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Dhrmm Neeti Darpan
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शो
धर्म नीति दर्पण
भाषानुवाद समेत
SAK*271
पण्डित जयदत्त शर्मा,
संशलित
SXI
star
नपुर
JEIFU
मुन्गीरदानन्द सनवाल द्वारा
अनाड़ा डिवेटिङ्ग लव यन्त्रालय में सुद्रित हुपा
सम्वत् १९५४
सन् १८८८ ईस्वी
मूल"
प्रथमवार १००.
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पुर निवने का पता- नैनेर हिटिमनस्य मनोका
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भूमिका मनुष्य का अपने मुख्य कर्तव्य कर्म को जानना तथा बालकों को प्रारम्भ से ही धर्म की प्रेर पृवत्त करना और सदाचरणम अनुशासित करना, व निन्दित कर्मो के बुरे परिणाम दर्शाकर उनका चित्त उन से फरना, प्राचीन समय से हो सभ्य जातियों के मध्य एक अति आवश्यक बात मानी गई है, क्यों कि जव बालकों के चित्त में धर्म के अंकुर प्रारम्भ से ही जम जाते हैं तो वे सयाने होकर भी सन्मार्ग को नहीं छोड़ते और समाज तथा सायिक राज्य को अपने प्राचरण से हानि नहीं पहुचात अत: इमारी उदार और दी गवर्नमन ने भो विद्यालयों में आर्य बालकों को उनके धर्म नीति में शिक्षा दियेजाने को अनुमति दिई है सन्देह नहीं है कि ऐसी शिक्षा से हमारे युवकों का मानसिक तथा सामाजिक उपकार होगा इस समय पार्य बालक के पढ़ने के लिये धर्म नोति की पुस्तके बहुत कम है इम प्रभाव को देखकर दम छोटो सो पुस्तक का संकलित करने का साहम मुझे भो हुआ है अत: मैने पुराण, इतिहास, स्मृति और नोतियों के अन्यों से ऐसे सदुपदेशों का संग्रह किया है जो स्वाभाविक सहर्म के नियमों के अनुकूल तथा सर्व जन सम्मत और सर्व साधारण के अनुसरण के उपयोगी है, आशा है, कि हिन्दू समाज के सभ्य जन इस छोटी सो पुस्तक का पठन पाठन को प्रणाली में स्थान देंगे, और जो कुछ त्रुटि इस में रहगई है। उस से मुभी सूचित करने से घिरबाधित करेंगे जिस से अब को बार के छपने में वह त्रुटि न रहने पावे, इस काटीसी पुस्तक के संग्रह करने में मुझे निम्नलिखित महाशयों से बड़ी सहायता मिली है जिस का मैं धन्यवाद पूर्वक यहां पर खीकार करता ईअर्थात् पण्डित लीलानन्द ज्योतिर्विद, पति मगदत्त ज्योतिर्विद बी. ए. पहित नारायण दत्त ज्योतिध्दि व हि पुटी भरकर चरपरिहत देवकीनन्दन ज्योतिर्दिद, जिन्हों ने संरकत के अनुवाद तथा हमें के शुद्ध करने में मुझे सहायता दिई है। जयदत्त ज्योतिर्विद तारीख २७ जनवरी १८८८ चीनावान, अल्मोड़ा जयदत्त ज्योति
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प्रथमोऽध्यायः ।
(विद्या)
विद्याधनं श्रेष्ठतरं तन्मूलमितरद्धनम् ।
दानेन वर्द्धतेनित्य नाराय न नीयते ॥१॥ (४०)
विद्या सब धनों से श्रेष्ठ है और इतर धनको मूल विधा है देने से सदा
बढ़ती है न भार होता है. न कोई उसे लेजासकता है।
रूपयौवन संपन्ना विशाल कुलसम्भवाः ।
विद्याहीनान शामन्त निर्गन्धा इवकिं शुकाः॥२॥ (हि.)
सुन्दरता और तरुणतासे युक्त श्रेष्टकुल में जन्म पाये हुए विद्याहीन पुरुष
गन्धहीन पलास के फूलों के समान शोभा नहीं पाते।
दोहा। रूपभयो यौबन भयो कुलह में अनुकूल
विनविद्या के जानिये गन्धहोन ज्यों फूल ।
विद्या विलास मनसी धृतशील शिक्षाः
सत्यव्रता रहितमानमालापहारा: ।
संसार दुःख दल नेग सुभूषिता-ये
धन्यानरा विहितकर्मपरीप काराः ॥३॥ (वि.)
जिनका मन विधाक विलासमें रहता है और जो सुन्दर भील और शिक्षा
से युक्त हैं जो मत्यवाा पालन करते हैं और जो अभिमान और अपषिचतासे
रहित हैं और जो संसारो जनों के दुःखेां को दूर करने से सभूषित हैं और
जो वेदानुसार कर्म करने से दूसरों का उपकार करते हैं वेजन धन्य हैं।
विद्वान् प्रशस्यते सर्वै विद्वान् सर्वत्र गौरवम् ।
विद्यया लमते सर्व विद्या सर्वत्र पूज्यते ॥8॥ (चा.)
विद्वान ही संसार में प्रशंसा पाता है विज्ञान ही सब जगह श्रेष्ठता को
प्राप्त होता है विद्या ही से सव बस्तुओं को पाता है विद्या ही सब जगह
पूजी जाती है।
(२) विहान वहि जानाति विद्वज्जनपरिश्रमम् । नहिबन्ध्या विजानाति गुवौं प्रसववेदनाम् ॥५॥ विज्ञान हो विद्वानों के परिश्रम को जानता है मूखे क्या जाने ने से कि वांझ खोपुत्र प्रसव के क्लेश को नहीं जानती। जातिभिवंटनेनैव चौरेणापि ननीयते । दाने नैव भयंयाति विद्यारत्न महाधनम् ॥६॥ कुटुम्ब के बीच में वाटने से भी क्षय को नहीं प्राप्त होती है और न चार इस को लेसकता है और दान करनेसे भी कम नहीं होती बरन वढ़ती है इस कारण विद्यारूप रन बेष्ट धन है। दाहा। चार न चारो करसके नक्षी नृपतिके साथ वन्ध भाग नहीं लेसके विद्याधन निर्वाध । विद्याददाति विनयं विनयाद्याति पावताम् । पावत्वाचन मानोति धनार्द्धमै तत: सुखम् ॥७॥ (म.) विद्या विनय को देती है विनय से मनुष्य पात्र होजाता है पात्र होने से धन लाभ करता है धनसे धर्म और धर्म से सुख मिलता है। दोहा । सुखचाहे विद्यापड़े विद्याहै सुखहेतु । भवसागर के तरन को विद्याहै दृढ़सेतु । विद्यानाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्न गुप्तधनम् विद्याभोगकरो यशः सुखकरी विद्यागुरुणां गुरुः । विद्यावन्धुजना विदेश गमने विद्यापरं दैवतम् विद्याराज सुपूजिता नहिधनं विद्याविहीनः पशुः ॥८॥ (भ०) विद्या हो मनुष्य का अधिक रूप और छिपाहुआ धन है विद्याही भोग यश और सुख की देने वाली है गुरुओं को गुरु है परदेश में विद्या ही मित्र हे और विद्या हो परम देवता है और विद्या हो राजा लोगों में पूज्य है न कि धन, इसलिये, विद्या हीन नर पशु हैं।
(३) . दोहा। विद्याउत्तम द्रव्य है विद्याधनद निकेत परम मित्र विद्याभनी विद्या कारत सुचेत भाग हीन नर को परम आश्रय विद्याज्ञान विद्या से संसार में गुरुपद ल हैं सुजान यथायथाहि पुरुषः शास्त्रसमधिगच्छति । तथातथा विजानाति विज्ञानंचास्य रचते ॥६॥ जैसे जैसे मनुष्य शास्त्रो को यथावत् जानता जाता है वैसे वैसे उस विद्या का विज्ञान बढ़ता जाता है और उसो में उसकी रुचि भी बढ़ती जाती है। मामृतैः पाणिभिघ्नन्ति गुरुवान विषाचितैः लालनाऽयिणादाषास्ताड़ना श्रयिोगुणाः॥१०॥ जे माता पिता और गुरु अपने सन्तान और शिष्यो का ताडन करते हैं वे उन को अपने हाथ से अमृत पिलाते हैं और जो लाड़ करते हैं वे उन को विष पिला के नष्ट भृष्ट करदेते हैं । सर्वेषामेवदानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते। वार्यनगीमहीवास स्तिलकाञ्चनमर्पिषाम् ॥११॥ संसार में जितने दान हैं अर्थात् अन्न, नल, गो, पृथ्वी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण, और तादि इन सब दानों से वेद विद्या का दान अति श्रेष्ठ है इमलिये तन मन धन से नहातक होसके अन्य दानों की अपेक्षा विद्या दान ही अधिका करना उचित है। विद्वत्वं चन्नृपत्वच नैवतुल्य पादाचन । खर्देश पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ॥१२॥ विद्वान् और राजा की कभी तुल्यता नहीं होमकती क्योंकि राजा अपने हो राज्य में मान और सत्कार पाता है परन्तु विहान सर्वत्र मान और प्रतिष्ठा पाता है। माताशत्रुः पितावैरौ येनवालान पाठितः । " नशाभते ससामध्ये हंसमध्ये बकायथा ॥१शा (चा.) वे साता पिता अपने वानकों के पूर्ण वरी हैं जो उन की विद्या प्राप्ति नहीं कराते हैं विहानों की सभा में वे शोभित नहीं होते हैं जैसे मां के बीच में बगुला। माढपित्तु कृताभ्यासी गुणितामेति बालकः । नगर्भब्युतिमाने पुनोभवति पण्डित: ॥१४॥ (चा.) बालक माता पिता के विद्याभ्यास कराने से गुणवान होता है गर्भ से निकलनेमात्र काई पण्डित नही होमकता है । किंकुलेन विशालेन विद्याहीनेन दहिनाम् । दुष्कुलं चापिविदुषी देवैरपि सुपूज्यते ॥१५॥ जो पुरुष विद्यासे होन हैं उनका उत्तम कुल में जन्म भी निष्फल है और विहान् नोच कुलवाला भो देवता कर के पूज्य होता है। कामधेनु गुणाविद्या ह्यकाले फलदायिनी । प्रवा से मातृ सदृशी विद्यागुप्त धनंस्मृतम् ॥१६॥ (चा.) विद्या में कामधेनु के समान गुण हैं अकालमें भी फलको देनेवाली है परदेश में माताके तुल्य हितकारिणी है इसलिये विद्याको गुप्तधन कहते हैं। द्वितीया ऽध्यायः (धर्म) प्रभवन् प्रकृतयोहि सन्मानयति वापुनः । नूनंमन्य स धर्मात्मा पण्डितास्यां सगच्छति ॥१॥ (शु.) अपने आप किसी वात में निपुण होकर भी ना दूसरे से सम्मत ले वा उसका सनमान करें तो वह धन्मामा पण्डित कहलाता है।
(५).
नसौदन्नमिधर्मेण मनोऽधर्मेनिवेशयेत् ।
अधार्मिकाणां पापाना-माशुपश्यन्वि पर्ययम् ॥२॥ (म०)
धर्म करते करते यदि कष्ट का भी प्राप्त होजाय तब भी मनुष्य को उचित
है कि अधर्म में मन न लगाव देखना चाहिये कि पाप कर्मों का परिणाम
शीघ्र ही बुरा होता है।
धर्माएव हताहन्ति धम्मारवतिरक्षितः ।
तस्माजी नहन्तब्यो मानाधर्मी हताऽवधीत् ॥३॥ म.
धर्मका नाशकरना क्या है मानो अपने को मारना है और धर्म की रक्षा
करा माना अपनीरक्षा करना है इस कारण धर्म का नाश नहीं करना
चाहिए ऐसानी कि हमधर्म का नाश करे और वह हमारा भो नाशकरे ।
मंगलाचार युक्तानां नित्यंच प्रयतात्मनाम् ।
जपतांजुह्वतां चैव विनिपातीन विदा ॥४॥ म.
जी उत्तम आचार युक्त हैं और नित्य शुद्ध हैं और जप और होम में
जो तत्पर हैं उन को देव व मानुष उपद्व नहीं होते हैं।
वेदमेवा भ्यसेन्नित्य यथाकाल मतन्द्रितः ।
तंयस्याहुः परंधर्म मुपधोऽन्यउच्यते ॥५॥ म.
नित्य कर्म के समय पालस्य छोड़कर आकार युक्त गायत्री प्रादि वेदकाही
सदा अभ्यासकरे क्यों कि मनु आदि ने वेद का अभ्यास ही ब्राह्मण का
परमधर्म कहा है और वेदाभ्यास से अन्य उपधर्म कहलाता है।
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्न महारिषु ।
संयमे यत्न मातिष्ठे विहान् यन्तेव वाजिनाम् ॥६॥
नेसे सारथी धेड़ो को वश में रखता है वैसे हो विद्वान्को मन और आत्मा
को खींचने वाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों के निग्रह में सब प्रकार से
प्रयत्न करना चाहिये ॥६॥
कामात्मता न प्रशन्ता नचैवेहास्य कामता। काग्योहि वेदाधिगमः कर्म योगश्च वैदिकः ॥७॥ स. इस संसार में अत्यन्त अभिलाषा और अत्यंत निष्कामता किमो के लिये भो श्रेष्ट नहीं है क्योंकि जो कामना न करें तो वेदों का ज्ञान और वद विहित उत्तम कर्म किसी से भी न होसके। इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्य संशयम् । सन्नियस्यतु तान्येव ततः सिद्धि नियच्छति ॥८॥ जीवात्मा इन्द्रियों के वश में होके नियय बड़े बड़े देषिों को प्राप्त होता है और जब इन्द्रियों को अपने वश करता है तभी सिद्धि को प्राप्त होता है। वेदोदितं खकं कर्म.नित्यं कुर्यादतन्द्रितः । तद्धिकुर्वन्यथाशति प्राप्नोति परमांगतिम् ॥६॥'. म० , वेद में कहे हुये अपने वर्णाश्रम के उचित, कर्म का नित्य आलस्य छोड़कर कर क्यों कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार उस कर्म को करता हुआ मनुष्य परमं गति को प्राप्त होता है। वेदाभ्यासन सततं शौचन तपसैवच. अद्रोहेणच भूतानां जातिं. स्मरति पौर्विकौम् ॥१०॥ म. सदा वेद के अभ्याम, शौच (मन देह.वाणी. करके शुद्ध रहना), और तप (शीत जण भूख प्यास हर्ष शोक को सह लेना), और भूनों के अद्रोह से (प्राणिमात्र का द्रोह भाव छोड़ने से) पूर्व जन्म का स्मरण मनुष्य का होजाता है। वर्जयेत् मधुमांसच्च गन्धं माल्यं रसांस्त्रियः । शुक्तानियानि सर्वाणि प्राणिनां चैव हिंसनम् ॥११॥ म. ब्रह्मचारी सुरा मांस गन्ध माला रसादि वस्तु स्खो का मंग मवप्रकार की मीठोचो जो पोछे खट्टो जाती है त्याग और किमो प्राणो का हिंमा न करे । यो ऽनधीत्य विजी वेद मन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
म. . सजौवन्नेव शूट्रत्व माशुगच्छति सान्वयः ॥१६॥ जो वेद को न पढ़नी और प्रकार के परिश्रम किया करता है वह अपने वंश सहित इसी जन्म में शीघ्र ही शूट भाव को प्राप्त हो जाता है। अर्थ कामेष्वसतानां धर्म जाने विधीयते । धर्म जिज्ञा समानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः ॥१३॥ जो पुरुष सुवर्णादि रत्न और स्त्री सेवनादि में लिप्त नहीं हैं उन्हों को धर्म और ज्ञान प्राप्त होते हैं जो धर्म के नानने को इच्छा करें वे वेद हारा धर्म का निश्चय करें क्यों कि धर्माऽधर्म का निश्चय विना वेद के ठीक ठोक नहीं होता। सत्ये रतानां सततं दांताना मूर्द्धरेतसाम् । ब्रह्मचर्या दहेद्राजन् सर्व पापा न्युपासितम् ॥१४॥ (वि.) जो सदा सत्याचार में प्रवृत्त हों जितेन्द्रिय हो और जिनका वीर्य अधः स्वलित कभी नही हेराजम् ऐसे पुरषांका ब्रह्मचर्य सबपापों का नाश करता हैं। इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषटच्छत्य संशयम् । संनियम्यतु तान्येव तत: सिविनियच्छति ॥१५॥ (म.)- मनुष्य केवल इन्द्रियों के संग से दोष अर्थात् पाप को प्राप्त होता है और उनकै छो रोकने से सिदि लाभं करता है। यथाषण्ढोऽफल: स्त्रीषु यथागोविचाफला । यथाचाऽफलं दानं तथाविप्रो ऽचे ऽफलः ॥१६॥ (शु०) जैसे नपुमके पुरुष लो के लिये निष्फल है जैसे एकगाय दूसरीगाय के लिये निष्कल है जैसे सूर्ख को दान देना निष्कन्न है वैसे ही वेदसे होन बामण निष्फल है । नतिष्ठति तुयः पूर्वा नापास्त यश्वपश्चिमाम् । सशूट्रबहिष्कार्य: सर्वस्मात् हिजकर्मणः ॥१७॥ म. जो प्रातः काल को संध्या को नहीं उपासता है और सायंकाल की भी (८ नहीं उपासता है वह द्विज सम्पूर्ण कर्मों से बाहर करने के योग्य है ! कामे लाभस्तथा क्रोधी दंभश्चत्वार इत्यमौ । महाद्वाराणि ऽवौचौनां तस्मादेतांस्तु वर्जयेत् ४८॥ (ग.) काम क्रोध लोभ दंभ ये नरक के चार महाद्दार हैं इसलिये इन कर त्यागना चाहिए। वर्धयन्निह धम्मायौं सवितौ सद्भिरादरात् 1 निरहौते न्द्रियग्रामः कुर्वीत गुगसेवनम् ॥१६॥ (शु०) चन से इन्द्रिय गणेां के निग्रह पूर्वक सम्बनी चे सेवित्व अर्थ धर्म की बढ़ाता ना गुरू की सेवा को करे। संमाद्ब्राह्मणा नित्व मुदित विषादिव । अमृतस्त्रचाकांक्षे दनानस्य सर्वदा ॥२०॥ म. ब्राह्मण सन्मान से विष के समान प्रति दिन डरे और अपमान को अमृत को समान सदा इच्छा कर अर्थात् तिरस्कार हनिपर खेद न करें। सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्मात्मविदुधः ॥ प्राप्येहलेोके संपानं सुगति प्रेत्य गच्छति ॥१॥ जो सदाचार शोलयुक्त सदासन्तुष्ट, प्रात्मज्ञानी और पण्डित है वही उम लोक में सम्मान पाता है तया मरनेपर भी उत्तम. गति को प्राप्त होता है। वतिः क्षमा दलाऽस्तेयं शौच मिन्द्रिय निग्रहः धौर्विद्या सत्यमक्रोधी दशनं धर्म लक्षणम् ॥२२॥ (म) धर्म के दश लक्षण कहे हैं । ति (अर्थात् धारणशक्ति) २ क्षमा (अवात् किमी से अपकार पाकर उसक्षा अपकार न करना और बुराई के बदले अन्लाई करना) ३ दम (अर्थात् विचार करने वाला विषय पाकर मन में विज्ञार न होने देना) ४ चारी का त्याग ५ पवित्रता ६ विषयों से इन्द्रियों का रोकना शास्त्र आदि का ज्ञान ८अात्म ज्ञान ८ सय १० नोध का हेतु रहते भी क्रोध न करना ।
(8)
.
न हायनैपलिते वित्तेन न वन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्म योनूचानः सनामहान् ॥२३॥ म.
वर्ष और केश का पकना द्रव्य और सम्बन्ध इन सभी से मनुष्य बड़ा नहीं
होता ऋषि लेगीने यहो नियम करदिया है कि हम सबमें बड़ा वही है जो
सामवेदों का जाननेवाला है।
एक: शयौत सर्वत्र नरेतः स्कन्दयेत् कचित् ।
कामाविस्कन्दयता हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥२४॥ म.
ब्रह्मचारो सब जगह अकेला सोया कर कदाचित् भी वोर्य को न गिरावै
क्योंकि इच्छा से वीर्य को गिराताहुआ अपने व्रत को नष्ट कर डालता है।
द्वतीयोऽध्यायः
आचार
रज्यते सत्फले खान्तं दुप्फले न हि कस्यचित् ।
सदसद् बोधकान्येवं दृष्ट्वा शास्त्राणि चाचरेत् ॥१॥ शु.
अच्छे फल की प्राप्ति से सब का मन प्रसन्न होता है दुप्फल को प्राप्ति से
किसोका भो मन प्रसन्न नहीं होता इस से सत् असत् के बोध कराने वाले
शास्त्रों का अवलोकन करो व्यवहार करे ।
असिवादन भौलस्य नित्यं वृद्धो पसेविन: ।
चत्वारि तस्य वर्धन्त आयुर्विद्या यशावलम् ॥२॥ (चा.)
नमस्वभाव वाले और नित्य हद्द ननों को सेवा करनेवाले मनुष्य को ये
चारचोजै अर्थात् श्रायु विद्या यश और बल वढ़ती जाती हैं।
शौलम्प्रधानम्पुरुषे तययह प्रणश्यति ।
नतस्य नौविते नार्थों नधन न बन्धुभिः ॥३॥ (उ०)
चरित्र ही पुरुष का प्रधान गुण है जिसका चरित्र इसलोक में नष्ट होगया
उसका जीवन धन और मित्र सबही वृथा है।
(१०) यद्यदा चरतिश्रेष्ठ रूदेवे तरीजनः । सयत्प्रमाणं कुरुते लाकस्तदनु वर्तते ॥४॥ गा. वेष्ट जन ना जो आचरण बात है इतर अज्ञानो नन भी उसी पाचरण को करते हैं जिम बात को छ पुरुष प्रमाण ठहराते हैं इतर नन भी उसी के अनुसार चसते हैं। अनारोग्य सनायुष्य मखयं चातिभाजनम् । अपुण्य लाकविदिष्ट तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥५॥ म. अतिभोजन करने से रोग बढ़ता है आयु कमहोती है खर्ग प्राप्तिं नहीं होसकती पवित्र को करने में वाधा पढ़ती है और नगत ने निन्दा होतो है इस से मनुष्य को चाहिए के प्रति मेाजन न कियाकरें। दोहा भानन साइ सराहिये नागरीर सुखदा । दुखदाई वह होत है जो मिति से अधिकाइ । नजाति कारणं तात गुणाः कल्याण कारणम् । व्रतस्थमपि चाण्डालं तंदवा ब्राह्मणं विदुः ॥६॥ हे तात युधिष्ठिर नाति कल्याण का हेतु महों है किंतु गुण ही सच्याण कारक है यदि चाण्डाल भो इन्द्रियों के मंमयरूपो व्रत में स्थित हो तिसको भो देवता ब्राह्मण जानते हैं । दृष्टिपूतं न्यसैत्यादं वस्त्रयूतं नलंपिवेत् । सत्यपूतां वदेहाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥७॥ मा भलीभांति टेखकर पैर रखना चहिए वससे छानकर जल को पीना चाहिए सत्य से पवित्र करके वचन बोलना चाहिए और शुद्ध सन से आचरण करना चाहिए। ननाति नकुलंरान नखाध्यायः श्रुतन्नच । कारणानि हिजत्वस्य व्रतमेवहि कारणम् ॥८॥ हे राजन् जाति कुल वेदाध्ययन शास्त्रका श्रवण यह सब विजन का (११) कारण नहीं है किंतु इन्द्रियों का समय रूपी व्रतही विजल का कारण है। अद्भिर्गावाणि शुद्धान्ति मनः सत्येन शुद्धाति । विद्यातपाभ्यां भूतात्मा बुद्धिजनिन शुद्धयति ॥८॥ नल से देह शुद्ध होता है मन सत्याचरण से, जीवात्मा विद्या और तप से, और बुद्धि नान से शुद्ध होती है । अनायुष्यं दिवास्वप्नं तयाभ्युदित शायिता । प्रगै निशा माशुतथा वैचाच्छिष्टाः खपन्ति ॥१०॥ दिन कोनीद लेना और सूर्योदय होने के उपरान्त सैतिरहना श्रायु को क्षय करता है प्रातः काल में तथा रात्रि को प्रोत्र सोजाना और अधि हाक साना ये सव निषिद्ध हैं। चतुर्वेदापि दुव्रत्त: शद्रादपतरः स्मृतः । तस्मादिदि महाराज व्रतंब्राह्मण लक्षणम् ॥११॥ जी ब्राह्मण धारों वैदों को पढ़ामी हो परन्तु जो खाटमार्ग में प्रवृत्त है वह शूद्रसे भो अधम है इसकारण हे राजन् व्रतही ब्राह्मण का लक्षण है। रजसासि प्नतांनारौं नरस्य युपगच्छतः । प्रज्ञातनी बलष्चक्षु रायुश्चैव प्रहीयते ॥१२॥ (म.) जो मनुष्य रजस्वला नारो गमन करता है उस की बुद्धि सेज चषु और परमायु का नाश होता है। नाप्सुमूवं पुरोषवा ष्ठौवनं वा समुत्सृजेत् । अमेध्य लिप्त मन्चहा लेाहितंवा विषाणिवा ॥१॥ (म.) जल के मोतर मल मूत्र न करें न थू के अथवा वस्ल को जिस में विष्ठा वां मूत्र लगा हो जल के भीतर नघावें और लाइ या किसीप्रकार का विष न डालें आचार होनं नपुनंतिवेदा यद्यत्पधीता सहषड् भिरङ्गः ।
(१२) छन्दांस्थेनं मृत्युकाले त्यजन्ति नौइंशकुन्ना इवजात पना: ॥१४॥ यदि चारों वेद छ: अगों के साथ भी पढ़ेजांय तौभी वे प्राचाररहित को पवित्र नहों करसकते वेद मृत्यु काल में उसको त्यागदेते हैं जैसा पक्षोका वचा पर निकलने पर अपने घासचे को छोड़ देता है इमनिमित्त विहानको मी किमो काल में प्राचार का त्यागना नहों उचित्त है। आचाराल्लमते चायु राचाराल्लभते श्रियम् । आचाराल्लभते कौति पुरुषः प्रेत्य चेहच ॥१५॥ (अ.) भले आचार से मनुष्य को आयु बढ़ती है धन प्राप्ति होती है और प्राचारही से इस लोक में तथा मरनेपर यश बढ़ता है ! श्रेयान्यत्कुरुते कसं तत्काल्य खिलाजनः । मनुतेयत्यमाणंस स्तदेवा नुसरत्यसौ ॥१६॥ ग• गौ. जो कर्म महान् पुरुष करते हैं वहो कर्म इतरजन भी करते हैं वे जिस को प्रमाणिक समझते हैं और भो उसी को मानते हैं। सत्यधर्माय वृत्तेषु शौचे पैवारमत्मदा । शिष्यांश्च शिष्याइस्मेण वाग्वाइदरसंयत: ॥१७॥ (म.) भले लोगों के प्राचार, सत्यधर्मा तथा पवित्रता इन सव में सर्वकास प्रवृत्त रहै भार्या पुत्र दास छात्र इन सब को धर्म का करना - सिखा वै वाणि वाहु उदर इनका संयम करे वाणि का समय सत्य भाषण से होता है बाहु के बल से किसी को पोड़ा नदेवै तब वाहु का संयम होता है जो कुछ थोड़ा सा मिलजाय उसो के भोजन से संतुष्ट रहने से उदर का संयम होता है । बनेऽपिदोषाः प्रभवन्ति रागिणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रहस्तपः । अकुत्सिते कर्मणियः प्रवर्चत ।
(१३)
निवृत्त रागस्य गृहं तपावनम् ॥१८॥ (शा.)
विषयानुरागो पुरषों की वन में भी दोष घेरलेते हैं घरपर पांचों इन्द्रियों का
संमय ही तप है जो निन्दित कर्मी में प्रवृत्त नहीं होता एसे विषयानुराग
रहित पुरुष के लिये घरही तपावन है ।
चतुर्थो ऽध्यायः
उद्यम
भारभेतव कर्माणि श्रान्तः श्रान्तः पुनः पुनः ।
काण्या रममाणंहि पुरुषश्रीनिषेवते ॥१॥ (म०)
काम करते करने यदि थक जाय तौभी कामी का प्रारम्भ करता ही रहे
कयो कि काम के प्रारम्भकर्ने वाले की सेवा लक्ष्मी करती है।
दोहा उद्यम किये अनेक विधि सधेन जवहु काम
दैव प्रवल तव कहत हैं जे पण्डित मतिधाम ।
उद्योगिनं पुरुष सिंह मुपैतिलक्ष्मी ।
वन देय मितिकापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरुपौरुष मात्मशता ।
यत्तकृते यदिनसिध्यति कोऽनदोषः ॥२॥ हि.
उद्यमी मनुष्य के पास धन अपने आप जाता है भाग्य से मिलेगा ऐसी
वात उद्योगहीन पुरुष कहते हैं भाग्य का भरोसा छोडकर अपने सामर्थ्य से
पुरुषार्थ करना चाहिए यदि यत्न करके भी काम सिद्ध न होवे तो
उस में क्या दोष है ।
दोहा श्रमही सो सबमिलत है
विन श्रम मिलेन काहि।
सीधी भंगुलो घीनस्थो
क्यों निकर नांदि।
(१४) . नवल्प मध्यध्य वसावभौगः । करोतिविज्ञान विधियांहि । बंधस्य किंहस्त तलस्थितोऽपि । प्रकाश यत्वर्थ मिहप्रदीपः ॥३॥ (भ.) उद्यम से डरनेवाले को विज्ञान विधि कुछमी गुणदायक नहीं होती जैसे इस लोक में अंधे को हथेली में राहुवा दीपक भो पदार्थ को नही दिखलाता। उद्यमेनहि सिद्ध्यन्ति कार्यागिन मनोरथैः । नहिसप्तख सिंहस्थ प्रविशन्ति मुखेमृगाः ॥४॥ चा. उद्यमसे ही प्रत्येक कार्यसिद्धहोते हैं केवल मनोरथ से नहीं जैसे सेतिहुए सिंह के सुख में मृग अपने पाप नहीं प्रवेश करते हैं। दाहा उद्यमघर लक्ष्मीपसे व्यापंखेने पोन । चलै फिरै तो कुछमिले बैठे दाता कौन । पूर्वजन्म कृतंकर्म तद्देव मितिकथ्यते । तस्मात्पुरुष कारण यत्नं कुर्य्यादतंद्रित: ॥५॥ पहिले जन्मका कियाहुमा कर्म प्रारब्ध कहलाता है इसहेतु श्रालस्य रक्षित हो कर्म करने में यन करतारहै।। दोहा श्रमकीन्हें, सुख मिलत है,बिनउपाय-नहीं भाग दैव देव करत भालसो भागत हैं दुःखशाक। निपानमिव मराडूकाः सरःपूर्ण मिवाकड़नाः ।। सोद्योगं नरमायान्ति विवथाः सर्व संपदः ॥६॥ हि.. जैसे कुड में मेड़क और बड़े तालाब में,जैसें पक्षी पाते हैं ऐसे ही उद्योगी मनुष्य के पास सारी सम्पतियाँ अपने.श्राप चली पाती हैं । दोहा श्रमकीन्हे धन हातहै धनही सुखका भूल। व्यवसाई अरु चतुरस्नेर उंयम को मत भूल ।
एकनापिहि शूदेगा पादानान्तं महौसलम् । वियते मारकरणे न सफारस्फुरित तेजसा ॥७॥ नि. एकही पराक्रमी पुरुप अपने प्रवल, परामाम से सम्पूर्ण पृथ्वो को अपने वग में कर सकता है जैसे एक सूर्य समस्त जगत की प्रकाशमान दारता है। आलस्यहि मनुष्यापों शरीरस्यो महान् रिपुः । नास्त्युद्यमसमा वन्धुर्यं कृत्वा नावसौदति ॥८॥ नि. प्रामास्य सनुप्य के टेह में बड़ा शत्रुहै, उद्यम के समान दुसरा कोई मिच नहों जिम के करने से मनुष्य कभी दुखित नही होता । शक्षा प्रालस वैरी वसत तन सव सुसकी हरिलेत त्यो हो उद्यम वंधुसों किये सबल सुखदेत । नहि देवेन सिध्यन्ति वार्थिवीन सत्तमः । नचापि कर्मणे दोन हास्यासिद्विस्तु योगतः ॥६॥ एक संग देव से वापक संग पौरुप से कोई कार्य सिद्ध नहीं होता इन दोनों के एकत्र होनेसे ही सिद्धि प्राप्त होती है। आवद्धा माजुषाः सर्वे निवद्धाः कर्सणाईयाः । देवे पुरुष कारेच परन्तास्यांनविद्यते ॥१०॥ मनुष्य देव और पौरुष इन दोनो कमी ते बंधे हुए हैं देव और पौरुष के सिवाय और कुछ भी बलवान नहीं है। पञ्चमोऽध्यायः सज्जनता साधाः प्रकापि तस्यापि मनानायोति विक्रियाम् ।
(१६) नहि तापयितु शक्यं सागराकरणतया ॥१॥ (हि.) साधु मनुष्य के मन का क्रोध दिलानसे भी उम में विकार नहीं उत्पन्न होता है जैमा ममुद्र का पानी फन को आग से गरम नहीं होता। धनानि जीवितच्च व परार्धे प्राजउमजेत् । सन्निसित्ते वरंत्यागा विनाशे नियते सति ॥॥ (हि.) बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि धन और प्राणका भी आग के लिये त्याग करें क्यों कि धन इत्यादि का विनाश ती नियय हाना है इसलिये सत्कार्य में त्याग करना हो उत्तम है । नित्योधर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवोऽनिलो हेतुरस्य त्वनित्यः । त्यक्त्वाऽनित्यं प्रतितिष्टखनित्यं सन्तुष्यत्वं तापपरीहिन्लाभः ॥३॥ वि. धर्महो नित्य है सुख दुःख वे अनित्य हैं जोव अनित्य है जीवका कारगा अविद्या यहभी अनित्य है इम मे इस्को छोडंना चाहिए और निमका कभी नाश नहीं ऐमी जे नित्य वस्तु परमेखर है उस में निष्ठा रख के संतोष पाना उचित है सव लाभों में संतोष ही बड़ालाभ है । यदाचरण सालोक्य तुष्यन्ति साधवाजनाः । तत्पुण्य मिति विज्ञेयं तत्वार्तव्यं सदाबुधैः ॥४॥ जिम आचरण को देखकर माधुजन प्रसन्न होते हैं उम को पुण्य कहते हैं बुद्धिमान ननों को ऐमा कर्म करना चाहिएँ । स्मरन्ति सुकृतानेव नवैराणि कृतान्यपि । सन्तः प्रत्यभि नानन्तो नवा प्रत्ययमात्मन: ॥५॥ (सभा) संजन अपने निज अनुभव हारा परायेदुःख का विशेष समभाते है इसलिये वे केवल उपकार काही स्मरण रखते हैं और यदि कोई शत्रुतासे भो अपकार करतो भूलनात हैं। नाप्राप्त मभिवाञ्छति नष्टंनेच्छन्ति शाचितुम् ।
। (१७) भापत्खपिन सुधन्तिनरा: पण्डितबुद्धयः ॥६॥ (हि.) बुद्धिमान मनुष्य दुप्याप्य वस्तु की इच्छा नहीं करते नष्ट वस्तु का मोच भो नहीं करते पापत्तिकाल में मोहित भी नहीं होते । यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्तिच कुर्वते नकिविदवमन्यन्ते नराःपण्डितं बुद्धयः ॥७॥ नो लोग अपने शक्ति के अनुसार कार्य करने की इच्छा करते हैं और उसी अनुसार कार्य करतेभी हैं और किसी का अपमान नहीं करते बेदी पण्डित हैं। अरण्ये विननेन्यस्तं परखंदृश्यते यदा । मनसापि नसिन्ति तेनरा: खगंगामिनः ॥८॥ म. जो निर्जन अमल में भी परायाधन देख कर जी से भी साखच नहीं करते वे वर्ग को जाते है। शत्रु मित्रच येनित्यं सुल्येन मनसानराः । भनति मैवाःसङ्गम्य तैनराः स्वगंगामिनः ॥६॥ (प.) जेा और मित्र के साथ समभाव से वर्ताव करते हैं अर्थात् दाना से मैत्रीभाव रखते हैं वे वर्ग को जाता है। वैप्रियाणि प्रभाषन्ते प्रियमिच्छन्ति सत्कृतम् । श्रीमन्तो वन्द्यचरिता देवास्तेनरविग्रहाः ॥१०॥ जो जन प्रिय अर्थात् मीठी वायो बोलते है और उसीप्रकार दूसरे का प्रिय अर्थात् भला करना चाहते हैं वेही श्रीमान् और प्रशंशनीय चरिच है और मनुष्य रूपसे साक्षात् देवता है। नचैवातान वानुक्ता हीनत: परुषागिरः । प्रतिजल्पन्ति वैधौरः सदातूत्तम पुरुषाः ॥११॥ (समा०) नीच मनुष्य बुराकई वा नकई परधोर जो मनुष्य हैं वे कभी उनका प्रत्युत्तर नहीं देते हैं।
(१८) हिमांशु मालौचयथा नवोत्फुल्लोत्पलंसरः । श्रानन्दयति.चेतांसि तथासुजन चेष्टितम् ॥१२॥. जैसा चन्द्रमा संगवर का जिस में नये फूले कमल हैं शोभित करता है ऐसे ही सज्जन का आचरण भी चित्त का आनन्दित करता है। दयालवश्व. दातारी रूपबन्ती जितेन्द्रियाः । परोपकारिणश्चैव तेऽपूर्वा मानवाः स्मृताः ॥१३॥ जो लोग दयावान दानशील रूपवान जितेन्द्रिय और परोपकारी है वे मनुष्य अपूर्व अर्थात् अहितोय हैं । येपरेषां श्रियंदृष्ट्वा नतपन्ति विमत्मारा: । प्रहृष्टाश्चाभि नन्दन्तितेनराः खर्गगामिनः ॥१४॥ जा मनुच य दूमरे के ऐश्वर्य का देख के नहीं जलते हैं वरच हिंसारहित और मन्तुष्ट होकर आनन्द प्रकाश करते हैं वे जन स्वर्ग को जाते हैं। सर्वहिंसानि वृत्ताये नंरा:सर्व सहावये । सर्वस्वाश्रय भूताच तेनराः खर्गगामिनः ॥१५॥ (हि.) जो मनुष्य सब हिंमाओं से रहित हैं जो सव सहने वाले है.जो सब को आश्रय देनेवाले हैं वे मनुष्य वर्ग गामी होते हैं।. यस्तुशवोर्व शस्थस्य शतोऽपि कुरुते दयाम् । हस्त प्राप्तस्य वीरस्यतञ्चैव पुरुषं विदुः ॥१६॥ शत्रु के अपने वश में आने पर भो वा.बीर के पकड़े जानेपर भी जो मनुष्य उसे दण्डदेने वा मारने को सामथं रखके भो उसपर दया करे वही पुरुष कहलाता है। माढवत्परदारेषु परट्रव्येषु लाष्टंवत् । आत्मवत् सर्वभूतेषु यह पश्यतिसपण्डितः ॥१७॥ (चा..) परखियों को माता के समान परावैधन का पत्थर के समान सवनीयों को अपने समान जो देखता है या मानता है वही पण्हित है। .
क सजातीयेन जातेन यातिवंशः समुन्नतिम् । परिवर्तिनि संसारेः मृत:का बानजायते ॥१८॥ (नि.) इस संमार में उसो मनुष्य का जन्म सफल है जिस के नन्मने से वशको उति हो नहीं तो गाडी के पहिये के समान सदा घूमनेवाले संसार में सभी जन्मन्ते और मरते हैं। मनसि वचसि कार्य पुण्य पौयूष पूर्ण। त्रिभुवन मुपकार श्रेणिभिः पौगयन्तः । परगुगण परमागून पर्वती कृत्य नित्यं । निजहुदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्त: ॥१६॥ (नि.) ऐसे जन जगत में विरले हो हैं जिन के मन में वचन में और शरीर में पूण्यरूपी अमृत भराहो और नो उपकार से तीनों भुवनों की बात करनेवाले हैं और दूमरों के घेडिमे भी गुणों का पर्वत समान वड़ाकर दिखाते हैं और मन में सदा प्रसन्न रहते हैं। मम्पत्सु महतांचित्तं भवत्युत्पल कोमलम् । विपत्सुच महाशैल शिन्लासयात कर्कशम् ॥२०॥ महात्मा लेागो का चित्त ऐश्वर्य में कमल से भी कामल और आपत्ति में पर्वत को वड़ी शिला के समान कठिन होनाता है। “विपदिधैर्यमथा भ्युदयेक्षमा सदसिवाक् पटुंता युधिविक्रमः । यशसिचाभि. चिव्यं सनंश्रुती- प्रकृतिसिद्ध मिदंहि-महात्मनाम् ॥२१॥ भी. विपत्ति में धोरज अपनो वृद्धि-में चमा, सभा में वायी की चतुरता युद्ध में पराक्रम, यश को इच्छा, मास्त्र में व्यसन, ये छ: गुण -महात्माओं में स्वभाव हीसे होते हैं। 1-
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(२०)
पद्माकरं दिनकरी विकची करोति ।
चन्द्रोविकाशयति कैरवचक्रवालम् ।
नाभ्यर्थिती जलधराऽपि जलंददाति ।
सन्तः खयं परहिते सुकृताभि योगाः ॥२२॥ नि.
जैसे सूर्य विना. प्रार्थना किये ही कमल का खिलाता है चन्द्रमा भो
कुमुटिनो के ममूह को भापही प्रफुल्लित करता है और मेघ भी बिना मागे
हो जल वरमाता है वैसे ही मत्पुरुष भी बिना के है ही परोपकार करने
में तत्पर रहते हैं।
निरर्थ कल हं प्राजो वर्नयेन्मूढ सेवितम् ॥
कीर्तिञ्च लभते लोक नचानर्थेन युज्यते ॥२॥. हि.
मूख यथा कलह को करते हैं बुद्धिमान मनव, ऐमानों करते हैं और
सो से जंग में यत्र पाते हैं।
विविधस्यापि दुःश्वस्य सन्तोषे विलया भवेत् ॥ .
प्रनया संस्थितचायं. प्रमन्न वृदयो भवेत् ॥२४॥ :
एक मन्तोष को प्राप्ति होने पर तीनों प्रकार के दुःख नष्ट हो जाते हैं
इमो प्रकार स्थिर बुधि वाले का मन मदा प्रसन्न ही रहता है।
सनीषा मृत तृप्तानां यत्सुखं शान्त: चेतसाम् ।
कुतस्तचन लुब्धानामितञ्च तश्चधावताम् ॥२५॥ हि.
जो सुग्म मंतोष रूप अमृत से लंत शान्तषित पुरुषांका है से सुख इधर
उधर दौड़तेहुए धन के लोभियों को कहा है।
सर्वाः संपत्तय स्तस्थ संतुष्टं वस्यमानसम् ।
उपानहूढ़ पादल नंनुचर्मा तेवभूः ॥२६॥ हिं.
जिमका मन संतुष्ट है उस को मव संपत्ति है जूतापैर में पहिने हुए
मनुष्य को पृथ्वीचमड़े से मलेसी है।
ग.
1
(२१)
सन्तोषम्बरमास्थाय सुन्वार्थों संयतोभवेत् ।
सन्तोषमूलहिं सुख दुःखमूलं विपर्ययः ॥२७॥"म.
परम सन्तोष को पार्यो संखार्थो संयम (अर्थात पन्द्रिय निग्रह) करें क्योंकि
सुरड को जड़ संतोष है दुखकोजड़ असंतोष है ।
तुल्यनिन्दा स्तुतिमांनी 'संतुष्टो येन कैनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमति भक्तिमान में प्रियानरः॥२८॥. ग.
निन्दा स्तुति की ममान जान प्रयोजन के अनुसार वत्व करें और जो
प्राप्त है। उस से संतुष्ट है। बुद्धिस्थिर रक्खे ऐमा भक्तिमान् पुरुष ईश्वर को
प्यारा. है.।
समः शचीच मिवेच तयामानापमानयोः ।
शीतोष्ण सुखदुःखेषु समा सङ्ग विर्वजितः ॥२६॥ ग०
शत्रु
मित्र मान अपमान को समान जौने और गोत अष्णा और सुख दुःख में
ममतारख अभंग रहे।
प्रलये भिन्न.सर्यादा भवन्ति किलसागरा:.1
सागरा भेद.मिच्छन्ति प्रलयेऽपि नसाधवः ॥३०॥ चा.
ममुद्र प्रलय के समय में अपनी मर्यादा का.छाड़देते हैं और सागर भेदकी
इच्छाभो रखते हैं परन्तु माधु-तोग, प्रलय होनेपर भी अपनो मर्यादा को
नहीं छोडते ।
दिौमा तदपि तजत मर्याद नहि साधु सभांव गंभीर।
प्रलयकाल में-रखें मर्यादा. मनधोर!
षष्ठोऽध्यायः
संसर्ग
शुचि त्वं व्यागिता गर्दा समान सुख दुःखयाः।
दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यताच सुगुणाः ॥१॥.
हि.
शुद्ध रहना, लाभ न करना, वीरता, संख दुःखं समान मानना, भद्रता,
देई और सत्य प्रेम येमित्र के गुण हैं।
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(२२) . मोहनालस्य योनहि मूढेरेव समागमः । अहन्यहनि धर्मस्य योनिः साधु समागमः ॥२॥ हि. सूढ़ों का समागम माइका कारण होताई पर साधुओं का समागम धर्म यदि का कारण होताहै। दोहा : संगति कीनै साध की हेरे और को व्याधि । पोशी संगति नीचकी आठों पहर उपाधि । उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्र विप्लवे । राजदारी सशाने च यस्तिष्ठति स वान्धवः ॥३॥ हि. उत्सव, विपद, दुर्मिष, विद्री, राजहार और श्मशान में जो साथ करता है उसी को मित्र समभाना चाहिये । दो। सुख में सज्जन बहुत दुप में लोन छीन । . साना सवन कसनको विपत कसोटी कीन । न कश्चित् कस्य चिम्मित्रं न कश्चित् कस्यचिद्रिपुः। व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा ॥४॥ हि. न कोई किसी का मिबहै न कोई किसी का शत्रुहे व्यवहार ही से मनुष्य मित्र या शत्रु होते हैं। कौटाऽपि सुमनः सदा दाहिति सतांशिरः । प्रमापियाति देवत्वंमहद्भिः सुप्रतिष्ठितः ॥५॥ कोड़ा भी फूलों के संग से श्रेष्ट पुरुषों के सिर पर चढ़ जाताहै पार पत्थर भो बड़े ननों से प्रतिष्ठा किया इभा देवत्व को पाताहै। दाहा। उत्तम ननके सप्त में सहन होय सुखभास । जैसे नृप ला तर तेत सभाजन बास । यथेादय गिरे सन्नि करेन दोप्यते । तथा सत्संनिधानेन हौंन वर्णोऽपिदीप्यते ॥६॥ जैचे उदयाचल की वस्तु सूर्य के समीप होने से प्रकाशित होती है ऐसे ही ससंग से नीच जाति भी प्रकाशित होती हैं। दोहा। होय शह मिट कलुषता समिति को पाय । जैसे पारस को परस लोई कनक जाय। जाउंधिया हरतिसिञ्चति वाचिसत्यम् मानीन्नतिं दिशति पाप मपाकरोति। चेतः प्रसाद यति दिचु तनाति कौंतिम् सत्सङ्गतिः कथयकिन्न करोति पुंसाम् ॥७॥ भ. सत्सङ्गति बुद्धि की जड़ता को माग कर देतो बाणी की सत्यता की बढ़ाती है मान की वृद्धि करती है और पाप को दूर करती है चित्त को प्रसन्न रखती है देशान्तरां में कीर्ति को फैलाती कहिए तो सत्सङ्गति मनुष्य का क्या नहीं करती पात उस सभी वस्तु प्राप्त होती हैं। सुजन : सङ्गतं कुर्याहर्माय च सुखायच । सेव्य मानस्तु सुजनै महानति विराजते ॥८॥ शु. धर्म और सुख के लिये सज्जन का संग करना चाहिए क्योंकि महान पुरुष सज्जनों से वेष्टित होकर अत्यन्त शोभा पाताहै। सतांसकृत् सङ्गत मौप्सितं परं ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते। नचाफलं सत् पुरुषेण सङ्गतं ततः सतां सन्निवसेत् समागमे ॥३॥ सज्जनों से एक बार भेट होने से ही परम मैत्री हो जाती है सजनों का सह कभी विफल नहीं होता है इस कारण उनका संसर्ग करना चाहिये। यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधि गच्छति । तथा गुरु गतां विद्यां शुश्रूषु रधि गच्छति ॥१०॥ (म.) गुरु को सेवा का फल यहहै जैसे मनुष्य कुदाली से खोदते खादते जलको प्राप्त होजाता है ऐसे हो गुरु की सेवा करने हारा गुरु में विद्या की মম কামা। । ...1 दुर्जनेन समं सत्यं प्रीतिचापिन कारयेत्... अणोदहति चाङ्गारशीता कृष्णायते करम् ॥२१॥ हि. दुष्ट से मित्रती और प्रीति नहीं करनी चाहिये अङ्गार गरम रहने पर ती हाथ जलाता है और ठण्डा होजाने पर भी हाथ काला करता है। दाहा। संगत से सब होत वाही तिन्न यहिं तेल । जातपात सब छोड़ के पायो नाम फुलेल । बसि कुसंग-चाहत कमल तनुमों ये मन, साचं । महिमा घटो समुद्र को रावण बस परोस । सत्संगागुण संभूतिःसपदा लय एवञ्। खहितं प्राप्यते स रिहलापरव च ॥१२॥ - ग संतसंगै गुण की प्राप्ति और भापति का नाश होता है इमलोक और परलोक में अपमा कल्याण होता . सत्संगः परमं तीर्थ- सत्संगः परमं पदम् । तस्मात्सर्व परित्यज्य सत्सङ्ग सततं कुरु ॥१३॥ सत्संग ही परम तीर्थ है सत्संगत ही में परमपद मिलता है इसलिये सबको छोड़ सत्संग करना उचित है। मत्या परौंक्षा मेधावौं बुद्धया सम्पाय चासात् । श्रुत्वा दष्टार्थ विज्ञाय प्रान्तमा समाचरेत् १४ उ. बुधिमान को चाहिये अपनी युक्ति से परीक्षा करके और बुद्धि में बार बार निश्चय करके भलीभांति देख अन और नानकर जानियों से त्रों करें ।
(२५)
सप्तमोऽध्यायः
पुत्र, नारी धर्मा इत्यादि
यम्माता पितरी बोथ सहते सम्भव नृणाम् ।
नतस्य निष्कातिः शक्या कर्तुम्वर्ष शतैरपि ॥१॥ म०
मनुष्योंके ना देने पर उनके पाखनमें जा कर माता पिता सहते हैं उसका
मदता सौ वर्षों में भी नहीं दिया आसकता है।
तयार्नित्यम्प्रियांदाचार्यस्यचसर्वदा ।
तेष्वेव विमु तुष्टेषु तमः सर्व समाप्यते ॥२॥ म.
इस कारण मा बान माता पिता को और पाचावं अर्थात् गुरु को भली
सगे उसका हदा किया करें क्योंकि पून तीनों को प्रसन्न रखने से ही सब
तपस्वा पूरी होती है।
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तेषां बयाणां शुश्रूषा परमन्तम उच्यते ।
नरभ्यननुज्ञाता धामन्यं समाचरेत् ॥३॥ म०
इन तीनों (माता पिता और भाचार्य) को शश्रूना अर्थात् टहल करना ही
परम तप कहानाता है, और तोनों की पात्रा बिना किसी दूसरे धर्म को
कभी न करे।
सर्वे
तस्यादृता
धर्मा वस्यैते बयथादृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वा स्तम्या फलाः क्रियाः ॥४॥म.
जिम मनुष्य ने इन तीनों का सत्कार करलिया है उसने मानी सब ही
धर्मा का यथाचित परिपालन करलिया है और जिसने इन तीनों का आदर
सत्कार नहों किया जाना कि उसके सबही कर्म निष्फल हैं।
तएव हि वयो लाकास्तएव वय आश्रमाः त एव हि बया वेदास्तएवातारवयाग्नयः ॥५॥ म. तोना नाम तीनों प्राश्रमतीनां वेद तीनों अदिन येहो तोनी हैं। तत्कर्म नियतं कुर्य्याद् येन तुठो भवेत् पिता। तबहाद येन पिता मनागपि विषौदापि ॥६॥ ऐमा काम खरना चाहिये जिममे पिता सन्तुष्ट हेव और ऐसा काम नहीं करना चाहिये जी किश्चिद भी उम को बुरा लगे। पुत्रस्य पितु राज्ञाहि परमं सुषचा स्मृतम् । भार्गवेग सा माता राघ वस्तु नं गतः ॥७॥ पिना कि पाज्ञा पालन करना पुत्र के लिये श्रेष्ट भूषण बहा है क्योंकि पिता को आज्ञा पालन करने के लिये परुशराम ने अपना माता का मार. डाला और श्रीरामचन्द्र जो ने वन वाम लिया। ' शोचन्ति नामयो यत्रबिनश्यत्वाशु तत्कुलम् । नशोचन्ति तु यता वर्हते ताई मर्वदा ॥॥ म. जिन कुल में स्लो दुःख पातो हैं वह अल शोन हो नष्ट होनाता है और जिम कुन्त में खो दुःख नहीं पाती हैं वह इन नटा वढ़ता है। सन्तुष्टी भार्यया भर्ता भर्वा भाया तवैवच । यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तववैध्रुवम् । ॥६॥ निस कुल में स्त्री से पुरुष और पुरुष से स्त्री सदा प्रसन्न रहते हैं उस कुख्य में आनन्द लक्ष्मी और सौभाग्य निवास करते हैं। छायेवानुगता खच्छा सखीवहित कन्झबु । दासौवा दिष्टकार्येषु भार्यामतुः सदा भवेत् ॥१८॥ स्त्री को चाहिए कि छाया के ममान पनि के अनुगत रहे उस के हित कर्म में सखी के समान होवे और दासो के तुल्य उस को आज्ञा में तत्पर रहे।
(२७) न कामेषु न भागेषु नैवये न सुखे तथा । स्पडा यस्या यथा पत्यौ सा नारौ धर्म भागिनौ ॥११॥ शु. जे. स्त्रो काम भै ग ऐश्वर्य पार सुख में पेसो इच्छा नहीं रखती जैसे अपने पति में रखती है वहो धर्म को भागिनो होतो है। आर्थ्यावन्तः क्रियावन्त: समाऱ्या गृ:मेधिनः । भार्सा वन्तः प्रमोदन्त सायावन्तः श्रियान्विताः ॥१२॥ निन को भार्या में उनकी को क्रिया मफल हैं जिन को भार्या हैं वेशी रहस्य है भाय्यावाने हो श्रीनंद करते हैं और भाऱ्यांवाले ही श्रीमान् हैं। साभार्थ्या या गृहे दना । साभ.यां या प्रजावती मनावा कर्मभिः शुद्धाः । पतिदेशानु वर्तिनौ ॥१३॥ भार्या वही है जो घर के काम धन्टों में निपुण है भार्या वही है जिस के. मन्त न उनपन्न होता है भार्या वही है जो पति के आघ्रा में रहती है और मन वचम तथा कम से शुए रहती है। खभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम् । अतीर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदास्तुविपश्चितः ॥१४॥ म. मनुष्यों को अपने शृंगार श्रादि की चेष्टासे माहित करके दूषित करना यह स्त्रोवों का खम वही है इमलिये पण्डित लोग नारी के विषय में साथ- धान से रहते हैं अर्थात उन्मत्त नहों होते हैं। अविद्यासमलं लाकै विद्वांसमपि वा पुनः । प्रमदा झुत्यथन्नेतुकाम क्रोधवशानुगम् ॥१५॥ म. काम क्रोध सहित हो वा पण्डित हो चाहे मूर्ख हो उसे निषित राहपर लेजाने को स्त्री समर्थ है। विशील कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः (२८) उपचयः स्त्रिया साध्या सततं देववत्यतिः ॥१६॥ शोल रहित उन्मत्ते अधवा गुणों से रहित नै हो क्यों नही पतिव्रता स्त्री के निकट पति देवता के समान सेवा करने के योग्यहै। अष्टमोऽध्यायः लोम माशानामनदी मनोरथ बला, ना तरंगाकुला रागग्राहवती वितर्क विगा, धैर्य द्रुम ध्वंसिनी । माहा वर्त सुदुस्तराऽ तिगहना प्रोतुङ्ग चिन्तातटो। तथाः पारगता विशुद्ध मनसा नन्दन्ति योगीश्वराः ॥१॥ (म) पाशानाम एक नदो है जिसमें मनोरथ का नउ भरा है उससे बणा की तरंग बारमार उठाकरती है संग जो उसमें मगर है नाना प्रकार के तर्क अर्याल शुम पशुभ विचार हो उस में पक्षी हैं ये रूपोहच को उखाइने वालो है भोप लपी भौरा उस में पडा है इस से वडो दुस्तर और कठिन हो रही है वडी चिन्ता हो उसके तट है उस से पार होकर केवल वडे शुद्ध मनन शीलं यामी हो भानन्द को पाते हैं ! लाभेन बुद्विलति लोभी जनयतेषाम् । दृषार्तो दुःखः मानोति परवेहच मानवः ॥२॥ हि लाभ से वुद्धि चलायमान होतो है वही सृषा अर्थात् कामना को उत्पन्न करता है कामना.वाला मनुष्य इस लोक तथा पर लोक में दुःख पाता है। सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुता ।छत्तार: संशया नाँच लियसे लाभ माहिताः ॥३॥ हिं. बड़े शास्त्रों को पढ़े व सुने हुए और वहुत संशयों को दूर करने वाले भो मनुष्य लाभ में ग्रस्त होकर दुःख को पाते हैं।
(18) लाभाल्क्रोधः प्रभवति लाभात्कामः:प्रजायते ।। लाभान्मोहश्च नशिश्च लोम: पापस्य कारणम् ॥४॥ हि. लोभासे क्रोध होता है:लोभ ही में काम की उत्पत्ति है लोभ से ही मोह और नाश होता है:लोम ही पापका कारण है। धनलुम्धोद्य संतुष्टोऽ नियतात्मा जितेन्द्रियः । सर्वाएवापदस्तस्य यस्यतुष्ट नमानसम् ॥५॥ हि. धन का लाभो. श्रमन्तीपो अनियतात्मा अजितेन्द्रिय पार जिसका मन प्रसन्न नहुधा उस वो.सवा आपत्ति होती हैं। असंभवं हेम मृगस्य जन्य तथापि रामा लुलुमे मृगाय । प्रायः समापन्न विपत्ति काल धियाऽ पिएसां मलिनौ भवन्ति ॥६॥हि. साने का मृग का जन्म असम्भव है तौभी राम ने मृग के लिये लोभ किया वहुधा विपत्तिकाल आनेयर पुरुषों की वृद्धि भ्रष्ट हो जाती है। नवमोऽध्यायः नीति लोभः स्वप्नोऽ तिः क्रौर्य नास्तिक्यं भिन्न वृत्तिता। याचिष्णुता प्रमादश्च तामसं गुण-लक्षणम् ॥१॥ (म) तमो गुणके लक्षण ये हैं अर्थात् लाभ (अधिक धन आदि की इच्छा) स्वप्न (नियमसे अधिक सोना) अधैर्य अथवा कायरयन, क्रूरता नास्तिकता। (ईस्वर या परलोक को नमानना) शास्त्रोक्त आचार से भिन्न प्राचार रखना मागने का खभाव डालना और उनमत्तता अथवा असावधान रहना । फलोपलब्धिः प्रत्यक्षः हेतुना नैवदृश्यते । प्राक्कर्म हैतुकीसातु नान्यथैवेति निश्चयः ॥२॥ (शु). कोई कार्य ऐसा होताहै जिस में फल की प्राप्ति दृश्यमान कारण से नहीं' (३०) - देग्न पडतो उस में निसय करके पूर्व जन्म का संचित् कर्म ही हेतु है। वयं कर्म कोल्यात्मा खयन्तत्फल मधुने । स्वयं भ्रमति संसारे खयन्तस्माविमुच्यते ॥ (चा) जीव अकेलाही कर्म करता है और उमका फल भी अकेला हो भीगता है आप ही संसार में भ्रमता है और पापडो उम से मुक्त भो होजाता है। परोल्कर्षा सहिष्णुत्वं परहात्य पगतिः । इत्याद्या वहवश्चान्ये राचस्याः प्रकृतगंगा: ॥8॥ दूसरे को उल्कार्षता न मानी दूसरे के काम को नष्ट करना इत्यादि बहुत से राक्षमी प्रति के.गुण है। कर्म कारौन्द्रियग्रामं नियम्यास्ते स्मरन्पुमान् । तगोचरान्मन्दचित्तो धिगाचार: सभाष्यते ॥५॥ ग. जो कर्म करने वाला इन्द्रियों की रोक कर मन हो मनमें इन्द्रियों के विषयों का स्मरण करता है वह दुरात्मा तुच्छ आचार वाला कहा जाता है। दुराचारो हौ पुरुषो लोक भवति निन्दितः । दुःश्व भागीच सततं व्यांधिताऽ ल्यायुविच ॥६॥ कर्म करने वाला पुरुष-मंमार में निन्दित होता है नित्य दुःख पाता है और रोगो होने से अल्पायु भो होजाता है। वेदात्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्तपांसिव । नविन दृष्टभावस्य सिद्धिगच्छन्ति कहिचित् ॥७॥ वि. जो दुष्टचारी अजितेन्द्रिय पुरुष है उस के वेद त्याग यन नियम और तप तथा अन्च. अच्छे काम कभी सिद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं। नधर्म शास्त्रं पठतौति कारणं नचापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः । खभाव ऐवाव तथाति रिच्यते
(३१)
.."
यथा प्रकृत्यों मधुरं गवां पयः ॥ "हि.
दुष्ट को धर्म शाग्न पढ़ाना और वेद का पढ़ाना धार्मिकता का कारण
नहीं है उम्र में ख़भाव ही काःवल सर्वोपरि है जैसा गाय का दूध खभाव
हो से मोठा होता है। ::
अन्योदया सहिषावाछिद्रदर्शी विनिन्दका
द्रोशीलः स्वान्तमलः प्रसन्नास्यः खलः स्मृतः ॥॥ (शु)
जिम का टूमरे का भला अच्छा नहीं लगता हो, दोष देखने वाला हो,
निन्टक हो, द्रोह करने वाला है। और भौतर अन्तः करण में मन्न भरी हो
और बाहर मुना में प्रमन्न-दिखाईटे उम को वन कहते है।
मनखन्यदरवन्चक मण्यन्वहरात्मनाम् ।
मनस्य ववस्येक कर्मण्ये कं महात्मनाम् ॥१॥ (हि.)
दुष्ट के मन में वचन में औरं, काम में और होता है परन्तु' महात्माओं के
मन में एक वचन में एक, कर्म में
एक
जयेत् कदा दानेन सत्येना ऋत वादिनम् ।
क्षनयार कर्माण मसाधु साधुनाः जयेत् ॥११॥ (वन)
दानमै लोभी की जय को मत्यवचन से मिथ्यावादी को, क्षमा से क्रूर को
धर्म से अधर्मों को जया करें...":
सत्यं ब्रूयात् प्रियं त्रुयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् ।
प्रियंत्र नानृतं ब यादेष धर्मः सनातनः ॥१२॥ - वि०
मञ्च वाले और प्यारा बोले : अप्रिय सत्य भी नहीं बोलना चाहिए और
प्रिय मिथ्या भी न वाले यही सनातन धर्म है।
विद्यागमार्थ पुत्रस्य हत्यर्थ यतते.
.. पुत्रं सदा साधुशास्ति प्रीति कृत्स पिता ऋणी ॥१३॥ (२०)
जो पिता पुत्र के विद्या लाभ और उस के जीविका के अर्थ यत्न करता है
होता है।
चयः ।
(३२) और पुष को भसा उपदेश करता है वह अनृणो पिता उस के प्रेम को बढ़ाता है। विषादप्य मृतंग्राह्य वालादपि सुभाषितम् । अमित्रा दपि सत्त ममेध्यादपिकाञ्चनम् ॥१४॥ (म.) अमृत विषमें भी मिसाहो तोयी विषदी पखग करके इसे अक्षण करना चाहि अच्छी वाह-को यदि चाकमो कहे तो उन से मी मोखलेना चारिए भना भाचरण यदि शत्रु भो करे तो उस का अनुमरह कर्ना चाहिए और सुवर्ण यदि मैले में भी चाहतो उसे उठालेना चाहिए। दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कतोपि सन् । मगिना भूषितः सर्पः किमसौ नभयकरः ॥१५॥ (हि.) दुर्जन यदि विधावान भी है तोभी उंस से दूर रहना चाहिए यदि सर्प के शिर पर मणि शोभित भी हो तो क्या लोग उस से नहीं डरत ?! दुराचारी दुराद ष्टिदरावासौ-चदर्जनः । यन्त्री क्रियते पुभिर्नरः शीघ्र विनश्यति ॥१६॥ जिमका आवरण बुरा है निम को दृष्टि पाप में रहती है जो बुरे स्थान में वास करता है और दुर्जन इन पुरुषों के साथ दो मैत्री करता है वह नर शीतो नष्ट होजाता है। दोहा। बुरे पाचरन नास के मासु दष्टिमें पाप बुरे ठौर में जा बसे जो दुर्जन है श्राप । दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सो न दुर्जनः । सो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे ॥१७॥ दुर्जन और सर्प इन में सांप अच्छा दुर्जन बुरा इस कारण कि सांप काल भानपर काटता है खलता पद पद में। दोहा। दुर्जन पद पद पर डसें सर्प काल को पाय । नातें दुर्जन सर्प ते अधिक हात दुखदाय ।
(३३) टाहा। त्यजेदेकं कुलस्वार्थ ग्रामखायें कुलंत्यजेत् । ग्रामं जनपदस्याः आत्मार्थे पृथवौं त्यजेत् ॥१८॥ कुम्न के निमित्त एक को छोड देना चाहिचे ग्राम के हेतु कुल का त्व ग करना उचित है देश के अर्थ ग्राम का और अपने अर्थ पृथवी का अर्थात् सव का त्याग ही उचित है। एक जै कुन्न अर्थ हित ग्राम कुलह के अर्थ । देश अर्थ ग्रामहु तजे, देश पातमा प्रधे । पदापाः पुरुषेयेह हातब्याभूतिमिच्छता। निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधं पालवं दीर्घसूत्रता १६॥ हि. मम्पत्ति के चाहने वाले पुरुप को चाहिए कि. निद्रा तन्द्रा (उत्साह शून्यता) भय क्र'ध पान्नस और दीर्घ सूत्रता (काम टेर लगाकर करना) इन दापी का त्याग करै चे. छहा दोष कार्य के विगाहने के लिये हैं इसमें मदद नहीं है। नहौदृशं संवननं विषु लोकेषु विद्यते । दया मैत्रीच भूनेधु दानज्च मधुराचवाक् ॥२॥ शु० भव प्राणियों में दया और सुहद्भाव रखने तथा टेने और मधुर वासने के तुल्य एम त्रिभुवन में कोई भी वशीकरण नहीं है। येन केनाप्यु पावैन यस्य कस्यापि देहिनः । संतोष ननयधर्मा त्तद वैश्वर पूजनम् ॥२१॥ जो मनुष्य किमी उपाय करके किसी देहधारो के आत्मा को संताप पहुंचाता है वही पूर्ण रीति से ईश्वर का पूजन करता है। कुचैलिनन्दन्तमलेापधारिणं वह्वाशिनन्निष्ठुरभाषिणंच । सूर्योदये चास्तमित शयानं विमुञ्चतिौर्यदि चक्रपाणिः ॥२२॥ चा मलिन बनधारण. करने वाले को, दांतों के मल दूर न करने वाले को, - (३४) . वहुत भोजन करने वाले की, कटु वचन वालने वाले की, मूर्य के उदय और अम्त ममय में सैनेि वाले का लक्ष्मो छोड़ देतो है चाहे वह विष्णु भी हो । यस्मिन् कर्मगि सिद्ध पि लभ्यते न फले। दयः । असिद्ध ऽपि महदुःखं तद्बुधः कथ माचरेत् ॥२३॥ जिस काम के मिह हानि पर भी कुछ पल न मिले और भभिड होने में महादुम्न होता मे काम को. ज्ञानी क्यों करें। अविमन्वादको दक्षः कृतज्ञो मतिमाऋजुः । अपिसंतीणा कोषोऽपि लभते परिवारणम् ॥४॥ जो किमो से नहीं डरता है. निमसे और जन भी नहीं डरत बसी पुरुष यथार्थ जानी है और वही मनुष्यों में उत्तम है। आलस्यं मदमाहाच चापलं गाष्टिरेव च । स्तब्धता चाभिमानित्वं तथा त्यागित्व मेवच ॥२५॥ वि. विद्या को इच्छा करने वाले को इन मात अवगुणेां को छोड़ना चाहिए पालस्य, गर्व, चंचतवृत्ति, वाने, उन्मत्तता, मान, लाभपना । एते बै मप्ताषा: स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः । सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिन: सुग्वम् मुखार्थी वा त्यजद्दिद्यां विद्यार्थी पा त्यजेत्मुखम् ॥२६॥ वि. नाम्निस्टप्यति काष्टानां नापगानां महादधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुसा वामलोचनाः ॥२७॥ . वि. येसात दोष-विद्यार्थियों के लिये कहेगते हैं सुपरकी या करने वाले को विद्या कहां विद्या को इच्छा करने वाले को सुख कहां इसलिये सुखी को विद्या शिड़नो विद्यावान को मुख छोड़ना अर्थात् सुख और विद्या दाना साथ नहीं प्राप्त होते । संक्रड़ियों से पग्नि को ति नहीं होती नदियों से. समुद्र तत नहीं' (३५) होता मंव माणि मात्र से मृत्यु सप्त नहों होसी पुरुषों ये छिनास खी लम नहोती। पुरुषा वहवा रानन् सततंप्रिय वादिनः । अप्रियस्य तु पथ्यख्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः ॥२८॥ नि. राजन् ! इस मंमार में प्रियवालने वाले पुरुष तो बहुत हैं परन्तु प्रप्रिय किन्त हित कहने और सुनने वाले पुरुष दुर्लभ हैं। एकैकशीविनिम्नन्ति विषया विषसन्निभाः। किं पुनः पञ्च मिलिताः न कथं नाशयन्तिहि २६॥ (श) एक एक भो विषय विष के समान मारडानता है जहां पाचों मिलेको वहा क्या नहीं करेंगे अर्थात् जहां पाचों हैं वहा तो अवश्य नाश करेंगे। अधर्मगधते तावत्तता भद्राणि पश्यति । ततः सपत्रान् जयतिसमूलस्तु विनश्यति ॥३०॥ अधर्म करने वाला पहिले हि पाता है फिर कल्याण को देखता है फिर मनुभो' को जोतता है पचात् भूल सहित नष्ट जाता है। वन्धीहि काया विषयानुरागः कावा विमुक्तिर्विषये विरक्तिः । को वाऽस्ति घेरीि नरकःखदेही वृषणाक्षयः खर्ग पदं किमस्ति ॥३१॥ वन्धन क्या है विषयों में प्रीति मुक्ति क्या है विषयों में वैराग्य वडा नरक क्या है अपना ही देश स्वर्ग प्राप्ति क्या है। प्राशा कृष्णा का स्वाग। विषयामिषलाभेन मनः प्रेरयतौन्द्रियम् । तन्निध्यात् प्रयत्नेन जिते तस्मिन् जितेन्द्रियः ॥५२॥ (श.) मन विषयक्षपो भाग्यपदार्थ के लाभ से इन्द्रियों को चलायमान करदेता है इनिये उम को प्रयन से राकै उमो के नीने जाने पर मनुष्य जितेन्द्रिय है। क्रोधादनान संभूतिविभ्रमस्तुततः स्मृतः । भ्रंशात्स्मृते मतध्वंसस्तदध्वंसात्मोऽपि नश्यति ॥३३॥ क्रोध से अज्ञान और इमसे स्मृति मंश होती है स्मृति भंश होने मे बुद्धि भष्ट होजाते है. और बुद्धि के नष्ट होने से ग्रह प्राणो नष्ट हो जाता है। कामाभिभूनः क्रोधादा यो मिथ्या प्रतिपद्यते । स्खेषुचान्ये वातत्य नमहाया भवन्त्य तः ॥३४॥ जो गनुच काम वा क्रोध के वश में होकर अपने वा परावे ने कपट करता है उस का काई भो महायक नहो हाना। 'प्रस्ताव मदृशं वाक्यं मनाव सदृशं प्रियम् । ‘आत्म शक्ति समं कापं या जानाति सपण्डित: ॥३H (चा) प्रमंग के अनुमार वालचाल मचे प्रेम से प्यार और अपने शक्ति अनुमार क्रोध को जी जानता है वही पगिड़त है। यथाहि निपुणाः मम्यक् परदोषे क्षणं प्रति । तथाचे निपुणाःखेषु कानमुच्येत् बन्धनात् ॥३६॥ जैसे यह जोव औगि के दोष खोजने में वडा निपुण है वैसे यदि अपने टोषिों के देखने में निपुण होवे तव कोन संसार रूपी वन्धसे से न छटे अर्थात् सवही छूट सकते हैं। • यूतं स्त्री मद्यसेवैतत् त्रितयं बबनर्धवत् । अयुक्तं युक्ति युक्तं हि धन पुत्र मति प्रदम् ॥३७॥ शु. यूत, स्त्रो,मय, येतीन जव अति मेवन किये नाव नो वडे अनर्थ कारी है यही, तोन युक्ति से सेवन किये जावे ता. धन, पुत्र, विद्या, देने वाले होते है अर्थात् थोड़े सेवन से जूवा धन को स्त्री पुत्र का, मद्य विद्या को बढ़ाता है। F संसारहत्कः श्रुतिजात्म वाधः का मोक्ष हेतुः कधितस्मएव । हारं कि मेंकं नरकस्य नारी स्वर्गप्रदं किं जगतामहिंसा ॥३८॥ संसार छुडानेवाली क्या वस्तु है वेदान्त, मेाक्ष का कारण क्या है, आत्मज्ञान, नरक का एक मार्ग क्या है, स्वो, स्वर्ग देनेवालो वस्तु क्या है, किसी भी प्राणी की हिंसा न करना। कावादरिद्रोऽति विशाल टमाः श्रीमांश्च को यस्य मनमुतुष्टम् । जीवन्मृतः कस्तु निरुद्यमा यः काबा मृतिौनजने दुराशा ॥३९॥ दरिद्री कौन है जिस को वड़ो या है, धनवान कोन है जिम का मन सन्तुष्ट है, जोनेपर भी मराहुा कौन है जो उदाम हीन है, मृत्यु के ममान क्या है, नीच मनुष्यों की आशा करना । कुसुमस्तवकस्थेव हेवृत्तौ तु मनखिनः। सर्वेषां मूनिवातिष्ठेदि येत वनेऽथवा ॥४॥ नि० फूलो के गुच्छों को नाई विदान की दो गति हैं याता सब के मस्तक पर रहना या वन में पड़े पड़े विखरा रहना। अथभद्राणि भूतानि हौन शक्ति रहम्परम् । मुटुं तथापि कुर्वीत हानिहेष फलंयतः॥४१॥ (वि) द्या धनादि में कुशली हैं और अपने में कोई पराकाम नहीं है यह देख किसी की हिंसा नहीं करनी चाहिए परन्तु विनोत हा के चलना उचित है क्योंकि इष से हानि ही होती है। . सब लोग (३) निरन्तु नीतिनियुगा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् । अद्यैव वा सरामस्तु युगान्तरे वा न्यायात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ॥४२॥ नि. नोतिज नाग निन्दा करें अथवा स्तुति,लक्ष्मी मनमानो अावे अथवा चनो जवि, आडर हो मरना होय, अथवा युगान्तर में, परन्तु धीर पुरुष न्याय के मार्ग से पाव विचलित नहों करते। गुणागुरानेबु गुणाभवति तेनिर्गुणं प्राप्य भवंतिदोषाः । आवाटा तायाः प्रभवन्ति नद्यः समुद्र मासाद्य भवन्त्यपेयाः ॥४३॥ (भ) गुणों के जानने वालों में गुण को प्रशंसा होती हैं बेहो निर्गुणियों में दोष होजाते हैं जैसे नदियां खादिष्ट जल वान्ती नि परभो मसुद्र में मिलकर अपय अर्थात् खारो जल हनि में पीने के योग्य नहीं रहती हैं। गुणायन्ते दोषाः सुजन वदने दुर्जन मुखे गुणा देोषायन्ते किमिति जगतां विस्मय पदम् । यथाजीमृतावं लवण जलधेर्वारिमधुरं फणी पीत्वा क्षौरं वमति गरलं दुःसहतरम् ॥१४॥ (भ.) श्रेष्ट पुरुषों के मुख में जाकर दोष भी गुणकप होनाते हैं और दुर्जनों के सुख में जाकर गुणभो दोष रूप होजाते हैं यह जगत् में आश्चर्य है जैसे मेघ समुद्र के खारी जल को पान करके मधुर जल वरसाते हैं और सर्प दूध पान करके विन को वरमाता है वैसे ही निंदक शास्त्रज्ञपी अमृत का पान करके निंदासपी विप को वरमाते हैं।
दैवे ससर्य चिरसञ्चितमोहजालं सुस्थाः सुखंसत किं परयाचनाभिः । मेरु प्रदक्षिणा यतोऽपि दिवाकरस्य ते तस्य सप्त तुरगा न कदाचिदष्टौ ॥४५॥ (शा.) बहुत दिनों के इकड़े किये हुए मेाह नालों को दैव के अर्पण करो अर्थात् छोड के सुख से भानन्दित होके रहे दूमरे से मागने से क्या होता है। (टेखो माने का पहाड) मेरु के चारोओर घूमकर भी सूर्य सात हो घोडे रखते हैं कभी पाठ न हुए. अर्थात् याचना करके भो भाग्य से अधिक कुछ नहीं मिलता। प्रारभ्यते नखलुविन भबैन नीचे प्रारभ्य विन विहिता विर मन्ति मध्या: वियुनः पुनरपि प्रतिहन्य मानाः प्रारभ्य चात्तम जना न परित्यजन्ति ॥४६॥ विघ्न के डरसे नोच मनुथ्य कार्य का प्रारंभ ही नहीं करते . मध्यम जन प्रारम्भ करके विघ्न को देख कार्य को छोडदेते हैं परन्तु उत्तम जन वारंवार विन्न होने पर भी कार्य का प्रारम्भ करके परित्याग नहीं करते अर्थात् उस का पूरा ही करके शेडते हैं। यात्यधाऽधा बजत्युच्चै नरः स्वरेव कर्मभिः । कूपस्य खनिता यवत् प्राकार खव कारकः ॥४७॥ मनुष्य अपने हो किये से उच्चता और नीचता को प्राप्त होता है जैसे दीवार का बनाने वाला क्रमश: उपर को ही चढ़जाता है और कूवा खादने वाला क्रमश: नोचे को ही जाता है। सुसन्विते सुविक्रान्ते सुहते सुविचारिते। सिद्धन्त्यर्थाः सहावाहा देवं चात्र प्रदक्षिणम् ॥४८॥ भलो भांति सोचविचार और प्रांगा पीछा देख कर जो कार्य किये जावं (४०) . सुख वे मव मिद्धहीत हैं. इस में देवभो सहायक होता है। सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्म वशं सुखम् । एतद्विद्यात्ममासन लक्षणं सुखदुःख या ॥४६॥ (म.) मव पराये आधोन काम अर्थात् जो अपने वश के नहीं हैं वे दुःख के कारण हैं और सव अपने अधिोन कर्म सुखदायो हाते हैं. इसी संक्षेप से और दुःख का लक्षण ज्ञानना चाहिए। वेषां नविद्या नतपा नदानं नचापिशीलं नगुणा नधर्मः। तेमृत्युलेाके भुविभार भूता मनुष्य रूपिया मृगाश्चरन्ति ॥५०॥ भ० जिनलोगों के नविद्या है न तप है न दान है न शील है न गुण है और न धर्म है. वे इस संसार में पृथ्वी का भारदेने वाले होकर मनुष्य के रूपसे भूग फिर रहे हैं आहार व्यवहारेच त्यकलज्जः सुखोमवेत् । धनं मैत्रौ करंदाने शत्रु कारणम् ॥५१॥ शु. पाहार और व्यवहार में जो मनुष्य लज्जा का छाड़े रहता है. वह सुखी रहता है क्योंकि धन देने के समय तो मैत्री और लेने के समय शत्रुता काराता है। सदाल्पमनुष्यपकृत महत् साधुषु जायते । मन्यते सर्वपादयं महच्चोपकृतंखलः ॥५२॥ भले जो वा में थोड़ा भी उपकार करना बहुत हो जाता है कपटी मनुष्य बड़े भारी'उपकार को सरसों से भी छोटा समभाता।
. (४१). हात्वाखान्ते तथौदाय कापण्यं वहिरीवच । उचितं तु व्ययं काले नरः कुर्यान्न चान्यथा ॥३॥ मनुष्य को चाहिए कि मन में तो उदारता और बाहर से छपणता पर समय के उपर यथायोग्य व्यव करें अन्यथा व्यय न करे। धीमन्तोऽवन्द्यचरिता मन्यन्त पौरुषं महत् । अशक्ताः पौरुषं कत्तुं नौवादैवमुपासते ॥५॥ शु. बुद्धिमान् और उदारचित्त वाले पुरुषार्थ का वड़ा मानते हैं पाससी असमर्थ..खेोग भाग्य को मानते हैं। नित्यं मनाऽ पहारिण्खा वाचाप्रसादयेज्जगत् । उदजयति भूतानि क्रूरवाग् धनदाऽपिसन् १५५॥ मनोहर वाणी से जगत को सदा सन्तुष्ट करे क्योंकि कटु बोलने वाला यदि धन दाता भी हो तौभी लोगों के चित्त को खिन्न करता है। .. पणुभ्यश्च महम्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलानरः । सर्वतः सारमादद्यात् पुष्येभ्य इवषट्पदाः ॥५६॥ - (श) जैसे भमर छोटे बड़े सब फूलों से सार खींच लेता है वैसे ही बुद्धिमान कोट वा बड़े सव शास्त्रों से सार ग्रहण करलेता है। भवश्यमेव भातव्यं कृतंकर्मफलं नरैः। प्रतीकारविनानैवप्रतौकार कृते सति ॥१७॥ पूर्व जन्म के कर्मों को शान्ति किये विना मनुष्यों को उन्का फल अवस भोगना पड़ता है पर उन्की शान्ति करने पीछे नहीं। यससेही भयं तच स्नेही दुःखस्य भाजनम् । नेमूलानि दुःखानि तानित्यक्त्वा वसेत्सुखं ॥५८ (चा) भी किसी चीन में प्रीति रखता है उसी को भय होता है. खेह ही दुःख .
का पात्र है और सब प्रकार के दुखों का मूल भो खैह ही है इस कारण उसे छोड़कर सुख से वसे। .. शानिभूमिरुदकं वाक् चतुर्थी चसूनृता । एतान्यपि सताङ्गे हे नाच्छिद्यन्ते कदाचन ॥५६॥ प भूमि जल चौथो भधुर धाग्यो थे चार वस्तु मत्पुरुषों के घर में कभी नष्ट नहीं होती हैं अर्थात् ये पदार्थ सत्कार के लिये सव के घर विद्यमान रहते हैं। अर्थेन,तु विहीनस्य पुरुष खाल्पमेधसः । उच्छियक्रियाः सर्वाः गौमे कुसरिता यथा ॥६॥ निर्धन अल्प वुद्धि पुरुष की सव क्रियां विगड़ती है जैसे पोषम ऋतु में छटो नदियां सूखनाती हैं। सर्पः क्रूरः खलः क्रूरः सात् क्रूरतरः खलः । मंत्रौषधिवशः सर्पः खलः केननिवार्यते ॥६॥ सर्य और स्वल ये दोनों यूर हैं मर्य से खल अधिक तर क्र है क्योंकि सर्थ मंत्र और औषधि से वश इसकता है खल किससे निवारित 'होसकता है अर्थात् किसीसे नहों। वित्तम्बन्धुर्षयः की विद्याभवति पञ्चमी। एतानिमान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम् ॥६॥ ..म.... द्रव्य, वन्छु, वय, कर्म, विद्या में पांच.. मान्य- वस्तु इस में पूर्व से उत्तर उत्तर वड़ा है। सर्वस्यहि परीचन्त स्वभावानेतरे-गुणाः-. ::: अतीत्यहि गुणान्मर्वा न्खभावामूधि वर्तते ॥३॥ .हि. खमावहो सव का परोक्षा किया जाता है, अन्यगुण नहीं क्योंकि सब गुणेां का शिड़ खभाव हो सव के उपर रहता है।
(४३) भ० शास्त्रःण्य धोत्यापि भवन्ति मूर्वा यस्तुक्रियावान्पुरुषः नविहान् । सुचिन्तितं वौषध मातुगगां ननाम मावण करीत्यरोगम् ॥६४॥ शास्त्रा को पढकर भी भूखे रह जाते हैं शास्त्र के उपटेश के भनुमार जी वर्तते हैं वही विहान् हैं क्योंकि रोगियों को नाममात्र से सोची है भी औषध नीरोग नहीं करती। अल्पानामपि वस्तूनां मंहति: वार्य साधिका । ढणैर्गुणत्व मापन्ने वैध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥६५॥ (हि.) यदि छोटो छोटो चीज भो इकट्ठी किई जावें तो उनसे वडा वडा काम इसकता है जैसे वहुत तणां की दूक हा कर रखा. वनाया नावे तो उससे मस्त हाथी वाधे जाते हैं। क्षणशः कण गश्चैव विद्यामर्थ च साधयेत् । न त्याज्यौ तु क्षण की नित्यं विद्याधनार्टिना ॥६६॥ शु. पलपल में विद्या का, दाना दाना करके धन का मंग्रह करना चाहिए विद्या के संचय करने वाले को क्षण का और धन के संचय करने वाले को कण का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए । कः कालः कानि मित्राणि कादेश: कोव्यया गमी। कचाहंकाचमे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥६॥ (चा) कान समय है कौन मित्र है कोन देश है क्या व्यय और क्या प्राप्ति है में कौनई मुझ में कितनी सामर्थ्य है इनवातों का विचार मनुष्य हर समय रक्स। पारतन्त्यात् परं दुःखं न खा तन्न्यात् परं सुखम् । अप्रवासौ एहौनित्यं खतन्तः सुखमेधते ॥६८॥ शु० पराधीमता के समान दुःख नहीं है और स्वाधीनता के समान सुण्ड दूमरा , .
(४४) नहीं है जो विदेश में नही भार स्वाधीन ही वही रख सदा सुख पाता है। किं कुलं ब्रत होनस्य करिष्यति दुरात्मनः । कृमयः किन्न नायंते सुसेषु सुगधिषु ॥६६॥ व्रत होन पुरुष की उत्तम कुन क्या सहायता करेगा क्या सुगन्धि वान्टे पुष्यों में कीड़े नहीं उत्पन्न हति किंतु इति हो हैं ऐसे ही वह भी एका कोड़ा है। दातृणां धार्मिकाणां च-राधा कोर्सनं सदा । शृणुयात् तु प्रयत्नेन तच्छिद्रं नैवलक्षयेत् ॥७०॥ शु. दान शोल धर्म शोल और वोर पुरुषों की कथा सदा प्रयन पूर्वक सुने और उनके देषां पर दृष्टि न देवे. माट पिट गुरु स्वामि भात पुव सखिपि । न विरुध्ये नापिबुार्यान्ानसापि क्षणं क्षधित् ॥७॥ शु० माता पिता गुरु स्वामो भाई पुत्र और मित्रों से कदाचित् क्षणमात्र भी कार्य से तो क्या मन से भी विरोध न करे और न उन का अपकार करे। परोपदेशे पाण्डित्यं सर्वेषां सुकरं नृणाम् । धर्मे खौय मनुष्टानं कस्य चित्तु महात्मनः ॥७२॥ औरों को उपर्टश कर्ना तो सब मनुष्यों को सहन है अपने धर्म में प्राप तत्पर रहना विरलेही महात्मा का काम है। अनित्यानि शरीराणि विभवानव शाश्वतः । नित्यं सं निहिता म्हत्य : कर्त्तव्योधर्म संग्रहः ॥७३॥ हि. शरीर नाशमान है धन सम्पत्ति भी सदा नहीं रहती भत्यु सदा शिर पर खड़ी है इस कारण धर्म का संग्रह करना योग्य है।
क इस भाव से प्राणा यथात्मनोऽ भौष्टा भूतानामपित्तथा । आत्मौपम्येनभूतानां दयां कुर्वन्ति साधवः ॥७४॥ जैसे अपने प्राण अपने को प्रिय लगते हैं वैसेही औरों को भी अपने प्राण प्रिय होते हैं से साधुजन सव प्रालियां को अपने ही समान सुख में सुखो तथा दुःख में दुःखो जानकर उनपर दया करते हैं। अनरा भरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थ चचिन्तयेत् । गृहीत इव के शेषुष्मृत्युना.धर्ममाचरेत् ॥७॥ हि. जानी जन अजर (अर्थात् मै बूढ़ा होने वाला नहीं') अमर (अर्थात् मै मरने वाला नहीं) के ममान विद्या मंचय करने में तत्पर रहे मृत्यु नै केशी को पकड़ लिया है अर्थात् मृत्यु सिर पर पड़ी है ऐसा समझ के धर्म करने में उदात होवि। यतते नैव कालेऽपि क्रिया कर्तचसालसः । नसिद्धिस्तस्य कुत्रापि म नश्यति च सान्वयः ॥७६॥ शु. भालसी. मनुष्य समय पर भी कार्य करने में उद्यत नहीं होता उसको कार्य में कभी सिरि नहीं होती और वह अपने वंश अहित नष्ट होजाता है। जलविन्दनिपातन क्रमश: पूर्यते घटः। सहेतुस्मर्वविद्यानां धर्मख च धनस्यच ॥७॥ चा. एक:२ वूद करके क्रमशः जलसे घडा भर जाता है, यही क्रम सब प्रकार को विद्या, धर्म और धर्म के संचय करने का भी है। आकाशमुत्यततु गच्छतु वादिगन्त मम्मोनिधि विशतु तिष्टतु वा यथेष्टम् । जन्मान्तरार्जित शुभाशुभ कृन्नराणा छायेव न त्यजति कममफलानुवधि ॥७॥ शाः प्राकाश को उड़जाय चाहें चारों दिशायों में धूम पाव समुद्र में प्रविष्टही .
- 0 जाय चाई इच्छानुमार वहां घाई गई। मनुष्या का सम्मान्तगं कारका किया दुधा शुभा शुभ कमी का फन छाया के समान पोछा नहीं छोडता । कूटेन व्यवहारं तु वृत्तिलापं नकस्यचित् । न कुर्याञ्चिन्तयेत् कच्च मनसाप्य हितं वचित् ॥७॥ शु. किसी की मांथ कपट का व्यवहार न कर पार न किमो के लोविक्षा का माप करे और कभी किमी का मन में भो अहित विचारना नहीं चाहि गुणै मत्तम तां याति नाच्चैरासनमंस्थितः। प्रासाद शिखरस्थोऽपि काकः विगमडायते ॥८॥ चा. गुणों से मनुष्य श्रेष्टता को पहुंचते हैं उचे शासन पर बैठने से नहीं क्या कोवा कोठे के ऊपर भाग में बैठकर गरुड़ होनाता है। परमात गुणो यस्तु निर्गुणोपि गुणीभवेत् । इन्द्रोपि लघुतांयाति स्वयंप्रख्यापितगुणैः ॥८॥ चा. निसके गुणों को दूमरे लोग वम्मान करते हैं उम में कुछ में गुग्ण नही तौभी गुणवान कहानाता है इन्द्र भी यदि अपने गुणों को शापही प्रमाकरे तो उससे इलकापन होजाता है। समाने शोभते ग्रौती राति सेवा च शोभते । वाणिज्य व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे ॥5चा. अपने वरावर जन के साथ प्रीति शोभायमान होती है राजा की सेवा भो गोमती है व्यवहार में वनिये की चाल और घरमें दिव्यं खो.शाभती है। मनसाचिन्तितं कार्य बाचानव प्रकाशयेत् । मन्वेण रक्षयेद् गूढं कायं चापि नियोजयेत् ॥८॥ चा. मन से सेचिये काम को वचन से प्रकाश न करे कितु मन ही मन में उसकी रक्षा करे और गुप्तही उस कार्य को काम में भी लावे ।
(४७) चा. परीक्षे कार्य हन्तारं प्रत्यज्ञे प्रिय वादिनम् । वर्जयेत् तादृशं मिवं विषकुम्भं पयो मुम्बम् ॥८॥ मुंह के सामने मोठोर वाते बनाकर कहनेवाला और पोठ पछि काम विगाडने वाला ऐसे मित्र को जो ऊपरता दूध से और भीतर विषमै भो घड़े के समान हो त्याग देना चाहिए। न भूषयत्यलझारी न राज्यं न च पीकषम् । न विद्या न धनं तादृग् वा दृक् सौजन्य भूषणम् ॥५॥ जेमा भूषण मज्जनता है वैमा गहना, र.ज्य, पराक्रम, विद्य और धन जाई भो नहीं है.अर्थात् सौजन्य के वरावर यह सव कोई मनुष्य की भूषित नहीं करते। दशमोऽध्य यः शु- धम्मसोपान ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुनतिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्नारूढानिमायया ॥१॥ गौ. है अर्जुन ! खर सवाणियोंके हृदयमें स्थित है और समस्त प्राणियों को मानो यन्त्र में चढ़ायक मायाकै हारा घुमाताजाता है अर्थात् जैसे मदारी कठपुतलियों को तारमें चढ़ाकर नचाता है. वैसेही. ईश्वर भी मायाके द्वारा समस्त प्राणियों को नचाताजाताई। म्न्यन्ते वै पाप कृता नकश्चित् पश्यतीतिनः । तांस्तुदेवाः प्रपश्यन्ति खस्यै वान्तर पूरुषः ॥२॥ पाय करने वाले मर्नुष्य यह समझते हैं कि अंधर्म करने में हम को कोई नहीं देखता है परन्तु उनको देवता अर्थात् इन्द्रियों के अधिष्टाता देव और म.
..- . - म. (४८) अपने ही अन्तः करण में वर्तमान पुरुष सदा देखते रहते हैं । शुभाशभफलंकर्म मनेा वाग्देह संभवम् । कर्मजागतयो नृगा मुत्तमाधममध्यमाः ॥३॥ स. मन धाणो और देह से उत्पन्न हुए कर्मों का फल उनके अनुमार शुभ अथवा अशुभ होता है ऐसे हो इनकर्मों से जो गति उनके करने हारों की होती है वह भो तोन प्रकार की है अर्थात् उत्तम, मध्यम और अधम । अधर्म प्रभवं चैव दुःख योगं शरिणाम् । धर्माथ प्रभवं चैव सुख संयोग मनयम् ॥४॥ अधर्म करने से मनुष्यों का उसका दुःख रूप फल प्राप्त होता है, अक्षय जो सुख है वह केवल धर्म के करने से ही प्राप्त होता है। एताष्ट्रवाऽस्यजीवस्य गतिस्वनैव. चेतसा । धर्मताऽधर्म. तश्चैव. धर्मे ददद्यात्मंदामनः ॥५॥ धर्म और अधर्म से उत्पन्न हुई जोव को मतियों को देखकराअर्थात् स्वर्ग और नर्क, भले और बुरे कर्मों ही से मिलते हैं यह बुद्धि से जानकर मदा धर्म ही में चित्त लगाना चाहिए। अज्ञानाद्यदिवाज्ञानां कृत्वा कर्म विगहितम् । तस्मादिमुक्ति मन्विछन् द्वितीयं नसमाचरेत ॥६॥ ज्ञान पूर्वक अथवा प्रमाद से जव कोइ निन्दित कर्म होजाय और यदि करने हारा उस से छुटकारा चाहे तो दूसरी बार उस कर्म को कदापि न करें। कृत्वापापं ही संतप्य तस्मात्पापात्प्रमुच्यते । नैवं कुार्यात्पुनरिति निवृत्त्या पूयते तुसः ॥७॥. म. मनुष्य पाप को करके फिर उस पाप का सच्चा सन्ताप करै अर्थात् मैने यह अनुचित कर्म किया और मै फिर कभी ऐसा न करूंगा तो यह उस से छूट जाता है। म..
(४६) गौ० . उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।. आसैवद्यात्मनावन्धु रात्मैवरिपुरात्मनः ॥८॥ अपने से अपना उहार करना चाहिए अपने को नीचे न गिराना चाहिए क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है अर्थात् संसार समुद्र तरने का हेत है और मात्मा हो पात्मा का शत्रु है अर्थात् संसार के दुःख में डुवाने का हेतु है। नामुत्रहि सहायार्थ पितामातच. तिष्टतः । न पुत्रदारा न ज्ञाति धर्मस्तिष्ठति केवलम् ॥६॥ म.. परचोक में सहायता देने के लिये माता पिता पुत्र स्त्री वान्धव इनमें से कार भो समर्थ नहीं है केवल धर्म ही अपने साथ नाता है और सहायता के लिये प्रस्तुत रहता है सत्यमेव जयते नानृतं सत्येनं पन्था वितती देवयानः । येना क्रमन्य॒ षया ह्याप्त कामा यत्र तत्मत्यस्थ.... परमंनिधानम् ॥१०॥. मु: मत्य ही को सदा नय होती है, मिथ्या की नहीं; मत्य से ही देवयान नामक मार्ग अर्थात् उत्तम लोकों को पहुचाने वाला मार्ग:वना हुआ है इस हो मत्य की सीढ़ी से मुनि लोग उस परमधाम को चढ़ गये हैं जहां सत्य- का अन्तिम विश्वाम अर्थात् 'ठहरने का स्थान है। सत्यं वद धर्मावर खाध्यायान्मा प्रमदः । सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम् कुशलान्न प्रमदितव्यम् ॥११॥ तै. सचवालो, धर्म के प्राचरण करी, अच्छे शास्तों के पढने में प्रमाद मत करी, सत्यसे प्रमाद मत करी, धर्म से प्रमाद मत करी, शुभकों से प्रमाद मत करो, (५०) "--- माटदेवेभिव, पिटदेवेभिव, आचार्यदेवोभव, । अतिथिदेवोभव, मान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपा यानि ना इतराणी । ॥१२॥ तै. माता को टेवता की नाई माना, पिता का देवता की नाई मानी, प्राचार्य को देवता को नाई माना, अतिथि की देवता की नाई भत्कार कगे, हमारे जो अच्छे पाचरण हैं उन्हीं का तमभो अनुसरण करो, जो अच्छे अचरण नहीं है उनका अनुसरण मत करे। अद्ययादेयम । अश्रद्धयाऽदेयम् ॥१३॥ तै. अहासे दान करो, विना अद्धा दान मत करो। ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुच्चोथा मागृधः कस्यखित्धनम् ॥१४॥ ई. जगत में जो कुछ यह सव है इश्वर के हारा पाच्छादित है, (प्रथवा उस के मङ्गल भावा से व्याप्त है.) (कामना का) त्याग करके (अथवा उस का दिया हुआ भाग करी परन्तु स्वार्थ परता को त्याग करके, किसी के धन को पाकाहा मत करो अर्थात् पराई वस्तु में लाभ मत करो। एष आदेशः एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत्, एतदनुशासनम् ॥१५॥ तै. यही श्रादेश, और यही उपदेश है, यही वेद का परम ज्ञान हैं, यहो शास्त्र है, इसी प्रकार से (ब्रहमकी) उपासना करनी चाहिये। है समाप्त पन शलाक अशुद्ध शुद्ध 8 बिहान जातिभिवं रुपमधिकं गुरुवा महारिषु वर्धयन्निई संमाद् यद्यत्पधीता सिध्यति ऐ० विहान् शातिभिर्व रूपमधिकं गुरवा पहारिषु वईयन्त्रिह संमानाट् यद्यत्यधोता सिद्धाति ऐ० स्तपाल्पाया यापश्यति संसारे मितचे शौच निहि, अश्मापियाति शुद्धा २५ २८ २२ २२ २२ स्वोतिया यहपश्यति संसारैः मित शचौच नहि अस्मापियाति शुधा: दुःखः प्रत्यक्षः मनुने ५ २८ २८ ३० प्रत्यक्ष भग्नुते सहिष्णाव बुयान्न स्वार्थ हानिहेष नोचै विहिता सहिप्सुथ बयान स्वार्थ हानिर्देष ...नोचः विश्ता ४१ ४६ ३८ ऐ. चादाने शत्रु ऐक ५२ ऐ० मनुष्य सर्व मम्यु सर्ष ऐ० शुलाक अशुद्ध इयपटपदाः সীন नापि प्रवपटपट: परोक्षान्त ४२ बाप ४४ ५ एतादा गतिखे ऐ० एतादृष्टा गती:स्खे दि ऐ० t सा या भूमिका प्रवृत्त जय प्रवन जड़ संकेत पत्र ड. . ...... ग. गी. ...... चा. ...... ते. नि. वि० अनुशासन पर्न उदयोग पर्ख [गणेशगोता गोता चाणक्यनीति तैत्तिरिय उपनिषद नीतिशतक विदुरनीति भहरिशतक मनुस्मृति सुण्डकउपनिपद् शान्तिपर्व মুরূনীনি ‘सभापर्व हितोपदेश म. स. ...... शा. ......
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