Adarsh Library, Jaipur

Pathshala Sandipan

Shankar Tara · 2011/03

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संदीप पाठशाला ताराशंकरवन्धोपाध्याय

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F-1439) 1474 एक प्रतिष्ठा की कामना जव मनुष्य की रोटी कपड़े की चिन्ता को भुला देती है तब उसका राह चलना आसमान की ओर मुंह किये चलने के समान हो जाता है । अति-ययार्य मिट्टी की धरती के वाधा-विघ्नो को वह उस समय भूल ही जाता है। एक कहानी है : एक ज्योतिर्विद अंधेरी रात में आकाश के तारों को और देखते हुए राह चलते एक कुंए में गिर गये थे। जिस व्यक्ति ने उनका उद्धार किया था, उद्धार करने के बाद ही निवृत्त नहीं हुमा था, माय ही साथ एक मनमोल उपदेश भी दे गया था। कहा था, अजी, धरती का हालवाल पहले जान यो, फिर भासमान की ओर देखना। इम मशहूर अंगरेजी कहानी के बारे में सीताराम जानता है, वचपन में उगने यह कहानी पढ़ी है, याद भी है । मीताराम का पिता वह कहानी नहीं जानता, उसने अंगरेजी नही पढो, बंगला पढ़ाई भी नहीं के बरावर । यही बात वह दूमरे ढंग से कहता है । कहता है, बेटा, ऊपर की योर मत देखना । नीचे की ओर निगाह डालो। तुमसे कितने लोगों का हाल बेहतर है, कितने लोग तुममे ज्यादा मान-सम्मान पाते हैं, उनका हिमाव मत लगाना वर्ना यशान्ति को आग बुझेगी ही नहीं। इससे बेहतर होगा कि तुमसे कितने लोगों की हालत खराब है, तुमसे मान-सम्मान में कितने लोग छोटे हैं, उन्हों का हिमाय लगाओ। इम से सुख चाहे न भी मिले, शान्ति में चीत जाएंगे तुम्हारे दिन। सीताराम के कुल-गुरु कहते हैं, वेटा, फामना और भाग में कोई फर्क नही, आग की लौ की भांति कामना का स्वभाव भी ऊर्ध्वमुपी है। कितना भी उसे नीचे की ओर घुमा दो, वह फौरन पलटकर ऊपर की ओर सिर उठा लेगी। लेकिन जब वह बुझ जाती है, तब जीवन जली हुई लकड़ी जमा हो जाता है, रास और कोयले का ढेर-सा। वान गीताराम के दिल को भी छू गयी थीं। लेकिन फिर भी वे सारी बातें वह आज किमी कदर मान ही नहीं पा रहा है। किसान का बेटा जमाने के रिवाग के मुताबिक स्थानीय हाई स्कूल में पढ़ने गया था। वहाँ अंगरेजी अपने काबू में करने के बूते की कमी के कारण व्यर्थमनोरथ अन्त मे हुगली नार्मल ६:: संदीपन पाठशाला ।। - हुक्का थामे स्कूल में पढ़ने चला गया था। वहाँ भी दो-दो बार फल हा कर फर पर शुमा लौट आया है। लेकिन इसी बीच जाने कव उच्चाशा की आग मन में सुलग उठी और वह नौकरी करना चाहता है। वह नौकरीपेशा वावू बनेगा। पंडित के रूप में संसार में जाना-माना जायगा। लेकिन बाप रमानाथ ने कहा, नहीं, यह इरादा छोड़ दो तुम। हम लोग किसान हैं, सिरजनकी घड़ी से वाप-दादों का खानदानी काम है काश्तकारी। हम लोग खा-पी, ओढ़-पहन अपनी औलाद को ज़र-जमीन दे, राम का नाम लेकर आंखें मूंदते चले आए हैं। यह सब छोड़- कर तुम नौकरी ढूंढ़ रहे हो ! सो भी किसी कायदे की नौकरी होती तो बात कुछ समझ में आती। हाय ! हाय रे किस्मत ! दाहिने हाथ से खुरपा चलाकर वह नींबू के एक दरख्त के नीचे से घास की निराई कर रहा था, बाएं हाथ में तमाखू रहा था। बेटे से बातें करते समय दोनों ही काम बन्द थे, अब बात चीच में अधूरी छोड़ वह फिर से वे दोनों काम करने लग गया। सीताराम सिर झुकाये खड़ा ही रहा। अचानक फिर अपने हाथ का काम रोककर रमानाथ ने मुंह उठाकर पूछा, क्या है ? वताओ ! अपना इरादा तो बताओ। सीताराम अब की बार वोला, कैसी भी हो, एक नौकरी जब मिली है तो मैं कोशिश करके देखूगा ही। रमानाथ ने खेद और श्लेप दोनों मिलाकर कहा, तकदीर तुम्हारी! नौकरी तो क्या, पेट-भर खाना और चार रुपए तनख्वाह ! आज दस साल स्कूल की फीस, बोडिंग का खर्च भरने के बाद आखिर में चार रुपए तनख्वाह और खुराकी, सो भी कोई कपड़ा लत्ता नहीं। जो लोग बिना पढ़ेलिखे नौकर-खानसामे का काम करते हैं वे भी खुराकी और तनख्वाह के साथ कपड़े पाते हैं, बेटा ! सीताराम खामोश सिर झुकाये अब बाप के पास से चला गया । बेटे के बिन-बोले चले जाने में ही रमानाथ को उसका जवाब मिल गया। वह मौन रहकर बाप के प्रस्ताव का समर्थन नहीं जता गया। वही काम वह करेगा। खुगकी और चार रुपए तनख्वाह ही उसके लिए काफी है । कुछ देर उसके जाने के रास्ते की ओर एकटक देखने के बाद एक लम्बी सांस लेकर रमानाथ फिर काम में लग गया। इतनी देर में अचानक ही उसकी निगाह पड़ी, बातें करने की वेसुधी में जाने कब उसने पौधे की एक मोटी-सी जड़ काट डाली है ! शायद यह पौधा न भी जी सके । कड़वी-सी मुस्कराहट रमानाथ के चेहरे पर झलकी, उसे लगा, उसके जीवन के आशा-तरु की मूल ही उसने काट डाली है। "मुखिया दादा हैं क्या?"-उनके गांव के आठ-आने हिस्से की जमीदारी का पुराना और खेती-बाड़ी की देखभाल करने वाला एतवारी कारिन्दा कन्हाई राय भाकर खड़ा हो गया। यह कन्हाई राय मुजस्सम कलि है । नल-दमयन्ती जिन दिनों एक ही धोती में वनवास के दिन काट रहे थे-एक-दूसरे से दूर । ।

संदीपन पाठशाला ::७ । जाने का कोई रास्ता नही था उस समय कलि ने नल के हाथ में एक तेज छुरा जुटा दिया था 1 वस उसी कलि जैसे ही कन्हाई राय ने सीता के हाथों में यह नौकरी ला दी है। इसी कान्हाई राय ने ही सीताराम की नौकरी तय की है। उसी ने उसको प्रलुब्ध किया है। उसको देखकर रमानाथ अपने को संभाल न सका, बोल पड़ा, आपने मुझसे यह दुश्मनी क्यो की, यह तो बताइए? दुश्मनी ! --कन्हाई राय आश्चर्य करने लगा। दुश्मनी तो है ही रमानाथ ने कहा, अकेली औलाद है यह मेरी । माँ मर गई इस बेटे की तो मैंने इसे पाला-पोसा गोद में। पढाई में याज चार साल से अलग-थलग रहा, सो भी मैंने कहा, झख मारने दो, वेटा पढ़ना चाहता है तो पढने दो । फेल होगा, यह तो मुझे मालूम ही था। लेकिन मैंने कहा, खैर शौक पूरा यार ले । वही फेल होकर घर लौट आया। सोचा था, बहरहाल, लडके की साध तो पूरी हो गयी, अब थिर होकर घर पर बैठेगा। मेरा दाहिना हाथ बनेगा, खेती-बाड़ी देखेगा । बूढा हो गया हूँ, पास रहेगा । सो नहीं, तुमने भला यह कैसी अक्ल दे दी उसे? राय ने ऐसी शिकायत की प्रत्याशा नहीं की थी। सीताराम से उसे प्यार है और उसी प्यार के कारण उसका अभिप्राय समझकर उसने ऐसी व्यवस्था कर दी है। रमानाथ ने आँखें पोंछो । माखों में आंसू आ गये थे, बोला, अचानक अगर मर जाऊ तो शायद बेटे के हाथो आग भी न मिले। अव राय से बिना हंसे नहीं रहा गया। चोला, अरे ढाई मील का ही तो रास्ता है, दूर क्या कहते हो? शाम को लड़को को पढ़ाकर, खा-पीकर रोजाना पर भी आ सकेगा। आपका सिर भी दुखे तो इत्तिला मिलते ही घंटे- भर मे घरभा जायगा। रमानाथ को इस बात का कोई जवाब ढूंढ़े नहीं मिला । खामोश मिट्टी को ओर नजर गड़ाये घास के एक गुच्छे की जड़ पकड़कर सोचने लगा। राय ने उसे समझाते हुए कहा, आप इसमें एतराज न करें । सीताराम का इसमें भला होगा, आपका भी। आठ आने हिस्से के जमीदार के घर के लड़कों का मास्टर बनेगा सीताराम, इससे... रमानाथ ने यकायक उसका हाथ पकड़ लिया और कहा, सरिश्तेखाने का कामकाज सीस ले, ऐसा कर देना भाई। राय ने कहा, यह कौन-सा मुश्किल काम है ! गाहे-बगाहे अगर सरिश्तेसाने के नायव के पास बैठे तो सीखने में के रोज लगेंगे? खैर, यह बात मैं रानी माँ से बता दूंगा। हाँ, बाबू लोगो की गुमाश्तागिरी अगर मिल जाये हमारे गांव की, तो इज्जत तो मिलेगी ही, दो-दस रुपए भी; धरपर रहेगा, मवकुछ ठीक रहेगा। अदृश्य विधाता हंसे, आग की छुरा लगते ही आग मुलग उठती है । .

संदीपन पाठशाला ऐन ऐसे ही समय सीताराम नाकर खड़ा हो गया। मैं जा रहा हूं वप्पा ! रमानाथ खड़ा हो गया। वोला, 'जा रहा हूं' नहीं कहा जाता है वेटा, रहा हूं' कहना चाहिए । चलो तिलक लगा दूं, फूल हूँ, भगवान को मत्या लो। चलो। सीताराम चला गया। रमानाथ उदास-मन हुक्का लेकर बोसारे बैठ या। उसका यह सजा-सजाया खेती-बारी का टाट, पीढ़ियों के खून से सींचा पह टाट, इसी टाट के देवता की पूजा बन्द होने का आज सूत्रपात हुआ। कुछ- कुछ पागल जैसे ही रमानाथ अकेले ही, मानों अपने को ही सुनाते हुए बोल पड़ा हो गया, आज से नोटिस मिल गया। काल-पुरुष बांस की गाड़ी पर बैठे यहाँ ना जाये और सबकुछ सीलमुहर कर दे वस, सारा का सारा सफाया ! जमाना है जमाना, जमाने की चाल ! पुराने जमाने का गाँव-सोने का गाँव होता था। अहा, क्या सारी गिरस्तियां थीं ! सोने की गिरस्ती। वह जमाना और वह गाँव आँखों पर तिर रहे हैं । उस जमाने का गाँव ! रमानाय की आँखों में आंसू आ गये। उस जमाने की बात ! किसान-अहीरों का गांव ! तेरह सौ सन' का किसानों का गाँव । उनके टोले के सिरे पर था वाडरी लोगों का पुरवा। मंडल जी की खेती-बारी में वे हलवाहे-टहलुए का काम करते हैं, गोपालन में सहायता करते हैं। भिनसारे मालिक उठने से पहले के र में आ पहुंचते । मालिक खुद खड़े रहते, वे गौवों को गुहाल से वाह नकाल कर सानी-पानी देते। मालिक तमाकू पीते, गौवों की पीठ पर हा सहलाकर उनको दुलारते, डांटते, सज़ा देते। फिर रात का काम भी वे सेवा कर समाप्त करते । गुहाल में धुंआ दे मच्छर भगाकर गौवों को उन अपने-अपने ठाँव पर बांध देते । कोई ठांव-ठिकाने में गलती करता तो उस फटकारते हुए कहते-वेवकूफ, बेहूदा, वदमाश, अपना ठांव-ठौर भी जानते ? फिर तमाकू पीते हुए दयामय भगवान का स्मरण करते । मिट्टी का बना घर, फूस का छाजन, वास या लकड़ी की अठकोनी ह से घिरा ओसारा, तारकोल-पुते दरवाजे, लाल मिट्टी से पुती हुई दीवा पर खड़िया या गेरू से वनी अल्पना, गोवर-मिट्टी से लिपी-पुती फ आंगन, इन्हीं से उनका घर वना। किसी-किसी का घर कोठा है यानी दुम ज्यादातर घर कोठे नहीं, इकमंजिले हैं। घर के बगल में तलया, त लकड़ी के लट्ठों से बने घाट, उस घाट पर बैठकर किसान-बहुएँ वरत १. बंगाब्द १३०० ईसवी सन् १९०७ होता है ।

"संदीपन पाठशाला:: हैं, नारी का साग चुगती हैं, मई लोग बांस की तीलियों का वना टापा डालकर मछली पकड़ते हैं। तलया के चारों और साग-सब्जियों का घरेलू सेत, लौकी-कुम्हढे का मचान, उसी के बीच जाफरी से घिरे एकाध कलगी आम के विरवे, इसके अलावा पपीते के दरख्त हैं, अड़हुल-कनेर के पेड़ हैं, गाढ़े हरे रंग के फेम की तरह तलया के पानी को घेरे रहते । अड़हुल-कनेर के फूल चुन कर वे खुद देवस्थान को दे आते, फल-साग भी दे आते और इससे विधि-निर्देशित मृत्तिका-मेवा में नियोजित उनके दो हाय धन्य हो जाते । घर के दूसरी और खलिहान और गोशाला; इसी ओर उनके घर का सदर पडता है-जिम प्रकार जमीदार की कचहरी, बाबू लोगो को वैठक, उसी प्रकार इन लोगों का सलिहान-गोशाला। एक लम्बा-चौड़ा छप्पर, छप्पर के मामने अनावृत्त खलिहान मे धान और पुयाल रखने के गोल खत्ते, गुहाल के सामने साफ-सुथरे मिट्टी के बने नादो के सामने गौवो को पति बंधी हुई। चौडे छप्पर के मचान मे सेती-बारी के सामान-हल, जुआ, होंगी, पगहा; यहां तक कि होगी इस्तेमाल करने में लगने वाला लकड़ी का पटरा और लम्बा वास भी रसे हुए रहते हैं। सबल गठे हुए बदन, सिर के बाल छोटे कतरे हुए, उसके वीच चुटिया, गले में तुलसी की माला, मदों की पोशाक सात हाय लम्बी और दो हाथ चौड़ी- करपे पर युनी मोटी धोती और कन्धे पर अंगोछा । औरतों की पोशाक-उसी करघे पर युनी नौ हाय वयालीस इंच वाली साही। सुबह उठकर मर्द खेतो में चले जाते हैं, औरतें घर का कागकाज करती, गो-सेवा करती, फिर पहरभर वेला चढ जाने के बाद रसोई चढाती, खाना-पीना सत्म होने में दो पहर ढल जाती है, वावुओ के गांव रत्नहाटा के स्कूल मे उस वक्त टिफिन के बाद यक्षा लगने का टन-टन घंटा बजता। लड़के दम-बारह साल की उम्र तक गांव के पुरोहित जी की पाठशाला में पढ़ाई करते, फिर पाठशाला जाना चन्द कर बड़ो के साथ सेती के काम में जुट जाते हैं। वे लोग जीवन में अधिक पढ़ाई की जरूरत महसूस नहीं करते । क्या जरूरत है भला? खेत की फगल, तालाव की मछली, घर का दूध, घर का गुड़-3ट कर सन्तोष से पेट भर कर खाते है, भगवान का मुमिरन करते, एड़ी-चोटी का पमीना एक कर सेत मे मेहनत-मशरकत करते, खेतों में फसल हहरा कर पका आती, उनका जीवन भी अकूत आनन्द से भर उठता; उसी मानन्द से दोनो हाथ ऊपर उठाये शाम को मृदंग बजाते कीर्तन की मंडली ले गांव के डगर पर निकल कर गाते हैं-"श्रो नामेर गुणे गहन बने मृततम मुंजरे । वल माघाइ मधुर स्वरे, हरिनाम विना आर कि धन आछे संगारे ।" इससे अधिक उन्हें सोचने की जरूरत नहीं और न वे सोचना १. उस नाम की महिमा से बीहड़ वन में मरे हुए दरसन मे भी कोंपल निकाल याते हैं । ऐ माघाइ, मधुर स्वर में बोल, हरि के नाम के मिवा संसार में और कौन-सा धन है।

१० :: संदीपन पाठशाला ही चाहते हैं। लिहाजा ज्यादा पढ़-लिख कर भला क्या होगा? किसी तरह टेढ़े-मेढ़े मोटे हरुफों में दस्तखत भर करना है, दस्तावेज.पर गवाही बनना पड़ता, हैंडनोट तमस्सुक कवाला पर दस्तखत करने पड़ते, इसलिए इतने भर की जरूरत है। और जरूरत है गिनती, पहाड़ा, धान के वजन का मन-सेर- छटांक का हिसाव लगाना, विसवा बीघा आदि की जानकारी की। उन्हीं में जो लोग अच्छा पढ़-लिख जाते हैं, सम्मान्य व्यक्ति हैं, ज्ञानी लोग हैं। उनके ओसारे में जाकर वे शाम को वैठते, सस्वर रामायण, महाभारत पढ़ते, ये लोग सुनते । जीवनतत्त्व के बारे में कितनी ही व्याख्याएँ वे उन्हीं से बटोरते रहते हैं। इससे अधिक उनके जीवन में कोई प्रयोजन नहीं था । पाप और पुण्य का एक सरल-सहज मीमांसावोध था। उसी वोध के अनुसार जीवन-सत्य को गम्भीररूप से अनुभव करने लायक हृदय का विस्तार और गहराई भी थी। भौतिक जीवन की आवश्यकता भी अल्प थीं, अभाव की अशान्ति नहीं थी, अन्तर में परम सत्य को पाने के विश्वास में गहरी शान्ति थी। किसानों के गाँव के कोलाहलशून्य दिनो-रात के साथ उनका जीवन भी प्रसन्नता में बीतता जा रहा था। अचानक देश में जोरदार हवा का एक झोंका भाया। झोंका नहीं था दरअस्ल क्योंकि झोका होने पर थोड़ी देर के बाद ही थम जाता है। यह हवा थमी नहीं, लगातार उसका जोर बढ़ता ही रहा, बरसात में पछुवा की नाई। भद्र बाबुओं के रत्नहाटा गांव में शुरू में माइनर स्कूल खुला । रत्नहाटा के ब्राह्मण प्रायः सभी जमींदार हैं । पंख होने पर ही पंछी बन जाता है। दो-चार गंडे जमींदारी हिस्से की मिल्कियत लेकर सभी जमींदार थे। इतने दिनों दो आने दो पैसे की पक्की शराब की बोतल और वारह आने का बकरा खरीदकर दावत करते और दावत में मौज-वहार कर वे दिन काट रहे थे, उनमें नई लहर आई, पढ़े-लिखे बनेंगे । माइनर पास कर वाबुओं के वेटों में कुछ तो सदर में जाकर आममुख्तार वने, सवरजिस्ट्री दफ्तर में क्लर्क बने, अदालत में भी नौकरी मिली, कुछ थे जो माइनर पास कर, कोनीहार के अंगरेजी स्कूल से भी पास किया-उनको कलकत्ते में रेल की नौकरी मिली, सरकारी नौकरी मिली- दारोगा बने, पोस्टमास्टर बने, एकाध कालेज में पढ़कर वकील बन गये और एक बन गया हाकिम । किसानों के गांव में भी यह हवा आ लगी। वे भी उसी ओर पलटे । सद्गोपटोले के मातबर रंगलाल ने अपने दो वेटों को माइनर स्कूल में भरती कर दिया। बड़े बेटे ने माइनर पास कर पाठशाला खोल दी। उससे छोटा भी माइनर पास कर पाठशाला खोलने की कोशिश में घूमता। उसके बाद वाले बेटे को माइनर पास कर वजीफा मिला। उसी वार रत्नहाटा में बड़ा अंग्रेजी स्कूल खुला। रंगलाल का वृत्ति-प्राप्त बेटा बड़े स्कूल में पढ़, पास कर कालेज में पढ़ने चला गया। साथ ही साथ सद्गोपटोले के सभी लड़के स्कूल में भर्ती हो गये । बरसात आई, मानस की खेती शुरू हो गई, नई फसल की खेती। ।

संदीपन पाठशाला :: ११ . । अचान ही एक दिन सद्गोपटोले को प्रवीण मण्डली भी उत्साह और गौरव से चंचल हो उठी । लड़के आश्चर्यजनक यवर ले आए हैं। रनहाटा के स्कूल में एक तरुण सद्गोप शिक्षक आ गये हैं । कुर्मी पर बैठकर ब्राह्मण, वैद्य, कायस्थ यावुओं के वेटों की गुरुआई कर रहे हैं। ममारोह महफिल जम गगी। मद्गोप मास्टर को एक दिन निमन्त्रित कर वे ले आए। गोष्ठी में घटकर मास्टर ने बहुत सारी विचित्र वातें बताई। ऐसे ही समय एक परम विस्मयकारी घटना घटित हो गयी। गांव के रास्ते पर रत्नहाटा के बाबुओं के घर के लड़के मा पहुंचे। रविवार की छुट्टी में बन्दूक लेकर वे शिकार करने निकले थे। शिकार से निबट लौटती राह वे सद्गोप मास्टर के सामने पड़ गये । बाबुमो के लड़के शिकार पर जाने-आने के रास्ते अक्सर इस गांव में आते हैं, मेहरबानी कर कभी-कभी प्यास लगने पर बताशे या गुड के माय पानी पीते हैं। मण्डल लोग झुककर जमीदार ब्राह्मण-कुमारों को प्रणाम भी करते हैं । आज आश्चर्यजनक काण्ड हो गया ! सद्गोप मास्टर को देखकर वे खड़े हो गये और सम्मान जताते हुए उनको नमस्कार किया । सद्गोप प्रवीणलोग ब्राह्मणनन्दनों को प्रणाम करते देखकर सविस्मय थमक गये । मास्टर ने हमकर कहा शिकार ? -~हां सर। कहकर वे चले गये। उमी दिन इस गांव में दुगुनी रफ्तार से यही हवा चलने लगी। रमानाथ ने भी अपने बेटे सीता को इसी उत्माहवश स्कूल में भर्ती कर दिया। हाय, उस दिन काश! वह समझ सकता! पांच साल पढने के बाद सीताराम थर्ड क्लास तक नियमित उठने के बाद यकायक वहर गया । अग्रेजी की अड़चन से और आगे न बढ मका । लगातार दो साल फेल होता रहा । दो साल के बाद रमानाथ ने अचानक ही एक दिन उसे स्कूल से छुड़ा लिया । वजह भी थी। उस वक्त रमानाथ पढ़ाई के एक दूसरे पहलू को देखकर शकित हो उठा था । इम और उसकी निगाह पडी थी और न ध्यान ही दिया था धर्ना वह सीता को अंग्रेजी स्कूल में न पहने देता। उम मुहल्ले के महादेवपाल का घेटाचंही सीताराम का हमउम्र है और पडता भी सीताराम के साथ था। वह सीताराम को लांघ कर एक कक्षा पर उठने के बाद अटक गया था। उस दिन उसे एक हाथ में एक फूल लेकर धुमाते और दूसरे हाथ मे सुलगती बीड़ी लेकर गाना गाते हुए देखा उसने । शाम के अन्धेरे में गांव के बाहर एक पेड़ तले बैठे सांझ के आकाश की ओर उदाम नयनो से देखते हुए छोकरा गा रहा था, "सम्मुख लाख मेघ खेला करे।" रमानाथ दंग रह गया ! सीता के प्रोमोशन के लिए स्कूल के बढ़े मास्टर के पास हो गया था, रमानाथ भारी मन लिए लौट रहा था, ऐसे समय अचानक ही यह दृश्य दिखाई पड़ गया। मन ही मन वह शंकित हो उठा । अगले दिन ही सवेरे अपने नाते के भाई के पर शोरगुल सुन १२ :: संदीपन पाठशाला - - उसने जाकर देखा, भाई वल्लभ हाथों में सिर थामे बैठा है, उसका बेटा ईश्वर सन्दूक का ताला तोड़ रुपया लेकर भाग गया है। ईश्वर भी सीताराम की उम्र का है। वह माज कई साल से फिफ्थ क्लास में ही अटक गया था। इस बार भी फेल हुआ था और उसी सिलसिले में कल वाप के साथ झगड़ा हुआ था। उसके फलस्वरूप रात ही को कभी ताला तोड़ कर मुट्ठी-भर रुपया- पचास-पचपन रुपए लेकर भाग गया है। वल्लभ ने कहा, अपने बेटे को कोई कभी स्कूल में मत पढ़ाना । रमानाथ को यह वात भा गई । घर आकर ही उसने सीताराम की पढ़ाई छुड़ा दी-कोई जरूरत नहीं अव और पढ़ाई की। हालांकि सीताराम उन लोगों की तरह नहीं था। वह वरावर मोटे कपड़े से ही सन्तुष्ट है, जूते की जरूरत अभी उस दिन तक उसे नहीं पड़ी । सिर के बाल भी वह एक ही लम्बाई के कटाता। कोई नशा भी नहीं करता था- रमानाथ का हुक्का-तमाकू आज तक जगह से हिले नहीं। फिर भी वह भविष्य के लिए शंकित हो उठा, वोला, अब और पढ़ाई की जरूरत नहीं, खेतीवारी देखो। सीताराम खामोश सिर झुकाये खड़ा रहा, कोई भी प्रतिवाद नहीं किया उसने । दो दिन बाद अचानक रात को नींद उचट गई और रमानाथ चौंक पड़ा। गर्मी के दिन-सीताराम ओसारे में खम्वे से टेक लगाये बैठे गुनगुनाता गाना गा रहा था । गर्मी के दिनों में भी देहात में खास कोई बाहर नहीं लेटते। कम उम्र के दो-चार लोग बड़ो से छिपकर भले लेट लें पर बड़े-बूढ़े कोई भी नहीं लेटते । चोर-डाकुओं के भय से पुरखों का निषेध है । वे आकर सबसे पहले घर के मालिक को अपने कब्जे में करना चाहते हैं। दूसरे लोगों पर थोड़ा-बहुत जुल्म कर डाकू छोड़ देते हैं । लेकिन मालिक का निस्तार नहीं। सारा माल-मता दे देने पर भी छुटकारा नहीं। वस और कुछ भी नहीं हैइस बात पर चोर- डाकू विश्वास नहीं करते, निर्ममता से पिटाई करते हैं । वहुधा कत्ल भी कर जाते हैं । खैर, जाने दो वह वात । वाहर के गुनगुनाने के शब्द से नींद उचट गयी तो रमानाथ ने खिड़की से देखा, सीताराम बाहर खम्वे से टेक लगाये गुनगुनाता गाना गा रहा था, "न साध मिटी मेरी, न आशा हुई पूरी-मेरा सभी कुछ चुका जाय माँ।" रमानाथ और भी अचम्भे में पड़ गया-सीताराम की आँखों से आँसू ढुलकते देखकर; चाँदनी उसके मुख पर आ पड़ी है, जुन्हाई की छटा में आंखों के कोर से लेकर ठोढ़ी के सिरे तक जल की दो धाराएँ चमक रही हैं । उसके दिल में एक हूक-सी उठी । सीताराम अपनी मां के लिए रो रहा है। उसकी भी आँखों में आँसू आ गये । धीरे-धीरे दरवाज़ा खोल वह बाहर निकल आया और अपने बेटे का सिर अपनी छातीपर खींच लिया। कुछ देर के बाद चौकीदार की हाँक सुन वह अपने आपे में आया। रात दो ण्डर पार कर रही है । वेटे से उसने कहा, 'आ जा, मेरे कमरे में आकर सो - - संदीपन पाठशाला ::१३ जा।' हमेशा से मीताराम बड़ा ही शान्त और आज्ञाकारी है। उसने कोई विरोध नहीं किया, अपने कमरे से चटाई और तकिया लाकर वाप के पास लेट गया। रमानाथ ने इतनी देर में सस्नेह पूछा, क्यों रे, अपनी मां को क्या सपने में देसा था? सीताराम ने कोई जवाब नहीं दिया। रमानाथ ने कुछ लम्हों के बाद फिर पूछा, तेरी मां ने कुछ कहा ? सीताराम फिर भी चुप किये रहा । रमानाय ने कहा, सो जा । सपने लोग देसा ही करते हैं । फिर एक गहरी- लम्बी सांस लेकर बोला, मेरी गिरस्ती तो तुझ ही को लेकर है । तेरे मुंह की और देखकर मैं चुप्पी साधे रहता हूँ। फिर कुछ देर चुप रहने के बाद बोला, तू अगर रोए तो मैं दिल मे होमला कैसे रखू, बता भी? वह उठकर आया और बेटे के बिस्तर के बगल में बैठकर उसके बालो को सहलाते हुए बोला, सो जा। । मीताराम स्तब्ध लेटा रहा लेकिन नीद उसे नहीं आई, यह समझने में रमानाय को देर नहीं लगी। वह पंखा लेकर झलने लगा । अब सीताराम ने हाथ बढ़ाकर पंखा ले लिया और कहा, नहीं । । रमानाथ ने पंखा नहीं दिया और सीताराम का जवाब पाकर उत्साहित हो उठा। उसी उत्साह में उसे अचानक दिलासे का रास्ता मिल गया, बोला, इगो साल मैं तेरा व्याह कर दूंगा। सीताराम चौंक पड़ा, उठ कर बैठ गया । वोला, नहीं। नहीं ! रमानाय दंग रह गया। नहीं-- क्या ? ध्याह नहीं करेगा यह कसी अनहोनी बात। 'नहीं ! मैं पढूंगा।' 'पढ़ेगा?' रमानाय स्थिर दृष्टि से बेटे की ओर देखता रहा, अन्धेरे मे ही। इतनी देर में सारी बात का धीरे-धीरे खुलामा हो गया । 'साध न मिटी, भाशा नही पूरी हुई '-राम कहो, पढाई की साध और आशा ! रमानाथ उठ कर अपने बिस्तर पर जाकर लेट गया, बोला, अच्छी बात, पढ़ लेना । अब सो जा। तेरी साध और माशा पूरी होगी। मीताराम बोला, मैं हुगली में नार्मल पढूंगा। हुगली में ? चौक पड़ा रमानाथ । हुगली तो बहुत दूर है । इसके अलावा यहाँ की पढाई घर का खाना खाकार, वहां खर्च पड़ेगा। 'महीने में बारह रपए मिलने पर ही मेरा काम चल जायगा, रमानाथ ने जवाब नहीं दिया, करवट बदलकर वह लेट गया। अगले दिन रमानाथ ने सबैरे उठते ही खाना चढ़ा दिया पकाने को। सीताराम के उठते ही बोला, भात उतार लेना । मैं खेत चला । खाकर तू अपने स्कूल चला जाना। इसी ढंग से उसकी पलीशून्य गिरस्ती चली जा रही थी। वह दाल !

१४ :: संदीपन पाठशाला - - बनाने के बाद एक तरकारी बना डालता था फिर चावल चढ़ाकर खेत चला जाता था, सीता पढ़ता था, सीता पढ़ते-पढ़ते ही भात उतार लेता था। बाप के लिए ढककर रख देता, फिर खुद खाकर ताऊ के घर चाभी रखकर स्कूल चला जाता था। दिन ढले पांच बजे लौटता था। ढाई मील का रास्ता है रत्नहाटा। उस दिन शाम को सीताराम छह बजे लौटा। रमानाथ घबरा रहा था; सारे लड़के लौट आए, सीता नहीं लौटा। उसे डर लगा; सबसे पहले उसने वक्सा- सन्दुक देखा। ताला तोड़कर वल्लभदा के बेटे ईश्वरा जैसा भाग तो नहीं गया ? नहीं, बक्से-सन्दूकचे तो सब ठीक-ठाक हैं। फिर भी दिल नहीं मानता । ईश्वरा की तरह ताला तोड़ रुपया लेकर न भी भागे, यूं ही एक कपड़े में भाग संन्यासी तो बन जा सकता है। कल ही रात को तो वह रो रहा था और गा रहा था 'साध नहीं मिटी।' रमानाथ गांव के बाहर रास्ते पर जाकर खड़ा रहा। सीता लौटा, उसके साथ रत्नहाटा के ही वही सद्गोप पंडित जी। पंडित बोले, मण्डल जी, सीताराम मेरे पीछे पड़ा है, वह नार्मल स्कूल में पढ़ेगा। मेरा काम है आपको सहमत कराना। रमानाथ क्या बोले, यह उसे ढूँढ़े नहीं मिला। पंडित जी वोले, अंग्रेजी इसे भली-भांति आती नहीं, इसीलिए यहाँ फेल हो रहा है । नार्मल में पढ़ना उसके लिए अच्छा ही होगा। रमानाथ ने अब कहा, लेकिन वह पढ़ने तो हुगली जाना पड़ेगा। हाँ, यहीं हुगली में, आज चिट्ठी दाली जाय तो कल मिल जाती है । सवेरे सवार होने पर बारह बजे दोपहर तक पहुँच जाइए, कौन ऐसी दूर है ? रमानाथ चुप किये रहा । अचानक उसे दिखाई पड़ा, सीता ओसारे के एक, कोने में बैठा रो रहा है । एक लम्बी साँस लेकर उसने कहा, अच्छा ऐसा हो होगा। रमानाथ ने ऐसा ही किया। हास्य से उद्भासित मुख लिये सीताराम वाप के पैरों की धूल सिर पर लेकर हुगली के लिए रवाना हो गया। पंडित जी ने भी हंस कर कहा, सीताराम आपके वंश का मुख उज्ज्वल करेगा। चन्द्र-सूर्य-सा नहीं कर सकेगा लेकिन माटो के दीपक-जैसा कर सकेगा। रमानाथ खुश्की लिए हंसा, कोई जवाब नहीं दिया। चुपके-से बेटे को रत्नहाटा स्टेशन के एक छोर पर बुलाकर कहा, एक वादा तुमको मुझसे करना होगा। इसबार तुम्हारा व्याह करूंगा मैं । 'नहीं' कहने से नहीं चलेगा। सीताराम ने सिर झुकाकर कहा, अच्छा। नार्मल स्कूल में पढ़ाई के पहले ही वर्ष में रमानाथ ने उसकी शादी कर दी। दुल्हन का नाम है मनोरमा। सीताराम को भी वह पसन्द आई। इन तीन वर्षों में जितनी बार वह छुट्टी में घर आया है, उतनी वार चन्द दिनों के लिए सीताराम ससुराल गया है । रमानाथ ही उसे भेज देता था। व्याह के समय - संदीपन पाठशाला :: १५ मनोरमा बारह साल की छोटी-सी लडकी थी। उस समय उसके माय बातें करने में सीताराम को अक्सर हमी आती थी। शादी के बाद गर्मी की छुट्टियों में सीताराम जब पहली बार ससुराल गया, अपने साथ वह ले गया एक पाठ्य- पुस्तक-महाकवि माइकेल मधुसूदन दत्त का 'मेघनाद वध कान्य' । गर्मियों के दिन थे । भोजन के बाद सास ने उसे अपने मिट्टी के बने नये दुमजिले की सीढियों का दरवाजा दिखलाते हुए कहा, ऊपर जाकर लेट जाओ बेटा, विस्तर लगा दिया गया । तुम्हारे सब सामान आर ही रस दिये गये हैं। आर आकर सीताराम ने दरवाजा खोल कर देखा, मनोरमा पहले से ही आफर बैठी हुई है, उसकी किताब खोलकर पढ़ रही है । सीताराम पुलकित हो उठा । मनोरमा पढ़ी-लिखी है ? दरवाजा भेड़कर सीताराम मनोरमा के बगल में आकर बैठ गया। तबतक हालांकि मनोरमा एकहाथ चूंघट काढकर किताब से दूर सरक कर बैठ गई है। विवाह के बाद पति-पत्नी की पहली मुलाकात रिवाज के मुताबिक जबरदस्ती ही उसका चूंघट खोलना होगा, काफी चिगरी- विनती कर उससे बात कराना होगा। चिरीरी-विनती पर भी अगर वह न बोले तो पति को रूठना होगा। -अच्छो वात, मुझसे भला क्यों वोलोगी ? मैं कौन होता हूं तुम्हारा? लम्बो सांग लेकर कहना पडेगा, कल ही चला जाऊंगा मैं । सीताराम को इनमें से कुछ भी नहीं करना पड़ा । चूंघट का पट खोल देते ही मनोरमा फिरफ से हम दी थी। कुछ ही देर में वह स्वच्छन्दता से बोलने लग पड़ी। यकायक सीताराम हाथ मे किताब लेकर पूछ बैठा, कौन-सी जगह पढ रही थी ? कैसी लगी? मनोरमा ने होठो की भंगिमा से अच्छा न लगने का आभास दिया और गर्दन हिलाकर बोली, वाहियात किताय है तुम्हारी ! एक भी तस्वीर नहीं। सीताराम बोला, तुम पगली हो! पढकर ममझ नही सको, यह एक महा- काव्य है । इसमे क्या चिन्न रहता है ? शब्द की ध्वनि से मनोरमा विस्मित हुई, महाकाव्य-महा शब्द के गाम्भीर्य और गुरुत्व-ध्वनि के प्रभाव से उनके मन पर असर डल चुका था। वह आँखें फाड़ती हुई बोली, महाकाव्य ! फिर अपराधबोध से लजाकर बोली, क्या मालूम 1 मुझे पढ़ना तो आता नही, तस्वीर देखने के लिए खोला था। पचांग मे कितनी-सारी तस्वीरें होती हैं । दादा के स्कूल की किताब में कितनी-सारी तस्वीरें हैं। एक शेर है उसमें बड़ा अच्छा-सा। सीताराम हँसा । बोला, खर सुनो । वह पढने लगा- "सम्मुस समरे पड़ि वीर चूड़ामणि 'वीरवाहु चलि अबे गेला यमपुरे- 'अकाले, कह है देवि अमृतभापिणि 'कोन वीरवरे वरि सेनापति-पदे..

१६ :: संदीपन पाठशाला . 'पाठाइला रणे पुनः रक्षकुलनिधि 'राघवारि ।" समझी ? रामायण की घटना है। लंका के युद्ध में रावण के वीरपुत्र वीर- वाह मारे गये। राम ने उनका वध किया। उसके बाद ही यह कविता आरम्भ होती है समझ लो। तकिये पर सिर रख मनोरमा तव तक लेट गयी है । बोली, हंऽ। इसीलिए कवि माता सरस्वती से कह रहे है, समझ लो। उसने शुरू कर दिया। एक साँस में पढ़ता चला गया--"गौड़जन याहे आनन्दे करिवे पान सुधा निरवधि" तक । फिर वह रुका । बोला, अव आरम्भ हुआ। रावण सिंहा- सन पर बैठे हैं, समझी? मनोरमा से कोई आहट नहीं मिली। सीताराम ने जरा झुककर उसके मुख की ओर देखा, मनोरमा तव तक सो गई है। शाम को मनोरमा ने कहा, वह सब पढ़ने पर अच्छा नहीं होगा जी । गाना गा सकते हो तो एक गाना गाओ, सबसे अच्छा हो अगर तुम एक कहानी सुना दो-~-भूत-प्रेत की कहानी। तीन साल इसी प्रकार बीत गये । इसके बाद आखिरी परीक्षा के पहले वह फिर ससुराल गया ही नहीं। मनोरमा के बारे में भी उसने एक तरह से चिन्ता नहीं ही की । लगभग आहार-निद्रा त्यागकर वह केवल पढ़ता रहा, और पढ़ता ही रहा। परीक्षा खत्म हो जाने के बाद मनोरमा याद आई । शिशिर के अन्त में रिक्तपन रक्तकांचन का वृक्ष अकस्मात ही एकदिन फूलों से भर उठता है, लसी प्रकार से मन उस दिन मनोरमा की चिन्ता से भर उठा। परीक्षा से निवट कर जव वह मेस में लौट आया उस वक्त भी उसे मनोरमा याद नहीं आई, उसवक्त भी किसने कैसा लिखा है इसी की चर्चा चल रही थी। फिर सामान बस्ते समेटने की बारी आई। इस वक्त एकवार वह याद आई। लेकिन साथ ही साथ वावा भी याद आ गये। लेकिन उसी दिन रात को उसने सपना देखा, अपने वावा को नहीं, मनोरमा को । सबेरे उसका दिल मनोरमा के लिए उतावला हो उठा। वह घर न जाकर ससुराल पहुंच गया। एक साल-करीब एक साल उसने मनोरमा को देखा नहीं, उसको देखकर वह अचम्भे में पड़ गया। मनोरमा सिर से लम्बी हो गयी है, भरी हुई नदी की नाई उसके अंग-अंग यौवन उच्छास से भर गये हैं। घर में दाखिल होकर वह चूंघट काढे खड़ी मनोरमा को पहचान भी नहीं सका, थोड़ा-सा चूंघट खोल कर मनोरमा ने उसकी ओर ताका, फिर भी सीताराम पहचान नहीं सका। लगा कि पहचाना चेहरा है लेकिन ठीक याद नहीं आया । मनोरमा मुस्काई और उसकी संवर्धना की । अब पहचान लिया सीताराम ने। विस्मय-आनन्द से वह व्याकुल हो उठा । एकान्त कमरे में भेंट हुई। खुद ही आगे बढ़ दोनों हाथों से सीताराम का गला बांध उसके कन्धे पर उसने मुख रख दिया। पूछा, इसवार तो पास हो ही जानोगे ?

संदीपन पाठशाला :: १७ मनोरमा की वात का जवाब देने को होकर सीताराम अचानक ही अपने उत्तरपनों के बारे में सन्दिग्ध हो उठा। यहीं पहली बार उसे लगा कि परीक्षा मे उसने कोई खास अच्छा नही लिखा है। वोला, कोशिश में तो कोई कमी नहीं की। मनोरमा बोली, इस बार तुम जरूर पास करोगे। मानो न हुआ? नहीं होगे? क्यो? इतना पढ़े ? पढ़ने के अलावा भाग्य नाम की भी तो एक चीज होती है। हाँ होती है। तो फिर? मनोरमा हँस कर बोली, सो शायद हो । भाग्य । भाग्य ही या। सीताराम इसबार भी फेल हुआ, अमफलता का सन्देश पन्न मे आया। उग वक्त वह घर मे था। परीक्षा में अमानता की खबर को मीताराम ने सिर झुकाये ग्रहण किया। अब और वह रोएगा नही। रमानाथ छिपकर रोया। बेटे की पढाई के सिल- सिले में उसे बहुत ज्यादा कामना नहीं थी लेकिन सोता पढ़-लिख कर एक बड़ा विद्वान् व्यक्ति बन जाये, ऐसी कल्पना करते हुए उसे अच्छा ही लगता था, यस । रंगलाल मडल का संझला बेटा बी. ए. पास पर एम ए पढ़ रहा है, साथ ही साथ वकालत भी पढ रहा है। उमको भाग्यवान ही मान लेना चाहिए, उस लड़के को-किशोरकृष्ण को देखकर दसजनो के माथ उसका भी दिल खुशी से भर उठता है। बाहर के दम लोगो के सामने किशोर उसके गांव-रिश्ते का भतीजा है-ऐमा गर्व करने की भी इच्छा होती है। माथ ही साथ ठंडी सास लेकर यह मोचता, काश ! सीता नामंल मे न पढकर यहां की पढ़ाई पाम कर कम-मे-कम एक मुख्तार भी वन जाता तो अच्छा होता। यह सभी कुछ सच है. फिर भी उसके साथ यह भी सच है कि इसको लेकर एक अनयुझी दाहमय आकांक्षा भी उसमें नहीं थी। शान्त सरल बादमी है रमानाथ । विधुर हो जाने के बाद इगी सीताराम के प्रति अतिरिक्त स्नेहवश ही उसने दुवारा व्याह नहीं दिया। ब्याह के बारे में सोचते ही उसे पहले ही यह ख्याल आता कि वह इस घर में सीताराम की मां बनकर तो नही आएगी, मौतेली मां बनकर आएगी। दिल से वह उसकी आल्याण-बामना करेगी, शायद मृत्युकामना भी करे । भय से सिहर कर वह विवाह की कल्पना मो मन से पोंछ डालता था। गोद में सीता को उसने बडा किया है । सीता उसकी आंखो के सामने स्वस्थ रह- फर जीवित रहे, यही उमकी सबसे बड़ी कामना है। इसीलिए पढ़लिख कर सीता नौकरी करने परदेश चला जायगा, इस काल्पनिक विरह की आशंका से उसकी पढ़ाई को सार्थकता को यल्पना वरावर न्यून ही बनकर उसके सामने आई १८ :: संदीपन पाठशाला है । नीता कितनी ही वार कहता, नार्मल पास कर अगर काव्यतीर्थ पास करे सकू तो हाई स्कूल में हेडपंडित वाला काम तो मिल ही जायगा। रमानाथ खामोश अपने हुक्के को फुर्र फुर्र गुड़गुड़ाता ही रहता। प्रसंग-क्रम से सीताराम नौकरी के स्थान पर ही घर बनाने की बात करता । कहता था, छोटा-सा घर वनाएंगे । आपके रहने पर मैं निश्चिन्त रहूंगा, दो वक्त दो लड़कों को पढ़ाने पर और भी वीस,पच्चीस रुपए आ जाएंगे। आप मेरी गिरस्ती की देखभाल करेंगे, मुझे फिर कौन-सी फिक्र होगी? लम्बी सांस लेकर रमानाथ कहता था, घर छोड़कर जाना क्या मेरे लिए मुमकिन है बेटा? जमीन-जायदाद, गाय-बछिया, धान-पान, खेती-बारी, नवान्न- लक्ष्मी.. सीताराम इस समस्या का समाधान बड़ी आसानी से कर देता था। क्यों? खेत-जमीन अधिया पर उठा दीजिएगा, गाय-वछिया भी पालने के लिए दे देंगे, धान-पान साल में एकबार आकर बेच देने से ही चलेगा। नवान्न-लक्ष्मी का पूजन जहाँ भी हम रहेंगे वहीं होगा। रमानाथ सिर हिलाता, ना-ना-नहीं। ऐसा नहीं होगा। डीह पर बाती नहीं जलेगी । इसके अलावा"। जरा चुप रहकर रमानाथ मन ही मन सोचता, फिर बोलता, बेटा, मेरे खेत बड़ी ही मेहनत-मशक्कत के बाद सोना उगलने वाले खेत बने हैं। पुकारने पर आवाज़ देता। अँऽहऽ। फिर जरा चुप रहकर वोलता, बल्कि तू बहू को ले जाकर घर बसाना । कभी-कभार मैं देख आया करूंगा। इसके बाद सीताराम चुप्पी साध लेता था। फिर कहता, फिर तो घर ही पर सब रहेंगे । मैं ही आया करूंगा छुट्टियों में । आपके न जाने पर अलग घर वसा कर क्या करूंगा? रमानाथ की जांखों में आंसू आ जाते थे । वह जरा जोर लगाकर हुक्का गुड़गुड़ाने लगता था। तमाकू के धुंवे से अपने मुख के सामने धूम्रजाल वना डालता था सीताराम फिर कहता, रत्नहाटा में अगर काम मिल गया तो कोई बात ही नहीं। घर में खाकर ही काम करूंगा। जैसे घर में खाकर स्कूल पढ़ने जाया करता था, वैसा ही चलता रहेगा। रमानाय हंसकर कहता, यहां का स्कूल तुमको कोई काम नहीं देगा बेटा। देना भी नहीं, नौर लेना भी क्या कहते हैं याने ठीक नहीं होगा । रत्नहाटा के वाबू हमें काश्तकार कहते हैं । अंऽहं-नहीं-नहीं-नहीं। उससे परदेस मानदेस वेहतर होगा। अचानक नारी कल्पना को व्यर्थ करता पन आया-सीताराम इसबार भी फेल हो गया है । रत्नहाटा के डाकपर से सीताराम खुद ही चिट्ठी ले आया। सिर झुकाये खुद ही उसने कहा, इसबार भी पास रहीं कर सका हूं वावा । ।

संदीपन पाठशाला :: १६ उसको एक माखें देखकर रमानाय ने अपने बांसुओं को रोका वा उसको आँखों में आमू आ गये थे। तीनेक दिन के बाद रमानाथ योला, मीता वेटा, अब घर बैठ कर सेती- बारी देखो । वह को भी लिवा लाता हूँ। तेरे घर पर न रहने मे उसका भी यहाँ जो नहीं लगता। एक महीना, दो महीना गुजरते-न-गुमरते पीहर चले जाना चाहती है। उसे पीहर में यव और रखना अच्छा नहीं दिखता। मोताराम यादतन थोड़ा चुप रहकर बोला, जो आपकी मर्जी हो कीजिए। दिन तय कर एक चिट्ठी लिख दीजिए। रमानाथ चोला, मेरा जितना कुछ है, उससे तुझे तंगी-कमी नहीं होगी। पढ़ना तेरी तकदीर में नहीं, वर्ना कोशिश मे तेरी कोई खामी नहीं, यह तो मैं जानता है। चाहे तो एक बार और"। बात खत्म करने की हिम्मत नहीं पड़ी रमानाथ की। सीताराम बोला, नहीं, अब और नहीं पहुंगा। रमानाथ ने पाराम की मांस ली। हमकर बोला, कोई तुझे मूरस तो नहीं कह सकेगा। सीताराम हेमा । पिता की इम तमरली से उमकी आंखो मे आँसू निकलने को हुए इसलिए हमी से उमको ढांपने की कोशिश की। अगले ही क्षण वह उठ कर चला गया। । इम महीने की पच्चीम वारीस तय हुई है वहू को ले आने के लिए । रमानाथ पुद ही जाकर ले आयगा। मीताराम जाने में संकोच महमूम करेगा--- यह मन में कूत कर रमानाथ ने मुद ही वहा, समझे, मैं ही बहू को लिवा लाने जाऊंगा। बहुत दिनो से समधी जी से मुलाकात नहीं हुई; फिर समधिन जी का पकाया पकवान भी खा माऊंगा, नजदीक दो कोम की दूरी पर गगा. माई भी है, नहा आऊंगा। तुझे दो-चार कामों की जिम्मेदारी सौंप जाता हूं--- उनको कर रखना। काम है-तस्तपोश की मरम्मत, पड़ोमी के घर मे दो कथ- रियां तयार करा लेना, घर-द्वार सहिया-मिट्टी से पुतवाना । और भी कई इमी तरह के छोटे-मोटे काम । समधी के घर को रवाना होने से पहले मुद ही सबकुछ निवटाने की कोशिश रमानाथ करेगा, लेकिन अगर सब निवट न सका तो उसकी भी जिम्मेदारी सीताराम को लेनी पड़ेगी। पन्ही सब कामों में रमानाथ व्यस्त था-व्यस्त शब्द से भी यह व्यक्त नही होगा, वह करीब-करीब मस्त हो गया था। रमानाथ की कितनी माधमरी गिरस्ती, उसी गिरस्ती में लक्ष्मी आएगी। सीताराम गृहस्थ बनेगा। सीताराम चुपचाप बैठे सबकुछ देखता था। भरसक कोशिश करता था कि सबकुछ अच्छा लगे। अपनी असफलता का दुःस भूल जाना चाहता था । मनोरमा की इम परिमागित घर-गिरस्ती के दो पल्पना करने की कोशिश करता और पुलकित होने की इच्छा होती उमे । लेकिन वह इच्छा भीमो मन २० :: संदीपन पाठशाला . में उभर कर ही विला जाती। कोई मानो साथ ही साथ उसे चावुक मारतां । विवाह के बाद प्रथम परिचय से ही वह मनोरमा से बताता रहा है, वह पढ़ाई कर रहा है, वह पंडित होगा, सद्गोप होते हुए भी वह किसान नहीं बनेगा। कैसे, कौन-सा मुंह लेकर वह मनोरमा के सामने जाकर खड़ा होगा? इसके अलावा कामना की आग भड़ककर उसको अस्थिर बनाती रही। जिस कामना का पथ रुद्ध हो जाने से किसी रात को उसने 'मेरी साधन मिटी, आशा नहीं पूरी हुई' गाना गाया था, जिस कामना की अस्थिरता से वह हुगली पढ़ने चला गया था, उसी कामना की वेचैनी ! आखिरकार क्या वह एक किसान बनकर ही रह जायगा? आग जाने कव भड़क उठी थी, उस वक्त समझ नहीं सके थे। आज वह अव बुझेगी नहीं। इसी गांव में रास्ते पर खड़े जमीदार के नायव ने एक दिन कहा था, उसे साफ याद है, किसान से बड़ा दाता नहीं, पर विना जूते के देता नहीं । बाबू लोग कहते हैं-किसान गवार। सीताराम फिर सख्त होकर अपने पैरों पर खड़ा हो गया। पिता से विना पूछे ही चारों ओर शिक्षक की नौकरी ढूंढ़ने कगा । नार्मल पास करने के बाद जो वह करने वाला था, वही करेगा वह । फिर वह रमानाथ के पास एक अजीव-सा प्रस्ताव लेकर आया। रत्नहाटा में उन्हीं के गांव के आठ आना हिस्से वाले जमींदार के घर में दो लड़कों को पढ़ाने के लिए एक गृह शिक्षक की जरूरत है, दो जून खाना और चार रुपए वेतन पर । कई दिन से सीताराम चारों ओर घूमता रहा है । एक दिन विप्रहार भी गया था। विप्रहार यहाँ से चार मील दक्षिण में है। वहाँ एक माइनर स्कूल है। दो दिन अभयापुर गया था। रत्नहाटा उनके गांव से ढाई मील उत्तर में है, रत्नहाटा से और भी सात मील उत्तर में है अभयापुर । अभयापुर में भी एक माइनर स्कूल है । लेकिन कहीं भी कुछ नहीं हुआ। सीताराम मुंह लटकाये घर लौट रहा था, अचानक भेट हो गई जमीदार-गृह के खेती की देखभाल करने वाले गुमाश्ते कन्हाई राय के साथ । सव कुछ सुनकर कन्हाई राय ने प्रस्ताव किया, हमारे घर के दो छोटे बाबुओं को पढ़ाने के लिए पंडित चाहिए । पढ़ाओगे? सीताराम ने दुविधा नहीं की, राजी हो गया। दो लड़कों को पढ़ाना है, दो जून खाना और चार रुपए वेतन । रमानाथ जानता है, वह चार रुपया वेतन भी उसे नियमित नहीं मिलेगा, शायद पूरा भी नहीं मिलेगा। जमींदार घराने के लोग प्रजा के बेटे से विद्या सलामी में लेने में कुंठित नहीं होंगे। फिर भी सीताराम ने नहीं माना । वह दोनों जून लड़कों को पढ़ाएगा और दस से चार बजे तक वावुओं के ठाकुरबाड़ी में छोटे बच्चों के लिए एक लोअर प्राइमरी पाठशाला खोल देगा; फीस होगी हर वच्चा चार आने । लेकिन उससे भी कितने 'पए होंगे? और जमींदार-घराने के वेटे इस खेतिहर गाँव के लड़के की क्या दर-पंडित के रूप में इज्जत करेंगे? . - ।

VZUV4 सीताराम ही जाने ! रमानाथ ने कहा था, मगर पाठशाला ही सोलनी है तो गांव में ही क्यों नहीं खोलता? सीता ने कहा, ताऊ जी के बेटे, बड़े भाई गोविन्द दादा ने पाठशाला सोल रसी है-क्या उससे में रार मोल लूं? इस बात का जवाव रमानाय नहीं दे सका। लेकिन गुराक और पार रुपए वेतन की मास्टरी कर होगा क्या?-इम बात का जवाब भी सोताराम नहीं दे सका । न दे सके, शायद इसका कोई जवाब ही नहीं, फिर भी- फिर भी सीताराम मानेगा नहीं। उसकी आंखों पर एक दिन या चित्र तिर रहा है । रत्नहाटा के वावुनों के बेटो ने इस गांव के सद्गोप शिक्षक को नमस्कार किया था। आग उसी दिन से भड़की है । रोजाना मान-बाना माफर घर आएगा और जमीदारी के मरिश्तेसाने में काम सीपने का चन्दोवस्त होगा-कन्हाई राय ये यह वादा देने पर रमानाथ ने मागिरकार फिर कोई एतराज नहीं किया। एका रामायण, कृष्ण का शतनाम, लक्ष्मी जी की पांचाली-इनका एक वस्ता लेकर रमानाय ने बेटे के माथे से छुवाया । तुलसी विरवा के नीचे से मिट्टी लेकर दही के साथ मिलाकर उसका टीका येटे के माथे पर लगाया। फिर मिर पर हाय रम्य एक सौ आठ बार कृष्ण नाम का जाप कर सारे अंगो पर तीन बार हाप फेरने के बाद बोला, भगवान का नाम लेकर यात्रा करो बेटा! कोई पाप मत करना, ऊँचे की ओर मत देसना ! कहते हुए होठ उमके कांपने लगे । आँसों की कोर में आंसू आ गये थे सीताराम ने प्रणाम किया। फिर एक बार बेटे के सिर पर हाथ रख रमानाय योला, रोजाना रात को घर लौट बायोगे । लालटेन लेकर आओगे और एक लाठी।-कहकर अपनी जवानी की सहचर-बांस की लाठी वेटे के हाथों में थमा दी । सांप-गोगर, मियार-भेड़िए, शोहदे-बदमाशो का मुकाबला इमी से करना। सीताराम ने यात्रा की। गांव पार करते ही सेत, मेतों के उस पार रत्नहाटा की पक्की इमारतें नजर आ जाती हैं । रईस लोगों का गांव है। शिक्षा- दीक्षा-सभ्यता में वायू लोग विशिष्ट हैं। सीताराम बचपन में उम स्कूल में पढा है। इसके बाद भी कितने ही वार गया है। फिर भी इस गांव के विचिन्न लोगो को देखकर उमका विस्मय दूर नहीं हुआ, केवन विस्मय ही नहीं, योड़ा-सा भय भी है मानो केवल भय ही नहीं, उनके प्रति क्षोभ भी है। बाबू लोग उनसे घृणा करते हैं और यह यात वे वैशिझक प्रकट करते हैं । रहते हैं --गंवार । निस्संकोच पाहते है-तुम लोग तो जाति से किमान हो । दिन अपने-आप ही डोल उठना । लेकिन अपने अन्तर का क्षोभ वह प्रकट नहीं कर पाता । उन्हीं के बीच २२:: संदीपन पाठशाला ? वह जा रहा है । वहीं उसे रहना है। भय वह नहीं करता। किसका भय, कैसा भय ? अन्याय वह करेगा नहीं, किसी का अन्याय वह सहेगा भी नहीं । फिर भी जाने कैसा लग रहा है ! सूटकेस हाथ में लेकर वह खेतों की पगडण्डी से रत्नहाटा की मोर बढ़ चला। दो बहुत बड़ा सम्पन्न गांव । आधा शहर । दोनों तरफ से ही-भीतरी और बाहरी दोनों रूपों में ही । सीताराम का ताऊजाद भाई किशोर कृष्ण एम० ए० में पढ़ता है। रत्नहाटा का जिक्र होते ही वह तिरछे ढंग से बोलने लगते, रत्नहाटा की तुलना केवल देहाती कल कतिया कालेजी लड़के के साथ हो सकती है - हालांकि विल्कुल हाल ही के नहीं और न पक्के-पौढ़े-यह समझ लो जो फर्स्ट इयर पास कर सेकंड इयर में आ गया हो : घर की माली हालत अच्छी है, नियमित रूप से रुपये आते हैं । पन्द्रहवें दिन बाल कटाता है, हर दूसरे दिन हजामत बनवाता है लेकिन अब भी सेलून में दाखिल नहीं हो पाता। रेस्त्रां में चाय-टोस्ट, आमलेट खाता है लेकिन फार्पो या अन्य किसी साहवी होटल में नहीं जाता, डरता भी है और रुचि भी आड़े आती है; कविता नहीं लिखता, काव्यचर्चा करता है, योरोपीय लेखकों तथा पुस्तकों के नाम रट रखे हैं, लेकिन किताबें पढ़ी नहीं, बड़ी कठिन लगती हैं । राजनीति पर बहस करता है, वन्दे- मातरम् से लेकर इन्कलाब जिन्दावाद तक, सभी बोलियां तोता रटन्तु-सा बोलता रहता है। कालेज-अधिकारियों के साथ हुए हंगामे में हुजूम के पीछे रहता, साथ भी। लेकिन हड़ताल होने पर कालेज में चोरी-छिपे आ जाता है। पोशाक फैशन माफिक लेकिन इस्तरी वेढंगेपन से की हुई । कृष्ण किशोर खुद कट्टर हिन्दू है, बहुत बड़ी चुटिया रखता है । इसलिए उसके मुंह ये बातें बड़ी अच्छी लगतीं। यहाँ सब-रजिस्ट्री दफ्तर है, पोस्ट आफिस, थाना है, यहाँ तक कि एक सर्कल डिप्टी ने भी यहां अपना हेडक्वार्टर खोल रखा है। स्कूल, वोडिंग, गर्ल्स यू० पी० स्कूल है, लायब्रेरी है, अमेचर थियेटर है, महिला समिति है, यहाँ तक कि साहित्य-सभा भी है यहाँ पर । फुटवाल मैच खेलने के लिए एक कप तक है, किसी भद्र सन्तान ने स्कूल के दिवंगत बंगला-साहित्य-शिक्षक के स्मृति- रक्षार्थ दान किया है। प्रवीण लोग तम्बाकू पीते, नये जमाने के वाबू लोग सिगरेट । सभी के पास कुछ देवदत्त सम्पत्ति है । लेकिन युवकों में प्रायः सभी मूर्ति-पूजा के विरोधी हैं । यात्रा करते समय सभी दही का टीका लगाकर घर . - ? मे निकलते हैं किन्तु बाहर आते ही सबसे पहले जेब से रूमाल निकालकर टीका पोंछ डालते हैं । नये जमाने की लड़कियों और बहुओ में प्रायः सभी के पास जूते हैं लेकिन गांव में कोई भी पहनती नहीं, कही जाना हो तो कागज में लपेट कर स्टेशन पहुंचने के बाद ही पहनती है। प्रवीण बाबू लोग सीधे गाली देते हैं, साला, हरामजादा, बदमाश, बदजात कहकर; नये वावू लोग अंगरेजी में गाली देते हैं, 'डम, स्वाइन' कहकर । यात- बात में कह देते, नानसेन्स । किशोर की बातें सुनकर सीताराम को कौतुक का बोध हुआ और सुशी भी हुई। लेकिन उसने कभी इन सारी यातो को विवे- चना के साथ देखापरखा नही । उसको पुद ही चुरा लगता, यहां नई रोशनी वाला कोई भी तालव्य 'श' का उच्चारण नहीं कर पाता, उनके लिए सभी अंगरेजी 'एस' के समान है। बाजारटोले और चावूटोले के जो लोग निचले तबके के है, वे यार-दोस्तो से मुलाकात होते ही उनको सानन्द सम्भापित करते, क्यो वे स्ला? ध्वनि की प्रतिध्वनि-मी जवाव आता, क्यों रे स्ला एक ओर डर है सीताराम को । डर के साथ नफरत भी है। यहाँ लग- भग सभी शराब पीते हैं, प्रवीण लोग तांत्रिक मतानुमार उसे कारणवारि बना लेते हैं और नयीन लोग अपने-अपने अड्डों पर इज्जत बनाये रखकर पीते हैं। कुछ नियमित पियक्कड़ ऐसे हैं जो दुकान की शराब पीकर रास्ते पर हो-हल्ला मचाते हैं, आस्तीन समेट कर गुंडई भी करते हैं, लेकिन छुरा-चक्र चलाने की हिम्मत नहीं करते, कोई निरीह मिल जाये तो कोई-न-कोई कसूर निकालकर बड़ी बहादुरी के साथ दो-चार घूमा-लप्पड़ रसीद कर ही देते हैं। रत्नहाटा में प्रवेश कर गांव के नुक्कड़ पर सीताराम एकवार ठिठक कर सड़ा हो गया । सामने ही मणिलालबाबू का घर है। मणिलालबाबू कचहरी के बरामदे पर खड़े मूछो पर ताव दे रहे हैं । उनके छोटे भाई महीन अद्धी का कुरता पहने एक बाइसिकल की सीट पर कोहनी रखे पड़े हैं, कही जाने से पूर्व शायद दादा से कुछ कह रहे हैं । कन्हाई राय बोले, क्यों, खडे क्यों हो गये ? सीताराम ने पीछे पलट कर एक बार अपने गांव की ओर देखा । ताड़, शिरीप, आम और बंसवारी के घने घिराव के बीच वह विलुप्त हो गया है । कन्हाई राय ने फिर कहा, चलो । सीताराम ने फिर अपने को मयत और दृढ़ बना लिया और कहा, चलिए। मणिलात बाबू की कचहरी के सामने आकर उसका दिल धड़कने लगा। मणिलाल बाबू को यहा सभी लोग 'जरनली' कहते है। बातचीत, चालढाल आदि मभी बातों में वे विशिष्ट हैं । मीताराम को अपने बाप का उपदेश याद आया। इसके अलावा कान्हाईराय ने पहले ही झुककर नमस्कार की मुद्रा में उनको प्रणाम किया, सीताराम ने भी अनुरूप ढंग से प्रणाम किया । सीताराम २२:: संदीपन पाठशाला.. वह जा रहा है । वहीं उसे रहना है । भय वह नहीं करता। किसका भय, कैसा भय ? अन्याय वह करेगा नहीं, किसी का अन्याय वह सहेगा भी नहीं । फिर भी जाने कैसा लग रहा है ! सूटकेस हाथ में लेकर वह खेतों की पगडण्डी से रत्नहाटा की ओर बढ़ पला। D दो us •. बहुत बड़ा सम्पन्न गांव । आधा शहर । दोनों तरफ से ही-~भीतरी और बाहरी दोनों रूपों में ही । सीताराम का ताऊजाद भाई किशोर कृष्ण एम० ए० में पढ़ता है। रत्नहाटा का जिक्र होते ही वह तिरछे ढंग से बोलने लगते, रत्नहाटा की तुलना केवल देहाती कलकतिया कालेजी लड़के के साथ हो सकती हालाँकि विल्कुल हाल ही के नहीं और न पक्के-पौढ़े-यह समझ लो जो फर्स्ट इयर पास कर सेकंड इयर में आ गया हो : घर की माली हालत अच्छी है, नियमित रूप से रुपये आते हैं । पन्द्रहवें दिन बाल कटाता है, हर दूसरे दिन हजामत बनवाता है लेकिन अब भी सेलून में दाखिल नहीं हो पाता। रेस्त्रां में चाय-टोस्ट, आमलेट खाता है लेकिन फार्पो या अन्य किसी साहवी होटल में नहीं जाता, डरता भी है और रुचि भी आड़े आती है; कविता नहीं लिखता, काव्यचर्चा करता है, योरोपीय लेखकों तथा पुस्तकों के नाम रट रखे हैं, लेकिन कितावें पढ़ी नहीं, बड़ी कठिन लगती हैं । राजनीति पर बहस करता है, वन्दे- मातरम् से लेकर इन्कलाब जिन्दाबाद तक, सभी बोलियां तोता रटन्तु-सा बोलता रहता है। कालेज-अधिकारियों के साथ हुए हंगामे में हुजूम के पीछे रहता, साथ भी । लेकिन हड़ताल होने पर कालेज में चोरी-छिपे आ जाता है। पोशाक फैशन माफिक लेकिन इस्तरी वेढंगेपन से की हुई । कृष्ण किशोर खुद कट्टर हिन्दू है, बहुत बड़ी चुटिया रखता है । इसलिए उसके मुंह ये बातें बड़ी अच्छी लगतीं। यहां सव-रजिस्ट्री दफ्तर है, पोस्ट आफिस, थाना है, यहाँ तक कि एक सर्कल डिप्टी ने भी यहाँ अपना हेडक्वार्टर खोल रखा है। स्कूल, वोडिंग, गर्ल्स यू० पी० स्कूल है, लायब्रेरी है, अमेचर थियेटर है, महिला-समिति है, यहाँ तक कि साहित्य-सभा भी है यहाँ पर । फुटबाल मैच खेलने के लिए एक कप तक है. किसी भद्र सन्तान ने स्कूल के दिवंगत बंगला-साहित्य-शिक्षक के स्मृति- रक्षार्थ दान किया है। प्रवीण लोग तम्बाकू पीते, नये जमाने के वायू लोग सिगरेट । सभी के पास कुछ देवदत्त सम्पत्ति है। लेकिन युवकों में प्रायः सभी मूर्ति-पूजा के विरोधी हैं । यात्रा करते समय सभी दही का टीका लगाकर घर संदीपन पाठशाला:::२३ से निकलते हैं किन्तु बाहर आते ही सबसे पहले जेब से रूमाल निकालकर टीका पोंछ डालते हैं । नये जमाने की लड़कियों और बहुओं में प्रायः सभी के पास जूते हैं लेकिन गांव में कोई भी पहनती नहीं, कही जाना हो तो कागज में सपेट कर स्टेशन पहुँचने के बाद ही पहनती है। प्रवीण वावू लोग सीधे गाली देते हैं, साला, हरामजादा, बदमाश, वदनात कहकर; नये बाबू लोग अंगरेजी में गाली देते हैं, 'डैम, स्वाइन' कहकर । वात- यात मे कह देते, नानसेन्स । किशोर की बातें सुनकर सीताराम को कौतुक या बोध हुआ और सुशी भी हुई। लेकिन उसने कभी इन सारी बातो को विवे- चना के साथ देखा-परवा नहीं । उसको खुद ही बुरा लगता, यहां नई रोशनी वाला कोई भी तालव्य 'श' का उच्चारण नहीं कर पाता, उनके लिए सभी अगरेजी 'एस' के समान है । बाजारटोले और बाबूटोले के जो लोग निचले तबके के हैं, वे यार-दोस्तो से मुताकात होते ही उनको सानन्द सम्भापित करते, क्यों में स्ला? ध्वनि की प्रतिध्वनि-सी जवाव आता, क्यो रे स्ला? एक और डर है सीताराम को । डर के साथ नफरत भी है। यहां लग- भग सभी शराब पीते हैं, प्रवीण लोग तात्रिक मतानुसार उसे कारणवारि बना लेते हैं और नवीन लोग अपने-अपने अड्डों पर इज्जत बनाये रखकर पीते है। कुछ नियमित पियक्कड़ ऐसे हैं जो दुकान की शराब पीकर रास्ते पर हो-हल्ला मचाते हैं, आस्तीन समेट कर गुडई भी करते हैं, लेकिन छुरा-चपकू चलाने की हिम्मत नहीं करते, कोई निरीह मिल जाये तो कोई-न-कोई कसूर निकालकर बड़ी बहादुरी के साथ दो-चार घूसा-लप्पड़ रसीद कर ही देते हैं। रत्नहाटा में प्रवेश कर गाव के नुक्कड पर सीताराम एकवार ठिठक कर खड़ा हो गया। सामने ही मणिलालबाबू का घर है। मणिलालबाबू कचहरी के बरामदे पर सड़े मूंछो पर ताव दे रहे हैं । उनके छोटे भाई महीन अद्धी का कुरता पहने एक बाइसिकल की सीट पर कोहनी रखे खडे हैं, कही जाने से पूर्व शायद दादा से कुछ कह रहे हैं। कन्हाई राय बोले, क्यों, खड़े क्यों हो गये ? सीताराम ने पीछे पलट कर एक बार अपने गाव की ओर देखा । ताड़, शिरीप, आम और वंसवारी के धने घिराव के वीच वह विलुप्त हो गया है। कन्हाई राय ने फिर कहा, चलो। सीताराम ने फिर अपने को सयत और दृढ बना लिया और कहा, चलिए। मणिलाल बाबू की कचहरी के सामने आकर उसका दिल धड़कने लगा। मणिलाल बाबू को यहां सभी लोग 'जरनलो' कहते है। बातचीत, चालढाल आदि मभी बातों में वे विशिष्ट हैं । सीताराम को माने वाप का उपदेश याद भाया। इसके अलावा कन्हाईराय ने पहले ही झुककर नमस्कार की उनको प्रणाम किया, सीताराम ने भी अनुरूप ढग से प्रगाम किया। श्री' २४:: संदीपन पाठशाला का भाग्य है कि मणिलाल ने इनके प्रणाम को तवज्जो नहीं दिया। वे मणि- वावू की कचहरी पार कर गये । लेकिन थोड़ा-सा बढ़ते ही मणिलाल वाबू के छोटे भाई ने पुकारा, अजी कन्हाई राय ! जी। कन्हाई पलटा। सीताराम वहीं खड़ा रहा। कुछ देर बातचीत के बाद कन्हाई ने पुकारा, सीताराम, सुनो, बाबू बुला रहे हैं। सीताराम आकर खड़ा हो गया। तीखी नजरों से उसको सिर से पैर तक देखकर मणिलालबाबू बोले, रमा- नाथ मुखिया के बेटे हो तुम ? नार्मल पास किया है ? वाह ! क्या नाम है ? तुम्हारा? सीताराम ने सविनय कहा, जी, मेरा नाम है सीताराम पाल । मणिलाल बाबू बोले, वाह ! बहुत खूब ! नार्मल पास किया है तुमने ! बड़ा अच्छा है। वावुओं के बेटों को पढ़ाओगे ? बहुत खूब ! तुम लोगों में पढ़ाई की बड़ी लहर उठी है न ? सीताराम खामोश रहा। मणिवावू के छोटे भाई ने कहा, हाँ, इसका एक ताऊजाद भाई किशोरकृष्ण पाल वी० ए० पास कर एम. ए. और ला पढ़ रहा है, किशोर का एक और भाई इस बार मैट्रिक देगा । वह लड़का भी अच्छा हैं। मणिलाल बाबू बोले, वाह बहुत खूब ! म्लेच्छ-विद्या में तो ब्राम्हण-सूद्र का कोई भेद नहीं, सभी को अधिकार है। तुम लोग पढ़ी-लिखो, आदमी बनो। तुम्हारी जाति की एक बदनामी है कि मूरख होते हैं, इस वदनामी को दूर करो तुम लोग। . एक अदम्य उच्छ्वास से सीताराम का दिल भर उठा । आंखों में आंसू आ गये । उसने तीखे श्लेपपूर्ण आचरण की प्रत्याशा की थी। ऐसे सस्नेह आचरण, ऐसी अकृपण प्रशंसा की उसने प्रत्याशा नहीं की थी। उस अप्रत्याशित उदार बरताव से सीताराम का दिल भावविह्वल हो उठा। वह अपने को संभाल न सका, झुककर मणिलाल बाबू के पैर छूकर उसने प्रणाम किया। मणिलाल बाबू के मुख पर अभिजातसुलभ मुस्कान खिल आई थी लेकिन अचानक ही वे चौंक पड़े, बोले, तुम रो रहे हो? सीताराम की आंखों में आंसू आ गये थे, वही आंसू उनके पैरों पर ढुलक पड़े हैं। गर्म सजल स्पर्श से अनुमान कर लेना मणिलालबाबू जैसे विलक्षण व्यक्ति के लिए कठिन नहीं हुआ। सीताराम झेंपकर मुस्काया और आँखें पोंछ वोला, जी नहीं। उसके बाद ही उसने मणिवाबू के छोटे भाई को नमस्कार किया। मणिलाल बाबू उसके दिल की उछाह को भांप गये थे । उनको भी कुछ अच्छा ही लगा और इस उछाह के स्पर्श से उनमें भी शायद कुछ भावस्पंदन - " संदीपन पाठशाला :: २५ जाग्रत हो उठा । उन्होने कहा, हमारे गाव में स्कूल है-भद्रसोगो का गांव है लेकिन ब्राहाणों के लड़के, हमारे बेटे पढ़ते-लिखते नहीं। स्कूल बनने के बाद दो लड़के बी. ए. पास कर चुके हैं, और कोई भी एंट्रान्स तक पाम नहीं कर सका। पेर, तुम लोग मीखो, तुम लोग बड़े होको । यकायक सीताराम हाय जोड़कर बोल पड़ा, मैंने नामल पास किया है यह आपसे किसने बताया, यह मुझे नहीं मालूम, लेकिन मैंने दो बार परीक्षा दी है, पास नही कर सका हूं। मणिलालबाबू अब विस्मित हुए। सीताराम ने कहा, तो अब मैं जाऊ मणिलालबायू बोले, तुहारा कल्याण होगा। बाद में मुझे मिलना। । . सीताराम भाग्य में विश्वास करता है। सभी सुख और दुस के नियन्ता के रूप में उससे भय भी करता है, भक्ति भी । अपने भाग्य को वह वारम्वार प्रणाम करता है । आज के दिन के लिए इतनी तृप्ति, इतना आश्वासन, इतना आनन्द उसने संचित कर रखा था। मणिलालवावू का यह आशीर्वाद और स्नेहपूर्ण वरताव ही सबकुछ नही, उसे और भी कुछ मिला। अपने कर्मस्थल, जमीदार भवन मे आकर लडको के पढ़ने के कमरे में उसने अपना मूटकेस रखा । यह कचहरी उसने इससे पूर्व भी देखी है । पहले भी वह यहां आया है । तब जमीदार बाबू जीवित थे। वे बड़े गम्भीर और भयंकर प्रकृति के थे। प्रताप और प्रतिष्ठा में वे मणिलालबाबू के समकक्ष तो थे ही, तिस पर अपने महज सत्य आचरण और स्पष्टवादिता के कारण सभी के आदरणीय भी थे। विषयो व्यक्ति थे किन्तु कुटिलपंपा के पक्ष- पाती नहीं थे। विरोध ठन जाने पर वे जो कुछ करते कह-सुन कर करते थे और अन्याय चाहे किमी का भी हो और कही का भी हो, प्रतिवाद करते थे। सीताराम में एक बात बड़े गहरे मे रेखांकित है । यहाँ यह कल हुआ था, इस गांव के और थाने के सामने । पुलिस ने सन्देवश इसी गाव के दो भद सन्तानो को गिरफ्तार किया। भद्र सन्तानो में जो लोग शराब पीकर गुडई की भेडेती कर अपने कोषौफनाक रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते है, उन्ही में अमूल्य और भूपति को इस सिलसिले में पुलिस साहब ने पकड़ा और गांव के समाजपतियो को बुलवाकर इन लोगों के चरित्र के बारे में राय जानना चाही । इस घर के मालिक को भी बुलाया था। पूछा था, अमूल्य और भूपति इन दोनों को आप जानते हैं ? मे लोग शराब पीते हैं ? मालिक ने जवाब दिया था, हां जानता है। दोनों ही गांव के रिप्ते मेरे नातेदार है और शराब पीते हैं। यया ये भयानक प्रकृति के हैं ? भयानक प्रकृति कहने से आपका तात्पर्य क्या है, : । के मन २६ :: संदीपन पाठशाला ठोक । लेकिन शराब पीकर वे चिल्लाते हैं, डोंग हाँकते हैं, शायद एकाध वेगुनाह को एकाघ पूंसा भी जड़ देते हैं । इसको क्या आप भयानक प्रकृति के नहीं कहते ? शराब पीते, चिल्लाते, लोगों को मारते-पीटते? मालिक ने जवाब दिया था, सुनिए साहब, शराव बहुत सारे लोग पीते हैं, मैं भी पीता हूं, शायद आप भी पीते हों; इसलिए शराव पीने से ही कोई भयानक प्रकृति का नहीं बन जाता । शराब पीते ही उसको एक क्रिया होने लगती है। कोई चीखता-चिल्लाता है, कोई रास्ते पर पड़ा रहता, कोई सावधानी से इज्जत वचाकर घर में रहता है । साधू लोग उसी को कारण बनाकर भगवान के नाम का जप करते हैं, काली की साधना करते हैं। ये लोग शोरगुल मचाते हैं, शराब पीकर फिर कभी सड़क पर भी पड़े रहते हैं लेकिन जिस अर्थ में आप उनको भयानक प्रकृति के कह रहे हैं, उस प्रकृति के वे नहीं हैं। जो सन्देह आप कर रहे हैं वह उनके द्वारा सम्भव नहीं। साहब ने आश्चर्य से उनके मुख की ओर देखा था। मालिक ने फिर हँसकर कहा था, वे शराब पीकर डींग हाँकते हैं, लोगों को मारते-पीटते भी हैं और इसी से अगर वे भयानक प्रकृति के बन जाते हैं साहब, तो एक वात और भी बता दूं साहब, शराब पीकर दूसरे के कष्ट पर उनको रोते भी मैंने देखा है। इन अपनी आँखों से कई बार देखा है। एक बार यहाँ के एक महान व्यक्ति की सख्त धीमारी के समय, मैंने देखा है, वे दोनों ही शराब पीकर भगवान को पुकारते कह रहे हैं, भगवान हमारी आयु लेकर इस महान व्यक्ति को जिला दो । तो क्या आपके तर्क के अनुसार वे महान व्यक्ति नहीं हैं ? इसी घटना की स्मृति में ही इस घर के मालिक सीताराम के मन में जीवित है। श्रद्धा और भय ये दोनों मिलकर उसे इस घर के सम्बन्ध में विह्वल बनाये हुए हैं। सीताराम की धारणा है कि इस घर के लड़कों के खून में प्रचंड दम्भ को एक धारा है। उसने सुना है, नाबालिगों के राज्य में, वड़ा लड़का बड़े ही उम्र स्वभाव का है। सीताराम का सौभाग्य है कि उसको पढ़ाना नहीं पड़ेगा, वह फर्स्ट क्लास में पढ़ता है। पढ़ाना है दो छोटे लड़कों को । लेकिन उनमें भी तो वही खून है । इस घर की मालकिन जब रानी माँ हैं । वे ही सीताराम की सहारा हैं । सुना है वे बड़ी नेक हैं। सूटकेस रखकर कमरे पर उसने एक बार अपनी नजर दौड़ायी। काफी साफ-सुथरा मझोले बाकार का कमरा । असवाब में केवल एक तस्तपोश बोर एक पुराने जमाने की मेज । कन्हाई राय ने कहा, इस कमरे में तुम रहोगे । अव चलो, मुंह-हाथ धो लो, राती मां को प्रणाम करने जाना है। कचहरी से सटा हुना एक बड़ा-सा तालाव है, पानी भी अच्छा है, पक्का वना घाट है । यह तालाव भी वायुओं का है । सबकुछ मिलाकर सीताराम को - संदीपन पाठशाला :: २७ यह स्थान अच्छा हो लगा। मकान के भीतर प्रवेश करने मे दो दरवाजे पार करने पड़ते हैं। दोनों दरवाजों के बीच में जो जगह है यहाँ खडे घर के भीतर की बातें सुनाई पड़ती है किन्नु कुछ दिखाई नहीं पड़ता। घर के भीतर मे एक शोरगुल-सा सुनाई पडा । कन्हाई राय टिठक कर खड़ा हो गया, हुआ क्या ? प्रश्न मानो उमने अपने से हो किया, धीमी और डरी हुई आवाज़ सीताराम को मुनाई पड़ा, पर के भीतर बचकानी आवाज में कोई कह रहा है, मैं चोर नहीं है और न मैं चोरी करने गया था। फुटबाल खेलकर घर लौट रहा था, देखा, उस मुहल्ले के छक, कड़ि और भी कई लडके खेत में शाम के अन्धेरे में मूली और वैगन तोड रहे हैं । मैंने पूछा तो छक ने कहा, हम नोग रात को फोस्ट करेंगे इमलिए तरकारो चुरा रहे है । मैंने भी उन लोगो को कुछ भालू सोदकर दे दिये। नारी-कंठ की आवाज सुनाई पड़ी, क्यों दिये ? जवाव मिला, उनकी सहायता की । और चोरी कभी को नहीं थी, देखा, चोरी करने में कैसा लगता नारी-गांठ ध्यनित हो उठा, लेकिन वह किमान अगर तुमको देख न लेता तो सवेरे उठकर वेशक गाली देता, किस गूखोर के बेटे ने, किस हरामजादे ने मेरा मूली-बैगन चुराया है । तब यह गाली तुम्हारे मरे वाप पर जा लगती। गाती अगर वह देता तो उसका कोई कसूर नहीं ! इस बरसात में वक्त उसने कितनी मेहनत से मूली-वैगन उगाया है । किसी पुरुष-कण्ठ की भारी आवाज सुनाई पडी, रह्न भी दीजिए माँ ! बच्चा है, कर डाला है। बच्चा मत कहिए नायव जी उमे, फस्ट क्लाम पढ रहा है, सोलह माल का हो गया है, बच्चा करो है ? कन्हाई राय सकपका-सा गया था। सीताराम की मौजूदगी को शायद भुलाकर ही वह बोल पड़ा, रानी मां बड़े बाबू को हाट रही हैं । बचकानी आवाज सुनाई पड़ी अब । मीताराम समझ गया कि यह उग्र स्व- भाव वाला बड़ा बेटा है । सीताराम सिहर उठा, इस लड़के ने अनायास कह दिया, चोरी करने में कसा लगता है, देख रहा था। इस बार वह क्या उत्तर देगा, गुनने के लिए सीताराम उद्ग्रोव हो उठा । लड़का कह रहा है, उसने सुना, हाँ, मुझसे बेजा काम हो गया है इसके लिए मैं उससे क्षमा माग ले रहा हूँ। इसके बाद ही उसने किमी और को सम्बोधित करते हुए कहा, मैंने दोष किया है, इसके लिए मैं तुमसे क्षमा मांग रहा हूं। घबरायी आवाज में शायद उस किसान ने कहा, जी बावू ! जी वायू ! जी नहीं । मुझसे बाप कहते तो मैं ही खेत से तोड़कर आपको दे देत रानी मां ने फिर कहा, नायब जी, इम आदमी को पाच सेर, २८ :: संदीपन पाठशाला बाजारदर का दाम चुका दीजिएगा। और यह दाम धीरा के नाश्ते के पैसे में से काट लीजिएगा। सीताराम विस्मय से अभिभूत हो गया। कहाँ मा पड़ा वह ! इनकी यह ध्यान-धारणा, यह रीति-नीति उसके लिए केवल विस्मयकर ही नहीं बल्कि उसे एक प्रकार के घुटन का भी अनुभव होने लगा। सिर्फ इतना ही नहीं, उसे लग रहा है, इसमें ऐसा कुछ निहित है जो इशारे से उस पर शासन कर रहा है। वह मानों बहुत छोटा हो गया। नायव जी का गला सुनाई पड़ा, आमओ जी आओ। पैछट सुनाई पड़ने लगी, लम्हेभर में कन्हाई सचेतन हो उठा, ऐसे छिप- कर वातें सुनने का वह आदी है। उसने गला खंखार कर अपने आने की सूचना देते हुए कहा, आओ आओ। यह तो तुम्हारे जमींदार की ही कोठी है, अपना ही घर है । आमओ, सकुचाते क्यों हो? नायव जी निकल आए, साथ में एक नीची जाति का किसान । सीताराम समझ गया, इसी के खेत से इस घर के बड़े लड़के ने आलू चुराया है, देख रहा था कि चोरी करने में कैसा लगता है। कन्हाई ने नायव जी से कहा, यह आपके-हमारे रमानाथ दादा का वेटा है, सीताराम । मां के पास ले जाऊँ ? नायव के कुछ कहने से पूर्व ही रानी मां निकल आई, नायव जी, उस आदमी से आप कुछ न कहें। उसने मुझसे शिकायत नहीं की। मुझे दूसरे आदमी की मार्फत इत्तला मिली थी। जिसने उनको आलू खोदते देखा है, उसी ने आकर मुझे बताया है। माँ की बात खत्म होते ही कन्हाई वोल पड़ा, सीताराम आ गया है मां। यह है सीताराम ? आओ, आओ बेटा, घर के भीतर आओ। सीताराम अचरज से इस मां को देख रहा था। देहवर्ण की दीप्ति से ही उनके अवयव की सारी विशेपताएं मानो ढक गयी थीं। न देखने पर विश्वास नहीं होता, कृशकाया दीप्तगौरवर्ण मध्यवय की इस मां को देखने पर लगता मानो एक ज्वलन्त शिखा हो । आँखें बड़ी नहीं, छोटी हैं। लेकिन देह-दीप्ति से सामंजस्य रखती हुई प्रखर दो आँखें। वस कंठस्वर कुछ विपरीत है- मधुर । सीताराम को उनके कंठस्वर से अभय मिला । उसने झटपट आगे बढ़ कर प्रणाम किया। - - । रानी मां नहीं, मां । सीताराम को लगा, रानी मां से वे कहीं अधिक बड़ी है-केवल माँ है। मां ने कहा, सीताराम को बैठने का आसन दो। मकान के भीतर प्रवेश करते ही सबसे पहले सीताराम ने उस उग्र और विचिन्न स्वभाव वाले बड़े बेटे को खोजा था। कहाँ है वह ? उसकी उग्र प्रकृति के बारे में उसने कानों से सुना था, इसके बाद अपने कानों उसकी अद्भुत बातें संदीपन पाठशाला ::२६ मुनकर उसके कौतूहल गौर शंका की कोई सीमा नही रही । अकूत शंकाभरा कौतूहल ! "चोरी करने में कैसा लगता है, यह देखा"। यह कैसा लड़का है ? कहाँ है वह ? लेकिन वह नहीं है, शायद ऊपर चला गया है । इसी बीच अचा- नक आसन की बात सुनकर वह चौंक-सा पड़ा, शासन की प्रत्याशा उसने नहीं की थी। इसके लिए वह तैयार नहीं था। वह चंचल हो उठा, हाथ-पैरो से पसीना छूटने लगा । आत्मसंवरण कर उसने लज्जित हो संकोच से कहा, नही, नही मां ! आसन किस लिए ? आसन नहीं चाहिए। आपके सामने- उसके मुंह की वात छीनकर कन्हाई राय बोल पड़ा, ठीक बात है मा, आपके सामने हम लोग क्या आसन पर बैठ सकते हैं ? आप ही का दिया खाकर जिन्दा है, फिर आपकी प्रजा भी तो हैं । माईसी, अनोसे स्नेहमधुर स्वर में प्रतिवाद करती हुई बोली, नहीं, नहीं राय, इस घर में सीताराम आज श्यामू-देवू का शिक्षा-गुरु बन कर आया है । इस घर में अन्न भी हम दया करके नहीं देंगे, वे ही दया कर ग्रहण करेंगे। जमीदार-प्रका का रिश्ता मला है। सीताराम, आसन पर उठ कर बैठो, बेटा। सीताराम के मन में एक अजीब-मी उथल-पुथल मच गयी। उसका कोई स्पष्ट रूप नहीं, लेकिन एक थावेश है। उस आवेश ने उसको एक मर्यादामयी प्रेरणा से प्रेरित किया; उसके संकोच को दूर कर दिया । वह आसन खीच कर बैठ गया। मां चली गयी, बोली बैठो, मैं अभी आयी। इतनी देर मे सीताराम ने कोठी की ओर देखा। जमीदार होने पर भी छोटा जमीदार है, धनी नहीं कहा जा सकता, सम्भ्रान्त गृहस्थ हैं, घरद्वार भी उसी के अनुरूप । कुछ हिस्सा पक्का है तो कुछ मिट्टी का बना । मिट्टी के बने होने पर भी दालान पक्का-सा ही लगता । खम्बेवाले बरामदे, पक्की फर्श, मिट्टी के सलोतर पलस्तर के ऊपर पक्के मकान जैसी सफेदी की हुई; आँगन- चबूतरा सभी पक्के । कन्हाई ने हंसकर किसी से कहा, आओ देवूदादा, तुम्हारे मास्टर जी हैं । आओ। । सीताराम की निगाह पड़ी, सामने वरामदे में एक खम्वे की आड़ से खूष- सूरत-सा एक चेहरा झांक रहा है । उमकी आँखो से आँखें टकराते ही उसने फिक्क से मुस्करा कर मुख छिपा लिया। सीताराम ने उसे सस्नेह पुकारा, आओ खोकाबाबू, आओ। ऐन ऐसे ही वक्त मां आकर खड़ी हो गयी । अपने हाथों एक तश्तरी मे दो मिठाई लेकर आई है-मलाई के दो लड्डू, एक गिलास पानी । उतार कर उन्होने कहा, तुम उन लोगो को 'बाबू' मत कहना बेटा! फिर बोली, लो, पानी पी लो ! पहली बार आए हो, कर लो। वह जरा मधु रखा है, उसी को पहले ले लो।।

१०:: संदीपन पाठशाला सीताराम को अब दिखाई पड़ा, एक ओर जरा-सा शहद है। विना किसी संकोच के उसने तश्तरी उठा ली। मधु चाट लेने के बाद उसने एक मिठाई उठा ली। दुकान की बनी नहीं, घर में बनाई हुई। ऐसी बेहत- रोन मिठाई सीताराम ने कभी खाई नहीं थी। मुंह में रखकर लीलने की मानो इच्छा नहीं हो रही थी, खाने से ही तो खत्म हो जायगी, वस एक ही तो - बची है। - - मां ने इसी बीच बेटे को लाकर सीताराम के सामने खड़ा कर दिया। तुम्हारे मास्टर जी, नमस्कार करो। बच्चे को माँ का रंग मिला है, मुखड़ा भी बड़ा गधुर-सा है, वरा आँखें ही बड़ी प्रखर और चंचल है और शरीर बड़ा हल्का-सा, दुबला ही लगता है । वह मुस्करा रहा था, उस मुस्कान में उसकी चंचल प्रकृति का परिचय उभरा आ रहा है, मानो फूलों की कलियों के हरे आवरण के अन्तराल में उनकी मुंदी पपड़ियों के भीतर के रंग का आभास हो। आँखों से आँखें मिलते ही आंखें झुकाये ले रहा है। उससे मुस्कान और भी स्पष्ट होती जा रही है। मां ने फिर कहा, नमस्कार करो। लड़के ने एकवार चट फुरती से सीताराम के पैर से हाथ लगा अपने माथे से छुवाया। सीताराम सकपका कर बोल पड़ा, नहीं-नहीं। मुझे इस प्रकार से प्रणाम नहीं करना चाहिए । नमस्कार करना चाहिए। मां ने हँसकर कहा, करने दो। उनका प्रणाम लेने पर तुम्हें कोई दोप नहीं लगेगा। - ! सीताराम बोला, क्या नाम है तुम्हारा ? लड़का आदतन नीरव मुस्कराने लगा। माँ बोली, बताओ, अपना नाम बताओ। सिरी देवानन्द मुखोपाध्याय । वाह ! बड़ा अच्छा नाम है, वैसा ही अच्छा लड़का भी। माँ ने हंसकर कहा, अच्छा वह कतई नहीं । बड़ा ही नटखट है। इसको लेकर तुमको जरा परेशानी होगी । लेकिन श्यामू कहाँ गया? श्यामू ! श्यामू! ऊपर के किसी कमरे से आवाज़ आई, यहां हूं मैं। क्या कर रहे हो ? नीचे आओ। जवाब आया, दादा मुझे कैद में रख गये हैं। माँ ने कहा, कोई बात नहीं, तुम्हारे मास्टर आए हैं, नीचे आओ। दादा जब तक रिहा नहीं करते, कैसे आऊँ? दादा से बताओ। धीरा! दादा हैं नहीं। तो मैं तुम्हें रिहा कर रही हूं। मैं माँ हूँ, दादा की भी गुरुजन हूँ। मेरे - संदीपन पाठशाला : ३१ रिहाई कर देने पर दादा कुछ नहीं कहेगा। अब दुमंजिले से एक गात-आठ साल का लडका निकत माया । इस लड़के का रंग सांवला है, नाक-नक्शे अच्छे, पर जरा गम्भीर । मा ने कहा, तुम्हारे मास्टर जी हैं, नमस्कार करो। लड़के ने दोनो हाथ उठाकर वडे ही सुन्दर ढग से नमस्कार किया। कोई जड़ता नही, चचलता नहीं, धीर और स्वच्छन्द भगिमा में नमस्कार किया। मां ने कहा, यह बड़ा धीर और शान्त है । वातें कम करता है। सीताराम ने उसे पास खींच लिया। बोला, क्या नाम है तुम्हारा ? श्री श्यामानन्द मुखोपाध्याय । क्या पढ़ते हो? श्यामू बोलता गया, सरल वंगला पाठ,प्रयम भाग, महज गणित, शिशु भूगोल पाठ, इतिहास की कहानियां प्रथम भाग, सचिन लिखनप्रणाती, और दादा ने पढ़ने को दिया है श्रीयुक्त रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 'कथा ओ काहिनी।' अरे बाप रे, तुम तो बहुत सारी कितायें पढते हो ! श्यामू नै निसंकोच स्वीकारा, जी हाँ। वाह, बहुत अच्छे लड़के हो ! छोटा देवानन्द शायद दादा का समादर देखकर ईर्ष्यातुर हो गया था। वह अब आगे बढ़कर बोला, मैं भी कविता जानता हूँ, बोल सकता है। बताऊँ ?- कह कर ही उसने शुरू कर दिया, राम्गति को प्रतीक्षा नहीं की, हाथ-पैर हिला- कर बड़े मजे में बोलने लगा- "नामटी यामार गडाढर, सवाइ बले गडा, सारा डिनटा रोदे टो-टो गाये धूलो काडा, डाडा बलले, गाढा तुई-लिखवि पड़वि ने ? अमनि मामि केंडे दिलेम-ए-ए-ए-ए।" आँखो पर हाथ रस ए-ए कर रोने वा बेहतरीन अभिनय उसने किया। उसका वह हावभाव देखकर सीताराम और सभी हंसने लगे। और भी उत्मा- हित हो देवू कविता-पाठ करता रहा- डीडी बलले- ना ना ना, तुमि भालो छेले, सोना मानिक एस सानिक-हाडुडुडु खेले । कहकर ही 'चल मारा चल कबड्डी, कवड्डी' कहते हुए सपक कर घर से निकल गया। मां ने श्यामू से कहा, तुम कुछ सुना दो। देवू की सफलता से श्यामू उत्साहित हो उठा था। सीताराम के पास से जरा दूर सरक कर वह खड़ा हो गया, एक नमस्कार दिया, फिर बोला, कवि- गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रार्थनातीत दान- "पाठानेरा जवे बांधिया आनिल वन्दी शिरोर दल ३२: : संदीपन पाठशाला सुहिदगंजे रक्तवरण हइल धरणीतल।" सीताराम दंग रह गया। स्पष्ट उच्चारण, कवितापाठ में कहीं कोई छन्द- पतन नहीं, युक्ताक्षरों पर जोर डाल उच्चारण-कौशल से दो अक्षरों की क्रिया को लाकर सुन्दर पाठ करता जा रहा है। ऐसा कवितापाठ सीताराम स्वयं नहीं कर पाता । और कविता भी कितनी सुन्दर है ! नार्मल स्कूल में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविताएँ पढ़ाई नहीं जातीं । यहाँ के स्कूल में जव वह पढ़ता था तव भी पढ़ाई नहीं जाती थीं। उनको नोवेल प्राइज़ मिला है, यह सीताराम जानता है। लेकिन उनकी कविताएं खास कुछ उसने पढ़ी नहीं। लेकिन यह छोटा-सा लड़का ! श्यामू ने अपना कवितापाठ समाप्त किया- "तरुसिंह कहे, करुणा तोमार हृदये रहिल गांथा जा चेयेछ तार वेशी किछु देव, वेणीर संगे माथा।" फिर उसने बताया, सिक्खों के लिए वेणी का कटना धर्मपरित्याग के समान दुपणीय है। यह तथ्य भी सीताराम के लिए नया था। वह अचम्भे के मारे हक्का- वक्का बना रह गया है। क्षणभर के लिए उसके मन में आया, इन लोगों को वह कैसे पढ़ाएगा? हंसी मानो माँ के चेहरे पर जन्मजात है, वे हंसकर बोली, धीरा ने इन लोगों को यह सब सिखाया है। धीरानन्द को पहचानते हो न? मेरा बड़ा बेटा ? सीताराम का गला और तालू मानों खुश्क हो गये। परिचय-वैचित्र्य से धीरानन्द उसके तई इस घर के मालिक जी के समान भय और श्रद्धा का पान बन चुका है। लार छुटते हुए उसने कहा, जी नहीं। मां ने पुकारा, धीरा! श्यामू बोला, दादा साहित्य-सभा में लेख देने गया है । माँ ने श्यामू से कहा, जाओ, मास्टरजी को ले जाओ। अकेले कमरे में बैठे वह सोच रहा था। भाग्य ने उसके आज के दिन को विपुल सम्पदा से भर दिया है-रूप और परिमाण में वह सम्पदा विस्मयकारी है। दूसरी ओर भय से उसका दिल सकुचाता जा रहा है। सिमेंट की फर्श पर बैठा था, अचानक ही किसी मकान की पालिश की हुई संगमर्मर की फर्श उसे याद आगयी । हुगली में रहते वक्त एक मशहूर रईस की कोठी देखने जाकर ऐसी फर्श उसने देखी थी, हिमशीतल पिच्छिल प्रकाश छटा से चमचमा रही थी। देखकर उसको जितना विस्मय हुआ था उतना ही भय भी, उस फर्श पर पैर रखने में। गोवर और लाल मिट्टी से पुते हुए गृहांगन में जो सस्नेह अन्तरंगता है, उसके रंचमान का भी पता वहाँ न पाकर वह फर्श उसको अनात्मीय-सी लगी थी। वहाँ वह पैर नहीं रख सका था, अद्भुत एक अनुभूति से अभिभूत हो कुछ देर खड़े रहकर, दरवाजे से ही लौट आया था। यहां के परिचय में से भी उसी संग- संदीपन पाठशाला मर्मरी फर्श की अनात्मीयता मानों उभर आई है। इन लोगों को यह वही मंगे पढ़ायेगा? क्या पर लौट जाये ? जिग तरह उस मगमर्मरी फर्ग के छोर से यह मौर आया पा? नहीं, वैसी इच्छा भी नहीं हो रही है। उमका ताऊजाद भाई रत्नहाटा के बारे में जो बात करता है. देशानुन बर, उसे और जगके गांव के सभी को मानन्द मिनता है, यह पाठ भी पूरी नहीं। इतने दिनों तक वही परिचय मिलता रहा। नेफिन मार और परत परिचय जो उसे मिला उससे व्यंग करने को या उपेसा करने की ठप पड़ गयी है । यह स्नेह, यह समादर उनके लिए दुलन पन्नु है । नानोपनी दुर्लभ वस्तु दे सकते हैं, उनको कैसे यह पुरा रहे ? दे भीमने है.सोने हैं-भले-बुरे मिलकर इन्सान होते हैं, भले भी हैं और सुरेमी-रिटरने, इतने बुरे। बहुत देर तक वह स्तम्घ वैठा रहा । सोचता रहा। नहीं, डर के मारे वह भागेगा नहीं। मद मोग मेरा यह मायने में ना कितने दिन लगे? यहाँ यह बहुत बुध मोम मरेगा। घर में हालांकि मो. भात और मोटे कपड़े की पोई तंगी नहीं, मेरिन या दही मरा. कपडे का अभाव रहने पर-किमान मदगोर का बेटा है मह बीमा नहीं हो सकती थी, रोटी-पपई के लिए दूसरे है गेर दनवासी सरा, अधिया पर हल जोतता होता। या ऐने हो रिरीर बार नौकर का काम करता होता । तादीर बेहतर होती नोरन्हा गरी मिल सकती थी। लेकिन जब मारे प्रकल और गिननी ही बादंदास वह उम हालत से उत्तीर्ण हो सका है, हो मरता है कि मेरी हा मिली हो लेकिन कुछ तो सोखने का मौनाम्प ने मिना ही, टरको जीवन में फिर से लौट जाये? यह जो मान जमीदार की कोठी में, मंत्रालय र irane आसन मिला, उस यामन की उपेसा कर वह कापरला दटार पद? नहीं । नहीं जायगा यह। कुछ देर बाद जाने टम का सहारना, बेद मेमनदिर :- पोग से लगी जो खिड़की है, उसके निर पर नियटि-: 4 बगान्दा याज की तारीत।

३४:: संदीपन पाठशाला ? की कल्पना का देवालय वनाने लगा । वावुओं के घर की इस नौकरी पर रहने से उसका चलेगा नहीं । मासिक चार रुपए में वह जिन्दगी नहीं काट सकता, गिरस्थी है, गिरस्थी बढ़ेगी। इसके अलावा देवू-श्यामू के बड़े होने पर उसका क्या होगा? हालांकि उस बडे लड़के का शायद तब तक व्याह हो. जाय-- शायद बच्चे भी हों । देवू-श्यामू के बाद वह उनको पढ़ा सकेगा। फिर श्यामू की सन्तान होगी, फिर देवू को सन्तान । कल्पना बहुत अधिक मधुर-सी लगी। यह मानो उस कोठी में मौरूसी खत लिखी नौकरी हो-मौल्सी मास्टरी। उससे बेहतर हो अगर वह यहां एक पाठशाला खोल सके ! : पाठशाला की बात उसने कन्हाई राय से की है। कन्हाई राय ने इस कोठी की माँ से बता दी है । मां ने आश्वासन दिया है। वे कोशिश करेंगी। मुहल्ले के ठीक बीचों-बीच उनका चंडीमंडप (चौपाल) है। वहीं पाठशाला के लिए जगह बना देंगी-ऐसा कहा है उन्होंने । लेकिन लेकिन वावुओं के बेटे क्या उसके पास पढ़ने आएँगे? बड़े स्कूल वाली पाठशाला छोड़कर ? सीताराम - ? सोचता रहा। ब्राह्मण जमींदारों के वेटों को लेकर पाठशाला की कल्पना से उसे कोई उम्मीद नहीं बंधती और न चैन ही मिलता। मन अजीब-सी परेशानी से भर उठता है । वनियाटोला, साहाटोला, या कैवर्तपुरवा में पाठशाला होने से बेहतर होगा। उनको वह पढ़ा सकेगा। वे मानों इनसे कहीं अधिक सहज हैं, बहुत सगे। अन्यमनस्क हो पेन्सिल से गोद-गोद कर दीवार पर लिखी ८ थावण की तारीख को मोटा और दागदार बनाने लगा। तीन सात दिन के बाद । आज महीने की पन्द्रह तारीख है। मिट्टी के दिये की रोशनी का मादी आदमी अचानक ही जोरदार बिजली की रोशनी के सामने आ जाये तो उसकी आँखें चौंधिया जाती हैं, आंखों की शिराएं तन्नाने लगती हैं, फिर दो-चार दिन की आदत के बाद ही वह तीव्रता आँखें सह लेती और क्रमशः रोशनी की उज्ज्वलता और मनोहरता ही दृष्टि को आनन्द देती है । उसी प्रकार इन चन्द दिनों के अभ्यास से ही, सीताराम के मन का संकोच और भय क्रमशः घट गये हैं। यहाँ के हालचाल का वह क्रमशः आदी होता जा रहा है । इस घर के लोगो से परिचय हुआ है, वे अच्छे भी लग रहे : हैं। इस कोठी में प्रवेश करते ही जो उसे सबसे अधिक विस्मयकर और भय का गंदीपन पाटगाला::३५ । पान लगा था, जिसके उन स्वभाव को शोहरत उगने बाहर मे ही गुन रखी थी और घर में प्रवेश के मुख पर ही 'देखा, चोरी करने में कंगा नगना है' बद विचित्र विस्मयकर उक्ति सुनी थी, इस घर के उस बड़े लड़के के माय भी उसका अच्छा खागा परिचय हो चुका है । प्रथम परिचय के ममय ही वह सबसे अधिक आश्चर्यचकित हुआ था और अब भी मन-ही-मन वही मबसे पाश्चर्यजनक व्यापार बना हुआ है । उमके माध परिचय हुमा बड़े महज ढंग मे, राह चलते ववत हमराही के साथ जैसे सहज ढंग से परिचय हो जाता है उतने ही सहज दंग से । आश्चर्य है! उसी पहले ही दिन शाम को धीरानन्द से भेंट हुई। विल्कुल मझले भाई जैमा ही चेहरा-मोहरा। नगे पर, कछाना मारे, धोती और पसीने से तर बनियान पहने, कचहरी के चबूतरे पर चढते ही टिठक कर खड़ा हो गया। सीताराम कमरे में बती जलाकर छानो की प्रतीक्षा में बैठा था । वाहर गोडी मे और कोई नहीं था । धीरानन्द आकर कमरे के सामने खड़ा हो गया। भाप ही नए मास्टर जी हैं ? मँझले मे घनिष्ट सादृश्य देख उसयो पहचानने मे सीताराम को देर न लगी। वह झटपट उठकर खड़ा हो गया, वोला, जी हा । समझ में नही आया, प्रगाम करे या नमस्कार --क्या करना चाहिए ? आपकी वत्ती जरा ले लू ' फुटबाल खेलकर आया हूँ, जरा हाथ-पैर धो लूं । चलिए, मैं ही बत्ती दिखाता हूँ । घाट पर हाथ-पैर घोफर धीरा बोला, नो फिर घर की गली में भी तनिक रोशनी दिखा दीजिए, हमारे घर के चारो ओर सांप भरे पड़े हैं। मीताराम उत्साहित हुआ और मह्ज मम्भाषण की धारा मे स्वच्छन्द गति से अनायाम ही धीरानन्द के मम्मुख पहुँचकर बोला, ठहरिए, तो फिर रोशनी लेकर में ही आगे चलता हूं। धीरानन्द ने कहा, पिछली बार हमारे घर से एक दिन मे छतीस गेहुअन संपोले निवले थे। छत्तीम ! फिर तो घर में कहीं बच्चे हुए थे। नहीं। घर में नहीं । लगभग मयके मय घर के बाहर से भीतर की ओर आ रहे थे। रास्ते वाली कोठरी में मोलह मारे गये, बाहर वाले दरवाजे के पास पांच, मारे के मारे बाहर में घर की ओर आ रहे थे । आँगन में तेरह । घर के भीतर मिर्फ दो । एक भण्डारे में, और दूसरादूमरे ने ही सबको हैरत में डाल दिया था। दालान -कमरा-दरदालान पार कर लक्ष्मी जी का कमरा है, उसके पीछे वरतन वाला कमरा है, उसमें कोई खिड़की नहीं, बस एक दरवाजा है, दिन को भी बत्ती लेफर उस कमरे में दाखिल होना पड़ता है । उमी कमरे में गंगाजल की बड़ी हांडी में जाने करो जा पडा था । क्यो, आपके का क्या हाल है?

३६ :: संदीपन पाठशाला सांप तो हैं। कावोलिक एसिड से कभी सांप मारा है आपने ? नहीं । सीताराम ने कहा, लेकिन सुना जरूर है कि कार्योलिक एसिड देते ही सांप मर जाता है। देते ही नहीं मरता। उस वार मैंने देकर देखा है । सिकुड़-सिमटकर काफी छटपटाने के बाद मरता है। भयानक यन्त्रणा मिलती है। लेकिन हां, उसकी गन्ध से साँप नहीं आता, यह भी ठीक है। कहते-रहते वे घर के भीतर आ गये थे। धीरानन्द ने हाँक लगायी, श्यामू, देवू, तुम्हारे मास्टर जी खड़े हैं । मेक हेस्ट।-कहकर ही वह ऊपर चला गया - था। - उसके चले जाने के बाद सीताराम को लगा था-बड़ा वेहतरीन आदमी है यह ! उग्रभापी कहां ! इसमें विस्मयकारी भी क्या है भला ! इन सात दिनों में और भी कई बार भेंट हो चुकी है, बीस-तीस बार तो वेशक, वातचीत भी दस-बारह बार हो चुकी है। बस एक ही ढर्रे की बातें। धीरानन्द सवेरे यहां के स्कूल के असिस्टैंट हेडमास्टर के पास पढ़ने जाता है। रात को घर पर पढ़ता है, घर के भीतर ऊपर धीरानन्द का पढ़ने का कमरा है । सुना है, वहाँ बहुत कितावें हैं । अच्छी-अच्छी अंग्रेजी और बांगला कितावें। सीताराम का जी करता, कितावें लेकर पढ़ें। पढ़ने का कमरा देखने की भी इच्छा होती, पर बोल नहीं पाता। परिचय और वार्तालाप हो चुका है और बड़े ही सहज-सरल ढंग से हुमा है, कहीं कोई भी तनिक-सी भी वाधा के कांटे का अनुभव नहीं करता; लेकिन फिर भी उस लड़के में ऐसा कुछ है, जिससे उससे लिपटने लायक सान्निध्य में नहीं आया जा सकता। संसार में एक-एक व्यक्ति ऐसा होता है, जिसके बदन पर हाथ रखने पर मुंह से तो कुछ भी नहीं कहेगा और न हाथ को परे धकेल देगा, फिर भी हँसते-हंसते ऐसे सहज ढंग से हाथ हटाकर अपने को दूर सरका लेता है, ताकि ठेस भी न लगे, यहाँ तक कि ऐपना भी नहीं पड़ता-वस उसी ढंग से वह अपने को सरका ले सकता है। सीताराम भी आगे नहीं बढ़ा। उसने भी इसी बीच अपने रोजमर्रा के काम को योजनावद्ध ढंग से निर्धारित कर डाला है। रात को घर जाता है। सवेरे अपने पिता के साथ ही उठता है । कुरता और बनियान कन्धे पर डाल छतरी, लालटेन और लाठी हाथ में लेकर वह रवाना हो जाता है । रत्नहाटा और उसके गांव के बीच एक छोटा नाला है, ऊपर के एक झरने से पानी वारह महीने प्रवाहित हो नदी की ओर चला जाता है । उसी नाले के पास आकर कुरता, वनियान, छतरी, लालटेन, लाठी रखकर वह अपना प्रातः कृत्य निवटा लेता है । नाले के दोनों ओर असंख्य वाघाभेरेंडा के पौधे हैं । एक पौधा उचार कर छुरी से काटकर वह दातौन बना लेता है । और भी थोड़ी दूर आकर रत्नहाटा के सिवान पर बहुत दिनों पुराना जो छायाधन बरगद का वृक्ष है को . -

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३८ : : संदीपन पाठशाला वेशक कुछ निकला है, लेकिन सीताराम ने जो आशा की थी वैसा नहीं हुआ। माँ ने कहा था, छोटे-छोटे लड़कों को दस बजे ही खाना खाकर भागना पड़ता है, आधे मील से भी अधिक रास्ता । तुम अगर मुहल्ले में घर के पास चंडीमंडप में ग्यारह बजे पाठशाला खोलोगे, स्कूल से कम फीस लोगे तो सभी लोग अपने लड़कों को तुम्हारी पाठशाला में देंगे। सीताराम को भी यह तर्क अकाट्य-सा लगा था। लेकिन वह आश्चर्य करता रह गया जब देखा कि तर्क थकाट्य होने पर भी लोग तर्क के आस-पास भी नहीं फटके । स्कूल से छुड़ाकर लड़कों को पाठशाला में देने को वे तैयार नहीं हुए। जगद्धात्री इस मुहल्ले की प्रवीणा महरी तबके की औरत हैं। उन्होंने उस दिन इसी कोठी में ही माँ से कहा, सीताराम मौजूद था उस समय, बोलीं, हजार हो, स्कूल की पढ़ाई और पाठशाला की पढ़ाई दोनों में फर्क है धीरू की अम्मा ! तुम्हीं वताओ क्यों ? तुम क्या लड़कों को स्कूल से छुड़ा लोगी ? माँ ने हँसकर कहा, ननद जी, मेरे छोटे दो लड़के तो स्कूल में नहीं पढ़ते, वे तो उसी के पास पढ़ते हैं। सो तो पेराइवेट पढ़ते हैं। दो लड़कों को लेकर वह मास्टर दो जून रगड़ता है । सो तो एक बात और पाठशाला के गोल में बैठ पहाड़ा वोलना दूसरी वात । जरा सोचने के बाद बोलीं, मेरे तीन भतीजों को दे सकती हूं अगर मास्टर तुम्हारे लड़कों की तरह उनको दोनों वक्त पेराइवेट पढ़ावे । सो तीन जनों के लिए तीन रुपए दूंगी । छोटा वाला तो मान लो पढ़ता ही नहीं, अ-आ और क-ख । उसका पढ़ना तो नाममात्र के लिए, वस संभाले रखना है, फिर भी तीन ही रुपये दूंगी। इस मुहल्ले के पतित पावन वायू प्रवीण और मातवर व्यक्ति हैं-उनको भी माँ ने बुलाया था, उन्होंने कहा, वह तो स्वयं एक बालक है। बच्चों को शिक्षा देना वह क्या जानता? स्कूल में पाठशाला रहते फिर पाठशाला ! हुं ह ! यहां के स्कूल का प्रायमरी विभाग स्कूल के साथ नाम से स्वतन्त्र होने पर भी स्कूल ही का एक अंश है। वहाँ तीन मास्टर हैं। उनमें केवल एक ही प्रवीण हैं ,पुराने दिनों का छात्रवृत्ति परीक्षा पास किया हुआ, बाकी दो जनों में एक तो मैट्रिक फेल है, दूसरा नार्मल पास । दोनों में एक है सेकेंड मास्टर का दामाद, दूसरा है हैडमास्टर के गुरुदेव का भतीजा । इन दोनों की उम्र हालांकि कम ही है, सीताराम के ही हमउम्र पच्चीस से तीस के अन्दर । प्रवीण जो हैं, प्रवीण होने के नाते स्कूल के पांच घंटों में ढाई घंटे कुर्सी पर बैठे विना सोये उनसे रहा नहीं जाता। मां ने सीताराम को फिर भी आश्वासन दिया और हँसमुंह कहा, उनकी बातों से तुम हिमात मत हारना बेटा ! लेकिन भले काम में बहुत सारी - - संदीपन पाठशाला :: ३९ वाधाएं आती हैं। माई, अगले दिन ही फिर एक बाधा आई । सीताराम पाने बैठा था, अचानक एक महिला या पहुंची । कहा हो धीरू की मम्मा! कौन ? मां निकल आयी। हूँ। दादा ने तुम्हारे पास भेजा है। बाहर से पुरुष का कंठ मुनाई पड़ा, बता दे कि मैं यहीं पड़ा हूं। बताओ। महिला गम्भीर भाव से कह गयी, चंदीमंडप के तुम लोग बड़े शरीक जरूर हो, बारह आना हिस्सा तुम लोगो का है-यह सच्ची बात है लेकिन इसलिए जो मर्जी सो तो नही किया जा सकता चंडीमंडप के साथ। मां अचम्भे में पड़ गयी, वात क्या है ? उन्होने कहा, मुहल्ले के बीच मे देवस्थान है, बहू-बेटियां सब आती-जाती हैं, यहाँ तुम अपने पति के नाम पर सुना, पाठशाला खोल रही हो? यह क्या ठीक हो रहा है? वाहर से महिला के दादा ने अब हाँक लगायो, ठीक होना-ओना नहीं। ऐसा होगा नहीं। वह मैं करने नहीं दूंगा। चली ना तू। वे चली गयी। सीताराम बोला, रहने दीजिए माँ, जय इतना-1 अपनी बात वह खत्म न कर सका। मां का मुख तमतमा उठा था। वे एकटक दृष्टि किये कुछ सोच रही थी, अचानक बोल पड़ी, हमारे कचहरी के पूरव के बरामदे पर पाठशाला खोलोगे तुम। यही तय कर यह शाम को स्कूल सब-इन्सपेक्टर के पास गया। रल- हाटा में ही एक सर्कल सव-इन्सपेक्टर रहते हैं। पाठशालाओ के वे ही हत्ती- कर्ता-विधाता है । सव-इन्मपेक्टर बैठे थे बड़े स्कूल के हेड-मास्टर के घर पर। मीताराम के लिए यह अच्छा ही हुआ, हेडमास्टर जी उसके किसी समय के शिक्षक रहे हैं, उनसे भी अनुमति लेना हो जायगा । उनके पैरो की धूल सिर से छुवाकर उसने प्रणाम किया, सव-इन्सपेक्टर को नमस्कार किया। फिर सवि- नय निवेदन किया। मय-इन्सपेक्टर बोले, अच्छी बात, खोलिए पाठशाला, चलने दीजिए कुछ दिन, मालभर गुजरने दीजिए, फिर दरख्वास्त फीजिएगा। तब देर जो समुचित होगा किया जायगा । हेडमास्टर गंभीर हो गए थे शुरू मे हो, उन्होने कहा, क्यों कह रहे हो ? मैं आपका छात्र हूँ। मैं यहाँ पाठशाना सोल रहा मति मांग रहा हूं। अनमति तो मैं नहीं दे सकूँगा। यहाँ हमारा , ४० :: संदीपन पाठशाला तुमको पाठशाला खोलने की अनुमति देकर कैसे उसका नुकसान करने को कहूंगा, वताओ? इसका उत्तर सीताराम नहीं दे सका, केवल जरा दुखी हुला। वह भी तो उनका छात्र है। उसका मंगल देखना नी क्या उनका कत्र्तव्य नहीं ? मास्टर जी ने फिर कहा, अपने गांव में क्यों नहीं खोली पाठशाला? जी, वहाँ मेरे ताज्जाद भाई पाठशाला खोले हुए हैं। तो? यहाँ भई हमारा अपना पाठशाला-विभाग जो है। लवकी बार सीताराम ने जवाब दिया, कहा, हमारा गांव छोटा है, वहाँ लड़के भी कितने ? यहाँ बड़ा गांव है, वीस लड़के जाएंगे तो मेरे पांच रुपए वन जायेंगे । और ज्यादा लड़के तो आपकी पाठशाला में पड़ते नहीं, ज्यादा फीस तो फिर शरीफ मुहल्ला छोड़कर तुम दूसरे मुहल्ले में पाठशाला खोलने की कोशिश करो। हंसकर बोले, देश-सेवा भी होगी। उन लोगों को इकळे कर पाठशाला खोल 'अन्धकार से प्रकाश' में अगर ला सको तो तुम्हारी एक कीति रह जायगी। उनके बोलने की भंगिमा से सीताराम मर्माहत हुना। वह वहां से चला नाया। - माँ ने फिर मणिलाल बाबू के पास भेजा।उनको एक वार वता बानो वे अगर कहेंगे तो चण्डीमण्डप के बारे में कोई भी सापत्ति नहीं खड़ा करेगा। मणिलाल वाबू को प्रणाम कर वह खड़ा को प्रणाम कर वह खड़ा हो गया। सारी बात बता दी। पाश्चर्य ! उस दिन वाले व्यक्ति ही नहीं हैं वे, बात करने का लहजा भी अलग । वे केवल चन्द वार बोले, हूं। हूं । हूं। सुना है जबर। अन्त में निलिप्त-सा वोले, देखो, कोशिश करो। फिर तकिए से टेक लगाकर हांक लगाई, चैतन, ऐ चैतन! जवाब न पाकर बोले, फरशी को चिलम लेकर बाहर किसी को दे देना छोकरा, बाग बुझ गयी है, आग देने को कहना। सीताराम स्तंभित रह गया लेकिन आज्ञापालन से भी विरत न हुआ। मां ने सुनकर कहा, मणि देवर जी ऐसे ही अजीव शब्त हैं। जव जैसी सनक सवार होती है वैसा ही बोलते हैं। बैठक में आकर कन्हाई वोला, नजी भद्रलोग तव ही सनकी होते हैं। सीताराम मन्तिक विषाद से भर गया है। बिना कोई उत्तर दिये उसने सिर्फ एक ठण्डी सांस ली। फिर सिर मुकाये बैठा रहा । अचानक एक दात याद आ गयी, हेडमास्टर को बात याद ला गयी। शरीफों का मुहल्ला छोड़कर दूसरे मुहल्ले में पाठशाला खोली जाय तो कैसा हो? बहुत सोच-विचार कर एक क्षेत्र का भी आविष्कार कर डाला। साहाटोला या मछुओं-फेवटों के टोले में पाठशाला खोलने की बात याद हो आई। साहाटोले के लड़कों में अधिकांश पढ़ने-लिखने की ही कोशिश करते हैं संदीपन पाठशाला::४१ साहा अर्थात् शोडिक समाज में जल-अचल सम्प्रदाय होने पर भी आर्थिक अवस्था से काफी सम्पन्न होते हैं । वंश-परम्परा से शराब की दुकान तो है ही तिम पर महाजनी कारोवार भी है इनका । जो जैसा है उसका वैसा ही कारोवार है- गहने बरतन गिरवी लेकर ऊंचे व्याज पर रुपये उधार देते हैं। छुड़ा लेने की एक अवधि निश्चित रहती है, वह अवधि पूरी होते ही वह देनदार को इत्तला कर देता है कि वह चीज तुम्हें अब वापस नही मिलेगी । आचार और वेश-भूपा में भी वे भद्र हैं, लेकिन फिर भी स्कूल में पाठशाला में उन लोगो का स्थान नीचे है। शिक्षक उनको घृणा की दृष्टि से देखते हैं । सीताराम को याद है, उसके साथ साहा घराने के खुदे और पचा पढते थे। मास्टर उनको बुलाते थे, ऐ शोडिक (कलवार)। कोई-कोई कहते थे, दारू वाले का बेटा ! मीताराम को लगा, उनके लिए अगर वह पाठशाला खोल दे तो वे वेशक खुश होकर उसकी पाठशाला में पढ़ेंगे। मछुवे-केवट के लड़के बहुत-सारे हैं । जाडा-गर्मी यारह महीने बरगद के तले सवेरे से शाम तक एक ही जगह वैठे वे हीः ही: कर हंसते रहते हैं, परस्पर गाली-गुफ्तार करते रहते हैं । वे पाठशाला नहीं जाते। उनमें से बहुतो की धारणा है कि उनको पढना-लिखना नही चाहिए । जो पढेगा वह मर जायगा। हालांकि फेवटों के पास पैसे हैं-मछली के व्यापार के पैसे। उनके मुखिया विपन की बड़ी इच्छा है, बेटे को पाठशाला में देने की । हाईस्कूल की पाठशाला में भरती भी कर दिया था। लेकिन वहां दो दिन जाने के बाद उस लडके ने फिर नही जाना चाहा । क्यो नही जाना चाहता, यह सीताराम अनुमान लगा सकता है। वह भय अगर न रहे, तो वे आयेंगे क्यो नही ? सीताराम उठकर बैठ गया। ज्योतिप साहा साहाटोले का मातबर है.--. आदमी भी नेक है। केवट भी साहा जी के अनुगत हैं। विपन को ज्योतिष 'काका' कहकर पुकारता और विपन कहता है, 'ज्योनिप वावा' । हो, यही करेगा वह । उन्ही के पास जायगा । ध्यामू और देवू को दस बजे छुट्टी देकर उसने नहा लिया । नहाने मे उसे जरा वक्त लग जाता है । पोखर में वह नही नहाता । इस बारे में वह अपने स्कूल-जीवन के दो प्राचीन शिक्षको का अनुगामी हुआ है । जिस पण्डित जी ने उसके वाप से उसे नार्मल स्कूल में पढ़ाने का अनुरोध किया था, वे और इस स्कूल के थर्डमास्टर दोनो ही घनिष्ट मित्र थे और थे निर्मल चरित्र के व्यक्ति । जितने दिन वे जीवन में कर्मठ थे, उतने दिन वे दोनो साढे नौ बजे अंगोछा और धोती कन्धे पर डाले गांव से मीलभर दूर झरने की तरफ चल देते थे । झरने में स्नान कर दो गडवे झरने के पानी से भर कर लौटते थे। दिन-भर उसी झरने का पानी पीते थे। सीताराम भी गडुवा लेकर अगोछा और धोती कन्धे पर डाले झरने पर जाता। तेज कदम जाता और तेज: लौटता। अपने कमरे के भीतर ही उसने मलगनी टांग ली है। उस बल गडुवा लेकर ४२ :: संदीपन पाठशाला - पर वह अपनी धोती फैला देता है, गडुवे को मेज के नीचे रख देता है । किसी टूटे वक्से का एक सलोतर लड़की का पटरा उसने जुगाड़ा है, उससे ढाप कर एक कंकड़ का वजन भी उस पर रख देता, फिर हुगली के पाठ्य जीवन की आदत के मुताविक बायें हाथ में आईना थाम बालों में कंघी करता है। मांग नहीं काढ़ता, बालों को समान रूप से सामने लाकर बाईं ओर से दाहिनी ओर कर देता है । एक चुटिया भी है, उसे बालों में ना-मालूम मिला देता है। इसके बाद खाना खाता है । खाना खाकर ही वनियान-कुरता पहन छाता हाथ में लिए वह निकल पड़ा। साहाटोले की ओर गया । ज्योतिप साहा जी की शराव गांजा-अफीम-भांग की दुकान के बरामदे पर जाकर खड़ा हो गया। ज्योतिष आश्चर्य करने लगा। उसकी दुकान पर रमानाथ मुखिया का बेटा क्यों ? यह लड़का पढ़ा-लिखा है, इसके अलावा सभी उसे एक नेक लड़के के रूप में ही जानते हैं। नमस्कार कर सीताराम ने कहा, आपसे एक बात करनी है। क्या है ? वताओ। आपके मुहल्ले में मैं पाठशाला खोलना चाहता हूं। आप लोगों के लड़कों के लिए पाठशाला। ज्योतिप ने हैरत में कहा, पाठशाला ? जी हां, पाठशाला । सीताराम ने अपने सोचे हुए तर्कों को साहा से कहा । बताया, स्कूल के छोटे बच्चों को दस बजे खाना खाकर भागना पड़ता है डेढ़ मील रास्ता-शरीफ लोगों के घर में हालांकि दस बजे खाना बन जाता है, लेकिन हमारे जैसे गिरस्त घरों में औरतों को इसमें दिक्कत होती है। मान लीजिए, मैं ग्यारह बजे पाठशाला आऊँगा; घर के पास पाठशाला हो, औरतों को घण्टाभर समय मिल जायगा, इसके अलावा खाना न पक सका हो तो लइया खाकर पाठशाला चला आएगा और एक वजे टिफन-बड़े मजे में दौड़कर घर चला जायगा और खाना खाकर लौट आएगा । अचानक किसी को अपने लड़के की जरूरत पड़ गई, हाँक लगा दी,-मास्टर, राम को छुट्टी दे दो। बस हो गया। इसके अलावा फीस भी कम कर दूंगा मैं । गिरस्त-घरों में दो आने पैसे कोई कम नहीं। इतने सारे तर्कों को पेश करने के बाद उसने साहा के मुख की ओर देखा, बातों का कोई असर साहा जी के मुख पर पड़ा या नहीं। साहा जी सोच रहे थे। वातें वाकई उनके मन को छू गई हैं । सीताराम को फिर एक बात याद आ गई, बोला, इसके अलावा मान लीजिए स्कूल की फीस सात तारीख को जमा न करने पर जुर्माना देना पड़ता है, फिर महीना खत्म हो जाय तो नाम कट जाता है । जो लोग गरीव गृहस्त हैं वे क्या हर महीने ही ठीक-ठीक फीस जमा कर सकते हैं ? पाठशाला में यह भी एक सुविधा है, जुर्माना नहीं देना पड़ेगा, नाम नहीं कटेगा। - संदीपन पाठशाला ::४३ इम पर साहा जी हंसे, वोले, जुर्माना नहीं देना पड़ेगा यह सुविधा वेशक है लेकिन फोम न देने पर अगर महीना खत्म होने पर भी नाम न काटा जाय तो उमसे तुम्हें दिक्कत होगी। फीस कोई देगा ही नहीं। सीताराम लज्जित हो गया, उसे लगा, उसने कंगलापन कर डाला है। अपने को सम्भालते हुए उसने कहा, उसके लिए एक कमेटी-जैसी रहेगी, आप लोग पांच जने मिलकर एक कमेटी बना देंगे। आप प्रेसिडेन्ट होंगे। महीने के अन्त में मैं आपको वही-साता दिखाऊँगा । आप लोग कहेंगे तो नाम काट दूंगा। कुछ देर चुप रहने के बाद फिर वह बोला, हालांकि में जी-जान लगाकर मेहनत से पढ़ाऊँगा, मुझे वेतन पेशक चाहिए । कुछ मिलेगा इसीलिए तो काम करने आया है। लेकिन मैं भी किसान-गिरस्त घर का बेटा हूँ-गृहस्थ-घर के दुख-दर्द को मैं जानता हूं । अपने दुःख के साथ छान के घर की दुःख-दुदंशा के बारे में भी तो मुझे मोचना है। कोई अगर एक महीना फीस न दे सका, आप लोग अगर देखें, फोस जानबूझ कर वाको नहीं पड़ी है, तो उसका नाम नहीं काढूंगा, यह रहेगा। और उसकी तंगी यदि अधिक हो तो दो महीने की फीस बाको रहे। बाद में दे देगा ! सो भी अगर आप लोग ऐसा मोचें कि बकाया फीस माफ कर दी जाय तो मैं वैसा ही करूँगा। साहा की दुकान के सामने ही बाबुओं का एक बाग वाला पोखर है। उस पोखर के पानी में उस वक्त हवा से हिलकोरें आने लगी हैं, मावन की बरसाती उतावली बयार । लहरों के सिर पर सूर्य की छटा चमचमा रही है । साहा उस ओर देखता हुआ काफी देर तक चुप रहा, फिर बोला, भाई, मैं जरा सोच लूं । मुहल्ले के और भी पांच जनों को पूछ लूँ । सीताराम ने इस बार भासिरी वात की, इसके अलावा यह होगी आप लोगों के लड़कों के लिए पाठशाला । बाबुओ के लड़के और आप लोगो के लडको में कोई फर्क नहीं रहेगा। आप लोगों का असम्मान नहीं होगा। ज्योतिप ने चकित-सा मुंह उठाया, एकटक सीताराम के मुख की ओर देखता रहा फिर सामने की ओर पोखर के, प्रकाश से उज्ज्वल, जल की और । और भी दो दिन बीत गये। पांच जनों को लेकर सलाह-मशविरा अभी तक चल रहा है। गन्धवणिक टोले में कई स्कूल वाले दोस्त हैं उसके । दो दिन वह उनके पास भी गया। वहीं उसे विशेष उत्साह नही मिला। ये लोग भी विचिन लोग हैं । इन्ही के तबके के कम उम्र वाले तालव्य 'श' का उच्चारण अंग्रेजी 'एस' की तरह करते हैं । यार-दोस्त देखते ही समादर सम्भापण कर कहते है- :-स्ला। इनके प्रवीण लोग बड़े विज्ञ होते हैं । बोले, हो, खोलो तो पाठशाला । देख लें पढाई कैसी होती है, फिर देखा जायगा। उस दिन दिनभर चक्कर लगाने के बाद सीताराम तिपहर लौटा।

, ४४:: संदीपन पाठशाला पीकर अवसादग्रस्त मन से गड़वा हाथ में लेकर अंगौछा कन्धे पर डाले वह निकल पड़ा । यह उसका नित्य कर्म है । झरने के किनारे घूमने जाता है। और एक चीज़ साथ होती-~~-एक आसन, यह आसन वह घर से ले आया है । आसमान में बादल होने पर छाता ले लेता है बगल में । गांव पार कर उस झरने के पास चला जाता है । कंकड़-पत्थर से भरे रुख-विरिख से शून्य एक ऊसर टीले के नीचे झरना है। वह उस टीले के किसी स्थान पर जाकर आसन बिछाकर बैठ जाता है। सूर्यास्त तक वैठा ही रहता है । यह भी उस पुराने जमाने वाले पंडित का अनुकरण है। बैठे-बैठे सोचा करता। उसकी चिन्ता-पाठशाला की चिन्ता। पाठशाला न होने पर खुराक और चार रुपए तनख्वाह पर नौकरी करना सच- मुच बड़ी ही लज्जा की बात है । वावा के सामने वह मुंह कैसे दिखाएगा ? उसके वावा अव भी कह रहे हैं, घर पर बैठे खेतीवारी देखो बेटा। माँ लक्ष्मी की सेवा करो। "नया वस्त्र और पुराना अन्न, यही खा-पहन बीते जन्म- जन्म ।" खेती छोड़ने पर खेती वरवाद हो जायगी । मैं भला कितने दिन । यह सव पुरखों की बातें हैं। यह सही है कि बातें पुरखों की हैं। और सच्ची भी हैं। उसके ताऊजाद भाइयों की--उसी किशोर वगैरा की खेती की हालत इसी बीच सचमुच खराव हो गयी है। बड़े दादा ने माइनर पढ़ने के बाद गांव में पाठशाला खोली है, न वह हल थामता है और न खेती देखता ! मंझला नौकरी की टोह में घूम रहा है। किशोर एम० ए० और लॉ पढ़ रहा है। छोटा इस बार मैट्रिक देगा। ताऊ बूढ़ा गये हैं, आँखों से अच्छी तरह दिखाई नहीं पड़ता। फिर भी खेती का सारा भार उसी बूढ़े पर है । खेत-मजूर पर सोलह आने निर्भर रहना पड़ता । इस कारण, ताऊ के खेत में उसके नाते-रिश्तेदारों से सबसे कम फसल होती है। बात ठीक है। लेकिन घर में रहकर खेती-बारी लेकर रहने की बात सोचते ही उसका दिल जाने कैसा करने लगता है । खेती करने पर क्या जमींदार-गृह में उसे बैठने का आसन मिलेगा? उस मणिलालबाबू ने जो उस दिन उसको बाहर चिलम ले जाने के लिए कहा था, वह किसान का बेटा था इसलिए । इतना कहने पर भी उससे तमाकू भर कर लाने को नहीं कह सके। पढ़-लिखकर मास्टरी करेगा, सुनकर उनको तारीफ भी करनी पड़ी। अपने हाथ खेती करने पर क्या वे इतना भर भी बोलेंगे ? अव की वार तमाकू भर लाने के लिए कहेंगे। भर पेट खाकर जिन्दा रहना ही क्या सबकुछ है ? उसके वे पुराने पंडित जी कहा करते थे, सूअर भी दिन गुजार लेता है, दिनभर घूम कर वह भी अपना पेट भर लेता है। उसके पिता और भी कहते थे, अच्छी वात, पाठशाला ही खोलनी है तो गांव में तेरे दादा ने खोल रखी है उसी में लग जा । या वगल के गांव राधिकापुर में खोल ले। राधिकापुर उन लोगों के गांव के पास ही है, उन्हीं के गांव जैसा ही छोटे - ?

संदीपन पाठशाला::४५ किसानो का गांव है । लेकिन वह भी उसको नहीं भाता। राधिकापुर के पंडित जी और रत्नहाटा के पंडित जी में क्या तुलना हो सकती है ! इसके अलावा छान्न ? जो जमीदार-गृह के दो लड़के, खिले हुए चेहरे, चमवती आंखें, झटपट वातों का जवाब देते हैं, चुस्त-दुरस्त, यह सब राधिकापुर के लड़कों में कहीं से मिलेगा ? मणिबाबू ने वेशक उस दिन कहा था, गांव में स्कूल होते हुए भी हमारे लड़के कोई भी कुछ भी नही कर सके, तुम लोग कर रहे हो, यह तो अच्छा है, बहुत अच्छा । फिर भी वे ही तो इस जवार के प्रधान हैं। वे ही तो मारे काम में आगे बढ पाते है । साहब लोग आकर उन्ही से बातचीत करते है। वे पढाई नहीं कर पाते अवहेलना के कारण, जानते हैं, पास न होने पर भी उनको प्रतिष्ठा कोई छीन नहीं सकता। उनके मास्टर जी बनने में कितना बड़ा गौरव है । श्यामू और देवू को यदि वह पढ़ाता है, और किसी समय अगर वे जाने-माने व्यक्ति बन जायें तो यह कह तो सकेगा कि वह श्यामू-देबू का मास्टर है । श्याम-देवू मे एक अगर जज बन जाये और एक मजिस्ट्रेट, तो? उसका दिल जाने कैसा होने लगता। झरने के पास का गांव उसी का गांव है। उसके गांव से औरतें आकर पानी ले जाया करती हैं। हरे धानो से भरे खेतो की पगडण्डी से, सज्जी मे धुले मोटे कपड़े पहने बहू-वैटियाँ भाकर पानी ले जाती हैं । वहुओ के सिर पर घूघट, बैटियाँ पूंघट नहीं काइतो, उनके सिर के जूड़ो पर शाम के भूरज की आभा आ पड़ती। रूखे बालो के ढीले जूडे, घड़े लेकर चलते वक्त पैर रखने के लय पर डोलते, जिनके जूडे बंधे हुए उनके तलाक्त वालो पर सूर्य की छटा चमकती। मनोरमा भी इनके साथ पानी लेने आएगी। उसके साथ इसी मौके रात को घर पर मुलाकात होने से पहले ही एक बार भेट हो जायगी। मनोरमा शुक्रवार को भा रही है। उसकी ख्वाहिश थी कि उसी वृहस्पतिवार को हो या जाये। ट्रेन पांच बजे थाने वाली है। बृहस्पतिवार ग्यारह बजे पाठशाला वृतेगी। उसी दिन पांच बजे मनोरमा आएगी, यह सोचते हुए उसे भला लगा था। लेकिन वृहस्पतिवार केवल गुरुवार ही नही, लक्ष्मीवार भी है । धान नहीं येचना चाहिए, कन्या घर की लक्ष्मी के समान है-उसको भी नही भेजना चाहिए। कल वावा रवाना होगे । उसकी ससुराल से गंगा बहुत निकट है, दो मील के अन्दर हो, खेत की जुताई खत्म हो चुकी है, निराई में अभी कुछ दिन को देर है । सावन के अन्त तक निराई होने से ही चलेगा, अभी लमेरा घास. पात बढ़े नहीं। इसी मौके पिताजी जाकर कुछ दिन रहेगे, गंगास्नान होगा। इन चार दिनो में उसके घर पर भी बहुत सारे काम हैं । बावा रहेगे नहीं, इसी वक्त घर को अपने मनमाफिक सजा डालना है। हालांकि बावा ने खुद ही कहा है, लेकिन फिर भी यात्रा के सामने यह सब करने में लाज लगती है । कपडे टांगने की खूटिया वह रत्नहाटा ले गया है । वह है भी बहुत छोटी । उससे घर में कोई काम न होता। मनोरमा के कपड़े, अपनी धोती कुर ४६ :: संदीपन पाठशाला , बनियान रखने के लिए एक बड़ी अलगनी चाहिए । वावुओं के घर के नायव उसने एक अलगनी खरीदने को कहा है, वे सदर गये हैं। दो पैकिंग केस खरी कर रत्नहाटा के सतीश बढ़ई को दो शेल्फ बनाने को दिया है-बड़ा वाल घर के लिए और छोटा वाला वह रत्नहाटा की पाठशाला में रखेगा। सांझ हो आई, वह उठा, झरने में मुंह-हाथ धो गड़ वा भरकर वह लौट चला। अचानक उसे 'मेघनादवध काव्य' के द्वितीय सर्ग का प्रारम्भ याद आ गया- "अस्ते गेला दिनमणि, आइला गोधूलि एकटि रतन भाले । फुटिला कौमुदी; मुदिला शरमे आँखि विरस वदना नलिनी।" इसके बाद ठीक तरह से याद नहीं। उसकी स्मरण-शक्ति कोई अच्छी नहीं। उसके जीवन की अकृतकार्यता का यही सबसे बड़ा कारण है । जाने क्या सोच यकायक वह खड़ा हो गया। फिर लौट गया झरने की ओर। कुछ ब्राहमीसाग चुनकर लौट चला। पकाकर खाने की सुविधा नहीं मिलेगी, कूट- कर रस पी लेगा सवेरे । हाँ, और भी है, सामने भादों का महीना है, पित्तवृद्धि का समय, ऐसे समय चिरैता का पानी कम-से-कम हप्ता-भर पीना है । शरीर को स्वस्थ रखना है । शरीरमाद्यम् । बाबुओं के घर लौटते ही कन्हाई राय ने कहा, क्यों जी पंडित, भरमन हो गया? यानी भ्रमण । सीताराम को यह बात जरा कोंच गयी। कन्हाई राय चन्द दिनों से जाने सी आड़ी-तिरछी बातें कर रहा है। 'सीताराम' कहकर नहीं बुलाता। -हता, पंडित, कभी-कभी 'पंडित जी' भी कहता । कन्हाई राय के मन की त वह समझता है । लेकिन वह उसका क्या करे। 'मूर्ख जो है, विद्या का मूल्य वह कभी क्या जाने ।' वणिक ने कुक्कुट से जो कहा था, "तेरा दोष नहीं है मूढ़, देव है यह ना, ज्ञानशून्य किया गुसांई ने।" कोई झूठ नहीं कन्हाई राय वोला, यह कैसा? वात नहीं करोगे क्या हँसकर सीताराम ने कहा, तुमको मैं 'काका' कहता हूं, तुम्हारा अनादर , अश्रद्धा करते कभी तुमने मुझे पाया, यह बताओ? राय जरा झेंप गया। नहीं, नहीं, नहीं।-कहकर ही अपनी आवाज़ में रोपन लाकर प्रसंग को दबाते हुए बोला, ज्योतिप साहा ने आदमी भेजा तुमको एक वार शाम को जाने के लिए कहा है। ताराम गड़ ई रख वनियान और कुरता पहनते हुए बाहर निकल गया। र की भी देर नहीं लगाई उसने । हा की दुकान के बरामदे पर शोरगुल हो रहा है। सीताराम ? दुकान के

संदीपन पाउलाला: ३
सामने ही ठिठक कर खड़ा हो गया। इसी गाय के बायुगों ने सो
हाथ जोड़कर ज्योतिप कह रहा है, मुझे माफ कर दीजिये माद ।
रहा हूं। मुझसे नही होगा। दुकान बन्द हो गई है। साता
मैं नहीं दे सकूँगा।
लड़खड़ाते स्वर में शिवकिंकर ने कहा, और नहीं दे सको
जी नही । हाथ जोड़ रहा हू आपको।
हाय जोड़ रहे हो?
जी हां।
जी हो ?

. ४८ :: संदीपन पाठशाला - इस तरह से बात करना शोभा देता है ? मतवाला शिवकिंकर नशे में लगातार हंसता ही जा रहा था, कह रहा था, खेतिहर पण्डित और कलवार छान ? हलवाहा पण्डित बन गया है, अब कलवार पण्डित होगा । हे-हे-हे-हे-हे-हे । सीताराम अव आगे बढ़ आया-बाबू के सामने जाकर सीना तानकर खड़ा हो गया। शिवकिकर ने उसकी ओर कुछ देर देखा। काली सूरत, पत्थर-सा सन्न जिस्म और आंखें गुस्से से दमकती हुई। विना कुछ कहे वह चलने लगा। सीताराम उसके साथ बढ़ रहा था लेकिन ज्योतिप ने बाधा दी, कहा, रहने दो, जाने दो। कुछ दूर आगे बढ़कर शिवकिंकर फिर हँसने लगा, हे-हे-है-है-हे-है ! हल- वाहा पण्डित और शौडिक छान ! कागजम् कलमम् खरचम् मात्र । भद्र घराने के लड़के के मन की कदर्यता देखकर सीताराम स्तम्भित रह गया । ज्योतिप भी धूप से तपी पत्थर की मूर्ति की नाई वाकशून्य खड़ा रहा। चार । एक छोटी-सी आकस्मिक घटना से अघटन, अर्थात् जिसकी घटित होने की सम्भावना नहीं थी, बहुधा घटित हो जाता है । घटित हो जाने पर सीताराम उसे भाग्य का खेल कहता है । शिवकिंकर का यह गाली-गलौज करना, सीताराम के लिए भाग्य का खेल बन गया। ज्योतिय साहा चन्द क्षण चुप रहने के बाद सीताराम से वोला, तो यही तय हुआ पंडित । तुम पाठशाला खोलो। सीताराम उस वक्त भी अपने को संभाल नहीं सका था । वह शिवर्तिकर के जाने के रास्ते की ओर अपलक देख रहा था। शिवक्किर दिखाई नहीं पड़ रहा था, केवल अंधेरा भाय-भाय कर रहा है। दिल जले के आवेश से स्खे स्वर में ही बोल पड़ा, शिवकिकर के व्यंग्य-श्लेष-भरे 'चापा' शब्द की नकल करते हुए वह वोला, चापा, चापा ! चापा लोग मानों इन्तान नहीं ! कलवार मानों इन्तान नहीं! ज्योतिष बोला, कलवार के दरवाजे पर चक्कर न लगाने पर बावुओं का दिन नहीं पूरा होता । शराब की दुकान हथियाने के लिए बाबुओं के वेटों ने कितनी कोशिश की। दस बारह दरख्वास्त मेरे खिलाफ भेज चुके हैं, मैं रात को शराव-गांजा वेवा करता हूँ। इसके अलावा- ज्योतिष-हंसा ! शिवकिंकर के पथ की ओर उसने भी एक बार देखा, फिर कहा, सिर्फ शराव ही नहीं, बाबुजों को !

संदीपन पाठशाला::४६ ? 1 रंपए की जरूरत पड़ जाये तो कपड़ों में गहने छिपाकर लाते और कितनी ही मीठी-मीठी बातें करते हैं । जानते हो पडित, दो-तीन घरो को छोड ऐमा कोई वायू नहीं है यहाँ जिमका कुछ-न-कुछ हमारे घर पर न हो। इस युद्ध के बाजार में बाबुओं की जायदाद हमी लोग तीन-चार घरों में बनाये रखे हैं । सीताराम बोला, आप अगर बीच में न पड़ते तो माज उसे एक सवयः दे देता मैं। कितनो को सबक दोगे ? ज्योतिष का मुख कठोर-सा हो गया। धीमी आवाज में बोला, वह तो शराबी है । मुंह के सामने बोल गया। वही बात याधुओं में कौन नहीं कहता? हम लोग जाति के साहा है, सर ठीक है । हमारा छुवा पानी नही पोते, हम लोग नीचे जमीन पर बैठते, हमें कलवार कहकर पुकारते हैं। खैर देशाचार चला आ रहा है, शास्त्र में है, बहुत अच्छा । लेकिन हमारे ही नातेदार नरेन साहा डाक्टरी पाम करके आया है, क्यों, उगकी दवा पानी मिली दया पर तो कोई ऐतराज नहीं करता? क्यो, उसके बारे में तो ऐमी यात कोई कह नहीं पाता? जानते हो, स्कूल में उसके बेटे-बेटियो की खातिर तवाजह ही निराली होती है । यकायक ज्योतिप का कंट-स्वर गम्भीर हो उठा, बोला, मुझे याद है, स्कूल में पढता था, पढाई में तेज नही था। जरा का वह । हराने के बाद फिर वोला, लेकिन यहा के वायुओ के लड़के भी तो कोई अच्छे नहीं थे। यही शिवतियार, यह भी तो मेरे साथ वा पढा है। हम लोग जो कुछ पढ भी सेते थे, वह नहीं पढ़ पाता था । मास्टर उनको कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं करते थे। और मुगरो क्या कहते थे, जानते हो। कहते, महुआ मिमने वाले जाकर महुया गिस । ताड़ी वेच जाकर । एक गहरी लम्बी सांस ली उसने । फिर चुप्पी माधे जाने क्या सोचने लगा। शायद उसी जमाने की ऐसी सारी बातें । मीताराम को भी याद आ गई। अंगरेजी उच्चारण उनके गांव के और बिरादरी के ज्यादातर लड़कों का मुद्ध नहीं होता था । 'ऐम' को 'एम' 'एन' को 'ऐन' 'एल' को 'ऐल' और 'एम' को ऐस' कह डालते थे । सेकंड मास्टर कहते थे 'ऐल' नहीं-'एल', 'ऐम' नहीं-'एम', 'ऐन' नहीं 'एन', 'रेल' नहीं रेल समझे 'एस' 'ऐस' नहीं है-- 'एरा' है, ऐस हो तुम गघे कहीं के । वे लोग शरमिन्दा हो जाते थे । मखौल उड़ाते हुए वे फिर बताते थे, अच्छी तरह से जीभ छिलोग, समझे ? अगर हो सके तो तुहार के घर से रेती लाकर घिमकर पतली कर डालोगे। फिर धमकाते हुए कहते थे, अवको बगर, 'ऐल', रैल कहा तो एक 'बैल' लोकर सिर पर ठोक-ठोक कर सिर तोड़ डालूंगा। छोड़ दे, छोड़ दे पढ़ना । जाकर अपना कुलकर्म शुरू कर दे ज्योतिप साहा ने कहा, तो फिर वही हुआ। तुमको बुलाया था, rocyte चाहा था, अब पाठशाना तुम वाबुप्रो के यहाँ ही खोलो, हमारे गहो गए ठुलमुलयकीन हैं । तुमने मुझसे कहा था, वृहस्पतिवार को हो पाउगाता तो - - - - n ५०१ : संदीपन पाठशाला चाहते हो इसलिए कहा था सबको समझा-बुझाकर देख लूं । लेकिन-~-चन्द क्षण स्तब्ध रहने के बाद वह वोला, नहीं, तुम वृहस्पतिवार ही को इस मुहल्ले में पाठशाला खोल दो। कलवार के लड़के, केवट के लड़के पढ़ेंगे, खेतिहर पंडित ही हमारे लिए अच्छा है । हाँ, यही अच्छा है। पक्की बात । सीताराम बोला, देख लीजिएगा आप, हर साल अगर लड़कों से वृत्ति न लिवा सकू, तो-- क्या शपथ लें यह उसकी समझ में नहीं आया। क्षण-भर चुप रहने के बाद बोला, देख लीजिएगा, आप देख लीजिएगा। अगले दिन से पाठशाला खोलने का आयोजन लेकर वह जुट गया । ऐसा उत्साह उसे माँ की सहायता से पाठशाला खोलने के प्रस्ताव पर नहीं मिला था । उस प्रस्ताव के तहत पाठशाला के उद्योग-आयोजन में मानों उसके लिए कुछ भी करने धरने का नहीं रह जाता। सारी व्यवस्था ही मां के हुक्म से हुई होती। और इस पाठशाला के लिए चेष्टा सभी कुछ उसी पर निर्भर है । साहा ने सम्मति दी है, कुछ छान वह शुरू में संग्रह कर देगा और पाठशाला के लिए जगह भी वही देगा । साहा ने एक नया वखार घर बनाया है, उसी बखार घर में पाठशाला लगने का स्थान निर्धारित हो गया है। साहटोला और केव टटोले के सिरे पर एक तालाब का किनारा है । तालाब के मालिक यहाँ के एक ऋण- ग्रस्त बाबू हैं, धन के लिए उसे वन्दोवस्त पर देना चाहा था । साहा के घर के पास ही है यह तालाब । साहा यूं ही दर्शक के रूप में बन्दोबस्त की वोली देखने के लिए चला गया था। जाने क्या जिद्द चढ़ गई, सबसे ऊंची बोली बोलकर उसीने बन्दोवस्त पर ले लिया। जब ले ही लिया तो चहारदिवारी से उसे घेरना भी पड़ा। दीवार से घेरते वह एक कमरा भी बना डाला था। साहा के तीन-चार बेटे हैं, भविष्य में काम आएगा। साहा ने खुद ही हँसकर कहा, किस काम के लिए क्या बन जाता है, किसके भाग्य से कौन भोग करता है, यह कोई भी नहीं बता सकता । इन दिनों सोच रहा था, गाँजा-अफीम की दुकान इस ओर ले आऊंगा। तो यह घर पाठशाला बन गया । अव सारा आयोजन करो तुम । एक कुर्सी चाहिए, एक स्टूल, एक मेज भी हो तो बेहतर । बोर्ड--एक लैक-बोर्ड तो चाहिए ही। इसके अलावा एक घड़ी। पानी के दो घड़े, दो गिलास; दो-चार खजूर या ताड़ के पत्तों की वनी चटाइयाँ । घड़े, गिलास आदि आदि बड़े मामूली सामान हैं। चन्द रुपये से ही हो जाएंगे। पहले वाले कई सामान के बारे में ही चिन्ता है। इन सब चिन्ताओं से रात को उसे अच्छी नींद नहीं आई। सवेरे उठते ही दूसरे दिनों से तेज रफ्तार वह रत्नहाटा की ओर चलने लगा। हो जायगा, किसी-न-किसी तरह सबकुछ हो जायगा। "विना उद्यम के पूरा होता भला किसका मनोरथ ।' कुर्सी-स्टूल मिल जाएंगे यह दोनों अभी वह बाबू के घर से ही ले लेगा-कुछ न हो, मोढ़े से भी काम । 1 संदीपन पाठशाला::५१ चल जायगा। पंकिंग केस सरीदकर एक मेजय नवा लेगा । अब सिर्फ घड़ी और ब्लकबोर्ड की फिक्र रह जाती है। यहां का यामिनी बनर्जी घड़ी मरम्मत करता है और जरूरत पड़ने पर नयी घड़ी भी मंगवा देता है । उससे एक टाइम- पीरा खरीदने से ही हो जायगा । सात-आठ रुपये होने से ही होगा। हालांकि एक क्लाक होता तो बेहतर होता । आधे घटे पर बजेगी, हर घटे पर ठीक-ठीक घंटे की आवाज देती रहेगी, बच्चे गिनेंगे-एक, दो, तीन, चार---1 जापानी घड़ी सस्ते में मिलती है इम समय, पन्द्रह, सोलह रूपये में मिल जायगी। न हो तो यह रुपया वह उधार ले लेगा। लेकिन डलंकवोर्ड ? सोचते-सोचते इस ममम्या का भी समाधान उसने कर डाला। थोड़ा-सा कटहल का तख्त मिल जाय तो रत्नहाटा के मंजे हुए मिस्त्री सतीश से एक छोटा-मोटा वार्ड बनवा लिया जा सकता है । कटहल की लकड़ी पर पालिश अच्छा चढेगा, अच्छी तरह पालिश चढ़ाकर मिट्टी के तेल मे तारकोल मिलाकर हल्का-सा अस्तर चढा देने से ही हो जायगा । फ्रेम के बदले पर दो कुंडे लगा, रस्मी बांध दीवार पर गड़े हुक रो टांग देने से ही हो जायगा। रत्नहाटा पहुंचते ही सतीश मिस्तरी के पास जाकर उसने सारी व्यवस्था कर डाली। जाया करने लायक समय अब यहाँ ? 'समय बदलता जाय नदी का प्रवाह प्राय.' यामिनी वांडुज्जे से एक क्लाक घड़ी का भी इन्तजाम कर डाला। इसके बाद रुपए का हिसाब लगाया ! उसका अपना जो संबल था उससे चार रुपए तो कटहल का तख्ता खरीदने में सर्च हो गया । और भी दो रपये मिट्टी का तेल, तारकोल, लोहे की कीलें, कुंडा आदि के दाम चुकाने में। इसके अलावा डोमों से चटाइयां भी सरीदनी पडी हैं । अब सम्बल रह गया कुल छह रुपए। दोपहर वह वायुमो के घर के कमरे में सामोश बैठा था । छह रुपये कई बार ठोकने बजाने के बाद एक ठंडी मास लेकर उमने तय किया, अब एक टाइमपीस ही ठीक रहेगा । आह, काश मनोरमा पहले आ गयी होती ! उससे कुछ रुपए ले लेने से ही काम बन गया होता। उसे मालूम है, मनोरमा का अपना कुछ रांचय है। बड़ी भली संचयो लड़की है । तीम-चालीस रुपए है उसके पाम । जव भी उसे जो कुछ मिला है, सब संचय कर रखा है-पैमा, इवन्नी, दुबन्नी, चौवन्नी, अठन्नी, रुपया सब मिल-मिलाकर उसका संचय है । रेजगारी बदल कर रुपया बनाने का ख्याल भी उसे नहीं हुआ। केवल एक बार उसने खर्च किया है~कान की पुरानी तरकी तोड़कर नई पारसो तरकियां बनवाई है और अंगूठी तुड़वाकर लाल नग लगवाकर अंगूठी वनवाई है। अचानक वह उठ खड़ा हुआ । उपाय उसे मुझ गया है । कमरा बन्द कर यह सीधे केप्टो सुनार के घर जा पहुँचा । नाक की नोंक पर था लटकने वाला चश्मा पहनकर केप्टो काम कर रहा था ! चश्मा और भवो के दरार से मीताराम की और देखकर बोला, आओ पंडित । अपने बेटे को मैं तुम्हारी ही पाठशाला में दूंगा। बड़ी मोटी अक्ल है उसकी । जरा ख्याल रसना । बैठो । सामने ही कुछ ५०६ : संदीपन पाठशाला - चाहते हो इसलिए कहा था सवको समझा-बुझाकर देख लूं । लेकिन चन्द क्षण स्तब्ध रहने के बाद वह बोला, नहीं, तुम वृहस्पतिवार ही को इस मुहल्ले में पाठशाला खोल दो। कलवार के लड़के, केवट के लड़के पढ़ेंगे, खेतिहर पंडित ही हमारे लिए अच्छा है। हाँ, यही अच्छा है। पक्की बात। सीताराम बोला, देख लीजिएगा आप, हर साल अगर लड़कों से वृत्ति न लिवा सकूँ, तो-- क्या शपथ लें यह उसकी समझ में नहीं आया। क्षण-भर चुप रहने के बाद वोला, देख लीजिएगा, आप देख लीजिएगा। - अगले दिन से पाठशाला खोलने का आयोजन लेकर वह जुट गया । ऐसा उत्साह उसे माँ की सहायता से पाठशाला खोलने के प्रस्ताव पर नहीं मिला था। उस प्रस्ताव के तहत पाठशाला के उद्योग-आयोजन में मानों उसके लिए कुछ भी करने-धरने का नहीं रह जाता । सारी व्यवस्था ही मां के हुक्म से हुई होती। और इस पाठशाला के लिए चेष्टा सभी कुछ उसी पर निर्भर है । साहा ने सम्मति दी है, कुछ छान वह शुरू में संग्रह कर देगा और पाठशाला के लिए जगह भी वही देगा । साहा ने एक नया बखार घर बनाया है, उसी वखार घर में पाठशाला लगने का स्थान निर्धारित हो गया है। साहटोला और केव टटोले के सिरे पर एक तालाब का किनारा है । तालाव के मालिक यहाँ के एक ऋण- ग्रस्त बाबू हैं, धन के लिए उसे वन्दोवस्त पर देना चाहा था। साहा के घर के पास ही है यह तालाव । साहा यूं ही दर्शक के रूप में वन्दोबस्त की बोली देखने के लिए चला गया था । जाने क्या जिद्द चढ़ गई, सबसे ऊँची बोली बोलकर उसीने बन्दोवस्त पर ले लिया। जब ले ही लिया तो चहारदिवारी से उसे घेरना भी पड़ा। दीवार से घेरते वह एक कमरा भी बना डाला था। साहा के तीन-चार बेटे हैं, भविष्य में काम आएगा। साहा ने खुद ही हंसकर कहा, किस काम के लिए क्या बन जाता है, किसके भाग्य से कौन भोग करता है, यह कोई भी नहीं बता सकता । इन दिनों सोच रहा था, गांजा-अफीम की दुकान इस ओर ले आऊंगा। तो यह घर पाठशाला बन गया । अव सारा आयोजन करो तुम । एक कुर्सी चाहिए, एक स्टूल, एक मेज भी हो तो बेहतर । वोर्ड---एक ब्लैक-बोर्ड तो चाहिए ही । इसके अलावा एक घड़ी। पानी के दो घड़े, दो गिलास; दो-चार खजूर या ताड़ के पत्तों की बनी चटाइयां । घड़े, गिलास.आदि आदि बड़े मामूली सामान हैं। चन्द रुपये से ही हो जाएंगे। पहले वाले कई सामान के बारे में ही चिन्ता है। इन सब चिन्ताओं से रात को उसे अच्छी नींद नहीं आई। सवेरे उठते ही दूसरे दिनों से तेज रफ्तार वह रनहाटा की ओर चलने लगा। हो जायगा, किसी-न-किसी तरह सबकुछ हो जायगा। 'विना उद्यम के पूरा होता भला किसका मनोरथ ।' कुर्सी-स्टूल मिल जाएंगे--यह दोनों अभी वह बाबू के घर से ही ले लेगा-कुछ न हो, मोढ़े से भी काम - सदापन पाठशाला::५१ चल जायगा। पंकिंग केस सरीदकर एक मेजय नवा लेगा। अब सिर्फ घड़ी और ब्लैकबोर्ड की फिक्र रह जाती है । यहाँ का यामिनी बनर्जी घड़ी मरम्मत करता है और जरूरत पड़ने पर नयो घड़ी भी मंगवा देता है । उसमे एक टाइम- पीम खरीदने से ही हो जायगा । सात-आठ रुपये होने से ही होगा। हालांकि एक क्लाक होता तो बेहतर होता। आधे घंटे पर बजेगी, हर पटे पर ठीक-ठीक घंटे की आवाज देती रहेगी, बच्चे गिनेंगे-एक, दो, तीन, चार- जापानी घड़ी सरते में मिलती है इस समय, पन्द्रह, सोलह रूपये में मिल जायगी। न हो तो यह रपया वह उधार ले लेगा। लेकिन लकवोर्ड ? सोचते-सोचते इस समस्या का भी समाधान उमने कर डाला। थोड़ा-सा कटहल का तख्त मिल जाय तो रत्नहाटा के मंजे हुए मिस्त्री सनीश मे एक छोटा-मोटा वार्ड बनवा लिया जा गकता है। कटहल की लकड़ी पर पालिश अच्छा चढेगा, अच्छी तरह पालिश चढ़ाकर मिट्टी के तेल में तारकोल मिलाकर हल्का-सा अस्तर चढ़ा देने से ही हो जायगा । फ्रेम के बदले कार दो कुडे लगा, रस्मी यांध दीवार पर गड़े हुक से टांग देने से ही हो जायगा। रत्नहाटा पहुँचते ही मतीश मिस्तरी के पास जाकर उमने मारी व्यवस्था कर डाली। जाया करने लायक समय अब महाँ ? 'समय बदलता जाय नदी का प्रवाह प्राय.' यामिनी वांडुग्गे रो एक क्लाक घडी का भी इन्तजाम कर डाला। इसके बाद रुपए का हिसाब लगाया। उसका अपना जो संवल था उससे चार रूपए तो कटहल का तख्ता परीदने में सचं हो गया । और भी दो रुपये मिट्टी का तेल, तारकोल, लोहे की कीलें, कुडा आदि के दाम चुकाने में। इसके अलावा होमो से चटाइयाँ भी खरीदनी पड़ी हैं । अव सम्बल रह गया कुल छह रुपए । दोपहर वह वावुओं के घर के कमरे में सामोश बैठा था । छह रपये कई बार ठोकने-बजाने के बाद एक ठंडी सारा लेकर उमने तय किया, अब एक टाइमपीस हो ठीक रहेगा । आह, काश मनोरमा पहने आ गयी होती ! उससे कुछ रपए ले लेने से ही काम बन गया होता। उसे मालूम है, मनोरमा का अपना कुछ संचय है। बड़ी भली संचयो लड़की है । तीम-चालीस रुपए हैं उसके पाम । जब भी उमे जो कुछ मिला है, सब संचय कर रखा है-पंमा, इकन्नी, दुबन्नी, चौवन्नी, अठन्नी, रुपया मब मिल-मिलाकर उसका संचय है। रेजगारी बदल कर रुपया बनाने का ख्याल भी उसे नहीं हुआ। केवल एक बार उसने खर्च किया है --कान की पुरानी तरको तोडकर नई पारमी खरकियां बनवाई हैं और अंगूठी तुडवाकर लाल नग लगवाकर अंगूठी बनवाई है। अचानक वह उठ खड़ा हुआ । उपाय उसे मूझ गया है। कमरा बन्द कर यह मोधे केप्टो सुनार के घर जा पहुंचा। नाक की नोंक पर आ लटकने वाला चश्मा पहनकर केप्टो काम कर रहा था । चश्मा और भवों के दरार से सीताराम की और देखकर बोला, आओ पंडित । अपने बेटे को मैं तुम्हारी ही पाठशाला में दूंगा। बड़ी मोटी अक्ल है उसकी । जरा ख्याल रखना। बैठो। सामने ही कुछ ५२:: संदीपन पाठशाला मोढ़े रखे थे, केष्टो ने उसी ओर संकेत किया। सीताराम ने अपने हाथ से दो अंगूठियां खोलकर दी, जरा देखिए तो कितना वजन है । सोना तो गिन्नी सोना है, मुझे मालूम । . अंगूठियों में एक दी है उसके पिता ने और दूसरी दहेज में मिली है। वेच । दूं मैं ? सुनार ने दोनों अंगूठियां हाथ में लेकर एक वार सीताराम के मुख की ओर देखा फिर दोनों अंगूठियों को दोनों हथेलियों पर लेकर वजन का अनुभव से अनुमान लगाता हुआ बोला, डेढ़ तोला होगा या छह आना याने एक तोला छह आना होगा। इसके बाद नन्हा तुला यंत्र निकाल कर वजन किया । तराजू के सिर पर के धागे को सावधानी से उठाकर वाट की ओर दो धुंधचियां रखीं, तराजू की कांटी स्थिर हो खड़ी हो गयी। केष्टो ने हँसकर कहा, एक तोला साढ़े छह आने। अंगूठियाँ वेचकर तैतीस रुपये कुछ आने हो गए । आज उसने युद्ध के बाजार को धन्यवाद दिया। युद्ध छिड़ने के कारण बाजार में मानो आग-सी लग गई है। पिछले नवम्बर में युद्ध थम गया है लेकिन आग आज भी बुझी नहीं। सीताराम ने खुद ही कितनी बार कहा है, काल-युद्ध। लेकिन आज सोना वेच इतने सारे रुपये मिल जाने से वह युद्ध छिड़ने के लिए खुश हुआ। सन उन्नीस सौ उन्नीस वाला युद्ध का बाजार। रुपया लेकर वह पहले ही अनन्त वैरागी के घर गया। वैरागी सिर पर बिसात लिये फेरी करता फिरता है। माला-डोरा-आईना-कंघी, तेल साबुन और कुछ गिलट के गहने । उसने देखा है वैरागी की दुकान में काले मखमल के छोटे- छोटे खाने में तरह-तरह की अंगूठियां रखी रहती हैं। दो अंगूठियाँ छाँटकर उसने खरीद लीं, कुछ-कुछ उसकी अपनी अंगूठियों की तरह । अपने बाबा और मनोरमा को वह यह बात जानने नहीं देना चाहता। बाबा दुखी होंगे, उनकी दी हुई अंगूठी उसने बेच डाली है। शायद डॉटें भी, वोलें, तू ही लछमी को भगाएगा। गनोरमा शायद मुंह लटका ले, शादी की अंगूठी, उसके बाप की दी हुई चीज उसने बेच डाली है वे उसके दिल की बात तो नहीं समझेंगे। इसके बाद वह गया रघुनाथ राजमिस्त्री के घर । तय कर आया; कल सवेरे से ही वह अपने लोगों को लेकर साहा के बखार-गृह जाएगा। छोटी-मोटी मरम्मत जो कुछ है कर देगा और चूने से घर और बरामदे की सफेदी कर देगा। रघुनाथ को ही चूना और कूची के लिए पैसा दे आया। थोड़ी दूर आकर फिर लौट गया और बोला, थोड़ी-सी नील दिये बिना ठीक नहीं होगा। नील भी थोड़ी-सी खरीद लेना। रघुनाथ ने कहा, तो फिर थोड़ी-सी चीनी भी इसके साथ दीजिए। वर्ना . - - संदीपन पाठशाला::५३ ? पकड़ेगा नहीं, बदन का पिस्मा लगते ही सफेदी उठ जाएगी। खल्वाट वाले सिर की तरह नीचे की मिट्टी उघड़ आएगी। अच्छी बात । कितनी लगेगी वताओ। चीनी लगेगी माधा पाव और नील"। खैर, चार जाना पंसा दे जाइए। जरा और सोच लेने के बाद सीताराम बोला, और भी एक काम का जिम्मा तुमको लंना पड़ेगा। घर का जिम्मा तो तुम्हारा है। बाहर आंगन को भी सलोतर बना देना होगा । सलोतर ढंग से छोल-छालकर गोवर-मिट्टी से पुताई कर देना पड़ेगा। एक फालतू मजूर और मजूरिन ले लेना। ठीक है न अच्छी बात । यह भी करा दूंगा। कल हमारा सारा काम खत्म हो जाना चाहिए । आज है मंगल । कल युध को तुम सबकुछ निवटा दोगे। परसो से हो मेरी पाठशाला खुल रही है, समझे? सो आप देख लीजिएगा। शाम को चार बजे आ जाइएगा। सव कम्पिलीट कर रागा । अगर न हो तो मेरा कान उमेठ दोजिएगा, यस । चार बजे तक वह धीरज न धर सका। छात्रो को पढ़ाकर उसने पोखर में नहाने का काम निबटा लिया। झरने तक जाने की फुर्सत नहीं है आज । नहा- कर खाना खा लिया और सीधे पाठशालागृह में जा पहुंचा। सारा काम खत्म कराफर जब वह निकला तो सिर से पैर तक चूने की गर्मी से कट गए हैं। सुद भी वह रघुनाथ के साथ सटता रहा । तिपहर के पांच बज रहे थे। कुरता- बनियान-जूते पोखर के किनारे रख वह पानी में उतर गया। तिपहर को घूमने जाना भी नहीं हो पाया। और भी बहुत-सारे काम बाकी हैं। आज उसने जरा चाय पी । मेह्नत की है. दो बार पोखर मे नहाया भी। चाय पीकर फिर चल पडा वह । अब यसबाय : बाबुओं को कोठी से एक कुर्सी मिली है-साहा ने भी एक दी है। सतीश मिस्त्री के घर से छोटा शेल्फ, मेज और ब्लैकबोर्ड मंगवा लिए उसने । ठीक दरवाजे के सामने दीवार से सटाकर उसने अपनी कुर्सी रखी, उसके सामने मेज, कुर्सी के दाहिने हाथ दीवार पर उसने ब्लकबोर्ड टांग दिया, इस ओर बड़े दो हुकों से पंकिंग वाक्स से बने शेल्फ को जड़ दिया 1 कुर्सी के ठीक सिर के ऊपर ढाई इंच लम्बी कील मजबूती से ठोककर उस पर क्लाक घड़ी लगा दी। दम देकर घड़ी को चालू कर दिया। मुहरले के छोटे-छोटे लड़के इकट्ठे हो गए थे। उनके उत्साह की भी कोई ओर- छोर नहीं। उनके लिए पाठशाला बन रही है, यही दे पढ़ेंगे। इसी बीच वे सीताराम को मास्टा जी कहकर पुकारने लगे है। घड़ी को चालू कर उन्ही लडको मे से एक सयाने को बुलाकर कहा, साहा जी की दुकान से पूछ आना कितने बजे हैं। कितने बजकर कितने मिनट ठीक-ठीक पूछ कर आओगे। दूसरे एक से कहा, तुम जाओ, यह चाबी लेकर धीरान मान के नये .'

५४::संदीपन पाठशाली जाओ। कन्हाई राय होगा, उसको देना, कहना, मास्टरजी की लालटेन दे दीजिए। फिर वह घड़ी की सूई घुमाने लगा। नो पर सूई थी। सावन का महीना, शाम हो आई है । इस वक्त कम-से-कम साढ़े छहः, पौने सात बजा होगा । दस, ग्यारह, वारह-टन्न-टन्न शब्द से घड़ी टंकोर बजा रही है। बढ़िया आवाज और तेज़ आवाज़! मास्टर जी! सीताराम चौंक पड़ा। धीरा बाबू की आवाज़ है। वह झट कुर्सी से उतर पड़ा। कमरे से बाहर निकल भाया । उसका दिल आवेश से भर आया। आप धीरा वाबू? धीरानन्द ही है। वह अकेले नहीं, श्यामू-देवू भी भाए हैं, साथ कन्हाई राय के दो हाथों में दो लालटेन । उनमें से एक सीताराम की है। धीरानन्द बोला, देखने आया कि आपकी पाठशाला कैसी हुई ? श्यामू-देवू भी आए हैं। सीताराम ने देवू को गोद में उठा लिया। देवू अपनी हंसी छिपाने की कोशिश में दांतों से होंठ दवाये मुंह फेरे रहा । धीरानन्द बोला, वाह ! बहुत अच्छा, वहुत खूब अकारण ही सीताराम शर्मा गया। फिर कुंठित स्वर में बोला, पाठशाला ? - जो है। धीरानन्द बोला, पाठशाला से कहीं बेहतर बना है। वाह ! घड़ी तो नई देख रहा हूं। सिर झुकाये सीताराम ने कहा, क्यों खूबसूरत है न ? इसी क्षण सीताराम ने खुद ही एक ऐव ढूंढ़ लिया। वगल की दीवार पर जैसे घड़ी लगी है वैसा ही उधर वाली दीवार पर अगर एक चित्र होता। धीरानन्द ने कहा, बहुत अच्छा हो । एक दीवार पर नहीं, तीन दीवारों पर तीन-स्वामी विवेकानन्द, महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर और एक-विधा- सागर का चित्र तो मिलता नहीं, एक माता सरस्वती का चिन्न! बड़ा ही अच्छा लगेगा। धीरानन्द की बात सीताराम को भा गई । उसके मुंह की ओर देखता रहा। उसे लगा, काश यह लड़का छोटा होता ! यह अगर उसका छान होता। ऐसा न हो तो छान ही क्या ! धीरानन्द वोला, इसके बाद हाथी, घोड़ा, शेर, गाय, भैंस, सांप इनके कुछ रंगीन चित्र मंगवा लीजिएगा। दीवार पर टांग दीजिएगा। लड़कों को बेहद पसन्द आएंगे। फिर उसने कहा, पाठशाला का नाम क्या रखा आपने ? नाम दीजिए- सन्दीपन पाठशाला । सन्दीपन मुनि की पाठशाला में श्रीकृष्ण ने पढ़ाई की थी।

संदीपन पाठशाला ::५५ इस बरामदे की दीवार पर मोटा-मोटा लिख दीजिए। या खुद ही एक साइन- वोर्ड बना डालिए। सीताराम विस्मय से मुग्ध-सा सुन रहा था। पहले दिन थाहर से इस लड़के की बातें सुनकर जैसी अद्भुत लगी थीं, इन दस दिनों के बाद फिर उसकी बातों से वैसा ही विस्मय जाग उठा। कन्हाई राय बोला, चलिए भैया साहव । चलो। धीरानन्द उठा ।-आप भी आइए मास्टर जी। माप चलिए। मैं जरा बाद में आ रहा है। लेकिन देवू तो मो गया है। धीरानन्द बोला, यह बड़ा चंचल है, जरा स्थिर होते ही सो जाता है। रायजी, तुम उसे ले लो। वे चले गए। सीताराम अकेला वैठा रहा। मेज पर लालटेन रख, कुर्मी पर बैठे बाहर अन्धेरे की ओर देखता रहा वह। उसकी पाठशाला! वच्चे शोर मचाते पढ़ते रहेंगे, वह बैठा रहेगा। तीखो नजरो से देखता रहेगा, जिसकी जहाँ गलती होगी संशोधन करता रहेगा । वे सारे लोहे के पिंड हैं। वह लुहार है। वह लोहे के पिंड से तरह-तरह का हथियार बना डालेगा। अथक मेहनत से उसके बदन से पसीना चू पड़ेगा । जतन से उनके धार पर सान चढ़ाकर तेज करेगा। साल-दर-साल लड़को में कुछ तो लोमर प्रायमरी पास कर चले जाएगे, वे बड़े स्कूलों में जायेंगे, वहाँ से कालेज चले जायेगे। कितने लोग जीवन में कृती बनेंगे । भेंट होते ही सविनय सम्मान से 'पंडित जी' कहकर उसको सम्बोधित करेंगे! यहां पढ़ाते-पढ़ाते वह प्रौढ़ हो जाएगा, वृद्ध होगा, सिर के बाल सफेद हो जायेंगे, क्षीण दृष्टि वाली आंखों पर ऐनक चढाए वह तब भी पढ़ाता रहेगा। वे उसके चारों ओर रहेंगे, नन्हें-नन्हें मुख कलरव करते हुए पढ़ेंगे। घड़ी में टन्न-टन्न दस बज गये । काफी रात हो गयी है, बाबू की कोठी मे भोजन समाप्त होने का ममय हो आया । वह उठा । लालटेन लेकर फिर एक वार कमरे को देखा। फिर दरवाजे पर ताला लगाकर आंगन में उतर आया। उसकी पाठशाला । आह ! आंगन में एक बगीचा-मा बनाना है । छोटे-छोटे कुछ पुरपे और दो छोटी. छोटी बालटियां सरीदेगा। लड़के पौधो के लिए जगह सोदेंगे, पोखर से पानी लाकर जड़ें सींचेंगे;-चारो ओर फूल खिले रहेंगे, सुन्दर शोभा होगी। लड़कों को एक फुटवाल भी खरीदकर देना है। कई कदम जाकर उसे याद माया, पड़ी के नीचे दम भरने का दिन लिख देना होगा--बुधवार, सन्ध्या सात - बजे। रोजाना सबेरे उठकर वह पुण्य श्लोकों का स्मरण करता है। बचपन से ही पिता से उसने यह सीखा है । बावा जो कहते हैं, बचपन में जो उसने सीसा था उसमें कुछ गलतियां हैं । इस समय बेशक वह शुद्ध श्लोक ही कहना उसने प्रगाढ़ भक्ति के माय उस श्लोक वा उच्चारण किया।

। -- ५.६ :: संदीपन पाठशाला मूर्ति मन-ही-मन कल्पना की और सिद्धिदाता गणेश का स्मरण किया। फिर उसने पुण्यश्लोक महात्माओं का स्मरण किया। रामकृष्णदेव को प्रणाम किया, उस नार्मल पास पंडित जी का स्मरण किया, प्रणाम किया; यहाँ के हेडमास्टर का भी स्मरण किया, प्रणाम किया। साथ ही साथ उसे याद आ गयी महात्मा हाजी मोहम्मद महसीन की मूर्ति । उनको भी प्रणाम कर वह दरवाजा खोल कर निकल आया। बाहर निकल कर वह बहुत खुश हुआ। सामने ही वाग में भोर के झुटपुटे में पक्की वेदी पर धीरानन्द वैठा था । अहा, भले आदमी का मुख ही देखा, दिन अच्छा बीतेगा। आज दिन अच्छा जाने का मतलब हुआ-- उसकी पाठशाला का भविष्य अच्छा होगा। पिछली रात वह घर नहीं गया। सवेरे से ही बहुत-सारा काम करना है। मुस्कराते हुए आगे बढ़कर उसने धीरानन्द से कहा, वाह, आप तो बहुत सबेरे उठते हैं ! धीरानन्द कुछ लिख रहा है। उसने कहा, जी । लिखता ही रहा वह । सीताराम ने इस छोटे-से उत्तर की प्रत्याशा नहीं की थी । वह जरा खिन्न हुआ। फिर भी कुछ क्षण खड़े होकर बोला, आज आपको प्रणाम करूंगा। क्यों? प्रणाम क्यों करेंगे ?--विना मुख उठाए ही धीरानन्द बोला। भाज अपनी पाठशाला खोलूंगा। लेकिन मैं तो किमी का भी प्रणाम नहीं लेता, अपने सगे लोग, याने भाई-बहनों के सिवा । मैं भी तो आप लोगों का अपना ही बन गया हूं। धीरानन्द लिखता ही रहा, जवाब नहीं दिया। सीताराम विस्मित नहीं हुआ, लेकिन उसे लगा, यह धीराबाबू की अधिकाई है, कुछ-कुछ चालबाजी जैसी ही। वह बिना प्रणाम किए ही धीरे-धीरे निकल गया और भरसक जल्दी लौट आया। वहुत-सारा काम है। शुभ कार्य, अपने जीवन की साध पूर्ण करने वाला कार्य आरम्भ करेगा वह । गांव के सारे देव- मन्दिरों में प्रणाम करना है । फिर यहाँ के ग्राम देवता-जाग्रत बूढ़ी काली माता के थान पर पूजा कराएगा। पूजा के अन्त में निर्माल्य लेकर कपड़े के टुकड़े में बांधकर पाठशाला के दरवाजे के सिर पर बांध देगा। माँ का प्रसादी सिन्दूर लेकर दरवाजे के सिरे पर लिखेगा--सिद्धिदाता गणेश जयति ! उसके नीचे पाठशाला खोलने की तारीख लिख रखेगा, २० श्रावण, सन् १३२६ बंगाब्द । झरने से लौटकर देखा, धीरानन्द अब और लिख नहीं रहा है, लिखा हुआ पढ़ रहा है। गड़ वी रखकर, बनियान-कुरता पहनकर निकल जाने के लिए सीताराम ने कमरे में ताला लगाया। सवेरे-सवेरे जाकर मन्दिरों में प्रणाम कर आएगा। धीरानन्द वोला, कितनी दूर घूम आए झरना तक। - ?

संदीपन पाठगालाः ५७ में भी रोज सवेरे टहलने जाता हूं लेकिन आज हो न सका । बडी नीद आ शायद बहुत मवरे न होगे, इसलिए । नहीं, कल रात को बिल्कुल सोया ही नहीं। रात-भर में एक कविता लिखी कविता-सीताराम दंग रह गया, इतना-गा लड़का कविता लिखता है ! उमने पूछा, कविता लिखी आपने ? जी। लेकिन अभी फिर कहाँ जाएंगे। देवी-देवताओं को ज़रा प्रणाम कर आऊँ । एक शुभ कार्य करने जा रहा है। जरा चुप रहने के बाद धीरानन्द ने कहा, लेकिन एक बुरी खबर दे रहा हूं। रघुनाथ राज का बेटा आया था आपको सीज में। वल रात को कुछ लोग पाठशाला के आंगन में उपद्रव मचाते रहे । उन लोगो या पर नजदीक ही है। उन लोगों ने देखा है। दाह-आड पीकर नाचते-कूदते रहे है शायद । कुछ नुकसान भी पहुँचाया है । बाबू टोले के चन्द लोगों के नाम भी वताए । सीताराम का दिमाग झन्ना उठा । वह फौरन भागने लगा। ठहरिए, मैं भी जाऊंगा। पाठशाला में घुसकर सीताराम स्तम्भित रह गया । साफ मुयरे मांगन और वरामदे को कदर्य रूप से गन्दा कर गये हैं। जूठे पत्तल, मांस का अवशेष, हड्डियों के टुकडे चारों ओर पड़े हैं । मिट्टी को जूगे हाँडी तोड़कर चारो ओर बिखेर दी गयी है । बगावग सफेद दीवार पर लकड़ी के कोयले से लिखा है --किसान-किसान-किसान, कलवार-पलवार-कलवार । एक संस्कृत श्लोक भी लिखा है। उसकी भापा विचित्र है और भाव भी- "अश्वपृष्ठे गजस्कन्धे यदि वा- दोलायाम् याते- न किसान सज्जनायते।" आंगन दुर्गन्ध से भर गया है । नीचतम दंग से आंगन को मले से भर दिया है। इसी बीच दर्शक भी बहुत सारे इकट्ठे हो गए थे। नाक कपड़े से दवाए उनमें कुछ तो इन युरी हरकत करने वालो को बुरा-भला माह रहे हैं और कोई. कोई इस रसिकता के रसग्राही जैसे मुस्कराकर धीमे स्वर में उनकी तारीफ कर रहे हैं । सीताराम मिट्टी का कुन-सा बना निर्वाक निस्पन्द-सा सड़ा रहा । ऐसे निष्ठुर और नीच अपमान का दु.ख उसको जीवन में कभी झेलना नहीं पड़ा था। कही शिवकिकर उसे पकहकर रास्ते पर हजार लोगों के सामने वेवजह जूता खोल कर मारता तो भी इतना दु.स न हुआ होता । ज्योतिष साहा मी बा पहुँचा, वह भी शुरू में सन्नाटे में आ गया। फिर वह सजग हो उठा। निमाई धुमाकर चारों ओर के लोगों को देख उसने व्यस्त भाव से कहा, ऐ, बस मेरे ५८:: संदीपन पाठशाला - - घर जाकर साड़ -पंजा तो लेते आना। रघुनाथ, रघुनाथ हो.? रघुनाथ था। उसने कहा, जी। सफेदी है और? हाँ शायद थोड़ी-सी बची है। हो तो बेहतर, वर्ना देखभाल कर ले आओ। दीवार पर की लिखावट घिस यार पोंछकर सफेदी पोत दोजाओ, जाओ, देर मत लगाओ। यह लो, झाड़- पंजा ले आए ? अरे भाई, चार थाने पैसा दूंगा, कोई पंजा से खुरचकर सारा मैला फेंक दे। किसी ने भी आहट नहीं दी। सभी लोग खिसकने लगे। जी, यह काम कौन करेगा? आठ आना पैसा दूंगा। एक ने कहा, अजी, समूचा एक रुपया देने पर भी यह नहीं होगा । मतिया मेहतर को बुलवा भेजिए। अचानक ही एक विस्मयकर घटना घटित हो गयी; धीरानन्द ने आगे बढ़कर पंजा उठा लिया, विना कुछ कहे-सुने ! फिर वोला, परेशान मत होओ ज्योतिष ! मतिया को ग्यारह बजे से पहले नहीं पाओगे। लेकिन, तो फिर आप क्यों ! लाइए, लाइए मुझे दीजिए। मुझे इसकी आदत है । मतिया से झगड़कर अपने घर का ड्रेन में सालभर साफ करता रहा हूँ। मुहल्ले में कुत्ता मरने पर उस लावारिस सड़ते जानवर को मैं ही फेंक आता हूं। धीरानन्द हँसा। सीताराम इस बार भागे बढ़ आया, उसकी निस्पन्द जड़ता इतनी देर में एक विपरीत भाव के आघात से दुर हो गई। उसने कहा, नहीं, मुझे दीजिए। मेरी पाठशाला है। उसका चेहरा तमतमा रहा है, होंठ फड़क रहे हैं । धीरानन्द बोला, यह तो मैं फेंक आऊँ। इसको लेकर खींचातानी करने से तो कोई फायदा नहीं। वही उसने किया, भैला फेक आया और पंजा सीताराम के हाथ में देते हुए बोला, आपकी पाठशाला है, आप तो करेंगे ही, लीजिए। सारी कीच मानो धीरानन्द ने पोंछ दी। फिर सारा-का-सारा साफ-सुथरा फर, नहा-धोकर जब वह देवस्थान में जाने के लिए तैयार हुआ तो उसका मन दिव्य प्रसन्नता से भर उठा था। सभी देवस्थानों में प्रणाम कर बूढ़ी काली माता को पूजा चढ़ाकर वह पाठशाला जा पहुँचा । उतनी देर में मुहल्ले के मातवर लोग बरामदे पर आ जमकर बैठ गए थे। ज्योतिष साहा ने किसी मजदूर से भाम के पल्लव मूंज की तुतली में पिरोकर बरामदे के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक टंगवा दिये हैं; दरवाजे के दोनों ओर दो जल-भरे कलशों के मुख पर भी आम्रपल्लव हैं। और इन दो कलशों के बगल में केले के दो छोटे-छोटे दरख्त । - -- - ।

संदीपन पाठशाला::५६ ! आंगन में लड़कों की भीड़। वे शोरगुल कर रहे हैं । सीताराम प्रमादी निर्माल्य लेकर आंगन में ही सड़ा हो गया। उसे बड़ा अच्छा लगा। गुवह मन जितना दुःस से वोझिल हो गया था, क्षोभ से जहरीला हो उठा था, उससे कही ज्यादा सुख और आनन्द से उसका दिल भर उठा। दुनिया में बुरे आदमी जितने हैं, नेक आदमी उनसे कहीं ज्यादा हैं, पाप से पुण्य अधिक है । इसमे उसे आज कोई सन्देह नहीं । भगवान के सिरजे हुए जो हैं वे ! इस क्षण भगवान का फिर एक बार स्मरण कर, प्रणाम कर, वह बरामदे पर उठ आया । निर्माल्य यांधना, नाम लिखना खत्म कर वह कुर्सी पर बैठ गया । ज्योतिप बगल की कुर्सी पर बैठा। लो, भरती शुरू करो। मेरे बेटे का नाम लिखो पहले-सीतेश चन्द्र साहा । ओ बेटा सीतेश, मास्टरजी को प्रणाम कर । दे, भरती की फीस दे दे । हो । क्यों स्वर्णकार काका, तुम्हारा बेटा कहाँ है जी? एक-एक कर सोलह लड़के भरती हुए। उसके प्रसन्न मन को यह मोतह संख्या भी बेहद भा गई। सोलह, शुभ सख्या है, पूर्णता का लक्षण । तिपहर को चार बजे छुट्टी। छुट्टी दे, सबकुछ सहेज, दरवाजे पर ताला चन्द कर जब यह रास्ते पर निकल माया, थकान से वह चूर-चूर हो रहा था। चाबी साहा जी को देनी है, उन्होंने सोने के लिए एक आदमी की व्यवस्था की है। एक भूल हो गयी है । टिफिन के वक्त भी याद पड़ी और छुट्टी के वक्त भी । एक घण्टा चाहिए । टन्न-टन्न ध्वनि के साथ स्कूल बैठेगा। टन्न-न-न-न शब्द के साथ स्कूल में छुट्टी होगी । उसे अपने पाठ्यजीवन की बातें याद हो माई। स्कूल लगने का घंटा वजता मानो वह पुकारता रहता। फिर छुट्टी का घंटा । अहा ! यह आवाज लडको के कानो मे कितनी सुहावनी लगती। घंटा एस चाहिए ही। एक अफसोस ! धीरावायू ने ऐसा बरताव किया, मां ने इतना माशीर्वाद दिया, लेकिन श्यामू-देवू को उसकी पाठशाला मे किसी तरह से भी भरतो नही किया। उन्होंने कहा---कई तरह के सोहबत-सगत से बचने के लिए ही तो घर पर तुमको रखा है वैटा! तुम्हीं तो उनको पढ़ाओगे। ट्रेन को सीटी बजी कहीं दूर, गांव के स्टेशन पर, गीताराम चौंक बजे वाली ट्रेन से मनोरमा भाएगी। जी मे आया लपक कर जाय । अगले ही क्षण वह अपने से झेंप गया । आज नहीं, वह तो कल है । याज बृहस्पतिवार है। पड़ा। पांच ..

६० :: संदीपन पाठशाला पाँच - वृहस्पतिवार को ही छुट्टी ली थी उसने वावुओं की कोठी से । शुक्रवार सवेरे उसे ख्याल हुआ कि शुक्रवार की भी छुट्टी उसे लेनी चाहिए थी। आज मनोरमा को लेकर बावा आएंगे । पाठशाला खोलने की तरह यह भी उसकी साध का एक दिन है। लेकिन मारे लाज के वह वता नहीं सका । मनोरमा के आने से पूर्व जो-जो काम उसने करने को सोच रखे थे उनमें प्रायः कुछ भी वह नहीं कर सका । कई रोज ये वातें सोचने का मौका ही उसे नहीं मिला मौका क्यों, मानो ध्यान ही से उतर गयी थीं। कमरे को खेत-मजूर और उसकी बीवी ने खड़िया मिट्टी से पोत दिया है । वावा ने बड़ा तस्तपोश मरम्मत के लिए भेज दिया था, मतिलाल बढ़ई ने उसे पहुंचा दिया है, लेकिन वह वाहर ही पड़ा है । बड़ा शेल्फ जो उसने बनवाया है, वह भी रत्नहाटा के सतीश मिस्त्री के घर से लाया नहीं गया। नायव जी अलगनी ले आए हैं, वह वावुओं की कोठी में पड़ी है । ख्वाहिश थी चार-पांच रुपए से एक टाइमपीस यां पाकेट वाच खरीदने की, रुपए में कमी होने से नहीं खरीद सका । उसे याद आया, वहाँ एक दवा की दुकान से दो पैकिंग केस उसने और खरीदे हैं। पुराने कपड़े या रंगीन अंगोछे से ढांप कर रखने से अच्छा दिखेगा। एक के ऊपर रहेगा मनोरमा का वक्सा । दूसरा तख्तपोश के बगल में रखने पर लालटेन, पानी का गिलास, पान-मसाला रखे जा सकेंगे । विस्तर पर लेटे मनोरमा के न आने तक किताव -इताव पढ़ेगा वह, किताव रखी जा सकेगी। इच्छा है कि एक साप्ताहिक अखवार वह रखे । पाठशाला में टिफिन के वक्त कुछ पढ़ेगा, शेष रात को घर लौटकर पढ़ेगा, उसको भी उसी पर रखेगा । एक और इच्छा है उसकी, रात को घर लौटते समय बावुनों की कोठी से कुछ फूल ले जाएगा वह । वावुओं की कोठी में रजनी- गन्धा, वेला, जूही फूल के कई पौधे हैं; और एक है मालती लता की बेल, अनगिनत फूलों से लदी रहती है, शाम को सारी कोठी मानों सुगन्ध से मतवाली बनी रहती। हर शाम कुछ फूल वावुओं की कोठी का नौकर चुनकर धीरावाबू के पढ़ने के कमरे में दे आता है । कभी-कभी डंठल समेत रजनीगन्धा काट कर ले जाता है । फूलदान में पानी भर उसमें लगा देने से, कहते हैं, बहुत दिनों तक रहता है । रोजाना रात को वह फूल ले जाया करेगा । फूलों को कांसे की तश्तरी पर सजाकर उसी वक्से पर रखेगा। लेकिन दोनों पैकिंग केस रत्नहाटा में हैं-उसी दुकान में पड़े हैं । खड़िया मिट्टी से पुती हुई दोवार पर खिड़कियों- दरवाजे-ताखे के ऊपर गेरू मिट्टी से चन्द अल्पना अंकित करने की इच्छा थी- सो भी नहीं हो सका । कुछ चिन्न उसके संग्रह में हैं, हुगली में पढ़ते वक्त मासिक पत्र से काट-काट कर एक कापी में रख दिया है, उनमें से कुछ को दफ्ती पर गोंद से चिपकाकर उसके चारों ओर काले कागज की वारीक पट्टी जैसी लगाकर टाँगने की कल्पना भी उसकी है। लेकिन कुछ भी नहीं हुआ। न - संदीपन पाठशाला::६१ हुआ हो, होगा। सबसे बड़ा काम तो हो गया है, पाठशाला तो खुल गयी है। यही उसका सबसे बड़ा आनन्द है। अब यह सब भी वह एक-एक करके कर डालेगा । जय भगवान-कहकर वह लेट गया । सवेरे उठ कुरता, बनियान, लालटेन, लाठी, छाता लेकर निकलने के बाद भी गांव के सिवान से वह लौट आया। किसी तरह से भी उसे जाने की इच्छा नहीं हुई। सवेरे से दस बजे तक सहेज लेने पर वह काफी कुछ सहेज लेगा। सेत-मजूर को लेकर उसने पहले ही तस्तपोश को कमरे में लाकर रख दिया, कमरे के दक्षिण-पूर्व कोने मे । सिरहाने एक खिड़की और बगल में भी एक । खिड़की हालांकि नाम से ही, यों चौड़ाई में एक हाथ और लम्बाई में बस डेढ़ हाथ । खैर जो है सो है । पुराने जमाने का घर है। छोटी है तो क्या, है तो खिड़की हो। फिर उसने खेत-मजूर से कहा, रलहाटा चला जा तू । दौड़ते हुए जाना और आना पडेगा। पहले जाना बाबुओ की कोठी में । वताना, इस वेले मैं जा नहीं सका । अगर पूछे, क्यो? तो वताना,--| वह चुप हो गया। क्या बताऊं? बताना- और भी कुछ देर सोचा, झूठमूठ तबियत खराब होने की बात वसाते संकोच हुआ ! सच्ची बात उम्दा ढग से कैसे बतायी जाय इसको सोच न पाने से उसने कहा, मताना, यह तो वे ही आकर बताएगे। हाँ, वहाँ जिस कमरे मे मैं रहता हूं उस कमरे मे एक नई बलगनी, लकडी की बनी अलगनी, नायव जी वर्धमान से खरीद लाये हैं, उसको ले लेना, कन्हाई राय से कहते ही यह निकाल देगा। यह रही कमरे की चाबी। दवा वाली दुकान में दो लकड़ी के बक्से खरीदे रखे हैं । वताना, सीताराम मास्टर का किसान हूँ मैं, मुझे दे दें। हल्के बक्से हैं, उन दोनों को लेने के बाद मतीश वढई के पास जाना । वहां और एक लकड़ी का सामान है। -सतीश से कहना, लकड़ी वाली यह टांड दे दो। वह भी वहुत हल्की है । एक के ऊपर दूसरा, दूसरे के ऊपर तीसरायों सजा- पर धरे सनसनाते हुए चले आना, समझे ? तेज़ चाल जाना और तेज चाल आना। इसके लिए तुझे दो बाने पेशगी दे रहा हूँ, जल्दी-जल्दी लोट माओ तो और दो आने मिलेंगे। सेत-मजूर चला गया । सेत-मजूर की बीवी से कहा, कमरे की फर्श और आंगन को अच्छी तरह लोपपोत दो भौजाई । तुमको भी दो आने मिलेंगे। किसान वधू कोई तरणी नहीं है, अधेड़ उम्र की है, उसने सीताराम को किशोर वय में देखा है, देवर का सम्बन्ध बनाकर बातचीत करती है, हमकर बोली, आज पंसा नहीं लूंगी । आज तुम्हारी दुल्हन बाएगी, आज जो कुछ भी कहोंगे अच्छी तरह कर दूंगी। लेकिन दुर्गा-पूजा मे कपड़ा लूगी। क्यों, भागते क्यों जी! बो देवर ! अभी माया। सीताराम लपककर निकल गया। अच्छी जवाबदेही मिल गई उसे । खेत-मजूर को पुकार कर लौटाया और बोला, अगर वावुओ की कोठी कर .

६२ :: संदीपन पाठशाला । पूछे क्यों नहीं आया तो बताना--- जी हां, काहगा, वह तो वे आकर बताएंगे। नहीं। बताना-बावा घर पर नहीं हैं, घर या कोई काम है, इसलिए इस वेले नहीं आ सके । सीधे पाठशाला आएंगे। क्यों? जी, ऐसा ही बताऊंगा। यकायक ही सच्ची वात कितने बेहतरीन ढंग से उसे याद आ गयी है। बात बताकर खुश-खुश यह घर लौट भाया। रास्ते में एक गली में घुसकर थोड़ा-सा जाते ही जुलाहों का घर है। दो बढ़िया रंगीन अंगोछे लाने हैं। मोफ ! बड़ी गलती हो गयी। कुछ छोटी कीलें लाने के लिए कह देता। उसने आकाश की ओर देखा । आंगन में छाया देखी। किसी जमाने में आंगन की छाया देखकर वह स्कूल जाया करता था। मावन के महीने में शायद यहां-सीढ़ी के बीच पूरब चाले घर की छाया आ पड़ने पर साढ़े नौ बजते थे और, और वे स्कूल जाते थे। अव भी काफी समय है। पाठशाला ग्यारह बजे है, वह यहां से दस बजे जाएगा। तन्तुवाय के घर से अंगोछा खरीद लाने के बाद उसने चित्र निकाले । गोंद तैयार कर वह चित्रों को तैयार करने लगा। बाबुओं के साथ सम्पर्क करने में उसे मानो कोई संकोच है। हाथ का माग अधूरा छोड़ उसी समय वह वायुओं की कोठी की ओर दौड़ पड़ा। ठीक वक्त पर ही वह पहुँचा-साढ़े दस से पांच मिनट पहले ही । इरादा था कि वहां नहायार खाना खा लेगा, फिर पाठशाला जाएगा। लेकिन रत्नहाटा पहुंचने के बाद वायुओं की कोठी के नजदीक आकर उसने एक संकोच का अनुभव किया । अगर न आने का कारण पूछ बैठे ? पूछे, कौन-सा ऐसा काम था जी? तो वह क्या कहेगा? आज मनोरमा आएगी, उसी के लिए घर-द्वार जरा सहेज कर रख रहा था~यह क्या कहा जा सकता है ? इसके अलावा, सीताराम का दिल घड़क उठा, अगर कहें-इस तरह नागा करने से क्या काम चलता है ? कहना कोई नामुमकिन तो नहीं है। मां शायद मधुर लहजे में कहेंगी, धीराबावू घुमाफिरा कर । लेकिन वह भेंगा नायव जी शायद सीधे-सीधे ही कह डाले, यहां तक कि कन्हाई राय भी कह सकता है। उस मध्यपदलोपी कर्मधारय और उपपद इन दोनों पर क्रमशः मानो उसका मन विरूप होता जा रहा है । नायव का नाम रखा है उसने मध्यपदलोपी कर्मधारय, सभी कुछ में है, कोई भी नहीं है, लेकिन वे ही सबकुछ घटित कराते हैं। कन्हाई राय नितान्त अप्रधान होते हुए भी सभी बातों में है, अधिकार हो चाहे न हो, रोय झाड़ेगा ही, इसलिए उसका नाम रख छोड़ा है 'उपपद। वे अगर जवाव तलव करें तो जवाव न देने से शायद उसकी इज्जत वरकरार रहेगी, लेकिन विना काम किये खाने के लिए जा पहुँचने पर, अपमान उसका हो जायगा, खुद ही कर बैठेगा, इससे न जाना ही बेहतर है। वह लौटा। विना नहाये, बिना खाये आकर पाठशाला खोलगार पह गया। - - - संदीपन पाठशाला::६३ छुट्टी के बाद वह बायुमो की कोठी गया। लेकिन इस बार भी उसकी शका झूठी गावित हो गयी । नायब ने हंसकर कहा, क्यो पंडित, मिठाई कहाँ ? मिठाई ? कन्हाई ने हंसकर कहा, ससुराल की। नायव बोला, टुरहन आयी? अरे नही, शायद पांच बजे वाली ट्रेन से आएगी! सीताराम के कान शर्म से लाल हो उठे। वह समझ गया कि निगोहे सेत- मजूर ने सबकुछ बता दिया है। कन्हाई बोला, जाओ, कोठी के भीतर तो जाओ। श्याम-देवू जिद्द पकड़े बैठे हैं, मास्टर जी को दुल्हन देखेंगे। सीताराम यानन्द से उच्छ्वसित हो उठा और उस वेले के मंकोच के लिए लज्जित अनुभव करने लगा। नायब और कन्हाई के प्रति विरूप मनोभाव के लिए ग्लानि भी कोई कम नहीं हुई। उसने निश्चय किया, ठगे जाना ही है अगर तो आदमी को नेक समझकर वो जाना ठीक है । दुरा सोचकर ठगे जाने से बढ़कर कोई अपराध नहीं, उसमें अपने ही निकट अपराधी बनना पड़ता है। इस क्षण उसने यही संकल्प लिया। श्यामू और देवू लड़-झगड़ रहे थे। कोठी में कोई और नहीं । अवेले में द्वन्द्वयुद्ध काफी जोर पकड़े है, श्यामू बड़ा है, देवू उससे मुकाबला नही कर पा रहा है, जमीन पर गिर रहा है, मुंह लाल हुआ जा रहा है, लेकिन अजीब लड़का है, रो नहीं रहा है। सीताराम जरा हमकर मार्ग वढ गया, छोड़ो, छोड़ दो श्याम ऐसे ही समय मां निकल आयीं । वे भी बोलों, श्यामू ! देवू ! सीताराम ने देखा, मां के गले की आवाज़ से करिश्मा हो गया, श्यामू हट आया लेकिन देव उठा नहीं, निश्चल-सा जमीन पर पड़ा रहा। गोताराम ने सस्नेह उसे उठाना चाहा, लेकिन वह किसी कदर उठेगा नहीं। कोई अवलम्बन न मिलने से वह आंगन को ही नाखून से खरोचकर पकड़ना चाहता था। सीताराम ने हंसकर उसे गोद में उठा लिया। वह क्षण-भर में फफककर रो पड़ा और दोनों हाथो से पागल की तरह मास्टर के मुह पर बूंसा- चांटा मारने लगा। मीताराम परेशान सा हो उसे दोनों हाथों से मुलाये जरा दूर टांगे रहा। वह अब दोनों पर फेंकने लगा। अपनी पराजय की लज्जा से वह बेहद अपमानित और क्षुब्ध हो उठा है। मां ने फिर एक बार कहा, देवू ! देवू के पर निश्चल हो गए, दोनो हाथ शिथिल पड़ गये, सिर झुक गया, लकवा मारे मरीज की तरह । मां बोली, सीताराम, उसे उतार दो यहां-उतार दो। सीताराम उस आदेश का उल्लंघन करने का साहस नही कर सका--उस कठस्वर के आदेश का।

६४: : संदीपन पाठशाला ! , । माँ ने कहा, देवू, तुम्हारे इस कसूर के लिए तुम स्टेशन नहीं जा सकोगे, मास्टर जी की दुल्हन देखने के लिए। श्यामू ! तुम कमीज पहन लो । सीताराम चुप खड़ा रहा । बड़े लोगों के घरों का शासन भी अजीव है ।उसे लगा, इस मामले में वह मानो बहुत छोटा हो गया है । उसे लगा, ऐसी शासन- पद्धति जिन लोगों की है, उनको पढ़ाने की योग्यता उसमें नहीं है । उसकी बड़ी इच्छा थी कि श्यामू का हाथ थामे और देवू को गोद में लेकर वह स्टेशन जाएगा। मनोरमा को दिखाएगा । दिखाएगा, उसके दो छात्र कैसे हैं। लेकिन इस घटना के बाद यह बात उठाने की हिम्मत नहीं पड़ रही है उसे मां ने कहा, बहू को यहाँ नाश्ता-पानी करा ले जाने में क्या कोई अमुविधा होगी वेटा? सीताराम वोला, और एक दिन आ जाएगी। माज-~। रूठ करके ही उराने यह कहा । वर्ना इच्छा थी उसकी । पाठशाला भी दिखाने की इच्छा होती है। लेकिन कुछ खिन्न मन से श्यामू को लेकर वह स्टेशन गया । मनोरमा ट्रेन से उतरी। ट्रेन के अन्दर ही बूंघट के भीतर से उसकी आँखों की काली पुतलियाँ सीताराम को दिखाई पड़ों, उसी को देख रही थी वह । होंठों पर मुस्कान खिल आयी है । सीताराम लजा गया, वह बहुत ही व्यस्त होकर चुस्ती से सामान उतारने में लग गया। बावा बोले, तू इतना परेशान मत हो, कहीं चोटाय जाएगा। किसान को उतारने देन। वह खेत-मजूर आया, वही सब सामान ले जाएगा, उसकी बीवी भी आई है और उनका वारह-चौदह साल का बेटा भी। उन्हीं की तो मालकिन है । फिर पहली बार दुल्हन आ रही है तो सामान एक आदमी के लदान से भारी होगा, यह वे जानते हैं । श्वसुर ने काफी सामान दिया है। सीताराम गोला, बावुओं का मॅझला बेटा, मेरा बड़ा छान देखने आया है। वावा बोले, कहां है ? बूंघट के भीतर से मनोरमा की उत्सुक सवालिया आँखें सीताराम के मुख पर टिक गयीं। सीताराम ने हँसकर पीछे पलटकर देखा, श्यामू के बगल में कन्हाई राय देवू को भी गोद में लेकर जाने कब आकर खड़ा हो गया है । देवू शरारत से मुस्करा रहा है। कन्हाई ने हँसकर कहा, मां ने भेज दिया। वह को नापता-पानी करा ले जाने के लिए कहा है। सीताराम ने देबू को गोद में लेकर कहा, तुम चलो रायकाका, मैं जरा आ रहा हूँ। वावा किसान के सिर पर सामान-बस्त लादने में व्यस्त हैं। सीताराम ने धीमी आवाज़ में देवू से कहा, यह लो देखो मास्टर की दुल्हन-तुम लोगों की मास्टरनी। जाओ गोद में जाओ। साथ ही साथ मनोरमा ने हाथ बढ़ाया। - संदीपन पाठशाला :: ६५ दांतों से होंठ दवाकर हँसी रोकते हुए देवू मास्टर से चिपक गया। सीताराम ने हंसकर मनोरमा से कहा, बड़ा ही लजीला. और जिद्दी है। आज मुझे पीटा है । तुम श्यामू को गोद में ले लो। मनोरमा ने श्यामू को गोद में उठा लिया। सीताराम बोला, आओ, रानी मां ने कहा है, उनके घर में नाश्ता-पानी कर घर जा सकोगी। मेरे छान तो है ही-जमीदार की कोठी भी है-भेट भी हो जाएगी। मां बोली, अच्छी दुल्हन है । बेहतरीन लड़की है। दो रुपये देकर आशीर्वाद किया । बोली, खुद सुखी होओ, पति को सुखी बनाओ। सीताराम से बोली, तुम माज बहू को लेकर घर जाओ । श्यामू-देवू को आज छुट्टी दो, उनको गुरु मां आयी हैं। बातें सुनकर सीताराम मुग्ध हो गया । ऐसी कुशलता से वातें करते किसी को उसने सुना नहीं था। श्यामू-देवू की छुट्टी उससे मंजूर करवाकर उसको छुट्टी दे रहे हैं । उसने कहा, नहीं। में पढाकर खाना खाने के बाद जैसा जाया करता हूं वैसा ही जाऊँगा। नही, वह कर्तव्य की अवहेलना और नहीं करेगा। शाम के बाद लड़कों को पढाकर खाना खाकर जाते वक्त उसने सब के अनदेखे कुछ मालती फूल चुन लिये । दिन को चुन नहीं सका था गारे शमं के । शुट्टी लेने में उसे एतराज नही था, लेकिन ये फूल चुनना रह गया होता। मनोरमा खुश हुई। बोली, पंडित जो हो । सीताराम हेमा। फिर वोला, घर-द्वार पसन्द आया? मनोरमा बोली, मुझे तो लाज लग रही थी। क्यों? बावा ने पर में घुमते ही कहा-वाह, यह कमरा तो मोताराम बड़ा वढिया वना रखा है ! वाह, वाह, वाह ! फिर बोले-बहू, सीता के साथ मेरा कमरा भी ऐसा ही बना देना बेटी । सुनकर मनोरमा को बड़ी लाज लगी। सोताराम भी लजा गया । छी छी छो! केवल छी छो ही नहीं, वेजा काम हो गया है उससे । बाबा का कमरा उसे पहले मजाना चाहिए था । छी ! मनोरमा बोली, तभी से देख रही हूं और सोच रही हूं, हो तुम पडित आदमी जी। सीताराम ने उसे प्यार से सीने मे खीच लिया। कान्धे पर मुंह रखकर मनोरमा बोली, जब खबर पहुँची, तुम पास नहीं कर राके तो मुझे रोना आ गया था। छिपछिपकर रोयी थी मैं । लेकिन, अब मुझे कोई अफमोस नहीं । बाबुओं की कोठी मे तुम्हारी खातिरदारी देखी, छान देखा, यही मेरे लिए काफी है। आवेश से सीताराम का दिल भर आया । उसे लगा, उससे सुखी व्यक्ति और कोई नहीं।

६६ : :संदीपन पाठशाला - छह सुखी सीताराम । सुख-भरे जीवन में बरसात के कारण सतेग दरख्त की तरह वह बढ़ने लगा। स्वस्थ देह लिए सबल पदक्षेप से यह पथ पर चलता, उत्साह- दीप्त आंखों से छात्रों के मुख की ओर देख वह निष्ठा से पढ़ाता है । उनको अपने मनमाफिक गढ़ने के लिए वह भरसक प्रयत्न करता । दुलारता, डांटता, मारता भी । मनोरमा को सुखी करने की कोशिश करता, मनोरमा ने उसे सुखी बनाया है। वावा की सेवा करता। लेकिन वहीं मानों अचानक एक कोटा-सा उभर भाया है, दिनों-रात फरक रहा है--निष्ठुर रूप से दुखदायी है उसका स्पर्श । समझ में नहीं आता-यह कांटा किस तरह कहां से उग नाया। न समझने पर भी सीताराम ने धीर भाव से इस दुःख को ग्रहण किया। सुख और दुःख इन्हीं को लेकर जीवन है । प्रकाश और अन्धकार, दिन और रात-यही लेकर काल है। धरती की मिट्टी, जिस मिट्टी में फसल उगती है, जिस मिट्टी पर लेटने से लगता, मां की गोद में लेटा हूं, उसी मिट्टी में पत्थर है, यह पत्थर वदन को कोचता है, नाखून को चोट पहुंचाता है, उस पर गिर कर आदमी मर भी जाता है। जल, जो जल अंग को शीतल करता, दिल को ठंडक पहुंचाता है वही जल कभी-कभी बाढ़ वनकर सबकुछ बहा ले जाता है- यह सबकुछ सीताराम जानता है। इसलिए छोटे-मोटे वाधा-विघ्न और दुख के वावजूद वह अपने जीवन को सुख के जीवन के रूप में ही जानता है। इस दु.ख के बीच अचानक एक दिन पिता रमानाथ चल बसे । यह नाघात उसके लिए भयंकर भाघात था, मर्मान्तक हो उठा । चार साल की उम्र में यह मातृहीन हुआ था, उसी समय से ही वावा उसके पिता-माता दोनों बन गये थे। मरते समय बावा ने उससे पाहा, रोना मत । मैं तो मुख का जाना जा रहा हूं तूने मेरे वंश का मान बढ़ाया है, दस लोग तुझे पंडित कहकर सातिर कर रहे हैं, घर में लक्ष्मी के समान मेरी बहू है, मेरे जाने में सेद किस बात का? जरा- सी विपाद-भरी मुस्कान के साथ कहा था, एक ही खेद रह गया, तेरे बेटे को देखकर नहीं जा सका। खैर--मैं ही तेरा बेटा वनकर फिर मा जाऊंगा। सीताराम पत्थर का बुत्त बना वैठा था । वह यदि चंचल हो जाये, उसको मांखों में यदि आंसू देख लें तो शायद वावा महायात्रा के समय चंचल होंगे । एक कहानी उसे बार-बार याद आ रही थी। वह शान्तिनिकेतन गया था। उस समय शान्तिनिकेतन में सर्वत्र एक विषाद-भरी छाया छायी हुई थी। इससे पूर्व जैसा देखा था गोया वैसा नहीं । पता लगा था, कविवर रवीन्द्र नाथ के बड़े भाई ऋषितुल्य द्विजेन्द्र नाथ के बेटे दीपेन्द्रनाथ का हाल में देहान्त हो गया था। वह खुद भी दुखी हुआ था। हाय, वुढ़ापे में यह कैसा शोक मिला उनको! इतना बड़ा आघात क्या कोई और हो सकता है ? भगवान से कहा था, यह कैसा न्याय है तुम्हारा ? लौटते वक्त द्विजेन्द्रनाय के बंगले के बगल से ही वह लौटा था । एक ।

संदीपन पाठशाला :: ६७ बार उनको देखने की इच्छा थी। द्विजेन्द्रनाथ के बंगले के सामने सुले बरामदे पर बोलपुर के वकील बाकर बैठे हुए थे, हमदर्दी जताने आए थे। द्विजेन्द्रनाथ प्रशान्त चेहरा लिये उनसे बातें कर रहे थे, कुछ बातें उसके मन में अक्षय बनी हुई हैं । देह का लय है मृत्यु, यह तो अवश्यम्भावी है। उसके लिए शोक-! वात को पूरी न करके ही वे मुस्फराये थे। यनोसी मुस्कान थी यह । ऐसी मुस्कान सीताराम ने जीवन में और पिसी के चेहरे पर नहीं देखी । इसके बाद वे दूमरी यातें करने लग गये । वकीलो में हर व्यक्ति का पुशल पूछने लगे। वे अवश्य ही महापुरुप हैं, ऋषितुल्य मनुष्य, और वह है सामान्य जन । उनके साथ किसकी तुलना हो सकती है ? लेकिन महाजनों का अनुसरण ही तो मनुष्य को करना चाहिए । वह रोया नहीं। लोगो ने लेकिन दूसरी बातें की, उसकी जपन्य निन्दा यो । योले, कहावत है न-बाप मरा बला टली, सीताराम को वैसा ही हुआ है । बूढा हर वक्त चिड़ाता रहता था , बूढा मर गया, उसको भी मुक्ति मिली। इन दिनों बाबा का रस कुछ ऐमा ही हो गया था। मुख के लिए जो गृहस्थी थी मानो उनके प्रमुख का कारण बन गयो । सदा ही अमन्तोष सताता रहता । कुछ भी पसन्द नहीं आता था। मनोरमा पर ही उनकी विरूपता मबसे अधिक थी, कोई भी सेवा करने जाती तो गाहते, रहने दो वचवा, रहने दो। 'बचवा' कहते थे, 'धेटी' नहीं। मनोरमा अपराधिन-सी स्तब्ध खड़ी रह जाती थी वावा इस पर भी गुस्साने लगते थे, गुस्गा मानो बढ जाया करता था, कहते थे, जाओ न बचवा, कुछ पामकाज हो, करो जाकर । जाओ, देखो मीता क्या मांग रहा है आखिरी बात में व्यंग प्रच्छन्न रहता, रास वी पतली तह से ढके संगारे को माई । उत्ताप की ज्वाला पौरन महमूग हो जाती थी एक दिन बाबा ने पाने की थाली उठाकर फेंक दी थी । उनको अरुचि हो गयी थी। सीताराम ने ही कहा था, रात को परा हलवा बना दिया करना, स्वाद भी आयगा, घी-दूध भी पेट में जाएगा। किसान के घर में लइया ही नाश्ता है, गुड ही मिठाई है, सूजी-चीनी का इन्तजाम नहीं था। घी हमेशा से ही है, दूध की साढ़ी जमाकर घी निकाला जाता, हालांकि विक्री के लिए ही निकाला जाता । सूजी-चीनी मीताराम ने रलहाटा से ला दी थी। मनोरमा ने रात में हलवा की थाली उनके सामने रखी ही थी कि हाथ से कुरेद कर नाक से मूंघ कर, वत्ती को तेज कर देखने के बाद पूछा था, यह भला क्या है ? 'आपके लिए जरा हलवा बनाया है। हलवा? मोहन मोग? जी ! याप कुछ भी सा नहीं पा रहे है। खोल-दूध भी मला कितना सा सकते हैं ? इसलिए- ६६ : :संदीपन पाठशाला छह सुखी सीताराम । सुख-भरे जीवन में बरसात के कारण सतेज़ दरख्त की तरह वह बढ़ने लगा। स्वस्थ देह लिए सवल पदक्षेप से वह पथ पर चलता, उत्साह- दीप्त आंखों से छात्रों के मुख की ओर देख वह निष्ठा से पढ़ाता है । उनको अपने मनमाफिक गढ़ने के लिए यह भरसक प्रयत्न करता । दुलारता, डांटता, मारता भी । मनोरमा को सुखी करने की कोशिश करता, मनोरमा ने उसे सुखी बनाया है। वावा की सेवा करता। लेकिन वहीं मानों अचानक एक कांटा-सा उभर आया है, दिनों-रात करक रहा है-निष्ठुर रूप से दुखदायी है उसका स्पर्श । समझ में नहीं आता-यह कांटा किस तरह कहाँ से उग आया। न समझने पर भी सीताराम ने धीर भाव से इस दुःख को ग्रहण किया। सुख और दुःख इन्हीं को लेकर जीवन है । प्रकाश और मन्धकार, दिन और रात~यही लेकर काल है । धरती की मिट्टी, जिस मिट्टी में फसल उगती है, जिस मिट्टी पर लेटने से लगता, मां की गोद में लेटा हूँ, उसी मिट्टी में पत्थर है, वह पत्थर बदन को कोंचता है, नाखून को चोट पहुंचाता है, उस पर गिर कर आदमी मर भी जाता है। जल, जो जल अंग को शीतल करता, दिल को ठंडका पहुंचाता है वही जल कभी-कभी वाढ़ वनकर सबकुछ बहा ले जाता है.--- यह सबकुछ सीताराम जानता है। इसलिए छोटे-मोटे वाधा-विघ्न और दुख के बावजूद वह अपने जीवन को सुख के जीवन के रूप में ही जानता है । इस दु.ख के बीच अचानक एक दिन पिता रमानाथ चल बसे । यह आघात उसके लिए भयंकर आघात था, मर्मान्तक हो उठा । चार साल की उम्र में वह मातृहीन हुना था, उसी समय से ही वावा उसके पिता-माता दोनों बन गये थे। मरते समय वावा ने उससे कहा, रोना मत । मैं तो सुख का जाना जा रहा हूं रे। तूने मेरे वंश का मान बढ़ाया है, दस लोग तुझे पंडित कहकर खातिर कर रहे हैं, घर में लक्ष्मी के समान मेरी बहू है, मेरे जाने में खेद किस बात का? जरा- सो विपाद-भरी मुस्कान के साथ कहा था, एक ही खेद रह गया, तेरे बेटे को देखकर नहीं जा सका। खैर-~~-मैं ही तेरा बेटा वनकर फिर आ जाऊंगा। . सीताराम पत्थर का बुत बना वैठा था । वह यदि चंचल हो जाये, उसकी आंखों में यदि आंसू देख लें तो शायद वावा महायात्रा के समय चंचल होंगे। एक कहानी उसे बार-बार याद आ रही थी। वह शान्तिनिकेतन गया था। उस समय शान्तिनिकेतन में सर्वत्र एक विपाद-भरी छाया छायी हुई थी। इससे पूर्व जैसा देखा था गोया वैसा नहीं। पता लगा था, कविवर रवीन्द्र नाथ के बड़े भाई पितुल्य द्विजेन्द्र नाथ के वेटे दीपेन्द्रनाथ का हाल में देहान्त हो गया था। वह खुद भी दुखी हुआ था। हाय, बुढ़ापे में यह कैसा शोक मिला उनको! इतना बड़ा आघात क्या कोई और हो सकता है ? भगवान से कहा था, यह कैसा न्याय है तुम्हारा ? लौटते वगत द्विजेन्द्रनाथ के बंगले के बगल से ही वह लौटा था । एक . ।

संदीपन पाठशाला :: ६७ । चार उनको देखने की इच्छा थी। द्विजेन्द्रनाथ के बंगले के सामने खुले बरामदे पर वोलपुर के वकील आकर बैठे हुए थे, हमदर्दी जताने आए थे। द्विजेन्द्रनाथ प्रशान्त चेहरा तिये उनसे बातें कर रहे थे, कुछ बातें उसके मन में अक्षय बनी हुई हैं । देह का लय है मृत्यु, यह तो अवश्यम्भावी है । उसके लिए गोक--! चात को पूरी न करके ही वे मुस्कराये थे। मनोसी मुस्कान थी वह । ऐमी मुस्कान सीताराम ने जीवन में और किसी के चेहरे पर नहीं देखी । इसके बाद ये दूगरी वातें करने लग गये । वकीलो में हर व्यक्ति का कुशल पूछने लगे। वे अवश्य ही महापुस्प हैं, ऋषितुल्य मनुष्य, और वह है सामान्य गन । उनके साथ किसकी तुलना हो सकती है ? लेकिन महाजनों का अनुसरण ही तो मनुष्य को करना चाहिए। वह रोया नहीं। लोगों ने लेकिन दूसरी बातें की, उसको जघन्य निन्दा की । बोले, कहावत हैन-बाप मरा बला टली, सीताराम को वैसा ही हुआ है। बूढा हर वक्त चिड़ाता रहता था , बूढ़ा मर गया, उमको भी मुक्ति मिली। इन दिनों वावा का रस कुछ ऐसा ही हो गया था। सुख के लिए जो गृहस्थी पी मानो उनके अगुख का कारण बन गयो । सदा ही असन्तोप मताता रहता । कुछ भी पसन्द नहीं आता था। मनोरमा पर ही उनकी विरूपता गवसे अधिक थी, कोई भी सेवा करने जाती तो कहते, रहने दो बचवा, रहने दो। 'बचवा' कहते थे, 'बेटी' नहीं। मनोरमा अपराधिन-सौ स्तब्ध पड़ी रह जाती थी। वावा इस पर भी गुस्साने लगते थे, गुस्मा मानो बढ़ जाया करता था, कहते थे, जाओ न यघवा, कुछ कामकाज हो, करो जाकर । जाओ, देखो सीता क्या मांग रहा है। आखिरी बात में व्यंग प्रच्छन्न रहता, रास वी पतली तह से ढके अंगारे की नाई। उत्ताप की ज्वाला फौरन महमूम हो जाती थी। एक दिन यावा ने खाने की थाली उठाकर फेंक दी थी । उनको अरुचि हो गयी थी । मीताराम ने ही कहा था, रात को जरा हलवा बना दिया करना, स्वाद भी बायगा, धी-दूध भी पेट में जाएगा। किसान के घर में लइया ही नाश्ता है, गुड़ ही मिठाई है, सूजी-चीनी का इन्तजाम नहीं था। घो हमेशा से ही है, दुध की साढ़ी जमाकर घी निकाला जाता, हालांकि वित्री के लिए ही निकाला जाता । मूजी-चीनी सीताराम ने रत्नहाटा से ला दी थी। मनोरमा ने रात में हलवा की थाली उनके सामने रखी ही थी कि हाथ से कुरेद कर नाक से सूंघ कर, वत्ती को तेज कर देखने के बाद पूछा था, यह भला क्या है ? 'आपके लिए जरा हलवा बनाया है। हलवा ? मोहन भोग? जी! आप कुछ भी सा नहीं पा रहे हैं। खील-दूध भी भला: सकते हैं ? इसलिए--- ।

६८ :: संदीपन पाठशाला - इसलिए हलवा बना है। इस बार डर गई थी मनोरमा। जवाब न दे सकी। चीनी क्या हमारे खेत में पैदा होती है ? या रवा ही हमारे खेत में होता है ? इसके बाद आकस्मिक विस्फोट-सा ही वे फट पड़े थे, मैं किसान का बेटा किसान हूँ। नमक छोड़ कर खेत की उपज के अलावा और कुछ मैं तो मैं-मेरे चौदह पुश्तों में किसी ने खाया नहीं। मैं खाऊंगा हलवा ?-~कहकर थाली फेंक वे उठ गये थे। उस वक्त भी उतका अफसोस जारी था लक्ष्मी को भगाया, तुम्हीं ने मेरी लक्ष्मी को खदेड़ा है। मुहल्ले-भर में वे यह बात कहते भी फिरते रहे । अलक्ष्मी बहू ने मेरी लक्ष्मी को भगा दिया। सीताराम को भी वे बड़े ल्खे ढंग से देवजह ही वीच-बीच में डांटते-फटकारते थे। रविवार का दिन । वह अब दिन में भी घर में खाना खाता है, सुबह वावुओं की कोठी में जाकर लड़कों को पढ़ाकर साढ़े दस बजे घर लौटता है, दिनभर घर ही पर रहता, शाम को फिर जाता, रात को रोजाना की तरह लौट आता। इसी रविवार को बावा खेत से थके-मांदे लौटे थे, सीताराम पंखा सलने गया था। हाथ से पंखा छीनकर उन्होंने कहा था, रहने दो बेटा, रहने दो, मैं किसान का बेटा किसान हूँ, धूप-पानी में खेतों में खट कर ही जिन्दगी वीत गई, बीत जाएगी भी। हम लोग कुर्सी पर बैठे पंडिताई नहीं करते। पंखे की हवा खाने के हम मादी नहीं। सीताराम स्तम्भित रह गया था। बावा फिर भी रुके नहीं थे, बड़े ही मीठे स्वर में बोले थे, रविवार छुट्टी का दिन है, आज थोड़ा ऐश-मौज करो जाकर । इसलिए सीताराम जरा दूर-दूर ही रहा करता था। मनोरमा के लिए यह उपाय नहीं था, इसलिए वह मनोरमा को कभी-कभी दिलासा देने की कोशिश करता था। लेकिन मनोरमा भी बड़ी अद्भुत लड़की थी, वह हँस कर कहती थी, तुम्हारे ही वावा हैं वे, मेरा कुछ भी नहीं ? फिर भी लोगों ने ऐसी बातें की। कहने दो, उसके लिए सीताराम को कोई अफसोस नहीं। वह केवल बीच-बीच में सोच कर देखने लगता है, पिता की सेवा में उसने कोई त्रुटि की है या नहीं। कभी-कभी गहरी चिन्ता में तल्लीन होकर वह इसका हिसाव लगाता रहता है। पाठशाला के लड़के भी उसकी अन्यमनस्कता और उदासीनता पर गौर करते हैं; एकदूसरे को इशारे से दिखाता है । बड़े लड़के कानाफूसियों में गवेषणा करते रहते हैं। पण्डित जाने कैसा हो गया है ! हां भाई। , .

संदीपन पाठशाला ::६६ बाप मर गया है जो। हो। जान बची। अव और मारता नहीं। आकू नाम का लड़का सू सू कर हंसने लगता। छोटे लड़के गवेपणा नहीं करते, वे आश्चर्य करने लगते । मास्टर अब और मारता क्यों नहीं भाई ? बाबा की मृत्यु के बहाने सीताराम को एक अनोखा अनुभव प्राप्त हुआ है जिस कारण उसने तय किया है कि लड़कों को वह मारेगा नहीं, यम-से-कम बहुत संगीन अपराध न करने पर मारेगा नही । वह भी एक अनोखा अनुभव है। बाबा की बीमारी का पहला चरण था उस वक्त । उमौ दिन सवेरे बीमारी को गम्भीरता महमूस कर उसने डाक्टर बुलाया था । डाक्टर को दिखला कर वह उसके साथ ही रत्नहाटा आ गया, उस वक्त केवल साढे दस बजे थे। लहके पाठशाला में आकर शोरगुल मचा रहे थे, यह पाठशाला में जाकर उन लोगों से बोला, तुम लोग खुद बैठे-बैठे पढ़ो। में एक बार डाक्टर साहब के दवाखाना जा रहा हूँ, दवा लेकर जल्दी ही आऊंगा मैं, समझे ? डाक्टर से दवा लेकर रोत-मजूर के हाथ भिजवा देने को सोचा था उमने । लेकिन डाक्टर ने कहा, आप सुद ले जाइए। यह बतलाने में गड़बडा देगा। पहले परगेटिव, फिर एक पौडर, उसके बाद मिाराचर दो निशान, एक के बाद एक, तिपहर को फिर एक पौडर, यह यह समझेगा भी नहीं और न समझा ही सकेगा। सीताराम वोला, जी हां, यह तो ठीक ही कह रहे हैं । यह फिर घर लौट आया । लौटते वक्त पाठशाला में बता गया, पढो तुम लोग, में आ रहा हूं। मेरे बाबा वीमार हैं, दवा देकर जल्दी ही लौट रहा हूं। एक बार मन हुआ कि छुट्टी दे दें। लेकिन हौसला न पड़ा । रत्नहाटा बड़ी वाहियात जगह है। यहां दस दिन की सेवा के बाद एक दिन के चूक के लिए माफी नहीं । उधर बड़े स्कूल की पाठशाता यी मजग दृष्टि उसी की त्रुटि को ओर है । इसलिए दवा देकर लौट आने का ही निश्चय किया उसने । घड़ी को और देखा, मवा ग्यारह बजे थे। दो मील का रास्ता, आने-जाने में चार मील । एक बजे के अन्दर ही वह लौट सकेगा। टिफिन के बाद से पढ़ाई होगी। लेकिन पर जाकर देर हो गयी। पाया नहीं था, मनोरमा नै विना खिलाये छोड़ा नहीं। पाठशाला लोटने में दो बज गए। पाठशाला के बाहर दरवाजे के पास बाकर वह ठिठक गया । सोच रहा था, पर धोकर ही अन्दर जाना चाहिए। भीतर लड़के कलरव कर रहे थे, अचानक भीतर से उमे सुनाई पड़ा-कोई कह रहा है : चल रे चल, आज और आएगा नही । वक्ता था आक । याकू बावुओं के टोले का एक विचिन जन्तु है, मूर्तिमन्त विघ्नराज । गोताराम उमे 'पाक' कहकर नही बुलाता, 'अकर' कहता था । अकूर वी यात मुनकर मीताराम को ७० :: संदीपन पाठशाला - . - हंसी आई; वे निकल आएंगे इस प्रत्याशा में वह दरवाजे के बाहर ही खड़ा हुआं, आकर ही ठिठक जाएंगे वे लोग। सुनाई पड़ा, ज्योतिष का भतीजा सीतेश बोल रहा है, नहीं भाई, अगर ना ही जाए । कभी नहीं। मैं कह रहा हूं। मुझे ठीक-ठीक मालूम हो जाया करता है । मास्टर घर गया है और उसका बाप भी मर गया है । वस । अव एक महीने तक नहीं आएगा। एक महीने तक सूतक है । बड़ा मजा आएगा, एक महीना अब चौटे-मुक्कों से छुट्टी ! सीताराम एड़ी से चोटी तक झन्ना उठा । गुस्से से भीतर गरज उठा। एक ने कहा, उसके बाद तो आएगा, तब सूद असल मिलाकर बकाया पूरा करेगा, लाग् धमाधम् । लाग धमाधम् ! बाप रे! वह लड़का मानों सिहर उठा । आकू बोला, ठहर, मैं जरा ध्यान लगाकर देख लूं। हाँ । सुन, ठीक उसी वक्त मास्टर की बीवी मर जायगी । बस, फिर एक महीना । उसके बाद सूतक जैसे ही खत्म होगा वम मास्टर खुद मर जाएगा। बस । सीतेश वोला, ना भाई ! हाय, पंडित ने कौन-सा कसूर किया है जो उसे मरने को कह रहे हो? बहुत मारता है भाई । वाप रे ! मुझ ही को ज्यादा मारता है । कभी-कभी तो लगता, इस बार मैं मर ही जाऊँगा। सीताराम भीतर आया। पैर धोना वह भूल गया। चुपचाप अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गया। बहुत देर तक खामोश सोचता रहा। अचानक उसकी आँखों में आंसू आ गए । छोटे-नन्हे शरीर में बहुत लगता है, बड़ी तकलीफ होती है उनको, उनको लगता है, मर जाएँगे । नहीं, उन लोगों का कोई दोष नहीं । दोप उसी का है। नहीं, अव वह उनको नहीं मारेगा। वावा की मृत्यु के दो महीने के बाद उन बातों को वही सोच रहा था । आज भी लम्बी सांस लेकर वह सोच रहा था, इन्हीं के दीर्घनिश्वास के उत्ताप से शायद उसने अपने बाबा को खो दिया है। आज भी वह बाबा के बारे में सोच रहा था। यावा नहीं रहे । संसार भाय-भांय कर रहा है। अशान्ति थी, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन बाबा का कितना रोव-दाव था। बातों का डंक अगर छोड़ दो तो लाड़ले बच्चे और वाया में कोई फर्क नहीं था। दूसरी ओर भी एक असुविधा आ पड़ी है-खेतीवारी की जिम्मेदारी उस पर आ पड़ी है। हालांकि मनोरमा बड़ी विचक्षण औरत है, खेतीवारी के सारे कामों से वाकिफ है । किसमें क्या लगता है, कितना लगता है-सब जानती है । लेकिन खेत का हालचाल दुल्हन होकर वह देखने नहीं जा सकती। सीताराम को ही अव जरा ज्यादा तड़के उठना पड़ता है । घर से निकलकर खेतों में चक्कर लगाते वह रलहाटा चला जाता है। भरपूर खेती के समय वह झरने के किनारे नहीं । संदीपन पाठशाला::७१ बैठता, घर आता, बेत देखता है । इसके बावजूद सेती में कुछ गिराव आ गया है। उसका फिर चारा क्या? यह वाया कहा करते थे। कभी-कभी बावुओं की कोठी वाली नौकरी छोड़ देने की सोचता। लेकिन श्याम-देवू से बडी ममता हो गयी है । इसके अलावा मां का स्नेह, धीराबाबू का स्नेह, वह भी उसके जीवन की बहुत बड़ी सम्पदा है। धीरावा अब कलकते में पढ़ रहे हैं, अपने पढ़ने के कमरे की किताबो का जिम्मा पे उस पर छोड़ गए हैं। सीताराम जय उस कमरे में प्रवेश करता है, उसे लगता है कि एक नया राज्य है । किताबें पढता । कितायें घर ले जाता । किताव ले जाने की मनाही है धीरावाबू की। कहा है, कमरे में बैठकर पढ़ेंगे, लेकिन बाहर नहीं जाएंगे। हालांकि आप पर मैं अविश्वास नहीं करता, लेकिन यह मैं पमन्द नहीं करता। मीताराम कपड़े में छिपाकर किताव ले जाता है, फिर लौटा लाता, रख देता। आज अचानक याद पड़ गया, सारी किताबें लौटाई नही गयी। ए, ए, क्या हो रहा है ? पाठशाला के लड़के हिमाव लगा रहे थे, चौंक पड़े। अच्छे लड़के स्लेट लेकर और भी सावधान होकर बैठे। कोई देख रहा है, नकल कर रहा है । जो देप रहे थे वे अपने स्लेट की ओर मनोयोगी बन गए । एकाघ ऊंप रहे थे, जाम कर हिल-डुल कर बैठ गए। लेकिन मोताराम शर्मा गया,-छी-छो । अनमने हो उसने एक धमकी दे डाली है । मामले को महज बनाने के लिए उसने सजीदेपन से कहा, हिमाव लगाओ । हो गया सबका ? पत्म करो। चुप हो गया वह । पुरानी बात फिर याद आ गई। बड़ा वेजा काम हो गया है, पर्द किता लम्बे अरसे से उसके घर पर पड़ी हैं। ये कितायें उसे अच्छी लग गई थीं, इसलिए एकाध वार और पढ़ने के लिए रस छोड़ी थी। अब फिर सजग होकर पढाने लगा। बाहर रास्ते पर कोई जोरदार आवाज में बोल पड़ा, क्यों रे अर्वाचीन, आंचल में लइया लिए क्यों पा रहा है, आंचल नूठ जो हो जाएगा। सीताराम के चेहरे पर मुस्कान सेल गई। उमी को व्यंग्य करता हुआ कोई गया । वह पडित है, शिक्षक है, इमतिए भरसक शुद्ध उच्चारण करने की बोशिश करता है, फिर भी अपने अनजाने ही बचपन में सीसे उनके देहाती खेतिहर । एकाध बातें मुंह से निकल ही जाया करती हैं और उसमें भापा का गुरु-लघु दोप आ ही जाता है । एक दिन एक लड़के को आंचल में लइया साते देखकर, आंचल उच्छिष्ट हो रहा है इस विषय में उसे सचेतन करने में जूठा के यदले देहाती 'जूठ' शब्द ही सचमुच मुंह से निकला था। रत्नहाटा के उच्वनासा लोगो को जाने कसे यह मालूम हो गया और इसको लेकर वे व्यंग करते हैं । में 'कों के शहरिया लहजे पर जोर डालकर बाद में ग्राम्य शब्द पर जोर डालकर व्यंग को प्रकट और प्रपर बना देते हैं वे, और इसकी हमें है शिवकिकर। समाज की ७२ :: संदीपन पाठशालों - उसके पाठशाला के छात्र ने ही यह बात पहले-पहल कहना शुरू कर दियां यहाँ तक कि तनजिया लहजा भी जोड़ा है उसने और वह लड़का है चिरंजीव याकू । उसी से सुनकर शिवकिंकर ने हाट-बाजार में इसे फैलाया है । आजकल उनकी पाठशाला में वावुओं के भी कुछ लड़के आ रहे हैं । ज्यादा फीस और फीस देने की समस्या से बड़े स्कूल की पाठशाला में उनका पढ़ना असम्भव हो उठा है । यहाँ लड़कों को पढ़ाना अभिभावकों के लिए बहुत सुविधाजनक लगा है । इसके अलावा ये लड़के भी बड़े ही नटखट स्वभाव के हैं इसलिए बड़े स्कूल की पाठशाला के मास्टरों ने फीस के लिए कड़े तकाजे के बहाने कठोर अनुशासन दिखाकर उनको भगा दिया है। वहाँ के पंडितों ने वता भी दिया है, जामो न बेटा, रत्नहाटा में रत्न बनाने का अखाड़ा सीताराम की पाठशाला है । यहां क्यों ? मजबूर होकर ही वे यहाँ आए हैं । बड़े स्कूल की इस प्रकार की बातों और वरताव से सीताराम को अफसोस होता । बुरे छात्रों को देकर उसकी पाठशाला से अच्छे छात्रों को वे बहका ले जाते हैं । छह महीने कोशिश करने के बाद पाठशाला को सरकारी ग्रान्ट मिली है मासिक चार रुपए । लेकिन वह ग्रान्ट रखना एक मुसीवत वन गया है । आज तक उसके एक भी छात्र को वृत्ति नहीं मिली। पिछली वार केवटों के एक लड़के पर उसका बड़ा भरोसा था । वृत्ति भी उसे मिली है। किन्तु उसकी पाठशाला से उसके छात्र के रूप में नहीं, स्कूल वाली पाठशाला के मास्टर उसको वहका ले गए थे। वहीं से उसे वृत्ति मिली है। लड़कों में एक ने सवाल लगाकर स्लेट लाकर सामने रखा। सबसे अच्छा लड़का है यह । इसी पर उसे अव भरोसा है । आगामी वर्ष इस लड़के को अवश्य ही वृत्ति मिलेगी। इसको बड़ा स्कूल बहका नहीं सकेगा। यह लड़का ज्योतिष साहा का भानजा है । सीताराम ने स्लेट उठा लिया। वाह-वाह-वाह ! राइट । राइट। यह भी राइट । यह-यह क्या कर डाला रे ? किसने दिमाग खा लिया तेरा, अय? हाँ, क्यों फादर मणि मेरे, वावामणि, यह क्या कर डाला माणिक, ॲय ? पांच-सत्ते कितना होता वेटा, कितना होता? पैतीस जी। पैतीस का कितना बनेगा? पांच या सिफर? पांच । पाँच ही तो लिखा है मास्साब । यह रहा पांच, जोड़ते वक्त क्या कर डाला ? खुद ही तुमने सिफर मान लिया है वेटा। बताता हूं, बार-बार तुमको बताता हूं मानिकचांद कि पांच की गिनती ठीक-ठीक लिखना शुरू करो। सो तो करोगे नहीं। अव उसका नतीजा देखो। घड़े-भर दूध में बूंद-भर गोमूत्र । सारा-का-सारा वरवाद ! लेकिन प्रोसेस राइट है । वर । जाओ, टिफन लेने घर जाना चाहते हो तो चले जाओ। पांच मिनट बाकी है। और एक आकर खड़ा हो गया । वावुओं का बेटा आकू, जिसने उसकी ।

1 संदीपन पाठशाला :: ७३ बातों का विकृत प्रचार किया वही नौनिहाल । सीताराम जानता है, उसका कोई भी मवाल सही नहीं होगा। फिर भी आया है, स्लेट देकर ही वह टिफन की छुट्टी पांच मिनट बढवा लेगा। वक्र हंसी हंसते हुए बोला, क्यो, अक्रूर के सारे सवाल हो गए हैं ? बलिहारी-बलिहारी, लाओ देखें । निर्लज्ज लडका स्लेट के पीछे मुंह छिपाए हंस रहा है। उसने हाथ बहाकर स्लेट ले लिया। अय-अंय ! अरे देख-देखें । शो मी योर टीय। दांत दिखाओ, देखें । स्लेट रखकर सीताराम उठा और दोनों हाय से उसके होठ फैलाकर दांतो को प्रकट कर डाला। देसो, देखो तुम लोग । इसने दाँत नहीं मांजा है, देख लो तुम लोग। वह लड़का फिर भी हंसता रहा । अजीव वेडा लडका है । होट छोड़ उमने उमके कान पकड़ लिए। फिर भी वह हमता रहा । जाओ, जाओ, दात मांज कर आओ, जाओ। वह लड़का मुख में कपड़ा डालकर बोला, आज अभी तक साना नहीं साया है सर, लगे हाथ दांत मांजकर खाना खा आऊँगा। बायुओं के लड़कों की पढ़ाई का भाग्य जो कुछ भी हो, चाल बदस्तूर वही है । वे 'मास्साब' नहीं कहते, 'सर' कहते हैं । मारपीट करने से भी कोई फायदा नहीं; मार खाते-खाते उनको पोठ पर घट्टे पड़ गए है। नित्यानन्द सा मार साकर भी वे हंमते हैं । सीताराम उसे अक्रूर कहता है--फिर कहता है निर्यात- ने सिद्ध। एक बना । टिफिन की छुट्टी हो गयी। घड़ी में इसी बीच एक खरावी आ गयी है, बडी मूई बारह के धापर पहुँचने के दो मिनट बाद टकोर बजने लगते हैं ! लड़के स्लेट लाकर सस गए। टिफिन की छुट्टी में बैठे सीताराम स्लेट देखेगा । लड़को में कुछ खाना खाने जाएँगे तो कुछ रोलेगे। छोटे बच्चो ने कचा खेलने के लिए आंगनभर में गड्ढे खोद डाले । रोजाना प्रत्येक दल मे एक झगड़ा होता है, एक दल टूटकर नया दल बनता, नया गुच्चू बनाता। बनाने दो, रास्ते की धूल फांकने से यही बेहतर । उन्ही के लिए तो यह आंगन है । आँगन क्यों सभी कुछ तो उन्ही के लिए है। फिर घटा बजा, टिफिन खत्म हुआ। घटा एक खरीदा है उसने । और भी बहुत-सी चीजें खरीदी हैं। दो मैप, एक ग्लोव, कलकत्ते से खरीदा हुआ एक बढ़िया ब्लैकबोर्ड, दो कुसियां । बाबुओ की कुर्सी और साहा की कुर्मी उगने लौटा दी है । घंटा बजते ही टिफिन के अन्त में लड़के आकर सब बैठ गए। लेकिन भाव ? कहाँ है वह ? 'दाँत मांजकर खाना सा ना कहकर गया और अभी तक लौट नही आया। टिफिन की छुट्टी खत्म हो चुकी है । आधा घटा हो गया। इन सब लड़कों से जब मरोकार पड़ता तो न मारने का संकल्प करके उसकी रक्षा नहीं की जा सकती। उसे लगा, ऐमा संकल्प करना ठीक नहीं। मार बन्द कर देने से बाकू और भी पाजी हो गया है। राजा विक्रमादित्य को टन्न ७४ :: संदीपन पाठशाला । एक कथा है । एक बन्दर उनकी सभा में रोज सवेरे आ पहुँचता था, राजा को एक अशर्फी देकर पैरों के पास बैठ जाता था। राजा अपनी छड़ी से उसकी पीठ पर कई बार सटकारते थे । बन्दर चुपचाप वहां से चला जाता था। एक दिन मन्त्री ने सविनय प्रतिवाद किया, महाराज, यह कोई न्याय नहीं । बन्दर अशर्फी भेंट करता है और महाराज उसको मारते हैं । राजा ने हंसकर कहा, भली ! कल से नहीं मारूँगा। अगले दिन वन्दर आया, अशर्फी दी लेकिन राजा ने रोज की तरह उसको मारा नहीं । बन्दर कुछ देर प्रतीक्षा करने के वाद दांत दिखाकर चला गया। अगले दिन भी उन्होंने प्रहार नहीं किया । उस दिन वन्दर ने राजा का कपड़ा पकड़कर खींचा । उससे अगले दिन प्रहार की प्रतीक्षा कर अचानक ही उछल कर सिंहासन के हत्थे पर बैठ गया। उसके बाद वाले दिन राजा की गर्दन पर जा बैठा । राजा ने उस दिन बन्दर को नीचे उतारकर हिसाव लगाकर सारे दिनों का बकाया सटकार उसकी पीठ पर अदा कर दिया। वन्दर फिर पहले की तरह चुपचाप चला गया। आज आकू को उसका पावना बकाया सारा चुका देना है। सीताराम ने हरिसाधन को बुलाया, साधन ! साधन लड़कों के बीच वयस्क लड़का है, पढ़ाई में कोई अच्छा नहीं, लेकिन फिर भी नेक लड़का है, निष्ठा है, कोई दुर्गुण वाली बुद्धि नहीं उसमें । साधन को देखते उसे अपनी बात याद आ जाती। खुद भी वह उसी ढंग का लड़का था। साधन आकर खड़ा हो गया। सीताराम बोला, तू एक बार आकू के घर चला जा । जाकर उसे बुलाना, कहना-मास्टर जी बुला रहे हैं । यदि घर पर न हो तो उसकी मां या जिस किसी से भेंट हो जाय, बता देना-आकू टिफिन से पहले निकलकर अभी तक पाठशाला नहीं आया है । वह अक्सर ऐसा करता है। आज दो महीने से फीस नहीं दी है उसने । फीस कल भिजवा दीजिएगा वर्मा उसे पाठशाला और मत भेजिएगा । समझ गए न? जी। अच्छा, क्या वताएगा, बताना तो ज़रा। साधन तोता-जैसा बोलता गया । सीताराम खुश होकर बोला, ठीक । चला जा तू। साधन जाते-जाते पाठशाला के दरवाजे पर ही खड़ा हो गया। बोला, वह आ रहा है मास्सा। आ रहा है ? ठीक है। नेपला, एक सन्दी तो काट ला। नेपला सन्टी काटने में माहिर है । खुद मार खाने पर रोता नहीं; दूसरा कोई पीटा जाता तो उसे बड़ी खुशी होती, हँसता है । सन्टी काटने में उसे वेहद उत्साह है। माज बहुत दिनों के बाद पिटन्नस होगी; उसने पूछ लिया, बाँस की कमाची या और किसी पेड़ की टहनी मास्सा? उससे पूर्व ही आकू चेहरा लटकाए उसकी मेज के पास आ खड़ा हो गया .

संदीपन पाठशाला::७५ और उदास स्वर में बोला, कलकत्ते में धीरानन्दया को पुलिग ने बन्द कर लिया है सर, उनके घर चिट्ठी आई है । श्यामू-दयू सड़े हैं। रो रहे हैं। धौरा बाबू को पुलिम ने गिरफ्तार किया है ? नही सर । गिरफ्तार नहीं किया, वन्दी किया है-राजबन्दी ! सीताराम के सारे अंग में रोमांच हो उठा। राजबन्दी। जी सर, महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में योगदान जो किया है। सन उन्नीस सौ इकोस । देश में असहयोग आन्दोलन चल रहा है । सोता. राम के पास साप्ताहिक पत्रिका आती, उसके मारे-के-मारे पन्नो मे यही सब खबरें होती-देशवरेण्य उन नेताओं के चित्र भी। धीरा वायू के कमरे में उसे एक किताब मिनी है-किताव का नाम है-'लाछितर सम्मान ।' सन उन्नीस सो पांच को आन्दोलन में जो लोग निर्वासित हुए थे, उन्ही की कहानी और उन सब के चिन्न भी हैं उममें । 'लांठिनेर सम्मान' वडा योग्य नाम है । लांछन सम्मान बन जाता है उन्हीं की साधना से, माथे के गुण से ही पकतिलक चन्दनतिलक में भी अधिक सहनीय होता है। धीरा बाबू योग्य व्यक्ति है। अब धीराबाबू की तसवीर असवार मे छपेगी, इस किताब के दूसरे खण्ड में उनको जीवन-कथा होगी, चिन भी। वयस्क-सा, विज्ञ-सा आत बोला, धीरा बाबू की मां, सर बैठी हैं, मुह में कोई बात नहीं, बस आंसों से टपटप मागू टपक रहे हैं । मोताराम उठकर खड़ा हो गया। बोला, छुट्टी, आज तुम लोगो की छुट्टी सुद ही उसने टन्न-टन्न घंटा वजा दिया। पाठशाला बन्द कर जमीन पर नजर गडाये वह तेज चाल बाबुओ की कोठी कीओर चल पडा । उसके दिल में उथल-पुथल मची हुई थी। मां की मूर्ति देखकर वह स्तब्ध रह गया। वह ममा न राधा, यह उनका सुस का रोदन है या दुस्स का । उसके मन में भी मानो ऐसा हो द्वन्द्व चल रहा है। अपराह में झरने के किनारे जाकर वह उदास-सा बैठा रहा। यहाँ छोटे-छोटे बन-फूलो की झाड़ियां हैं, उनमे तीतरों के पोसले है । तीतर साझवेले वाहर निकल भागते फिरते, कलरव करते, कीड़े पकड़कर खाते, दीमको के विमौट पर धावा बोलते। योड़ी ही दूरी पर रत्नहाटा के एक वायू का एक बगीचा है, बगीचे के चारो और ताड़ के पेड़ों की पांव । शाम को ताड़ के मिर पर सुरज का सुखं प्रकाश ना पड़ता है. फास्ता घुमाते हैं । इसी बीच वह बड़े मजे में रहता मानो ध्यानस्य बना रहता । बाज उन सबको और उसकी निगाह नहीं पड़ी। एक वार के लिए भी नहीं । कुछ सोचता रहा हो, ऐमी बात भी नही केवल उसको आँसो के सम्मुख निरन्तर घोरा वादू के नितने ही मिन तिरने ६:: संदीपन पाठशाला श्यामू । शाम को श्यामू-देवू को लेकर वह बैठा। विपाद में भी गम्भीर बना हुआ है । देवू उसकी गोद में मुंह छिपा- र फफक फफककर रोता रहा। उसके मुख पर जो हंसी दिगन्त के मेघ की गोद में विद्युत्-चमक जैसी क्षण-क्षण निःशब्द कौतुक में दीप्त हो उठती है, आज वह हंसी उसके चेहरे पर एक वार भी क्षीण आभास तक न दे सकी। वह मुख नानो आज वर्षामुखर श्रावण रात्रि के मेघ से ढक गया है। वह उन लोगों को दिलासा देते हुए बोला, जानते हो, दादा ने कितना बड़ा काम किया है ? श्यामू ने सिर हिलाकर वताया, जानता हूँ। देवू, जानते हो तुम? देबू ने कोई जवाब नहीं दिया। वह रो रहा है। रोओ मत । छी ! सिर पर हाथ सहलाया उसने। फिर बोला, बड़े होकर तुम लोगों को भी दादा के साथ देश का काम जो करना है। जानते हो न--- महाज्ञानी महाजन जिस पथ पर कर संचरण हो गए हैं प्रातः स्मरणीय उसी पथ को लक्ष्य कर स्वीय कोतिध्वजा थाम हम लोग भी होंगे वरणीय । वाहर से नायव जी ने कहा, मास्टर, रहने दो। इन लोगों को इसकी सीख अभी से मत देने लगो। कन्हाई राय ने हामी भरी, हां । कुछ देर चुप रहकर उसने कहा, इतने में ही धक्का संभालना मुश्किल हो जायेगा । बाद में समझोगे। उपपद तत्पुरुप नाम उसका झूठा नहीं पड़ा। मध्यपदलोपी को फिर भी सहन किया जा सकता है। रात को मनोरमा ने सबकुछ सुना, वह भी उदास हो गयी। सीताराम के स्पर्श को अद्भुत ढंग से ग्रहण कर पाती है, धरती का धूपस्पर्श करने जैसा ही। उसका उदास भाव देख सीताराम ने कहा, वात दरअसल अफसोस करने वाली नहीं है मनु ! हम लोग नान्ह लोग हैं, हम समझ नहीं पाते । मनोरमा वोली, हाय कितने बड़े घर का लड़का है, कितना सुख का शरीर है, जेल की तकलीफ और मान-सम्मान- सीताराम उसे समझाने बैठ गया, यह देशसेवा के कारण कारावरण है, यह है परम गौरव की बात । होने दो न सुख की देह, लेकिन मन की दृढ़ता से असंभव सम्भव हो जाता है, बन्दूक के सामने सीना तानकर खड़ा हुआ जा सकता है। अचम्भे से आँख फाड़-फाड़कर मनोरमा अपने पति के मुख की ओर देखने . , लगी। सीताराम बोला, हम लोग भला क्या कुछ कर सकेंगे? क्षमता भी भला कितनी है ? जितना भर हो सके उतना भर तो करना ही पड़ेगा। चरखा खरीद संदीपन पाठशाला::७७ लाऊंगा। पुराने जमाने वाला चरणा तो टूट ही गया है। चरमा कातूंगा। अपने धागे से हम लोगों का कपड़ा बनेगा। समझी ? और रामकपाम या वीज लाऊंगा, चारो बोर लगा दूंगा। अचानक ही मनोरमा बोली, तुम्हारा धीराया कैसा है, एक बार भी देस न सकी। सीताराम ने कहा, विल्कुल श्यामू जैसा। उठकर शेल्फ के पास चला गया। 'लांछितेर सम्मान' नामक किताव ऊपर ही थी। उसी को अन्यमनस्क भाव से पोला। अचानक एक बात उसके मन में आ गई। मनोरमा के हाथ में देवर वह बोला, इस किताब के चिन्नों को रोजाना देखना, प्रणाम करना । इस बार मनोरमा मा होगी। उमका घर भी अब बच्चे की किलकारी से आलोकित होगा। शिशु का हास्य स्वर्गीय वस्तु है । शिशु देवदूत होते हैं । कितनी ही किताबों में उसने पढ़ा है। और यह सत्य है, यह वह भलीभांति समझता है। लेकिन ज्यों-ज्यो वह वढा होता जाता गडबडी होने लगती । शंतान आकर उसकी गर्दन पर सवार हो जाता है । लड़को को वह दो हिस्सों में बांटता है। एक होता है--कुत्ते की जाति का, बचपन में बड़ा ही सुन्दर होगा, ज्यों-ज्यो बड़ा होगा सौरहा होता जाएगा। और एक है मोर की जाति का, जितना ही बड़ा होता जाएगा उतना ही विचित्र वर्ण के पखों से सज्जित होता रहंगा, हर पंप पर आकाश का चन्दा आ फंसेगा । यह जाति वडी दुर्लभ होती है। धीरा• नन्द का ध्यान आया। श्यामू-देवू जाने कैसे होगे। हां, बिल्कुल सराव नहीं होगे । कहावत है, सामने का हल जिम ओर जाय पीछे का हल भी उमी और जाए। वे धीराबाबू जैसे न भी हों, उसके नजदीक तो पहुँचेंगे ही। अपने बच्चे के बारे में भी यह बहुत-सी गुप्त आशाओं को सजोये है । तभी तो वह किताव मनोरमा को देकर चित्रों को प्रणाम करने की बात कही उसने । उसने सुना है, इसका फल अच्छा होता है। महात्माओं का प्रभाव गर्भस्थ भ्रूण में संचरित हो जाता है। कई क्षण के बाद वह एकाएक च चल हो उठा। बड़ा वेजा काम हो रहा है, धीरा बाबू की किताय आज तक लौटाई नहीं। सात चन्द दिनो के बाद सीताराम का ताऊजाद भाई मीताराम को ढूंढ गया। तीन- तीन वार। सीताराम का ताळजाद भाई पंडित-दादा बड़ा भला आदमी है ७८ :: संदीपन पाठशाला . , सीधासादा आदमी, गांव में ही पाठशाला चलाता, गांव की चिट्ठी-पत्नी दस्ता- वेज लिखा करता और इसके अलावा जप-तप करता है । पंडित दादा पाठशाला लेकर ही मगन है। गांव में कहीं भी रार-तकरार हो, समझौता करने के लिए खुद ही जाकर दोनों पक्षों से अनुरोध करता है। जमींदार की लगान-वसूली के वक्त गुमाश्ते की बैठक में भी खुद ही चला जाता है, लोगों का वाकी-बकाया का हिसाव देख देता, लोगों को लगान बकाया रखने के लिए डांट-फटकार वताता, सूद-व्याज माफ करने के लिए गुमाश्ते से भी अनुरोध करता। उस दिन शाम के बाद तीन वार आकर उसने सीताराम की खोज की। सीताराम उस वक्त रलहाटा से लौटा नहीं था। खाना-बाना बना लेने के वाद मनोरमा लोसारे बैठी चरखे के लिए रुई वट रही थी। किसान-बहू जरा दूर बैठी किसी काम के अभाव में अपने ही परों पर हाथ फेर रही थी। बीच-बीच में कह रही थी, जाने तुम लोगों को खत कैसी है, सनक हुई सवार चल मक्का के पार | दिनोरात चरखा और चरखा। इससे बेहतर है कि पर में जरा एल-तेल लगानो, मच्छर नहीं काटेंगे, सरदी नहीं लगेगी। जब तक सीताराम लोट नहीं आता-किसान-बहू घर पर ही रहती है। वैठे-बैठे अपने ही तरंग में वह बड़बड़ा रही थी लेकिन मनोरमा के कानों में कुछ भी पहुंच नहीं रहा था, वह जरा चिन्तित हो गयी है। पंडित जेठ तीन-तीन बार क्यों आए ? यूं तो पंडित-जेठ बात नहीं ! किसान-बहू बोल पड़ी, इसमें होना-ओना क्या ! अरे अगान-लगान वाकी- माकी पड़ गया हो तो मुच्छल गुमाश्ते ने कुछ कहा-अहा होगा। बस तड़-फड़ भागते चले आये पंडित-मंडित । मनोरमा लिस-पड़ नहीं पाती, लेकिन इस बार भी सीताराम ने लगान चुकाकर रसीद ला उसे रखने को दी है । उसको खूब याद है । घुमा-फिराकर देखने के बाद उसने बक्से में रख दी है । वेशक लगान के बारे में कुछ नहीं। तो क्या ? किसान-बहू ने उसका भी फैसला कर दिया, तो फिर गांव के काइयां-कमीने कुछ साजश-आजश रच-बच रहे होंगे। यह मुमकिन है । मुमकिन क्यों, वेशक यही बात होगी। उसके पति को कोई मच्छो निगाह नहीं देखता। सभी कहते हैं, फेल करके जिसकी गर्दन पर घट्टे पड़ गए, वही आखिरकार पंडित बन गया! बहुत से लोग कहते हैं, मैंने बड़े अच्छे नादमी से सुना है कि वावुओं को कोठी में उसे वेतन-एतन कुछ भी नहीं मिलता, इस खुराकी-भर मिलती है। बहुत से लोग बिला-बजह लानत- मलामत करते हैं. कहते हैं, ज्यादा मत बड़ो, आंधी में गिर जाओगे-गिरेगा, जल्दी हो गिरेगा, देखते भी रहो। कितान-बहू ओसारे के एक छोर पर बैठी थी, धप से लेटकर बोली, तनिक लेटलो ना उसके बारे में सोच-सोच मत करो। वह सब सफाचट हो जाएगा। कोन । , - - - - संदीपन पाठशाला::७६ । क्या बिगाड़ मकता ? हमार हो माठ माने जमीदार की कोठी में मास्टरी. फास्टरी कर रहा है ।लो तनिक लेट लो। मालिश-फालिश कर लो तनिया । हो तो नही? नही । तू लेटी रह । में आई । वस आ ही जाती हूं। जल्दी माना वचवा। अगर कहीं मैं सो-प्रो गई तो इल्ली-विल्ली आकर असोई-रसोई चार्ट जाएगी । दूध उध सभाल के रख जाना जी। बाहर के दहलीज पर आकर मनोरमा फिर ठिठककर खड़ी हो गई। वह ताऊ के घर जा रही थी। किसी की मार्फत पडित-जेठ से पूछ लेगी कि मामला क्या है । लेकिन उसे याद आ गया, उसके जाकर खड़े होते ही उस घर की ननद बाँकी हमी हँसकर बोलेगी, आओ मास्टरनी याओ । स्टेशन पर सीताराम ने श्यामू-देवू से कहा था, 'मास्टर की दुल्हन--- मास्टरनी।' वही बात गांव-भर में फैल गई है। या तो किसान-बहू ने यह प्रचारित किया है या तो उस लड़के ने। उन्ही लोगो ने सुनी थी यह वात । इसके अलावा, मनोरमा को भी वे कोई अच्छी निगाही से नहीं देसते 1 याहते है, घमंडी है। वह कौन-सा घमंड दिखाती है, मनोरमा की समझ में नहीं आता। दरवाजे पर खड़ी वह निरत्साह हो गयी। इसी कारण शायद उसे घर की याद आई, किसान-बहू की कुछ चोरी करने की आदत है । लकड़ी अकड़ी, फूस- पुआल खपचियाँ तो वह नियमित लेती ही है, तिस पर छोटी-मोटी चीजें पल्लू में छिपा लेती है। पकड़े जाने पर भी शरमाती नहीं, पारमाना तो दरकिनार, ऊपर से झिडक उठती, घर से लूगी-ऊगी नहीं तो क्या कल्लू-जगधर के घर से लूंगी? इसमे अजर-नजर मत डालो बचवा । हाँ, तीन पीढ़ी से तुम्हारे यहाँ सट- अट रहे है। इसके अलावा उसके पांव भारी हैं, प्राय: आसन्न-प्रमवा है । तबीयत कोई ठीक नहीं। रात को घर से निकलना भी ठीक नही होगा । अब तो घर के आँगन में उतरती है औरतें, सुनत हैं पहले रात को घर में भी अनछायी जगह में कोई निकलती नहीं थी । वह लौट आई। इसी बीच किसान-बहू की नावा बोलने लगी है। फिक्र में भी उसे हंसी आ गयो । भला नाक बोलने की आवाज तो देखो फर-फर्र। फिर फरफरत भी बीच-बीच में । वह रूई लेकर बैठ गई। लेकिन वह भी सुहाया नहीं। उल्लू घुघुआ रहा है । बेशक काला उल्लू होगा । के बज गए ? ऊपर घड़ी देखने के लिए वह उठी। सीताराम ने घर के लिए एक टाइम-पीस खरीदी है। मनोरमा को कई बार उसने घड़ी देखना सिखाया है। मनोरमा की अक्ल मोटी है, यह मनोरमा खुद ही समझ पाती है। सीताराम कहता, लोगो के दिमाग में गाय का गोवर भरा होता है और तुम्हारे दिमाग मे गधे का गोबर भरा है। गधे का कही गोवर होता है ! याद आते ही मनोरमा को हंमी आ जाती।

८०:: संदीपन पाठशाला पंडित लोग कितनी ही उद्भट बातें करते हैं। ऊपर उसे नहीं जाना पड़ा। सीताराम की आवाज सुनाई पड़ी। पंडित. जेठ से ही बातें कर रहा है, मुझे शाम से तुमने तीन बार ढूंढा ? मैं तो अभी चला आ रहा हूँ। लेकिन खोज क्यों रहे थे? स्वाभाविक शान्त स्वर में पंडित, जेठ ने कहा, चल, तेरे घर ही चल । घर पर आकर जेठ ने कहा, ऊपर चल । ऊपर ? क्यों जी? ऐसी क्या बात है ? सीताराम भी उत्कंठित हो उठा। चल, बता रहा हूं। नीचे वह किसान-बहू जो है। ऊपर जाकर दोनों बैठ गये । मनोरमा से सीढ़ी पर खड़े हुए बिना रहा नहीं गया। उसका दिल धड़क रहा है । पंडित दादा ने कहा, धीराबाबू के जेल जाने की खबर जिस दिन आई उस दिन क्या तूने पाठशाला में छुट्टी दे दी थी? सीताराम चौंक पड़ा। इस बात को उसने इस नजरिए से कभी सोचा नहीं था । उसने कहा, हाँ खबर सुनी। सुना, बाबुओं की कोठी में चिट्ठी आई है, माँ रो रही हैं, श्यामू देवू रो रहे हैं । उनके घर में पढ़ाता हूं, वे जमींदार हैं, वह रिश्ता भी एक है। मुझसे रहा नहीं गया, भागता गया। जाते वक्त छुट्टी दे गया। पंडितदादा बोले, छुट्टी न भी देता तू । तेरे न रहने पर सभी लड़के अपने माप ही भाग गये होते। वह भी तो एक ही बात हुई । सीताराम हंसा। नहीं। एक बात नहीं । वहाँ के लोगों ने सव-इन्सपेक्टर के पास दरख्वास्त भेजी है। - । दरख्वास्त भेजी है ? उसका दिल धक-सा हो रह गया। हाँ । मैं आज एक सफाई दाखिल करने गया था । तो उन्होंने मुझे चुपके से यह बात बताई । रत्नहाटा के किसी ने दरख्वास्त में लिखा है, पाठशाला में तू असहयोग का प्रचार भी करता है। धीरावावू के जेल की खबर आते ही तूने उसके सम्मान में फौरन पाठशाला बन्द कर दी। घर में भी चरखा कातता है। तू क्या चरखा कातता है ? कातता हूं । सीताराम ने इतनी देर में अपने को संयत कर लिया था। तव तो पंडित दादा के समूचे सिर पर खल्बट । गंजे सिर पर हाथ फेरना उनकी आदत में शुमार है-खासतौर से समस्या वोझिल होने के समयों पर। पंडित दादा खल्वट पर हाथ फेरने लगे। सीताराम ने कहा, किया होगा तो शिवकिकर वगैरा ने किया होगा। करने दो। फिर थोड़ी देर बाद बोला, कुछ वैजा काम तो किया नहीं। जो कुछ होना है, होगा। केवल शिवकिंकर या उसका गुट ही नहीं, सीताराम दंग रह गया, करीब- करीब सारे भद्र लोग ही मानों उत्तेजित हो उठे हैं और इस दरख्वास्त में बहुतों की ही प्रेरणा है। इसका प्रमाण उसे अगले दिन सवेरे ही मिल गया। - संदीपन पाठशाला ::११ रत्नहाटा में प्रवेश करते ही मणिलाल बाबू से भेंट हो गई। मणिलालबाबू अपनी आदत के मुताविक मूंछों पर ताव दे रहे थे। जरा झुककर नमस्कार करते हुए सीताराम चला आ रहा था । मणिबाबू ने कहा, क्यों जी, सुना तुमने अपने जमीदार बाबू के जेल जाने के ऑनर में पाठशाला बन्द कर दी थी ? थोड़ी देर चुप रहने के बाद सीताराम ने अपने को काफी मजबूत कर लिया। शुरू मे दिमाग में दन्न-से आग की लौ की तरह गुस्सा लपलपा उठा था, अपने को संभालकर सविनय मुस्करा कर बोला, जी हां, सो तो वन्द कर दी थी। लेकिन इसलिए नहीं कि वे जमीदार बाबू है हमारे, बल्कि जो भी ऐसे गौरव का कार्य करेंगे उन्ही के लिए करुंगा। आपका बेटा भी तो धीराबाबू का हमउग्न है, ये जायें तो उनके ऑनर में भी दूंगा। गणियाबू ने ऐसे उतर की प्रत्याशा नहीं की थी। चन्द लमहे ठहरकर सीता- राम मणिवाबू को पारकर चला गया। रत्नहाटा के इन सब बाबुओं को देखकर उसके मन में पहले की तरह विस्- मय नही जाग उटता । उम विस्मय और भय में कोई फर्क नहीं । उसने सोचकर देखा है, भक्ति और भय मिलकर ऐसा होता है । जमीदार चावू तोग, पक्की कोठियां, धन-दौलत-यह धारणा किमान रियामा का बेटा होने की वजह से उसको भक्तिमान बना देती थी। पाठशाला में उमने देखा है, माते-पीते घर के लडके जो अच्छे कपडे-लत्ते पहनकर आते हैं, नए किस्म की पेन्सिल, लकदक नई किताबें, रंगीन कंचे जिनके पाम होते, लाल-नीले कम्पट जेव में लेकर जो लोग पाठशाला में आते हैं उनका प्रेम-पान बनने के लिए यहां तक कि केवल उनसे गटकर खड़े होने-भर के लिए दूसरे लड़के लालागित हो उठते हैं । जो लोग कतई गरीब है, वे नजदीक आकर भी जरा फासला बनाये रस मा फाड़-फाड़ कर देखा करते हैं । अमीर लड़के की कोई चीज जमीन पर गिर जाये तो वे शट अा उमे उठाकर उनके हाथों में देकर कृतार्थ से हो जाते हैं । वायुओं के प्रति भक्ति भी एक ही बात हुई-कोई फर्क नहीं। और भय ? किस बात का भय ! अब उमे भय भी नही होता। एक बात वह समझ गया है। ये लोग हुंकार भरेंगे ही, इमकी आदत जो पट गयी है उनको । हुंकार के पीछे दो-चार चपरासी होते हैं । हिम्मत से अगर इस हुंकार की उपेक्षा कर खड़े हो जाओ तो वे हक्कावरका रह जाते हैं। और वह इरेगा भी क्यों, वे भी इन्मान है और सभी लोग इन्सान है। यकायक पीछे से मणिवाबू ने पुकारा, मुनो, सुनो ऐ छोकरे ! माय ही साथ बाबू का चपरासी सआदत शेख भागते हुए आकर उसके सामने खड़ा हो गया, तुम्हें बुला रहे हैं बावू । सीताराम ने स्थिर दृष्टि से उसके मुष की ओर देखकर कहा, मुझे इस या फुरमत नहीं। वायु से जाकर बता दे। फुर्सत नहीं ! सआदत दंग रह गया।

८० :: संदीपन पाठशाला , पंडित लोग कितनी ही उद्भट बातें करते हैं। ऊपर उसे नहीं जाना पड़ा। सीताराम की आवाज़ सुनाई पड़ी। पंडित- जेठ से ही बातें कर रहा है, मुझे शाम से तुमने तीन बार ढूंढा ? मैं तो अभी चला आ रहा हूँ। लेकिन खोज क्यों रहे थे? स्वाभाविक शान्त स्वर में पंडित, जेठ ने कहा, चल, तेरे घर ही चल । घर पर आकर जेठ ने कहा, ऊपर चल । ऊपर? क्यों जी? ऐसी क्या बात है ? सीताराम भी उत्कंठित हो उठा। चल, बता रहा हूं। नीचे वह किसान-बहू जो है। ऊपर जाकर दोनों वैठ गये । मनोरमा से सीढ़ी पर खड़े हुए बिना रहा नहीं गया । उसका दिल धड़क रहा है। पंडित दादा ने कहा, धीराबाबू के जेल जाने की खवर जिस दिन आई उस दिन क्या तूने पाठशाला में छुट्टी दे दी थी ? सीताराम चौंक पड़ा। इस बात को उसने इस नजरिए से कभी सोचा नहीं था । उसने कहा, हाँ खबर सुनी । सुना, वावुओं की कोठी में चिट्ठी आई है, माँ रो रही हैं, श्यामू देवू रो रहे हैं । उनके घर में पढ़ाता हूं, वे जमींदार हैं, वह रिश्ता भी एक है। मुझसे रहा नहीं गया, भागता गया। जाते वक्त छुट्टी दे गया। पंडितदादा बोले, छुट्टी न भी देता तू । तेरे न रहने पर सभी लड़के अपने आप ही भाग गये होते। वह भी तो एक ही बात हुई। सीताराम हसा। नहीं। एक बात नहीं । वहाँ के लोगों ने सव-इन्सपेक्टर के पास दरख्वास्त भेजी है। दरख्वास्त भेजी है ? उसका दिल धक-सा हो रह गया। हाँ । मैं आज एक सफाई दाखिल करने गया था । तो उन्होंने मुझे चुपके से यह बात बताई । रत्नहाटा के किसी ने दरख्वास्त में लिखा है, पाठशाला में तू असहयोग का प्रचार भी करता है। धीरावाबू के जेल की खबर माते ही तूने उसके सम्मान में फौरन पाठशाला बन्द कर दी। घर में भी चरखा कातता है। तू क्या चरखा कातता है ? कातता हूं । सीताराम ने इतनी देर में अपने को संयत कर लिया था। तव तो पंडित दादा के समूचे सिर पर खल्वट । गंजे सिर पर हाथ फेरना उनकी आदत में शुमार है-खासतौर से समस्या वोझिल होने के समयों पर। पंडित दादा खल्वट पर हाथ फेरने लगे। सीताराम ने कहा, किया होगा तो शिवकिकर वगैरा ने किया होगा। करने दो। फिर थोड़ी देर बाद वोला, कुछ बेजा काम तो किया नहीं । जो कुछ होना है, होगा। केवल शिवकिंकर या उसका गुट ही नहीं, सीताराम दंग रह गया, करीव- करीव सारे भद्र लोग ही मानों उत्तेजित हो उठे हैं और इस दरख्वास्त में बहुतों की ही प्रेरणा है। इसका प्रमाण उसे अगले दिन सबेरे ही मिल गया। - - मंदीपन पाठशाला ::३ वार हो आओ। सीनाराम बोला, माहा जी, अगर स्कूल का एड देना वह बन्द कर दे ता आप लोग -तो क्या आप लोग भी पाठशाला-- माहा ने बीच में टोकते हुए कहा, पहले से ही इतना सब मोच रहे हो पण्डित ? एक सफाई देते ही सबकुछ निवट पाएगा। यह मुझे राय-इन्मपेक्टर साहब ने कहा है । इसके अलावा इन्सपेक्टर रजनीया भले आदमी, धार्मिक और महाशय व्यक्ति हैं। जाओ, तुम एकचार चक्कर लगा आमओ। स्कूल सब-इन्सपेक्टर रजनीवायू सचमुच बडे नेक है । जरा ज्यादा मात्रा में ही भलेमानुस हैं । रामकृष्ण देव के भक्त हैं, किमी प्रकार से भी झूठ नहीं बोलते, किमी भी पण्डित से जर्रा भर चीज भी स्वीकारते नहीं। सिर्फ दो गन्त हैं उनके । मज्जन होम्योपैथी का इलाज करते हैं, इमार-बीमार पड़ने पर उनकी दवा सेवन करने पर ये गुश होते हैं और रामकृष्णदेव, श्री श्रीमा व विवेकानन्द का आविर्भाव या तिरोधान उत्सव मनाने पर रजनीवायू उसे हृदय से सोह किए बिना रह नहीं पाते। सीताराम का दुर्भाग्य है कि उमको तन्दुरस्ती बहुत अच्छी है, उसने कभी रजनी यावू की दवा नही ली। और रत्नहाटा गांव रत्नों का ही हाट है, यहां मणिलाल और शिवनिकर जैसे रल इतने प्रबल हैं कि रामकृष्ण देव का जन्मोत्सव करना यहाँ आज तक सम्भव नहीं हो सका है । एकावार आयोजन हुआ था, धीरानन्द के हम-उग्र और उसी के कुछ मिन्त्री ने प्रयत्न किया था लेकिन शिवकिपर दल ने उमको चौपट कर दिया था। उन लोगो ने सलाह की थी, उत्मय होने पर एक बारा लाकर वे उसका उत्मय क्षेत्र में बलिदान करेंगे। मणिलाल बाबू को चाल कुछ स्वतन्त्र किस्म की है । जमीदारी काटनाल । उन्होने रजनी बाबू को नहला भेजा था, हाल में उनको मुनाई पड़ा है, रजनीवाबू आजकल कुछ नाबालिग लड़कों के महारे गांव के भीतर आ-जा रहे हैं। वे नयति मणिलालबाबू विश्वास करते हैं कि रजनीवायू ईमानदार और भद्र व्यक्ति हैं, उनका कोई बुरा अभिप्राय नहीं है या हो नहीं गकता, लेकिन चूंकि उनके भआने-जाने के कारण गांव को बहू-बेटियो को असुविधा होती है, इमलिए वे गविनय प्रतिवाद कर रहे हैं। दस्तावेज़ के ममोदे जैमी परकी और पेचीदा भाषा को यह उक्ति सुनकर रजनीवा के हाथ-पांव और उंगलियों के मिरे सचमुच टण्डे पड़ गए थे। उन्होने मारा प्रायोजन बन्द कर दिया था। अगले वर्ष में ये बड़े स्कूल के वोडिंग में, वहां के छात्र और शिक्षकों को लेकर इन पावन दिवमों का पालन किया करते हैं । हपते में एक दिन शाम को वोटिंग के छात्रों को लेकर माधा घण्टा रिलिजियम क्लारा लगाते हैं, गाना होता- "मां, मुझे कृपा कर बच्चा-गा बनाए रखना, शरीर चाहे चढता रहे कोई गुकमान नही पर दिल यच्चा जमा हो बना रहे।" लेकिन सीताराम ने इनमें से किगो में भी योगदान नहीं किया। उसका ६२ :: संदीपन पाठशाली - - . नहीं । उसी स्थिर दृष्टि से वह उसकी ओर देखता रहा। सादत ने कहा, चले चलो भाई एकवार । क्यों हम से हंगामा-हुज्जत कराभोगे? हाथ की लालटेन, छाता, लाठी, कन्धे का कुरता यह सव सीताराम ने रास्ते पर रख दिया। समादत ने कहा, साथ ही ले चलो पण्डित । वे कोई भारी थोड़े ही हैं ? सीताराम जवाव में सीना तान कर खड़ा हो गया और बोला, हाथापाई- हंगामा करोगे? या लाठी लोगे? काहो तो लाठी उठा लूं । किसान का बेटा, बचपन से ही मेहनत-मशक्कत करके उनको बड़ा होना पड़ता है, तिसपर जन्म से ही उसका कदकाठ बलिष्ठ है। लेकिन इस ढंग से जिन्दगी में वह कभी खड़ा नहीं हुआ था। कभी-कभार अन्याय का विरोध करता रहा है लेकिन उसमें और इसमें बड़ा फर्क है । आज उसे लगा कि आज खून हो जाने को भी वह तैयार है। उद्धत अपमान को वह बरदाश्त नहीं करेगा। यलिष्ठ देह लेकर उसका इस तरह खड़ा होना बेतुका नहीं लगा, सआदत भी चौकन्ना हो गया। अगर व्यक्तिगत मामला होता तो फौरन हंगामा छिड़ गया होता। सआदत भी ताकतवर है, लेकिन सआदत की ओर से यह मालिक का काम है, हुक्म के मुताविक करना होगा, खासतौर से मालिक जब वहीं खड़े हैं। उसने हाँक लगाकर कहा, पण्डित कह रहा है, उसको इस वक्त फुरसत नहीं। मणिवाबू की कचहरी थोड़ी ही दूरी पर थी, वे अपनी आँखों से ही सबकुछ देख रहे थे । वे बोले, रहने दो । तुम चले आओ। सआदत बोला, तुम्हारे साथ मारपीट करने में नहीं आया था पण्डित भाई । मुझ पर तुम नाराज मत होना। भला बताओ, मैं करूँ तो क्या करूं? गरीबगुर्वा जाहिल मनही, इसी तरह खट कर खाता हूँ। वह चला गया। सीताराम जरा लज्जित हुआ। वाकई, सआदत पर इतना गुस्सा करना वाजिव नहीं था। सआदत का क्या कसूर? लेकिन यह मणिलाल बाबू ? ये लोग भी क्या हैं ? छाता, लाठी, लालटेन, कुरता उठाकर वह बाबुओं की कोठी में दाखिल हुआ। पाठशाला के दरवाजे पर ही ज्योतिप साहा खड़ा था। साहा वोला, पण्डित, उस दिन का काम कोई ठीक नहीं हुआ। साहा के वक्तव्य का मतलब क्षणभर में सीताराम समझ गया। फिर वह सवालिया निगाह से देखता रहा। धीराबाबू के जेल की खबर सुनकर पाठशाला में छुट्टी देना कोई ठीक काम नहीं हुआ। सीताराम जमीन की ओर नजर गड़ाए सोचता रहा । स्कूल सव-इन्सपेक्टर साहब ने तुमको एक बार युलवा भेजा है। एक - मंदीपन पाठशाला ::३ बार हो आओ। सीताराम बोला, साहा जो, अगर स्कूल का एड देना यह बन्द कर दे तो आप लोग-तो क्या आप लोग भी पाठशाला- साहा ने बीच में टोकते हुए कहा, पहले से ही इतना सब मोच रहे हो पण्डित ? एक सफाई देते ही सबकुछ निवट जाएगा । यह मुझे सव-इन्स्पेक्टर साहब ने कहा है। इसके अलावा इन्सपेक्टर रजनीया भले आदमी, धार्मिक और महाशय व्यक्ति हैं। जाओ, तुम एकवार चक्कर लगा माओ। स्कूल सब-इन्सपेक्टर रजनीवायू सचमुच बड़े नेक हैं । जरा ज्यादा मात्रा में ही भलेमानुस हैं । रामकृष्ण देय के भक्त हैं, किमी प्रकार से भी झूठ नहीं बोलते, किसी भी पण्डित से जर्रा भर चीज भी स्वीकारते नहीं। सिर्फ दो खल्त हैं उनके । मज्जन होम्योपैथी का इलाज करते हैं, इमार-बीमार पड़ने पर उनकी दवा सेवन करने पर वे गुण होते हैं और रामकृष्णदेव, श्री श्रीमा व विवेकानन्द का आविर्भाव या तिरोधान उत्मव मनाने पर रजनीवाबू उसे हृदय गे स्नेह किए बिना रह नहीं पाते। मोताराम का दुर्भाग्य है कि उसकी तन्दुरस्ती बहुत अच्छी है, उसने कभी रजनी बाबू की दवा नही ली। और रत्नहाटा गांय रत्नों मा ही हाट है, पहाँ मणिलाल और शिकिकर जैसे रल इतने प्रबल हैं कि रामकृष्ण देव का जन्मोत्मय करना यहाँ बाज तक सम्भव नहीं हो सका है। एकवार आयोजन हुआ था, धीरानन्द के हम उग्र और उमी के कुछ मित्रो ने प्रयत्न किया था मेकिन शिवकिकर दल ने उगको चौपट कर दिया था। उन लोगो ने सलाह की थी, उत्सव होने पर एक बकरा लाकर ये उमका उत्मय क्षेत्र में बलिदान करेंगे। मणिलाल बाबू को चाल कुछ स्वतन्त्र किस्म की है । जमींदारी कूटचाल । उन्होंने रजनी बाबू को कहला भेजा था, हाल में उनको मुनाई पड़ा है, रजनीवाबू भागकल कुछ नाबालिग लड़कों के महारे गांव के भीतर आ-जा रहे हैं । वे अर्थात् मणिलालयावू विश्वास करते हैं कि रजनीवायू ईमानदार और भद्र व्यक्ति है, उनका कोई पुरा अभिप्राय नहीं है या हो नहीं सकता, लेकिन चूंकि उनके बाने-जाने के कारण गांव को यहू-धेटियों को अमुविधा होती है. इमलिए वे मविनय प्रतिवाद कर रहे हैं। दस्तावेज के मगौदे जैसी पाको और पेचीदा भाषा को यह उक्ति सुनकर रजनीबाबू के हाथ-पांव और उंगलियो के मिरे सचमुच ठण्डे पड़ गए थे। उन्होंने मारा आयोजन बन्द कर दिया था। यगले वर्ष से वे बड़े स्कूल के बोडिंग में, वहां के छात्र और शिक्षकों को लेकर इन पावन दिवसो का पालन किया करते हैं । हपते में एक दिन शाम को वोटिंग के छात्रों को लेकर बाधा घण्टा रिलिजियस पलाम लगाते हैं, गाना होता- "मा, मुझे कृपा कर बच्चा-मा बनाए रचना, शरीर चाहे बढ़ता रहे कोई नुकसान नहीं पर दिन बच्चा जमा ही बना रहे।" लेकिन सीताराम ने इनमें से किगी में भी योगदान नहीं किया। उसका ८४३ : संदीपन पाठशाला कारण यह नहीं कि सीताराम में भक्ति की कमी या अविश्वास हो। उसका कारण यह है कि उस बड़े स्कूल के किसी आयोजन में वह किसी प्रकार भी जाना नहीं चाहता है, जा नहीं सकता। बड़े स्कूल के हेडमास्टर की पहले दिन वाली स्नेहशून्य और सहानुभूतिशून्य चातें उसे हमेशा याद आती रहती हैं । हेडमास्टर ने पलेप के स्वर में ही कहा था, साहा केवट इन्हीं को लेकर तुम पाठशाला करो। पुण्य भी होगा-अंधेरे से उनको प्रकाश में भी लाना होगा । वही वह कर रहा है। फिर भी उसका एक निगूढ़ अभिमान है । इसके अलावा, स्कूल के किसी भी उत्सव में वे उसे निमन्त्रण भी नहीं भेजते । दूसरे मास्टर भी उससे घृणा करते हैं । यहाँ तक कि, शिवकिंकर-आविष्कृत 'अंचरे में लइया क्यों खा रहा है, आँचर जूठ हो जाएगा'-~-इस वाक्य को लेकर भी ठिठोली किया करते करते हैं। हालांकि सीताराम अगर चाहे तो इस व्यंग के उत्तर में व्यंग कर सकता है । उस स्कूल के मास्टरों में बहुत से लोगों का उच्चारण खराब है, कोई 'एवम्' और 'केवल' का उच्चारण करते हैं 'अयवम्' और 'कैवल' । कोई 'आमेन' को कहते हैं 'एमौन' । कोई 'कर्तव्य' को कहते हैं--कोरतव्य । यह सब लेकर व्यंग कर सकता है, लेकिन वह ऐसा करता नहीं। बल्कि उनके संसर्ग से वह कतरा कर चलता है। इसलिए रजनीवावू को खुश करने के सुयोग की उपेक्षा करके भी बड़े स्कूल की धर्मसभा में वह योगदान करने नहीं जाता। वहाँ जाने की बात खयाल में आते ही उसे एक कथा याद आ जाती है। नदी में एक स्वर्णकुम्भ और एक मृतकुम्भ वहते चले जा रहे थे । स्वर्णकुम्भ ने मृतकुम्भ को बुलाकर कहा था, हम दोनों ही जव कुम्भ हैं, चलो एक ही साथ चलें। नजदीक आ जाओ। मृतकुम्भ ने नमस्कार करते हुए कहा था, हे मूल्यवान स्वर्णकुम्भ, तुम को धन्यवाद । लेकिन तुम्हारी अनमोल उदारता की झंकार सहन करने की शक्ति मुझमें नहीं है। मेरा दूर रहना बेहतर है। इसलिए वह दूर ही रहता है। रजनीवावू इसको बुरा मानते हैं या नहीं, उसे नहीं मालूम । लेकिन भरोसा यही है कि रजनीवाबू अन्याय करने वाले व्यक्ति नहीं हैं। अन्याय वे नहीं करेंगे इसका विश्वास सीताराम को है। फिर भी आज चिन्तित सा सविनय नमस्कार कर सामने जा खड़ा हो गया। रजनीवाबू बोले, तनिक वैठो। वैठना पड़ेगा । इन लोगों का काम निवटा दूं। स्कूल सव-इन्सपेक्टर का दरवार । इस सर्कल की पाठशालाओं के पण्डितों में दो-चार जने रोजाना ही आते हैं। वेशभूपा में गरीवी की छाप, चेहरे पर शीर्णता, विनीत दृष्टि, सब-इन्सपेक्टर के चबूतरे पर वही-खाता लेकर बैठे रहते हैं । रत्नहाटा के बाबू लोग सिगरेट का धुंआ उड़ाते लकदक पोशाक पहने चले जाते हैं, वे वावशून्य देखते रहते हैं। शायद ही कभी पुराने जमाने के बूढ़े पण्डित यहां के बावुओं के किसी लड़के को अकेला पा बुलाकर उससे बातें करते हैं । फिर अकस्मात् ही कठिन हिज्जा, जटिल मानस-गणित पूछने लगते, वावुओं के लड़कों के लाजवाब हो जाने पर खुश होते, चेहरे पर सन्तोप की मुस्कान झाँकने लगती। लेकिन दो-एक लड़के ऐसे भी हैं, जो लोग यहाँ के भावी . । -

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। १६:: संदीपन पाठशाली सिर खुजलाते हुए लज्जा प्रगट करते हुए बोले, तमाकू पीता हूं हुजूर तो यह लड़का तमाकू-कोयला कुछ भी शेष नहीं रखता । तिस पर किसी को मार रहा है तो किसी को पीट रहा है। किसी की किताब फाड़ रहा है। उस दिन एक का कान दांतों से काट लिया-मार लहूलुहान मागला। कान उमेठा तो आंखें लाल-लाल कर कहने लगा-खवरदार, कायस्थ होकर मेरा कान मत छुओ । ये कान मेरे गुरु के हैं, मैं मन्त्र ले चुका हूं। रजनीवाबू बिगड़ पड़े-सन्टी ? सन्टी क्या हुई आपकी ?. सन्टी से पीटा क्यों नहीं आपने उसको ? बहुत अयोग्य व्यक्ति हैं आप! पंडित बोला, तो फिर किसी दिन अन्धेरे में अचानक ही किसी ढेले से मेरा सिर फूट जाएगा हुजूर । ब्राह्मण नहीं हूं, निरीह शिक्षक हूं-वह तो, गोवध हो जाएगा साहब। रजनीवाबू इस बार हँस पड़े-क्या मुसीबत ! तो फिर करेंगे क्या आप ? मैं भी भला लिखूगा क्या? जरा सोच कर बोले-अच्छी बात । फिर कभी ऐसी वातें न करिएगा। जी नहीं, फिर कभी नहीं कहूंगा हुजूर । इसके बाद उसने कहा, जी साहब रामकृष्ण कथामृत का दाम क्या है ? मैं एक मंगवाना चाहता हूं, दुकान का पता अगर लिख दें। कायस्थ की अक्ल बड़ी तेज होती है, चिन्ता में होते हुए. भी सीताराम ने तारीफ की। कायस्थ-पंडित ने बड़े फायदे से रामकृष्ण- कथामृत का प्रसंग छेड़ दिया है। इसके बाद पलाशबुनी के वृद्ध पंडित की बारी आई । इसी पंडित जी के साथ सीताराम इतनी देर से वातें कर रहा था। पंडित अपना दुखड़ा सुना रहे थे। जिस गांव में पाठशाला खोली है वहां पाठशाला खोलने की सम्मति प्राप्त करने के लिए जमींदार की कचहरी में रसोइए का काम स्वीकार करना पड़ा था। उन दिनों जमींदार के इस इलाके में आने पर उनका खाना बनाना पड़ता था। जमींदार के ग्राम्यदेवता की पूजा करनी पड़ती थी। इसमें हालांकि फायदा था। इस कारण ग्राम्य-पुरोहित का पद उनको मिल गया था । ईख पेरते वक्त शालपूजा कर गुड़ पाते थे, इतूपूजा करके उड़द पाते थे। लेकिन पंडित ने हँस कर कहा, बेटा, सवेरे से डेढ़ पहर दिन तक पाठशाला, फिर स्नान, फिर पूजा। इसका मतलव, दिन के तीन पहर तक विना खाए गुजारना पड़ता था। खाना हालांकि उतना वच जाता था, लेकिन उसके फलस्वरूप अब वीमारी आ जुटी है, तिस पर यह कन्यादाय भी है। जिन्दगी खत्म हो गई । वस दो-एक वर्ष रह गए। थोड़ा चुप रहने के बाद बोले, तुम लोगों का जमाना तो सुनहरा ज़माना है बेटा । गृहस्थों के घर लड़के के लिए धरना नहीं देना पड़ता । लड़के का बाप नहीं कहता, मेरा बेटा पढ़-लिखकर भला क्या करेगा? लड़के की मां-बुना नहीं कहती, इस वंश में तो पढ़ाई नहीं की जाती, पढ़ाई झेल भी लेगा, लड़का ? खयानत होगी । नहीं-नहीं, कोई जरूरत नहीं उसकी ? तुम तो बेटा साहा केवटों -- ?

संदीपन पाठशाला ::५७ के वेटों को लेकर पाठशाला कर रहे हो अव । अव सभी में पढ़ाई-लिखाई के लिए एक उत्माह है । और भी होगा। हम लोग नहीं देख सकेंगे, तुम लोग देखोगे। मीताराम ने यह बात मान ली, बोला, सो तो ठीक ही कहते है आप । माय-ही-साथ उसने अपने को भाग्यवान समझा। रजनीवाबू ने पुकारा, पलाशवुनी के पंडित जी। ब्राह्मण हाय में जनेऊ पकड़े सामने आ गड़े हो गए, वोले, हुजूर, मैं गरीय ब्राह्मण हूं, यही मेरा अन्न है । यह भी मारा जाय तो बच्चो को लेकर मुसीबत में पड़ जाऊँगा । तिम पर कन्यादाय भी है। वृद्ध पंडित ने कन्या के लिए रिश्ता तलाशने में दस-बारह दिन पाठशाला से नागा किया है। रजनीबाबू सहृदय व्यक्ति हैं । वृद्ध के मुप की ओर देख प्रसन्न हंसी हंमते हुए बोले-वैठिए, वैठिए आप । बैठने को होकर पडित रो पड़े। रजनीबाबू बोले-मुझे भी तो वताकर आप जा सकते थे। इन्सपेक्शन पर जाकर मैंने देखा, पाठशाला बन्द है। लोगों ने कहा-आप इस तरह नागा अक्सर किया करते हैं। पंडित बोले, डर से, साहब डर से मैंने आपसे-। फिर रो पडे यह । फिर बोले, साहब, सोलह माल की बेटी गले में फांसी जैसे बटकी हुई है, रात को नोंद नही, दिन को भोजन नही, उस दिन प्रतिज्ञा करके निकला था-पान ढूंढे बिना लौटूंगा नहीं। मिला कोई पान? -जो, मिला है । एक वृद्ध तिआह वाला 1 वर उसी से कादंगा । कहें भी तो क्या ! पंडित उद्घान्त-सा हो उठे। रजनीवाबू ने लम्बी सांस लेकर कहा-वर, जाइए-आप । लेकिन इरा तरह विना बताए लगातार दस-बारह दिन का नागा फिर कभी न करें। पलाशबुनी के पदित चले गए। अय और कोई नहीं । सभी को विदाकर रजनीवाबू ने बुलाया, सीताराम ! सीताराम नमस्कार कर सड़ा हो गया । रजनीवायू बोले, चटो। बढ़े लिफाफे में से एक दरख्यास्त निकालकर उन्होंने युद पढ़ी। फिर बोले, तुम्हारे गांव का पंडित, वह तो तुम्हारा दादा है; उससे सबकुछ यताया है, मुना है तुमने? जी हां। तुम तो अंग्रेजी भी कुछ जानते हो। पढकर देखो-सरमरी तौर पर सब समझ जाओगे। उन्होंने मोताराम के हाथों में दरख्वास्त दिया। टाइप किया हुमा दरख्वास्त-टू द डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट । मोघे मजिस्ट्रेट ५८:: संदीपन पाठशाला - साहब के पास दरख्वास्त भेजी है । साहव ने स्कूल सव-इन्सपेक्टर के पास तहकी- कात के लिए भेजी है। दरख्वास्त का कारण, असहयोग आन्दोलन में धीरानन्द मुखर्जी के जेल होने की खबर आने पर सन्दीपन पाठशाला के शिक्षक सीताराम पाल ने उसके प्रति सम्मान-प्रदर्शन करने के लिए पाठशाला वन्द की है। इसी से सिद्ध होगा धीरानन्द के प्रति उसका अनुराग । सीताराम धीरानन्द की रिआया है, उसी के घर में वह रहता है और उसी के आदर्श से प्रेरित है । इस मतिभ्रान्त उच्छं खल प्रकृति का युवक धीरानन्द इस समय अहिंसा आन्दोलन में योगदान करने पर भी दरअस्ल वह हिमक आन्दोलन के साथ युक्त है। सीताराम धीरानन्द के परामर्श से और आदर्श से पाठशाला के लड़कों को राजद्रोह सिखाता रहता है । मीताराम ने बड़े ही कमजोर आदमी की तरह धीरे-धीरे दरख्वास्त को रजनीवाबू के सामने उतार दिया । एक दुरि भय से उसका मन मानो अभिभूत हो पड़ा था। धीरानन्द हिंसक आन्दोलन से जुड़ा है ! सीताराम उसके पगमर्ण और आदर्श से पाठशाला के लड़कों को राजद्रोह की शिक्षा देता है ! उसे लगा, पाठशाला का एड बन्द होगा-यह तो मामूली बात है, इससे पुलिस भी उसको पकड़कर ले जा सकती है। रजनीवाबू ने पूछा, पाठशाला क्यों बन्द कर दी थी तुमने ? इस बारे में मैं क्या लिखू ? अपने को संयत कर मीताराम धीरे-धीरे बोलने लगा, मैंने उस ढंग से पाठगाला बन्द नहीं की थी। मैं उनके घर में रहता है, वे मुझे घर के लड़के की तरह देखते हैं, जब उनकी इस विपदा के बारे में सुना, माँ रो रही हैं, मेरे दोनों छात्र रो रहे हैं, तब मैं- रजनीवावू बोले, क्या तुमने कोई ऐसी बात की थी कि भाज धीरानन्द देण के लिए जेल गए हैं, उमीलिए पाठशाला बन्द हुई । जी नहीं साहव । आप मुझसे जो सौगन्ध खाने को कहिए, खाने को तैयार हूं । आप लड़कों से पूछ सकते हैं । ज्योतिप साहा जी हैं, उनसे पूछ सकते हैं । रजनीवावू बोले, मैंने साहा जी से पूछा है । उन्होंने हालांकि वही बताया जो तुम कह रहे हो। जरा चुप रहकर वे बोले, खैर, मैं यही लिखे दे रहा हूं। लेकिन इसके बाद से तुम बल्कि जरा सावधान रहना- जरा चुप रहने के बाद वे जरा संकोच के साथ ही वोले, हो सके तो तुम धीरानन्दवाबू के घर में रहना छोड़ दो। उससे भला ही होगा। समझे ? मीताराम चुप किए रहा । श्यामू-देवू को पढ़ाना छोड़ दे ? उनके घर के साथ रिश्ता छोड़ दे ? ऐमी विपदा के समय ? रजनीवावू बोले, देखो, ये सारे मान्दोलन, यह राजनीति, यह हमारे देश की नहीं है । यह है विदेशी चीज । इससे हमारे देश का कल्याण नहीं होगा। हम लोगों का एक गाव पर है धर्म का पथ, धर्म-नीति के बीच से ही हम लोगों की । - ? - संदीपन पाठशाला : ८६ मुक्ति आएगी। परमहंसदेव, स्वामी जी बार-बार यह बता चुके है । सीताराम ने आँखें घुमाकर देखा, रजनीवाबू की दीवाल-अलमारी में कितावें कतार में सजी हैं। रामकृष्ण कथामृत से स्वामी जी की पुस्तक- 'वीरवाणी', 'परिव्राजक', कितनी ही पुस्तकें ! रजनीवाबू विवेकानन्द प्रवर्तित सेवाधर्म के बारे में कहते जा रहे थे। ये बता गए हैं, मैं भारतवासी हूं। भारत की मिट्टी मेरे लिए स्वर्ग है । भारतवासी मेरा भाई है। वाहर से किसी ने आवाज दी, रजनीवाबू हैं क्या? कौन ? मास्टर जी? जी। आज की जोरदार खबर । सी० यार० दास अरेस्ट हो गए हैं। सच? रजनीवाबू बाहर निकल गए। सीताराम ने 'वीरवाणी' पुस्तक सोच यह क्या कर डाला ? थर्रा दिया इन्होने तो । आज कोई भी लड़का क्लास में आएगा नही । हँसकर रजनीवावू बोले, आप लोग च थामे बैठे रहिए, वर्ना इस गाँव का कोई भरोसा नहीं । शायद दरख्वास्त ठोक दें। बेचारे सीताराम के खिलाफ दिए हुए दरख्वास्त के बारे मे तो जानते ही होंगे? हालांकि वेचारे ने उस ढग से पाठशाला बन्द नहीं की थी। धीरानन्द के घर पर रहता है, विपत्ति का ममाचार सुनकर बेचारा वहां चला गया था। विपदा मे जिम प्रकार आदमी आदमी के घर जाता है। मचानक कोई मजदूर या किसान तबके का आदमी बोल पडा । जी बापू साहब-- सीताराम कमरे में ही बैठा था। 'वीरवाणी' लेकर उलट-पुलट कर देत रहा था। अचानक उसे अपने खेत-मजूर के बेटे को आवाज सुनाई पडी । जी, यहां सीताराम पंडित तो भाये हैं न ? क्या है रे, क्या बात है ?- सीताराम बाहर आ गया। जी, कन्या सन्तान हुई है जी । इसलिए वप्पा ने कहा, इत्तला कर आओ। मनोरमा ने एक कन्या सन्तान प्रसव किया है। वह लज्जित हो गया। रजनीवाबू ने कहा, जाओ, तुम घर जाओ । फिक मत करना । मैं सबकुछ ठीक कर दूंगा। जरा पथ आगे बढकर मीताराम ने कहा, अच्छे हैं न जच्चा-बच्चा? जी हां, वप्पा ने नहीं बताया। मालकिन ने ही कहा । लेकिन शरीफ लोगों के सामने वप्पा का नाम ही लिया। सीताराम जरा हंसा । छोकरे में अक्ल है । छोकरा पीछे से बोल पड़ा, जी, जेब से किताब गिर पड़ेगी, बाहर निकल आई है।

१० :: संदीपन पाठशाला किताव ! जेब से उसने किताब निकाल ली। उसका सारा शरीर सनसना उठा। रजनीवाबू की 'वीरवाणी' पुस्तक उलट-पुलट कर देख रहा था, जल्दी में उठ आते समय उसे जेब में डाल लिया है ! पीला सा चेहरा लिये मनोरमा लेटी हुई थी। गोद के पास अभी जन्मी शिणु- कन्या। अद्भुत ! ठीक तौर से आंखें नहीं खोल पा रही है, उंगलियों ने मुट्ठी बन्द कर रखी हैं, थर-थर कांप रही है। बड़ा अच्छा लगा सीताराम को ! मनोरमा ने हँसकर कहा, तुम पर पड़ी है। सीताराम बोला, तब तो बहुत खूब । शादी करने में ही आँखें कपार पर चढ़ेंगी। मुझ जैसी बदसूरत टोकती हुई मनोरमा बोली, हाय अम्मा ! कैसी वाहियात बात करते हो । बदसूरत कहाँ से हो गये तुम ? या अपने को वदसूरत बताने पर बड़ी दिलेरी हो जाती है ? सीताराम हँसा। फिर बोला, यह वात अगर तुम्हारा छल न हो तो तुम्हारे लिए चश्मा मंगवाना पड़ेगा। बात का मर्मार्थ न समझ पाने से मनोरमा ने एक बेतुका मजाक किया। जवाब में बोली, चश्मा देना, जूता देना, एक टोपी भी खरीद देना, तुम्हारे स्कूल में तुम्हारे एवज में काम कर आया करूंगी। सीताराम ने लड़की की ओर देखकर कहा, काली बदसूरत हुई भी तो क्या, उसको मैं पढ़ी-लिखी बनाऊंगा। अच्छी शादी अगर न हो तो उसकी शादी में करूंगा ही नहीं । शिक्षित करूंगा उसे, वह खुद किसी स्कूल में मास्टरी कर लेगी। वक्त कट जायगा। कैसी मनहूस बातें हैं तुम्हारी! क्यों? मास्टरी कैसे करेगी, औरत भी कभी मास्टरी करती है ? यहीं रलहाटा विद्यालय में ही स्त्री-मास्टर आ रही हैं । स्त्री-मास्टर आ रही हैं ? ईसाई हैं क्या? अहँ । ईसाई क्यों होगी-हिन्दू कायस्थ की बेटी है। मनोरमा दंग रह गई । कायस्थ घर की लड़की नौकरी कर रही है ? शादी नहीं की उसने ? मुझे मालूम नहीं। मनोरमा ने खुद ही अनुमान लगा लिया, शादी हो जाने पर पति भला उसे क्या नोकरी करने देगा? शादी नहीं हुई होगी। सीताराम बोला, यही तो बता रहा हूं, अच्छा पान, पढ़ा-लिखा पात्र अगर न मिला तो बेटी की शादी मैं करूंगा ही नहीं। समझी। मनोरमा वोली, ढेर-सा रुपया देना, मादी की कौन-सी चिन्ता ? - संदीपन पाठशाला ::६१ ढेर-सा रुपया ! सीताराम हस पडा। मनोरमा बोली, हो । तुम्हारे जितने सारे छान हैं उनसे ले लोगे-एक रुपया, दो रुपया, पांच रुपया, दस रुपया, जो जिस हैमियत का हो- सीताराम को पलाशवुनी के कन्यादायग्रस्त वृद्ध पंडित की याद आ गई। वह मनमने ढंग से 'चीरवाणी' पुस्तक को उलटने लगा। अचानक मनोरमा को भी याद आ गई, पिछली शाम जेठ की बातें । उसने कहा, वह जो दरख्वास्त की बात पंडित जेठ बता रहे थे, उसका क्या हुआ मामले को भरसक हल्का और संक्षिप्त कर सीताराम ने रजनी यायू के यहा का ब्यौरा दिया। आठ रजनीयाबू को सीताराम कमुरवार नहीं ठहरा सकता, रजनीबाबू ने अपनी कोशिश में कोई कोताही नहीं की। रिपोर्ट में उन्होंने क्या लिखा था, न देखने पर भी सीताराम जानता है, उसको बचाते हुए ही उन्होंने रिपोर्ट दाखिल की थी । कसूर शायद सीताराम के भाग्य का ही है । इसके अलावा और कुछ भी उसे दिखाई नहीं पड़ा। अचानक उम दिन पाठशाला के दरवाजे पर एक मोटरकार आकर खडी हो गई। मोटर से पुलिस साहब उतरे । आकू लपककर बाहर निकला फिर फौरन ही लौट आया । पुलिस साहब, पुलिस साहब जी । दफादार से पूछा, दफादार ने बताया। सीताराम हवड़ाकर बाहर निकल आया । पुलिम माहव दरवाजे के सिर पर लकड़ी पर लिखा नाम पढ़ रहे थे-सन्दीपन पाठशाला । सन्दीपन, पिफ्यू- लियर नेम ! दरोगा को ओर पलटकर उन्होंने पूछा, हू इज दिम सन्दीपन ? मास्साब ? इज ही? दरोगा ने कहा, मुझे ठीक मालूम नही सर । सीताराम नमस्कार कर खड़ा हो गया । उसका दिल तुरन्त भय से कॉप- कांप रहा है। ग्राम्य पाठशाला में माहब लोग सास कोई आते नहीं, आते भी हैं तो एस-डी-ओ या मजिस्ट्रेट साह्य आते हैं। पुलिस साहब का पाठशाला में आना और लकड़हारा के पास लाड़ी का बोझ उठाने के लिए यमराज का आना-इन दोनों में कोई फर्क नही। कहानी के लकड़हारे ने यम को पुकारा था, लोट जाने को कहने पर लौट भी गया था। लेकिन यह तो विन बुलाये खुद १० :: संदीपन पाठशाला किताव ! जेब से उसने किताब निकाल ली। उसका सारा शरीर सनसना उठा। रजनीवावू की 'वीरवाणी' पुस्तक उलट-पुलट कर देख रहा था, जल्दी में उठ आते समय उसे जेब में डाल लिया है ! - - पीला सा चेहरा लिये मनोरमा लेटी हुई थी। गोद के पास अभी जन्मी शिशु- कन्या। अद्भुत ! ठीक तौर से आंखें नहीं खोल पा रही है, उंगलियों ने मुट्ठी वन्द कर रखी हैं, थर-थर कांप रही है । वड़ा अच्छा लगा सीताराम को ! मनोरमा ने हँसकर कहा, तुम पर पड़ी है। सीताराम बोला, तब तो वहुत खूव । शादी करने में ही आँखें कपार पर चढ़ेंगी । मुझ जैसी बदसूरत ! टोकती हुई मनोरमा बोली, हाय अम्मा ! कैसी वाहियात बात करते हो। बदसूरत कहाँ से हो गये तुम ? या अपने को वदसूरत बताने पर बड़ी दिलेरी हो जाती है ? सीताराम हँसा । फिर बोला, यह बात अगर तुम्हारा ल न हो तो तुम्हारे लिए चश्मा मंगवाना पड़ेगा। बात का मर्मार्थ न समझ पाने से मनोरमा ने एक बेतुका मजाक किया। जवाव में वोली, चश्मा देना, जूता देना, एक टोपी भी खरीद देना, तुम्हारे स्कूल में तुम्हारे एवज में काम कर आया करूंगी। सीताराम ने लड़की की ओर देखकर कहा, काली बदसूरत हुई भी तो क्या, उसको मैं पढ़ी-लिखी बनाऊंगा। अच्छी शादी अगर न हो तो उसकी शादी मैं करूंगा ही नहीं। शिक्षित करूंगा उसे, वह खुद किसी स्कूल में मास्टरी कर लेगी। वक्त कट जायगा। कैसी मनहूस बातें हैं तुम्हारी! क्यों? मास्टरी कैसे करेगी, औरत भी कभी मास्टरी करती है ? यहीं रलहाटा विद्यालय में ही स्त्री-मास्टर आ रही हैं। स्त्री-मास्टर मा रही हैं ? ईसाई है क्या? में हैं । ईसाई क्यों होगी-हिन्दू कायस्थ की बेटी है। मनोरमा दंग रह गई । कायस्थ घर की लड़की नौकरी कर रही है ? शादी नहीं की उसने ? मुझे मालूम नहीं। मनोरमा ने खुद ही अनुमान लगा लिया, शादी हो जाने पर पति भला उसे क्या नौकरी करने देगा? शादी नहीं हुई होगी। सीताराम बोला, यही तो बता रहा हूं, अच्छा पान, पढ़ा-लिखा पात्र अगर न मिला तो वेटी की शादी मैं करूंगा ही नहीं। समझी। मनोरमा वोली, ढेर-सा रुपया देना, शादी की कौन-सी चिन्ता?

संदीपन पाठशाला::६१ ढेर-सा रूपया! सीताराम हंस पड़ा। मनोरमा बोली, हाँ। तुम्हारे जितने सारे छान हैं उनसे ले लोगे-एक रुपया, दो रुपया, पाँच रुपया, दस रुपया, जो जिस हैसियत का हो-- सीताराम को पलाशवुनी के कन्यादायग्रस्त वृद्ध पंडित की याद आ गई। वह अनमने ढंग से 'वीरवाणी' पुस्तक को उलटने लगा। अचानक मनोरमा को भी याद आ गई, पिछली शाम जेठ की बातें । उसने कहा, वह जो दरख्वास्त की बात पंडित जेठ बता रहे थे, उसका क्या हुआ ? मामले को भरसक हल्का और संक्षिप्त कर सीताराम ने रजनी बाबू के यहा का ब्यौरा दिया। आठ मास्साब! रजनीवाबू को सीताराम कसूरवार नही ठहरा सकता, रजनीवाबू ने अपनी कोशिश में कोई कोताही नहीं की। रिपोर्ट में उन्होंने क्या लिखा था, न देखने पर भी सीताराम जानता है, उसको बचाते हुए ही उन्होने रिपोर्ट दाखिल की थी। कसूर शायद सीताराम के भाग्य का ही है । इसके अलावा और कुछ भी उसे दिखाई नहीं पड़ा। अचानक उस दिन पाठशाला के दरवाजे पर एक मोटरकार आकर खडी हो गई । मोटर से पुलिस साहब उतरे । आकू लपककर बाहर निकला फिर फौरन ही लौट आया। पुलिस साहब, पुलिस साहब ? जी । दफादार से पूछा, दफादार ने बताया। सीताराम हड़बड़ाकर बाहर निकल आया। पुलिस साहब दरवाजे के सिर पर लकड़ी पर लिखा नाम पढ़ रहे थे-सन्दीपन पाठशाला । सन्दीपन, पिक्यू- लियर नेम ! दरोगा की ओर पलटकर उन्होने पूछा, हू इज दिस सन्दीपन ? इज हो? दरोगा ने कहा, मुझे ठीक मालूम नहीं सर । सीताराम नमस्कार कर खड़ा हो गया। उसका दिल तुरन्त भय से कॉप- काँप रहा है। ग्राम्य पाठशाला में साहब लोग खास कोई आते नहीं, आते भी हैं तो एस-डी-ओ या मजिस्ट्रेट साहब आते हैं । पुलिस साहब का पाठशाला में आना और लकड़हारा के पास लकड़ी का वोझ उठाने के लिए यमराज का आना-इन दोनों में कोई फर्क नहीं। कहानी के लकड़हारे ने यम को पुकारा था, लौट जाने को कहने पर लौट भी गया था। लेकिन यह तो दिन बुलाये खुद ६२ : : संदीपन पाठशाला ही आ धमका है. यह क्या यूं ही लौट जायगा! पर्याप्त सम्मान दिखाते हुए सीताराम नमस्कार कर खड़ा हो गया। दरोगा ने कहा, यही पाठशाला के पंडित हैं सर । तीखी नजरों से सिर से पैर तक उसे निरखकर साहव बोले, यू पंडिट ? सीटाराम पाल? - जी हाँ हजूर। , साहव ने बंगला में कहा, सन्दीपन पाठशाला ! क्या मतलव ? सीताराम बात का मतलब समझ नहीं सका, परेशान और सिटपिटाया-सा वह वोला, जी? पाठशाला का नाम सन्दीपन क्यों है ? सन्दीपन कौन है ? सीताराम जरा विस्मित हुआ। वंगाली साहब, हिन्दू का बेटा, सुना है साहब किसी बड़े वैद्यवंश के हैं, सन्दीपन कौन है, यह साहब नहीं जानते ! उसने हाथ जोड़कर कहा, हुजूर, श्रीकृष्ण के गुरु का नाम है । सान्दीपनि मुनि । उन्हीं की सन्दीपन पाठशाला में कृष्ण-बलराम पढ़े थे। आई सी ! स्थिर दृष्टि से साहब कुछ देर तक सीताराम की ओर देखते रहे । इसके बाद बोले, तुम्हारी उपाधि तो पाल है ! सद्गोप किसान के बेटे हो ? जी हाँ। तुम्हारा गांव भी छोटे किसानों का गांव है ? जी हाँ हुजूर । यही नजदीक ही-कोस-भर में. यस, यस । आई नो, आई नो । जरा चुप रहकर बोले, पाठशाला का नाम सन्दीपन क्यों रखा ? अय परित्राणाय साधुनाम् ? वे जरा हँसे । फिर बोले, यह तुम्हारे दिमाग से आया है ? संय? कृष्ण बनाने का कारखाना ? सीताराम की समझ में नहीं आया, इस नामकरण में अपराध कहाँ छिपा हुआ है ! लेकिन बिना भयभीत हुए रहा नहीं गया। साहव की बातें धमकी नहीं, लेकिन रूखी-तीखी और निर्दय हैं, हथौड़े की तरह आघात नहीं करती, धारदार धूरे की नाई स्वच्छन्द अनायास काटती चली जाती हैं। सीताराम ने महसूस किया, साहब विल्कुल पेन्सिल छीलने की तरह उसको छोलते चले जा साहव ने फिर प्रश्न किया, किसने पाठशाला का नामकरण किया है ? तुमने ? सीताराम वोला, जी धीरानन्द बाबू ने। आइ सी । चलो, तुम्हारी पाठशाला देखूगा। । - ऐसे वक्त पर क्या करना पड़ता है, यह सभी पाठशालाओं के लड़के जानते हैं। इसी बीच वे अपनी-अपनी जगह पर मनोयोग के साथ पढ़ने वैठ गये हैं, यहां तक कि आकू भी । साहब के भीतर प्रवेश करते ही वे ससम्मान सड़े हो संदीपन पाठशाला::६३ । गए, नमस्कार किया उन लोगों ने । सीताराम ने कुर्सी झाड दी। मेज पर सारी कापियां उतारकर रख दी। साहब ने उनको वाएँ हाथ से ठेलकर सरका दिया। वे कमरे का असवाव-सामान तीखी नजरों से देखने लगे। लड़कों मे कुछ भागे बढकर नमस्कार कर कविता-पाठ करने लगे : "आओ सब खड़े हो जायें कतार में दरशक आए हैं आज विद्यागार में प्रणाम तुम्हारे चरणो मे मतिमान आशीर्वाद करो हम बनें ज्ञानवान ।" साहब ने हमकर कहा, बहुत खूब । गुड सीताराम ने लड़को को इशारा किया, वे रुक गये। साहब यकायक उठे, चारों ओर की दीवार के पास जाकर अच्छी तरह से कुछ देख आए । वै दीवार पर लड़को द्वारा पेन्सिल से लिखी इबारत पढ़ आये- वन्देमातरम्, बन्दमातरम्, भोला चोर है, माकू डाकू है, वन्देमातरम्, गांधी महाराज की जय, वन्देमातरम् । साहब लौटकर कुर्सी पर बैठ गए। लड़कों को ओर देखकर कहा, तुम लोग भारतवर्ष के सम्राट का नाम जानते हो 'सीताराम ने ज्योतप साहा के भतीजे से कहा, बोलो, डर क्या है ? उसने हाथ जोड़कर कहा, इंगलडेश्वर सम्राट पंचम जार्ज। साहब बोले, महामान्य इंगलंडेश्वर सम्राट पंचम जार्ज । गुड | क्यों, तुम लोग भारतवर्ष के सबसे बड़े यादमी का नाम जानते हो? रुपये से बड़ा नहीं- भला आदमी, वडा यादमी। ज्योतिप साहा का भतीजा विह्वल दृष्टि से मास्टर के मुख को और देखता रहा। कुछ ऊपर की ओर मुख किए सोचने लग गये। आकू अपनी आदत के मुताधिक मुस्करा रहा था। माहवको आँखो से आंखें मिलते ही वह मुस्कराकर सिर झुकाए बोला, महाराज गांधी। ज्योतिप साहा का भतीजा फौरन वोला पड़ा, चित्तरजनदास । एक ने कहा, मोतीलाल नेहरू । आके फिर बोल पड़ा, सुभाषचन्द्र बोस । जवाहरलाल नेहरू । सीताराम के हाथ-पांव सचमुच ठडे पड़ गये। वह पसीने से तरबतर हो रहा 7 । था। साहब बोले, बस, बम । जाओ, तुम लोगों की छुट्टी । जाओ। लड़को के चले जाने के बाद साहब ने पूछा, तुमने यह सब मिपाया है ! चाकू से पेन्सिल काटते काटते किसी समय पेन्सिल भी संगीन ए से नुकीलो और धारदार बन जाती है । भय की अन्तिम सीमा तक पहुंचकर मनुष्य बहुधा अभय न मिलने पर भी निर्मय हो उठता है। उसने अब मुंह उठाकर कहा, नहीं। मैंने नहीं मिलाया। यह सब आजकल किसी को मिसानहापर ६६ :: संदीपन पाठशाला बैठो तुम, बैठो। रजनी बाबू उसके बगल में बैठ गए। फिर बोले, मैंने सबकुछ सुना है। सीताराम चुप किए रहा। रजनी बाबू बोले, इच्छा थी कि सर्च के बाद ही एक वार पाठशाला जाऊं। अपनी आँखों देख आऊं। लेकिन यहाँ के मास्टर लोगों ने मना किया। कुछ देर चुप रहने के बाद फिर बोले, सुना था, तुम रोजाना इस झरने के पास घूमने आते हो, सो चला आया। सीताराम मूढ़-सा प्रश्न कर वैठा, जी ? रजनी बाबू उसकी पीठ पर सस्नेह हाथ रख अव बोले, तुम बेहद मायूस- सा हो गये हो । ऐसा मायूस हो पड़ने से तो काम नहीं चलेगा। सीताराम ने आँखें मूंदकर कहा, जी नहीं। जरा मुस्कराने की भी कोशिश की उसने। रजनी बाबू बोले, मणिवावू के साथ तुम्हारा क्या हुआ था--जमींदार मणिलाल बाबू के साथ ? सीताराम मुछ भी याद नहीं कर सका, सविस्मय उसने कहा, जी कहीं, कुछ भी तो--। वह स्तब्ध हो गया, अब उसे याद आ रहा है। क्या कहा था तुमने उनको ? सीताराम ने अकपट सारी बात बता दी। वे ही इस मामले के मूल में हैं। उन्होंने ही पुलिस साहब को यह सब बातें बताई हैं। सीताराम ने अब एक गहरी लम्बी सांस ली। रजनीवाबू बोले, पहले जो दरख्वास्त दिया गया था वह मेरी रिपोर्ट से ही ठीक हो गया था। कोई गड़बड़ी नहीं हो सकती थी। सीताराम का बदन सख्त हो उठा; मणिलाल बाबू के द्वारा यह सब किया- कराया गया है-इस समाचार ने ही उसे कड़ा बना दिया। उसने जरा हँसकर कहा, यह मेरा भाग्य है। बहुत देर चुप रहने के बाद रजनीवावू बोले, क्या करोगे ? सीताराम ने प्रश्न किया, क्या मुझे पाठशाला और खोलने नहीं देंगे ? चाहे तो गवर्नमेंट क्या नहीं कर सकती ? गैर कानूनी संस्था कहकर वन्द करवा सकती है, लेकिन-। रजनी वाबू हँसे, बोले, ऐसा नहीं करेंगे, उनमें भी एक शर्म-हया है । एक पाठशाला- नहीं इतना नहीं करेंगे। लेकिन एड का रुपया बन्द हो जाएगा। फिर कुछ देर चुप रहने के बाद वे वोले, लेकिन अभी कुछ दिन चुपचाप रहना ही बेहतर होगा । वावुनों के वेटे पढ़ रहे हैं, उसी के साथ अगर दो-चार लड़के और ले लो तो तुम्हारा गुजारा किसी तरह हो जाएगा। इसके अलावा दोपहर को नगर मव-रजिस्ट्री के दफ्तर में लोगों की अर्जी-दरख्वास्त लिख दोगे - वार संदीपन पाठशाला :: ६७ तो भी कुछ कमाई हो जाएगी तुम्हारी। पाठशाला से बेहतर ही होगी। मैंने सब-रजिस्ट्रार बाबू से कहा है । वे भी सारा मामला सुनकर दुखी हुए। बोले, --अच्छी वात, भेज दीजिएगा। सीताराम ने लम्बी सांस ली। बोला, देखें । बाबुओं को कोठी में लौटते ही पान्हाई ने कहा, मां जो तुम्हें बुला रही हैं। धीरानन्द की मां इस मामले को लेकर काफी लज्जित हो गयी थी। किमी तरह मे भी भुला नहीं पा रही थी कि इसके लिए धीरानन्द जिम्मेवार है। धीरानन्द जेल गया है, धीरानन्द का सीताराम आदर करता है, धीरानन्द के भाइयों को पढ़ाता है, उनके घर में रहता है, तभी उसका ऐमा दुर्भाग्य है । बड़ी मेह्नत से वैचारा किमान मद्गोप का बेटा, थोडा-मा पढ़-लिसकर भद्र तरीके से जीवन बिताने के लिए पाठशाला खोल बैठा था, वह पाठशाला ही मान टूट गई, ऐमा नहीं, शायद उम वेचारे या उस पथ को अपनाकर चलना भी के लिए सरम हो गया। उनकी जिम्मेवारी केवल इतनी ही नहीं, सीताराम केवल बेटों का गृहशिना ही नहीं, वह उनकी रिआया भी है। उन्होंने उसे बुलवाकर धीरानन्द के पढ़ने के कमरे में बिठाया। बोलों, बैठो बेटा । उस वेने तुमने अच्छी तरह साना नहीं साया । पहले खाना खा लो। सीताराम ने आपत्ति नहीं की। भूख भी लगी थी, पेट भरकर साया । माँ बोली, सुनो वेटा, मैं यह भूल नही पा रही हू, धोरा के लिए तुमको यह तक- लीफ उठानी पड़ी। मोताराम की आँखो में अचानक ही आंसू आ गए। उसने आग पोछार जी नही था । यह सारा बवाल बाराया है मणिलाल बाबू ने । मणि देवर जी ने? जी हाँ। उसने सारी बातें बतायी। मा हेमो-बाड़वी-सी धारदार हमी। यह हंगी गीताराम को आश्चर्यजनका- सी लगी। यह हेमी इनके अलावा और कोई हंग नहीं सकता। मां बोली, जानते हो वेदा, जंगल मा मिह मर जाता है तब दूमरे जंगल का मिह ाकर इस जंगल के आश्रितों पर अत्याचार करता है । लेकिन उसमा भी प्रतिकार किसी धरत हो जाता है। मिह के छोने जब बड़े हो जाते हैं तब वे इसका बदला चुकाते हैं। मां गंभीर चेहग लिये बैठी रहीं कुछ देर तक । फिर एक लम्बी-मी सांस लेने के बाद बोली, मेरे बेटे भी कभी बड़े होंगे। लौट आने दो धीरा को। मोताराम नीरव बैठा रहा। मां की ये वान उमे बहुत कठोर-मी लगीं। उनके वेटेमिह हैं और वे आश्रित है ! मां बोली, गुनो बेटा आज जिमलिए तुम को मैंने वुला भेजा है । या करोग तुम? पाठशाला तो उस गयी। सीताराम हड़बड़ाकर बोल पड़ा, जी नही, उठ नहीं गयो है, लेकिन हो, एड १६ :: संदीपन पाठशाला . बैठो तुम, वैठो। रजनी बाबू उसके बगल में बैठ गए। फिर वोले, मैंने सबकुछ सुना है। सीताराम चुप किए रहा। रजनी बाबू बोले, इच्छा थी कि सर्च के बाद ही एक वार पाठशाला जाऊं। अपनी आँखों देख आऊं। लेकिन यहाँ के मास्टर लोगों ने मना किया। कुछ देर चुप रहने के बाद फिर वोले, सुना था, तुम रोजाना इस झरने के पास घूमने आते हो, सो चला आया। सीताराम मूढ़-सा प्रश्न कर वैठा, जी ? रजनी वाबू उसकी पीठ पर सस्नेह हाथ रख अव बोले, तुम वेहद मायूस- सा हो गये हो । ऐसा मायूस हो पड़ने से तो काम नहीं चलेगा। सीताराम ने आँखें मूंदकर कहा, जी नहीं। जरा मुस्कराने की भी कोशिश की उसने। रजनी वाबू बोले, मणिवावू के साथ तुम्हारा क्या हुआ था-जमींदार मणिलाल बाबू के साथ ? सीताराम कुछ भी याद नहीं कर सका, सविस्मय उसने कहा, जी कहाँ, कुछ भी तो~~। वह स्तब्ध हो गया, अव उसे याद आ रहा है। क्या कहा था तुमने उनको ? सीताराम ने अकपट सारी बात बता दी। वे ही इस मामले के मूल में हैं । उन्होंने ही पुलिस साहव को यह सब बातें बताई है। सीताराम ने अब एक गहरी लम्बी सांस ली। रजनीवाबू वोले, पहले जो दरख्वास्त दिया गया था वह मेरी रिपोर्ट से ही ठीक हो गया था । कोई गड़बड़ी नहीं हो सकती थी। सीताराम का बदन सख्त हो उठा; मणिलाल बाबू के द्वारा यह सव किया- कराया गया है-इस समानार ने ही उसे कड़ा बना दिया। उसने जरा हँसकर कहा, यह मेरा भाग्य है। बहुत देर चुप रहने के बाद रजनीवाबू बोले, क्या करोगे ? सीताराम ने प्रश्न किया, क्या मुझे पाठशाला और खोलने नहीं देंगे ? चाहे तो गवर्नमेंट क्या नहीं कर सकती ? गैर कानूनी संस्था कहकर बन्द करवा सकती है, लेकिन--1 रजनी बाबू हँसे, बोले, ऐसा नहीं करेंगे, उनमें भी एक शर्म-हया है। एक पाठशाला- नहीं इतना नहीं करेंगे। लेकिन एड का रुपया वन्द हो जाएगा। देर चुप रहने के बाद वे वोले, लेकिन अभी कुछ दिन चुपचाप रहना ही बेहतर होगा । बाबुनों के बेटे पढ़ रहे हैं, उसी के साथ अगर दो-चार लड़के और ले लो तो तुम्हारा गुजारा किसी तरह हो जाएगा। इसके अलावा दोपहर को अगर मव-रजिस्ट्री के दफ्तर में लोगों की अर्जी-दरख्वास्त लिख दोगे - फिर कुछ संदीपन पाठशाला ::६८ मनोरमा बोली, मगर पकड़ ले जायें? नही, पकड़ नहीं ले जायगा कोई। नहीं ले जायगा? नहीं। मुस्कराकर सीताराम ने फिर कहा, और अगर ले ही जाय तो क्या हमा ? यह कोई चोर-डकैत का जेल तो है ही नहीं। मनोरमा ने विरोध करते हुए कहा, नहीं। नहीं ? अव सीताराम हंसा । तुमको, भई यह सव करने की जरूरत नहीं। क्या? पाठशाला--आठशाला। हां और बगर करना ही हो वो अपने गांव में करो। उम घर के पंडित-जेठ बता रहे थे, मैं तो अब समुराल जाकर ही रहूगा, तो फर्ता यहीं पाठशाला क्यों नहीं करता! सीताराम चुप किये रहा। मनोरमा लाड जताती हुई बोली, गांव के लड़के मुझे 'गुरू मां' कहकर पुकारेंगे उग घर की दादी की तरह । हाँ। सीताराम ने उसांस छोड़ी। जमींदार कोटी की नायवी, गांव को पाठशाला, किसी से भी उसका मन बुश नहीं हो पा रहा है । उमके बड़े जतन, बड़ी साथ से बनी रनहाटा को सन्दीपन पाठशाला! उम पाठशाला के मिवा किमी से भी उसका मन नहीं भरेगा । शायद राज्यपद पाने पर भी नहीं । वरमात में धान मेत की तरह उसकी पाठशाला की उमंग उठी थी। गदले पानी मे भरे मेत में धान का पौधा रोप दिया जाता है, शुरू-शुरू में ये पौधे दिखाई नहीं पड़ते-गंदले पानी से भरा मेत जलभरी परती जमीन-मा लगता है, देखते ही देसते धान के पौधे हमकः कर हरियाली से सारे पेत को भर देते हैं । उस समय दूर से उनकी हरियाली का लालित्य लोगों की आँखों में पड़ता है, यांग जुहा जाती हैं। उगकी पाठशाला भी इसी तरह जमने लगी थी। साहाटोला, मुनारटोला, केवटटोला में एक गलवनी आ गई थी। कमरे की फर्श, वरामदा लड़कों से भर उठे थे । शोर मचाते वे पढ़ा करते थे, तरन्नुम से पहाड़ा पढ़ते थे-दो एक्के दो, दो दूना चार, दो तिया छह । मानो एक गीत हो । मुहल्ले के लोग कहते, पाठशाला में पढ़ाई हो रही है। रास्ता चलते राहगीर ठिठक कर पड़े हो जाते पे। जो लोग पढ़ना जानते हैं, वे इस साइनबोर्ड को पढ़ते थे-रत्नहाटा मन्दीपन पाठशाला, शिक्षक-सीताराम पाल । । ..

१८::संदीपन पाठशाला वन्द हो जायगी। लड़के भी तो सभी सर्टीफिकेट लेकर चले गये। जी हां। । तो फिर? सीताराम को इसका जवाब ढूंढ़े नहीं मिला। मां वोली, हम लोगों के लिए ही तुम्हारा यह कमाई का जरिया बन्द हुआ। मैं सारा दिन ही सोचती रही। तुम एक काम करो बेटा। हमारे सरिश्तेखाने में तुम काम करो। तुम्हारा गांव, इस ओर सुरभिपुर, रामचन्द्रपुर ये तीनों गांव अगल-बगल हैं। इनकी वसूली ले लो और सदरसरिश्तेखाने के कागजात की देखभाल करो। उससे पाठशाला से बेहतर कमाई होगी। तनख्वाह होगी, तहरीर होगी, दाखिल खारिज की फीस का हिस्सा होगा। अच्छा होगा। अच्छा होगा । उपपद तत्पुरुष कन्हाई राय जाने कव आकर दरवाजे के सामने डकडू हो वैठा था। मां बोलीं, इसके अलावा बेटा, मेरा भी एक स्वार्थ है । तुम मेरे सन्तानतुल्य हो । केवल यही नहीं, तुम अच्छे स्वभाव के हो, ईमानदार हो तुम। हमारे नायव जी की सेहत खराब है । उनके बाद तुम्हारे ही हाथों में मैं सारा भार सौंपना चाहती हूं। लम्बी साँस लेकर वोली, धीरा ने जो पथ अपना लिया है, उससे उस पर मेरा अव कोई भरोसा नहीं। सीताराम इसके लिए तैयार नहीं था। वह चंचल हो उठा। क्षण-भर में कल्पना में नायव जीवन का रूप उभर आया उसके सामने । जमींदार कोठी का नायव ! पीछे-पीछे कन्हाई राय सिर पर पगड़ी बांधे, कन्धे पर लाठी लेकर चलेगा। तख्तपोश पर छोटी-सी गद्दी के आसन पर सामने कैशवाक्स लेकर वह वैठेगा। इसके अलावा-सिंह का आश्रित बनकर वह नहीं रह सकेगा। कन्हाई राय बोले, लग जाओ, लग जाओ । भला के रोज लगेंगे सीखने में ? मैं सब सिखा दूंगा। सीताराम कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर वोला, सोचकर देख लूं मां । सम्मति देने को होकर भी उसका गला रुंध गया। दिल जाने कैसा करने लगा। । मनोरमा उत्कंठित-सी उसके लिए प्रतीक्षा कर रही थी। पाठशाला की खानातलाशी की खबर उसको सवेरै मिल चुकी थी। आसपास के पांच-छह गांवों में यह खबर फैल चुकी थी। मनोरमा ने हलवाहे को भी भेजा था, वह रत्लहाटा में दो बार आकर पता लगा गया है। लेकिन सीताराम से उसने बातें नहीं की। मनोरमा की मनाही थी। उत्कंठित होने पर सीताराम नाराज होता है। सीताराम के आते ही वह अपने को संभाल नहीं सकी, रोने लगी। सीता- राम सस्नेह उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोला, रोती क्यों हो?

संदीपन पाठशाला ::६१ मनोरमा बोली, अगर पकड़ ले जायें? नही, पकड़ नहीं ले जायगा कोई। नही ले जायगा? नही । मुस्कराकर सीताराम ने फिर कहा, और अगर ले ही जाय तो क्या हुआ? यह कोई चोर-डकत का जेल तो है ही नहीं। मनोरमा ने विरोध करते हुए कहा, नहीं। नहीं ? अव सीताराम हंसा । तुमको, भई यह सब करने की जरूरत नहीं। क्या? पाठशाला-आठशाला। हाँ और बगर करना ही हो तो अपने गांव में करो। उस घर के पंडित-जेठ बता रहे थे, मैं तो अब ससुराल जाकर ही रहूंगा, तो फलां यही पाठशाला क्यों नहीं करता ! सीताराम चुप किये रहा। मनोरमा लाड जताती हुई बोली, गांव के लड़के मुझे 'गुरु माँ' कहकर पुकारेंगे उस घर की दादी की तरह । हाँ। सीताराम ने उसांस छोडी। जमींदार कोठी की नायवी, गाँव की पाठशाला, किगी से भी उसका मन खुश नहीं हो पा रहा है। उमके बड़े जतन, बढ़ी साध से बनी रत्नहाटा की सन्दीपन पाठशाला ! उस पाठशाला के सिवा किसी से भी उसका मन नहीं भरेगा । शायद राज्यपद पाने पर भी नहीं । बरसात मे धान खेत की तरह उसकी पाठशाला को उमंग उठी थी । गंदले पानी से भरे खेत में धान का पौधा रोप दिया जाता है, शुरू-शुरू में ये पौधे दिखाई नहीं पड़ते-गदले पानी से भरा खेत जलभरी परती जमीन-मा लगता है, देखते ही देखते धान के पौधे हुमक कर हरियाली से सारे खेत को भर देते हैं । उस समय दूर से उसकी हरियाली का लालित्य लोगों को बांखों में पड़ता है, आंग जुड़ा जाती हैं। उनकी पाठशाला भी इसी तरह जमने लगी थी । साहाटोला, सुनारटोला, केवटटोला में एक खलवली आ गई थी। कमरे की फर्श, वरामदा लड़कों से भर उठे थे । शोर मचाते वे पढ़ा करते थे, तरन्नुम से पहाडा पढ़ते थे-दो एक्के दो, दो दूना चार, दो तिया छह । मानो एक गीत हो । मुहल्ले के लोग कहते, पाठशाला में पढ़ाई हो रही है। रास्ता चलते राहगीर ठिठक बार गहे हो जाते थे। जो लोग पढ़ना जानते हैं, वे इस साइनबोर्ड को पढ़ते थे-रत्नहाटा मन्दीपन पाठशाला, शिक्षक सीताराम पाल ।

१०० :: संदीपन पाठशाला + नौ 1 अगले दिन भी वह लाठी, छाता और लालटेन हाथों में लेकर सवेरे रत्नहाटा गया । बुझे दिल से आकर ही वह श्यामू-देवू. को पढ़ाने बैठ गया। कुछ दिन हुए श्यामू बड़े स्कूल में भरती हो गया है । देवू अव भी घर ही में पढ़ता है। दस बजे उनको छुट्टी देकर सीताराम ने एक ठंडी सांस ली। नहाने की कोई जल्दी नहीं । पाठशाला बन्द है । आंखों में आंसू आ गए, आँसू छिपाने के लिए ही वह तख्तपोश पर लेट गया। कुछ देर बाद ही उठकर बैठ गया। किसी भी तरह से उसे शान्ति नहीं मिल रही है । अचानक मन में क्या आया कि टूटी हुई घड़ी को दीवार की एक कील से लटकाकर उसको चलाने की, कोशिश में जुट गया । एक वार दाहिने सरका कर फिर जरा-सा बाएँ ठेलकर दीवार और घड़ी की पीठ के वीच एक कागज ठूस पेंडलम डुलाकर आवाज सुनने लगा है। हां, अव आवाज़ कुछ-कुछ ठीक आने लगी है। बहुत देर तक वह घड़ी की ओर ताकता रहा । चल रही है घड़ी। फिर फटे हुए मैप को लेकर वैठ गया। जरा मैदे की लेई चाहिए और थोड़ा-सा बारीक कपड़े का टुकड़ा। फिर यह भी दुरुस्त हो जाएगा। पंडित! कौन? शिशु कक्षा के एक बच्चे को गोद में लेकर उसकी विधवा मां आई है । जरा इसकी नाड़ी तो देख लो पंडित ! कल रात से बुखार है । तुमको विना दिखाये हम लोगों का काम नहीं चलता वेटा । देख लो एक वार । इन कई वर्षों में सीताराम ने इस एक विद्या पर भी अधिकार प्राप्त कर लिया है। नाड़ी देखना सीख लिया है उसने । कफ पित्त-वायु मादि के माधिक्य- दोप का भी निर्णय वह कर सकता है। देखें ? दाहिना हाथ । दाहिना हाथ कौन-सा है जी? अंय ?. जिस हाथ से खाना खाते हो । वाह । वायाँ हाथ. लड़के की कोहनी के नीचे रख दाहिने हाथ से उसने नाड़ी दवायी। बुखार तो काफी है-अन्दाजन एक सौ एक होगा। दो दिन लगेंगे। पित्त- दोप हुआ है जी। लड़के ने कहा, पाठशाला क्या नहीं लगेगी मास्सा ? मलिन हंसी हँसते हुए पंडित वोला, लगेगी क्यों नहीं। पहले चंगे हो जामो, फिर चलकर आ जाना। मुझे टिफन का घंटा बजाने देंगे मास्ता ? दूंगा। तुम ही घंटा वनायोगे । सिर और पीठ पर हाथ फेरकर मास्टर ने संदीपन पाठशाला::१०१ कहा, देखना, ठंड न लगे। वह फिर मैप लेकर बैठ गया। जरा मैदे की नई चाहिए। महीन कपड़ा थोड़ा-सा । कोठी के भीतर जाने के लिए वह उठ पड़ा हुआ। कौन ? कोई शायद बाहर से झांक रहा है। मैं हूँ सर । आफू बाकर सामने खड़ा हो गया। आक ? जी हां । माकू दरवाजे के पलड़े को पकड़े उमी पर मुग रखकर बोला, पाठशाला कहाँ लगेगी सर? पाठशाला? हो। सीताराम चुप्पी साधे रहा । भला क्या जवाब दे वह ? पाठगाला लगेगी नही-यह वाक्य उसके मुस से निकलना ही नहीं चाहता। आफू बोला, मैं सर, आपको पाठशाला के मिवा और कही नही पदूंगा। कहीं नहीं। बैठो, यही बैठ जाओ। बाकू बैठा। एक बार किताय सोली, फिर उठकर पंडित के बगल में भाकर बैठ गया । मैदे को लेई ले आऊँ ? लेई से चिपका क्यो नहीं देते। ले आऊँ लेई ? ला सकोगे? जी हाँ । बिल्कुल ले आऊँगा। वावुओं की कोठी में धीराबाबू की मां से कहना, पंडित ने जरा मैदे को लेई और थोड़ा-सा लत्ता मांगा है। आफू चला गया। भागता हुआ। ब्लकबोर्ड के टूटे जोड़ पर एक कील ठोकती हैं। बस काम चल जायेगा। रस्सी से बांधने से भी चल गकता है । सीताराम एक कील ढूंढता फिरता रहा। कौन? यह क्या, आप? आकू की माँ भाकर सड़ी थी। आक की मां बड़ी ही भली और अनोखी है। बेटे को लाइ देकर चौपट करने को अशेप योग्यता के माय और भी एक दुर्लभ योग्यता उनमें है। दुनिया के लोगो को सुदुलंभ प्यार करना जानती हैं। उसका स्वभाव मानो एक मधु को हाँडी हो और कहानी के मधुदादा के दिए हुए मसय भाड की तरह कभी न सत्म होने वाली । वह अकूत मोठा रम भिमकी जीभ पर वह डालना शुरू कर देती है उसे अन्त तक वह हलका बनाकर छोड़ देती है । आक की मां के हाय में एक कटोरी में थोडी-मो मंदे को लेई और घोडा-सा सत्ता है। आक की मा हंग. चार बोली, वह कहाँ है? आकू देवू के घर के अन्दर गया है, जरा लेई भोर- .

१०० :: संदीपन पाठशाला नौ अगले दिन भी वह लाठी, छाता और लालटेन हाथों में लेकर सवेरे रलहाटा गया । वुझे दिल से आकर ही वह श्यामू-देवू को पढ़ाने बैठ गया। कुछ दिन हुए श्यामू बड़े स्कूल में भरती हो गया है ।. देवू अब भी घर ही में पढ़ता है। दस बजे उनको छुट्टी देकर सीताराम ने एक ठंडी सांस ली। नहाने की कोई जल्दी नहीं । पाठशाला वन्द है । आंखों में आंसू आ गए, आँसू छिपाने के लिए ही वह तख्तपोश पर लेट गया। कुछ देर बाद ही उठकर बैठ गया। किसी भी तरह से उसे शान्ति नहीं मिल रही है। अचानक मन में क्या आया कि टूटी हुई घड़ी को दीवार की एक कील से लटकाकर उसको चलाने की, कोशिश में जुट गया । एक वार दाहिने सरका कर फिर जरा-सा बाएँ ठेलकर दीवार और घड़ी की पीठ के बीच एक कागज ढूंस पेंडलम डुलाकर आवाज़ सुनने लगा है । हां, अव आवाज़ कुछ-कुछ ठीक आने लगी है। बहुत देर तक वह घड़ी की ओर ताकता रहा । चल रही है घड़ी। फिर फटे हुए मैप को लेकर बैठ गया। जरा मैदे की लेई चाहिए और थोड़ा-सा वारीक कपड़े का टुकड़ा। फिर यह भी दुरुस्त हो जाएगा। पंडित! कौन? शिशु कक्षा के एक बच्चे को गोद में लेकर उसकी विधवा माँ माई है । जरा इसकी नाड़ी तो देख लो पंडित ! कल रात से बुखार है। तुमको विना दिखाये हम लोगों का काम नहीं चलता वेटा । देख लो एक वार । इन कई वर्षों में सीताराम ने इस एक विद्या पर भी अधिकार प्राप्त कर लिया है। नाड़ी देखना सीख लिया है उसने । कफ पित्त-वायु आदि के आधिक्य- दोप का भी निर्णय वह कर सकता है। देखें ? दाहिना हाथ । दाहिना हाथ कौन-सा है जी ? अंय ? जिस हाथ से खाना खाते हो । वाह । वायाँ हाथ लड़के की कोहनी के नीचे रख दाहिने हाथ से उसने नाड़ी दवायी। बुखार तो काफी है.अन्दाजन एक सौ एक होगा। दो दिन लगेंगे। पित्त- दोप हुना है जी। लड़के ने कहा, पाठशाला क्या नहीं लगेगी मास्सा ? मलिन हंसी हंसते हुए पंडित बोला, लगेगी क्यों नहीं। पहले चंगे हो जाओ, फिर चलकर आ जाना। मुझे टिफन का घंटा बजाने देंगे मास्सा ? दूंगा। तुम ही घंटा वजाओगे । सिर और पीठ पर हाय फेरकर मास्टर ने संदीपन पाठशाला ::१०३ प्रागरस से वह संजीवित हो उठा। कन्हाईराय ने आकर कहा, नहाओ, साना खाओ। घर में रसोइया परेशान हो रहा है। कब तक पाना लेकर बैठा रहेगा? फिर कमरे में घुस मप मरम्मत करना देख मुंह टेढ़ा कर उपेक्षा की पोक यूकते हुए बोला, फिर यह सब लेकर बैठ गये हो ? तुम्हें कभी भी अविकल नहीं नसीब होगी। सीताराम ने जवाब नहीं दिया। राप इस बार काफी दिन की मुद्रा में, स्वर में संजीदापन लाकर बोला, मां ने जो कुछ कहा है, वहीं करो सीताराम । भला होगा । उसे जमींदारी के काम में डालकर कन्हाई राय को कौन-सी सुविधा होगी, उसी को मालुम । शायद उमसे प्यार है । या सोचता है, सीताराम के नायब हो जाने पर उसके अधिकार बढ़ जायेंगे; वही तो उसे इस घर में लाया है या शायद और कोई वाव हो। सीताराम सोचकर कुछ भी तय नहीं कर सका । जवाब न मिलने से कन्हाई राय क्षुब्ध हुआ, घोला, फिर एक दिन आमर फाड़ दूंगा। जवाब दिया आकू ने । बोला, फिर सेई से लत्ते से चिपकाऊंगा, है न सर? फिर अगर फाड़ दें तो फिर हम लोग जोड़ लेंगे, है न भाई ? इस बार उसने अपने साथियों से कहा। वे सभी बोले, हाँ। कन्हाई राय बोले, ऐसा ही करो। फटो कंथरी की तरह सिलाई करो, सिलाई ही करते रहो । सिलाई ही करते रहो । कन्हाई राय सचमुच दुखी हुआ था। सीताराम से उसे प्यार है और उस पर एक अधिकार का दावा भी वह मन-ही-मन पोपण करता है । वह दावा उसके गोपन दावे में परिणत हो चुका है। उसे प्रकट करने का उसे साहस नहीं होता। पहले दिन जिस रोज सीताराम इस कोठी में आया था और माता जी ने उसके बैठने के लिए आसन देने को कहा था और मुंह से कहा था, तुम हो म घर के लड़कों के शिक्षा-गुरु, उसी दिन उमी क्षण से शायद वह अपने दावे को ससंकोच गोपन करने को मजबूर हो गया था। उसके बाद से ये कई साल यह देख रहा है, सीताराम और उसके बीच का पार्यश्य बढ़ता ही जा रहा है । सीताराम की बातचीत, है सी-मजाक सभी अलग किस्म के हैं। फिर सोताराम के माय कलह- वेसह करने का भी कोई अवकाश नहीं । सोताराम उसकी उपेक्षा नहीं करता। सीताराम के कामकाज के प्रसंग में कोई तर्क छेड़ने का उसे कोई मौका नहीं। मन-ही-मन वह क्लेश सहता था। इसलिए आज जब मा उसे जमींदारी सरिश्तेसाने में काम करने के लिए बताया तो यही सोचकर वह सुश हुमा कि सोताराम उसकी पहुँच मे आ जाएगा। चाहे नाव क्यों न वन जाये, कन्हाई राय की सलाह उमे लेनी पड़ेगी। इसलिए यही वह ठंडा नहीं पड़ गया। तिरहर १०४ : : संदीपन पाठशाली । को सीताराम के घर जाकर किसान-बहू की मार्फत मनोरमा को वह अपना सत्परामर्श दे भी आया। सीताराम के पंडित-दादा से वताया। चन्द बड़े-चूड़ों से भी। "सीताराम को तुम लोग समझाओ। तुम्हारा अपना वादमी है। इसमें भलाई है छोकरे की । इसके अलावा, तुम लोगों का अपना नादमी अगर नायव वन जाय, तो मान लो तुम्हीं लोगों की सहूलियत होगी।" बात सभी को जंच गई। कन्हाई राय जैना ही गुप्त बोर अज्ञात क्षोभ सभी लोगों में था। अचानक घर का एक लड़का भगवा वस्त्र पहन कर ब्रह्मचारी बन बैठे तो जैसी उलझन आदमी महसून करता है वसी उलझन ही सब लोग महसूस करते थे। रात को घर लौटते ही किसान-बहू ने शुरू कर दिया, मैं कहूं, अजी मालिक जी! टूटेफूटे सामान को जोड़जाड़ कर सीताराम का मन लाज बड़ा प्रसन्न था। कन्हाई राय ने कहा था, फटी कंथरी सिलने की तरह सीताराम जोड़जाड़ रहा है । हां जोड़ा है उसने, जोड़ने का दाग भी मौजूद है और रहेगा भी,लेकिन निर्जीव प्राणशून्य कंधरी की जोड़ाई उसने नहीं की है। मनुष्य की देह में चोट लगती है, मांस कट जाता है, हड्डी टूट जाती, उसकी जोड़ाई करने पर भी दाग रह जाता है, लेकिन दाग रह जाने पर भी वह अंग-प्रत्यंग फिर से कार्यक्षम हो जाता है, वह पुष्ट होता है, बड़ता है । यह जोड़ाई उसकी वह जोड़ाई है। फिर से उसकी पाठशाला लगेगी, पाठशाला बड़ी होगी, पांच से दस, दस से पन्द्रह, वीस-पच्चीस लड़के हो जाएंगे। वह पढ़ाएगा- "स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वन पूज्यते ।" किसान-बहू फिर बोल पड़ी, अजी को मालिक जी ! सुन-उन पा रहे हो कि कान-वान से ऊँचा-तूंचा सुनने लग गए? सीताराम ने हँसकर कहा, व्यक्त करो, क्या वक्तव्य है तुम्हारा ? यह लो। ये सटर-पटर बातें हमारी समझ-समझ में नहीं जाती। मैं कह रहा है, आप क्या कह रही हैं, पाहिए। मैं कहती, बाबू लोग तुनको नायव-सायव बनाना चाहते हैं, तो तुम लेना- एना नहीं चाहते, ऐसा क्यों कहते हो ? तो तुम नहीं समझोगी । तुम्हारे मस्तिष्क में वह प्रवेश नहीं करेगा। मनोरना हतकर सविनय चोली, तुम पंडित मनही हो, समझाकर बतालोगे तो क्यों नहीं समझ पाऊंगी? समझाकर बतानो। मीताराम ने उनके मुल की नोर विस्मय से देखा। मनोरमा तो ऐसी नहीं। यह मामूली पाठशाला का पंडित है, लेकिन मनोरमा उसको संसार का सबसे बड़ा पंदिन समझती है । उमी गर्व से मनोरमा के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। सीताराम जो कुछ गहता है यही उनके लिए ध्रुव सत्य है। तो फिर ? आज । - - संदीपन पाठशाला::१०५ मानो मनोरमा की बातों में एक नया स्वर ध्वनित हो रहा है। मनोरमा बोली, पाठशाला के पंडित से लायव वायू बनोगे, चारापी, लगदी, परजा मभी लोग परनाम करेंगे, सातिर करेंगे; गांव में तुम्हारी कितनी इज्जत होगी! पकड़ लाओ फलां को, वह हाथ जोड़ सामने या गड़ा हो जाएगा। नवान्न-लक्ष्मी के त्योहार में लोग लोटा भर-भर के दूध दे जाएंगे। बेटी के ब्याह के वक्त चन्दा मांगना, लोग चन्दा देंगे। किमान-बहू ने कहा, जमीन-अमीन के पानी-आनी के बारे में नाफिकर । कोई भी मेड़-एड के आस-पाम से नहीं फटकेगा। घर में लेटे मजे से कान में तेल डालकर सोते रहो, हाँ। मनोरमा बोलती रही, षष्ठी पूजा में पुरोहित आफर पहले पूजा कर जाएगा, लक्ष्मी पूजा नवान्न में देवताओं का भोग हमारा ही पहले चटेगा। पुरोहित-बूढ़ा कहेगा, नायय की घरवाली की पूजा भई पहले निवदा दूं, ठहरो जी। मीताराम एक लम्बी सांस लेकर हमा, योला नहीं। .. सवेरे ही पंडित दादा से भेंट हो गई। शान्त उस व्यक्ति ने कहा, कल रात तुम्हारे पास गया नही । कन्हाई राप आया था। बता रहा था- सीताराम बोल पड़ा, नही दादा, मुझमे वह नहीं होगा। पंडितदादा खुद पाठशाला का पंडित है, पमूली-उगाही के वक्त जमीदार के सरिश्ते में भी जा बैठता है। शुरू-शुरू में जब वह वैठता था तब उसका मन भी विरूप हो उठता था, लेकिन फिर भी उसको जाना पडता था । बारहमारी कालीतला में पाठशाला लगती है, जमींदार ही उमका मालियः है क्योकि वह पुजारी है, इसी मजबूरी में गुमाश्ता उमको वमूली के हिमाय-किताब में महायता करने के लिए बुलवाता था। और गांव के लोग भी इमे पमन्द करते थे, विश्वास करते थे, उन्हीं के गांव के लडके की लेखा में कोई मारपेच नहीं होगी। पंडितदाता मोताराम की वितृष्णा को समझ ससा, वह जरा चुप किए रहा, फिर वोला, हो । पंडिताई करने के बाद यह सब अच्छा नहीं लगता। फिर बड़ा ही पाजी काम है, दस लोगों के माथ हंगामा, यह होकर रहेगा । र, तो अच्छा ही है। लेकिन- फिर एक बार पंडितदादा यमक गया फिर बोला, लेकिन पुलिस ने जब एक बार हंगामा कर डाला, तो-फिर क्या पाठशाला करना ठीक होगा? सीताराम बोला, देखें। तो मैं तो चला जाऊँगा । श्वसुर ने कहा है-यूढा हो गया हूँ, अब देखभाल कर लो। तो तु गांव में मेरो ही पाठशाला लेकर क्यों नहीं बैठ जाता? पंडित दादा को ससुराल की जायदाद मिल रही है। वहीं जाएंगे। सीताराम बोला, अपने मंझले भाई को दुम पाठशाला में दिठा दो। मैं १०४ : : संदीपन पाठशाली को सीताराम के घर जाकर किसान-बहू की मार्फत मनोरमा को वह अपना सत्परामर्श दे भी आया। सीताराम के पंडित-दादा से बताया। चन्द बड़े-बूढ़ों से भी। "सीताराम को तुम लोग समझाओ। तुम्हारा अपना आदमी है। इसमें भलाई है छोकरे की। इसके अलावा, तुम लोगों का अपना आदमी अगर नायव बन जाय, तो मान लो तुम्हीं लोगों की सहूलियत होगी।" बात सभी को जॅच गई। कन्हाई राय जैसा ही गुप्त और अज्ञात क्षोभ सभी लोगों में था। अचानक घर का एक लड़का भगवा वस्त्र पहन कर ब्रह्मचारी बन बैठे तो जैसी उलझन आदमी महसूस करता है वैसी उलझन ही सब लोग महसूस करते थे , रात को घर लौटते ही किसान-बहू ने शुरू कर दिया, मैं कहूं, अजी मालिक जी! टूटेफूटे सामान को जोडजाड़ कर सीताराम का मन आज बड़ा प्रसन्न था । कन्हाई राय ने कहा था, फटी कंथरी सिलने की तरह सीताराम जोडजाड़ रहा है । हां जोड़ा है उसने, जोड़ने का दाग भी मौजूद है और रहेगा भी,लेकिन निर्जीव प्राणशून्य कंथरी की जोड़ाई उसने नहीं की है। मनुष्य की देह में चोट लगती है, मांस कट जाता है, हड्डी टूट जाती, उसकी जोड़ाई करने पर भी दाग रह जाता है, लेकिन दाग रह जाने पर भी वह अंग-प्रत्यंग फिर से कार्यक्षम हो जाता है, वह पुष्ट होता है, वढ़ता है। यह जोड़ाई उसकी वह जोड़ाई है। फिर से उसकी पाठशाला लगेगी, पाठशाला वड़ी होगी, पांच से दस, दस से पन्द्रह, बीस-पच्चीस लड़के हो जाएंगे। वह पढ़ाएगा- "स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।" किसान-बहू फिर बोल पड़ी, अजी ओ मालिक जी ! सुन-उन पा रहे हो कि कान-वान से ऊँचा-तूंचा सुनने लग गए ? सीताराम ने हँसकर कहा, व्यक्त करो, क्या वक्तव्य है तुम्हारा ? यह लो । ये सटर-पटर बातें हमारी समझ-अमझ में नहीं आतीं। मैं कह रहा हूं, आप क्या कह रही हैं, कहिए। मैं कहती, बाबू लोग तुमको नायव-सायव बनाना चाहते हैं, तो तुम लेना- एना नहीं चाहते, ऐसा क्यों कहते हो? सो तुम नहीं समझोगी। तुम्हारे मस्तिष्क में वह प्रवेश नहीं करेगा। मनोरमा हंसकर सविनय बोली, तुम पंडित मनही हो, समझाकर बताओगे तो क्यों नहीं समझ पाऊंगी? समझाकर बताओ। सीताराम ने उसके मुख की ओर विस्मय से देखा। मनोरमा तो ऐसी नहीं। यह मामूली पाठशाला का पंडित है, लेकिन मनोरमा उसको संसार का सबसे बड़ा पंडित समझती है । उसी गर्व से मनोरमा के पैर जमीन पर नहीं पड़ते। सीताराम जो कुछ कहता है वहीं उसके लिए ध्रुव सत्य है । तो फिर ? आज । संदीपन पाठशाला::१०७ मन्तोप कर लिया है। गांव छोड़कर रनहाटा में पाठशाला खोली है, उसका कारण यह है कि इस गांव से रत्नहाटा के ममाज में मर्यादा कही अधिक है। शिक्षितो का समाज, मर्यादाशील वित्तमानों का ममाज है रत्नहाटा । इसके अलावा, उससे उसके परदेश में नौकरी करने की साध आंशिक रूप से तृप्त होती है । सवेरे उठकर जाता है, रात दग बजे लौटता है, गप्ताह में सोमवार से शनिवार-ये छह दिन वह गांव वालो के लिए परदेशी के समान ही है । उनके साथ रविवार को मुलाकात होती है। रविवार दोपहर को गांव की बैठक में जा बैठता है, रत्नहाटा की बातें सुनाता है । अपने जमींदार की कोठी की यातें, रीति-रिवाज की बातें, उनके अभिजात सुलभ मर्यादाज्ञान की बातें करता है, मणिया के बारे में बताता है, बड़े स्कूल की खबरें सुनाता है, यहाँ के समाज में देश-देशान्तर के जो समाचार आते हैं, वह राब भी सुनाता है। वे थोड़ा-बहुत विस्मित जरूर होते हैं। मुग्ध होकर सुनते हैं । फिर बाजार-भाव की बातें भी करता, शनिवार शाम तक धान-चावल का मही भाव उनको बताता है, उन लोगों के काम आता है। फिर यह मूचना देता है कि रलहाटा में इस बार मोटरगाड़ी आ रही है, बड़े स्कूल के संस्थापक बड़े या लोगो अबकी बार कलकत्ते में मोटरकार परीद ली है, चन्द दिनों में ही पा रही है । और भी बताता है. शिवकिंकर जैसे वायुओं के लड़को के साथ अपने विरोध के बारे में। कहता, मैं ऐसे वायुओ की परवाह नहीं करता। इन्ही मब बातों में उराको परदेश में नौकरी की आकांक्षा पोड़ी-बहुत पूरी हो जाती। इसके अलावा इतने दिन रत्नहाटा में पाठशाला करने के बाद एक आकर्षण और पैदा हो गया है । आज कई वर्षों से वह पाठशाला कर रहा है । रलहाटा के लड़कों से उमे प्रेम हो गया है। जिन गव गृहस्थों के लड़के पढते हैं उनके साथ भी उसका एक घनिष्ठ प्रेम का सम्बन्ध बन गया है । शुरू में उसने सुनारो और केवटों के लड़के लेकर पाठशाला खोली थी-कुछ-कुछ जिद्द के मारे ही । वड़ें स्कूल के हेडमास्टर ने हँसी में ही उसे बहा था, उनको लेकर पाठशाला करने पर पुण्य होगा-अमान के अन्धकार से प्रकाश में लाने का पुण्य होगा। उसी बात पर उसने जिद के मारे उन्ही को लेकर ही पाठशाला खोली पी, साय-ही- साथ उसने यह भी आशा को पी कि इनके लड़कों को, जिनकी यडे स्कूल के मास्टर उपेक्षा करते हैं, उन्ही को कृती बनाकर वह अपनी शिक्षकता का कृतित्व प्रतिष्ठित करेगा। जी-जान लगाकर पढ़ाएगा वह । साल-दर-साल इन्ही के लड़कों को वह वृत्ति दिलाएगा। अपने ही मन में वह इसका दृष्टान्त ढूंढ लेता। नार्मल स्कूल में पढ़ते समय उसने शिक्षकों से पडित योपदेव के सम्बन्ध में प्रचलित कहानी मुनी थी। वोपदेव के शिक्षक उसके बारे में निराश होकर बोले थे, उसका कुछ भी नहीं होगा। वोपदेव मन के दुःस से देशत्याग कर धन पहे थे। रास्ते में वे विश्राम के लिए एक मरोवर के पक्के घाट पर बैठ गए थे। यहाँ उन्होंने देखा, पत्थर काट-काट कर छोटे-छोटे कटोरों के आकार के गड़े मनाए १०६ :: संदीपन पाठशाला देखूगा, वहीं-उसी रत्नहाटा में ही देखूगा ! दादा, मना मत करो तुम । उस पर जिद्द सवार है; वह देख कर रहेगा। दादा बोला, यह तेरी झक है। यह भी पाठशाला है और वह भी पाठशाला है। यहाँ अगर तू वेखटके रह सके, घर-बाहर दोनों ही देख सके तो उस पाठशाला पर तेरा ऐसा झुकाव क्यों है ? इस बात का जवाव सीताराम ने नहीं दिया। दस सीताराम ने दादा की बात का जवाब नहीं दिया। रत्नहाटा की सन्दीपन पाठशाला पर उसकी अजीव ममता है । पुश्तैनी घर के प्रति मनुष्य का जैसा आकर्षण होता है, वैसा ही प्रवल है उसका यह आकर्षण । बहुधा सोचा है, गांव ही में यदि 'सन्दीपन पाठशाला' नाम देकर पाठशाला खोल दे, तो यह सारा ववाल शायद मिट जाय । लेकिन नहीं । दिल में एक करक है। किसी तरह से भी मन को यह भाया नहीं। सन्दीपन पाठशाला अगर रत्नहाटा में ही नहीं रही तो फिर सन्दीपन पाठशाला किस वात की? इस गांव की सन्दीपन पाठशाला के साथ धीरावाबू, मणिवावू-इन लोगों का सम्पर्क नहीं रह जाएगा। जीवन में उसकी आकांक्षा थी, नार्मल पास कर शिक्षकता की नौकरी लेकर वह परदेश जाएगा। वहीं घर लेगा, मनोरमा को ले जाएगा। शिक्षित समाज में स्थान मिलेगा, कितने ही महान लोगों से परिचय का सौभाग्य प्राप्त होगा, उन लोगों की सोहवत में कितनी ही नयी शिक्षाएं मिलेंगी । छुट्टियों में सपरिवार गांव लौट आएगा। गांव के लोग भी उससे मिलने आएंगे, हँसमुख कुशल-मंगल पूछेगे। बड़े-बूढ़ों को वह प्रणाम करेगा, मित्रों को आलिंगन में बांध लेगा, कनिष्ठों को सस्नेह आशीर्वाद देगा। गुरुजन का आशीर्वाद, मिन्नों का प्रेम-सम्भापण, कनिष्ठों का प्रणाम-सभी कुछ में और भी कुछ रहेगा; मनुष्य के जीवन में वही शायद श्रेष्ठ काम्य है। रहेगा आदरमिश्रित विस्मय । बड़े- बूढ़े कहेंगे, हाँ, तुमने हम लोगों का मुख उज्ज्वल किया है । लड़कों से कहेंगे, देखो, सीताराम को देखकर सीखो। मित्रों के प्रति सम्भापण में भी स्वीकृति रहेगी, हाँ भाई तुम हम लोगों में श्रेष्ठ हो । कनिष्ठों के प्रणाम में अनकही कामना होगी, आशीर्वाद करो, हम लोग भी तुम जैसे बन सकें। वह आशा उसकी आकाश-कुसुम में परिणत हो चुकी है । भाग्य तो है ही, लेकिन अपनी असमता को भी वह स्वीकारता है । इसीलिए तो उसने जीवन में अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुरूप पाठशाला के पंडित का पद लेकर ही - - संदीपम पाठशाला ::१०९ और एक मछली देकर निलंज्ज हास्य मुग पर लिये सडा हो गया। सीताराम बोला, क्या है रे? लडके का बाप दुड़ि भी आया था, उसने वहा, पंडित जी, माज से बेटे को पुश्तैनी पेशे में लगा दिया। और पढ़ेगा नहीं? नहीं, सिर खुजलाते हुए दुकड़ि ने कहा, हमारे लडके पढ़-लिखकर क्या करेंगे भला? क के पोछ खलिखना मोष गया है, यही तो काफी है। जलकर समरे पर दस्तखत कर मकेगा, पढ़ के देख-मुन लेगा, बस इतना ही काफी है। केवटो की पढाई और शिक्षा के लिए इम मामूली कोशिश के पीछे शौक के माय-साथ इगका भी तकाजा है। शरीफ लोगों में वे पोखर-तालाब ठेके पर लेते हैं, जमींदार से नदी के जलकर का ठेका लेते हैं। पहले यह कारोबार निपट विश्वास पर चलता था । जुवानी वाने हो जाती थी, वे जाकर मालगुजारी का रूपया दे आते थे, एक से बीस तक गिन सकते थे-एक कोडी, दो कोड़ी, रूपयों की गड्डी लगाकर, जलकर मालिक के पैरो की धूल लेकर चले आते थे। अब ढर्रा बदल चुका है । अब मुंह मवानी कोई वन्दोवस्त नहीं हो पाता, दस्तावेज---'डेमी' कागज पर दो प्रतियां बनती हैं, कृपया देकर रसीद लेनी पड़ती है । सो भी पहले वे अंगूठे को छाप रमीद लेकर चले आते थे सग्ल विश्वास मे, लेकिन ज्यों-ज्यो वक्त बीतता जा रहा है त्यों-त्यों गडबड़ियां बढ़ती जा रही हैं। आजकल समरं दस्तावेज में गलतियाँ निकल आ रही है, कई मामलों में उनके रुपए पानी में गये । इसलिए नाम-दस्तखत करने और दस्तावेज पढ सकने लायक शिक्षा मात्र ही वे चाहते हैं, उससे अधिक नहीं। इससे सीताराम की पाठशाला को सास कोई नुकमान नहीं होता । एक साल और पढ़ लेने पर उसे सालभर की फीस और मिल गई होती। वह नहीं मिलती, इतना भर ही नुकसान है। लेकिन सीताराम उस लाभ-हानि का हिसाव नहीं लगाता । वह उनसे प्यार करता है इसलिए वह चाहता है, उनमें से एक भी प्रकृत शिक्षा पाने, क के पीछे य लिपना मोष जाना ही पर्याप्त शिक्षा नहीं है. यही बात वह उन लोगों को ममझाना चाहता है कम-से-कम एक लड़के को शिक्षित बनाकर । उगने गुना है, मंथाल लोग ईसाई बन पढ़-लिखकर डिप्टी बन गये हैं। सुना है, ये लोग जो छोटी जात के रूप में परिचित हैं, पढ़-लिख लेने पर ही गवर्नमेंट की नौकरी पा जाते हैं, किमी तरह से एक को भी अगर वह इस लायक बना सके तो उसकी माशा पूरी हो । गिकिंकर ने कहा था, वही पहले दिन, विसान, किसान पंडित, कलवार छान्न, मछुए छान ! हा हा करके हंसा था, उसके उस व्यंग का, उसकी उस हमी का फिर तो योग्य जवाब मिल जाये । रत्नहाटा की सन्दीपन पाठशाला वह किमी कदर छोड़ नहीं सकता, नापी वह करेगा ही नहीं। नायवी ! लोगों पर अत्याचार का काम है नायवी । मनुष्य को ठगने का काम है नायवी। नीच काम । यह यह काम नहीं करेगा । रत्नहाटा १०८:: संदीपन पाठशाला । गए हैं । वोपदेव ने सरोवर के मालिक को आशीर्वाद किया । वे दीर्घजीवी हों। सुविवेचक मालिक, ! गरीव पथिकों के खाने के लिए सुन्दर जगह बना रखी है ! जिनके पास थाली-कटोरी-गिलास नहीं है, वे अनायास इन पत्थर में खुदे आधारों में भोज्य को भिगोकर सान कर खा सकेंगे। किन्तु कुछ देर बाद ही उनका भ्रम टूटा । उन्होंने देखा, नगर की नारियाँ आकर घड़ों में जल भर उन गढ़ों पर घड़ों को विठा नहाने सग गई । तब वे समझ सके कि ये गढ़े मालिक ने नहीं वनवाए हैं, दिन-ब-दिन एक ही स्थान पर घड़े रखने के कारण घड़ों के घर्षण से वे गढ़े बन गए हैं । साथ-ही-साय विजली की तरह उनको लगा कि इस प्रकार के नियमित घिसने से अगर पत्थर भी खिया जाता है, तो उनकी बुद्धि कितनी भी स्थूल क्यों न हो उनके लगन के फलस्वरूप नियमित पाठाभ्यास से क्यों तीक्ष्ण नहीं होगी ? वहीं से वह दृढ़ संकल्प लेकर लौटे । उसी के फलस्वरूप वोपदेव भारत-विख्यात पंडित मुग्धबोध प्रणेता वोपदेव वने । यह कहानी ध्यान में रखकर उनको कृती छान बनाने के लिए वह परिश्रम करने लगा था। छात्रों में कोई भी कृती नहीं बन सका, उसकी आशा सफल नहीं हो सकी । किन्तु दूसरी ओर उन लड़कों से और अभिभावकों से वह विचिन्न ढंग से प्यार के बन्धन में बंध गया है। वे उससे प्यार करते हैं, कितना-भर प्यार करते हैं, इसका हिसाब वह नहीं लगाता। लेकिन अपने प्यार का परिमाण वह जानता है। वे उसको दस्तावेज लिखाने, अर्जी लिखाने को बुलाते हैं, हारी- वीमारी पर नाड़ी देखने बुलाते हैं, रेशम-पशम के कपड़े रफूगिरी के लिए देते हैं-उसमें स्वार्थ भी है, प्यार भी है। यह प्रगट होता है उनके सादर सम्भापण में, नवान्न लक्ष्मीपूजा में भेजे हुए उनके मिष्ठान में । केवट लोग मिठाई नहीं भेजते, कभी-कभी ताज़ा मछली या साग-सब्जी देकर अपना प्यार जता जाते हैं । सीताराम का यह प्यार एक चरम परिणति प्राप्त कर चुका है। उसकी साध, उसकी आकांक्षा है कि उनके लड़कों में कम-से-कम एक को भी पढ़ाई का जास्वाद चखा कर शिक्षित मनुष्य बना डालेगा! साहा-स्वर्णकार के लड़के पढ़ते हैं कि थोड़ा-बहुत पढ़-लिख लेना चाहिए, अनपढ़ रहना लज्जा की बात है। इसलिए पाठशाला की पढ़ाई खत्म कर बड़े स्कूल में चन्द क्लास किसी तरह पारकर, पढ़ाई छोड़ अपने-अपने धन्धे में लग जाते हैं । केवट के लड़कों की पढ़ाई पाठशाला में ही खत्म हो जाती है। बिल्कुल शौकिया मामला है। पाठशाला की पढ़ाई भी खत्म नहीं कर पाते। बारह-तेरह साल का होते ही हल-बल और खेती लेकर जुट जाते हैं जो लोग मछुए केवट होते हैं वे कन्धों पर जाल लादे मछली पकड़ने के धन्धे में लग जाते हैं। अभी उसी दिन की तो वात है, दुकड़ि मछुए के बेटे ने पाठशाला छोड़ दी। लड़का कोई बुरा नहीं था। एक साल और पढ़ लेता तो पाठशाला की पढ़ाई पूरी हो गई होती। अचानक सिर पर जाल लादे आकर उसने प्रणाम किया संदीपन पाठशाला::१०६ और एक मछली देकर निलंग्ज हास्य मुख पर लिये खड़ा हो गया। सीताराम बोला, क्या है रे? लड़के का बाप दुकड़ि भी आया था, उसने कहा, पंडित जी, आज से बेटे को पुरतनी पेशे में लगा दिया। और पढ़ेगा नही? नहीं, सिर खुजलाते हुए दुकड़ि ने कहा, हमारे लडके पढ़-लिखकर क्या करेगे भता' क के पीछे ख लिखना सीख गया है, यही तो काफी है। जल-करके खसरे पर दस्तखत कर सकेगा, पढ के देख-मुन लेगा, बस इतना ही काफी है । केवटो की पढ़ाई और शिक्षा के लिए इस मामूली कोशिश के पीछे शौक के साथ-साथ इसका भी तकाजा है । शरीफ लोगो से वे पोखर-तालाब ठेके पर लेते हैं, जमींदार से नदी के जलकर का ठेका लेते हैं। पहले यह कारोबार निपट विश्वास पर चलता था । जुवानी बातें हो जाती थी, वे जाकर मालगुजारी का रुपया दे आते थे, एक से बीस तक गिन सकते थे--एक कोड़ी, दो कोड़ी, रुपयों की गड्डी लगाकर, जलकर मालिक के पैरों की धूल लेकर चले आते थे। अब ढर्रा बदल चुका है । अब मुंह जबानी कोई बन्दोवस्त नहीं हो पाता, दस्तावेज--'डेमी' कागज पर दो प्रतियां बनती हैं, रुपया देकर रसीद लेनी पड़ती है । सो भी पहले वे अंगूठे की छाप रसीद लेकर चले आने थे सरल विश्वास से, लेकिन ज्यो-ज्यो वक्त बीतता जा रहा है त्यों-त्यों गड़बड़ियां बढ़ती जा रही है । आजकल खसरे दस्तावेज में गलतियां निकल आ रही हैं, कई मामलों में उनके रुपए पानी में गये । इसलिए नाम-दस्तखत करने और दस्तावेज पढ सकने लायक शिक्षा मान ही वे चाहते हैं, उससे अधिक नहीं। इससे सीताराम की पाठशाला को खास कोई नुकमान नहीं होता । एक साल और पढ़ लेने पर उसे सालभर की फोस और मिल गई होती। वह नहीं मिलती, इतना भर ही नुकसान है । लेकिन सीताराम उस लाभ-हानि का हिसाव नहीं लगाता । वह उनसे प्यार करता है इसलिए वह चाहता है, उनमें से एक भी प्रकृत शिक्षा पावे, क के पीछे ख लिखना सीख जाना ही पर्याप्त शिक्षा नहीं है-यही बात वह उन लोगों को समझाना चाहता है कम-से-कम एक लडके को शिक्षित बनाकर । उसने सुना है, संथाल लोग ईसाई बन पढ़-लिखकर डिप्टी बन गये हैं। सुना है, ये लोग जो छोटी जात के रूप में परिचित हैं, पढ़-लिख लेने पर ही गवर्नमेंट की नौकरी पा जाते हैं, किसी तरह से एक को भी अगर वह इस लायक बना सके तो उसकी माशा पूरी हो । शिवकिकर ने कहा था, वही पहले दिन, किसान, किमान पंडित, कलवार छात, मछुए छान ! हा हा करके हंसा था, उसके उस व्यंग का, उसकी उस हमी का फिर तो योग्य जवाब मिल जाये। रत्नहाटा की सन्दीपन पाठशाला वह किसी कदर छोड़ नहीं सकता, नायधी वह करेगा ही नहीं। नायवो! लोगों पर अत्याचार का काम है नायवी । मनुष्य । ।

११०:: संदीपन पाठशाला छोड़कर गांव में पाठशाला खोलने पर भी उसे सन्तोष नहीं होगा। सवेरे यथानियम वह रत्नहाटा जा रहा था । अचानक पीछे से एक वात कानों में आई-रत्नहाटा के पंडित-रल जा रहे हैं। पीछे पलटकर उसने नहीं देखा फिर भी गले की आवाज से समझ सका कि यह बात उसीका दोस्त चंडी कह रहा है। चंडी अव गांव में डाक्टर बनकर बैठा है। रत्नहाटा के दवाखाना में चन्द रोज वह कम्पाउंडर का असिस्टैंट बनकर काम करता रहा था, वहां खास कोई सुविधा न कर पाने से अव गांव में आकर डाक्टर बन बैठा है। उसकी बात सुनकर सीताराम विपाद से मुस्कराया। चंडी को रत्नहाटा में ठांव नहीं मिली इसलिए सीताराम से ईर्ष्या है, सीताराम को ठांव मिल गई है। किसी दूसरे ने कहा, लेकिन भाई, घपले से चला तो रहा है। चंडी वोला, घपला तो पुलिस साहब ने पकड़ ही डाला है । अव पाठशाला करने से तो रहा। सीताराम जरा तेज कदम चलकर गाँव से निकल आया। लेकिन पाठशाला खोलेगा भी तो कहाँ ?-~यही चिन्ता उसे व्याकुल करती रही । वावुओं की कचहरी का बरामदा उसे मिल सकता है। लेकिन यहाँ पाठशाला करने का मन नहीं करता उसका । वह उपपद तत्पुरुष, वह मध्यपद- लोपी-कन्हाई राय, टिपंका नायब हजार बातें करेंगे, मजाक-मखौल उड़ाएंगे, लड़कों को घुड़केंगे, लड़कों के शोरगुल मचाने पर झुंझलाएंगे। लड़के भी वहां जाने में कुछ संकोच का अनुभव करते हैं, डरते हैं। उनकी हजार उदारता, असीम अनुग्रह, धीराबाबू का वैचित्र्य, मां का मधुर स्नेह सबकुछ के वावजूद वह बावुओं को अपना नहीं सोच पाता, उन पर अपने मन की विरूपता को वह किसी तरह से भी दूर नहीं कर पाता है । इसके अलावा रजनीवावू ने उसे धीराबाबू के घर से सम्बन्ध छोड़ने को कहा ही है, सो हालांकि वह नहीं छोड़ेगा, अकृतज्ञ वह नहीं बन सकता । लेकिन ऐसे क्षेत्र में, धीरावाबू के बैठकखाने में पाठशाला लगाना किसी तरह से भी उचित नहीं होगा। इसके अलावा वे सब है सिंह । सीताराम हँसता । लेकिन जगह तो उसे कहीं नहीं मिलेगी। पुलिस के इस हंगामे के बाद उसको कोई भी किराए पर कमरा नहीं देगा। तो फिर ? वह ठिठक कर खड़ा हो गया। चेहरे पर मुस्कान उभर आई । दुखभरी मुस्कान । साथ-ही-साथ जांखों से मांसू भी आ गए। अपनी उधेड़-बुन में बाबुओं की कोठी न जाकर अन्यमनस्क ही पाठशाला-गृह के दरवाजे पर आ खड़ा हो गया है । दरवाजे के सिर पर साइन-वोर्ड अब भी झूल रहा है । दीघनिःश्वास छोड़ वह लौट चला। फिर ठहर गया। रास्ते के इस ओर पाठशाला-गृह को विपरीत दिशा में एक पक्के चबूतरे वाले पीपल के नीचे लड़के संदीपन पाठशाला::१११ खेल रहे हैं। छायाधन पेड़ के नीचे छाया के कारण घास नहीं उगती। उसे अचानक ही शान्तिनिकेतन याद आ गया। शान्तिनिकेतन में नाम के पेड़ की छाया में स्कूल लगता है । उसने देखा है । अनोखी शोभा है उसकी। क्षणभर में उसका सारा अवसाद विला गया। यही वह पाठशाला लगाएगा । बरसात आने में अभी काफी देर है । वर्षा के समय यहीं वह छप्पर डालेगा। वह जानता है, यह जगह धीराबाबू के ताऊजाद दादा की है। यह वृक्ष उनकी मां द्वारा प्रतिष्ठित वृक्ष है। धीराबाबू की मां से कहकर इस पेड़ के तले की जमीन वह लगान पर बन्दोबस्त कर लेगा। जरूरत पड़े तो शर्त लिख देगा-प्रतिष्ठा किए हुए वृक्ष पर उसका कोई अधिकार नहीं रहेगा। पेड़ के तले पक्का चौरा बना ही हुआ है-थोड़ा-सा और पक्का करा लेगा, सामने पुरानी सन्दीपन पाठशाला के पास ही साहाटोला, सुनारटोला, केवटटोला है, जिनके लहकों से उसका सरोकार है, उन्ही के बीच यही इसी पेड़ के तले वह पाठशाला शुरू करेगा । उसने मन में निश्चय कर लिया। - लेकिन इसमें भी बाधा आ पड़ी। धीराबाबू के ताऊजाद भाइयो ने पेड का तला दे दिया, सीताराम ने पांच रुपया नमस्कारी के रूप में दिया, छप्पर बना कर लगान देने को भी राजी हो गया। बाधा उधर से नही आयी, बाधा दी- अष्टावक्र गोविन्द वैरागी ने, जाने कहाँ से सहसा आकर खड़ा हो गया। यह मैं नहीं दूंगा। किसी तरह से भी नही । -यह जगह मेरी है। गोविन्द जन्म से विकलांग है। हाथ-पैर टेढ़े-मेढ़े असमान, शरीर की बनावट अजीब है उसकी, एक पैर छोटा-एक पैर वड़ा, मुखड़े की शक्ल भी वैसी ही, नाक बैठी हुई–ठोड़ी दबी हुई। और उसका क्रोध भी बड़ा भयंकर ! वह भीख मांग कर खाता है। किसी समय उस पेड़ के नीचे एक झोंपड़ी बनाकर वह रह चुका था। किसी से भी उसने अनुमति नही ली थी, इन लोगो ने भी अनुमति देने को कोई आवश्यकता नहीं समझी थी। कुछ दिन के बाद आंधी में वह झोपड़ी उड़ गई तब उसने ताड़ के पत्तों से छपवाया था लेकिन बरसात का पानी ताड़ के पत्तो से न रुक सका-वर्षा से वह घर गिर गया था। गोविन्द ने भी फिर घर बनाने की कोशिश नहीं की। इस जगह को छोड़ वह जिस-किसी के ओसारे- चबूतरे पर रहने लग गया है। वह आकर खड़ा हो गया-हाय में लाठी लेकर- यह जगह मेरी है, सिर फोड़ दूंगा मैं । ज्यादा चालाकी करोगे तो मणिवाबू को वेच दूंगा। हां। मणिवाबू का नाम सुनते ही सीताराम बोरा गया । उसने सप्प से गोविन्द का हाथ पकड लिया । वोला. मरोड़ कर तेरा हाथ में तोड़ दूंगा। गोविन्द का शरीर विकृत है -मन भी शायद ऐसा ही हो। पत्रिक पाप की सजा भुगतने के लिए ही उसका जन्म हुना। दुरन्त है उसका क्रोध । क्रोध से चिल्लाकर उसका हाथ दांतों से काट लिया। कुछ देर में ही दांतों से कुछ ११२ :: संदीपन पाठशाला मांस काट उसने मुख उठाया, उस वक्त उसके दांतों के दोनों ओर से खून चू रहा है। सीताराम के हाथ के घाव से भी झर-झर खुन झर रहा है । सीताराम दंग रह गया था। गोविन्द खुद भी स्तम्भित हो गया अपने इस कांड से। वह मूढ़-सा आँखें फाड़-फाड़ कर देखने लगा। कन्हाई राय ने आकर उसे गर्दन से पकड़ा-हराम- जाद ! राक्षस! गोविन्द-वर्वर गोविन्द हतवाक हो गया है । वह देख रहा है-सीताराम के हाथ का खून । कन्हाई राय ने उसकी गर्दन पकड़ी तो वह वोल पड़ा-सही कहते हो, मैंने राक्षस जैसा ही काम किया है । मारो, तुम लोग मुझे मारो। सीताराम वोला, नहीं। छोड़ दो कन्हाई काका । छोड़ दो। वेचारे ने यकवयक यह कर डाला है । मैं समझ गया हूं। छोड़ दो। गोविन्द बहुत देर तक हक्कावका-सा बना बैठा रहा। फिर बोला-मैं भिखमंगा हूँ, वैष्णव हूं, यह जगह भी मेरी नहीं। लेकिन दूसरे की मंत्रणा से-1 वार-चार अफसोस से उसने सिर हिलाया। फिर हाथ जोड़ कर वोला- तुम वहाँ पाठशाला खोल लो भाई । गाली-गलौच कर डाला मैंने । छी छो छो! यह क्या कर डाला मैंने ? बताओ भला। राधाकृष्ण ! अब उसकी बातों से मांसू टपकने लगे। सीताराम ने उसको भी पांच रुपये दिए। बोला, मैं दे रहा हूं तुमको । खुशी से दे रहा हूं। गोविन्द ने रुपया लेकर कहा-तो भाई मेरे अंगूठे की एक छाप ले लो। और लिखपढ़ लो। वर्ना समझे न -मन है, मतिभ्रम भी हो सकता है। इस गांव को तो जानते हो! बार- भाई ! रुक-रुक कर संकोच से ही वह बोला,--एक छप्पर तो खड़ा करेगा ही सीताराम, वहां बगर रात को वह उसे सोने दे-तो वह दोनों हाय उठाकर बाशीर्वाद करेगा। इसके एवज में वह उसकी पाठशाला बुहारेगा। लड़कों के लिए घड़े में पानी भरके लाएगा। -अच्छी बात । सीताराम हंसा। ग्यारह पीपल तले सीताराम की पाठशाला लगी। घड़ी-मप-बोर्ड यह सव बसवाव कमरे में ही बन्द रहा । केवल पेड़ के तने पर सड़िया से लिख दिया-रलहाटा संदीपन पाठशाला :: ११३ , सन्दीपन पाठशाला। केवल पांच लड़के ! लोग आश्चर्य करने लगे ! बहुतों ने कहा, यह आदमी पागल है । शायद नागल ही हूं. सीताराम ने हँसकर कहा-पागल तुम सभी लोग हो । किमी-न- किसी पागलपन के न होने से वक्त कैसे कटेगा । धीरावाबू का जेल जाना पागल- मन है, इस गांव के अन्य बाबुओं में-किसी का है जमीदारी की रोव झाड़ने का नागलपन, शिवकिंकर का शराब पीना पागलपन है तो मेरा पागलपन है नाठशाला। गोविन्द वैरागी ने कहा--बहुत अच्छा कहा है सीताराम तुमने, बहुत अच्छा। यह सबेरे ही आ गया है । मुद ही कही से झाइ लाकर झाड़ -बुहारू लगाया है, घड़े भर पानी लाकर चारों ओर छिड़क दिया है, थोड़ा-सा गोवर भी कहीं से लाकर जमा किया है । पाठशाला खत्म होने पर वह जगह को लीप- पोत देगा। बहुत खुश होकर सीताराम ने उसकी पीठ पर हाथ रखकर कहा था- इतनी मेहनत क्यो कर डाली तुमने बाँका चाँद ? अप्टावा गोविन्द को बहुत-से लोग बांका चांद कहकर पुकारते है । गोविन्द उस नाग से खुश होता है । गोविन्द बोला-कर डाली, अपनी खुशी। -तुमने क्या वह बात याद कर रखी है गोविन्द ? -जब कर ही डाली है तो बताओ उसे भूल कैसे जाऊँ ? लेकिन उस कारण मैंने नही किया । तुमको दांतों से काटकर मैंने खून बहाया है, तुम चाहो तो सिर फोट दोगे। उसके लिए नहीं । ममझे, ये कई रोज तुम्हारे बारे में जितना ही सोचता रहा उतना ही तुम अच्छे लगे। लोग चोरी करते, बुरे काम करते, लोगों को ठगते, मार-पीट करते, जाने क्या-क्या करते, और तुम इन बच्चों को पढ़ाओगे ! इसमें भी जाने क्या-यया वारदात, कितने ही लोगो का रोप है। इस लिए, इमीलिए तुमसे प्यार कर बैठा। हंसने लगा गोविन्द । फिर बोला, छप्पर छवा लो तुम । मैं भी तुम्हारे यहां डेरा डालूंगा। समझे न, मैं भी तुम्हारी पाठशाला का एक जना बन जाऊंगा। गीताराम अव दिल खोलकर हंगा, बोला, पढोगे तुम ? पढा भी जा सकता है । आकू और मैं एक ही साथ पढेंगे। में फास्टो, आकू सेकन । क्यो रे आकू? लेकिन मैं पढ़गा नहीं। मैं तुम्हारे स्कूल का सेकन मास्टर होऊंगा। घंटा वजाऊँगा-झाड़ बुहारू लगाऊँगा। तुम नहीं रहोगे तो इन वछियों को सम्भालूगा, समझे । ठीक ऐसे ही समय शिफिकर आकर रास्ते पर खड़ा हो गया । उसे ऐन वक्त पर सवर मिल गई है, सीताराम ने पाठशाला शुरू कर दी है । वह आकर रास्ते पर सड़ा हो गया। फिर हम कर आक को बुलाकर कहा, ऐ आक !

११४:: संदीपन पाठशाला क्या ? भवें सिकोड़ बाकू जाकर खड़ा हो गया। हाराधन के दस बेटों के बारे में जानता है न न ? जानता हूं। बता तो-'हाराधन का एक बेटा रोवे जार जार' इसके बाद वाली लाइन क्या है? "दुख के मारे वन गया रहा न कोई संसार।" शिवकिंकर हंसते-हंसते चला गया । सीताराम ने कोई भी प्रतिवाद नहीं किया, चुपचाप बैठा रहा । अच्छी बात, उसके भी दिन माने दो, शिवकिकर को एकदिन बुलवाकर लड़कों से वह कविता भी पढ़वा कर सुनवा देगा जिसमें हाराधन के दस वेटे वापस आ जाते हैं। लेकिन मणिलालवाबू मव और वोलते नहीं। वह भी मणिलालवावू को नमस्कार नहीं करता । सीधे सिर उठाए चला पाता है। अचानक धीराबाबू के नायव आकर खड़े हो गए। साथ में देवू । सीताराम जरा चकित हुमा-फिर क्या बात हो गयी? उसने पूछा, क्या है नायववावू नायव बोले-माँ ने देवू को भेज दिया, तुम्हारी पाठशाला में भरती होगा। -मेरी पाठशाला में ? सीताराम हैरान हो गया। यह कैसा सौभाग्य है ? उसका! गोविन्द वोला-जय राधा-गोविन्द की। लो मास्टर-भरती कर लो। उस दिन देवू पड़ रहा था- नहीं है हमारी कोठी पक्की नहीं है हमारा वित्त, गर्व केवल इतना हमरा मरा नहीं है चित। दिन मजूरी करता लेकर थकामांदा शरीर, कुटिया और हूं लपकता ले जवाथ अकूत पीर । सीताराम ने कहा, हां। तो क्या हुआ ? यह बातें किसने कहीं ? यह एक दरिद्र व्यक्ति कह रहा है याने गरीव आदमी, जिसके पास दालान, पक्की कोठी नहीं है। जिसके पास वित्त अर्थात् पर्याप्त धन-सम्पदा, याने ढ़ेर-सा रुपया-पैसा या सोना-दाना नहीं है, जो रोज मेहनत-मजदूरी करके खाता है, जिसके पैरों में जूते नहीं, बदन पर कुरता नहीं, दो जून पेट भर खाना जिसको मिलता नहीं, ऐसा ही एक आदमी कह रहा है, एक गरीब आदमी कह रहा है। कह रहा है- क्या कह रहा है, वतामो? ?

संदीपन पाठशाला: : ११५ . देवू ने कहा, हम लोगों के पास पक्को कोठी नहीं है। हमारे पास रुपए- पैसे भी नहीं हैं। फिर भी हम लोगों का अहंकार है कि हमारा मन मर नहीं गया है। सीताराम बोला, मन मर नही गया है, बताना तो कैसे? मुसीबत बस पाक को लेकर । कोई भी वात लेकर फुसफुसाने लग पड़ा है। सभी लड़को को चंचल बनाए दे रहा है। आजकल सीताराम आक को कठोरता से शासित नही कर पाता है। वह किसी तरह से भी भूल नहीं पाता आया की उस दिन की बातें, आकू के उस दिन के काम यह न होता तो शायद ठीक इसी तरह से इतनी जल्द यह टूटी पाठशाला फिर खड़ी न हो सकी होती। वह जी-जान से कोशिश कर रहा है, ताकि आफू का मन अच्छाइयों की ओर जाय, लिसाई पढाई में ध्यान दे। लेकिन वह किसी तरह से भी मुमकिन नहीं हो रहा है । उस दिन वह 'हलवाहा' नाम की एक कविता पढ़ा रहा था-'सव साधको से वहा साधक है हमारे देश का हलवाहा।' उगने पूछा था, हलवाहा किसे कहते हैं ? आकू बोल पडा था, आप लोग मर । गुस्से से दिमाग झनझना उठा या । जी मे आया था कि मंटो की मार रो इस लड़के की पीठ लहूलुहान कर दे। लेकिन पुरानी प्रतिज्ञा का स्मरण कर उसने अपने को संभाल लिया था। फिर उसको समझाया था, जो आदमी हल जोत कर खाता है, अपने हाथ से हल चलाता है वही हलवाहा होता है। कौशल से प्रसंगवश उससे बताया था, वे जाति में गद्गोप हैं, मद्गोप लोग हल जोत कर खाते हैं इसलिए लोग उनको हलवाहा कहते हैं । आफू ने कहा था, गांव के लोग कहते हैं, तुम लोगों का मास्टर हलवाहा थाकू का कोई दोष नहीं । मणिलालवावू का गांव, शिवकिंकर का गांव, भद्र सभ्य बावुओं के गांव रलहाटा की भाषा ही यही है और चाल भी। किसी-किसी दिन बाहर आत्मसंवरण करने पर भी अन्तर के माननेश का दमन नहीं कर पाता है वह । उस दिन वह अपनी पूर्व प्रतिज्ञा की रक्षा नहीं कर पाता है। ज्यादातर ऐसी बात पाठशाला के समाप्त होने की ओर होती है, शरीर के थकान में एक-एक दिन वह विल्कुल विक्षिप्त-सा हो उठता, अपने सिर के बाल नोचने की इच्छा होने लगती। सबकुछ भूल-भालकर वह उस वक्त निदंय कौशल से छात्रो को सताता । कान के नीचे जुल्फो के वालो को निर्ममता से सोचता, दो उंगलियों के बीच पेन्सिल रखकर जोर से दवाता रहता, पेट का मांस वकोटता, अन्त में सामने यो वाल मुट्ठी में दवा घसीट कर गर्दन को नीचे शुका देता और कई घाटके देकर छोड़ देता। लड़कों को मारूंगा नहीं, यही सौगन्ध रख नही सका मीताराम । नही रस सकेगा। रसा नहीं जा सकता।

११६:: संदीपन पाठशाला दिन गुजरते हैं। चन्द महीनों में ही उसने एक छप्पर खड़ा कर लिया। बांस और लकड़ी कुछ तो उसने अपने घर से मंगवायी और कुछ रानी मां ने दी। भरसक कम खर्च में ही बन गया । मजदूर का काम उसने खुद किया और साथ दिया लंगड़े गोविन्द ने । श्रीमान वांकाचांद ! अव नीचे भी पक्का बनाना है। इसी बीच पाठशाला में कई लड़के बढ़ गये हैं। पांच लेकर शुरू हुई थी- उसके बाद देवू, फिर और पांव । लोगों का भय मानो कुछ घट गया है। कुछ दिन पहले गोविन्द ने ही उसे कहा था-पण्डित, एक बार तुम लड़कों के मुरब्बियों के पास क्यों नहीं जाते। विपादपूर्ण हंसी हँसकर सीताराम ने कहा था-क्या होगा? -होगा जी होगा । वैशाख-जेठ में बैसाखी आंधी आती । असाढ़ में हवा रुख बदलती-तव बारिश होती । हवा रुख बदल रही है जी । मैं सुन आया हूं। लोग बतिया रहे हैं । बड़े स्कूल में फीस ज्यादा है, मास्टर गाय-बैल को पीटने की तरह बच्चों को पीटते हैं -अनाप-शनाप बकते हैं। समझे न, इन्दरशाह का वेटा मारे डरके स्कूल ही नहीं जाता, सड़कों पर घूमता फिरता है। तो कह रहे थे-सीताराम के वहाँ ही दिया जाय-जो होना है सो होगा। इसके बाद फीस के कारण ननी धीवर के बेटे का नाम काट दिया है । तुम एक- बार जाओ भी। सीताराम गया था। बताया था, जो होगा सो तो मेरे ही साथ होगा । वे तो बच्चे हैं, उनको तो जेल नहीं भेजेंगे-यह बात आप लोग सोच-विचार कर देखें। इसका फल मिला । और पांच लड़के आ गए । अब ग्यारह लड़के हैं। उस दिन पाठशाला में पढ़ाने बैठकर वह अन्यमनस्क हो सोच रहा था । हाथ में एक चिट्ठी । एक ओर तो डर के मारे उसके सीने के भीतर खुश्क हो गया है, दूसरी ओर आनन्द और गौरव से उसकी आंखों में आंसू आ रहे हैं । जेल से धीराबाबू ने उसे पत्र लिखा है -जेलखाने के आकाओं का दस्तखत किया हुआ पत्र । उन लोगों ने पास कर दिया है । सीताराम सोच रहा है-जेलखाने से बेशक उसका नाम फिर पुलिस के खाते पर चढ़ गया है । हाय धीरावाबू, क्यों हमें आप इस तरह जकड़ रहे हैं । मैं गरीव हूँ, मामूली आदमी हूं, भला मैं गया भाप लोगों के साथ पथ पर चल सकता हूं? लेकिन लिखा बहुत अच्छा है । वड़ा ही सुन्दर मानो मन-प्राण सब जुड़ाए जा रहा है । "पंडित,-आपकी तुलना में रामायण के भगीरथ से करता हूं जानते हैं क्यों? मेरे निकट शिक्षा ही सचमुच पतित-पावनी धारा है, अशिक्षा के अभिशाप से अभिशप्त भस्मावृत लोगों की आत्मा को मुक्ति दिलाती है। ये सगरीर मुगित पाकर उच्चता के स्वर्गलोक में उठ आते हैं। केवल यही नहीं - संदीपन पाठशाला :: ११७ पंडित, मनुष्य के अन्तर के मत्यं लोक में स्वर्गमन्दाकिनी की धारा उतर आती है, प्रवल करलोल से बहती जाती है, मनुष्य के असर अन्तर को उदारता की उर्वरता से उर्वर बना देती है, विनय से उमे स्निग्ध बना देती है, श्यामलता से मुश्यामल सुन्दर । उमके तट-तट पर पविन्न महत्त्व के तीर्थस्थल बन जाते है। देश- देशान्तर के लोगों के साथ भाव-विनिमय की समृद्ध बन्दरगाह बन जाती है।" और भी बहुत-सारा लिखा है उन्होंने। बीच-बीच मे दो-चार शब्द, चन्द सतरें किसी ने काट दी हैं, ऐसे काटा है कि पढ़ा नहीं जा सकता । यह सब जेल के आका लोगो ने काटा है। अचानक गोविन्द पर उसकी निगाह पड़ी। गोविन्द किसी के साथ इशारे मे बातें कर रहा है । उसकी आँखो और भवों की भगिमा देखकर सीताराम को हमी आ गई । वह चिट्ठी की ही बोट लिए रहा । आर के साथ इशारेबाजी चल रही है । आक कुछ मांग रहा है, गोविन्द गर्दन हिला रहा है भौंह और आँख के इशारे मीताराम को दिखाई दे रहे है । कुछ भी नही, गोविन्द ने आफू को बीड़ी, दियासलाई या नसवार की डिबिया छीन ली होगी, जिसे आकू वापस मांग रहा होगा। गोविन्द सीताराम की ओर सैन करके जता रहा है-बता दूंगा मास्टर को। गोविन्द बड़े ही आश्चर्यजनक ढंग से उसके जीवन में आ गया। फिर भी सीताराम को डर लगता। किसी भी दिन अगर उसमें वह पाशव क्रोध मडक उठे तो ! किसी लडके पर ही । लेकिन उसने मतर्क निगरानी रखी है। कुछ भी उमकी निगरानी से बच कर निकल नहीं पाता । वह पाठशाला माता, रास्ते में पेड़ की आड़ में सड़ा हो जाता, दूर से देवता रहता है कि गोविन्द क्या बोल रहा है या कर रहा है। गोविन्द उसके आसन के पास हाथ मे छड़ी लिए बैठा रहता और कान मे कलम खोसे रखता । चिल्लाता---ऐ-ऐ चुप-चुप ! पहो, सब लोग पढो । ऐ याकू! ऐ लातू ! येवकूफ-बुद्ध कही के । आफू आकर खड़ा हो जाता-सर यह जगह समझ में नही आ रही है । समझ नहीं पा रहे हो? डॉकी-मांकी कहीं के । यहां लिखा है "मली-भांति पड़ो पाठशाल,.वर्ना कष्ट झेलो मन्तकाल ।" या कह देता, मैं हेड मास्टर हू.- यह सब छोटा-मोटा सवक मैं नही पढाता। सेकन मास्टर को आने दो । उसी से पढ़ना, समझना। किसी दिन अंग्रेजी पढ़ाता है : पढ़ो सब-ची-ए-सी- माहव बने देसी। के-ई-जे- दुम लगी पीछे। एन-एम-एन--- राम जी हुक्म देन । - ११६ : : संदीपन पाठशाला दिन गुजरते हैं। चन्द महीनों में ही उसने एक छप्पर खड़ा कर लिया। बांस और लकड़ी कुछ तो उसने अपने घर से मंगवायी और कुछ रानी मां ने दी। भरसक कम खर्च में ही बन गया। मजदूर का काम उसने खुद किया और साथ दिया लंगड़े गोविन्द ने । श्रीमान बांकाचाँद ! अव नीचे भी पक्का बनाना है। इसी वीच पाठशाला में कई लड़के बढ़ गये हैं। पांच लेकर शुरू हुई थी- उसके बाद देवू, फिर और पांव । लोगों का भय मानो कुछ घट गया है। कुछ दिन पहले गोविन्द ने ही उसे कहा था-पण्डित, एक बार तुम लड़कों के मुरब्बियों के पास क्यों नहीं जाते। विपादपूर्ण हँसो हँसकर सीताराम ने कहा था-क्या होगा? -होगा जी होगा। बैशाख-जेठ में बैसाखी आंधी आती । असाढ़ में हवा रुख बदलती-तव बारिश होती। हवा रुख बदल रही है जी । मैं सुन आया हूँ। लोग बतिया रहे हैं । बड़े स्कूल में फीस ज्यादा है, मास्टर गाय-बैल को पीटने की तरह बच्चों को पीटते हैं-अनाप-शनाप बकते हैं। समझे न, इन्दरशाह का वेटा मारे डरके स्कूल ही नहीं जाता, सड़कों पर घूमता फिरता है । तो कह रहे थे-सीताराम के वहां ही दिया जाय-जो होना है सो होगा। इसके बाद फीस के कारण ननी धीवर के बेटे का नाम काट दिया है । तुम एक- चार जाओ भी। सीताराम गया था। बताया था, जो होगा सो तो मेरे ही साथ होगा.। वे तो बच्चे हैं, उनको तो जेल नहीं भेजेगेयह वात आप लोग सोच-विचार कर देखें। इसका फल मिला । और पांच लड़के आ गए । अव ग्यारह लड़के हैं। उस दिन पाठशाला में पढ़ाने वैठकर वह अन्यमनस्क हो. सोच रहा था। हाथ में एक चिट्ठी । एक ओर तो डर के मारे उसके सीने के भीतर सुश्क हो गया है, दूसरी ओर आनन्द और गौरव से उसकी आंखों में आंसू आ रहे हैं । जेल से धीरावाबू ने उसे पत्र लिखा है -जेलखाने के आकाओं का दस्तखत किया हुमा पनि । उन लोगों ने पास कर दिया है । सीताराम सोच रहा है-जेलखाने से वेशक उसका नाम फिर पुलिस के खाते पर चढ़ गया है । हाय धीरावाबू, क्यों हमें आप इस तरह जकड़ रहे हैं। मैं गरीव हूं, मामूली आदमी हूं, भला मैं क्या आप लोगों के साथ पथ पर चल सकता हूं? लेकिन लिखा बहुत अच्छा है । बड़ा ही सुन्दर मानो मन-प्राण सब जुड़ाए जा रहा है । "पंडित,-आपकी तुलना में रामायण के भगीरथ से करता हूं। जानते हैं क्यों ? मेरे निकट शिक्षा ही सचमुच पतित-पावनी धारा है, अशिक्षा के अभिशाप से अभिशप्त भस्मावृत लोगों की आत्मा को मुक्ति दिलाती है । वे सगरीर मुक्ति पाकर उच्चता के स्वर्गलोक में उठ पाते हैं । केवल यही नहीं ।

संदीपन पाठशाला::११७ पंडित,-मनुष्य के अन्तर के मर्त्यलोक में स्वर्गमन्दाकिनी की धारा उतर आती है, प्रवल कल्लोल से वहती जाती है, मनुष्य के ऊसर अन्तर को उदारता की उर्वरता से उर्वर बना देती है, विनय से उसे स्निग्ध बना देती है, श्यामलता से मुश्यामल सुन्दर । उमके तट-तट पर पवित्र महत्त्व के तीर्थस्थल बन जाते हैं । देश- देशान्तर के लोगो के साथ भाव-विनिमय की समृद्ध बन्दरगाह बन जाती है।" और भी बहुत-सारा लिखा है उन्होने। बीच-बीच में दो-चार शब्द, चन्द सतरें किसी ने काट दी हैं, ऐसे काटा है कि पढ़ा नहीं जा सकता। यह सब जेल के आका लोगो ने काटा है। अचानक गोविन्द पर उसकी निगाह पडी। गोविन्द किसी के साथ इशारे में बातें कर रहा है । उसको आँसों और भवो की भगिमा देखकर सीताराम को हँसी आ गई। वह चिट्ठी की ही मोट लिए रहा । आकू के साथ इशारेबाजी चल रही है । आकू कुछ मांग रहा है, गोविन्द गर्दन हिला रहा है भौंह और आँख के इशारे मीताराम को दिखाई दे रहे हैं। कुछ भी नही, गोविन्द ने आकू को बीड़ी, दियासलाई या नसवार की डिबिया छीन ली होगी, जिसे याकू वापस मांग रहा होगा। गोविन्द सीताराम की ओर मैन करके जता रहा है-वता दूंगा मास्टर को। गोविन्द बड़े ही आश्चर्यजनक ढंग से उसके जीवन मे आ गया। फिर भी सीताराम को डर लगता। किसी भी दिन अगर उसमे वह पाशव क्रोध भडक उठे तो ! विसी लड़के पर ही । लेकिन उसने मतकं निगरानी रखी है। कुछ भी उसकी निगरानी से बच कर निकल नहीं पाता । वह पाठशाला माता, रास्ते में पेड़ की आड़ में खड़ा हो जाता, दूर से देवता रहता है कि गोविन्द क्या बोल रहा है या कर रहा है । गोविन्द उसके आमन के पास हाथ मे छड़ी लिए बैठा रहता और कान में कलम खोसे रखता। चिल्लाता-ऐ-ऐ चुप-चुप ! पढ़ो, सब लोग, पढो । ऐ आकू ! ऐ लातू ! बेवकूफ-बुद्ध कही के। आफू आकर खड़ा हो जाता-सर यह जगह समझ में नही रही है । समझ नहीं पा रहे हो ? डॉकी-मांकी कही के । यहाँ लिखा है "भली भांति पढो पाठशाल, वर्ना कष्ट झेलो अन्तकाल !" या कह देता, मैं हेड मास्टर हूं-- यह सब छोटा-मोटा सबक मैं नही पढाता। सेकन मास्टर को आने दो । उमी से पढ़ना, समझना। किसी दिन अंग्रेजी पढ़ाता है : पढो सब-वी-ए-सी- साहब बने देसी। केईम्जे- दुम लगी पीछे। एत-एम-एन--- राग जी हुवा देन।

११५:: संदीपनं पाठशाली एस-टी-आर--- छलांग जरा मार। इतना कह कर ही वह लंगड़े पैर से एक छलांग मारता। किसी-किसी दिन छलांग मारने में वेचारा गिर भी पड़ता। सीताराम को बड़ा अच्छा लगता। कभी-कभी सोचता, विकलांग भिखमंगा लड़कों की माया-मोह में फंस एक अनचाखा रस पाकर धन्य हो गया। उसके द्वारा कोई अनिष्ट होना असम्भव है। सीताराम के आते ही गोविन्द लज्जित-सा कहता-लो जी, तुम्हारी पाठशाला सम्भालो। में चला। पांच दरवाजों पर मांग माऊँ। तिपहर को छुट्टी से पहले ही आ जाता, घण्टा वही वजाता है। चिट्ठी को सरका कर गला खंखार कर वह अच्छी तरह सेवैठ गया। फिर वोला-इशारा किस बात का है गोविन्द ? गोविन्द बोला-इमली । पंडित,- आक इमली खा रहा था। यह इत्ता सा-यह देखो । मैंने कहा, अम्ल रोग हो जाएगा-तो सुनेगा ही नहीं। हाथ जोड़कर कहता-दे दो, दे दो। -आक ! तुम इमली खा रहे थे? आकू भी विचित्र है। वह उठकर खड़ा हो गया और बोला,-सर-एक चरखा-एक चरखा लेकर जा रहा है। चरखा? जी हां। कुली ले जा रहा है वक्से के ऊपर लाद कर । बगल ही स्टेशन का रास्ता है । आकू ने रास्ते की ओर उँगली उठाकर दिखा दिया । होने दो । बैठो। आकू टप्प से बैठ गया, वोला, स्कूल का सव-इन्सपेक्टर आ रहा है सर । साथ में कोई है । औरत । आकू फौरन सामने-पीछे डोलते हुए पढ़ने लग गया, "अनेक नद-नदियों में मगर पाए जाते हैं। मगर पानी में रहता है और पानी के भीतर रहकर शिकार करने में बड़ा दक्ष है।" वह पाठशाला का बहुदर्शी छान है, वह जानता है, स्कूल सव-इन्सपेक्टर पाठशाला का हर्ता-कर्ता-विधाता है । भला-बुरा कुछ देखते ही इन्सपेक्टर के खाते पर सर-सरं कुछ लिख मारेगा! सीताराम इस बार अपनी कुर्सी छोड़कर उठ खड़ा हुआ। बगल ही स्टेशन का रास्ता है । वाकई सतीश हाड़ी सिर पर एक बक्सा लादे जा रहा है, उसके पर एक चरखा है। चरखा कौन ले आया ? विना पूछे उससे भी रहा नहीं गया। चरखा किसका है सतीश? जी, पंडित जी, चरखा है लड़कियों के स्कूल की दीदी जी का। लड़कियों के स्कूल की दीदी जी ? हां जी, हां । नयी माई यहां । वो पा रही हैं । जमाने के साथ जाने क्या- .

संदीपन पाठशाला::११६ क्या और देखूगा पंडित जी । मेहरिया कुर्सी पर बैठे पढ़ाया करेगी-परों में जते । वो देखिएन। सीताराम उत्सुक-सा खड़ा रहा। उसने हालांकि हुगली में रहते शिक्षित नारियां देखी हैं, फिर भी यहाँ जो आई है, वे कैसी है-देखने के लिए उसके कौगृहल की कोई सीमा नही थी। सामतौर से यह महिला चरसा लेकर आई है। बिल्कुल इसी कारण उसने उसके प्रति एक विशेष आकर्षण का अनुभव किया। बहुत दिनों से दीदी जी के आने की बात सुनता भी आ रहा था। यो देखो, रजनीवावू के साथ एक महिला चली आ रही है- चौबीस- पच्चीस वर्ष की सांवली लम्बी है वह महिला-खद्दर की साड़ी, खद्दर का ब्लाऊज़ पहने, पैरों में सैडिल, हाथो मे दो-दो चूड़ियां । सिर पर पूंघट नही, रूखे बालों का सादासूदा जूड़ा। यह महिला कोई सुन्दरी नही, काले रंग की, फिर भी साफ-सुथरी देश-भूषा में बड़ी सलोनी-सी लग रही है । उस महिला की आँखों और बालों में भी दी है। सीताराम ने रजनीबाबू को नमस्कार किया। रजनीवावू ठहर गए । नयी शिक्षिका को भी नमस्कार करने की इच्छा सीताराम की थी लेकिन उससे हो न सका । लज्जा और कुंठा पर वह विजय न पा सका । रजनीबाबू बोले, मैं चला जा रहा हूं सीताराम । चले जा रहे हैं ? ट्रान्सफर हो रहे हैं ? हाँ । उसांस छोड़कर रजनीवायू बोले । मुझे अफमोम रह गया, तुम्हारे लिए कुछ भी न कर सका । खैर, मैंने ऊपर नोट भेज दिया है । यहाँ भी रखे जा रहा हूं। जो आ रहे हैं वे भी बड़े नेक सज्जन है। उनसे मिलो, मेरा विश्वास है, ये तुम्हारा काम कर देंगे । जरा चुप रहकर वे बोले, एक और बात तुमसे वता जाऊँ । हमारे देश में नये स्वायत्तशासन कानून के बारे में जानते होंगे ? अभी कुछ ही दिन पहले कानून-सभा में वोट हो गया ? सीताराम ने हल्के हंसकर कहा, जानता हूं। हल्के से हँसा, इसका कारण कांग्रेस आन्दोलन, धीरावाबू का जेल-सभी इस वोट के मामले को लेकर जो है । पोला स्वायत्तशासन । अखबार में लिखा जाता है 'मंटेगू माकाल"। रजनीवाबू बोले, वही कानून । डिस्ट्रिक्ट बोर्ड अब और मजिस्ट्रेट के कब्जे में नही रहेगा। नया इलेक्शन होकर नान-आफिशियल चेयरमैन होगा। हमारे यहां राय साहब मुकर्जी खड़ा हो रहे हैं, और भी कई लोग खड़े हो रहे है । तुम एक काम करना : राय साहब के चुनाव में जरा दौड़-धूप करना । तो वे अगर चेयरमैन बन गए तो तुम्हारा एड आसानी से मिल जाएगा। एट होगा डिस्ट्रिक्ट 1 १. माकाल एक छोटा-सा खूबसूरत लाल रंग का फल है जिसके भीतर के बोये कड़ए और काले हैं। ऊपर मे सुहावनी किन्तु सर्वथा वेकार चीज की तुलना माकाल फल गे की जाती है।

१२०:: संदीपन पाठशाला बोर्ड के चेयरमैन के हायों में। वै चले गए, महिला को साथ लेकर। रजनीवा के द्वान्सफर की खबर सुन मोतारान आन्तरिक रूप से दुखी हुआ । वाकई, ऐना नेक नादमी शायद ही और हो। कोमल-वित्त धार्मिक व्यक्ति, कभी किसी से कड़ी बात नहीं करते। साथ-ही-साथ उनके दिल में एक गहना बाराध-बोध भी जाग उठा । उनके घर ले अन्यननत्क हो नुनी के जन्म- दिन पर वह उनकी वीरवाणी' पुस्तक ले भाया था। उसे मारे शर्म के वह लोटा नहीं सका। उसको किन तरह वह लौटाएगा? एक बार जी में आया, दौड़कर उनके पास जा सारी वा लोल कर बता दे, और रजनीवा के पैर पकड़कर क्षमा मांग ले । लपका भी वह । लेकिन कुसह लज्जा ने. उनका गला घर दवाया । रजनीबाबू ने पूछा, फिर कैसे लाए पंडित ? कुछ वाहना है ? सीताराम कुछ भी न कह कर उनके पैरों को छू प्रणाम कर उठ खड़ा हो गया, केवल आंखों के कोर से दो बूंद नामू छलक पड़े। रजनीवा ने फिर एक ठंडी सांस ली, फिर वोले, तुम्हारा भला होगा सीताराम शिक्षकता नत छोड़ना तुम। वे फिर खड़े नहीं रहे । चले गए । सीताराम खड़ा ही रहा। पीछे से यह महिला बड़ी जंच रही है । नवसे भला लगा उस महिला का दाश्चर्यजनक शान्त, धीर और अकुंन्ति स्वभाव । शिक्षा न होने पर मनुप्य प्रकृत मनुष्य नहीं वन पाता है । यह बात पुरुष और स्लो दोनों के लिए लागू है । । - तो छुट्टी के बाद वह बाजार के रास्ते से जा रहा था। एक दुकानदार निन्न ने पूछा, अरे पंडित, तुम इधर से? नीताराम इस सवाल से वेवजह नाराज हो गया, बोला, क्यों क्या हम लोगों को इधर नहीं जाना चाहिए ? उसने हस कर कहा, बरे बिगड़ क्यों गए भाई ! मैं कह रहा था कि इधर तुम आते नहीं । तुम तो मरने के किनारे बैठकर तपस्या करते हो । इसलिए पूछ रहा हूं। सीताराम बोला, इधर ही जाऊंगा आज, जरूरत है। चले जाना। लाओ थोड़ा बैठकर तो जाओ। हम लोग तुम्हारी तारीफ करते रहते हैं। कहते हैं, हां, सीताराम में साहस है । इसके अलावा इतनी सारी तकलीफों के बावजूद जिस आदमी ने पंडिताई नहीं छोड़ी उत्तो के पान लड़कों को पढ़ने भेजना चाहिए । शिवकिंकर नोर मणिलाल वा लोग निन्दा करते हैं । समझे? सीताराम को इतना तो अच्छा लगा। वह बैठ गया । चन्द मिनट बाद ही वह हड़बड़ाकर बोल पड़ा, आज चलें भाई। कहाँ जानोगे? क्या काम है ? की हन संदीपन पाठशाला :: १२१ मीताराम बौला, एक बार रजनी वायू के पास जाऊँगा, वे यहाँ से चने जा रहे हैं । यह वात उमने झूट यताई। वह वालिका विद्यालय की ओर जा रहा था। शिक्षिका उसे बड़ी अच्छी लगी है । वही एक बार उसको देख सके -ग उद्देश्य से वह जा रहा था। यह जानता है, यह उसके लिए अनुचित है, बहुत ही अनुचित, बार बार उसने अपने दिल को गमझाने की कोशिश की है, फिर भी वह अपने को संयत नही रस सका। .. गांव के बाजार वाले रास्ते के किनारे ही बालिका विद्यालय है। इंट की वनी दीवारों के ऊपर टीन का छाजन । सामने सम्पे वाला बरामदा । बरामदे के कोने में छोटा-सा बगीचा । इतने दिनों तक स्कूल में वृद्ध ही मास्टरी करने रहे हैं। हाल में कार के निर्देश से शिक्षिका नियुक्त हुई। यह महिला ही पहली शिक्षिका है। स्कूल के बगल में बने मिट्टी के घर में उसे रहना है। सीताराम रास्ते पर सड़ा हो गया। कमरे का दरवाजा बन्द है। सिड़को पनी हुई, सिडको पर पर्दा लटका दिया है। इतने भर से ही उगको परिष्कृत रुचि का पता चल जाता है। शिक्षिता महिला है, वह क्या घूमने नहीं निकलती ? दूर से कोई ला रहा है। यहां इस तरह पड़े रहने की उसे और हिम्मत नहीं पड़ी। वह दनदनाकर तेज कदमो से आगे बढ़ गया। थोडा-सा आगे वढकर ठहर गया । वहाँ से लौटकर फिर आकर उस मकान के मामन खडा हो गया। कमरे में वत्ती जल रही है, पर्दे पर रोशनी आ पडी है। उस प्रकाशित पर्दे पर उसने उस महिला के मुस की छाया देखी, घायस्कोरके परदे पर जिम तरह काया की छाया पढ़ती है हूबहू उसी तरह । मिर का जूड़ा भी लाया में उभर आया है। दोनों होंट हिल रहे हैं । शायद किताव पढ़ रही है। नही । अकेला तो कोई इस ढंग से किताव नही पढता । सामोश ही पढ़ता है। तो? तो क्या अपने ही मन हल्की आवाज में गाना गा रही है ? अचानक वह खुद ही चौंक पडा । यह वह क्या कर रहा है ? छी छी! छी! वह तेज़ चाल चलने लग गया । मानो भाग रहा हो । सीधे रजनीवाय के मकान के सामने ही आकर का । जेब में हाय हाला । 'वीर वाणी उसकी जेब में ही है। रजनीवा ने बुलाया सीताराम ? आओ! आओ! रजनीयाव ने अपना रजिस्टर खोल दिया। बोले-पही। अंगरेजी में लिखा हुआ मन्तव्य । रजनीबाव को लिसाक्ट बड़ी माफ है, पूरा पढ़ गया। मीताराम अगरेजी का अच्छा ज्ञाता नही, सभी पाब्दी का अर्थ वह नहीं समझ सका, लेकिन इतना वह समझ सका कि रजनीवा ने लिखा है, निर्दोष पंडित पर अन्याय हुआ है । ग्राम पड्यंत्र के कारण ही मरकार पक्ष के मन में प्रान्त धारणा का उद्भव हुआ है। पंडित ईमानदार और निष्ठावान १२२ :: संदीपन पाठशाला रजनी बाबू । मादमी है। उसे सजा देने की वजह से एक हानि और हुई है। गांव के अति दरिद्र और उपेक्षित तवकों के लड़कों की पढ़ाई में काफी हानि पहुंची है। और भी बहुत-कुछ लिखा है उन्होंने । पढ़कर सीताराम की आँखों में आंसू आ गए। कैसे आभार प्रगट करे, यह उसकी समझ में नहीं आया । जेब की वीर- वाणी पर वह हाथ रखे हुए था। उसको भी वह निकाल नहीं सका। इसके बाद कैसे निकाल सकेगा वह ? रजनी बाबू की सारी धारणा पलट जाएगी। दिल धड़कने लगा । नहीं रहने दिया जाय । इस पाप की सजा वह परलोक में ही लेगा । यहां उससे नहीं हो सकेगा। ने हँसकर कहा, तुम्हें एक और पते की बात बता जाऊँ सीताराम । नये सव-इन्सपेक्टर जो आ रहे हैं वे सूरन खाना बहुत पसन्द करते हैं । सूरन, वेल और भी जाने क्या-क्या सब ? यानी डिसपेप्टिक हैं। समझे न ? भेंट करते वक्त एक बढ़िया जमीकन्द लेकर जाना । और एक बात, तुम लोगों के धीरा बाबू कहानी लिखते हैं। नये इन्सपेक्टर साहव आधुनिक साहित्य पर बेहद नाराज हैं। समझे ! तुम धीरावाबू की कहानियों की निन्दा करना। समझे ? निन्दा अगर न भी करो, तारीफ कभी न कर बैठना । वर्ना वह बूढ़ा विगड़ जाएगा। मेरे साथ एक बार वहस हुई थी। अन्त में एक पेपरवेट उठा- कर मेरे सिर की ओर फेंका। गनीमत, मैंने सिर जरा हटा लिया था। रजनी बाबू हँसने लगे—यह भी तुम लोगों के लिए मुसीवत है। हम लोगों का मन रखकर चलना । हमारी सनक के मुताविक नाचना । लौटती राह सीताराम अभिभूत-सा चलने लगा। वह मानो खो गया है। रजनीवावू के स्नेह और काली छाया से अंकित चित्र के सौन्दर्य से~-जाने वह कैसा-कैसा हो गया है। बारह दो महीने के बाद उस दिन मनोरमा रो रही थी। सीताराम ने उसे निर्दयरूप से डांटा है, अपमान किया है । उसका अपराध क्या है यह वह समझ नहीं सकी। इसीलिए वह ज्यादा रो रही है। इन दिनों सीताराम की साफ-सुथरेपन की सनक क्रमशः मानो माना पार किए जा रही है। कपड़े मैले हैं, विस्तर गन्दा है, यहाँ बदबू निकल रही है-यही लेकर वह दिनोरात नाक-भौं सिकोड़ता रहता है। केवल यही नहीं, उसका स्वभाव भी मानो अत्यन्त रूखा हो उठा है। आज सीताराम घर लौटकर मुंह-हाथ धो खाना खाने वैठा था, मनोरमा के सदापन पाठशाना::१२३ आकर सामने भात रखते ही वह बोल पड़ा, भात से जाओ । मैं नहीं साऊंगा। साओगे नहीं ? क्यों क्या हुआ? पाने बैठे- ले पाओ भई, ले जाओ । भात मुझे रुचेगा नहीं। कहकर ही सीताराम उठ खड़ा हुआ। वोला, तुम्हें क्या कोई गन्ध नहीं मिलती ? तुम्हारी धोती से कसी बदबू आ रही है और तुम्हें पता ही नहीं ? मनोरमा लज्जित हुई । सचमुच इस घोती से बदबू निकल रही है। छोटे बच्चे की मां है वह, तिम पर भीगी धोती हया से लिपट-मिपट गयी थी, धूप नहीं मिली। घोती गन्दी भी हो गयी है । इसका वह क्या करे ? गोद में बच्चा है, घर में चौका-रसोई आदि काम का कोई अन्त नही; अकेली प्राणी है वह वह क्या साफ-सुथरी हो सिंगारपटार कर बैठे रहना चाहे तो बैठ सकती है ? इसके अलावा जो धोती वह पहने हुए थी वह रेशम का कपड़ा है, गुद पपड़ा। यह कपड़ा कौन है जो बारह महीने सज्जी से धोता हो ? उसने ऐसा ही जवाब दिया था, क्या करूं? शुद्ध कपड़ा जो है । यह कपड़ा क्या रोज-रोज धोया जाता है ? इसमें जरा बू ही आ जाती है । लो, बैठ जाओ । साना सा लो। सीताराम ने व्यंग के स्वर में कहा था, शुद्ध कपड़ा ! हाँ, देखते नही, रेशमी कपड़ा है। मगुद्ध कपड़ा । जिससे बदबू निकलती हो, जो माफ न हो वही अगुद होता - ? सुनो, जो जानते नहीं, उसके बारे में बकवास मत करो। पंडित हो तो पाठशाले में हो, घर के आचार-आचरण के बारे में तुम्हें क्या मालूम सही बात । आचार-आचरण के मूरस ही पंडित बनते हैं। यह भी मासूम हो गया। मनोरमा को उस मूरस शब्द से ही ज्यादा टेम लगी है। जवाब में उगने कहा था, अच्छी बात, मैं मूरम ही सही। कुछ भी जानती नहीं। सकिन यह घोती और पांच ठो खरीद दो न, रोजाना एक फीच लूंगी। फीगी भी पर्यो, धोने का इन्तजाम करा देना, धोवी को दे दिया करूंगी । उग यपर गो गभी लोगों ने खुशामद की, वायू लोग नायबी देना चाहते हैं. ले लो। लेकिन- टोककर सीताराम ने कहा, तुम कमीनी हो । वहद कमीनी हो । मैं कमीनी हूँ ? इतनी बड़ी वात तुमने मुझे कह दी ? हो तुममूर्य हो, कमीनी हो. लालची हो। सोताराम अब तक आसन पर ही खड़ा था, अब जाकर मुंह-हाय पानी से धोने लगा। अभिमान से और रंधे हुए रोदन से मनोरमा के दिल में उस वक्त हलचल मचा हुआ था। वह सन्नाटे में आ खड़ी रही। किमान वह लेटी हुई थी, अच भे से सबकुछ सुन रही थी, अब उठकर बैठ गयो। बोली, मैं कहूं मालिक जी, तुम्हारा यह चलन-वोलन कैसा है जी? सीताराम उसको धमकाकर बोला, तू चुप रह । जो समझती नहीं, उस १२४:: संदीपन पाठशाला ? । 1 वारे में बोलना नहीं चाहिए। अरे मैं कहूं, समझूगी क्यों नहीं ? मूरख-सुरख मनही हैं, छोटी-खोटी जाति वाली लेकिन इसलिए कोई वोदी-सोदी तो नहीं। समझू काहे न ? चिड़चिड़ा मिजाज लेकर तो घर आए तुम और एक बहाना-अहाना ढूंढकर वीवी को डाँट- फटकार रहे हो! सीताराम किसी बात का जवाब न देकर ऊपर उठ गया। किसान-बहू की वात उसके दिल में तीर की तरह जा पैठी। ऊपर आकर अकेले बैठे बहुत देर तक वह सोचता रहा--देखा, सचमुच वात ऐसी ही है। बहुत ही मामूली बात पर उसने मनोरमा का निर्दयता से अपमान किया है। क्यों उसका दिल ऐसा रूखा 1 क्यों उसका दिल ऐसा रूखा हो गया? क्या हो गया है उसे ? सोचते हुए वह सिहर उठा। क्या वाकई ऐसी बात है ?-हाँ बात यही है । इसमें अब कोई भूल नहीं । लेकिन यह तो अपराध है ! हाँ, अपराध तो है ही। केवल मनोरमा के निकट ही अपराध नहीं, यह उसके चित्त का कलुष है, उसका यह अपराध भगवान के निकट भी है । इसके अलावा यह तो उसकी धृष्टता है। वह पाठशाला का एक मामूली पंडित है, और वह महिला, शिक्षिता नारी है। यह बात अगर किसी तरह से भी उसके कानों में पहुँच जाय, तो वह कैसी कठोर दृष्टि से उसकी ओर देखेगी, कैसी टेढ़ी मुस्कान उसके होंठों पर उभर आएगी, कल्पना करते हुए भी वह सिहर उठा। आज करीव महीना-भर हुए वह आयी है । माह-भर से ही मानों किसी जुनून में दोनों वक्त उसको देखने के छिपे उद्देश्य से वह आ-जा रहा है । इतने दिनों का आने-जाने का नियमित पय बदलकर आजकल वह नए पथ से याने बालिका विद्यालय के सामने वाले बाजार के रास्ते यातायात कर रहा है। सवेरे गाँव से निकलकर काफी चक्कर लगाकर उसी रास्ते से वह वाबुओं की कोठी जाता है । आजकल दिन-ढले वह झरने की ओर नहीं जाता। बाजार के रास्ते उसी मकान के सामने से जाता है और थोड़ी देर बाद उसी रास्ते से लौट आता है। उस वक्त शाम हो जाती है । उसके कमरे में बत्ती जलती, परदे पर उसके मुख की छाया पड़ती, वही देख कर वह लौट आता है। महीने-भर में सिर्फ दो ही तीन बार उसको वह बाहर देख सका है। काली लम्बी महिला, जतन से जूड़ा बाँधे, धुली साफ खद्दर की साड़ी पहने, बदन पर ब्लाउज़, पैरों में सैंडिल, हाथों में एक-एक सोने की चूड़ी । सीताराम देखकर मुग्ध हो जाता है। एक दिन उसे पोस्ट-ओफिस में देखा था, एक दिन बड़े हैडमास्टर के मकान के दरवाजे पर, तो एक दिन अपने ही मकान के बरामदे में वह अनमनी-सी खड़ी थीं। कितने ही दिन उससे बातें करने के कितने ही तरीके के बारे में वह सोचता रहा है । वह महिला बरखा कातती है। एक दिन कुछ रामकपास को रुई ओट कर क्यों न उसे भेंट किया जाए ? बालिका विद्यालय की नौकरानी प्रायः - ?

संदीपन पाठशाला::१२५ रोजाना ही यहां की लायनेरी में उसके लिए किताब ले जाया करती है धीरावावू की बहुत सारी वितायें है, क्या नौकरानी से वह न दिया जाए--- उनसे कहना, उनको एतराज न हो तो मैं किताव दे आऊंगा और फिर लोटा भी लाऊँगा । लेकिन कुछ भी वह कर न मका । केवल भूत ग्रस्त-सा उसके मपान के सामने से चलता-फिरता रहा है । नहीं । यह उसके लिए अनुचित है। यह पाठशाला का एक गिक्षक है। उसके जीवन में कोई कनुप नहीं रहना चाहिए । यह मोह उसको त्यागना ही पड़ेगा । एक उसांस लो उसने। ऐसा ही करेगा वह । उसने बार-बार मन हो मन भगवान को पुकारा, भगवान मुझे बल दो। भगवान को प्रणाम कर फिर से जी-जान लगाकर वह फिर पाठशाला में जुट गया । इस एक महीने में उमकी पाठशाला में दो लडके और बह गये। तेरह लड़के 1 एक ठंडी समि ली उसने । तेरह लड़को में एक भी बहुत अच्छा लड़का नही है । सो लड़कों की बगाय अगर उसे एक भी अच्छा लड़का मिल जाय-अगर-सचमुच का अच्छा लड़का मिल जाय उसे तो वह अपने को भाग्यवान समझेगा । देवू पर तमे भरोसा था। लेकिन वह भरोसा दिन-ब-दिन क्षीण होता चला जा रहा है । देबू क्रमश अधिक चंचल और पढ़ाई में अमनो- योगी बनता जा रहा है। ज्योतिष का भतीजा जाने कैसा बोदा होता जा रहा है दिन-ब-दिन | कभी-कभी अपने पर उसे सन्देह होने लगता है । यह क्या उसी का नकारापन नहीं है ? उसो के लिए क्या उन लोगों की परिणति ऐमी हो रही . । वह अब जी-जान से जुट गया । आक का कुछ भी नही होगा। उसको पाठशाला से विदा कर देना चाहिए । लेकिन विदा वह लेगा नही। वह लड़का वीड़ी पीना सीख गया है। और भी तरह- तरह की धुरी बातें उसके दिमाग में उभर आई हैं। अबकी बार प्रायमरी पाम का सर्टीफिकेट देकर वह उसे विदा कर देगा । आफू ने फिर एक शगूफा छेडा है--पाठशाला में फुटबाल टीम बनानी है । इन सब बातों में गोविन्द उमका वकीरा है । गोविन्द अच्छी वकालत कर लेता है। कहता, यह तो मानते हो न कि लड़के कोई गरीब-अमीर में फर्क नहीं करते। उनकी साध होगी ही। बडे स्कूल के लड़के गेंद खेलते हैं। वे भी भला क्यो न खेलें ? तो फिर तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं, मुनो । बहुत बड़ा बादशाह था एक । वडी लम्ची दादी। गुस्सा भी गजव का। रोब-दाव भी वमा ही । ममहो ! एक दिन बादशाह दरबार में आकर आंखें लाल करके बोले, मेरी दाढी पकडकर अगर कोई खीचे तो उमको मजा क्या है ? सभी लोग गिहर उछ । हुजूर की दाड़ी पकड़कर सीवना? यह भी क्या कोई कर सकता है। बादशाह बोले-मकता है क्या, मका है, सीचा है, सोचा है ?-तो फिर उसे सूली पर चढा दो। नहीं नहीं, उसकी चोरी-चोटी काट डालो। कुत्ते को पिला दो बोटियां । लेकिन वजीर पामोश १२४:: संदीप पाठशाला वारे में बोलना नहीं चाहिए। अरे मैं कहूं, समझूगी क्यों नहीं ? मूरख-सूरख मनही हैं, छोटी-खोटी जाति वाली लेकिन इसलिए कोई वोदी-सोदी तो नहीं। समझू काहे न ? चिड़चिड़ा मिजाज लेकर तो घर आए तुम और एक वहाना अहाना ढूंढकर वीवी को डाँट- फटकार रहे हो! सीताराम किसी बात का जवाब न देकर ऊपर उठ गया। किसान-बहू की बात उसके दिल में तीर की तरह जा पैठी। पर आकर अकेले वैठे बहुत देर तक वह सोचता रहा-देखा, सचमुच बात ऐसी ही है। बहुत ही मामूली बात पर उसने मनोरमा का निर्दयता से अपमान किया है। क्यों उसका दिल ऐसा रूखा हो गया? क्या हो गया है उसे ? सोचते हुए वह सिहर उठा । क्या वाकई ऐसी बात है ?हाँ बात यही है । इसमें अब कोई भूल नहीं । लेकिन यह तो अपराध है ! हाँ, अपराध तो है ही। केवल मनोरमा के निकट ही अपराध नहीं, यह उसके चित्त का कलुष है, उसका यह अपराध भगवान के निकट भी है। इसके अलावा यह तो उसकी धृष्टता है। वह पाठशाला का एक मामूली पंडित है, और वह महिला; शिक्षिता नारी है। यह बात अगर किसी तरह से भी उसके कानों में पहुंच जाय, तो वह कैसी कठोर दृष्टि से उसकी ओर देखेगी, कैसी टेढ़ी मुस्कान उसके होंठों पर उभर आएगी, कल्पना करते हुए भी वह सिहर उठा। आज करीव महीना-भर हुए वह आयी है । माह-भर से ही मानों किसी जुनून में दोनों वक्त उसको देखने के छिपे उद्देश्य से वह आ-जा रहा है । इतने दिनों का आने-जाने का नियमित पथ बदलकर आजकल वह नए पथ से याने वालिका विद्यालय के सामने वाले बाजार के रास्ते यातायात कर रहा है । सवेरे गाँव से निकलकर काफी चक्कर लगाकर उसी रास्ते से वह बावुओं की कोठी जाता है । आजकल दिन-ढले वह झरने की ओर नहीं जाता। बाजार के रास्ते उसी मकान के सामने से जाता है और थोड़ी देर बाद उसी रास्ते से लौट आता है। उस वक्त शाम हो जाती है। उसके कमरे में बत्ती जलती, परदे पर उसके मुख की छाया पड़ती, वही देख कर वह लौट आता है। महीने-भर में सिर्फ दो ही तीन वार उसको वह बाहर देख सका है। काली लम्बी महिला, जतन से जूड़ा बाँधे, धुली साफ खद्दर की साड़ी पहने, वदन पर ब्लाउज, पैरों में सैंडिल, हाथों में एक-एक सोने की चूड़ी । सीताराम देखकर मुग्ध हो जाता है। एक दिन उसे पोस्ट-ओफिस में देखा था, एक दिन. बड़े हेडमास्टर के मकान के दरवाजे पर, तो एक दिन अपने ही मकान के बरामदे में वह अनमनी-सी खड़ी थीं। कितने ही दिन उससे बातें करने के कितने ही तरीके के बारे में वह सोचता रहा है । वह महिला चरखा कातती है। एक दिन कुछ रामकपास की रुई मोट कर क्यों न उसे भेंट किया जाए ? बालिका विद्यालय की नौकरानी प्राय: - संदीपन पाठशाला::१२५ रोजाना ही यहां की लापरेरी से उसके लिए किताव ले जाया करती है धीरावाबू को बहुत सारी किताबें हैं, क्या नौकरानी से कह न दिया जाए- उनसे कहना, उनको एतराज न हो तो मैं किताब दे आऊंगा और फिर लौटा भी लाऊँगा । लेकिन कुछ भी वह कर न सका । केवल भूत ग्रस्त-सा उसके मवान के मामने मे चलता-फिरता रहा है । नहीं । यह उसके लिए अनुचित है। यह पाठशाला का एक शिक्षक है। उसके जीवन में कोई कलुष नहीं रहना चाहिए । यह मोह उसको त्यागना ही पड़ेगा। एक उसाम ली उसने । ऐसा ही करेगा वह । उसने बार-बार मन ही मन भगवान को पुकारा, भगवान मुझे बल दो । भगवान को प्रणाम कर फिर से जी-जान लगाकर वह फिर पाठशाला में जुट गया । इस एक महीने में उसकी पाठशाला मे दो लडके और बढ गये। तेरह लड़के । एक ठंडी साँम ली उमने । तेरह लड़को में एक भी बहुत अच्छा लड़का नही है । सौ लड़कों की बजाय अगर उसे एक भी अच्छा लड़का मिल जाय--अगर-सचमुच का अच्छा लडका गिरा जाय उसे तो वह अपने को भाग्यवान समझेगा । देवू पर उसे भरोसा था। लेकिन वह भरोसा दिन-ब-दिन क्षीण होता चला जा रहा है । देवू क्रमशः अधिक चचल और पढ़ाई में अमनो- योगी बनता जा रहा है । ज्योतिप का भतीजा जाने कैसा बोदा होता जा रहा है दिन-ब-दिन । कभी-कभी अपने पर उसे सन्देह होने लगता है । यह क्या उसी का नकारापन नहीं है ? उसी के लिए क्या उन लोगों को परिणति ऐसी हो रही - वह अव जी-जान से जुट गया। आकू का कुछ भी नहीं होगा । उसको पाठशाला से विदा कर देना चाहिए। लेकिन विदा वह लेगा नहीं। वह लड़का बीड़ी पीना सीख गया है । और भी तरह- तरह की धुरी बातें उसके दिमाग में उभर आई हैं । अबकी बार प्रायमरी पास का सर्टीफिकेट देकर वह उसे विदा कर देगा । आफू ने फिर एक शगूफा छेड़ा है-पाठशाला में फुटबाल टीम बनानी है । इन सब बातों में गोविन्द उसका वकील है । गोविन्द अच्छी वकालत कर लेता है । कहता, यह तो मानते हो न कि लड़के कोई गरीब-अमीर में फर्क नहीं करते । उनको साध होगी ही। बडे स्कूल के लड़के गेंद खेलते हैं। वे भी भला क्यो न खेलें? तो फिर तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं, सुनो । बहुत वहा बादशाह था एक । यड़ी लम्बी दाढ़ी। गुस्सा भी गगव का। रोब-दाब भी वैसा ही । ममझे ! एक दिन बादशाह दरबार में आकर आँखें लाल करके बोले, मेरी दाढी पकड़ कर अगर कोई खीचे तो उमकी मजा क्या है ? सभी लोग सिहर उठे । हुजूर की दाढी पकड़कर सोचना ? यह भी क्या कोई कर सकता है ? बादशाह बोले-सकता है क्या, सका है, खीचा है, खीचा है ?--तो फिर उसे सूली पर चढा दो। नहीं-नही, उसकी चोटी-बोटी काट डालो । कुत्ते को खिला दो बोटियां । लेकिन वजीर पामोश १२६ :: संदीपन पाठशाला -- । रहे । वादशाह बोले, वजीर, तुम तो कुछ भी कह नही रहे हो। वजीर बोले- हजूर- क्या बताऊं? वादशाह की दाढ़ी पकड़कर अगर किसी ने खींची हो तो वह उनका छोटा बच्चा होगा । मैं कहता हूं कि उसका हाथ सोने से मढ़वा दिया जाय । कहानी उसे सचमुच बड़ी अच्छी लगी। देहात की पाठशालाओं में ये सब टंटे नहीं हैं, वहां पंडित लोग छुट्टी देकर ही नजात पा जाते हैं। लेकिन रत्न- हाटा जैसे गांव में नजात लेने से तो काम नहीं चलेगा। यहाँ बड़े स्कूल से संलग्न पाठशाला के लड़कों के लिए फुटबाल खेलने की व्यवस्था है । लड़कों के लिए वह एक बहुत बड़ा माकर्पण है। इसके अलावा उसकी पाठशाला के लड़के मुंह लटकाये उनके फुटबाल ग्राउंड के किनारे जाकर खड़े रहते हैं, इससे भी उसका दिल दुखता है । इमलिए अपनी पाठशाला में यह रखना होगा। एक अन्य कारण से भी यह उसे अच्छा लगा । तिपहर को अगर वह लड़कों के खेल के पास जाकर बैठ जाये तो उस महिला के मोह से उसे मुक्ति मिलेगी। अब विना दुविधा किये फुटवाल का आर्डर देकर चिट्ठी आकू के हाथ में दी और कहा, डाल आ। आक उछलते-कूदते चला गया, "सन्दीपन पाठशाला फुटवाल टीम।" चैलेंज-चैलेंज-हाई स्कूल की प्रायमरी फुटबाल टीम के साथ । लड़के खुशी से चंचल हो उठे। पढ़ो। पढ़ो। पढ़ो सब देवू, साहा, गणित लिखो । एक मन सन्देश (मिठाई) का दाम अगर चालीस रुपया दस आना छह पाई हो तो उस दर पर सन्देश खरीद कर कितना रुपया सेर बेचने पर एक सौ पच्चीस रुपया मुनाफा होगा? गणेश, गोकुल अपना पाठ सुनाओ तुम लोग । किताव वन्द कर महात्मा हाजी मुहम्मद महसीन की कहानी बताओ। खामोश दोपहर । लड़के धीमी आवाज में पढ़ रहे हैं, मधुचक्र के मधुपानरत मधुमक्षिकाओं की गुंजनध्वनि-जैसी मधुर ध्वनि । पढ़ो, पढ़ो । विद्या ही संसार का श्रेष्ठ मधु है । आकंठ पान करो इसे सब लोग। जीवन को धन्य करो। देवू और साहा के स्लेटों पर पेन्सिल चल रहे हैं --टक टक शब्द हो रहे हैं। गणेश कह रहा है, मुसलमानों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है मक्का । इस मक्का तीर्थ में जो हज करके लौटते हैं उनको हाजी कहा जाता है। मुहम्मद महसीन मक्का की जियारत कर आए थे इसलिए उनको हाजी कहा जाता है। वाह ! वाह ! ठीक है वोलते रहो । पढ़ो, पढ़ो, तुम लोग पढ़ो। जी लगाकर पड़ो । ध्यान लगाकर पढ़ो। मेरे पास जितना भर है, ले लो, उसका सारा तुम लोग ले लो। वसूल कर लो। लेने में कोई दिक्कत हो तो वताओ। फिर जामो बड़े स्कूल में । वहाँ से जाओ कालेज, विश्वविद्यालय में । तुम लोगों का कल्याण हो, उन्नति हो तुम लोगों की, देश के जाने-माने बनो, देश का मंगल करो, देश का मुख उज्ज्वल करो । सन्दीपन पाठशाला धन्य होगी। सीताराम पंडित मामूली आदमी है, सद्गोप किसान का बेटा है, उसका नाम तुम्हारी कीति में अक्षय । --- - .

संदीपन पाठशाला ::१२७ बना रहेगा, वह स्मरणीय बना रहेगा। साढे तीन बजे ट्रेन की सीटी बजी। सर, साढ़े तीन बज गये। हां, पहाड़ा पढ़ डालो, पढ़ाओ, आज देव पढ़ायो । देबू अकेला सड़ा हो गया। लड़के यस्ता बांधकर बैठ गये । देवू बोलो लगा, एक से चन्द्र। समस्वर लड़के बोल पड़े, एक से चन्द्र । दो से पक्ष । दो से पक्ष । क्रमशः अस्मी नब्बे पारकर नौ दस नवे आया फिर दगदग- एक सौ। अब कौड़ी-दमड़ी का हिसाव । एक कौड़ी-पाव गंहा। स्वर तेज होने लगा। थके शरीर में सीताराम को यह मुर अच्छा लगता है। कंघाई-सी आने लगती है। पहाड़ा खत्म हुआ। इस इलाके में कहते हैं पहाड़ा-धोपा-याने घोषणा करते हुए पढ़ना । अब छुट्टी है। दो छोटे लड़के आकर खड़े हो गये, कल पष्ठी है मास्सा । कल छुट्टी मां के छोटे लड़के हैं शायद ? पेर, एक जून की छुट्टी। टिफन के बाद आओगे। पाठशाला में छोटे लड़को की छुट्टी की तालिका अधिक है । पप्ठी. पूजा में आधे दिन को। नवान्न मै छुट्टी । लक्ष्मी पूजा मे छुट्टी। अहा, बच्ची की टोली ! उन्हीं लोगों के लिए ही तो आनन्द है । छुट्टी के बाद लड़के स्टेशन के किनारे मंदान की ओर दौड़े। सीताराम बैठा रहा । वे सभी फावड़ा लेकर मैदान बनाने लग गये । ओफ ! कितनी उमंग है उनमें ! बड़ा ही अच्छा लगा। आजकल शाम के बाद पयामू एक मास्टर के पास अंगरेजी पढ़ने जाता है। कन्हाई राय लालटेन लेकर साय जाता है। देवू अब अकेला पढ़ता है। भाज पेलने जाकर देवू के पैर मे मोच मा गयी है, वह पढ़ने नहीं आया। सीताराम निकल पड़ा । जरा मैदान के किनारे जाकर वैठेगा । सुन्दर जुन्हाई छिटकी हुई है । जुन्हाई से धुले मैदान मे बैठे-बैठे सोचेगा अपनी नियति के बारे में, अपने दुःख के बारे में । दुःख के बारे में मोचते हुए उसे भला लगता है । दुःस पाने पर वह मानो चंगा रहता है । उसांस लेकर मानो उसे सन्तोष होता। वह मणिलाल बाबू के आक्रोश के बारे में सोचता, शिवकिकर-द्वारा कूटकौशल से उस पर अत्याचार करने के बारे में मोचता। पाठशाला की साना- तलाशी के बारे में मोचता । प्रकाशित परदे पर छाया में उभर आए एक मुख के बारे में सोचता। राह चलते-चलते वह बचानक चौंक पड़ा। यह क्या ! मंदान के किनारे जाने का संकल्प लेकर वह निकला और कहाँ वह आ पहुंचा है। सामने ही १२८ :: संदीपन पाठशाला - ? - रास्ते के किनारे कमरे की खिड़की में उज्ज्वल परदे परं छाया से अंकित एक मुख उभर आया है । अंधेरे पेड़ के नीचे वह खड़ा रहा । बिल्कुल उसी ढंग से वह वैठी हुई है। गर्दन पर ढीला जूड़ा डोल रहा है। वीच-बीच में आज हाथ आँखों के पास चला आ रहा है । लगता है, कुछ है उस हाथ में। आज शायद सिलाई कर रही हैं । अचानक सिर के ऊपर पेड़ पर उल्लू घुघुमा उठा कर्कश स्वर में । वह चौंक उठा । अगले ही क्षण मानों उसमें चेतना लोट आई। अब तक वह अपने आपे में नहीं था। उसे लगा-यह क्या ? छी-छी-छी! यहाँ क्यों आया है वह ? अन्यमनस्क हो मैदान न जाकर वह यहां आ गया है । दिल की यह छलना भी अद्भुत है। वह भाग नहीं गया । नहीं, इतना अधिकार तो उसका रहे । पाठशाला का पंडित है वह, पाठशाला के पंडित को क्या कोई सुख भा नहीं सकता ? भला लगना क्या अपराध है ? अपराध शायद होता हो लेकिन फिर भी भला लगता। पाठशाला का पंडित है तभी भला लगने वाली बात हमेशा के लिए अजानी रह जाती है । शायद दिल ही में वह वात लिखी रहती है । पंडित मरता है, मरने के बाद पंडित की देह के साथ वह वात राख हो जाती उसके साथ भी ऐसा ही होगा। यह गुप्त अधिकार उसका बना रहे, इसको वह छोड़ नहीं सकता। मन-ही-मन मनोरमा से उसने बार-बार क्षमा-प्रार्थना की। तुम मुझे क्षमा करना, तुम्हारा असम्मान मैं कभी नहीं करूंगा। तुम लक्ष्मी हो, तुम देवी हो । केवल मेरे इतने से गोपन अपराध को तुम क्षमा कर देना। रात को लौटकर उसने मनोरमा को बहुत लाड़-प्यार जताया। उसके लाड़-प्यार से विगलित हो मनोरमा ने हंसकर कहा, तुम पंडित मनही हो, इतनी सारी बातें तो मुझे नहीं मालूम । उत्साहित हो सीताराम ने कहा, हमारी मुन्नी को हम लोग पढ़ाएंगे । साथ ले जाया करूंगा। बालिका विद्यालय में देकर पाठशाला चला जाऊंगा। दीदी जी से वाहूंगा, जरा देखते रहिएगा। फिर पाठशाला खत्म होने पर साथ लेकर चला आऊंगा। तेरह । दिन बीतते । महीने वीतते । एक साल बीत गया। पाठशाला चलती रही। पाठशाला की पढ़ाई खत्म कर लड़कों का एक दल बड़े स्कूल में चला गया। नया एक दल आया, हाथ में प्रथम भाग वाली पुस्तक और स्लेट लेकर । नई धोती, नया कुरता पहने, कुछ की आँखों में काजल । वाह ! वाह ! वाह !

संदीपन पाठशालाः १२६ उस दिन मास्टर बैठे र कर रहा था। लड़के बैठे पढ़ रहे हैं। नए लड़कों का जत्था । देवू, ज्योतिष साहा का भतीजा और उसके महपाठी यहाँ की पढ़ाई खत्म कर चले गये है । आप माला गिरोह भी विदा ले चुका है। लेकिन ये पुछ घेले रस गये हैं-चौड़ी गीते है, एक ही कक्षा में दो-तीन साल रहते हैं, पूठ बोलते हैं । इनको सही तौर पर आक वाले गिरोह के पैसे नहीं कहा जा सकता । सीताराम ने माफी सोच- विचार कर तय किया है, ये हैं प्रथम भाग पुस्तक में वर्णित रासाल नामक नट- खट लड़के के चेले। ईश्वरचन्द्र विद्यामागर जी ने सर्वप्रथम उसको पाठशाला में भरती कर उनका हक उनको दे दिया है। ये रहेगे ही। आफ ने नाम से ही पाठशाला छोड़ी है। बदमाश छोड़कर भी नहीं छोड़ रहा है । माक पाठशाला में पढ़ता नहीं लेकिन एक बार आएगा जरूर । घंटे-दो घटे रहकर फिर कही चला जाता है । आता और सीताराम को दुनिया भर की खबरें सुना जाता है । कुछ काम-काज भी कर देता है । इसमें पड़ी में चाभी भरना मुख्य है । और, लड़की की हाजिरी लेता-नाम पुकारता। गोविन्द से गप्प लड़ाता। नगवार नेता। लड़कों को कभी-कभी घुड़को भी लगाता। यही उसका काम है । और काम है तिपहर को सन्दीपन पाठशाला फुटबाल टीम में हीस्ल बनाना। मीताराम मना नहीं कर पाता है । आक चाल चाहे हो लेकिन सीताराम को गो में कहीं गिव ढूंढे मिल गया है नन्हे-नन्हे कोमल चेहरे सबके । सीताराम की सबसे बड़ी खुशी : अबकी बार गचमुच उसे एक अच्छा लड़का मिल गया है । वायुओ की कोठी की नौकरानी का बेटा है यह । गीताराम ने अचानक ही उसका आविष्कार कर डाला। गोरा पिट्टा लहर, चमकती हुई भांखें, उसमें मुष को और देखते ही सीताराम की छाती चौड़ी हो जाती है। बाबुओं की फोटो को नौकरानी का बेटा-नाम जयघर । गौरा-चिट्टा बेटा सेकर उसको विधवा मां वायुओ को कोठी मे नौकरानी मा काम लेकर आई। उस दिन शाम के वात बाबुओं की कोठी में सीताराम बगीचे को वेदी पर बैठा था। वह लहका रोते-रोते बैठक को बरामदा पारकर योठी मी और ना रहा था। सीताराम ने उसे पुकारा कोन हो तुम? हो । ओ मुन्ना! मुनो. गुनो। कोई भी लड़का देखते ही सीताराम के मन में एक पेशेवर शिक्षा जाग उठता है। पाठशाला में भरती करने पर मामि यार में चार आती बढ़ोत्तरी! पुकार सुनकर तड़ा गड़ा हो गया, रोते-पो हो कहा -~-तुम रो क्यो रहे हो? यया नाम है तुम्हारा ? उराने जवाब दिया- जगधर है। - संदीपन पाठशाली -रो क्यों रहे हो? -मिठाई में गुठली थी, मैंने खा डाली है। -मिठाई में गुठली थी, खा डाली है ? सीताराम हँस पड़ा। मामला ने में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई । आज तिपहर को उसने भी गुठलीवाली ई खाई है । याने हड़ का मुरब्बा । हड़ की गुठली उसी में रह जाती है। रा देहाती लड़का ! शायद बाबुओं की कोठी में किसी वज्र-देहात से कोई या होगा ! हड़ की गुठली निगल गया है । हँसकर उसने कहा, उससे डर या है ? तुम्हारे पेट में कोई पेड़ नहीं उगेगा। . लड़का ठिठक गया, उसका रोना भी रुक गया। सीताराम ने पूछा, तुम्हारा नाम जयधर है, जयधर क्या? -जयधर घोष। -यहां कहां आए हो? -मां यहां काम जो करने आई है। सीताराम समझ गया, कौन-सा काम है। ब्राह्मण के घर में घोप घराने की औरत नौकरानी के काम के अलावा भला कौन-सा काम करेगी? नोकरानी बेटा । उसने फिर सवाल किया, तुम ? तुम क्या करोगे? --में ? मां ने कहा है, बड़ावाबू के आने पर उसका नौकर हो जाऊंगा। -पढ़ना जानते हो? -हैं । कहकर ही उसने शुरू कर दिया-'क'-गाय चराने चल । गाय ने मुंह मारा धान में.. अब सीताराम ने उठकर उसे दौड़ा दिया। अब की बार वह बोलेगा- 'फूंक जरा पण्डित के कान में ।' निहायत चालू लड़का है। सीताराम ने दौड़ कहा-'पकड़ तो लड़के का कान जरा।' वह लड़का उस दिन दौड़कर भाग गया। इसके बाद लगभग दो महीने उस लड़के की ओर कोई ध्यान न दिया। उस लड़के पर ध्यान देकर वह भी क्या ? हालांकि वह लड़का आता था, फतिंगे पकड़ता फिरता था उसका नशा था । बाबुओं की गायों के चरवाहे के पास बैठा रहता था। राय को वह लड़का फूटी आंखों न सुहाता था, वह कहता-वाहियात जानते हो सीताराम-यह विधवा के बेटे और राजा के बेटे में कोई फ इस छोकरे का दिमाग चढ़ा रखा है-इसकी मां ने । मैंने एक दिन दवाने के लिए कहा तो हरामजादे ने, पैर चांपना तो दरकिनार, अप जाकर शिकायत कर दी। उसकी मां रोते-रोते रानी मां के पास बड़ा ही बदजात है। सीताराम भी ऐसा ही सोचता था। अचानक एकदिन उसका गया । वह चौंक पड़ा। उसने आविष्कार कर डाला-दरिद्र कुशिः गति की हीरक दीप्ति का।

संदीपन पाठशाला::१३१ जाड़े के दिन । वह लड़का देव-श्यामू के पढने के कमरे के बाहर दरवाजे के पास बैठा दोहर बोटे लइया खा रहा था। श्यामू-देव गणित लगा रहे थे- यह मुद किताब पढ़ रहा था। गणित सत्म कर श्याम ने कहा- सर, अब प्राइज वाली कविता कण्ठस्थ कहें। बड़े स्कूल में प्राइज दिया जाएगा, श्यामू रवीन्द्रनाथ को 'भारततीर्थ' नामक कविता कंटस्थ सुनाएगा । उसी को लेकर यह जुटा हुआ है। गीताराम ने एक लम्बी सांस लेकर कहा-पढो। वही पढ़ो । उसके स्कूल में प्राइज नहीं दिया जाता। न दिया जाएगा। श्यामू पढ़ने लगा । पढ़ना खत्म कर दे घर के अन्दर चले गए। मीताराम तेल मालिश करने बैठा । अचानक उसके कान में आया, बाहर दरवाजे के पास चंठा वह लड़का अपने ही मन पाठ याद कर रहा है- ध्यान गम्भीर एइ जे भूधर नदी जपमालाघृत प्रान्तर हेपाय नित्य हेरो पवित्र धरितीरे एइ भारतेर महामानवेर सागर तोरे । विस्मय से वह वाक्शून्य रह गया । जयघर रवीन्द्रनाथ की कविता कंठस्य कर पाठ करता जा रहा है । वह बाहर निकलकर यड़ा हो गया। बोला--यह नूने किस तरह सीख लिया? वह लड़का अपने चमकते चेहरे को उठाकर बोला-गुनकर मोप गया । मंझले वायू पढ़ जी रहे थे। कमरे में भाषण करता जो पढ़ता है। -सुन-गुनकर सीखा? -जी। -~-कहाँ, बोल, बोल तो जरा। कितना गोस डाला। जयधर बहुत सारा पाठ कर गया । अन्त में- पश्चिमे आजिगुलियाछे द्वार सेपाहते सवे आने उपहार यहाँ तक पढ़ने के बाद वह हंसकर बोला- --इगके बाद सोस नहीं मका । सीताराम उत्साहित हो बोलने लगा- 'दिवे आर निये मिलाये मलिये जाये ना फिरे । एइ भारतेर महामानवैर सागर तारे।' जयधर भी साथ-साय दोहराता रहा । मोताराम ने उमगे पूछा, और भी कुछ सीखा है? कई कंठस्थ कषिताएं उसने मुना दी। ये देव की पाठ्य पुस्तक की कविताएँ धीं। सोताराम ने जयधर का हाथ पकडकर कहा, तू तो सोना है मोना, गुदड़ी मा लाल है रे । उगगे तेल लगे यदा में उसे गोद में उठा लिगाम दीपन पाठशाली . - रो क्यों रहे हो? मिठाई में गुठली थी, मैंने खा डाली है। -मिठाई में गुठली थी, खा डाली है ? सीताराम "हँस पड़ा। मामला: में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई । आज तिपहर को उसने भी गुठलीवाली ई खाई है । याने हड़ का मुरव्वा । हड़ की गुठली उसी में रह जाती है। रा देहाती लड़का शायद बाबुओं की कोठी में किसी वज-देहात से कोई ना होगा ! हड़ की गुठली निगल गया है । हँसकर उसने कहा, उससे डर है ? तुम्हारे पेट में कोई पेड़ नहीं उगेगा। लड़का ठिठक गया, उसका रोना भी रुक गया। सीताराम ने पूछा, तुम्हारा नाम जयधर है, जयधर क्या? -जयधर घोष। -यहां कहां आए हो? -मां यहां काम जो करने आई है। सीताराम समझ गया, कौन-सा काम है। ब्राह्मण के घर में घोप घराने की औरत नौकरानी के काम के अलावा भला कौन-सा काम करेगी? नौकरानी.. का बेटा। उसने फिर सवाल किया, तुम ? तुम क्या करोगे? मैं ? मां ने कहा है, बड़ावावू के आने पर उसका नौकर हो जाऊंगा।' -पढ़ना जानते हो? -हैं 5 । कहकर ही उसने शुरू कर दिया--'क'--गाय चराने चल । गाय ने मुंह मारा धान में अव सीताराम ने उठकर उसे दौड़ा दिया। अब की बार वह बोलेगा. 'फूंक जरा पण्डित के कान में ।' निहायत चालू लड़का है। सीताराम ने दौड़क कहा-'पकड़ तो लड़के का कान जरा।' वह लड़का उस दिन दौड़कर भाग गया। इसके बाद लगभग दो महीने उन उस लड़के की ओर कोई ध्यान न दिया। उस लड़के पर ध्यान देकर वह क भी क्या? हालांकि वह लड़का आता था, फतिगे पकड़ता फिरता था, उसका नशा था । वावुओं की गायों के चरवाहे के पास बैठा रहता था। राय को वह लड़का फूटी आंखों न सुहाता था, वह कहता-वाहियात जानते हो सीताराम यह विधवा के बेटे और राजा के बेटे में कोई फर्क इस छोकरे का दिमाग चढ़ा रखा है-इसकी मां ने । मैंने एक दिन उ दवाने के लिए कहा तो हरामजादे ने, पैर चांपना तो दरकिनार, अपर जाकर शिकायत कर दी। उसकी मां रोते-रोते रानी मां के पास ज बड़ा ही बदजात है। सीताराम भी ऐसा ही सोचता था। अचानक एकदिन उसका गया । वह चौंक पड़ा। उसने आविष्कार कर डाला. दि शिक्ष तद्धि की हीरक दीप्ति का। । ।

संदीपन पाठशाला::१३१ जाड़े के दिन । वह लड़का देवू-श्यामू के पढने के कमरे के बाहर दरवाजे के पास बैठा दोहर ओढ़े लइया खा रहा था। श्यामू-देव गणित लगा रहे थे- वह खुद किताव पढ़ रहा था। गणित सत्म कर श्याम ने कहा- सर, अव प्राइज वाली कविता कण्ठस्थ कीं। बड़े स्कूल में प्राइज दिया जाएगा, श्यामू रवीन्द्रनाथ की 'भारततीर्थ' नामक कविता कंठस्य सुनाएगा । उसी को लेकर वह जुटा हुआ है। मीताराम ने लम्बी मांस लेकर कहा--पढ़ो। वही पढ़ो । जमके स्कूल में प्राइज नहीं दिगा जातान दिया जाएगा। श्यामू पढ़ने लगा। पढ़ना खत्म कर वे घर के अन्दर चले गए। मीताराम तेल मालिश करने बैठा । अचानक उसके कान में आया, बाहर दरवाजे के पाम बैठा वह लड़का अपने ही मन पाठ याद कर रहा है- ध्यान गम्भीर एइ जे भूधर नदी जपमाला धृत प्रान्तर हेपाय नित्य हेरो पवित्र धरितीरे एइ भारतेर महामानवेर सागर तोरे । विस्मय से वह वाक्शून्य रह गया । जयधर रवीन्द्रनाथ की कविता कंटस्थ कर पाठ करता जा रहा है । वह बाहर निकलकर बड़ा हो गया। बोला--यह तूने किस तरह सीख लिया ? वह लड़का अपने चमकते चेहरे को उठाकर बोला--मुनकर मीप गया। मंझले वाबू पढ़ जो रहे थे। कमरे में भाषण करता जो पढता है। -सुन-गुनकर सीखा? -जी। --कहाँ, बोल, बोल तो जरा। कितना सीख डाला। जयधर बहुत सारा पाठ कर गया। अन्त मे- पश्चिमे आजियुलियाछे द्वार रोया हते राधे आने उपहार यहाँ तक पढ़ने के बाद वह हंसकर बोला- -इसके बाद सीख नहीं सका। सीताराम उत्साहित हो बोलने लगा- 'दिवे आर निने मिलाये मलिवे जावे ना फिरे । एइ भारतेर महामानवेर सागर तीरे।' जयधर भी साथ-साथ दोहराता रहा । सीताराम ने उमसे पूछा, और भी कुछ मीखा है? कई कंठस्य कविताएं उसने सुना दी। ये देवू की पाठ्य पुस्तक की कविताएं थीं। सीताराम ने जयधर का हाथ पकड़कर कहा, तू तो सोना है मोना, नू तो गुदड़ी का लाल है रे । तराने तेल लगे बदन में उसे गोद में उठा लिया । अद्भुत १३२ : : संदीपन पाठशाला । । ? - - लड़का है ! श्रुतिधर है। वह बोला-मेरे साथ पाठशाला जायगा, चल । मैं तुझे पढ़ाऊंगा। किताव स्लेट सब खरीद दूंगा। कपड़े-लत्ते भी दूंगा। तू तो जज- मजिस्ट्रेट बनेगा। उसी दिन से उसे लाकर उसने पाठशाला में भरती कर दिया है। किताव दी। स्लेट दिया। कपड़े दिए। इसके अलावा रोज सवेरे घर से लाते वक्त आधा सेर दूध लाकर जयघर की मां के हाथ में दे देता है।-जयधर को पिलाना। छोटा लड़का-वह शरीर से बढ़ेगा-मन से बढ़ेगा-यह उसके बढ़ने का समय है। लेकिन पुष्टि न मिलने पर बढ़ेगा कैसे ? दूध है अमृत । वह देह पुष्ट करेगा, लुनाई देगा, मेघा बड़ाएगा । सिर्फ भात और लइया खाकर-बड़े लोगों के वेटों से कैसे मुकाबला कर सकेगा? आश्चर्य की बात है, बदमाश जयधर-उस पहले रोज गोद में लेकर दुलारने के बाद से ही मानो वदल गया। उसने नहीं कहा-नहीं पढूंगा ! ही ह करके हमा भी नहीं। पहले ही दिन सीताराम ने देखा-वह बा कस भी जानता है। पहचानता भी है। चन्द महीनों में ही वह लड़का द्रुत गति से भागे बढ़ने लगा। अव जयधर सरपट दौड़ रहा है । दौड़ रहा है। अद्भुत लड़का! सीताराम बीच-बीच में कहता-जयघर मेरी सन्दीपन पाठशाला की जय-ध्वजा है। कभी-कभी उसे लगने लगता, उसका भाग्य अब लच्छा चल रहा है । लम्बे अरसे के बाद उसने एक छप्पर वनवा डाला है । बठपहला एक छावन मान । ब्लैक बोर्ड लाकर लगा दिया गया है। घड़ी मैप, यह सब अभी टांगने का साहन नहीं होता। चारों तरफ से बुला उप्पर, अगर कोई ले जाये या तोड़ जाये। शिवकिंकर का दल अव भी है। हालांकि अब उनका नाक्रोश पहले जैसा नहीं रहा, लम्बे अरने में होनवल न होने पर भी मानो उनका उत्साह शिथिल पड़ता जा रहा है । दूसरी ओर संनार की गति में मणिवाबू को भी दीप्ति मानो मलिन पड़ती जा रही है। सीताराम स्पष्ट देख पाता है, केवल मणि वाबू ही नहीं, इस रत्नहाटा के बाबुओं का बाहरी चेहरा क्रमशः मैले पड़ते हुए कपड़े-लत्ते की तरह होता जा रहा है । प्रणाम है गान्धी महाराज को, प्रणाम देशवन्धु को, प्रणाम यतीन्द्रमोहन को, प्रणाम सुभाषचन्द्र को। साथ ही साथ धीरानन्द को भी वह प्रणाम करता। तुमको भी प्रणाम ! तुम्हीं ने तो यहाँ का मान रखा है। इत स्वदेशी आन्दोलन के बाद से वाबुओं के चेहरों पर मानो काल की छाप पड़ी है । जमींदारों में, महाजनों में जो लोग साहब लोगों के पीछे थे वे मानो पुराने गणित की अंक- रीति की पाठ्य पुस्तक से निकाल दिये जा रहे हैं। तीन पाई से एक पैसे की चलन के वाद कौड़ी-दमड़ी के हिसाब जैसा ही मान्यता खो चुके हैं। हाल में चालु वालय पद्धति से लिखी किताबें चलने के बाद उस जमाने के विद्यासागरी बड़े-बड़े कठिन शब्दों से भरी किताबों की तरह ये वाय मप्रचलित होते जा रहे - संदीपन पाठशाला : १३३ हैं । सीताराम भलीभांति जानता है, इस गांव का प्रभावशाली व्यक्ति इसके बाद बनेगा धीरानन्द । इस बारे में उसे कोई सन्देह नही । धीरावावू दीर्घजीवी बने । उममे उसे परम आनन्द मिलेगा। धीरा बाबू उनके जमींदार है इसलिए यह आनन्द नहीं, धीराबाबू ने उसे प्रेमभरे नयनों से देखा है, वह उससे प्यार करता है, यही उसका आनन्द है । आह, घोराबाबू अगर उसका मिन न होकर छात्र होता तो उसका मानन्द सर्वाधिक होता! धीरावावू आएगा-चही बाट जोह रहा है वह । उसकी उन्नति हो रही है, किन्तु उसमें भी एड न मिलने का दुःख उसे रातोदिन मालता है । रजनीबाबू ने कहा था, वोट में रायबहादुर की सहायता करने को, उसने वैसा किया था। फिर भी उसे एड नहीं मिली। हजार हो, हैं तो रायबहादुर ही। मजिस्ट्रेट साहब, पुलिस साहब, इन लोगों से विगाड़ करके वह कुछ भी करने की हिम्मत नहीं करते। धीरावाबू के आने पर, उनको लेकर यह एक बार इसके लिए लड़ेगा । धीरावाबू रिहा कर दिए गए हैं । लेकिन उसने एका ठडी सांस ली! जेल से मुक्ति पा जाने के बाद भी कुछ दिनो तक पुलिस ने उसको नजर- वन्द कर रसा था। उमसे भी धीरावावू को रिहाई मिली है। लेकिन यहां नहीं याया। मां गई थी बेटे से मिलने के लिए। देवू-श्यामू को साथ ले गई थी। गम्भीर-मा चेहरा लिए मां लोट आई है । देयू और श्यामू रोए थे, अब भी कभी. कामी रोते है । दादा घर नहीं लौटेगा। धीराबाबू ने यहाँ को जायदाद से भी अपना रिश्ता छुड़ा लिया है । अपने हिस्से की जायदाद भाइयो को दे दी है। देवू ही अचानक एक दिन वोल पड़ा, दादा ने वहाँ एक कायस्थ की लड़की से शादी कर ली है। भाभी बी ए. पाम है । इसीलिए मां के साथ झगड़ा हुआ। सीताराम चौंक पड़ा था। देबू ने कहा था, वताइएगा नहीं वर्ना माँ मुझे डांटेगी। अनोखी शिक्षा है ! अद्भुत धर्य है मां का ! किसी दिन भी इस बारे मे एक शब्द भी नहीं कहा उन्होंने । ये छोटे-से लड़के ! इन लोगों ने भी नही। एक-एक बार मीताराम के जी में आता, मां से कहे, हाय जोड़कर अनुरोध करे, धीरावांबू को, उसकी दुल्हन को ले आइए। वह दुल्हन चाहे आपकी स्वजाति की न भी हो, वह पढ़ी-लिखी लड़की है, उसे ले आइए, आपका घर उज्ज्वल हो उठेगा, हँसने लगेगा, पविन होगा। सारी जातियों के अतिरिक्त और भी दो जातियों संसार में हैं-शिक्षित और अशिक्षित । आरके बेटे की जाति और आपके बेटे की दुल्हन की जाति में कोई फर्क नहीं । वे सचमुच एक ही जाति के हैं। यह मैं अपने प्राणों से जान सका हूं। लेकिन ये बातें करने की उमे हिम्मत नहीं पड़ी। बीच-बीच में अब भी जी करने लगता है। वह केवल दीर्घनिश्वास छोड़कर चुप बना रहता। वह जानता है कि कितना भी स्नेह वे करें, फिर भी इन लोगों से उसका वडा फासला है। ।

१३४ : संदीपन पाठशाला सोचते-सोचते उदास हो वह स्तब्ध बैठा रहता। यकायक किसी समय उसके कानों से आ टकराता, लड़के शोर मचा रहे हैं। उसकी अन्यमनस्कता का सुयोग पाकर वे चंचल हो उठे हैं। वह अपने को संयत कर सजग हो बैठता, ऐ ! ऐ ! चुप ! पढ़ो, पढ़ो सब लोग ! माधारण लड़के पढ़ने में मन लगाते। दो वावू घराने के लड़के अपनी-अपनी शिकायत लाकर पेश करते। उसने सर, मुझे मारा । मुक्का मारा है । उसने मुझे उल्लू कहा है सर । दोनों ही वावुओं के वेटे हैं। सीताराम का जी करता, इनको वेधड़क पीट दे। उसका दुर्भाग्य है कि बाबुओं के जितने पाजी लड़के हैं वे हाई स्कूल की पाठशाला के जूठन की तरह उमी की पाठशाला में आकर इकट्ठे हो जाते हैं। उसका जी करता, चिल्ला कर कहे, अरे तुम सब वावुओं के वेटे हो, तुम्हारे घर में अन्न है, सन्दूक में रुपये हैं । दलान-कोठे के इंटे और चूने में दबकर तुम लोगों की इज्जत बरकरार है, तुम लोगों को इसका क्या दरकार है ? क्यों गरीव के लड़कों की पढ़ाई में अड़चन डाल रहा है ? आक ने आकर उसका परित्राण किया। उसने उन दोनों को छुड़ा दिया। उसके पीछे लंगड़ा गोविन्द चिल्लाता-यह चिल्लाना उसका अभिनय है । सीताराम का गुस्सा ठंडा कर उसको हँसाने के लिए ही वह यह अभिनय करता। एकदम प्रसाद के गुरु पंडामार्क जैसा-मार ही डालूंगा। खा ही डालूंगा। भुर्ता बनाकर खा जाऊंगा। बैल पिटाई करूंगा। उल्लू पिटाई करूंगा। सीताराम को अन्त तक हँसना ही पड़ता। , इस वक्त पाठशाला में वाईस लड़के हो गए हैं। वह जानता है कि संख्या और भी बढ़ेगी। केवटों में, साहा-सुनारों में पढ़ाई के प्रति रुझान बढ़ा है। कभी-कभी उसकी इम उदासीनता को तोड़ देता है जयधर। मास्टर जी! js? यहां जरा देखिए। उसकी पीठ पर प्यार से हाथ फेर सीताराम हँसकर कहता, कौन-सी जगह वचवा? वह, यहां। सीताराम उसे कहता, वैठो। यहां बैठो। इसके बाद वह उसको समझाने लगता है। कोई दिन वह माता, मास्टर जी यह सवाल गणित की किताब में दिए उत्तर से मिल नहीं रहा है। सीताराम जयधर का निकाला हुआ सवाल अच्छी तरह से देखता है। कहीं पर कोई गलती नहीं । बुद भी एक बार निकालकर देख लेता है। जयधर के संदीपन पाठशाला ::१३५ - हल के माय उनका हल मिल जाता । वह कहता, उत्तर गलत लिखा है । काट कर अपना उत्तर लिख दो। फिर यह अमृत भाषा में जयधर को प्यार करने लगता। अरे कुरकुरी की मां ! मुरमुरी का छौना ! इसका मतलब क्या है, उसे भी नहीं मालूम । यह उमने हुगली में अपने पंडित में मोता है। ये भी युग होने पर यही याहार प्यार करते थे। वह भी करता है। जो सोलकर अकारण ही हंगता । उसको सबसे बड़ी युशी है, जयधर बिल्कुल गरीब सड़का है, वायुगों की कोठी की नौकरानी का बेटा। जपघर छोटे से बडा होगा ! सामान्य जयघर असामान्य अमाधारण बन जायगा-यही उसका मबसे बड़ा आनन्द है। वह अगर इन वायुओ का बेटा होता तो इतना मानन्द न हुआ होता। कभी-कभी उगके जी में माता कि चिल्लाकर महे. भरे, अरे, ओ यायुओं के सड़के, तू सय देस ले ! देश से इसे । जयधर को वृत्ति मिलेगी-इममे कोई सन्देह नही। जयधर पड़ता है - निर्धान्त जबाव देता है। उसकी पढ़ाई मे एक अमामान्य तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय मिल जाता । बीच मे देवू की पढाई में अमनोयोग देखकर दुःख के बदले उसे गुपो हुई। कभी इस कोठो को नौकरानी का बेटा जयघर, इम पर के अन्यतम उत्तराधिकारी को मलिन कर पिल उठेगा । अगले ही क्षण वह अपने आरो लज्जित हो जाता । नहीं, ऐमी कामना करना उगके लिए उचित नहीं । कामना न करने पर भी अवश्य ही ऐमा ही होकर रहेगा, यह वह जानता है, फिर भी कल्पना मे मानन्द अनुभव करना उसके लिए अनुचित होगा। इस घर का उम पर बहुत ऋण है । अवानक एक लड़के के रोदन में उसके चिन्तन या बानन्द- स्वप्न टूट गया। मारा है रे मारा ! एक लड़के को नाक मे यून टपक रहा है। वामा अरे, ऐं राधेश्याम, क्या हुआ ? किसने मारा? राधेश्याम धोयरो का लडका है ! नाक से टप-टप सून टपक रहा है। राण- भर के लिए भी अगर शान्ति मिल जाय ! किसने मारा गोगरा ने? नहीं सर ।-आप ने झट जवाब दिया। यह राधेश्याम की शुथपा कर रहा था, बोला, नाक में पेनिराल घुमेड़ दी है। पेन्सिल? जो। इतनी बड़ी एफ स्लेट-स्मिल नाक में घुमेड़ दी है। क्या मुमीवत ! सीताराम पदड़ाकर उग सड़के को ले बेटा। लगता है, आखिरकार डाक्टर को पाम से जाना पड़ेगा। लेकिन आफू ने उपाय बता दिया। चोला, नसवार दीजिए सर, छीकते ही निकल आपगी। सीताराम को यह बात चर-संगत लगी। आमूने आनो नरवार को द्विविधा मीताराम के हाय मे हो। ऐन उसी वका गोविन्द आ धमधा लंगड़े परों रो पुकाते हुए आकर बोला, दावमटर आ रहा है पण्डित ! ? 7 सर!

१३६ :: संदीपन पाठशाला - सव-इन्सपेक्टर ! उसके लिए सीताराम परेशान नहीं हुआ। एड ही नहीं मिलती है। उसकी पाठशाला को अभी तक मंजूरी ही नहीं मिली, सव-इन्सपेक्टर के आने पर परेशान होने की क्या जरूरत है उसे ? उससे भी ज्यादा तकाजा है, राधेश्याम की नाक से खून गिर रहा है। सीताराम ने नाक में नसवार दिया। वाहर सायकिल की घंटी बजी। उस लड़के ने फच्च से छींक मारी, साथ ही साथ पेन्मिल बाहर निकल आई। वाइसिकिल की घंटी फिर वजी। सब- इन्सपेक्टर बाहर से ही बुला रहे हैं, पंडित ! सीताराम ! नया सव-इन्सपेक्टर अजीर्ण का रोगी है, जमीकन्द पसन्द करने वाला, आधुनिक लेखक से उदासीन सब-इन्सपेक्टर ! - - हालांकि सव-इन्सपेक्टर अच्छा समाचार लेकर आए हैं। नये डिस्ट्रिक्टवोर्ड का इलेक्शन फिर कुछ दिन पहले हो चुका है। इलेक्शन का नतीजा निकला है । रायवहादुर का गुट हार गया है। कांग्रेस लगभग सभी थानों में जीत गई है। सव-इन्सपेक्टर ने हँसकर कहा, अव तुम्हारा काम होगा सीताराम । काम होगा ? सीताराम मानो विश्वास नहीं कर पा रहा है। होगा जी होगा! बस नए वोर्ड के बनने की अपेक्षा है सीताराम ने सव-इन्सपेक्टर को प्रणाम किया। सव इन्सपेक्टर बोले, पंडित, हम लोग मरकारी नौकरी करते हैं। नौकरी के लिए अपने को बेच चुके हैं। देश का पक्ष लेकर बात करने का कोई उपाय नहीं। मामूली अपराध के लिए तुम्हारे ऊपर जो कुछ गुजरा है, उससे मन- ही-मन दुखी हुए हैं, लेकिन कर कुछ भी नहीं सके। रजनीवाबू वार-बार तुम्हारे बारे में बता गये थे-सो इस बार होगा। बोर्ड फॉर्म हो जाने के बाद एकवार चेयरमैन के कानों तक पहुँचाने की बात है। वस ! तुम्हारे स्कूल के छात्रों ने कहा है, महात्मा गांधी देश के श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। चेयरमैन तुम्हारी पाठशाला को डबल ग्रांट देंगे। मैं कोशिश कर रहा हूं इस मामले को उनके कानों तक पहुंचाने की। . . प्रवीण सब-इन्सपेक्टर साहव भले आदमी हैं। रजनीवावू जैसे ही नेक आदमी। सज्जन जरा वीमार रहा करते हैं इसलिए वीच-बीच में अकारण ही गुस्सा हो उठते हैं। फिर फौरन ही ठंडे पड़ जाते हैं। एक तरह से देखा जाय तो रजनीवायू से भी अच्छे हैं, कम-से-कम पंडितों के लिए। पंडितों का पक्ष लेकर वे ऊपरवालों से वादानुवाद करते रहते हैं। । सीताराम आज न केवल खुश ही हुआ वल्कि उसने सब-इन्सपेक्टर के प्रति कृतज्ञताबोध किया। अगले दिन दी मते तत ।

मंदोपग पाठशाला::१३७ लेकर सव-इन्गोक्टर साहब के मकान पर जा पहुंचा । मकृतज्ञ माव उसको रमने के बाद उसने कहा, यह सर, हमारे पर का पैदा हुआ है। सव-इन्सपेक्टर साहब अभिभूत हो गये, बेहतरीन, बेहतरीन गूरन है । यहत बूब ! वह रोजाना सूरन का चोखा खाते हैं । जहाँ भी जाते हैं वहीं पता लगाने है, पटित, तुम्हारे यहाँ अच्छा गूरन मिलना है न ? आज गीताराम ये हाय में जमीकन्द देखकर वे खुद ही गल गये । वाह, वाह, वाह ! जमीकन्द रप आने के बाद बोले, यही मीनाराम, तुमको फाइल ही दिसा दूं। देखना, मैंने तुम्हारे लिए कितना-कुछ लिखा है। हो जायगा, मैं बता रहा है, तुम्हारा हो जारगा। और चुपके-चुपके तुम एक भयर बताये दे रहा है। कांग्रेमी बोर्ड के जो नेयरमैन होंगे~वे तुम्हारे धीरानन्द को बहुन चाहने हैं जी । उनका अभिमत है कि धीरानन्द एक दिग्गज लेसर है । मुना, कभी रवि ठाकुर के पास गये थे, ठाकुर ने उनसे कहा है -उनमे तन्य है । गमझे। धीराबाबू के कारण तुम्हारा ग्राट जाता रहा, वही ग्राट अब डबल होकर लौटेगा । हगने लगे थे। मीताराम उसी दिन के लिए आशा लिए प्रतीक्षा पर रहा है। वही उसके जीवन का सर्वश्रेष्ठ दिन होगा। आशाभी दृष्टि में वह भविष्य की और देखता। नन्हे-नन्हें कोमल चेहरे यहां पढ़ेंगे । आने दो वह दिन, पाटगना के लिए वह भवन बनाएगा। परका फर्श । उनके लिए वेंच का इन्तजाम करना पड़ेगा। कुर्गी, मेज, ब्लैकबोर्ड, क्ताक घड़ी, मर, ग्लोब, चाक, पेन्गिल, दम्टर जाने कितने सामान-असवाब मंगवान हैं ! उसने कहा- तो आज मुझे इजाजत दें। -ठहरो ! एक दुअन्नो देकर सब-इन्मोपटर माहरा चोले-यह लार जाओ। सूरन का दाम । है । लेना ही पड़ेगा । वर्ना यह तो मेरे लिए घूम लेने में शामिल हो जायगा । विचित्र व्यक्ति ! धन तिपहर के बाद वह अपनी आदत के मुताविक इग्ने के किनारे जाकर बैठ गया। आज उमने अपनी कल्पना को पिंजरे का दरवाजा खोल पछी की तरह उडा दिया। इस बार उसको ए मिलेगी। उमको माग पूरी होगी। वह मानो इतने दिन पंडितों के सम्मुल हुक्का-पानी बन्द विरादरी वाहर बना हुआ था । अब वह विरादरी में शामिल कर लिया जायगा। माफी मागार, यमूर काम कर बिरादरी में लिए जाने का मामला नहीं। आनी जिद्द को बरकरार रगकर यह बिरादरी में दासिल होगा । भविप्प की पाठशाला का मानदार रूप पोरन उमको औसी के सामने तिर जाता। "मन्दीपन पाठगाला, रत्नहाटा। शिक्षक-श्री सीताराम पान।" . वारिश से लिखावट अस्पष्ट हो नापगी। हर वर्ष उमके कपर यह स्याही से भये तौर पर लिखेगा। उसके पास सरोद हो जाएंगे, आँसो की रोशनी हो।

१३८ :: संदीपन पाठशाला - । जाएगी, ऐनक लगाकर वह पढ़ाएगा। लड़के बैठे पढ़ेंगे। नन्हे नाजुक चेहरे ! एक दल जाएगा, एक दल आएगा। उनकी पढ़ाई खत्म कर वह आशीर्वाद देगा, मेरा जीवन तो दुःख से ही भरा है, दुःख-कष्ट का भाग्य लेकर ही संसार में आया हूँ। लेकिन तुम लोग तरक्की करो, सुखी होओ ! वही देखकर मुझे सबसे बड़ा सुख मिलेगा। घर-गृहस्थी का कष्ट उसका कुछ बढ़ा है । कुछ वढ़ कर ही छुटकारा नहीं, दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। बाप के श्राद्ध के समय उसने कुछ ऋण लिया था, सोचा था, पाठशाला की आय से ही वह हर माह चुकाता जायगा। लेकिन सो भी नहीं हुआ। इतने दिनों तक पाठशाला की आय भी क्या-कुछ थी ! दूसरी ओर धान की कीमत भी दिन-ब-दिन घटती जा रही है। थोड़ी-सी जमीन- खेत की आय ! वह और भी घट गई है। एड मिल जाय इसबार तो कुछ सुविधा हो । महीने में पांच रुपए की आयवृद्धि उसके जैसे आदमी के लिए कोई कम नहीं। अगले ही क्षण उसे हँसी आई। पांच रुपए ! हाय रे ! दुनिया दिन-ब-दिन बदलती जा रही है। बाजार के रास्ते चलो तो नित नयी चीजें दिखाई पड़ती हैं। दिल कंगलापन करने लगता है। पांच रुपए की आय बढ़ने पर, उसका एक कणभर भी क्या वह पा सकेगा? कभी-कभी कितनी ही चीजें खरीदने की ख्वाहिश होती। लेकिन लम्बी साँस लेकर वह अपने मन को धमकाता, तुम पाठशाला के पंडित हो, उस और मत देखो तुम । "छोटे-से घर में वड़ा-सा मन लेकर" तुमको रहना है। कभी-कभी उसकी यह चिन्ता सुदुरप्रसारी बन जाती है । वह भविष्य के बारे में सोचने लगता है । कन्या का विवाह है । उसके और मनोरमा के जीवन में हारी-बीमारी है। अगर वह ही बीमार हो, कई महीने विस्तर पकड़ ले, तो? उसे रजनीवाबू के दफ्तर में कन्यादायग्रस्त वृद्ध पंडित की बातें याद आ जाती हैं। वृद्ध पंडित ने रुपए के अभाव में अपने ही समवयस्क किसी वृद्ध के साथ बेटी की शादी की थी । कन्या विधवा हो गयी है। उसके सौतेले वेटों ने उसे खदेड़ दिया है । वह लड़की किसी बाबू के घर अव खाना बनाती है। पंडित की हालत भी इस वक्त शोचनीय है । पंडिताई करने की अब उसमें सामर्थ्य नहीं, वह अब भीख मांगता है । गाँव-गाँव घूमता, सम्पन्न लोगों के घर में दो-एक दिन रह जाता है, स्तव-स्तुति कर दो माना, चार आना लेकर पन्द्रह- वीस दिन के बाद घर आता है। वह सिहर उठता। क्या उसकी भी दशा आखिर तक ऐसी ही हो जाएगी? उसकी एकमात्र तसल्ली यही है कि उसके पास कुछ जमीन है । दूसरी तसल्ली, सन्तान ! बस उस कन्या के अतिरिक्त नहीं हुई। बड़ी साध थी उसकी एक पुन-सन्तान के लिए । उसको वह अपने मन के मुताविक गढ़ता । लेकिन सर ! भगवान अव उसके घर कोई सन्तान न भेजें। दरिद्र शिक्षक है वह, किस सम्बल । ।

संदीपन पाठशाला :: १३६ के ऊपर - रो यह उमे इन्मान-सा इन्मान बना सकेगा? कल्पना-चिन्ता के बीच ही उसका मन सचेतन हो उठता । किमी दिन सिर से उल्लू घुघुआ कर चला जाता है, किसी दिन सिर के ऊपर चमगादह के देनों की आवाज होने लगती है तो कभी नजदीक ही गियार करने लगते हैं। वह सचेतन हो आकाश को और देखने लगता । अन्धकार-भरा माकाश, कमोटी-से काले आकाश मे तारे सिल पाए हैं । चांदनी रात चारों ओर उन्हाई मे झलमलाने लगती है, जमीन पर उसकी छाया पडती दिखाई देती। उसके मन में लिर जाती, प्रकाश-प्रतिविम्वित परदा लटकाती एका खिडकी, परदे पर काली छाया में जाग उठा है - एक मुखडा, नुकीली नाक, पीछे की ओर ढीला जूड़ा । वह चलने लग पड़ता। आकर बालिका विद्यालय के सामने पहा हो जाता। कुछ देर सड़े-खड़े देखने के बाद लौट आता। आजकल शाम को उसे अवकाश भी मिला हुआ है । श्यामू बहुत दिन पहले ही से रात को दूसरे मास्टर के पास अंगरेजी पहने लगा है। कुछ दिन हुए देवू भी बद्दी पढने जा रहा है । आजकल वह काफी समय लेकर यह चिन्न देव पाता है मनोरमा शिकायत करती, रात को जब पढ़ाना नही पडता तो छुट्टी के बाद घर भी तो चले आ सकते हो। सीताराम कहता, दिन को पाठशाला की नौकरी,तिम पर घर की नौकरी। थोड़ी-सी भी छुट्टी नहीं दोगी मुझे ? विसान-बहू अपने पैरों पर हाथ फेरते हुए वाहती, मुनो पडित मानिस ! पया? मैं कहूं तो मान-गुन लिया न तुमने ? क्या मान लिया ? सीताराम हेमता। यही, हमारी मालकिन की मिल्कियत-हकूमत मालकिन जो वहा करेगी वही मानोगे? तो अब तुमने परिवार को हुजूर कहा ! मनोरमा हसती, कहती धत् मरी! सीताराम बोला, तुझसे जो कहा कि तेरे बेटे में वही युद्धि है, उरो पाठशाला में दे । तो क्या हुमा उसका ? लो देखो। बावड़ी का बेटा पढ़-लिखकर कोई हाशिम-हुपाम तो बनेगा नहीं। नाहक बखत क्यों मरवाद-बरवाद करे? सीताराम ने अब दिल्लगी करते हुए उमसे कहा, तो तू ही मेरी पाठशाला में भरती हो जा। तेरी जैसी अक्ल-शक्ल है, तुझे वृति-इति मिल-इस ही जायगी। आम तूने मुझे ऐसी पकड़-अकड़ में बाघ डाला है कि क्या बताऊँ ! वह हंगने लगा।

सदापन पाठशाला चौदह । और भी दो साल के बाद । सीताराम को लगा कि दुनिया में उससे बढ़कर सुखी शायद दूसरा कोई नहीं है । लगा, इसी दिन के लिए वह आजन्म तपस्या कर रहा था। मणिलालवावू उसकी पाठशाला में आए । उससे पूर्व विचित्र घटना घटित हो चुकी थी। पहले जयधर को वृत्ति मिली। जिले-भर में वह अव्वल आया। उसको रिकार्ड मार्क्स मिले। उसके बाद ही पाठशाला की जय-जयकार हुई मणिवायू आए उस जय-जयकार के बाद । इस समय पाठशाला को मंजूरी मिल चुकी है, ग्रांट मिल गयी है । पाठशाला का मकान भी बन गया है। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन स्वयं उसकी पाठशाला में आए । धीरावावू दीर्घजीवी हों। धीरावाबू ही लेकर आए । इस सवसे पूर्व अचानक एक दिन धीरावाबू आए थे। अकेले ही आये थे। मां ने चिट्ठी लिखी थी, तुझे एक बार देखने की इच्छा हो रही है, लेकिन अकेले ही आना। धीरावावू, वही धीरावाबू ! सीताराम को बाहों में बांधकर बोले थे, पंडित, तुम्हें मैं सचमुच प्यार करता हूँ। धीरावाबू को उससे प्यार है, यह सुन वह कृतार्थ हो गया था। कितनी ही सारी बातें की थीं, अपने दुख-दर्द की बातें । फिर धीरावावू से उसकी बीवी के बारे में पूछा था। भाभी ? उनको क्यों नहीं ले आए ? वे तो नौकरी करती हैं। वे ढाका में गर्लस स्कूल में शिक्षिका है। मैं कलकत्ते में रहता हूँ। इन दिनों एक छोटे-से मेस में रहता हूँ। पहले एक टिन के मकान में रहता था, पाइस-होटल में खाता था। टिन के मकान में रहते थे ? पाइस होटल में खाते थे ? हाँ । उस समय जैसी कमाई थी उसी तरह रहता था पंडित ! जानते ही ।, लिख कर कमाना हमारे देश में कितना मुश्किल काम है । वे हंसे । धीरावावू लेखक है। किताब लिखकर वे अपनी आजीविका कमाना हते हैं । आश्चर्यजनक व्यक्ति हैं। धीरावाबू अपनी किताबें उसे दे गये हैं। हने पढ़ी हैं । अच्छा लिखा है, वेहतरीन लिखा है धीरावाबू ने । शादी की -वीवी नौकरी करती हैं। हालांकि उनके घर में अन्न की कोई कमी नहीं ! चिन्न! वे किताबें पाकर उसदिन उसकी लज्जा की कोई सीमा न थी। साथ ही उसे याद पड़ गया था कि धीरावाबू की वे चन्द किताबें आज भी उसी के में हैं । एकबार मन में आया, धीरावाबू के दोनों हाथ थाम कर वह बात कर दे। लेकिन सो भी उससे नहीं बन सका । उन सारी पुस्तकों में एक । ? ।

संदीपन पाठशाला::१४१ की तलाश भी की थी धीराबाबू ने याद है यह पिताय तो मैंने सरीदी थी। सीतागम फर पड़े चेहरे से पढ़ा था, बड़ी कोशिश कर उमने कहना चाहा था, मैं एकवार अपने घर में सोर कर देगा। लेकिन उसके मुंह से दो बार सिर्फ निकला था, मैं,मैं- धीराबाबू साय ही साथ बोल पड़े थे, देवा होगा या श्यामा, बिगी को दे माए होगे ! धीरायाबू ही हिस्ट्रिक बोर्ड के चेयरमैन को लेकर भाए। योग-पच्चीग रुपये खर्च कर सन्दीपन पाठशाला के प्रान हिस्ट्रीब्यूशन के लिए पिता से माए। सीताराम ने पाठशाला की रिपोर्ट लिम्मी थी। धीरायाय ने देस ली। योपते स्वर में उसने रिपोर्ट पढी । सन्दीपन नाम या इतिहाम पौराणिक है। मीताराम ने लिया था, भगवान् श्रीकृष्ण का गम । धीरायाबू ने बाटार लगा था, "महामानव श्रीकृष्ण के शिक्षागुरु सान्दीपन मुनि की पाटगाला के नाम पर इम पाठशाला का नामकरण हुआ है।" उस दिन गांव के बहुत-मारे भलोग आए थे । बड़े स्कूल के मास्टर भी मौजूद थे। बालिका विद्यालय की शिक्षिका भी आई थी। पाली लम्बी महिला कुछ ज्यादा ही काली लग रही थी। इस महिला के जीवन में भी माती रही दुःख है। शायद वह काली है इसलिए उसे कुछ लग्ना भी हो। बड़े ही राम्घ्रम के साथ सारा समय बैठी रहीं। धेयरमैन ने कहा था, जिस पाठशाना या छात्र भारत के श्रेप्ट व्यक्ति के रूप में अहिंमा और सत्य की प्रतिमूति माहात्मा गाँधी का नाम से गाता है, उस पाठशाला को में देश का अन्यतम श्रेष्ठ शिक्षा प्रतिष्ठान मानता है। चेयरमैन ने मासिक छह रपया एड मंजूर कर दी है। पाटगाना के मरान के लिए एकमुफ्त एक सौ रुपया दान मिला डिस्ट्रिकबोर्ड में । अमवाव के लिए तीस रुपए। गवन बन गया है। अमबार भी कुछ या गया है । मैग्नि और भी चाहिए। सो भी शायद हो जाएगा। गांव के लोग प्रमन्न है। पेपरमैन को प्रगंगा मिली है उसे, उसके जयपर ने उसका नयहवज फहरा दिया है। इस बार भी एक अच्छा लड़का हैनन्दनाय मुमग्न । मे भी पनि मिलेगी। यह बाबुओं का लड़का है । लेकिन मोताराम को भी बड़ी मृतो है. हम वजह से कि इस लड़ो को भी बहे नगरी पाभासा में नामा करार कर उसका वर्णन किया गया था। यानी नामारल। नटपट महमा सेकिन बड़ा ही खूबसूरत चेहरा या समका। चेहरा देवार दमयी ममता बाग आई। तभी उसने उसे ले लिया था। इसके बाद उसने मावि,मोटी वान करने पर वह लड़का बड़ा ने है। और यह भी यादिपार कर साता कि फोम का तकाजा करते ही वह सन में नागा यरने लगता है, उसका SE -- १४२ :: संदीपन पाठशाला खटपन बढ़ जाता है। उसने उसकी फीस मांगना वन्द कर दिया। देखते ही देखते वह लड़का वदल गया । उसे वृत्ति मिलेगी। सीताराम उसी को पढ़ा रहा था । यही उसकी विजय का दूसरा सोपान " अचानक मणिलाल बावू पाठशाला आए। यही सीताराम की पाठशाला है। वाह ! बहुत खूब ! बहुत खूब ! यह तो बड़ा अच्छा किया है जी। सीताराम अपनी कुर्सी छोड़ उठ खड़ा हो गया । एक कुर्सी बढ़ा दी उसने, वैठिए आप, वैठिए। मणिवाबू बैठ गये । नाम तुम्हारा बड़ा अच्छा हुआ है पंडित-सन्दीपन पाठशाला । सम्यक रूप से दीपन, जीवन को अग्निमय वनाना। सीताराम बोला, यह नाम मेरा दिया हुआ नहीं है, यह धीरावाबू का दिया नाम है। धीरानन्द ! एक दीर्वश्वास छोड़ मणिलालबाबू बोले, हालांकि सुनता हूँ, छोकरे ने अच्छा नाम-यश कमा लिया है। लेकिन वे जरा रुके । फिर बोले, वंश पर कालिख पोत दी उसने। आखिरकार एक कायस्थ की बेटी से शादी कर ली! सुनते हैं, बीवी नौकरी भी करती है। सीताराम चुप किये रहा । कड़ा जवाव उसके जुबान की नोक पर आ गया था। बड़ी कोशिश से उसने अपने को संयन किया। हजार हो, इज्जतदार शख्स हैं, वे उसकी पाठशाला में आए हैं, वे अतिथि हैं । मणिलालवावू ने किसी से कहा, कहाँ है रे ? य? उनका नौकर एक लड़के का हाथ थामे अन्दर आ गया। मणिवाबू का पौत्र ! उनका वेटा धीराबाबू का हम-उम्र है, वे खुद फोयं क्लास तक पढ़कर पढ़ाई छोड़ चुके थे। यह उन्हीं का वेटा है मणिवायू बोले, मेरे इस पचु को, चिरंजीत पंचानन को तुम्हारी पाठशाला में भरती कराने भाया है। लो भरती कर लो। एक बात मौर : तुम्हें इसको प्राइवेट भी पढ़ाना पड़ेगा। मूल बात, इसकी बुनियाद तैयार कर देनी है। सीताराम को लगा, ऐसा शुभ दिन उसके जीवन में शायद कभी माया नहीं। मणिवायू को प्रणाम कर उसने पंचानन को भरती कर लिया। वोला, वावू, प्राइवेट पढ़ाना मेरे लिए अब सम्भव नहीं होगा। लेकिन आदमी में देख दूंगा। मणिबाबू जरा गम्भीर बने रहे । वोले, अच्छी वात, फिर कोई आदमी ही देख देना। मैं जानता है कि तुम अच्छा भादमी ही दोगे। लेकिन तुम हो ईमान- दार । तुम ही होते तो बेहतर होता। सीताराम चुप्पी साधे रहा। मणिलाल बाबू चले गये। सीताराम ने अपनी एक कापी में सन-तारीख नोट कर ली। इस कापी में वह अपने जीवन को स्मरणीय घटनाएँ लिख रखता है। धीरावाबू ने कहा है, मास्टर, तुम्हारे बारे में मैं एक किताब लिम्बुंगा । तुम - संदीपन पाठगाला::१४३ बूढे हो जाओ। उस वक्त एक दिन मैं आऊंगा। आगर तुम्हारी जीवन-नया गुन जाऊंगा। मीताराम ने इसीलिए जिल्दवाली मापी बनाई है। वह अपने जीवन की स्मरणीय घटनाएं और तारीख लिखकर रखता। डिस्ट्रिक बोर्ड के नेयरमैन जिग दिन आए थे, वही तारीख उसका पहला इन्दराज है। उसके बाद जयपर वो वृत्ति मिलने की तारीख । केवल दो ही तारीखें लिखी गयी हैं । उमसे पूर्व- शुरु की ओर की कहानियों को राहेज कर रखा है। उममे भी कई तारीये हैं। जो तारीसें बाबुओ को कोठी की दीवार पर लिखी थी, वही तारीखें। सफेद कापी उलट-पुलट कर उसे बीच-बीच में हसी याती। अपने ही मन में हराता। क्या लिगेंगे धीरावावू ? जीवन के रग मे कोई रोनक नहीं, गुर मे कोई बहार नहीं, इसे लेकर चिन्न नही बनता है, इसे लेकर गीत नहीं बनता है। फिर भी वह लिखकर रखता। आज भी रसेगा-५ फरवरी १९२६ । आठ महीने बाद। सन् १९२६ के २१ सितम्बर को कापी सोलकर उमने तारीस लिस दासी। और माय-ही-साथ उसे बन्द कर डाला। परसों छुट्टी होगी पूजा की । पुआर का महीना, नीले आसमान में शरत की धूप झिलमिला रही थी। बीच-बीच में सफेद बादल उड़ते जा रहे थे । बीन. बोच में बगुलों की पति । अनोखी प्रसन्नता से दिगदिगन्त भर उठा है । लेकिन सीताराम को लगा-सबकुछ मलिन हो गया। मीताराम उस दिन, उस वक्त लड़को से चन्दे के लिए अपील कर रहा था, पूर्वी बंगाल में बाढ बाई है, कितने ही गांव यह गए हैं,कितनी ही जान चली गई हैं, फसल बरबाद हो गयी है । बड़े-बड़े नेता लोगो ने-गुभाषचन्द योम, याचार्य प्रफुल्ल चन्द्र राय ने सहायता के लिए देश के सम्मुख हाय पसारे है । चारी और चन्दा वसूला गया है। बड़ा स्कूल भी चन्दा घमूल रहा है। तुम लोग भी कुछ दो। जो जितना भी दे सकता है-दीवाने, चार आने, जो जितना दे सकता। अभी से तो गह सब सोसना पड़ेगा। बडी-वडी जगहों से चन्दा जायगा, जराय, साथ सन्दीपन पाठशाला में शिक्षक और छानो की सहायता के नाम पर तो कुछ भेजना ही पड़ेगा। कम-से-कम पनि रुपए । जो कुछ तुम लोगो से बन पड़े दो, चाकी में दे दूगा। अचानव भाकू आ पहुंचा । आक अब जादा विगड़ चुपा है । बीडी पीता, तमाकू पीता, रात को फोस्ट करता है । यहाँ पर ज्यादा आता नही । मड्डा सब स्टेशन पर है। कुलियों की ओर से मुगाफिरो के माय मोलभाव करता है, गड़ा भी । कुली उसे वोड़ी पिलाते हैं, चाय वा दाम दे देते हैं, आक इसी में गुग है। कभी-कभी पाठशाला में वह आता और मास्टर जी या हालचाल पूछ जाता । गांर का हालचाल सोलाराम यो यता जाता । गोविन्द भी बार के साथ गिगर 1 १४२ :: संदीपन पाठशाला खटपन बढ़ जाता है। उसने उसकी फीस मांगना बन्द कर दिया। देखते ही देखते वह लड़का वदल गया। उसे वृत्ति मिलेगी। सीताराम उसी को पढ़ा रहा था। यही उसकी विजय का दूसरा सोपान अचानक मणिलाल वावू पाठशाला आए। यही सीताराम की पाठशाला है। वाह ! बहुत खूब ! वहुत खूब ! यह तो बड़ा अच्छा किया है जी। सीताराम अपनी कुर्सी छोड़ उठ खड़ा हो गया । एक कुर्सी बढ़ा दी उसने, वैठिए आप, बैठिए। मणिवाबू वैठ गये । नाम तुम्हारा बड़ा अच्छा हुआ है पंडित-सन्दीपन पाठशाला । सम्यक रूप से दीपन, जीवन को अग्निमय बनाना। सीताराम बोला, यह नाम मेरा दिया हुआ नहीं है, यह धीरावावू का दिया नाम है। धीरानन्द ! एक दीर्घश्वास छोड़ मणिलालबाबू बोले, हालांकि सुनता हूँ छोकरे ने अच्छा नाम-यश कमा लिया है । लेकिन वे जरा रुके। फिर बोले, वंश पर कालिख पोत दी उसने। आखिरकार एक कायस्थ की बेटी से शादी कर ली! सुनते हैं, बीवी नौकरी भी करती है। सीताराम चुप किये रहा। कड़ा जवाब उसके जुबान की नोक पर आ गया था। बड़ी कोशिश से उसने अपने को संयत किया। हजार हो, इज्जतदार शख्स हैं, वे उसकी पाठशाला में आए हैं, वे अतिथि हैं । मणिलालवावू ने किसी से कहा, कहाँ है रे ? अँय ? उनका नौकर एक लड़के का हाथ थामे अन्दर आ गया । मणिवाबू का पौत्र ! उनका बेटा धीराबाबू का हम-उम्र है, वे खुद फोर्थ क्लास तक पढ़कर पढ़ाई छोड़ चुके थे। यह उन्हीं का बेटा है । मणिवाबू बोले, मेरे इस पचु को, चिरंजीत पंचानन को तुम्हारी पाठशाला में भरती कराने आया हूं। लो भरती कर लो। एक बात और : तुम्हें इसको प्राइवेट भी पढ़ाना पड़ेगा। मूल वात, इसकी बुनियाद तैयार कर देनी है। सीताराम को लगा, ऐसा शुभ दिन उसके जीवन में शायद कभी आया नहीं। मणिवाबू को प्रणाम कर उसने पंचानन को भरती कर लिया। बोला, वाबू, प्राइवेट पढ़ाना मेरे लिए नव सम्भव नहीं होगा। लेकिन आदमी मैं देख दूंगा। मणिवावू जरा गम्भीर बने रहे। वोले, अच्छी वात, फिर कोई आदमी ही देख देना । मैं जानता हूं कि तुम अच्छा आदमी ही दोगे । लेकिन तुम हो ईमान- दार । तुम ही होते तो बेहतर होता। सीताराम चुप्पी साधे रहा । मणिलाल बाबू चले गये। सीताराम ने अपनी एक कापी में सन-तारीख नोट कर ली। इस कापी में वह अपने जीवन की स्मरणीय घटनाएँ लिख रखता है। धीराबाबू ने कहा है, मास्टर, तुम्हारे बारे में मैं एक किताब लिखूगा। तुम । - संदीपन पाठशाला::१४५ हैं। वह दौड़कर गया, एका टिकट परीदा, जंकशन, एक इन्ट र पलासा। जंक्शन यहाँ से सात मील है 1 वहां जाकर यह नाइन खत्म हो गई है। यहाँ गाही बदलनी पड़ेगी। वह उसी डिब्बे के दूसरे छोर पर जा जमकर बैठ गया। ट्रेन चली। उदास दृष्टि से वह महिला गाँव की ओर देख रही है। क्रमशः वह उदा. मीनता विला गई और चेहरे पर बेलोमपन उभर आया। याली-मी लम्बी लड़मी । बगुले के पंप जैमी मफेद घुली पदर की, नीली किनारी वाली गाडी, बदन पर मान हल्के लाल रंग का ब्लाउज पंगे में संडिल, मिर पर पट नहीं, परिछन्न निपुणता से बाल ढोले जूड़े में बंधे । मधे में लटक रहा है खद्दर का एक झोला। कई बार मीनाराम के जी में आया, एका बात करे, कहे-- चली जा रही हैं याप ? लेकिन मिगी तरह मे भी उगमे न हो सका । नहीं-नहीं, यह पाठशाना का पंडित है। उसने सोचा कि जमशन स्टेशन पर कुली चुतवाकर वह उगवी मदद करेगा । लेकिन यह भी उससे नहीं हो सका। उन्होंने मुर ही कुली बुला लिया। मामान चढाते वक्त भी वह एक चार आगे बढ़ा, जाकर फिर पीछे हट मापा। गाड़ी चली गई। उसने अपनी कापी फिर खोली। मोचा था, तारीख काट देगा। लेकिन नहीं, रहने दो । बल्कि उगने और भी थोड़ा-सा लिष डाला। "जीवन में बूंद गर रंग था, रात के अन्धेरे में, मुग्पुटे मे आकार की नीहा- रिका की तरह उभर आता पा; यह भी पुंछ गया २१ मितम्बर १९२६ पी।" उदाम मन लिए यह रलहाटा को ट्रेन गे आ चंठा । काफी ममर है हाथ में । बया. नक पराल आया, यहाँ की गितावों को दुकान से कुछ फिसायें परीद लो ना तो कैसा हो । आजकल यह पाठशाला में पाठ्य पुस्तकों का व्यापार करने लगा है। समी पंडित करते हैं । साल में एक बार, पांच गात रूपए का लाभ । महीने में दम-पन्द्रह गए जिमको याय हो उसके लिए साल में पाच-गात लाए गी यात होते हैं। कुछ कंजी वाली कितावें चाहिएँ । कुंजी बाली विताओं में मुनाका जादा है । इनकी बिक्री सारा माल होती रहती है । लेकिन नहीं, रहने दो। आज का दिन उसके जीवन की माला से अलग ही रखा जाए । आज उकाली लडकी के सिवा और किमो के बारे में वह नहीं मोगा। जीयन की गुप्त वात गुप्त हो रह जाए । केवल धारावायू से महंगा, वह उस पर किताब लिसेगा। लेकिन इतनी-सी पान के मिया धीराया में यह पा कहेगा? भया लिसगे धोरावायू उम रगशून्य जीवन के बारे में लिगेगा, उसकी गन्दोपन पाठशाला के बारे में लिखेगा धीरामावू? 7 १४४ :: संदीपन पाठशाला , गया है । वह अव आकू का अनुचर है। सिर्फ रात को यहां आकर लेटता है। सीताराम ने उसे देख हँसकर पूज, क्या खबर है आकू ? आक वीड़ी पी रहा था, फेंकी नहीं। आजकल वह फेंकता नहीं, कुशलता से उसे ढीली मुट्ठी के अन्दर छिपा लेता है । वीड़ी छिपा, दूसरी ओर मुंह फेर धुआं छोड़ आकू वोला, बड़ी मुश्किल हो गई सर। थोड़ी-सी रस्सी चाहिए । विस्तरबन्द का चमड़े वाला फीता टूट गया । सीताराम हँसा । आकू परोपकार कर रहा है । आकू वोला, विस्तर में दुनिया भर का सामान भर दिया है । मैंने तव बताया तो उन्होंने सुना ही नहीं। पढ़ी-लिखी हुई तो क्या ? है तो औरत ही ! उस वालिका विद्यालय की दीदी जी हैं सर। सीताराम हड़बड़ा गया, रस्सी- यह लो, यह रस्सी ले जाओ । उसने बच्चों के लिए खरीदे हुए स्किपिंग रोप की एक रस्सी दे दी। अच्छा ही होगा । ठीक ही है। आकू बोला, बड़ी तरस मा गई सर, दीदी जी काफी दिन यहां रहीं । चली जा रही है, फिर तो यहाँ आएगी नहीं। मेरी बहन पढ़ती है वहाँ । उसी से मुझे बुलवा भेजा, बोलीं, आकू, तुम अगर मेरे जाते वक्त जरा मदद करो, कुली बुलाकर तय कर दो तो अच्छा हो । बड़ी तरस आ गई उस पर । बहुत दिनों से थी हमारे यहाँ । फिर तो आएगी नहीं । सुनकर बड़ा अफसोस हुआ। इसलिए सबकुछ ठीक-ठाक कर दिया। लेकिन रास्ते में विस्तरबन्द का चमड़ा फट गया। गोविन्द को पहरे पर विठा कर आया हूं। सीताराम को लगा, शरत् काल का यह अपराह्न अकस्मात् ही फीका पड़ गया । जा रही हैं । चली जा रही हैं ! सीताराम अभिभूत-सा आकू निकल आया। अच्छी नौकरी मिली है इसीलिए जा रही हैं । रास्ते पर विस्तर टूट पड़ा है । कुली को लेकर आकू विस्तर बांधने लगा। विखरा सामान गोविन्द ने उठा- उठाकर दिया। सीताराम ने भी । विस्तर में वह परदा भी बंधा है । आकू चला गया । लेकिन वे कहां हैं? वे शायद दूसरे रास्ते से स्टेशन गई हैं । शाम के अन्धेरे में प्रकाशित परदे पर यह मुख फिर कभी उभरेगा नहीं। वह वहीं खड़ा रहा। ट्रेन आ रही है, घंटी टनटना गयी है । घड़ी में तीन बजकर पन्द्रह हो रहा है । यकायक सीताराम दौड़कर पाठशाला लोट आया, हथौड़ी उठाकर छुट्टी की घंटी बजा दी। अरे, छुट्टी आज - छुट्टी ! मुझे याद नहीं रहा। मुझे एक वार जंकशन जाना है। आज छुट्टी! झटपट दरवाजा वन्द कर वह दौड़ पड़ा । उसे जंकशन पहुंचना ही है । पहुँचना ही है। ट्रेन आ गयी है । एक खाली इन्टर क्लास में वह बैठी हुई हैं। स्कूल की लड़कियां भाई हैं, उन्हीं की ओर देख रही हैं, वतिया रही के साथ ।

संदीपन पाठशाला ::१४५ हैं। वह दौड़कर गया, एक टिकट खरीदा, जंकशन, एक इन्टर क्लाग वा। जंकशन यहां से सात मील है । वहां जाकर यह लाइन खत्म हो गई है। वहाँ गाड़ी बदलनी पड़ेगी। वह उसी डिब्बे के दूसरे छोर पर जा जमकर बैठ गया। ट्रेन चली। । 1 उदाम दृष्टि से यह महिला गांव की ओर देख रही है । क्रमश. वह उदा. गीनता विला गई और चेहरे पर बलोमपन उभर आया। काली-मी लम्बी लडकी। वाले के पंस जैसी सफेद धुली पद्दर की, नीली किनारी वाली साड़ी, बदन पर आज हो लाल रंग का ब्लाउज, पैरों में संडिल, मिर पर घूघट नहीं, परिछन्न निपुणता से बाल ढीले जूडे में बंधे । बन्धे से लटक रहा है खद्दर का एक झोला । कई बार सीताराम के जी में आया, एक बात करे, कहे- चली जा रही है आप? लेकिन किगी तरह से भी उगसे न हो सका । नहीं-नहीं, यह पाठशाना का पडित है। उमने सोचा कि जकशन स्टेशन पर कुली बुलवाकर वह उसकी मदद करेगा। लेकिन यह भी उससे नही हो मका । उन्होंगे सुद ही कुली बुला लिया। सामान चढ़ाते वक्त भी वह एक बार थांग बढ़ा, जाकर फिर पीछे हट आया। गाड़ी चली गई। उसने अपनी कापी फिर सोली । सोचा था, तारीख काट देगा। लेकिन नहीं, रहने दो । बल्कि उगने और भी थोड़ा-सा लिय डाला। "जीवन में बूंद पर रग था, रात के अन्धेरै में, मुम्पुटे में आकाश की नीहा- रिका की तरह उभर आता था; वह भी पुंछ गया २१ मितम्बर १९२६ को।" उदाम मन लिए वह रत्नहाटा को ट्रेन में आ बैठा । काफी समय है हाथ में । मचा- नक सराल आया, यहाँ की किताबो की दुकान से कुछ फिनावें खरीद ली बार तो कसा हो । आजकल वह पाठशाला में पाठ्य-पुस्तको का व्यापार करने लगा है। सभी पंडित करते हैं 1 साल में एक बार, पांच सात रूपए का लाभ । महीने में दम-पन्द्रह रुपए जिमकी आय हो उसके लिए साल में पांच-मात रुपए भी बहुत होते हैं। कुछ कुंजी वाली किताबें चाहिए । कुंजी वाली किताबों में मुनाफा जादा है। इनकी विक्री सारा साल होती रहती है । लेकिन नहीं, रहने दो । आज का दिन उसके जीवन की माला से अलग ही रसा जाए। आज उम वाली लड़की के मिवा और किमी के बारे में वह नही मोचेगा। जीवन की गुप्त वात गुप्त ही रह जाए । केवल धीराबाबू से कहेंगा, यह उस पर किताब लिखेगा। लेकिन इतनी-मी बाल के मिवा धीराबाबू से वह क्या कहेगा? क्या लिखेंगे धोरावाबू ? उसके रंगशून्य जीवन के बारे में लिगेगा, उगको गन्दीपन पाठशाना के बारे मे लिखेगा धीरावा?

१४६ : : संदीपन पाठशाला ! . पन्द्रह लिखेगा-कोवल-कोवल मुख वाले सारे बाल-गोपाल चिरकाल सन्दीपन पाठ- शाला को प्रकाशित कर पांतों में बैठे मधुर कंठों के कलरव से पढ़ते हैं-अ, भा, छोती ई, वली ई। हां। फिर यह क्या है ? वताओ भला। छोटी-1 संकेत से सीताराम उसे समझाता । तुतलाती जुबान में वह लड़का कहता, छोता उ, वला ऊ । वाह ! वाह ! बोलो। उत्साह से कोवल मुखड़ा सुबह के सूरज की छटा पड़े कोंपल की नाई झलमला उठता, शुभ्र आंखें चमचमा उठती। हरी-हरी घास पर ठहरी ओस की बूंदों की भाँति । वह पढ़ता जाता, ऋ। यह ? यह क्या माच्चा? यह माच्चा ल कार है। उस ओर लड़के पढ़ते अ और च और ल, अच-ल । अध और म, अघ-म । हाँ यह दोनों यानी अचल और अधम कभी मत बनना तुम । ज, ल, ग में छोटी इ की मात्रा और र में ए की मात्रा-जल गिरे। सीताराम खुद ही कहता, प में आ की मात्रा और त, पात और ह में छोटी इ की मात्रा और ल में ए की मात्रा, हिले, पात हिले । जल गिरे, पात हिले । ज और ट जट, ह में छोटी इ की मात्रा ल में ए की मात्रा ले..~जट हिले । कहाँ, अपनी जटा तो हिलाओ एक वार । उस लड़के के सिर पर बड़े-बड़े बाल, उसी में दो जटाएं वन गई हैं । देवता के पास मनौती है । यहां के प्रचलित पद्य कहता सीताराम-जटा हिले, इमली गिरे और उसे दुलारता। लड़का शर्मा कर सिर झुकाये रहता है। इसी बीच उसे अपने सिर की जटा के लिए लाज लगने लगी है । सीताराम खुद ही उसकी जटा हिला देता। बड़ी कक्षा के लड़के पढ़ रहे हैं। "हम लोग जिस देश में रहते हैं, उस देश का नाम है भारतवर्प । भारतवर्ष के उत्तर में संसार की सर्वोच्च पर्वतमाला हिमालय है, दक्षिण में वंगोपसागर, भारत महासागर हैं।" वे खड़े होकर तरन्नुम से पढ़ते- "कोन देशेरइ तरुलता सकल देशेर चाइते श्यामल? कोन देशेते चलते गेले दलते हय रे हय रे दुर्वा कोमल? कोयाय फले सोनार फसल सोनार कमल फोटे रे? सेनामादेर बांगला देश-" गीताराम भाई ? पुशल रो तो हो ? । - संदीपन पाटगाना ::१४७ यौन ? मीताराम कुर्मी से उठ पड़ा हुआ । यही पलाशबुनी वाले इन पंटित जी। ईय, यह कमी शकल हो गई है उनकी शिथिस चर्म अल आने गे हटियाँ प्रगट हो पाई हैं, कुबड़ा-मा झुक गए हैं. लाठी थामे पाठशाला के आंगन में मा पड़े हो गए हैं । मैली काली-मी धोती पहने हैं, उनमें मिलाई के बडे-बडे दाग काली मिट्टी में दरार जसे दिप रहे हैं। हड्बड़ाकर उतरने के बाद आगे वा गया मीनाराम । आइए-आइए । पितना मौभाग्य है मेरा । तुम्हारा मौभाग्य -हा-हा कर हंस पडे पडित । गौभाग्य क्यो नहीं । अवश्य ही यह मेरा गौभाग्य है । कल्याण हो तुम्हारा। भले आदमी हो तुम । अब पुछ पिलाओ तो भाई। बड़ी मूस लगी है। सिलाकर अपना सौभाग्य बढ़ा लो। मीताराम व्यस्त हो उठा, अरे ! गोविन्द पद, मुनो तो भई। पंडित बोलता ही रहा, जानते ही होंगे, भीख मांगता हूँ, हाँ नीस ही है एक तरह से । गृहिणी को मुक्ति मिल गई है। तो धाद तो करना ही पड़ेगा। इमलिए पलागयुनी गया था । हैं तो सब मेतिहर किमान ही लेकिन कभी के छान तो हैं मारे । कुछ भीस-ईस मांगकर गर पाऊंगा। दोपहर हो गई, विधाम चाहिए, धूम्प-प्याग भी लगी है । गो एक बार गोना कि बाबुओ की ठाकुरवाड़ी चला जाय या विगी भी याबू की कोठी में । लेपिन मन नहीं लिया । तुम्हारी हो याद आ गई । शास्त्र में कहा है, ब्राह्मणम्य, ब्राह्मणम् गति । यायू बाह्मण और पाठशाला का पडित भिसमगा ग्राह्मण तो कोई एक नहीं। तो मन में आया, पाठशाले के पंडितस्य पाठशाले कै पडितम् गति । गो यही चना आगा। कहकर ही फिर रो हा-हा कर पडित हेगने लगे। इस हंगी गे गोनाराम शप गया। उसे लगा, पडित उसकी मुशामद कर रहे हैं। उनको कुर्सी पर बिठाकर यह एक कापी पी जिद से हवा करने लगा। घोसा, अच्छा ही किया है आपने । आप पधारे हैं गसे मुझे कितनी गुगी हुई है, क्या बताऊँ ? तेल मगाऊँ, नहा लीजिए। स्नान? तो-1पंडित ने अपना मंगौछा पलाकर एक बार देसा अंगी धोती से भी ज्यादा मेला । तिम पर कितने ही घेद । दिसायर बोले, माप गोई धोती तो है नहीं। इसको पहन कर नहाना-1फिर हा-हा कर हंग पहे पंडित । फिर धीमे स्वर में बोले, गम भाई, पलाशयुनी ये मैदान याने पोवर में जाकर दिगम्बर होकर ही, समझे ? पंडित की हंगी यमती ही नहीं । कापी को जिल्द उनके हाथ में देफर गीताराम बोले, आर तनिक इन बच्चो को देखते रहें। मैं अभी पाया। यह एक नयी धोती और शीशी में थोड़ा-गा तेन लेकर लौट आया। बोला, तेल मल लीजिए। नहाफर यह धोती पहन लीजिए। यूट के होठ काने लगे। पंडित को विदा कर उगने ठदी गाम जी । दारिद्रयदोषो गुणरागि.

१४८ :: संदीपन पाठशाला - देखो, नाशी । पंडित स्वयं यह बात बता गए। नहा कर खाने के बाद पंडित ने कहा घा, भाई, लड़कों से दो पैसे-चार पैसे चन्दा अगर वसूल कर देते। जानते ही हो पत्नीदाय । मातृदाय पितृदाय नहीं, वृद्ध ब्राह्मण का पत्नीदाय । कहकर फिर हा-हाकर हंस पड़े। लड़कों से एक रुपया सात आने इकट्ठे हुए, उसने खुद एक रुपया एक माना मिलाकर ढाई रुपए पूरे कर उनके हाथ में दे दिए। जाते वक्त पंडित बता गए, एक बात बताते जा रहा हूं भैया ! जानते होंगे, वृद्धस्य वचनम् ग्राह्य । बूढ़े की बात याद रखना। ये बड़े-बड़े दालान-कोठे बनते हैं, देखा है न ? उसे राजमिस्त्री बनाते हैं, नक्शा बनाते, कारीगरी दिखाते है, वेतन लेते और विदा हो जाते हैं। बड़े लोग उसमें वास करते हैं, कोठियाँ उन्हीं की होती हैं । फिर भी राजमिस्त्री अपने नाम लिख जाते हैं-फला राज, फलां सन् आदि आदि । कुल वात यह कि उनके नाम रह जाते हैं। मजदूरी भी उनको कोई बुरी नहीं मिलती। हमारे पंडितों से ज्यादा ही पाते हैं। लेकिन शुरू में जो लोग काम करते हैं, नींव के लिए मिट्टी खोदते हैं-वे बस मिट्टी खोदने वाले मजदूर हैं, उनको कोई भी याद नहीं रखता। उनकी मजदूरी भी सवेरे से तीन पहर तक मिट्टी काटने के वाद--कुल चार आने होते हैं। पेट-भर खाना भी उससे नहीं जुटता। वे अपनी आखिरी उम्न में अनखाये मरते हैं। अगर वे वावुओं की कोठी में जायें, कहें, बाबू साहब, मैंने आपके महल की नींव खोदी थी, आज अनखाये मर रहा हूं, लिहाजा मुझे कुछ भी भीख दीजिए। बाबू क्या करेंगे? पहचान भी नहीं सकेंगे। भैया भीख देना तो दर-किनार दरबान को बुलाकर निकाल देंगे। स्कूल-कालेज के मास्टर हुए बड़े राज- मिस्त्री छोटे राजमिस्त्री । और अभागे हम पाठशाला के पंडित हुए नींव के लिए मिट्टी खोदने वाले मजदूर । हम लोगों को कोई याद ही नहीं रखता। जाओ तो पहचानेंगे नहीं । भीख भी दें तो दो आने, चार माने, वस । इसीलिए कहता हूं- । ढेर-सी बातें कर वे हांफने लगे थे। जरा रुककर फिर वोले, कुछ-कुछ संचय करते रहो । समझे? हालांकि तुम्हारे पास कुछ जमीन-खेत हैं, मेरी जैसी हालत तुम्हारी होने वाली नहीं । फिर भी वृद्ध की बात याद रखना । इस तरह से-जिस तरह अभी तुमने मुझे धोती दी, खाना खिलाया-इस तरह खर्च मत किया करना । कुछ-कुछ जमा करने की आदत डालो। दरवाजे के पास पहुंचकर वृद्ध ने फिर कहा, भैया, एक वात और बताऊँ ? बताइए। मुझे एक बंडल बीड़ी और एक माचिस खरीद दो। , सीताराम लौटकर पाठशाला की कुर्सी पर बैठा सोचने लगा। पंडित उसे अव- साद से ग्रस्त कर गए। वही चिन्ता आकर उस पर सवार हो गई है। पंडित ने कोई झूठ तो कहा नहीं। और भी बहुत सारी बातें की थी पंडित ने । दोपहर- भर वह अनर्गल वोलते ही रहे। धोती और ढाई रुपये की सहायता पाकर

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१५० :: संदीपन पाठशाला : - मोफ, छी छी ! फिर आंखों में आंसू आ गए। कुछ दिनों से, यही शायद महीने भर से यह उत्पात शुरू हो गया है। आँखों से पानी टपकता है। खास तौर से तिपहर में पाठशाला के आखिरी घंटों में ज्यादा पानी गिरता। सिर भी भारी हो जाता है । डाक्टर को दिखलाना पड़ेगा। खैर, बाद में लिखेंगे। पंडित की बातें अब भी कानों में गूंज रही हैं। मन में बिल्कुल गुंथ गई हैं, यह क्या भुलाने वाली बात है ? पंडित ने कहा है, भैया, आज लगता है, मति मारी गई थी मेरी। वर्ना जरा सोच-विचार कर देखो, हिसाब लगाकर देख लो, पुरोहित का रोजाना का रोजगार पंडित के रोजाना के रोजगार से कहीं ज्यादा है। चावल, धोती, दक्षिणा-हिसाब लगाकर देख लो। और ठेके पर पकवान बनाने के काम में कमाई भी दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही है। एक वक्त एक रुपया, दो वक्त दो रुपए। रसोइया-ब्राह्मण की माहवारी तनख्वाह ही अव खुराक-पोशाक और आठ रुपये-दस रुपये। इसके अलावा बावुओं के नाते-रिश्तेदार, आने-जाने वाले महीने में दो रुपए बख्शीश के । पाठशाला की पंडिताई करके जिन्दगी-भर धुइयाँ ही छोलते रहे । कहकर ही हा हा कर हँस पड़े। फिर बोले थे, कुछ बुरा न मानना भैया! सच बात बताऊँ ? तुमने भी मुझ जैसी भूल की है। सद्गोप किसान के बेटे हो। बाप-दादा खेती-बाड़ी करते थे; अपनी जमीन, और भी दो-चार जनों की दो-दस बीघा जमीन वटाई में लेकर दूध-भात खाते रहे । खलिहान में धान, घर में ऊड़द, गेहूं, गुड़ जमा कर सुख से दिन काटते रहे। तुमने भी मेरी तरह घुइया भूनकर खाये भया ! पुश्तैनी पेशा छोड़ लिखपढ़ पंडित बनने में बेजा किया है। अचानक उसका हाथ थामकर बोले थे, कुछ बुरा तो मान नहीं रहे हो भैया? नहीं, नहीं । आपने सच्ची बात बताई है। बुरा क्यों मानूंगा? हां । तुम्हें जानता हूं, तभी कहने की हिम्मत पड़ी । वर्ना अब तो मैं भिख- मंगा हूं, मैं- कुछ देर के लिए वे खामोश हो गए थे, फिर बड़े ही धीमे स्वर में कहा था, भैया, क्या यूंही कहता हूं ? आज तुमसे कुछ भी छिपाऊँगा नहीं। विधवा युवती कन्या महाराजिन का काम करती है, जानते होगे ? लेकिन काम छोड़कर भाग आई है । जानते हो क्यों ? भाग आने को मजबूर हुई है। मतलव, समझ रहे हो न? वहीं वावुओं का युवा पुत्र उसके पीछे पड़ा था। बताओ भैया, अव तो मान लो मैं हूं, भीख मांगकर खिला रहा हूं, लेकिन मेरे बाद उसका क्या होगा? सम्बल कुछ होता तो आज मैं चिन्ता न करता होता । मेरे बाद उसी सम्बल के सहारे अपने घर में आत्मरक्षा कर किसी कदर वह रह सकती थी। सीताराम सोचता, उसके जीवन में क्या जाने क्या होगा। फिर उसकी आंखों में पानी आ गया । यह पानी आना वह पानी आना नहीं। यह उसका -- ।

सदीपन पाठशाला ::१५१ मन रो रहा है, तभी पानी आ रहा है । आँण पोंछ हाली उमर्ने । पाठशाला के दरवाजे पर सायकिल की घंटी बजी। स्कुल सब-इंस्पेक्टर साहब ने प्रवेश किया। नए आदमी, थोडे हो दिन हुए पाए हैं, कर उन, कड़ा भादमी ! साहब के दफ्तर में जाकर देखा है, मोटी-मोटी अंगरेजो को कितायें पढ़ते हैं। एक शेल्फ में चमाचम जिल्द लगी बंकिमचन्द्र, रवीन्द्रनाय की किता। दो-तीन मामिक पन्न मंगवाते हैं । आप अति आधुनिक हैं। आप कहते है --तुम लोगों के धीराबाबू वाहियात लिखते हैं जो । विल्कुल प्रतिक्रियावादी, रिऐक्शनरी! सीताराम इन दोनो शब्दों का ही अर्थ नहीं समझता । घुग किए रहता। गम्भीर भाव से सब-इन्सपेक्टर रजिस्टर-वही आदि लेकर बैठ गए। नोट से लिये । इन्मपेक्शन बुक पर मन्तव्य लिसा । उनके चले जाने के बाद पाठशाला की छुट्टी हो गई। टन्न-टन्ननननन । फिर अगले दिन साढ़े दस बजे पाठशाला लगेगी। टन्न-टॉन-टन्न । माल-दर-साल यही चलता रहेगा । सीताराम के बाल सफेद होगे। माथे पर रेखाएं उभर आएंगी। शायद अन्त में उम वृद्ध पंडित-जैसी दशा हो जाएगी। लिगा, धीरावायू यही लिखेगा, यही तो उसका जीवन है। जीवन मानो प्रमश. थान्त-क्लान्त नीरम होता जा रहा है। इसी बीच एक-एक लहर आती । मूखी हुई नदी में बाढ़ आ जाती है। उम दिन सब-इन्सपेक्टर ने माकर कहा, पंडित, तुम लोगों के यहां प्रायः मरी टीचर्स कांफ्रेंस होने की बात चल रही है । सुना है? जी नहीं। खबर तुम्हारे पास भी भाएगी एबर आई। बड़े स्कूल की पाठशाला के हेडपंडित श्रीश वायू ही इसके संयोजक हैं । वे अपने दल के साथ आए। श्रीशवायू बढ्दर्शी व्यक्ति, योग्य शिक्षक और अत्यन्त मिष्टभापी हैं। एकमात्र दोष है. ये दक्ष पड्यंत्रकारी हैं। उसके बहुत सारे अच्छे लड़को को ये बहका ले गए हैं। पर, ये जय आये हैं और यह कांफ्रेंस- जिला प्राथमिक शिक्षक सम्मेलन जब मभी की भलाई के लिए है, तव वह जी सोलकर साथ देगा। उनकी दद्धि दशा के बारे में देश को बताया जाएगा, गवर्नमेंट के पास मांग रखी जायगी। दिल को मानो कुछ बल मिल रहा है। स्वागत-समिति का गठन हुआ। इस थाने की पाठशालायों के पडितो से चन्दा उगाहकर सारा सर्च निभाना पड़ेगा। उनमे से पन्द्रह को स्वागत-गमिति में लिया गया। गोपालपुर का हपिकप दाम वृद्ध पंडित है। गोविन्दपुर का मोरोन मित्र उनसे छोकरा है, व्यापारी पाड़ा के मक्तब के मौलवी मुहम्मद हुसैन रत्नहाटा के सभी बड़े स्कूल के तीन जने और सन्दीपन पाठशाला का मौवा- १५२:: : संदीपन पाठशाला - । । - राम-इसी तरह से पन्द्रह लोग । श्रीशवावू अध्यक्ष हैं। सीताराम दो सहकारी मंत्रियों में एक । यह एक उत्साहजनक मामला था । ऐसी घटना जीवन में कम हो पाई है, केवल एक बार और आई थी, उस वार जव धीरावावू ने डिस्ट्रिक्ट वोर्ड के कांग्रेसी चेयरमैन को लाकर सभा की थी। फिर वैसा उत्सव हो न सका। अचानक याद आ गई, उस सभा में एक काली लड़की वैठी थी। हर सांझ को आज भी वह ठंडी सांस भरता है। सांझें सारी-की-सारी विरस हो चुकी हैं । अव और प्रकाशित परदे पर छायाछवि-सा एक मुखड़ा उभर नहीं आता है । सीताराम की आँखों में कुछ नुक्स आ गया है । विना चश्मा लिए गुजारा नहीं। पानी गिरता, धुंधला देखता, लेकिन फिर भी प्रकाशित परदे पर छाया की छवि में उभरा हुआ मुख अमावस के आकाश में सुकवा-जैसा सुस्पष्ट है। नोट-बुक में उसने लिखा-सन् उन्नीस सौ तीस, छब्बीस जनवरी । उस तारीख पर जिला प्राथमिक शिक्षक सम्मेलन है। लेकिन तारीख के लिए वह दुखी हुआ । उधर वही तारीख कांग्रेस का स्वा- धीनता दिवस मनाने के लिए निर्धारित हुई है। लेकिन चारा भी क्या ? मजिस्ट्रेट साहब उद्घाटन करेंगे, उन्होंने ही यह तारीख दी है । उस तारीख पर देवू यहाँ कांग्रेस का झंडा फहराएगा, संकल्प वाणी का पाठ करेगा। धीरावाबू ने लिखा है, मैं नहीं आ पा रहा हूं, लेकिन रत्नहाटा गाँव में स्वाधीनता दिवस नहीं मनाया जायगा, यह सोचते हुए मुझे मन्तिक दु ख हो रहा है । तुममनाना। धीरावावू ने लहर भेज दी है । जय-जयकार हो धीराबाबू का। लेकिन धीरावाबू, तुम आए क्यों नहीं ? लहर क्या प्रवाह है ? तुम्हारा काम क्या देवू से हो सकता है? देवू और श्यामू के लिए उसे मर्मान्तक क्लेश है । वे मैट्रिक पास कर बैठे हैं। श्याम आइ०एस-सी में फेल हो कर घर लौट आया है। देवू ने तीसरी बार की कोशिश में मैट्रिक पास किया है । देवू से क्या धीरावाबू का काम हो सकता है ? लेकिन देवू का इस ओर एक रुझान है। खैर, जाने भी दो यह बात । मामूली पाठशाला का पंडित है वह । अदरक का व्यापारी है वह, जहाज का हालचाल लेकर वह क्या करेगा? सम्मेलन के लिए उसने श्यामू-देवू से एक भीख मांगी, माधा मन मछली। मैंने कहा है, मैं वसूल कर दूंगा । मेरी इज्जत रखनी है । सो उन लोगों ने दी है। धीरावावू को उसने चन्दे के लिए लिखा था । धीरावाबू ने दस रुपए भेज दिए हैं । उस दिन सवेरे उसे सबसे बड़ी खुशी हासिल हुई। मनोरमा ने उसके हाथ में एक रुपया दिया, तुम लोगों के उसमें वह क्या हो रहा है जी, उसमें यह मेरा चन्दा है। वेचारी कॉमन्स शब्द उच्चारण नहीं कर सकती। तुम्हारा चन्दा ? मैंने तो दे दिया है, फिर ? तुम लोगों की तनख्वाह बढ़ेगी, सम्मान बढ़ेगा और मैं चन्दा न दूं ?

संदीपन पाठशाला :: १५३ रुपया उमने ले लिया, लेकिन मनोरमा को आगोग में लेकर, घूम कर प्यार जताने को फरमत नहीं । रलहाटा में ढोलक बन रहा है। उनकी आवाज यहां तक आ रही है, मुनाई पड़ रही है । रायवेशे नाच हो रहा है । सहो नाच रहे हैं। यही एका विडम्बना है। मजिस्ट्रेट माहब आएंगे, उद्घाटन करेंगे । माहब की सनक है, लोक-नत्य की। साहब के आने के बाद में जिला में इस नाव को लेकर हो-हल्ला करते फिर रहे हैं । शिव नाचे, ब्रह्मा नाचे मोर नाचे इन्द्र ।-सरकारी हाकिम नाच रहे हैं, रायबहादुर लोग नाच रहे हैं, वकील नाव रहे हैं, मुख्नार नाच रहे हैं, बड़े स्कूल के लड़के नाच रहे हैं. मास्टर नाच रहे हैं, अब उन लोगों की बारी है । पाठशाला के लड़कों को नाचना पड़ेगा और साथ-ही-साय उन लोगो को भी । मुंह बन्द किये नाचना है। कुछ भी बोलोगे तो सर्वनाश । रायपुर के ब्योमकेश ने उस नाच का व्यंग्य कर एक कागज छाया था,--गोव-देम में जैमी तुकबन्दी प्रचलित है: "मेरी शादी तो ज्यों-त्यो दादा की शादी में रायवेश नाच आओ गटागट दारू पीके आज।" इसके परिणाम व्योमकेश को जेल हो गयी है। फिर भी गनीमत कि डिविजनल इन्सपेक्टर साफ स्कूल्म रायसाहृय मित्र साहब की कोई सनक नही । वे ही सभापति होंगे। सन् तीस को छब्बीस जनवरी ! मुमज्जित मंडप में अधिवेशन हुआ। संयोग से सीताराम को सभापति के आसन के पास ही खड़ा होना पड़ा। अचानक अप्रत्याशित रूप से उसके जीवन को एक बड़ी माघ पूरी हो गई आज । उसकी नजर पड़ी, ममा के बाहर जनता के बीच शिकिकर खड़ा है। वह इशारे से उसे ही बुला रहा है । सीताराम सावधानी से निकल गया। शिफिकर अनुग्रह-प्रार्थी की तरह मविनय बोला, मुझे भीतर कहीं विठा सकते हो भाई पंडित? सीताराम की जुबान की नोक पर जवाब मा गया, नहीं । लेकिन अगले हो क्षण उमने आत्मसंवरण कर सादर मम्भापण से कहा, याइए। उस समय मभापति का अभिभापण शुरु हो गया था। एक अप्रत्याशित समाचार उन्होने मुनाया, "नयी शिक्षा योजना बन रही है जिसमें देश के सर्वन, प्रत्येक गांव चाहे न हो, हर पांच-सात गांवों के केन्द्रों में अवतगिक प्राथमिक विद्यालय स्थापित होंगे। सारे देश के बच्चे अमानता के बन्धकार से ज्ञान के प्रकाश में संसार को देखकर धन्य हो मर्क, ऐसी व्यवस्था होगी । उन सब केन्द्रों मे जो शिक्षक होगे, आप ही लोग रहेंगे, जिससे उनका देतन चा हो, उनके १५४ :: संदीपन पाठशाला सम्मुख सभी कुछ मानों अभाव-अभियोग दूर हों, इसके लिए भरसक कोशिश की जायगी। आप ही लोग देश के आदिगुरु हैं । आप लोग कोई मामूली नहीं हैं।" खुशी से सीताराम की आँखें नम हो गई । उसकी दृष्टि-शक्ति कम हो आई है। आज उसकी आंखों के पानी में क्षीण दृष्टि के सफेद कोहरे में ढक गया । उसदिन घर लौटकर अपनी नोट-बुक में उसने यह तारीख लिख ली-- "आज मुझे लगा, आकाश में नीलापन झलमला रहा है । झील-तड़ाग में जल झिलमिला रहा है । पंछियों के गीत में आनन्द झर रहा है। बड़ा आनन्द है आज । आज मन में बड़ी आशाएं जाग उठी हैं ।" इसके बाद लिखा है- "घर लौटने के रास्ते-देवू की फहरायी राष्ट्रीय पताका को छिपकर प्रणाम कर आया। संकल्प-वाणी जेव में है । घर आकर उसको पढ़ा । आज २६ जनवरी १६३० सन है।" सम्मेलन समाप्त होने के बाद वह वहां गया था जहाँ तिरंगा ध्वज उड़ रहा था। अकेले खड़े प्रणाम कर कहा था-मुंह खोलकर कहने का साहस नहीं, लेकिन मेरा भी अन्तर कहता है-तुम्हारी जय हो! तुम्हारी जय हो! तुम्हारी जय हो! सोलह २६ जनवरी १६३० । प्राथमिक शिक्षक सम्मेलन । उसके बाद भी और कई तारीखें उसकी नोट-बुक में लिखी गयी हैं। तारीखों के बगल में घटनाओं के संक्षिप्त व्योरे। "१७ अगस्त १६३० । देवू -मेरे हाथों गढ़े हुए देवू ने भारतवर्ष के स्वतन्त्रता-युद्ध में कारावरण किया। धीरावाबू कलकत्ते में राजवन्दी के रूप में फिर पकड़े गये हैं । देवू ने उन्हीं के पदचिन्हों का अनुसरण किया है । यह मैं जानता हूं। लेकिन मैंने ही तो उसे बताया था : "महाज्ञानी महाजन जिस पथ कर गमन हो गये प्रातः स्मरणीय उसी पथ को लक्ष्य कर स्वीय कीर्ति-ध्वजा धर हम लोग भी होंगे वरेणीय ।" अन्त में उसने लिखा है-'आज गौरव से मेरा सीना तन गया है। यह वात किसी से कहने की नहीं । हाय ! इस गौरव के बारे में मुंह खोलकर कहने की हिम्मत नहीं मुझे । मैं दुर्बल हूं, मैं अभागा हूं।" इस सिलसिले उसका दुःख - मंदोषन पाठगामा::१५५ 7 भी बहुत है । जिस दिन देवू को पुलिग गिरातार कर ले गई, उस दिन स्टेशन पर कितनी भीड़ थी ! गांव के नरनारी युवा-युद्ध-गिशु गभी उसका अभिनन्दन करने आए पे फूलमालामओ से देयू का गला गर गया था। वह भी माला गंपार ले गया था। लेकिन दरोगा को देगकर-देने का माहग नहीं हमा। उसे बहुत दिन पहले की बात याद पड़ गई थी। उगकी क्षीण-दृष्टि आँसो के सम्मुख तिर आया था-सदीपन पाठशाला का चिन्न । भय गे उसने वह माला अपने चदरे के नीचे छिपा ली थी। फिर ट्रेन के चले जाने के बहुत दिनो के बार उगने देव के घर में प्रवेश किया था। मां से मिलेगा। मो को प्रणाम पर अपना जीवन सार्थक करेगा । उनके पास बैठार एकवार रोएगा। वोगा-- भापके देवू का मैं पहित बना था-तभी मेरा जीवन धन्य हुआ । घर में प्रवेश कर उसने चारों ओर देख कर महा-कही, मी कहा -मा, मां, कहाँ है ? बरामदे पर कोई वैठा था-~-उसीसे उसने पूछा । उन्होंने जवाब दिया- सीताराम ! आओ बेटा। यह रही में। सीताराम जरा झेंप गया।--मेरी आँखों की रोशनी -जरा कम हो गई है न । मैं पहचान न सका मा ! --बैठो वेटा, बैठो। सीताराम बैठ गया। उसकी समझ में नहीं गाया कि क्या कहे। दुल जताने तो यह माया नहीं, दु.स प्रगट करने से यह मां होगी, यह वह जानता है। लेकिन किस भाषा में उनका अभिनन्दन प्रगट करे ? यह भाषा तो उरो आती नहीं। उसके दिल की बात यहां आकर सजा रही है। वह महने आया पा-जानती हैं मां, देवू को और श्यामू को मैं बचपन से यह गव सिखाता रहा हूं। लेकिन ये बातें झेपा रही हैं । ऐसी मा न होने पर क्या वैसे बेटे होते हैं ? धीरानन्द क्या किसी मास्टर का गढ़ा हुआ धीरानन्द है ? हाय रे हाय ! इस मा के तीन बेटों में एक है धोरानन्द तो दूसरा है देवानन्द । और उसने व धोरावाबू के शिक्षकों ने जाने कितने लड़कों को जीवन-भर शिक्षा दी है । लेकिन दूसरा धीरानन्द और दूसरा देवानन्द वहाँ है ? इस मों के सामने क्या वैमा दावा किया जा सकता है ? मो ने कहा--तुम रोक्यो रहे हो बेटा? सीताराम रो नहीं रहा था, उसकी आँखों से जिम प्रकार पानी टपकता है-वैसी ही एक धार दुलक आई थी-वही मो को दिखाई पड़ गया है। आये पोंछकर सीताराम बोला-नहीं मा ! मैं रोया नहीं । मेरी आँखों से कभी-कभी पानी गिरता है। वर्ना क्या यह कोई रोने की बात है ! यह तो मेरे लिए मीना तानकर बतलाने वाली बात है। देव मेरा छाव है। मां हंसी-यह हंसो देखकर सीताराम का मुंह उतर गया। बड़ी इमारत की नींव पर जिस मजदूर ने काम रिया है वह अगर कभी बाकर गृहस्वामी से १५६ : : संदीपन पाठशाला । कहे-यह मकान मेरा बनाया हुआ है, उस वक्त गृहस्वामी करुणा की जो हँसी हंसता है-यह वही हँसी है। उसने झटपट कहा-आपकी सन्तान के सिवा इस गाँव में और कौन ऐसा काम कर सकता है ? मां थोड़ा चुप रहकर वोली-यह भी ऐसा क्या कुछ किया है बेटा। देश के लिए बड़े-बड़े लोग सर्वत्यागी संन्यासी बन गए हैं, सबकुछ न्योछावर कर दिया है उन लोगों ने । आन्दोलन के समय-हजारों में लोग तीर्थयात्री-जैसे चले जा रहे हैं। इनमें कुछ हलचल से खिंच भी गये हैं। मां हंसी, इसके बाद ही वात को पलटकर वोली-लेकिन तुम्हारी आँखों की यह हालत कव से हुई है वेटा? यह कोई अच्छी बात नहीं । इलाज कराओ। ऐनक ले लो। सीताराम कहने को हुआ-पैसे की बात । कहने को हुआ, इलाज करवाने में मां, रुपया चाहिए । वह मुझे कहाँ से मिलेगा? लेकिन रुक गया। यह कहने पर मां शायद सोच लें कि वह रुपया भीख मांग रहा है । साथ-ही-साथ बोल पड़ेंगी, बीस-पच्चीस रुपए मैं दे दूंगी, शेष तुम संग्रह कर लो। उसने कहा, जी हाँ, अव कराऊँगा। सोचा था, शहद-अहद डालने से ही यह दोप जाता रहेगा, लेकिन गया नहीं । अब इलाज कराऊँगा। चश्मा लूंगा। उठकर चला आया वह। ? - . - रुपया उसे मनोरमा ने दिया। मधुमक्खी-सी संचयी मनोरमा ! पैसे जोड़-जोड़- कर रुपया बनाती है, दस रुपए हो जाते ही उसे नोट में परिणत करती है। वह रत्ना के व्याह के लिए रुपया जमा कर रही है । वह कहती यही है लेकिन बात दरअस्ल यह नहीं है-वही उसका स्वभाव है । वह साक्षात् लक्ष्मी है। पचास रुपए हाथ में देकर बोली, आँखों की तुम जाँच करवा लो। और भी रुपया लगे, मैं दे दूंगी। बाँखों की जांच करवा आया वह । कलकत्ते से नहीं, चालीसेक मील दूर संथालों के बीच क्रिश्चियन मिशनरियों ने मिशन खोला है। वहाँ अच्छा अस्पताल है । आँखों का इलाज वहाँ अच्छा होता है। उन्हीं से इलाज करवा आया। साथ भाकू गया। सीताराम मोटे शीशे वाला चश्मा लेकर लौट आया। रोशनी काफी लौट आई है। नोट-बुक खोलकर उसने प्रसन्न-मन लिखा-"विद्या-ज्ञान कितनी अनोखी सामग्री है। मृतप्रायजन को संजीवित कर देतीं । अन्धे को दृष्टि देती । आह, आज नीला आकाश देखकर जान में जान आई । उन पादरी साहबों को लाख- लाख प्रणाम करता हूँ। और मनोरमा को दोनों हाथ उठाकर आशीर्वाद करता । लेकिन मेरी यह दृष्टि क्या टिकी रहेगी ? मैं तो प्रतारक हूं। मैं प्रतारक जो हूँ। मैंने मनोरमा से धोखा किया है। आज भी झरने के किनारे बैठे मन- ।

संदीपन पाटशाला::१५७ ही-मन सोचता हूं और मन की बायो से घर की खिड़की के परदे पर उभरी काली छाया से बनी तस्वीर देखता हूँ। इसके बाद तारीख है ३० मार्च १९३५ । समाचार याया है कि धोवरो के लड़के ममीनाम मोति मिली है। भासों की रोशनी वापस पाना सायंक हुआ है । मार्थक हुआ है। यही गायद सरारे सर्वोत्तम मुस का दिन है। धीवर शशीनाय के अन्धकारमय जीवन पर पर उसके हापों में दोपफ दे सका है। माज बड़े स्कूल के वृद्ध हैडमास्टर नहीं रहे । आकाश को बोर मुख उठाकर उसने मन-ही-मन महा, मुझे दिया हुमा आएर थाशीर्वाद सफल हुआ है। पूरे पांच पाए सर्व मर वह देव-स्थान पर पूना पड़ा आया। सन्दीपन पाठशाला को उसने उम दिन मनोरम दंग मे सजाया । लहरों को मिठाई बांटी। स्वयं जाकर शगीनाय को बड़े स्कूल में भरती कर भाया। असमय-वृद्ध सीताराम को मानो नया जीवन मिल गया। वह फिर जवानी की उमंग लेकर पढ़ाने लग गया। लोग उममे सस्नेह मजाक कर रहते हैं- यलिहारी पंहित। यह हंसता। अब भी बाकी है । जयधर पिछली बार मैट्रिक में वृत्ति पाकर कालेज में पढ़ रहा है। यह माई०ए० में वृत्ति पाएगा, वी० ए० में पाएगा, एम० ए. में पाएगा। हाकिम बनेगा । नौकरी पर जाने से पूर्व वह उगे प्रणाम कर जाएगा । बोलेगा, मापको एकवार मेरे घर आना होगा। वह जाएगा। वहीं पढेचकर उसको भागीर्वाद घर माएगा। सब लोगों के निकट जयपर परिचय देगा, मेरे गुरु। इन्होंने ही मुझे मेरे हायो को पकड़ सोचकर अपनी पाठमाला से जाकर भरती किया था। वह कहेगा, बेटा, माणिक का मूल्य उसका अपना ही मूल्य होता है । उसी मूल्य पर यह राजमुकुट पर गोमा देता है। जो मणिकार उसका आविष्कार कर, उसे काट-घिस कर उज्वल बनाता है उसका नाम उस माणिक के मुख्य को बदौलत माय बन जाता है। उसका असली मूल्य मणि काटने पाने मबदर की मजदूरी से अधिक नहीं। पड़ो-पढो मय } पढ़ते रहो ! मेरे लाल-मेरे माणिक पढ़ते रहो! "भगवान बुद्ध ने कभी राज्य-ममदा याग कर संन्यास ग्रहम शिपाया मनुष्य के सर्वप्रकार दुःसमोचन के लिए तपस्या की थी। दीनतम-पंचम लोगों में भी उन्होंने अपना तपस्यालाध फल वितरम शिया या"~ -कपा है रा है तुम्हारा? अब को तुम्हारी बारी है। मार दुमयों वृत्ति लेनी होगी। क्या रहने हो? -~-हिमाय मिल नहीं रहा है गर। हिमाव नहीं मिलता? देन है: यह क्या? !

१५८ :: संदीपन पाठशाला । ? शून्य की तरह लिखता था । लिखकर जोड़ने-घटाने के समय खुद ही उसे सिफर मानकर गणित में गलती कर बैठता था। उसी गलती के कारण उसे वृत्ति नहीं मिली। तेरा-नौ और एक को लेकर सारी गड़बड़ी है। नौ को एक जैसा लिखोगे और एक को नौ जैसा। मेरी सारी मेहनत पर पानी फेर दोगे । क्या बताऊँ ? तुझे भला बताऊं भी तो क्या ? ऐ ! ऐ रमन ! जरा छड़ी तो ले आ। आज तुझे मैं मार-मारकर सिखाऊँगा। एक और नौ जब भी लिखेगा तभी यह मार तुझे याद आएगी। वह क्रुद्ध हो उठा। लेकिन आखिर तक उसने आत्मसंवरण कर डाला। क्या होगा मार कर ? उसकी नियति है। सीताराम हजार कोशिश से भी उसको बदल नहीं सकेगा। वह थककर बैठे-बैठे नियति के रहस्य के बारे में सोचने लगा। धीराबाबू नियति नहीं मानते । हाय धीरावाबू ! सोचते-सोचते उसे ऊंघाई आने लगी। कुर्सी के पीछे की ओर थकान से सिर टिका देता। चन्द लम्हों में ही उसके नाक बोलने लगते । मुंह खुल जाता। लड़के एक-दूसरे की ओर देख इशारा करते, मास्टर की हालत दिखाकर हँसते। गोविन्द अब भी है । उसने आकू की सोहबत छोड़ दी है। वह भी देखता और हँसता है। लड़कों को इंगित में सिखाता है-दे मास्टर के मुंह में-मक्खी डाल दे। घर से खेत-मजूर ने आकर पुकारा, पंडित जी ! गोविन्द ने खंखार कर आवाज की । सीताराम की नींद टूटी। चौंक पड़ा वह । -क्या है रे? तू ? घर के सब -1 ठीक है जी ठीक ! रत्ना दीदी का रिश्ता आया है। रत्ना के मामा लोग-बाग साथ लेकर आ गए हैं। वे कन्या देखेंगे । जय भगवान ! रत्ना ही एकमात्र सन्तान है । उसका विवाह हो जाने से ही वह मुक्त होगा। काम खत्म होगा । आज कुआर की चार तारीख है । फिर रत्ना के विवाह के दिन । उसने अपनी नोटबुक में लिखा- "सन् उन्नीस सौ पैंतीस । बंगाब्द तेरह सौ इकतालीस, ७ अग्रहायण को विवाह । कितना आनन्द ! वर मैट्रिक पास है। आइ०ए० पढ़ रहा है। भगवान तुम्हारी अपार करुणा है।" । -- सत्रह दीर्घकाल-वारह वर्ष वाद । पहली सितम्बर सन् १९४७ । बारह वर्षों के बाद सीताराम. ने उस दिन अपनी नोटबुक खोली। देश संदीपन पाटगाला :: १५६ स्वान्न हो गया है । उगी मांगों पर मोटा पाचपन घर में बीमारे पर बैठ, नोटबुक सोलकर उसने पढ़ने की कोशिश थी। फिर उगी दधिधंधनो पड़ने लगी है । क्षीण से शोपतर- बुझते हुए दोपर यो नाई। आज धीरावायू आएंगे । देश स्वतन्त्र हुआ है। स्वतन्त्र देश के ग्वनामधन्य लेएक धोराबन्द मुखोपाध्याय । उन्होंने लिखा है-"पहित, स्वतन्त्र रलहाटा दो प्रगाम माग्ने आऊँगा । तुमको देखने आऊंगा। तुम वहीं चले न आना 1 में युद तुम्हारे घर आऊँगा । तुम्हारी नोटबुक ले जाऊंगा।" जय-जयकार हो ! धीरामायू, आपकी जय-जयकार हो । लेकिन देशोगे भी तो क्या ? गाज के गिरने से जला हुआ शालवृत नहीं, शीशम नहीं, देवदार नहीं, विशाल बरगद नही, विराट अर्जुन नहीं, पमशान का आकाणम्पर्शी गेगम भी गही। अफला अपुणित बौना-मा छोटा- रोहूंड । मूस गया है, इस बार मरेगा। लेकिन जब तुम आओगे तब तुमको तुम्हारा प्राधिन नीग्युक तो मुझे देना ही है। यह नोटबुक और पेनिमल लेकर बैठ गया। झुक कर अन्दाजे में ही लिग गया। -"क्या देखने जा रहे हैं धौराबाबू ? देश स्वतन्त्र हुआ है । उस दिन यसंकर ध्वज, यनगिनत झण्ड-रोशनी-अनेक गाने-प्रभूत आनन्द पलरव से देश उच्छ्वसित हो उठा था। किन्तु रत्नहाटा तो ध्वंसोन्मुख है । इम मीताराम की तरह ही वह अपने अन्तिम क्षण की प्रतीक्षा में है। आपने मंमार का इतिहास पढ़ा है घोरावायू ! मैं सीताराम-किमान पर का लड़का-अंग्रेजी स्कूल में नार्मल स्कूल में मैंने भारतवर्ष का इतिहास पढ़ा था। फिर भागीदन पाठशाला की पंटिताई, पाठशाला के पाठ्य में इतिहाग नहीं है । इमलिए भारतवर्ष का इतिहासभर भी मैं करीब-करीब भूल गया है। भूगोल ? भूगोल भी वैमा हो । रलहाटा के चोच में पड़े होने पर पारों और आकाश जितने-भर में गोल होकर झुम आता है उतनी ही सीमा तक मेरा भूगोल है । लेकिन इस बार इतिहास देखा । मन् उन्नीस सौ सीस से तुम रनहारा के पुत्र--भारतवर्ष के स्वतन्त्रता युद्ध में मत हो गए, वह मेरे लिए भारतवर्ष का स्वतन्त्रता-युद्ध नहीं, रनहाटा का स्वतन्त्रता-युद्ध रहा। सन् मैतालीस में आकर वह युद्ध समाप्त हुआ । इस बीच ममार का इतिहाम आगे बढ़ार रनहाटा के इतिहास को अपने में मिला चुका था। युद्ध में बड़े-बड़े राज्यों के इतिहास को ही केवल नहीं बदना, रलहाटा के इतिहास को भी बदल दिया। युद्ध आया । रत्नहाटा तहम-नम हो गया। वही-बड़ो गृहम्पिया टूट गयीं। श्री गयी-सम्पदा गयो। जो लोग मिर ऊंचा विए हुए ये उन मिर मर गए। मणिवाबू को एक बार देस जाना धीराबाबू । कमरे के भीतर घुपचास बैठे रहते हैं । नौकर रखने की भी हैमियत नहीं रही। गुद ही तमार बनाकर पीते है। द्वैपायन मे महामान्य दुर्योधन को क्या पुराण में पटी है । अनी ला कया मे मणिवाबू के अन्धकार में दुबक कर वैटने की रात निाना " - १६० :: संदीपन पाठशाला मैं जानता हूँ धीरावायू, तुम कहोगे, "पंडित अब भी वाकी है। जंघा- भंजन।" तुम मनुष्यों के साथ मनुष्य के रूप में विला गए हो ! तुम हँसोगे। वोलोगे-जिन सम्बन्धी व्यक्तियों की उन लोगों ने वंचना की है-तुम उनकी बोर हो । शायद तुम कहो, "मैं हो गदायुद्ध के समय-जांघ पर चपत मारकर गदाघात का इंगित दूंगा। देना । मैं बगर रहा तो रोऊँगा। मैं रोऊँगा, धीरावाबू!" मेरी आँखें जाती रही-अच्छा ही हुआ। मुझे बसोन्मुख रलहाटा अव और नहीं देखना पड़ेगा । तुम हंस कर कहोगे"इसमें डरने का क्या है पंडित ! फिर नए तौर से गदूंगा। गड़ो, ऐसा ही गढ़ो धीरावावू ! अमृत की तपस्या है तुम्हारी-तुम गढ़ो। में पाठशाला का पंडित हूं। मेरी सन्दीपन पाठशाला ही टूट गयी है, मैं अन्धा वना बैठा हूँ। मेरी मनोरमा नहीं रही । मेरी रत्ना विधवा हो गई है । मैं मृत्यु- कवलित हूं। अजगर जिस प्रकार धीरे-धीरे खरगोश को पकड़कर ग्रास करता है-उसी प्रकार से मुझे लील रही है। लेकिन फकं क्या है, जानते हो ? फर्क है-खरगोश-सा में आर्तनाद नहीं कर रहा हूं। मनोरमा हंसते-हंसते मरी, मृत्यु उसने चाही थी। उसी से सीखा है। लिखना बन्द कर वह नोटबुक के पन्ने उलटता रहा। "सन् १९३७ के १२ दिसम्बर मनोरमा को मुक्ति मिली। हां, यह मृत्यु उसके लिए मुक्ति ही थी। बड़ा ही निष्ठुर आघात उसे लगा था। रत्ना का वैधव्य उसे निदारुण शल-सा दिल पर ना लगा था।" रत्ला विधवा हो गयी है ! फिर नोटबुक के पन्ने पलटे। सन् १९३७ के ७ सितम्बर को रला विधवा हुई । लिखा है-"पाठशाला में बैठा था कि टेलिग्राम मिला।" रत्ला-उनकी एकमान्न कन्या थी-बड़ी साध से उसका नाम रलावली रखा था। आइ. ए. पढ़ने वाले लड़के से उसका व्याह किया था । याद आ रहा है-पादरियों की चिकित्सा से उसकी आंखों की रोशनी करीव-करीव ठीक ही थी। आसमान में उस दिन वादल थे। लड़के पढ़ रहे थे। मचानक टेलीग्राम माया। टेलीग्राम पढ़कर वह पत्थर हो गया था। कानों से कुछ सुनाई नहीं पड़ रहा था, आँखों से कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था, संसार मानो पुंछ चुका था। गोविन्द भयभीत हो गया था-उसने माकर पुकारा था-पंडित! पंडित ! वह अपने बापे में आया, उसे सुनाई पड़ा, कोई शब्द हो रहा है-झर, झर, झर, झर! लेकिन समझ न सका किसका शब्द है । लड़के पढ़ रहे हैं-अ आ इई-क-र-कर। ख-ल-सल जि-ल-जल । जल गिरे, पात हिले । जल गिरे पात हिले । नीताराम की आंखों के मानुओं से दृष्टि अवरुद्ध हो चुकी थी । झर-झर धारा में वर्षा उतर आई थी उस वक्त-कानों से सुना था, मांखों से देखा नहीं। -- संदीपन पाठशाला::१६१ तभी से फिर उसकी आंखों से पानी टपकना शुरू हो गया । वह आज भी यमा नहीं । आँखें हैं"दृष्टि नहीं, देख नहीं पाता, पानी टपकता ही रहता है। अपने- आप ही टपकता है। उधर इस शोक से मनोरमा ने बिस्तर ले लिया। फिर उठी ही नहीं। नि:शब्द अपने बुरे भाग्य की लज्जा से-ईश्वर पर-सीताराम पर रूठ कर ही यह चली गई एक दिन। मनोरमा की यन्तिम बातें भी लिख रखने की इच्छा थी उसकी । कई रोज कोशिश भी की थी। लेकिन लिस न सका। जितनी ही बार कोशिश की- उतने ही यार उसकी आंखों से अविराम जल गिरता रहा था। नोटबुक और कलम रख देनी पड़ी। रहने दो लिखना। क्या होगा लिखकर? दिल ही में लिखा रहा । अक्षर-अक्षर अस्थिपंजर पर खुदे रहे। सज्ञान ही मनोरमा मृत्यु की गोद में दुलक पड़ी थी। मानों हंसते-हंसते मरण-सागर में डुबकी लगाकर फिर उतरायी ही नहीं--गल गयी चीनी की गुड़िपा-सी। सिर्फ चारेक वार व्याकुल हो मुंह से सांस लेने की कोशिश की थी। उसके बाद ही सिर मानो एक ओर ढलक गया था। मृत्यु से पूर्व उसने बार-बार उसके हाथ थाम कर कहा था-तुमको मैं सुखी न कर सकी । माशीर्वाद करो, अगले जन्म में मैं तुम्ही को पाऊं, तुम्हारी मन. माफिक बन कर तुमको सुखी बना सकूँ। चौंक पड़ा था सीताराम।-पयों ? क्यों ? यह बात तुम क्यों कर रही हो मनो? तुम मुझे बड़े भाग्य से मिली थी। ऐसी बात न करो तुम । नहीं नहीं। कहकर वह चिल्ला उठा था। मनोरमा ने भी कहा था, नहीं । उसके मुख पर एक विचित्र मुस्कान खिल आई थी। कहा था, मैं जानती हूँ । मैं जानती हूं। तुम सुखी नहीं हुए। तुम्हारा असन्तोप में भाप जो लेती थी। सीताराम कायक्का रह गया था। उसका दिल अनुशोचना से भर गया था। जी में आया था कि अपना अपराध स्वीकार कर ले। पर न कर सका। साथ-ही-साथ मनोरमा की मृत्युशय्या के सिरहाने दीवार पर दाणभर के लिए एक चित्र उभर माया। रात के अन्धेरे में एक प्रकाशित खिड़की के परदे पर काली छाया से अंकित एक चिन । बहुत देर बाद अपने को सम्भाल कर उसने उससे कहा था-तब तो तुम भी सुपी नहीं हो सकी मनो! तुम मुझे क्षमा कर जाओ मनो! मनोरमा ने बड़ी सुन्दर हँसो हँसी थी । हँसकर कुछ कहने जा रही थी। लेकिन उसी क्षण जाने क्या हुआ । वह व्याकुल और बेचैन हो उठी, चन्द बार मुंह खोलकर सांस लेने की कोशिश की उसने-हाय बढ़ाकर उसको पकड़ने की कोशिश की फिर सभी कुछ स्थिर हो गया; वह ढुलक गई । सीताराम रोया नहीं। फूल घुन-सजाकर उसने मनोरमा को अपने हाथों १६२ : : संदीपन पाठशाला चिता पर लिटा दिया था। उसने अपने बचपन में पुत्रशोक-विजयी महर्षि द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर को शान्ति-निकेतन में देखा था। मन-ही-मन उस दृश्य का स्मरण किया था उसने । प्रशान्त चेहरा लिये वैठे-बैठे रत्ना को उसने सान्त्वना दी थी। आज से उसी को रत्ला का माँ-बाप दोनों बनना पड़ेगा। दिल की पीर दिल ही में रख उसको हँसमुख सारा जीवन विताना पड़ेगा। लोग ढाढ़स बंधाने आकर थोड़ा-सा अचरज ही करने लगे थे। प्रौढ़ वय में पत्ली-वियोग से कोई भी सीना पीटकर रोता नहीं है, वह देश और समाज में लज्जाजनक बात मानी जाती है। लेकिन उसको इस प्रकार स्थिर और शान्त देखने की भी उन्होंने प्रत्याशा नहीं की थी। लोगों ने भला भी कहा था और बुरा भी। हालांकि वह सब आड़ ही में कहा गया था। मुंह के ऊपर कहा था कन्हाई राय ने । कन्हाई काका को उससे प्यार था। लेकिन विचिन मनुष्य था वह । उसने उस दिन उससे कहा था-~-तुम तो बेटा, पत्थर हो। फिर कहा था- सो भी कैसे कहूं। पत्थर में न सुख है न दुख । तुम्हारा सभी कुछ उल्टा-पुल्टा है बेटा! सुख के दिनों तुम्हारे चेहरे पर कभी हँसी नहीं देखी। फिर इतना दुःख- शोक है-तुम्हारी आँखों में आंसू नहीं; सुख के दिनों में मुख देखकर लगता कि हाय इस आदमी को कितना कष्ट है ! आज देख रहा हूं, हँसकर बुला रहे हो, आओ काका, आओ। हथेली उलट कर उसने जताया था-क्या जाने ! कुछ भी न समझ सका तुमको। फिर बोला था, अच्छा, बताओ भला तुम्हें दुःख में ही सुख मिलता है कि नहीं? सीताराम ने कहा था, संसार में दुःख ही तो परम वस्तु है राय काका! सुख के समय लोग भगवान को भूल जाते हैं, दुःख ही उसे याद दिला देता है । राय ने कहा था, क्या जाने वेटा, दुःख किसे कहते हैं, नहीं समझ सका। -~-नहीं समझे। सीताराम हँसा था। -कौन जाने ? दोनों हाथ उलटकर उपेक्षा से उसने कहा था-हंसा, खेला, नाचा, गाया-दिन गुजर गया। खात्मा भी कर लाया हूं। कहाँ, दुःख कहां? हालाँकि नाचने में पैर फिसलता है, दौड़ने में ठोकर लगती है, जिन्दा रहने में वीमारी होती है। दारू पीने पर खुमारी, खत्म होते वक्त सिर भारी हो जाता है। जब मर्जी चीखता-चिल्लाता-रोता हूँ, उसी में सुख मिलता। तुम रोओ-देखोगे, सुख मिलेगा। जाते वक्त बोला था--मैं तो खुद आया ही हूं, रानी मां ने भी सन्देश भेजा है। कहा है -गाड़ी पर एक दिन जाऊँगी । बड़ा दुःख मिला है सीताराम को, उसमे बेटे की तरह स्नेह करती हूं -मुझे भी बड़ा दुःख मिला । एक दिन जाऊँगी। यह क्या? चौक पड़ा या सीताराम । माँ आएँगी क्यों ? नहीं-नहीं। काला गां से गहना मैं खुद हो जाऊँगा । कल ही जाऊँगा। ८ ---- ? ? -- संदीपन पाटगाना::१९३ अगले दिन ही वह गया था। मा ने उसके मुम की ओर देस सिर पर हाय रस पानीदि पिया पा-- तुम्हें मिति मिलेगी बेटा 1 तुम्हारी गहनशक्ति देखकर मैं गमा रही-तुम्, मिलेगी। वह भी एक विचित्र नारी हैं। सदा से सीताराम जितना उनसे प्यार मरगा रहा है-उतना ही डरता रहा है । यह भय उगका सिल भर भी या नहीं हुआ। लेकिन हा ! रानी मा-मचमुच की काली गी थी। हिमालय की गोद मांगे ढकी। वैमी ही उज्ज्वल, वैगी ही प्रदीप्त, बंगी ही गरिन । हालाकि उन्ही . वक्ष से-~-गंगा-यमुना-ब्रह्मपुत्र निकल आए हैं। मारणा की धाराएं। कितना नाम है धीरायाबू का! कितना गोरख ! देग-देशान्तर गारे भारा. घर्ष भर में उनकी पाति फैली हुई है। फिर भी उग एक अपराध के मारण ये कभी बेटे के पास नही गई, बेटे को बुलाया गही। यहा है. मो.ले धीग गोग चुलाऊगी? बहू का शुवा हुआ साऊंगो नहीं, उगरे यनों को गोद में से मर सकुनाएगा-उनको मैं खुला नहीं सगी, धीरा गया गुशी गे मा गयेगा ? मा की इस प्रान्ति से सीताराम को मनेश होता। सकिन प्रालि भी तो पपा, उनको चरित्र-महिमा और अन्तर-वेदना से यह प्रान्ति भी गहिमाबित हो उठी है। उनकी वेदना को सीताराम गमझता था। देवू को लेकर ही वे प्रगन-मन गारा जीवन विना गई। देवू क्रमश.स इलाके का नामी देश संयम बन गया है। वे गी में गुणधी । मेरिन उन्होने एक अन्याय कर टाला है। देयू-श्याम के शुभामाशी होने के कारण ही गीताराम ने इस बात को महगूम किया है । जमाना विगहने जाने के बावजूद--माने पर. के क्रिया-कर्म और हर एक के प्राप्य में कोई कमी नहीं की है। फलत. दयू. श्यामू की हालत ज्यादा सराव हुई है। गिी या प्राप्य घटाने का प्रसार में लाने का भी उपाय नहीं था। लाने पर-उन नेहरे पर प्रचंड पणापा भार उभर आता था-क्या गजब यी निगाहों से यह देशती थीं। लहाटा कयाधुओं की कोठी का जमाना मानो उन्ही के माय-गाय पला गया। मापी गरी किन्तु उनको याद कर मौताराम मात्र भी भय और गरम से गजग ही उटना है। उनकी महिमा और माधुर्य के बारे में मोचते-गोचते यह उदास हो जाता है। मां के साथ यासिरी भेट हुई पी ली गंगगमा पर 1 उगमय पाठशाला उसने बन्द कर दी। यासोंग रोगनी उमसी वि:शुल सीन हो मुसीपी माटी के महारे राह चलकर वह मां को देगने गया था। --कैसी है मा? उस बात का प्रवाद उन्होंने नहीं दिया था। पापा, तुम्हाग धिमा हो गई है बेटा? गीताराम हमारा । माये पर हाय गाया। मां ने पहा दा-दीवाने मी है वटा? दशा में नो गुग। बाहर की १६४:: संदीपनं पाठशाला रोशनी जव कम होने लगी है तव भीतर रोशनी जलाने का प्रबन्ध करो। ! दीक्षा उसने ली है। गुरु को प्रणाम, और मां--आपको प्रणाम । गुरु ने दिया है मंत्र-और आपने दिया था परामर्श । धीराबाबू मंत्र की बात सुनकर हंसे थे। सीता- राम ने उनको पत्र से यह समाचार भेजा था। जवाब में धीरावाबू ने लिखा था -~~-"कौन-सा मंत्र लिया तुमने पंडित ? सरस्वती मंत्र हो तो मुझे कुछ कहना नहीं । लेकिन वह दीक्षा तो तुम्हारी बहुत दिन पहले हो चुकी है। खुद ही ली थी तुमने । उसका गुरु कौन है--सो तुम ही जानते हो । पंडित, माथे पर तिलक- चन्दन लगाये तुम्हारे चेहरे की कल्पना करता रहा और हंसता रहा । नहीं- नहीं पंडित, यह मुझे अच्छा नहीं लगा।" सीताराम ने लिखा था, "आपका कर्म उच्च है, साधना विपुल, शायद जन्म-जन्मान्तर का पुण्य हो या किसी भी कारणवश जन्म से ही आपकी उपलब्धि की प्रतिभा बड़ी है। आपको मंत्र की आवश्यकता नहीं, मुझे है।" है क्यों नहीं ! धीरावावू, जो लोग आकाश में उठते हैं-उठ सकते हैं, उनसे आकाश की बातें, आकाश में उठने के पथ के बारे में उपदेश या मंत्र लिए विना धरती के मनुष्य के लिए क्या उपाय है ? तो सुनो कन्हाई राय की बात बताऊं। वह जो मनुष्य कन्हाई राय है--जिसने हँस-खेल, नाच-कूद कर सारी जिंदर्ग विता दी उसकी आखिरी बात बताता हूं, सुनो। उपपद तत्पुरुप लोगों ने उसे पसन्द नहीं किया, उसने भी किसी की परवाह नहीं की। लोगों ने उसकी बात सुनी नहीं लेकिन कहने से वह चूका भी नहीं । वावुओं की कोठी में सारी जिंदगी विता दी। उनके हितों की कामना करता रहा। वावुओं की वसूली से पूर्व वह अपना हक वसूल करता था, शराब पीता था, ऊंची आवाज़ में कहता था, कोन जाने वावा, दुःख किसे कहते हैं। उसी कन्हाई राय ने मरते समय कहा-सीता- राम से ही कहा- भगवान को क्या कहकर पुकारूं, बता भला सीताराम ! पुकारने जा रहा हूं पर पुकार नहीं पा रहा हूं। बड़ा डर लग रहा है ! हाय रे वप्पा ? बता भला क्या करूं? निमोनिया हुमा था कन्हाई राय को। वावुनों की कोठी में ही मरा। म तव नहीं रही, इसलिए कोई तीमारदारी भी उसकी नहीं हुई। विना किसी देख- रेख के ही पड़ा था। देखने जाकर सीताराम ही नाखिरी तीन दिन उसके पास रहा । छोड़कर न आ सका। उस वक्त वह घोर विकार में था। बाँ:! ऑ: शब्द कर छाती के दर्द से वह कराह रहा था; वीच-बीच में विह्वल मांखें खोल उँगली वढ़ाकर चिल्ला उठता था। मरा रे, मरा रे! गया, गया गया। पया हुआ? राय काका! राय का का! जाये। साला खूब बच गया।

संदीपन पाठशाला:::१६५ । -- आखिरी दिन होश में थाए थे। गोताराम को देख हंसकर कहा था- तुम? हाँ, तुम्हारे सिवा और हो भी कोन सकता? सीताराम ने कहा था-कैसे हो? सीने पर हाथ रख राय ने कहा था -छाती में बड़ा दर्द है। इसके बाद वही बातें कही थीं। कहा था-उस तकलीफ से ज्यादा तकर खौफ मन में है। समझे ? भगवान को क्या पाहकर पुकार, समझ नहीं पा रहा हूं। पुकारने को होकर भी पुकार नहीं पा रहा हूँ। यता सकते हो तुम? मरने में डर लग रहा है। . .. दीक्षा की बात पर तुम हँसो मत धीरावाबू, तुमको तो हँसना नहीं चाहिए । घोराबाबू, जो नान्ह लोग माटी पर रहते है वे हाथ बढाकर भी ऊँचे तबके के लोगो तक पहुँच नही पाते हैं। कार वाले लोगो को वे समझ नहीं पाते । और जो नान्ह लोग मुयोग-मुविधा पाकर ऊपर उठ जाते है वे भी हाथ बढाकर माटी मानुम को छू नही पाते। लेकिन जो लोग सचमुच वडे लोग हैं, वे माटी पर सड़े होकर भी ऊंचाई में रहने वालों को अपनी पहुँच में पाते हैं, फिर ऊँचे उठ जाने के बाद भी नीचे की ओर हाथ बढाकर माटी-मानुस के हाथ थाम लेते हैं । उनको समझने में कोई गलती तो नहीं होनी चाहिए। दीक्षा न लेता तो मेरा वक्त कैसे कटता, बताइए? भांपों के सामने से लगभग सभी कुछ पुछ गया है । पृथिवी सफेंद कोहरे से ढकी हुई । ओसारे बैठा रहता हूं और मन मे इप्ट का जाप करता रहता है। दिन यो नी बने एक बार दुनिया से सम्पर्क स्थापित होता है। लड़के रास्ते में पाठशाला जाते हैं । सन्दीपनं पाठशाला की घड़ी घर में टगी है । उसमें टन्न-टन्न नी की टंकोर यजते ही उसके कान सजग हो उठते हैं। पैट सुनाई पड़ने लगती है । सीताराम सुरु झुककर देखता । कोहरे में धुंधली भाकृतियों जैसे लड़कों को देखता-रोगाना ही उनको बुलाता; पूछता, स्कूल, चले सब? -जी। ,, . ? 18 -स्वाल कैसा लग रहा है? ---अच्छा -अच्छा? सच कह रहे हो -~जी, सच कह रहा हूँ। -मास्टर मारता नहीं ? -~-मारता है। ---तो? तो फिर अच्छा क्यो लगता? --लगता है। कितने सड़ो आते है इस गांव, उस गांव से। कितना गुन्दर भवन है ! बहुत-मी तसवीरें हैं । कितने चमचमाते वेध हैं। । । .

१६६: संदीपन पाठसाली सीताराम चुप हो जाता । वह काल के परिवर्तन के बारे में सोचने लगती बड़े परिवर्तन माए हैं। पिछले सन् चालीस में उसकी सन्दीपन पाठशाला वन्द हो गयी । उस वक्त फी प्रायमरी स्कूलों की नींव पड़ी थी। उसको कोई अफसोस नहीं था। वह अक्षम हो गया है और दूसरी ओर बिना फीस के देश के सभी वालक पढ़ सकेंगे, लिहाजा इसमें खेद करने का क्या है ! खेद केवल इतना ही है-अगर सिर्फ नाम रह जाता। सन्दीपन पाठशाला । दूसरा खेद, अपने प्रथम जीवन में उसे ऐसा मौका क्यों नहीं मिला ? काश! वह ऐसे एक सुसज्जित स्कूल में शिक्षकता कर सकता । वह उदास हो जाता। अचानक उसे एक वात याद आ जाती। वह पूछता-क्यों-क्यों! तुम लोगों की कुर्सी-मेज, मकान- अकान तो अच्छे हैं-फूलों का बगीचा बनाया-तुम लोगों ने ? अजी ! कहाँ ? सभी चले गये क्या? वे उस वक्त चले गए थे। सीताराम चुपचाप बैठा रहता। रास्ते से कोई जाता तो वह गुहारता- कोन जा रहे हो? में हूं पंडित। -कौन ? चंडीचरण ? -हां। -सुनो सुनो। -ढेर सारे काम हैं पंडित, सुनने की इस वक्त फुरसत नहीं। गाय दुहना । बछड़ा अभी नन्हा-सा है। तिस पर गाय सिर हिलाती है। किसी औरत की क्या मजाल जो पास चली जाए। -जाभो । तो फिर जाओ। चंडीचरण आधा झूठ बतला गया। गाय शायद दुहना है लेकिन उसके लिए इतना हड़बड़ाकर वह नहीं गया, सीताराम के पास बैठना नहीं चाहता, तभी चला गया। वह जानता है, वे कहते हैं- अरे वाप, ऐसे मनही के पास कहीं बैठा जा सकता है ? बस पढ़ाई-लिखाई की बातें नहीं तो विज्ञ-विज्ञ बातें। अगर रस की दो बातें करो तो छी-छी करने लगेगा। राम कहो। घह करे भी तो क्या ? उससे यह सव नहीं होता । जाने कैसी रुचि बन गई है उसकी ! पवित्र तो है लेकिन वह जरा खुश्क और कठिन है इसमें कोई संदेह नहीं । दीर्घश्वास छोड़ वह बुलाता-रला विटिया! रना इस वक्त रसोई के काम में लगी रहती है। वह भीतर से जवाब देती, क्या है यावू? -क्या कर रही है ? -सब्जी चढ़ाई हे वावू । --अच्छा, तो फिर रहने दे। -क्यों बाबू ? चाय पिओगे ? -- संदीपन पाठशाला::१६७ अव उसने यह एक यादत डाल ली है। चाय पीता है। पाप की मातच में दो-चार जने या जाते हैं। कोई न याने पर रत्ना ही एक कटोरी लेकर पास बैठ जाती है। और कुछ भी न होने पर चुपचाप बैठा रहता है । सोचता है-मूर्य के चारों और पृथ्वी धूम रही है। चल रही है तो चल रही है । वही केवल बैठा है। यह भावना भी दुस्सह हो उठे तो क्या करेगा वह ? यता सकते हो धीराबाबू ? क्या करेगा? तब उसी इप्टमंत्र का जप । वह इस इष्टदेवता के रूप का ध्यान करने की कोशिश करता। विना मंत्र के कहीं चल सकता है धीराबाबू ? समय बीत जाता । बड़े मजे में बीत जाता । कहाँ से बीत जाता, यही उसकी समझ में नहीं आता । रत्ना आकर बुलाती-चावू ठो, नहा लो, दिन काफी चढ़ आया है। सचमुच दिन काफी चढ़ आया है। स्वतंत्र रलहाटा के नए प्राथमिक विद्यालय में, बड़े स्कूल में टिफन का घंटा बजता-टन्न टन्न टन्न-ट न न न घप्प धपाम, घप्प धपामः-दो यममान शब्द द्रुत आगे बढते आ रहे हैं। सीता- राम ने सुनकर ही जान लिया, श्री बांकाचाँद गोविन्द छोटे-बड़े पैरो से एक कम एक ज्यादा आवाज उभारते भागते आ रहे हैं । आओ वाका चांद, वंकुविहारी। वही-वही एक है-उसके इस निस्संग जीवन का सायी । बीच-बीच दो- तीन दिन के बाद एक-एक दिन गोविन्द आता है। एक वेला-किसी दिन दोनों वेले ही यहां काट जाता । दुनिया भर की सवर लेकर आता है। -समझे पंडित, बढ़ी जवरदस्त सवर है आज! -क्या जवर सवर है बांकाराय? --याने कलजुग का सारमा समझो। चंही के थान में सभी पूजा कर सकेंगे, मन्दिर में प्रवेश कर मर्केगे, कानून बन गया । नौर साथ ही साथ एक जबरदस्त मामला, चाटने के घर में किम्भूतकिमाकार बच्चा पैदा हुआ है, घिर पर सींग! है न कलजुग का खात्मा ! ऐमी ही विचिन्न सबरें वह ले आता है। किसी दिन खवर लाता-"मंत्री पा रहा है रलहाटा में । वावू दावू में लड़ाई छिड़ गयी है । यह कहता मंत्री हमारे घर में टिकेगा तो वह कहता कभी नहीं, हमारी कोठी में ठहरेगा।" स्वाधीन देश का मंत्री भा रहा है। बाबू लोग वो झगड़ेंगे ही। झगड़ें। लेकिन ये मंत्री लोग वावुओं के घर में टिकते ही क्यों है ? मन यसन्तोष से भर जाता। गरीबों के घर में क्यों नहीं ठहरते ? किसी दिन खवर लाता, कलकत्ते में मकानात घर-घर हो गए हैं। हवाई पहाज टूट पड़ा है।

१६८ :: संदीपन पाठशाला । किसी दिन बांका चांद आता, कहता, "हो गया है पंडित! चलो कल ही चलो। बिल्कुल आँखें. दुरुस्त कर घर लौटोगे । सपने देख एक तीर्थ उभर आया है, कैसा भी मरीज क्यों न हो, सात दिन नहाकर लोटपोट खाते ही चंगा हो जायगा । समझे, कोढ़ी अच्छे हो गये है। यहीं नजदीक ही। बीस कोस होगा। सीताराम हंसता । वह इष्टमंत्र का जप बेशक करता है, लेकिन यह विश्वास उसमें नहीं है। एक दिन खबर ले आया था, पंडित, तुम्हारे जयधर को देखा। ओफ ! इतना भारी: बदन हो गया है--सारे जहाँ का सामान लेकर टीसन पर उतरा। मुझे पहचाना जी । वोला, लंगड़े गोविन्द ! अर्दली मुझे भागो-भागो कह रहा था लेकिन जयधर ने पहचान लिया तो वह खिसक गया । तुम्हारे बारे में पूछा; मैं तुम्हारा सारा व्योरा सुना रहा था लेकिन पूरा सुना न सका। उससे पहले ही किराए की मोटर आ धमकी । सामान लादकर सर रो चली गई। मुझे माठ भाना दिया है । सोचा था, पूरा रुपया देगा । हाकिम है । लेकिन मिले आठ ही आने । . जयधर अब मुन्सेफ है। सीताराम की नोटबुक में जयधर का नाम बहुत बार रहने की बात है लेकिन ऐसा नहीं है । उसके मैट्रिक में स्कालरशिप मिलने का समाचार । आई. ए. में द्वितीय होने की खबर । उसके बाद भी एक खबर है जिसको लिखकर भी सीताराम ने काट दिया है। जब जयघर बी. ए. पढ़ता था, एका दिन आफू स्टेशन से भागता हुआ आया। सर, जयधर स्टेशन पर उतरा है। जयघर ! सीताराम ने उच्छ्वसित हो आकू से कहा था, आकू, उसे जाकर बता, में बुला रहा हूँ। जल्दी: जा।. जयधर कालेज से आता-जाता है, इस रास्ते से नहीं। दूसरे स्टेशन पर उत्तरकर घुमावदार रास्ते से जाता है। उसकी मां उस वक्त नौकरी छोड़कर चली गयी है । सीताराम जयधर के झंपने का कारण जानता था। आकू गया । सीताराम प्रतीक्षा में उद्ग्रीव वैठा रहा । लेकिन दोनों में एक भी नहीं आया। अन्त में ज्योतिप साहा के भतीजे से मालूम हुआ-आकू और जयधर में स्टेशन पर बड़ा भद्दा-सा झगड़ा. हो गया है । ... क्यों ? कैसा झगड़ा? उसे पछतावा हुआ- क्यों उसे बुलाने उसने को भेजा था। सीतेश जरा चुप रहकर शिक्षकते हुए ही बोला-आफू ने कहा था, पंडित से भेंट करसो जाना जयघर । इस पर जयधर ने कहा था- इससे मुझे घर जाने में देर हो जाएगी। इसी पर आक ने शायद कहा था, देर हो जायगी इसलिए पंडित से नहीं मिलेगा ? अजीब निमशहराम है तू ! यही झगड़ा है। जयधर ने भी क्या कुछ कहा है, आकू ने भी यहा । और आफू की जुवान !:: जयधर ने कहा था-बहुत-सारे पंडित, बहुत सारे मास्टरों के पास ही पढ़ा, . चंडाल आफू संदीपन पाठशाला::१६६ . सभी से मिल-मितकर प्रणाम भरना पड़े तो-पर धिमकर माघे हो जायेंगे और माथे पर गुमट निकल आयगा। तेरा तो बस वही एक पंडित है.तू जा। आफू ने जयधर को नौकरानी का बेटा होने का स्मरण करा दिरा है। बहुत सारी बातें कही हैं उमने -रलहाटा के बाबुओं या बेटा है वह । लेकिन जयधर विश्वविद्यालय का कृती छान है, उसने ऐमी तीली भाषा में उस पर तीर चलाये है कि आफू ने हार मान ली है। इसके बाद जयधर दूसरा रास्ता पकड़ घर चला गया है। भेंट नहीं की। यह घटना लिखकर भी उसने काट दिया है। लेकिन उसके बी. ए -एम ए. पाम को तारीखें हैं । मुन्रोफ होने के समाचार पाने की तारीख है । बस और नही ! कल्याण हो जयधर का, जयधर को उसने जीवन से पोंछ डाला है। मुन्मेफ होने वाली खबर पाकर उसने जयधर को आशीर्वाद करते हुए पत्र लिसा या । अपनी दशा के बारे में भी लिखा था-हो सके तो एक बार अभागे पडित को भी देख जाना । जवाब मे चिट्ठी नहीं आई, पांच रुपये का एक मनी-आर्डर आया था। हाय जयघर ! मीताराम को तूने भिसमंगा 'ठहराया। उनने क्या तेरी महायता पाने के लिए अपना दुख-दर्द सूचित किया था रे? रुपया उसने लौटा दिया था। उसी दिन से उसने उसे अपने मन से पोंछ डाला था। फिर भी उसने उसकी अमंगत-कामना नहीं की। धीरावायू की ही एक वात का उमने स्मरण किया था-धोरावायू एकदिन देवू का प्रथम भाग उलट- पुलटकर देखते हुए बोले थे-विद्यासागर महाशर ने त्रिकालदर्शी की तरह प्रथम भाग की रचना की है पडित । देखा है आपने-पहले पत्रल है फिर अधम । संसार में जो चलता नहीं वही अचल है, और जो मचल है यही अधम है। उस दिन सीताराम ने कहा या, नही धीराबाबू, यह बात लेकिन उल्टी है, जो अधम होता है वही अचल हो जाता है । हम लोगो की ओर देखिए न, मधम भाग्य लेकर जन्मे हैं तभी संसार में अचल वने रहें। शिवगिकार की ओर देखिए, अधम पुल में अधम भाप लेकर उमने जन्म नहीं लिया है तभी अचल होने पर भी उत्तम के रूप में चला जा रहा है। । 1. - असम पैरो से विचित्र शब्द करते हुए गोविन्द माज भागता हुआ आया।- पंडित ! -~-क्या समाचार है वांकाचांद ? कौन-सी संगीन घटना घटित हो गयी आज? -वस आ ही पहुंचा पंडित. -पौन? -तुम्हारे धीरावाबू जी। -~-यह क्या ? वै तो शाम के वांद आएंगे। नहीं जी, उसने मीटिंग-पिटिंग मुलतवी कर दी और कहा, पहले मैं । पंडित री मिलूंगा। -- ।

१७०:: संदीपन पाठशाला ? सीताराम अभिभूत हो गया। विश्वसंसार मानों मधुमय हो उठा! धरती पर इतना मधु है ? धीरावाबू कोन है ? यह तो सारे संसार का मधु है-इस संसार का दान । संसार के मधु से धीरावाबू मधुर है। पंडित ! धीराबाबू सचमुव आकर खड़ा हो गया। सीताराम अपने जीणं झुके हुए शरीर को सीधाकर बैठ गया। धीरावावू ! उसका शरीर मानन्द से रोमांचित हो उठा। वह उठकर खड़ा हो गया। धीरानन्द ने जोर से उसे अपने वक्ष में बांध लिया ।-मैं मा गया पंडित। - में जानता हूं, आप आएंगे। रत्ला, बासन दे, लासन दे बेटी। रत्ला पहले ही निकट आ खड़ी हो गयी थी। उसने कहा, आसन लायी हूं वावा! - - दे, विछा दे। मेरे पास ना जा। खुद ही रत्ना के सिर पर हाथ रखकर वोला, मेरी रत्ला है यह धीराबाबू ! मेरा शक्तिशेल । प्रणाम कर बेटी। धीरानन्द ने आशीर्वाद किया। सीताराम बोला, लक्ष्मण से भी मैं बड़ा वीर हूं धीरावाबू । शक्तिशेल के घाघात से लक्ष्मण अचेतन हो गये थे, हनुमान को विशल्यकरणी लाने में गन्ध- मादन उठाकर ले जाना पड़ा था। मैं शक्तिशेल सीने में लिए फिर रहा हूं। वह हंसा, फिर बोला, कहां, आप जरा आगे बढ़ लाइए, देखें आपको, कितने बड़े बादमी हैं आप। -आंखों से क्या विल्कुल देख नहीं पाते हो मास्टर ! -~-पाता हूं। अच्छी तरह नहीं देख पाता। बरे तो फिर ! -तो फिर क्या? -उन्न तुम्हारी कोई ज्यादा तो है नहीं। पाठशाला का पंडित जिसकी मासिक आय पन्द्रह रुपया हो, उसके लिए यही उम्र काफी है। इसके अलावा। पंडित हंसा। हंसते हंसते ही बोला, जानते ही होंगे, सन्दीपन पाठशाला उ० गयो । देश पर शिक्षा-कर लगा। फो यू० पी० स्कूल बने, मेरो पाठशाला भी उसी में चली गयी। और ये आंखें लेकर करूंगा भी क्या? नहीं पंडित ! तुम वीर हो, तुम सच्चे पंडित हो । नाज इस नए स्कूल में जरूरत थी। नए युग में पुरानी बातें, सुख के दिनों में दुःख की बातें करने वाले लोगों के सिवाय चलेगा नहीं। नहीं, बस और नहीं । नांखें भी जाती रहीं। जमाना भी नया है घोराबाबू । नये अच्छे लोग नाए हैं। वेहतरीन नादमी, भला छोकरा । वातें करके नानन्द मिला। बहुत-सारी बातें हुई उसके साथ । क्या कहा, जानते हैं ? कहा, सभी लोगों को शिक्षित करना पड़ेगा-चंडाल से ब्राह्मण तक। धीराबाबू, मेरा शरीर रोमांचित हो उठा। सिखाएँ। शिक्षा दें। नगर जिन्दा रहा, तो उस दिन । ?

संदीपन पाटगासा:: काश! एकबार के लिए भी दृष्टि वापस पा जाऊ । इन्सान के उस मुफ पाइप एकबार देखूगा। धीरानन्द उसके बदन पर हाथ फेरते हुए बोला, यह सब बातें रहने दो पंडित! रहने दूं? हो । मैं तुम्हारी अपनी बातें सुनने आया हूँ। वही तो हमारी अपनी बात है जी । अ-या क-स पढ़ाई सभी करें। पाठशाला के पंडितों के पास इसके सिवा और कौन-सी बातें हैं, बताइए? जो नहीं सीख सकेगा, उसे वेवकूफ, बुद्ध, गधा कहकर गाली दूंगा । सीताराम हंसने लगा। वह मैं जानता हूँ। उसका मैं अनुमान लगा सकता हूं। पंडित, अपनी मनोरमा के बारे में बातें करो। अपनी रत्ना के बारे में। केवल मेरी ही बातें लेकर किताव लियेंगे आप? हाँ । बताओ अपनी बातें । मिर्फ तुम्हारी ही बातें। गरी रत्ना! येटी जरा किसान-बहू से कह दे, ताजा दूध ले आने को। धीराबाबू को चाय बना दे । पर्ना कहानी जमेगी नहीं । हां-धीराबाबू, यही अच्छा है। सिर्फ मेरी बातों को लेकर ही किताब लिखिए। श्रीशबाबू भी पाठशाला के पंडित हैं लेकिन वह मुझसे बहुत बड़े आदमी हैं। फिर पलाशवुनी के पंडित-वे मुझसे कुछ अलग ही तरह के हैं। सिर्फ मेरी बातें लेकर किताब लिखिएगा । लेकिन कोई झूठा रंग न चढ़ाइएगा उस पर। इसतारे से जिस प्रकार फासुर निकलता है वैसा ही वजाइएगा। बाउल का गाना जैसा होता है, वैसा ही रखिएगा । इकरंगा चित्र कैसा भी लगे उस पर दूसरा रंग न चढ़ाइएगा।- सन्दीपन पाठशाला का यह सीताराम पंडित। नोटयुक उसके हाथों में देकर वह बोला, इसी में सबकुछ लिखा है । सिर्फ एक बात नही लिखी । जरा देखिए तो रत्ना कहाँ है ? यहां तो नहीं है, शायद रमोई में हो । धीमे स्वर में वह बोला, धीरावायू, विद्यालय में एक शिक्षिका आई थी- उससे मैंने प्यार किया था। पाठशाला का पंडित होने पर भी मैं इन्सान ही है। यही बात इसमें लिखी नहीं। बताता हूं, सुनिए वह वात । वह बात खत्म कर पंडित घुप हो बैठा रहा। धीरानन्द बोला, पंडित, तो मैं अब उठू। पंडित भी उठकर खड़ा हो गया। धीरानन्द ने फिर उसे बाहों में बांध लिया। सीताराम अचानक बोल पड़ा, और एक बात है धोराबाबू ! उसके होंठ फापने लगे। बताओ पंडित । A.. -मेरी एक बात और भी है घीरावा । .

१७२:::: संदीपनापाठशाला ! -बतायो पंडित बिताओ" मेरा हाथ थामकर मुझे ऊपर ले जाएंगे ? वहाँ बताऊँगा, वहीं बताऊँगा। 'धौरानन्द उसे सहारा देकर ऊपर ले गया। पंडित अन्दाज़े से ताले के पास गया । पुकारा, धीरावाबू ! पंडित ! मेरा पाप-- इस पाप से मुझे 'मुक्त करें। T ये कितावें आपकी हैं । मैं पढ़ने लोकर इनको 'लौटाया नहीं। इनको आप ले जाइए। रजनीवाबू की एक किताव है। धीरावाव! घोरानन्दं स्तब्ध खड़ा रहा। कुछ देर बाद फिर आकर उसने पंडित को अंकवार में भर लिया। भीरु दुर्वल हृदस्पन्दत दरिद्रता-क्षीण वक्षपंजर के अन्तरह से ध्वनित हो रहा है । आवेश की प्रबलता से शरीर ज्वर से उत्तप्त और प्रखर । क्षीण दृष्टि से वह मुक्त द्वारपथ से अस्तगामी सूर्य की अन्तिम रश्मि से उज्ज्वल पश्चिम आकाश की ओर देख रहा है। होंठ मानों किसी असहनीयः घर-थर कम्पन से कांप रहे हैं। धीरानन्द ने गाढ़े स्वर में कहा, 'जय हो जय हो। पंडित, तुम्हारी जये हो! धोरानन्द के आलिंगन के समय उसकी माँखों से घश्मा गिरं गया। सीताराम ने पुकारा रंली! एक बत्ती दे जा वेटी कमरा अंधेरा हो गया वावू !-रत्ना ने जवाब दिया। धीरानन्द ने साश्चर्य से 'कहा, यह क्या पंडित, तुम तो कुछ भी देख नहीं पाते हो ? कमरे में अब भी तो प्रकाश है । इतनी देर में उसने पंडित की दृष्टि: हीनता का परिमाण महसूस किया। सिहर उठा वह। सीताराम ने हंसकर कहा, प्रकाश है ? ओह, चश्मा गिर गया है ना आँखों से । देखिए तो धीरावाबू, नहीं तो मैं ही शायद अपने पैरों से तोड़ डालूं। धीरानन्द ने चश्मा उठाकर उसके हाथों में दिया। चश्मा पहन कर सीताराम ने कहा, यही अच्छा है। धीरानन्द ने उसका हाथ थामकर कहा, पंडित, तुम मेरे साथ चलो, आँखों का इलाज कराओगे। सीताराम ने गर्दन हिलाई, नहीं। जरा चुप रहकर बोला, क्या देखूगों आंखों से ? रत्ना की विधवा मूर्ति ! 'रहने दो। धीरानन्द सन्नाटे में आ गया। रला बत्ती पहुंचा गई । खामोशो तोड़कर सीताराम ने कहा, अच्छा आँखों से मैं भगवान को देखने की कोशिश करूँगा। आपकी मां ने कहा था-मैं देख सकूँगा । देखें, देख पाता हूं कि नहीं। ऊपर की ओर उसने दृष्टि टिका दी धीरानन्द ने, इस क्षण का मौका पा, दोनों हाथ माथे से लगाकर उसे प्रणाम भाई वाबू , fATI

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१७२:: :: संदीपन पाठशाला -वताओ पंडित। वताओ। मेरा हाथ थामकर मुझे ऊपर ले जाएंगे ? वहाँ बताऊँगा, वहीं बताऊँगा । धीरानन्द उसे सहारा देकर ऊपर ले गया। पंडित अन्दाजे से ताले के पास गया । पुकारा, धीरावाबू ! पंडित! मेरा पाप- इस पाप से मुझे मुक्त करें। ये किताबें आपकी हैं। मैं पढ़ने लाकर इनको लौटाया नहीं। इनको आप ले जाइए । रजनीवाबू की एक किताव है । धीरावावू ! धीरानन्द स्तब्ध खड़ा रहा। कुछ देर बाद फिर आकर उसने पंडित को अंकवार में भर लिया। भीर दुर्वल हस्पन्दन दरिद्रता-क्षीण वक्षपंजर के अन्तराल से ध्वनित हो रहा है । आवेश की प्रबलता से शरीर ज्वर से उत्तप्त मौर प्रखर । क्षीण दृष्टि से यह मुक्त द्वारपथ से अस्तगामी सूर्य की अन्तिम रश्मि से उज्ज्वल पश्चिम आकाश की ओर देख रहा है। होंठ मानों किसी असहनीय थर-धर कम्पन से कांप रहे हैं। धीरानन्द ने गाढ़े स्वर में कहा, 'जय हो, जय हो ---पंडित, तुम्हारी जय हो! धीरानन्द के आलिंगन के समय उसकी आँखों से चश्मा गिर गया... सीताराम ने पुकारा, रत्ना ! एक वत्ती दे जा बेटी। कमरा अंधेरा हो गया। --रत्ना ने जवाब दिया। धीरानन्द ने आश्चर्य से 'कहा, यह क्या पंडित, तुम तो कुछ भी देख नहीं पाते हो ? कमरे में अब भी तो प्रकाश है। इतनी देर में उसने पंडित की दृष्टि- हीनता का परिमाण महसूस किया। सिहर उठा वह । सीताराम ने हँसकर कहा, प्रकाश है ? ओह, चशमा गिर गया है न आँखों से । देखिए तो धीराबाबू, नहीं तो मैं ही शायद अपने पैरों से तोड़ डालूं । धीरानन्द ने चश्मा उठाकर उसके हाथों में दिया । चश्मा पहनकर सीताराम ने कहा, यही अच्छा है। धीरानन्द ने उसका हाथ थामकर कहा, पंडित, तुम मेरे साथ चलो, आँखों का इलाज करामोगे। 1. सीताराम ने गर्दन हिलाई, नहीं। जरा चुप रहकर बोला, क्या देखूगा आँखों से ? रत्ना की विधवा मूर्ति ! रहने दो। धीरानन्द सन्नाटे में आ गया। रत्ना बत्ती पहुंचा गई । खामोशो तोड़कर सीताराम ने कहा, अच्छा आँखों से मैं भगवान को देखने की कोशिश करूंगा। आपकी मां ने कहा था--मैं देख सकूँगा । देखें, देख पाता हूँ कि नहीं। ऊपर की और उसने दृष्टि टिका दी। घोरानन्द ने, इस क्षण का मौका पा, दोनों हाथ माथे से लगाकर उसे प्रणाम आई बाबू - ? - । - किया।

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१७२:: :: संदीपन पाठशाला ? :- -बताओ पंडित । बताओ। मेरा हाथ थामकर मुझे ऊपर ले जाएंगे ? वहाँ बताऊँगा, वहीं बताऊँगा। धीरानन्द उसे सहारा देकर ऊपर ले गया। पंडित अन्दाजे से ताखे के पास गया । पुकारा, धीरावाबू ! पंडित ! मेरा पाप-- इस पाप से मुझे मुक्त करें। ये किताबें आपकी हैं । मैं पढ़ने लाकर इनको लौटाया नहीं। इनको आप ले जाइए । रजनीवाबू की एक किताव है। धीरावावू ! घीरानन्द स्तब्ध खड़ा रहा। कुछ देर बाद फिर आकर उसने पंडित को अंकवार में भर लिया। भीरु दुर्वल हृदस्पन्दन दरिद्रता-क्षीण दक्षपंजर के अन्तराल से ध्वनित हो रहा है । आवेश की प्रबलता से शरीर ज्वर से उत्तप्त और प्रखर। क्षीण दृष्टि से यह मुक्त द्वारपथ से अस्तगामी: सूर्य की अन्तिम रश्मि से उज्ज्वल पश्चिम आकाश की ओर देख रहा है। होंठ मानों किसी असहनीय थर-थर कम्पन से कांप रहे हैं। .' . धीरानन्द' ने गाढ़े स्वर में कहा, जय हो, जय हो ---पंडित, तुम्हारी जय हो! धीरानन्द के आलिंगन के समय उसकी आँखों से चश्मा गिर गया। सीताराम ने पुकारा, रत्ना ! एक बत्ती दे जा बेटी । कमरा अंधेरा हो गया। " आई बाबू !-- रत्ना ने जवाव दिया । धौरानन्द ने आश्चर्य से कहा, यह क्या पंडित, तुम तो कुछ भी देख नहीं, पाते हो ? बामरे में अब भी तो प्रकाश है । इतनी देर में उसने पंडित की दृष्टि- हीनता का परिमाण महसूस किया। सिहर उठा वह । सीताराम ने हँसकर पाहा, प्रकाश है ? ओह, चश्मा गिर गया है न आँखों से । देखिए तो धीराबाबू, नहीं तो मैं ही शायद अपने पैरों से तोड़ डालूं । धीरानन्द ने चश्मा उठाकर उसके हाथों में दिया। चश्मा पहनकर सीताराम ने कहा, यही अच्छा है। धीरानन्द ने उसका हाथ थामकर कहा, पंडित, तुम मेरे साथ चलो, आँखों का इलाज करायोगे। सीताराम ने गर्दन हिलाई, नहीं। जरा चुप रहकर बोला, क्या देखूगा आंखों से ? रत्ना की विधवा मूत्ति ! रहने दो । धीरानन्द सन्नाटे में आ गया। रत्ना वत्ती पहुंचा गई । खामोशो तोड़कर सीताराम ने कहा, अच्छा आँखों से में भगवान को देखने की कोशिश करूँगा। आपकी मां ने कहा था-मैं देख सकूँगा । देखें, देख पाता हूं कि नहीं। ऊपर की और उसने दृष्टि टिका दी। धीरानन्द ने, इस क्षण का मौका पा, दोनों हाथ माथे से लगाकर उसे प्रणाम . .. किया।

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Pathshala Sandipan

Author
Shankar Tara
Title
Pathshala Sandipan
File name
Pathshala Sandipan
Text
OCR done
Citation
1930
Published
2011/03
Publisher
Delhim,rajpal & Son
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552204
Barcode
4990010032920.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
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