Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Paryant Aaradhna Tatha Shri Navapad Aaradhna
Front matter
No text on this page.
मुनिश्री मोहनलालजी जैन प्रथमाला नं. ९
श्री सोमसूरीश्वरविरचित
पर्यन्त आराधना
तथा
नवपद आराधना विधि.
सशोषक,
जनशिल्पज्यातिपविद्यामहोदधि श्रीमान्
जनाचार्यश्रीजयमुरीश्वरजी के
शिष्य
प्रतापमुनि
प्राक-श्री पचमसिंह बोहरा
मन्द्री मुनिधी मोहनगलनी जनप्रन्यमाला
इदार सिंग (मारया)
वीर स २४५६
मूल्य याठ याना
प्रकाशक --धी पचमसिंह योहरा
मन्त्री मुनिश्री मोहनलालजा जैनग्रन्थमाग
मु इदोर सिटी (माया)
मुद्रक -एक्ष्मण भाऊराव कोकाटे, हनुमान प्रेस
३०. सदाशिव पेठ, पुना सिटा
विश्ववद्य परमपूज्य प्रात म्मरणीय
मुनिमहाराज-श्री मोहनलालजी महाराज
बालाद्यान प्रेस, पुणे
No text on this page.
अहम् प्रस्तावना. आ ग्रथना मु य वे विभाग रा खवामा आया है, तेमा प्रथमविभाग सोमगिविरचित पर्यन्त आगधना ( अन्त समयनी आराधना) बीना मागमा नवपद मण्डल पूजनपिरि (नपद ओलिनी गिरि) तेमा प्रथम प्रय मूल प्रारत मापामा टल्बामहित नी एक हस्त लेसित प्रत न १ जैनशिल्पयोतिपनिद्यामहोदर श्रीमान् जैनाचार्य श्री जैनमूरीश्वस्ती महाराज श्रा ना पामे जोगामा आवी, अने ते लोकोपयोगी होगरा थी गुज रानी भाषामा शुद्ध सशोषन करी छपानामा आगी, तेना दशद्वार तथा बागीश अवश्य बनिश अनत काय प्राकृत भाषामा ज के तेनु यथा सशोपन करवामा आसु छे, ते वाचको समक्ष रजुकरवामा आवे छे ससार सागररूपी महान् भयकर आठवीमा अथडाता प्राणिओने आ अन्य पोताना जिदगिना छेडा मुधि शाति पमाडे तेना उद्देशची लखि जैन प्राकृत साहित्यमा मोटो प्रचार कर्यो छे वाचको ? जरूर मन्थनु अध्ययन कर्या पछे पोते पोतानी जिंदगिमा करेल पापने खे पड़ी पाप नहीं कर वानी प्रतिता अभिग्रह करे के ग्रन्थना अध्ययन पछे वाचकोने अपक्ष्य ध्यानमा आशे टू कोण ? मारू शु कर्तव्य ! मारो धर्म क्यो । मारे शु फरमानु शु क्रू छू इत्यादिक विचारो जन्म तैना आमामा पुरि आरशे जेथा भव्यामा ओपोताना समस्त जीवननो मुधारो करी शके तेवा हेतुथी सूरीश्वरे टखेल छ ध्यानमा राख्नु पर्यन्त आराधना अन्ति आराधना समाधेि मरण- कोनु प शके तथा पोतानु समाधि मरण कैम-याय तेना माटे केवोकेव प्रयन करवो ते आ प्रथमायी जे शाखबानु मली आने के (२) अठार पापस्थानस्नी त्याग, अम्हितादिर चार गगण नु माण, आर अतिचारनी अटोपना, निन प्रतिमा पूजन विधिम' आशावना, पचंद्रिय जीगेनो नाग, देवना मनुष्य तियचारि साये भोगविद्याम, नविपरि ग्रहना उपरे ममत्व भाव, राति मोनन, या अन्य तर तप, बारमा, समानावोनी साथै वैग्मार थपेठ होय , चाविश यविषय युम्न तिपररनी आगाना, आट मदनी मदता, निगरेमा रागउ पापनी आगे चना, आममानी-गुस्माक्षी ० टया प्रसार भगमण यो छ तथा अन्तिमसमयमा अश्हितादिक पचपरमेटि तथा चार शरण प्रण करना पोते पोाना पापवृत्ति थी पाठा हटया प्रयन रे - आनारीने आ पन्थमा अनेक विषयो ना समावेश परसामा आठ छ- अन्तमम ना पोताना समस्त जीवनने अराधक बने आ पयत आगपना मात्र अन समयेन आराममानु, नेम नहा परतु रोन आनु स्मरण करयाना पोताना मविष्य समयने मुपारी शरे रे तथा रोन पापनो पधाताप यवायी ते पोताना कर्मानो नाश करे माटे भव्यामा ओनिर रार आनु जारापन वरसाधी पोने शुभ गाी ने प्रारा थाय छ आ प्रथमा चीजो विभाग नपद गोटानी विवि ने लगती सम्पूर्ण क्रिया बतायडे जोके नए ओगनी विधिना पुस्तको धणी सम्या जोतरमा प्रराशित थपेग रे परतु आ प्ररमा पाम विशेष ननरे पटगे नरपदनु प्यानकनार तिमिर नो क्रिया को तोते पण प्रापार महागना मापक महान् भयपर गगोनो नाश कराने छटग पद्धि भी विधि पण प्रामक्री शके आजमा- पण उप विधिपूर्वक गुरुम मुख निया श्रनार वाति मुरखने मानररेट टिगोवर थाय 3 आज काठ नपरनु आरायन क्यु याने सहे? 4 गयुठे कारण गानमारो कोर पिपि प्रमाणे विधि अनुम्ममा थती नभी तैपी फल प्रानि मार्गमा बरोवर देखा तो ना प्रथम विचिक आरामाती ए -
(३)
--
आयविरम कर १ कारणले आनिटमा घणान प्रकार का टेवाय
उ आनस्ल आपिटमा लोको पक्त विगयादिकतो त्याग कमा हलदर
लविंग, हिंग माचु न पाय परतु माम्नकिक आम नदी कारगरे आ
विटमा तो नरपद आरामक भव्यामा ओ पोजाना करने अन्त पांचादया
नरदनो जे ने वर्ण रग होय ते प्रमाण ते निरस न धाननु आमिर
पर उचिा परतु आदिग्नी ओठी या प्रमाणे न थानी होगमा
रोमोने यमा लाम से प्रमाणे मटयो नोदए तेरो महतो नथी तथा आ
तपनी सम्पूर्ण जिया गुर समुप राती नया माटे न लाभ मपूर्ण
मटी सस्तो नयी
चीनमा तार्यकर मुनिमुन मागन ना सनयमा थोठा मुनि मुर
सूगश्वर नाप श्रागल मगजने नगमा पूर्वमाना उधार करेल मिद्धनका
नाद य सना आरायन विधि बतास अने ते पन्त्रनी समुर नागाला
मारानाप लिया क्ग नेपामना मनोकामना पूर्ण Tथा सामान
देशविदेशमा नियने प्राप्त कर्या-
माज नरपदना नागपकोण आ मिद्धचक यन्त्रने ममुप रायी निया
कवी जेना अपय रोमनी अभिडापा यामे तथा यन्त्रनी पुनानिधि
आगहन, सिजन, पूजन विधि ममम्तनी समावेश आम फरमाम
जावेट मोगमामा रित्तिनी ना करनार आनराड सिद्धचन नपर
यजनी बगेपर कोई वस्तु ना मारे हमेपा आ यन्त्रनु आरा पन करनार
पोपोताना मुखमय जीवन निनामा दिन नहीं उपस्थित थार मारे
क्याओ से नदपनु ध्यान निरन्तर करा हेतु इति ।
वीर २४५६ )
जेष्ट शु०५।
प्रतापमुनि
जुनेर
१था मिदुम नवपद यन्व आ मस्या तरफ्थी यागत दिवसमा जान रगोची
भरपूर थेने वार पशे मारे भोग करनारा ओष लाभ ल्वा चुस्नु नहि
-
No text on this page.
सारा कामनी अनुमोदन करू, शुममता रमन, तया पर नाणम्मि अदमणमिमा चरणानिमनय विरा अहम श्रीमजैनाचार्य धीजयसरिगुरुभ्योनम श्रीसोमसूरिविरचित पर्यन्त-आराधना नमिउण भणड एच भयर समभोचिम समाइसमु । ततो यागरइ गुरू पन्जना-राहणा पय १॥ प्रण लोकना अधिपति परमात्मने नमस्कार करीने समरिनु तत् कार पयत आराधना गुरुमहाराजे जे प्रमाण बहड छन प्रमाणे पहुऐ ॥१॥ आला इम मुदयारो यायाश्चारि सुम मुजाये। वोसिरिम भाषि अप्पा अटारसपाचगणाइP4 लिला ग्रनोमा लागेल पापी आलोचना-र्य गरम जीतीने हणयाथी तथा अठार पापस्थानको प्राणापित, मृगवाद, अदतादान, मैथुन, परिग्रह, प्रोध, मान, माया, टेन, गम, कलह, अभ्यारयान, पेशू य, रति, भरति, मायास्यवद मा लागेल पापने सिरा? ॥२॥ चउसग्ण दुमडगरहणं चसुपडाणुमा भरमा सुहभारण अणसण पचनमारसरण चार सरणा, मरिहत सरण, सिसाण, भगवाने हेरधर्म सग्ण, मा लगिए पानी निदाघर, तया मुख्न परमटिने नमस्कार पूनम सरणु लघु छ। पचविहे भायारे अश्यापे टापर सु ज्ञानाचार, दशनाचार, चारित्राचार, तपाचार वियाचार, आ पाः प्रकारमा आचाग्ने विशे से कोई पाप लाग्यु होय तेनी हु आरीचा पर छु मिच्छामि दुमड दयु छु ॥ ४॥ काले निणयाइ अठापयाय आयारविरहिय नाण ॥ जसिंचि मए पनि मिच्छामि दुकाई तस्स ॥' ॥ कालग्नियादिव आट प्रकार जेम पार समयमा ज्ञान भण्य गण्यो तथा तेनी परावर्तना करी नहीं, तथा काल समयने छोडी अकाल समयमा भण्यो, विनयथी रहित, बहुमानवी रहिन, याग पधानथी रहित, तथा जेनी पासे भण्यो होय ते गुरनु नाम लोप घीजा गुग्नु नाम क्यु, देवयन्दन, गुरुवन्दन, पतिश्मण, तः स्वाध्याय करता, भणता, गणता युट अक्षर कानो मान आग पाउल ओछा पधारे यहो मण्यो-तथा गण्या, सूत्र अथ तेत्र पुटा पद्या त सबन्धि तथा आचारथी रहिन पान-मति शन श्रुः ज्ञान भवधि शान, मनपर्यवसान रेयर शान ए पाच प्रकारना ज्ञान मे जकाइ का हाय निंदाररि हाय ता ८ मिन्छामि दुक नाणीण जनदिन सइसामथ मिवथ असणाद । जाविहि आय जगन्ना मिन्छामि दुमड तस्स ॥६॥ छती शक्तिए ज्ञानी पुरुषोने वस्त्र अन्न आदि नदीधा तथा न आतना अघज्ञा-यरी होय ता हु मिच्छामि दुफड दधु छु ।॥ ६ ॥ जपचभेय नाणस्स निंदण ज इमरम उचहामा । जोययो यचाउ गिच्छामि दुखद तरस ॥७॥ मनिशान, श्रुतज्ञान, अबधिज्ञान, मनपर्यवज्ञान अने रेवलशान, पाच प्रसारमा माननी निंदा परी होय तथा तेनी हासी कीधि हो तना नाशा होय तोहमिछामि दुकद दधु छु ॥७॥ नाणो पगरण भूयाण कमाल्याफ्ल्य पुथपाईण । शामायण क्याज मिच्छामि दुक्कड तस्य ॥ ८॥ सानो की (३) सापडा, सापडी दफतर, यही, कागलिया आकणी, पुस्ता आदिनी ज कार आशातना क्गे होय त मिच्छामि दुका छ॥८॥ जसम्मत निस्सफियाइ अठविह गुणसमाउत्त । धग्यि मान सम्म मि शामिदुपट तस्म ॥९॥ जबाट प्रमारना सम्यन्यने निशकपणे नधायाहाय तेहुमिच्छामि जन जाणिमा निणाण निणपडिमाण च भारपूना। जच असत्ति विहिया मिच्छामि दुष्ट तम्म ॥१०॥ जिनचा भगनाननी तथा जिनप्रतिमानी भाचपूना न करी हाय, नया नमा अशनि धर्ग होय, तो मिन्छामि दुक्कड़ दधु छु ॥१०॥ ज विग्मी विणामी चद अद रस्स ज विणासनो। अन्न उपरियोम मिन्छामि दुझड तस्म ॥७॥ चय द्रव्पना-तया तनी जानो निनाश विधी हाय, तया तेमा उपेमा युद्धि धारण होय ते १ मिन्छामि दुष्ट छु ।। १० ॥ आसायण कुण ना ज पद्दति निर्णिद मंदिगइमु । सतिप न निसिद्धो मिन्छामि दुमड तस्म ॥१२॥ ज कोर पग जिनश्वर भगवानना मनिग्नी जाशातनान करता हाय नगनने आपणी छति शानिए निषेध न कार्यो हाय तो है मिरामि दुफ्त दनुछु।०॥ ज पचहि ममी पहिं तिहिं गुतिदि मगय सयय। परिपारियन चरण मिच्छामि दुपट तस्म ॥ ३ ॥ जपाचसमितीच्या समिति भाषासमिति एपपासमिति आदा नभइमानिपणासमिति, उचारपासनगरज-सिंधाणापारिष्टा पनिका समिति, नया प्रणाप्ति: मनोगुमि, वरनगुति, कायगुप्ति, महेन निरनर चारित्र यगयर पायु नहाय ते है मिच्छामि । इरह॥४॥ पगिनियाण अपहरि पुढविजय रण मार अतरुण । नियाण यहोगिह को मिच्छामि टकड नस्म ॥२४॥ -
(४)
ज पोर पफेन्द्रियादिक जीप, पृथ्वी काय अप काय, ते काय,
वायुकाय पनस्पति कायनो पध-माश क्यों होय ते ई मिच्छामि
टेकड दछु
शिमिसखसुत्तिपूभर जलो बगहोलयाल सम्पमुहा ।
बे इद्रियाइ द्याज मिन्छामि दुमद तस्म ॥१५॥
क्रीडा, सख, छीप, पुग, जलो, गोला अलसिया प्रमुख, ये
इद्रिय जीने जेवण्या होय-चाप्या होय ते हु मिच्छामि दुरुड
गदह पशु जुआ मकुण मकोडकीडिया ईया।
ते इदियइ इयाज मिडामि दुकह तस्स ॥१६॥
गईया कुशुभा, माकड, मकोडा, कीडाादि तद्विय जीवन
हण्या होय ते हुमिच्छामि दुकड छ ॥ १ ॥
कोलि भकुत्ति अपिच्छ मछिमा पसलह छप्पय प्पमुहा ।
च उरिदियाद हयाज मिच्छामि दुका तस्स ॥१७॥
परोलिया, फुति, कमारी, घि, मावी तोड, भमरा, प्रमुन्य
चारोद्रिय जीधोने जहण्या होय ते ६ मि छामि दुमड पुछू ॥१७॥
जलयर थलयर खयरा आउद्दिपमायदपप्पसु ।
पदिया हयाज मिच्छामि दुकड तस्स ॥ १८॥
जलयर, थलचर, खेचर, जीयोने, प्रमादथी दर्पथी पद्रिय
जीवाने हण्याहोय ते हुमिच्छामि दुई दबु छु॥१८॥
ज फोदलोह भयहास परवमेण मए विमूढण ।
भासि अमसञ्चययण त निदे तब गरिहामि ॥१९॥
ज प्रोध, लाम, मय, हास्य, यी तया अज्ञानताथी, असत्य
पचन योया होयते निदुछ गहुँ छु ॥ १९ ॥
जे घड घावडेण मए परच विउणोधम्पि ।
गद्दि अधण अदिन त निद तच गरिहामि ॥२०॥
जे पाटल्यापरथी, मे थोडूपण रितु धन नदिधु होयते हु निंदु
छु गई छु ॥२०॥
दिप या माणुस घा निरिज्जया सरागधियपूर्ण । अ मेहुण मापरिय त निदे सय गरिहामि ॥२१॥ देवता मनुष्य तियंचनो गगयी भोग कर्यो होय मैथुनसे यु होय तेने हुनिदु छ तथा गहु छु ॥२१॥ जघण्ण घन सुयषण प्पमुद्दम्पि परिगाहविनय विरदेवि । विहिया सम्मत भागो त निदे तच गरिहामि ॥२२॥ जे धनधाय सोनु, मु प्रमुग्य नानिय परिग्रह, न निश ममवमान विधा होयते टुमिच्छामि दुफा दधु छु ।। २९ ।। अरारमोमण रिरणमाई नियमेसु विनिह स्तु। खाल ममहसं जाय तं निदे संथ गरिहामि ॥२३॥ जे रात्री मोजन यिरमण प्रत, नियनेयिये विविध अनेक प्रकारना जे फार दोष लाग्या होय ते हुँदाकर छु तथागहकिरुछु वदिरममितपय तर दुयालस विह जिणुदिछ । जं सत्तिएन क्य त निदे तच गरिहामि ॥२४॥ छ याहा, छ अभ्य तर, तप धारभेदे जे जिनेश्वर मायाने बदल छ ते छति शक्तिए न फ्यु-ना तेनी हुँ निंदा करु दु तथा गई टु॥२४॥ जोगेसु मुख पहसागहेसु पीरियं नप पउस मणनाया कारहि त निदे तंच गरिहामि ॥२५॥ मोक्षमार्ग साधयाना माटे पोतानी छति शकिता मन वचन फाया थी उपयोग न कर्या होय तो तेनी हु निंदाश्रू छु गर्नु छ। प्रथम द्वार समाप्त अथ वीजु द्वार पाणार चार विरमण पमुद्वा तु मदुयाल सयाई । सम्म परि भाययतो भणम जहा गहिम मगाई ॥ २६ ॥ प्राणातिपात मिग्मण ग्रत, स्थूरथी म्थुम्पापाद, स्थल अद त्तादान, स्थुर मैथुन, स्थुल परिग्रह, दिगग्रत, मोगोपभोग प्रत, अनथ दण्डवत, सामायव्रत, देशावगामिक्यत, पोषधयत, अतिथि सविभागध्रन प्रमुख चारपतनी सम्यक प्रकारे भावना भारता म जे माइग्रत भाग्या हाय ते संबधी हुमिन्छामि दुराड दधु यौनु द्वार ममामः अथ ती द्वार खामे सु मरसत्त पमेमुतामितुम निमय कोगी। परिहरि अपु वेरो समित्तिति चिंतेमु ॥ २७ ॥ ममम्न प्राणियोनी साथे मात्र भावने करता-विचारतो समस्त जीयो ने खमाबुध तथा वैरभावी त्याग करी पापरहित खमू ई, निजुद्वार समात अथ चौधु द्वार पाणाइयायमल्यि चोरक मेहण दविणमुच्छ । कोहमाण माया लाद पिज तहा शेम ॥ २८ ॥ पर अभखाण्ह पनुन र मगर समाउत्त परपग्विाय माया मांस मिन्उत्त सल्लव ॥ २० ॥ घोसिरितु इमाइ मुगमग ममगधभू आउ। दुग्गइ निवघणार आठारस पावठाणा ॥ ३०॥ माणातिपान मृषापाद, आदत्तादान, मथुन, परिग्रह तथा तन मूच्छा मात्र मान, माया, लोभ, राग, द्वेष कलह, नभ्याख्यान, पैर रति अरति, परिपरिवाद माया पानाद, मिथ्यात्व शल्य, आ यध मनमागना रिश विन बरनारा दोबाथी, तथा आ आकार पर म्थानातिना मार्गने पाँचाइनार होयाची तने हुघेमिरा मु॥२८-२0-30 चोथु हार मान ।
अथ पाचमु द्वार उर्तास अइसय जुआ अटमहापाडिदर काय साहा । नियरा गयमोहा आए अना पयत्तण ॥ ३१॥ चातिम अतिशय घड युक्त तथा अष्टमहापानि हार्यथी शोभायमा न गगडेपमी रहित एमा नियाग्नु यनपूर ध्यान करे ॥३॥ चउनीस अामयजुआ अठमहापाहिहरपडि पुना । सुगनिहिय समयमरणा अरिहंता त मुग मरण ॥ ३०॥ चोतीम अतिशयर्थी युक्त, अष्टमहा प्रानिहायी शोभायमान, ग्वता नु रचेल ममरमरणमा सिनेला पवा अरिहत भगवान मरण हो॥३०॥ चडविस्माय चत्ता चउवयणा चउपयार धम्मरहा चाइदुहनिहरणा जहिता मुगने मरण |॥ ३३ ॥ शोध मान, माया, प्रेम, ए चारस्पायनो त्याग करनार, चार, मुखे चार प्रकारना - दान, शील, तप मापना, धम ने कहनारा तथा देव, मनुष्य नियच नरक ए चार गनिनो नाशपरनारा पना जरिहत भगवाननु सरण हो ॥ ३३ ॥ जे भट्टकम्म मुका वर फेल नाणमणि अपरम था। जठमय ठाण रहिया अग्हिता मुराते सग्ण ॥ ३८॥ ज आट कमना त्याग थी श्रेष्ट फेवर मानाठा तथा आठ मदनी त्याग करनार ए अरिहननु सरण हो ॥ ३४॥ भाम्वित्ते अरहता भानारिप्पहणणेण परिहता। जे तिजग पूणिज्ना अरिहता मुगते सरण॥ ३५॥ ससागरपी क्षेत्रमा अपगरना (समारमा आपरागमन निवारक) तथा अतग्ग शत्रु ओने नाशकरनाग त्रण जगतना पूजानिक अरिहन भगराननु सरण हो। तरिउण भवसमुद्द रउद्ददुदर हरि लम्व दूल्धं । जे सिद्धि मुह पत्ता ते सिद्धा हु तुमे सग्ण !! ३६ ॥ ससाररपी समुद्रन तग्नार, भयर दुम्म रुपी लाखो रदरियाने ओलंधीन-जे मिद्धि गतिन पामय एया मिति मगयाननु सरणदो॥३६॥ जे माने उण तय मुग्गरण निपाई पम्मनिगमारे । सपत्ता मुस्वमुई ते सिसाई तुमे सरण ॥ ३७॥ जे तपरूपी मुहग्याड करी पठिण फम भो नाशरी, माहामुगगन पामेला एघा सिद्ध भगवाननु मरण हो।॥ ३७॥ शाणामलजोगेर्ण जागो निद्हु सयर पम्म मलो। पणगजाण अपाते निदानुमे मरणं ॥ ३८॥ शानरूपी तापी समस्त कम मरना माशयरी पनामुषण ना अपो आमा को छ जेणे एया सिद्ध भगवान सरण हो ॥ ३८॥ जाण न जम्मो न जरा न पाहिणा न मरण नवायाद। नय पोहायसाया से सिमा नुमे सरण ।। ३९ ॥ जेने जन्म नहीं, यूद्धा यस्था नहीं, भ्याधि नही मरण नही कोई प्रसारनी बाधा नहीं, तथा प्रोष मान माया भने होम, ए चार पसाय नही एया मिस भगयाननु सरण हो ॥ ३० ॥ काउ मारवीति ते यायालस दोसपरिसद । भुजति भत्तपाण ते मुणिणो तुम मरणं ॥ ४० ॥ भमरानी माश्य युति में यरता, येतालीस दोपथी रहित शुन आहार पाणीनी गवेषणा करता, एवा मुनि महारान नुं मरण पदि अदमणपगनिन्जिन यदप्प सग्यमरा। धरनि भवेर ते मुणिणो हुसुमे सरण ॥ ४० ॥ पाचे इंद्रियो दमन परनार, तथा कामदेवरूपी पाणने जितनार, तथा मल प्रय प्रतने धारण परनार एवा मुनिमहागज- सरण हो ४० जे पच समिइ ममि पचभेरभ महरय घसहा । पचमगह अणुरत्ता ते मुणिणो हुतु मे सरण ॥४॥ जे ईयासतिा मापासामति, एपणासमिति, भादाणभडमतिनिक्षे पणासमिति, उधारपासवणजमिधाणपारिठापानिरासमिति, आ पाच समितिथी युक्त, तथा प्राणातिपात मृपावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह, ए पाच महामतरुपी पम समान, अने सिस्मोक्ष गतिमा जाया तत्पर गया मुनिमहाराजर्नु सरण हो ॥ ४ ॥ जे चत्तमयरसंघा समतिण मणिमित्त सतुणो धीरा। साइति मुफ्ष मम्गं ते मुणिणों है तुमे सरण ॥ ४२ ॥ समस्त संसगना त्याग करनार तुण (खास) मणि मित्र शत्रु ने सम समजनार, तथा मोक्षमागने साधनार एया मुनिराजनु सरणु हो॥४॥ जो चल नाण दीवायरहि तित्थकगह पन्नतो। सजग जीवहिय ओ सो धम्मा हाउ मे सरण ॥४३॥ ममस्त जगतना जीयने हित करनार तिथंकर भगवाने कद्दल जे वेघर ज्ञानरूपी धम तेनु मन सरण हो । ४३॥ कल्याण योडी जणणी जत्थ अणत्याप यनिहरणी। चन्नीजयी निघदया सो धम्मो होउ म सरण ॥४४॥ कल्याण कोटीनी माता अहिंसा तथा अनथ यधनन नाश करनार जने जीयदयानु मूठ ज अहिंसा ते धम मार सरण हो॥४८॥ जे पापभरकत जीभीमम्मि कुगह कुम्मि ! धारेइ नियतमाण मो धम्म होउमे सरण ॥४॥ जे पापरूपी भारथी आक्राम-दया अल एया भयंकर पुगतिरुप पुवामा पडता प्राणि ओन यचारकरनार धर्मनु सरण हो ॥ ४ ॥ सग्गापरग्गा पुरमग्गागोयाण सथाहो जो। भर अडपि सघण यम्मो सो धम्मो हाड मरण ॥४६॥ भ्वग तथा मोक्षमागने पिशे तत्पर, तथा लाकमा सार्थवाद समान, जे ससाररूपी अटपी-उल्ययामा समथ- एयाधमनु मने सरण हा ॥४६॥ पाचमुद्वार DC- ON अथ छठु द्वार पपचाउण्ड मरण पपन्नो निविनवित्तामर चारगाओ। ज दुक्कट निम्पि समस्पममि निन्दामि मनम्पिजह तमिहर चार सरणा रेता, संसारमा भमता अरिहत-प्रभूनी जे काइ निंदा क्री होय ते पापने हमणाहुनिंदुई-मिच्छामि दुपपद छ जे इत्थ मिच्छिन निमोहिण मयेभय तेण युतित्थ । मणवासरवरण निंदामि सम्मपि अहत मिण्ह ॥ ४९॥ जे काइ मिल्या जुठा माह पी, मसारमा पुतिथि ओजय लोगोनी साथै मोह पयों होय, ते मन वचन कायाए परी हमणा धु निदु रु.॥ पच्छाइ ओज जिणघम्ममग्गो भए कुमग्गा पयार आ ज । जजो अहे जपरपावऊ निंदामि सम्मपि अह तमिह ॥ ॥ जिनेश्वर भगवानना माने ढाक्यो होय-निंद्यो होय, तथा ग्राम मार्ग आताच्या होय पाप हेतु तूथी यता या हाय हे सर्वनी । हमणा निदारू ॥ ॥ जताणि जे जे पुरुहावहाणि हर उसलामए क्याणि । ज पोसिय पाचाडवय च निदामि सम्मि अहं तमिण्ह॥॥ यत्रकमधी प्राणियाने-दुस दिधु होय तथा हल, उग्यलधी में पापम्म पर्या होय तथा पापग्मथी युटुयन पोश्या-रक्षा वर्ग होय, ते सननी हमणा हु नि कर छु ॥ १ ॥ छाडार समाप्त । जय सातमुद्वार जिणानि भरण पुत्थय संघसरूनाइसत्तखित्तिये। जबपि धनयिन तमह अणुलापमुस्य ॥५२॥ जिन मन्दिर, जिनश्वर भगाननी प्रनिमा पुस्ता माधुमाची धाधर नायिका चतुविधर्मग्र रूप ए सात क्षेत्रने विष ज धन- रक्ष्मी रूपी घाज यायु होय- अथात् आ माते क्षेत्रमा पोतानु (११) द्रव्य ज खच्यु होय ने मुरन पुन्यन अनुमोदना कटु-प्रसमा जसुद्ध नाण दसण चणार भवपणनप्पर हाणार । मम्म मणु यार्ग आइ तमह अणु मोया मुख्य ॥३॥ शुद्ध झान दशन चरिव समाररूपी ममुद्रमा जहाज समान पाल्या होय तेवा सुस्त पुन्यनी अनुमोदन पर छु ।। ५३ ॥ जिण तिसूगि उयनाय साहुमाहम्मियप्पधयणसु । जपिदि यो यहमाणा नमद अणुमायप मुक्य ॥ ४॥ जिन सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु, मामि, प्रवचन, भागमन न पिये ज यहुमान विधु होय तनी हैं अनुमोदना कर छु ।' ॥ मामान्य चउविमत्ययाइ वारस्ययम्मि उमेएण । ज उज्जम्मिश्र मार तमह जणु मोयाए मुश्य ।। सामायस, चोविमथा- चन्दना, पष्टिकमण काउमग्ग, पपग्वा. ण आरश्यकना छ भेदेन हु अनुमोटा॥ द्वार मानमुममान। 1॥ अथ द्वार आठमु पुचयपुनपानाणि सुपटपरयाणकारण लोप । नय अगायोनिनणो यमुणिउ गुणसु मुहमा । ॥ आर्मसारमा सुखदुष्प अपनार पूर्व भरनापुयपाप सिवाय फोइ पण नापी शक्तु नी माट आम समनीने सुम भानना भावो ॥५६॥ पुचि चिनाण पम्माण वयाण ज मुक्खो। न पूणा अयइयाण इय मुणिउ कुणस सुहमारे ।'७॥ पहिला यरंग सगर कर्मो ते भोग याग्निा छुटको नथी, माटे तेम ममजीने-सुभ भावना भाग -७॥ जंतु मप नर नारपण दुस्खनि निषिव अतिक्प । तत्ता रित्तियमित्त इयमुणिउ पुणम् सुह भा॥॥ जेमे नरकमा नारक्निा नहि महन परवा योग्य बदुसहा ते सपेक्षाए, भादु ख थोडाम छ माटे माम सममीने मुम भावन भावो ॥८॥ जण विणा चारित्त सुयंत पदाण तीलमविसथ्य । फास पुसुम मिहल इय मुाण पुणतु मुहमायं ॥ ५० ॥ भाय धगर चारित्र शान, तप, दान, शीयर-प्रमचय, भाचर होय तो आकाशमा जेधोरीमेपुल होय ते सममय अर्थात् भार शमा पुल न सभशावरे तेम आरधु भाव यगर निष्फर जाणयु आम समजीने शुभ भावना भायो ।।..॥ इति ठार आठमु समाप्त अथ नमुद्वार जवनिरण यहा सुरसेल समूह पचय हितो! तित्तिए तए न पत्ता तचय सुचयिहार ॥६॥ मरपरतना जेटलु भोज फ्यु तोपण आजीवने तृप्ति न था ता चतुर्विध आहारनो त्यागपण न क्यों थाम समजीने चार प्रकार आहारनो त्याग करयो॥०॥ जा सुलहो जीवाण सुरनरतिरिनाहगई च उपकवि । मुणि उ दूर है विरदय त चप मूवउविहार ॥ ६१॥ देव, मनुष्य, तिर्थच नारफि, आचार गतिमा जीपने आहार सुर छतेम जाण्यु, तथा दुलम घिरनिने समजीने पण चार प्रकार आहारनो त्याग करयो।। ६१॥ छजीवनिकाययह अश्याप कद्दपि जाने सभवह । भय ममण दुहाहार त थप सुयायिहाद्वार ५६२ ॥ पृथी काय, अप काय तेक फाय, वायुपाय, वनस्पति काय, काय, एछ जीवनी कायनो हिंसारपीजे आहार जे नरया योग आहार भवनमणादुम्वरूपी घार प्रकारना माहारनोत्यागकरच चत्ताम् जाम्स आपण हाग्यल गय मुरिदास । सिद्धि मुहेपिछ सुलह तें चय मुत्रविहार ।। ६३ ।।
लखमि ममि जीयाण जायए गावर व मालद्दी। ससारमा जमलाने, समाररुपा ममुहमा पासना माटे नवकार हाथमा प्राप्तक्यु इद्रपणुजणे एषाजीको ए आहारनो त्याग पये, मुलभ सिद्धि सुरक्ने प्राप्तकरयावाला ओए चार प्रकारनामाहा- रनो स्याग करयो ।॥ १३॥ द्वार नयमु समाप्त अथ द्वार दशमुं। नाण यिह पायपरायणेयि अ पावित्रण मरमाणे । जीयो रहा सुरत्त त सरमुमणे नमुक्तारं ॥ १४ ॥ नाना प्रकारता पाप करयामा नल्पर, एघा प्राणियो पमतमा नवसार मनु स्मरण करता जीय देय पदीने प्रामवरे छमाट समाधि मरण पछता निर तर छेपटनाममयमा पण नपकार मन्ननु स्मरण परता रहेछु। ६४ ॥ जेणसहायेण गयाण परमधे समविशण। मणपछि भसुखाइ त सरसमण नमुक्कार ॥६॥ जेनी सहायताथी भयामा भो परमरमा सुनी थाय, ते माणि ओ मनन पउिन सुग्ने देनार ण्या नगार मन्त्रनु स्मरम कातारहेतु मुलहा ओ रमणि आमुलद्द रज सुरता मुह । युधि मना दुलहो तं सासुमणे नमुटार ५ ६६ ॥ सुभ लियो, सुलभ राज्य, देवतापणु सन्स पग्नु आवधामा दुलभ एकर जेफ मारीरीने नगार मनु स्मरण कर तेन दुल्म छे पाणी ससारमा धधु सरमन ३ दीनार मत्रनु स्मरण करता रहेयु ॥ ६ ॥ सिचमुहमच पार त सरसुमणे नमुखम् ॥ ७ ॥ मनु स्मरण परता रहेषु पशमुमार सा एर गुरु पइट पञता गहण निमुणि ऊण । वो मठसम्वपानातहेय आमेर एसो॥ ६८॥ आप्रमाणे गुरमहारजना उपदेशी पयत-आराधना-छली आग धना सामलीने सयपापक्मनो त्याग करनार-श्री नवकार मन स्मरण करता रहेवु ॥१८ परपरामिलि समरण पगयो पारिउणपचत्त। पत्तो पचम कप्पम्मि गयसिंहा मुरिदत्त ॥ १९॥ पचपरमेटिना स्मग्णथी पचत्रने पामेल, पवा श्री रायसिंहयुमार पाचमा देवलोकने रिपेगया ॥६॥ तप्पत्ति ग्यणयह नोह आराहि ऊणतक। सामाणि अत्तपत्ता ऊ तयु आनिस्ताने ।। ७० ।। तनी स्त्री रलवती, नवकार मनी आराधना करी तेज देवलोम मा सामानिक रद्रपणुपामी, अने त्याची चवीने मधमा जाले ॥७॥ मिरि सामसूरि रइय पजता राहण पसमजणण । ने अणुसरति सम्म रहनि ने सासय सुक्य ॥७॥ मी सामरि रचित-यन पेली शातिने करनारी पची पर्यत आरा धना-ठेला-आगना ने सागैते भादग्रशे ने शाश्यता सुनने पामशे ॥ ७ ॥ इति पर्व आगरना समाप्त । पापित अभक्ष्य पच परवडनिगद हिमरस रगेय सनमहिना। राय भायणगचिय बहुविक्ष अणत समाण ॥१॥ घट, पापर, उ, नजिर, महुडा, ए पार उयर तथा चार मट विगह मध, मास माखण, अने मदिरा-(दार ) तथा परफ डिन चलते जमट पाणि, और, पाणिनाग-(गार ) पधी जातनी मार्ट गति भोजन करपाथी घणा जीवानो घात वाय नेयी ना पण त्या कायो पापोटा-(मिमीट) प्रमुख रहविज, नत काय नथाए (१) घोलपटा धायगण, अमुणिय नामाणे पुष्पल्याणि । तुछफल चलिभग्स धनह अभक्ख पर्यास ॥२॥ गाचा दहिमा ते करेल दहिगडा, रिंगणा, तथा जेना नामो न जाणता होय तेगा, तथा तु फल, जाउ प्रमुख, चलितरस कोई पण चिजनो रस जरतो होय-मडी गयरा होय, एवा पाचीस प्रमा रना अभय नहीं खाना योग्य चिजोनो त्याग करना ॥२॥ यानिश अमाप समाप्त । वधिश अननकाय सच्चाउपद जाट सुरण कोन वनस्दा । अल्लहलिहाय तहा अद्द नह अल्लाचुरो॥२॥ सन जानिना नगन अनन काय, तथा सुग्णपद, वनक्द, लीली हर दर, आदु, तथा कचुरी, ते अनत काय समजवा । मत्तावर्ग चिपली, फुनारी तहथाझरी गिन। लसकरिला, गजहर तह लुगा लेना ॥२॥ भातावरी, रोगवरियाली, आपढा, थाहर, गली, लसण, वासरा, गाजर, तथा कावुमिह, रेढा नामनी वनस्पती-अनत याय समजयी ॥॥ गिरिकनि सिल्लयपत्ता खरि सुना येग अल्लमुथाय । ताटणा कटपरी चिलाटा अमयरलीय ॥३॥ गिरिफणिवर, कुपग, परसुनामना पद थगक्द, दीनी माथ, नया आर, पिलोडा कद तथा जमृतवल्ल अनत काय जाणा ॥३॥ मूला तहभूमिरहा विरहाइ ढयरथुलापमा सुम बल्लेअ तहापल्लो कोमल पलिया ॥४॥ भूग, समिकोड, जे छबिना नाकार जगाथायन, अनुगसहित घेलही, ढक मामना भाजी, मुनापार, पारशार, तथा कोमल आयरिप्रमुव अनन काय जाणमा ।।४।।
थालु तपिंडातु यतिमाणि उप माइ । युसियमिपपाई परिजरियापयत्तेण ॥५॥ ग्ता, पिंट, भापनिस भनन पाय जाणीने खुशियान पुरणप त्यागपरयो । अथ धी मागधना पुयमाश स्नयन दोहा मार मिरिदायर सदा, चीयिश मिनगर । मगुरु सामिनी सरस्वती मेमेप्रणय पाय ॥ ॥ त्रिमुयन पतिशिल प्रणा नारा गुणगंभीर । गासन नायक जगमयी यसमान पडवीर ॥२॥ दिनार जिणदने चरणेपरी प्रणाम । मयिक जीपना हितमणी पुछ श्रीगीरमस्याम ।। ३॥ मुत्तिमाग मागधिये पगे विण मरिहता सुधासम्म नयव वन ग्य, मा श्री भगत ॥४॥ अतिचार भाग। इये, मन धरिये गुग्शाम जीय ममाया मयरज, यानि चागणी र ॥रिधि घलो धामयिय पप स्थानक भतार चार शरणनित्य अनुमग, निंदा दृस्ति आचार ॥६॥ गुमागणी अनु मोदिये माय भोमन आणा भणमण अवसर पानी नयाद जपा मुजाण ॥ ७ ॥ भगति आरामन तणा ए छ दश अधिकार निम आणिने आगे जेम पामो भयपार ॥८॥ दार पदेवी डी फिहा रासी शानदशन चारित्र तप धीरज, ए पाच भाचार । पदमणा भर परभनना भालोइये अति गारगे ॥१॥ प्राणी शानमणो गुणराणी धीरयदे पम याणी रे । मा० 110 ए आरणी । गुरु ओपिय नही गुग विनये काले घरी यहुमान । सूत्रमय तदुभयरी सुधा भणिये बद्दी उपमानरे ॥२॥प्रा०क्षामानोपकरण पाटी पोथी, रपणी नोकरवाली। तेह तणी किधि आशातना, शानमान सामगैरे, ॥३॥ प्रा० शापयादिकायपरितपणाची झान चिरायु जेह । याभर परमर घर्गय मनोभन मिच्छामि दुमड सहरे ॥ ४॥ मा०॥ Na (समस्तिरयो शुद्ध जाणी, ए नारणी । निनयचने शका न विकीज विरग्मत यमिलाप | साधु तणी निंदा परिहरजो पर सहम गपरे ॥ ॥ प्रा० मा0 1 मूढपणु छडो परशमा गुणवनने आदग्थेि । सामिोधर्मकरी थोरता, भनिप्रभारना परियेरे ॥६॥ प्रा० शा० सघ चैत्य प्रामाद नणोज, श्रवणपाद मतम्या । द्रव्य देव से जे रिण साडयु, विगसना उपयोरे ॥ ७ ॥मा० स०। इत्यानि परिपरीत पणायी समक्नि पडयुनद ।आमर० । मिरठा० । प्रा०पचारिखत्या चित्त आणी। ए मायणी ॥ पाच समिति नीन गुति नराधी आठ प्रवचन माय, साधु तण धर्म प्रमादे अपुर वचन मन फायरे ॥९॥ प्रा०ाचा श्रावन घम सामायक पो सहमा मनवाली, ज जयणा पूरा पाठ प्रररन माय न पालिरे ॥ १०॥ मा० चा०॥ इत्यादिर विपरित पणाथी चारित्र डोत्यु जह । आभव० मि०॥ ११ ॥ यारे भेद नप नवि की छने यागे निज शते । धर्म मन परन काया चौरज नगि फोर नियो भगते रे ॥१॥ प्रा० चा० । तपधरज आवार एणी परे, विविध निगच्या जेह। थामव० मिच्छा०॥ १३॥ मा० चा०। परि विशेष चारित करा अतिचार आलाइये पीर जिणे सर वयण मुणीने पाप मल मति धोइये रे ॥ १४ ॥ दार धीजी पामी सुगुरु पसाय एनशी पृथ्वी पाणी नेड, पायु धनस्पनि ए पाचे थावर पहाय, वर्ग परसण आरम ले पायोडिया। बुधा तलारपणारियाप ॥१॥ घर थारंम अनेक दाका भायरा, मेडी मार चणावियाए । लिंपण धूपण फान, पाणिपर । पृथ्वी काय पिराधियाए ॥२॥ धोरण नादण पाणी जीरण अपमाय, छोती घाती परी दूहव्याए । भाटीगर पुमार, लोह सोनगरा भाइभुजा रिहा रागराए ॥३॥ तापण शीरण (१८) काजे वस्त्र निवारण, रंगण राधण रस पतीए । एणीपरे धर्मादान पर लपी, तेउ घायु विराधीयाए ॥४॥ थाडी यन धाराम, धाची वनस्पती, पान पुर पर चुटिया । पोस पापडी शाय, शेका सुक्या, छुद्या छेद्या भाचिया ॥५॥ अलसीने एरंड घाणी घालीने घणा तिलादिक पीलियाए । घाली कोठे माहि पीली शेल्डी पंदमूल पर घचियाए ॥ ६॥ एम एयद्रिय जीव हण्याह णारिया एणता जे अनुमोदिया । आमर परभर जेह चली भयोभय ते मुतमिच्छामि दुकाड ए०॥७॥ प्रमी सरमीया प्रोटा गाडर गडीला इयल पुरा भरसियाए । घाला जल चुडेल, पिच लित सतणा, परी अथाणा प्रमुसना ए॥८॥ पम येन्द्रिय जीर जेमेरया ॥ ते मुन। उद्देही जु लीख मास्ट मोडा चारडसीडी आए ॥ ९ ॥ गद्दहिया घामेल फान सतरडा गिंगोटा धनेरिया पएम तेद्रिय जीव ज मे दुद्दया । ते मुझ०॥ १०॥ ममी मच्छर डाम, ममापतगिया फसारी कोलिया यडाए । ढिरण वितीड भमरा भमरिया कोता यग पड माकडीए ॥ ११ ॥ एम चारद्रिय जीन जे में दूह या । ते मुझ । जरमा नाग्बी जाल, जलचर दूहया, चनमा मृगसतापिया ए॥।॥ पांड्या पसी जीय पाडी पा शमा पोपट वाल्या पाजरे ए, एम पंचेद्रिय जीव जेमे दृद्दया । ते मुझ॥३॥ ढाल तीजी प्रथम गोयाला तणे भवे जीए देशी पोध लाभ भय दास्यधीजी वोल्या वचन असत्य । फुडारी धन पारपाजी लिया जे अदत्त रे । जिनजी ॥ ॥ मिन्छामी दुमड आज, तुम सापे महाराजरे ॥ निनजा ॥ देह सारु कान रे जिनजी मि० ए आणी । देव मनुज तिर्यंचजी, मेथुन सेयश जेह, विषयरस लंपटपणजी, घणुवेिटग्यो दहरे ! जिनना०२ मि० परि ग्रहनी ममता परी जी, भवभर मेली आथ । जेह जिहानी ते तिहा . - रहीजी कोइ न आनी साथ रे । जि० मि०० ॥ रयणी भोनन जे पर्याजी, कीधा माप अभार रसना रसनी लालचेनी, पापा प्रत्यक्षरे । निमि०४॥ व्रत रेइ विसार्याजी री भाग्या पञ्च खाण कपट हतु शिपयारगेजी, कांधा आप वपाणरे ॥निमि० ॥ श्रण ढाले आठ दुहजी, आलोइया अतिवार । शिवगति आराधन तगोनाए पहेलले अधिकाररे । जि०॥६॥ ढाल चोथी । माहेलडानी देशी ॥ पच महानत जादरा, साहेल डारे । अथाल्यो व्रत पारतो यथा शक्ति व्रत आदर्गा मा० पालो निरती चार तो ॥ १॥ त लीधा समाग्थेि। साहियद धरी विचारतो शिवगति आराधन तणो । सा० एपीजा अधिकार तो ॥२॥ योनी चोराशी लावतो, मन शुद्ध करी यामणा सा० काइशु रापन रावतो ॥३॥ सर्व मिनकरी चितवो ॥ सा० कोई न जाणा शत्रु तो । गगद्वेष एम परिहरो। सा० कीज जन पवित्र ना॥॥माग सघ समापियें । सा० जे उपनी अनीति तो मनन युदर परी बामणा मा० एजिन शासन रीततो पमिये अने समाविय ॥ सा एहज धर्मनो साग्ता शिव गति आराधन तणो सापतीजो अधिकार ता ॥६॥ मृपावाद दिमा चोरी सा० उन मूर्छ मन तो मोघ मान माया तृष्णा सा० प्रेम द्वय पैगुय तो॥ ७ ॥ निंदा कह न कीजिए सा० फुडा नदीजे आग्ता रति अरति मिथ्या तनो-सा० माया मास जनाले तो॥८॥ विधिविध घोसिरापिए सा०पाप स्थान अढारतो शीनगनिराधन तणो सा०॥ए चाथा अमिर तो॥९॥ ढाल पाचमी हरे निस्सुण इहा मारिया एदशी जाजरा मरणे परिप ए ससर आसार तो कर्या कम सह अनु भरे ए कोइ न राखण हार तो॥ १॥ शरण एस अरिहंतर्नु ए शरण सिद्ध भगतनो, शरण धम श्री जिननी ए माधु शरण गुण यततो A (२०) ॥२॥ अपर मोह सनिपरिहरिप चार शरणचित्त धारतो। शिव गति आराधन तणो ए, ए पाचमो अधिकार तो ॥३॥ आभरपर भव जे र्या ए पापकर्म के गवतो। आममाखे ते निरिये ए पांडेसमिये गुर सासतो ॥४॥ मिथ्या मते चतानियो । जे भारया उतनूमनो। घुमति दाग्रहने वगैप वलीथाप्या उत्सुघतो ॥ ॥ घड्या घडाया जे घणायें घरटी हल हथीयारतो । मन भव मेरे मुक्यिा ए परता जीवसदारता ॥६॥ पाप क्रोने पोपिया ए जमजम परिचारतो! जमातर पहोता ए कोइए नर्माधी सारतो ॥ ७॥ आभव परभर जे क्या ए ए एम अधिकरण अनेक तो। त्रिविधे विधेि पोलिराविष आणि हृदय विस तो॥ ८॥ दुधननि दा एम करिए, पाप क्या परिहारतो शिवगति आराधन तणोप ए. उठो थधिकार तो ॥९॥ ढाल छठी जादि तु जोइने जापणि । ए देशी। धन धा ते दिन माघरो जिंहा विधी धर्म । दान शील तप आदरी, टाल्या दुप्फर्म ॥ ३० ॥ १॥ शगुजयादिक तीथनी, जे फांधी यात्रा । युगते जिनवर पूजिया, यली पोख्या पात्र ध० ॥२॥पुस्ता शान लवापिया शिणहर जिण चैल्य सः चतुविध साचव्या, ए सात क्षा ते ॥ध० ३॥ पांडेयरमणानुपरे क्या अनुम्पा दान, दीधा पहुमान ॥ ०४॥ धमगरज अनु मोदिये एम वाग्वार, गिरगति आराधन तणो प सातमो अधिकार ध' ॥भाष भलो मन आणिये चित आणि ठाम । समता भार भाविय ए आ मगम ॥ध०६॥ सुख दुप कारण जीनने कोर अपर न होय । यम आर जे आचाया भोगनिये मोय ॥ध०८॥ समना रणने अनुसरे, प्राणी पुयना काम । छार उपर ते लिंपणु झापर चित्रामण ॥ ३० ॥ ८॥ भार मटिपरे भागिय पधर्मनो सार | शिगनी आराधन तणा प आठमो अधिकार ॥१०॥९॥ साधु सुरी उपशायने ६ ढाल सातमी रेवतगिरि उपर ए देशी । हरे अमर जाणी, फाग्य मरेपणा सार, अणसण यादरिय पद्यपी चार आहार (रना सविमुनि खाडी ममता साप आत्म बरे समता शान तरग ॥ १ ॥ गति चार पधा, माहार अनत निशा पण तृप्ती न पायो । जोर लालचिया रक दुरहो ए चली घा अणसणनो परिणाम, एथी पामीजे शिषपद सुग्पद ठाम धन धना शारिभद्र पयो मेघमार, अणमण आराधि पाम्या भरना पार नियमदिर जाश परी एक अतार आराधन रेगे, ए नयमो यधिकार ॥ ३॥ दशमें अधिकारे महामत्र नवकार, मनयी नयी मुका शिव सुखफल महार। अपना जायें दुगती दोष विशार। मु ए सम्रो चउदपूर्वना सार ॥ ४ ॥ ज मातरे जाता, जापाम नमार तो पातर गाली पामे सुर भतार । नरपद सरियो मात्र कान मसार इहमवने परभने मुख मंपति दातार ॥ ॥ जु ओभीरने माडी राना गणी थाय नवपद हिमाथी राजमिह महाराय । राणी रतापती प.स्याल सुरमो एक भरथीलेशे मिद्धि घर सयोग ॥६॥श्रीमतीने पयली, मात्र फयो तत्माल। पणी घर फीटीन प्रगट 2 फुल माल शिपमरे योगी मोचन पूरि सोफोर।एमपणे मात्रे याज घणाना सिद्॥ ७ ॥ ए दश अधि कारे यार जिणे मर भाग्या, आराधन कगे विधि जणे चित्तमा राख्यो । नेण पाप पावाली भवभय दूरे नारयो । निन गिय करता मुमति शमृत रस चाग्यो ॥९॥ दाल जाठमी नमो भनि भारतु , ए देशी। सिद्धाग्य गय कुरति लोप तिसरामात मल्हागतो। अवनतिले तुमे अयतया ए परसा अम उपगारता॥1॥ जयोनिनवीर जीए ए याकणी । मे अपराध क्या घणा ए पता न लहै पारतो तुम चरणे आया मणिण जी तारे तो तार ॥२॥ ज० नाशारीने आधयो ए (0) तुम चरण महागज तो। माया ने उवेखशोए तो फेम रहेगान ॥३॥ ज० फर्म बजण अश्य एजन्ममरण जंजाल तो है छुप हथी उभग्यो ए छोडायो देवदयाल तो ॥ ४॥ ज० ॥ आज मन रथ मुग फल्या पाठा दु पर्ददोल तो॥ तुग जिन चोविशमो एप्रगट्यो पुण्य कल्लोलतो ॥५॥ ज० ॥ भव भर विनय तुमारडोप, भाव भक्ति तुम पायतो। दवदयापरी दीजिए धोधोज सुपमायनो ॥६॥ ॥ ज० इति ॥ स्यतरण तारण सुगतिकारण दुचनियारण जग जगे। श्री धागजिनवर चरण थुणता अधिक मन उट थयो ॥१॥ श्रीविजय देव मुगद पटघर तीरथ जगम इणि जग | तपगय पति श्री विजय प्रमसुरि, सूरितेजें जगमगे ॥ २॥ श्रादीरविनय सूर्ण शिष्य चाचर, पनि विनयो, सुरगुरु समा । नम शिष्या निनय विजये धुण्यो निन चोनिशमो ॥ ३ ॥ सह सत्तर सपत् जोगण प्रिये रही, रादर चौमास ए । विनय दशमी विजय कारण, पियो गुण अभ्यास ए॥ ४॥ नरभय आगधन सिद्धिमाधन मुक्त गठ चिरा- मए । निजग हेते स्तरन रचियु नाम पुण्य प्रशशप ॥ इति पूण्य प्रगाश स्तवन समाप्त । 11 प्रत्येक युद्धना रामनी तीजी ढाल जननी मन माशाधरी ए दाल पद्मावती जीव राशी राग वराडी हव राणी पद्मावती जीयराशीग्पमायाजाण पगु ते जुगनेमटण चला आने ॥ १॥ ते मुझ मिच्छामि दुपाड, हितनी साम्य । जेमें जीत रािधिया चउराशिलाग्य ते मुझ ॥२॥ सात लाख पृथ्वी तणा, साते जप काय । सात लाख तेउ फायना, सात वली याय ॥ ते मुझ० ॥ ३॥ दश प्रत्येक वनस्पति चौदह साधारण ।
निति चारिद्विजीवनावे येराव निचार । ते मुब० ॥ ॥ देघना नियंघ नारकी चार चार प्रकाशी।चौदह लाम्ब मनुष्यना ए लगय चोराशी ॥ ते मुन॥ ॥ इण भरपरभो मेरिया जे पाए अगर । विविध विविध फर्ग परिहर दुर्गति दानार ॥ त मु० ॥६॥ हिंसा सीधी जीवनी याल्या मृपावाद । दोष अदत्ता दानना मैथुन उमाद ।। त मुब० ॥७॥ परिग्रह मल्यो कारमा, स्त्रिामोध विशेष। मान माया रोममें किया वली रागने दुप ॥ ते मुगः ॥८॥ पल्ह परी जी द्या दीघा फूडा करक । निंदा कीधी पारपी रति अरति नि शक ॥ त मुझ० ॥ ९॥ चाडी कोधी चानर कोधो पारण मोमो । युगुग युधमने। भलो गाण्यो भरूमा ॥ ते मु० ॥१०॥ खाटकीना मध में पिया जी नानाविध धान । चटीमार भने चर फा मायादिन रान ॥ ते मुगः ॥ ११ ॥ माडीने भने माछला जाल्यानल पास । धीर भीर कोली भय मृग पाझ्या पस ॥ त मुन०॥ १२॥ कानी मुलाने मधे पढी मत्र पटोर । जीय अनेक मारिया कीधा पाप घोर ॥ ते मुझ०॥ १३ ॥ कोटचालना भवे में रिया आग दड । पदिवान मराचिया, कारडा उडी दंड ॥ ते मुय० ॥ १४ ॥ परमा धामिन मरे दीधा नारकी दुस । छेदन भेदन वेदना ताडना अनि निप । ते मुग०॥" ॥ कुंभारना भरेन रिया निभाडा पनाया। तेली भरे तिल्पीलिया, पापे पेट भराया ॥ ते मुझ० ॥ १६ ॥ हालीने भरे हर पेडिया पाड्या पृथ्वीना पेट । सूड निदान किया घणा पायरद चपेट ते मुन० ॥ ७॥ मारिन भरे रोपिया नानाविध वृष । मूरपव परपुरना, लाग्यापापते रक्ष । ते मुझ० ॥ २८॥ अधोगाइयाने भरे भर्या अधिका भार । पोटी उट काटा पदा दया न रही लगार ॥ ते मुझ० ॥ १९ ॥ छीपाने भर छनरी फीधा रगणपाम । अगनि आरंभक्यिा घणा. घातुर्माद यभ्यास ॥ ते मुय० ॥ २० ॥ शूरपणे रण जूझता, भार्या माणस घृद । मदिरा माम मासण भर्या खाधा मूलने का ॥ ते मुम० ॥२१॥ पाण पणानी धातुनी पाणि उल्लेच्या गारंभ विधा अति घणा पोते पापज सेया ॥ ते मुए० ॥ २२॥ अंगारयम किया (२४) घरी घरमे दरीघा । मुस मिया पीतगगना पुसाकोसा पांधा। ते मुझ० ॥ २३ ॥ विल्टी भये उदर लाया गियरी इस्यारी । मूड गमार तणे भये मेंजु सीप मारी । ते मु०॥ २५ ॥ भाड ना त भये पद्रिय जीव जनार चणा गोपिया पाडतात मुम०॥२॥खाडण पीमण गारना आरंभ अनय । गषण पण अग्निना रिया पाप उद्र ॥ त मुझ० ॥ २६ ॥ विषया चार विधी पसी से या पार प्रमाद । इष्टवियोग पाट्याम्यिा रदा रियाद । मुम० ॥२७॥ माधु अनेक थमण तणा प्रतला भाग्या । मूल धने उत्तर तणा मुन दृषण 7ग्यात मुम० ॥२८॥ साविधी सिंह चितरा शकराने समला । सिर जीय तण मग हिंगा पाधी माली ॥ न भु० ॥ ९॥ सुयायी दूषण धणा, यली गर्म गलाया जानाणी ढोल्या घणा शलयत भनाया ते मुझ ॥ ३० ॥ भर अनंत भमना था कीधा पु?य सम्मघ । विविध विविध परी यामिर्क तिण प्रतियध ॥ ते मुश० ॥३॥ भन अनेन भमना था कीधा परिग्रहसंयध । त्रिविध विविध परी चोसिरुतिण प्रतिरघाते मुझ० ॥३२॥ एणिपो इण भने परमये कीधा पाप अवध विविध विषिष करी थोमिक क्रम पवित्र ते मुझ० ॥ ३३ ॥ राग चे गडी जे सुण ए तीनी ढाल । समय सुंदर यहे पापयी छुट तत् काल ॥ ते मुझ०॥ ३४॥ अर्हम श्री मिद्धचकमण्डल पूजनविधि प्रथम मुदर अगोपागवाला मात्रियानीए मला पाणिथी स्नान फग्र्यु -जन्मत्र-ॐही अमृते अमृतोदव अमृतयारणि अमृत श्रापय २ स्वाहा । आ म प्रथी पाणि मत्रीने पडेही मामले विमरे विमलाइ सय तीर्थ जलरोपमे पापा चावा अनुचि शुचि भवामि स्वादा था मरथी सातयार भणी स्नान क्सु, परे ॐ ही ओं आँ नम नामथी सातवार मन्त्रिने वरन शुद्धपरीने पेरा, तथा ।
ॐ आ हा प्रों बहते नम आमत्रासातयार पेशर मात्रिने तिलक करघु पछी में ही अवतर बस्तर, मोमें सोमे धुर पुरु यग्गु चागु सुमणे सोमणम महमदरे ॐ पचली फ क्षा म्याहा आमत्रथी नाडा छोडी, मिंडल, मरोडापरी मत्रिने हाथ पाधवी, ज्यार मड रनी चार तरफ लामिडल याधे यापण यामप्रथी मखिने घाधनु, तथा नाप्रमाणे गपणा शरीरने गुद्धकरि स्लामिया गुरु महाराननी समुप हाथ जोडाने घेसे त्यार गुरुमहाराज या स्नानियामो पण अगरश्या स्तोत्र मणी अगरक्षा करे --- अथ मगरक्षा स्तोत्र ॐ परमेण नमस्कार सार नरपदामय यामरक्षाफर बन पज राम स्मराम्यहम् ॥ ॥ॐ नमा अरिहनाण शिरस्थ शिरसि स्थित ॐ नमा ससिद्धाण मुगे मुग्वपटर ॥ २॥ ॐ नमो आयरियाण अंगरक्षातिशायिनी ॐ नमो उय शायण आयुधं इस्तयोदृढम् ॥३॥ ॐ नमो रोप मनसाहण मोचये पादयागुभे एसा पवनमुकारे शिलाज मयितले ॥४॥सार पार पाणामणाम्रो बज्रमयो यहि मगलाण च स वेमिखादिग्गार खातिया ।। ५ ।। स्थाहात च पद प्रय पदम हवा मगर वापरिवनमय पिध न देह रक्षण ॥६॥ महा प्रभागादय शुद्रापद्रवनाशिनी परमेष्टि पदाहुना पथिना पूर्व सूरािम ॥ ७ ॥ यधे कुस्त रक्षा परमेपिदै सदा तस्य न स्याट भय याधिगतिश्चापि पदाचन ॥८॥ था स्तोत्र गणनार गणिने नामरक्षा करपी, पछ वणगार नवकार मरथी मनिने चोटलीनी गाठ याधी, आ प्रणयार नरसाग्मत्र गनिने सर्वे नात्रियाना कानमा गिनिमगरनार गुरपुत्र आप था प्रमाण निधि गानिस्नान पतिष्टामा तथा नरपद मडलनी पूजायपते फरपी पडे मन्दिरमा जे अधिष्टायिका वधी होय त सर्वना पूजा करे, जद्रव्य चढाव, पठे चपरी ना तलमा हिंगलुर अथवा सिंदर, भेलवीने क्षेत्रपालनी पूजा कर, तथा चादना परखथी अग
रचना परे अतर तथा पुरु धुप दीप नवे। पर बिगो भर
ॐक्षत्रपागय नम एमयाला साध्य चढाय
रायपद मण्टरनी जमणा तरफ दशदिगपारना पाटलानी स्थापना
परवा परदिग पारनी पूजा कगने मय प्रत्ययी पूजा कर
दशदिग्पाल पूना
ॐनमा द्वाय, सायुधाय समानाय सपरिकगाय, शम्मिन
जम्युद्धिय भग्नयेने अमुष नगर अमुक जिन चैत्य श्रीायपदमपनर
पुजा महात्मर आग छ र यति पूना गृह शान्ति नुष्टि पुष्टिं रिद्धि
घृद्धि पुरु२ म्वाहा । ॐrहाय नम आ प्रमाणे पहीन भारान
पूजा पर दिशामा जल पदन धूप, दीप, नरेव, आदि अदर वढार
२ ॐ नमा अग्नय मायुधाय, समादनाय अस्मिन् जम्बूद्विष भरत
षेत्र अमुक नगरे अमुकनिन चैत्य श्री नयप मण्डलपूजा महोत्सरे
परिपजा गृह शानि तुपि पुष्टिं गिद्ध पृद्धि पर
दय चटापा ॐ अयय नम । ३ ॐ नमो यमाय सायुधाय मयाद
नाय मपरियराय जम्यादप भरतो अमुग्न थमुर जिन नवपद
मण्डल पूजा महोत्सरे आगन्ध २ य- पूजा गृह २ शानि तुष्टि पुष्टि
गिद्ध द्धि कुरुगुर स्वाहा सब द्रव्य चढायवा, ॐ यमाय नम ।४ ॐ
नमो नरुनाय सायु सरा सपरि म जम्बू भरतक्षेत्र नयपद्मण्डल
पूना महोमवे आगच्छ र यहिं पूजा गृह र शान तुष्टिं पुष्टिं गिद्ध
वृद्धि फर २ स्वाहा, मध्य चढायया ॐ नम्ताय ना ।
नमो यरुणाय सायु समा सपरि 4 जम्यू मरतने नवपदमण्डल
पूजा महोत्सव यागच्छ २ पनि पूजा गृह २ शाति तुष्टिं पुष्टिं रिविं
वृद्धि कुरु २ माहा मन द्य चढापा ॐ चरणाय नम । ६ *
नमो बायरे सायु मयाह सपरि अम्मि जम्मु भरत अमुक्न
अमुमजि नयपदमण्डल पूजामहोत्सव भाग 3 - पति पूजा गृह ।
शाति नुधिं पुष्टि रिद्धिं कुरु स्वाहा सव द्रय चटावना ॐ धायने
नमः ७ ॐ नमो कुरोग्रय, सायु समाह सपरि शास्मि जम्बू भरत
अमुस्न भमुजि था ननपदमण्डरपूजा महोत्सने आगन्छ गरि
पूजा गृह २ शानि पुष्टिं तुष्टि सिद्धि वृद्धिं कुरु स्वाहा, सब द्रव्य
चढाववा, उपगय नम [८ॐ नमो इशानाय, सायु मना
सपरि अस्मि जम्बू भरत अमुरन यमुनि श्रीनवपदमण्टर पूजा
महोत्सवे आगन्छ २ वलिं पजा गृह शाति तुटिं पुष्टि गिद्धं वृद्धि पुर
२ स्वाग, सप द्वय चढावया, ॐ ईशानाय नम १९ॐ नमा ब्रह्मणे
सायु सवा मपरि जस्मि जम्बू भरत यमुक्न नमुराजि श्री
नवपदमण्डलपृजामहोत्म आगन्छ वरि पजा गृह शान्ति तुष्ट्रि
पुष्टिं रिद्धिं वृद्धि कुरु २ स्वाहा, मव द्रय पदारया ॐ ग्रहह्मण नम ।
70 ॐ नमो नागाय, सायु सा सपरि अस्मि जम्यु भरत अमुर
अमुर श्रीनरपदमण्डरपूजामहोसव आगच्छ - परि
पूजा गृह
शानि ताट पुष्टिं गिद्ध वृद्धि फ २ स्वाहा, सर द्वय चढाया,
नागायनम ।
उपरप्रमाण सव दिशामा नाटय पानसहित चदारना, गेण्ड
नाणु पछे उपर यमुपरस्त्र लाल सूत्री गगन, पछ ॐ शनिपा
लाय नम का प्रमाणे ही दशदिशमा दशदीपक पुलपती-उभी
पतीनोटीचो परे
इति दशनिग्पाल पूजनविधि ।
--
श्री नवग्रहपृजननिधि ।
भगनाननी डारी तरफ नचाहना पटानी स्थापना करवी, १
ॐनमो मादित्याय मायु सवाह सपरि भस्मि जम्यू भरत
अमुक्न अमुनि श्री नवपदमण्डलघुनामहान्सव भागन्छ र यलि
पूना गृह र शाति तुधिं पुधि रिवं वृद्धि गुरु २ अन तिष्ट २ स्वाहा
सूपाय नम जल सदन पुष्प धूप दीप नैवद्य अक्षत फ्ल यजामहे
म्यादा आमयोगिअपद्रव्य चडागया।
२ॐ नमो चढ़ाय, मायु सवाह सपरि अस्मि जम्बु भरत
अमुस्न अमुमन धीनवपदमपटरपूजामहोत्सने आगच्छ २ याल
(२८)
पूना गृह शानि तुष्टिं पुछिरिद्धिं वृद्धिं कुरु २ अन तिष्ट २ स्वाहा,
चद्राय नम थम वोटरीने जर चन्दन द्रव्यथी पजारे, तथा अप
दय चार
३ ॐ नमो भामाय, सायु सना मप स्मि जम्बू भरत अमुन्न
जमुपाजि श्रीनरपद मण्डरपूजामात्मने आग छ - चलि पूजा गृह
शान्ति तुष्टिं पुष्टिं गिर वृद्धि पुर २ अन तिष्ट स्वाहा, ॐ भोमाय
नम जाम कहीने अपदप चहोर।
ॐ नमो बुधाय, सायु सवा सपरि, अस्मि यम्बू भरत
अमुमन अमुजि श्रीनरपदमण्डरपूजामनोये आगच्छ र यलिंपूजा
गृह २ श्री शातिं तुष्टिं पृष्टि गिद्धं वृद्धि युरु २ अत्र तिष्ट . स्वाहा,
ॐ उधाय नम आम यालीने अपदव्य चढाया
ॐनमा वृहस्पतये सायु सपा सपार अस्मि जम्बू भरत
जमुस्न अमुकाजि श्रीनरपदमडल पूजामहोन्सो यरि पूजा गृह २
शानि पुष्टिं पुष्टि रिद्धिं वृद्धिं कुरु अत्र तिए माहा ॐ वृहस्पतये
नम , कहीने अपद्रव्य चढाये
६ॐ नमो गुराय, मायु० साह० सपरि० अग्मि जम्बू भरत.
अमुस्न अमुनि श्रीनवपदमटर पुजामहोत्सरे गले पूजा गृह २
शाति पुष्टिं पृष्टि रिद्धिं वृद्धि कुरु • अत्र निष्ट २ स्वाहा, ॐ शुवाय
नम पहाने अप द्रव्य चढ़ाये।
७ ॐ नमो शनिश्चराय,मायु सवा सपरि अस्मि जम्धू भरत
नमुक्न अमुकजि श्रीनवपदमण्डलपुजामहोत्सवे आगच्छ २ वलि
पूजा गृह अत्र तिष्ट स्वाहा, ॐ शनिश्चराय नम पहीने बट
द्रयचढावा
८ॐ नमो राहवे सायु सपा मपरि अस्मि जम्य भरत अमुग्न
जमुजि श्रीनवपद्मडल पूजामगेसन आगच्छ - यलि पूजा रह
२ अत्र तिष्ट स्वाहा, ॐ राय म , कहीन अद्वय चढावया
९ॐ नमो वेनरेसायु समा सपरि गस्मि जम्मू भरत अमुक्न
अमुमजि श्री नगपदमहलपुनामहात्म आगच्छ २ वाले पुजा गृहर
(२९) २ अन तिष्ट २ स्थाग, ॐ ऐतवे नम आमहीने अष्ट द्रव्य चढाया आप्रमाणे नवग्रहनी पूजा परीने पड़े नवमहानो पाटो भगया ननी डागी पास रावयो अने तेने कुसुयल घन तथा सूत्रथा थाधे पछ ॐननग्रहाय नम पर पहीने अष्ट द्रव्य नागरचरना पान तथा स्पान'णु भेटररे चार तरफ नव दीपक को, अपना एस दीपक करे इति नगृह पूजन वरि ॥ - जय देवगन्दनानिधि पछे वधा स्नात्रियाओ आठ वस्तु (थोय) यी देवपदन करे, प्रथम विधिफरावनार गुरु अथया विधि फरमार प्रथम खमासमण इरियारहि, तस्म उत्तरी, अनथ कहिने चार नोहारनो का उस्मग करि प्रगट लोग्गस्म फहे पडे खमासमण० दइने, जमणो दिचण निचे राखे, डायो पग उचो रासे, पछे इन्छा कारण सदिमह भगवन् चैत्यपदन करु इच्छ-चैत्यवदन परे ॐ नमो पार्श्वनाथाय विश्यचितामणियते । ही धरण द्र वगेट्या पद्मादेवी युतायते ॥१॥ शाति तुष्टि महा पुष्टि धृति कीते विधायिने । ही दिव्याल्वेताल सर्वारियाधिनाशिने ॥२॥ जयाजितारय रिजयारया पराजितान्विता । दिशापाल प्रहयक्षीनद्यादेवी भिरन्विता ॥ ३ ॥ ॐ असिया उमाय नमस्तन प्रलोक्य नारताम् । चतुष्टि मुरदास्ते भागते छत्रचामरै ॥४॥ श्री सवेश्वरमण्डनपार्थनिन ' प्रणतकल्पतरकल्प । चूरय दुष्ट बातमे पुरय वान्छित नाथ ॥५॥ पछे जरिचि नमुथुण, अरिहत चेइयाण करोमि काउसग्ग, पदण, अन्नय काउसग एर नवरारनो पारीने, नमोऽहत् सिद्धाचार्यो- पाध्याय सवसाधुभ्य , फहीने थोय पहे - (३०) महस्तनोतु माय त्रिय यस्यानतो । अध्यन्द्रिमा हिरेहरा सासाच्यते ॥३॥ पछ लोगम्म पनीन सपलप, यत्रण पत्तियाए, मसयप काउस्मग एक नगरनो परे पडे पान-योजिथायदे- आमिनिमता या डासनस्य नाता मदा यदाधिध। याश्रिय ते थिया 7 भवता भवना जिना पातु ॥२॥ पुपरवदि पदण, पाइरसग्ग पर नाना करीन, पार्गनि- याय कई नातत्ययुना निपातिता रिसान पुण्यशक्तिमता । पन्धमानि विद्यानन्दाम्या जागीजियार ॥ ३॥ सिद्धाण उद्धाण याने देवाधिदेव शारितानाय आगधनार्थ करे पाउस्मग चंग्ण जगाय, पटीन काइसग एक रोगस्सनो सागर गभिरा मुधि पीन पर नमाऽदन वदीन चोधी थोय पदपी--- श्री शाति श्रुतशाति प्रशान्तिकोऽसायशानिमुपशान्तिम नयनु गदा यस्य पदा मुशान्तिदा सन्तुसतिजने ॥४॥ भी हादशाह।-आगधनाथ परेमि का उमग्ग पदण अन्तर कद्दीन काउन्सग एक नारनो परीने पारे पड नमोऽईत् कहाँ पाचमी धाय यह- सागरसिद्धसाधन योजोपाहगा सदा पुरदुपागा। भरनादनुपदतमहातमोऽपहाडादशाहोय ॥५॥ सुभदवियाए परमि फाउस्सग अपथ, पद्दीने नकारना उम्मग्ग करे नमोऽहत् पहीन छडी योय कद्द-- वद बदति चाग्वादिनि भगवति श्रुतसरस्थति गमेच्छु ॥ रङ्गतरङ्ग मतिवरतरणि स्तुभ्य नमः इतीह ।। शासन दवता आगधनार्थ फरेमि का उसग्ग अपत्य नोकार काउसग्ग करी नमोऽहत् कहीने सातमी योय कहे- उपसग्गयलयविलयननिरता जिनशामनाउनेकरता । द्रुतमिह ममोहित रने स्यु शासन देवता भवताम् || ॥
- --- समस्त वेयावच्चागराण मात करेमिमिका अनत्य काउस्मग एक नवाग्नो यही पारीने नमोहन रही आठमी थोय फ्हे- मघऽवये गुग्गुणानिधे सुचैयामृत्यदिकरणैनिघद्धस्था । ते शातये सहभवन्तु सुरा मूरिभि सहृदृष्टयो निखिल विन निघातदक्षा ॥८॥ पछ नकार उभा गणया पछे रेसाने नमुयुण जावनिचे समा जोरत पिसाट नमोऽईन् सिद्धा कहीन म्तचन क्हेवु ॐमिति नमो भगवआ अरिहतसिदायरिय उपन्याए । वरम साह मुणि सघधम्मतिथपरणस्स ॥१॥ सापरणमो तह भगवई सुयदेवयाह मुहयाप । सिरपति देवयाण मिपश्यण देवयाण च ॥२॥ इना गणिजमनरेइय चाणपाडरमाणा। घभा नागुति दसहमविय सुटिसाण पालाण ॥ ३ ॥ मामयमवरणवसमणनाममाण तहेच पचण्ह । तह रोगपाल्याण मुरागहाणय ननण्ह ॥ ४ ॥ साहतम्म समय मामिण चेन उम्मणु हाण । सिद्धिमनिग्ध गच्छर जिणार नवकारओ धणिय ॥५॥ पछ जयनियराय सम्पूर्ण कहेगा इति देवपदनानिधि पूर्ण . नवपदमण्डल प्रतिष्ठाविधि । प्रथम मण्डरनी बग्ने तरफ रस्त्र तयाधीना नीवोमरे, दीयो चारपदो सुचि दाखण्ड राये, प3 सोनाना-या चारिना पर शमा पाणि भरिने सोनाचाणिकरे, पठे हाथमा कलश रइने सात नवकार गणे हीधी जीयररी पा-यनाथाय रक्षा कुरु स्वाहा आम न्त्री पाणिन मातवार मत्रे, तया ने पाणिन मण्डलनी चारे तरफ धाराडी दे तथा उपर जरा पाणना छाटा नापीने गुद्धको, पछे नवनार लाल सूना साडाग आटा मण्डलनी यहार चारे तरफ फरे, पहेला पहेर मन्नायी मन्निने राल सुत्र, मिंडल मपेडा फली,
No text on this page.
₹ पीली ध्वजा, पलु घर, पाच गामकरलश मनना पुल तथा जरपुपादि म हाथमा ल्इने आवाय पनी पुकार- आचार्यपद स्थापनानी पूजा करे, सब वस्त, पानीम सीलगाला लीला वस्त्र लीलीवन, वरन रन्न पचीस मरफत रत्न पना, लीरामगना समयीपा छायमा लाने उपाध्याय पदनाजायज हादसारथुतधारान् सपना निवेशयाम्युपाध्यायानु त श्रीधर्मशास्त्रण्यनिशप्रशाप उशीन। ॐ ह्रीं श्रीं उपाध्याय योनम वरदान पश्चिन घीमा,काला रंगना गोला पायबापान, तरफ उपाध्याय पदस्थापनानिमय लाडवा गनपट, २१ रिट लाद मान्य तस्य पुवदल मिशान मन्यस्यादिगुणा मचान् । निश्रेयस पद प्रातान् लिङ्घ मतिमा तत् पुर्वपो परित प्रपष्ट दृष्टानि । प्राप्तानगन् सिद्धिमन तोप सिदगत कर भी मिद्धेभ्यो नम म्याहा दुवं PRITA स्थापनानी पुना फरे, सर्व द्रव्य चनाचे पडे रवाना चदा स्थापयामि तन सूरिन दरियामि चरत पम्यधाचायन् पनि सूरिस्मदाचारविचारसायनाचारत वरम् । उनोसप्र म निवारणार्यसम्पर्य या * ही श्रीसरिभ्योनम स्वाहा, अपनी यानिशातरख अध्यापकास्ता न परापत्रे मिशनमा पूजयानि 10. साधुपदनी पूजा आप्रमाणे कई व्याण्यादिक्मदिन ३ (३४) चैराग्यमतर्वचलि प्रसिद्ध सत्य तपोद्वादशधा शरीरे । येपामुदस्यपगतान सुस्तान् परिधान साधून सदा तान् पूजयामि ॥ १०॥ ॐ हैं। श्री सर्व साधुभ्यो नम स्वाजाप्रमाणे पहीने उतर दिशा तरफ साधुपद स्थापनानी पूजा करे सर्व द्रव्य चढाये, पछे रकेचीमा सफेद गोला, सफेद वस्त्र, सफेद ध्वजा, ६७ मोती, जलपुष्प धूप दीपादि हाथमा लग्ने आप्रमाणे दशन पदनी पूजा कहे- जिने द्रोक्तमतश्रद्धालक्षणेदर्शने यजे मिथ्यात्वमथन शुद्ध यस्तमीशाने मट्टले ॥ ११ ॥ ॐ ह्रीं श्रीं सम्यस्त्वदर्शनाय नम स्वाहा, आप्रमाणे यही इशान खुणे दर्शनपदनी स्थापना पूना परे, पछे रफेरीमा ५१ मोती, सफेद गाला, घना, यस्त्र, घपदीप नैवेद्य सर्ने अष्टद्रय हाथमा लइने आ प्रमाणे पज्ञा कहे- अशेषसनद्रव्यपर्यायमवारभासकम् । शानमाग्नेयपत्रस्थ पूजयामि हितानहम् ॥१२॥ ॐ है। श्री समरत्वज्ञानाय नम , स्वाहा आ प्रमाणे कही अग्नि कोणमा शानपदस्थापनानी पूजा करे, सर्व द्रव्य चढा, पछे रकेतीमा ७० मोती सफेद गोला सफेद या सफेद धजा जलपुष्प धृपदीपादि हायमा लड्ने चारित पदनी पूजा पहे-- स सामायिकादि दैश्चारित्र चार पचधा। सस्थापयामि पगाध पत्रेह नरुते प्रमात् ॥ १३॥ थी मम्मग चारित्राय नम राहा, आ प्रमाण फहीन नेरुत्य गुणमा चारित्र पद स्थापनानी पूजा करे, पछे रचीमा ' मोती सपद गोगमफेद घन्त्र सफेद मजा, तथा जरपुप धूपदीपादि हाथमा रहने तपपदनी पूजा या प्रमाणे करे- द्विधाद्वादशधाभिन्न प्रतेपत्रतप म्ययन निघाययामि भायात्र याय या दिशि शर्मदम् ॥१४॥ ॐही धी समश्य तपसे नमः स्वाहा का प्रमाणे कद्दीने बायय गुणामा तपपनी स्थापना पूना करे,
(३०)
अथ अर्घ्यपूजा
नि स्वेदत्वादिदीव्यातिशयमयतनुन् धाजिनेद्रान मुसिद्धान्
समक्त्वादिप्रयाएमृदाचारसाराश्चसुगन् ।
शास्त्राणि प्राणि रक्षाप्रवचना सुंदराण्यादि यज्ञ
तत् सिद्धय पाठकाना मुनिपतिसहितानर्वयाम्यघाने ॥ १४ ॥
इथमष्टदलंपद्म पूररेदहदादिभि ।
साहाने प्रणवाद्यश्चपदैनिमनिवृतये ॥१६॥
ॐ ह्रीं श्री अहं अमिया उसा सम्यग् दर्शनशानचारित्र तपसभ्यो
ही श्री अहं परमेष्टिने परगनाथ परमदेवाधिदेवाय परमाई परमानत
चतुष्टय परमामने तुभ्य नम । या प्रमाणे मनमणीने अर्घ्य आप।
इति प्रथम घल्य मूलपूजाविधि ।
अथ द्वितीय घल्यपूजा
प्रथम वलयमा एकमयमा चारदिशा,चारविदिशा, आप्रमाणे अष्ट
दल कमलना आकारे नर कोठा मंडल्ना मध्यभागमा होय छ ते नी
पुर्वोक्तविधिथी पूजा कर, पछे यीजा वलयमा १६ कोठा होय, जमा
एक कोठाना आतर आठ कोठामा अपदि जाउ वर्ग स्थापना परे,
तथा एक एक कोठामा पचमा पाली रहेल कडामा अनाहत जेम-
ॐ ही नमो अरिहताण आठ पद स्थापना कर, पछे एक रकेतीमा
सार तथा विग तथा एर रकेचीमा माटी द्वाप, लइने उभा रहे
१ तथा ॐ ही नमो मरिहताण कहीने सार लविंग चढाववे तथा
तथा आठवर्गमा द्राप चाढाये, अ, आ, इ, ई उ, ऊ, नार, ल,
ल, ए, ऐ, ओ औ, अ अ . ही स्वर घर्गाय नम आटेकाणे १६
सोल द्राख चढाने, २० ही नमो थरिहताण साकर लविंग चढाने,
३॥फ ख, ग, घ ड,ॐ ही व्यजनक्वर्गाय नम १६ द्राप चढाने
४॥ॐ ही नमो अग्हिताण ७च छ ज झ ञ, ॐ ही चवर्गायै नम
६ ॐ हा नमो अरिहताण ७ ट ठ ड ढ ण, ॐ ही टवर्गायै नमः
ॐ ही नमो अरिहंताण ९ तथदधन ऊँ ह्रीं तवर्गाय नम १० ॐ ही
नमो अरिहंताण ११ पफयमम, ॐ ही पवर्गायै नम १२ ॐ ही नमो
अरिहताण १३ यरलय, ॐ हीं यक्गायै नम १४ ॐ ही नमो अरिह
ताण १५शपसह ॐ ही शयर्गाय नम ॥१६॥
(३)
पेग भयगथी पगसुधिदग्य यर्गमा मार सोर द्वारा चढारे
तथा यरल्यमा ३२द्वार चढाये, सया शरसमा ३२ छाप घढान,
इति द्वितीययस्य पूजा
अथ तृतीयालयलब्धि पद पूजन विधि ।
तीजायल्यमा चारदिशा, घार विदिशा, भाउ परमेष्ठि पदनी
स्थापनाना आठ योगर अनेभा बाट काटा पचमा वणवण
पत्यामारपरे प्रण पत्र्याचारमा २५ पाना थाय, एक एप पोटामा
घोधिपद म्यापन कग्याथी २५ पानमा ४८ धिपदनी स्थापना
करपी भाट परमेटिपदमा * ही परमेटिने नम स्यादा मा प्रमाणे
आठ थपत फहीने आट धानोरा पदाचे कारण तेनो रगतीमोरा
जैपाछे पछे ग्धिपदना नामयोरीन ४.सारको चढाय, मामा ५८
एन्धिनो यणी सारेक जयोछ
१ॐही अहणमो अग्दिनाण
२ॐही ईणमो मोहिजिणाण
३ ॐही ईणमो परमोदि जिणाण
४*ही णमो सयादिजिणाण
५ *हिणमो अणतोहि जिणाण
६ ॐ ही हणमो पुरधुरिण
७*ही अहणमा पीय बुद्धिण
८ॐ ही आईणमा पयाणुसारिण
९ॐही .हणमो आनीपिसाण
१. ॐ हीं अहणमा दिठीविसाण
१. ॐ ही अहणमा समिश्नसोयाण
१२ ॐ ही अँहनमोसयसंयुद्धाण
१३ ॐ ही अहणमो पत्तेय युद्धाण
१४ही हणमो चाहियुद्धाण
१५ ॐ हा अहणमोजमहण
१५ॐ ही हणमो रिउलमण
१७ ॐही अणमो दसपु पीण
१८ ॐ ही अंदणमो चउदसपुपुयीण
१९ ॐ हीं थहणमा अटगनिमितयुशलाण
२०ॐही अहणमो यिउरण इहिपत्ताण
२१ॐही अहणमा निजाहराणा
२२ ॐ हीं अॅईणमोकारण लक्षिण
२३ ॐ ही अहणमा पण्णास मणाण
२४ॐही अंदणमा आगाम गामिण
२ ॐ ही अहणमो खीगमतीर्ण
२६ ॐही हणमा सप्पिसवाण
२७ॐही भेदणमो महासन्याण
२८ ॐ ही हणमो थामियाममाण
२९ ॐ ही अंदणमो सिद्धायणाण
३० ही महणमा भगवयामहा महावीरयमाण
घुसरिमिण
३.ॐही अंदणमो उम्गतवाण
३२ ॐही हणमो अग्रियणमदाणसियाण
३३ ॐ ही हणमो यद्रमाणाण
३४ ॐ ही अणमा दित्तवाण
अँहणमो तत्तयाण
३६ॐ ह्रीं महणमो महातयाण
३७ ॐ ही अहणमो घोरतयाण
३८ ॐ हीं अहणमो घारगुणाण
३. ॐहीं हणमो घोरपरिमाण
४. ॐ ही अहणमो घोरगुणयमयारिण
४. ॐ हीं अँणमो यामासहिपत्तार्ण
४२ॐ हा अहणमो पलोमटिपताण
४३ ॐही हणमा जल महिपताण
४४ ॐ ह्रीं अहणमो विप्पासाहपत्ताण
४ *ही भरणमा सयोमा पसार्ण
४. ॐMणमो मणयगणं
५. *ही अहणमा ययणयरीण
४८* अदणमा वापयलीण
ॐही भई अडयाररधिपदभ्यो नम आधारीत धिपदना नाम
पोलीने तीजा चाथा, अन पाचमा परगमा, मारय ४८, चहारथी, पछे
मण्डलना गलाना स्थानमा ही पारना स्थापना पायी, अन त्याची
मादा त्रण पत्य, मंगनी चार नरम घी, श्रने नी लखयो
छटायग्यमाना मार दिशामा माउ गुरुपादुफानी स्थापना एपी
*ही थी अहगदुषभ्यो नम
२ ॐ हीं भी मिद्धपादुपभ्यो नम
३ ॐाधी भाचार्यपारेभ्या नम
४ ॐाश्री गुरुपादुरेभ्यो नम
vधी परमगुरुपादुकभ्या मम
६ ॐ श्री भदृष्टगुरुपादुअभ्यो नम
७*ही श्री अनन्तागुरुपादुभ्या नम
८ ॐ श्री अनन्तान तगुम्पादुरेभ्यो नम
ॐ हीं अष्टगुम्पादुक्म्या नम स्वाहा
आ प्रमाण पालीन आठ दाड तथा धुरमाना थाउ साड्या
चढावया
मातमा वलयमा जयादिदेवीयोनी स्थापना करवी.
१ॐ ही जयायै नम स्याहा
ॐ जयय नम स्वाहा,
ॐ ही जम्माये नम स्याहा ६. ही माहार्य म म्वाहा,
३ ॐ ही रिजयायै नम महा ७ ॐ ही अपराजितायै नम स्वाहा
४ॐ ही धमाय नम म्वाहा
८*ही अधाय नम स्वाहा
आप्रमाणे आठ नारंगो तथा थुदिना अयया चणानु लाइ चढाया
आग्मा चल्यमा सोलविद्यादेवीनी स्थापना करवी
१४ हीरोहिण्यै नम २*हीं प्राप्न्यैनम
३ ॐ ही वजम्वलाय नम १०ॐही गधाय नमः ४ ॐ हीं बज्राकुशाय नम ११ ॐ ह्रीं समात्र महाग्नालाय नमः ॐही चक्रेश्वर्य नम १२ ॐ ह्रीं मानये नम ६ॐ ह्रीं पुरुपदत्ताय नम १३ ॐ ह्रीं वेस्टयाय नम ७ॐ ह्रीं फाल्नम १४ ॐ है। अछुन्ताय नम ८ॐ ह्रीं महामाय नम । ॐ हैं मानस्यै नम ९ॐट्टी गार्य नम १६ॐ ही महामानस्यै नम था प्रमाणे बोलीने सोल नारगी, तथा सोल मोतीवरना लाडवा चढावे ननमा वलयामा टाना पडसे २४ शासन देवी ओनी स्थापना करवी १ॐ चम्यानम १३ ॐ विदितायै नम २ ॐ अनितालाय नम १४ॐ अकुशाय नम ३ ॐ दुरिताय नम १५ ॐ कलपाय नम ४ॐकाल्ये नम १६ॐ निजाण्यै नम । ॐ महामाल्यै नम १७ॐ चलाये नम ६ॐशामाय नम १८ ॐधारिण्यै नम ७ॐशाताय नम १९ ॐ धरणप्रियाय नम ८ॐ भृकुट्यै नम २० ॐ नरदत्तायै नम ॐ सुतारमाय नम २१ ॐ गाधार्य नम १. ॐ अशेवाय नम २ॐ अस्त्रियाये नम ११ॐ मानये नम २३ ॐ पद्मावत्यै नम १२ ॐ चण्डाय नम २५ ॐ सिद्धायिकाय नम पठी दक्षिण दिशा २४ यक्षनी स्थापना करवी आ प्रमाणे गोलीने घरप रगारेटी २४ सोपारी, चढायची ॐ गोमुखाय नम ४ॐ यक्ष नायफाय नम २४महायमाय नम • ॐतुयरवे नम ३ॐ त्रिमुपाय नम ६ ॐ कुसुमाय नम (४०) ७ॐ मातगाय नम १६ॐगरुडाय नम २४ विजयाय नम १७ ॐ गधयाय नम ९ॐ अजिताय नम १८ यक्षराजाय नम १० ॐ ब्रह्मणे नम १९ ॐ कुयेयय नम ११ ॐ यक्षराजाय नम २० ॐवरणाय नम १२ ॐ कुमाराय नम २१ ॐ भृकुटयै नम पण्मुखाय नम २२ ॐ गोमधाय नम १४ ॐ पातालाय नम २३ ॐ पाश्चयक्षाय नम १५ ॐ किन्नराय नम २४ ॐ ब्रह्मशातये नम मा प्रमाणे चोलीन २४ सोपारी चढावे तथाचारे दिशामा चार द्वारपालनी स्थापना करे पूर्यदिशामा-१ॐ मुकुन्दाय नम दक्षिण दिशामा २ ॐ अंज नाय नम पश्चिमदिशामा ३ ॐ यामनाय नम उत्तर दिशामा ॐ पुष्पदताय नम आ प्रमाण योरीने चारे दिशामा पीला चणाना फाफडा नथा यलियाकुला चढावया पछे चार विदिशामा चीरनी स्थापना करवी १ॐ मणि भद्राय नम ३ॐ कपिलाय नम २ॐ पूर्ण भद्रायनम ४ॐ पिंगलाय नम आ प्रमाणे योलीन काला बलीवावुरा तथा बाला तरना लाडू चढावा त्यारयाद पूण कलशना आकारे घरेल, सिद्ध चक्रना गगना ठेकाण नव निधाननी स्थापना करवी, तथा सोनु चादि आदि परशाोमा गेस्ड नाणु घालीने स्थापना पग्धी १ॐनैसरिफायनम ५ॐ महापामाय नम २ ॐपण्डाय नम ६ ॐ कालाय नम ३ ॐ पिंगलाय नम ७ ॐ महाशाय नम ४ ॐ सवरत्नाय नम ८ॐ माणघाय नम ९ ॐशस्त्राय नम
पारवाद कालापल (काशीफल) हायमा लाने ॐ ही गि
मलस्वामिने नम पर कहीने चढायु पाहु यीजीवार कोला
फल (पाशीफ्ल ) हाथमा रहने ॐ ह क्षेत्रपालाय नम
कहीने चढायु, पछे ताजीयार कोलापल झपमा एने ॐ
है। चकेश्च म पद्दीने चढायधु, पछे चोथी पार कोलाफल
हायमा लाने ॐ ही सिद्धायिकाय नम फहीने चढायतु त्यारयाद
दशदिशाओमा दशदिगपालनी स्थापना परची अने आपणी यया
शनि यण प्रमाणे यब न चलायया अथवा वध ने समान
चढाया
दशदिग्पाल पूजा
१ ॐ इद्राय नम फनर यण-पलवस्त्र चन्दन केशर,
धूप दीप तथा दाख, पान सोपारी, गण्ड माशु यादि द्रव्य
चढायना, २ अग्निशेषमा ॐ अग्नये नम
रोकर नाणु धूप दीप नैवेद्य जल चंदन चढाधु ३ दक्षिण
दिशामा ॐ यमाय नम काला गगनु परख, तथा पकड नाणु
धूप दीप नैवेद्य जल चदन चदारयु, ४ नैरु यकुणमा धुसर यणनु
यन्त्र तथा रोक्ड नाणु घरदीप नैवेद्य जर चंदन चढाय..
पश्चिम दिशामा ॐ यरुणाय नम धुमरयण यरब, तथा धुमर
घर्णनु नैवेद्य धूप दीप जल चदन चदाउ ६ पायय कुणम ॐ
घायवे नम प्लुवर्णनु घरन तथा धूप दीप नैवेद्य जल चंदन चढा
यवा ७ उत्तर दिशामा ॐ कुरेराय नम सफद वस्न तया
धुप दीप नैवेद्य जल चदन रोक्ड नाणु चढावना ८ इशान कोणमा
ॐ ईशानाय नम सफेद यरस, गाड नाणु धुप दीप नैवेद्य जल
चदन चढाव ९ अधा दिशि ॐ नागाय नम, सफेद पत्र
धुप दीप नैवेद्य जल चन्न रोकड न णु चढापघु १० याच दिशामा
ॐ ब्रह्मणे नम सफेद पत्र घुपर्दप नैना जल चदन रोक्ड
माणु चढायधु
स्यारवाद निचे पडघी स्थान नवग्रहनी स्थापना करवी
(४२) नवग्रह स्थापना ॥ ॐ सूर्याय नम लाल वस्र धुप दीप नैवेद्य जल चंदन सर्व द्रव्य रोस्ड नाणु चढाना २ ॐ मोमाय नम सफेद वस्त्र धुप दीप नैवेध जल चदन सबढ़ प रोस्ड नाणु बढाउनु ३ॐ भोमाय नम लाल वस्त्र धुप दीप नैवद्य जल चदन नैवेद्य सन द्रव्य तथा रोक्ड नाणु चढावधु ४ ॐ बुधाय नम लीला रंगनु वस्त्र धुप दीप नेवेध जल चदन तथा गैर नाणु चढान ॐ वृहस्पतये नम पीठ घन्न धुप दीप नैवेद्य जल चदन रोकड नाणु चना ६ ॐ गुमाय नम सफेद वस्त्र धुप दीप नैयद्य जल चदन पेस्ड नाणु चढाव ७ॐ शनिश्चराय नम अस्मानी रगनु वस्त्र धुप दीप नवेद्य अर चदन तथा रोमड नाणु चढाउ ८ ॐ राहवे नम पाठा रगनु वस्त्र धुप दीप नैवेद्य जल चदन तथा रोक्ड नाणु चढायवु ९ ॐ पतये नम पारगी चल धुप दीप नैवद्य जर चादन रोकड नाणु चढावनु था प्रमाणे यपि पिधि करीने पड़े नरपदजीनी पूजाकहे भणावे, तथा नवपदजीना आरती उतारे पछे नवपदजीनु चयवदन करे, उम्पन सनाण महोमयाण सम्पाडिहेरासणसठियाण। सद ममाण दियमजणाण नमो नमो होउ सया जिणाण ॥१॥ जो धुरिसिरिमरिहतमूरढ पपिइटिओ सिद्धर उपाय साहुचिहुँ सागरिटिया । दसण नाण चरित्त तवहि पडसा हे मुदर, तत्तपर समग रद्धिगुरुपयदल्डारु, जा जमावणी पमुहसुर कुमुहिं मलक्यिो जोसिद्धचक गुरु कापतरु अहम मनवछिय दियभो ॥२॥ जरिचि नमुयुण जापति जावत० नमोऽहत० उप सनाण. स्तवन जयवीपराय अरिहंत चेनमारनोमा उसग्ग थोय नवपदनी कहेगी प3 गुरुनी पासे आपीने वासक्षेपथी ज्ञान पूजा करे, रोकड नाणु चढाये, तया शक्ति प्रमाणे सार्मिक वात्सत्प को-अनाथ धारकोनु पोषण कर इति श्री नरपर मटल पूनन विधि
आ ओरी-नयपदनी तपस्या कोई श्रीमत-जैन ग्रहम्यवरे
तो तेणे छ छ महिने आ मंडरानी पूजा विधि, उपर पहेल प्रमाणे
करे तथा तपस्या सादाचार घप कग्यी, पूण थये उद्यापन नव
नव उपकरण, रापया, यथाशत्ति उद्यापा द्रव्य क्षत्र माय
थी करे परतु अनाथ श्रावसोनी रक्षाजिर्णोद्धार आया तप निमिते
फरता रहेछ
नेत्राय घनायुधाय
दगदिगपाल निमर्जन विधि
ॐ नमो राय, पुर्षदिग आधिष्टिकाय, पेरावण चाहनाय सहन
सपरिक्राय अस्मिन् जम्बूद्विपे अमुष नगरे,
अमुक्क्षेने अमुक महात्मने, सर्योपद्रवादक्षयलि पूजा गृह २ स्वस्थाने
गच्छ २ स्याहा ॐ इद्राय नम , २ आगणमा ॐ नमो अग्नेि मतये
शक्ति हम्ताय सायु० सवा० सपरि० अस्मि० अमुक अमुक
सर्वोपद्रवार पलिं पूजा गृह २ स्वथाने गच्छ २ स्वाहा ॐ अनि
मूतये नम ३ दक्षिण दिशामा ॐनमा यमाय, दक्षिणदिग अधिष्ट
पाय, महिपहनाय, दण्डपायुधाय, कृष्णसूतये सायु० सपा०
सपरि० अस्मिक सोपद्वाद् रक्षा बलि पूजा गृह २ सस्थाने गच्छ
२ स्वाहा ॐ यमाय नम ४ नैरुतरणमा ॐ नमो नैरुनाय,
पड़गदस्ताय मायु० सा० सपरि० अस्मि० अमुक अमुक
समापदागद् धनि पुजा गृह २ स्वस्थान गच्छ २ स्वाहा ॐ
मैग्ताय नम, पचिम दिशामा ॐ नमो घरुणाय पश्चिमनिग
अधिष्ठाय मर चाहनाय, सायु० स० सपरि० अम्मि० अमुक०
अमुक० सर्योपद्वाद्, यति पुजा गृह २ स्थस्थाने गच्छ २ स्याहा
ॐ वरुणाय नम ६ घायर पुगमा ॐ नमो घायवे पाय
चाधिपतये, घजहस्ताय इग्निसाइनाय, सायु० सवा० सपरि०
अस्मिक अमुक अमुक० मर्गोप० वलिं पुजा गृह २ स्थरथाने
गच्छ ० स्वाहा ॐ पायवे नम , ७ उत्तरदिशामा ॐ नमो
धनदाय, उत्तरदिग् अधिष्टायकाय, नरवाहनाय, गदाहस्ताय, सायुक
नग्रह स्थापना
, ॐ सूपाय नम हाल यरन धुप दीप नैयेच जर घदन सर्व
द्रव्य रोक्ड नाणु चढायतु २ * सोमाय नम सफेद पात्र
धुप दीप नैवेध जल चढ्न सहस रोड नाणु चढासु ३
भोमाय नम लाल यन्त्र धुप दीप पय जल चदन नैवेध सर
दय तथा रोष्ड नाणु चढावः ४ ॐ धुधाय नम हीला रंगनु
चन्न धुप दीप नैवेद्य जल चदन तथा रोका नाणु चढामधु ५
पृटस्पतये नम पीठ परन धुप दीप नये जर चदन राक्ड
नाणु चढाय ६ ॐशुप्राय नम
शुप्राय नम सफेद चरन धुप दीप नैयर
जल चदन रोक्ड नाणु चढान ७ॐशनिश्चराय नम अस्मानी
रगनु घस्त्र धुप दीप नैयद्य जल चदन तथा रोक्ड नाणु चटावधु
८ ॐ राहवे नम काला रगनु घग्न धुप देय वेद्य जठ चान
तथा रोस्ड नाणु चटाय ९ ॐ पतरे नम पचरगी पत्र
धुप दीप नैवेद्य जल चदन रोकड नाणु चढावा
ा प्रमाणे बरि विधि बरीने पछे नयपदजीनी पूजाकहे-मणाये,
तथा नरपदीना आरती उतारे पछ नरपदी चयबदन परे,
उग्पन सन्नाण महोमयाणं साडिद्दगमणमठियाणे ।
सद ससाण रियसणाण नमो नमो होउ सया जिणाण ॥
जो धुरिसिरिमरिईतमूढ पहिपइटिमो सिद्धसूरि उपाय
साहुचिहु सागरिठिमो । दसण नाण चरित्त तयहि पडसाद सुदरु,
तत्तपर समग रद्धिगुरुपयदलड्यरु, जम्प जस्पणी पमुबसुर
कुमुदि अलंकियओ जोसिद्धचक गुरु कापतरु अझ मनछिय
दियो ॥२॥ जमिचि नमुयुण जापतिः जापत० नमोऽहम्० उप
नसन्नाण० स्तरन जयवीपराय आरहैत चेनपसारनोका उसग
थोय नवपदनी कहती पछ गुरुनी पामे आवीने घासक्षेपथी शान
पूजा फरे, रोकड नाणु चढाये, तया शक्ति प्रमाणे सार्मिक यात्सल्प
करे-अनाथ श्रारमोनु पोषण फरे
इति श्री नपरु मडल पूनन विधि
२॥ पम पद्दी प्रभुना जानुए पूजा करीर ॥ गाया। निम्मल नाणपया- सर निम्मल गुण सम्म निम्मल धमोबएसकर, सो परमप्पा घन्न ॥३॥ ताल ॥ लामा लोक प्राशर नाणी, भविनन तारण जेहनी वाणी ॥ परमानद तप। निशाणी, नसु भगने मुज मति रहपणी ॥ पुसुमाञ्जलि मेले नेम जिगदा ॥ तो० ॥ १० ॥३॥ एम यही प्रभुना ये हाथे पूजा करीए । गाया॥ ज सिन्जा सिननि जे मिन्नं सनि अणत ॥ जमु मालयन टनिय मणसो सनी अरिहत ॥४॥ ढाल | शिवमुप कारण जह त्रिकाले, सम परिणाने जगत नीहारे॥ उत्तम साधन मार्ग देखाडे, इद्रादिक जसु चरण पखाले । उसुमानलि मेटो पास जिणदा ॥ ता० ।। कु. ॥४॥ पम यही प्रभुना ममाए पूजा करीए ॥ गाथा ॥ सम्मदिट्टी देस जय साहु साहुणी सार ॥ आचारिज उयज्ञाय मुणि, जो निम्मल आधार ॥ ५ ॥ ढाल ॥ चउविद मधे जे मन धार्य । मोक्ष तणु कारण निरघायु ॥ विवि कुसुम वर जाति गहेवी, तम् चरणे प्रणमत ठगी ॥ कुसुमाजलि भेलो चार जिणदा ॥ areron.॥ एम कहि प्रभुने मस्त पूजा परीए ॥ इति पाया। - , छह ॥ मयल जिनवर सयल जिनवर निमिय कल्लाणशरिहि संठरिय फरिस धम्म सुपरित्त ॥ इग सत्तरि तिथ्यकर, एक समय विहरति महीयल ।। इगवीस जिण जम्म समय इगस ॥भत्तिय भावे सुजगीश ॥१॥ । दाल पीजी।
(४४) सया मपरि० अस्मि० अमुक अमु० सर्योप० यलि पुजा गृह २ स्वस्थाने गर ३स्थाहा ॐ धनदाय नम ८शान कुणमा ॐ नमो इशानाय, विशाल हस्ताय शानाधिपतये वृषमया यहनाय स यु० सपा० मारि० अस्मि० अमुक अमु० मर्यो० परि पुजा गृह २ स्वस्थाने गच्छ २ स्यादा ॐ पशानाय नम उप दिशामा ॐ नमो ब्रह्मणे, राजहंसवाहनाय, उद्योग विष्टायमाय सायु० सरा० सपारे० अस्मि० अमुक अमुरु० सर्यो. यलिं पुजा गृह २ स्वस्थान ग २ स्वाहा ॐ नमो प्रमणे १० अघो रोक्मा ॐ नमो नागाय पातालनिवासाय, पदमराहनाय, सायु० स० मपारे. अस्मि० अमुक अमु० सर्वोप० र पुजा गृह २ स्वस्थाने गच्छ स्याहा, ॐ नागाय नम इति दश दिग्पालपिमर्जननिधि ॥श्री देवचद्रजी कृत स्नात्रपूजा प्रारभ्यते ॥ ॥पारडी गाथा ।। दाल पहेली ।। दोहा । चउनिसे अनि पयजुओ पचनातिशय जुत्त । सोपरमेसर देगी भषि, सिंहासण सात्त ॥ १॥ ढाल सिंहासन घेठा जग भाण, दखो भविक जन गुग मणि पाण ॥ जे दोठे तुज निपल नाण रहोए परम महोदय ठाण ॥ पुसुमाजलि मलो आदि जिणदा तोप चरण कमल मेव चोम इदा ॥०॥१॥ चोयाम थैरागी, चावीस सोभागी, जिणदा ॥०॥ एम कही प्रभुना चरणे पुजा करीए ॥ गाथा ॥ जो नियगुण पजय रम्पो, तसु अनुभर गत ।। सुह पुग्गल आरोपता, जो तसु रंग निरत्त ॥२॥ ढाल ॥ जो निज आतम गुग आणदा, पुग्गल सगजेह अफ्दी । जे परमेसर निज पद लोन पूजो प्रमाणमा भय अदीन ॥ कुमुमानाले मेरो शति जिणदा । ता० ॥ कु०॥
२॥ एम कही प्रभुना जानुए पूजा क्रीए ॥ गाथा ॥ निम्मलनाणपया सकर निम्मल गुण सरना निम्मल धमोघपसरर, सो परमापा धन ॥३॥ ढाल | लोका लेक प्रसशक नाणी, भविनन तारण जेहनी धाणी ॥ परमानद तणी निशाणी, तसु भगते मुज मति उहराणी ॥ कुसुमाजील मेले नेम जिगदा ॥ तो० ॥ कुछ ॥ ३॥ एम कही प्रमुना ये हाथे पूजा परीय ॥ गाथा ॥ जे सिजा सिन्नति जे मिन्सनि अणत ॥ जसु आलयन ठपिय मणसो सेयो अरिहत ॥ ४ ॥ ढाल ॥ शिवसुर कारण जेह निकाले, सम परिणाने जगत नीहाले ॥ उत्तम साधन माग देखाडे, इद्रादिक जमु चरण पसाठ॥ कुसुमा नलि मेला पास जिणदा ॥ ता० ॥ ९० ॥४॥ एम पही प्रभुना खभार पूजा करीए ॥ गाथा॥ सम्मदिट्टी देस जय, साहु सारणी सार ॥ आचारिज उपजाय मुणि, जो निम्मल आधार ॥५॥ दार ॥ चयिह सधे जे मन धार्यु ॥ मोक्ष तणु कारण निरधार्यु ॥ विवि कुसुम घर जाति गहवी, तुस् चरण प्रणमत टपेवी ॥ पुसुमाजलि मेलो धीर जिणदा ॥ तो० ॥ २० ॥५॥ एम कहि प्रभुन मस्तके पूजा करीए ॥ इति पाखडी गाथा॥ ॥ यस्तु छंद ॥ मयल जिनयर सयल जिनपर । नमिय मनग्ग, फ्लाणविहि संठावय, करिस धम्म सुपवित्त । सुंदर सय ग सत्तरि तिथ्यपर, एक समय विहरति महीयल ।। चरण समय इगवीस जिण जम्म समय इंगवास ॥ भत्तिय भाचे पूजारो मय सुजगीश ॥१॥ ॥ ढाल पीजी ।। ॥ एक दिन अचिरा हुलरायती ॥ ए देशी ।। ॥भव श्रीजे समस्ति गुण रम्या, जिनभक्ति प्रमुग गुण परिणम्या तजी इद्रियसुख भाशसना करी स्थान चीशनी सेवना ॥१॥ अति राग प्रशस्त प्रभावता मन भायना एड्ची भारता॥ सारे जीव फरु शासनरसी, इसी भावया मन उल्लसी ॥२॥ लही परिणाम पद भनु, नापजावी जिनपद निर्मटु ॥ आयुषध घचे एक भव करी . थद्धा सग ते चिर धरी त्याची चवीय लहे नरभर उदार, भरत तेम परवतेज सार । महानिन्हे निजये पर प्रधान, मध्य सडे अर तरे जिन निधान ॥४॥ ॥ अथ सुपनानी ढाल त्रीजी ॥ ॥ पुण्ये सुपनह देखें, मन माहे हर विशेपे ॥ गजवर उज्ज्वल सुदर, निर्मल वृषम मनोहर ॥॥ निर्भय केसरी सिंह, ह भी अतिही अनीद ॥ अनुपम फूलनी माल, निर्मः शशी सुकुमार ॥ २॥ तेजे तरणि अति दीपे, इद्रधना जग ळापे ॥ पूरण फलश पंदूर, पा सरोवर पूर ॥ ३॥ अग्यारमे रयणायर, देवे माता गुण सायर ।। धारमै भुवन विमान, तेग्मे अनुपम रत्नानिधान ॥४॥ अग्निशिग्ना निरधूम, देये मानाजी अनुपम ॥ हों रायने भापे, गजा अरथ प्रकाशे। ॥ जगपति जिनवर सुग्वार, होशे पुत्र मनोहर ॥ इद्रा दिक जसु नमशे साल मनोरथ फलशे ॥ ६॥ वस्तु छन् । पुण्य उदय २, उपना जिननाह, माता तर रयणी सम, देखें पन हरखती जागीय ॥ सुपन कही निज कतने, सुपन अरथ साभतो सोभागीय । त्रिभुन तिला महागुणी, होशे पुत्र निधान । इद्रादिक जसु पाय नमी, परशे सिद्धि विमात ॥१॥ ॥ दाल चोयी। ॥ चद्रागलानी देशीमा ।। ॥ सोहमपति आसन पीयो ए, देह अवधि मन आणदियो ए ॥ निजमातम निर्मर करण काज, भवजलतारण प्रगम्यो जहाज ॥ १॥ भवभडनी पारग सथनाह चिल नाणाइय गुण अगाह ॥ शिवसाधन गुण यंरोजेह, कारण उल्ट्यो आसाढी मेह ॥ २॥ हरख विश्सी तव गमराय, पल्यादिमा निज तनु न माय ॥ सिंहासनथी उठ्यो 'सुरिद प्रणमतो जिन आनदरद ॥३॥ सगनम पय सामो आरी तथ, परी अजन्यि प्रणमीय मत्य ।। मुखे भाखे एक्षण आज सार, तिय लोय पहु दीटो उदार ॥ ४॥रेरे निसुणो सुरलोय देव, विष यानल तापित तुम समेव ॥ नसु शातिकरण जलधर ममान मिथ्या विष चूरण गरुडवान ॥५॥ ते देव सरल तारण समत्थ प्रगट्यो 7 (४७) - तमु प्रमणी हुवा सनाथ ॥ एम जपी शक्र स्तर परेवि, तव देव देवी हरन मुनि ॥ ६॥ गाव तवरमा गीत गान, सुरलोक हुवो मगल निधान नरक्षेत्र आरज वश ठाम निनपज वधे सुर हा धाम ॥७॥ पिता माना घरे उत्मय थशेय, निनशासन मगल अति विशेष ॥ सुग्पति देवादिक हर्ष सग, सयममयों जनने उमग ॥८॥ शुभ वेग लगने तीर्थनाथ जनम्या इद्रादिक हर्ष साथ ।। सुग्व पाम्या त्रिभुन सर्व जीर, यघार यधाइ थह अतीय ॥९॥ ॥ ढाल पाचमी॥ ॥ श्री शाति निननो कलश कहीशु, ग्रेम सागर पूर ।। ए देशी॥ ॥ श्री तीथपतिनु कलश मन्जन, गाइए सुपकार नरपित्त मडण दुह रिहण भरिक मन आधार ॥ तिहा राव राणा हर्ष उत्मा, यो जग जयकार ॥ दिशिकुमरि अगानि विशेष जाणी रह्यो हर्प अपार ॥१॥ निय अमर अमरी सग कुमरी गावती गुण छद ।। निन जननी पाने बानी पहोती गहगहनी आणंद ॥ हे माय ! ते निनयज जायो शुचि वधायो रम्म || यम जम्म निम्मल करण कारण, परीश सूईकम्म ॥२॥ निहा भूमि गोधन दीप दपण वायीनण धार ॥ तिहा परीय पदरी गेह जिनपर जननी मन्चनकार॥ घर राखडी जिनपाणी याधी दीए एम आशीष ॥ जुग पाँडा कोही चिर जीनो, धर्मदायक श ॥३॥ ॥ ढाल छठी ॥ पस्तीशानी ॥ ॥ जगनायकनी, त्रिमुग्न जन हितकार ए ॥ परमानजी, चिटानद घन सार ए ॥ ।। ए देशी ।। ॥ दाल निण रयणीनी दश दिशि उज्वरना घर ॥ शुमारग्ने
(४८)
जी ज्योतिषचातेसंचर।जिन जनम्याजी जेण अयमरमाताघर॥
तणे अयसग्नी दामन पग धरहरे॥ त्रुट थाहर भासन हर्षित,
कोण असमर ए याया।जिन जाम उत्सय पाल जाणी, अतिहा मानद
उपयो।। निज मिद्धि सपति हेतु निमयर, जाणी मते उम्मयो।
पिकमित यदन प्रमाद यधने सपनायक गद्गयो ।।१॥ टाल । तर
सुरपतिजी घटानाद यगय ५॥ सुलोजी घोरण पर देवयव
नाथजी जिनघर जम हुउ अ॥ तमु भगतेनी, गुरपनि
मदीरि गच्छे । त्रुटर ॥ गच्छति मदर शिगर उपर भरा जीयन
जिन तो जिन ज उत्सव परण पारण भायमो मयि मुरगणो
तुम शुद्ध समक्ति थाो निर्मल, देवाधिदेय नीदाता ॥ आपणा
पनिक मर जाशे नाय चरण पपालनाnonदार ॥एम माम
लोजी सुरपर फोडी या मनी ॥ जिनपंदनजी मदरगिरि सामा
चली।। सोहमपतिजी, जिन जननी घर भावीया । जिन माताजी,
धदी स्वामी पधाया ॥ युटफ ॥ पधारीया जिन हर्ष यहुले घप?
त्यपुण्य ५ ॥ रैलोक्यनायक देव ठिी, मुज समो कोण अय En
है जगतजननी ! पुत्र तुमचो मेरु मजन पर करी ! टरसग शुमचे
धर्मीय थापीश, भातमा पुण्ये भरी ॥ ३॥ ढाल । मुरनायकजी जिन
निज करकमरे टल्या ॥ पच रूपेजी अतिशे महिमाप स्नग्या।
नाटर विधिजी तय यधीश आगल पदे ॥ सुर पौडीनी जिनदर्श
नने उम्महे ।। त्रुटक ॥ मुरयोडाफोडी नाचती पली नाथ शुचि गुण
गायता। अप्सरा फोर्डी हाथ जाडी, हाय भाय दग्गरती ॥ जयों
जयो तु जिनराज जगगुरु, एम दे माशीप ५ ॥ अस त्राण कारण
आधार जीवन, एक तु जगदीश ए॥४॥ दाल ॥ सुरगिरिधरजी
पादुक घनमें चिहु दिशे॥ गिरि शिल परजी, सिंहासन सासय यसे॥
तिहा आणीनी शजिन खोले प्रहा। चौसठेजी, तिहा सुरपति
बारी रहा ।। त्रुटका आवीया सुरपति सर्व भत्ते कलश श्रेणी पनाव
५॥ सिद्धाथ पमुहा तार्थ औषधि, सय घस्तु अणाय ए ॥ अच्चुभ
पति तिक्षा हुयम कीनो देव कोडारोडीने ॥ जिन मजनारथ भार
लायो, सर्वे सुर पर जोडीने ॥५॥
(४०) ॥ दाल मानमी। ॥ शातिने कारणे इद्र पलशा भरे ।। ए देशी।। ॥ मामसाधन रसी देवोडी हसी उल्लमीने धमी क्षीरसागर दिौरी ॥ परमदद आदि दद मग पमुहा नइ, तपनल अमरोया भणी ते गह॥१॥ जाति अद्ध परपशाकरी सहम अटोतरा, छत्र चामर सिहासण मुभनय ॥ उपकरण पुफ चगेरी पमुद्दा मये,मागमे भाषीया तम आणी ठ॥॥ तीर्थजर भर्यय पर चरश परी देवता, गारता भावना धर्मदनतिरता ॥ तिरिय ना अमरने हर्ष उप जारता धन्य अम शर्ति शुचि भक्ति पम भावता ॥ ३॥ समरित पीज निज आम आरोपता, परमपाणी मिषे भाक्ति जल मिता॥ मेसिद्दरोवरे सर्व आया यही शक उ सग किन देखी मन गहगही॥४॥ । वस्तु छन । हो देवा हो देवा अणाइ काणे, अदिट पुग्यो तिलोयतारणो तिलोययधु मिच्उत्तमोद विसणो || अणाइ तिहा विणासणो, देवादिदेवो रिट योहिय कामेदि ॥ ७॥ ॥ ढार तेहीज ॥ पम पमणत घणभवण जाइमरा देय घेमा गिया भत्ति घम्मायरा ॥ केवि पप्याठिया येवि मित्ताणुगा, फेरि पर रमणी घयणेण अइ उच्डुमा ॥ ६॥ ॥ वस्तु छद् ॥ तथा अच्चुय इद थादेस पर जोड़ी सवि देवगण, लय करम आदेस पामीय ॥ अदभुत रूप मरूप जुग, फयण पह उत्सगे सामिय ॥ इद कद्दे जगतारणो, पाग्ग अम परमेस। नायक दायक धम्मनिति, क्रीए तमु अभिसेस ॥७॥ ॥ दाल आठमी। तर्थिकमलदल उदक भरीने, पुष्करसागर आने ॥ए देशी॥ ॥ पूरण फलश शुषि उदयनी धाप, निजवर अगे नामे ॥ सातम विमल भार करता, वयते शुभ परिणामे ॥ अच्चुतादिक सुरपनि मज्जन, रोकपार रोषात सामानिक द्राणी पमुहा, ४ (५०) . एम अभिषेक करंत ॥३॥ गाहा ॥ तय ईसाण मुरिंदो, सपर्क पभणई, यरह सुपसाउ॥ तुम अग्रे महन्नाहो, पणमित्त अम्ह अपेह ॥२॥ ता सिग्दा पमणेह, साहमीप छलमि यहु हो । आणा पचं तेण गिहिहयो उकयाथ्याभो ॥ ३॥ एम पही मर स्मात्रीया परश ढाले अने मुप्पथी नाच प्रमाणे पाठ कद्दे ॥ ॥ ढाल तेहीज । सोहम सुरपति वृषभ रूप परी, म्हषण करे प्रभु अग ॥ करीय चिलेपण पुष्पमाल टपी घर आभराण अभग ॥ तव सुग्यर यह जय जयरय क्ग, नाच धरी आणद ॥ मोक्षमार्ग सारथपति पाम्या, भाजणु हवे भवफद ॥४॥ कोडी यत्रीश सोरन उवाग, चाजत पर नादे ॥ सुरपति मघ अमर श्री प्रमुने, जननीने सुसमादे ॥ आणी थापी एम पयपे, अम निस्तरिया आज ॥ पुत्र तुमार धणो र हमारा, तारण तरण जाज ॥ ॥ मात जतन करी राजा पहन, तुम मुन अम आधार । सुरपनि भनि सहित नम्वर परे जिनभत्ति उदार ॥ निय निय फाप गया सवि निर्जर, कहता मभु गुणसागर ॥ दक्षिा फेघर ज्ञान पत्याणक च्वाचित मजार ॥ ६ ॥ यगतगन्ध जिन आणाग्गी, राजसागर उपाय | धर्म दीपचद सुपाठक, सुगुर तण सुपसाय ॥ देवचगसुजिनभने गायो, ज ममहोसर छ योध नीज अकुगे डरम्या, मध मका आनद ॥७॥ ॥फ्लश । गग वेलामल ॥ पम पूजा भक्त ग, आतमहिन काज ॥ तजीय निभाव निज भायम, रमता शिगज पम०।। ॥१॥ काल अनत जे दुआ होश जेह निणद ॥ सपय सीमधर प्रभु फेरमाण रिट । पम ॥२॥ जन्ममहोत्सव एणी परे, बारा रचिषत ॥ चिचरे जिनप्रतिमा तणा, अनुमोदन संत ॥ एम० ॥३॥ देवचंद्र जिनपजना, यरता भवपार ॥ जिनपडिमा जिनसारखी कही सूत्र मजार ॥ पम० ॥ ४॥ उति पन्निनादव चद्रजीत मात्रपूजा सपूर्ण ।
॥ अथ ॥ ॥ नवपद लघुपूजा॥ ॥ प्रथम अरिहतपदपूजा ॥१॥ ॥दोहा॥ ॥ परम मत्र प्रणमी करी; तास धरी उर ध्यान ॥ अरिहतपदपूजा करो, निज निज शक्ति प्रमाण ॥१॥ ॥ छद ॥ उत्पन्नस नाणमहोमयाण, मप्पाडिहेरासणसठियाण ॥ सदेसणाणदियम जणाण णमो णमो होउ सया जिणाण ॥ १॥ नमोऽनतसतप्रमोदप्रदान,-प्रधानाय भयात्मने भास्वताय ॥थया जेहना ध्यानयी सोस्यमाजा, सदा सिद्धचप्राय श्रीपाल राजा ॥ २॥ क्या धर्म दुमर्म चक्र जेणे, भला भय नव पद ध्यानेन तेणे ॥ परी पृजना भय भारे त्रिकाले, सदा घासीयो भातमा तेणे काले ॥३॥ जिंक तीर्थकर धर्म उदये क्रीन दीप देशना भन्यने हित धरीन ॥ सदा आठ महापाडिहारे समता सुरेशे नरेशे स्तव्या ब्राह्मपुत्ता ॥ ॥ क्या धातिया कम चारे अलग्गा, भवोप ग्रही चर जे छ चिलग्गा ॥ जगत् पच पल्याणा सौख्य पाम, नमो तेहतीर्थरामोनकामे।। हार॥ ॥ज भर निधिस करी, धीश स्थानर तप करीन र ॥ गोत्र तीर्थकर याधीयु, समक्ति शुद्ध मन धरीने र ॥१॥ अ रिहतपद नित पदीए, करम कटिन जिम छडीए रे ॥ आणी ॥ जनम फ्ल्याणाने दिने, नारकी मुखीया थावे र ॥मति धृत अवधि विराजता, जसु उपम फोह नावे रे ।। 4000 दक्षिा रीधी गुम मने, मन पर्यन आदर्गयु र ॥ तपपरी फर्म गपानिने, ततविण पेपल परायु रे ॥ ३० ॥ ३॥ चउर्ताश अतिशय ॥
(५२) शोमता, पाणी गुण पतीशा रे ॥ अदश दाश रहित था पुरे मघ जगीशोर ।। अ०॥४॥ तन मन घयण रगारने, अग्हित पद आगारे रे । ते नर निश्चयथी मही अरिहनपदवी साधे रे।। अरिहतपद नितरदीप ॥५॥ ॥ श्लोक ॥ अथाटदलमध्यान्ज-कणिकाया निनेश्वरान् ॥ अगि भुतलसमाधा नागृत स्थापयाम्यदन् ॥ ॥ नि शेरदाधनधूम फेन-नपारम मारसमुद्रसतून ॥ यजे समम्तातिशयरवेतन श्री मन्जिनान गुजाणिकायाम् ॥2॥ ॐ "ही अद्दभ्यो नम ॥ इति ।। ॥ अथ सिद्धपदपूजा ॥२॥ ॥ दोहा ॥ ॥ दुजी पूजा सिसकी कीजे दिल रशियाल ।। कम अशुभ दूर टले,फ्ल मनोरथमाल ॥१॥ ॥ छद ।। सिद्धणमाणसुग्म ल्याण णमा णमोणतचयाण, सम्म माग्वयकारयाण जम्मनरादुक्सशिवाग्याण ॥१॥ परी आठ धर्म क्षय पार पम्या जरा जाम मरणादिभय प य म्या॥ निरायरण जे आत्मरुपे प्रसिद्धा थया पार ५ त्रिभागोनदेहावगाहात्मदेशा मोरयाधिता ज्योतिरूपा समानत ॥
- "शोक ॥ तस्य पूर्वदले सिद्धान् सम्यश्त्वादिगुणात्मकान् । निश्रेयसपद प्राप्तान् विदधे मातेनिर्भर ॥ १॥ सत्यपत्रे परितः प्रणट-दुष्पकमानधिगम्य शुद्धिम् प्राप्तन्नरान् सिद्धिमनतयोधान, सिद्धान्यने शातिरानपणाम् ॥ २॥ * "ही सिद्धेभ्यो नम ॥ इति ॥ २॥ ॥ अथ आचार्यपदपूजा ॥३॥ ॥दोहा॥ ॥ हवे आचारज पद तणी पूजा करो विशेष ।। मोह तिमिर दुरे, हरे सुझे भाय अशेष ॥१॥ ॥ छद ॥ सूरिणदुरीक्याम्गहाण, पामो णमो मुरसमप्पहाणं॥ सद्देमणादाणसमायराण, अखड छत्तीस गुणाराण ॥१॥ नमु सूरी राजा सदा तत्वताजा, जिनेद्रागमे प्रोढ साम्राज्यमाजा॥ पटयर्ग पर्गित गुणे शोभमाना, पाचारने पाल्वे सावधाना ॥ भविप्राणीने देशना दश काले सदा अप्रमत्ता यथा सत्र आले ॥ जिके शास. नाधार दिग् ति पल्पा, जगेत जिर जीयनो शुद्धजल्पा ॥ ॥ दाल ।। गुण छत्तीशे दोपता, पाल पच आचारो रे। जिन मारग साचो यहे, युगप्रधान जयकारो रे ॥ आचारिजपद प्रदीप ॥ १० ॥ ए आणी सारण यारण चोयणा, पडिचोयण ची शिवारे ॥ भव्यजीय समझायया, देवाने ते दक्षा रे ॥ आ० ॥११॥ निनघा मूरज आथम्या, परतिपदापर जेहारे ॥ सरल भान परगट कर, नामयी जनु देवा रे ॥ आ० ।। १२ । निधिशु पूजा साचवे, ध्याये निज हित जाणारे ॥ पारे लघुतर कालमा, याचारजपद प्राणी रे ॥१३॥ ॥शोय ॥ स्थापयामि तत सूर्गन् , दक्षिणे स्मिन दरेऽमला चरत पत्रधाचार, पटरित् सरयुतान् ॥ ३॥ सूर्गन स्दा चायरताश्थ, सारानाचारयंत स्थपरान्यथेष्टम् ॥ उग्रोपरगनिवा-
रणाथ-मभ्यरचयाम्यक्षतगधी 10॥ ॐ "ही मारभ्यानम ॥
इति॥३॥
॥ अथ उपाध्यायपदपूजा ॥४॥
॥दोहा॥
॥ गुण अनय जग जेहना, सुदर शोभीत गाय ॥
उगायापद सरीण, अनुभयग्सनु पात्र ॥१॥
॥ छन् । नुततत्यानथारणतप्पराण, मो मो धायगडुजराण
॥ गणस्न संधारण मायराण, सरपणारन्जियमच्छराण ॥१॥
नहीं मूरि पण सूरगणन सहाया नमु पाचका त्यत्तमदमोहमाया।
घरी द्वाशागादि ममापदान निक मानधाना निद्धाभिमाने ।
धरे पचने घग यति गुणाधा प्रादि द्विपेच्छदने तुल्य सिंघा।
गुणी ग छसधारणे स्थभभूता, उपाध्याय ने वरीप चित्प्रभुता॥१॥
॥ ढार ॥ द्वादशागा घाणी यद्दे, सूत्र अरथ विस्तार र ॥ पच
पर्ज
गुण जहना, सुमन गुपति नित्त धार रे ॥४॥ श्री उच
शाया यादए ॥ ए आपणी ॥ दायक मागम घाचना, भेद भाव युत
सरी ॥ मूग्पर्ष पडित परे जगतजतु हितकारी रे ॥ ५ ॥ श्री०
शीतल चंद शिरण समी, वाणी जेहनी कहीए रे ॥ ते उमझाया
पनता अपिचर सुग्यमा रहीए रे ॥ १९॥ इति ॥
॥ मार ॥ हाद। शूनाधारान शास्त्राययननरपरान् ॥ निश-
याम्युपध्यायान पायत्र पश्चिमे दर ॥ ॥ श्रीधर्मशास्त्रा
ण्यनिश प्रशात्यै पठति येऽम्यानपि पाउयति ॥ अध्यापस्यास्तान
पराजपत्रे, स्थिाता पवित्रा पारेपूजयामि॥ॐ ही उपाध्यायभ्या नम
रति ॥४॥
॥ अथ साधुपदपूजा ॥५॥ ॥दोहा॥ ॥ मोक्षमारग साजन मणी सायधान थया जह। ने मुनिवरपर चंदता, निमस थाये देह ॥ १॥ ॥छद ।। साहण ससाहिश संजमणा पमा णमो सुखदयाद' माण ॥ तिगुत्ति गुत्ताण समाहिगणं मुणोण मणः पठिगण ॥१॥ परे सपना सूरि पयग गणिनी, करु वर्णना तेहनी भी मुणिनी ॥ समेता मदा पंच ममिति त्रिगुप्ता त्रिगुप्त नहीं काममा गेषु लिप्ता चली थाहा अभ्यंतर प्रथि टाली होये मुचिन योग्य चारित्र पानी । शुमाएग योगे ग्मे चित्त याली, नमु माधुन नह निज पाप टाली ॥ दाल । सफल विषय धिप यारान, भातमध्यान राना। उपशम रसमा शीलता निज गुण शाने मानारे ॥२७॥ हिन धरी मुनिपद बदी ॥ आरणी ॥ रतनत्रयी मायधना, पटायापति पाले ॥पचिंद्री जीपे सदा, निनमारग अजुगाल रे॥तिक गुण सत वीम अलाया पर महायत धार्गरे । महावितर आदरे, चिदानंद सुबकारी रे ॥ हित०॥ १० ॥ नरेश परिज धर परम महा भट जी या रे ॥ एहवा मुान याव मानमर जगन चिन्तिार॥हित०॥२०॥ ॥ शोक ॥ यस्यादिकर्म फुर्वणन् शुम यानेश्मानमुन् । स पप्रगतानित्य, सधृपदामि मयतान ॥1 प्रसिद्ध सत्य तपो द्वादशधा शरीरे ॥ येषामुदस्सलाम वान, माधन् सदा तन परिपूजयामि ॥ * टी समधुमा नाम इति ॥५॥ ।
॥ अथ दर्शनपटपूना ॥६॥ !! दाहा॥ ॥जिनपर मारित गुट नय, सरप सनी पानी तेसम्ममा भादगए मगन ॥शिशुत्तरसे गलपण, मापमा निम्मरमगाम मिच्छरनामा ममुग्गमम्म मुगम गाम्म माम पिर मार दट्यामनारूप मिथ्या, टरेज प्रनादि म Team जिसने ये महजया भरपान, महीए सन सा परम निमा पिना जी मान मानमर्ष गरित्र विचित्र मयारण्य ॥प्रयते सानन उपशम अप हार, निदा मारोगा भार साये ॥१॥ ॥दाल । मुगुरु मुरेय गुपनी मरणारित घरीरमात मातिनो क्षय परीक्षायिक समषित पर्पएरे ॥२॥ राणा नित यंदीप । ए भापणी जायण नलि थारेज मिल जाये रे ॥ शियमुणए यिण मामिले, या मसारी पर ॥३०॥२२॥ सहसठी मन माम अजगर पल दातार मर पूजे माया मे पाम सुम शाना र दानापर० ॥२३॥ । नाकामिनदातमनं असा एपण दाने य मियान्यमयन शुद्ध पम्नमालाराम ॥१॥ *ही मम्यग्दाय नम ॥ इति ॥६॥ ॥ अथ ज्ञानपदपूजा ७ ॥ ।।दोहा।। । समम पद श्रीमान मिडचा तपमा आगाजे शुम मन, दिन दिन अघि ॥ छन् । अन्नाणसमोन्तमादरम्म लमा पमा माणदियापरस्म। पत्रपयारम्सुयगारगस्म, मत्तण मरथपामगरस जाये अदथा सान गुद प्रशेध यावरण नास नानापोध ॥ तेणे घंदीप || आवणी ।। पटवड सुख तगमदासयम शिखर आणीए घरतु पइ द्रव्य भाना, न हये वितथ्या (वाद) निजेन्छा स्थभारा होय पच मत्यादि सुभान मदे, गुरूपासस्तिथी याम्यता तेह घेदे ॥ यलो क्षेय हेय उपादेयरूपे, ल्हे चित्तमा जेम पात प्रदीपे ॥१॥ ॥ ढाल ||मक्ष अमक्ष विचारणा पेय अपेय निधारो रे ॥ कृत्य अत्यने जाणीप, प्रान महा जयकारो।। २४ ॥शान निरंतर अंदीए ॥ ए आकणी ||शन विना जयणा नहीं जयणा धिण नहीं धर्मो रे ॥ धम पिना शिवसुम्व नहीं, ते रिण न मिटे भर्मो रे ।। झाना ॥५ पाचे प्रकार छे जेहना, भेद कारन तासो रे ।। जाणीने पूजे सदा, ते रहे क्वल सासोरे॥ज्ञान ॥२६॥ ॥ शोर ।। अशेषव्यपर्याय, रुपमेयानभासकम् ॥ क्षानमाग्नेयपत्रस्थ, पूजयामि हितावहम् ॥१॥ ॥ अथ चारित्रपदपूजा ॥८॥ ॥ दोहा ।। । अधम पद चारित्रनु, पूजो धरी उमेद ।। पूजत अनुमवरस मिले पातक होय रछद ॥१॥ ॥५॥ आराहिअखडीभ सकिनस्स, णमा णमा सयम वीरि अस्स ॥ सझावणा सगरियायस्स, निव्यणदणाह समुज्जयस्स ॥ ॥ यसरी ज्ञानफर चरण धरीए सुरंगे, निगसता द्वाररोध प्रसगे ॥ भवामोधिसंतागण यान तुल्य, धन त चाग्नि अप्राप्त मूल्यं ॥१॥ दोय जास महिमा थकी रंक भणो होय ताजा ॥ घली पापरूपेपि नि पाप थाय, थर मिलते फमने पार जाय ॥3॥ Dढाल | सपिरत देशारिरतिया, अमगार मागारी रे ॥ जय चतो यायो मदा, त चारित्र गुणधाप रे ॥ ९॥ चारित्रपद नित दायी रे ॥ सत्तर भेदे गिन कहो, ते आइयण भाइ र ॥ चा० ॥ राना, बली द्वादशागी तत्त्वरमणा तमु मूल छ, सार आश्रवनो स्यागी रे ॥ चित्रि मेती पूजन करे, भाव धरी घड भागीरे॥चा ॥२०॥ ॥ शक॥ सामायिमादिभिर्भदै,-श्चारित्र चार पत्र सस्थापयामि पूजार्थ, पने हि नै भने प्रमात् ॥१॥ ॐ ही सम्यग चारित्रायनम । - ॥ अथ तपपदपूजा ॥९॥ ॥ दोहा ।। ॥ कमराठ प्रतिजालना, परतिय गति ममान । ने तपपद पूजो सदा, निमल धर ए ध्यान ॥१॥ ॥ छ । कम्मदुमोम्मलणगुजरस्म, णमो णमा निम्यतयोभरस्म । अणेगर द्धीपनियधणस्स, दुम्सज पथ्याण य साहणस्स ॥१॥ त्रिकार्मिकपणे कम कपाय टाले, निकाचितपणे वाधोया तेहयाले ॥ कहा तेह नप पाह्य तर दु भेदे श्रमा युक्त नितु दुध्यान छेदे । होये जास महिमा थमीरमध सिद्धि अमाछापा कम आवरण गुद्धि ।। तो नेह तप ज महानंद हेते होय सिद्धि मीमतिनी निज सके ते॥१॥ १९ दाल ॥ निज रच्छा अपरोधीए तही तप जिन माण्यु रे । याहा अभ्यतर भेदी द्वादश भेद दारयु रे ॥ ३०॥ अनुपन तर पद घदीप ॥ ए आक्णी । तस्य मोत्यगामीपणु जाणे पण निनगय रे॥ तप कांधा अति आवग कुत्सित फरम खपाया र । अ० १३१ प्ररम निकाचित क्षय हुये ते तपने परमारे ॥ रधि अध्यावी उपजे अष्ट महासिद्धि पचेर ॥ १० ॥३२॥ एतपपद ध्यारता पूनता चित्त चाहे रे । अधय गति निमल रह सटु योगद सग रेअ०॥३३॥ ॥ लोक ॥ द्विधा द्वादशधा भिन्न, पून पत्रे तपश्चय सस्था पयामि मस्त्यान, वाय यश दिशि शमदम ॥ ॐ हीं सम्यक्तष नम ॥इति।।.॥
क्लंग, मनयपद प्यारे परम भानद पामे नया मशाल जाये, देय : मया । सानाधिमर गुणगार मिदनाप्रमाये माधुरिन माये श्य जयकार पारे॥१॥ अरिहंत सिद्ध आचारज उचानाय मायु दमण माणए । चारित्र पनवपदी, हा खिद्ध चक्र प्रमाणए !! - धाप राना सुरव जा, लशासिद्ध चमच्यानमा मरिना मानिनामजी,हिय पाणी मानसो ॥ ६ इय नय पदसिद्ध द्धिविग्नासामद पियहिसुरणग्ग ही निरहा नमा दिसासुरमार स्रोणिपाटारयार । नियरिजय यामिन नमानि ॥३॥ निस्वदेत्यादिदि यातिशयमयतनून श्रीनिमुखान् । मम्मत्वादिष्ठाट गुणगणदाचार माराध मुरीन् । মাত্রা প্রাপ্নিা সবন না মুফান- स्तत् सिद्ध पाटकाना यतिपति सहितानच्चयायधंदाने । 'रत्यमालपद्म पुरये ददादिति । स्याहातै प्रणयाद्यश्च पदविमवृत्तये । * ही पचपरमेक्नेि सम्यग्नानादि चतुान्वितेभ्योनम । इति श्री नापद लघु पूजा अथ नवपद आरति । ए नयपद घ्यावो पाणिनित घ्याया पयम गति सामय सुवपानी ए आरणी । घुरथी पारेदेतारध्याइने, थिरता ए सिख सुणिज । ए०१॥ आरज निर आपया, गुद्ध मन निजारिज सायो । ए०॥ ययाया पचम मणगाय, प्रणामना पाम ग्ध पग । २०३॥ दमण नाण रण भलादापे, तातपता कम भरिनं जीपे । ए०४॥ ए नरपद माणा नित धुमता, गिरया माउगिणता १९०५ मिड चकनी काज सेवा मनयाछित लहिए निनमया 4 ए०६॥ अजर अमर सुखदायक साचो रुडे मनसे नितप्रति राचो। ए०७॥ इति नरपद आरति हवे स्तवना परवाना प्रसगे प्रयम नव पदना ॥ चैत्यवदन ९ स्तवन ९ थोय कहे छ दगेज करयानु ।। ॥ अय अरिहतपद चैत्यवदन ॥ ॥ श्रीइष्टदेवाय नम ॥ जय जय श्री अरिहत भानु, भघि कमल विकाशी ॥ लोकालोक अरूप रूरी, समस्त यस्तु प्रकाशी ॥१॥ समुद्यात गुभ फेघले, क्षय एन मल राशि ॥ शुट चरम शुचि पादसे, भयो घर अविनाशी ॥२॥ अतरग रिपुगण हणीप, हुय अप्पा अरिहन ॥ तसु पदर्पक्जम रही, हीर धरम नित संत ॥३॥ इति मरिहतपदचैन्यवदन ॥ ज किंचि०॥ नमोर्डत् ।। ॥ अथ प्रथम पद स्तवन । ॥ पूजो मनरगे, हा हो दादा पुशल सूगद ॥ पू०॥ ए देशी॥ श्री तेरम गुण घसिके फत, कमा भने श्री अरिहन ॥ मन मान रे॥ अष्ट समय में समय तीन, सर्व आहार पी हाचे हीन ॥ म०॥ १ ॥ यादर काये मन यच भेग, तनु तनुसे पुन ढ तनु योग । मन ॥ मुखम कायते मन यव रोक, निज धायें ताई फर फोक ॥ मन० ॥२॥ सशी मामन यापार, येइदिने याश्य प्रचार म० ॥ आदि समय रहो पणक सुजीव, सुग्वम रहो तिण जाग अतीय ॥ मन० ॥ ३ ॥ योगथा समये एर, हीना सखगुणो कर छर म०॥ समया सखे जोग निरोग, कृत्या जो त्यो जोगी सोध ॥ मनः ॥ ८॥ व समना हारता पाय, पुशल कहे ते श्री जिनराय॥ म० ॥ तेरमे गुणमें गुण समे देव, आपा सा जगषु नितमेव ॥ मन ॥ ५॥ अरिहतपदस्तयतम् ॥१॥ ॥ अथ युइ ।। सरल द्रव्य पयाय प्ररूपर, यालो सरूपोजी॥ केवल ज्ञानी ज्योति प्रकाशक, अनत गुणे यरी पूरोजी । तीजे भय थानक आराधी, गोन तार्थपर नूरोजी ॥ चार गुणाकर एदया थरि- ईत, थाराधो गुण भूरोजी ॥ इति अरिहतपदस्तुति ॥१॥ ॥अथ सिद्धपद चेत्यवदन ॥२॥ ॥ श्री शैलेशी पूचनात, तनु हान निमागी ॥ पूष्पपयोगपसगस, ऊद गत जागी ।। १ ।। समय परमें लोकमात, गये निगुण निरागी । वेतन भूरे आत्म रूप, सुदिशा रही मागी॥ २॥ पेचल दसण नाणी ए, मातीत म्बमार ॥ सिद्ध भये तसु हरि धर्म, पद धरी गुभ भाव ॥ ३ ॥ इति मिद्धपदचैन्यवदनम् ।। ॥ अथ सिद्धपद स्तवन ॥२॥ ॥ था रे महिरा उपर मेह रोष पीजली। ए चाल ।। अष्ट यग्स नंग मासहीना फोडी पूर्वम म्हारा सार ही० ॥ उत्कट परे यास सयोगी धाममें म्हा० स० ॥ अजोगीके अंत तजे भव भयता म्हा० शरशी रहे कर्म दल गुणश्रेणिता म्हाद० ॥३॥हस्याक्षर पच काल रहेते योग म्हा० र तेरस प्रतिनो अन्त करीने अतमें म्हा० क०॥ गमन करे नगरजासे अक्रिय होयने म्हा० ।। १० । पुव्यपोग असग स्वभान अयधने म्हा० स० ॥२॥ इयु गुण नर परमाण जोजन लक्षेपही म्हा० जा० ॥ चतुल निसदा भाश निरालयन सही म्हा०नि०मध्ये जोजा अष्ट घनायति मतमें म्हा० य० ॥ मक्षी पक्षथी हीन भणी सिद्धातमे म्हा० भ० ॥ ३॥ तनु गम्भारा नाम शिलासे जोयने म्हा०शि० ॥ रघु अगुल वर्तस प्रमाण अषगाना म्हा०प्र० ॥ सृद्धि गनु शत पच गुणासे हीनता म्हागु० ॥ मिलिया एकमे नत अवाथा ना रबी म्हा० अ०॥४॥ अष्ट प्राण धरी रम्य सिरीही जो सही म्हा०सि०।। जो पद श्रीसद घरो मन गेहमें म्हा धरो कुशल भये जगजीव मिरागा तेदम म्हा०मि० ॥ इति सिद्ध पदस्तानम्॥ ॥ अथ थुइ ॥ अष्ट करमा धमन करीने गमन रियो शिववामीजी अन्यायाध सादि अनादि, चिदानद चिदाशिजी । परमातम पद P - (६) पूरण विलासी, अघ घन दाध निनाशीजी ॥ अनन चतुष्टय शिनपर भ्यागो, फेघरशानी भाषीजी । इति सिद्धपदस्तुति ॥२॥ ॥ अथ तृतीय पद चैत्यवदन ।। ॥ जिनपदाल मुखरस अनिल, मितरस गुण धार्ग ॥ प्रयल मवल्धन मोहकी, जिणते चमु हागाराचादिक जिनराज गीत नयनत विस्तारी॥ मर पे पापे पडत जगनन निस्तारी॥२॥ पचाचारी जीयरे आचारजपद सार । तिनक वंदे हीर धर्म, अणेत्त रसो चार ॥ ३॥ इति आचार्यपदचैन्यवदनम् ॥ २॥ ॥अथ आचार्यपद स्तवन ॥ ॥ नणदल दिलारे ए चाल ॥ खती खडगी जेणे, हण्या मोध सुभट सा देणे हो ॥ गणपति गुण पेखी ॥ मान महा गिरि धयरे, अति सोभन महव यर हो०॥ ग० ॥ ॥ दभरूप विपवेली यर अजय कील ठेली हो ॥ ग० ॥ मूछा घलथी भरीयो लोहसागर मुत्ते तरीयो हो ।। ग० ॥ २॥ मदन नाग महिना जिण दम शम जत्रे कीनोहाग०॥ माह महामल ताड्या, पुण पपग मुगेर पाड्याहाग०॥३॥दाप गयद यस पीना धरा उपशम अमुश लीना हा॥ ग० ॥ अतरग रिपु भेधा, मुर घर पिण जिण निपध्या हा । ग०॥४॥रम कृती गुणथा रीनो मन भरथे आगम पीनो हो || ग० ॥ आचारिजपद पहना, धरी जीन फुलता सेयो हो ॥ग ॥ इति आचार्यपदस्तवनम् ॥३॥ ॥ अथ थु: ।। पचाचार पार उजयार, दाप रहिन गुणधारीजी गुण छत्तीस आगमधाग, द्वादश ग पिचारी प्रार मयर धन माह हरण अनिर समो गुण वाणीजा । श्रम सहित जे मयम पाले, आचारज गुणध्यानीजी ॥ इति आचायपदस्तुती ॥३॥ ॥ अथ चतुर्य पद चैत्यवदन॥ ॥धन धन श्री उपाय राय शठना धन भजन॥जिजिनयर दिमत. दुधारसग, करपत जनरजन ॥ ॥ गुणगण भजण मण गयद, सुर .
शाणि क्यि गजण कुणाग्य लोय रायण, जत्थय मुय मंजण ॥ २॥
महा प्राणमें जिन लहो ए, आगममे पद तुर्य ॥ तिनपे अहानिश हीर
धर्म, पद पाट्यर्थ ॥ ३॥ इति उपायायपदययंदनम् ॥ ५॥
॥ अथ उपाध्यायपद स्तवन ॥
॥ सावरिया मलगा रहोने ॥ए चार ॥ हुयने ३ दुरी हुयन
चतन भाये शठने दुर्ग होयन । तुमुन्न पाम फ्यु आय ॥४०॥ तुजन
पुण यतलावे इ० आरणी ॥ तो सगे निज पचेंटिनो, रचना चरण
भूलाणो ॥ नाणापरणी खय उपशममे, भाहिम हाणो ॥ दुः॥१॥
हरेते परजाते कीना, जाति नाम “यपदेश । एष तो गौ तुरग
गजादिक, विण कर्म उपदे॥१०॥ ॥ इत्यादिव या मुजर
शंका, तेरे संग लागी ॥ नील यणकी शमता मती, में भया तो
रागी। इ० ॥ ॥ उप याहिप णीयो भपियाना, अपिया लागत
भाय ! आधीना मन पाहा नाम, मायो यन विलाय ॥ दृ०॥४॥
अधिक्ये म्मरीए घर अगम, मूत्रमे त उपाय ॥ तत्साते दणी
शहनाउ, चतन कुशलता पाय २०॥
इति चतुर्थपदस्तवनम् ॥
॥ अथ युइ ।।ग इश्यार चउद पूरय गुण पचर्यासना धारीनी।
सुध अरथधर पाठर यहीए, जोग समाधि विचाराजी ॥ तप गुण
शूरा आगम पूग नय निक्षप तारीजी । मुनि गुणमार्ग धुध निस्तारी
पाठ पूजावि गयिमार्गजी ॥ इति उपाध्यायपदम्नुते ॥४॥
॥ अथ पचम पद चैत्यवदन ॥
॥दसण नाण चरित्त करी, वर शिवपद गामी ।। धम गु शुचि
चरस, आदिम यय कामी ॥ १॥ गुण पमत्त अपमत्तन, भय अंतर
जामी । मानम इदिय नमन मूल, शम दम अनिगमी ॥॥ चामति
धन गुण भर्या ए परम पर मुनिराज ॥ तपदपंग्ज नमत है हरि
धर्म काज।। ३॥ इति साधुपदत्यवदनम् ॥ ४॥
(६४) ॥ अथ साधुपद स्तरन । "मालन मालन मति कहो॥ए चाल || निम्पाया जगजन कहे, घार चउगति यमनसे रोर हो । मुनादजी। राग हान भय तु करे, साहिवा शिररमणीस हेत हो । मुनादजी॥१॥ सर्व प्रमाद तजी रहे ।। सा०॥ छठे पूरव रोड हो।मु०॥शत सोगम आगम परे। सा०॥ पाम कम निस्द हो। मु०॥२॥ मला निद्रा में रही। सा॥यारमे गुणनो घास हो । मु०॥३॥ स्थिति रस घात प्रमुप परे ॥ सा० ॥ जा गुग सख्यातीत हो । मु० तो पीण.तिण जगमें रही ॥ सा०॥ त्रिक त्रिक धन गुणनी रयात हो । मु०॥ ४ ॥रयण यसे शिवपये ॥ मा०॥ साधन परयर जीर हो ।मु०॥ साधु टुबइ तसु धममें ॥ सा० ॥ पुशल भवतु जगतीप हो।मु०॥५॥ इति साधुपदस्तवनम् ॥ ५॥ अथ थुइ ।। सुमति गुणति कर सजम पाले, दोष पयालीश रा- रेजी ॥ पटकाया गोकुल रख्घाले नवविध म्ह्मात पालजी ।। पच महाबत सूधा पले, धम शु उजयाले जी ॥क्षपय श्रेणि फी पम खपाये, दमपद गुण उपनाघेजी इति साधुपदस्तुति ॥ ॥ अथ दर्शनपद चैत्यवदन ॥ Fय पुग्गल परियष्ट अङ्क परमित ससार ॥ गठिभेद तप कर रहे, सय गुणना आधार ॥ ॥क्षायय वेदक शशी असख, उप- शम पण वार ॥ विना जेण चारित्र नाण, नहीं हुवे शिय दातार। ॥२॥ श्रीसुदेव गुरु धमनी ए रुचि रच्छन अभिराम ॥ दरशनई गणि हर धर्म, अहानिश करत प्रणाम ||३॥ इति दर्शनपदचत्य घदनम् ॥६॥ ॥ अथ दर्शनपद स्तवन ॥ । रामचद्रके याग आगो मोह रह्यो री ॥ए चाल ॥ देव श्री जिन गज, गुरु ते साधु भण्या री॥ धर्म जिनेश्वर प्राक्त, योधि रक्षण तणेरी॥१॥याधिरामयाज,सप्तम नरक मलोरी॥ तेण विना सायेजी ।। म्हा०॥४॥ नाणापरणी उपसम न्यथी, चतन ॥ म्हारे यति उछरंग ॥ए चार निनयर मारित भागममणीया, तत्व यथास्थिति गमीयाजी ।। म्हार जगजनतारत उत्तम परमाण यहामविजन नहनिशि चाहेगी । हागामायामय थुपथ अनुमानेजी ।। म्हा० ।। त्रिभुवन पूजे जासु पलाये धारी: सुरलाम, तातें आधिष पूरो रीमिथ्या ताप वन, प्राधही छाद ल्हेरी ॥ उपशम क्षायक थे, ईश्वर तीन कद ग॥३॥मय सागर हे थपार, कृण अम्ताध का ग । जसु लाभे ते होर, गोस पद मात्र खरी री॥४॥ यदभार प्रमाण घाण चारित भगरी॥ योर धर्म नीर, लामे कुशल काग॥ ॥ इति दशनपर' स्तयनम् ॥ ॥ अथ धुर ।। निापन्नत तन सुना सरधे, ममस्ति गुण उज चालजी । भेद छेद करी आतम निराप्ती, पशु टारीमुर पायेगी। प्रत्यारयाने सम तुल्य भारव्या, गणधर अरिहत शृगजी पदा पद नित नित पदो भवमागरको तीराजी ॥ इति दानपद स्तुनि ॥६॥ ॥अथ ज्ञानपद चैत्यवदन ॥ निप्रादिक ग्म राम वहि, मित आदिम नाण ॥ मात्र मिलापम जिन जनित, सुय धारा प्रमाण ॥ १॥ अयगुण पज आदि दाय, मण लोचन नाण ॥ लोकालोक स्वरूप साण, एक परल मा TU नाणाचरणी नाशथी प, चेतन नाण प्राश ॥ सतम पदमें हार घम, नित चाहत अपकाश ॥ ४॥ इति ज्ञानपदचैयदनम् ।। ॥ अथ ज्ञानपद स्तवन।। सुर्पया, पयापय सथानी ॥ म्दा० ॥ २ अन्य अहित हात पारी जाणे जेण विचारीजी ।। म्हा० ॥ २॥ श्रने भनि दाय हिसार- तण परोक्ष विचाम्जी म्हा! उहि मण चलाई पार, जीव प्रत्यक्ष सुधारुजी म्हा०॥ ३ ॥ ययपि जस्म पर ना जाणे, कादिक । गुम माध्यम ना
.
रिलासेजी ।। म्हा० ।। सप्तम पदमें भरिनन हरखे, निशदिन कुशलता
निरपजी ।। म्हा०॥ ॥ इति नाणपदस्तयनम् ॥ ६ ॥
॥ अथ थर ।। मति धृत दि जनित कहीए, नहीए गुण गी
रोजी ॥ मातमधारी गणधा विचारी द्वारा अग विस्तारोजी ।।
अनधि मन पयच कर वली, प्रत्यक्ष रूप अवधाराजी ॥ ए पच
ज्ञानर यदा जा, मजनन सुसयागेजी ॥ इति सानपदस्तुति ॥६।
॥ अथ अष्टम पद चत्यवदन ॥
। जस्स पसाय माष्ट पाय, जुग जुग समितेंद ।। नमन कर शुभ
भान राय, फुण नरपति वृ ॥१॥ जपे धरी अरिहत राय करी
कम निकद ॥ सुमति पच तीन गृति युत, टे सुख अमद ॥२॥
इयु कृति मान कंपायी ए, रहित रेश गुचियत ।। जीप चरित्ता
हीर धम, नमन परत नितसत ।। ३॥ ति चारित्रपदचैत्यवदन
॥ अथ चारित्रपद स्तवन ।।
नियिम्ल्प अज निर्गुणी, चिदाभास निरसग ॥ सुग्यानी साभलो।
मूतिहीन चेतन परे रूपी पुट्ट रग ॥ सु०॥ १॥ स्पर्मक कारण
याणा, कार्ये कारण भार || सु०॥ रुन्या जोग सुधामता, रच्या
संस स्वभार । सु०॥०॥ पर्याप्ता रघु जोगमें, वृद्धि लह जुगमाम
।मु०म ये वसु समये रहे, अते द्वौ ते जाण ॥ सु० ॥३॥ सह
पारी मानस भुरपा, कारण रम्य योण सु०॥ प्राप्तायन प्रभारता,
सात प्रामृतका तेन ॥१०॥ ४॥ तगोधन रूपी भलो, चतन संग
मधाम ॥ सुपर धन मिल पद धम, कृशल भवतु अभिराम ।
।मु०॥ ॥ इति चारित्रपदम्तवनम् ॥
॥अथ थुइ॥षम अपचय दूर खपाने, आतमध्यान लगावेजी।
यारे भावना सधि भावे, सगारपार उतारेजी ॥ शट खंड राजकपूर
तीन, ची मजम वरेजी ।। एडवो चारित्रपद नित पदा, आतम-
गुण द्वितधारेजी ॥ इति चारित्रपदस्तुति ॥०॥
पदाच तिथि घटा हाय ताथा या हाय तामाग्मथा शक परे । पण आरिल . पूनिम सुधि यो। तिहा प्रयर मम गुद पग्नेि मालादिक्थी चित्रित्रको पछे बाजाठ, पर नए सिद्धचर ॥ अथ तपपद चैत्यवंदन ॥ ॥श्री शमादिक नीयनाय, तद्भव नायनाप । विदि अतैरपि यात मश्या द्वारा परिणाम ॥५॥ यातु पर मित मामामद्दी, आदिक चिनियान । भेने समता युत पिणे दवयन धर्म निमान || २॥ नवमी श्री तपर भरा ए, उसे सरूप। बदनसे निन होर धम, दूर भवतु गवएप ॥ ३॥ इति तपपदचत्य यदनम् ।। ॥ अथ तपपद स्तवन ।। यारम भेद मण्या जिनराजे, याहा मध्य 7णा जगाने र शशिर पदणि ॥ तिण भव सिद्धि तणा घर ग्याना, जिनपर पिण तगना फर्ता र ॥ शि०॥ ॥ ममता सहित जिनत मारी, मला फौचमु पिण हारी ॥शि०॥ जीन फनपस कर्म यचोप, देना पार नका जोरा रे ॥ शि०॥२॥ तप तस्वरना अनुम है ऋति, त्य नग्नी फल ते सिद्धि र ॥ शि० ॥ पाप सरर है तमनी राशि तप भानुम जाये नासी रे ॥ शि० ॥ ३ ॥ जस्मा गसाय ठप पाम, घिसारी जगहिनमरु रे ॥ शि०॥ अति दुरुपुष साध्यमा हीना, पाम ताते यार मीनारे ॥ शि० -पनी कहीए, तपपम्ही चेतन वढाए रे ॥ शिव ॥ ५॥ इति श्रीनपारदस्तयनम् । ॥ अथ थुइ। इन्ग्रारोधन नपते मारव्यो, आगम नना सीसी। द्रव्य भानम द्वादश दापी, जाासमावि रावीना ॥ चतन निज गुण परणित पेरी तहान तप गुण दारपीजी !! ग्ध माल्ना धारण नपी, वर सेर्मुख भाषीजी ।। इति तपपरतुनि ॥४॥ ॥ अथ नवपद ओलीनी पेलादीवसनी विधि ॥ प्रथम नासा सुदि ७ अथया चैत्र मादे ७ यो बार (६८) थापे । त्रिकार पूजा परे । सवारना यह पमिकमणु परी पीछे यस्त्र पडिलेहे ज्या नवपद सिद्धचक्र यनी स्थापना होय त्या आगीने पाच शरन देव वादे त्या या नपचे यादन नयपदना यत्रपासवरे पछे नव चैत्ये अथवा नर प्रतिमा आगे न चैत्यवदन करे अने नव पदनी लघु पूंजा फरे यासक्षेप यादिथी करे। पाछे केसर चदनथी पूजापरे पछमध्याद समय पाच शकस्तये दव यादे । पछे गुर पामे मानिने राइ यालरोये । जम्मुटिनोमि यामिने आयथिल्नु पन्चस्खाण परे । प्रथम जरिस्तपदना वर्ण सफद छे तथी आरिमें चोरया भात अन गरम पाणी आरड र रे एवु आथिल पच्चम् । पीछ समासमणा तथा फेरी माचिया माला कारसगा आरधु नरपद सिद्धचा यत्रनी पास करघु अने न होयतो यसरमा फरयु अरिहतपद ना चार गुण छ एक चित्त धार नमस्कार करे॥ प्रथम सब ठेकाणे इच्छामि खमा ममणो घरयादि कहिने नमसार करे । ॥ अरिहतपदना १ अशोर वृक्षप्रातिहार्यसयुताय श्रीअरिहताय नम • पुष्पवृष्टिमातिहार्यमयुताय श्रीभरिहताय नम ॥ १३ दियध्वनिप्रानिहार्यसयुताय श्रीमरिहताय नम ॥ ४ थामरयुगमानिनायसयुताय श्रीअरिहताय नम ७ स्वसिहासनमातिहार्यसयुताय श्रीमरिहताय नम ॥ मामडमातिहार्यसयुताय श्रीअग्हिनाय नम ॥ दुदुभिप्रातिहायसयुनाय श्रीअरिहनाय नम ॥ ८ उपप्रयप्रातिहार्यसंयुताय श्रीमरिहताय नम ।। झानातिशयसयुताय श्रीअरिहनाय नम ॥ १० पूजातिशयमयुताय श्रीगरिहताय नम || "घचनातिशयमयुताय श्रीअग्हिताय नम ।। १२ अपायापगमातिशयमयुताय श्रीमरिहताय नम ॥ ॥ इत्यादि नमस्कार करिने श्री अरिहतपद नाराधया निमित्त का उस्सगरिन्छ अरिहतपद बापना करोमि काउस्सरग इच्छ वंदणक १२ गुण ॥
भन्न्नपदास नली
अगुणमानना
याबरमपपत्रा
काहरलागरमxarartime
पत्रकार पर ज र ! REAT
भास्ट और. ३ को चैन्यदन का
पच्य - परिईता sm
गुनगं पर सर महिनामा
निदश मन्ट असाग feer
नई मदन शतनामा
पूजा सदर प्रमुख श्रा
( मेवाको हित विमिन Arial 2
सथान समानदान मा Army
स्मरण का
11 दिनीय दिवम शिविर
॥ आगीत चरar
ना लार
यया रात
मासिद्धांजा
गुण छ ने मटे
बार करे
गुणणो गणे।
. अमन
२५ गुण याद
६अति
८अनन
मम
• अनन्तनम
Tea नन
H ऊससिएण पहिने आठ लोगम्मनो पारस्सग यो । पफ लागेस्म पनि पारे । पर्छ पूर्वान करणी अनुममयी पर पति द्वितीय दिघम विधि ॥२॥ ॥ अथ तृतीय दिवस विधि ॥ । पूढेन पिधियी सधारतुं यतय कर। आचार्यपदनो पालो यण छ तेथी चणानी दाल- आयिर परे। 'ॐ ही णमो आयरियाण" था पदनो गुणा हजार करे। बाचायपदना ३२ गुण याद करिने छत्तीस नमस्कार कर ॥ ॥ आचार्य पदना ३६ गुण ॥ २ प्रतिरूपगुणस्युनाय श्रीआचार्याय नम ॥ २ सयपत्तवम्बिगुणसयुताय श्रीआचायाय नमः। ३ युगप्रधानागमसयुताय श्रीआचायाय नम ॥ ४ मधुरयास्यगुणमयुताय श्रीआचार्याय नम ५ गाभीर्यगुणसयुताय श्रीलाचायाय नम ॥ ६ धर्यगुणसयुताय श्रीगाचार्याय नम ॥ ७ उपदेशगुणसयुताय श्रीआचायाय नम ॥ ८ अपरिश्राचिगुणसयुताय श्रीमावायाय नम ।। ९ साम्मपतिगणमयुनाय श्रीआचार्याय नम ॥ १० शील्गुणमयुताय श्रीआचायाय नम ॥ १ अधिग्रहगुणसंयुताय थाभाचार्याय नम ॥ १२ अविश्थरगुणसयुताय श्रीआचार्याय नम ॥ १३ अचपलगुणसयुताय धीआचार्याय नम ॥ १४ प्रसन्नवदनगुणसयुताय श्रीभाचार्याय नम ॥ १५क्षमागुणसयुताय धीमाचार्याय नम ॥ १६ जुगुणसयुनाय श्रीआचार्याय नम ॥ २७ मृद्गुणसयुताय श्रीभाचायाय नम ॥ १८ सर्वसगमारगुणमयुताय श्री आचायाय नम ॥
१९हाराविधतपगुणसयुताय श्रीमायायाय नम ॥
२० मतदशानिरामयम पामयुताय श्रीआचायाय नम ॥
" मत्यग्रतगुणयुताय श्रीमचायाय नम ॥
२९शाचरणसयुनाय श्रीमानगर्याय नम ॥
२३ आचगुणसयुताय श्रीमागर्याय नम॥
२४ ब्रह्मचर्यगुगलयुनाय श्रीनाचायाय नम ॥
अनिय भावनामाराय श्रीआचायाय मम ॥
अशरपर भारनामानकाय श्रीआचार्याय नमः।
२७ मसाग्म्यरूपमापनाभायाय श्रीशावायाय नम ॥
२८ परस्यरूपमारनामायगय धीवाचार्याय नम ।
२९ अयत्वभावनाभाषकाय श्रीनावायाय नम ॥
३० अनुचिमायनामाशाय श्रीआचार्याय नम ॥
३१ आयरमायनाभाकाय श्रीभाचायाय नम ॥
३२सपरभावनाभाकाय श्रीपाचायाय नम ॥
३३ नि नगभावनाभाषकाय मीमाचार्यायनम् ॥
३३ म्यागायनामारमाय मानायाय नम ॥
३ थाघिदुर मानाभाराय श्रीमाचार्याय नम ॥
३९ धमदुलभभारनाभाशय श्रीश्राचायाय नम ॥
॥ छत्तीस नमस्सार परिने मत्थ उमसिएण इत्यादि दिने
छत्तीम [३] लेगस्मनो काउस्सग करे। एक रोगस्स ने
म्बरणीप पारे । यथोन फरणी अनुसमयी करे।
॥ अथ चतुर्थ दिवस विधि ॥
॥ ॐहोणारी उयज्रयाण' या पदना हसार गुणणो गणे।
स्ट्रीग मगनीदालनु क्षायिल करे। रास्ययपदना २ गुण याद
करिने नमस्यार करें।
॥ उपाध्यायपदना २५ गुण ॥
धीनारागसूत्रपटनगुणयुताय श्रोपाध्याय नमः ॥
धीसुपा डागमूत्रपग्नगुणयुनाय धीउपाध्या०॥
(७२) ३ धीटाणागसूत्रपटणगुणयुत्ताय धीउपाध्यायाय॥ ४श्रीसमवायागमत्रपटणगुणयुताय श्रीउपा०॥ धीमगवतीमत्रपटनगुणयुताय श्रीपाध्यायाय० ।। ६ श्रीशातासूत्रपठागुणयुवाय धीउपाध्याय०॥ ७ श्रीउपासकदर दशागसूधपठनगुणयुक्ताय धीउपा०॥ ८ श्रीअ तगडदशागमत्रपठनगुणयुक्ताय श्रीउपा०॥ ९ श्रीमणुत्तरोनाईसूत्रपटनगुणयुनाय श्रीउपा० ।। १. श्रीप्रश्न यारणम्नपउनगुणयुणयुत्ताय श्रीउपा०॥ २. श्रीपिपासूधपटनगुणयुक्ताय श्रीउपा० ॥ १२ उत्पान वपटनगुणयुनाय श्रीउपा०॥ १३ आग्रयणापूर्वपउनगुणयुत्ताय श्रीउपा०॥ २४ वीयप्रवादपूर्वपठनगुणउत्ताय श्रीउपा० ॥ .- अस्तिप्रवाद पटनगुणयुक्ताय धीपा०॥ F६ माननादयपटनगुणयुत्ताय श्रीउपा०॥ १७ मत्यप्रमादपूर्वपटनगुणयुक्ताय धाउपा०॥ २८ आग्मप्रथादपूर्वपटनगुणयुनाय श्रीउपा०॥ १९ फमनगदपत्रपठनगुगयुक्ताय श्रीउपा०॥ २० न्यारयानश्चादपवपटनगुणयुत्ताय श्रीउपा०॥ २१ विद्याप्रवादपूर्वपटनगुणयुत्ताय श्रीउपा०॥ २२ कल्याणप्रयाद्धपठनगुणयुत्ताय श्रीउपा०॥ २३ प्राणायामप्रसादपूर्वपठनगुष्पयुक्ताय श्रीउपा० ॥ २४ क्रियापिशाल—पउनगुणयुक्तार्य थीउपा० ॥ २ लोकपिंदुसारचपठनगुणयुक्ताय श्रीउपा० ॥ आचीरीते पचीस नमस्कार करे । उभा बन अन्नथ उससि इयादि महिने पचचीम लोगम्मनो गाउम्सम्म कर । एक लो पहिने पारे । १3 पूर्वोक्त करणा करे । रति चतुथ दिवस निधि ॥ अथ पचम दिपम विधि ।। *ही णमो लाए ससाण आ पदनो० हजार गूणणों में
मत्तानीम गुण
(७३)
साधुपद पाल वर्णनो छे, ती घाट आपिर करे। सर्व साधुपद
चित्तविो नमस्सार पर।
।। साधुपदना २७ गुण ॥
•प्राणतिपातविरमणमतयुनाय श्रीसाधरे नम ॥
२ मृपापादविरमणमतयुत्ताय श्रीसाधनम ॥
३ अदत्तादान विरमणप्रतयुताय थीसाधये नम ||
दमैथुननिरमण मतयुताय श्रासाधये नम ॥
५ परिग्रहविरमणवतयुत्ताय श्रीमाध्रने नम ॥
६ रात्रिभोजनविरमणप्रतयुक्ताय श्रासाधये नम ॥
७ पृथ्वीकायरक्षकाय श्रीमाधव नम ॥
कायरक्षकाय श्रीसाधये नम ॥
तेउमायराशाय श्रीमाधो नम ॥
१० याउपायरक्षकाय यीसाधये नम॥
२१ पनम्पतिकारक्षमाप श्रीसाधरेनम ॥
सायरनशाय धीसाधये नम ॥
२३ (द्रियजीवरक्षाय धीसाधये नम ॥
२५ यद्रियजीवरक्षकाय त्रीसाधनम ॥
१.तेइंद्रियजीवरमाय श्रीसाधये नम ॥
१६ चौरदियजीवरषयाय श्रीसाधने नम ॥
२७ पद्रियजीचरथकाय श्रीसाधय नम ॥
रोमादिनिप्रकारकाय धीसाधनमः॥
२. क्षमागुणयुगीय थ्रीसाये नमः ॥
२० शुमभावनाभाषकाय श्रीसाधये नम ॥
२१ प्रतिरेपनादिक्रियाशुद्धकारफाय धीमाधये नम ||
२२ सयमयोगयुक्ताय धीसाधरेनम ॥
२३ मनोगुपियुत्ताय श्रीमाधनम ॥
२४ वचनगुप्तिकाय श्रीसाधचे मम ॥
- वायगुतियुनाय धीसाधये नम ॥
(७३) २६ शीतादिदार्षिशतिपरिपहसहनतत्पराय० धीमाय नम २७ मरणातउपमगसहनत पराय धीसाधये नम ॥ । आगीरीत सत्तागीम नमसार कर। उभा धने अन्नत्य कम सिपण इत्यापिहिने सत्तावीस लागस्मनो काउस्तग्ग परे । पर लोगस्य कहिन पार । पर्छ पूनात करणी गरे । मा पच परमेष्ठि पदना सा गुण मलागायी १०८ बाय । तेथी पार पालीगीमाळना दाणा (१०८) धाय छे ।। इति परम दिवस विधि ॥ ॥ अथ पष्ठ दिवस विधि ॥ ॥ॐद्री णमो मणस्म या पदनी २ हजार गुणणा गप दशनपद सफेन छ तभी माननु नाचिर परे । सम्यक्त्वना सदसल गुण चिंतन नमस्कार करे ॥ । सम्यक्तना-दर्शनपदना सडसट भेद ।। र परमाथालस्तयरूपश्रीसाशनाय नम ॥ परमाथातृसेवनरूपत्रीसहानाय नम ॥ ३ यापनदशनपर्ननरूपधीसदशनाय नम ॥ ४ कुशनपजनरूपयासरशनाय नम ॥ • गुश्रुपारूपश्रीम-शनाय नम ॥ अधमरागरूपभासदशनाय नम ॥ ७ चैयावृत्त्यरूपीसदशनाय नम ॥ ८ अईदिनयरूपनामदशनाय नम । ९ सिद्धग्नियरुपनीमदर्शनाय नम ० त्यविनयरूपर्थ सदर्शनाय नम ॥ ११ श्रुतविनयरूपश्रीसदशनाय नम ।। १२ धमयिनयरूपश्रीसदशाय नम ॥ १३ साधुवगविनयरूपश्रामदानाय नम । . . ४ आचार्यग्नियरूपत्रीसंदर्शनाय नम ॥ १५ उपाध्यायविनयम्पनीसदशनाय नम ॥ १६ प्रवचनविनयरूपश्रीमदशनाय नम ॥
- शनाय नम। {७१) १७ दशनाग्नियरूपभासदशनाय नम ॥ १८ ससारे जिनमारमिति चितनरूपसश्रीदर्शनाय नम । ९ ससार पिनमतिसारामिति चिनमस्पतीहशनाय नमः ।। * ससार जिनमनिस्थितमामादिसामिति चिंतन स्पर्धासद- गरादूपणारहिताय श्रासदर्शनाय नम ।। २२ मा पापरहिताय श्रीसदशनाय नमः ।। ५३ विविस्मिारूपपणरहिताय श्रीसहाय नम ॥ सदापिप्रशंसापदणहिताय श्रीसद्दर्शनाय नम ॥ सनपरिचयपणा हिताय सहर्शनाय Tम ॥ १५ मवयनममायकरपश्रीसदशनाय नमः ।। २७ धमक्याप्रमावररूपधीसद्दशनाय नम ॥ २४ पादिप्रभाययपश्रीमदर्शनाय नम ॥ २९ नैमित्तकप्रभावमरूपीसदशनाय नम ॥ ३० तपस्निप्रभातफरूपश्रीसदशनाय नम ॥ ३१ भशप्त्यादिविद्याभ प्रभाव स्पधीमदशनाय नम ॥ ३३ चुणांजनादिसिन्दप्रभाषायस्पश्रीसशनाय नम ३२ कारिप्रभापकरुपधीसहशनाय नम ॥ ३५ जिनशासने काशल्यभूषणरुपश्रीसदर्शनाय नम ॥ ३ प्रभावनामृपणत्पश्रीसद्दशनाय नम ॥ ३६ तीयसंघाभूपणम्पर्धासदशनाय नम ॥ ३७ धैयभूषणरुपश्रीमदर्शनाय नम ३पिनशासने भतिस्पणम्पांसदर्शनाय नम ॥ ३९ उपशमगुणरूपश्रीमदर्शनाय नमः ।। ४ मवगगुणरूपधीसद्दशनाय नम ॥ ४१ निर्वेदगुणरुपनीसदर्शनाय नम ॥ • अनुम्पागुणहपश्रामदर्शनाय नम || ४३ आस्तिस्यगुणरुपांसहशनाय नाम ។ ६४ सच जीन कृतम्माणि पदयीनि श्रद्धानस्थानयुक्या (७) ४४ परतीयशदिवानयजनरुपधीसंदर्शनाय नम ४' परतीथशादिनमस्कारवर्जनरुपधीसदशनाय नम ॥ ८८ परतीर्थकादिवालापरजनरपथीसहर्शनाय नमः ।। ४७ परनीथकादिसलापयजनस्यश्रीसदशनाय नम ॥ ४८ परतायकादिनानादिदानवर्जनरुपश्रीसदशनाय नम ॥ ४० परतीथशादिगधपुप्पादिप्रेपणयननरपोप्सद्दशनाय नमः । १०० गजामियोगामारयुक्तश्रीसद्दर्शनाय नम ॥ १ गणाभियोगाभाग्युक्त श्रीमद्दशनाय नम ॥ ५० यगभियोगाकारयुक्धीसदशनाय नम ।। '३ सुराभियोगाकारयुक्तश्रीसदर्शनाय नम ।। काताग्वृत्त्याकाग्युतश्रीमदशनाय नम । ५५ गुणनिग्रहाकारयुक्त श्रीमदशनाय नमः ।। ५६ सम्यक्त्व चारित्रधर्मस्य मुलमिति चिं० श्रीस०॥ १७ सम्यक्त्वं धमपुरस्य द्वामिति चि० श्रीस०॥ '८ मम्यक्त्व समस्य प्रतिष्ठानमिति चिंधीस०॥ १ सम्यवव घमस्याधारमिति चिं० श्रीस० ॥ ६० सम्यक् व धर्मस्य भावनामिति चिन्थीस०॥ ६१ सम्यक्त्व घमस्य निधिसानिभामिति चिं० श्री० ।। ६२ अन्तिाजी इनि अडानस्थानयुक्तश्री सद्दशनाय० ॥ २३ मच जीरा निय शति श्रद्धास्थानयुक्तश्री० ॥ काउम्मग्ग परे। एक लेगस्त । उमा धने भन्नत्थ ऊसास M मदर्शनाय नम ॥ ६ स च जीव इतकम्माणि दयनीति श्रध्दास्थानयुक्धी सद्दर्शनाय नम ॥ ६६ जीवस्याति निनाणमिति श्रद्धास्थानयुक्त० ॥ इति श्रदानस्थानयुक्त० ॥ M करे
.
(3)
॥ अथ सप्तम दिवस विधि ॥
ॐ ही नमो नाणस्म' मा पदनो इनार गुपणी गणे।
जनपद उपर यम छ ती मातर्नु थाविर पर। कारन भेट
मानपनाचितपिन नमस्कार करे ।।
॥ अथ जानपदना ५१ भेद ।।
पर्शनायियजनायग्रहमतिगानाय ममः ।।
ঘনঘন্যমনিরনাথ সদ।
३ रणद्रिय यजनामपदमनिशानाय नमः !!
धादियध्यातनावग्रहमनिमानाय नमः ।।
निद्रियभावप्रहमनिमानाय नम ॥
रमडियमथानहमनिशानाय नम ॥
७ मापडियायाम मनिशानाय नम !!
चाहियथानहमनिपानाय नम ॥
• धादियभधारामनिवानाय नम ।।
१० मनायाग्रहमतिक्षानाय नम ॥
११ स्पर्शनंद्रियोहामतिमान य नम ॥
१२. रसनेंद्रियदामानिशानाय नम ॥
१३ घ्राणेंद्वियबहामतिनानाय नम ॥
१४चरिदियाहामतिबानाग नाम ।
। पात्रंद्रियामनिशानाय नम ॥
१६ मन हामनिशानाय नम
७ सशद्रियपायमतिशानाय नम ॥
८ रमनेंद्रियायमतिमाय नम ॥
५ घ्राणाठियअपायमतिबानाय नम ॥
-० चभुगन्द्रियनपायमतितानाय नम ॥
२. श्रोद्रियनपायमनिशानाय नः ||
२२ मनोऽपायमनिशानाय नम ॥
विपशनटियधारणामनिसानाय नम ॥
(७४) -- २५ रसद्रियधारणामतिक्षानाय नम ॥ २५माणेडियधारणामतिशानाय नम ।। २८ चधुरिदियधारणामतिज्ञानाय नम ॥ २७ श्रोत्रंद्रियधारणामतितानाय नम ॥ २८ मनापारणामतिशानाय नम ॥ २९ अक्षरथुनशानाय नम ॥ ३०अनक्षरथुनशानाय नम ॥ ३१ सशिनशानाय नम ॥ ३२ असशिश्रुतज्ञानाय नमः। ३३ सम्यक्श्रुतशानाय नम ॥ ३४ मिथ्याशुतज्ञानाय नम ॥ ३' सान्तिहानाय नम ।। ३६ अनादिश्रुतशानाय नम ३७ सपयरसितशुनशानाय नम ॥ ३८ अपयवसितशुतज्ञानाय नम ३९ गमिततधानाय नम ॥ ४० अगमिकथतज्ञानाय नम ॥ जंगप्रविणतानाय नम ॥ ४२ अनगमविष्टश्रुतशानाय नम ॥ ४३ जनुगामिअवधि मानाय नम || अननुगामिअवाघशानाय नम ॥ ४ वधमानयाधिशानाय नम ॥ ४. हीयमाननयधिशानाय नम ॥ ४७ प्रतिपातिविधिपानाय नम ॥ अप्रतिपातिअधिशानाय नम ॥ ३१ रुजुमारोमन पर्यवशानाय नम ॥ ५. रिपुलमतिमन पर्यवशानाय नम || .१ रोशनगशवधीक्यलशानाय नम ॥ आरीते । नमस्सर कर। उमा धेने अन्नस्थ उस - इत्यादि कहे।.१रोगस्मनो पउिसग करें प्रगट रोगस्स कह। पठे मन पूर्वोच परणी करे ।शी सप्तम दिवस रिधि ॥ ७॥ ॥ अथ अष्टम दिवस विधि ॥ ॥ ॐ ही नर्माचारितस्म' आ पन्नो २ हजार गुणणो गणे। चारित्रपदनो उज्वर पण छे, तेथी भातन साथिट परे । सिनरे २ भेद चाग्निपदन, वितयिने नमस्कार करे॥ ॥ अथ चारित्रपदना ७० भेद ।। प्राणातिपातचिरमणरूपवारित्राय नम ॥ मृपानादनिरमणरूपचारित्राय नम ॥ ३ अत्तानचिरमणरुपचारित्राय नम ॥ ४मधुननिग्मणस्पचारित्राय नम ॥ परिग्रहविरमणम्पचारित्राय नम ।। ६षमाधमरुपगारवाय नम ।। जावधमरुपचारियाय नम ॥ ८ मृदुताधमरपचारित्राय नम ॥ २ मुनिघमरूपारिभाय नम ॥ १० तपोधमपचारिवाय नम ॥ सयमधर्मग्पचारित्राय नम ।। १० सत्यधर्ममपचारित्राय नम । १३ शौचधमस्पचारित्राय नम ॥ १४ अस्चिनधर्मग्पचारित्राय नम !! २. या धर्मरुपचारित्राय नम ॥ २६ पृरिक्षासयमचारित्राय नम ।। ७ उदरवासयमचारिमाय नम । २८ तेउरक्षासयमचारित्राय नम याउंग्यामयमचारिचायनम ॥ २० वनस्पतिरक्षासयमचारित्राय नम ॥ २१ वेद्रियरक्षासंयमचारित्राय नमः .
२२ ताद्रियरक्षासंयमधारित्राय नम ॥
२३ चोरिद्रियरक्षासयमचारिणाय नम ।
२४ पंद्रियरक्षासंयम गरित्र य नम
• अजीयरक्षामंयमचारिमाय नम
२५ प्रेमासयम चारित्राय नम
२७ अनुपेक्षासंयमचारित्राय नम ॥
२८ अतिरिनघामभत्तादिपठण पागपसपम०॥
२० प्रमाजनरूपमयमग्राग्विाय नम॥
३०मन मयमयारित्राय नम ॥
३१ यासयमचारित्राय नम ॥
३२ पायासयमचारित्राय नम ॥
३३ माचार्ययेयावृत्यरूपसयमचाग्निाय नम ॥
३४ उपाध्यायवेयावृत्यरूपलयम पारित्राय नम ॥
३५ तपस्विनैयायपरुचारित्राय नम ॥
३६ लघुशिष्यादिवयावृत्यरूप गारित्राय म ॥
३७ ग्लानसाधुपैयापरुप गरित्राय नम ॥
२८ साधुघयावृत्यरूपचारिधाय नम ॥
३९ थमणोपासक्यावृत्त्यरूपचारित्राय नम ||
४० सवधावृत्यरूपचारित्राय नम ॥
४१ कुलश्यावृत्यरूपचारित्राय नम ।।
४२ गणवयावृत्यरूपचारित्राय नम ॥
४३ पशुपंदगादिरहिनासतिरसनब्रह्मगुप्तियारित्रा०॥
४५ बीहास्यादिविस्थावजनगुनिचारित्राय०॥
४५ स्त्रीभासनपर्मनतमगुनि पारिवाय नम ॥
४६ सीगोपागनिरीक्षणपजनप्रमगुप्तिचारित्राय० ॥
४७ युदयन्तरस्थितरत्रीहायभारथयणयजनप्रमगुप्ति०॥
४८ पूर्वग्नीर्ममागचिंतनवजनगुप्तिचारित्राय नम ॥
४९ अतिसरममाहारवर्जननगुनिचारित्राय नमः ॥
५० अतिआहारपरणवजनग्रह्मगुप्तिचारित्राय नम ।
(८)
७१ अगविभूषावजनग्रह्मगुप्तिचारित्राय नम ॥
५२ अनशनतपोरुपचारिताय नम ॥
५३ ऊनोदरीतपोरुपचारित्राय नम ॥
५५ वृत्तिसंक्षेपतपोरूपचारित्राय नम ॥
४. रसत्यागतपोरूपचारित्राय नम ॥
७६ कायफ्लेशतपोरुपचारित्राय नम ॥
। ७ सलेमनातपोस्पचारिनाय नम ॥
५८ प्रायश्चित्ततपारुपचारित्राय नम ॥
५९ विनयतपोरुपचारित्राय नम ॥
६० घेयावश्चतपारूपचारित्राय नम ॥
६. सन्यायतपोरूपचारित्राय नम |
६२ ध्यानतपोरूपचारित्राय नम ॥
६३ उपसर्गतपोरूपचारित्राय नम ॥
६४ अनतज्ञानसयुत्तचारित्राय नम ॥
६ अनतदर्शनसयुक्तचारिताय नम ॥
६६ अनतचारित्रसंयुक्त चारित्राय नम ॥
६७ मोधनि ग्रहकरणचारित्राय नम ॥
६८माननिग्रहारणचारित्राय नम ॥
६९ मायानिग्रहकरणचारित्राय नम ॥
७० रोमानिग्रहकरणचारित्राय नम ॥
॥ आवि रीते ७० नमस्कार करे । उभा थैने अन्नत्थ
ऊसमिपण. इत्यादि कहे । ७० लोगस्सनो फाउस्सग्ग परे
एक लोगस्स प्रगट कहे । पछे पूर्वोक्त फरणी यधी परे । इति अष्टम
दिवस निधि
॥ अथ नवम दिवस विधि ॥
॥ॐही नमो तवस्स मा पद्नो २ हजार गुणणो गणे।
तपपदनो उज्ज्वल पण छे तेथी भातनु मायिल करे । पचास भेद
तपपदना चिंतविने नमस्कार पर।
६
+
॥ अथ तपपदना ५० भेद ॥
१ यात्यथिततपसे नम ॥
२ इत्यरतपोभेदतपसे नम ॥
३ वाद्यऊनोदरीतपाभेदतपमे नम ॥
४ अभ्यतरऊनादरीतपाभेटतपसे नम ॥
'द्रयनपोवृत्तिसरेपतपाभेदनपसे नम ॥
६ क्षत्रतपोवृत्तिसश्वरतपोभेदतपस नम ॥
७काठतपावृत्तिसपपतपोभेदतपसे नम ॥
८ भारतपोवृत्तिसक्षेपतपामेन्तपसे नम ॥
९ फायशतपोभन्तपसे नम ॥
१० रसत्यागतपोभदतपसे नम ॥
११ द्रियक्पाययागविषयसलीनतातपसे नम ॥
१२ स्त्रीपशुपडकादियार्जितस्थानअवस्थितमलीनताश्तपसे नम
१३ आलायणप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१८ पडिकमणप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१५मित्रप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१६ विवरप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१७.पमगप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
१८ तप प्रायश्चित्ततपस नम ॥
१९ छेदप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
२० मूरपायश्चित्तनपम नम ॥
२१ अनयस्थितप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
२२ पारचियप्रायश्चित्ततपसे नम ॥
२३ शानविनयरूपतपसे नम ॥
२८ दशनविनयरूपतपसे नम ॥
०५ चारिमविनयस्पतपसे नम ॥
२६ गुवादिकमनोपियरूपनपसे नम ॥
२७ पचनविनयरूपतपसे नम ॥
२८ कायरिनयरूपनपसे नम ॥
(८३)
२९ उपचारकरियरूपतपसे नमः ॥
३० याचार्यघयावञ्चतपसे नम ॥
३१ उपाध्यायवेयावश्चतपसे नम ॥
३९ साधुवेयावयतपसे नम ॥
३३ तपस्वियावश्चतपस नम ॥
२४ रघुशिष्यादिययारचतपसे नम ॥
३ ग्लानमाधुयेयायश्चतपमे नम ।
३६ श्रमणोपासरयारयतपसे नम ।
३७ सरयाचथतपसे नम ॥
३८कुठपयायञ्चतपसे नम ॥
३० गणयानश्चतपसे नम ॥
४. चायणातपसे नम ॥
बा पृच्छानातपसे नम ॥
४२ पपयत्तनातपम नम ।।
४३ अनुप्रेश्यामपस नम ॥
उधमक्थातपसे नम ॥
४ आत्तध्याननिवृत्ततपसे नम ॥
४६ राहध्याननिवृत्ततपसे नम ॥
८७ धमध्यानचिंतनतपसे नम ॥
२८अध्यानचितनतपसे नम ॥
४० घाघउपसर्गतपसे नम ।
५० अभ्यतरउपसगतपसे नम ॥
॥ आची रीते १० नमस्कार करे। भा थेने अन्नत्य ऊसासेपण
इत्यादि कहे। ..रोगस्सनो पाउस्सग करे प्रगट एक लोगस्स
यो । पछे पूर्वोत्न करणी करे ।। इति नरम दिवस विधि ।
नवपदओलीनी विधि
प्रथम आसोगुदी ७ सातम थी अथना चैत्रगुदी ७ थी शर परे
तीया तुटेली हायतो छठ थी शरु करे, आवेल नघ पुनम सुधी पूण
(८४) करे, पेसा सवारना उठीने राय पदिममशु तथा 'पडा विगैरेनी पहिरोहण करे, पछे भूमि गुरु दरो यामोठ उपर "नवपद सिद्ध चयन्त्र 'मी स्थापना करतेना साम पाच नमुत्युण थी दययदन करे, पछे सिद्धचाना नय चैत्ययदा, कर, जेनीपासे नयपद मिद्ध चमयत्र न होय तेण नर मदिर अयया एक मदिरमा नय घेय घदन परया, सिद्ध चमय भनी यास क्षेपयी पूजा परयो, पछे म्नान परीन शुद्ध वस्त्र पहेरी तिगडानी उपर मदिरमा भादिश्यर भगवान् नी प्रतिमा स्थापन करयी तेनी पासे 'नयपद सिद्ध चमय' मुकीने स्मान भणाये, तथा नवपदजीनी लघुपूना भणारे, को, पॐ जे जे पदना जेटलापमासमणा होय तथा तेटलीन फ्री (प्रदक्षिणा) फरे तथा तेटलाज साथिया, तेटलाज पर, मुके, पछजजे पद छोय तने आराधयानिमित्त काउमग्ग जटा होगसनो होय तटकरे, पछे नवकारयाली पद पनी पीस धीर रोजगणे जे ज पदनी जया यण होय तथा तेया वर्णनु आपिर ये द्रव्य थी अर्थात् पर अनाम नी पर घस्तु, तथा पाणी, मायेयस्तु आयल नु पचखाणकर, पछ मध्याह्नना देवघदन करी ने पछ पञ्चम्याण पारीने पछे पायेर रे, अने त्यारयाद आयेल करीने यवदन परे पछ तिथिद्वारनु पर. खाणकर, अथवा चौबिहारनु पथयाण पर, त्यारयाद तीजापहारे पडिरहण करे, तथा साजना देव याद्या पछ मदिरमा जर धूप पूजा आरति मगल, दीयो करे पछे उपाश्रय जान पडियमणु करे, पहोर रात्रि गया पर्छ सथाप पारसी भणायथी भने भूमिशयन- संथारा उपर सुधु तथा नवमा दिवस विशेष नवपदजीनी मोटी पूजा भने मडरनी पूजा विधि खेल प्रमाणे करे नरपदनी भोली पूण थये उद्यापन फ्खु तेनी विधि विस्तारथी श्रीपाल चरित्र माथी जाणयी, अथवा गुरु मुखे जाणधी, अने यथा शक्ति उजमणु क्षु मदिर जवानीविधि तथा पूजन विधि प्रथम धावके चार घडी रात थाकी रहे त्यारे उठे, मयम मनमा उटताज नयकार मनु स्मरण क्रेटुकोण मारी जाती कोण मार पर्तव्य मुं' मारोघम मुं' इत्यादिक धर्म जागरणथी मनने सायचेत परे, पर्छ मलमूघनी बाधा दूर की अग पवित्र फरी, सामायक प्रतिक्रमण फरीने विधि सहित घरदेगसरनी पूजा करे, पछे यथा शक्ति, सारायन थाभूषण पहरी, पोताना परियार तथा अधि साथै पूजा योग्य फल फूल नैवेद्य उत्तम द्रव्य हायमा राइने भय जीवीने माममार्ग यायता, नया जैन शासननी प्रभावना पर तानिनमंदिर जाय, निनमदिरमा प्रवेश करता शत्रिक साचने ते दशत्रिय पहिलु त्रिक प्रण निस्सदि करपानी, तेमा पेलीनि स्सिदी जिनमदिग्मा पेमता परे पीछे ससार घर सयंधी काइपण कार्यविचारणा न कर ॥१॥ योनी निस्सिही प्रदक्षिणा प्रण आये। जिनमदोरमा तुटेल फुटेर फुटाहटा टोफ करवानी सार सभाल राखली हती ते पण छोडे । अहिया इस्यपूजानी परणी छुटी रही ॥२॥ तीसरी निस्सिही यहिने निकर भावपूजा परे, पण द्रव्यपूनान करे । मा प्रथम निस्सिदी निक का॥ धीमी त्रिव शानविश्नी आयधना करवाने प्रभुना जमपी तर पथी तीन तीन प्रदक्षिणा आपे । तीजु धिक मूलनायकजीना निंदनी समुसे पचाग मेगा करीन तणवार नमस्कार करे ॥ ६॥ चौर त्रिक । प्रभुनी अंग । अग्र २ भार ३ त्रिविध प्रकारनी पूजा करे हरे निस्सिही क्या पछे मृत्य अपत्य तथा पूजानिधिमक्षिप्त लये छ । निस्सिही कहा पाछे मनोगुप्ति, पचनगुति, पायगुमि फरिने युक्त रहे । पाचौ इद्रियाने यशमा राप । गमनागमनमें उपयोगी रहे। गानचिगेर अन्यनु सामली चित्तमा व्याकुलता राखे । कोइपण देय कायने छोहीने अन्य कायनी विचारणा न करे । रानश्यादि सपूर्ण विस्था छोडे । जम अने कर्मना अनुगत पचन न योले, अयात् कोइना मातापितादिषना करेला वोग कामने प्रगट न -4 +4 क --
4
परे । तथा मानुगत पचा बाघलाने आधी गोलो। गोला
इत्यादि वचन न यार ।निस्मितो क्या पीछ जिनमदिरमा धर्म
सयुक्त, आत्मदितकरी, प्रमाणापत यमन योग्युजोहए जी मन,
बचन, पायाधी ग्यादा व्यापागना निपथ आपणी आमाथी पर्यो
छे तेना भावधी निस्मिही हाय ! थन जगे दुरणनो त्याग न पयों
होय तेन फेयर शाद उच्चारण मात्र द्रव्य निस्सिही थाय, तों
पूजा योग्य उत्तम घर पहेरिने, भाठ पग्ना उन्चर पानी
मुखपोश थाधे । धुपादिययी अग आपणु शुद्ध पर । मायणी धीमी
निस्सिही परे मूर गभारामा प्रयश परे । जयणा संयुा पूजा
परे। पूना परता भरीरमा पाजन , पेल नावार न परे
निपल भगवाननी स्तयनामा चिन गप । प्रथम मुगध युवं जल
पचामृतयी स्रन करे । सुकुमार सार, यामल मुगध युन यरमयो
भगराननु अगददे। पपूर, पम्नी मिश्रित गुख पेशर चदननु
दिलपन परे । शुभ षण, शुभ गध युक्त जीवादि रहित निदार
गुलार चपा, चपली, घडा जाइ मागगदिन पुष्परी पूजा परे ।
अष्टाग धूप अगरबत्ती उपय! मगलदीप कर। भरपड उपन्यल
अक्षरथी प्रभुना म मुस अष्ट मगलिय रो।दर्पण | भद्रामन २
बधमान शरायसपुर ३ श्रीवत्स मस्ययुग ५ वरश ६ म्यतिक ७
नापत ८ आधी भए मगलना रचना पर पच पण पोथी अष्ट
मगलीफ्ना पूजा करे । मुदर फुकुम मिश्रित चदनयी थापा दे।
उत्तम नयेच चदारे । सार माय फर चढावे । इत्यादि पूजानी
विधि आरती पर्यंत रायपसेणी, हाताधमश्था जीयाभिगमादि
सिद्धातोथी लखी छे ते मुजय परे जथी । पर्छ अतरग भक्तिी
प्रभुना समुख नाटक को । जेपी रीते देयेंद्र दानद्र, नारद घगेरे
तथा उदायी गजानी राणी प्रभावतीये औपीये नाटक क्यु । थने
राण प्रमुप फेटला जीयोए अप्रापद उपर नाम फरिने नायपर
गोत्र उपाजन कयु तेवी रीने प्रभुना समुप, शमा रहित थैन
उत्तम पुग्ध नाटक कर ।
॥ हवे जर यदन पुपादिक्यी पूजा कर ते अंग पूजा (१
(८७) प्रभुना समुख नैवेद्य प्रमुख चढावे ते अग्रपूजा (२)। प्रभुना समुख शकस्तयादी गीत गान नाटकादिक करे ते भावपूजा (३)। आ द्रव्य पूजानो विचार गमित चोयु भिक का। हो पाचमा त्रिका तीन अपस्था विचारयो । पिंडस्थ १ पदस्थ २, रूपानीत ३१ आमा पिंडस्थ अस्थाना प्रण भेद । जमावस्था (१)राज्यावस्था (२) श्रमणावस्था (३)। अने पेयली यास्थाने विचारवीत पनस्थ अवस्था निरजनाकार नसिद्धारस्था। तेने रूपातीत अवस्था कहेछ । हये छठु त्रिक तीन दिशा छोडिने प्रभुनी सामने नजर राखे । ऊर्म १ अघो २, तिरछी ३, डाची जमणी तरफ नजर न परवी । हये सातमु लिक । तीन चार भूमि प्रमार्जिने ते एकाने चैत्यवदन फो । हरे माठमु त्रिक । वर्णादिक तीन सपदाना अक्षर शुद्ध उचारण करे पर्ण शुद्धि ( ")। अक्षरोना अथ उपर आलग्न रासे ते अर्थगुद्धि (२) आल्वन एक जिनप्रतिमानु राखे ते मन शुद्धि (३) हवं नवमुनिक प्रण मुद्रा करवी 1 जोगमुद्रा(१) जिनमुद्रा (२) मुक्तानि मुद्रा (३)। शामा जोगमुद्रा कोनेके छ। पनकाशाकारे पन्ने हायनी परस्पर आगली मलावधी ए जोगमुद्राए चस्तान पहे (1)। पाउस्सग्गमुद्रा ते जिनमुद्रा (२)। अने त घे सीपनु जोडते आसरे हाय गसयो ते मुक्ताशुक्तिमुद्रा (३) आ मुद्राथा प्रणिधान जय घायराय इत्यादि फर हवे देशमु त्रिक। प्रणिधान तीन । जिनवदन प्रणिधान {१) मुनिवदन प्रणिधान (२) प्रार्थना प्रणिधान ( ३)। आमा जे "आपती चेइआइ इह सतो तय सताइ' सुधि जिनन प्रणिधान (१) "जावत फेरि मा इत्यादि तिविहेण निदडविरयाण इद्दा सुधी मुनिवदन प्रणि धान (२) जय वीयरायथी रइने आभवमसडा सुधी प्राथना रुप माणिधान (३ । आधी रीते दश विश्वनु पहेतु द्वार का हर पाच अभिगम साचगर्नु घीजु द्वार पद्दे छ ॥ सचित्त द्रव्य कुमुमादिक आपणी पासे होय तेने अलग मुश्या (१) भने राज विद मुगट, छन, खड्ग, चामर, पादुश पचित पस्तु छोडवी । आभूषण प्रमुग्व पहेरेला राखया (२) मन एकान करखु (३) एक (८ पट्ट उत्सरासंग परषु (४) जिायिय दपवाज 'नमो भुयणयधुणो' पयो नमसार करयो (५) याजु द्वार क्यु इय तीजु द्वार यो दिशिनु । पुरुष जमणी दिशा या भगयतने यादेखीयो डावी दिशा बैटा भगरतने याद । हये चायु द्वार तीन अभिप्रह। अभी ग्रह देय पादणामा क्यु छ । जयय भय दाप दूर येटा देव पाद (१)मायम नव हाथी उपरात येमीने देय पाद (२)। उन्रष्ट ६० हाय दूर सीने देव पादे ( ३) इये पाचमुहार चैत्ययंदननु । ते जघय १ मध्यम २ उत्पए ३ आत्रण भेद छ । तिहा णमो अरिह ताण इत्यादिक रहे घा एक पहिने गाथानो नमस्वार यभान स्तव कहिए जघन्य चैत्यदन (१)। जे देवयइन मा स्थापना हचैत्यबदन नमुथ्थणयी लाने अरिहतचेयाण यादिक सपूण कहीं पर स्तुति कहे ते मध्यम चैत्यवदन । तय फोर भावार्य हे पाव दडर सहित थी ४ गाथा, ते मध्यम चयवन पदे, तथा विधि पूर शमम्नयादि पी पाच दहा जययीयगय सुधी आठ थोये देव याद तेने उत्तष्ट चैत्यबदन कहे , अने छ हार पचागमणि पात ये पग ये हाथ, मस्तर, भापचाग मलाविन, जमिनमा रगार्ड तथा सातमु द्वार जघय एष गाथा थी लाने एपसो आठोक थी प्रभुनी स्तुति-स्तव नारे। सधारा पोरमी निसिही निसिही निसिहाँ । नमो ममासमणाण गोयमाइण मदा मुणोण ( आ पाठ तथा नयकार क्रमिभंते सामाइस प्रणयखत कद्देवा) अणु जाणद्द जिठिचा ठिज्जा । अणु जाणह परमगुर गुरगुण रयणेहि मण्डिय सरारा। यहुपडिपुन्ना पोरसी, राय सथापए ठामि॥१॥ अणु जाण सथार यावदाणेण थामपामेण कुक्कुडि पायपसारेण अतरत पमज्जए भूमि ॥२॥ सकार थ सडासा उपदृत म कायपडि रहा।
८९
दव्याह उन योग ऊसासनिरु मणालोए॥३॥
अामे हुज्ज पमाओ, मस्स देहस्सिमाइ रयणीए ॥ ३॥
थाहारमुवदिदेई सय तिविहेण योसिरिम॥४॥
चतरि मगर, अरिहता मगल सिद्धामगर,
साहु मगल, फेथलि पन्नती धम्मो मगल ॥ ॥
चाचारि रोगुत्तमा, अरिहना लोगुत्चमा,
सिद्धालगुत्तमा, साहु रोगुत्तमा,
देचलिपन्नतो धम्मो लोगुत्तमा ॥६॥
चत्वारि सरण पयज्जामि । अरिहते मरण पय जामि।
सिद्धे सरणं पय मामि साहु मरण पज्जामि ।
येवलिपन्नत घम्म सरण पषमामि ॥७॥
पाणाइ यायमलिम चोगिधा मेहुण दक्षिणमुच्छ ।
कोह माण माय लाम पिज्जतदादास ॥८॥
कलह अम्मरवाण, पेसुन्न र अरह समाउत
परपरिवाय मायामास मिच्छत्त मर च ॥९॥
घोम्मिरिसु इमाइ मुपसमग्गससग्गविग्धभू आर ।
दुग्गइ निघणाइ, अट्टारस पारठाणा ॥१०॥
गोई नथि मे कोह नादमनस्म कस्सह ।
एवं अदीणमणमो आपाण मणु सासर ॥११॥
पगो मे सास आ अप्पा माणदसणसत्तो ।
सला में याहिगभारा सये सजोग लपत्रणा ।। १२ ।।
संजोग मूला सीण पत्ता दुपत्र परपरा ।
तम्हा सजोग संघ सय तिथिद्देण चोसिरि ॥१३॥
अरिहतो मह देवो जावजीर सुमारणो गुरुणो।
जिणपन्नत तत्तइ अ सम्मन, मए गद्दि ॥१४॥
स्खमि अखमावि अमइ समिम सरह जीय निकाय ।
सिद्ध साप आलोयणह मुजद पार नभार ॥ १७ ॥
सघे जीया कम्मषस चउदह राजममत ।
नेमे सरखमाविमा मुन्नपि तेह खमत ॥ १६ ॥
जमण पर पापण मानिर्भ पाय नपारण पये मिसळामिपाईनम्म ॥ १७॥ ' आरोना मध्देया भागाथा तयार माँ साल मार पहया पड मागगगाधा कामी (मायपिस्नु पचर) उग्गए गए नमुशारमरिभ पागि मा पोशिम, मुहिमदिर्भ पवनार । उग्गए मुर प्रायिपि भादार असण, पाने मार्म साराम असषणा भोगण, गहमागार (भाशा, दिसा मोदण साहुययण, मासगगा, मायारमादिधसिपागाण मायबिल पच्चयापाई भन्नत्यता मागण मामागारणं पाटण, मिहत्यासमटण, उनियन वियगण, पारितामणियागास मदसरा মা, মালিবাগাল পায় না। নিবিষ্ট यादा मरण समसाम अमायणाभागा मदरागारण, रागा रिया गार आउटपरमारणे गुरु भाभुधामण पारिटायणिपा गारो महत्तगगाण मय समाधियानयागारणाणसत्येणया, अल्पेजया, अछणया, यदुरेपणा, ससिथणया, भसियेणया यारिया। ( आयल क्याप3 दियच्चरिम निषिद्वार नुपच्चपाण परपुते माप्रमाणे दियम चरिम पस्चपधारा नियिपि भादार भरज शाम. माइम अमायणा भोगेण, सहसागारेण महसपगारण, सम्यसमाधि- पत्तिा गारेण घासिद। (पाणि चुकाया पो पाणदारनु परयमाण पर पाणदार दिवस चरिम पचमगा। अन्नपणाभागण सहसा. गारेण महतरागारणे सासमाधि धसियागारण योसिए॥ पारणाना दिपसे पासणु पेस रघु सेनुपयषपाण उग्गए सर ममुजारसदिभ, पोरिसिं माहपोसिस, महिसाहिर्भ, पच्चक्षाद उग्गए सूर, घडपिपि माहार भमपा, पाण बारमा साइम, अनत्यणामोगेण, गहमागारेण पकाने, दिसामोदेणे, साध्ययणेण महत्तय गारण, सयसमाहिचिया गार। विगामी
-
पच्चरसाद । अन्न यणामागेण, सहसागारण, ल्याण गिहत्य
संसण उस्वितषियगण, पदुच्चमक्खिएण, पारिटायणिया गारेण,
महतरा गारण मपसमाहियातयागारेण । एमासण पच्चक्पाइ ।
तिविपि आहार, असण, साइम, साइम, समस्यणाभागेण, सहमा
गारेण, मागारिआ गारेण, आइटण यसारेण, गुर अम्भुट्टाणेण,
पारिटायणियागारेण, महत्तरागारेण सममाहित्तिया गारण, पा-
णसवेगना, अर येणना, अच्छेणमा, बहुलवेगना, समि येणना,
अमिन्थेणवा योसिरह ।
जो रियामणानु पच्चपाण कर होय तो 'एकासण' नाटे
काणे पियासणु क्यु ।
मिद्धचक्र चत्यबदन
१
सिरिसिद्धचकनवश्य महलपढ मिल्लाय,
मयनिणद असुरिंदच्चिय पयपक्य नाह तुम नमो ॥१॥
सिरि रिसदेसर सामिय परदाण पप्पतरू,
कप्पक्दपगजण मरमजण देव तुज नमो ॥२॥
सिरि नामिनाम कुलगर फुलपमल्हास परमहस,
समसम तमतम तमा भर, हरणिय पाय तुझ नमो ॥३॥
सिरिमरुदेव मामिणि उदरदरिदरिय सरि,
क्सिोर घोर भूयदड सडिय पयह माइस्सतुझ नमो॥४॥
पखागुणयमभूसणगण गय दुसण दुरिय मयगल मइन्,
चदसमवयणवियमिय निपुल नयण तुझ नमो ॥५॥
फलाण कारणु समतत्त क्णयकरम सरिस सटाण,
ठठिय करकुंतल निपल कालेय तुम नमो ॥६॥
आइसर जोइसर स्यगय मणय लम्विय सरुवा,
भवर पहिय अतुतारण जिणनाह तुझ नमो॥७॥
मिरिसिद्धसेल मटण दुहखडण पयर राय नयपाय ।
सयलमह सिद्धिदाय जिणनायगहोउ तुय नमो॥८॥
(०२) तुरगमा तुम ममो नुनमा दय तुम घेव ममो। पणय सुर स्थल सदर गरनिय पाय नुस नमो. नियंत रगारि गण मुयाणे, मापारि सयपापा सदेह सदोदरप इरंता ज्ञाप, तिच्यविजित रहतो॥१॥ दुर पम्मापरण पमु, अणेत नामिारेयउसे। समग्ग लागग पयायमिन, झारद निन्यपि मम्मम्गसिर ॥२॥ न से सुद नदि पीया न माश, जदनि जीयाहि सूरी माया। तमाद ते उप सथा मजेद मुशार मुफ्गार पदुमदद ॥ ३॥ सुनत्य मयेगमर्य मुपणं संनीर मारामय विमुरत। पानिजते सायपर शाप निच्य पयामाया" घेतय दतेय मुगुतिगुना, मुत्तय सेतो गुण जोगगुना। गयापमाए गयमा माए, भारद निचं पुणिरापाये ॥५ जदयि पायेमु महार्ण, सदमण सध्यगुणदान । कुग्गही वादी उपयति जेण, जहारियण रमायण ॥ ६॥ नाणपहाण नयचरमिदं तत्तपोद्दी मर्य पमिद । घर रित्तायमर पुरत, माणिमादिमाय तमोहरत ॥ ७॥ सुमेयर माहनिरोधसार, पपशा यिगमाइयार। मूलोतराण गुण पयित पारद नियपिटु सरवरित ॥८॥ यज ता मितर भेयमेय दयाय दुमेय पुरम्ममेयं । दुषस्वययत् पयपायनास, तपण दादागमय सिराम ॥९॥ प्यार फेवि न्यापया, मारायतिरपलपा तहनि त सुपथपरंपराणं सिरि मिरीपार मसाnion सपन केशर धरणही के काढासुंया महारा हाल देशी गोयमनाणो दो, के कद्दे सुणी पाणी महारालाल । जिनयर यापी छो, के द्विय आणी । मा० आसो मासे गुरुने पास मा० ।
नवपद व्यास हा, के अग उल्लाममा || आपिल कीजे हो, क दिन पूजि मा ज्ञापनपीने वादेययादि मा० । भाप नामायो हा सिद्धचक्र ध्याया मा० जिनगुणगायो दी, के शीपसुपपापो मा०।२३ मा श्रीपाले हो, पेमयणायारे मा० स्थान रसाल हो, कपा टाल, मा०सिद्ध भ्यायो दो, पे रोग गमायो मा० मामापायोदो, फ नयपद पायो मा०॥ ३॥ मामनी भोली हो, रहरी पटाली, मा० सदीय टोली दो, के पुंफमयोली मा० । यालयाली हो, पीजनयरनोली मा० ॥४॥ पूजी प्रणमीदो, के कीन पानी मात्र यामी हो मनन उल्लासे, मा० नयपद यादाशीरमुख पास मा । उत्तम सागर दो, के पडितराया मा० स्यातिहो, फे बहुसुण्यपाया मा०॥ ॥ . भदो मयि माणार सयो, सिद्ध चमयान समो नही मेयो महो। नकार सिस, चम ने आराधे, तेहनो जगमादि जरायाधे । महो। ॥ पदर पदे अग्दित, पीज मिरपुर प्यानमहत । तीजे पदे रे मुश, चोये उबलाय ने पाचमे मुनीश। अदो० ॥२॥ छठे रक्षपर पीने, मातमे शानथी शियमुखलीने । पाठमे चारित्र बालो, नयम तपथी मुक्ति मागे। अदो ॥ ३॥ आवेल ओलि रे जे, नोकारवाली धाशगणिजीत्रणे किनारे देयो, पडिरहण हिक्मण्ड मेयो । महो॥४॥ गुरुमुन्य मियारे पोजे, देवगुरु सनि विधमा धरीजीएम पद रामनारे शिशी पली उनपिए नगीचोभहो ॥५॥ मिद्धचक्र स्तुति र जिनेवा अति अग्रेसर, गौतमगुणना दरियाजी। क दिन आणा पारनी लेने राजगृहीस चरियाजी। रेणिक राजा पन्दन पाया, उल्टमनमा आणिजी। पदा आगेल पार यिराजे, हये मुणो मविप्राणिजी ॥१॥ गानय मव तुमे ये पाम्या, श्रीसिद्ध चक माराघोजी।
सरित सिद्ध मूरी उपनमाया, साधुदघी गुणयाधेजी।
दराण नाण चारित्र तपसीने, नयपद ध्यान परिजे।
धुर मासोथी या यायिल मुखमपदा पामी मेसी ॥
श्रेणिक राय गीतमान पुछ, नामी ए तप फेणे कि घासी।
मय आपित नए विपितु परता, याछित मुख येणे लिधोजी,
मधुरि ध्वनि थाल्या श्री गातम, सामाणिक राय ययणाजी।
रोग गयोने सपदा पाम्पा श्राधीपारने मयणाजी ॥३॥
रमझुम परली पाये नेटर दीस दयी रुपालीजी।
नाम चमेसरी नेसिडाइ, आदिमितर रापानी॥
विधनशोह हर मासयना, ज सवे पना पायजी ।
भाणविजय पयि सर नय यद्दे, मानिधरजा मायनी ॥४॥
३
अईमूर प्रकाण्डो तनुनिकरधर मरिरानश्च शापा ।
गुल्म सदाचरेशो दलिततिपरिधि मायको मरीचित् ॥
पुप्पाघादशन चाभिमतपरिमलश्चार पारिधरप ।
शस्त शस्य तपश्यामरतरुचिमर सिद्धचत्र पुनातु ॥२॥
आप्ता सिद्धा मुनीद्रा प्रवरमुनियरा माघयो ज्ञानपा।
वेता रत्ताश्च पीता युधमम दरिता बनलाभाजिनेशा।
चञ्चत्युष्पाप्रपा छमियनकरजपण रोलरधारा ।
गीर्ण गाइवेष्ट मालमति तन पारन सददातु ॥२॥
सर्वाना गृहनेता द्विधनवपरिमिता कमानेमूरपाना
माचायाणा रमनिय नवमुनि यो यारकाना मुनीनाम् ॥
त्रिंश सतयुक्ता मुनिति सरिता नेत्रसख्या चतुर्णः ।
पष्टि रधि वसतीगगन शरमिता सद्गुणौधा जयति ॥३॥
देवेद्रा अष्टयों गहगगममहिता गोमुवाचा परेऽपि ।
चश्वयादि देयोऽपि च कुशलरा सिद्ध चास्य भता ॥
श्री श्रीपारादिकानामिन सुममभृता प्राणिना भनिभाना ।
श म्पवृक्ष ददातु पराममुसफल मुनिमौभाग्यधीनम् ॥४॥
आमिल तपती सज्झाय समय श्रुतदेवी शारदा, सरसयचनयर थापे सदा ॥ आवेिल तपनो महिमा घणो भावजन मापथको ते सुणो ॥ १॥ निगय सरलनी जिंहा परिहार, अशनमाहि घणो मंद विचार ॥ जिंदल सर तिल तूयर रिना अलसी पादय कागनी मना ॥२॥खधान पासे दुष्ट फर सय, पजिय आणिलपर्षमा ॥ थोसामण पर जो जलभल तो आयिल थपिर रसटल ॥ ३॥ विस्वण सुट मरीयन सुआ, मेयी संवर रामट जुमा ॥ अजमादिर मेला रचाय, तो आबिलमा वाथाय ॥४॥जिक भले त जेवहा बद्दी, ते मुज पण जी नहीं ॥ गोमुत्र पिना छ अगाहार त मपि ऐवानो व्यवहार ॥५॥ सात जाति ते तदुर ती ते पुजती आरिलमा मनः॥ सेकेट धान अपक्की दाल,माडापावरा त्या टाल॥६॥दग्दर लविंग पीपर पीपली, हाडे संघर घसणवली । बादिम धादिममें कवाय, ते आपिलमा नरि गाय ॥ ७ ॥ उत्रए विधे उग जल- नीर, जब यपिधे का सोनु नीराम निर दृषण आपिर पर, मुख घोरण दातण नयि को ॥ ८॥जे निरदूषण रिप थाहार, ओदननो तेहने यरहार || भाटा लिंगट पाणीयतु, तपण-मामिलमा मुअतु ॥०॥ अशड गातारथ अणमाउरी, जे जे जनिधि याल से बरी॥ लाभा लाभनिगारे जह, विधि गीतारथ फहिए ते॥१०॥ आदिल तप उरत कन्यो, विधन विदारण कारण रह्यो । चाचाशीति विजय सुपसाय, भागे विनयविनय उय साय ॥१॥ इति सहाय सम्पूर्ण ममात जाहिर सूचना जलदी करो । जलदी करो।। जलदी करो।" वहेलो ते पेलो पाठलथी पस्तावु पडशे । श्री नवपद सिद्धचक्र यन्त्र. नदपद ओलीनी आराधना करनाराओने आ यन्त्र अति उप- योगी होनाथी हमोए मोटु सर्च करी तैयार करेलछे सातरगोथी सुशोभित मनोहर तैयार करेल , आ यर नवपदनी ओली आसो चैत्रमा करनारने अति उपयोगी छ कारणके नरपद ओलिनी विधि सम्पूर्ण आ यन्त्र पासेज करवानीछे आ यन्त्रनी सामे श्रीपाल महाराजा तथा मयणा सुदरीए आराधन करेलु तेथी तेमनो अति कठण कोठनो रोग चाल्यो गो आ यन्त्र दरे- कने अति उपयोगी छे घरदेरासमा तथा श्रीमघना देरा सरमा पण राबमा जेजुछे. मोटा परिश्रमे सशाधन करेलछे हवे थोडाज नसमा बार पडशे मूल्य रु. १ पोस्ट अलग लसो- मुनिश्रीमोहनलालजी जैन ग्रन्थमाला जैन स्वयसेवकमडल पीपलीवजार इदोरसिटी (माळया मध्यभारत )
No text on this page.