Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Jain Tatva Ka Nutan Nirupan

Turkhiya,dhirajlal · 2011/03

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गनिया भर नपमा पुष ४ nel HARLOTTEHTaurunm.nurs 3१७ जैन तत्व का नृतन निरुपण ruin turuptetaigr Ritiureti मम्पादक भौर शान- धीरजाल फे० तुरसिया ओं अधिष्टाना, जो गुगल म्यापर মাই- श्री ऍगनिया सरदार जैन ग्रन्थमाला तयारी यानार, नागपुर प्रथमावृत्ति प्रनि १००० ति} धीर सघन २०६४ विक्रम सं०१६६४ in-teamin

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8 समर्पण
भामार्य भी हो जो नियमित है।
पूष भी होना ही प्राता में रहे।
शिरोमणी होतए जा सका।
गुग्पर्य सने हुए जो भी मि
मान मति होने जो नमकाको गति
को भूदित हुए वीमा भतार
M
पर कशासागर, पाय, नापार्य,तरोपनी, नपाधीशवो
पूज्य श्री १०८ श्री देवनी पिनी महाराम श्री मोदी
पुनीन संगा में किसान पंदन !
भीगी प्रमाप्रापा पुगीत, पुय प्रमाण,
मापक शिरोमणी, माधुमार,
दानवीर श्री सरदारमलनी गलिया (नागपुर) की प्रेरणा से
धीजी कारवाया में
मदिरा पागम गाटिपा र पुल का माना था
यह मेवाको पामर मया रूप लघु पुस्तिका
सविनय समर्पण
महावीर मयन, मागपुर

Lakhand989
दानवीर
श्रीमान सेठ नेमीचदजी सरदारमलजी पुंगलिय
पी
श्र० सौ. धर्मप्रेमी श्रीमतीमगनदेवी की तरफ से
अपनी स्वर्गीया पुनी
श्री जमनाबाई की पुण्य स्मृति में
सादर समेम मेंट
सन्त

रुपया मया लाग्य जितना दान करने वाले
दानवीर मठ मरतारमनना माहय पुगलिया (नागपुर)
मापन श्री जैन गुरुकुल, व्यावर का देवभवन निमाण हेतु
१८०००) रपय की उदार भै जाहिर की है।

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दानगीर श्रीमान् सेठ श्री सरदारमलजी पुगलिया का संक्षिप्त परिचय विश्व भमाम भोर अनादि है। उसमें अनगिनते मनुष्य प्राणी समय २ पर जाम धारण करत रहत है, मगर यहुत श्म का धाद कर अधिकार मनुष्य प्राप्त हुए सर्वोष्ट मानव जीवन का उस जावन की रक्षा में ही व्यतीत कर दत है। ये जावन रुपी जी को जरा भी नहीं बदात, पक्कि उस पूजी का उपयोग करके भगले जीवन को और अधिक रिद्ध बना लत हैं। कई प्राणी अपना रिम्य पक्तियों का उल्ला उपयोग कर के सर्वश्रेप माना जीवन को सव निकृष् जीवन बना डालते है। इनके जावन का मुख्य ध्यय सांसारिक आमाद प्रमादों का अधिक से अधिक प्राप्त करना होता है। और ये व्यक्तिगत भावश्यकताओं की पूर्ती में ही सलग्न रहत है। प्रेस मनुष्यों का जानन या तो निफ्लहा जाता है या विपरत परदायी सिद्ध होता है। समाज श या ससार की उपया गीता की दृष्टि से उनका अन्तिम नहीं के समान है। इससे विपरत कुछ मनुष्य मे हात है, ना परलोक से पक अच्छी पक्षी रेकर भात है और इस लाक में अपने सदनुष्टानों के द्वारा धर्म और समान या ब० मूल्य से कर क परापकार में अपनी समस्त शक्तियों का व्यय कर के, सब प्रकार से अपनी प्यक्तिगत आवश्यक्ताओं से विमुख. होकर समार भारती भावश्यकताओं को पूर्ती को ही सड़ा रखते है। ऐसे महानुमारों का जीरन धारण करना साथ होता है और वे प्राप्त पूभी अधिक पढ़ात है। इन पचियों में जिनक जीवन की गप रेसा भकिस करने का प्रयत्न किया जा रहा है, वे दूसरी श्रेणी क महानुभागों में अग्रगण्य घमारायण पुरप हैं । जैन समाज में और विशेषत स्थानकवासी समागम से मर दारमलजी पुनिया से कौन अपरिचित है। सेट साहय का अन्त करण भाकारा का सरह विशाल, हिमको भाति स्व और अमृत यर की नाह उदार हैं । भापके विद्या प्रेम क ज्वर त प्रमाण स्थानकवासी सम्प्रदाय में या सत्र सवय टिगोचर हात है। एसे विद्यारसिक और दानवीर सजन का जीवन चरिय थीमानों के लिये एक अच्छा भादरा है और इसलिये उसे यहाँ भक्ति करने का प्रयत्न मिया गया है। हमारे चरिन नायक के पूर्वजों का मूल निशस स्थान पशिनर है। धीकानर में आपक पदों की यही प्रतिष्ठा थी। भापका परिवार यहाँ के उंगलियों पर गिने जान चार प्रतिष्ठित परिवारों में से एक था । मुनत हैं श्रीकानर शहर में जब भनेक धन कुबरों क होत हुए भी किसी के यहां भी तांगा न था तब सबसे प्रथम आपके पूर्वजों ने तांगा लाकर मुसाफिरी की सुविधा का मार्ग सरके सामने प्रगट किया था। बीकानेर में आज भी पुगलियों का विशार प्रासाद अपना मस्तक उचा किये बड़ा है और भापके परिवार की कार्ति वापरिचय करा रहा है। परन्तु व्यापारिक कारणों से भापके पूर्वज मध्य प्रात के मुख्य नगर नागपुर में भा यसे और वही हमारे चरित्रनायकजी का जम हुआ। भापका जन्म दिवस भी वही है जोशी जैन गुरुकुल यावर क भटम वापिंक महारसव का जिसके आप माननीय प्रमुख निर्वाचित किये गये थे। पापक पधारन की पूर्ण अभि पापा हाने पर भी, दुभाग्य से भापकी सुपुत्री का अवसान होजाने से नहा पधार सके। विक्रम सम्बत् १९४४ की मागशाप गुस्ता १० को आपने अपने पुण्य नाम से अपने कुटुम्ब को भामादित किया था।

भारम्भ से ही भाप कुशाग्र बुद्धि थ! तरकालीन वातावरण के अनु सार भारकी शिभा-दीक्षा समय हुई और तदतर आपने अपना परम्परा गत व्यवसाय में पड़ जाने पर भी अन्य क्षेत्रों से सर्वथा उदासीन न रह भीर सच्चे श्रावक की भाति अपना जावन यापन कर रह हैं। पेमे सच्चे जैन धारक का यह कतव्य होता , कि वह परस्पर विरद्ध रूप से धर्म अर्थ और काम पुरुषाय का सेवन करे । जो इस प्रकार का अपना जीरन यना देता है, यह मा चनुथ पुरपाय (मोक्ष) को भी पास कर देता है। श्री पुंगरियाजी में यह वास्तीिकना भी भाति देखी जाती है। धनोपार्नन करते अवन्य है पर गुद सग्रह शार नहा । दान दने में उनका हाथ कभी पुरिन नहीं होता! दीन-हीन की सेना, समान का विधा बहिनों की युद्ध सहायता, शिक्षा सस्था और साहित्य प्रकाशन कलिय दान देना भाप व्यसन सा होगया है। मार द्वारा दान दी गह रकम का टीक टोक पता नहीं लग सकता। आपका दान कीर्ति की कामना से नहीं, बल्कि शुद्ध करम्य पालन के उद्देश्य से हाता है। अतएव आप यहुतसी रकमें गुप्त रूप से ही प्रदान करते हैं। उन रकमा का पता {गलियाजी के समीपवर्ती दनक प्रायवेट सेकरी तक को नहीं है। ऐसा हालत में उनके दान का रोक अदाज ही नहीं लगाया जा सकता। स्थानस्वासी सम्प्रदाय का पूर्ण आधार मुनिराज है। वही सम्प्रदाय रक्षक, विक्रामक और धमापदशक है। मुनिराजों की शिक्षा पर समस्त सम्प्रदाय की शिक्षा निभर है । अतएर मुनिराजों का इञ्चातिरच शिक्षा का साज दना मानों पुत्रों के मूल को सींचना है। मूल का सीवन स सारा दरस्त भाप ही भाप सिच आता है, इसी प्रकार मुनिराजों की शिक्षा से सारा सम्प्रदाय मुशिक्षित हाता है। इस तथ्य का श्री पुगलिया जी भली भांति समझते हैं और इसी कारण आप मुनिराजों की शिक्षा पर खासी रकम सरचते है। साधर्मी माइयों के प्रति आपरा अनुपम बन्सलभाव है। उन्हें हर प्रकार से सहायता पहुचाना भाप अपना क्त्तय समझत है । भनेकों भाइयों को आपने अपमा उदारता का परिचय दिया है। जिनके मानन थे रहे मकान दान दिया । जा अर्धाभार क कारण अपनी सतान का विवाह न कर सकत थ, उ ह यथोचित सहायता पहुचाइ । नागपुर विश्व विद्यारय ममी भापने सटी रकम प्रदान की है। आपने नामली में सूखेड़ा में रतलाम (नीम चौक तथा साहू पारटी) के दो स्थानक आदि का जीर्णाद्वार कराया तथा धम स्थानक क रिप नये मकान दिला । नागपुर इतयारी का विशाल धर्म स्थानक और व्यायामशाला बनाने में भा आपस बड़ा हिस्सा है। प्राय भारत की काई भी न सस्था ऐसी न हागी, जिसमें धी गलियाजी का दान न पहुँच हो। भापका प्रकट दान जितना पात हा सकता है उससे मालम होता है कि बापने एक बाप रपयों से भी अधिक दान दिया है। साहित्य प्रकाशन क लिये आपन रुपये १००००) निशान जिसमें से श्री सरदार प्रथमाला चल रही है । इसी समय मापने अपन श्रद्धेय तपोधनी पूय श्री दवजी ऋपिजी के नाम से दय भवन निमाण करने के लिए श्री जैन गुरकुर म्यावर का १८०००) रपय की उदार रक्म जाहिर आपक गुप्त दान का तो काई गिनती ही नहीं है। आपकी टानशीलता का प्रभाव आपके सार घुटुम्ब पर पड़ा है। यही कारण है कि भापकी धमपरनी भी दान दने में पूरा है। प्यावर गुरकुर को दी .) की रस्म आप ही की है। इसके अतिरिन सा गुप्त दान दिया है । भापकी सुपुत्रा स्व० मुरीबाई ने भी र० ५.००) धमाथ प्रगान किये है। अभी ही आपने 10 १५.) की कीमत का भवन अपनी स्व. पुत्री जमनापाई के नाम पर पायपुर श्री सघ को अपण किया है। सच तो यह है कि स्थानकवासी सम्प्रदाय में आपकी काटि के उदार

से प्राथना
कत्तव्यनिष्ट दाागेर सान पहुन नहीं है। भाका मान विम्युन और
समयानुसूर होता है। शिक्षा प्रम भापशी नम-नस में कर मरा
हुभा ६ । हमें पसे धमपगपग पुरय म पर ण गौर। भीर गासन
पह
अभिमान पिरमाल तक इमी प्रकार कायम रह।
भारको धग मारना, उगरता मरता, निरभिमानना मापमा
पर दानवारता पान, विरार मा. पा भादि प्रातों में प्रसिय।
नागपुर में मुनिवरों क चातुर्माम हाा में भापकी दमारना और मुनि भनि
प्रधान नागपुरभत्र मापकी धम मापनाक कारण हासपि प्रसिद हुआ
है। आप में पेमे प्राध्याय के मुसस्कार परम प्रतापा, सपाधना तपस्वी दय
पूज्य धा १००८ श्री दवजी पाजाम. सा. धर्मापदाप परिचय
से मुन्दए । श्रेताम्बर गिम्बर, स्थानकामी झादि मपनि
समान भाप समान टि मे दग्यता है । भारकी शरनियता नागपुर
में ही नहीं पर पानवेग से दूर दूर पैर रहा है। नैन ससार में इमनी
स्टाकप्रियता प्राश करन वाल पटुत कम होंग।

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थी० दानवीर पुगलियाजी की सुपुत्री
धी० पुगलियाजी के नेक सलाहकार
momommur
RA
स्वर्गीया नमनापाई, नागपुर
प्राइवेट सेरेटरी श्री. मूलजीभाई शाह

श्री० पुंगलियाजी की सुपुत्री की अमर यादगार
श्रीमान् शानदाट सरदारम भीमा गालियामी सरसमे
जपेज पर प्रधानमनमाल (राना मला
जमनाबाईगलिया भवन
*
L
।
j
erje
श्री. जमनाबाई पुगलिया भवन, नागपुर

प्रस्तावना
अनाचाय भागमोतारक ज्य धी प्रमानक पिनी
म. कृत 'जन सत्य प्रकाश गुमराता अनुवाद पजिय
मौक्षिक विज्ञान की विम उम प्रथम ५ का
माटरूप में कुछ माह किया थ रिच गुजराती में उम प्रय
का अनुवाद न हो मकन म उम मय पनिय निम्नी हो
वास्यिक रम पम प्रकाश को गई । प्रकाश पत्र न उस
धात्विक रिमाग को प्रकाशित किया । उमविभाग को
पुस्तकाकार रूप में दग्गन की गुजराती और हिंदी पाठकों
की भावना जागृत हाने मन ममाजदानोर धीमान
सरदारमालजी पुगनिया की प्राधिक महायता से यह पुस्तक
हिती प्रा१ मामने उपस्थित हो सकी है।
यह ममह भनक महापुरुर्षा मादर्श प्रथना
मारपदै मर्मसमापन प्रसातही उमर यश और
पुराय फ भागीदार मून प्रय र लपक और प्रकाशक महा
स्मन् और महाशय है। शुटियों प जिये समाह शुद्धि पात्र
है। तदपि भामा किया, लपा विधार्थीगण और
निशामु मय पारमाण की यह पुस्तक किंचिन मेश कर
ममगा। सामानर विश्याम 1 म मग्राहक पोसताप
*शाfa शाति॥
1
ता० १.८.३५.} श्री महावीर भुग्न, नागपुर
जनजनताल
40

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विषय सूची धर्म-विभाग विषय प्रष्ट प्रहरगा विषय १ धम १ निदान . धर्म की परीक्षा २ ह परोपकार ३ धर्म रहित भिजुक ६ मावना ४ माना भर ११ भोग २६ मनुष्यत्व १५१ १२ राग सत्य थीमन्ताह १७१३ उपवास १६ १४ धर्मोपदेश ३२ मार्गानुमारी-विभाग १ गुरपष्टि निन्दा भौर निन्दक ४२ बन्दक ४५ . झघुना ५ ३ गुरुवा ६ फर्सव्य प्रकाश मसार-स्वरूप १ ६ ७ २ ३ है ५ ससारासत जीवों मृत्यु की मनोदशा ४H पाजका मानस दोष दृष्टि संसार-शरापखाना ६१ ८ जडवादीमात्मामों इ.प्रकार जीव ६४ का ध्यरूप ७६ छ काय सिद्धि ३ नारकीय यातना ७६ तत्व-विभाग शोध क्षमा ६ नवतस्वों का स्वरूप८२ । १३ विषय पाय १२८ मियात्य ६२ १४ कपाय भविरति चारकपायस्पस१३८ ४ प्रसाद १३६ ज्ञान व समकित ६६ १७ मान विनय १४४ पच महाप्रत माया १४६ मौन ५ १०७ धात्म सयम १४० ६ वेदनीय प्रत प्रत्याख्यान १५० १.मोहनीय १५४ योग १०१।२३ भात्म सयम १५६ मन वचन काया १२५ / २४ जेनधर्म यमनससार१५७ SAR जैनतत्त्व का नूतन निरूपण धर्म-विभाग १-धर्म इम शरीर को निभाने में निस प्रकार अन्न, जज पर प्राण यायु की कायश्याना उत्तरोत्तर अधिष रूप सहानी है उसी प्रकार प्रागवायु सभी भगत गुग्ण अधिक मावश्यक्ता धमतत्त की है। धम की नुपस्थिति में ममप मात्र भी शरीर का जीवित रहना सयमा असम्भय है । प्रात्म हित शरीर प्रन्य मुदा है व धम रहित शरीर भाष मुर्दा है द्रय मुर्दे की अपेजा भाघ मुळ विशप भय पर है । द्रव्य मुदा द्रव्य अग्नि से जन्नसा है और भाष मुर्श भाव अग्निस (रात्रि दिवस म्प अग्नि है ) द्रव्य मुर्दे से द्रय टुगंध निकलती है उसी प्रकार धर्म रहित भार मुद स विपय कपाय रूप भाव दुगध निकलती है। य मुम द्रव्य कीड उत्पन्न होन है उसी प्रकार भाष मुद में भाष काई-पा, निदा, द्वेप, फलह, घृणा, मत्सर, बहमाघ सृष्णा ममरव रूप कोट प्रति समय रा रहत है। F समस्त विश्न, धर्म क उपर ही अवलम्मित है। पशुत्रों में सततिरक्षा का धर्म है पक्षी,व विक्लन्द्रिय म भगटा की रक्षा का धम है। जगजी मनुष्यों म घुटुम्ब रक्षा रूप धम है। राज्य समाज एर जाति का नियमन भी धर्म पर निर्भर है। धर्म के अमाव से सर्व व्यवस्था नष्ट होरर मानव ससार पशु ससार से भी अधिक चदतर, क्षुद्र एप भयप्रद बननाना है। अतय विश्व समस्त व्यवहार म धर्म ही श्रोत प्रात हा रहा है। पनिर प्राचार, पवित्र विचार र पवित्र श्रत करण रूप निमणीक सगम होन से धम तीय की प्राप्ति हो सकती है। धर्म की परीक्षा समस्त समाज में मनुष्य निजको धमात्मा कहलाने में गौरव लेते हैं उन महानुभवों का निम्न प्रश्नों का विचार कर उत्तर देना चाहिये। परोपकारिणी संस्था प्रापर समाज में हैं कि अन्यर्मिया दान फा सद्गुण आप में अधिक है कि अन्य पर्मियों में, फिजूलरपर्ची पर विलास के साधनों की रिपुस्ता पाप म है कि अन्यधर्मियां में? महारम्भी यनवादी व्यापरी का त्तनन दने वाले शाप हैं कि माय? हिमक पदार्थों का व्यापार व्यवहार श्राप में विशेष है कि यस्माभूपण घ वाघाडम्बर का मोह श्राप में अधिक है कि

फचदरियर द्वारों शोभाप सरपटात है कि अन्य ?
या लोभ स प्ररित हार समुद्र पार र दशो म प्राप घूमते
हैं शिमय
मत्य नीति न्याय पापमई किमयम
धार्मिक नियमा का पालन श्राप अधिक करते कि अन्य :
धार्मिक प, धम गुरुश्रा को निशप भादर आप दते हैं
किय?
धार्मिक मयादा में रहने वाले श्राप हैं कि अन्य ?
धार्मिक स ( साम्प्रदायिक यलह) आप में अधिक है कि
सय में।
उपयुक्त प्रश्नों क सन्तोप जन प्रत्युत्तर देने में ससथ समान
के मनुष्य में ही धमतत्त्व की उपस्थिति है । फिर चाह व मनुष्य
मिमी भी जाति क या क्मिी भी दश कहा और अपने धम का
नाम भी चाह सो रस्त हो । यास्तर में व ही शुद्ध धार्मिक प्राय
एवं भास्तिक हैं माक्ष पथ म स्थित है। इससे अतिरिक्त समाज
पवित्र दश जाति व धम की वाध्य छाप लगाय हुए भी श्रधार्मिक
अनाय प नास्तिक है।
जाति भोज प समय पर मिष्टान उडाने का व मनोहर पत्रा
भूपगों को परिधान करने का तीन भाव उत्प न होता है वैसा ही
नीम भाव धम पिया म कभी प्रादुभून होता है क्या ?
तीन निझामा पे यिना धन मीन मिझना है तो फिर धर्म
जमी
अमूल्य
चीज कैसे मिले?

लास रुपये का मुनाफा घ घाटा प्रापर दय पर ६१
त्रिपाद का जो सार उपनाता है वही धसर भास्तिरीको धम
मयोग पियोग से होता है। किन्तु चनमान मानव ममान ने तो
विषय पाय सा4 पाणिग्रहमा कर लिया है और घम तक
विषय में सिधुरावस्था में है। मनुष्य का माप्य व धम तत्व में
रहा हुआ है।
नगन्नी प्रदेश में जयागत का मृत्य नही है वसेही १:-
बाद के जमाने मे धम तत्व का मूल्य नहीं हो सकता। मनुष्य
सुग्म की इच्छा करते है, परतु सुग घे उपादान कारग सप धम
की पहलना करते हैं। फी माश्चय जना घाना है !!
मिना म्याथत्याग र धर्म की भाराधना कभी नही हो सकती।
मसार में अपना सर दर धम भाराधना करने वाला सुमाध्य
गेगी। अनुकूलत्तानुसार धमाराधन करने वाला साध्य रोगी
है और लोग व्यरदार से धर्म श्राराधना करने वाला साध्य
धम प प्रभाव से मोहरूप उन्माद का रोग राग परका
राग, परूप शुभरोग, विषयक पायरूप सुजली का रोग, देपाव
निदारूप रक्तपातस रोग अशान पान और प्रमादम्पजनो
दर रोग इत्यादिक नानाविध रोग उस में होता है।
नगर पम प मिष्ट फल पाने को तत्पर होतो बीज बोने में भी
तत्पर हो जाओ। धन की अपक्षा घम यो विशप सादर देते
रहा। धम क सत्यरूप समारकी सेवा क्रो।
समुद्र में रहा हुभा पत्थर ज्यों पानी मे मृदु नहीं होता है
वैसे भारम्भ परिप्रहम शासन जी धर्मोपदश स मृदु नहीं होता
ऐमा श्रीस्थानाडा सूत्रम सरज्ञ का स्पष्ट क्थन है।

धन प प्रभार से इस जीय ने २ फर इतने प्रक्ष गिराय
+है कि जिम भरणोदधि में सुद श्राप ही मन्नतपार बह गया रिन्तु
धर्मतत्व प जिय मृत तुल्य एक भी गरिदु भी गिराया है
- क्या ? वी पुन एव धन के लिय मनुष्य अपात करता है तो भी
- निराशा मिलता है तो जरा विचारिए शिधम क लिय कितन
हार्दिक अवयपण की मारश्यकता है धन प्राप्तिक लिए जो
पुरुषाय पिया जाता है उमस काडगुणा अधिक पुरुपाय करने स
ही घम प्राप्ति हो सस्ती है । रोटी ५ टुक्डे ५ लिय रात दिन
भविश्रांत परिश्रम करने पर भी पूर्ण प्राप्ति नहीं होती तो कम
पुस्पार्थ से धम प्राप्ति केस हो सकती है ? नादान लडका चिस
तरह पिजीन के लिए लास स्पयर्या काहीग द दता है वैसही
अज्ञानी जीव'वषय विलास के माधना की प्राप्ति के हतु धर्मरूप
हीरा व मानय भयरूप चितामणी रनबर डालता है।
धन य लिय नितनी व्याकुलता है उतनी ही याकुजता धम
जिये जागृत होव तभी धम की प्राप्ति होती है । धार्मिक जीवन
भ्यवहार में स्थान होना चाहिये ।
चायुबह रहा हो तो फिर पख की कौन परवाह कर ? सिफ
रोगी । वैसे ही सुसक प्रभाव से रोग य समय म ही धम भावना
फ लिय धूमधाम मचाई जाती है।
म्यय धमधारायना कर सो उत्तम।
प्रश्याासेकर सोम यम!
प्रेरणा से भी न कर मो प्रधम ।
विषय पाय की प्रवृत्ति ही धम से परागमुस होन म पारण
भूत होती है। धर्म क प्रभाव में ही मनुष्य मे पाशविक्ता प्रकरती

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है । धम का नियमन काल्पनिक नदी पिन्तु शास्वत है धर्मस्थान
यह पूवाचार्यों का किया हुमा अद्भुत रिकार है। तिन
शों में धार्मिक्ता का प्रभाव उतनशम पाशयिकता का
प्राच्या नितने अशा में धम भावना उतने ही प्रों में चैतन्य
तत्व । पुरयानुनमीपुण्य + उत्य से ही धमतर की प्राप्ति
होती है।
धर्म प बिना पुयय नहीं और पुण्य थे चिना शाता नहीं।
समस्त सुसों का धाम व सुग्य की जड धर्म और सघ दुनों का
धाम अधम है।
समुद्र को पार करने के लिय नारा या मासिकार किया
गया है उसी तरह ससार ममुद्र में गिरन य लिय ज्ञानी पुरुषों
म धम रूप प्रवहण (नाव) का शाधिकार पिया है। शुद्ध हवा
प्रभार से रोग पढता है वैसे ही धर्म १ अमार से प्रारमा म
पापरूप रोग वटता है। निरक्षरा (अनपद) ज्ञान पोथी में
कीरें दिखाई देती है वस ही हीनपुषयजीमाको धमनच निर्माल्य
मा मालूम होना है।
धर्मतत्व र लिये दर भी सोच करत है, मि तु माझानी धर
भावना का उपहास करते है।
मनुष्य की प्रत्यक प्रवृत्तियाँ-न्यौपार गुमाम्ती दशाली प्राति
म करम धन कमाने का ध्येय रहता है से ही मनुष्यों की समस्त
प्रवृत्तियां म धम का ध्येय होना चाहियमा विना मालय
धरले ( धारदान) क ममान मनुष्य का निमाल्य स्थिति सम्मान
चाग्यि । मनुष्यों व चारित का विकाश करने की वमा उमो क

नाम धर्म धार्मिक जीवन ही नमगि या जीवन
एवं निरया है।
पशुगगा पन जीमशरमिग मासा घम्ही धर्म
रहिन माग्य भी मपन जीयन मनी शरमात । धर्मरहिन मनुष्य
करा पशु भूमि की शामा अगर या पहा नाय कि धमक्षिका
मनुष्यों का अधिकांश भाग पशुमि का भी नितिन कर रहा है
तो भी
अधोगी। मनुष्य नितन श स पशु पानि म
सन प्रशाम यह विषय पायकी प्रवृत्तियाँ म लग्नितनी हाता!
नितन अश में पाशकिना पाभार उतनभमभपन धम
मय जीवन जियजमाय पश्चात्ताप।
जहागिन म निम प्रगर अग्निर पकी शक्ति काम
कर रही है उसी प्रकार जर शरीर म शक्ति पधमय पुगय दै
धम को भादर देव या नहीं प्रिन्तु यह हमार दर एक शासोन्द्राम
में सहायक है। रिना धमए मनुष्य का मूल्य मांस पिगड से
अधिक नही है।धम काही प्रमाय में माल का पहलोमा पृथ्या
-
पर गिर पड़ेगा।
धमतत्व पशुओं में नहीं है । फिर भी ना मनुष्य प्राप्त शक्ति
का मदुपयोग न करता है यह पशु से भी निकट क्यों न फदा
जाय १ धर्म शरण मिराश मात्र भी सुना मिल सकता।
धम योद कट श्रीपधि नहीं है कि निमका सदाग मिर्फ दुस में
लिया जायें। धम यह कोड भाभूषण नहीं है कि जो मात्र पय
'दिनां में ही पदिना जाय।
भधम राय की सवारी पधार तय उमप निमित्त अधी
सड़क ( Road) बनाई जाय उस पर मपमा विद्याया जाय और

। है । धम या नियमा काल्पनिक नहीं कि तु शाररत है । धर्मस्य न यह पूवाचार्यों का किया हुभा अट्भुत विकार है। जितने अशा में धार्मिक्ता का प्रभाव उतनवी शो में पाविकता का प्रायनितने श्रां मे धम भारता उता ही अशों में चैतन्य तत्व । पुण्यानुबयोपुण्य के उदय से ही धमतत्व की प्राप्ति होती है। धर्म के बिना पुण्य नहीं और पुण्य के बिना शाता न। समस्त सुखों का घाम व सुख की जड धर्म और सर्व दुतों क धाम अधम है। समुद्र को पार करन य लिये नीरा का अविष्कार किय गया है उसी तरह ससार समुद्र म गिरन क लिय ज्ञानी पुरु ने धम रुप प्रयाहग्य (नाव) का आविष्कार किया है । शुद्ध : भाध से रोग बढता है वसे ही धर्म प्रभार समात्मा पापरूप रोग बढता है । निरक्षरों (अनपढ़ ) ज्ञान पोथी लकीरें दिखाई देती हैं वैस हो हीनपुगयजीगाको धमनत्व निर्मात सा मालूम होता है। धमत्तन प जिय देव भी सोच करत हैं, किन्तु प्राज्ञानी । भावना का उपहास रत है। मनुष्य की प्रत्येक प्रवृत्तियाँ-व्यापार,गुमास्ती दलाली श्रा मे क्वल धन कमान का ध्येय रहता है यसे ही मनुष्यों की सम प्रवृत्तियों में धम का ध्येय होना चाहिए। यथा बिना माल थैले ( बारदान) ममान मनुष्य को निमाल्य स्थिति समझ चाहिय । मनुष्यों क चारित्र का विकाश करने की कला उसो' -

नाम धर्म | धार्मिक जीयन मांगा नायन ६ । राप नायन
ज्य निरयर दे।
पशुगण अपन जी म शमिक्षा नी हाता यही धम
रहित मनुष्य मा अपने जायन सनी शरमात धादिस मनुष्य
पर पशु मृमिकशोमारपसार यो वहा जाय रिमदित
मनुष्यों का अधिकांश भाग पशुभूमि को भीति कर रहा है
ता भी अनि न होगा। मनुष्य निवन म पशु कोटि म ६
उतन प्रशाम यह विषयकायकी प्रवृत्तियों म तितनी दाता।
नितन NA पाशतिना घाममाय दै उननभमभपन अधम
मय जीरन क नियमानाय पश्चात्ताप है।
} अदशिन मनिस प्रपरमनिरासी की शक्ति काम
कर रही है उसी प्रकार जह शरीर म शक्ति पधम 4 पुगय है
धम को मादर दव या नहीं दिया हमार हर एक श्वासोन्द्राम
में सहायक है । पिना यमय मनुष्य का मूल्य मांस र पियर
अधिक नहीं है। धम ही प्रभाय म माम पापमोचा पृप्पी
पर गिर पड़गा।
घमनत्य पशुओं में नहीं हैं। फिर भी उस माग्य प्राप्त शान्ति
का सदुपयोग नहीं करता है यह प स मी निष्ट क्या न पहा
जाय १ धर्म प शरण यिा लश मात्र भी मुस नहीं मिल सकना ।
धर्भ कोर कटु श्रीपधि f६ किनिसका महारा मिर्प दुस में
निया आधे । धर्म यह काई भाभपण नहीं है कि जो मात्र पर
'दिन मे ही पहिना जाय !
अधर्म राय की मपारी पधार तम उस प निमित्त प्रच्छी
सहर ( Read) यनाइजाय उम पर मस्समज विद्याया जाय और

। है । घम का नियमन काल्पनिक नहीं किन्तु शाश्वत है | धर्मस्थान यह पृवाचार्या का किया हुश्रा अद्भुत विकार है। कितने अशों में धार्मिक्ता का प्रभाव उतनहीशा में पाशविकता का प्राकमानितन अशा मं धम भावना उतन ही प्रशों में चैतन्य तत्व । पुरयानुनकीपुपय फ उदय सदी धमतत्त की प्राप्ति होती है। धर्म के विना पुण्य न और पुण्य के विना शातामा समस्त सुखों का धाम व सुख की जड धर्म और सर्वदुषों व धाम प्रधम है। समुद्र को पार करने व नियमीका का अनार दिया गया है उसी तरह ससार समुद्र में गिरन क लिय ज्ञानी पुरुषों ने धर्म रूप प्रवहगा (नाव) का आविष्कार किया है। शुद्ध हवा प्रभाव से रोग बढ़ता ६ घसे ही धर्म य प्रभार से प्रारमा में पापरूप रोग घटता है। निरक्षरा (अनपढ) ज्ञान पोथी में लकीरें दिखाई देती हैवमे ही दीनपुरयानाको धमतत्व निर्माल्य सा मालूम होता है। धमतत्व प लिये दव भी सोच करते है, कि तु माज्ञानी धम भावना का उपहास करते हैं। मनुष्य की प्रत्यक प्रवृत्तियाँ-न्यौपार गुमास्ती दशाजी श्रादि मे परम धन कमान का ध्येय रहता है वस ही मनुष्यों की समस्त प्रवृत्तियों में गम का ध्येय होना चाहिए। यथा मिना माल के थेले ( गारदान) ये ममान माग्य का निमाल्य स्थिति समझना चाहिये । मनुष्यों व चारित्र का विकाश करने की कला उमी का

है
म
नाम धम ! धार्मिक जीयन दा नमगिक नीया । नप जीपा
यनिस्या है।
पशुगण अपने नीका मशरमिदा नदी ता यम ही धम
रहिन मनुष्य भी अपन जाया मनी शरमात धर्मादिन मनुष्य
पयन पशु ममि की शामापामार यांपा ज्ञाय धिमादित
मनुष्यों का अधिकार माग पभूमि को भी निन पर रहा है
वा भी अनि न होगा। मनुष्य तिन घाम पशुपाशिम
उतन अशों में यह विषयकायका प्रतिमलसिनीता
नितन न पाशसिनापामाय है उनमनपरधर्म
मय जीयन क नियमानाय पश्चात्ताप है।
अशिम जिम प्रधर नियती की शसि काम
कर रहीद उमी प्रकार जर शरीर में शक्ति कप धम य पुगय
धम को मादर दप या हरितुवद हमार हर सोमदास
में सहायक है । यिना म मय का मून्य मांस प पिराडस
अधिक नहीं है। धमकही प्रभार म मास का यह सोचा था
ET
पर गिर पड़गा।
धमतत्व पशुभों में नहीं है । फिर भी जो मनुष्य प्राप्त शक्ति
का मदुपयोग न करता है यह प B मी निश क्या न कहा
जाय १ धर्म र शरया यिा। लश मान भी मुवनही मिज साना ।
धर्म का कटु श्रीपति मिनिमया सहारा मि दुस में
लिया जाय। घम यह कोई माभूपण नहीं है कि जो मान पर
'हिनां मही पदिना जाय।
अधर्म राय की पारी पधार तय उस प निमित्त अच्छी
महक ( Road, घनाइ जाय उम परमसमन मिटाया जाय और

है ।धम का रियमा बाल्पनिक नहीं किन्तु शाश्वत है धर्मस्थान
यह पूवाचारों का किया हुधा अद्भुत रिकार है। पिता
अशों में धामिक्ता का अभाव उतने ही शो में पाकिता र
प्रारभ्य। तिने श्रशा में म मायना उतने ही अंशों में चैतय
तत्य । पुण्यानुयचीपुण्य १ उपय स धमतत्व की प्रार
होती है।
धर्म क बिना पुण्य नहीं और पुण्य के बिना शाता नहीं।
समस्त सुसी का धाम व मुख की जड धर्म और सर्य दुतों का
धाम अधम है।
समुद्र को पार कान के लिये नौका का अविष्कार किया
गया है उसी तरह ससार समुद्र म गिरने के लिय ज्ञानी पुरण
न धम रूप प्रवहगा (नाव ) का प्राधिकार दिया है। शुद्ध हया
प्रभाव से रोग बढता है वैसे ही धर्म प श्रभार समात्मा में
पापरूप रोग चढता है। निरक्षरों (अनपद) ज्ञान पोथीम
लकीरें दिखाई देती हैं वैसे ही द्दीनपुण्यनीयाको धमतत्व निर्माल्य
सा मालूम होना है।
धमतत्व य लिये दर भी सोच करते हैं, कि तु श्राज्ञानी धम
भावना का उपहास करते है।
मनुष्य की प्रत्यक प्रवृत्तियाँ-व्यापार गुमास्ती दमाजी प्रादि
म क्यान धन पमान का ध्येय रहता है वसे ही मनुष्यों की समस्त
प्रवृत्तियां म धम का ध्येय होना चाहिए। यथा लिना माज के
थॉन ( यारदान) ममान मनुष्य को निमाल्य स्थिति समझना
चाहिये । मनुष्य र चारितका विकाश करने की कला उमी का
।

आम धर्म । धार्मिक जीवन दो नैसर्गिक नीरा र जीयन
ग्य निस्या है।
पशुगगा अपन नीया सशमिश नगदता यमही धम
हिन मनुष्य मा अपन जीवन सनी शरमात । धमनि मनुप्य
र पशु भूमिका सामारप है |भार या कहा जाय कि धमक्षित
उनुप्यो का अधिकांश भाग पशुभूमि को भी मनिन कर रहा है
भी भयुक्तिन दागी मनुष्य जिवन अंश स पशु कानि
इतने शाम यह विषयपरायी प्रवृत्तियां मलनिन Rat ना!
बेतन अशम पाशकिना कामाय है उतनशमअपने अरम
यजीयन प नियझपाय पश्चात्ताप है।
अहम निम प्रगर भग्नि कर पातीवी शगि वाम
कर रही है उमीप्रसार जड शरीर में शशि रूप धम य पुगय है
धर्म का मादर दय या नहीं पिन्तुर६६मा दर एक श्वासोन्द्रास
में सहायक है । रिना धम य मनुष्य का अन्य माम पियड में
अधिक नहीं है । घमा प्रमाय म मांस का २६ लोया की
पर गिर पटगा
पमनव पशुभी में नहीं है । फिर भी जो मनुष्य प्राप्त शशि
मदुपयोग नहीं करता है यह पशु R मी निष्ट श्यां न पहा
जाय ? धर्म व शरण यि लेश मात्र भी मुसनरी मिन माना ।
धर्म को कटु श्रीपति नहीं है मिनिममा सदारा सिर्फ दुस
हो लिया जाय। धम यह कोई प्राभूषण नहीं है कि जो मात्र पर
दिनों महीपहिना जाय।
अधम राय की सारी पधार तय उस निमित्त मच्छी
सहक (Rond) घनाई जाये उस पर मरमन विद्धाया जाने और

धमरामो अपमानित का हड धृत रिया नार यह कैसी भारतम
अज्ञानता "धमतच की अवहनना साधम मप्रशहाना
है । धम की प्रथदा ही दुस एय दारिद्र का मूज
है। धर्म रहिन
जायन स्व-पर उभय पजिय निता तभयप्रद है। यहा तो विचार
करा दृढ निश्चयक्रोमि धर्मस्थान ही हमारी रक्षा नियक्ति के
सदृश है समस्त जाति समाज व दश तो एक मूनम पिरोन वामा
एक धम ही है। मानयममाज मे से धमतस्य यदि निम्न जाय
तो
समप्र दश क मनुष्य जगली पशुओं से भी विशेष भयकर हो जाय।
साम्प्रत समय का जडवादी समान एसा पामर बन गया है
कि धन के समान प्रत्यक्ष लाभ या अनुभव न हो ता धर्म की
अराधना नहीं करता उदर निशाह यानिय प्राण भी धमा
यहा वासान करता है । घम एघ धमाचाय य स्थान पर धन एवं
धनाचार्यों की पूजा हो रही है । मान य निया के स्थान में साना
व चादी में ही धम माना जाता है। परन्तु स्मरणा है कि, विन्य में
सुख शाति का अाधार स्थभ क्वज एक धम दी है। यदि धम का
प्रभाव हो तो सारा ससार नष्ट हो जाय ।
धम "यान पवित्र है ता धम करने वाली में परिणता पानी
चाहिए। धम की जिज्ञासा रखने वालों या चाहिये कि वे अपने
को रजकण से भी लघु समम । जिस में लघुता का भाव नहीं
यह धमका अधिकारी भी नहीं । बाजार मे गरीमाय माथ ठगाई
करना और धर्मस्थान में ज्ञा7 ध्यान की बातें बनाना यह तो
बाजारू ठगाई से भी अधिक भयर है।
योग्य काय ही धर्म और श्याग्य कार्य ही अधर्म है । मनुष्य
का हित करना उसमें सर्व गुणों का समावेश हो जाता है । नीति

गह नीर है और धर्म दीवार है नीष बिना दीपार नहीं
टिकती।
धन प अमार से नतुि ग्म प प्रभाव से शर्मिंदा होना
चाहिय । प्रागतिक कारणों को नष्ट कर द उसी का नाम बम
धार्मिकत्ता कजण शात समाय एप निरभिमानना है | धम
बुद्धिमाह्य नहीं किन्तु हृदयग्राह्य है । पवित्र विचार र पवित्र
प्राचार यही धार्मिक जीवन है।
धर्म-रहित भिक्षक।
धम धाप यिना भामा भात कान म भिक्षुक (मैंगना)
पना हुआ है । प्रनत काल से भीस मांगत २ पुरपाय हीन और
रोगी बना हुआ है । (निस माय रोग सम्बन्धम भाप पहिलपढ
धुरु ई)। ऐसे धर्म रहित भिनुक महा-पुरुषों प जिय दया पात्र है,
धर्माध जीनां व निरा हास्यास्पद हैं और रिपय पायी जीवों व
लिए ग्रीडा स्थान है।
ऐस घम हीन भिक्षुफ जीर की तृष्णारूपी सुधा भी शान्त
नहीं होती । प्रत वह सपथा मनाथ है। पापरूपी भूमि पर शयन
करने से ऐसे भिनुक की हड्डियां व शरीर घिस गए हैं, फम-रूप
धृति से प्रति मलीन होगया है, एर विषय कपाय की भिक्षा सदा
मोगत रहन से चौदह राज-जोक में भटक रहा है। उस पास
भीय मांगने के लिए प्रायु कम रूपी पूनी हराष्डी है । 'स्थग नहीं है,
नरक नहीं है पुण्य नी 'मी मिया १ल्पना रूपी यानक इस
मिनुको सतात हैं और उससे पाप वृत्ति करा
गति में भेनते हैं।

(१०) शद रूप गन्ध रस व स्पर्श आदि तुन्छ अन्छितान्न इस भितुक प्रात्मा को अधिक प्रिय है। यह भिक्षुक अपनी भिया का अन्न अय कोई न सोस ले इस लिए सदा भयभीत ए साघधान रहना है। वह विषय कपाय का मजिन भोजन रन से बुद्धिहीन होगया है, जिससे सम्यर विचार भी नहीं कर मक्ता। विषय धुपथ्य भोजन से उसके शरीर में मलरूप क्म सञ्चय का गेग पद होगया है। और उस अजीया जय शुम रोग की भांति नरक तियच गति की पीडाएँ सहता है। महा-मोह निद्रा से उस गि वे बक्षु घद होगये हैं । विषय कपाय फ कुपध्य भोजन से उस चारितरूप पथ्य भोजन रुचिकर नहीं मालूम होता। शोध, मान माया, लोभ राग व द्वेष क प्रहार से यह भिसारी पीडित हा रह है,भान भूल गया है। ऐसी निर्माल्य दशा में भी स्त्री, पुत्र वध मिल जाय तो परम सतोप मानन की धृष्टता करता है। अपर रक्षा के लिये दास-दासी रसता है। इस अलावा यह भिक्षुक अपकारी ज्ञानी पुरुपों से भी सदा भय भीत रहता है। यह सोच कर कि, शायद उनर उपदेशा से या लो बज्ञा से दानादि शुभ फार्यों में द्रव्य व्यय न करना पटे | इस भय से सत्पुरुषों का ममा गम भी नहीं हो सकता । धन का भिक्षुक यह धनिक धन के बंधन में यहाँ ता पॅस जाता है, कि स्त्री धन पुनादि का माह कभी नहीं छोड़ सस्ता । धन का भिक्षुक धन को परमात्मा की मूर्ति मान कर स्वय धन का उपासक यागी धनकर उसमी भाराधना करता है। ऐसा भिक्षुक चौदह राजमोक प कौने २ म भिक्षा लिए चक्कर लगा कर भ्रष्ट कम रूप पाथय (भाता) को जो कि भर रोग का मज है, अपन मिक्षा पात्र में भरता है । इसमें उसका परमानद की प्राप्ति होती है। कम रूप पाथय यद्यपि उसक रोगों की वृद्धि करता है ता भी अज्ञानतावश पुन ऐसा ही करपे रोग एर दुस ( ११ ) का भागी यनता है । सत्य चारित्र प्रादि पथ्य भोजा जो कि रोगा का नाश करन वाला है उस पर उदासीनता प्रकट करता है। माता, पिता, बधु, मित्र पुन, पुत्री, दव, गुरु, राजा और सब परिवार एक धर्म ही है | धम रूप क्याद्रिय द्वारा तमाम शास्त्रों का श्रथ सुनना सुलभ होता है ! धम तीना जोकों को हस्तामजस्वन् दिसाने में समय-कल्याणदर्शी नत्रों के समान है। धम कारत्न-राशि की उपमा दी जाती है। प्रत विश्व भर म सर्वात्कृष्ट स्थान पर धम का ही है। जय परोपकारी मनात्मा भिक्षुक को सदुपदश दत है तब वह पुगयहीन पामर धात्मा विपरीत विचार करता है, कि मुनिराज अपने मात्म ध्यान से च्युत होकर मरी इच्छा न होन पर बलात् मुमको व्याख्यानादि श्रषण करने के लिये क्या नियम आदि परात हैं ? क्या उपदेश के द्वारा व मुझो जाज में पैमाना चाहत हैं ' ऐसे भ्रम में पडकर यह गुरु को अपमानित करता है। इससे गुरु विशेष रूप से प्रात्म ध्यान में लीन होजात हैं। एसे भ्रम एव महान को दबार महात्माओं को महद् आश्चर्य होता है ।

मानव-भवा ज्ञानी पुरुष समुद्र कोरत्नों की निविसमझता है कि तु अज्ञानी उसे पवन नमक को दने बाजामानना है । इमी तरह ज्ञानी गुरुप मनुष्य जन्म का मोक्ष का साधन भूत और अज्ञानी विषय भोग का साधन भूत समझते है । दमो का भी दुलभ मनुष्य भर यदि धर्म रहित है तो दवा को ता क्या किन्तु नारकी क लिए भी अनिन्छनीय र अधम बन जाता है । पशुश्री में विपय पायों पर अंधुश रखने की शक्ति नहीं है वितु मनुष्य म है । यही मनुष्य की विशेपता है। यह विशेषता न हो तो मनुप्य पशु में समान ही है। मनुष्य अपना मस्तक उचा रस चलता है,जितु पशु नीचा कर । उन्नत मस्तक वाले मनुष्यका स्वभाव स्थग मोक्ष प्रद काय करन का है । मनुष्य दह से बढकर कोई शरीर तीन लोक में नहीं है। पनित विचारों स ब्राह्मण, प्राश्रित की सहायता देने से श्ननिय परोपकारार्थ धन सचय करनेस धेश्य और विश्व की सेवा करने से शूद, य मनुष्य समाज चार श्रग हैं । इसी तरह मनुष्य के शरीर म भी परोपकारमयजीचा सूचकचारग हैं,मस्तिष्क, भुजा पट और पैर ये चारा अपयर परोपकार मय जीवन बिताने की प्रेरणा करत है। मनुष्य देह मा सागर से तिरने क लिए नाथ के समान है। मास-भूमि देव भूमि से भी उत्तम है। क्योंकि मनुष्य अपना भनय इच्छानुसार बना सकता है। यह शक्ति दनां में तो क्या अन्य किसी भी जीर यानि में नहीं है । भतुभ्य भव स अधिः महत्व किमी दर का भी तीन लोक में नहीं है। प्रनत भवों में की हु कृषि एर बोय हुये वीनां क पज प्राप्ति करने का यह समय है। अन्य योनि फे अनात जीयों से भी मानव भर सत्कृिष्ट एप प्रधान है, अत इम भर में कार्य भी उत्कृष्ट एर प्रधान करन चाहिए। उद्धामा हुमा पत्थर भाकाश में रह इतनी स्थिनि मनुष्य भव की, और फिर जमीन पर पत्थर के रहने की स्थिति के बरायर स्थावर व श्रय जीपायोनि की स्थिति समझनी चाहिये । मानव भूमि यह मोर भूमि है। प्रात्मगुण + निफाश की परीक्षा दने की भूमि है । मानर मा जी और शिवपीच का पुल है। मानय भवरूप कल्पवृक्ष मिलने से मनोवांछित फल मिलते हैं। कोई वर्ग मांगते हैं कोई नर्क | सर अपनी २ योग्यता के अनुसार ही मांगत हैं । तदनुमार ही गति होती है। घमाराधन मनुष्य भर में ही हो सकती है । इसी दिन' जीर अनेक यशनिया में अपने पापा पओं को भोगत हैं। पन्डों को बाल्यावस्था में माता का दृध नहीं मिलता है, युववस्था में जननाय काटी जाती है । उन्हें क्षुधा तृपा से पीडित होकर भी गाडी का भार वहन करना पड़ता है। उनकी कोमज नाक को बैद कर उसम नाथ ढाली पाती है। जीया पयत वचारों कोमस मार सहनी पडती है । मृत्यु के याद भी उनकी प्रांतों क इ धुनने के लिए तार बनाये जाते है। उनक घमंडे की भनक ची ने बनाई जाती है, उनको कम किया जाता है। इस प्रकार से अनेक प्रकार 7 से यातनाए दी जाती हैं। तात्पर्य यह है कि अधम जीवायोनि में उत्पान होने वाले जीवों को जीवन भर दुख भोगना पहना है । और मृत्यु क भन तर भी उनो शरीर क तत्वों की दुदशा की जाती है। बडौं र सदृश निर्दाप प प्रत्युपयोगी जीवीं की जय

इस प्रकार दुर्दशा की जाती है ता पाप मय नीयन बिताने वाल
मनुष्यों की दशा इससे भी अधिक होनी चाहिय यह निर्विवाद
सिद्ध यात है। शा त म्यभार, परोपकारीजीयन एव सद्गुग्यों को
प्राप्ति ही मनुष्य मय में उत्तम यस्तु है। जय समुद्र
में रिपत्र
सर्चलाइर का छोटा सा दीपक भी नासा मायां की जान पचाता
है तो मनुष्य जैस उत्तम भर में परमाथ करना चाहिय । इसे स्वय
मममा जा सकता है।
मनुष्य प तीन प्रकार प फुटुम्ब होत हैं।
१ दव, गुरु, धम, श्रमा, नम्रता सरलता, सन्तोप, ज्ञान
दर्शन, चारित्र, दान शील तप, भावना मादि
२ ग्रोध, मान माया लोभ, राम तुप, इपा और शान
भादि।
३ माता पिता भाई, बहिन, पुत्र, पुनी, बी, सास, सुसर
मादि।
पहिल का एटुम्य मनुष्य य हित कीचिता करता है । दूसरा
भक्ति का चिंतक और तीसरा कुटुम्य अल्पसाल जिए मिलता
है । पर अल्पकाल लिए ही रहता है ।
मृत्यु प बाद अल्प काल के लिए प्राप्त होने वाला कुटुम्ब नहीं
छूट जाता है । एक दूसर नम्बर २ कुटुम्ब का बढाने में सहायता
करता है। इतना ही नहीं मितु पहिल नम्बर ५ फुटुम्ब का ज्ञान
घश तीव्र विरोध करता है। मनुष्य प्रथम नम्बर ५ कुटुम्ब क साथ
प्रम करे तो तीसर नम्बर का कुटुग दूसरे की सहायता से उसे मार

भगाता है, पवापिस न भावे इस हतु स मार २ कर उसको नि सत्य बना देता है। सपनीयन् प्रथम कुटुम्य में साथ दूसरा घतोसरा कुटुम्ब द्वप य इण करते हैं। तीसर नम्बर के ज्ञान कुटुम्य या पहिन की साथ नादि काल में यर है । दृमर पतीसर नम्बर वान की भाषा शनिधिक है मन उनका सम्मान होता है और पनि सम्पर य युटुम्घ का माकपण रदिन एय निधन सगम पर उस तिरस्कृत कर भगा दन है । दूसर नम्बर का कुटम्य परक्षोक में साथ रहता है। नी प्रज्ञान यश सुम्प्रदायी बुटम्प का निरस्कार और दु सदायी युटुम्ब का पहुमान करता है और सकी रक्षा व सेवा य लिये मनुष्य मपनी तमाम प्रायु रिता । ५-मनुप्यत्व वकील, पैरिस्टर, सॉजीसीर डॉक्टर वैध आदि नेक विषयों की परीक्षाओं में उत्तीगी होने वाले हजारों लोग प्रति परिसाइ यत है । परतु मनुष्यत्व की परीक्षा लेने दने वाला या इम परीक्षा में उत्तीगा होने वाला एक मी मनुष्य नजर नहीं पाता। मनुष्यत्व की मच्ची शिक्षा दने वाले स्कूल, कॉलेज एक अभ्यापक व पाय पुस्तक मादि भी दृष्टि गार नहीं होती। समस्त परीक्षाएर परचियों को अपना मनप्यत्व की परीक्षा एर पदवी महान है । इस पदपी को प्राप्त करने वाले व्यक्ति विरल ही होत हैं । मनुष्या- पति में घूमते फिरत करोडो मनुष्य दृष्टि गोचर होते हैं । किन्तु भाकृति र अनुरूप पदय वाले, मप्यत्न सम्पन्न-मानवता प गुणों से ममत प्राणियों के दर्शनभति दुर्लभ है । समस्त शिक्षाए वाचन मनन, लेखन, चितन, ये सब एक मात्र मनुष्यत्य प्राप्त aki करने क लिये ही है । सूर्यादय से समप्र अन्धकार का नाश होता है, इसी तरह मनुष्यत्व की प्रातिसे सर्व दोषों का नाश हो जाता है । मनुष्य जीवन का सरचि स्थान है। मनुष्यत्व रहित जीवन नीचातिनीच पशु पक्षियों सेव नारको से भी निकृष्ट है। मनुष्यत्व की प्राप्ति होने से उसमें सम प्रकार प सद्गुणों के बीज बोये जाते हैं। शरीर के स्वास्थ्य की रक्षा स मनुष्यान की रक्षा अधिक करना चाहिये । मनुष्यत्र ही सच्ची स्वस्थ दशा है। भिन्न २ भाकृतियों प अनक मनुष्यों को दस २ कर अच्छा चित्रकार उनमे से सव सुदर प्रवयव एक ही चित्र में कित करता है, इसी तरह मिन्न २ मनुष्यों के सतगुणों का समुदाय एक ही व्यक्ति म प्रादुर्भूत होना चाहिये । वृक्ष की लकडी स समुद्र तिरन की नौका बनती है वैसे ही मानर वृक्ष की सद्गुण रूप लकडी में से ससार समुद्र को पार कराने वाली जीवन नौका बनानी चाहिय। पृथ्वी पाना अग्नि, वायु और वनस्पति रूप स्थावर जीया का जीवन मनुष्य जीउन पलिय अति उपयोगी है तो माननीपन समस्त विश्व के लिये विशपत उपयोगी होना ही चाहिये। पशु पक्षी अपना अपनी सन्तान पा एवं अपनी झाति का श्रेय अपने सरस का भोग द कर भी करत है। मनुष्य जहाँ तक स्वकुटुम्य व स्वाति का श्रेय कर वहां तक तो उसको पशु जीवन के समान ही मानना चाहिए। जिस प्रकार चद्र सूर्य प्रभेद मार से प्रकाश देकर विश्व की सेवा कर रह हैं उसी प्रकार मनुष्यत्व की प्राप्ति के इच्छुक मनुष्य

को चाहिये। समस्त विश्य को सवा मेरमाय में कर यमुध्य
घुटुम्बकम"इम मन को मदर स्मरणाम सम्म रिशाश
भावना में जितनी सचितमा रहगी उतन प्रशों में मनुष्यत्य में
भी
मणवा रह जायगी।
भरना, विनय, या और निरभिमान य पारी मद्गुग्य
मनुष्य कस्समाव में हान पादिय । इन सदगुर्जा बिना यद अन्य
है । एमे मनुष्या शास्त्रमा न भाय मे नरक तथा पगुयोनिए
जीय कह है।
६-सत्य श्रीमन्नाई
हर पसान में सपा ग्यता नहीं है. पर सपा बजाना नो
अपनीमामा माजी कम मे कम सम्पति म सन्नाप मानन
षद पड़े से भी पढ़ाधीम त है। निनाम भीड्दय की विशाला
ही मची धनिक-पृमि है । अपना रात मुयुट अपने ही भात
करम में है। उम मुकुट काहीर माती गार की गवश्यकता
नदी होनी । एमा मुकुट शायद ही किसी राना भाग्य में होगा।
दम मुकुट का नाम देसाताप य चारित्रासदाचार ही मय स
पड़ा धन है । शरीर की सुहद हड्डिया हीर सभी अधिक मूल्यवान
हैं।मदापार, परिम्ना, नम्रता य परापकार ये मत्य, दम्य है।
लोम प्रमन्नाप उत्तरोत्तर पढ़ने पाना राक्षम ६ । चारित्र
की वृद्धि मे दी श्रीमनाई की वृद्धि होती है। समार ए घनी मृत्यु |
समय सब युद्ध छोड़ कर मृत्यु को प्राप्त होता है।
मदगुणों की पृद्धि कमी प प्रमाण म ही धीम ताई या
दीनना का नाप है। तमा, विनय, सरलता, सनोपय

सहिप्नाना ये सद्गुण पुनर क भण्डार से भी प्रतिक मूल्य पान होते हैं । मुरण मोहारों का मप्राह करने व पाय मुरगा मय विचारों का भग्रह करना विशप हितकर है। इसात शाश्यत एवं सच्च गुस की प्राप्ति होगी। धन मे रहित मनुध्य दीन है, मगर जि पास पैसे ५ सिवा और युन भी (चरित्र) नहीं यह तो महानीन है। गुण नष्टि यह महान सम्पत्ति है। दापनि मे महान दारिद्र बसा हुमा है । जो समस्त पृथी को पीतने वाला पश्यनी राना हो जाय स्मिा समस्त जगत् की धन सम्पत्ति प्राप्त कर स, तो भी यदि उस पास चारित्रम्प भात्मिा जमीन हा तो उस का धन धूल समान है। धन रहित होने पर भी चारित्र धन का थीमत बनना चाहिया मामी मुवया की पासी है। फरोडों रुपयर्या ला ढेर होने पर भी मनुष्य य गाज होता है । सदाचाररूप धन सामन हारे, मोती य मागरुका मूल्य क्कर से अधिक नहीं होता । धारिम को ही निजी सम्पति यना दो, पिर निर्धनता का स्पर्श भी न होगा सद्गुण रूप निन सम्पत्ति को अपने हृदय की तिनोरी म भर दो । यह चारित्र धन कभी नष्ट न होगा। यह स्वसम्पति हव्य चक में जमा रसने से सूद भी सब से अधिक मिलेगा। राज मुकुट धारण करने वालों की अपभा सदाचारी विशेष सत्तावान् है । उच कुश की अपना भी सदाचार सयतो भारन उच्च है।

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२०) प्रजा न हो तो तुम्हारी स.मी फा मदुपयाग त हो सकता है। जो सम्पत्ति भोग विलासों में व्यय हाने वाली थी और निसस दुर्गनि मिलने वाली थी, उमी सम्पत्ति का दान दने स (दीन हीन प्रजा के लिये उपयोग में जाने से) पुगय वध होता है और मद् गति की प्राप्ति होती है। भापको गरीय प्रना की सहायता लिए उचित क्षेत्र मिला है इस लिये अपने भाप कृताध समझिये और उस क्षेत्र में कुद पडिय। वतमान में दान का क्षेत्र इतना समुचित हो गया है कि दानवीर कहलाने वाले अपने पापको इम नाम से ही कृताथ समझ लेते हैं। और करोड़ों की सम्पत्तिकमा लिक होत हुए भी अपनी कोनि की लालसा से मात्र बुद्ध हजार रुपयों का दान देकर भनत कीनि योरना चाहते हैं। यह मालसा जनित दान सम्यग दान न कहा जा सकता। जलाशय का प्रति यद्ध जल गदा हो जाता है, किन्तु सतत पहने वाली सरिता का जज विशुद्ध रहता है। उसी प्रकार कृपया व्यक्ति का धन तालाय फजल ये समान एय उदार व्यक्तियों का धन नदीक निर्मल जल कममानहाता हैं। कोयले पर किसी प्रकार का रंग नहीं चढ़ता । इसी प्रकार कस कोयले ५ समान है और उदार व्यक्ति श्वेत हीर ५ समान है। यह उदार व्यक्ति अपनी दान को प्रभा से चमक उठना है । दान ही सच्ची कमाई का एक साधन है और बिना जोसम का व्यापार है। जैसे काय का पन काय ही देता है वैस ही दान स्वत अपना बदला चुकाता है । महान पूजा की लालसा से दान करता महत्ती नीचता है। परोपकार का भर पर उपकार नहा किन्तु अपने भाम दि. कास का सोपान (सीटी) है। पर हित साधना ही प्रात्म स्वास्थ्य S

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( २२ ) E-ज्ञान-दान निस प्रकार सूय में मत्र प्रकाश समाविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार विश्वकरोडो दानों का समावेश एक ज्ञान-दान में होता है। ज्ञान दान सूय प्रकाश समान है, इतर सभी दान दीपक प्रकाश ममान है । अन्नदान. वस्त्रदान, पात्रदान, श्रीपदा जीवनदान, ये सब तो कुछ दिन मास या वर्षांप लिये शान्ति . धाले दान हैं, और ज्ञानदान शाश्वत सुग्मों को देने वाला परमोत्सम दान है । अक्षान य योग से वर्तमान में इस मर्दथेष्ठ ज्ञान दान को लोग भूल गये हैं। ज्ञान दान का दाता अनन्त काल के लिये पाशीवाद को प्राप्त करता है । ज्ञानदान अनन्त काल के लिये शाश्वत-चक्षु का दान है । शानदान बड़े से बड़ी सेवा एव सर्वोत्तम सुखों का दान है। विश्व में स्थान २ पर ज्ञान की प्याज व प्रभात सस्थापित कर ये शाश्वत सुरों की प्राप्ति करें य करावें। कोटावधि पारमार्थिक सस्थाएँ (निन में कि विश्व की तमाम सम्थानों का समावेश किया जाय उन सर्व) से अधिक उपकारक सिफ एक ही ज्ञान सस्था होती है। अन्य क्षेत्रों में करोड़ रुपये का दान देने की अपेक्षा ज्ञान दान में दी हुई एक कौडी भी विशेष मूल्यवान् है । २५०० वर्ष स प्रभु महावीर का शासन चल रहा है और १८५०० वप पर्यंत पलता रहगा, यह फेवज शान दान काही प्रभाव है । भगवान् ऋषभदेव व महावीर प्रभु तथा अन्य तीवकर ए ज्ञानी पुरुषों का महत्व अद्यावधि अटल एष सुरक्षित रहा है यह ज्ञानदान का ही प्रभाव है। शानदान का प्रवाह अनन्त काल के लिये शाश्वत यह रहा है। वर्षाऋतु मे प्याउ लगाने (२३) धौर मुसाल में इन नेश सोजन की पक्षा उकालम प्याऊ और दुकान में अनक्षेत्र को स्थापित करना विशप प्रावश्यक है। । इसी तरह वतमान प्रधानाधकार मय जमान म ज्ञान की प्याज- - सम्यगास प्रारक संस्थानांकी परम श्रावश्यक्ता है। ज्ञान दान करने यामा तीन लोक की लमी का दान करता है। ज्ञान प्राप्ति से तीन लोक प न मोक्ष सुख प्राप्त किये जा सकन हैं । शान दान मोर दान है। ज्ञानदान में समस्त दान समा जात है। शानदान क मिष्ट पलों की महिमाकथ्य है ! ज्ञानदान क प्रदामा नशासन का उद्धारक बनता है । धान पान ही मुगा का परम निधान है । ज्ञानदान उत्तमोत्तम गति को प्राप्त कराता है । ज्ञान सटष्ट विभूति दे ज्ञानार्मकार से विभूषित व्यरित सार मसार फजिय पुननीय है । पापामानों का द्वार शानदान से ही हो सकता है । शानदान स्य पर के लिय मसार तारक जहाज है। ह-परोपकार। मात्मिक गुण या दापों की मरया इस प्रकार पढ़ती जाती है १+१-११+१-१११+१ - ११११। अत इस विषय में सावधान रहने की परम धावश्यकता है। दान को महगा परन वाला नहीं मितु दे पाना कजदार है । क्याषि दया, दान, यम प्प परोपकार पृति की परीक्षा करने का अवसर उसने दिया है। अतण्य उसका परम उपकार मानना चाहिये । "मैन उस पर उपकार किया है। ऐसा विचार करना भी पपराध है । दान लने वाले से भाभार किया प्रत्युपकार की प्रतीक्षा न करने हुए उजग सका भाभार मानना चाहिये। में किसी का श्रेय कर रहा हू" यह विचार करना भी अभिमान है। दान क पात्रों का पुण्य उदय होगा जब उनकी सेवा करने का अपने हदय में भाव प्रकट होगा। अतएर अपनी सेवा की प्रधानता नही, किन्तु पात्र पुण्योदय की है। परोपकार को परोपकार मानना प्रवृत्ति है । परोपकार में ही मात्मोपकार मानने से किसी कृतघ्नी की ओर से भलाई फा बुरा यदना मिलने पर भी उसके प्रति दुर्भाय न होगा। स्वशरीर की सेना को परोपकार मानन वाले उपहास के पात्र है। इस प्रकार से समस्त विश्व रूप शरीर की सेवा को परोपकार मानन पाले को कितनाधिउपहास का पात्र सममना पाहिय? कुटुम्ब सेवा में सर्वस का भोग दते हुए भी वह परोपकार नहीं समझा जाता तो फिर अपनी अनुकुलतानुसार सामान्यरूप से जो विश्य सेया की जाती है उसको परोपकार किस तरह सममें ?. हम किसी की सेवा करते हैं उस समय उस के पुराय हमको उसका पाहन बनाता है उससे परोपकार मानना भयकर पतन है। हम पुग्यशाली जीवा थे मजदूर है, और निजी धन, वैभवादि पा उठाने वाले मजदूर भी हम है । मत समझना चाहिये कि हम पुण्यशालियां क मानदूर मात्र हैं। इससे अधिक कोई विशेषता हमर्मनी है। राति समय भोस' चुपचाप बनस्पति की सेवा करता और प्रात काम में मनुष्य जागृत होत हैं तब अदृश्य हो जाता है इसी प्रकार प्रत्येक परोपकारी प्रवृत्ति गुप्त रीति से करनी चाहिये मोसपिदु की गुप्त सेना समान प्रादर्श परोपकार वांछनीय है दान (परोपकार) कर के मौन रह वह उत्तम । दान करपे दूसरों से कहने वाला मध्यम ! दान दने क पहले ही उस लिए टोंटी पीटने वाला प्रश्न ।

(२५) १०-भावना। वाणी की अपक्षा विचार विशप सृन्म हाने से शुभा शुभ प्रेरणाओं का पिशप रूप से प्रेरक होता है । इस जिये वचन सभी विशेष प्रकुश विचारों पर रखने में सावधान रहो। वाणी, पानी के समान है और विचार बाप्प और विद्युत प समान है। वाष्प एव विद्युत् मे भी मन की शक्ति अनन्त गुण अधिक है। बाफ और पिननो सार शहर को प्रकाश व नमाम यन्ना को गति देते हैं। इस तरह विचार समम विश्व को प्रकाश प गति देता है । बाफ और विद्युत् के उपर धनिकों का स्वामीत्व है, किंतु पिचार फ उपरधनी एव निधनी दोनो काममान स्वामीत्व है । पत्थर क डालने से उत्पन हुमा समुद्र का तरग समस्त समुद्र म फैज्ञ जाता है, शी, गर्मी और वपा की या सर्वत्र फैलती है, इसी प्रकार विचार भी तमाम निस्त्र में प्रति सरलता एव शीघ्रता पूर्वक फैजत है। अच्छे विचार स-पर का हित साधक एवं वर विचार उभय को अहितकारी हाता हैं। विचार सूक्ष्म शरीर है, उसकी शक्ति स्थूल शरीर से भी अधिक है । इस लिये महापुरुषों ने शनु ओं का भी हित चितन करने का सदुपदेश दिया है। शुभ 'विचार से शुभ और अशुभ रिचार से अशुभ पुद्गल समूह घारमा प्रहया करती है। किसी के लिये बुरा विचार करना यह उसा सर पर सजवार उठाने समान अपराध (पाप) है। ममस्त जीवन व्य. वहार का प्रेरक एवं उद्गम स्थान अपने प्रदर है। प्रथम विचार उठता है याद हाथ उठन है । बुरा विचार अपनी अनेक सतति उत्पन्न करता है । और उन सब का निवास स्थान अपना शरीर होता है। गुप्त विचारों का भी अच्छा या बुरा प्रमर अवश्य पडता है। मन हर एक गुप्त से गुण विचारों का भी पवित्र रखना चाहिये। f (२६) विचारों को शाद द्वारा व्यक्त करे या नहीं, मगर उसका प्रभान तो अवश्य ही दूसरों पर पड़ता है। तुम्हारे विचारों क तरंग विश्व में करा कर फिर तुम्हारे ही पास जीट भाता है। अन्य 4 जिये किये हुए बच्चे या पुरे विचारों से दूसरी पर असर चाहे हो या न भी हो, पर मय अपने पर ता उसका अच्छा बुरा प्रसर अश्य होता है। अच्छे विचार शरीर मे धारोग्य व पल को बढ़ात है और पुर विचार रोग व मृत्यु को अच्छे विचार का पदना शुभ तत्सीय रूप में विश्व की भोर से मिपता है और ये शुभ तत्व हमका दर्श नीय एष जगट्वल्लभ बनाते है । पुर विचार का परिणाम इसस विपरीत होता है। प्रतिक्षण विचारों द्वारा ही शरीर और मन की रचना होती है । अत विचारों पर पूर्ण रूप से अकुश होना चाहिय । अपनी वर्तमान स्थिति अपने विचारों का ही परिणाम है। धैलों क पीछे २ ज्यों गाड़ीसिंचाया करती है इसी तरह शुभा शुभ विचारों फ पीछे २ सुर दुख भी पाया करते हैं। शरीर की छायावत् सुख टुप भी विचारों क अनुगामी हैं। पवित्र विचार प्रमु समान हैं और अपवित्र विचार पिशाच के समान है । विचार का रंग मनुष्य के चारित्र पर लग जाता है। तुम विचार को भले ही भूल जानो, कि तु विचार तुमको भूलने वाला नहीं । उसकी नीध शाश्वत है। अपवित्र विचार, अपरित कार्य के ममान भयकर है। बुरा विचार सिंह की तरह धात्मा पर छन्द्रन पडता है। करोडों देवों से भी पनि विचार की सेवा प्रा. स्मा के जिये अधिक उपयोगी है । करोडों दुश्मन दान से भी तुम्हारा एक पवित्र विचार अनत काल के लिये अधिक माहित परेगा । जिस प्रकार जन्न न परमाणु मेघ म एकत्रित होकर यथा 1 .

ममय परमत मी प्रकार मामा म पिचारा गुमा गुमपा
मानुपारित होकर स्वय अपने माय प्रष्ट करत रिपार
एरण में पाहमिवने ही गदा १५ हो सामी मंदा की दावादा
शिसभात पुर विचार निशन दिय ज्ञाय ती मा म्यान
ধ মধু বিবাহ । বিখl
रहे पवितवर्ग अपने भविष्य को पाने याने भावी।
परलो मावना मूर महिनाम दो । त्यागी, योगी, गती,
वेश्या, परमार्थी भार कमा समान विचारोस पनेर।
पनन ।यचन और विचार दूसरों ५ मामने मृति मत
।न्दिा, मधुता, निरस्कार धादिम्म विचार Ex.
नि रूप होकर दूसर पर अमर करता । मामाघ rivari
फ. और भट्टी निष्ट उमाना के परमाणु प्रतीन
पवित्र विचार यात पास स पवित्र परमाणु 1ि6
परित्र विचार या स पवित्र माता और ER
सानिधान पर भी सभि प्रकार के पाrat
इमी प्रसारमा भौर पुर विचार यानो कपाre
दोता है। अपना विचार गफिफा वरमा
अपने विचार ही अपना भविष्य यनावा | tara
विष्य पड़ने वाल।
-
3

(२८) ११-भोग। सातम पस्यान्न की विष्टा भी ग्रहण करने योग्य नहीं है वैसे ही उत्तमोत्तग भोग भी उपादय नहीं है। क्यों कि यह मनत जीवों की निष्टा है। चलत समय दाहिन पैर की साथ पाया पैर उठना है वैसे भोग पे साथ रोगमवश्य मावी है । भोग भाव रोग है और यह द्रव्य रोग (बीमारी) से अधिक भयकर है। भोग समय भोग्य पुद्गों का भारि मत विचार फर जिसको त्याग. भावना जागृत होती है वही सचा त्यागी है। इद्रियों के भोग भोगना यह सांप को पक्ड पर उसय ति से खाज खुनालने तुल्य है। ज्ञानियों को भोगी जीयों पर करुणा भाती है, कि ये पामर जीव भोग य क्टु पक्ष नरक और निगोर को कैसे सहेंगे। भाग से इस भर में ही अनेक रोग होते हैं। तो परलोक में मन त दुस होना स्वाभाविक है। भीगास जीर इस लोक क रोगों से डरता नही है । तो परलोक का भय कहाँ से रवर? भोग विलास जम मस्तनधारी दृष्टि विप सप तुल्य है। भोगी मनुष्य मृत्यु समय पीडित और दुखित होकर भोगों को छोड कर म्लान मुस से भोगों की शिक्षा भोगने परजाक में जाता है । भोग सामग्री एकत्र करने में ताप ( कष्ट) है। भोगने मे पधिक ताप है। और पनत परलोक में महा ताप है।

(२६) १०-रोग। रोग कारले पर्दे में छिपकर माता है, पर नसमें भात्म जागृति कचद्र का प्रकाश चमता रहता है। रोगही समझाता है कि, समार मार और शरीर क्षणिक है। रोग भूतकाल की मनो नता का पिशोधन, भविष्य काल जिये प्रात्मोनति काम- गयोदय है। रोग बडे सयडी सेवा बनाता है। काश्तकारी की प्रगति के लिये स्वाद उपयोगी है, जैसे माना की प्रगति के लिये रोग उपकार रोग समार स्वप्न का नागकरने वाला परमोप कारी है । ससारी जीनों को समार काराप्रम तथा मोह से मुक्त करने रोग और दुस जत्ता प्रहार कर चनात हैं। भय रोग! तुमको नमस्कार हो। त जागृति में साधक है। 'हित करन याला शत्रु मी मित्र है और प्रहित कता मिन भी शत्रु तुन्य है । जैस अपने ही शरीर में उत्पन्न हान बाल रोगशत्रु तुल्य बाधक हैं और जगल में रही हुइ हवा मित्र तुल्य साधक है। सु- वा की शुद्धता म अग्नि मावश्यकीय है स प्रगति के लिये रोग मायश्यक है । जगन् म दुध, शोक और क्लेप न होन तो प्र. गति भीन हाती । ससार के विविध दुस मनुष्यों को प्रयोगति म जान से रोकत है क्या कि कुदरत द्वाराटुस पलेप रागादि हाना यदजामति जिय उपकारक चतावनी है। अपनी नहीं तो परकी दया र सातिर मी ग्यान पान में - फुश रसो, मिताहारी यनो, निससे रोगी नहीं बनोगे और मापक मशुभ परमाणुओं का प्रमर दूसरों को 7 हागा । यदि नल द्वारा भी सत्य क प्रदशम भाना सुश्मय हो तो उस जिय भी करियर पनो।णिक राजा जैसे नरक से न धभराते, च कि वह भाषी (३०) निश में साधक है । वैज्ञानिक ष्टि से भी अशुभ विचार रोग है और शुभ विचार आरोग्य है । इसी प्रकार नियम से दिव्य भोग शाता का रोग है और नारक माग अशाता का रोग है। मकान मेंस करा दूर करने के लिय बुहारी उपकारक है, वैसे ही शरीर का चरा दूर करने के लिये रोग उपकारक है। शस्त्रों से रक्षा भी होती है और नाश भी। उपयोग करन पाना चाहिये । इसी तरह रोग य समय धमरा कर दुनि ध्याने वाला स्य दुखी हो कर दुर्गति का यन्ध करता है और भात्म ज्ञानी सतर्क हाता है, अपनी प्रगति करता है । जैसे- अनाथी मुनि, नमिराय राजपि । १३-उपवास। मास (अनशन) करने से जठराग्नि रोगों को मरा करती है।एमा कोई भी रोग नहीं है नो उपवाम द्वारा दूर न ही मक। उपवास से मगज शक्ति घटने की मान्यता गन्न है। रोग समय उपवास करने से रोग का रिप बन जाता है और उपासन कर न से विप शरीर में फैल जाता है। अधिक सानपान स होने वाली मृत्यु सस्या दुष्मान की मृत्यु सरया से अधिक गिनी गद है । रोग यह चेतरनी है कि शरीर में नया सानपान का कचरा भरना च करण उपवास करा। उपनास द्वारा रोगी वे भी सड निरोग होत है और दवाइयों से नव्ये फी सकड रोगियों के रोग पहत हैं। दवाइयों से दह में नये २ रोग उत्पन होत हैं और उपचास स रोग भस्मीभूत होत है । जुलाब लेने में भी शरीर म घुछ कचरा रह जाता है, परन्तु उपमास से रोग TE मृज से नष्ट हो जाते हैं।

दायाम करने बाल को जथाप पन्तया शारने सरनी
है हर सममा पादि रोग दो गा और मारोग्य प्राप्त
हुणरागीको दवाइन र नपशाम (अपन) कराना ही
अधिक उरकारक है| रोगी पशरीर में अन्न न हासन से पिचारा
रोग नष्ट हो जाता है। हाथ पैर, शरीरमादिको से भाराम
दिया जाता है, यसदी उपयाम फरक जराग्नि का भी विधाम
दना जरूरा।प्रति दिन पाने वाले डशिन को नम प्रति मताद
एकदिन पन्दपक माप दिया जाना है, मी सरह उपयाम भी
भावश्यक परमावस्या है।
शरीर ए पाय उश्याम स मर जात है। रोहिडया संघ
आनी हैपशु पी भी रोगोने पर माना पीना राहत ६, निस
से व विना वा गोम्र निरोगी होन नात ६। सात दिन ५
प्रयास मेवास (पायु) का, इस उपराम स पित्त का, पौर
पारद उपधाम से कपका रोग नष्ट दाता है। पन्नधात (जरया)
जेम भयकर रोग भी उपपास से दूर हात है। गर्मी की मौसम में
मीन दिनउपयास से जो माम दाता है यह शरदीदी मौसम में दो
रवासमा पासा।
अमरिका में उपधाम द्वारा रोग मिटान र उपगार पर
हैं और मफल भी हुए है । भने प्रारकी दयाइयों को चिकित्सा
से जो मनोप और मरतानी मित्रो यो मायास चित्मिा
मे मिन्न रही है।

१४-धर्मोपदेश मानुपिक मशुचिमय भोगों में प्रशानी मनुष्य इतना मासा (गृद्ध) हो गया है, जि स्यर्ग और मोक्ष सुख की भी परया नहीं करता है तुच्छ समझता है, इस से अधिक प्राश्चय भय क्या हो सकता है? जग जीयों से पैर और शग्रता का त्याग न कर सको तो कम से कम भाप अपने स्वयं घरी तो न यने मानवता की सत्य समझ सद्गुरु समागम और सत्य धर्म प्राप्ति होती है । सन्त समागम और सत्य धम का सयोग मिलने से भारमा की साक्षात् प्रतीति होती है क्यापि अनात्म दशा जड दशायन् जीयन जीना शोमा नहीं देता। यह तो सद्गुरु और सत्य धर्म का उपहास करने या क्लक दने समान है। यदि पिचार शत्ति तो सत्यासत्य को विचारें । अक्ल्याण फता विश्व र अन्य जीवों से भी वे अधिक यापात्र है जो सुसयोग मिलने पर भी उस की उपक्षा करता है। पूय पुन्य पुरुषार्थ से प्राप्त उत्तम सयोगो का सदुपयोग फरें। दुगति फ दातार विषय भोगों का तिरस्कार न कर परम कल्याणकारी निनवाणी सद्धम का तिरस्कार करना-उपेक्षा करना मद्धाश्चय है! दुर्गति नगरी मे रोजाने वाले विषय और पाय का त्याग करना चाहिए। मज्ञानी पामर जीव सद् गुरु को भी स्पष्ट सुना देता है कि, चाह सो हो, पर मृत्यु ष पहिले स्त्री, धन, विषय, पायादि का त्याग मर से नहीं होगा | अज्ञानी जीव स्वर्ग व मोक्ष प सुसां को तृष्णावत् निरर्थक समम कर उपना करता है और भोग के दुखद

नेपा प्रत्य तुमय धान पर भी हानी पुरपायपनों का
मनार फरतालानी का प्री पर प्रति पापन लिए
विषय भोगों का भोग कर दुर्गति का भामत्रण दना है।
निद्राधीन जाय पाहमा मुदर याप या मुन्दर श्य पर
चिन नीरसता, सदी मोर निद्रापातीयारियों पचन
नसुनता देने ममम सामान्य मुर यमय में
FE प्रति वृद्धि होती, यह कमाइ मनुष्य की पुराना या शाम
पुद्धि का प्रताप से नही दानी पर पूष कमर पुय प्रताप से
मानती है, मन' सुर गृद्रिामादि पीर थम सत्र को उन्यष्ट
पुण्य में रक्षा करें । धर्म शुभ फल माया प्रतीत होने पर
भी उस का इतना भनादर किया जाय नोइमस पदारय क्या
प्रयाय हो सकता है?
पुन्य पाप का प्रत्यक्ष म्याप जानत हुए भनजान नाम्निष्यत्
पिन बिताया जाय इसस विशेप मामय क्या हो सर ?
रक्त पातों को जानकर, समझ कर, जीवन में प्रतार र धम
गच्च कामाराधन-मापरण करना चाहिए, धम ही प्रारम धेय
का प्रधान पथ।
Pune

मार्गानुसारी-विभाग । १-गुणदृष्टि धम मार्ग को अनुसरने वाल म प्रथम गुण दृष्टि-गुणग्राहक घृत्ति-होना आवश्यक है। जगन् का प्रत्येक पदार्थ गुणों से भरा है। यकरी की मैगगी में गुलाय पुष्प की सुगध य पोषक तत्त्व है, गोबर और फूडे फचर पसाद में गाने करस पोपक तत्त्व है, और कोजसे मे शक्कर प तत्त्व होते हैं तो दोप कहाँ से ? समस्त जड तथा चतन्य तत्व गुणों कनियान रूप है । वैमानिकों ने पत्यर फे कोजसा में से सामान्य शक्कर से ८०० गुणी अधिक मीठी शंकर निकाल दी है । शिल्प शास्त्री पत्थर के टुकड़ों मे दव देवी, राजा राणी की प्राकृतियो दसत है । मधुमक्षिका निष्टा में से शहद क तत्त्व मिंच सकता है । गुणी जनां को सर्वत्र गुण और दोपितों को सर्वत्र दाप ही दाप दिग्यते है । गुण ग्राहकता समुद्र समान है, उस में सर्व प्रकार की गुण नदियाँ मा मिलती हैं । वद अपने गाभाय म सा स्थान दता है। थाप अपने को पवित्र बनाना चाहते हो तो दूसरों को भी पविन मार्ने । दूसरीका अपवित्र मानने वाला स्वयं अपवित्र है। मानव भातरिक गहराइम से स्वमार (प्रति) की परीक्षा निना किये बाह्य-ष्टि से उसके जिए कल्पना पाशत्ति है । बीमार को बीमारीय अपराध से मारना नहीं चाहिए। बीमार हालत में उसप दीप देस नहीं जात, परन्तु उपचारक प्रयत्न कर उसे यामारी मुक्त क्यिा जाता है । गीमार हालत में उसप दोष दखे नहीं जाते, इसी तरह मानसिक बीमार (दोषी अपराधी ) उसमें (३५) दापों के लिए दूषित समझ जाना नहीं चाहिए । शारीरिक बीमार की अपना मानमिक नीमार पिशप दयापान और सपा पात्र है। सामारिक प्रतान युक्त सार्थ, व्यवहार न पर अपनी खानदानी र अनुमार यबहार रवये । पशुओं से भिन्न उच्च प्रकार की अपनी गानदानी मनुष्य कोरिचारना चाहिए | गुणियां + गुणों को तो पशु भी ग्रहण करत है, पर दोपितों से गुण ग्रहण करना मानता है। मनुष्य चाह तो ग्ल्ट प्रम को मुजट सकता है। गुण दृष्टि की ज्वाला म समस्त दोप मम्मी भून होत हैं। दूमरों को पनि प स दमन की वृत्ति म बढ कर कोई दया, दान या महोभाग्य नहीं हो सस्ता । दूसरा में कौन २ मे गुण छिप है सो हँडस युद्धि से ट्रेनो । हम दूसरा गुण दसँग तो दुनिया हम का गुग्गी यनान में सहायक होगी। माना जीरन क विकासकी पुन्जी 'गुण दृष्टि है। देवी और शाश्वत नियमों का अनुसरण गुण -ष्टि है और गमी त्तिका अनुसरण नाप दृष्टि । गुण दृष्टि के प्रभाव मे दुय व्याधि प्रादि का प्रारमण हाना और दोष दृष्टि कमार में मुम सम्पत्ति की वृद्धि होना प्राकृतिक नियम सा है । फलत गुण दृष्टि परनात्मपद प्रात्मपर ५ सम्मुर ले जाती है। जहाँ चतन्यवाद है वहां भास्निकता और गुण दष्टि है और जड़ वाद है यहां नास्तिकता और दोप दृष्टि होती है । गुग्ण दर्शा के प्रति ताना ही काल मे अन त नीय गुण -ष्टि रसत है और भोप दर्शी प्रति घनत जीव दोष दृष्टि रसते हैं।ष्टि बदलने माध से नारकीय प्रसग स्वगीय प्रतीत होता है। दापाक दोपदग्गना छोड कर उसमे रही हुइ दिव्यता दसैं । अपनी निनात्मा की या Bye फे सातिर भी किसी से दोप न दय । दोषों में में गुण दराने का प्रयत्न करना ही ससुरुपाय है। अपने दोष मुधार मे थे पहिले दूसरों पदोप दसने का अपना क्या अधिकार है ? जहाँ तक हम सनत्र गुण नहीं दग्रत, यहाँ तर हम दोपऐ भण्डार है। सद्गुण के भण्डारी को सपन गुण ही गुण दोस। सप फ प्रति परमात्मा समान सम्मान रसना ही सत्य शिक्षण है। शब्द रूप सेड पुत्ते की तरफ जान नहीं दर वक्ता र प्राशय को देखना चाहिए । दोषी को मिना गुण का अनाथ समम पर सस अपने गुण देकर सनाथ यनाव, तो हम अनाथ नाथ कहे जायेगे। हम मनुष्य, मनुष्यों मे गुण न देख सके तो अन्य रिस तत्त्व में गुण दस साँग? दूसरों क दोप रूपबाट अपने में धुभाकर निरर्थक दुसी क्यों होना चाहिए ? विश्व की पवित्र मानव भूमि जो कि मोक्ष भूमि है उसम दोप दृष्टि फ वीज थोकर मोक्षभूमि फो निरथक न भूमि क्यों मनायी जाय ? किसी के विषय मे चुरा अभिप्राय बांधना अपने पैरों पर कुल्हाडा मारने समान है। गुण दृष्टि समृद्धि है और दोषदृष्टि गाजियत । गुणदर्शी का जीवन सुसरों की माला समान है। गुण दृष्टि परमात्मा का निवास स्थान है । गुगण दृष्टा के चारों ओर प्रेम प्रवाह और दोप दृष्टा की श्रास पास द्वेष का प्रवाह नित्य बहता है । गुण दृष्टा चोर, कसाई और शराबीम भी परमात्म पद की सत्ता समझ कर सम्मान रयता है।सूय को अपने भ्रमण में सिवाय प्रकाश क अन्य कुछ नहीं दिसता वैसे गुणदृष्टि वाले को भ्रमण म, अनुभव म, विचार में, वचन मे, यर्तन में प्रम का प्रकाशमलता है । गुण दृष्टि समभाषी दृष्टि है और स्वग तथा मोक्ष के साक्षात्कार समान है। पिना गुण दृष्टि का जीवन नरक या पशु तुन्य नीच कोटिका जीवन है। पवित्र पुरुष ही गुण दृष्टि पाचन कर सकता है।

गुण दी सदा प्रसन्न होता है और दोप दर्शी सदा द्वेषाग्नि से दुम्बिन होता है। गुण दृष्टि ही साधुता और सत्य धम है। गुण-ष्टि वामा अात्म पथ पर चलता है । अशक्त और दुर्वज पाशक परक्ष्याभाव से माताकाप्रेमविशेष होता है, वैसे दापीमानव को रिशप दयापार समझ कर उसकी विशप दया, सेवा और सहाय्य करना चाहिए । गुणीजनों को सर सहायता करत ही है परन्तु दोपितों की मेगा करने में ही महत्व है। 'गुण दृष्टि रक्यो और दोप दायानात को भस्म करो' यही सब शास्त्रों का सार है । गुण दृष्टि मुग्य का समुद्र है और दोप दृष्टि दुख का सागर है । गुण दृष्टि का कांटा नित्य ननर ५ सामने रचना चाहिए । गुग्ण दृष्टि से युक्त होने पर अन त जीवां से वर शिरोध मिट जाता है। महात्माओं की पवित्रता कामूल्य पापात्मा दत है।पापात्मामा की कसौटी द्वारा महात्मा का मूल्य मालूम होता है। जैसे श्रीमतों को विकास र साधन गरीयों द्वारा मिजत है। वैसे ही पवितात्मामा को परिप्रताप साधन पापियों से प्राप्त होत हैं । इस लिए गुण दृष्टि स पवित्रामा पापियों का आभार मानत हैं। चोर, हिंसक और पापात्मा न होत तो साहूकार, दयालु और धमात्मा का भद कस होता ? उनको यहुमान कौन देत ? मूल्य का महत्त्व इसी सतो है। अपना सवस्व दकर दोषी की सेवा करना ही गुण -ष्टि है। सहाय्य दें, कि तु सहार न करें । दोपी प दोष सुधार ने मे उसे सहायता दें । परतु उसे अधिक गिाड निरस्कार न करें । प्रत्येक निराधार वस्तुओं को पृथ्वी प्राधार दती है, वैसे ही सबको माश्रय (३८) १ देचर प्राणी जैसी महान दष्टि मान नहीं रख तो अन्य कौन दृष्टि दो माम प्रगति के लिये परम सुरणायसर है। हिंदु यानक को चाह शितना भी जानच दन पर यह किस, पशु पक्षी का घारा नहीं करगा। जय मुसलमान का बच्चा कारण ही चाह रस भी निर्दाप प्राणी को हमने २ मार डालेगा। कारण यही है कि हिन्दु पाजमा म अहिंसा का तत्व और मुसज मान प न म मिा का सत्र श्रोत प्रोत है। इसी प्रकार भार्य सदा गुण दृष्टि रखता है क्या कि उसकी प्रकृति में वैसे सत्व, जय कि भनाय की प्रति म दाप दृष्टिक तत्व भरे पड़े हैं। भार्यत्व का दावा करने वाल को समस्त सयागों में गुग्ण दृष्टि का शरण प्रण करना चाहिय। गुण्य प्राहकता भवाधितारक नौका तुल्य है । दोपष्टि पत्थर की नाव तुल्य है। दवाधिदर की पृज्यत जमा गुया प्राहयताका गुया है । दापष्टिक मन को श्रग्नि में जलान मे गुगा इष्टि प्रार होगी। गुण दृष्टि उदार भात्मा की नमी, सम्पत्ति और वैभव है। गुण दृष्टिही भात्म भाराधा ष्टि है। अन्यथा विनाशक ष्टि है। मोधी को क्षमा का, मानो को विनय का, मायी (कपटी) पो सर लता का और लोभी का स ताप का दान देना ही गुण दृष्टि है। वृक्ष की जड़ में पानी का सींचन होने से वृक्ष पध, पुष्प फलादि समस्त विभाग का पोपा मिलता है वैस गुण दृष्टि का सिंचन करन से आत्माम अग्विन गुण प्रकट होते हैं। हम जैसे बनना चाहे, पान सकत हैं। गिल्ली उही दांतों से अपना यचा और चूह को पानी है एक में प्रेम और दूसरे में कैप है। उसी प्रकार जीर की दृष्टि में गुग्प ग्राहकता और दोप माइस्ता हो सकती है।

(३६) । सहन करने का गुण सबसे बडा है । वर्णमाला म सर एक २ प्रकार अमर हैं जब कि 'श तीन प्रकार क (श पस) हैं। और प्रतम माता मथान शह, प, मह हाता है। निस प्रकार सहम वर्गामाला समाप्त होती है उमी प्रकार मर गुण सहन- शीना में समाप्त होत हैं। सोमज सरिता पालक, स्कदक कमठ और चगह सप जैसे को भा प्रभु ने उपकारस मममें सो दोप किस पस? नासा की यतिम मिजन स नो भान दहाता हैं इससे अत्यधिक धान द गुण नष्टि म है । और लाग्यों य नकमान में नो सद होता है, उससे भी अधिक पर टोप नष्टि म है। अपने शरीर पर काव करन से जब यह नहीं सुधर सकता है तो अन्य क उपर दाप दृष्टि से प्राय फरन से वह मे सुपर साता है ? दाप इष्टि से शत्रुता पदा करन म नुक्सान है मगर गुण दवि से मित्र- वा प्राप्त करने में कौनमा नुक्मान है ? मनुष्य अपनी भूल शायद ही कवून करता है। अय को शिक्षा दने के यनाय निन २ ससर्ग में अपन भाये उन २ म शिनार ग्रहया करना चाहिय । गुण प्टि यह भविष्य में महान् पुरुप होन का शुभ चिह्न है। भगरमाप परोपकार प्रथया धमाराधन विशप रूप स नहीं कर सकत हो तो सब स गुणों को ही ग्रहण करत रहा। नाप दापी का नहीं कितु उमा प्रगान का है। गुग्ण टि वाला मनुष्य दूसरी प दोष दएपने सुनने और कहने में अध विर व गृगा है। पशुधा सभी मनुष्य विशेष अनुम्पा पान है क्या कि उनम हिता हित का ज्ञान हान पर भी तीन मोहोदय से पसे नापों का सेवन करन हैं । प्टि को ण्मी निर्मम यना दा किनिसम अपना सूम समूमनोप भी नेत्र में गिर हुए रजण क समान मालूम हो जाय और उमे अप्रमत्त हो शीघ्र निकाल लिया जाय। ।

(४०) अपने दोषों की जांच दूसरोक दोपों की जांच क समान हो तघ सर्व दोषों का नाश होता है । स्वमुम्ब मे अपनी प्रशंसा करता अलवा अन्य की ओर से अपनी प्रशंसा सुनकर प्रमान होना उसका नाम है जघुता (तुच्छत्ति)। अपनी भूल का स्वीकार करने से तुम्हारी भूगों का प्रभाव को कर तुम स्वय गुणों का भगडार यन जाभागे। अपनी राइ नितन भूज को मरू क समान मानो। अपने एक दोप का मरो के सहस्त्र दोपों से भी अधिर भयर समझो। शुद्र से क्षुद्र प्राग्यो सरीखा में भी दोप पाम हूँ ऐसी मान्यता अपने निपय में रक्सो । भृक्ष को स्वीकृत करने की वृत्ति बुहारी (सावरगी) के तमान है । बुहारी पचर को निकाजती है और मकान को स्वच्छ रखती है। प्रत भूलक स्वीकारने में लघुता नहीं, किन्तु भात्मा की पपिता की समझनी चाहिये । निरभिमान वृत्ति रिमी पर अपना सामिल नहीं रसती । सुद को छोटे से छोटा मानने मे शर्म नहीं है, किन्तु सच्चा सम्मान है। अपनी भूल स्वीकार कर लघुता का स्वीकार परन में धडा गौरव है । अधुता करना फर्मों से मधु (हल्क) हान ५ समान है, मोक्षमाग समान है और गुरुता इच्छना कर्मों से गुरु (भारी) होर भन त ससार बढाने तुल्य है ( शहर और रत मिली हुई होने पर भी चिटी शहर का स्वाद ले सकती है, पर हाथी स्वाद नहीं ले सकता । वैस मधुत्ति (नाघरवा) सत्य तत्त्व प्राप्त कर सकती है, तच प्रहय पर सस्ती है। पर की जघुता और स्म की गुस्ता कहने की भूल करने वाली जिन्हा न हो तो भी उत्तम है। नितम शिष्य हाने की योग्यता नहीं वह गुरु होने

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(४२) योग्यता प्रायश्या है । प्रमरय मेरा से सेवा लेने वाले से प्र सख्य यादमियों को सेवा देने वाला पडा है। अधिकार की याकांक्षा सब से बड़ा शत्रु है। मान, पूजा की इच्छा दूसरों मस्तक पर पैर रखकर चलने १ ममान है। मान, पूपा, सत्कार- सम्मान प्राप्त करने की लालसा जमा घाट का अन्य कोड च्यापार नहीं है । पर लघुता और स्य-गुरुता करने वालों का जीवन मुद समान सचहान है। ४-निन्दा और निन्दक। निन्दा करना पीठ का मांस खाने बराबर है, ऐसा शास्त्रकारों ने फरमाया है। योरोप में निदा निधक सभा स्थापित हो रई है। निदा करने वाला जीरन्त मनुष्य का मोह मांस भक्ष राक्षस है, सब से बड़ा पापी है । सतार शास्त्र में "पिट्ठी मस पाएजा" (पीठ का मांस नहीं माना ) ऐसा फरमान है। रजी में भी निदा पो Bach bite (पीठ का मांस गाना) वैमा तिरस्कृत शद प्रयोग किया है। यात्म निन्ा करना पवित्र का है-प्रायश्चित का घोतक है, प्रात्म-शुद्धि करने वाला है दूसरे से अपनी निन्दा सुनकर समभान रखना विशेषतम पनि कार्य है। किसी के सामने ऐसी बात न करें कि जो बात उस सम- न कही जा सर पर नि कधपनी ही निदा करता है। निद को निन्दा करने में कुछ मिनट लगती है, किन्तु सुनने वाले (निसकी नि दा की जाती है ) वी तक दिज दुपता है। इस भधिन भयकर पाप और क्या हो सकता है ? दानी दूसरे कृपणा की या क्षमा शील दूसर शोध की निदा कर वह पा कृपणता व मोघ से मविक है! और उसके दान नपा क्षमा प

नसा है। निदा करना प्रामको पान.
नो नारा परना है। मीनिदान मुदमी
सा जाहिराना है 1 Rat (मगानी) पर
निन्दा रनाहै। मिदानानेदय पगन्नको निन्दा र
जमाना है। निता गुमाया और दरन वाय
में माना जातीय मन्तिारा भगवाय
पदा दिपा और रक्षा प्रारमिये निता की जाना
निरमाग में TAIT जमना है और म्य
को किमी की निशा करन',
उन दान
धमपदान हुने परापर है।
रात्रि मी दिनमी पाप मरदी जितनी गर्मी व गर्मी
जितनी दी या रकमेनिस भी HIR निना
जी कारक है।
पन fireleोभायादद, क्योंरि भाभपना भयनef
रमन उसगापामय ये करत अपनी माती
की परया किये बिना आप विण्य पाप (दु) को
नक शिये मयत है। दो मनुष्य तुमको धिकारत हो, हा
म पूर्वक वा भौर उन उपकारी पुरा (fitकों की कल्याए
कारी मदर द्वारा अपने ईमाया को भगान लिये वे सिनी
भार माष म मदने (मममाघ सस्य fiदा सुनो)finा
भाभार मानो या कि यह तुमको अपन भाग-गुणाय दर्शन
सन माय मायना दिपजाता है। जिसमें प्रपन भाप दार
रमात्म मुधार किया जा माना है। कोई तुम्हारी निदा फरक
बमानदाता समापो परम माम्यशाशी समझो कि बिना
रिधम में उसर मुया सहाय या। पदमाग सन मन

।
(१)
और धन का भोग दर अन्य पात्रों को प्रायोका परारभार
परत है तो यह निदा भाइभापकी निंदा परम प्रसोता है।
मत उमरी प्रसन्नता य लिये भरनी निंदा सुन सेने की भारता
य सविधाना रसना चाहिय ।
ििदर की निश को आप माना समगा यह निझा करेगा,
अन्यथा किम पास शिरगा? यदिर को गालीकोन दवा
है? अन्ध ५ पास पुया कौन करता है? अधिक टु दया।
अधिक रोग पा नाश करती है। यम प्रति दुष्ट प्रति याला मा
पका भधिक हित परगा। तब उसका मकार करें। सि
हमार झिये सर्चमाइन समान उपकारक हैदोषों की पटान से 21
राती हुई जीवन नौका को बचाता है। निक र मय वार
हाती सो अपना विगप पतन हाता| अपकार हाते से पर में
चोर, पुत्ता आदि घुमते हैं, और प्रकाश हाने पर सप भग जात है,
इसी तरह निदक को राशनीष भय से दारूप पोर कुत्ते भग
जाते हैं। सुवया को रिशुद्धिय जिय जैस तेजाम है, वैस भारम
शुद्धि जिय निंदर है । पिसी में निन्दायुए या अपमानित कर
मुन कर अप्रसान दाना टेनोफोन द्वारा भशुम समाचार सुनकर
टलीफोन को तोडना ही है। राी गर्मी और धपा लिये किसी
परोध नहीं किया जाता है, पैस निन्दप निन्दायुक्त प्रतिज
शब्दों पर प्रोध न होना चाहिये। स्वयं अपना शरीर मी इमारी
इच्छानुसार नहीं चलना तो मन्य किस पर हमारा अधिकार हो
सकता है कि हमार लिय रूचिकर योले यानि निदा प्रनि
मनाने से कोई सुधार न होगा, माग समभाव ररने में ही श्रेय
और सुस है।
-

६-चन्दक।
अनुराणियों की अपना टीकाकारा से विशेष प्राम मिलता
का भी शत्रुस अपनी रक्षा ही इस्ना पितु मित्रों में
भानी पान न हो और रक्षा हो मा द्धता है । शामपना
योड़ा ममय यिगाटना है, अप कि मित्र वर्ग प्रशमा करप अधिक
समय सराव करता है। और भारमाको पात मी यिशप प्रमाणा
में करता है। निन्दौर प्रशंसक दोनों हमारी में धून
फैकते हैं । निन्दक को भूत मिर्ध जैसी है जाशीघ्र सावपान करती
है और प्रशमककी धून मुषण की मिट्टी ममान है, मुग्गर का प्रहार
माय का अधिक लगता है और सम भारत को अधिक उम्सा
होता है। नएय मारमा रशिय निन्दक से प्रशमक अधिक पातर
है। शास्त्रकारी ने अपमान परिषद र विजेता को देश विजयी
माना है और मान परिपहर दिनेता को सम्र्य विजयी माना
पनि नाक प्रसंगों में सममायरसना इतनामुश्किल नहीं नितना
कि मान, पूजा और प्रशंसा प योग में । से प्रसगा में सम
भाव का सयम रख सर वही पूगा विजयी है।

हैं. ६-कर्तव्य प्रकाश वित्र यो समस्न ६ पन मानसूम रिधारी प्रत्य- स्वरूप है, मनुष्य की अश्य-महाशक्तिप सप ध्यछ स्थान हैं। यन, शस्त्र स्मर, शहर प्रादि दृश्यमान पदाथ मानर की इन्द्राशक्तिप व्यर यरूप पर्दयधीर कर्म है। जीया शृभामुम सप प्रवृत्तिया राम कम और शुभ में हैं। कुदरत व मामाज्य में उन माध्यता रहता है। मुरऔर दुपपन काय द्वारा निर्मापन मिरवान है। मिशान तौर पर दोनों का सतार करना चाहिय । कभी जागृति न रही सा यह सुख वैमा और विशामम गिर कर पतन पाता है। अपना प्राचीन इतिहाम दग्न तो मदापुरप सुर मम्पति और स्तुति की अपेक्षा दुस विपत्ति और निदा (कसौग) मे दी जानी, प्रमा- वशील और प्रगतिशील यने हैं। समानुसार स्त्रमार, स्वमायायुमार इच्छा मोर इच्छानुसार प्रयत्ति होती है। धनमान समस्त जीयर्या का स्यरूप राजा कि, सुग्गी दुग्गी, चिंग और हाथी, मादि घोरासी लक्ष जीयायोनी का स्वरूप यह जीवा की अने। अमों की इनद्वार्धा का मुने स्वरूप है । अधम और भरतारी पुरुष भी पने पूध जमों की इन्छाओं का मूत स्वरूप है। सत्र का इनानुसार स्वरूप प्राप्त होता है । भूतकालीन इशाओं प स्थरूप वर्तमान में भौर परमान पालीन इनाना य सरूप भविध्या में मूनस्वरूप धारण करत है । जीर सय अपना रिस्मा और विधाता है, जैसा बनना चाई धन सरना है। यतमान पइ अनिष्ट संयागीय गिय इपा सेद, दुस प्रकट करना व्यर्थ है क्यायि भूतकाज तो भूत सा है, (४७) यह हायको पाइम नहीं धासमना मात्र भावी जीवन रचना अपने अधिकार में है। स्वर्गीय, नारकीय, पाशमि और मानुपिक, इनमें से ना जीवन प्रिय हो उसे घनाव और वही स्थान प्राप्त कर । उपरोक्त रचनाओं में से निस को जो पसद हो मी रचना के लिये प्रहा- रात्र विश्रात परिश्रम कर । पजन अपनी को हुई रचना प्राप्त हाती है । अपनी इन्द्रा विरुद्ध मनुष्य को कुछ नहीं मिषता इसलिये प्रत्येक कम करने पे पहिले कर्म-प्रकर्म, कतव्य, अनि य इछनीय भनिन्दनीय का विचार करें और उचित प्राचरया कर। कम करना अपनी मानसिक शक्ति का प्राकय करना ही ह। सभी कर्मों क हतु हात है । यिना हतु कम नहीं हो सकता । यतमान में मनुष्य मान-पूजा व धन य हतु ही कम किया करत हैं। पाश्चात्यों की गणनानुसार १५० करोड़ मनुष्यों की साया है, उनमें १५ करोड आकृतियाँ ही भिन२६, वैसे ही उनकी इच्छाए भी भिन्न २ है । १५०करोद में से ममान आनति बाल दो पुरुप या दास्त्रियों का मिलना (समान हाना) मुश्किल है।भारतिम साधारणा समानना शायद होगी, परतु इन्छाओं में ता आकाश पाताल का भतर रहता है। भारतीय मनुष्य कीर्ति र जिये कम परत है उसी तरह चीनी मनुष्य भी। किन्तु दोगों का प्राशय में महान् अतर है। चीन मनुष्य अपनी मृत्यु पादहोनवाली कीर्ति व जिय शुभ फर्म करते हैं, उन लोगों में मृत्यु ष याद सम्माननीय पदवियाँ दी जातो हैं । यहाँ की भपक्षा यह प्रणालि अन्छी है । वतमान में कई जोग राय यहादुर दिवान यहादुर,रायसाहब प्रानि पदपियाँ प्राप्त करन के लिये अनेक सच्चे मूठे प्रयन या रपट करते हैं । और उस मिलने से हय और न मिलने से सेद का परिताप सहन करते हैं। जप चीन देश में पुष ५ अन्छे कार्यों की पदवी मृत (४९) पिता, पितामहादि को मिलती है और मृत पूयमों प म प्रकार १ सम्मान में चीनी लोग प्रसान होत हैं और अपने पूर्व के ऋण से मुक्त होने का व प्रयत्न करते हैं। पद लोग तो जाम होते ही अपनी का योधना प्रारम्म कर दते हैं और शिजी सम्पत्ति का अधिकांश असम सचते है। जीयन पर्यत का पनाया करत है। यही कम से घडी महत्ता मानी जाती है। जिसमे कि मृत्यु समुम्ब रह और पाप काय से मन शकाशीन रहन पावें । इसके पनाय भारत में अपने मोगायिनास प लिये बड़ी २ महलात, याग यगीचे प्रादि बनाये जाते हैं इनक पनाने वालों का ध्येय मानीवन विजाम ही रहता है । इस प्रकार मनुष्यों की प्राकृति की भिन्नता साथ ही साथ उनकी प्रवृशिया में भी भिन्नता का अनुभर होता है। पई लोग पसत्य अनीति एप प्रयायमय पेशा परक टन पापों को धोने के लिये दान करते हैं यह दान नहीं कि तु गाई है। जिस प्रकार कोई चोर चोरी फरफ उस अपराध से बने 4 जिय सिपाही को धूस (रिश्वत) दता, इसी प्रकार यह मीशुभ फर्मकोधूस दने समान है। भवन तो भारत म दान की प्रथा ही कम है, उस में भी पतमान म ता सिफ मान समा74 तु ही दान दिया लाता है। पाता दान लेने पाले ५ पैरों में पड़े और सोचे, मेरे सद्भाग्य है कि भाप सरीखे पान प योग से मरी लक्ष्मी गगा पावन होती है, भयया दुर्गंधमय हो जाती । कृपा करके फिर इम सेरक को पाषन करें | भाजपल तो सोरुपयेका दान देकर मार रुपये व मानकी इच्छा करते हैं । लास का दान करना सुलभ है, किन्तु उससे प्राप्त मान का दाा दना परम दुर्लभ है। दान में दन का नहीं है मगर पडेसे बडी लूट (प्राप्ति) है। निस प्रकार किसान जमीन में पान्य को योत हैं सो जमीन को दान नहीं देते हैं मगर उसको लूटन हैं। मिट्टी, पानी कदम व सात से भरी हुई जमीन में बौन योने से उस फल स्वरूप एक पे स्थान पर सैकड़ों धीज मिजत है, तो फिर मानव समाज प उद्धारार्थ मानव भूमि में दान क योन पोन से चोन यालों का कितना इजभ्य लाभ होता होगा? स्वान्नी कुभ में जर मरा हुमा कुम्भ पानी डालता है, तय यह अपनी गर्दन को अहाता है । वृक्ष भी पन प्राप्ति होने पर नीच मुक्त हैं। उसी प्रकार दाता को भी दान लेने धाल का सम्मान करफ म्बुद द्वारार्थ दान देना चाहिये । दान लेने वाला ऋगी नहीं, मगर दने वाक्षा प्राणी है। लेने वाले प प्रताप से ही इसकी लक्ष्मी का अच्छे से अच्छा उपयोग होता है । कर्म कतव्य के लिये ही करना उत्तम है । स्वग, सुप या मत्ता की लालसा को छोड कर जो पांच मिनट के लिये ही सत्काय कर सकता है, उसमें पात्मिक गुणों का विकास करने की सत्ता बीज रूप से रही है । किमी प्रकार की इच्छा फाल की पाशा-रक्से मिना सत्काय करना ही पात्म मयम की शक्ति का उच्चतम स्वरूप है। बाहर भनेक व्यापारों की अपेक्षा प्रारम सयम बहुत ही उच्च शक्ति है। शुभ कार्य के कल की स्वार्थी भावना निर्मूल हाने से मनुष्य विश्व भर में प्रचगड शक्तिशाली बन जाता है । फलाशा की स्वार्थमय दृष्टि न रख कर स्वरसमान मय विशाल दृष्टि रक्यो । शत्रु है या मिन यह पिचार किये-निना उन य के लिये तत्पर रहो । अमद भाव से पक्ष की भाशा विना शुभ काय करना प्रसिधारा सम फठिन व्रत है। यही प्रसिधारा व्रत प्रगति के पथ में आगे बढ़ा सकता है। अपने बच्चे प्रति यरुणा, प्रेम और स्नह घताने यानी दिल्ली दयामूर्ति या प्रेम योगण पन नहीं सकती। उसे अपन जीवन में मिचिन्मान सफलता भी नहीं मिल सक्ती ! यह प्राणीमात्र पे

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प्रति अपने बच्चे जैसा मातृभान रवयें तो दयामाता हो सो
उस का जीवन सफल हो। इमी प्रसार मनुष्य अपने घुटुम्ब,
सजन, स्नेहि फ साब स्नेह भार रसम्वे और इसी से यदि म
को दयावतार माना जाय तो अपने बच्चे पर दया करने
बिल्ली को भी दयावतार मानना चाहिए। शत्रु तथा मित्र
अभेद भाव से सेवा करन थाला हा शुभ कर्तव्य करना है,
ममझना चाहिए।
अपने पास मांगने वाला भिक्षुक हमारी उपकार बुद्धिज
फरक हमें ग्यी बनाता है । भिक्षुक हमका उपकार करने
अवसर देता है प्रत उमका प्रामार मानना चाहिए न कि 3
श्राभार मनाना या यशोगान कराना । इसम शोभान है। मि.
द्वारा दातृत्व बुद्धि रूपी सौभाग्य प जिए कृताथ समझ मि
की भिक्षा याचना मात्र थीमन्तो र उद्धार प लिए सपकारक
तो अनाथ, दया पात्र और ज्ञानपिपासुनों क लिए साधन सम
परना श्रीमन्ता के लिए कितना मदुपकारक है ? इस बात
विचार करपे थीमा को अपना फतव्य में प्राम्ट होना चाहि
हमने परोपकार किया, ऐसा विचार भी प्रकार
पोषक ई । परापार वृत्ति बढ़ने पर सहभाय का नाश होता है
जगल मे लगोद मात्र रकफर रहने वाला भी प्रवृत्ति रक्स:
वह त्यागी नहीं, ससारी है । और अनासक्त भाधना पाले मर
जैसे चस्पति सिंहासनाढ होत हुए भी त्यागी है।
पवित्र विचार करना विश्व म अमृत पैमाना है और अपवित्र
विचार करना विश्व में विप पैलाना है । दूसरों को सहाय्य कर
याला खुद को दी सहाय्य करता है, दूसरों को नहीं। ऐसा करके

यह मुरका सुशिक्षित और सरकारी पनाता है। मान यह एक स(पाठ) सिम तो भी बात है। भन्दै पाँप बदल में ज्य एम शुम काय स्यमायिक होत ऐमी भाषा का फल को भाग रहित युद्धि एक अमोध शस्त्र है । इमीस तान पा भारा होता है और उसका पूर्व मानन्द सय भोग सकता है। भावी पृतादि वास्तु शानभाती है परंतु मीम मकर मरना है येस ही मनुष्य पिय विमाम का भानन्द लून्त उसी म पंस धान है और दूसरों प दया पात्र या हास्यास्पद दोन है। गय लेन और लिया गये, गय मोगन और मोगा गर, गय मानिक होन पर होगय गुलाम, गये कर्म करने पर कम रुप होगय, जीयाप मुग्म भागने गय और स्वयं भोग रूप होगये। इतना प्रत्य भय धान पर भी जो सायथा नहोउमे अपना भय पिनास प मापन पक्षान् बाहर दोन मुयम पन्ना जाना पड़ता है. इनना हा नहीं यमान उसे दूर किया जाता है। दाना उदारमा भौर सहिपाता प्ररम्परोग उमसेमात गुणा वैभव मिनगा । या आता भार महिना नहीं रपयें तो भी परत बनान् करायगी। सुरा विज्ञासपे साधा सदुपयोगमलगाय अन्यथा कुदरत गर्दन पर छातीपर बैठकर हडपपरगी। भान नभून करयुद्ध श्याने पोभिनिरक्षा मेरिधिमात्र छोड़ने में दुग्य १ परतु स्वाधीनता (म्येच्छा ) से सयम का त्याग में परम सुग्म और शांति है ।पमा कोई मानर नहीं है कि निसमा सबस्त्र कुर- रत ने कभी न दोना हो। निवना अधिक समय रिया होगा, उम अधिक सम्पत्ति को भन्न समय राजते नाही धि मोहनर । द

दोगा, निहाय! यह सप मर मे पाना जारहा,मरापुर
नही चामता, विवश हूँ । इस प्रन्यापार मामन पाल, प्रायना
पयार, आफन्दा मुनने यामा को ही मि शरीर को
जीराभर पुष्ट किया, रक्षा की शृंगार रिया, अपना दी मानकर
आत्म भान भूत र जिमा शिर पाप किये, पर भी उसर
(दगा) ६ रहा है । उदने अठन की शक्ति नहीं दी और शरीर
भार भूत मालूम होता है। मम्पत्ति परम विपत्ति सरश्मिनी है।
उस समय कनन्य पिमुग्पना आपा प्रत्याचार और पापों का
प्रकाश नजर माता पाप-पल पी पल्पना पर कम्पित
होता है, सर्वस्व का मोग दपर भी युद्ध ममय अधिक जीना था
हता है किंतु यह शरण, दया पात्र, अपामा पने जीवन
की यदी बचाने युदरत र साम्राज्य मन्य गति मगमन करता
है। इसे दसार स्नेटिजन दा मधु गिरात , ताना पीत है
फोइ मत कूदते हैं और पुत समय पार भूल जाते है पाद भी
नहीं करते और जसा माहीन था येसे उसका नाम निशालुन
दो जाता है।
शीघ्र योमोग ताशीव उगगा, यमे शीर दाग सो शीघ्र मि-
लेगा। अन्यथा मृत्यु समय जाममें 4मे पनीया सड़फडाट करना
व्यय होगा ।वी पुग्न परिवार धन और अधिभर के गरिरले सुराक
लिय मनुष्य अपने जीवन को भस्म बनाता है और मरममा वा
में उह जाता है।
रोग योग्य शरीर नको यहा तक शरीर में रोग प्रविष्ट नहीं
होते । दु सों को सामना यिना दिये दुरस पास में नहीं मा
सकते । मुदा हुये बिना कौर, गोधादि फाड सान नहीं पाते,
वैसे ही नीर भपने सुख दुख का क्ता हता है। विचारने पर
1

मालूम पडेगा, कि जीवन म नितनी ठोकर गात हैं उसकी पूर तयारी अपने से हुई थी ऐसा स्पष्ट प्रतीत हागा । इसस सिद्ध दाता है कि, याह्य जगत् हम पर सत्ता नहीं चला मकता, किंतु अतिर सत्य की सत्तानमार-धाज्ञानुमार याद्य जगत् प्रवतता है । शनी भतर सृष्टि पर सत्ता अधिकार अमाये तो रिश्त की कोई सत्ता हम पर नहीं चल सके। हम अपन दोष नहीं दपत, पर प्रत्यय दग्पत है। यदि हम स्वय दिपि हो तो ऐसे दूषित जग में हमारा जम ही क्यों है? जगत् में सब संतान है, तो तू भी संतान है। वरना तरा जम मैतानों में नहीं होता। दूसरों क दोप देखने की कायर (नीच) दृत्ति बाड फर दोष दसने की धीर वृत्ति से महावीर बने। हम ज्ञान की बात करते है, पर प्रसग भाने पर श द रूपी कार तोप के गोने की तरह हमें चमका देता है और ज्ञान को भगा दता है, इससे अधिक पामरता क्या हा स ? को भी मूर्य मनुष्य इमको प्रिय शन्द कहकर हमारी ज्ञान वृद्धि को वि. पृत यना सप राग द्वेष जगा सक, इससे बढकर अय पामरता क्या हा सर ? दिवार को मुष्टि प्रहार करने वाले को ही मार लगता है, रिवार का नहीं। ना क्या हम दिनार से भी अधिक जड है कि छोटे कार से हिल जाये विकृत होजाय ? हम चतन्य है मत चतन्य शक्ति को समझकर अपना कर्नत्य विचारना चाहिये घेतना जागृत हो। - निसस शुद्ध ससार-स्वरूप १-ससारासत जीवों की मनोदशा। कोई परोपकारी वद्य घर घर जाकर निरोगध यीमारों की नम्न (नाटी ) दपकर सा भाव से प्रमून्य दवाइयाँ दये वो जोग कहेंगे कि, चैा अपने धध की जाहिरात लिए फिर रहा है और वेद्य की दवाई पर विश्वास कम करते हैं। वैसे ही ज्ञानी परोपकारी पुरुपय स्थान २ पिचर करधर्मापनशदन को अज्ञानी जन स्वाय समझते है और उनका यचन उपदश का अनादर करते हैं। अँड (सूभर) ये पाम मया मिष्टान्न धरने पर भी यह उसका स्वीकार नहीं कर पाने मारने दौडता है। उस शंका होती है कि, यह मरा अमृत थाहार विश जन प्राया है। इसी तरह सप्तारी जीवों को विषय पाय प्रारम्भ परिप्रद (जो विष्टा से भी अत्यधिक मलीन है ) छोइ ने की इच्छा नहीं होगी। ऐसा साग का उपदश दने वालों का विरोध करते हैं । उनको सान, दर्शन परित दान शील तप भावनादि अमूत भोजन परोसने पर भी धन्हें चिप भोजन समझकर अनादर करत है। अज्ञानी थाल जीवा को ज्ञानी क य पर विश्वास नहीं भाता । श्रद्धा करता भी है तो अपने विषय कषाय तथा भारम्भ परिग्रह की रक्षा करणे वर्ग या मोक्ष मिलताही तो उस पर रिचारकरता है। ज्ञानी र पचनों को मुह में मिथ्या नहीं कहता, इता उसका उपकार समम । परन्तु पतन से तो ज्ञानी र पचन हलाहल विप हो ऐसी उपक्षा करना है।

- व्यारयान में अनेक तिपय आते हैं। निफ्यामक्त आता जम ध्यारयान थरण करता है और वक्ता ( ज्ञानी) जन धन की नि मारता परमात है उस वक्त उसे वमूली याद आती है । दान का उपदश सुनते समय लैना याद आता है। ब्रह्मचय का उपदेश मुनते समय अपना या पुर पुनी जग्न याद अात हैं । उप उपदश श्रवण फसमय जीमणवार याद प्राता है। पवित्र मावना का पदेश सुनत समय कचहरी के दाय पच याद भाते हैं। इस प्रकार उपदश का असर किंचित् मान नहीं होता। भर हुरा घडे में पानी भरा नाय तो ऊपर से चला जाता है, वैसे ही विषय कपाय से भरे हुए हृदय पर स उपदश बह जाता है कोई असर नहीं होता। उसमें यात्म कल्याण के तत्व कैसे ठहरे ? धम तत्व में भी विषय कपाय के तत्व मिला कर विषमय बनाया जाता है। सर्वस्व त्याग कर भीजो धर्मोपदेश सुनता है, वह सुसाध्य रोगी है । अनुफलता होने पर धर्मापदश सुनना है, यह कष्ट साध्यरोगी है और ना मात्र लोक व्यवहार के लिए ही उपदेश मुनता है वह घसाध्य रोगा है। मीठाह साते २ जैसे चटणी नीम्बू मिर्च, दान शाक आदि साने की इच्छा हो जाती है, वैसे ही धर्मोपदेश मुनते २ विषय- वासना प्रति जी का चित्त चना जाता है। जैसे गगन विहारी चीन की रष्टि जमीन पर फ सडे मांस पर ही होती है जैसे धर्मा पदश रूपी गगन विहार करने पर भी विषयासक्त जीनों की दृष्टि विषय रूप सड़े मांस की ओर जगी रहती है। अपथ्य पर प्रेम करने वालों को औषधि फायदा नहीं करती, वैसे ही विषय पाय पे प्रमी जीरों को जिनवाणी नहीं रुचती जैसे चोर सिपाही के समक्ष माहूकार जैसा अच्छा यतार करता है और सिपाही प्रभाव में पुन चोरी कर भाग जाने का विचारता है, येसे ही अज्ञानी नीष घमशान में धार्मिकता की सभ्यता रखता है और धर्म श्रवण ५ पाद धर्म स्थान छोडत ही पुन रिपय पाय में दौड चूप करता है। रोगादि समय में धर्म भारना का विचार करता है और रोगादिप प्रभार म पुन विषय पाय में लीन होता है। मनुष्य अपने जीवन रूप तन मे सदा गुण या दोप भरत रहते हैं। बाजारू पीने सरीदने के लिये जैसे धन की आवश्य- कता है, वैसे ही ससार में सुख दुस रूपी सौदा के लिए पुन्य पाप रूपी धन की पारश्यकता है। धर्म के शरण निना भारमा क्षुद्र भिक्षुक है। विषय कपाय युक्त भिक्षुक वात्मा का उदर पड़ा है मनस काल से उसमें विषय भोग भरने पर भी यह नहीं भरता है। विषय कपाय पं योग से प्रात्मा बुद्धि हीन बनी है। अनन्त काल पविषय भोग क धनक विध दुस भोगने पर भी सुस के लिये लेश मात्र विचार करता नहीं है । मन वचन काया के शुभ योग धर्म एवं धन फ लुटेरे हैं तथापि उनका माऊ पुत्रवत् भादर क्यिा जाता है। स्त्री, पुनधनादिशात्मा क अनादिकाल फेयधन है,लपि उहे मुक्ति ५ कारण मानकर उन पर स्नेह किया जाता है। ऐसी मनोदशा कारण मंसारी जी अन त काल से अनन्त ससार में भवनमण करते हैं।

(५७)
२-दोष दृष्टि
स्मिा के स्वभाव र बीच मनहां पडना चाहिय। अपना
स्वभाव बदलन म स्वय समर्थ होते है, दूसर सभी चाह क्तिन ।
नानी हो असमर्थ है | तो हम किसी का प्रभाव पदलन वाल
कौन है ? किसी का दाप दग्बना अनधिकार चटा है। कटक करक
म ही निकल सकता है, वैसे दाषीक दोप देसने में हम स्वय
दापित होग तभी दोपका कांटा दस सफग। निर्धन और रोगी
का निरस्कार नहीं किया जाता, वैसे ही गुण हीन और दोपी का
भी निरस्कार नहीं करना चान्यि। किमी की टीका या निन्दा
रय उसको सुधार ने की श्राशा कीचड स कीचडधोने समान है।
कोइ वृक्ष मीठे फल दत है और कोई कडुय-तदपि निदा या
टोका नहीं की जाती, क्या दिय प्रकृति र प्राधीन है। वैस हा
मानर अपनी प्रकृति के आधीन है तो दोप किनर देग' सय
अपने सभावाधीन है वह यथा सहा सक ? फाल लेते समय
उसफ द्विभर, गुटजी प्राति भी साथ लेना पडता है, इसी
तरह मानन क दोप रूप दिला गुटली की उपक्षा करव
उसमें द्विपे हुए गुण रूप फल को ग्रहण करना चाहिए । टोपी
कदाप नहीं दग्यत दोष रूप फल उत्पाद उपादान चीप
दयना चाहिए। अपने दाप प्रयम्य और पर दोपथम्य समझना
चाहि माय का दोपए पतरने से पुन यह =ष्टि गोचर
नहीं होता । दोष दृष्टि अपनी ही तुच्छता है । दोषी प्रति माता
पुषवन् प्रेम रखना चाहिए ! दाप दृष्टि रामा आज दूसरों के दोष
दराता है, कल मित्र स्नेहियों के दोष दसगा और स्मश यह
भादन बहारें आतत उसे प्रसिज विश्व दोपित निवेगा है। दोप

(५८) फ कटक इघि से दूर किये जाय तो विश्व नन्दनन दिखेगा और दोपछि कदर से शाल्मली वृक्ष । शिष्टाफ पान से निष्ठा और अमृत क पा से अमृत मरता है। बस दोपी की दृष्टि से दोष और गुणी की इष्टि से गुग्ण प्रतित होत । मनुष्य किसी का दोप दूसर को कहता है। दूसरा तीसरे को, तीमरा चौथ को चौथा पांचवे को, यो परम्परा चढती जाती है धौर मिन्दुका सिन्धु होता है। दोप दर्शो क्रमश जिन्दु विषको सिन्धु घना कर निश्व म विप के परमाणु फैलाता है और गुगा दर्शी विश्व में अमृत परमाणु फैलाता है। विश्व में सुप का उपा दान गुण -ष्टि तथा दुप का उपादान दोप दृष्टि ही है । मनुष्य को अपने हृदय का दोष दृष्टि रूप पौधा उसाड फेक्ना चाहिये जिसस गुण -ष्टि का पौधा पढ समगा। मजह प्रिय पुन का पक्ष लने वाला पिता उसा अहित करता है । वसे अपना दोप नहीं निकालते दूसर का दोप निकालने वाला अपना अहित करता है । हम म जहाँ ता सम दोष हो, यहाँ तक हमको भपना पक्ष नहीं करना चाहिये । दोप -ष्टि हिंसक प्रष्टि है और गुया ष्टि अहिंसक दृष्टि है । दोष दृष्टि गये बिना, दया तथा हिंसा का पालन नहीं हा सकता । यह मानव दया पालने में असमर्थ है । एसा अपात्र अन्य स्थापर तथा प्रस जीवों की दया पैसे पाल सक्ता है ? भार्य की दृष्टि मांस व दारू से नारत करनी है तो परदोष दर्शन में क्यों नफरत न करें? दोष दृष्टि वाले का जीवन विघ्नों की माला है। प्रेम स गुग्ण दृष्टि और दोष से द्वप दृष्टि उत्पन्न हाती है । दोष दृष्टि म सकुचितता भारीपन है। भारी वस्तु का स्वभाव नीचे जाने का है । गुग्ण दृष्टि में उदारता अर्थात् हलमापन है । उसका स्वमार उची गति में जान का है। दोप रष्टि का जम स्वाथ म स हाता है । वह आत्मा या महान स्वरूप का विस्मरण घराता है। दोप दृष्टि से इ, वैर, निराच, निंदा और अन्य पाप मय भावनामा का जन्म होता है। शेष दृष्टि वाला परदाप दर्शन रूप पड़ का चीन लेकर अपने में वट वृक्ष मनाने की क्रिया करता है । किसी का झूठा आहार नहीं साया जाता, तो उसम अनन्त मीन मायना का दोप रूप आहार आत्म प्रदश में किस प्रकार पच या जाय? इम पग्दो सहिष्णु हाना चाहिये । परदाप जैसे सामान्य तत्व को जो नहीं मह सक्ता, वह शरीर की भयकर बदना समभाव से यस सह सके १ सय ५ उयल पहलू दयो । काला पहलू दखने यनिय अधर म जाना पड़ेगा। भुट (सुमर ) की दृष्टि नन्दन पन में भी विष्टा दुरती है पैस दोपदार, परमात्म स्वरूप मानव मसार पन दन वन में अनन्त रमणीय मतुप्या में से भी दोप दराने की बुद्धि रग्यता है। परधन छिपान वामा चोर है तो पर गुग्ण रूप धन छिपाने वाला दोष दर्शी, महा चोर है। मड़े हुए खून को पीने वाली जोक से भी दोष दर्शी प्रथमतम है। क्योंकि यह अनन्त दुर्गंध-मन त मजीन दोष रूप रस पीता है । क्सिी प दोष दयना धमाधम कर्तव्य है । पर दोपन सहना बड़ी दरिद्रता, निधनता और दीन दशा है। और दोप सहकर गुग्य दृष्टि रचना सच्चि श्रीमन्वाई है। शरीर प जरम की मनुष्य प्रेम से सेवा करता है तो दोपी मनुष्य क्या जरम से भी अधिक घृणास्पद है कि, उसकी सेवा नहीं परये तिरस्कार किया जाय? जग्म को प्रराम होने सकप्रेम पूर्वक सेवा की जाती है, वैसे ही दापी, गुणी न बने वहां तक उसकी प्रेम पूर्वक सेवा करना चाहिये । मनुप्य पदोप नहीं । दग्पत उसकी अन त शनि धारक पतन्य गत्मा को दग्गो । दूसर का राई मितना दोप मस्सम और अपना मरु जितना दोष राह मममा जाता है, इससे अधिक पात्रता और पामरा भय क्या होसकती है। किसी का हाप दसना अपने में दोपों को निमन्त्रण दना है । दूसर के लिये जैसे तुच्छ विचार हम करत हैं इसका प्रतिपान स्वरूप हम दूसर को अपन जिय हलका विचार परने की प्रेरणा करते हैं । एमा एक भी मनुष्य मश की दृष्टि में नहीं है जो कि भन त गुग्ण शक्ति का धारक न हो । परदोष देखन हमारी भाग वाय नमी बडी बनती है और स्वदोष दसने क जिये मासी जैसी छोटी | मदाय दयनक जिय खुर्दयिन रखना चाहिये और परताप दराने प जिय दुर्थिन । स्वदोष दर्शक को परदोष दसन ममय नहीं मिलता । नाम परदोष दग्यता है और मर्द वीर महावीर अपने ही दोष दम्पत हैं । मैतान छिद्र टुटता है और सज्जन विद्र टोकता है। दोष शी सूई का काम (छेद ) करता है और गुगदी उसम गुण रूप धागा पिरोकर उस द्विद्र को ढक दता है। मानव शरीर म रही हुइ नाप दृष्टि की पाशता दूर करें। दोष वृत्ति की पा का नाश कर गुण इष्टि की मानवा भात्मा की माइक जिय प्रकटाना चाहिय। घर में कुत्ता, दिल्ली जैसे पशू को भी नदी थुमन दत, ना मात्मा में दोष दृष्टि रूप भयकर पभों का क्यों घुमाय जाय १ द्रव्य पशु का इतना तिरसार रिया जाता है तामात्मा में उत्सान होने वाली भार पशुता का मरदा त्याग करना चाहिए। किमा दोष दररने पहल रिचारना चाहिए कि हममी किमी भज्ञान भाम्या में फेम या हम स्यय इससे विशेप दोषीथा अपने सविस का नहीं मोशन हुआ परमात्म पद कार से तोजना चाहिए। हमारी दोपष्टि हमम तथा अन्य में दोप उत्पन्न करती है। दाप निन्दा, इपा, वैर और दोष दृष्टि माना का जाति स्व भाव नहीं होने से वे जीवन में अनेक विध विष उत्पन कर रोगी धनात हैं । 'पर सो भर याय से दोप दी अपना पतन करता है। दोप दी ए राक्षसी विचार दूसरे से भी राक्षसी परमाणु माकर अपने में भरता है और गुण दी शांति के सन्दश म इसर प शांति के शुभ परमाणु अपने में भरता है । दोष दर्शी को दुगुणा नुकशान सहना पडता है। अपने में उत्पन्न हुए अशुभ पर माणु और दूसर से प्राय हुए अशुभ परमाणु, इस प्रकार दुगुण शुभ परमाणु दूसर 4 महित से हमारा दुगुया अहित करना है। “यायगर (धूल शोधक) धूम में से भी सोना द्रूगढता है, तो उमे मिलता है। वैसे ही मनुष्य जो अनात ज्ञान और गुण शक्ति का धारक है उससे नितन गुण ग्रहण करना चाहे ने सस्त हैं । पान अपनी पावनानुमार योग्य स्थान लेता है। दोपी दापों को और गुणी गुण को ग्रहण करत है। ३-ससार शराय बाना ससार प मदिरा मन्दिर में पार इद्रियों और रिपय कपार्यों को पोषण मिलता है। इस नशे में ससारी जीव मदोन्मत दिसते है। स्तिनेक स्थावर (द्रिय) जीर उस नगे में इतने बेभान है कि किसी प्रकार की प्रवृत्ति नहीं कर सस्ते न काया को हिना वइंद्रिय वाले जीव दिन भर ठाम ठोस कर शराय पिया करत ह और अहो रात्रि दौड धूप करते हैं। व उस मद प नशे म 7 मुघ सस्ते हैं, न देख सकते है, न सुन सकते हैं, न विचार सकते हैं। तीन इद्रिय वाले जीप दास की गध लिया करते हैं। चार इद्रिय याले गध लेत और मदिरा मदिर दयते रहत हैं । इसीलिये घूमत हैं, उडत हैं । पांच इद्रिय वाल जीव पायां इद्रियों से मदिरा सेवन करते है और इतने मस्त हैं कि उनके मन मर गये है। (प्रमशी- पचेन्द्रिय } नारकीय जीव नरो में मात होकर परस्पर लडत है, झघड़त है, छेदन, मदन प्रादि विविध पदना सहते हैं। पशु पक्षी दारू के नशे में अपन हिता हित का विचार नहीं कर मक्ते तथा माता, यदिर, पुत्री के साथ व्यभिचार करत किंक्ति मात्र जत्तित नहा हात । मुंह से चीत्कार करते रहते हैं, जल में गोता लगात रहते ह, याकाश में उड़त हैं, परस्पर मड झघड कर प्रत्य त पठिन कष्ट भोगत है। कई मनुष्य भराय पे नश में भान भूज पर पड़ रहे हैं, जमीन पर लौटते रहत हैं। मज मूत्र, लोहू, राद, हाड़ मांस प थात पित्त फ ादि अशुचि में पड़े रहने में आनद मानने हैं, उसी का भोजन करते है उसी का पान फरत है, ऐसे असत्य मानव है जिसको समूनिम मनुष्य कहते है। मात्र भल्प सरयक मनुष्य ही एसे हैं जो शराब के नशे में नाचते पदते हैं, सिप खिलार सते हैं, गात है, नशे में बड़े २ भाषण करते हैं, निरर्थक धूमन फिरते हैं। लोहू राद, हाड मांस, मल मूत्र पुतले पुतली परस्पर चाटते हैं, स्पर्शत , आलिंगते हैं, थूक भरे मुँह से ईंधन करते है, भास, नाक, कान को चाटते हैं, मांस के टुकड़े को अमृत समझ कर चाटते हैं ग्रहया करत हैं। समझदार को शर्म जना वतीय करते हैं ! असन्य, चोरी, व्यभि पार, रिपय-पाय मय १२ पाप मय प्रवृत्ति करते हैं। नीचाति नीच प्रवृत्ति करने में अग्नित नहीं हात हैं। राम पुरुपा द्वारा पकड जाते हैं दंडित हाते हैं, सना पाते हैं तथापि नशे से दूर नहीं होता है। पुन चार प्रसार फजीर है, जो देव कहे जाते हैं। वे विचित्र प्रकार से नशे में चूपचूर हैं। व नशे में अपनी प्रसि भी मदत नहीं ६ नमीन से उंचे धनते है सारे दिन गान तान नाटक चेक करते रहते हैं, नाचते हैं, दते हैं, हमते हैं, रोत हैं, नशे में चकचूर मदिरा में मस्त होकर पारस्परिक ईवद्वेप करत हैं। स्विनेक महापुरुष शराय रागना (संसार) में रहते हुए भी लशमात्र शगय न पीत है, न सूघते है, न आवाज सुनते हैं, न स्पर्श भी करते हैं और सर्वथा ससारी प्रवृत्ति रहित हैं, ये साधु- मुनिराज भादि महापुरुष है । कई पुरुण ससार शराब पाने को छोड़ कर परम सुप मय निज स्थान में पहुंचे हैं, वे सिद्धात्मा । उक्त प्रम से जीव मद्य की मादक शक्ति बढ़ाता जाता है। ज्ञानी पुरुष परोपकार भावना से नशा न करने को समझाते हैं, किन्तु जिनक भा • में मय का नशा भरा है, य शानियों पे वचन का अनादर उपेक्षा तिरस्कार करते हैं। संसार मय शाला इतनी लम्बी चौड़ी है कि, उसका मादि और अन्त नहीं दीरमा । उसमें ससारी जीव मदोन्मत्त हो कर भटक रहे हैं और अनन्त दुग्म भोग रहदै । पुन्यशाली प्रारमा इम मय-शामा ये मोह से मुष होकर मोक्ष मदिर क लिए पैर उठात है। .

६४) ४-दुः प्रकार के जीव। ममार में छ प्रकार के जीर हैं। उन (मानना) का महापुरुषों ने राजा की उपमा दी है। इन नाम धमाधम, अधम निमध्यम, मयम, उत्तम और उत्तमोत्तम । अघमाधम राजा का स्मस्प- यह राजा ज्ञान पर भी परम भाग्य हीन है। उस अपने पद का कुछ भी भान नहीं है । परलोक की बातों से यह कोपा दूर है। धर्म का सदा विरोध करता है विषय कपाय रूप पिप का अकुर है। यह बहार विप वृक्ष होता है, दाप समूह का यह घर है उसमें से उतारता पराक्रम, धीरता, शांति आदि मद् गुण भग जात है। यह अपने मात्म तत्त्व को शुन्य समझता है। ऐसा रियल सच हीन राजा मानव भर की गद्दी पर बैठा है, वह पामर यह भी नहीं समझता है, कि उस राज्य मिलता है या नहीं। उसे निन यन की मालूम नदी है अपनी सम्पत्ति का भान नहीं है, आत्म स्वरूप को जानता नहीं है, चोर उसका राज्य लू टता है निसरा उसे भान नहीं है। वह अक्षानी चोर व दुश्मनों फो रिस्तदार, स्वामी, पडर मानता है। इससे चोर, लूटर हर्ष बधाइ मना रहे हैं और कहत है कि यह पड़ा दयालु राजा जिसने उमका मय राज्य इमं दिया है और हमार अधीन वर्तता तथा दर्शन चारित्र, दान, शील, तप आदि ग्नेहियों को भूल कर इमको परम स्नेहि समझता है। चार पाती कम चार राज्य क स सवा समझ जात है इदिय चोर धन लग्ने का रसासर जान प्रसन्न हो रहे है।

कपाय चोरों को डाका डालन की मौज मिलती है। नो पाय- लुरे लूट क भान दम लीन है। परियह रूप दुष्ट सताने का अच्छा अवसर दसकर खुश होत ह । अधमाधम गना फे राज्य में महा मोह का पहरा लग रहा है जिससे चारिग व धर्म के सेवकों को प्रवश ने नहीं दता। उसकी गन्ध भी लेने से सावधानी रसता है । मधमाधम राय नपुसक (सत्वहीन) है, उसक शरीर पर रिपय वासना के अनेक निध फोड फुन्सी निक्ल है पाप रूप मज से समस्त शरीर ढक गया है। राजा होने पर भी नौकर का और दास का दास है। नमक, मिर्च, घृत, गुड, शकर सोना, चांदी भादि यचकर अपना पेट भरता है। राज्य भ्रष्ट होजाने पर भी अपनी भ्रष्टता समझता नहीं है । सा राजा पट भ्रष्ट होकर भाटकी मे भरकता फिरता है। अधम राजा का स्वरूप- इहलौकिक भोगों म मासक्त, इस लोक में सब प्रकार की पूर्णता मानने वाला, परलोकपी यात को न मानने वाला परलोक विभुख, धम तत्त्वां से उदासीन,श द-रूप गध रस-स्पर्शादि पियों में मासक्त, दान शील तप भावनादि से उदासीन अधमराज है। वह विषय पाय प्रति स्नेह रसता है, विषय-कपाय की समस्त माताए उठाता है । इसे भी अपने राज्य का मान नहीं है । सम्यक ज्ञान नहीं है, परन्तु सत्ता रूप अल्पशि है । यह अधमराज विषय पाय प्रायल्य क कारण प्रायु पूर्ण कर नरक में जाता है। विमध्यम राजा (समदृष्टि ) का स्वरूप- इम राजा का विषय कपाय तथा महामोह से मन्द प्रेम होता है । तदुपरांत चारित्र वरफ भी उसकालस्य होता है । चारित्र रान प्रति उसका प्रेम । इस लोक के लिए विचार करता है वैसे । लोक के लिए भी। धर्माराधन के लिए मन से भाव रखता है। दान शील तपादि प्रति रचि है । धम सम्मुख होने के लिए दिन गत यत्न करता है, समार क भोगों को रोग तुल्य मानता है रोग मुक्त होने की भावना रागी की होती है, वैसे ही यह राजा अपने जीवन को ससार रूपी पदपाने से मुक्त करना चाहता है, यत्न परता है । कैदी यधा युक्त होना चाहता है वैसे ही यह रिमध्यराय ससारबंधन से मुक्त होने का प्रयत्न करता है। मध्यम राजा (क) का सस्प- यह राना भाव पूना घमाराधन करता है ससार में रहते हुए भी अपना लक्ष मोक्ष सम्मुस रखना है । विषय फटुक पज जानकर उससे घगने में नित्य प्रयत्न शील रहता है। यथाशक्ति धमाराधन करता है। मसार को प्रसार समम पर इसरत्याग की पहोरात्र भारना करता है। उत्तमराय ( मुनिराय ) का सम्प- यह राना अपने राज्य और सामर्थ्य को समझना है अपने गुण दोपों को समझता है । मोह क सेन्य को तथा विषय कपाय को मार भगाता है। समार का त्याग पर आत्मराज्य शासन मे लीन रहता है । मोह जाम को निखेर देता, विपय रूप घर को फोड देता है, राग द्वेष का पराभर करता है स्नह पाश को तोड़ दता है, प्राधाग्नि को शान्त करता है मान पर्वत को चूर देता है, मान वेली को उसाद देता है और लोभ समुद्र को तैर जाता । उत्तमोत्तम राय (तीर्थकर ) का स्वरूप- यह राज राजेश्वर स्वय प्रानी, सिद्धांतां पं स्थापन, आत्म- स्वरूप में लीन होकर मोक्ष पधारते हैं। + ५, छ काय मिहि पृथ्वी काय जैम मनुष्य के शरीर का घाव स्मय भर जाता है वैमे ही खुदी र सान भी स्वय मर जाती है । खुले पैर चलने वाले मनुष्य के वन घिमते हैं और पूर्ति होती रहती है वैसे ही मनुष्य, पशु, सपा रियाक प्रापागम से पृथ्वी पिसटी रहती है और पूर्ति होती रहती है जैम थामक क्रमश यहना है इसी प्रकार पर्वतादि नित्य धीर र धारे २ रडत रहते हैं। मनुष्य को लोह पकडना लना हो जब मोह के पास जाना पडता है, पर तु चम्धुक नामा-पत्थर अपने स्थान पर रहकर चैतन्य शक्ति द्वारा लोई को बचता है। मनुष्य ५ पट में पत्थरीका रोग होता है यह सचित्त होने से नित्य बढ़ता है । महनी र पट में रहा हुआ मोती भी एक तरह का पत्थर है, यह नित्य पढ़ना है। जैसे मनुष्य की इटिया में जीव है, पैस पत्थर में भी जीव है। अपाय (जल)- पती प अपड में रहे हुए प्रयाही पदार्थ पचेन्द्रिय पश्ची के ५ पिण्ड स्वरूप है, वैसे पानी के जीवमी एयन्द्रिय जीवोंक पिपष्ट रूप है। मनुष्य तथा नियेच गर्भावस्था प प्रारम में प्रयाही रूप होते है, वैसे ही जाये जोर सममें। जैसे सद "सतु-म मनुष्य के मुँह में मे पाफ निकती है पैमे एक जज से थाफ निकलती है। मनुष्य का शरीर उपडी में गर्म और गर्मी में ठगडा रहता है वैसे कुए का जज भी ठपडी में गर्म और गर्मी में उपड़ा रहता है। मनुष्य की प्रति म जैसे टपडी और गर्मी है। -- (६८) से जान की प्रति म भी ठगडी और गर्मी रहती है। जैसे शीत फाल में मनुष्य का शरीर अण्ड जाता है, अधिक ठगड प्रदेश में लोह जम जाता है, पेस ही भरकाय जज भाड़ जाता हैातम जाता है पर्फ हो जाता है । दहधारी पाम, युवा और वृक्षायस्या प्रमश धारया परत है, से सभी याफ, धर्फ मौरवर्ण प्रवाया धारण करता है । जस मनुष्य दह माता व गर्भ में पता है उसी प्रकार जल भी छ मास तक याद रूप गर्भ में रहकर पश्य होने पर धपा का रूप लेता है । दहधारी फा गर्भ कभी फाचा गिर जाता है वस पानी का भी पन्चा गर्म गलता मिस को गड़े तेनकाय ( अग्नि )- जैस देह धारी जीव स्यामोरयास बिना जी नहीं सकता, अग्नि पाय भी श्यासाश्यास विग नहीं जी सकती है। जैसे घर में द६ धारी या शरीर गर्म (उच्य ) रहता है बसे पनि जीव भी सण होत है । मृयु होन से मनुष्यादि का देव ठण्डा पड जाता है, वेस अग्नि जीव भी नाश होने पर अग्नि ठगठी हो जाती है। जैस जुगन् जीय के शरीर में प्रकाश होता है, से भग्नि के नीया में प्रकाश है। जैसे प्रसजीव पजते हैं, वैमे अग्नि भी चलती है फैज पर प्रागे यदनी है। जैसे मनुष्य ऑक्सीजन (प्रास यायु) लेकर कायन (विप वायु) निकालता है पैसे ही भान भी मोक्सीजन पाती है और काधन हवा बाहर निकालती है। वायु काय- या कोसा तक स्वतन्त्रता से चल सकती है। या अपने चैतन्य पा से बड़े २ वृत और महलादि को गिरा देती है। हमा धान में से बड़ा शरीर बना सकती है। वैज्ञानिका का मत है कि, इश मे थक्सस नाम प स म जन्तु उडत है वे इतने सूक्ष्म होते है कि, सूईफ अग्रमाग पर एक लास जन्तु पाराम पूर्वक रहर सस्त हैं। घनस्पति काय- - मनुष्य का जम माता के गर्भ में प्रमुक समय रहने के बाद होता है वैसे वनस्पति का जन्म भी पृथ्वी माता के गर्भ में अमुक समय रहन के याद मधुरित होती है । जैसे मनुष्य दह पढती है, वैसे वनस्पति भी बढ़ती है, जैसे मनुष्य बाल, युवा, वृद्धावस्था मोगता है, वैसी ही तीन अवस्था पनस्पति की है । जैसे मनुष्य थे शरीर को काटने से लोह निकलता है, पैसे घनस्पति को पाटने मे विविध रंग के प्रवाही रस निकलत हैं। जैसे खुराक मिलने में मनुष्य दह पुष्ट होता है और नहीं मिलने से सुखता है, वैस। वनस्पति को साद और पानी का सुराक मिलने से विकमित हो- है और न मिलने से सुग्न जाती है । मनुष्य की भरद पनपति स्वास लेती है। दिन को कार्वन लेकर ऑस्सीजन HिAR और रानि को प्रॉक्सीजन लेकर फापन निकालनी । मनुष्य मांसाहारी होते हैं, यस कोई . धनपनि मी मई गादि छोट जीयों का सत्व पत्तों द्वारा चूस लेनी trar मांसाहार करती है । व द्रमुसी पुष्पे चद्र Bra पून सूर्य ष समत सिजत हैं और उन भEPTE जाते हैं। दो तीन, चार और पांच इन्द्रिय याताया तो विश्व विख्यात है।

६-मृत्यु। कान (मृत्यु) गप सप गुप में समस्त विश्व येठा है। गाने में काम की फांसी लग रही है, मात्र नाचने का विजम्द है। निसको प्रारम भाउ नदी उमे मृत्यु का भान से हो । मृत्यु का निवास, अवश्यम्भावी सममा जाय, तामातही जीवन परि वतन हो जाय । भारत में निय४० हजार माध्य मरत हैं। भारत म मनुष्य का मतायुष्य मात्र २३ वर्ष का है। इससे अधिक जीनयामा भाग्य शाली है। प्राणीमात्र जीने की इच्छा में दीमरगा शरण होत हैं। अज्ञानी मृत्युप सामना को नीयन द्धि प साधन मानता है। मत्यु समय पश्चाताप न हो, ऐमा जीवन जीना चाहिए। माज ही मृत्यु होगी, ऐसा मानकर जीवन पवित्र रखना चाहिए भाज मृत्यु हो तो कौनसी गति हो ? मृत्यु मान नहीं नो फल । ही। सतान की मृत्यु से पशु पक्षी योध नहीं ले सकते, येसे : ज्ञानी भी अपनी सन्तान या नही की मृत्यु से थोध नहीं पाते। प्रति समय मृत्यु पद यज रहा है, तथापि सुमन लिए समानी हिरा है । घडी घटा, वार, तिथि मास पर मानि मृत्यु घंटे है। प्रति समय जीय देह पर काजका अमर होता है, पर पामर समझते नहीं है। - - अनेक अफरमाता म से होरर १ दिन सुस कप बीतता है। जहाँ तक पुय का उदय है, यहां तक अनेक प्रकारमातों से बचाव हो जाता है । पुयाई पुगा होने पर एक बक, या पयासी भी मरण शरण क निर पयाप्त है । मृत्यु की समझ में न भात्ती हो तो स्वग नरम पुय पाप मादि कैसे समझ में गये। >> ७१) यदि जीयन (जीवित) दशा में ही मरा जाय-मर-नाया' हारे तो पुन पुन माना ही न पडे । 'सर जो पुरुष क प्रत्यक श्यासोश्वास में सत्पनीनता, पद पर में गीतरागता, शद-शब्द में गम्भीरता थौर उसीनता, स्थान स्थान प्रात्म स्थिरता पर- माय में शयन दशा, स्वभाव में जागृत दशा, जीमत हुए थनाहार दशा, पीने में ज्ञानामृन पान दशा, चलने में मोक्ष पथ पर प्रयाण और उठना बैठना भी मात्म धर्म में ही हाता है । मृत्यु को पत्र- श्यम्भावी समझने याल का जीवन ही उक्त प्रकार का हा जाना चाहिए। मृत्यु फाल जितना दूर माना जाता है, उतना ही कूदते दफ्ते वह निकट धारहा है। अपना शरीर जितना निक, उतनी ही निकट मृत्यु है। दुनिया समझती है कि, जम हुमा, परतु मानी समस्त हैं कि जीन गर्भ में भाता है उसी समय में मृत्यु निकट हा रही है। मन्टनी मारकी भाति फाज, पाल, युग या युद्ध का नहीं देखता। यह नो जान में जो भाते हैं, उनको श्मसान की मट्टी में और यहा स रकादि भट्टियों में झांश्ता रहता है। शरीर रूप प में से चद्र, सूर्य रूप घे रात्रि विस रूप भरहट द्वारा श्रा युग्य रूप पानी अप्रमाद से क्षग्य क्षण पाली करते है । निम को को गाली करन क लिए चन्द्र सूर्य जैसे बलवान बैल है उस को साली करने में क्या विलम्ब हा? मृत्यु समय जीव घशरण पनता है, परतु धमाराधन बात जोर-मृत्यु शरण हाने पर भी स्त्र तत्र होत है । घमात्मा मत्यु समय में निर्भय और पापात्मा मय भीत हाता है।

--ma h (७२) मृत्यु ही माग्य की प्रति मानका मत है। तो भी माना। मृत्यु को भूजन के मिरे विषय विकास पय साधन बढ़ाकर मृत्यु को भूल जाता है, परंतु मृत्यु उसे नहीं भूननी, मानव वर्ष मान में जिस पस्या में है उमी अवस्था में नित्य रहना चाहता है अपनी दशा बदलना नहीं चाहता मियाधा-शा का पाना मानता भी नहीं है। काल हाथ मम्या कर भेदने को सामने खड़ा है किन्तु मानी उसे दमन में भन्ध है। प्रशानी पक्षिय मृत्य भय रूप है और शानी ५ जिय मृत्यु मगम स्वरूप है। एक मिना भी मधिन जीने के लिये सई भाराधना नहीं है और जीवन दीपक जल रहा है। मत प्रति समय पूर्व पुन्या का तेल घटत २ जीवन दीपक घुम रहा है। फमाई माने में पहुँच पशूधन् मृत्यु मम्मुख हात हुए भी जाना अपने मापको मनर अमर मान कर नि.. सवाचता से नित्य पाप प्रवृत्ति पहा रहा है और मृत्यु से सावधान होने की शिक्षा दने याल सद्गुरु को दीवाना या दया पात्र मान वर पाप प्रवृत्ति से पीछाननी हटता।

७-माज का मानस ।
दिनानक जड़ादी जमाने मे घतमान माननों के मानस
भी जड निरसते है । चैतन्यवाद चूर हो रहा है और जदनाद की
इमारतें विविधता से चुनी जा रही है । धम युग के स्थान पर
पतमान युग धन-युग'ध्ययुग'हो रहा है । धन अथ लिये ही
वज्ञानिक साधना रल्ये, मोटर स्टीमर प्रादि द्वारा दौड धूप हो रही
है । अथ युग को पहुंचने के लिये इन साधना की गति तो
पूटी यनगाडी जैमी मन्द निपने से एरोप्लेन ( वायुयान ) का
प्राविष्कार हुआ है। इसकी गति भी मद मालूम हाता है अत
इससे भी अधिक यगनत साधनों प भाविकार की धुन म चैना
निक लोग लग रह है।
निम वस्तु व पेस मिन्नते हैं-घदने में धन मिलता है, उसी
को सत्य माना जाता है। निस यस्तु प पैसे न मिनस असे
मिण्या, किम्मी मानी जाती है। मानन की सय शक्ति द्रव्य,
कीर्ति व योग्य पदार्थों के सचय म सच होती है । धार्मिक प्रवृत्ति
सहारक व्यर्थ वियना रूप दिसती है और प्रायिक प्रवृत्ति
प्राणदाता सम प्रिय प्रतीत होती है। चतयनाद का पूरक फना
कामिनी और कीर्ति पो त्रिविध घधन समम पर सांप
की कांचनीवत् दूर करता है और जडाद का पूजक उक्त निमूर्ति
(पचन कामिनी, कीर्ति) क प्रभाव में चौधार अथ धपाता
है। विषय विलास और शिकार पर्धक उपदेश, वाचन, श्रवण,
मनन को उचित समझता है और प्रात्मवाद क तत्वों को पि.
मय मानता है। अनीति अन्याययुक्त धनोपार्जी जीवन को
वास्तविक, भान दमय, सममता है और नीति याययुक्त निगनता

को दुम्य का भण्डार सममना है। विषय पाय रहित चैत य-मय प्रति दुगंधयुक्त सडे मु जसी दुर्गधी और विषय पाय युक्त प्रवृत्ति प्राणप्रिय समझी जाती है। विषयपाय युक्त प्रवृत्ति के लिये जीर प्रविमान्त यत्न करता है मृत्यु की भी परवाह नहीं करता। धर्म तत्व का पदजि से भी अधिक य समझता है और धार्मिक क्रिया, धर्म गुरु धर्म माम्नादि यो सड़ी हड्डियों का पियड सम अान्द्रतीय सममता है । अधार्मिकता को योग्य प्रवृत्ति और जीवन मानत है। अपनी शक्तियों धनोपाजन मे लगाकर अपने भापमा सफल समझता है। मुख, भानद एश धाराम और मोरशोक मे धेनसीय, भाग्यहीन और मानायरा नियही धर्मतत्व समझा जाता है। धार्मिकता प त्याग म ही अपना उद्धार माना जाता है । धार्मिक प्रवृत्तियों को शम भरी मुसता और प्रधाातिका द्वार माना जाता जडवाद प चश्म को मारकर प्रात्मवादष्टि से दग्ना जाय तो स्पष्ट प्रतीत होगा कि धम तत्व को 2 मानन पाजा स्वय जड़ है । धर्म की शरण से भी भविष्य में विशेष उज्वलता मिलेगी धम भावना के अभाव मे ही देश का पतन दिसता है। समस्त राय और साम्राज्य भयभीत है, ममन राजा महाराजाओं के सर पर कोहिनूर क नहीं मिन्तु पोट वाले ताज है। व्यापक विना- शी विषमय जहरील गेम, याम्यगोले, लड़ार हवाईजहाज एवं जज जहाजों की धूमधाम से तैयारियां हो रही है । सब राज्यों ५ जीव मुट्ठी में है । घाज शांति है फल की पुदरत जान त्रिय के लिए भी मामी भर्ना र कानून बन चु ६, इन्कार होत पाले क लिये पीसी क मच तैयार हैं। लाग्या मनुष्य भूगर्भ में छिप कर रह सकें एमे गुप्त भूतल बनाये गये हैं। जहरीले गैसों से धचन के शिलासों टोपियों का संग्रह किया गया है। ७० भाग्य की भावादी वाला जडन कुछ घण्टों में साली करने की योजना विचारी जा रही है । श्राकाश में उडत हवाई जहाजों को पक्षी की तरह गिराने वाले तोप गोले तैयार हो रद हैं । हवाइजहानों को कागन की तरह आकाश में ही भस्मीभूत कर देने वाले किरणका माविष्कार किया जा रहा है। पारधी पक्षी को जाल मे फ्माता है इकी तरह हवाई जहाजा को फंसाने की जाने गृथी जा रही हैं। यह प्रताप धम का या अधर्म का? धर्म प प्रताप से शांति और शीतल छाया है, इमाप्रभाव मे दावान और जालामुखी की ज्वालाए तैयार होता है । रिना धर्म की प्रवृत्ति म पर रखना या विचारमात्र करना मानव धम का अपमान तुल्य है। सत्य, पवित्रता और निस्वाथता, ये तोन यज रिलोक को हिला दने समर्थ है । धर्म भावना वाला विश्न क्रिय भाशीपाद और तीथ यात्रा समान है, इससे विपरीत शाप समान है। धम शाश्वत जीवन की शांति के लिये पाताल प है। पानानी ए का सुख शांति रूप शीतल जल कभी नष्ट नहीं हुमा है, न होगा । जडवादी समाज प्रात्मवाद का शरण लेगा तभी यह शरणभूत होगा। अन्यथा विकास नहीं किन्तु विनाश के पथ पर है।

-जड़वादी प्रात्मात्रों का स्वरूप। श्राम तत्व चद्र सूय मे भी धनात गुण भधिक प्रकाशित और सम्र म अन्यविकनीक धान पर भी उस अस्तित्र का भान अशुभर म नहीं पाता। शगैर प लिये घद्र सुयम भी अधिक प्रकाशित चतुया का उपयाग पिया जाता है, परतु भात्म- तत्व के दर्शन के लिय जुगनू नितना प्रमाश भी जडयाद फ भा- वरगा प कारगा अनुभा में नहीं माना। माया अन्य विषयों में बहुत लानत है किन्तु भपने विषय में कुछ भी नहीं जानते हैं। अनेक विषय में प्रा उत्तर द सक्त है, मात्र अपने निजात्म का नता दने म सस्था समय है। लासा मिज दूर प प्रदेशा पीर हमालूम है जितु सय स निस्ट शरीर सभी त्यन्त नि स अपने प्रात्म तत्व पाकिचिन्मात्र भान नहीं है। जल, स्थान और गगन विहार मफर कर अनेक अनजान प्रदशां का नवपग दिया और कर रह है, परतु खुद पं श्रात्म प्रदश को हगान मसा लाग्यो मिजदूर बैठ रडियो प घायरलम द्वारा घात चीत हो रहा है, वहां की जनता सुरु दुपय ममाचार पूर जा रहे हैं । इतने दूरस्थ मनुष्यां स सम्बन्ध धाध रकमा है, परंतु आत्मा म्बुद साथ सम्बन्ध बार नहीं सम है, भात्मा तुक सुस दु ख का विचार मात्र नदी पर सका है नअपात्मा स लेश मान सम्पन्ध जोड़ सका है। इससे अधिर प्राधय और पस्तिकता अन्य क्या हो सक? तीन लोक का राज्य करने का यल कर रहा है, परतु अपन आत्मा पर राज्य करने का यत्न न करता तीन लोक भा जानन की आतुरता है अत उई जानने दसने के लिये लालोक सच करने का तयार है मान उसे निज भात्म भाय जानन सुर कोरकार नहीं है कोई आत्म भाव कह-मुना तो जानने मुनने की इलामी नहीं होती। मनुष्य मे अपिल 'पसको वश में करने का प्रयत्न होता है परन्तु खुद सपन कोवश में नोंकर मक्ता। निश्चय Bाय मत्री करना चाहता है और निजात्मा से घर बुद्धि बढाता है। विश्व को दसन की मातुर इन्द्रा है पर निजात्म दशन प लिये घदशा रखता है। तीन लोक य जीवों की चिंता व पचायत रता है और अपना निजात्मा का लेश मान भान नहीं है। रेडियो, यायरलेस, यिजली, भाफ, रल्व, मोटर, स्टीमर एरो सैन मादि अनेक प्राधिकार हुए और हो रहे है। परतु अपनी मात्मा का प्रायिष्कार न दिया । जड पदार्थों की प्रगति की परतु अपनी प्रगति न कर सका। विश्व को दयापात्र समझ कर उसकी दवाद करने का यत्न करते हैं, परतु अपनी दया नहीं है तथा अपने लिये दवा का विचार भी नहीं है। निश्च को सुली रसन की नमाना बाल को अपने सुख का तो भान नह है। मलीन म मकीन पदार्थ को उपयोगी-पाद माना है और उसकी रक्षा के लिय वाड की जाती है,पर तु सुद को निरथक निरुपयोगी माना जाता है सो रक्षा के लिये बात ही क्या हो? रोड और डयो र हिसाब क्यि परतु अपने एक फ, हिसाय न किया, न अपने हिमाव का एका जिसन को पाटी पन हाथ में लिया । लेना भाता ना है, पसन्द भी नहीं है। पड़े हुए सिर क याज या हाथ पर फ नाखून नितना भी मात्म तत्व को मान देने में प्राय या स्मरण मान दिया जाय तो 'म कौन हूँ ? कहा से भाया हूँ और कहाँ जाउगा ?' इसका भान सोना रहे । छोट से वडे समस्त दुनियानी पदार्थों लिये म

(७)
नन्त कष्ट सह जात हैं और म्यात्मा व साय प्रमाद किया जाता है।
शरीर के नाश क साथ प्रात्मा का भी नाश माना जाता है।
बडोद क अनायर घर में ३००० वर्ष का पुगना मृत देह ।
(मुर्दा) है । उसे दम्पने क जिय हजारो मनुष्य हजारों बोसों से
हजारो रुपयों का सर्य कर पाते हैं, पर तु उसे सम्यक् प्रकार से
दग्बने के लिये प्राय भी नहीं मोक्षत ।
स्थूज भाषा म कह नो प्रात्मा कीर योनि में भ्रमण करती है
और माध्यामिक भाषा में कहें तो मिन्न मानसिक भूमिका में
भ्रमण करती है और करगी । मानसिक भूमिका के अनुरूप प्रात्मा
निविध जीवयोनियो प्राप्त होती है, किन्तुजडवाद कथयन से प्रात्मा
अपना भान भूला हान से अपने अस्तित्व का भी भान नहीं है।
इससे पैतन्य होने पर भी उडवत् जीवन बिनाकर जड जैसी
(स्यावर) जीषयोनि में जन्म धारण कर मानव भर पे महत्व
शाली पद को हार जाता है। ऐसा न हो और मानव की ता
समझ कर उत्तरोत्तर प्रगति र क्षिय पाप प्रपन ही चौकीदार
बन
और अपनी मामा का टूटे ।
Soladki

( ७६ ) ह-नारकीय यातना नरक कसा है ? उसको वसमय दीवार है बहुन चौडी है रगड़ (यिना साध की) है, चिना द्वार की है, कठोर, भूमितज बाली है, कठोर फर्कश स्पशवाली है उची नीची विषय भूमि है बन्दीखाने (Jail ) जैसी है। अन्य व उप्या, सदा तप्त टुगंधयुक्त पुद्गल वाली उद्वेग जनक भयर म्वरूप वाली है। ये नरक र शीतलता मे हिम य पटल जैसे, काली करत वाल, भयकर नहर गहन रोमांचकारी ई, अरमणीय हैं। भनियाय राग और नगसे पीहित नारकीय जीवों का यह नियामस्थान है | वहां सदा नमिर गुफा जैमा अधिकार व्याप्त है, और परस्पर भयभीत रहन वह चन्द्र, सूर्य, ग्रह नवन, तार भादि नहीं है । नारक ग्रह वी, मांस, ग्मी, जोह से मिश्रित, दुगधमय, चीन और सड घड से व्याप्त हैं। वहां पर की लकडी क अग्नि जैसा या वल्यमान और रास से ढका हो यैसा अग्नि है । उन नरक महा स्पर्शतमनार,धुर करपती जैसा तीक्ष्ण, एव दिन्छु फ डक जैम बति दुगार है । एसे नरक में जीव रक्षण मिना, वाण दिना, वरण यिना, फडुये दुस से पीडित होता हुमा पार्जित शुभ में भोगता है। नरफ परमाधामी दव (जमदय) से भरा है। इन नमदों के द्वारा नारखी जीवों को अन्त मुदत म पैश्य मन्धि दारा पदसूरत, भयानक, हड्डी नम-नाम्वून रोम रहित देह बनात निस द्वारा शुभ वेदनाए मोगत हैं । यह वदना मन्यन्त कठोर नयम, सय शरीर व्यापी चित्त-वाणी व दह में व्याप्त,न्त तक नर तर रहने वाली है । व वदना तीन कर्कश, प्रचण्ड, भयानक चौर दारण कैमी १ सोमय कहते हैं।

(८०)
लोहू की बडी हाडी म पकाना भंजना, कड़ाह में तनना,
भट्टी म भूनना, माह ५ वतन में उबालना, धनिदान दना (गदन
उडा दना ), मांडना, चीरना फाइना, सिर को पीट भुका कर
बांधना, उंधा काना, र मारना, गले में फांसा डाल कर
मुलाना, शूक्षी पर चढ़ाना मासा देकर ठगना, पमानित करना,
षधभूमि पर लेभाना, गुहा यता २ कर दडदना जमीन में गाडना
आदि अनेक विध कहों से पूवचित र्म द्वारा जीय नरक
पीडा पात हैं।
नरक क्षेत्र अग्नि महा भग्नि दायानल की है। उसकी
अति दुखद, मयप्रद, धरमता जाम, शारीरिक और मानसिक
दान प्रकार की वदना भागत है। पल्योपम और सागरोपम के
मायुष्य तक विचार सहत हैं।
परामाधामी दय नारकां को नास उपजात है. जब नारकीय
जीव घडे फरुण धान्नस भयभीत स्वरसे कहत है कि "हे प्रत्यत
शक्तिमान, ह स्वामिन्, ह तान, मायाप, मुझ छाडिये, मैं मरता
हूँ, मैं दुबल हूँ, याधि पीडित हूँ " एसा बोलते ० प दया रहित
परमाधामी की तर्फ दृष्टि करता है कि वन मारे 1 कात है "मुझ
कृपा करपे क्षण भर जिय श्वासोश्वास लेन दें, मुझ पर रोपन
करें मैक्षण-मात्र विश्राम ले सक् इमलिए मेर गाने का बधन
छोडिए, नहीं तो मैं मर जाऊँगा। मुझे बहुत प्यास लगी दे मत
पानी पीने द। उस यत्त परमाधामी उन नारक को ठंडा
निमज पानी पी एसा कह कर उसका मुँह फाडार सीसे का
उष्ण प्रवाही रस डालत है, इस असे नारफ जीप कम्पित हो
जाते हैं और मथुपात करते हुए कहते हैं कि 'मरी तृषा नष्ट होगई
पत्र पानी पीना नहीं है। ऐमा याजने २ नारकी चार भौरष्ठि

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-- 1 पुन परमाधामी नरम मे नाहर, कुत्ते, बिल्ली को, भष्टार मुहर, मुमुंटी, करवत, शिशूम, हल गदा, मुशम, चक्र, भान धागा, शूली जकडी, स, लम्याभाला, नाम, चमडे में मना हु पत्थर मुद्राकार हथियार तयार, नीर, लोह का वाया, कतरने घसोमा परशु भादि प्रति निक्ष्या, उज्जवल चमकीले भनेक प्रका क भयकर शस्त्र विकूध कर (वैरिय नार) और समर ६ भर ५ पैर भाव से नारकों को मक्षा वेदना उपजाते हैं । मुहर प्रहार से चूगा कर डालते हैं, मुमुढी से भागत तोडत , दहय छुचते है यत्र स पीचर है, तडपन देह इथियारों से काटत चमड़ी उतारते हैं, कान पोष्ट नाक को मुल में मे काट डामत। हाथ पैर छेदते हैं, तलवार, करपनी नौकवाला भाला, भौर पर का प्रहार से नारक दह को भारत है। वसोला से भगोपांग व दैदत है । गरमागरम पार दिपाय से गानों को जजान है भाले की नौ स शरीर अर्जरित करत है। जमीन पर परफ रगड़ने हैं । इमसे नारकों व अगों पांग सुम जात है। चित्त बाध सिंह श्रादिक रूप बनाकर नारक जीवों को परों धीच रखकर तीक्ष्ण दाडों स मारत है सचते हैं, तीक्ष्ण नाखू से पाहते हैं, चीरते है । परमाधामी दय कौए, गीध, कादि १६ परूप बनाकर अपनी वनमयी तीक्ष्या चोचसे पीडा उपज है, आँख फाइन हैं चमडी उधडत हैं इत्यादि भनक प्रकार की पी नारक जीव मोल है और अपने पूर्व भर ५ पाप क लिए पर पश्चाताप करते हैं तथा स्वय निजात्मा की निंदा करते हैं, तथा पाप शुभ फन पिना भुगत छुटकारा होता नहीं है । (श्री प्रश्न याकरण सूत्र प्राधार ,

नत्व विभाग
१-नए-नयों साम्परूप
पुरुषों ने ममा MAINमरमरात
HIROERain [at].(Ju
Rem | [ETAer (R) ने
trali मगन रात
in पर हाना),(८14 [Ar गाय मापना
(R) मा urvी मौम मुनि
PER का नाम Animuaire जायगा।
और सपा मीत्र
यामा युग तिन ने गाय गमरगा,
भारद्वार, रहिया, निता वापाम, विनी, गम, फार
मा विभिET
पियारिवानिकी
पाने पर पानने में मजा पाये मरन
ifracाररते ९गे।
यो पनि एस्त्र हाने पर भी यह बीज सो
Fireोगी पाशा ही मन । प्रा जिन और
Rन सभी बार ची मरगुनी अधिशान्ति
बम प्रोड़ा बीज ही ही परनु मीनार
परतार पाने प्राही बरत 3। यह बात प्रत्यक्ष मिस
ने मविप विस्तार मनाया।

ब्यान पैन म
विज्ञामियों का मत है। पटकपीज में और पानी की वन्दों में 7
कि स्थावर जीय है उनमे इतनी शक्ति है तो मनुष्य म नि
शक्ति हो सकती है? इसा जुमान सहज में ही जग माना।
विज्ञानियों ने भारिपार किए। उन्होंने जड़या का किस
६वी शक्ति को प्रकट करने और उसी माशय से'माला
चाह पसा बन सकता है। बहमये प्रकार से शक्ति सम्पन्न ।
अनता तथा यज्ञका अधिकारी है। जीवनका विकास व
wrat of37 और नमीन में गाड़ दिया जाय गोमा
मिट्टी में मिट्टी पण मिनायगा, किन्तु या पात्र को समान
में रपन स विशाल पर यहा होजायगा। क्योंकि, उम हो
म धौर म चाय सता और पड़ेगन है । इनो
कारगार अपनी प्रति विकाश में प्रममर्थ है।
१२ ताने र एक पानी गिनाश००० न कोयत की
शक्ति है।महिमाय मरती पानी में मया रन
मन कोयाने की शक्ति है। ताले पानी की यिजनी की शान
में एक विशाल सीमर जाम कीया सहनी है ऐम
प्राणी का स्वभाय जान मय है । इमी मानवीय शधियों के द्वारा
रिया है। येस ही मनुष्य परम विकास कर सकता है।
सातवी नरक का परमाणु समय मात्र में मिशिला में 3
सस्ता है। इतनी शक्ति नही ६ नो चतन्य की अनन्त गुर्ण
विशेष शक्ति होना स्वभाविक है।
सब चीयारिया को प्रभा माय में उत्कृष्ट शक्ति है ।
अम उत्प्र शक्ति का सदुपयोग धाराधाम करना चाहिए।
कलाकार पत्थर को कार में से इखित प्रतिमा
बनाता है, उसी प्रकार मनुष्य जीवन का प्राशय विषय कषाय से
ही परमात्मा' यह वचन शानियां न कहा है।
मनुस
जैसा बना
मानव भव में ही हो सकता है।

(८५) - पुण्य- शीतल चन्दन से उसन हुई अग्नि शरीर पर पद नो पद शरीर का जमाती है । नमी प्रकार प्राप्त पुगय से अगर धमा राधन न किया जाय तो वह घाटन स उपना अग्निवत् दुस- दायी है। एक भिवारा पुण्यादय स धनी हा जाय तो वह पहले की प्रपा विशेष भोगमय नीयन बितायगा और विशप पाप कम नपाजन फरफ विशप दुगति का अधिकारी होगा । उसी प्रकार पूर्व सन्म पुण्योदय से प्राप्त सम्पत्ति का विश्व की भनाईक लिए उपयोग न करफ क्या अपन ऐश पाराम में उपयाग करन वाला पाप का उपार्जन करकमद्गति का अधिकारी नहीं होसकता। एस पुरुषों को शास्त्रकारों ने पापानुनधी पुण्य वाला माना है। अथात् धन, यमन उसको पुगयोदय से प्राप्त हुना है, किन्तु उसका धम काय में उपयोग न करने स वसाधन मम पाप में अधिकता जा दत है, और यह पाप के कारण दुर्गति का अधिकारी जाता है। धमागधन न कराने वाली पुण्य से प्राप्त धनायता से शास्त्र कारों ने निधनता, दीनता निशप जीवनोपयोगी श्रष्ट मानी है। एसे जीवों को पुगयानुबयी पाप मानने में प्राता है । पापादय से यह निधन हुआ, किन्तु निर्धनता से वह ऐश पाराम तथा विनाम मयनीवन नहीं वितासका और भपन स्वाभाविक मादगी मय जीवन कोबिता कर यह विशेष पाप से बच सका। एसे फारण से किसान ही सद्गति के अभिशापी राजकुमारों तथा श्रेष्ठ पुत्रोंने दूसर जन्म म निर्धन होने के लिए भारना भायी थी । निर्धन होने की ही इच्छा (नियाणा) उत्तम नहीं गिनी जा सकती। जो पुषय होने वाली सम्पत्ति, धन वैभव सुप सामग्री धमाराधन म साधेश है यही पुण्य है। नो पुराय घमाराधन में माधक नहीं और पघल विषय विनास, पश भाराम म ही उपयोगी हो, सा पुगर भविष्य एव पालाक दानों क जियो परम दुरदायी है। पुपय की मामग्री में धमागधना को एस पी को पुगयानुयधी पुगय का उदय मानन में प्राता है जो निर्धन मनुष्य धर्म भाराधन न करता हुमा विषय रिमामय लिग गत दिन नहफ्ना रहता है से मनुष्य का पापानुराधी पाप का उपय समझना चाहिए। पाप- सजन सुपए पर ण्य दुजन युपर पर न जाता है, उसी प्रकार शुभ कम मुपंथ पर लेनाता है पशुभ कुपथ पर पाप मय प्रसि ही पर है । जब एक भी यार दुखदायी विपना जन्तु या जहरी पदार्थ स सावधानी पी जाती है तो सनस भनों में दुख दन बाल पाप रूप विपाने तन्तुस क्तिी सावधानी चाहिए, यह स्यय ही सममा ना सकता है। ज्ञानी पाप सिंह, मप अग्नि यत् भयकर समझ कर उम स सावधान रहताई पार RETTी उस ममय भर करता है। प्रमीम पीडाका भागी बनना है। हिंसा, भूठ, घोग, व्यभिचार, धन-लाभ धादि पापी में भी प्राध, मान माया एप जोमादि महान् पापा का क्टु फल भोगना पडेगा, यह विचारणीय है। इस लोक म पापी जीवा क लिए अल्प समय पहल ६०० प्रफार की तरसा तरसा कर मार डालने वाली प्रासदायक दन में भाती थी । उसम भी मनत्त गुणी रिशेप सना पापी को सरक में भोगनी पड़े यह स्वाभाविक है। पामी

-
नारकीय जीव नरक में स याहर निकलने के लिए कोलाहल
करत हैं वैसे पापी जीव पाप मय प्रवृत्ति स नरक में प्रवेश करन
लिए कोलाहल करत हैं।
नारकीय जीव नरक को यातना भोगकर बाहर निकल
रह है और पापीजीय पाप करक सम प्रवेश करते है।
निम प्रकार अग्नि राम्ब में वी होने से नहीं निसाहदती
किन्तु फिर भी अपना स्थायीत्व रखती है उमी प्रमर पुण्य स्पी
राख म पाप रप भग्नि दची हुइ छोनम पाप यहुयेफर वर्तमान
म दयने में नहीं मात किन्तु पुण्य पूरा होने पर पाप प्रकट होता
है । भीर उस परिणामस्वरूप विविध दुख भोगन पडत हैं।
पाप दसने मे बड़ फ बीज की तरह सामान्य प्रतीत होता है।
कितु घीन पढकर रिशाल वट वृक्ष जैमा गम्भीर बनजाता है, वैस
मज्ञानी अपने किए हुए पापों प लिए मन त पश्चाताप करता है
ग्दन करता है शाक करता है, तपि उसको पिए हुए पापा
का फल अवश्य भोगना पड़ता है।
कमाद जैस जीर को भी पु म पडन की सलाह नहीं दी जा
सकती तो ज्ञानी पाप न त मयार कृप में स्वरदा सस
उतर? पाप-प्रवृत्ति म प्रवृन नहाना यह परोपकार नहीं किन्तु स्व.
छात्मा पर परम उपकार है।
आधर--
यह रिश्व पिशाची राज्य है। इसे चलानेवाला भाव नामक
क्षुद्र राजा है, उसका नाश करने से ही प्रात्मा का शासन स्यापित
हो सकता है। प्राथन ने तीनों लोक पर अपनी सत्ता चला है।

(८८) परमाधामी - मार से भी साध्य का मार अधिक भयकर है, परन्तु ज्ञानी जीव भाशय को अमृत मानार उसका (मानवका) सेवन करता है। आम्र की गुटली पाने वाला मैक्टों भाम्र वृक्ष का मालिक बनता है और गुटला मुजकर सा जाने वाला दरिद्री बनता है। उसी प्रकार इन्द्रियों का मर घरमा-नियमन परना पुयाई को बढ़ाना है और इन्द्रियों व विविध भोग मोगमा अनत पूर्व पुन्याई कोपाजाने जैसा है। पाची ही इन्द्रियों में गर्मा द्रय से अधिक सावधान रहन का है अन्य इद्रियाँ क २ काय करती है और रसन्द्रिय (सिहा) साद लेने और बोलने का, दो काय करती है। कुत्त की जीभ स्नेहियों के शरीर य घार रुमा देती है य मनुष्य की प्राश्रयी जीभ स्नहियों कहल्य में घाव पर देती है, पुराने घावको ताजे और छोटे घाय को बड़ा करती है । रसास्वाद भी द्रव्य और भाव से विशेष भयकर है । सल्वार अपन स्वामी की रक्षा करती है, पर तु जीम रूप तल्दार रसास्वाद से शरीर में अनेक रोग उत्पन्न फरप अपनी बात करती है तथा वचन से ग्नेहियों की घात करती है। श्रय इन्द्रियाँ प्रकट रहती है जब यह इन्द्रिय पद में मुंह क भीतर रहती है। रसद्रिय को श करने वाला अपनी पांचों ही इन्द्रियों को वश करता है। मिथ्यात्व का भाव चौथ गुणास्थान पर पूर्ण होता है। अप्रत का भाव ? गुणस्थान पर पूर्ण होता है। प्रमाद का माश्रय सातर गुणम्यान पर पूर्ण होता है। कपाय का प्राश्रय तरच गुणस्था1 पर पूग्य होता है। योग का भाव चौदा गुणस्थान पर पूर्ण होता है।

मवा- मन पचन काया का सयम तथा किमी का लेश मात्र दिलन दुपावरसर प्रवृत्ति नागृतिपूर्वक करना'समर' है ।हजन चलन आदि की प्रवृत्ति शीघ्रता पूर्वक करने से प्रात्मोपयोग भूना जाता है। इमस असयम होता है और सर का नाश होता है। ज्ञानियों को उपयोगों की जागृति दान में प्राशन के स्थान सवर रूप होत हैं प्रशानियों को उपयोग नागृत्ति के प्रमाम म (भयना से) सबर य स्थान प्राश्रय पहाते हैं। डॉक्टरया य कहने से रोगी को वर्षी तर अपनी इन्द्रियों का सयम (मवर) रसना पडता है, तो भनन नन्म मरण के दुओं से मुक्त हाने निए कितने सयम की आवश्यकता हो ? यह महज सममा जा सकता है। इस भर में अपनी इन्द्रियों का सवर न करने वाले को नरफ निगोद रूप अन त दु यमय स्थिति म परवशता से अपनी यासना एव तृष्णाको वश करना पड़ता है। दूध दही, धृत, गुड, शक्कर, मिथी भादि पदार्थों का भी अच्छे से अच्छा उपयोग करने का नत्यपग जाता है तो अपनी इन्द्रियाँ और शरीर का अच्छे से अच्छा सबर मय उपयोग करना चाहिए और माशय की प्रवृत्ति से अपनी प्रारम रक्षा करना पादिए। निरा- मात्मा तथा कम को प्रयय करने की त्रिया सो निजरा राग द्वेष यजवान निमित्त प्रत्यक्ष उत्पन दो, रितु जिसका प्रारम माव किचि मात्र राग द्वेष की प्रवृत्ति में लुप्त न होमो नि:--.

A
६०)
जन्म मरण दूर करने क लिये निरा (तप) औषध समान है।
संसार रूप काम ज्वर से पीडिनों के लिये तप शीतल चदन
समान है। तप करने से प्रत्येक समय क्म का क्षय होता है और
मन्त म कम रोहत होत हैं।
बन्ध
-
मिध्यात्व प्रवृत, प्रमाद कपाय, भौर योग, ये पांच प्रकार के
बधन है ! मन बचन काया मामा के यत्र है। इन या द्वारा
कर्मों का वध हाता है । मन यचन काया की प्रवृत्ति मजही २क्याय
मालूम हा उस निकाल दना चाहिए ! मन वचन काया की प्रवृत्ति
म कर्म धन की वृद्धि हाय तो इनकी प्राप्ति ही निरर्थक है ।
और छोडती है। नितना
श्रात्मा स्वर प्रात्मा को बांधती
पुरुषार्थ कम बांधने के लिए किया जाता है इतना पुरुषार्थ कम
तोड़ने के लिए किया जाय तो श्रात्मा शीघ्र कर्मों से मुक्त हा सर!
कम बांधन का पुरुषार्थ असद् है और कम तोडन का पुरुषार्थ
सत्पुष्पाथ।
पौड को दौडता रखने के लिए मालिक घोड गले मे और पैरों
मधुवर बांधता इतथा मस्तक पर कलगी क्षगाता है । मुँह पास
चन और हराघास रसता है और दौड़ाने के लिए रंगीन चावुक
रखता है । एम प्रमामना स पाडा गाडी में बना है, धमे है।
ससारी जीव स्त्री पुत्र कुटुम्ब बाग बगले गाडी घाडे माटर तथा
सोना चांदी होर मोती माणक प टुक्तों के प्रलोभना मे इस भत्र
में ममार रूप गाडी क बधन में चार चौरासी लाय जीवयोनि
मअत काज तर भरभ्रमण करते हैं।

andA (६१) मोन- मानव मन मोक्ष द्वीप है परन्तु विषय क्पाय युक्त प्रतिक कारण वह समार द्वीप बन पाया है। माता क गर्भावास के बधन में से मुक्त होने क लिए अकाम परिवह सहन करने पड़ते हैं तो मनत जन्म मरण के बन्धनों में से मुक्त होने के लिए कितने तप और न्याग का प्रावश्यक्ता होना चाहिए' यह सहन ही समझ में भा सकता है। काडों बहर वीज कुचला कर नष्ट होत है उनमें से कोई एक श्रीन बड का म्वरूप धारण करता है, उसी प्रकार प्रोडों मनुष्य अपना जीवन पाप मय रीति से पूर्ण करत है और कोई भाग्य- शाली नीव धर्म पथ मोक्ष पथ प स मुरबहाते हैं। द्रव्य पथ काटने के लिए रजव, मोटर, स्टीमर प्लेनादि शीचगामी साधन काम मे लिये जाते हैं, तो मोक्ष पथ लिए क्तिनी शीघ्रता अप्रमत्त दशा होनी चाहिए? यह मुझ मरलता मसममसरग। मात्र प्रारमा का पात्र है । उस पात्र में रखने की वस्तु ज्ञान दर्शन है। स्थावर जीवायोनि मिट्टी धादि स मानव हुए नोमानर म मे मोतगामी हाने लिए मिट्टी से मानव हान नितनो प्रति जिता न है, यह प्रत्वव सिद्ध है। मनुष्य मात्र लिए मोक्ष की हुंडी बघ जिफाफे म है। मात्र वध कवर को गोल कर देखने की दर है। पुय से स्वग पाप से ना और वातसा से मोक्ष होता है। प्रान्मा मे विषय याय का पक्ष दूर हा तो नीवका 'शीव' होवे। KATTER

मोक्ष मधुर है, मोक्ष की साधना उसम विशेप मधुर है ।
मोक्ष भथात् मात्मनिकाश की पूर्णता
खात्म म्वरूपस गिरना बंध है और प्रात्म स्वरूप में स्थिरता
ही मोत है। भारमा (निज) जिय प्रारम (निज) बुद्धि ही
माक्ष है।
प्रश्न-मै कर मुक्त होगा?
उत्तर-जब में नहीं रहूंगा।
२-मिपाव
वर्तमान कालीन पिना धार्मिक ज्ञान का शिना मनुष्य का
मान अपने शरीर सुप में जीन रखता है। नये भाविष्कार
द्वारा शरीर सुप व साधन यदाकर मृत्यु का विचार मात्र मुलाया
जाता है। मानव सभ्यर विचार नहीं कर सकत । सदा शरीर
मुस कमिया विचार ( मिथ्यात्य) मे लीन रहते हैं। भारमा
का ज्ञान हो वही सन्य शिक्षा और वदी समकित है।
पचम काल म मिथ्यात्व वृद्धि साधन प्रति दिन बढ रह हैं।
विनास साधनों में गृद्ध होरर मानन आत्म विकास र पथ को
भूल जाता है।
मानस में से मित्याल के काग्या प्रति दिन दान शील
तप मापना, ज्ञान दर्शन चारिनादि भाव नष्ट हो रहे
और विपरीत भार भर रह है मिथ्यापक कारण इस भर से

मनावा परमय के विचार भी न हात । यतमान युग सचमुच
गार मियात्व का युग है। प्रत न्याय नीति प सुध मुले गरे
हैं 'शाठा उमरी भैम और निरंत का मयु इस युग में हैं।
देवा को भी दुनम मानव भव मिथ्यात ५ उदय में नारक जीव
मी न चाह सा निरस्कार पात्र बन रहा है।
वर्तमान में गम और पिनली का प्रकाश याह विश्व को
प्रकाशित कर रहा है किन्तु अन्तर (चित्त) में मियात्य का घोर
निमिर यह रहा है । सावधानी अनेक कानुन, क्याने और
कचहरिया बनने पर भी माया अनीति अन्याय व्यभिचार, भरता
द्वप पा, निदा मादि मिथ्यात्व पोषक दुर्गुण मानव में बढ रह
है। वकील, पैरिस्टर सोलीमीटर्म और न्यायाधीश बढ़त जात ६
त्या त्या मिमारव अन्य उपरोक्त अपराध घटने पे बजाय बढ़त
नाते है । विज्ञास यक यत्र और साधन पढ़ रहदै त्यो त्यो भूख
मरा बढ रहा है और "सी कारण पाप प्रवृत्ति यदरही है। मिमा
लपर्ध साधन एक दम बद रहे हैं। पूर्व कालम तौर गा.
माज एक धोतल निपला गैस पक्षण मात्र में लाया गायनागा
लेता है । रेषत्र, मोर, सीमर हवाई जहाज मानि पाप पर
साधन ( मिथ्याल) वट रह है। शरीर पर पेश भूषा माविकी
बाहरी सभ्यता घट रही है और प्रतरात्मामापति, पामरता,
स्वार्य, शटता, और शांति र नित्य नये रोप जिपट र पात्म
भावना भूलान वाना मिथ्यात्व का महा रोग वर्तमान में बढ रहा
है । ऐसे महारोग म से बचने के लिए सम्यक् दृष्टि निरतर यत्न
करता है । मिथ्यात्व की जड बोध मान माया लोभ और राग
द्वप पर जगती है । और सम्यक्त्व की जड क्षमा विनय साना
मतोप एच समभाव पर लगती है।

मिथ्याली निन्य विज्ञान साधन और अपनी बावश्यका
बढाये जाता है और समष्टि अपनी मावश्या शरीर रोगवन
घात जाते हैं प्रमश अपना जीवन सादगी से चमार सपने
मभ्यत्तवरल की रक्षा करते हैं।
३~प्रपिरति
मात्म स्वरूप में विशेष रति पाना रस होना सो विरति और
उस पृशि से उदासीनता का नाम विरति । जय सफ ात्मा की
प्रतीति न हो वहाँ तक रितिपना को नहीं सकता। शात्मा
अमर है, शानद का भण्डार है,ऐसाभनुभव नहा यहाँ तक इन्द्रियों
के विषय माग प्रति उदासीनता होने नहीं पाती।मात्मानुभव
हुए मिना प्रत प्रत्याख्यान की इमारत टिक नहीं मकती । तिने
प्रमाणा में प्रात्मानुभन पीढ़ता होती है उतन प्रमाण में अन
प्रत्यारयान में बता रह सकती है।
भात्मा म मिथ्यात्व का शहा जब तक महान उपदशों
की भी असर नह होती। रेती की नींव पर मकान ठहर नहीं
सकता, वैसे ही मिध्यात्य शमिना त प्रत्यारयान टिक नहीं
सकते। मिथ्यात्व भाव दूर किय बिना घोष दमा लोहक साथ
लक्कई चिपकाना है अथवा त प जइट पौधना है।
विना मात्मानुभव थे प्रत प्रत्यास्यान कुलमयादा ज्या
लोक रूदी से पाल जाते हैं। मत प्रत्यारयान शरीर का घम नही
है परन्तु भारमा को आंतर स्थिति बताने वाले हैं। येष, भाषा,
मान और विद्वता सच्चे त्याग के लक्षण नहीं है।मांतर वासना

हा नाश हुए बिना कोई मप या अवस्था याह्य रूप धारण की
वाय, यह दयी हुइ अम्निया उपांत मान ई, निमित्त पाकर
रसका पुन उदय हाता है।
जन प्रत्यारयान की प्रसर जीवन की समस्त प्रतियों में हा,
नही त्याग व्यवहार सत्य है। यदि प्रत प्रत्यारयान की असर जीवन
पर न हो तो व मतादि प्राय सत्य नहीं हो सकते । त्याग प्रभाव
म मानव मानवता का त्याग कर पाशवता प्रकटाता है। व्यों ज्यों
त्याग की मात्रा चढती है त्या त्या पाशवता का नाश होकर मार
वना प्रकटती है।
परत्व, मनुष्यत्व देवत्व, शत्व मादि में जातिगत फ्क नहीं
परतु उपरोक्त भिन्नता त्याग विकाश पर ही है।
भोग भोगने के लिए मानव भव योग्य नहीं है, कि मनुष्य
में मारा सार विचार ने की शक्ति है । अत नि शक हार भोग
नहीं भोग सफ्ता । भोग रसिक मनुष्यों को स्वतम ( स्वछन्द
और नि शक भोग भोगने क लिए पशु योनि म पुरा जाना पड़ता
है। वहीं उनकी साक्षसा पृण हाती है। तियेच योनि में शनि
दिन, एकान्त अनकात, इष्ट-अनिष्ट और माता यदिन पुनी पिता
पुन या माई फमद जान विना नि शक हो भोग भोग वर मानय
मन में रही हुई अपूर्ण विषय वासना को पूर्ण करत है।
विषय वासना का सकल्प मा (प्रथम इन्छा) द्वारा जीव
उचित दिशा म, उचित जीवायोनि में जम धारण फरक विषय
वासना का सकल्प पूर्ण किया जाता है।
त्याग के अभाव में मनुष्य को प्रथम वासनाओं की प्रबल
इच्छा होती है और भौगोपभोग किस तरमत है।
~

भोग की वासना पूण करना लिए मृत्यु ५ बाद पूर्ण पशुवा (पशु योनि ) प्राम करना है। त्याग प्रत्यारयान फ विना का भोगी मानव स्वार्थाध होता है वह कुटुध समाज या देश का कल्याण पर नहीं सस्ता । कुटुम की प्रति पाल लिए भी तप और भ्याग की मावश्यकता होती है । मात पिता स तान लिए अनेक कष्ट उठाते हैं, अपना मवस्व दवर स वान की सेवा करत है तो वे भन्छे माँ बाप माने जात है । भादर्श नागरिक कहलाने क लिए भी सयम की परमा वश्यक्ता है। विश्व की नटिम भी गिना संयम का अच्छा नागरिक पच्छे मात पिता युटुम्मी या आदश त्यागी साधु समझा नहीं जाता । वतमाम प्रजा विलासी व माज शोक में मानने वाले मां बाप को मा राप या राजा को राजा मानने भी तैयार नहीं है।" जितने प्रमाण में संयम की मात्रा अधिक होगी उतना ही अच्छा गृहस्थ या प्रादश त्यागी कहलायगा। मच्छ होने के लिये साधु था ससारी हर एक को अपनी स्थित्यनुमार त्याग और प्रत्यान्यान की भावश्यता है। सयम धृत्तिवाला सुन्दर गृहस्थाथम धमा सकता है, चाहे वह राजा हो या रफ, सभी को सयम वृत्ति का शरण लेना पड़ता है। मयमी जीवन के प्रभाव में साधु जस अपन पद से च्युत होता है वैसे गृहस्थ भी अपने पद से पतीत होकर गृहस्थाश्रम फे, राज्याधिकार के और माँ बाप क पवित्र कर्तव्य से च्युत होत है । योग्य मा बाप होने के लिये पशु पक्षी भी अपने सन्तान की प्रति पालना स्वय भूस दुस सहफर भी करते हैं। त्याग ही इस लोक एव परलोक में परम सुख का रथान है।

(६७) ४-प्रमाद। मामा की मान्यतर भवम्या स्वाभाविक शृद्ध उपयोगमय है, इसस विपरीत स्वानुमय से चलिन स्थिति का प्रमाद कहा है। करकर में प्रमाद करने वाले घोड़े या सिपाही को पन्दूक से डा दिय जात है।ता प्रात्म धर्म में प्रमा- करने यालों की क्या दशा हो ? पाश्वमणी का मोह साथ ममागम करने में क्षण मान का प्रमाद क्रोड़ों का नुकसान करता है तो माम धम रूप पार्श्व- नगी समागम में प्रमाद होने से कितना नुकसान हो ? धर्म काय प्राज नहीं कर मन करने वाला प्रमादी प्रात्म धम को सदा के लिय यो दता है और कल के बदल में धान कान से माम धम की मनन्त काल जिय रक्षा होनी है। प्रमाद दशा में कर्तव्याकतन्य का मान होने पर भी प्रमाद नश में प्रकर्तव्य सेवनहाता है। मानर प्रगति मे प्रमाइजैसा प्रक्षित कर शट भयकोई नहीं है । मनुष्य से प्रमाद दूर हो तो परमात्मत्व प्रकहा जाय। प्रमाद का नशा इरादा पूवक कतव्याकतन्य का भान भूला देता है। प्रमाद हा वर्तमान सभागों में सतुष्ट रह करें माग बढन में पायक है । प्रमाद ही प्रगति पथ में बना बाधक सनाह देता है। जीव का भतिक पतन करने क लिय प्रमाद अपन अनेक मिर साथ माता है और महान पतन करता है। चार विक्रया (स्नी, सान पान, देश, और रान सम्बन्धी गा), चार फपाय (कोप, मान, माया, मोम), पाप (इद्रियों क) विषय (स्परी, रस, गंध रूप, शब्द), निद्रा, स्नेहादि प्रमादप भनेक मिन है।

(85)
विश्व में कोई तत्त्व ( पदार्थ } स्थिर नहीं है । समस्त तत्व पूर्ण
वा से गतिमान हो रहे हैं। इस परिस्थिति में प्रारमा यदि अपनी
प्रगति न फर तो उसका पतन होकर अपने मूल स्थान नरक नि
गोद में जाता है। प्रमाद पतन की और बेग से ले जाता है।
माद दशा में नरफ निगोद की वासना मधुर मानी जाती है ।
प्रमार फकारण पिशाचिनी भी अप्सरा मानी जाती है।
आरोग्य धन का प्रय रोग का पढना है, वैसे स्वग या मोर
प्रभाव म नरक निगोद की और पदापण होते हैं।
प्रमाद और मदिरा मे कोई फर्क नहीं है। प्रमाद की असा
धीर २ अप्रकट और गुम रीत्या होती रहने से मनुष्य की समझ
नहीं पाता, परतु मदिरा का परिणाम प्रत्यक्ष होने से लोग उस
सावधान रहते हैं । शराब के नशे के लिये सावधानी का समर
निकट माता है, जर प्रमाद करने वाला सावधानी फ समय क
अनादर करता है।
.

५-जान व समकित ज्ञान-चन्द्रम्य तथा तारे लासों मील उचे दूर होने पर भी इतना प्रकाश दते हैं, तो मान का प्रकाश कितना अधिक हा यह सहज समझम भा सकता है । चन्द्र सूर्यप्रकाश का सामान्य घदन तथा चूना भी दवा सकती है, परन्तु भात्म ज्ञान का प्रकाश दाने कोइ भी समर्थ नहीं है | ज्ञान दशा प प्रभार में स्थावर विकन्द्रिय और अमानी नी जैसी दयापात्र दशा सज्ञीको भी हो जाती है। जिसय पास पाश्चमणी है यह मेरु जितने सोने ५ पहाड का भी पत्थर तुल्य मानता है, वैसे ही ज्ञान हाने पर दय व मानव के उत्कृष्ट भोग भो रोग तुल्य समझ जाते हैं । जो ज्ञानी हाता है वह आरमा में रमण करता है। बिना ज्ञानका मानव चमडे का मनुष्य जैसा प्रज्ञ माना जाता हैं। रसायण शास्त्री विविध प्रयोग न करे तो उसका ज्ञान निरथक हैं, वैसे हानयत् प्राचार न हो तो मान की कीमत ही क्या ! रल्व क पुल नीचे होकर क्रोडों मण पानी घह जाता है। किंतु पुन को विन्दु मात्र स्पर्शता नहीं है, वैसे ही चिना प्राचार का ज्ञान लाम- दायी नहीं है। सूर्य प्रकाश प प्रभाव में वनस्पति व पौध मुग्मा जाते वेस ज्ञान के प्रकाश क प्रभाव मे प्रात्मगुण प पौध नष्ट होते हैं शान क प्रकाश द्वारा प्रारमगुण प्रति समय अधिकाधिक पढ़ता जाता है। ज्ञान प्रग्नि तुल्य है । जैसे अग्निप्रपथ्य को पथ्य और प को पक्व यनाती है, वैसे ज्ञान प्रतिकृत सयांगों को मनान विषम भाव को समभाव मनाता है। ।

करता, जैसे दौडना जैसे (१००) शरीर यम की भपक्षा इंद्रिय वन में और इद्रिय वन मे जान थन में अधिक सामर्थ्य और मानन्द। इसीनिये सत्यक्षा शान को भाचार (चरित्र) में रसने क्षणा मात्र का प्रमाद नहीं सुपातुर जन प्राप्ति में दावाना देय कर यहां स दूर न जान पाना पंगू जैस जज कर भइम हो जाता है, घेसे HIR मुनव वर्ताय (चरित्र)न करने वाला हानी हाल पर भी सद्गति का अधिकारीन हा साना मध का निर्धारित स्थान पर पहुँचन म असफल होता है उसी प्रकार मान मिना की निया भी सफल रहती है । ज्ञान और विया मोक्ष गति रूप रय दो पहिय तुल्य है। समकित--चौथा गुण स्थान (मम्यक्त्य) घथात् श्रत रात्म भाव भाम मन्दिर का गर्भ द्वार है। जिसमें प्रवेश करय उस मन्दिर मे वर्तमान परमात्माभायरूप निश्चय दव (निजात्मा) के दशन किये ना सात हैं, जैस कैदी येद खाने म चुदने की नित्य चिता करता है और अपन सावी दिया स सदा उदासीन रहता है येसे समष्टि प्रात्मा अपन प्रापको संसार का कैदी समझ कर समार से मुक्त हान की भावना से भोग परिवार में अनासक्त बना रहे। पामी पर लटकने नयार यक्ति की अनाम मनोदशा समारम्धित समदृष्टि की हाती है। पुष्ट गेगी रोग मुक्त होने में जितना प्रयत्न शीम होता है समदृष्टि जीव धर्म क्षय होने पर्यन्त इसमे भी अधिक प्रयत्न शील रहता है, आराम की नींद नहीं सोता। समष्टि को अपनी दह पर भी ममत्व नहीं हाता तो अन्य किस पर ममात्र श सकता है ? राग द्वेष क प्रवन साधनों में भी ममपि पडोम रह ! सम-ष्टि की व्यवहार प्रवृत्ति में भी अलौकि का हो। दह धर्म की तरह प्रात्मघम प्रत्यक्ष और अनिवार्य प्रतीत हा वन समकित प्राप्त हुमा मानना चाहिए । राग द्वप एव मोह का नाश न हो वहाँ तक समदृष्टि को चैन नहीं होता। ममदृष्टि को वीतराग सुख य अलावा शेप सप दुम प्रतीत होता है । समदृष्टि देह मय नहीं किन्तु पात्म माव मय होता है । दह मय दशा है सो मिथ्यात्र दशा है। ६-पच महाव्रत १ महिंसा- अहिंसा की भास पास १०० कोसों में सममाव पैलता है । अमिक क पास पूर प्राणी मी दयालु बनता है तो समझ शक्ति पामा मानव बेर वृत्ति को भूले जिसमें आश्चय ही क्या ? जितने अश में समदर्शिता हो उतने ही अश म अहिंसा और विषम भाव में हिमा है। अहिंसक समदर्शी पत्थर का उत्तर गुजाब से दवा है। विषय कपाय का विजय ही अहिंसा व तप है। हिमक, महित करन वाल का मी हित करने का प्रयत्न करता है। हिंसा अपनी वृत्ति नहीं छोडता तो अहिंसक जीव अपनी दिसा वृत्ति क्या द्रोडे ? मानव पूर्ण रूप से अहिंसक, पूया भमान न हा यहां तक वह पृणा मानव नहीं है और जितनी अपूपाता है उतनी पशुता है। ना की डोर से भी हिंसा की टोर सूक्ष्म है । हिंसा पिशाच वृत्ति है । और अहिंसा परमात्म त्ति है। समभाव स स सहना भहिंसा का राज पथ है । कृविचार, दोप दृष्टि, रिचार से उत्तर दना, हिमा है । किमी पर भति सत्ता स्थापन करणे माता मं चलाना भी हिंसा है पर लघुता व स्वप्रशंसा भी हिंसा है। निज मान को छोड कर भी शत्रु का मान बढ़ाने में हिंसा धम की रक्षा है। अहिंसा धर्म की रक्षा थे लिये अरण्ड जागृति रखनी चाहिए। अहिंसक को श नहीं होत "शठ प्रति शाल्य नहीं, परतु सत्य 'कुयात्' अहिंसाप्रर्थात् विश्व या पी प्रेम,पुत्र पुनी मपराध निना शतक माफ किये जाते है वैसे भहिंसा पुरुप विश्व को अपना मानकर सब अपराधों की उदार भाव से क्षमा दव । अहिंसा के पालन में अत्यन्त धैर्य और शीय की पावश्यक्ता है। हिंसा समझ में भाव तो उभय लोक मे वह चिन्तामणि रत्न तुल्य सुख दता है। किसान खेती ५ विकाश के लिये, वर्षा क पानी प्रहार की 'सहर्ष झेलता है। बसे हिंसफ अपनी खती (महिसा) की प्रगति प लिये समस्त प्रकार प्रहारों को सहर्ष मेले । कष्ट भोगने वाले की अपक्षा कष्ट दने वाले को अधिक कष्ट सहना पटता है। महिंसा प्रत का भाराधक किसी किसी निमित्त से अधुता नहीं करे। जीयन क भोग स माता अपनी सन्तान की रक्षा करती है, वेस पहिसर विश्व माता धनकर अपने जीवन भोग से विश्व की रक्षा करें। भहन्ता का सर्वथा नाश ही हिंसा है। शत्रु को भी मुसी दसन की भावना ही सत्य अहिंसा है। वैरियों को वश करने का सर्वोत्तम शख हिंसा ही है। सत्य- हजारी सूची प्रकाश से सत्य का प्रकाश पिशप है। और लामों राहुओं से अधिक अन्धकार असत्य का है । मन सद्गुणों का सत्य में और मब दोषां का भसत्य मे अतर्भाव हाता है। निसमे प्रकार का प्रात्यतिरु नाश हुमा हो, वही सत्य मुर्ति ।

। हो सकता है। सत्याचारी-सदाचारी सदा नम हाता है। यह अपनी रिया प्रतिदिन सममता जाता है । विचार वाणी और वर्तन म सत्य हाना राहिए । सत्य समुद्र समान है। उसमें समस्त गुण रूप नदियां आमिलती हैं। प्रत्येक श्वाच्छोछनास म सत्य का समावेश रहना चाहिए । जहाँ सत्य का वास है वहीं परम भान है। निन प्रशंसा से प्रसन्न हाना मी मृपावाद है । परभाव वाली मापा याजना निश्चय से असत्य है। स्वस्वरूप में स्थिर हाना निश्चय सत्य है । भात्मा को स्वभाव स चमित करना निश्चय म सत्य है। अपने गुणों को प्रकाशित करना मृपायाद है । सत्य भ्यय विना मानव का जीवन पशु तुल्य प्रचोय- भस्तय प्रत पालन करने वाले को बहुत उम्र विचारशील यन कर अति सावधानी से रहना चाहिये। जैसे रोगी अपना रोग घदान का तहदिल से यत्न करता है, उसी प्रकार अस्तेय मत पाभाराध मपनी प्रावश्यकनाथों को घटाने में प्रयत्नशील रह । जरूरत से ज्यादा अन्न, वस्त्र, मकान, धन या अन्य वस्तुमा का समह रसना चोरी है। विषय पाय का सेवन निश्चय से चोरी है । स्त्री पुरुष मगोपांग विकार दृष्टि से दसना भी चोरी है। पोर जबरदस्ती से धन लूट जाते हैं जिसको लोग बुरा सम मन हैं। माश्चर्य है कि भज्ञानी मात्मा आत्मिक धन लुटाने क लिये रिपय कपाय चोरों को निमन्त्रण दत हैं। प्रयचर्य- प्रात्मा शुद्ध स्वरूप में विचरने को ब्रह्मचय कहत हैं। स्थात् जीरन स्पर्शी पूर्ण सयम पूण भाश्रव निषध यह प्रहाय है ।

प्रात्स स्परूप विचार असावा सय व्यभिधार है। पाव इद्रियां के २३ प्रकार विपयों में प्रासशिमोन्यमिवार है और इन्द्रियों प विषयों का सयम, यह शीज है । "समभाय सी शीश और रिपम भाव सो व्यभिचार प्रह्मचर्य का अर्थ मात्र शायिक पवित्रता रमन का करना पाईप लिए रुपये का यमना है। सदाचारी मनुष्य अपनी बी के साथ भी भोग दृष्टि नहीं ग्यता। मनुष्य के गुलाम बनो पर विषयी मन के गुलाम मत बना" नितशय मानव की सबसे विशेष मूल्यवान संपत्ति ब्रह्मचर्य है । जैसे फूटा लेम्प हा सोतम नीचे से दुन पाता है अन्यथा ऊँचा पढ़ कर प्रकाश दता है, वैस ही प्रमचय + अमाय में भारमतज प्रारम प्रकाश का नाश होता है, और उस पालन से प्रारम तज तथा प्रारमशक्ति की पृद्धि होती है। व्यभिचारी पुरप को पशु कहना पशु का मान करना क्योंकि पशु प्रकृति के प्रम मयम म्यता है। इतनी संयम वृत्ति मनुष्य नहीं रखता है। -- एक पतन मजा मांस, हड्डियों, चमड़ा, यीय मजमूत्र पीप भादि भर हुय है, उस पर थूकनमें भी प्रचि होनी है। इन्हीं पदार्थों का समूह स्पश्री पुरुष शरीरों की रचना है । उस पर ज्ञानी समझदार विषय जन्य राग दृष्टि कम रख परिग्रह- माह राजा कहता है, कि मैन अपनी समस्त शनियाँ परिग्रह के पीछे सर्च की हैं, परिग्रह के पीछे मेरा समस्त सैन्य है।

परिग्रह बनानक लिये मेरे समस्त सैनिक नोभी को प्रेरणा करत
और पद मामी पुयोल की तरह धन के लिये चारों दिशा में
मरना फिरता है।
कदि व लहसुन की खेती में कपूर पशर और कस्तुरी का ख.
हाला बार और सुवर्या की भारी से दूध सिंचन किया जाय तो
भी वह अपना स्वभाव नहीं छोडेगा। वही दुगन्ध मय कादय
महसुन होगा उसी प्रकार प्रनीति स प्राप्त धन का कोई विचार
शीम पुरुष भी शायद ही सद्उपयोग कर सा ।
श्रीमत हाने में या थीमन्त पुत्र हाने म हा मानते हा
परतु वह धा कितने पाप से एकत्र हुमा है, उसका विचार करत
हा ? दुनिया म धन कर चुगन चुगने भारम गुण के हीर
भाग क्या? धन का नशा मदिरा से भी अधिक भयकर है
उस भयकर नशे याला (धनवान ) क्वचित् धर्म र सन्मुसरह
सकता है। परिग्रह से ज्ञान के स्थान में प्रधान की, घमक स्थान
म अधम की और मोक्ष प स्थान ब ध की प्राप्ति हाठी है । बुद्धि-
मान् सुद को धन का मालिक नहीं परतु धन का हम्टी मात्र मा
नता है। और अपनी समस्त सम्पनि काविश्नहित र जियभद्रस
अच्छा उपयोग करता है । पैसा मनुष्यों के बीच भद भाव,
विचार बड़े करता है। विषय विजास में व्यय हाने वाला धन
किसी जुल्मी राजा ने दड रूप गले मे बांधी हुई सुनगा की शिना
तुल्प है । पैसा मनुष्य प्रेम का व मानव धर्म का नाश कराता है।
धन का उपयोग विकाश के मार्ग में होना चाहिये । पिससे प्रात्म
धम का विनाश न हो। इस लिय निन्य सावधानी रक्लें।
।

- ७-मान । मौन धारण कर जो अपने जीवन को कछुए की तरह गुप्त यना नेता है, वही मचा साधा है वह विश्व के लिय महाउए । कार है। इस प्रकार जान से माप फर मौन धारण करने वाला, मत्य मंचाला जीवन मुक्त सस्था अभाव रहित सम्पूर्ण शुद्ध “वक्तित्वशाली महत्त्वाकांक्षा रहिन हा यही विश्व का दित कर सस्ता है। मात्मिक योग्यता रिना शनचार रिये हुय प्रकाशित हाती है । वोजने की अपक्षा मौन विशेष प्रभावशाली है। पचन की शक्ति मयादित है और मौन की शक्ति अमर्यादित है। मौनी स्या धीन है, श्रार वामन वामा पराधीन है। मौन कार्यकता सरस घडा सफा सका है। प्रत्येक काय मौन में विशेष प्रकाशित और प्रभावित होता है जो नम्र है वह गुपचुप अपना काम कर भी मौन रहता है, और अभिमानी अपने थोडे काय का बड़ा बिगुल पृकता है। मौन मा यात्म पथ पर लेजान वामा पथ प्रदशक है। पांच इन्द्रियाँ मन और चार पाय, एमे दश का मयम पूर्वक मौन धर्म का पालन करें। मौन प्रन का भङ्गीकार करने वाला सब क्लेशों से दूर रह कर परम शांतिमय जीवन पिताता है।

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, समय नहीं है। ममाज और सरकार पे नियम नोड़ कर मनुन्य भग सकता है दिप सकता है, किन्तु कर्मों के निया को तोड़ कर वह कहीं नहीं जा सकता है। उसे अपने किए कर्मों का पाल मुग- तना ही पड़ता है । भर कम करने के लिये फर्म के नियम बाध्य नहीं करते, इच्छानुसार कर्म परो। सुसप योज पोगो या दुःख प कम तो कुदरत क नियमानुसार गये हुये यीज की तरह फस दते रहगे । कम किमी पर दया या मरहमानी नहीं करते। वसे मिर्फे न्याय और सत्यप्रिय है जिससे किसी की मानीजी या प्राथना नहीं सुन कर अपन प्रचलित नियमानसार तीन लोक में अपना शासन प्रमतात है। राग ट्रेप का परिणाम सो भाव फर्म और मुगलों का छात्मा य" माथ मिजना मो द्रव्य कम है। प्रथम भाव फम भोर उसक परिणाम रूप द्रव्य कम है। कर्म परिणाम राजा में समान है। उसकी माझा से जीव पौरासी लास जीरयोनि में भटकत है। कर्म मदोन्मत्त राजा है, वह किसी को प्रार्थना नहीं सुनता । कर्म अपने भरल नियमानुसार किया करता है । कर्म प्रार्थना नम्रता क्षमा प्रादि किसी तत्व को महत्ता नहीं देता यह अपना कार्य करने म मस्त हैं । कम राजा दुग्गियों व दुग्य का सुनने में हिरा और दसने में भन्यवत् रहता है। कर्म राजा जगत के जीयों को हण तुल्य मानना है, उसमें या नहीं है, परन्याय है। न्याय प रिना यह एक पैर भी नहीं रखता, यह निष्पक्ष न्याय करता है ! कमे की आज्ञा का पालन मयको मप्रमत होकर करना पडता है इस लिये अपील का स्थान नहीं है, यही उसकी अन्तिम कचहर है । उसम दिय हुए फैसले को भी कि ही सयोगों में कभी भी नई यदल सकते। पर्म की कचहरी मे रिश्वत था सिफारिश नई पलती, सायाफ्ता शिक्षा भोगन योग्य है या भयोग्य, उस

(108)
है या नहीं, सह सपगा या न, उसका लेश मात्र विचार
पिता मजा परमा देवा ।म राजा मानना है शिपिमम
पिन कौनिधी, मर्म भोगन की शपिहानीदीपादिये।
हाम्म ब्याज महिन पुधना दी पाहिए।
मि काराय पिशान शिरिष स्थान में विविध रुपम
पिनो करना है। कम विविध प्रार कप पारा रा
यों को मुस्खा गया दुसी बात है। विविध जीवयोनियों
पंचमरपारण कराये जाते है। यदरिय फम की भारद्वारा
को नचान को रणभूमि मोश मिवाय ममित मसार म
इम काही राम।
कार और उमर खाप को पृय नहीं पर सपत, मही
मोर तसा परिणाम कोयर याज्ञा मागे
न में भार उसका परिणाम मरिष्य में है। बनमान भून
भषिप्य एक दी का सीन मिन्न टु ६, सदी कम
कारण कर्म भोर मच परिणाम या प्रतिष
असे गाड़ी मेंहदानुमार पम देगी ६२ पात पि
rs ,second Third & Inter) में मनुष्य प्रेरना है यम ही
मनुष्य और नियंच गोदामार Pिक भी जामफ्नी
ही पहुच मान है, कामाचार न करता मान्द्रा
पर्वा नाननी मामा की जाती है और यह पाया
है। प्रतिगा उस गीतकी मोर गमन हा हा, पशु
यशजीवात्मायापीगगन हिमापामानमा नहीं है।
मिरजीक धिरहमान्य गनिमत्राने पोरकासमध
सनामिनाम पायदम साहन

हैं, वसी हो गति मिलती है । प्रज्ञान योग से मांगन का (चाह
का) जीव को लेश मात्र भी भान नहीं है । श्रात्मा की मर्जी कि
रुद्ध एक भी प्रवृत्ति कराने में कर्म मप्रथा असमय है।
मनुष्य निमा लिए याग्य न हो वैमे सुप या दुख उसे मि
नहीं सकते उसकी याग्यतानुमार ही सुख या दुस मिलते है
शूली या फांसी पर चढन वाना तोप सामन सड़ा रहने वाम
शमशेर स फटने माला, भग्नि म पानी में मरने वाला अपE
कृति का फल पाता है । उसका बाय हुए बीजका पश मिनरहा।
स्वय किय कम भूल नाय या कुदरत 7 घर में अन्धेर सम
कर चाह जैसी प्रवृत्ति कर परन्तु कर्म (पुरत) की यहिया में का
मात्रा का भी फरक नहीं पड़ना । जोपसय अपन किय कर्मों
अध, पहिर, लुल, गृग, काहिये श्रादि यन है । और ये
रह है, इनको सुरप सिराय भय कोई नहीं नाता। अपने
याग्य कर्म न हा सा इन्द्र भी यान वांका करने में समय नहीं दे
कर्म का उदय होना कर्म की पक्व दशा है और वह
मामग्री में से विकृति रूप फाल उपजात हैं । योया हुधा उगा
नया कुछ नहीं पना है, न बनन वाला है। होना था सो हुन
नया पुछ नहुमा है। कर्म कठोर दढ दने बाजा कोई दव
है, कुदरत की कानून मात्र है। मन्द्र काम का बदला इनाम
घुर काम का दण्ड हम स्वयं मांग लेते है । अनुकार्य स्वय सुरु
नुभव करात हैं और बुर काय दुसानुभव ।
हमारे इनाम व शिभा के उत्पादक हम मुद ही है । प्रार
अपनी वामना को तृप्त करने के लिये तरस रहा है। और स
तक याग्य स्थान में जाकर क्षुधा तुम न हो यहाँ तक क्षुधा

। (१११) वासना निवृत्त नहीं होती। स्त्री पुत्र और धन की उपादि किसी शतान ने गाने म पदिी नहीं है किंतु जीवात्मा प्रेम पूर्वक ग्रहण सरता है । यसको भविष्य की गति मी प्रम पूर्वक स्वीकार की लगती है और सहर्ष इसम पदमा भी दिया जात है। अपनी इच्छा वेगद एक भगुल्ल भी भाग यढाने में समर्थ नहीं है । दुगति भी नको पथरदस्ती से पेंच नदी जाती है। जीगारमा स्वयं दुर्गति पलिय जाने वाले कारणों की तथा साधनों की सुशामद करता और उमर योग्य सामग्रा एकत्र करता है । तब उसको उस पनि म ज नाया जाता है । जीवात्मा की शानची दीनता, प्रार्थना बार बहुत काम की भावना पजिनार्थ दुगति का ममागम होता है । येस ही दर गति का भी । भगिपर अगुली सी जिस म पन्न-बाला हुमा और पीडा भोगी उस में अग्नि का दोप नहीं है। इसी प्रकारजम में प्रिय वैस ही न मिले दोप जीपका न किम का। स्स्य शिक्षा पाता है । छाला अग्निम हायन राम ने जिग सारधान करता है ये कर्म भी प्रनि समय सावधान पनात हैं। व ग्राफाश मोप( Search Light) की तरह उपकारक है। कम दया करय विषयी को रोगी बनात हैं। अन्यथा अधिक पार करय पापी दुगति में लायें, पनगिय व पास में दीपक उठा लना इसपर उपकार करना है इसी प्रकार विषयो को रोगी ना कर रिपयों के अनिष्ट का भान कराने में उपकारक है। जना शील चार बडी से शर्माता है विश्व के समस्त प्रमग (बनार) कर्म का माक्षात्कार बताते है । शरीर का मल भी दुपदायी है तो प्रात्मा का क्म मैन कितना दुखदायी हा मक्ता है ? शरीर रूप अर्तन में डाला हुमा (साया हुधा) अन्न यात, पित्त, स, लोहू पीप और मल मूत्र प्रादि सप्त (११२) बनता है। वैसे एक समय में बंधे हुए कर्म साट प्रकार में पट जात है। जीव रूप भार वाहन पर्म हप भार भर कर चौरासी जाग्र जीवयानि में प्रनत कम से परिभ्रमया करते हैं। जितन फर्म अधिक उती काया सकुचित, निगोदधत् । ज्यों फर्म क्म हात जात हैं, या फाया की संकुचितता दूर होती जाती है। जेस-प्रत्यक स्थावर पद्रिय तइद्रिय चौरन्द्रिय पद्रिय शादि । निनन भात्मा कर्म स परात्रय पाते हैं और सयन यात्मा कम को पराजित करत हैं। उदयमान कर्म निमित्त मिजात हैं, परन्तु वसा करने के लिये मात्मा को प्रेरणा नहीं करते । यदि प्रेरणा परे तीमात्मा के पास आत्म सामर्थ्य ही न गिना जाय। निमित्त की सत्ता पे प्राधीन होने वाले का पतन होता है । निमित्त प्राधीत समात्मा नि मित्ता को फक देते हैं। और निरज प्रात्मा उस प्राधीन हाते हैं। In समय का समन कर्मों का विनय अनन्त समय फा विजय है। और एक समय की हार लम्बी हार है । बड़ के चीन का बट पदा होन र पाद विजय दुर है। वतमान में ता मात्र बड़ के बीन का पिनय करना है चीज जैसे छोट कमी से हारन वाल को पुन बड क साथ युद्ध के लिए तैयार होना पडेगा । काँ निमित्तों से सानी नहीं सजचाता, मात्र अज्ञानी मनचाता है। ज्ञानी कम या। म तृण की तरह उडा करता है और क्षाना हमेशा रियर रहते हैं। प्राश्चय की बात है, कि भूतकाल कर्म यतमान में भोग बात है फिर भी नय कर्मधन में प्रमाद नहीं किया जाता । म ५ नियमों का विश्व समझयान ममम तथापि ये अपना शासन विर पर चला रह हैं। और विश्व को उसके प्राधीन होना ही पडता है, जन्म मरण बन्ध हुए कर्मों को भोगने क द्वार है। और उसक द्वारा एक गति में से दूसरी गति में रोजा मफत है। मकान योधन में जितने मुश्किली है उती बाडने में नहीं, धैसे ही कर्म धांधने में कितना फष्ट है उतना तोडने में नहीं। यानक माँ बाप को हराये जिससे मां पाप भय नहीं पात। वैसे कमे हमार वाला है हमने उनको जन्म दिया है ऐस योगों में ज्ञानी मारमा अपनी कर्म सन्तान से भय नही पाप । फम बांधने में अनन्त बाल गया तोड़ने में इतने समय की जरुरत नहीं है, क्यों कि प्रारमा कम से अन्त बलवान है। फर्म वन्ध दायने में नहीं पाता किन्तु विपाक ( कम फल) अनुभम भाता है। जैस दवाइ शरीर में क्या दिया करती यह दराने में नहीं माता परन्तु उसका परिणाम जाना जाता है। इन माँ से सर फर्म बदनीय (फज दन वाले)है। अन्य कर्मों का चेदन लोक प्रसिद्ध रूप से नहीं होता यंदनीय कर्म का पन सुप दुस लोक प्रसिद्ध होने से बदनीय फर्म प्रयक् गिना है। शानावरणीय, शनावरणीय मोहनीय और ये चार घाती कर्म है। शेष पारों अपातीय हैं। घाती कर्म का सम्बन्ध प्रात्मिक गुण के साथ है और अधातीय फौ का सम्मघ शरीर साथ।घाती धर्म जितने बडे हैं उतने ही यत्न पूषक नाश होने वाले भी हैं। पाती कर्मों या क्षय होने के बाद अघातीय कर्मों का क्षय होता है। पाती धर्म यनों से नाश होते हैं । 'ज्ञान' नहीं माता हा तो परिश्नम से सीसा ना सकता है.'दर्शनावरणीय निद्राभाती होतायत से उडाइ मासाती है । 'मोहनीय कपाय का उदय हे तो भापना से थाह (११४) भावना परन से पायों को रोक जा सकत हैं । पुरुषाथ से अन्त- राय कम का भी नाश हो सकता है । परन्तु अधाती कर्म वेदनीय भादि भोगने ही पडत है । भावना प्रादि से वेदनीय कर्म नष्ट नहीं हात । भायुष्य मे घट घढ नहीं हो सकता । नामकम-शरीर रूप रग तथा सरूप में भी परिवतन नहीं हो सकता। गोत्र कम-नीच कुल में जमा हुमा उच्चवुन का नहीं गिना जा माता । इस प्रकार घाती कर्म का नाश स्वाधीनता पूर्वक शीघ्र हो सकता है, जितु प्रघाती कम तो भोगने ही पड़ते है । पायुष्य कर्म की प्रकृति उसी भव मे बदाती है। शेष कर्मों की प्रकृति उसो भव मे या अन्य भनों में भी वेदाती है। योग और पाय पर फर्म का प्राधार है। किसान सुथार औ हार,मोची,दी प्रादि कायिक श्रम करने वाला मनदूर वगमे योगा की अधिक चपलता हाती है और उनम योग चपलता 4 कारणा फपायों की मदता होती है । जब गद्दी तकिये पर बैठकर माराम करने वाले व्यक्ति या कुर्मी टपल पर बैठ रहने वाले पकोज जन या प्रय अफसरों के योग शरीर आदि शान स्थिर हाते है और स्थिरता प्रमागास उनमें कपार्या की तीव्रता हाती है । ऐस जीनों व कर्म वधम काय भित्रना स पन्ध भिन्नता होती है। प्रदेश में फम की विशेषता होने पर अनुभाग अल्प हो सकता है, जैस आकाश म घने बादल चढ भान पर भी मात्र थोडे छींट हाकर रह जाय वस कर्म भोगने में जैसे चेचक,जोखिनम भयकर है, पर वह अल्प अशाना का फल दररह जाता है । ऐसे रागियों प लिय यागों की अशुभ प्रवृत्ति विशेष और पाय की मन्दता के कारया उस प्रकार क क्म उदयमान होते हैं। इससे विपरीत योग

को मदता भीरपाय की तीम्रता पाल जीववी मधु प्रमेह, दाह
सर पर गुन, मस्तर शुभ मादि रोग होत । निन रोगों
कारण शरीर निरोगदौर और रोगी भयरमास मरणान यदना
और कष्ट मागत हैं।
।
यतमान मयाग (मन पचन और कया) र प्रति पिशयल
दिया जाता है, योnt म सारा प्रहात नहाने दक्षिण मावधानी
रखा जानी है । परन्तु उपार्या की घनता व नीमा जिय,
कपाय रोधक शियल्प बन्न दिया जाता है याग मय पाप
प्राति नियेन दिया जाता है, इसका पाडांसभी पाय पस्य
पापय जिय मा दन में भाय ता समाज तथा सम्प्रदायर्या में
पोप शक्ति मालूम हो। यागों क सयर को सर पायों का
मर किया जाय ताप कम रघदो और त म जीव कम
हिन भी हो सके सफा में मोदनीय कर्म प्रधान है। पायरों
माश सप सप कर्मों का नाश होता है और माँ का नाश
भामा कम रहित स्वस्वरूपी सिद्ध यन सकता है।
ह-वेदनीय।
पदनीय कर्म भयाती है। क्यों कि चाहजमी यदना को ज्ञानी
अपनी समझ कर बदते नहीं है। दुम पास कानश अपमान पादि
भशाता करीयागों में मानी शांति पदते हैं। मादय को निजरा
मानते हैं, सुश होत ६, इसलिए प्रपाती हैं। मयोग का सुरदायक
याद ग्यदायक मानना मोदनीय की सत्ता है।

वेदनीय काल में याई भपना असर दिखाती है, वैसे दवाई
उत्पन होने में हुई पाप वृत्ति प्रारमादि प्रिया भी अपना असर
पहुँचाती है । वेदनीय काल में मममदार पाती है, भनिन्यता
अन्ध विचार पाते हैं और मोहोदय ६ समय सघ मान भूना
जाता है। वेदनीय कर्म का डर विच्छू जैसा है जो खुद भाराम
का नींद सो नहीं सकता, न दूसरे को मोने देता है। वसे वेदनीय
र उदय से स्य श्राकुल व्याकुल बनता है और दूसरों को भी
गभरा देता है।
मोहनीय का डर सप दश सा है । सर्प दश घामा जीव
अपनी वेदना व मान भूज फर घन की नींद लेता है।
उस वक्त उससे नीम प पत्ते का फमापन भी मालूम
नहीं होता । वैसे मोहाधीन जीर मोह में भासक्त पनकर
मोह धर्धक दुखदायी सयोगों को परम मुराधाम समझकर
उस लिए दिन रात दौड धूप करता है और उस माय
मे रोता है, दुप मानता है शाक करता है। प्रज्ञानियों की
समस्त प्रवृत्ति वेदनीय र मयाग घटाने की और मोहनीय क सयोग
बढाने की होती है। बदनीय से मोहनीय की भयकरता अधिक है।
यदि यह समझ म प्राव और बदनीय क लिए जितने प्रयत्न किय
जात है, उतन मोहनीय य मिगने के लिए किये जाय तो जीव शीत्र
मोक्षगामी हो सन । वदनीय योग निरा का कारण है और
माहनीय योग सिफपध हतु मनन्त संसार भरकाने वाले हैं।

(११७)
१०-मोहनीय
हिताहित का भान न होने द वह मोहनीय, शारीरिक रोगक
ऑपरेशन के लिए क्लॉरोफार्म की आवश्यक्ता है, वैसे मोहजय
राग दूर करने के लिए ज्ञान रूप क्लॉरॉफॉर्म की प्रावश्यता है।
घूमने से थकावट हो और थकावट से निद्रा प्रावे वैसे जीनों को
८५ लाख जोमायोनिय भटकने से थकावट लगी है और जीन यहाँ
अपना मान भूलकर मोहनिद्रामें नींद ले रह हैं। मोह अग्नि म
मग्निज विश्व जल रहा है । वेदनीय से माहनीय की
सत्ता पति सूरम और मयकर है। मोह की तीन प्रमजता के
पहाड नीच समस्त विश्व दय रहा है। सफ लिए प्राय ऊची
करने भी समर्थ नहीं है । मोहनीय कर्म अनन्त ससारीत्व कापानक
और रक्षक है। मानव पर मोह का सग पहरा है जिससे वह
अनादि ससार के निज स्थान को छोड नहीं सकता। माह एक है
और जीन अनन्त है, तदपि अनत होकर सभी में प्रविष्ट होता है
भौर अपना साम्राज्य च जाता है। मोह परम जागृत रहता है।
यह क्षणमात्र का प्रमाद नहीं करता वह गिन २ कर सबकी
सम्हाज लता है । उस (मोह) की सत्ता समस्त विश्व म
व्यापक है।
जीव स्थावर से मनुष्य पद तक पहुंचता है इस पातका मोह
को ग्वद मालूम होता है । इसी से मनुष्या को धक्क मार २ फर
पुन जीवसरी स्वस्थान-स्थावर मे ले जाने की मोह प्रेरणा करता
है और अपना बल मानन क पतन के लिये बचता है । मोह को
चिंता है कि, शायद मानव मेरा विरोध करें। इसी से तो मानना
में विरोध की सम्यक् समम माने के पहिले ही सान पान, मिठाई
मना, स्त्री-पुत्र कुटुम्ब ये बधन में बांध कर विषय कपाय में गुलतान...
बना कर
भुलाता है।

।
मोई मानता है कि, भग्नि और परि का प्रारम से ही
नारा करना चाहिए । इस लिए मानव को अगती वय में
ही मोह पसाता है। क्योंकि, मोह भावना और धम
मायना का अनादि धैरहै । मोह परिवार को धर्म
भावना का नाश कि बिना चैन नहीं होता। समाम परिवार का
स्वभाव एकसा है। मोदी जीव महामोहक १९ पापस्थान रूप
सतान का अपने महल में स्वागत करता है और १८ पापों की
निनिरूप धम राज पे सन्तानों से कहता है कि, शाइए, म भाप
को नही पहिचानता। ऐसी परिस्थिति में मोह थोड़ी लालच देकर
धनत काल में हरान हो से काम करावा है भौर भवानी जीव
प्रसन्नता पूर्वक पाप कार्य करता है।
माछीमार धने की नाम से मच्चियों को पसाता है, पैसे
मोहमाद्रीमार पिय भाग की लाजच स जीवों को नरकादिति
में साता है । माह का काम जीरों पे सद्गुणों का नाश करक
दुगुणी बनाने का है । माद नाटक का मनेर है और जीव नाचने
वाला न है । सूत्रधार का साक्षानुसार वह विविध भेष धारण
करता है। येदनीय, नाम, गोत्र औरमायुष्यमादि कर्म का स्वभाव
मोभन्छा और बुरा दोनों तरह का है, परन्तु मोह का स्वभाव प्रति
दुष्ट है उसका दूसरा प्रकार ही नहीं है । मोह मारपक्षी की तरह
जीव पर एकाएक हमला करता है ज्ञानी जीव मोहकीका
मानत हैं । मोहनीय कर्म कमाता, राप सात फर्म भैठे वह बाते
{ मोह मदा शूरवीर है। क्षण भर में विश्व को चकाचौंध कर
देता है।
घाति और इन्द्र को भी मोह स मचाये नाचना पडता
है। राना या यता एक मरों का अपमान करत है, पर मोह का

(११६)
मामान को नहीं कर सकता। लोगमन्य कर्मों को दुश्मन रूप
मानते है और मोह को मित्र स्प, यह प्राश्चर्य है ? त्यागी तपस्यी
और वाणी को भी मोह नवा सकता है। यहुरूपिया की तरह
माद विभिम रूप धारण कर रिश्व को माता है। मोद विश्व
का पाता है। मोहर प्रभाव में विश्व का समस्त व्यवहार
ना होगाया विश्व को चलाने का निभाने का पोषण दने का कार्य
मोर काही। मोह ने यमात् सब जीवों में प्रपना रा जमा रखा
है। महामोह का शरीर विद्या से पना है, जिससे यह दुगों को
सुम मनाता है। मोह का अनादर कोई विरल व्यक्ति हो कर
सकता है।
मोह राणा को पररानी 'महा मूढता' है। सेनापति "मिध्या
दर्शन" है। महामोह ऐसा काप उत्पन्न करता है जो ज्वाला मुरती
को भी मुभा दता है, मेक को भी मधु दिवाव ऐसा महान रूप
पन्न करता है, नागिन को भी मुभाष एसी माया उत्पन्न करता
है, स्वयंभूरमण समुद्र को पिन्दु मनावे एसा मोम पैदा करता है ।
मोहाधीन जीव इजा होने वाली भूमिका पर पसे हुए है।
मोह मय प्रकृति के प्रभाव में संसार विप स्थानों को मृत मय
और दावानल क स्थानों को सुधामय सममना है। माहवारण
और सपना जीवन प्रन्यों के संहाराय पितात है और मोहर
माय मपना जीवन विश्व-सेवा शिर पितात है। मोहा-
पानी का जीवन प्रनार्य जगी या पशु-नीषन से बढकर नहीं
होता । गोद का कारण मर्म इंदी जीवन बिताया जाता है । मोह
ही माफ में अन्य कइयों का माण होताता है और में कान
रस होते हैं । मोहाधी अन्यों को कुपन देता है और स्वयं
REारा एक साय करना जाता है।
-GK

पशु सृष्टि नियमों को दापकर, कुचलकर मपना जीवन नि.
माती है, वैसे ही मोह की प्रधानता के कारण मानव सृष्टिमी
पशु सष्टि तुल्य अत्याचारी बनती है। विश्व की मारामारी-युचना
कुधनी भीषण प्रचाह क्लेश मय जीवन और मन मोहमय जीवन
से ही उत्पान होती है। मोहपा की वासना में मान अपने
आपको फाड साता है। जीनो को मोदमय जीवन और विषय
वर्धक यातालाप फ भक्षावा कुछ भी पसन्द नहीं भाता।
कबूतर और धृहे में भी इतनी सामान्यममम है कि, ये अपने
घातक बिल्ली और कुत्ते से दोस्ती नहीं रखत । इतनी समम भी
जिसम हो ऐस राममदार माह के सयांगों से सदा सावधान रहे।
मदिरा मयल और निरज पर सर करता है, परतु मोह मदिरा
विना परदी भमर कर सकता है । एनिका तिनका मासों
भान रूई को जमा सकता है, वैस मोह जन्य गग द्वेषाग्नि अनन्त
जन्मों को पुन्याई का नाश करता है। मोह की मदोन्मान दशा में
प्रभु पथ को पाप पध और वीतरागवायी को वैरी वचन मानते
हैं। मोक्षार्थी जी को या पात्र मानकर पने (मोह मय) जीवन
को मुभागा मानत । माह की इतनी भयकरवा होने पर भी -
नादि परिचय र कारगा यह भयकरता भूलो जाती है और विपरीत
दिशा मे बहाव होता है। भात्मा अनन्त यज्ञ की धारक है। स्वय
*सा बनना चाह यन माता है, माह की सत्ता का नाश पर
मरता है। सूर्यादय होने पर अनात घर क्षण मानम नाश
हो जाता है स ज्ञानोदय होन पर अनन्त काल की मोह की सत्ता
नष्ट हो जाती है। बिल्ली को दसकर चूहे भग जात है, वैसे ही
भान ये मान पर माइमय घहियो भग जाती हैं और प्रामा
निजान द का अनुभव करता है।

है ( १२१) ११-योग । योगशाम तुडना या मिलना होता है। मामा, मन पागो और दह क साथ मिलकर पदिर भाष को प्राप्त हावा है, उस व्यापार को योग कहते हैं। भारमा म पम प्रहण की शक्ति बोन की स्थिति विशेष को भाव-योग कहत है। भाव योग फ नि मित समारम प्रदशम पारस्प दन (पांचल्य) उत्पन्न होने का देस्य योग कहा जाता है। एमी का प्रात्मा साथ यहोने में योग और कपाय नि- मिच स्प६ मिना पाय का योग धर्म पन्ध का हतु हा सकता परन्तु जहा फपाय हो यहां योग की अनिवायता होती है। समारा दशा म योग छूट नहीं सकता। परमात्मा चाह तो कपाय को छोड सकती है। कपाय से स्थिति और अनुभाग यध होता है और योग से गचिरनी जैसे विषय पाय धर्धक विचार पैदा करता है। महामाइ की निद्रा में विवरूप थक्षु यन्द हो जाते हैं। निद्रा म मानवी जीवन सय प्रसग भूल जात हैं, वैत मोह निद्राम भी पुरय पाप, स्वर्ग ना यध और मोक्ष रिचार भी भले जाते है। नी, पुत्र भौर धन का मोह नहीं होता तो मनुष्य माक्ष दीपक का पतग बनकर अप्रमत्त भाव से उस दिशा में प्रयत्न करता। मोह को भविद्यामय प्रतिनीयां शरीर ह तथापि यह चालक जैसा नानी पूर्ति वाला है । मन त काल का जीयां होने पर भी वृद्ध नहीं है। नित्य नयी बाल्यावस्था जैसा प्रतीत होता है । माह अ- नियको नित्य, अपवित्र को पवित्र दुपद को मुग्यद अनात्म को भात्मरूप,. यां विपरीत रूप अनुभव कराता है। मोह व अनादि जीया दह में जवानी का जोश है।

(१२२) दूसरे पाप काले मालूम होत है, जब कि मोद प हास्यादिपाप सफेद मालूम होते हैं, जिससे उसके पाश मे सनन भी पंसते है। मोह मीठा जहर है। जिससे उस विष को अमृत मानकर जीव शौक से पीता है। मोह के सोमद विचित्र प्रकार फतोफानी लड़ये हैं, उन सोलह बालकों को प्रशानियों ने मुँह लगाकर माडले बनाये हैं। कोष, मान, माया, जोम इन चार २ मद६, यो सोजद पाक कह है। कोष, मान का द्वेष में और माया लोम का राग मे अन्तर- भाव होता है। यदि मोक्ष की गाडी का किराया दो रुपया लगवा हो तो मोहाधीन जीय स्त्री पुत्र और धन क मोह से सवा रुपया ठहराने की कोशिश करेगा। जीयों को धनादि का मोह मोक्ष से भी म धिक मूल्यवान मालूम होता है। दान, शील, तप और भावना मादि मोक्ष में लेजाने वाली गाड़ियों में क्यापि मोक्षाधीन जीयों को उसमें बैठना क्यों नहीं सुहाता! मनुष्य की कमर टूट जाय तो सब भग नीचे झुक जाते हैं, वैसे ज्ञान पे दड से मोह कर्म की कमर तोड़ दी जाय तो सम फर्मों का नीचे देर हो जाय। मोह की सत्ता से बीय अपने आपको पीस कर चूना पनाता है, विमकुल निर्माल्य पन जाता है, जिससे उसको प्रारम मान नहीं रहता है । मकड़ी अपनी बनाई हुई जाल में फंस कर मृत्यु पाती है, वैसे जीव अपने मोह जाल में फंसकर मरता है । मोह से मनुष्य अपन भापको मृत्यु से भी अधिक निमाल्य बनाता है। मोह पे पनाये हुए Bomb से वह म्वय चूर हो जाता है। मोह अग्नि में जलकर वह स्वयं रास का ढेर होजाता है। मोह (१२) क प्रताप से पीव याधना द्वारा धिका हुमा है। मोहमय जीवन श्राप समान है। मोह द्वारा मानी जीव यास की तरह विषय कपाय अग्नि में होम बात है। प्रकृति और प्रदश यध, कपाय योगरूप श्चत पत्र पर का रंग है। विना रंग का घर हो सका है येसे कशय चिना भी योग प्रवृत्ति हो सकती है। अपने सब प्रकार फ योगों से कपाया का मुक्त रस कर उम सध्य, प्रशस्त मात्माभिमुख रसना धार्मिकता का मुग्य लक्षण है। अपनी मनोवृत्ति पाणी और शरीर चेष्टा में जितना कपाय का अरा हो उसे पढ़ कर पहिष्कार करने में प्रान्तरिक जीवन की सार्थकता है। जहां सिर्फ शारीरिक जीवा विताने का भौरमाध्यात्मिक जीवन की गंध भी न हो यहा कपाय का तारतम्य मम्पूया होता है। मनुष्य में से पुद्धि, विचार, विवेक सारासार फ निगाय की शचि घगने में पाये तो वह पशु तुल्य है। जहां तक मारमा- भिभुव नहीं होता यहाँ तक उसकी वृद्धि, विचार आदि शक्तियों उस पशु पनने में साथ देती है और पनु बुद्धि के प्रभाव में पृत्तियों का मयादा में उपयोग करता है, उन गृत्तियों को मनुष्य अपनी युद्धि, शक्ति से पहा कर विपय फपाय के तत्वों को अति भया- नक बनाता है। मनुष्य को जो घुद्धि प्राप्त है वह विषय-पाय को उत्तनित करने के लिये नहीं किंतु भात्माभिमुख होकर विषय- कपाय को नाश करने लिए मिली है। धिना प्रात्माभिमुख हुए मानव पर पद पर अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता है। अक्षानरशान् प्रात्मा को पाय का नाद मधुर लगता है। उस उस रग की धम पर भति प्रेम है जिससे वह इसे सहन ( १२४) बोड सकता । जब मनुष्य स्वेच्छा पूर्वक विषय कयाय का त्याग नहीं करता तो बलात्कार से प्रक्रति छीनकर उस पर उपकार करती है। दुम प्रहारों से भी कुदरत निफ्य-पायों को छीनकर जीव की घोर पतन से रक्षा करती है। फर्म की गति अथवा विधि का विधान ही ऐसा है कि वह मनुष्य को परमात्म स्वरूप में बदलना चाहती है। प्रकृति भनक रीत्या मानव को शुभ सन्देश दती है। सदुपदश नहीं माने ता दुख देकर भी उसकी असि सालती है। फिर भी मनुष्य न माने तो जहा विशेष सुरा को स्थान न हो एसी जगह उसे भनती है। मा, वचन और शरीर की सर नियात्रा को पनिर, उज्ज्वल और धात्म विरास ५ माग प भनुयूज बनाने में अपना पुरुपाथ है। मन का पवित्र, निर्मन, निष्पाप अवस्था में शात्मा का प्रति बिम्ब स्वच्छ और यथार्थ पटता है। शरीर का उपयोग पाल्मो- न्नति - जिप ही करना चाहिए। जो मन, वचन और शरीर भात्मा को धन्धन रूप हो तो उनकी प्राप्ति निरथया और शवल्यायकारक है वर्तमान क राक्षसी यनवाद युग । मे मानों के मन, वाणी और शरीर के योग ऐसे मयेकर, राक्षसी और जड बने हैं कि वर्तमान जगत की सर्व सम्पत्ति, वैभव विजास और सुसफ साधन नारकी जीनों को दिया जाय ता वह लन के लिये तैयार नहीं होवे । क्यों कि वर्तमान के विषय रिलाम और शृगार पे सुर नरकप दुखों स अनन्त दुसों भयहार रूप है। वर्तमान के राक्षसी यमादक और विज्ञान के विलासी साधनो को विनाश के सावन मानते हैं और नारकीय दुग्मों को अपना विकास धाम तीथया मानन इ । नारक जीव प्रति समय दुस मुक्त हो रहे हैं । जय वर्त मान का वैज्ञानिक युग का विलासी जीर अपने मन वचन और (१२५) शरीर क योग से हर समय रक क अनन्त दुख के निकट जारहा है । उत्तम योगा की प्रानि उत्तमता के लिए मिली है, उससे दुरुप- योग से दुश्मन को भी दया उपजे ऐसे दुखद सयाग पैदा होत हैं। मत योगों का अप्रमत्त भाव में प्ररवाना ही जीवन क योगों का साफल्य है। १२-मन वचन काया। मन- चद्रसूय में से प्रकाश, पुष्प में से सुगन्ध और अग्नि में से उष्णता मरती है । इसी प्रकार मनो द्रव्य म से नित्य प्रमा मरती है । उसको अपनी शास्त्रीय भाषा में लेश्या कहते हैं। मन परमाणुओं का अक्षर हजारों की तक कायम रहता है । पवित्र पुरुषों के धम मय मन परमाणुनों स धर्म स्थान पनि मानने मे पाता है। कारण कि यहाँ ऐसे परमाणु हैं। श्रत मन ५ विवारी को सदा पवित्र रसो। वायरलेस द्वारा मन परमाणु हजारों कोसों तक जा सस्त फिर मन परमाणु तो उसस विशप सूक्ष्म पर शीय जाने वाले हैं। किसी य लिए अच्छे या धुर विचार करने में श्रात हैं तो उनका असर चाहे जितनी दूर हो, हाताती है। मन पाल्मारी तुल्य है, उसमें विविध साने (विभाग) है। हर एक में गिध विषय प्रस्तुभरी हैं। जैस विषय भरे हवस ही निशिंग । मैली वस्तुओं को स्पर्श मान नहीं किया जाता तो मैन विचार मनमें कम रक्ख जायें ? या भरे नाय ?

(१२६) पवित्र विचार वाले मानर जगम तीथ स्थान है। वहाँ पर रसते हैं, यह शचि, प्रेम, साग, क्षमा, दया का वातावश्या यजता है, और पवित्र विचार याझो के पापण हो, यहाँ शान्ति संजती है। पवन- दूमरा प्रत ( सत्य) दूसरी समिनि (भाषा) और दुसरी गुमि (वचन) की मर्यादानुमार भाषा पर मयम रखने का प्रमु का फरमान है । लिखने में पाना मात्र, यिदी, पद, हम्म, दार्शदि की सावधानी रखी जाती है स पचन घोमनम भी निरर्थक शह या काना-मानादि का उच्चारण न होने का ध्यान रखना मावश्यक है। वचन प्रयोग चिंतामणो से भी अधिक मूल्यवान है । धन की जियों से भी वचन की कीमत अधिक है। हदय नापने लिए वचन थर्मामीटर है। मत विना विचार के घोलना जोखम कारक है। मर भापी को अप और यहमापी को बहुत पश्चाताप करना पड़ता है। प्रभु महावीर ने भी १२॥ वसा मौन रखा था। विना गानी पाक की प्राधान निशानाकानी तोहता, से ही मिना यतन + वचन तथा उपदेश का ना हातान ऐसे पचन वाला, निग्यो, विचारा चितयोकि दुश्मन भी अपना घर भून जाय । अत्यधिक चालने से शरीर में अनेक प्रकार रोग भी उत्पन हात ई,श्रत यथा शक्ति कम वजना वचन का सयम रखनाभावश्यक है। काया- गन्दी हड्डिया मांस, लोहू चर्मक पिड रूप काया है | धर्मा- राधना ही उसकी विशेषता-मच्छापन है। शरीर से निकलता (१२७) आमोश्वास मारिना है। वनम्पति का श्वासोश्वाम मनुष्या के लिए अमृत तुल्य है। शरीर में ऐसे पदार्थ भर है मि, निस को बाहर निकाज र दख जाय तोनात प्राय के हो उस रात स चाने का दिश नहीं होता। एम देह में प्रशानी माहित होत हैं। देह इतना पशुचिमय है कि, विभिसाथ रानी रात्री जाय तो कोडे पहाय। धमागधना की रिशेपता न हो तो उारिक शरीर मिट्टी कठीका सभी निकम्मा है। हाह मास, झाडू वात, पित्त, कफ, मजमूत्र, कमि और शा जान पर से घम का ढकन हम जिया जाय तो महा भयकर और कौए कुत्ते का स्वाने याग्य दह दिव | काया मलमूत्र, बाहू पीप की बहती गार है । अशुचि पदार्थ बहते हैं, यहाँ तक शरीर की कीमत है । गरे बहती नद दुइ कि काय मुद्रा समझी जाकर श्मशान योग्य हाती है। पेत में उकरड़ा मक्षा सात साज ने से सुदर पूज पजादि उत्पन्न किए जाते है और शरीर रूप खत में मपा, मिष्टा नादि डालकर मममूत्र सत्पन किया जाता है । जिस मकान में सिंह सर्प मादि रहते है। उस मकान में कौन रहना पसन्द कर ? कोई नहीं | शरीर रूप घर में सिंह सादि से अत्यधिक भयकर सवा पांच कोड़ रोगवसते हैं। ऐसे शरीर पर कौन ममत्व रखें? रत्नत्रय का माराधन देह द्वारा किया जाय तो सापल्य है, वरना निरर्थक है। ।

१३ विषय-कपाय।
प्रात्मा मे विषय यासाकी सडक बनी है। उस पर विषय
फपाय के घोड़े पूर्ण वेग से दौडते हैं। पोनोग्राफ की रेकार्ड की
सरह भारमा में विषय शिकार के विचार भरे है, जिससे सयोग
मिलते ही वैसी भावान होती है । ज्ञान के विचार भर जाय तो
वेसी प्राचाज निफ्ले रेका भरने वाला यही है ।
समारी जीवों ५ मगजरूप तपुर में विषय कषाय के तार जम
जिसरे गिना बनाये भी पनन की लहरों से वसी ही आधाश
निकलता है। मगज पे तम्मूरे मे से विषय कपाय के तार बदल कर
ज्ञान क्रिया के तार वेठाये जाय तो वैसी भावाज निकलेगी?
गणित की साया घोड़ा ट्वों की है, किन्तु एक भी साया
या अक निरसना नहीं पाता, उस अफ शान निफन है। वैसही
विषय झपाय कर एकाध शसना का विनय याकी दो सो सरस्व
फा नाश होता है।
चार पाये और चार इस में से एक भी कमी हो, यही
तक पजगनहीवनता से प्रात्मा मे विषय कषाय की लश भी मात्रा
हो, यहाँ तक भात्म आराधना नहीं हो सकती। मैले कपडे पर
राग नहीं चढ़ मकता, वैसे विपय घासना का नाश हुये बिना पात्म
शान का सच नहीं सकता।
विषय वासना द६ है तो क्याय उसकी छाया है 1 'जहाँ
फाया पहा छाया न्याय से जहां विषयों का बास, वहीं
कपायों का पाय है।

पिरम फैसे हुए पनी को पराधीन हो मामाहारी की ही
मनना पडता है तो पन्छा-पक विषय दाय के पिंजरे में
क्म वानों की क्या गति होगी ? ए में गिरने वाला कमी वय
भी सकता है, परतु विषय कषाय कृप पातानीमा है, उसम गिरन
बामा कमी पच नहीं समता| विषय फपाय का प्रेम काले नाग
को गोद म ठाकर दूध पिलाने तुल्य है । विषय क्षाय शरण
समरण का शरण कि श्रेयापर है।
परलोक का विश्वासु नास्तिक विषय याय या शरण लने
हैं। विपय पाय स शिप जुल्मगार विश्व में कोई नहीं है।
विषय कपाय मय जीवन विताना स प मुद की तरह विश्व में
दुर्गव पभान ममान है | विषय पाय 4 दुसद फैलाने के
नबने । रिपय वामनाका नाश श्यि यिना धर्म भावना रसना,
वह दुर्गंधयुक्त मह वतन में पानी भरने समान है।
विषय पाय दिसन म मक्खन का पिंड है, पर दे चूने का
पिंपाने वाले पनि काट देता है। विषम कपाय के यशी
भून होने वाला स्पय अपनी का योदता है। निमका अपना
विनाश करना हो वही विषय कपाय का सेवन करें | विषय कपाय
फ एंजिन पौददुसफ डि व जग हुए हैं।
मनुष्य विषय क्याय के मझाया अन्य किसी का भी गुलाम
या दास नहीं है | विषय वासना अधीन जी अपने लिये नरक
निगोद की तैयारी करता है। विषय वासना का सयम करना
महत् पुण्य है।

विषय कपाय युक्त मानव RAार पशु ससार को भी गिनत
करता है। विषय कपाय नाश सिए चिना को दिया रेना
म्से बदने समान है। जो पशुयोनि निकट है वही विषय म रत्त
रहता है। माश्चय है कि, मनुष्य में गुलाम हाने में कज्जा मानने
बाल विपय कपाय गुणाम हाने से क्यों मस्जित नहाते ।
विगाह करने या नौकर या ज्ञानरसे भी प्रम नहीं किया जाता,
नो मनन काल से दुख दावानल में सपने वाले विषय कपाय
रूप विषैले तत्वों से क्यों प्रेम किया जाता है ?
इन्द्रियजय सुख पशुहुरा यिना भोगे न जातागडुरिये व
कीचड से विषय पाय का कीचड़ अनन ममीन है । मैले का
घर मे सपने म रोग फैलता है और पत मेंक दन से
मधुर
फ्नने में साधक मनता यस विषय कपाय को प्रात्म मदिर में
रसने से मात्मा का पतन हाता है और बाहर फेंकने से स्व-पर
का प्रय होता है। विषय कषाय प सग में मप और अजगर का
सगभल्प हानिप्रद है। विषय फाय को फांसी पर लटका ,
अन्यथा वे तुम्हें फांसी पर जायगा। विषय पाय 4 स्वामी
मिट पर सेवक मत बनो। विषय कपाय चडाला को कहा
कि, तुम्हारा सरी मात्र हम नहीं रेंग । शानी यायत दे ही
को विपय कपाय नाच या सका है।
वीतरागता के शासन पर विपय कषाय विराजम न होने से
अपना मान मममर पीतगगता लौट जाती है। शरीर से
भी विषय काय । बधन रिशेप है। शरीर नो अनन्तवार छूट
गया, परतु विषय पाय धान एक बार भी रही है।
भारमा की पवित्रता विषय पाय के पई पीडीप गई है। अपने
शरीर पर शग्नि का तिनका नहीं रखा जाता तापिय कपाय
की भार मग्नि में क्यों मुकाया जता है ।

विषय कपाय की मदता से माम प्रकाश बढ़ता है। शरीर
* लिए मछे से इन्द्रा गफ दिया जाता है, तो प्रात्मा को
शा मी न घे ऐसा बुरे से बुरा विषय कपाय का खुराक क्यों
दिया जाता है? शरीर की तरह मारमा पर मी दयालु पन पर
दया करें। विषय पाय वृत्ति पिशाच ति। पर नीचे जननी
विषय कपाय को नका बूमा दो।
नियन पशुकोअधिक मक्सियां सताती है यस निज मात्मा
को विषय पाय की पत्तियां अधिक सताती है । विषय कपाय की
कानिमा युक्तहस्य का श्वेत बनाये यिना न यस धारण करना
मायापार है। विषय कपाय का स्यागना सफे तो सत्य फ
खातिर कारस पत्र पदिन कर पाप से पचे। जंगली घाघ शेर से
भी विषय-पाय की रक्षा प्रत्यधिक है।
नित जन्म मरण या उपादान यिषय पाय हैं । एना त्याग
से निर्माण की प्राप्ति हाती है।मोह का जग लोह को पाता है,
बस विषय काय का जग नित्य विषयी का नाश करता है।
विषय पाय-वृत्ति सजन के जीवन का एनक है।
चिपम मानो मधीतरामा यसब या मित्र है मय शत्रु
नरक के एंध को न चाहने हाता विषय पाय 4 पधनों का
हाई। अपने त र म नरकको ज्याला प्रकाने पे लिए
विषय पाय रूप घृत मत हामो ।
विषय कायो वृत्तियों का वध करना ही सत्य यक्ष है।
विपय पाय के विचार करना, भारी
फ दाते में जकड़ी
भगाना है, अपने हाथ स्वय पीहा पैशा करना है। विषय कपाय

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पुण्य नाश करता है। परमाधामी देय नईran समय इजका (निजेरा कराकर) बनाते हैं पymararl (१३५) पागल कुत्ते का कोई नहीं बचा सकता तो पांच दिया और समस्त भगोपांग से जो पागल बना है, ऐसे विषयी को पारा सय रत्नत्रय को छोडकर हिंमा विषय कपाय का शान में सरगोश जसा पशु संकड़ों निशान पान में मेरा INT है वो अनन्त शक्तिशाली मात्मा विषय काय का l धन मा १ विषय कपाय प्रधुचि का पिंड है । मान- मर्म प्रमाद नहीं किया जाता तो फिर विपय कपाय क मय पिंड त्याग में प्रमात क्यों किया जाय १ मा विष देह का नाश करता है वैसे विषय काय marria परमाधामी देव समय समय पर जीवों को मई HERE निरन्तर सावधानी की भयश्यकता है। Meani

(१३६ )
१४-कपाय।
पशुओं म कपाय-वृत्ति स्वभाविक है। साधन भी बैस ही हैं।
वृक्षों में कांट, अग्नि म अध्याता, गाय, भैमा को मौंग, पक्षियों को
तीस्य पांच, यिच्च को डक, साप में विप, सिंघ या सैद्धादि
निशाचरों को नाखून दौत
और
दाद
तथा उनमो मर शारीरिक
प्रकृति, सौप मकाध सिंहयाघमादिम करता, मामडी में
लुच्चाई कुत्ते में इषा, मार म मान, पशुमा म माया प्रतीत हात
हैं, वैसी यत्ति उनमें दोना प्रावश्यक है। तो कृत्त में द्वेष और ईषा
नहीं होती तो उसके पाम का कत्ता या भय पशु म गेटी के
टुकडे न सान दत और नम भूखे मरना पड़े। गाय, भसों को सींग
महो तो वन्य पशुओं से अपनी रता कम कर मक? सौर ष
काटन का भय न हा उससहरकोई सताये। पशु मसार की
पाकृति में मार स्वभाव में ही कपाय प्रतीत हाना है परन्तु मनुष्य
अनन्त पुगयशोज हान से ज म साथ ही सुख साधन यथ
पुण्य आता है, तथा जमत हो उस रक्षक माता पिता हात है।
जय कि पशुओं के पास अपनी रक्षा क लिय पाय पा सींग
मालिक मनावा अन्य साधन नहीं होता। मनुष्य चाह जैसे पोधी
को भी अपनी मीठी वाणी द्वारा शांत कर सकमा है समझा सकता
। मनुष्य की प्राकृति में, शांति, क्षमा, धर्य गभीरता भादि गुप्य
प्रकाशमान है । पशु जैसी करता और भयरता मनुष्य चेहर
पर न होना चाहिए। माना देह पर पशु असे सोग शोभा नहीं
देते। वैसे ही पशुसी कपाययत्ति भी नहीं शोभा दती । कपाय
करने वाला, मनुष्य मिटकर पशुहोवा पायकरन पाले मनुष्य
पर पशु जैसे सींग चाहिय, जिससे यह पाय करने योग्य माना
स

मनुष्य का अपने पूर्व पायन की कपाय प्रनि याद माती
है,लिमस कषाय-प्रवृत्ति मे पशुता प्रस्त करता है और मानव
प्रानि मे विरुद्ध पशु प्रकृति अनुकून पाय का प्राविष्कार
करता है। प्रोध के लिए मनुष्य के पास मांग, नाखुन जहरीले
दात, दाढ हक या विप न होने से मनुष्य विष मय पदाथ
विप-मय शब्द तथा तलवार, भाजा, यही तोप
मशीन
गन और गैस मादि पनाकर कार वृद्धि के साधन बनात जात हैं।
मान कपाय पोपने के लिए यह धनवान, यह नियन, या मूर्य
यह चतुर मानिशब्द जाम रच कर तथा मान-पापक माधन, गाडी
पोहा मोटर हवाइनहाज याग बगीच गान यजियां और
विविध प्रकार व वस्त्र, पात्र और पाभूपयो का माविष्कार किया
है मौर नित्य नय साधन यदात जा रह है।
माया-पने अपराध पिाने लिय वकील, परिस्टर जज
कचहरीमादि का शरया लिया जाता है और मन्य का सत्य और
अमत्य को सत्य बनान वाल घील यरिगटगे की सल्यापरही है।
लोप को पढ़ान व नि अनेक पाप मयधन्धे, व्यापार,नौकरी
दमासी शराफी, बैंक बीमा कम्पनी पदि साधन बढ रह है।
वत रीत्या कषायों को पुष्टकर मनुष्य अर्थपशु बनता है और मृत्यु
के बाद पूण पशु बनना है।
कषाय पाप में से घीतरागी मुनि का भेष धारण करने वाले
भी नही पच पाये।
त्यागी-वग ने भी अपनी क्याय दृरा को पुष्ट करन क लिए
अपने मप में शोम ऐसी विविध शोध की है। पायो प त्याग से
में से मानव प्रमश समदृष्टि, श्रावक और साधु होते हैं ।
जहाँ तक कपाय हैं, वहाँ तक मनुष्यत्व समदृष्टि धावक और साधु
पद के लिए कलक है | इसी लिए शास्त्रकारा ने पाय नही -
का घार पार पादश दिया है।

(१३८) १५-चार कपाय रूप सर्प। शोध रूप सर्प की पास मध्यान्ह के सूर्य सी मान होती है। जीभ विजली ५ चमकार जसी चचल होती है भयकर विष से भरी दाद होती हैं, उल्कापात पग्नि जैसी भयकर प्रकृति होती है। जिसको मोव सर्प काटता है वह कार कार्य हिता हित का विचार न कर सकता है। मान रूपी सर्प मर शिसर से भी मोट, है । उसे पाठ मद रूपी पाठ फ्ण है। निसको मान रूपी सर्प काटता है यह पड़ ज्ञानी की भी शर्म नहीं रखता महात्माओं ५ बचना का भी अनादर करता है। माया-नागिन दियने म बडो मुन्दर है। वह भात्मा की तह म पहुँचकर अपना विप पक्षाती है । इस सर्पिणी न घड़े सपास भी अधिक पिप सचय कर रक्या है। उसका विपसविशेपमयकर है । यह नागिन गुमरुप सप्रारमण कर अपनाविप फैलाती है । मोम सप निमको काटता है, उसका पट चिप क कारण पूज कर समुद्र नितना बडा बन जाता है । उसम चाहे कितनी ही ची मरो, पट नहीं भरता | सरसों का राजमार्ग यही सप है । वह निन्य अपना शरीर बढाता जाता है। चार कपाय रूप चार सप समस्त विश्व को सदा तप्त गमा गर्भ रयत हैं। ये चार सप निमे कारत हैं उसे कोई बचाने में समर्थ नहीं है। शा त दयालु पुरुष चार सौ व माथ रमत रमना पसद नहीं करत ! परन्तु प्रज्ञानियों को इन सौ स सेलने का शौक होता है। फजत ये सर्प प्रज्ञानियों का भक्षण करते है। चार सपी को पकड़कर ज्ञान य करहिये में डाल दिये जाय तो बाहर निकलने न पा और पडी दृष्टि रखने मे रक्षा हो सकन है। तभी शाश्वत अनन्त सुप प्राप्त हो मरता है।

१६-फ्रोध-क्षमा। कोव करक चालक को भयभीत करने से पाजक की मृत्यु भी बासस्नी है, ऐमा डॉक्टर एक विज्ञानियां का मत है । क्रोध करन वाले कधूक को चाटने वाला भी मृत्यु को प्राप्त कर सकता ६,ऐसी अमेरिकन डॉक्टरों की मrयता है। मोधी को धाई तथा हिनिया का राग भी जग जाता है। जीवन में एक बार पिप पाने वाला या भग्नि में गिरने वाला मृत्यु को प्राप्त कर तो निन्य ही अनेक घार मोघ रूप पिका भगण करने याला तथा श्रोध रूए भाग में पड़ने वाले की स्तिनी दुगनि हो सफती है। माह से सयोगों में भी अग्नि में गिरना कोई पसद नही फरता, समी प्रकार पाह जैसे संयोगों में भी शोध रूपी अग्नि में नहीं गिरना चाहिए। भग्नि में पड़ने से शरीर की हानि होती है। वितु कोष से नामात्मा को मन त गुण्णी हानि होती है । कारण कि द्रव्यमग्नि सशोध की भाव भग्नि अन गुणो मयकर है। क्षमा मय मरया उत्तम है, कि तु प्राध मय सागरोपम का स्वग भीवन भी नारकीय जीरन से अधम है। क्रोधीको उत्तर दशा यह अग्नि में पी होमन समान है। अब वाद तथा दूध का एक मो इद व्यथ नही पंका जाता सो मोती से भी महंग पचन धाग्नि में रिस लिए होम जाय। कोष करना यह प्रिपनी पति है। यह तिमपन गरे को हप्त रन का माधन है। प्रोप में दी है। क्षमा में पुरुषार्थ है माप वापाशफारस्त है। श्रमाचौर का शस्त्र क्षमा को प्रा माशा समर कठोर मठोर घायर दिश भी विपक्ष नाना

माधी क मामने बाथ मय उतर दना दुवमता Eिमा पति
है। किसी में अधिक काप दशर पना पाPिo, यति
पिममें जितनाधिका यह गनाहा मधिक क्षमा रान
का विशेष अवसर देता है।
माधी का प्राप या उसाय दुर्गुण को काधमय दिन
शिक्षा दन दूर नहीं होत, निमम अमा, nिot
सजनमा गा व्यवहार पर तुम उम मुरार मकन हो ।
विशपाधीका गुम् शिप पहा मानना पाहिए। क्योंकि वह
अमा फ्रिीक माना । या गुम्हारा परीक्षा है
सुम उमय विशार्थी हो । परोपा समय कठिन प्रश्न उपस्थित होने
पर जेम विगार्थी पथराता नही है और बाप करता, तुि
शोनि में उतरता है। इसी प्रकार मा मोभमा की परीक्षा
पममय गांति रखना चाहिए।
काधी रोगी है। उसकी मम्दाम मी पाहिला मया उस
दवाई दना माहिए। उमम शांतिमय यताय करना यह मो मम्मान
राने ममान और 31 पर-मा भाव रखना यह दवा देने
ममान है।
माघ कर तुम सुग्दा आमा कोहानि क्या करते हो मोर
रूप रामस की रक्षा करन प नि मार देवी गुग का नाम
पिस निय करते 1? धिम वस्तु प प्रिये पोध पप अपन
शाश्वत मातम गुण का नाश क्यों करना चाहिये रीमिह
का विजय करने की अपेक्षा बोध पर विषय करना विशेष
मूल्यवान है।
समार म * मिसी मे सथ भएम् सभी प्रागियों को मित्र
मानने वाला किस पर शोध कर ? अब अपने दांतों सरी जोम
• जाती है और पीडा । जानी है, तप दात उबाड़े नहीं आते.

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(१५०)
स्पष्ट नीति म शान्ति रहती है। उमीप्रसार तुम भो तुम्हारी क्रोधाग्नि
सससार में शांति स्यो। निसरे जीवन में माण्य शांतिक
मणव पिरोये हुए हैं यह स्वय गुण मय माजा स्वरूप भागध्य
है। कोई अपने शरीर की सवारी बनाकर उस पर घटानका
उठने नहीं दता तो फिर मळा चहाज क्रोध को अपन
उपर सवारी क्या करने दी जाय और जिस प्रकार हाथी अपन
उपर रखे हुए हैं पसे (अम्यारी)स अपनी शोभा मानता
उमी प्रकार महानी महा पहामोव से अपनी शाभा में अधि
कता मानता है, और उसकी खुशामद करप उसको मामन्त्रणा
दकर अपने पर सयारो कराय प्रपने पापको कृतार्थ मानता है।
मार करना यह अपनी नास्तिकता का परिचच कराने के समान
है। भास्तिक प्राणी ता प्राण का कोम छाड कर भी क्षमा की
रक्षा करता है । क्षमा यु एव शांति मय वचन योजना यह हीर
और माती की प्रभावना करन की माता कही अधिक मूल्यवान
अग्नि की गोद में तीदा कांग भी राख हा जाता
उसी प्रकार पायी जीव भी मावान ५ पास मुलायम
रशम पनता है। प्रोध राक्षसी प्रकृति है । क्षमा यह देवी
प्रति है। भग्नि कदाचित् किसी वस्तु को जमा किन्तु प्रोध
का गक पार बुजानोगे तो यह पुत्ते के समान पार २ प्रायेगा।
तुम्हारे शरीर को शोध दावानल में से निकाल कर क्षमा
शीतज सरोवर में रसो। कारण कि श्रोध के साथ ही साथ ईपा,
द्वप, अमिमान, अनुदारता निर्दयता, कठोरता, हठीला स्वभाव
आनि अनेक दुगुणां का हमझा होता है।
।

(१४३ )
क्षमा-
भमा मही सच्चो वीरता काममावश हाता है। यही सत्य दान
है। अन्यदान ना पुद्गज क दान है किन्तु क्षमा सर्वोपरि भारम
शक्ति कादान है। पनका धम सिा करने का है और मनुष्य का धम
हिमा कान का इस प्रकार पशु का स्वभाव काय करने का और
मनुष्य का स्वभाव थमा कम्न का है। क्षमा याचक मात्म-कल्यागा
का परम इच्छुक है और यह थमा य लिग अपना सर्वत्र यनि-
न कर देता है और क्षमा धम की ला करता । सच्चा क्षमा
वान अपन निमित्त स्मिी का भ बोध न करना पड़े इसकी पूरी
सावधानी सम्वना है।ममा फ कितने ही सर गँवाय, मत यह
विचार कर अपनी योग्यता का विचार कगे।माधीक फ्रोध मय
वचन शांत माम मान करना या परम सेया है। क्षमा मात्र
रखना यह साधुता का लक्षण हनिमा रमना शत्रु से पैर लेने
का उत्तमोत्तम उपाय है।
क्षमावान मन्या भाग्य शाली है। क्षमा प्रकाश से उस
का हदय प्रकाशित हाता है । क्षमा हाथ म को तमवार है और
बोध हाथ म म हटी तलवार है । क्षमा व भाव में रिवेक और
झान का भी प्रभाव होता है । पानी ए पास अग्नि का जोर नहीं
चलना, पैसे क्षमाधान के पास क्रोधी का जोर नहीं चलता है। वह
तो उसपने मा धनाने लिय भाग्यशाली बनता है।

(१८४)
१७-मान-विनय
मान यह पाठ पण धामा मर्प है। पाठ प्रकार मद ये
इसा फया है। प्रतिवक और द्वप सेमान का जन्म होता है। मान
की माता अविवक्ता और पाप द्वेप गगेन्द्र है।
जीर मानपी मित्रता में इवना जकर जाता है कि उसकी
दुननता को भूज पर उसको परम स्नही सन्नन के समान
मानने ममाता/मानको मित्रता मे योग्य मात्मा अपने
आप को योग्य एक मुम अपने प्रापका विद्वान मारता है। मान
मित्र के सहयोग से मनुष्य अपनी दृष्टि उचा रसना है। मान मित्र
का त्याग करन की सलाह दने वाले सनम को धैरी मानता है।
मानी के लिए मानन भन ठीक उसी प्रकार है जैसे फौर की गरदन
में चिन्तामणि रल बांधना ।
मघुर
मान मीठा विप ह अपमान कटु विप है कडुन विष की अपना
पि निशेष भयकर है। राज्य पाट त्यागने वाला भी मान
क दजश्रम में फंस जाता है। मनुष्य काभपमान उसी समय हाता
है जब वह अपना परम पद-परमात्म पद त्याग कर अपमान पान
लिए तैयारी करता है। गेसेसाधनअपने पास उत्पन्न करता है।
प्रहकारी या भादर कोई नहीं करता है। अपने में दान,
शील
नप, भाव मादि गुण है ऐसा भान हाना भी प्रकार है। जैसे
निरोगी को स्वशरीर का भार अनुभव में नहीं भाता उसी प्रकार
सद्गुणी, नन को भी अपने सद्गुणों का भान नहीं रहता।

(१४) दूसरे का अपमान करना यह अपना अपमान करने प समान है। सूर्य के सामने बम फक्न समान है। मा7 अपमान 4 मात्र दो ही शदों में म्मान होना इससे विगेप अन्य गुलामी क्या हासकती है? अपमान धिक्कार ने योग्य है। इससे विराप अप मान का अपमान मानने वाला पिरकार के योग्य है। मानस पडापन र पा रूप पिशाचिनी सनाती है। भग्नि से काट का नाश होता है इमी प्रकार माम सभात्म गुगा का नाश होता है । मानी अपनी एक अपि पोड़ पर दूसरे की दानों प्रासं फोडन जमी प्रवृत्ति करता हुमा भामय में माता प्रोकन करने से माम मान रहित मनुष्य की प्रयूत्ति पाग यगीचा, हाट दयनी गाडी, घोडा, मोर,भाभूपण निशान प्रासाद ) जीमा प्रभारना, दान आदि तमाम शुभ एवं अम प्रत्तियों में मान के परमाणु अनुभर करने में भाते हैं विनय- विनय शील सा शानि भोगता है। मानी क भत्त करा में मदा ईपा और ग्रोधादि पाय अग्निमा सिनगत रहते हैं पिनयी को सय मयोगों में विनय प्राप्त हानी है विनयी मान मयोगों से दुय मानता है, एक मधुता में ही अपनी प्रगति करता है सानन में विनय हो तय दुर्जन में मान की मात्रा हाती है सजन तथा दुर्नन की परीक्षा नम्रता तया पहना से हो सकती है। नम्रता की छाया सहनशीलता है, अता की छाया पाय जहा नम्रता है वही हिसा है। जहां मान है यहां दिसा है। नम्र को अपनी नम्रता का मान नहीं होता । मैं कुर है ऐमा मान होन मे ही नम्रता का नाश होता है। नम्रता अर्थात् भात्यन्ति प्रहमाव का प्रमाय । नन्न सपने को रजक स भी तुमानता है। अपर पने का नाश ही नम्रता सामान को निभूति है । महता दुर्जन की विभूति है। सज्जन नम्र स्निया होता है सभी विश्व उसके चरणां पर पड़ता है। विनय और नम्रता सद्गुण म सधा प्रहसा एध प्रतिपय दोप रूप सममा जाप का भी मना पापों म बचा जा समता है। प्रापद में प्रविनय गय उपन्यता है। रिनय रूप समुद्र को सर्व गुण रूप नदियां पहनी हैं और भविनय 4 समुद्र में सर्व फोध रूप नदियां एकत्र होती है। १८-माया माया विचारती है कि मोहराना की सेना म सभी पुरुष । किन्तु मैं ही मात्र अपना हुँ । तो भी तमाम मोक्षराजा की मतानों में मैं मर क्रोधादि भाइयों की अपक्षा पन्या रूप अधिक बाजधान । मर जसी शाति मेरे किसी भी माह में नहीं है। समभाव और सरल स्वभाव ये दोनों मेरे मनादि चैरी है। इनका नाश किये बिना मुसलमान भी चैन नहीं पड़ती। मात्र इन नाशक लिए यह रात दिन प्रयत्न करती है। सीधी लकडी मंदिर की चोटी परध्वना दहरूपमें शोभा देती है। और टटी जकडी जजान 4 काम में माती है। इसी प्रकार प्रकृति की सरलता दोनों सोका में सुस दती है । वता-माया कपट से दोनों लोकों में दुम मिलता है तथा दूसरों को भी साथ में दुख मिलता है।

(१४७ )
श्राधी व मामन फ्रोध, मानी र प्रनि मान मायावा ६ प्रति
कपट करना यह विश्व में दुष्टना की अधिकता करने के ममान
है। किन्तु याधी प्रति क्षमा मानी 4 प्रनि विनय कपटी क
प्रति सरलता रखना ही विश्व में सज्जनता का बढ़ाना है।
कपटी मनुष्य की गति, म्बर योनी, रीति नीति, निद्रा, सस्थान
मौर संवयय भादि पशुको शोमे से होत हैं और मरने क पीई
वे था पशुता प्राप्त करना है।
लोभ--
२५ यो गुण स्थान पाल को काष मान, माया मादि गिराने
म परिबर करने में समय नहीं है। किन्तु उसका दि सिद्धि
उत्पन्न होने से मुमय प्राप्त हैं ऐसी नाम हत्ति होने से पतन
हाता है । साधारया जोम राति ११ गुणस्थान
पाले को पवित
कर देती है तो फिर दूसर समारियां की तो क्या दशा होगी?
लोम-रि क्षय कर दी हाती तो मोक्ष हाता किन्तु उस वृत्ति
को उपशात रखने म पतन हाता है।
लाम और जूसा मे शरीर व स्नायु तथा बुन यध जाता
है। और यह स्वरत रीति से वेग पूर्वक नहीं यह मकता ।
तुम्हारे शरीर के व मन के भी तुम स्वामी नहीं हो तो अन्य किसा
स्वामी बनने की इच्छा करते हो? जोम धन कमाने के सिवाय
और को मनाहन दता और यह नौति न्याय तथा सन्तोप का
त्याग करने की वारम्बार प्रेरणा करता है। लोभी को धन में ही
विश्व का तव धम परमात्म पद और मोम का अनुभव होता है।
लोभी धन प्राप्ति में ही अपने जीवन की मानता मानता है।
शास्त्रकारों ने जोमसागर तथा भाकाश की उपमा दी हुई है।
मन्तोप ही इस जन्म में तथा परजोक मे परम सुखदायी है
-

१६-लोभ
ग्यारहवें गुणा स्यानी मारमा को मोघ मान माया निशाने
समथ नहीं है, परन्तु उसे रिद्धि सिदि उत्पन्न होन से 'मुझे यह
उत्पन्न हुमा है' इस प्रकार की लोमश
होन से उसका पतन
हाता है । साधारण जोम चि ११ व गुण स्थान वाले को गिगनी
है नो धन्य की क्या दशा !
लोभ की वृत्ति भय की होती तो जीव का मोम हा ताण।
उप पृत्ति को उपशान्त रक्पी होमे से जीना का गहरा पतन
होता है।
लोम और कृपणता से शरीर स्नायु और लोहू बघ हाजाता
है और वग पूर्वक वह नहीं सकता। जो अपने शरीर और मन
स्वामी नहीं हैं वे अन्य किसके स्वामी हो सकत है ? लोभ धुन
कमान के अलावा दूसरी सलाह नहीं ६ सकता और वह न्याय
नीति तथा मन्तीय का त्याग करने की प्रेरया वारवार करता है।
लोमी को विश्व का सार धम, परमात्मपद और मोक्ष धन मही
प्रतित हेाता है। शाखकारों ने लोम को महासागर एवं प्राकाश
की उपमा दी है। मोम का त्यागथात् सन्तोप ही इस भर म
और परमन म परम सुख का निधान है।

-
२०--यात्म मम
विजय हो सत्य विषय है। पिना दवा क्षुद्रातिशु
भात्मज्ञान प्रारम दर्शन भरलद्वारा सर्वान्च
सत्ता प्राप्त हाती है। श्रात्म विजय रवि भात्म
गजाम है। अपने हदय रे बागीप्रम]इन्द्रि
और विषय वासना पर गश्य करना है।
मन पर मत्ता चलाने वाला वरपने प्रतिम
म्राज्य पर राज्य स्थापने वाजाहामा धात्म सा
हा समस्त गुणो कोनांव है।भार मानव कालिन
और महान् विनय है। शान्त समारी सनार
पर चलेगी|न्य पर मत्ता चपनोभात्मा
सत्ता चजाश्रीराधात्म सयमसनमा काम
हाता है। अपने दापों का नाम स दूर
मोघ पर कानूनकर मकामोधमान
सताप मिट जात है।मात्मा र रिषय कपा
भी घरता है ऐसा जातिकोPAam करने सेर
की उत्पशिहोती है। बिना जीवन,
सदाचार को अधिक मान,
स्वाधीन नाद यह पशुतुबपात्र
जाते हैं।
व सत्य स्वरूप का नाश करना।
मनुष्य का प्राय
विषय कपाय प्रात्म गुणों का
योगों में शान्त रह सा विषय
यो मनुष्य
সাচ্চা

(१०)
२१-व्रत-प्रत्याख्यान
मध्य भय म जहाँ तक मियाय का जाश कम न हुमा
हो, वहाँ त याद्यपदायों की श्रामक्ति कम नहाती। हम लिए
भावों में मियाल की प्रधानता है।
। जहां तक यात्मा रापोवार हो वहाँ त मत प्रत्यारयान
को निकुन प्रकाशन है। प्रात्मा अमर है और श्रमिक
मुग्गों से भरा हुमा ममुद्र मेर पामही, एमा ह निश्चय न हो
वहां तक प्राप्त भोगां की माममा दोडन का दिल नहीं होना।
जहां तक भात्मिा मुख को प्रतातिरूपन्दनींव परवत प्रत्यायान
की इमारत न खडी की जाय वहां तक यह इमारत ठीक नहीं हो
मकती। मात्म सुधार की भावना नितन अशत मनबून हाती है
इतने दी अश म न मो दृढ और कायकर बन सक्त है। वहां तक
मिथ्यात्म तत्तहाग यहाँ न बन प्ररयान उपदश का असर
नहीं हो सकता। रत की नीर पर की हुई चुनाइ अधिक न ठीक
सकती। जहां तक सम्यान भावना र शीशा धात्म विकाश की
इमारत की नींव में डाला न जाय वहाँ तक त्याग, प्रत्याग्यान
नाणिक मममन चाहिय।
। प्रत प्रत्यारयान याद्य स्थिति घर तर नहीं है स्न्तुि
अन्तर अवस्था का प्रदशन कराने वाला है। प्रा प्रत्याग्यान शत
प्रति शत प्रारमा की अतर स्थिति है | वाद्य मेप को निया कागडे
या प्रत प्रत्यारयान मानने वाल पृया भून परतहै। विश्य अन्य
तत्व दूसरी वस्तुओं की तरह नव प्रत्यारयानों में भी रियति का
मडन प्रविष्ट हमा है।
मानाक शारीरिक या प्राध्यात्मिक मार्ग मेत्याग प्रत्यारधान
सी परम प्रधानता रही हुई है। और त्याग प्रयरयान हीव्यक्ति
-
।

ममान, मात दश तथा विश्व का परम कल्याण पर मस्त है। प्रयया भव पतन है। त्याग-प्रत्यागस्यान के नियम मि त्यागी नगर निगम है पर तु निसको अपने मत्य हित की कुछ भी दरकार है उन सर का सधन करने याग्य है। मछली पानी पिना और भोगी भागारिना तडप कर मरत है, वैसे भारमार्थी त्रत प्रत्यारयान के अभाव में या उसाभा में मृत्यु का शरण स्नेत । अनर महासतियों ने और सुशन अमे धारक रत्नान त प्रत्याग्यान की रक्षा व लिय शूनो को मुग शग्या ममम कर साप मीकार किया । अम्बई मयामी सात सौ शिष्यों ने प्रतों की रक्षा र जिय गगा नती की जा रत में अपने प्राण दिय । अरणक की माता ने अपने पुत्र को पत्थर की शिक्षा पर पिघल जाने पर भी नत रक्षा करन की मनाह दी। इस अतिरिक्त मतारान कन्धनोर पांच सौ शिष्य गजमुकुमार धम रुचि भणगार आदि अनेक महा पुरुषां न प्रत रक्षा के लिए अपने प्रागा दिय ई और सिर देकर अपने शील (व्रत ) की रक्षा की है। लश्कर व सिपाही पाव भर पार की लालच म तप र दुक, मशीनगन, बम्र के सामन गुनी छाती मे बट रहत ह तो श्रात्मसुस ५ अभिनापियों को अपने व्रत प्रादिलिय कितना महान् प्रारम भोग देना चाहिये यह सहम समझा जा सकता है। मनुष्य प्रन-प्रत्यार यान प्रभाव में व्यक्ति, कुटुम्ब, समाज दश या प्रना का कल्याण नहीं कर सकता है। त्याग प्रत्या ग्यान की विशेषता प्रमाण में वह अच्छे से भन्छा गृहस्थाधम चला सकता है, अन्यथा गृहस्थाश्रम चलाने में असमय होता है मेयरी रन प्रभार मे मनुष्य गृहस्थ जीवन म भी पतित होता है (१५२) सन्तानकोय लिए मात पिता का त्याग और प्रारम भोग सुप्रसिद्ध है । त्याग प कारण ही मातृ पितृ पर निभ रहा है-- अन्यथा स्थान भृष्ट हो। त्याग-प्रत्यारयान के शरण बिना उत्तम गृहस्थ भी ना हो सकन है ता त्यागी कैसे हो सकत हैं ? भोगोपभोग 4 प्रति सयम रसने से ही आदर्श गृहस्थ धर्म या त्यागी धम पड़ता है। कुटुम्म भावना से भाग समाज, दश और विश्व भावना क लिए क्षेत्र प्रमाण से विशेष त्याग-प्रत्याग्यान की आवश्यकता है। वर्तमानम त्याग-प्रत्यारयान का अर्थप्रति सकीर्ण और क्त्तव्य प्रदेश में प्राय निरूपयोगी जैसा हो गया है | रान पान तथा माने जाने की मयादा म व्रत-प्रत्यारयान मान लिए जाते हैं, परन्तु जिसका असर जीवन के प्रत्येक प्रदेश और प्रवृत्ति में हो वही सच्चा त्याग है । जिस साग का फल प्रत्यय नहीं है, परोक्ष में मिलोगा यह प्राशा निस्थक है । भरिय म फल प्रद होने वाल प्रत्येक काय वतमान में भी उसकी प्रागाही दिये नित नहीं रहते। जिस त्याग का परिणाम वतामान जीवन पर नहीं पड़ता और भाचार विचार पर जरा भी असरनहीं करता उसपे सेवन स मनुष्य कुछ भी उदार उन्चाशयी या निकामी नहीं होगा। यह त्याग मिना समझ का था अति पूण समझनाचाहिय यह भूज न सुधर वहाँ ता त्याग प्रत्याग्यान व मात्र है। इससे कोई उत्तम फल की आशा नहीं रहनी।

स्याग-प्रत्यारयान | प्रताप म मनुष्य पशु से भाग पद्धता
भौर जितने अशम त्याग प्रत्यारयान बढ़ाता है, तन प्रश
में वह विशेष म्प से शुद्ध मनुष्य पाता जाता है और मानवता
गुणों को विकसित करता है।
प्रत प्रत्यारयान मात्मा की पास हैं । सिप द्वारा यह योग्य
शिशाम पालाश गमन कर सकता है । उमर प्रभाव में मृत्यु लोक
मैं विषयी प्रीडा वन पट घीस कर जमीन पर रेंगता है। और
पदपद पर पश्चातापय शोक करता त्याग प्रत्यारयान प्रभाव
में प्रथम वामनामों की 7 इच्छा होती है। और गोगोपयोग
पनि पशु को भी मलित कर एसी धूम मारता है । इमस
प्रमश मूत्यु पदिल ही यह अर्ध पशु बनना है और भोग
पासनामों का पूगा करने ५ लिए मृत्यु के बाद पूण पशु धनना
है । पशु या मानर मां बाप का अपनी सन्तान पनिण त्याग या
प्रात्मभाग महर्षिया प त्याग में भी अधिक है। सन्तान जीवन
म अपना जीवन और सतानक मरण म अपना मरण मानते हैं।
अन्तिम श्वामो सासतक स तान धेय की चिन्ता करत है।
पान पान और भागोपभोग म स तान र श्वेयर लिए शुष्क और
मादगी का जीवन वीतात हैं और पिरोप में इस लोक + मुम की
परवाह तो नहीं करत, परतु परलोर के सुराको थम नीति और
न्याय को भा लात मार र मा जीवन का ध्यय सतान की
सेना बनात है।

२२-चारित्र
मात्मा पनिजी स्वरूप मे चलना सो चारिन है। मनुष्य
चाह जैसा अपा चरित्र मा साता है। साधु थापक धरी की
स्थापना चरित्र वृद्धि य जिय ही है । मत प्रत्यारयान चारित बनाने
फा हथियार है । जैन दर्शन चारित्र विकशित करने की शामा है।
शरीर सुधारन य लिये जैस दयायाने और डाक्टर है, पैस ही
जीवन सुधार न क लिये धम स्थानक और धमगुरु हैं । चारित्र
अपने तनमन को अपस्था मात्र है।
सरल और नियम मनुष्य म यही अतर है, कि सयम अपने
चारित्र गे इच्छानुसार यना सकता है और नियल पास पास
संयागों के माधीन हो जाता है। उसे काई गुस्से भी कर सकता
है और खुश भी कर सकता है उसका मन मामी तरह नर्म और
सयोगा प्राधीन होता है। वह अपने मनकामानिक नहीं है.
पर तु सयोगों प प्राधीन पामर प्राणी है ।
भात्मा मन का माझिक है। जसे व्यायाम से शरीर को
सुदृढ बनाया जाता है, वैसे ही यात्मा मन को बलवान और
उत्तम बना सकता है।
जिनक चारित्रको सैकड़ों प्रकारमे सुधारनायासी है ऐसे मनुष्य
भी दूसरों को सुधार की सलाह दने लग जाते हैं। जैसी समाद
थे दूसर को देते हैं, यदि वैसा याव वे खुद करें तो वे स्वय शीघ्र
सुधर सकते हैं। मगर सलाह देन पाले को अपनी सलाह मे ई
विश्वास नहीं, तो दूसरी का उसको समाहम विश्वास या सन्मान
कसे उत्पन्न हो सकता है ? विना गोली की पाक क्सिने ई

मागान करे तो भी वह आवाज र पत्ते को भी नहीं तोडसकती, वैसे ही मिना चारित्र का उपदश असर नहीं करता। बिना यात व पानी के पौधा सुपरजाना है, वैसे ही वासनाओं को विषय पोपा मिशा घ हो तो व मर ज ती ह । सिर्फ एक वक्त वासना क गुमाम बा तोमनात काल तक उसकी रिमय रहगी। मौर ६ वक्त वासनाओं को हरा दी तो मदा के लिय आप की विजय रहगी। फइ मनुष्य को प्रथम वासना य सिवाय चैन नहीं हाता, इमी प्रकार ऐसा अभ्यास किया जा सकता है कि नत्तमता के पिना चैन न पड़े। चिन्तन से रस (तमयता ) प्राप्त होता है और कार्य करन से श्रद्धा प्राप्त होती है बिना कार्यमान गटान्त दलीन और पाचन से श्रद्धा नहीं पाती मात्र कार्य करने पर ही वह प्राप्त हाती है। जिननी श्रद्धा अधिक होती है उतनी ही चारित्र की परिनता अधिक होती है । श्रद्धा ही मन रूपी सडक को साफ करती है, प्रतिवर्धा का नाश करके सरलना करती है और रिनों प्रसग में प्रात्मा को धीर और स्थिर रखती है। श्रद्धा चरित्र की नींव है। भूमकाजीन संस्कार और भादतों स चारित्र बनता है चारिय का परिवर्तन प्रादतों का परिवतन है । आज का सीना हुभ्रा पाठ समय पाकर हद होता है यही स्थितीचरित्र की है। हिमा, सय क्षमा ब्रह्मचय सरलता मन्तोप आदि भादन रूप बनजाय जीवन में एकाकार हा जाय, इसीनिये इतना विधान फरमाया है और वही सत्य चारित्र है।

२३-'प्रात्म सयम श्रात्म ज्ञान, भात्म दशन और प्रात्म चरित्र के द्वाराही सपरि मत्ता प्राप्त होती है। यात्म (इन्द्रियों का) विजय ही सष्टि विजय है, सत्य विजय है। इस सिवाय अन्य विजेता क्षुद्र गुलाम हैं। अपन हदय कथागी प्रदश पर विजय प्राप्त करें। इन्द्रियों और विषय वासना पर शासन करने वाला ही महा- राजा है। अपने मन पर सत्ता चलाने वाला महासत्ताधीश है। त साम्राज्य पर राज्य स्थापने वाला मानव बन सकता भारम सयम समस्त गुणा को पड़ है। प्रारम विनय मनुष्य का तिम और महान विनय है। शांत बनने से सब पर सत्ता चल सकेगी। दूसरा पर सत्ता बनानकी अपक्षाअपनपर सत्ता चलाना सीसो । आत्म सयम का अभाव है यहाँ सब सद्गुणों का प्रभाव समझना चाहिय | अपने दोषों का नित्य अवलोकन करने से दोष दूर होते हैं। अपने मोध को वश में रख सको तो जीम को तो अवश्य यश सना सीसामोध शात्मा प शुद्ध स्मरूप का नाश करता है । बोधी मनुष्य का भाग्य भी अन्य होता है । मौन धारण करने से सब सन्ताप मिटते हैं। भात्म तत्व नाश से ही विषय कपाय की उ पति हाती है। बिना सयम का जीवन राक्षसी सीवन है। विषय फपाय प्रारमगुणों को फांसी देकर मारत है । लोकाचार की भपक्षा उच्चवाचारों को विशेषमानदना चाहिये। पिपय कषाय ५ सयांगों म शांत रहे वही म्मतन्न है । जो मनुष्य स्वाधीन नहीं है वह पशुतुल्य अज्ञान और दयापान है। 1 1१५७) २-जैन धर्म व प्रजैन ससार जैन धर्म अनादि काल का है। यह बात निर्विवाद तथा मत मद रहित है। । लोकमा यतिक्षक) मनुष्या का उन्नति के लिए जैन धम का धारिप बहुत लाभ दायी है । यह धम बहुत प्रसजी स्वतन, सरज और विशेष मूल्यवान है। (डॉ० ए० गिरनाट परिस) केस उत्तम नियम और उनच विचार जैन धर्म और जैन मा. चार्यों में है। । डॉ० जोहन्नेस इस्टर, जर्मनी) जैन धम ऐसा प्राचीन धम है कि, पिसकी उत्पत्ति तथा इति- हास को ढूढना प्रति (जाला फन्नूमना) नि सशय जैन धर्म हो पृप्ती पर सत्य धम है और यही धम गनुष्य मान का श्रादि धर्म है। ( मिमा ने ए याइ मिशनरी) म जैन सिद्धातों व मूम तत्वों का पूर्ण प्रेमी हूँ। (मुहम्मद हाफ्षि सयद) मुझे जैन तीथकरों की शिक्षा के लिए अतिशय भक्ति है। (नेपालचन्द) मुझे जैन सिद्धात का अत्यन्त शौक है कारण हि कम सिद्धातों का इस में सूक्ष्म रीत्या चणन किया है। (एम० डी० पाइडे, थियोसोफिकल सोसायटी) महावीर ने एक आवाज़ से हिंद मे ऐसा सन्दश पलाया धर्म सांप्रदायिक रूढी नहीं है, पर तु वास्तविक सत्य है। (रवीन्द्रनाथ टागोर) दुष्कर है। N

(१८)
जैन धर्म की उपयोगिता को रूपण पाश्चिमाय विद्वाना
को स्वीकारना चाहिए। (डॉ० जौली प्रोफमर जमनी)
भारत वर्ष में 7 घम की प्रधानता रही यहाँ ता इसका
इतिहास स्वर्णाक्षरों से मियन योग्य था।
जिनसरों ने उपदश दिया है उसे ध्यानयक गुनो । म श्रम
प्रार्थना करता हूँ कि, मसार सा मनुष्य उनप उपदश अनुसार
अपना जीवन व्यतीत कर।
(श्रीमती पा वीसन्ट)
*धम पशावक तथा मुनि दानों का चरित्र मनुष्य मात्र
के लिए भादर्श रूप है।
(गंगाप्रमादनी एम )
मैं आपको कहाँ तक फहूँ ? बड २ प्रमिश धमाचार्यों ने अपने
प्राथों में जैन धमका पडन किया है,वह ऐसा है कि, उस दरबार
हास्य छुन्ता है । स्याद्वाद का यह ( 7न धर्म ) अभेद्य किल्ला है।
उसमें बाद विवाद करने वालों का माया मय गोला प्रवेश नहीं
कर सकत । एक दिन ऐसा था कि रैन धमाचार्यों प्रवचन से
मर दिशा गुंज रही थीं । जैन दर्शन पदान्त दशन म भी प्राचीन
ऐसा मानने में मुझे काद हर्ज तहीं है।
(५० स्वामी राममिश्रजी शात्री)
ब्राह्मण धर्म को जैन धर्म ने ही भहिंसा धर्म बनाया । हिन्दू
घम में जैन धर्म प्रताप से ही मांस भक्षण तथा मदिरा पान
बहुभा
(लोकमान्य तिलक)
गरीय प्राणियों का दुश्य दूर करने के लिए जमनी में अनेक
सस्था वर्तमान में चल रही है, परन्तु जैन धर्म यह फार्य यह

( १५६)
-
काय हनारों वर्षों क पहिल से है करता प्रा रहा है ।
(मि० जोइन्स इटल, जर्मन)
नैनधर्म में हिंसा तव प्रत्यन्त श्रेष्ट है ।
(रा० गोविंद प्राप्ट बी०००)
जैन धर्म के महत्व पर मरी हार्दिक श्रद्धा है।
(गगाप्रसाद्नी मोहता एम००)
मेर चित्त में जैन धम प्रति अत्यन्त प्रादर है । पूर्व कालीन
स्थिति में हिंदू समान में भनेक पुराइयाँ मा घुसी थी। जिसका
सुधार जैन धर्म ने ही किया है। जैन धर्म में अहिंसा का यथार्थ
स्वरूप प्रतिपादन किया है । जैन राजाभों न ध गृहस्यों ने महान्
पपिन काय म्यि हैं ,भौर महान् विजय प्राप्त किये हैं । जैन धम
की शिक्षा से सामाजिक जीवन भी पूर्ण हा सकता है । हिन्दू मान
को जैन धम का कृतम हाना चाहिए, चूंकि उस धर्म ने हिंदू समाज
फी अनेक बुराइयां का सशोधन किया है।
(प्रॉ० चतुरसेन शास्त्री)
जैन धर्म सुग्न और शांति प्राप्त करने का साधन है । भगवान
महावीर का उपदेश ज्ञान मय तथा चारिन सुधारने वाला है प्रायी
मान पर दया का सिद्धांत अमूल्य सिद्धांत है।
(फलीभूषण एम०ए०)

अन्तिम निवेदन
भयात्म रसिक श्राभार्थी मुनि श्री मोहन ऋयिनी म. सा.
व विवेक सम्पन्न मुनि श्री विनय ऋषिजी म. सा. मातृदय का
जैा मान भनी प्रकार लानत है । मिफे ऋषि सम्प्रदायक ही नीं
समस्त निनशासन श्राप हितधिनक धौर शासनगार
है
थी वृहत्साधु सम्मलन अजमेर समय की श्रापकी मेत्रा
पास बल्लनेसनीय और प्रमुस थीं।
मापक विचार यडे मनन, चितन और अध्यात्मानुभव साथ
प्रकट होते हैं। स्व. पूज्य श्री ममोलस ऋषिजी म. सा० का
सुप्रसिद्ध प्रथ जैन तत्व प्रकाश का गुजरातो अनुवराद मे स्थान
२पर घट नोट दन प लिए प्रात्मार्थीनी ने कुन्द्र रियारको जिपि-
घद्ध क्यि , नितको 'चन प्रकाश' ने जावोनु नूतन
निरुण्य' हडिंग से नीचे गूजराती में प्रकट किया था।
यह नूतन निरूपण भूतन युग के रिचारकों को बहुत उपयोगी
मालुम पड़े और पुस्तकाकार साहित्यर प म प्रकट करने का प्रामह
हुधा । प्रत दानवोर सेठ सरदारमानजी सा (गनिया न
हिंदी मे छपवाने की अपनी हार्दिक भाधना प्रस्ट की और इसका
अनुवादन भादि काय क लिए मुझ कहा गया ।
म चाहता था कि एसा उत्तम स्थायी साहित्य हिन्दा प्रखर
लेखक द्वारा प्रद हो, परन्तु पुस्तर भीम प्रकाशित करनी थी
त भनुरादन काय मुझ करना पडा। शीनता के कारण
अनेक ध्रुटियाँ होंगी । पाठकगण उसे क्षमा करें और पामार्थी जी
प भावों की महत्ता समझकर अपना जीवन सुधारें।
धीरजलाल के तुरसिया

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Jain Tatva Ka Nutan Nirupan

Author
Turkhiya,dhirajlal
Title
Jain Tatva Ka Nutan Nirupan
File name
Jain Tatva Ka Nutan Nirupan
Text
OCR done
Citation
1937
Published
2011/03
Publisher
Nagpur,shri Pugaliya Sardar Jain Granthmala
Language
Sanskrit
Pages
184
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551860
Barcode
4990010032559.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
KWsCPLFGi87
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