्तव्य (३) कर्मजनित शक्ति और (४)जीवका अन्तिम उद्देश, इन ही चार भिन्न असंध्य कल्पनाओंका संग्रह है जो एक दर्शनिक विचारमे नवीन मदाखिलत करनेवालेके मास्तिको लापश्याही ३ स्थिर होकर अदृष्टके रूपकके तौर पर संसार शासक सम्बन्धी विषय में भूल और झगडेका उपजाऊ झारण है।

(५६) फुट नोट नं० ३. तुल्लाके लिये डुनायस्सनके दि सिस्टेम औफ़ दि वेदांत'का निन्न लिखित विषय पढ़िये (चास जॉस्टन साहयका अंग. रेजी तर्जुमा, पृष्ठ ८):- "...... ..यह वात ठीक है कि आरण्यकों में हमको वलिदान के भावार्थके वदलनेकी विलक्षण दशा बहुधा मिलती है। यज्ञ संस्कागेंके अमली रीतिसे करने के स्थानमें उन पर भावार्थको बदलकर विचार करना बतलाया है जो धीरे २ सर्वोत्तम विचारों पर पहुंचा देता है । उदाहरणके लिये वृहदारण्यकका प्रारम्भिक विषय ( जो अधोवायुके लिये नियत है ) गिसमें अश्वमेधको वणेन है ले लीजिये:- 'ओ३म् ! प्रातःकाल वास्तवमें यज्ञके अश्वका सिर है। सूर्य उसका नेत्र है वायु उसकी स्वाम है। उसका मुख्य सर्वव्यापी अग्नि है। कण वलिदानके घोड़े का शरीर है, स्वर्गलोक उस को पीठ, आकाश उसका उदर और पृथ्वी उसके पाँव रखने की चौकी है। ध्रुव ( Poles ) उसके कटिभाग हैं, पृथ्वो का मध्य भाग उसकी पलिया है, ऋतुयें उसको अवयत्र है, महीना और पक्ष उसके जोड़ हैं, दिन और रात उसके पार हैं; तारे उसकी हड्डियां है, और मेव उसका मांस है । रेगि स्तान उसके भोज्य हैं जिनको वह खाता है। नदियां उसकी अंतड़ियां हैं; पहाड़ उसके जिगर और फेफड़े हैं; वृक्ष और पौधे उसके केश हैं; सूर्य उदय उसके अगाडीके भाग । ७७ हैं; और सूर्यास्त उसके पोछेके भाग हैं, जब वह जमुहाई लेता है तो वह बिजली होती है, जब वह हिनहिनाता है तो वह गजैता है। जब वह मूनता है तो वह बरसता है; उसका स्वर वाणो है। दिन वास्तव में उसके सामने रखे हुये याके घरतनकी मांति है, उसका पलना पूर्वी समुद्र में है गत वास्तव में उसके पीछे रक्खा हुआ वर्तन है, उसका पलना पश्चिमी समुद्र में है, यह दोनों यशके वतन घोड़े के गिर्द (इधर उधर ) रहते है। घुड़दौड़के अश्वके तौर पर वह देवताओं का बाहन है। युद्धके घोड़े को भांति वह गंधोंकी सवागे है, तुरंग के सदृश वह असुरों के लिये है; और साधारण घाड़े के समान मनुष्यों के लिये है। समुद्र उपका माथी है, समुद्र उसका पलना है।' "यहाँ संसार बलिदानके घोड़े के स्थानमें पाया जाता है, शायद इसके पीछे यही भाव है कि योगीको संमारका त्याग कर देना चाहिये (देवो वृहदारण्यक उपनिषद ३१ व ४६ ). जिस प्रकार कुटुम्यका पुरुष यन्त्र के वास्तविक प्रतादों ( Gifto) को त्याग देता है। ठीक उसी प्रकार छादोग्य उपनिषद (अध्याय, श्लोक-१)जो उदगानाके लिये है सच्चे उदगाना के समान शिक्षा देता है। ओ३म! शब्दको जो ब्रह्म (परमात्मा प्रतिक्रम ) का विन्ह है जनना और उसका आदर करना और मंत्र जिसका संबंध होता' से है ऐने आरण्यकम् (२, १, २) में उसा प्रकार अर्थका परिवर्तन किया गया है। तुलनाके लिये देखो ब्रह्मसूत्र ( ७८ ) ३, ३, ५५-५६, जहां इल विचारकी पुष्टि की गई है, कि इस प्रकार के चिन्हित अलंकार (प्रत्यय ) शाखामोंमें ही केवल सही नही पाये गये हैं बल्कि साधारण तौर पर भो। फुट मोट नं०४ इस प्रकारके रूपकोंका द्रोपदोके रूपसे उदाहरण दिया जा सक्ता है जो महाभारतके अनुसार पांघो पाण्डव भ्राताओंको स्त्री थो। जैनमतके दिगम्बर आनायके पुराणों में इस यातका विराध किया गया है। और यह कहा गया है, कि वह केवल अनुनकी ही खी थी. जिसने उसको स्वयम्वरमें समाजके समक्ष जीता था। निस्सन्देह यह वात करीन कयास नहीं है कि ऐसे पुरुष जिनकी नेक और बदकी विचार शक्ति पाण्डवोंके समान उच्च अवस्था की थी, इनने भ्रष्टावरण हो कि वह उसको एक ही समयमें पांच पतियों से संबंध करने पर बाध्य करें। सत्य यह है कि महान उपाख्यान के रचयिताने ऐतिहासिक घटनाओं को तोड मरोड कर अपने अलङ्कतिक आवश्यकाओंके योग्य बना लिया है, और सत्यार्थ के ढूंढ लेने का भार पाठकोंकी बुद्धि पर छोड़ दिया है। नवयौवना द्रोपदीका अधूरुपमें पांच पाण्डवोंके खान्दानमें प्रवेश करना, जीवन (Life ) और शान इन्द्रियोंके संबंधसे इननीसदशता रखता है कि उसको महाभारत के रचयिता को अत्यन्न तात्र बुद्धि ध्यान में लाये बगैर नहीं रह सक्ती थी, और उपने उपका अर्थात् द्रोपदीका तुरन्त अपने युद्धके बड़े नाटकमें जो आत्माकी स्वामात्रिक और कर्म शक्तियोंके अन्तिम ( ७६ ) युद्ध और धर्म शक्तियोंकी पूर्ण पराजयका महान् अलङ्कार है, प्रयोग किया (देखो 'दि पर्मेन्यन्ट हिस्टी औफ भारतवर्ष के० एन० आइयर कृत भाग २) | इस प्रकार जब कि ऐतिहासिक द्रोपदीको युधिष्ठिर और भीम जो उसके पतिके जेष्ठ भ्राता थे अपनी पुत्रीके समान और अर्जुनसे छोटे नकुल और महदेव अपनी माताके समान मानते थे, तो उसकी (louble ) अर्थात् काल्पनिक द्रोपदी पञ्चज्ञान इन्द्रिय और जीवन सत्ताके सम्बन्धको दर्शाने हेतु पांचोंकी स्त्री विण्यात दुई। एक और कथाके अनुसार जो उसमे सम्बंधित है सूय्य (शुद्धात्माके चिन्ह ) ने उसको एक अद्भुत माजन ( घटलोई ) दिया था, जिससे सब प्रकार के भोजन और और पदार्थ इच्छानुसार मिलते थे। इस इच्छित वस्तुको देनेवाली बदलाईकी व्याख्या इस भांति है कि आत्मा स्वमावसे परिपूर्ण हैं और बांध सहायताले स्वतंत्र है। दुष्ट दुस्सासनका द्रोपदाको सुन्दग्नाको जनताके समक्ष, उसके वस्त्रो जो अलौकिक ढंग से बढता गया उतार कर प्रत्यक्ष कर, देने में असमर्थ रहना एक ऐसी बात है जिस से जीवके स्वभाव पर प्रकाश पड़ता है, क्योंकि बंध (द्रोपदी की रजस्वला)-अवस्थामें जीव सदैव माह की तहोंमें इतना लपेटा हुआ है कि किसी प्रकार भी उसकी नग्न छविका दर्शन करना सम्भव नहीं है! जीव सनाका एक और सुन्दर अलंकार श्रीमती फगोइया- की जापानी कथामें पाया जाता है उसके पांव चाहनेवाले पांच इन्द्रियोंके सूचक हैं जो सबके सब उसको उन असलो चीजों (८०) स्थानमें जिनको वह चाहती व मांगती है नकली और बुरी वस्तुः भेंट करके धोखा देते हैं; ओर मैकाडो बहिरात्मा (शारीरिक व्यक्ति) है जिसको छोड़कर वह चन्द्रलोक ( पितृलोक)को वहाँके निवासियों के साथ प्रस्थान कर जाती है। मगर द्रोपदीको इन्द्रले जो जावात्माका एक और अलंकार है पृथक् "समझना चाहिये। इन दोनों रूपकोंमें भेद यह है कि जब कि द्रोपदी जीवन सत्ता और ज्ञान इन्द्रियों के सम्बंधको जाहिर करती है, इन्द्रका भावक्षेत्र उसको अपेक्षा अधिक विशाल है। इन्द्रका जीवन यदि उत्तको एक ऐतिहासिक व्यक्ति या जीवित देवता माना जावे तो वह हिन्दुओके सदावार सभ्यता और देव तामोंके गुणों से घृणा उत्पन्न करने के लिये यथेष्ट है क्योंकि सिर्फ यही बात नहीं है कि उसने अपने गुरु गौतमको स्त्रोले भोग किया वरन् पितामह ( ब्रह्माजी) ने भी उसे दण्ड देनेकी वजाया उसके पापके चिन्ह फोड़े फुन्सियोंको केवल उसकी प्रार्थना पर नेत्रों में परिवर्तन करके उसे और भी सुन्दर बना दिया, परन्तु इस कथाके यथार्थ अर्थका कोई संबंध इतिहाससे नही है और उससे प्रतीत होता है कि उसके रचयिताको आत्मज्ञानका बहुत कुछ बोध था, और अलंकारोंकी कवि-रचनाकी अनुपन योग्यता प्राप्त थी। उस अलंकारिक भाषाका जो इस रूपकके सम्बन्धमे व्यवहृतं हुई है पूर्ण गतिसे रस लेने के लिये यह आवश्यक है कि हिन्दुओंके सृष्टि रचना सम्बंधी विचारोंको जो साँख्यमतानुसार पुरुष और प्रकृति के संयोग से उत्पन्न होती है ध्यान में रखा जावे।

-
(८१)
लेकिन यहाँ पर हमारा अभिप्राय सांख्यदर्शनों के सृष्टि-धिकाश
संबंधी विचारों से नहीं है वरन् इसीले है कि पुरुषसे जीवात्माओं
की उत्पत्ति किस प्रकार होती है जिसका वर्णन हिन्दुभोंके
प्रमाणित शास्त्र योगवाशिष्टमें निन्न प्रकार दिया गया है।
"उस ब्राह्मणके समान जो अपने उच्च पदसे च्युत हो कर
शूर हो जाता है, ईसा ( ईश्वर ) भी जीयमें पतित हो जाता
है। सहस्रों जीव प्रत्येक सृष्टिम चमकते रहेंगे। उस
उत्पन्न करनेवाले विचारके आन्दोलनले जीविकवर प्रत्येक
विकाश अबस्या उत्पन्न होंगे। परन्तु इसका कारण यहां
(इसलोकमें ) नहीं है। जो जीव क्षि ईश्वरने निकलते हैं
और उनी सहानासे उन्नति करते हैं मरने कर्मों द्वारा
वारम्वार जन्म मरणको प्राम होते हैं। हे गम! यह कार्य
कारण का संबंध है जो कि जीवों की उत्पत्ति के लिये कोई
कारण नहीं है तो भी सत्ता और का आपलमें एक दूसरेके
लिये कारण हैं। समस्त जीव धगैरह फारणके ईश्वरीय
पदसे निकलते हैं, मगर उनको उत्पत्ति के बाद उनके कर्म
उनके और सुखके कारण होते हैं। और संकल्प जो
आत्मयोधकी अज्ञानताको मायासे उत्पन्न होता है सब
काँका कारण है।"
हिन्दूओंफा ऐसा विचार एकसे अनेक हो जाने के बारे में है,
और यपि यह विचार सदोप है और उन कठिनाइयोंसे जो
साधारण मानसिक विचारों अर्थात् गुणोंको पक्षसे जिनमें

रखना उस ( ८२) वह पाये जाते हैं प्रथक समझने के कारण पैदा होते है, बचनेके लिये वाहरी उपायके नौर पर है, तो भी इस विचारका मनमें मर्मके जाननेके लिये जो हिन्दुओंके इन्द्रादि देवताओं संबंधी कल्पनाओं में पाया जाता है आवश्यक है। इन्द्र के अपनी गुरुकी पती अहिल्यासे भीग करनेवाली कथाकी व्याख्या करते हुये यह बात जानने योग्य है कि आत्मा का पुद्गलसे समागम नितान्त मना है, क्योकि मोक्षका अर्थ ही एकका दूसरेसे पृथक होना है। इससे आत्माका पुनलमें प्रवेश करना एक वर्जित किया है, और इस कारण उसे व्यभिचार कहा गया है। अब चूंकि पुद्गल बुद्धिके ज्ञानका, जो जीवका शिक्षक है, मुख्य विषय है, इसलिये श्रात्मा और पुद्गलका समा. गम गुरुकी पत्नीके साथ व्यभिचार कर्म हो जाता है । आत्माके पुद्गलमे प्रखण्ड एकताके रुपमे प्रवेश करनेका फल अनन्त जीवोंकी उत्पत्ति है (जैसे योगवाशिष्टके उल्लेखमें वर्णन है) जिनमें से प्रत्येक जीव पौद्गलिक परमाणुओंमे शरीरधारी हो जाता है और माइका अंधकारमयी प्रभावके कारण फोड़े फुरसी. के सदृश होता है। परन्तु यह जीव फिर शीघ्र ही आत्माके ज्ञान और विश्वास द्वारा ( जिसको अलंकारकी भाषामें ब्रह्माजी अर्थात् ईश्वरकी उपासना कहा गया है ) आत्मवोध प्राप्त कर लेते हैं, और फिर पूर्णता और सर्वशताको पा लेते हैं, इसलिये वह नेत्रोंमें परिणत हुये कहे गये हैं।

(८३)
इन्द्रको बावत कहा जाता है कि उसको सोम रसका भी
चहुत शौक है जो मुसलमानो के मतको शराब तहरासे सशता
रखता है। यह एक प्रकारकी मदिग है जो मगन करती है
मगर मस्त नहीं करनी, और जो प्रात्माके स्वाभाविक आनन्द
का चिन्ह है।
इन्द्रका वाहन हाथी है जो विस्तार, और वजमवाला है,
इसलिये पुद्गलका चिन्ह है। इस विचारका सार यह है कि
आत्मा स्वयम् चज फिर नहीं मरती है परन्तु पुद्गलको महा-
यतासे चल फिर सकती है। इस विचारको और भी व्याख्या
स्वयम हाथोके वर्णनमें पाई जाती है जिसके एक सिरसे तीन
सूड निकले हुये माने गये हैं और यह एक विलक्षण चिद है जो
अतंकारक भावको सिद्ध करने के लिये निम्सन्देह गढ़ा गया है
क्योकि तीन सृष्ट पुद्गतके तीन गुणोके धात्रक र मर्यान् सत्य,
रजन व तमस के जो सांख्यमनके अनुसार प्रकृतिके तीन
मुख्य गुण हैं। सोच और विस्तारको शनि जो जीवका मुख्य
गुण है इन्द्रकी प्रशंसा करने पर बढ़ने और शत्री ( पवित्रता या
पुण्य )-से पृथक होने पर अत्यन्त लघु रूप धारगा कर मज
(महनार चक ) दगड (अनुमानत: मेरुदण्ड ) के भीतर धिप
जानेसे दर्शायी गई है।

(८४) फुट नोट नं ५ - केवल थोड़ेसे विचारनेमे यह विदित हो जायगा कि यह दर्शन शास्त्र न तो हर्षदायक तौर पर निर्माण किये गये हैं और न वह वैज्ञानिक अथवा सैद्धान्तिक शुद्धताले लक्षित हैं । प्रारम्भ में ही वह सैद्धान्तिक दृष्टि (नय) वादको भुला देते हैं और बहुत करके प्रमाणकी किस्मों और ज़रायोंसे अपनी अनभिज्ञताको प्रगट करते हैं। उनकी तत्त्व-गणना भी अवैज्ञानिक और भ्रमपूर्ण है। सैद्धान्तिक दृष्टिसे देखते हुये विद्वान् हिन्दू भी इस बातको मानने पर वाध्य हुये है कि उनके छहों दर्शनों से कोई भी सिद्धा. न्तानुकूल ठीक नहीं है । निम्न लेख, जो कि सक्रड बुक्स औफ दि हिन्दूज' की नवीं पुस्तकको भूमिकासे उद्धृत किया गया है, हिन्दू भावोंका एक अच्छा नमूना है:- "वह (विज्ञान भिचु जो साख्यदर्शन पर एक प्रसिद्ध टिप्पणी टीकाकार है ) इस घातको जानता था कि छह दर्शनों में से काई भी... .....जैसे कि कई बार हम पहिले कह चुके हैं पश्चिमीय विचारके अनुसार पूर्वीय सद्धान्तिक ढंगका दर्शन न था बल्कि वे केवल एक प्रश्नो- तरीके सदृश हैं, जिनमें कि सृष्टि उत्पत्ति संवधमें ही वेदों और उपनिषदोंके किली २ सिद्धान्तको तर्क वितर्क रूपमें एक विशेष प्रकारके शिष्यों का बताया है .........उनको संसारके गूढ़ विषयोंको समझाये विना ही, कि जिनको वे अपनी मानसिक और आध्यात्मिक कमियोके कारण समझने की योग्यता नहीं रखते थे।" .

( ) है, मिस्सन्देह भूमिकाकार हिन्दू सिद्धान्तके दोषोको, उसके शिष्यों को प्रपत्र बुद्धिके माधार पर छिपानेका प्रयत्न करता , परन्तु गुरुके पूर्ण भानको सिद्ध करनेवाले हेतुओंकी अनु- पस्थितिमें. वह व्याख्या बुद्धि नहीं वरन विश्वास द्वारा प्रेरित की हुई ही मानी जा मक्ती है । इमको प्रतिपादनकी यथार्थता से कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु मूल सिद्धान्तकी योग्यतासे है,. और स्नके यथेष्ट न होनेके वाग्में तो साफ २ सफवाल है । 'प्रमाण'के उपायों (जरायो) के विषयमे भी इन दम एकात्ता नहीं है । वैशेपिकोंके मतानुसार प्रत्यक्ष और अनुमान (Observation and inference ) ही केवल माननीय प्रमाण है, नैयायिक लोग इन दोनोके अतिरिक्त शब्द (आगम) व उपमा को और बढ़ाते है, और मीमांसक लोग 'पर्धापत्ति' (Corollary or inference by implication ) t Futa 'STE उपलब्धि' (inference by negation ) को भी शामिल करते हैं। परन्तु उपमान ( analogy ) वास्लत्रमें सिवाय एक प्रकार के 'अनुमानामाम' ( fallacy of inference ) के और अब नहीं है, और 'प्रर्थापत्ति' ( corollary ) व अनउपलब्धि सचे न्याय संगत अनुमानमें गर्मित है। शेषके तीन अर्थात् प्रन्यन (direct observation ) अनुवान { inferenc' ) और आगम ( relrable testimony ) साधारणतया मत्यमान के मुख्य उपाय हैं, बावजूद इनके निवोषिक मागमको नहीं मानते है, क्योंकि विश्वसनीय शाती ही उन वस्तुओं के ज्ञान प्रालिका द्वार है जो ( ८६ ) 'प्रत्यक्ष और अनुमान ( perception and inference ) दोनोंसे परे है। विला शुबहा सांख्यदर्शनमें यह तीमो प्रमाण माने हैं मगर वह वेदोंकी अभ्रान्तिको साधारण ही मान लेता है और उसकी अनुमान संबंधी विधियों में उपमान भी गर्भित है जैसे इस उदाहरणमें कि सब आमके वृक्षोंम वौर अवश्य लगा होगा क्योकि एक वृत्तमे बौर लगा हुआ दिखाई देता है (देखो मि० टीकाराम तातियाका अगरेजी अनुवाद प्रकाश किया हुआसांख्य कारिका अंगरेजी अनुवाद पृष्ट ३०)। इस हिसावसे तो एक कुत्तेको दुम कटी देख कर यह परिणाम भी निकल सकता है कि सव कुत्ते दुमों को फटनाते होंगे। अब हम तत्वांके विषयको लेते हैं जिनका ठोक निर्णय लिये 'बिना सिद्धान्त या धर्ममें सफलता नहीं हो सकी। तत्वों का भाव उन्हो मुख्य बातों या नियमोसे है जिनके द्वारा अनुसंधान के विषयका अध्ययन किया जाता है, और उत्तका निर्णय बुद्धि- मत्तानुसार करना आवश्यकोय है अर्थात् वेढंगे तोरसे नहीं परंतु वैज्ञानिक ढंगके फायदा करोनाके मुताबिक, क्योंकि धर्मका उद्देश और अभिप्राय जीवोंकी उमति और अन्ततः मुक्ति में है इसलिये उसकी खोज आत्माके गुणों और उन कारणोके, जो उसको स्वाभाविक स्वतन्त्रता ओर शक्तिको घटा देने हैं और जो उसको सिद्धि प्राप्तिके योग्य कर देते हैं, निर्णय करनेके लिये होती है। सच्चे तत्व इस कारण वही हैं जो जैन सिद्धान्त में वर्णित हैं अर्थात् जीव अजीव इत्यादि ; शेष तो तत्वाभास

(८७)
हैं जो वास्तवमै असत्य हैं मगर तत्वका वस्त्र पहिने हुए हैं।
इन बातोंको मनमें रख कर हम इस बातका निर्णय करेंगे
कि षट् दर्शनोंको कहा तक सच्चे तत्वों का पता लगा। प्रथम
ही सांख्य दर्शनमें निम्न २५ तत्वोंका वर्णन है-
(१) पुरुष (जीव)
(२) प्रकृति, जिनमें तीन प्रकारका गुण, मत्व ( बुद्धि)
रजस्, (क्रिया ) नमस् (स्थूल ) मम्मिलिन हैं।
(३) महत, जो पुरुष और प्रकृति के संयोगले उत्पन्न
होना है।
(४) अहंकार।
(५-१) पञ्च ज्ञान-इन्द्रियां ।
(१०-१४ ) पञ्च कर्म-इन्द्रियां-हाथ, पांव. वचन, लिङ्ग,
गुदा।
(१४-१६) पाच प्रकारको इन्द्रिय उत्तेजना-सश, रस
आदि जो पाच इन्द्रियोंसे सावध रखती हैं।
(२.) मन ।
(२१-२५) पांच प्रकारके स्थूल भूत-आकाश, घायु,
अग्नि, अप, पृथ्वी
इनमेसे पहिले दोनत्य तो सदेयक है प २३ उनके सपो.
गसे विकाश पाते हैं। इस तन्य-गणनाकी योग्यता इस काबिल
नही है कि जिसकी चुदि प्रशंसा कर सके क्योंकि तत्यपन उन

(८८) मैसे पहिले ही.दो में कुछ थोड़ासा झलकता है। काल और माकाश जैसे बड़े मुख्य पदार्थीको यह विचारमें नहीं लाती जब कि साधारण वस्तुओं जैसे कम-इन्द्रियोंको इनमें अलग स्थान दिये गये हैं। इस बातका भी पता नहीं चलता कि उनका चुनाव फिल आधार पर किया गया है क्योंकि इसी प्रकारके बहुतसे भावश्यकीय कार्य जैसे पाचन क्रिया, रुधि का संचालन इत्यादि 'बिल्कुल छोड दिये गये हैं। यह पूर्ण दर्शन फर्म, आवागमन और मुक्तिकी वैज्ञानिक और पूर्णतया वृद्धि अनुसार व्याख्या समझी जाती है तो भी इस विषयमें किसी बानके समझाने का अयल नहीं किया गया है। और आध्यात्मिक विद्याका यह सम्पूर्ण विभाग तत्वोंमे होने के कारण विलक्षण प्रतीत होता है। नैयायिक लोग निम्न १६ तत्वोंको मानते हैं। (१) प्रमाण (२) प्रमेय (१०) घाद (३) संशय (११) जल्प ४) प्रक्षा (१२) वितण्डा (१३) हेत्वाभास (६) सिद्धान्त (१४) छल (७) भषयष (१५) जाति (१८) (१६) निग्रहस्थान • यहां भी एक दृष्टि इस बात के वोधके लिये यह है कि यह तत्व केवल न्यायका ज्ञान करा सकते हैं। परन्तु न्याय (६) निर्णय (५) द्रात ( ८६ ) निस्सन्देह धर्म नहीं है, यद्यपि वह व्याकरण, गणमा और अन्य साइन्सेजकी भांति ज्ञानका एक उपयोगी विभाग है। मगर न्यायके नियमोंको तस्त्र कहा जा सका है तो हमको व्याकरणके अङ्गों-संशा, क्रिया इत्यादि-और गणित विद्याके नियमोंको भी तत्व कहना पड़ेगा परन्तु यह स्पष्टतया वाहियात है। नैयायिक लोग इस कठिनाईसे अपने दूसरे तत्वके अभिप्रायमें बारह प्रकार के पदार्थीको शामिल करनेसे यवनेकी कोशिश करते हैं अर्थात् (१) आत्मा (२) शरार (३) शानइन्द्रिय (४) अर्थ ( जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, गर्भित हैं ) (५) बुद्धि (६) मन (७) प्रवृत्ति (रचन, मन, या शरीर द्वारा उपयोग) (८) दोप (जिसका भाव राग द्वेष, मिथ्या झान या मूदता है) (8) प्रत्येक भाव (पुनर्जन्म ) (१०) फल ( नतीजा या परि- णाम ) ( १९) दुःख ( १२) अपरगे ( दुःखसे छुटकारा )। परन्तु परिणाम पड़ी गड़बड है क्योंकि दूसरा नत्व प्रमेय से सम्बंध रखना है जिसमें समस्त नेय पदार्थ और इसलिये समस्त अस्तित्व पदार्थ अन्तर्गत हैं और इस कारण वह बारह दी पदार्थों पर सीमित नहीं हो सका है। इस भाग (किरम ) चंदीका नियम विरुद्ध होना, इसमे स्पष्ट है कि इसमे अत्यंत आवश्यकीय वातों जैसे प्रास्त्रव, बंध, संगर और निगपर विल्कुल ध्यान नही दिया गया है और ऐसी अपनानश्यकीय यातों पर जैसे स्पर्श रस इत्यादि पर आवश्यकासे अधिक जोर दिया गया है । जल्प, वितण्डा और छलका (जातिको शुभारमें

( 86 ).
.
(५) विशेष
(३) कम
न लेने पर भी) अलग अलग तयोंके तौर पर कायम किया जाना
सरुन मानसिक फूहडपनकी मिसाल है।
वैशेषिक लोग निम्न पदार्थोका उल्लेख करते हैं-
(१) द्रव्य
(२) गुण
(६) समवाय
(७) असाव
(४) सामान्य
परन्तु यह भाग बन्दी तत्व-गणना नहीं है बल्कि,अरस्तू
और मिलके तरीकोंके सदृश एकप्रकारकी विभाग वन्दी है चुनगंचे
मेजर बो० डी० पासूके प्रकाश किये हुए कणाडके वैशेषिक
सूत्रोंकी भूमिकाके योग्य लेखको इस बातको अपना सच्चा
कर्तव्य समझा कि इस दर्शनके दोषों के लिये पाठकसे क्षमा मांगे।
वह लिखता है :-
वैशेषिक दर्शन पदार्थोको एक विशेष और पूर्ण निश्चित
दृष्टि से देखता है। यह उन लोगोंको विचार दृष्टि है जिनके
लिये कणाडके उपदेश बताये गये थे। इस कारण वह एक
उतना पूर्ण व स्वतन्त्र विचारों का दर्शन नहीं है जितना कि
वह वेदिक और अन्य प्राचान ऋषियोंकी जो कणाडके
समयके पूर्व गुजरे हैं शिक्षाकी, उसकी उत्पत्तिके उपकरणों के
लिहाज़से वृद्धि या प्रयोग है।"
वैशेषिकोंको तत्वगणनामा आरम्भ वास्तवमें द्रव्य, गुण,
और कमेकी भागबंदीसे होना कहा जा सका है। द्रव्य नी ।
।

(६१) प्रकारके कहे जाते हैं। (१-४) चार प्रकारके अर्थात् पृथ्वी, अप, अग्नि व वायुके परमाणु (५) आकाश (६) काल (७) दिक (८) जीवात्मा (1) मन । गुण निम्न प्रकारके हैं अर्थात् रूप, रस, गंध, स्पर्श संख्या, नाप, प्रथकता, संयोग, विभाग, पूर्वकता, पश्चान्, समझ, सुख, दुःख, इच्छा, द्वप, और प्रयत्न । परंतु शब्द आकाशका गुण कहा गया है। कर्म पांच प्रकारका है, अर्थात् उक्षेपन ( ऊपरफी ओर फेंकना) अवक्षेपन (नीचेकी ओर फेंकना) आकुञ्चन ( सिकुडना) प्रसाग्नम् (फैलाना ) और गमनम् (चलना )। इस प्रकारको संख्या द्रव्य, गुण और कमकी है जो वैशेषिकों ने दी है, परन्तु वहां भी हमको सच्चे तत्वोंके वर्णनको को कोशिश नही मिलती है। कुल विधि अत्यन्त अनिश्चित और बेढंगी है। सामान्य परिणाम दोषपूर्ण है । कर्मों की भागवन्दी अथहीन और गुणोका वर्णन महा और अनियमित है। घायु, अप अग्नि और पृथ्वी चार भिन्न द्रव्य नहीं हैं. वरन् एकही द्रव्य अर्थात् पुद्गलके चार भिन्न रूप है, और शब्द ईथरका गुण नहीं है चरन् एक प्रकारका आन्दोलन है जो पौद्गलिक पटाौके हिलने जुलनसे पैदा होता है। मनको एक नये प्रकारका द्रव्य मानना भी स्पष्ट रीतिसे युकिसंगत नहीं है, क्योकि जीव और पुदगलले प्रथक् मन कोई अन्य पदार्थ नहीं है। इस प्रकार हिन्दू मिद्धान्त के तीन निप्रसिद्ध दर्शन मंधान हीन युकि रदिन विचारको प्रगट करते है और पूर्ण रोनिसे मगर (६२) न्याययुक्त कहलानेके अधिकारी नहीं हैं। शेषके तीन अर्थात् योग, वेदान्त और जैमिमनीके मीमांसाकी भी दशा इस सम्बन्ध कुछ इनसे अच्छी नहीं है। वह तत्व आधार पर निर्धारित नहीं है और इसलिये उन पर ध्यान देनेकी यहां हमें मावश्यकता नहीं है। निकटस्थ कालमें कुछ लोगोंने अद्वैत वेदान्तको जिसको शिक्षा यह है कि ब्रह्म पदको प्राप्तिके लिये केवल ब्रह्मका जानना ही आवश्यकीय है, अतिशय महत्वपूर्ण माना है । वेदान्ती यह नहीं बता सकता है कि ब्रह्मके जानने परभी वह अव तक ब्रह्म क्यों नहीं हो गया। यदि यह सिद्धान्त वैज्ञानिक विचारके आधार पर अपलम्बित होता तो यह समझ लिया गया होता कि ज्ञान और सिद्धि दो भिन्न वाते हैं, बावजूद इसके कि आत्माके उच्च आदर्शको सिद्धिके प्रारम्भके लिये ज्ञान अत्यन्त आवश्यकोय है । यहां भी हमको जैनमत शिक्षा देता है कि सत्य-मार्ग सम्प ग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चारित्र रूप है परन्तु इनमेंमे कोई भी प्रथक तौर पर मार्ग नहीं है। पतञ्जलि भी अपनी शक्ति को सामान्य बातोंके वर्णनमें व्यय कर देते है और प्रात्माके स्वरूप और बन्धनको नहीं बतला सक्ते हैं और न वह अपने ही मार्गको जिसको वह आत्मा और पुग्दल के अनिष्ट संयोग को दूर करनेके लिये सिखलाते हैं कार्य कारण रूपसे दर्शा सक्त है।

Sanatanjain Dharm

Author
Jain, Champatray
Title
Sanatanjain Dharm
File name
Sanatanjain Dharm
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2009/11
Publisher
Hardoi, Champatray
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344298
Barcode
99999990234170.00
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