Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Meera Loktattvik Adhyayan

Dr. Alam Shah Khan · 2011/03

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मीरा: लोकतात्त्विक अध्ययन

मावरण चित्र साभार
थी गुरेश शर्मा
सघी प्रकाशन
जयपुर उदयपुर

मीरा : लोकतात्त्विक अध्ययन

प्रकाशक विजेन्द्र कुमार सपी
सपी प्रकाशन
सी 177, महावीर माग,
मालवीय नगर
जयपुर
शाखा 53, बापू बाजार,
उदयपुर-313001
मुम्प एप सोपये
पी प्रधान, जयपुर-उदयपुर द्वारा प्रमागिन | प्रपम संस्करण 1989
पनिकामेवाधीन/ोपमा प्रिटर्स मोहन पाक रिम्मी 110032 में मुहिम
MECRA LOKTATTVIK ADHYAYAN
by Dr Ala Suad Abas
Rs 10000

समर्पित
प्रथम गुरु श्री पुरुषोत्तम लाल जी तिवारी
को
इस भावना से-
मेरा मुझ मे कुछ नहीं
जो कुछ है सो तोर।
तेरा तुझ को सौपता
क्या लाग है मोर।
-कबीर

प्रस्तावना मीरा राजस्थानी साहित्य मे एक एसो भक्त हुई है कि जिसका व्यक्तित्व दो बडे राजघराना के वीच सतु घ रहा है । तथापि दोनो मम घिमी न भी उसके व्यक्तित्व मा उसकी भक्ति के दस्तावठी राबूत सहेर वा नही रसे । मौरा की भक्ति गरिमा का अनुमान इसी तथ्य से किया जा सकता है कि अपन जीवन काल में ही गुजरात से वदावन तक और धुर पूरब म काशो और बगाल के बाउला तक उसके पद गाय जाल लगे थे। ऐसा क्या था मीरा की भक्ति म, उसके जीवन की परिस्थितियो और घटना क्रम मे कि एक ठाकुर घरान की व या, मात्र पैतालीस वर की होते होते भावना रूप होकर मत्युजयी बा गयी, कालजयी हो गयी। यह सवाल लम्बे अरस से मन माथे मे घुमड रहा था । अत्त निश्चय किया कि मीरा के प्रामाणिक माने जाने वाले पदो को लेकर एक अध्ययन के द्वारा यह खोजने का प्रयास किया जाय कि विन किन तत्वो विशेषताओ के रहन कोई सत्त, कोई भक्त या वीतरागी अपन देश-काल की सीमायो को लांघ र सवदेशीय और सवव्यापीहा जाता है। यो तो भीरा को लेकर काफी ऐतिहासिक विवेचन हुमा है उसके देशव्यापी पदा को छान कर प्रामाणिव अप्रामाणिक का विभेदीकरण भी किया गया है, उस पर पूर्ववर्ती भक्तो सतो एव पविया के प्रभाव की छाप का पहचानो के प्रयत्न भी किये गये है, उसके परेको काव्य शास्त्र की कसौटियो पर कस कर यह सिद्ध करने की कोशिश भी की गयी है कि वह क्वयिनी थी या नहीं वह भक्त थी मा नही यादि वह स्वयं भी थी या नहीं? इस प्रकार के साहित्यिक ऊहापोह और अनुमानो चक्कर मे न पड कर प्रस्तुत अध्ययन में यह जानन का प्रयास किया गया है कि दो धुरमूलीय राजघरानो म अमरत्व को प्राप्त मीरा जैसे पक्तित्व के जनक होने का गौरव भाव जानबूझ कर क्यो छोड दिया? यह खोजने का प्रयल भी किया गया है कि वे कौन-सी सामाजिक, सास्कृतिक एव मनोवैज्ञानिक गुत्थियां थीं जिनके रहते मीरा के विशिष्ट, अन्तर्मुखी, हठीले और अक्खड़ व्यक्तित्व का गठन हुआ था । तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक-लौक्कि घरातल के साथ मीरा के व्यक्तित्व का समीकरण विठाने का प्रयत्न भी इस अध्ययन में दिया गया है, जिसे अपने ढग वाप्रथम व्यवस्थित प्रयास कहा जा सकता है। मीरा ने व्यक्तित्व को चरण बद्ध करके देखने के इस प्रयास में उसके रचना- कार के स्वरूप को समझने की एक दृष्टि उभरती है, किंतु यहाँ गहराई मे न जाकर उसकी ओर सवेत मात्र किये गये हैं। इस अध्ययाका मुख्य लक्ष्य लोक साक्ष्य में मीरा और मीरा मे लोक साक्ष्य की तलाश है। साथ ही यह भी देखना है कि मध्यरालीन वजनाओ मर्यादामो से बंधी एक राजवधू, वह भी विधया धागो बन कर लोक मे ऐसे कैसे रलमिल गयी कि मीरा म तोर और लोक म मीरा मूत हो उठी । वस्तुत मीरा हिंदी देश की प्रथम जन-कवयित्री है और उसका काव्य कबीर के साथ, प्रथम जन काव्य । इसलिए प्रस्तुत अध्ययन मे शास्त्रानुगमन एव चितन नही है, यदि कुछ है तो लोक धतातल पर मीरा काय्य की परख का प्रयास । भाशा है, इससे मीरा को समझने की एक और दिशा मिल सकेगी। --आलम शाह खान 15 अगस्त, 1987 'आँगन छाया 23, सुदर वास (उत्तरी) उदयपुर-313001 (राज.)

विषय सूची 924 14 18 25-38 25 1 मीरा एव उसका युग मेडता--प्रादुर्भाव उत्यान और सघप युग मेवाड-प्रतिष्ठित गुहिलवरा और मीरा कालीन राणा 2 मीरा पारिवारिक परिवेश मेवाड और मेडता का तत्कालीन परिवेश 3 मीरा लोक साह के अवसर 4 मीरा व्यक्तित्व मीमासा बाह्य साक्ष्य पारिस्थितिक समीकरण 5 मीरा काव्य लोकसात्विक अध्ययन (1) धार्मिक तत्त्व (2) सामाजिक तत्त्व (3) लोक सस्कृति के तत्त्व (4) शैली तत्त्व उपसहार 3948 4964 48 60 65-184 6 124 163 174 सदभ सकेत 185189 191 1 मीरा एव उसका युग पृष्ठभूमि अजमेर दिल्ली के चौहानो, कनौज के गहरवालो, गुजरात मालवा के सोलकियो परमारो का पतन होने पर 15वी सदी के अतिम चरण मे मारवाड- मेवाड मे राठोडो गुहिलो का वचस्व बढ गया।1(5) इन दो राजपूतवशो के जोर पकडने का यहपरिणाम हुआ कि दिल्ली सुलतानो की राज्य सीमा सिकुड गयी और यह स्थिति आ गयी कि, "राजधानी दिल्ली के पश्चिमी दरवाजे दोपहर की नमाज के बाद बद कर दिए जाते थे। उसके बाद उस ओर से न कोई शहर म आ सकता था न बाहर जा सकता था, उस नमाज के समय मेवाती लोग बहुधा सरे हौज पर आ-जाते थे और पानी भरने वालो के बतन-कपडे तक छीनकर ले जाते थे।2(105) मेवाड के महाराणा कुभा (विक्रमी 1525 मे मृत्यु) और राणा रायमल की (विक्रमी 1565 मे) मृत्यु के समय गुहिल राणाओ के लिए 'हिन्दूपत पातशाह', "हिंदुवा सूरज', 'परमेश्वर', 'राजेद', जैसी उपाधिया अभिलेखो मे आती हैं, 3(13) जबकि जोधपुर और मेहता के राठोडो के लिए 'राव' की उपाधि लगती थी 14(22-23) अर्थात पश्चिमी भारत की राजनीतिक मर्यादाएं इस तरह से गुंथ चली थी कि गुजरात मे पठान शासक 'सुल्तान' हो गए थे, मालवा में भी वे 'सुलतान' हो गये थे, मेवाड मे 'महाराणा' थे जो वस्तुत अपने को 'दीवाण' कहते थे, मारवाडमे 'राव' थे और धुर पश्चिम मे भाटी राजपूत भी 'राव' कहलाते थे। बीच के छोटे-मोटे सामत, जागीरदार, ठिकानेदार कोई राव' कोई रावराजा, कोई रावल, कोई 'सरदार' कहलाते थे। सम सामयिक गुजरात राजस्थान की सास्कृतिक भूमिका कुछ इस तरह की थी।5(89) (1) राठौडो तथा गुहिलोतो का मूल स्थान गुजरात, काठियावाड, मे था और कम से कम 18वी सदी तक गुजरात राजपूताने की सास्कृतिक और भाषातात्विक विशेषतामो मे समता मिलती है 15(8) हमें पता है कि 8वीं विक्रमी मे वप्पा रावल 10/मीरा लोकतात्विक अध्ययन ने भेदपाट का इलाका जीतकर गुहिलोत राज्य की नीव डाली थी। जो अगले 700 800 वर्षों में फैलकर इतना बड़ा हो गया था कि उत्तर में वह आगरा को छूता था पूर्व मे अजमेर-श्रीनगर वो पश्चिम में बदायू को और दक्षिण म गिरनार की सीमा छूता पा। उस वश की अद्वितीय प्रतिष्ठा थी और इता मान था कि पडोसी राजा और राजपूतवश के लोग नजराने में महाराणा को अपने कुल के 10,000 50000 सिर नजरान मे देने की प्रतिज्ञा करते थे। 1(32 32) हमे यह भी पता है कि राव सोहा ने पवारोक भण्डारे को जीतकर जिम राठौडी राज्य की स्थापना की थी, वह 200 300 वर्षों मे गगानगर से सिरोही और ईडर तक फैल गया था और इस तरह से पश्चिमी भारत के पूरे माग पर राठौडा का नियत्रण हो गया था। दिल्ली और गुजरात के बीच मालवा होकर जाने के अलावा सारे रास्ते पाता गुहिलोता या राठोडों के राज्यो में से होकर जाते थे। ये रास्ते सदा व्यापारियो, साधुसतो, शिल्पियो और अश्वविक्रेताओ से व्यस्त रहने वाले माग थे जिन पर राठौर घशी छोटे मोटे रावल, लोगो की रक्षा भी करते थे और अवसर पड़ने पर लूटमार भी करते थे4(38) (2) राजपूती जीवन सदा तलवारो की सकारो के बीच, घोडा की पीठ पर और युद्ध तथा सघर्षों के बीच बीतता था। पर पर रहना, सामाजिक या धार्मिक कामो मे मन लगाना न ता गुहिलोता म प्रमाणित है, न राठोडो में। छोटे मोटे जागीरदार, सूबेदार या ठिकानेदार कभी-कभार आलस और अमल पानी का सुख उठा लेते थे 5(36-37)। राजपूती वीरो की दिनचर्या इतनी युद्ध सकुल होती थी कि उन्हें स्त्रियो और उनकी गतिविधिया पर व्यक्तिगत ध्यान देने की फुरसत्त ही नहीं होती थी। उस समाज मे राजपूत घराने की पलियां या तो नजराने मे आई हुई भेंट होती थी या फिर युद्ध और सधि के नतीजे में आई हुई 5(89)। उनके साथ दावडियो, दासियो वे ज ये भी हुआ करते थे और इस तरह की स्त्रिया से बह सामता और राजामा के अन्त पुर भरे रहते थे, जो मापस म एक दूसरी की भाषा भी नहीं समझ पाती थी। खुद महाराणा सागा को 27 रानियाँ पी 1(87), जो हाडा, राठोड, चौहान, सेराह, देवडा, तवर, सोलकी, वागडिया चौहान, साकला, ईहरिया राठौह घरानो से यौ।जिम राव, राजा मोर महाराणा का जितना शौय और प्रताप होता या उसके अन्त पुर मे लियो की उतनी ही भर- मार होती थी। बताया जाता है कि राजपूता का पारिवारिक जीवन लगभग शून्य होता पा। किसी राव या राजा को जब अपने महलो में रात बितानी होती यौ तो अन्त पुर के रक्षा से पता किया जाता था कि किस रानी के यहां समय बिताया जा सकता है ? तदनुसार सूचना होती थी और उस रानी के महल म चहल पहल हो जाती थी। दासियां कासा बनाती थो, समय होने पर सरदार वहां पहुंचते, मीरा एव उसका युग/11 जीमण चाटण, पासा चौपड होता और मनोरजन का वातावरण बनता था5(37)। रानियो का पद और गौरव राजनीति और युद्ध के वातावरण से बधा रहता था। वे रानियां अपने निर्वाह और व्यय के पृथक साधन भी रखती थी-अपने पास आभूपण, नकदी, होरे, जवाहरातो का सचय करती रहती थी। ताकि वक्त- जरूरत काम आए 5(38)। ऐसे प्रमाण भी हैं कि जब ससुराल मे निभाव न हो सो पीहर वाले अपनी क या के निर्वाह की व्यवस्था करते थे। राणा सागा की एक बहिन आनदाबाई का विवाह सिरोही के राव जगमाल के साथ हुआ था। उसका वहीं निभाव नहीं हुआ तो सागा के भाई पृथ्वीराज ने 1566 विक्रमी मे जगमाल को अपमानित करके उसे अपनी बहन के चरण चूमने को मजबूर किया या 1(39 40)। उसी तरह पृथ्वीराज गिरनार के यादव राजा मढलीक के यहां से अपनी बुमा--रमाबाई-~को मेवाड ले आया था और उसके निर्वाह के लिए 'जावद का परगना निर्धारित किया था।1(30)। इससे पता लगता है कि राजपूत राज घरानो मे रानियो की प्रतिष्ठा और मर्यादा स्थिर नहीं होती थी। अपनी सतान के लिए कई बार उहे कूटनीतिक- योजना भी करनी पडती थी। हाडी रानी करमैती ने इसी तरह योजना करके अपने पुत्रो-विक्रमाजीत और उदयसिंह-के लिए राणा सागा से रणथम्भौर का इलाका निर्धारित करवा लिया था और मेवाड की कुल परम्परा के विरुद्ध अपने 'भाई सूरजमाल हाडा को उनका सरक्षक बनवाया था। (17-18)। ऐसे प्रमाण भी है जहां राव या राजा के साथ वीर पली युदरत भी रहती थी। सागर के भाई पृथ्वीराज का पूरा जीवन घोडे की पीठ पर बीता था और उसकी पत्नी 'तारा' उसके साथ हर युद्ध मे साथिन रही थी 1(40)। बल्कि 1566 विक्रमी मे वह उसके साथ सती भी हुई थी 1(40)। अर्थात् 16वी सदी मे राजघरानो की रानियो के दो स्पष्ट कतव्य थे। एक तो यह कि वे अपने महल मे अपनी दसियो, दावडिया और सेवको के साथ अपनी मडली बनाकर मर्यादा मे जिए और जैसी राजनीतिक स्थिति हो वैसा गौरव या अवमानना सहें अथवा यह कि वे राजनीतिक दाव पेंचो का सचालन करें या पति गृह त्यागकर पीहर में रहे। पहले उदाहरण मे नि यानवे फीसदी रानियो की गिनती हो सकती है, परतु दूसरे उदाहरण मे गिनीचुनी महिलाएं आए गी जैसा कि मेवाड की हाडी रानी करमंती या सीसोदिन रमाबाई या आनदाबाई 1(29, 30,40)। (3) सोलह्वी सदी के गुजराती राजपूती समाज मे पुत्रियो का जम नरक भाग के समान माना जाता था 5(123)। पुत्र जम पर चारो ओर से बधाई और नजराने आते थे मगर पुत्री के जम पर सब ओर मौन छा जाता था 5(121)। तथापि, राज-कुलो मे पुत्री के पालन पोषण और शिक्षा-दीक्षा मे कसर नहीं रखी 12/मोरा लोकतात्विक मध्ययन जाती थी। उहें कुल-मर्यादा, मषित, संगीत, नृत्य और शस्त्र-पौशल की शिक्षा पुत्रो के साथ और उनके समान ही दी जाती पी। राजपूती परानो मे क पाओ की शिक्षा पुरोहित के सुपुद की जाती थी और ध्यान रखा जाता पाराजकुला की मर्यादा ये अनुकूल उनकी तैयारी हो 5(123)। स्वय मीरा के लिए गूजर गौह पहित गजाधर को नियुक्त किया गया था और वह तपा उसका परिवार, विवाह से बाद, मीरा के साथ चित्तोह भी गया पा- थो चित्रकूट मुरलीधर नाम मूति- सासन द्विज राज गजाधराय । प्रददाति मीरापत्यु स्वस्ति अथ वामा तस्या वय कुल जन प्रथमो हि व्यास 117(68) पह पहित मीरा को सगीत, वाद्य कपा, पुराण, भजन, आदि सिपापा करता पा और मीरा के निज मदिर में पूजा पाठ किया करता था। राज-कुल के चारण भाट, बच्चो को पूवज क्या और पारिवारिक नात रिश्तो की बातें सुनाते थे 4(185) घराने की बूढ़ी दासिया, विधवा रानियां अपवा रिश्तेदार महिलाए, मलो मे बच्चो की देख रप करती थीं और उहैं पूजा की कहानियां सुनाया करती थी। एसे प्रमाण हैं कि महलो म पुत्रो का आवागमन प्रतिवधित रखा जाता था जबकि कयाओं के आवागमन पर उतने प्रतिबंध नहीं होते थे। राणा रायमल के पुत्र पृथ्वीराज का भावागमन सीमित पर दिया गया था, रानी फरमंती ने अपन पुत्र विश्रमाजीत और उदयसिंह को चित्तौड मन रखकर रणथभौर मे रखवाया था, मगर रायमल को कन्या मानदाबाई पूरे चित्तोड क राज-परिवारो म निद्वन्द घूमती थी। आज भी राजपूताने म क्याएं नाते- रिश्तेदारी में स्वतत्रता से आ जा सकती हैं । किन्तु राजपूत परिवारो मे पुत्रो का निदआवागमन नही हाता । उन पर रक्षात्मक नजर रखी जाती है। (4) राज परिवारा म पिता की अपेक्षा माता का स्थान अधिक आदरणीय और रक्षात्मक होता था। अपने पुत्रो के भविष्य की चिन्ता माता को होता थी 3(121) जबकि वयाओ की चिता पितृव्य जन करत थे क्योंकि उन्हें राजनी- तिक मोहरो के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता था। (5) सती हाना और निविरोध समपण मे रहना राजपून रमणी का परम धम माना जाता था 5(125) यद्यपि सती होने का कही दुराग्रह नहीं मिलता। वह भावनात्मक आवेश की बात होती थी कि सत का आवेग दासियों और रखैलो तक को हो जाता था। जो रानी विधवा होकर जीवित रहना चाहती थी उसके लिए कठार नियत्रण होत थे। 5(127) राजस्थान की सवर्ण प्रथा मे विधवा को आरम के 9 महीने तक खुणे' मे यानि घर मे रिसी अधकार युक्त स्थान पर रहना होता था। उस अवधि में कोई भी उसका मुख दशन नही करता था, उसे भूमिशयन और मीरा एव उसका युग/13 रूखे भोजन पर जीवित रहना होता था। उसके बाद उसके पीहर वाले उसका शोक भग करते थे, उसे पीहर ले जाते थे। देव-दशन और तीय प्रत इत्यादि करके वह वैधव्य भोगने को तैयार होती थी। बाद मे वह अपने ससुराल मे जीवन यापन करती थी । यदि वहाँ समायोजन नहीं हो पाता तो पीहर वाले उसके निर्वाह की व्यवस्था करते थे 5(128)। राजपूती घरानो मे साल भर कोई न कोई उत्सव, पव, व्रत आदि की गहमा- गहमी रहा करती थी और उस माध्यम से सारा रनिवास राग रग मे मगन रहा करता था। तीय मेले, दशन आदि भी उनके लिए अभियानिक महत्व के होते थे 5(132)। उनका उपयोग और भजन के लिए, शक्ति सतुलन के लिए, या लूट- मार क्या हरण, दप-दलन जैसे कामो के लिए होता था । उनमे राजघराने अपने प्रतिष्ठा चिह्नो के साथ, रनिवास के साथ, जाया करते थे और बल-प्रदशन करते थे (वगणावत महागाथा) जहाँ राज परिवार बसता था और राजधानी होती थी, वहां हर तरह की प्रवत्ति के केद्र होते थे। उसी तरह हर प्रसिद्ध तीर्थ स्थान पर हर राज्य और शक्तिशाली सामतों के स्थान होते थे 5(143)। वैसे स्थान आज भी हर तीर्थ स्थान और हर पुरानी राजधानी मे मौजूद हैं चाहे उनके स्वामी अब नहीं हैं । द्वारिका और गिरनार के आस पास, व दावन और मथुरा मे, पुष्कर म, उज्जयिनी और बदरगाहो पर बहुत चहल-पहल रहती थी और हर शक्तिशाली राज्य के वहाँ अपने स्थान होते थे। (8) गांवा, शहरो और राजधानियो मे बस्ती को बसावट इस तरह से होती थी कि केंद्र मे राजमहल और उसके चौतरफ घेरो मे सामत, मत्री, ब्राह्मण, ध्यापारी आदि तथा बाहरी छोर परकमीन, शूद्र आदिबसे होते थे 5(146 47)। दिले के पास रक्षक और विश्वसनीय लोगो को बसाया जाता था । बस्तियों जाति बद समूहा मे बसती थी। हर जाति के अपने त्योहारो, उत्सवो का आयोजन राजाज्ञा से होता था, मगर धार्मिक आयोजनो पर पाबदी नहीं थी। जब कभी राजाज्ञा से कोई आयोजन होता था तो उसका खर्चा विशेष कर लगाकर निकाला जाता था 3(148-49)। तदनुसार राजमहला मे आयोजित आराधना, पूजा, पाठ, यज्ञ हवन सत सम्मेलन आदि के व्यय का भार प्रधान और मत्री जनो पर पडता था । उहे सब व्यवस्था पहले से या बाद मे करनी पड़ती थी। (9) राज्य की गतिविधियो प्रशसा नि दा, स्थिति, प्रतिष्ठा, निबलता, सवलता धम रुचि आदि का प्रचार करने वाले साधन औपचारिक नही थे, न उन पर राज्य का कोई नियत्रण होता था 5(153) साधु सत चारण, भाट पुरोहित, बजारे, व्यापारी, नाई आदि चाहा अनचाहा प्रचार किया करते थ और स्वभावत यह प्रचार प्रवादो, अफवाहो, किंवदतियो के रूप मे फैलता था। यही कारण है कि 14/ मीरा लोक्तात्विक अध्ययन यहाँ के ऐतिहासिक लेखे तथ्यो और प्रमाणो की अपेक्षा किंवदतियो पर अधिक निभर हैं और उनम अति रजना अथवा अवमानना के तत्व मौजूद होते हैं । जना. पवाद और किंवदतिया पर राज्य का नियरण सभव भी नही था क्याकि राज्यो और जागीरो की सत्ता स्थिर नहीं होती थी। सत्ता, अधिकार और जीवन तपा प्रतिष्ठा सब कुछ काल की तरह गतिमान था। ऐसे म किसी लोकापवाद को रोकना या नियनित करना राज्य के वश की बात हो ही नहीं सकती था। बजारो का आवागमन और व्यापारिया के सचरण म इन लोकापवादो का बड़ा महत्व था। 16वी 17वी सदी विक्रमी मेजबकि राठौरो गुहिलोतो के प्रगाढ सम्बध थे और माग सुरक्षित थे तव बजारो के काफिले गांव-गाव पहुंचते थे 4(164), मगर उससे 50 वप पहले जब राठौर लूट मार मे व्यस्त थे और पश्चिमी क्षेत्र में अशाति थी तब सैनिकों के लिए आटा मिलना भी मुश्किल हो गया था 8141- 42), प्रजा तक राज्य छोड़कर चली जाती थी। मेडता प्रादुर्भाय, उत्थान और सघय का समय मेडता कभी आदि शहर था--- -पौराणिक राजा मा धाता का बसाया हुआ। 8 (37) बाद में यह चौहानो के आधिपत्य मे रहा था। 14वी-15वीं सदी विक्रमी में यह अचल उजाड रहा । अत सारा प्रदेश धने झाड-शवाहा से भर गया था 8 (37)। नागौर के चौहान कभी कभार वहां शिकार करने के लिए डेरे लगाते थे। राव जोधा ने जब सवत 1515 वि० मे जोधपुर बसाया तब परम्परा के अनुमार भाइयो और पुना को धरती बांटन का विचार किया। अपने दो सहोदर पुत्रावर्गसंघ और दूदा-~~को उसने मेडता का उजाड इलाका बसाने के लिए लिया। तदनुसार उहान वतमान मेडता नगर की स्थापना सवत 1518 मे चत्र सुदी 6 को हस्त नक्षत्र में की 8 (39)। उस अनबसे क्षेत्र में लोगो को बसान के लिए राठौडो को नागौर पाली, फलोदी बीकानेर, अजमेर आदि स्थानो से राजपूतो, जाटो तथा अ य जनो को लावर बसाना पड़ा 8 (3941)। तत्कालीन आवश्यक्ता और राठौड परम्परा के अनुसार राजघरान और प्रजावग के बीच शासक शासित का वैसा नाता नहीं हाता या जैसा कि गुजरात, मालवा या मेगाह के स्थापित राज्या मे था 9 (97)। वे अपेक्षाकृत उनके निकट होते थे और उनमे सुख दुख की बधी हुई भागीदारी हाती पी। खेती म, नई जमीन तोडने म पानी की व्यवस्था म, आसपास के क्षेत्रो को लूटमार मे सब निस्सकोच भाग लेते थे। वैस भी मेहता का क्षेत्र वम वर्षा और मावागमन को कटिनाइयो के कारण उजाह पहा हुआ पा पद्यपि वह मारवाड शारभरी, अजमेर, जालोर, सिरोही के चीच महत्त्वपूण केद्र था 8 (40)।

मीरा एव उसका युग/15 तत्कालीन जोधावत, राजा कम और योद्धा अधिक थे तभी वि० स० 1550 तक बीकानेर से लेकर अजमेर तक, उधर जालोर-बाडमेर तक और दक्षिण में ईडर तक उनका वचस्व फैल चुका था 10 (126, 236)। राजघरान और सामत- भूमिधरो के साथ-साथ अय जनों के निरतर सम्पक सगत के लिए भक्ति, कीतन, पव, उत्सव, मेलो का आयोजन मेडतियो की विशेषता थी 9 (99 100)। मेडता राज्य की स्वतत्र सत्ता मे, उसके विकास और उत्थान मे, तीन पीढियो -दूदाजी वीरम दे और जयमल--का योगदान रहा था। 9 (97-137)। मेडता बसाने मे मुख्य भूमिका दूदाजी जोधावत की थी यद्यपि वह दो सहोदर भाइया की सम्मिलित जागीर यो 8 (38-39)। मेडता बस जाने पर दोनो भाइयो मे अनबन हो गई जिसके कारण दूदाजी धोकानर जाकर रहे 8 (4445) और वापस तब आए जब बरसिंघ का परलोक वास हुआ 8 (46)। दूदा मेडतिये का और उसके पुत्रो का मेडता पर स्वत्व कभी निर्विवाद और निविरोध नहीं रहा। अत उन परिस्थितियो मे उनके पारिवारिक जीवन और सामाजिक परम्पराओ मे हम स्थिरता और अविचलता की वैसी कल्पना नहीं कर सकते (12) जैसी कि जोधा घराने में थी, गुहिल धरानो मे थी या सोलकी घरानो मे थी। हमे मानना होगा कि विक्रमी 1550 से 1560 तक के अपेक्षाकृत शात समय के अलावा मेडतिया दूदाजी, वीरमदे एव जयमल को कभी स्थिर रहने का अवसर नही मिला होगा। यही समय मीरा के जम और पालन पोषण का समय था 9 (67)। मेडते का राज्य कभी शात नहीं रहा । स्थापना के कुछ समय बाद दूदाजी को बीकानेर और शेखावाटी की तरफ रहना पडा। बाद मे जब वे मेडता वापस आए तो सखाड की तरफ रहने को बाध्य हुए । ढलती उमर मे मेडतावास किया तब तक उनके सहोदर बरसिंघ जोधाणा के पौत्र और राव सीहा के पुत्र राव जैसा गागा और भोजा से उनके बैर पड गए 8 (47) । तब से लेकर सवत् 1590 वि० तक मेडता और जोधपुर के रावो के वीच सघष बना रहा-~~जब तक कि वीरमदे दूदावत ने मेडता से पलायन नहीं किया और बाद मे उसका पुत्र मवाड का सूवेदार होकर न चला गया 1 (41)। वि० सवत् 1518 मे स्थापित मेडता सिफ 70 वष तक येनकेण प्रकारेण ।मेडतियो के हाथ मे रहा, वह भी निर्विरोध नही । सदा अशात और सदा युद्धरत जीवन के कारण यह सहज अनुमान हो सक्ता है कि दूदा और उसके वशजों को कभी घर परिवार की सुध लेने का समय मिला हो, यह सभव नहीं। राज्य कुल की और वश परम्परा की जैसी विशेषताएँ और मर्यादाओ के बधन गुहिलोतो मे विकसित हुए थे वैसे मीरा के कुल में हुए होगे, ऐसी सभावना नहीं लगती। कहा जाता है कि दूदाजी के पांच पुत्र थे--क्रमश वीरमदे, रतन सी, राय- मल, रायसल और पीवाण 11 (42)। इनमे से प्रथम दो के बारे में तो सूचनाएँ 16/भीरा लोकतात्विक अध्ययन -मिले मिलती है. मगर बावी तीन के बारे में कोई विगत प्राप्त नहीं है। मोरा में पिता रतन सी को दूदा की तरफ से 12 गाँव-जिनमे सबसे बड़ा दुयी या- हुए थे और उनकी देखरेय तपा मीमारदी में उसका पूरा जीवन पर गया। वे सदा ही गुहिलोतो को विविध अभियानो मे साथ देते रहे और मन्तत धानवा ये युद्ध म वि० सवत 1584 मे शाम पाए। इतिहास इस बात का गवाह है कि मेवाड़ के राणा रायमल के पुत्र सांगा को अपना प्रारभिक जीवन देशाटन और गुप्त वास करके बिताना पहा था। पम से कम वि० सवत 1566 तक वे श्री नगर (अजमेर) की ओर गुप्तवास पर रह थे ! (40), तभी उनका सम्पक और सम्बध दूदाजी एप रतन सी से हुआ होगा । वीरमदे के साथ सागा की वहिन गोरज्यादेवी का विवाह हुआ था। (39) और वीरमदे के भाई रतन सो की पुत्री और वोरमदे की पालिता मीरा का विवाह राणा सागा के पाटवी पुष भोजराज के साथ हुआ था 11 (80) । यह विवाह सम्बध निश्चित रूप से मेहता और मेवाड घनी सागा के पूर्वकालिक मम्बाघो कागजनीतिक परिणाम था। निश्चित रूप से राठौर अपनी दुदम युद्धपाक्ति, निष्ठा और समपण भी विशेषताओ के लिए विख्यात थे। कहावत है~~"जान गऊदा, मरण रा दूदा' 46 (7) सागा से पहले भी गुहिलोता तथा राठौरो में राजनीतिक और वैवाहिक सम्बध थे 9 (101) और वे सम्बध सागा के समय इतने प्रगाढ हुए विचित्तोड के कई अभियानो म और सकट के समय राव वीरमदे तथा जयमल गुहितोतो के स्तम्भ बनकर काम आए थे 11 (42) जयमल ना अक्यर के चित्तौड आक्रमण मे अपनी अदम्य वीरता की छाप छोड गया था 11 (42)। तत्कालीन राजनीति में वीरता और अदम्य साहस ही राजपूती मान-मान के आधार होते थे। राजनीतिक दष्टि से राठौरो का मध्य-पश्चिमी भारत पर- दिल्ली से लेकर बीकानेर, शेखावाटी, मेहता, नागोर पाली, सिरोही तक अखड प्रभाव होने से वैमे भी उनकी प्रभुता मित्रता योग्य थी, फिर उनकी वीरता, पहलशक्ति और दुदमनीय साहस किसी को भी शत्रुता से बचन मे सहायक था। यपि उनमे मातरिक सघध कम नहीं था 4 (38) फिर भी वे भीतर-बाहर सब ओर अपना डका बजाते रहे और टूटे तो आपसी वर से ही टूट। मगर, विश्मी 1518 से लेकर 1588 तक के समय मे तो वे दुर्जेय ही कहलाए । (40411 अवश्य ही वि० स० 1590 में मेडता के पतन और वीरमदे के मेडता छोडबर चले जाने के पीछे पारिवारिक सघप को टालना एक कारण पा और भेडता को दुगबद्ध न कर रखना एर दूसरा कारण था 3 (143)। और यही वह समय था जब मोरा वित्तौड से रूठकर मेहते आई थी। निश्चित रूप से उसे अपने मौरा एवं उसरा पुग/17 माई मतीनोंरे साप मेरवा होरर मरमेर गेयावाटी तर भटकना पग होगा। गरि एरबार सरोवर रे मालदेव । मेला र अधिकार र मिपा वोपन मेड़तियों के मरम, मावाग, पोरिपा सय नष्ट परम मंदा पर दिया था और यहाँ मूनों को गती रपाई पी4 (7071)। प्रतिहिंसा उनमे इसनी तोषी होती पीरिये अपने पूर्वी या भाइमों तर वियर नहीं रखते पे। ऐसे गमान में मनापा, भागपा, पुपरप, पारसस्य बाहिरी सपना पता पठिन ही है। पिरस मोईरान-परिवार दर-दर हो और अपने अस्तित्व में मिए मागमारा फिरता हो तो उसरा मानस किसी अपापिसका योस सहन परगा, यह मानना और भी रठिन काम होगा 13 (74)। ऐसे में यदि पोरमदे और यमन मोरागो पारसत्य और सतार 7 दिया हो तो इसमें उनका दोप मानना गरे प्रति अमाप पहा जाएगा। एर चार पर महतिया वीरमदे रे पर मपनी धरसी मे उपरे तो 14 परस सर ये मारे-मारे पिरते रह । परिवार तितर बितर हो गए, जिसराना सिर रामाया यह यहाँ शरणागत हो गया और मासदेव 14 परग तर पीरम देने पीछे-पीये मगा रहा 4 (72)। सारंगा वि० संवत 1318 म राप दूदान जिस मेहता राज्य की स्थापना गी, उसपी यसायट के लिए जिस उद्दाम-नौति थी पासना भी उसमे जनता ये साप निकटता माई पारा, अपनाया और भमितभायना की निच्छलता पो । यहाँ रसने वाले अधिकतर सो जाट परियार थे जि पिकी सगन ज्यादा थी। जो राजपूत पे वे प्रतियट और निष्ठावान पे सभी राय मीरमदे , रतन सी और उनये सभी भाई गिरतर युदरत रहते थे। राणा सांगा उनकी अदम्यवीरता और निष्ठा के प्रति आग्यस्त थे। अमेसे पौरपदे ने उनरे साथ 18 युदों में भाग लिया था और पानवाये युट मे घायल सागामी प्राण रक्षा की थी 11 (42) 1 मीरा ये पिता राव रतन सी उसी युद्ध मे वि० स० 1584 में पाम आए थे। मेहता या राज्य अपनी स्थापना के बाद शांत और स्पिर कभी रहा नहीं। सदा युद्ध की छाया पो तरफ महराती रही, जोधपुर पराने से सदा अधिकार का बात यना रहा और पडोस मे अजमेर और दक्षिण में गुजरात से घुसपैठ भी होती रही। भीतरी समस्याओम अभाल की समस्या अवसर बनी रहती थी, तब रतन सी और धीरमदे को विशेष अभियान भी परने पहते थे। वि० सवत 1542 एवं 1547 में भारी अकाल पडे थे 4 (186) । मेहता का विकास सदा अवरोधित रहा, इसमे सदेह नही और राव दूदा का परिवार सदा भीतरी-बाहरी मोरा के समय-सवत 1555 से 1603 तफ-को केन्द्र बनाकर देखें तो कह सकते हैं कि इस अवधि के आरभ म तो मेहता को राव दूदा और धीरमदे ये अपूर्व उत्साह और वीरत्व का वरदान मिला हुआ था। राव दूदा अपनी ढलती समस्याओं से जूझता रहा।

18/मीरा लोकतात्विक अध्ययन . अवस्था मे मेडतावासी होकर रह रहे थे, जोधपुर की ओर का आतक शिथिल पड़ा हुआ था और अजमेर का शाही प्रतिनिधि शात था। मेडता होकर जाने वाले मार्ग प्रशस्त थे और मडतिय राजपूत सीमाओ पर चौकस थे। कम से कम वि० सवत 1570 तक शाति का वातावरण था, जन जीवन सामान्य था और बीकानेर, नागोर, शेखावाटी के साथ मेडता के सम्बध सौमनस्यपूण थे। वि० सवत् 1570 के बाद, मेडता पर जोधपुर की कुदृष्टि गहरी होती गई, राव दूदा का अतिम काल (म० 1572) आ गया, मेवाड के राणा सागा के व्यापक अभियान शुरू हो गए और मालवा तथा गुजरात के बादशाह भी सत्रिय हो उठे। देश की राजनीतिक गतिविधियो मे अभूतपूर्व मोड आने लगे। पश्चिम की और भाटियो और तुर्को की हलचलें भी बढने लगी और मेडता के साथ जोधपुर के सम्बध कटुतापूण होते चले गए । इधर जव मेडतिये महाराणा सागा की पोज के साथ एक सशक्त सगठन बनाने और पूरे पश्चिमी भारत को अक्षुण्ण रखने के प्रयत्नो मे लगे हुए थे, तब उही क कुटुम्बी उनकी जड़ें खोदने का काम कर रहे थे। वि० स० 1572 से लेकर 1584 तक का समय मेवाड और मेडता की दोनो शक्तियो के लिए अपने अस्तित्व के सघष मे नगे रहने और दिल्ली, गुजरात और मालवा की राजनीति की काट करने का विकट समय रहा था। उसका अवसान सागा की मृत्यु राव रतन सी के खेत रहने और मेवाड धरान के विध्वस मे हुआ। मेडता के दुर्दिन भी मडरा रहे थे जो स० 1590 मे उसके पतन का परिणाम लेकर आए जबकि मीरा उसी समय कभी स० 1589 मे मेवाड त्याग कर वहा आई थी । वह विनाश भी ऐसा था कि मेडतियो के भवन बावास, सब नेस्तोनाबूद कर दिए गए, सिवाय चार भुजा के एक मदिर के सब नष्ट हो गया था। मेवाड प्रतिष्ठित गुहिलवश और मीरा कालीन राणा गुहिलो का राजवश मेडतिये राठौरो की तुलना मे प्राचीनतम माना जाता है । इस वश की स्थापना विक्रमी स० 512 मे कही जाती है ।1(2) जब कनौज पर हप वधन का राज्य था तब मेवाड मे शिलादित्य की आन फिरती थी। कहा जाता है कि मेवाड से पहले गुहिलो का उदय गुजरात कच्छ-बनासकाठ मे हुआ था।1(2) राठौरा का अभ्युदय भी उधर ही हुआया। तुजुके जहागिरी वे मुताविक मेवाड के राजाओ का राज पहले पूर्व मे था। उस समय उनकी पदवी राजा की थी, बाद मे वे दक्षिण में गए और रावल कहलाए । वहाँ स मेवाड के पहाडी प्रदेशो म धीरे धीरे बढकर उन्होने चित्तौड ले लिया। यहां से उनकी पदवी महा- राणा हुई। 15 (73) जहाँगीर के समय इस घटना को 1421 वप हो गए थे। ऐतिहासिक मायताओ के अनुसार गहिल रघुवंशी कहलाते हैं । राय ये पुत्र मीरा एव उसको युग / 19 कुश के वश में गुहिल से पहले अतिम राजा सुमित्र था। सुमित्र का पुरा गुहिल हुआ जिसके नाम पर यह वश गुहिल, गुहिलोत, गोहिल कहलाया। गुहिल का राज्य उत्तर मे आगरा चाटसू तक फैला हुआ था। विक्रमी स० 1044 के उसके सिक्के उस क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं ।(14) उससे पहले विश्मी स० 718 का गुहिल अपराजित का एक शिलालेख नागदा के पास कुण्डेश्वर मदिर मे मिला कहा जाता है।(14) इससे स्पष्ट होता है कि मेवाड के पवतीय प्रदेश मे इनका प्रवेश दक्षिण से हुआ था और वे बढते बढते आगरा तक पहुंच चुके थे। इतना बडा राज्य उस समय देश मे कोई नही था और उसका अस्तित्व राणा रायमल पथ्वीराज और सागा के समय तक--विक्रमी स० 1584 तक-भी था। यानी एक विशाल राज्य के रूप में मेवाड की स्थिति-मीरा के समय तक-800 वष पुरानी हो चली थी। इस प्राचीनता और विशालता के सदभ से देखा जाए तो मेवाड की शक्ति, प्रतिष्ठा और गौरव की कल्पना की जा सकती है । अनेक शिलालेखो मे, ताम्रपत्रो मे वहां के राजाओं को अवनीश्वर (एपिक इडिका भाग 24, 323) हिंदूपत पातसाह, समस्त राजवलिसमलकृत महाराजकुल (दरीबा का शिलालेख), महाराणा (हम्मीर के समय से), महाराजाधिराज (15) हि दुवा सूरज जैसी उपाधियां दी गई थी। चित्तौड का दुर्ग कई बार गुहिलो के हाथ से गया और आया, मगर छोटे- मोटे विक्षेपो के वावजूद मेवाड की प्रभुता और उसका गौरव अक्षुण्ण रहा । दीर्घ- कालीन प्रभुता के साथ वहां के राजवश की मर्यादाएं भी उसी अनुपात मे बढी और उन मर्यादाओ की रक्षा भावना भी उतनी ही तीव्रतर रही हो तो यह सहज स्वाभाविक माना जाएगा। महाराज लाखा, मोकल, कुभा और रायमल की परम्परा मे यद्यपि मेवाड का राजघराना कुत्सित पड्यत्रो, पितृघात, 15 (54) भ्रातघात 15 (47) के अदरूनी कुकर्मो से मुक्त नही था तथापि उसको बल प्रभुता और राजनीतिक प्रतिष्ठा कम नहीं हुई थी। विक्रमी स० 1525 के बाद रायमल के समय मे उसका शक्तिवधन सिरोही से आगरा-बयाना तक और गोडवाड से मालवा तक हो चुका था 1(25)। रायमल के तीन पुत्रो-पृथ्वीराज मग्राम सिंह और जयमल मे यद्यपि पार- स्परिक जानलेवा शत्रुता थी 15(47) तथापि उहोने मेवाड के विशाल राज्य को सबल करने में ही अपनी शक्ति का उपयोग किया था। राणा संग्रामसिंह को अपन कवर पदे का समय (विक्रमी स० 1566 तक) अजमेर के पवारो के बीच छद्मवेश मे विताना पडा था 4(1331-333)। वि० स० 1566 से जब उहोंने राजग्रहण किया तव से वि० स० 1572 तक मान छह वर्षों में इतना 20/ मीरा।लोकतात्विक अध्ययन शक्ति सचय कर लिया था कि उनके नेतृत्व म 80 हजार अश्वारोही, सर्वेच्च श्रेणी के 7 राजा, राव, 500 रावल और रावत, और 104 सरदार सदा तयार रहते थे। मारवाड, आमेर, ग्वालियर, अजमेर, सीकरी, रायसेन, कालपी, चदेरी, बूदी, गागरोन, रामपुरा, आयू के राव उनके यरद थे 1(2) और मेडता, जोधपुर, ईडर, जैसलमेर से उनके पारिवारिक और कौटुम्बिर सम्बध ये।16 इससे पता लगता है कि सागा के समय मे मेवाड की शक्ति और प्रतिष्ठा अप्रतिम थी। यहां तक कहा गया है कि यदि खानवा के युद्ध का परिणाम उलटा निकलता तो देश के साम्राज्य का झडा चितौह पर लहराता । यह सवाल जरूर विचारणीय है कि इतने प्रतिष्ठित, शक्तिशाली और मर्यादा श्रेष्ठ मेवाड ने मेहता के उन राठोडो से वैवाहिक सम्बध क्यो किए जो किसी धरती के निर्विवाद धणी नही थे । वस्तुत मेवाड को राजनीति मे विवाह, सम्बध- स्थापन और मंत्री का साधन रहा था। राणा सागा से पहले के हर मेवाड नरेश ने 14 से 28 तक विवाह किए थे। खुद रायमल के 28 रानियां थी जो हर छाटे-मोटे राजकुल की थी 1(11) और उनसे राणा सागा के 14 भाई और 2 बहिनें थी। स्वप राणा सागा ने कई विवाह किए थे, उनके 4 पुत्र और 2 पुत्रियां थी, कई पासवानिये पुत्र थे और अनेक धाय भाई थे 1(12-17)। बहु- विवाह के कारण ही मेवाड के राजकुल मे आतरिक कलह, विद्वेष और पडयत्री की गहमागहमी रहती थी। उनके परिणाम स्वरूप राणा कुभा को उसके एक पुन उदाकण द्वारा विष देकर मारा गया था, 1(4)। एक पुत्र जैसा और उसकी माता ने राणा रायमल से कपट करने का यत्न किया पा तो जसा की हत्या कराई गई थी और उसकी मा को महलो से नीचे उतार दिया गया था 14(12 15)। राजनीतिक विवाहो के ऐसे परिणाम मेवाड के शासको को हर युग मे भोगने पडे होंगे। आमतौर पर राज कुलो मे पुत्री या बहिन का विवाह राजनीतिक लक्ष्य पूर्ति से किया जाता था 9(98) । मेवाड घराने ने ऐसा ही किया था जब रायमल ने अपनी पुत्री का विवाह राव दूदा के पुत्र वीरम दे के साथ किया और राणा सागा ने दूदा की पौत्री मीरा का विवाह अपने पुन भोजराज के साथ किया 9(103) 1 इन सम्बधो का यह प्रभाव रहा कि चित्तोड और मेडता क राजनीतिक सम्बध सागा के समय से लेकर राजसिंह के समय तक लगातार बने रहे। 4(220 30) वीरम दे के पुत्र जयमाल ने उदयसिंह के समय मे अकबर के आक्रमण को बेला ऐसी अनोखी वीरता से प्राण त्यागे थे कि अकबर भी चमत्कृत रह गया था। हर सम्पत्ति विपत्ति मे दोनो कुलो के सम्बध 150 200 वर्षों तक अनवरत बने रहे । इससे स्पष्ट होता है कि यदि मीरा दोनो के बीच सेतु थी तो भी दोनो कुलो मे वह प्रतिष्ठा का बिदु कभी नही बनी। वैसे भी राजपूत - मीरा एव उसका युग /21 युग में नारी राजनीतिक सम्बध-सेतु तो होती थी मगर उसकी प्रतिष्ठा की स्वतत्र इयत्ता ऐसी नहीं होती थी कि जो प्रगाढ़ता को कम करे या राजनीतिक हितो को खहित करे। ऐसे प्रमाण भी हैं जब राजा लोग पारिवारिक कटुता के कारण अपनी क याओ को पीहर वापस ले आए हैं और उनके निर्वाह के लिए व्यवस्था की है मगर उससे राजनीतिक हितो पर असर नही पडा । राणा सग्राम सिंह की एक भुआ (रमाबाई) का विवाह सौराष्ट्र (गिरनार) के यादव राजा मडलीक से हुआ था। वहा अनवन होने के कारण साया के भाई पृथ्वीराज उस मेवाड ले आए थे और राणा रायमल ने उसके निर्वाह के लिए जावर का परगना निर्धारित किया था 1(29 30)। उस रानी ने अपना सारा जीवन चित्तौड मे बिताया मगर गिरनार के साथ राजनीति सम्बध खडित नही हुए। राणा सागा के साथ मडलीक ने उसके बाद भी कई युद्धो मे भाग लिया था और मीरा के द्वारिका वास के समय गिरनार के चारण उसकी सेवा मे बन रहते थे। उनके कुछ दूहे आज भी प्रचलित हैं- मीराबाई राठोडा नी कुवरी रोहीदास जात ना चमार । मीराबाई घेर जाओ ने घेरे बैठे रटो राधेश्याम । चित्तोड के रे चौक मां मीराबाई बातो एवी चित्तौडा रा जानसी तो मारसी थारी चोपे करसी बात 1 9(503) यह स्पष्ट तथ्य है कि मेवाड के राजघराने मे अनेकानेक ठिकानो से कुल- ललनाएं ब्याही जाती थी और वैसे सम्बधो से कुल प्रतिष्ठा और बल वृद्धि होती थी। यह भी निश्चित है कि बहुत बडी सख्या मे भीड होने से रनिबास या अन्त पुर की व्यवस्था भी उतनी ही जटिल, मर्यादानुसार और कठोर होती होगी। कुछ सक्त ऐसे जरूर मिलते हैं जो बताते हैं कि रानियो की प्रतिष्ठा और राजनीतिक महत्व के अनुसार अन्त पुर मे उनकी गरिमा, आदर और मर्यादा निभायी जाती थी। राणा सागा के समय उनकी हाडी रानी करमती का वचस्व अधिक था। उसके राजनीतिक कुचको के कारण मेवाड घराने मे विशृखलता उपजी थी और गुजरात के सुलतान ने करमंती का प्रिय बन, चितौड का भेद लेकर उस पर आक्रमण किया था। 15(60 61)। अवश्य ही अन्त पुर की कुटिल नीतियो, कुचक्रो और लोकापवादो से चितौड का राजवश मुक्त नहीं था। यही कारण रहा होगा कि मेवाड के राजकुल ने सावजनिक धार्मिक या थाय।

22/ मीरा लोकतात्विक अध्ययन सामाजिक पर्वो उत्सवा से राजधगने को ममपृक्त रखने की परम्परा बना रखी थी। साधु सगत, जोगी विरागी आदि के प्रवेश पर वहां पाबंदिया पी और अन्त पुर की मर्यादाएँ माश्चयजनक रूप से कठोर थीं। यही कारण था कि राणा- सांगा के बाद और वि० सवत 1588 के बाद जब राणा रत्नसिंह (वि० स० 1553 1588) को मारा गया और मेवाड की राजनीति में विशृखलता मा गई, तब बाहरी लोगो के दुग प्रवेश पर कठार नियत्रण किया गया था। इसका पतालसमे भी लगता है-- राणाजी थाडो देसडोलो रग रूडो। थारे देस मइ राणा साध नहि छ, लोग बस सब कूता। --मीरा और वही समय था जब मीरा के साधु सगत के मायोजनो पर राजनीतिक कारणो स~~-आक्षेप उठे थे अथवा निषेध लागू किए गए थे। मेवाड की राजनीति मे निषेध, मायता, स्वीकृतियां आदि मे राणा की अपेक्षा उसके सरदारों, उमरावा, पुरोहिता का वचस्व अधिक होता था। उनकी राय जनमत बनाती थी 1(5}। उहोंने हो वि० सवत् 1525 मे राणा कुमा के हत्यारे उदा को राणा मानने से इनकार किया था और रायमल को ईडर से लाकर गद्दी पर बिठाया था । बनवीर और विक्रम के अनाचारी आचरणा का विरोध और प्रतिकार होंने ही किया था और उदयसिंह को कुभलगढ से लाकर चित्तोड की गददी पर बिठाया था। सरदारा-उमरावो के वयस्व की परम्परा इतनी सुदृढ़ रही है कि स्वतचना के बाद भी और देशी रियासता के अस्तित्व- हीन हो जाने के बाद भी-महाराणा भगवतसिंह के बाद उत्तराधिकार के प्रश्न पर मेवाड के सरदारो-उमरावा मे तनातनी बनी हुई है। मोरा के साधु-सगत के विरोध में जितनी भूमिका राणा की नही रही होगी, उससे ज्यादा मेवाड के सरदाओ उमरावो को रही होगी। मेवाड की कहावतो मे प्रसिद्ध है कि वीजावर्गो वापियो, दुजो गूजर गोड । तीजो मिल जो दाहिमो, कर टापरी चोट। -~-इनकी भूमिका मीरा की भक्ति की धारा को रोकने, मोडने और सोहन मे प्रमुख मानी जाती है। हो सस्ता है विप देन और सप पिटारी भेजने में इनका हाय रहा हो और अन्त पुर की कुटिल नीतियो को जोड तोह से वे विफल भी हुए हो। इन दो घटनामो के मन्त साक्ष्य भी है और बहिषिय भी। तथापि इन घटनाओ मे मेहतियो और गुहिलोतो रे राजनीतिक और सामरिफ गाड़ेपन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा था, यह भी तथ्य है।

मोरा एवं उसका युग /23 मेवाड की भूमि, अपन प्राचीन काल से, नई जमीन तोड्ने, राजनीतिक प्रसार करने और घाडे की पीठ पर उमर वितान वालो की रही है। यहां के सरदार- उमराय और राणा भाई यद नजराने में राणा को अपना सर देने की मान रखते 1(28-32) । वस वातावरण में राजपूतो वे घराना म वल्लि सामाय प्रजा में भी वैरागी, साधुओ और कमहीन लोगो के प्रति सम्मान या भक्ति का अभाव भालोचित माना जाना चाहिए । आज भी लोग में यदि कोई स्त्री भक्ति बरे या राग बताए तो उसे मेवाड मे 'भगतण' कहा जाता है जो कि एक तरह यो गाली है । अत मीरा को उस समय के राजबुल के परिवार उपेक्षा से बरतते रहे हो, वर्जना करते रहे हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं माननी चाहिए। बल्कि ऐसे प्रमाण भी हैं कि राजकुल म पिसी अवमानना के दह स्वरूप रानियो को 'महलों से नीचे उतार दिया जाता था', रायमल के समय में जेसा और उसकी मां के साथ ऐसा किया गया था 1(12-15)। यदि मीरा के साथ उपेक्षा का व्यवहार किया गया हो तो विस्मय की बात नहीं। मीरा के कुछ पदा से ऐसी ध्वनि निकलती भी है- तात, मात, प्रात बधु अपना नहिं कोई। छोडि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई ।। मोती माणक परत न पहिलं, मैं तो कब को नटगी। गंणो तो म्हारे माला दोवही, अर घनण की कुटकी ।। कुल मिलाकर मेवाड को तत्कालीन राज परम्परा उतनी भक्ति प्रवण नहीं यो जितनी कि मेहता की वैष्णव परम्परा थी। दीघकालीन राजपरम्परा, बहु- विवाह और अनेकानेक राजवशो की क याओ से भरे हुए अन्त पुर की राजनीतिक कूटयुद्धि के कारण आतरिक विद्वेष और सरदारो सामतो को वचस्व वाली राज बुद्धि मेवाड को एक विशिष्टता प्रदान करती थी। यह विस्मय कारक तथ्य है कि राज रानियो को, उनके राजनीतिक महत्व के अनुकूल, महलो मे सम्मान भी मिलता था, अवमानना और उपेक्षा भी होती थी, महलो से नीचे भी उतारा जाता था मगर उन व्यवहारो का सामरिक सहयोग और राजनीतिक मित्रता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता था। मीरा के साथ यदि वर्जना, प्रतिबध और निषेध का व्यवहार था तब भी मेहतिया के साथ मेवाड के सम्बध सौ से अधिक वर्षों तक-रायमल के समय से लेकर अमरसिंह के समय तक अक्षुण्ण बने रहे थे 15(53-75)। यह मी तथ्य है कि सब कुछ होते हुए भी मीरा मेवाड मे अरक्षित नही थी । राणा सागा ने अपनी इस विधवा पुत्र-वधू के लिए मांडल और पुर के परगने निर्धारित कर रखे थे 17(13)। मगर मीरा को उन परगनो की व्यवस्था, सुख भोग मादि मे कोई रुचि नही थी। यह बात उनके इस पद मे व्यक्त 24/मीरा लोकतात्विक अध्ययन होती है- हाल्या मोस्यां सूं काम नहिं रे, सीख नहिं सिरदार । कामदारी सू काम नहिं रे, में तो जाय फरूं दरबार ॥ मीरा दो विरोधी युगवृत्तियो के बीच विवादग्रस्त इकाई बनी थी । एक और उसके बचपन का मेडता-युग था जिसने उसे निश्छल भक्ति, प्रेम, लोक चेतना और स्वतत्र चेता भावुकता से पोपित किया था तो दूसरी ओर मर्यादाओ, प्रतिबधो, निषेधो का मेवाड युग जिसने उसके लोरचेता मानस को क्षुब्ध किया था। दो विरोधी वातावरणो के बीच उसका लोकमानस प्रखर होकर उभरा और अन्तत राज वैभव, सत्ता और मर्यादा का त्याग करके वह लोकाभिमुख हो उठी।

2 मीरा : पारिवारिक परिवेश किसी व्यक्तित्व के निर्माण मे उसके जम स्थान, वातावरण और बाल्यकालीन परिवेश का विधायक महत्व होता है। जिन सस्कारो का निर्माण अबोध तथा बल्यावस्था मे होता है, वे कई बार अनमनीय और अपरिवतनशील भी होते हैं। उनकी अवचेतन प्रभाव कारिता को निरूपित और निर्दिष्ट कर पाना चाहे दुष्कर काय हो, किंतु यह मनोसामाजिक तथ्य विवाद ग्रस्त नहीं रहता । इस तथ्य को ध्यान में रखकर मीरा के व्यक्तित्व और भक्ति वैभव के लिए हमे उनको पीहर और ससुराल की पारिवारिफ स्थितियो का समवय करना चाहिए। (1) मेडता और मेवाड का समकालीन परिवेश जैसा कि पहले कह चुके हैं मेडता की स्थापना के समय वह इलाका काफी समय से वीरान पड़ा हुआ, गैर आबाद क्षेत्र था। बरसिंह और दूदा ने नागौर, अजमेर तथा जोधपुर के कई भागो से जाटो और कई साखो के राजपूतो को ला- लाकर वहाँ बसाया तथा उसे आवाद कराया 19(3941)। अधिकतर प्रवासी नागौर के थे। वहां के निवासियो में जाट, राजपूत, ओसवारा, माहेसरी, अगरवाल, खडेलवाल महाजन, भोजक, खत्री, भाट, निरतकारी जो, कि नाचने गाने वालो मे से थे, ब्राह्मणो मे पोकरण, राजगुरु, गूजरगोड, पारीटव, दाहिमा, सनावड, सखवाल उपाध्याय, श्रीमाली, गुजराती, गोड, सिपाही श्रेणी मे पठान, तुर्क, तरकसबद, तोपची, देसवाली, काजी, और उनके अलावा 52 अन्य जातियो के लोगो को सम्मिलित करके बसाया गया था 19(83 86)। जिन जाटो को पहले लाकर बसाया गया था। उनके साथ मेडतियो का घरोवापन था, बरिक सभी नव- निवासियो के साथ उनका सम्बन्ध राजा प्रजा का न होकर सहभागी और सह- योगियों का था 19(39)। इस तरह से नये राज्य की स्थापना के कारण स्थान नाम से दूदा के वंशज मेहतिये कहलाए । निश्चित है कि नये राज्य की स्थापना के साथ राज परिवार को लोक रुचि का और लोक समूह को राज रुचि का परस्पर मान रखना पडता था। नई जमीन, नये राज्य और सुविधाओ के पदा होन पर धार्मिक मतो और साधु सतों की जमावट भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। राव 26/मीरा लोकतात्त्विक अध्यमन दूदा परम वष्णव कहे जाते हैं और उनके साथ साथ उनके समय के कुछ दरजी, सुनार आदि भी परम वष्णव कहे गए हैं। कहा जाता है कि व कठीधारी वैष्णव थे । मीरा के पाम भी सक्त है कि- म्हारा पीयरिया का लोक भलेरो, वाधे कठी माला।" यह स्वाभाविक भी हा सक्ता है । जिस समय दूदा न मेस्ता राज्य की स्थापना की थी उस समय ब्रज से लकर गुजरात तर और मालवा प्रदेश तर का क्षेत्र वैष्णव भक्ति मे सराबोर था 20 (38-51। वैष्णव भक्ति जन-आदोलन के रूप में स्थानीय भापाओ, लार भावनाजो और निष्ठाओ को लेकर पनपी थी, 20(39) अन उसके प्रसार प्रचार मे जन ज्वार का उफान था। प्राचीन दाशनिक मतो की लौकिक मा यता जीव धम, परम तत्व, असारता, सेवा, निष्ठा, मोन, अहिंसा प्रेम नानात्मक दृष्टिकोण परचे, चमत्कार, सब मिलकर एक ऐसा सशिलष्ट लोक मानस उस भक्ति की भूमिका म कायरत था कि आम आदमी को कुछ भी समझाने की किसी को जरूरत ही नहीं थी। 20(39 41) केवल समपण और भावुकता के बल पर ही अनपढ और अनगढ भक्त महात्मा और सत बन सकते थे---ऐसा सवेदनशील लोक मानस उम युग मे मौजूद था। मारवाड- बीकानेर नागौर शाकभरी, अचल, शेखावाटी, जोधपुर, जैसलमेर के क्षेत्र मे लोक मानस की रचना म प्राचीन शैवमत जैनमत, नाथपथ, सतमत के साथ मिलकर वैष्णव भक्ति ने कृष्ण के सनातन भागवत रूप और चारभुजा स्वरूप को आराधना में विकसित किया था। दूदाजी के वश देवता चारभुजा नाथ थे, जो कि राव दूदा के समय से लेकर जयमल के समय तक निर्वाध भक्ति के आलम्बन रहे थे 11(5357), 'यथा राजा तथा प्रजा' के सूत्र से मेडता अचल की प्रजा मे भी वैष्णव भक्ति की प्रबलता थी और कृष्णपथ वे साधु सतो और धर्मा धिकारियो का वहा आवागमन बना ही रहता था। वप भर कई अवसरो पर- सावन से लेकर फागुन तक-राजपरिवार, राजय वग और सामा यजन मम्मिलित होते थे 9(97-137) और साधु सगत तो आम प्रथा थी । राव दूदा परम वैष्णव थे इस कारण भी साधु-सतो का आवागमन, भजन-कीतन सदा चलता रहता था। उसमे राज परिवारो और सामान्यजना का निकट सम्पक बना रहता था। उसी तरह का सम्पक यात्रा, पव, उत्सव, नेम, धरम, खेती, खलिहानी, छोटे मोटे अभियान, बेसरे आदि के समय भी बना रहता था 9(110) । अत मेहता के राजपरिवारो और लोकजीवन के बीच अलगाव, दुराव और असम्पृक्तता की स्थिति वैसी नहीं थी जैसी कि मेवाड या पुराने राजघराना मे हुआ करती थी। इस परिस्थितियो का प्रभाव मीरा के बचपन और मानसिक विकास पर लक्षित होना चाहिए । भक्ति के लौकिक स्वरूप के बीच जमी, पनपी और मुक्त- भाव से राजपरिवारो और साधारण जनो के साथ रहते हुए मीरा ने लोकभक्ति मीरा पारिवारिक परिवेश/27 का जो सस्कार कमाया था, वही आगे हठीला बनकर उसके व्यक्तित्व का आधार बना था। बचपन की मीरा को हमे राजरानी और मेवाड की जेठी बहू से भिन्न करके देखना चाहिए क्योंकि तत्कालीन मेडतिया परिवारो मे और मेडता से लेकर चुरू-बीकानेर तक के राठौरा मे रहन-सहन, पालन पोषण और जीवनप्रणाती मे सुस्थापित मेवाड राजवश से कई मायनो मे भिनता थी। मेडतियो मे जीवन- यापन मुख्यत कृषि आधारित था और अवसर पड़ने पर रयत को साथ लेकर छोटे मोटे धाडे डालना आम जीवन प्रणाली थी 21 (32)। ऐसे मे राजपरिवार शेष जना से अलग थलग और असम्पृक्त बनकर नहीं रह सकते थे। ऐसे वाता- वरण मे मीरा ने लोकरीतियो का, लोकमानस को, लोकरुचियो, विश्वासो और जीवन को, वास्तविकता मे जीकर, सीखा था जिसके सकेत उसके पदो मे मिलते हैं। मेडता की बसावट और उसे आबाद करने की नीति में लोक-रुचियो के साथ राज परिवार की भागीदारी मेडतिया परिवेश का एक उपयोगी कारक था। दूदा की वैष्णव भक्ति, साधु-सतो का सत्कार, उहे आमत्रित करने का आग्रह उस नीति का अग था ताकि मेडता के नवोदित राज्य का प्रचार हो। इसी नीति के कारण दूर दूर वे डागा, जाट, ब्राह्मण, चारण, महाजन मेडता मे आकर बसे थे और सबने इच्छानुसार भूमि भोग प्राप्त किया था 4 (23)। दूदा की इस साव- जनिकता की नीति को, बचपन मे, मीरा ने सहज भाव से ग्रहण किया हो तो आश्चय नही। वैसे भी राठौर वश मे और मेवाड के गुहिलोत वश मे जीवन की मर्यादाएँ भिन शैलियो की थीं। मेवाड मीरा के समय तक भी उस मर्यादा कोटि मे था जिसमे राजशियों का घर, घोडे की पीठ पर ही होता था। स्वय राणा सागा का अधिकाश जीवन और उनके बड़े भाई पथ्वीराज का पूरा जीवन नई धरती की खोज, नई स्थापना, शत्रु दलन और मर्यादा-रक्षा मे बीता था 1 (25-41)। इसके विपरीत राव दूदा को प्रकृति इतनी भिन्न थी कि बरसिंघ से मतभेद होने पर वे पहले तो बीकानेर की ओर चले गए थे और बाद मे सरवाह जाकर रहे 19 (4246)। अपनी सुदीप राज्य परम्परा मे मेवाड ने राजपराने, राजरानियो, राजकन्यामओ और अन्त पुर की मर्यादाएं स्थापित कर ली थी, जबकि मेडता के सघपरत राजघराने को हर ऊंच-नीच के साथ जीवन-यापन निद्वन्द्र रहकर करना परता था। मीरा के विषय मे एक तथ्य का हमे ध्यान रखना चाहिए कि वह किसी राव, राजा या महाराणा की कन्या नहीं थी। वह एक ऐसे ठिकानेदार की क या यो जिसकी स्थिति सिर्फ एक राजनीतिक मोहरे को पो। मीरा के पिता रतनसिंह को गुजारे के लिए 12 गांव मिले हुए थे और उनका जीवन छोटे-मोटे युद्धों और -- 28/मीरा लोक्तात्विक अध्ययन व्यवस्थाओ मे बीता था। मीरा का पालन-पोषण उनके दादा वीरमदेव की 'कोटडी' मे हुआ था और वहाँ वह केवल राजकुल की क या पी, कोई राज या नहीं थी। तत्कालीन राजपूती रीति में यदि मेवाड के राजघरानो मे एकांतिकता और प्रतिबधित नारी जीवन था तो मेहना मे क याओ के निकटवर्ती वुटुम्बियो मे आने जाने-खेलने पर कोई प्रतिवध नही था । पर्दा प्रथा अवश्य थी मगर वह वयस्क कन्याओ और परिणीतामा तक सीमित थी। मीरापर बचपन से जिस तरह से लौकिक मा यताओ का और भक्ति तथा साधु सगति का प्रभाव पड़ा था, वह उसके वयस्क होने पर परिपक्व हो चुका था। इसका सस्त उसके पद में भी मिलता है-- "में बैठी ही पडदा माही, ईश्वर पट खोलिया।" इससे पता लगता है कि वयस्व होने पर और आम लोगो से पर्दा करने की स्थिति में भी मीरा साधु सगत और भक्ति में पगी हुई थी। एक वृत्तान्त बताता है कि- "श्री गुसाइ जी के सेवक हरिदास बनिया-सो वे हरिदास बनिया मेरता ग्राम मे रहते हते। वा ग्राम में एक ही वैष्णव हते और वा ग्राम को राजा जैमल हतो सो स्मात धम मे हतो और एकादशी पहली करतो हतो। और जैमल राजा की बहिन को घर हरिदास बनिया के सामे हतो। सो जब गुसाई जी हरिदास के घर पधारे हते तब जैमल की बहिन कू बारी मे सू श्री गुसाइ जी मे साक्षात् पूर्ण परमेश्वर के दर्शन भये सब जमल की बहिन ने पत्र द्वारा श्री गुसाई जी क विनती लिख के पत्र द्वारा सेवक भई काहे त वे पर्दा म से बाहर नहीं निक्सते जा सू पत्र द्वारा सेवक भये । (1870) चाहे मीरा का विसी सम्प्रदाय में शामिल होना तय नहीं है, मगर इतना तथ्य है कि बचपन से जिस भक्ति के वातावरण मे वह पली थी और आस्था के जिस लौकिक स्वरूप को उसने कमाया था वह उसके व्यक्तित्व की एक विशिष्टता बनकर विकसित हुई थी। मेडता की और जिस लोकिर भक्ति का विकास हुआ था, उसे निर्दिष्ट करने ही हम मीरा के परिवेशगत लाक तात्त्विक घटको की पहचान कर सकते हैं। बहुत प्राचीन काल से ही पुष्कर, मडोवर नागोर, फ्लोदी क्षेत्र, द्वारिका मथुरा का गज पथ रहता आया था। नाना प्रकार वे भक्ति पथ, शाक्त-मत, सत, मत, नाथ-पप और मुनि-पथ वहां सम्मिलित होते रहे थे। शाकभरी चौहाना के समय मे वे सब रल मिलकर एक ऐसा लौकिक स्वरूप धारण कर घुरे पे जिसम सगी को कुछ बातें मौजूद थीं और समयानुसार विसो प्रचलित सम्प्रदाम की उसम प्रधाना पपशिता हो जाती थी। पूनाधिक रूप से ऐसी ही प्रवृत्ति पश्चिमी देश मीरा पारिवारिक परिवेश/29 के हर क्षेत्र मे देखने को मिलती है कि सामाय जन की भक्ति और आस्था साकार भी होती है, निराकार भी होती है, भावना प्रवण भी होती है, वैराग्य- तत्वी भी होती है, कमवादी भी होती है, कीतनपरक भी होती है, योग तत्त्वी भी होती है और लीला दर्शी भी होती है। मीरा के समय मे मारवाड की लोष- चेतना पर प्राचीन नाथपथो साधुओ का प्रभाव भी था, भैरव, शक्ति, तत्र आदि की छाया भी थी, सूफी प्रेमवाद भी था और गोगाजीपाबूजी जसे सिद्धो का परचाई प्रभाव भी था। उस आधार भूमि पर वैष्णव भक्ति पनपी थी और कृष्ण भक्ति सूफी छाया लेकर यत्र तत्र प्रेममयी होकर विकसित हुई थी। जब राजनीतिक और सास्कृतिक विकास केंद्र बिंदु राजभवन और राज- वश हुआ करते थे तब राजवशो की रुचियाँ और क्रियाएं ही जनमत बना करती थी। वह स्थिति मेडता मे भी थी। जब राज परिवार वैष्णव भक्त हो तब वहाँ साधुओ का, भक्तो का जमघट होना स्वाभाविक था, विशेषकर ऐसे सावदेशिक वातावरण में जब हर सम्प्रदाय और मत राजनीतिक शक्ति का सहारा लेकर लोक म प्रतिष्ठित होने की होड मे लगी हुआ हो 9 (101) । 15वीं-16वी सदी मे सारे देश म ऐसी ही स्थिति थी। साधु सतो की मडलियां, भक्तो के काफिले और व्यापारी-जन आवागमन मे साथ होते थे और उन सभी स्थानो पर डेरे करते थे जहां उनकी आव भगत होती हो या आश्रय मिलता हो। तीथ स्थानो, मेलो, उ सवा, पर्वो और स्थानीय आयोजनो का ऐसा लौकिक विधान जमा हुआ था कि हर समय, हर माह, हर पक्ष, हर कही कोई न कोई साधु मडली जमी रहती थी । और ऐसा जब विधान था ता निश्चित रूप से कूट नीतिक उपयोगो के लिए और राजनीतिक गुप्तचरी के लिए भी इन विधानो का उपयोग क्यिा जाता था। मीरा अपनी भक्ति प्रवणता के साथ जब चित्तौड पहुंची तो वहाँ की राज मर्यादाओ और राजनीतिक सवेदनशीलता के साथ उसकी साधु सगति का समायोजन हो ही नहीं सकता था। और अपनी वश परम्परागत सस्कारशीलता से वह मुक्त भी नहीं हो सकी थी। मूलत यह उसके राज मर्यादा विरोध का परिवेशजन्य कारण था। मेडतियो की परम्परा मे 4(176) राव दूदा से तीन पीढियो तक तो वैष्णव भक्ति की सुदढ परम्परा थी ही, अपन पूवज पाबूजी से भी दूदा प्रभावित थे और समकालीन जम्भोजी का गहरा प्रभाव उनके समय के मेडता पर था 4 (182)। चारभुजा, ठाकुर जी, रघुनाथ जी, गोपालजी जैसे नामो से चतुर्भुज विष्णु की भक्ति हाती थी, वैष्णव सम्प्रदाय के कई ग्रथ मेडतिया ने लिपिबद्ध करवाये थे मेवाड के गढबोर में चारभुजा को स्थापना मेडतियो ने की थी, पई ठाकुर अकेले या सपत्नीक साधु सत भी हो गए थे 4 (176), साधु सतो को वे साक्षात् विष्णु मानते थे और सत समागम को एक पद का रूप दिया जाता था। मदिरो मे 1 30/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन आराधना के लिए सगीत और कीतनो या आयोजन किया जाता पा 3 (148). लोग और राज परिवार के सदस्य उनमे सज धज कर एकत्रित होते थे। कई ठाकुर और सामा य-जन भक्ति ये कुछ 'नम' भी पालते थे 3 (172) जसे प्रात उठकर सबसे पहला काम दशन करना, चरणामृत लिए बिना कोई भी आहार ग्रहण न करना, कठीमाला धारण कराा और दिन में चारोपहर ईश्वर दशन परला, माला धारण करना, गुरु करना, और, ये सब लोव प्रथाएं आज भी मारवाड- मेवाड को जाता मे देखी जा सकती हैं । मीरा ने भी कठीमाला वा और चरणा- मृत का नेम धारण कर रखा था- "चरणामृत को नेम हमारी, नित उठ दरसणजास्या। "तुलसी को माला मो वीरा म्हारा न छूट कोइ छाडया नौसर हार, हरि के भजना में ।। 23 (69) और-“काठ की क्ठी नहिं छोडूं राणाजी नहिं पहरू मोतीडा रौ हार।" 23 (38) मेडता मे भक्ति के गहरे वातावरण का एक कारण उस अचल की तत्कालीन भौगोलिक और यातायात परक स्थिति भी थी। मेडता निम्नलिखित मार्गों के केन्द्र मे पडता था-4 (193) (1) अजमेर-अहमदाबाद-अजमेर मेडता सिरोही देसा-अहमदाबाद । (2) दिल्ली पाटन-दिल्ली-आगरा मेडता पाली भगवानपुरा-जालोर पाटन। (3) आगरा अहमदाबाद-आगरा अजमेर मेडता सिरोही अहमदाबाद । (4) आगरा चित्तौड-जयपुर-अजमेर मेटता होकर । (5) चित्तौड अहमदाबाद-चाक्सू लाइन मेडता जालोर होते हुए। (6) जयपुर जोधपुर---परबतसर-अजमेर-पुष्कर मेडता जोधपुर । (7) नागौर-पाली-मेडता हार। इतने माग जो कि पश्चिमी भारत को उत्तर दक्षिण म जोडते थे, यातायात, व्यापार, सना और धार्मिक विस्तार के साधन थे । इनके बीच मे पडन से मेडता कई तरह की धार्मिक मा यताओ का समवय केन्द्र बन गया था। सामरिक दष्टि से भी वह चित्तौड, जोधपुर और अजमेर वालो के लिए महत्त्वपूण पा। वहा का सामाजिक जीवन मेवाड, बीकानेर, जैसलमेर जस क्षेत्रा के राज पूती जीवन से, कई मायना मे भिन प्रकार का था यद्यपि वेशभूषा और जातीय मा यताओ के धरातल पर अय राजपूती पराना स समानता थी।5(36 67)। यथा- (1) गो रक्षा जीवन का प्रमुख व्रत था और कई बार राठौर वीरो न गो- रक्षा में अपने को बलिदान पर दिया था।

मीरा पारिवारिक परिवेश/31 (2) विधवा विवाह को मान्यता नहीं थी। विधवाओ के लिए विशेष नियनित जीवन विधान होता था। उनके आवागमन, मेलजोल, शृगार, भोजन, दिनचर्या आदि का पथक विधान होता था। राजपूती परिवारो मे आज भी वैसा ही निभाव चला आता है। (3) वैसे अय राजपूत वशो मे मास, मदिरा, अफीम आदि का सेवन वजित नहीं था मगर दूदावत मेडतियो मे उनकी वजना थी 4 (164) (4) मेडतियो मे भी दासी दावडी प्रथा थी। (5) क्याओ की शिक्षा के लिए पुरोहित रखे जाते थे और वृत्ति के अलावा उह गांव या जागीर भी दी जाती थी। मीरा के लिए राव दूदा ने गूजर गोड पडित गजाधर को नियुक्त किया था। वे मीरा की शिक्षा दीक्षा के साथ उसके लिए चारभुजा की पूजा, सेवा कीतन आदि भी करते थे। विवाह के बाद मीरा उहें अपने साथ चित्तौड ले गई थी 4 (185)। चित्तौड मे मीरा के लिए निर्धा- रित माडल परगने का जिम्मा भी बाद मे इसी पडित को दिया गया था। मीरा को उस परगने की व्यवस्था, आय व्यय आदि से कुछ भी लेना-देना नहीं था- यद्यपि मेवाड घराने की जेठी बहू होने के नाते राणा सागा न उसकी मर्यादा के अनुरूप परगना निर्धारित किया था 1 (61) 1 तत्कालीन परम्पराओ के अनुसार विधवा होने पर स्त्री को 12 माह तक घर के एकात कोने मे रहना पड़ता था, तब पीहर वाले उसे अपने यहा ले जाते थे और उसके बाद शोक भग सभव होता था। मीरा के वैधव्य (1579) के 5 वष बाद तक भी राणा मागा जीवित रहे थे । उस अवधि वि० स० (1574) मे अपने अपग होन से पहले उहोंने चित्तौड मे चारभुजा मा मदिर बनवाया था 15 (144)। बत मीरा को मेवाड मे कम से कम वि० स० 1584 तक कोई भारी विरोध नहीं सहना पडा था। राज मर्यादा के अतगत उसरी भक्ति, गजाघर पडित की सहायता से, चलती रही । अधिक से अधिक स. 1588 तक भी- जयषि राजा रत्नसिंह की हत्या की गई-उसे वर्जनाओ से अधिक कष्ट नहीं सहने परें । वधप वे वाद 10 वर्षों तक चित्तौढ म वह अपनी भक्ति साधना परती रही । स० 1588 के बाद कुछ महीनों तक उसकी सास-मवती और दवर विक्रमाजीत ये हायो उसे बजनाए और तकलीफें सहनी पडी होंगी। तभी स० 1589 मे उसो मेडना गमन किया था। 11 (57) उसी समय पोस्मृतियां उनके इन पदों में हो सकती है- 'राणाजीकोप्या राजा रूठे नगरी रामं हरि रूठया पद जाणा।" कनां भोजन जीम त्यो, परोपजीवा धीर। सीसोया पर आयोया, सगलो मेला में पारा सौर। ठंडा टुक्ता पायो सोई, पोलो साटो हाह। .

32/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन भू सूवो, भूखो मरो, कठं मिल गोपाल ॥"-ठडा खाना देना, छाछ रोटी देना-मेवाड के अन्त पुर की अपनी व्यवस्थाए थी। यदि मीरा के साथ ऐसा हुआ था, ता निश्चित ही उसकी भक्ति प्रथा और साधु सम्मेलन चित्तौड की तत्कालीन राजनीतिक स्थिति के लिए हानिकारक रहे होंगे। मेवाड मे राज रानियो की मर्यादा राजनीति से नियरित होती रहती थी और वह कभी स्थिर नही रहती थी। राणा मोक्ल के जमाने से ही मेवाड, अन्त पुर के पडयत्रों और कुचक्रो का शिकार था 4 (67) । वडा राज्य, विविध स्तरो के सम्पक बहु विवाह और निरतर युद्धो के कारण चित्तौड़ के राजपुरुष कभी घरेलू और गहस्थ नहीं रह सके थे। उनक अन्त पुर में भी इतनी विवधता रहती थी कि रानिया आपसी रीतियो भाषा और प्रथाआ से पूरी तरह परिचित नहीं हो पाती थी। एक तरह से छत्तीसो राजकुलो और पूरी राजपूती प्रथाओ की खिचडी मेवाड के अत पुर मे होती थी। प्राचीन राज्य परम्परा जातीय गौरव और मर्यादा को बनाए रखन के लिए वहा कुछ मर्यादाए विकसित हो गई थी जिनमे उच्च- भावना, कुल गौरव, जातीय श्रेष्ठता,उच्च चरित्र नारियों का नियत्रण में रहना, पर्दा पालन आदि पर दुराग्रह की सीमा तक आग्रह रहता था 1 (11)। राजरानियो बल्कि दावडिया के लिए भी सती होना गौरव की बात मानी जाती थी 1 (40)। मेवाड की परम्पराओं मे स्वय राणा के निणय इतने निर्णायक नहीं होते थे जितने कि सरदारो और भाई-वधुओ के होते थे। वे लोग राणा के प्रति,राज्य के प्रति इतने निष्ठावान होते थे कि नजराने में अपना सिर देने की प्रतिज्ञा रखत थ 1 (32 33) बताया जाता है कि मेवाड मे सरदारो सामता के साथ राजा क अपनापे का यह रिवाज था कि महाराजा जब खाने बैठता था तो अपने याल की चीजो मे से थोडी थोडी चीजें दोने में रखकर बडे बडे सरदारों को देता था और में उसे बहुत बडा सम्मान मान कर ग्रहण करते थे 1(31)। ऐसे सामत सरदार यदि मवाड की मान रक्षा के लिए पहल करें और राणा के मान को अपना माने तो आश्चय नहीं । अब यदि मोरा की भक्ति का मेवाड गौरव के विपरीत मानने और वजनालो या अम्बार खड़ा करने में उनकी भूमिका रही हो तो यह असम्भव वात नही कही जा सकती। राजा के कुपित होन पर' रानियो के कास' म बटौती करना उनकी मुविधाए बद कर देना, दर्जा उतार देना-एमी अन पुर का प्रयाए भी थीं। अन पुर का प्रशासन वडा कठोर होता या 1(20)। अत मेहना के लोक सम्पन परिवश म पली-पनपी मीरा को प्रवाह मे याधाओ का सामना करना पडा हो और उसका लापव्यापी मानस विद्रोही वन गया हा तो तारजव की बात नही । अन्त पुर की मर्यादा रसा मे राजरानी के शील और मर्यान-पालन को कुल तारख मानन को प्रपा मेवाट म भी 15 (41)। यदि रिसी रानी के बारे में कोई विवाद रहा हा तो उसका नाम मेवाड़ की वाहियों मीरा पारिवारिक परिवेश/33 मे न लाने की प्रथा थी। तभी मेवाड के इतिहास मे रावल रतनसिंह के समय की पदमिनी का विवरण नही मिलता, सागा के समय की मीरा काभी नहीं मिलता। इस तथ्य के काफी ठोस प्रमाण हैं कि मेवाह मे मीरा केवल अपनी भक्ति के कारण विवादग्रस्त नहीं बनी होगी। मेवाड के राजवश मे भक्ति पुरातन गुण रहा है । दूसरी सदी विक्रमी से मेदपाट मे वासुदेव पूजा का प्रचार मिलता है 15 (140) । आज भी गांव गांव मे वैसे ही देवरे (चबूतरे) होते हैं जैसे कि प्राचीन काल मे थे--जबकि मदिरा का शित्ल-विधान प्रचलित नही था । जैन धम भी व्यापक था और चितोड के राजा जैन विद्वानो का सम्मान करते थे 15 (116- 120)। विष्णु पूजा आक्षुण्ण रूप से लोक मे और राजवश मे प्रचलित थी। उसक प्रमाग दूर-दूर तक-आज के विजन प्रदेशो में भी मिलते हैं । विष्णु पूजा के साथ शैव, शाक्त, मातृका, भैरव, जैन पथ भी लोकव्यापी थे 15(141-142) महाराणा माल ने चित्तोड मे द्वारिकाधीश का मदिर बनवाया था 15 (142), कभान कुभश्याम का मदिर 15 (143) बनवाया था। स्वय महाराणा सागा ने स० 1574 से चारभुजा का मदिर बनवाया था 15 (144) जो कि मीरा के इप्ट- देव थे। मेवाड की कई रानिया राज-मर्यादा में रहते हुए विष्णु की सेवा करती थी, कइयो ने राज्य में कई स्थानो पर मदिर बनवाए थे। राणा सागा की बुआ रमावाई ने जावर परगने में राम स्वामी का मदिर बनवाया था 1 (29-30)। तो, मीरा की भक्ति निश्चय ही वजनाओ और कोप ताडनाओ का कारण नही थी। मूल कारण था, राज मर्यादा का उल्लपन, मेवाड की जेठी बहू होने ‘पर भी माधु सगत और कोतन सम्मेलन के आयोजन करने का-जिनसे चित्तोड को सवेदनशील राजनीति पर कुप्रभाव पडना स्वाभाविक था । मीरा विवश थी अपनी लोकाजित भक्ति को उद्दाम भावना से और मेवाड का राजवश विवश था अपनी मर्याओ की निष्ठा स । यही कारण था मीरा के असमायोजन का जो उन पदो मे भी प्रखरता से व्यक्त हुआ है- लोर-लाज कुल की मरजादा, यामे एक न रखूगी। पिय के पलगा जा पोटोगो, मीरा हरि रग राचूगी। पोहर वसू न वसू सास घर सतगुरु सबद सगाती। ना घर तरा, ना घर मेरा मीरा हरि रग राती॥ बह पर ताती लागी रे,म्हारा मन री उपारप भाजी रे। छोलरिय म्हारो चित्त नहीं रे, डावरिय कुणजाव। गगा-जमना का काम नहीं रे हू तो जाय मिलू दरयाव! हाल्यो मोल्या सू काम नहीं र, सोर नहीं सिरदार। कामगारांसामनही रे.हतोजाय यरूदरवार 34/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन कोई निदो, कोई बिदो, म्ह तो हरि गुन गास्या। जिण मारग म्हारा साद पधारे, उण मारग म्हे जास्यो। मोती माणक परत न पहरू, मैं तो क्ब को नदगी। गणो तो म्हारे माला दोवडी अर घनण की कुटकी। तो, मीरा चित्तोड मे यदि विद्रोहिणी थी तो अपनी लोकार्चित भक्ति की अदम्य भावना के बल पर और मेडता में वह यदि मा य थी तो अपनी सहज लोका- भिव्यक्ति के कारण। उसका व्यक्तित्व तत्वालोन लोक मान्यताओ के तत्वों से गठित था और उसमे किसी तरह के प्रस्थान भेद, रूपा र का उदात्तीकरण या मार्गातर की गुजाइश नही थी । यदि उसके व्यक्तिस्व मे कुछ लचीलापन होता तो सभवत वह मेवाड घराो मे भक्त राजरानी बन सकती थी मगर जिस रीति से उसने भक्ति वैराग्य और गज मर्यादा के प्रतिकूल साधु सगतो मे रुचि दिखाई, वह मेवाड की सुदीध मर्यादा परम्परा मे खप नहीं सकी। मेवाड की राजपूती परम्परा मे तो स्त्री, स्त्री से भी पदा करती है और अपनी सास अथवा जेठा के सामने जबान तक नही खोलती । उसका परम धम यही होता था और होता है कि वह कुल की मरजाद निभाए । वह यदि भक्ति और वैराग्य दिखाए, आभूषण, परिवार, लोक सम्पक, माला, कठी यादि धारण करे तो उसे 'भगतण' कहा जाता है जोकि किसी कुलीन महिला लिए बहुत बडी गात्री होती है । मेवाड और मेडता को कुल परम्पराओं में नारी के स्थान, उसके कत्तव्यो और व्यवहार सरणियो मे इतना अतर था कि मेवाड मे राजपूत महिला 'कुल को आन' मानी जाकर चहारदीवारी मवर रहती थी जबकि मेडता की ओर वह कृषि, हाली, मोली, मनिहार, हमजोली नाते रिश्तेदारो के बीच मुक्त रह सकती थी। राजपूत वधुए भी कुछ समय तक पदें और प्रतिवघो मे रहती हैं बाद मे गहस्थी की आवश्यकतानुसार मेल जोल करती हैं। वेटिया पर तो पावदी रहती ही नहीं। एक की बेटी पूरे गाव की बेटी होती है। मीरा का विकास ऐस ही वातावरण में मुक्त रूप से हुआ था कि वह तो- जगती म्हारो पीर साधा सग सासरो" के स्तर तक पहुंच चुकी थी। ऐसे धरातल पर पहनने वाली भवत के लिए मेवाड की अत पुर की वर्जनाए कोई मायने नहीं रख सकती थी। यहा के यन्त पुर का वातावरण तो राजनीतिक हप- दहा और पुटिलताआ म गम रहता था 1 (31)। हमजोलियो बहुओ, बेटियों, प्रौढ़ाओ, युद्धाओ मे अपन जमघट होत च और वे निंदा, स्तुति, गपशप आदि में अपना समय बिताती थी। महल और वोठरियां दासियो और वाहियो स भरे रहते थे और उनसे जामूसो, छल कपट और पातव काम भी बगए जाते थे। राज परिवार और बतपुर बाम जीवन मे एर भिन्न सोक हाता था 1(71)। परा यातावरण मे मीरा एक अजूबा हो बनी थी शि उसकी हर क्रिया पर हर मवहार मीरा पारिवारिक परिवेश/ 35 पर, टिप्पणियो से उसका पहला दिन आरभ हुमा होगा और निंदा स्तुति के उस माहौल ने अतत 'बात को बतगड बना दिया होगा! मेडता और मेवाड के लोकघम में एक भारी अतर यह रहा है कि मेडता जितनी गहराई से वैष्णव भक्ति, साधु सेवा नाथ पथी विचारधाराओ और सत- पूजा के प्रति मवेदनशील था, मेवाड उन मामलो मे उतना ही उथला था । मेवाड के लोगो म तन मत्र के प्रति बडी आस्था थी, शक्ति के विविध रूपो की- त्रिवडा, तोतला, त्रिपुरा, लक्ष्मी, तुलजा भवानी नदा क्षेमकरी, सवती, भामणी, सव मगला, स्वेती, हरिसिद्धि, सुलीला, मांगी ललिता, कालिका लीलावती उमा, पार्वती, गौरी, हिंगलाज, झातला लालबाई फूलवाई आवरी आदि 15 (150) उपासना प्रचलित थी। कई तरह के धम समातर चलते थे मगर वैष्णव धम को कुछ मा यताए ही लोकिक हो सकी थी-जस, चार वर्षों की उत्पत्ति और ऊच नीच के अभिप्राय, गगा का शकर की जटा म रहा त्रिलोत्तमा द्वारा पियो की तपस्या भग करना, हनुमान का समुद्र लाघना, रेणुका का उद्धार, जरासध का जुडा हुआ शरीर, सुड निसुड की कथा, वराह अवतार, सेतुबध की क्था, आहिल्या तारण, लका दहन आदि 15 (145) । कृष्णलीला या कृष्ण स ब धी मत लौकिक नहीं थे, साधु सगत जैसी बात अप्रचलित थी यद्यपि नाथपथी सतो के प्रति आतक जनित भक्ति प्रचलित थी। मेडता की ओर नाथपथ की इतनी व्यापक भूमिका रही थी कि वहा के लोक जीवन मे इडा, पिंगला, समाधि, ध्यान, योग, पाणीपियोछाण, वैराग्य, असारता आदि के अभिप्राय सहज हो चुके थे। ऐसी अवस्था मे मीरा को कृष्ण भक्ति मवाड मे हलचल मचाने वाली सिद्ध हुई हो तो आश्चय की बात नही कही जा सकती। मेडता की ओर वैष्णव कृष्ण भक्ति और नाथपथी जोगियो की दीर्घकालीन परम्परा ने 24 (85) सूफी प्रेम- भक्ति के साथ रल मिलकर एक ऐसी लोक धारणा की रचना को यो जिसकी छाया मीरा के पदा मे मिलती है, जबकि मेवाड मे मिन भिन्न धम भिन भिन्न वर्गों मे स्थापित थे और वे कोई विशिष्ट रूप नहीं बना सके थे। अत मीरा का चित्तोड मे अपनी मारवाडी लोक चेतना के साथ प्रवेश, उसका निर्वाह और उसका आग्रह वहाँ ये राजघराने मे अप्रासगिर विशेप बना तो, यह स्वाभाविक था। तथापि मेवाड ये विशाल अत पुर मे मीरा की भक्ति, उसकी सत-सगतियो और भजन कीर्तन वाली पूजा कम स-कम 15 वर्षों तक तो निभती रही शिाम से वैवल अतिम वप मे वजनाओ, निषेधा और निवारण के प्रयत्न सघन हुए होंगे। एतिहासिक तथ्यो ये अनुसार विक्रमी 1884 तक मीरा ये सामने समस्याएं गभीर नहीं बनी थी। राणा सांगा पो मृत्यु के बाद वहां के राजपरान मे और बाहरी सम्बधो मे अस्थिरता, बुधना और दुटिलताओ बी उग्रता बढ़ी और स.

36/मीरा लोकतात्विक अध्ययन 1889 मे रानी ककरमती और उसके पुत्र विक्रमादित्य के गद्दी पर आते ही परिस्थितियां बहुत विषम हो गई । साधु सतों, जोगियो और भक्तो के रूप मे बाहरी जासूसा और आतरिक विरोधियो की घुसपैठ चित्तोड के महलो तक होन लगी थी। चित्तोड के मुख्य मार्गों पर से सदिग्ध जनो और अपरिचित विदेशियो का आवागमन रोक दिया गया था 11 (50) मीरा के काय व्यापारो पर भी कठोर नियत्रण किया गया होगा जिसके कारण मेडतिया वीरम दे ने उहें मेडता बुला लिया होगा। विष देने की योजना या सपदश की बुटिलता-यदि ऐतिहा सिक घटना हो तो वह स० 1888 89 म भी घटी होगी, यद्यपि उसकी सभा वना कम है क्योकि ऐसी कुटिलता मेवाड के राजघरान की प्रतिष्ठा के जनुकूल नही ठहरती । वहाँ की अतपुर व्यवस्था मे नीचे उतार देने की प्रथा पहले से मौजूद थी और निश्चय ही मीरा के साथ वह दिया गया था जिसके सकेत उसके पदो मे भी मिलते हैं- 1 सास नणद दे लीवो लीवो म्हाग मात पिता पछताय । 2 ठडा टूकडा थे पावो कोई पीवो खाटी छाछ । भू सूवी भूखा मरो कठे मिल गोपाल । 3 सासरिया म दुक्ख धारौ सास नणद सतावै। देवर जेठ म्हारो कुटुम क्बीलो नित उठ राड चलावै। 4 सासू बुरी है म्हारी नणद हठीली। 5 गढ चीत्तौडे ना रही नहीं रहण को जोग। बसस्यां रूडी दवारिका, जहें हरि भगतरा भाग ॥ 6 मीठा लागे टूक्डा, काई अमरत लागे छाछ । भू सूवा, भूखा मरा, मा ने काल मिले करतार ॥ 7 सासरिया न दुक्प घणो रे, सासू-नणद सतावै । कैजो म्हार वाबो सा ने, बेगा लेबा आव॥-और मीरा के वाबो सा-- चीरमदे विक्रमी स. 1889 के आरम्भ म मीराको मेडता ले गए 18 (1888) मीरा को कष्ट देश की बात इससे भी प्रमाणित कही जा सकती है कि इति हासकार एकमत से विक्रमाजीत को दुष्ट, अयोग्य और नीति विहीन बताते हैं- विमात बधु उन रान वारो नरेश श्रीविक्रम नीति यारो। बन न जामा महिपाल बन, धनो नसा देह प्रमाद छत्तै। भानज जो अर्जुन को अधागो, रहे सदा मत्त अफीम रागी। सु रानह वै ऊघन का सरा है चित्तौड को राज न जाहि चहै । 25 (2190) यह भी समय है कि मीरा के साथ दुव्यवहार म रानी करमेनी और विक्रम के साथ फ कुटिल सरदारो-सामनो या पुरोहितो का हाथ रहा हो। मेवाड में प्रचालित एक कहावत- मीरा पारिवारिफ परिवेश/37 बीजावर्गी वाणियो, दूजो गूजर गोड तीजो मिल जो दायमो, वर टापरी चोड ।।-बताती है कि कोई ऐसी घटना रही जरूर होगी जिसने मेवाड के राजकुल को बिखेरने और निंदा का पात्र बनाने का काम क्यिा होगा और उस घटना मे इन तीन जातियो के लोगो की पहल रही होगी। चाहे जो भी हो, इतना निश्चित है कि एक तो अपनी अनोखी कृष्ण भक्ति के साथ मीरा चित्तौड मे समायोजित नही हो पाई, दूसरे चित्तोड की कुटिल आन्तरिक दुष्टताओ ने उसका सम्पक ही चित्तौड से तोड दिया। वरना उसका तो कहना था कि 1 सात बरस की मैं राम आराध्यो, जब पायो करतार । मीरा ने परमातम मिलिया भव भव का भरतार ।। 2 साध हमारा मैं साध की, हम हैं साधा आग । साध हमार मे रम्या, ज्यू पथरी मे आग । 3 साडीडा साडयो फेर देरे, परत न देसु पाव । ले जाती बैठ को, समज्या नहिं सीसोद ।। हर परिस्थिति, हर घटना और मीरा के व्यक्तित्व का गठन परिवेशजनित परिणति के रूप में माना जा सकता है। मीरा का मेवाड त्याग और उसके बाद मेडता का दुर्भाग्य भरा भविष्य भी एक ऐसा सयोग था जिसने मीरा को- -तात, मात, भ्रात बधु अपना नहिं कोई। -छाड दई कुल की कानि कहा करि है कोई ॥ -~-इक ससार सगा नहिं कोई, सोचा सगा रगुबर जी। मात पिता सैकुटुम कबीला, सब मतलब कंगरजी ।। कहने पर मजबूर किया। वस्तुत घटना चक्र इस तरह से चला कि मेवाड छोड कर और मेडता जाने पर स० 1589 से 1590 के लगभग एक वर्ष के बाद ही मालदेव के आक्रमण के कारण मेडता छिन भिन्न हो गया। 8(41 42) तथा 11(51) वह भी इस कदर कि वीरमदे को अपने परिवार और कुटुम्ब सहित शेखावाटी, अजमेर आदि की ओर भटकना पडा । 26 (27) मेडता से अजमेर, अजमेर से अमरसर से दिल्ली यो 9 वय तक जब वीरमदे का परिवार बेघर बेठिकाने, आश्रय के लिए भटकता रहा हो 27(299) व 10 (36) तो भीरा अपनी भक्ति और लावनमे ये साप कहाँ कहाँ भटकती फिरती ! उसके कुल की आन और मर्यादा क्या हो सकती थी जिसका ससुराल भी विखर गया हो और पीहर भी छिन भिन हो गया हो। उसकी यह मानव्यथा छिपी भी नहीं रही- 38/ मीरा लोक्तात्विर अध्ययन मैं तो छोहि कुल पी आनि, रानी मेरो यहा परसी। सादा रे सग जाय दवारका में तो मज्या थी रणछोड। रायश्री रणछोड दीज्यो दवारसा कावास। सख चक्र गदा पदम मिट जग की पास। सकल तीरप गोमती रहत नित वास । साजर झा बजे, सना मुरा यो रास तज्यो देस स स ह तजि तज्यो राना राज। दासी मीरा सरन आवल तुम्हें अब सम लाज || माना जाता है कि जब वीरमद दर बदर होकर (स० 159192) भटक रहे थे और चित्तौह मे विक्रमाजीत की हत्या परके बनवीर ने गद्दी हडप ली थी, रानी परमैती जौहर कर चुकी थी और मेवाह के भावी बालक राजा उदयसिंह को कुभलगढ मे छिपकर (स० 1593) रहना पड़ा था 15 (72) तव सत्र ओर से निस्सहाय, अवेली और उपेक्षित होने पर मीरा ने अपने रण छोडलाल की शरण ग्रहण की। उसका द्वारिका गमन विक्रमी स० 159393 मे हुआ था। कहा जाता है कि द्वारिका के रणछोड मदिर की बहियो म मीरा के आने और लम्बे समय तक वहां रहने का उल्लेख है 11 (53)। मीरा का द्वारिका मे जाकर रहना दुष्कर कार्य नही था। ऐतिहासिक मा यताओ के अनुसार सोसोदा का मूल गुजरात मे या और गुहिलवशी राजघराने आज भी उधर विद्यमान हैं। इतिहास म चित्तौड को राजक याओ के विवाह गिरनार तक हाते रहे हैं, हर प्रसिद्ध राणा ने द्वारिका यात्रा की थी और वहाँ मन्दिर तथा निवास बनवाए थे। वहां गोमती के तट पर भी मेवाडी राजाओ का एक प्रसिद्ध मदिर था और वही मीरा का प्रवास स्थल था 11 (53) निश्चय ही द्वारिकावास के अपने 10 दो म मीरा की भक्ति का आवेग प्रखर होकर व्यक्त हुआ होगा । उसमे लोकतात्विक चेतना, अवचेतन आकाक्षाएं, हताशा, असारता मानि के जो परम्पर पोषक और विरोधी आवेग मिलते हैं, वे उसी अवधि के हो सकते हैं जबकि वह कोई राजकया, किसी धराने की जेठी बहू, विहीं दो राज कुलों को आन, या रानी न होकर सिर्फ मोरा बन गई थी सब बधनी और प्रतिबद्धताओ से मुक्त।

3 मीरा लोक-सग्रह के अवसर मीरा के जीवनवृत्त मे किन प्रभावा ने उनका व्यक्तित्व सगठन किया था, यहा-कहाँ से क्या क्या प्रभाव उनके बचपन से उन पर पडे थे और क्यो उनको भक्ति वैराग्य प्रधाना और हठीलेपन से सम्पृक्त हो गई थी, इहें समझने के लिए उनके समय को लोकतात्त्विक भूमिका को समझना आवश्यक होगा। मीरा जम और विकास के समय सामाय और राजय वर्गों मे शासक- शासित का वैसा वग-भेद और प्रशासनिक विधान नहीं था, जैसा कि मालवा में था, गुजरात मे या या मेवाड मे था । रेगिस्तान, पठार, अवर्षा, अनाभाव आदि ऐसे भौगोलिक कारण थे जिन्होंने छोटे छोटे क्षेत्रो को सुरक्षात्मक गढी, परकोटो का स्वरूप दे दिया था। उनसे बाहर या तो वीरान इलाके थे या झाड-झखाडो से भरे बीड थे। जनता में जब भी जो भी धार्मिक, सामाजिक रूढि बन जाती वह अपेक्षाकृत दीपजीवी और स्थायी हो जाती थी। जीवन इतना सधपमय था कि परस्पर सहयोग और सहकार के बिना राजन्य वग को या साधारण जन को जीवन-यापन की सुविधा हो ही नहीं सक्ती थी। 11वी से 15वी शती विक्रमी तक लगभग पूरे देश मे लोकमानस ने एक समवित लोकधम और लोकमा यताओ का विकास कर लिया था-खास करके उत्तरी और मध्यभारत मे 27(17-31) यथा (1) भक्ति मे लाग वण या जाति भेद आवश्यक नहीं मानते थे । पूर्व काल मे नाथपथी सिद्धो सतो ने, वैष्णव भक्तो ने और साधु महात्मालो ने इसके लिए आधार भूमि तैयार की थी। (2) बाग्यो और शास्त्रो मे वणित सगुण, निर्गुण, प्रेम, ज्ञान, वैष्णव, स्मार्त, शाक्त, सिद्ध आदि मतमतान्तर उस समय तक समवित होकर ऐसे सवसामाय लोकमत में विकसित हो चुके थे जिसमे- ज्ञान माग की मान्यताए भी थी, ईश्वर अलोकिक अरूप भी था और साकार भी था, उसके अवतारी रूप भी थे और वह प्रेम मय भी था वह बालक भी था, योगी भी था, वह नियामक भी था, भय का मालबन भी था और अधम उद्धार 40/मीर लोकतात्विक अध्ययन भी था । जीवन मे अहिंसा दूसरो को पीडा न पहुंचाना, क्षमा, धीरज, इच्छाओ का दमन, चोरी न करता, बटमारी न करना, ठगी न करना, दया परना, सत्सग करना, साधुओ की सवा करना-~-ऐसे मूल्य व्यापक मान्यता पा चुके थे। (3) साधु सत्सग और हरि-कीतन सर्वोत्कृष्ट और सर्वाधिक मान्यता पा चुके थे । तुलसी, सूर, मीरा और उनसे पूव वे सतो ने इन उपायों को जनता के लिए मोक्ष का सरलतम साधन प्रसिद्ध किया था । साधु सत्सग और कीतन उपदेश के एक मात्र लौकिक सचार का साधन बनने का मुख्य कारण यह भी था कि यातायात, सचार, शिक्षा और देशाटन अभाव के उस युग मे नान, चेतना और लोकोपयोगी जानकारी का इसक सिवा दूसरा उपाय हो नही था । साधु-सन्त देशाटन करते, तीर्थयात्रा करते और अपने ज्ञान का प्रसार भी करते थे। इसी कारण भक्त और सत कवियो ने सत्सग की, साधु भगत की और साधुत्सेवा की निविवाद प्रशसा की है-- बहे भाग पाइय सतसगा। बिन हि प्रयास होइ भव भगा (7-33 4) तुलसी ने कई प्रसगो में कई तरह से सत्सग को महिमा बखानी है जैसे-मोहजनित सशय के नाश के लिए सत्सग जरूरी है उसके बिना भक्ति और विवेक का उदय नहीं होता, स न मोदमय, मगलमय, सावदेशिक, सावकालिक सद्य फल दायक जगम और अलौविक तीर्थराज हैं इसी जीवन मे चारो फल देते हैं, सतो की कभी निदा नहो करनी चाहिए, सतो का अपमान समस्त कल्याणो की हानि करता है । सूर के शब्दो मे भी- जा दिन सत पाहुने आवत । तीरथ कोटि स्नान करे फल जसो दरसन पावत (सर सागर 2 17) मारवाह की और तो वैसे भी पथिको का आवागमन कम होता था और जिधर साधु सतो का माग होता था उधर लोग खुले मन से उनके सत्सग की भावना रखते थे। साधु महात्माओ का जाना पव माना जाता था और भक्तजन उनके आवास, भोजन, भजन कौतन का अधिकाधिक लाभ उठाने की भावना से अभिभूत रहते । वह लोक परिवेश लगभग उसी तरह का होता था जैसाकि हम लोग आज भी जैन मुनियो और सतो के बारे मे देखत हैं । तथापि साधु सतो के रूप मे कुटिल और दुष्ट खल जन भी अपना स्वाथ साधन करते थे। राजनीतिर जासूसी, कूटनीतिक प्रचार और गुप्तवास के लिए भी इस वेशभूषा का उपयोग किया जाता था। अत जो राज्य जटिल पडयत्रो और पेचीदा सम्बधो वाले ये उनमे साधु जोगी जती आदि को शका की नजर से देखा जाता था। मेवाड में साधु मडलियों और उनके भजन कीर्तन की लौकि रीति के प्रमाण नहीं मिलते । जबपि मेहता, जालोर, जोधपुर, नागोर आदि क्षेत्रो की बोर उनकी मीरा लोक-सग्रह के अवसर / 41 बहुलता थी। स्वय ठाकुर, जमींदार, सरदार, राव, राजा सत मडलियो को आमत्रित करते थे और वष भर किसी न किसी तरह का आयोजन होता रहता था। (4) मारवाड की तरफ लोकमानस मे समानता और ऊच नीच की भावना का विलोप अपक्षाकृत बड़े पैमाने पर मिलता है। पशु पालन, कृषि को तुलना मे अधिक उपयोगी साधन था और गो रक्षा सावजनिक धर्म माना जाता था। लौकिक सहयोग, नतिकता और समानता का वातावरण कितनी तेजी से बनता था, इसका प्रमाण हमे मल्लीनाथ, पाबूजी, गोगाजी, हरभूजी मागलिया, मेहा, रामदेव जैसे वीरो सतो और उनकी महिमा के क्षिप्र प्रचार से मिलता है 28 (30 62)। ये सब वीर और सत जालौर, जोधपुर, नागौर, शुरू क्षेत्र के थे और उनमे से अधिकाश राजपूत थे। पाबूजी राठौर थे और मीरा के पूर्वजो मे से थे 28 (41)। हरभूजी राव जोधा के पूज्य थे और राव दूदा पर भी उनका अटूट प्रभाव था 28 (60)। इन सब लोक देवताओ ने-जो किमोरा से कुछ समय पहले हुए और लग- भग समातर भी थे--पशु धन की रक्षा, त्याग, परोपकार, अयाय का प्रतिकार, जाति भेद का विरोध, सामाजिक समानता, साधु सत्सग, तीथ यात्रा कमकाड आदि का विरोध, भजन कीर्तन का प्रचार, सत्सग करने का प्रचार, नीच और अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियो का उत्थान, स्त्रियो को समकक्षता देने का प्रचार और समवित लोक घम का वातावरण बनाया था। 28 (61) मल्लीनाथ (1415 विक्रमी मे जम) ने राव राजाओ के लिए सत सम्मेलन करने और सव- साधारण जनता के साथ राज्य वर्ग की निकटता स्थापित करने की प्रथा चलाई थी। वे नाम स्मरण, साधु सत्सग, साधु सेना और त मय होकर भजन-कीतन करने को परम साधना मानते थे 28 (57) 1 तोमर रामदेवजी मीरा के निकट- तम समकालीन थे। उहोंने जिस तरह से कष्ट सहन परवे सामती ठसक और राज मर्यादा आदि का दृढतापूर्वक विरोध करके, प्रतिष्ठा पाई थी, वह यदि मीरा के लिए सस्कारप्रद रही हो तो हमे आश्चय नही करना चाहिए। 'घट भीतर सकल तीरथ', 'तीय-व्रत व्यथ', सत्सग सब तीर्थों का सार', 'जाति पांति कुल मरजाद सब जीव का बधन-ये सब रामदेवजी की मान्यताएं थी। और भी- -~-'सत री नाव गुरु सेवटिया रे, बैठो पार हो जावे" (रामदेवजी की वाणी 101-17) ~~'सत्सग सिवा बठेइ नहिं सुधरे ती हि लोक फिरि आवं अमर पटो सत्संग मे मिलसी, वो फिर कोइ न छुडा" (राम० वाणी-106-27) हरभूजी नागोर के ये और राव जोधा तथा उनके पुत्र दूदाजी उनके भक्त थे।

42/मौरा लोकतात्त्विक अध्ययन उनके यहां माधु सगत की यह स्थिति रहती थी कि हमेशा सदावत चलता रहता था 28 (9)। राव दूदा भी साधु सेवा और सत्सग के लिए विख्यात थे। ऐसे म मीरा के बचपन के संस्कारों को सरलता से समझा जा सकता है। (5) इन लोग देवताओ द्वारा निर्मित लोक मानस के साथ फबीर, रैदास और रामानद की भक्ति और ज्ञान को धारा भी मारवाडी लोक जीवन में समा गई थी । मारवाड मे धना भगत (स० 1481) और गागरोन के पीपादास (स. 1491) न सतगुरु, वैराग्य, सत सगत और 'सब हरि जन' वाले लोकमत की भमिका तैयार की थी। मीरा ने अपने पदो मे पीपा के परचे की बात कही भी पीपा को प्रभु परचो दोहो, दिया रे खजीना पूर । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, धणी मिल्या छ हजूर ।। धना टोक क्षेत्र के थे और पीपा गागरोन (कोटा) के । ये दोनो भी मीरा से कुछ समय पहले ही हुए थे और उनके उपदेश साधु सतो की परम्परा मे, मीरा के चेतना काल में, प्रचलित थे। 28 (73 84)। (6) और जिस लोकभूमि पर यह स त मत पनपा था, नाथ और सिद्ध सम्प्रदाय की वह मानस धारा भी मारवाड मे विक्रम की 6ठी से 9वीं सदी तक गगानगर से जैसलमेर तक, चुरू नागौर पाली पुष्कर, जोधपुर (मण्डावर), जालोर तक प्रबलता के साथ प्रवाहित यी 28 (19)। मीरा के समय तक उस प्रवाह की कई उपधाराएँ-माननाथी, बालनाथी, रतननाथो जसनाथी पूरे मारवाड-अचल मे घ्याप्त हो चुकी थी। उनका इतना गहरा प्रभाव लोक मामस यह था कि इडा, पिंगला, सुखमना, जागे, वैराग, जोग, धूधरा धमकास्या, निरजन, ध्यान, समाधि जसी अभिव्यक्तियां आम आदमी की आम भाषा में भी समा गई थी 11 (238 40)। वस्तुस्थिति यह थी कि 13वीं से 16वी विक्रमी का मारवाह प्रदेश समवय फा क्षेत्र या जिसमे ऐसे लोकमानस की रचना हो चुकी थी जो धम, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सामाजिक भेदभाव, वर्णाश्रम आदि के मामले में उदार हो चुका था और हर मत की सावलौकिक बातें रलमिल कर उसमे समा चुकी थी। 28 (22) उस लोक मानस में ऐसी व्यापकता आ गई थी कि-- "जाति, गोत, कुल, नाम गनत नहि रक होइ के रानो।" (सूरदास) और "जाति, पांति, कुल-बानि न मानस, वेद-पुरानन साखी।" (सूरदास) जसी अमि- व्यक्तियां आधारभूत हो चुकी थीं। (7) इनके बलावा पुरातन काल से चली या रही भाग्यवाद, विधाता, परि- स्पितियो के सामने समपण, ज्योतिप, ग्रह, नक्षत्र, कम भोग, भाग्य, शकुन-अप- शकुन आदि मे विश्वास, भूवमन्म, ईश्वर या देवी-देवता के साथ जम जमान्तर .

मीरा लोक संग्रह के अवसर/43 - - का कौल, पिछले जन्म के कर्मों का भोग अगले जम मे मानना, अगले जम के सुधार ने लिए इस जन्म मे कष्ट-योजना करना, शुद्ध जीवन के लिए सुख- सुविधाआ का स्वेच्छा से त्याग करना, भूमि पर सोना, रूखा सूखा खाना, छाछ पीकर ही जीने का अभ्यास करना, टाट पहनना, किसी न किसी तरह का व्रत लेना, मानता करना, कठीमाला धारण करके उस व्रत को हर हालत में निभाना- ऐसी मा यताएँ और प्रथाएँ भी प्रचलित थीं। 27 (244) इनके स्रोत या मूल का पता नहीं लगता किंतु उनके अस्तित्व का पता पच्चीसो लोक कथाओ और लोक-गीतो से लगता है। हुआ यह होगा कि ईस्वी पूव के सामाजिक रिवाजो, और जैन, बौद्ध, वैदिक, अवैदिक, यावनी आदि मा यताओ का उसी तरह से लोक जीवन मे समवय भोर तादात्म्य हो गया होगा जैसाकि परवर्ती युगो मे होता रहा है और आज भी हो रहा है । ऐसी पारपरिक मा यताओ मे कुछ ऐसी सामाजिक- सास्कृतिक प्रथाएँ भी लोक मे प्रचलित थीं जो स्त्री की पवित्रता, नैतिक-निष्ठा और पतिव्रत की क्सौटी मानी जाती थी। कई ऐसे प्रसग आते हैं--पुराणो मे, कथाओ मे, महाकाव्यो में-जिनमे स्त्री को अपनी सत्यनिष्ठा के लिए परीक्षाएं देनी होती हैं। राम युग सीता के बारे मे भी अग्नि परीक्षा का विधान काव्य चर्चित है, महाभारत युगीन द्रौपदी के बारे मे, परशुराम युग मे रेणुका के लिए ऐसी कुछ प्रथाएँ थी--अग्नि में हाथ डालना और उसका न जलना, हाय मे जलते अगारे लेना, गगाजल हाथ में लेना और उसका सूख जाना, तुलसीदल हाप मे लेना और उसका सूख जाना, सर्प को पकडना और उसके दश से बच जाना, विप पीना और उससे बच जाना, खौलते तेल में हाथ डालना। 27 (185) वास्त- विकता तो यह है कि मध्यकाल तक (12वी-14वीं सदी तक) प्राचीन-नवीन सब घम, विश्वास और मान्यताएं लोक में इतनी समीप हो गई थी कि इनमे विभेद करना कठिन हो गया है 29 (30 31)। मेवाड मारवाड मे यह स्थिति थी कि एक ही वश के एक राव, राजा या ठाकुर एक मत के थे तो दूसरे किसी दूसरे मत के थे और कही कोई वैमनस्य नहीं होता था। सम्पन्न हो या साधारण व्यक्ति, उसके जीवन मे दान देना परम धर्म माना जाता था। विश्वास था कि दान देने से रोग शासन होता है, सम्पति की अभिवद्धि होती है, यश फैलता है 29 (301)। तप को भी मन-शुद्धि और पश्चात्ताप का साधन माना जाता था 29 (304)। विधवाओ के बारे मे भायता थी कि उनका वैधव्य पूर्व-जम के पापो का नतीजा होता है इसलिए अगला जम सुधारने के लिए वे कठिन तप करती थीं। उसमे भूमि पर सोना, रूखा सूखा खाना, शृगार न करना, लोगो को मुह न दिखाना, सिर मुहवाना, एकात सेवन करना भजन भाव मे रहना-ऐसे विधान थे। सृष्टि के कर्ता को सव शक्तिमान मानना, उसे आत्मा का अधिष्ठाता मानना, कमभोग से धौरासी लाख योनियो मे जीव का आवागमन मानना, काल .

44/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन की-कमगति या समय को अटल मानना, ईश्वर के भिन्न भिन प्रयोजनो से अवतार मानना-~मत्स्य, पच्छप, वाराह, नसिंह, हरि, मनु, वामन, राम, कृष्ण, बलराम, सनकादिक रिषभ, हस, मोहिनी, ध्रुव, व्यास, यम, दत्तात्रेय, बुद्ध, नारद, नारायण, निकलक 29 (309 10) और उनमे से राम, कृष्ण, वासुदेव, चतुर्भुज, विष्णु आदि को पर्यायवाची मानना, सतो सिद्धो को सदगुरु मानना, साधु-सतो और सतिया के शाप को आस्था की नजर से देखना, उनके वरदान मे विश्वास रखना, हर अच्छे बुरे काम के लिए मुहूत और लग्न मे विश्वास रखना, 29 (313) स्वप्न के शुभ अशुभ फल मानना मत्र तत्र और टोने-टोटको मे विश्वास रखना, तावीज, गडे, लच्छ वाधकर शरीर को देवी आपत्ति से बचाने की मा यता रखना 29 (321), पराचेतन मा यताओ मे विश्वास रखना, जैसे- पूर्व जम की अधूरी इच्छा की पूर्ति के लिए ही विशेष घर मे जम लेना, ईश्वर के किसी शाप या वरदान की पूर्ति के लिए या जम लेना अपने का पूर्व जाम का योगी या राज्य या देवदूत या हाथी या मृग या कुछ भी मारने में विश्वास रखना, प्रेतात्माओ के अस्तित्व मे विश्वास रखना, उसके साथ ही उह वश में करने, उनसे इच्छित काम कराने मे विश्वास रखना, 29 (326) ऐसी अनेकानेक मायताएं सर्वलौकिक हो चुकी थी। (8) मारवाड मेवाड की ओर राजपूती घराना मे स्त्रियो को लेकर विशिष्ट मा यताएं और जीवन चर्या और प्रथाएं निर्धारित थी। बचपन म लडकियो के लिए गुडिया खेलना, गोटे खेलना, अपना रग रूप निषाग्ग, सिंगार करना, हार, माला आदि धारण करना, गौरी पूजना और अच्छे पति की कामना करना, खेल तमाशे करना और देपना, मेलो मे जाना, पर्व-उत्सवो मे रमना हेसी ठिठोली करना, घरेलू व्यवहार सीखना झूठी-सच्ची प्रशसा या निंदा करना, बाहरी लोगो से और साधुओ आदि से लज्जा रखना--30 (24 26) इस तरह के विधान थे। कुलवधू बनने पर उसे पति कुल की 'आन' माना जाता था। पति को ही सवस्व मानना, उसके जीवन मरण के साथ अपना जीवन मरण मानना सती होना, फायर पति स सम्बधन रपना- पिय भाग तिस अद्दर, सौंपे सक्ल सरीर । वह रजपुत्तनि कुक्करी, सुमतन ही गहीर ।। (परमार रासो-2231) कुल की मान मर्यादा निभाना-ऐमी मा यताएं दढता के साथ स्थापित थी 13 (189 90) राजपूती किशोरियो और युवतियों पर पीहर म भी और ससुराल म भी, सुहागिन पर भी और विधवा पर भी वजनायो और निपेधा की अधिकता इस कारण भी पी कि अभिजात वग रक्त की शुद्धता और आगिव नतिस्ता मे विश्वास रखता पा--स्त्रो की पचलता, कुटिलता और मिथ्यापरण सावलोपित . हमीरा लोक-संग्रह के अवसर 145. भत्सना के विषय थे। फिर राजनैतिक और चारित्रिक दुघटनाओ की आशका सदा बनी रहती थी। इसी कारण कन्या के जम को दुर्भाग्यपूर्ण मानने की मा यता भी थी। पिता की ओर से कया का मिवाय राजनैतिक हित साधन के दूसरा आकपण या स्नेह नही हाता था, मगर मां के लिए कया और कया के लिए मा अन्तरग होती थी 13 (195)। अपने मन की बात क या मां से या धाय मां से कह सकती थी या अपनी अतरग सहलियो से तथापि मां अपनी पुत्री को व्यवहार की, पतिकुल मे समायोजित होन को शिक्षा देती थी- मात पुत्ति परठिय सुमति । विधि विवेक विनयान। पतिव्रत सेवा मु प धरम । इहै तत्त मति ठान। पति लुप्पं लुप्पै जनम । पति बेचं बेचाइ। इहै सीप हम धरौ। जौ सुहाग समवाइ। (पृथ्वी० रासो 1026/68 69) सती का पूजना सती चौरे बनाना और सती को देवी मानकर पूजना, मनौती मनाना-यह भी परम्परागत मा यता सावलौकिक थी 13 (243)। मगर, सती होने की प्रथा राजपूत सरदारो सामतो, राव, राजाओ के घरानो मे ही थी और वह भी मीरा के युग तक वैकल्पिक हो चुकी थी- अरी महरिया क्यू तन जार, जीवत इस मुर्दे के साथ । मरे पिया तरे ना मिलि हैं, नाहक दी है पाय गमाय । (परमार रासो-440) ऐतिहासिक तथ्य है कि राणा सांगा के साथ करमैती सती नहीं हुई थी। राव दूदा व वीरमद तथा मीरा के पिता रत्नसिंह के साथ भी किसी के सती होने का उल्लेख नहीं मिलता। सती होने न होने की महिमा जितनी काव्यात्मक और साहित्यिक है उतनी व्यवहार जगत को नहीं है। तभी मीरा ने कहा है- 'गिरधर गास्या सती न होस्या, मन मोहयो धन नामी।" (9) मीरा के युग मे कुछ दैनिक-जीवन सम्बधी आचरण-व्यवहार सम्बधी, लोविक मान्यताएं भी थी जो स्वस्थ, शस्त और सदाचारी सामाजिकता के लिए आवश्यक थी। यथा-चोरी न करना, मारगी या बटमारी न करना, पर निदान करना, छानकर पानी पीना (अभिधा मे भी, लक्षण मे भी) सयुक्त परिवार में राड (झगडे) की अनिवाथता मानना। 11 (150-51) सहेलियो मे नाच-रग, हास विलास सिंगार पटार, घर व्यवहार को बतकही आम दिनचर्या थी जिस गभीर स्वभाव वाली स्त्रियों पसद नही करती थी । वडो मे दासियो, दावडियो के जरिये निदा स्तुति के प्रसग दिनचर्या के अग थे। मीरा जैसी लडकियो को इनम रचि नही भी होती थी- 46/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन - भावो खहेल्यया रली करा हे ! पर-घर गवण निवारि।। बाकी तो, स्त्री के पुरुष की दासी बनकर रहने की प्रथा परम्परा से लोका- जित थी 9 (97) बडे घरानों मे जहाँ बहुविवाह होते थे, वहाँ तो राजरानियों का नाता केवल मोदी पाने से होता था, राजा या राणा से भेंट तो कभी हो जाती तो हो जाती। हास बिलास एकात शृगार और पति से भेंट के लिए भी रानियों को दूतियो, विदूषको खवासा आदि या सहारा लना पड़ता था। राज मर्यादा यही होती थी कि जिस रानी को जो राजनीतिक दर्जा मिला हा, उसके अनुरूप वह अन्त पुर वासिनी बनी रहे । 'वह फुल पी आन' मानी जाती थी और उसके लिए उसे बहुत मर्यादित रहना होता था, यहां तक कि 'साका करन' वा मौका आने पर उसे जोहर भी करना पड़ता था। मगर, अपनी कोठरी में या महल में उनकी दिनचर्या सिंगार पटार और विलासिता में बीतती थी15 (132)। उस जमाने मे बस्तिया की वसावट इस तरह से होती थी कि राजमहल के आसपास सामत, सरदार, पुरोहित, बडे साहूकार आदि बसते थे-आतिवार, समूहबद्ध होकर, और बाहरी घेरो मे कमीन, श्रमिक, शूद्र आदि बसत थे। 5 (146-47) इसलिए समृद्ध वर्गों को जीवन चर्या, निदा स्तुति आदि साधारण जनो तक अनुश्रुतिया के रूप मे ही पहुंच पाती थी। मदिरा मे पव, उत्सव, सकीतन आदि वा आयोजन किया जाता था। तब लोग उनमे सज धज कर जाते थे। उनके अलावा लोगो के पास अपने को सजा हुआ दिखाने का मौका और नहीं होता था। 3 (148) (10) आम जनता की रीति राज रीति के अ धानुकरण की होती थी। जहाँ कही राज परिवार मे धम या भक्ति का रुझान दिखता था, विविध मत मतातरो के साधु, सत, महात्मा, प्रचारप, मठाधीश वहाँ पंठ करने और अपना सम्बध राज- परिवार से जमाने की चेष्टा मे लग जाते थे। हर सम्प्रदाय राज परिवार को अपने से जोडकर प्रचारित करने लगता था और माम जनता मे किंवदतियां फैलने लग जाती थी। राणा कुमा के बारे मे शैव, वैष्णव, शाक्त सब मतो के उल्लेख मिल जाते हैं । राव जोधा को लेकर सिद्ध, सत और वष्णव होने की किंवदतिया प्रच- लित हैं । मीरा के बारे में भी वैसा ही हो तो आश्चय नही मानना चाहिए क्योकि उस युग मे हर धम मत और सम्प्रदाय राज आश्रय चाहकर या उससे अपने को जोडकर लोक व्यापी बनने की आपाधापी मे लगा हुआ था। इसका एक परि- णाम तो यह हुआ कि हर मत या सम्प्रदाय की कोई न कोई रीति लोक-मामस मे जाकर समवित हो गई। तभी हम देखते हैं कि एक ही कवि या भक्त या उपदेशक एक बार पान और वैराग्य गाता है तो दूसरी बार रास रग के माधुरी भक्ति के गीत गाता है। एक बार वह सुरति निरति माया-ब्रह्म, सुन्न मदिर की बात करता है तो वही दूसरी बार प्रेम पिपारे आधीरात के मिलन' और दास-दासी ।

मीरा लोक सग्रह के अवसर/47 बनकर चरण सेवा की बात करता है। ऐसी समवित रीति लोक-धम मे भी थी कि बिना भेदभाव के लोग नवरात्र मे शक्ति पूजा करते थे, शिवरात्रि पर त मय होकर शिव पूजा करते थे, दशहरे पर राम की पूजा करते थे, मानता करने के लिए दरगाह शरीफ भी जाते थे, भैरव उपासना भी करते थे और सतो पीरो के देवरे भी धोका करते थे। ऐसे समवित लोकधर्म के उदाहरणा का आज भी अस्तित्व मिल जाता है । अत उस युग के जो भक्त, सन्त, महात्मा या कवि जो कि किसी सम्प्रदाय विशेष से बधे हुए नही हाते थे, आम जनता की लोक चेतना की अभिव्यक्ति करते थे। मीरा पर उसके समय के मेडता के परिवेश का ऐसा प्रभाव था कि वहां वैष्णव, सिद्ध, सत, नाथ, सूफी मातपूजक, वासुदेवीय, चतुर्भुजीय, लोकदेवता आदि के मतमतातर रलमिल कर एकरस हो गए थे। (11) मेडता क्षेत्र मे यद्यपि वह नव स्थापित राज्य था और सदा सघषरत था-खान-पान की रीति राजपूती मर्यादा के अनुसार थी। 4 (164) पोषण के लिए अक्सर गोठो का आयोजन होता रहता था जिनमे मिठाइयां पानी मे गगा जल मिलाना, उसे सुवासित करना, इलायची, कपूर, पान, कस्तूरी, लौंग का सेवन मुख को सुवासित करने के लिए करना, छाछ का अमृत मानना, दूध, दही, घी, शक्कर के बिना भोजन को रूखा मानना-इस तरह की मा यताए प्रचलित थी । सामतो, सरदारो, पुरोहितो मे दाल, बादाम, नारियल, खीर-खाड मेवे सामाय चीजें मानी जाती थी। सरदारो, प्रसिद्ध वीरो और जुझारो की खुराक पर पूरा ध्यान दिया जाता था। आमतौर पर एक-एक सरदार को डेढ सेर का रोट, डेढ पाव घी, डेढ कूचडा मांस और डेढ सेर दूध मिश्री की खुराक दी जाती थी। लोक मे भी लापसी, चूरमा, खीर-खाड, बाटी दलिया, बाफले, राब का चलन था। उनके लिए मेवामिसरी धुलभ वस्तु थी, खाड और भात भी विशेष सम्मान की चीजें थी ।।(153)। वेशभूषा में लहगा, चोली, बूटेदार ओढना लहरिया, दखणी चौर, कसूमल साही और भांति-भांति के आभूषण 11 (138) जैसे राजवर्ग मे होते थे, वैसे ही लोक मे भी, अन्तर उनके सस्ते या महंगे होने का होता था। अगर देव वृद के, क याओ के, सधवाओ के, विधवाओ के, परित्यक्ताओ के सजने-पहनने के साधन इतने भिन्न होते थे कि देखते ही उनकी पहचान हो जाती थी। राज परिवारो मे सोना, हीरे, मोती वैभव के प्रतीक होते थे, विलास की भांति भांति की चीजें होती थों और साधारण जनो मे चांदी, पीतल या रागे के आभूषणो का चलन पा। उनकी घडत में भी जाति और स्तर के अनुसार विशिष्टताएँ होती थी। यानी लोक जीवन मे परम्परा से जाति भेद इतनी गहराई तक चला गया था भगर धम भक्ति, उत्सव, पर्व आदि मे सब समान हो जाते थे। लोक-जीवन को दिनचर्या या तो कृषि जीवन आधारित या पशु पालन आधा - 1 48 / मीरा लोकतात्विक अध्ययन रित थी। प्रात उठवर कलेवा करना, दूध-दही बेचने जाना, खेत जाना, भैस- गाय दुहना, पास पूले लाना, रसोई करना, दोपहरी ले जाना, पानी भरने जाना, हाट-बाजार करना, बाजार में बिछायत करना-चादर बिछाकर अपना माल बेचना, बजारो से सौदे करना, इस तरह के प्रतिदिन के व्यवहार होते रहते थे। भिन्न भिन्न जातिया और सेवा कर्मियों की अपनी दिनचर्या अपने ढग की होती थी और फुरसत या पर उत्सवा पर लोग अलग-अलग ढग से खेल-तमाशा में भी रमते थे-यथा-पत्रा (१), फाग, चौपड, चट-भट रस्साकशी, धूसा मुक्की, शिकार, नट-नटी के खेल, नाच गाना, रेल-पेल जिसमे किशोर किशोरियां सब शामिल होते थे। होली सर्वाधिक लोक प्रचलित त्यौहार था। 11 (14445) मोर, सारस, बगले, दादुर, वागा, कोयल जैसे पक्षी, गाय, भेड, बकरी, हिरण, भैस, कुजर जैस पशु मधुमक्खी, वीर वहूटी जैसे कोट पतग, आम, महुआ, नीबू, कनेर जैसे फलदार वक्ष पौधे और झाडियो से भी लोगो की दिनचया जुडी हुई थी। प्रकृति के अदभुत व्यापारो, कजड खेडो, खडहरो आदि से जुडकर भूत प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी डायन, राक्षस, चुडेल, जिन, परी देवता, परचा आदि भयदायक या आकाक्षा जनिक विश्वास भी प्रचलिक थे और उनके निराकरण मे मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण वाले तत्र मत्र टोने-टोटको का अभाव भी लोकमत में नहीं था। 11(140-155) भिन भिनजाति स्तरो के जीवन मूल्य यद्यपि भिन होते थे तयापि भूमि प्रेम मवव्यापक और सर्वोच्च हाता था। कई जातिया मे जो युद्ध प्रिय थी-~भूमि और स्त्री दो ही मानदड होते थे। उनके उदाहरण आज भी दिखाई देते हैं।' स्वामिभक्ति राजगुण माना जाता था । वचन पालक्ता को आन माना जाता था और उसकी व्यापकता सरदारो चारण, भाटो, पुरोहितो, महाजनी, व्यापारियो तक यो । स्वाधीनता का मूल्य भी ऊचा पा और सेवा मे भी व्यक्तिगत स्वाधीनता का सम्मान किया जाता था। राजपूती आन मे पारिवारिक या कुल जनित नित्य नियमों को आचार विचार को भी स्वाधीनता के समान मूल्य लिया जाता था। नेम को अटल माना जाता था, चाहे उसके लिए कुछ 'सहन पसापडे 4 मीरा व्यक्तित्व मीमासा रचनाकार अपने परिवेश का उत्पाद होता है । उसके व्यक्तित्व के घटक जितने आनुवशिकी होते हैं उतने ही वातावरण मे पोषित और परिपक्व होते हैं। मोरा उस आनुवशिक परम्परा म थी जिसमे पाबूजी जमे लोक देवता हुए थे। 28 (41) पाबूजी का समय विक्रमी 1296 का था। वे राठौर राव धौधल के पुत्र और राव आसथान के पौर थे। उनके जीवन के कई पराक्रम एसे कहे जाते हैं जिनको कल्पना उस युग को राजपूती या जातीय परम्परा मे कोई भी कर नहीं सक्ता था। उस समय सिरोही कोलू के बीच 'आना बघेला' का ठिकाना था। वहा के भगोडे साठ थोरी (अन्त्यज और अछूत) भाइयो को जब बघेला के भय से किसी ने आश्रय नहीं दिया तब पाबूजी ने उह शरण दी, उनकी रक्षा की बल्कि राज्य ने उहें सम्मानित पदो पर स्थापित किया। वीरता, वैराग्य, गो रक्षा, पचन पालकता और इच्छा शक्ति की दृढता के कारण उहे लक्ष्मण का अवतार माना गया था। गो-रक्षा मे शहीद हो जाने के कारण जनता ने उहे लोक देवता के रूप पूजा। 28 (41-44) तय बात है कि पाबूजी की परम्परा जोधाणी पे लिए गौरव की बात थी। और दूदा जी उस परम्परा के वैष्णव भक्त थे। मेहता का यातावरण भक्ति, कीतन, साधु सत्सग और सामाजिक सौमनस्य से भरा-पूरा था और उसमें पली- पनपी मीरा के लिए साधुओ के लिए भक्ति भाव, भक्ति से पवित्रता की पल्पना, जीवन मे भक्ति से ही सुख, असारता मे सार, क्षणिवता मे स्थायित्व जरो सम्बोयो का विकास असगत नहीं था। उसके व्यक्तित्व मे साधु-सगत इतनी गहन भावना से सम्पक्त हो गई थी कि ताप हमारा हम साधकी, हम हैं साधो आग। साध हमारे में रम्या, ज्यू पथरी पो माग ।। 11(159) माई म्हारे साधा, री इकत्यार है। साधु ही पीहर, साधु ही सासरो, सांवरिया भरसार हो।

50/मोरा लोक्तात्त्विक अध्ययन जात पति पुल बुटुम कबीलो, साधु ही परिवार है। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रमस्यो साधो लार है। 32 (111-159) बरजी री म्हाँ स्याम बिना न रह्यो । साधो सगत हरि सुप पास्यू, जग सू दूर रह्यो। 31(12760) साधु मात पिता कुल मेरे, सुजन सनेही नानी । मत चरण की सरण रैन दिन, सत्त कहत हूँ वानी ॥ 33 (107 30) चाहे कुल मरजादा रहे राजाए, निंदा हो या स्तुति, चाहे प्राण जाए मगर, साधु सगति छोडना मीरा के लिए प्राण विसजन जमा हो गया था। साधुओ के बारे में, जोगी-उती सयासी आदि के बारे मे मीरा की मृत्यु के 40 45 वर्ष बाद ही तुलसीदास न भ्रष्टता का जो चित्र अपनी कवितावली, विनय पत्रिका आदि मे दिया है वह चाहे प्रादेशिक हो, मगर यह सोचने को विवश करता है कि मारवाड मेडता की ओर वसी प्रप्टता-मीरा के समय मे पी या नही । तुलसी का कहना है- सूद्र द्विज ह उपदेसहिं ग्याना । मेलि जनेक लेहिं कुदाना ।। 34 (7-99) वभिन निज मत कलपि करि प्रकट किए बहु पथ। 31 (7697) सूद्र करहिं जप-तप व्रत नाना । बैठि वरासन कहहिं पुराना । 34 (7-99) नहिं तोप विचार न सीतलता। सब जाति-कुजाति भवे मगता ।। 34 (7 101) जबकि मीरा का कहना था- सेवा साधू जनन की, म्हारे राम मिलण की आस । 33 (10629) बाज म्हारो साधु जनन रो मग रै राणा म्हारा भाग भल्या । साधू जन रो सग जो करिये चढे ते चौगुनो रग रे।। 33 (108 33) इस तरह की गहनतम साधु सगत की भूख मोरा के व्यक्तित्व का वह अतरग घटक या जो उसकी हठधर्मिता विद्रोह जगत बोध की तटस्थता, पीहर या ससुराल की मर्यादा चेतना से शूय और विक्ट अन्तर्मुखी प्रवत्ति का प्रेरक था। इस घटक का प्रभाव शायद बचपन का वातावरण था । मीरा का कयन है- सात बरस की मैं राम आराध्यो, जब पायो भरतार । मीरा ने परमातम मिलिया, भव भव का भरतार ॥

मीरा व्यक्तित्व मीमासा 151 तथ्य बताते हैं कि अपने पिता रतनसिंह के निरन्तर युद्धो और व्यवस्थाओ मे व्यस्त होने के कारण मीरा मेडता मे बाबा राव दूदा और दादा वीरमदे की स्नेह छाया मे पली थी। वहां का वातावरण भक्ति, सत्सग और चारभुजा की पूजा- अचना का था। बचपन से ही गजाधर पडित को मीरा को दिक्षा दीक्षा के लिए नियुक्त किया गया था। वे पडित चारभुजा की सेवा पूजा भी करते थे और बालिका मीरा को कथा-पुराण भी सुनाते थे, भजन-कीतन भी करते थे। यह भी तथ्य है कि राव दूदा और वीरमदे निश्चित गृहस्थ नही थे युद्धो और सघर्षों से उहे पर पर रहने और राज मर्यादोचित शिक्षा का ध्यान रखन का समय कम ही मिलता था। फिर मीरा स्वत राजपुत्री नही थी, वह दूदा के ऐसे पुत्र की पुत्री थी जो राज्य का उत्तराधिकारी नहीं था, भायला था, जिसकी हैसियत सिफ 12 गाँवो के ठिकानेदार की थी। वह हैसियत भी इस तथ्य पर निभर थी कि वह अपने कठिन कर्तव्यो का पालन करता रहा, वह भी ऐसी स्थिति मे जबकि मेडता का राज्य नया नया ही स्थापित हुआ था और उस पर जोधपुर के बरसिंह तथा उसके पुत्रो की गिद्ध दष्टि लगी हुई थी। ऐसी स्थिति मे मीरा को राजपुत्री की मर्यादाओ, प्रतिबधो, सीमाओ, निषेधो के दायरे मे न तो बांधने की जरूरत थी, न कोई बांधने वाला था। उसका स्वभाव निश्चित रूप से अन्तर्मुखी और एकातिक तथा चिन्तन प्रिय रहा था जिसे आज के मनोवैज्ञानिक असामा य बच्चे के लक्षण कहेंगे। 'मीरा की परची' 30 से पता लगता है कि- गुडीया गोटा सयाँ रमा, मीरा सत-सेवा पधराव। रग रूप सईयां मिल राचं, मीरा हरि के मिंदर नाच । सईयां मिल-मिल मगल गाय, मीरां कू हरि का जस भायै । हार डोर सईयो गल पैहर, मीरा कठी माला हर। सईयाँ फिरि फिरि मान मनावं, मीरां हरि विन सिर नहि वाव। सब सईयाँ सिफ भवर्ग पूज, मीरा भगति सतो न बुझे । सईयो हस-हा पर तमासा, मोरी बोस वपन उदासा ।

52/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन . सईया सीख विध व्योहारा, मीरा सिवर सिरजण हारा। सईयां झूटी निकर चलावै, मीरां उनमन हरि गुण गावे। सईया साध सतो सू लाज, मोरा हिलमिल मगत साजे । 30 (24 25) ---मीरा बचपन से ही विशिष्ट थी । अतर्मुपी, चिन्तन प्रधान और एको न्मुखी भावना प्रवणता के विना वह ऐसे दिवा स्वप्न नही देख सकती थी कि- माई म्होने सुपने मे परण गया जगदीस । सोती को सुपना आवीया जी सुपना विस्वा वीस। अग-अग हल्दी में करी जी, सुधे भोज्यो गात । छप्पन कोट जहाँ जान पधारे, दुलहा श्री भगवान । सुपने मे तोरन बाधियो जी, सुपने मे आई जान । मीरां को गिरधर मिल्याजी, पूरव जनम के भाग । सुपने मे म्हाने परण गया जी, हो गया अचल सुहाग ।। 33(10536) और, असामा य आत्मनिष्ठा न होती तो उस स्वप्न को जीवन का परम सत्य मानकर असामा य हठधर्मिता का अद्वितीय उदाहरण भी नहीं बनती। मनोविश्लेषणकर्ता मीरा के व्यक्तित्व मे मातृवात्सल्य का अभाव, निश्ठल पित छाया की कमी, सहज स्वाभाविक स्नेह का अभाव, अकेलेपन वाला वचपन जैसे कारण 23(510) खोज लेते हैं, मगर सचाई यह माननी चाहिए कि अतीन्द्रिय आत्म तत्व कभी इतना प्रखर भी हो सकता है कि वह व्यक्ति के चरित्र और व्यवहार को आजीवन आच्छादित कर ले। मीरा के साथ ऐसा ही हुआ था कि चात्सल्य और सहज स्नेह की उसकी उत्कट आत्मपोपित भावना कृष्णो मुखी हो गई 23(15)। उसके व्यक्तित्व को यह विशेषता और वचपन मे साधु-सतो से मिला उ मुक्त स्नेह उसके मन मे घर कर गया कि सच्चा सुख हरि स्मरण मे है। ससार की असारता का, काया की नश्वरता का, पूवाम के कोल का यदि मीरा को बचपन से ही विश्वास हो चला हो तो अचमे की बात नहीं होगी। वह उसे अनोखा बना गया।हरि स्मरण से आगे बढ़ते-बढते उसकी उत्त -~~-आयु और परिस्थितियो के मदर्भ से-क्सि तरह दाम्पत्य ॥ ग्रहण क्यिा होगा? यह किसी स्वतत्र अध्य का विषय हो सकता क्थ्य जरूरी है कि-

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54/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन देवर जेठ म्हारे कुबूधी, नित की छाडे राड। 11 (167) सासू बुरी है म्हारी ननद हठीली। 11 (167) सासरिया मे दुख घणो रे, सासू ननद सतावै । देवर जंठ म्हारो कुटुम कबीलो नित उठ राड चलावै ।। 11 (167) इस टकराव मे उसके व्यक्तित्व का वह हठीलापन उभरता है जो हमे पाबूजी की याद दिलाता है, या वीरमदे वी याद दिलाता है, जिहोन नौ बरस तक दर- बदर रहते हुए भी अतत मेडता वापस लिया। ऐसा हठीलापन मोरा को विरासत मे मिला था। वही उसे बहला सका पा- -म्हाने गुरु गोबिन्द री आण, गोरक न पूजा। 33 (10629) -राणा जी म्हे तो गोवद का गुण गास्यां । चरणामृत को नेम हमारो, नित उठ दरसण जास्यां ।। 33 (108 34) -नहिं भावे यौरो देशडलो रग रूडो। थारा देस मैं राणा मगति नहिं छ लोग बस सब रूडो॥ 33 (109-35) थे तो राणा जी म्हाने इसहा लागो ज्यू बछल मे कर। महल अटारी हम सब त्यागा, त्याग्यो थारो सैर। काजल टीकी राणा हम सब त्याग्या, भगवा चादर पर ।। 33(11037) --सीसेद्यो रूठो तो म्हारो काइ करसी। म्हें तो गोबद का गुण गास्यां । 33 (11038) -म्हें तो गोविंद का गुण गाना। राणा रूठ नगरी राख, हरि रूठे कहें जाणा। 33(11243) गढ चित्तोडे ना रहां नहिं रहण को जोग । वसस्या रूही दुवारिका, जहं हरि भक्ता रा भाग 1 11 (53) अपनी टेक के कारण मीरा को चाहे चित्तौड छोड़ना पड़ा, परिस्थितियों की कुटिलता के कारण मेडता भी छोड़ना पडा, सब ओर से निराश्रित होना पड़ा, मगर उसका व्यक्तित्व अटल और अडिग रहा । उसके व्यक्तित्व ने बचपन में जो लोकव्यापी तत्व सगठित किये थे वे खुलकर तब प्रगट हुए जब वह उग्मुक्त होकर द्वारिका वास करने लगी- रामश्री रणछोड दीज्यो द्वारिका वास । सख चक्र गदा पद्म मिट जग को त्रास ।

khree मीरा व्यक्तित्व मीमासा-55... मकल तीरय गोमती के रहत नि बास झालर झझा बाजे, सदा सुख की रास.। । तज्यो देस रू बेस हू ताजि तज्यो राना राजो दासी मीरा सरन आवत तुम्हें अब सब लाज ।। (22) एक व्यक्तित्व जो बचपन से हरि भक्ति, लोक स्नेह, साधु-सगत और निश्छल भावभूमि पर पनपा, राजकुलो की नारी मर्यादा, निषेधो, वजनाओ और ताडनाओ की टकराहट से बदला नहीं झुका नहीं, टूटा भी नहीं बल्कि लोकानुगत हो गया, लोकव्यापी हो गया और लोकाश्रित हो गया-यह मीरा के विकास का सार कहा जा सकता है। नभी मीरा का जस, मीरा की कीर्ति, उसकी स्तुति और वदना के गीत उसके पीहर और समुराल वालो ने नहीं गाए, जनता ने गाए, भक्तो ने अपने-अपने ढग से उन घटनाओ और भक्ति के उद्गारो को सजोया-~चाहे उनमे उन्होने अपनी छाप भी लगा दी हो । हर लोकिक भक्त गोर महान व्यक्ति के साथ ऐसा होता आया है । लोक मानस की श्रद्धा, उनकी भक्ति, उनकी भावना जब खुलकर अभि- व्यक्ति होती है तब उसमे अपने-पराये का भेद नहीं रह जाता । महानता व्यापक हो जाती है और उसमे सबका समावेश हो जाता है। मीरा के पदो के जो देशव्यापी सक्लन मिलते हैं, उसमे मीरा के व्यक्ति को खोजना सरल काम नहीं है । उनमे देश हो गई है, युग हो गई है बल्कि जगत हो गई है। तभी तो कहा है- जगती म्हारो पोर, साधा सग सासरो। मोहन चतुर सुजान, हरिजी रो आस रो॥ (35) मीरा के बारे ऐतिहासिक दस्तावेज चाहे कम हो, अधूरे हो, लोक भावना ने जो कुछ सकेला है, सहेजा है, वह उसके व्यक्तित्व की प्रखरता, टेक और उसकी महानता और प्रसिद्धि को समझ पाने में सहायक है । ऐसे बहिर्साक्ष्यो को काफी बडी सूची है जिनमे भीरा के राठौर वश के पारण, भाट, पुरोहित भी हैं, परवर्ती ठाकुर और भक्त भी हैं, वल्लभ मत थे, गयो, वैष्णव-पथ के, नाथपथ के, परवर्ती भक्त और सत भी हैं और न माधु-गानिया भी हैं। ऐसे बहिर्साक्ष्यो का समय मीरा के जीवन काल ने कालीगदी गयी विक्रमी तक जाता है। जहां तक मीरा के पदो का प्रश्न है, कितने हैं, लोक के कितने हैं यह उत्तर अव तर अनुगनिभा प्रगति रहेगा। वितु भावना भीरा की है जो लोव ने 87 3१ अपनी- अपनी भाषा में उसने आज तक जीवित रण 19 (1339) ऐसे साक्ष्यों से मूलत जो तथ्य उमग्न - 56/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन (1) मीरा मेडतिणी का हठीला व्यक्तित्व था जिसने अपने ससुराल की कुल मर्यादा, सासारिक लाज की परवाह न करके भक्ति की। (2) उसके व्यक्तित्व की जा अनूठी विशेषता राज विरोध का कारण बनी, वह भक्ति भावना नहीं थी बल्कि साधु सगति की अटस टेक पी जिसे उसने नहीं छोडाऔर क्या मेवाड तथा क्या मेडता वालेउ होंने उसे छुडवाना चाहा तो छुडवाना ही धार लिया। इस खीचतान मे ही परिस्थिति वश ही सही-नाते रिश्ते टूट गए और मीरा लोक्मयी हो गई। (3) मीरा यद्यपि राज घराने के एक ठाकुर की क या थी और एक महत्व- पूण राजवश की बहू थी फिर भी ससार के वभव, राजसुप, सिंगार, भोज आदि उसे भक्ति-पथ से विचलित नही कर पाए । जबकि राज- वशो की ओर से वजनाओ, निषेधो और प्रतिबधो के जितने प्रयत हुए उनसे उनका साधु सगत का आग्रह वढता चला गया। इस सीमा तक कि अतत वह सब मर्यादाएँ तोडकर लोकव्यापी हो गई। काल अम से देखें तो विविध स्रोतो मे मीरा सम्बधी मत उल्लेख इस तरह से मिलते हैं। 11 (271) (1) नरसी मेहता माय समय विक्रमी 1528 से 15951 इनके एक पद मे मीरा की एक परची का हवाला भाता है- मीराबाई ना विप अमत कीधा, बिदुरनी आरोगी भाजी रे॥ यदि नरसी मेहता का समय सदिग्ध नही है तो मानना होगा कि मीरा के राजकुल की घटनाएं गुजरात काठियावाड तक फैल चुकी थीं। उस जमाने मे जब साधु सतो का निरन्तर आवागमन द्वारिका मेडता मेवाड-वृदावन होता रहता था तब लोक प्रवादो के फैलाव मे कोई देर नहीं लगती थी। (2) हरिराम व्यास रचना काल का माय समय विक्रमी 1612 और निर्वाण विक्रमी 16301 यह स्वामी हितहरिवश के शिष्य थे, ओरछा के निवासी थे और वदावन मे निवास करत थे। उनके पद मे उल्लेख आता है- (1) इतनी है सव कुटुम हमारो। सैन, धना अस नामा पीपा, रबीर रैदास चमारी। रूप सनातन को सेवग, मगल भटट सुढारौ। सूरदास परमानद मेहा, मीरा भगति विचारो॥11 (259) (1) मीरा बाई विनु की भगतनि पिता जानि उर लाये। स्वारप परमारय जमल विनु को सक वधु कहावे ।। (दही) अर्थात विक्रमी 1612 अथवा उसके चार छह वप वाद तक मीरा की साधु सेवक के रूप म इतनी ख्याति हो चुकी थी कि परवर्ती साधु-सत उहें स्मरण करने मीरा व्यक्तित्व भीमासा/57 लगे थे। निश्चित रूप से वह ख्याति उन्होंने बचपन से अजित की थी और साधु- सतो को पितृवत मानकर उनसे नान ग्रहण करने की उनकी अटल वृत्ति थी। (3) नाभादास इनका समय विक्रमी 1632 से 1680 तक मान्य है। ये कृष्ण भक्त थे और अनक भक्ता पर इहान भक्तमाल की रचना की थी। उसमे मीरा के बारे में भी एक छप्पय है-~-9 (13-14) सदश गापिका प्रेम प्रकट विजुहिं दिखायो। निरस अति निडर रसिक जस रसना गायो । दुष्टनि दोष विचारि मृत्यु को उद्यम कीनो। बार न बाको भयो, गरल अमरित ज्यू पोयो । भगति निसान बजाय के, काहू ते नाहिंन डरी (लजी)। लोक लाज कुल शृखला, तजि मीरा गिरधर भजी। 33 (2441) इसमे व्यास जी की अपेक्षा एक लक्षण और व्यक्त होता है कि मीरा का व्यक्तित्व निडर और निरकुश था, भक्ति के पथ पर वह किसी से नहीं लजाई या डरी-यहाँ तक कि उसके लिए लोकलाज और कुल मरजादा भी छोडनी पडी तो उसने उसे छोडा। ऐसी जब सतो और भक्तो मे मीरा की ख्याति थी तो व्यवहारत घटनाए अनुश्रुत रही ही होगी। आज भी देखा जाता है कि जिन बड़े लोगो की ख्याति, धम, साधु सत्सग, सदाव्रत, दान धम की ओर होती है उनके बारे मे वे लोग ही ज्यादा सवेदनशील और सावचेत होते हैं जिनका उन कामो से प्राप्ति सम्बध होता है । कहाँ भडारा हो रहा है, कोन दाता उदार है, कौन सकट मे है-इसका पता पडोसियो और समवर्गीय को नहीं होता मगर दूर दराज से आने वाले साधुओ, मगतो, याचको आदि को को विद्युत गति से उनकी खबर हो जाती है । सामाजिक सचार प्रणाली की इसी विशिष्टता ने मीरा को साधु सगति को, उसकी भक्ति भावना को उसके जीवन-काल मे ही व्यापक बना दिया हो तो माश्चय नहीं। और ऐसे प्रचारक जनो को मीरा के जनम, विवाह, परिवार आदि से क्या लेना-देना हो सकता था ? सिवा इसके कि वह साधू सतो का सम्मान करती थी। पोपण करती थी आदर देती थी और उनसे ज्ञान प्राप्त करती थी। मगर, एक बात और ध्यान में रखनी होगी। मीरा अवश्य ही साधु सगत करती होगी, साधारण राजपूत कुल बधुओ की तरह उनसे पर्दा और लज्जा भी नहीं करती होगी, उहे पिता समान मानती होगी मगर उनसे व्यवहार मे अवश्य ही उसका प्रखर व्यक्तित्व अपनी विशिष्टता कुलीन पाथक्य और अनमनीय गौरव को अक्षुण्ण बनाए रखता रहा होगा । यदि वैसा न होता तो उस जमाने की मत मतातर की आपाधापी मे अवश्य ही कोई न कोई सम्प्रदाय उसके नाम को पचा लता, उस पर अपने सम्प्रदाय की छाप लगा देता। उ मुक्त साधु सतो के सम्मेलन 58 / मीरा लोक्तात्विक अध्ययन - - के उपरात भी मीरा किसी सम्प्रदाय स नही बंधी, केवल कृष्ण प्रेम मे रमी। यह उस व्यक्तित्व के अटल निश्चय और अनढ प्रेमका प्रमाण बनना है। (4) दादूपयी राघवदास -~~इनका समय विक्रमी 1653 1746 कहा जाता है और उनका मीरा-वरनन वि० 1717 था । इनका मीरा-वरनन 'भक्त- माल के समान है-11(265) यथा-लोक, वेद, कुल, जगत के सुख छोडकर श्री हरि भजना, कलियुग मे गोपी प्रेम की रीति प्रकट करना, सत समाओ मे निडर रह कर कृष्ण भक्ति करना, राणा का कोप वरना, जहर का प्याला पौना, गिरधर को पति मानना, भक्ति की नौबत बजाकर भक्ति को प्रसिद्ध करना । इनके अलावा किसी कुटिल सत द्वारा मीरा के सामने कुत्सित प्रस्ताव करना और उसकी निडरता से भयभीत होना अकबर का मौरा के दर्शनार्थ आना, जीवगोस्वामी की गाथा, चित्तोड से द्वारिका जाना और वही लीलाधाम पाना-इतनी गाथाएँ नहीं हैं। (5) दयावाई-इनका रचना समय विक्रमी 1765 कहा जाता है। मीरा सम्बधी एक दोहे मे इ होने केवल विप पान की गाथा का उल्लेख किया है। 36 (308)। (6) प्रियादास-इनका समय विक्रमी 1760 1794 माना जाता है, यानी मीरा के लगभग 100 वष बाद । ये भी वृदावन के वासी थे और गोडीय भक्त कहे जाते हैं। इनके चार दोहे मीरा को टीका के हैं 9(14) जिनके अनुसार मोरा को घुघर बांधकर नाचते, करतार लेकर बजाते और ससार को तिनके की तरह मानते बताया गया है। साथ ही ललिता नामक सखो के साथ वृन्दावन यात्रा को बात भी कही गई है। भक्ति के आवेश मे नाचने गाने की यह पल्पना तमयता दर्शाने के लिए की गई हो तो विस्मय की बात नही होगी। हो सकता है, मीरा छाप के भजनो मे ही तब तक नृत्य कीतन की बात जमा दी गई हो। प्रियादास ने मीरा की क्या को पूरा सिलसिला देकर उसे "भक्ति का प्रकट रूप" सिद्ध कर दिया है । लगता है कि मीरा सम्बधी जितने मत, तम्म, मिपक उस समय तक बन गए थे, उनका सम्पादन र प्रियादास ने उहे एक ऐतिहा सिक कथा का रूप दे दिया। तद्नुसार- (1) मीरा का मेहता में जम (2) बचपन से ही कृष्ण भक्ति का उन्माद (3) राणा के घर विवाह (4) कृष्ण का पति रूप में वरण--यह भी कि भावर के समय भी कृष्ण की मूर्ति और शालिग्राम बटिका उसके बटुए मे थी (5) ससुराल जाते समय माता पिता से गिरधर की मूर्ति को दहेज मे मांगना (6) ससुराल मे गृह प्रवेश के समय गोरल पूजा से इनकार करना, फलत सास से विवाद (7) सास की शिकायत पर राणा/युवराज का मीरा को सेल मारले आना मगर नारी हत्या के भय से रुक जाना। नतीजन मीरा को एकातवास का दह देना (8 मीरा व्यक्तित्व मीमासा 159 तथापि मीरा का देवदशन को जाते रहना और साधु सतो को आमवित करते रहना (9) ऊग नामक नणद द्वारा राजवश को लज्जा रक्षा के प्रयास, मीरा को समझाना और वापस 'महलो पर चढाने का प्रयल करना (10) असफल होने पर राणा द्वारा मीरा को विप का प्याला भेजना, साधु-सगत मे किसी कपटी साधु द्वारा मीरा के साथ कुत्सित आचरण, राणा, द्वारा मीरा पर गुप्तचर लगाना (11) मीरा का वृदावन जाना, जीव गास्वामी का भ्रम मिटाना, चित्तौड वापस आना (12) राणा क दुव्यवहार से चित्तौड त्यागना और द्वारिका में जाकर वास करना (13) चितोड पर आपत्तियां आना, उनको मीरा के प्रति अत्याचारो का परिणाम मानकर मीरा को वापस बुलाने के लिए ब्राह्मणो को द्वारिका भेजना (14) रणछोड जी के विरह से दुखी होकर मीरा को प्राथना (15) रणछोड जी की मूर्ति मे मीरा का समा जान्ग 7(15) इस प्रकार से प्रियादास ने मीरा की गाथामो को एक सिलसिला दिया है जिनमे से कुछ तो ऐतिहासिक तथ्य हैं और कुछ युग-धारा, जिसने मीरा की भावनाओ को, भजनो का रूप देकर, उन्हे चार- ताथ करन की कोशिश की होगी। चाहे जो हो, इन गाथाओं से मीरा के व्यक्तित्व की अटल अनड़ता व्यक्त होती है । वह इतना बताने में सक्षम है कि उसने सब कुछ छोडा मगर लोक- -सम्पक और लोक जीवन से अछूता रहना स्वीकार नहीं किया। (7) नागरीदास-इनका मूल नाम सामतसिंह था। यह जोधपुर के महाराजा उदयसिंह के छोटे पुत्र कृष्णसिंह की सतानो मे से थे और किशनगढ (अजमेर) के नरेश थे। वे उसी राठौर वश के थे जिसमे मीरा हुई थी। सामतसिंह सरल स्वभाव के हरिभक्त थे। उनके छोटे भाई बहादुरसिंह ने जब विक्रमी 1805 मे किशनगढ का राज्य जबदस्ती ले लिया तब सामतसिंह सपरिवार दिल्ली गए-- सहायता पाने को। सहायता न मिलने पर मयुरा चले गए और विरक्त होकर रहने लगे। राठौर वश का होने से और भक्त होने से उनके मीरा बयान मे प्रामा- णिकता मानी जाती है। इनका समय विक्रमी 1756 से 1823 तब का था-- यानी मीरा के 200 वर्ष बाद । इनके मीरा वणन मे सती न होकर गिरधर गाना, 'सिंगर पटारन भाता, निंदा स्तुति की परवाह न करना, कुल परिवार सब गिरधर को ही मानना-ऐसी बातें आई हैं 11 (265 66)। मीरा पर गुप्तचरी कराना, बिप भेजना, विधवा होने के बाद चितोड का त्याग, वृन्दावन जाना और वहां से द्वारिका वास करना और वहीं निर्वाण पाने की बात कही गई है। नागरीदास जी के विवरण से पता लगता है कि वृदावन और द्वारिका मे भी मीरा अकेली नही थी। राज मर्यादा के अनुकूल उसके साथ पुरोहित आदि राणा के लोग भी थे। वहाँ रणछोड जी के मदिर मे--जो कि मेवाडी राणाओ ने हो बनवाया था --मीरा का वास था। ।

60/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन पारिस्थितिक समीकरण-मीरा ये व्यक्तित्व को समझने बूझन वे इतने हो आधार समव हैं। ये सब मिलार बताते हैं कि- (1) राठोड वश की और जाधाणो की जो भानुवशिप टप थो, मान थी- दुदम अनमनीयता थी जो दूदा, वीरम दे, जयमल, दुर्गादास, जसवतसिंह तर इतिहास म प्रमाणित है, वह मीरा का विरासत में मिली थी। (2) उसके साथ-साथ दूदाजी क नये राज्य की नई रीतिया में संस्कारो मे वह पली थी जिनम राज्य के निवासी प्रजावत नहीं थे, सहयोगी थे। राज- कुल और लोक-जीवन के बीच अतर के अवसर बने-बढे नहीं थे बलि अकाल, सुकाल पव उत्सवो मे दोनो सहभागी होते थे। मीरा को-कुछ तो इस कारण से कि वह कोई राजकुमारी नहीं थी, किसी सुम्थापित राज्य की मयादा उसे बचपन से बाधन वाली नही थी और कुछ इस कारण कि सदा युद्ध-रत और सघपरत दादा पिता के घर मे उसे लोक सम्पक की सुविधाए अधिक थो-लोक धरातल पर विकसित होने के अवसर मिले थे। अत उसका सस्वारी मन राज-कुलोचित मर्यादाओ, निषेधो से पृथक धरातल पर विकसित हुआ था। (3) बचपन का वात्सल्य-अभाव और अपने को निराश्रित मानने का अव- चेतन भी उसके चिंतनशील, एकात प्रिय और गभीर हाने का कारण था। वही उसे साधु-सगत मे सुख देने वाला और नान प्राप्त करन और उसीमे रमाए रखन वाला अभिकारक बना था।' परची (30) के लेखक ने उसके बचपन को बहुत सही आका है । साधु सगति और उनके पितृवत स्नेह में पगी पत्नी मीरा ने ससार की नश्वरता, असारता, सादगी की महत्ता और मन की उदारता जितनी सीखी, उतने लोक व्यवहार, कुल मर्यादा, राजपूती कयाओ की लज्जा, परदा, बाहरी सम्पर्कों की शू यता जसे तत्व नही सीखे। (4) उसका मन सभार केवल अन्तमुखी चेतनाओ और स्वयकृत धारणामा विश्वासो से ही निर्मित हुआ था। यदि मीरा का विवाह मेवाडी राजघराने मन होकर मारवाड मे ही किसी ठाकुर घराने में होता तो सभवत वह अपने पति को भी अपने रग मे रग लेती, इतना उत्क्ट उसका भक्ति आवेग माना जा सकता । (5) मेवाड के राजघराने मे उसका विवाह चाहे राणा सागा के हित में रहा हो, दूदावशियो के लिए भी वह सबल के सहारे का साधन रहा हो, मगर मीरा के लिए वह दुपातक राजभोग ही रहा। अपनी विशिष्टता के साथ वह वहाँ समायोजित नहीं हो सकी। बहा विचित्र सयोग था कि मीरा अगर मीरा न होती तो वह राजनीतिक सम्बधो के यज्ञ की एक आहुति बनकर रह जाती। विचित्रता यह भी थी कि मेवाड के राजकुल में उसने कष्ट पाए, अपमान पाया तथापि मेवाड और मेडता के बीच राजनीतिक सम्बधो म दरार नहीं पड़ी | सागा के बाद मीरा व्यक्तित्व मीमासा/61 उदयसिंह के जमाने मे जयमल राठौर ने चित्तौड की रक्षा में अपना अनोखा बलि- दान दिया, उसके बाद भी मडतिए राठौर मेवाड मे जागीरें पाते रहे और आज भी उनके वशज मेवाड मे बसे हुए हैं। (1) इसके पीछे मीरा के व्यक्तित्व का अनोखापन था या तत्कालीन राजनीति में नारी के स्थान की नगण्यता की प्रथा थी, कुछ कह सकना कठिन है मगर, यह ऐतिहासिक तथ्य है कि विवाह के बाद मेवाड मे मीरा ने अपन को निषेधो, प्रतिबंधो, वजनाओ और प्रताडनाआ से ही घिरा पाया। (6) विवाह (वि० 1573) से लेकर विधवा होने तक (वि० 1579) मीरा को मेवाड के राजघरान के अनुरूप ढालने के प्रयास होते रहे । भाजराज के बारे में कोई विगत नहीं मिलती किन्तु एक तो राणा सांगा की नीति कुशलता, दूसरे उनके अदर बाहर के प्रभाव के कारण मीरा को साधु सगत चलती रही होगी, पडित गजाधर स्थिति पर नियत्रण परते होगे और भोजराज भी शायद, मेडता के महत्व को समझते हुए, मीरा के साथ उदारता बरतते रहे होगे । मीरा का व्यक्तित्व तब भी राजसी प्रभाव से अछूता रहा और 'नित उठ दरसण जाने' और 'चरणामत का नम' निभाने की उसकी टेक चलतो रही । साधु सत भी आत रहे और राज मर्यादा के भीतर मीरा उनके उपदेश सुनती रही । शायद सिंगार- पटार मणि आभूपण उसने धारण किए ही नही । (7) विधवा होने के बाद वि० 1579 से राणा सागा की हत्या वि0 1584 के समय तक मीरा का व्यक्तित्व दुधारी हो गया हागा। एक तो क्वरपने मे भोजराज की मृत्यु का दोषारोपण उसी पर हुआ होगा, अन्त पुर मे वह नाना प्रकार से निदा का पात्र बनी होगी और उसकी भक्ति साधना पर भी व्यवधानी असर हुआ होगा । पाट पटम्बर, सुहाग, हार, माला, वस्त्र आदि त्याग कर कठीमाला, दोवडी धारण करने, भूमि पर शयन करने, रूखा सूखा खान और महलो मे भी वैरागन होने का समय यही था। उसका भक्त हृदय साधु सगति और भजन मे रमना चाहता था और राजमर्याग उसे दूसरी तरह से रह्न को बाध्य करती थी। इस वश्मकश मे उसन 'जपन को जीवित रखा और मर्यादा को तिलाजलि दे दी। अतत 'काहू की बरजी अब ना रहीं वाली स्थिति मे वह आ ही गई। यही उसके व्यक्तित्व की परिवेश पर विजय थी और यही से उसके लोक व्यापी होने की घडी जारभ हुई थी। (8) निश्चित रूप स विक्रमी 1584 स लकर 1588 तक का चार साल का समय मीरा क एक त का, उपेना का वजनाआ का और निषेधा का समय रहा होगा। बचपन वीएकानिकता के, निराश्रयता की भावना के पनपने और सकल्प को नई दिशा देने का समय यही था। मेडता पुष्कर-डाकोर तीथयात्रा के निमित्त जाने आन का कम प्रम इस अवधि मे बना हागा जसी कि वैधव्य के बाद रीति 62 / मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन हुआ करती थी। मेवाड की राजनीति मे भी कुचक्र, बाहरी भेदियो का आवागमन, बाहरी आक्रमण की तैयारियो और रानी करमंती के कुटिल चक्रो का दौरदौरा चल पडा था। यही समय रहा होगा जब अत पुर में जोधाणी जोधकवर का प्रभाव कम पडा होगा और बूंदी की करमैती का जोर वढा होगा (1) सागा के बाद राणा रत्नसिंह के राज के ये 4 वप (वि० स० 1584 1588) मीरा के लिए राणा के कोप के कम और अन पुर के बधनों के वर्ष अधिक रहे, जवकि उसे सास नणद की कुटिलता, राड और भक्तिहीनता की बातें कहनी पडी होगी। इसी समय में उसकी अतर्मुखता बढी होगी और बाहरी दुनियां उसके लिए अथहीन हो गई होगी। हमे मान लेना चाहिए कि राणा सागा की मृत्यु के बाद मीरा ने अपने को पूणत निराश्रित और अकेला अनुभव क्यिा होगा। 'भव सागर मे बही जात हों' जैसी अभिव्यक्ति मे निराश्रितता फूट पड़ी है। (9) और वह निराश्रितता वह घुटन चरम सीमा पर विक्रमी स० 1988 में पहुंची जव रानी करमंती के आंतरिक कुचो ने अपना रग दिखाया-राणा रत्नसिंह की हत्या हुई और रणथभौर से करमैती के बेटे विक्रमाजीत को लाकर चित्तौड की गद्दी पर बिठाया गया। उसके बारे मे किसी का मत अच्छा नहीं पा। स्वय बूदी के कवि सूयमल्ल ने-लगभग 250 वष बाद भी-उसके बारे मे लिखा- विमात बधू उत रानवारो, नरेस श्री विषम नीति यारो। बनें न जासो महिपाल बत्त, घनो नसादेह प्रमाद धत्तं । भाणेज थी अजुन को अथागी, रहे सदा मत्त अफीम रागी। सुरान हर ऊंघन को सराहै, चित्तौड को राज न जाहि चाहै। 25(2190) विक्रमाजीत का सिफ9 10 महीने का शासन ही मीरा ने भोगा होगा जिसमे अन्न पुर को उसकी सब गतिविधियों वर्जित और निपिद हुई हागी, राजनीतिक बुचको और बाहरी उपद्रवों के भय से साधु सतो, जोगी जतियो और बाहरी लोगो के आवागमन पर कठोर नियत्रण लगे हागे और अत पुर में राज वधुओ की गतिविधियां भी निपिद्ध की गई होंगी। कुचत्रो के दौर मे मीरा से मुक्ति पान थे पत्न भी हुए हो तो आश्चय नहीं। इस समय मे ही मीरा के अह, उसकी भनयी भक्ति उसको चेतन-अवचेतन सत्ता को इतना धक्का पहुंचा कि वे जो म्हारा बाग सान वेगा या आव।' सासरिय म दुख पणारी, सामू-नणद मनाये। वाली बातें बनी पही होंगी। ऐतिहासिक तथ्य है कि विक्रमी 1590. में आरम्म मे वीरमद मीराको चित्तोर मे मेहताल गए ५। और वही समय या जब मीरा ने पादुल मन न निषय पर लिया था- - मीरा व्यक्तित्व मीमासा/63 गढ चित्तौडे ना रहा, नहिं रहण को जोग । बसस्य रूडी द्वारिका, जह हरि भगता रा भोग। (10) तो, मीरा का मेवाड की जेठी बहू बनना, उसके व्यक्तित्व के विपरीत असगत और असमायोज्य पटाक्षेप रहा । इन सघपमयी घटनाओ के बीच वह अनय रूप से सहनशील, साहसी, धंयवान और आत्मनिष्ठ बनकर उभरी। 17 (32) उसकी अपार सहनशीलता, अगाध विश्वास और अटूट निष्ठा तो उभर कर भाई होगी जब विक्रमी 1591 मे मेडता बिखरा, राव वीरम दे को अजमेर, शेखावाटी, दिल्ली तक दर वदर होकर भटकना पडा और इस वीच मीरा को रणछोण की शरण मे जाना पड़ा । उस भयकर निराश्रयता मे--जिसका ससुराल भी मिट गया और जिसका पीहर भी अनाधित हो गया-मीरा की व्यथा शायद इस तरह फूटी होगी- विध विधणा रा न्यारा। दीरघ नैक मिरध कू दीवा, वण वण फिरता मारा। उजलो बरण बागला पावा, कोयल बडणा काला। नद्यो नदयां निरमलधारा, समद करया जल खारा। मूरख जण सघासण राजा, परत फिरता द्वारा। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, राणी भगत सँघारा ।। (11) और, यह व्यथा अतत द्वारिका मे रणछाड की शरण में जाकर ही मिली होगी- म्हारे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोया। दूसरा जी कोयो साधो, सकल लोक जोया। भाया छोड्या बधा छोड्या, छोहया सगा सूया। भगति देख राजी हुवया, जगति देख रोया ।। तथा उसके युग-युग में भक्ति पिपासु व्यक्तित्व मे निखार तभी से आना शुरू हुआ होगा जब सब बधन काटकर उसने अनुभव किया होगा कि- द्वारिका को वास हो मोहिं द्वारिका को वास । सख वक्र पदम हू ते, मिटै जग को त्रास । सकल तीरथ गोमती मे करत हैं नितवास । सख झालरि झाझ बाज, सदा सुख की रास । तजियो देस, वेस, पति गह तज्यो सम्पत्ति राजि । दासी मीरा सरन आई, तुम्हें अब सब लाजि ॥

64) मीरा लाक्तात्त्विक अध्ययन
और, वह लोक व्यापी हो गई, युग-जीवी हो गई, जीवन काल में ही उसने
ख्याति कमा ली थी और शायर अपने ससुराल वालो के दुर्भाग्य पर खेद भी प्रकट
किया था कि-
राठोडोरी धीयडी जी, सोसोया रे साथ।
ले जाती बैकुठ क, राणा कुन मानी बात ।।
उसकी भक्ति के बहुमुखी आयाम द्वारिका वास के समय में विक्रमी स०
1592 से 1603 तक-~मुखरित हुए होंगे।

5 मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन समाजशास्त्री 'लोक का अर्थ उस 'जन' से लगाते हैं जो अपनी परम्पराओ, प्रथाओ और विश्वासा की सत्ता मे जीवित रहता है। 37(3) मनुष्य के व्यक्तित्व और व्यक्ति तत्त्व की भांति हर समाज का अपना मुखरित और आधारिक लोक तत्त्व भी होता है। हर वस्तुनिष्ठ सत्ता की भूमिका में आत्मनिष्ठता के ऐसे तत्व मौजूद होते हैं जिहें प्रयत्न करके समझना पडता है। लाक और लोकमानस दीघकालीन परम्पराओ जातीय विशेषताओ, आदिम सस्कारो और अजित सदा- चारो का सगृहीत सभार होता है । वह लोकतत्वो से बनता है। लोक्तत्त्व दरअसल समाज की चेतन अवस्था के मूल मे स्थित वे गुण-सूत्र हैं जो चेतन धरातल को, आचरण, व्यवहार को सजीवक रस प्रदान करते रहते हैं । सामाजिक जीवन का हर शान उसकी हर चेतना, उसकी हर पल की आचार- सहिता, उसकी प्रयोजनवती भाषा, उसकी उक्ति सम्पदा जो चलते को रोक दे, बैठे को उछाल दे, पानी में आग लगा दे~-वह हर बात पोषियो मे नही होती, वह समाज के लोकतत्वो मे होती है और परम्परा, रीति, आचरण, व्यवहार, मा यता आदि के जरिये से समाज को अनुप्राणित, सचालित और फियमरण रखती है । लोकतत्व समाज के हजारों वर्षों के अवचेतन लोकमानस का सकलित सभार होता है जिसमे कौन सा तत्व विस युग का, क्सि प्रसग का, किस सस्कृति का है, इसे पहचानना कठिन होता है। किसी समाज म हजारो हजार रीतियों होती हैं, जीवन के हर कदम पर प्रयाएँ होती हैं, मा यताएं होती हैं, विश्वास होत है, धारणाएं होती हैं, परम्पराएं होती हैं, जो कभी पर्वो म, उत्सवो में, सस्कारा म साहित्य मे शिल्प म, चित्रकला मे, सगीत नृत्य गीत, क्था कहानी सब मे अनुस्यूत हाती हैं । 38(23) लोकाभि- व्यक्ति उनस बनती है। हर समय, समाज की हर भौतिक सत्ता, उसकी उप- सब्धियां और उसका चतन जगत इस लातात्विक सभार से आदान प्रदान करता रहता है और इस प्रक्रिया से लोक्तत्वो का मभार भी उसी तरह से बनता-- विक्सता रहता है, जैसे व्यक्ति का व्यक्तित्व बढता विक्सता रहता है। अन्तर 66/ मीरा लोकतात्विर मध्यपन इतना ही होता है कि व्यक्ति की सत्ता सीमित हाती है और समाज के लोक- तत्वो की कोई इयत्ता नहीं होती। लोकतत्वो के अध्येतामो ने मानव के सगहीत मन के तीन स्तर निर्धारित किए हैं--37(36) ला मानस, जनमानस और मुनि मानस । जनमानस तो दैनिक व्यवसाय बुद्धि के नियंत्रण और संचालन से सम्बध रखता है। वह चेतन स्तर होता है । इस स्तर के अनुकूल जा लोग आचरण और व्यवहार परत हैं, उनसे जनमानस को कोई शिकायत नहीं रहनी । लोकमास लोकतत्त्वो को जाम देता है, साधारणीकरण का धरातल बनाता है और काव्य, भक्ति, वार्ता, कथा थादि का ज म इस धरातल से होता है । मुनि मानस विशिष्ट क्षेत्र मे ज्ञान विज्ञान के सम्बधो का निर्माण करता है। ज्ञान विज्ञान, साहित्य, शास्त्र आदि इस मानस के उत्पादन और परिणाम होत हैं । मुनिमानस और लोकमास मे घात- प्रतिघात और आदान प्रदान होता रहता है जबकि जन मानस आवश्यक्तानुसार दोनो का व्यावसायिक उपयोग कर लता है। डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुमार भारतीय साहित्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग लोकसाहित्य पर आधारित था। न जाने कितनी बार वह उपरले स्तर के प्रयो से प्रभावित हुआ है और क्तिनी बार उसने उहे प्रभावित किया है । वस्तुत लोक्तत्वो की व्याप्ति इतनी अधिक है कि साहित्य उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता क्योकि साहित्य- कार स्वयं उस भूमि की उपज है जिसके विभिन्न भाव एव विचार पक्षो को लोक- तत्वो के नाम से पुकारा जाता है। 23(189) मीरा अपने युग और मेडतिया समाज की उपज थी (अध्याय 1-7)। वह भी ऐसी उपज जो आगे जाकर समवर्गी समाज म खप नही सकी बल्कि लोकान्तर व्यापी हो गई । मेडतिया समाज के लोक तत्वो (अध्याय--2) ने उसके व्यक्तित्व फो सवारा पा और उसकी अपनी व्यक्ति सत्ता ने इतनी अन्तर्मुखता कमाई पो कि वह जीवन भर जनमानस के के धरातल पर नही आ पाई। वह एक पुनीत भक्त आत्मा तो थी ही, एक अनय लोनिधि भी थी। उसके पदो मे-जिहें अब तक अनुसधानकर्ताओं ने तरचित माना है और जिनमे प्रक्षेपो की कमी बताई है- (39) उसके युग और समाज के लोक्तत्वो को अभिव्यक्ति जिस तरह से हुई है उसे हम निम्नलिपित शीपको में वर्गीकृत करके अनुशीलन के योग्य बना मक्ते हैं 1 धार्मिक तत्व (1) स्वरूप (6) निगुण तथा नाय तत्व (1) सगुण तत्व (11) सगुण निगुण मे अभेद (2) साधना (1) निगुण मत आधारित (1) सगुण मत आधारित मोरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन /67 2 सामाजिक तत्त्व (11) सगुण निगु ण मे अभेद (3) ईश्वरीय अनुभूति के तत्व (1) दरसन-परसन (1) प्रतीक्षा और विरह (a) विनय और दासता (iv) टेक और हठीलापन (v) पूरब जनम को कौल (1) पव उत्सव आदि के बालो मे (1) कीनन, भजन, साधना के आयोजनो मे (1) साधु सगति की टेक मे (iv) खान-पान, वेशभूषा, आभूषण आदि के प्रासगिक उल्लेखो मे (v) सुहाग दुहाग की सांस्कृतिक चेतना के रूप में (vi) राज-रीतियो के प्रासगिक हवालो मे (vii) लोक रीतियो और प्रथाओ के वक्रता विधानो मे (vi) रूढोक्तियो के प्रयोग मे 3 लोक सस्कृति के तत्व (1) शकुन (1) स्वप्न (1) सदाचार धारणा (iv) कमवाद (v) भाग्यवाद (1) नेम धरम (vi) जतर मतर आदि (vii) प्रकृति (ix) संयुक्त परिवार चेतना (1) शब्द सम्पदा (1) उक्ति सम्पदा 4 शैली-तत्त्व 1 धार्मिक तत्व (1) स्वल्प (1) निगुण भक्ति तत्व-उपनिषद काल का ब्रह्मवाद निगुण शान भक्ति में विकसित होते-होते बौद्ध वचयान, हीनयान और सिद्धियो से छनता- छनता वित्रमी 10वी-11वीं सदी मे एक ओर ज्ञानमार्गी कबीर मादि की भक्ति मे विकसित हुआ और दूसरी ओर सूफी प्रमभक्ति स मिलर वैष्णव सगुण भक्ति 68/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन हाँ बलि से सम्मिधित हुआ। 11(187) सिद्धो की परम्परा मे ही गोरखनाथ का नाथ मत योग और साधना का आधार बनकर प्रचलित हुआ 9 (105) । मोरा के समय तक निगुण भक्ति का स्वरूप इतना लोकायत हो गया था कि कहीं वह नाथ सम्प्रदायो मे सिद्धि, चमत्कार, हठयोग, शैव पूजा, शक्ति साधना, शक्ति पीठ, पौर भावना आदि मे फैल गया था और वही ब्रह्म के अलक्ष्य अरूप, सवव्यापी दाशनिक धारणा के रूप में जम गया था। कही वह प्रेमवाद से मिलकर जम जमान्तर की विरह वेदना, कप्ट साधना और कातर पुकार के रूप में स्थापित हो गया था। इस विखराव मे लोकमानस ने सबसे कोई न कोई तत्व ग्रहण दिए। लोकमानस कभी प्रेम शूय नहीं होता। उसका अवचेतन नान और योग- वैराग्य को भी लौक्ति भावनाओ से जोड लेता है। वीर जसे निगुण सत के काव्य में भी मोरा वाला लोक्तात्विक धरातल मिलता है 'हरि मेरा पिउ में राम की बहुरिया पुरुष एक अविनासी द्वारा अपने को ब्याहने की बात', 'साई के राग सासुर आई । सग, न सूती स्वाद न माना, गा जीवन अपने की नाइ पर देखोगी सोहि से होते होते, विरह अगनि तन अधिक जराव 'बहुत दिनन के विछुरे माधो मननहिं बध धीर 40(88) मे यानी आत्मा को ब्रह्म का अश मानकर उस चिर विराहिणी मानना और पूर्ण होने की ललक मे तहपना--पह लोक्तत्व उसी तरह का हुआ जैसे विराहिणी पत्नी पति के लिए ललयती है। इसी तरह की लोक्तात्विक परम्परा धमदास (वित्रमी 1515) म भा मिलती है--मितक महया मूनी पर गइ सा । अपना बलम परदेम निबरगलो हमरा पिछयो न गुन ४ गैलो। जागिन होइ में धन बन हों हमरा में विरह विराग दे गेलो। 40(83) निगुण उपासना चाह दाशनिय धरातल मे शुरू हुई थी, मैग्डों वर्षों में सो सम्पर न उसरा साधारणीकरण हम स्नर तर पर दिया था जिसम ब्रा रास्वरूप तो मिरजा मलय अनाम विगट, अजमा अप अग्रत पर पट प्यापी, पनन्त, अविनासी अनादि मना रहा यह गाधर पारमापा अमान सत्य भी बन गया, उरामा स्यामी वा गया जिमा सिए माधिराएं (मारमा) सो मापों है मगर माधिकार लिए यह एप है- हममें तुमई माधतुमग एमाल" तुमग हम हमगी मार RiRI मोर मोगम पही मार II IITो मारमानम तर मा +fo यहा मारमारमा का पिरसित पाया र माप विद और गामको भावनाए । महम बन पाभरी गगन मनीमाधिया . .

मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 69 बन गई और उत्कट आवेग लौकिक बनकर जुड गए। कबीर के यहा वह लोकतत्त्व- हरि मोर पिउ मैं राम की बहुग्यिा । राम बडो मैं तन की लहुरिया ।। 41(18) बना,सत दरिभाव कपास- सोइ सोहागिनी प्रेम रस, करे पियासे नेह । सोहागिनी पिया हुकुम जो गावं । जिस दिन सेवा खसुम को लावै ।।- बनकर व्यक्त हुआ। कबीर मीरा की तरह मगलाचार भी गाते हैं--- दुलहिनी गावहु मगलचार । हम धरि आए राजा राम भरतार । तन रत करि मैं मनरत करिहौं, पांचउ तत बराती, रामदेव मेरे पाहुने आए, मैं जोबन मैं माती। 41 (5) कबीर की चुनरी भी नेह-बस भीगती है- भी चुनरिया प्रेम रस बूदन, भारती सज के चली है सुहागन । प्रिय अपन को ढूढन ॥ घरनीदास, दादूदयाल, बुल्ला साहब घरमदास-ऐसे निगु निया सतो मे हम आत्मा परमात्मा के दाम्पत्य भावी लोक्तत्वो के सबूत मिलते हैं-42(48) भई कत दरस की बिनु बावरी । मोत न व्यापे पीर प्रीतम की मूरख जान आवरी ॥ (धरनीदास) आव पिया तू सेज हमारी। निस दिन देखों बाट तिहारी।। (दाद्) पिया बिनु मोहि नीद न आवै । खन गरज खन बिजुरी चमक, ऊपर से मोहि आकि दिखावे ।। (धरमदास) मोर मनुवा मनाव, धावं पिया नहिं आवे हो। सास मोरी दारुनी, ससुर भोरा भोला हो।। (सत रज्जब) प्रोतम अपनो परम सनेही, नैन निरखिन अधानी ॥ (दादू) नानक भी मीरा के युग के थे। वे कहते हैं- पीर घटि सो है नारिजे, पिर भावए जिउ । झूठे वंण चवं कामिन आवए जिउ 11 42(31) 70/ मोग लोकतात्त्विक अध्ययन - सा मोहागिनी अकि समाव । गख गहेली गहलु पाव । फिर पछताव जव रूणि विहावं । करमहीणि मनमुखि दुघु पावै ॥ 42(92) सत रैदास भीजि हे कि मीरा न गुरु माना है-इस लोकतत्व का उपयोग कर चुके हैं- पिया बिन सजेइ क्यो सुख सोऊँ। विरह विथा तन खाई) 42193) और गुरु अजुनदेव, गुरु अमरदास मे भी वही परम्परा अवतरित होती चली गई है। बल्कि पली भाव के इस तत्व का निभाव बरात, पोठी, सास, ननद, ससुर, जेठ, देवर, आदि के नाते रिश्तो का सामाजिक धारणा के साथ भी हुआ है- 42(96) खेलत रहलू अंगनवा, सखी सग साथी हो। आई गवन निगिचाव, बदन भयो धुनिल हो॥ पहिले गवनवा ऐलू, पनियां के भेजलन हो। देखि कुवो के रूप, मन पछितैलू हो॥ कुंवा भीर भई भारी, तो गागर फूटल हो । कौन उतर घर देव, हाय दोउ छूछे हो । घर मोरी सास दारुनी, तो ननद हठीली हो । कहि से पहन दुख पापन, सगी न साथी हो। ठाढि मोहारे धरि सुलुके, मनै पछिताइल हो। पिया मोसो मुखह न बोले, पवन गुन लागल हो॥ (धरमदास) और निगुनिया भक्ति को यह लोक परम्परा अवश्य ही साधु-सगति से मीरा तव अवतरित हुई होगी । वह भी "गिरधर के रग राती 33 (20) "परदेशी प्रीतम को पाती लिख भेजने", 'पचरग घोला पहनकर मिरमिट सेलने जाना", "तन खोलकर पिय से मिलना", "सुरत निरत बा दीप निरतर जलाए रखना" जैसी बातें रहती है। वह अपने पिया' को ही अपनी परम गति मानती है, "विराना छल लाखमा होतो भी अपने काम का नहीं" ऐसी निष्ठा जगाती है और "वर होणो अपणो भलो हे, कोढ़ी दुष्टी गोइ"तब के धरातल तर एकनिष्ठता ध्यक्त करती है 33(25)। वह 'स्वप्न में अपन गोविंद से अपन व्याह" मनु- भव करती है। उसमे हल्ली-पीठी, मुधा से तन भीगने, अप्पन मोटि जीवों की यरात, तोरण और अचस मुहाग को अनुभूति करती है 33 (27) 1 वह मुध में इतनी मगन" है कि सब "सार-सरम, पुस f मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/71 - चुकी" है, "ऊची अटरियां पै सेज बिछो" है और वह उस 'पचरगी झालर वाले, कलियो और फूलो से सजी सेज" पर 'बाजूबद, कडूले पहने" "माग मे सिंदूर भरे" "सुषुम्ना सेज" पर प्रतीक्षा कर रही है 33 (32)। वह अपने सांवलिया के रग मे" इतनी 'रव' गई है कि अपने भीतर ताल, पखावज, मदग की सुर लहरी सुनती रहती है और "नत्य मग्न" रहती है कि लोग उसे "मदमाती और बावली" समझने लगते हैं 33 (40)। उसे अपने 'पिय के बिना घडी भर भी सुहाता नहीं", "भोजनिया नही भाता" और 'नोदलडो नही आती' 33 (41)। रैदास की चेतना की तरह मीरा 'विरहिणी भी पिवकी बाट जोहतो" है और प्राथना करती है कि "नेरी राखियो" यानी अपने पास रख लो 33(65)1 कबीर की तरह मीरा को भी "रमैया दिन रह्योइ न जाइ", "मोहि खान पान फोको सो लागे", "नणा मुरझाइ रहे" और "हरि मिलिया बिनु तन तरस-तरस जाइ" का अनुभव सताता है । 33(71) उस "दरद दीवानी का दरद न जाणे कोइ", "उसको सज सूली पर है जहा सावण किणविध होइ" और "पिया की सेज गगन मडल मे है" सो "किण 'विध मिलना होइ" का सकट है । अत 'दरद की मारी" वह ' बन-बन डोलती है" उसे कोई "बंद" नहीं मिला। वह पीर तो तभी मिटेगी जब "वंद सांवलिया होय" 33(72) उसे अपने "रमैया लिन नीद न आवै", "विरह सतावै", "पिय बिन सेज अलूनी" रह जावं और "रेण जागत बिहावै '1 33(76) मीरा 'विरहिणी जागती बैठी रहती है" जबकि 'सारा संसार सुख की नीद सोता है', सदा ही उसकी नीद नमानी हो" और "पिय का पथ निहारत सिगरी रण बिहाणी हो" 33(87) | 'अपने पिय की रट" उसे 'रात दिन लगी रहती है और "दूसरी सब सुध बुध" वह खो चुकी है 33(91)। निगु निया मत को लोक-मानस तक पहुंचने के लिए लौकिक प्रतीको का विधान करना पड़ा और पति पत्नी भाव हजारो-लाखो वर्षों का ऐसा प्रतीक विधान रहा जो सावदेशिक और सावकालिक बन सकता था । उसके साथ सजोग, वियोग, अलकरण, प्रतीक्षा, आनन्द, उत्साह, सृजन, परिवार, देश, काल को मर्यादा सबकुछ जुड़ सकने लायक स्थिति थी। यही कारण है कि ऐसा प्रतीक विधान दशन और मतमतातरो की मर्यादा तोडकर क्या निगुनिया और क्या सगुनिया, क्या देशी और क्या ईरानी-सभी भक्ति मार्गों मे दिखाई देता है। उसके भीतर की ताविक सत्ता ही प्रमुख रूप से उसके सवव्यापी होन का कारण हो सकती है तभी हम निगुनिया सतो और मीरा के बीच लौक्कि प्रतीको के माध्यम से निगुनिया कहिए या सगुनिया [--आत्मा की खोज सम्बधी समान अभिव्यक्ति भी पाते हैं, . श्वोर ऊंची गेल राह रपटोली पांव नहिं ठहराय। लोक लाज कुल की मरजादा, देखत मन सकूचाय।

72/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन नहर यास बसो पोहर म, लाज तजि नहि जाय। अधर भूमि पुरुष भय भोला, सुरत योरा पाय ॥ (वीर) मीरा ऊंची नीधी राह रपटोली, पाव नहिं ठहराइ । सोच सोच पग धरूं जतन से बार बार हिंग जाइ। ऊंचा नीचा महल पिया वा, हमसे चढया नजाइ। पिपा दूर पप झीणोम्हारो, सुरत फोल याइ । 2(230) कधीर जोगिया विन रहो न जाय। हौ हिरनी पिव पारधी हो, मारे मवद के वान ॥ जाहि लगि सोई जानहि हो, और दरद न जान । मैं प्यासी हों पीव भी हो, रटत रटत पिव पीव ॥ पिया मिले तो जीव हैं ना तो सहजै त्यागं जीव ।। पिय कारण पियरी भई हो लोग कहें तन रोग। छह छह लाँधणा में किया, पिया मिलण के जोग ।। मीरा घायल ज्यू धूमू सदारी, म्हारी विधान बूझ कोई। काढि कलेजो मैं धरूरे कागा तू ले जाई । ज्यादेसा म्हारो पिव बरी, वै देखें तू खाइ॥ यह कागा कलेजे वाला प्रतीक विधान राजस्थानी लोककाव्य का प्रसिद्ध विधान है जिसका उपयोग ढोला मरवण और कई लोकगीतो मे मिल जाता है । पानां ज्यू पीली पड़ी रे लोग कहें पिंड रोग। छाने लागण मैं कियारी राम मिलण के जोग। -कबीर को व्यजना से यहाँ शैलीगत और देशकाल गत अतर ही नजर आता है। निगुनिया अद्वत सम्बधो की लोकतात्विक अभिव्यक्ति मे रैदास और मौर। मे तुल्यभाव मिल जाता है, यथा- मीरा जो तुम तोडी पिया, मैं नहिं तोडू रे । तोरी प्रीत तोडी कृष्ण, कौन सग जोडू रे ॥ तुम भये तस्वर, मैं भई पखिया । तुम भये सरवर, मैं भई मछिया ।। तुम भय गिरधर, में मई तुम भय चदा सामों, मैं भई चकोरा ।। तुम भये मोती प्रभुजी मैं भई धागा। तुम भप सोना तो हम भई सुहागा ॥ 9(232) चोरा।

यहाँ हम मार- बाट ईसर पत्नी के लिए foreigneral जाना हजारों दर-17, मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन/73 रंदास अब कैसे छूट, राम रट लागी। प्रभुजी तुम च दन, हम पानी। जाको अग-अग बात समानी। प्रभुजी तुम धन हम बन मोरा। जैसे चितवत चद-चकोरा। प्रभुजी तुम दीपक हम बाती। जारी जोत वर दिन राती। प्रमुजी तुम मोती, हम धागा। जैसे सोन हिं मिलता सुहागा ।। 9(232) --इस तरह के नाते रिश्तो के अभिप्राय भक्तों तक ही सीमित नहीं थे। माधुनिक हिदी छायावादी कवितामो मे भी उनके उपयोग हुए हैं। हमे यह मानना चाहिए कि मीरा के समय तक मारवाड क्षेत्र में निगुनिया सतो, लोक-देवताओ और नापपथियो का जो व्यापक प्रभाव या (अध्यार-3/37- 38) उससे मीरा अछूती नही थी, रह भी नहीं सकती थी क्योंकि रावान्प भक्त थे और साधु-सतो के जमघट उनके यहाँ बने ही रहते बाद उनके बीच मुक्त भाव से खेलती गुनती रहती थी। उन मागे सतो की बानी, उनकी शैली और उनकी बातो के अर्थ मोराटाहोटी, वह स्वाभाविक था। हो सकता है निगुनिया वानी और भजन- कीपटल व की भाव सामग्री मीरा को प्राप्त हुई हो। और हायर सदा मोर- तत्वो से रचपचकर अपने ढग से व्यस्त हुई हारेरा देने जिनमे प्रामाणिक्ता और मीरापन को कमी दरा- कृत प्रमाणित पदो' मे भी निगनिया गाre-या- माई मेरा पिया विन बना दे राग रग सिणगार न मानो। सावण याया मामिरे, सेज बलूगी मदन ऑनर आव सलो मीरा के प्रमुगार,न्द 1947 जनाना, मादाट 74/ मीरा लोक्तात्विर अध्ययन स्खा सूखा पा लेना--ये सब सामाजिक-सास्कृतिक परिपाटियां आज भी जीवित हैं । "अलूणी सेज," "पुलि रह सिर पेरा'~-मे उही पी छाप है। उसी प्रकार- रमैया बिन मोसू रह्योइन जाइ। खान-पान मोहि फीगो लागे, नंगा रहै मुरझाई ।।9 (407 9) और, ओलू पारी आवै हो महाराज अविनासी । बिरह वियोगिन बन-बन डाल करवत लूगी वासी 9(409 13) -यहाँ 'वन वन डोलू" म नायपयो गोपीचद भरथरी को लोक कयामओ के तत्वो की छाप है । उनमे बार बार जाम लेने और किसी अय को-समाधान को -पोजने के अभिप्राय मिलत हैं। 'कासी करवत लना" और "दुष्ट से जा मिलने' की लोक भावना एक विश्वास के रूप मे 19वी सदी तक भी विद्यमान थी और यह लोक्तत्व जैसा निगुनियो और नाथपथियो में था वैसा ही वष्णव सगुनिया भक्तो मे भी था। वैस ही लोक्तत्व इस पद मे मिलता है- जोगिया जा छाइ रह्या परदेस । या तन ऊपर भसम रमाऊँ पौर वीं सिर केस।। भगवा वेस धरू तुम कारण, ढूढत च्या देस ।। मीरा के प्रभु राम मिलण कू, जीवनि जनम अनेस ॥ 9(421-62) और तेरे कारण बन-धन डोलू, कर जागण को भेस ।। 9(42164) निर्गुनिया पथ के अविनाशी, अनादि, अनन्त, अलक्ष्य, ज्योतिष्मान स्वरूप का दिग्दशन भी लोकतात्विक धरातल पर मोरा मे मिल जाता है-~- तेरो मरम नही पायो रे जोगी। आसन माडि गुफा में बैठयो, ध्यान हरि को लगायो ।। गल विच सेली, हाथ हजारियो, अग भभूत रमायौ । मीरा के प्रभु हरि अविनासी, भाग लिख्यो सोइ पायो । 9(42367) यहाँ 'गुफा” साकतिक प्रतीक है "सहस्रार चक्र" का 42(171) और इसका प्रयोग कई सतो ने किया है-- गगन गुफा मे बठि के देखे जगमग जोति (मलूकदास) गगन गुफा में पंठि अधर आसन बठि (पारी साहब) मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/75 . नैनन बनज बसाऊँ री, जो मैं साहिब पाऊ। इन ननन मेरा साहिब बसता, डरती पलक न लाऊ री॥ विकुटी महल मे बना है झरोखा, तहा से झांकी लगाऊ री सुन महल मे सुरत जमाक सुख की सेज बिछाऊ री॥ मीरा के प्रभु प्रभु गिरधर नागर, बार बार बलि जारी॥ 9(42581) ये त्रिकुटी महल, झरोखा, झोकी लगाना, सुन महल, सुख की सेज जैसे 'प्रतीक बहु प्रचलित रहे हैं और साधु सतो के माध्यम से लोक धरातल पर उतरे हैं । ब्रह्म के निर्गुनिया स्वरूप की धारणा भी लोकव्यापी थी। मीरा ने भी जैसे पूरण ब्रह्म अखड अविनासी, तुम बिन बिरह सतावै जी। 9(3257) सम्बोधन निर्गुण ब्रह्म के लिए किए हैं जैसे सत कवियो ने जोगिया, रमैया, दयाल, राम, हरि, का हा, गाविद, साहब, गोपाल, अविनासी, अविगत, सत्गुरु, निरजन 'पुरुष, कत, खसम, सैया, पिया, भरतार, सबद, औंकार आदि किये हैं 42 (112 14) मीरा ने स्थानिक प्रभाव से महाराज, पावणा, ब्रजराज हरि के 'प्रयोग भी किए हैं- आज रंगीली रण प्रीतम पावणा हो राज। 11(78-13) तन सणगारु सेज सवारु, अजन सास, धनवारु । स्याम सुदर तन धारू, लेसू भावना माराज ।। 11(78 13) आजि म्हारै पावणिमा बैरागी जी। 11(79-17) कदिरे मिलेगी आई रमयो महान कदि मिलेगो आई। 11(83-30) ओ तो वर देही को सगाती, मो वर सिरजण हार। 11(93 63) तुम भज्या हो महाराज सबै सुख । 11(9467) कबीर आदि सतो ने तो ब्रह्म को पति रूप मे माना ही है, मीरा ने अपनी आत्मा के विवाह का और प्रतीक्षा का पूरा चित्रण भी किया है- माई म्हाने सुपने मे परण गया जगदीस । सोती को सुपना आवीयाजी, सुपना बिस्वा बीस । अग अग हल्दी करोजी, सुधै भोज्यो गात । माई म्हानै सुपने मे परण गया दीनानाथ । छप्पन कोटि जहाँ जान पधारे, दुलहा थी भगवान । सुपने मे तोरण बाधियोजी, सुपने मे आई जान । मीरा को गिरधर मिल्याजी, पूरब जनम के भाग । सुपने मे म्हान परण गया जी, हो गया अचल सुहाग । 33(105-27) 76/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन मारवाड के लौकिक जीवन को छाप तो इसमे है ही, वहां को नारी के सामाय अनुभव भी मीरा के पदो मे अभिप्राय बनकर उतरे हैं। एक परिणीता को प्रीतम की निरतर याद~ ओलू थोरी आव हो महाराज अविनासी। 9(409 13) निस दिन ऊभी पथ निहारू, कब मोहे धोर बंधासी। किरपा करो म्हारै भवन पधारो, नाही ये जिवडी जामा ।। और कवीर की तरह मगलाचार भी-~ म्हारा ओलगिया घर आया जी। तन की तपन मिटी सुख पाया हिलमिल मगल गाया जी। धन की धुनि सुनि मोर मगन भया, यू मेरे आणद आया जी। मगन भई मिलि प्रभु अपणा सू में कर दरध मिटाया जी। चद को देखि कमोदण फूले, हराखे भया मेरी काया जी। रग रग सोतल भई मेरी सजनी, हरि मेरे महल सिधाया जी!--इसमे 'घर' भवन' 'महल' शरीरवाची प्रतीक हैं 42(172) और, निवेदन भी कि- सतगुरु म्हारी प्रीत निभाज्यो जी। थे छो म्हारा गुण रा सागर औगण म्हारा मति जाज्यो जी ॥ 9(42475) -~-ये सब निगुनिया स्वरूप के प्रभाव सिलसिलेवार नहीं हैं, यत्र तन हैं, यादच्छिक हैं और बेतरतीब हैं । यह इस बात का सबूत है कि मीरा किसी मत विशेष के प्रति प्रतिबद्ध नही थी । साधु मगति से जो अभिप्राय या प्रतीक या अभियक्तियां सावजनिक हो चुकी थी, उहे मीरा ने अपनी भावनानुसार अप- नापा और भजनबद्ध किया। निर्गुनिया ज्ञान पथ और नाथ पथ-मोरा के समय स काफी पहल लाक- धरातल पर आकर अभेद प्राप्त कर चुके थे। मौरा पर परिवेशगत नाथ पथिया का लोक प्रभाव हमे स्वीकार करना ही चाहिए। कहा जाता है कि भारत के पूर्वी भाग मे यदि सिद्धो का गोलवाला था तो परवर्ती काल मे वमा ही यापक प्रभाव पश्चिमी भारत मे नाय पथियो का था। जलघरनाथ, मत्स्पंद्रनाप, गोरखनाथ भरपरी राजा गोपीचद की परम्परा मे राजस्थान का पूरा मारवाह मंत्र और दक्षिण म वागड तथा मेवाड भी प्रभाव क्षेत्र था । जसलमर-जोधपुर मानापी तथा नागोर बालनाथी पपो के गढ़ थे। स्वप दूदानी चालनाधी हरभूजी के समकालीन और उनके पूजन थे। पूरा नागोर, जालोर, जोधपुर मेहता मौरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/77 नाथपथी जोगियो, मिदो, पीरों और लोक देवताओ की मा यताबा से आपूरित या। 28(19) मेवाडी राणा चाहे एकलिंग के उपासक थे मगर एकलिंग जी की पूजा का अधिकार आज भी नाथपथी पुजारी को होना है। 9(105) नाथपथ का इतना लोकप्रभाव था कि आम लोकगीतो मे 'पिय' को वाल्हा, 'जोगी जी' 'जोगराज' जैसे सम्बोधन मिलते रहे हैं। नायपयो एक ओर अपनी यम नियम की पराकाष्ठा, दूसरे अपनी विशिष्ट वेशभूषा और-धुनी रमाकर, भभूत चढाए रतनारी आंखो के स्वरूप से भयदायक और आतक्यारी व्यक्तित्व वाले भी मान जाते रहे हैं और दूसरी ओर नारी समुदाय के लिए अस्पश्य और अप्राप्य भी माने जाते रहे हैं। इसलिए महिला जगत मे नाथपथी सिद्ध सदा ही 'बैरागी, "निर्मोही,' मिलकर भी न मिलने वाला, 'भरम मे न फंसने वाला व्यक्ति लोक- सिद बना है। मीरा के पदो मे नाथपथ के प्रभाव के कारण ही प्रियतम के लिए 'जोगी' 'जोगीडा' जसे प्रतीको का प्रयोग हुआ है और उसके स्वरूप वणन मे ताथपथी वेषभूपा का भी यथा-माला, मुद्रा, कुण्डल, सेली, नाद । ऐसे 'जोगी' प्रियतम के ‘लिए 'जोगण' बनने और उसे "बन बन ढ्ढने का अभिप्राय भी व्यक्त हुआ है।" 'सतगुरु' 'सैन,' 'जोत मे जोत,' 'सुरत, 'अमरितपान, "बिष सो अमरित कीनो,' 'गगन मडल रस पीज' 'अमृत झरै सदा सुख उपज, 'सुरतनिरत को दिवलो,' 'त्रिकुटी महल मे झरोखा-एसे प्रतीक और पारिभाषिक प्रयोग मीरा को नाथ- पथी जोगियो या सतो से लोकाश्रित होकर प्राप्त हुए थे, ऐसा विश्वास करने का कारण बनता है। नाथपथी परम्परा मे जिन पारिभाषिक अर्थी को प्रतीक दिए गए थे, वे लोकमत प्रधान थे, 42(36-38) यथा-गगन मडल (ब्रह्मरध्र), बकनाल (सुपुम्ना), सुवा (व्यक्ति), विलाई (माया), कुटुम (काया) अगनि (माया), अरघ (मूलाधार), नाग (काल), गगा इडा नाडी), चकवा (चित्त), चिता (आत्म तत्व), चितामणि (प्रबुद्ध मन), चारे (विषय, ससार), कथा पावर, डीली, येगली, नगर मह न भुवत बाडी (काया शरीर), खीर (अमृत), गगन (ब्रह्मरध्र), भुजगम (सास क्रिया) बाघिन (माया) दीपक (जीवन, ज्योति), सेज (लो, लगन)। मीरा के पदो मे ऐसे ही लोकमत मे स्वीकृत अभिप्रायो, प्रतीको को देखा जा सकता है-- जोगिया नै दीजो जी आदेस जोगिया चतर सुजाण सजनी ध्याव सकर सेस । आचूगी मैं नाह रहूंगी रे म्हारा पिव बिना परदेश । करि किरपा प्रतिपाल मो परि, राखो नि आपणे देस ।

78/ मीरा लोक्तात्त्विक अध्ययन माला मुद्रा मेखला रे, वाला खप्पर लूगी हाथ । जागण होय जग ढूढ सू रे, म्हारा रावलिया ही साथ । सावण आवण कह गया रे, कर गया कौल अनेक। गिणता गिणता धस गई रे, म्हारो आगलिया री देख । पिव कारण पीली पड़ी रे, बाला जोवन बालो बेस । दासी मीरा राम भजिके, तन मन कीन्ही पेस । 9(288 29 -यहाँ जोगिया के स्वरूप का वणन नाथपथ से प्रभावित है, तथापि पूरे पद मे नाथपथी मत की एक्ता नही है । साहित्यिक रूढि विरह, आकुलता, सब कुछ गडडमडड हो गया है और बीच मे नाथपथी जोगी वाला प्रतीक जड दिया गया है । इसी तरह के पदो मे नायपयो दूसर प्रतीक अथवा अभिप्राय भी प्राप्त हैं--- यथा- बाऊँगी मैं नहीं रहूंगी, कर जटाधारी बेस । चीर को फाडू कथा पहिरू, लेऊगी उपदेस । मुद्रा माला मेखलू रे, खप्पड लेऊ हाथ । प्राण हमारा वहाँ बसत है यहाँ तो खाली खोल। पाच पचीसो बस किए, मेरा पलू न पकडे कोय । मीरा व्याकुल विरहिणी रे, कोई आय मिला मोय ॥9 (289) -इसमे कई नाथपथो स्वरूप के लोक्तत्व हैं। कही ये हैं, तो वही सयासी तपस्वी वाला स्वरूप भी है- अग विभूति, गले मृगछाला, घर घर जपत अलेप । मौरा के प्रभु हरि अविनासी, राम जी मिलन की टक् । 9 (29032) इतना ही नही नाथपथी मत के साथ 'रसीली प्रीति की अभिव्यक्ति विरोध- वक्रता भी व्यक्त करती है- जोगिया री सूरत मन में बसी। नित प्रति ध्यान करत हूँ मन मे, नितप्रत होत खुसी। बहा कर क्ति जाकै मोरी सजनी, मानो सरप इसी। मीरा कहें प्रभु क्बरे मिलोगे प्रीति रसीली बसी। --'जोगिया' साथ 'प्रीति रसीली' की वात और पुन 'ध्यान' में अभिप्राय को अमगत अभिव्यक्ति माना जा सकता है । नाप मत के साप वैष्णवी स्वस्प का रलमिल जाना, मीरा के पदो प माश्चयजनर नहीं है-- मोरा काव्य लोकतात्विक अध्ययन/79 मोर जोगियो आण मिल्यो अनुरागी। ससा सोक मग नहिं तिसना, दुबिधा सब ही त्यागी। मुगट पीतावर सोहै, स्याम बरन बड भागी। जनम जनम को साहिब म्हारी, वा ही सोलो लागी। अपणा पिव सू हिलमिल खेला, हरि दरसन अनुरागी। मोरा के प्रभु गिरधर नागर, अब मैं भई सुहागी।। 9 (291-36) देखने जोग बात है कि वही 'जोगिया' है, "जनम जनम का साहिब" है और वैष्णवी मतानुसार 'मोर मुकुट पीताम्बर' वाला 'श्याम वर्णी' भी वही है। ऐसा रलना मिलना प्रासगिक साधु तगति से प्राप्त जानकारी और अभेद लोकमत के कारण ही सभव हो सकता है। विधिवत साम्प्रदायिक दीक्षा का अभाव इस प्रकार के पदो से लक्षित होता है। ऐसी स्थिति मे-जहा लोक तत्व ही अभिव्यक्ति के साधन हो और किसी तरह के दशन या मत की दीक्षा का अभाव हो-प्राप्त ज्ञान की प्रधानता नही होती, भावना-ही भावना उजागर रहती है । उसमे क्या नाय मत, क्या सत मत और वैष्णवी मत सब समवित हो जाते हैं- चाला वाही देस, चाला वाही देस । कहो कसुम्भी सारी, रगावा, कहो तो भगवा वेस । कहो तो मोतियन मांग भरावा, कहो तो छिटकावा कस। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, सुणज्यो बिडद नरेस । -देखने लायक बात है कि मिलन की तैयारी के लिए नाथमती और वैष्णव मती लोक्तत्वो का विकल्पात्मक प्रयोग हुआ है। प्रिय के स्वरूप मे भी वैसा ही विकल्प होगा जोकि ध्वनित हो रहा है। ऐसी स्वायत्त अभिव्यक्ति की स्थिति तभी हो सकती है जब मत विशेष से प्रतिबद्धता न हो और लोकमत मे सब रलमिल फर एक हो गए हो। उसी तरह अरे मैं तो ठाढी जपूरे राम माला रे। मैं तो जपती नाम मेरे सायब का, आण मिलो नद लाला रे । हाथ सुमरणी काख कूबडी, ओढ रही मृगछाला मोर मुकुट पीताम्बर सो है, ओढे लाल दुसाला रे । मीरा के प्रभु गिरधर नागर भगतन के प्रतिणला रे। 9(31293) इतना ही नही नाथपथी जोगियो के नाम स्मरण भी मीरा के पदो मे मिलते - 80/मीरा लोक्तात्त्विक अध्ययन ज्यारा चित चरणा से लागा, वे ही सवेरे जागा। पहले भूप भरपरी जागा, शहर उजीणी लागा। सुण सुण यचना साहय सतगुरु का गोपीचद उठ भागा। साहब सेन बलखा रा राजा, याण विरह रा लागा। आठो पहर क्वीरा जागा, मरण जीवण भय भागा। राणा रूस्था भव मोरे नाही, चित साहय से लागा। मीरा बाई तो सरणं बाया, लोक लाज भय त्यागा। 9 (313 94) मारवाड के लोकमत पर नाथपथी प्रभाव दीघकालोन और बहुत गहराई तक रहा है। उसकी झलक इस पद म मिल सकती है- चलो अगम के देस, काल देखत डर। वहाँ भरा प्रेम का होज, हसा बल्यो करें। ओढण लज्जा चीर, धीरज को घाघरो। छिमता वाण हाय, सुमति की मून्दहो। दिल दुलडी दरियाव, सोच को दीवहो । उबटन मुरु को ज्ञान, ध्यान को घोवणो । कान अखोटा ज्ञान, जुगत को जूठनो। बेसर हरि को नाम, चूडोचित कजलो। जोहर सील सतोर निरत को धूपरो। विदली गज अरु हार, तिलक गुरु ग्यान को। साज सोलह सिणगार, पहिर सुबरन की राखडी । सांवलिया सू प्रीति और मू आकही। पतिबरता की सेज, प्रभुजी पधारिया। गावे मीरा बाई दासी कर राखीया।। 9 (317-18-109) --इसम नाथपथी मा यताओको शृगार रूपक दिया गया है। ऐस रूपक लोकगीतो में भी मिलते हैं यथा- लगनिरा लंगो पहरि सुहागण बीती जाये विव्हार । धन जोबण दन च्यार का रे जात न लागे वार।। (श्रुत परपरा) मौरा की अभिव्यक्ति प्रारभिक प्रभाव नाथपथी शैली का ही रहा होगा क्याकि वह परिवेशगत था और उसके प्रारभिक पदो मे अथवा वैधव्य के बाद के पदो म वह प्रभाव अधिक प्रखर रहा होगा। उसकी चौतरफा प्रसि दि में बार मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन /81 साधु सतो के बीच प्रचार पसार मे ऐसे पद ही प्रधान तथा प्रभावकारी रहे होंगे- अपण प्रीतम के कारण, मीरा बैरागण भई रे। जय तें सीस पै जटा रखाई, नणा नीद गई रे। दड कमडल और गूदडी, सिर पर धार लई रे । छापा तिलक बनाये छवि सा, माला हात लई रे । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, गोविद सरण लई रे।। 9 (321-117) -वैसे ही, राख कमडल गूदडी रे बाला, कियो नवेलो भेष । प्रीतम ओज्यू ने आइया, यो है बडो अनेस । गुरु को सबद कान मैं पीहरू अग विभूति लगाय । जा कारण मैं जगत तज्यो है, भौरे लागी आय । पांच पचीसा बस करूं, पलो न पकडे कोय। मीरा व्याकुल विरहणी, हरि मिलिया सुख होय। 9(322 118) -'पाँच पचीसा' नाथ पथियो का अभिप्राय है जिसमे पांच इद्रियो और उनके साथ मन, छह दशन, छह चक्र, छह दलकमल और स्वाधिष्ठान चक्र—यो पचीस साधन घटक होते हैं । 'जोगी', 'जोगीडा' छाप वाले पद नाथपथी प्रभाव वाले हैं और उनकी भावनात्मक व्याप्ति स्वरूप वणन तक, साधना परक, विरह और मिलन परक अभिव्यक्ति तक है। यथा- म्हारे घर तू रमतो ही आई रे जोगिया। काना बिच कुडल, गले बिच सेली अग भभूत रमाई रे। तुम देख्या बिन कल न परत है, ग्रिह आगणो न सुहाई रे। मीरा के प्रभु हरि अविनासी, दरसण द्यो मोकू आई रे ।। 9(42266) जोगिया आव मैं नेरी। मनसा वाचा फरमणा प्रभु पुरवो आसा मेरी। में पतिवरता पीव की हो, मोल लई चेरी। तुम बिन कोक दूजो देवा सुपने हूँ ना हरी। मात पिता सुत बधू दारा ये पाद में बगे। तुम बिना कोउ नाही मेरो पुकार कहूँ टेरी।

82/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन एक वीरियां मेरे नगर दे जावो फेरी। मीरा के प्रभु गिरधर, मैं घरना सू नरी॥ 11192 59) मुगत री ऐ गहणी वैरीयो। परियो परियौ ऐ सतगुर परताप । म्हारे खिम्यारी चूदड बाण रही, रामइयो ऐ सालूडा री कोर। म्हारे करणी रौ काजल सारियो, रामइयो ऐ मारे तिलक लिलाइ । म्हारे सील सनोख चूप वणी, म्हारे नथ बेसर गुर ग्यान । म्हारे तत नाम तिमणियो, रामइया ऐ हिवडा रौ हार । म्हारे चित चेतन चुडलो वण्यो, रोमइयो ऐ चुडला री मजीठ। म्हारे ग्यान वाजूब द बहुरग, रामइयो ऐ वाजूब द री लम्व । हू तो इतनो ए पहिर निसरी, चाली चाली ऐ रामइया री सेज । बाई मीरा ने गिरधर मिल्या, पूरी पूरी ऐ मनडा री हूस। 11(116 144) -मुक्ति के इस आभूषण रूपक मे नाथपथ के स्वरूप और लक्षणो का प्रयोग लोक धरातल का वाचक है। इसी तरह नाथपथ के परिवार प्रतीको का प्रयोग इस पद मे खोजा जा सकता है- म्हारा पियरिया री वाता सतगुरु केता जाज्यो। सतगुरु आया सब रस लाया प्रेम पियाला पाया। सतगुरु साचा सूरमा, म्हाने सेजा राम मिलाया। सासरिया मे दुक्ख घणो रे, सासू नणद सतावै। कैजो म्हारा बाबो सा नै, बैगा लेवा आवै। देवर जेठ म्हारो कुटम कबीलो नित उठ राड चलाव । इण घरधधे री बाता मानै एकई दाय न आवै । म्हारा पिहरिया रो लोक भलेरो बांध कठी माला। तिलक छाप। रूडा सोहै, ने अमरापुर वाला। अमरापुर मइ सासरो पीहर सेता पास । भले न इण जुग आवसा, गावै मीरा दासी। 11(119 153) इस पद मे मीरा के जीवन की पारिवारिक स्थिति और जयपथ के परिवार रूपब मे आश्चयजनन समानता आ गई है। परिवार, साम, नणद, जेठ, देवर, ससुराल-ये सब माया जगत, प्रपच के प्रतीक हैं, (42) और पोहर, वावोसा, सतगुरु -ये परम तत्व के प्रतीक हैं। उधर मीरा के पीहर-मेहता में भक्ति का वातावरण था और मेवाड-ससुराल मे जागतिक मर्यादा और प्रपचा था। दोनो मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन/83 ही पक्षो मे यह प्रतीक विधान अथवान बनता है। वैसा ही एक नाथपथी प्रभाव-- म्हार मिदरिये पधारो, जोऊ थारी वाट । धरण गगन बिच झरी लागी, उगत परभात । रसना मेरी राम रटत है, सतगुरु जी के परताप । दोई चौकी मैं सहजै छेको, नाम कमल के घाट । बक नाल पर मुरली बाजै, सतगुर मारया घाट । फाया नगर मे रास रच्यो है सुरत सुहागण नार। जनम जनम का टोटा भाग्या, मिलिया दातार । इगला पिंगला सुखमण नारी सहेज रच्यो घर वास । मीरा ने गुरु गरवा मिलिया, जब पायो बिसवास ।। 11(120-156) -इसमे नाथपथ के पारिभाषिक अर्थो के प्रतीको का प्रयोग हुआ है। मीरा के पदो मे-भावपक्ष मे भी और अभिव्यक्ति पक्ष म भी यदि नाथपथी विचारणाओ, मा यताओ और प्रतीको का सहज प्रयोग मिलता है और वह भी सगुण निगुण जैसी छाप से पूर्वग्रहीत न होकर तो वह स्वाभाविक ही कहा जाएगा। क्योकि मारवाड क्षेत्र के लोकमानस पर नाथपथ के शील, सदाचार, एकनिष्ठता, तप, त्याग आदि की इतनी गहरी छाप रही है कि वे सब वहा के भापा मुहावरो, कहावतो, लोकगाथाओ और गोतो मे भी उसी तरह से मुखर हुए हैं । यथा- अमर नाव परमेसर को 43(15), अलख पुरुष को माया, कठे धूप कठे छाया वही (16) अलख भरोसै अक्क, ऑदण ईसरदास, वही (16), अलख राजी तो खलक राजी वही (17), आई मौज फकीर की देई झुपडी बाल, वही (26), आत्मा सो परमात्मा, वही (34) आसोजा का तावडया, जोगी होग्या जाट वही (51), ऊपर भरै नीचे झर, जैको गुरु गोरखनाथ के करै वही (63), कठी लीनी खोल, अब पूरे गांम ईडोल, वही (75), क्नफडा दोनू दीन बिगाडया, वही (81) करता गुरू न करताचेला वही (86) का गोरख, का भरथरी,का गोपीचद गोड । सिद्ध गयाई पूजिये सिद्धरहा री ठोड वही (94), काची काया को के गारबो ? वही (99), काना में मुदरा होया, आप ई आ आदेशकरसी वही (104), के जागे जोगी, जागे भोगी वही (124) के सोवै राजा का पूत के जोगी अवधूत (128) कोई कदै रामदेजी काई वेवं पब्बा। दो दो राटी बांट लेड आप आपके ढब्बा (129) घायल की गत घायल जाण (184) जाग मछदर गोरख आयो (214) देखा देखी साध जोग छीजे काया बाई रोग (276), राजा से जोगी भयो, जोगी से भयो कुम्हार । दोनू खोई वन्य, आदेसा जुहार (281), पाणी 84/ मीरा लोक्तात्त्विप अध्ययन पीव घाण जीव मार जाण (310), इसा जेहा मजला, पापर जेडा चित्त । कांग्रे पाली मेपली, जोगी किसका मित्त (409), जोगी जोगी सहे तो यपरां री हांण, ऐसा जहाँ नाथपथ का लोकमत पर गहरा प्रभाव रहा हो, वहाँ अगर मीरा ने पदो मे उनके प्रतीक और अभिप्राय आ गए हो तो वह सहज स्वाभाविक है। मीरा की भावानुभूतियो को पुष्ट करने वाले और अभिव्यक्ति देन वाले लोर- तत्व निगुनिया सता और लोग व्यापी नाप पथियो ये अभिप्राय तथा प्रतीक रहे हैं । उसके परिवेश मे उही का प्रचलन था और ऐसा लगता है कि उनका अजन मीरा ने कुछ तो लोक जीवन की परिपाटियो से दिया था और कुछ साधु सतो की सगति स कमाया था। (u) सगुण भक्ति तत्य तथापि मीरा न सत थी न नाथपथी साध्वी या जोगण पी। वह एक गुरुकुल की राजकन्या थी जिसकी एक पारिवारिक मर्यादा यी ही घी, एक शीलाचार और जीवन प्रणाली थी। चाहे मेहता के राजघराने की क या होने के नात उसे पर्दे मे रहने, असूयम्पश्या बने रहने और हर किसी से लाज करन की जरूरत नहीं थी तब भी साधु सगति मे भजन कीतन मे, हेलमेल मे कुछ न कुछ मर्यादा रेखाएँ तो रही ही होगी। दूदाजी, वीरमद आदि को परम वैष्णव कहा गया है, उनके राजकुल मे विष्णु के चार भुजा स्वरूप की वैष्णवी पूजा होती थी। मीरा के लिए भी कहा जाता है कि उसी चार भुजा स्वरूप के सामने वह ध्यानावस्था मे बैठी रहती थी वही उसका एक आसन था और उसके दीक्षा गुरु गजाधर वहीं पूजा पाठ और पुराण क्पा आदि उसे सुनाया करत थे। वैष्णव भक्ति का इतिहास बहुत पुराना है और वह एक ऐसा प्रवाह रहा है जिसमे सूर्य, गणेश शक्ति, शंव बौद्ध, जैन सभी परवर्ती और परवर्ती विचार- धाराओं का सगम और समवय हो चुका है। मीरा के समय तक उसकी कई धाराएं वाढ की तरह उमड रही थी। वल्लभ, निम्बाक, चैत य, हरिदासी, राधा स्वामी आदि के साथ साथ रामानदी, रामानुजी और अनक छोटे माटे सम्प्रदाय अस्तित्व में थे। 11 (180) लोक मे सब रलमिलकर कर ऐसे एकाकार हो गए ये कि मूर्ति पूजा, निराकार उपासना ब्रह्म ज्ञान, कृष्ण, राम, नसिंह, वराह, विष्णु, चतुर्भुज शिव, सबका अन्तर्भाव भक्ति' मे हो गया था। लोक्तात्विक घरातल पर जो भक्त-सम्प्रदाय मुक्त होकर भक्ति करते थे उनम सबका सश्लिष्ट स्वरूप देखन को मिलता । ऐसा समवय का कम क्बीर क समय भी था और परवर्ती सत एव भक्त कवियो मे भी था । उसी समवय को शास्त्रीय रूप देन का प्रयत्न तुलसी न भी दिया था । अध्येताआ ने मीरा की भक्ति में सम्प्रदायो की छाप ढूढन का प्रयल तो किया है मगर तत्कालीन लोक्मत का अध्ययन यदि वे करते तो मीरा के पदो में उसके प्रमाण मिल सक्त थे। वस्तुत लाक्मत अभेद की ओर जाता है अपडता और एकता की ओर जाता ।

मोरा काट्य लोसात्त्विक अध्ययन है। आज भी वैष्णद सिफ वैष्णव होत है और भिन्न न भूत्रमतातो वा सम वय अन्तर्गपन तथा अन्तर्भाव उनकी मान्यताला म मिलता है । सो हो स्थिति मीरा के समय में भी थी। स्वय मेहतिये ठोबुर शक्ति के उपासक थे, 441127) दूदाजी परम वैष्णव भी माने जाते थे, हरभूजी का उह वरद हस्त प्राप्त था, पावजी मादि लोक देवताओं के यानक भी पूजे जात थे, मदिर चार मजा के थे और वैष्णव नवधा भक्ति तथा पूजा पाठ वहा चलते रहते थे। सत और साधुआ का आवागमन बना रहता था और ज्ञानाजन का वही एकमात्र साधन होता था। राजपूती युग मे इसी कारण अध्यात्म और भक्ति का सम्मेलन भी मिलता है कि जीवन दोघ्र वा के बीच जिया जाता था---एक तो रणक्षेत्र मे या फिर दो युद्धो के बीच विराम मे, जो कुछ तो शृगार मे बीतता था और कुछ साधु सगति में । मोरा से पूर्वकाल के वीरगाथा साहित्य मे उसक प्रमाण मिल जाते हैं। इसलिए यदि मीरा के पदो मे हमे कही पचरात्र, कही रामानुजी, कही वल्लभ-मतीय, कही चैतन्य मतीय, कही रूद्र सम्प्रदायो, कही सफी प्रभाव मिलते हैं तो वे इसलिए नहीं हैं कि मीरा का उनसे सम्बध था या वह उनमे दीक्षित हुई पी, बल्कि इसलिए हैं कि वे सब लोकमत मे जाकर एकाकार हो गए थे। 44(129) भक्ति का जो लौकिक स्वरूप मारवाड क्षेत्र में 15वी-16वी सदी मे रहा, उसके कुछ लक्षण इस प्रकार से कहे जा सकते हैं--(1) भागवत के अनुसार ईश्वर के विराट स्वरूप को मा प्रता-उसकी निगुनिया धारणा से निकटता हान के कारण सतो के प्रतीक विधान और ब्रह्म निरूपग के अभिप्राया को स्वीकृति । (2) ईश्वर के विष्णु स्वरूप मे-जाकि सृष्टि का पालक माना जाता है- शक्ति सूय वराह नृसिंह राम, कृष्ण आदि अवतारो के अन्तर्वेश को मा यता। (3) ईश्वर के नीलामयी स्वरूपो का आवश्यकतानुसार उपयोग, यया-वामी रूप का, त्राता रूप का, सहायक रूप का, अधम उधारक रूप का, मायो सका, बाल रूप का, शत्रु सहारष रूप फा, भक्त की मर्यादा के एसक प का मन का। 4) ईश्वर सम्बधी जिन भिन्न भिन्न धारणाओं, मिदादी, मालानी, विश्वासो या प्रचार मिन भिन्न दाशनिक मन मनानगंन छियान्च्या मा- सतो द्वारा साधारणीयरण और सरलीकरण नाहिदे से मानणमामारि आवश्यक्ताओ पे अनुकून हो म और उनका रियान मीलिए हम पाते हैं कि भक्ति के दायर में , गन, पार fraर्ग मुग्नीय गोपी वल्लभ, कस नाशक, योगी, नधि, वार, भट्टर आदि नाम बलग-अला मांगो और आवश्यक्तायों का टार है कि मौराको भक्ति मे प्रेम सा पक्ति को 11(214) और उसने भी नोसर को उपमा वान्तामाद 11(219)मा कान्दामाद राजपूती सम्मृति में सलमान और कर * 86/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन प्रेमभक्ति कही कही गूथी जा चुकी है और जिसके साहित्यिक प्रमाण वीसल दे रासो जैसे नथो मे मिल जात हैं 13(277 310) । मौखिक परम्परा वाले लोग काच्या और लोक गीतो मे भी हम भक्ति प्रेम और शृगार के रले मिले प्रतीक विधान मिल जाते हैं- जे जीवण तिहां-तणा तन ही मांहि बसत । धारइ दूध पयो हर, वालक किम काढत ।। 45(142) तुं ही सज्जता नित्त तू प्रीतम तू परिवाण। हियडइ भीतर तू वसई, भावइ जाण म जाण!! 45 (114) हु बलिहारी सज्जणा, सज्जणमो बलिहार। हूँ सज्जण पग पानही, सज्जण मो गल हार ॥ 45(145) सज्जण गुणे समुद्द तू, तर तर थक्की तेण । अवगुण एक न सांभर इ रहूँ विलबी जेण ।। 45(151) महर फरक्कइ तन फुरइ, तनफुर नर्यण फुरत । नाभी मडल सहु फुरइ, साँझइ नाह मिलत ।। 44(160) -इसी प्रकार 'संकरी गली मे प्रियतम का मिलना', 'दिन गिनते गिनते उगलियो की रेखाओ का घिस जाना , याद मे दुबला जाना कि हाय की अंगूठी बाह में आने लग जाए' 'पपीहा', 'चकारे' थादि के अभिप्राय लोकतत्वो की बहुत पुरानी शृखला है और इनका उपयोग जसे प्रेम काव्यों में हुआ है वैसे ही भक्ति साहित्य मे भी। कहा जाता है कि मेडता म राव दूदा के जमाने मे चार भुजा की पूजा और भक्ति का जार था। राजपरिवार की महिलाएं भी धार्मिक थी। नितनेम, भजन, पूजन, कोतन, साधु-सगत आम जनता मे बहुलता के साथ प्रचलित थे। भक्ति भरे वातावरण की छटा निराली ही रहती थी। मथुरा वृदावन, पुष्कर, द्वारिका, डाकोर आदि की ओर से आने जाने वाली साधु मडलियां भक्तजन और सत- महात्माओ के डेरे मेहता मे पडे ही रहते थे। 11(219) मेहता के पडोस में नागोर, पाली आदि स्थान भी सतो, नाथो और सिद्ध महात्माओ के अखाहे थे। उनका आवागमन भी बना रहता था । राजनीतिक दष्टि से मेहता का महत्व इस तरह पापा कि वह जोधपुर, जयपुर, अजमेर, मालवा, दिल्ली-आगरा बीकानेर, चुरू, जालोर, मेवाड और गुजरात के बीच केद्रीय स्थान या। वहां सेनाओं और राज- नीतिक जनो तथा बनजारो, व्यापारियो का जमघट बना ही रहता था। उसके कारण वहाँ के लोकमानस मे अपेक्षाकृत उदारता और खुलेपन की मात्रा अधिक ही थी। उसी राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखकर राणा सांगा ने मेहता के

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साथ वैवाहिक सम्ध स्थापित किए थे। 44(13031)
एक तो वहाँ का भक्ति पूर्ण वातावरण, दूसरे व्यापक वृत्ति वाले लोकमानस
और तीसरे बचपन से उस वातावरण मे पली पोसी होने से मीरा के सस्कार
भक्ति भावना प्रधान बने थे। 11(219) मीरा के पदो से ही सकेत मिलता है
सात बरस की मैं श्री रग सेविया, जद पायो सुख सुहाग ।
-ये सस्कार ही उसकी माधुय भक्ति के रूप मे प्रकट हुए। वैष्णव भक्ति
के वातावरण के कारण उस पर चार भुजा के सगुण स्वरूप का प्रभाव निश्चय ही
प्रधान था। यद्यपि लोकमत के अनुसार उस भक्ति भाव में लोकतत्वो की प्रखरता
थी।
तभी मीरा के पदो में अपने इप्ट के लिए विविध नामो और स्वरूपो का
प्रयोग हुआ मिलता है यथा--13(154)
गिरिधर नागर राम गोकल का बिहारी हरी गोविंद, मनमोहन, ब्रजराज,
सावरो, सावरिया चतरभुज नाथ, बीनानाथ प्रभुजी श्याम सुदर भरतार मोहन,
बाँके विहारी, नदलाल गोपाल यदुनाथ का हा नागर नट महाराज, ठाकुर,
रावल, जोगी, जोगीडा, सामी, स्वामी अविनासी, सतगुरु खसम, प्रियतम, प्रिया,
प्रिय, प्रान अधार ।
-इनमे लोक प्रचलित प्रयोगो की झलक मिलती है। जहां तक मीरा के
पदो मे इष्ट के सगुण स्वरूप के वणन का प्रश्न है, हमे उसके कई भावना परक
प्रकाशन देखने को मिलते हैं।
बरजी मैं काहूकी नहिं रहू, म्हारो श्याम सुदर भरतार । 9 (405)
नना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय।
रोम रोम नख लिख सब निरखत, ललकि रहे ललचाय ।
मैं ठाढी ग्रिह आपणे री, मोहन निकरी आय ।
बदन चन्द परफासत हेली, मद मद मुसकाय । 9(405 2)
हमरो प्रणाम बाके बिहारी को।
मोर मुगट माये तिलक बिराज, कुडल अलक अकारी को ।
अधर मधुर पर बशी बजाव, रीझ रिझाव राधा प्यारी को।
यह छवि देख मगन भई मीरा, मोहन गिरवर धारी को।
33(95-2)

88/ मीरा लोकतात्विक अध्ययन बसो मोरे नैनन मे नदलाल । मोहन मूरति, सांवरि सूरति, मना यन विसात । अधर सुधा रस मुरली राजति, उर पंजती माल । छद्र पटिया कटि तट सोहति, नपुर सवद रसाल । मीरा प्रभु सतन सुध दाई भगत बछल गोपाल । 33(963) मेरोमा पहिगो गिरधरलाल सो। मोर मुण्ट पीताम्बर हो, गल बेजती माल । गउवन में सग डोलत, हो जमुमति साल । पालिंदी के तीर हो, का हा गवां चगय । सोतल कदम को छाहियां हो मुरली बजाय । दावन कोहा कर, गोपिन के साथ । सुर नर मुनि मोहे हो, ठाकुर जादुनाथ । इद्र कोप धन बरसो, मूसल जल धार। बूडत ब्रज को मखेड मोरे प्रान अधार। मीरा के प्रभु गिरयर हो, सुनिये चित लाय। तुम्हरे दरस को भूखी हो, मोहिं कछु न सोहापा। 33(976) -इसमे मधुर भाव क माथ-साथ लीला स्वरूप भी हैं। दरअसल मौरा के गिरधर तीन स्वरूपो मे भावित हुए हैं 44(307)-- (1) अवतारी कृष्ण के रूप मे-जिस रूप मे मीरा ने उहे नर रूप माना है और सयोग-वियोग का आलम्बन बनाया है। (2) विष्णु रूप मे-जिस रूप मे वे भिन्न भिन्न अवतारो के मूल, देवत्वमय प्रभु स्वरूप वणित हुए हैं और (3) अविनाशी म्प मे---जिसम वे असीम, निराकार, परमतत्व के रूप में अनुभूत हुए हैं । ये तीनो स्वरूप तथापि बहुन विभेद के साथ पृथक नहीं हो पाए हैं क्योकि लोकमत मे वसा विभेद या विभाजन था नहीं । प्रधाता की दृष्टि से देखें तो मीरा को कृष्ण का बांकेबिहारा वाला स्वरूप ही अधिक इष्ट था- निपट बकट छवि अटके। मेरे गयन निपट रक्ट छवि अटके । देखत रूप मदन मोहन को, पियत पियूष न मटक् । बारिज भवां अलक टेटी मनो अति सुगध रस अटके। टेवो कटि टेढो करि मुरली टेढ़ी पाग लर लटके। मीरा प्रभु के रूप लुभानी गिरधर नागर नट के । 33(97-7) -ऐसे ही अम पदोम मीरा के रियर का स्वरूप वसा ही है.---'सुन्दर मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 89 . - - वदन', 'कमल दल लोचन', 'बाँकी चितवन', 'मद मुमकान', 'धेनुचराता बसी बजाता, 33(988) सीस मुकुट पर मोर पद्रिका', कभी 'भाल पर केसर का तिलक', 'कानो में लहराते फुडल', 'कुटिल भकृर्टि', 'चितवन में टोना', 'अति सुदर नासिका', 'ग्रीवा तीन रेखा युक्त' 33(989) ऐसे स्वरूप वाले गिरधर के 'भग-अग पर मीरा बलिहारी है । गिरधर के इन स्वरूपो मे कुछ तो पारम्परिक हैं, 'वैजतीमाला' वाला रूप विष्ण स्वरूप के साथ जुड़ा हुआ-चार भुजा की छाप प्रमाणित करता है" 'टेढी पाग और उस पर लटकती मोतियो की लह' राजपूती वा वीरो की छाप बतात हैं। ऐसे ही स्वरूप में मीरा के 'लोभी नैन अटक गए हैं और बहुरते नहीं' 33(98-10), वे वही 'ललक कर रह गए हैं और नख से सिख तक उनका रोम रोम देख रहे हैं ।' (वही) ऐसी 'माधुरी मूरत' मीरा के 'उर विच आन अडी है, उसके विना वह 'प्रान कैसे रखे' कि वही 'उसके लिए जीवन मूर जही है वही (99 11)। ऐसे ही गिरधर के रूम के लिए उसने वह भाव भूमि पाई कि- मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई। जाके सिर मोर मुगुट मेरो पति सोई। और उस भाव बेल को उसने-"असुवन जल सीचि बोया है" क्योकि 'कुल की कानि' व 'जगती तत्व' बाधक रहे थे। वही (100 15) -इस सगुण, साकार और नर स्वरूप के अलावा मीरा ने कृष्ण के चार भुजाधारी विष्णु स्वरूप की वदना भी की है- मन रे परसि हरि के चरन । सुभग सीतल कवल कोमल त्रिविध ज्वाला हरन । जिस घरण प्रह्लाद परसे, इद्र पदवी धरण । जिण चरण ध्रुव अटल की है, राखि अपनी सरण। जिन चरण ब्रह्माड भटयो, नखसिखा की धरण । जिस चरण गोवरधन धारयो, इद्र को प्रब हरण । जिण चरण कालीनाग नाथ्यो, गोप लीला करण । दासी मीरा लाल गिरधर, अगम तारण तरण ।। 33(95-1) इसमे विष्णु तथा उनके नृसिंह, वामन व कृष्णावतार के प्रसग आए हैं। कुछ अन्य पदो मे "कृष्णावतार की द्रौपदी की लज्जा बचाने वाली" झांकी नृसिंह अवतार और गजमोक्ष वाले विष्णु का स्मरण है 33(119 63)। यह ध्यान देने योग्य है कि जोधपुर-बीकानेर-चुरू की ओर आज भी होता के आसपास नृसिंह धारण किया जाता है और स्वागधारी रस्सी का चाबुक लेकर दुष्ट जनो को मारने का नाटक करता है । उस क्षेत्र मे नृसिंह की मा यता पौराणिक काल से चली 90/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन आती है। मीरा ने यदि उसी अवतार को बार बार याद किया है तो वह लोक. तत्वानुसारी है । उसके अनुसार वह ऐसे 'हरी' से विनती करती है जिसने 'जुग- जुग भौर हरी भगतन को, दोनी मोक्ष समाज" वही 111964)। तथापि ऐसे पदों मे भी मीरा अपनी दाम्पत्य भावना नहीं छोड़ सकी है। यानी इसका मूल स्वर मधुरा भक्ति का है और कृष्ण के 'सरण-तारण' वाले सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन करते हुए भी वह 'विरहिणी की भावना उसके साथ जोड देती है-- हरी विन कण गति मेरी। तुम मेरे प्रतिपाल कहिए, मैं रावरी चेरी । आदि अन्त निज नाम तेरो, हीया मे फेरी। वेरि बेरि पुकार कहीं, प्रभु आरति है तेरी। यो ससार विकार सागर, बीच मे घेरी। नाव फाटी प्रभु पाल बांधो, चूडत है मेरी । विरहिणी पिव की बाट जोवे, राखि तयौ नेरी। दासी मौरा राम रटत है, मैं सरण हूँ तेरी । 33(11965) मीरा के "गिरघर' चाहे 'बांके बिहारी' हैं, चाहे 'नन्दलाल' हैं, चाहे 'अविनास' हैं, चाहे 'भुवनपति (वही 130 96)हैं, चाहे 'मन मोहना (वही 131- 99) हैं, चाहे केवल 'तुम' हैं (वही 131-104) चाहे 'जनम मरण के साथी हैं (घही 132-106), चाहे 'सजन हैं, चाह 'राम' (वहीं 133), चाहे 'राज' है--- उसो मधुरा भाव से सम्पृक्त किए गए हैं। लगता है कि विष्णु सम्बधी मधुरा और तरणतारण वाले मीरा के पद अलग-अलग समय के हैं। मधुरा भावी पद तो समवत किशोरावस्था के होंगे और दीनता और आतुरता वाल विनय के पद उस अवस्था के होंगे जब चारो ओर के दबावो और पारिस्थितिक सकटो के बीच मीरा ने अपने को निराधार निराधित अनुभव किया होगा। वैसे समय मे उसने विष्णु के तरणतारण स्वरूप का ही स्मरण किया है और उनमे मधुरा भावा का अभाव है, यथा- तुम सणो दयाल म्हारी अरजी। भव सागरम बही जात हों, वादो तो पारी मरजी। यो ससार सगो नहिं कोई, सांचा सगा रघुबर जी। मात पिता और कुटुम मधीलो सव मतलब + गरजी। मीरा की प्रभु अरजी सुण लो, परण लगावी पारी मरजी। वही (141-130) मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन/91 इसी तरह से- में पो तेरी सरण पड़ी रे रामा, ज्यू जाणो त्यू तार । अडसठ तीरय भ्रमि भ्रमि आयो, मन नहिं मानी हार । या जग में कोई नहिं अपणा सुनियो श्रवण मुरार। मीरा दासी राम भरोसे, जम का फदा निवार।" वही (141-131) वैसे हो- अब में सरण तिहारी जी, माहिं राखो कृपा निधान । अजामील अपराधी तारे, तारे नीच सदान । जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढी विमान । और अधम तारे बहुतेरे, भाखत सत सुजान । कुबजा नीच भीलनी तारी, जान सकत जहान । कह लागे कहूँ गिणत न आये, थकि रहे वेद पुरान । मीरा कहें मैं सरण रावल, सुणि यो नोनो कान । वहीं (141-132) इसमे विष्णु के स्वरूप का तथा राम और कृष्ण अवतार का ही स्मरण है । कुछ और पदो म उसी प्रकार 'गजराज के तारण का' (वही 147-135) 'द्रौपदी की रक्षा का' (वही 135) 'प्रहलाद की रक्षा का', 'अहल्या उद्धार का', 'सुदामा की विपत्ति के निवारण का' (वही 135)। प्रसग देकर कहा गया है-'मीरा के प्रभु मो बदी पर, एसी अबेर भई किन कारण।' अविनाशी, परमतत्व और निराकार स्वरूप वाले पद वे हैं जिनकी चर्चा निगुनिया प्रभाव के अन्तर्गत हो चुकी है । और वे सभवत मीरा के एकात चिंतन के उन क्षणो के पद हैं जब वे तात्त्विक विमर्श की अवस्था मे रहती होगी और सघषपूर्ण जीवन जी रही होगी। वस्तुत हम मीरा की रचनाओ को उनके जीवनवृत के मोडो और सघर्षों से जोडकर देखना चाहिए। एक तो उनका प्रारभिक जीवन था--किशोरावस्था से लेकर विवाह के समय तक दूसरा विवाहित जीवन का समय, तीसरा वधव्य और उसके बाद राणा सागा को मृत्यु तक, चौथा रत्नसिंह के राज्यकाल का राजनीतिक कलह का समय और अतिम राणा विक्रमाजीत का समय जबकि कष्टो का अन्त और आरभ चित्तोड त्याग के साथ हुआ था। अतिम समय रणछोड की शरण में रहने का हो सकता है जिस समय के पदमुक्त कोतन और आध्यात्मिक धरातल के हो सकत हैं। मीरा के पद--वे चाहे विष्णु के कृष्णावतार से जुड़े हो अवतारमूल से जुड़े हा या निराकार स्वरूप से जुड़े हो-तीनों मे यदि प्रयत्न किया जाए तो भीरा 92/मीरा लोक्तात्विक अध्ययन का जीवन वृत्त और पारिस्थितिय साक्ष्यगत विकास पृषक से खोजा जा सकता है। तथापि इतना ध्यातत्व है कि मीरा के सामने सगुण, निर्गुण, लीलाधारी, प्रेमल आदि स्वरूपो में कोई विभेदक रेखा नही भी । हमे यह मानकर चलना चाहिए कि मीरा केवल भावना थी और उस भावना की बाढ़ मे जहां जो आ गया सो या गया । वह न दाशनिक थी, न शास्त्रवत्ता थी, न आचाय थी, न भवन थी। वह भक्ति को साकार भावना थी जिसरे सामने किसी तक की, किसी सम्प्रदायी छाप की कोई अस्मिता नही थी, 44(302) इसी कारण वह धार्मिक आंदोलनो के अपने युग मे भी सम्प्रदायवाद से निरपेक्ष रही । वैसा न होता तो अष्टछापी भक्ता की तरह वह भी एक छाप बन कर रह जाती। वह केवल भावना थी, इसीलिए अभूत होकर लोक के मन मे उतर गई और अनचाहे अनजाने देश-काल की सीमा मे फैल गई। (m) सगुण निर्गुण मे अभेद यही कारण है कि उसके पदो मे हमे सगुण मे निर्गुण और निर्गुण मे सगुण, परम मे अहम् और अहम में परम का सम्मिश्रण मिलता है। यथा-'गिरधर नागर' के साथ ही यह व्यक्त करना कि 'सतगुरु शरण गहू' (404-1)1 'स्याम सुदर भरतार' की बात करते हुए उसके साथ मीरा के प्रभु अविनासी पूण ब्रह्म अपार', (4053) कहना । एक ओर 'देखो साईया कहना और उसके साथ ही 'हरिमन काठ किया (41640) कहकर गिरधर नागर' की छाप से पद पूरा करना । उसी तरह पद की अर्धाली से मोर मुकुट पीताम्बर सौहे स्याम वरण वह भागी' कहना और उसी के साथ निगुनिया शैली मे-- 'जनम जनम को साहिब मेरो, वाही से लो लागी। अपने पिया सग हिल मिल खेलू, अधर सुधारस पागी ।।" का सम्पुट देना। सगुण, निर्गुण, लीलामय और परम तत्व के सब स्वरूपो का विचित्र-सा मेल भी कुछ पदो मे मिलता है- महान चाकर राखो जी गिरधारी लाल, चाकर राषो जी। चादर रहसू बाग लगा सू, नित उठि दरसन पासू। व दावन को कूज गलिन म गोविंद लीला गा सू। चाकरी मे दरसन पाऊँ सुमिरन पाऊँ खरची। भाव भगत जागीरी पाऊँ तीनों बाता सरसी।। मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, गल वैजन्ती माला । दावन में धेनु चराव, मोहन मुरली वाला। ऊंचे-ऊंचे महल बनाई बिच बिच राखू वारी। सावरिया के दरसन पाऊँ, पहिन कुसुम्भी सारी ॥

मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/93 जोगी माया जोग करन को तप करने सन्यासी। हरी भजन को साधू आया, वृदावन के वासी ॥ मीरा के प्रभु गहिर गभीरा, हृदै रहो जो धीरा। आधी रात प्रभु दरसन दी जो, प्रेम नदी के तीरा ॥9(418-48) से ही एक पद मे 9(419-53) लौकिक धरातल पर लोकिक काव्य रुढियो का प्रयोग करते हुए 'पपोहे को पी पी करने पर चोच मरोडने की धमकी है, चेतावनी है कि पी-पी करने का अधिकार तो विरहिणी का है, तू पी-पी करने वाला कोन " उससे दूर हटकर कौए को बानी को स्वागत की नजर से देखा गया है, उसकी चोच सोने से मढाने की बात है, उसके जरिये पाती भेजने की इच्छा भी कि जाकर 'पी से कहना कि तेरी प्रेमिका धान नही पाती' और अन्तत 'प्रिय' के लिए 'अन्तर- जामी का प्रयोग जोकि परमतत्व का वाचक है। ऐसा लगता है कि निर्गुनिया शैली की व्यथा को लौकिक सगुनिया और कायिक अभिप्रायो से व्यक्त किया गया है। एक पद मे 9(420 56) तुलसी की तरह केवल 'नाम महिमा' के प्रमाण मे पौराणिक 'पत्थर तैरने', 'गणिका', 'गजग्राह की कथाए कहकर अत मे 'नाम महातम गुरु दियो परतीत पिछाणी हो' कहा गया है। पद 9(429 60) म 'अविनाशी के चरण कमलो की वदना' करके अत मे 'स्याम तुम्हारी दासी' कहा गया है। 'जोगिया' के नाम पर 'अलख जगाने, जोग जगाने की बात कहकर मीरा अपने 'गिरधर नागर से मिलकर तपन बुझाना चाहती है 9(423 70)। उसी तरह जिन आखो मे साहब बसता है, उह मीरा बद भी नहीं करना चाहती, त्रिकुटी महल म झरोखे से झाकी लगाए बैठी है' और एसी जाग साधना मे 'गिरधर नागर को पाना चाहती है। 9(42581) मीरा की भाव भगति में क्सिी मत विशेष को छाप नहीं है । सब मतमतातरो के प्रतीक, अभिप्राय और सार तत्त्व लाकमानस मे जाकर एकमेक हो जाते हैं । मीरा जैसी भका की भावनाए जब उमड उठती हैं तब चाहे जो उसके वेग को सह सके वह सहज भाव मे सामने आ जाता है-तभी 'वगनी का लहगा पहन कर वह सुहागण, राम नाम का घुडला पहनना चाहती है', 'हरि नाम की नक बेसर धारण करके 'सावरिया वर को बरना' चाहती है बल्कि 'कृष्ण नाम की झनकार करते हुए सुरत मे रमना चाहती है।' 43(162-201) और ऐसो 'पुकार' वह अविनासी की पोल पर कर रही है । मीरा के पदा मे (33) कुछ उपदेशपरक हैं, कुछ सासारिक माया मोह की असारता बतान वाले, लाक रूढियो से सने हुए चरित्रोपदेशक पद भी हैं जो सब सामान्य वाछा के अभि यजक कहे जा सकते हैं- - .

94/ मीरा सोक्तास्विर अध्ययन जग मे जोवण योहा, राम कुण कहरे उजार। मात पिता जो जनम दियो है, परम दियो परतार कई रेखाइयो कहरे परचियो, पहरे पियो उपगार। दिया लिया तेरेसा चलेगा, और नसी तेरे लार। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, मज उतरे भव पार ॥ 33(161 1960 मनखा जनम पदारय पायो, ऐसी यहर न आती। अबके मोसर ज्ञान विचारो, राम नाम मुख गाती। सतगुरु मिलिया सुज पिछाणी, ऐसा ब्रह्म मैं पाती। सगुरा सदा अमरित पीव, निगुरा प्यासा जाती। मगन भया मेरा मन सुख मे, गोविंद का गुन गाती। काहब पाया आदि अनादि, ना तर भव में जाती। मीरामह इक आस आपरी, औरो सू सकुचाती।। 33(161-197) -~ध्यान योग्य बात है कि मारवाड के लोकमत मे 'गुरु' कहना एक व्यापक विश्वास रहा है । आज भी सवण और मवर्ण विना कान फुराए भी किसी को 'गुरु' मनाते मानते हैं । विश्वास है कि गुरु बिना 'जनम अकारप' जाता है। नहिं ऐसो जनम बारम्बार। का जानू का पुण्ण प्रगटे, मानुसा अवतार। बढत छिन छिन पटत पल पल, जात न लाग बार। विर के ज्यू पात टूटे, बरिन लागे डार। भो सागर अति जोर कहिए अनत उडी धार। राम नाम का बांध बहा, उतर परले पार । शान चौसर मडी चौहटे सुरत पासा सार। या दुनिया में रची बाजी जीत आवै हार। साधु सत महत ज्ञानी, चलत करत पुकार दासी मोरा लाल, जीणा दन च्यार 33{160 195)-एसे पदो मे लोकतत्त्वो का सार-ही-सार है। उनमे सब दर्शनो का सार, सब मत मतां- तरो का निचोड और सब साधनाओ का तत्त्व लोकमत में समाया हुआ है। दाशनिक वेदांत कहें तो बौद्ध वाद कहें तो, मायावाद कहें तो कमयाद पहें तो, नवधा भक्ति, निराकार उपासना, गग, जोग, भोग मबके सब लोकमानस के मच पर रलमिलार किस तरह से साधारणीकरण मे ढलते हैं इसका पता मीरा के पदों से चल जाता है- मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन/95 भज मन चरण केवल अविनासी। जैताई दीसे धरण-गगन बिच, तेताइ सब उठ जासी। कहा भयो तीरथ व्रत कीन्हे, पहा लिए करवत कासी। इण देही या गरव न करणा, माटी में मिल जासी। यो ससार चहर की बाजी, साझ पड्या उठ जासी। कहा मया जो भगवा पहर्यो, घर तज भये सयासी। जोगी होय जुगति नहिं जाणी उलटि जनम फिरि आसी। अरज करू अबला कर जार, स्याम तुम्हारी दासी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटो जम की फांसी। 33(160-194) और कमगति की अटलता, भाग्य का भोग लोकमत मे कितना अटल है, यह भी मीरा के पदो मे उतरा है- करम गति टारे नाहिं टरी। सतवादी हरिचद से राजा, सो तो नीच घट नीर भरे। पांच पांडु अरु सती द्रोपदी, हाड हिमाल गरे। जग कियो बलि लण इद्रासन, पाताल धरे। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, विप से अमत करे। 33(158-190) एक तरफ तो 'सहज बैराग' की आवश्यकता का उपदेश- यहि विधि भगति कैसे होय। मन की मैल हिये तें न छूटी, दियो तिलक सिर धाय । पाम कूकर लोभ होरी, बोधि मोह चहाल । क्रोध कसाई रहत घट मे, कैसे मिलें गोपाल । बिलार विषया लालची रे, ताहि भोजन देत । दीन हीन ह क्षुधा रत से, राम नाम न लेत । इस तरह से अत मे- हरि हितु से हेत कर, ससार भासा त्याग । दासी मीरा लाल गिरधर, सहज कर बैराग ।। 33(150 162) और दूसरी तरफ "रमैया के बिना जीव दुख पाता है" ऐसी अभिव्यक्ति मे रसीमिली दुनिया की अज्ञानता पर खेद- 96/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन - रमझ्या विनि यौं जिवडी दुख पावै । कहो कुण धीर बंधावै। वो ससार कुबधि को माडो, साध संगत नहिं भावे । गम नाम की निंद्या ठाणे, फरम ही कुगत कुमाव । राम नाम बिन मुकुति न पावै, फिरि चौरासी आवै । साध संगत मे कबहुँ न जावं, मूरखि जनम गुमाव । जन मीरा सतगुरु के सरण, जीव परम पद पावै । 33(150 160) मौरा के इष्ट का स्वरूप आलम्पन रूप में चाहे "मोर मुकुट वाले, बाकी चितवन वाले, गोपी लीला वाले कृष्ण का था" तथापि उसकी भक्ति भावना बहु मुखी, लोकोन्मुखी और लोकमतानुसारी थी। (2) साधना उसी तरह उनकी साधना पद्धति मे भी हमें उसी तरह मिन भिन पद्धतियो और लौकिक समग्रता के प्रमाण मिल जाते हैं। मीरा के मन मे भक्ति का उद्रेक सात वर्ष की उमर से हुआ था और तबसे निरतर भजन कोतन, उपदेश, कथा, अतर्मुखी चिंतन तथा साधु सतो की सगति मे पुष्ट होकर उसने जो अनोखा और सुदढ रूप धारण क्यिा वह कुछ इस तरह का था कि जो टूट सकता था, मगर नम नहीं सकता था। जैसा कि मेडता का धार्मिक और नैतिक परिवेश था, उसमे किसी सम्प्रदाय विशेष को प्रश्रय नही शा। दूदाजी स्वय जगदबा के भक्त थे, परम वैष्णव थे, विष्णु का चार भुजा स्वरूप उनके कुल का इष्ट था, हरभूजी का उनका वरदहस्त और स्नह था, पाबूजी उनके वश गौरव थे, जाम्भोजी जनमत के जाग्रत महात्मा थे । इन सबके साथ पौराणिक और नाथ पथी प्रभाव लोकगत हो चुके थे। साधु-मतो का निरतर आवागमन, भजन, कीतन और सतसग लोक जीवन और राज घराने लिए ज्ञान और प्रकाश का राजपथ बना हुआ था। ऐसे वातावरण मे सात बरस नी मीरा ने जो सस्कार ग्रहण किए वे भावना प्रवण होकर इस कदर पनपे कि मीरा न व्यक्ति रही न क्या रही, न राजवधू रही, न भक्त रही, न सत रही बल्कि 'लोक' हो गई और अमर हो गई। कहा जाता है कि उसने सगुण रूप श्री कृष्ण की पत्नी भाव स भक्ति की, कृष्ण को अपना पनि माना और उसके लिए किसी की परवाह न की । कोई उसमे नाथपपी जोग साधना, निगनिया शान साधना की बात भी करते हैं। उसके व्यक्तित्व निर्माण की चर्चा म पहले यह कहा जा चुका है कि परिस्थितिजय विशिष्टतामोन मोरा या विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान किया था। बचपन से उसने अपने को "आभंगरयो घरता झल्ली जैसा अनुभव किया था। अन्तर्मुखता उसकी विशिष्टता थी और धार्मिक वातावरण ने उसके पानी मन को परम तत्त्व की मीरा काव्य लोकतात्विक अध्ययन / 97 । अनुभूति से भरने का काम किया। उसका भौतिक जीवन भी विषादपूण संघों और विषमताओ की कटु कहानी 'रहा था 44(149) -बचपन की निराश्रित भावना, किशोरावस्था मे वजनाओ का अम्बार, ठाकुर कया को राजवधू के रूप में देखने की परिवारवालो की कामना और आकांक्षाओ के साथ उसके रिक्त मन की भूख का सघष जोकि उसे अधिक शक्ति पूर्वक कृष्ण शरण की ओर ले जाने वाला सिद्ध हुआ । वह मान चुकी थी कि "माता पिता उस कुटुम कबीलो, सब मतलब के गरजी" और इसीलिए शायद सकल्प कर चुकी थी। कि "बरजी मैं अब काह की न रहीं।" उसके व्यक्तित्व की प्राणशक्ति बडी प्रबल थी, इसी कारण उसने अपने मन के खालीपन को भरने वाली भावना भक्ति और साधु सगत को नहीं छोड़ने की टेक, छिन्न भिन्न होने तक निभाई । पीहर में भी उसकी टेक थी कि- "तू मत बरजे माइडी म्हने साधा दरसण जाता" और ससुराल मे भी उसकी स्टेक रही कि- "राज किये ज्याना करणे दीजो, मैं भगता री दास। सेवा साधु जनन की, म्हारे राम मिलन की मास ॥" -यदि उसने अपनी भावना भक्ति जारी रखी होती और साधु सगत की टेक 'छोड दी होती तो मीरा मीरा नहीं बनती, मेवाड के राजघराने की एक घटना- विहीन राजवधू होकर रह जाती। उसकी सारी साधना के मेरुदड ये दो ही हैं- एक तो अपनी विशिष्ट शैली मे भावनाशक्ति मे डूबे रहना और दूसरा साधु संगत से विमुख न होना। भावना परकता भी इतनी एकातिक और इतनी तीव्र और अभेद्य कि राज वैभव, ऐश्वय, लोभ, वजना, प्रताडना मृत्यु, पात कुछ भी उसे भेदने में सक्षम नहीं रहा। (1) निर्गुण मताधारित-जागतिक सघपों का झेलते हुए भी उसने अपनी भाव भगति की साधना शायद चारभुजा स्वरूप की स्तुति, विनती और निगु निया -सतो की बानी के प्रभाव से आरम्भ की। हो सकता है कि उसके आरभिक पद साधु सतो से सुने हुए या उनके अनुकरण स्वरूप हो । उनमे सामान्य हरि स्मरण के, पुराण आधारित, स्वरूप वणनात्मक तथा सत वानी प्रभावित पद हो सकते ओलू योरी आवै हो महाराज अविनासी। हो म्हान कवटे दरस दिखाती। बिरह वियोगन बन-बन डोलू करवत लूगी कासी। निसदिन कभी पथ निहारू,क्व मोहे धीर बधासी। कृपा करो म्हारे भवन पधारो नहिं ये जिवहो जासी19(409.

98/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन आत्मा के विरहिणी अभिप्राय के नमूने कबीर, रैदास और अन्य सतो की बानी मे भी मिलते हैं । आत्मा की परमात्म चेतना की आकुलता, वियोग की व्याकुलता, मन पानी मे अरुचि, काया सिंगार से विमुखता-जैसे सतो की बानी मे लक्षण मिलते हैं, वैसे ही मीरा के कई पदोम मिलते हैं। ऐसी अन्तमुखी साधना मीरा को मधुरा भक्ति की अपनी विशेषता है जिसमे वह नारी के उमाद, विषाद अकुलाहट आदि को विशिष्ट रगरूप देकर अभिव्यक्त करती है । कबीर आदि सत तो आध्यात्म के धरातल को छोड नहीं पाए, मगर मीरा अपन अविनासी को 'पति' बनाकर उसमे सगुण तत्व भी डाल दिए । बल्कि इस आलम्बन के लिए ससारी पति, कुल, परिवार, मर्यादा सबकी बलि चढ़ा दी। उसको साधना में अनु- भूतियो की अतमु खता अतुलनीय है- अरी ही तो याही उमा है लागी रही री। कचऊ न पिय मो सो प्रेम जतायो, कबऊ न हसि मोरि बहियां गही री। अब कैसे जीवन बनै मोरी आली, पबऊ न पिय मो सो जिय की कही री॥ 11(766) -अमूत भावना मे लौकिक अभिप्रापो और क्रियाओ का सहज आरोपण मीरा की साधना की ऐसी सम्प्राप्ति है जिसकी सचाई से कोई इनकार नहीं कर सकता फिर भी जिसकी शास्त्रीयता पर प्रश्नवाचक बना रहता है। वैसे तो कबीर भी 'राम की बहुरिया' बनते हैं और मीरा भी उस टाप पर "प्रेम की चूनर ओढकर भरतार गिरधर" को मानती है फिर भी नारी हृदय की जो कसक, व्यथा और पीडा मोरा की साधना मे है वह कबीर से कोसो दूर है- कबीर भी अपने "राम से मिलने के ताइ सिंगार करके" बैठते हैं, मगर उसी छाप पर मीरा की साधना कुछ अलग ही है-- आज रगीली रण प्रीतम पावणा हो राज। सन सनगारूं सेज सवार अजन सार धन वारु। स्याम सुदर तन घारू लेसू भावना फले मनोहर मन-मन फूले सदा सुहाग पटन तपहले। सब दुख भूले फूले करसु वदावना हो राज । 11(78-13) देखने लायक है अनुभूति को वह तल्लीनता जिसमे राजपूत नारी की पविणा पधारण और वदावन के लोक्कि तस्य सहज अभिव्यक्ति मे उतर आए हैं। मीरा एक ओर "भगति देश राजी होती है और "जगती देख रोती है"सो दूसरी ओर "अत लोर की मन्त अनुभूति मे किसी धगम सोर में सुष भी पाती माराज।

मीरा-कान्य लोकतात्विक अध्ययन/99 . चाला अगम वा देस काल देख्यां डरी। भरा प्रेम रा होज, हसा केल्या करा ।। 44(365) और ऐसी अन्तमु खता इतनी प्रबल सधी कि माता, पिता, पोहर, सासरा, दड, भय, लोभ सब नाकारा होकर रह गए- नैण लगे तो घूघट कैसो, लोक लाज तिनका ज्यो तोर्यो। नेकी बदी है सिर पे धारी, मन हाथी आकुस दै मार्यो। प्रगट निसान बजाय चली, राणा राव सकल जग छोर्यो। मीरा सबल धणी के सरणे, का भयो भूपति मुख मोर्यो। —देखने की बात है कि राजपूत रमणी जो 'सबल धणी' के 'सरणे' हो और 'निसान' के पोप पर चल पडी हो, उसे कोन छेड सकता है । मीरा ने अमूर्त पति को जो लोकतात्त्विक अथ दिया है, वह अनन्य है । माई मेरा पिय बिन अलूणो देस । राग रग सिणगार न भावं, खुलि रहे सिर के केस । सावण आयो साहिब दूरे, जाइ रहे पर देस । सेज अलूणी भवन अकेली, रंण भयकर भेस । आव सलूणो प्रीतम प्यारे, बीते जोवन वेस19(4008) -इस टेक मे व्यपा का अनोखापन तो है ही, निगुनिया छाप मे लौकिक अभिप्राय और व्यजना-"अलूणो", 'खुलि रहे सिर के पेस", "जाइ रहे परदेस", "सेज अलूणी", "सलूणे प्रीतम' ---मीरा की विशिष्टता के द्योतक भी हैं। मीरा की साधना अध्यक्त के प्रति, अमूर्त के प्रति, अमूत की शैली मे भी है और मूत की शैली में भी है। सभव तो यह है कि साधु-सतो के समागम से उसने आत्मा-परमात्मा के अमूत ज्ञान के तत्त्व और पारिभाषिक अभिप्राय ग्रहण किए थे। वे मेडता के लोक मानस में भी रूद थे। वे ही उसकी एकातिक अनुभूतियों में सहज उद्गार बनकर फूट पड़े हैं --'रमैया बिन मो सू रह्यो न जाइ।' और जब 'उस अविनासी महाराज की भोलू आती है तब तो उसकी अन्तव्यथा कितने- कितने रूपों में फूटी पडती है कि- विरह वियोगिन बन बन बोलू करवत लूंगी कासी। 'नहिं वे जिवडोजासों और मैं भेद अभागण पाहे को सरजी, पिया मा सूं रहत उदासी' 9(409-13) जो सिरजन हार है, उसी के वियोग की यह व्यथा मीरा ही उससे कह सकती पी । अपने 'भुवन पति' को वियोग व्यथा में भूख मिट जाना', 'नींद का नसाना', "रेण बिहाणी होना तो सामाय लोविक अभिव्यक्तियां हैं, मगर 'बालपनो की प्रोत' वाले 'रमैया का कदे तोल न आने पर मीरा को जो कष्ट-साधना है, उसे 100/भीरा लोकतात्त्विक अध्ययन 'पहचान पाना कठिन ही है- आवो मनमोहना जी मीठा भारा बोल। बालपना की प्रीत रमइयाजी, पदे नहिं पायी पारोतोल। दरसण बिन मोहिं जकन परत है, चित मेरो डांवाडोल । मौरा कहे मैं भई रावरी, कहो तो बजाके ढोल । 9(410 19) जो 'आत' भाव मीरा के मन मे है उसके कारण 'तलपत-तलपत पलना परत है,' 'रात दिन पप देखते बीतते हैं और 'पलक न पल भर लागो रे', 'रात दिन पिव पिव रटते रटते', 'दूजी सब सुध-बुध भाग गई है। इसी कारण शायद मोरा ने लोक लाज, कुल मर्यादा किसी की परवाह नहीं की क्योकि- मीरा व्याकुल अकुलाणी, पिया की उमग अति लागी री। 91401-24) उसको साधना का लोकानुसारी स्वरूप यह था कि- अग छीन व्याकुल भई, मुख पिय पिप बानी हो । अतर वेदन विरह की, वह पीर न जानी हो। ज्यो चातक धन को रट, मछली जिमि पानी हो। मीरा व्याकुल बिरहणी, सुध बध बिसरानी हो। 9(414 35) साधना की वेदना मे क्प्टो के बयान मे मीरा के पास आलकारिक या कलात्मक अभिव्यक्ति नही है । लोक जीवन की सपाट अनुभूति जागते रहना, ,आरति सहना, प्रतीक्षा करना खानपान न भाना, अनसिंगारे रहना -यही सब दार बार सहज बानी म उभरती गई है। पये को बुरा भला कहना, कौए को सदेशवाहक बनाना, उसको कांव-काव को प्रिय आगमा का सूचक मानना, चातक, मोर, सावण को शहक मानना ये सब राजस्थानी लोककाव्यो के बहुत पुराने अभिप्राय या प्रतीक हैं-यथा-- चावहियउ नइ विरहणी दुहुवा एक सहाव । जबही परसइ घण घणउ, तबहि कहइ प्रिय आव ।। (ढोलामारू 27) बावहिया निल पखि पा बाढत दइ वइ लूण । पिउ मेरा भइ प्रीउ की तू प्रिउ कहइ सफूण । (वही 33) सावण दूभर हे सखी विहां मुा पाण आधार । (वही 49) कउआ दिॐ बधाइयां, प्रीतम मेलई मुज्झ । काढि क्लेजउ उप्पन भोजन दिउली तुझ । (वही 75) हूं बलिहारी सज्जणा सज्जण मो बलिहार । हूँ सज्जण पग पानहीं, सज्जण मो गलहार। (वही 176) चाल सखी निग मदिर रहूं, सज्जन रहियडे जेण । (वही,359) विकल रहना, मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 101 और, उन सबका अपने ढग से उपयोग करते हुए मीरा ने अपनी साधना को वाणी दी है-- "ज्यो चातक धन को रहै, मछली जिमि पानी हो।" "भूख गई निदरा गई, पापी जोर न जाये हो।" 9(410-13) गरे पपैया प्यारेक्बको बैर चितार्यो। दाया ऊपर लूण लगायो, हिवडो करवत सार्यो॥" 9(408-11) "पपइया रे पिव की वाणी न बोल। सूणि पवेली विरहणी रे, थारी राखेली पांख मरोड । चाच कटाऊँ पपइया रे, कपरि कालर लूण ! पिव मेरा मैं पिव की रे, तू पिव कहे सकूण।" 9(419-53) प्रीतम कू पतिया लिखू कउआ तू ले जाइ। प्रीतम जी सू यू कहै रे, थारी बिरहणि धान न खाइ ।। 9(41953) निरतर सालती पोडा का अनुभव ही मीरा की साधना का सार है-~वह भी अमूत के साथ सुरति की पीडा- मौरा मनमानी सुरत सैल असमानी । जब जब सुरत लगे वा घर की, पल पल नैनन पानी। ज्यो यि पीट तीर सम सालत, कसक कसक कसकानी । रात दिवस मोहिं नीद न आवत भाव अन न पानी 19(42578), और वह पीडा भी ऐसी कि उसके लिए मीरा-- 'माता पिता सुत बधू दारा, ये पांव मे बेरी' 11(93-59) भानकर उहे तोडने का सकल्प रखती है। सकल्प भी बहुत पुराना है-- "सात बरस री मैं धीरग सेविया, जद पायो सुख सुहाग, मीरा ने प्रभु मिल्याजी भव भवरा भरतार ।" 11(93 64) और वह भरतार भी ऐसा कि- बलि जाऊँ चरणा की दासी। यो हो मेरे गगा, यो ही मेरे जमणा, यो ही है तोरण कासी। हरिजी मेरा म्हें हरिजो की, जगत करा किन हासी। मीरा के सिर उपरि बिराजे एक सखेड अविनासी। 11(107-115) एक पल भी इस अविनासी के दिना प्राण दूभर हो जाते हैं- प्रभुजो तुम दरमण विन दोरी। मेरो सान लगी है राम सूं और सकल मूं तोरी ।

102/ मीरा लोकतात्विक अध्ययन और पौया मोसू मुख न बोले, मैं विणसू विध जीऊ। मैं तो प्राण तजत हूं अब ही, भर बटको विष पीऊँ। 11(106 111) उस दूभरता मे वह-- फारूंगी चोर यरूं गलकथा, रहूंगी रागण होयरी। धुरियां फोर्स, मांग बिखेरू, पजरा में डालें घोपरी। 33(11448) -~-ऐसा करके 'जोगन बन कर' 'वन-बन भटकने को भी तैयार है, मगर 'कुल मरजाद 'पीहर-सासरे की लाज' निभाने को तैयार नहीं है। ऐसी अटलता, अविचलता और एकात निष्ठा मीरा की साधना के निगुनिया रूप मे उभरती है। (1) सगुण मताधारित-~-दूसरी ओर सगुण वैष्णव मत से प्रभावित उसकी साधना में साधु सगति, भजन, कीर्तन, नितनेम, दरसण, कीर्ति स्मरण, गुणवर्णन, लीला गान-~की बातें दो रूपो मे मिलती हैं। एक तो प्रेम भावना की अनन्यता के साथ और दूसरे दासी भावना के साथ। साधु-सगति मीरा के साधना-पथ का कटकाकीण क्षेत्र था । यदि वह अपनी भक्ति कायम रखती और साधु सग की टेक छोड देती तो उसके जीवन का सपप मिट जाता। मगर उसकी यह टेक बहुत अडिग यो- पीहर मे भी वह 'दू मत बरजे माइही म्हन साधो दरसन जाती राम नाम हिरदै बस, माहिले मदमाती।" 33(106-20) कहकर उस टेक को पूरा करती थी, और सासरे मे भी उसने वही टेव पकड "रखी थी- "राज किये ज्याना करणे दीज्यो, म्हें भगतां री दास । सेवा साधू जनन की, म्हारे राम मिलण की आस ।" 33(10629) उसके लिए साधुजन ही आत्म कल्याण के माध्यम थे और वह उनकी सगति किसी भी कीमत पर छोडने की तैयारी नही पी। उसकी नजर मे- "साध माता पिता कुल मेरे, सजन सनेही ग्यानी। संत चरण की सरण रैनदिन, सत कहत हूँ बानी।" 33(107 30) -ऐसी लगन यो साधु सगत के प्रति । निश्चित रूप से उसके बचपन की भावात्मक रिक्तता यो साधु-सगत मे आश्रय मिला था और वह उस आश्रय को मीरा काव्य लोकतात्विक अध्ययन/ 103 आजीवन नहीं छोड़ सको, चाहे उसको वह टेक निदा, वजना, प्रताडना, अपमान आदि का कारण बनी। लीला गुण-गान में उसने विष्णु के पौराणिक स्वरूप का,अवतारो का, कल्याण- कारी और पोषक भावना का वैष्णव शैली मे स्मरण किया है जहाँ वै भक्तवत्सल हैं, दया निधान, कृपाल, स्वामी, भुवनपति, विपदविदारण, राम आदि हैं। विनय और प्रार्थना साधन बने हैं-कही दास भावना उभरती है तो कही भक्त का समपण और श्रद्धा ही व्यक्त होती है। हो सकता है मेडता के चारभुजा मदिर मे ऐसे प्राथना के पद उसके सुने सुनाए हो या रणछोड के मदिर मे हताश मीरा के वे उच्छवास भी हो। यथा-- 'मन रे परसि हरि के चरण जो कि 'सुभग शीतल कंवल कोमल त्रिविध ज्वाला हरण' हैं । 33(951) ऐसे विष्णु के स्मरण के साथ नृसिंह अवतार, ध्रुव वाले विष्णु वामन अवतार, राम अवतार और कृष्ण अवतार का स्मरण है । 33(951) ऐसे पदो मीरा के साथ 'दासी' का सम्पुट लगा हुआ है । वही कुछ भी नहीं है-'यह छवि देख मगन भइ मीरा मोहन गिरधारी को।' कही वे 'सतन सुखदाई प्रभु भक्त वत्सल' हैं 33(963) मगर, प्रमुख स्वर यहाँ भी निराश्रित के माश्रय', 'स्वामी' और 'प्रियतम' का है-- हरि मोरे जीवन प्रान अधार। और मासिरो नाहिं तुम बिन, तीन लोक मंझार। भाग बिना मोहिं कुछ न सुहावे, निरखौ सब ससार । मीरा कहे मैं दास रावरी, दीज्यो मती विसार। 33(964) -जहाँ 'दशन की भूखी या प्यासी वाली भावना है वहाँ आलम्बन 'गिरधर' 'मेरो मन बासिगो गिरधरन लाल सौ' और उसके साथ लीला स्मरण और तब 'मोरा में प्रभु गिरधर हो, सुनिए चित लाय। तुम्हारे दरस की भूखी हो मोहिं कछन सहाय । वही (97-6) -यह 'प्रभु' भावना और 'दशन की भूत' उत्तरोत्तर विकसित होकर 'दाम्पत्य भावना में खिल उठती है जो मीरा को विशिष्टता है । ऐसा कहा जा सकता है कि 'प्रभु' भावना वाले पद या तो आरभिर अवस्था के हैं और कुछ अतिम अवस्था वाले भी हो सकते हैं -खास करके वे जिनमे निराशा, हताश और गिडगिडाह लाती है । 'दाम्पत्य भावना वाले पदों का समय हम 'किशोरावस्था से लेकर भोजराज को मृत्यु-पूच' तर या मान सकते हैं यानी सगभग 11 वप को अवधि रे (विक्रमी 1579 तप) और वे पद ही मीरा की मुख्य साधना के स्वर माने जाते हैं जिनम वैष्णव भजन, कोतन, गुणगान आदि से 104/मौरा लोक्तात्विय माध्यमन मिन अनुभूतियो की तीव्रता, एकनिष्ठता, ध्यान मग्नता और अदितीपता कही जाती है-उनकी शुरूआत कुछ ऐसे होती है- निपट बवट छवि अटने, मैरेन। देखत रूप मदन मोहन को, पियत पियूध न मरके। बारिज भयो अलप टेढी मनो, अति सुगम रस अटके । टेढ़ी कटि, टेढो करि मुरली, टेढी पाग लट लटके । मोरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरधर नागर नट के 1 33(977) और अपने कृष्ण वे रप पर लुभाने की वह सोमा इस कदर बढती चली गई कि 'या मोहन के मैं रूप लुभानो' से होकर 'तन मन धन गिरधर पर वालं, कंवत नपटानी' (वही 8) से भी उसकी वाह रुकी नहीं बल्कि उत्तरोत्तर वढती गयी-- "जब से मोहिं नदनदन दृष्टि पर्यो माई। तव से परलोक लोर, बछ न सुहाई ।' (वही 9) और "गिरधर के अग-अग मीरा चलि जाई।" (बही) ~~~यह बलिहारी ऐसी सीमा तक होती रही कि 'रोम रोम आंखें बनकर उसमे अटक गए और वापस नहीं आए सो नहीं ही आए । (वही 10) 'लोक कुटुम गरजि बरजहीं बतिया कहत बनाई' मगर मीरा क वे नन' 'चचल निपट अट नहिं मानत, परप गये बिकाई। (वही) ऐसी सीमा मान पर मीरा राजपन्या नहीं-नही लडकी नही रही, राजवध नहीं रही सिप कृष्णमयी हो गई । ऐसा मावनात्मक विकास भली कहो कोई बुरी मैं सब लई सीस चढाई म झलकता है। ऐसी 'कृष्णमय' अवस्था मे मीरा की जो भक्ति साधना पनपी वही उसका अमूल्य धन है। फिर तो- आलो री मेरे नैणा बान पड़ी। चित चढी वह माधुरी मूरत, उर विच आन झडी । (वही 11) उसके बिना-- कसे प्राण पियाबिन राख, जीवन मूर अही। मीरा गिरधर हाय विकानी, लोग कहें बिगडी । (वही) ऐसी भावना प्रवणता में जहां मीरा को लोकलाज, कुल मर्यादा आदि की सुध भी नहीं थी, तो उसे आचार्यों और शास्त्रियो के सम्प्रदायवाद का ध्यान से रह सकता था। वह तो सिफ प्रवहमान भावना बन गई थी जिमम व्यथा, वेदना, बाधाएं, सांसारिक रोहे सब आतुरता, व्याकुलता और अभिलाषा मे आप्लावित हो गए, बहते चले गए। तभी मीरा की भक्ति साधना निर्गुनिया-सगुनिया गलियो मीरा-काव्य • लोकतात्विक अध्ययन / 105 की परवाह नहीं करती। लोक मे प्रचलित और साधु-सतो से गृहीत जो कुछ भी मीरा सेंजो पाई वही उसकी अभिव्यक्ति का साधन बन गया। तभी वह यह भी। कहती है कि- 'असा पिया जाण न दोज हो । तन मन धन करिवारण, हिरदे धरि ली हो। आव सखी मिलि देखिए, नैणा रस पीज हो। जिह-जिह विधि रीझ हरी, सोई विधि कीजे हो। सुदर स्याम मुहावणा, मुख देख्या जीजे हो । 33(99-13) और "मुन्न महल मे ममाधि लगाकर अपने प्रिय का अमृत अकेली भी पीना चाहती है"- ननन बनज बसाक री, जो मैं सहिब पाऊँ री । इन नैनन मेरा साहिब बसता, डरती पलक न.लऊँ री । त्रिकुटी महल में बना है झरोखा तहाँ से झाकी लगाऊं री। सुन्न महल मे सुरत जमाऊँ, सुख की सेज बिछाऊ री। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊ री। (वही 12) एक तरफ वह चैतन्य मतियो की तरह अपने गिरधर के आगे नाचती भी है, मगर वेशभूषा निगुनियो को लेकर- गिरधर आगे नाचूगी। नाचि नाचि पिव रसिक रिझाऊ, प्रेमीजन को जाचूगी। प्रेम प्रीत की बाधि घुघरू, सुरत की कछनी काछूगी। लोक लाज की कुल मरयादा, यामे एक न राखूगी। पिव के पलग जायौ ढूगी, मीरा हरि सग राचूगी। (1) सगुण निगुग में अभेद मीरा के पास सगुण निर्गुण का भेद नहीं है। वहाँ सिफ मन का उमहता दरियाव है, जिसको लपेट मे घर, ससार, मरजाद सब डूबकर रह गए हैं और ऐसी अवस्था या गई है कि- मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई। 33{100-5) यही अवस्था "ऐसे घर को क्यू वर्स, जो परणे मर मर जाय ।" के विरोध में "वर परणीजे सावरोम्हारो पडलो अमर हो जाय।" से व्यक्त होती है।

106/ मोरा लोकतात्त्विक अध्ययन और उस 'पति भाव की बेल को' मीरा ने 'आंसुओ से सींच-सोचकर बडा किया था क्योकि उस 'भाव को परिपक्व करने के लिए उसे बहुत सधप झेलना पहा था- "लोग कुटुम्बी गरजि बरजहि, मानत परहय गई विकाय ।" 9(405 2) "सखियन मिलि के सीख दई, मन एक न मानी हो।" (वहीं 414-35) "कुल कुटुम्बी बान बैठे, मानहूँ मधुमाखी। दासी मीरा लाल गिरधर, मिटी जग हासी। 33(103-22) "लागे पीहर सासरोजी, माइ तणो मो साल । सब ही लाजे मेडतियाजी, यासू बुरो क्हे ससार । 33(105-29) मगर, अन्तत मीरा का अटल निश्चय रहा कि- तेरो कोइ नहिं रोकणहार, मगन होउ मीरा चली। लाज सरम कुल की मरजादा, सिर से दूरि करी । वही (108-33) और राणाजी म्हे तो गोबिंद का गुण गास्या । चरणाम्रित का नेम हमारो, नित उठ दरसण जास्यां । हरि मदिर मे निरत करस्या, घुरिया धमकास्यां । राम राम का झाश चलास्या, भव सागर तट जास्यां। (वही 109-34) सीसोया रूठो तो म्हारो काई करसी। म्हें तो गोविंद का गुण गास्यां हो माइ । (वही 11038) -ऐसी टेक के परिणामस्वरूप मीरा ने अपमान, प्रताडना और प्राणघात भी सहे- "राणाजी में जहर दियो मैं जाणी।" जैसे--कचन दहत अगिन मे निक्सत बारा वाणी । मगर, -वसे ही मीरा खरी उतरी और साधना के सघप को एक निश्चित दिशा मिली- लोक लाज कुल काण जगत को, दइ बहाय जस पाणी । अपणे घर का परदा पर ले, मैं अबला पौराणी। 33(111-41) फिर से उस 'बोराई ने भी पला विद्रोह कर दिया- बरजो मैं काहू की नाही रहीं। और तन मन धन मेरो सवही जादो, मल मेरो सील लहो । 9(404-1) मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन /107 मगर, उस बौराएपन से जीवन का सघष, मन की व्यथा, प्रतिष्ठा की 'आतुरता, आत्मा की व्याकुलतान मिटी, न कम हुई। विरह निवेदन के, मर्मभेदी व्यथा के, पद सभवत उसी अवधि के हैं जब मीरा ने चित्तोड की कुल मर्यादा सिर से उतार फेंकी और द्वारिकावास कर लिया। बीच में मेड़ता का पतन और वीरमदे के दर बदर होने की परिस्थितियो ने एक बार और उसकी साधना को जबदस्त धक्का पहुंचाया होगा। और उसकी दीनता भरी गिडगिडाहट फूट पड़ी होगी- हरि विण कूण गति मेरी। तुम मेरे प्रतिपाल कहिए, में रावरी चेरी। आदि अत निज नाम तेरो, हिया मे फेरी। बेरि देरि पुकारि कहूँ, प्रभु आरती है तेरी। यो ससार विकार सागर, बीच में घेरी। नाव फूटी प्रभु पाल बांधो, बूडत है बेरी। 9(2819) या कि अब मैं सरण तिहारी जी, मोहिं राखो कृपा निधान । अजामील अपराधी तारे, तारे नीच सदान । जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढी विमान । और अधम तारे बहुतेरे, माखन सत सुजान । कुबजा नीच भीलनी तारी, जाने सकल जहान । कह लगि कहीं गिणत नहिं आवै, थकि रहे वेद पुरान । मीरा कहे म्हे सरण रावरी, सुनियो दोनू कान । 9(306-78) और भी हम सुणी छ हरि अधम उधारण । अधम उधारण सब जगतारण। गज की अरजि गरजि उठि घ्यायो, सक्ट पर्यो तब निवारण । द्रोपदी सुता को चोर बढायो, दुसासन को मान पद मारण। प्रह्लाद की प्रतिज्ञा राखी, हरनाकुस नख इद्र विदारण । रिखपली पर किरपा की ही, विप्र सुदामा की विपति विदारण। मीरा के प्रभु मो ददी पर, एती अवेर भई क्णि कारण। 9(307-82) अन्तत द्वारिका वास ही मोरा की साधना का अन्त रहा- राय श्री रण छोड दीज्यो दुवारिका को बास । सख चक्र गदा पद्म तें मिटे जग के त्रास । - 108/ मीरा लाकतात्त्विक अध्ययन सकल तीरथ गोमती मे करत रहत निवास । सख झालरि झझि बाजे, सदा सुख की रास । तजियो देस, बेस, पति ग्रह तज्यो सम्पत्ति राजि । दासी मीरा सरल आई, तुम्हे अब सब लाजि1 9(4793) और नागरीदास के प्रमाण पर जब रणछोडजी का मदिर छोडकर वापस मेवाड या मेडता आने की परिस्थिति बनी तब उसकी अतिम अरदास ऐसी रही कि- हरि, काटि हो जान को पीर। द्वापदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो चोर । भक्त कारण रूप नरहरि, धर्या आप शरीर । हरिण कस्यप मारि लीन, धर्यो नाहिंन धीर । बूडते गज ग्राह तारयो, कियो बाहर नीर। दाम मीरा लाल गिरधर, दुक्ख जहाँ तहाँ पीर 19(4794) उसके साथ ही जिस अतिम पद के साथ शरीरपात हुआ- सजन, सुधि ज्यों जाने त्यो लीजे। तुम बिन मेरे और न कोई, कृपा रावरी कोज। योस न भूख रैन नहिं निंदरा, यह तन पल पल छोजे, मीरा प्रभु गिरधर नागर, अब, मिलि बिछुरन नहिं कीन । 9(4804) और वस्तुत "मिला का बिछुरन नहीं हुआ' और एक भावना जीवन्त होकर लोकव्यापी हो गई, युग जीवी हो गई। इस तरह मीरा को आत्मसाधना को परमात्मा से तादात्म्य पाने मे पूरा जीवन काल लगा। मोटे रूप से कुल 48-49 वर्ष की आयु में से 41 बरस उसने साधना मे विताए-- यही इस बात का अनुमान करन का काफी है कि वह हाह मांसपी ससारी उपज नही थी। कुछ विशिष्ट ही थी कि जिमया कलेवर भावना- ही भावना का बना था। वह केवल अन्तमनवासिनी थी, इसीलिए बाहरी दुनिया की कोई बात उसे छू नहीं पाती थी। जान-बूझकर उसने कोई विद्रोह नहीं किया बल्कि गे कुछ घटा और जो कुछ हुआ यह देवल बाहरी दुनिया मे ही घटा मीरा तो केवल निमित्त रही, इसलिए कि वह कायिक रूप से उन घटनाओ के प्रति संवेदनशील पी ही नहीं। पीहर मे माई बाप बरजते रहे कि सहेलियां सिपाती रही जिससुराल मे मनिराजीवी लोग सीख देते रहे, पर सोख लेने वाला साया मे स्थित गा ही नहीं तो कौन सुनता और कौन अपने को सुधारता! वह भावनाजीवो मीरा उत्तरोत्तर पति भावमयी होती गई सेवा परि- मीरा-कान्य लोकतात्त्विक अध्ययन/109 स्थितियां उसे संघर्ष और व्यपा देती गई कि अ तत रण छोड की शरण में वह जगत् व्यापी हो गई। (3) ईश्वरीय अनुभूति के तस्व-"शृगार की मधुर कामना का आलम्बन जब लौकिक पुरुष न होकर अलौकिक पुरुष सत्ता का अपार्थिव देवता होता है तब वह दिव्य शृगार भावना कहलाती है।" 23(113) मीरा की मधुरा भक्ति कही रिमझिम प्रेम वृष्टि, कही आवेगमयी लहर और कही खिन्नता और विषाद भरी उतराई के साथ उत्कट हठ और उमडता ज्वार लेकर इस कदर आवेशन करती है कि वहा भावना-ही भावना प्रखर रहती है और शब्द सौंदर्य या उक्ति चमत्कार जैसी बात ध्यान मे ही नहीं आती। यानी कि मीरा की वाणी कही दूर अन्त स्थल की गहराई से अपनी वेदना, व्यथा, खि नता, आशा, प्रतीक्षा, खीझ, रोष, हताशा आदि के साथ सहज स्वाभाविक उद्रेक पाती है और जैसे वह उसके अन्तस्थल से 'फूटती है, वैसे ही श्रोता या पाठक के मम मे उतर जाती है। मीरा की दिव्य अनुभूति के कुछ आयाम स्पष्टतया उनके पदो मे परिलक्षित हो जाते हैं और वे उनकी साधना के स्वायत्त विकास के सोपानो का परिचय देत हैं। सामाय लोकजीवन मे जैसे हम अपने किसी स्नेहीजन का परिचय पाते हैं, गुण बोध करते हैं, नाम स्मरण करते हैं और घनिष्ठ होते-होते एकाकार हो जाते हैं । मोरा की प्रभु भक्ति में भी ऐसे ही लोकतात्त्विक विकास के आयाम हैं जिनमे प्रमुख हैं- (1) दशन परसन-परिचय, गुणगान, नाम स्मरण, आशा, आकाक्षा आदि के साथ हर्प आदि। (u) प्रतीक्षा विरह-साधना, गुण स्मरण, व्यथा, आतुरता आदि । (1) टेक और हठ-अटल निष्ठा, एकागी प्रेम, खोज अनुसरण, पीडा आदि। (v) विनय और दासता-प्रार्थना, खिनता, निराश्रयता कृपाकाक्षा आदि। (v) पुनर्जभ का कोल--अटूट भनत नाता, अमर सम्बध आदि । (1) दरसन परसन-मीरा को अनुभूतियां मानवीय संवेदनाओ के आस्वा- दन वाले धरातल की हैं द्वैत दर्शी या तटस्थ अवलोकनकर्ता की वे नहीं लगती। उनके लिए जा इष्ट है-चाहे वह अविनासी, अलख, प्रभु, गिरधर, जोगी जो कुछ भी है, वह परोक्ष बनकर 'वणित नही हुआ है, वह 'अनुभूत होकर 'बिम्बित' हुआ है। तभी प्रिय के दशन, परिचय रूप निरूपण के उनके पदो मे भी पूरी भाव प्रवलता मिलती है, यथा- सखि मेरो कानूडो कलेजा रीबोर । मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, कुडल को सक्झोर ।

110/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन । प्रिंदावन की कुज गलिन मे, नाचत नद किसोर । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरण कवल चितचोर । ऐसे पदो मे आरभिक परिचय की अवस्था खोजी जा सकती है कि यहां 'चितचोर' 'चरण कॅवल' हैं फिर भी 'वह कानूडो 'कलेजे की कोर' बना हुआ है। परिचय से आगे 'मोहित होने' 'लुभाए जाने की अवस्था भी उतनी ही भाव प्रवण मिलती है- निपट बंकट छवि अटके, मेरे नैन । देखत रूप मदन मोहन को पियत पियूख न मटके । बारिज भवा अलक टेढी मनो, अति सुगध रस अटके । टेढी कटि, टेढी करि मुरली, टेढी पाग लर लटके । मीरा प्रम के रूप लुभानी, गिरधर नागर नट के । 33(976) - ऐसे जिस लुभावने रूप से परिचय प्रगाढ होता चला गया है, उसमे 'कमल- दल लोचन हैं, 'बाको चितवन' है 'मद मुसकानि' है, 'मीठी मुरली की वानी है" और मीरा उस रूप के "चरण कमलो से लिपटानी' है 33(988)। परिचय के साथ प्रति परिचय की उत्कठा भी है- पिया तेरे नाम लुभाणी हो । १(420 56) और इसके साथ 'पत्थर तैराने', 'गणिका को तारने', 'गज की पशु योनि छुड़वाने की बात कहकर 'नाम महातम गुरु दियो, परतीत पिछाणी हो' से 'अमूर्त प्रियतम' से कामना की गई है कि 'मीरा दासी रावकी, अपणी कर जाणो हो।' (वही) परिचय प्रति परिचय के बीच कई तरह की आशाओ आकांक्षाओ, शकाओं की सभावना रहती है । मीरा के पदो में वे सब यत्र-तत्र विखरी भावनाएं व्यक्त हुई मिलती हैं जैसे साधना का नतीजा न मिलने पर व्यग्रता- जावा दे, जावा दे,जोगी किणका मीत । सदा उदासी रहे मोरी सजनी, निपट अटपटी रीत । बोलत बचन मधुर से मानूं जोरत नाही प्रोत । मैं जा" या पार निभेगी, हाडि चले मध बीय । मीरा के प्रभु स्याम मनोहर, प्रेम पियारा मीत । वही (41161) कुछ ध्यानावस्या के बाद जब साधना में प्रत्यान्तर आता है, तब की दशा है यह, जो व्यग्रता उत्पन्न करती है । अवस्था निरूपण में भावना प्रवणता ही प्रधान है और अभिव्यक्ति माध्यम मे नाथपपी 'जोगी' और 'स्याम मनोहर' सगुण दोनो ही वाहर बन रहे हैं । मीरा की यही विशिष्टता थी कि वह भावना का बास्था- गीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/ 111 दन कर रही होती थी, अय बातो की उसे परवाह नहीं होती थी, क्याकि जैसा कहा जा चुका है, वह कवयित्री नहीं थी, आचाय नही थी, एक प्रेमल भावना थी। परिचय प्रति परिचय के बीच नाना रगी भावनाओ के उतार-चढाव के साथ मीरा की अत साधना प्रगाढ होती चली गई है। उसे प्रियतम की हर चीज लुभावनी और आकर्षक लगती है। उस आकर्षण का उत्साह और उससे सलग्न रहने का भाव भी प्रखर होता जाता है, यथा- नणा लोभी रे बहुरि सके नहिं आइ । 33(98-10) "रोम रोम नख सिख ललक ललक कर ललचाते रहते हैं" और इस दशा तक पहुँचा देते हैं कि "प्रभु गिरधर के बिन, पल भर रह्यो न जाए" प्रेम को निरतर देखते रहने की उत्कठा और अभिलाषा इस सीमा तक बढती है कि- मीरा गिरधर हाथ बिकानी, लोग कहें बिगडी। वही (11) दूसरे शब्दो में दरसन परसन अभिलाषा के लिए मीरा 'एकटक ध्यान लगा कर बैठी' रहती है। नैनन बनज बसा रो, जो मैं साहब पाऊँ । वही (12) किस सम्प्रदाय के किस अभिप्राय के जरिये भावना उजागर होती है, यह मुख्य 'बात नहीं है, मुख्य बात है कि प्रियतम के दरस-परस की ललक प्रकाशित होती है या नहीं। मीरा ध्यानावस्था मे 'पलक भी नहीं झपकती' कि नैनो मे बसे प्रेम की छवि मिट न जाए और, त्रिकुटी महल मे बना है झरोखा तहां से झांकी लगाऊँरी। सुन्न महल मे सुरत जमाऊ, सुख की सेज बिछाऊं री। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार-बार बलि जाऊ री 33(99 12) अपने प्रिय को हर हालत मे रिझाए रखने और पास बनाए रखने की ललक कितनी सहज अनुभूति के साप उभरी है कि- असा पिया जाण न दी हो। तन मन धन करि वारण, हिरदे धरि लीज हो। वही (13) और जिहि बिहि विधि री हरी सोई विधि की हो। मीरा के प्रभु रामजी, बड भागड रोई हो । वहीं और भक्ति की वह भाषना इस सीमा तक गहरा जाती है कि 'मगन भई 112/मौरा लोकतात्त्विक अध्ययन . . मीरा' दुनियावी चेतना से एकदम परे हो जाती है- मैं तो सावरे के रग राची । साजि सिंगार बांधि पग घुघरू, लोक लाज तजि नाची। वही (100-16) और ऐसी अवस्था आने पर ससार और सासारिक वजनाओ के साथ संघर्ष की शुरुआत हो जाती है । ससारी सघर्ष और आतरिस महापोह के बीच मीरा को अन्तर्मुखता, प्रेम की विकलता, प्रिय दरसन की आकुलता, प्रतीक्षा भी बढ़ती पली जाती है- (1) प्रतीक्षा और विरह मैं तो म्हारा रमैया ने देवबो कर री। तेरे ही उमरण, तेरो ही सुमरण, तेरो ही ध्यान धरूं री। जहाँ जहाँ पाव धरणी पर, तहां तहां निरत करूं री । मीरा के प्रमु गिरधर नागर, चरणां लिपट पलं री। वही (101) स्मरण, ध्यान और उसके साथ चैतन्य मतीय नत्य प्रतीक्षातुरता और मग्नता की अनोखी भाव व्यजना कर रहे हैं। वैसे ही 'गिरधर के आगे नाचना, और "उसको रिझाने की तैयारी जिसमे 'प्रेम प्रीत के घुघीं' और 'सुरत की कहानी' वही (100) मिलकर एकाकार हो गए हैं, यह बताते है कि मीरा के परिवेश मे वैष्णव या सत-नाथ मतो की धारणाए समवित होकर एक लोकमत मे गल इल चुकी थी। अपने प्रिय के लिए समपण की निष्ठा मे मीरा तत्कालीन नारी मर्यादा का इस तरह से निरूपण करती है- मैं तो गिरधर के घर जान। गिरधर म्हारो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाने । रंणपढे तब दी उठि जाऊं। मोरि भये उठि मार्क। रंण दिना वाके सग खेलू ज्यू त्यू वाहि रिझाऊँ । जो पहिराव सोही पहरू जो दे सो ही खाऊ । मेरी उनको प्रीत पुगनी, उण बिन पल न रहा। जहाँ बिठावे तित ही बैठू बेचे तो बिक जाऊ । ऐसे साग समर्पण के साय ही मधुरा भावना पक्की हो जाती है। बल्कि 'चापर रहबर देवल दरसण पान' तक की सीमा तक भी वह समपण चला गया है 33 (14714)। प्रिय के पास चापर के में रहकर, पेषल बाग की सीमा तर अपने को सीमित रखकर गुणगान .

मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 113 के साथ उनको रिझाए रखने से ही वह सतोष नही पा गयो अपितु 'कुसुभी सारी' पहनकर 'दरसण पाने की अभिलाषा' की सीमा तक उसका समपण भाव जाता है । उसमे भी उसकी विवशता ही है कि- राणा जी म्हारी प्रीत पुरवली, मैं कांई करूं। राम नाम बिन घडी न सुहावे, राम मिले म्हारा हियराय ठराय । 33(111-42) यह उसकी विवशता ही है कि ससारी बातो का प्रवेश उसके मन में होता ही नही । वहां तो केवल प्रिय का स्मरण ही छाया हुआ रहता है-- में गिरधर रग राती सैया। पचरंग चोला पहर सखी मैं, झिरमिट खेलन जाती। ओहि झिरमिट मे मिल्यो सावरो, खोल मिली तन गति । वही (103-22) उसकी निष्ठा कितनी सच्ची है कि- मैं अपणे सैया सग साची। अव काहे की लाज सजनी परगट हनाची। कुल कुटुम्बी आन बैठे मनहुँ मधुमाखी । वही (103-22) ऐसी एकात निष्ठा के सामने वह अनुभव करती है कि "मीरा लागो रग हरि, औरन रग अटक परी।" और वे 'औरन रग' ससार, वैभव, पत्नी धम, पुषी धम, जगत व्यवहार सब थे जो 'अटक मे पड़ गए ।' अब तो 'कोई कुछ कहै, मन लागा,' सोने मे सुहागा जैसे मन-भावना से एकाकार हो ही गया, सतगुरु शब्द सुनकर सोया मनवा जाग गया, तागे की तरह नाते रिश्ते, कुटुम, क्वीले के बधन टूट गए और तुलसी की तरह सकल्प हो गया कि- अब लौ नसानी अब ना नस हों। राम कृपा भवनिसा सिरानी, जागे फिर न डस हो । -मीरा जाग गई तो जाग ही गई। कृष्ण को, परमात्मा को पति के रूप मे पाकर कभी मिलन की आशा, कभी आगमन की प्रतीक्षा, कभी आकाक्षा के कोरो मे लहराते रहने में ही उसकी इयत्ता बध जाती है-कभी तो- 'दरस दिन दूखण लागे नेण', वही (132 103) कभी "म्हारा जनम-जनम रा सापी, पाने नहिं विसरू दिन-राती" वही (106), कभी "राग मिलण रो धणो उमावो, नित उठ जोवू बाडियो' वही (108) तो कभी म्हारे घर होता जाग्यो महाराज" के साथ 'अब के जिन टाला देजा वो, सिर पर राखू विराज" वही (109) और फिर भी सासालार न होने पर, 'ये, तो पलक उपाहो दीना .

114/भीरा लोकतात्त्विक अध्ययन नाथ, हाजिर नाजिर कव को खडी वही (137-119) वाले मुकाम मीरा अनु- भव करती है और कभी पल-दो-पल का साक्षात्कार होने पर उमगो और आशाओ से हिलोर लेने लगती है--"सुनी हो मैं हरि आवन की" बात सुनकर 'महल चढना, प्रतीक्षा करना' वही (144-141) और अनुभव करना कि 'जैसे धरती मेघ का स्वागत करने को उदयत हो-नये नये रूप धारण करके, विविध प्रकार की किलकारियो के साथ वैसे ही मीरा का रोम रोम आगत की प्रतीक्षा में उत्सुक है । मिलन की वह घडी उमगो और सुखो की घडी बन गई है कि- "आज आनद उमागें भयो है, जीव लहै सुखधाम । पांच सखी मिलि पीव परसि के, आनद ठामूठाम । बिसिर गई दुख निरखि पिया को सुफल मनोरथ काम । वही (142) -वैसी अनुभूति के क्षण बहुत कम और बड़ी मुश्किल से आते हैं कि- बदरिया जल भर लाती है, छोटी छोटी बूदो से मन काया भीग जाती है । पवन, कोयल सब आनद मगल गाने लगते हैं और-सेज सवारी पिय घर आए, हिल मिल मगल गायो वही (145-147)। और 'रग रगीली होली भी मच जाती है।' वही (146) प्रियतम के हायो मीरा रग मे भर दी जाती है। चोवा, चदन अरगजा, केसर को गागरें को गागरें उस पर उलट जाती हैं । (वही) रतन न्योछा वर किए जाते हैं बधावणा होता है, आरती होती है -सब कुछ जो ऐसे मगल अवसर पर राजघरानो म परम्परित रूप से होता रहा है। मगर, सूरदास के अनुसार 'ऐसा पल का जीना ही काफी या-धन्य सूर एको पल या सुख, का सत कल्प जिये। मगर, मीरा को उसके बाद भी जीना पहा। बाहरी सघर्ष भी सहना पड़ा और भीतरी दन्द्र भी सहना पहा । पल भर का 'जोगिया' का दरसण सहेज कर नहीं रखा जा सका--- मैं जाप्यो नहिं प्रभु को मिलण कसे होरी। आए मेरे सजता फिरि गए भगना, मैं अभागण रहि सोहरी। फालंगी चीर करूंगी गल गया, रहूंगी वैरागण होइरी। धुरियां फोर माग बिसेस, पजरा में डालंगी धोइ रो। वही (11448) एक तरफ ऐसी सिन्नता, ऐसी व्यथा और दूसरी तरफ माइतो की तरफ से यजना- माईबहे सन धौयही, काहे गुण फूनी। सो सोवे सुख नींदडी, ५ गए रैणन मूली। वही (106-28) मीरा काव्य लोक्तात्विक अध्ययन/ 115 दूसरी तरफ से सांसारियो के वजन, तजन और सीख सदेस की- बाल सनेही गोबिंदो, या तो साध सता को काम । में बेटी राठोड की, था ने राज दिया भगवान । वही (29) और, या ने बरज बरज मैं हारी, भाभी मानो बात हमारी। राणे कोप कियो था ऊपर, साधा मे मत जा री। वही (30) यहाँ तक कि "राणा जी ये क्याने राखो म्हा सू बेर" को और "राणा जी थे जहर दियो मैं जाणी" वही (37-41) के बीच मीरा की शेष सारी अनुभूतियां या तो वियोग जनित पीडा की है या फिर अपनी टेक, अपना हठीलापन बनाए रखने की हैं या अत मे टूट कर बिखरने वाली हताशा और दीनता की हैं। इन मिलीजुली खीझ, पीडा, अकेलेपन की टीस, दरसन रहित एकागी निष्ठा की खि नता, आकुलता, उमाद आदि की भाव सम्पदा ही मीरा को मीरा बनाने वाली अनोखी सम्पदा है चाहे उसने गहना गाठी त्यागा, हाथ का चुडला त्यागा, काजल टीकी त्यागी" वही (109 34) 'माला-दोवडी धारण कर तो' वहीं (140 23) 'भाव भगति के भूषण' और 'प्रेम को चूनड' धारण की वही (107- 30) 'भगवी चादर पहन ली' वही (110-37) 'भूइ सोना और भूखे मरना शुरू किया' तयापि-- 'जोगिया कू जोवत बहू दिन बीत्या, अज हूँ आयो नाहिं । वही (115-49) उस जोगी के लिए ललक इतनी विकट है कि- "अगर चन्नण की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा। जल बल भई भसम की ढेरी, आपणे अग लगाजा । वही (115-50) यहाँ तक मीरा की तैयारी है। मगर, न जोगी आया, न गिरधर के दरसन हुए और मीरा इस दुविधा मे दुख भोगती रही कि- "रावली होय के फिण रे जाऊँ, तुम ही हिवडा रो साज । मीरा के प्रभु और न कोई, राखो अबके लाज ।" वही (115-51) दुविधा, दुख, चिन्ता, निराश्रयता, आकुलता आदि के कई स्तर मीरा ने पदों मे साधना के परणों के रूप मे मिल जाते हैं-उमाकुल विरहिणी के 'प्राण तडपते रहते हैं वही 115 (49) 'भोजनिया नहिं भावे', नींदडली नहिं आवे', 'तहफ तहफ जिय जायी जैसी व्यथाएं तो आम हैं, मगर मीरा उनसे अगे अपने 'जोगी के कारण', 'जोगण होने और वैसा भी न हो सकने पर 'कासी करवत सेने, (वही) (11552) की तैयारी मे है। उपालम्भ उलाहनों की बात तो ठीर है, मगर .

1161 मीरा लोकतात्विक अध्ययन 'कासी करवत लेने पर भी जब दरसन-परसन नहीं होता तो हताश भावना को शरणागत ही होना पडता है । सब उपाय आजमा लेने के बाद भी अनुभूति सार्थक नही होती- माई म्हारी हरि हूँ न बूझी बात । पिंड मे सू प्राण पति, निकसि यूनहिं जात । पट नहिं खोल्या मुख न बोल्या, सांझ भई परमात भबालणा जुग बीतण लाग्यो, काहे की कुसलात । वही (12068) मत लेइ कटारी क्ठ सर, मरूंगी विष खाइ। मीरा दासी राम रती, ललच रही ललचाइ । (वही) या फिर अपने जोगी की खोज मे- या तन ऊपर भसम रमा, खोर करूं सिर केस। भगवा भेस धरूं तुम कारण, टूढत च्या देस। मीरा के प्रभु राम मिलण जीवनि जनस अनेसा वही (121-70) क्योकि-"नातो नाम को मोसू तनक न तोडयो जाय।" वही (122 74) उसे पाने के लिए 'छाणे लगण में किया रे' (वही) जैसे कि लौकिक जीवन मे स्त्रियां करती आई हैं और करती रही हैं । उसके कारण- मास गले गल छोजिया रे, करक रह्या गल आई। ओगालियां रो मूदडो, म्हारे आवण लागो बाहि ।। (वही) -ऐसी काव्य रूढि राजस्थानी प्रेमकाव्यो की लोक काव्य की बहुत पुरानी रूढि रही है । मीरा के लोकानुसारी मन मे वह सहज होकर फूट पड़ी है। इतना ही नहीं, उसे पपैया की बानी भी असहनीय लगती है- रहो रहो पापी पपीहा रे पिव को नाम न लेइ । जो कोई विरहगि सोभले पिव कारण जिव देह । (वही) अपने प्रिय को सदेसा भेजने का तरीका भी अनोखा है- काढि कलेजो मैं धरू रे, कौआ तू ले जाइ। ज्या देसा म्हारो पिव बस, वा देख तू खाइ । (वही) और मीरा का यह 'नाता' सिफ नाम का पा और 'किसी स्तर का नही था। मगर न जोत जगी, न दरसन परसन हुआ न जोगी आया। (1) विनय और दासता तब तक सांसारिक घटनाओं ने करवट बदल ली। 'चित्तोड छूटा, मेडता टूटा और सब ओर से निराश्रित, हताश, भग्नाश मीरा को भावना भक्ति मे दीनता भरी करुणा घोलनी पड़ी- मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन /117 तुम सुणो दयाल म्हारी अरजी। भव सागर में यही जात हूँ, काढ़ो तो पोरी मरजी। या ससार सगो नहिं कोई, सांचा सगा रघबर जी । मात पिता अर कुटुम कबीलो, सब मतलब वे गरजी। भीरा की प्रभु अरज सुणलो, चरण लगावी यारी मरजी। ---यह 'थारी मरजी' वाली बात मीरा की अतिम पराजय और हताशा वाली स्थिति बताती है। "मैं तो तेरी सरण पडी रे रामा, ज्यू जाणे त्यूँ तार । अडसठ तीरथ प्रमि भ्रमि आया, मन नहिं मानी हार। या जग मे कोई नहिं अपणा, सुणियो श्रवण मुरार । मीरा दासी राम भरोसे, गम का फदा निवार । वही (141-131) ----यहाँ वह स्थिति आ गई है कि मीरा बाहरी भीतरी सघर्षों से थक चुकी है या कि टूट चुकी है- "अब मैं सरण तिहारी जी, मोहि राषो कृपा निधान । अजामील अपराधी तारे, तारे नीच सदान । जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढ़ी विमान । और अधम तारे बहुतेरे, भाखत संत सुजान । मीरा कहे मैं सरण रावरी, मुनियो दोनू कौन । वही (141-132) स्पष्ट है कि शरणागत होने की यह स्थिति पोर सबट की है जैसी वि गजराज की थी, जिसकी तुलना में अजामील और गणिका का तारण तो मारस्मिक ही या। यहां हम डूबते गजराज' साथ 'डूबती मीरा की समानता कर सरत हैं। क्योकि मीरा ने इस स्थिति तक आते-जाते- "या भव मे मैं बह दुय पायो, मसा सोग निवार। वही (133) और सगो सनेही मेरो नको,बरी सकन जहान । (वही) -निराधय स्थिति की अपनी तुलना मीरा ने गजराज से', 'दोपदी से', 'प्रहलाद से' और 'ऋपि पत्नी अहित्या से भी है वही (142-135) निश्चित रूप से ऐसे दीनता मिपिन पद मोरारे निराधय-वासरे हैं। बमोरि विनय बोरदास्य भावना वाले ऐसे ही बत्य पदों में अंतर मिलता है। साधारण स्टुति, गुणगान, पिनस, मसारता, उपदेश के अन्य पदों मे यह मर्म परी 118/ मीरा लोकतात्विक अध्ययन वेदना नहीं है जो इसम है । उनमे-"अविनासी के परण कवलो की पदना" है, यही (160-194) मानुस जनम की दुष्प्राप्यता के साथ 'दुनिया में शान चौसर की बाजी' का उल्लेख है, चाहे तो 'जीतो' चाहे तो 'हारों' यही (195), 'योडे दिन के जीवन मे 'सलम' का उपदेश है, (196) 'बदगी न भूलने की चेतावनी है, 'भजन भाव से जम जमातर के खत फटने का विश्वास है, वही (162 200) मगर, वैसी असहायता और आकुल शरणागति नही है। और अन्तत द्वारिका वास के साथ सभवत इम दीनता का एक बार अवसान होता है, नई आशा और उमग भावनाओ मे भरती है- राय श्री रणछोड दीज्यो द्वारिका का वास । सख चक्र गदा पद्म दरस, मिट जग को त्रास । सकल तीरय गोमती के, रहत नित पास । झालर प्रझा बाजे सदा सुख की रास । तज्यो देस अरु वेस हूतजि, तज्यो राना राज । दास मीरा गिरधर सरन आवत, तुम्हें अब सब लाज। 9 (4793) और निश्चित है कि टूटी मोरा के उस समय के भजनो मे समपण, दया निधान से शरण मांगने उपदेशात्मक और वैराग्य मूलक पद ही बने होंगे। वह समय सिंगार का, मिलन का प्रतीक्षा का, अनुनय का नहीं था । अन्नत एक विधवा राजवधू अपने सस्कारो मे इतनी मर्यादित तो रही होगी कि 'विधवा होकर अपने सिंगार के पद नही गाए होंगे' क्योकि वह लोकतत्वो को गढन्न थी और लोक मर्यादा से बाहर होने का ऐसा काम वह कर ही नही सकती थी। (iv) टेक और हठीलापन चाहे उसकी भावना भक्ति की टेक अनोखी यो और उसके लिए लोक लाज, कुल मर्यादा, राज मर्यादा आदि को न पालने का उसका हठीलापन भी उत्तर से परे था, मगर नारी भाव की मर्यादा मे, लोक- प्रतिष्ठित नारीत्व को मर्यादा मे वह सच्ची थी, वैसे ही जैस, 'मैं अपने संया सग साची' थी। जहां तक भावना भक्ति की टेक का सवाल है, मीरा उसके लिए विवश थी। जो एक बार आत्म तत्व को पहचान लेता है, जगत उसके सामने कूडा हो जाता है उसके सबूत हमे नामदेव, कवीर गोरख, नानक और बीसियो सतो के जीवन चरित्र से मिलते हैं। मीरा के साथ भी यही था कि उसने सात बरस की उमर से राम की आराधना शुरू की थी। मुश्किल नहीं कि साधु सत्सग और अपनी विशिष्ट परिस्थितियों के कारण उसने मारमतत्व को पहचान लिया हो । यदि ऐसा न होता तो अपने पीहर मे ही वह यह नहीं कहती कि- मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन / 119 "तू मत बरजे माइडी म्हने साधा दरसण जाती। राम नाम हिरदे बसे, माहिले मद माती। -33 (106-28).. धारभुजा जोधाणो के इष्ट थे और उनके प्रति विशेष आग्रह होना सहज स्वाभाविक था । आत्म तत्व को पहचान कर मीरा ने कृष्ण मे या धारभुजा मे परमतत्व का आधान किया हो तो यह भी स्वाभाविक था। और सत्सग तथा वातावरण से नाथपथी अलख तत्व का माधान किया था तो वह भी सगत था। उसकी भावना भक्ति की टेक, आचार-व्यवहार की टेक इन दोनोस्वरूपो को लेकर मिलती है-'मीरा लाओ रंग हरी, औरन रग अटक परी'कहकर यह अपनी टेक का परिचय देती है तो 'चूहो म्हारो तिलक अरू माला' वही (140- 23) 'सील बरत सिंगारा' कह कर अपनी विराग भावना का परिचय देती है। ऐसी टेक के लिए, 'सात बरस को मैं श्रीरग भजिया तप पाया करतार थाला क्यन महत्वपूर्ण है। बचपन के पडे सस्कार स्थायी हो सकते हैं और जहाँ तक आत्मबोध का प्रश्न है, वह एक बार हो पडे तो आजीवन उसकी स्मृति बनी रहती है । तभी मीरा ने कहा है- "मैं तो चरण लगी गोपाल । जब लागी तब कोऊ न जायी, अब जाणी ससार19(41433) बचपन की पड़ी उस 'बान के कारण ही उसका रूझान साधु सगत, सील, बरत, गौन, माला, चिन्तन आदि की ओर अधिक था और ससार व्यवहार की ओर अत्यल्प था। तभी कहती है- "आवो सखी रली पर है, पर घर गवण निवारि । झूठा माणक मोतियां री झूठी जगमन जोति झूठा सब आभूषणो री, सांचा पियाजी री पोति । झूठा पाट पटम्बरा री, झूठा दणीय चोर । सांची पियाजी री गूदडी, जामे निरमल रहे सरीर । 33 (105-25) -उसकी अपनी टेक थी कि 'मीरा कू प्रभू मिलिया है तो उसे किसी भी हालत मे छोडेगी नहीं-'कोई कछू कहे, मन लागा।' वही (26) 'ज्यू सोन मे सुहागा', तो वह अलग होने से तो रहा। 'जनम जनम का सोया मना जागा- तब उसके वापस सो जाने का सवाल तो था ही नहीं। तभी उसने पीहर वालो के सामने भी अपनी टेक बनाए रखी कि-धूमत बरजे माइडी म्हन साधो दरसण जाता क्योकि- - 120/ मीरा लोकतात्विक अध्ययन "मैं तो लिया गोविन्दो मोल ।" वही (101 19) ----वह भी 'तराजू तोल कर और 'बजता ढोल' के साथ कि 'आँखें खोस कर उसका विश्वास भी था कि यह सब 'पूरब जनम का कौल'पा । और कोल' था तो राजपूत क या को उसे निभाना ही था । और जब वह अपने सैया सग सांची धी', 'परगट होकर नाचने लगी थी', 'अव काहे को लाज'-~-वही (103-- 22) ऐसा अनुभव कर चुपी पो, तब अपनी भावना भगति पर अड़े रहना, उसे छोडकर ससार चेतना के धरातल पर न आना उसको सहज नियति ही बन गई थी। वह तो उस स्थिति तक पहुंच गई थी कि-'म्हारा मनरी रणरय भागीरी वही (21) छीलरिये सू काम नही रे, डाबरिये कुण जाव । गग जमुन सू काम नहीं रे, मैं ता जाय मिलू दरियाव । हाल्या भोल्यां सू काम नही रे, सीख नही सिरदार। कामदार सू काम नहीं रे, मैं तो जाय करू दरबार । (वही) --जो परमतत्व का अनुभव कर ले, उसे तब छोटे मोटे भैरव, भवानी, गारक, देवर, भोप आदि से क्या लगाव हो सकता है । इसलिए पीहर की तरह सासरे में भी उसकी टेक थी या कि उसका हठ था कि-- कोई निदो कोई बिदो, म्हैं तो गोविंद का गुण गास्यो । चोरी न करस्या, जिव न सतास्या, काइ करसी कोई म्हारो। गज सू उतरि के घर नहिं चढसा, या तो बात न हाई। वही (10423) अपनी टेक निभाने के लिए उसने 'राजकुल की लाज गमाई', सांधो के सग भटकी', 'नित उठ मदिर जाती रही, जेठी बहू होने की कानि की परवाह नहीं की', 'घूघट-जो कि मेवाडी राजपूता मे हर जठी स्त्री के लिए भी होता था- भी 'पटकी' वही (24) गुरु गोविंद की आन देकर' सकल्प व्यक्त किया कि गोरस नही पूजेगी वही (106 29)। न केवल गोरल बल्कि कोई भी 'अनदेव' न पूजने को 'मान' थी। (वही) वह तो 'अपने गिरधर के हाय विकानी यो क्योकि 'राणा जी म्हारी प्रीत पुरवली में कोई परू' वही (111-42) उस 'पुरबली प्रीत' के कारण वह स्वय सचेत नहीं थी, चेतन संसार में नही थी तो उसके निणय लेन या मार्ग बदलने का प्रश्न ही नहीं उठता था। चेतन जगत में तो उसकी टेक इतनी सी थी कि- राणजी म्हें तो गोविंद का गुण गास्यो। चरणानित को नेम हमारो, नित उठ दरसण जास्यां।

मोरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/121 मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, निरख परख गुण गास्या । हरि मदिर मे निरत करास्या, घुघरिया धमकास्यां । वही (109-34) और, इस टेक के लिए, उसका हठ भी इतना विकट रहा कि वजनाएं, तजनाएँ, कोप, कपट, छल, धात, बात कुछ भी उसे अपनी टेक से डिगा नही सके । "लोग कहैं मीरा भई बावरी न्यात कहे कुल कुल नासी" "नणद आदि बरजि बरजि हारी" मगर उसका तो कहना या-- राणाजी म्हांन या बदनामी लागे मीठी। कोई निदो कोई बिदो मैं तो चलूगी चाल अपूठी।" वही (36) 'पीठ दिखाना' यो भी राजपूत महिला के लिए अपमानजनक था। फिर मीरा के लिए तो वैसा करना सभव ही नहीं था। चाहे उससे अनुभव किया कि- "राणाजी थे क्या ने राखो म्हा सू बैर? थे ताम्हा न इसडा लागो ज्यू बिच्छन मे कर।" वही (110-37) यह भी कि-'राणा थें जहर दियो, हम जाणी' मगर, जैसे कचन दहत अगन मे, निकसत बारावाणी वही (111 41) अब तो, "आपने घर का परदा कर ले मैं अबला बौराणी।" -जिसको 'साकही गली में सतगुरु' मिल गए जो ज्योतिष्मान हो चुकी, वह पुन तममोगमय कैसे हो सकती थी। उसने- "महल अटारी हम सब त्यागा, त्यागा थारो बसनो सहर । काजल टीको राणा हम सब त्यागा, भगवी चादर पहर।" वही(37) अत अपनी टेक की रक्षा मे उसने सष्टत घोषणा कर दी कि--- नहिं भावे यारो देसडलो रग रूडो। थारा देस मे राणा भगति नहिं छे, लोक बसै सब कूडो। वही (109-36) चाहे राणा काप करे चाहे लोक निंदा करे, चाहे पोहर लाजे, चाहे सासारिया लाजे, मीरा की टेक तो अनन्य थी- "सीसोदयो रूठयो तो म्हारो कइ कर लेसी। राणा जी ठेवारो देस रखासी। हरि रूठयो कठे जास्या हो भाइ ।" वही (11038) - राज भय, न लाज भय, न मर्यादा भय,न लोक भय---ऐसी निभय हो 122/ मोरा लोकताविर मध्ययन - पुकी मीरा हठीली और टेक बाली बनी तो या बनी कि- 'या तो रग धत्ता लग्याए माइ पिया पियाला अमर रस का, चढ गई धूम धुमा। यो तो अमल म्हारो कर हु न उतरे कोइ करो न सपाव । वही (11244) वह तो, "भजन भाव में मस्त डोलती, गिरधर पे बलि जाय," की सुरत में रमी रहती थी। उसे बाहरी जगत की चेतना व्यापती ही नही थी। उसे तो अपने 'सबल धणी का साथ', (वही 113 47) था, ससारी रामा राणा का भय उसे कसे व्यापता। उसकी तो बहे घर तालो लागी रे, 'समद सू सोट' हा गया था, तब क्या चित्तोड और क्या मेहता--कोई उसे अपनी टेक से नहीं डिगा सका। टेक की मान और ऐमा हठीलापन अन्तत रोजकोपका कारण बना। इतना कि उस 'परम तत्व चेती मोरा' को भो...चाहे पार्थिव कहिए या अपार्थिव कहिए, अपने 'बाको सा' से कहना पड़ा कि-~- "म्हारे बाबोसा ने कहियो म्हांन बैगा लेवा आये।" भावना भक्ति के दायरे में भी मीरा की टेक और हठीलापन वैसे ही पलकता है जम परिवार जनो या ससुगल वालो के प्रसग मे था। "प्रिय के दरसन की ललक में उसन केवल पूजा या भजन कौतन को पर्याप्त नहीं माना था। उसकी टक तो अपने पिया को रिझाने की थी। असा पिया जाण न दोज हो। तन मन धन करि वारण, हिरदै धरिलीज हो। आव सखी मिलि देखिये, नणी रस पीजे जिह जिह विध रोझे हरी, सोई विधि कीजे हो। 33(99 13) और उन विधियो मे 'एक्टक दरसन', गिरधर आगे नाचना और पिव रसिक को ही रिझाना,' 'सतो के साथ बठकर स्मरण करना' 'रमैया ने देख वो करूं करना, 'पचरग चोला पहिन कर झिरमिट खेलने जाना, 'सुरतनिरत या दिवला सजोकर रात दिन जलाए रखना', भूख सहना''नोदा सहना, 'सुन महल मे सेज बिछाकर जोगिया की प्रतीक्षा करना, "खीय और खिलता पूर्वक जोगिया की आट जोहना,''चनण की चिता बनाकर अपने को भस्म कराा और भस्म जोगी के अग लगवाना,परसन के लिए ऐसा हठ, 'जोगन बनकर बन वन अपन जोगिया को ढूढना-यानी जिस विधि से सभव हो हरि दरसन की टेक निभाती मिलती है।' 'वास्तव में पैरागिनी हूँगा हो।' 33(147-152) (१) पुरम जनम को कोल मीरा की भावना भक्ति के मूल मे उसका पुनर जनम का कोल एक प्रभावकारी अभिकारक प्रतीत होता है। चाहे ताकि मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/123 और वैज्ञानिक कसौटी पर इसमें तथ्य न हो, मगर भावना लोक किसी विश्वास पर टिका होता है । वह विश्वास ईश्वर के साकार रूप का हो, तरणतारण स्वरूप का हो, निराकार सत्ता का हो, अवतारवाद का हो, भक्तो और सतो का चितन उही आधारो पर टिका हुआ है। भक्ति स्वय भी भावना ही होती है। मीरा कई पदो मे अपनी 'पुरवली प्रीत' की बात दोहराती है और इसी बल पर उसकी मधुरा भक्ति की टेक और उसका हठीलापन टिका हुआ भी है- "मेरी उसकी मौत पुरानी, उण बिन पल न रहाऊँ। 33(101-17) राणा जी म्हारी प्रीत पुरवली में कोई करूं1 33(111-42) हेलो म्हासू हरि विन रह्योइ न जाय । सास लडे म्हारी नणद खिजावै, राणा रह्या खिझाय। पहरो भी राख्यो चौकी विठारयो, ताला दियो जडाय। पूरय जनम की प्रीत पुराणी, सो क्यू छोडी जाय । 33 (11346) रियों बैल जुताय के, ऊँटा कसियो भार। कैसे तोड़, रामा सू, म्हारो भो भो रो भरतार । वही (114 47) थाने कइ कइ कहि समझा दू, म्हारा वाला गिरधारी। पूरब जनक की प्रीत हमारी अब नहिं जात निवारी । वही(116-54) सदके करूं जो सरीर जुगे जुग बारणे । छोडी छोडी कुल की लाज, साहिब तेरे करणे। वही (55) म्हारो जनम मरण को साथो, थान नाहि बिसरू दिन राती । वही (132-106) म्ह तो जनम जनम की दासी, थे म्हारा सिरताज । वही (133-109) जनम जनम का सोया मनवां, सतगुरु सबद सुण जागा 19(42476) जोगी होय जुगति नहिं जाणी, उलटि जनम फिर मासी। वही (421 60 जनम जनम को पूजी पाई, जग मे सबै खोवायौ । वही (417-45) जिस मीरा की बचपन की अनुभूति थी कि-"नहिं म्हारे माय र बाप, अम्मर डारयो, धरती झेलीयो 9(203 10) उसके लिए यदि यह विश्वास दृढ़ हो गया हो कि वह 'उसी को' है जिसने उसे धरती पर फेंका है, तो यह असगत बात नहीं होगी। उसका पुनजम का विश्वास उतना ही मजबूत था जितनी कि उसकी भक्ति की टेक हठीली थी। तभी उसका यह भी निर्विकल्प विश्वास या कि--- "रमापति आवे म्हारी भोर, अरज करूंछु यो सू विनती।" (वही) 124/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन उसी विश्वास के बल पर वह कह सकी थी कि- "न्हें तो गाबिद का गुण गास्या, राणा जी म्हारा काई करसी।" या कि 'बाई ऊदा थे राणा ने रावले मेल्हि, कुल रोही नाती म्हारे कोई नहिं । ---इस तरह से मीरा की अनुभूतियो के तत्व अनेकधा होते हुए भी, मधुरा भक्ति को केद्र मे रखकर गुम्फित कहे जा सकते हैं । अभिव्यक्ति के साधना का कोई आग्रह मीरा के सामने नहीं था । अनुभूति को सहजता, तीव्रता और सच्चाई जिस तरह से उभर सकी, वही उसके पदो मे सहज स्वाभाविक रूप से फूट पडी 2 सामाजिक तत्त्व और, उस सहजता मे उसका सामाजिक सास्कृतिक परिवेश चरिताथ हो उठा है। उस परिवेश की झाक्यिा हम निम्नाकित रूपो मे देख सक्त हैं मीरा के सम्बध मे हमे एक बात ध्यान मे रखनी चाहिए कि "वह एक राज परिवार मे जम लेकर भी लोकजीवन के साथ एकरस हो गई और राज- परिवारो को पूरी उपेक्षा और विस्मरण कर देने को चेष्टाआ के बाद भी लोक व्यापी हो गई'--यह बहुत बड़ी बात है। यद्यपि उसके लिए परिस्थितिया ऐसी थी कि वह सामान्य राजपूत महिला धन सकती थी। उस समय का मेडता, युद्ध और राजनीति के लिए अत्यत महत्व- पूण केद्र था। चित्तोड के राणा देश के एकमात्र नेता थे और वीरता वैभव और प्रभाव मे अनय थे। इन दोनो का लाभ उठाकर वह देश की सवश्रेष्ठ शक्ति की राजवधू के रूप मे इतिहास मे स्मरण की जा सकती थी जैसी कि रानी करमती की जाती है किन्तु वैसा नहीं हुआ। क्योकि उसका व्यक्तित्व जिस विशिष्ट तरीके से निर्मित हुआ था वह राजकन्या का नही था, राजवधू का नहीं था, वह भावना लोक का एक अनन्त गामी सूक्ष्म व्यक्तित्व था जो वस्तुत जगत व्यापी हो गया, युगजीवी हो गया, सनातन हो गया । तभी उसने कहा था-'ले जाती बकुठ कू म्हारी नक न मानो वात।" 33 (112-42) उसकी भावना भक्ति सामाजिर उपज थी जैसे कि उसका व्यक्तित्व तत्का- कालीन परिवेश के अनुकूल और पारिवारिक सीमाओ वे उल्लघन से बना था। उस आत्मतत्व की पहचान वस्तुत समष्टि की पहचान यो और उस पहचान अभिव्यक्ति एसे साधनों से और ऐसे धरातल पर हुई पो जो लोकानुमारी या बल्कि जो लोक्तात्विक या । यत्र-तत्र उसके पदो में हमे ऐस प्रमाण मिल जात - मीरा काव्य लोकतात्विक अध्ययन/125 (i) पव उत्सव आदि के बालों मे-जोधपुर-मेडता बीकानेर क्षेत्र मे, 'परम्परा से कुछ खास पर्वो उत्सवो का लोकव्यापी महत्व है- यथा-सावणी तीज, होली, गणगोर, अक्षय ततीया। यो रक्षाबधन, विजया दशमी, दीवाली, करवा चौथ, बसत पचमी, शिवरात्रि 13 (251) ऋषिपचमी, अन त चतुर्दशी, नवरात्रि, भाई दूज मकर समाति, शीतला पूजन 23 (196) अनेक पद और उत्सव राजस्थानी जन-जीवन में प्रचालित थे और हैं, मगर मीरा के पदो मे उन्ही का सकेतात्मक या अभिव्यक्ति मूलक उल्लेख आया है जो उसकी अनुभूतियो के वाहक बन सके हैं । एक पद मे, जो कि 'बारहमासा' की शैली मे है, तत्कालीन 'ऋतु माहात्म्य और उत्सवों का हवाला मिलता है- पिया मोहि दरसण दीजे हो। बेर बेर म्ह टेर हूँ, अहै किरपा कीजे हो। जेठ महीना जल बिना, पछौ दुख होई हो । मोर असाढा बुरल हे, घन चाचग सोई हो । सावण मे झड लागियो सखि तीजा खेल हो। भादरवं नदियो बहैं, दूरी जिन मेलं हो। सीप स्वाति ही झेलती, आसोजा सोई हो। देव काती मे पूज है, मेरे तुम होई हो । मगसर ठड बहोती पडे, मोहि वेगि सम्हालो हो। पोस नही पाला धणा, अवही तुम हालो हो। महा महीं बसत पचमी, फागां सब गावै हो। फागुण फागा खेल हैं, वणराइ जलावै हो । चैत चित्त मे ऊपजी, दरसण तुम दीजै हो । वसाय बणराइ फूलवै, कोइल कुरलीज हो। काग उडावत दन गया बूझू पिडत जोसी हो । मीरा विरहिणी व्याकुली, दरसण कब हासी हो। तीज वसे मारवाड देश मे तीज, दीवाली और होली का महात्म्य साव- लौकिक है । अय प्रदेशो मे अय-अय पर्वो का महत्व है, यथा-- तीजा पूगल देसरी गवरल उदिया दीप, दिली दसेरी देखिए मोती समदा दीप 45(328) और इनमे से भी तीज वह त्यौहार है जो स्त्रियो वे सुख सुहाग का माना जाता है-मोरा बिन डूगर क्सिा मेह बिन किसी मलार। तिरियां बिन तीजा किसी, पिव बिन क्सिा तिवार 1 45 (328) राजस्थानी लोक जीवन मे तीज जीवत त्योहार है और वह जैसे लोक- 126/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन - - जीवन मे वैसे ही काव्य रूढ़ियो मे भी बहुत गहराई में साप उतरा हुआ है । वह पति मिलन का, सुख का या सुहाग का प्रतीक बन गया है। जइ तू ढोला नावियउ, काजलिया रीतीज । चमक मरेसी मारवी, देख खिवता बीज 145 (328) वैसे भी काव्य रूढिया मे 'सावण' पिय मिलन का और वियोग मे दाह का प्रबल अभिप्राय रहा है। उमडते मेघ, कडक्ते बादल, चमकती बिजली, नाचते मोर, पिव पिव करते पपीहा, टरटराते मेढकसब मिलन मे सुखदायी और विरह मे दग्धकारी माने जाते रहे हैं । लोक काव्यो मे भी उनकी बहुलता मिलती है । वैसे ही मीरा के पदो मे- कहीं 'सावण' प्रतीक्षा की अवधि सीमा के रूप म साधन बना है- "श्रावण कह गए भज हुँ न आये, जिवडी अति अकुलावै ।" 33 (12169) "सावण आवण कह गया वाल्हा कर कोल अनेक" वही(137-118) रावल कण बिलमाइ राखो, विरहिन है बेहाल । वही (136 117) "आया सावण मास सजनी, भरे जल थल ताल । "सावण दे रह्या जोरा रे, घर आज्यो जी स्याम मोरारे। उमह घुमड चहुँ दिसि से आया, गरजत है धन घोरा रे । दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल कर रही सोरा रे। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, ज्यो वारू सो ही थोरा रे। वही (145-145) तो कहीं वह विरह की तपन का मापक बना है- "दादुर मोर पपीहा बोले, कोयल सबद सुनाव। घुमड घटा ऊलर होई आई, दामिने दरक डराव। वही (12376) नन झर लावें। सावन भादों, ऊमहो, बरखा रितु आई है। भौंह घटा घन घोरि के नैनन झर लाई रे । वही (140 129) कहीं वह तीज मनाने की खुशियों का पैमाना है- सावण मे झह लागियो सखि तीजां खेले हो। वही (135116) तो कहीं वह भय और त्रास का प्रतीक है और ताप बुझाने का साधन भो- बादल देख डरी हो स्याम, मैं बादल देख हरी। काली पीली घट म्मडी, बरस्यो एक घहो।

मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 127 जित जाऊ तित पाणी पाणी, हुई हुई भोम हरी। जाका पिय परदेस बसत है, भीजू खडी खडी। मीरा के प्रभु हरि अबिनासी, कोज्यो प्रीत खरी । वही (126 82) कैसी रुत आई मेरो हियो लरजे हे माय । निस अंधियारी कारी, बिजरी चमक, सेज चढता जिया डरपे हे माय । नहीं कदन मेहा वरसे, ऊपर से सुरपति गरजे हे माय । सूनी सेज स्याम बिन लागत, कुक उठी पिया पिया करिके हे माय । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, मोय विधाता क्यू सरजी हे माय । 9(412 27) मनवारे बादर आए रे, हरि को सनेसो कछु न लाये रे। दादर मोर पपीहा बोल, कोयल सबद सुनाये रे। कारी आधियारी बिजरी चमक बिरहणि अति डरपाये रे। गाजे बाजे पवन मधुरिया, मेहा अति झड लाये रे। कारी नाग बिरह अति जारी, मीरा मन हरि भाय रे। वही (128-81) कही वह मिलन की आतुरता का उद्दीपक है--- भीजै म्हारो दावण चीर, सावणियो लूम रह्यो रे । आप तो जाय बिदेस छाये, जिवडो धरत न धीर । लिख लिख पतियां सदेसा भेजू कब घर आवै म्हारो पीव । मीरा के प्रभु गिरधर नागर, दरसन द्यो बलवीर । वही (138-123) नद नदन बिलमाई, बदरा ने घेरी माई । इत धन गरजे, उत धन लरजे, चमकत बिज्जु सवाई। उमड धुमड चहुँ दिस से आया, पवन चले पुरवाई। दादुर मोर पपीहा बोल, कोयल सबद सुणाई। मीरा के प्रभु गिरधर गागर, चरण कमल चितलाई । वही(143-140) तो, कही वह मिलन की उमगो और आशाओ का साक्ष्यीभूत भी है- सुनी हो म्हैं हरि आवन की आवाज । म्हेल चढ़े चढि जो मेरी सजनी, अब आवे महराज। दादर मोर पपीहा बोले, कोइल मधुरे साज । उमग्यो इद्र चहुँ दिसि बरस, दामिणि छोडी लाज । धरती रूप नवा नवा धरिया, इद्र मिलण के काज । मीरा के प्रभु हरि अविनासी, वेग मिलो महाराज । वही (144-141) .

128/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन वसे ही- झुक आई बदरिया सावन को, सावन की मन भायन की। सावन मे उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनो हरि आवन की। उमड घुमह चहुँदिसि से आयो, दामण दमक झट सावण की, नही नन्हीं बूदन मेहा बरस, सीतल पवन सुहावन की। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, आणद मगल गावण को। वही (145-144) बदली रे तू जल भर लाई। नन्ही नही बूदन वरसन लागी, काइल सवद सुणाई। गाजे बाजे पवन मधुरिया, अम्बर बदरा छायो। सेज संवारी पिय घर आये, हिलमिल मगला गायो। मीरा के प्रभु हरि अविनासी, भाग चलो जिन पायो । वही(145 147) और, कहीं वह रामखुमारी का उद्घाटक और चतय प्रदायक अभिघटक भी लगी मोहि रामखुमारी हो। रमझम बरसै मेहडा, भोज तन सारी हो। चहुँदिस चमक दामणी, गरज धन भारी हो। सतगुरु भेद बताइया, खोली भरम किंवारी हो। सब घट दीसै आतमा सबही सू यारी हो। दीपक जाऊ ग्यान का, चढू अगम अटारी हो । मीरा दासी राम की, इमरत बलिहारी हो। वही (149 158) राजस्थानी लोक-जीवन मे सावण और सावणिये की तीज का अवसर विशेष स्वागत, उछाह और प्रतीक्षा का मानक रहा आया है। लोकगीतो मे, लोक कथाओ मे और लोक काव्यो मे वह उतना ही माय रहता आया है जितना कि खेती किसानी मे जीवन का मुख्य आधार बना रहा है। लोककाव्यो म भी सावण और पिया' अनिवार्य सम्बधी रहते आए हैं कि- उनमी आई बद्दली ढोलउ आयउ चित्त । यो बरसइ रितु आपणी, नहण हमारे नित्त । 45(142) या कि गिरह पलाखण, सर भरण, नदी हिंडोलण हारि। सूती सेजइ एकली, हइ हा दइव म मारि । (वही) वैसे ही बिजली भी- विजलियां निलज्जियां, जलहर तुं ही लाग्ने । सूनी सेज विदेस प्रिय, महरे महुरे गग्जि । (वही) मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/129 सावन तो प्रकृति जादूगरनी का क्रीडा केंद्र है- अम्बर मे बदलियो की लीलाएं, गरजते मेघ, लरजती बिजली, उमडती घटा, शीतल पवन, नन्ही बूदो की झडी, नाचते कूकते मोर, पपीहे को पुकार, उमंगती धरती-ऐसे मे भला पिया का योग या उसकी स्मृति आए बिना कैसे रहा जा सकता है-~~ सावण आयउ साहबा, पगइ विलबी गार। अच्छ बिलबी बेलडयां, नरा विलबी नार। वही (149) मीरा की लोकानुसारिता इसी से जाहिर होती है कि उसके पदा मे अन्य 'ऋतुओ की उपेक्षा सावन का उपयोग आलबन, उद्दीपन और अनुभूति प्रकाशन के लिए अधिक संख्या में हुआ है और वह सब उसी रूप मे है जिस रूप में वह लोकानुगत रहा है। बसत और होली मारवाड मे बसत का वसा महत्व नहीं रहा जैसा कि मालवा गुजरात और पूर्वी राजस्थान मे रहा, तथापि रसत आगमन के साथ फाग गाने और होली की तैयारिया करने का सिलसिला आरभ हो जाता है। लोक- काव्यो मे भी बसत का उतना महत्वपूण उपयोग नहीं हुआ जितना कि वर्षा का 'पृथ्वीराज रासो' मे बसत पचमी के उत्सव के राजकीय आयोजन का वर्णन मिलता है 13 (255) उस दिन श्रीकृष्ण के फाग खेलन का आयोजन किया जाता था। अगरू, कपूर, केसर, कस्तूरी, पुष्प, अबीर, रोली मेवा, मिष्ठान आदि के साथ श्रीकृष्ण की पूजा की जाती थी। लीलाओ के नाभिनय किए जाते थे और 'घटे, शष, झालर, मृदग, वीणा, नफोरी, भेरी, शहनाई, ढोल, नगाडा वशी आदि याद्यो साथ नत्य भी होत थे।" यदि मीरा के मेडता मे ऐसा कोई आयोजन रहा हो तो वह स्थानिक रहा होगा, मगर इतना जरूर है कि आज भी धसत पचमी से डफ और फाग गाना जारी हो जाता है। मीरा के एक पद मे बसत के आगमन और उस समय प्रिय के पास न रहने का दुख प्रकट हुआ है- घाजत झांश मृदग मुरलिया, बाज रही इकतारी। मायो बसत केत घर नाही, तन मे जर भया भारी। स्याम मन कहा विचारी । 33(124-78) मगर, होली का मारवाद क्षेत्र में सर्वाधिक महत्व है। मई अंचलो में इस समय नृसिंह अवतार के स्वाग भर जाते हैं, हिरणावश्यप को मारन की घटना का उस माध्यम से सार्वजनिक स्मरण किया जाता है। सब वण और जातियाँ भेदभाव भूनकर इस पर समानता के धरातल पर रग, गुलाल, कीचड, कादा र एक दूसरे को सरार करते हैं, भक्ष्य-अमक्ष्य खाते खिलाते हैं, स्त्री-पुरुष सब 130/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन उमादित होकर नाचते गाते हैं, सामाजिक मर्यादाएं, शिष्टाचार एक एक दिन के लिए भूल जाते हैं, ईलाजी की स्थापना करते हैं, स्त्रियाँ भी अश्लील गीतो-नृत्या में सम्मिलित होती हैं । गधे की सवारी, अश्लील गालियां, हदग सब ओर मच जाती है। ऐसा लगता है जसे हजारो वर्षों को नैतिकता, शील आदि को छोडकर लोक आदिम हा जाना चाहता है । हरलीसव नृत्य, गैर जैसे उमाद भरे नत्य चारो ओर होते रहते हैं। और, यह सब बहुत पुरानी बात भी है । गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यो को हल्लीसक नृत्य मे भाग लेने का निर्देश दिया था। कई तरह के वाद्यो और कई तरह के रगो अवीरो का उपयोग राजघरानो मे होता था जबकि लोक में कीचड, राख धूल की होली खेली जाती थी। स्त्रियों में क्जली तीज की तरह होली की दूज का भी महत्व होता था। उस दिन परदेसी पिया के आए बिना होली नीरस हो जाती है। कई जगह स्त्रियो पति पत्नी को पुन विवाह करने पर भी विवश करती हैं तो कई जगह "जमरा खाडने" की प्रथा निभाई जाती है। पिछली होली के बाद जमे बच्चो की ढूढ़ भी की जाती है। मीरा के पदो मे इस लोक त्योहार के सदभ उसी रूप मे आए हैं जिस रूप मे सावन के आए हैं--- "होली पिया विण मोहिन भाव, घर आगण ना सुहावै। दीपक जोय कहा करूं हेली, पिय परदेस रहावं । सूनी सेज जहर ज्यू लागे, सुसक सुसक जिय जावे। नींद नहि आवे। 33 (12479) प्रीतम के बिना होली खेलन मे कोई रस नही । और किसके साथ होली खेली जा सकती है। किण सग खेलू होली, पिया तज गये हैं अकेली। माणिक मोती सब हम छोडे, गल मे पहनी सली। भोजन भवत भलो नहि लागे पिमा कारण भई गोली। म्हन दूर क्यू मेलो। वही (12580) और यदि प्रीतम पास मे हो तो वही होली रंग रंगीली, मदभरी मस्ती का मालम बन जाती है- रंग भरी रग भरी रग सू भरी रो। होली आई प्यारी रग सू भरी गे। उडत गुलाल लाल भये वादल, पिचकारिन की लागी शरी। घोवा चन्दन और अरगजा, केसर गागर भरी धरी री मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, पेरी होय पायन में परी री। दही (145) मीरा काव्य लोकतात्विक अध्ययन /131 और दश्य वर्णन के रूप में भी होली- होरी खेलत हैं गिरधारी। मुरली चग बजत डफ यारो, सग जुवति ब्रज नारी। चदन केसर छिरकत मोहन, अपने हाथ बिहारी। भरि भरि मूठि गुलाल चहुँ देत सबन पं डारी । छैल छबीले नवल काह सग, स्यामा प्राण पियारी। गावत चार धमार राग तह, दै दै कल करतारी। फाग जुखेलत रसिक सावरो, बाढयो रस ब्रज भारी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर मिलिया लाल बिहारी । वही (177) और सतमत से प्रभावित आत्म साधना की होली भी मीरा के पद मे मिलती फागुन के दिन च्यार रे होली खेल मना रे। विन करताल पखावज बाज, अणहद की झणकार रे। बिन सुर राग छत्तीसौं गाव, रोम रोम रग सार रे । सीत सतोख की केसर धोली, प्रेम प्रोत पिचकारी रे। उडत गुलाल लाल भयो अम्बर, बरहत रग अपार रे। घटके पट सब खोल दिये हैं, लोक लाज सब डार रे। होरी खेलि पोव घर आये, सोइ प्यारी प्रिय प्यार रे । मीरा के प्रभु गिरधर नागर कवल बतिहार रे । वही (151) होली लोक त्योहार है। मीरा के समय मे भी था और इसी कारण उसके लोक मानस ने होली को वण्य विषय के रूप मे और आलम्बन-उद्दीपन के रूप मे अपनी मधुरा भक्ति मे स्थान दिया है । गणगौर होली के साथ ही जुडा हुआ गणगौर का त्यौहार है जिसे कन्याएँ अच्छा वर पाने की कामना से मनाती हैं । ईसर और गौर के पूजन का यह त्योहार किसी न किसी सीमा तक पूरे मारवाड क्षेत्र मे प्रचलित है । जैसे बच्चे के जम मरण का लौकिक महत्व है, वैसे ही इच्छित भरतार की कामना भी सावलौकिक होती है। मीरा के प्रसग मे गणगौर पूजन इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं माना जा सकता कि उसको आस्था पार्थिव भरतार मे थी ही नहीं। "ऐसे घर का क्या करें जो जनमे अर मरि जाय ।" इसी कारण विवाह के बाद की चर्चित घटना में ससुराल जाकर गौर पूजा से उसने इनकार किया होगा- म्हाने गुरु गोविंद री आण, गोरल ना पूजां। ओरज पूजे गौरज्यो जी, पें क्यं पूजो न गोर।

132/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन मन वछत फल पावस्यो जी, थे क्यू पूजे और । नहिं हम पूज्या गोरज्या जी, नहिं पूजो अनदेव । परम सनेही गोविंदो, काइ जानो म्हारो भेव। 33 (106-29) गणगौर पूजन का यह विरोध सभवत मीरा की मधुरा भक्ति को टेक का वाचक ही अधिक है। इससे शायद यह बात अधिक उजागर होती है कि पार्थिव भरतार के साथ सुहाग-कामना मे उसको आस्था नही थी क्योकि उसने तो परम तत्व को पति प्रमाण प्राप्त कर लिया था। मगर, अपने अलौकिक प्रियतम के साथ गणगौर भी इसके लिए उतनी ही मा य थी जितनी क्सिी ससारी स्त्री के लिए होती है-- रे सांवलिया म्हारे आज रगीली गणगौर छजी। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, चरणा में म्हारो जोर छ जी। वही (145) कुल मिलाकर मीरा के पदो मे लोक्तत्व मूलक वर्षा, होली, बसत, गणगौर का उपयोग प्रकृत वणन के रूप मे और आलम्बन उद्दीपन के रूप में हुआ है। वर्षा का उपयोग अपेक्षाकृत अधिक हुआ है जो कि बहुत पुराना लोक मगल का आधार भी रहा है और मानवीय संवेदनाओं का जनक, प्रयेता और वाहक भी (1) कोतन भजन साधना के आयोजनों मे मध्य युग धार्मिक वातावरण का पुग था। हजारों वर्षों की दाशनिक और धार्मिक मा यताओ का लौक्ति पयवसान सोपयात्रा, सत्सग देवदशन, भजन कीतन, साधना, मदिर निर्माण और दान-पुण्य हमा पा। जो लोग मदिर आदि का निर्माण र सकत थे, वे पैसा करने और मामा य लोक दर्शन, पूजा, सत्सग आदिर के जीवन की आध्यात्मिक भूख शांत पिया करते थे। साधु, सत, जोगी जती, महारमा तपस्वी, नाप, पटुष आदि के एसे अनेक समूह बने हुए थे जो निरन्तर प्रमणशील र लोक ये लिए घम की प्याच्या किया परव थे। दर्शन, पुराण, ब्रह्मा, ईश्वर सपा जगत् सम्बधी जितनी भी मा यताएं विकसित हई पी रहें सोय शिक्षा बनाने के साधन यही लोग पे मौर इनो सिपापुछ भी नहीं था । पचपि इनके नाम पर पुटिल कपटी सोग भी अपना स्वाप साधावा कामरते ये तथापि साधु-सतोंरा रागम और लोर म मान सम्मा पाभवन तन माधना,दीक्षा और तपस्यामाधना मे ये सोग मोफ- मिनापामारते पेनि रामों म उन्हें तनिक भी बाथप होता यही उनके यमपट बने रहने पे मोरनहाँ बंगा नहीं होगा पासपर माधु-संतों का मायागमन भी पम रहना पामेवा मोर पितर में यह मर प्रपर पााभी मीराको मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 133 कहना पडा था कि- नहिं भावे धारो देसडलो रग रूडो। यारे देए मे राणा साध नहि छ, लोग वस सब कूडा।" और इसकी तुलना मे-- "म्हारे पीहरिया रा लोक भले रो, बाधे कठी भाला।" मेहता, जोधपुर, नागोर, शेखावाटी, जालोर, बीकानेर की तरफ नाथपथियो का गहरा प्रभाव रहा था और लोक मानस उनको साधना प्रणाली से बहुत दूर तक प्रभावित था। वैष्णव भक्ति, लोक देवता, सिद्ध-पुरुप आदि का प्रभाव भी व्यापक था और वैष्णव चतुर्भुज, नरसिंघ, कृष्ण, शिव आदि मता का भी प्रभाव या। मेडता स्वत जगदम्बा, चारभुजा और नायो का गढ था । वहाँ भजन कीतन के आयोजन और साधु समागम सदा चलते रहते थे। मीरा पर उनका प्रभाव रहा था। उसके पदो मे भजन कीतन और साधना के कई स्वरूपा का मिला-जुला लौकिक प्रचलन व्यक्त हुआ है। वह अभिव्यक्ति वैष्णव रूप की भी है और नाथपथी साधना रूप की भी है। वह अभिव्यक्ति हमे बता सकती है कि उस समय भक्ति, भजन और साधना के किन रूपो की लोक म अवस्थिति थी। मीरा के पदो मे से कम से कम 36 पद ऐसे मिलते हैं जिनमे भजन कीर्तन और इष्ट प्रीति की साधनाओ के सकेत हैं । सामान्य स्तुति प्रार्थना और विनय के पद इनसे अलग हैं जिनमे कभी इष्ट के परमतत्व की महिमा कही गई है और कभी अवतारो की महिमा बखानी गई है । अय तथा जो साधना रूप व्यक्त हुए हैं, उनमे गायन-नतन बहुत प्रखर भाव से व्यक्त हुआ है-- "मैं तो गिरधर आगे नाचूगी।" और अकेले ही नहीं बल्कि "नाच-नाच कर रसिक प्रिय को रिझाने और अय प्रेमी जनो को भी उस हेतु प्रेरित करने की बात भी है । 33(14) इस नतन में प्रेम प्रीत के घुघरू हैं, सुरत को पछनी है और उसके साथ लोक लाज की मर्यादा का उल्लघन हो तो भी चिंता नहीं है। ऐमी अभि- व्यक्ति में वैष्णव भावना के साथ सत मत का प्रभाव परिलक्षित है। 'गिरधर के रग मे रची हुई मीरा के लिए" "सिंगार साज कर, पग में घुघरू बांध कर" नतन करना स्वाभाविक है, वही (16) बल्कि "धरती पर जहाँ जहाँ पैर पडें वहाँ नृत्य करना" वही (18) 'अपने प्रिय के प्रति इतनी सच्ची होना कि लाज शरम छोड कर भी यह काम करना वही (22) 'नित प्रति उठ कर मदिर जाना और चुटकी दे देकर नाचना", वही (24) राजवधू होकर भी "हरि मदिर में निरत कराना और घु धरूओं की धमन कराना", वही (34) चारो तरफ से विरोध होने "गोविद के गुण गाना", वही (38) 'पग घुघरू बाँध कर नाचना" है 134/मीरा लोकतात्विक अध्ययन ससुराल वाले कुलनासी कहे या लोग बावरी कहें वही (39), केवल इष्ट के सामने ही नही बल्कि इष्ट साधक "साधुबो के सामने ताल परवावज मदंग के साप नाचल" वही (40)। चाहे कोई वावरी कह, चाहे मदमाती कहे, चाहे निव देकर मारना चाहे-ये सब मीरा की भक्ति साधना की अभिव्यक्ति के मापक हैं । ये बताते हैं कि इस प्रकार का गायन और नतन लोक मे और राज परिवारोम, किसी कुलीन महिला का या कन्या के, लिए सम्मानजनक तो नही था। मगर मारवाड क्षेत्र मे-खास करके जालोर, जैसलमेर, सिवाना की तरफ देवदासियो की प्रथा अनजानी नही थी और उस प्रथा की छाप यदि मीरा पर रही हो तो असभव नही कहा जा सकता। भजन और गुण गायन के लिए तो इतना आग्रह था कि "राणा रूठ जाए, शहर निकाला दे दे तो परवाह नही," ' मैं तो गोविद के गुसु गाणा" वही (43) और गुण गायन' करन करते "मगन हो जाना" वही (45) "कीतन गा गाकर अपने राम रनिया को रिझाना" वही (92)-इसकी टेक मीरा ने बना रखी थी। वस्तुत इस अभिव्यक्ति मे भजन, कीतन, गुणगान तो लोक सम्मत व्यवहार थे ही, नृत्य करना अवश्य ही सम्मानजनक नही था। चित्तोड के राजघराने मे राजवधुओ के लिए तो वह भयकर दुष्कम भी माना जाता रहा होगा क्योकि वहाँ तो महिला महिला से भी पर्दा करती थी, तब इतनी निलज्जता कैसे सहन हो सकती थी। भजन कीतन और साधना की दूसरी प्रखर अभिव्यक्ति सतमत से प्रभावित ज्ञान, ध्यान और सुरत समाधी से साधत कही जा सकती है। 'पचरग चोला पहिनकर झिरमिट खेलने जाना और वहाँ 'स्याम से तन खोल कर मिलना' 33(102 20) मे सतमत की आत्मा परमात्मा का विचार अन्त निहित है। इसी तरह 'मोती माणक छोडकर माला दोवडी धारण करना वही (24) और परम गुरु के चरणो मे प्रणाम करना' भी उसी प्रभाव का समेत करते हैं। 'अपने पिया की पोत को सच्ची मानना', वाकी 'आभूषणो को व्यथ मानना' और 'गुदडी' धारण करना वही (25) उस पर सतपथ के सयासी मत का प्रभाव यताता है। 'सतगुरु के सबद' से 'आत्म ज्ञान' मिलने की बात अनेक पदो मे स्वीकार की गई है। 'पचरगी झालर, सुखमण सज और सुरत निरत' वही (32) की बात भी कई पदो मे माती है। बल्कि अपने 'परम प्रिय' के लिए सुहाग चिह्न छोडवर 'भगवा चादर पहनन' वही (37) को भी मोरा तैयार है । उतना ही नहीं 'चीर फाहर कया धारण करना, वैरागन होकर रहना चूहा, काजल टीकी सब त्याग कर जोगन हो जाना' भी वही (48) उसे चूल है। लोक-पाध्या का सत प्रभाव मोरा पर इतना प्रवल है कि 'अपने जोगी प्रियतम के अग पर भभूत यन पर लिपटना परे तो वह वैसा भी परला पाहती है।' वही (50) मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 135 "अगर पदण की चिता बनाऊँ, अपने हाथ जला जा। जल बल भई भसम की ढेरी, अपणे अग लगा जा।" वही (52) "प्रिय के कारण जोगन होना, वन वन जोगी को ढूढ़ना तो राजस्थानी प्रेम कथाओ और पायो मे प्रचलित सदियो रही हैं मगर मीरा उनमें 'कासी करवत लेने (52) और 'विप खाकर मरने' जैसे अतिसीम अभिप्राय भी भरती है जो कि उसकी अनुभूति की तीव्रता को व्यक्त करते हैं । 'तन-मन की सुरति मे सजोकर परम तत्व को समपण करना' वही (55) तो साधरण अभिव्यक्ति है, मगर मीरा इससे आगे जाकर भस्म रमाकर, जटा बाँध फर जोगण बनना और च्यारो खूट अपने जोगी को ढूढने वही (70) की साधना से नहीं चूकना चाहती । नाथ पथी रीति के अनुसार वह जोग सुरति और उसके साथ नतन की अनोखी साधना को अभिव्यक्ति देती है-- मन कू मार सजू सतगुरु, दुरसत दूर भगाऊं। डाको नाम सुरत की डोरो, कडियो प्रेम चढाऊँ। ज्ञान को ढोल ब यो अति भारी, मगन हाय गुण गाऊ । तन करू ताल, मन करूं मोरवग, सोती सुरत जमाऊँ। निरत फम्र में प्रीतम आगे, तो अमरापुर पाऊँ। वही (92) नाथपथियो की तरह 'जोग धारण करके, घर घर अलख जगाने' वही (40) मे भी वह अपनी आत्म साधना मानती है, बल्कि 'माला, मुद्रा, मेखला, खप्पर धारण करके' पूरा 'जोगण वेश' ही धारण करना चाहती है । वही (118) बाल्हा म्हैं बैरागण हूँगी हो। जी जी भेष म्हारो साहब रीझे, सो सो भेष धरूँगी हो । सील सतोप धरूं घट भीतर, समता पकड रहूंगी हो । जाको नाम निरजण कहिये, ताको ध्यान धरूगी हो। गुरु ग्यान रगू तन कपडा, मन मुद्रा पहिरूँगी हो। प्रेम प्रीत सू हरि गुण गाऊँ, चरणन लिपट रहूंगी हो। या तन की हैं करूं किंगरी, रसना राम रटूगी हो। वही (152) कभी उसकी अनुभूति शुद्ध ज्ञानात्मक धरातल पर उभरती है-- सतगुरु भेद बताइया, खोली भरम किवारी हो। सब घट दीसै आस्मा, सब ही सू यारी हो। दीपक जोऊ नान का, चढू अगम अटारी हो । मीरा दासी राम की, इमरत बलिहारी हो। वही (158) 136/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन नाथपथी और जोग रीति से परे रहकर कभी अनुभूतियों का प्रभाव सत- मतानुकूल शील-सदाचार को अभिव्यक्ति का माध्यम वाता है जो कि मारवाड दे लोक जीवन का गृहीत सार है, और भक्तजनो की सहज बानी भी है--- यहि विधि भक्ति कैसे होय । मन की मैल हिये तें न छटी, दियो तिलक सिर धोय । काम कूकर लोभ डोरी, बोधि मोह चडाल । ऋोध कसाई रहत उर मे, कैसे मिले गोपाल । बिलार विषया लालची रे, ताहि भोजन देत । दीन हीन छुधा रत से, राम नाम न लेत। आपहि आप पुजाय के रे फूले अग न समात । अभिमान टीला किये बहु, कहु जल कहां ठहरात । जो तेरे हिय अनर को जान, तासो कपट न बने। हिरदै हरि को नाम न आवै, मुख में मनिया गर्ने । हरि हितु से हेत कर, ससार आमा त्याग ! दासी मीरा लाल गिरधर, सहज कर बैराग। वही (162) और मन को धो धाकर माफ करके तव- चलो अगम के देस, काल देखत डर। जहं भरा प्रेम का होज, हम वेल्या कर। ओढण लज्जा धीर, धीरज को धापरो। छिमता कांकण हाप, सुमति को मूदहो। दिल दुलही दरियाव, सांच यो दोवडो। उबटन गुरु को पान, ध्यान को घोवणो । मान अघोटा ग्यान, जुगत को मूटभो । वेसर हरि को नाम पूडो चित जलो। जोहर सील सतोय, निरत को धूधरो। दिली गज अरहार, तिलक गुरु ग्यान को। सर सोलह सिंगार पहिर सोने रासही। सवालिया सू प्रीति और सूं पापड़ी। यही (192) -मीरा अपने प्रियतम से मिलन जाती है। बत मोरा ये भजन-कौतन और प्रेम साधना की अभिव्यक्ति में हमे वैष्णव, सत, नाय ममी मतोरे लोक प्रचलित सस्कार एवं साप देधन को मिलते हैं। वस्तु जहा मतमत बोर नापपपी प्रभाव हैं वहां अभिव्यक्ति में गोरापन और स्पष्टता भी अधिक मिलती है। पूजा-अपना के बाहरी तत्वों की बात मौरान मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 137 । पदो में नहीं मिलती-आरती, हापा, माला, पूजा भोग आदि के अष्टकम या नवधा रूप मोरा के स्वभाव में नहीं थे। दशन और नित नेम का हवाला जरूर मिलता है- चरणाम्रित का नम हमारो, नित उठ दरसण जास्या। वही (34) और एक पद में छापे तिलक का कमकाड भी आता है- छापा तिलक वणाविया जी मन मई निस्पं धार। रामजी काज सवारिया, म्हन भावे गरदन मार ।। वही (42) वैसे ही एक पद मे चाकर भक्ति का हवाला मिलता है 33 (154) और 'दासी' छाप तो कई पदो म मिलती है। (1) साधु सगति को टेक मे मध्ययुग मे साधु-सन्त ही लोक शिक्षा के साधन थे। उनके भिन्न-भिन्न मतो के उपदेश, उनको बानी और उनकी शिक्षाएं लोर मे जाकर एक सावजनिक मान्यता का धरातल बनाती थी जिस पर विविध लोक विश्वासों, रीतियो और प्रथाओ का प्रचलन होता था। मेडता में साधु सतो का आवागमन और समागम अपेक्षाकृत अधिक था। यहाँ तक कि वल्लभ मत ने पुष्टि मार्गी अधिकारी भी मेडता मे कई बार प्रवास कर चुके थे यद्यपि वे राज्याश्रय के भागीदार नही बने । मुक्त साधु सगति का मीरा पर इतना प्रभाव पडा था कि 'साधु सगति और साधु सेवा' को अपने जीवन का प्रत बना लिया था। वह उसकी प्रेम भक्ति मे एक ऐसो टेक बन गई थी जो हठ की सीमा तक पहुंच गई थी। यहां तक कि उसे मरना पबूल था, मगर साधु सेवा छोडना कबूल नहीं था। साधु सगति करि हरि सुख लीजै जग सूं दूरि रहूं। तन मन धन मेरे सब ही जावो, भलि मेरो सीस लहू । 33(31) बचपन से ही साधु सगति की उपयोगिता मीरा ने इस रूप मे और इतनी अनिवायता से अनुभव कर ली थी कि परिवार वालो के मना करने पर भी यह नहीं मानती थी- तू मत बरजे माइडी म्हन साधो दरसण जाती। राम नाम हिरदे बसे, माहिले मदमाती। वही (28) तदुपरान्त उसके पदो मे अनेक बार साधु सगति की अनिवायता और साधना मे उसका सहायक्पना कई तरह से उगाजर हुआ है- यदि राजकुल की कन्या या महिला के लिए साधु सतो की सभा में बैठना निलज्जता थी तो मीरा ने अपने लिए उसे भी स्वीकार किया था- छाडि दई कुल की कानि, कहा करि है कोई। सतन ढिग बैठि बठि, लोक साज खोई। वही (15) 138/मीरा सोक्तात्त्विक अध्ययन . -~-कोई वर कर लेगा, राजा हो तो अपना राज रख लेगा धन ले लेगा मगर जिनसे हरि भक्रि या माग मिलता है उहें छोडने से तो जनम हो मकारय हो जाएगा। ऐसी उसयो मा पता उसके पदो से उभरती है। इसलिए उसकी टेक थी कि- कोई निदो पोई विदो, म्हें तो गोविंद का गुण गास्यां । जिण मारण म्हारा साध पधारे, उण मारग म्हें जास्यां । वही (23) उसे परिवार निदा, कुटुम्न नि दा, लोक निदा की कोई परवाह नहीं थी। साधु मतो से प्रेरणा लन या उसमे सुख पाने की उसकी इच्छा अटल थी, अडिग थी। इसीलिए उसने- "राजकुल की लाज गमाई", और "साधो के सग भटकी" वही (24) उसके कारण-"भाग पुल्यो म्हारो साध सगत सू सांवरिया को वट की। (वही) इसीलिए चाहे 'मात पिता सब कुटुम कबीला, टूट गया ज्यू तागा।" वही (26) फिर भी उसका भाग जाग गया और "जनम जनम का सोया मनवा जाग उठा।" (दही) तो 'सीसोदे' ने उसकी बात मानी नहीं वरना वह तो उस 'राज- कुल' को भी 'बैंकुठ ले जाती।' वही (42) माधु सगति की टेक के लिए उस ' राजपाट, सुख सुविधा' किसी की परवाह नही थी । वह तो इस पर अडिग थी कि- 'राज पिय ज्याना करणे दोर्ज, म्हे भगता री दासी।" सेवा साधू जनन की, म्हारे राम मिलन की मास ।-उसकी नजर मे तो "राम मिलन की आशा के केन्द्र साधु मगत" का मह व इना अधिक था कि उसके माध्यम से ही- "बडे पर ताली लागी रे, म्हारे मन री उणरथ भागीरी।" वही (2) यह तो अपने ससुराल मे भी साधु सगत की टेक पर अडी रही थी- "राणा ने समझावो जावा, मैं तो बात न मानी।" मीरा के प्रमुगिरधर नागर, सतां हाथ विकानी । वही (30) जब कभी साधु सगत का जाग जमता था, मीरा का अनोखी प्रसन्नता होती थी- आज म्हारो साधु जनन नो सग राणा म्हारा भाग भल्या । साधू जन नो मग जो करिये, चढ़े ते चौगुणो रग रे। वही (33) वह तो "सब तरह के सतो पर तन मन वारती थी" वही (41) इसका आशय यह भी पाकि "शान के लिए यह मुक्न माग पसर करती थी। उसके लिए यदि राणा लज्जित होता था तो मीरा मा कयन था- मोरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/139 - "अपणे घर का परदा कर ले, मैं अबला दौराणी।"-(वही) उसकी टेक भी-"सेवा करस्या साध की, म्हारे और न दूजो काम । वही (47) उसने तो "साधु सगति ने ही सुगति पाई थी", वही (16) इसलिए- साधु मात पिता कुल मेरे, सजन सनेही ग्यानी। सत वरण को सरण रैन दिन, क्षत्त कहत हू वाणी । वहीं (30)-और जो माता पिता हो कुल-कुटुम्बी हो उनसे लज्जा केसी, दुराव छिपाव कसे । साधु-सगति की इतनी महिमा अय किसी भक्त या सत कवि की रचनामो मे नही मिलती तो इसका कारण सभवत मीरा का राजघराने से जुड़े रहने का तथ्य होगा। राजघराने चाहे भजन कीर्तन भनियो का आयोजन करवा सकते थे, साधना की सेवा की व्यवस्था करवा सकते थे, मगर उनकी सगति मे बैठना और उनके टना बैठना मर्यादा मे नही अटता था। इसी प्रतिष्ठा का खडन मीरा ने किया था, उसी पर टीका टिप्पणी भी हुई थी और अतत मीरा के चित्तौड त्याग का कारण भी वही टेक बनी थी। (iv) खानपान, वेशभूषा, माभूषण आदि के प्रासगिक उल्लेखो मे जोधपुर- मेडता मारवाड भारतीय संस्कृति में अपने चटक रगी, वस्त्रो, आभूषणों और खानपान के लिए विख्यात रहा है। मीरा के पदो में यद्यपि इन वणनो और प्रसगो के बारे मे समृद्ध और विविध सकेत नहीं मिलते, कि तु अ य लोक काव्यो और रासो साहित्य मे पयाप्त सूचनाएं मिल जाती हैं । मीरा के पदो मे खानपान, वेश- भूषा, आभूपण आदि के पर्याप्त सकेत न मिलने का एक कारण तो उसकी सहन वैराग भावना का हो सकता है, दूसरा उसकी अनुभूति प्रवणता का और तीसरा प्रेम भक्ति की केन्द्रीय वृत्ति का जिसमे इस तरह के सकेत कही प्रासगिक होकर आए हैं तो आए हैं भयथा वैसा कोई लक्ष्य रहा नहीं। वसे मध्यवालीन सिंगार भोजन की स्थिति आर्थिक सामाजिक स्तरो के अनुसार भिन्न भिन्न रही थी। दूध, दही, घी, छाछ, लूणी, बाजरा, मूग, तिल-- सावजनिक खानपान के पदाथ थे। रोटी छाछ, दूध रोटी का चलन लगभग हर परिवार मे था और आज भी वही चलन मिलता है। प्रात काल दही रोटी भी अधिकतर चलन में है। वार त्यौहार और जिमणार म लपसी गात और घी श्रेय स्कर माने जाते थे। लोककाव्यो मे भी उनके उल्लेख आते हैं- छटठे प्रहरी दिवस में हुई न जीगणवार। मन चावल, तन लापसी नैणज घी की धार । अमल पाणी भी राजपूती घराना मे आम चलन की बात रही है जिसका हवाला मीरा के पदो मे भी मिलता है-"राम अमल माती रहे, धन मीरा राठोड।" 33(47) विम्बा फल (9), दाडिम (9) और फलो (15) के उल्लेख 140/मोरा लोकतात्विक अध्ययन केवल उपमा मूलक अभिव्यक्ति में हुए हैं। भीरा की जैसी वैराग भावना थी और चित्तौड म जिस ढंग से उसने विद्रोहिणी टेक धारण कर रपी थी तथा राणा के कोप की शिकार बनी थी, उस कारण समव है कि उसे माम मेडतियो का भोजन छाछ और रोटी-की हो आपूर्ति की जाती रही हो.-- खीर खाड को भोजन त्याग्यो ये बाई, त्याग्यो दिखणीचीर। राणा सो दर त्याग्यो ए बाई, सब सतन मे म्हारो सीर19(20513) बास्या खूस्या देवडा ये भाभी और मिलसो खाटी छाय ! रो रो भुखा मरो ये भाभी, नहीं मिले हरि माम ! (वही) बास्या तो मूस्या टुकहा ये बाई, पोस्या खारी छाय । म्ह रोवा, भूखा मरां ये बाई, जबरे मिलेगो हरि आय । माया म्हें तो यू रे लजी (वही) दूध दही गोरस के सकेत प्रजवर्णन के कुछ पदा मे मिल जाते हैं-~-33(1637 168 व 178) म "भोजन दूध दही को", "गोपी दही मयत सुनियत है," 'दधि को नाम बिसरि गयो प्यारी"-जैसे ही। बाकी सम्पन परिवारो मे खानपान का स्तर काफी अच्छा और भली भांति की मिठाइयो चटनियो, अचारो आदि से मम्पुटित होता था। राज परिवारो मे मेवा, मिष्टान, खाड, खीर क्दु मधु, द्राक्षा, केसर, कपूर कस्तूरी, भांति भौति की मिठाइयो आदि से मम्पृक्त होना था। नमो के लिए अमन पाणी, ताम्यूल सेवन, मदिरा आदि का चलन भी लोक व्यापी था। मगर सावजनिक जीवन म मूग, बाजरा और गोरस की चीजो का चलन ही प्रधानतया था । भात का चलन बहुत विरल और वार-त्यौहार पर ही होता था, वह भी पी शर के साप जद किसा प्रसिद्ध वीर की मत्यु होती थी या शोक होता था तो भात को वर्जित किया जाता था । वह शोक मनाने की प्रथा थी। वस्त्राभूपण के बारे में भी उसी तरह से प्रासगिक मकेत ही मीरा के पदा में मिलते हैं। अन्य स्रोतो से प्राप्त सूचनाओ के अनुसार स्त्री-पुरुष, बालप-बूढे सब चटक्दार रगो वे भारी वस्त्राभूषण धारण परते थे। तथापि विधवाओं के लिए वस्त्राभूषण, शिकार आदि की वजनाएँ पो । पुष्पो के लिए पाए और उस पर प्रतिष्ठा के अनुसार कलगी पेंच आदि इज्जत की चीज होती पौ। नीमा, जामा, अगरखा, पीतांबर, दौलगी धोती, कमर बद, कछनी, मोजही वेशभूषा में प्रचलित वस्त्राभूषण पनीर लोग पैरो मे सगर भी पहनते थे स्त्रिया मे पाथरा, चुनही, काचती चुहा, गले में हार, पान, नाक, सिर पर बनेर तरह आभूषण आर्थिक-सामाजिक स्थिति ये अनुमार प्रचलित थे। सबके लिए वही मगर स्तर द से राणे, पोतस, चांदी, सोनये हमारत । मौरा एक - मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/141 प्राचीन चित्र मे 11 (प्रारभ मे) मीरा को घाघरा, चुनही, काचली के साथ बताया गया है और बोरडी, कण फूल, नौसर हार, चूडले भी चित्रित हैं । मीरा के पदो मे वस्त्राभूपण के जो प्रासगिक सकेत आए हैं वे या तो कृष्ण के स्वरूप वणन के रूप मे या जोगी के उल्लेखो मे या अयथा रूपो मे बाए हुए हैं। कृष्ण के प्रसग मे कृष्ण के प्रसग मे मीरा का वस्त्राभूषण का वणन परम्प- रित भी है और अपनी छाप वाला' भी है। अधिकतर वो 'मोर मुकुट, तिलक, कुडल,' 33 (2) कमर मे छोटी घटियो वाली करधनी, पैरो मे नूपुर, 33 (3) पीताम्बर, गल मे वैजयती माला 33 (6)-और ऐसे ही रूप मे 'कालिंदी क तीर हो काहा, गउवा चराय' वही (6) और 'सीतल कदम की छहियां मुरली बजाय कहकर चित्रण किया गया है। मगर, कही उनके 'बाँके, छैल छबीले रूप' को उकेरते समय 'बक्ट छवि' उभारी गई है। उसम 'भौंह भी बांकी, अलकावलि भी बांकी, पाग भी वांकी और बाकी पाग पर लट भी बांकी' वही (7) है । उसके साथ 'कटि बाकी' और 'कर मे मुरली भी बांकी' हैं । कभी "तिलक' केसर का कहा गया है, कभी 'चदन का' । इसका मतलब यह कि चदन में केसर घिसकर तिलक करने की प्रथा जब भी थी। अधिकतर तो कृष्ण की वेशभूषा, ‘मोर मुकुट पीतावर सोहे, गल वंजती माला" वही (154) वाला ही है, उसमे कभी 'केसर का तिलक' जुड़ता है तो कभी 'हरि के कुडल वही (164) झलकते हैं । एकाध स्थान पर मीरा के कृष्ण 'रतन सिंघासण पर विराजते हैं और 'तुलसी का मुकुट' वही (163) धारण करते हैं। जोधपुरी प्रभाव से एक पद मे मीरा के कृष्ण 'पाताबर फेटा बाँधे, अरगजा से अपने को सुवासित किए हुए' भी हैं। वही (166) वे "ठाकुर' रूप मे मीरा को 'दरसन देते हैं। वैसा ही पूरा मारवाडी पुरुष का रूप मीरा उकेरती है-- आवत मोरी गलियन मे गिरधारी। में तो छिप गई लाज को मारी। कुसुमल पाग केसरिया जाना, कपर फूल हजारी:- मुकुट ऊपर छा बिराज, कुहल की छबि यारी केसरी चीर, दरयाई को लैंगो, ऊपर अगिया भार आवत दयी किसन मुरारी, छिप गई राधा प्यारी । मोर मुकुट मनोहर सोहै, नथनी को छवि यारी। गल मोतिन की माल विराज, चरण कमल वलिहारी। वही (172) -यह मीरा कृष्ण का राज रूप है जो तत्कालीन पुरुष वेशभूपा का चित्र स्तुत करता है। जोगी रूप के उल्लेखों में मारवाड क्षेत्र मे 'जोगी' नाथपथी योगियो के लिए A 142/मौरा सोश्वारियर अध्ययन प्रचलित सम्बोधन है। उस सस्कृति मे नाथ पप या प्रमाव इतनी गहराई तक पा कि मीरा के पहले से ही लोक्तायों और पानी में प्रियतम के लिए जोगो का सम्बोधन मोर जोगसाधना से उसे पाने के अभिप्राय प्रचलित थे। मीरा ने नापपथी योगी ने शीस, प्रत, सदाचार और उसकी वेपभूषा आदि को प्रियतम कृष्ण पर मारोपित पिया है- धूतारा जागी एक रसू हरि बोल । जात बदीत परी मनमोहन, बहा बजावत ढोल। अग भभूति, गले मृगछाला, तु जन गुढ़ियां बोल । सदन सरोज बदन को सोभा, अभी जो कपोल । मेली नाद यभूत न वटवो, अजू मुनी मुख खोल । चढती बैंस नेण अणियाले, तू परि परि मति होल । 33(62) वैसे ही योगियो के परम्परित रूप और वेशभूषा को उमेरा गया है-- आसन माडि गुफा मे बैठो, ध्यान हरी को लगायो । गल बिच सेली, हाय हाजरियो, अग भभूत रमाय । वही (189) ~~-बस, जोगी रूप मे प्रियतम की पत्राभूषण सज्जा का इतना ही उल्लेख है। इस रूप के वणन मे मीरा यो रुचि रतनी नहीं रही जितनी कि उस परम जोगी को पाने की साधना में 'जोगन' का रूप बनाने और खोजने के अभिप्राप में थी। "चूढो म्हारे तिलक अर माला, सील परत सिणगारो। और सिंगार म्हारे दाय न आवै, यो गुर ग्यानहमारो। वही (23) वह 'जोगन' बन कर 'पचरण चोला पहर कर' शिरमिट सेलने' जाती है वही (20) और वहा अपने बरे से तन बोलकर मिलती है।' 'इमरित प्याला पीने की इच्छुक' मीरा- "मोती माणक परत न पहरू, मैं तो कबकी नटगी। गणो तो म्हारे माला दावडी, अर बनण की कुटकी। वही (24) -~-अपने प्रिपनम से मिलने के लिए, वह जोगन-- यातन कहर भेस्म रगाऊ, खोर करूं मिर केस । भगवा भेम धरूं तुम कारण, दृढत च्यार देस । वही (70) तेरे कारण जोगण हूगो, दूगी नगर बिच फेरो। अग भभूत गले निग छाला योगन मस्म करो। बज हम मिल्या राम अविनासी, बन बन बीच फिरू री। वही (94) मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन /143 -- . वह पूरी तरह जोगण बेस धारण करके अपने जोगी को ढूंढना चाहती है- "माला मुदरा मेखला रे बाला, खप्पर लूगी हाय । जोगिण होय जग ढूंढ, सू रे, म्हारा रावलियारी साथ । वही (118) इसके साथ ही जोगियों के 'कीकरी' के वाद्य का भी हवाला है । वही (151) ये सब वेशभूपा जोगी पपियो की है जिनका चलन मीरा के समय मे अधिक था और जिनके अभिप्राय लोकमानस मे गहराई तक पैठ चुके थे। अन्य प्रसगों मे ऐसे ही प्रसग, तत्कालीन वेशभूषा, सिंगार आदि के, बिखरे- विखरे सकेत मिलते हैं । कहीं अभिसार मूलक 'पचरगी चोले' (20) का सकेत है, वही सौभाग्य चिह्न चूडे' का (23), कही 'मोती, माणिक जडे आभूपणो का' (24), कही सामान्य जनो की स्त्रियो के सुहाग चिह्न 'पोत' (25) का तो कही सम्पन वग के 'पाट पाटम्बर' और 'दिखणीचीर' (25) का हवाला है । 'हमारी हार' व 'रतन जडित आभूषण' (30) राजघरानो के आभूषण थे, तो 'बाजूबद, कड ला और माग मे सिंदूर' (32) सुहाग के चिह्न थे। 'काजल, टीकी (35) सावजनिक उपयोग के सिंगार, तो 'नौसर हार' (44) राजमलो मे ही सभव था। सामाय जनो के 'चोर' 'चूडिया' और 'काजल' (48) भी सुहाग चिह्न होते थे जिहें प्रिय वियोग मे छोडने तोडने की प्रथा थी। वही 'मांग भरने' (48) या 'सजाने की भी रीत थी 'दुहाग' मे मांग बिखेर कर केस खुले छोड दिए जाते थे। 'बालो मे पट्टी पाडना', और 'मांग सवारना' (129) सुहागिनो का काम था, जबकि बैरागन होने पर 'भगवा चादर' धारण की जाती थी। 'हार', 'चीन माल चतुरभुज चूडलो', 'झाझरिवा', कठी , "बिछुवा', 'घुघरू', 'अनवट', 'कमर पेटी', 'टीका (139)--ये सब विविध प्रकार के आभूपण थे। मीरा ने इनके हवाले सयोग वियोग की अनुभूतियो के प्रसगत दिए हैं। (१) सुहाग दुहाग की सांस्कृतिक चेतना के रूप में मीरा के पदो मे तत्कालीन सामाजिक रुढिया, रीतियो और मान्यताओ का दिग्दशन सुहाग दुहाग की चेतना के हवालो से भी होता है। सुहाग के चिह्न चूडा, टोकी, काजल, माग, सिंदूर, चुनडी चीर आदि को दुहाग के समय या तो स्थगित करने की रीति थी या फिर उहें मिटाने की। 'मीरा ने इष्ट के वियोग मे अनेक बार ऐसी अभिव्ययित की है कि- चूडो म्हारे तिलक अरु माला, सील बरत सिंगारी। और सिंगार म्हारे दाय न आवै । 33(23) अपने 'दुहाग की वेला मे मीरा ने 'मामूली कॅठी माला धारण कर रखी थी। उससे कहा जाता है- 144/मीरा लोकतात्विक अध्ययन छापा तिलक गल हार उतारौ, पहिरो हार हजारी। रतनजडित आभूपण पहिरो, भोगो भोग अपारी । वही (30) अपने प्रिय के वियोग मे मीरा 'दुहाग' की रीति का पालन करती है- गहना गांठी हम सब त्यागा, त्यागो कर रो चूडो । काजल टीको हम सब त्यागा, त्यागो छ वाधन जूडो । वही (35) बल्कि, "महल अटारी हम सब त्यागा, त्यागो थारो बसनो सहर । काजल टीकी हम सब त्याग्या, भगवी चादर पहर। वही (37) -भगवा चादर पहनकर वैरागन कहलाना 'दुहाग सूचक' था। दुहाग का एक लक्षण था कि वैसी महिला रूखा सूखा खाती थी, भूमिशयन करती थी और अन पानी का त्याग करके अपने को तपस्या मे झोक देती थी- "सीप भर्यो पाणी पिवे रे, टाक भरयो अन खाय ।" वही (47) "बास्यो तो कूस्यो टूकडा ये बाई, पोस्या खाटी छाय। भुइँ हूवा, भूखा मरा ये वाई, जब रे मिलेगो हरि आय । 9(205 13) इतना ही नहीं दुहाग की स्थिति मे- "फारूंगी चीर करूं गल कथा, रहूगी वैरागण होय रो। चुरियो फोरू मांग बिखेरू, क्जरा में डारू धोयरी। 33(48) सुहाग को वेला में सिंगार करना, मोतियो के चौक पूरना, वही (54) मगल गाना बधाइया झेलना सास्कृतिक चेतना के तत्त्व थे तो दुहाग मे "घर मे दीप जलाना' भी धजित होता था- विन पिया जोत मदिर अधियारो, दीपक दाय न आवे । वही (76) और "दीप जोय कहा क्रू सजनी, पिय परदेस रहाये। वही (79) सुहाग हो तो- रतन धरूं नैवछावरी, ले भारति सा हो। पांच सखी इक्ठी मई मगल गावे हो। पिय का रली वधावण, आणद अगिन मावे हो। वही (148) इस तरह से सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति मौरा के पदों में मिलती है । यताती है कि तत्कालीन लोक्तत्वों को सहज प्रकाशिका मीरा पी।

मीरा काव्य लोक्तात्त्विक अध्ययन / 145 (vi) राजरीतियों के प्रासगिक हवालों में एक ओर जहां लोकजीवन और लोक संस्कृति की चेतना मीरा के पदो मे व्यक्त हुई है, वहां प्रासगिक रूप से राज- रोतियो के भी कुछ सकेत मिलते हैं । मेडता मे यद्यपि राजरीतियो मे और लोक- रीतियो मे स्वरूपगत अतर नहीं था किन्तु चित्तौड मे था। चित्तौड मे राजघरान को शासन प्रतिष्ठा का परम्परित दर्जा मिला हुआ था। वैभवपूण जीवन, विलासितापूण उपभाग और साधारण जनो से अलगाव वहां की राजरीतियो के आधार थे जबकि मेडता नवस्थापित राज था जहाँ राज घराने और जाट, सरदार और भाई बधु कठिन सघप मे साथ साथ रहते थे। मेवाड मे राणा अपने थाल मे से कुछ सामग्री दाने मे रखकर किसी सरदार को दे सकता था और उसे सौभाग्य समझकर अपनाया जा सकता था, मगर मेडता की ओर ठाकुर सरदार और अय उत्पादक जन एक थाल मे भोजन करते थे। घनिष्ठता, सम्पक और समानता की यह रीति आज भा मारवाड के कई क्षेत्रो मे लोकरीति के रूप में देखी जा सकती है। मीरा वहां की उपज थी जिसे राज- वधू बनकर एक विपरीत रीतियो वाले समाज मे जाना पड़ा था जहां स्त्री, स्त्री का धूघट निकालती थी, बोलना तो अपमान करने के बराबर माना जाता था। नारी भावना के साथ 'हुजूरी', 'पाय लिपटान' जैसी रीति रही थी। मीरा के 'पदो मे इसीलिए 'दासी मीरा' और चरण लिपट परी' जैसे सहज प्रयोग हुए 'कभी ढाडी अरज करत हूँ", 33(5) "मीरा कहे मैं दास रावरी" (4), "तन मन धन गिरधर पे वारू, चरण क्वल मीरा लपटानी" (8)-मे नारी की समर्पण रीति और पुरुष के मुकाबले उसकी व्यवहार रीति के सकेत हैं । साधारण लोक जीवन मे तो पली परिवार के भरोसे रह करदुहाग की अवधि भोग सकती थी, क्तुि राजनीति मे राजवधू को प्रिय की प्रतीक्षा, दुख भोग और मोन बिलाप निभाना होता था । मीरा के कई पद ऐसा समेत करते हैं- "लोक कुटुम्बी गरजि बरहिं बतियाँ कहत बनाई" (10), यदि वैसी रीति का पालन न हो अथवा अयथा रूप से अपनी व्यथा को भुलाने की कोशिश की जाए । यदि प्रीतम कभी भूले भटके 'रीझ' जाएं तो बड भागण रोझ हो' (13) माना जाता था, वरना तो राजनीति मे-~जो पहिराव सोही पहिरू, जो दे सो ही खावू' 'जहाँ बिठावे तित ही बैटू, बैचे तो बिक जावू (17) वाली रीति का पालन करना पडता था। निरतर युद्ध और सघप में लिप्त राज पुरुषो की पत्नियो को सदा उनकी प्रतीक्षा ही रहती थी। यही प्रयत्न करने पडत थे कि-'तरोही उमरण, तेरो ही सुमरण' (18), करते रह कर "वोहि जेहि विधि मेरो साहिब रीझ, तेहि तेहि विधि कोजे हो"के उपाय करके उसे रिझाये रखना पडता या। यदि पति सेवा, पति आशा और स्थापित मर्यादा का पालन न हो तो राज- - * 146/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन रीति निभाने के लिए सुवचन, सीख आदि भी दिए जाते थे- "लाजे पीहर मासरो, माइ तणो मौसाल। सब ही लाजे मेडतिया जी, थां सू बुरो कहे ससार ।" वही (29) ~~-मेडता मे तो साधु सगति पर उनना अकुश नहीं था, मगर चित्तोड मे पा और राजवधू होने के नाम पर चित्तोड को प्रतिष्ठा मेडते मे भी निभानी जरूरी थी । इसलिए मीरा के सत्सग की टेक का जैसा विरोध चित्तौड में था, वैसा बाद मे मेडतियो ने भी किया ही होगा। राणे रोम कियो था ऊपर, साधा मे मत जारी। कुल को दाग लग ; भाभी निंदा हो रही भारी। साधार सग वन वन भटकी, लाज गमाई सारी। वहा पर थे जनम लियो छ, नाचो दे दे तारी। वर पायो हिंदवाणे सूरज थे झाई मन धारी । (30) -~-बड़े घर और बडे कुल की स्त्रिया की मर्यादा महलो मे रहने की और प्रतिष्ठा के अनुसार परदे म रहने की थी। उनकी प्रतिष्ठा इसमे थी कि- "पहिरो हार हजारी", रतन जडित आभूषण पहिरी", और "भोगो भोग सपारी" (30) । उसके साथ ही साथ अंचे चढि बाद अपने प्रिया का 'पप निहारों' (106) मोर "गेय रोप अखिपा राती करी।" (वही) कभी 'प्रीतम' आ जाएं या उनके आने की भनक मिले तो सिंगार कर, मोती चौक पूराने, आरतो सजाने (148) और मगल गीत गाने (54) तपा मोती रतन आदि की नेवछावरि करत' की राजरीत थी। और, न आएं या आवर भी न माएं तो-- "कारूगी पीर व गल कपा, रहंगो वैरागण होय रो। परियो पोर्स, मग विरोरू, कजरा मैं डास धोय री।" (48) -इस तरह अपने को 'दुहागन' बनकर जाहिर करने की रीनिथी। यह सावजनिक रीति भी थी कि प्रिय परदेस में हा' तो घर मेंधरा रखा जाता था। यही रोति राजपरानो में भी थी- "दीपर जोय बहा रह सजनी, पिय परदेस रहा।" (79) -इस तरह से मोरार पदों में तत्कालीन रामरीतियों और मोक्रीतियों के बुछ समेत मिल जाते हैं। सभी भय सोतो से पता लगता है 13(238) रिपरीति में पानी मिए पति का परमेश्वर मानन, प्रात उठकर उसका पनपने कोई शिकायत या शिकवा न ले, सब कुछ गहन प्ले और । ধনীর ধন যা সব মহি । দাদা, ল্যাগিন্নী मीरा-काव्य लोक्तात्त्विक अध्ययन / 147 को दुर्गुण माना जाता था। राजघरानो मे बहुपत्नी की प्रथा थी, इसलिए भी पत्नी को अपने पति को प्रतीक्षा करनी पडती थी। तदथ हर एक को पति को 'रिझाए रखने के उपाय करने पडते थे । पतिपरायण होने से और पति का विशेष स्नेह मिलने पर उसका राजनीतिक सम्मान भी बढता था । अवमानना की स्थिति मे 'महलो से उतार देने की रीति' भी थी। दास-दासियो मे कमी, भोजन पानी पर नियत्रण और सुख साधनो मे कटौती के साथ कभी-कभी 'हाथ खच के परगने' भोजन कर लिए जाते थे। अत राजपूती वधुभा को पूर्णतया परवश होकर रहना पड़ता था। (vi) लोकरीतियो और प्रयाओं के वक्रता विधानों मे मीरा के पदो मे राजरीतियो की तरह लोकरीतियो और प्रथाओ के सरेत भी अभिव्यक्ति माध्यम के रूप मे अयया विश्वासो, मा यता के आधार रूप मे बिखरे हुए मिलते हैं । इहें हम कुछ शीपका म रखपर देख सकते हैं- (क) ग्वतार मा यताओ के रूप मे, (ख) लीला धारणा के रूप मे, (ग) पुराण-मा यताओ के विश्वासो म, (घ) जीवात्मा दशन को मा यता मे (च) विवाह, विरह आदि के रीति सकेतो मे, (छ) जमातर से मुक्ति-चाह की धारणा मे, (ज) ससारी काय व्यापार-बनज आदि के सकेतो मे। हर समाज मे---देश काल के अनुसार-अपनी कुछ मा यताएं होती हैं जो सामाजिक जीवन प्रथाओ आदि के मूल मे प्रेरणा केद्र बनती हैं। मीरा के युग में भी युगयुगान्तर से आई हुई कुछ मा यताए रही होगी। जो उसके पदो में अनुभूति या अभिव्यक्ति के रूप में उभरी हैं- (क) अवतार मा यताओं के रूप मे पुराने समय से नाना मत मतात्रो ने ईश्वर के मूल रूप को अवतारो के रूप में अवतरित माना है और उसे सासारिक फष्टो, सघर्षों मे रक्षक की तरह स्वीकार किया है । मीरा के समय मे मेडता क्षेत्र मे-नृसिंह अवतार, चार भुजा और विष्णु अवतारो की लोकमा यता थी। उसके पदो मे इन अवतारो और उनसे जुडो पौराणिक कथाओ के सकेत स्तुति, प्राथना, विनय सम्बधी अनुभूतियो मे आए हैं—यथा-33(1), (63), (94), (65), (138) मे खास करके विष्णु अवतार की महिमा का बखान किया गया है । दूदाजी वैष्णव थे और चार भुजा (विष्णु) उनके वश परम्परागत इष्ट थे । मीरा के पदो मे, मत (एक पद को छोडकर),विष्णु का ही स्मरण हुआ है। ऐसे अवतारो को तरण तारण (61) लज्जा रक्षक (64)' 'कष्ट निवारक, (63) 'यारति हर' (65) के रूप मे स्मरण किया जाता है और उस माध्यम से 148/मोरा लोक्तात्त्विक अध्ययन हारी-थको आत्मशक्ति को सजीवन दिया जाता है। लोक में भी अवतार मान्यता बहुत गहराई तक जमी हुई है। (ख) लोला धारणा के रप में ईश्वर को जगनियता, मूत्रधार और सपालय मानने पो धारणा बहुत पुरानी है । उसमे अवतारो के साथ भी लीलाओं के विश्वास वैधे हुए हैं। पितु 'लीला' या बहुप्रयोग पृष्ण अवतार के साथ है। मीरा की भक्ति कृष्ण द्वित थी और उसके पदो से मवेत मिलता है कि उस समय कृष्ण लीलाओ मे बजतीला गोप) (164), बाललीला (165,66) मावन लोला (167), वशीलीला (166) नागलीला (168), चीरहरण लीला (369), रासलीला (172 73), पनघटलीला (174,75,76), फागलीला (177), दधिलीला (168,79), मयुगलोला (181,82 83), गोगलीला (184, 85, 86), सुदामालीला (188) का चलन हो चुका था। लीलाओ को ऐसी विविधता अप विमी अवतार के साथ नहीं थी। (ग) पुराण मान्यताओं के विश्वासों में अवतारों के साथ, उनकी स्तुति, वदना उनस सम्बधित उत्सवों, आयोजनो आदि के साथ पुराण मा यताओं के विश्वास भी जुडे हुए होते हैं। उन विश्वासों के बल पर ही, आज भी रामनवमी, दशहरा, रक्षावधन, हाली गणगार जस त्यौहार, पव, उत्सव आदि लोक जीवन में आयोजित होते रहते हैं । उसी तरह दान, पुण्य, नितनेम, व्रत-पालन, आदि लोक जीवन में क्रियाशील होते हैं। मीरा के पदो में ऐसे कुछ विश्वासों के सकेत मिलते हैं- । - चदा जाएगा, सूरज जायेगा, जायेगी अबासी। पवन पाणी दोनू ही जायेंगे, अटल रहे भविनासी 1 33 (20) मे अनत का विश्वास, मा घर तेरा, ना घर मग, गावं मीरा दासी । (वहीं) में असारता का, चोटी न कररयां जिवन मतास्या, काई करसी म्हारी कोई। मे शील को निभयता का, गज से उतर के पर नहिं चढस्या, ये तो बात न होई । वही (23). मे संसार की हेयता का, चरणामृत को नम हमारा नित उठ दरसण जास्या । वही (34) में नेय धरम का, झूठा माणक मोतिया री, मुठी जगमग जोति । मुठा सर आभूपणा रो, सांचा पियाजी री पोति । वही (25) मे ससार की अनित्यताका, मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन /149 छल विराणो लाख को है, अपणे काज न होइ । वाके सग सिधारतो हे, मला न क्हसी कोइ । (वहीं) वह होणो अपणो भलो है, कोढी कुष्टी कोइ । (वही) मे पतिनिष्ठा का, आटेज पूजे जोरज्याजी थे क्यू न पूजो जोर । मन बधत फल पावस्योजी, थे क्यू पूजे और । वही (20) मे 'पूजा परिणाम का, चोरी करा न मारगी, नहिं मैं करूं अकज । पुन के मारग चालतां जी, झक मारे ससार । (वही) मे शीलव्रत का, राणाजी म्हारी प्रीत पुरबली मैं काई करूं। वही (42) और "रामजी काज सवारिया, म्हाने भावे दरदन मार।" मे अतिविश्वास की धारणा है । - ऐसे अनेक विश्वास और ऐसी अनक धारणाएँ मीरा के पदो मे मिलती हैं जो उस समय के लोकमानस के घटको का हवाला देती हैं- "विप का प्याला राणाजी भेज्या, अमत कर आरोगो में" वही (40)~-भक्ति की निष्ठा और उसके सुफल का 'विश्वास' जमा हुआ बैठा है क्योकि, 'कर चरणा- मत पी गई म्हाने रामजी के विश्वास' वही (42) वाला विश्वास पुराणो से छन. छन कर लोक मानस मे गहराई तक उतर गया है। बकुठ जाना' और 'अपन साथ दूसरो को भी तार देना' का विश्वास भी उस समय था-- राठोडा रोधीवडी जी, सीसोदया र साथ । ले जाती बकुठ कू, म्हारी नेक न मानी बात । वही (पद) -और इप्ट के प्रति निष्टा की गहराई इतनी अधिक कि घर, द्वार, राज, परिवार छूटे तो परवाह नही-हरि रुस्या कत जाणा । वही (44) 'पूवज म' और 'पुनर्जन्म' भी मजबूत पौराणिक विश्वास था । आज भी है । 'प्रीत पुरवली में काइ करू' के साथ 'पूरबजनम की प्रीत पुरानी सो क्यूं छोडी जाय' वही (46) और 'मीरा के प्रभु गिरधर नागर पूरबजनम को कोल- -मीरा के पदो में व्यक्त है । इष्ट मे भरोसा भी अन य भाव से रखा जाता था कि पारी 'मारी ना मरूं, म्हारे राखण हारो और वही (47)। और इस दुनिया मे, जगत मे, घर-परिवार मे लोग मिलते हैं तो वह 'सुख रासि होती है मगर बिछुडते हैं तो सतापकारी होता ही है । पुराण मा यता जमी कि-'मीरा के प्रभु हरि अविनासी, मिलि विठुरो मत कोई री।' (48)- कितनी मगलमयी कामना है जो पुराण-मायताओं न हम दो है कि उसके बल पर - 150/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन - जीवन आशा किरणे फेंकता है और उनके भरोसे सतापो को, कष्टो को सहने की ताकत मिलती है। जब तक अपने का गुणहीन, अबला और नीचा न माना जाए तब तक इष्ट के प्रति एसा विश्वास और इतना भरोसा उपज भी तो नहीं सकता । इसलिए-- हर भक्त मैं गुणहीन गुण नहिं गुसाई, तुम समरथ महाराज ।' वही (51) --वेवल मीरा की बानी नहीं है। वह लोक जीवन की जड है और कवि में उसका रस स्रोत उजागर मिल जाता है । "भव सागर' का विश्वास, 'उससे पार पाने की कामना, उसके लिए 'भक्ति' व साधना' हजारो वर्षों से लोक चेतना के तत्वों में रही है। तभी भी सागर मे वही जात हूँ, वैग म्हारी सुघ लीजे हो। (53) कहकर मीरा उस लोक मा यता को अभियक्ति देती है। (घ) जीवात्मा दशन को मा यताओं में भारतीय दशन जीव को परमात्मा मा विकरण मानते हैं और कम के अनुसार जीव को चौरासी लाख योनियो में भ्रमणशील । तदुपरात यदि जीव मुक्ति' हो गई तो वह प्रकाश पुज मे एकाकार हो जाता है अ यथा पुन भवचक्र म फंस जाता है। यह दाशनिक मा यता लोक जीवन में बहुत गहराई तक धंसी हुई है, बहुत पुरानी है और सारे सांसारिक क्रियाकलापो अध्यात्म चेतना सदाचार व तिक्ता के मूल में भी है । मोरा के पदो मे यह नोक मा यता कई तरह से प्रकाशित हुई है-~~-"म्हारो जन्म मरण का साथी, थाने नहिं विसरूं दिन राती" 33 (86), से लेकर, "म्हारी प्रीत पुरवली में काइ कसै, और 'म्हारे भी भौ से भरतार' तक उसन इसी लाक मान्यता को अभिव्यक्त किया है। पुरवजनम को कोल' (19) मे भी वही मान्यता मुखर है । और, इस मामता के आधार पर ही मारा की भक्ति को टेक टिकी हुई है उसका 'प्रभु के मिलने का विश्वास टिका हुआ है और एकात समर्पण का दुराग्रह इसी जीवात्म दशन को मायता के माधार पर जीव 'दास है और परमात्मा 'तरणतारण है 33(1) वह परमात्मा 'सतन सुखदायो' है, 'भगत वछल (2) है और अविनाशी होने से उसरे विना जीव का कोई दूसरा आधार है ही नहीं, वह जीवन प्राण आधार' (4) है। उसे 'जीवा मर जडी (11) भी कहा गया है और यह भी कि 'हरि रूस्या क्त जाणा।' उस परमतरव को चाहे जिस रूप मजीवात्म भजे, लक्ष्य वही होता है कि 'भव सागर में यही बात हो, वेग म्हारी सुप लीजे है, मार्ग चाहे मजन का हो, सरसग का हो, साधना काहो। मारा के समय में नापपय सिद्धो और लोक देवताओं की सिद्धियो का भी मेहता ये लोकमानस पर गहरा प्रभाव था। मत मीरा ने पर्दो म जीवात्म दशन व निरगुनिया वस्व भी प्रकाशित हो गए हैं। - मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन /1511 वह 'जोगी हो गया है जो आसन माडि गुफा मे बैठा', 33(189) है । उसकी साधना बडा कठिन है और जोगी मे प्रीत करके' काहू न सुख लह यो क्योकि जोगी किसी का मौत नहीं होता। वह तो 'ज्याति स्वरूप होता है जिसकी साधना 'सुन महल मे दिवला जलाकर रात दिन बलते रहने मे हाती है। साधना सम्बन्धी 'ऐसे लोक विश्वास लोक मे आज भी हैं। (च) विवाह विरह आदि के रीति सकेतों मे उसी तरह सामाजिक और पारिवारिक जीवन की तत्कालीन लोक रीतियो छिटपुट सकेत भी मीरा के पदो में मिल जाते हैं । मीरा को 'अपने मनमोहन का 'बाका' रूप भाता है- 3317) जो बताता है कि वाके राजपूत समाग में आकर्षण के केंद्र रहते होंगे। 'टेढी पाग लर लटके' में किसी बाक राजपूत नवयुवक को देखा जा सकता है। सामाजिक रीति रही हागी कि राजपूत किशोरी इधर-उधर नजर न डाले, घर परिवार में पर्दानशीन रहे वरना लोग और कुटुम्बी सब टीका टिप्पणी करेंगे। राजघराने में तो वह मर्यादा और भी कठोर हाती थी-तभी मौरा के मुस्त व्यवहार पर-'लोक कुटुम्बी गरजि बरजहिं, बतियों कहत बनाई' 33(10)। ससुराल मे तो वह मर्यादा रीति और भी अधिक कठोर हाती थी, फिर चिनौर जसे राजघराने मे तो राजरानी को तो लाज रखनी हो यो । परतृ मीय टो- 'जेठ को कान न मानू घघट पड गई पटकी' (24) एसेम ही तोमरा कहा जाता था-~बड घर म जनम लियो है, नाचो दे दे तारी।' बर पायो हिंदवाणे सूरज, थे काइ मनधारी 1 33(30) यानी रीति थी कि 'बडे घर की बहू' असूयम्पन्या दरकार हमी मर्यादा रहती है। उसकी कुल मर्यादा की रीति थी zि77 लामपण' पहिरो और आपार भोगा का भोग करो। (वही) द्वारा मग, बांधे कठी माला' यानी 'साधु संगति' वहाँ प्रविधिमाधु मात पिता कुल मेरे, सजन मनेही ग्योनी' 2 ( 47 दि अलग यी-कि साधु सती का साथ करने में- 'लाज पीहर सासरों' यति ममबार, 'सबही लाज भेनिया ,दानमाई, (29) एक तरफ तो ऐसी रीति यो मन समय मगन होकर नाचन और घटना की वही (34) .

152/ मीरा लोकतात्विक अध्ययन , तथा छाछ का भोजन करना' 9(205-13) ऐसा पड मीरा के लिए था, सिफ इसलिए कि मीरा को राजरीतियो की कठोर मर्यादा स्वीकार नही थी और वह साधु-सतो से ज्ञान और भक्ति की अपनी लगन छोडना नही चाहती थी। राजपूत घरानो मे पति सदा युद्धरत रहता था और पत्नी उसके लिए शुभ कामना करते हुए प्रतीक्षारत रहती थी।'ऊँचे भवन चढि चढि पति का 'पथ दखना' और 'आने की भनक' मिलन पर 'मोतियन चौक पूरना', 'भारती सजाना' 'नवछावरि' 33(148) करना, 'मगल गाना' 33(54) ऐसी-रोति थी। और पत्नी का यही कुल धम था, यही उसका शील था और यही मर्यादा थी। दुहाग की स्थिति म या पति द्वारा उपेक्षित होने पर पत्नी को 'अनसिंगारे रहने', 'भूमिशयन करने और 'परासचित' करने की रीति थी। "फारूंगी चीर, वरू गल कथा रहूंगो वैरागण होइरी चुरियां फोड़ें, मांग बखेलं, कजरा में डालू धोइ री।' 33(48) या कि 'बास्या कस्या टूबडा ये भाभी और मिलेगी खाटी छाय। रो रो भूधा मरो ये भाभी, नही मिलेगो हरि आय । 9{205 13) वैसे ही विरह की स्थिति में दीपक न जोने', 'सिर के केस खुले रखने', सिंगार पटार न करने' और 'रूखा सूखा खान की रीति थी । वह आज भी मारवाडी गाँवो म मिल जाती है- सीप मर्यो पाणो पिय, टाक मरयो अन खाय । और घर म होते हुए भी पति 'पट न खोले' और 'मुख न खोले' 33((68) तो पत्नी के लिए मरणयोग ही बनता था कि वैसी स्थिति मे~'लइ कटारी कठ सरू, मरूंगी विप खाई' (वही) एसी रीति भी रही होगी। पति कामना के लिए गणगोर, करवा चौप जैसे व्रत उपवास तो सावजनिक थे और आज भी हैं मगर अन्तमिना की पूर्ति के लिए क्याए 'छागे लधन' 33(74) भी करती थी। आमतौर पर परदेस गए प्रीतम के सदस माने जाने वाले पथिको से मिलत रहत थे, भेजे भी जाते थे, जिनके हवाल पुराने लोक गीतो मे मिलते हैं-~-'बाट, वटाउदा म्हारा मायेला, ऐके सनेसो जइ वेजा रे। कि तु मीरा के पर्दो मे 'पतिपा भेजने' 33177) की रीति का हवाला भी है-- "पतिया में कैसे लिपू लिसि ही न जाय । कलम पटत मेरो कर वपत, हिरदो रह्यो पर्रा ।' 33(77), 9(123) मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/153 - 'सूरज का तप करना' भी 'पति मगल और मिलनेच्छा' के लिए एक रीति यो। 33(120)- इण सखरिया री पाल, मीरा बाई सापडे। सापड किया असनाना, सूरज सामी जप करे । और अन्तत विवाह सम्बधी रीति का भी एक प्रसग मिलता है जिसमे प्रासगिक रूप से 'क या को हल्दी चढाने', 'छापन कोटि जान' आन 'तारण बांधन' 33(27) को रीतियो के सकेत भी हैं। (छ) जमांतर से मुक्ति चाहने की धारणा मे लोक मे जीवात्मा को कर्म बधन में बंधा हुआ और भव सागर म आवागमन के चक्र म फंसा हुआ माना जाता है । यह बार बार का जम और मरण जीव का कष्ट है । उससे मुक्ति की धारणा दशनी से होकर लोक मानस में गहराई तक धंसी हुई है। हर भक्ति और साधना का मतव्य इसी मुक्ति की चाहना मे होता है । इसीलिए मीरा ने भी अपने पर- मात्मा को 'अगम तारण तरण' 33(1), 'सतन सुखदायी' (2), 'भगत वछल' (2), कहबर याद किया और "पिव के पलगा जा पौढूगी' (14), तारो अब मोहो' (15), 'चरणा लिपट रहूँ री' (18), 'धणीमिल्या छ हुजूर' (21), 'बडेघर ताली लागी रे (वही) 'जनम जनम का साया मनवा सतगुर सवद सुण जागा' (26), 'जनम मरण सू छुटको' (24), 'गिया अचल सुहाग' (27), अपनी कर लीज' (28), 'गिरधर जी भरतार' (30), भव सागर तट जास्या' (38), 'मीरा को प्रभु राख लइ छ'(41), 'जात मे जोत मिला जा'(50), 'लोज्यो कठ लगाई (73), 'अग से अग लागवौ हो (104) 'मीरा प्रभु गिरधर मिल, ज्यू पाणी मिल गयो रग' (105), क्ब हरि राखै पासडियाँ (108), 'जोत मे जोत रली (119) 'जम का फदा निवार'(132), 'आवागमन निवार'(133) "भव सागर तटि आयो' (157), जीव परम पद पावै' (160) 'जुगन जुगन से बिछडी मीरा घर मे लीन्ही लाय' (193), 'काटा जमको फासी' (194), 'भज उतरै भवपार' (196), 'साहब पाया आदि अनादि, ना तर भव मे जाती' (197), सुरत चली जहं मैं चली री' (201) -इस तरह की अभिव्यक्तियो से जमातर से मुक्ति को चाहना व्यक्त की है। ये सभी अभिव्यक्ति रीतियो लोक मे बहुप्रचलित है, चाहे कुछ मीरा को अपनी उपज हो सकती है-जैसे-'घर मे लीही लाय', सुरत चली रीजह में चली', मीरा को प्रभु रख लई छ । (ज) ससारी कार्य व्यापार आदि के सकेतों में भी मीरा की सामाजिक चेतना के कुछ हवाले उजागर हो गए हैं, जैसे कि मोल तोल के व्यापार-व्यवहार की बात- मैं तो लियो छै गोविंदा भोल' के प्रसग मे 'लियो छ तोल', 'लियो छ आखिन खोल' 33(19)। उसी तरह 'कब की ऊभी अरज करत हूँ, अरज करत 154/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन भयो भोर', वही (5) मे सामती युग की लोकचर्या और सामतो भूमिधरों की उदासीन वत्ति स प्रेरित व्यवहार का हवाला मिलता है । ग्वालो को वत्ति, व्यवहार, नटखटपन आदि के हवाले भी सभवत मौरा के अनुभव क्षेत्र से परे के नहीं थे, मगर उनमे सहजता और प्रत्यक्ष अनुभूति का अभाव जरूर है-~कालिंदी के तोर हो काहाँ गइवां चराय' (6) कहकर इति श्री कर दी गई है, मगर बाँके रजपूती के बाने' मे अनुभूति तीव्रतर है---33(7) म 'टेढीपाग लर लटवे' के साथ हर बात मे 'बाकाना' है । लोक चेतना की सजगता यहाँ मुरार जान पडतो है । ऐसी बात भी हम नहीं कह सकते कि मीरा 'पत्नी धम या स्त्री धम' के लोक व्यवहार से शूप थी । यदि वैमा होता तो प्रेम भक्ति की उसकी अनुभूतियो मे एकातनिष्ठा, समपण और अकुलता के तत्व प्रभावकारी नही बनत । कुछ एक पदो में अभिधात्मक रूप से भी स्त्री-व्यवहार के हवाले मिलते हैं 'जिहि जिहि विधि रोझे हरि, सोई विधि कीजे हो । (13) 'जो पहिराव सोई पहिलं, जो दे साई खाके । जहां बिठा तित ही बैठू, बेचे तो बिक जाऊँ।' (17) वितु जब वह कहती है कि 'लोक लाज कुल को मरजादा यामे एक न राखू गी' (14) तो इससे यह भी ध्वनित होता है कि वह निता त व्यवहार शूय' नहीं थी। नृत्य वाद्य आदि के व्यवहारा का हवाला भी मिलता है और भजन कौतन मे चुटकी देकर मगन होने लोक व्यवहार का भी~'नाच्या दे दे तारी' हाली मवाली, कामदार, सरदार, वैभव, वैभवहीनता राजकाज सम्बधी और वित्त व्यवहार सम्बधी लोक व्यवहार के हवाले भी मिल जाते हैं.-- "हाल्या मोल्या स काम नहीं रे, सीर नहिं सिरदार । कामदारों सू काप नही रे, मैं तो जाय करू दरबार । काच कथीर सू काम नहीं रे, म्हारे लोह चढे सिर भार । सोना रूपा सू काम नहो रे म्हारे होर रो बोपार ।" 33(21) ससुराल मे सास-बहू की कान, घुपट, मरदाजा के व्यवहारो का भी हवाला मिलता है-'मास-बहू को काण न मानूं घूघट पड गई पटवी।' (24) लोर व्यय हार की नीति 'आप काज महावाज' के हवाले भी मिलते हैं--- "लूण अलूणो ही भलो है अपणे पिया वो साग।" और पालर अपणो ही भलो ह, जाने निपजे चीज।" तपा वर हीणो अपणो भलो है कोढ़ी चुप्टी बाय । 'चौमास्ये मी बावडी और बहत निर्झर का पानी' (28) इनमे सुद्धता स्वास्थ्य और निश्छलता वे लोर व्यवहार का हवाला भी है और लोक प्रतिष्ठित ।

मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन/155 सदाचार के हवाले भी हैं- 'चोरी करो न मारगी, नहिं मैं करूं अकाज । पुन के मारग चालता जी, झक मारो ससार । (29) मारवाडी लोक मे 'राजा-ठाकर के अत्याचार होते तो किसान महाजन आदि राज त्याग कर चले जाते थे। यह लोक व्यवहार मेडता की स्थापना के समय भी चरिताथ हुआ था कि जालोर, सिवाना, नागोर, अजमेर पटटे के लोग वहां आ आकर बसे थे। 'राजा म्ठे नगरी राखं' वाला लोक व्यवहार मीरा के पदो मे भी आया है-- राणो जा रूल्या, वारो देस रखासी । हरि रूठ्या क्त जास्यां हो माई । (38) तौर-तरकस, पटार जैसे अस्त्र शस्त्रो के व्यवहार के हवाले भी मीरा के पदो म हैं । वे सहज अनुभव आधारित ही हैं । 'अपणे घर का परदा कर ले' (41), मे 'परदे के व्यवहार' की अतिरजना है और घोडोली बहुओ के प्रति 'पहरा, चौकी' ये लोक व्यवहार का हवाला भी है-- "पहरा भी राख्या चौकी बिठादयो ताला दियो जडाई।" (46) आवागमन के साधनो मे सांडिया भेजना, केटो पर भार क्सना, रीया (नागौरी) बलो के रथ जुतवान का हवाला भी है (47) और 'पतिया भेजने' के दूत का भी । घर आए प्रीतम पाहुने के आदर सत्कार का लोक व्यवहार भी है- 'मोती चौक पूरा वाल्हा, तन मन तो पर वारी (54) और रुग्णता आदि के समय 'वैद गिरी' का भी हवाला है-'बाबल बंद बुलाइया रे, पक्ड दिखाई म्हारी बांह' (74)। पिय के परदेस' रहने पर 'दीप न जलाने का मारवाडी लोक व्यवहार तो है ही' (79), 'देस-परदेस मे सदसा पहुंचने का देसा' भी व्यक्त हुना है। (78), 'आने वाले के स्वागत मे डगर बुहारने' का व्यवहार भी है (102), और नगर में घोषणा ढिढोरे या ढोल की चोट पर होती थी (वही) इसका सकेत भी है । हाथी और अकुश (106) पाराधि और मृग (105) ऋतुओ के अनुसार पव, उत्सवो के व्यवहार (116), लिय लिख पतियां सदेसा भेजना (123), चाकरी म खाली दररान और सुमिरन पाना यानी बेगार (154), के सकेत भी यत्र-तत्र हैं । तुलसी और हरिदास की तरह मीरा ने भी अनुभव किया था कि-'लोकडिया राम नाम लत लाज मरेछ (161), गांव मे लोग इधर उधर डोलते फिरते हैं मगर हरि- मदिर जाते उनके पैर दुखते हैं, घर का काम धाम छोडकर वे झगडे फसादा का नाटक देखने जरूर दौड जाते हैं । भांड नट, भावी, गाणिकाओं के नृत्य में रात रात भर बैठे रहते हैं मगर भक्ति भाव म उनका मन नहीं लगता। (वही) तथापि लोकताविक अध्ययन - सभवत गावो मे प्रात कालीन लोक व्यवहार जल्दी उठकर दूध दुहने, दही बिलौने और छाछ की मटकियां भर कर मालिको के यहां पहुंचाने का चलन काफी आम था (168)। इस तरह से चतुर्दिक ससारी व्यवहारो के सकेत मीरा के पदो मे आए हैं जो उस समय के लोक जीवन के कुछ चित्र प्रस्तुत करते हैं। और इन चित्रो की प्रस्तुति मे तथा अपनी अनुभूलियो मे लोकतात्त्विक प्रभाव लाने के लिए मीरा ने कुछ ऐमी रूढोक्तियो का प्रयोग भी किया है जो भाव विशेष या स्थिति विशेष के लिए लोक शैली मे परम्परा से रूढ हो चुकी मालूम होती हैं । (vin) ढोक्तियों के प्रयोग मे समाज सावजनिक अनुभवो अनुभूतियों, लोक व्यवहारो, कामनाओ आदि की अभिव्यक्ति के लिए कुछ भाविक प्रयोगो को रूढ बना लेता है । ऐसी रूढोक्तियां हमे लाक-काव्यो मे, लोकगाथाओ मे मिलती हैं । वे अपना विशिष्ट प्रभाव रखती हैं- यथा-- जिणि देसे सज्जण वसइ, तिणि दिसे बज्जउ बाउ । उआ लगे मो लागसी, क ही लाख पसाउ। (ढोला मारू) चिता अइण ज्यां नरा, त्यो द्रिढ अगन पाइ। (वहीं) पति लुप्प लुप्पै जनम, पति बच बचाइ । (पृथ्वीराज रामो) पिय भाग तिस अहरै सोये सक्ल सरीर । वह रजपुतनि कुक्करी, सुमतन कही जहीइ । (परमार रासो) अहो आदि मातपिता भूल जान, पछ तोरण आठ सटठ प्रमान । (पथ्वी रासो) मातु हेत पितु तजिप, पिता के हेत सहाहर । (रतन बादनी) गानिका गनिक काव्य की ठग विद्या परवीन । (पृथ्वी रासो) मरदा सेती पग मदन अस्थि समापन हत्य। (पृथ्वी रासो) सती सूरमा पुरुप को मरतहि मगल होय। (हम्मीर रासो) तीन सहस रजपूत साइ ममल घूमे खडे । कृयाण को सूत, राम नाम मुखते रटें। (गोरा बादल की कपा) बारह भूसन सजे सुहागन, औ कहिके सोलहसिंगार। (अल्हा पड) परि तीन बसनान, ध्यान गोरख को धायौ। (रासो) भूम सेज सुख सयन गग महल पर धारय । (पृथ्वी रासो) हिपहउ रतन तलाव ज्यू फुटी दइ रिस जति (ढोला मारू) सादिकलेजउ आपणठ भोजन दिउली तुगा (वही) पहु तन जारी मसि करू, धूमा जाहि सरग । मुन्त प्रिय बददल होइगरि बरस बुझाइ अग्गो । (वही) मोरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन /157 सज्जण गुणे समुद्द तूं, तर तर यक्की तेण । अवगुण एक न सभरइ, रहूँ बिलबी जेण । (वही) ऊंची चढ़ि चातुगि जिउ, मागि निहालइ मुन्ध । (वही) सुसनेही समदा परइ, बसत हिया मझारी (वही) बावहिया निलपखिया, बाढत दइ दइ लूण । (वही) प्रिउ मेरा मई प्रिउ की, तू प्रिउ कहइ सकूण । पथी हाथ सदेसउद, धण विक्लती देई । (वही) जोवण हस्ती मद घढयउ, अकुस लइ धरि आइ । (वही) दादुर मोर टबक्क घण, बीजडली तलवारि। सूती सेजइ एकली, हइ हइ दसू म भारि । (वही) हइ रे जीव निलज्ज तू, निक्स्यू जात त तोहि। प्रिय बिछुडत निवस्यउ नहि, रह्यउ लजावण मोहि । (वही) विरह महाविस तन बसइ, ओखद दियइ न जाइ। (वही) आजे रली बधामणा आजे नवला नेह । सखी अम्ही णी गोठ मइ, दूधे बूठा मेह । (वही) वाही थी गुण वेलडी, वाही थी रसवेलि। (वही) ओछइ पाणी मच्छ ज्यू, वेलत ययउ विहाण । (वही) विरह बाध वनि तनि वसइ, सेहर गाजइ आह (वही) दीह गणता णह घस्यां । (वीसल दे रासो) --इस तरह की रूढोक्तियां अनुभूतियो के साधारणीकरण में सहायक होती हैं और लोक मे गहराई के साथ असर करती हैं। मीरा के पदों में भी ऐसी रूढोक्तियो का प्रयोग मिलता है । उहे हम कुछ शीषको मे रखकर देख सकते हैं--- (अ) दाशनिक और धार्मिक पक्ष मे, (ब) सामाजिक और नतिक पक्ष मे, (स) वियोग और शृगार पक्ष मे, (अ) दाशनिक और धार्मिक पक्ष मे इस पक्ष मे जीवात्मा या भक्त के लिए 'दास' और परमात्म के लिए 'प्रभु के प्रयोग की रूढि प्राचीन है। मीरा के पदो मे छाप है--दासी मीरा लाल गिरधर', 33(1) मीरा के प्रभु गिरधर नागर', 33(12) मीरा कहै मैं दास रावरी' 33(4)। जहाँ प्रेम भक्ति मे विरह और आकुलता व्यक्त होती है वहाँ जीवात्मा को 'जोगन', बैरागन' कहने को रूढोक्ति प्रेम काव्यो मे भी मिल जाती है-'बालजी, में बैरागन हूँगी हो' और 'फारूंगी चीर करूं गलकथा, रहूंगी बैरागन होइ री', 33(48) वैसे ही सत पथ मे 158/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन परमात्म के साथ सुरति-निरति का खेल करना, सुन्न महल मे पिया के साथ एका- कार होना सहज सुमिरन करना ये सब रूढोक्तियां मीरा के पदों में मिल जाती "तेरो ही उमरण तेरो ही सुमरण, तेरी ही ध्यान धरूं री।" वही (18) "सुरत निरत का दिवला सँजोले, मनसा की करलें बाती। प्रेम हरी के तेल मगा ले, जगे रह्या दिन राती।" (20) ससार की असारता सम्बधी रूढोक्तिया भी- चदा जायेगा, सूरज जायेगा, जायेगी धरणि अकासी। पवन पाणी दोनू हो जायेगा, अटल रहे अविनासी । (वही) और 'ना घर तेरा ना घर मेरा, गाव मोरा दासी ।" (वही तो सूफी काव्यो से लेकर लौकिक कहावतो तक मे देशव्यापी रूटोक्ति है । भक्ति मे मीरा ने दरबारी रूढोक्ति भी डाली है-'कामदार सू काम नहीं रे, मैं तो गाय करू दरबार' (21)। यह वैसी ही रूढाक्ति है जैसे- "गग जमुन सो काम नही मेरे भयो समद सू सीर ।' (वही) भक्ति की सापेक्षता मे जगत को 'चौमास्यां की चावडी' (28) कहना, 'छोलग्यिा' और 'डाबरियाँ' (21) 'बाह को बाटो (34) कहना भी प्रसिद्ध रूढोक्तियाँ हैं । उसी तरह 'अमृत प्याला छोडिक कुणपीव कडुबो नीर (20) भी रूठोक्ति है । सांसारिक सुख सुविधाओ को नकारने के लिए उनकी तुच्छता व्यक्त करने के लिए उहें कांच कथीर', मोती माण' पट पाटम्बर' (25) कहकर व्यक्त करना भी सदोक्ति है । सांसारिक सम्बघा के परिहार को टूट गया ज्यू तागा' (26) कहने की रीति है तो 'शोल, सदाचार' को चूनड' (30) कहा गया है। सांकही गली मे प्रभु का मिलना या सतगुरु का मिलना (36) ताकि वापस न लोटा जा सके, भी रूढोक्ति है जिसके अप रूपो म 'भरी सराय रहीम लाखे वाली अभिव्यक्ति भी है। भक्ति मे परीक्षा और परीक्षा में खरा उतरने की अभिव्यक्ति के लिए 'वचन दहत अगनि मे निकसतावारवाणी (41) वाली रूडोक्ति है तो भक्ति की मग्नता लिए 'अमल' को-यो ता अमल म्हारो कबहू न उतरे' (44)। धार्मिक पक्ष में मीरा ने 'जोगी प्रकरण में प्रिय से एउमेर हान मोम्यजना के लिए प्रेम काथ्यो की इस रूटोक्ति का उपयोग किया है- को - मोरा-पाय लोकसायिक अध्ययन / 130 अगर चरण को चिरा बना, अपने हाय लागे। इल दल मई मनन को रो पणे अगम (50) भक्ति मार्ग को कठिनाई के लिए, पप सुहेलो, भासा ओघट पाट', (49) लोकगार से' (72) तो रूटोपितो का उपयोग है तो उस मार्ग में बाधा रनने पाले 'विच्छन में करें', (37) 'सूल' (45) कहे गए हैं। जैसे प्रेम काथ्यो में नचिका चातक' और 'पोह' की तरह मुरलाती है, वैसे ही मौरा की भक्ति में ज्यूंचानक धन को स्टे मीजिम पाणो हो' (57) कौरवोषित आई है। परम नत्व के दर्शन बिना दरद दिवाणी होना' 'तलफ तलफ ज्यि पाना तो बहु प्रचलित रूठोक्ति है मार मीरा ने 'ले कटारी कठ सरला' और विष खाकर मरने' (68) का भी रूटोलित प्रयोग किया है। जोवात्मा के लिए परमात्मा तो एक ही है, 'जीवात्मा' लाखो है। इस दार्शनिक अर्थ के लिए रूढोक्ति है-'तुमसे हमकू एक हो हमसी साख करोर'। इसी उक्ति का अन्य रूप है-म्हें सो पुरी हो, धोके भलो छ पणेरी, तुम हो एक रसराज (109)। ---दशन और धम के पक्ष की ऐसी कोक्तियाँ पुराने समय से पसी भाती हैं और मोरा के बाद ये भक्तो में भी उसका पला मिलता है। (ब) सामाजिक और नैतिक पक्ष मे उसी तरह सामाजिव पोरगतिक जीवन में भी रीति-रिवाज, व्यवहार मीसि से सम्बधित सदोनितयो का पता है । जिस समाज मे राजा शाही और सामतवादी परम्परा रही हो, महा रोटे की उपेक्षा बडो द्वारा होती है। परती से पति बड़ा है और भारी भगवा इसके लिए अन्तनिहित वेदना व्यक्त करोषी रूहोवित है- "हम चितवत तुम चिरायत गाही," और "तुमसे हम माबरे मिलोगेसी लाख करोरि ।" (5) रैदास में भी यही रूदोकित है । इसी का एमा REritra- काव्यो मे मिलता है--'सज्जन, गुणे समुद्र सू, तरतर पनको सैण, (ant पारू) इसलिए बडे के हुजूर मे बड़े होकर भी जाती है। यह समातिन रात मीरा मे भी है--"ऊभी ठाढ़ी मरण पररा है," (पही) और "भरण को भोर हो जाती थी" तब भी सुनयाई' ही होती थी | सातपाषी समाण में पा 'हजूर' "बडभागण रीता था।"(13) भक्ति या प्रेम के मार्ग मे सामागिन' गर्याया, मुरा गौग्य मावि tirtोरो ही आए हैं। ऐसे प्रमगो मे लोरव्यवहार के प्रति मोनितयों जाना ही है । लोक पुदम्बी गरजि यरजहिं, बतिया पहरो पाई। (10) महारगी। ने उसका हवाला दिया है। जब तर बाधाएं नहीं होती, परीक्षा नहीं होती, तक प्रेम या लगन की तीव्रता भी नहीं उगरती । इसलिए--"मुरा मुटुकी लग 160/ मीरा लोक्तात्विक अध्ययन बैठे, मानहुँ मधुमाखी" (22) वाली रूटोक्ति है। इसीलिए प्रेम काव्यो मे "प्रेमी के प्रति रसवेल बड़ी कठिनाइयो से बोई जाती है और उसे आसुओं से सीधा जाता है। प्रेम काव्यो मे-- "वाही थी गुणवेलडी, बाही पी रसबैलि" और मीरा के प्रयोगो मे~~~ "असुक्न जल सोचि सौंवे प्रेम वेलि बाई।" लोक मर्यादा में पति के प्रति एकांगी निष्ठा वही महत्वपूर्ण मानी जाती है.-"वर होणो अपणो भला कोढी दृष्टी कोय।" और "ताके मग सिधारता हे भला कहै सब लोप।"(25)-ऐसी रूढोक्ति का प्रयोग है । और प्रेम के पथ पर घर-बार, Tात रिपते तो टूटते ही हैं । उसरे लिए रूढाक्ति है-~"मातपिता सुत कुटुम कबीला टूटि गया ज्यू तागा ।"(26) 'सत्यमेव जयते' वाली बात जैसे सामाजिक जीवन में है वैसे ही प्रेमियों के प्रेम माग मे भी है । 'सत्' पर अडिग रहने वाली भीरा इसीलिए प्रयोग करती है ~~चीरी करान मारगी जी, नहिं मैं करूं अकाज । पुन के मारग चालता जी, झक मारो ससारा (29) ऐसी नैतिकता कभी हार नही मानती जिसमे- 'भाव भगत भूखण सजे सील सतोक सिंगार।"(30) -~-और ऐसा आत्मबल होता है तब चाहे प्रेमिका हो, चाहे भक्त हो, चाहे साधक हो वह 'टेक' पक्ड लेता है और उस टेक के लिए वह चाहे 'नाम बिकाने' चाहे प्रेम विकाने, चाहे 'गिरधर हाय विकानी', चाहे 'सता हाथ विकानी'(30) की रूढोक्ति काम मे लेता है क्यादि जब 'विक हो गया तो उस पर 'घर षणों' का या अमानतदार' का क्या जोर चलेगा ऐसी बेबाक अवस्था मे ही 'पर्दा चाहने वाले के लिय' रूढोक्ति होती है-'छोड दई कुल की कानि, कहा करि है कोई, मा कि 'अपणे घर का पर्दा कर ले ।(41) 'छीजन' का आशय व्यक्त करने के लिए रूढोक्ति है... मीप मर्यो पाणी पिवे रे, टाय भर्यो अन खाय ।(47) यह विरह मे भोजन न भावे' को रूढाक्ति की पोषक उचित है । समाज मे निवल पणो के मुकाबले 'सबल घणी'(47) का साथ जिक्ता प्रदान करता है, उसी तरह 'गवण हारी (47) कोई और हो तो ढोक्ति बनती है.---'थारी मारी ना मरों (47) स्पोकि सामाजिक मा यता है कि मरना जीना तो परमात्मा के हाथ है। सामाजिक और नैतिक मान्यताओ के वशीभूत किशोररियो का इधर उधर भटक्ने से सावचेत किया जाता है-"पद्धती वैस, नण अगियाले घरि घरि मत डोल। (62) पष्ट पर कष्ट पड़े तो 'दाध्या पर सूण लगायो '(83) का प्रयाग है यह लोक में मुहावरे की तरह भी प्रचलित है । और 'मदमाता हाथी अंकुश से ही वश मे आता है' इस नैतिक सत्य को सदोक्ति का रूप दिया है- -- मीरा-कार्य लोकतात्विक अध्ययन /-161 "यो मन मेरो बडो हरामी, ज्यू मदमाती हायो। सतगुरु दस्त घरयो सिर ऊपर अंकुस दे समझाती (105) यही उचित प्रेम गाथाओ मे है- "जोबण हस्ती मद चढयड, अकुस लइ परि आइ.।" (ढोला माल हाथी हो तो अकुश से वश मे करे, घोडा हो तो पागडा डाल दे, मगर 'प्रीतम चचल हो तो रूढोक्ति है-जो तुम जाबो मेरी बाखरियां, जरि राखू विवारिया।"(165) इस तरह प्रचलित सामाजिक नैतिक मा यताओ के लिए कुछ प्रसिद्ध और कुछ मौलिक रूढोक्तियो के प्रयोग मीरा के पदो मे मिलते हैं। (स) पियोग और सिंगार के पक्ष मे प्रेम काव्यो म शृगार और वियोग के 'पक्ष ही प्रबल होते हैं । मीरा का शृगार और वियोग अव्यक्त सत्ता के प्रति है जिसमे भक्त की मर्यादा सीमा रेखा बनाती है । इन पभा मे कुछ ऐसी रूढोक्तियाँ हैं जिनका प्रयोग मीरा ने भी किया है-ऐसे प्रयोग के अवसर वियोग वेदना के तीखेपन मे, उपालम मे, नाकुलता म, प्रतीक्षा मे, मिलने की आकांक्षा में आए पिया के बिना 'सब जग खारो लागत'(16) भोजानिया नहिं भावे', 'नोदलडी नहिं आवे" तो बहुत अभिधामूलक हैं और ज्यादातर इही रूढोक्तियो का प्रयोग मीरा के पदो मे हुआ है, किन्तु इनके साथ जहा 'अब काहे को लाज सजनी (22) 'छाडि दई कुलको कानि' जैसी रूढोक्तियां सम्पुष्ट देती हैं वहाँ अनुभूतियां तीव्रतर हो जाती हैं । 'राज किये ज्यांना करणं दीज, 'महल अटारयो हम सब त्यागा' जैसी उक्तियों से भी अनुभूति सघन हो जाती है ! भक्ति की टेक को प्रखर बनाने में 'मल मेरा सीस लहो'(31) 'सबका मैं बोल सहू (वही), 'कोई निदो कोई बिदो'(35) जैसी रूढोक्तियां भी आशय को सबल बनाती हैं क्योकि वे लोक- धरातल और भाषा के प्रयोजन मूलक रूप मे से उभरी हुई हैं । 'काजल टीकी स्यागने' मौर भगवा चादर पहनने'(37) मे विरोध वक्रता आशप को कई गुना बढ़ा देती है। 'विप को प्याल्लो' और नाग गले मे पहिरिया'(42) वाली रूढाक्ति तो इतनी प्रखर हो गई है कि लोग उमका इतिवृत्त तक खोजते रहे हैं जबकि "वियोग' के प्रलाप मे ऐसी इच्छा प्रेम काव्या मे आम बात है । अतर इतना ही है कि वहाँ ऐमा काम खुद वियोगी करता है और मीरा के पदो मे वह काम 'राणा' कर रहा है । 'विरह महाविस तन बसई-को रूढोषित तो ढाला मारू मे कई बार माई हो इसी तरह से 'मरूगी कटारी मार, "जोगण होय सरू चहुँ ओर,' 'तेरे कारण जोगण हूँगो' रहूंगी बैरागण होइ री-ऐसी रूढोक्तियां जैसे प्रेम क्याओ में आती हैं, वसे ही मीरा के पदो मे भी हैं । बल्कि उनसे भी आगे-- अगर चुदण की चिता वणाऊँ, अपणे हाय जला जा। जल बल मई भसम को ढेरी, अपणे अग लगा जा (50) 162/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन जैसी रूढोक्ति में एक नवीनता भी है जो प्रेम गाथाओ को रूढोक्ति से काफी भिन्न है- यह तन जारी मसि करूं, धुआ जाहि सरग्ग। मुझ प्रिय बददल होइ करि, बरसि बुझावइ आगी । (ढोला मारू) "चे चढकर प्रिय की प्रतीक्षा करना" जैसी प्रेमगाथाओ मे हैं वैसी ही रूढोक्तियां मीरा के पदो मे हैं-'ऊंचे चढि चानगज्यू मागि निहालइ मुध" जैसे ढोला मारू मे है, मोरा मे उसकी छाप है-'निस दिन जोऊ बाट पिया की' (73) 'कबकी ठाढी मैं मग जोऊ' (79), 'निस दिन पिव को पथ निहालं,(91) 'म्हेल चढे चढि जोऊँ म्हारी सजनी (141) ऊंची चढ चढ पथ निहार ।'(106) विरह में 'प्राण न छूटने का खेद भी प्रेम गाथाओ की तरह मीरा के पदा मे रूढोक्ति बद्ध होकर आया है। मीरा के प्रयोगो मे-"पिंड मा सू प्राण पति निकासि क्यू नहिं जान' (68) ता प्रेम काव्यो मे है-'हह रे जीव निलज्जनूं निकस्यू जात त तोहि (ढोला मारू)। सावण, पपीहा मोर प्रेम गाथाओ मे और मीरा के यहा भी विरह निवेदन की समान रूढोक्तियो वाले बन कर आए हैं।- दादुर मोर टवक्क घण, बीजउली तरवारि । मूती सेजई हेकली, हइ हइ दइव न मारि।-प्रेम काव्यो मे है तो मीरा के यहाँ भी-'सावण कह गए अजहूँ न आये।(69) 'दादुर मोर पपीहा बोले दामिन दरक डराव'(76)-जैसी रूढोक्तियां हैं । उधर 'पपी हाय सदेसडो' मारू भेजती है तो मीरा भी वैसी ही रूढोक्ति से 'पतिया मैं कैसे लिखू बनाय'(77) अपनी अनुभूति प्रकाशित करती है। उधर विरह वेदना की असता मे मारू--- 'कादि क्लेजर आपणउ भोजन दिउली लुज्य कहती है और 'कागा सव सन पाइयो चुन चुन खइहो मांस । दो नैना मत पाइयो, पिया मिलन की वास। वाली नायिका भी प्रेम-गायात्रा महै तो मीरा के पदों में भी वैसी ही रूढ़ो- क्तियों हैं- 'कादि कलेजो में धलं रे दौवा सू से जाइ। ज्यो देसी म्हारे पिव बस व देये तू याइ।'(74) और 'लेइ पटारिका सरइ, मरूंगी दिप याद।(68) पपीहे मी घोंच मागको दायित भी मीरा रे पदो म सोर मानस का बिम्ब बन रमाई है-- मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/1633 "बाबहिया निल पखिया, बाढत दइ दइ लुण । प्रिउ मेरा मैं प्रिउ की, तू प्रिउ कहइ स कूण।" (ढोला मारू)- वैसे ही मीरा के यहां- पपइया रे पिव की वाणि न बोल । सुणि पावली विरहणी रे, थारी राखली पप मरोड । चाच कटाऊँ पपइया रे ऊपरि कालर लूण । पिव मेरा मैं पिव की रे तू पिव कहै स कूण ।(84) उधर बीसल दे रासो मे विरहणी के नख दिन गिनते गिनते घिस जाते हैं तो मीरा के यहां भी- गिणता गिणता घस गई रेखा, आंगकिचा की सारी ।(78) दोनो ही तरफ 'विरह नागण काया डसती है (76) और 'बाघड विरह (120) सताता है। दोनो ही तरफ 'रसबेल , मीरा के यहां, 'प्रेमबेलि' बोई जाती है और चातक, मीन, चकोर के प्रतीको का उपयोग रूढोक्तियो मे किया जाता है। इस तरह से विरह और शृगार के पक्ष मे मीरा ने लोक मे प्रचलित रूढी- क्तियो का प्रयोग किया है जो उसके पदो को लोक मानस मे पैठने लायक बनाते 3 लोक सस्कृति के तत्त्व कवि अथवा भक्त अपने समाज और संस्कृति की उपज भी होता है और उसका वाहक भी होता है। समीक्षाकारो ने लोकसस्कृति की खोज करते समय कविता मे शकुन, धारणा, विश्वास आदि के सकेत और समावेश ढूढने के उपक्रम किए हैं। आम तौर पर इस के अन्तगत (1) शकुन, (1) स्वप्न, (II) सदाचार धारणा, (iv) कमवाद (v) भाग्यवाद, (vi) नेम धरम, (vii) जतर मतर टोना टोटका, (vii) ज्योतिष प्रकृति (1x) सयुक्त परिवार आदि बातें खोजी बताई जाती हैं । ये बातें पूर्व मध्य युगीन समाज तथा सामती लोक जीवन के सास्कृतिक तत्वो मे गिनी जाती हैं। मीरा के पदो मे भी इनके बिखरे बिखरे सकेत मिल जाते हैं () शकुन लोक जीवन मे शकुनो पर पूरा शास्त्र बना हुआ है । मग उपागो के फडकने धडकने से लेकर छिपकिली, चिडियाएं, ब्राह्मण, हरिजन, महाजन, आदि, जातियो, दूध, दही आदि पदाथ और पशु, पक्षी से लेकर जीवित मृत चीजो तक को शकुन-अपशकुन से बांधा गया है। मीरा को 'पदावली'(33) मे शकुन का सकेत देने वाला कोई पद नहीं मिलता, कितु एकाध पद मे 'कागा को सदेश वाहक और शकुन वाचक 164/मीरा लोक्तात्विक अध्ययन आज, । बनाया गया है-'बाग उहायत दिन गया, बूझू पिंडत जोसी हो।'33(116) उसी तरह 'मीरा' (9) ये प्रामाणिक गोपर वाले पदोम भी गकुन परक समेत नाम मात्र को और प्रच्छन्न हैं-'यारा सबद मुहावणा हे जो पिद मेल्या पाच मढाऊ यारी सोवणो रे, तू मेरे सिरताज । 9(41953) कौए को सदेश वाहक भी बनाया गया है-'प्रीतम पतिया लिखू, पउवा तू ले जाई (वही) (1) स्वप्न भी लोक संस्कृति का शकुन परव एक तत्व रहा है । मीरा के पदो में एकमात्र स्वप्न प्रसग है जो उसकी अति मानसिक अवस्था बताता है कि 'भाई म्होंने सुपने मे परण गया जगदीस 133(105) उसके स्वप्न मे बरात भी आती है, हल्दी भी चढ़ती है, तोरण भी बघता है और मीरा उसे सच मानकर अपने सुहाग को अचल मानती है । इसके अलावा स्वप्न का कोई सकेत नही है मात्र एक पद में सपने से चौंकने की बात है-चमक उठी सपने सुध भूली ।(76) (m) सदाचार धारणा शील सतोष, सदाचार की धारणा लोक तत्वों का एक महत्वपूण घटक है। सामाजिक जीवन, सहयोग, परमाय, आत्म कल्याण की आवश्यक्ता-वश सदाचार और शुद्ध जीवन की धारणाएं विकसित हुई होगी। मीरा के पदो में इस लोक्तत्व के काफी प्रयोग मिलते हैं--- "भगति देख राजी हुई जगति देख रोई।" 33(15) "चोरी न करस्यां न जीव सतास्या, काई करसी कोइ म्हारो।" (23) 'कालर आपणो ही भलो, जामे निरजे बीज।' (25) "छल विराणा लाख को हे मपणे वाज न होय ।" (वही) वर होणो अपणो भलो है, कोढी कुष्टी काय।" (वही) 'चोरी मरा न मारगी जी नहिं मैं करू अकाज।" पुन्न के मारग चालता जी भ मारो ससार।" (29) "भाव भगत भूपण सजे सील सतोख सिंगार।' (29) 'मान अपमान दोउ घर, पटके, निकसी हूँ शाय गली।" (32) " चढती बैंस नण अणियाले, तू धरि धरि मत डोल। (62) "मन कू मार सजू सतगुरू से दुरमत दूर भगा । (92) वो मन मेरो बडो हरामी ज्यू मदमातो हाथी। सतगुरू दस्त घर्यो सिर ऊपर अकुस दे समझाती। ( 06) मात पिता तुम दियो, तुम ही भल जानो हो। तुम तजि और भतार को, मन मे नहि आनो हो। (129) । .

मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययने । 165 "म्हों में औगुण घणा छ हो प्रभुजी पें ही सहो त सहो । (136) "इत उत चित्त चले नहिं कबहू, डारी प्रेम जजीर । (155) सब घट दीस आतमा, सवही सो न्यारी है। दीपक जो ज्ञान का, चढू अगम अटारी हो । (158) "आप ही आप पुजाय के रे, फूलै अग न समात । अभिमान टीला क्येि बहुत कह जल कहाँ ठहरात । जो तेरे हिय अन्तर की जानत, ता सो कपट न बने । (162) "रीति छोड अनरोति करो ना।" (173) "चौमास्या की बावडी ताको जल क्यू पोज" "पहली शान मान नहिं की हो मैं ममता को वाधी पोट । सुणियो मेरी बगड पडोसन, गेले चलती लागी चोट ।" (14) 'मात पिता तो जनम दियो है, करम दियो करतार । कइरे खाइयो, कइरे खरचियो, फइरे कियो उपकार । दिया लिया तेरे सग चलेगा, और नहिं तेरे लार । (196) 'तज कुसग सतसग बैठ नित।" (199) "काम क्रोध मद लोभ मोह , चित से वहाय दीजै। (वही) (iv) कमवाद लोक जीवन मे कमवाद और पुनजम की धारणाए भी काफी पुरानी और व्यापक हैं । जीव के कर्मानुसार उसका भोग और अगला जम मानने के विश्वास के आधार पर चौरासी लाख जीव कोटियो मे जीव का भ्रमण, तदनन्तर मनुष्य योनि और वहा भी जीव साधना न करने पर पुन भवचक्र मे आवागमन --ऐसी मा यताएँ आम लोगो मे हैं । तदनुसार मनुष्य जीवन पा कर भक्ति, सत्कम आदि का व्यवस्थापन किया गया है। मीरा के पदो मे लोकतत्व के ये घटक भिन भिन्न प्रकार से व्यक्त हुए हैं- 'गाय गाय हरि के गुण निसदिन, काल ध्याल सू बांची" 33(16) -~-बार बार जीव का जनम और मरण ही भव चक्र है। इस जम-मरण के चक्कर से मुक्त होना, परमात्मा स्वरूप हो जाना भी कमवाद की एक उपपत्ति है। 'मेरी उनकी प्रीत पुराणी (17) मे भी आत्म परमात्म के कारण काय सम्बध का बाशय है। पूरब जनम को कौल' (19) के मूल मे पुनजम की धारणा है । 'जनम जनम का सोया मनवा' (26) के मूल मे भी भव चक्र का आधार है । और 'मीरा को गिरधर मिल्याजी, पूरव जनम के भाग (27) मे भी वही बात है। भव सागर तर जास्यां (34) मे आवागमन से मुक्ति की चाहना आधार स्वरूप है । और, उसकी प्रतिपत्ते स्वरूप प्रयत्न है कि- 'यह ससार वाह का कांदा ज्या सगत नहिं जास्या।' (34) तथा 166/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन राम नाम का झाझ चलास्या, भव सागर तर जास्या। (38) मे भी जीवन्मुक्ति की कामना है । मीरा इसीलिए अपने को "गिरधर नागर की जनम की दासी 11(40) कहती है और चाहती है कि 'जात मे जोत मिला जा । (50) "मी सागर मे वही आत हूँ' (53) वहकर बारम्बार के जनम मरण का दुख व्यक्त किया गया है और 'पूरब जनम को प्रोत हमारी' (150) कहकर जीव और ब्रह्म के सनातन सम्बधा को कमवादी ढांचे मे व्यक्त किया गया है । पुनजम के आधार पर ही आत्मा का 'जनम जनम को क्वारी' (78) कहा गया है । कमवाद और पुनजम की धारणाओ को सायक्ता दन के लिए ही कई बार "गरधर' के लिए 'अविनासी पद का प्रयोग हुआ है । 'मीरा दासी जनम जनम की (101)कहकर अविनासी परमतत्व और आवागमन मे फैसे जीव का आशय उभारा -गया है। "निदा करसी नरक कड मांजासी' 33(23) में कर्मानुसार भोग का आशय विद्यमान है । और 'तुम प्रभु पूरन ब्रह्म हो, पूरन पद दीजे हो।' (129)मे जीवन- मुक्ति को चाहना है क्योकि यो ससार सब बह्यो जात है, लख चौरासी धार (133) इसलिए मेरा आबागमन निवार' (वही) की विनती करती है। उसका मानना है कि 'राम नाम बिन मुकति न पावै, फिर चौरासी जावै ।' (160) और लोकमत हैं कि 'माता पिता तो जनम दिया है, क्रम दियो करतार' (196) इस- लिए जैसा कम वैसा भोग । मीरा ने तो सत गुरु पाया, कम कमाए अत माहब पापा आदि अनादो ना तर भव मे जाती। (197) ---इसके पीछे पूरा जीवन दशन है-जाता का- वदे बदगी मत भूल। चार दिनों को कर ले पूबी, ज्यू दाहिम दा फूल । आया था ऐ लोग के कारण, मूल गमाया भूल । (198) कमवाद म सत्कम का सार भी पदों में आया है- 'राम नाम रस पोजे", 'तज कुसग सतसग वंठ नित ।" और "काम क्रोध मद लोग मोह कू चित से बहाप दीज।' (199) तव "जनम जनम क खत ज पुराने नामहि लेत फटे रे । (200) (v) भाग्यवाद लोक मानस में पूर्व जाम की धारणा ने भाग्यवाद को 'कम भोग' की प्रति पत्ति के रूप म स्थापित किया हुआ है। एक दो पदा मे मीरा ने "पूरव जनम को कोल' कहकर उस ओर समेत किया है और माग्यवाद को ध्यजना एक पद म भी है- मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन/167 करम गति टारे नाहिं टरी। सतवादी हरिचद से राजा, नीच घर नीर भरे। पाच पाडु अर सती द्रौपदी हाड हिमाण गरे। जग कियो बलि लेण इद्रासण सो पाताल घरे। 33(190) -~भाग्यवाद सम्बधी अय उदाहरण नहीं मिलता। सिवा इसके कि एक पद मे भाग्य लिख्यो सो ही पायो (189) कहा गया है। (vi) नेम धरम मीरा कालीन समाज मे लोक जीवन भौतिक वाछाओ से सम्पृक्त नहीं था । परलोक सुधार की मा यताएँ सजीव थी । प्राय हर परिवार स्वच्छ जीवन के लिए कुछ नम धरम पालता था। मीरा के पदो मे कुछ ऐसे सकेत आए हैं जो लोक जीवन के उस तत्व का हवाला दते हैं- "चरणाम्रित का नेम हमारो, नित उठ दरसण जास्या । 33(34) -~-और सहज साधना नेम भी- 'मेरे पिया मेरे हिये वसत है, ना कहु आती जाती । (20) -तिल माला और कठी धारण करने का नेम भी पाला जाता था- "चूडो म्हारे तिलक अर माला, सील बरत सिणगारो । (23) "म्हारे पीहरिये रा लोक भले रो वाधे कठी माला।"9) साधु सगत और सत्सग भी घम-कम का अग था। उस पर मीरा ने अपनी भक्ति की टक ही स्थापित कर रखी थी। "जहाँ जहाँ देखू म्हारो राम, तहाँ सेवा करूं। (55) भी एक नेम था। इसके अलावा 'नेम धरम' मे नित प्रति ध्यान धरत हूँ दिल में' (88) भी एक उपाय था। 'कीर्तन करना' (91), 'सुरत समाधि लगाना (92), 'मन को इच्छाओ पर अकुश लगाना (106)-ऐसी त्रियाओ के सकेत भीरा के पदो मे मिलते हैं । ऐसे नेम धरम आज भी लोक जीवन मे आत्म साधना के पोपक हैं । (vi) ज तर मातर आदि लोक मानस मे जसे भक्ति, मुक्ति को चाहना और नेम धरम को मा यताएं होती हैं, वैसे ही जादू मतर, टोना टोटका और भावी के पूर्व बोध को लातसा भी होती है । मध्ययुग का जन मानस इनसे सम्पृक्त था । अनुष्ठान, पूजा पाठ आदि भी उही भावना से प्रेरित होत थे। मीरा के पदो म जतर मतर, टोना टोटका से सम्बधित सक्त नहीं मिलत- 'मोरा पदावली और मीरा व्यक्तित्व एव कृतित्व के प्रमाणिक कहे जाने वाले पदा मे-सिवाय एकाघ नामोल्लेख के-'चितवन म टोना 33(95) किन्तु ज्यातिप से सम्बंधित कुछ सवेत जरूर मिलत हैं। इससे पता लगता है कि सम्भ्रात धरानो मे और सामान्य जना में ज्योतिप, पया आदि का चलन तो आम या विन्तु 16/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन जतर मतर टोना टोटका उन समुदायों में प्रचलित रहे होंगे जिनको पहुँच वैद जनों तक नहीं होगी। अपवा यो कहे कि मीरा का व्यक्तित्व अन्तत राज- मर्यादाओ और सस्कारो से महित था। उसकी वेदना भक्ति में 'वद्य' तो है, मगर जतर मतर नहीं है, प्रिय को रिझाने हेतु टोने टोटक भी नहीं हैं। यह मोरा के व्यक्तित्व की दृढता का परिचायक माना जा सकता है। वह अपने प्रियतम को प्रतीक्षा पडर केस तक कर सकती है, विरह वेदना मे 'तडप सकती है, उसके 'अग लगने के लिए 'जल बल भसम को ढेरी' बन सकती है, पर बाहरी उपायो से वशीकरण, आकपण के उपाय नहीं कर सकती। उसकी आत्मनिष्ठा की परिचायक यह स्थिति हो सकती है। द्रष्टव्य----- कितु जासीहा को बधाई' 33(142) देना वह नहीं भूलती क्याकि उसने शोध के प्रिय आगमन की भावी वही होगी और 'अब पर आये स्याम' (वही) वा बधाई। 'बाग उडावत दिन गया, बूझे पिंडत जोसी हो। मीरा विहिणी व्याकुली, दरसण कब होती हो । 33(116) (vit) प्रति भयो, सतो, परियो सबके लिए प्रकृति भाव निरूपण का बहुन सपाक्त माध्यम रही है । मीरा के साथ भी वही बात है । प्रेम गाथाओ मे तो मन के साथ, 'योभा माचं घर हम, खेलण लागी खाट' तक भी कवि जन जा चुके हैं। मगर, मीरान प्रकृति को वही तो विषय वणन के साथ अपनी अनुभूतियोस उसे सम्पक्त किया है तो वहीं काव्य रूढियों की तरह उसे सहापक वाया है। दृश्य वणन के रूपो म कालिंदी के तौर गऊएं चगते, कदम तले वशी बजात कृष्ण' 33(6) हैं, 'मूसलाधार वर्षा में डूबता वज' है, जमना तोर' का स्मरण है, 'असुवन से सीवी पली प्रेम की बेल' (15) है, डारिया, छोलरिया, चौमात्यां को बावडी, झरना, गगा, जमना, दरियाच, समद के सकेत-सुमिरण हैं । 'कालर अपो' के साथ निपजे चीज' (25) की म्मति है, 'वन वन भटकने के साथ 'पथ दुहेला' और 'आहा औघट घाट' (49) भी हैं जिनमे शायद पुष्कर और अरावली के घाटा की याद हो। 'मववारे वादल' के साथ 'वर्षाकालीन' प्रकृति का चित्र है (81) मारवाह को 'काली पीली घटा' और पाणी परी भूमि' (82) है। बारहमासे का चित्र है (116), 'सरवरिया की पाल और उस पर प्रतीक्षा करती सूप पूजा करती महिलाएं हैं (320), और "रिमझिम सावन की' उद्दीपक 'नन्हीं नही बूदें' (117) भी हैं । 'फागुन और उसकी फुलाहिया (151) भी हैं। और सबके साथ बदावन' की झांकी भी है (163)। भाष्य रूदियो के रूप में प्रकृति का उपयोग नानाविध हमा है- पवन कोमल' 33(1), 'मबद रसाल' (3), 'पारिन भवो अलक टेढ़ी मनों (7) 'मुर मीरा काव्य लोकताश्विक अध्ययन /169 . वदन कमल दल लोचन' (8) 'कुडल की अलक झलक कपोलन पर छाई । मनो मीन सरबर तजि मकर मिलन आई' (9) 'अधर बिंब' (9) 'दसन दमक दाडिम दुति' (वही) 'चमके चपला मी', 'वदन चदा परकासत हेली' (10) 'पिया जीवन मूर जडी' (11) 'असुवन जल सीचि सीचि प्रेम वेल बोई ।' 'अब तो बेल फल गई आणदपल होई'(15) 'काल व्याल सू बाची' (16), सुरत निरत का दिवला, मनसा की बात , प्रेम हरी का तेल' (20), छोलरिये म्हारो चित्त नही रे, डावरिये कुण जाब। 'गगा जमुना से काम नही र हिं तो जाय मिलू दरयाव', (21) 'कुल कुटुम्बी आन बैठे सानहुँ मधुमाखी' (22), चौगास्यां की बावडी ज्या कू नीर न पीज। हरि नारे अम्मत झरे, ज्यां की आस करीज' (28) यह ससार बाड का काँटा' (34), 'थे तो राणाजी म्हन इसडा लागो ज्यूं बच्छन मे कर' (37), 'सीप भइयो- पाणी पिवे रे, टाक भरयो अन्न खाय' (47), 'अगर चदण की चिता वणा। जल बल भई भसम की ढेरी आपणे अग लगा जा।' (50), 'चरण कंवल की दासी' (51), 'तोडत जेज करत नहिं सजनी, जैसे चमेली में फूल' (58), 'आबा की डाल कोइल इक बोले, मेरा मरण अर जग पेरी हाँसी।' (61) 'सांझ भई परभात' (68), 'रण अधेरो बीज विच चमक, तारा गिणत निरास' (वही) 'सावण कहि गए अजहु न आये' (69) 'गगन महल पं सैज पिया की' (72), 'पाना ज्यू पीली पडी रे, लोग कहे पिंड रोग (74), 'रहा रहा पापी पापीहा रे पिय को नाम न लेइ , (वहो) काढि कलेजो मे धरूं रे, कागा तू ले जाइ' (वही), 'दादुर भोर पपीहा बोले वोयल सवद सुणवें । घुमट घटा ऊलर होई माये, दामिनि दरक डरावे', (76), 'विरह नागण मोरी काया इसी है, लहर लहर जिय जावे', (वही) 'स्याम विना जियडो मुरझावे जसे जल बिन बेली, (80) "मतवारे यादल आये रे, हरि को सनेसो न लाये रे । दादर मार पपइया वोले, कोयल सवद सुणाएँ रे । कारी अधियारी विजरी चमक, विरहिणी अति हरपाये रे। गाजे बाजे पवन मधुरिया, मेहा अति पड लाये रे। वारी नाग बिरह अति जारी, मीरा मन हरिभाय रे । (81) और वस हो- बादल देख हरी हो स्याम म्हें बादल देख हरी । काली पीली घट कमरी, बरस्यो एक घरी । जित जोऊ तित पाणी पाणी हुई, हुई भोम हरी । (62) -इससे भिन्न पपीहे को घातक माली-रे पपपा मार को चितार्यो उठि बैठो वा विच्छ कोडारी, बोल बोल व सारो।' (१३) - 170/मोरा लोकतात्विक अध्ययन पपीहा और मोआ प्रेम काध्यो में यह प्रयुक्त जीव हैं। पपीहा तो माहित है-~चाच पटाऊ पपइया रे अपरि कालर लूण। पिव मेरा मैं पिच को रे, तू पिक कहे सण (84) और कौआ सुहावया है.---'चाव मठाऊयारी सोवर्ण रे, हूँ मेगे सरताज ।' (वहीं) चातक और मछली विरह के प्रतीक है.--'ज्यू चातक धनकू रट मछली जिमि पानी हो।' (87) सप विरह है-~-'वहाँ का क्ति नाक मेरी सजनी, मानो मरप डसी', 188) 'बमठ, दादुर और मौन में अतर है-- 'कमठ दादर वसत जल म जल से उपजाई। मीन जल से करत बाहर, तुरत मर जाई ।' (89) विरह कारण वोरी भई, ज्यू काठहि धुन पाइ।, (89) एक उपमा है नो 'विरह पिजर की बाड सपो से', (92)-दूसरे तरह की जा प्रकृति के विरल उपयोग हैं।' बिरह म 'छमासो रण' हाना भी एक काव्य रडि है, तो पाधि ज्यू चूकै नहि. मृगी बेधि दई आय , शिकारी जीवन से उठाई गई उपमा है। 'रसिक मधुस के मरम को नहिं ममझत केवल सुभाई', और 'पानी पोरन जाणइ मीन तलाफि मर जाई', (105) मे मानवीकरण अनोखा है यद्यपि 'दीपक जु दया नहीं, उडि उर्हिगरत पतग', (वही) में मूपियाना तरीका है। 'मन मदमाता हाथी', (106)-~~यह लोक काव्यो की दन है जिस पर राजपूती छाप , अलग अलग महीनो मे माघर की पति भी मीरा के पदा में प्राकृतिक सामाजिक परिवेश के माथ उभरी है- 'जेठ महीने जल विणा पछी दुख होई हो । मार असादा कुरल है, धण चात्रग सोई हो। सावण मैं झड लागियो, सखि तीला खेल हो । तो, भादरवं नदियां बह, दुरि जिणि मले हो । और, सीप स्वाति ही झेलती, आसोजा मोई हो। देव काती मे पूजहे, मेरे तुण होई हो। मगसर टड बहोती पडे, मोहि वेगि सम्हालो हो। पोस मही पाला घणा, अब हो तुम हालो हो । महा मही वसत पचमी, फाग सब गाय हो। फागुण फागा खेल है, वणराइ जगावै हो। चत चित में ऊपजी, दरसण तुम दीजै हो। और, बैसाख नगराइ पूलव, कोइल कुरला हो । (116) सरवरिया री पाल (120) भी है जो 'सापडने असनान', करने के लिए सांस्कृतिक व्यापार के लिए देश है। उधर लाक काव्या की तरह 'अखिया से नदिया वह ज्यू सावण की' (122)वाली अतिशयोदिन भी है और पांख नहिं उहि मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन/171 जावण' (122) वाली कल्पनोक्ति भी है। एक तरफ विरह 'नागण' है तो दूसरी तरफ वह 'बाधड़' (126) भी है। उसके कारण 'ज्यू चकवो रंण न मावे जी (वहीं) और 'ज्यूं जल त्यागा मीना जी' से उपमा है। 'सावन' तो कई रूपो मे है-"सावन भादा उमडो, वरखा रितु आई हो । भौंह घटा धन धेरि के, नैनन झर लाई हो।' (129) वाला भी है और, "बदरा ने धेरी माई। (140) जैसे 'डाकू लुटेरे' घेर लें कि- इत धन गरजे, उत धन लरजे, चमकत बिज्जु सवाई। उमड धुमड चहुं दिस तें आया, पवन चले पुरवाई। दादर मोर पपीहा बोल, कोयल सबद सुणाई । (140) -पूरी लुटेरो की फौज का नमूना हैं जो सुख चैन लूटने आए हैं । वही सावन दूसरी तरह से भी है कि- उमग्यो इद्र चहुँ दिसि बरसे, दामिण छोडी लाज ।' (141) -मिला की वांछाम- मगल वाद्य दादुर मार पपइया बाल, कोइल मधुरे साज । और नायिका की तरह- धरती रूप नवा भवा धरिया, इद्र मिलण केकाज । (141) -मारवाड मे कभी होली पर मावठे भी जोरदार होते हैं-~-- ----गणगोर पर भी- "काली पीली बादल मे बिजली चमक, मेध घटा धनधोर छंजी। - दादुर मोर पपीहा बोल, कोयल कर रही सोर छनी । (143) - में केवल काव्य रूढि का निभाव है क्योकि मावटे की बरखा मे ये सब प्राकृतिक व्यापार होते नहीं । अकसर करके सावन ही प्रिय आगमन का अवसर होता है- झुक आई बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की। सावन में उमग्यो मेरो मनवा भनक सुनी प्रिय आवन की। उमड घुमड चहुँ दिसि से आयो, दामण दरक झरलावण को। नही न ही बूदन मेहा बरसे, सीतल पवन सुहावण की। (144) सावन मारवाडी लोक जीवन मे विशेष महत्व रखता है, तभी मीरा ने बहुलता से उसे वखाना है--'सावण दे रह्या जोटा रे' (145) और 'बदलारे तू जल भरि नायो' (147)। वैसे ही 'फागुन पर भी मीरा के पद अपेक्षाकृत ज्यादा है।

172/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन सूर की गोपियों ने मीरा से ही आंसू बहाना सीखा था कि "कागद ले राधा बाचण बैठी, भर आई छाती। नण नीरज मे अव बहै रे बाला, गगा बहि जाती। पाना ज्यू पीली पडी री वाला, अन नहि खाती। हरि विण जिवडो यू वल रे वाला यू दीपक सग वाती। (186)--कुछ अनोखापन ही है जो लोककाव्यो के लिए भी नया ढंग है। और राजमहलो को हौज' और 'फव्वारों' वाली प्रकृति भी मीरा के पदो मे है-चलो अगम के देस काल देखत डर। वहा भरा प्रेम का हौज, हस केल्या करे। (192)-'प्रेम की राह', 'ऊची नीची राह रपटोली, पाव नही ठहराइ।' (193) 'बीता समय तो "विरछ के ज्यू पात टूटे, बहुरिन लागे डार' (195) से समझाया गया है तो 'चार दिना का जीवणा' को 'ज्यू दाडिम का फूल' (198) कहा गया है। इस तरह से प्रकृति मालबन रूप मे उद्दीपन रूप में, अलकार रूप मे व्यक्त हुई है और उसमे राजघराने से लेकर लोक धरातल तक के तत्व समाविष्ट हैं । (ix) सयुक्त परिवार मध्य युग मे कृषि आधारित जीवन, युद्ध, सघप और सम्मिलित जीवन प्रणाली के कारण, परिवारो का रूप एकात्मक था। राजघरानो मे तो बहु विवाह और राज सचालन की आवश्यकताएं सयुक्त परिवार से ही पूरी होती थी। मीरा के पदो मे एक दो स्थानो पर सयुक्त परिवार वे 'उसके अनुभव' व्यक्त हुए हैं। प्रेम भक्ति की टेक, साधु सगति का दुगग्रह भजन-कीतन और बैरागी जीवन जीने की उसकी टेक ने परिवार मे उथल पुथल कर दी थी- 'कुल कुटुम्बी आन बैठे मानहु मधुमाखी' (22)---मधुमक्खियो की तरह सीख देने, समझाने वालो की भीड लग जाती थी। नणद, भाभी, सखी, सहेली, जेठानी, धायें-सब, इसलिए कि उसने राज कुल की लाज गमाई, साधा के सग मे भटकी। (24) छोटे समझाते या बड़े- "जेठ बहू की काण न मान, घूघट पड गई पटकी।' (24)-ऐसा उसका था। उल्टे वह अपनी 'सखियों को समझाती थी- "आवो सहेल्या रली करा हे, पर घर गावण निवारी। (25) क्योकि खाली समय मे महिलाआ का एक ही काम रहता था कि पास पहास म जाकर "महिला पुराण, निंदा, स्तुति की चर्चा की जाए। अपने पीहर मे भी और ससुराल मे भी मीरा ने कुटुम्ब परिवार का सहयोग नही पाया। सीख ही-सीय पाई और इतनी पाईकिअन्तत:- मात पिता सुत कुटुम क्वीला, ट्ट गया ज्यू तागा।' (26) - आग्रह मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 173 धाय माई की नजर मे मीरा- "गेली दोखे मीरा बावली, सुपना तो आल जजाल।" (27) और "माई कहे सुण धीयडी, काहे गुण फूली।" "लोक सौवं सुख नोदडी, थू क्यू रैणज भूली।" (78) सास के उससे सवाल थे- "औरज पूजे गोरज्या जी, थे क्यून पूजो गौर ? (29) और उलाहने भी- "बाल सनेही गोविंदो ये तो साध सता का काम । थें बेटी राठोड की थाने राज दियो भगवान । (वही) लाज पीहर सासरी, माइतणो मोसाल । सब ही लागे मेडतिया जी, था सूबुरी कहै ससार । (वही) नणद तो बार-बार बरज बरज कर हार गई । अत मे चेतावनी देने लगी--- 'पाने बरज बरज म्हें हारी, भाभी मानो बात हमारी । राणे रोस किया था कपर, साधा मैं मत जारी । (30) -फटकार भी- कुल को लाग लगे छ भाभी, निंदा हो रही भारी। साधारै सग बन बन भटकी, लाज गमाई सारी। बडा घर थें जनम लियो छ, नाची ददै तारी। वर पायो हिंदवाण सूरज, थे काई मन धारी । (वही) 'फिर समझाने सम्बोधने के अनुभव भी कि- भाभी बोलो वचन सभारी। साधा की सगत दुख भारी, मानो बात हमारी। छापा तिलक गलहार उतारो, पहिरोहार हजारी। रतन जहित आभूखान पहिरो, भोगो भोग अपारी। मीरा जी थें चतो महल मे, था ने सौगन म्हारी। (वही) तथापि मीरा का हल रि- 'वरजी मैं काहू की नाहि रहू ।' (31) 'म्हे तो गोविंद का गुण गास्या, 'नित उठि दरसण जास्या, 'हरि मिदर मे निरत करास्या' (31)-और 'राणा को न भावे तो मीरा को मो-नहि भाव थारो देसडलो रगसडो। (35) राणा आदि बर भी रखते थे-'राणाजी थे क्याने राखौ म्हा सूबर ।' (37)--कुल कुटुम्बी म मानें, बैर रखें तो-'सीसोद्यो रूट्यो तो म्हारो कइकरसी।' (38) 'आपणो 174/मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन । रखासी' (वहीं)-वर इतना कि- 'विप का प्याला राणाजी भेज्या' (39) 'राणाजी में जहर दियो में जाणों (41) 'पेट्या वासक भेज्या जी 9 (42) । रोज ही रोज- "सास लडे मेरो नणद खिजा, राणा रह्या रिसाय । पहरो भी राख्यो, चौकी बिठादयो, ताला दिपो जडाय । (46) तब असहनीय अनुभव हो गए कि- "यारी मारी गा मरूं, म्हारो राखण हारो और । (47) और अतत "कर मूरापण नीसरी, म्हारे कुण राजा कुण राव' (47)। इस तरह से सयुक्त परिवार और राजनीति के शिकजे से टूट कर भीरा न अनुभव किया- "माता पिता सुत कुटुम कबीला सब मतलब के गरजी।' और भी- "म्हारो सगपण तो सूसवारया, जुग सूनही विचारी।'(54) "यो ससार सगो नहि कोई" (130) की वेदना के साथ अतत मीरा को हरिशरण होना पडा- "अब मैं सरण परीरे रामा, ज्यू जाणे त्यू तार । (131) या जग मे कोई नहिं अपणा, सुणियो श्रवण मुरार।" इरा तरह मीरा के पदो मे लोकतत्वों के कम से कम नो घटको के हवाले मिलते हैं। इनके अलावा लोक जीवन के नत्य, याह्य, जोग साधना आदि के फुटकर सकेत भी हैं चाहे रूपक योजना मे ही हो या नामोल्लेख के रूप मे J 4 बोलीतत्व साहित्य अपने परिवेश बोर लोक मानस की उपज होता है । भक्ति साहित्य लोक से लोक के लिए होता है, अत उसमे लोक भाषा, शब्द-सम्पदा और उक्ति सम्पदा का उपयोग होता है। मीरा के पदो के साथ भी ऐसा ही मानना चाहिए। लोक मे गीति तत्व, सस्वर बामिप्यक्ति के प्रमाण बहुत पुराने हैं । सामवेद तो गीतियो का वेद ही कहलाता है। प्राकृत में, अपघ्र शम, मयागीतियों के अलावा पद गोतियों और चर्या गीतों के नमूने सिद्धो और वौद पपियो क जमाने से पले पा रहे हैं । लोक मे ही पद शैली में भावाभिव्यक्ति जनमी और पनपी पी। सस्कृत के नाटको में पद गोतियो को प्राकृत में रखने की परम्परा भी यही बतलाती है। नाय पंथियों और हठयोगियों में से होत हुए पदों का प्रचारमवीर, नामदेव, मारा-काव्य लोक्तात्त्विक अध्ययन/ 175 . नानक, सूर, तुलसी आदि के, हर तरह के, भक्ति साहित्य मे मिलता है । बताया जाता है कि 44 (406) पद-रचना ग्राम रागो की एक विधा थी और उसका सम्बध कई तरह के रागो से होता था। "स्वर विभूपित राग-रीतियां साहित्य में शब्दाथ की साधना बन कर पद कहलाई।" पद परम्परा का प्राचीन प्रमाण-हिदी मे-सिद्धो के चर्या पदो मे मिलता है । उनके साथ अर, कामोद, गउडा, गूजरी, देशीरव, बराडी, वगाल, शीवरी आदि रागो के नाम मिलते हैं। इससे पता लगता है कि पद गेय होते थे चाहे उनमे छदो का निभाव हो सके अथवा नहीं । सिद्धो के बाद पदो का विकास नागदेव, कबीर, रैदास दादू आदि मे भी मिलता है। वैष्णव शक्ति मे भी पद-रचना की गेय परम्परा ही भक्ति की प्रकाशिका रही है। रामानद के बाद पद साहित्य की परम्पराएँ वैष्णव भक्तों में सतो मे, शृ गारवादियो मे और सगीतकारो मे कुछ भिनताओ के साथ विकसित होती बताई जाती हैं। राजस्थान मे का हडद प्रबध मे फिर धना, पीपा, बालनाथ, जसनाथ आदि पंथो मे पद साहित्य प्रचुरता के साथ प्रचलित था और यह सब मीरा का पूर्ववर्ती साहित्य था। मीरा के समय तक भक्ति परक पद साहित्य का विपुल भडार प्रचलित था। उनमे भक्त की छाप, टेक और इष्ट को छोडकर अभिव्यक्ति की शैली और सांचे लगभग समान थे। यही कारण है कि विनती, प्राथना, असारता अवतार वदना आदि के पदो मे सभी भक्तो के पद लगभग समान मिलते हैं। मीरा के पटो के साथ रागो का भी उल्लेख मिलता है । कम से कम 27 रागो के नाम उसके पदो के साथ मिलते हैं (वही) जिनमे आनद भरो, जोगिया, कान्हडा, तिलग, प्रभाती, पूर्वी, एक ताला, मल्हार, आसावरी, काफी, टोडी, विहाग, मारू आदि मुख्य हैं। इन रागो को भाव प्रकारो से जोडकर भी बताया जाता है, जसे-जोगिया को करुणा के भावो से, आसावरी, पील, भैरवी शृगार से । मीरा के पदा मे करुणा, व्यथा और शृगार की प्रधानता है। गेयता को दृष्टि से मोरा के पदा मे भावना प्रवणता, अनुभूति का तीखापन और स्वानुभूति परक्ता अधिक प्रधानता रखती है। उसके पदों मे बाह्य वस्तु परकता नही है बल्कि स्वानुभूति परकता प्रखर है इसीलिए वे पद रसिक जनों को अधिक उद्दीप्त करते हैं, जैसे-'आये मेरे अगना, फिरि गये सजना, में अभागन रही सोय री", 'सेज अलूणी, भवन अकेली, रण भयकर भेस । अब सलूणे प्रीतम प्यारे, बीते जोबन बेस ।"-जैसे पदो में 129, 129 कही 88 11 मात्राओं के क्रम से स्वर का उतार चढाव भावों को जगाने और उद्दीप्त करने का काम करता है और वह उद्दीपन तथा विभाजन स्वानुभूतिपरक होने से सीधा ही रसिक के मन में उतर जाता है। उसे अध्यास नही करना पडता ।

176/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन गेयता के साथ छद रचना का भी विशेष सम्बध होता है यद्यपि पद रचनामा मे छदोबद्धता का कठोरता से निभाव अधिकतर नहीं मिलता। हम मोरा को शास्त्रावद पवयित्री नहीं मानना चाहिए, वह स्वयं सिद्ध भक्त थी-ऐसा हम वह सकते हैं। जिन समीक्षकों ने मीरा पदो में छद विधान की खोज की है उनका यही मत है कि इन पदाम किसी एक छद का निभाव नहीं है, कई जगह दो-तीन छदो का मिश्रण है और कई जगह एक छद होते हुए भी सवत्र वह लक्षणवद्ध नहीं है । इसका कारण यह कि मीरा द रचना करने नही बैठी थी, तब गेयता के प्रवाह मे छन्द लक्षण टूटते-बनते भी रहे हागे । बताया जाता है कि मीरा के पदो मे 16 मात्रा के चौपाई छद से लेकर 32 मात्राओ वाले समान छदो के उदाहरण मिल जाते हैं जिनमे सार (28 मात्रा), सरसी (27 मागा), विष्णु पदी (26) दाहा (24), ताटक (30), कुडल (22), चाद्रायण (21), सुगीत (25) को पहचाना जा सका है, तथापि पदो म कहीं मात्राएं कम ज्यादा हैं तो कहीं यति स्यानो मे भी अतर है । अत छद शास्त्र के निगमन की क्सौटियां मीरा पर लागू करना सुसगत नही होगा। वहाँ तो भावना प्रवणता का आस्वादन करना ही प्रधान लक्ष्य रहना चाहिए। वैसे गीति तत्व के विचार से सार, सरसी, विष्णुपद और कुडल छद अधिक प्रवाही माने जाते हैं । जैसे-पग घुघरू बांध मीरा नाची रे। (1612) मैं तो मेरे नारायण की हो गइ आपहि दासी, रे । (16 12/2) अत के 3 3 गुरु स्वर को खुलापन देकर आलाप और तान की सुविधा भी प्रदान करते हैं । मीरा अधिकतर पद इस शैली के हैं जो अत मे ऽ या या ss के लक्षण रखते हैं-यथा-पदो के चरणांत मे-"लेसी माई, मान, चलास्या' दासी रे, नासी रे, हासी रे, अविनासी रे" 'राची रे, नाची रे, मदमाती रे, आरोगोरे" 'जाणी, बाराबाणी, पाणी, पौराणी, सनकाणी, लपटाणी। मीरा के कलापक्ष की समीक्षा करते हुए समीक्षको ने मीरा को मेडता पासिनी मानकर उसकी भाप्त मे पुरानी राजस्थानी की छाप खाजने के प्रयत्न किए हैं। हमें सोचना चाहिए कि जब किसी सत या भक्त की बानी लोकव्यापी हो जाती है, लोगो की जबान पर चढ जाती है तब वह भापा विशेष के साँचे और ढांचे की सीमा तोडकर ही वैसा कर पाता है । क्वीर, दादू, रेदास, मीरा के लिए हम इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए। ऐसे साहित्य में अधिक से अधिक हम (1) उसकी शक सम्पदा और (2) उसकी उक्तिगत सरचना को ही समान की कोशिश कर सकते हैं क्योकि उनम हो उस साहित्य की मूल बातें सुरक्षित रह सकती हैं और परिवेश को प्रमाणित कर सकती है- - मोरा काव्य लोकतात्विक अध्ययन/177 मीरा के पदो मे शब्द सम्पदा के स्वरूप को देखना चाहे तो उहे कई प्रयोजन निष्ठ वर्गों में देखने की जरूरत होगी, यथा भक्ति सम्बधी, उपासना सम्बधी नितनेम, लोक जीवन से सम्बधित विविध वस्तुएं, काय, व्यापार, प्रकृति आदि उसी तरह उक्ति सम्पदा के प्रसग मे हमे कयन रीति मे पद योजना या सरचना, मुहावरे, रूढोक्तियो, कहावतो और सास्कृतिक निरुपणवाची कथनो को देखना 'पहेगा। उनसे मीरा के समय की लोक भाषा और अभिव्यजना के स्वरूप का आभास मिल सकेगा। (6) शब्द सम्पदा मीरा भक्त थी। उसकी भक्ति पर लाकतात्विक कारणो से सगुण भक्ति धारा का प्रभाव भी था और सत एव नाथ साधना का भी। उसके पदा मे अपने इष्ट के लिए जिन शब्गे सम्बोधनो का प्रयोग हुआ है, वे लोक मानस और समवित साधना का प्रमाण देते हैं-पथा- (6) मोरा के इष्ट, गिरधर नागर, गोकल का बिहारी, हरी, गोव्यद, मन मोहन, सांवलिया, बलवीर, 33 (123), साबरो, सांवरिया चतर- मज नाथ, श्याम सुदर भी हैं, बदाबन चद की है, मोहनलाल, बिहारी भी। (1) दीनानाथ, प्रभुजी, प्रभु, और (11) राम के साथ साथ (iv) जोगी, जोगीडा, सामी, स्वामी अविनासी, सतगुरु, खसम, रमैया भी हैं और (v) प्रियतम, प्रिय, पिया, सजन, प्रान आधार, धणी होने के अलावा (५) महाराज, ठाकुर, रावल, हुजूर, नरेस, भी हैं, और गरीब निवाज 33 (109) भी। इतने सारे नामो से सम्बोधन बताता है कि लोक मे ईश्वर वाचक नामा में सम्प्रदायवादिता नही थी। मीरा की अपनी छाप तो प्रियतम' वाचक थी और 'ठाकर' वाची प्रयोगो का चलन राजघरानो मे था। स्वय मीरा ने अपने लिये 'मीरा, दासी मोरा, बाई मीरा, जन मीरा 33 (160), दास मीरा (161)--जस सम्बोधनो का प्रयोग किया है जिनमे उसकी विनय पूर्णता झलकती है । 'बाई' मे राजपूती छाप है। अपनी भक्ति के लिए मीरा ने भगति रसीली 33(16), दास रावरी 33(4) धणी मिल्या छ हुजूर (21}, गिरधर रगराती (20), अपणे सया सग सांची प्रभु गिरधर नागर, (24) सो गया अचल सुहाग (27), अपणी कर लीजै (28), गोविंद मिल्या जी (29), प्रभु हरि अविनाशी (31), सरण सबल गिरधर की 178/ मोरा लोकताविप अध्ययन (38), जनम जनम की दासी (40), दाप्ती अपणी जाणी (41), वाह गहे वो साज गपज्यो (42), साँवलिया पर पावा (43), भजन भाव में मस्त डोलती (45), राम अमल माती रहे (47), मोरा प्याकुल विरहिणी (49), मोत मे जात मिला जा (50), चरण सरण है दासी (54), प्रेम पियारा मीत (61), घेरी भई बिन मोल (62), लाज रायो महाराज (64), तुम मेरे ठाकुर मैं तेरी दासी (67), मीरा दासी राम रती (68), चंद साँवलिया होइ (72), लीन्यो कठ लगाई (73), पिया दरमण दीजो मोहि (74) रमया बिन नीद नहिं भाव (76), पी यो प्रीत खरी (82), प्रीत रमीली वसी (88), पिया की उमग अति लागी रो (91), तुम चरणा आधार (93), मैं भई राबरी (100), अग से अग लावी हा (104) चरणन की चेरी (128), सहज कर वैराग (162}, जीव परम पद पावं (160), छाज ये वर वयो (174) साँवलिया सू प्रीत औग्न हूँ आखडी (192) भज उतरे भा पार (196), ताहिक रग मे भोजे रे (199), इस तरह के पदो का प्रयोग किया है। इनसे पता लगता है कि इनके पीछे कभी भक्ति का, कभी शरणागति का, कभी साधना का, कभी दाम्पत्य या भाव प्रधान रहा है । यह मानना ठीक नहीं होगा कि मीरा की भक्ति केवल दाम्पत्य भाव की ही पी यद्यपि उसमें दाम्पत्य भावना एक प्रखरतर विशेषता थी। उसके कारण उसकी भक्ति में एक मतवालापन था, एक हठ या और विशेष तरह का आग्रह भी था । उसे मीरा की भक्ति का स्थायी भाव कह सकते हैं। इसी तरह नितनेम, घरम-करम सम्बधी जैसी शब्दावती आई है, उसम-~- परसि हरि के चरण, 33(1) प्रणाम (2), मगन भई मोरा (2), सतन सुखदायी (3), अरज करत हूँ (5), दरस की भूखी (6) चरण केवल लपटानी (8), सुरत जमाङ (12), हिरदे धरि लोजे हा (12) गिरधर आगे नाचूगी (14), रमैया में देख बो करूंरी (18), जगे रह्या दिन राती (20) बधि वार-पार हगो ग्यान गुह गांसी : 22), जिण मारग साध पधारे उण मारग जास्या (23), साधा के सघ मैं भटकी (24), साधा दरसण जाती (26) सेवा साधु जनन की (29), सत गुरु सरण लहूं (31), सुमिरन थाल हाय म लोना (32) चरणानित को नम (34), नित उठ दरमण जास्यां (वही) निरत करायां (दही), धुंधरिया धम- कास्या (वही), गुण गास्यां (वही), हाय धोय जब देखण लागी (45), उठत बैठत राम (47), भजन कर वही ठौर (47), रहूंगी वैरागण हाय री (48), प्रम भगति को पंही हो न्यारा (50), तरे ही कारण जोगण हूँगी (52), भगवा भेस धरू तुम कारण (70), छाने लपन में कियागे (74), मन कू मार स सन गुरु (92), सोनी सुरत जगाऊ (वही), जोग धारणा (93) रन-वन बीच फ्रूिगी (94), पल पल तरा रूप निहारू (106), दीपक जोऊ ग्यान का (158) इस तरह के भक्ति और साधना स्यों का हवाला है।

मीरा-काव्य लोक्तात्विक अध्ययन /179 इसका आशय यह होगा कि मीरा के समय साधु सतो और लोक मानस में सभी पुरानी रीतियो का समवय हो चुका था। तभी मीरा की भक्ति के रूपो में स्मरण, ध्यान, भजन, कीतन, नतन, दशन, चरणामृत आदि के साथ ध्यान, समाधि मोर भगवा वेश धारण करने की बातें आई हैं । ज्ञान चर्चा भी । लोक जीवन की क्रियाओ, व्यापारो से सम्बधित शब्द-सम्पदा विविध है और अपने समय के सामाजिक, सास्कृतिक और प्राकृतिक स्थितियो के हवाने देने मे सभम भी है। वस्त्रामपणो के, पर्व उत्सदा के विश्वास, धारणा आदि अमूत व्यापारो के, स्वप्न शकुन, नत्य, वाद्य, पशु, पक्षी, परिवार, नाते रिश्त आदि से सम्बधित शब्दो का, मीरा के पदो के आधार पर,पूरा कोश बनाया जा सकता है। ऐसी शब्द सम्पदा का उपयोग या तो नामोल्लेख के रूप मे हुआ है या मीरा की भक्ति के उद्दीपक साधनो के रूप मे, यथा-- क्षुद्र घटिका कटि तट शोभित नुपुर सवद रसाल । मीरा प्रभु सतन सुखदायी, भक्त बछल गोपाल 1 33{3} मारवाड मे आज भी छोटे बच्चों की कमर मे किकिणि वाली करधनी पहनाई जाती है और उसकी आवाज पर बच्चे ठुमक्ते रहते हैं । इस गोपाल रूप के साथ 'सतन सुखदायो' और 'भगत बछल' की भावना जोडी गई है। उसी तरह से 'बकट छपि' (7), के लिए कृष्ण के वाके छैल छबीले रूप के वाचक शब्द सजोए गए हैं। उनमे भीरा की अपनी लोक सस्कृति के तत्त्व भी हैं-- टेढी पाग लद लटके।" कभी ठादी अरज करत हूँ--मे सामतवादी संस्कृति की झलक है । त्रिकुटी महल, झरोखा, सुन्न महल, सुरत, सुख की सेज, पिय के पलग, सुमिरन, सुरभो आसन, मेखला, माला, मुद्रा, खप्पर- :-ऐसी शब्दावली जोधतुर, मेडता नागोर के लोक जीवन म व्याप्त नाथपथी योगियो, सिद्धो और लोक देवताओ के प्रभाव के सकेत देती है। सुदर, सुहावणा, मोहन, नटवर, बकट छवि-जैसे शब्द जोधपुरी राठोडो की सहज सु दरता और माकपक व्यक्तित्व और तद्रूप सौंदय बोध के वाचक हैं। ढोल, डोरी, घुघरू, कछनी पखावज, ताल मदग, निरत मुरली, चग, डफ, भोरचग,-जैसी शब्दावली लोकप्रचलित नृत्य दाद्य, मस्ती, मग्नता की सकेतक है तो बाजूबद कडू ला, नौसर हार, सिंदूर, रतन जडित आभूषण, चूनर, लंगो, घाघरो, चूडो, तिलक, मोती माणक-जैसी शब्दावली तत्कालीन साज सज्जा का हवाला देती है। मोती चौक, आरती, सुमिरण थाल, मोती यौछावरि, मगल गीत-जैसी शावली राजपूती परम्परा, स्वागत, उत्सव की रीति नीति के वाचर हैं। आम, कोयल, पपीहा, मोर, विच्छू, केर, झिरमिट, बादल, कठ चुन, काली

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मीरा-काथ्य लोकतात्त्विक अध्ययन /181 साथ अथ की सगति भी बैठ रही है । वैसे ही 'बडे घर ताली लागी रे 33(21) वाले पद मे छोटी-वही स्थितियो का तुलनात्मक सरणिया से जो विरोध वक्रता पैदा हो रही है, वह चमत्कारी अथ देती है- छोलरिये, डावरिये' की तुलना में 'दरयाव की सरचना, 'हाल्या मोल्या और काम्दारों की तुलना में 'दरबार' 'काँच, क्योर, लोहाँ की तुलना मे हीरा रो व्यापार'-इस तरह से 'बेधि वार- पार ह्व ग्यौ ग्यान गुह गांसी' (22) की सरचना भी अथ भी अतिशयता पैदा कर रही है। 'तो' सरचना वाली उक्तियां अथ मे निश्चयात्मवता और बल पैदा करती हैं--कोई निदो कोई विंदा म्हें तो गुण गोविंद का गास्याँ' (23)। क्रियापद व पास हान से अथ का भार 'गुण' पर नहीं, गाविंद' पर चला गया है । इस तरह से वाक्य सरचना और पराक्रम की मोरा की अपनी विशिष्टता है जो उसके अथ को पैना और वेध बनाती है-- 'भाभी, वोलो वचन विचारि मे (30) 'या ने सौगन म्हारी' (30) म' वरजी मैं काहू की नाहिं रहूँ (31) मे सरचना वदरा दें तो अथ का तीयापन खतम होकर रह जाएगा। जब उक्ति लाक मे प्रचलित मुहावरो, रूढोक्तिया से मिलती-जुलती होती है तो वह लोकानुभव को जाग्रत करन वाली और हृदयग्राही हो जाती है। रूढोक्तियो की चर्चा करत हुए इस बात को हम पहले उजागर कर चुके हैं । मीरा के पदों मे ऐसी उक्तियो की भरमार है-~-'यह छवि देख मगन भई मौग' 33(2), 'माप बिना माहि कुछु न सुहावै, निरखौ सव ससार', दिल दे बहे पठोर (5), 'तुमसे हम कू कब रे मिलोन हम-सी लाख करोरि । (5), 'अरज करत भया भोर (5), 'मन वसिगों (6), 'गउवन के सग डालत हो' (6), 'कभी ठाढी अरज करत हूँ (5), वरजहू अपन दुलरवा' (6), 'सुनिये चितलाय (6), 'रूप लुभानी' (7), चरण कवल मोरा लपटानी' (8), 'नेणा लोभी रे' (9), 'बतियां बहत बनाई' (10), परहण गये विकाई (10), सब लई सोम चढाई' (1), 'पल भरि रह्यो न जाइ (9), नैणा बाण पडी (10), उर विध आन मही' (11), कव की ठाढी पय निहारी (11), 'जीवन मूर जही' (11), 'गिरधर हाप विकानी' (11), लोग पहें विगही (11) 'वनज वसा रो (12), 'डरती पलक न नाऊँ री (12), 'झांकी लगा री' (12), 'सज विद्यारी' (12), 'अलि नाऊ री (12), 'हिरदे धरि लौजे हो' (13) 'नेणा रस पोजे हो' (12) जेहि जेहि विधि रीझ हरी सोई विधि कीजे हो (13), 'बड भागण रोक्ष, हो' (13), प्रेमी जन च जाचूगो' (14), यामे एक न राखूगी' (14) 'पलगा जा पोरगी, रग राचूगी (14), 'कहा करिहै काई (15), 'भगति देवि राजी हुई जगती देखि रोई (15), 'सब जग बारा लागत' (16), 'आर परख, 180/मीरा लोकतात्विक अध्ययन पीली आंधी, दामिनि, पद्रकला, पाला, मेहा, काली नाग, पागा-ऐसी शा वली मारवाही प्रकृति के भिन्न भिन्न रूपो का आभास देती हैं। डगर बुहारना, हिंढोरा फेरना, पारधी, बनज बसाना, तोल तराजू, निरख छाने चौहे लेना, पविणां पधारणा, फेरी देना, पर पर गवण निवार, सरव रिया री पाल सापडणो, पतिया भेजना, सनेसा भेजना, अहसठ तीरथ, व्रत नम, अप्टकरम, सेत निपजाया कालर लूण, ताला कूची पेटी, गुलाल, चोवा, चदन, केसर, अरगजा गागर, राग छतीसू, रंग तन कपडा, कसाई, चंडाल, बावरिया और किंवरिया, दही दूध, माखन माखन रोटी' मटुकी, गुजरिया- ऐसी शब्दावली लो जीवन के विविध काय व्यापरी का सकेत देने वाली है । मौरा के पदो की शब्द सम्पदा विपुल, व्यापर और प्रयोजनवती कही जा सकती है। (2) उक्ति सम्पदा शब्द समदा जव अपशक्ति से आवेशित की जाती तब वह उक्ति सम्पदा बनती है और वक्ता के आशय को, मतव्य को, धारणा को, और उसकी प्रेरणा को आकार देती हैं। मीरा के पदो मे उक्ति चमत्कार कम है किंतु उक्तियों में भावना प्रवणता, अनुभूति की सहजता और मम भेदक्ता के तत्त्व अधिक हैं । उक्ति सम्पदा मे हम मीरा के पदो मे आयी उक्तियो की सरचना, उनकी मुहावरेदानी, रूढोक्ति परम्परा और लोक वान को देख सकते हैं। किसी उक्ति का प्रभाव उसमे अर्थवत्ता की शक्ति, उसकी सरचना से आती है। मीरा के पदो मे उक्तियो के गठन को शैली सामान्य से कुछ मिन ही लगती है, यथा-- जिण चरण ब्रह्माड मेटयो नखसिखा सिरी धरण 33(1)-इस उक्ति में ब्रह्माड की सीमा मेटने के साथ नखसिखा का अव्यव प्रयोग अथ को साकारता देने का काम कर रहा है। ऐसा लगता है जैसे ब्रह्माड भी आकाश से पाताल तक एक रूप हो जिसे नख से शिख तक विष्णु के चरणा न नाप कर उसको अनत सीमाओ का लोप कर दिया। ब्रह्माड नापना कहने या धरती आकाश नापना कहने से उक्ति मे ऐसी अथवत्ता नही आ सकती थी। उसी तरह 'क्षुद्र घटिका करि तट सोभित' (3) मे कटि तट की सरचना अनोखी है जो 'कमर की करधनी का अथ ध्वनित कर रही हैं । 'मेरे यासा चितवनि तुमरी और न दूजी दोर' (5)---यहाँ भी सरचना विचित्र है जो आशा और चितवन के बीच डोर का सम्बध बनाती है वह अगर टूट जाए तो निराश्रितता का अथ मामिर बन कर उभरता है। उसी तरह-सुर नर मुनि मोहे हो ठाकुर जादुनाप, (6) वाली उक्नि मे "ठाकुर' ईश्वर वाचक और 'जदुनाय' यदुकुल शिरोमणि वाचक हाकर दुगुना अथ प्रकाशन करने वाली सरचना बना रहे है, तभी सुर' 'नर' और 'मुनि' जनो के मीरा-काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 18r साथ अथ की सगति भी बैठ रही है । वैसे ही 'बडे घर ताली लागी रे 33(21) वाले पद मे छोटी वडी स्थितियो का तुलनात्मक सरणियो से जो विरोध वक्रता पैदा हो रही है, वह चमत्कारी अथ देती है- छोलरिये, डावरिये' की तुलना मे 'दरयाव की सरचना, 'हाल्या मोल्या और काम्दारा' की तुलना मे 'दरबार' 'कांच, कथीर, लोहा' की तुलना में हीरा रो ब्यापार'--इस तरह से वेधि वार- पार ह्व ग्यौ ग्यान गुह गांसी' (22) की सरचना भी अथ को अतिशयता पैदा कर - 'तो' सरचना वाली उक्तिया अथ मे निश्चयात्मक्ता और बल पैदा करती हैं---'कोई निदो कोई बिंदो म्हे तो गुण गोविंद का गास्यो' (23) 1 क्रियापद के पास होने से अथ का भार 'गुण' पर नही, गोबिंद पर चला गया है । इस तरह से वाक्य सरचना और पदक्रम की मीरा की अपनी विशिष्टता है जो उसके अथ को पना और वेधक बनाती है-- 'भाभी, बोलो वचन विचारिसमे (30) 'या ने सौगन म्हारी'(30) मे वरजी मैं काहू की नाहिं रहूँ' (31) मे सरचना बदल दें तो अथ का तीखापन खतम होकर रह जाएगा। जब उक्ति लोक में प्रचलित मुहावरो, रूढोक्तियो से मिलती-जुलती होती है तो वह लोकानुभव को जाग्रत करने वाली और हृदयग्राही हो जाती है। रूढाक्तियों की चर्चा करत हुए इस बात को हम पहले उजागर कर चुके हैं । मीरा के पदो मे ऐसी उक्तियों की भरमार है-'यह छवि देख मगन भई मीरा' 33(2), आप बिना मोहि कुछ न सुहावं, निरखौ सव ससार', 'दिल के बडे कठोर' (5), 'तुमसे हम कू कब रे मिलोन, हम-सी लाख क्रोरि । (5), 'अरज करत भयो भोर (5), 'मन बसिगो' (6), 'गउवन सग डोलत हो' (6), "कभी ठाढी अरज परत हूँ (5), 'बरजहू अपन दुलरवा' (6), 'सुनिये चितलाय' (6), 'रूप लुभानी' (7), चरण कवल मीरा लपटानी' (8), 'नेणा लोभी रे'(9), 'वतियां रहत बनाई (10), परहय गये विकाई (10), 'सब लई सीस चढ़ाई' (1), 'पल भरि रह्या न जाई (9), नैणा बाण पडी' (10), उर विध आन अही (11), पब की ठगढ़ी पर निहारों (11) 'जीवन मूर जही' (11), 'गिरधर हाप विकानी' (11), लाग पहें बिगडी (11) 'बना बसाऊ री (12), 'डरती पलव न मारी' (12), 'मांकी लगा री' (12), 'सेज विद्यारी (12), 'रलि नारी (12), "हिरदे घरि लोजे हो' (13), भंगा रस पीजे हो' (12), जेहि जेहि विधि रीझे हरी सोई विधि कीजे हो (13), 'वह भागण रोहन, हो' (13), 'प्रेमी जन क जांचूगी' (14), पाम एक न राखूगी' (14) पलगा जा पोरगी, रग राचूगी' (14), 'कहा करिहै काई (15) 'भगति देगि राजी हुई जगती देधि रोई (15), 'सय जग धारो लागत' (16), और 182/ मीरा लोक्तात्विर अध्ययन - बात सब कांची (16) "गिरधर के घर जाऊँ" (17), 'ज्यू त्यू वाहि रिझाऊ' (17), 'जो पहिरावं सो ही पहिरूं जो दे सो ही खाऊ" (17), 'वेचे तो विक जाऊँ" (17), जहाँ जहा पाव धरणो पर' (18), कोई कहे छाने कोई कहै चौडे' (19), 'बजना ढोल , 'मूहधो सूहघो', 'तराजू ताल', 'अमोलक माल', 'लियोरी आँखी खोल , 'पूरब जनम को कौल मतलब कि मीरा के पदो मे लौकिक शैली की मुहावरेदारी ही उन्हें हृदयहारी बनाती है, उनम मगन भाव और महडता लाती है । एक एक पर मे चार से छह तक मुहावरो को बहार दिखाई पड़ती है--- 'खोल मिली तन गातो (20), 'ना कहु आती जाती', 'विरह कलेजो खाय' (101), 'क्यू तरसावौ अतर जामी (101), 'पापी जीव न जा' (96), 'नगर दिढोरा फेरती रे' (102), 'रीत छोड अनरीत क्रोना' (173),-जिधर भी नजर डालें चाहे जिस पद को उठा लें उसमे मुहावरेदार प्रयोग की चटक जरूर मिल जाएगी। इस मुहावरे दरिता के कारण ही मीरा के पद अपवान और सीधे घोट करने वाले बन जाते हैं । इसके अलावा उनमें कहावतो और सहज उपमा, रूपक, आदि अलकार मयता के कारण भी मीरा को उक्तियां विशेष प्रभाव पैदा करती हैं-'और आसिरो नाही,तुम बिन, तीनू लोक मझार' 33(4), 'तुमसे हमकू क्वर मिलागे, हम मी लाख करोरि (5), देस्यू प्राण अकोर (5), 'कुटिल भृकुटी, तिलक भाल, चितवन मे टोना खजन अर मधुप, मीन, भूले मगछौना (9) भली कहो कोई बुरी कहो मैं, सब लहू मीस चढाई' (10), चित्त चढी मेरे माधुरी मूरत, उर विध मान अडी' (11), "पिव के पलगा जा पौढूगी मीरा हरि रग राचूगी' (14), 'जहां बिठावे तित ही बैठू, वेचे तो बिक जाऊ" (17) 'कोई कहे छाने, कोई रहे चौडे, लियो री बजता ढोल' (19), कोई कहे मूहयो, कोई कहे सूहयो, लियो री तराजूतोल' (19), 'चदा जायगा, सूरज जायगा धरणी अकसी। पवन पाणी दो, हो जामेंगे, अटल रहे अविनाशी' (20) 'ना घर भैरा, ना घर तेरा, गाव मीरा दासी' (20), 'इमरित प्याला छोहिके, वुण पीवं कडवो नोर' (21), कुल कुटुम्बी आन बैठे मानहु मधु माखी' (22), 'गज से उतर के खर नहिं चढस्या' (23), 'चाट लगी निज नाम हरी को म्हारे हिवडे खटकी (24), 'सांची पियाजी री गूदडी , देवि विराण निवाण कू, क्यूं उपजादै खोज । कालर अपणोही भलो, जामे निपजे चीज (25), छल विराणा लाख को है अपणे माज न होइ' (25) 'वर होणो अपणो भलो, कोदो कुष्टी कोई,' (25), 'माता पिता सुत कुटुम रवीला, टूट गया ज्यू तागा' (25), चौ मास्यां को बावही ज्या क नीर न पोज, हरि नारे अमृत अरे, ताशे पास करीज' (28), पुन वे मारग चालता जी, हर मारो संमार (29), 'बो पर जनम लिया छ, नाचोददै तारी' (30), 'मान अप- मान दाउ घर पट (33), पह समारबाड का फाटा, ज्या सगत नहिं जास्या" मीरा-काव्य लोकतात्विक अध्ययन / 183 (34), 'थे तो राणाजी म्होंने इसडा लागो, ज्यू प्रच्छन म कर' (37), 'राम नाम का थाझ चलास्या भय सागर तर जास्यो (38), 'जैसे कचन दहत अगिन म, निकसत बारा वाणी (41), 'अपणे घर का परदा कर ले, मैं अबला वौराणी (41) 'म्हन भावे गरदनमार' (42) राठोडा री धीयडी जी सीसौदयाँ रे साथ। लं जाती बैकुठ कू म्हारी नेकुन मानी बात (42), 'या तो अमल म्हारो कबहुँ न उतरे' (44) 'साँझ भई मीरा सोवण लागी, मायो फूल बिछाय' (45) सास लर्ड म्हारी नणद खिजाव, राणो रह्या रिसाय (46), सीप भर्यो पाणी पिबे रे, टॉक भर्यो अन खाय (47), मार्या पराछित लागसी, म्हांने दीजो पीहर मेल' (47), 'कुल की तारण अस्तरी या तो मुरड चली राठोर' (47), कर सूरापण नीसगै, म्हारे कुण राजा कुंण राव' (47), फारूंगी चीर करूंगल कथा, रहूंगी बैरागण होय री चुटियां फोर्स, मांग बिखेरू, कजरा मैं डाढू धोय री' (48), "पविन चाल पय दुहेला, आडा औघट घाट' (49), 'अगर चदण की चिता बणाऊं, अपणे हाथ जला जा' (50), 'जल बल भाई भसम की ढेरी, अपणे अग लगाजा' (50), 'जोत मे जोत मिलाजा'(50), 'रावारी हो के किण रे जाऊ"(51), तरे खातर जोगण हूँगी, करत लूगी कासी' (52) 'भात न दीस, जात न दीस, जोगी किसका मीत' (59) 'इमरित पाइके विप क्यू दोर्ज, कूण गांव की रीत' (60), 'मैं जाणू या पार निभंगी छोड चले अध बीच (61), 'चढती बैस नण अणियाले, तू घरि घरि मत डोल' (62), 'विरह समद मे छोड गया छो नेह को नाव चढाय' (66), 'पाट न खोल्या, मुख ना बोल्या, साँझ भई परभात' (68), 'सूली ऊपर सेज हमारी, किण विधि सोवणा होइ' (75), 'शाण लघण में कियारी, राम मिलण के काज' (74), 'मास गले गल छोजिया रे, करक रह्या गल आहि' आगलिया रो मूदडो म्हारे आवण लागो बाह' (74), "विन पिया जोत मदिर अंधियारो, दीपक दाया न आवे' (75), "विरह नागण मेरी कायाडसी है, लहर लहर जिव जाव' (75) दाभन्या ऊपर लूण लगायो, हिवडो करवत सार्यो'(83), 'ज्यू चातक घन कू रट, मछरी जिमि पाणी हो' (87)। मन कू मार सजू सतगुरु सू दुरमत दुर भगाऊँ। जाको नाम, सुरत की डोरी, कडिया प्रेम चढाऊँ। ज्ञान को ढोल बण्यो अति भारी, मगन होय गुण गाऊ । तन करू ताल, मन करू मारेचग, सोती सुरत जगाऊँ। (92) तरे कारण जोगण हूँगी, दूगी नगर बिच फेरी (24) रूम रूम छावा भई डर मे, मिटि गई फेराफेरी (94), 'भूप गई निदरा गई, पापी जीवन जाणे दै (96), मीरा दासी भई है पडर, पलटया काला देस (97), 'दरसण विण मोहिं जक न परत है, चित मेरो डांवाडोल मीरा कहे मैं भई रावरी, कहो तो बजाऊँ ढोल (110), 184/भीरा लोकतात्त्विा अध्ययन प्राण गमापो झूरता रे, नयण गमाया सेय (102), सबद सुपत मेरी छतियाँ कार्प, मीठे मीठे वैन (103)', 'भई छमासी रंन, (103), 'तुम देख्यो विन कल न परत है, जानत मेरी छाती, (106), 'यो मन मेरो बडो हरामी, ज्यू मदमातो हाथी, (106), 'लागि लगनि छूटण की नाही, अब क्यू कीजै मोटडियां, (108), 'तुम गुणवत बडे गुण सागर, मैं हूँ जो मो गुण हारा, (113) 'तुम बिच हम बिच अतर नाही जैसे सूरज धामा, (115), साणिया दुसमन होय बैठया, सबने लगू कडी (119)-कही कहावतो का प्रयोग, वहीं रूढोक्ति का उपयोग, कहीं सहज समावेश वाली उपमाएँ, वहीं रूपक, कही उत्प्रेक्षा, कही विभावना-'बिन सुर राग छत्तीसू गावं (151), कहो अत्युक्ति~~'आंगलियारो मूदडो म्हारे आवण लागो हाथ, कही उदाहरण~'तुम विच हम विच अतर नाही, जैसे सूरज धामा, कही विरोध वरना और कही नितात लोकिक प्रयोग-~-फाटत छाती, बोलो बचन सम्हालि, दरम की भूखी, हमसी लाख करोर, पियत पिभूख न भटके, चरणा लिपट परूगी ये सब मिलकर मौरा की अभिक्ति को पैनी, तीपी, चुटीली और सहज भाव से मन मे उतरा वाली बनाते हैं । उसको उक्तियां जितनी सपाट बयानी वाली हैं, उतनी ही लोकानुभूतिया से सम्पृक्त है । उनम कवियो को सी कसरत भी नहीं है, जडाव और सजाव नहीं है, इसी कारण शामद पे उक्तियाँ जन जा को हो गई हैं, सव-यापक हो गई हैं और युग जीवो बन गई हैं।

उपसहार मीरा का युग मध्यकालीन सामती युग था। युग ऐमा जिसमे भक्ति, ज्ञान, चराग, वीरता और बलिदान की पाच धाराएँ समातर बहती थी। एक सुदीर्घ सास्कृतिक परम्परा ने उन सबका एकमेव करके ऐसे लोक धरातल का निर्माण कर रखा था कि उसमे से उनके तत्वो को अलग करना सभव नहीं था। मीरा से कुछ पहले नामदेव, कबीर, रैदास, लगभग समकालीन पापा, सेन, सूरदास, वल्लभाचाय, विट्ठलदास आदि थे। मारवाड की भूमि मे लालनाथ, बालनाथ, जभोगी, रामदेवजी जैसे सत और पीर अपने पूरे प्रभाव के साथ लोकचित थे। ऐसे मे मीरा के व्यक्तित्व नै जा भक्ति की बान पकडी तो वह सबके प्रभाव से एक अनोखी ज्योति बनकर प्रकट हुई । उसी पूर्व काल मे ढोला मारू, सोहणी- महिवाल, परमणी, वीसलले रासो परमार रासो (आल्हाखड) जैसे लोककाव्य, भरथरी, गोपीचट, गोरख मछिदर जैसे नाथ कुछ एसा परिप्रेक्ष्य बना गए थे जिसम आम आदमी की आम अनुभूतियो, राग विरागो और मल्हह धारणाओ को वाणी मिली थी। मीरा की अभिव्यजना का वही धरातल था। इसी कारण उसके पदो में हमे ऐसो तीखी अल्हड उक्तियां मिलती हैं जो लोक भाषा मे, लोक व्ववहार मे, ही होती हैं, तथाकथित साहित्य में प्रयुक्त परिनिष्ठित और सीमित अभिव्यक्ति मीरा के पदो का लक्षण नहीं हो सकती। इसी कारण हम पात हैं कि मीरा के कुछ पदो म कबीर, नामदेव, धमदास, गोरख, तो कुछ मे नरसीभगत, सूर, तुलसी, हरिदास और कुछ मे सूफियाना 'आशिक मिजाजी मिलती है । ऐसी समानता का कारण यही है कि ये सब लोक साधक थे । लोक मगल उनका क्षेत्र था और लोरमानस के साथ वे तदाफार हो गए थे, सारे देश में लोकमानस-किसी समय विशेष मे-क्सिी सीमा तक एकाकार होता है और किसी सीमा तक उसमे आंचलिक प्रस्थान भेद भी होता है । उदाहरगतया 'भक्ति या गान तत्व की प्राप्ति अमूल्य धन है-यह लोक- मा यता हजारो वप पुरानी है और सस्कृत से लेकर आज तक उसे भक्तो, सतो, कवियो ने अपने ढग से वाणी दी है- ।

186/भीरा लोकतात्त्विक अध्ययन "निधन कोधन राम हमागे निधन को धन राम । चोर न लेवे, घटह न जाव, भीर पडे 4 आवे काम।" -यह कबीर की वाणी है तो- "हमारो निरधन को धन राम।" "हाय न खरचत, चोर न लूटत, गाढे आवत काम।" ---यह तुलमी को। इधर- "पायो जी मैंने राम रतन धन पाया।" "खरचे नहिं कोई चोरन लेवे, दन दन बढत सवायो।" मीरा ने गाया है। एक तरफ कबीर साधना पथ की कठिनाई गा गए - "मिलना कठिन है कैसे मिलेगी प्रिय जाय।" "ऊँची जेल यह रपटीली, पाँव नही ठहराय ।' "लोकलाज कुल की मरजादा, देखत मन सकुचाय।" 'नहर बास बसो पीहर मे, लाज तजी नहिं जाय।" तो दूसरी तरफ मीरा ने लोकलाज त्यागने मे सकोच नहीं किया-~- लोकलाज कुल की मरजारा या मे एक न राखूगी।' बल्कि- 'छोडि दई कुल की कनि कहा करि है कोई" यद्यपि उसके लिए भी- 'गली तो चारो बद हुई हैं, मैं हरि सू मिलू कैसे जाय ।" "ऊँची नीची राह टपटीली,पाव नहि ठहराह।" ~वाली स्थिति थी। जब भक्त और सत लोर धरातल पर जीते हैं तो उनके काव्य के उपजीवक लोक अवचेतन मे से आते हैं। इसी कारण हमे सब भक्तो सतो मे काफी समान अभिव्यजना दिखाई देती है- कबीर के लिए भी 'परमात्मा जोगी था और उससे मिलने की तहर लोषिक 'सहपन जैसी तोखी थी'-- "कोई मिलावो मोहि जोगिया जोगिया बिन रह्योई न जाय ।" हों हिरनी पिव पारधी हो मारे सवद ये बान।" -तो मौरा के मानस में भी वही लोक चेतना घुमड रही थी- "पिया दिन रह्योई न जाई।" और ' है ऐसो कोई परम सनेही, तुरत संदेसी सावं।"

मीरा काव्य लोकतात्त्विक अध्ययन / 187 -तो, दोनो मे एक सी वेदना और एक सी भापा भी है- उसी तरद रैदास भी लोक मानस के रमैया ये और मीरा भी। तो मीरा और रैदास की कुछ अभिव्यक्यिा भी लगभग समान मिल जाती हैं-~- रंदास गाते हैं- जो तुम तोरो सैया में नाहिं तोहरे।" "तुम सग जोरिक सजना कोन सग जोरू रे ।' -उघर मीरा उलाहना देती है- "रावरी होइ के किणरे जाऊ, तुम ही हिवडा ये साज ।" -अगर रैदास के यहा ब्रह्म-जीव के नाते-सखर-मछिया दीपक-बाती, चांद चकोरा के हैं तो मीरा के वहा "तुम बिच हम विच अतर नाही जैसे सूरज घामा" की व्यजना है। अगरचे सूर, तुलसी, कबीर रैदास, सबने 'असार ससार और दुलभ मनुष्य जम की बातें की हैं तो मीरा ने भी की हैं- "नहिं ऐसो जनम बारम्बार।" का जान् कछ पुण्य प्रकटे माणसावतार।" -सूरदास इसी को यू कहते हैं- "नहिं अस जनम बारम्बार ।" पुटवलौ धौ पुन्न प्रगट्यो, लहयो नर अवता।' और तुलसी इस तरह से कहते हैं कि स्वर वही है, वाणी भिन्न हो गई 'अब लौ नसानी अब ना नसहो।" "राम कृपा भव निसा सिरानी, जागे फिर ना डस हों।" —सूर अपनी गोपियो के माध्यम से 'गोविंद को प्रोत से हटकी रहने, सोक- साज टूटने, चौडे आ जाने की बातें कराते हैं- 'माई री गोविंद सों प्रीत करत, तव ही काहे न हटकी री।" "अब तो बात फैल गई, भई बीज बट को री।" घर पर नित इहै बेर बानी घट घट की रो।" 'मैं तो यह सब सही, लोक लाज पटकी।" ---मगर मीरा ता बचपन से ही कहती है- 'तू मन बरजे माइडी म्हन सांधा दरसण जाता।" और लोकलाज कुण काण जगत की, दइ बहाय जास पाणी ।" कहकर सूर को पीछे छोड देती है। ३

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स्त मोरा काव्य लोक्तात्त्विक अध्ययन् । 489 रह जाता, उसको बानी लोक बानी बन जाती है और अपने अपने ब्रा से व्यापक भूगोल मे, व्यापक देश-काल मे वह लोकवाही हो जाती है। इन व्यापकताओ के बीच मूल को छान निकालना कठिन काम हो जाती है गोरी, रि, रैदास, सूर, तुलसी की तरह मीरा को छान निकालना भी कठिन काम कहा जाएगा। तथापि भीरा के पदो मे हम कुछ लक्षण ऐसे खोज सकते हैं जो 'मीरा की पहचान बनाने वाले कहे जा सकते हैं, यया-- (1) कबीर, सूर, की तरह पदो मे मीरा" 'दासी मीरा' की छाप एक पहचान कही जा सकती है। (2) पदो मे आत्मनिष्ठता की प्रधानता । तदनुसार ही 'म्हैं', म्हारी', हम के सम्बोधनो को एक पहचान बना सकते हैं। (3) उक्तियो मे, राजस्थानी लोकजीवन की रूढीक्तिया,कहावतो मुहावरो को अधिकता को एक पहचान बना सक्त हैं । आम तौर पर हर पद मे उक्लियो की वह लौकिकता ही मीरा की मुख्य पहचान बन सकती है कि उनके कारण ही मीरा की अभिव्यक्ति मे खरापन, तीखापन, अल्हडता और सपाट बयानी आती है। सार रूप मे कथन शैली म एक ओर हम 'कबीर' को रखें-अक्खडपन म तो दूसरी ओर हमें मीरा को रखना चाहिए अल्हडपन मे--- (4) भाषा के शब्द रूपो को, व्याकरणिक गठन को, आधार बना कर हम पहचान नहीं बना सकते क्योकि जव बानी सावदेशिक हो जाती है तो उसका स्थानिक व्याकरण जीवित नहीं रहता। फिर, बानी युगजीवी हो जाए तो रूपाकार शेष नहीं रह जाना, भावना ही भावना रह जाती है । अत' मीरा के पदा की पहचान हमे उसके पदो मे व्यक्त--- (1) टेक (1) हठीलापन, (n) एकागी समपण और (iv) धारदार गति से करनी चाहिए। (5) यह भी नहीं भूलना चाहिए कि "क्तिनी भी लोको मुखी हो गई हो, अभिव्यक्ति मे कितनी भी धारदार हो गई हो, अतत मीरा राजघराने की राठौर क या थी गुहिलोत-बहू थी और राज गयादा उसके रक्त मे थी।" अत मीरा के पदो को बहुत सावधानी के साथ-पास करके सयोग, वियोग 1 जुडे पदो को भावना भूमि पर परखने की कोशिश होनी चाहिए। इस दष्टि में एक आयाम यह भी जोड लेना चाहिए कि मोरा के जीवन म के जितने मुकाम थे, पदो को उनस सहयोजित करके देखना बेहतर होगा-यया-(1) किशोरअवस्था, (1) विवाह सुख की अवस्था, Im) वैधव्य की वह अवस्था जो राणा सागा की 188/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन सूरदास यदि 'गोविंद पो मोल लेते हैं तो मीरा भी यही परती है- "हमनद नदन मोल लिये।" "जम की फांस काट मुममाये, अभय भाजात पिये।" (सूर) तो मीराने- "माईरी में तो लियो गोयिदो मोल।" "कोई यह छाने फाई पहे चौहे लियो री बजता ढोल।" एक तरफ यि ही गदाधर भट्ट नाम के कीतनकार का एक पद मिलता है- 9(242) "हू ता स्याम रग राचो।" देयि विकाय गई वह मूरति, सूरति माहि पगी।' तो मीरा के पद मे कुछ अल्हड अभिव्यक्ति है-- "मैं अपन संयो सग साँची।" "अब काहे को लाज सजनी परगट ह नाची।" वल्लभ छाप के कृष्णदास और मीरा (दोनो समकालीन) के कुछ पदो मे भाव साम्य मिल जाता है - "तनक हरि चितवो मेरी ओर।" "मेरे तो मोहन तुम्ही एक हो, मो सो तुमको लाख वरोर।" कबकी ठाढी में अरज करत हूँ, सुनि हो नदकिशोर।" (कृष्णदास) ऐसे ही भाव मीरा के अलग अलग पदो मे मिलते हैं- "तनक हरि चितवो जी हम ओर।" "हम चितवत तुम चितवत नाही, दिल के बड़े कठोर।" --एक-दूसरे पद मे-"तुमसे हमकू एक होजी, हमसी लाख करोर।" और एक तीसरे पद में-'कभी ठाढी नरज करत हूँ साप भयो परभात ।। ---ऐसे ही निर्गुनिया छाप वाले मीरा के पदाम भी सतो की बानी के साथ समााता मिल जाती है। इन सबका कारण यही जान पडता है कि पूरे लोक मानस मे धर्म भक्ति, वैराग, साधना, नीति, सचाचार, व्यवहार, दर्शन, ससार, जगत, काम, क्रोध लोभ माह स्वाथ, परमाय आदि के बारे में सोच समान धरातल पर स्पदित हाता था। वह मान लेना कि मीरा के पद विही अय जनो के हैं और उह मीरा की छाप से खपा लिया गया है, अच्छा निष्कप नहीं होगा। प्रधेपो की मा यतावे कारण मीरा के पदो में अनक विधवा और विविधता मिलती है। हकीकत यह । कि जब कोई सत या भक्त लोक तत्वो का सिद्ध बन जाता है तब वह व्यक्ति नहीं Homom मीरा काव्य लोक्तात्त्विक अध्ययन् । 189 रह जाता, उसकी बानी लोक बानी बन जाती है और अपने अपने दग से व्यापक भूगोल मे, व्यापक देश-काल मे वह लोक्वाही हो न इन सपिर्वताओ के बीच मूल को छान निकालना कठिन काम हो जाता है। योग कार, रैदास, सूर, तुलसी की तरह मीरा को छान निकालना भी कठिन काम कहा जाएगा। तथापि मीरा के पदो मे हम कुछ लक्षण ऐसे खोज सकते हैं जो 'मीरा की पहचान' बनाने वाले कहे जा सकते हैं, यथा- (1) कबीर, सूर, की तरह पदो मे 'मीग" 'दासी मीरा' की छाप एक पहचान कही जा सकती है। (2) पदा मे आत्मनिष्ठता की प्रधानता । तदनुसार ही म्ह', 'म्हारी', 'हम' के सम्योधनो को एक पहचान बना सकते हैं। (3) उक्तियो मे राजस्थानी लोकजीवन की रूदीक्तियो, कहावतो मुहावरो को अधिवता को एक पहचान बना सक्त हैं। जाम तौर पर हर पद मे उक्तियो की वह लौकिक्ता ही मीरा की मुख्य पहचान बन सकती है कि उनके कारण ही मोरा को अभिव्यक्ति मे खरापन, तीखापन, अल्हडता और सपाट बयानी आती है। सार रूप में कथन शैली मे एक ओर हम 'कबीर' को रखें-अक्खडपन मे तो दूसरी ओर हमे मीरा को रखना चाहिए अत्हडपन मे- (4) भाषा के शब्द रूपो को, व्याकरणिक गठन को, आधार बना कर हम पहचान नहीं बना सकते क्योकि जव बानो सावदेशिक हो जाती है तो उसका स्थानिक व्याकरण जीवित नहीं रहता। फिर, बानी युगजीवी हो जाए तो रूपावार शेष नहीं रह जाता, भावना ही भावना रह जाती है । अत मीरा के पदो की पहचान हमे उसके पदो मे व्यक्त--- (1) टेक, (1) हठीलापन, (ii) एकागी समपण और (iv) धारदार गति से करनी चाहिए। (5) यह भी नहीं भूलना चाहिए कि "क्तिनी भी लोको मुखी हो गई हो, अभियक्ति मे कितनी भी धारदार हो गई हो, अतत मीरा राजघराने की राठौर क या थी, गुहिलोत बहू थी और राज गयादा रसके रक्त मे थी।" अत मीरा के पदो को बहुत सावधानी के साथ-सास करके सयोग, वियोग से जुड़े पदो को भावना भूमि पर परखने की कोशिश होनी चाहिए। इस दृष्टि मे एक आयाम यह भी जोड लेना चाहिए कि मीरा के जीवन म के जितने मुकाम थै, पदो को उनसे सहयोजित करके देखना बेहतर होगा-यथा-(1) किशोरअवस्था, (1) विवाह सुख की अवस्था, (u) वैधव्य की वह अवस्था जो राणा सागा की 190/ मीरा लोमतात्त्विक अध्ययन मृत्यु तक रही, (19) वैधव्य की यह अवस्था जो रत्नसिंह के शासन के समय पी, (1) वैधव्य की वह अवस्था जो मेवाड त्याग से लेकर सम्पूर्ण निराश्रयता ने समय तक पो और (1) द्वारिकायास के समय को अवस्था। इन छह अवस्थाओ मे मीरा के पदा को वर्गीकृत करके देखा जाए तो मीरा के पदोगा कुछ प्रमाणिक स्वरूप उभर सकता है। OD

सन्दर्भ सकेत
[सदभ देते समय पहले तो सदर्भ सख्या दी गई है । उसके बाद कोष्ठक मे
पष्ठ सख्या और पद सख्या।
सकेत
प्रयका नाम
1 महाराणा सागा-हरविनास शारदा
2 भारत का इतिहास खण्ड II
3 राजस्थान के अभिलेखो का सास्कृतिक अध्ययन-डा० श्याम प्रसाद न्यास
4 राजस्थान के मेडतिया राठोड- डा० हुकम सिंह भाटी
5 सास्कृतिक गुजगतगोपाल नारायण बहुरा
6 सोलहवी सदी मे राजस्थान-~~-डा० मनोहर सिंह राणावत
7 परम्परा (पत्रिका) भाग 63 64-सपा० नारायण सिंह भाटी
8 मारवाड रा परगना री विगत-मुहता नैणसी-प्रथम भाग
9 मोरा व्यक्तित्व और कृतित्व-पद्मावती शबनम
10 मारवाड का इतिहास-रामकरण आसोपा
11 मीरा का जीवन वृत्त और काव्य- कल्याण सिंह शेखावत
17 आल्हा खण्ड
13 हिन्दी वीर काव्य मे सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति-डा० राजपाल
14 उदयपुर का इतिहास-गौ० श० ही च० ओझा
15 वीर भूमि चित्तोड-राम वल्लभ सोमानी
16 जैसलमेर की ख्यात [सवत 1513 मे चित्तोड पर राणा कुमा का राज्य
था। उसकी पुत्री दिलकवर जैसलमेर के कुवर देवीदास को ब्याही गई थी।
सवत 1585 मे लूणकरण भाटी को चित्तोड के राणा सागा की पुत्री सरस
कवर न्याही पी और उसने अपनी पुत्री राज कवर-उदेसिंह को ब्याही
पी।]
17 मीराबाई ऐतिहासिक व सामाजिक विवेचन-डा० ईकुमसिंह भाटी

192/ मीरा लोकतात्त्विक अध्ययन 18 जयमल वश प्रकाश 19 मारवाड रा परगना री विगत-नणसी द्वितीय भाग 20 मुगल कालीन सगुण भक्ति काव्य का सास्कृतिक विश्लेषण-डा० रत्नच द शर्मा 21 चुरु मडल का इतिहास-गोविद अग्रवाल 22 दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता 23 मीरा स्मृति ग्रथ-सपा० शलभ' 24 मारवाड का इतिहास-विश्वेशरनाथ रेऊ 25 वश भास्कर-सूर्यमल्ल मीसण 26 पूर्व आधुनिक राजस्थान-डा० रघुबीर सिंह 27 मुगल कालीन सगुण भक्ति काव्य का सास्कृतिक विश्लेषण-डा० रलपद शर्मा 28 मध्यकालीन राजस्थान मे धार्मिक आदोलन-डा० पेमाराम 29 मध्यकालीन भारतीय संस्कृति-डा. गो० ही० ओझा 30 मीराबाई री परची-परम्परा 1984 31 मीरा एक अतरग परिचय-नीलिमा सिंह 32 मीराबाई-डा० राजेद्र मोहन भटनागर 33 मीराबाई की पदावली-परशुराम चतुर्वेदी, सवत, 2012 34 रामचरित मानस-गो० तुलसीदास 35 मीरा मगल-मरुवाणी 31 36 राजस्थानी भाषा और साहित्य-डा० हीरालाल माहेश्वरी 37 लोक साहित्य विज्ञान-डा० सत्येद्र 38 हिदी उपयासो मे लोक तत्त्व-डा० इदिरा जोशी 39 यहाँ हमने आचाय परशुगम चतुर्वेदी, डा. कल्याणसिंह शखावत तथा पद्मावली शबनम द्वारा चयनित पदो का सहारा लेकर लोक्तात्विक अध्ययन किया है। 40 हिदी साहित्य का इतिहास-रामचन्द्र शुक्ल 41 क्बीर ग्रयावली-सपा० श्याम सुदरदास 42 सत साहित्य मे प्रतीक विधान-डा० मुहम्मद अहसन 43 राजस्थानी कहावत पाश-भगीरप वानाडिया 44 मीराबाई-डा0 प्रभात 45 ढोला मारु रा दूहा डा. भगवती लाल शर्मा 46 मीरा सुधा सिंधु-स्वामी आनन्द स्वरूप

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Meera Loktattvik Adhyayan

Author
Dr. Alam Shah Khan
Title
Meera Loktattvik Adhyayan
File name
Meera Loktattvik Adhyayan
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2011/03
Publisher
Sanghi Prakashan Malaviya Nagar Jaipur
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551194
Barcode
4990010031960.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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