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Geetgovind-kavyam Bhashatika Samanvitam
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थी।
महाकवि श्रीजयदेव विरचितम्
गीतगोविन्द काव्यम् ।
4.
.......
RANATH
भाषाटीका समन्वितमें।
अम्बिकाप्रसाद शर्मणा संशोधितम कोहीस्थ
विश्वविद्यालये व्याकरणसाहित्या
ध्यापकेन व्याकरणा चायण
तालय
काशीस्थ भार्गव पुस्तकालयाध्यक्षण
बावू काशीप्रसाद भार्गवेण
काशीयां
द्वितीयवार २०००] सन् १९२५ ई० 1 [मूल्य ।।)
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॥ श्रीगणेशाय नमः
श्रीराधाकृष्णाभ्यानमः
अथ
wati
॥ भाषा टीका समेतम् ॥
गीतगोविन्दम्
प्रथमः सर्गः
मेधैर्मदुरमम्वरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमे ।
नक्तं भीरुश्यं त्वमेव तदिमं राधे गृहं प्रापय ।।
इत्थं नंदनिदेशतश्चलितयोः प्रत्यध्वकुंजगुमं ।
राधामाधवयोर्जयन्तियमुनाकूलेरहःकेलयः १
भा० टी०-एक समय राधिका, श्रीकृष्ण, और कोई
'सखी फिसी बनमें उपस्थित थे जब संध्या हो गई तब
सखी राधिका से बोली कि, हे राधे | यह आफाश मेघोंसे
गीतगोविंदम् ।
[प्रथमः
.
.
१
आच्छादित हो रहा है, और पनकी जमीन भी तमाल
वृक्षोंसे श्यामवर्ण हो गई है । और श्रीकृष्ण रात्रि में डरते
हैं इस लिये तुम्ही इनको घर पहुँचा श्रावो, इस प्रकार
सखीकी आज्ञा पाकर राधा और कृष्ण चले उन के. .
मार्गके कुंन तथा वृक्षोंकि वीच २ जमुना के तौर पर
एकान्त की क्रीड़ा सब कीड़ाओं से बढ़-चढ़ के है यह
वस्तु निर्देशात्मक मंगल है ॥१॥
वाग्देवताचरितचित्रितचित्तसना।
पम्दावतीचरणचारण चक्रवर्ती ।।
श्रीवासुदेवरतिं कोलकथासमेत।
मेतं करोतिजयदेवकविः प्रवन्धम् ॥२॥
भा० --सरस्वतीजी के चरित्र से जिनका चित.
श्वरूप.गृह सुशोभित हो रहा है और लक्ष्मी (राधिका की
चरण सेवकों में चक्रवती श्रेष्ठ जयदेव कवि श्रीकृष्णकी ।
रति क्रीडा (रासलीला) विषयक यह प्रबन्ध (गीतगोविन्द):
बनाते हैं ॥२॥
यदि हरिस्मरणे सरसं मनो।
यदिविलासकलासु कुतूहलम् ॥
मधुरकोमलकान्तपदावलिं।
शृणु तदाजयदेवसरस्वतीम् ॥ ३॥
सर्गः१] भोपाटीका समेतम्। " भा० टी०- यदि आपलोगों का चित्त भगवान के स्मरण में ले न है, और यदि विलास कलाओंको सुननकी इच्छा है तो अति मधुर कोमल और सुन्दर पदावली संयुक्त जयदेव कविकी वाक्य रचना सुनिये ।।३।। वाचःपल्लवयत्युमापतिधरः सन्दर्भशुद्धिं गिरा। जानीते जयदेव एव शरण श्लाघ्यो दुरूहदुतेः॥ श्रृंगारोत्तरसत्पमेयरचनैराचार्यगोवर्धन-। स्पर्धीकोऽपिनावश्रतःश्रुतिधरोधाईकविमापति, मा० टी०-उमापनिधर कवि शब्दाडम्बर करनेमें निपुण ये किन्तु अर्थ गौरव नहीं) अर्थ और शब्द दोनोंसे वचन की सन्दर्भाशुद्धि (ग्रंथ शैली ) जयदेव ही जानता है । और शरण नाम कषि क्लिष्ट' काव्य रचना में चतुर थो, तथा गोवर्द्धनाचार्य की श्रृंगार रसकी कविताके साथ कोई भी स्पर्धा (वरायरी)न कर सका और धोई नाम कविराज एक बार कहनेसे धारणमात्र कर लेता था, किन्तु अादि समझने में कुशल नहीं था प्रथम भगवान के दशावतारका वर्णन करते हैं । प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् ।। विहित बहिनचरित्र मखेदम् ।। केशव धृतमनिशरीर जय जगदीश हरे ॥१॥ - ४ गीतगोविंदम् । [प्रथमः भा०टी०-हे मत्स्यरूपको धारण करने वाले केशव । आपने प्रलय के समय समुद्रमें विना परिश्रम नौकायारूप धारण किया अतः हे जगदीश ! हे हरे आप की जयहो तितिरतिविपुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे ।। धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे ॥ केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥२॥ भा० टी०-हे कूर्म ( कछुपा ) का रूप धारण करने पाले केशव! आपने अपनी बड़ी भारी पाठपर पृथ्वीके धारण किया इसीसे अप पृथ्वी धारण व्रणके चिन्ह (ठेले ) पडगये है इसलिये हेहरे आपकी जयहो । वसति दशनशिखरे धरणी तव लमा ।। शनिनि कलंककलेव निममा ।। केशव धृतसूकररूप जय जगदीश हरे ॥३॥ मा० टी०-हे सूकरावतार धारण करनेवाले केशव आपके दन्त पर लगीहुई पृथ्वी चन्द्रमाकी कलंक रेखा समान शोभित होती थी, अतः हे हरे आपकी जय हो.. तब करकमलवरे नखमद्भुतश्रुङ्गम् ।। दलितहिरण्यकशिपुतनुभृङ्गम् ॥
सर्गः१]
भाषाटीका समेतम्
केशव धूतनरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥४॥
भा० टी०-हे नरसिंह रूपको धारण करनेवाले
केशव! आपके करकमलोंमें जो विलक्षण नख हैं. उनस
हिरण्यकसिपके शरीररूपी भ्रमरको विदारण किया भ्रतः
हे हरे॥
छलयसि विक्रमणे बलिमद्भुतवामन ।।
पदनखनीरजनितजनपावन ॥
केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥५॥
भा० टी०-हे वामनरूपको धारण करने वाले केशव !
आपने अद्भुत वामनावतार को धारण कर बलिनाम
दैत्य को, ठगाथा और चरणके नख कमलसे संसारको
पवित्र किया अत: है जग० ॥५॥
क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् ।।
स्नपयसि पयसि शमितभवतापम्
केशव धृतभृगुपतिरूप जय जगदीश हरे ॥६॥
भा. टी०- परशुरामके रूपको धारण करनेवाले
केशव ! आपने परशुरामावतारमें क्षत्रियों के रुधिर में
संसार को स्नान कराकर जगत्के पापोंका और तीनों
तापोंका नाशकिपा, अतः हे जग० ॥ ६ ॥
गीतगोविंदम् । [प्रथमः वितरसें दिक्षुरणे दिक्पतिकमनीयम् ॥ दशमुखमौलिवाल रमणीयम् ॥ केशव धृतरघुपतिरूप जय जगदीश हरे।।७।। भा० ठी-हे रामचन्द्र के रूपधारण करनेवाले केशव। आपने इन्द्रादिदेवों के अनुकूल रण में रावण नाम राक्षस- राजके दशमुखोंको दों दिशाओंको बलिदान दिया अतः हे० ॥७॥ वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभम् ॥ हलहतिमितिमिलितयमुनामम् !! केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥८॥ पा० टी-है हल धारण करनेवाले केशव ! आपने स्वच्छ शरीर पर मेघके समान वस्त्र [ नीलम्बर] धारणकिया वह वस्त्र मानों हल के डर से आईहुई यमुना के सदृशं मालूम पड़ता, अतः हे जग० ॥ ८ ॥ निन्दसि यज्ञविधरहह श्रुतिजातम् ।। सदयहृदय दर्शितपशुपातम् ॥ केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ।।६।।
सर्गः १] भाषाटीको समेतम् । " - भा० टी०-हे बुद्ध रूप धारण करने वाले केशव! आपने रविषयक श्रुतियों का जिनमें पशुहिमा है उनकी निन्दा की है, अतः हं दयायुक्त अन्तःकरणवाले जगदीश म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् ॥ धूमकेतुमिव किमपि करालम् ॥ केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीशहरे॥१०॥ भा० टी०-हे फल्कीरूप धारण करनेवाले केशव ! आपने म्लेच्छोंके वध निमित्त धूमकेतु के समान अपूर्व तरवार धारण किया अर्थात् आपने कल्की अवतार लेकर म्लेच्छों का विनाश किया अतः हे जगदीश ० ॥१०॥ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् ।। श्रृणु सुखदं शुभदं भवसारम् ॥ केशवधृतंदशविधरूप जय जगदीश हरे ॥१॥ भा० टी०-हे दशाविधरूपधारी जगदीश हे हरे आप की जय हो और हे भक्तजनों ! यह श्री जयदेव कविका बनाया हुआ, मनोहर, सुख तथा कल्याणकारी और संसार के तत्वस्वरूप है । इस स्तोत्रको सुनो अर्थात् इसके सुनने से सब प्रकार के सुख होंगे ॥ ११ ॥ इति श्री गीतगोविन्द भाषा टीकायां प्रथम प्रवन्धः॥ * इस तारा का जब उदय होता है तब सन्सार में बहुत बड़ा उपद्रव होता है।
गीतगोविंदम् । [प्रथमः पूर्वमें कहे हुए दश अवतारोंका कृत्य संक्षेप से वर्णन करते हैं । वेदानुद्धरते जगन्तिवहने भूगोलमुदिभ्रते । दैत्यंदारयते वलिंबलयते क्षत्रक्षयकुर्वते । पौलस्त्यंजयते हलंकलयते कारुण्यमातन्वते । म्लेच्छान्मूर्च्छयतेदशाकृतिकृतकृष्णायतुभ्यंनमः भा० टी०-हे जगदीश ! (१) मत्स्या- बतार लेकर वेदोंको उद्धार करने वाले (२) कूर्मावतार से जगत को धारण करने वाले (३) वराहवतारसे पृथ्वी मण्डल को धारण करने वाले (४) नृसिंहरूप धारण कर हिरण्यकसिषु का वध करने वाले (५) चाम- नावतार से वलिको छलने वाले (६) परशुगम रूपसे क्षत्रियों का नाश करने वाले (७) रामावतार लेकर रावणका विनाश करने वाले (८) वलरामावतार में इल धारण करने वाले ( ९) बुद्धावतारमें दयाका विस्तार करने वाले (१०) कल्की अवतार धारण कर म्लेच्छ की संहार करने वाले इस प्रकार दश विध अवतारधारी श्रीकृष्णचन्द्रकी प्रणाम है ॥ १॥ अथ दूसरा प्रबन्ध गुनी राग प्रतिर्मठताल श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए॥ ..
सर्गः] भाषाटीको समेतम्। कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥१॥ भा० टी०-हे लक्ष्मी के दोनों कुनों को आश्रय करने वाले । हे कुण्डल ! धारी पुष्प माला को धारण करने वाले हे देव! आप की जय हो २॥. दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए ॥ मुनिजनमानसहंस जयजय देव हरे ॥२॥ भा० टी०-हे सूर्यमंडल के आभूपण ! अर्थात् सूर्य में जो तेज है वह आपडी का है। हे सांसारिक दुःखका विनाशकरनेवाले (अथात् संसारका आवागमन मिटानेवाले हे मुनि जनों के मानस (चित्त) के इस स्वरूप ! हे देव ! आप० ॥२॥ कालियविषधरगञ्जन जनरञ्जन ए॥ यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे ॥३॥ भ' टी-हे कालिय नाम सर्पराजके मदको, नष्ट करने वाले ! भक्तजनोंके आनन्ददाता ! हे यदुकुलरूपी कमलके सूर्य (जैसे सूर्यको देख कमल प्रफुल्लित हो जाता है वैसे ही आपने यदुकुलको आनन्दित किया.) हे देव श्राप० ॥३॥ मधुसुरनरकविनाशन गरुडासन ए॥ सुरकुलकलिनिदान जयजय देव हरे॥४॥ - . “१० 'गीतगोविंदम् । [प्रयंमः W भा०टी०-हे मधु. और मुर नरक नामक असुरों क विनाशक ! हंगरुडवाहन ! हे देवताओंकी क्रीडाके आदि कारण ! आपने देवताओंको मधुआदिक शत्रुओं को मारकर देवताओंको श्रानन्दमें मग्न कर दिया जाये राक्षस जीवितथे तब इनके भयसे इन्द्रादिदेवता बहुतदुःखी थे इन सब शत्रुवोंका नाश होने से सब देवगण निश्चिन्त भावसे नन्दनवन में क्रीडा कर रहे हैं ॥४॥ अमलकमलदललोचन भवमोचन ए॥ त्रिभुवनभवननिधान जयजय देव हरे ॥ ५ ॥ भाटी-हे निर्मल कमलके पंत्र समान विशाल.. नेवाले ! हे संसाररूपीजालसे छुडानवाले! हे त्रिलोकी रूप गृहक निधान (सारख रूप) स्वरूप ! हे देव श्राप०॥५॥ जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए समरशामितदशकण्ठ जयजय देव हरे॥६॥ भा० टी०-हे जानकाजी से आभूषित ! हे दूपणनाम राक्षसराजके. संहारक 1 हे रणमें रावणको शान्त करनेवाले, हे देव आप० ॥ ६॥ अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए॥ श्रीसुखचन्द्रचकोर जयजय देव हरे ।। ७ ॥
सर्गः १] भाषाटीफा समेतम् । ११ भा०टी०-नवीनमेषके सदृश सुन्दर ! हे मन्दराचल को धारण करनेवाले ! हे लक्ष्मीके मुखरूपी चन्द्रमाके . कोर.! हे देव आप० ।। ७॥ • तव चरणे प्रणता वयामिति भावय ए॥ कुरु कुशलंपणतेषु जयजय देव हरे । ८ ॥ ... भाण्टी-हे देवा हमलोग आपके चरणों में प्रणाम करते हैं यह आप जानिये और प्रणत हमलोगों को कल्याण करें और आपकी जय हो ॥२॥ . श्रीजयदेवकवेरिदं कुरुते मुदम् ।। मंगलमुज्ज्वलगीतं जयजय देव हरे ॥ ६ ॥ इति श्रीगीतगोविन्द द्वितीय प्रवन्धः ॥२॥ भा०टी०-हे देव..! हे हरे ! आपकी जयहो और यह ओजयदेव कविका बनाया हुआ, मङ्गलकारी मनोहर गीत श्रवण या पढ़ने वालोंको आनन्द्रदाता है ॥९॥ इति श्रीगीतगोविन्द भाषा टीकायां द्वितीयः प्रबन्धः ।।२।।
.
१२
गीतगोभिदम् ।
[प्रथमः
--
पद्मापयोधरतटीपरिरम्भलग्न
काश्मीरमुद्रितमुरो-मधुसुदनस्य ।
व्यक्तानुरागभिव खेलदनगखद-।
स्वदाम्बुपूरमनुपूरयतु प्रियं वः ॥ १॥
भाण्टी-श्रीलक्ष्मी महारानी के वक्षःस्थल के प्रालियन
करनेसे लगी हुई केसर चिन्हित (शृंगार के समय महा.
रानीने अपने स्तनों में जो केसर लगाया था वही श्रीकृष्ण
के आलिंगन करनेसे. उनकी छातीमें लग गया) वही
धाकृष्ण के हृदयमें लगा हुआ केसर मानो प्रत्यक्ष अनु
राग (मेम) है । अथवा राधिकाजीने श्रीकृष्ण के हृदयमें
मुद्रा (मोहर ) करदी है कि मेरी आज्ञाके बिना इसको .
कोईभी स्पर्श न करै । और रतिके परिश्रमसे उत्पन्न स्वद
(पसीना ) के प्रवाह से युक्त श्रीकृष्णचन्द्र का हृदय आप
शोगों का कल्याण की दृद्धि कर ।। ।।
यसन्ते बासन्तीकुसुमसुकुमारैरवयवै,
भ्रमन्तीकान्तारे बहुविहितकृष्णानुसरणास् ।
अमन्दं कन्दर्पज्वरजानतचिन्ताकुलतया ।
चलंदाधाराघांसरसमिदमूचे सहचरी ॥१॥
सर्ग:१] भाषाटीका समेतम्। भाण्टी०-माधवीलताके पुष्पोंसभी अधिक कामलाङ्गी निर्जन वनमें घूमनेवाली श्रीकृष्णजी पीछे वार बार घूमती हुई और अत्यन्त बढ़ी हुई कामदेव की ज्वालासे उत्पन्न हुई चिन्ता की व्याकुलतासे पीड़ित राधिकासे कोई सखी वसन्तकालमे विलास पूर्वक यह ( वक्ष्यमाण गीत ] बोली ॥२॥ अथ तृतीय प्रवन्ध वसन्तराग रूपक ताल, ललितलवङ्गलतापरिशीलनकोमलमलयसमीरों मधुकरनिकरकराम्बतकोकिलकूजितकुंजकुटीरे विहरति हरिरिह सरसवसन्ते ॥ नृत्यति युवति जनन समंसखि विराहिजनस्य दुरन्ते ॥ ध्रुव०॥ मा०टी०-हे राधे! सुन्दर लौंगकी लताके स्पर्शसे मन्द मन्द बहती हुई मलय पर्वतकी वायुसे संयुक्त, तथा भौरों के झुण्डसे झंकारित, और कोयलोंकी कूकसे कृजित निकुखवाले इस मनोहर और वियोगी जनोंको दुःखदाई वसन्तकालमें श्रीकृष्णचन्द्र युवती गोपिकाओं के साथ नाचते और विहार करते हैं।
.. गीतगोविम्। [प्रथः उन्मदमदनमनोरथ पाथिकवधूजनजनित विलापे । अलिकुलसंकुलसुमन समूहनिराकुल- वकुलकलापे ॥२॥ भाण्टी०-उन्मच करने वाले काम की इच्छासे पथिकोंकी स्त्रियों को विलाप कराने वाला । ( अर्थात् इस वसन्त ऋतु में विरहिणी स्त्रियां काप से पीडित हो कर विलाप करती हैं) वकुल- [ मौलसिरी] के फूलों पर भंवरे व्याप्त हो रहे हैं ऐसे वसन्त ऋतुमें श्रीकृष्णचन्द्रजी युवती गोपियों के साथ नृत्य और विहार. करते हैं ॥२॥ : मृगमदसौरभरभसवशंवदनवदल मालत माले । युवजनहृदयविदारणमनसिजनखरुचि किंशुकजाले ॥३॥ भा० टी०-कस्तूरीके गन्धके समान गन्धवाले नवीन पत्रोंसे शोभित संयुक्त तमाल के वृक्षों और युचक्र लोगोंके हृदयको विदारण करने वाले कामदेवके नखाके सदृश पलासके पुष्प हैं ऐसा वसंत ऋतु०.३ मदनमहीपतिकनकदण्डरुचि केसरंकुसुम विकाशे॥ मिलितशिलीमुखपाटलिपटलकृतः सरतूंणविलासे ॥४॥ . .
सर्गः:१० भोपाटीका समेतम् । PM 4 भा० टी-फूलहुए नागकेसर के पुष्प ऐसे शोभायमान हो रहे हैं, कि मानो राजा कामदेव का सुवर्ण दण्डवाला छत्र होय । पाटली के (गुलाब) पुष्पों में बैठे हुए भ्रपर ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो कामदेवके तूणीर (तरकस ) में वाण भरे होयं । ऐसे वसंत के समय श्रीकृष्ण युवती गोपियों के साथ नृत्य और विहार करते हैं ॥ ४ ॥ विगलितलज्जितजगदवलोकनतरुणवरु- पकृतहासे। विरहिनिकृन्तनकुन्तमुखाकृतिकेत किदन्तुरिताशे ॥ ५॥ मा०टी०-निर्लज्न जगवको देखने के लिये नवीन वरुण वृक्ष पुष्पको विकशित कर मानों हास्य कर रहे हैं भौर वियोगी नोंको काटने के लिये भाले के नोक की तरह के वडोसे हो रही हैं। ऐसी वसंत ऋतुमे श्रीकृष्ण युक्ती गोपियों के साथ नृत्य और विहार करते हैं ॥५॥ माधविकापरिमलललिते नवमालतिजाति सुगन्धौ। मुनिमनसामपि मोहनकारिणि तरुणा. कारणवन्धौ ॥६॥ भा०टी०-मधुमाळनी की मनोहर सुगन्धिसे अति मनो. हर, नवीन. मालती और चमेली की सुगन्धिसे सुगन्धित, सानिननों के चित्तको भी मोहने वाला और युवा जनोंका. २ गीतगोविंदम्। प्रथमः सामाधिक मत्र, ऐसे वसन्तकालमें श्री कृष्ण गोपियों के साथ बिहार और नृत्य करते हैं ॥ ६ ॥ स्फुरदतिमुक्तलता परिरम्भण मुकुलित पुल- कितचूते । वृन्दावनविपिने परिसरपारंगतयमु. नाजलपूते ॥ ७ ॥ माल्टी-खिली हुई ( या हिलती हुई ) माधवी लताके स्पर्शसे खि हुए आम मानो पुलकित होगए हैं, जैसे चंचल स्त्री के मालिंगन करनेस पुरुप पांचित होजाता है उसी प्रकार सता [सी] के आलिंगन करनेम आन्न क्ष [पुरुष] मुझालित और पुलकित होगया अर्थात् आनके वृत्तों के मञ्जग आर्गई, जमुना जरस वृन्दावन के आस पास गीन पवित्र हो गई है वमन्त में श्रीकृष्ण गोपियों के साथ विहार और नृत्य कर रहे हैं।॥ ७॥ श्रीजयदेवभाषितनिदमुदयतिहरिचरणस्मृ. तिसारम्। सरसवसन्तसमयवनवर्णनमनुगत मदनविकासम् ॥८॥ ® इति गीतगोविन्दं तृतीयः प्रवन्ध ३० मा० टी०--यह श्रीयुत जयदेव कनिका श्रीकृष्ण के घरणों के स्मरणका तत्त्वभूत, कामदेव के विलास संयुक्त और सरस वसन्त ऋयु का वर्णन संसार में मत्तापित होय ।।
सर्गः१] भाषाटीका समेतम् ७ . নিবনা স্থা इति श्रीगीतगोविन्दरापाटीकायां तृतीयः प्रबन्धः ॥३॥ दरविदलितमल्लावल्लिचञ्चत्पराग, प्रकटितपटवासै वसियन काननानि ।। इह हि दहति चेतः केतकीगन्धवन्धुः, प्रसरदसमवापनापद्धवाहः ॥ १॥ ग:००-छविली चमेला से ( अधिक खिलने से सुगन्ध उड़ जाती है इसीरे कुछ खिली हुई कहा). जो पगण ( पुगोधूरी ) वही हुभा पक्षास । सुगन्धिद्रों को चूम विशेष ) उससे वो ओं सुगन्धित करमा हुभा और केतकी पुष्पोती मुगन्धिका मित्र, तथा, कापदेव के प्राण के समान यह वायु इस बसन्त ऋतु निरहीजनोंक प्राणीको जला रहा है ॥१॥ अद्योत्संगवस जंगवलय नेशादिवेश चली. पालेयप्लवनेच्छयाऽनुसरतिश्रीखंडशैलानिल: किंचस्निग्धरसालमौलिमुकुलान्यालोक्यहर्षोदया दुन्मीलंतिकुहू कुहूरितिकलात्तालाःपिकानांगिरः भा० टी०-हे राधे ! इस वमन्त ऋमें यह मलय वायु, चन्दन के वृक्षोमें रहनेवाले सो मुखमें जानेमे दुःख से गानो हिम ( पाला ) में स्नान करने की इच्छास हिमा पीतमोविंदम्! [प्रथमः - चलकी ओर जा रही है ( मलयपर्वत दक्षिणमें है और हिमाचल उत्तरमें है जो दक्षिणकी ओरसे बहता है, पा उत्तरकी ओर अवश्यही जायगा यहाँ उस्मैक्षा की जाती है कि यह वायु इधर उधर न जाकर सांधी उत्तरही की और क्यों जारही है ? उत्तरमें जानेका यही कारण है कि मलयाचलमें रहने से वहाँक साँके विषसे गरमाय गई है अत: यह वायु शीत होनेके निमित्से हिमाचल की ओर जारही है ) और कोमल २ श्रामोंकी मंजरियों को देखकर आनन्दित होकर कोकिल 'कुह २ 'ऐसी अपनी मधुर भौर मनोहर वाणी बोल रहे हैं ॥२॥ उन्मीलन्मधुगन्धलुब्धमधुपन्या धूतचूतांकुर- कीडकोकिलकाकलीकलकलैरुतीर्णकर्णज्वराः। नीयन्ते पथिकै कथं कथमपिध्यानावधानक्षण- प्राप्तप्राणसमासमागमरसोल्लासरमीवासराः३ भा० टी०--(आम्रकी मंजरियोंसे ) बाहर निकलते हुए रसके लोभी भ्रमणोंसे कम्पित भानकी मंजरी पर क्रीडा करनेवाले कोकिल की मधुर और मनोहर वाणी से मानो संताप उत्पन्न हो गया है ऐसे (वसन्तफ) दिनों में ध्यान से चित्त को एकाग्र कर क्षणमात्र चित्त में अपनी माणप्यारीके समागम नुस्खके आनन्द से विरहीजन ..
सर्गः१] भापाटीका समेतम्! २४ . किसी किसी प्रकारसे समय बिताते हैं ॥३॥ अनेकनारीपरिरम्भसम्भ्रम। स्फुरन्मनोहारीिषिलासलालसम् । मुरारिमारादुपदर्शयन्त्यसौ। सखीसमक्षं पुनराह राधिकाम् ।। मा० टी०--अनेक गोपिकाओं के आलिंगनलके 'मनोहर विलास से आलसी श्रीकृष्णचन्द्र के समीपही से जाती हुई दूर हीसे साक्षात् दिखलाती हुई कोई सली राधिकासे फिर बोली ॥ ४॥ चौथा भवन्ध--रामकरी राग । रूपक ताल॥ चन्दनचर्चितनीलकलेवरपीतवसनवनमाली ॥ केलिचलन्मणिकुण्डलमण्डित गण्डयुगस्मित; शाली ॥ हरिरिह मुग्धवधूनिकरे विलासिनि विलसति केलिपरे ॥ध्रु०॥ भा० टी०-हे प्रिये ! राधिके चन्दन से सुशोभित, श्यामवर्ण · वाले, पीताम्बर - तथा वनमाला धारी, चंचल और रत्न मड़ित कुंडलोंसे शोभायमान कपोल
२.
गीतगोथिदम्।
[प्रथमः
( गाल ) वाले, और मंद २ मुस्क्याने हुए श्रीकृष्णचन्द्र
यहां नवीन और क्रीडामें तत्पर गोपिकाओं के समूहमें
विलास कर रहे हैं ॥ १॥
पीनपयोधरभारभरण हार परिरभ्य सरा-
गम् ॥ गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चितपञ्च-
मरागम् ॥ २॥
भा० टी०-हे राधे ! कोई गोपाङ्गना श्रीकृष्णको
प्रेम पूर्वक ऊँर स्त से शालिंग · का कृष्ण के
पीछे २ ऊँच र वाल पंचमम्बरसे गाती हैं ।। २ ।।.
कापिविनामविलालविलाचनखलनजनि-
तमनोजम् । ध्यायति मुग्धबंधूगधिक मधुसूदन
बदनसरीजम् ॥ ३॥
भा० टी०--ई गधे ! कोई सुदा गोपनिना
कटाच युक्त चंचल नेत्र के संच से काम पीदिन श्रीकृष्य
चन्द्र के मुखारविन्द का अधिक ध्यान करती है ॥ ३ ॥
कापिकपोलतले मिलितालपितुक्रिमपि
श्रुतिमूने। चोर चुचुम्ब नितम्बवनी दयितं पुल-
करनुकूल ॥ ४ ॥
सर्गः१] भाषाटीका समेतम्। मा०टी०-फाई नितम्बवाली गोपी कुछ कानमें करने के छनमे श्रीकृष्ण के रोपांचित कपोलों को बड़ीही सुन्दरतामे चुम्बन किया ॥४॥ कलिकलाकुतुकेन च काचिदमुं यमुना- जलकूले । मञ्जुलवजुलकुञ्जगतं विचकर्ष- करेण दुकूले ॥ ५॥ भा०वी०-हे राधे ! कोई गोण सुन्दरी यमुना जी के तटपर, सुन्दर चैतमलना के निकुजमें कॉल करने की इच्छा से श्रीकृष्णक वस्त्र (पीताम्बर) को खाचन लगी।५|| करतलतालतरलवलयावलिकलितकल स्वनवंशे । रासरसेसहनृत्यपरा हरिणायुवतिः प्रशशंसे ॥६॥ मा० टी०-हे राधे ! गस क्र डामें श्रीकृष्ण के साथ नाचने वाली किसी गोपवधूकी श्रीकृष्णने अधिक प्रशंशा. की कि, उमने करताल देने के समय अपने कंगनों की ध्वनि उनकी मुरलीकी ध्वनिक साथ मिलाय दियां ॥ ६॥ लिष्यति कामपिचुवति कामपि रमयतिका. मपि रामाम् । पश्यतिसस्मितचारु परामप म
-
२
गीतगोविंदम्।
[प्रथमः
गच्छतिवामाम् ॥ ७॥
भा० टी-हे राधे । श्रीकृष्णचन्द्रजी किसी गोप
पामाको आलिंगन करते हैं, किसी गोपालाका चुम्बन
करते हैं, किसी गोपरमणी के साथ रमण करते हैं, किसी
को मन्द २ मुसक्यानसे देखते हैं और किसी के पीछ ।
चलते हैं ॥ ७॥
श्रीजयदेवकवेरिदमद्भुतकेशवकेलिरह-
स्थम् ॥ वृन्दावनविपिने ललितं वितनोतु शुभा-
नि यशस्यम् ॥८॥
इति श्रीगीतगोविन्द चतुर्थः प्रवन्धः॥ ४ ॥
भा० टी०-श्रीजयदेव कवि वर्णित यशको देने
वाला यह भगवानका वृन्दावन में अद्भुत क्रीडा का रहस्य.
भक्तजनों का कल्याण करें ॥८॥
इति श्रीगीतगोविन्द भाषाटीकाय चतुर्थः प्रवन्धः॥ ४ ॥
विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दी
वरश्रेणीश्यामलकोमलैरुपनयनरनहोत्सवम्।।
खच्छन्दं ब्रजसुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालि-
गितः । शृङ्गारः सखिमूर्तिमानिव मधौ मुग्धो.
हरिः क्रीडति ॥१॥
सर्गः17 भाषाटीमा सतम्। २३ मा० टी०-हे सखि (राधे 1) अनुराग ( प्रेम, भाक्त स्नेह,.) के वशीभूत होकर सकल संसारको आनन्द देते हुए नीलकपलोंक समान स्याम तथा कोमल अंगोंसे कायदेव के उत्साहको बढ़ाते हुए, चारों ओर अपनी इच्छा पूर्वक व्रजवनिताओंसे रमण किये हुए, सब अंगों में आलिगित मूर्तिमान शृंगार के समान श्रीकृष्णचन्द्र बसन्तऋतु ( ब्रजवनिताओं के साथ ) क्रीडा कर रहे है। "इन्दीवरभणी श्यामलः, यह विशेषण पद 'श्याम- मोमवतिशृंगार सितोहासः प्रकीर्तितः, इस प्रमाणसे श्रृंगार रसका स्वरूप स्याम है और श्रीकृष्णचन्द्र स्वयं स्याम . हैं इसीलिये "श्रृंगार। मखि मानिमानिव, कहा है ॥१॥ रासोल्लासभरेण विभ्रमभृतामाभीरवामन्भु- वामभ्यर्णपरिरभ्य निर्भरमुर प्रेमान्धयाराधया। साधुत्ववदनंसुधामयमिति व्याहृत्य गीतस्तुति- व्याजादुद्भटचुम्वितः स्मितमनोहारी हरिः पातुवः॥ २॥ अब कवि मतोंको भाशिर्वाद देते हैं- मा०टी०-पासक्रीड़ाके मानन्दमे विभ्रम युक्त (मुंगार रसमें निमम ) गोपांगनाओं के सम्मुखहीमें मसे अन्धी (विल) राधिकाने "तुम्हारा सुन्दर मुख २५ गीतगोरिदम्। [प्रथमः अमृत मय है, यों कहकर और गीतकी प्रशंसाके छलसे उद्भट दृढ़ता पूर्वक चुम्बन किया । । इस प्रकारकी चुंबनमें चतुराई देखकर मन्द मुसक्यानसे चित्तको हरण करने पाले श्रीकृष्ण भक्तजनोंकी रक्षा करें ॥२॥ इनि श्री गीतगोविन्द मापाटीकायां सामोददामोदरो नाप प्रथमः सगः ॥१॥ द्वितीयः सर्गः। विहरति वने राधामाधारणप्रणये हरी विगलितनिजोकादीविशेन गतान्यतः ॥ क्वचिदपि लताकुजे गुञ्जन्मधुव्रतमंडलीमुख- रशिखरे लीना दीनाप्युवाच रहः सखीम् ॥१॥ मा० टी०-सकल गोपियों में बगावर प्रेम रखनेवाले श्रीकृष्णचन्द्र जब वृंदावनमें रासक्रीड़ा करने ये उस समय राधाजी अपन हनम ग्यसे ईश के वर्श होकर अर्थात् अन्य गपियोंकी क्रीड़ा अंकृष्णक साथ न सहकर (श्रीकृष्णका तो समो पर एकसा प्रेम है परंतु रामाने यह समझा कि इंप पर श्रीशका प्रेम नहीं है। नहां भंपरों की मण्डली वृक्षों के शिखर पर गूंज रही ऐसे लता कुंजमें छिपगइ और दाम्यता होकर भी . अपनी मिय सखीस एकांतमें वाली ॥ १ ॥ है ।
सर्गः:२]
भापाटीका समेत
अथ पांचवां प्रबन्ध गुर्जरी राग रूपक ताल ।
संचरदधरसुधामधुरध्वनिमुखरितमोहनवंशम्।।
चालितहगचलकञ्चलमौलिकपोलविलोलवंतं
सम् ॥ गसे हामिह विहितविलासम् ।। स्मरति
मनी मम कृतपरिहासम् ॥ध्रु.॥
भा० टी०-हे माखि ! अधर सुभाभी बहार मधुर
ध्वनिस परिपूरिन और सफल जनोंवो मान करनेवाली
बंशीका वजनवाले, (अर्थात् कामा जनोंकी अधर सुधा
से बढ़कर कार्डभी वस्तु मीठा नहीं लगनी यहां श्रीकृष्ण
और राधिका दोनही कामुक हैं अनः राधिकाके कथना-
नुसार अधगमन भी बढ़ी चढ़ी वंशी मिठास पाई गई
क्योंकि, जो जिसमे अधिक प्रिय वस्तु है वही यदि
उससे बढ़ार वा तबही उसकी ठीक प्रशंसा जाननी
चाहिये कटाक्षवाल, वंशी वजानने के समय चंचलं मुकुट
और कपोलों पर चचल कुंडल वाले, विलामी और मेर-
संग हास्यकारी श्रीकृष्णचन्द्रको मेगचित्त ध्यान करता
है ॥१॥
चन्द्रकचारुपयूगशखण्डकमंडलवलयित
केशम् ॥
प्रचुरपुरन्दरधनुरनुर रञ्जितमेदुरमुदिर
-सुवेशम् ॥ २॥
२६ गीतगोविंदम्। [द्वितीय भा० टी०-हे सखि ! चित्र सुन्दर मयूरके पक्षासे अपने केशोंको कंगन के समान थनेवाले अर्थात् केशाम मयूर का पंख मूंथे हुए हैं जैसे गोलाकार कंगन होता। अतएव वहुन इन्द्रधनुषों से चित्रित स्याम घटाके समान शरीरवाल ( श्रीकृष्णचन्द्रने जो मयूर पक्ष धारण किया वह इन्द्रधनुष के तुल्य हैं और स्वयं श्रीकृष्णचन्द्र स्याम मेघ सहश हैं) "श्रीकृष्णको मेरा चित्त ध्यान करता है पह पूर्वोक्त पद सर्वत्र अन्वित है ॥ २ ॥ गोपकदम्बनितम्बवतीमुखचुम्वनलम्भित लोभम् ॥बन्धुजीवमधुराधरपल्लवमुल्लसितस्मित शोभम् ॥ ३॥ भा० टी०- हे साख । गोप समूहोंको वनिताओगे मुख चुम्बनके लोमी, और बन्धुजीव (दुपहरिया) के पुष्पके समान लाल. ओष्टरूपी पल्लव (कोमल पत्र) बाले और मन्द २ मुसक्यानसे सुशोभित श्रीकृष्णका मैं ध्यान करती हूं ॥ २॥ विपुलपुलकभुजपल्लववलयितवल्लवयुवति सहस्रम्।।करचरणोरसि मणिगणभूषणकिरणवि मिन्नतमिस्रम् ॥ ३॥ भा० टी०- साखि । विशाल और रोमांचित तथा.
सर्गः २]
भापाटीका समेतम् ।
नवीन वसन्त कालीन पत्रों के समान भुनानोंसे गोपान-
.. नामोंका मालिंगनकारी और हाथ पैर और वक्षःस्थल
में धृत ( बहुमूल्य हारकादि मणियोंसे जहित ) आयूप-
गों की लिटकती हुई किरणों से अन्धकारको नाश करनेवाले
श्रीकृष्णका मैं चितसे ध्यान करती हूं ॥४॥
जलदपटलचलदिन्दुविनिन्दक चन्दनतिलक
ललाटम् ॥ पीनपयोधरपरिसरमर्दननिर्दयहृद-
यकपाटम् ॥ ५॥
मा० टी०-जिस श्रीकृष्णने स्याम मेघकी घटाके
बीच चलते हुए चन्द्रमाके समान अपने मस्तको मलया-
गिर चन्दन लगाया है, और जिनका विशाल हृदय पीन
कोंके मान्त भागोंको मर्दन करनेम निर्दयी है, जब
धाकृष्णचन्द्र गोपियोंके स्तनोंको मर्दन करते हैं तब गोपि-
यो अति विहल हो जाती हैं परन्तु उनकी श्रीकृष्ण एक
भी नहीं सुनते और उनके कुचोंको निर्दयी के समान मर्दन
(करतेही जाते हैं ) ऐसे श्रीकृष्ण को मैं हृदय से ध्यान
करता हूं ॥ ५॥
मणिमयमकरमनोहरकुण्डलमण्डितगण्ड
मुदारम् । पीतवसनमनुगतमुनिमनुजसुरासुर
वरपरिवारम् ॥६॥
२८ गीतगोविन्दम्। [द्वितीयः भा० टी०-जिन श्रीकृष्णचन्द्र के सुन्दर कपोलोपर माणे समूहोंमे जाड़न, मकगंकृत और मनोहर कुण्डल सुशोभित हैं और जो भक्तजनों के मनोरयोंको पूर्ण करने- पाले हैं, तथा पीताम्बर धारण किये हुए है, और जिनके मुनि, मनुष्य, देवता और दैत्य ही श्रेष्ठ परिवार ( कुटु. बी') हैं ऐसे श्रीकृष्ण का मैं चिंत्तसेध्यान करती हूँ ॥६॥ विशदकदम्बतले मिलितं कलिकलुपभयं शमयन्तम । मामपि किमपि तरङ्गदनकाशा मनसा रमयन्तम् ॥ ७॥ भा. टी--निर्मल (सुन्दर) 'दंब वृक्षके नीचे मिले हुए, कलियुग सम्बन्धी पापोंके भयको शान्त करनेवाले और कटाक्ष पातसे तथा अपने हृदयसे हमको ही रमण करानवाल श्रीकृष्णको मैं चिचसे ध्यान करती है॥७॥ श्रीजयदेवमणितमतिसुन्दर मोहनमधुरिपु रूपम् । हरिचरणस्मरणं प्रति संप्रातपुण्यवता अनुरूपम् ॥ ८॥ इति श्रीगीतगोविन्दे पञ्चमः प्रवन्धः ॥ ५ मा० टी०-श्री जयदेव कविका बनाया हुआ, अति: सुन्दर और मोहन करने वाले 'मधुरि श्रीकृष्णचन्द्रकी सर्ग:२] २४. भाषाटीका समेतम्। छविको वर्णन करनेवाला यह काव्य श्रीकृष्णके चरणार- विन्दोंको स्मरण करनेवाले पुण्यात्मा भक्तजनों के लिये आनन्ददायी होय ॥ ८॥ ॥ इति श्रीगीतगोविन्द भाषाकाय पञ्चमः प्रबन्यः ॥ गणयति गुणग्रामं भामं भूमादपिनेहते । वहति च परितापं दोषं विमुञ्चति दूरतः । युवतिषु चलतृष्णे कृष्णेविहारिणि मांविना । पुनरपिमनोवासकामंकरोति करोमि किम् ।।१।। भा० टी०- हे सखि ! अन्य गोप वनिताओग. भभिलाष युक्त और मेरे धिना रासक्रीड़ा करनेवाले श्रीकृष्णचन्द्र के विषयमें मेरा मन अवश्य ( कुटिल ) होता' हुमा भी श्रीकृष्णही की इच्छा करता है। मैं क्या करूं और मेरा मन, श्रीकृष्ण के अपराधी होने पर भी उनकी गुणाचलीको भ्रमसे भी भूलनेकी चेष्टा नहीं करता किंतु उन्हींकी गुणावलीको सुनकर अत्यन्त संतुष्ट होता है, और जो हमको उनाने छोड़ दिया है इस तिरस्कारसे भी मेरा मन(: कोसों दूर है ॥१॥ .
३० गीतगोरिदम्। [द्वितीया अथ षष्ठप्रबन्धो मालवरागेण एकताली ताले गीयते । निभूतनिकुञ्जगृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तम् ॥ चकितविलोकितसकल- दिशा रतिरभसभरेण हसन्तम् ॥ १॥ सखि हे केशियमथनमुदारम् ॥ रमय मया सह मदनमनोरथभावितया सविकारम् ॥ धु० ॥ छठा प्रबंध-मालवराग--एकताका । : भा० टी-चुपचाप निकुंजगृहमें पाई हुई वारम्बार इधर उधर देखने वाली ( कोई देख न ले ) मेरे साय रात्रिमें एकांतमें छिपकर विहार फरनेवाले, रतिक उत्साइसे मधुर २ हँसनेवाले, केशानाम दैत्य के वधकारी, उदार चरित्र और कामपीडित श्रीकृष्णके साथ हमको मिलाय दे॥१॥ '. प्रथमसमागमलाजितया पटुचाटुशतैरनु कूलम् ॥मृदुमधुरस्मितभाषितयाशिथिलीकृत. जघनदुकूलम् ।। २॥ • भा० डी०-हे सखि पहिले २ शाम के समय. के तरह लज्जाके वश होनेवाली, और कोमल र मधुर ३१ N-M. -~-~~..... सर्ग:२] भापाटीका समेतम् ।। मुमुक्यान क साथ कोमल २ मधुर २ भापिणी, मेरे साथ बड़ी चतुरतासे सैकड़ों प्रसंशाके वाक्य कहनेवाले और मेरी जघा के वस्त्र हटानेवाले श्रीकृष्णको मुझ से, मिलाय दे ॥२॥ किसलयशयनानिवेशितया चिरमुरसि. ममैव शयानम् ।। कृतपरिरम्भणचुम्बनया परि- रभ्य कृताधरपानम् ॥३॥ भा० टी०--हे संखि! कोमल नवीन २ पोकी शय्या रचनेवाली और श्री कृष्णचन्द्रको शालिंगन कर उनके मुन्दको बुन्धन कारीके साथ, तथा गैरही पक्ष: स्थल ( हृदय ) के ऊपर चिरकाल तक शयनकारी और हमको श्रालिंगन कर मेरे अबरको पान करनेवाले श्री कृष्णको मेरे साथ मिलाय दे ॥ ३ ॥ : अलसानिमीलितलोचनया पुलकावलि ललिनकपोलम् ।। श्रमजलसिक्तक लेवरया वर. मदनमंदादतिलोलम् ॥ ४ ॥ या०.टी.-६ साख ! रतिक आनन्दमें उत्पन्न हुए . आलस्यगे नेत्रोता झूदने वाली और गतिक परिश्रमसे पसीनों के हिन्दुओंग भीगे हुए शरीरवाली जो मैं हूँ मेरे साथ, रोमांचयुक्त और सुन्दर कपोलवाल और उत्तम ३ गीतगोविंदम् । [द्वितीयः ~~~~ कामदेवके शनि आनन्दसे मत चञ्चल श्रीकृष्णको मिलाय दे ॥४॥ कोकिलकलरवकूजितया जिनमनसिज- तन्त्रविचारम् ॥ श्लथकुसुमाकुलकुन्तलया नसलिखितधनस्तनभारम् ॥ ३ ॥ भा० टी०-हे सखि ! रतिके मय कोकिलके कण्ठ के समान अस्फुट ( साफ नहीं) शब्दोंको उच्चारण करने दाली, और रति परिश्रमसे ढीली पुष्पोंसे गुयी हुई अलकावलीवाली मेरे साथ, कामदेवके सिद्धान्त शास्त्र कोकको जीतनेवाले, और मेरे कठोर स्तनों को अपने नखोसे विदारणकारी श्रीकृष्णको मिलाय दे ॥ ५ ॥ चरणरणितमणिनूपुरया परिपूरितसुरत वितानम् ॥ मुखरविशृंखलमेखलया सकचग्रह चुम्वनदानम् ॥ ६॥ मा० टी०-हे साखि ! रतिके समय बाँकी माण जड़ित पानेव और करधनीके शब्दोंके फरनवाली मेरे. 'साथ, रतिके विस्तारको सम्पूर्ण करनेवाले आर. मेरे केशपासको पकड़कर चुम्बन करनेवाले श्रीकृष्णको रिलाय दे॥६॥ .
सर्गः २] भाषाटीका समेतम् । . ३३ रतिसुखसमयरसालसया दरमुकुलितनयन सरोजम्। निःसहनिपतिततनुलतया मधुसूदन मुदितमनोजम् ॥ ७॥ हे सखि । रति के सुख के समय आलस्युक्ता भौर विना सामर्थ्य के मुरझाई हुई शरीररूपी लतावाली मेरे साथ, रति के प्रानन्द से नेत्र रूपी कमलों को मीचने वाले मधुनाग दैत्य के विनाशक, और उद्दीपित (जगा हुआ) कामदेव वाले श्रीकृष्ण को मिला दे ॥ ७ ॥ श्रीजयदेवमणितमिदमतिशयमधुरिपुनि धुबनशीलम् ॥सुखमुत्कण्ठितराधिकया कथितं वितनोतु सलीलम् ॥ ८॥ इति श्रीगीतगोविन्द षष्ठः प्रबन्धः ॥६॥ मा० है ०-श्रीजयदेव कविः निर्मित, श्रीकृष्णकी रति का वर्णन करने वाला, उत्कठित राधिका से कहा हुना यह गीतगोविन्द भक्तजनोंके आनन्दको देवे ॥८॥ इति गीतगोविन्द भा० टी० पठः प्रवन्धः । + अधुना ऽत्युत्कंगठ्या सख्या नीयमाना सा गोपीगणवृतं कमां दृष्टा परावृत्य सखीपाह-
गीतगोविंदम्।
[द्वितीयः
हस्तस्रस्तविलासवंशमनृजुभूवल्लीमदल्लंबी
वृन्दोत्साहिगन्तवीक्षितमतिस्वेदागण्डस्थल
सामामुद्रीक्ष्य विलजितस्मितसुधामुग्धानन्का-
नने गोविन्दंब्रजसुन्दरीगणवृत पश्यामिहृष्या-
मिच ॥१॥
गोपीगणोंसे घिरेहुए श्रीकृष्णचन्द्रको देखकर और
वहाँसे लौटकर रधिका अपनी सखीसे कहती है।
भा० टी०-हे सखि ! टेढी भाह वाले गोपाङ्गनाथ
के तिरछे फटाक्षसे देखेगये ब्रजवनितापों से घिरे हुए चार
हमको देखकर अधिक लज्जायुक्त मुसक्यानसे सुशोभित
मुखबाल तथा हमको देखकर जिनके हाथों से मुरली और
लकुटी गिरगढ़ी है ऐसे श्रीकृष्ण को मैं देखती हूं और मान-
न्द में मग्न होती हूं ॥१॥
पुनः विभावयन्नाह-
दुरालोकस्तोकस्तवकनाविकाशोकलतिका
विकाशः कासारोपवनपवनोऽपि व्यर्थयति ॥
अपिभ्राम्यदृगिरणितरमणीया न मुकूल प्रसू.
तिश्चूतानां सखि शिखारिणीयं सुखयति॥२॥
.
वर्ग:२]
भापाटीका समेतम् ।
३५
भा. टी. हे सखि ! यह नवीन अशोक लनाओं के
छोटे २ गुच्छोंका खिलना तालाशके किनारे पर बगीचोंकी
वायु भी हमको दुःख दे रही है यहां नालाब क रहन से
ठंडा पन, चगीचोंसे सुगन्ध और ठंढा पन र सुगन्ध के
पानेहीसे मन्दत्व स्वयंही आजाता है कारण, जोरसे
चलनः सुगन्ध उड़ जाता है अथवा वृक्षोंके गासिनतास
भी मन्दत्व आजाता है । वायु वर्णनमें शतित्व, ( ठंढा-
पन ) मन्दत्व, ( धीमापन ) और सुगन्ध होना अत्या-
वश्यक है इन तीनों में एक भी न रहन काव्यमें दोष
समझा जाता हैं) और यह जो गावन पर्व पर
श्रामों के वृक्षों की मंजारयां हैं जिनके ऊपर भारियां
मनोहर गान कर रही है ये भी हमको सुख नहीं देती हैं।
साकूतस्मितमाकुलाकुलगद्धमिल्लमुल्लासित
भ्रूवल्लीकमल कदर्शितभुजाबालार्द्धहस्तस्तनम्
गोपीनांनिभृतांनिरीक्ष्यललित्तांकांचिच्चिरंचिंत
यन्नतर्मुग्धमनोहरोहरतुवाक्लनिव केशवः ॥३'
इति श्रीकविराजश्रीजयदेवकृतगीतगोविन्दे
महाकाव्ये अल्केश केशवा नामद्वितीयः सर्गःर
मा०टी-अभिमायसे युक्ता मुसक्शन वाले अत्य -
न्त अस्तव्यस्त होकर खुठीहुइ केशपास वालो सुशोभित
गीतगोविंदम्। [तृतीयः. - मोह रूपी लतावालीफिनी* यससे भुजा केश आधा हाथ और कुच दिखानेवाली गोपिय के भवों को देखकर किसी सुन्दरी ( राधिका) को अपने अन्तःकरणमें चिरकालवक ध्यानकारी, ( अर्थात् इन सब गोपिकाओंका उपरोक्त भाव देखने से राधिका महारानी इनके स्मरणमें हो पाई 'और यह यों विचाग्ने लगे कि राधिका की सुन्दरता के समान इनमें सुन्दरता नहीं है। माह में मग्न और हृदय हारी तरुण श्रीकृष्ण हे भक्तवृन्द ! पाप लागों के क्लश को हरे ॥ ३॥ इति अंगानगोविन्द भाषाटीकायां अक्लेश केशवो नामा द्वितीयः सर्गः२ ॥ तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥ कंसारिरपि संसारवासनावन्धश्रृंखलास् । - राधामाधाय हृदये तत्याज वूनसुन्दरीः॥१॥ भा० टी०-कंग के शत्रु श्रीकृष्ण ने भी मंसार की पासनाओं को बांधन के लिए जंजीररूपी श्री राधिकाजी की - - * कापिकुन्तलसंधान संयमव्यपदेशतः । वा मूलं स्तनौनाभि- पदर्शयेत्स्फुट । जम्भते स्फोट यत्यनामित्यादि नायिकानाम नुराग चेष्टितानि।
सर्गः३० भापाटीका मनम्। अपने हृदय में रख कर सकल जग की रमणियों की छोड़ दिया। पुनः किं कृतवान्- इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिका मनायाणवणखिनमानसः ॥ कृतानुतापः स कलिन्दनन्दिनी- तटान्तकुञ्ज निषसाद माधवः ॥२॥ भा० टी०-धर उधर भनेक स्थानों में श्रीगपिका जी को ढूंढ कर कामदेव के वाणों से अत्यन्त परिपीडित चित्त हो कर और पश्चात्ताप करते हुए यमुना जी के तट के समीप कुंज भवन में श्रीकृष्ण चन्द्र बैठ गय ।। २ ॥ अब सप्तमप्रवन्धो गुर्जरीरागेण प्रतिमण्ठताले गीयते। मामियं चलिताविलोक्य वृतं वधूनिचयेन ॥ सापराधतया मयापि नवारितातिभयेन ॥१॥ हरिहरि हतादरतया गता सौ कुपितवे ॥ध्रु०॥ अथ सातवां प्रवन्ध-गुर्जरी राग-प्रतिमरठाल : बड़े दुःख का विषय है कि हमको गोपियों के समूहमें बैठे हुये देख कर (अपना निगदर जान कर ) वह ..
के
गीतगोविन्तम्।
तृतीयः
सषिका चली गई और हम इसी लिये अपराधी होने
कारण भय से रोक न सके और यहां से वह (राधिका)
क्रोध में होकर चली गई।
किं करिष्यति किं वदिष्यति साचिरं विरहेण ॥.
किं जनेन धनेन किं मम जावितेन गृहेण ||२||
वह राधा हमारे बहुन समयता वियोगमें पड़कर विर
हाग्नि के शांत्यर्थ क्या क्या उपाय करेंगी और क्या र
हमको बुरा या भला कहेगी अब उस राधिका के बिना
'जन, ( कुटुम्ब या अन्य गोपीजन) धन, माण, और गृह ये
सर्वव्यर्थ हैं । अर्थात् उसके विना सर्व प्रिय प्राणही को मैं
कुछ नहीं समझना कारण जब सब सुख की मृत राधिका
ही हपार पास नहीं है तब धनादिक तो उसके डाल पांत हैं
मूल के नष्ट हो जाने से डाल पात तो स्वयं ही नष्ट हो
जाते हैं ॥२॥
चिंतयामि तदाननं कुटिल रोपभरेण ॥
शोणपद्ममिवोपरि भ्रमताकुलभूमरेण ॥३॥
भा० टी०-अधिक क्रोधके वश देदी भौंह वाली उस
राधिकाका मुख मानो रक्त कमलपर और घूमते हों ऐसी
'सुन्दर शोभायुक्त राधिकाके मुखारविंदका मैं ध्यान
करता हूं ॥३॥
- -सर्ग:३.] मापाटीका समेतम्। तामहं हृदि संगतामनिशं भृशं रमयामि ॥ किंवनेऽनुसरामितामिह किं वृथाविलपामि॥४ मा० ०-यदि मैं उस हृदयास्थत राधिका के साथ बारम्बार और अत्यन्न रमण करता हूं अब उसको वन ढूढने मे क्या प्रयोजन है और उसके लिये विलाप करना व्यर्थ है अर्थात् जो हुदयीमें स्थित है उसका इंदना 'वा' उसके लिये विलापादि करना भी व्यथही है ॥४॥ हदि संगतांना प्रत्याह- तम्वि खिन्नमसूयया हृदयं तब कलयामि ॥ तंन्नवेभिकुतो गतासि नतेनतेऽनुनयामि ॥५॥ मा० टी०-हे सूक्ष्माणि राफे ! मैं यह अनुमान करता हूं कि तुम्हारा चित्त इसे दुःखी होगया है और मैं यह भी नहीं जान सक्ता कि तूं यहांसे क्यों चली गई तुमको प्रणाम कर मनाता हूं दृश्यसे पुरतो गतागतमेव मे विदधासि ॥ किं पुरेव ससंभ्रम भरिरम्मणं न ददासि ॥६॥ हे सुन्दरी ! तूं मेरे सम्मुखे कवन अती जाती दिखाई देती है । पहले की समान तूं मुझे अति शीघ्र आलिङ्गन क्यों :नीं करती। विरहियोंको रात दिन mom १० गीतगोविंदम् । हितीयः उमीका ध्यान रहनेसे भागे, पीछे, दाहिने, घायें वही सर्वत्र दीखती है ॥ ६ ॥ क्षम्यतामपरं कदापि तवेदृशं न करोमि ।। देहि सुन्दरि दर्शनं मम मन्मथेन दुनामि ॥७॥ मा०टी०-हे सुन्दरी! क्षमा करो अब ऐसा कभी भी नहीं करूंगा अब दर्शन दो क्योंकि कामदेव से अनि पीड़ित हूं ॥७॥ वर्णित जयदेवकेन हरेरिदं प्रवणेन । किंदुविल्यसमुद्रसम्भवहिणीरमणेन ॥ ८ ॥ इति श्रीगीतगोविन्दे सप्तमः प्रबन्धः ॥ ७ ॥ भा०टी०--श्रीकृष्ण को प्रणाम करनेवाले, भार फिन्दुपिन्च फुलरूपी समुद्र में चन्द्रमाके समान जयदेवं कविने यह वर्णन किया ॥८॥ इति श्रीगीतगोविन्द सप्तम् प्रवन्धः ॥ ७ ॥ इदानीं काम एव में दुःख प्रयच्छनीति तमेवापाळम्भे मार हृदि विसलनाहारो नायं भुजङ्गमनायकः ॥ . कुवलयदुलश्रेणी कण्ठे न सा गरलद्युतिः ॥
संग:३] भापाटीका समेतम्! ४ मलयजरजो नेदं भस्म प्रियारहिते मयि । प्रहर न हरमान्यानङ्ग क्रुधा किमुधावसि ॥१॥ भा० टी०-कामदेवही हमको इस समय दुःख दे रहा है अतः कामदेवहीका तिरस्कार करते हैं। हे कामदेव ! में राधिका का वियोगी है हमारे ऊपर महादेवजीकी भांति से अपने पापोका प्रहार भत करो यह बारम्बार हमारे कार चढ़ाई व्यर्थ क्यों कर रहे हो । मैं महादेवजी नहीं हूं यह मेरे गले में झमनोंकी जडोंका ( तन्तुका) हार है किन्तु यह सर्पराज नहीं है, कण्ठमें यह नील कमलों की पांती है किन्तु यह इलाहलकी छवि नहीं है, और यह मियाकी विरहाग्निकी शान्ति के लिये चन्दनकी धूली है, किन्तु भस्पी नहीं । श्रीमहादेवजीके चिन्द्र जानकर हमको महादेवजी सगा और अपने पूर्व बैरको स्मरण करके हमको क्यों व्यर्थ दुःख दे रहे हो ॥ १ ॥ पाणौ मा कुरुचूतसायक्रममुं मा चापमारोपय । कीडानिर्जितविश्वमूर्षितजनाघातेनकिंपौरुषम् तस्याएवमृगीहशो मनसिजप्रेखत्कटाक्षानिल. "ज्वालाजर्जरितमनागपि मनो नाद्यापिसंधुदतेार मा० टी०३ विना परिश्रममे समस्त संसारको जीतनेवाले कागदेव ! आप इन भाम्रोकी मंजरीरूप वाणों
गीतगोविंदम्।
तृतीयः
को अपने हाथों में मत लीजिये और यदि हाथमें भी लोगो
धनुष मत चढाइये क्योंकि हे पनी भव ! मूर्छित आदमी
को मारने में क्या बड़ा पराक्रम है क्योंकि उस राधिका
के. चंचल कटाक्ष रूपी आग्न के ज्वालास टुकड़े २ हुआ
हूं (जला हुआ) मेरा. मन आजतक भी स्वस्थ नहीं
भ्रूपल्लवो धनुरपाङ्गतरङ्गितानि ।
वाणा गुणःश्रवणपालिरिति स्मरेण ॥
तस्यामनङ्गजयजङ्गमदेवताया।
मस्त्राणि निर्जितजगन्तिकिमर्पितानिां।
.
हे कामटेच ! यदि तुम कहोकि, इसमें मेरा क्या
अपराध है क्योंकि , जब २ राधिकाके कंटाक्षादिकोंका.
स्मरण करते हो तब २ श्रापको दुःख होता है, सो यह .
भी अपराध आपहीका है । :कारण, आपने शत्र
राधाजीको अर्पण कर दिये हैं देखिये !! भूलता रूपी
धनुष है, चंचल कटाक्ष वाण है कर्णपाली. ही गुण (धनुष
की डोरी) है। ये सर्व जगतको जीतनेवाले शस्त्र चलने
फिरनेवाली जय लक्ष्मी स्वरूप श्रीराधिकाजीमें, तुमने
को दे दिया है तो क्या यह आपका अपराध नहीं है।३६
सर्गः३] भापाटीका समेतम् भूचापे निहितः कटाक्षविशिखो निर्मातु मर्मव्यथां श्यामात्मा कुटिलः करोतु कवरीभा- रोऽपिमारोधमम् मोहं तावदयंच तन्वि तनुलां विम्वाधरो रागवान सवृत्तस्तनमण्डलस्तव कथं पाणैर्मम क्रीडति ॥ ४॥ '' भा० टी०-अय हृदयों सपाईहुई राधिकारी अपने दुःखका वर्णन करते हैं हे कृशोगि ! तुम्हारा भौं रूपी धनुपमें स्थापित कटाक्षरूपी. वाण मेरे मौका पीडा दे नो दे ( पोंकि, वाणका यह स्वभावही है कि वह लग जानेसे दुःख देताही है ) और यह स्यामा और कुटिल केशोंके पास भी कामदेवको जगावे, (क्योंकि , जो कुटिल और जो अन्तःकरण के काले होते उनझी यही दशा रहती है कि वे दूसरोंको दुःखही दिया करते हैं ) और यह राग वाला ( लाल ) विश्वाघर, (कुन्दुरूंक सहश अधरोष्ट. ) मोहको पढाये तो बढाचे क्योंकि, रागी, विषयी, मोहको बनाताही है, यह सब पूर्वोक्त ठीकही है ] परन्तु यह तुम्हारा सद्धृत ( सुन्दर, गुलाई वाला वो अच्छे आचरण वाला ] स्तन मन्डल हमारे प्राणों के साथ क्यों खेल रहा है यह बड़े आश्चर्य की बात हैं क्यों जो अच्छे भाचरणवाले हैं उनके लिखें गीतगोविंदम्। [तृतीयः । दूसरोंका प्राण लेना तो दूर रहा वे किसी के भी प्राणों को कुछ भी पीड़ा देना नहीं चाहते और ये कुच हमारे प्राणोंके ग्राहक क्यों बनगये हैं ॥४॥ तानि स्पर्शसुखानि ते च तरलाःस्निग्धा दृशो विभ्रमा स्तनाम्वुजसौरभंस च सुधा- स्यन्दी गिरां वक्रिमा ॥ सा विम्वाधरमाधुरी विविषयासङ्गेऽपि मनमानसं तस्यां लग्न समाधि हंत विरहव्याधिः कथं वर्तते ।। ५ ।। भा० टी -- जो सुन्दरीरमणी संगम होते हैं, वेही सर्शके सुख हमको होते हैं, वेडी चंचल प्रेम पूर्ण कटाक्ष पात है, वही मुखारविन्दकी सुगन्धी है, वही अमृत इससे परिपूर्ण वाणीकी बक्रिमा [व्यंगोक्ति, टेढापन ] है और पी बालवर्ण अरोष्टकी मधुरता है, इन रूप, रस, गन्ध और स्पर्शादि विषयोंकी तरफ होनेपर भी मेरा मन उस राधिकाके ध्यानमें लगा ह तो भी पढ़े खेदकी बात है कि यह विहकी वेदना कैसे होरही है क्योंकि ध्यानयुक्त योगियों को किसी प्रकारकी वेदना नहीं होती ॥ ५ ॥ तिर्यकण्ठविलोलमालितरलोत्तंसस्य बंशो- बरगीतस्थानकृतःवधानललनालेर्जनसंलक्षि: 1.
हर्ग:.]. भोपाटीका समेतम्। १५ - ताः ।। संभुग्धे मधुसूदनस्य मधुरे राधामुखेन्दा मृदुस्पन्दं कन्दलिताश्चिरं ददतु वः मं कटाक्षोर्मयः ॥ ६॥ इति श्रीकविराज श्रीजयदेवकृत गीतगोविन्द महाकाव्ये सुग्धमधुसूदनो नाम तृतीयःसर्गः।३ भा. टीवनती हुई वंशी गाने के पदों में चित्त देने से अन्य गोपांगनाओं से देखी नहींग, और राधिका के सुन्दर मुल की चद्रमा में अमाद भाव से धीरे धीरे चना कर दी हुई नीला ( गरदन ) को तिरकी करने से चंचल मुहर धर बुण्डलबाले कृष्णचन्द्र की फटाक्षांकी बारी (प। श्राप लोग भक्त जनों का पल्याण . कारिमी होना ।।६।। .. शुग गीतगोविन्दभापा टीका मुग्ध मधुन्दनो नाम हनीयः सर्गःशा +0088+ गीतगोविंदम्। [ चतुर्थः Pune चतुर्थः सर्गः। । - - - यमुनातीरवानीरनिकुञ्ज मन्दमास्थितम् ।। प्राह प्रेमभरोद्भ्रान्तमाधवं राधिका सखी भा० टी०-यमुना जी के तीर पर वेतों के झुंज में उदासीन बैठे हुए और प्रेम की भधिकता से उद्विग्न चित्त श्रीकृष्णचन्द्र से राधिका की सखा वोली ॥१॥ उक्तश्लोकार्थ गीतना:- अथ अष्टमप्रवन्धः कर्णाटकरागेण एकताली ताल गीयते। निन्दति चन्दनपिन्दुकिरणमनुनिन्दति खेदमधीरए ॥व्यालानिलयमिलनेन.गरलमिव कलयति मलयसमीरम् सा विरहे तव दीना ॥ माधव मनसिजविशिखभयांदिव-भावनयात्वयि लीना ॥ ॥२॥.. अथ आठवां मवन्ध-कर्णाटक राग-एकताली ताल- भा० टी०-हे माधव । विरह से अति दीन वह रा- सर्गः४] भाषाटीका समेतम् । विका काम बाणों के भय से मानो तुम्हारे ही में लीन हो गई। अपने को श्रीकृष्ण के हृदय में गई हुई जान कर अब हमको कामदेव के बाणों से कुछ भी भय नहीं है क्योंकि मैं श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करती हैं। ऐसी २ भावनासे वह रहती है और चन्दनकी निन्दा करती है, चन्द्रमाकी शीतल किरणों को अधीर होकर अत्यन्त कष्ट- दायी समझती है और मलय पर्वत के जिसमें चन्दन के वृक्ष होते हैं ] सुगन्धि वायुको सपोंका निवासस्थान होनेसे उनके विषाग्निरूप श्वास के मिलानेसे उस वायुको विषके समान मानती है यद्यपि ये सब बस्तु शीतल है तो भी मापके विरह से उसको दुःखद है ॥ १ ॥ अविरलनिपतितमदनशरादिव भवदव- नायविशालम् । स्वहृदयममणि वर्म करोति सजलनलिनीदलजालम् ॥२॥ भा० टी०-निरन्तर लगानवाले कामदेव वाणोंके भय से मानों उनके हृदयस्थित आपकी रक्षाके लिये निज हृदयरूपी मर्म स्थानमें जलसे आई कर२ के कमल के पत्तोंका कवच [वखतर] बनाती है। जैसे योद्धा संग्राममें लोहे भादिका बाणोंके भयसे कवच धारण करते है वैसेही कामदेवके बाणोंके भयसे हृदयस्थित जो कृष्ण - गीतगोविम्। [चतुर्थ . हैं उनकी रक्षाके लिये कमल के पत्तोंका कवच बनाकर श्रीकृष्णकी रक्षा करती है यहां कमलिनीक पचोंका कवच बनाना युक्तही है कारण कामदेव भी कुसुमं शर है अर्थात् काम जनित दाहको हृदयपर कमल के पत्ते रख शान्त करती है। कुसुमविशिखशर तल्पमनल्पविलासकला कमनीयम् ॥ व्रतमिव तव परिरम्भसुखाय करो ति कुसुमशयनीयम् ॥ ३॥ सा. वि. मा० टी०-हे श्रीकृष्णचन्द्र ! वह राधिका पुष्पाकी शव्या बनाकर उसपर साती है, क्योंकि, पापही के आलिङ्गन सुखके लिये नाना प्रकारकी विलास कलाओसे सुन्दर कामदेवके वायों की शय्या बनाकर मानो बड़ा भारी प्रत कर रही है, ईश्वर प्राप्तिके निमित्त योगी भी नाणोंकी शय्या पर सोता है और इससे यह भी सिद्ध होता कि, विरहाग्निकी शान्ति के लिये वह पुष्पोंकी शय्या पर सोती है परन्तु वह भी आपके बिना उसको बाणों के समान लगती है ॥३॥ वहति चलितविलोचनजलघरमालनकमल सुदारम् ।। विधुमिव विकटविधुन्तुददन्तदलन गलितामृतधारम् ॥ ४॥ सा. वि. ।
सर्गः ४] गापारीका समेतम् । भा० टी०-हे कृष्णचन्द्र ! वह राधिका पहते हुए अशु (थांसू ) जल से परिपूर्ण सुन्दर मुखारविन्द को अति कठोर राहुके दन्तों से दलित चन्द्रमा के मुखसे बहती ई अमृत धारा के समान धारण करती है अर्थात् आप के वियोग से आंसुओं को वहाती रहती है ॥ ४ ॥ पिलिखति रहसि कुरङ्गमदेन भवन्तमसम शरभूतम् ॥ प्रणमति मकरमधो विनिधाय करे च शर नवचूतम् ॥ ५ ॥ सा०वि० मा० टी०-हे माधव ! वह राधा कामदेवके समान रूपधारी श्रापका चित्र कस्तूगसे एकान्त चैठकर लिखती है और उसके नीचे मकरका बाझार बनाकर हाथमें आपकी गंगरी देती है और प्रणाम किया करती है जब आपका चित्र लिख चुकती हैं तव अति व्याकुलता में जो मकर ऊपर लिखना चाहिये था वही नीचे लिख देती है। ॥ ५॥ प्रतिपदमिदमपि निगदति पाधव तर चरणे पतिताहम् ॥ त्वयि विमुखे मयि सपदि सुधानिधिरपि तनुते तनुदाहम् ॥६॥ सा०वि० भा० टी०-फिर इधर उधर घूमती फिरती बार २ यह कहती है कि, हे मम माणमिय ! मैं आपके
५०
.
गीतगोविंदम् ।
[चतुर्थः
चरणाम गिरती हूँ कि आपके विमुख होनसे सुधानिधि
( अमृतकी खानि, चन्द्रमा ) भी मेरे शरीरको जला
रहा है ॥६॥
ध्यानलयेन पुरः परिकल्प्य भवन्तमतीव
दुरापम् ।। विलपति हसति विपीदति रोदिति
चञ्चति मुञ्चति तापम् ॥ ७॥
भा० टी०-हे श्री कृष्णचन्द्र ! बड़े कष्टसे प्राप्त होने
योग्य आपका ध्यान करके अपने सम्मुख एक श्रापकी
प्रतिमा कल्पनाकर उसके आगे विलाप करती है इंसती
है, विषाद करती है रोतीहै और वहाँम इट जाती है कि.
भब आलिङ्गन होगा अतः कुछ घणके लिये दुःखको
छोड़ देती है ।। ७॥
श्रीजयदेवमणितमिदमधिकं यदि मनसा
नटनीयम्।हरिविरहाकुलवल्लवयुवतिसखीवचनं
पठनीम् ॥ ८॥
इति श्रीगीतगोविन्द अष्टमः प्रबन्धः ॥८॥
भा० टी० श्रीजयदेवकारिके काव्यका यदि मनसे
अधिक भानन्द लेना होतो श्रीकृष्णचन्द्र के विरहसे व्याकुल
श्रीराधिकाजीकी प्रिय सखी वचनोंको पढ़ो ॥ ८॥
इति श्रीगीत: अष्टमः प्रबन्धः ॥ ८॥
सर्गः४] भाषाटीका समेतम् । ५१ ' ॥ आवासो विपिनायते प्रियसखीमालापि जालायते । तापोऽपि श्वसितेन दावदहन ज्वालाकलापायते ॥ सापि त्वद्विरहेण हन्त हरिणीरूपायते हा कथम् । कन्दर्पोऽपि यमा: यते विरचयञ्छार्दूलविक्रीडतम् ॥ १ ॥ भा. टी. हे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! आपके विरह से राधिकाको गृह वनके सपान प्रिय सखियां जंजाल के समान, श्वान की गर्मी भी दावानल के समान और वह राधिका भी हरिणी के समान जान पड़नी है और अति खेदकी बात है कि, कामदेव भी व्याघ्रके समान उसे राधिकारूपी हरणीफे लिये यमराज पयों हो रहा है अर्थात् अब मैं कहांत क कहूं आपके विना राधिका अब नहीं बच सक्ती ॥१॥ अथ नवमः प्रवन्धो देशाख्यारगेणएका तालीताले गीयते । स्तनविनिहितमपि हारमुदारम् ॥ सा मनुते कृशतनुखि भारम् ॥१॥राधिका विरहे तव केशव ॥ ध्रु०॥
५२ गीतगोविंदम् । [चतुर्थः अथ नवम् प्रवन्ध देशराग एकताला ||३|| भा० टी-हे श्रीकृष्णचन्द्र ! आपके वियोगमे इश शरीरवाली वह गंधिका स्तनों पर बहुमूल्य हारको भी भार (वाम) ही के समान मानती है। आपके बिना उसको होगेका हार भी नहीं सुहाता ॥१॥ सरसमसृणमपि मलयजपंकम् ।। पश्यति विषमिव वपुपि सशकम् ॥२राधिका भा०टी०- केशव ! वह राधिका आपके विरह से अति शीतल चिकना शरीरमें लिप्त मलयागिर चन्दन को भी शङ्का के साथ विषके सपान देखती है ॥ २॥ श्वसितपवनमनुफ्मपरिणाहम् ॥ मदनदहनामिव वहति सदाहम् ॥३॥ राधिका भा० टी०-हे केशव ! व राधिका बडे लम्बे २ सांशको कामाग्निके समान धारण करती है अर्थात् आपके वियोगमे गरम २ और षड़े २ लम्व २ साप्त लिया करती है ॥३॥ दिशि २ किरति मजलकणजालम् ।। नयननलिनमिवविगलितनालम्॥४॥ राधिका भा० टी०- केशव ! वह राधिका अश्रुजलोंसे . परीपूर्ण विनडटीपाले कमलों के सदृश अपने नेत्रों को सर्व सर्गः४] भावाटीका लमेतम्। ya दिशाओं में फेंकती है अर्थात् आपके दर्शनकी इच्छासे आंसू भरे नयनोंसे चारोंओर देखती है कि श्रीकृष्णचन्द्र आये तो नहीं ॥ ४॥ नयनविषयमपि किसलयनल्पम् ॥ कलयति विहितहुताशविकल्पम् ॥५॥राधिका भा० टी०-हे केशव ! वह राधिका नयनों के सामने मी नवीन २ कोमल पत्ताकी शय्यामें अग्निका संदेह फरनी के पत्तोंको ताम्रवर्ण देखकर उसको यह संदेह हो नाना है कि, इस शव्यायें अग्नितो नहीं बिछी हुई है।।५।। सजति न पाणितलेन कपोलम् ॥ वालशशिनमिव सायमलोलम् ॥६॥राधिकार भा० टी०-2 केशव | वह राधिका सायंकाल अपनी हथेली पर स्थापित अपने कपोलोंके निश्चल और वाल चन्द्रमाले समान नहीं छोड़ती अर्थात् अपने हथेली पर अपने गालोंको रख कर शामको रात विताने की चिन्ता में डूबी रहती है ।। ६ ॥ हरिरिति हरिरित जपति सकामम् ।। विरहविहितमरणेव निकामम् ॥७॥राधिका भा० टी०-हे शव ! आपके विरह से वह राधि- का माण अवस्था में पड़ीहुईके समान, यथेष्ट, "हरि हरि, गीतगोविन्दम् । [चतुर्थः इस मंत्रका जप करनी है जैसे कोई मरण समयमें "हरि हरि, जपता है कि हमको उस जन्ममें इस मंत्र के जपनेसे हरि अवश्य मिलेंगे इसी प्रकार गधिका भी श्रीकृष्णके नामको जप करती है कि हमको श्रीकृष्णचन्द्र इस जन्ममें नहीं मिलेंगे तो उस जन्ममें तो अवश्यही मिलेंगे ॥ ७॥ श्रीजयदेवमणितमिति गीतम् ॥ सुखयतु केशवण्दमुपनीतम् ॥ ८॥ इति श्रीगीतगोविन्दे नवमः प्रवन्धः ॥ ६ ॥ भा० टी०-श्रीकृष्ण के पदों में सपिर यह जयदेव फविका गीत आपलोगोको सुख देचे ८ ॥ इति श्रीगीतगोविन्दे भाषा टीकाया नवमः प्रवन्धः ॥९॥ सा रोमाञ्चति सीत्करोति विलपत्युक्त- म्पते ताम्यति ध्यायत्युद्धमति प्रमीलतिपत- त्युद्याति मूर्च्छत्यपि ।। एतावत्यतनुज्वरे वरतनु नर्जीवेन किं ते रसात् । स्ववर्धप्रतिम प्रसीदसि यदि त्यक्तोऽन्यथा हस्तकः॥१॥ भा० टी०-हे अश्विनीकुमार (स्वर्गके वैद्य) के तुल्य वैद्यराज श्रीकृष्णचन्द्र ! उस राधिकाको रोमांच उठते हैं, शी २ करती है, विलाप करती है, शरीर पवा सर्ग:४] भाषाटीका समेतम् । पू - ग्लानि (हर्षनाश ) होता है, ध्यान करती है, भ्रम होता है, नेत्रोंको बन्दकर लेती है, ( भूमिमें ) गिरती है, उठती है, और मूचित भी हो जाती है इस प्रकारका बढ़ा चढ़ा हुआ उसको कामज्वर है सो बह पापही के रस (श्रृंगार रस ) देनेसे क्या नहीं जीवगी ? अापके मिलने से अवश्य ही जीवेगी, अतः हे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! आप प्रसन्न होइये तो वह मरण से बच जायगी और यदि श्राप प्रसन्न न होइयेगा तो उसकी हस्त चेष्टा भी बन्द. होजायगीअर्थात् वह इस समय बोल नहीं सकती परन्तु इशारे से काम होताह वह भी काम बन्द हो जायगा। यही रस शव्द लिष्ठ (दो अर्थ में) है जैसे सनिपात वसवैद्य के 'र' (चन्द्रोदयादि ) रस प्रदान करने से रोगो वा सक्ता है, इसी प्रकार राधिका को भी कामज सनिपात ज्वर के लक्षण हो गये हैं "कामचित्तविभ्रशस्तन्द्रालस्यम भोग्नमित्यादि माधवनिदाने याद यहां पर भी कामंज सन्निपातमें श्रीकृष्णरूपी सद्वैध रस (शृंगार) का मदान करें तो यह भी बच सक्ती है और इस ज्वरको यही औषधी भी है। किसी भाषाके कविने कहा भी, है "जा वैदा घर आपने, तू क्या जानै सार । श्राशिक चंगे बिना किये, विन देखे दीदार" इत्यादि. ।। १ ।। पुनरूपेन्द्रवजावृत्तेनाह- स्मारतुरान्दैवतवैद्यहृद्य त्वदनसङ्गामृत- ।
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५०
गीतगोविंदम् ।
[चतुर्थः
मात्रसाध्याम् ॥ विमुक्तवाधां कुरुपे न राधाः
मुपेन्द्रबज्रादपि दारुणोऽसि ॥२॥
भा० टी०-हे देवोंके वैद्य [अग्विनी कुमार] के
सदृश सुन्दर ! केवल आपके आलिङ्गनरूपी अमृत ही से
साग, उस कामातुर राधिकाको यदि रोग दिन नहीं
करियेगा तो हे उपेन्द्र ! (वामनस्वरूप ) आप बज्रमे भी
अति कठोर हैं ।। २ ॥
एवम्विधापि राधा त्वञ्चिन्तन व जीव त्याह-
कन्दर्पज्वरसज्वरा कुलतनोराश्चर्यमस्या
चिरम् । चेतश्चन्दनचन्द्रमाकमलिनीचिन्तासु
सन्ताम्यति ॥ किन्तु शान्तिवशेन शीतलतनु
खामेवमेकं प्रियम् । ध्यायन्ती रहसि स्थिता
कथमसौ क्षीणा क्षणं प्राणिति ॥ ३ ॥
भा० टी०-कामज्वरक सन्तापसे व्याकुल शरीर-
वाली राधिकाका मन चन्दन, चन्द्रमा और कपलिनी
इन्होंका ध्यान करनेहीमे बहुत देर तक दुःखित हो जाता
है, यह अतिही आश्चर्य है । परन्तु शीतल शरीर और.
असाधारण प्रेमी यापहीका ध्यान करती हुई एकान्तमें
बैठी दुर्चलाङ्गी वह राधिका केवल शान्तिके वश होकर
किसी प्रकार से जीती है अर्थात् आपहीके स्मरणसे वा
माणोंको वचाए हुए है ॥३॥
सर्गः४] भापाटीको समेतम् ५७ -rum vNH- - पुनरपि उद्दापनविभाषेन विरहोद्रे पुष्पित्तामामृचनाह- क्षणमपि विरहः पुरा न सेहे। नयननिमीलनखिमया यया ते ॥ श्वसिति कथमसौ रसालशाखाम् । चिरविरहेण विलोक्य पुष्पिताग्राम ॥४॥ भा० टी०-हे श्रीकृष्णचन्द्र जो राधिका पहले नेत्रों की पलक गिराने में भी दुग्वी क्षणभा भी आपका विरह नहीं सह सक्ती थी. ही राधिका फूली हुई मामकी मंज- रियोंको देखकर आपके चिर बिरहमें कये जा सकती है अर्थात् जो साधारण समय में आपका वियोग नहीं सह- सक्ती थी वही आन इस वसन्त ऋतुको देखकर आपके वियोगको किस प्रकार सहगी अब आपके बिना उसका जीवन दुर्घट है ॥३॥ वृष्ठिव्याकुलगोकुलावनरसादुद्धृत्य गोवर्धन विभ्रद्वल्लवसुन्दरीभिरधिकानन्दाचिरंचुम्बितः।। दणैव तदर्पिताधरतटी सिन्दुरसुद्राङ्कितो बाहुर्गोपतनोस्तनोतुभवतःश्रेयांसिकंसद्विषः।५।। इति श्रीकविराज श्रीजयदेवकृते गीतगोविन्दे महाकाव्ये स्निग्धमाधवो नाम चतुर्थः सर्गः ४ पीतमोविचम् [पञ्चमः भा. टी.-से व्याकुल गोलकी रक्षा के अनु- राग से गोवर्द्धन नामक पर्यनको उखाड़कर धारण करने वाले और अति श्रानन्द पूर्वक बनकी गोपाङ्गनामोंसे चिरकाळतक चुम्बित (पान भी कोई हाथों से अनुतकार्य करता है तो उसके हाय चूमें जाते है ) अतएव अभिमान वश में होकर गोपियोंने जो अपने लाल श्रोगको (बाहु पर) थापन किया वही लाल वर्ण मानों उस पर (बाहु पर) मिन्दरका तिलक किया हो एमा गोपवेशधारी कंपारी भगवान कृष्णचन्द्र की पाहु श्रापलोगोंकी रक्षा ॥५॥ इति गीत गांधिले भाषाटीका सिग्मायानाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥ पञ्चमः सर्गः । अहमिह निवसामि याहि राधा- मनुनय मचनेन चानयेथाः।। इति मधुरिपुणा सखी नियुक्ता- स्वयमिदमेत्य पुनर्जगाद राधाम् ॥१॥ भा० ०--अब श्रीकृष्ण की भेनी हुई सखी राधिका से बोली, कि हे राधे! हमने श्रीकृष्णचन्दजी मर्गः ५.] भाषाटपा समेतम्! ने यों कहा है कि मेरे कहने से तुम नाधिकाजी को जाफर सांत्वना दो (समझायो ) और यहां बुलालादो जयतक यह नहीं सविंगी तबतक मैं इमी निज गृहमें रहूंगा इस प्रकार श्रीकृष्णचन्द्र की भेजी हुई सखी राधिका के पास स्वयं मारुर और श्रीकृष्ण का संदेशा कहकर राषि- फासे फिर वोही ।।२।। अथ दशम प्रबन्धो वराडीरागण रूपकताले गीयते। वहति मलयसमीरे मदनमुपनिधाय ।। स्फुटति कुसुम निकरेविरहिहृदयदलनाय॥१॥ तव विरहे वनमाली साखि सीदति ॥ध्रु.॥ दशनां प्रबन्ध वराडी राग रूपकताले ॥ १० ॥ भा० टी०-हे सखी कामदेवकी सहाय करके जब पलपानिल ( दक्षिणकी वायु) वाती है और विरहियोंके हृदयको विदारण करने के लिये पुष्पोकी कलियां खिलती हैं तर हे राधे ! तुम्हारे वियोगसे बनमाली श्रीकृष्णचन्द्र- मी अत्यन्त दुखी होते हैं ।॥ १० ॥ दहति शिशिरमयूखे मरणमनुकरोति ॥ पतति मदनविशिले विलपति विकलतरोऽति ॥ २ ॥ तववि० ६० गीतगोविंदम् । पश्चमः भा० टी० --हे राधे ! श चन्द्रमा अपनी किरणासे नलाता है तब श्रीकृष्णचन्द्रजी मरणासन्न हो जाते है और जब तुम्हारे बिन हमें कामदयके वाण उनके ऊपर गिरते हैं तब वे अत्यन्त विकल होकर विलाप करते हैं। धनातु मधुपसमूहे श्रवणमपिदधाति ।। मनसि वलितविरहे निशिनिशि रुजमुपयाति ॥३॥ तव वि. भा० टी०-हे राधे ! जिस समय भारोंका झुण्ड पूंजता है उस समय श्रीकृष्ण चन्द्रजी अपने कानोको बन्द कर देते हैं । जिसमें उनका शब्द सुनाई न दे। और अब तुम्हारा विरह उनको स्मरण हो पाता है तब उनको प्रति रात्रिमें बढ़ा का होता है। वसति विपिनविताने त्यजति ललितमपि घाम लुठति धराणिशयने बहु नाम ॥४ातववि० भा० टी०-हे राधे ! तुम्हारे बिरहम पिाकच्छचन्द्रजी सुन्दर २ अपने गृहको छोड़कर अति लघन और अति विशाल धनमें निवास करते हैं, भूमिहीकी शय्यापरे लोटते रहते हैं और तुम्हारा नाम लले हर बारम्बार विलाप करते रहते हैं ॥४॥ दिलपति तव सर्ग:५] भोपाटीका समेतम् । रणति पिकसमवाये प्रतिदिशमनुयाति ॥ हसति मनुजनिचये निजविरहमपलपति नेति॥ ५ ॥ तववि० या०टी०-हेराधे ! कोकिकाओंका समूह जय "कुहूर' फरक बोलता है तब उस शब्द के पीछे तुम्हारा शब्द जानकर चारो ओर घूमते हैं । भीकृष्णचन्द्रनाफी यह दशा देखफर जब मनुष्यगण सते हैं। तब अपने विरहको श्रीकृष्णचन्द्रजी छिपाते हैं कि कुछ नहीं है। स्फुरति कलरवरावे स्मरति भाषितमेशा तव रति सुखविभवे बहु गणयति सुगुणमतीव॥६॥तववि भा० टी०- राधे ! जर पक्षियों के सुन्दर और मधुर शब्द सुनते हैं तब भीक्ष्णचन्द्रको तुम्हारा भाणित ( रति समयका शब्द ) स्मरण हो पाता है और जब तुम्हारी सुरतिके आनन्दका अनुभव होता है तब इस भानन्दसे बढ़कर दूसरे मानन्द नहीं है ऐसा कह कर इस आनन्दको बारम्बार गिनते हैं (मानते हैं ) ॥६॥ वदभिधशुभदमासं वदति नरि शृणोती॥ 'तमपि जपति सरसं परयुवतिषु न रतिमुपैति॥ भा० टी०-हे राधे ! जब कोई मनुष्य, कल्याणदाता तुम्हारे नामवाले राधा (वैशाख ) पासका नाम लेना.
६२ गीतगोविंदम्। . [पश्चमः है तब उसको अविष्णचन्द्र बड़े प्रीति पूर्वक सुनते हैं और उसी नामको अत्यन्त प्रेम पूर्वक जपते भी हैं अतएव उनको दूसरी व्रज युवतियों में प्रीति नहीं होती ॥ ७ ॥ भपति कविजयदेव इतिविरहविलसितेन । मनसि रभस विभवे हरिरुदयतु सुकृतेना।८।। इति श्रीगीतगोविन्द दशमः प्रबन्धः ॥ १०॥ भा० टी०-जयदेव कविके इस प्रकार श्रीकृष्णचन्दके वियोगरूपी विलासका वर्णन करने पर अत्यन्त आनन्द युक्त जयदेव कविके चिमै पुण्यके प्रभावसे श्रीकृष्ण चन्दजी प्रकट होय ॥८॥ इतिश्रीगीतगोविन्द मा० टी० दशम प्रवन्धः ॥१०॥ पूर्व यत्र समेत्य या रतिपतेरासादिताः सिद्धयस्तस्मिन्नेव निकुञ्जमन्मथमहातीर्थे पुन- माधवः॥ध्यायंस्त्वामनिशंजपन्नपि तवैवालाप- मन्त्रावलि भूयस्त्वत्कुचकुम्भनिर्भरपरारिम्मामृत- वांछति ॥१॥ भा० टी०-सखी राधिकासे फिर कहता है, हे राधे जिस निकुंजमें पहले तुम्हारे साथ प्राकृष्णचन्दजीने काम देवकी सिद्धि ( चुम्वन आलिंगनादि) मासकी थी.उसी कामदेव के महातीर्थ निकुंजमें बैठकर श्रीकृष्णचन्दूजी र सर्गः४] भाषाटीका समेतम् ६३ ६ दिन तुम्हारेही ध्यान और तुम्हारेही नाम के अक्षरों की पंक्तिका जप करते हुये फिर आपके चोंको गाद प्रालिंगन रूपी अमृतकी इच्छा करते हैं । जैसे ऋषि ईश्वरादिका ध्यान करता हुआ और उसीके नामका जप कर सिद्धि ( अणिमादि) प्राप्त कर फिर अमृत (मोक्ष) की इच्छा करता है इसी प्रकार कृष्णचन्द्रजी को भी जानो।॥१॥ अथ एकादश प्रवन्धः केदाररागण एकताली ताले गीयते । रातिसुखसारे गतमभिसारे मदनमनोहर- वेषम् । न कुरु नितम्विनिगमनबिलम्बनमनुसर तं हृदयेशम् ॥ १ ॥धीरसमीरे यमुनातीरे वसति वने वनमाली ।। गोपीपीनपयोधरमदर्न चञ्चलकरयुगशाली ॥५०॥ ग्यारहवां प्रवन्ध-केदार राग-एकताला ॥ १॥ मा० ०-हे राधे गोपियोंके पीन [ मोट २] कुचें। के मर्दन करनेमें चंचल दोनों हाथवाले वनमाली श्रीकृष्ण : चन्द्रजी जहां मन्द २ वायु वह रही है देसे प{ना-तारके . पनमें बैठे हैं अतः हे नितम्बिनि रतिके तत्वस्वरूप संकेत स्थल में प्राप्त कामदेवके समान वेषधारी ऐसे जो तुम्हारे . ५ गीतादोविंदम्। [पञ्चमः हृदयक स्वामी श्रीकृष्णचन्द्रजी है उनके पास चलने में बिलम्ब न करो ॥१॥ नामसमेतं कृतसंकेतं वादयते मृदुणुम् । बहु मनुते तनुते तनुसंगतपवनचलितमापिरण्य भा० टी०-हे राधे ; तुम्हारे नामके संकेत से [ तुम्हारा नाम ले ले कर ] मधुर स्वरसे श्रीकृष्णचन्द्रजी बंशीको बजा रहे हैं और वायुसे उड़ाई तथा तुम्हारे अंगोंसे स्पर्श करनेवाले धूलीके कणोंको भी बहुत समझते हैं ॥ २ ॥ पतति पतत्रे विचलति पत्रे शंकितभव- दुपयानम् । रचयति शयनं सचकितनयनं पश्य तितव पन्थानम् ॥३॥ भा० टी०-हे राधे ; जब पक्षी उड़ते हैं तब उनकी आइटसे और पत्तों की खटखडाइटसे तुम्हारे आगमनकी आशंका करके चकित नयन [ चौकन्ने] होकर तुम्हारे आगमनके मार्ग की देखने लगते है और सोने की तयारी करते हैं ॥३॥ : मुखरमधीरंत्यजमजीरं रिपुमिव केलि. सुलोलम्।चल सखिकुजं सतिमिरपुजं शील यनीलनिचोलम् ॥ ४.
सर्गः५] भाषाटीको समेतम्। भा० टी०-हे राधे ! बहुत वाजनेवाले अतएव अधीर ( सूर्ख ) और केलि करने के समय चंचल अतएव ये नूपुर (पाजय ) शत्रुक समान हैं इनको यहीं पर छोडा और नील बलों को धारण कर आत घोर अंधकार युक्त कुंजमें चला ॥ ४॥ उरसि मुरारेरुपहितहारे घन इव तरल- बलाके ।। तडिदिव पीते रतिविपरीते राजसि सुकृतविपाके ॥ ५॥ भा० टी०-हे पीत वर्णवाली राधे ! मेघोंमें वक. पक्ति के समान हीराके हारों से सुशोभित और पुण्य से माप्त श्रीकृष्णचन्द्र नीके हृदय पर विपरीत* रतिमें विजलीके शोभाको प्राप्त करो ॥५॥ - विगलितवसनं परिहृतरशनं घटय जघन मापिधानम् । किसलयशयने पंकजनयने निधि मिव हर्षनिदानम् ॥ ६॥ भा० टी-हे राधे नवीन २ कोमल पत्तोंकी शय्यापर शयन करनेके समय. वस्त्र और करधनी रहित आर निधि (खजाना ) के समान आनन्दका आदि कारण ® विपरीत रति उस रति का नाम है जिसमें पुरुष नीचे रहता है और स्त्री ऊपर। . .
गोलगोविंदम् । पञ्चमः अपनी नग्न जंघाको श्रीकृष्णके जंघा से मिलायो ॥६॥ हरिरभिमानी रजनिरदानामियमपियाति विरामम् । कुरु मम वचनं सत्वररचनं पूरय मधुरिपुकामम् ॥ ७ ॥ भा० टी-हे राधे ! मेरे कहे हुए वचनको शीघ्रतासे करो और श्रीकृष्णके मनोरथको शीघ्रही सम्पादन करो। श्रीकृष्णचन्द्रजी अभिमानी हैं शीघ्रता न करनेसे न जाने कुछ रुष्ट हो जाय और इस समय रात्रि है सो भी बीती जा रही है ( फिर सूर्योदय होनेसे अभिसारिका का समय भी नहीं रहेगा ॥ ७ ॥ - श्रेजयदेवे कृतहरिसेवे भपति परमरमणी: यम् ।। प्रमुदितहृदयं हरिमतिसदयं नमतसुकृत कमनयिम् ॥७॥ ॥ इति श्रीगीतगोविन्द एकादशः प्रवन्धः । भा० टी०-हे भगवद्भक्तजनों! श्रीकृष्णसेवा और अनिष्ठन्दरतासे इस पूर्वोक्त गीतके रचयितापर अति दयाकारी प्रसन्न चित्त और पुण्यसे भी अधिक श्रेष्ठ पाहणजाको प्रणाम करो॥७॥ ॥पि.श्रीगीतगोविन्द भाषा टीकाया एकादशः प्रवन्धः ।।
. सर्गः५] भोपाटीका समेतम्। विकिरति मुहुः श्वासानाशाः पुरो मुहुरीक्षते प्रविशतिमुहुः कुजं गुञ्जन मुहुर्बहुताम्यति । रचयति मुहुः शय्यां पर्याकुलं मुहुरीक्षते । मदन कदनक्लान्तः कान्ते प्रियस्तव वर्तते ॥१॥ भा० टी०-हे सुन्दरी राधे, कामदेव की पीड़ासे.. डित तुम्हारे प्यारे श्रीकृष्णजी वारम्बार श्वासों को लेते हैं, चारम्बार दों दिशाओंकी ओर निहारते हैं परम्बार कुंजके बाहर आकर फिर बड़ वड़ाते हुये भीतर जाते हैं, वारम्शर दुःखित होतेहैं और वारम्बार शय्या की रचना करते हैं, और घड़ी व्याकुलता से पारम्बार फिर देखते हैं। त्वदाक्येन समं समग्रमधुना तिग्मांशुर- स्तंगतो गोविन्दस्य मनोरथेन चसमं प्राप्तं तमः सान्द्रताम् । कोकानां करुणखनेन सदृशी दीर्घामदभ्यर्थना । तन्मुग्धे विफलं विलंवन- मसौ रम्योऽभिसारक्षणः ॥५॥ मा० टी० हे मुग्धे राधिके ! पी और मानसे भरे हुए तुम्हारे वचनों के साथ २ सूर्यभी अस्त होगयां अर्थात् मेरे वचनों का उत्तर कुछ भी नहीं दिया और . . .
६ 'गीतगोविंदम्। [पञ्चम अन्धकार : सूर्य के अमन - श्रीकृष्णजी के मनोरथों के साथर ..mm, अर्थात् श्रीकृष्णकी योंही विवारते विच : वीनी जारही है कि मेरी प्राण- प्यारी आनी जमा कई के गेदन के स.मा :याई अर्थात् चकवा चकाई - शिगन विजाप करते हैं तामा र शिलाप नहीं है।ता इसी प्रकार मैं इतना कह रही हूं तोमी मम्हारा मान नहीं छूटता अथवा जैसे चकवा चकई मिलने के लिये विलाप करते हैं उसी प्रकार मैं भी तुम दोनों के मिलाप कराने के निमित्त इतना कह रही हूं अतएव है राधे ! सूर्य अस्त होनसे रात्रिका अन्धकार बढ़ जानेसे यही समय अभिसार (छिपकर प्रियके समीप जाना) का अत्युत्तम है अब विलम्ब न करके शीघ्रतासे चलो ॥ २॥ अभिसारे रसाधियं भवतीत्याह- श्राश्लेषाहनुचुम्वनादनुन खोल्लखादनुस्वा- न्तजात् । प्रोद्रोधादनुसम्भूमादनुरतारम्भादनु प्रीतयोः ॥ अन्यार्थङ्गतयोभमान्मिलितयो: सभाषणानतो दम्पत्योनिशि कोन कोन त- मसि ब्रीडाावीमश्रोरसः ॥३॥ मा० टी-हे राघे संकेत स्थानमें दूसरी स्त्री के लिये सर्गः५] भाषाटीका समेतम् । दूसरा पुरुष और दूपरे पुरुष के लिये दूसरी स्त्री प्राप्त होती है त्व मिलने के समय तो अन्धकारके कारण परस्पर . दोनोंदी पहिचान नहीं सकते फिर वार्तालापसे परस्पर का ज्ञान होता कि यह अमुक पुरुप है और यह अमुक स्त्री जब ना हो जाता तव आलिंगन, उसके पीछे चुंबन, फिर कुचस्थानादिमें नखक्षतादि, पीछे कामोद्दीपन इसके अनन्तर आनन्ददायिनी रतिको शाम फिर दोनोंही प्रिया और प्रियतमाके लज्जासे संयुक्त कौन २ रस नहीं प्राप्त होते हैं अर्थात् अति आनन्दमें मग्न हो जाने से सभी रस प्राप्त होते हैं ॥३॥ इदानीं त्वल्लाभात्कृष्णः कृतार्थोभवत्वित्याह- संभयचकितं विन्यस्पन्तीं दृशन्तिमिरे पथि । प्रतितरु मुहुः स्थित्वा'मन्दं पदानि वितन्वतीम् ॥ कथमाप रहः प्राप्तमझेरनंगतरंगिभिः । सुमुखिसुभगःपश्यन् सत्वामुपैतु कृतार्थताम्।।४।। भा० टी०-हे राधे । अन्धकारयुक्त मार्गमें चकित ( चौकन्नी ) दृष्टिसे देखती हुई वृक्षोंके नीचे बार घार ठहर कर पैरोंको रखती हुई . कामदेवसे व्याप्त सर्वाङ्गीसे किसी प्रकार ( अति कठिनाईसे) चलकर उस संकेत स्थानमें प्राप्त हुई तुमको देखकर हे सुमुखि ! वह - भय और
.
गीतगोविंदम्।
[पञ्चमः
सौभाग्यवान श्रीकृष्णचन्द्रजी कृतार्थ होजाय ॥४॥
इदानीकविः सर्गान्ते भक्तजनमाशिपयति-
राधामुग्धमुखारविन्दमधपस्त्रैलोक्यमालि-
स्थली । नेपथ्योचितनीलरत्नभवनीभारावता-
रक्षमः ॥ स्वच्छन्दंब्रजसुन्दरीजनमनस्तोष-
प्रदोषश्चिरं । कंसध्वंसनधूमकेतुरवतुत्वाम्देवकी-
नन्दनः ।।५॥
भा० टी०-राधिका के मुखरूपी कमलके भ्रमर (जैसे
कमल रसको भौरा पान करता है वैसेही राधिकाके मुख
रूपी कमलमें जो अपरामृतरूपी रस है उसको पीने वाले
तीनों लोकोंका मुकुटस्वरूप जो वृन्दावन है उसके रेष
रचनार्थ नलिम मणिके समान, पृथ्वीके भार ( वोझ)
पतारने में समर्थ, स्वच्छन्दतासे (निर्भय होकर ) व्रजकी
रमणियोंके मनको प्रसन्न करने के निमिच प्रदोष (सन्ध्या)
स्वरूप ( स्त्रियां प्रायः सन्ध्या वा सन्ध्याके अन्तरही
प्रसन्न रहती है कारण वही समय कामोद्दीपन तथा उनके
विनोदका है ) और कंसकों विनाश करने में धूमकेतु
(पुच्छलतारा ) के समान देवकी नन्दन ( श्रीकृष्ण )
तुम्हारी रचा करें ॥५॥
सर्गः ६] भाषाटीका समेतम्। भाषा टीकायां पञ्चमः सर्गः । षष्ठः सर्गः प्रथतांगन्तुमशक्तां चिरमनुरक्तां लतागृहेदृष्टा। तचरितंगोविन्दे मनासजमन्दे सखी प्राह ॥१॥ भा. टीकाधिकासे समस्त वाला कहकर सखी. राधिका को जानेंगे असमर्थ और चिरकाल से अनुग- गिणी देखकर कामदेव से पीडित श्रीकृष्ण के समीप नाकर बोली ॥१॥ अथ द्वादशः प्रवन्धो गुणकरीरागेण रूपकताले गीयते । पश्यति दिशि दिशि रहसि भवन्तम् ॥ खदधरमधुरमधूनि पिवन्तम् ॥ १॥ नाथ हरे जयनाथ हरे॥ सीदति राधाः वास गृहे ॥५०॥ अथ वारहां प्रवन्ध गुणकरी रग रूपक ताल ॥ १२ ॥ भा० टी०-हे हरे ! हे नाथ! अगने अधर रूपी मधुर मधु को पीते हुए आपको निइंजमें बैठी हुई राधिका सर्व दिशाओंमें देखती रहती हैं और हे नाथ भाप का जयहो ७२ गीतगोविंदम् ।। [पः वह राधिका वास गृहम आपके लिये. दुःख पा रही हैं। नन्वेचं देहि किमित नागतेत्यत आह- त्वदभिसरणरभसेन वलन्ती ।। पतति पदानि कियन्ति चलन्ती ॥२॥ मा० टी०-जब उसकी यह दशा है तो वह क्यों नहीं आई ? इस प्रश्नका उत्तर श्रीकृष्णको राषिकाकी सखा देती है हे नाथ ! तुम्हारे लिये जव उस गधिकाने चलन में उत्साह किया तबहीं कई एक पैर चलकर मिर पड़ी अर्थात् वह इस विरहसे इतनी दुर्वल होगई है कि यहां तक श्राही नहीं सक्ती ॥२॥ हा । कष्टमेव चेदशता तर्हि कथं जीवतीत्यत आह- विहितविशदविसकिसलयवलया ।। जीवति परमिह तवरतिकलया ॥३॥ भा० टी०-अत्यन्त कष्टका विषय है कि जब उसकी यह दशा है तो वह जीती कैसे है इसका उत्तर-कमल के अंकुर और पत्तोंके कंकण धारण करती है और केवल आपका रतिकी लालसाही से इस समय वह राधिका जीवित है और कोईभी उसको दूसरा सहारा नहीं है।३। मुहुवलोकितमण्डनलीला॥ मधुरिपुरहमिति भावनशीला ॥ ४॥ .
सर्ग:६] भाषायीका समेतम् । ७३ D Nou भा० टी०-हे नाथ ! वह राधिका बारम्बार अपने आभूषणों के विलाप को देखती है, आपके ऐसी अपने वेषकी रचना बनाकर गा कहती है कि श्रीकृष्णचन्द्रजी मही हूँ इस प्रकार का पालना करती हुई जीवित है जीवनोपाय में यह दू-२-१३-५ है ॥ ४ ॥ तदेवाह- त्वरितमुपैति न कथमभिसारम् ॥ हरिरिति वदति सखीमनुवारम् ॥ ५ ॥ भा० टी-हे नाथ ! मेरे मन हरण करनेवाले श्री. कृष्णचन्द्रजी इस संकेत स्थळमें क्यों नहीं आते यों चार २ सखी से कहती रहती हैं ॥ ५ ॥ अपि च- श्लिष्यति चुम्बति जलधरकल्पम् ॥ हरिरुपगत इति तिमिरमनल्पम् ॥ ६॥ भा० टी०-मेयके सहश थोड़े अन्धकारको हरि सम- मकर आलिंगन और चुम्बन करती है ॥ ६ ॥ भवति. विलम्बिनि विगलितलजा ।। विलपति रोदिति वासकसज्जा ॥ ७ ॥ भा० टी०-जब आप के आने में विलम्ब होता है तब . मौतगोविदम्। [पष्टः निर्लज्जा अवासकसज्जावाराधिका होकरविलापकरती है। श्रीजयदेवकवेरिदमुदितम् ॥ रसिकजनं तनुतामतिमुदितम् ॥८॥. मा० टी०-यह श्रीजयदेव कविका बनायाहुमा गीत भगवत् प्रेमियोंको आनन्द दे ॥८॥ इति श्री गीतगोविन्दे द्वादश प्रवन्धः ॥ १२ ॥ इदानीं तस्यास्त्वदेशपरत्वमाह- विपुलपुलकपालिः स्फीतसीत्कारमन्त- । जनितजाडमकाकुव्याकुलं व्याहरन्ती ।। तव कितव विधायामन्दकन्दर्पचिन्तां । रसजलनिधिमग्ना ध्यानलग्ना मृगानी॥१॥ मा टी-हे धर्व श्री कृष्णचन्द्रजी ! वह राधिका अत्यन्त काम चिन्ताको अपने हत्यमें धारण करके श्राप के ध्यानमें मग्न होजाती है। और उसी ध्यानमें उसको यह जान पड़ता है कि हमारे अगोंसे श्रीकृष्णचन्द्रजीका स्पर्श हुआ अतः इर्षसे उसको सर्वांग रोमाञ्चित हो । जाता है। फिर उसको उसी ध्यानमें यह ज्ञात होता है कि श्रीकृष्णजी हमारे अधर चुंबन और नखक्षनादि कर , यासक सजा उसको कहते हैं जो पति का आगमन सुन फर अपना तथा पासगृह की तयारी करती हैं और न आने ले दुःखी होती हैं।
सर्गः६ भापारीका समेराम्। रहे हैं ऐमा जानकर " सी सी" करने लग जाती है और उसके अन्तःकरणमें जडता समाजानेसे प्रति विहल हो- कर वह अति भयसे नही २" ऐसा मतकरिये" इत्यादि वाक्योंको कहती हुई आपके भंगार रस रूपी समुद्र में डूब जाती है ॥१॥ अङ्केष्वाभरणं करोति बहुशःपत्रेऽपिसञ्चारिणि । प्राप्तत्वांपरिशंकतेवितनुते शय्याश्चिरन्ध्यायति । इत्याकल्पविकल्यतल्परचनासंकल्पलीलाशतं । व्यासक्तापिविनात्वयावरतनु पानिशान्नेष्यतिर भा० टी०- श्रीकृष्णचन्द्र जी वा सुन्दरी राधिका 'पत्तों की खन्नड़ाहट सुन फर भी आप को भाया मान हस्तपादिको में आभूषण धारण करती है, और पुष्पादिकों से शय्याकी रचना करती है, और बहुन देर तक सोचती है इस प्रकार सैकड़ों संकल्प करती है (माकृष्णचन्द्रनी जा पायेंगे तब में यों कहंगीबों करूँगी और मानकर पैठ जाऊँगी यदि वे न मनावेंगे तो मैं बड़ी कठिनाइयों से मानूंगी इत्यादि ) वातें विचारती हुई "मापही विषय में मग्न है तथापि आपके विना राव नहीं बितावैगी अर्थात् यदि आप उससे इस समय नहीं मिलि- येगा तो उसके प्राण पखेरू मूर्योदय तक उड़ जायेंगे।।२।।
- गीतगोविन्दम् । [पठः ~- अधुना कविः सर्गान्ते भक्तानाशिपयति । किम्बिश्राम्यसि कृष्णभोगिभवने भाण्डीर, भूमीहि । भातर्यासि न दृष्टिगोचरमितः सा नन्दनन्दास्पदम् ॥ राधाया बचनन्तदनगमु. खानन्दान्ति के गोपतो गोविन्दस्य जयन्ति सायमतिथिप्राशत्य गर्भागिरः ॥ ३॥ भा. टी.-सर्गान्त में कवि आशीर्वाद देता है । हे भाई बटोही ! भांडार वट की भूमि में जो कृष्ण (सर्पका का निवास स्थान है वा भाग विलास करने वाले श्रीकृष्ण चन्द्रजी का घर है वहीं क्यों विश्राम करते हो यहां से नो दिखाई देता है और श्रानन्दमद नन्द जी के घर में क्यों नहीं चले जाते इस प्रकार के राधिका जी के वाक्य उस पार्थिक के मुख से सुन कर उन वाक्यों को नन्दजी के सन्मुख छिपाने वाले श्रीकृष्णचन्द्रजी से उस पथिक की प्रशंसा कही हुई वाणी जय युक्त हो इसका अर्थ यहां मह है कि कोई राही अपने विश्राम के लिए वट वृक्ष के नीचे गया उससे राधिका जी ने कहा कि भांडीर वट में शो कृष्ण सर्प रहता है आप नन्द जी के गृह भा कर विश्राम करो आप को वहां सर्व प्रकार की सुविधा होगी यही पूर्वोक्त वचनों को सुन कर श्रीकृष्णचन्द्र ने में सर्गः६] भाषाटीका समेतम् । N . विचारा कि हम लोगों की चतुराई कहीं नन्द जी न जान जाय क्योंकि आज रात्रि में इसी भांडीरहीवर के नीचे राधिका से मिलने की इपने प्रतिज्ञा की है इसी से रा. पिका ने श्लिष्ट ( दो अर्थ में) "कृष्ण भोग भवन,ऐसा कहा है इसी कारण से श्रीकृष्णचन्द्र ने उस बात को गुप्त रखने के लिये उस पथिक की प्रंशसा की कि श्राप का स्वागत हुआ हे महारान आपने बड़ी कृपा करी इत्यादि ॥३॥ इति गीतगोविन्दे भाषा टी० महाकाव्य वासकसज्जावर्णने सोत्कण्ठवैकुण्ठो सप्तमः सर्गः। अधुना चन्द्रोदयव्याजेन राधाया विरहव्य- याधिक्यं वर्णयन्नाद- अत्रान्तरे च कुलटाकुलवमपात- सञ्जातपातक इव स्फुटलाञ्छनधीः ।। वृन्दावनान्तरमदीपयदंशुजाले- दिक्सुन्दरीवदनचन्दनविंदुरिन्दुः॥१॥ भा० टी०-इसके अनन्तर कुलटा ( व्यभिचारिणी गीतगोविंदम् । [सप्तमः स्त्रियों के मार्मको रोकने के पाप से मानो कलकित और पूर्वदिशारूप रमणीके चन्दन विन्दु के समान चन्द्रमा अपने : किरण समूहसे समस्त वृन्दावनको प्रकाशमान कर दिया अर्थात् चन्द्रोदय होगया ॥१॥ प्रसरातशशधराबिम्मे विहितविलम्वे चमा धवेमधुरा। विरचितावविधविलापं सापरिता- पंचकारोचैः ॥ २॥ भा० टी०- जब चन्द्रमाका विम्य ऊपरको चड़ा अतिा था और श्रीकृष्णके आगमनमें विलम्ब हुआ तब श्रीकृष्णचन्द्रकी अनुरागिणी वह राधिका नाना प्रकारके विलाप करनेलगी और बहुत दुखी हुई ॥२॥ विलापमेव गीतेनाह- अथ त्रयोदशःप्रवन्धो गौडमालवारागण प्रतिमण्ठताले गीयते। कथितसमयेऽपि हरिरहहं न ययो वनम् ॥ मम.विफलमेतदनुरूपमपि यौवनम् ॥ पामिहेकामहशरणसखीजनवचनवञ्चिता॥ध्रु० परहवा प्रबन्ध गाड़ मालव राग प्रतिर्मठताल ॥ १३ ॥ अब राषिकाजी गीतमें विलाप करती है कि रे मेरे सर्ग:0] भ पाटीका समेतम् । मन ! श्रीकृष्णचन्द्रजी कहे हुए ममय पर भी इस चनमें नहीं आए, इसमें बड़ा भारी आश्चर्य वा खेद है, अब मेरा यह यौवन योग्य भी है तौभी श्री कृष्णचन्द्रजीके बिना निष्फल है " श्रीकृष्णचन्द्रजी अभी आते हैं अभी आते हैं" यों कह २ कर सखियोंने हमको ठग लिया । अब मैं किसकी शरण जाऊं अर्थात् अब मेरा कोई भीरक्षक नहीं है जब विश्वासपात्र सखियोंनेही विश्वासघात किया तव तो अब मैं “क” जलहीकी शरण जाजंगी अर्थात् जलमेंही डूब कर मरूंगी ॥१॥ . यदनुगमनाय निशि गहनमपि शीलितम् ।। तेन मम हृदयमिदमसमशरकीलितम् ॥ २ ॥ भा० टी०-जिस श्रीकृष्णचन्द्र जीके लिये मैंने इस घोर अन्धकारमयी रात्रिके समय इस घोर बनमें निवास किया उन्हीं श्रीकृष्णजीने मेरे हृदय में कामदेवके पापोंको गाड़ दिया। मम मरणमेव वरमतिवितथकतना ।। : किमिति विषहामि विरहानलमचेतना ॥ ३ ॥ भा. टी अब मैं इसषनमें ज्ञानशन्य होकर विरह रूपी. अग्निको कैसे सह सकी हूं और यह शरीर भी व्यर्थ है इससे अच्छा तो मरनाही है ३. .
गौवनोविंदम् । [ सप्तमः ममहह विधुस्यति मधुरमधुरयामिनी ॥ कापि हरिमनभवति कृतसुकृतकामिनी॥ ४ ॥ भा. टी-बड़े दुख की बात है कि यह सुन्दर बसन्त की रात्रि हमको तो दुःख देरही है. [क्योंकि, यह दसन्त की रात्रि श्रीकृष्णचन्द्रजीके. बिना हमको नहीं मुहाती] और कोई अति पुण्य शालिनी गोपयनिता श्रीकृष्णचन्द्रजी के साथ पान- न्द कर रही है ॥४॥ ग्रहह कलयामि दलयादिमणिभूषणम् ।। हरिविरहदहनवहनेन बहुदूषणम् ॥ ५ ॥ भा० टी० हाय !!! मैं मणियोंके कंदाण इत्यादि आभूषणोंको श्रीकृष्णचन्द्रकी विरहाग्नि से दूषण स्वरूप मारती हूँ (उचितही है क्योंकि, अग्नि के समीप रत्नादि जडित आभूषण दूषणही होजाते हैं और स्त्रियों के बाभूजणादि जबतक अपनी प्रियतमें नहीं देखें तक्तक उनको वे निष्फतही मानती हैं ५ कुसुमसुकुमारतनुमतनुशरलीलया ॥ संगपि हदि हन्तिमायतिविषमशीलया ॥६॥ भा० टी०-पुष्पोंके समान कोमलांगी जो मैं हूँ मुझे पप्पोंकी मालाभी अति दारण कामदेव के सर्गः७] ब भोपाटीको समेतम् । याण की तरह मार रही है (अर्थात् कामदेव ने पीडितको पुष्पों की मालाभी कामोद्दीपक होने के कारण दाखप्रद मालूम पड़ती है) ॥ ६ ॥ अहमिह निवसामि न गणितवनवेतसा ॥ . स्मरति मधुसूदनो मामपि न चेतसा ॥७॥ भा० टी०-मैंने तो श्रीकृष्णचन्द्रजीके लिये पन और येतसकी क्यारियों को कुछ भी नहीं गिना और इसी पनमें निवासभी करती हूँ और श्री कृष्णचन्द्रजीले हमको चित्तसे भी स्मरण नहीं किया ( यहां आना तो दूर रहा ) हरिवरणशरणजयदेवकविभारती ।। वसतु हृदि युवतिखि कोमलकलावती ॥८॥ इति श्रीगीतगोविंदे त्रयोदशः प्रबन्धः ॥१३॥ भा० टी-श्रीकृष्णचन्द्रजी के चरणोंकी शरण मानने वाली जयदेव कविकी सुमधुर कला (साहि स्य संगीतकला) से युक्त यह वाणी भक्तोंके हृदय में इस प्रकार निवास कर जैसे रसिकजनोंके हृदय में सुन्दरकला (शृङ्गार १६ कला) जाननेवाली युवती नायिका निवास करती है ॥८॥ इति श्री गी० गो० भा.टी० या प्रयोदशः प्रबन्धाः ।। . ।
मर . गीतगोविंदम्। [सप्तमः तति कामपि कामिनीमभिसृतः किंवा क- लाकेलिभिर्वद्धो बन्धभिरन्धुकारिणि वनोपांते किमु भ्राम्यति ॥ कान्तःक्लान्तमना मनागपि पथि प्रस्थातुमेवाक्षमः । संकेतीकृतमञ्जुवञ्जुलल- ताकुळेऽपि यन्नागतः ।। १ ।। भा० टी०-श्री कृष्णचन्द्रजीक्यों नहीं आये इसी का संकल्प विकल्प अपने मन में राधिकाजी कररही हैं, कि श्रीकृष्णचंद्रजी क्या किसी दूसरी कामिनी के अभिसरण (संकेत) स्थानमें चले गये, अथवा, अपने इष्टमित्रों के हास्य क्रीडामें बंध [फंस] गये, वा इस अन्धकारयुक्त गझिन पनमें मार्ग ढूंढ़ते हुये घूमते हैं क्योंकि इस घनमें थोड़ाही समय हुआ कि, अत्यन्त अन्धकारथा उसमें मार्ग का भूलना सम्भव है। या जैसे मैं श्रीकृष्णजी के पिरहमें दुखित होकर एक पगभी नहीं चलसकी इसी प्रकार वे भी मेरो विरह से दुःखित होकर एक पगं भी- चलने में असमर्थ होगये हों। क्योंकि, इस सुन्दर वेतसलताके कुंजको अपना संकेतस्थल बना करभी नहीं पाये ॥१॥ अथागतां माधवमन्तरेण संखीमियं वीक्ष्य सर्गः भाषाटीका समेतम् । विषादमूकाम् ॥ विशंकमाना रमितं कयापि जनार्दनं दृष्टवदेतदाह ॥ २॥ भा० टी०-इसके अनन्तर कार्यकी सिद्धि न होने से दुःखित और चपचाप और श्रीकृष्णजीके विना अकेली आई सखीको देखकर " श्रीकृष्णचन्द्रजी क्या ? किसी दूसरी गोपरमणीके साथ तो रमण नहीं करते" इसकार्य को नेत्रोंसे देखनेके समान शंका करनेवाली राधिका सखीसें यह बोली ॥२॥ अथ चतुदर्शप्रबन्धो वसन्तरागेण एकताली ताले गीयते । स्मरसमरोचितविरचितवेषा। गलितकुसुमदलविलुलितकेशा ॥ १ ॥ कापि चपलामधुरिपुणा विलसतियुवतिर- धिकगुणा ॥ ध्रु०॥ श्रथ चौदहवां प्रवन्ध वसन्तराग एकताला॥१४॥ भा० टी०-हे सखि ! कामयुद्ध (संभोग ) के योग्य प्राभूषणादि धारण करनेवाली विपरीत रति करनेके केशोंके और वेषीभी ढीली होगई है ऐसी कोई चंचला और हमसे भी अधिक सौन्दर्यादि गुणावलीसे समय पुष्प इधर उधर गिरगये हैं गीतगोविंदम् । [सतमः विराजमाना कोई कामिनी श्रीकृष्णचन्द्र के साथ विलास कररही है ॥१॥ हरिपरिरम्भणवलितविकारा ।। कुचकलशोपरि तरलितहारा ॥ २ ॥ कापि० भा० टी-हे सखि ! कृष्णचन्द्रजीके श्रालिंगन फरने से कामविकार उत्पन्न होनेवाली और विप- रीत रतिमें जिसके कुचरूपी कलशोंपर हार हिल- डोर कररहे हैं। ऐसी कोई कामिनी श्री कृष्णचन्द्र जी के साथ विलास कर रही है ॥२॥ विचलदलकललिताननचन्द्रा ।। तदधरपानरभसकृततन्द्रा ॥३॥ कापि० भा० टी०-हे सखि ! जिसके सुन्दर मुखरूपी चंद्रमा में चञ्चल अलकावली शोभायमान होरही और जिसको श्रीकृष्णके अधरामृत पान करनेसे तन्द्रा (बालस्य ) भारही है ऐसीकोई ब्रजवाला श्रीकृष्णचन्द्रके साथ भानन्द कर रही है ॥ ३ ॥ चञ्चलकुण्डलदलितकपोला । मुखरितरशनजघनगतिलोला ॥ ४ ॥ कापिक भा० टी०-विपरीत रतिमे अण्डलोंके हिलनेसे कुण्डलों की रगड़ लग २ कर जिसके कपोल घिस सर्गः७] - भोपाटीका समेतम् । गऐ हैं, झन २ शब्द करनेवाली करधनी युक्त जघ- नोंके हिलानेसे स्वयं चञ्चला कोई गोपांगना श्री कृष्णचन्द्रजी के साथ रमण कर रही है ॥ ४ ॥ दयितविलोकितलज्जितहसिता॥ बहुविधकूजितरतिरसरसिता ॥ ५ ॥ कापि० भा०टी०-हे सखि ! प्यारे श्रीकृष्णचन्द्रजीके कटाक्ष सहित देखनेसे लजाके साथ मन्द २ सुस क्यानेवाली और नाना प्रकारकी रतिक्रीड़ामें नाना प्रकारके हंस, मयूर, पिक, इत्यादि पक्षियोंकी मधुर २ वाणीसे प्रसन्न कोई ब्रजगोपी श्रीकृष्ण- चन्द्रजीके साथ रमण कर रही है ॥ ५ ॥ विपुलपुलकपृथुवेपथुभङ्गा ।। श्वसितनिमीलितविकसदनङ्गा ॥ ६ ॥ भा० ठी०-रतिके अानन्दसे जिसका सर्वांग रोमांचित होजाता है और कम्पायमान होजाता है, और स्वर में भेद होता है और श्वास और नेत्रों को मूंदलेने से जिसका काम का भाव प्रकट है ऐसी कोई गोपांगना श्रीकृष्ण चन्द्रजी के साथ विलास कर रही है ॥६॥ श्रमजलकणभरसुभगशरीरा॥
[सप्तमः गीतगोविंदम्। परिपतितोरसि रतिरणधीरा ॥ ७ ॥ भाटी रतिक परिश्रम सम्बन्धी स्वेद पसी ना] के मिन्दुओंके समूहसे जिसका शरीर शोभित हो रहा है और विपरीत रतिमें श्रीकृष्णचन्द्रके वक्षःस्थलपर स्थित और रतिरूप युद्धमें धैर्यको धारण करनेवाली कोई गोपांगना श्रीकृष्णचन्द्रजी के साथ रमण कर रही है ॥७॥ श्रीजयदेवभणितहरिरमितम् ॥ कलिकलुषं जनयतु परिशमितम् ॥ ८ ॥ इति श्रीगीतगोविन्दे चतुर्दशः प्रवन्धः ।। १४ ॥ भा० टी०-यह श्रीजयदेव कवि निर्मित श्री कृष्णचन्द्र के सम्भोगका वर्णन श्रवणकरने वालों के कलियुग सम्बन्धी पापोंका नाश करै ।। ८ ॥ इति गी० गो० भाषा टीकायां चतुर्दशः प्रवन्धः ॥ ४॥ विरहपाण्डुमुरारिमुखाम्बुज । द्युतिरयं तिरयन्नपि वंदनाम् ॥ विधुरतीव तनोति मनोभुवः। सुहृदये हृदये मदनव्यथाम् ॥ ४॥ भा० टी०-अपि सखि ! मेरे विरहसे पीले रंगवाले श्रीकृष्णचन्द्रजीके मुखारविन्दके समान -- सर्गः७] ७ भाषाटीका समेतम् । पीलेरंगवाला यह कामदेवका मित्र चन्द्रमा धान- न्द देनेवाला है तो भी मेरे हृदयमें कामदेव की पीडाको बढ़ाता है। अथ पञ्चदशप्रबन्धो गुर्जरीरागेण एकताली ताले गीयते । समुदितमदने रमणीवदने चुम्बनवलिता धरे ॥ मृगमदतिलकं लिखति सपुलकं मृगमिव रजनीकरे ।। रमते यमुनापुलिनवने विजयी मुरारिरघुना ।। ध्रु०॥ अथ पन्द्रहवां प्रबन्ध गुर्जरीराग एकताला ॥१॥ भा० टी० हे सखि ! श्रीकृष्णचन्द्रजी कामो- हीपन (कामको जगाना) के लक्षणोंसे युक्त और चुम्बन करने से संकुचित सुन्दर अंधर श्रोष्टवाली किसी गोपरमणी के मुखपर कस्तरीका तिलक य- नाते हैं मानो चन्द्रमामें हरिणको लिखते होय ऐसे कामक्रीड़ामें विजयी श्रीकृष्णचन्द्रजी यमुनाके तीर वाले वनमें इस समय रमण करते हैं ॥१॥ घनचयरुचिरे रचयति चिकुरे तरलिततर- पानने ।। कुरखककुसुमं चपलासुषमं रतिपति
[संतमः
गीतगोविंदम् ।
मृगकानने ॥ २॥
भा० टी० हे सखि ! मेघोंके समूहके समान
सुन्दर युवजनोंके चित्तको चंचल करने वाले और
कामदेव रूपी मगोंका वन (जैसे बन मगोंका
निवासस्थान है) वैसे केश कामदेवका स्थान है श्री
कृष्णचन्द्रजी ऐसे गोपवनिताकी वेणी में विजलीके
समान शोभावाला [पीला] कुरवक का पुष्प लगा
ते हैं अर्थात् कुरवकले पुष्पोंसे वेणी गूंथने हैं ॥शा
घट्यति सुघने कुचयुगगगने मृगमदरुचि-
रूषिते || मणिसरममलं तारकपटलं. नखपद
शशिभूषिते ॥ ३ ॥
भा० टी०-हे सखि ! श्रीकृष्णचन्द्र जी कस्तूरी
की छविसे युक्त, नखचिन्हरूपी चन्द्रमासे सुशो-
भित कठोर स्तनद्रय स्वल्प भाकाश में निर्मल
मणियोंके हार पहनाते हैं मानों तारोंके समूहको-
एकत्रित करते होंय (यहां कस्तूरीसे श्राकाशकी,
नखके चिन्हसे चन्द्रमाकी और हारक मणियोंकी
तारोंसे समानता दिखाई है अर्थात् गोपियोंक
स्तनोंमें नखचिन्ह और कस्तूरी लगाकर हीरों के
हार पहनाते हैं)॥ ३ ॥
1 सर्गः७] भाषाटीका समेतम्। जितविसशकले मृदुभुजयुगले करतलन- लिनीदले ॥ मरकतवलयं मधुकरनिचयं वित- रति हिमशीतले ॥४॥ भा० टी०-हे सखि ! कमल डंटियोंसे भी अधिक शोभायमान, कमल पुष्परूपी करतल [ हथेली ] चाले और हिमके समान शीतल ऐसे हाथोंमें श्री कृष्णचन्द्रजी मरकत मणियोंसे जडित कंकण पह- नाते हैं मानों कमलक पुष्पोंपर भ्रमर बैठे होंय ४ रतिगृहज घने विधपुलापधने मनसिजकन- कासने ।। मणिमयस्शनं तोरणहसनं विकिरति कृतवासने ।। ५॥ भा० टी०-कामदेवक बैठनके लिये प्रासन, रतिक निवासस्थान स्वरूप और सुन्दर झीने वस्त्र को धारण करानेवाले किसी गोपीक अति मोटे जधन स्थलोंपर वह श्रीकृष्णचन्द्रजी बन्दनवारक समान फरधनी पहना रहे हैं ॥ ५ ॥ चरणकिसलये कमलानिलये नखमणिग- णपूजिते ।। बहिरपवरणं यावकभरणं जनयति हृदि योजिते ।। ६॥ .
६० गीतगोविंदम् । [सप्तमः भा. टी-हे सखि ! वह श्रीकृष्णचन्द्रजी लक्ष्मीक निवासस्थान, और नखरूपी मणियोंसे सुशोभित किसी गोपवनिताके कोमल पत्तोंक समान साफ चरणोंको अपने हृदय पर स्थापन करके यावक (अलता, महादर) लगाते हैं ॥६॥ स्मयति सुदृशं कामपि सदृशं खलहलघर सोदरे ॥ किमफलमवसं चिरमिह विरसं वद सखि विटपोदरे ॥ ७ ॥ भा० टी०-हे सखि जन वह दुष्ट और हल- धर यजदेवजीका भाई किसी अपने जैसी सुनय- नाके साथ रमण करता है तन तुम्ही बतावो कि इस वेतसलताक गृहमें रस गिना (शृङ्गाररसके गिना) नहुन समयतक मैं क्यों बैठी रही अर्थात् अग अपने घर चलो॥७॥ इह रसभणने कृतहरिगुणने मधुरिपुपद सेवके ॥ कलियुगचरितं न वसतु दुरितं कवि- नृपजयदेवके ।। || इति श्रीगीतगोविंदे पञ्चदशः प्रबन्धः ॥ १५ ॥ भा० टी०-शृङ्गाररसका वर्णनकारी, हरिगुणों का गानकर्ता, और श्रीकृष्णचन्द्रक चरणोंका सेवी सर्गः७] हर भाषाटीका समेतम् । जयदेव कविराजके उदयमें कलियुग के पापोंका नि- वास मत होय ॥१॥ इति श्रीगीत गोविन्द भाषा टीकायाँ पञ्चदशः प्रवन्धः ॥१५॥ कृष्णस्थानागमाना दु:खितां सखोमाश्वासयन्त्याह- नापात. सखि निर्दयो यदि शठस्त्वं दूति किं दूयसे स्वछन्द बहुवल्लभः स रमतें किं तत्र ते दूषणम् ॥ पश्याच प्रियसङ्गमाय दयितस्या- कृष्यमाणं गुणैरुत्कण्ठार्तिभरादिव स्फुरदिदं चेतःस्वयं यास्यति ॥ १ ॥ भा० टी-है सखि ! हेदति निर्दयी और धूर्त श्रीकृष्णचन्द्रजी नहीं पाए तो इसमें तुमको क्या दुःख होता है, क्योंकि वे बहुत और प्यारी स्त्रियों को रखने वाले हैं अतः घेउन त्रियों के साथ अपनी इच्छापूर्वक रमण करते हैं इसमें तेरा क्या दोष है अर्थात् तू इतना दुःख व्यर्थ क्यों पा रही है देख त कि, उस पारे श्रीकृष्णचन्द्रजा के सौन्दर्य्यादि गुणों के वशीभूत होकर तथा उत्कठा और कामदेव की पीड़ा केवोझ से मानो माहर निकल, कर यह मेरा चित्त बापही श्राज उनसे मिलने, जायेगा.[अर्थात् राधिका जी को कामपीड़ा. .
६२.
गीतगोविंदम् ।
[सप्तमः
इतनी बढ़ गई है कि जिससे इनका जीवन रहना
अति कठिन हो गया है अतः मृत्यु के पश्चात् इनका
मन श्रीकृष्ण जी में लीन हो ही,जायगा क्योंकि
जिसका चित्त भरण समय में जहां रहता है उसको
वहाही पाना होता है, और राधिकाजी का चित्त
तो जन्म से ले कर वन तक श्रीकृष्ण ही में रहा
अतः यह तो अवश्य ही श्रीकृष्ण से मिलेगा)॥१॥
अथ पोडरामवन्धो देशाङ्करागण
रूपकताले गीयते ।।
अनिलतरलकुवलयानयनेन ॥
तपति न सा किसलयशयनेन ॥ १ ॥
सखि या रमिता वनमालिना ।। ध्रु०॥
अथ सोलहवां प्रगन्ध देशांक राग रूपक ताल ॥१६॥
भा० टी०-हे सखि ! जिस गोपिका ने वायु
से चंचल काल के समाल नेत्र वाले वनमाली श्री
कृष्णचन्द्र के साथ रमण किया है वह कोमल
कोमल पत्तों की शध्या पर शयन करने से संतप्त
नहीं होती है और जो मेरे सदृश 'अरमिता'
[जिसने रमण नहीं किया वह तो कोमल पत्तों की
शया पर शयन करने से संता होती है) ॥१॥
- " -- : सर्गः-७] भापाटीका समेतम्। विकसितसरसिजललितमुखेन । स्फुटति न सो मनसिजविशिखेन।।२।। सखियां० मा० टी०-हे सखि प्रफुल्लित कमल के लहश सुन्दर सुख वाले श्रीकृष्ण जी के साथ जो ब्रजा- जना रमण करती है वह कामदेव के पापों सेदो टुकड़े (पीड़ित) नहीं होती और जो मेरे समान हैं वे तो दो टकड़े हो जाती हैं ॥२॥ अमृतमधुरमृदुतरवचनेन । जलति न सा मलयजपेवनेन॥३॥सखिया भा० टी०-हे सखि अमृत से भी अधिक मधुर और मनोहर बचन बोलने वाले श्रीकृष्ण चन्द्रजी क साथ जो ब्रज गोपिका मरण करती वह मलयाचल सम्बन्धी [शीतल मन्द सुगन्ध ] वायु से नहीं जलती हैं और जिसने मेरे सदृश रमण नहीं किया है उसका तो मलयानिल. अवश्य ही दग्ध करता है ।। ३ ।। स्थलजलरुहरुचिकरचरणेन ॥ लुठति न सा हिमकरकिरणेन॥५॥ सखिया० भा० टी०- हे सखि स्थल कमल के समान इस्त.और चरण वाले श्रीकृष्णचन्द्र जी के साथ- - . मीतगोविंदम्। [सप्तमः जिस गोप रमणी ने रमण किया है वह रमणी चन्द्रमा की शीतल किरणों के स्पर्श से लोटती दुःखी नहीं है और जिसने श्रीकृष्ण के साथ मेरे सदृश रमण नहीं किया उसको तो, चन्द्रकिरण तपाता ही है ॥४॥ सजलजलदसमुदयरुचिरेण ॥ दलति न सा हृदि चिरविरहेण॥५॥ सखिया भा० टी०-हे सखि ! जल सहित मेघों के समूह क तुल्य वर्ष पाले श्रीकृष्ण जी के साथ जिसनज गोपरमणी ने रमण किया है उसका हृदय विरहादि से नहीं फटता और जिसने मेरे सदृश रमण नहीं किया उसका हृदय अवश्य ही फट जायगा ॥ ५॥ कनकनिकपरुचिशुचिवसनेन ॥ श्वसिति न सा परिजनहसनेना सखि या. भा० टी०-हे सखि सुवर्ण की रेखा के समान पीत और शुद्ध [ साफ ] धन धारण कर- ने वाले श्रीकृष्णाजी के साथ जिस प्रजगोपरमणी ने रमण किया है वह रमणी सखियों के हास्य से दुख.संसूचक श्वास नहीं लेती और जी मेरे सदृश है. वह तो अवश्य ही गारम्बार श्वास लेती ही है।
सर्गः भावाटीका समेतम् । सकलभुवनजनवरतरुणेन ॥ वहति-न सा रुजमतिकरुणेन ॥७॥ सखि या भाटी-है सखि त्रैलोक्य के समस्त जनों में श्रेष्ठ,जवान और प्रति दया वाले श्रीकृष्णचन्द्र के साथ जिस ब्रज गोप रमणी ने रमण किया है वह किसी प्रकार की भी पीड़ा नहीं पाती और जिसने मेरे सदृश श्रीकृष्ण जी.के साथ रमण नहीं किया वह सर्व प्रकार की पीड़ाओं को पाती ही है ॥७॥ श्रीजयदेवभणितवचनेन ॥ प्रविशतु हरिरपि हृदयमनेन ॥८॥ इति श्रीगीतगोविन्द षोडशः प्रबन्धः ॥१६॥ : भा० टी०-श्रीजयदेव कवि के कहे हुए इन वाक्योंसे श्रीकृष्णचन्द्र जी भक्तों के हृदय में प्रवेश करें अर्थात् भक्तों के हृदय में प्रवेशकर के समस्त भक्त जनों के पापों को नाश करें ॥८॥ इति श्रीगीतगोविन्द भाषाटीकायां षोडशः प्रबन्धः ॥ १६॥ पीडयन्तं मलयानिलं प्रार्थयते- मनोभवानन्दनवन्दनानिल प्रसीद रे दक्षिण मुंञ्च वापताम् ॥
. ६६ गीतगोविंदम् । [सप्तमः क्षणं जगत्माण विधाय माधवम् पुरो मम प्राणहरो भविष्यसि ।। १ ।।. भा० टी०-हे कामदेवको जगानेवानी मल- याचल सम्बन्धी दक्षिणकी वायु ! आप अपनी कुटिलताको छोड़िये और हमारे ऊपर प्रसन्न होइये, और हे जगत्के प्राण ! यदि तम्हारी यही इच्छा है कि इसका प्राणही हरण करूंगा तो एक क्षणमात्रक लिए श्रीकृष्णचन्द्रजीको मेरे सन्मुख करके मेरा प्राण हरण करलेना ॥१॥ पुनरपि सखी प्रत्याह- रिपुरिख सखीसम्वासोऽयं शिखीव हिमानिलो- विषमिव सुधारश्मिर्दूरे दुनोति मनोगते ॥ हृदयमदये तस्मिन्नेवम्पुनर्वलते वलात् । कुवलयदृशांवामः कामों निकामनिरंकुशः ॥२१. भा० टी०-हे सखि जब वह श्रीकृष्ण मनमें आते हैं तब तुमलोगोंके साथ बैठना हमको शत्रुके समान, शीतलवायु अग्निके सहश और 'चन्द्रमा विषके समान अत्यन्त दुःखी कर रहा है तो भी मेरा मन उली नि यी श्रीकृष्ण में वलात्कार से । . .
सर्गः] भाषाटीका समेतम्। ७ लगताही है अतः हे सखि ! स्त्रियों के लिए काम- देव अति कुटिल और निरंकुश है अर्थात् जैसे मत्तहाथी शंकराके न रहनेसे मनमानी चाल चला- ता है उसी प्रकार नव स्त्रियों को कामदेवकी मत्तता शिरपर चढ़ जाती है तब वे अपनी मनमानी चालें चलती हैं यहां पर राधिकाके मनमाने श्रीकृष्णजी है अतः श्रीकृष्ण का अपराध होनेपर भी श्रीकृष्ण हीकी ओर राधिकासा मन जाता है ॥२॥ पुनरपि जीवितनिरपेक्षत्वेन मलयानिलादीन्मत्याह- बाधाम्विधेहि मलयानिल पञ्चवाए प्राणान् गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये ।। किं ते कृतान्तभगिनि क्षमया तरङ्गै. रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देहदाहः ॥ ३ ॥ भा० टी-हे मलय सम्बन्धी चन्दन वृक्षोंके पवन ने हमको जितनी इच्छा होय उतनी पीड़ा दे और है कामदेव ! आपभी मेरे प्राणोंको हरण करिये परन्तु अब मैं प्राणोंक रहते गृह नहीं जाऊंगी और हे यमराजकी बहिन यमुने ! तू भी अब मेरे पर क्यों क्षमा करती है क्योंकि तं यम- राजकी वहिन है अब त् अपने तरंगोले मेरे अंगों गीतगोविंदम् । [प्रमः . का सिञ्चन कर जिसमें सदाक लिये मेरा सन्ताप दूर होजाय । अर्थात् अपने जलमें हमको डुबोले क्योंकि श्रीकृष्णजी विना मेरामरणही श्रेष्ठ है। सर्गान्ते कविनमस्करोति- सान्दानन्दपुरन्दरादिदिविपद्धन्दैरमन्दाद- गदानप्रैर्मुकुटेन्द्रनीलमणिभिः सन्दर्शितेन्दि- विरम् ॥ स्वच्छन्दम्मकरन्दसुन्दरगलन्मन्दा- किनीमेदुरंश्रीगोविन्दपदारविन्दमशुभस्कन्दाय- वन्दामहे ॥ ४ ॥ इति श्रीक० धीजयदेवकृत गीतगोविन्द महा-धोनार नारायणों नाम सटीकः सर्गः। भा० टी०-अति हर्षित होकर इन्द्रादिदेवता श्रोंके समूह ने नीलमणि जटित मुकुटोंको जो श्री कृष्णके चरणारविन्दों में अति आदर पूर्वक नवा- या इससे उनके चरणारविन्दपर भँवरेदिखलाई देने लगे और पुष्परस (सहद) के सदृश सच्छन्द निकसनेवाली गंगाफेसे स्निग्ध [चिकना] ऐसे श्रीकृष्णचन्द्रजीके चरणारविन्दोंको हमलोग अशुभ (पाप) के विनाशार्य प्रणाम करते हैं यहां भगवानके चरण को कमल बनाया देवताओं के . सर्गः:] भाषाटोका समेतम् । . - मुकुट में जो नीलम है उसको भंवरा और गंगाको पुष्परस इस तरह कमल का सय गुण है ॥४॥ इति श्रीजयदेव कविराज कृत गीतगोविन्द भाषा टोकायुते श्रीनागरनारायणो नाम सप्तमः सर्गः ॥७॥ अष्टमः सर्गः। अधुना राधा प्रियं प्रातरागतं दृष्ट्वा साम्यस्य वचन मेवमाह- अथ कथमपि यामिनी निनीय । स्मरशरजर्जरितापि सा प्रभाते ।। . अनुनयवचनं वदन्तमगे। प्रणतमपि प्रियमाह साभ्यसूयम् ॥ १ ॥ भा० टी०-इसके अनन्तर अति कष्टसे रात्रि- को व्यतीत कर कामदेवके पापोंसे जर्जेरितं भी होगई थी तो भी वह राधिका प्रातःकालमें नम्रता युक्त वचनोंको कहने वाले और पावोंमें प्रणाम कर ते हुए श्रीकृष्णजीसे इर्पायुक्त पचन पोली ॥१॥ साभ्यसूयवचनमें गीतेनाह- अथ सप्तदशप्रवन्धो भैरवरागेण यति- ताले गीयते ॥
१०० 1 गीतगोविंदम्। श्रमः रजनिजनितगुरुजागररागकपायितमलस- निमेषम् । वहति नयनमनुरागमिव स्फुटमुदि- तरसाभिनिवेशम् ॥ १॥ हरि हरियाहि माधव यहि केशव मा वद कैतववादम् । तामनुसर सरसीरुहलोचन या तब हरति विषादम् ॥ धृ०॥ सत्रयां प्रबन्ध भैरव राग यति ताल ॥१७॥ भा० टी०-हे केशव ! बड़े दुःखका विषय है . हे माधव ! आप उसीके पास जाइये, आप उसी के पास जाइये । जो आपके दुःखको हरण करती है और इतने धूर्तता के वचन मत कहो यदि यह कहो कि तुम्हारे विना मेरा दुःख नाश करनेवाला दूसरा कोई नहीं है तो यह आपके नेत्र रात्रिक जागरणसे लालवर्णके हो रहे हैं. पलकोंमें भी आलस्य दिखाई देता है और यह जो आपके नेत्र लालवर्णके हो रहे हैं यही स्पष्टतया यह कह रहे हैं कि इन नेत्रोंमें उसीजीकेशृङ्गाररसका अनु- राग भराहुआ है इसीसे लालरंगके होरहे हैं। ननु त्वदन्वेषणार्थ जागरान्मे नेत्रयोलोहित्य- मलन्दुःख शङ्कयेत्यत आह- कजलमलिनविलोचनचुम्बनविरचित नी- सर्गः] भाषाटोका समेतम् । . लिमरूपम् ॥ दशनवसनमरुणं तव कृष्णतनोति तनोरनुरूपम् ।। २ ॥ हरिहरि भा० टी०-तुम्हारे खोजने के लिये जागने से यह आंख लाल हुई यदि कृष्णचन्द्र ऐसा कहें तो इस पर राधा जी कहती हैं । हे केशव ! है श्री कृष्णजी ! फजल युक्त उस स्त्रीके नेत्रोंको चुम्बन करनेसे आपके ये लालवर्ण वाले ओष्ठ नीलरंगके होकर आपके सर्व शरीरके समान [ काला होगये हैं, अतः श्राप वहांही जाइये, जिसके श्रा- पने नेत्र चुम्बन किये थे ॥२॥ किश्व- वपुरनवहति तव स्मरसङ्गरखरनखरक्षतरे खम् ॥ मरकतशकलकलितकलधौतलिपेरिख रतिजयलेखम् ॥ ३ ॥ हरिहरि- भा० टी०-हे केशव ! यह जो श्रापका शरीर कामदेव के युद्ध में तीखे २ नखोंकेक्षतसे रेखा युक्त होगया है मानो ( उसी स्त्रीने ) प्रसन्न होकर मर- कत [ नीला सङ्ग मरमर ) की शिलाके टुकड़ेपर सुवर्णाक्षरोंसे लिखकर रति के विजय पत्र (प्रशं- सापत्र, सर्टिफिकेट) दिया है अतः जिससे'धापने गीतगोविंदम्। [अष्टमः प्रशंसापत्र पाया है उसीके पास जाइये ॥३॥ ननु मार्ग विस्मृत्य गच्छतो मे वपुषि चने कण्ट- कादिस्पर्शादेव दृश्यते न तु नखाङ्कमित्यत श्राह- चरणकमलगलदलक्तकसिक्तमिदं तब हृदयमुदारम् । दर्शयतीव वहिर्मदनद्रुमनवकि सलयपरिवारम् ॥ ४॥ हरि हरि भा० टी०-कदाचित् यह कहो कि तुम्हारे खोजने के लिये रातमें जाते समय यह छिल गया यह नखक्षत नहीं है इस पर राधा कहती हैं । हे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! यह जो आपके हृदय में उसी के चरण रूपी कमलोंकी लगी हुई महावर ऐसी जान पड़ती है मानों कामदेवरूपी वृक्षके नवीन पत्तों का समूह बाहर होगया होय अतः जिसका चरण कमल आपके हृदय में लगा है उसीके पास जाइये, दशनपदंभवदधरगतं मम जनयति सि खेदम् ॥ कथयति कथमधुनापि मया सह तव वपुरेतदभेदम् ॥ ५ ॥ हरिहरि० भा०टी०- माधव ! आपके श्रोष्ठों पर जो अन्य गोपांगनाओंके दांतों के चिन्ह दिखाई देते हैं बेही मेरे हृदय में दुःख उपजाते हैं. इससे इस सर्गः-] भावाटीका समेतम् । १०३ समय आपके और मेरे शरीरोंमें कितना अभेद (एकता) कहे देता है यदि आप ऐसा नहीं करते तो हमारे चिसमें कुछभी दुख नहीं होता आपने अन्य गोपियोंसे अपने श्रोष्टॉपर दंतक्षत करवाकर हमको दुःख दिया है अत: आपने जिन्होसे ये चिन्ह करवाये हैं उन्हींके पास जाइये ॥ ६ ॥ ननु तवोपायना) कमलश्रोटनं कृतवति मयि पद्मकोशदापतता भृङ्गण मयाधरो दष्टो नतु दन्त- क्षतमित्यत पाह- वहिरिख मलिनतरं तवकृष्ण मनोऽपि . . भविष्यति नूनम् ॥ कथमथ वञ्चयसे जनमनु गतमसमशरज्वरदूनम् ॥ हरि हरि० भा० टी०-कदाचित् ऐसा कहो कि तुम्हारों प्रसन्नता केलिये मैं कमल का फूल तोडने गया था वहां पर भँवारे ने काटा यह दन्ता क्षत नहीं है इस पर राधा कहती हैं। है श्रीकृष्णजी ! मैं यह . अनुमान करती हूं कि जैसे श्रापका शरीर बाहर से कृष्णवर्ण है वैसे आपका मन भीकृष्णवर्ण (मलीन) है यदि आप कहिये कि ऐसा नहीं है तो कामदेवकी ज्वालासे संतापित इस जनको कैसे उग रहा है।।६॥ - गीतगोविंदम् । [अटमः भ्रमति भवानवलाकवलाय वनेषु किमत्र विचित्रम् ॥ प्रथयति पूतनिकेव वधूवधनिर्दय वालचरित्रम् ॥ ७॥ भा० टी०-हे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! थाप इस पनमें अवलायोंके ग्रास करनेही के निमित्त घूम रहे हैं इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है क्योंकि पाप का बाल्यावस्था का पूतना नाम राक्षसीके यधका निर्दयी चरित्रही यह कह रहा है ॥ ७ ॥ श्रीजयदेवभणितरतिवञ्चितखण्डितयुवति- विलापम् ॥ शृणुत सुधामधुरं विबुधा विबुधाल यतोऽपि दुगपम् ॥3॥ इति श्रीगीतगोविन्दे सप्तदशः प्रवन्धः ।। १७॥ भा० टी०-हे पण्डित जनों ! श्रीजयदेव कवि निर्मित सम्भोग शृङ्गार रससे वंचित खण्डिता युवतीके विलाप को सुनिये क्योंकि यह श्रीकृष्ण चरित्र स्वर्ग भी दुर्लभ है। इति श्रीजयदेव कवि विरचित गीतगोविन्द भा० टी०सप्तदशः प्रवन्धः ॥ १७ ॥ तवेदं पश्यन्त्याः प्रसरदनुरागं वहिरिव । .
सर्गः-] भाषाटीका समेतम् । प्रियापादालक्तच्छुरितमरुणयोति हृदयम् ।। ममाद्य प्रख्यातप्रणयभरभङ्गेन कितव । त्वदालोकः शोकादपि किमपि लजां जनयति ? भा० टी०-है ठग श्रीकृष्णजी । दुसरी गोप- पनिताके चरणोंमें लगे हुए रक्त वर्णवाले अल- तासे संयुक्त आपका हृदय मानो पाहरहीके अनु- रागसे व्यास है अर्थात् श्रापके हृदय में लगा हुमा यह थलता पा कह रहा है कि इनका अन्तः कर- एका प्रेम है ही नहीं । ऐसे बाहरी अनुरागवाले श्रापके हृदयको देखनेसे हम को, विख्यात और अतिशय प्रेमके विनाशसे (अर्थात् संसारमें आपका थौर मेरा प्रेम अत्यन्त है यह प्रसिद्ध है थापने ऐसे प्रेमका विनाश कर दिया ) यह आपका दर्शन शोकसे अधिक लज्जा को उत्पन्न करता है ॥ १ ॥ हदानी सर्गान्ते कविर्भक्तानाशिपयति- प्रोतर्नीलनिचोलमच्युतमुरः सम्वीतपीतांशुकं । राधायश्चकिर्तविलोक्यहसतिस्वैरंसखीमण्डले ॥ बीडाचञ्चलमञ्चलं नयनयोराधाय राधानने । स्वादुस्मेरमुखोऽयमस्तुजगदानन्दायनन्दात्मजः भा. टी०-मातःकालमें राधिकाका नीलवस्त्र . . १०६ गीतगोविंदम् । [नवमः श्रीकृष्णचन्द्रजी और श्रीकृष्णजीका पीताम्बर श्री राधिका महारानीजी को धारण किए हुए. देखकर जब सखियोंकी मण्डली आश्चर्य युक्त होकर धीरे २ हंसनेलगी तप लज्जा युक्त चञ्चल नेत्रोंसे राधिकाजीके मुखारविन्दको देखने वाले श्रीकृष्णचन्द्रजी संसारको श्रानन्ददायी हो ॥२॥ इति श्रीजयदेव कवि निर्मित गीतगोविन्द भा० टी सहित खण्डितावर्णने विलक्षणलक्ष्मीपतिामा टमासर्गः ॥८॥ नवमः सर्गः। प्रणयकापात् हरिमधिक्षिप्येदानी कृत्पश्चा- त्तापां मखी पाह- अथ तां मन्मथखिन्नां रतिरसभिन्नां विषाद सम्पन्नाम् ॥ अनुचिन्तितहरिचरितां कलहान्त रितामुवाच रहः सखी ॥ १ ॥ भा० टी०-इसके अनन्तर कामदेवसे पीडिता, रति रंगसे रहिता, अति दुःखिता,श्रीकृष्णचन्द्रक चरित्रोंको स्मरणः करनेवाली कल हांतरिता (पतिका तिरस्कारकरके पश्चात्ताप करनेवाली). राधिकासे कोई सखी एकान्त में बोली।
सर्ग भाषाटीका समेतमः। १०७ अथ अष्टादशगवन्धो गुर्जरीरागेण यनितालेन गीयते । हरिरभिसरति वहति मधुपवने ॥ किमपरमधिकसुखं सखि भवने ॥ १ ॥ माधवे मा कुरु मानिनि मानमये ॥ध्रु०॥ अथ पाठरहवां प्रबन्ध गुर्जरी राग यतिताल ॥१८॥ भा०टी०-अये सखि राधिक ! इस वसन्त वायुक' पहनेक समय श्रीकृष्णचन्द्र जी जब तु. म्हारे संकेत भूमिमें स्वयं चले पाए तो अब इसने बढकर गृहमें आनन्द होवेगा अतः हे मान करने. वाली राधिक ! तुम श्रीकृष्णजीक विषयमें कुछ भी मान मत करो ॥१॥ अपि च- तालफलादपि गुरुमतिसरसम् ॥ किं विफलोकुरुषे कुचकलशम् ॥२६॥ माश्वेमा भा० टी०-अयं सखि राधिका ! ताल फल सेभी अधिक भारी और सरस इन कुचरूपी कल- शोको क्या निष्फत करती हो अर्थात् श्रीकृष्ण चन्द्रजीसे आलिंगन कर इन कुचोंका जन्म साफ: .
गीतगोविंदम् ।
[नवमः
ल्प करो (ताल फजोंसे इन अचों में इस कारण
भी अधिकता पाई जाती है कि ताल फलोंके भक्ष-
गले कुछ मादकना होनी है और इनके दर्शन
मात्रही से अत्यन्त मादकता हो जाती है)। २५.
ननु चदा हरिरागतदा त्वया न कथितमित्यत आह-
कति न कथितमिदमनुपदमचिस्म्
मा परिहर हस्मितिशयरुचिरम् ॥ ३ ॥ माधवेमा०
भा० टी०-अयं सखि राधिके । मैं तुमको
कई बार इसी समय कह चुकी हूं कि अति सुंदर
श्रीकृष्णचन्द्रजी का मत त्याग करो यह क्या मैंने.
नहीं कहा था अर्थात् कहाहो था ॥३॥
एवं सुमुखी प्रल्याह-
किमिति विपीदसि रोदिषि विकला !
विहंसति युवतिसमा तव सकला ॥ ४ ॥
भा० टो-अपि राधे ! तुम अब क्यों व्यर्थ
दुःख पाती हो और क्यों दिकल होहो कर रोरही
हो, यह युवती गोपियोंकी सभा तुमको देख २
इसती है कि देखो हमें आए हुए श्रीकृष्णचन्द्र
का निरादर करके व उन्हींके निमित्त रो रही
है.ऐसी दशा में हास्पयुक्त हो है ॥४॥
. स] भाषाटीको समेतम् । 208 क तर्हि किं करोमीत्यत आह- मृदुनलिनीदलशीतलशयन ॥ हरिमवलोक्य सफलय नयने ।।५।। भा०टी०-"तब मैं क्या कर” इस प्रश्न पर पनीर राधिकासे सखी कहती है कि अयि . राधे ! कोमल २ कमलनियोंक दलोंसे रचित श्रत- एव शीतल शय्यापर बैठे हुए श्रीकृष्णचन्द्रका दर्शन करो और अपने नेत्र फिर सफल करो ॥५॥ विचारयन्ती प्रत्याह- जनयसि मनसि किमिति गरुखेदम् ।। शृणु मम वचनमनीहितभेदम् ।। ६ भा० टी०-अयि राधे! तुम अपने मनमें इतना बड़ा दुःख किस कारणसे उत्पन्न करती हो मुझे अपना समझ कर मेरा कहना सुनो वर्थात् तुम्हारे हितहीका वाक्य कहूंगी ॥ ६ ॥ कीशं वचनमित्यत शाह हरिरुपयातु बंदतु बहुमधुरम् ॥ कमिति करोषि हृदयमतिविधुरम् ।। ७ ।। भा० टी०-"ऐसा करो कि श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारे पास आवे मीठे २.५चन कई और तम गीतगोविंदम् । [नवम अपने चित्तको क्यों दुखा रही हो ॥ ७ ॥ श्रीजयदेव भणितमतिललितम् ।। सुखयतु रसिकजनं हरिचरितम् इति श्रीगीतगोविन्द अष्टादशः प्रवन्धः ॥१८॥ भा. टी.-श्रीजयदेव कवि रचित, धनि , सुन्दर; यह कृष्ण चरित्र रसिकजनोंको सुख दे ॥८॥ इति श्रीजयदेव कवि रचित गीतगोविन्द भांपा टीकायों श्रष्टादशः प्रवन्धः ॥ १८ ॥ इदानीं प्रणतमपि प्रियमतिरोपात् त्यजंती राधानि दन्ती सखी माह- स्निग्धे यत्परुणासि यत्प्रणमति स्तब्धासि यद्रागिणिदेवस्थासि यदुन्मुखे विमुखतां यातासि तस्मिन् प्रिये ॥ तद्युक्तं विपरीतकारिणि तव श्रीखण्डचर्चाविषेशीतांशुस्तमनो हिम हुतवहः क्रीडामुदो यातनाः ॥ १ ॥ भा० टी०-हे श्रीकृष्णचन्द्र जी के साथ विप रीत विरुद्ध, ( उलटा) भाचरण करने वाली रा. धिक ! जब श्रीकृष्णचन्द्र जी तम्हारे साथ मीठे. मीठे पाक्य कहें तब तुम उनसे कठोर वाक्य कह सर्गः:]. भागटीका समेतम् । ती हो, जप वे विनय प्रकाश कर तब तुम उनके साथ जड़वत् मूक की सदृश आचरण करती हो अर्थात् श्रीकृष्ण जी के वाक्यों का कुछ भी उत्तर नहीं देती, जब वे तुम पर प्रेम प्रकट करे तब तम उनसे शत्रु तुल्य व्यवहार करती हो और जय चे श्रीकृष्ण चन्द्र जी तुम्हारे सम्मुख होय तर तुम उनसे अपना मुख फेर कर बैठ जाती हो हे सखी! श्रीकृष्णचन्द्र जी से विरुद्धाचरण करने वाली की यही दशा होती है जैसी कि आज कश तुम्हारी दशा होय रही है, देखो तुमने श्रीकृष्णचन्द्र से विपरीत पाचरण किया उसी का यह फल है कि, तुमको चन्दन का लेप लगाना तो दूर रहा तुमसे यदि कोई चन्दन की चर्चा भी करता है तो वह चर्चा तुमको विप के समान, चन्द्रमा सूर्य के समान, पाला अग्नि के समान, और क्रीड़ा के अानन्द दु:ख के समान लगता है ॥ १ ॥ इदानी कविभक्तानाशिषपति- अन्तर्मोहनमौलिघूर्णनचलन्मन्दारविसंसन- स्तब्धाकर्षणदृष्टिहर्पणमहामन्त्रः कुरङ्गीदृशाम् दृप्यदानवदूयमानदिविपद्दरिदुःखापदां अंशः -
१२२
गीतगोविंदम् ।
[दशमः
कसरिपोर्व्यपाहयतु वः श्रेयांसि वंशी खः ॥२॥
भा०टी०-हरिण नयनी स्त्रियोंके अन्तःकरण
को मोहन करने में, धन्य २ कहने के समय ( वाह-
बाहीके वख्त ) वेणीमें गुथेहुए पारि जातके पुष्पों
को वेणीसे वर्षा कराने और जड पदार्थोकोभी
अपनी और खीचने में मुरली बजानेके समय
दखेने तथा सुनने वालों के नेनादिकों को आनन्द
देनमें महा मन्त्र स्वरूप और गर्म करनेवाले दान-
बोले पीडित देवगणोंके दुःसह दुःखका विनाश
करने वाले श्रीकृष्णचन्द्रजी की वंशीकी ध्वनि श्राप
लोगों (भक्तजनों) की कल्याण करिणी होय ॥६॥
इति श्री जयवेध कविकृते गीत गोविन्द भाषा
टीका युत लुग्ध मुकुन्दो नाम नवमा लगः ॥ ६ ॥
दशमः सर्गः।
سمی
इदानीं सोत्कण्ठाकृष्णो राधा दृष्ट्वा अनुनयनाह-
अत्रान्तरे मसृणरोषवशामसीम-
निःश्वासनि सहमुखी सुमुखीमुपेत्य ॥ .
सबीडमीक्षितसखीवदनों दिनान्ते ।
सानन्दगद्गंदपदं हरिरित्यवाच ॥ १॥
सर्गः १०] भापाटीका समेतम् । ११३ भा० टी०-इसीके मध्यहीमें [जिलसमय सखी राधिकाजी को समुझाती थी उसी समय) सन्ध्या के समय कुछ क्रोधवाली, उसी क्रोधसे वारम्वार जिसके मुखले श्वास निकल रहा है और लज्जाके साथ सखीके मुखकी ओर निहार रही है ऐसी सुन्दर मुखवाली राधिकाके पास जाकर और श्रानंद में गद्गद होकर राधिका से श्रीकृष्णचन्द्र बोले॥१॥ उक्तप्रर्थ गीतेमाह- अथ एकोनविंशः प्रवन्धो देशवडीरागंण अष्टतालीताले गीयते । बदसि यदि किंचिदपि दन्तरुचिकौमुदी हरति दरतिमिरमतिघोरम् ॥ स्फुरदवासीघवे तव वदन चन्द्रमा रोचयति लोचनचकोरम् ।। १ ।। प्रिये चारुशीले प्रिये चारशीले, मुश्च मयि मानमनिदानम् ॥ सपदि मदनानलो. दहति मम मानसं, देहि मुखकमलमधुपानम् ॥ धृ०॥ उन्नीसवां प्रवन्ध देशवराडी राग आठ ताल॥१३॥ ,
११४
गीतगोविंदम् ।
[दशमः
.
भा० टी०-हे प्रिये ! हे सुन्दर स्वभाव वाली
राधिके ! जय तूं कुछभी बोलती हैं तय तुम्हारे
दाँतोंकी चाँदनी मेरे भयरूपी अतिघोर अन्धकार
को विनाश करती है और तम्हारा मुखरूपी चन्द्र-
मा मेरे लोचनरूपी चकोरों को तुम्हारे अधरोंकी
सुधाको पान करनेके लिये ललचाता है । प्रिये
अय तो तूं मानको छोड़ क्योंकि कामदेव संवन्धी
श्रग्नि हमको अत्यन्तही जलारही है । उसीके
शान्त्यर्थ अपने मुखरूपी कमलकी सुधाका पान
करावो ॥१॥
मृषा रोष प्रकाशयंतीमाह-
सत्यमेवासि यदि सुदति मयि कोपिनी,
देहि खरनखरशरघातम् ।।
घट्य भुजवन्धनं जनय रदखण्डनं
येन वा भवति सुखजातम् ॥ २॥ प्रिये.
भा० टी०-हे सन्दर दाँतोंवाली प्यारी ! यदि
तुम हमारे ऊपर सत्यही क्रोधित हो तब तुम.
हमको अपने तीखे नखरूपी वाणोसे घात करो,
भुजाओंमें हमको घांधलों और दांतोंसे खण्डन करो
अथवा हमारे दण्डके विषय में जिससे तुमको
सुख उत्पन्न-होय वैसाही हमको दण्ड देवो ॥२॥
सर्गः १०] भापाटीका समेतम् । ११५ ननु याऽतिमिया सा दण्डं विदधातु किं मयात पाह- त्वमसि मम भूषणं त्वमसि मम जीवनं, स्वमसि मम भवजलधिरत्नम् ।। भवतु भवतीह मयि सततमनुरोधिनी, तत्र मम हृदयमतियत्नम् ॥ ३ ॥ प्रिये भा० टी०-प्रिये ! तुम्हीं मेरे भूषण हो तुम्ही मेरा, जीवन हो और तुम्ही मेरा संसाररूपी समुद्र में रखस्वरूप हो अत: हे प्रिये ! तम मेरे ऊपर प्रसन्न हो, क्योंकि तुम्हारे प्रसन्न करने में मेरा चित्त अति यत्न कर रहा है ॥ ३ ॥ नीलनलिनाभमपि तन्वि तव लोचनं, धारयति कोकनदरूपम् ।। कुसुमशरवाणभावेन यदि रञ्जयसि, कृष्णमिदमेतदनुरूपम् ॥ ४ ॥ प्रिये भा० टी०-तुम्हारे नील कमल के समान काले दोनों नेत्र हैं तौभी क्रोध से साल कमल समान हो रहे हैं यह उचित नहीं है। किन्तु इन- को कामदेव के वाण ( पुष्प) समझ कर कृष्ण को (अपने को) रंगती हो लाल करती हो अथ- वा अनुरक्त. करती ही तो यह ठीक है ॥ ४ ॥ के गीतगोविंदम् । [दशमः किंचित्प्रसन्नां वीक्ष्यमाह- स्फुरतु कुचकुम्भयोरुपरि मणिमञ्जरी, रञ्जयतु तब हृदयदेशम् ।। रसतु रसनापि तव जघनघनमण्डले, घोषयतु मन्मथीनदेशम् ॥५॥ प्रिये ॥ भाण्टी है प्रियो तुम्हारे कुचरूपी कलशोंको मणि- का हार सुशोभित करै, और वही हार तुम्हारे हृदय देशको रंजित (अनरत) कर, और जघनों पर करधनी का शब्द होय और वही करधनी कामदे- चकी आज्ञाकी घोपणा दे, अर्थात् तुमने जो मानके दशसे आभूषणों को उतार दिये हैं उनको फिर धारणकर कामक्रीडा करो ॥५॥ स्थलकमलगञ्जनं मम हृदयरञ्जन जनितरतिरङ्गपरभागम् ॥ भण मसृणवाणि करवाणि चरद्वयं, सरसलदलतकसुरागम् ॥ ६ ॥ प्रिये ।। भा० टी०-हे कोमलवाणी राधिके ! स्थल कमलो से भी अधिक शोभायमान, मेरे हृदयको रंजन करनेवाले रति रंगमें परस्पर प्रानन्द दायी सर्गः १०] भाषाटीका समेतम् । १९७ -- . तुम्हारे चरणों में सरम (सुन्दर) महावर लगा दूं ऐसी तुम हमको आज्ञा दो ॥ ६ ॥ स्मरगरलखण्डनं मम शिरसि मण्डनं, देहि पदपल्लवमुदारम् ॥ ज्वलति मयि दारुणो मदनकदनानलो, हरतु तदुपहितविकारम् ॥ ७ प्रिये भा० टी०-है प्रिये ! कामदेवकी पीड़ाके विना- शक तुम्हारे मनोहर और कोमल चरणोंको मेरे शिरपर भूषण स्वरूप स्थापन करो क्योंकि दारुण कामाग्नि हमको दुःख दे रही है उसको शान्त. करें । अर्थात् तम्हार कोमल पत्रोंके समान चरण जव हमारे अंगोंसे स्पर्श करेंगे तप, उनकी शीत- लतासे मेरी कामाग्नि दूर होजायगी॥७॥ इति चटुल चाटुपटुचारु मुवैरिणो, राधिकामधि वचनजातम् ।। जयति जयदेवकविभारतीभूषितं, मानिनीजनितशांतम् ॥ ६ ॥ इति श्रीगीतगोविन्दे एकोनविंशतितमः प्रान्धः भा० टी०-इस प्रकार अतिशय चातुर्य और .
गीतगोविंदम्। प्रेम.रससे भीने, जयदेव कविकी वाणी से सुशो- भित (कथित) और मानवती नायिकाओं के लिये अति सुखको देनेवाले और राधिकाके प्रति श्रीकृष्णजी से कहे हुए वचन सब वचनोंसे बढ़े चढ़ हैं ॥८॥ इति श्रीगीतगोविन्द भाषा टीकायाकोनविंशः प्रवन्धः ॥ १६ ॥ इदानीमात्मानं निरपराधं ज्ञापयन् संभोगार्थ . प्रोत्साहयन्नाह- परिहर कृतातङ्के शंकां त्वया सततं धन- स्तनजघनया कान्ते स्वान्ते परानवकाशिनि । विशति वितनोरन्यो धन्यो न कोऽपिममान्तरं स्तनभरपरीरम्भारम्भे विधेहि विधेयताम् ॥ १ ॥ भा० टी०-है मेरे विषय में शङ्का रखनेवाली प्रिये ! तुम इस शंकाको छोड़दो कि "मैं दूसरी नायिका के णस गया हूं" क्योंकि, जय कठोर कुच और जघनवाली त मेरे चित्तको श्राक्रमण करती है तब मेरे हृदय में दूसरी नायिकाके रह- नेका स्थानही नहीं रहता एक कामदेव को छोड़ . कर मेरे चित्तमें निवास करनेका किसी को अव..
सर्गः१०] भाषार्टीका समेतम् । काश नही मिलता है अतः हे पिये। स्तनोसे मालिंगन करने के तरफ ध्यान दो अर्थात् हमको प्रालिंगन करो ॥ १ ॥ पोवन प्रत्येपि तदा मध्यपराधानुकुलं दंडमाचरेत्याह मुग्धे विधेहि मयि निर्दयदन्तदंश दोल्लिबन्धनिविडस्तनपीडनानि ।। चरिड खमेव मुदमञ्चय पञ्चवाण चण्डालकाण्डदलनादसवः प्रयान्ति ।।२।। भा० टी० है सुन्दरी ! यदि तुम्हारी शंका- दूर नहीं होय तो हमको अति निर्दयतासे दांतोंसे चत विक्षत करदो और दोनों भुजारूपी लताओं में हद आलिंगन करके प्रति कठोर स्तनोंसे हमको पीडा दो, यही हमारे लिये दंड है। हे अतिक्रोध स्वभाववाली राधिके । तुम्ही हमको भानन्द दो क्योंकि इस समय मेरे प्राणोंको चांडाल कामदेव अपने बाणोंसे ले रहा है यदि तुम प्रसन्न न हो- चोगी तो मेरे प्राण कामदेव ले लेगा ॥२॥ ननुकीपो नास्त्यत आह-- शशिमुखि तव भाति भंगुरभ्रू- युवजनमोहकरालकालसी ॥
गीतगोविंदम् । [ दशमः तदुदितभयभञ्जनाय यूनां त्वदधरसीधुसुधैव सिद्धमन्त्रः ।।३।। भा० टी-है चन्द्रवदनी प्रिये ! तुम्हारी कुटिल भौहें युवा पुरुपोंको मोहन (मूर्छा) करने में भयं- कर कालो नागिन हैं। इन भौहोले काटेहुए युधा पुरुषों के लिये, नुम्हारा अधरामृतही सिद्ध मंत्र है. जैसे कोई सिद्ध कृष्ण सर्पिणीस काटेहुए मनुष्यों को सिद्ध मन्त्रधारा विषहीन करता है पैसेही इन भौंहरूपीणी कृष्णप्तर्पिणी से जो मोहित होगए हैं. उनके लिये तुम्हारा अधरामृतही सिद्ध मंत्र है॥३॥ व्यथयति वृथा पौनं तन्वि प्रपञ्चय पञ्चम तरुणि मधुरालापैतापं विनोदय दृष्टिभिः ।। सुमुखि विमुखीभावं तावद्विमुञ्च न वञ्चय - स्वयमतिशयस्निग्धो मुग्धे प्रियोऽहमुपस्थितः||४|| भा० टी०-हे सूक्ष्माङ्गि! राधिके ! तुम्हारा यह व्यर्थ का चुपचाप बैठे रहना हमको प्रति दुःख दे रहा है, है तरुणी ! हे मीठी २ वाणीसे पंचम स्वरसे हमसे संभाषण करों, और अपने दृष्टिसे मेरे हृदय के संताप को दूर करो अर्थात् तुम्हारे प्रेम पूर्वक देखनेहीसे मेरे संताप दर हो जायेंगे . ।
सनः१०] भापाटीका समेतम् । १२१ -- और हे सुन्दर मुखवाली ! तुम हमारते विमुख हो रही हो अब इस विलुखताको छोड़ो, अब हमको मत गो क्योंकि, मै तुम्हारा प्यारा स्वयं पाकर उपस्थित हुना ॥ ४ ॥ अधुना मानाएनोदनाच तदङ्गस्तुति करोति- वन्यूक्युतिवान्धवोऽयमधरः स्निग्धोमवृक च्छवि गण्डश्चण्डि चकास्ति नीलनलिन श्रीमो- चनं लोचनम् ।। नासाभ्येति तिलप्रसूनपदवीं कु. दामदन्ति प्रिये प्रायस्त्वन्मुखसेवया विजयते विश्वं स पुष्पायुधः ॥ ५ ॥ भा. टी०-हे अत्यन्त कोपवाली राधिके यह तुम्हारा अधर पोष्ट दुपहरियाके पुष्पके सदृश, [लाल] चिकने और महुवे पुष्पके समान कान्ति वाले कपोल, नील कमल की शोभाको जीतने वाले ये. नेत्र और तिलक पप्पके समान यह ना- सिका सुशोभित हो रही है । है कुन्द(मौलसिरी) के पुष्पके समान दांतवाली ! प्यारी । प्रायः (बहुधा) तम्हारे सुखको सेवा करनेसे पप्पा युध (कामदेव ) संसारको जीतता है अर्थात् कामदेवक शस्त्र पुष्पही हैं वे पुष्प तुम्हारे मुख में , प्र गीतगोविंदम् । [दशमः निवास करते है अतः मैं यह अनुमान करता हूं कि इन्हीं पूष्पोंके द्वारा काम देवन संसारको जीत लिया है ॥ ५॥ दृशौ तव मदालसे वदनमिन्दुमत्यान्वितं गतिर्जनमनोरमा विधुतरम्भमूरुदयम् ॥ रतिस्तव कलावती रुचिरचित्रलेखे भ्रुवा वहो विवुधयौवतं वहसि तन्धि पृथ्वीगता ॥६॥ भा० टी०-हे सुंदरी ! तुम्हारे नैत्र यौवनके मदसे श्रालस्य युक्त है मुख चन्द्रमाकी पद्धिसे युक्त हैं अर्थात् तुम्हारा मुख देखनेसे तुम्हारे मुखमें चन्द्रमाकी युद्धि हो जाती है कि यह चन्द्रमा ही है, तुम्हारा गमन (चलना) लोगोंके चित्तको श्रानन्द देनेवाला है तुम्हारी दोनों जांघ रंभा [कदली] के वृक्षको अपनी शोभासे तिरस्कार करने वाली हैं, तुम्हारी रति क्रीडा काम कलाओंसे युक्त है और तुम्हारी भौंह सुन्दर चित्र की रेखा के समान हैं, यहां ऊपर कहे हुए विशेपणोंसे मदा- लसा, इन्दुमती, मनोरमा, रंभा और कलावती इन अपसरावोंके नामभी पागए इसीसे. श्रीकृष्णचन्द्र जी कहते हैं कि तुम पृथ्वी पर निवास करती हो --- सर्ग १० भाषाटीका समेतम्। १२३ तो भी बड़े आश्चर्यकी बात है कि देवाङ्गनावों को धारण करती हो अर्थात् एक तुम्हारे में पूर्वोक्त सभी अप्सराओंके गुण हैं ॥ ६॥ कविः सर्गान्ते आशिये प्रयुक्त- प्रीतिं वस्तनुतां हरिः कुवलयापीडेन साधरणे राधापीनपयोधरस्मरणकृत्कुम्भेन सं- भेदवान् ॥ पत्रे विभ्यति मीलति क्षणमपि. क्षिप्रंतदालोकनाद् व्यामोहन जितंजितंजित- मभूदयालोलकोलाहलः भा० टी०-कवि सर्गान्तमे आशिर्वाद देते हैं, संग्राम में कुवलयापीड कंप्तके हस्तोके साथ संग्रा म करने में लगे हुए श्रीकृष्णचन्द्रजीने जब उस हस्तीक मस्तस्ककास्पर्श किया तय राधिकाके पीन कुचोंका स्मरण होगया, ऐसे श्रीकृष्णचन्द्र, और जय हस्ती भयभीत हुआ तथा मर गया तब उल को देख कर उसी समय जीत लिया ३ ऐला देख नेवालों के चित्तको चंचल करनेवाला को लाहल हुआ । अर्थात् चालकोंने यह कोलाहल किया कि पालक श्रीकृष्णचन्द्रने कंसको जीत लिया ऐसे श्री कृष्ण भक्तजनोंकीप्रीति वादाचें ॥६॥ ..
१२४ गीतगोविंदम्। [एकादशः इति श्रीजयदेवकचिकृत गीनगोविन्दे भापा टीका युक्त मानिनीवर्णने चतुरचतुर्भुजो नाम दशमः सर्गः एकादशः सर्गः। अधुना राधां प्रति तत्लखी ब्रूते- सुचिमनुनयेन प्रीणयित्वा मृगाची । गतवति वनोपे केश कुमशय्याम् ।। . रचितरुचिरभूषां दृष्टिमोरे प्रदोपे। स्फुरति निस्वमादा कापि गया जगाद ||१|| भाटी-वसुत फालतक प्रेमपूरित वचनों से मृगनयनी राधिकाको प्रसन्न करके अन्धकार मय सन्या के समय अपना गार करक श्रीकृष्ण चन्द्र जब कुञ्जभवन की शय्या पर चलेगथे तब कोई राखी राधिकाका सुन्दर भंगार कर के प्रसन्नचित्त वाली राधिकासे बोली॥१॥ उतार्थ गीतेनाह- अथ विंशः प्रवन्धोवसन्तयगेण रूपक- ताले गीयते ।। विरचितचाटुवचनरचनं चरणरचितप्रणिपातम् सर्ग ११] भापाटीको समेनम् । १२ -- ---- संप्रतिवंजुलसीमनि केलशयनमनुयातम् ॥१॥ मुग्धे मधुमथनमनुगतमनुसर राधिक ॥ध्रु०॥ बीसवां प्रवन्ध वलन्त राग रूपक ताल ॥२०॥ भा० टी०-हे राधिक! हे भूखे ! नाना प्रका- रके प्रेम युक्त पचनोंको कहनेवाले, तुम्हारे घर- णों में प्रणाम करने वाले, तुम्हारे अनुकूल इस समय मधुरिपु श्रीकृष्ण चन्द्रजी वेतप्त लताओं के पास क्रीडाकी शय्या पर गए हैं अतः तुमको उनके पास अति शीघचलना चाहिये ॥१॥ घनजघनस्तनमारे दरमन्थरचरणविहा- रम् ।। मुखरितमाणिमञ्जीरमुपैहि विधेहिमराल- विकारम् ॥ २ ॥ मुग्धे० भा० टी०-हे कठोर तथा पीन जंघा और कुचस्थलवाली राधिके ! अछ धीरे २ चरणोंको रखते हुए तथा माणियों के नपुर घजाते हुये हंस- की गतिका अनुकरण करो और श्रीकृष्णके समी पचलो ॥२॥ शृणु रमणीयतरं तरुणीजनमोहनमधुरिपु- रावम् ।। कुसुमशरासनशासनवन्दिनि पिकनि २ गीतगोविंदम् । [एकादशः करे भन भावम् ।। ३ ।। मुग्धे भा० टी०-हे सखि राधे ! युवती जनोक मोहन कारी अति श्रीकृष्णचन्द्रकी वंशीका स्वर सुनो, और इस समय कामदेवको श्राज्ञाके लिये वन्दी कोकिलो के भाव को भजो अर्थात् अपनी मिठी वारपी से कृष्ण को प्रसन्न करो ॥६॥ अनिलतरलकिसलयनिकरेणकरेण लता- निकुरम्बम् ।। प्रेरणमिव करभोरु करोति गति प्रति मुञ्च विलम्बम् ।। ४ ।। मुग्धे भा० टी०-हे करभोरु चलने में विलंब न कर क्योंकि लताओ का समूह तुमकों वायुसे चंचल पल्लवस्वरूप हाथों से प्रेरणा कर रहा है कि अब शीघ्रता. करो चलने में विलम्ब न करो अर्थात् वायु से जो लतानोंक पत्ते हिल रहें हैं सो नुमको मानों हाथों के संकेन से कह रहे हैं कि अन विलम्ब करने में ठीक नहीं ॥ ४ ॥ स्फुरित मनङ्गतरङ्गवशादिव सूचितरिहपरि- रम्भम् ॥ पृच्छ मनोहरहारविमलजलधारम, कुचम्भर ।। ५ ।। मुग्धे सगः भाषाटीका समेतम्। १२७ भा० टी०-है श्रीराधे ! यदि आपको मेरे कहने पर विश्वास नहीं होयतो इन कामदेव के तरंगोंसे कांपते हुए और श्रीकृष्णचन्द्रके आलिंगन को पहलेही सूचित करने वाले और मनोहर हार ही जिन्होंके लिये निर्मल जलपारा के समान है ऐसे अपने कुचरूपी कुम्भोंसे पूछलो कि ये चंचल क्यों हो रहे हैं ॥ ५ ॥ अधिगतमखिलसखीभिरिदं तवं वपुर्राप रतिरणसज्जम् ॥ चण्डि रमितरशनारखडिण्डिम मभिशा सरसमलजम् ॥ ३ ॥ भाण्टी-हे अत्यन्त कोपस्वभाववाली राधि के ! तुम्हारी सर्व सखियोंने भी यह जानलिया 'कि तुम्हारा शरीर भी रतिस्वरूप संग्रामके लिये सज्जित हो रहा है अतः हे सखो ! करधनीक शब्दको करती हुई लज्जाको छोड रससे संयुक्त अभिसरण में चलो ॥६॥ स्मरशस्सुभगनखेन सखीमवलम्ब्य करेण सलीलम् ॥ चलयवलयस्वणितैरवबोधय हरि मपिनिजगतिशीलम् ॥ ७॥ मुग्धे० भा० टी०-है सखिराधे ! कामदेवके वाण सदृश नखवाले हाथसे सखीका हाथ पकड़ कर ६.. - - १२८ गीतगोविंदम् । [दशमः विलास पूर्वक चलो और कामदेव के वशीभूत श्री कृष्णचन्द्रको कंकणोंको हिलाकर उन्हें भी अपनी चाल जनावो ॥७॥ श्रीजयदेवमणितमधरीकृतहारमुदासितवा- सम् ॥ हरिविनिहितमनसामधितिष्ठतुकण्ठ तटीयविरामम् ॥ ८॥ इति श्रीगीतगोविन्दे विंशतितमः प्रबन्धः॥२०॥.. मा० टी०-यह श्रीजयदेव कवि कथित, रत्नो के हारको भी तिरस्कार करनेवाला, और युवती जनोंको तिरस्कारकारी यह गीत हरिभक्तोंके कण्ठदेश में सदा निवास कर ॥ ८॥ इति श्रीगीतगोविन्द विंशतिम प्रबन्धः ॥ २० ॥ इदानी लखी कृष्णस्य स्नेहातिशयमाह- सा मां द्रक्ष्यति वक्ष्यति प्रियकथा प्रत्यङ्गमा- लिङ्गनैः प्रीति यास्यतिरंस्यते सखि समागम्येति चिन्ताकुलः ।। सत्वां पश्यति वेपते पुलकपत्या- नन्दति स्विति प्रत्युद्गच्छति मूर्च्छति स्थिर तमः पुओ निकुञ्ज प्रियः ॥ १॥ भा० टी०-हे सखि राधे ! अत्यन्त अन्धकार : .
• सर्गः १०] भाषाटीका समेतम् । १२६ मय निकुञ्ज भवनमें बैठे तुम्हारे प्यारे श्रीकृष्ण चन्द्र चिन्ता ध्यान में व्याकुल होकर यों विचार ते हैं कि वह राधिका हमको देखकर मिठी २ यात कहेंगी फिर सर्वाइसे मालिंगन करके प्रसन्न हो जायगी फिर हमारे साथ क्रीडा करेगी इस प्रकार के ध्यानही में मनोरथ करते हुए श्रीकृष्णचन्द्रजी तमको ध्यानही देखते हैं राधिका अपन जाने क्या २ कहेगी यह सोचकर कांपते है, ध्यानही में अंगोंका स्पर्शकर रोमांचित होजाते हैं, ध्यानहीं में तुम्हारे साथ रनि रङ्ग करक परिश्रमक पसीने टपकने लगजाते हैं ध्यानहो में जब तुम्हारे लिये उठ खड़े होते हैं तब ध्यान टूट जाता है और तुमको अपने संमुख नहीं पाते तव सूर्छा होजाती. है इस पूर्वोक्त कथन से सखीने राधिकाको उसमें अत्यन्त प्रेम होना दिखाया ॥१॥ अक्षणौनिक्षिपदञ्जनं श्रवणयोस्तापिच्छ- गुच्छावलि भिश्यामसरोजदाम कुचयोः कस्तूरिकापत्रकम् ॥ धूर्तानामपिसारसत्वरहृदां विष्वनिकुञ्जे सखि ध्वान्तं नीलनिचोल- चारुसुदृशां प्रत्यङ्गमालिङ्गति ॥ ३॥ ..
गीतगोविंदम्। [दशमः भा० टी०-, सखि राधे ! अभिसरणसिंकेत- स्थल ] में जल्दी करने वाली धूत नायिकाओंके कजल कानोमें तमालके गुच्छे, मस्तकमें श्याम कमलोंकी माला और कुचोंपर कस्तुरीकी रचना विशेष कर निकुञ्जमें, चारोंओरसे, नीली कंचकी के समान अन्धकार उनके सर्व अङ्गोंको प्रालिंगन करता है इससे एकतो अन्धकार हैही और दुसरे उस अन्धकारको गाढ बनानेवाले फजलादिक हैं, क्योंकि ये सभी अन्धकारहीके वर्णके सदृश हैं इस कारण यदि और कोई प्राभूषण धारण न करो तो कोई चिन्ता नहीं है अन्धकारमें येही (कजलादिक) सहायक होते हैंइस पूर्वोक्त वर्णनसे कृष्णाभिसारिका सूचित हुई है ॥ २ ॥ काश्मीरगौरवपुषामभिसारिकाणा मावद्धरेखमभितो मणिमञ्जरीभिः ।। एत्ततमालदलनीलतमं तमित्रं । .. तत्प्रेमहेमनिकषोपलतां तनोति ।। ३ ।। भा० टी०-केसरके समान पीत वर्णवाली आभिसारिकाओंको यह मणियोंकी कान्तिसेचारो- श्रोर बंधाहुआ, तमालके पत्तोंके सहश अतिनीला अन्धकार उन (अभिसारिकाओं) के प्रेमरूपी
सर्गः१०]
भाषाटीका समेतम् ।
सवर्षका निकषोपल ( कसौटी) के समान है
अर्थात् जैसे कसौटी पर सुवर्णकी परीक्षा होती है
वैसेही इस अन्धकारमें अभिसारिका स्त्रियोंकी
परीक्षा होती है
हारावलीतरलकाश्चनकाश्चिदाम-
केयूस्कङ्कणमणिद्युतिदीपितस्य ॥
द्वारे निकुञ्जनिलयस्य हरिं निरीक्ष्य ॥
ब्रीडावतीमथ सखी निजगाद राधाम् ॥ ४ ॥
भा० टी०-इसके अनन्तर हीरे और मोति-:
योंके हार, चञ्चल सुवर्णकी करधनी, वाजवन्द,
कङ्कन इन्होंकी मणियों की कान्तिसे प्रकाशित
कुञ्जभवनके द्वारपर श्रीकृष्णचन्द्रजीको देखकर
लज्जायुक्त राधिकासे सखी चोली ॥४॥
तदेव गीतेनाह-
अथ एकविंशतितमः प्रवन्धो वराडीरांगण
प्राढवताले गीयते ।
• मञ्जतरकुञ्जतलकेलिसदने ॥
विलस रतिरभसहसितवदने ॥
प्रविश राधे माधवसमीपमिह ॥ १॥
गीतगोविंदम् । इसीसवां प्रवन्ध पराडी राग अाढव ताल ॥२१॥ भा० टी० हैं सरतिके उत्साह हास्ययुक्त (प्रसन्न)मुखवाली राधिक अति सुन्दर कुंजभवनके भीतर वाले केलीगृहमें प्रवेश करो और श्रीकृष्ण चन्द्रजींके समीप जाकर उनके साथ यहां पर विलास करो॥१॥ अपि च- . नवभवदशोकदलशयनसारे ॥ कुचकलशतरलहारे ॥ २ ॥ प्रविश भा० टी०-है कुचरूपी कनसों पर चंचल हार वाली राधिक ! नवीन अशोकके पत्तोंसे सजी हुई श्रीकृष्ण की शव्यापी महाधनाले निकुंज भव- नमें जाकर श्रीकृष्णजी के साथ विलास करो ॥२॥ कुसुमचयरचितशुचिवासगेहे ॥ कुसुमसुकुमारदेहे ॥ ३ ॥ प्रविश० भा० टी०-हे पुष्प सदृश कोमलागि राधिके पुष्पों से रचित और शुद्ध (किसी दूसरी नायि- कासे नहीं भोगा हुआ) हस निकुञ्ज भवनमें जावो और श्रीकृष्णक साथ विलास करो ॥ ३॥ मृदुचलमलयपवनसुरभिशीते ॥
सर्गः १०] भापाटोका समेतम् । १३३ रसवलितललितगीते ॥ ४ ॥ प्रविश० भा० टी०-हे सरस और सुन्दर गीतोंको गान करनेवाली राधिक मन्दर बहती हुई और मलया- चलके संसर्गसे शीतल वायुवाले कुंज भवन में जावो और श्रीकृष्णचन्द्रके साथ विलास फरो॥४॥ विततरहुबल्लिनवपल्लव घने ॥ चिरमिलितपीनजघने ॥ ५ ॥ प्रविश० भाण्टी०-दे पहुत मिली हुई और पीन(मोटी) जंघावाली राधिक! विस्तारित नाना प्रकारकी नवीन लतावों के पत्तोंसे नियिड (गझिन) कुञ्ज- भवनमें जावो और श्रीकृष्ण के साथ विलास करो। मधुमिलितमधुपकुलकलितरावे ॥ मदनरभस रसभावे ॥ ५ ॥ प्रविश० भा० टी०-हे शृङ्गार रसके अभिप्रायवाली राधिका ! पुष्पोंके रसको पान करने के लिये इकडे हुए भ्रमरोंके गानेसे गुजारित कुञ्ज भवनमें जायो और श्रीकृष्ण के साथ विलास करो ॥६॥ मधुतरलपिकनिकरनिसदमुखरे ॥ दशनरुचिरुचिरशिखरे ॥ ७॥ प्रविश० . भा० टी०-हे सुन्दर दन्त रूपी शिखरवाली . १३४ :- गीतगोविंदम् । [दशमः राधिक तुम वसन्त ऋतुसे चञ्चल कोकिल समूह के शब्दसे शब्दायमान कुंजभवनमें जाबो और : श्रीकृष्णचन्द्र के साथ विलासं करो ॥ ७ ॥ विहितपद्मावतीसुखसमाजे ॥ कुरु मुरारे मंगलशतानि भवति जय देव कविराजराजा॥ इति श्रीगीतगोविन्दै एकविंशतितमः प्रबन्धः २१ भा० टी० हे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! आप पद्मा- वती (जय देवजीकी स्त्रीका नाम) के मुख समाज को विधान करने वाले, भगवद्गुणगानकारी, श्री जयदेव कवि राजक विषय में अनेक मंगल करिये इति श्रीगीतगोविन्द भाषा टीकायां एक- विंशतितमः प्रबन्धः ॥ २१ ॥.. त्वां चित्तेन चिरं वहन्नयमतिश्रान्तो भृशं- तापितः कन्दर्पण च पातुमिच्छति . सुधा सम्बाधविम्वाधरम् ॥ अस्यांक तदलंकुरु क्षण- मिहभ्रूक्षेपलक्ष्मीलवक्रीतोदासइवोपसेवितपदा- म्भोजे कुतः सम्भ्रमः ॥ १॥ भा० टी०-हे राधे ! श्रीकृष्णचन्द्रजी तुमको बहुत काल तक चित्तमें धारण करनेसे बहुत धक सर्गः१०] भाषाटीका समेतम् । १३५ गये हैं और कामाग्निसे प्रति सन्तापित होगये हैं इसी कारण तम्हारे अमृत रससे भरे हुये और विम्व [कुंदुरु] के फलके सदृश श्रोष्ठको पान करने की इच्छा करते हैं। इसी कारण से इनकी गोदीको क्षणमात्रके लिये सुशोभित करों, अर्थात् पालिङ्गान करो यदि यह कहो कि इनके पास जानेमें हमको भय लगती है सो ठोक नही क्योंकि, यह श्रीकृष्णचन्द्र तो भौहोंकी चलानेकी शोभासे तुम्हारे नवीन खरीदे हुये दानके समान है अप तुम्ही वतावो कि जो चरणकमलसेवी दास है उसके समीप जानेमें घबड़ाहट कैसी ? ॥१॥ सो ससाध्वसानन्दं गोविन्दे लोलोललोचना। सिञ्जाना मञ्जमञ्जीर प्रविवेश निवेशनम् ॥२॥ भा. टी-श्रीकृष्णचन्द्रके विषय में चञ्चल नेत्रवाली वह राधिका लज्जा और आनन्दके साथ अपने पाजेवों को बजाती हुई कुंज भवनमें गई २ अथ द्वाविंशतितमः प्रवन्धो वराडीरागंण रूपकताले गीयते । राधावदनविलोकन विकसितविविधविकारवि भङ्गम् ॥ जलनिधिमिव विधुमण्डलदर्शन- गीतगोविदम् । [ दशमः तरलिततुङ्गतरङ्गम् ॥ १ ॥ हरिनेकरसंचिरम- भिलषितविलासम् ॥ सा ददर्श गुरुहर्षवशंवदवदनमनङ्गविकाशम्॥ध्रु० वाईसवां प्रवन्ध वराडीराग रूपकताल । भा० टी-चन्द्रमण्डलको देखकर चंचल और उंचे तरङ्गवाले समुद्र के समान राधिकाके मुखका दर्शन कर प्रफुल्लित एवं नाना प्रकारक भृङ्गार रसके भावों से युक्त एक राधाहीमे प्रीति रखनेवाले बहुत दिनोंसे राधिका साथ विला. सकी इच्छा करनेवाले और अत्यानन्दसे वशीभूत कामक भावसे पूर्ण मुखबाले श्रीकृष्णचन्द्र राधिकाको देखा ॥१॥ हरिममलतरतारमुरसि दधतं परिलम्बित- दूरस् ॥ सुटतरफेनकदम्बकरम्बितमिवयमुना जलपूरम् ॥ २ ॥ हरिमेक० भा० टी०-अत्यन्त श्वेत फेनोंक समूहसे संयुक्त यमुना जलके प्रवाहक समान अपने हृदय पर मुक्का और हीरोंक जानुपर्यन्त लटकते हुये हारको धारण किय हुये श्रीकृष्णचन्द्रको राधिकाने देखा [ फेनोंको सहश हार यमुना जलके समान :. ', सर्गः १०] भाषाटीका समेतम् । R- श्रीकृष्णचन्द्रका श्याम शरीर)॥२॥ श्यामलमृदुलकलेवरमण्डनमधिगतगौरदु: कलम् ॥ नीलनलिनमिव पीतपरागपटलभर वलयितमूलम् ॥ ३ ॥ हरिमेक० भा० टी०-पीत रङ्गवाले पराग(भीतरकी धूली) के समूहसे प्राच्छादितभूल नील कमलके समान श्याम और कोमल शरीर पर पीताम्बर धारण किये हुये श्रीकृष्णचन्द्रको राधिकाने देखा ॥ ३ ॥ तरलगञ्चलचलनमनोहरखदनजनितरति- रागम् ॥ स्फुटकमलोदरखेलितखञ्जनयुगमिव शरदि तडागम् ॥ ४॥ हरिमेक० भा० टी०-शरद ऋतु में खिले हुए कमलक बीचक्रीडा करनेवाले दो खनन पक्षी युक्त तलाव के सदृश चंचल कटाक्षोंक चाल द्वारा सुन्दर नुस्खें से स्त्रियोंमें अनुराग उत्पन्न करनेवाले श्रीकृष्णको राधिकाने देखा ॥४॥ वर्दनकमलपरिशीलनमीलितमिहिरसमक ण्ड्लशोभम् ॥ स्मितरुचिरुचिरसमुल्लसिताधर- पल्लवकृतरतिलोभम् ॥ ५॥ हरिमेक० गीतगोविंदम् । [दशमः - भा० टी०-मुख कमलके दर्शनार्थ आयें हुए के तुल्य कुण्डलसे शोभितवाले और कोमल हा- स्यको क्रान्तिसे सुन्दर विकाशित अधररूपी पञ्च- वोदारा नायिकापोंको रतिमें लोभ करानेवाले श्री कृष्णचन्द्रको राधिकाने देखा ॥ ५ ॥ शशिकिरणच्छुरितोदरजलघरसुन्दरकुसुम- सुकेशम् ॥ तिमिरोदितविघुमण्डलनिर्मलमल- यजतिलकनिवेशम् ॥ ६ ॥ हरिमेक० भा० टी०. चन्द्रमाकी किरणोंसे रक्षित मेघ मध्य के समान सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित केश: वाले (यहां पुष्पोंकी चन्द्र किरणोंसे और मेघोंकी केशोंसे समानता दिखाई है) और अन्धकारमें उदित चन्द्र विम्बकी समान निर्मल मलयागिर चन्दन तिलक लाये हुऐ श्रीकृष्णचन्द्र को रा. धिकाने देखा ॥६॥ विपुलपुलकभरदन्तुरितं रतिकेलिंकलाभि- रधीरम् ।। मणिगणकिरणसमूहसमुज्ज्वलभूषण सुभगशरीरम् ॥ ७ ॥ हरिमेक० भा० टी०-अधिक रोमाञ्चों से व्याप्त सूरतकी क्रीडावोंसे चंचल और मणियोंक किरणों के प्रति . गैस१०] भापाटीका समेतम् । प्रकाशमान अलङ्कारों से विभूषित शरीर वाले श्रीकृष्णचन्द्र को राधिकाने देखा ॥ ७॥ श्रीजयदेवभणितविभवद्विगुणीकृतभूपण- भारम् ।। प्रणहत हदि मिनिधाय हरि सुचिरं. सुकृतोदयसारम् ॥ ३ ॥ इति श्रीगीतगोविन्दे बाविंशतितमः प्रबन्धः ।। श्रीजयदेव कविक वर्णनकी अपेक्षा दने अल- कारों से युक्त और पुण्योदयके तत्वस्वरूप श्री कृष्णचन्द्रजीको चिरकाल तक हृदय में धारण कर प्रणाम करो। इति श्रीगीतगोविन्द भा० टी० द्वाविंशः सर्गः २२ अतिक्रम्यापाझं श्रवणपथपर्यन्तगमन- प्रयासेनेवायोस्वरलतरतारं पतितयोः ।। इदानीं राधायाः प्रियतमसमालोकसमये । पपात स्वेदाम्बुप्रसर इव हर्षाश्रुनिकरः ।। १ ।। भा० टी० इस समय प्रियतम श्रीकृष्णचन्द्र के दर्शन के समय प्रति चाल नयनोंक अपांगों [नेत्रोंक अन्तिम भाग.] को उलंघन करके कर्ष तक जाने के परिश्रम से राधिका जी के नेत्रों गीतगोविंदम् । [एकादशः से स्वेद [ पसीना ] जल के समान प्रानन्दाथ. बहने लगा ॥१॥ भजन्त्यास्तल्पान्तं कृतकपटकरातिपिहित- स्मिते याते गेहाबहिरवहितालीपरिजने ।। प्रियास्यं पश्यन्त्याः स्मरशर वशाकूतसुभगं सलज्जा लज्जापि व्यगमदिव दूरं मृगदृशः।।२।। भा. टी-फर्ण आदि के खुजलाने के छल से हास्य रोक कर जब लाबधान सखिया कुंज से बाहर चली गयी तब शय्या के जपर प्राप्त, और कामदेव के घाणोंक. वशीभूत सुन्दर श्री कृष्णन्द्र के मुख को देखने वाली, राधिका की लज्जा भी लज्जित होकर दूर चली गई (लज्जा ने यह देखा कि जब इस राधिकाकी सखियांही सव चली गई जब तुम भी यहां से दूर हटो अव तु. म्हारे रहने का यहां कोई प्रयोजन नहीं हैं) ॥२२॥ जयश्रीविन्यस्तैर्महिव इव मन्दारकुसुमैः ।। स्वयं सिन्दूरेण दिपरणसुदा मुद्रित इव ॥ भुजापीडकीडाहतकुवलयापीडकरिणः ।। प्रकीर्णामृग्विंदुर्जयति भुज दण्डो मुरजितः।।।३॥ ..
सर्ग ११] भापाटीको समेतम् । १४१ मा० टी०-याहु दण्ड क्रीडा से कुवलयापीड नामक केस के हाथी को मारने वाले श्रीकृष्ण चन्द्र का सुजदण्ड रुधिर की दिन्दुत्रों से संयुक्त, मानो कुवलयापीड़ हस्ती के संग्राम से सन्तुष्ट श्रीकृष्णचन्द्र ने स्वयं सिंदुर के विन्दुओं से मुशो भित किया हो, और जय लक्ष्मी से मानो परि जात के पुष्पों से पूजित मुरारी [ श्रीकृष्णचन्द्र] . का भुजदण्ड भक्तों की रक्षा के लिये सब से चढ़ चढ़ के हैं ॥ ३॥ ' इति श्रीजयदेव कविराज कृत गीत गोविन्दे भापाटीकायुते अभिसारिका वर्णने सानन्दगोविन्दो नाम एकादश: सर्गः ॥ ११ ॥ द्वादशः सर्गः ॥ गतवति सखीवृन्देऽमन्दत्रपामरनिर्भर- स्मरशर वशाकूतस्फीतस्मितस्नपिताधराम् । • सरसमनसं दृष्ट्वा राधा मुहुर्नवपल्लव- । प्रसवशयने विक्षिप्ताक्षी मुवाच हरिः प्रियाम्॥२१॥ भाटी०-इसक अनन्तर जब सखी कुंज १४२ गीतगोविंदम्। [एकादशः , भवनक वाहर चली गई तव अधिक लज्जाक भारसे कामदेधक बाणोंक घशमें होजाने के अभिप्रायसे बड़े हुये इपत् हास्य स युक्त अधर (श्रोष्ट ) घाली, अनुरागसे संयुक्त और वार वार नवीन पल्लव और पुष्पोंकी शय्याको निहार ने वाली, राधिकाको देखकर अपनी प्यारीसे श्री कृष्णजी चोले ॥१॥ अथ त्रयोविंशतितमः प्रवन्धो विभास गगेण एकतालीताले गीयते । किसलयशयनतले कुरु कामिनी चरणन लिनविनिवेशम् । तव पदल्लवरिपराभवमिद मनुभवतु सुवेशम् ॥१॥ क्षणमधुना नारायण मनुगतमनुसर मां राधिके ॥ ध्रु॥ अथ तेरहवां प्रवन्ध विभास राग एकताला ॥ १३ ॥ भा. टी-हे सुन्दरि ! राधिक ! एक क्षण मात्रके लिये श्राधीन जो नारायण मैं हूं मेरे तुम क्षणमात्रको लिये अनुकुल होजाचो अनुकुल होने का प्रकार हिखाते हैं कि, हे.कामिनी । इस को- मल पत्तोंकी शय्यायर चरणारविन्दोंको रखो और यह नवीन कोमल पत्तोंकी शय्या तुम्हारे सर्गः ११] भाटीका समेतम् । शत्रु है तिरस्कृत होय अर्थात् जब तम इनक मस्तक पर चरण रखोगी तब ये तुम्हारे चरणोंकी कान्ति हरण करनेसे शत्रुके सामान ये शब्याक पल्लव तिरस्कृत हो जायँग ॥१॥ करकमलेनकरोमिचरणमहमागमिता सिधि- दूरम् ॥ क्षणमुपकुरुशयनोपरिमामिव नूपुरम- नुगतिशूरम्।।२।।क्षण मधुनाव भा० टी-हे राधे ! आपको में बहुत दूर ले भाग ई इस्से में आपके चरणों को अपने करा- मलोंसे दवाएं। और साथ चलनेसे शूर नुपरों का मेरे समानही उपकार करो अर्थात् जिस प्रकार श्रापने मेरा उपकार किया है उसी प्रकार इन पायजेवों को भी शय्या पर स्थापन कर इनका भी उपकार करो ॥२॥ वदनसुधानिधिगलितममृतमिश्स्चयवच- नमनुकुलम् ॥ विरहमिवापनयामिपयोधरये- धकमुरसि दुकूलम् ॥३॥ क्षण भा० टी-है सुन्दरि ! पाप मुखरूपी चन्द्रमा से निकले हुए अमृतके समान अनुकूल वचनोंको १० गीतगोविंदम् । [एकादश कहा और बिरह के समान आपके स्तनों के ऊपर के वस्त्र को मैं हटाऊंगा ॥ ३ ॥ प्रियपरिम्भण रभसवलितमिवपुलकित- मतिदुरखापम् ।। मदुरसि कुचकलशंविनिवेशय शोषय मनसिजतापम् ॥४॥ क्षण. भा० टी०-मेरे आलिंगन करने के लिये मेरे संमुख और रोमांचित और दुसरोंका दुर्लभ कुच- रूपी कलशोंको मरी छातीपर रखो और काम- देवकी पीडाको दर करो ॥ ४॥ अधरसुधारसमुपनय भामिनि जीषय मृत- मिव दासम् । त्वयि विनिहितमनसे विरहानल दग्धवपुषमविलासम् ॥५॥ क्षण भा० टी०-हे भामिनि ! तुम हमको अधर सुधाका पान कराकर तुम्हारेमें लगेहुए चित्तवाले, बिलासरहित और मरे हुएके तुल्य हम दासको जीषित करो ॥ ५॥ शशिमुखि मुखस्य मणिरसनागुणमनुगुण कण्ठनिनादम् ॥ मम श्रुतियुगले पिकरख वि. कले शमय चिंरादवसादम् ॥६॥ क्षण सर्गः ११) भापाटीका समेतम् । १४५ - भा० टी०-हे चन्द्रमुखि राधे ! तुम्हारे कण्ठ के गीतों के शब्दके समान अपनी करधनीको वजारो और कोकिलाफ शब्दोंसे विकल मेरे कोंको सुखी करो ( विरहावस्थामें कोयलका सन्द अच्छा नहीं लगता है) ॥६॥ किश्चिदवलोकयन्तीमाह- मामतिविफलरुपा विकलीकृतमवलोकितु मधुनेदम् ।। मोलति लज्जितमिव नयनं तव विरम विसृज रतिखेदम् ॥७॥ क्षण. भा. टी०-हे सुन्दरि ! अत्यन्त निष्फल क्रोध से हमको देखने के लिये इस समय तुम्हारे नेत्र लजित होकर मानों वन्द हो रहे हैं इस कारण तुम विराम करो और रतिके खेदको छोड़ो अर्थात् मोधको छोड़ कर मेरे साथ प्रानन्द करो ॥७॥ श्रीजयदेवकवेरिदमनुपदनिगदितमधुरिपु- मोदम् ।। जनयतु रसिकजनेषु मनोरमरतिरस भावविनोदम् ॥८॥ इति श्रीगीतगोविन्दे त्रयोविंशतितमः प्रवन्धः। भा० टी०-पद पदमें श्रीकृष्णचन्द्रक आनंदको वर्णन करनेवाला श्रीजयदेव कवि रचित यह गीत ...
१४६ गीतगोविंदम् । [एकादशः रसिक जनोंमें रस भाव आनन्दको उत्पन्नकरै।। इति श्रीगीतगोविन्द प्रयोविंशः प्रबन्धः ॥ २३ ॥ इदानीं सुरताम्भं निरूपयति- प्रत्यूहः पुलकांकुरेण निविडाश्लो निर्माण च क्रीडाकृतविलोकितेऽधरसुधापाने कथा केलिभिः। आनन्दाधिगमेन मन्मथकलायुद्धेऽ पि यस्मिन्नभूदुद्भूतः स तयोर्वभूत्र सुरतारम्भः प्रियं भावुकः ॥ १॥ भा० टी०-उन श्रीकृष्ण और राधिकाजीके अत्यन्त अभीष्टप्रकट सुरतका प्रारम्भ हुआ जिस सुरत के समय गाढ आलिंगनमें रोमांच विघ्नकारी मालूम होते थे क्रीड़ाके समय अभिप्राय पूर्वक देखने में निमिष (पलक गिरना) भी चिन्न करता था अधरोंकी सुधारान करने में बात भी विध कारक होता था और नाना प्रकारकी क्रीड़ा और काम कलाओंसें संयुक्त सुरत रूपसंग्राममें आनन्द की प्राति भी विघ्न सी मालम पड़ती थी। तदेव विपरीताख्य उक्तिवैचित्र्येण कथयति- दोभ्यां संयमितः पयोधरभरेणापिडितः पाणिं- जैराविद्धोदशनैः क्षताधरपुटः श्रोणीतटेनाहतः ॥
. संग:११] १४३. भाषाटीका समेतम्। ami हस्तेनानमितः कोऽधरमधस्पन्देन सम्मोहितः कान्तः कामपि तृप्तिमाप तदहो कामस्य वोमा गतिः ॥ २॥ भा० टी०-जव राधिकाने हाथोंसे बांधा कुचोंके भारसे दवाया नखोंसे क्षत किया दोतोंसे अधरोंको काटी कटिसे तानकिया, केशोंको पकड़ कर हाथोंसे नमाया अधरोंकी मधुरताके रससे मंमोहित किया तव श्रीकृष्णाचन्द्र को अकथनीय तृप्ति हुई इसी कारणसे कामदेवको घड़ी टेनी गति : । अर्थात् दूसरा कोई, पदि इस प्रकारके कार्य करे तो क्रोधही होजाता है और स्त्री द्वारा ये सब कार्य होनेसे प्रसन्नताही होती है अतः कामदेवकी गति टेढ़ी कही गई है ॥ २॥ कथयति- मोरके रतिकेलिसंकुलरणारम्भे तया साहसपायं कान्तजयाय किञ्चिदपरि प्रारम्भि यत्सन्भ्रमात्॥ निष्पन्दा जघनस्थली शिथिलिता दोर्वल्लिरुक म्पितम्बक्षोमीलितमक्षि पौरुषरसः स्त्रीणां कुतः सिद्धयति ॥ ३ ॥ . तदेव पुनः गौतगोविंदम् । [दशएका भा० टी०-सुरत क्रीड़ा रूपी संग्राम में जब काम चिन्ह स्पष्ट भासमान होने लगा तय उस. राधाने कान्त श्रीकृष्णजीके जीतने के लिये कुछ समयतक सम्भ्रम पूर्वक साहससे ऊपर (विपरीत) रति प्रारम्भ की तब ऊनकी जंघा-जड़के समान होगई भुजा लता शिथिल पड़गई पक्षस्थल कम्पित होगया और नेत्र बन्द हो गये इसीलिये स्त्रियोंका परुषोंको रस कहां से हो सका है अर्थात् नहीं सिद्ध हो सक्ता ॥ ३ ॥ तस्याः णटलपाणिजांकितमुरो निद्राकषाये दृशौ निर्धताधरशोणिमा विलुलितस्रस्तस्रजो मूर्धजाः ॥ काञ्चीदाम दरश्लथाञ्चलमिति प्रात- निखातेदृशो रेभिःकामशरैस्तदद्भुतमहोपत्युर्मनः कीलितम् ।। ४॥ भा० टी०-गुलावी नखोंसे चिन्हित उस रा. धिकाका हृदय, रात्रिके जागरणसे लाल. नेत्र, चुस्यनादिकसे जिस की लालिमा नष्ट होगई ऐसा अधर, विखरी और ढीली पुष्पोंकी मालावाले केश : हीले पड़े हुये कम्रोपरकी करधनी इन सवोंको प्रातः कालके समय देखनेसे पति, (श्री कृष्ण चन्द्र) सर्गः१०] भाषाटोका समेतम् । १४६ का मन कामदेवके शरोंसे विद्ध हो गया यह बड़े ही आश्चर्यकी बात है जिसको वाण लगे उसके.. मन को वेधना चाहिये यहां । नखक्षत २ जाग. रण, ३ चम्यन, ४ केशोंको खींचना ५ वस्त्र ग्रन्धि विमोचन ये कामदेवके पांचो वाण लगे तो राधि- काको, और श्रीकृष्णचन्द्र का मन विध गया यही श्राश्चर्य है ॥ ४ ॥ वामप्राप्यमयि स्वयम्बरपरां क्षीरोदतीरोदरे शंके सुन्दरि कालकूटमपिवन्मूढों मृडांनीपतिः।। इत्थं पूर्वकथा भिरन्यमनसों विक्षिप्य वामाञ्चलं राधायाःस्तनकोरकोपरि लसन्नेत्रीहरिः पातुवः॥५॥ भा० टो०-हे सुन्दरी ! क्षीर समुद्र तटमें मेरे स्वयंवर के लिए आई हुइ तुमको नहीं पाकर मुग्ध होकर महादेवजी विष पान कर लिये ऐसा मैं अनुमान करता हूं। इस प्रकारकी अपनी पूर्व कथामें दूसरी ओर मन वाली राधीका के कुचों परका वस्त्र हटाकर उसके स्तनों के अगर भागको देखने वाले श्रीकृष्णचन्द्रजीआप लोगोंकी रक्षा करें। व्यालोलः. केशपाशस्तलितमलकैः स्वेद- लोलो. कपोलो स्पष्टा दष्टाधरश्रीः- कुचकल:
. गीतगोविंदम् । [एकादशः शरचा हारिता हास्यष्टिः । काञ्ची काञ्चिद्द ताशा स्तनजघनपदं पाणिनाच्छाद्य सद्यः । पश्यन्ती चात्मरूपं तदपि विलुलितसूग्धेश्यं धिनोति ॥ ६॥ भा० टी०-केश पाश इधर उधर विखरा हुआ है और अलकावली चंचल हो रही है कपोल स्वेदोंके कपो से व्याप्त हो गये हैं इष्ट अधरोंकी शोभा स्पष्ट दिखाई दे रही है, कुचरूपी कलशोंकी दीप्तिसे मोतियोंका हार दूर होगया है, अर्थात् कंचुकी (चोली ) न रहनेसे कुचोंकी शोभासे हारकी शोभा हार गई है, करधनी किसी-दिशाको जा रही है अर्थात् अपने स्थान पर नहीं है और रात्रिकी मुरझाई हुई मालाको धारण किये हुए हैं यद्यपि ऐमी पूर्वोक्त दशा राधिकाकी होरही है तौभी अपने हाथोंसे स्तन और जघनोको आच्छा- दन (ढांप) कर अपने इस प्रकारके बेढंगे रूपको देखती हुई श्रीकृष्णचन्द्रके मन को प्रसन्न करती है। ईषन्मीलितदृष्टि. मुग्धहसितं सीत्कारधा- रावशादव्यक्ताकुलकेलिकाकुविकसहन्तांशुधौता 1- सर्गः११] भापाटीका समेतम्। '१५१ धरम् ।। श्वासोत्कम्पिपयोधरोपरि परिष्वङ्गाकुर- जीडशो हषोत्कर्षविमुक्तनिसहतनों धन्योधयः त्याननम् ॥ ७॥ भा० टी० श्वाससे कुछ चंचल स्तनोंके श्रा. लिङ्गन करने से अधिक हर्ष के कारण शिथिल अतएव कार्यमें अक्षम मृग नैनी (स्त्री) का मुख नेत्र कुछ बन्द हो सुन्दर हास्यसे युक्त और सी- कारोंकी परम्परा के वशसे अप्रकट और व्याकुल- ताले निकले हुए शब्दोंके द्वारा विकशित और दांतों के किरणोंसे धुले हुए अधरहो ऐसा मुखको भाग्यवान ही पान करते हैं ॥ ७॥ अथ सो निर्गताबाधा राधा स्वाधीनभर्तृका ॥ निजगाद रतिक्लान्तं कान्तं मण्डनवाञ्छया।। इति च सहसाप्रीतं सुरतान्ते मानितातिखि- नागी । राधा जगाद सोदरमिदमानन्देन गोविन्दम् ॥ ६ ॥ भा० टी० इसके अनन्तर सुरतक अन्तमें सर्प प्रकार से कामठेवकी पीडा शान्त होगई और अपने गुणों से अपने प्राधीनमें भर्ती श्रीकृष्णजी] हो પર : गीतगोविंदम् । [द्वादश: गये तब वह शृङ्गारकर रतिके खेदसे थके हुए अपने कान्त से अपना शृङ्गार कराने की इच्छा वोली ॥ ८॥ श्रीकृष्णसे सम्मानित और रति के परिश्रम से थकी हुई सुरतके अन्त में गोविन्द से आदर पूर्वक आनन्दके साथ राधिकाजी बोली। यद्राधा निजगाद तदेव गीतेनाह- अथ चतुर्विशतितमः प्रवन्धोरामकरीरागण यतिताले गीयते। कुरु यदुनन्दन चन्दनशिशिरतेरण करे एपयोधरे ॥ मृगमदपत्रकमत्र मनो भवमङ्गलक- लशसहोदर॥ १॥निजगादसा यदुनन्दने क्रीड तिहदयानन्दने ॥ ५० चौबिसवां प्रवन्ध रामकरीराग यतिताल॥२४॥ भा० टी० जिस समय हृदयको आनन्द देने वाले श्रीकृष्णचन्द्रजी क्रीडा कर रहे थे उसी समय अपने प्यारे श्रीकृष्णचन्द्रजीसे राधिकाजी बोली कि हे यदुनन्दन ! चन्द्रन सदृश अति शीतल अपने हाथोंसे कामदेवके मंगल कलशोंके (सदृश)-कुचों पर कस्तुरीक पत्र मिछली, फूल, बेल,ट]लिखीये। अलिकुलगञ्जनसंजनकं रतिनायकसायकमोचने सर्गः १२] '. भाषाटीका समेतम्। १५३ वदधरचुम्बनलम्बितकज्जलमुजुवलयप्रियलोच- ने ॥ २॥ निज भाटी हे प्यारे श्रीकृष्ण चन्द्रजी ! कामदेव के बाणोंको छोड़नेवाले मेरे नपनोंमें भ्रमरों समूह के सदृश और आपके अधरोंक चुम्बनसे नष्ट हुए. मेरे कजलको उज्वल (साफ,दुवारा)करो॥२॥ नयनकुरङ्गतरङ्गविलासनिरोधकरे श्रुति मण्डले ॥ मनसिजपाशविलासधरे शुभवेष लिवेशय कण्डले ॥ ३ ॥ निज. भा०टी०-हे' सन्दर वेषको धारण करनेवाले प्यारे ! नयनरूपी हरिणों के विलासको रोकनेवाले मेरे कानों में कामदेवके पाशके सदृश कुण्डल' पहनाइये ॥३॥ भ्रमरचयं रचयन्तमुपरि रुचिरं सुचिरं मम सन्मुखे।। जितकमलोचिमले परिकर्मय नर्नजन- कमलकं मुखे ॥ ४॥ निज.. भा० टी०-हे प्यारे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! कम- खौंको जीतनेवाले निर्मम मेरे सुन्दर मुखपर शोभावाली और जिसके ऊपर भ्रमरोंका समूह गिरताहै (अर्थात् जिनको देखकर भ्रमरोंका समूह - १५४ गीतगोविंदम्। [द्वादशः अपनी जाति की वद्धिसे इनके ऊपर गिरतेही अर्थात् चमर सदृश) और कामको उत्पन करने- वाली, अलकावलियोंको सुधारो अर्थात् भ्रमरोंके सदृश मेरे काले केशोंको गंथो ॥ ४ ॥ मृगमदरसवलितं ललितं कुरु तिलकमलि- करजनीकरे ॥ विहितकलंककलं कमलानन विश्रमितश्रमसीकरे ॥ ५ ॥ निज. भा० टी०-हे कमलमुख श्रीकृष्णचन्द्रजी! रति के परिश्रम स्वेद बिन्दुवोंसे युक्त अर्द्धचन्द्र सदृश लला टमें कलङ्क रेखाके समान कस्तुरी रससे तिलक करिये ॥५॥ ममरुचिरे चिकुरे कुरु मानद मनसिज ध्वजचामरे ॥ रतिगलिते ललिते कुसुमानि शिखण्डिशिखण्डकडामरे ॥६॥निज.. भा० टीहै मानको देनेवाले यदुनन्दन ! कामदेवकी पताका चामर [चंबर ] सहस, रति में ढीले, हुए सुन्दर और मयूर पिच्छके समूहके समान मेरे केश पाशमें पुष्प लगाइये ॥ ६ ॥ . सरसघने जघने मम शम्बरदारणवारण कन्दरे | मणिरशनावसनाभरणानि शुभाशय सर्ग१२] भापाटीका समेतम् ।. वासय सुन्दरे ॥ ७ ॥ निज० भा० टी० हे उदार चित्त श्रीकृष्णचन्द्रजी श्राप मेरे कामदेवरूपी मत्त हस्तीके निवासस्थान, और शृङ्गार रससे निबिड (गछिन ) मेरे सुन्दर संघनों पर मणियों की करधनी, वन और श्राभू- पोंको पहनाइये ॥७॥ श्रीजयदेववचसि शुभदे हृदयं सदयं कुरु मण्डने ॥ हरिचरणस्मरणामृतनिर्मितक लिकल पज्वरवण्डने ॥ ८॥ निज. इति श्रीगीतगोविन्दे चतुर्विंशतितमः प्रबन्धः भा० टी०-श्रीकृष्ण के स्मरण [ध्यान रूपी अमृतसे कलियुगमें किएहुए पापोंगा विनाशक भूषण स्वरूप, कल्याण दानी श्रीजयदेव कविराज के गीतमें अपने हृदयको [तत्पर ] करिये ॥८॥ इति श्रीगीतगोविन्द भा० टी०चतुर्विन्श- तितमः प्रबन्धः ॥ २४ ॥ स्वय कुचयोः पत्रं चित्रं कुरुष कपोज- योंर्घटय जघने काञ्चीमञ्च सजा करीभरम् ।। कलय वलयश्रेणी पाणी पदे कुरु नूपुराविति नगदितः प्रीतः पीताम्बरोऽपितथाकरोत् ॥ १॥.
१५६
गीतगोविंदम्।
[ द्वादशः
भा० टी०-हे प्यारे श्रीकृष्णचन्द्रजी ! आप
अपने हाथों से मेरे कुचोंपर पत्र (सुन्दर पत्रोंका
प्रकार ) की रचना करिये कपोलोपर (मित्र फूल
पत्ते इत्यादि ) लिखिये जघनस्थलोंपर कांची
[करधनी ] पहनाइये और अपने हाथोंसे मेरे
केशपासको पुष्पोंसे गूथिये और हाथों मे कङ्गन
और चरणोंसे नपुर [ पायजेष] पहनाइये यह
राधिकाने श्रीकृष्णचन्जीसे कहा तव पीताम्बर
धारी श्रीकृष्णचन्द्रने प्रसन्न होकर वैसाही किया
अर्थात् राधिकाका शृङ्गार किया ॥ १ ॥
पर्यीकृतनागनायकाणा श्रेणीमणीनाङ्गणे ।
संक्रान्तप्रतिविम्बसंकलनया विभ्रदपुर्विक्रियाम्।।
पादाम्भोरुहधारिवारिधिसुतामणांदिदृक्षुःशतैः।।
कायन्यूहमिवाचरनपचिताकूतोहरिः पातुवः ||२||
-भाटी०-पलङ्गके स्थानापन्न शेषजीके मस्तक
की मसियों में पड़ेहुए प्रतिविम्व ( परछाई) के
सम्बन्धसे अनेक रूपोंको धारण करते हुये थानों
चरणोंकी सेवा करने वाली लक्ष्मीजीको सैकड़ों
नेत्रोंसे देखने के लिये अनेक शरीरों को धारण
करने वाले कामदेवक भावसे युक्त श्री कृष्णचन्द्र
जी आप लोगों की रक्षा कर ॥२॥
.
१५७
सर्ग १२] भाषाटीको समेतम् ।
यद्गान्धर्वकलासु कौशलमनुध्यानश्च य-
द्वैष्णवम् यसृङ्गारविवेकतत्त्वरचनाकाव्येषु ली
लायितम् ॥ तत्सर्वं जयदेवपण्डितकवे कृष्ण-
कतानात्मनः सानन्दाः परिशोधयन्तु सुधियः
श्रीगातगोविन्दतः ॥ ३ ॥
भा. टी-जो गान्धर्व कला [गाम ] में जो
चतुराई है, श्रीकृष्णचन्द्रका जो ध्यान हैं और जो
काव्योमें शृङ्गार रसका अनेक भेदकी रचना है ये
सर्व श्रीकृष्णचन्द्रमें एकाग्र चित्तवाले पण्डित श्रीज
यदेवकषिक [बनाये हुये) गीतगोविन्दसे पण्डित
'. लोग शोधन करलें अर्थात् जिन कवियोंको गान-
विद्याका और श्रृंगाररसके कान्यकी रचना करना
होय वे इन सबके विषयमें इस ग्रन्थसे शिक्षा
ग्रहण करें ॥३॥
श्रीभोजदेवप्रभवस्य राधादेवोमुतश्रीजय-
देवकस्य ॥ पराशरादिप्रियवर्गकएठे श्रीगीत
गोविन्दकवित्वमस्तु ॥ ४ ॥
भाटी-श्रीराधा देवकीक गर्भसे श्रीभोजबके
पुत्रश्रीजयदेव कविकी यह गीतगोविन्दकी कविता
पराशरादिक श्रेठ कवियोक कण्ठ में अर्पित होय ॥४॥
१५० गीतगोविंदम् । [द्वादशः साध्वी माध्वीकचिन्ता न भवति भवतः शर्कर कर्कशासि द्राक्षेद्रक्ष्यन्ति केत्वाममृत मृतममि क्षीर नीरं रसस्ते ॥ माकन्द कन्द कान्ताधर धाणितलं गच्छ यच्छन्ति भावमे । यावच्छजारसारस्वतमिह जयदेवस्य विष्वग्वचासि भाटी०-श्रीजयदेव कवि अपने कान्यकी प्रशसामें कहते हैं कि इस संसारमे जस्तक श्री कवि शृङ्गाररसके भावका काव्य विराजमानहै तबतक हैमाध्वीक; (महुत्रा) हसके सामने तरी चिन्ता ठीक नहीं होती, है शहर ! तूं कठोर है, दाक्षे ! (दाख) तमको कौन देखेगा, हे अमृत ! तू इसके सामने मरा हुआ है, हे क्षीर ! [दुध ] तेरा रस जलक दृश हैं हे यान न रो, स्त्रीयोंक अधर ! तूं भी तब तक पांतालमें चला जायक्यों कि इसका नाम ही अधरका अर्थ नीच अर्थात् जयदेव कविक इस सर्वोत्तम काव्य के सामने कोई इस सुन्दर न लगेगा सब फीक पड़ जायेंगे। इति श्रीकविगजश्रीजयदेवकविकृतगीतगोविन्दे भापा टोकायुते :: प्रीतपीताम्बगेनाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥ इति-श्रीगीतगोविन्दम समाप्तम् । गोकुल प्रेस नं०४६ बुलानाला बत्तारस सिनी।
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शीघ्रबोध
सारस्वत
अमरकोश
तर्क संग्रह भा. टी.
किरातार्जुनीय
चमत्कार चिन्तामणि
वृहज्ज्योतिषसार भा. टी.
मुहूर्त चिन्तामणि भा. टी.
लघु संग्रह भा. टी,
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पुस्तक मिलने का पता-
मैनेजर-भार्गव
पुस्तकालय,
गायघाट, बनारस सिटी।
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