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उपक्रमणिका 1927

चट्टोपाध्याय, नारायण · 2009/06

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भूमिकाः। संबंद १९०८ (१८५१ ईसवी) में संस्कृत व्याकरण की उपक्रमविका वाभाषा में पहलेपहल प्रकाशित हुई थी। पण्डितप्रवर वरचन्द्र विद्यासागर महोदय ने संस्कृतशिक्षार्थी कोमलमति बालकों को सुगमता के साथ संस्कृत व्याकरण की मुख्य मुख्य बातें सिखलाने के लिए ही इस म्याकरण की रचना की थी। जिनका हृदय किसी का कष्ट देखने से सदा पिघल जाता था, दूसरे के उपकार के लिए अपना सर्वस्व देने में जो कभी हिचकते न थे और दूसरों का कट दूर करना जिनके जीवन का प्रधान व्रत था, उन्हीं दयार्णव संस्कृत काव्य, व्याकरण, दर्शनादि के परमज्ञाता क्यिावारिधि पण्डित ईश्वरचन्द्रजी ने अल्पवयस्क बालकों के संस्कृत म्याकरण सीखने का कालाघव करने के लिए मानों देवबल से बली होकर यह व्याकरख लिखा था। संस्कृतशिक्षार्थियों के लिए यह पुस्तक परम- उपयोगी है, इसमें जब भी सन्देह नहीं। हिन्दीभाषाभाषी संस्कृतशिक्षार्थी बालकों के लिए और विशेषकर जो लड़के मैट्रिक ग्लेशन परीक्षा में संस्कृत लेते हैं, उनके लिए संस्कृत व्याकरण सीखने के निमित्त यह बड़ी ही उपयोगी पुस्तक समझी जाती है। हिन्दी- भाषा में इसका अनुवाद भी हो चुका है, किन्तु आजकल की परीक्षा के उपयोग की दृष्टि से इसका अनुवाद या संस्करब अबतक किसी ने भी नहीं निकाला। यह प्रभाष दूर करने की इच्छासे हो हमने इसका नया संस्करण किया है। इस व्याकरण को अँगरेजी विद्यालयों के छात्रों में उपयोगी बनाने के निमिस बहुतचेष्टा की गई है और उपक्रमणिका पड़कर व्याकरण कौमुदी का प्रथम भाग पढ़ने की आवश्यकता न रहे, इस उमेश्य से कौमुदी प्रथम भाग की प्रविश्यक ज्ञातव्य बातें प्रायः सभी इसमें दी गई हैं-छपाद टिप्पणी ( Poot nots) में और कुछ परिशिष्ट में । अंगरेज़ी से संस्कृत अनुवाद करने में सहायता मिलने के लिए प्रत्येक धातु के साथ अनुशीलनी ( Exercise ) भी दी गई हैं। अगरेज़ी विद्यालय की तृतीय और चतुर्य श्रेणियों में इसको सम्पूर्ण पढ़ादेने से प्रथम और द्वितीय श्रेमियों में कौमुदी के द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ भाग सुगमता के साथ सिखाये जा सकते हैं। जिनके लिए यह पुस्तक बनाईगई है यदि इससे उनका भी उपकार. हुआ तो मैं अपने को कृतार्थ समझंगा । मिति । कलाचा। श्रीनारायणचन्द्र चट्टोपाध्याय ।

तृतीयावृत्ति की विज्ञप्ति। पण्डितवर विद्यासागरजी की उपक्रमणिका की सरलता तथा सुगमता को ज्यों की त्यों रखकर हमने इस श्रावृत्ति में संस्कृतशिक्षार्थियों के अवश्य ज्ञातव्य बहुतसी नयी बातें दी हैं । प्रथम शिक्षार्थियों को घबड़ाना न पड़े इस अभिप्राय से अतिरिक्त विषयों के कुछ पाटीकाओं ( Foot notes ) में और अधिकांश परिशिष्ट में दिये गये हैं। अभ्यास की सुगमता के लिए इस संस्करण में पहले से अधिक, सरल संस्कृत पाणिनीय-सूत्र दिये गये हैं और उनकी व्याख्या पादटिप्पणी में दी गई है। पहले से अनुशीलनी की संख्या भी बढ़ गई है और पात्मनेपदी विभक्ति और धातुरूप ऐसे प्रबन्य से दिये गये हैं जिसमें वालकों को कष्ट झेलना न पड़े। परिशिष्ट में अति- रिक सन्धि प्रादि और नये शब्दों के उपरान्त कईएक परस्मैपदी, आत्मने- पदी तथा उभयपदी धातुओं के रूप वढ़ा दिये गये हैं और संस्कृत शिक्षा- र्थियों के दिग्दर्शन के निमित्त धातुरूपादशं दिया गया है जिसमें बहुतसे प्रचलित धातु अंगरेज़ी अर्थ तथा लटादि छः लकारों के स्पादि सहित हैं। इतनी नयी बातें देने पर भी मैने विद्यासागरजी की सरलता और सुगमता की हानि नहीं की है, यही इस उपक्रमणिका की सबसे अधिक विशिष्टता है। यह पुस्तक सभी संस्कृतशिक्षार्थियों के व्या परीक्षार्थियों के लिए परम- उपयोगी है। अंगरेज़ी विद्यालयों की तृतीय तथा चतुय अथवा उनके सम- नेणियों में इसको पढ़ा देने से मॅट्रिक्यूलेशन की संस्कृत-परीक्षा में उत्तीर्ण होना कठिन नहीं होगा। शुभमिति । : गाजीपुर, संवत् १९८४ श्री नारायणचन्द्रदेव शर्मा।

सूचीपत्र। पृष्ठा ... १ १ विषय .". निर्दय... , स्वरवर्ड मानवी ... पदों का इशारयस्थान Krarcisa. I मन्धि प्रकरब FFAIRTE १७ २७ ३४ ..." ३६ स्वरसन्धि न्यातसन्धि विसर्गसन्धि Eserciee II हत्व-विधान परक्-विधान सुबन्त प्रकरण विभक्ति की प्राकृति शब्दरूप. स्वरान्त शब्द ... ४५ ... पुंलिङ्गः . ... ... ६० ६० ८१ ... "/ क्लीब (नपुंसक) लिङ्ग Exercise.III व्यञ्जनान्त शब्द पुंलिङ्ग और खोलिङ्ग क्लब (नपुंसक) लिह Exercise IV सर्वनाम शब्द संख्यावाचक (शब्द) Exercise Y .. ... । ... म्यय शब्द हिंग पृष्ठा ६५ .... ... . १६ एक .. विषय स्त्रीलिङ्ग-प्रत्यय कारक का कर्म करण सम्प्रदान अपादान अधिकरण विभकिनिर्णय प्रथमा विभक्ति द्वितीया विभक्ति तृतीया विभक्ति चतुर्थी विभक्ति पन्चमी विभक्ति षष्ठी विभक्ति सप्तमी विभक्ति Exercise VI विशेष्य और विशेषण तिङन्त प्रकरण काल वचन पुरुष अकर्मक क्रिया सकर्मक क्रिया विकि विभक्ति की आकृति घातुरूप ... ... १०० १०१ १०१ १०३ १०३ १०४ १०५. १०६ १०० १०० १०८ १०६ १०६ १०६ ११० ११० MOM ... ... ११३ अकर्मक (धातु) ... Exercise VII VIII . IX १६४ ११५ ... ११. . ...

। ओ३म् ॥ संस्कृत-व्याकरण की उपक्रमणिका । 'वर्ण-निर्णय (Distinction of Letters.) १। अ इ उ, क ख ग इत्यादि एक-एक को वर्ण ( Letter ) कहते हैं । वर्ण दो प्रकार के हैं, स्वर (Vowel) और व्यञ्जन (Consonant)| स्वरवर्ण (अच् , Vowels )। १२। अ आ इ ई उ ऊ ऋऋ ल ए ऐ ओ औ, ये तेरह एर्ण (अच् ) हैं (१) । स्वर दो प्रकार के हैं, हस्त्र अथवा लघु (Short), और दीर्घ अथवा गुरु (Long)| अ इ उ ऋ लू, ये पाँच हुत्व (लघु) स्वर (Short Vowels) हैं। आई ऊ ऋ ए ऐ ओ औ, ये आठ दीर्घ (गुरु) स्वर (Long Vowels) हैं । लु दीर्घ नहीं होता (२)। (१) "स्वयं राजन्ते इति स्वराः" । जो वर्ण दूसरे वर्ण का सहारा न लेकर स्वयं उच्चारित होते हैं उनको स्वरस्वर्ण कहते हैं । (२) मुग्धवोध- कर्ण बोपदेव के अनुसार (दीर्घ ) व होता है । यथा, शक्लूदन वास्तव में ऐसा पाणिनि के मत में नहीं होता।

२ . उपक्रमणिका। व्यञ्जन-वर्ण (हल, Consonants) ३१ क ख ग घ ङ च छ ज झ बट्ठड्दा, त् थ् द्धन्, ५१ व भ म य र ल व, श् प् स् ह, (), (:), ये तेंतीस व्यञ्जन-वर्ण (१) (हल) हैं। इनमें से क् से लेकर म् तक पच्चीस वर्षों को स्पर्शवर्ण (Mutes) (२) कहते हैं । स्पर्शवर्ण पाँच वर्गों ( Groups ) में विभक्त हैं। क ख ग घ ङ, ये पाँच कबर्ग (कु) हैं । च छ ज झ बू, ये पाँच चवर्ग (चु) हैं । ठ् ड् ढ् ण, ये पाँच टवर्ग (C) । त् थ् द् ध न, ये पाँच तवर्ग (तु) हैं। प फ ब भ म, ये पाँच पवर्ग (पु) हैं । र ल व्, ये चार अन्तःस्थ वर्ण (Intermediates, Semi-Vowels ) (३) और श् प स ह, ये चार अप्मवर्ण (Sibilants) (४) कहलाते हैं। (') अनुस्वार, (:) विसर्ग, इन दोनों वर्गों को और ख, यह जिह्वामूलीय और प, फ, इस उपध्मानीय को भी अयोगवाह (५) कहते हैं। (१) जो वर्ण स्वर-वर्ष की सहायता के विना स्वयं उच्चारित नहीं .. हो सकते उन्हें व्यञ्जनवर्ण कहते हैं। (२) "कादयो मावसानाः स्पर्शाः।" जिह्वा के अग्र, उपाय, मध्य तथा मूल, इन स्थानों को स्पर्श करके उच्चारित होते हैं, इसलिए इनको स्पर्शपर्ण कहते हैं । (३) "यरलवा अन्तःस्याः।" स्पर्शवर्ण और मम्मवर्ण के बीच में हैं, इसलिए इनको अन्तस्यवर्ण कहते हैं। (४) श ष स ह, इनको उच्चारण करने में मुंह से विशेष करके ऊपमा (वायु) निकलती है, इसलिए इन्हें अप्मवर्ण कहते हैं। (५) पाणिनि ने स्वर और व्यञ्जन के विषय में जो सब संज्ञा की हैं, उनमें इन दोनों का और जिह्वामूलीय, उपध्मानीय का योग (उलेख) नहीं है, इसलिए 'अयोग' और टल्लेख न रहने पर भी ये प्रयोगको निर्वाह करते हैं, इसलिए 'वाह' है। इन दोनों से धर्माकान्त होने के कारण अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय, ये चारों प्रयोगवाह नाम को प्राप्त हुए हैं। क वों का उच्चारणस्थान। ३ वों का उच्चारणस्थान। (Seats of Utterance of Letters.) ४ | अ आ ह क ख ग घ ङ (:) विसर्ग, इनके उचारण का स्थान कण्ठ (Throat) है, इसलिए इनको कण्ठ्यवर्ण (Gnturals) कहते हैं (१)। ५। कस्, इनका उच्चारण स्थान जिह्वामूल (Root of the tongue) है, इसलिए इनको जिह्वामूलीयवर्ण (Lingne-radicals) कहते हैं (२)। ६ । इ ई च् छ् ज् झ् ब् यश, इनका उच्चारणस्थान तालु ( Palate) है, इसलिए इनको तालत्र्यवर्ण ( Palatals) कहते हैं (३)। ७। ऋऋट् ठुड्ड् ण् र प, इनका उच्चारणस्थान मूर्धा ( Cerebellum) है, इसलिए इन्हें मूर्द्धन्यवर्ण (Cerebrals) कहते हैं (४)। ८। ल त्थ् द्धन ल स, इनका उच्चारणस्थान दन्त (Teeth) है, इसलिए इन्हें दन्त्यवर्ण( Dentals) कहते हैं (५)। ६। उ ऊ प् फ् व् भू म्, और, फ, यह उपध्मानीय हैं । इनका उच्चारणस्थान ओष्ठ (Lips) है, इसलिए इन्हें ओष्ठ्य- वर्ण ( Labials ) कहते हैं (६)। १० । ए ऐ, इनका उच्चारणस्थान कण्ठ और तालु है, इसलिए (१) अकुहविसर्जनीयानां कपठः, इस सूत्र के अनुसार अ आ हक ख ग् घन, इनके उच्चारण का स्थान कराठ है। किन्तु शिक्षाग्रन्थ का निर्देष समीचीन बोध होने के कारण विद्यासागरजी ने अाह, इनके उच्चारण का स्थान कण्ठ, और कवर्ग का जिह्वामूल निर्देष किया है। (२) जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम् । (३) इचुयशानां तालुः। (४) ऋटुरषाणां मूर्धाः । (५) तुलसानां दन्ताः।(६) उपूपध्मानीयानामोष्ठौ । .

उपक्रमणिका। इनको कण्ठ्यतालव्यवर्ण ( Gutturo-palatals ) कहते हैं (१)। ११ । ओ औ, इनका उच्चारणस्थान कण्ठ और श्रोष्ठ है, इसलिए इसको कण्ठ्यौष्ठ्यवर्ण (Gutturo-labiaJs ) कहते हैं (२)। १२ । (अन्तःस्थ ) व् का उच्चारणस्थान दन्त और पोष्ट है, इसलिए इसको दन्त्यौष्ठ्यवर्ण (Dento-labials ) कहते हैं (३)। १३ । (') अनुस्खार का उच्चारणस्थान नासिका ( Nose) है, इसलिए इसको अनुनासिक ( Nasal ) वर्ण कहते हैं (४)। १४ । (:) विसर्ग आश्रयस्थानमागी है अर्थात् यह जिस स्वरवर्ण के आगे रहता है, उस स्वरवर्ण का उच्चारणस्थान ही उसका उचारणस्थान होता है। परन्तु पाणिनि मत में इसका कण्ठ ही स्थान है, और दीक्षित मत में भी । १५ । ङ् ण् न म्, ये सब जिह्वामूल, तालु श्रादि जैसे नासिका से भी उच्चरित होते हैं, इसलिए इन्हें अनुनासिकवर्ण Nasals ) भी कहते हैं (५)। Exercise 1. (अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रभ (१) स्वरवर्ण जब व्यञ्जनवर्ण में मिलते हैं उनके हर एक का रूप कैसा होता है दिखलाओ । व्यञ्जनवर्ण में प्रकार का योग कैसे जाना जाता है ? स्वरवर्ण कितने हैं ? (१) एदेतोः कण्ठतालुः । (२) ओदौतोः कण्ठोष्ठम् । (३) वकारस्प दन्तोष्ठम् । (४) नासिका अनुस्वारस्य । (५) यमणनानां नासिका च ।

. अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रभा ५ (२) व्यञ्जनवर्ष का स्वरूप कैसा है, लिखो। व्यञ्जनवर्गों में प्रायः प्रकार लगाकर लिखा जाता है, क्यों ? ऐसा लिखना ठीक है या नहीं? कारण दिखाकर बतलाओ। (३) स्वरवर्ण के प्रकार के होते हैं हर एक प्रकार का नाम बताओ और उसमें कौन कौन स्वर हैं, कहो। स्वरवर्ण का लक्षण क्या है ? (४) व्यञ्जनवर्ण कितने हैं? वे के प्रकार के होते हैं? उनके नाम बताओ और उनमें से किसी का कोई विभाग हो तो नाम सहित वर्णन करो। व्यसन का लक्षण क्या है ? यदि अ आ आदि को. व्यञ्जन और क ख आदि को स्वर कहा जाता तो क्या दोष होता? (५) अयोगवाहवर्ण कौनसे हैं? उन्हें क्यों अयोगवाहवर्ण कहते हैं! अन्तःस्थ, अम्म तथा स्पर्शयों को अँगरेज़ी में क्या कहा जाता है ? (६) आ, ई, ऊ, ए, ओ, ऋ,स्, ष,श, य, र, ल, व, ब, ह, घ, उच्चारण के स्थान के अनुसार इनके हर एक का संस्कृत तथा अंगरेज़ी नाम बताओ। (७) अनुनासिकवर्ण कौन कौन हैं ? वे क्यों अनुनासिक कहलाते हैं ? विसर्ग के उच्चारण का स्थान क्या है ? उदाहरण देकर समझायो। (८) राम, हरि, विष्णु, गणेश, इन शब्दों का वर्ण-विश्लेषण करो। (.) इस चिह्न का नाम क्या है ? : ६) युक्ताक्षर किसे कहते हैं ? स्वरवर्ण में युक्ताक्षर है या नहीं ? (मम्म), (रद्धू अ), (कप अ), (ज न् अ), (क्ष्म ई), (इ), (द य् उ), पूर्ववर्ती हर एक बन्धनीस्थित वर्णों से एक-एक युक्ताक्षर बनाकर लिखो। N. B.:-स्वरवर्ण का व्यवधान नहीं रहने पर दो वा दो से अधिक व्यञ्जनवर्ण एकसाथ संयुक्त होने से (अर्थात् मिल जाने से ) उसे संयुक्त- वर्ण अथवा युक्ताक्षर कहते हैं। यथा, व अ-त, गमई-ग्मी, सर- नि,++ओ=ौहत्यादि। क,ग्मी, नि,कर्को संयुक्तवर्ण वायुक्ताक्षर हैं। .

६ उपक्रमणिका। (१०) अनुस्वार, विसर्ग और ल स्वर हैं अथवा व्यञ्जन ? क्ष एक स्वतन्त्र वर्ण है या नहीं ? कारण दिखलाकर बताओ। सन्धि-प्रकरण । (Combination of Final and Initial Letters.) सन्धि । दो वर्ण परस्पर अत्यन्त सन्निहित (निकटस्थ) होने पर मिल जाते हैं। वर्षों के इस मिलने को सन्धि कहते हैं। सन्धि तीन प्रकार की हैं; स्वरसन्धि, व्यञ्जनसन्धि और विसर्गसन्धि । स्वरवर्ण के साथ स्वरवर्ण की जो सन्धि होती है उसको स्वर- सन्धि (Combination of Vowels ) कहते हैं। व्यञ्जनवर्ण के साथ व्यञ्जनवर्ण की, व्यञ्जनवर्ण के साथ स्वरवर्ण की अथवा स्वरवर्ण के साथ व्यञ्जनवर्ण की जो सन्धि होती है उसको व्यञ्जन- सन्धि (Combination of Consonants) कहते हैं । विसर्ग के साथ वरवर्ण अथवा व्यञ्जनवर्ण की जो सन्धि होती है उसे विसर्गसन्धि (Combination of Visargas) कहते हैं । N. B.:-सन्धि होने से कभी दो वर्ण मिल जाते हैं, कभी पूर्ववर्ण विकृत होता है, कभी परवणं विकृत होता है, कभी दोनों वर्ण विकृत होते हैं, कभी पूर्ववर्ण का लोप होता है, कभी परवर्ण का लोप होता है। यथा; महान्+आग्रहान्महानाग्रहः; उत्+चारयतिउच्चारयति; याच+ना= याचा; महान्+शन्दः-महान्छन्दः, स:+आगतःस आगतः; गुरो+ अनुमन्यस्व-गुरोऽनुमन्यस्व । प्रकृत प्रस्ताव में विसर्गसन्धि व्यञ्जनसन्धि के ही अन्तर्गत है।

स्वरसन्धि। स्वरसन्धि। (Combination of Vowels.) १। "अकः सवर्णे दीर्घः (१)। श्र के परे अ अथवा श्रा होवे तो दोनों मिलकर पा होता है; यथा, शश+अङ्कः शशाङ्क: उत्तम अङ्गम् - उत्तमाङ्गम् ; अद्य+अविध-अद्यावधि; रन आकरःरनाकरः; देव+आलयः = देवालयः; कुश+आसनम् - कुशासनम् (२)। २॥ "अकः सवर्णे दीर्घः" ।श्रा के परे अ अथवा आहोवे तो (१)दो सवर्ण स्वर (समान स्वर) अत्यन्त सन्निहित होने से दोनों मिलकर दीर्घ हो जाता है । अर्थात् अ+अधा पाम (नियम१), मा+ अ वा बा-आ (नियम २) + वाई-ई (नियम ३), ई+हवाई-ई (नियम ४) उ+उवा 3-3 (नियम ५), +उ वा ॐ(नियम६); +-+ (नियम); a+(नियम ७ की पाटीका)। प्रयोजनवश ऋ, टु सवर्ण माने जाते हैं। (२) निम्नलिखित कई एक शब्द निपातन से सिद्ध होते हैं अर्थात् सन्धि के नियम के अनुसार सिद्ध नहीं होते-सार+अङ्गम् सारङ्गः (चात- कादि, a kind of bird; किन्तु साराङ्गः वाद्ययन्त्र विशेष); सीम+अन्त:- सीमन्तः (केशविन्यासः, the white line left by the parting of the heir of the head किन्तु सीमान्तःसीमा का शेष boundary);कुल अटा -कुलटा(an ill-famed women); माश्रियान्मार्तण्ड:(the sun); शका अन्धु:-कन्धुः (कुआँ, a well); कर्क+अन्धुः कर्कन्धुः; समामर्थम् समर्थः; सम+शनम्-समशनम्, अर्द्ध+प्रशनम्-अर्द्धशनम् ; पर+अक्ष-परोक्षः, अन्य+अन्यः-अन्योन्यः । यहाँ अ+अ-आ नहीं हुआ।

5 उपक्रमणिका। दोनों मिलकर आ होता है; यथा दया+अर्णवः दयार्णवः; महा+अर्घः महाः, लता+अन्तः= लतान्तः; महा +आशयः- महाशयः, गदा आघातः = गदाधातः; विद्या + आलयः= विद्यालयः। ३। "अकः सवर्णे दीर्घः" । इ के. परे इ अथवा ई होवे तो दोनों मिलकर ई होता है; यथा, गिरि+इन्द्रः=गिरीन्द्रः, अति + इव=अतीव; प्रति + इतिः=प्रतीतिः, कवि+ ईश्वरः = कवीधरः, क्षिति + ईशः = क्षितीशः; प्रति + ईक्षाप्रतीक्षा । ४। "अकः सवर्णे दीर्घः" । ई के परे इ अथवा ई होवे तो दोनों मिलकर ई होता है; यथा, मही+इन्द्रः =महीन्द्रः, महती+ इच्छा=महतीच्छा; लक्ष्मी+ईशः=लक्ष्मीशः; पृथ्वी+ईश्वरः =पृथ्वीश्वरः। ५। 'अकः सवर्णे दीर्घः" । उ के परे उ अथवा ऊ होवे तो दोनों मिलकर ऊ होता है; यथा, विधु + उदयः= विधूदयः, मधु+ उत्सवःमधूत्सवः; वादु + उदकम् = स्वादूदकम् साधु+उक्तमः साधूक्तम् लघु + ऊर्मिः = लघूमिः, गुरु + अहः =गुरूहः । ६। "अकः सवर्णे दोघः" । ऊ के परे उ वा ऊ हो तो दोनों मिलकर ऊ होता यथा, वधू+ उत्सवः-यधृत्सवः स्वयम्भू+ उदयः = स्वयम्भूदयः; भू+ ऊर्द्धम् = भूर्द्धम्; वधू + हनम् = वधूहनम् । ७ । "अकः सवर्णे दीर्घः" । ऋ के परे ऋहोवे तो दोनों मिल-

ह
प्रव+
स्वरसन्धि ।
कर (दीर्घ) ऋ होता है; यथा पितृ+ऋणम् =पितृणम्। मातृ +
ऋद्धिः =मातृद्धिः (१)।
८ । “श्राद्गुणः"। (२)। अ के परे इ वा ई रहे तो दोनों
मिलकर एहोता है; यथा. देव+इन्द्रः देवेन्द्रः; पूर्ण+इन्दुः पूर्णेन्दुः,
गण+ईशः-गणेशः, परम + ईश्वरः = परमेश्वरः;
ईक्षणम्-अवेक्षणम् (३)।
६ | "आद्गुणः" । आ के परे इ वाई रहे तो दोनों मिलकर
ए होता है; यथा, महा+इन्द्रः-महेन्द्रः; लता+इव =लतेव; रमा+
ईशः रमेशः; महा + ईश्वरः-महेश्वरः।
१० । “श्राद्गुणः"। असे परेउवा ऊ रहे तो दोनों मिलकर
ओ होता है; यथा, नील+उत्पलम् =नीलोत्पलम्; सूर्य+उदयः
।
(१) से परे ल रहने से दोनों मिलकर (दीर्घ ) ऋहोता है। यथा,
होत+लकार:=होतृकारः। मुग्धबोध के अनुसार लु+ल=(दोघ) लृ होता
है। यथा शक्ल + लृदन्तः शक्लृदन्तः । (२) अ अथवा आ के परे इई
रहने से दोनों मिलकर ए, उ क रहने से दोनों मिलकर ओ और ऋ रहने
से दोनों मिलकर पर होता है। अर्थात् श्र+इ वा ई-ए (नियम); आ
+हवाईए(नियम); अ+उवा -ओ (नियम १०); आ+उवा
ऊ-श्रो (नियम ११); अ+अर् (नियम १२), श्रा+ऋ-अर्.
(नियम १३)। इईका गुण ए; उ ऊ का ओ; ऋ का अरः लू का अल्
होता है। (३) परन्तु स्व+इर: स्वैरः ( Self-villed ) । यहाँ अ+s
-ए न होकर ऐ हुआ है। (स्वादोरेरिणोः)। हल+ईषा-हलीषा,
लागल+ईषालाङ्गलीषा, मनस्+ईषा-मनीषा (बुद्धि Intellect),
ये तीन पद निपातन से सिद्ध हैं।
.

१० उपक्रमणिका। सूर्योदयः; एक + ऊनविंशतिः एकोनविंशतिः, गृह + ऊर्द्धम गृहोर्द्धम् (१)। ११। “श्राद्गुणः" । आ से परे उवा ऊ होवे तो दोनों मिल- कर ओहोता है। यथा, महा + उदयः-महोदयः; गङ्गा + उदकम् = गगोदकम् गङ्गा ऊम्मिः गङ्गोम्मिः; महा+म्मिः महोम्मिः । १२ । "श्राद्गुणः” । अ के परे ऋ रहे तो ऋ के स्थान में र होता है, और र पर वर्ण के मस्तक पर चला जाता है । यथा, देव + ऋपिः =देवर्पिः, हिम + ऋतुः हिमतुः (२)। १३ । "श्राद्गुणः।" श्रा के परे ऋ होवे तो श्रा के स्थान में अ, और ऋ के स्थान में होता है; र् पर वर्ण के मस्तक पर चला जाता है। यथा, महा+ऋपिः=महर्पिः (३); देवत्ता+ ऋपमः-देवतर्पमः। १४। "वृद्धिरेचि" ४)। असे परे ए अथवा ऐ होवे तो (१) परन्तु अक्ष+अहिणी- अक्षौहिणी;प्र+कहा-पोहः (Principal reasoning); प्र+मा-प्रौदः ( Full-grown); प्र+अदिप्रीतिः (Audacity)। इन सवों में प्र+3=ओ न होकर भी हुआ है । (२) किन्तु तृतीया तत्पुरुष समास में अवा आ के परे ऋत शब्द के ऋ रहे तो दोनों मिलकर पार होता है। यथा, शीत+ऋतःशीताः; भय+ऋतः= भयार्तः; तृष्णा+ऋतः-तृष्णाः। तृतीया तत्पुरुष समास न होने से ऐसा नहीं होता। (३) महा + ऋषिः-महपिः, महाऋपिः, महपिः भी होता है। ब्रह्मा ऋपिःब्रहार्षिः, ब्रह्माऋपिः, ब्रापिः होता है। किन्तु परा+ ऋच्छति % परादति होता है। (४) वा पा के परे ए वा ऐ रहे तो दोनों मिलकर ऐ और ओ वा श्री रहे स्वरसन्धि। ११ दोनों मिलकर ऐ होता है; यथा, अद्य+एव-अद्यैव (१); एक + एकम् -एककम् ; मत + ऐक्यम् मतैक्यम् ; तव + ऐश्वर्यम् -तवैश्वर्य्यम् (२)। १५ । "वृद्धिरेचि"। आ के परे ए वाऐ होवे तो दोनों मिल- कर ऐ होता है; यथा, सदा+ एव%3 सदैव; (३) तथा+एतत्= तथैतत् ; महा+ऐरावतः महैरावतः ; महा+ऐश्वर्यम्-महैश्वर्य्यम् । १६ । “वृद्धिरेचि" | अ के परे ओ अथवा औ होवे तो दोनों मिलकर औ होता है; यथा जल +ोघा-जलौघः ग्राम+ोका ग्रामौकः; चित्त + औदार्यम् = चित्तौदार्यम् ; गत + औत्सुक्यः =गतौत्सुक्यः (४)। तो दोनों मिलकर औ होता है, अर्थात, अ+एवा ऐ ऐ (१४), पा+ए वा ऐ-ऐ (१५); अ+ओषा औऔ (१६); श्रा+ो वा औ-प्रो (१७) । को वृद्धि श्रा, इ ई की वृद्धि ऐ, उ ऊ की वृद्धि औ, ऋ की वृद्धि पार हैं। (१) यहां एव निश्चयार्थक है। निश्चयार्थक भिन्न अन्य अर्थवोधक एव शब्द परे रहने से अवर्णका लोप होता है; यथा, सम्भावना अर्थ में-अद्य+ एक्-अयेव । सादृश्य अर्थ में चर्म+एव-चम्मैव । अनिश्चय अर्थ में-क+ एव-क्केव। किन्तु निश्चय अर्य में १४ नियम के अनुसार अ+ए=ऐ होता है; यथा, इह एव-इहैव; तव+एव-तवैव; मम+एसम्ममैव इत्यादि। (२) परन्तु प्र+एषः-प्रेषः, प्रेषः (Sending): प्र+एष्यःम्प्रेष्यः, प्रेष्यः (a servant)(३) नियम १४ की पादटीका (१) देखो। (४) समास में श्र अथवा श्रा के परे गोष्ठ और श्रोतु (a cat) शब्द का ओ रहने से दोनों मिलकर विकल्प से ओ और औ होता है; यया, विम्+ोट-विम्बोष्ठः, बिम्बोष्टः उमा+ोष्ठः-ठमोष्ठः, उमौष्ठः; स्थूल+श्रोतुस्थूलोतुः, स्थूलौतुः; महा+ ओतुः=महोतुः, महौतुः। समास न होने से ऐसा नहीं होता; यथा, , उपक्रमणिका। १७ । " वृद्धिरेचि" । आ के परे श्रोअथवा ौ होवे तो दोनों मिलकर श्री होता है; यथा, महा +ओपधिः महीपधिः; सदा + मोदनम् = सदीदनम् ; महा + औदार्यम्; महौदार्यम् ; सदा+ औत्सुक्यम् =सदौत्सुक्यम् । १८ । “इकोऽयणचि” (१)। इ ई भिन्न स्वरवर्ण परे रहने से इ के स्थान में य होता है; य और उसका पूर्ववर्ण भी आगे के स्वर में मिल जाता है; यथा, यदि + अपि-यद्यपि; अति + आचार:-अत्याचारः; अमि+उदयः =अभ्युदयः; प्रति + ऊहः= प्रत्यूहः; मुनि+ऋपभः=मुन्यृपभः; प्रति + एकम् प्रत्येकम् ; अति + ऐश्वर्यम् =अत्यैश्वर्यम् ; पचति +श्रोदनम-पचत्योदनम् : अति + औदार्यम् =अत्यौदार्य्यम् (२)। १६ | "इकोऽयणचि" । इ ई को छोड़कर दूसरा स्वरवर्ण पर रहने से ई के स्थान में य होता है ; य और पूर्ववर्ण आगे के स्वर में युक्त होता है । यथा, नदी +अम्बु नद्यम्बु ; देवी + श्रागता- देव्यागता; सखी + उक्तम् = सख्युक्तम् ; शशी + ऊर्ध्वर्गः शश्यू- वली +ऋपभः =बल्यूपमः ; गोपी + एपा-गोप्येया; वर्गः; . तब-ओष्ठः=तवौष्ठः; मम+ ओष्ठः ममौष्ठः; तव+ोतुः-तधौतुः । (१) असवर्ण अर्थात् असमान स्वरवर्ण परे रहने मे इ ई के स्थान य (१८, १९), उ ऊ के स्थान में व (२०, २१), ऋ के स्थान में र (२२) और न के स्थान में न होता है ( पादटीका १ नियम २२ ) । (२) किन्तु चक्री अत्र, चक्रिपत्र, चक्रयत्र ई पद के अन्त में हो और उसके परे इ ई को छोड़ कर दूसरा स्वरवर्ण हो तो ऐसा होता है। दधि+ऋच्छति दधिच्छति, दध्यच्छति । ।

स्वरसन्धि । १३ १ बली + ऐरावतः=वल्यैरावतः; सरस्वती + ओघः =सरस्वत्योघः; वाणी + औचित्यम् =वाण्यौचित्यम् (१)। २० 1 "इकोऽयणचि"। उ ऊ को छोड़कर दूसरा स्वरवर्ण परे रहने से उ के स्थान में व होता है; व और उसका पूर्ववर्ण आगे के स्वर में युक्त होता है। यथा, अनु + अयः=अन्वयः सु+आगंतम्-स्वागतम् ; मधु + इदम् मध्विदम्; साधु + ईहितम्- साध्वीहितम् मधु +मृते-मध्वृते; अनु + एपणम् =अन्वेपणम् अनु + ऐतिष्ट-अन्वैक्षिष्ठः पचतु+ओदनम् पचत्वोदनम्। ददातु +औषधम् ददात्वौपधम् (२)। २१ । "इकोऽयणचि" । उ ऊ को छोड़कर दूसरा स्वरवर्ण परे रहने से ऊ के स्थान में व होता है; व् और उसका पूर्ववर्ण आगे के स्वर में युक्त होता है। यथा, सरयू + अम्बुसरय्वम्चु वधू+आदिवध्वादिः ; तनू+इन्द्रियम् तन्विन्द्रियम्; तनूईश्वरः तन्वीश्वरः; सरयू + एधितम् =सरय्वेधितम् वधू + ऐश्वर्यम् =वध्वैश्वर्यम्; सरयू +ोघः =सरय्वोधः; वधू + औदार्य्यम् -वध्वौदार्यम् (३)। - (१) शार्णी+अत्र-शार्णी अत्र, शामित्र, शायंत्र । ई पद के अन्त में रहे और उसके परे इ ई भिन्न स्वरवर्ण होवे तो ऐसा होता है। नदी+ अम्बु-मद्यम्बु (समास होने से), नदी+अम्बु नदिअम्बु, नद्यम्बु भी (समास नहीं होने से)। (२) मधु+ऋते मधुते, मध्वृते भी होता है; कारण यहाँ उ पद के अन्त में है और उसके परे कसे भिन्न अन्य स्वरवर्ण है। (३) सरपू+अम्बु-सरयुअम्बु, सरवम्बु, सरयू+ोधा-सरयु उपक्रमणिका। २२ । "इकोऽयणचि"। ऋ को छोड़कर दूसरा स्वरवर्ण (७) परे रहने से ऋ के स्थान में र होता है; र और उसका पूर्ववर्ण आगे के स्वर में युक्त होता है। यथो, पितृ + अनुमतिः= पित्रनुमतिः, पितृ +आदेशः%Dपित्रादेशः; पितृ + इच्छा=पित्रि- च्छा; पितृ + ईहितम् =पित्रीहितम् पितृ + उपदेशः=पित्रुपदेशः; पितृ अहः =पित्रुहः, पितृ + एपणा-पित्रेपणा; पितृ + ऐश्वर्य्यम् = पित्रैश्वर्य्यम्; पितृ +ओकः पित्रोकः, पितृ + औदार्यम् = पित्रोदाय॑म् (२)। २३ । “एचोऽयवायावः" (३)। स्वरवर्ण परे रहने से ए के स्थान में अय् होता है (४); अ पूर्ववर्ण में युक्त होता है और आगे के स्वर में य युक्त होता है । यथा, शे+अनम् =शयनम्; ने+अनम् = नयनम्; जे+अति जयति; सच्चे+:-सरचयः; +आत-शयाते; अशे+आताम् = अशयाताम्; शे+इतम् = शयितम् अशे + इष्ट =अशयिष्ट; शे+ईत शयीत,शे + ईरन् = शयोरन्; शे+ ए =शये; शे+ऐ =शयै । श्रोधः, सरय्घोषः, ऐसे भी हो सकते हैं; कारण ऊ यहाँ पद के अन्त में है और उसके परे उ से भिन्न स्वरवर्ण है । परन्तु समास न होने पर समास में एक ही रूप सरवम्बु, सरवोध होगा। (१) और लू को छोड़कर । (२) असवर्ण (असमान) स्वर परे रहने से लू के स्थान में न होता है। यथा, लु+प्राकृतिःलाकृतिः। (३) स्वरवर्ण परे रहने से ए के स्थान में अय् (नियम २३), ओ के स्थान में अव (नियम २५), ऐ के स्थान में प्राय (नियम २४ ) और औ के स्थान ' में आव (नियम २६) होता है। (४) अभिन्न स्वरवर्ण परे रहने से पद के अन्तस्थित ए के स्थान में अ और अय होते हैं। अ होने पर और सन्धि नहीं होती। यया, सखे+आगच्छ-सख आगच्छ, सखयागच्छा ते+एव स्वरसन्धि। १५ २४ । “एचोऽयवायावः" । स्वरवर्ण परे रहने से ऐ के स्थान में आय होता है (१); आ पूर्ववर्ण में युक्त होता है और आगे के स्वर में य प्रयुक्त होता है । यथा, विनै + अकः विनायकः, सबै+अकः + सञ्चायकः; रै+आराया; रै+इ-रायि +ए-राये; +ओ-रायो। २५ । “एचोऽयवायावः" । स्वरवर्ण परे रहने से ओ के स्थान में अव होता है (२); अ पूर्ववर्ण में युक्त होता है और आगे के स्वर में वे युक्त होता है। यथा, भो+अनम् भवनम् पो+अनः= पवनः; श्रो+अनम् = श्रवणम् ; गो+आगवा; भो+इता- मविता; पो+इत्रम् पवित्रम् ; गो+ए-गवे; गो+ओः गवोः (३)। २६ । “एचोऽयवायावः" । स्वरवर्ण परे रहने से औ के स्थान - - त एव, तयेव सर्वे+एते सर्व एते, सवयते । (१) स्वरवर्ण परे रहने से पद के अन्तस्थित ऐ के स्थान में था और बाय होते हैं। आ होने पर और सन्धि नहीं होती। यया, त्रिय+अर्थ श्रिया अर्थः, श्रियायर्यः; भुक्त्यै + श्रोदनम् मुक्त्या प्रोदनम्, अक्ल्या- योदनम् । (२) भिन्न स्वर वर्ण परे रहने से पद के अन्तस्थित प्रो के स्थान में अऔर अव होते हैं। अहोने पर और सन्धि नहीं होती। यथा, प्रमों+आगच्छ-प्रम आगच्छ, प्रभवागच्छ; शम्भो+एहि- सम्म एहि, शम्भवेहि। (३) स्वरवर्ण परे रहने से पद के अन्तस्थित मो शब्द के पो के स्थान में प्रव और अव होते हैं, अव होने पर फिर सन्धि होती है। यथा, गो+ईश:-गव+ईश:-गवेशः, गो+ईश: =गव+शिगवीशः । अक्ष और इन्द्र शन्द परे होने से गो के ओकार के स्थान में केवल वही होता है। यथा, गो+अक्षानगवाक्षः (Windows गो+इन्द्रागवेन्द्रः (Lord of Kine)। किन्तु गो+अनम-गवानम्, गोऽयम् (भागे के का लोप होकर), गो अग्रम् (सन्धि न होकर)।

१६ उपक्रमणिका। में श्राव होता है ( १); आ पूर्ववर्ण में युक्त होता है और आगे के स्वर में व युक्त होता है । यथा, पौ+अकः = पावकः; नौ + आनावा; भौ+ इनी =साविनी; भौ+ उकाम्भावुकः; नौ+ नावे; नौ +ोः =नावोः; नौ+श्रीनावौ (२)। ए-नावे; २७ | "एड: पदान्तादति" । पद के अन्त में स्थित ए अथवा ओ से परे जो अरहता है उसका लोप होता है । लोप होने पर अ का जो चिह्न (s) रहता है उसे लुप्न प्रकार कहते हैं । यथा, कवे + अवेहि =कवेऽवेहि; सखे + अर्पयः सखेऽर्पय; प्रभो+ अनुगृहाण = प्रभोऽनुगृहाण; गुरो+अनुमन्यस्त्र-गुरोऽनुमन्यस्व । पद के अन्त में स्थित नहीं होने से नहीं होता। यथा, ने + अनम् =नयनम् ; भो+अनम् = भवनम् । (स्वरसन्धि के अतिरिक्त नियम परिशिष्ठ में देखो।) (१) स्वरवर्ण परे रहने से पद के अन्तस्थित श्री के स्थान में प्रा.और आव होता है; आ होने पर सन्धि नहीं होती। यथा, रखो+अस्तमिते =रवा अस्तमिते, रवावस्तमिते; ती+इमो-ता इमो, ताविमी; गती +औत्सुक्यम गठा औत्सुक्यम्, गतावौत्सुक्यम् । (२) यकारादि प्रत्यप परे रहने से ओ के स्थान में अब और ी के स्थान में प्राव होता है। यथा, गो+यम् गन्यम् नौ यम्-नाव्यम् ।. पथ परिमाण बोध होने पर गो+पूतिः गन्यूतिः (A distance of four miles) होता है; अन्यथा गोयूतिः (A yoke of oxen )।

व्यञ्जनसन्धि। १७ " व्यञ्जनसन्धि । (Combination of Consonants.) १ । "स्तोः श्चुनाचुः (१)। च् अथवा छ परे रहने से त् और द् के स्थान में च होता है । यथा, महत् + चक्रम् =महञ्चक्रम्; भवत् चरणम्भवचरणम्: उत्क्चारणम्-उच्चारणम् एतत्-चन्द्र- मण्डलम् =एतञ्चन्द्रमण्डलम् विपद् + चयः विपञ्चयः, तद् + चलनम्-तचलनम्। महत्+छत्रम्-महच्छत्रम् भवत् +छलम् भवच्छलम्; उत्= छिनत्ति-उच्छिनत्ति; तद् + छवि मच्छविः, एतद् +छाया:एतच्छाया। २। "स्तोः चुनाश्चः" । ज् अथवा झ परे रहने से त् और दु के स्थान में ज होता है । यथा, भवत् +जीवनम् =भवजीवनम् ; उत् + ज्वल:= उज्ज्वलः; सरित् + जलम्-सरिजलम् वद्+जन्म- तज्जन्म; एतद्+जननम् = एतजननम्; विपद जालम्-विपन्नालम्; महत् + मलमनम् महम मनम् तत् सनत्कारः-तज्मनत्कारः । ३ । “ष्टुनाष्टुः" (२)। अथवा ठ परे रहने से त् और द के स्थान में ट होता है । यथा, उत् +टलति-उट्टलति (३); (Oशकार और चवर्ग के योग में सकार और तवर्ग के स्थान में क्रम से शकार और चवर्ग होता है। यया, रामस्+शेते रामशेते, सत्+ चित् सच्चित् । (राषकार और टवर्ग के योग में सकार और तवर्ग के स्थान में कम से पकार और टवर्ग होता है। यथा, रामस्+षष्ठः- राम षष्ठःपेष्+ता-पेष्टा । (३) वर्ग के परे तवर्ग रहने से भी तवर्ग के स्थान में टवर्ग होता है। यथा, ईट्+ते ईट्टे। किन्तु टवर्ग पद के अन्त में रहने से तवर्ग के स्थान में टवर्ग और स के स्थान में ए नहीं होता। यथा, षट्+ते-घटते, षट्सन्तः। परन्तु षट्+नाम्=पण्बाम्, षट्+ नवतिः पयशवतिः, षट्+नगर्यः=षयगर्यः, इन तीन पदों में निषेध नहीं है किन्तु विधान है। २ १८ उपक्रमणिका। 35 ५। "स्तो चुनाथुः”। महत्स्टङ्कनम् -महट्टङ्कनम् तद्+टीका तट्टीका; एतद् टङ्कारः एतट्टकारः; सत्+ठकार:-सहकारः; एतद् ठकुरः एतहकुरः। ४ । “ष्टुनाष्टुः" । ड् अथवा ढ् परे रहने से न और द के स्थान मेंड होता है। यथा; उन + डीनः = उड्डीना; भवत् डमरु:- भवडुमरुः; तद+डिण्डिमः-तडिण्डिमः; एतद् डामरः एतहामरः; उत् + ढोकते-उड्डोकते; महत् + ढालम्-महड्डालम; एतद् + ढका- एतडका; तद् +दुएढनम-तड़दुण्ढनम । ज अथवा म और श परे रहने से न. के स्थान में ज होता है । यथा, महान + जया महाजयः; राजन+ जागृहि-राजजागृहि भवान+जीवतु-भवाजीवतु; उद्यन्+मङ्कारः- उद्यमङ्कारःविरमन + झनकारः-विरमझमनत्कारः; गच्छन + झटितिगच्छन्झटिति; सवान +शूरः =भवाशूरः ६। "शश्लोऽटि"| पद के अन्त में स्थित न अथवा द् से परे श् होवे तो न् द् के स्थान में च् और श् के स्थान में छ् होता है। यथा, जगत् + शरण्यः जगच्छरण्यः; महन +शकटम् - महच्छकटमः तद्+शरीरम् = तच्छरीरम् एतद् +शकान्दीयम् - एतच्छकाब्दीयम् (१)। (१) बयाकरण लोग श के स्थान में विकल्प से च कहते हैं; इमलिए नगशरगयः, महच्शकटम्, तशरीरम्, एनच्शकान्दीयम् भी होते हैं। पद के अन्तस्थित'क, ट् और प के परे श रहने से भी श के स्थान में विकल्प से छ होता है । यथा, वाक+शतम् वाकछन, वाशतम्: परित्राद+ शेते-परित्राट्छेते, परिबाटोते; अप+शब्दः=अपद्धन्दा, अपशब्दः । किन्तु च युक्त श् के स्थान में नहीं होता। यथा, उन्+श्च्योतति उन्श्च्योतति; धाक+श्च्योनति=बाकश्च्योतति । ।

व्यञ्जनसन्धि । (8 :: ७१ "शि तुक्" । पद के अन्त में स्थित न् से परे श होवे तो न के स्थान में सदा अ और श के स्थान में विकल्प से छु होता है । यथा, महान्+शब्दः =महाञ्छन्दः, महाशब्दधावन+ शशःधावञ्छशः, धावब्शशः; निन्दन +शठः -निन्दछठः, निन्दशठः (१)। ८ । "झयो होऽन्यतरस्याम्” (२) । पद के अन्त में स्थित त् अथवा द् के परे ह होवे तो त् के स्थान में द् और ह के स्थान में ध होता है । यथा, उत् + हतः उद्धतः; उत् + हरणम् - उद्धरणम् महत् हसनम् =महद्धसनम् ;, तद् + हितम् =तद्धितम् । तद् + हेयम् = तद्धेयम् ; विपद् हेतुः = विपद्धेतुः (३)। .61 "स्तोः श्रुनाश्चः" । च अथवा ज के परे न होवे तो न के स्थान में न होता है। यथा, याच्+ना-याञ्चा, यज+ना यज्ञः; जज़ + नाते =जज्ञाते; जज + निपे-जज्ञिपे; जज् + निध्वे = जज्ञिध्वे; जज्+ने जज्ञे; राज+ना=राज्ञा; राज +नी-राज्ञी। १० । “घुनाष्टुः” । ड् अथवा ढ् परे रहने से न के स्थान में रण होता है। यथा,महान् डामरः महाण्डामर, रुवन्+डिण्डिमः= (१) वैयाकरण लोग यहां चार पद सिद्ध करते हैं । यथा, महान्छन्दः, महान् शब्दा, महान्छन्दः, महाञ्च्याब्दः। (२) मय प्रत्याहार से परेह के स्थान में विकल्प से पूर्व का सवर्ण होता है। यथा, वाक् हरिम् वाग्धरिः, वारहरिः। म भ घ ढध, ज ब ग ड द ख फ छ ठ-थ, ष ट त क प, ये वीस वर्ण मय् प्रत्याहार के अन्तर्गत हैं। प्रत्येक वर्ग का चौथा चौथा वर्णहका सवर्ण है। (३) वैयाकरण लोगह के स्थान में विकल्प से धू करके उहतः विपदहेतुः इत्यादि भी करते हैं।

२० स्थान में उपक्रमणिका। स्वण्डिण्डिमः भवान् + दुण्ढति भवाएदुण्डति; राजन् + टोकसे राजएढौकसे। ११ । "नाष्टः” । प् के परे न के स्थान में ट् और थ् के ठ होता है । यथा, प्राकृप् +त:=आकृष्टः, नपता- स्रष्टा; दृष् + ता=द्रष्टा; निविप् + नः = निविष्टः; प्रविपतिः = प्रविष्टः; उत्कृप +तः=उत्कृष्टः; पप् + थः=पष्टः (१)। १२ । “तोलिः" (२) । ल परे रहने से त्, द् और न के स्थान में ल होता है; और न् के स्थान में जात ल अनुनासिक उच्चारित होता है, इसलिए पूर्व वर्ण चन्द्रविन्दु संयुक्त होता है (३) । यथा, वृहत् + ललाटम् =वृहल्ललाटम्; उन + लेखः = उल्लेखः; तद् लीला- यितम = तल्लीलायितम् । एतद् + लीलोद्यानम् एतल्लीलोद्यानम् ; महान + लाभः =महांल्लाभः; भवान् + लभते = भवाल्लभते । १३ । “ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्डिनत्यम" (2)। स्वरवर्ण परे रहने से और ह्रस्व स्वर से परे पद के अन्त में स्थितन को द्वित्व होता है। यथा,धावन् + अश्वः धावन्नश्वः; हसन+यागतः हसन्नागतः चिन्त- यन्+इह -चिन्तयन्निह सृजन ईश्वरः सृजन्नीश्वरः स्मरन्+उवाच- (१) किन्तु "तोःपि" इस सूत्र के अनुसार प् परे रहने से तवर्ग के स्थान में टवर्ग नहीं होता । यया, सन्+पठ:-मन्पष्टः। (२) ल परे रहने से ठवर्ग के स्थान में न होता है। (३) किसी किसी के मन में न के स्थान में जात ल ही चन्द्रविन्दु संयुक्त होता है। यथा, महालाभः, भवांल्लभते । (४) बमः+ ह्रस्वात्+अचि, मुट्+नित्यम् । (हस्यात् परो यो उम् तदन्तं यत् पर्द तस्मात् परस्य अचः मुट्)। ह्रस्व स्वर से परे जो उम् (इ, न ) बद्द जिसके अन्त में हो ऐसा जो पद उससे परे अच् हो तो उसे हमुद (अर्थात् व्यञ्जनसन्धि। २१ स्मरनुवाच (१)। परन्तु दीर्घ स्वर के परे न रहने से अथवा दीर्घ से परे न् को द्वित्त्व नहीं होता। यथा, महान् + अाग्रहः- महानाग्रह; कवीन् + आह्वय= कवीनाह्वय; साधून +आद्रियस्व =साधूनाद्रियस्व; भ्रातन + अनुगृहीष्वभ्रातॄननुगृहीष्व । १४ । “नश्छव्यप्रशान्" (२) । च् अथवा छ परे रहने से पूर्वपद के अन्त में स्थित न के स्थान में अनुस्वार और अनुनासिक (") होता है और च के स्थान में श्च् और छ के स्थान में श्छ होता है। यथा, पश्यन् + चकितः = पश्यश्चकितः; पश्यश्चकितः इत्यादि क्रम से । हसन् + चलितः हसंश्चलितः; नृत्यन् + चकोर:- नृत्यंश्चकोरः, धावन् +छागः=धावंश्छागः; महान् +छेदः = महाश्छेदः, विराजन् + छायापथः = विराजश्छायापथः। दुद, गुट् और नु) का आगम क्रम से होता है । उट, इत्, ङ, ण, न रह जाते हैं, अर्थात् स्वरवर्ण परे रहने से पद के अन्त में स्थित हस्व स्वर के परवर्ती इणन को द्वित्त्व होता है। यथा, प्रत्यङ्+आत्मा-प्रत्यङ्- गत्मा, सुगण+ईशः सुगरणीशः; सन्+अच्युतः सन्नच्युतः। किन्तु ति+अन्तःविहन्तः यण+अचि=यणचि । (१) परन्तु समास होने पर किसी किसी स्थानों में विकल्प से न द्वित्त्व होता है । यथा, सन्+आदिः = सन्नादिः, सनादिः, सन्+ अन्तःसन्तः, सनन्तः। किन्तु अन्+अन्तः अनन्तः (अन्नन्तः नहीं) किन्तु तिङन्त इत्यादि और अन्नन्त नहीं; परन्तु पाठ पाणिनी से विरुद्ध है । (२) न+छविः+अप्रशान् (अम्परे छवि नान्तस्य पदस्य 6) अम् प्रत्याहार (अर्थात् स्वरवर्ण, य, र, ल्. व् तथा वर्ग के पञ्चम, वर्ण) के पूर्ववर्ती छव् प्रत्याहार (अर्थात् च छ, ट ठ, तथ) परे रहने से नकारान्त पद न् के स्थान में रु (अर्थात् अनुस्वार तथा स्) और अनुनासिक सू भी होता है, अर्थात् न के स्थान में अनुस्वार और छ के स्थान में शू शछ (१५) ट्द के स्थान में ष्ट छ (१५) और तथ् के स्थान में स्त् स्थ (१६) होता है। प्रशान् शब्द के न के स्थान में नहीं होता। ।

२२ उपक्रमणिका। १५ । "नश्छव्यप्रशान्” । ट् अथवा ठ् परे रहने से पद के अन्त में स्थित न् के स्थान में अनुस्वार तथा अनुनासिक (") भी होता है और ट के स्थान में ष्ट और ठ के स्थान में ष्ट होता है। यथा, चलन् + टिट्टिभः चलंष्टिट्टिमः, चलँष्टिट्टिमः इत्यादि क्रम से उद्यन् + टङ्कारः उद्यष्टङ्कार, महान् +ठाकुरः महाप्टकुरः । १६ । "नश्छन्यप्रशान्” । त् अथवा थ् परे रहने से पढ़ के अन्त में स्थित न के स्थान में अनुस्वार तथा अनुनासिक () भी होता है और त् के स्थान में लू और थू के स्थान में स्थ होता है। यथा, पतन् +तरुः=पतंस्तरुः; महान् + तडागः-महांस्तडागः; महाँस्तडागः; उत्तिष्ठन् + तरङ्गः- उत्तिप्टस्तरङ्गः, उत्तिष्टस्तरङ्गः, शाम्यन् + तापः शाम्यंस्तापः; शाम्यस्तापः; क्षिपन् + थुत्कारः- क्षिपस्थुत्कारः क्षिपस्थुत्कारः; स्पृशन +थुध्यति स्पृशंस्थुध्यतिः; स्पृशंस्थुध्यति (१)। १७ । “मोऽनुस्वारः" (२) । व्यंजन (हल) परे रहने से पद के अन्त में स्थित म् के स्थान में अनुस्वार होता है। यथा, सत्वरम् + याति=सत्वरं याति; करुणम् + रोदिति-करुणंरोदिति; विद्याम् लभते विद्यां लभते; भारम् वहति भारं वहति; शय्या- याम् + शेते शय्यायां शेते; कष्टम् + सह्ते कष्टं सहते; मधुरम्+ हसतिमधुरं हसति (३)। यथा, प्रशान +तनोति -प्रशान्तनोति । न पद के अन्त में नहीं रहने से भी नहीं होता। यथा, हन +ति-हन्ति । (१) कान् +कान् = कांस्कान, कांस्कान् ( मुग्धोत्र के मत में) कान्कान्; नून+पाहि न पाहि, न पाहि । (२) मः अनुस्वारः (मान्तस्य पदस्य अनुस्वारः हलि )। हल (व्यञ्जनवणं) परे रहने से पद के अन्तस्थित मू के स्थान में अनुम्बार होता है। (३) "मो व्यञ्जनसन्धि । २३ १८ । “मोऽनुस्वारः वा पदान्तस्य" (१)। स्पर्शवर्ण अथवा य, र, ल, व, परे रहने से पद के अन्त में स्थित .म् के स्थान में अनु- स्वार होता है अथवा जिस वर्ग का वर्ण परे रहता है उसी वर्ग कापञ्चमवर्ण होता है । यथा, किम् करोषि-किंकरोपि, किङ्करोषि; गृहम् गच्छ-गृहं गच्छ, गृहङ्गच्छ; क्षिप्रम् चलति=क्षिप्रं चलति, क्षिप्रश्चलति; शत्रुम् जहि शत्रुजहि, शत्रुञ्जहि; नदीम् + तरति नदी तरति, नदीन्तरति; धनम् ददाति-धनं ददाति, धनन्ददाति; स्तनम् + धयति स्तनंधति, स्तनन्धयति; गुरुम् + नमति-गुरुं नमति, गुरुन्नमति; चन्द्रम् पश्यति = चन्द्रं पश्यति, चन्द्रम्पश्यति; किम् फलम्-किंफलम्, किम्फलम्; सत्यम्+व्यात्सत्यं ब्रूयात्, सत्यम्ब्रूयात; मधुरम् +भाषते मधुरं भापते, मधुरम्भाषते; शास्त्रम्म्मीमांसते-शास्त्रं मीमांसते, शास्त्रम्मीमांसते (२)। सय्यन्ता संयन्ता, सव्वत्सरः संवत्सरः, पल्लोक, पंलोकम् इत्यादि। - राजि समः को"। किचन्त राज् धातु परे रहने से सम् के म् के स्थान में अनुस्वार नहीं होता । यथा, सम्+राटसम्राट् (अधिराज Emperor अर्थ में); दूसरे अर्थ में मू के स्थान में अनुस्वार होता है। यथा, सम्+ राट-संराट् (चन्द्रमा Moon )। य व् न् परे रहने से पद के अन्त में स्थित म् के स्थान में अनुस्वार होता है। यया, वशम्+वदः-वशंवदः, सम्+वत्सर संवत्सरः किम्+वा-किंवा, इसलिये वशम्बदः, सम्वत्सर, किम्बा ऐसे अशुद्ध पद नहीं हो सकते । (१) स्पर्श वर्ण और अन्तःस्थ वर्ण परे रहने से पद के अन्तस्थित म के स्थान में विकलर से अनुस्वार होता है। (२) "पुमः खय्यम्परे" स्वर- वर्ष, वर्ग के पजमवर्ण और य र ल व ह, इन सब वर्गों के पूर्ववर्ती वर्ग के प्रथम किंवा द्वितीय वर्ण परे रहने से और उनसे स्वरवर्ण, ह ए व एल और वर्ग के पञ्चम वर्ष परे रहने से पुम् के म् के स्थान में अनुस्वार और अनुनासिक (') भी होता है और उन दोनों के परे स होता है। यथा, पुम्+कोकिला-पुरकोकिलः; पुँस्कोकिलः इत्यादि क्रम से उपक्रमणिका। १६ 1 "छे च” । छ परे रहने से स्वरवर्ण के (१) परे च् श्राना है (२) और च छ मिलकर च्छ होता है । यथा, सित+छत्रम् = सितच्छत्रम्, परिछिदः परिच्छदः, अब छेदः अवच्छेदः, वृन्न+ छाया वृक्षच्छाया; गृह छिद्रम् गृहच्छिद्रम्; छिद्यते चेच्छि- द्यते। २० । “मलां जशोऽन्ते" (३)। स्वरवर्ण, वर्ग का तृतीय, चतुर्थवर्णं अथवा र ल व ह परे रहने पर पद के अन्तस्थिन क् के स्थान में ग, च के स्थान में ज्, ट् के स्थान में ड्, और प के स्थान में व होता है। यथा, दिक+अन्तः दिगन्तः, वाक् + आडम्बरः वागाडम्बरः; त्वक् + इद्रियम् त्रगिद्रियम्; वाक + ईशः वागीशः सम्यक् + उक्तम्-सम्यगुल्लम्; धिक् +ऋणकारिणम् धिगृणकारिणम् प्राक् + एव-प्रागेव; विक् + ऐश्वर्य्यमतम् - धिगैश्वर्य्यमतम्; सम्यक् +ोजः सम्यगोजः, वाक् + औचि-- त्यम् =वागौचित्यम्; दिक् +गजः= दिग्गजः; प्राक् + घनोदयः अनुनासिक का उदाहरण होता है। पुम्+काकास्काकः; पुस्। पुत्र:=पुंस्पुत्रः । पुम्+चली पुंश्चली (यहां च परे रहने के कारण म के स्थान में श् हुआ है)। किन्तु पुम् + क्षीरम्-पुंक्षीरम् : पुम्+क्याम्= पुंख्यातः। यहाँ सू नहीं होता क से प और य परे रहने से। प्रथम द्वितीय भिन्नवर्ग का अन्य वर्ण परे रहने से स नहीं होता । यया, पुम्+ग- पंगवः; पुम्+दासः पुंदासः। (१) स्वरवर्ण यहाँ हस्त्र स्वर और दीर्घ स्वर मी है । (२) "पदान्ताहा"। छुपरे रहने से पद के अन्त में स्थित दीर्घ स्वर के परे विकल्प से न् बाठा है। यथा, लक्ष्मी+छाया लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीचाया। परन्तु छ परे रहने से मा और श्रा के परे च नित्य आता है। यथा, मा+छादयति-मान्छादयतिः आ+छादयंति-आच्छादयति । (३) मा .लशाअन्ते। पदान्त मल व्यञ्जनसन्धि । २५ प्राग्घनोदयः; वाक् जालम् वाग्जालम्; सम्यक् मङ्कारसम्यग्म- कारः; सम्यक् +डयते-सम्यग्डयते; सम्यक् + ढौकते-सम्यग्डौकते; वाक् + दानम् =वाग्दानम् ; धिक् +धनगर्वितम्-धिग्धनगर्वितम् ; वाक् + बाहुल्यम्-वाग्वाहुल्यम्; दिक् + भागः-दिग्भागः; धिक् + याचकम्-धिग्याचकम् ; वाक् +रोधः-वाग्रोधः; धिक् + लोभिनम्- धिग्लोभिनम् सम्यक् + वदति-सम्यग्वदति; दिक+हस्ती-दिग्हरती (१); अच् +अन्तः-अजन्तः, अच् +हीनः अव्हीनः (१); सम्राट+ अयम् सम्राडयम् सम्राट +आगतः सम्राडागतः, सम्राट् गच्छति =सम्रागच्छति; सम्राट + हसतिसम्राडहसति (१); अप+ इन्धनम् अबिन्धनः; अप+घटा अब्धटः; अप +जम्-अजम्; अप+हरणम्-अव्हरणम् (१)। २१ । "झलां जशोऽन्ते"। स्वरवर्ण अथवा ग, घ, द्,ध, व, भ, य, र, व और ह परे रहने से पद के अन्तस्थित त् के स्थान में न होता, । यथा, जगत् +अन्तः-जगदन्तः, जगत् +आदिः जगदादिः, प्रत्याहार के स्थान में (अर्थात् झन् प्रत्याहार के अन्तर्गत केवल कन्ट त् प् इन वर्गों के स्थान में) जश् प्रत्याहार होता है (अर्थात् क्रम से गजइहोता है)। (१) "भयो होऽन्यतरस्याम्" वर्ग के प्रथम वर्ण से परे ह रहने से प्रथम पर्ण के स्थान में उस वर्ग का तृतीय वर्ण होता है और ह के स्थान में विकल्प से उसी वर्गका चतुर्थ वर्ण होता है। इस सूत्र के अनुसार वैयाकरण लोग कन्टू प के परस्थितह के स्थान में विकल्प से यथा क्रम. म द भ करते । यथा, दिक+हस्ती-दिग्हस्ती, दिग्घरती; अच्+हीनः-अहीनः, अन्झीनः सम्राट हसति-सम्राहसति, सम्राड्ढसति; अप+हरणम् = अन्हरयम्, अम्मरणम् ।

२६ उपक्रमणिका। जगत् + इन्द्रः जगदिन्द्रः; जगत् + ईशः जगदीशः;भवत् + उक्तम्- भवदुक्तम् ; भवत् + ऊहनम्-भवदूहनम् ; तत् + ऋणम्-तहणम् । जगत् + एतत् जगदेतत् ; महत् + ऐश्वर्य्यम् महदैश्वर्यम् ; महत् । ओजः महदोजः; महत् + औषधम् महदौपधम् ; वृहत् + गहनम् = बृहद्गहनम् ; वृहत् + घटा=वृहदघटः; भवत् + दर्शनम् मवद्दर्शनम् महत् + धनुः=महद्धनुः; जगत् + बन्धुः-जगद्वन्धुः; महत् + भयम् =महद्भयम् वृहत् +यानम् =वृहद्यानम् ; वृहत् +रथः बृहद्रथः ; महत् + वनम्-महद्वनम् ; जगत् + हितम् जगद्धितम् । २२ । न् अथवा म परे रहने से पद के अन्तस्थित क के स्थान में ङ् और त , द् के स्थान में न विकल्प से होता है (१)। यथा दिक + नागः =दिङ्नागः, दिग्नागः; जगत् + नाथः = जगन्नाथः, जगद्नाथः; तत् + नीरम् =तन्नीरम्, तद्नीरम् ; प्राक+मुखःप्राङ्मुखः, प्राग्मुखः, भवत् + मतम्-भवन्मतम् , भवद्मतम् ; एतद् +मानसम्-एतन्मानसम्, एतद्मानसम् । (व्यञ्जनसन्धि का अतिरिक नियम परिशिष्ट में देखो) . . (१) “यरोऽनुनासिके अनुनासिको वा" । न् अथवा म् परे रहने से- पद के अन्तस्थित वर्ग के प्रथम वर्ण के स्थान में उस घर्ग का पञ्चम वा तृतीय वर्ण होता है । यथा, दिक+नागः= दिङ्नागः, दिग्नागः; अच्+नास्ति- अनुनास्ति, अज्नास्ति; मधुलिट् + नईति-मधुलिगनईति, मधुलिड्नईति; जगत्+नाथ जगन्नाथः, जगन्नाथः; अप+नदी-अग्नदी, अन्नदी; प्राक +मुखः प्राङ्मुखः, प्रारमुखः; अच्+मव्यम्-प्रमव्यम्, प्रज्मध्यमः मधुलि+मत मधुलियमतः, मधुलिड्मत्तः, भवत्+मतम्-भवन्मतम्, भवद्मतम्; अप+मानम्-अम्मानम्, अम्मानम् । किन्तु "प्रत्यये भाषा- यां नित्यम्" अर्यात् मात्र किंवा मय प्रत्यप का म् परे होने से पद के अन्त- स्थित वर्ग के प्रथम वर्ण के स्थान में उस वर्ग का केवल पञ्चम वर्ण होता है। यथा, अच्+मात्रम् अञ् मात्रम् मधुलिट्+मात्रम् मधुलिपमात्रम् क+मयम-वाङ्मयम् चित् +मयम्-चिन्मयम्; अप्+मयम अम्मयम् । .

विसर्ग सन्धिः। २७ विसर्ग सन्धि। (Combination of Visargas with Vowels or Consonants.) १ । “स्तोः चुनाश्चः”। च वा छ परे रहने से विसर्ग के स्थान में श होता है । यथा, पूर्णः + चन्द्रेः पूर्णश्चन्द्रः ज्योतिः+ चक्रम् =ज्योतिश्चक्रम् ; निः+चयः निश्चयः, वायुः+चलति= वायुश्चलति; रखेः+छविः रवेश्छविः; तरोः+छाया - तरो- श्छाया; रज्जुः + छिद्यते-रज्जुश्छिद्यते (१)। २। “ष्टुनाष्टुः" । ट्वा परे रहने से विसर्ग के स्थान में प होता है । यथा भीतः +टलति भीतष्टलति; उड्डीनः+टिट्टिमः= उडीनष्टिट्टिभा, धनुः + टङ्कारः धनुष्टङ्कारः; स्थिरः + ठकुरः स्थिर- ठकुर, भमः + ठकुरः भनष्ठकुरः (१) । ३ । “विसर्जनीयस्य सः” (२) । त् वा थ् परे रहने से विसर्ग के स्थान में सहोता है । यथा, उन्नतः + तरु:-उन्नतस्तरुः; नद्याः + (१) "वा शरि" (शर् प्रत्याहार) अर्थात् श ष स परे रहने से विसर्ग के स्थान में विकल्प से क्रमानुसार श, ए, स होता है। यथा, सुष्ठः+ शिशु सुप्तरिशशुः, सुप्तःशिशुः; मत्तः+षट्पदा-मत्तषट्पदः, · मतः षट्पदः प्रयमः+सर्गः-प्रथमस्सर्गः, प्रथमः सर्गः। किन्तु श, , म के परे वर्ग का प्रयम अयथा द्वितीय वर्ण रहने पर विकल्प से विसर्ग का लोप होता है। यथा, का+च्योततिकरच्योतति, काश्च्योतति; का+छीवति- कष्ठोवति, काष्ठीवति; का+स्तौतिकस्तौति, कस्तौति; यहां. राम स्थाता, हरिस्फुरति इत्यादि उदाहरण भी जानने चाहिए। (२) खर प्रत्याहार (अर्थात् वर्ग के प्रथम तथा द्वितीय वर्ण और श् एस् ) परे रहने से विसर्ग के स्थान में सभी होता है। यथा, रामस्स्थाता, हरिस्स्फुरति इत्यादि होगा।

२८ उपक्रमणिका। तीरम् = नद्यारतीरम्, भूमेः + तलम् = भूमेस्तलम्; क्षिप्तः +थुत्कारः =क्षितस्थुत्कार, लुप्तः +थकार:-लुप्तस्थकारः (१)। ४ । “ससजुषो रुः (२); अतो रोरसुतादसुते (३)” अ के परे विसर्ग अथवा विसर्गार्थ र और उससे परे अहो तो अ और उसके परिस्थित विसर्ग के स्थान में श्री होता है; श्रो पूर्ववर्ण में युक्त होता है और परिवर्ती अ का लोप होता है। यथा, नरः + अयम् नरोऽयम् ; नवः + अङ्करः = नवोऽङ्करः; तीक्ष्णः + अङ्कुशः तीक्ष्णोऽङ्कुशः; ज्वलितः + अङ्गारः ज्वालतोऽङ्गारः; वेदः+अधीतः वेदोऽधीतः। ५। "हशि च" (४)। वर्ग का तृतीय, चतुर्थ वा पञ्चम वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह परे रहने से अ और उसके परस्थित विसर्ग दोनों के स्थान में भी होता है। ओ पूर्ववर्ण में युक्त होता है। यथा, शोभनः+गन्धः =शोभनोगन्धः; नूतनः + घटः= नूतनोघटः; सद्यः + जातः सद्योजातः मधुरः +झङ्कारः मधुरो झङ्कारः; नवः + डमरुः = नवोडमरुः गजः +ढौकते जोढीकते; मूर्द्धन्यः +नकारः = मूर्द्धन्योनकारः निर्वाणः +दीपः-निळणे दीपः, अश्वः+धावति -अश्वो धावति; उन्नतः+नगः =उन्नतो नगः; दृढ़ः + वन्धः दो वन्धः; अकुतः +भयः = अकुतोभयः; (१) पृष्ठ २७ की पाद टीका (१) देखो। (२) पद के अन्त में स्थित स और सजुष् शब्द के प् को रु (र) होता है। (३) अप्लुत प्रकार परे रहने से अजुत प्रकार के परस्थित रु (२) के स्थान में उ होता है । तब "श्राद्गुण" इस सूत्र से पूर्ववर्ती अ+उ इन दोनों का ओ होता है और परवर्ती अ का लोप होता है। (४) हर प्रत्याहार (वर्ग का तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम घर्ण और य, र, ल, व, ह) परे रहने से अप्लुत प्रकार के , विसर्ग सन्धि। २३ अतीतः+मासः-अतीतो मासः; कृतः + यत्नः कृतो यत्नः, शान्तः +रोषः-शान्तो रोषः; कृतः + लोमः=कृतो लोभः; शीतः + आयुः शीतो वायुः, वामः +हस्तः =वामो हस्तः । ६ । “भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि" (१)। अ को छोड़- कर कोई दूसरा स्वरवर्ण परे रहने से अ के परस्थित विसर्ग का लोप होजाता है (२); लोप होने पर और सन्धि नहीं होती। यथा, कुतः+आगतः=कुत आगतः; नरः+इवनर इव; कः+ ईहते-क ईहते; चन्द्रः + उदेति =चन्द्र उदेति; इतः + ऊर्द्धम् = इत ऊर्द्धम् ; देवः+ऋषिः =देव ऋषिः, उच्चारितः + लृकारः उचारित लकारः; कः + एषः क एषः; कुतः + ऐक्यम् =कुत ऐक्यम्; रक्त+ओष्ठः =रक्त ओष्ठः; राज्ञः औदार्य्यम् =राज्ञ औदार्य्यम् । ७ । “भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि"। स्वरवर्णवर्ग का तृतीय, चतुर्थ वा पश्चम वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह परे रहने से श्रा के परस्थित विसर्ग का लोप होता है (३); लोप होने पर और सन्धि नहीं होती। यथा, अश्वाः+ अमी-अश्वा अमी; गजा: इमे गजा इमे; ताराः + उदिताः तारा उदिताः; गताः +ऋषयः गता ऋपयः, नराः + एतेनरा एते; हताः गजाम् इता गजा क्रीता+ परस्थित रु (ए) के स्थान में उ होता है। तब अ+उ इन दोनों को ओ हो जाता है। (१) भोस, भगोस्, अधोस्, इन अन्ययों को स् को और और श्रा के परस्थित स् को जोरु होता है उस रुको य आदेश होता है। तव "लोपाशाकल्यस्य" इस सूत्र के अनुसार विकल्प से यू का लोप होता है। (२)चयाकरय लोग विसर्गका लोप अथवा विसर्ग के स्थान में यू करते हैं । यथा, कृत:+आगतः=कुत आगतः; कुतयागतः; क+एषा क एषः, कयेषः इत्यादि । (३) स्वरवर्ण परे रहने से वैयाकरण लोग पा के परस्थित विसर्ग के स्थान में य भी करते हैं । यथा, गजा+हमे-गजा इमे, गजायिमे नराः+एतेनरा एवे, नरायेते इत्यादि।

३० उपक्रर्माणका। घटा:-क्रीता घटापुत्राः+जाता-पुत्रा जाता मधुराः + मकारा: =मधुरा मङ्काराः; नवाः +डमरवा-नवाडमरवः गजाः ढोकन्ते- गजा ढौकन्ते निर्माणा+दीपाः निर्माणा दीपाः; अश्वाः धावन्ति =अश्वा धावन्ति, उन्नताः+नगाः= उन्नता नगा बढाः + बन्धाः =हढा बन्धाः; नराः+भीताः नरा भीताः अतीता:+मासाः- अतीता मासाः; छात्राः+यतन्ते छात्रा यतन्ते; एताः+रथ्याः एता रथ्या; नराः लभन्ते-नरा लभन्ते; वाता+वान्ति-वाता वान्ति; बालकाः+हसन्ति बालका हसन्ति । ८ । “ससजुपो रुः" । स्वरवर्ण वर्ग का तृतीय, चतुर्थ वा पञ्चम वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह परे रहने से अ आ भिन्न स्वरवर्ण के परस्थित विसर्ग के स्थान में तथा सजुप शब्द के पकार को र होता है। यथा, कविः + अयम-कविरयम; गतिः + इयम् = गतिरियम्; रविः + उदेतिरविरुदेति; श्रीः + असौ=श्रीरसौ; सुधीः + एपः-सुधीरेपः; वन्धुः + वन्धुरागतः; गुरु + उवाच-गुरुरुवाच ; वधूः + एपा=वधूरेपा; भूः + इयम् = भूरियम्; मातृः + अर्चय-मातृरर्चय; दुहितः + अाह्वय दुहितराह्वयरवेः + उदयः-रवेरुदयः; तैः + उक्तम् तैरुतम् "विधोः अस्तगमनम्-विधोरस्तगमनम्; प्रभोः+आदेशः प्रभोरा- देशः, गौः अयम् गौरयम; ऋपिः +गच्छति-ऋपिर्गच्छति; हविः +घ्राणम्-हविर्घाणम् गुरुः + जयति-गुरुर्जयति; कृतः मङ्कारैः कृतमकारैः; नवैः डमरुभिः नवैर्डमरुभिः; गौः ढोकते गौढौंकते;. रवेः + दर्शनम्-रवेदर्शनम्ः निः +धनम् = निर्धनम्। दुः+नीतिः = दुर्नीतिः; निः + वन्धः निर्बन्धः; निः + भयः निर्भयः; मुहुः मुहुः- मुहुमुहुः; वहिः + योगः वहियोगः; विधुः + लीयते विधुर्लीयते; वायु: +वाति =वायुर्वाति; शिशुः + हसति-शिशुईसति; सजूली- यते, सहसति इत्यादि। प्रागतः- ३ १ विसर्ग सन्धि । है। "हशि च । स्वरवर्ण, वर्ग का तृतीय, चतुर्थ वा पश्चम- वर्ण अथवा य, र, ल, व, ह परे रहने से अ के परस्थित र जात विसर्ग (१) स्थान में र होता है। यथा, पुनः +अपि = पुनरपि; पुनः+आगतःपुनरागतः; प्रातः + इहागतःप्रात- रिहागतः, प्रातः+एव-प्रातरेव; अन्तः+धानम् =अन्तर्धानम् ; खः+गतः स्वर्गतः; भ्रातः+आगच्छ-भ्रातरागच्छ; पितः+ 'अनुमन्यस्व-पितरनुमन्यस्व; मातः +देहि =मातर्देहि जासातः + वद-जामातर्वद; दुहितः +याहि =दुहितर्याहि (२)। १० । "रोरि (३); ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' (४)। र परे रहने (१) विसर्ग दो प्रकार के होते हैं, र-जात और स-नात ! शब्द के अन्त में स्थितर के स्थान में जो विसर्ग होता है उसे र-जात और स् के स्थान में जो विसर्ग होता है उसे स्-जात विसर्ग कहते हैं। जिन शब्दों के अन्त में र रहता है उनके र के स्थान में आया हुआ विसर्ग, मातृ, पितृ आदि प्रकारान्त शब्दों के सम्बोधन के एकवचन का विसर्ग और अहन् शन्द के. न के स्थान में आया हुआ विसर्ग जात है । जैसे, गीः, धः, पुनः, प्रातः, अन्तः, स्वः, पितः, मातः, भ्रातः, अहः आदि के विसर्गर-जात हैं। जिन शब्दों के अन्त में स रहता है.उनके सू के स्थान में आया हुआ विसर्ग और प्रथमा एकवचन का विसर्ग स्-जात है। जैसे, मनः, वचः, पयः, वेधाः, गजः, नरः, मुनिः, विभुः इत्यादि के विसर्ग स-जात हैं। (२) अहा+पति-अहर्पतिः, अहस्पतिः, अहः पतिः, गीः पतिःगीतिः, : गीपतिः, गीः पतिः; चू+पति: पूर्पतिः, वृष्यतिः, धूः पतिः; अहा+अहः अहरहा; अहः+गण-अहर्गणः। किन्तु र, क् वा विभक्ति परे रहने से अहः के विसर्ग के स्थान में नहीं होता। यया, अहा+रात्रम् अहोरात्रः, अहः+रूपम् अहोरूपम्, अहः रजनीअहोरजनी (पाणिनि के अनुसार अहोरजनी); अह कर अहस्करः; अहः भ्यामू-अहोभ्याम् । (३) र परे रहने से. विसर्ग के स्थान में जात र.का लोप होता है। (४) ढरेफ़योः लोपनिमिच्योः पूर्वस्य अणः दीर्घः । द के परे ढ़ और र के परे र रहने में , ... ..

३२ उपक्रमणिका। से विसर्ग के स्थान में जो र होता है उसका लोप होता है और पूर्वस्वर दीर्घ हो जाता है । यथा, पितः +रक्ष-पितारक्ष; निः+ रसः-नीरसः; निः +रोगः नीरोगः; विधुः +राजते विधू- राजते; मातुः+रोदनम् =मातूरोदनम् । ११ । "एतत्तदोः मुलोपोऽकोरनसमासे हुलि” (१).1 अको छोड़कर कोई स्वर अथवा व्यञ्जनवर्ण परे रहने से सः और एषः, इन दोनों पदों के विसर्ग का लोप हो जाता है। लोप होने पर और सन्धि नहीं होती (२)। यथा, सः +आगतः स श्रागतः; सः + इच्छतिस इच्छति; सः+ईहतेस ईहते ; सः+ उवाच =स उवाच; सः+करोतिस करोति ; सः +गच्छतिस गच्छति; सः+चलति स चलति; सः + हसतिस हसति; एपः+आयाति-एप आयाति; एपः+ एतिएप एति; एपः + धावति =एपधावति; एपः+रोदिति एप रोदिति; एपः + वदति = एप वदति; एपः + शेते = एप शेते; एपः + सहते =एप सहत पूर्ववर्ती द वर का लोप होने पर उस द वा र् के पूर्व में स्थित अर (अर्थात् अ, इ, उ) दीर्घ हो जाता है। द लोप का उदाहरण लिद+:- लीदः, मुद्+ढम्मूढः इत्यादि। (१) एतद् तदोःमु लोपः अकोः अनन् समासे हलि (अककारयोः एतन्दोः यः सुः तस्य लोपः हलि न तु नन ममासे)। ककाररहित 'एतद् तया त शन्दों को प्रथमा विभक्ति सुका लोप होता है रहने से। सः तथा एपः का विसर्ग-लोप का उदाहरण १३ नियम में है। कयुक्त एतद् तद् के विसर्ग का लोप नहीं होता । यया, एपका स्ट्रा- 'एपकोमः। नज समास में भी नहीं। यया, अस+शिव-असशिवः (२) "सोऽचि लोपे चेत् पादपूरणम्"। श्लोक के पादपूरण की आवश्यक ता होने पर सः तथा एपः के विसर्ग का लोप होने के पश्चात् सन्धि हो सकती है। यथा, सैप दाशरयो रामः, सैप राजा युधिष्टिरः । एषेष रथमारुह्य मथुरां प्रयाति माधवः । इल परे ।

अनुशीलनो। ३३ १२ । “भोभगोअघोऽपूर्वस्य योऽशि"। स्वरवर्ण, वर्ग का तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम वर्ण, अथवा य र ल वह परे रहने से भोः इस पद के विसर्ग का लोप होता है। लोप होने पर और सन्धि नहीं होती । यथा, भो+अम्बरीष भो अम्बरीष; भोः+ ईशान भो ईशान; भोः + उमापते =भो उमापते; भोः+गदा- घरभो गदाधर; भोः+जनमेजय भोजनमेजय; भोः + दामोदर =भो दामोदर; भोः+माधव= मो माधव; भोः +यदुपते भो यदुपते (१)। (विसर्गसन्धि के अतिरिक्त नियम परिशिष्ट में देखो।) Exercise II (अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रश्न)। १। सन्धि किसको कहते हैं ( What is Sandhi)? सन्धि क प्रकार की हैं ( How many kinds of Sandhis are there ) ? व्यञ्जन- सन्धि किसे कहते हैं (What is Euphonic Combination of Consonants व्यञ्जनसन्धि) । नियम बताकर सन्धिकरो (Join the following citing rules):- रख+माकरः, परम+ईश्वरः, गौरी+आगता, खौ+उदिते, महा+ऋषिः, प्रति+इतिः, मही+इन्द्रः, महा+इन्द्रः; कपि+ईश्वरः, स्व+ईरम् , अद्य+एव, तब+ोष्ठः, रमा+ोष्ठः, स्थूल+श्रोतुः, भू+पादिः, गो+ एषणा, सखे+अधुना, साधो+अत्र, त+चलनम् , भवत्+जननम् , राजन्+जीवतु, महत्+शकटम् , महान्+शब्दः, विपद्+हेतुः, उत्+ दौकते, सृजन्+ईश्वरः, नृत्यन् +चकोरः, क्षिपन्+थुत्कारम्, सत्यम्+ यात्, गृहे+छिद्रम्, वा+दानम् , जगत्+बन्धुः, भवत्+मतम् , दिक+नागः, रखे+छविः, भन्नः+ठक्कुरः, नर+अयम् , दृढः+बन्धः, चन्द्रः+उदेति, गतिः+इयम्, निः+रसः, सः+चलति, गङ्गायाः+तीरम् , सम्राट् +इसति, गी+पतिः, अप+भक्ष्यः, स:+अत्र, पशम्+बद, सा+ एषः, विष्णु: त्राता। (१) भगो+रक्ष-भगो रक्ष, अघो+याहि अघो याहि । स्वरवर्ण अरे रहने से भोः के विसर्ग के स्थान में विकल्प से यू होता है । यथा, भो। ईशानःम्भोयीशानः, मो ईशानः। ३ उपक्रमणिका ३. सन्धि विच्छेद करो (Disjoin ):-जगन्नाथः, पावकः, ममापि, पविशतिः, अभ्युपेत्य, गमिष्याम्युपहास्यताम्, क्षीरनिधाविव, एकेनैव, सरस्तीरे, मातूरोदनम् , वाग्धरिः, तच्छु त्वा, विद्वालिखति, काश्वित, वृक्ष- च्छाया, अम्मानम्, लोहितेक्षणम् , नायका, महोम्मिः, मातृणम् , पित्रुहः, स्वागतम् , मनोरथः, स्वर्गतः, गठासूश्च, शुकनासोऽपि, पाणिरग्नी, नीरोगः धाग्वाहुल्यम्, अहोरात्रम् , श्रीरसौ, अन्तर्धानम् । ४ । शुद्ध करो (Correct):-गङ्गीदकम् , सर्वदेव, शम्बदः, दुरादृष्टम् , निरव, अत्यान्त, शीतन, सन्मानः, किम्वा मनगतम्, सम्बादः, तान्नाद्वय, सम्वत्सरः, अजमात्रम् , सुन्दरोपुरुषः, फुतागतः, आयुर्चलति, पुनोऽपि, हसञ्चलित। ५। इन वाक्यों को शुद्ध करके लिखो (Correctly ramrite the following Sentences ) :- शुष्क काठं तिष्ठत्यग्रे; निरस तरुवरो पुरत भाति; एंपो गच्छति विद्यालयम् ; कुतागतः वालकरसी; सर्चदेव विद्याभ्यासो कार्य बालका नदीं गच्छति; एपो भगवान भवानीपतिः; संयत अर्यो धनं काइक्षति । ६ मचान+पानय-प्राधान्नानय नहीं होता क्यों? णत्व-विधान (Change of 'न' into 'ण')। १ । ऋ, ऋ, र् और मूर्धन्य प, इन चार वर्षों के परस्थित दन्त्य नमूर्धन्य ण होजाता है। यथा, नृ-नाम्, नृणाम्; तिसृ-नाम्, तिसृणाम्; चतसृ-नाम् चतमृणाम; नृ-नाम्, नृणाम् भ्रातृ-नाम, भ्रातृणाम्; दात नाम, दातणाम; चतुर्-नाम, चतुर्णाम:- दोप-ना, दोष्णा; पूप-ने, पूष्णे। २ । स्वरवर्ण, कवर्ग, पवर्ग, य, व, ह और अनुस्वार, इन सब • .

षत्व-विधान। ३५ वों से व्यवधान रहने से भी न के स्थान में ण होता हैं । यथा, कर-नम्, करणम् ; करा-नाम्, कराणाम् करि-ना, करिणा, गुरु- ना, गुरुणा; परे-न, परेण; अर्केन, अर्केण; मूर्खे-न, मूर्खण; मृगे-न, मृगेण; दीर्धे-न, दीपेण; दु-न, दर्पण; रेफे-न, रेफेण; दर्भ न, दर्भण; द्रमेन, द्रुमेण; रये-न, रयेण; गर्वे-न, गर्वेण; ग्रह-न, ग्रहेण; वृह-नम्, हणम् । ३। इनको छोड़कर दूसरे वर्ण का व्यवधान रहने से दन्त्य न मूर्धन्य नहीं होता। यथा, अर्चना, मूर्च्छना, अर्जनम्, किरीटेन, षष्ठेन, मृड़ेन, दृढेन, वर्णानाम्, पान, अर्थेन, विमर्दैन, अर्द्धन, विरलेन, स्पर्शन, रसेन । ४। पदं के अन्त में स्थितन् का ण नहीं होता। यथा, नरान् , हरीन् , गुरुन्, भ्रातन् । (णत्व-विधान के अतिरिक नियम परिशिष्ट में देखो)। षत्व-विधान (Change of 'स्' into 'ष') १ । अ ा भिन्न स्वर तथा क् और र्, इन वर्गों के परस्थित प्रत्यय का दन्त्य स् मूर्धन्य ष् होता है। यथा, मुनि-सु, मुनिषुः गुणि-सु, गुणिपु; नदी-सु, नदीपु; सुधी-सु, सुधीषु; साधु-सु, साधुषुः गुरु-सु, गुरुषुः प्रतिभू-सु, प्रतिभूषुः वधू-सु, वधूपु; भ्रातृ-सु, भ्रातूषुः स्वस-सु, स्वसृषुः सर्वे-साम्, सर्वेषाम्; अन्ये-साम्, अन्येषाम् गो-सु, गोपु; द्यो-सु, घोषु; ग्लौ-सु, ग्लौषु;

उपक्रमाणका।
नौ-सु, नौपु; वाक्-सु, वाक्ष; दिक-सु, दिक्ष चतुर्-सु, चतुषु;
गीर्-सु, गीऍ (१)।
२। अनुस्वार (२) और विसर्ग का व्यवधान रहने पर भी
स् का प् होता है । यथा, हवीं-सि, हवापि; धनूं-सि, धषि;
आशी:-सु, आशीःपु; धनुः-सु, धनुःपु ।
(पत्व-विधान के अतिरिक्त नियम परिशिष्ट में देखो)।
सुबन्त-प्रकरण।
(Declension.)
प्रथमा (First Case or Nominative), द्वितीया
(Second Case or Accusative), तृतीया (Third Caseor
Instrumental), reif ( Fourth Case or Dative),
पञ्चमी (Fifth Case or Ablative), पष्टी (Sixth Case or
Genitive), सप्तमी (Seventh Case or Vocative),
यही सात विभक्तियाँ (Inflectional terminations or
Case-endings ) हैं । शब्द के उत्तर यही सात विभक्तियाँ होती
हैं। विभक्ति (सुप) से युक्त शब्द (प्रातिपदिक ) को सुवन्त या
पद कहते हैं (३)।
.
(१) सात् प्रत्यय का दन्त्यस मूर्द्धन्य प नहीं होता। यपा, भूमिसात,
अग्निसात्, वायुसात् इत्यादि । (२) नपुंसक (क्लोव) लिङ्गको प्रथमा और
द्वितीया विभक्ति के बहुधचन के पद में सो अनुस्वार रहता है उसको छोड़-
कर दूसरा अनुस्वार व्यवधान रहने से 'स्' का '' नहीं होता।
यथा, पुं-सु, पुंसु । (३) साधारणतः कर्ता में प्रथमा, कर्म में द्वितीया,
करण में तृतीया, सम्प्रदान में चतुर्थी, अपादान में पञ्चमी, सम्बन्ध पद
षष्ठी, पक्किरण में सप्तमी, और सम्बोधन पद में प्रथमा विभक्ति होती है।

विभक्ति की आकृति । ३७ प्रत्येक विभक्ति में तीन तीन वचन (Number ) होते हैं- एकवचन ( Singular ), द्विवचन (Dual) और बहुवचन (Plural) शब्द में एकवचन की विभक्ति का योग होने से एक संख्या, द्विवचन की विभक्ति का योग होने से दो संख्या, और बहुवचन की विभक्ति का योग होने से तीन से परार्द्ध तक की सब संख्या समझी जाती है। विभक्ति की आकृति । आ (टा) प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी एकवचन. द्विवचन बहुवचन औ अः (जस्) अम् औ (औट) अः (शस्) भ्याम् भिः (भिस्) भ्याम् भ्यः (भ्यस) श्रः (ङसि) . भ्याम् भ्यः (भ्यस) अः (डस्) ओः (ओस्) आम् ओः (ोस्) सु (सुप) इ (ङि) किस शब्द में किस विभक्ति का योग करने से कैसे पद होते हैं वे क्रम से दिखाये जाते हैं। सम्बोधन ( Vocative Case) में प्रथमा विभक्ति होती है, परन्तु किसी किसी शब्द के सम्बोधन के एकवचन में कुछ विशेषता है; इसलिए शब्द-रूप में सम्बोधन का रूप भी पृथक् दिखाया:जायगा।

उपक्रमणिका। गजाभ्याम् गजः शब्दरूप (Declension of Words.) FELICITAT ŞTE ( Bases ending in Vowel ). पुंलिङ्ग ( Masculine )। अकारान्त-पाज ( Elephant) एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा गजः गजौ गजाः द्वितीया गजम् गजौ गजान् तृतीया गजेन चतुर्थी गजाय गजाभ्याम् गजेभ्यः पञ्चमी गजात् गजाभ्याम् गजेभ्यः पष्ठी गजस्य गजयोः गजानाम् सप्तमी गजे गजयोः गजेपु सम्बोधन हे (१) गज हे गजौ प्रायः सभी प्रकारान्त पुंलिग शब्दों के रूप गज शब्द के सदृश होते हैं। अल्प प्रमृति तथा, द्वितीय, तृतीय और पादादि शब्दों के रूप में कुछ विशेषता है। आकारान्त-विश्वपा ( The Sun, The Moon, Fire) ! एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा विश्वपौ विश्वपाः द्वितीया विश्वपाम् विश्वपौ विश्वपः हे गजाः . विश्वपाः (१) हे शब्द का प्रयोग सम्बोधन में होता है इसी प्रकार अन्यत्र समझ लो। कर (Hand, Ray of light, Tax), नर, मृग, कृश, वृष, रोपद्म प्रह, अन्ध, जल, सागर, पराग (Pollen), राम, शिव, वृक्ष इत्यादि। + इन शब्दों के रूप परिशिष्ट में देखो।

स्वरान्त पुंलिङ्ग शब्द।. .. 'एकवचन द्विवचन वहुवचन तृतीया विश्वपा विश्वपाभ्याम् विश्वपाभिः चतुर्थी विश्वपे विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः पञ्चमी विश्वपः :: विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः अष्ठी विश्वपः विश्वपोः विश्वपाम् सप्तमी विश्वपि विश्वपोः विश्वपासु सम्बोधन हे विश्वपाः हे विश्वपौ. हे विश्वपाः धातुनिष्पन्न समस्त श्राकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप विश्वपा के सदृश हैं। धातुनिष्पन्नशब्दों को छोड़कर दूसरे आकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप परिशिष्ट में देखो। इकारान्त-मुनि (Sage) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा मुनिः मुनी द्वितीया मुनिम् मुनी. मुनीन् तृतीया मुनिना मुनिभ्याम् मुनिमिः चतुर्थी मुनये मुनिभ्याम् मुनिभ्यः पञ्चमी मुनेः मुनिभ्याम् मुनिभ्यः 'षष्टी मुनेः मुन्योः मुनीनाम् सप्तमी मुनौ मुन्योः मुनिपु सम्बोधन हे मुने पति और सखि शन्दों को छोड़कर समस्त इकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों। के रूप मुनि शब्द के सदृश होते हैं । मुनयः - हे मुनी हे भुनयः * सोमपा, धूमपा, गोपा, तातता, बलदा, शङ्खध्मा इत्यादि । * निधि, विधि, गिरिर, अग्नि, हरि, कवि, कपि, ऋषि, रवि इत्यादि।

४० उपक्रमणिका।. पतयः. हे पतयः पति (Lord, Husband )| एकवचन द्विवचन वहुवचन. प्रथमा पतिः पती द्वितीया पतिम् पती पतीन् तृतीया पत्या पतिभ्याम् पतिभिः चतुर्थी पत्ये पतिभ्याम् पतिभ्यः पञ्चमी पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः षष्ठी पत्युः पत्योः पतीनाम सप्तमी पत्यौ पत्योः पतिपु सम्बोधन हे पते हे पती दूसरे शब्दों के साथ समास होने से समास के अन्त में पति युक शब्दों के रूप मुनि शब्द के सदृश होते हैं। यथा, नृपति, भूपति, महीपति, नरपति (King, Sovereign) geutfc *1 सखि ( Male friend)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सखा सखायौ सखायः द्वितीया सखायम् सखायौ सखीन तृतीया सख्या सखिभ्याम् सखिभिः चतुर्थी सख्ये सखिभ्याम् सखिभ्यः पश्चमी सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः * डति प्रत्ययान्त कति शन्द केवल वहुवचन में ही व्यवहत होता है। कति (how many) कति, कति, कतिभिः, कतिभ्यः, कतिभ्यः, कठीनाम, कतिपु । तीनों लिङ्गों में इसके रूप ऐसे ही होते हैं। .

स्वरान्त पुंलिङ्ग शब्द। ४९ एकवचन द्विवचन बहुवचन षष्ठो सख्युः सख्योः सखीनाम् सप्तमी सख्यौ सख्यो संखिषु सम्बोधन हे सखे हे सखायौं हे सखायः ईकारान्त-सुधी (A learned man) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सुधीः सुधियौ सुधियः द्वितीया सुधियम् सुधियौ सुधियः तृतीया सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभिः चतुर्थी सुधिये सुधीभ्याम् सुधीभ्यः पञ्चमी सुधियः सुधीभ्याम् सुधीभ्यः षष्ठी सुधियः सुधियोः सुधियाम् सप्तमी सुधियि सुधियोः । सुधीपु सम्बोधन हे सुधियौ सेनानी, अप्रणी, प्रामणी प्रभृतिक कई एक शब्दों को छोड़कर प्रायः सब पुलिाईकारान्त शब्दों के रूप सुधी शब्द के सदृश होते हैं। X उकारान्त-साधु (A pious man)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा साधुः साधू साधवः द्वितीया साधुम् साधू साधून तृतीया साधुना साधुभ्याम् साधुभिः हे सुधीः हे सुधियः परिशिष्ट में देखो। + सुनी, शुद्धधी, हतघी, दुर्थी, यवक्री, अपही इत्यादि ।

उपक्रमणिका। हे साधू हे साधवः एकवंचन द्विवचन बहुवचन चतुर्थी साधवे साधुभ्याम् साधुभ्यः पञ्चमी सायोः साधुभ्याम् साधुभ्यः षष्टी साधोः साध्वोः साधूनाम् सप्तमी साधौ साध्वोः साधुपु सम्बोधन हे साधो कोण्टु र भिन्न प्रायः समस्त उकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप साधु शन्द के सदृश होते हैं। अकारान्त-प्रतिभू ( A surety)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा प्रतिभूः प्रतिभुवौ प्रतिमुवः द्वितीया प्रतिभुवम् प्रतिभुवी प्रतिभुवः तृतीया प्रतिभुवा प्रतिभूभ्याम् प्रतिभूमिः चतुर्थी प्रतिभुवे प्रतिभूभ्याम् प्रतिभूभ्यः पञ्चमी प्रतिभुवः प्रतिभूभ्याम् प्रतिभूभ्यः पष्ठी प्रतिभुवः प्रतिभुवोः प्रतिमुवाम् सप्तमी प्रतिभुवि प्रतिभुवोः प्रतिभूपु सम्बोधन हे प्रतिभूः हे प्रतिभुवी सुलू, खलपु, वर्षाभू, करभू, कारामू, पुनर्भू प्रभृति के सिवाय प्रायः सब हो ऊकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप प्रतिभू शन्द के ऐसे होते हैं। . : हे प्रतिभुवः * क्रोष्टु शब्द परिशिष्ट में देखो। प्रमु, विमु, विष्णु, रिपु, ऋतु ऋजु, शिशु, पशु, शम्मु, विधु,भानु, वायु, लघु, गुरु इत्यादि। + परिशिए में देखो। + मनोभू, अग्निमू, स्वभू, अधिमू, वितमू इत्यादि।

खरान्त पुंलिङ्ग शब्द। ४३ ३ ऋकारान्त दाद (Giver) एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा दाता दातारौ दातारः द्वितीया दातारम् दातारौ दातून तृतीया दात्रा दातुभ्याम् दावृमिः चतुर्थी दात्रे दातभ्याम् दातृभ्यः. पञ्चमी दातुः : दातृभ्याम्. दातृभ्यः पष्टी दातु: दात्रोः दातृणाम् सप्तमी दातरि दात्रोः दातृषु सम्वोधन हे दातः हे दातारौ हे दातार भ्रात,पितृ आदि कईएक शब्दों को छोड़कर सब पुंलिंग कापन्त शब्दों के रूप दातृ शब्द के तुल्य होते हैं। STTEL ( Brother :) 1 एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा भ्राता भ्रातरौ भ्रातरः द्वितीया भ्रातरम् ভাবী भ्रातॄन् तृतीया भ्रात्रा भ्रातृभ्याम् भ्रातृभिः चतुर्थी भ्रात्रे भ्रातृभ्याम् भ्रातृभ्यः पञ्चमी भ्रातुः भ्रातृभ्याम् भ्रातृभ्यः पष्टी भ्रातुः भ्रात्रोः भ्रातणाम् कर्तृ, ज्ञात, हन्तु, धातु, विधात, सवित, श्रोतृ, द्रष्ट, जेत, ऋतु इत्यादि।

उपक्रमणिका। हे भ्रातरः एकवचन द्विवचन बहुवचन सप्तमी भ्रातरि भ्रात्रोः भ्रात्पु सम्बोधन हे भ्रातः हे भ्रातरो पितृ, जामात, देव ( Husband's Founger brother ), सव्येष्ट्र (Charioteer ), नृ इन कई शब्दों के रूप भ्रातृ शब्द के सदृश होते हैं, केवल नृ शब्द की षष्ठी के बहुवचन में नृणाम्, नृणाम् ये, दो पद होते हैं। एकारान्त तथा ऐकारान्त शन्दों के रूप परिशिष्ट में देखो। ओकारान्त-गो (Ox or Cow). एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा गौः गावी गाव: द्वितीया गाम् गावी गाः तृतीया गवा गोभ्याम् गोभिः चतुर्थी गवे गोभ्याम् गोभ्यः पश्चमी गोः गोभ्याम् गोभ्यः पष्ठी गोः गवोः गवाम् सप्तमी गवि गवोः गोपु सम्बोधन हे गौः हे गावौ सव प्रकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप गो शन्द के ऐसे होते हैं। औकारान्त-लौ ( The Moon, Camphor, Earth) एकवचन द्विवचन वहुवचन थमा ग्लौः ग्लावौ ग्लाव: द्वितीया ग्लावम् ग्लावौ ग्लाव: तृतीया ग्लावा ग्लोभ्याम् ग्लोभिः हे गाव:

४५ स्वरान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द। एकवचन द्विवचन बहुवचन चतुर्थों ग्लावे ग्लोभ्याम् ग्लोभ्यः पञ्चमी ग्लाव: ग्लौभ्याम् ग्लोभ्यः षष्ठी ग्लावः ग्लावो ग्लावाम सप्तमी रतावि ग्लावो ग्लौषु सम्बोधन हे ग्लोः हे ग्लावौ हे ग्लावः सब औकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों के रूप ग्लो शन्द के सदृश होते हैं स्त्रीलिङ्ग (Feminine)। आकारान्त-लता (Creeper )। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा लता लते लताः द्वितीया लताम् लते लताः तृतीया लतया लताभ्याम् लताभिः चतुर्थी लतायै लताभ्याम् लताभ्यः पञ्चम लतायाः लताभ्याम् लताभ्यः षष्ठी लतायाः लतयोः लतानाम् सप्तमी लतायाम् लतयों लतासु सम्बोधन हे लते हे लते अम्बा, द्वितीया, तृतीया, सर्वा और जरा शब्दों को छोड़कर प्रायः सभी प्राकारान्त खोलिङ्ग शब्दों के रूप लता शब्द के सदृश होते हैं। अम्बा शब्द के सम्बोधन के एकवचन में अम्ब होता है। और सब विभकियों में हे लताः .* विद्या, दुर्गा, शिखा, जटा, रेखा, दया, नासा, नासिका, सेना, सेवा, प्रभा, पूजा, शोभा इत्यादि।

४६ उपक्रमणिका। ا इसका रूप लता शब्द के तुल्य है। अक्का (mother ) तथा अल्ला ( mother ) शब्दों के रूप अम्बा शब्द के ऐसे होते हैं। द्वितीया, तृतीया और जरा प्रमृति शब्दों के रूप परिशिष्ट में देखो। इकारान्त-मति ( Intellect, Mind )। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा. मतिः मती मतयः द्वितीया मतिम् सती मतीः तृतीया मत्या मतिभ्याम् मतिभिः चतुर्थी मत्यै, मतये मतिभ्याम् । मतिभ्यः पश्चमी मंत्याः, मतेः मतिभ्याम् मतिभ्यः पष्ठी मत्याः, मतेः मत्योः मतीनाम सप्तमी मत्याम्, मतौ मत्योः मतिपु सम्बोधन हे मते हे मती हे मतयः सव इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप मति शब्द के ऐसे होते हैं। ईकारान्त-नदी ( River)| द्विवचन बहुवचन प्रथमा नदी नद्यौ नद्यः द्वितीया नद्यौ नदी तृतीया नद्या नदीभ्याम नदीभिः चतुर्थी नये नदीभ्याम् नदीभ्यः एकवचन नदीम् - धूलि, प्रालि, अवलि, भूमि, रात्रि, पंक्ति, प्रोपधि, प्रणति,अहुलि, कान्ति,शान्ति, कृति, गति, वुद्धि, श्रुति, स्मृति, भक्ति इत्यादि ।

नंदीपु हे नद्यः स्वरान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द। एकवचन द्विवचन बहुवचन पञ्चमी नद्या: नदीभ्याम् नदीभ्यः षष्ठी नद्याः नद्योः नदीनाम् सप्तमी नद्याम् नद्योः सम्बोधन हे नदि हे नद्यौ श्री, ही, घी, भी, खी, प्रभृति कई एक शब्दों के सिवाय प्रायः सब दीर्घ-कारान्त जीलिङ्ग शब्दों के रूप नदी शब्द के तुल्य होते हैं। लक्ष्मी शब्द के प्रथमा के एकवचन में लक्ष्मीः यह विसर्गयुक पद होता है, और सब विमक्तियों में इसका रूप नदी शब्द के सदृश है । अवी (ऋतुमती स्त्री, a woman in her menses ), तन्त्री (Lute) तरी और स्तरी शब्दों के रूप लक्ष्मी शब्द के तुल्य हैं। sit (Fortune, Beauty)? एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा श्रीः श्रियौ श्रियः द्वितीया श्रियम् श्रियौ श्रियः तृतीया श्रिया श्रीभ्याम् श्रीभिः चतुर्थी श्रिय, श्रिये श्रीभ्याम् श्रीभ्यः पञ्चमी श्रियाः, श्रियः श्रीभ्याम् श्रीभ्यः षष्ठी श्रियाः, श्रियः श्रियोः श्रीणाम्, श्रियाम् सप्तमी श्रियाम, श्रियि श्रियोः श्रीपु सम्बोधन . हे श्रीः हे श्रियौ हे श्रियः काली, गौरी, वाणी, श्रेणी, वीथी, अटवी, प्रोषधी, अंगुली, मञ्जरी, शुमारी, सुन्दरी, जननी, भगिनी इत्यादि।

४८ उपक्रमाणका। हो (लजा, Bashfulness), घो (बुद्धि, Intellect), भी (भय, Fearl, शब्दों के रूप श्री शन्द के तुल्य हैं । eit (Woman, Wife) i एकवचन 'द्विवचन वहुवचन प्रथमा स्त्री. स्त्रियो त्रियः द्वितीया खियम्, खीम् स्त्रियो त्रियः, खी: तृतीया त्रिया स्त्रीभ्याम् ख्रीमिः चतुर्थी त्रिय खीभ्याम् खोभ्यः पञ्चमी स्त्रियाः स्त्रीभ्याम खीभ्यः षष्ठी स्त्रियाः त्रियोः खीणाम् सप्तमी खियाम् त्रियोः खीपु सम्बोधन हे स्त्रि हे स्त्रियो हे त्रियः उकारान्त-धेनु (Cow)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा धेनुः धेनू द्वितीया धेनुम् धेनू धेनूः तृतीया धेन्वा धेनुभ्याम् धेनुभिः धेनवः * बहुव्रीहि-समास-निष्पन्न स्त्रीलिङ्ग सुधी शब्द के रूप पुलिङ्ग सुधो शब्द के ऐसा है; कर्मधारय-समास-निष्पन्न स्त्रीलिङ्ग सुधी शब्द के रूप श्री शन्द के तुल्य है । वहुव्रीहि-समास-निष्पन्न खोलिङ्ग प्रयो गन्द का रूप (परिशिष्टस्य) पुलिङ्ग प्रधो शब्द के सदृश और कर्मचारव-समास-निष्पा जीलिङ्गप्रधी शट के रूप लक्ष्मी शब्द के तुल्य हैं।

. स्वरान्त स्रोलिङ्ग शब्द । एकवचन :: द्विवचनः । बहुवचन चतुर्थी धेन्वै, धेनवे धेनुभ्याम् धेनुभ्यः 'पञ्चमी धेन्वाः, धेनोः धेनुभ्याम् धेनुभ्यः पष्ठी धेन्वाः, धेनोः धेन्वोः धेनूनाम् -सप्तमी धेन्वाम्, धेनौ धेन्वोः धेनुषु सम्बोधन हे धेनो हे धेनू हे धेनवः सब हस्व उकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। ऊकारान्त-बधू (Wife, Woman, Daughter-in-law)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा, वधू वध्वौ वध्वः द्वितीया बधूम् वध्वौ वधू तृतीया वध्वा वधूभ्याम् वधूमिः 'चतुर्थी वध्व वधूभ्याम् वधूभ्यः पञ्चमी बध्वाः बवूभ्याम् वधूभ्यः षष्टी वध्वाः वध्वोः वधूनाम् सप्तमी वध्वाम् वध्योः वधूघु सम्बोधन हे वधु हे वध्वौ भ्र, भू, सुन आदि कई एक शब्दों के सिवाय सभी दीर्घ अकारान्त श्रोलिङ्ग शब्दों के रूप बघू शब्द के सदृश होते हैं। तनु, रेणु, चक्षु, उह (अश्वनी, भरणी आदि २७ नक्षत्र, Lunar •mansion), रज्जु इत्यादि। चिमू, चञ्च, तनू, पुनर्भू, प्रसू, वीरतू इत्यादि। किसी किसी के मन में 'पुनर्भू (a widow remarried) और प्रसू ( mother:) शब्दों के द्वितीया के एकवचन और बहुवचन में यथाक्रम पुनर्वम्, पुनः और प्रस्वम्, , हे वध्वः * उपक्रमणिका। द्वितीया ध्रुवम् . हे भ्रूः हे ध्रुवः भ्रू ( Eyebrow) एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा भ्रूः भ्रुवौ भ्रवः भ्रवौ भ्रवः तृतीया ध्रुवा भ्रूभ्याम् धृभिः चतुर्थी ध्रुवै, ध्रुवे भ्रूभ्याम् भ्रूभ्यः पञ्चमी ध्रुवाः, ध्रुवः भ्रूभ्याम् भ्रूभ्यः षष्ठी भ्रुवाः, ध्रुवः भ्रुवोः भ्रूणाम्, ध्रुवाम् सप्तमी ध्रुवाम्, भ्रुवि भ्रुवोः सम्बोधन हे भ्रुवौ भू शब्द का रूप भ्र शब्द के तुल्य है। सुभ्र शब्द का रूप भीभ्र शब्द के सदृश है, केवल सम्बोधन के एकवचन में सुत्र यही हस्व उकारान्त विसर्ग- हीन पद होता है, इतना ही विशेष है। ऋकारान्त-दुहित (Daughter )। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा दुहिता दुहितरौ दुहितरः द्वितीया दुहितरम् दुहितरौ दुहितः प्रस्वः होता है और किसी किसी के मत में सभी विभक्तियों में वधू शब्द के तुल्य हैं । वर्षाभू (frog, the herb Punarnava) शब्द के रूप पुनर्भू शब्द के ऐसे हैं, केवल सम्बोधन के एकवचन में frog अर्थ में वर्षाभः और Punarnave अर्थ में वर्षाभु होता , इतनी ही विशेषता है । * किन्तु सुन्न पुंलिङ्ग होने से सम्बोधन के एकवचन में सुध्रः होता है। यया, गिरीश सुभ्र स्तव पादपद्मभजन्ति मुक्त्यै कवयोऽसुरारे । V ..

दुहिने हे दुहितरः Vishva स्वरान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । ५१ एकवचन द्विवचन बहुवचन तृतीया दुहित्रा दुहितभ्याम् दुहिवृभिः चतुर्थी दुहितृभ्याम् दुहितृभ्यः पञ्चमी दुहितुः दुहितृभ्याम् दुहितृभ्यः षष्ठी दुहितुः दुहिनोः दुहितॄणाम् सामी दुहितरि दुहित्रोः दुहित्पु सम्बोधन हे दुहितः हे दुहितरौ स्वस शब्द के सिवाय समस्त ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। ERE ( Sister), एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा स्वसा स्वसारी स्वसार द्वितीया स्वसारम् स्वसारौ और सघ विभक्तियों में दुहित शब्द के तुल्प हैं। , N.B. ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द पाँच हैं दुहित, मा, याचनाre और स्वछ । इनमें से दुहित,मातृ,यात, ननान्द, ये चार शब्दों के रूप भ्रातृ शब्द के समान हैं, केवल द्वितीया के बहुवचन में दुहितः, मातः, यातः, ननान्तः ऐसे पद होते हैं, इतना ही विशेष है । स्वस शब्द का रूप दातृ शब्द के तुल्य है, केवल द्वितीया के बहुवचन में स्वसः ऐसा पद होता है, इतना ही भेद है। बोकारान्त और औकारान्त शब्द । बोलिङ्गोकारान्त और नौकारान्त शन्दों के रूप पुलिङ्गोकारान्त और औकारान्त शब्दों के सदृश होते हैं। द्यो शब्द के रूप गो शब्द के, और नौ शब्द के रूप ग्लौ शब्द के तुल्य हैं।

उपक्रमणिका। क्लोष ( नपुसक, Neuter ) लिङ्ग । अकारान्त* -- फल ( Fruit )11) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा फले फलानि द्वितीया फलम् फले फलानि तृतीया फलेन फलाभ्याम् फले चतुर्थी फलाय फलाभ्याम् फलेभ्यः पञ्चमी फलात् फलाभ्याम् फलेभ्यः पष्टी फलस्य फलयोः फलानाम् सप्तमी फले फलयोः फलेषु सम्बोधन हे फल हे फले हे फलानि प्रायः सब अकारान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के ऐसे ही रूप होते हैं। इकारान्त–वारि (Water)। . एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा वारि वारिणी वारीणि द्वितीया वारि वारिणी वारीणि प्रथमा और द्वितीया को छोड़कर और सब विभक्तियों में लोवलिङ्ग अकारान्त शब्दों के रूप पुलिङ्ग अकारान्त शब्दों के सदृश है। जिल, वल, धन, वन, कानन, ज्ञान, तृण, शप्प, पुप्प, कमल, मूल, पत्र, कुसुम इत्यादि । अजर, शीर्ष, हृदय, उदक, प्रासन और मांस शब्दों के रूप में विशेषता है। इनके रूप परिशिए में देखो। .

स्वरान्त छीवलिङ्ग शब्द । ૨૨ एकवचन द्विवचन बहुवचन तृतीया वारिणा वारिभ्याम् वारिभिः चतुर्थी वारिणे वारिभ्याम् वारिभ्यः पश्चमी वारिणः वारिभ्याम् वारिभ्यः षष्ठी वारिणः वारिणोः वारीणाम् सप्तमी वारिणि वारिणः वारिपु सम्बोधन हे वारे, हे वारि हे वारिणी हे वारीणि दधि, अक्षि, अस्थि (bone), सक्यि (thigh) भिन्न समस्त विशेष्य हस्व इकारान्त क्लोवलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। दधि (Curd )। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा दधि दधिनी दधीनि द्वितीया दधि दधिनी दधीनि तृतीया दना दधिभ्याम् दधिभिः चतुर्थी दध्ने दधिभ्याम् दधिभ्यः पञ्चमी दनः दधिभ्याम् दधिभ्यः षष्ठी दनः दनोः दनाम् सप्तमी दनि, दधनि दनोः दधिषु सम्बोधन हे दधे, हे दधि हे दधिनी हे दधीनि अक्षि, अस्थि और सक्यि शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं, केवल अक्षि शब्द के रूप में जो 'न्' पाता है वह णत्वविधि के नियमानुसार 'ण' हो जाता है, इतना ही विशेप है।

उपक्रमणिका। मधूनि हे मधूनि उकारान्त-मधु ( Honey)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा मधु मधुनी मधूनि द्वितीया मधु मधुनी तृतीया मधुना मधुभ्याम् मधुभिः चतुर्थी मधुने मधुभ्याम् मधुभ्यः पञ्चमी मधुनः मधुभ्याम् मधुभ्यः पष्ठी मधुनः मधुनोः मधूनाम् सप्तमी मधुनि मधुनोः मधुयु सम्बोधन हे मघो, हे मधु हे मधुनी प्रायः सव विशेष्य हस्व उकारान्त क्लोवलिस शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। विशेषण इकारान्त और उकारान्त कीवलिङ्ग शब्दों के रूप विशेष्य इकारान्त और उकारान्त लोवलिङ्ग शब्द के सहश होते हैं; केवल चतुर्थी, पञ्चमी, पष्ठी और सप्तमी के एकवचन में और पष्ठी तथा सप्तमी के द्विवचन में पुंलिङ्ग इकारान्त और उकारान्त शब्दों के ऐसे रूप भी होते हैं । यथा:- (१) अनादि ( Eternal)। एकवचन द्विवचन । चतुर्थी अनादिने, अनादये पञ्चमी अनादिनः, अनादेः पष्टी अनादिनः, अनादेः अनादिनोः, अनाद्योः सप्तमी अनादिनि, अनादी अनादिनोः, अनाद्योः .... *जानु (knes), वस्तु, वमु (wealth), दारु (wood), अम्बु, अनु, नु इत्यादि । सानु (peak, ridge) शब्द के रूप में विशेपता है; परिशि में देखो।

स्वरान्त लोवलिङ्ग शब्द। और सव विभक्तियों में इसका रूप वारि शब्द के सदृश होता है। सब विशेषण इकारान्त क्लीलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। (२) स्वादु (Street)। एकवचन द्विवचन स्वादुने, स्वादवे .... चतुर्थी पञ्चमी पष्ठी सप्तमी स्वादुनः, स्वादोः स्वादुनः, स्वादोः स्वादुनि, स्वादौ " स्वादुनोः, स्वाद्वोः स्वादुनोः, स्वाद्वोः और सब विभक्तियों में इसका रूप मधु शब्द के तुल्य होता है । सव विशेषण उकारान्त क्लोवलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। अकारान्त-धात (The Creator) M एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा धात धातुणी धातणि द्वितीया धात धातणी धातृणि तृतीया धातणा, धात्रा धातृभ्याम् धावृभिः चतुर्थी धातणे, धात्रे धातृभ्याम् घातभ्यः पञ्चमी धातणः, धातुः धातृभ्याम् धातृभ्यः पष्टी धातृणः, धातुः धातृणोः, धात्रोः धातृणाम् सप्तमी धारिण, धातरि धातोः, धात्रोः धासुपु सम्बोधन हे धातु, हेधातः हे धातणी हे धातणि सव प्रकारान्त जीवलिङ्ग शब्दों के रूप घातृ शब्द के समान होते हैं।

उपक्रमणिका। -- Exercise III. (अनुशीलनी-अभ्यासार्थ प्रश्न ।) मन्तव्य-अनुवाद की सुविधा के लिए स्वरान्त शब्द सीखने के पश्चात् वालकों को सर्वनाम शब्दों में से अस्मद, युग्मद्, यद्, तद् आदि शब्द, धातुरूप में से भू, स्था, गम्, अ, कृ श्रादि धातु और कारक पदा देना अच्छा है। 1. Hints :-विशेषण ( Adjective), विशेग्य (Noun) का गुण. और अवस्था प्रकाशित करता है और यह प्रायः विशेप्य के पूर्व में रहता है। संस्कृत में विशेष्य के जो लिङ्ग, वचन और विभक्तियाँ होती हैं उसके विशेषण के भी वे ही लिङ्ग, वचन और विभक्तियां होती हैं (In Sanskrit the adjective has the same gender, number and case-ending as. the Noun, it qualifies, has). • 2. हिन्दी तथा अँगरेज़ी आदि के जैसा संस्कृत में तीन पुरुष. ( Persons ) हैं-उत्तम पुरुप (First person ), मध्यम पुरुष ( Second person ), और प्रथम पुरुष (Third person ) | अस्मद् शब्द से टतम पुरुष, युष्मद् शब्द से मध्यम पुरुष, और इनको छोड़ कर और सब हो शब्दों से प्रथम पुरुष समझा जाता है। Nominative case (कर्तृकारक-फर्ता ), उत्तम पुरुष-अहम् (मैं, I), आवाम् (हम दोनों, re tiror or both of us), वयम् (हम, re)! मध्यम पुरुष-त्वम् (तू, thon ), युवाम् ( तुम दोनों, yon bro, or both of you), यूयम् (तुम, you)| प्रथम पुरुष, सः (वह, he), तौ (वे दोनों, they two, or both of them ), ते (वे, they), नरः (a man), नरौ ( two men ), नराः (men) इत्यादि। . Objective case (कर्मकारक-कर्म), उतम पुरुप-माम,मा (सुमे, मुझको, me),श्रावाम, नौ (हम दोनों को, to broof us, or to both of us), अनुशीलनी-अभ्यासार्थ प्रश्न। अस्मान् नः (हमें, हमको, us) । मध्यम पुरुष-स्वाम्, त्वा (तुझे, तुझको, thes), युवाम्, वाम् (तुम दोनों को, to you two, or to both of you, युष्मान्, वः (तुम्हें, तुमको, to you ) । प्रथम पुरुष–तम् (उसे, उसको, him), तो (उन दोनों को, to thro of them, or to both of them ), तान् (उन्हें, उनको, them ), नरम् (to a man), नगै (to two men), नरान् (to men) इत्यादि। Possessive case (सम्बन्ध-पद), उत्तम पुरुष-मम, मे (मेरा, my, mine), आवयोः, नौ (हम दोनों का, of tro cf us, or of both of us), अस्माकम् , नः (हमारा, our, oars)| मध्यम पुरुष-तव, ते (तेरा, thy, thine ), युवयोः, वाम् (तुम दोनों का, of you two, or of both of you), युष्माकम् , वः (तुम्हारा, your, yours)| प्रयम पुरुष-तस्य ( उसका, his), तयोः (उन दोनों का, of tro of them, or of both of them), तेषाम् (उनका, उन्हों का, their, theirs), नरस्य (man's, or of the man ), नरयोः (tro men's, or of tro men ), atrurg ( mens', or of the men ) ycutfg .3. Model Translation (अनुवादादर्श ):-I go=अहं गच्छामि। Tre (tro) go=आवां गच्छावः; we go=वयं गच्छामः। Thou goest=त्वं गच्छसि; you (tro) go=युवां गच्छथः; you ge=यूयं गच्छय । He goes =सः गच्छति; they (two) go=तौ गच्छतः; they go=ते गच्छन्ति । Men go=नराः गच्छन्ति । Ram goes=रामो गच्छति । A beautiful man =सुन्दरो नरः; Tro beuutiful men= सुन्दरी नरौ, Beautiful men =सुन्दरा नराः; To beautiful men = सुन्दरान् नरान् । By an ignorant boy=मूलैण बालकेन | From the father=पितुः | The house of a king=नृपतेरालयः | In the towns नगरे | Of the mountains =पर्वतानाम् | Surely (हि) the milk of the cow (गवां क्षीरम् ) is sweet (मधुर)-मधुरम् हि गवां क्षीरम् ।

उपक्रमणिका। Krishna is the friend of Arjun=अर्जुनस्य सखा कृष्णः | King is the protector of men=नराणां रक्षको नृपः । From the giverse दातृभ्यः | An old man=वृद्धः पुरुषः। A red flowersरकं पुष्पम् । A chaste womanपतिव्रता (साध्वी) नारी। Surely (हि) amam (नर ) is the enemy (रिपुः) of a man (नरस्य)=नरो हि नरस्य रिपुः । From an enemy=अरेः, रिपोः, शत्रोः। In the hand=पाणी, हस्ते। Waves of the sea =समुद्रस्य तरङ्गाः, उदधेर्वीचयः । High trees= उन्नता वृक्षाः, उन्नतास्तरवः । In the hermitage of the sages%3D ऋषीणामाश्रमे । Big trees=विशालास्तरवः । Cool air=शीतलः Hotu: 1 To the wives=watu: 1 A handsome lady=daruuhat ललना | Affectionate mother=स्नेहमयी माता (जननी)। In the shade of a tree=तरोश्छायायाम् | In the house of the son-in-laxy =जामातुरालये । To the brother of the father=पितुर्मातरम् ( or पितृव्यम् )| To the brother of the husband =पत्युर्धातरम् (or देवरम् ) | Shiva's wife Gauri is the daughter of Himalaya = शिवस्य वनिता गौरी हिमालयस्य दुहिता | Krishna's sister Subhadra is the wife of Arjun=कृष्णस्य स्वसा सुभद्रा अर्जुनस्य पनी । Wet clothes =सिक्कानि (श्रााणि) वसनानि | Two hard bones = कठिने अस्थिनी| Lame of one leg=पादेनखञ्जः।Brahmin by caste जात्या ब्राह्मणः | How many sons have you?=कति भवतः पुत्राः? 4. Translate into Sanskrit:-We go home. Boys go to school. Many black cows. Valmiki is the first poet. Bright stars. Two dead men. By intelligent ( ger ) boys. By the order of the general (सेनापति). The guests (अतिथि) in the house (गृह) of a giver ( दातृ). To Thungry (क्षुधान) beggars (भिक्षुक). In deep (गम्भीर ) wells (कूप). Snakes (सर्प) are reptiles (सरीसृप). A sword (खड्ग) in the hand (पाणि) of the warrior (योध् ). Among poets (कविपु) Kalidas is the best (श्रेष्ठ). Lakshmi is the wife (स्त्री, वनिता) of Vishnu. The cows (धेनु) of the sages. By the female attendants (सखी) of the queen (राज्ञी). The daughter of अनुशीलनी-अभ्यासार्थ प्रश्न । ५६ M Rama's sister. Flowers, fruits and (च) roots. White flowers in the forest. Travelling (भ्रमणम्) in spring (वसन्त) is beneficial (हितकरम् ). Men's life is transitorj (अनित्यम् ). Garuday(पङ्किल) water of the river. The sight (दृश्य) of the rising (उदीयमान) sun in the sea-coast is very charming मिनोहर). Contentment is the source of happiness. Jadu's sister is an accomplished. (सर्वगुणालंकृत) roman. Arundhati is the wife of Vashishtha:-The earth is round. Seen (:) by the learned (विदुषी) girl. Given (दतम् ) by the cows of the sages. Of the mountains the Himalayas are the highest (उबतम). 5. Translate into English:-विधेः; नृपतौ; सुश्रिया; निशायाम्। चञ्चली मतिः; दीपानामुज्ज्वलाः शिखाः; पुष्पिते लते; हिंसा जन्तूनां प्रकृतिः, पतिहि गुरुः खीणाम् ; शोमनश्चन्द्रः; व्याघ्रात् भीताः भिक्षयः, कर्णेन वधिरो वालकः; गुणेषु विनयः श्रेष्ठः; देवानामरयः दैत्याः; सुन्दर- माननम् ; उष्णेन वारिणा; वृद्धस्य वचनं ग्राह्यम् ; पीडितस्यौषधं पथ्यम् । अमृतं बालानां भाषितम् ; रोगे भ्रमणं स्वास्थ्यस्य अहितकरम् ; गुरोरादेशः सदा पालनीयः। 6. Correct:-भीषणेन अनलस्य; ग्रहणामधिपतिर्भानुम् करुणानिधानेन गुरुभिः परोपकारो परमं धर्मः; सभास्य परमः शोभा; शस्यपूर्णम् वसुन्धरा; कमला सदैव चञ्चलाः; स्वास्थ्यं सुखस्य निदानः; पवित्रमुदकः गङ्गायाः; मूर्खाणाम् जीवनं शून्यः; उद्यानस्य सुन्दरम् कुसुमानि; मलिनेन कन्थया श्रावृतं देहः साधुःभार्या असाचुः पतिः ऋणम् स्नेहमयी जनन्याः । 7. Point out the difference and resemblance in the declension of the bases:-मुनि, पति and सखि नदी, श्री and खी; वधू, and सुभ्र; and वारि, दधि and अनादि । 8. Explain the formation of:-अम्ब, दातॄन् ; सुधियः, मृगीम्, देवि, साघोः, गोः, ग्लावः, वधूः, वैदेह्याः, मातः, भुषि, फले, दधीनि, वारीणाम् , मधुनो, स्वादुभिः, स्वाद्वोः, फल, गजान and विश्वपः । 9. Give the alternative forms of: अल्पे, नृणाम्, मत्यै, मती, श्रियः, श्रीणाम् , खोः, धेनोः, वारे, अक्षणि, मघा, स्वादोः, अनादये and घावृणी।

६०
उपक्रमणिका।
व्यञ्जनान्त शब्द।
( Bases ending in Consonants. )
पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग ( Masculine and Feminine ).
व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप एक ही प्रकार
के होते हैं ; इसलिए दोनों लिङ्गों के रूप एकत्र लिखे जाते हैं।
ककारान्त तथा खकारान्त शन्दों के रूप परिशिष्ट में देखो।
चकारान्त-जलमुच् ( Clond ) पुलिङ्ग।
एकवचन द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा जलमुक्
जलमुची
जलमुचः
द्वितीया जलमुचम् जलमुची जलमुचः
तृतीया जलमुचा जलमुग्भ्याम् जलमुग्भिः
चतुर्थी जलमुचे जलमुग्भ्याम् जलमुग्भ्यः
पञ्चमी जलमुचः जलमुग्भ्याम् जलमुग्भ्यः
षष्ठी
जलमुचः जलमुचोः जलमुचाम्
सप्तमी जलमुचि जलमुचोः
जलमुक्षु
सम्बोधन
हे जलमुची हे जलमुचः
प्राच, प्रत्यच, तिर्यंच, उदच् प्रभृति* कई एक शब्दों को छोड़कर
सभी चकारान्त पुंलिङ्गा और खोलिङ्ग शब्दों के रूप जलमुच शब्द के सदृश
होते हैं।
हे जलमुक्
इन शब्दों के रूप परिशिष्ट में देखो। पुंलिङ्ग-आरिमुच, पयोमुच
इत्यादि । स्त्रीलिङ्ग-वाच, त्वच, रुच, स्युच्, शुच्, ऋच इत्यादि।

व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग ओर स्त्रीलिङ्ग शब्द । ६१ जकारान्त वणिज ( Merchant ) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा वणिक वणिजौ वणिजः द्वितीया वणिजम् बणिजौ वणिजः तृतीया वणिजा वणिग्भ्याम् वणिभिः चतुर्थी वणिजे वणिग्भ्याम् वणिग्भ्यः पञ्चमी वणिजः वणिग्भ्याम् वणिग्भ्यः षष्ठी वणिजः बणिजोः वणिजाम् सप्तमी वंणिजि वणिजोः वणिक्षु सम्बोधन हे वणिक हे वणिजौ हे वणिजः सम्राज, देवराज, विराज्, परिवाज, विश्वसन आदि कई एक शब्द भिन्न सब जकारान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्दों * के रूप वणि शब्द के सध्य होते हैं। सम्राज ( Emperor ) पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रधमा सम्राट सम्राजौ सम्राजः द्वितीया सम्राजम् 'सम्राजौ सम्राजः . पुलिङ्ग-भिषज्, ऋत्विज्, भृतिभुज, वलिमुज्, हुतभुज्, दुःखमान, भूभुज् इत्यादि। स्त्रीलिङ्ग-सज्, रुज् इत्यादि। रुधादिगणीय धातुसे निष्पन्न युज् शब्द की प्रथमा विमति में युङ, युञ्जौ, युनः; द्वितीया में युञ्जम, युऔ, युजा, और सब विमतियों में बणिज् शब्द के ऐसा । दिवादिगणीय धातु से निष्पन्न युज् शन्द का रूप सभी विभक्तियों में वणिज शब्द के तुल्य है। विश्वस्जू शब्द का रूप सम्राज् के ऐसा होता है । यथा, विश्वस्ट् इत्यादि ।

६२ एकवचन तृतीया सम्राजा चतुर्थी सम्राजे पञ्चमी सम्राजः पष्ठी सम्राजः सप्तमी सम्राजि सम्बोधन हे सम्राट उपक्रमणिका। द्विवचन वहुवचन सम्राभ्याम् सम्राभिः सम्राड्भ्याम् सम्राड्भ्यः सम्राभ्याम सम्राड्भ्यः सम्राजोः सम्राजाम् सम्राजोः सम्राट्स हे सम्राजौ हे सम्राजः देवराज, विराज्,परियाज, विभ्राज, देवेज, और परिमृज् शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। विश्वराज् शब्द का रूप भी ऐसा होता है, केवल जहाँ न के स्थान में दवा होता है वहाँ विश्वा होता है। यथा, विश्वाराट्, विश्वाराड्- भ्याम्, विश्धाराट्सु, खनज् आदि शब्दों के रूप परिशिष्ट में देखो। द्वितीया भूभृतम् तृतीया भूभृता Vतकारान्त-भूभृत् ( Mountain, King)। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा भूभृत् भूभृतौ भूभृतः भूभृती भूभृतः भूभृद्भ्याम् भूभृद्धिः चतुर्थी भूभृते भूभृद्भ्याम भूभृद्भ्यः पश्चमी भूभृतः भूभृद्भ्याम् भूभृदभ्यः षष्ठी भूभृतः भूभृतोः भूभृताम् सप्तमी भूभृति भूभृतोः भूभृत्सु हे भूभृतौ भूभृतः सम्बोधन हे भूभृत् व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । प्रायः सब अत् (ग), स्यत् (स्पतृ) प्रत्ययान्त शब्द, सभी मत् (मतुप), क्त् (चतुप अथवा मतुप), तवत् (क्तवतु) प्रत्ययान्त शब्द और महत् शन्द भिन्न सभी पुलिङ्ग और स्त्रीलिंग तकारान्त शब्दों के रूप भूभृत् शब्द के सदृश होते हैं। - गायत् ( Singing)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गायन् गायन्तौ गायन्तः द्वितीया गायन्तम् गायन्तौ गायतः तृतीया गायता गायझ्याम् गायद्धिः चतुर्थी गायते गायझ्याम् गायझ्यः पञ्चमी गायतः गायद्भ्याम् गायभ्य: षष्ठी गायतः गायतोः गायताम् सप्तमी गायति गायतोः गायत्सु सम्बोधन गायन् गायन्तौ गायन्तः आप्रत्, शासत्, अक्षत, दरिदत्, चकासत, ददत् दधत, विभ्रत् आदिशन्द भिन्न सब अत् (शतृ) और स्यत् (स्यतृ) प्रत्ययान्त शब्दों में के रूप गायत् शब्द के तुल्य हैं। अत् और (स्यत्) प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में तकारान्त नहीं रहते, दीर्घ इकारान्त हो जाते हैं । भवत् शब्द का रूप गायत् शब्द के ऐसा है, परन्तु नब भवत् का अर्थ 'तुम' होता है सब इसका रूप श्रीमत् शब्द के सदृश होता है । जाग्रत् आदि शब्दों के रूप भूभृत् शब्द के तुल्य हैं। *पुलिङ्ग-महीमृत (Mountain), विपश्चित्, महीक्षित् , दिनकृत, पराभूद, परभृत् (crow), इन्द्रजित, तनूनपात् (fire), प्रियकृत, दत, हरित, मरुद, इत्यादि व्या अत् और स्यत् प्रत्ययान्त-जाग्रत, शासत, उदद, विनव, प्रभृति । खोलिङ्ग-सरित, योषित, तड़िद, विद्युत् इत्यादि । + भवत्, कुर्वत, गच्छत्, तिष्ठत, ध्यायत्, चुवत्, पिवत्, जानत्, गृहत, इच्छत, पश्यत्, नृत्य, धावत्, द्विषत्, करिष्यत्, गमिष्यत्, स्थास्यत, यास्पत, दास्यत् इत्यादि । वृहत् और पृषत् शब्द का रूप गायत् शम्द के ऐसा होता है।

६४ उपक्रमणिका N. B.-प्रथमा के तीनों वचन, द्वितीया के एकवचन और द्विवचन तथा सम्योधन के सिवाय और सद विभक्तियों में गायत् शब्द का रूप भूत शब्द के तुल्य है। श्रीमत् ( Beautiful)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा श्रीमान् श्रीमन्तो श्रीमन्तः 'द्वितीया श्रीमन्तम् श्रीमन्तो श्रीमतः तृतीया श्रीमता श्रीमद्भ्याम् श्रीमद्भिः चतुर्थी श्रीमते श्रीमद्भ्याम् श्रीमद्भ्यः पञ्चमी श्रीमतः श्रीमद्भ्याम् श्रीमद्भ्यः पष्टी श्रीमतः श्रीमतोः 'श्रीमताम् -सप्तमी श्रीमति श्रीमतो श्रीमत्सु सम्बोधन हे श्रीमन् हे श्रीमन्ती हे श्रीमन्तः ' मत् (मतुप ) वन वितुप) और तवा (कवत्) प्रत्ययान्त शन्दों के रूप श्रीमत् शन्द के ऐसे होते हैं। उक्त प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में तकारान्त 'नहीं रहते, दीर्घ ईकारान्त हो जाते हैं। N.B.-श्रीमत् शब्द का रूप गायत् शन्द के ऐसा ही है, केवल प्रथमा के एकवचन में न के पूर्ववर्ती 'अ' का 'श्रा' हुआ है; इतनी ही विशेषता है। इससे यह सिद्ध होता है कि मत्, वन और तवत् प्रत्ययान्त सभी शब्दों के रूप अत् (शतृ) प्रत्ययान्त गायत् शब्द के तुल्य होते हैं। केवल प्रयमा के एक- वचन में 'न्' के पूर्वस्थित 'अ' को 'आ' होता है, इतना ही अन्तर है। . - . * मत्प्रत्ययान्तु-धीमत, बुद्धिमत्, मतिमत्, अंशुमत, आयुष्मत्, धनुष्मत् इत्यादि । वत्प्रत्ययान्त ज्ञानवत्, प्रज्ञावन् लजावत्, विद्यावत, भगवत्, युप्मदर्यक भवत्, यावत्, तावत्, एतावत्, कियत्, इयत्, नभस्वत्, विवस्वत् इत्यादि । तवत् प्रत्ययान्तु-कृतवत्, स्थितवत, ज्ञातवत्, गतवन्, 'जितवत, श्रुतवत्, घटवत्, उकवत् इत्यादि ! भगवन्, अथवत्, युष्मदर्यक भवत् शब्दों के सम्बोधन के प्रयमा एकवचन में दो दो पद होते हैं। यथा भगो, भगवन्, अघोः, अघवन, भोः, भवन् ।

. सम्बोधन महन् व्यञ्जनात्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । ६५ * महत् (Great ) पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा महान् महान्तौ महान्तः द्वितीया महान्तम् महान्तौ महतः महान्तौ महान्तः और सब विभकियों में भूभृत् शब्द के ऐसा होता है। दकारान्त-सुहृद् ( Friend ) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा सुहृत्, सुहृद् सुहृदौ सुहृदः सुहृदौ तृतीया सुहृदा सुहन्याम् सुहृद्धिः चतुर्थी सुहृदे सुहृद्भयाम् सुहद्वचः सुहृद्याम् सुहद्यः पष्ठी सुहृदः सुहृदोः सुहृदाम् सप्तमी सुहृदि सुहृदोः सम्बोधन सुहृत्, सुहृद् सुहृदौ सुहृदः सव दकारान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे होते हैं। सुपाद् आदि के रूप में विशेषता है; परिशिष्ट में देखो। द्वितीया सुहृदम् पञ्चमी सुहृदः *पुंलिङ्ग-निरापद्, सभासद्, दिविषद्, उद्रिद्, पद् इत्यादि सोलिङ्ग-आपद्, सम्पद्, विपद्, उपनिषद्, नुद् (Mulberry tree), मृद्, परिषद्, संसद् (Assermbly), संविद् (Intellect), दृषद् (Stone, Rock), शरद इत्यादि। ५ १६ उपक्रमणिका। धकारान्त-वीरुध ( Creeper ) स्त्रीलिङ्ग । एकवचन, द्विवचन बहुवचन प्रथमा वीरुत्, वीरुद् वीरुधौ वीरुधः द्वितीया वीरुषम् वीरुधौ वीरुधः तृतीया वीरुधा वीरुद्भयाम् वीरुद्धिः चतुर्थी वीरुधे वीरुद्रयाम् वीरुद्धयः पञ्चमी : वीरुधः वीरुद्याम् वीरुद्धयः पष्टी वीरुषः वीरुधोः वीरुधाम् सप्तमी वीरुवि वीरुधोः वीरुत्सु, सम्बोधन वीरुत्, वीरुद् वीरुधौ वीरुधः प्रायः सभी धकारान्त शब्दों के रूप ऐसे होते हैं। नकारान्त शमा नकारान्त शब्द तीन प्रकार के हैं अन्-मागान्त; इन्- भागान्त और हन-भागान्त । अन्-भागान्त लघिमन् (Lightness) पुंलिङ्गः । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा लघिमा लघिमानी लघिमान: द्वितीया लघिमानम् लधिमानी लपिन्नः तृतीया लघिन्ना लघिमभ्याम् लघिमभिः चतुर्थी लघिम्ने लघिमभ्याम् लघिमभ्यः *पुंलिङ्ग-मृगाविध् (Huntor), मुयुध्, धर्मवुध् (Knowing tho, law); स्त्रीलिङ्ग क्षुध, युध, समिधु इत्यादि । धकारान्त पुंलिङ्ग शब्द • बहुत ही कम होते हैं । बुध (A leurned man) शब्द का रूप वीरुय शब्द .- के तुल्य है; केवल प्रयमा तथा सम्बोधन के एकवचन में और तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमी के द्विवचन और बहुवचन में, और सहमी के बहुवधन में बुके स्थान में भु हो जाता है, इतनी ही विशेषता है। - व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । ६७ एकवचनं द्विवचन वहुवचन पश्चमी लघिनः लघिमभ्याम् लघिमभ्यः षष्ठी लपिन्नः लघिनौः लघिन्नाम् सप्तमी लधिनि, लघिमनि लघिनोः .. लघिमसु सम्बोधन लघिमन् लधिमानौ लधिमानः आत्मन्, युवन्,, मघवन्, श्वन आदि कईएक शब्दों को छोड़कर प्रायः सब अन्-भागान्त पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप लधिमन् शब्द के सदृश हैं। राजन् तया दोषन् शब्दों के रूप लघिमन् शब्द के ऐसे ही हैं 'कैवल लघिमन् के रूप में जहाँ न है राजन् शब्द के रूप में वहाँ ज्ञ और दोषन के रूप में प्ण होता है, इतना ही अन्तर है। श्रात्मन ( Soul, Self ) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा आत्मा श्रात्मानौ यात्मानः द्वितीया आत्मानम् आत्मानी आत्मनः तृतीया श्रात्मना थात्मभ्याम् आत्मभिः चतुर्थी : यात्मन आत्मभ्याम् आत्मभ्यः पञ्चमी यात्मनः आत्मभ्याम् आत्मभ्यः पष्टी आत्मनः आत्मनः आत्मनाम् सप्तमी आत्मनि आत्मनः आत्मसु सम्बोधन अात्मन् आत्मानौ आत्मानः * पुंलिङ्ग-गरिमन्, प्रथिमन्, नदिमन्, द्रद्धिमन्, महिमन्, प्रेमन, मूर्द्धन, वेमन् (Loom), दोषन्, राजन इत्यादि, श्रीलिङ्ग-सोमन, पामन् इत्यादि । पूषन् (Sun) शब्द की प्रथमा विभक्ति में पूषा, पूषणो, पूषणः; : द्वितीया में पूषणम्, पूषणो, पूष्णः और सप्तमी के एकवचन में पूष्यि, पूषदि होता है और सब विभक्तियों में लघिमन् के ऐसा, केवल जहाँ न है वहांश होता है, इतनी ही विशेषता है। अर्थमन् के प्रथमा में अर्यमा, अर्यमयी, अर्यमणः द्वितीया में अर्यमयम्, अर्यमयी, अर्यम्णःऔर सब विभक्तियों में लघिमन् के ऐसा, केवल सम्बोधन के एकवचन के सिवाय समीन के स्थान में होता है। :

६८ उपक्रमणिका। जिन अन्-भागान्त शन्दों के अन् का अकार म् अथवा च संयुक वर्ण में मिला रहता है उनके रूप आत्मन् शब्द के समान होते हैं। युवन ( Youth) पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा युवा युवानी युवानः द्वितीया युवानम युवानी यूनः तृतीया यूना युवभ्याम् युवभिः चतुर्थी यूने युवभ्याम् युवभ्यः पञ्चमी यूनः युवभ्याम् युवभ्यः पष्ठी यूनः यूनोः यूनाम् सप्तमी यूनि यूनोः युवसु सम्बोधन युवन् युवानी युवानः मघवन् । (Indra) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा मघवा मघवानी मघवानः द्वितीया मघवानम् मघवानी मघोनः तृतीया मघोना मघवभ्याम् मघवभिः चतुर्थी मघोने मघवभ्याम् मघवभ्यः पञ्चमी मघोनः मघवभ्याम् मनवम्चः पष्टी मघोनः मघोनोः मघोनाम् * पुलिङ्ग-यज्वन्, यक्ष्मन्, अश्मन्, द्विजन्मन्, ब्रह्मन्, महात्मन इत्यादि। अर्वन् (Horse) शब्द के रूप में न के स्थान में न होकर सभी विभक्तियों में श्रीमत् शन्द के सदृश हैं, केवल प्रथमा के एकवचन में अचा. होता है। अनन् शब्द का रूप आत्मन् शब्द के तुल्य है । + नववन् शब्द के न के स्थान में न होकर श्रीमत् शन्द के सख्श और एक रूप सम्बोधन को..छोड़कर सभी. विभक्तियों में होता है। यथा, मघवान्, मववन्ती, मघवन्तः इत्यादि । ।

व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । एकवचन द्विवचन बहुवचन सप्तमी मघोनि मघोनो मघवसु ' सम्बोधन मघवन् मघवानी मघवानः श्वन (Dog) पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा श्रा श्रानौ श्वानः द्वितीया श्वानम श्वानी शुनः तृतीया शुना श्वभ्याम् वभिः चतुर्थी शुने अभ्याम् श्रभ्यः पश्चमी शुनः श्वभ्याम पष्ठी शुनः शुनोः शुनाम् सप्तमी शुनि शुनोः श्रानौ श्वानः इन्-भागान्त--गुणिन् (Qualified) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा गुणी गुणिनौ गुणिनः द्वितीया गुणिनम् गुणिनौ गुणिनः तृतीया गुणिना गुणिभ्याम् गुरिणभिः चतुर्थी गुणिने गुणिभ्याम् गुणिभ्यः पञ्चमी गुणिनः गुणिभ्याम् गुणिभ्यः पष्टी गुणिनः गुणिनोः गुरिणनाम् सप्तमी गुणिनि गुणिनोः गुरिणपु सम्बोधन गुणिन् गुणिनौ गुणिनः पथिन्, मयिन्, भुक्षिन् (इन्द्र) भिन्न समस्त इन्-भागान्त शब्दों के रूप गुगिन् शन्द के तुल्य होते हैं। *पुंलिङ्ग-लिन्, ज्ञानिन्, मेघाविन्, तपस्विन, मनोहारिन्, एकाकिन, सम्बोधन.श्वन् उपक्रमणिका। पथिन् (Path, Was) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा पन्थाः पन्धानी पन्थानः द्वितीया पन्थानम पन्थानी पथः तृतीया पथा पथिभ्याम् पथिभिः चतुर्थी पथे पथिभ्याम् पथिभ्यः पञ्चमी पथः पथिभ्याम् पथिभ्यः पष्टी पथः पथोः पथाम् सममी पथि पथो पथिपु सम्बोधन पन्थाः पन्थानी पन्थान: मथिन् (Churning stick) शब्द का रूप ऐसा ही है । मुक्षिन् शब्द के रूप भी पथिन् शब्द के तुल्य है, केवल प्रथमा विभक्ति में ऋभुक्षाः, भुक्षाणी, ऋभुक्षाणः, और द्वितीया के एकवचन में मुलायम, और द्विवचन में ऋभुक्षाणी ऐसे रूप होते हैं, इतनी ही विशेषता है। हुन्-भागान्त-कृत्रहन (Indra) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथना वृत्रहा वृत्रहणी वृत्रहणः द्वितीया वृत्रहह्मम वृत्रहणी वृननः तृतीया वृत्रना वृत्रभ्याम् चतुर्थी वृत्रन वृत्रहभ्याम् वृत्रहभ्यः पञ्चमी वृत्रन्नः वृनभ्याम् वृनभ्यः पष्टी वृनन्नः वृत्रनोः वृत्रन्नाम् वृत्रहभिः करिन्, हस्तिन, पक्षिन्, यामिन्, अर्थिन्, मन्त्रिन्, वाजिन्, विपिन्, स्वामिन् इत्यादि । इन्-भागान्त शब्द का स्त्रीलिङ्ग ई लगाकर बनता है, इसलिए इन-भागान्त खोलिङ्ग शब्द नहीं है। * द्वितीया के बहुवचन में ऋभुक्षः; तृतीया ऋमुक्षा, ऋभुमिभ्याम, भुक्षिभिः इत्यादि।

। - सम्बोधन वृत्रहन " व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । ७१ एकवचन द्विवचन बहुवचन सप्तमी वृत्रग्नि, वृत्रहणि वृत्रन्नोः वृत्रहस वृत्रहणौ वृत्रहणः सभी हन्-भागान्त शब्दों के ऐसे रूप होते हैं । 'ह' के स्थान में व होने से दन्त्य न् मूर्धन्य ण नहीं होता। पकारान्ता-अप (Water) स्त्रीलिङ्ग । अप शब्द का प्रयोग केवल बहुवचन में होता है। बहुवचन प्रथमा द्वितीया तृतीया चतुर्थी पञ्चमी पष्ठी सप्तमी सम्बोधन आप: अपः अद्भिः अद्भ्यः अभ्यः अपाम् अप्सु आपः भकारान्त-ककुम (Quarter, Region) स्त्रीलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा ककुप्, ककुन्। ककुभौ ककुभः द्वितीया ककुभम् ककुभो ककुमः तृतीया ककुमा ककुभ्याम् ककुभिः चतुर्थी ककुमे ककुम्भ्याम् क्कुम्भ्यः पञ्चमी ककुमः ककुब्भ्याम् ककुभयः पष्टी ककुमः ककुभोः ककुभाम् सप्तमी ककुभि ककुभोः ककुप्सु ककुभो । सम्बोधन ककुप्, ककुन् । , ककुमा - . *हन्-धातु से निष्पन्न न होने से नहीं होता। यया प्लीहन्, दीर्घाहन्, अल्पाहन इत्यादि शब्दों के रूप लघिमन् के ऐसे हैं। + पकारान्त शब्द बहुत ही कम हैं, केवल नीलिङ्ग अपशब्द का, प्रयोग देखा जाता है। पुलिङ्ग गुप् शब्द परिशिष्ट में देखो। .

i ७२ उपक्रमणिका। समस्त भकारान्त शब्दों के ऐसे ही रूप होते हैं। मकारान्त शब्द के रूप परिशिष्ट में देखो। रकारान्त (रफान्त) -गिर् (Speech) स्त्रीलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा गी: गिरौ गिरः द्वितीया गिरम् गिरी गिरः तृतीया गिरा गीाम् गीर्भिः चतुर्थी गिरे गीाम् गीर्यः पश्चमी गिरः गीर्ध्याम् गीर्यः पष्टी गिरः गिरोः गिराम् सप्तमी गिरि गिः गी सम्बोधन गीः गिरी गिरः सव रकारान्त (रफान्त) शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। स्रोलिङ्ग पुर और धुर् शब्दों के रूप ठीक गिर शब्द के ऐसे हैं। गिर शब्द के रूप में जहाँ इ के स्थान में ई होता है पुर् और धुर शब्दों के रूप में वहां ट के म्यान में होता.है। वकारान्त-दिव (Heaven, Sky) स्रोलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा द्योः दिवो दिवः द्वितीया दिवम्, द्याम् दिवी दिवः तृतीया दिवा घुभ्याम् धुभिः चतुर्थी दिवे शुभ्याम् शुभ्यः पुंलिङ्ग-गर्दभः ब्रीलिङ्ग-अनुष्टुभ, त्रिशुभ इत्यादि । पुंलिङ्ग भकारान्त शब्द विरले हैं। + रकारान्त (रेफान्त) शब्द बहुत कम हैं । खोलिङ्ग-गिर, पुर और धुर्, ये ही तीन शब्द साधारणतः पाये जाते हैं। पुलिङ्ग रकारान्त (रेफान्त) शन्द प्रायः नहीं मिलते। 1वकारान्त शब्द बहुत ही कम है, केवल इस शब्द का प्रयोग प्रसिद्ध रूप से देखा जाता है। तेव, देव, धीव इत्यादि धातुओं से निप्पन्न कियन्त शब्द अप्रसिद्ध है।

व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । ७३ विशाम् .. एकवचन द्विवचन बहुवचन पञ्चमी दिवः धुभ्याम् धुभ्यः पष्टी दिवः दिवो दिवाम् सप्तमी दिवि दिवो सम्बोधन द्यौः दिवौ दिवः शकारान्त-विश (People in general, Vaishya) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा विट, विड विशौ विशः द्वितीया विशम् विशौ विशः तृतीया विशा विड्भ्याम् विडभिः चतुर्थी विशे विड्भ्याम् विड्भ्यः पञ्चमी विशः विड्भ्याम विड्भ्यः पष्ठी विशः विशोः सप्तमी विशि विशो विट्स विशौ विशः दिश, दृश्, स्पृश् और नश् भिन्न समी तालव्य शकारान्त* तथा दोष । भिन्न प्रायः सब षकारान्त शब्दों के रूप विश् शब्द के तुल्य होते । दष् के दरक, दुग यह रूप होते हैं। हलादि विभक्तियों में और पिपठिष के रूप दोषवत हैं। दिश (Quarter, Space, Cardinal Point) स्त्रीलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा दिक, दिग दिशौ दिशः द्वितीया दिशम् . दिशौ दिशः तृतीया दिशा दिग्भ्याम् दिग्भिः चतुर्थी दिशे दिग्भ्याम् दिग्भ्यः * सोलिङ्ग-निश्, विपाश् इत्यादि। दोष आदि शब्दों का रूप परिशिष्ट में देखो। पुलिङ्ग-द्विष, अतिरुषु इत्यादि । जीलिङ्ग-विष (Virgin), रुष, विप्र (4 drop.of water), विष् इत्यादि । सम्बोधन विद्, विड् .. .

७४ उपक्रमणिका , एकवचन द्विवचन वहुवचन पञ्चमी दिशः दिग्भ्याम् दिग्भ्यः षष्ठी दिशः दिशोः दिशाम् सप्तमी दिशि दिशोः दिक्ष सम्बोधन दिक् , दिग दिशौ दिशः ध्य , स्पृश् , षकारान्त धृष् (Impudent, Defeating) शब्दों के रूप दिश् शब्द के समान होते हैं। सकारान्त-वेधस (Creator) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा वेधाः वेधसौ वेधसः द्वितीया वेधसम् वेधसौ वेधसः तृतीया वेधसा वेधोभ्याम् वेधोभिः चतुर्थी वेधसे वेधोभ्याम् वेधोभ्यः पञ्चमी वेधसः वेधोभ्याम् वेधोभ्यः पष्टी वेधसः वेधसः सप्तमी वेधसि वेधसोः वेधःसु सम्बोधन वेधः वेधसौ वेधसः विद्वस्, जग्मिवस्, लघीयम्, पुम्स्, आशिस आदि कईएक शब्दों के सिवाय प्रायः सभी सकारान्त शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। उथनसू शब्द का रूप वेधस शब्द के सदृश होता है, केवल प्रथमा के एकवचन में "उशना" और सम्बोधन में उशन, उशनन्, उशनः, ये पद होते हैं। अनेहस् वेधसाम् ॐ दृश् और स्पृश् दो प्रकार के हैं-स्वतन्त्र और दूसरे शब्दों के साथ मिलित । यथा, पुलिङ्ग-ईश, तादृश, कीटश, एतादृशू. भवाश, स्पृश, बहुस्पृश, मर्मस्पृश् इत्यादि । बोलिङ्ग-दृश, सुश, मृगीदृश इत्यादि । + इस शब्द का रूप परिशिष्ट में देखो | पुंलिङ्गा-चन्द्रमस्, प्रचेतस्, दिवौकस्, विमनसू, दुर्मनस्, विहायस्. इत्यादि। स्त्रीलिङ्ग-सुमनम्, अप्सरस इत्यादि । सुमनस और अशरस शब्द वाषचनान्त हैं। अप्सरस .

1 व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग शब्द । तथा पुरुदंशस् शब्दों के प्रथमा.एकवचन में अनेहा तथा पुरुर्दशा होता है और सब विभक्तियों में वेधस् के सदृश हैं । विद्वस् (Learned) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा विद्वान् विद्वांसौ विद्वांसः द्वितीया विद्वांसम् विद्वांसौ विदुषः तृतीया विदुषा. विद्याम् विद्वद्धिः चतुर्थी विदुषे विद्वद्याम् विद्वद्यः पश्चमी विदुषः विद्वद्भ्याम् विद्वद्यः पष्ठी विदुषः विदुपोः विदुषाम् सममी विदुषि विदुपोः विद्वत्सु सम्बोधन विद्वन् विद्वांसौ विद्वांसः ध्वस शब्द के रूप परिशिष्ट में देखो। जग्मिवस् ( That which is gone, Gone, Departed ) पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवंचन प्रथमा जग्मिवान् जग्मिवांसौ 'जग्मिवांसः द्वितीया जग्मिवांसम् जग्मुषः तृतीया जग्मुपा जग्मिवद्याम् जग्मिवद्भिः चतुर्थी जग्मुषे जग्मिवद्यः पश्चमी जमुषः पष्टी जग्मुषोः जग्मुषाम् सप्तमी जग्मुपि 'जग्मिवत्सु" सम्बोधन जग्मिवन् जग्मिवांसौ जग्मिवास कभी कभी एकवचन में भी प्रयुक्त होता है। यथा “मेनका नाम अप्सरा: प्रेषिता'शकुन्तला । ॐ अस्-भागान्त शब्द के.शेष भाग धातु होने से प्रथमा के एकवचन में आ नहीं होता। यथा, सुक्स सुवः पिग्रहास.. पिण्डमः। और सब विभक्तियों में वेघस् के तुल्य हैं। " भा ... .

७६ उपक्रमणिका। : लघीयसः सब वस् (अर्यात् कमु ) प्रत्ययान्त शन्दों के रूप जग्मिवसू शब्द के सदृश होते हैं। लघीयम् (Lighter ) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा लघोयान् लघीयांसो लघीयांसः द्वितीया लघीयांसम् लघीयांसो लघीयसः तृतीया लघीयसा लघीयोभ्याम् लघोयोभिः चतुर्थी लघीयसे लघीयोभ्याम् लघीयोभ्यः पञ्चमी लघीयोभ्याम् लघीयोभ्यः पष्टी लघीयसः लघीयसो लघीयसाम् सप्तमी लघीयसि लघीयसोः लघीयस्सु. सम्बोधन लंघीयन् लघीयांसो लघायांसः सब ईयस् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। पुम्स् ( Male, Man) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा पुमान् पुमांसौ पुमांसः द्वितीया पुमांसम् पुमांसी पुंसः तृतीया · पुंसा पुभ्याम्, पुम्भ्यम् पुंमिः, पुमभिः, चतुर्थी पंसे पुभ्याम्, पुम्भ्याम् पुभ्यः, पुमभ्यः पञ्चमी पुंसः भ्याम्, पुम्भ्याम् भ्यः, पुम्भ्यः * पुलिङ्ग-निदिवस, तस्यिवस, उपेयिवस् इत्यादि । वस भागान्त शब्द खोलिङ्ग में सकारान्त नहीं होते । लगन्वस् शब्द-जगन्वान्, जग- मांसौ, जगन्वांसः; जगन्वांसम, जगन्वांसी, जग्मुषः, जग्मुषा, लगन्वदः भ्याम, जगन्वद्भ्यः, जगन्वतम् इत्यादि । शुश्रवस् शब्द द्वितीया के बहुवचन . में शुन् त्रुषः । तृतीया शुश्रुषा, शुश्रुवयाम्, शुत्रुवन्द्रिः । शुश्रबुपे इत्यादि । . + पुलिङ्ग-गरीयस्, द्रढोया, क्येयस्, प्रेयम्, ज्यायस, कनीयस्, यवीयस्, श्रेयस इत्यादि । ईयस् प्रत्ययान्त शब्द बोलिङ्ग में सकारान्त नहीं होते।

व्यञ्जनान्त कोवलिङ्ग शब्द । सम्बोधन पुमन एकवचन द्विवचन बहुवचन षष्ठी. पुंसः पुंसोः पुंसाम सप्तमी पुंसि पुंसोः युंसु पुमांसौ पुमांसः अतिरिक सकारान्त शन्दों के रूप परिशिष्ट में देखो। हकारान्त-मधुलिह (Bee) पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा मधुलिट मंधुलिड मधुलिहौ मधुलिहः द्वितीया मधुलिहम् मधुलिहौ मधुलिहः तृतीया मधुलिहा मधुलिड्भ्याम् मधुलिभिः चतुर्थी मधुलिहे मधुलिड्भ्याम् मधुलिड्भ्यः पञ्चमी मधुलिहः मधुलिड्भ्याम् मधुलिड्भ्यः षष्ठी मधुलिहः मधुलिहोः मधुलिहाम् सप्तमी मधुलिहि मधुलिहोः मधुलिटसु सम्बोधन मधुलिट् मधुलिड् मधुलिहौ मधुलिहः उपानह, अनडुह् आदि * कईएक मिन्न सब पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग हकारान्त शन्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। क्लीव (नपुंसक) लिङ्ग (Neuter ) तकारान्त-श्रीमत् ( Beautiful, Rich) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा श्रीमत् श्रीमती श्रीमन्ति द्वितीया श्रीमत् श्रीमती श्रीमन्ति सम्बोधन श्रीमत् श्रीमती श्रीमन्ति . - इनके रूप परिशिष्ट में देखो। पुंलिङ्ग-तुरासाह, इत्यादि।

1 उपक्रमणिका सम्बोधन महत् और सब विभक्तियों में पुलिङ्ग के सदृश रूप होते हैं। कई एक अन्- प्रत्ययान्त क्ष शरद तथा महत् शब्द मिन्न समी तकारान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप श्रीमत् शब्द के सदृश होते हैं। महत् ( Great)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा महत् महती महान्ति द्वितीया महत् महती महान्ति महनी महान्ति और सब विक्तियों में पुलिङ्ग के तुल्य रूप होता है। नकारान्त क्लीवलिङ्ग नकारान्त शब्द दो प्रकार के होते हैं-अन- भागान्त और इन्-भागान्त । अन्-भागान्त-धामन् (House)| एकवचन द्विवचन यहुवचन प्रथमा धाम धान्नी, धामनी धामानि द्वितीया धाम धाम्नी, धामनी धामानि सम्बोधन धाम, धामन धान्नी, धामनी धामानि और सब विभक्तियों में पुलिङ्ग लघिमन् शब्द के सदृश रूप होता है। कर्मन् श्रादि कईएक और अहन् भिन्न सभी अनू-भागान्त लोवलिङ्ग शन्दों , रूप इसी प्रकार के होते हैं Forria ( Action, Work) एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा कर्म कर्मणी कम्माणि द्वितीया कर्म कर्मणी कारिण सम्बोधन कर्म, कम्मन् कर्मणी कम्मारिण * परिशिष्ट में देखो। सामन्, व्योमन्, नामन्, वेमन्, प्रेमन, दामन् इत्यादि।

व्यञ्जनान्त क्लीवलिङ्ग शब्द । .७४ और सब विभक्तियों में पुंलिङ्गमात्मन् शब्द के सदृश रूप होता है। जिन जिन शब्दों के अन्-भाग का प्रकार म् अथवा व् संयुक्तवर्ष में मिला रहता है उन सब शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। - अहः अहन (Day)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अहः अही, अनी अहानि द्वितीया अहिः अही, अहनी अहानि तृतीया अहा अहोभ्याम् अहाभिः चतुर्थी अह अहोभ्याम् अहोभ्यः पश्चमी अहः अहोभ्याम् अहोभ्यः पष्टी । अहः अहोः अह्नाम् सप्तमी अह्नि, अहनि अहोः अहःसु सम्बोधन अही, अहनी अहानि इन्-भागान्त-स्थायिन् (Existing)। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा स्थायि स्थायिनी स्थायीनि द्वितीया स्थायि स्थायिनी स्थायीनि सम्बोधन स्थायिन् स्थायिनी स्थायीनि और तृतीयादि सब वित्तियों में पुंलिङ्ग गुबिन शब्द के तुल्य है। सब इन्-भागान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। सकारान्त। लीवलिङ्ग सकारान्त शब्द तीन प्रकार के होते हैं- भागान्त, इस्-मागान्त और उस-भागान्त । . - * धर्मन्, वर्मन्, यमन, नर्मन्, जन्मन्, समन्, भस्मन्, लक्ष्मन्, परमन्, पवन इत्यादि।

उपक्रमणिका। . हविर्मिः अस-भागान्त-पयस् ( Milk, Water)1 एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पयः पयसी पांसि द्वितीया पयः पयसी पयांसि सम्बोधन पयः पयसी पयांसि और तृतीयादि सब विमक्तियों में वेधस शब्द के सदृश रूप होता है। सव असू-भागान्त क्लोबलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। इस-भागान्त-हविस ( Clarified butter ): एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा हविः हविपी हवींपि द्वितीया हविः हविपी हवींपि तृतीया हविपा हविया॑म् । चतुर्थी हविषे इविया॑म् हविर्यः पञ्चमी हविपः हविाम हविद्यः षष्ठी इविपः हविप्रोः हविषाम् सप्तमी हविपि हविषोः हविः सम्बोधन हविः हविपी हवींपि सब इस-भागान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। उस-भागान्त-वनुस (Bow)| एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा धनुः धनुपी धनुपि. द्वितीया धनुः धनुषी धनूंपि तृतीया धनुषा धनुर्ध्याम् धनुर्मिः चतुर्थी धनुपे धनुभ्याम् धनुर्यः * अम्भस, अयस्, श्रागस्, सरस्, उरस, चेतस, छन्दस, तमस्, मनम, यशस, रजस्, वक्षस्, वयस, तपस्ः इत्यादि। + ज्योतिस्, सर्पिस्, अर्चिस्, रोनिस्, शोचिस' इत्यादि . ..

अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रश्न। एकवचन द्विवचन बहुवचन पश्चमी धनुषः धनुर्ध्याम् धनुर्यः षष्ठी धनुषः धनुषोः धनुषाम् सप्तमी धनुषि धनुषोः धनुःघु सम्बोधन धनुः धनुषी धनूंषि सब उस-भागान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। Exercise IV.(अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रश्न)। 1. Translate into Sanskrit:-Kind-hearted (कृपामयी) woman (योषित् ). In the skin (त्वच्) of a lion. Bam's Younger (कनीयस्) brother. By the grace (महिना) of God. (भगवत् ). Hari is an intelligent (बुद्धिमत्) man. King (राजन् ) is the protector (वलम्) of the weak. The advice of a learned man (विपश्चितः). A friend in need. (विपदि) isa Trnend. indeed. (यथार्थः सहदेव ). By the blessing (आशिस्) of mr (मम) mother. With the help of the kind Emperor. A work conceived (चिन्तितम्) in the mind (मनसा). The blooming (विकसित) lotuses in the tant (सरसि). To the minister (मन्त्रिन ) of the great (महत) King. The bright stars in the sky (नभसि ). By the birth of a great man. In the house (वेश्मन् ) of a Ohandala. A serpent lying (शायितः) on the road. The sweet words of the child. 2. Translate into English:-पञ्चलं मनः | भास्वन्ति रक्षानि । कृपामयो भगवान् । तेजस्विना वाजिना। कमलवन्तं जनम् । दद्धिाः गृहिणः सम्पदः पदमापदाम् । रामः जन्मनाक्षत्रियः जीर्णानि वासांसि । प्रकृत्या मधुरं गर्वा पयः। श्रात्मैव बन्धुरात्मनः । अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् । बलवता सह विवादो न कर्तव्यः । विपदि धैर्य श्रेयः । मूर्खस्य जन्म निरर्थकम् । हितं मनोहारि दुर्लभं च वचः। विपत् सन्निहिता यस्य । 3. Correct:-तपस्य फलम्; निम्मले नमे; महन्तौ तरू; दिशः शून्यः; सम्पदे सुहत; महतानाम् जनानां कृपयाँ दुर्गमेव पंथेन गतः, आयुस्, चक्षुस्, वपुस, यस् इत्यादि।

उपक्रमणिका। हरेगोपस्य कुले जन्मः; जगते सन्तोषीः एव सुखी; आत्मस्य प्राकनः फलम् गुणिस्य राजस्य उपदेशः हवि विना भोजन, बुद्धिमते नरे। 4. Explain the formation of: सम्राजः, धनुषः, भूमृता, अहो, धावतोः, नामनी, सुहृदः, गुणिनी, पयांति, पथः, लघिम्नः, श्रात्मानौ, यूनः, Haifa, wa, at: and give their Hindi and English equivalents. 5. Point out the main difference between the declensions of the bases वणिज and सम्राज, भभृत् and महद, धावत् and महत् and आत्मन् and युवन् । 6. Give ths alternative forms of पुंभिः, वृत्रहनि, लधिनि, हे नामन and हे कर्मन् । 7. Classify the bases ending in and 7. सर्वनाम शब्द। (Pronoun) रूप की विलक्षणता के अनुसार सर्वनाम शब्द निम्नलिखित पाँच श्रेणियों में विभक्त हैं: (१) सर्वादि-सर्व, विश्व, उभ, उभय, एक, एकतर । (२) अन्यादि-अन्य, अन्यतर, इतर, कतर, कतम, एकतम । (३) पूर्वादि-पूर्व, पर,अपर, अवर (West, Posterior), अधर (West, Inferior), दक्षिण, उत्तर, स्व । (४) यदादि यद्, तद्, एतद्, त्यद्, किम् । (५) इदमादि-इदम्, अदस, अस्मद्, युष्मद् । सादि-सर्व। (All)। पुंलिङ्ग एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सर्वः सव्वों सर्व द्वितीया सर्वम् सव्वौ सव्वान् * सर्वादि, अन्यादि और पूर्वादि अकारान् सर्वनाम शब्दों के रूप पुंलिङ्ग तथा क्लीवलिङ्ग मै साधारण अकारान्त शब्दों के और सीलिङ्ग में साधारण आकारान्त शन्दों के तुल्य होते हैं, केवल निम्नरेख स्थलों में प्रभेद है। +द्वित्व की आवश्यकता होती है और नहीं भी होती।

सर्वनाम शब्द । ८३ एकवचन द्विवचन बहुवचन तृतीया सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः चतुर्थी सर्वस्मै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः पञ्चमी सव्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः षष्ठी सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् सप्तमी सवस्मिन् सवयोः सर्वेषु सम्बोधन सर्च सव्वौ सर्वे क्लीबलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा 'सर्वम् सर्वे सर्वाणि द्वितीया सर्वम् सधैं सर्वाणि सम्बोधन सर्व सर्वे सर्वाणि और सब विभक्तियों में पुंलिङ्ग के तुल्य है। स्त्रीलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सा सर्वे सर्वाः द्वितीया साम् सवें साः तृतीया सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः चतुर्थी सर्वस्यै सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः पञ्चमी सवस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः षष्ठी सर्वस्याः सर्वयोः सर्वासाम सप्तमी सर्वस्याम सर्वयोः सासु सम्बोधन सर्व सर्वे साः सर्व तथा विश्व शब्द "सकल" अयोधक होने परही सर्वनाम होते. हैं, नहीं तो उनके रुप पुंलिङ्ग और लीवलिङ्ग में ठीक साधारव अकारान्त' और सीलिङ्ग में साधारण आकारान्त शब्दों के सरश होते हैं।

उपक्रमारणका। FREE सर्वादि के अन्तर्गत सभी शब्दों के रूप ऐसे ही होते.है। अन्यादि के अन्तर्गत सब सर्वनाम शब्दों के भी रूप सर्व शब्द के सदृश होते हैं, केवळ क्लीवलिङ्ग की प्रथमा और द्वितीया के एकवचन में अन्यन, अन्यतरत, इठ- रत, कतरत, कतमत्, एकतमन्, ऐसे रूप होते हैं। इतना ही अन्तर है। पूर्खादि-पूर्व ( East, Prior ) | पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा पूर्वः पूवौं पूर्वे, पूर्वाः द्वितीया पृचम पूच्चों पूर्वान तृतीया पूर्वेण पूर्वाभ्याम् पूज्वः चतुर्थी पूर्वस्मै पूर्वाभ्याम् पूर्वेभ्यः पञ्चमी पूर्वमान्, पूर्वात् पूर्वाभ्याम् पूर्वेभ्यः पष्टी पूर्वस्य पूर्वयोः पूर्वेपाम सप्तमी पूर्वस्मिन् , पूर्वे पूर्वयोः पूर्वेषु सम्बोधन पूर्व पूवी पूचे, पूर्वाः क्लीवलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पूर्वम् पूर्वे पूत्राणि द्वितीया पूर्वम् पूचे पूर्वाणि सम्बोधन पूर्व पूर्वे पूवाणि और सब विभक्तियों में पुंलिङ्ग के तुल्य हैं। पूर्बादि के "पूर्व" से लेकर "उत्तर" तक के सात शब्द दिक, देश और कालवाचक होने पर अर्थात् पूर्वदिशा, पूर्वकाल, प्रदेश इत्यादि अर्थ में ही सर्वनाम होते हैं, नहीं तो पुंलिङ्ग तथा क्लोवलिङ्ग में साधारण अकारान्त और स्त्रीलिङ्ग में साधारण आकारान्त शन्द के.ममान रहते है। "स्व" शब्द कुटुम्ब (Relation) और धन (Wealth) अर्य में साधारण अकारान्त शन्द के तुल्य है और इनके सिवाय (अन्य सापया अपनाOD. - ८५ ये सर्वनाम शब्द। बोलिङ्ग में पूर्व शब्द का रूप ठोक सर्वशद के सदृश होता है। पूर्वादि के अन्तर्गत सभी शब्दों के रूप पूर्व शम के सध्य होते हैं। यदादि *-यद् (Who, Which)। पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा या यौ द्वितीया यम् यौ यान. तृतीया येन याभ्याम् चतुर्थी यस्मै याभ्याम् येभ्यः 'पञ्चमी यस्मात् याभ्याम् येभ्यः षष्ठी यस्य ययोः येषाम् सप्तमी यस्मिन् ययोः येपु क्लीवलिङ्ग । एकवचन. द्विवचन बहुवचन प्रथमा यत् ये यानि द्वितीया यत् यानि और सब विभक्तियों में पुलिस के सदृश रूप होता है। ययो ये अर्थ में सर्वनाम होता है। "आत्मा" अर्थ में. "स्व" केवल पुंलिङ्ग में म्यवहुत होता है। दिक, देश और काल अर्थ में पूर्वादि शब्दों के योग से शब्दों के उत्तर पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा,नगरात् पूर्वस्याम् दिशि (नगर की पूरव दिशा में), हिमालयान उसरे देशे (हिमालय के उत्तर देश में)। यदादि के यद्, तद्, एतद्, स्यद्, किम् , ये सब शब्द क्रम से य, त, एत, स्य, क, ऐसे अकारान्त हो जाते हैं और इनके रूप सर्वादि के तुल्य होते हैं। केवल क्लीबलिङ्ग को प्रथमा और द्वितीया विभक्तियों के एकवचन में यत्, तत, एसत्, त्यत्, किम्, ऐसे रूप होते हैं, और तद्, एतद् और स्पद् शब्दों की प्रथमा के एकवचन में यथाक्रम से पुंलिङ्ग में सः, एषः, स्या, और जीलिङ्गा में सा, एषा, स्या, ऐसे रूप होते हैं और इतनी ही विशेषता है।

10. उपक्रमणिका ये ये चतुर्थी स्त्रीलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन- प्रथमा या याः द्वितीया याम् याः तृतीया यया याभ्याम् याभिः यस्य याभ्याम् याभ्यः पश्चमी यस्याः याभ्याम् याभ्यः पष्टी यस्याः ययोः यासामः सप्तमी यत्याम ययोः यासु तद् ( He, She, It, That)| पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा सः तो द्वितीया तम् ती ता तृतीया तेन ताभ्याम् तः तस्मै ताभ्याम् तेभ्यः पश्चमी तस्मात् ताभ्याम् तभ्यः पष्टी तस्य तयोः तपाम सप्तमी तस्मिन तयोः तेपु लीवलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा तत् तानि द्वितीया तन् तानि और सब विभक्तियों में पुलिङ्ग के समान रूप होता है। स्त्रीलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा सा ते ताः द्वितीया ताम् ताः तृतीया तया ताभ्याम् ताभिः चतुर्थी तस्यै ताभ्याम् ताभ्यः चतुर्थी ते सर्वनाम शब्द । ८७ षष्ठी एकवचन द्विवचन बहुवचन पञ्चमी तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः तस्याः तयोः तासाम् सप्तमी तस्याम् तयोः एतद् शब्द भी ठीक तद् शब्द के सा है; केवल एकार मात्र अधिक है और पुंलिङ्ग तथा खोलिङ्ग में प्रथमा के एकवचन में मूर्धन्य 'प' होता है। यथा एषः, एषा । त्यद् शब्द भी तद् शन्द के सघ्श है। इसके पुंलिङ्ग और श्रीलिङ्ग में प्रथमा के एकवचन में क्रम से 'स्यः' और 'स्या' होते हैं। किम् ( Who, Which, What) पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा को के द्वितीया कम् को कान् तृतीया केन काभ्याम् कैः चतुर्थी कस्मै काभ्याम् केभ्यः पञ्चमी कस्मात् काभ्याम केभ्यः षष्ठी कस्य कयोः केपाम् सप्तमी कस्मिन् कयोः केषु कीबलिङ्गः। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा किम् कानि द्वितीया किम् कानि और सब विभक्तियों में पुलिङ्ग के तुल्य होता है। स्त्रीलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा का के द्वितीया काम् के काः तृतीया कया काभ्याम् कामिः चतुर्थी कस्यै काभ्याम् काभ्यः के काः .

पस उपक्रमणिका। काभ्यः कासाम् एकवचन द्विवचन बहुवचन पश्चमी कस्याः काभ्याम् षष्ठी कस्याः कयोः सप्तमी कस्याम् कयोः कासु इदमादि-इदम् ( This)। पुंलिङ्ग। एकवचन द्विवचन वहुवचन प्रथमा अयम् इमौ इमे द्वितीया इमम, एनम् * इमो, एनौ इमान, एनान तृतीया अनेन, एनेन आभ्याम् एभिः चतुर्थी अस्मै आभ्याम् पञ्चमी अस्मात् आभ्याम् एभ्यः षष्ठी अस्य अनयोः, एनयोः एपाम् सप्तमी अस्मिन् अनयोः, एनयोः एषु क्लीवलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा इदम् इमे इमानि द्वितीया इदम्, एनत् इमे, एने इमानि, एनानि और सब विभकियों में पुलिङ्ग के तुल्य है। * एक वाक्य में किसी एक विशेष्यपद का इदम्' 'या' 'एतद्' शब्द से निर्देश कर दूसरे वाक्य में उसी विशेष्य पद का इन शब्दों से निर्देश किया जाय तो इदम् और एतद् शब्द को द्वितीया विभक्ति के तीनों वचनों में, तृतीया के एकवचन में और षष्ठी तथा सप्तमी के द्विवचन में 'एन' आदेश होता है। यथा, अनेन स्नातम्, एनं भोजयेत् ( इसने स्नान किया है, इसी को खिलाओ), अनयोः पवित्र कुलम्, एनयोः प्रभूतं धनम् ( इन ही दोनों का पवित्र कुल है, इन ही दोनों का अधिक धन है)। - सर्वनाम शब्द। है स्त्रीलिङ्गा एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा इयम् इमाः इमे द्वितीया इमाम्, एनाम् इमे, एने इमाः,एना: वृतीया अनला, एनया प्राभ्याम् आमिः चतुर्थी अस्यै. श्राभ्याम् आभ्यः पञ्चमी अस्याः प्राभ्याम् आभ्यः षष्ठी अस्याः अनयोः, एनयोः अासाम् सप्तमी अस्याम् अनयोः, एनयोः आसु अइस ( This, That) पुंलिङ्ग । एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा असौ अमू श्रमी द्वितीया अमुम् श्रमू अमून तृतीया अमुना अमूभ्याम् अमीभिः चतुर्थी · अमुष्मै अमूभ्याम् अमीभ्यः पञ्चमी, अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः षष्ठी अमुष्य अमुयोः अमीषाम् सप्तमी अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु कीवलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा अदः 'अमू अनि द्वितीया अदः अमू अमूनि और सब विभक्तियों में पुंलिङ्ग के सदृश रूप होता है। : स्त्रीलिङ्ग। एकवचन द्विवचन बहुवचन. प्रथमा. असौ अमू अमूः अमू अमूः तृतीया अमुया अमूभ्याम् अमूभिः चतुर्थी अमुष्ये अमूभ्याम् अमृभ्यः द्वितीया अमूम् १० उपक्रमणिका। मह्यम्, मे मम, मे एकवचन द्विवचन बहुवचन पञ्चमी अमुष्याः श्रमभ्याम् अमूभ्यः पष्टी अमुष्याः अमुयोः अमूपाम् सममी अमुष्याम् अमुयोः अमृयु अस्मद् (I)1 एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा श्रहम् यावाम् वयम् द्वितीया माम्, मा श्रावाम, नौ अस्मान्, न: तृतीया मया धावाभ्याम् अस्माभिः चतुर्थी आवाभ्याम्, नौ अस्मभ्यम्, नः पञ्चमी मत श्रावाभ्याम् यस्मत पष्टी श्रावयोः, नौ यस्माकम्, ना. सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु तीनों लिङ्गों में समान है, कुछ भी भेद नहीं है। युष्मद् ( Thou, You)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा त्वम् युवाम् यूयम् द्वितीया त्वाम, त्या युवाम, वाम् युप्मान्, वः तृतीया त्वया युवाभ्याम, युप्माभिः चतुर्थी युवाभ्याम्, वाम् युष्मभ्यम्, व: पञ्चमी त्वत् युवाभ्याम् युप्मत् पष्टी युवयोः, वाम् युष्माकम्, वः सप्तमी त्वयि युवयोः युप्मासु तीनों लिङ्गों में समान है, कुछ भी भेद नहीं है। अस्मद् और युष्मद् शब्दों के रूप में मा, मे, नौ, नः तथा त्वा, ते, वाम्, धा, ये जो पाठ पद होते हैं इनका प्रयोग किसी वाक्य के अथवा लोक के चरण के प्रारम्भ में अथवा च, वा, एव, ह, अह, इन अव्यय शब्दों के पूर्व में तथा सम्बोधन पद के परे नहीं होता। तुभ्यम्, ते तव, ते संख्यावाचक शब्द। ९१ द्वे द्वे . संख्यावाचक-शब्द ( Numerals)| एक(One)-इस अर्थ में यह शब्द एकवचनान्त है; किन्तु कोई, थोड़ा, प्रधान, समान (Some, a few, chief, the same ) आदि अर्थों में द्विवचन तथा बहुवचन में भी प्रयोग होता है। इसका रूप तीनों लिङ्गों में सर्च शब्द के सदृश होता है, कुछ भी भेद नहीं है। अनेक (Many)-यह शब्द वहुवचनान्त है, तीनों लिङ्गों में सर्च शब्द के तुल्य है। द्वि (Two)-द्विवचनान्त । पुंलिङ्ग क्लीबलिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग द्विवचन द्विवचन 'प्रथमा द्वौ द्वितीया द्वौ तृतीया द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् 'चतुर्थी द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् पश्चमी द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् 'षष्ठी द्वयोः द्वयोः सप्तमी द्वयोः द्वयोः त्रि ( Three)-बहुवचनान्त । पुंलिङ्ग क्लीवलिङ्गं स्त्रीलिङ्ग बहुवचन. बहुवचन बहुवचन प्रथमा त्रयः त्रीणि तिनः 'द्वितीया त्रीन त्रीणि तिस्रः तृतीया त्रिमिः त्रिभिः तिसृभिः 'चतुर्थी त्रिभ्यः त्रिभ्यः तिसृभ्यः पञ्चमी त्रिभ्यः त्रिभ्यः तिसृभ्यः षष्ठी त्रयाणाम् त्रयाणाम् त्रिसृणाम् सप्तमी त्रिषु त्रिष तिसृष ६२ उपक्रमणिका। चतुर्यः चतु चतुर् ( Four ) बहुवचनान्त । पुंलिङ्ग कीवलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग बहुवचन बहुवचन वहुवचन प्रथमा चत्वार: चत्वारि द्वितीया चतुरः चत्वारि चतस्रः तृतीया चतुर्मिः चतुर्भिः चतसृभिः चतुर्थी चतुभ्यः चतुभ्यः चतसृभ्यः पञ्चमी चतुर्थ्यः चतसृभ्यः षष्ठी चतुर्णाम् चतुर्णाम् चतसृणाम् सप्तमी चतुप चतसृप पप (Six) बहुवचनान्त । प्रथमा द्वितीया तृतीयाँ चतुर्थी पञ्चमी पष्टी सप्तमी षट् पड् षट् पड़ पडभिः पड्भ्यः पड्भ्यः परणाम पट्ट, पटसु तीनों लिङ्गों में ऐसा ही रूप होता है। अष्टन (Eight)-बहुवचनान्त । पश्चन (Five) बहुवचनान्त। बहुवचन बहुवचन प्रथमा पञ्च द्वितीया पञ्च तृतीया अष्ट्राभिः, अष्टभिः पश्चभिः चतुर्थी श्रष्टाभ्यः, अष्टभ्य: पश्चभ्य: पञ्चमी अष्टाभ्या, अष्टभ्यः पञ्चभ्यः पष्टी श्रष्टानाम पश्चानाम् सप्तमी अष्टासु, अष्टसु पञ्चसु अष्टन् तथा पश्चन् शब्दों के रूप तीनों लिङ्गों में समान होते हैं। सप्तन् , नवन, दशन् आदि समरत नकारान्त संख्यावाचक शब्दों के रूप पश्चन् शब्द के सहश होते हैं। अष्टौ, अष्ट अष्टौ, अष्ट . अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रभ। १३ Exercise V.(अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रश्न)। 1. Translation Model:-These boys-मीवासका: To those two girls अमू पालिके; To that poor man-स्मै दरिद्धाय; By this woman-नया नाU From all quartere-सर्वस्याः दिशः By this girl-अनया बालिकया, In the east=पूर्वस्यां दिशि; Other women= अन्याः खियः; It is the order of our teacher-एष हि अस्माकं शिक्षकस्य श्रादेशः; Three youths-त्रयो युवानः; By four womens चतसृभिः रमशीभिः, Four fruits- चत्वारि फलानि; Forty hoys= चत्वारिंशत् बालका: One hundred and eight students of the school-विद्यालयस्प अष्टोत्तरशतम्बात्रा, On the twenty fifth day of Baisakh वैशाखस्य पञ्चविंशतितमे (पञ्चविंशे वा ) दिने, The tenth canto-दशमः सर्गः; The eighth chapter-अष्टमोऽध्यायः; Who is thy (or your) father-करते पिता; What is thy (or your) name-किंते नाम; I have great confidence in thee (or your): त्वयि मे महान् विश्वासः; To thy (or your) mothereतव मातरम्, You ars learned-यूयं विद्वांसः or mवं विद्वान् । N. B:आजकल अंगरेज़ो में मध्यम पुरुष का एकवचन thou,.thy, thine, thee का प्रचलन बहुत ही कम है, you, your, youms मध्यम पुरुष के एकवचन तथा बहुवचन में साधारणतः: व्यवहत होते हैं। इसलिए आशय के अनुसार you-त्वम् वा यूयम्, to rou-त्वाम् (त्वा) वा युष्मान् (क), your or yours-तव (ते) वा युष्माकम् (वः), In you-त्वयि वायुष्मासु इत्यादि । 2. Translate into Sanskrit:-He is pale (विवर्णः). They are angry (क्षुधातुरा:). He is., a tall (प्रांशु) man (पुरुष). This is her best (श्रेष्ठ) dress (परिच्छद). This man is kind (दयालु) and wise (प्राज्ञ). That is a pretty (सुन्दर) girl. She is my niens (भ्रातुष्पुत्री वा भागिनेयी). This piece of land (भूमिखण्डम् ) ismine (मम एव), That is a nice ( रमणीय) fiela (क्षेत्रम् ). Come (आगग्छ) to my house (भवन ). There. (कुत्र ) were you born (जातः)? We are helpless (निराश्रयाः). These men are intelligent. Surely it is the order ( आदेश) of air teacher. Life is dear (state) to all. Here is (a) , उपक्रमणिका। that beautiful picture (आलेख्यम् ). He who is relpful (सहायः) to s (अस्माकम् ) in danger, is our real friend. This is the best time to take a morning walk ( stosura). What is your father's name? God is the.creator of all: Four borses of Ram: One of the five students. The king gavie (अददात) me (महम्) eight of his sixty horses. The thirty first day of the present month. The sixth canto of Raghuvansh. In the forty-fifth chapter of the history. She is my tenth daughter. Who are you? What relation have you with me? 3. Translate into English: अन्यत् जन्म; सा मे प्रियसखी; वयं सदा सुखिनः, कस्मिन्नेव नगरे तेषां निवासः, अनित्योऽयं संसार एषो हि भगवान् हरिः; सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः; ईश्वरो हि सर्वेषां लोकानां पालकः ज्ञानहीनस्य यत् जीवनं तद् वृथा एव; महाजनो येन गतः स एव पन्था; एकस्मिन् मासै द्वौ पक्षौ; वत्सरस्य द्वादश मासाः सप्तविंशतिनक्षत्राणि; तव व्याकरणस्याटमोऽध्यायो द्रष्टव्यः । 4. Correctly rewrite:-सर्वाः बालकाः; अन्य फलं; एषाम् लतानाम; सः ते मे च वचनं न शृणोति; एषः जन्मः ते तनयस्य; इर्द पुस्तकानि मे एव; कस्ते नामः? त्वा सारक्षति यत्नेनं मा सःद्वष्टि निरन्तरं; पञ्चविंशतयः दिवसानि सप्तमः ब्राह्मणाः। 5. Classify the Sanskrit pronominal bases and say when the bases सर्व, विश्व, पूर्व and स्व are treated as pronouns. Point out the difference in their declensions when they are treated as pronouns and when they are not, 6. Name the Sanskrit pronominal bases that are declined alike in all the genders. 7. Mention all the pluess where ते occurs in the declension of Sanskrit pronouns. 8. Explain the icrmation of:-सर्व, वः, नौ, अम्, इमे, अमूह, के, तयोः and केपु। 9. Give the feminine forms ot:-सबस्मात्, अस्मै, अमीभ्यः, एषाम, तेष, पूर्वस्मिन्, येन, तैः, अमीपाम्, चत्वारः and sः । 10. Ascertain the genders of the Sanskrit numerals.

अव्यय शब्द, लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग-प्रत्यय । ६५ - अव्यय शब्द। (Indeclinables) जिन शब्दों के रूप में लिक, विभक्ति तथा वचन के कारण कुछ भी परिवर्तन नहीं होता, अर्थात् शब्द ज्यों के त्यों रह जाते हैं, इन्हें अव्यय कहते हैं:-(१);अव्यय शब्द के अन्त में स्थित 'र' और 'स' के स्थान में विसर्ग होता है, यथा, प्रातर्, अन्तर् , स्वर् , पुनर् , उवैस , नीचैस , शनैस् , बहिस , नमस् , पुरस, युगपत् , पृथक् , विना, ऋते, स्वयम्, सायम् , वृथा, मृषा, मिथ्या, सह, सार्द्धम्, साकम्, अलम्, अथ, एवम्, एव, नूनम्, धिक, च, वा, तु, हि, भोस, अथवा, प्र, परा, अप, सम्, नि, अव, अनु, निर्, दुर्, वि, अधि, सु, उत् (उद्), परि, प्रति, अमि, अति, अपि, उप, श्रा। क्रिया (धातु) के साथ योग होने से 'प्र' से लेकर 'श्रा' तक बीस अव्ययों को उपसर्ग कहते हैं। पाणिनि के अनुसार निस, दुस, भी और दो उपसर्ग है। लिङ्ग। (Gender) लिङ्ग तीन प्रकार के हैं-पुंलिङ्ग (Masculine); स्त्रीलिङ्ग ( Feminine ). और क्लीवलिङ्ग ( Neuter )। साधारणतः पुरुष-बोधक शब्द पुंलिङ्ग, स्त्री-बोधक शब्द स्त्रीलिङ्ग और जो शब्द पुरुष अथवा स्त्री-बोधक नहीं होते वे क्लीवलिङ्ग होते हैं; परन्तुं बहुधा इसका व्यतिक्रम देखा जाता है। स्त्रीलिङ्ग-प्रत्यय। (Feminine Suffixes) (१) "अदन्तादाप । ईप गौरादिभ्यः।" कुछ अकारान्त पुंलिङ्गशब्द स्त्रीलिङ्ग में प्राकारान्त और कुछ दीर्घ ईकारान्त होजाते हैं। · यथा, सर्व-सर्वा, स्थिर-स्थिरा, प्रबल-प्रबला, (O सशंत्रिषु लिङ्गेषु सर्वाप विमकिषु । वचनेषु सर्वेषु यन्न बेति उदव्ययम् ॥

६६ उपक्रमणिका। कृश-कृशा, वैश्य-वैश्या, शूद्र-शूद्रा, दृढ-ढा, इत्यादि; वैष्णव- वैष्णवी, नद-नदी, हंस-हंसी, मृग-मृगी, गौर-गौरी, कुमार- कुमारी, सुन्दर-सुन्दरी इत्यादि (१)। (२) स्त्रीलिङ्ग-विहित श्रा प्रत्यय परें रहने से अक-भागान्त शब्द के 'क' के पूर्ववर्ती 'अ' के स्थान में 'इ' होता है । यथा, नायक-नायिका, गायक-गायिका, पाठक-पाठिका, पालक- पालिका, वालक-बालिका इत्यादि। (३) "जातेरस्त्री विपयादयोपधात्" हय, गवय, मुकय, मनुष्य, मत्स्य, इन जातिवाचक योपधशब्दों से भी डीप होता है जिसका ई रहता है। जातिवाचक अकारान्त पुंलिङ्ग शब्द वीलिङ्ग में दीर्घ ईकारान्त हो जाते हैं । यथा, मृग-मृगी, हंस-हंसी, सिंह- सिंही, हय-हयी, वृपल-पली, तट-तटी, मत्स्य-मत्सी (२), मनुष्य-मनुपी, (२) इत्यादि । परन्तु 'अज' प्रभृति कई-एक जातिवाचक शब्द स्त्रीलिङ्ग में आकारान्त होते हैं। यथा, अज- अजा, कोकिल-कोकिला, चटकन्चटका, अश्व-अश्वा, मूषक- मूपिका इत्यादि। (४) चतुर्थ प्रभृति पूर्णवाचक शब्दों के उत्तर स्त्रीलिङ्ग में "ई" होता है। यथा, चतुर्थ-चतुर्थी, पञ्चम-पञ्चमी, षष्ठ-पष्ठी इत्यादि। (५) जिन शब्दों के अन्त में मत् अथवा वत् रहता है, स्त्रीलिङ्ग में उनके उत्तर "ई" होता है । यथा, बुद्धिमत्-थुद्धिमती, श्रीमत्-श्रीमती, भक्तिमत्-भक्तिमतो, बलवत्-बलवती, लन्नावत्- लज्जावती, विद्यावत्-विद्यावती, गुणवत्-गुणवती इत्यादि । (६) जिन शब्दों के अन्त में अत् रहता है, स्त्रीलिङ्ग में उनके उत्तर प्रायः "ई" होता है; और उनमें से कुछ शब्दों (१) (२) स्त्रीलिङ्ग प्रत्यय दो हैं-त्रा (आप) और ई (ई)।

स्त्रीलिङ्ग-प्रत्यय के 'त्' के स्थान में 'स्त्' होता है। यथा, रुदत्-रुदती, कुर्वत्- कुर्वती, गृहत्-गृहती, द्विषत्-द्विषती, गच्छत्माच्छन्ती, तिष्ठत्- तिष्ठन्ती, पश्यत्-पश्यन्ती, पवत्-पतन्ती, नृत्यत्-नृत्यन्ती, वदत्- वदन्ती, गायत्-गायन्ती, ध्यायत्-ध्यायन्ती इत्यादि। (७) जिन शब्दों के अन्त में इन् रहता है, स्त्रीलिङ्ग में उनके उत्तर 'ई' होता है। यथा, कमलिन्-कमलिनी, मालिन्- मालिनी, मानिन्-मानिनी, शुभदायिन-शुभदायिनी, मनोहारिन्- मनोहारिणी, मेधाविन्-मेधाविनी, मायाविन्-मायाविनी इत्यादि । (5) ईयस् प्रत्ययान्त शब्दों के उत्तर बीलिङ्ग में ई होता है । यथा, पापीयस-पापीयसी, गरीयस-गरीयसी, लघीयस्- लघीयसी इत्यादि। (६) जिन शब्दों के अन्त में 'मय', 'कर', 'चर', 'श' प्रभृति रहते हैं स्त्रीलिंग में उनके उत्तर प्रायः 'ई' होता है। यथा, मृन्मय-मृन्मयी, दयामय-दयामयी, अर्थकर-अर्थकरी, यश- स्कर-यशस्करी, निशाचर-निशाचरी, सहचर-सहचरी, यादृश- यादृशी, ताश-ताशी इत्यादि । (१०) जिन विशेषण शब्दों के अन्त में ह्रस्व उ रहता है, स्त्रीलिंग में उनके उकार के परे विकल्प से 'ई' होता है। यथा, मृदु-मृद्वी, मृदुः साधु-साध्वी, साधुः गुरु-गुर्वी, गुरु, लघु-लघ्वी, लघुः इत्यादि। (११) जिन पुंलिङ्ग शब्दों के अन्त में ऋकार रहता है, स्त्रीलिङ्ग में उनके कार के परे प्रायः 'ई' होता है। यथा, कर्तृ-कर्वी, धातृ-धात्री, जनयितृ-जनयित्री, प्रसवितृ-प्रसवित्री इत्यादि।

उपक्रमणिका। कारंक (Case)। क्रिया के साथ जिसका अन्वय होता है (अर्थात् सम्बन्ध रहता है। उसे 'कारक' कहते हैं (१) । कारक छः प्रकार के हैं; यथा-कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण । १। कर्ता ( Nominative) | जो काम करे वह कर्चा है (२) । कत्र्तवाच्य के कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है। यथा, वालको रोदिति (बालक रोता ), मृगो धावति (मृग दौड़ता है), मृगौ धावतः (दो मृग दौड़ते है), मृगाः धावन्ति (बहुतसे मृग दौड़ते हैं)। २ । कर्म ( Accusative or Objective Case)| जो किया जावे, तो देखा जावे, जो खाया जावे, जो पिया नावे, जो दान दिया जावे, जो स्पर्श किया जावे उन सबों को 'कर्मकारक' कहते हैं (३)। कर्मकारक में द्वितीया विमक्ति होती है। यथा, घटं करोति (घट बनाता है), चन्द्र पश्यति (चन्द्रमा को देखता है ), अन्नं भुक्ते (अन्न खाता है), दुग्धम् पिबति (दूध पीता है), धनं ददाति (धन देता है), गात्रं स्पृशति (शरीर स्पर्श करता है ), शत्रु जयति (शत्रु को जीतता है), शास्त्रम् अधीते (शास्त्र पढ़ता है), पुष्पं चिनौति (फूल तोड़ता है), गुरं पृच्छति (गुरु पूछता है), ग्रामं गच्छति (गाँव को जाता है ) इत्यादि। ३। करण (Instrumental Case)| जिससे क्रिया निष्पन्न होती है उसे 'करणकारक' कहते हैं (४)। करणकारक में तृतीया विभक्ति होती है। यथा, हस्तेन गृह्णाति (हाथ से ग्रहण करता है), चक्षुपा पश्यति (नेत्र से देखता है), दन्तेन चर्वयति (दाँत से चबाता है), दण्डेन (१) क्रियान्वयि कारकम् । (२) क्रियासम्पादकः कर्ता। (३) क्रिपयाक्रान्तं कर्म। (४)साथकतमं करणम् । से । कारक। १९: ताडयति (दण्ड से 'ताड़ना करता है); जलेन अनि निर्वापयति (जल से आग बुझाता है)। ४। सम्प्रदान (Dative Case)। जिसको कोई वस्तु दी जाय उसको 'सम्प्रदानकारक' कहते हैं (१) । सम्प्रदानकारक में चतुर्थी विभक्ति होती है । यथा, दरिद्राय धनं दीयताम् (दरिद्र को धन दो), दीनेभ्यः अन्नं देहि, (दुखियों 'को अन्न दो), मह्यं पुस्तकं देहि (मुझे पुस्तक दो)। 13141GTA ( Ablative Case ) 1 जिससे कोई वस्तु अथवा जीव चले, डरे, ग्रहण करे अथवा. उत्पन्न हो उसे 'अपादानकारक' कहते हैं (२) । अपादान कारक में पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा, वृक्षात् पत्रम्पतति (वृक्ष से पत्र गिरता है ), व्यावाद विभेति (व्याघ्र से डरता है ), सरोवराद् जलं गृह्णाति ( तालाब से जल लेता है), दुग्धाद् घृतमुत्पद्यते (दूध से घी उत्पन्न होता है)। ६। अधिकरण.( Locative Case )। क्रिया का जो आधार (३) है उसको 'अधिकरणकारक' (४) कहते हैं। अधिकरणकारक में सप्तमी विभक्ति होती है। यथा, शय्यायां शेते (विछोने पर सोता है), आसने उपविशति (आसन पर वैठता है), गृहे तिष्ठति (घर में रहता है ), दुग्धे माधुर्य्यमस्ति (दूध में मधुरता है ), कलशे जलमस्ति (कलसे में अल है), तिलेषु तैलमस्ति (तिलों में तेल. है ), पात्रे दुग्धं स्थापयति (बरतन में दूध रखता है), वासु वृष्टिर्भवति (वर्षाकाल में वृष्टि । (१) यस्मै दानं सम्प्रदानम् । (२) यतो विश्लेषोऽपादानम् (जिससे अलग होता है उसे 'अपादान' कहते हैं)। (३) आधार तीन प्रकार के होते हैं। यया, ऐकदेशिक-वने वसति (धन के एक देश में बसता है), वैषयिक- विद्यायामनुरागः (विद्या के विषय में अनुराग), अभिव्यापा-तिले तैलमस्ति (तिलों के सभी स्थान में तेन है)। (७) आधारोधिकरणम् ।

१००
उपक्रमणिका।
होती है), रात्री चन्द्र उदेति (रात्रि में चन्द्रमा का उदय
होता है)।
विभक्तिनिर्णय।
(Case-endings.)
प्रथमा विभक्ति ( The First Case-ending)।
१। “कर्तरि प्रथमा।" कर्तृवाच्य के कर्ता में प्रथमा विभक्ति
होती है । यथा, बालकः क्रीडति (बालक खेलता है, The
boy plays or is playing ) । रामो गच्छति (राम जाता है,
Ram goes or is going)।
२। "उक्त कमरिण प्रथमा ।' कर्मवाच्य के कर्म में
प्रथमा विभक्ति होती है। यथा, मया चन्द्रोदृश्यते (मुझसे
चन्द्रमा देखा जाता है, The moon is seen or is being
seen by me) i
३। "सम्बोधने प्रथमा।" सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति
होती है । यथा, हे पितः, हे भ्रातरी, हे पुत्राः ।
४। लिङ्गार्थे अभिधेयमात्रे वा प्रथमा।" जहाँ कर्मपद
क्रियापद् प्रभृति नहीं रहते, केवल किसी वस्तु अथवा व्यक्ति
का बोध कराने के लिए शब्द का प्रयोग किया जाता है वहाँ
उस शब्द के उत्तर प्रथमा विभक्ति होती है। यथा, वृक्षः, लता,
पुष्पम, गिरिः, नदी, जलम, रामः, सीता, नरः, राजा, गृहम्,
पुस्तकम, अन्न, वस्त्रम् इत्यादि।
५। "अव्यय योगे च प्रथमा।" इति प्रभृति कईएक
अव्यय शब्दों के योग में भी प्रथमा विभक्ति होती है। यथा,
पुरा दशरथ इति ख्यातो राजा आसीत् (प्राचीन समय में दशरथ
नाम के राजा थे), कस्मिंश्चिद्वने भासुरको नाम सिंहः प्रति-
वसति स्म (किसी वन में भासुरक नाम का सिंह रहता था)।

विभक्तिनिर्णय । १०१ द्वितीया विभक्ति (The Second Case-ending)। १। “कर्मणि द्वितीया।" कर्तृवाच्य के कम्मे में द्वितीया विभक्ति होती है । यथा, स पुष्पं चिनोति (वह फूल तोड़ता है, He plucks the fiower), अहं जलं पिवामि (मैं जल पीता हूँ, I drink water)! २। "कालाध्वनोरत्यन्त संयोगे।" व्याप्ति अर्थ में कालवाचक और मार्गवाचक शब्दों के उत्तर द्वितीया विभक्ति होती है क्रिया का अत्यन्त संयोग होने पर । यथा, कालवाचक-दिवसमुपवसति (दिन भर उपवास करता है), क्षणम् अपेक्षते (क्षणभर ठहरता है); मार्गवाचक-क्रोशं गिरिः स्थितः (पहाड़ एक कोश तक अवस्थित है ), स योजनं भृत्येनानुगतः (एक योजन तक नौकर उसके साथ गया)। ३ । धिक् , प्रति प्रभृति * कईएक शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति होती है । यथा, पापिनं धिक् (पापी को धिक्कार है, Fie upon the sinner), कृपणं धिक् (कृपण को धिक्कार है), गुरो! मां प्रति सदयो भव (हे गुरु, मुझपर कृपा कीजिये), दीनं प्रति दया उचिता (गरीब पर दया करनी उचित है)। ४। "क्रियाविशेपणे च ।" क्रिया के विशेषण में द्वितीया विभक्ति का एकवचन होता है और क्लोबलिङ्ग के सदृश रूप होता । यथा, शीघ्रं गच्छति (शीघ्र जाता है), सत्वरं धावति (तेज दौड़ता है), मधुरं हसति (मधुरता से हँसता है)। catat features (The Third Case-ending ) १। "तृतीया करणे ।" करणकारक में तृतीया विभक्ति होती * प्रति, अनु, धिक्, निकषा (Near), समया (Near), अन्तरा (Between ), अन्तरेण (Without ), इन शब्दों के (प्रत्यनुधिक्निकषा- समयान्तरान्तरेय) और अभितः (Around or towards), परिठ: (Around), सर्वतः (Bvorywhere), उभयतः (On both the sides), इन शब्दों के योग में (अभिपरिसन्वर्वोभयस्तसन्तैः) द्वितीया विभक्ति होती है।

:१०२ उपक्रमणिका। है । यथा, हस्तेन गृहाति (हाथ से ग्रहण करता है), कर्णेन शृणोति (कान से सुनता है)। २। "अनुक्ते कर्तरि तृतीया।" कर्मवाच्य और भाववाच्य के कर्ता में तृतीया विभक्ति होती है। यथा, कर्मवाच्य-मया चन्द्रो दृश्यते (मुझसे चन्द्रमा देखा जाता है), राज्ञा धनं दीयते (राजा से धन दिया जाता है)। भाववाच्य-तेन गम्यते (वह जाता है), तैः स्थीयते (उनसे रहा जाता है अर्थात् वे रहते हैं)। ३। सह, साकम्, सार्द्धम्, अलम् (निषेधार्थबोधक ), किम् इत्यादि कईएक शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यथा, रामो लक्ष्मणेन सह वनं जगाम (राम लक्ष्मण के साथ वन गये थे), केनापि सार्द्ध विरोधो न कर्त्तव्यः (किसी के भी साथ विरोध करना उचित नहीं है), विवादेन अलम् (विवाद से प्रयोजन नहीं है ), कलहेन किम् (कलह से क्या प्रयोजन है ?), कोऽर्थः कलहेन ( कलह से प्रयोजन क्या है ?)। ४। ऊनार्थक शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यथा, एकेन ऊनः (एक कम), विद्यया हीनः (विद्या से हीन), अहंकारेण शून्यः (अहंकार से रहित ), पापेन रहितः (पाप से रहित)। ५। "प्रकृत्यादिभ्यस्तृतीया।" स्थलविशेष में प्रकृति प्रभृति कईएक शब्दों के उत्तर और जो शब्द क्रियाविशेषण का अर्थ प्रकाश करते हैं उनके उत्तर तृतीया विभक्ति होती है। यथा, प्रकृत्या चारुः (प्रकृति से सुन्दर ), स्वभावेन सरलः ( स्वभाव से सरल), जात्या ब्राह्मणः (जाति से ब्राह्मण)। सहाथैः ऊनवारणप्रयोजनार्य (सहायक तथा ऊनार्थक, धारणार्थक और प्रयोजनार्थक शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है)।

विभक्तिनिर्णय। १०३ चतुर्थी विभक्ति ( The Fourth Case-ending )। १। "चतुर्थी सम्प्रदाने।" सम्प्रदानकारक में चतुर्थी विभक्ति होती है। यथा, दरिद्राय धनं ददाति (दरिद्र को धन देता है, Gives money to the poor man)। २। निमित्त अर्थ में (तादर्थे ) और नमस् शब्द के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है । यथा, दानाय धनोपार्जनम् (दान के निमित्त धन का उपार्जन है ), परोपकाराय सतां जीवनम् (परोपकार के लिए साधुओं के जीवन हैं ), गुरवे नमः (गुरु को प्रणाम), पित्रे नमः (पिता को प्रणाम )। पञ्चमी विभक्ति (The Fifth Case-ending)। १। “अपादाने पञ्चमी।" अपादानकारक में पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा, अश्वातु पतति (घोड़े से गिरता है, गृहात् गच्छामि (घर से जाता हूँ), जलात् उत्तिष्ठति (जल से उठता है, Rises from water ) | २।"ल्यब्लोपे पञ्चमी।" यप (ल्यप् प्रत्ययान्त पद के अप्रयोग में गम्यमान ल्यप् प्रत्ययान्त के कर्म और अधिकरण वाचक से पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा, वृक्षात् चन्द्र पश्यति "वृक्षमारुह्य पश्यति" (वृक्ष पर चढ़ कर चन्द्रमा को देखता है), आसनात् पश्यामि "आसन उपविश्य पश्यामि (आसन पर चैठकर देखता हूँ)। ३। “पञ्चमी, विभक्ति" दो अथवा अनेकों में से एक का उत्कर्ष वोध होने से निकृष्ट के उत्तर पञ्चमी विभक्ति होती है। न्यथा, धनात् विद्या गरीयसी (धन से विद्या अच्छी है), माथुरा: पाटलिपुत्रकेभ्यः श्राव्यतराः (मथुरा के रहनेवाले पाटलिपुत्र के रहनेवालों से धनशाली हैं)।. ४। “अन्यारादितरतेदिक्छदाश्त्तर पदा जाहियुक्त अन्याथैः ।” अन्यायक (अन्य, इतर, भिन्न इत्यादि) शब्दों के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा, मित्रादन्यः कः परित्रातुं समर्थः ( मित्र को छोड़ कर और कौन बचा सकता है); घटः १०४ उपक्रमणिका। पटात् इतरः ( घट पट से अलग है), इदमस्मात् भिन्नम् ( यह इससे भिन्न है)। ५ । “वहिरारात्प्रमृतिभिः ।" वहिस्, बारात, प्रभृति, इन शब्दों के योग में पञ्चमी विभक्ति होती है। यथा, गृहान बहिः ( घर से बाहर ), बारा वनात् (वन के समीप), जन्मनः प्रभृति (जन्म से लेकर)। ६। "हेतौ तृतीया च ।" हेतु (कारण) अर्थ में पञ्चमी और तृतीया विभक्तियाँ होती हैं। यथा, हात् हर्षेण वा नृत्यति (हर्प के हेतु नाचता है ), भयात् भयेन वा कम्पते (डर से काँपता है), क्रोधात् क्रोधेन वा ताडयति (क्रोध से पीडित करता है), दुःखाद् दुःखेन वा रोदिति (दुःख के कारण रोता है)। ७ | "ऋतेयोगे द्वितीया च ।" ऋते शब्द के योग में पञ्चमी और द्वितीया विभक्तियाँ होती हैं। पाणिनि के मत में केवल पञ्चमी ही होती है । यथा, अमात् श्रमं वा अते विद्या न भवति (श्रम न करने से विद्या नहीं होती), धर्मात् धर्म वा ऋते सुखं न भवति (धर्म न करने से सुख नहीं होता)। "पृथग्विनाभ्यां द्वितीयातृतीये च ।" पृथक और विना शब्दों के योग में पञ्चमी तथा द्वितीया और तृतीया विभक्तियाँ होती हैं । यथा, चैत्रात् चैत्रं चैत्रेण वा पृथक् (चैत्र से पृथक् ), श्रमात् श्रमं श्रमेण वा विना किमपि न सिध्यति (विना श्रम के कुछ भी सिद्ध नहीं होता), विद्यायाः विद्यां विद्यया वा विना वृथा जीवनम् (विद्या के विना जीवन वृथा है), पापात् पापं पापेन वा विना दुःखं न भवति (पाप के विना दुःख नहीं होता)। get farfeto (The Sixth Case-ending) i १ । “षष्ठी सम्बन्धे ।" सम्बन्ध में पष्ठी विभक्ति होती है। यथा, मम हस्तः (मेरा हाथ), तव पुत्तः (तेरा पुत्त), नद्याः जलम् नदी का जल ), वृक्षस्यशाखा (वृक्ष की शाखा ), प्रभोरादेशः प्रभु की आज्ञा)।

विभक्तिनिर्माय । १०५ २। "क कर्मणोः कृति ।" कईएक कृत-प्रत्ययों के योग | में कर्ता और कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है। यथा, शिशोः । शयनम् (शिशु का शयन), अश्वस्य गतिः (अश्व का गमन), सुखस्य भोगः (सुख का भोग), धनस्य दाता (धन का देनेवाला).। ३ । "तुल्याथै स्तृतीया च !" तुल्यार्थक (सम, तुल्य, समान, सदृश इत्यादि) शब्दों के योग में षष्ठी और तृतीया विभक्तियाँ होती हैं । यथा, विद्यायाः विद्यया वा समं धनं नास्ति ( विद्या के समान धन नहीं है), विनयस्य विनयेन तुल्यो वा गुणो नास्ति. (विनय के तुल्य गुण नहीं है)। ४ । “दूरान्तिकार्थः पञ्चमी च !" दूरार्थ और अन्तिकार्थ शब्दों के योग में षष्ठी और पञ्चमी विमक्तियाँ होती हैं । यथा, दूरं ग्रामस्य ग्रामात् वा (ग्राम से दूर); अन्तिर्क नगरस्य नगराद् वा (नगर के समीप)। :: सप्तमी विभक्ति ( The Seventh Case-ending)। १। “सप्तम्यधिकरणे ।" अधिकरणकारक में सप्तमी विभक्ति होती है। यथा, गृहे तिष्ठति (घर में रहता है ), नद्यां स्नाति (नदी में स्नान करता है)। २। भावे सप्तमी (१)।" जिसकी क्रिया के काल से अन्य क्रिया का काल (समय) निरूपित होता है उसके उत्तर सप्तमी. विभक्ति होती है (२) । यथा, सूर्ये उदिते स गतः ( सूर्य के उदय होने पर वह गया), रजन्यां प्रभातायां ते प्रस्थिताः (रात्रि के प्रभात होने पर वे गये)। ३ । एक प्रकार की अनेक वस्तु अंथवा व्यक्तियों में से एक को निर्धारित (निश्चय ) करने को निर्धारण' कहते हैं। (१) यस्य च भावेन भावलक्षयम् । (२) अंगरेज़ी में जहां Nominative Absolute होता है संस्कृत में वहाँ "भावे सप्तमी" (Locative Absolute) होता है; जैसे, Phe sun haring set, they went home--रखावरतं गते ते गृह जग्मुः।

९०६ उपक्रमणिका। "यतश्च निर्धारणम् (१)।" जिनमें से निर्धारण किया जाता है, उनके उत्तर सप्तमी और पष्ठी विभक्तियाँ होती हैं। यथा, पर्वतेपु पर्वतानां वा हिमालयः श्रेष्ठः (पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है ), कविपु कवीनां वा कालिदासः श्रेष्ठः (कवियों में कालिदास श्रेष्ट है)। ४ । “पष्टी चानादरे । अनादर का बोध होने से जिसका अनादर होता है उसके उत्तर सप्तमी वा पष्ठी विभक्ति होती है (२)। यथा, रुदति शिशौ (रुदतः शिशोः) माता जगाम (शिशु रो हो रहा था, माता चली गयो)। Exercise VI. (अनुशीलनी, अभ्यासार्थ प्रश्न)। 1. What is called लिङ्गार्थ प्रथमा ? Whut other name has it ? Give throe examples of it. 2. Make sentences to illustrate (a) उक्त कर्मणि प्रथमा, (b) अनुक्ते कर्तरि तृतीया, (c) तादय चतुर्थी, and (a) ल्यग्लोपे पञ्चमी । 3. Namo all the words through the ipfluence of which द्वितीया विभक्ति is used. 4. What do you understand by (a) प्रकृत्यादिभ्यस्तृतीया, (b) अपेक्षाथै पञ्चमी, ()भावे सप्तमी, (a) यतश्च निर्धारणम्, and (e) पठी चानादरे ? Give examples of each. 5. What aase-endings (विभक्तियों) are used through the influence of the words हेतु, ते, पृथक्, विना, सम, तुल्य, समान and सरा? 6. Account for the case-endings in the underlined words: कुम्भकारेण घटः क्रियते, स'मासं व्याकरणमधीते, सासकोपम् आह, कोऽर्थः कलहेन, सगेन गच्छति, परोपकाराय साधूनां जीवनम्, स प्रासादात् चन्द्र पश्यति । (१) इस नियम को निर्धारणे पठी सप्तमी च' भी कहते हैं। (२) इसे Locativo or Genitive Absolute कहते हैं।

विशेष्य और विशेषण। १०७. 7. Correct प्रभो मम प्रति सदयो भव । स वेगाद् धावति । सस्वरो गन्छ। पिता पुत्रस्य सह नगरं गच्छति । पितरं नमः । पापस्य ऋते दुःखं नभवति यत्नस्य विना विद्या नमवति। विशेष्य और विशेषण । (Noun and Adjective)। १। जिसके द्वारा केवल किसी वस्तु वा जीव का वोध होता है इसको विशेष्य पद कहते हैं । यथा, गृहम्, जलम्, वृतः, लता, नौका, वस्त्रम्, पुस्तकम्, पृथ्वी, चन्द्रा, सूर्यः, 'नक्षत्रम्, शिशुः इत्यादि। २। जिसके द्वारा विशेष्य का गुण या अवस्था प्रकाशित होती है उसको विशेपण पद कहते हैं। विशेषण प्रायः विशेष्य के पहले रहता है। यथा, नूतनं गृहम्, निर्मल जलम्, फलवान् वृक्षः, धार्मिकः पुरुपः, पुष्पिता लता, भग्ना नौका । ३ । कुछ विशेष्य शब्द पुंलिङ्ग ( Masculine ), कुछ स्त्रीलिङ्ग ( Feminine) और कुछ क्लीवलिङ्ग (नपुंसकलिङ्ग) ( Neuter ) होते हैं। विशेष्य शब्द का जो लिङ्ग हो प्रायः वही लिङ्ग विशेपण शब्द का भी होता है। यथा, सुन्दरः शिशुः, सुन्दरी कन्या, सुन्दरं गृहम्; उज्ज्वलः शशी, उज्ज्वला दीपशिखा, उज्ज्वलं नक्षत्रम् बुद्धिमान् पुरुषः, बुद्धिमती स्त्री; निर्मला बुद्धिः निर्मलं जलम् । ४। विशेष्य पद जिस वचन का रहता है विशेषण पद भी प्रायः उसी वचन का होता है, अर्थात् विशेष्य.पद एकवचनान्त होने से विशेपण पद भी एकवचनान्त होता है; विशेष्य पद द्विवचनान्त होने से विशेषण पद भी द्विवचनान्त होता है, और विशेष्य पद बहुवचनान्त होने से विशेषण पद भी बहुवचनान्त होता है। यथा, बलवान सिंहः, वलवन्तौ सिंहौ, बलवन्तः ,

उपक्रमणिका।
-
सिंहाः, वेगवती नदी, वेगवत्यो नद्यौ, वेगवत्यः नद्या, निविदम
वनम्, निविडे बने, निविडानि वनानि ।
५। विशेष्य पद की जो विभक्ति होती है प्रायः वही विभक्ति
विशेपण पद को होती है। यथा, सुन्दरः शिशुः, सुन्दरं शिशुम,
सुन्दरेण शिशुना, सुन्दराय शिशवे, सुन्दरात् शिशोः, सुन्दरस्य
शिशोः, सुन्दरे शिशो, निर्मल जलम्, निर्मलेन जलेन,
निर्मलाय जलाय, निर्मलात् जलाद्, निर्मलस्य जलस्य,
निर्मले जले।
६। एकोनविंशति से लेकर नवनवति तक सब संख्यावाचक
विशेषण शब्द एकवचन में व्यवहृत होते हैं, विशेष्य के लिङ्ग और
वचन के अनुसार इनका कुछ भी परिवर्तन नहीं होता। यथा,
एकोनविंशति गजाः, विंशति नद्यः, एकविंशति फलानि,
चत्वारिंशत् नराः, चत्वारिंशत् खियः, चत्वारिंशन गृहाणि ।
७ । शत, सहस्र संख्यावाचक विशेषण शब्द सदा क्लोवलिङ्ग
के एकवचन में व्यवहत होते हैं, इसलिए विशेष्य के लिङ्ग और
वचन के कारण इनका कुछ भी परिवर्तन नहीं होता । यथा,
शतं नराः, शतं नार्यः, शतं मित्राणि, सहस्रेण पुरुपैः, सहस्रण
स्त्रीभिः, सहस्रेण नेत्रैः।
तिङन्त प्रकरण।
१ । भू, स्था, गम्, दृश प्रभृति को 'धातु' कहते हैं। एक--
एक धातु से एक-एक क्रिया समझी जाती है। धातु के उत्तर
जो विभक्तियाँ होती हैं उनको 'तिङ' कहते हैं। इसलिए
क्रियावाचक पद को तिङन्त पद कहते हैं।
काल ( Tense)।
२। जिस समय में क्रिया निष्पन्न होती है उसे 'काल (Tense)
कहते हैं । काल तीन हैं-वर्तमान, अतीत (भूत), और भविष्यत् ।

है, युष्मद् शन्द से मध्यमपुरुप समझा जाता है अकर्मक क्रिया। १०९ जो उपस्थित है, वह वर्तमानकाल ( Present Tense) है। यथा, पश्यति (वह देखता है), पश्यामि (मैं देखता हूँ)। जो गत होगया वह अतीतकाल (Past Tense) है। यथा, ददर्श (देखा, देखा था), चकार (किया, किया था)। जो होने वाला है उसे भविष्यत्काल ( Future Tense ) कहते हैं। यथा, गमिष्यामि (मैं जाऊँगा), करिष्यामि (मैं करूँगा)। वचन (.Number )। ३। क्रिया के तीन वचन होते हैं-एकवचन, द्विवचन; वहुवचन । एकवचन से एक की, द्विवचन से दो की, और वहुवचन से दो से अधिक की क्रिया समझी जाती है। यथा, गच्छामि (मैं जाता हूँ); गच्छावः (हम दोनों जाते हैं), गच्छामः ( हम जाते हैं ); गमिष्यसि (तुम जाओगे), गमिष्यति (वह जायेगा), गमिष्यतः (वे दोनों जायेंगे); गमिष्यन्ति (वे जायेंगे)। पुरुप ( Person)। ४। प्रथमपुरुष (Third Person), मध्यमपुरुष (Second Person ), और उत्तमपुरुप (First Person') में धातु के उत्तर भिन्न भिन्न विभक्तियाँ होती हैं। इसलिए क्रियावाचक पद भिन्न भिन्न होते हैं। अस्मद् शब्द से उत्तम पुरुष समझा जाता इनके सिवाय और सव शब्दों से प्रथमपुरुष समझा जाता है। यथा अहं गच्छामि (मैं जाता हूँ), त्वं गच्छसि (तू जाता है), राजा गच्छति (राजा जाता है ) । युष्मद् शब्द के सदृश अर्थ होने पर भी भवत् शब्द से प्रथमपुरुष समझा जाता है। यथा, भवान् गच्छति (आप जाते हैं)। अकर्मक क्रिया। (Intransitive Verb). ५। जिन क्रियाओं में कर्मपद की आवश्यकता नहीं है उनको अकर्मक अर्थात् कर्म शून्य क्रिया कहते हैं। यथा, अहं उपक्रमणिका। तिष्ठामि (में रहता हूँ), शिशुः शेते (बच्चा सोता है ), अयो धावति (घोड़ा दौड़ता है ), नदी वद्धते (नदी बढ़ती है)। सकर्मक क्रिया। Transitive Verb.) ६। जिस क्रिया के साथ कर्मपद हो उसको सकर्मक अर्थात् कर्मयुक्त क्रिया कहते हैं । यथा, गुरुः शिप्यमुपदिशति (गुरु शिष्य को उपदेश देता है), रामः रावणं जवान (राम ने रावण को मारा) कालवोधक दश लकार (१)। (Inflectional or Conjugational Terminations.) वर्तमानकाल में धातु के उत्तर लट् लकार होता है। अतीत. भूत ) काल में धातु के उत्तर लङ और लिट (२) लकार होते हैं। भविष्यत्काल में धातु के उत्तरे लुट (१) लकार होता है। अनुज्ञा, नियोग, निमन्त्रण, अनुरोध, प्रार्थना जिज्ञासा प्रभृति अर्थों में लोट् लकार होता है। विधि अर्थ में और लोट के सभी अर्थों में विधिलिङ् होता है। अतीतकाल में लङ और लिट् दोनों लकार होते हैं, परन्तु उत्तमपुरुष के साथ प्रायः लिट का प्रयोग नहीं होता (1) 1 केवल चित्तविक्षेपादि अर्थ में ही होता है। (१) संस्कृत में धातु के उत्तर दश लकार होते हैं और इनके स्थान में होनेवाली तिक विभक्तियाँ दो संज्ञाओं में और दो भागों में विभक्त हैं। प्रथम भाग को परस्मैपद और द्वितीय भाग को प्रात्मनेपद कहते हैं। कुछ धातु परस्मैपदी, कुछ आत्मनेपदी और कुछ उभयपदो, अर्थात् परस्मैदी और आत्मनेपदी दोनों ही होते हैं। इस व्याकरण में केवल लट्, लोट, लङ्, विधिलिङ्, लूट और लिट्, इन छ: लकारों के रूप दिये गये हैं। लुङ, लुट आशीलिङ और लङ् इन चार लकारों के लिए तथा धातुरूप के विशेष ज्ञान के लिए मन-सम्पादित व्याकरण-कौमुदी द्वितीय और तृतीय भाग देखी। (२) लुइ भी। (३) जुद मी। (१) लिट्परोक्ष अतीत में व्यवहत होती है ।

१११ विभक्तियों की आकृति । तिङ्-विभक्तियों की आकृति । लट्-वर्तमानकाल (Present Tense)। परस्मैपद। सि थस् (थः) वस् (वः) बहुवचन अन्ति प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचन ति मि द्विवचन 'तस (त:) थ मस् (म.) आत्मनेपद। एकवचन ते से द्विवचन आते प्राथे वह बहुवचन अन्ते ध्ये महे -अनुज्ञा (Imperative food ) | परस्मैपद। एकवचन तु-तात् हि-तात् आनि द्विवचन ताम तम् पाव बहुवचन अन्तु त आम अर्थात् बका ने जिस क्रिया को सम्पन्न होते नहीं देखा हो उसी भूतकालि क्रिया में लिट् विभक्ति होती है। उत्तमपुरुष में कर्ता श्राप ही वक्ता है, इसलिए उत्तमपुरुष में लिट् का प्रयोग नहीं हो सकता। अतएव "अह जगाम," "आवां जग्मिय," "वयं जग्मिम," इत्यादि लिखना भूल है। इनको जगहों में "अहमगच्छम," "श्रावामगच्छाव, “वयमगच्छाम," इत्यादि लिखना ही उचित है। परन्तु जो भूतकालिक क्रिया कर्चा के अज्ञान की अवस्था में सम्पन्न हुई हो या जिसके कार्य को कर्ता बिलकुल अस्वीकार करता हो उस क्रिया का कर्ता उत्तमपुरुप होने पर भी उसमें लिट् लकार का प्रयोग हो सकता है। पया, सुप्तोऽहं किल रुरोद (सम्भवतः में मोते समय रो उठा था), न खल्वहं मुरां पपौ (मैंने निश्य ही मुरापान नहीं किया), नादमयोध्या जगाम (मैं निश्रय ही अयोध्या नहीं गया)। "तुह्मोस्तातरूवाशिष्यन्यतरस्याम्" केवल प्रथम और मध्यमपुरुष के एकचन में तान भी होता है बागीर्वाद अर्थ में। .

उपक्रमणिका। 'एकवचन द्विवचन 'बहुवचन आत्मनेपद प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष ताम् याताम् श्राथाम् श्रावह अन्ताम् ध्वम् आमहे लङ्-अतीतकाल ( Past Tense) | परस्मैपद। स:) एकवचन द्विवचन बहुवचन द् (त्) अम् ताम् तम् व अन् त म आत्मनेपद। थास (था) इ श्राताम् ग्राथाम् वहि अन्त ध्वम् महि विधिलिङ्-(Potential food) त एकवचन द्विवचन बहुवचन परस्मैपद। यास् (याः) एकवचन यात् याम् द्विवचन याताम् यातम् ग्राव बहुवचन युस् (युः) यात ग्राम आत्मनेपद। एकवचन ईत ईयास (ईया.) ईय द्विवचन ईयाताम् ईयाथाम् ईवहि बहुवचन ईरन् ईध्वम् ईमहि लट्-भविष्यत्काल (Future Tense) | परस्मैपद। एकवचन स्थति स्यसि स्यामि द्विवचन स्थतम् (स्यतः) स्यथस् (स्यथः) स्यावत (स्थावः) •बहुवचन स्यन्ति स्यथ स्यामस (त्याम:)

धातुरूप। ११३ आत्मनेपद। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष स्यते स्यसे स्ये स्येते स्येथे स्यावहे स्यन्ते स्यध्वे स्यामहे लिट-अतीतकाल ( Past Tense)| एकवचन द्विवचन बहुवचन परस्मैपद। थ एकवचन अ द्विवचन अतुस (अतुः) बहुवचन उस् (उ:) अथुस् (अथः) व म. p एकवचन ए द्विवचन आते बहुवचन इरे आत्मनेपद । से आथे वहे महे धातुरूप। परस्मैपद अकर्मक। भूधातु-होना ( To be; to exist लट्-वर्तमानकाल (Present Tense प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप एकवचन भवति भवसि भवामि द्विवचन भवतः भवथः भवावः भवथ भवामः लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। एकवचन भवतु, भवतात् भव, भवतात् भवानि भवतम् भवाव बहुवचन भवन्तु भवत भवाम बहुवचन भवन्ति द्विवचन भवताम् ११४ उपक्रमणिका। लङ्-अतीतकाल ( Past Tense)| अभवम् भवेम.. प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचन अभवत् अभवः द्विवचन अभवताम अभवतम् अमवाब बहुवचन अभवन् अभवत श्रसवाम farüfers-( Potential Mood ) | एकवचन भवेत् भवः भवेयम् द्विवचन भवेताम् भवेतम् . भवेव बहुवचन भवेयुः भवेत लुट्-भविष्यत्काल (Future Tense) एकवचन भविष्यति भविष्यसि भविष्यामि द्विवचन भविष्यतः भविष्यथः भविप्यावः बहुवचन भविष्यन्ति भविष्यथ भविष्यामः लिट्-अतीतकाल ( Past Tense )। एकवचन बभूव वभूविथ बभूव द्विवचन बभूचतुः वभूवथुः बभूविव बहुवचन वभूवुः बभूव वभूविम Exercise VII, 1. Translate into Sanskrit:- It rains. He was happy. They wero sorry. We two are happy. I shall be sorry. May ho be happy! Sons should be respectful to their mothers (ATEATT). Let him be happy: Bei respectfal to your father, + . 2. Correct:-त्वं भवति । अहं भवतु । सः भवसि । तो भव । ते अभवताम् । युवां वभूषिम । घयं भविष्याव । वयं भवेयम् । अहं बभूव ।

मध्यमपुरुष T घातुरूप-- ११५ प्रस धातु-होना; रहना (To be to exist)1- लद-वर्तमानकाल ( Present Tense)| प्रथमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन अस्ति असि अस्मि द्विवचन स्थः स्वः बहुवचन सन्ति स्थ लोट अनुज्ञा ( Imperative Mood )| एकवचन अस्तु, स्तात एधि, स्तात् "असानि द्विवचन स्ताम् स्तम् असाव बहुवचन सन्तु स्त असाम ल-अतीतकाल (Past Tense)| एकवचन आसीत् आसीः भासम् द्विवचन प्रास्ताम् श्रास्तम् बहुवचन आसन् आस्तु श्रास्म farfers -( Potential Mood ) एकवचन स्यात् स्याः स्याम् द्विवचन स्याताम् स्यातम् स्याव बहुवचन स्युः स्यात स्याम लुट् और लिट में अस् धातु का रूप भू धातु के सदृश है। यथा, लट्-भविष्यति इत्यादि, लिट्-वभूव इत्यादि Exercise VIII. 1. Translate into Sanskrit: There is a river. We two are here (97). You are in the house. Be it so. We are happy. They were sad. We are dutiful (कर्तव्यपरायब). 2. Correct : नराः अस्ति । अहं प्रसि । यूयं स्मः। चौपस्तु । युवाम् स्याव । वयं रतम् । ते आसीत्। अहमास्तम् । वयमास्म। त्वं स्यात् । भावां स्युः। श्राव उपक्रमणिका! तिष्टाव अतिष्ठः अतिष्टम् WRITUTO TEST ( To be; to exist; to stay ) i लट्-वर्तमानकाल (Present Tense ) । प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचन तिष्ठति तिष्टसि तिष्टामि द्विवचन तिष्टतः तिष्टथः तिष्टावः बहुवचन तिष्टन्ति तिष्टथ तिष्टामः लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood ) | एकवचन तिष्ठतु, तिष्टतात तिष्ठ, तिष्टतात् तिष्टानि द्विवचन तिष्टताम् तिष्टतम् बहुवचन तिष्ठन्तु तिष्ठत तिष्टाम. लङ्-अतीतकाल ( Past Tense ) | एकवचन अतिष्ठत् द्विवचन अतिष्ठताम अतिष्ठतम् अतिष्टाव बहुवचन प्रतिष्ठन् अतिष्टत अतिष्ठाम विधिलिइ-(Potential Mood )। एकवचन तिष्ठेत तिष्टः तिष्ठेयम् द्विवचन तिष्ठेताम् तिष्ठतम् तिष्टेव बहुवचन तिष्ठेयुः तिष्टेत तिष्टेम लुट-भविष्यत्काल ( Future Tense ) । एकवचन स्थास्यति स्थास्यसि स्थास्यामि द्विवचन स्थास्यतः स्थास्यथः स्थास्याव: स्थास्यथ स्थास्यामः लिट-अतीतकाल ( Past Tense)| तस्थिथ, तस्थाथ तस्थौ, तस्थ द्विवचन तस्थतुः तस्थथुः तस्थिव बहुवचन तस्थुः तस्थ तस्थिम बहुवचन स्थास्यन्ति एकवचन तस्थौ धातुरूप.. ११७ ह Exercise IX..., 1. Translate into Sanskrit:-He stays here. Two men stay there. I stay here.. We stay here. Let him stay here. Stay you at home. You should not stay here. They tro atayed here yesterday (A). Who was there at that time.? We two shall stay here. 2. Correct :- वयं तिष्ठसि । यूयं तिष्ठन्ति । ते तिष्ठेयम् । भवान् तिष्ठ। अहमतिछत् । युषां तस्यौ। भावां स्थास्यन्ति । अहं तस्थौ। हे तितु। हस् धातु-हँसना (To laugh)। वर्तमानकाल (Present Tense)। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष एकवचन हसति हससि. हसामि द्विवचन हसतः हसथः. हसाव: बहुवचन हसन्ति हसथ हसामः लोट-अनुज्ञा ( Imperative. Mood )। एकवचन हसतु, हसतात् हस, हसतात्. · हसानि द्विवचन हसताम् हसतम् हसाव बहुवचन हसतं हसाम लङ्-अतीतकाल ( Past Tense )। एकवचन अहसत् अहसः अहसम् द्विवचन अहसताम् अहसतम् अहसाव बहुवचन अहसन् अहसत अहसाम farafore (Potential_Mood ) | एकवचन हसेत् हसे हसेयम् द्विवचन हसेताम् हसतम् हसेव बहुवचन इसेयुः हसेत हसेम .. -हसन्तु:

- १५८ उपक्रमणिका। लूट-भविष्यत्काल (Future Tense)। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप एकवचन हसिष्यति हसिष्यसि इसिप्यामि द्विवचन हसिष्यतः हसिष्यथः हसिप्यावः बहुवचन हसिष्यन्ति इसिप्यथ हसिप्यामः लिट्-अतीतकाल ( Past Tense )। एकवचन जहास जहसिथ जहाम, जहस. द्विवचन जहसतुः जहसथुः जहसिव । वहुवचन जहसुः जहस : अहसिम Exercisex. 1. Translate into Sanskrit : -Ram laughs. Te two laugh. Three girls are laughing. Iet us laugh. Laugh you. The three women laughed. We laughed. I laughed. They laughed for joy. Students should not laugh at the time of reading, All the girls of the school will laugh. We tre Bhall laugh. 2. Correct:-बालकाः हसाव | अहं जहस । नराः हमठा वयं अहसम् । भवान् हंस । ताः हसिष्यसि । हो,वालकी हसन्तु । वयं सच्च हसेयुः । वयं हसन्ति । +/- वस् धातु-चास करना (To live; to dwell) | लट्-वर्तमानकाल (Present Tense)| प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष एकवचन वसति वससि वसामि द्विवचन वसतः वसथः वसावः बहुवचन वसन्ति वसथ वसामः mietan (Imperative Vood) | एकवचन वसतु, वसतान् वस, वसतात, वसानि द्विवचन वसताम् वसतम् वसाव बहुवचन वसन्तु वसत वसाम ।

११६ .. धातुरूप। लह-अतीतकाल (Past Tense) रथमपुरुप मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन श्रवसत् अवसम् द्विवचन श्रवसताम् श्रवसतम् 'अवसाव बहुवचन अवसन् अवसत अवसाम विधिलिङ्- ( Potential Mood )। एकवचन वसेत् वसेः वसेयम् द्विवचन . वसेताम् वसतम् वसेव बहुवचन वंसेयुः वसेत वसेम लूट--भविष्यत्काल ( Future Tense ) एकवचन वत्स्यति वत्स्यसि वत्स्यामि द्विवचन वत्स्यतः वत्स्यथ: वत्स्यावः बहुवचन वत्स्यन्ति.. वत्स्यथ वत्स्यामः लिट-अतीतकाल (Past Pense). एकवचन उवास उवसिथ, उवस्थ उवास; उवस.. द्विवचन ऊषतुः.. ऊपथुः बहुवचन ऊष ऊषिमा अपिव : Exercise XI.' - 17 1. Translate into Sanskrit:- Four lions live in a' certain forest. You two live in the city. Let them live with their mother. No one should dwell in a place full of bad smelli Who lived with you? How did he live with me? You will dwell in this town. I too lived in this small village: 2. Correct :- बहुवो पक्षियः अत्र वसति । व्याघ्रादयःप्राशी. वने वसानि । अहं गृहे उवास । छात्राः विद्यालये ऊपथुः । वयं तंत्र वत्स्यन्ति । भवान् वसा खं उपतुः।

१२० उपक्रमणिका। रुद् धातु-रोना; कानना (To cry; to weep) । लट्-वर्तमानकाल ( Present Tense ) | प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष एकवचन रोदिति रोदिपि रोदिमि द्विवचन रुदितः रुदिथः रुदिवः बहुवचन रुदन्ति रुदिथ रुदिमः लोट-अनुज्ञा (Imperative Mood ) । एकवचन रोदितु, रुदितात् रुदिहि, रुदितात, रोदानि द्विवचन रुदिताम् रुदितम् रोदाव वहुवचन रुदन्तु रुदित रोदाम लड-अतीतकाल ( Past Tense ) । एकवचन अरोदीत्, अरोदत् अरोदीः, अरोदः अरोदम् द्विवचन अरुदिताम् अरुदितम् अरुदिव वहुवचन अरुदन् अरुदित अरुदिम विधिलिङ्-(Potential Mood )। एकवचन रुद्यात् रुद्याः रुद्याम् द्विवचन रुद्याताम् रुद्यातम् रुद्यावं वहुवचन रुयुः रुद्यात रुद्याम लट्-भविष्यत्काल ( Future Tense )। एकवचन रोदिष्यति रोदिष्यसि रोदिष्यामि द्विवचन रोदिष्यतः रोदिप्यथः रोदिप्यावः रोदिष्यथ रोदिष्यामः लिट्-अतीतकाल (Past Tanse) एकवचन रुरोद करोदिथ द्विवचन रुरुदतुः रुरुदथुः रुरुदिव बहुवचन रुरुदुः रुरुदिम *. बहुवचन रोदिष्यन्ति सरोद, रुरुद धातुरूप । . Exercise-XII. 1. Translate into Sanskrit:-Why is he crying? The boy cries for food. Two women cried. 'We two cried with them. They will cry. Yon should not: ory. Let me cry. We wept for his death. 2. Correct :- अहमरोदत् । त्वं रोदिहि । ते स्याः। त्वं रोद । यूर्य रुरुदधुः। ते रुदत् । अहं रुदिपि । बालकाः रोदन्ति । वयं रुरुदिम । का सदन्ति? पत् धातु-गिरना ( To fall)। लट् वर्तमानकाल (Present Tense)। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष एकवचन पतति पतसि पतामि द्विवचन पततः पतथः पतावः बहुवचन पतन्ति .पतथ पतामः लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। एकवचन पततु, पततात् पत, पतंतात् पतानि ,द्विवचन पतताम् पततम् पताव बहुवचन पतन्तु पतत पताम. लड-अतीतकाल ( Past Tense)! एकवचन अपतत् अपतः द्विवचन अपतताम् अपततम् अपताव बहुवचन अपतन् अपतत अपताम fafafers ( Potential Wood ) 1 एकवचन पतेत् पतेः पतेयम् द्विवचन पतेताम् पतेतम् पवेव बहुवचन पतेयुः पतेत पतेम . अपतम् १२२ उपक्रमणिका। .. लूट-भविष्यन्काल (Future Tense ) | प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप .. उत्तमपुरुष: एकवचन पतिष्यति पतिष्यसि पतिष्यामि : द्विवचन पतिष्यतः पतिष्यथः पतिण्यावः बहुवचन पतिष्यन्ति पतिप्यथ पतिष्यामः लिट-अतीतकाल ( Past Tense ) | एकवचन पपात पेतिथ पपात, पपत द्विवचन पेततुः पेतथुः. पेतिंव बहुवचन पेतुः पेत पेतिम Exercise XIII. -1.: Translate into Sanskrit: The hind (हरिणी) talls on the ground. Leaves fell from the tree. Monkeys will fall. Let them fall on the ground. Do not fall. Will ha fall from the tree ? 2. Correct:- अमु पतसि। त्वं पतेयुः। यूयं पपात । इमे पतिष्यति । आवामपतन् । वयं पेतिम । ती पेतुः ।। सकर्मक। 8 कृ धातु (उभयपदी)-करना ( To do )। लट-वर्तमानकाल ( Present Tense)| परस्मैपद। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप .उत्तमपुरुष एकवचन करोति करोपि करोमि द्विवचन .कुरुतः कुरुथः कुर्वः बहुवचन कुर्वन्ति कुरुथ कुर्मः अत्मनेपद। एकवचनं कुरुते कुरुपे कुबै द्विवचनं कुर्लाते कुर्वाये "कुवहे बहुवचन कुर्वते : कुरुध्ये बहुवचन कुर्वन्तु धातुरूप] १२३ लोट-अनुज्ञा (Imperative Mood). परस्मैपद। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन करोतु-कुरुतात् कुरु-कुरुतात् करवाणि द्विवचन कुरुताम् कुरुतम् करवाव कुंरुत करवाम आत्मनेपदै। एकवचन । कुरुताम् कुरुष्व करवै -द्विवचन कुर्वाताम् कुर्बाथाम् कुरवावहै बहुवचन कुर्वताम् कुरुध्वम् करवामहै लङ-अतीतकाल ( Past Tense)। परस्मैपद। एकवचन अकरोत् अकरोः अकरवम् द्विवचन अकुरुताम् अकुरुतम् अकुर्व बहुवचन अकुर्वन् अकुरुत अकुर्म श्रात्मनेपद। एकवचन | अकुरुत अकुरुथाः अकुंटिव द्विवचन / अकुव्वाताम् .. अकुळथाम् अकुर्वहि बहुवचन अकुर्वत अकुरुध्वम् अकुर्महि Farajas ( Potential Mood) | परस्मपद। एकवचन कुर्यात् कुर्य्याः कुर्य्याम् द्विवचन कुर्याताम् कुर्यातम् कुर्य्याव बहुवचन कुर्युः कुर्य्यात कुर्य्याम आत्मनेपद। एकवचन : कुर्वीत -कुर्वीथाः कुचीय द्विवचन कुर्वीयाताम् कुर्वीयाथाम् कुर्चीवहि बहुवचन कुरिन् । कुर्वीध्वम् कुर्चीमहि १२४ उपक्रमणिका। द्विवचन चक्रतुः लृद्-भविष्यत्काल-(Future Tense)। परस्मैपद। प्रथमपुरुप मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप. एकवचन करिष्यति करिष्यसि करिष्यामि द्विवचन करिष्यतः करिष्यथः करिष्याव: वहुवचन करिष्यन्ति करिष्यथ करिष्यामः आत्मनेपद। एकवचन । करिष्यते करिष्यसे करिष्ये द्विवचन करिष्येते करिष्येथे करिष्यावहे बहुवचन 'करिष्यन्ते करिष्यच्चे करिष्यामहे लिट-अतीतकाल ( Past Tense) | परस्मैपद। एकवचन । चकार चकर्थ चकार, चकर चक्रथुः चव वहुवचन चक्रुः चक्र चकम आत्मनेपद। एकवचन । चक्रे चकृपे चक्रे द्विवचन 'चक्राते चक्राथे चवहे चकृढवे चकृमहे Exercise XIV... 1. Translate into Sanskrit: Ram.does his work every day. We never do our work, I shall always do my. work. You should - do the work. I have done my work., They laboured skilfully. He had worked hard. What did you do there? Let them do the work. Did you do anything? We did nothing at all. 2. Correct:- अहं किं करिष्यति। यूयं परिश्रमं चकार नाहमिदम- कुरुवम् । यूयमिदं कुरु । वयं परित्रमं कुर्वन्ति। बालकाः अमं कुर्यात् । क्यमिदं चंकृम । भवान् कुविदम् । अहें किमपि न अंकुरुत । वहुवचन !चक्रिरे १२५ गम् धातु-गमन करना; जाना (To go)। लट्-वर्तमानकाल ( Present Trense)। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन गच्छति गच्छसि गच्छामि द्विवचन गच्छतः . गच्छथः गच्छावः बहुवचन गच्छन्ति गच्छथ गच्छामः लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। एकवचन गच्छतु, गच्छतात् गच्छ, गच्छतात् गच्छानि द्विवचन' गच्छताम् गच्छतम् गच्छाव बहुवचन' गच्छन्तु. गच्छत गच्छाम लड-अतीतकाल (Past Tense) । एकवचन अगच्छत् गच्छः अगच्छम् द्विवचन अगच्छताम् अगच्छतम् अगच्छाव बहुवचन अगच्छन् अगच्छत अगच्छाम fararte-( Potential Mood ) | एकवचन गच्छेत् गच्छेः गच्छेयम् द्विवचन गच्छेताम् गच्छेतम् गच्छेव बहुवचन गच्छेयुः गच्छेत गच्छेम लट्-भविष्यत्काल ( Future Tense)| एकवचन गमिष्यति गमिष्यसि गमिष्यामि द्विवचन गमिष्यतः गमिष्यथ: गमिष्याव: बहुवचन गमिष्यन्ति गमिष्यथ गमिष्याम: लिट्-अतीतकाल ( Past Tense ) । एकवचन जगाम जगमिथ, जगन्थ जगांम, जगम जग्मथुः जम्मिव बहुवचन जग्मुः जग्म. जग्मिम द्विवचन जग्मतुः १२६ उपक्रमणिका। Exercise-XV. 1. Translate into Sanskrit:--Hour .cows are going, Three ladies go to the village (919). We went to Benares, Six girls went home from the school. When will you go there ? Let them go to the forest. Thou didst go there alone (एकाकी). Who will go betore me? 2. Correct:--अयं बालिकाः गृहं गच्छतु । एषः नार्य जगाम । वयं अग्मिम | नौ अगच्छत् । ते गमप्यति । आवां गच्छेत् । नाहं गच्छति। अहमयोध्याम् जग्मतुः । भवान् स्वगृहं गच्छ । श्रु धातु-श्रवण करना, सुनना (To hear लट्-वर्तमानकाल ( Present Tense) प्रथमपुरुप मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन शृणोति शृणोपि शृणोमि द्विवचन शृणुतः शृणुथः शृणुवः, शृण्वः शृणुथ शृणुमः, शृएमः लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )| एकवचन शृणोतु, शृणुतात् शृणु, शृणतात् शृणवानि शृणुतम् शृणुवाव बहुवचन शृण्वन्तु शृणुत शृणवाम लड्-अतीतकाल (Past Tense)|. एकवचन अशृणोत् अशृणोः अशृएवम् द्विवचन अशृणुताम् अशृणुताम् अशृणुतम् अणुव, अश्व बहुवचन अण्वन् अशृणुत. अशृणुम, अशृण्म faturas-( Potential Mood)) एकवचन. शृगुयात् शृणुयाः शृणुयाम् द्विवचन शृणुयाताम् शृणुयातम् शृणुयाव बहुवचन शृणुयुः शृणुयात शृणुयाम चहुवचन शृण्वन्ति द्विवचन शृणुताम् बहुवचन श्रोष्यन्ति द्विवचन शुश्रुवतुः धातुरूप १२७ लट्-भविष्यत्काल ( Future Tense) प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन श्रोष्यति श्रोष्यसि श्रोष्यामि द्विवचन श्रोष्यतः श्रोष्यथ: श्रोष्याव: श्रोष्यथ श्रोष्यामः लिट्-अतीतकाल (Past Tense )। एकवचन शुश्राव शुश्रोथ शुश्राव, शुभ शुश्रुवथुः शुश्रुव बहुवचन शुश्रुवुः शुश्रुव शुश्रुम Exercise XVI. 1. Translate into Sanskrit:-They hear the words of the teacher. Why do you not hear the advice of your father ? Hear my words, boys. I did not hear the sound. I heard the sound. You heard my words. He has heard the news. Good students should hear the advice of their teachers. A faithful servant must hear the order of his master. We two will hear the story now. You also hear it. 2. Correct :- अहं तव वाक्यं शुश्रुवतुः। भवान् इदं शृणोसि । त्वं सदुपदेशं शृणुयात् । यूयं मृणु मे वचः। तौ शृणुयातम् मे वचनं । आवामयोः तव करुणं रोदनम् । युवा शुश्रुवतुः मम पाठं । वयमशृणुमः तेषां प्रार्थना । यूयं भवन्तु गुरुपदेशम् । दृश् धातु-दर्शन करना ; देखना ( To see )। लिट-वर्तमानकाल ( Present Tensé ) । प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप एकवचन पश्यति पश्यसि पश्यामि द्विवचन पश्यतः पश्यथ: पश्याव:.. बहुवचन पश्यन्ति पश्यथ पश्यामः: . .

. १२८ उपक्रमणिका। लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप एकवचन पश्यतु, पश्यतात् पश्य, पश्यतात् पश्यानि द्विवचन पश्यताम् पश्यतम् पश्याव बहुवचन पश्यन्तु पश्यत् पश्याम लङ्-अतीतकाल (Past Tense ) एकवचन अपश्यत् अपश्यः अपश्यम द्विवचन अपश्यताम् अपश्यतम् अपश्याव बहुवचन अपश्यन् अपश्यत अपश्याम विधिलिड-(Potential Mood')| एकवचन पश्येत पश्ये: पश्येयम् द्विवचन पश्येताम् पश्येतम् पश्येव पश्येत पश्येम लूट-भविष्यत्काल ( Future Tense ) एकवचन द्रक्ष्यति 'द्रक्ष्यसि द्रक्ष्यामि द्विवचन द्रक्ष्यतः द्रक्ष्यथ: द्रक्ष्याव: वहुवचन द्रक्ष्यन्ति द्रक्ष्यथ द्रक्ष्यामः लिट-अतीतकाल (Past Tense)। एकवचन ददर्श ददर्श द्विवचन दहशतुः दशथुः दहशिव बहुवचन ददृशुः दहश दवशिम Exercise XVII. 1. Translate into Sanskrit:-We two are seeing the moon. Two youths see the lion. Three women say the flowers. Have you been an elephant 1 What did they see there? Surely I did not see the moon. What will you see in the city of Calcutta now? They should see the king. Let them see the picture now. वहुवचन पश्येयुः ददर्शिथ, दद्रष्ठ धातुरूप। १२९ . 2. Correct:-बालकाय किं पश्यतः १ वयमिदमालेस्थम । द्वे बालको पश्यन्तु । वयं पुस्तकानि दशिय । ते किं दशन ते मां द्रक्ष्यति । चमी एतद न पश्येयम् । दा घातु (उभयपदी)-दान देना देना ( To give) | लट्-वर्तमानकाल ( Present Tense )। परस्मैपद। R प्रथमपुरुषः · मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष ददाति ददासि ददामि द्विवचन दत्तः दत्यः बहुवचन ददति दत्थ द्मः आत्मनेपद। एकवचन दत्ते दत्से ददे द्विवचन ददाते ददाथे दद्वह बहुवचन ददते दध्ये दद्महे लोट-अनुज्ञा (Imperative Mood)। परस्मैपद। एकवचन ददातु, दत्तात् देहि, दत्तात् ददानि द्विवचन दत्ताम् दत्तम् ददाव बहुवचन ददतु दत्त ददाम आत्मनेपद। एकवचन दत्ताम् ददै द्विवचन ददाताम् ददाथाम् ददावहै बहुवचन ददताम् दध्वम् ददामहै लड-अतीतकाल ( Past Tense)। परस्मैपद। एकवचन अददात् अदाः अददाम् द्विवचन अदत्ताम् अचम अदद। बहुवचन . . आ १३० उपक्रमणिका। आत्मनेपद। प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचन अदत्त अदत्थाः अददि द्विवचन अददाताम् अददाथाम् श्रद्वहि बहुवचन अददत अद्ध्वम् अहि विधिलिङ्-( Potential Mood )। परस्मैपद। एकवचन दद्यात् दद्या: दयाम् द्विवचन दद्याताम् दद्यातम् दद्याव बहुवचन दधुः दद्यात दद्याम आत्मनेपद। एकवचन ददीत ददीथाः ददीय द्विवचन ददीयाताम् ददीयाथाम् ददीवहि बहुवचन ददीरन् दीध्वम् ददीमहि लूट-भविष्यत्काल ( Future Tense )। परस्मैपद। एकवचन दास्यति दास्यसि दास्यामि द्विवचन दास्यतः दास्यथः दास्याव: वहुवचन दास्यन्ति द्रास्यथ दास्यामः आत्मनेपद। एकवचन दास्यसे दास्ये द्विवचन दास्येते, दास्येथे दास्यावहे बहुवचन दास्यध्वे दास्यामहे ". 'लिट-अतीतकाल (Past Tense)| परस्मैपद। एकवचन ददी ददौ द्विवचन ददतुः ददथुः ददिव वहुवचन ददुः ददिम •- दास्यते -: १ दास्यत्ते ददिथ, ददाथ धातुरूप। १३१ आत्मनेपद। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन ददे ददिपे ददे द्विवचन ददाते ददाथे ददिवहे बहुवचन ददिरे ददिध्वे ददिमहे Exercise XVIII. 1. Translate into Sanskrit:--The rich give money and food to the poor. You give alms to the beggars. Let them give clothes to the blind. We gave some fraits to the birds. You gave them flowers. What will they give to these four girls? We must give them something. 2. Correct:-अहं तं धनं दनः। ते त्वां किं ददाति ? त्वं मे वित्तं ददानि । अयं बालको ते पुस्तकं दत्तम् । ते किं दद्याः। तौ पुरुषाः किम- ददात् । वं मां धनं दद । वयं किमपि न दास्यन्ति । धातु ( उभयपदी)-ग्रहण करना, लेना ( To take )। लट्-वर्तमानकाल ( Present Tense )। परस्मैपदी प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन गृहाति गृहासि गृहामि द्विवचन गृहीतः गृहीथः गृहीवः बहुवचन गृहन्ति गृहीथ गृहीमः आत्मनेपद। एकवचन गृहीते ..गृहीये गृहे द्विवचन: गृहाते गृह्णाथे गृहीवहे बहुवचन गृहते. गृहीध्वे गृहीमहे लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। ...परस्मैपद। एकवचन गृहातु, गृहीतात् गृहाण, ग्रहीतात् गृहानि द्विवचन गृहीताम् गृहीतम् गृहाव बहुवचनं गृहन्तु गृहीत गृद्दाम प्रह 4..

१३२ उपक्रमणिका। गृहीताम् एकवचन द्विवचन वहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन वहुवचन आत्मनेपद। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष गृहीव गृह गृहाताम् गृहाथाम् गृहावह गृहृताम् गृहीध्वम् गृहामहै लङ्-अतीतकाल (Past Tense) : परस्मैपद। अगृह्वात् अगृहाः अगृहाम् अगृहीताम् अगृहीतम् अगृहीव अगृहन् अगृहीत अगृहीम आत्मनेपद। अगृहीत अगृहीथाः अगृहि अगृहाताम् अगृहाथाम् अगृहीवहि अगृहत अगृहीध्वम् अगृहीमहि विधिलिड- Potential Mood )। परस्मैपद। गृहीयात् गृहीयाः गृहीयाम् गृहीयाताम् गृह्णीयातम् गृहीयाव गृहीयुः गृहीयात गृहीयाम आत्मनेपद। गृहीत गृहीथाः गृहीय गृहीयाताम् गृहीयाथाम् गृहीवहि गृहीरन् गृहीध्वम् गृहीमहि लट-भविष्यत्काल (Future Tense)। परस्मैपद। ग्रहीष्यति ग्रहीष्यसि ग्रहीष्यामि ग्रहीष्यतः ग्रहीष्यथः ग्रहीष्याव: ग्रहीष्यन्ति ग्रहीष्यथ ग्रहीष्यामः एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन - एकवचन द्विवचन बहुवचन धातुरूप १३३ आत्मनेपद। 'प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन ग्रहीष्यते ग्रहीष्यसे ग्रहीष्ये द्विवचन ग्रहीष्येते ग्रहीष्येथे ग्रहीष्यावहे बहुवचन ग्रहीष्यन्ते . ग्रहीष्यध्वे ग्रहीष्यामहे लिट-अतीतकाल (Past Tense)। परस्मैपद। एकवचन जग्राह जग्रहिथ जग्राह, जग्रह द्विवचन जगृहतुः जगृहथुः जगृहिव वहुवचन जगृहुः जगृह जगृहिम आत्मनेपद। एकवचन जगृहे जगृहिषे जगृहे द्विवचन जगृहाते जगृहाथे जगृहिवहे वहुवचन जगृहिरे जगृहिध्वे, जगृहिढवे जगृहिमहे Exercise XIX. 1. Translate into Sanskrit:-They do not take aims from any one. We take the flower from him. We took money from the man. You have not taken anything from us. They took it from you. Boys, take these pictures from me. Takest thou the money from the rich. Let us take the flowers from the garden. You should not take my books. I shall not take it from you. They will take it. 2. Correct:-अहमिदं गृहाति। त्वं पुस्तकमिदम् गृह्णाति । अयं धनमगृहीताम् । ते पुष्पमगृहीत । नाहमेतत् जगृहः ! युवां फलानि नगृहतुः । अहं सत् न गृहीष्यति । . 1 ।

१३४ उपक्रमणिका। प्रच्छ् धातु-पूछना (To ask)। लट्-वर्तमानकाल ( Present Tense ) | प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष. एकवचन | पृच्छति पृच्छसि, पृच्छामि द्विवचन पृच्छतः पृच्छयः पृच्छाव: बहुवचन पृच्छन्ति पृच्छय पृच्छामः लोट-अनुन्ना (Imperative Mood)। एकवचन पृच्छतु, पृच्छतात् पृच्छ, पृच्छतान् पृच्छानि द्विवचन पृच्छताम् पृच्छत्तम् पृच्छाव बहुवचन पृच्छत पृच्छाम लह-अतीतकाल ( Past Tense ) | एकवचन अपृच्छत् अपृच्छः अपृच्छम द्विवचन अपृच्छताम् अपृच्छतम अपृच्छाव वहुवचन अपृच्छन् अपृच्छत अपृच्चाम विधिलिङ्--( Potential food )। एकवचन पृच्छेत् पृच्छेयम् द्विवचन पृच्छेनाम पृच्छेतम् पृच्छेच बहुवचन पृच्छेयुः पृच्छेत पृच्छेम लूटू-भविष्यत्काल (Future Tense) । एकवचन प्रक्ष्यति प्रक्ष्यसि प्रक्ष्यामि द्विवचन प्रक्ष्यतः प्रक्ष्यथ: प्रल्याव: बहुवचन प्रक्ष्यन्ति प्रक्ष्यथ पक्ष्यामः लिट्-अतीतकाल ( Past Tense ) । एकत्रचन पप्रच्छ पप्रच्छिय, पप्रष्ट पप्रच्छ, द्विवचन पप्रच्छतुः पप्रच्छयुः पप्रच्छिव बहुवचन पप्रच्छ पप्रच्छिम धातुरूपा १३५ Exercise xx. 1. Translate into Sanskiit:-We ask you, a question. What do you ask me ? 'Let the teacher ask questions to the students. Let them ask their mother. Students asked this question to the teacher. He has asked me this question: We asked you this question. They had asked us: these questions! I will not ask you: anything. They will..ask him this. Students should not ask such questions... 2. Correct...स्वं मां पृच्छति । भवान् नः पृच्छ। प्रहमपृच्छत् । त्वमावां पप्रच्छ । वयं तं पप्रच्छुः । नाहं प्रक्ष्यति । बालकाः इदं प्रश्नं. पृथ्ः। 'ब्रू धातु (उभयपदी)-बोलना ( To tell; To say.). लद-वर्तमानकाल ( Present Tense ) । परस्मैपद। प्रथमपुरुष. मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप एकवचन ब्रवीति, आह ब्रवीषि, आत्थ ब्रवीमि द्विवचन तः, आहतुः अ॑थः, आहथुः ब्रूवः बहुवचन ब्रुवन्ति, आहुः बेथ आत्मनेपद। ढते षे ब्रुवे द्विवचन ब्रुवाते ब्रुवाथे वहे बहुवचन ब्रुवते ध्वे लोट-अनुहा ( Imperative Mood )। ब्रमः - एकवचन महे एकवचन द्विवचन बहुवचन परस्मैपद। ब्रवीतु, ब्रूतात् ब्रूहि, तात् ब्रूताम् बृतम् ब्रत अवाणि नवाब अवाम अवन्तु ३ ब्रवामहे १३६ उपक्रमणिका। आत्मनेपद। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन वृताम् प्व अवै द्विवचन बुवाताम् ..ब्रुवाथाम् प्रवावहै बहुवचन ब्रुवताम् 'वृध्वम् लङ्-अतीतकाल ( Past tanse)। एकवचन अब्रवीत् अत्रवी अनवम् द्विवचन अब्रूनाम् अवतम् अव बहुवचन अनुवन् अत्रूत अत्रम आत्मनेपद। एकवचन अवत अबेथाः अत्रुवि द्विवचन अजुवाताम् अब्रुवाथाम् अवहि बहुवचन अब्रुवत अब्रुध्वम् अवमहि विधिलिड-( Potential Mood )। परस्मैपद । एकवचन ब्रूयात् ब्रूयाः याम् द्विवचन याताम् यातम् बेयाव वहुवचन ब्रूयुः জুমার याम श्रात्मनपद। एकवचन त्रुवीत त्रुवीथाः ब्रुवीय द्विवचन ब्रुवीयाताम् ब्रुवीयाथाम् ब्रुवीवहि बहुवचन ब्रुवोरन् ब्रुवीध्वम् . .ब्रुवीमहि लूटू-भविष्यकाल (Future Tense )। परस्मैपदं । वक्ष्यति एकवचन द्विवचन वहुवचन वक्ष्यतः वक्ष्यसि वक्ष्यथ: वक्ष्याथः वक्ष्यामि वयावः वक्ष्यामः वक्ष्यन्ति . धातुरूपं ।' १.३७ आत्मनेपदं । प्रथमपुरुष.......मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचनः वक्ष्यते वक्ष्यसे वक्ष्ये द्विवचन- . वक्ष्येते वल्येथे वक्ष्यावहे बहुवचन' : 'वक्ष्यन्ते वक्ष्यध्वे 'वक्ष्यामहे लिट-अतीतकाल ( Past Tense )। परस्मैपद। एकवचन द्विवचन- बहुवचन : . उवाच. उवचिथ, उवक्थ उवाच, उवच ऊचतुः ऊचथुः अचिव ऊचुः :: ‘ऊच अचिम : :...: आत्मनेपद। 'ऊचे 'अचिषे ऊचे ऊचाते ऊचाथे ऊचिवहे ऊचिरे ऊचिध्ये अचिमहे Exercise XXI. एकवचन द्विवचन.. बहुवचन . 1: Translate into Sanskrit-We tell you this. What did he say ? Tell him that. Let him say. We told him this, You told me that. - What did be toll ? 'He said this. You should not tell it. Should he tell this? They will tell it.:. I shall not tell it..... 2. .Correct:--अहं किं अवीषि.! ते आह, भोः प्रभुः भवानेव मा ब्रूहि । अहमिदं. अवाम। मृत्याः अग्रवीत् । यूयमम । त्वमुवाच । श्रावामुचधुः। ते सत्य वयात् । नाहमप्रियं सत्यं वयात् । स्वमसत्यं वक्ष्यति । अयं सदानृतं वक्ष्यामि।

-- १३. उपक्रमणिका। * भक्ष धातु-भोजन करना; खाना ( To eat)। लट्-वर्तमानकाल ( Present Tense ) | प्रथमपुरुष' मध्यमपुरुष : उत्तमपुरुष एकवचन भक्षयति भक्षयसि 'भक्षयामि द्विवचन भक्ष्यतः भक्षयथ: भक्षयाव: वहुवचन भक्षयन्ति भक्षयथ भक्षयामः लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। एकवचन भक्षयतु, भक्षयतात् भक्षय, भक्षयतात् भक्षयाणि द्विवचन भक्षयताम् भक्षयतम् भक्षयाव बहुवचन भक्षयन्तु भक्षयत भनयाम लङ–अतीतकाल ( Past Tense )। एकवचन अभक्षयत् अभक्षयः अभक्षयम् द्विवचन अभक्षयताम् अभक्षयतम् अभक्षयाव बहुवचन अभक्षयन् अभक्षयत अभक्षयाम faraf 6-( Potential Mood )! एकवचन भक्षयेत् भक्षयः भक्षयेयम् द्विवचन भक्षयेताम् भक्षयेतम् भक्षयेव बहुवचन भक्षयेयुः भक्षयेत भक्षयेम' लूट-भविष्यत्काल-(Future Tense)। एकवचन भक्षयिष्यति भक्षयिष्यसि भक्षयिष्यामि द्विवचन भक्षयिष्यंतः भक्षयिष्यथः भक्षयिष्याव: बहुवचन भक्षयिष्यन्ति भक्षयिष्यथ भक्षयिष्यामः लिट-अतीतकाल ( Past Tense) | एकवचन ४ भक्षयामास भक्षयामासिथ भक्षयामास द्विवचन भक्षयामासतुः भक्षयामासथु: भक्षयामासिव बहुवचन भक्षयामासुः भक्षयामास । भक्षयामासिम * भस् धातु भ्वादिगणी उभयपदी भी है। रूपः-हस, और ग्रह के सदृश है-भक्षति भक्षतः भक्षन्ति, भक्षते, भक्षेते, भक्षन्ते । xभक्षयाञ्चकार तथा भक्षयाम्बभूव इत्यादि क्रम से भी नव नब रूप जानने चाहिये।

धातुरूप। १३९ Exercise XXII. 1. Translate into Sanskrit:-Cows eatgrass. We eat all sorts of good food. Eat ripe fruits. Do not let him eat, G green (अपक) mangoes. Thes have eaten fruits to-day. Youate three green mangoes. We two ate very sweet fruits. He ate two sweet mangoes. Boys should not eat green fruits. Te should eat sweet fruits You two will eat tro mangoes: We two will ent mangoes. 2. Correct:-अहं किं भक्षयति ? युवामेतत भक्षयत । त्वमिदं मा भक्षत । अहमेतत् भक्षयानि । स्वमिदं भक्षयामास । अहमपि भक्षपाम । सैततभक्षपत | युवामिदमभक्षयताम् । ताविदं भक्षयेयम् । आवामेतत भक्षयिष्यथः कापि न भक्षयिष्यन्ति। पा धातु-पान करना; पीना (To drink)। लट-वर्तमानकाल (Present Tense )। प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप पिवति पिवसि पिवामि द्विवचन पिवतः पिवथः पिवावः वहुवचन पिवन्ति पिवथ पिवामः लोट-अनुज्ञा (Imperative Mood ) | एकवचन पिवतु, पिवतात् पिव, पिवतात् पिवानि द्विवचन पिवताम् : पिवतम् पिवाव बहुवचन पिवन्तु पिवत पिवाम लह-अतीतकाल (Past Tense).। एकवचन अपिवत् अपिवः अपिवम् द्विवचन अपिवताम् अपिवतम् अपिवाव बहुवचन अपिवन अपिवत अपिवाम एकवचन . . .

.. प्रथमपुरुष -- उपक्रमणिका। fafarers(Potential Mood) मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचनं पिवेत् ': पिवेः पिवेयम् द्विवचन पिवेताम् पिवेतम् पिवेव बहुवचन पिवेयुः पिवेत पिवेम लुट-भविष्यत्काल..( Future Tense )। एकवचन पास्यति पास्यसि पास्यामि द्विवचन पास्यतः पास्यथः पास्यावः बहुवचन पास्यन्ति पास्यथ पास्यामः लिट-अतीतकाल ( Past Tense)। एकवचन पपो पपिथ, पपाथ पपी द्विवचन पपतुः पपथुः पपिव बहुवचन. पपुः पप पपिम Exércise XXIII. 1. Translate into. Sanskrit:-Ve drink cold water. What do they drink? Lat them driak warm milk. Drinkest thou pare milk. Three boys have drook sweet inilk. These two girls have not drunk milk as yet. We drank water. They drank only cold water. They should not drink cocoanut water at nigbt. No one should drink wine. You will driók cocoanut water. The cats will drink the milk. 2. Correct:-बालक: दुग्धं पिवन्तिावालका दुग्धंपिवन्तु ।मधुकराः मधुमपिवत् । अहं दुग्धं पपौ। यूयं जलं पास्यन्ति । ते कदापि मद्यं न पिवेत् । इप धातु इच्छा करना ( To wish)। FEATHTAT ( Present Tense )! प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकचचन इच्छति इच्छमि इच्छामि द्विवचन इच्छतः इच्छथः इच्छावः वहुवचन इच्छन्ति इच्छथ इच्छामः धातुरूप! . ..-- . द्विवचन इच्छताम् .१४१ लोट-अनुशा-( Imperative Mood )। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष. उत्तमपुरुष.. एकवचन इच्छतु, इच्छतात् इच्छ, इच्छतात् :- इच्छानि इच्छतम् : इच्छाव बहुवचन इच्छन्तु इच्छत इच्छाम ल-अतीतकालं (Past Tense)। एकवचन ऐच्छत् ऐच्छः ऐच्छम् द्विवचन ऐच्छताम् ऐच्छतम् ऐच्छाव बहुवचन ऐच्छन् ऐच्छत ऐच्छाम विधिला-(Potential Mood )। एकवचन इच्छेत् इच्छे इच्छेयम् द्विवचन इच्छेताम् इच्छेतम् इच्छेव इच्छेत इच्छेम लूटू-भविष्यत्काल ( Future Tense)। एकवचन एषिष्यति एषिष्यसि एपिष्यामि द्विवचन एपिष्यतः एषिष्यथः एषिष्याव: बहुवचन एषिष्यन्ति एषिष्यथ एषिष्यामः लिट्-अतीतकाल ( Past Tense ) । एकवचन इयेष इयेषिथ इयेष द्विवचन ईषतुः ईषिव बहुवचन ईषुः ईप ईषिम . Exercise XXIV. 1. Translate into Sanskrit:-We wish you weltare. Iot teachers always wish the welfare of the students of their classes. What did you wish ? W. wished his happiness. They will wish our prosperity. Good students should wish the prosperity of their teachers. Will you wish anything from me? Did they wish anything from-you? बहुवचन इच्छेयुः . ईषथुः उपक्रमणिका। बहुवचन जानन्ति 2. Correct:-न ते इदमिच्छति । गुरुवः एतानि इच्छतु | भवान् एतानि इच्छ । अहं किमपि नैच्छत् । अयं नेदं ईपतुः । ते किमपि न इयेष। इदं सः एपिण्यति । शिष्याः शास्त्रार्थ इच्छेन् । ज्ञा धातु-जानना ( To know )| लेट-वर्तमानकाल (Present Tense)! प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचन जानाति जानासि जानामि द्विवचन जानीतः जानीयः जानीवः जानीथ जानीमः : लोट-अनुज्ञा (Imperative Mood )। एकवचन · जानातु, जानीतात् जानीहि, जानीतात् जानानि 'द्विवचन जानीताम् जानीतम् जानीव बहुवचन 'जानन्तु जानीत जानीम लड्-अतीतकाल ( Past Tense )। एकवचन थजानात् अजाना: अजानाम् द्विवचन अजानीताम् अजानीतम् अजानीव बहुवचन श्रजानन् अजानीत अजानीम fafafara-( Potential Mood) i 'एकवचन :जानीयात् जानीयाः .जानीयाम् : 'द्विवचन जानीयाताम् । जानीयाताम् । जानीयातम् जानीया बहुवचनं जानीयुः "जानीयात जानीयाम : :: : लूट-भविष्यत्काल (Future Tense ) | एकवचन- ज्ञास्यति ज्ञास्यसि. ज्ञास्यामि । द्विवचन ज्ञास्यतः ज्ञास्यथः ज्ञास्याव: 'ज्ञास्यथ ज्ञास्यामः बहुवचन ज्ञास्यन्ति द्विवचन जज्ञतुः धातुरूपा १४३ लिंट-अतीतकाल ( Past Tensé)। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुप उत्तमपुरुष एकवचन जो जझिथ, जहाथ जज्ञो. जनयुः जज्ञिव बहुवचन जनः जन जझिम Exercise XXV. 1. Translate into Sanskrit:-We do not know anything. The boys know something. Let them know it. We tro knew it. The students also knew it. They should know their own fault. You will soonknow your offence (अपराध). Will they know it 2. Does be know your offence ? Did you know anything? 2. Correct: यूयं जानीयः। किं ते जानाति ? भवानिदं जानीहि । वयं जानीयाम् । नाहमिदमजानांत । त्वमेतत् जानीयात् । तेऽपि ज्ञास्यति । भवान्तः अझैठत् । नैवाहम् जज्ञः। प्रपूर्वक आप धातु-प्राप्ति करना; पाना (To get)! लट्-वर्तमानकाल (Present Tense )। प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुप एकवचन प्राप्नोति प्राप्नोमि प्रानुथः प्राप्नुवः बहुवचन प्रानुवन्ति प्रापथ प्राप्नुमः लोट-अनुझा ( Imperative Mood ) । एकवचन प्रानोतु, प्रांमुतात् प्रामुहि, प्रामुतात् प्राप्नवानि द्विवचन : प्रागुताम् : . . प्रामृतम् प्राप्तवाव वहुवचन प्रामुवन्तु प्रानुत.. प्राप्नवाम ला- अतीतकाल ( Past Tense ) | एकवचन प्रामोत् प्राप्नोः प्राप्नुवम् द्विवचन : प्राप्ताम् प्रामुवम् बहुवचन- प्रामवन् प्रामुत आप्रम ... प्राप्नोषि . द्विवचन- प्रानुतः प्रामुव : . प्राप्स्यन्ति द्विवचन .प्रापतुः उपक्रमणिका। Palufer-(Potential. Mood):1 . : प्रथमपुरुष :मध्यमपुरुष: उत्तमपुरुष एकवचन प्रामुयात् प्राप्नुयाः प्रामुयाम् द्विवचन : प्राप्नुयाताम् प्राप्नुयातम् प्राप्नुयाव बहुवचन : प्राप्नुयुः प्रामुयात प्राप्नुयाम लूट-भविष्यत्काल (Future Tense)। एकवचन प्राप्स्यति प्राप्स्यसि प्राप्स्यामि द्विवचन प्राप्स्यतः प्राप्यथः प्राप्स्यावः बहुवचन.. प्राप्स्यथ प्राप्स्यामः लिट्-अतीतकाल (Past Tense)। एकवचन प्राप प्रापिथ प्राप प्रापथुः प्रापिव वहुवचन प्रापुः प्राप प्रापिम Exercise XXVI. 1. Translate into Sanskrit:- I get this book from my father. Let the beggars get some food from "me. We got money there. Intelligent boys should get prizes. You will also get a prize. You got the object of our desire (arfo फल). Shall we get the object of your desire? Does he get money from you? Did the boy get sweets from his mother? 2. Correct :-शिशुवः मोदक- प्रामोति। वयमेतत् प्रामुवानि । त्वमिदं प्रामोत् । अहमेतत् प्रामुयात् । वयमेतत् प्राप्स्ययः । वाविद प्रापथुः। त्यज धातु-त्यजना; छोड़ना ( To give up)| लट्-वर्तमानकाल (Present Tense) | मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन त्यजति त्यजसि त्यजामि द्विवचन त्यजतः त्यजथः त्यजाव: बहुवचन त्यजन्ति त्यजथ त्यजामः प्रथमपुरुष धातुरूप। १४५ लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood )। प्रथमपुरुप मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन त्यजतु, त्यजतात् त्यज, त्यजतात् त्यजानि द्विवचन त्यजताम् त्यजतम् त्यजाव बहुवचन त्यजन्तु त्यजत त्यजाम ल-अतीतकाल (Past Tense) | एकवचन अत्यजत् अत्यजः अत्यजम् द्विवचन अत्यजताम् अत्यजतम् अत्यजाव बहुवचन अत्यजन् प्रत्यजत अत्यजाम विधिलिड-(Potential Mood ) | एकवचन त्यजेत त्यजे त्यजेयम् द्विवचन त्यजेताम् त्यजेतम् त्यजेव बहुवचन त्यजेयुः त्यजेत त्यजेम लूटू-भविष्यत्काल ( Future Tense )। एकवचन त्यक्ष्यति त्यक्ष्यसि त्यक्ष्यामि द्विवचन त्यक्ष्यतः त्यक्ष्यथ: त्यक्ष्याव: बहुवचन त्यक्ष्यन्ति त्यक्ष्यथ त्यक्ष्यामः लिट-अतीतकाल ( Past Tense ) । एकवचन तत्याज तत्यजिथ, तत्यकथ तत्याज, तत्यज द्विवचन तत्यजतुः तत्यजथुः तत्यजिव बहुवचन तत्यजुः तत्यज. तत्यजिम Exercise XXVII. 1. Translate into Sanskrit:-Good students give up bad. Company (प्रसत्संग). Let them give up their bad habit. We two gave up your bad company, You two should give up your bad habit. These boys will give up my company. The four women gave up all hope of success (कार्यसिद्धराशा). १० १४६ उपक्रमणिका। द्विवचन हतः बहुवचन नन्ति जहि, हतात् द्विवचन हताम् Will you give me up ? Does a good student leave his teacher ? Did he give up bad company ? 2. Correct:-आवां तान् न त्यसन्ति । ते नीचा प्रवृत्ति त्यजानि । इमे नार्य त्वमत्यजत् । यूयमसत्संगं त्यजेत् । नराःघनाणं न त्यक्षति । ते दुराश तत्याज । सुशील शिष्याः गुरुं न त्यजेत् । हन् धातु-बध करना; मारना (To kill)। लट-वर्तमानकाल ( Present Tense)| प्रथमपुरुप मध्यमपुरुप उत्तमपुरुप एकवचन हन्ति हन्सि हन्मि हथ: हन्वः हथ हन्म: लोट-अनुज्ञा ( Imperative Mood ) । एकवचन हन्तु, हतात् हनानि हतम् हनाव बहुवचन घन्तु हत हनाम लड-अतीतकाल ( Past Tense)| एकवचन अहन् अहन् अहनम् अहतम् यन्व बहुवचन अनन् अहत अहन्म विधिलिङ्-( Potential Mood )। एकवचन हन्यात् हन्या: हन्याम् द्विवचन हन्याताम् हन्यातम् हन्याव बहुवचन हन्युः हन्यात हन्याम लट्-भविष्यत्काल ( Future Tense )। एकवचन हनिष्यति हनिष्यसि हनिष्यामि द्विवचन हनिष्यतः हनिष्यथः हनिष्याव: बहुवचन हनिष्यन्ति हनिष्यथ हनिष्यामः द्विवचन अहताम् .

कर्तृवाच्य । लिट्-अतीतकाल ( Past Tense). प्रथमपुरुष मध्यमपुरुष उत्तमपुरुष एकवचन जघान जघनिथ, जघन्थ जघान द्विवचन जनतुः जनथुः जनिव. बहुवचन जनुः जनिम Exercise XXVIII. 1. Translate into Sanskrit:-Do not kill any living being. . Oruel men kill animals tor pleasure. This wicked boy killed the young ones of a bird. You must not kill this worm. They two will not bill this bird. Rem killed Ravan in the battle. Do you. kill a bird ? Who killed Indrajit ? Will they kill any animal? Does the lion kill & small boast for food ? 2. Ourrects:-वयं किमपि जीव न हन्ति । भवान् शत्रून जहि । न ते पक्षी अहन् । अहं तं न हन्यात् । ते त्वं हनिष्यति । प्रबलाः निवलान् जन। कर्तृवाच्य। ( Active Voice.) कर्तृकारक में प्रथमा विभक्ति और कर्मकारक में द्वितीया विभक्ति हो तो उसको . कर्तृवाच्य-प्रयोग कहते हैं। यथा, कुम्भकारः घटङ्करोति (कुम्भकार घड़ा बनाता है ).। देवदत्तः प्रामङ्गच्छति ( देवदत्त गाँव को जाता है)। शिशुः पुस्तकं पठति (बालक पुस्तक पढ़ता है)। अश्वः जलं पिवति (घोड़ा जल - पीता है)। कर्तृवाच्य में कर्ता का जो वचन होता है, क्रिया में भी वही वचन होता है । अर्थात्, कर्ता एकवचनान्त होने से क्रिया में एक- वचन होता है; कर्ता द्विवचनान्त होने से क्रिया में द्विवचन होता है; कर्ता बहुवचनान्त होने से क्रिया में बहुवचन होता है । यथा, उपक्रमणिका। कुम्भकारः घटङ्करोति, कुम्भकारौ घटं कुरुतः, कुम्भकाराः घटं कुर्च- न्ति; शिशुः पुस्तकं पठति, शिशु पुस्तकं पठतः, शिशवः पुस्तकं पठिन्त। कर्मवाच्य (Passive Voice.) कर्तृकारक में तृतीया विभक्ति और कर्मकारक में प्रथमा विभक्ति हो तो उसको कर्मवाच्य-प्रयोग कहते हैं। यथा, कुम्भकारेण घटः क्रियते* (कुम्हार के द्वारा घड़ा बनाया जाता है), शिष्येण गुरुः पृच्छयते । (शिष्य से गुरु पूछे जाते हैं, अर्थात् शिष्य गुरु से पूछता है), मया चन्द्रः दृश्यते (मुझसे चन्द्रमा देखा जाता है, अर्थात् में चन्द्रमा को देखता हूँ )। कर्तृवाच्य में जैसा कता के वचन के अनुसार क्रिया का वचन होता है, कर्मवाच्य के प्रयोग में वैसा नहीं होता । कर्मवाच्य में कर्म का जो पुरुप और जो वचन होता है, क्रिया में भी वही पुरुप और वही वचन होता है। यथा, कुम्भकारेण घटः क्रियते, कुम्भकारेण घटौ क्रियेते, कुम्भकारेण घटाः क्रियन्ते; शिष्येण गुरुः पृच्छयते, शिष्येण गुरू पृच्छयेते, शिष्येण गुरवः पृच्छयन्ते । तेन त्वं पृच्छयसे, तेन युवां पृच्छयेथे, तेन यूयं पृच्छयध्वे इत्यादि क्रमसे। भाववाच्य ( Impersonal Passive Voice)| जहाँ कर्तृकारक में तृतीया विभक्ति होती है और कर्मपद नहीं रहता उसे भाववाच्य-प्रयोग कहते हैं सदा अकर्मक धातु से ही होता है। भाववाच्य की क्रिया कर्मवाच्य की क्रिया के सदृश है, परन्तु सदा प्रथम पुरुप के एकवचन में होती है। * कर्मवाच्य और भाववाच्य में धातु आत्मनेपदी हो जाता है और लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ्, इन धार विभक्तियों में धातु के उमर "" + कर्मवाच्य और भाववाच्य में "य" का आगम होने से प्रच्छ धातु के स्थान में पृच्छ, ग्रह के स्थान में गृह, यू के स्थान में उच्, वह के स्थान में उह, तथा वद् के स्थान में उद् होता है और दा, घां, मो, गा (गै)हा था और पा (पानार्थक) धातुओं के "आ" के स्थान में होता है। का पागम होता है।

- णिजन्त धातु । सन्नन्त धातु । यथा, मया स्थीयते (मैं स्थित हूँ), आवाभ्यां स्थीयते.(हम दोनों स्थित हैं), अस्माभिः स्थीयते (हम सब स्थित है)। त्वया स्थीयते, युवाभ्यां स्थीयते, युष्माभिः स्थीयते इत्यादि । णिजन्त धातु। (Causative Verbs.) प्रेरण-अर्थ में धातु के उत्तर "णि" प्रत्यय होता है। "णिच" का केवल "इ" रहता है। णिजन्त धातु प्रायः उभयपदी होते हैं। "णिच" प्रत्यय के योग से धातुओं के रूप ऐसे होते हैं:-पत् + णिच् =पाति; चल + णिच्चालि; वह + णिच् =वाहि; लन् + णिच् =जनि; दृश् + णिच्=दर्शि; गम् + णिच् गमि; स्था+णिच स्थापि; ज्ञा+णिच् शापि; पा+णिच-पायि, पालि; श्रु+णिच् =श्रावि; कृ+ णिच् = कारिह+णिच हारि; हन् +णिच धाति इत्यादि । णिच प्रत्यय से जो धातु बनते हैं वे स्वतन्त्र धातु में गिने जाते हैं। णिजन्तु धातुओं के रूप भक्ष् धातु के तुल्य होते हैं । यथा, कृ+ णिच% कारि; कारयति, कारयतः कारयन्ति इत्यादि । करोति = करता है (He does), कारयति=कराता है (He causes or makes to do) i सन्नन्त धातु। (Desiderative Verbs.) इच्छा-अर्थ में धातु के उत्तर "सन्” प्रत्यय होता है। "सन्" प्रत्यय का केवल "स" रहता है। "सन्" प्रत्यय से धातु के आकार में परिवर्तन होता है । यथा, पा+सन् =पिपास; स्था+ सन्-तिष्ठास; ज्ञा+सन्-जिज्ञास; दा+सन् दिदित्स; रुद् +सन् =हरुदिष; ग्रह +सन् = जिगृक्ष प्रच्छ +सन्-पिपृच्छिष; गम् +सन् =जिगमिष; कृ+सन् =चिकीर्ष; दृश+सन् = दिदृक्ष श्रु+सन् =शुश्रुष, हन् +सन् =जिघांस इत्यादि।

१५० उपक्रमणिका। सन् प्रत्यय से बना हुआ धातु स्वतन्त्र धातुओं में गिना जाता है; परन्तु सन्नन्त धातु मूल धातु के अनुसार परस्मैपदी, आत्मने- पदी अथवा उभयपदी होते हैं। यथा, परस्मैपदी गम् + सन् - जिगमिप धातु, लट्-जिगमिपति, जिगमिपतः, जिगमिपन्ति इत्यादि । गच्छति =जाता है (He goes) निगमिपति = जाने के लिये इच्छा करता है ( He wishes to go)। यङन्त धातु। ( Frequentative Verbs.) पौनःपुन्य (वारवार) और अतिशय अर्थ में किसी किसी धातु के उत्तर अर्थात् प्रायः एक स्वरवाले तथा हलादि धातुओं से "यङ् प्रत्यय होता है । "यह का केवल "य" रहता है। यहन्त धातु आत्मनेपदी होते हैं। यथा, गम् + यह जङ्गम्यते (वारवार जाता है), रुद् + य-रोग्द्यते (बारबारे रोता है), कृ+ यह चेक्रोयते (वारवार करता है) इत्यादि । कृदन्त, कृत्-प्रत्यय। (Verbal Affixes.) धातु के उत्तर तुम् (तुमुन), क्त्वा आदि जो प्रत्यय होते उन्हीं को कृत्-प्रत्यय कहते हैं । कृन-प्रत्यय से जो शब्द बनते हैं. वे प्रायः क्रिया के तुल्य अर्थ प्रकाश करते हैं। कृत्-प्रत्यय अनेक हैं, उनमें से कईएक का विषय संक्षेप में लिखा जाता है- तुम (तुमुन्)। (Infinitive Suffix.) निमित्त अर्थ में धातु के उत्तर तुम् (तुमुन् ), प्रत्यय होता है। यथा, दा+तुम् =दातुम् ( देने के निमित्त), स्था+तुम् = स्थातुम् (रहने के निमित्त), पा+तुम् = पातुम् (पीने के निमित्त), हन + तुम् =हन्तुम् (वध करने के लिए), गम् +तुम् -गन्तुम् (जाने के निमित्त), ग्रह +तुम्-ग्रहीतुम् (ग्रहण करने के निमित्त ), कृ+तुम् = कत्तुम् ( करने के लिये ), वच् + तुम् =वक्तुम् अथवा ब+तुम् = वक्तुम् ( कहने के लिये), जि+ . १५१ कृदन्त, कृत्-प्रत्यय । * तुम्जेतुम् ( जय करने के निमिच ), श+तुम् = द्रष्टुम् । (देखने के लिये), चिन्ति + तुम्चिन्तयितुम् (चिन्ता करने के लिये), मुज्+तुम् = भोक्तुम् (खाने के निमित्त) इत्यादि । (त्व, क्त्वा)।- अनंतर अर्थ में धातु के उत्तर त्वा प्रत्यय, होता है। यथा, कृत्वा-कृत्वा (करके, करणानन्तर), जि+त्वा-जित्वा (जीतकर, जय के अनन्तर), गम् +वागत्वा (जाकर, गमनानन्तर), भुज + त्वा भुक्त्वा (खाकर, भोजनानन्तर), दृश्+त्यादृष्ट्वा (देखकर, दर्शनानन्तर), दा+वा-दत्त्वा (देकर, दानानन्तर), पा+वा-पीत्वा (पीकर, पानानन्तर); चिन्तित्वा-चिन्त- यित्वा (चिन्ता करके, चिन्तनानन्तर), वच् + त्वा अथवा + वा-उक्त्वा (कहकर, कथनानन्तर), ग्रह + त्वा-गृहीत्वा (लेकर ग्रहणानन्तर) इत्यादि। यप (ल्या) यदि धातु के पूर्व में उपसर्ग रहे, तो अनन्तर अर्थ में धातु के उत्तर यप् (ल्यप) प्रत्यय में बदल जाता है । यप (ल्यप) प्रत्यय का केवल "य" रह जाता है। यथा, .श्रा+दा+यप = आदाय (ग्रहण करके, ग्रहणानन्तर), आ + गम् + यप आगम्य, आगत्य (श्राकर, आगमनानन्तर), श्रा+हन् + यप आहत्य (मारकर, आघातानन्तर), वि + जि+यप-विजित्य (जीतकर, जयानन्तर), सं+स्मृझ्यप-संस्मृत्य (स्मरण करके, स्मरणानन्तर), प्र+नन् । यप-प्रणम्य, प्रणत्य (प्रणाम करके, प्रणामानन्तर)। तुम्, त्वा और यप् प्रत्ययों से वने हुए शब्द अव्यय हैं; इसलिये इनके उत्तर विभिक्ति नहीं होती। वे असमापिका क्रिया हैं। तव्य, अनीय, य। भविष्यकाल में धातु के उत्तर कर्मवाच्य और भाववाच्य में तव्य, अनीय और य, ये तीन प्रत्यय होते हैं। इन प्रत्ययों से - १५२ उपक्रमणिका १ - जो शब्द बनते हैं उनके रूप पुलिङ्ग में गल, स्त्रीलिङ्ग में लता, और लीवलिङ्ग में फल शब्द के सदृश होते हैं। स्वरान्त धातु यन् और हलंत धातु से ण्यत् प्रत्यय होता है और दोनों काय भाग अवशिष्ट रहता है, किन्तु य स्वतंत्र प्रत्यय नहीं है। 'तव्य, 'मनीय, 'य' प्रत्ययों के योग से कहीं कहीं धातु का आकार ज्यों का त्यों रहता है और कहीं कहीं कुछ बदल जाता । यथा, दा धातु-तव्य, दातव्यम्: अनोय, दानीयम, य, देयम् । जि-जेतव्यम्, जयनीयम, जेयम् । शी-शयितव्यम् शयनीयम्, शेयम् । श्रु-श्रोतव्यम्, श्रवणीयम, श्रव्यम् । भू-- भवितव्यम, भवनीयम्, भव्यम् । कृ कर्त्तव्यम्, करणीयम्, कार्य्यम् । ग्रह-प्रहीतव्यम् , ग्रहणीयम् , ग्राह्यम् । गम्-गन्तव्यम गमनीयम्, गम्यम् । हरा-द्रष्टव्यम्, दशनीयम, दृश्यम् । वच- वक्तव्यम्, वचनीयम्, वाच्यम् । भुज-भोक्तव्यम, भोजनीयम, भोज्यम् । चिन्ति-चिन्तयितव्यम्, चिन्तनीयम, चिन्त्यम् । सह -सोढव्यम्, सहनीयम्, सह्यम् । कम्मवाच्य में तव्य, अनीय और य प्रत्यय करने से जो शब्द वनने हैं, वे कर्म के विशेषण होते हैं । इसलिये कर्मपद में जो लिङ्ग, विभक्ति और वचन होते हैं वे ही लिङ्ग, विमक्ति और वचन उन शब्दों में भी होते हैं । यथा, पठ् धातु-अनीय, मया ग्रन्थः पठनीयः, मया पत्रिका पठनीया; मया पुस्तक पठनीयम् । पठनीयः ग्रन्थः, पठनोयेन ग्रन्थेन, पठनीयाय ग्रन्याय, पठनीयात् ग्रन्थात, पठनीयस्य, ग्रन्थस्य, पठनीये ग्रन्थे, पठनीययोः ग्रन्थयोः, पठनीयेषु ग्रन्थेषु । भाववाच्य में तव्य, अनीय और य प्रत्यय करने से जो शब्द बनते हैं, उनके रूप अकारान्त कोवलिङ्ग शब्द को प्रथमा विभक्ति के एकवचन के तुल्य होते हैं । यथा, स्था धातु-तव्य मया स्थातव्यम् ( मैं रहूँगा ); क्रोड धातु-तन्य, त्वया क्रीडितव्यम् (तुम खेलोगे); लन्न धातु तव्या तेन लन्नितन्यम् (वह लजित होगा)।

कृदन्त, कृत्-प्रत्यय। १५३ ( Affixes forming Sanskrit Present Participles.) शत * और शानच् । कर्तृवाच्य में परस्मैपदी धातुं के उत्तर वर्तमानकाल में शत और आत्मनेपदी धातु के उत्तर वर्तमानकाल में शानचू. प्रत्यय होता है। "शतृ" का "अत्" और "शानच" का "न" रहता है। यथा, गम्+शतृ-गच्छत्, स्था+श तिष्ठत्, दृश+ शत-पश्यत, ज्ञा+श-जानत्, ग्रह शत-गृहत्, कृ+शत- कुर्वत्, दाशतृन्ददन्, कृशानच-कुर्वाणः, दा+शानच = ददाना, शानच-ब्रुवाणः। कर्तृवाच्य में उभयपदी धातु के उत्तर वर्तमानकाल में शतृ और शानच ये दोनों प्रत्यय होते हैं । यथा, कृ+शत-कुर्वत्, कृ+शानच-कुर्वाणः। कर्मवाच्य में धातु आत्मनेपदी होते हैं, इसलिए कम्मैवाच्य में धातु के उत्तर वर्तमानकाल में केवल शानच प्रत्यय होता है; और "शानच" के स्थान में "मान" होता है । येथा, दा+शानच =दीयमानः, पा+शानच-पीयमानः, दृश+शानच-दृश्यमानः,हन्+ शानच हन्यमानः। * शतृ प्रत्यय में धातु का रूप लट की अन्ति विभक्ति के रूप के तुल्प होता है, केवल "अन्ति" के "न्ति" स्थान में "त्' होता है, इतना ही प्रमेद है। सथा, गम्+अन्तिगच्छन्ति, गम्+शतृ गच्छत् । यदि पूर्व कालिक (प्रधान) तया उत्तरकालिक (प्रधान) क्रियाओं के कार्य एक ही समय में सम्पन्न होते हों तो पूर्वकालिक क्रिया शतृ अथवा शानच प्रत्यय से बनती है । यथा, स नृत्यन् श्रआयाति (वह नाचता हुआ.आता है। यहाँ "नाचना" और "पाना" इन दोनों क्रियाओं के कार्य एक ही समय में सम्पन्न होते हैं। परन्तु यदि पूर्वकालिक क्रिया का कार्य उत्तरकालिक क्रिया के कार्य के पहले सम्पस हो तो पूर्वकालिक किया क्त्व का ल्यप् प्रत्यय से बनती है। यथा, स गृहं गत्वा मामपश्यत् (घरं आकर उसने मुझे उपक्रमणिका। के शत और शानच् प्रत्यय से बने हुए शब्द विशेषण होते हैं, इसलिए ये विशेष्य के लिङ्ग, विभक्ति और वचन को प्राप्त होते हैं। यथा, पश्यन् पुरुषः, पश्यन्तं पुरुषम्, पश्यता पुरुपेण; पश्यन्तौ पुरुषौ, पश्यन्तः पुरुषाः ; गच्छन्ती स्त्री, गच्छन्ती स्त्रियम्, गच्छन्त्या स्त्रियाः; पतत् फलम्, पतता फलेन, पतता फलानाम् इत्यादि। (क्तवतु तवत्)। अतीतकाल में धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में क्तवतु प्रत्यय होता है । क्तवतु प्रत्यय का तवत् रहता है । क्तवतु प्रत्यय करने से जो शब्द सिद्ध होता है वह विशेषण होता है; इसलिए उसके विशेष्य का जो लिङ्ग, विभक्ति या वचन होता है वही लिङ्ग, विभक्ति या वचन उन शब्दों में भी होता है। इन शब्दों के रूप पुंलिङ्ग, और क्लीवलिङ्ग में श्रीमत् शब्द तुल्य और स्त्रीलिङ्ग में नदी शब्द के तुल्य होते हैं। यथा, जि धातु+ क्तवतु जितवत् ; पुंलिङ्ग, जितवान्, जितवन्ती, जितवन्तः; क्लीवलिङ्ग, जितवत्, जितवती, जितवन्ति; स्त्रीलिङ्ग, जितवती, जितवत्यौ जितवत्यः । रामो रावणं जितवान (राम ने रावण को देखा अर्थात् वह पहले घर गया तब उसने मुझे देखा)। यहाँ आने का कार्य देखने के कार्य से पहले सम्पन्न हुआ, इसलिए गम् धातु के उत्तर शतृ न होकर क्त्वा हुआ है। अँगरेज़ी "Present Participle" का संस्कृत अनुवाद प्रायः शतृ और शानच् प्रत्ययान्त पद से किया जाता है, किन्तु कभी कभी क्त्वा और ल्यप् प्रत्ययान्त पद से भी करना होता है। ' यथा, He comes dancing-स नृड्यन् श्रायाठि, See him running- धावन्तं ( धावमानं वा ) तं पश्य, Going there he said-तत्र गरबा सउवाच। . किसी किसी धातु के उत्तर "शानच्" के "पान" के स्थान में "मान" होता है। यथा, सेव+शानव-सेवमानः, विद्+शान-विद्यमानः,{+ शान=नियमावः इत्यादि । पास् धातु के उत्तर "शानच्" के "पान" के स्थान में "ईन" होता है। यथा, आस्+शानचासीनः ।, कृदन्त, कृत्-प्रत्यय। १५५ जीवा)। श्रु धातु, अहं शास्त्रं श्रुतवान् ( मैंने शास्त्र सुना)। कृ धातु, स किं कृतवान् (उसने क्या किया)। इसी प्रकार, स्था धातु, स्थितवान्, दा धातु दत्तवान् ; गम् धातु, गतवान् । हन् धातु, हतवान् ; ग्रह धातु, गृहीतवान्; दृश धातु, घटवान् ज्ञा धातु, ज्ञातवान् ; वच् धातु, अथवा ब्रू धातु उक्तवान् । भुज धातु, मुक्तवान् ; चिन्ति धातु, चिन्तितवान् । - क्त (त)। अतीतकाल में धातु के उत्तर कर्मवाच्य में क्त प्रत्यय होता |क्त प्रत्यय का त रहता है। जि धातु+क्त=जितः; कृ धातु + ककृतः ; ग्रह.धातु+क्त गृहीतः; दा घातु+क्त दत्ता, हश धातु+क्त-हटः; ज्ञा धातु+क्त-ज्ञातः; श्रु धातु+क्त-श्रुतः; बच् धातु+क्त, अथवा व धातु+क्त-उक्तः । कर्मवाच्य में क्त प्रत्यय करने पर जो शब्द सिद्ध होता है वह कर्म का विशेषण होता है; इसलिये कर्म के जो लिङ्गादि होते हैं वे.ही .लिङ्गादि उन शब्दों के भी होते हैं। क्त प्रत्यय करने से जो शब्द बनते हैं उनके रूप पुंलिङ्ग में गज शब्द के सघश, कीवलिङ्ग में फल शब्द के समान, स्त्रीलिङ्ग में लता शब्द के तुल्य होते हैं । यथा, पठ् धातु+क्त = पठित, तेन ग्रन्थः पठितः (उसने ग्रन्थ पढ़ा)। तेन पत्रिका पठिता (उसने पत्रिका पढ़ी)। तेन पुस्तकं पठितम् ( उसने पुस्तक पढ़ी)। अकर्मक धातु के उत्तर और गम, रुह आदि कईएक सकर्मक धातुओं के उत्तर कर्तृवाच्य में भी क्त प्रत्यय होता है । कर्तृवाच्य में क्त प्रत्यय करने से जो शब्द सिद्ध होता है वह कर्ता का विशेपण होता है । यथा, मृ धातु, पुरुषोमृतः (पुरुष मर गया), स्त्री मृता. (स्त्री मर गई ); अपत्यं मृतम् (सन्तान मर गयी)। भू धातु, भूतः ; स्था धातु, स्थितः ; भी धातु, भीतः, जागृ धातु, जागरितः; गम् धातु, गतः; स गृहं गतः (वह घर गया); रुह घातु, रूढः; वानरो वृक्षमारूढः (वानर वृक्ष पर चढ़ गया)।

उपक्रमणिका। अकर्मक और कर्म की अविवक्षासे जोसकर्मकभी अकर्मक हैं दोनों धातुओं के उत्तर भाववाच्य में भी क्त प्रत्यय होता है। भाववाच्य में क्त प्रत्यय करने से जो शब्द सिद्ध होते हैं, उनके रूप सदा क्लीवलिङ्ग की प्रथमा विभक्ति के एकवचन के सहश होते हैं। यथा, मया जितम् (मैने जीता); तेन कुत्र स्थितम् ( वह कहाँ रहा); त्वया दृष्टम् (तुमने देखा); शिशुना रुदितम् (लड़के ने रोदन किया); मया भुक्तम् (मैंने खाया ); तेन जागरितम् (वह जागा); चौरेण पलायितम् (चोर भागा)। क्ति (क्तिन्)। भाववाच्य में धातु के उत्तर क्ति प्रत्यय होता है। "क्कि" प्रत्यय का "ति" रहता है। क्ति प्रत्ययान्त शब्द बोलिङ्ग होते हैं। और इनके रूप मति शब्द के सदृश होते हैं । यथा, ख्या + क्ति= ख्यातिः, स्था+क्ति-स्थितिः, नी+क्ति-नीतिः, प्री+क्ति- प्रीतिः, भी+क्ति भीतिः श्रु+क्ति-श्रुतिः, कृ +क्ति कृतिः, स्मृ + क्तिस्मृतिः, शक + क्ति-शक्तिः, मुच् + क्ति = मुक्तिः, वच अथवा ब+क्ति =उक्तिः, भज् + क्ति भक्तिः, युज् +क्ति- युक्तिः, सृज.+क्ति-सृष्टिः बुध + क्ति-बुद्धिः, मन् + क्ति = मतिः, स्वप + क्ति =सुप्तिः, गम् +क्ति-गतिः, शम् +क्ति =शान्तिः, दृश् +क्ति = दृष्टिः, वृप् + तिवृष्टिः । एनुल अथवा एक कर्तृवाच्य में धातु के उत्तर एक प्रत्यय होता है। "णक" तथा 'एवुल" का "अक" रहता है। यथा, नो + णक= नायका; ऐसे ही-क, कारकः; स्मृ, स्मारकः; नश, नाशकः; पच्, पाचका; मुच, मोचका; हन् , घातकः; दा, दायका, गा (गै), गायका; ग्रह, ग्राहका, पू, पावकः; जनि, जनकः; पालि, पालकः। तृच् (तन्) कर्तृवाच्य में धातु के उत्तर तृच्. (तुन् ) प्रत्यय होता है। "तृच (तन)" का "तृ" रहता है। यथा, दा+तृच्दातृ-- १५७ कृदन्त, कृत्-प्रत्यय। दाता; ऐसे-मा, मातृ-माता; जि, जेतुं-जेता; नी, नेतृ- नेता श्रु, श्रोत-श्रोता; क, कर्तृ-कर्ता; हू, हर्तृ-हर्ता धा, धात-घाता; हन्, हन्तु हन्ता; गम्, गन्तु-नान्ता । पिन (णिनि)। कर्तृवाच्य में धातु के उत्तर णिन् प्रत्यय होता है । "णिन्" का "इन्" रहता है। यथा, गम् + णिन्यामिन्-गामी; ऐसे- दा, दायिन्-दायी; या, यायिन्यायी; स्था, स्थायिन्-स्थायी कृ, कारिन्–कारी; हन् , घातिन्-घाती; वद्, वादिन्-वादी । ल्युट तथा अन। भाववाच्य में धातु के उत्तर अन प्रत्यय होता है । ल्युट् का यु रहता है उसको अन होता है और यह अन प्रत्ययान्त शब्द कोवलिङ्ग होता है। यथा, गम् + अन गमनम्; ऐसे-भुज, भोजनम् पत्, पतनम्। भक्ष् , भक्षणम्; तूप, तर्पणम्, पा, पानम्। दा, दानम् ; गा (न), गानम्; ज्ञा, ज्ञानम्; स्ना, स्नानम्। श्रु, श्रवणम्। कृ, करणम् मृ, मरणम् स्मृ, स्मरणम् दृश, दर्शनम् ; रुद्, रोदनम्। किसी किसी धातु के उत्तर कर्तृवाच्य में भी अन प्रत्यये होता है या ल्यु इसका यु शेष रहता है उसको अन होता है पाणिनि के अनुसार । और यह अन प्रत्ययान्त शब्द क्लोवलिङ्ग नहीं होता। यथा, नन्द, नन्दनः; शोभ, शोमनः; सह, सहनः, तप, तपनः; क्रुध, क्रोधना; मंडि, मंडना; दह, दहनः । अनट् तथा ल्यु। करण तथा अधिकरण अर्थ में घातु के उत्तर अंनट प्रत्यय होता है । "अनद" का "अन" रहता है । अनट प्रत्ययान्ते शब्द क्लीवलिङ्ग होते हैं । यथा, नी+अनट् =नयनम्; ऐसे ही-या, यानम् भूष,भूषणम् शी, शयनम् भू, भवनम् आस्, श्रासनम् । घन, अल कर्तृवाच्यको छोड़कर दूसरे वाच्यों में धातु के उत्तर घ और अल् प्रत्यय होता है । "घन' और "अल" का "अ" रहता है। ।

. १५८ उपक्रमणिका। घन्म और अल प्रत्ययान्त शब्द पुंलिङ्ग होते हैं; केवल भय, पद, ये दो अल प्रत्ययान्त शब्द क्लीवलिङ्ग है; परन्तु पाणिनि के मत से यह दोनों यथाक्रम अच् और घ प्रत्ययान्त हैं । यथा, पच् + घम्=पाकः; ऐसे ही-त्यज, त्यागः ; नश, नाशः शुच, शोकः; भुज, भोगः; वस, वासः ; दह, दाहः । हू, हारः । जि+अल = जयः, ऐसे ही-क्षि, क्षयः ; भी, भयम्; पाणिनि के मत से यहाँ तीनों में अल ही प्रत्यय होता है और रु, स्तु, भू, इत्यादि उकारान्त धातुओं से अय प्रत्यय होता है । रु, रवः; स्तु, स्तवः ; भू, भवः; क्रुध, क्रोधः ; रुप, रोपः; कुप, कोपः; वुध, वोधः ; भिद, भेदः; .. हष, हर्पः। समास। (Compounds.) विभक्तिहीन शब्द को नाम कहते हैं । वही नाम विभक्तियुक्त होने से पद कहा जाता है। वृक्ष, गिरि, पशु, भ्रातृ श्रादि शब्दों में विभक्ति नहीं है, इस अवस्था में इनको नाम. कहते हैं । वृक्षः, वृक्षौ, वृक्षाः; गिरिः, गिरी, गिरयः; पशुः, पशु, पशवः; भ्राता, भ्रातरौ, भ्रातरः; ये सब शब्द विभक्तियुक्त हैं, इसलिये इन शब्दों को नाम न कहकर पद कहते हैं। प्रत्येक पद के अन्त में एक एक विभक्ति रहती है । कभी कमी दो तीन पद इकट्ठे हो जाते हैं तो सभी पदों की विभक्ति का लोप हो जाता है और ये सब विभक्तिहीन पद एकत्रित होकर एक शब्द वन जाता है; पश्चात् उसमें नयी विभक्ति दी जाती है। यथा, सुशीलवालकः, पहले सुशीलः बालकः ऐसा रूप था; परन्तु दो पदों को योग करने से सुशील बालकः हुआ। योग होने के कारण सुशीलः और वालकः, इन दोनों पदों की प्रथमा विभक्ति का लोप होने से सुशील वालक ऐसा विभक्तिहीन शब्द हुआ। तव उसमें प्रथमा विभक्ति का योग होने से सुशीलवालकः ऐसा पद हुआ। एकपदीभावः समासः लुक विभकः ।

समासा १५९ इसी प्रकार दो वा अनेक पदों के एकपदीभाव को अर्थात एकपद होजाने को समास* कहते हैं । समास छः प्रकार के हैं। कर्मधारय, तत्पुरुप, द्वन्द्व, वहुव्रीहि, द्विगु और अव्ययीभाव । कर्मधारय । (Appositional Compounds.) विशेषण और विशेष्य पदों का जो समास होता है, उसका नाम कर्मधारय है। यथा, उन्नतः तरुः, उन्नततरु; नीलम् उत्पलम्, नीलोत्पलम्; गभीरः कूपः, गभीरंकूपः; सुन्दरः पुरुषः, सुन्दरपुरुषः। यदि विशेषण और विशेष्य स्त्रीलिङ्ग हों तो विशेषण शब्द पुंलिङ्ग के समान हो जाता है, अर्थात् आकार, ईकार आदि स्त्रीलिङ्ग शब्द के जो चिह्न हैं वे नहीं रहते । यथा, दीर्घा यष्टिः, दीर्घयष्टिः ; जीर्णा तरिः, जीर्णतरिः; सती प्रवृत्तिः, सत्प्रवृत्तिः । जिस कर्मधारय समास में मध्यस्थित पद का लोप होता है, उसे मध्यपदलोपी कर्मधारय समास कहते हैं। यथा, शाल्मलीनामा तरुः, शाल्मलीतरुः; काष्ठनिर्मितम् आसनम्, काष्ठासनम्, कैलासनामको गिरिः कैलासगिरिः इत्यादि । तत्पुरुप। (Determinative Compounds.) पूर्वपद द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, पठी और सप्तमी, इनमें से किसी विभक्तियुक्त पूर्वपद हो, और परपद प्रथमा विभक्तियुक्त हो तो ऐसे दो पदों का जो समास होता है उसको तत्पुरुष समास कहते हैं । पूर्वपद द्वितीया विभक्तियुक्त होने से उसको द्वितीया- तत्पुरुष समास कहते हैं । यथा, गृहं गतः, गृहगता, सुखं प्राप्तः, सुखप्राप्तः, कृष्णम् श्रितः, कृष्णश्रितः, विस्मयम् आपन्नः, विस्मयापन्नः। * समासः प्रातिपदिकानि ।

उपक्रमणिका। पूर्वपद तृतीया विभक्तियुक्त होने से, उसको तृतीया तत्पुरुप समास कहते हैं। यथा, लोभेन जितः, लोभलितः; शीतेन ऋतः, शीतात; धनेन हीनः, धनहोनः; जलेन सिक्तः, जल- सिक्तः ; अग्निना दग्धः, अग्निदग्धः, पित्रा दत्तम्, पितृदत्तम् । पूर्वपद चतुर्थी विभक्तियुक्त होने से, उसको चतुर्थी तत्पुरुष समास कहते हैं । यथा, धनाय लोमः, धनलोभः; यूपाय दारु, यूपदारु, गवे हितम्, गोहितम् । पूर्वपद पञ्चमो विभक्तियुक्त होने से, उसको पञ्चमी तत्पुरुप समास कहते हैं । यथा, व्याघात् भयम्, व्यानभयम्; सात् भीतः, सर्पमीतः; वृक्षात् पतितः घृक्षपतितः; राज्यात् च्युतः, राज्यच्युतः; स्वात् भ्रष्टः, स्वर्गभ्रष्टः; बन्धनात मुक्तः, वन्धन- मुक्तः, विदेशात् आगतः, विदेशागतः । पूर्वपद् षष्ठी विभक्तियुक्त होने से, उसको पष्ठी वत्पुरुप समास कहते हैं। यथा, वृक्षस्य शाखा, वृक्षशाखा; सुखस्य भोगः, सुखभोगा; अर्थस्य नाशः, अर्थनाशः; अग्नेः शिखा, अग्निशिखा; पयसः पानम्, पयःपानम्; राज्ञः पुत्रः, राजपुत्रः मम गृहम्, मद्गृहम्: नद्याः जलम्, नदीजलम् । पूर्वपद सप्तमी विभक्तियुक्त होने से उसको सप्तमी तत्पुरुष समास कहते हैं। यथा, जले मनः, जलमग्नः शास्त्रे प्रवीणः, शास्त्रप्रवीण, कवियु श्रेष्ठः, कविश्रेष्ठः; पुरुपेषु उत्तमः, पुरुषोत्तमः क्रीडायां कुशलः, क्रीडाकुशलः। सुबन्त पद के साथ नम् (न-अ, अन् *) का जो समास होता है उसे नन्-तत्पुरुष समास कहते हैं । यथा, न ब्राह्मणः, अब्राह्मण, न प्रियः, अप्रियः, न विकृतः, कविकृतः, न सिद्धः, असिद्धः; न उपलम्मः, अनुपलम्भः । * आदि में स्वरयुक्त सुवन्त पद परे रहे तो "नन्" के स्थान में "अन्" होता है ? और सब जगहों में "अ" होता है।

समास... १६१ धातु के साथ उपपदा का जो-समास होता है उसको. उपपद-तत्पुरुष समास कहते हैं । यथा, कुम्भं करोति यः, सः कुम्भकारः; तन्तून् वयति यः, सः तन्तुवायः; जले चरति यः, सः जलचर, शत्रु हुन्तीति, शत्रुघ्नः; जलं ददातीति, जलदः, धर्म जानाति यः, संः धर्मज्ञः; अप्सु जातं यत्, तत् अन्जम् । पवात् जातं यत् तत् पङ्कजम् ; पारं गच्छतीति, पारगः इत्यादि । द्वन्द्व समास। ('Copulative Compounds.) परस्पर विशेष्य विशेषण नहीं हो इस प्रकार के प्रथमा- विभक्तियुक्त दो अथवा अनेक पदों का जो समास होता उसका नाम द्वन्द्व समास है। यदि एकवचनान्त दो पदों में द्वन्द्व समास हो तो अन्त का पद द्विवचनान्त होता है और बहुपद समास में बहुवचनान्त होता है। अन्त के शब्द का जो लिङ्ग होता है, द्वन्द्व समास करने से भी वही लिङ्ग रहता है । यथा, रामश्च लक्ष्मणश्च तौ, रामलक्ष्मणौ; भीमश्च अर्जुनश्च तौ, भीमार्जुनौ; नदी च पर्वतश्च तौ, नदीपर्वतौ; फलञ्च पुष्पञ्च ते, फलपुष्पे; कन्दश्च मूलश्च फलश्च तानि, कन्दमूलफलानि; रूपश्च रसश्वगन्धश्च स्पर्शश्च शब्दश्च ते, रूपरसगन्धस्पर्शशब्दाः। इसको इतरेतर द्वन्द्व कहते हैं। कमी-कभी द्वन्द्व समास करने से अन्त का शब्द कोई लिङ्ग हो पर समस्त शब्द (अर्थात् समासनिष्पन्नं शब्द ) लीबलिङ्ग और एकवचनान्त हो जाता है। इसको समाहार द्वन्द्व कहते हैं। +जिन सुबन्त पदों के परवर्ती धातु के उत्तर कृत् प्रत्यय होता है उनको अपपद कहते हैं। कुम्मकार, यहाँ कुम्भम् इस उपपद के साथ कृधातु का समास होकर कुम्भकृहुआ, तब कुम्भश्रण-कुम्भकार हुआ है। ऐसे ही सब स्थानों में। ११ १६२ उपक्रमणिका। यथा, हंसाश्च. कोकिलाश्च, हंसकोकिलम'; पाणी च पादौ च, पाणिपादम् ; गावश्च महिपाश्च, गोमहियम् । वहुव्रीहि समास । (Relative or Attributive Compounds.) जिन पदों का समास किया जाय उन पदों का जो अर्थ उनका वोध न होकर यदि किसी दूसरी वस्तु या व्यक्ति का बोध हो तो उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। समास करने के समय बहुव्रीहि में यद् शब्द का एक पद अन्त में कहा जाता है। यथा, दीघौं बहू यस्य, सः दीर्घबाहुः (पुरुषः), इस स्थल में दीर्घ दो वाहु न समझ कर दीर्घबाहुविशिष्ट पुरुप का बोध होता है; निर्मलं जलं यस्याः, सा निम्मेलजला (नदी), यहाँ निर्मल जल नसमझ कर निर्मल जल सहित नदी का बोध होता है। यदि दो स्रोलिङ्ग पद में वहुव्रीहि समास हो तो पूर्वपद प्रायः पुंलिङ्ग हो जाता है अर्थात् स्त्रीलिङ्ग का चिह्न आकार ईकारादि नहीं रहता । यथा, निर्मला मतिर्यस्य, स निर्मल- मतिः, मृट्ठी गतिर्यस्य, स मृदुगतिः । वहुव्रीहि समासं करने से जो पद सिद्ध होता है वह प्रायः विशेषण होता है, इसलिए विशेष्य के लिङ्ग, विभक्ति और वचन को प्राम होता है। द्विगु समास । (Numeral Campounds.) जिसमें पूर्वपद संख्यावाचक शब्द हो और जिसमें समाहार बहुवचनान्त पशुपक्षिक्षुद्रजन्तुवाचक तथा फलतृणतरुवाचक शब्दों का विकल्प से समाहार होता है। यथा, हंसाश्च कोकिलाच, हंसकोकिलम्, पक्षे हंसकोकिलागावश्च महिपाश्चगोमहिपम् , पक्षे गोमहिपाः । पश्चादि और फलादिवाचक शब्द एकवचनान्त अथवा द्विवचनान्त होने से समा.. हार नहीं होता। यथा, हंसश्च वकश्च तो हंसवकी; हंसबकम नहीं होता।

संमास। १६३ रहे अर्थात् एक ही समय अनेक वस्तुओं का बोध हो उसको समाहार द्विगु कहते हैं। समाहार भिन्न अन्य अर्थ में भी द्विगु समास होता है। समाहार द्विगु करने से, किसी किसी स्थल में स्त्रीलिङ्ग और ई हो जाता है, किसी किसी स्थल में लीवलिङ्ग हो जाता है। यथा 'त्रयाणं लोकानां समाहारः, त्रिलोकी'; इस स्थल में स्त्रीलिङ्ग और ई हुआ है और त्रिलोकी कहने से एक समय में तीन लोकों का वोध होता है। त्रयाणां भुवनानां समाहारः, त्रिभुवनम् । अव्ययीभाव समास । ( Indeclinable Compounds.) सामीप्य, वीप्सा, अभाव, पय॑न्त, अनतिक्रम आदि अर्थ में जो समास होता है, उसका नाम अव्ययीभाव है। जिन पदों में समास होता है उनमें प्रथम पद प्रायः अव्यय शब्द रहता है । समास करने से अन्त का शब्द यदि अकारान्त हो तो उसका रूप पश्चमी के सिवाय और सव-विभक्तियों में अकारान्त वीवलिङ्गं शब्द की प्रथमा विभक्ति के एकवचन के सदृश होता है, परन्तु तृतीया और सप्तमी में दो दोरूप होते हैं । यथा, उपकूलम् उपकूलेन, उपकूले उपकूलम् । इसके सिवाय सव जगह अव्यय शब्द के. तुल्य होता है अर्थात् किसी विभक्ति का चिह्न नहीं रहता । यथा; कूलस्य समोपे, उपकूलम् ; गृहंगृहं प्रति, प्रतिगृहम् विनस्य अभावः, निर्विघ्नम्, समुद्रपर्यन्तम्, आसमुद्रम् ; . शक्तिमनतिक्रम्य, यथाशक्ति। तद्धित-प्रत्यय। (Nominal Affixes.) अर्थ विशेष में शब्द के उत्तर त, त्व, वत, मत् आदि प्रत्यय होते हैं, उन प्रत्ययों को तद्धित कहते हैं। तद्धित-प्रत्यय अनेक हैं, उनमें से कईएक का विषय संक्षेप में लिखा जाता है:- त (तल), त्व। भाव अर्थ बोध होने से प्रातिपदिक के उत्तर त (तल) .

१६४ उपक्रमणिका। और त्व प्रत्यय होता है । त (तल ) प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग और त्व प्रत्ययान्त शब्द क्लीवलिङ्ग होता है । यथा, प्रभुता, प्रभुत्वम् (प्रभु का भाव ); लघुता, लघुत्वम् (लघु का भाव)। पशुता, पशुत्वम् (पशु का भाव ); खलवा, खलत्वम् (खल का भाव)। इमन् (इमने) वा (इमनिच)। भाव अर्थ बोध होने से गुणवाचक प्रातिपदिक के उत्तर इमन (इमनि) प्रत्यय भी होता है। यथा, नील का भाव- नीलिमा, नीलत्वम, नीलता। लघु का भाव-लघिमा, लवु. त्वम्, लघुता । गुरु का भाव-गरिमा, गुरुत्वम्, गुरुता। ऐसे ही मृटु -म्रदिमा, मृदुत्वम, मृदुता । हद-द्रढिमा, दृढत्वम्, दृढता। प्रिय-प्रेमा, प्रियत्वम्, प्रियता। महत्-महिमा,महत्त्वम्, महचा। दीर्घ द्वाघिमा, दीर्घत्वम्, दीर्घता। इमन् प्रत्ययान्त शब्द पुंलिङ्ग होते हैं। वत् (वतिच ) वा वति । सादृश्य अर्थ वोध होने से प्रातिपदिक के उत्तर वत् (वतिच). होता है । यह वत (वतिच्) प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होता है। यथा, चन्द्रवत् (चन्द्र के सदृश); पितृवत् (पिता के सहश); मातृवत् (माता के सदश); पुत्रवत् ( पुत्र के सदरा); गुरुवत (गुरु के सहश)। मन् (मनुप्)। जिसका अथवा जिसमें है, इस अर्थ में प्रातिपदिक के उत्तर मत ( मतुप) होता है। यथा, जिसकी बुद्धि है, बुद्धिमान् ; जिसकी श्री है, श्रीमान : ऐसे, धीमान् ; मतिमान् ; अंशुमान । अग्नि जिसमें है, अग्निमान ; ऐसे वायुमान, नदीमान् । अवर्णान्त* तथा अ, म उपधावाले और तकारान्त, ककारान्तादि कईएक प्रातिपदिक के उत्तर मत् (मतुप) के अकारान्त और श्राकारान्त ।

. तद्धित-प्रत्यये। २६५ म के स्थान में वं होता है। यथा, ज्ञानवान, बलवान्, विद्यावान् । दयावान्, तंडित्त्वान , आत्मवान् , लक्ष्मीवान् इत्यादि । इन् (इनि)। जिसका अथवा जिसमें है, इस अंथ में एक से अधिक स्वर- विशिष्ट प्रकारान्त शब्द के उत्तर विकल्प से इन् होता है। इन् होने से अन्त्य स्वर का लोप होता है । यथा, जिसका ज्ञान है- झानी, झानवान् ; जिसका गुण है गुणी, गुणवान् ; जिसका धन है-धनी, धनवान् । .. - विन् (विनि)। जिसका अथवा जिसमें है, इस अर्थ में अम-भागान्त प्राति- पदिक के उत्तर विन् (विनि) होता है। यथा, यशस्-यशस्वी, तेजस्-तेजस्वी, तपस्-जपस्वी, पयस-पयस्वी ! स्रज , मायां और मेधा शब्द के उत्तर भी विन होता है । यथा, सज-सग्वी माया-मायावी, मेधा मेधावी। . तर् ( तरम् ), ईयस् ( ईयसुन्)। दो में से एक का उत्कर्ष बोध होने से प्रातिपदिक के उत्तर तर (तरप् ) और ईयस् (ईयसुन् ) होता है। यथा, दो के मध्य में दृढ, दृढतरः, द्रढीयान् ; दो के मध्य में गुरु, गुरुतरः, गरीयान् ; दों के मध्य में मृदु, मृदुतरः, म्रदीयान् । तम (तमम् ), ईष्ठ (इष्टन्)। अनेकों में से एक का उत्कर्ष बोध होने से प्रातिपदिक के उसरतम (तमपू) और इष्ठ (इष्ठन् ) होता है । यथा, अनेकों में दृढग दृढतमः, द्रविष्ठः, अनेकों में गुरु, गुरुतमः, गरिष्ठः, अनेकों में मृदुमृदुतमानविष्ठः ।.. ::::, मय: (.मयट्.): विकार, अवयव व्याप्ति और प्राधान्य अर्थ बोध होने से १६६ उपक्रमणिका। प्रातिपदिक के उत्तर मय (मयट) होता है । यथा, स्वर्ण का विकार, स्वर्णमयम् ; रजत का विकार, रजतमयम्; लौह का विकार, लौहमयम् ; मृद् का विकार, मृन्मयम् । धूम से व्याप्त, धूममयम् । जल से व्याप, जलमयम् ; रोग से व्याप्त, रोगमयम् । दारु जिसका अवयव, दारुमयम् ; काष्ठ जिसका अवयव, काष्टमयम् ; ऊर्णा जिसमें प्रधान है अथवा ऊर्णा जिसमें व्याप्त है, अामयम् । धा (धाच)। प्रकार अर्थ बोध होने से संख्यावाचक प्रातिपदिक के उत्तर धा (धाच) होता है। धा प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होता है। यथा, एक प्रकार, एकधा; द्विप्रकार, द्विधा; नि प्रकार, निधा; चतुः प्रकार, चतुर्धा । नकारान्त शब्द के उत्तर धा प्रत्यय होने से शब्द के अन्तस्थित नकार का लोप होता है। यथा, पश्च (पश्चन् ) प्रकार पञ्चधा; नव (नवन् ) प्रकार, नवधा । था (थाल)। प्रकार अर्थ वोध होने से सर्वनाम को तृतीया विभक्ति के स्थान में था (थाल् ) होता है । यथा, अन्येन प्रकारेण, अन्यथा सबै प्रकारैः, सर्वथा; इतरेण प्रकारेण, इतरथा; उभयेन प्रकारेण, उभयथा; येन प्रकारेण, यथा; तेन प्रकारेण, तथा । कथम् (केन प्रकारेण) और इत्थम् (अनेन वा एतेन प्रकारेण) ये दो पद निपातन से सिद्ध होते हैं। तस् (वसिल )। पञ्चमी और कहीं सप्तमी विभक्ति के स्थान में भी विकल्प से तस् (तसिल) होता है। यथा, पञ्चमी-गृहात्, गृहतः ग्रामात् , ग्रामतः; उभयस्मात् , उभयतः; एकस्मात्, एकतः यस्मात् , यतः; तस्मात् , ततः एतस्मात्, अतः, कस्मात् । कुतः ; अस्मात् , इतः। सप्तमी-अग्रे, अग्रतः ; आदौ, आदितः, अन्ते, अन्ततः। .

तद्धित-प्रत्यय ।
१६७
त्र (बल)।
सर्वनाम प्रातिपदिक की सप्तमी विभक्ति के स्थान में विकल्प
से त्र (बल) होता है। यथा, सर्वस्मिन्, सर्वत्र; अन्यस्मिन्,
अन्यत्र; एकस्मिन् , एकत्र; परस्मिन्, परत्र; उभयस्मिन्, उभयत्र;
एतस्मिन् , अत्र; यस्मिन् , यत्र; तस्मिन्, तत्र; कस्मिन्, कुन
अस्मिन्, अत्र, इह ।
के
कालार्थ बोध होने से कईएक सर्वनाम शब्द की सप्तमी
विभक्ति के स्थान में दा होता है । यथा, एकस्मिन् काले, एकदा;
सवस्मिन् काले, सदा, सर्वदा; कस्मिन् काले, कदा, यस्मिन्
कालें, यदा तस्मिन् काले, तदा
तन (तना) वा ट्यु (ट्युल)।
उत्पत्ति अथवा घटना अर्थ बोध होने से कालवाचक अव्यय
शब्द उत्तर तन (तनप) होता है। यथा, अद्य उत्पन्नम्,
अद्यतनम्; ऐसे ही-सायम्, सायन्तनम् । पुरा, पुरातनम् ; चिरम्,
चिरन्तनम् अधुना, अधुनातनम्। इदानीम्, इदानीन्तनम् तदा-
नीम्, तदानीन्तनम् प्राक, प्राक्तनः।
चित्, चन।
विभक्त्यन्त किम् शब्द के उत्तर अनिश्चय अर्थ में चित् और
चन प्रत्यय होता है । यथा, कः कश्चित्, कश्चन; किम्-किश्चित्,
किश्चन, का-काचित्, काचन; के-केचित्, केचन; केनचित्,
कस्मैचित्, कस्यचित, केपाश्चित, कयाचित्, कस्याश्चित
कासाचित् कुतश्चित, कुतश्चन कचित् कचना कुत्रचित्, कुत्रचन।
वि!
कृ, भू और अस धातु के योग में प्रांतिपदिक के उत्तरे

- १६ उपक्रमणिका। अभूततद्भाव अर्थ में च्चि प्रत्यय संपद्यते क्रिया के कर्ता से होता है । "च्चि" का कुछ नहीं रहता । यथा, अशुद्धं शुद्धं करोति, तत् संपद्यते शुक्लीकरोति; अलघुः लघुः भवति, लघूभवति; अशुक्का शुक्ल: स्यात्, शुक्लीस्यात् । सात् (सातिच ), (साति)। देय और परिणत अर्थ में प्रातिपेदिक के उत्तर सात् (सातिच्) होता है। यथा, विप्रसात् , जलसात्, भस्मसात, अग्निसान, भूमिसात्, धूलिसात् । सात् प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होते हैं । (अणादि) पिणादि अपत्य-प्रत्यय 1 ; अपत्य अर्थ बोध होने से प्रातिपदिक के उत्तर पिण (इ), पायनण ( आयन), ज्यण (य), पण (अ), पेयण (एय), पीयण (ईय), पिकण ( इक) प्रभृति प्रत्यय होते हैं। यथा, दशरथस्यापत्यं, दाशरथिः; सुमित्राया अपत्यं, सौमित्रिः। बदरस्यापत्य, वादरायणः। पुलस्तेरपत्यं, पौलस्त्या, दितेरपत्यं, दैत्यः; अदितेरपत्यं, श्रादित्यः । पृथायाः अपत्यं, पार्थः; कुशिक- स्थापत्य, कौशिक, भृगोरपत्यं , भार्गवः; रघोरपत्यं, राघवः गङ्गाया अपत्य, गांङ्गेयः, विनताया अपत्यं, वैनतेयः, सरमाया अपत्यं, सारमेयः, कुन्त्या अपत्यं, कौन्तेयः । स्वसुरपत्यं, स्वस्रीयः। खत्या अपत्यं, रैवतिकः। अपत्य भिन्न अन्य अर्थों में भी ये सव प्रत्यय होते हैं । यथा व्याकरणं वेत्ति अधीते वा, वैयाकरणः, ऋपिणा प्रोक्तं, आपम्। कायेन कृतं, कायिकमः शिवोऽस्य देवता, शैवः, भिक्षाणां समूहः, अक्षम्। मथुरायां भवः माथुरः; सभायां साधुः, सभ्यः; शिवस्येदं शैवम् सुवर्णस्य विकारः, सौवर्णः; तपोऽस्य शीला, तापस: राममधिकृत्य कृतं, रामायणम्: यज्ञाय हितं, यज्ञीयम् इत्यादि। : अभूत का तद्राव अर्थात् जो जैसा न था वह वैसा हुआ । जैसा, नो वस्तु शुक्ल ने थी वह शुक्ल हुई। - पाशिनि मन में यह प्रत्यय: भिन्न हैं। यथा, इन फक सन् वा एय, अण, ढकं, घे ठक, यह हैं।

" सरल-संस्कृत-पाठाः । (Easy Lessons in Sanskrit. ). प्रथमः पाठः। अश्वी धावति । गौः शब्दायते । सूर्यास्तपति । चन्द्र उदेति । वायुरोति । नंदी वहति । फलं. पतति । पत्रं चलति । पीडा धर्द्धते । बालको रोदिति । वृष्टिर्भवति । मेघो गर्जति । पुष्पं शोभते । नटो नृत्यति । गायको गांयति । शिशुः क्रीडति । युवा हसति । वृद्धो निद्राति । चौरः पलायते । द्वितीयः पाठः। स ग्रामं गच्छति । अहं चन्द्र:पश्यामि । पिता पुत्रमाह्वयति । पुत्रः पितरं प्रणमति । गुरुः शिष्यमध्यापयति । शिष्यो गुरु पृच्छति। शिशुः शय्यायां शेते । राजा प्रजाः पालंयतिः। सं इहागमिष्यति । यूयं कुत्र गमिष्यथ ? तत्राहं गमिष्यामि । त्वं कथं रोदिषि ? बीजादङ्कुरो जायते। अश्वमारूह्य गच्छंति.! तन्तुवायो वस्त्रं वयति। गोपो दुग्धं दोग्धि । गौः शष्पाण्यत्ति। विद्यान्ददाति विनयं । तृतीयः पाठः। भृत्यः प्रमोरांज्ञां पालयति । प्रमुभृत्याय वेतनं ददाति ! वालको यत्नेन विद्यामञ्जयति । स क्लेश सोढुं शक्नोति । दशरथ पुत्रशोकेन प्राणांस्तत्याज। रामः समुद्र सेतुं धवन्ध । ग्रीष्मकालें रविरतितीक्ष्णो भवति । शरदिं नमोमण्डलं निर्मलं भवति । बोपदेवों मुग्धबोध, व्याकरण प्रीतवान् । पक्षिणों रात्रौ वृक्ष- शाखायां निवसन्ति । साधवः सर्वभूतेषु द्धयां - कुर्वन्ति । कालिदासो बहूनि कान्यानि रचितवान् । अर्जुनो बाहुबलेंन Translate ail these Toobsinto English:::" : .

१७० उपक्रमणिका। पृथिवीमजयत् । युधिष्ठिरः सदा सत्यमुवाच । उद्योगी पुरुषः लक्ष्मीमुपैति । कापुरुपा एव देवमवलम्बन्त । चतुर्थः पाठः। पाटलिपुत्रनगरे चन्द्रगुप्तो नाम राजा बभूव । चाणक्य- श्चन्द्रगुतस्य नरपतेरमात्य आसीत् । परशुरामः पृथिवीं नि:- क्षत्रियामकरोत् । धृतराष्ट्रो जन्मान्ध आसीत्, तेन स राज्यं न प्राप । रामः पितुरादेशात् सीतया लक्ष्मणेन च सह वनं जगाम । भीमो गदापातेन दुर्योधनस्यऊरूवमन । चन्द्रं दृष्ट्वा मनसि महान हो जायते । आकाशे रजन्यामसंख्यानि नक्षत्रानि दृश्यन्ते । रात्रौ प्रभातायां पूर्वस्यां दिशि सूर्य प्रकाशते । वसन्तागमे तरुपु लतासु च नवपल्लवानि कुसुमानि च जायन्ते । पश्वमः पाठः। यो वाल्ये विद्यां नोपार्जयति, स चिराय मूोमवति । यो दयालुर्भवति स दीनेभ्यो धनं ददाति । यः कृपणो भवति, स आत्मानमपि वश्चयते । यो बन्धुवाक्यं न शृणोति, स विपद- माप्नोति । पण्डिताः शास्त्रालोचनया कालं यापयन्ति । मूर्खा निद्रयाकलहेन च समयमतिवाहयन्ति । यः शठेपु विश्वसिति, स श्रात्मनो मृत्युमाह्वयति । यो विपदि सहायो भवति, स एव यथार्थवन्धुः। यो दुर्जनेन सह मैत्री करोति, स पदे पदे विपदमाप्नोति । यस्य कुलं शीलं च न ज्ञायते, न तस्मिन् सहसा विश्वसनीयम् । यत्नेन विना किमपि न सिध्यति, तस्मात् सर्वेषु कार्येषु यत्रः करणीयः। सदा सत्यं ब्रूयात् । सर्वे सत्यवादिनमाद्रियन्ते, तस्य वचसि विश्वासं कुर्वन्ति चं। यो हि मिथ्यावादी भवति, न कोऽपि तस्मिन् विश्वसिति । सदा प्रियं ब्रूयात् । प्रियवादी सर्व्वस्य प्रियो भवति। विद्याहिपरमंधनम् । यस्यविद्याधनमस्ति, ससदा सुखेन पष्टः पाठः।

सरल-संस्कृत-साठा। १७१ कालं नयति । श्रमेण यत्नेन च विना विद्या न भवति; तस्माद् विद्यालाभाय श्रमो यत्नश्च विधेयः। विद्यां विना वृथा जीवनम् । आलस्यं सर्वेषां दोपाणामाकरः । अलसा विद्यामुपार्जयितुं न शक्नुवन्ति न च धनं लभन्ते । अलसानां चिरमेव दुःखम् । तस्मादालस्यं परित्यजेत् । माता पितरौ पुत्रार्थं वहून् क्लेशान् सहेते। तयोनित्यं प्रियं कुर्यात् । कायेन मनसा वाचा तयोहितं. चिन्तयेत् । तयो सततं भक्तिमान् भवेत् । प्राणात्ययेऽपि. तयोरवमानना न कार्य्या । न च तयोरनुमतिं विना किञ्चित् कर्म कर्तव्यम् । सप्तमः पाठः। अतिभोजनं रोगमूलमायुःक्षयकरञ्च । तस्मादतिभोजन परिहरेत् । योऽस्मानध्यापयति, सोऽस्माकं परमो गुरुः, स हि पितृवत् पूजनीयः । विद्यादाता, जन्मदाता द्वावेव समानौ, समं माननीयौ च । क्रोधं यत्नेन वर्जयेत् । क्रोधवशो न परुष भाषेत नापि प्रहरेत् । क्रोधो हि.महान् शत्रुः । सव्वं परवशं दुःखम् । सर्वमात्मवशं सुखम् । एतदेव सुखदुःखयोर्लक्षणम् । परहिंसायां परापकारे च बुद्धिर्न कार्यो । तयोः समं पापं नास्ति । यथाशक्ति परेपामुपकारं कुर्यात् । परोपकारो हि परमोधर्मः । अहङ्कार परिहरेत् । नाहकारात् परो रिपुः । सन्तुष्टस्य सदा सुखम् । य आत्मनः सुखमंन्विच्छेत् , स सन्तोषमवलम्वेत । सन्तोषमूलं हि सुखम् ।

, ॥ - परिशिष्ट वर्ण-निर्णय ( The Alphabet ) | (अतिरिक) अइठण ॥ १ ऋलक् ॥ २ एप्रोङ् ॥ ३ ऐौच ॥ ४ हयवाट् ॥ ५ ला ॥ •मबनम् ॥७ मभन् । घढघः ॥ ६ जवगडदश् ॥ १० खफछव्यचटठवम११ कपम् ॥ १२ शुपतर् ॥ १३ हत् ॥ १४ ॥ संस्कृत वर्णमाला के लिए ये चोदा माहेश्वर सूत्र हैं। इनमें से पहले चार सूत्र अन् (स्वरवर्ण) के हैं और बाकी इस सूत्र हन (व्यञ्जनवर्ण) के हैं।. हरएक सूत्र के अन्त में जो एक एक इल वर्ण है संज्ञा गणना के समय उसे छोड़ दिया जाता है। जैसे, अग से को, छोड़ कर अ इ उ, अक से ण, तथा क को छोड़ कर अ इ उ ऋतू. एङ सेह को छोड़ कर ए ओ, एच. से तथा च को छोड़ कर ए ओ ऐ . औ समझ जाते हैं, और ऐसे ही अच से सभी स्वरवर्ण, तथा हल् से सभी व्यञ्जनवर्ण समझे जाते हैं। हकारादि. में जो अकार है वह उच्चारण की सुविधा के लिए है। अण अक इत्यादि को प्रत्याहार कहते हैं । अक प्रत्याहार से अ आ इ ई उ ऊ ऋ तथाल समझना चाहिए। वैयाकरण लोग अ इ उ ऋ इ ए ऐ ओ औ, इन आठ स्वरों के उच्चारण की विशेषता को प्लुत-संज्ञा देकर हरवस्वर, दीर्घस्वर के ऐसा पाठ प्लुतस्वर मानते हैं। इसलिए स्वर की संख्या इक्कीस होती है और प्लुत ल तथा दीर्घ ल मान लेने से स्वरवर्ण की संख्या कुल तेईस होती है, परन्तु पाणिनि के अनुसार ल दीर्घ नहीं होता। “दूरावाने चगाने च रोदने च तुटो मतः ।" दूर से पुकारने, गीत गाने और रोने के कामों में प्लुतस्वर का उपयोग होता है । हस्वस्वर के उच्चारण में जो समय लगठी है, दीर्घस्वर के उच्चारण में उसका दूना, और प्लुत स्वर के उच्चारण में उसका तिगुना समय लगता है। हस्वस्वर के उच्चारण के समय को मात्रा (umit ) कहते हैं। इसलिये हस्वस्वर एक मात्रा का, दीर्घस्वर दो मात्रा का, और सुतस्वर तीन मात्रा का होता है, (एकमात्रो भवेद् हस्त्रो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते । त्रिमावस्तु सुवो ज्ञेयो व्यञ्जनमा मात्रकम् )। प्लुतस्वर लिखने की रीति ऐसी है यया, अर, २, ३२ इत्यादि। साहित्य आदि में इसैंका प्रयोग बहुत ही कम होता है... वारण के प्रयन के अनुसार वर्गों के प्रथम और द्वितीय वर्णतयों शपस पास वा अघोष-वर्ण (Surasi Hard laters) कहे जाते हैं। , परिशिष्ट, परिभाषा। १७३ कों के तृतीय, चतुर्थ और- पञ्चमवर्ग : तथा युरन नाद का घोषवर्ण ( Sonants or Soft letters.) कहे जाते हैं। वर्गों के द्वितीय और चतुर्थवर्ण अर्थात् ख (kh), घ (gh): छ ( chh'), म (jh); (th), (dh); 4 (th), ध (ab); फ (ph), में (bh ); इनको सोम (वायुप्रधान) वर्षे कहते हैं। स्वरवर्ण, वर्गों के प्रथम, तृतीय और पञ्चम तयां य र ल वू, अल्पप्राय-वर्ण ( Non-aspirates or sightly aspirated Tetters) हैं। वर्गों के द्वितीय और चतुर्थवर्य तथा शुसह, महाप्राण-वर्ण (Aspirates or Long-breathed letters) हैं। TRITT ( Definitions ). i (अतिरिक्त) प्रकृति ( Radicals):-क्रियावाचक, वस्तुवाचक किंवा वस्तु के विशे- पण-वाचक को अर्थात् पद के मूलभाग को प्रकृति कहते हैं । प्रकृति दों प्रकार की हैं-धातु और प्रातिपदिक। धातु ( Verbal roots):-"भूवा- दयो धातवः।" जिससे क्रिया समझी जाती है उसे धातु कहते हैं । यथां, भू, स्था, गम्, श इत्यादि । प्रातिपदिक ( Nominal Stem):--"अर्थ- बधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ।" धातु, प्रत्यय तथा प्रत्ययान्त को छोड़कर अर्थयुफ शब्दों को वा विभक्ति रहित मूल शब्दों को अर्थात् जो वस्तु- बाचक वा वस्तुओं के विशेषण-वाचक होते हैं, उन्हें प्रातिपदिक कहते हैं। वस्तु वाचक-चन्द्र, सूर्य, तरु, लता, जल, वायु, गृह इत्यादि वस्तुओं के विशेषण-वाचक-दृढ, स्थिर, प्रपल, नूतन, पुरातन, मन्द, सुन्दर इत्यादि। प्रत्यय ( Affix, Sufix, Postfix ):-धातु और प्रातिपदिकों के उसर जो, लगाये जाते हैं उन्हें: प्रत्ययः कहते हैं। प्रत्यय-पांच प्रकार के होते हैं- विभक्ति; कृत् , तद्धित, स्त्री-प्रत्यय और धात्ववयव । विभक्ति (Infiec., tioas); धातुओं के उत्तर ति, तस् , अन्ति आदि तथा प्रातिपदिकों के उतर: (सु.), औ, अः (नस) आदि नो सब प्रत्यय लगाये जाते हैं, उन्हें विभक्ति कहते हैं। कृत् (Primary Affixes or Verbal Sufixes):-- धातुओं के उत्तर तव्य, य, तृ, त, त्वा आदि जो सब प्रत्यय होते हैं, उन्हें कृत् कहते हैं । तद्धित ( Secondary Afixes or Sufixes to bases )- प्रातिपदिकों के उत्तर अ, य ादि और तिङन्त पदों के उत्सर करप भादि जो सब प्रत्यय होते हैं, उन्हें तद्धित कहते हैं। सी-प्रत्यय (Femi- . १७४ उपक्रमणिका। nine Sufixes ):-स्त्रीलिङ्ग में आ, ई आदि जो सब प्रत्यय होते हैं सीप्रत्यय हैं। धात्ववयव ( Parts of Roots ):-धातुओं के उत्तर इस प्रादि तथा प्रातिपदिकों के उत्तर य, काम्य आदि जो सब प्रत्यय होते हैं, उन्हें धात्ववयव कहते हैं। पद (Inflected rrords):-"सुप्ठिन्तं पदम्।" धातु तथा प्रातिपदिक विभक्तियुक्त होने से उन्हें पद कहते हैं । आदेश (Substitutes ) प्रकृति और प्रत्ययों का जो रूप परिवर्तन (स्वरूप का बदला) होता है उसे आदेश कहते हैं । यथा, वृद्ध शब्द के स्थान में न्य, स्था-धातु के स्थान में तिष्ठ, य-विभक्ति के स्थान में इ, अनु-विभक्ति के स्थान में उः इत्यादि । गुण ( अदेशणः) स्वर का गुण बोलने से यह समझना चाहिये कि, इ ई के स्यान में ए, उ ऊ के स्थान में श्रो, ऋके स्थान में अर्, ल के स्थान में अल होता है। वृद्धि (वृद्धिरादेच् ।-स्वर की वृद्धि बोलने से यह समझना चाहिये कि अ के स्थान में आ, इ ई के स्थान में ऐ, उ ऊ के स्थान में श्री, ऋ ऋ के स्थान में प्रार् होता है। लघु और गुरु (हस्वं लघुः, संयोगे गुरुः, दीर्घञ्च )-हस्वस्वर को लघु और दीर्घस्वर को गुरु कहते हैं । युक्ताक्षर के पूर्ववर्ती हस्वस्वर को भी गुरु मान लिया जाता है। उपसर्ग ( Prepositional Prefixes ):-"उपसर्गाः क्रियायोगे"- क्रिया के साथ योग होने से प्र, परा, अप, सम् आदि वाईस शब्दों को उप- सर्ग कहते हैं । वाक्य (Sentencs) उस सुवन्त और तिङन्त पद-समष्टि को कहते हैं जिससे एक सम्पर्ण मनोभाव प्रकट होता हो । सवर्ण (तुल्पास्यं प्रयत्नं सवर्णम्) एक ही स्थान और समान प्रयत्न से उच्चारित वर्षों की सवर्ण-संज्ञा है। यथा, अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ये एक दूसरे का सवर्ण है। ऋऔर लू एक ही स्थान से उच्चारित न होने पर भी विशेष कार्यक्स सवर्ण समझे जाते हैं। एक ही स्थान से उच्चारित वर्गीय व्यञ्जनवर्थ भी एक दूसरे से सवर्ण हैं। टि (अचोऽन्त्यादि टिः) स्वरों में से जो अन्त्य (शेष) उसको लेकर सब वर्ण को टि-संज्ञा होती है । उपधा (अलोऽन्यात पूर्व उपधा) अन्त्य-वर्ण के पूर्व-वर्ण को उपधा कहते हैं। सन्धि । (अतिरिक्त) "पुरः सन्निकर्षः संहिता।" वर्णों की अत्यन्त निकटता की संहिता संज्ञा होती है, अर्थात् दो वर्ण परस्पर अत्यन्त निकटस्थ होने से मिल जाते परिशिष्ट, स्वर सन्धि। १७५ . हैं उसी मिलने को सन्धि कहते हैं। "सहितैकपदे नित्या नित्या धातूपं- सर्गनिया समासे, वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते । "(१) एक पद में सन्धि सदा करनी चाहिये । (जैसे, ने+अनमूनपनम्, हरे+ए- हरये इत्यादि)(२) धातु के साथ उपसर्ग की सन्धि अवश्य होती है (जैसे- अनु+अमक्त-अन्वभवंत, प्र+एजतेप्रेजते इत्यादि)। (३) समास में भी सन्धि अवश्य करनी है (जैसे, भीमश्चअर्जुनश्च तौभीमार्जुनौ, त्रीणि अम्ब- कानि यस्य सध्यम्बक)। अर्थात् इन तीन जगहों में सन्धि नहीं करने से गलती होती है, किन्तु वाक्यों में सन्धि करनी नहीं करनी इच्छाधीन है। (जैसे, सन्धि न करने से नलः नाम नृपतिः आसीत्, इति उक्त्वा; सन्धि करने में "नलो नाम नृपतिरासीद, इत्युक्त्वा इत्यादि)। इच्छाधीन- स्थलों में भी जहाँ तक होसके सन्धि करना ही अच्छा है। स्वर सन्धि । (अतिरिक्त)। १। प्र, वत्सतर, कम्बल, वसन, ऋण और दश, इन शब्दों के प्रकार के परे ऋण शब्द का ऋ रहे तो दोनों मिलकर पार होता है। यथा, प्र+ ऋणम्-प्रार्थम् ऋण+ऋणम् ऋणार्णम् (Debt for paying off an-- other debt ), वसन+ऋणम् = वसनार्णम्, दश+ऋणम् = दशार्णम (Name of a country ) इत्यादि। धातु का ए अथवा पो परे रहने से उपसर्ग के अऔर श्रा का लोप होता है; ए वा श्री उपसर्ग में मिल जाता है। यया, प्र+एजते-प्रेजते,. उप+एषते-उपेषते, परा+एखतिपरेखति, आ+ एटतिएटति, उप+- औषति-उपोषति, अंव+ोहति अवोहति, परा+पोखति-परोखति । एप और इ (to go ) धातुओं का ए परे रहने से उपसर्ग के अ और आका' लोप नहीं होता । यथा, उप+एघते-उपधते, परा+एधते-परैधते, अव+ एति-प्रति, पा+एति ऐति, उप+एति ठपैति । किन्तु लोट् (अनुज्ञा) के मध्यम पुरुष का ए परे रहने से उपसर्ग के श्र और श्रा का लोप होता है। तथा, अब+एहि-अवेहि, उप पहि-उहि । ३१ उपसर्ग के अ अथवा श्रा के परे घातु का ऋरहे तो दोनों मिलकर भार रोता है। आ उपसर्ग में युक्त होता है और र् परवर्ण के मस्तक पर जाता है। यथा, अप+ऋच्छति अपाईति, अब ऋणोति-अवार्णाति, प्र+जते-प्राजते, परा+ऋषतिपराति, प्र+ऋच्छति प्राकृति। .

१७६ उपक्रमणिका। (सन्धि-निषेध)। • ४(१)ोकारान्त अथवा एकस्वरमात्र अव्ययं शब्द की सन्धि नहीं: होती। यथा, अहो अपेहि, अहो अहि; अहो आगमिष्यति, अहो आग. मिष्यति; ' अ-अद्यापि, अद्यापि; आ-एवम्, आ एवम् उ-उतिष्ठ, उसिष्ठ; ए-एवमेतत्, ए एवमेतत; औ-श्रागम्यताम् , औश्रागम्पठाम् । किन्तु सीमा, व्याप्ति और ईषदर्य वोध होने से या क्रिया के साथ योग होने से आ इस अन्यय शब्द की सन्धि होती है। यया, सीमा-आ+अध्यय नाताध्ययनात् (अध्ययनपर्यन्तम् ) । व्याप्ति-आ+एकदेशत्- एकदेशात् (एक देशं व्याप्य)। ईषदर्थ-आ+आलोचितम् आलोचितम् (ईषत् आलोचितम् ) क्रिया के साथ योग-आ+इहि एहि। - (२) द्विवचननिष्पन्न ईकारान्त, अकारान्तं और एकारान्त पदों की सन्धि नहीं होती। यया, कवी-इमो, की इमौ.गिरी-एतौ, गिरी एती; साधू-हमी, साधू इमो; वन्धू-आगठी, वन्धू आगतो; लते-एते, लते एते; विद्ये-इमे, विद्ये हमे; शपाते-अर्मको, शयाते अर्भको; शयावहे-पावाम्, शयावहे आवाम्; याचेते अर्थम्, याचेते अर्थम् । (३) अदस् शन्द के ईकारान्त और ऊकारान्त पदों की सन्धि नहीं होती। यथा, अमी-अश्याः अमी अश्वाः; अमी-इषवः, अमी इषवः अमू- अर्भको, अमूअर्भको। व्यञ्जन-सन्धि। (अतिरिक्त)। १। श्, स् अथवा ह परे रहने से पद के मध्यस्थित न के स्थान में अनुस्वार होता है। यथा, दन्+शनम् दशनम् , अन्+शतेग्रंशते, मीमान+सते-मोमांसते, जिघान् + सति-जिघांसति, रन्+हतेरहते, वृनु+हितम्= वृंहितम् । २। स् परे रहने से पद के मध्यस्थित म् के स्थान में अनुस्वार होता है। यथा, रम्+स्यतेशंस्यते, सङ्गम् +स्यते-सङ्गस्यते, अयम् +सीत अयंसीत् । ३। जिस घर्ग का वर्ण परे रहता है पद के मध्य में स्थित न के स्थान में उस वर्ग का पञ्चमवर्ण होता है। यया, आशन्+कते आशङ्कते, वन् + चयतिवद्धयति, वन+टयति-वण्टयति, कन्+पते कम्पते ।। ४। "अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः।" यदि त परे हो तो पद केमध्यस्थित मू के स्थान में न होता है। यथा, गम्+गिन्ता, गम् +तव्यम्: गन्तव्यम्, शाम तम्-शांन्तम् , दाम+ताम्दान्तः । - - परिशिष्ट, विसर्गसन्धि । ५। "उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ।" उत् उपसर्ग के परस्थित स्था और स्तम्भ धातुं के सकार का लोप होता है। यथा, उत्स्यानम्-उत्यानम्, उत+स्थिति उत्यितिः, उत्+स्तम्मनम् उसम्मनम्। ६ । "खरि च।" वर्ग का प्रथम ' या द्वितीय वर्ण अथवा श, ष,स परे रहने से वर्ग के तृतीय और चतुर्थ वर्ग के स्थान में उस वर्ग का प्रथम वर्ण होता है। यधा, विपद्काल:-विपत्कालः,क्षुद्+क्षामन्त्क्षामः, समिधु +सु-समित्सु इत्यादि। ७। वर्ग का तृतीय अथवा चतुर्य वर्ण परे रहने से वर्ग के चतुर्य वर्ण के स्थान में उस वर्ग का तृतीय वर्ण होता है। यया, क्षुध+बोधः क्षुद्बोधः । ८। "समः सुटि" कृ धातु अथवा कृ धातु से बने हुए शब्द परे हो तो सम् शन्द के "म" के स्थान में अनुस्वार होता है और अनुस्वार के परे "स" का आगम होता है। यथा, सम्+कृतः संस्कृतः, सम्+कार:- संस्कारः सम् +करणम् संस्करणम्, सम्+कर्ता संस्कता। विसर्गसन्धि (अतिरिक्त)। १। क, ख, प, फ परे रहने से निः, आविः, वहिः, दुः, प्रादुः और चतुः इन शब्दों के विसर्ग के स्थान में मूर्द्धन्य ष होता है। यथा. निः+कामः= निष्कामः, निः+खेदः निष्खेदः, निः+पीडितः निष्पीडितः, निः+फल:- निःफलः, आविः+कृतम्-आविष्कृतम्, वहिः+कृतः- वहिष्कृतः, दुःकरम् दुष्करम्, प्रादुः+कृतम् -प्रादुष्कृतम्, चतुः+कोणम्-चतुष्कोणम्, चतुः +पथमू-चतुष्पथम् । २। क, ख, प, फ परे रहने से हविः, सर्पिः, वर्हिः, अर्थिः, रोचिः, शोचि,पायुः, धनुः, चक्षुः, वपुः, यजुः इत्यादि के विसर्ग के स्थान में विकल्प से मूर्द्धन्य होता है। यथा, हकि+पतति-हविपति, हविः पतति सपि: पिति-सर्पिष्पिवति, सर्पिः पिवति; आयुः+करोति=आयुष्क- रोति, आयुः करोति; धनुः+करोति धनुष्करोति, धनुः करोति । समास में नित्य मूर्द्धन्य होता है। यथा, हविः+पानम् इबिप्पानम्। सर्पिः +पात्रम्-सर्पिष्पात्रम् श्रायुः+कामा आयुष्कामः; धनु:+पाणि:- धनुष्पायिः। भ्रातुः+पुत्र:=भ्रातुष्पुत्रः; यहाँ समास न होने पर विसर्ग के स्थान में होता है। ३। तकारादि तद्धित प्रत्यय परे रहने से इ और ठ के परस्थित विसर्ग के स्थान में और त् के स्थान में ट् होता है। यथा, अनिः+त्वम्- बर्विष्ट्वम्, चदुः+वयम्-चतुष्टयम् । - " उपक्रमणिका।' ४। कृ धातु परे रहने से नमः, पुरा और तिरः, इन तीन शब्दों के विसर्ग के स्थान में दन्त्य स होता है। यथा, नमः+कार= नमस्कारः, नमः . कृत्य-नमस्कृत्य, पुरः+कार पुरस्कारः, पुर: कृत्या-पुरस्कारयः,. तिरः+कार-तिरस्कारः, तिर:+करणी-तिरस्करणी। ५। कर, कार, कान्त, काम, कुम्भ, कुशा, की और पात्र शन्द परे रहने से अ के परस्थित विसर्ग के स्थान में स् होता है। यया, श्रेया+कर- श्रेयस्करः, पयः+कार पयस्कारः, श्रयः+कान्तःअयस्कान्तः, मनः+ काममनस्कामः, अयः+कृम्म अयस्कुन्मा, पयः+पात्रम् पयःपात्रम्, अपः+क्याम्पसकुशा, अपः+की अपस्क। ६। निम्नलिखित पदों की सन्धि में विसर्ग के स्थान में होता है। यथा, तमः+कापड तमस्काण्डः, मेदः+पिण्डम्मेदस्पिगडा, मानकर भास्करः, अहः+करः अहस्करः, वाच:+पति वाचस्पतिः, दिवः पति- दिवस्पतिः, अयः+कीलःअयस्कोलः, अधः+पदमू-अघस्पदम्, yिe+ पदमू-शिरस्पदम् । एणत्वविधान (अतिरिक्त) १। न मिन्न तवर्ग, प और म संयुक्त "न","ण" नहीं होता ! यथा, कृन्तति, ग्रन्यनम, वृन्दः, धनम्, तृमाति, क्षुम्नाति । २ । यदि एक पद में , ऋ, र, प और दूसरे पढ़ में "न" हो तो यह "न", "" नहीं होता। यथा, नृयानम्, कृपयानम्, रघुनन्दनः, गिरि नन्दिनी, त्रिनयनः इत्यादि । किन्तु-(क) अन्य पदस्थित "न" विकि के स्थान में जात, विभक्तियुकअथवा स्त्रीलिङ्ग "ई" प्रत्यय में मिलित होतो विकल्प में "" होता है। यथा, प्रमाण, प्रभावन नगरयायिणा,नगरया- यिना; विषपायिणो, विषपायिनी। (ख) परपद एकस्वरविशिष्ट अथवा कवर्गयुक्त हो तो "न" के स्थान में नित्य "ण" होता है। प्रथा, प्रमुगा, पुनर्भूणाम्, वृत्रहणः, श्रीकामेण, दुर्गमेण, गृहगामिणा, धर्मकामाजन, दोपमागिणा, शुष्कगोमयेण, परिपाकेण, नगरगामिणी, इत्यादि । परन्तु पक्क, युवन्, अहन् व्या भगिनी, कामिनी, यूनी आदि कई एक शन्नों का "म", """ नहीं होता । यथा, परिपकेन, नृयुवानी, चारुयूना, दीर्घाहा, पितृमगिनी, हरकामिनी, हरभामिनी, घोरयामिनी, क्षत्रिययूनी। ३१ द्विस्वर अथवा त्रिस्वर विशिष्ट ओषधि (शस्य पक लाने से सूख जाते हैं ऐसे टदिइ) वाचक शब्दों के परे वन शब्द का न विकल्प ने ण हो जाता है। यथा, दर्भवणम्, दर्भवनम्; हरिद्रावणम्, हरिदावनमः मरवणम्, वेसरवनमः बदरीषणम्, बहरीवनम् । परन्तु घर, इस. प्र. , ।

। . - परिशिष्ट, णत्वविधान। १७६ पान, खदिर, इन शब्दों के परे बन शब्द का न सदा ण हो जाता है। यथा, शरवणम्, आम्रवणम् इत्यादि। ४ । प्र, निर्, अन्तर, अग्रे, इन शब्दों के परस्थित वन शब्द का न, ण हो जाता है। यया, प्रवणम्, निर्वणम्, अन्तर्वणम्, अग्रवणम् । ५। अन्य पदस्थित र आदि के परवर्ती पान शब्द का न विकल्प से ब हो जाता है । यथा, क्षीरपाणम् , क्षीरपानम् ; विषपाणम् , विषपानम् । कषायपाणम्, कषायपानम् । ६ । वयस् अर्थ बोध होने से त्रि और चतुर् शन्दों के परस्थित हायन शन्द का न, ण हो जाता है। यथा, त्रिहायणः वत्सः, चतुर्हायणी गौः। ७। प्र, पूर्व, अपर आदि.शब्दों के परस्थित अंह्न शब्द के न के स्थान: में.ण होता है । यथा, प्राझा, पूर्वाह्नः, अपराह्नः। ८। पर, पार, उत्तर, चान्द्र, नारा आदि शब्दों के परस्थित अयन. शन्द के न के स्थान में ण होता है । यथा, परायणम्, पारायणम् , उत्तरा- यणम्, चान्द्रायणम् , नारायणः। । अग्र और ग्राम के परस्थित मी शब्द का न, ण हो जाता है। यथा, अग्रणीः, ग्रामणी। १०। शूर्प शब्द के परस्थित नख शब्द के और प्र, द्रु, खर, खुर, वार्षी शब्दों के परस्थित नस शब्द के भी न के स्थान में ण होता है । यथा, शूर्पणखा, प्रणसः, द्रुणसः, खरणसः, खुरणसः, खरणाः, सुरणाः इत्यादि। ११ । गिरिनदी प्रभृति का न विकल्प से ण होता है । यया, गिरिणदी, गिरिनदी; स्वर्णदी, स्वन्दी; गिरिणितम्बा, गिरिनितम्बः इत्यादि । १२ । पूर्वपद के अन्त में प रहने से परपद के न के स्थान में ण नहीं होता । यथा, निष्पानम् , दुष्पानम्, निष्कामेन । १३ । प्र, परा, परि, निर् , इन चार उपसर्ग और अन्तर शब्द के परस्थित नद्, नम्, नश् , नी, हन् प्रभृति घातुओं का न, ण हो जाता है। यथा, प्रणदति, प्रणामः, परिणामः, प्रणश्यति, परिणाशः, अन्तर्णाशः, प्रणयः, परिणयः, निर्णयः, प्रहणनम्, पराहणनम् । परन्तुं नश् धातु के श् के स्थान के षु और हन् धातु के ह के स्थान में घ होने से न, ण नहीं होता।'यथा, प्रनयः, परिनष्टः, निनटः, प्रघ्रन्तिः, शत्रुघ्रः। १४ । कुछ शब्दों में स्वभावतः "ण" होता है । यथा, अणु, फणि, मणि, वाण, गुण, गण इत्यादि- .

८० उपक्रमणिका। हविर्मिः हविर्यः अस-भागान्त-पयस् ( Milk, Water') 1 एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा पयः पयसी पयांसि द्वितीया पयः पयसी पयांसि सम्बोधन पयः पयसी पयांसि और तृतीयादि सब विभक्तियों में वेधस शब्द के सदृश रूप होता है। सब असू-भागान्त क्लोवलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। इस-भागान्त-हविस ( Clarified butter )। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा हविः हविपी हवींपि द्वितीया हविः हविपी हवापि तृतीया हविपा हविया॑म् चतुर्थी हविपे हविया॑म् पञ्चमी हविपः हविाम पष्ठी हविपः हविपोः हविपाम् सप्तमी हविपि हविपोः हविःपु सम्बोधन हविः हविपी हवींषि सब इसभागान्त क्लोवलिङ्ग शब्दों के रूप इसी प्रकार के होते हैं। उस-भागान्त-धनुस् (Boy)। एकवचन द्विवचन बहुवचन प्रथमा धनुः धनुषी धनूंपि द्वितीया धनुः धनुपी धनूंपि तृतीया धनुपा धनाम् धनुर्भिः चतुर्थी धनुपे धनुर्ध्याम् धनुभ्यः * अम्भस, अयस्, आगस्, सरस्, उरस्, चेतस, छन्दस्, तमस, मनस्, यशस, रजस्, वक्षस्, वयस, तपस्: इत्यादि। ज्योतिस्, सर्पिस, अच्चिस्, रोचिस्, शोचिस' इत्यादि। हविर्यः . -- .. परिशिष्ट, शब्दरूप-स्वरान्त पुंलिङ्ग शब्द । १८१ पुष्पं पुष्करवाष्पशष्पषिरं दुखं तुरुष्कौषधे । मुष्कं गोष्पदपौरुषेपरुषमित्येते तथा वापरे । शब्दरूप (अतिरिक्त)। स्वरान्त पुंलिङ्ग शब्द । अकारान्त अल्प (Little), द्वितीय (Second ), तृतीय (Third ) | अल्प शब्द का रूप गज शम्द के तुल्य है केवल प्रथमा के बहुवचन में अल्पे, अल्पा, ये दो पद होते हैं, इतना ही प्रभेद है। प्रथम, घरम, अर्द्ध, कतिपय, नेम, दय, त्रय, द्वितय, त्रितय, चतुष्टय आदि शब्दों के रूप अल्प शब्द के सदृश हैं। द्वितीय और तृतीय शब्दों के रूप भी गज शब्द के सदृश हैं, केवल चतुर्थी, पञ्चमी और सप्तमी के एकवचन में कुछ विशेष हैं । यथा-- चतुर्थी पञ्चमी सप्तमी द्वितीयस्मात् द्वितीयस्मिन् द्वितीयात् द्वितीय तृतीय } तृतीयस्मै तृतीयस्मात् तृतीयस्मिन् तृतीयाय तृतीयात् तृतीये धि, साय औरसंख्यावाचक शब्दों के साथ अहन् शब्द का समास होने पर समासोत्पन्न बहभागान्त शब्दों के सप्तमी के एकवचन में तीन तीन . पद होते हैं। यथा, (वि+ग्रह) व्यह-यह्नि, व्यहान, व्यः (साय+अह) सायाह-सायाह्नि, सायाहनि, सायाह्न (द्वि+प्रह) दू यह-दहि, दूयहनि, द्व.यहे। अंकारान्त पाद, दन्त श्रादि कई एक शब्दों के रूप में भी विशेषता है। यथा- पाद (Leg, Root)| प्रथमा-पादः, पादौ, पादाः। द्वितीया-पादम्, पादौ, पादान पदः। तृतीया-पादेन पदा, पादाभ्याम् पद्भ्याम्, पादः पद्रिः। चतुर्थी-पादाय पदे, पादाभ्याम् पदभ्याम्, पादेभ्यः पद्भ्यः पञ्चमी-पादात् पदा, पादाभ्याम् पद्भ्याम्, पादेभ्यः पद्भ्यः । षष्ठी- पादस्य पदः, पादयोः पदो, पादानाम् पदाम् । सप्तमी-पादे पदि, पादयोः पदोः, पादेषु पत्सु । सम्बोधन-पाद, पादौ, पादाः! दन्त (Tooth )| प्रथमा-दन्तः, दन्तौ, दन्ताः। द्वितीया-दन्तम्, दन्ती, दन्तान् दतः। तृतीया-दन्तेन दता, दन्ताभ्याम् दद्भ्याम्, दन्तः द्वितीय }.द्वितीयाय } . .

१८२ उपक्रमणिका। दनिः। चतुर्थी-दन्ताय दते, दन्ताभ्याम् दद्भ्याम्, दन्तेभ्यः दद्भ्यः । . पञ्चमी-दन्तात् दतः, दन्ताभ्याम् दद्भ्याम, दन्तेभ्यः दद्भ्यः । षष्ठी- दन्तस्य दतः, दन्तयोः दतोः, दन्तानाम् दताम् । सप्तमी-दन्ते दति, दन्तयोः दतोः, दन्तेपु दत्नु । सम्बोधन-दन्त, दन्ती, दन्ताः। मास (Month) | प्रथमा-मासः, मासौ, मासाः। द्वितीया-मासम्, मासौ, मासान् मासः। तृतीया--मासेन मासा, मासाभ्याम् माभ्याम्, मासैःमाभिः । चतुर्थी-मासाय मासे, मासाभ्याम् माभ्याम्, मासेभ्यः माभ्यः । पञ्चमी-मासात् मासः, मासाभ्याम् माभ्याम्, मासेभ्यःमाभ्यः। षष्ठी-मासस्य मासः, मासयोः मासोः, मासानाम् मासाम् । सप्तमी- मासे मासि, मासयोः मासोः, मासेपु मास्सु । सम्बोधन-मास, मासो, मासाः। -- यूष (Soup, Broth) | प्रथमा-पूपः, यूपी, यूपाः। द्वितीया-पूपम्, यूषौ, यूपान् यूष्णः । तृतीया-यूपेण यूपणा, यूपाभ्याम् यूपभ्याम, यूपः यूपभिः । चतुर्थी-यूपाय पूण्णं, यूपाभ्याम् यूपभ्याम्, यूपेभ्यः यूपभ्यः ।, पञ्चमी-यूषात् यूप्यः, यूपाभ्याम्, यूपभ्याम् , यूपेभ्यः यूपभ्यः । षष्ठी- यूषस्य पूष्णः, पूषयोः यूष्णोः, यूषाणाम् यूष्णाम् । सप्ठमी-यूपे यूपिण यूषणि, यूपयाः यूप्णोः, यूषेसु यूपसु । सम्वोधन-यूप, यूपी, यूपाः । शसादि विभक्तियाँ परे रहने से पाद, दन्त मास और यूप शब्दों के स्यान में विकल्प से क्रमानुसार पद्, दन, मास् और यूपन आदेश होता है। इसलिए इन शब्दों के रूप एकधार गज शन्द के ऐसे होते हैं और एक वार व्यञ्जनान्त शब्दों के ऐसे होते हैं। निर्ज (जीर (A god ) शब्द । प्रथमा-निर्जरः, निरी निर्जरसौ, निर्जराः निर्जरसः। द्वितीया-निर्जरम् निर्जरसम्, निर्जरी निर्जरसौ, निर्जरान निर्जरसः। तृतीया-निर्जरेण निर्जरसा, निर्जराभ्याम्, निरः निजरसैः । चतुर्थी-निर्जराय निर्जरसे, निर्जराभ्याम्, निर्जरेभ्यः । पञ्चमी- निर्जरात निर्जरसः, निर्जराभ्याम् निर्जरेभ्यः । पठी-निर्जरस्य निरसः, निर्जरयोः निर्जरसोः, निर्जराणाम् निर्जरसाम् । सप्तमी-निर्जरे निर्जरसि, रिर्जरयोः निर्जरसोः निर्जरेपु । सम्बोधन-निर्जर, निर्जरी निर्जरसी, 'निर्जराः निर्जरसः। किसी किसी वैयाकरण के अनुसार तृतीया के एकवषन में निर्जरसो म होकर निर्जरसिना होता है और पञ्चमी के एकवचन में निर्जरसन होकर निर्जरसार होता है। .

. परिशिष्ट, स्वरान्त पुंलिङ्ग शब्द । "१८३ स्वरादि विभक्तिपरेराने से निर्जर शन्द विकल्प से निरस होता है। इसलिए इसका एक रूप गज शब्द के ऐसा होता है और केवल स्वरादि विभक्तियों में वेघस् शब्द के ऐसे भी होते हैं। आकारान्त-हाहा (Name of a Gandharva)| प्रथमा हाहाः, हाहौ, हाहाः। द्वितीया-हाहाम्, हाहौ, हाहान् । तृतीया, हाहा, हाहाभ्याम्, हाहामिः । चतुर्थी-हाहै, हाहाभ्याम् , हाहाभ्यः पञ्चमी-हाहाः, हाहाभ्याम् , हाहाभ्यः । षष्ठी-हाहाः, हाहो, हाहाम् । सप्तमी-हाहे, हाहो, हाहासु।सम्बोवन-हाहौः, हाहौ, हाहा। : धातु निष्पन्न भिन्न सब पुंलिङ्ग आकारान्त शब्दों के रूप ऐसे ही होते । यहाँ हाहा अव्युत्पन्न गन्धर्व-वाचक शब्द है। किन्तु हा शब्द जहा- तीति हाहा (हा+किप) शब्द का रूप विश्वपा के तुल्य है। ब्राह्मण-वाचक श्रा शब्द का रूप किसी किसी के मत में गन्धर्व-वाचक हाहाके ऐसा और किसी किसी के मत में विश्वपा के ऐसा होता है। ईकारान्त । . सेनानी ( The leader of an army, A general )। प्रथमा-नानीः, सेनान्यौ, सेनान्यः। द्वितीया सेनान्यम, सेनान्यौ, सेनान्यः। तृतीया-सेनान्या, सेनांनीभ्याम्, सेनानीभिः। चतुर्थी-सेनान्ये, सेनानीभ्याम्, सेनानीभ्यः । पञ्चमी-सेनान्यः, सेनानीभ्याम्, सेनानीभ्यः। षष्ठी-सेनान्यः, सेनान्योः, सेनान्याम् । सप्ठमी-सेनान्याम्, सेनान्योः, सेनानीपु । सम्बोधन-सेनानीः, सेनान्यौ, सेनान्यः । अग्रणी, ग्रामणी प्रमृति शब्दों के भी ऐसे ही रूप होते हैं। प्रधी (प्रकृष्ट ध्यानकारी) आदि कईएक शब्दों के रूप सेनानी शब्द के तुल्य होते हैं, केवल सप्तमी के एकवचन में प्रध्यि ऐसा पद होता है, इतना ही विशेष है। वातप्रमी ( antelope ) आदि कईएक शन्दों के रूप सेनानी शब्द के सदृश हैं, केवल द्वितीया के एकवचन में वातप्रमीम् बहुवचन में वातप्रमीन और सप्तमी के एकवचन में वातप्रमी ऐसे पद होते हैं, इतना ही प्रमेद है। ययी ( a horse ) और पपी ( the sun) शब्दों के रूप वातप्रमी के ऐसे ही हैं। प्रकृष्ट बुद्धि विशिष्ट (Pra-eminently intelligent ) अर्थ में प्रधी शन्द के रूप वातप्रमी के तुल्य हैं, जैसे चतुर्थी के एकवचन में प्रध्य, पञ्चमी के एकवचन में प्रध्याः,पाठी के एकवचन में प्रध्याः, बहुवचन में प्रधानाम, सप्तमी एकवचन , १८४ उपक्रमणिका। . . . में प्रघ्याम् और सम्बोधन के एकवचन में प्रधी ऐसे रूप होते हैं, इतनी ही विशेषता है। क्रोष्टु (Jackal) शन्द | प्रथमा-कोष्टा, क्रोटारी, क्रोटार। द्वितीया-क्रोप्रारम्, क्रोटारी, कोष्टन् । तृतीया-क्रोष्टुना क्रोष्टा, क्रोष्टु- भ्याम् , क्रोष्टुभिः । चतुर्थी कोटवे क्रोष्टे, कोष्टुभ्याम् , क्रोष्टुभ्यः । पञ्चमी-क्रोप्टोः क्रोष्टुः, क्रोष्टुभ्याम् , क्रोप्टुभ्यः । षष्ठी क्रोटोः क्रोष्ट, क्रोम्वोः क्रोष्ट्रोः, क्रोष्टनाम् । सप्तमी-क्रोष्टौ क्रोएरि, कोटवोः क्रोष्टयाम् । क्रोष्ट्रोः, क्रोष्टुपु । सम्बोधन-क्रोटो, कोष्टारो, क्रोप्टारः। मुग्धबोध के अनुसार द्वितीया बहुवचन में क्रोएन भी होता है। किन्तु पाणिनि के अनुसार केवल क्रोप्दून् होता है। अकारान्त सुलू ( A good cutter ) | प्रथमा-सुलूः, मुल्वी, सुल्यः। द्वितीया-सुल्वम्, सुल्वी, सुल्वः। तृतीया-सुल्वा, सुलूभ्याम, मुलूभिः । चतुर्थी-सुल्वे, सुलूभ्याम्, सुलूभ्यः । पञ्चमी-सुल्वः, सुलूभ्याम् , सुलूभ्यः । षष्ठी-सुल्वः, सुल्योः, सुल्वाम् । सप्तमी-सुल्वि, सुल्वो, सुलूपु । सम्बोधन-सुलूः, सुल्वी, सुल्पः । खलपू(Sweeper), वर्षाभू ( Frog), करभू (Finger nail), कागपू, हन्भू ( Snake ) प्रभृति शब्दों के भी ऐसे ही रूप होते हैं । हूहू (एक गन्धन्त्र का नाम ) शब्द का रूप सुलू शब्द के तुल्प होता है, केवल द्वितीपा के एकवचन में हूहम् और वहुवचन में हूहून् ऐसे पद होते हैं, इतना ही प्रमेद है। एकारान्त से “सह इना कामेन वर्तते," (One with desire) शब्द! प्रथमा-सेः, सयौ, सयः। द्वितीया-सयम् , सयौ, सयः । तृतीया-सया, सेभ्याम् , सेभिः । चतुर्थी-सये, सेभ्याम् ; सेभ्यः । पञ्चमी-से, सेभ्याम्, सेभ्यः । पष्ठी-सेः, सयोः, सयाम् । सप्तमी-सयि, सयोः, सेपु । सम्बोधन-से, सयौ, सयः । एकारान्त पुंलिङ्ग शब्द बहुत ही कम हैं। ऐकारान्त रै ( Wealth, Riches) शब्द प्रयमा-ग, रायो, रायः। द्वितीया-रायम्,रायौ,रायः। तृतीया-राया,राभ्याम् राभिः । चतुर्थी - राये, राभ्याम्, राम्यः । पञ्चमी-रायः, राभ्याम, राभ्यः । षष्ठीरायः, रायोः रायाम् । सप्ठमी-गायि, रायोः, गसु । सम्बोधन-रा,रायो, रायः .

परिशिष्ट, स्वरान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । १८५ . स्वरान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द आकारान्त द्वितीया, तृतीया, जरा । द्वितीया और तृतीया शब्दों के रूप लता शब्द के तुल्य हैं, केवल चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी और सप्तमी के एकवचन में कुछ विशेष हाते हैं। यथा- चतुर्थी पञ्चमी षष्ठी सप्तमी द्वितीया } द्वितीयस्यै. द्वितीयस्याः द्वितीयस्याः द्वितीयस्याः द्वितीयस्याम् द्वितीयायै द्वितीयायाः द्वितीयायाः द्वितीयायाम, (तृतीया शन्द के रूप द्वितीया शब्द के समान हैं) जरा (Old age, General debility ) | . एकवचन 'द्विवचन बहुवचन प्रथमा नर अरसौ*, जरे जरसा, जराः द्वितीया अरसम्, जरामू जरसोर, जरे जरसः, नराः तृतीया जरसा, जरया जराभ्याम् . जराभिः चतुर्थी जरसे, जराये जराभ्याम् नराभ्यः 'पञ्चमी मरसः, जरामाः नराभ्याम् मराभ्यः षष्ठो अरसः, नरायाः नरसोः, जरयोः रसाम, जराणाम्, सप्तमी अरसि, अरायाम् नरसोः, अरयोः जरासु सम्बोधन जरे नरसौ, जरे जरसः,जराः * किसी किसी वैयाकरण के अनुसार सरसों न होकर नरसी होता है। निशा ( Night ) शन्द । प्रथमा-निशा, निशे, निशाः। द्वितीया- निशाम्, निशें, निशाः निशः। तृतीया-निशया निशा, निशाभ्याम् निड्भ्याम, निशाभिः निभिः। चतुर्थी-निशायै निशे, निशाभ्याम् निड्भ्याम्, निशाभ्यः निड्भ्यः । पञ्चमी-निशायाः निशः, निशाभ्याम् निड्भ्याम्, निशाभ्यः निड्भ्यः । षष्ठी-निशायाः निशः, निशयोः निशोः, निशानाम् निशाम् । सप्तमी-निशायाम् निशि, निशयोः निशोः, निशासु निट्स निट्सु । सम्वोधन-निशे, निशे, निशाः। मतान्तर में निजभ्याम्, निभिः, निजभ्यः, निशु ऐसे पद भी होते हैं। नासिका. (.Nose.) शब्द । प्रथमा-नासिका, नासिके, नासिकाः। द्वितीया-नासिकाम, नासिके, नासिकाः नसः। तृतीया-मासिकया १६ उपक्रमणिका। नसा, नासिकाभ्याम् नोभ्याम्, नासिकाभिः नोभिः । चतुर्थी-नासिकार्य नसे, नासिकाभ्याम् नोभ्याम्, नासिकाभ्यः नोभ्यः। पञ्चमी-नासिकायाः नसः, नासिकाभ्याम् नोभ्याम्, नासिकाभ्यः नोभ्यः । षष्ठी-नासिकायाः नसः, नासिकयोः नसोः, नासिकानाम् भसाम् । सप्तमी-नासिकायाम् नसि, नासिकयोः नसोः, नासिकासु नासु नस्सु । सम्बोधन-नासिके, नासिके, नासिकाः। पृतना ( Army) शब्द । प्रथमा-पृतना, पृतने, पृतनाः। द्वितीया- पृतनाम्, पृतने, पृतनाः पृतः । तृतीया-पृतनया पृता, पृतनाभ्याम् पृद्धभ्याम, पृतनाभिः पृद्धिः । चतुर्थी-पृतनायै पृते, पृतनाभ्याम् पृझ्याम्, पृतनाभ्यः पृद्भ्यः । पञ्चमी-पृतनायाः पृतः, पृतनाभ्याम् पृयाम, पृतनाभ्यः पृभ्यः । षष्ठो-पृतनायाः पृतः, पृतनायोः पृतोः, पृतनानाम् पृताम् । सप्तमी-पृतनायाम् पृति, पृतनयोः पृतोः, पृतनासु पृत्सु । सम्बोधन-पृतने, पृतने, प्रतनाः। जरा आदि शब्दों के एक रूप ठीक लता शब्द के तुल्य हैं, दूसरे रूप में कहीं कहीं विशेषता है। स्वरान्त-क्लीवलिङ्ग (नपुंसक लिङ्ग) शब्द । अजर (One not getting old ) शब्द। प्रथमा-अजरम्, अजरे अजरसी, अजराणि अजरांसि। द्वितीया-अजरम् अजरसम्, अजरे अजरसी, अजराणि अजरांसि, और सब विकियों में पुलिङ्ग निर्जर शब्द के तुल्य है। मुग्धबोध के अनुसार प्रथमा के एकवचन में अजरसम् भी होता है । शीर्ष (Houd, Summit) शन्द । पाणिनि के अनुसार सभी विभक्तियों में फल शब्द के सदृश किन्तु मुग्धबोध के अनुसार प्रथमा और द्वितीया विभक्तियों में फल शब्द के और दूसरी विभक्तियों में पुंलिङ्ग यूष शब्द के - हृदय (Heart) शब्द । प्रथमा-हृदयम्, हृदये, हृदयानि - द्वितीया- हृदयम्, हृदये, हृदयानि हन्दि । तृतीया--हृदयेन हदा, दयाभ्याम् इद- भ्याम्, हृदयः वृद्धिः । चतुर्थी हृदयाय हृदे, हृदयाभ्याम्. हृद्भ्याम्, हृदयेभ्यः हृद्भ्यः । पञ्चमी हृदयात् हृदः, दयाभ्याम् हृद्भ्याम् हृदयेभ्यः हृद्भ्यः । षष्ठी-हृदयस्य हृदः, हृदययोः हृदोः, इंदयानाम् दाम् । सप्तमी- हृदये हदि, हृदययोः दो,हृदयेषु हत्सु । सम्बोधन-इदय, हदये हदयानि ।

. - : '- परिशिष्ट, स्वरान्त क्लीवलिङ्ग शब्द । ::१८७ 1:. उदक (Water) शब्दः। प्रथमा-उदकम्, उदके, उदकानि । द्वितीया- उदकम्, उदके, उदकानि उदानि । तृतीया-उदकेन, उना, उदकाभ्याम् उदभ्याम्, उदकैः ठन्द्रिः। चतुर्थी उदकाय उद्ने, उदकाभ्याम् उद्भ्याम्, उदकेभ्यः उद्भ्यः। पञ्चमी-उदकात् . उनः, उदकाभ्याम् उद्भ्याम, उदकेभ्यः उद्भ्यः । षष्ठी-उदकस्य उनः; उदकयोः उनोः, उदुकानाम् उद्नाम् । सप्तमी-उदके ठनि उदनि, उदकयोः उद्नोः, उदकेषु उद्सु । सन्धोधन-उदक, उदके, उदकानि । आसन (Seat) शब्द, प्रथमा-श्रासनम्, आसने, श्रासनानि । द्वितीया-प्रासनम्, आसने, आसनानि श्रासांनि । तूंतीया-पासनेन .आना, आसनाभ्याम् प्रासभ्याम्, आसनः श्रासभिः। चतुर्थी-आसनाय श्रास्ने,..आसनाभ्याम् आसभ्याम्, आसनेभ्यः आसभ्यः । पञ्चमी बासनात् श्रानः, आसनाभ्याम् आसभ्याम्, आसनेभ्यः आसभ्यः । षष्ठो-आसनस्यं आनः, आसनयोः श्रास्रोः, श्रासनानाम् आमाम् । सप्तमी-प्रासने आनि श्रासनि, आसनयोः श्रास्रोः, आसनेषु प्रासम। सम्बोधन-आसन, प्रासने, आसनानि । आस्य (Mouth) शन्द का रूप फल शब्द के ऐसा है, किन्तु सिद्धान्त- कौमुदी के अनुसार शसादि विक्तियों में आस्य शब्द के स्थान में प्रासंन् आदेश होकर आसन शब्द के विकल्प रूप के पद मा सब होते हैं। मांस ( Flesh ) शब्द । प्रथमा-मांसम, मांस, मांसानि । द्वितीया- मांसम्, मांसे, . मांसानि मांसि । तृतीया-मांसेन मांसा, मांसाभ्याम् मान्भ्याम्, मांसैमानिमः । चतुर्थी-मांसाय.मांसे, मांसाभ्यामुमान्भ्याम्, मांसभ्यः मान्भ्यः। पञ्चमी-मांसात् मांसः, मांसाभ्याम् मान्भ्याम्, मांसेभ्यः मान्भ्यः । षष्ठी-मांसस्य मांस, मांसयोः मांसोः, मांसानामू मांसाम् । सप्तमो-मांसे मांसि, मांसयोः मांसोः, मांसेषु मान्सु मान्सु सम्बोधन-मांस, मांसे, मांसानि । सानु ( Peak, Summit, Ridga ) शन्द | प्रथमा-सानु, सानुनी, सानूनि । द्वितीया-सानु, सानुनी, सानूनि स्नूनि । तृतीया-सानुना स्तुना, सानुभ्याम् स्नुभ्याम्, सानुभिः मुभिः । चतुर्थी-सानुने स्नुने, सानुभ्याम् स्नुभ्याम्, सानुभ्यः स्नुभ्यः। पञ्चमी-सानुना,मन, सानुभ्याम् स्नुभ्याम्, सानुभ्यः स्तुभ्यः। षष्ठो-सानुनः स्तुनः,': सानुनोः स्नुनोः, सानूनाम् स्नूनाम् । सप्तमी सानुनि स्तुनि, सानुनोः स्नुनोः, सानुषु स्नुषु । सम्बोधन-सानो सानु, सानुनी, सानूनि । .

. १मन उपक्रमणिका। - दीर्घस्वरान्त क्लोबलिङ्ग शब्द हस्वस्वरान्त हो जाते हैं और उनके रूप हस्वस्वरान्त क्लोवलिङ्ग शब्दों के ऐसे होते हैं। इसलिए क्लोवलिङ्ग आका- सन्त शब्द अकारान्त ईकारान्त, शब्द इकारान्ठ, ऊकारान्त शन्द उका- रान्त और विशेष विधान के अनुसार एकारान्त तथा ऐकारान्त शब्द इका- रान्त और पोकारान्त तथा औकारान्त शब्द उकारान्त हो जाते हैं। यश, श्रीपा-श्रीप (रूप फल शब्द के सदृश, सुधी-सुधि (रूप वारि शब्द के तुल्य केवल तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी तथा सप्तमी के एकवचन में यथाक्रम सुधिया, सुधिये, सुधियः, सुघियः, सुधियि और षष्ठी तथा सप्तमी के द्विवचन में सुधियोः और षष्ठी के बहुवचन में सुधियाम् ऐसे विकल्प रूप भी होते हैं, इतनी ही विशेषता है। प्रधी शब्द के रूप सुधी शब्द के तुल्य ही हैं केवल तृतीया के एकवचन में विकल्प रूप प्रध्या प्रधिना होता है, इतना हो अन्तर है। सुरै सुरि (रूप वारि शब्द के ऐसा); प्रद्यो (Ledding to good heaven, i. e., Virtue) =प्रय (रूप मधु शब्द के तुल्य); सुनौ (Having good boats )=(सुनु रूप मधु शब्द के सदृश) किसी किसी वैयाकरण के अनुसार सुधी आदि शब्दों के रूप क्लोवलिङ्ग इकारान्त ठथा उकारान्त विशेषण शब्द अनादि और स्वादु के ऐसे होते हैं। प्ररै (Exceedingly wealthy) प्ररि के रूप में अनादि के रूप से कुछ विशेषता है। यथा, प्रथमा तथा द्वितीया-प्ररि, प्ररिणी, प्रणि । तृतीया-प्ररिया प्रराया, पराभ्याम्, प्रराभिः । धतुर्थी-परिणे, प्रराये, पराभ्याम्, पराभ्यः। पञ्चमी-प्ररिणः प्ररायः, प्रराभ्याम, प्रराभ्यः । षष्ठी-परिणः प्रायः, प्ररिणोः प्रायोः, परीणाम् प्ररायाम् । सप्तमी-प्ररिणि प्रगयि, परिणोः प्ररायोः, प्ररासु । सम्बोधन-प्ररे प्ररि, प्ररिणी, प्रीणि । पाणिनि के मत में प्ररि के रूप विकल्प रहित वारि के सदृश होते हैं। दूसरे नहीं होते। दीक्षित के अनुसार षष्ठी के धाषचन में केवल प्ररीणाम् होता है। प्रद्यो-प्रा के रूप स्वादु के ऐसे हैं केवल तृतीया के एकवचन में प्रद्यवा और षष्ठो के बहुवचन में प्रद्यवाम् ये विकल्प रूपी भी होते हैं। सुगौ-सुनु के रूप मधु शब्द के तुल्य है केवल तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठो तथा सप्तमी के एकवचन में विकल्प रूप यथाक्रम सुनाषा, सुनांवे, सुनावः, मुनाका, सुनावि और षष्ठी तथा सप्तमी के द्विवधन में सुनावो और षष्ठो के बहुवचन में सुनावाम् भी होते हैं और इतनी ही विशेषता है। पाशिनि के मत में हो.रूप नहीं होते केवल मधु के सहश एक ही होते हैं।

. परिशिष्ट, व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग शब्द । १८९ व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग शब्द । ककारान्त-सर्वशक् ( Almighty ) शब्द । प्रथमा-सर्वशक् सर्वशग, सर्वशको, सर्वशकः। द्वितीया-सर्वशकम्, सर्वशको, सर्वशकः । तृतीया-सवंशका, सर्वशग्भ्याम्, सर्वशग्भिः। चतुर्थी- सर्वशके, सर्वशग्भ्याम्, सर्वशग्भ्यः। पञ्चमी-सर्वशकः, सर्वशग्भ्याम् , सर्वशाभ्यः। षष्ठी सर्वशकः, सर्वशकोः, सर्वशकाम् । सप्ठमी-सर्वशकि, सर्वशकोः, सर्वशक्षु । सम्बोधन-सर्वशक सर्वशग, सर्वशको,सशकः । खकारान्त-चित्रलिख (Painter)। प्रथमा-चित्रलिक चित्रलिग, चित्रलिखौ, चित्रलिखः। द्वितीया-चित्रलिखम्, चित्रलिखौ, चित्रलिखः । तृतीया-चित्रलिखा, चित्रलिग्भ्याम्, चित्रलिग्मिः । चतुर्थी-चिलिखे, चिलिग्भ्याम्, चित्रलिग्भ्यः । पञ्चमी-चित्रलिखः, चित्रलिग्भ्याम् , चित्रलिग्भ्यः । षष्ठी-चित्रलिखः, चित्रलिखो, चित्रलिखाम् । सप्तमी- चित्रलिखि, चित्रलिखोः, चित्रलिक्षु । सम्बोधन-चित्रलिक् चित्रलिंग, चिलिखौ, चित्रलिखः। चकारान्त-प्राच (East, Eastern)| प्रथमा-प्रा, प्राञ्चौ, प्राश्वः। द्वितीया-प्राचम्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः। सम्बोधन-प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राश्चः । और सब विक्तियों में जलमुच शब्द के तुल्य रूप हैं। प्रत्यच् (West, Western)। प्रथमा-प्रत्य, प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः। द्वितीया-प्रत्यञ्चम् , प्रत्यश्चौ, प्रतीचः। तृतीया-प्रतीचा, प्रत्यग्भ्याम् , प्रत्यग्भिः । चतुर्थी-प्रतीचे, प्रत्यग्भ्याम, प्रत्यग्भ्यः । पञ्चमी-प्रतीचा, प्रत्यग्भ्याम् , प्रत्याभ्यः । षष्ठी-प्रतीचः, प्रतीचोः, प्रतीचाम् । सप्तमी- प्रतीचि, प्रतीचोः, प्रत्यक्ष । सम्बोधन-प्रत्यङ, प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः । सध्यच ( सहाच किप ), सम्यच, अद्यच् आदि शब्दों के रूप प्रत्यच शब्द के तुल्य हैं । सप्य सहगामी । अन्च (One who follows)। प्रथमा अन्वा, अन्वञ्चौ, अन्यञ्चः । द्वितीया अन्वञ्चम्, अन्वञ्चौ, अनूचः । तृतीया अन्चा, अन्वन्याम् . अन्वग्भिः । चतुर्थी अनूचे, अन्वग्भ्याम्, अन्वग्भ्यः । पञ्चमी-अनूचः, अन्वग्भ्याम् , अन्धभ्यः । षष्ठी-अनूचः, अनूचोः, अनूचाम् । सप्तमी- अनूचि, अनूचोः, अन्वक्षु । सम्बोधन-अन्वङ्, अन्वञ्चौ, अन्वः। विश्वच ( Al-parvading) शब्द के रूप अन्धच शब्द के तुल्य हैं। अदमुयच् शब्द । प्रथमा अदमुयङ्, अदमुयञ्चौ, अदमुयञ्चः। द्वितीया- अचमुयञ्चम् , अदमुयञ्चौ, अमुईचः । तृतीया अदमुईचा, अदमुपग्भ्याम. . ।

१६० उपक्रमांणका। .. -- . .. , . अदमुयग्भिः इत्यादि। अमुमुपच शब्द का रूप भी ऐसा ही होता है। द्वितीया के बहुवचन में असुमुईचः; तृतीया के एकवचन में अमुमुईचा. इत्यादि होता है । सुवृश्च शब्द । प्रथमा-सुवृद्, सुवृश्ची, सुवृश्चः। द्वितीया- शुवृश्चम्, सुवृश्चौ, सुवृश्चः। तृतीया-सुवृश्चा, सुवृड्भ्याम, सुवृद्धि इत्यादि सप्तमी के बहुवचन में सुवृटुसु होता है। faezia ( A beast or bird, moving tortuously ) 1 STAT- तिर्य, तिर्यञ्चौ, तिर्यञ्चः। द्वितीया-तिय॑ञ्चम्, तिर्यौ, तिरश्चः । तृतीया-तिरश्वा, तिर्यग्भ्याम्, तियेग्भिः। चतुर्थी-तिरश्चे, तिर्यग्भ्याम्, तिर्यग्भ्यः। पञ्चमी-तिरश्चः, तिर्यग्भ्याम्, तिर्यग्भ्यः । षष्ठी-तिरश्चः, तिरश्चोः, तिरश्चाम् । सप्तमी-तिरश्चि, तिरश्चोः, तिर्यक्षु । सम्बोधन- तिर्यङ्, तिर्यञ्चौ, तिर्यञ्चः। उदच् (North, Northern)। प्रथमा-उदङ्, उदञ्चौ, उदञ्चः। द्वितीया- उदञ्चम्, उदयौ, उदीचः । तृतीया-उदीचा, उदग्भ्याम् , उदग्भिः । चतुर्थी-उदीचे, उदग्भ्याम्, उदग्भ्यः । पञ्चमी-उदीचः, उदग्भ्याम्, उदग्भ्यः। षष्ठो-उदीचः, उदीचोः, उदीचाम् । सप्तमी-उदीचि, उदीचोः, उदक्षु । सम्बोधन-उदङ्, उदयौ, उदञ्चः। प्राञ्च (One who worships ) । प्रथमा-माङ्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः । द्वितीया-प्राञ्चम्, प्राञ्चौ, प्राञ्चः। तृतीया-पाञ्चा, प्राभ्याम् , प्राभिः । चतुर्थी-प्राञ्चे, प्राभ्याम्, प्राइभ्यः । पञ्चमी-प्रायः, प्राभ्याम्, प्राभ्यः। षष्ठी-प्राञ्चः, प्राञ्चोः, प्राचाम् । सप्तमी-प्रीचि, प्राञ्चोः, प्राङ्मु । सम्बोधन-प्राङ्, प्राञ्चौ, प्राचः। प्रत्यञ्च, उदच, तिर्यच, क्रुञ्च इत्यादि शब्दों के रूप प्राञ्च शब्द के तुल्य । सभी चकारान्त पुंलिङ्ग शब्द स्त्रीलिङ्ग में, ईकारान्त होजाते हैं। नकारान्त खनूज् (Lame, Limping) प्रथमा-खन्, खी, खञ्जः। द्वितीया-खञ्जम्, खञ्जौ, खञ्जः । तृतीया-खजा, खन्भ्याम् , खन्मिः । चतुर्थी-खञ्ज, खन्भ्याम् , खन्भ्यः । पञ्चमो-खञ्जः, खन्भ्याम् , खन्भ्यः । षष्ठी-खनः, खो, खाम् । सप्तमी-खजि, खो, खन्सु । सम्वोधन- खन्, खौ, खञ्जः। भृस्ज् ( Trying) | प्रथमा-भृद्, भृजौ, भृजः। द्वितीया-भृजम्, भृजौ, भृजः । तृतीया-भृजा, भृड्भ्याम्, भृभिः । चतुर्थी-भृजे, भृड्- भ्याम् मृड्भ्यः। पञ्चमी-मुजः, मृडूभ्याम्, भृड्भ्यः। षष्ठी मृजः, भृजो, मृजाम्। सप्तमी "भृज्जि, भृजो, मृट् । सम्बोधन-मृद्, मृजौ, मुजः . - . परिशिष्ट, व्यञ्जनान्त पुंलिङ्ग शब्द । १९१ "अंक्यांजू ( Badly sacriticing) | प्रथमा अवयाः, अषयाजौ, अव- याजः। द्वितीया-अवयासम्, अवयाऔ, अवयानः। तृतीया-अव्याजा, अवयोभ्याम, अवयोभिः । चतुर्थी अवयाजे, 'अवयोभ्याम्, अवयोभ्यः । पञ्चमी-अवयाजः, अवयोभ्याम्, अवयोभ्याषष्ठी-अवयाजः, अश्याजोः, . अक्याजाम् । सप्ठमी-अवयानि, अषयांजोः, अवयःसु ( अवयस्सु)। सम्बोधन-अवयाः अवयः, अवयानी, अवयाजः। दकारान्त-सुपादु(Having beautiful feet)|प्रथमा-सुपात् सुपादु, सुपादौ, सुपादः। द्वितीया-सुपादम्, सुपादौ, सुपदः । तृतीया-सुपदा, सुपाझ्याम्, सुपादिः। चतुर्थी-सुपदे, सुपाझ्याम्, सुपाभ्यः । पंञ्चमी-सुपदः, सुपाभ्याम्, सुपाद्भ्यः। षष्ठी-सुपदः, सुपदोः,सुपदाम् । सप्तमी-सुपदि, सुपदो, सुपारसु । सम्बोधन-सुपात् सुपाद्, सुपादौ, सुपादः। द्विपाद्, त्रिपाद्, चतुष्पाद्, व्याघ्रपाद् आदि पादु-भागान्त समास-निष्पन्न शब्दों के रूप ऐसे ही होते हैं। पकारान्त-गुप् (One who protects) | प्रथमा-गुप गुह, गुपौ, गुपः। द्वितीया-गुपम्, गुपौ, गुपः। तृतीया-गुपा, गुरुभ्याम्, गुन्भिः। चतुर्दी-गुपे, गुन्भ्याम्, गुन्भ्यः। पञ्चमी-गुपः गुल्भ्याम्, गुब्भ्यः । प.ठी-गुपः, गुपोः, गुपाम् । सप्तमी-गुपि, गुपोः, गुप्सु । सम्बोधन- गुप् गुरु, गुपी, गुपः। मकारान्त प्रशाम् (Tranquil)। प्रथमा-प्रशान्, प्रशामौ, प्रशामः । द्वितीया-प्रशामम्, प्रशामौ, प्रशामः। तृतीया-प्रशामा, प्रशान्भ्याम्, प्रशान्मिः । चतुर्थी-प्रशामे, प्रशान्भ्याम्, प्रशान्भ्यः । पञ्चमी-प्रशामः, प्रशान्भ्याम्, प्रशान्भ्यः । षष्ठी-प्रशामः, प्रशामोः,प्रशामाम् । सप्ठमी- प्रशामि, प्रशामोः, प्रशान्सु । सम्बोधन-प्रशाम्, प्रशामौ, प्रशामः । षकारान्त-दोष (An arm)| प्रथमा-दो, दोषौ, दोषः। द्वितीया- दोषम् ; दोषौ, दोषः दोषणः । तृतीया-दोषा दोष्णा, दोाम् दोषभ्याम्, दोभिः दोषभिः । चतुर्थी-दोषे दोष्णे, दोभ्याम् दोषभ्याम, दोभ्यः दोषभ्यः । पञ्जमी-दोषः दोष्णः, दोाम् दोषभ्याम्, दोभ्यः दोषभ्यः । षष्ठी-दोषः दोष्णः, दोषोः दोष्णोः, दोषाम् दोषणाम् । सप्तमी-दोषि दोष्मिण दोषणि, दोषोः दोष्णोः,दोपु दोषसु । सम्बोधन-दोः, दोषौ, दोषः। सजुम् (Helping)| प्रथमा-सनूः, -सजुषो,.. सजुषः। द्वितीया- सनुषम्, सजुषो, सञ्जुषः ! तृतीया-सनुषा, साम, सर्मिः । चतुर्थी- सजुये, सनूाम, सभ्यः । पञ्चमी-सक्षुषः, साम, सनद्यः । षष्ठी - ११२ उपक्रमरिएका। सङ्घषः, सजुषोः, सजुषाम् । सप्तमी-सजुषि, सजुषोः, सनू । सन्दोधन- सनूः, सजुषी, सजुषः ।। पिपठिष ( Wishing to read ) शब्द के रूप सतुष्शब्द के ऐसे होते हैं केवल सजुध के रूप में जहाँ उ और हैं पिपठिष के सर में वहां यथा- क्रम इ और ई होते हैं, इतनी ही विशेषता है। यया, पिपठीः, पिपठिषा, पिपठीभिः, पिपटीाम्, पिपठीयः पिपठीपु पिपठीप्पु इत्यादि। पिपक्ष (Wishing to cook) 1 प्रथमा ज्या सम्बोधन-पिपक पिरग, पिपक्षी, पिपक्षः। द्वितीया-पिपक्षम्, पिपलौ, पिपक्षः। तृतीया- पिपक्षा, पिपग्भ्याम्, पिपग्मिः । चतुर्थी-पिपक्षे, पिपग्भ्याम्, पिपग्भ्यः। 'पञ्चमी-पिपक्षः,पिपग्भ्याम्, पिपग्भ्यः । षष्ठी-पिपक्षः, पिपक्षोः, रिपक्षाम्, सप्तमी-पिपक्षि, पिपक्षोः पिपक्षु । गोरक्ष, विवक्ष, दिघक्ष आदि सब क्षकारान्त शब्दों के रूप ऐसे होते हैं। । विषिश्, लिलिक्ष्, तक्ष, म, आदि शब्दों के रूप भी पिपल के ऐसे हैं केवल प्रथमा और सम्बोधन के एकवचन में क्ष् के स्थान में है और होता है, तथा तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन और बहुवचन में स् के स्थान में इ होता है और सप्तमी के बहुवचन में क्ष् के स्थान में होता है, इतनी ही विशेषता है। यथा, विषिट्, विक्ट्,ि विविड्म्याम, विषिभिः, विविड्भ्यः, विविट्सु इत्यादि । व्यञ्जनादि विभक्ति सु, भ्याम्, मिस्, भ्पस, और सुप परे रहने से शब्द के अन्त में स्थित म के अन्तर्गत क ष्वाद के स्थान में जाता हो तो उस क का लोप होता है, अन्यत्र के अन्तर्गत.पू का लोप होता है। शकारान्त-पुरोडार (Sacrificial food or oblation) । प्रपमा- पुरोडाः, पुरोडाशौ, पुरोडायः। द्वितीया-पुरोहायम्, पुरोडाशी, पुरोडाशः। तृतीया-पुरोडाथा, पुरोडोभ्याम्, पुरोडोमिः । चतुर्थी-पुरोड शे, पुरोडो- भ्याम्, पुरोडोभ्यः । पञ्चमो-पुरोडाश, पुरोडोल्पाम्, पुरोडोस्यः। पहा- पुरोदशः, पुरोडशोः, पुरोडशाम् । सप्ठमी-रोदशि, पुरोडाशोः, पुरोटाम् । सम्बोधन-पुरोडाः पुरोडः, पुरोडाशी, पुरोडाशः । हकारान्त अनुग्रह (An or )1 प्रथमा अनड्वान्, अनवाही, अनड्वाहः । द्वितीया-अनड्वाहम्, अनवाही, अनडहः । तृतीया- अनडहा, अनभ्याम्, अनहन्द्रिः। चतुर्थी अनहुहे, अनम्याम, अनहद्भ्यः। पञ्चमो-अनहहः, अनहुभ्याम्, अनम्यः। पडो- अनड्डहा, अनड्डहोः, अनड्डहाम्। सप्तमी-अनड्डहि, अनहुहोः, अनइत्स। सम्बोधन अनड्वन्, अनड्वाही, बनबाहः । इ . .

परिशिष्ट, व्यञ्जनान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द १९३ व्यञ्जनान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द शकारान्त-नश् (Destruction)| प्रथमा तथा सम्बोधन-नक नग नट् नड़, नौ, नशः। द्वितीया-नशम्, नशौ, नशः । तृतीया-नशा, नग्भ्याम् नड्भ्याम्, नग्भिः नभिः । चतुर्थी-नशे, नग्भ्याम् नड्भ्याम्, नग्भ्यः नड्भ्यः। पञ्चमी-नशः, नग्भ्याम् नड्भ्याम्, नग्भ्यः नड्भ्यः । षष्ठों-नशः, नशोः, नशाम् । सप्तमी-नशि, नशोः, नक्षु नटसु नट्सु । सकारान्त-आशिस (Blessing)| प्रथमा-आशी:,आशिषौ,आशिषः। द्वितीया-आशिषम्,आशिषौ,अाशिषः। तृतीया-आशिषा, प्राशीाम्, पाशीभिः । चतुर्थी-आशिये, आशीर्ष्याम्, आशीर्व्यः। पञ्चमी-आशिषः, श्राशीाम्,आशीभ्यः । षष्ठी-आशिषः,आशिषोः, आशिषाम् । सप्तमी- भाशिषि, आशिषोः, आशीषु । सम्वोधन-पाशीः, आशिषौ, पाशिषः । हकारान्त-उपानहु ( Shoe ) | प्रथमा-उपानत् उपानद्, उपानही, उपानहः । द्वितीया-उपानहम्, उपानही, उपानहः । तृतीया-उपानहा, उपानद्भ्याम्, उपानद्रिः। चतुर्थी-उपानहे, उपानद्भ्याम्, उपानद्भ्यः । पञ्चमी-उपानहः, उपानद्भ्याम्, उपानद्भ्यः। षष्ठी उपानहः, उपानहोः, उपानहाम् । सप्तमी-उपानहि, उपानहोः, उपानरसु । सम्बोधन-उपानत् उपानद्, उपानही, उपानहः । व्यञ्जनान्त क्लीवलिङ्ग शब्द । चकारान्त-प्राच (East, Eastern) I प्रथमा-प्राक, प्राची, प्राचि । द्वितीया-प्राक्, प्राची, प्राञ्चि । सम्बोधन-प्राक, प्राची, प्राचि । और सव विभक्तियों में जलमुच शब्द के तुल्य प्रत्यच-(West, Western)| प्रथमा-प्रत्यक, प्रतीची, प्रत्यञ्चि । द्वितीण-प्रत्यक, प्रतीची, प्रत्यञ्चि । सम्बोधन-प्रत्यक, प्रतीची, प्रत्यञ्चि । और सव विभक्तियों में पुंलिङ्ग के सदृश है। faeza (DIoving tortuously ) | प्रथमा-तिर्यक, तिरश्ची, तिर्यञ्चि । द्वितीया-तिर्यक, तिरश्ची, तिर्यचि। सम्बोधन-तिर्यक, तिरश्नी, तिर्यञ्चि और सब विभक्तियों में पुलिङ्ग के सदृश है। उदच्-(North, Northern ) | प्रथमा उदक, उदीची, उदश्चि । द्वितीया-उदक , उदीची, उदश्चि । सम्बोधन-उदक, उदीची, उदश्चि । और सव विभक्तियों में पुंलिङ्ग के सदृश है। अकारान्त-अमृज् । (Blood)| प्रथमा असक, असूजी, असृञ्जि। द्वितीया-असक, असूजी, अनि। सम्बोधन-असूक, असूजी, असलि। ।

१६४ उपक्रर्माणका। और सब विभक्तियों में पुंलिङ्ग वणिज शब्द के समान रूप होते हैं। प्रायः सब जकारान्त क्लीवलिङ्ग शब्दों के रूप ऐसे ही हैं। तकारान्त-च्छत् (Going)| प्रथमा-गच्छत्, गच्छन्ती,गच्छन्ति । द्वितीया-च्छत, गच्छन्ती, गच्छन्ति । सम्बोधन गच्छत्, गच्छन्ती, गच्छन्ति। इच्छत् (Wishing) प्रथमा-इच्छद, इच्छती इच्छन्ती, इच्छन्ति । द्वितीया-इच्छत्, इच्छती, इच्छन्ती, इच्छन्ति । सम्बोधन-इच्छत, इच्छती इच्छन्ती, इच्छन्ति । ददत् (Giving) 1 प्रथमा–ददद, ददती, ददन्ति ददति । द्वितीया- ददत, ददती, ददन्ति ददति । सम्बोधन-ददव, ददती, ददन्ति ददति । और सब विभक्तियों में इन शब्दों के रूप गायत् शब्द के तुल्य हैं। बहुत से अत् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप श्रीमत् शब्द के सदृश हैं। भ्वादि- गणीय और दिवादिगणीय धातु के उत्तर अत् प्रत्यय से बने हुए शब्दों के रूप गच्छत् शब्द के समान हैं। तुदादिगणीय और आकारान्त अदादि- गणीय धातु के उत्तर अत् प्रत्यय से निष्पन्न शब्दों के रूप इच्छत शब्द के तुल्य हैं । अभ्यस्त धातु के उचर अन् प्रत्यय से बने हुए शब्दों के रूप ददत् शन्द के ऐसे हैं। दकारान्त-हृद् ( Heart)| प्रथमा-हत् हृद्, हदी, हन्दि। द्वितीया-हृत् हृद्, हृदी, हन्दि । सम्बोधन-ढत हृद्, हृदी, हन्दि । और सब विभक्तियों में सुहृद् शब्द के रूप ऐसे होते हैं। संख्यावाचक शब्द (Cardinal numerals)। १। एक शब्द एकवचनान्त, द्वि, द्विवचनान्त और त्रिशन्द से लेकर अष्टादशन् शन्द तक बहुवचनाम्त है। २। एक, द्वि, त्रि और चतुर्, इन शब्दों के लिङ्ग परवर्ती विशेष्य के लिङ्ग के अनुसार होते हैं। यथा, एकः पुरुषः, एका नारी, एकं फलम द्वौ बालको, देखियो, द्वे फले; त्रयः पुरुषाः, तित्रः नार्यः, त्रीणि फलानि चत्वारः पुमांसः, चतनः खियः, चत्वारि फलानि । ३ । पञ्चन् शब्द से लेकर अष्टादशन् शन्द तक सभी शब्दों के रूप तीनों लिङ्गों में एक ही प्रकार के हैं । यथा, पञ्च पुरुषाः, पञ्च खियः, पञ्च फलानि इत्यादि। ४। एकोनविंशति (Nineteen) से लेकर नवनवति (Ninety-nine तक सब संख्यावाचक शब्द सदा एकवचन में व्यवहत होते हैं। - परिशिष्ट, अव्यय शब्द । १६५ . पथा, वितिः पुरुषाः, त्रिंशत् विया, चत्वारिंशत् शिशवः, षष्टिवृक्षाः, अशीतिः सरांसि । नवतिः पत्राणि इत्यादि । ५। शत, सहन इत्यादि शब्द नित्य क्लोवलिङ्ग के एकवचन में प्रयोग किये जाते हैं । यथा, शतं पुरुषाः, शतं लताः, सहस्रं फलानि इत्यादि । ६ । विंशति, षष्टि, सप्तति, प्रशोति, नवति प्रादिशब्दों के रूप जीलिङ्ग भति शब्द के सदृश होते हैं । त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, आदि शब्दों के रूप तकारान्त वीलिंग शब्दों के ऐसे होते हैं । शत, सहस्र आदि शब्दों के रूप क्लीवलिंग फल शब्द के तुल्य हैं। अव्यय शब्द। (अतिरिक्त) ११कुछ अव्यय शब्द और उनके अँगरेज़ी अर्थ यहाँ दिये जाते हैं, यथा- स्वर् (Heaven); अन्तरा (Between): पुनर् (Again); प्रातर् (In the morning); उच्चस् (Loudly, High); नीचैस् (Slowly, low); शनैस् (slowly); अलम् (Enough); विना, ऋते, अन्तरेण (Except, Without); पारात्, निकषा, समया, समीपम् (Near); चेत् , यदि (I1); कञ्चित् , कञ्चन (What if); यया (As, Namely); तथा (So); तथाहि (As for instance); खलु (Certainly); किल (Verily, Indeed); युगपत् (At once); पृथक -(Separatels);. दिवा (By day); सायम् (In the evening); नकम् (By night); मनांक, ईषत् (A little); जोषम्, तूष्णीम् (Silently); पहिस् (Outside); अन्तर् (Insids); स्वयम् (One's self); सहसा (Suddenly); सुण्ड, सम्यक् (Well); उपांशु (Secretly); भूषा, मिथ्या (Talsaly, In vain); सुधा, वृथा (In vain); पुरा (Form. orly); मिथो, मिथम् (Secretly, Mutually); अद्य (To-day); ह्यस्, पूर्वंयुस् (Yesterday); श्वस, परेयुस् (To-morrow); प्रायस् (Mostly, Often); मुहुस् (Often, Repeatedly); सह, सार्द्धम्, साकम् (With); यद, यतस् (Since); तत, ततस् (Therefore); इति (Thus); न, नो, मा (Not); तु, किन्तु (But); हि (Since, Because); समम् (Egnally); धिक (Fio); अधस्, अघस्तात् (Below, Down); अथ (Then, After- . wards, Now); अथकिम् (Yes); बा, अथवा (Or); एष (Indeed, Only): ध्रुवम्, नूनम् (Certainly); एवम् (Then, So); शश्वत् (Always); भूयस (Exceedingly, Repeatedly); च (And); इव १९६ उपक्रमणिका। (As, Like ); हा, अहो, हन्त (Alas ! AhI); नाम (By name, Indeed ); साम्प्रतम् ( Proper ); यावत् ( As long as); तावत् ( THII, Then ); सकृत् ( Once ): सपदि ( At once ); भृशम् (Grontly): द्राक् (Quickly), दिय्या ( Luckily); चिरम्, चिरेण, चिराय, चिरात, चिरस्य (A long time); कथम् ( How); कहिं (When); वर्हि ( Then); प्राक् ( Before ); हे, भोः, अयि, अये, अरे, रे ( Used in address); नु, ननु, अपि (Used in question );ननु ( Surely). २। उपसर्ग । प्र ( Forth, Forward, Well, Very); परा (Away, Back, Opposed to); अप (Away, off, opposite to);सम् (Together, Thoroughly); नि (Down, in, Opposed to); अव ('Down, off); अनु ( After, Along ); निर् ( Out of, Forth, Without ); दुर् ( Bad ); वि ( Apart, Aray); अधि ( Over, above): सु (Well); उत् (Up, On,Out); परि ( Round, About,On, Every side);प्रति (Again, Back, In opposition to); अभि (To, Of wards); अति (Over, Beyond ); अपि ( Near to, On); उप ( Near to, Under):- श्रा ( To, Towards, A little ) | अब, अपि, इन दोनों उपसर्गों के आदिस्थित प्रकार का विकल्प से लोप होता है । यथा, वगाहः, अवगाहः, वगाहते, अषगाहते, वगाह्म, प्रव- गाह्य; पिधानम् , अपिधानम् ; पिहितम् , अपिहितम् । वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपञ्चव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा ॥ तिङन्त-प्रकरण (अतिरिक्त)। धातु विभाग । भ्वायदादी जुहोत्यादिर्दिवादिः स्वादिरेव च । तुदादिश्च रुधादिव तनक्रयादिचुरादयः ।। संस्कृत के सव धातु दश गणों में विभक्त हैं। यथा, भ्वादि ( Firs conjugation), अदादि (Second conjugation), द्वादि ( Third conjugation), दिवादि ( Fourth conjugation ) स्वादि ( Filth conjugation ), तुदादि ( Sixth conjugation) रुघादि ( Seventh conjugation ), तनादि ( Tighth conjugation ), क्रयादि ( Ninth conjugation), चुरादि ( Tenth conjugation ) | धातुरूप (अतिरिक्त)। अदु (खाना, to ent) अदादिगणीय, परस्मैपदी । लट् प्र० पु०-- .. ..

. परिशिष्ट, धातुरूप। १६७ अति, अत्तः, अदन्ति म० पु०-अत्सिः, अत्थः, अत्य; उ० पु०-अग्नि, श्रद्धा, अमः । लोट्, प्र० पु०- अनु अत्तात्, अत्ताम्, अदन्तु म. पु०- अंखि असार, अचम्, अत्त, उ० पु०-अदानि, अदाव, अदाम । लङ, प्र० पु०-यादव, प्रासाम्, आदन म० पुo-आदः, आतम्, आत्त; 30 पुर-आदम्, आद्व, आन। विधिलिङ्, प्र० पुल-अधातु, अद्याताम्, अयुः, म० पु०-अद्याः, अद्यांतम्, अद्यात; 3० पु०-अद्याम्, अद्याव, अद्याम । वृद्, प्र० पुल-अत्स्यति, अत्स्यतः, अत्स्यन्ति; म०पु०-अरस्यसि, अत्स्पथः, अत्स्यथ; उ० पुर–अत्स्यामि, अत्स्यावः, अत्स्यामः । लिट्, प्र० पु-आद, आदतुः, आदुः: म०पु०-आदिथ, आदथुः, पाद: उ०पु०- श्राद, आदिव, आदिम । लिट् में अद्-धातु के स्थान में घस आदेश होकर प्र० पु०-जघास, नक्षतुः, जक्षुः म० पु०-जघसिथ, जक्षथुः, जक्ष; उ० पु०- जघास अघस, जक्षिव, जक्षिम । ऐसे रूप भी होते हैं । अदु+क्त जग्धः, अन्नम्, धासः। अत्वाम्जगावा । अतुम्-अचुम् । लभू (लाम करना, पाना, to gain, to get, to have ) भ्वादिगणीय, आत्मनेपदी । लद्, प्र० पु०--लमते, लभेते, लभन्ते म० पु०-लभसे, नमेथे, लभध्वे; उ० पु०-लमे, लभावहे, लभामहे । लोट्, प्र० पुo- लभताम्, लभेताम्, लभन्ताम् । म० पु०-लभस्व, लभेथाम् , लभध्वम् । ३० पु०-लभै, लभावहै, सभामहै । लङ्। प्र० पु०-अलभत्, अलभताम् , अलभन्त; म० पु०-अलभथाः, अलमेथाम् , अलभध्वम् उ० पु०-अलमे, अलभावहि, अलभामहि । विधिलिङ, प्र० पु० -लमेवा लमेयाताम्, लमेरन् म० पु०-लमेथा, लभेयायाम, लमध्वम् । ३० पु०लमय सिमेवहि, लमेमहि । बुद् प्र० पु०-लप्स्यते, लप्स्येते, लम्स्यन्ते; म० पु०- लिप्स्पसे, जप्स्याये, लय: उ० पु०-लप्स्ये, लप्स्यावहे, लप्स्यामहे । . लिट् प० पु०-लेमे, लेभाते, लेमिरे म० पु०-लेभिषे, लेभाये, लेभिवे १० पु०-लेमे, लेभिवहे, लेभिमहे । नी (ले जाना, to lead, to carry off ) भ्वादिगणीक, भयपदी। लट्-परस्मैपद प्र० पु०--नयति, मयता, मयति नयथा, नयथ; उ० पु०नयामि, नया + म० पु०-जयसि, नयत, मयेते. नवातेम. Yo- नयामः। आत्मनेपदः प्र० पु०-- नयाहि । लोर--- नयसे, नयेथे, नयध्वे, उ० पु०-नये, नयावहे, 10 पद, प्र० पु०-नयतु नयताद, नयताम्, नयन्तु: म० .+नयतात्, नयतमू, नयत; 30 पु०-नयानि, नंयाव, नयाम । श्रा० पद, प्र० पु०-नयताम् , नयेताम्, नयन्ताम् ; म० पु नयस्व, नयेथाम् ।

१९८ उपक्रमणिका। नयध्वम् उ० पुर-नये, नयावहै, नपामहै। लङ्--प० पद, प्र• पु अनयन् , अनयताम् , अनयन् । म० पु०-अनयः, अनयतमू, अनपत . पु०-अनयम् , अनयाव, अनयाम । श्रा० पद, प्र० पु०-अनयत, अनयेताम्, अनयन्त; म० पु०-अनययाः, अनयेयाम्, अनयध्वम् । ३० पु०-अनये, अनयावहि, अनयामहि । विधिलिङ्-प० पद, प्र. पु०-नयेत् , नयेताम् , नयेयु: म०पु०नयेः, नयेतम् , नयेत; उ० पु०-नयेयम्, नयेव, नयेम । श्रा० पद, प्र० पु०-नयेत, नयेयाताम्, नयेरन् : म० पुo-नयेयाः, नयेयायाम, नयेवम् ; ३० पु०-नयेय, नयेवहि, नयेमहि । नट-प० पद, प्र० पु०-- नेष्यति, नेप्यतः, नेयन्ति म० पु०-नेप्पसि, नेप्यथः, नेप्यय: ट पु:- नेण्यामि, नेप्यावः, नेप्यामः । श्रा० पद, प्र० पु०-नेप्यते, नेप्येते, नेप्यन्ते म० पु०-नेप्यसे, नेप्येये, नेप्यच्चे; उ० पु०-नेप्ये, नेप्यावहे, नेप्यामहे । लिट्-प० पद, प्र० पु०-निनाय, निन्यतः, निन्युः; म० पु:-निनपिय निनेय, निन्ययुः, निन्यः ३० पु०-निनाय निनय, निन्यिव, निन्यिम। श्रा०पद, प्र.पु०--निन्ये, निन्याते, निन्यिरे; म० पुल-निन्यिपे, निन्याये, निन्पिढ्ने निन्यिन्वे; ३० पु०-निन्ये, निन्यिवहे, निन्यिमहे । (गाना, to sing) भ्वादिगणीय, परस्मैपदी । लद्, प्र० पु०-गायति, गायतः, गायन्तिम पुoायसि, गायथः, गायय: उपुलायामि, गायावः, गायामः । लोट्, प्र० पु०-यतु गायठात्, गायताम् , गायन्तु; म. पुर~-गाय गायतात्, गायतम् , गायत; 3०पु०-गायानि, गायाव, गायाम लङ, प्र०पु०-अगायन, अगायताम्, अगायन्: म०पु०-अगायः, अगायतम्, अगायत; 3० पु०-अगायम्, अगायाव, अगायाम, विधिलिङ्ग, प्र० पुछायेत्, गायेताम्, गायेयुः म० पुल-गायः, गायतम् । गायत उ० पु०-गायेयम्, गायेव, गायेम । लुट्, प्र. पु०-पास्यति, गायनः, गास्यन्ति, म० पुoयास्यसि, गास्यथा, गास्यय; उ० पुल-पाध्यामि, गास्यावः, गास्यामः । लिटूप्र० पु०-जगी, जगतुः, जगुः; म० पु:-जगिय जगाथ, जगथुः, जग; उ० पु०-जगी, अगिव, जगिम । क्षम् (समा करना, to forgive) भ्वादि, आत्मनेपदी । लट्, प्रापुर- क्षमते, समेते, क्षमन्ते म० पु-क्षमसे, क्षमेये, क्षमस्व उ० पु:-क्षमे, क्षमावहे, क्षमामहे । लोट, प्र०पु०-क्षमताम्, अमेवार, क्षमन्ताम् म०पुर- क्षमस्व, क्षमेयाम, क्षमध्वम् ; उ० पु०-क्षम, क्षमावहै, क्षमामह । लङ्, प्र. पु०-अक्षमत, अक्षमेताम् , अक्षमन्तमपुर-अक्षमयाः, प्रक्षमेयाम, अक्षमध्वम् ; ३० पु०-अक्षमे, अक्षमावहि, अक्षमामहि । विधिलिक . परिशिष्ट, धातुरूपादर्श। १६ प्र० पु०-क्षमेत, क्षमेयाताम्, क्षमेन्म० पुं०-क्षमेथाः, क्षमेयायाम, अमेध्वम्; उ० पु०-क्षमेय, क्षमेवहि, क्षमेमहि । लूट, प्र० पु०-क्षमिष्यते क्षस्यते, क्षमिश्येते क्षस्येते, क्षमिष्यन्ते क्षस्यन्ते; म० पु०-क्षमिण्यसे ऑस्यसे, क्षमिण्येये क्षस्येथे, क्षमिण्यध्वे ऑस्यध्वे, उ० पु०-क्षमिष्ये-क्षस्ये, क्षमि- प्यावहे क्षस्यावहे, क्षमिष्यामहे संस्यामहे । लिट् प्र० पु०-चक्षमे, चक्षमाते, यक्षमिरे; मा पुo-चक्षमिपे चक्षसे, चक्षमाथे, चक्षमिध्ये चवे; उ० पुरु-चक्षमे, चक्षमिवहे चक्षयवहे, चक्षमिमहे चक्षण्महे । धातुरूपादर्श कुछ प्रचलित धातु (रूप-लट्, लोट्, लङ्, विधिलिङ्, तृद्, लिट् के क्रम से)। अख-स्वादि, पा० पदी-to mark. अङ्कते। अङ्कताम् । आन्त । अद्वेत । अहिण्यते । आनङ्के। अ-भ्वादि, प० पदी to worship. अंञ्चति । अञ्चतु । आश्चत् । अञ्चेत् । अञ्चिष्यति । आनञ्च, पानञ्चतुः, पानञ्चुः आनंञ्चिथ, आनब्बथुः, पानञ्चः आनञ्च, आनञ्चिव, पानञ्जिम । अट्-स्वादि, प० पदी- to go, to roam. अति । अस्तु । आटत् । अटेत् । अटिष्यति । पाट, आटतुः, आटुः पाटिथ, पाटथुः, आट इत्यादि। अद् तथा अस्-अदादि, प० पदी । पुस्तक में देखो। अ-भ्वा०प०-to worship. अति । अर्जतु । आर्चत् । अचेत् । अर्धिष्यति । बानर्च । चुरादि, प० पदी-अचयति । अञ्चयतु । आर्चयत् । अच्चयेत् । अर्चयिष्यति । अचंयाञ्चकार-अर्चयामास-अर्चयाम्बभूव । अन्ज-वा०प०-to earn, to procure. अर्जति । अर्जतु । श्रार्जत् । अर्जेत् । अर्जिष्यति । पानज। चुरादि, प०-अर्जयति इत्यादि like अञ्चुरादि। . अह -भ्वा० प०-to deserve, to worship. अर्हति । अस्तु । पाहत् । अर्हेत् । अर्हिष्यत । आनह । अ-भ्वा० प०-to protect: अवति । अवतु । श्रावत् । अवेत् । अविष्यति । श्राव, आवतुः; आबुआविय इत्यादि । आप-स्वादि, प० पदो-to obtain. See प्र+श्राप in the book. इ-अदादि प० पदी-to go. लट्-एति, इतः, यन्ति; एषि, इथः, इथ; एमि, हवः, इमः । लोट-पुतु, इताम्, यन्तु; इहि, इतम्, इन यानि, अयाव, अयाम । लङ्-ऐन, ऐताम्, आयन् ऐः ऐतम्, ऐत; आयम, ऐव, २०० उपक्रर्माणका। . ऐम । विधिलिङ्-इयात्, इयाताम्, इयुः, इयाः, इयातम्, इयादः इयाम्, इयाव, इयाम । लुट्-पुण्यति, एण्यतः, एप्पन्ति इत्यादि । लिद-इयाय, ईयतुः, ईयुः, इपयिय-इयेथ, ईययुः, ईय; इयाय-इयय, ईयिय, ईयिम । उन्ह (to rise)-उदेति इत्यादि । अभि+इ (to obtain)| अभि+उ+इ (to prosper) | अप+इ (to go away)| अभि+उप+s (to arrive)| प्रति+इ ( to trust)| अधि+s ( to read ) आत्मनेपदी-अधीते, अधी- यावे, अधीयते, अघीपे, अधीयाथे, अधीच्चे, अघोये, अघीवहे, अघीमहे । अधीताम् इत्यादि । अध्यंत इत्यादि । अघोयीत इत्यादि । अध्येन्यते इत्यादि । अधिजगे इत्यादि । इप-तुदादि, प० पदी-to wish. See the book. ईक्ष-स्वादि, श्रा० पदो-to see, to look at. ईक्षते। ईक्षताम् । ऐक्षत । ईक्षेठ । ईक्षिप्यते । ईक्षाञ्चक्रे ईक्षाम्बभूव-ईक्षामास । अप+ई (to expcet), अभि+ईस् (to gaze at) अव+ ईक्ष् (to inspect); उन्+ ईक्ष् (to expect, to avait); निर+ईक्ष् (to see ); परि+ईक्ष् (to examino); सम् ईस to compare); प्रति ईक्ष् (to expect); प्र+ईल (to see ); उप+ईक्ष् (to neglect, to abandon ) | ईह-स्वादि, आ. पe-to aim at, to try. ईहते । ईहताम् । ऐहत । ईहेत । ईहिप्यते । ईहाञ्चक्रे ईहाम्बभव-ईहामास । ऋध-दिवादि, प०१०-to prosper, to please. ऋध्यति । ऋध्यतु । आर्यन् । ऋध्येत् । अधिप्यति । आनर्ध, आनृपतुः, अनृधुः आनर्धिय । कय-चुरादि प० प०-to tell. कथयति। कथयतु । अकथयन् । कथयेत् । कययिष्यति । कथयामास । कम्प-भ्वादि, आ० प०-to shake; to tremble. कम्पते । कम्प- ताम् | अकम्पत । कम्पेत । कम्पिप्यते । चकम्पे। काङ्क्ष-स्वादि, प०प०-to desire, to wish. काक्षति । काक्षतु । अकाक्षत् । काक्षेत् । काक्षिप्यति । चकाक्ष, चकाक्षिय इत्यादि। काय-वादि, प्रा०प०-to shine. काशते । काशताम् । प्रकाशन | काशेत | काशिप्यते । प्रकाशे। कास्-भ्वादि, प्रा० प०-to cough. कासते। कासताम् । अका- सत । कासेत । कासिष्यते । चकासे-कासाबके। कुप-दिवादि प० प०-to be angry. कुप्यति । कुप्यतु । अकुप्यत् ।

परिशिष्ट, धातुरूपादर्शी २०१ कुप्येत् । कोपिण्यति। चुकोप, चुकुपतुः, चुकपुः चुकोपिथ, चुकुपथुः, चुरूप; चुकोप, चुकुपिव, चुकुपिम । कू-स्वादि,५०प०-to make an iherticulate sound, to coo. कूजति । कूजतु । अकृजत् । कूजेत् । कूजिष्यति । चुकूज । कृ तनादि, उ०प०-to do. See the book.. कृत्-तुदादि, प० ५०-to cut. कृन्तति । कृन्ततु.। अकृन्तत् । कृन्तेत कस्य॑ति-कतिष्यति । चकर्त, चकृन्तुः कृतः, चकर्तिय इत्यादि । कृष-भ्वादि, प०प०-to draw, to pull, to plough. कर्षति । कर्षतु । प्रकर्षत् । कर्षत् । कति-ऋक्ष्यति । चकर्ष, चकृषतुः, चकूपुर, चकर्षिय इत्यादि । अप+कृष् (to draw down ) अव+कृष (to draw out ) श्रा+कृष् (to attract ); उत्+कृष् ( to raise, to draw up); सम्+कृष (to draw together ) सङ्कर्षति इत्यादि। सम्+नि+कृष् (to draw near ) सन्निकर्षति इत्यादि । क्रन्द्-स्वादि, प० प०- to cry, to weep. कृन्दति । क्रन्दतु । अ- कन्दत् । क्रन्देत् । क्रन्दिष्यति । चक्रन्द, चक्रन्दिय इत्यादि । क्रम्-भ्वादि, प० प०-to step, to walk, क्रामति-क्राम्यति । कामतु-क्राम्यतु, अक्रामत्-अक्राम्यत्, कामेत्-काम्येत्, क्रमिष्यति, चक्राम, पक्रमः, चक्रमुः। चक्रमिय, चक्रमथुः, चक्रम; चक्राम-चक्रम, चक्रमिक, चकमिम । “वृत्तिसर्गताय-नेषु क्रमः" वृत्ति unobstruction, सर्ग energy, सायन increase इन अर्थों में क्रम्-धातु केवल आ० पदी होता है । इन तीनों अर्थों में ही उप तथा परा पूर्वक क्रम-धातु केवल आ० पदी होता है। इन तीनों अर्थों में ही उप तथा परा पूर्वक क्रम-धातु केवल प्रा०प० होता है किन्तु उप+क्रम् (to begin ) उपकामति, पराक्रम (to display prowess )! For this root see my Hindi Edition of Vyakaran Kaumudi II & III, 246-248, rules 328-332 with foot notes. क्री-क्रयादि, उ०प०-to purchase. क्रोणाति, क्रीणीतः, क्रीणन्ति, क्रीयासि, कोणीयः, क्रीणीयः क्रीणामि, कीयोवः, क्रीणीमः। क्रीणोते, कोणाते, क्रोणिते क्रीणिषे, क्रोणाथे, क्रीणीवेः क्रीणे, क्रीणीवहे, क्रीणी- महे । क्रोणातु, क्रीणीताम् । अक्रोणात, अक्रोणीत । क्रोणीयातू, क्रीणीत । क्रेष्यति, ऋषयते । चिक्राय, चिक्रियतुः, चिक्रियुः चिक्रयिय-विक्रय, चिकि- थथुः, चिक्रिय चिकाय-विक्रय, चिक्रियिवं, चिक्रियिम । चिक्रिये, चिक्रियाते इत्यादि।

२०२
उपक्रमणिका।
कोड-भ्वादि, प०प०-to play. क्रीडति । कोडतु । अक्रोडन् ।
क्रोडेत् । क्रीडिण्यति । विक्रीट।
क्षर् (to flow), क्षन् (to wash-भ्वादि, प० प०-क्षरति,
क्षलति इत्यादिक्षरिष्यति, क्षतिष्यति चक्षार, चक्षाल |क्षल ( to rash)
चुगदि, प०प०-क्षालयति इत्यादि ।
क्षि (to decay) भ्वा०प०प०-क्षयति । क्षयतु । अक्षयत् । क्षयेत् ।
क्षष्यति । चिक्षाय, चिक्षियतुः चिक्षपिध-चिक्षेथ, चिक्षिय; चिक्षाय,
चिक्षियिव इत्यादि।
क्षिप् (to throw) दिवादि, १० पर-क्षिप्यति । क्षिप्यतु । अक्षिप्यन् ।
क्षियेत् । क्षेस्यति । चिक्षेप ।
क्षुभ ( to disturb) भ्वादि, आ० ५०-क्षोभते । क्षोभताम् ।
प्रक्षोभत् । क्षोमेत । क्षोमिष्यते । चुक्ष्मे ।
खगड् (to break) चुरादि, प० प०-खण्डयति । खण्डयतु ।
अखण्डत् । खण्डयेत् । खण्डयिष्यति । खण्डयामास ।
खन् (to dig)-भ्वादि, उ०प०-खति, खनते । खनतु, खनताम् ।
श्रखनव, अखनन । खनेत्, खनेत । खनियति, खनिष्यत। चखान,
चखूनतुः, चखनिय चखान-चखन; चनिव इत्यादि । घखने, चखनिपे,
घावनिवे; चल्निवहे इत्यादि।
खाद् (to eat)-भ्वादि, प०प०-खादति। खादतु । अखाद ।
खादेत् । खादिष्यति । चखाद चखादिय इत्यादि।
गण
(to count ) चुरादि, प० पाणयति । गण्यतु । अगण्यत् ।
अगणन। गणयेत् । गणयिष्यति । गणयामास ।
गद् (to speak to say) स्वादि, प० पादति । गदतु ।
अगदत् । गदेत् । गदिष्यति । अगाद।
गम् (to go) स्वादि, प० प० and ग्रह (to take ) क्रयादि,
gogo See book

परिशिष्ट, धातुरूपादर्श। २०३ गन्ज (to roar) स्वादि, प०प०-गर्जति | गजतु । गर्जत । 'गजेत् । गर्जिष्यति । जगज। गाह (to bathe. to dive into) स्वादि, श्रा० प०-याहते। गाहताम् । अगाहत । गाहेत । गाहिण्यते-घाक्ष्यते । जगाहे, जगाहिपे- जधाक्षे, लगाहिट्वे-जघाने, जगाहिवहे जगाह्नहे, जगाहिमहे-जगामहे इत्यादि। ग (to devour, to smallow) तुदादि, प० प-गिरति-गिलति । गिरतु गिलतु । अगिरत्-अगिलत् । गिरेत्-गिलेत् । गरिष्यति-गरीयति- गलिण्यति-गलीष्यति। जगार-जगाल, जगरतु जगलतुः, जगरु:-जगतः, जगरिय-जगलिथ इत्यादि। गें (to sing) स्वादि, ५० प०-गायति । गायतु । अगायत् । गायेत् । गास्यति । नगौ, जगतुः, जगुः, जगिय-जगाय, जगथुः, जग, जगौ, जगिव, नगिम । - अस् ( to swallor, to eat ) भ्वादि, श्रा०प०-असते । ग्रसताम् । अग्रसत । ग्रसेत । प्रसिप्पते । जप्रसे। घट् (to happen) स्वादि, आ० प०-घटत । घटताम् । अघटत । घटेत | घटिण्यते । जघटे । चुरादि, प०प०-(to collect, to gather ) घटयति इत्यादि । लुट-घटयिष्यति । लिट्-घटयामास इत्यादि । घुष् (to sound, to declare) स्वादि, प० प०-घोषति । घोषतु । अघोषत् । घोषेत् । घोषिष्यति । जुघोष । चुरादि, प० प०-to proclaim aloud. घोषयति । गेषयतु । अघोषयत् । घोषयेत् । घोषयिष्यति । घोषया- मास-घोषयाञ्चकास्घोषयाम्बभूव-घोषयाश्चक्रे । घा (to smell) स्वादि, प० प०-जिनति । जिन्नतु । अजिघ्रत् । जित् । प्रास्यति । जनौ, नम्रतुः, जनुः जघ्रिथ-जनाथ इत्यादि । घर (to walky स्वादि, प० प-चरति । चरतु । अचरत् । चरेत् । चरिष्यति । चचार । पा+चर् (to behave, to practise a duty), अनु+चर (to attend, to follow); अति+आ+चर (to transgress) अत्याचरित; परि+चर् (to serve); वि+अभि+चर (to go astray) व्यभिचरति; समू+चर (to accompany) सञ्चरति, (to ride upon) रयेन-सवरते सम्+आ+चर् (to perform) समाचरति । चल (कॉपना, to shake, चलना to walk,- to move) भ्वादि, प० प०-चलति । चलतु । प्रचलत् । चलेन् । चलिष्यति । बघाल ।

. २०४ उपक्रमणिका। ‘चर्च ( to chew ) भ्वादि, प० प०-चर्चति । चर्वतु | अचन्नन् । चचेत् । चविष्यति । चचर्न । चि ( to collect ) स्वादि, ० प०-चिनोति-चिनुते । चिनोतु- चिनुताम् । अचिनोत्त । चिनुयात्-चिन्वीत । चप्पति चेप्पते । 'चिकाय-चिचाय, चिश्ये-चिच्ये । चिन्न् (to think) चुरादि, प०प०-चिन्तयति । चिन्तयतु । अचि न्तयत् । चिन्तयेत् । चिन्तयिष्यति-चिन्तिष्यति । चिन्तयामास इत्यादि। चुम्बु ( to kiss ) भ्वादि, प. प०-चुम्बति । चुन्दतु | अबुम्बत् । चुम्वेत् । चुम्बिप्यति । चुचुम्व । चुर् ( to steal, to rob) चुरादि, उ०प०-चोरयति-ते। चोरयतु- ताम् । अचोरयत्-त । चोरये-त । चोरयिष्यति-ते । चोरयामास-चोरयाञ्च- कार-चोरयाम्बभूव-चोरयाञ्चक्रे । चेष्ट ( to try, to make efforts) भ्वादि, पा०प०-चेष्टते । चेट- ताम् । अचेटत । चेऐत। चेष्टिप्यते । चिचेष्टे । जन् (to be bora) दिवादि, प्रा० ५०-जायते । जापताम् । . 'अजायत । जायेत । जनिष्यते । जज्ञे । जप ( to mutter, to repeut in mind ) भ्वादि, ५०१०-जपति । जपतु । अजपत् । जपेन् । जपिप्यति । जलाप, नेपतुः, जेपुः इत्यादि । नि (to conquer) भ्वादि, प०प०-जयति। जयतु । अजयत् । जयेत् । जेप्यति । जिगाय-जिग्यतुः, जिग्युः; जिगयिय-जिगेय, जिग्यधुः, जिग्य, लिगाय, जिग्यिव, जिग्यिम । जी (to live) भ्वादि, प० प०-जीवति । जोवतु | अजीवन् । लीवेत् । जोविप्पति । जिजीव । (to grow old ) दिवादि, प० ५०-जोयति जोयतु । अजी- यत्-जीयेत् । जरिष्यति-जरीप्यति । लजार, अजरतुः जेरतुः, जजरु:- जेरु; जरिय-जेरिथ, सज़रा जेरा नजर-जेय जज्ञार-जज़र, जारिव- जेरिव, लजरिम जेरित। (to know)41, 80 90Hor TTHCE see the book. आ० प०-लट्-जानीते, ज्ञानाते, जानते; जानो, जामाये, नानीवे जाने, जानीवहे, जानीमहे । लोट-जानीताम्, जानाताम्, जानठामः जानीप्य, जानाथाम, जानीध्वम्: जान, जानावह, जानामहै । लह- अजानीत, अजानाताम्, अजानतअजानीथाः; अज्ञानायाम, अज्ञानी- - परिशिष्ट, धातुरूपादशं । २०५ ध्वम्, अजानि, अजानीवहि, अजानीमहि । विधिलिङ्ग-जानीत, जानी.. याताम इत्यादि । खुट्-ज्ञास्यते, ज्ञास्येतेयादि । लिट्-जज्ञ, जज्ञाते,. अज्ञिरे अशिष, अज्ञाथे, जज्ञिध्वे; जज्ञे, नौशह, जज्ञिमहे। अनु+ज्ञा (to assent, to order); अप+ज्ञा (to conceal); अव+ज्ञा (to disrespect); परि+ज्ञा (to asertain); प्रज्ञा (to know well); वि+ज्ञा' (to discriminate); सम्+ज्ञा (to recollect) प्रति+ज्ञा and अभि+ ज्ञा (to recognise). ज्वल् (to burn, to glow) भ्वादि, प० प० ज्वलति । ज्वलतु । अज्वलत् । ज्वलेत् । वलिष्यति । जन्वाल; बलतुः, जज्वलुः; जज्वलिथ. इत्यादि। तप ( to shine, to heat ) भ्वादि, प० प०-तपति । तपतु । अतपत् । तपेत् । तप्स्यति । तताप,तेपतुः, तेपुः तेपिथ-ततप्या, तेपथुः, तेप; तताप, तेपिव, तेपिम । परि+तप् (to repent); सम्+तप् (to be sorrowful); अनु+त ( to repent, to regret) श्रा० पा०-अनुतपते । तुषु ( to be satisfied or pleased ) दिवादि, प०प०--तुष्यति । तुष्यतु । अतुष्यत् । तुष्येत् । तोक्ष्यति । तुतोष, तुतुषतुः, तुतुपुः: तुतोषिथ इत्यादि। तु ( to cross ) भ्वादि, प० प०-तरति । तरतु। अतरत् । तरेत् । तरिष्यति-तरीष्यति । ततार, तेरतुः तेरु तेरिथ, तेरथुः, ते वतार, तेरिव, तेरिम । अव+तृ ( to come down, to descend ), आ+तु (to cross by a boat ), निर्+तृ ( to obtain salvation ) निस्तरति; वि+तु (to give away); सम्+तृ ( to swim); उत्सत ( to answer, to pass over ) उत्तरति । 64* ( to give up, to leave, to abandon ) taifa, qo go- See the book. ( to protect) भ्वादि, श्रा०प०अायते । त्रायताम् । अत्रायत । आयेत त्रास्यते । तत्रे, तत्रा, तत्रिरे, तत्रिपे इत्यादि। त्वर ( to hurry, to hasten ) भ्वादि, आ० 40-त्वरते। त्वरताम् । अत्वरत | त्वरे। त्वरिष्यते । तत्वरे,'तत्वराते, तत्वरिरे; तत्वरिषे इत्यादि। दण्ड (to punish) चुरादि, प०प०-दण्डयति । दरदयतु । अदण्डयत् ।। दयडयेत् । दण्डयिष्यति दण्डयामास इत्यादि।

२०६ उपक्रमणिका। दन्श ( to bite, to sting ) भ्वादि, प०प०-दशति । दशतु अद 'शत् । दशेत् । ईक्ष्यति । ददंश । दय (to pity) भ्वादि, श्रा० प०-- दयत । दयताम् । अद्यत । दयेत । दयिष्यते । दयाश्चके इत्यादि। दह (to burn, to pain ) भ्वादि, प० प०-दहति। दहतु । अदहत् । दहेत् । दक्ष्यति । ददाह, देहतुः, देहुः, देहिथ-दग्ध इत्यादि। दा ( to give) द्वादि, उ० प०-Given in the took. म्वादि, 'प० प०-यच्छति । यच्छतु । अयच्छत् । यच्छेत् । दास्यति । ददौ । दृश ( to see ) भ्वादि, प०प०-See the book. धाव ( to run, to wash, to flow) भ्वादि, उ०प०-यावति ते 'धावतु-ताम् । अधावत्-त । धावत्-त । धाविष्यति। दधाव; दधाविय। 'इत्यादि; दधावे इत्यादि। (to hold, to beur) भ्वादि, उपर-धरति-ने, घरतु-ताम् । 'अघर-त । धरेन्-। घरिष्यति-ते । दुधार, प्रतुः, दधुः दधर्य इत्यादि द, दधाते, दधिरे धिपे इत्यादि। घे ( to suck) भ्वादि, प०प०-धयति । धयतु । अधयत् । घयेत् । धास्यति । दधौ, दधतुः, दधुः दंधिथ इत्यादि। व्यै ( to ponder over, to meditate, to think of) भ्वादि, प०प०-ध्यायति । ध्यायतु । अध्यायन । ध्यायेत् । व्यास्पति । दृष्यो। दध्यतुः, दध्युः दध्यिथ इत्यादि । नट ( to dance, to act ) भ्वादि, प०प०-नटति । नतु । अनन् । नटेत् । नटिष्यति । ननाट। नन्द ( to be pleased, to rejoice ) भ्वादि, प० प० नन्दति । नन्दतु । अनन्दत् । नन्देत् । नन्दिष्यति । ननन्द । अमि+नन्द्र (to welcome). नम् ( to salute, to bend ) भ्वादि, प० प०-नमति। नमतु । अनमत् । नमेत् । नस्यति । ननाम, नेमतुः, नेमुः नेमिथ-ननन्य इत्यादि। नश ( fo perish) दिवादि, प०१०-नश्यति । नश्यतु । अनश्वत् । नश्येत् । नशिष्यति नहक्ष्यति । ननाश, नेशतुः, नेशुनेशिय ननंह, नेशः, नेश ननाश-ननश, नेशिव-नेश्व, नेशिम-नेश्म । निन्द ( to blams) स्वादि, प०प०-निन्दति निन्दतु ! अनिन्वत् । निन्देव निन्दिप्यति । निनिन्द।

परिशिष्ट, धातुरूपादर्शी २०७ नो (to lead, to carry off, to settle) भ्वा०, 3०प०-See the book. अनु+नी ( to entreat); अप+नी ( to remove ), अभि+नी (to indicate by signs); ा+नी (to bring); उत्+नी (to raise घ) उन्नयति-ते; उप+नी (to approach, to invest with the sacred thread); दुर्+नी (to behave wickedly); निर्+नी (to obtain, to ascertain) निर्णयति परि+नी (to marry); प्र+नी (to love); वि+नी ( to be humble or modest); वि+अप+नी (to remove) व्यपनयतिसमू+नी (to collect ). पच् ( to cook, to digest, to bake) भ्वादि, उ० प०-पचति-ते। पचतु-ताम् । अपचत्-त । पचेत्-त । पक्ष्यतिते । पपाच, पेचतुः, पेचिय, पपक्य इत्यादि। पठ् ( to read ) भ्वादि, प०प०–पठति । पठतु | अपन्त् । पठेत् । पठिष्यति । पपाठ, पेठतुः,पेठिय इत्यादि । पद ( to fall, to alight, to fiy ) भ्वादि,प० प०-See the book “अति+पत् (to surpass); अभि+पत; and अव+पत् (to descend); आ+पत् (to come); उत्+पत् (to ascend); नि+पत् (to happen, to fall down) परि+पत् (to go fast);प्र+नि+पत् (to salute);सम+ पत् ( to go with); सम्+उत्+पत् ( to fiy). पा (to drink) भ्वादि, प० प०, प्रच्छ ( to ask) तुदादि, प. प०-See the book. पूज् ( to adore) चुरादि, प०प०-पूजयति। पूमियतु । अपूजयत् । पूजयेत् । पूजयिष्यति । पूजयामास । वाथ् (to oppress, to torment, to thwart) भ्वादि, बा०प०- वाघते । वाधताम् । अबाधत । बाधेत । बाधियन्ते । वाचे । बुध ( to know ) भ्वादि, 30 प०-योपति-ते । बोधतु-ताम् । अबोधत्त्त । दोधेत्-त । भोत्स्यति-ते । बुबोध, बुबुधे। घ्र (to speak) अदादि, उ०प०, भक्ष ( to eat) चुरादि, प०प०,मू ( to be, to exist ) भ्वादि, प० प०-See the book. भज् (to share, to worship, to honour) भ्वादि, उ०प०-भजति- ते । ममतु-ताम् । अभजत्-त । भजेत्-त, भक्ष्यति-ते। वमाज, भेजे । भर्स { to abuse, to menacs or threaten ) चुरादि, प्रा०प०- मन्म्यते । भपिताम् । अमर्सयत । भासयेत। मसयिष्यते । भर्सयाञ्चन।

२०५ उपक्रमणिका। . भाष ( to say, to speak) भ्वादि, आ० प०–भापते। भाषताम् । अभापत । भाषेत । भाषिप्यते । यभापे, वभापिरे, वभाषिर्षे इत्यादि। भिक्षु ( to beg ) भ्वादि, आ० प०-भिक्षते । भिक्षताम् । अभिक्षत | भिक्षेत । भिक्षिप्यते । विभिक्षे । भृ( to fill, to nourish) भ्वादि, उ०प०-भरटि-ते । भरतु-ताम् । अभरत-त। भरेत्त । भरिष्यति-ते। वभार-बन्ने (like कृ)। भ्रश ( to tall, to decline) भ्वादि, प्रा०प०-भ्रंशते । शताम् । अभ्रंशत । भ्रशेत । नंशिष्यते। वनशे । भ्रंस ( to fall down) भ्वादि,' आ० प० like भ्रंश । भ्रम् (to roam) भ्वादि, प०प०-भ्रमति । भ्रमत । अभ्रमन् । ब्रमेत् । भ्रमिष्यति । वभ्राम। मण्ड् ( to decorate, to adorn ) भ्वादि, ५० प०-मण्डति । मण्डतु । अमण्डत् । मण्डेत् । मण्डिष्यति । ममण्ड | चुरादि, प० प०-- मण्डयति इत्यादि। मुगड ( to shave ) भ्वादि, प०प०-मुगडति । मुण्डतु । अमुगडत् । मुण्डेत् । मुण्डियष्यति । मुमुण्ड । मुद् ( to rejoice, to be glad ) भ्वादि, श्रा० प०-मोदते । मोद- ताम्, प्रमोदत । मोदेत । मोदिप्यते । मुमुद्दे । मृ { to die, to perish ) तुदादि, आ. प०-म्रियते । म्रियताम् । अम्रियत । म्रियेत । प० प० in लूट and लिट् । मरिष्यति । ममार, मंत्रतुः, मम्र: ममर्य, मम्रथुः, मम्र; ममार, मनिव, मम्रिम । यज् (to sacrifice ) भ्वादि, उ० प०-यजति-ते । यजतु-ठाम अजयत्-त । यजेत्-त । यक्ष्यति-ते । इयाज-ईजे । यत् ( to try, to strive atter, to labour) भ्वादि, प्रा०प०- यतते । यतताम् । अयतत । यतेत । यतिष्यदे । येते । येताते, येतिरे येति इत्यादि। याच (to beg) भ्वादि, उ०प०-याचति-ते । याचतु-ताम् । अयाचत, त। याचेत्-त। याचियप्यतिन्ते । ययाचचे। रक्ष ( to protect ) भ्वादि, प० प०-रक्षति । रक्षत | अरमन रक्षेत् । रक्षिष्यति । ररक्ष । रुद् ( to ery, to reep) अदा दि,५०५०-See the book. रह ( to grow, to increase, to rise ) भ्वादि, प० पल-रोहति । रोहद । अरोहत । रोहेत् । रोक्ष्यति । रुरोह, रुरुहतुः, रुरोहिथ इत्यादि । - -

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उपक्रमणिका 1927

Author
चट्टोपाध्याय, नारायण
Title
?????????? 1927
File name
उपक्रमणिका 1927
Text
OCR done
Citation
1927
Published
2009/06
Publisher
श्री नारायणचन्द्रदेव, कलकत्ता
Language
Sanskrit
Pages
214
Library
Central Library, Jain Vishva Bharti University, Ladnu
DLI number
322487
Barcode
99999990253039.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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