Government College, Kota

Vedbharti

Gupta, Dr. Sudhir Kumar · 2012/04

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राजकीय मामिालर
वेदभारती
[स्नातक कक्षोपयोगिसकलनम् ]
कोटा,
विमान
सम्पादक
टा० सधीरकुमारगुप्त , एम० ए०, पीएच० डी०, स्वरणपदः ।
जयपुर राजस्थानविश्वविद्यालम्य
सस्कृतविमागे प्रयापक (रीडर)
भारती
मन्दिरम्
अनुमन्धानशाला
आर-२, विश्वविद्यालयपुरी, जयपुरम-४

प्रकाशक
श्री प्रमोदकुमारगुप्त
• मुद्रण प्रकाशनाध्यक्ष
भारतीमन्दिरम् अनुसधानशाला,
पार-२, विश्वविद्यालयपुरी
जयपुरम् - ४।
सर्वेऽधिकारा सम्पादकेन स्वायत्तीकृता
मूल्यम-४-०० (साधारणो वन्ध )
४-८० (पक्वो बन्ध)
©प्रथम सस्करणम्, १९६८ ई०
मुद्रको
वैशाली प्रेस-पृष्ठानि १ अ-५२ अ ।
अजन्ता निरादर्स,
जयपुरम् -३ - शेप सर्वम्

राजनीय मतदातर पोटा, अस्वस्त वेदभारती विषय-सूची [ कोष्ठकों मे सर्वत्र सदर्भमख्या दी गई है । ] विपय १ अपोद्घात ७मा-११ या १ चेदमन्त्रा–वदपरिचय (१-२) मन, नयी और अथर्ववेद (३) यजुर्वेद और यज्ञ (४) ऋग्वेद (५)। देमा-४ (१) गायत्रीमन्त्र-भूमिका '७-८) मन (8) अथ (१०), टिप्पणिया (११)। (२) भद्रकामना-भूमिका (१२-१३) मन (१४) अाथ (१३) टिप्पणिया (१६)। ७-६ (३) दीर्घायुष्काम - भूमिका (१७-१८) मत्र (१६) अथ (२०) टिप्पणिया (२१)। चरैवेति-भूमिका (१-१४) ब्राह्मण (१) बाहाणों का काल (२) ब्राह्मणों को सस्पा और नाम (३) ब्राह्मणो ये विषय (1) श्राह्मणो वे प्राख्यान (५) ऐतरेय ब्राह्मण (६), गुन शेप पाख्यान (७) शुन- शेष प्राख्यान की कथा (6-१८), चरैवेति (११-१४) शुन गैप की कथा का उपरहार (१५-१८) १२---१८ चरैवेति-(मूल, अथ योर टिप्पणिया) [१-२१)। १८-२९ ३०- ४०- ४८- है आ ] [ वेदभा. ३ शतपथब्राह्मणे मत्स्यावतारेतिहास - शतपथब्राह्मएए (१) शतपथब्राह्मण के विषय (२), पाख्यान (३), मछनी के अवतार की क्या (४-~६) सानुनादो मत्स्यावतारेतिहास (१-६) ४ [शतपथब्राह्मणे] मनो प्रजाति --मत्स्यावतारेति हासस्योत्तराद्ध ५ गुन शेपास्याने वरुणस्य तितिक्षा-कथा का प्रयोजन और भापा (१-२) [मूल अनुवाद और टिप्पणिया] शुन गेप के आख्यान मे वरुण की महनगीलता ६ रैत्तिरीयोपनिषदि शिक्षावल्ली-उपनिषद (१-२) परिचय (३) मार (४-५) महन्व १६) मूल अथ और टिप्पणिया (७) (1) तप (अनुवाक ६) ५६-१ (u) श्राचार्यानुशासनम (अनुवाक ११) . ईशोपनिषद्-उपनिपद (१-२) ईशोपनिषद- परिचय (३) विस्तार (४) विषय (५) सार (६) दशन (७) काल (८) शातिपाठ का भाव (8) मृल अर्थ और टिप्पणिया-ईशोपनिपद का शान्ति पाठ (१०) ईशोपनिपत (११) उप सहार (१२) परिशिष्टम-भावप्रकाशिका मुधीरिणी सस्कृतटीका--- [ दाई ओर पृष्ठसरया दी गई है ] १ अ-४३ ७४-.. ७७-६६

[ ५ आ
१अ-३
२
२-३
४-६
विषय-सूची ]
१ वेदमन्त्रा
१ गायत्रीमान
भद्रकामना
३ दीघायुकाम
२ चम्वनि
३ मत्स्यावतारेतिहास
४ मनो प्रजाति
५ वरणम्य तितिक्षा
६ तत्तिरीयोपनिपदि शिक्षावल्ली-
ग्रनप
प्र-प्राचार्यानुशासनम्
७ ईशोपनिपद
१०-१३ अ
१४ -१८
१६-२०
२३ प्र-२४
२५ अ-२८
२६-४३ म
४४म
विज्ञप्ति
शानुक्रमणिका

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सनीय गाविस
ॐ या मेधा देवगणाः पितररचोपासते
तया मामय मेधयाग्ने मेधापिन चूस ॥ ॐ
वेदभारती
उपोद्घात
। बद भारत को विशेष रूप से अमृन्य निधि है। भारतीय
जीवन के बहमस्यक जनो के जीवन पर मन्त्रो और उन के चारो
और निर्मित माहित्य की अमिट छाप है। मलो के भावो को
समझाने रोचक बनाने और जीवन का प्राण्या अग बनाने के
लिए ही प्राचीन ऋपियो और प्राचार्यों ने ब्राह्मण ग्रथो सूत्रा
और उपनिपदा की रचना की। ब्राह्मणो म यज्ञ और यज्ञो के दर्शन
को रावा बनाने के लिए कतिपय मारयानो की भी मृष्टि की गई
है । उपनिपदा की शैली तो बडो रोचक है, उन म प्रास्यात अश
भन ही कम हो।
२ प्रत प्राचीन काल से वेद का अध्ययन और अध्यापन
भारत के कोने-काने म स्थान पाता रहा है। आज एम ए म तो
वेद के एक वा अधिक पन हाने हो हैं, स्नातकाय कक्षामो म
भी इम को स्थान मिला है । तथापि साधारण स्नातवीय क्शामा
के लिए उपयुक्त ऐमे सकलन का सर्वथा अभाव था जो हिन्दी के
माध्यम म उच्च स्तरीय अध्ययन म सहायक सामग्री मे युक्त
वैदिक गहिय के विविध रूपो का आस्वादन करा सके और
विद्याथिया म वेदाध्ययन के लिए कुछ रचि उत्पन कर सके । इसी
अभाव को पति के निमित्त इस सक्लन की रचना की गई है।
३ इम सक्लन को अनुभूति दिल्ली विश्वविद्यालय के
बी ए पान दे १६६६ के प्रथम पत्र वे पाठ्यक्रम से ली गई है। यहा

5 या ] [ बेदभारती पर उस पाठ्यक्रम साथ-साथ कुछ अन्य पाठ भी दिए गए है जो उस पाठ्यक्रम म निर्धारित प्रशो के पूर्व भाग या उत्तरार्द्ध के स्प म है । इन का विवरण नीचे दिया जा रहा है। स्त्रन थो से भी कुछ अश इस म मलित करने अभीष्ट थे। इस के लिए पारस्करीयोपनयनसूत्र सब से अधिक उपयुक्त मालूम पड़े। उन का लेखक का अलग से सम्करण उपलब्ध है। अत उ हे यहा नही रक्पा गया है। ४ इम सकलन म तीन ही वेदमत्र-गायनी मात्र विश्वानि देव और तच्चक्षर रखे गए है । इन मे शुभ बुद्धि और कर्मों तथा भद्र की कामना के साथ उत्साह-पूर्वक मौ वर्ष का जीवन बिताने की कामना व्यक्त की गई है। इन तीनो मन्नो म लौकिक जीवन में सफलता की कु जी और परलोक का परिष्कार निहित है । इन को भापा परम सरल है। ५ ब्राह्मणो मे दो पारयानो के अश लिए गए है-ऐतरेय ब्राह्मण से शुन शेप के आरयान के ३३ वे अध्याय के दूसरे और तीसरे खण्ड लिए गए है। इन दोनो को अलग-अलग पाठा मे रक्खा गया है। दिल्ली के पाठ्यक्रम की दृष्टि में पहले तीसरे खण्ड को और उस के बाद दूसरे खण्ड को रक्खा गया है । इन के बीच मे मनु और मत्स्य के जलप्लावन की विश्वप्रसिद्ध क्था को दो भागो म बाट कर प्रस्तुत किया गया है। ६ तैत्तिरीयोपनिषद् से तप और आचार्य के अनुशासन से सम्बद्ध प्रकरण लिए गए हैं । काण्व यजुर्वेद सहिता का ईशोपनिषद् केप मे प्रस्यात अन्तिम अध्याय अविकल रक्खा गया है। यह उपनिषद् मन्त्रो शाखामी और उपनिपदो का प्रतिनिबित्व करता है। यद्यपि इस के अनेको सस्करण उपलब्ध है, तथापि अन्य प्रशो में साथ उपर्युक्त विशेषता के कारण इसे यहा सलिन क्यिा गया है।

उपोद्घात ] [६आ ७ समस्त सक्लन को पाठो म बाट कर उन को उपयुक्त शीर्पक दे दिए गए हैं। ये शीर्षक सरल, सक्षिप्त और पाठ के विषय के परिचायक हैं। प्रत्येव पाठ के पहले उपयुक्त सक्षिप्त भूमिका दी गई है। मूल पाठ को मोटे अक्षरो म, शान्दिक हिदी अनुवाद को उस से कम मोटे छापे म और टिप्पणियो नथा भाव को बारीक छापे म कराया गया है । भूमिका का छापा शेप भागो मे भिन है। मित भित कातो मनिखे जाने के कारण सटिप्पण हिदी अनुवाद और टोका म दो-चार स्थलो पर कुछ विचारभेद गा प्रतीत होगा। वह आपातिक है मौनिक नहीं। सस्टनटीका लिखते समय हिन्दी भाग प्रेसम था। अत उन म समन्वय सम्भव न हो सका । ईशोपनिषद् के मन ३ म हिन्दी अनुवाद वाले पाठ को ही मून और प्रामाणिक मानना उचित मालूम पडता है क्या fr यजुर्वेद म भी यही पाठ हे टोका वाला नहीं। ८ यद्यपि यहा सकलित सब अशो पर सायण और शकराचार्य आदि ने भाष्य मिलते है, तथापि बी ए के साभारण विद्यार्थी के लिए वे अनेक बार कठिन हैं, अनेक बार अपर्याप्त और अस्पष्ट है। अत एक परिशिष्ट म समस्त ग्रन्थ के पाठा की सरन पदावली म लगभग प्रत्यक पद की व्यारया करने वानी, भाव को स्पष्ट करने वाली, सरलता से बोधगम्य नूतन भावप्रकाशिका सुधीरिणी सस्कृतटीका भी दी गई है। इस टीका म मूल पदो को बहुश बारीक अक्षरो म रम कर टोका के व्या यान से अलग दिखाया गया है । कुछ पाठो म यह सम्भव नही हो भवा । है । इस टीका म मामा यत व्याकरण और दशन के जटिल और अनावश्यक विवेचनो का परिहार किया गया है सामान्यत इम म सचियो का भी परिहार किया गया है। फिर भी कुछ हो ही गई हैं। परन्तु वे सुगम ही हैं। । ।

१० पा] [ वेदभारत ६ ग्रन्थ मे टिप्पणियो म व्याख्यात पदो को अनुक्रमणिक भो दी गई है। विद्याथियो को अनुक्रमणिकाओ का प्रयोग समभ में आजाने पर ये उन के बटे उपयोग को रहती है । १० सक्षेप मे पुस्तक को पर्याप्त प्रामाणिक, उपयोगी औ पाठ्यक्रम में निर्धारण के स्तर का बनाने का प्रयास किया गय है। यदि यह सकलन विद्यार्थियो को वेदाध्ययन में सहायक औ रचि उत्पन्न करने वाला हो सका और विश्वविद्यालयो क प्रधि कारियो को अपने पाठ्यक्रम में रखने के लिए उपयुक्त मालम पट तो लेगक या परिश्रम सफल होगा और परमेश को पर। अनुकम्पा होगी। ११ इस ग्रन्य की रचना भ मनु को कया और तैत्तिरीयोप निषद् के अ शो के अनुवाद टिप्पणिण और भूमिकाए लेखक अपने पुराने ग्रन्थ 'गद्यपारिजातविवरण' से परिवर्धन पार सशो धन के साथ अपनाए गए है । उम कृति म मून पाठ नहीं छपा था इन अशा और शेष भाग की रचना में अनेको ग्रथो से सहायत ली गई है। इन के लेखको और प्रकाशको का परम धन्यवाद है। १२ १५-१-६८ को श्रीर र दिवाकर के भाषराम सभा पतिपद में भाषण देते हुए डा महाजनी उपकुलपति उदय पुर विश्वविद्यालय ने प्राचार्यानुशासन का उल्लेख करत हु। एक बहुत सुन्दर विचार दिया कि इस उपदेश का मूल लक्ष्य भाद नागरिका म समाजसेवा के क्रियात्मक आदश को सक्रान्त करन है। प्राचार्य का अपने आदर्श और उदाहरण मे उपदेश देना ड महाजनी के विचार को पुष्ट करता है । आप के मत म इम उपदे' मे कुशलान प्रमदितव्यम् के कुगल' का भाव समाजमेवा है अात्मा नति कर समाज और राष्ट्र की सेवा करना सस्कृति का प्रमुग्व तत्त्व रहा है। यज्ञ और दान-दोनो ५ यही भावना है।

टास को उपोद्घात ] [ ा ११ १३ ग्रन्य के प्रान्पो के शोधन मे दृष्टिदोप में अनेको भूल रह जानो स्वाभाविक हैं । मानव स्वभाववश और भी अन्य अशुद्धिया रही हो सकती है। विज्ञ पाठको के उत्तरोतर परिष्कार के लिए मुभायो वे लिए प्राभारी रहूँगा। १४ मुद्रण में प्रयास करने पर भी प्रेस गु नही जुटा मवा। अत एक स्थल पर ८१ के द्वारा इगित कर शेप सर्वन', मे इमे व्यक्त किया गया है । १५ वैदिक व्याकरण लौकिक और बी ए में प्व पदो गई व्याकरण में कई धाराओ म भिन्न है। वैदिव मदर्भो को सम भन के लिए उम का कुछ परिचय आवश्यक है । इस न य म यह परिचय पदा पर टिप्पणी देते हुए ही दिया गया है, निम में साधारण मे-साधारण पाठक भी उसे समझ सके और उसे बोझा न समझे। इस मे भी व्यावरण की जटिन प्रक्यिा नादि सपरि- र क्यिा गया है। जो पाठक कुछ विस्तृत परतु सक्षिप्त म्प म दिक व्याकरण का परिचय करना चाह वे लेखक के वेदनावण्यम् ।। ऋक्यूक्तानि मे एतद्विपयक परिशिष्ट की सहायता ले बते है। १६ भारती मदिर के अधिपतियो ने इस के मुद्रण और प्रकाशन की उचित व्यवस्था की है और अपनी अभिरुचि दिखाई है। उन को मेरी शुभ आशिप ह । परमपिता परमात्मा की महती अनुकम्पा से जीवन के तृतीय चरण की एक यह देन भी पूर्ण हुई, प्रत उन का कोटिश ध यवाद है। आर-7 विश्वविद्यालयपुरी, जयपुर-४ २४-१-६८ - म 4 गुप्त

१२ अ]
[ वेदभारती
पाठक की टिप्पणियां

१ राजकीय भरा पालन काय, वेदारती पुस्तकालय वेदमन्त्रा. वेदपरिचय , भारतीय प्रायों की मूल धर्मपुस्तके वेद कहलानो है। वेद का अर्थ ज्ञान' है । यह पद विद् धातु से बनता है । संस्कृत म विद् ातु के अर्थ 'जान्ना विचार करना प्राप्त करता और विद्यमान होना' है । वेद इन सव अर्थों को व्यक्त करता है। अत हिदुओ का विचार है कि वेद म सब सत्य विद्यानो का मूल पाया जाता है । इ हे मष्टि के आदि म परमेश्वर ने मानवो के कल्याण और मार्गनिर्देशन के लिए चार प्रादि ऋषियो द्वारा प्रक्ट किया। ये अपि अग्नि, वायु आदित्य और अगिरा थे जिन के माध्यम से क्रमश ऋग्वेद, गजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद व्यक्त हुए। इस प्रकार मूल वेद चार हैं। इन की कुछ शाखाए भी । वेदो को महिता भी कहते हैं । वेदो की शाखाए शाखासहिता नाम से प्रमिद्ध है । ऋग्वेद की शाक्ल महिला, यजुर्वेद की माध्यदिन वाजमनेयो सहिता, सामवेद की कोथुम सहिता और अथववेद को शौनक सहिता मल वेद मानी जाती है। शाखासहिताश्री म यजुर्वेद वो तैत्तिरीय कठ-कपिप्ठन, काठन और मैत्रायणी, सामवद वी जैमिनीय और अथर्ववेद की पेपलाद सहिताए प्रसिद्ध हैं । इन शाखा-सहिताप्रो म मूल वेदो के मन्त्र ही कुछ पाठभेद कमभेद और पाया आदि के साथ सालित किए गए है । वेदो के विषयो या व्याख्यान ब्राह्मणग्रन्थो, पारण्यको और उपनिषदो म मिलता है । वेदो के धर्म के यज्ञ, सस्कार और व्यवहार आदि क्रियाकलापा का वर्णन एक विचित्र सक्षिप्त - [ वेदभारती शैली मे सूत्रग्रन्यो म मिनता है । वेदो की रक्षा के लिय हिन्दुओ ने अनेको उपाय किए जिन के कारण वे आज तक सुरक्षित चले पा रहे हैं और उन म किसी प्रकार का भी कोई विकार नहीं पाया है । इन की सुरक्षा के लिए ही इहे गुरुपरम्परा से मुख से सुन कर याद किया जाता था। अत इह श्रुति कहते है। २ आधुनिक विद्वान् हि दुनो के धार्मिम विचारों से सहमत नही है। वे वेदो को ऋषियो की रचना मानते है, जो ईसा से १५०० वर्ष पूर्व निर्मित हो चुके थे। कुछ भारतीय विद्वान् वेदो की रचनातिथि को बहुत प्राचीन मानत है । इतने लम्बे वाल म मौखिक याद क्येि जाने के कारण इन म कुछ विकार आ जाने स्वाभाविक है। यही नहीं एक ही वदसहिता म भी भाषा और विषय के भेद से भिन-भिन्न कालो के रचना, स्तर भी दिखाए गए है। मन्त्र, त्रयी और अथर्ववेद ३ वेदो के वाक्य मन नहलाते है। ये पद्यात्मक भी हो सक्ते है और गद्यात्मक भी । स्तुतिप्रधान मन्त्रो को ऋक् या ऋचा और कर्म के विधायक मत्रो को यजु कहते है। जो मात्र गाए जाते है उ हे राम कहते है । ऋग्वेद मे समस्त मन्त्र पद्या स्मक है और ऋचा कहलाते हैं । यजुर्वेद मे गद्य और पद्य दोनो हैं । इस के मन्त्र यजु कहनाते है । सामवेद के सव मात्र गाये। जाते हैं। अथर्ववेद मे भी गद्य-पद्यात्मा दोनो प्रवार के मिनते है । अथर्ववेद के म त्रो मे अचानो की सरया पर्याप्त हैं। बदमत्रो के इन तीन प्रकारो के कारण इह नयी भी कहा है। आजकल अथर्ववेद को पीछे की रचना माना जाता है और इमे जादू टोने और प्रायुद का ग्रथ कहा जाता है इस मे उच्च टि का दर्शन भी पुष्कल परिमाल में मिलता है -

वेदमन्त्रा ]
[३
सामवेद के मत्र लगभग सभी ऋग्वेद से लिये गये ह । देवन
७. मन नए है । इन वा उपयोग सोमयाग म होता है। इहे
'सामन् कहते हैं।
यजुर्वेद और यज्ञ
४ यजुर्वेद में अनेका प्रकार के यज्ञों का वर्णन और
विधान है। यह अग्निहोत्र से प्रारम्भ होता है जिस म गग्नि
जला कर घी नादि पदार्थ डाले जाते है । अन्य यज्ञ इसी का
विकसित और परिवर्वित रुप हैं । इन म अश्वमेध और पृरपमेय
के नाम विशिष्ट है। कुछ विद्वान् मानते ह कि इन म पनो और
मनुष्यो को बाहुति या बलि दी जाती थी परतु म य इस से
सहमत नहीं है । यज्ञ के समय सासारिक सुखो की प्राप्ति, दुखा
और पापो से निवृति यादि भी प्रायनाए भी या जाती थी।
इस वेद म एमी प्रार्थनाए प्रचुर मात्रा में मिलती है । इस वेद के
भाग अध्याय कहलाते हैं । प्रत्येक अध्याय म मत्र मनित ह ।
कुत नध्याय चालीस है। अध्यायो म अधिर से अधिक ११७
और कम मे कम १३ मन्त्र मिलते है । अतिम अध्याय कुछ
अल्प स भेद में शोपनपद् के पग प्रसिद्ध है और एक बार
की सत्ता का वर्णन करता है। शेष अध्यायो की प्रार्थनाए
अनेको देवताग्रो को सम्बोक्ति की गई है। इन देवताग्रो के
कुछ विद्वान् इश्वर के ही विभिन्न नाम मानते हैं। ये
गव मन यतो से सम्बन्धित है।
भाग्वेद
५ इन मज वेदो का प्राचार सम्वेद है क्यो कि उन न
बहन मे म म नम्वद गे लिए गए है । ऋग्वेद ही सगार के
साहित्य म प्रावोत्तम पत्र भी है । इम के दस भाग है जो
मण्डल कहलाते है । प्रत्येक मण्टल में कुछ सूरत हैं । प्रत्यक सक्त
नामोगे

४ ] [ वेदभारती म कुछ मन्त्र सलित है । इन मूक्तो मे कम से कम एक और अधिक से अधिक ५८ मन्त्र पाए जाते है। प्रत्येक मत्र का एक पि एक वा अविक देवता और एक छद होता है । ऋपि मन्न का प्रकाश या रचयिता होता है। मत्र मे जिस नाम से देवता को स्तुति की जाती है या विषय का प्रतिपादन होता है वह नाम मत्र का देवता होता है और जिस छद म मन्त्र लिखा होता है । वह मन्त्र का छन्द कह नाता है। इस वेद म अग्नि इन्द्र, वरुण रुद्र, मस्त्, सविता उपा, सूर्य और सोम आदि देवी देवताओ की स्तुति और उन से प्रार्थना के मन्त्र सनित किये गये हैं । इन मन्नो म भौतिक सुखो की कामना की गई है और सर्वत्र प्राशावाद ही भरा पडा है। निराशा का वहा लेश भी नहीं है । यज्ञ का इम म भी प्राधान्य है । यज्ञ के मुरय लक्ष्य परापकार और आत्मकल्याण है। वहा दान सत्य और अहिंमा की भावना प्रचुर है परन्तु शत्र, के नाश म काई सकोच नही है । राक्षसा की कल्पना भी की गई है। जो अनेक बार मनुष्य के मार्ग म पाने वाली बाधाए, दु ख और राT श्रादि ही ह । देवता राक्षसो को मारने वाले बताए गए है । देवो के साथ स्तोता मैत्री की भावना रखता है । उन म पारस्परिक आदान प्रदान होता है। ६ दस सालन में तीन मत्रो का संग्रह है उन म मे पहला गायत्री मन है दूसरे मे क्ल्यारग की और तीसरे म दोघायु की कामना है। गायत्री मन्त्र भूमिरा ७ वेद का प्रमुख लक्ष्य मानव के ऐहलौकिक और पारलौकिक जीवन में सुख को सृष्टि पोर उम के लिये भावना गायत्रीमत्र ] उत्पन्न करना है । इस लक्ष्य की पूर्ति उत्साहपूर्ण और अाशा पर निर्भर जीवन मे हो सकती है। जब तक मनुष्य की युद्धि निमन है, वह अच्छे कर्म करेगा और उत्साह मे जीवन वितायगा। इसी लिए वैदिक भापा म बुद्धि और कर्म दोनो का वाचक एक हो पद भी मिलता है-धी' । गायत्री मन्त्र म परमा मा से इसी 'धी'--बुद्धि और वर्म की शुद्धि की प्रार्थना की गई है। ८ यह मन्त्र ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में मिलता है । ऋपि गाथिन विश्वामित्र देवता राषिता और उद गायत्री है। देवता के नाम पर इमे सावित्री, छन्द के नाम पर गायत्री और जीवन का मूलमत्र होने से अव्यापन के प्रारम्भ म गुर द्वारा सब से पहले पढाए जाने में गुस्मत्र कहते है । भारतीयो म इस मन मे वड कर और किसी मन्त्र का महत्त्व नही है। प्रत्येक व्यक्ति मे अपेक्षा की जाती है कि प्रात और साय इस का जप करे और अपने आप को इस के अनुरूप ढाले । इस के जप से शरीर म शक्ति वीर्य की वृद्धि और बुद्धि का विकास होता माना गया है । अत विद्यार्थियो को स्वप्नदोष यादि होने पर मनु ने मनुस्मृति म दरा का जप करने का विधान किया है। [गाथिनो विश्वामित्र । सविता। गायत्री ] । तत् मचितुर् वरेण्य भगो देवस्य धीमहि । थियो यो नः प्रचोदयात् ॥ [ मम्बद २६२०१० सागवद १४६२ यर्वेद २१५५ सह ३०२ ३६ । ६ ] सव ६] [ वेदभारती १० अर्थ-हम] (मविशु ) [जगदुसादक] सवित नामक परमात्मा] (दवस्य) देन के (तत्) उस (वरेण्यम्) श्रेष्ठ [या चुनने योग्य कमनीय] (भग) तेज का (धीमहि) चिन्तन [-ध्यान] करते है (य) जो [ तेज या परमात्मा] (7) हमारी (निय ) बुद्धियों और कर्मी को (प्रवादयान) उत्तम प्रेरणा दे [-अच्छे मार्ग पर चलाए । ११ टिप्पणिया-सामा यत इस म 7 मे पूप तीन दाद और जाडे जाने है-भूर् भुग और स्व । इहै व्याहृति रहत ह । इन के अय (१) सल नित और प्रानद (२) प्राण का भो प्राग द खा से छुदाने वाला और म्वय सुसम्बम्प तथा दूसरा को मब मुस मात कराने वाला (३) प्राणाधार, दुस निवारक और जगदव्यापक दिए गए है । प्रोम् मब मना के पहले बोला जाता है । यह परमात्मा का सवरेष्ठ मून नाम माना गया है। परमामा अव्यय है और तोता लिंगो और काला आदि म एस स्प रहता है । ग्रो३म् भी अ यय और सदा एक रूप रहने वाला है । इन चार साथ मिल कर गायनो मत्र विशप प्रभावशाली हो जाता है । यहा इन तीना पदा को नहीं पड़ा गया है । भूर भ्रव और स्व भी अपय हैं । तत्-यह तद से नपु सब लिंग द्वितीया एक वचन का स्पह और वरेण्यम् का विशेषरा है । नासदीय सूक्त म 'तत् एक' परमात्मा का नाम है । उनी परमात्मा के नाम का भी अह द्योतक हो सरा है । दयानद मरस्वती एमा ही मानत है। सरितु - मनित से पाठी एक वचन पुन्लिग का स्प है । सामा मत सवितृ स्य वा पर्याय है । सूय जड पदाथ और परारित है, उस मे बुद्धि और कर्मों के गावर का सामथ्य नही । इसी लिए दयान द सरस्वती न सवितृ का । सू से निप्प न बरत हुए परमात्मा का वाचक माता है । नान का उत्पादक होने से गुरु' भी सवितृ हैं ।परण्यम्-Va+एय । द्वितीया एक वचन नपु सनिंग। भर्ग -v भज-मसुन् । तेज या पजापी परमात्मा। पाके तत ।

। भद्रकामना ] देवस्य-देव म षष्ठी एक वचन पुल्लिग । देव शब्द / दिव् से बाना है। इन धातु के दस अथ ह क्रीडा जीतने की इच्छा व्यवहार द्य नि (प्रकाा), स्तुनि, मोद. मद स्वान, काति और गति । अन देव पद चम क्न याना, स्तुतियोग्य, प्रतारामान सुखम्वरूप आदि मात्रा का वाचन है । गमायत इम का अथ 'देवता -दाक्तिविरोप लिया जाना है । धीर्माह-Vध्य से विाघ लिट, उत्तम पुरुष वढुवान का वदिन म्प है। वद म बहुमा मनाना और नियात्रा के म्प लौषि म्पा से मिन भी मिलन है । ध्य-ध्यान पता । दयानन्द सरस्वती इस / धि धारण करनाग म्प मानो प्रतीत हान हे । धिय-धीस द्वितीया बहुरचन स्त्रीनिंग रूप है । वेद म यह कम और वृद्धि दोना का नाम है। य-या से पुन्निग प्रथमा एक वचन का स्प है । यत और उन मदा साथ रहत है । अत यह रन का द्योतक प्रमोन होता है और नपु सक लिंग म होना चाह्यि था। वद में बहुधा सिंगो और वित्यिो के प्रयोग म लोरिक व्यागरण के नियमा से कुछ भिन्नता भी मिलती है। दयानंद सरस्वता ने तत औ- भग का प्रथ परमामा का वाप ल कर य या परमामा का वाचक माना है। यहा क अनुवाद का योजा गायिन सीधी मालूम पड़ती है। प्रचोदयात्-प्र+v चुद+ विधि लिट, प्रथम पुरप एक वचन ।चुद प्रेरित करना लगाना । अत अच्छी प्रकार--अच्छ माग म प्रेरित कर लगाए-चनाए। २ भद्रकामना- भूमिका- १२ दूसरा मन्त्र भी ऋग्वेद का है । यह यजुर्वेद म भी मिलता है । इस के ऋपि श्यावाश्च प्राय देवता मविता और छन्द गायत्री है । अत यह भी सावित्री और गायत्री मन है परन्तु इन नामा से प्ररपात नही है । ये नाम केवल गुस्मन के लिए ही विशेष रूप से प्रचलित हैं । -

[ वेदभारती
१३ इस मन्त्र मे सवित--परमात्मा से सब पापा-दुष्ट
कर्मों को दूर कर के कल्याण प्रदान करने की कामना की गई है।
दयान द सरस्वती को यह मत्र इतना रचिरर लगा है । कि उस ने
अपने भाष्या और ग्रन्थों के अध्यायो ग्रादि के प्रारम्भ म मगला
चरण के रूप मे इसे बहुश लिखा है ।
१४ मन्त्र-[श्यावाश्व आत्रेय । सविता । गायत्री ]
विश्वानि देव मनितर्
दुरितानि परा सुर ।
यद् भद्र तन्ना सुन ।
[ऋग्वेद ५।८। य० ३०१३। ]
१५ अर्थ-हे ( देव ) दिव्य गुणों वाले (मवितर)
[ जगदुत्पादक ] सवित नामक परमात्मा [हमारे ] (विश्वानि)
समस्त (दुरितानि ) पापणे । और ] कष्टो का ( परा मुव ) भली
भान्ति सुदर भेज दो-[अर्थात् नष्ट कर दो ] । (यत) जो कुछ
भी (भद्रम् ) कल्याणकारी (हो), (त) उस को (न)
हमार समीप (पा सुव ) ले आओ-अर्थात प्रदान करो।
.६ टिप्पणिया-देव-देव शब्द से सम्बोधन एक वचन
पुल्लिग रूप है । सवितर-सदित -सवितृ में सम्वाधन
एक वचन का रूप है । दातृ आदि के समान रूप चलगे । पहने मन में
इस का षष्ठी का रूप पाया है। और उस के समान ही यह रहा भी पर
मात्मा और मूय का वाचक है । सूय भी जड चेतन का अधिष्ठाता शासक
देव है । मध्यकालीन भाष्यकारो और आधुनिक बटुत मे अनुवादको ने
इसे सूर्य का ही द्योतक माना है । दुरितानि-दुर+Vइ + का,
नपु सनिंग द्वितीया वहुवचन का रूप है I इजाना, प्राप्त करना
प्रथमा

दीर्घायुकाम ]
[६
समझना आदि । अत पाप, कष्ट टुख प्रादि । प्राधुनिक विद्वान
इसे कष्ट वाचक ही मानते है । परा सुर, प्रा सुव-परा और पा
पूवक / मू (अदादि और दिवादि) से लाट् लकार मध्यम पुम्प एक
वचन । वेद म प्रधान वाक्य मे उपसग क्रिया म अलग और स्वतन
रहा है । न-अस्मद से द्वितीया चतुर्थों और पप्ठो वहुवचन का
अवादेश-वल्पिर स्प है । यहा चतुर्थी या षष्ठी का स्प अभिप्रेत है ।
३. दीर्घायुष्काम
भूमिका
१७ तीसरा मन भी ऋग्वेद और यजुर्वेद दानो
में आया है । यजुर्वेद की परम्परा सश, र् ह आदि से तुरत
पहले आने वाने पदा त म को ४ * या चिह नी से अक्ति करते
हैं और उसे गुम्' बोलते है।
१८ इस मात्र के द्रष्टा ऋषि दध्यड आथर्वण, देवता
सूर्य और छद भरिग ब्राह्मी निष्टुप है । इम म सूर्य मे प्रार्थना
की गई है कि हम १०० वर्ष से भी अधिक बाल तक स्वस्थ और
अविकद्रिय रहे । सवितृ के समान सूर्य भी परमान्मा और
सूर्य का वाचक है।
१६ मन्त्र-[दघ्यट प्राथवरण । सूय । भूरिग् ब्राह्मी विष्टुप ।]
तच्चक्षुरहित पुरस्तान्छुक्रमुच्चरत् ।
पश्येम शरद शत जीवेम शरद शत
शृणुयाम शरद. शत प्रबनाम शरदः शतम्
अदीना. स्याम शरदः शत भ्यश्च शरदः शतात् ।।
[ य०३६४२४ ० ७६६।६]

१० ] [ वेदभारत २० अर्थ-(पुरस्तात ) सामने पूर्व दिशा मे (सत वह [ मुनिर यात ] (देवहितम्) देवताओं के लिए कल्याणकार (शुम्) देदीप्यमान (चक्षु ) नेत्र (उच्चरत) उपर निकल आय है। हम] (शनम्) सौ (शरद ) शरद् ऋतुओं [ अर्थान्-वर्षों तक (पश्यम) देखते रहें । (शतम्) सौ (गरद ) सदियों-वर्ष तक (जीवम) जीते रहे । (शतम्) सौ शरद् ऋतुत्रो ।-चर्पो ] त- (शृणुयाम) सुनने रहे । (शतम् ) सो ( शरद ) सर्दियों त (प्र प्रवाम ) प्रवचन-उपदेश आदि करते रहे। (दातम्) सं (दारद ) सन्यिो तक, (च) ओर ( शतात् ) सौ ( शरद ) सर्दिय से भी (भूय ) अधिक [ वर्षों तक ] ( अदीना ) [-स्वतन्त्र स्वाधीन ] (स्याम) रहें। अपरत देवनाआ। २१ टिप्पणिया-चक्षु -चक्षुप से नपु सक विग प्रथमा ए वचन का रूप है। देवहितम्- देवेम्य हितप । लिए हितकारी बल्याण करने वाला । एक अय मन म सूय को अग्नि मित्र और वरुण को आज कहा है । दशन और विश्वास का एव मा कारग होने स प्राख सब की हितसाधक है। हित-धा+बन स्थापित किया हुआ, रक्ना हुआ । अत लक्षणा मे कल्याणकारा अथ हुआ। पुरस्तात् -पुरम् + तातिल । एव दिशा । यह पद सद अव्यय रहता है । शुक्रम् - सफेद शुभ्र स्वच्छ । मह / शुच निप्पन हुअा है । दयानद सरस्वती ने इस का अथ प्रागुकर प्रिय है । अत शीनकारी प्रथात तोद्र-दूरदशक भान भी लिया ज सकता है । उच्चरत्-उद+/चर् लिड, प्रथम पुरुष एक वचन काम होन म्प । पर निक्ल पाया है। यहा यह भूतकात तत्वात अभी ३ योता है। पश्येम, जीवेम शृणुयाम व्रनाम स्याम-ये क्रमस VE • जाव. Vशु/ब्र और / अस से विधिलिड उनम पुरुप बहुवच के रपह! शरद शतम-मानव की आयु सौ वप की मान - दीर्घायुपाम ] [ ११ -'शतायुर्वं मानव 1 अत यहा भी सौ वप जाने मादि की कापना की गई है । दगना जोना गुनना पहना और होता-सन एक दम- पूरक है और जोना' निया के भाव को सुपुष्ट करत ह । विद्वानो न निपप निकाना है कि प्राचीन पाल में जिप स्मृतु से वप प्रारम्भ होना गा उगी नातु का नाम वष का पर्याय बन जाता था। यहा पर परत का प्रयोग उमी नली के अलगत हुआ है । इसा प्रकार मान के नाम पर सभा का प्रयोग होता है। कुछ विद्वान् इन प्रयोगा ज्योतिष की गएना द्वारा कम्बद को रचना के काल का अनुमान भी साान है । अनीना-दीन और पन्त न वो स्वग्न म भी सुख नहीं मिलता है । जन स्वन न रहन की प्राथना की गई है । भूपश्च-जीवन जितना लम्बा हागा, मन उतना ही अधिक लोर पे मुखो का उपभोग परता हुमा नागामी जीवन के लिए पुण्या का मचय कर तेगा। इस प्राथना स यह भी ज्ञात होता है कि उस समय सौ वप स भी अविर आयु वाल जन होते थे। शतम, शतात-शत शद सदव नपु सब लिए एक वचन म प्रयुक्त होता है।

.२.
चरैवेति
भूमिका
ब्राह्मण
१, वैदिक साहित्य में वेदो और उन की शाग्वा सहिता
के बाद ब्राह्मण साहित्य का स्थान है । एक परम्परा इहे भं
श्रुति और ईश्वरीय ज्ञान मानती है, परन्तु दूसरी परम्परा इन
वेदव्यास्यान मात्र मानती है और वेद के अनुकूल भाव आदि होने
पर ही इन्हे प्रामाणिक मानती है । यह कहना अनुचित नहीं वि
मूल की तुलना में जितनी प्रामाणिक्ता एक उद्धरणो सहित कुज
प्रश्नोत्तर और सरल अन्ययनो की होती है उतनी ही वेद
सहितानो की तुलनाम ब्राह्मणो की है । ब्राह्मण शब्द की ब्रह्मन् रे
पण प्रत्यय लगा कर 'ब्रह्मणो वेदस्य व्याग्यानम्' अर्थ :
व्यारया की गई है।
ब्राह्मणों का काल
२ ब्राह्मणो की रचना का काल वेदमहितागो के सकलन
के बाद माना जाता है । मैक्स मूलर ने इहे ६०० मे ८०० ई०
पू
रक्खा । ज्योतिप के आधार पर शतपथ ब्राह्मण का काल
३००० ई० पू० के लगभग बैठता है। यह भी निर्विवाद है कि
ब्राह्मण ग्रन्थो मे वणित यज्ञ आदि सहिताकाल म प्रचलित थे।
उसी परम्परा को यहा लेखबद्ध प्रामाणिक और ससा रूप दिया
गया है। यह विकास दीर्घकालीन रहा होगा । सम्भव है कि
उपलब्ध ब्राह्मणो से पहले छोटे-बड़े कर्मकाण्ड विषयक ग्रन्थ रहे
हो जिन के आधार पर ये उपलब्ध ब्राह्मण रचे गये। कुछ भी हो,
।

।
ब्राह्मगा ]
[ १३
इन को रचना चाहे जब और चाहे जिस आधार पर की गई हो,
इन को मल सामग्री का सीधा सहितावाल से सम्बध है।
ब्राह्मणों की मरया और नाम
३ प्रत्येक वेद के अपने अपने एक वा अधिक ब्राह्मण है ।
ऋग्वेद के ऐतरेय कौपीतवि और शाखायन ब्राह्मण यजुर्वेद के
श-पय और तैतिरोय ब्राहाण, सामवेद के ताण्ड्य महाजाह्मण
(=पचविंश ब्राह्मण), मन, आर्षेय, सामविधान, सहितोपनिपद्
देवन, पशि, वश जैमिनीय और जैमिनीयोपपिद् ब्राह्मण तथा
चथर्ववेद का गोपथ ब्राह्मण मिलते हैं । इन मतैत्तिरीय और जैमि-
पीय इन नामो की शाखाओं के ब्राह्मण है। जैमिनीयोपनिषद् जैमि
तीय ब्राह्मण का ही अग है। इसी प्रकार मत्र ब्राह्मण आदि भी
कमी समय पविश ब्राह्मण के अग रहे हो सकते हैं ।
बाह्मणों के विपय
४ ब्राह्मयो म अपनी अपनी सहिताप्रो और शाखायो
सम्वचित क्रियाकलाप का सक्लन उन की प्रामाणिक्ता का
ववचन और उन के मूल भाव या प्रतीक आदि का क्थन मिलते
। इन म परिणत क्रियाए बटी जटिल है और विशेपज्ञ के बिना
सावित नहीं की जा सकती । कुछ का तो सभार भी सामा य
उनुप्य जुटाने म असमर्थ रहेगा । कुछ नितान्त अव्यवहार्य
और प्रतीकमात्र हो मालूम पटते है। शेष म भी कुछ नियाए
प्रयाज्य प्रतीत हानी है। प्रताक की दृष्टि से ये सव शिष्ट और
मह्य हो जाते है।
ब्राह्मणों के पारयान
' ब्राहाणा मन्यन-स्यल पर बहुत से सरन, सक्षिप्त
और रोचक पारवान भी मिलते हैं। इन से ही आगे चल कर

१४ ]
[ वेदभारती
कहानी कथा आदि का विकास हुआ है। इन आस्यानो बी भाषा
सरल सुबोध और ललित है। सामान्यत ब्राह्मणो को भापा
अपरिपक्व, अविकसित, भही, अस्पष्ट और अपूर्ण है, परतु
आरयानो की भाषा मे ये दोष नहीं है । यहा वाक्य भी छोटे छोटे
है। उन की भाषा पीछे की लौकिक संस्कृत में विकासोन्मुख है।
ऐतरेय ब्राह्मण
६ ऋग्वेदीय ऐतरेय ब्राह्मण महीदास ऐतरेय की रचना
है। बाल की दृष्टि से यह वैदिक सस्कृति के हास के युग का
प्रतीत होता है और कम-से-कम सतपथ ब्राह्मण से अर्वाचीन
मालूम होता है । तथापि आधुनिक विद्वान् इमे शतपथ ब्राह्मण
से पहले की रचना मानते है
शुन.शेप पाख्यान
७ इस ऐतरेय ब्राह्मण म राजसूययज्ञ के प्रसग मे पुत्र की
आवश्यकता और परिश्रम के फल का प्रतिपादक एक बहुत मुन्दर
भारयान मिलता है । इसे शु7 शेप पार यान कहते हैं। स्मरण
रहे जिस प्रकार स्वप्न म मारव के अनुभव म अाई हुई वस्तुप्रो
और घटनायो से एक सम्बद्ध मा रूप दिखाई पटता है इसी
प्रकार कवि अपने चारो ओर के वातावरण से सामग्री ल कर
कल्पना मिश्रित क्था को किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सृष्टि
करता है । ये क्याए वैदिक साहित्य म प्रारयान या इतिहास
कहलाती है । अत पार पानगत वणनो को यथार्थ मानना व्यामोह
और अज्ञान है।
शुनाशेप आख्यान की कथा
८ गुन शेप के इस प्रारयान पी मक्षेप से कथा इस
पकार है

- - शुन शेप आख्यान ] [ १५ ६ इक्ष्वाकु कुल म वेधस के पुन हरिश्चन्द्र नामक एक राजा हुए हैं। उम को सौ रानिया थी, परतु उस के न काई पुत्र था न और कोइ स तान । एक वार उस का नारद ऋपि से पुत्र- प्राप्ति को अनिवार्यता के विषय म वार्तालाप हुआ। नारद ने बनाया कि अपने जीवनकाल म पुन का मुख देखने मे पिता पितृ ऋण मे मुक्त हो जाता है। पृथिवी अग्नि और जल मे मिनने वाले भोगो से बढ कर पुत्र का सुख है। वह पिता की आत्मा और मसार तथा दुख से पार उतारने वाला होता हे । पुत्रहीन के लिय चागे प्राथमो का जीवन निरर्थक है । पुत्र दोनो लायो म ज्योति है । पुत्रहीन का लोक नष्ट हो जाता है। सब उसे पशु समझते हैं । पुत्रवाले ही शोकरहित हो कर छाती तान कर नि शक और सानद इस जगत् म घूमते है । यह सुन कर हरिश्चन्द्र न नारद से पूछा कि उसे पुत्र से मिले । २० नारद ने कहा कि वरण देवता से प्रार्थना करो और कहो कि जो पुत्र तुम्हे दा होगा उस को तुम राजा वरण की प्ट चढा दोगे। हरिश्चन्द्र ने उस के परामर्श के अनुसार किया। वरण ने उस को प्राथना पर उमे एक पुत्र दिया और उसकी बलि मागी। परतु हरिश्चन्द्र यदि ऐसा कर दते, तो उन को क्या लाभ होता । अन उन्हो ने वरुण को टनाया कि अभी तो यह दम दिन का भी नहीं हुआ। दस दिन का हो जान पर मैं इम को तुम्हारी मेट चटा द् गा । वरण मान गया और रोहित नामक इस बालक के दस दिन का हो जाने पर फिर बलि को माग की। हरिश्चन्द्र ने फिर टलाया कि दन्त निक्लने प” यन कर गा। वरुण मान कर फिर अपने स्वीकृत समय पर पाया । अब हरिश्च द्र ने फिर युक्ति निकाल कर कहा कि अभी इस के दूध के दान गिर कर पक्के दान्त निकल पाने दो। वाण उम की बात

[ वेदभारनी
मान कर दी हुई अवधि पर फिर आया। हरिश्चन्द्र ने उसे रोहित
के शम्बधारी होने तक के लिए फिर टला दिया। जब राहिन
शस्त्रधारी हो गया, तब वरुण ने फिर माग को। अब हरिश्चन्द्र
आगे न टला सके और रोहित की भेट देने के लिए राजी हो गए।
उन्हो ने रोहित को बुला कर सब बात बता कर कहा कि
उमे वाण की भेट चढाया जायगा । गहित सहमत न हुआ और
जगल मे भाग गया।
चरैवेति
११ यहा से इस सकलन म सगृहीत अश-चरैवेति वी
क्था चाल होती है।
१२ रोहित के भाग जाने पर वरुण ने हरिश्च द्र को
पकड लिया । हरिश्चन्द्र को जलोदर रोग हो गया और उस का
पेट फूल गया । रिता के रोग की वार्ता सुन कर रोहित घर आने
के लिए जगल से वस्ती म प्राया। वहा पुरुष के वेप में इन्द्र ने
मिल कर कहा कि परिश्रमशील को ही लक्ष्मी प्राप्त होती है इस
लिए परिश्रम करो और घूमो-गतिशील बनो। घर म बेठना
बेकार है । रोहित एक वर्ष फिर भ्रमण करता रहा और पुन
घर की ओर चना । इद्र ने फिर उपदेश दिया कि विचरणशील
का सब प्रकार के फल मिलते है और उस के दुख दूर हो जाते
है और रोहित को फिर एक वप के लिए जगल म भ्रमणशील
बना दिया। इसी प्रकार तीसरे चौथे और पाचवे वर्षों में इन्द्र ने
रोहित को अपने घर जाने से रोका और कहा कि विचरणशील
का ही ऐश्वर्य वृद्धिशीन रहता है। घूमने वाला ही मत्ययुग और
जूए की कृत फेक के समान पूर्ण हो पाता है और स्वादु फन को
प्राप्त करता है।
-

चरैवेति ]
१३ छठे वर्ष में उस की भेट भूख से सतप्त सौयवसि
अजीगर्त ऋपि से हुई। इस के तीन पुत्र थे-शुन पुच्छ, सुन शेप
और शुनोलाड,गूल । रोहित ने अपने बदले बलि देने के लिए उन
मे से एक पुत्र को मागा । पिता और माता ने क्रमश ज्येष्ठ और
कनिष्ठ को देने से इ कार कर दिया और सौ (सुवर्ण मुद्रानो या
गौनो) के बदले मध्यम पुत्र शुन शेप को बेच दिया।
१४ रोहित इस शुन शेप को ले कर पिता के पास आया।
दोनो ने वरुण से रोहित के बदले म शुन शेप की भेट स्वीकार
करने की प्रार्थना की। वरुण सर्प राजी हो गए, क्यो कि क्षत्रिय
बालक से ब्राह्मण वालक अधिर्व गुणवान् या श्रेष्ठ होता है।
वरण के निर्देश पर शुन शेप को राजसूय म बलि देने के लिए
बाधा गया।
।
शुन.शेप की कथा का उपमहार
१५ प्रस्तुत सकलन की कथा यहा समाप्त हो जाती है ।
आगे की कथा इस प्रकार है।
१६ जा शुन शेप को बत्रि के लिए लाया गया तो उसे
बलि के यूर मे बा चने और उस के बाद मारने के लिए कोई
आदमो नहीं मिला। यहा भी शून शेष का पिता सौ-सौ [सुर्वण
मुद्रामो या गौग्रो] के बदले इन दोनो कामो को करने के
लिए तय्यार हो गया।
१७ शुन शेप इस नृशस और वीभत्स कर्म की तय्यारी को
देख कर काप उठा और देवताओ को शरण म गया। उस ने म
से प्रजापति, अग्नि, सविता, वरुण अग्नि, विश्वे देवो इद्र,
अश्विनो और उपस् की स्तुति की। उपस् की स्तुति म उस ने

१८ ] [ वेदभारती तीन मन्त्र पढे और उन से उस के एक-एक कर के तीनो बन्धन अपने आप खुल गए। १८ ऐसा होने पर ऋत्विजो ने शुन शेप को अपना भागो बना लिया और उस ने अपने पिता की प्रार्थना को ठुकरा कर विश्वामित्र को अपना पिता मान लिया। चरैवेति १. अथ हैवाक स्णो जग्राह । तस्य होदर जन्ने । तदु ह रोहित शुभार । सोऽरण्याद् ग्राममेयाय । अर्थ-अब वरण ने इक्ष्वाकुसन्तान [हरिश्चद्र] को पकड लिया । उस [हरिश्चन्द्र ] को जलोदर | रोग] पैदा हो गया । रोहित ने इस [ घटना को सुना। वह जगल से वस्ती की ओर] प्राया। टिपणिया-अथ-यह प्रारम्भ और घटनाओ मे एक के बाद आने वाली दूसरी घटना के काल का सूचक अव्यय ह । इस पद को शुभ और मागलिक भी माना गया है । ह-यह वाक्य म शोभा आदि लाने के लिए प्रयुक्त किया जाता । यह अव्यय है । सामा यन हिदी मे इस का कोई अनुवाद नहीं किया जाता है । कभी-कभी 'निश्चय म अथ कर भी देते हैं । वरुण -ये ऋग्वेद म ऋत-नियम और व्यथम्पा के देवता है । इन के तीन पाश हैं, जिन मे वे अपराधियो को बावत है । ये पाश उत्तम मध्यम और अधम कहलात हैं। इन के दण्ड मे सब डरते हैं।' इन का जल से भी सम्बध जोडा गया है। पुराणो म तो य ममुद्र के देवता हैं । अत इन के द्वारा बान्धा हुआ पुरुप जलोदर जन रोगा से पीडित होता है । ये नतिर अपराधो के दण्डदाता हैं। इस प्रास्यान म वरण को शरीरधारी और मानवीय भावो से युक्त सरल, विश्वासी [ १६ चरैवेति ] और दूसरे को सुविधा का ध्यान रखने वाला चित्रित क्यिा गया है। जग्राह- ग्रह +लिट् लकार प्रथम पुरुष एक वचन । उदरम्-पेट- पेट का बटना-जलोदर रोग । जन्जे-/जन्+लिट प्रथम पुरुष एउ' यचन, प्रात्मने पद । पैदा हुआ-हो गया। तत्-इस अर्थात पिता के जलोदर से पीडित होने वो। उ--यह भी ह के ममान पूरक पद है । शुधार- +लिट् प्रथम पुरुप एक वचन । एयाय-पा+/इ+लिट् प्रथम पुरप एक वचन । २ तमिन्द्र. पुरुषरूपेरा पर्येत्योनाच- "नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रु म । पापो नृपद्वरो जन इन्द्र इचरतः ससा ॥ चरैवेति।" इति । अर्थ-पुरुप के रूप मे पास जा कर इन्द्र ने [ उस रोहिन से 1 कहा- 'हे रोहित-हम ने सुना है कि जो घूमता-फिरता नहीं है उस को लक्ष्मी नहीं मिलती है । मनुष्यों (अपने सम्बन्धियों) के बीच रहने वाला जन पापी होता है। नि मन्देह इन्द्र गतिशील का मित्र होता है । अत भ्रमण करो ही।' टिप्पणिया- इन्द्र -यह अपद का सवप्रगुल और प्रार्यों का युद्ध और राष्ट्र का देवता है। ऋग्वेद का अधिकार भाग इसा की स्तुति म हैं । इस के प्रमुख दम वृत्र पे साथ युद्ध करना और सोमपान परना है। पौराणिक सम्प्रदाय म यह देवा का राजा और स्वग का शासक है । इस का दूसरा प्रधान गुण सम्पत्ति का स्वामित्व है। पुराणो इद्र पडय पारी है । अत यहा भी रोहित को बताने म ममय होता है । पर्यत्य-परि---प्रा+vs+ल्यप् । उवाच-+लिट प्रथम पुरुष एक वचन । अनाश्रान्ताय-न यवा हुग्रा जो विश्रामी जीव २० ] [ वेदभारती नहीं है, क्मठ है। शुश्रुम-V+-लिट् उत्तम पुरुष बहुवचन । पाप - पापमस्यास्ति । पाप+अच । नृपद्-नृपु सीदति । मनुष्यो म रहता है। चरत -Vवर+शतृ, पुल्लिग प्रथमा बहुवचन । चरैव- चर+एव । चर्चर तोट मध्यम पुरुप एक वचन । ३. "चरैवेति वै मा ब्राह्मणोऽयोचद्" इति ह द्वितीय मनत्सरमरण्ये चचार । सोरण्याद् प्राममेयाय । अर्थ-नि सन्देह 'विचरण करी' यह मुझे ब्राह्मण ने कहा है, यह सोच कर रोहित] दूसरे वर्ष [भी] जगल में घूमता रहा । वह जगल से बस्ती की ओर आया। टिप्पणिया-वोचत्-ब्र मे धुड प्रथम पुम्प एक वचन । वै-यह निश्चय', 'नि स देह' वाचक अव्यय है । मा-अम्मद से द्वितीया एक वचन का अवादेश रूप है। यह वाक्य में प्रारम्भ म पयुक्त नहीं होता है । चचार/चर+लिट प्रथम पुरुप एक्वचन । ४. तमिन्द्रः पुरुषरूपेण पर्यत्योवाच- "पुष्पिण्यौ चरतो जड्थे भूष्णुरात्मा फलग्रहिः । शेरेऽस्य सर्वे पाप्मान श्रमेण प्रपये हतारचरैवेति ॥" इति । अर्थ--पुरुप रूप मे पास जा कर इन्द्र ने उस [रोहित] को कहा-"विचरण करने वाले की दोनो जघाए फूलों से युक्त हो जाती है। उस की] आत्मा ऐश्वर्यशाली और फल को प्राप्त करने चाली हो जाती है । उस के मव पाप [लम्वे] प्रशस्त मार्ग पर [भ्रमण की] थकान [या परिश्रम] से नष्ट हा सो जाते है। इस लिए भ्रमण करते ही रहो।" ..

चरैवेति ] [२१ टिप्पणिया--पुष्पिण्यौ--स्त्रीलिंग पद-'ज' का विशेषण है । पुष्पाणि प्रस्या जातानि सन्ति वा सा पुप्पिणी, ते । फूलो से युक्त पूल पाने पर ही फल आता है । मासिक धम से युक्त स्त्री को भी पुष्पवतो कहते है क्या कि वह गर्भ धारण करने में समथ होती है । अत यहा जघाए परिश्रम के फल प्राप्त करो वाली हो जाती है और घूमने वाला सफलता प्राप्त करता है । अत यदि तुम परिथम क्रोगे तो तुम्हारे मन की इच्छा-वरण देवता को बलि दिये जाने से मोक्ष-की सिद्धि हो जायगी और तुम्हारा पिता भी ठान हो जायगा । अन परिश्रम करो, घूमो, अभी घर मत जानो।' इन्द्र के ममस्त वचना का यही अतिम और एक मान लक्ष्य और भाव है । चरत -V+ शतृ+पप्ठी एक वचन पुल्लिंग । घूमने-परिश्रम करने वाता। भूगु - भू+स्नु । होने वाला धन कमाने--प्राप्त करने वाला जत एश्वय- शाली, समृद्ध । फलमहि -फल गृह्णाति इति । फल+/ग्रह-+कि । फा प्राप्त कर लेने वाला मफ्ल । शेरे--/शी से लट प्रथम पुरप बहुवचन का वदिक स्प। लौक्कि रूप शेरत होता है। पाप्मान-पाप्मन् से प्रथमा बहुवचन, पुल्लिग । पाप,कष्ट, दु ख । वदिक दशन मे दुख निवनता, रोग आदि को पाप माना गया है । देवो हमारा 'वदिक दशन' नाम लेख । प्रपथे--प्रकृष्ट पथा , तस्मिन् । प्र-पथिन--। हता हिन्+क्त पुल्लिग प्रथमा बहुवचन । । ५. "चरैवेति' वै मा ब्राह्मणोऽयोचद्" इति ह तृतीय सरत्मरमरण्ये चचार 1 सोऽरण्याद् ग्राममेयाय । अर्थ–'नि सन्देह भ्रमण करो' यह मुझे ब्राह्मण ने कहा है,' यह [मोच कर रोहित] तीसरे वर्ष [भी] जगल मे घूमता रहा । वह जगल से वस्ती की ओर आया।

० ] कहा-"बैठे | वेदभारती ६. तमिन्द्र, पुरुषरूपेण पर्येन्योवाच--- "आस्तै भग आसीनस्योघस्तिष्ठति तिष्ठतः । शेते निपद्यमानस्य चराति चरतो भगश्चरैवेति । इति । अर्थ-पुरुप स्प मे पास जा कर इन्द्र ने उस [रोहित] को हुए का ऐश्वर्य (या-सौभाग्य] बैठा रहता है, खडे हुए का उपर {सीधा खडा रहता है, लेटे हुए {या सोए हुए या पड़ें हुए] का सोता है और भ्रमण करने वाले का ऐश्वर्य या सौभाग्य अवश्य ही गति करता रहता है अर्थात-विकसित होता-चढता रहता है ] इस लिए घूमते ही रहो।' टिप्पणिया-वास्ते--प्रास् वटना मे लट् प्रथम पुरुष एक वचन । भग ~/भज्+घ । ऐश्वय, सौभाग्य । वेद मे यह ऐश्वम का दवता है । सविता आदि के साथ इस से भी धन देन वी प्राथनाए की गई है। प्रात कालीन प्रायना में अग्नि इद्र आदि देवताग्रो से भग- एश्वय देने की प्राथना की गई है। देखो यजुर्वेद ३४१३४-४० । आसीन-Wधास्+शाच् । तिष्ठत - स्था+शत-+ पुरिलग पप्ठी एव वचन । शेते-</शी+लट प्रथम पुरुष एक वचन । निपद्यमानस्य-नि+पद+(दिवादिगणीय य+शानच् + षष्ठी एक वचन पुल्लिग । गतिहीन, पड़ा हुग्रा सोया तुप्रा । चराति- चर्+लेट् प्रथम पुरुष एक वचन । वेद मे एक लट् लकार भी होता ह, जो लोप म नहीं मिलता है । सामायत यह लेट विधिलिड, के अर्थो म प्रयुक्त होता है । यहा पर 'सभावना प्राशा और अवश्यभाविता के भाज अभिप्रेत हैं। ७. ""चरैवेति' वै मा ब्राह्मणोऽनोचद्" इति ह चतुर्थ मरत्मरमरण्ये चचार । मोरण्याद् ग्राममेयाय ।

चरैवेनि ] [ २३ अर्थ- 'नि सन्देह 'भ्रमण करते ही रहो' यह ब्राह्मण ने मुझे कहा है" यह [ सोच र रोहित ] चौथे वर्ष [भी] जगल मे घूमता रहा। यह जगल से वस्ती की ओर आया । ८ तमिन्द्रः पुरुपरूपेण पर्येत्योवाच- "फलि. शयानो भनति सनिहानस्तु द्वापरः, उत्तिष्ठन्त्रता भवति कृत सपद्यते चरश्चरैवेति ।।" इति । अर्थ-पुरुष रुप मे पास जा कर इन्द्र ने उस [रोहित] को कहा- 'सोता हुआ [पुम्घ कलि के समान होता है जागता हुआ [श दार्थ-नींद को त्यागता हुआ) द्वापर [के समान होता है, [बिस्तर से] उठता हुअा त्रेता के समान होता है और गति करता हुया कृत के समान हो जाता है । इस लिए अवश्य ही भ्रमण परते रहो।" टिप्परिण्या-कलि , द्वापर , त्रेता, कृतम-मनु ने मनुस्मृति में भी नहीं भाव प्रकट क्यिा है- "कलि प्रसुप्तो भरति स जामद् द्वापर युगम् । मस्नभ्युद्यतस्त्रेता विचरस्तु कृत युगम् ॥" [१।३०२] मनु के भाव के अनुल कलि आदि पदा को चारो युगो का द्योतर माना है । माव यह है कि जिस प्रकार कलियुग आदि में धम को स्थिति होती है, उसी प्रकार सोते हुए आदि मनुष्यो के भाग्य को होनी है । स ययुग (वृतयुग) म ही घम अपने पूण उत्लप पर होता है अत परिश्रम गील का भाग्य भी चरम उत्तप को प्राप्त होता है। कुच विद्वान् दन वलि आदि को जुए मे इन नामो वाली पामो की फैनो का द्योतक मानते हैं। भाव दोनो मे समान है। शयान-शो-शानच् । सजिहान-मम्+हा (जाना) दशावच् । उत्तिष्ठन्-उ+vम्या+ सायण ने २४ ] [ वेभारती शतृ पुल्लिंग प्रथमा एक वचन । सपचते--सम् +/पद+लट प्रथम पुरुप एक वचन । चरन-चर+श+पुल्लिंग प्रथमा एक वचन । 1 'चरैवेति' वै मा ब्राह्मणोऽत्रोचद्" इति । पचम सनत्सरमरण्ये चचार । सोऽरण्याद् ग्राममेयाय | अर्थ- नि स देह 'भ्रमण करते ही रहो' यह ब्राह्मण ने मुझे कहा है", यह [सोच र रोहित] पाचवे वर्ष भी] जगल घूमता रहा । वह जगल से वस्ती की ओर आया। १०. तमिन्द्रः पुरुषरूपेण पर्येत्योराच- "चरन् वै मधु विन्दति चन्न् म्बादमुदुम्बरम् । सूर्यस्य पश्य श्रेमाण यो न तन्द्रयते चरचरैवेति ।" इति। -सौंदर्य, सायण- अर्थ- -पुरुप रूप में पास जा कर इन्द ने उस [रोहित) को कहा- गति करता हुआ [पुरुष] निश्चय ही शहद [ के महश मीठे और ] उदुम्बर [-गूलर के सटश ] स्वादिष्ट [ फल ] को प्राप्त करता है। सूर्य के परिश्रम [कीय-प्रमुखता-वैशिट्य, गगा प्रसाद-स -श्रेष्ठता ] को देखो जो गति करता हुआ [कभी भी] आलस्य नहीं करता है । अत धूमते ही रहो । टिप्पणिया-मधु और उदुम्बरम् मे उपमा अभिप्रेत है। इहे तादात्म्यज य अतिशयोक्ति का स्प भी माना जा सकता है। उदुम्बर- गूलर, इजीर । श्रेमाणम्-भाष्यकारों और अनुवादको नै इस लक्ष्मी के वाचक श्री मे मान कर अथ दिए हैं। परनु थम का प्रकरण होने से इसे थम दे अथ मे लेना और श्रम से व्युत्पन करना हो ऐतरेयकार को प्रभप्टि है। श्री (उबालना, पकाना ) से धुत्पन चरैवेति ] [ २५ करने पर यह भाव प्राप्त किया जा सकता है। तन्द्रयते--तद्रा करोति । तद्रा से नामधातु, लट् प्रथम पुरुप एक वचन । ११. । 'चरैवेति' वै मा ब्राह्मणोऽवोचढ" इति ह पष्ठ समत्सरमरण्ये चचार । सोऽजीगत मौयामिमृपिम- शनया परीतमरण्य उपेयाय, इति । अर्थ-"नि सन्देह 'घूमते ही रहो' यह ब्राह्मण ने मुझ से क्दा है", यह [ सोच कर रोहित ] छठे वर्ष [ भी ] जगल मे घूमता रहा। [वहा] बगल में उस [रोहित] ने भूख से सताए हुए सुयवस के पुत्र अजीत नामक ऋषि को पाया। टिप्पणिया-सौयवसि-सुयवसस्य अपत्य पुमान् मुयधम+ इन् । अशनया-प्रशना (-भूख ) तृतीया एक वचन, सोलिग। परीत-परि+Jइ+क्त । उपेयाय-उप+/इ--लिट् प्रथम पुरप एक वचन । १२. तस्य ह त्रयः पुना यातुः-शुन पुच्छ, शुन - शेप', शुनोलाङ्गल इति । अर्थ-उस के तीन पुत्र थे, [जिन के नाम] शुन पुन्छ शुन शेप और शुनोलागृल [ये] । टिप्पणिया-आसु-प्रत्+लिट् प्रथम पुरप ववचन । लोक मलिट् प्रादि प्राधधातुक लवारा मे/मस् को/भू हो जाता है, देवल कारयामास प्रादि रूपो मे ही अस् रहता है परन्तु या भून हो कर प्रस् हो रहा है । शुन पुच्छ आदि-ये नाम इस प्रकार के मालूम पडते हैं जसे आज-कल नृहामल, मूसा, चोबा, तोताराम, , वेदमारती छिपकली मत, बरफी, इमरती, जलेवी, चौथमल आदि नाम रो जाते है । गुन श्वन (कुत्ता) से पष्ठी एक वचन का रूप है । पुच्च और लागूल दोना पूछ के और शेप प्रजनन इद्रिय का वाचक हैं। वेद म गुन 'सुन का भी वाचा है, और शेप 'स्पश' का । अत इन नामो को इम गुन -मुख से भो सम्बद्ध किया जा सकता है। हरियप्पा ने ऐसा ही माना है । दयानन्द सरस्वती का भी यही मत है। ये मत इस लिये माननीय प्रतीत होते हैं कि वैदिक ऋपिया और राजामो प्रादि के नाम! मै कुत्सित नामो की सत्ता विरली ही मिलगी । १३. त होवाच- -"ऋपेह ते शत ददामि । अह- मेपामेनात्मान निष्क्रीणा" इति । अर्थ-[रोहित ने] उस [अजीगत] से कहा-'हे ऋपि में तुम्हें सौ [ सुवर्ण मुद्राए या गोए ] देता हूँ। में इन [तुम्हारे पुत्रों ] में से एक [पुत्र को यज्ञ में दे कर अपने आप को ऋण मुक्त कराना चाहता हूँ। - टिप्परिणया-शतम्-ये सो क्या है ? यह नहीं लिखा गया है। उस कात्र म सुवरण मुद्राग्री और गौमा से क्रय-विस्य व्यवहार चलता था । गहिन जगत मे धूम रहा है । उस के पास मुद्रा तो हो सकती है, गौए हाता सम्भव नही जान पडता । निजीणे--निस+Wी लोट् उत्तम पुम्प एक वचन । मूल्य देकर-ऋण का धन दे कर अपने को मोन लता-छुराना-बचाना चाहता हूँ । सधि म ए को प्राय और प्राय ने मालाप हो गया है। १४ स ज्येष्ठ पुत्र निगृह्णान उपाच--"न विमम्" इति।

.
घरैवेति ।
अर्थ -यह सर से बडे पुत्र को पकडता हुआ बोला-
'निश्चय ही इम को [ तो नहीं दूगा, और किसी को ले
मरते हो]।"
टिप्पणिया-ज्येष्ठ-वृद्ध+दष्ठन् । निगृहरणान-नि+
ग्रह-शानच् ।
१५. "नो एवमम्" इति कनिष् माता ।
अर्थ-माता ने मब से छोटे [पुत्र को पकडते हुए कहा कि]
'न ही इस को [दूगी।"
टिप्पणी-कनिष्ठ-युवन् + इप्ठन् ।
१६. तो ह मध्यमे सपदायाचक्रतु शुनःशेपे ।
अर्थ--उन दोनों ने बीच के [पुत्र] शुन शेप पर [ मूल्य
के पल को ] सक्रान्त क्रिया [अर्थात् धन ले कर वेचना-
देना स्वीकार कर लिया ।
टिप्पणी -सपादयाचक्रतु 1- सम् + पद + गिन्+लिट
प्रथम पुटप द्विवचन । पिजत धातुप्रो के अत मे आम् लगा कर कृ,
न और अस् के लिट् लकार पं रूपो काप्रयोग किया जाता है । अत
यहा का लिट् मध्यम पुरुष द्विवचन का म्प लगाया गया है।
१७ तस्य ह शत दचा स तमादाय सोरण्याद
ग्राममेयाय, इति ।
अर्थ--वह [ रोहित ] उस [ अजीगत ] को सौ [मुद्रा]
दे कर उस [शुन शेप को ले कर वह रोहित] जगल से बस्ती
मे आया ।
टिप्पणी-दत्ता-दा-क्वा। आदाय-या+/दा+ल्यप् ।

२८ ]
[ वेदभारती
१८. स पितरमेत्योवाच-'तत हन्ताहमनेनात्मान
निप्क्रीणा" इति ।
अर्थ-वह [रोहित अपने ] पिता [हरिश्चन्द्र ऐनाम]
के पास आ कर बोला-"पिताजी, अहो, मैं इस [शुन शेष के दान]
से अपने पार को [वरुण से उस का] देय चुका कर छुडाऊगा।"
टिप्पणी--एत्य-मा+vs+ ल्यप । तत-प्रिम जनो के
लिए सम्बोधन पद है । इसी से बोच म 'पा' लग कर लोविक साहित्य
का "तात' पद बना है। हन्त-प और शोक का सूचक अव्यय
है। यहा यह हप को व्यक्त करता है, क्या कि अब पिता और पुत्र
दोनो सानन्द और सुरक्षित रह सकेंगे।
स वरुण राजानामुपसमार- "अनेन त्या
यजा" इति ।
अर्थ-वह [हरिश्चन्द्र] राजा वरुण के पास गया [और
कहा कि मैं) इस [शुन शेप] से तुम्हारे लिए अज्ञ करना
चाहता हूँ।"
टिप्पणिया--राजानमू-वरुण को वेदा म बहुश राजा
महा है, क्यो कि वह सृष्टि में नैतिक व्यवस्था का धारक है।
उपससार-उप+म+लिट प्रथम पुरुष एक वचन । त्ना-युप्मद से
द्वितीया एक वचन मे प्रवादेश रूप है । यजै/यज् + लोट उत्तम
पुरप एक वचन अात्मनेपद ।
२० "तथेति । भूयान् वै ब्राह्मणः क्षत्रियाद्" इति
वरुण उवाच।
अर्थ-वरुण ने कहा कि "बहुत अच्छा । ब्राह्मण नि सन्देह
क्षत्रिय से अधिक अच्छा [या फलदायक होता है।"
।

चरैवेति ] [ २६ टिप्पणिया-भूयान्-~-बहु+ईयस+पुल्लिङ्ग प्रथमा एक वचन । २१. तस्मा एत राजसूय यज्ञक्रतु प्रोवाच । तमेतमभि- पेचनीये पुरुष पशुम् पालेभे ॥ इति ॥ अर्थ-[उस वरुण ने ] उस [हरिश्चन्द्र को] इस राज- सूत्र नामक यज्ञ कर्म को करने और उस मे शुन शेप की बलि देने के लिये निर्देश दिया। [उस] अभिषेक [यज्ञ] मे उस पुस्प शुन शेप] को पशु [रूप में उपस्थित किया। टिप्पणिया-तस्मा--तस्मै का सघि म यह रूप हो गया है । राजसूय- राजा के राजतिलक किये जाने के समय की धनक्रिया। इम म तीथस्थानो से जल ला कर राजा को स्नान कराया जाता है। यज्ञातुम् -यन और व्रतु सामा यत पर्यायवाची हैं । यहा इहे अगी और अग के रूप में या विशेप्य-विशषण स्प लिया गया है। अभिपेचनीय अभि+/सिन्+णिच् +अनीय । यह राजस्य के लिये प्रयुक्त हुअा है । आलेमे-पा+लिम् +- लिट् प्रथम पुरुप एक वचन । मा+लभ का प्रयोग पशु की हिंसा के लिये भी होता है । यहा अभी न हिमा की गई है और न मागे जा कर की जानी है । अत धारण पित्रा प्राप्त किया तय्यार किया भात्र अभिप्रेत हैं।' [ ऐतरेय ब्राह्मण ३२३ ] शतपथब्राह्मणे मत्स्यावतारेतिहासः शतपथ ब्राह्मण मे (भाई) मछली के अवतार की कथा शतपथ ब्राह्मण १ शतपथब्राह्मण यजुर्वेद का व्यारयान ग्रन्थ है। विद्वानो ने इसे वैदिक काल के अन्त का ग्रन्थ माना है। परतु इस वी सामग्री पर्याप्त प्राचीन है और वैदिक काव्यकाल की समकालीन है। इस को भाषाशैली अन्य ब्राह्मणो की भाषाशैली के समान अपूर्ण, अपरिष्कृत, अनतिपरिस्फुट प्रावत्तिपूर्ण निरथक शब्दो से युक्त और भावमयी है । इस मे वैदिक प्रयोगो की बहुलता है । प्रकृत कथा मे लेट् के रूपो, लिट् के प्रयोगो और निङ्ग आदि के व्यत्यय की छटा देखने योग्य है। शतपथब्राह्मण के विषय २ इस ब्राह्मण मे १४ काण्ड हैं । इन म से पहले नौ म यजुर्वेद के पहले अठारह अध्यायो का अविरल व्यारयान है। दसवे और ग्यारहवे काण्डो मे अग्निरहस्य, बारहढे म प्रायश्चित्त तेरहवे मे अश्वमेव और नरमेघ और चौदहढे म आरण्यक और उपनिषद् है । इस ब्राह्मण मे वेदार्थ के लिये महान् सामग्री भरी पडी है । वेदार्थ और वैदिक संस्कृति और धर्म के ज्ञान के लिए इतनी उपयोगी पुस्तक शायद ही अन्य कोई हो।

मत्स्यावतारेतिहास]
[ ३१
प्रारयान
३ अत्य वाहाणो के समान इस म भी अनेको रोचक
पायान मिलते है । ये पाख्यान सरल और ललित पदावली मे
गुम्फित हुए है । ये प्रारयान अनेकविध है।
मछली के अवतार की कथा
४ यह कथा शतपथब्राह्मण के प्रथम काण्ड के आठवे
अध्याय में आई है। जलप्लावन की कथा प्राय संसार के सभी
साहित्यो मे पाई जाती है । परन्तु शतपथब्राह्मण की कथा जितनी
सरस, सरल, स्वाभाविक और मौलिक है उतनी अन्य किसी
साहित्य म प्राप्त कथा नहीं है।
५ मत्स्यावतार की कथा बडी सरल और मक्षिप्त है।
'एक दिन मनु जी मुख धोने के लिये जल ले रहे थे कि उन के हाथ
म एक मछली आ गई । मछली ने मनुजी से कहा कि 'मुझे पालो।
मै पाने वाले जलप्लावन से 'तुम्हारी रक्षा पर गी। पहले मुझे
एक घडे म रखना । फिर एक खाई म । जब बहुत बड़ी हो जाऊ
तो समुद्र म छोड देना । जब जलप्लावन हो तो एक नौका म चढ
जाना' । मनु ने मछली को पाला। जब वह बढी हो गई तब उसे
समुद्र में छोड दिया। नियत समय पर जलप्लावन हुआ। मनु
नौका मे चढ़ गए। मछली ने आ कर नौका को पानी में तैरा दिया
और उसे उत्तर में हिमालय पर्वत पर ले गई । यहा जा कर उम ने
मनु को आदेश दिया कि वह नौका को वक्ष से बाघ दे और जैसे-
जैसे पाने उतरने लगे मनु भी पर्वत से नीचे उतरे। मनु ने आज्ञा
का पालन किया। जिस स्थान से मनु नीचे उतरे उसे अव भी
'मनोरवसर्पण' कहते हैं। इस जलप्लावन मे समस्त प्रजा वह गई
थी। केवल मनु बचे थे।

३२] [ वेदभारती इस आख्यान की कथा आगे भी चलती है, परन्तु उस मे कथानक का अश अत्यल्प है। इस अश के अनुसार अब मनु सतान की इच्छा करते हुए घूमने लगे। उहो ने पाक्यज्ञ किया। जिस मे घी, दही आदि की जल में आहुति दी। उस से उन्हें एक पुत्री हुई जिस का नाम इडा था। इडा के निवेदन पर मनु ने उसे यज्ञ में अपना साथी बना लिया। उस से मनु ने मानव जाति की सृष्टि की। यह इडा प्रयाजानुयाज का मध्य ही थी । यही इडा पात्रस्थ यज्ञ सामग्री थी। जो इस प्रकार रहस्य को जान लेता है, वह भी मनु के सदृश प्रजा की सृष्टि कर सकता है। सानुवादो मत्स्यावतारेतिहासः अनुवाद सहित मछली के अवतार की कथा .१. मनवे ह वै प्रातर अपनेग्यम् उदकम् आजह र, यथेद पाणिभ्याम् अवनेजनायाहरन्त्येव तस्थापनेनिजानस्य मत्स्य पाणी आपेदे ॥१॥ अर्थ-एक दिन] प्रात काल मनु के लिए [मुख अादि] धोने के लिए [सेवक] जल लाए। जैसे इस [जल] को हाथों से [मुख आदि ] धोने के लिये लेते हैं, उसी प्रकार बार-बार मुख धोते हुए उस [मनु] के हाथो मे [एक] मछली पहुच गई।

चरैवेति ] [ ३३ १ टिप्पणिया-ह और वै ये दोनो शब्द अव्यय हैं और निश्चय के प्रय मे वेद म प्रयुक्त होते हे । वाक्य म हा का कोई विशेप अर्थ नही लगता है । अपनेग्यम्-अवनेज्यने प्रक्षाल्यते मुबहस्ताद्यनेन इति अवनेग्यम् । प्रव+निज + यत् । अाजह्न प्रा+६+लिट् प्रथम पुरप बहुवचा । अपनेजनाय-(मुखादि) धोने के लिए । अब+निज् +ल्युट चतुर्थी एक वचन नपु सब लिंग । अपने निजानस्य- अव+/निजघड शानच् । पप्टो पत्र वचन पुल्लिग । बार-बार धोते हए के । आपेदे-पा+पद+लिट प्रथम पुरुष एक वचन आत्मनेपद । इस के लिट के स्प ये हैं-आपदे पापदाते प्रापदिर । ग्रापदिप प्रापेदाथे प्रापेदिग्त्र । प्रापद प्रापदिवह आपेदिमह । - २ [माम्य ] म हास्मै वाचमुवाद । “विभृहि पारयिष्यामि त्वेति ।" [मनु "कस्मान्मा पारयिष्यसीति ।" मन्न्य ] "श्रोध इमा सर्मा प्रजा निवोटा, ततस्त्वा पारयितास्मीति ।" ।मनु] "कथ ते भृतिरिति ॥२॥ २ अर्थ- उस [ मछली ] ने उस [ मनु ] से वचन कहे [अति-महा] । 'मुझे पालो। [में] तुम्हें पार उतारू गी [या-चाउगी] ।' [मनु ने मछली में पृट- 'मुझे किस से पार उतारागी [या-चाओगी।

३४ ] [ वेदभारती [मछली ने उत्तर दिया] ~~ 'जन का समूह दन सत्र प्रजाओं को बहायेगा । तुम्हे उस से पार उनाम गी [या- बचाङ्गी] । [ मनु ने कहा-'अच्छा । परन्तु यह तो पतायो ] कि तुम्हारा पालन-पोपण कैसे हो।' २ उपार-Vवद+निट प्रथम पुस्प एक वचन । यह + लोट् मध्यम पुग्प एक वचन । पारयिष्यामि-. पृ+णिप+लट उत्तम पुरुष एक वचन । अथवा- पाल+ला उत्तम पुरुप एम नचा । त्वा-- युप्मद शन का द्वितीया एस वचा। मा-प्रम्मत शका द्वितीया एम वचन । अघ -~-जल का समूह । जलप्लावन । निवाडा--निर+ Vवह-+-लुट लकार प्रथम पुरप एन वचा। इम लकार न दम के रूप ये है–निर्वोढा निर्वोढागे निर्वोढार । निवोढामि निवाडा निवाडास्थ । निवांटास्मि निर्वोढास्व निर्वोढास्म । पारयितास्मि-vY-+-रिंगच + लुट उत्तम पुस्प एक वचन । भृति -पालन । मृ+निन्+त्रीति प्रयमा एक वचन । .३ [मत्स्य ] म होगाच । “यापद् वै नुल्लका भवामी यही नस्तापन नाष्टा भरति । उत मत्स्य एर मत्स्य गिलति । कुम्भ्या माग्रे भिरामि । म यदा ताम् अतिनी अथ रुप सात्वा तस्या मा निभरामि । म यदा तामतिपद्वा अथ मा ममुद्रम् अभ्यरहरामि । तर्हि ना अतिनाटा भपिता- स्मीति" ॥३॥ ३ अर्थ-वर मछली] दोली-'जब त-हन बोटे मे [प्राणी) रहन है, नत्र तक नि मन्देह हमार रने वाले तक नादाव नष्ट करन वाना चरैवेति ] । ३५ [प्राणी] बहुत होते हैं। ओर [एक] मछली ही [दूमरी] मच्छली को निगल जाती है। मुझे घड़े मे [अपनी प्रास्त्रों में] मामन पालना। वह [में] जर उम [घडे] से बढ जाऊ तर साई वोट कर मुझे उम मे रसना [या-पालना] । यह [ में] जर उस खाई से [भी] पडी हो जाऊँ तब मुझे समुद्र मे छोड देना। नत्र नि सन्देह [मैं ] नाशक प्राणियो की पहुंच से बाहर हो जाऊगी।' 3 टिप्पणिया-यारन्-जन अथवा-क्या कि -छोट मे । वह्वी-बहु पद से स्त्रीलिंग हितीया एक वचन । न-अस्मद का पप्ठी वह वचन । नाष्ट्रा मारन बाना । निश+रिणच् + न् । उत—और । गिलति- गृ. निगलना+लट प्रथम पुस्प एक वचन । कुम्भ्याम्-म्भा (घर) सप्तमा एक वचन । विभरासि-vभू पालना धारण करना+ लट् लका मध्यम पुष्प एक वचन । वदिक साहित्य म विधिलिट के अर्थों म एव अर लकार का भी प्रयोग होता है जिसे लेट् नकार क्त है। इस कहानी में लेट के अनका प्रयोग पाए हैं । अतिवर्धे- अनि+v वृध पटना ( बादि० मा मनपद )+लेट् उत्तम पुरप एक वचन । कपृम-बाई । द्वितीया एक वचन, स्त्रीलिंग । खासा- सन् खोदना+वा । मा-अस्मद स द्वितीया एक वचन का वल्पिक स्प है। अभ्यरहरा स-अभि अव+NE+ लेट मध्यम पुम्प एक वचन खोर दना । अतिनाष्ट्र -प्रतीत नाप्टान् इति अतिनाष्ट्र मारने वाले नाशक प्राणिया त पर। अर्यात उन की पहुँच स पर । भचिनास्मि- /भू होना-+ नुट् लकार उनम पुत्प एन वचन । तुट लकार ग्राज से मिन (अनचतन ) भविप्न पाल के लिये प्रयुक्त होता है । [अब मनु ने मचली को पालना प्रारम्भ कर दिया। ४. शयद्ध झा भास । स हि ज्येष्ठ वर्धते ।

३६ ] [ वेभारती [मत्स्यः) "अथेतिथी समा तदोघ आगन्ता । त मा नारमुपकल्प्योपासाम। स आप उत्थिते नाम- मापद्यास, ततस्त्वा पारयितास्मीति" ॥४॥ ४ अर्थ-वह [ मछली ] जल्दी ही वडा मच्छ हो गई क्यों कि वह [अर्थात्-मछली] बहुत तेजी से बढ़ती है। [अर मछली ने मनु से कहा कि-] "अब निश्चित अवधि वाले वर्ष मे यह जलसमूह आयेगा। तर एक नौका बना कर मेरा आश्रय लेना । वह तुम] जलप्लावन क उमडने पर नौका मे बैठ जाना। तब मैं तुम्हे बचा दूगी [या-पार उतार दृगी।"] ४ टिप्पणिया-शश्वत्-दीघ्र ही । झप-मच्छ बड़ी मछली । हि-क्यो कि । ज्येष्ठम् -बहुत ही अधिक अर्थात बहुत जल्दी प्रशस्य (या) वृद्ध+रष्ठन् । इतिथीम्-इयनीना दशाना द्वादगाना वा पूरणी तिथि इतिथी । जिस म इतनी पूरक निथिया हा । इदम् + तिथि +ई ( डोप)। अथवा- इयत्य तिथय यस्या सा इतिथी -श्यतन तिथि-इतिथि । इतने दिन जिस म हो । दोनो अर्थो का एक ही भाव है-निश्चित अवधि वाले। अमुक फला। यह समाम् शब्द वा विशेपण है । समाम-वप। यह शब्द बहुधा स्त्रीलिंग बहुवचन मे ही प्रयुक्त होता है। देखो-कुवन्नवेह कर्माणि जिजिविपेच्छत समा । यजुर्वेद ४०१२। परतु यहा पर एक वचन मे ही प्रयुक्त हुआ है। तनाघ--तन के स्थान पर स का प्रयोग होना चाहिये था ।ौघ. जल का समूह । जलप्लावन । आगन्ता-~-आ+ गम् + लुट प्रथम पुरुष एक वचन । उपकल्प्य-उप+/क्ल्प (बनाना) + ल्यप् । उपासास-सेवन करना आश्रय लेना । उप+ पास वना+लेट - -- चरैवेति ] मध्यम पुस्प एक वचन । आपद्याम-आ+पद प्राप्त होना+लेट मध्यम पुरुष एक वचन । पारयितास्मि-- पृ. वचना, पार लगता+ णिच-+लु उत्तम पुरुष एक वचन । [ अर ऋपि जलप्लावन की क्था प्रारम्भ करते है।। तमेर भृत्ला समुद्रमभ्यरजहार । स यतिथी तत्ममा परिदिदेश, ततिथी समा नानम् उपकल्प्योपामाञ्चक्रे । म औघ उत्थिते नानमापेदे, तम मत्स्य उपन्या- पुप्लुवे, तस्य शृङ्गे नान. पाश प्रतिमुमोच । तेनैतमुत्तर गिरिमधिद्रार ॥॥ ५ अर्थ-उस [मछली] को इस प्रकार [अर्थात-जैसे- जैसे मदली ने बताया था-पहले घडे मे और फिर साई मे] पाल र [मनु ने उमे] समुद्र मे छोड दिया। उस [मछली] । ने जितनी अवधि वाले उस [जलप्लावन के ] वर्ष रा निर्देश किया था उस अवधि वाले [अर्थात-उसी ] वर्ष मे [मनु] नौका बना कर [उस का] सेवन करने लगा [अर्थात् उम नार में रहने लगा] । जल समूह के आने पर यह [मनु] नाव मे चट गया। वह मछली उस [मनु] से पास [नार के नीचे आ गह। उस मिछली के सींग में [मनु ने] नौका की रस्सी को बाध दिया। उस [ नौका की रस्सी ] के साथ वह [मछली] उत्तर दिशा के पर्वत (हिमालय] पर वेग के साथ चली गई । ५ टिप्पणिया-भृत्वा-भृ पालना+क्वा । अभ्यरजहार- अभि+अब+VE (छोडना) +लिट् प्रथम पुरुष एक वचन । छोड दिया । यतिथीम्-इतिथी के समान यावत+तिथि-यतिथी [ वेदभारती जितना अवधि वाले । तत्-'ताम्' होना चाहिये । परिदिदेश-~~परि +दिन+लिट प्रथम पुरुप एक वचन । ततिथीमनावत+तिथि। उतनी अवधि वाले । उपासाच -वठ गया। सेवन किया। उप+ /ग्राम घटना+निट प्रथम पुम्प एक वचन । उस्थिते-जस्थान त+गि मप्तमी एवं वचन । उठन पर उमडने पर आन पर | आपदे-~-या+पर+लिट प्रथम पुरुष एक वचन । उपन्यापुग्नुवे-- उप-+-नि+या+/प्ल जाना तरना+लिट् प्रथम पुरुष एक दवन । समीप में नीचे प्रा गई। प्रतिमुमोच-प्रनि+मुच +लिट प्रथम पुरपए वचा । वार दिया । अपिदुद्रार-~अधि+जाना, दोना--निट प्रथम पुष्प र बचन । वग स चली गई दौर गई। [मत्म्य.] स होगच । "अपीपर पै त्या । वृक्षे नान प्रति- वघ्नीप्प । त तु त्या मा गिरौ सन्तम् उदकम् अन्तरछेमीद्, यारद् उदक ममनाऽयात्, तापत् तापदन्वयमामीति । म ह तात् तारदेवान्याससम् । तदप्येतदुत्तरम्य गिरेमनोररमपणमिति । योघो ह ता मा प्रना निमाह । अथेह मनुरेकर परिशिशिपे ॥६॥ शतपथबामणे १ ३.१.१-६] ६ अर्थ-वह [मछली] वोली-'नि सन्देह [मैं ने ] तुम्हें पार उतार दिया है ] या-बचा दिया है। [अर अपनी] नाव को वृक्ष से वॉर दो। नि सन्देह पर्वत पर वर्तमान तुम्हे जल

[ ३६
चरैवेति ]
बिल्कुल भी नष्ट नहीं कर सकेगा [शब्दार्थ-नही नाट
सकेगा । जैसे-जैसे जल नीचे उतरता जाए वैसे-वैसे [तुम
भी] नीचे उतर आना।
वह मनु [जैसे-जैसे जल नीचे उतरता गया] पैसे-से ही
नीचे उतर आग। [जहा में मनु नीचे उतरे] उत्तर दिशा में
पर्वत [हिमालय] के उम इस [यान] को भी 'नोरनगण'
(मनु र जरने का म्यान) [रहने हैं ।
जनालापन ने उन सब प्रजामओ को कहा दिया। तर पहा
{इस समार मे) मनु ही अरेला बचा।
६ टिप्परिणया- अपीपरम –v वचना, उत्तरमा+च+
लुट, उत्तम पुरुप एक वचन । पार उतार दिया है । यचा दिया है।
मन्तम्-
-अत्त हाना++ पुल्लिग द्वितजा एक वचन । अत -
अत तर पूरा स्म म बिल्कुल । मा दैत्मीन-मा के बा म जुट,
लकार का प्रयोग होता है और प्र कालाप हो जगा है । अच्छेन्सीत्-
Vहिद + लु, प्रथम पुस्प एक वचन । इस वाक्य का प्रवर गिरी
मा उत्पीन' होग। समायान-सम्+
अव++या+लट प्रयम पुरुष एक वचन यहा पर लट लकार
का प्रयास विधिलिट प अय महता है। अच्छी प्रकार माने जाए
प्रधान उत'न तो । अन्चासमि-अनु+व+ सृप जाना+लट
तबार मध्यम पुष्प एक दान । नाचे स्तरमा । रन्वयसम-अनु+
अव + प + लिट् परम पुरुप
प्रमर्पणप-प्रव+ मृ+तुट+नमा गिप्रथमा + पचन ।
निम्बाह-निर+/वह +निट प्रथम पुरष एक वचा। अह-प्रथ+
ह पशिशि-प+ "नट प्रथम पुरप एरन् ।
नु
मन त ला उदनम् अत
वचन

.४ मनोः प्रजातिः मत्स्यावतारेतिहासस्योत्तरार्द्धः १. सोऽर्चञ्छाम्यश्चचार प्रजाकामः । तत्रापि पाफ- यज्ञेनेजे । स घृत दधि मस्त्नामिक्षामित्यप्सु जुहमाञ्चकार । तत सवत्सरे योपित् सम्बभूव । मा ह पिब्दमानेगोदेयाय । तस्य ह स्म घृत पदे मन्तिष्ठते । तया मित्रावरुणौ सञ्जग्माते ॥७॥ मनु की प्रजा ( मछली के अवतार की कशा उत्तरार्द्ध ) १ अर्थ-सन्तान का इच्छुक वह [मनु] पूजा करता हुआ और काट मैलता हुआ रहने लगा। वहा भी उम ने पास्यज्ञ से हवन किया (अर्थात पौष्टिक पदार्थों का सेवन किया)। उस ने जलों (अर्थान प्राणों) मे घी, दही दही की मलाई, दही के पानी (अथवा दूध और दही की बनी लासी ( का हवन किया। ( =गन किया अर्थात्- सेरन क्यिा ) । उस से एक वर्ष में एक स्त्री उत्पन्न हुई । वह तो मानो शरीरधारी पाक्यज्ञ ही उठ पाई थी। उस के (निर्माण के लिए आहुतियों मे घी विद्यमान था। उम [स्त्री] से मित्रावरुण देवताओं (अर्थात-प्राण और अपान, या प्राण और उदान ) की भेट हुई।

मनो प्रनापति ] [ ४१ एस वप में स्त्री की उत्पत्ति का भाव अथववेद ८।१०()" म भी है। १ टिप्पणिया–अर्चन्- अच पूजा करना+शतृ + पुल्लिग प्रथमा एक वचा । देवतामा की पूजा करता हुप्रा । श्राम्यन् - श्रम् थकना परिश्रम करना+गढ़+पुल्लिग प्रथमा एक वचन । थवता हुअा, परिश्रम करता हुना अर्थात क्प्ट भोगता हुा-तप करता हुप्रा । पाफयज्ञन-शतपथब्राह्मण में लिखा है-'पश यो हि पाकयन (२।३।१।२१) 'पशवो वा इडा (१।८।१।२०) । अपि च --शतपथब्राह्मण १।८।१११२-१३ के आधार पर इडा का अथ इडा नामर यनपान मे रक्षी हुई पुरोडारा आदि सामग्री है । यही पशु है। यही पाक्या है । प्रत इम ब्राह्मण के मत म पाक्यन का अथ इडापान मे रक्त्री हुई सामग्री है । इस अथ की पुष्टि अथववद ३ १०११-'डया जुह्वतो वय घतवता यजे । गृहानतुम्तो वय स विशेमोप गोमत -पन म घीयुक्त सामग्री स हवन करत हुए लालचहीन हम गाग्रो से भरे को प्राप्न हो-से भी होती है । यहा यह सामग्री धन दघि मस्त्वा मिक्षाम् इन पदो मे बताई गई है । अपम् शद का अथ प्राण है। अत पौष्टिक पदार्थों की प्राणो म प्राहुति अर्थात उन का प्रयोग ही पनयज्ञ होता है। गोपथ ब्राह्मण ( १॥५॥२३ ) के मत मे साय प्रान)मी स्थानीपाको नवरच । वनिश्च पितृयनश्वाष्टका पारित्यते पाक्यज्ञा । अथान-(१) प्रात और (२) साय हवन करना (३) नया पौष्टिक भोजन तय्यार करना (४) बलिवश्वदव यन (४) पितृ- यज्ञ (६) अष्टका यन और (७) पशुपालन यज्ञ-ये सात यज्ञ पाक्यन होते हैं । प्राश्वलायन अपने गृह्यसूत्र में इन की सख्या तीन ही बताते हैं और मनु बार। ईजे-/यज+लिट् प्रथम पुरुष एक वचन । मस्तु- दही को मलाई । श्रामिक्षा-दही का पानी अथवा दूध और दही को हुए घरो य सप्तम [ चेदभारती मिला कर बनाई हुई लसी । श्रासु--जलो में प्राणा मे। [ देखो नापो व प्रारणा । शतपथब्राह्मण ३।६।२।४] । जुहवाचकार- हु बन करना दान करना ग्रहण करना+लिट प्रथम पुरप एक वचन । हवन क्यिा ग्रहण किया। पिब्दमाना-श्री मोनियर विलियम्ज ने इस का अथ स्थिर' दृढ दिया है । ऋग्वेद १०।१०।११ मे सायण ने इम का अथ शद करते हुए किया है। परतु यहा पर 'धाररा भरते हुए अथ ही उपयुक्त है । सायण ने यहा पर इम का अर्थ पाक्धर्मात्मिवा' अर्थात 'पाक्यज्ञ रूप दिया है । इस ब्राह्मण के आने के लख से इमो अय की पुष्टि होती है । अत इस का सरल अथ शरीरधारी पाक्यन किया जा सकता है । तस्य में तादध्य मे चतुर्थी है । पदे-स्थान म पाहुतिया मे । उदेयाय-उद+मा+Vइ जाना+लिट प्रथम पुरुप एक वचन । मित्रावरणी-मिन और वरण देवता । प्राण अपान या प्राण और उदान वो भी मित्रावरुण यहत हैं। सजग्मात-सम्+ गिम जाना+लि प्रथम पुरष द्विवचन आत्मनेपद । मिल । २. ता होचतु - काऽसीति । मनोहितेति । आपयो प्वेति । नेति होवाच । य एव मामजीजनत, तस्यैवाऽहमस्मीति । तस्यामपि समीपाते । तद्वा जतो तद्वा न जज्ञावतित्वेवेयाय । सा मनुमाजगाम ॥८॥ २ अर्थ-उन [मित्र और वरण-प्राण और श्रपान या प्राण और उदान] ने उस [ पास्यज्ञात्मिका स्त्री ] से पूछा- [तुम] कौन हो ? [ उस स्त्री ने उत्तर दिया ] कि [में] मनु की पुत्री हूँ ।' [मित्रापरुण ने कहा कि ऐमा मत कहो वरन् ] यह कहो कि हमारी पुत्री हो ] । [उस स्त्री ने] उत्तर दिया- नहीं। [यह कहना सम्भव नहीं ]। जिस ने ही मुझे उत्पन्न क्यिा है उस की ही में (पुत्री] हूँ।

मनो प्रजापति ] [ ४३ परन्तु उम [स्त्र] पर भी वे दोनो [ मित्र और वरुण ] शासन करते हैं (अर्थात्-अधिकार रखते है) । उस [स्त्री] ने इस [तथ्य को माना अथवा न माना परन्तु वह [रहा से] चली गई । वह मनु के पास पहुची।।।। दम सदभ का भाव यह है कि प्राण और अपान या प्राण और स्दान ने शरीरधारी पाक्यन स्प स्त्रो (अधात-पौष्टिक पदार्थों के मवन से उत्पन गक्ति ) ने पूछा कि वह कौन है । उम म् ने कहा कि मुझे मनु ने बड़ी कटिन्ना मे [ दृ दुपेन हिता स्थापिता प्राप्ता इति रहिता ] प्राप्त किया है । इम पर मित्रावरुण (प्राण, अपान) ने उन स्त्री ( शक्ति पर अधिकार बताया । परन्तु व्यय । ऋपि कहते है कि वस्नुत मित्रावरण का भी उमस्ती (गक्ति। पर अधिकार धा यो नि अदतिया देवताग्रो को दी जाती हैं। उन की सम्पत्ति रोती हैं अत जातियो मे उत्पन वह स्त्री मित्र और वरण की पुत्री थी। मनुष्य का अस्तित्व प्रारणा के साथ ही है । अत उस की शक्ति प्राशो को भी है । २ टिप्पणिया-चतु ---दच बोलना+लिट प्रथम पुन्ग द्विवचन । अनीजनत-/जन् उत्पन्न होना+च+जुद प्रथम पुरप एक वचन आत्मनेपद । त्वमीपाते-तु+प्रमो+ईपाते। अमी-द्विवचन । यहा 'अमू के स्थान पर अदस का पुल्लिग प्रयपा वहुवचन प्रयुक्त हुआ है। ईपाते-/ईप से लट् प्रथम पुष्प द्विवचन । अज्ञो- ना+लिट प्रयम पुस्प एक वचन । यह 'प्रतिबनी के स्थान पर प्रयुक्त हुआ है । मानिया, स्वाकार कर लिया। अतिवेयाय-अति+तु+ एव+इयाय । इयाय-1+लिट प्रथम पुरुष एक वचन । अति का इयाय से सम्बध है । छोड कर अतिक्रमण कर के चली गई। ३ ता" ह मनुरुवाच-काश्मीति । तर दुहितैति । क्थ भगति मम दुहितेति । या यमूरप्स्वाहुतीरहोपीर् धृत दपि मस्त्यामिक्षा, ततो मामजीजनथाः । साऽऽशी- - ४. ] | वेदभारती मिला कर बनाई हुई ल सी । अप्मु---जला म प्राणो म । [ देखो आपो व प्राणा । शतपथब्राह्मण बारा४] । जुह्वाचकार-हु बन करना दान करना ग्रहण करना+लिट प्रथम पुरप एक वचन । हवन किया ग्रहण किया। रिब्दमाना-धी मानियर विलियम्ज ने इस का अथ स्थिर' दृढ किया है । ऋद १०१०११११ म सायण ने इस का सब र बरते हुए किया है। परतु यहा पर धाररा करते हुए' अथ ही उपयुक्त है । सायण ने यहा पर इस काम पारधर्मात्ममा' अथात 'पाक्यज्ञ रूप' किया । इस ब्राह्मण के आगे में लेख से इसो अथ की पुष्टि होती है । अत इस का सरल अथ शरारधारी पाक्यज्ञ किया जा सकता । तस्य म तादथ्य म चतुर्गी है । पदे-स्थान म पाहुनिया ने । उदेयाय-उद+आ+Vइ जाना+लिट प्रथम पुरप एक वचन । मित्रावरणौ~-मित्र और वरण देवता। प्राण अपान या प्राण और उदान को भी मित्रावरुण बहते हैं। सजग्माते--सम्+ /गम् जाना-+लि प्रथम पुरष द्विवचन अात्मनपद । मिल । २. ता होचतु -काऽसीति । मनोहितेति । आयो प्वेति । नेति होाच । य एव मामजीजनत, तस्यैवाऽहमस्मीति । तस्यामपि त्वमीपाते । तद्वा जज्ञौ तद्वा जज्ञापतित्वेवेयाय । सा मनुमाजगाम ॥८॥ २ अर्थ- -उन [मित्र और वरण-प्राण और अपान या प्राण और उदान] ने उस [ पाश्यज्ञात्मिका स्त्री ] से पूछा-- [तुम कौन हो? { उस स्त्री ने उत्तर दिया } कि में मनु की पुत्री [हूँ।' [मित्रानरुण ने कहा कि ऐसा मत कहो परन् ] यह कहो कि हमारी पुत्री हो । [उस स्त्री ने] उत्तर दिया- नहीं। [यह कहना सम्भ नहीं । जिस ने ही मुझे उत्पन्न क्यिा है उस की ही में पुनी] हूँ।

मनो प्रनापति ] [ ४३ परन्तु उम [स्त्रं ! पर भी वे दोनों [ मित्र और वरुण ] शासन परत है (अर्थात्-अधिकार रखते हैं) । उस [स्त्री] ने इस [तथ्य] को माना अथवा न माना परन्तु यह रहा से चली गई । वह मनु के पास पहुची ।।।। न्म सदभ का भाव यह है कि प्राण और अपान या प्राण और उदान ने शरीरधारी पाश्यन म्प स्त्रो (अर्धात-पौष्टिक पदार्थों के सेवन मे उत्लन शक्ति ) मे पूछा कि वह कौन है । उस स्त्री ने कहा कि मुझे मनु ने बटी कठिनता मे [ दृ दुखेन हिता स्थापिता प्राप्ता इति दुहिता ] प्राप्त किया है । इस पर मित्रावरण (प्राग, अपान) ने उस स्त्रो (= शक्ति) पर अधिकार बताया। पर व्यथ । ऋषि बढे है कि वस्तुत मित्रावरण का भी उस स्त्री (शक्तिपर अधिकार था क्यो कि अहुतिया देवताना को दी जानी हैं। उन की सम्पत्ति होती है अत आहुतियो मे उत्पन वह स्त्री मित्र और वरुण की पुत्री थी। मनुष्य का अस्तित्व प्राणा के साथ ही है । अत उस को शक्ति प्रागा की भी है। २ टिप्पणिया-उचतु -Vवर बोनना+लिट प्रम पुम्प द्विवचन । अनीजनत-जन उत्पन्न होना+च+ लुन, प्रथम पुरुप एक वचन पात्मनेपद । त्वमीपाते-नु+मी+ईपाते। अमी-द्विवचन । यहा 'अमू के स्थान पर अदम' का पुल्लिम प्रथपा बहुवचन प्रयुक्त हुआ है। ईपाते-Vईप से लट् प्रथम पुम्प द्विवचन । जज्ञी- /ना-+-लिट प्रथम पुरुष एक वचन । यह 'प्रतिजनो के स्थान पर प्रयुक्त हुपा है । मान त्रिया, स्वागार कर लिया। प्रतियेयाय--प्रति-+तु+ एव+इयाय । इयाय-Vs+लिट् प्रथम पुरुप एक वचन । अति का इयाय से सम्बध है । छोट कर-अतिरमण कर के चलो गई ।।८।। ३. ताह मनुरुषाच-काऽसीति । तर दुहितैति । क्थ भगति मम दुहितैति । या अमूरप्स्वाहुतीरहोपीर् घृत दवि मस्त्वामिता, ततो मामजीजनथाः । साऽऽशी- - ४४ ] [ वेदभारती रस्मि । तामा योऽल्पय। यो चढ़े माअाल्पयिष्याम, बहुः प्रजया पशुभिर्भविष्यमि । यामु मया काचाऽऽशिष माशामिथ्यसे, सा ते मर्ग समर्द्धिप्यत इति । तामेतन्मध्ये यजस्यानाकल्पयत् । मध्य एतद् यज्ञस्य यदन्तरा प्रयाजानुयाजान् ॥६॥ ३ मनु ने उस [इडा} से पूछा- तुम] कौन हो।' [ इडा ने उत्तर दिया }-में) तुम्हारी पुत्री हूँ।' मनु ने फिर पूला ] 'कि हे ऐश्वर्यशालिनी देवि! आप] मेरी पत्री कैसे [६] ?" [उस इडा ने उत्तर दिया ]-'! आप ने ] जो वे घी, दही दही की मलाई ओर नही के पानी [अथवा] दूध दही की धनी हुई लप्सी ] की जलों अर्थात प्राणों) में आहुतिया दी थी, उन से मुझे उत्पन्न क्यिा है । वह ! मैं शाप की भलाई की कामना [8] हूँ । उस मुझे [श्राप] यज्ञ मे [अपना] अङ्ग (अर्थात-साथी, पत्नी ) बना लें। यदि नि सन्दिग्ध रूप से [प्रार] मुझे यज्ञ में अपना ( साथी, पत्नी ) बना लेगे तो आप] सन्तान और पशुओं से बहुत ( सम्पन्न ! हो जायेंगे । नि सन्देह मेरे साथ मे [श्राप } जिस किसी हिनकामना की चाहना करेंगे वह सर तुम्हे अच्छी प्रकार सिद्ध हो जायगी (शब्दार्थ-खब बढ़ जायगी)। इस का भाव यह है कि मुझ अपनी पली बना पर मुझ से काम लौ । म तुम्हारी शनि है। मसार म सब वाम शक्ति से ही मिद होने है । अत मरे से तुम्हारी सब ही इच्छए पूर्ण हो जायेंगी। दूसरी पार विवाह द्वारा ही सन्तान की प्राप्ति होती है । गृहस्थी होने पर ही मनुष्य मसार कामो में ग्रासक्न हो कर अनेक प्रकार के काम करता है और यनरुप बनाता है । मत यह ब्राह्मण इस सुन्दर गल्प के द्वारा ।

मनो प्रजापति ] [ ४५ मनुष्या को ब्रह्मचय प्राधम मे गविन सगृहीत कर के गृहस्थ म प्रवेश करन विवाह करने सतान उत्तन करने तथा धन कमान की शिक्षा दे रहा है। [मनु ने] [उस की प्रार्थना और आग्रह पर] उस [इड!] को यज्ञ के बी में अपना अङ्ग बना लिया। निसन्देह यज्ञ का वीच यही है जो प्राण (प्रयाज) और अणन ( अनुयाज) के बीच मे है ।। भाव यह है कि मनु ने उस शक्ति को अपना अङ्ग बना लिया और उम मे शक्तिसम्पन हो कर वह यज्ञ (= अच्छ अच्छे कम) करने लगा । समस्त क्मों का केंद्र प्राण और अपान के बीच म स्थित है। प्रत मनु ने उस शक्ति से प्राण और अपान के बीच मे स्थित इस कमों वे केन्द्र को शक्तिशाली बना दिया। ताम् इति ३ टिप्परिणया-भगति-भग ऐश्वय को कहते है। प्रत ऐश्वयशालिनी देवी पल्याणी, भाग्यवती । यहा यह सम्बोधनष्प है। अमू = अदम्-शब्द का स्त्रीलिङ्ग द्वितीया बहुवचन । पाहुती माहुति का द्वितीया बहुवचन । मति के समान रूप बना है । अहीपी- Jहु+ लुइ मध्यम पुस्प एक वचन । हवन किया था दधि मस्तु- दोनो द्वितीया के एक वचन हैं और अहोपो क्रिया के कम है तथा 'आहुती' पद का व्याख्यान है । अजीजनथा -/जन+श्चि+लुङ, मध्यम पुरुष एक वचन । आशी - भलाई की कामना । माअस्मद का द्वितीया के एक वचन वा दूसरा रूप । साधारण म्प 'माम् होता है । अबाल्पय-प्रव+पि+रिणच+लोट मध्यम पुरुष एक वचन । अङ्ग बनायो । मया-यहा पर सह' का प्रध्याहार करना चाहिए । मेरे साथ । मेरे साहचय मे अथात मुझ से युक्त हो कर। श्राशासिप्यसे-पा+वास्+ पिच+लुट मध्यम पुरुष एक वचन । - ४६ ] [ वेदभारती ते तव । तुम्हारी । समर्पियते-सम् +Vऋषु (बदना) (दिवानि) +लट् प्रथम पुरुष एक वचन । इम के स्प-ध्यति । ऋध्येन् । ऋध्य तु। श्रा यत ( लट) प्रानद्ध (लिट) 1 अधिप्यनि । प्राद्ध त आद्ध तान, प्राद्ध न (लुट.) 1 ईत्मति (मनन्न) । अधयति (गिजत) और अनिवा बनते हैं। यहा आत्मनेपद का प्रयोग वदिर है। इसे कम व्यतिहार का प्रयोग मान कर भी पात्मने पद पाया माना जा सकता है। ताम् प्रयानानुयाजान् एतत्-यहाँ "एताम्' के लिए पाया है । उस मत्रावरती मानवी पिदमाना इडा गे। अचाक्ल्पयत्-अव+क्लप्+रिण+ नड, प्रथम पुरप एक वचन । प्रयासानुया पान्-ऐतरेय कोपोतकि शतपथादि ब्राह्मणो के मत मे-'प्रारणा वै प्रयाजा' और अपाना अनुयाजा' अर्थात प्रयाज-पारण और अनुयाज-अपान हैं । अत प्रया जानुयाजान् का अथ प्राण और अपान है । इस अय की पुष्टि प्रणा वै प्रयाजानुयाजा' (शतपथब्राह्मण १४३२।५१ ) -~-प्राण हो प्रयाजानुयाज हैं, तथा 'पयाजानुयाजा वै देवा प्राज्यपा' (शतपथब्राह्मण १।४।२।१७ आदि)-घी पीने वाले देवता हो प्रयाजानुयाज हैं से भी होती है । भाष्यकार सायण ने 'प्रयाजा' का प्रथ इस नाम में मन और 'अनुयाजा का अथ घी की आहुति' रक्खा है। यह अथ मध्य काल को विनि याज्ञिक मनोवत्ति को बताता है तथा भाष्यकार के ब्राह्मण ने मूल भावा के अनववोध का परिचय देता है । वास्तव म यह सम्पूण प्रात्यायिका काल्पनिक और पालकारिक है। ब्राह्मण ने स्वय इस मा निर्देश किया है । कुछ अाधुनिक वैदिक विद्वान मध्यकालीन शली के पीछे चलते हुए लेख के पूर्वधि को ते लेते हैं और उत्तराध की उपक्षा कर देते हैं । इस प्रकार वे मनमाने नि निकालने मनो प्रजापति ] [५७ ४ तयाऽर्चच्छाम्यश्चचार प्रजाकाम तयेमा प्रजाति प्रजजे, येय मनो प्रजातिर याम्वेनया काञ्चाऽऽशि- पमाशास्त माऽस्मै म; ममार्द्धयत ॥१०॥ ४ सन्तान का इच्छुक [वह मनु] उस [इडा] के साथ पूजा करता हुआ और कष्ट झेलता हुया रहने लगा। उस [इटा] के माथ [उस ने] इस प्रजा को उत्पन्न किया जो यह मनु की प्रना [ कहलाती है। ] लालसा से प्रेरित हो] (अथवा उस के साथ ) उस [मनु] ने जिस किसी हितकामना की चाह की वह सब उसे पूर्ण रूप में प्राप्त हो गई ।।१।। ५ प्रजातिम् -प्र+जन + क्लिन् । द्वितीया एक वचन । प्रजापो को । प्रज्ञे-प्र+/जन्+लिल प्रथम पुरुष एक वचन । यहा णिजत का भाव अभीष्ट है । वेनया-वना से तृतीया एव वचन । कामना से लालसा से इच्छा से । 'याम्वनया' का पदच्छद याम् उ एनया' भी किया जा सकता है । एनया-इदम् पद का स्त्रीलिंग तृतीया एक वचन है। इस पदच्छेद से अय ययपि पर्याप्त स्पप्ट हो जाता है, परन्तु इस म उत्कट अभिनापा का भाव नष्ट हो जाता है । विना उत्कट अभिनापा के मनुष्य कर्मों में अपनी इच्छा मे प्रवत्त नहीं होता है । अन 'या वेनया' यही पदच्छेद अच्छा है । आशास्त- प्रा+Vशास+ल, प्रथम पुरप एक वचन । ५. संपा निदानेन यदिटा । स यो हैव विद्वानिडा चरत्येता है। प्रजाति प्रजायते, या मनुः प्राजायत । याम्वेनया काञ्चाऽऽशिपमाशास्ते, साऽस्मै सर्ग समृद्धयते। ५ चिह्नों से । निश्चय किया जा सकता है ] कि वह [स्त्री] यह [ही है। जो इडा पात्र में रखी हुई मामग्री है।

[ वेदभारती नि सन्देह जो इस प्रकार जानने वाला है और इडा के साथ रहता है वह नि सन्देह उसी सतान को उत्पन्न करता है जिस को मनु ने पैदा किया और उत्कृष्ट इच्छा से (अथवा उस के द्वारा जिस किसी हितकामना की चाह करता है उस की यह सब [हितकामना] सम्पूर्ण रूप से फलती फूलती है ।। ११ ।। टिप्पणो-निदानेन-पहचान से चिह्नो से ॥११॥ भाव यह है कि जो व्यक्ति यज्ञ में आहुति डाल कर अपने स्व थ का त्याग कर दूसरी का उपकार करने की भावना रखता है उस को सब गुभ कामनाएं पूरी हो जाती हैं। यही भ व वसिष्ठ धमसूत्र २६।१ के दानेन सर्वान् कामान् अवाप्नोति --दान से सब कामनायो को प्राप्त करता है-म है। [शतपथब्राह्मणे १२११७–११] शुन शेपाख्याने वरुणस्य तितिक्षा कथा का प्रयोजन और भाषा १ यह कथा राजसूय यज्ञ से सम्बन्ध रखती है। देखने में इस मे मानव की बलि का आभास मिलता है, परन्तु ऐसी बलि यहा न दी गई है, न अभीष्ट है । वस्तुन अजीगत सौयवसि ।

वरणस्य तितिक्षा ]
39344 [ ४६
स्वार्थपरता का और शुन शेप परोपकार लोककल्याण और
राष्ट्रहित का द्योतक है। आरयान शब्द का अर्थ-- पा सनतात्
समग्रस्पेण वा स्यायते-वर्ण्यते प्रस्तूयते वा'-अर्थात् जो सम
ग्रता से- स्पष्टता से वरिणत क्यिा जाय-रखम्बा जाय, वह
पार नि है । इस का एक पर्याय 'इतिहास' ( इति हास'--
इस प्रकार प्रस्तुत किया है-वणित क्यिा है ) है । अत आम्यान
किमी तथ्य को रोचक, कहानी के रूप में वर्णित करने को कहते
है। देवताओ और सृष्टि मे सम्बर के कारण इन्हे पुराक्था
भी कहते हैं।
२ इस क्था म वाक्य पूरे पूरे नही हैं। बहुत सा भाव
अध्याहार द्वारा स्पष्ट अोर पूर्ण किया जाता है।
16
शुनःशेपाख्याने वरुणस्य तितिक्षा
शुन शेप के बारयान मे वरुण की सहनशीलता
१ अथैनमुनाच नरुण गनानमुपपात-"पुनो मे
जायता, तेन त्वा यजा" इति ।
१ अथ-अब उस [राजा हरिश्चन्द्र] को [ नारद ने ]
कहा कि राजा वरुण की [शरण मे जायो (और प्रार्थना कर
कहो कि 'मेरे लडका हो जाए, उस से तुम्हारे लिए यज
रूगा।'
१ टिप्पणिया-उपधात्र–उप+/धाव +बोट
पुरुष एक वचन । यता इति-यज+इति । यज-यम् + लोट्
उत्तम पुस्प एक वचन ।
मध्यम

५० ]
[ वेदभारनी
[हरिश्चन्द्रः] * २. "तथेति ।
हरिश्चन्द्रः] स वरुण राजानमुपममार-'पुत्रो मे जायता,
तेन त्वा यजा" इति ।
वरुणः
"तयेति ।
तम्य पुत्रो जज्ञे रोहितो नाम । इति ।
[परुण.] त होपाच-"प्रजनि वै ते पुनः । यजस्न
मानेने"ति ।
अर्थ-[हरिश्चन्द्र] "बहुत अच्छा' कह कर मान गया ] ।
[हरिश्चन्द्र] वह राजा वण के पास गया-'मेर पुत्र हो
जाए। उस से मैं तुम्हे यज्ञ करू गा।'
विरुण]--[वरण ने उस की बात मानते हुए कहा] 'बहुत अच्छा ।
उम [हरिश्चन्द्र को एक पुत्र उत्पन्न हुआ [जिस का]
नाम रोहित [था] ।
विरुणा-[वरुण ने ] उस [हरिश्चन्द्र] को कहा-'तुझे पुत्र
हो गया है। मुझे इस से [अर्थात-इस को] यज्ञ कर
दो [बलि दे दो?"
२ टिप्पणिया-उपयसार- उप+स-+लिट प्रथम पुरुप
एक वचन । जज्ञे-/जन +लिट प्रथम पुरुष एक वचन । अजनि--
/जन् कमवाच्य लुड प्रथम पुरष एक वचन । यजम्य- यज्+
इस सम्पादन म मस्कृत और हिन्दी अनुवाद म बाई पार
[]-इन कोष्ठको मे कहानी में सवाद की उक्तियो के घनायो के नाम
दिए गए हैं । ये नाम मूलपाठ के अश नहीं है । सम्पादक द्वारा भाव को
स्पष्ट करन के अभिप्राय से जोडे गए हैं।
*

वरुणस्य तितिक्षा ] [५१ लोट् मध्यम पुरुप एक वचन पात्मनेपद । मा- अस्मद्+द्वितीया ए५ वचन पुल्लिग। [हरिश्चन्द्र ] ३ -म होवाच- "यदा पशुनिर्दशो भव- त्यथ म मेध्यो भवति । निदशो वस्तु । अथ या यजा इति । [रुण]-"तये"ति। [वरुण]-म ह निर्दश ग्राम । त होपाच--"निदशो- धभूद् , यजम्म माऽनेने"ति । {हरिश्चद्र] ३ अर्थ-बह हरिश्चन्द्र] बोला [अर्थात्-उस ने उत्तर दिया] -बन पशु दम दिन के उपर का हो जाता है [शब्दार्थ-दस दिन पार कर लेता है। तन [ही] वह यज्ञ के योग्य होता है। [इस लिए] इसे दस दिन का हो जाने दो। तर तुम्हारे लिए यज्ञ करूगा।" विरुण-[वरुण ने मानते हुए कहा) ऐसा ही हो] । वरण]-वह [रोहित] दस दिन पार कर चुका [अर्थात् दस दिन का हो गया ।] [उस वरुण] ने उस [राजा हरिश्चन्द्र] से कहा- नि सन्देह यह दस दिन का हो गया है। [अर तो] इस से मुझे यज्ञ क्रो।" ३, दिप्पणिया-पशु -जो देखता है, या जिसे देखते हैं, वह पशु कलाना है । पुरुष, अश्व गाय, भेड वारी-ये पाच पशु हैं । यन-देवपूजा मगतिकरण और दान के योग्य सशक्त और समन प्राणी हो सकता है । अत हरिश्चन्द्र इस प्रकार कह पर रोहित के युवक होने तक वरण को मनाता रहता है, और वनण भी मानता ५२ ] [ वेदभारती रहता है। निर्दश -निमात निगत वा दशभ्य दिनेभ्य ---दस दिना में पार गया हुमा अत दस दिन की आयु का। इस से पहले अशीच का काल भी होता है। मेध्य -/मेघ+यह+पुलिग प्रथमा एक वचन I /मेघ के अय मेधा हिंसा और सगम (मिलन) है । सामायत इम के अथ पवित्र होने, हिंसा करने योग्य होते है। बलि स पूर्व भी है । सगमन-मिलना यनस्म है। आस- अस् होना+लिट लकार प्राणी को शुद्ध किया जाना प्रथम पुरप एक वचन । अभूत्-- भू-+सुड प्रथम पुरुष एक वचन । [हरिश्चन्द्रः] ४. स होगाच-"यदा वे पशोर्दन्ता जायन्ते- ऽथ स मेध्यो भाति । दन्ता वस्य जाय- न्ताम् । अथ त्वा यजा" इति । [वरुणः "तथेति । इति । तस्य ह दन्ता जज्ञिरे। त होगाच-'प्रज्ञत वा अस्य दन्ताः । यजस्म माग्नेने"ति । [हरिश्चन्द्र] ४ अर्थ-उस [हरिश्चन्द्र] ने उत्तर दिया-'जब पशु के दात निकल आते है, तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इस के दात आ जाए । तब (में] तुम को यज्ञ करूगा।" [वरुण] -[वरुण ने कहा]-'बहुत अच्छा। उस के दात निकल आए। उस हरिश्चन्द्र] को [वरुण ने] कहा-"इस के दात निक्ल पाए है। इस [गेहित] से मुझे [ अर्थात् मेरे लिये । यक्ष करो"

वरणस्य तितिक्षा ]
४ टिप्पणिया---म्चियद्योतन अन्चय है। सामा यत
वाक्य में इस का भय नहीं किया जाता है। जज्ञिरे-मन्+लिट
प्रथम पुरुप बहुवचन । अज्ञत-जन्+लुङ प्रथम पुग्प बहुवचन ।
[हरिश्चन्द्रः] ५ स होगाच-“यदा वै पार्दन्ता पद्यन्ते
ऽथ स मेध्यो भवति । दन्ता न्वस्य पयन्ताम् ।
अथ त्वा यजा" इति ।
[रुण.] "तयति" इति।
तस्य ह दन्ता पेदिरे।
[परण.] त होवाच-"अपत्सत वा अस्य दन्ताः ।
यजस्व माऽनेने"ति ।
[हरिश्चन्द्र.] स होराच-"यढा नै पशोदन्ता' पुनर्जा-
यन्तेऽथ स मेध्यो भवति । दन्ता वस्य पुनर्जा-
यन्ताम् । अथ त्वा यजा" इति ।
(वरुपः]
"तथेति" इति ।
तस्य ह दन्ता पुनर्जगिरे ,
[रुणः] त होवाच-"अब्रत या अस्य पुनदन्ता. यजस्त्र
माऽनेने"ति ।
हिरिश्चन्द्र]-५ अर्थ-वह [हरिश्चन्द्र] बोला-'नि सन्देह जब
पशु के [दूध के दात गिर जाते हैं तब वह यन के
योग्य होता है। इस के दान गिर जाण । तत्र में
तुम को यज्ञ क्रूगा।"
.

५४ ] [ वेदभारती (वरुण] [रुण मान गया कि] 'बहुन ठीक' । उस [रोहित] के [दूध के दात गिर गए । [धरण]-[वरुण ने] उस [ हरिश्चन्द्र से फिर ] कहा- 'दम रोहित] के दात गिर गए हैं। [अब] इस [रोहित] से मेरे लिए यज्ञ करो।" [हरिश्चन्द्र]-उस हरिश्चन्द्र] ने [फिर टलाते हुए कहा- निसन्देह जर पशु के दांत निकल आते है, तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इस के दात फिर निकल श्राने दो । तब [में तुम्हे उस [रोहित] से यज्ञ कर दृगा। विरुण]-[वरुण मान गया-बहुत अच्छा। उस [रोहित] के दात फिर निम्ल आए। [रुण]-विरुण ने] उस [हरिश्चन्द्र] से [फिर] कहा- दात फिर निकल आए हैं। [अब मेरे लिए इस से यज्ञ करो।" ५ टिप्पणिया-पद्यन्ते-vपद जाना से लट प्रथम पुरुष बहुवचन । इस मे प्रव+/पद का भाव अभिप्रेत है। अव उपग्ग का प्रयोग नहीं किया गया है, क्यो कि पद बिना उपसर्ग के भी 'गिरना' अथ को व्यक्त करने मे समथ है । पद्यन्ताम्- पद्+लोट प्रथम पुस्प बहुवचन । पेदिरे-/पर+बिट प्रथम पुरुप बहुवचन । श्रपत्सत- पद्+लुङ, प्रथम पुरुष बहुवचन । [हरिश्चन्द्रः] ६. स होवाच--"पदा वै क्षत्रियः सानाहुको भाति, अथ स मेध्यो भवति । सनाह नु प्राप्नोतु । अथ ला यजा" इति ।

- . वरुणस्य तितिक्षा ] [ ५५ (परुण] "तयेति । इति । स ह सनाह प्रापत् । [रुण.) त होनाच-"सनाह नु प्राप्नोद, यजस्त्र माऽनेने"ति। (हरिश्चन्द्रः) 'स तये"त्युक्त्वा पुत्रमामन्त्रयामास- तताय वै मह्यमदाद्धन्त, त्वयाऽहमिम यजा इति ।" इति । (रोहित) सह "ने"त्युक्त्वा धनुरादायारण्यमुपातस्थौ । स सरत्मरमरण्ये चचार ॥२॥ [हरिश्चन्द्र]-६ उम [हरिश्चन्द्र] ने फिर] टलाते हुए | कहा- ‘नि सन्देह जब क्षत्रिय शस्त्रधारी हो जाता है तर वह यज्ञ के योग्य होता है । [इस बालक को शस्त्र [ज्ञान] प्राप्त कर लेने दो। तब [मैं इस से यज्ञ कर दू गा" [वरुण]-स्वीकार करते हुए वरुण ने कहा]—'अच्छा' । उम रोहित] ने शस्न ज्ञान] प्राप्त कर लिया। [वरुण]-[रण ने अब फिर] उस [ हरिश्चन्द्र ] को कहा- निश्चय से [ इस रोहित ने अब तो] शस्त्र [ज्ञान] प्राप्त कर लिया है। [3] इस से मेरे लिये यज्ञ करो। [हरिश्चन्द्र]-उस [हरिश्चन्द्र] ने [अब आगे टलाने का बहाना न पा र] 'अच्छा यह कह कर पुत्र को बुलाया [और कहा।

प्रत [ वेदभारती [हरिश्चन्द्र]-- 'प्रिय [पुत्र] ! इस वरुण ने ही [तुम को] मुझे दिया था । अहो । इस लिए [4] तुम्हारे से इस के लिए यज्ञ करू गा [अर्थात्-यज्ञ में तुम्हें इस की बलि चढाऊगा। रोहित]-वह रोहित]-'नहीं' ऐसा नहीं हो सक्ता] यह कह कर धनुष ले कर जगल मे भाग गया [शब्दार्थ- चला गया ] । वह वर्ष भर जगल मे घूमता रहा । ६ टिप्पणया-सानाहुक-सनद्ध, वा सनाह प्राप्तु वा धारयितु वा शीलमस्यास्ति इति । सम् + नह+उकज+पुल्लिङ्ग प्रथमा एक वचन । शस्त्र धारण करने का स्वभाव-मामथ्य, शस्त्रज्ञान । प्रापत्-प्र+मा+लुङ, प्रथम पुरुप एक वचन । प्राप्नोत्-+Vाप् + लड, प्रथम पुरुष एक वचन । अामन्त्रयामास- पा+म+रिणच+लिट प्रथम पुरुष एक वचन । इस रूप में अम होला का लिट् लकार का रूप प्रयुक्त किया गया है। ऐसे धातुओ के प्रागे। और भू के भी लिट् लकार वे रूप प्रयुक्त क्येि जा सकते है । अदात्-दा+लुड, प्रथम पुरुप एक वचन । उपातस्थी-उप+प्रा +/स्था + लिट प्रथम पुरुष एक वचन । सवत्सरम्-एक वप एक साल तक । निर तर काय चालू रहने के कारण वाल वाचक पद सवत्सर में द्वितीया आई है। चचार-/चर+लिट् प्रथम पुरुष एक वचन । ऐतरय ब्राह्मणे ३३२] [इस से आगे की कथा पहले २. चरैवेति में दी जा चुकी है।]

राजकीय महा ियाला कोटा, के पुस्तकालय तैत्तिरीयोपनिषदि शिक्षावल्ली उपनिपद् १ आधुनिक सम्प्रदाय के विद्वानो का विचार है कि ब्राह्मण काल के क्रियाकाण्ड के आडम्बर से जब लोग ऊब गये तो उम के प्रति विद्रोह की भावना ने जम लिया और वह उपनिषदो के रूप म व्यन हुई । अत उपनिपद् ब्राह्मणो के बाद की रचनाएँ है । परतु स्थिति ऐसी प्रतीत नहीं होती । उपनिषद् वेदो के आध्यात्मिक स्थलो के ही व्याख्यान मात्र है। इन का प्रधान विषय ब्रह्म जीव और प्रकृति तथा उन के सम्बध का विवेचन है। श्री कुमारस्वामी ने तो अपने ग्रन्थ 'A New Approach to the Study of Veda' म उपनिषदो की सहायता से वेद का अर्थ करने का सुझाव दिया है । ये उपनिषद् हो पिछले छ दर्शनी के मन खोत मानेजाते हैं। २ प्रत्येक वेद के उपनिषद् अलग-अलग है। इन म से ईशोपनिषद् तो यजुर्वेद का चालीसवा अध्याय ही है। कुछ उप- निपद् ब्राह्मण और प्रारण्यको के अन्तिम भाग हैं । कुछ स्वतत्र भी हैं । वेसे तो आज असरय उपनिषद् मिलते है परतु प्रामाणिक और प्राचीन कुल १२ उपनिषद् है. ईश वेन, कठ, मुण्डक, माण्डूक्य ऐतरेय, कौषीतकि, प्रश्न तेत्तिरीय वृहदारण्यक छान्दोग्य और श्वेताश्वतर । समस्त उपनिषदो को (१) वैदिक (२) आर्प (३) साम्प्रदायिक और (४) कृत्रिम-इन चार भागा म ५६ ] [ वेनभारती बाटा जा सकता है । उपनिपदो की भाषा बडी सरल, रोचक, प्रभावोत्पादक और सप्रवाह है । वहा क्लिष्टता तो प्राय नाममात्र को भी नहीं है। उन मे ब्राह्मणकालीन भाषा के दोपो का प्राय प्राय अभाव है । वास्तव मे भावो की प्राचीनता होते हुए भी वे भाषा के दृष्टिकोण से अर्वाचीन ही हैं। इन मे कुछ गद्य म है कुछ पद्य मे और कुछ मिश्रित है। इन ग समय ८०० से १००० ई० पू० माना जाता है । पर तु यह सीमा सर्वसम्मत नहीं । सम्भवत उपनिषद् निर्माणकाल बहुत पहले जाता है। परिचय ३ तैत्तिरीय उपनिषद् कष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से सम्बध रखता है । यह तैत्तिरीय प्रारण्यक का एक भाग है । यह उपनिषद् एक लोकप्रिय कृति है और अपनी उच्च नैतिक शिक्षाओ, अध्यात्मविद्या और पञ्चकोशो के सिद्धात के कारण बडे महत्त्व का है। सार ४ प्रथम भाग म पाच महायज्ञो की महिमा बताई है। ब्रह्मयज्ञ देवयज्ञ, अतिथियज्ञ पितृयज्ञ और भूतयज्ञ अवश्य करने चाहिए । प्रधान बल तप, सत्य और स्वाध्याय प्रवचन पर दिया गया है । प्रतिम को ही मर्वश्रेष्ठ माना है ॥ [अनुवाक ६] । ५ अब विद्यार्थी वेद पढ़ चुका । वह ससार म प्रवेश करने के लिये जाना चाहता है। उस का समावर्तन सस्कार होता है। उस समय य-विदा के काल मे-गुरु अपने प्रिय शिप्य को सासारिक व्यवहार म काम आने वाली मुरय मुरय शिक्षामो का पुन उपदेश करते हुए कहता है कि सत्य बोलना, धर्म पर चलना स्वाध्याय करना । कुशल और उन्नति का ध्यान रखना । सतान की पालना

[५६
करना ॥३॥ माता पिता, अनिथ, प्राचार्य और विद्वानों को सेवा
करना । उन के गुण ग्रहण करना, दोपो की उपेक्षा करना ।
अप्ठ विद्वानो का आदर करना हर प्रशर मे दान करना ।।।
'नब कर्म के मम्बध म कुछ सदेह हो तो नि स्वार्थ, धार्मिक,
प्रियवादो विचारशील और वर्तव्यपरायरा ब्राह्मणो का अनु.
करण करना । यही अतिम उपदश है । [अनुवाद ११]
महाय
६ यह उपदश आज भी प्रत्येक विद्यार्थी को मिनना
चाहिये । दीक्षा भाषणो म ऐसे ही उपदेशा की आवश्यकता
है । कुछ विश्वविद्यालयों ने दीक्षान्त समारोहो मे डने उपकुलपति
की प्रेरणा और आदेश के रूप म ग्रहण किया भी है ।
-
मूल, अर्थ और टिप्पणिया
तपः
च साभ्यायप्ररचने च ॥
मत्य च स्वाध्यायप्रवचने च ।।
तपश्च
म्वाध्यायप्रवचने च ॥
दमन्च साध्यायप्रवचने च ॥
शमथ स्वाध्यायप्राचने च
अग्नयश्च स्वाध्यायनाचने च ॥
अग्निहोत्र च म्याध्यायनाचने च ।।
अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च ॥

६. ] [ वेदभारती मानुप च स्वाध्यायप्रश्चने च ॥ प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च ॥ प्रजनश्च स्वाध्यायप्रपचने च ॥ प्रजातिश्च स्वाध्यायप्राचने च ॥ सत्यमिति सत्याचा राधीतरः ॥ तप इति तपोनित्य. पौरुशिष्टिः ।। स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौदल्य ॥ तद्धि तपस्तद्धि तप. ॥६॥ इति ननमोऽनुराकः ॥६॥ तैत्तिरीयोपनिपद् मे शिक्षा की वल्ली तप अर्थ ऋत [शास्त्रादि द्वारा बुद्धि मे निश्चय क्यिा हुआ अर्थ अथवा वेदाध्ययन अपना नियम और अनुशासन-Law and order अथवा ईश्वर का ज्ञान] तथा स्वाध्याय ( शास्त्री का पढना) और प्रवचन [अध्यापन अथवा वेदपाठ रूप ब्रह्मयज्ञ ] [ ये अनुष्ठान करने योग्य हैं ] । सत्यभाषण, शास्त्राध्ययन, अध्यापन और वेदपाठ रूप ब्रह्मयज्ञ [करने चाहिए।] तप (क्लेश का सहना), शास्त्री का अध्ययन और अध्यापन [करता रहे ] ! इन्द्रियो को वश में करना, स्वाध्याय और प्रवचन [ सदैव करता रहे ] । मनोनिग्रह और स्वाध्याय तथा प्रपचन [ये सदा करने चाहिएँ ] । अग्नि की स्थापना और स्वाध्याय और प्रवचन [ये नित्य करने वाहिए । हवन, शास्त्रों का पढना और उपदेश तप ] [ ६१ [ करते रहना चाहिए ] । [अतिथिसत्कार ] तथा स्वाध्याय और प्रश्चन [दन को नियम से करना चाहिए] । मानुपम ( विवाह आदि लौकिक व्यवहार) तथा स्वाध्याय और प्रवचन (परने योग्य हैं] । प्रजा [ उत्पन्न करना] तथा स्वाध्याय और प्राचन [ये मदा करने चाहिए । ऋतुमाल मे पत्नी से समागम (प्रजन) तथा स्वाध्याय और प्रवचन [क्तव्य कर्म है] । पौत्रोत्पत्ति (प्रजाति) तथा स्वाध्याय और प्ररचन [ नियम से करता रहे ] सत्य ही [अनुष्ठान करने कोग्य है ] ऐसा रथीतर का पुत्र सत्याचा [मनता है । तप [ही नित्य पर्म है । ऐमा नित्य सपस्वी पोर. शिष्टि [का मत है] । स्वाध्यार और प्रवचन ही [नित्य कर्म है] ऐसा मुद्गल के पुत्र नाक का मत है। ये (स्सा याय और प्रवचन ) ही तप हैं, वे ही तप हैं। , भार इस भाग मे वरिणत पाच महायनो ब्रह्मयन (अतम् सत्यम्, तप दम Tम स्वायाय और प्रवनम् ) देवान ( अग्नय अगि- होत्रम् स्वाध्याय और प्रवचनम् ) अतिथियन ( अतिथय मानुपम् स्वाध्याय प्रवचनम्) पितृयज्ञ (मानुपम् प्रजा प्रजन प्रजानि स्वाध्याय प्रदचनम् ) भूतपन ( तप , दम शम प्रजा प्रजाति स्वाध्याय प्रवचनम्)-कावटा महत्त्व माना गया है। प्राचीन ग्राचार्यों न इन पर बटा बल दिया है। इन दे विप वरगन और महत्व के लिए दो दयान दश्त पञ्चमहायनविधि। स्वामी न्यानन्द का अनुवाद सागा म्वामी दयान द द्वारा किया गया अनुवाद बना मरल स्पष्ट और स्वाभाविक है। वह नीचे दिया जाता है । पर का मनुवाद गोरखपुर के शावर भाष्य के अनुवाद दे ग्राधार पर किया गया है।

६. ] [ वेदभारती मृत च अग्निहोत्र च०।- है ब्रह्मचारिन् । तू सत्य धारण कर, पढ और पढाया कर । मत्योपदेश करना कभी मत छोड, सदा मत्य बार पढ और पढाया कर। हप गोकादि छोड, प्राणायाम, योगाभ्यास कर तथा पढ और पढाया भी कर । अपनी इन्द्रियो को बुरे कामो से हटा अच्छे कामो मे चना विद्या का ग्रहण कर और कराया घर । अपन प्रत करण और पात्मा को अ यायाचरण से हटा न्यायाचरण में प्रवृत्त कर और पराया र तथा पढ और सदा पढाया कर । अग्निविद्या ये सैवनपूर्वक [प्राहनीय अग्नि और विद्युत प्रादि को जान के--मत्याचप्रमाश] विद्या को पढ़ और पढापा कर । अमिहोन करता हुमा प. और पढाया घर । (मस्सार विधि) इस भाग का मत्याथप्रकाश व तृतीय समुन्नाम म दिया हुग्रा अथ भी अच्छा है । वहा नतम् सत्रम् आदि को क्रियाविशेषण लिया है । जिनासु विद्यार्थी वहा से देख लें। अतिथयश्च प्रजातिश्च अतिथिया की मेवा करते हुए पढ़ें और पढावे । मनुष्य सम्व धी व्यवहारा को करते हुए पढने पढात रहे । मतान और राज्य का पालन करते हुए पढते पदाले जाए । वीय की रक्षा और वद्धि करत हुए पत्ते और पढाते जाय। अपने स तान और शिग्य का पालन बरत हुए पढने पढात जाये। (सत्याय प्रकाश) सत्यमिति तप सत्यवादी होना तप है यह सत्यवचा राधीतर आचाय का यायाचरण म मष्ट सह्ना तप है यह तपोनित्य पौरशिष्टि नाचाय का तौर धम म चल के पढना पढाना और सत्यापदेश करना ही तप है यह नाक मौदगल्य प्राचाय का मत है और सब प्राचार्यों के मत म तप ] [ ६३ यही पूर्वी तप है, यही पूर्वोक्त तप है ऐमा तू जान ।' (मस्कारविधि)। टिप्पणिया--मत च--तप मतम-आधुनिक विद्वान् इस का अथ Law and order- नियम और अनुशामन करने है । ब्राह्मणो मे पाए इम के अच अनेको अर्थो म सद ईश्वर ओ३म्' यहा विशेष उपयोगी है। भाष्यकार दाकर न न का अप 'शाम्रो के नान से बुद्धि म निश्चय किया हया अथ किया है। कपि दयाद न दम का अय 'सत्य धारण किया है। स्वाध्याय-नियम के साथ निम्बाय भाव से वेदादि सत्यशास्त्रा का अध्ययन । यह नित्य क्म है। प्रवचन-उपदेश पढाना। दम इन्द्रिया प व पाना । शम --मन को वश मे करना । अग्नय- कमभर न अग्निया पे कई भेद होते हैं । गृहस्थिया को उन का स्थापन करा अथात उन का उपयोग करना आवश्यक है। अग्निस्थापन एल निना का नाम है जिस म नया गृहस्थी घर मे यज्ञकुण्ड में अग्नि रम कर उम अपन गृ स्थवाल म अक्षुण्ण रखन और उस म बन बरन की प्रतिना बरता है। अग्निहोत्रम् -आग जला कर मत्र पढ़ते गए उस म घा अन प्रादि सामग्रा डालना हवन कहलाता है । इस से वायु का गद्धि होता है । रोग दूर होते हैं तथा स्वाथ-त्याग की भावना उपन हाती है । अतिथय -जो परम विद्वान् सदाचारो गुभचिनक हो तथा जिम के आने-जान की तिथि न हो अथवा माननीय सम्बन्धी आदि हो उम अतिथि कहते है । अनिधि का मलार न करना पाप का कारण हाता है । अतिथि ही गृहस्थ क दापो का विवेचन कर सकते हैं। प्रत व उम शुभ माग पर चला वर पुण्यवान बना देन है । मानुषम् - मनुपस्य दद मानुपम् । मनुष्या के वर्म-विवाह आदि । प्रजा-सन्ता नोत्पत्ति । प्रजन -ऋतुकाल म पनी का ससग । स्त्री को हर माम दूषित म्म्न का स्राव होता है । इसे ही स्त्री का ऋतुमती होना कहा है ।

[ वेदभारती ऐसा होन के ५वें दिन से १५ वें दिन तक के समय को रतुवाल कहते है । प्रजाति -पाते को उत्पत्ति अर्थात्-पुत्र को योग्य बना कर उसे गृहस्थ कम मे नियुक्त कर उस को पुन को उत्पत्ति के लिये प्ररित करना । सत्यनचा-सत्य बच यस्य स । सत्य नाणी वाला। यहा यह एक मपि का नाम है । राथीतर -रथीतरस्य अपत्य पुमान् राथीतर । स्थीतर मा पुन । पोरुशिप्टि --पुरुशिष्टस्य अपत्य पुमान् । पुष्टि का पुत्र । इस का नाम तपोनित्य है । तपोनित्य का अथ-तपसि नित्य तपोनिष्ठ है। मौद्गल्य -मुदगलस्य अपत्य पुमाव । मुदगा का पुत्र । इस का नाम नाक (शोवरहित) है। (11) आचार्यानुशासनम् १. बेदमनूच्याचार्योऽन्तेगामिनमनुशास्ति ।- २. सत्य बद । धर्म चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । ३. प्राचार्याय प्रिय धनमाहत्य प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सीः । ४ सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान प्रमदितव्यम् । कश- लान प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्याय- प्रवचनाम्या न प्रमदितव्यम् ॥१॥ ५. देवपितृकार्याभ्या न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । प्राचार्यदेश भर । अतिथिदेवो भव । ६. यान्यनवद्यानि कर्माणि, तानि सेरितव्यानि, नो इतराणि ।

, आचार्यानुशासनम् ] [ ६५ ७. यान्यस्माक सुचरितानि, तानि सयोपास्यानि ॥२॥ नो इतराणि । ८. ये के चास्मच्छ या मो ब्रामणाः, तेपा त्वयामनेन प्रसमितव्यम् । ६. श्रद्धया देयम् । अश्रद्धया देयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । मरिदा देयम् । १० अथ यदि ते कर्मविचिकिन्मा ना वृत्तनिचिफिन्मा ना स्यात् ॥३॥ ये तर ब्राह्मणाः समशिनः। युक्ता आयुक्ता । अलूना वमकामा म्यु । यया ते तर वर्तेरन् । नया तत्र पर्तेथाः ।। ११ यथाभ्यारयातेपु । ये तर ब्राह्मणा ममशिन । युक्ता आयुक्ता.। अलूना धर्मकामाः म्यु । यथा ते तेषु पर्तेरन् । तथा तेषु नर्तेथा. । १२ एप आदेश । एप उपदेश । एपा वेदोपनिपन् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चेतदपा- स्यम् ॥४॥ ॥ इत्येकादशोऽनुवाकः ॥ १ वेम् अनुशास्ति- अर्थ १ वेद को पढ़ा कर (अर्थात् पढाने के पश्चान ) आचार्य आश्रम में रहने वाले (शिय) को उपदेश देता है -

-
[ वेभारती
२-३ मन्य व्यरच्छेत्सी
अर्थ-२-३, सत्य बोल। धर्म का आचरण कर [ स्वाध्याय
से प्रमाद न कर [अर्थात ज्ञानोपार्जन मे अविरत लगे रहो ।
श्राचा के लिये प्रिय (अभीष्ट) धन ला वर [अर्थात्-गुरुदक्षिणा
दे, यहा से विदा ले कर विवाह कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो
तथा ] मन्तान परम्परा का छेदन न करो।
भाव यह है कि मतानो पति के लिए प्रयत्न करो । यो नि जब
तर स तान उ पनि दर के उन योग्य नहीं बना देत तब तर तुम पितृऋण
से उनण नहीं हो सकन । तथा दश के लिए और जाति लिए भी
सतान स न करता तुम्हारा तय है।
नोट :- इस का अय इस प्रकार भी हो सपना है-अपनी
मामथ्य म वाटर प्राचाय के लिये अभीष्ट धन दे कर अपनी मतान को
दुख म न डालना । यदि योडी प्राय हो तो प्राचाय को थोडा ही धन
लावर देना।
।
मत्यात
धर्मान प्रमदितव्यम्।-
अर्थ-४ सत्य से प्रमाद न करना चाहिये। धर्म से
प्रमा नहीं करना चाहिये।
भार-मत्य बद और धम चर म आदेश दिया था कि झूठ
और यधम का परित्याग कर साय और धम का सवत करो। पुन दूसरे
दशाम उमी बात को यहा कहने का अभिप्राय है कि चाहे कितने ही
वष्ट और विपत्तिया अाएँ तुम यो सत्य और धर्म युक्त व्यवहार ही
करना चाहिये । उसे कभी न छोड़ना चाहिए। यौवन धन-सम्पत्ति
प्रभुव
के प्रभाव स असत्य और अघम व्यवहार न करना । तथा
चाह दूसर लोग तुम्हारे साथ छन क्पट आदि का प्रयोग करें तो भो तुम
उन के प्रति ऋजु ही रहना क्यो कि सत्समव जयत नानतम्

आचार्यानुशासनम् ] [६७ अत में सत्य और धम की ही और चमा रक्षति धार्मिकम् । अत विजय हागो ! कुशलात् न प्रमदितव्यम- अथ-मुशल [ आत्मरना मे अयोगो] र्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए भाव-माता म भवगान् वृष्ण क्त ह-योग बमसु कौग- नम् । इसी कौरान का ओर ऊपर के उपनिपट वाक्य मे निर्देश है। क्या कि जब नर म सुप्रकार नहीं किया जायगा यथष्ट फन नहीं देगा । म करन के लिये नान का होना अयन अावश्यत्र है। तभो योशनवर कम कर चे मनुष्य कमयोगी बन मरता है । इस विषय में बद कहना ह- विद्याञ्चाविद्याञ्च यस्तद् वेोभय सह । अविद्यया मृत्यु तीर्दा विद्ययामृतमश्नुते ॥ जो कम और नान का साथ साथ जानता है वह कम स मृतु का जीतता है और नान न मोक्ष पाता है । इमो वदादत का यहा वरणन किया है। अन जो भा काय किया जाय बहुत साच-विचार पर क्यिा जाए । इमी मात्र को चाणक्य न प्रात्मान सतत रक्षेद दाररपि घनरपि में रखा है। भृत्य न प्रमन्तिव्यम्- अर्थ-भूति [अर्थात् ऐश्वर्य देने वाले माङ्गलिक कर्मों ] से प्रमाद नटी करना चाहिये। भाष-मनुष्य का उत्तरोत्तर उतति के लिए प्रयत्न करना चादि । जा भी अवसर प्राप्त हो उस का समुचित उपयोग करे। जवसर वो कभी भी हाय स न खाए । परतु सब कुछ सत्य और धमयुक्त हो।

[ वेढभारतो
छन, क्पट और पापपूर्ण उन्नति का तो निचैध हो है । ऐमी उनति भूति
नहीं भू नि है और कुफन देती है उम से मदव बचे ।
स्वाध्याय प्रमदितव्यम् -
अर्थ-स्वाध्याय [=वेद के अध्ययन, मनन और निटि.
ध्यामन ] और प्रवचन [ वेद के अध्ययन, मनन और अनुभूति
का प्रचार, व्यार गन आदि करना] मे प्रमाद नहीं करना चाहिये।
भाव-स्वाध्याय ने अपनी जननि कर के उपमा द्वारा दूग
की उन्नति विया करो।
.
५-६ देव
अर्थ-- देवकार्य और पितृकार्यों [ अर्थात देवयज्ञ पार
पितृयज्ञ ] को नहीं छोडना चाहिये । तु माता की पूजा कर।
पिता की पूजा कर । प्राचार्य को पूजा कर। अतिथि (अभ्यागत)
की पूना (आदर, मत्कार, सेना आदि ) क्र।
यानि इतराणि-
अर्य-६ जो अनिन्द्य अर्थात् निन्दारहित सुर्म है उन्हीं
का सेवन करना चाहिये । दृसरों ग नहीं।
७-यान्यस्माफ उगस्यानि-
[ गीता मे कहा है- 'यद यदाच नि प्ठम्नत तदेवेतरो जन
स यत् प्रमाण कुरुते लास्तदनुवतते ।।-सब लोग उत्तम पुम्पा का
अनुकरण करते हैं और उहे प्रमाण मानते है इस मिजात को गन
मे रख कर ग्राचाय उपदेश देते हैं-
अर्थ-७ हमारे [-अनुकरणीय हम गुरुजनों के ] जो शुभ
[अर्थात् सत्य और धर्मयुक्त तथा ऊपर के उपदेश और वेदादि रे
आदेश के अनुसार प्रमाणित और प्रशसित ] आचरण [पर्म]

श्राचार्यानुशासनम् ] [६६ हो तुझे उन्हीं की उपासना ( अर्थात संबन, आचरण ) करनी चाहिये । [ इस आदश मे हीन हमार अन्य क्मों की उपामना] नहीं करनी चाहिये। भार--यहा रषि ‘गुस्वाक्य ब्रह्मवाक्यम् अथवा गुरुरेव ब्रह्म' का अण्डा करस है । मनुष्य अगुद्धि करता है, भम में पटता है-इम को मन मूलना । अत उस के जो शुभ कम ह उही का अनुकरण करना । प्रया का रही। -ने के च प्रश्वासितव्यम्-- ससार म एक न एक उत्तम ज्ञानी भरे पडे ह । व्यक्ति विरेप हो सघन नहीं है । अत हमारे से मी धेष्ठ विद्वान और ब्रह्मवेत्ता तुम्ह ममार में मिलेंगे। यह ममझ कर कि हमारे प्राचाय से श्रेष्ठ और कोई विद्वान् और ब्रह्मवेत्ता पुरुष ससार में नहीं है उन अय विद्वानो की उपमा नहीं करनी चाहिये । कदाचित् वे तुम्ह प्रसन हो कर कुछ नान दर जिस ६ तिय तुम यत्न करते हो-इस उद्देश्य से अपि पहल हैं- अर्थ-- जो कोई [आचार्याटि धर्मों से युक्त होने के कारण ] हमारी अपना भी श्रेष्ठ विद्वान] और ब्रह्म ( वेद और परमात्मा ] के जानने वाले हों, उन का आसनादि के द्वारा तुझे श्रा पासन [यान] दूर करना पूजा सत्कार और आदर करना चाहिए । ६ श्रद्धया सनिदा देयम्- अर्थ-:-श्रद्धापूर्वर देना चाहिये । अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिये । अपनी शक्ति के अनुसार देना चाहिए। लज्जापूर्वक (अर्थात विनय से चिनम्र हो कर) देना चाहिये । (धर्म के) भय से चाहिये 1 दयाभान और मित्रभार से देना चाहिये।

७० ]
[ वेदभारनी
भाव-हमारे शास्त्रा मे दान की बडी महिमा कही गद है।
दान समाज को स्थिति के लिये आवश्यक है । भूसे को अनमि लन पर,
नोका बस्न मिलने पर तथा ज्ञानार्थी को नान मिलन पर ससार ३
बहुल से दुख दूर हो जाते है । भूखा पट भरने के लिये चोरी यानि
दकम वरेगा । अज्ञानी अधिकार से मतप्त हो अनेक प्रकार का अन्य
वस्थाए समाज मे उत्पन करेगा । अत दान करना चाह्मि पर वह
श्रद्धापूर्वक किया जाए । अश्रद्वा से दिया हुआ दान तामस हाता है।
दयो गोता १७२२॥
हमारे शास्त्रो म श्रद्धा को बड़ा महत्त्व दिया गया है। कन्वेन
म श्रद्धा पर एक पूरा मूक्त है । गीता और महाभारत तथा अच ग्रन्था
ने घद्धा की महिमा गाई है । कहा है-
'अश्रद्धा परम पाप श्रद्धा पापप्रमोचिनी।
जहाति पाप श्रद्धावान् सर्पो जीर्णामिव त्वचम् ।।'
जो दान शक्ति से बाहर दिया जाता है वह बुल म तथा अपने
हृदय म क्लेश उत्पत करता है। धनाभाव म मनुष्य पापवृत्ति मा हो
जाता है । तथा 'प्रजाततु मा व्यवच्छत्सी इस उपदेा का प्रतिसमग
हो जाता है जो पाप का कारण बनता है।
विनय की भी बड़ी महिमा है-'विनयाद्याति पात्रताम्
च-विनयरहित दान तामम होने के कारण कुफ्त देता है श्री धन
TT कारण होता है।
शास्तोम दया और मिनभाव के उपदेश स्थल-स्थल पर मिलते
हैं। दयावान् ही ब्रह्म को जानने का वास्तविक अधिकारी है। यजुर्वेद
का उपदेश है कि- मित्रस्य चक्षुपा ममीक्षामह'-हम सव का मित्र
सम में।
अत दाम उक्त उपदा के अनुसार ही करना चाहिए।
।अपि

प्राचार्यानुशासनम् ] [. (०-११ अथ तथा- क्सिी विषय मे मदेह होने पर ग्मे दूर करने का आप बनाने हुए आचाय अनुशासन को समाप्त करते हैं । अर्थ–१० यदि तुझे कर्म या आचार के विषय में कोई सन्देह उपस्थित हो तो यहाँ जो विचारशील र्म मे नियुक्त [ अन्यो द्वारा क्सिो कर्म मे लगाए हुए ], आयुक्त [अपनी इन्छा से कर्मपरायण], अरुक्ष (सरल मति), एस वर्माभिलापी ब्रह्मवेत्ता विद्वान हों, उस [प्रसग] मे वे जैसा व्यपार रे पैसा [ही तू भी] करना। १० इसी प्रकार जिन पर सशययुक्त दोप आरोपित किए गए हो उन के निपय मे वहाँ जो विचारशील कर्म मे नियुक्त अथवा आयुक्त [ दूसरो से प्रोरित न हो र रत कर्म मे परायण ] सरलहदय और धर्मामिलापी ब्राह्मण हो रे उन में जैमा व्यर हार करे तू भी उन मे वैसा ही करना । अर्थ- आत्यम्- -१२ यह आदेश [विधि है ] । यह उपदेश [है।। यह वेद का रहस्य (उपनिपत) है । [और] यही [ प्राचार्य की] पाता है । इसी प्रकार [ तुझे] उपासना करनी चाहिए। ऐसा ही यह आचरण करना चाहिए ।। १-४-टिप्पणिया--अन्न्य-अनु+Vवच+ ल्यप । उपनयन मस्कार के बाद पटा कर । अतेवासिनम-अते वासी तम् । इस का दूसरा Fप प्रतवासी होता है । अनुशास्ति-अनु+Vशाम+लट् प्रथम पुम्प एक वचन । मा प्रमद -मा के योग म लुट, लकार आता है और उम के प्रारम्भिक प्रको लाप हो जाता है । अत प्रामद । प्र+v मद+वुड मध्यम पुरष एक वचन ! वोपदेव वे मत में प्रमद- मध्यम ७२ [ वेदभारती अमदीन और अमादीन रूप भी बनते हैं । थाहत्य--छा/हत्यिप। ला कर । प्रजातन्तुम्-स तान की परम्परा । ततु- धागा, मूत्र धन परम्परा । व्यवच्छेत्सीवि+व+ छिद+लुङ, पुरप एक वचन । मा के कारण 'अ मा लोप हो गया है। कुशलान्- शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य । भाव यह है कि शारारिक और माननिर उनति म तत्पर रहना चाहिए । भूत्यै-पचमी के स्थान पर चतुर्थी का प्रयोग प्राप है । प्रमाद के योग म पचमी पाती है । भूति-- सामाग्मि उ नति, समृद्धि ऐश्वय आदि । ५-७ देवपितृकार्य-देवयज्ञ (अग्निहोत और स्वाध्याय तथा प्रवचन) और पितृयन ( =स तानोत्पत्ति, स्वाध्याय और प्रवचन ) । देखा प्रथम शिक्षा पर टिप्परिणया। शेष भाग मे देव और पितृकार्यों की परम प्रावश्यक और स्थूल याख्या की है । मातृदेव ---माता देव यस्य म । माता को देवता-पूजनीय मानने वाला । अथवा-मातर दीव्यति, माता की स्तुति करने वाला या माता को आनद, तृप्ति भादि देन वाला । इसी प्रकार पितृदव आदि शब्द बनते है। अनन द्यानि-न-प्रवद्यानि प्रावधानि । निदारहित । अपद्य-न+ द+क्यप । न बने याम अप्रशसनीय, निन्दित । नो-'न के अथ मे अव्यय है । उपास्यानि-उप----/नास+य+पु सनिङ्ग प्रथमा एक वचन । ८ अस्मन्छ यास --अम्मन+श्रेयास । अस्मत- यह अस्मद रादा पचमी का बहुवचन है। प्रश्वासितव्य-प्र+Vश्वस + तव्य । आगन देना चाहिए । थकान दूर करनी चाहिए । ६ श्रद्धा--श्रत+धा। मय का धारण। सत्य भावना से अपात मत्य मान कर । भिया-'मी स तृतीया एक वचन । धमभय से । सविदा-मित्रता के भाव स । मनुष्या को सदव मिना का तो । प्राचार्यानुशासनम् ] [ ७३ उपकार करना ही चाहिए, पर साथ ही प्रयो का भी मित्रभाव मे ही उपकार करना चाहिए । देयम्-~/दा+यत् । १०-११ कर्मविचिकित्सा-कमणि विचिकित्सा । सप्तमी तत्पुरुष । विचिकित्सा-वि+क्ति+सन्+पा। सदेह । वृत्त- व्यवहार । समर्शिन -सम् + मृश--+-इन् । पुल्लिंग प्रथमा बहुवचन । विचारलीन विद्वान्, अनुभवी । युक्ता -Vयुज्+त। अपने आप काम मे लो हुए। आयुक्ता -दूसरो द्वारा काम में लगाए हुए। अलक्षा -अरक्षा । र और ल में भेद नहीं माना जाता है-रलयोर- भेद । जा पे नहीं अर्थात मोठा बोलने वाले । अभ्यारयातेपु- अभि ++Vत्यानत ! दूसरो द्वारा निदा किए हुए । बुरे बताए हुए। १२ वेदोपनिषत्-वेद का गुप्त ज्ञान-रहस्य शासनम्-शिक्षा नियम । एवमुपासितव्यम्-यह द्विरुक्ति उपदेश को अनिवायता और महिमा को बताने के लिए की गई है । ऐमी द्विरक्ति शिक्षा की समाप्ति को भी बताती है । इस शिक्षा का ऋषि दयान द का सत्याथपराा के तृतीय समुतास म दिया गया अनुवाद भी देखने योग्य है। । अनु.

ईशोपनिषत् उपनिषद् १ अाधुनिक सम्प्रदाय के विद्वानो का विचार है कि ब्राह्मण काल के क्रियाकाण्ड के प्राइम्बर से जालोग ऊन गये तो उस के प्रति विद्रोह की भावना ने जन्म लिया और वह उपनिषदा के रूप मे व्यक्त हुई । अत उपनिषद् ब्राह्मणो के बाद की रचनाएँ है । परन्तु स्थिति ऐसी प्रतीत नही होती । उपनिषद् वेदो के प्राध्यात्मिक स्थलो के ही व्यारयान मात्र है । इन का प्रधान विषय ब्रह्म, जीव और प्रकृति तथा उन के सम्बन्ध का विवेचन है । श्री कुमार स्वामी ने तो अपने ग्रन्थ A New Approach to the Study of Veda' मे उपनिषदो की सहायता से वेद का अर्थ करने का सुझाव दिया है। ये उपनिषद ही पिछने छै दर्शनो के मूल स्रोत माने जाते है। २ प्रत्येक वेद के उपनिषद् अलग अलग है। इन मे से ईशो पनिषद् तो यजुर्वेद का चालीसवा अध्याय ही है । कुछ उपनिषद् ब्राह्मण और प्रारण्यको के अन्तिम भाग है। कुछ स्वतन्त्र भी हैं। वैसे तो अाज असर य उपनिषद् मिलते हैं परन्तु प्रामाणिक और प्राचीन कुल १२ उपनिषद् है-ईश, केन, कठ, मुण्टक, माण्डूक्य, ऐतरेय कौपीतकि, प्रश्न, तैत्तिरीय, वृहदारण्यक, छा दोग्य और स्वेताश्वतर। समस्त उपनिपदो को (१) वैदिक (२) प्रार्प (३) साम्प्रदायिक और (४) वृत्रिम--इन चार भागो म बाटा जा ईशोपनिषत् ] [ ७५ सक्ता है। उपनिपदो की भाषा बडी सरल, रोचक, प्रभावोत्पादक और सप्रवाह है। वहा विनष्टता तो प्राय नाममात्र को भी नहीं है। उन म ब्राह्मणकालीन भाषा के दोषा का प्राय प्राय अभाव है। वास्तव में भावो की प्राचीनता होते हुए भी वे भापा के दृष्टि- कोण से अर्वाचीन ही हैं। इन मे कुछ गद्य मे है, कुछ पद्य में और कुछ मिश्रित है । इन का समय ८०० से १००० ई० पू० माना जाता है। परन्तु यह सीमा सर्वसम्मत नहीं । सम्भवत उपनिषद् निर्माण काल बहुत पहले जाता है। परिचय ३ यजुर्वेद के दो सम्प्रदाय है-शुक्न और कृष्ण । शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाए है--माव्यदिन और काण्व । दोनो म चातीस चालीस अध्याय हैं । काण्व साहिता का चालीसवा अध्याय हो ईशोपनिषद कहलाता है। माध्यन्दिन सहिता के चालीसवे अध्याय से इस में अल्प से भेद है। विस्तार ४ ईशोपनिषद् उपनिषदो में पर्याप्त प्राचीन है और ग्यारह प्रामाणिक उपनिषदो म से एक है । इस म अठारह श्लोक हैं। इन के पहले और इन की समाप्ति पर अन्त म फिर एक ही समान एक शातिपाठ भी पढ़ा जाता है-'पूर्णमद पुणमिदम्" आदि । निपय ५ इम उपनिषद् म ठन्दोबद्ध रोचक और सरल गैली म ईश्वर, जीव तथा मृप्टिगत मुखो म सझिप्त मारभूत प्रेरक और क्रियात्मक विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इन कर्म और नान का यय ये गौर अयय का मम वय, आदर्श और [ वेदभारती व्यवहार का सुन्दर सम्मिश्रण और क्रियात्मक स्म प्रस्तुत किया गया है। सार ६ यह समस्त ससार ईश्वर द्वारा व्याप्त है। वह जो भोग दे, उहे निलिप्त भाव से भोगता हुआ मनुष्य सौ वर्ष तक जीने की कामना करता रहे। प्रात्मघाती जन अन्धकार से व्याप्त लोको में जाते है । गतिहीन और अकेला होने पर भी वह परमात्मा सब की पहुच से बाहर है । उस मे विरोधी गुणो के युग्म भी हैं-वह गतिहीन, और गतिमान्, ममीप और दूर में अन्दर और बाहर- मर्वत्र है । वह ईश्वर रोगो और शरीर से होन, शुक्र पापहीन, शुद्ध, कवि, मनीपी, सब को वश मे करने वाला और स्वयंभू है। वह व्यवस्था के अनुसार अनन्त काल के लिये अर्थो पदार्थो का निर्माता है । अविद्या और विद्या सम्भूति और असम्भूति मे से किसी भी एक की एका तत उपासना अनुचित है। दोना युग्मो के अगो में साथ साथ समुचित ति चाहिए। तभी मृत्यु से तरण और मोक्ष की प्राप्ति होती है । वस्तुत सत्य आक्षक प्रलोभनो में ढका हुआ है । पूषा उस को खोल सकता है । उस की कृपा से उस के कल्याणतम रूप को देखा जा सकता है। मृत देह के जल जाने पर शरीरयात्रा समाप्त हो जाती है और प्राण वायु मे मिल जाते हैं । अत मनुष्य अपने कमों का और परमेश्वर का चिन्तन करें। परमेश्वर अग्नि मृत जीव को उत्तम मार्ग से मोक्ष की और ले जाए और मानव के पापा को नष्ट कर दे। वह सब कुछ जानने वाला है। दर्शन ७ इस प्रकार यह उपनिषद् इश्वर जोध और जगत् इन तीन तत्वो को आधार मान कर चलता है। यह न प्रलय की

ईशोपनिषद् ]
[ ७७
क्ल्पना करता है, न सृष्टि की। मरने के बाद की स्थिति का
भी कोई विशेष विस्तार या वर्णन मही किया गया है। नैतिक
सदाचारी आदर्श जीवन से ही परमात्मा के दर्शन सम्भव है । अत
इस उपनिषद् का प्रमुख केद्र सदाचार है और इस का दर्शन एक.
मात्र व्यावहारिक और क्रियात्मक है।
काल
८ इस का काल सहिताकाल से बहुत पीछे का मानना
सम्भव नहीं। यह अध्याय ब्राह्मण ग्रन्थो के युग से पहले ही यजु-
वेद म स्थान पा चुना था। अत न्यूनतम यह १००० ई० पू० से
पहले लिखा गया होगा। इस के रचयिता और उस की जीवनगाथा
का कोई परिचय अत्र उपलब्ध नहीं है ।
शान्तिपाठ का भार
६ शान्तिपाठ उपनिषद् का अश नहीं है । किमी कार्य को
प्रारम्भ करने से पूर्व जैसे मगल किया जाता है वैसे ही उपनिषद्
के अध्ययन में पहले शातिपाठ क्यिा जाता है । इस शातिपाठ
म कहा गया है कि परमेश्वर पूर्ण है । उसी में से यह पूर्ण समार
निबनता है । परतु परमात्मा फिर भी पूर्ण ही रहता है ।
मूल अर्थ और टिप्पणियां
१०. ईशोपनिपद् का शान्तिपाठ
पूर्णमदः पूर्णमिद पूर्णान् पूर्णमुदन्यते ।
पूर्णस्य पूणमादाय पूर्णमेगा-शिष्यते ॥
ॐ शान्ति, शान्तिः शान्तिः ।।

] [ वेदभारती अर्थ-(यद ) यह [परमेश्वर] (पूणम्) पूरा है। (इदम्) यह [ जगत् ] भी (पूणम्) पूरा है । (पूणात) पूर्ण (परमात्मा] से (पूराम्य) पूर्ण (परमात्मा] की [पूणम्] पूर्णता बो (प्रादाय) ले कर (पूणम्) पूर्ण जगत] (उदच्यते) निकलता है। तो भी वह परमात्मा) (पूणम्) पूरा (एव) ही (अवशिष्यते) बचा रहता है। (ॐ) दसर (शान्ति) आधिभौतिक (शान्ति ) आधिदैनिक [और] (श ३ } आध्यात्मिक दु खो से हमारी रक्षा करे। टिप्पणिया-अद-दस-+गपुसक लिंग प्रथमा एक वचन । सामायन अदस से चु लोर का और इन्म से पृथिवीलार या बोर होता है। यहा अद ईश्वर का और इदम् ब्रह्माण्ड का द्योतक हैं। उच्यते--उद्+/अच्-मवाच्य+लट् प्रथम पुरप एक वचन । अवशिष्यते अव+/शिप+कमवाच्य+लट् पथम पुरुप एक वचन । शान्ति -~-तीन बार शानि का प्रयोग विविध दुख-आधिभौतिक प्राधिविक और आध्यात्मिक के निवारण की कामना का द्योतर है। ११. ईशोपनिपत १ ईशा वास्यमिद" म यत्किञ्च जगत्या जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ॥१॥ अर्थ- (जगत्याम्) ससार में ( यत ) जो (तिम् च ) कुछ भी (जगत) पदार्थजात [६] (इदम् सबम्) [वह] यह सब कुछ (ईशा) परमेश्वर से (वास्यम्) व्याप्त है। [प्रत ] ( तेन ) उस परमेश्वर] द्वारा (त्यक्तन) दिए हुए पदार्थों स्थितियों आति] से भृन्जीथा) [अपना अपना] भोग प्राप्त करो। (क्स्य) अन्य क्सिी के (स्वित) भी ( ननम् ) धन का (मा गर) लालच मत - क्रो॥शा मे ईशोपनिपद् ] [ ut टिप्पणिया-ईशा-ही से तृतीया एक वचन । बास्य--- दस+पन । इद मम् - इदम् सवम् । यजुर्वेद मे र, और स् पूर्व म चागु योरते हैं और उसे मुद्ररा की सुविधा के लिये द्योतित करने हैं। नगत्यामु-जगतो+सप्तमी एक वचन ! जगती- गम्+अति । पृथिवी, चर सृष्टि । गतिशाल होने के कारण पृथिवी को गो और उगती कहते है। जगत्-~गच्छनि इति जगत् । अथवा जगमीति नि जगत । प्रति दरो वाला चर। यह चराचर जगत् का उपलक्षण है। परन्तु ऐमा मानने वा नपेक्षा 'सर्वे गत्यर्या प्राप्त्यर्थी ज्ञाना- र्थाश्च ( मर गमनाथन धातग्रा का पाप्त करना और जानना अथ भी होत हैं ) के अनुमार इसे प्राप्ति और गानाथ मान कर नान और प्राप्त पान पथ करना अधिक प्रकरणोचित है । त्यक्त- स्यज+क्त। छोड हा दिए हुए । सारा मे तृताया है । भुन्नीथा-/भुज् भोग करना+विधि लिइ मध्यम पुरुप एक वचन । मा गृध ~~मा के योग म अटकीन उट, का प्रयोग होता है । अगध ~~/गर+लद मध्यम पुरुप एक वचन । स्वित्~अयय है ॥१॥ २ कुन्नेिवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत. समा । एर लयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरः ।। अर्थ-(इह) इस [लोक] मे (कर्माणि) धर्म ( कुवन् ) करता हुआ (त्र) हो (शतम्) सौ (समा) वर्ष तक ( जिजीविपत् ) जीने की इच्छा करता रहे । (त्वयि) तुम्हारे (एसम्) इस प्रकार [आचरण करने पर] (इत ) इस [मार्ग से] (अयथा) मिन या श्रेयर-उत्तम मार्ग ] (म) नहीं (अस्ति) है और] (नर) मनुष्य मे (म) [उस के द्वारा उपर्युक्त विधि से किए गए कर्म (न लिप्यत) लिप्त नहीं होते है ॥२॥ टिप्पणिया-कुर्वन्-/+शतृ पुल्लिग प्रथमा एर वचन । जिजीरिपेत- जो+11+विधि लिट, प्रथम पुरुष एक वचन । प्रत

८०]
[ वेदभारती
शतम्-शत, सहस प्रादि सख्याए सदैव नपुसक लिंग एक वचन में
प्रयुक्त होती हैं । समावष। यह पद मदव स्त्रीलिंग और बहुवचनात
अभीष्ट है । लिप्यते--/लिप्+कर्मवाच्य लट प्रथम पुरुप एक
वचन ॥२॥
३. असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः ।
तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ।।
अर्थ-(ते) वे (लोका) प्रदेश [या स्थितिया] (नाम)
नि सन्देह (अमुर्या) नाशक [अर्थात् दुखदायी और] (अधेन)
गहरे (तमसा) अधकार से (प्रावृता) आच्छादित हैं (तान्)
उन [लोकों को (प्रत्य) मर कर (1) वे [लोग] (अभिगति) प्राप्त
करते है, (ये) जो (२) कोई (प्रात्महन ) अात्मघाती (जना ) मनुष्य
होते है] ॥३॥
भाव-भाव यह है कि आत्महत्या करने वाले जन घोर दुस-
मय जीवन वाले जम को प्राप्त करते हैं। आत्महत्या शारीरिष भी हो
सकती है और मानसिक भी।
टिप्पणिया-असुर्या-असुर सम्बधी । असुर-अस्यति
क्षिपति नाशयतीत्यसुर । अत नाशक, दुखदायी तत्त्व का द्यातक है ।
असुर्या को विशेषण न ले कर लोको का नाम भी माना जा सकता है ।
प्रागे पाने वाले नाम' अव्यय से यह प्रय सुविधा से प्राप्त हो जाता
है । परतु उस अथ का कोई औचित्य न होने से वह त्याज्य ही है । कुछ
लोग 'अमूर्या पढते हैं (सस्कृत टोका देखें)। वहा 'मूर्य के प्रकाश से
रहित अथ होगा। तमसा-तमस+तृतीया एक वचन नपु नकलिंग ।
श्रावृत-प्रा-+Vवृ+वत । प्रत्य-x+Vs+ ल्यप् । आत्महन
आत्मान घ्नन्ति ते आत्महन ॥३॥

ईशोपनिषद् ] [१ ४. अनेजदेक मनसो जबीयो नैनवा आप्नुवन् पूर्वमर्पत् । तद्धारतोऽन्यानत्येति तिष्ठत वम्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।। अर्थ-वह] (एकम्) एक [नामक अथवा अकेला ब्रह्म] (अनजत) गतिहीन होता हुआ [भी] (मनस ) मन से [भी] (जवीय ) वेगशाली (है)। (देवा ) इन्द्रिया [आदि देन] (एनत्) इस [ब्रह्म] को (न प्राप्नुवन्) प्राप्त नहीं कर सकते हैं क्यों कि यह तो) (पूत्रम्) पहले ही (अपत्) विहा] पहुचा हुया है। (तिप्टन) स्थिर [रहता हुआ] (तत) वह तत् नामक ईशर [घावत ] दौडते हुए (अयान्) दूसरों का (प्रत्यैनि) अतिक्रमण कर जाता है। (मातरिश्वा) वायु (तम्मिन्) उम परमात्मा मे (अप) [प्राणिया के] क्मों को (घाति) धारण करता है॥४॥ टिप्पणिया-अनेजत्-न एजन ना तत्पुरुष ममाम । एजत्--/एज+मातृ नपुसक लिंग प्रथमा एक वचन । एम्-मी म परमात्मा या ब्रह्म को एर तद एक प्रादि कहा है । प्रत प्रारम् के समान वह भी परमात्मा का नाम है । इस को एन प्रवेला अथ म भी लिया जा सकना है। जवीय -जव+ईसुद् + नपुसा निग प्रथमा एक वचन । एनत्-इदम् से नपुमर निग द्विताया एक वचन का वकल्पिक स्प है । यह ब्रह्म-परमात्मा का बाधन मदनाम है। देश-इद्रिया। ये दो प्रकार की हातो हैं--कद्रिया और नानेद्रिया। मनुप्प इगिया के माध्यम मे क्रीडा व्यवहार आदि का सम्पादन करता है चमकता है और मुदित होता है, प्रत इहै 'दव वहा गया है। यह पद दिव से बनता है जिस के १-जीडा २-विजिगीपा ३-- व्यवहार, ४-द्युति ५-स्तुति, ६-मोद ७-मद, ८-स्वप्न १- कान्ति और १०-गति-ये दम अथ होते हैं । इन प्रयों से मबद्ध सभी पदाथ प्रादि देव या देवता क्लाते हैं । आप्नुवन्-/प्राप्+लट, प्रथम पुरुष बहु वचन । वदिक भाषा में क्रिया के स्पा में बात 37

[ वेदभारती
भेद प्रान भित नहीं होता है और भूत काल के स्प सभी काला-
बतमान और भविष्य को भी द्योतित करते हैं। अत वहा बहुधा
भनका केम्पो का वतमान काल मे अथ किया जाता है । अर्पत-
पि म त पथम पुरुष एक वचन का रूप है । लौविक रूप प्रापत
होगा है । तन-तदेा नाम ब्रह्म, जिसे प्रथम पाद में 'एवम् पहा
गया है । वारत -Vधा+दातृ+पुल्लिग द्वितीया बहुवचन । अप-
अपस (कम) म नपु सक लिंग द्वितीया एव वचन । मातरिश्वा--
मातरि मामा श्वसिति इति । वायु । वायु गति का माध्यम है-वानि
गच्छनि इति वा । कम गति में ही किए जा सकते है। ईश्वर सक्त्र
व्यापक है । अत वाणु परमात्मा में ही पाणियो से बम कराता
रहता है ।।४।।
-
५ तदेजति तन्नेजति तद रे तद्वन्तिक ।
तदन्तरस्य मर्मस्य तदु मस्यास्य बाह्यत. ॥
अर्थ-(तनयह तत् [नामक परमात्मा] (एजनि) गति
करता है । (लत) वह तत् (न एजति) गति नहीं करता है । ( नन)
घह तन् (रे) दूर [ है], (तत् ) वह तन (उ) नि सन्देह (अनिर)
समीप है) । (तत) नह तत् (अस्य) इस (मवस्य) सब कुछ के
(अ.न ) अन्दर है। (उ) निश्चय हो (तत) वह तत् (अस्य) इस
(मरम्प) सर कुछ रे (बाह्यत ) बाहर भी] है ॥५॥
टिप्पणिया-भार-इम मा में परमात्मा में सब प्रकार
की शक्तियो और स्थितिया को सत्ता को उस म विरोधी गुणा पो मत्ता
बता कर हृदयगम बराया है। वस्तुत ग्रह प्रथम श्लोक के 'ईशा
वाम्यमिद सब यत्किन्च जगत्या जगत का ही अनुवाद या यारयान
है । 3-निश्चयद्योक अध्धय है । बाह्यत -भिव बाह्य , उस से
स्वाथ म तसित प्रसय ॥५॥

ईशोपनिषद् ]
[३
६ यस्तु सर्वाणि भूतान्य आत्मन्येवानुपश्यति ।
माभूतेषु चान्मान ततो न नि जुगुप्मते ॥
अर्थ-(य ) जो (तु) तो (सर्वाणि) सत्र (भूतानि) प्राणियों
[और पदार्था आदि ] को (आत्मनि) परमात्मा मे [ या अपने
आप मे] [ स्थित ] (अनुपश्यति) देखता है -सममता है,
(च) और (प्रात्मानम्) परमात्मा [या-अपने आप को] (मवस्तेषु)
सन प्राणियों में व्याप्त अनुभव करता है। पह] (तत ) इस
[दर्शन-अनुभ] के कारण (न वि जुगुप्सन) [क्सिी मे) घृणा
नहीं करता है ।।६।।
भार-सवन परमा मा ही परमात्मा का अनुभव करने वाला
जब भरे घृणित स्वम्प का अनुभव हो नही करेगा, सब कुछ को
परमामा की ही विभूनि Fप मे देखगा तो उन अचि और घृणा
हो हा ही मस्ती । इस तथ्य को बृहदारण्यकोपनिषद के याज्ञवल्कन-
मन बी मवान सरल और मुदर प म प्रस्तुत किया
F बड
यन हि द्व तमिद भवति, तदितर इतर जिघ्रति तद इतर
इतर पश्यति तद इलर इतर शृणोति तद इनर इतरम् अभिवदति
तद इतर इतर मनुने तद इतर इतर जानाति । वन वा अस्य सबम्
प्रात्नबाभूत तत क्न - जिनेन तत् केन क पप्येत तत न शृणुयान
लन न कम अनिवदन नत केन मवाट तत न क विनानीया।।
[-1४.१४ ] ॥॥
टिप्पणिया-पि जुगुप्मते-वेद मे प्रचार वाक्यो मे उपसर्ग
निया म अलग रहता है और गौणवाघ म क्रिया से मिला हझा ममस्त
रहता है । जुगुप्मते-गुप्+मन+लट प्रथम पप एक वचन ।
दि
पूवर यह म्प निन्दा घृणा और अरचि को व्यक्त करता है ॥६॥

४]
[ वेदभारती
७. यस्मिन् सर्वाणि भूतान्य आत्मनाभृद् निनानतः ।
तत्र को मोह, कः शोक. एकन्यमनुपश्यतः ॥
अर्थ-(यस्मिव) जिस [समय] (विजानत ) ज्ञानवान् के
लिए (प्रात्मा) आत्मा (एव) ही (सवाणि) सब (भूतानि) प्राणी
[और पदार्थ आदि] (अभूत) हो जाती है, (तर) वहा [---उम
समय या अवस्था मे] (एक्त्वम्) [सब मे] एकता को (अनुपश्यत )
समझने वाले को (क) क्या (मोह ) मोह [और] (क) क्या
(शोक ) शोक {रह जाता है ? अर्थात् यह मोह पार शोफ से
मुक्त हो जाता है । ॥७॥
टिप्पणिया-सर्वाणि~ अभूव' क्रिया एक वचन म है अन
इस वाक्य मे 'प्रात्मा' उद्देश्य है और सर्वाणि भूगानि विधेय । यदि
इम के विपरीत योजना की जायगी तो क्रिया विधेयानुमारिणी हो
जायगी । भूतानि-भू+त+नपुसक लिंग प्रथमा घडवचन । सत्तावान्
पदाथ । अत 'प्राणी और पदाय प्रादि' । अभूत्-~/+लुइ प्रथम
पुरुप एक वचन । विजानत ---वि+/ज्ञा+शत-+-पप्ठी बहुवचन ।
यहा सम्बध मे पष्ठी नहीं है क्षेप म पष्ठी है । यदि ऐमा न मान तो
पिछले श्लोक' सख्या ६ से विरोध उत्पन्न हो जाता है। को मोह -
जसा पहले श्लोर ६ की टिप्पणी में लिखा गया है मोह और गोक
तब ही हो सकते हैं जब मनुष्य अयो को प्रात्मा-(=परमात्मा से भिन
मानता है । जब वह सब को परमात्मा के स्वरूप का प्रतिविम्ब मान
लेता है और अपने आप को भी उसी का प्रतिबिम्ब ममझ लेता है तव
वह एक रस, एक स्प और एक काल में स्थित हो जाता है रसभेद,
रूपभेद और कालभेद नष्ट हो जाने से मोह, योक और दुख अपन आप
तिरोहित हो जाते हैं । एक्त्वम्-एक्स्य भाव एकत्वम् । एक परमा मा
का नाम है, अत एक्ता-परमात्मा-भाव-परमात्मा से तादात्म्य ।
अनुपश्यत - अनु+हि+श+पुल्लिग पप्ठी एक वचन ॥७॥

शोपनिषद् ] [८५ ८. स पयगाच्छुक्रमकायमन्त्रणम- स्नादिर शुद्धमपापविद्धम् । कनिर्मनीपी परि भू स्वयभूर्याया- त यतोऽर्थान् व्यवधाच्छाश्वतीभ्य समाभ्यः ॥८॥ अथ--(म ) वह [परमात्मा] (परि अगात) सर ओर गया हुआ [-व्याप्त] है । [चह] (गुरम्) शीघ्रकारी [ सर्वशक्तिमान , अयरा दीप्तिमान् ]. (अकायम्) शरीर-रहित, (अत्रणम् ) अक्षत (अस्नापिरम्) स्नायुनों से रहित, (शुभम्) निर्मल-पवित्र और (अपापविद्धम्) निष्पाप है] । (कवि) मा तद्रष्टा [अथवा सबद्रष्टा या सवज्ञ] (मनीपी) भवन (परिभू ) सब को वश मे करने वाला [अथवा सर्वोत्कृष्ट] [और] (स्वय भू) स्वय हो सत्तावान् [उम परमात्मा न हो] (शाश्वतीभ्य ) सनातन-प्रनादिम्बरुप (समाभ्य) वा [या प्रजामो] + लिए (याथातथ्यत ) यथाय रूप से [अपन-अपने स्वरूप के अनुस्प] (अर्थान् )पदार्थों को (वि अदधात् ) विविध रूप में बनाया है। टिप्पणिया-अगात्---इ लुट, लकार प्रथम पुरुप एक वचा । शुक्रम्-इस की पुत्पत्ति प्रागुकरम्'-शोघ्र करने वाला दी गई है । दयानद सरस्वती ने इस का भाव 'सवशक्तिमान' लिया है । लोक और वद दोनो मे यह दीप्ति और प्रकाश का भी दावा है। अमआयम्-न काय विद्यते यस्य तन । शरीर तीन प्रकार का हाना है- स्थून सू-म और कारण । इन तीना ही प्रकारो का यहा निषेध किया गया है । अत्रणम्-न विद्यत व्रण यस्य तन । जम्मा आदि स हीन, अर्थात् नीरोग । दयान द सरस्वती ने दण' का अय छिद्र' किया है । अनाविरम् -न स्नावा विद्यन्ते यस्मिन् तन् । स्नाद-शिराए, नाडी आदि के सम्बध स्प व धन (दयाद सरस्वती) । शुद्धम्-Vध+ [ वेदमारती ८६] क्न अविद्या प्रादि दोषो से रहित, सदा पवित्र । अपापविद्धम-- पापेन विद्धम् । पाप से हर प्रकार से अमम्पृक्त और अस्पृष्ट । अथात कभी भी न पापयुक्त है, न पाप करता है न पापप्रिय है। विद्ध-व्यध्+क्न । कपि-(शकर)--मवष्टा (दयानद)-मवज्ञ । दोना का माव एक ही है । मनीपी 1-मनस इपिता। सब जीवा च मना की वृत्तियो को जानने वाला (दयान द सरस्वती) सवज्ञ (शकराचाय)। परिभू–परि भवति इति । १ अब वे ऊपर-मर्वोत्कृट (शकर) २ दुष्ट पापिया का तिरस्कार करने वाला (दयानन्द) । स्वयम्भू --म्वय भवति इति । अनादि स्वरूप- जिस का सयोग में उत्पत्ति, वियोग से विनाश, माता-पिता गभवास ज म वृद्धि और मरण नहीं होत वह परमात्मा, (दयानन्द सरस्वती) । यथातथ्यत ---यथा च तथा ध यथातथा, तयो भाव याथातथ्यम् तस्माद याथातथ्यत । जो जने हे (उहे) उस प्रकार । शकर के मत मे-यथाभूत कम फल और साचत के अनुसार । अर्थान्-सृष्टिगत पदाथ । अदधात्--Vधा + लुङ, प्रथम पुरुष एक वचन । शाश्वतीभ्य - शश्वत--अनादि स्वम्प से अपने-अपने स्वरूप से उत्पत्ति और विनाश रहिन नित्य । समाभ्य–यह पद वप' का पर्याय है। प्रत काल का द्योतक है-अनादि और अन्नत काल म होने वाले पदार्थों का निर्माता परमात्मा ही है। स्वामी राक्गचाय ने 'सवत्सरारम प्रजापति' अथ कर के इसी भाव को अप्रत्यक्ष रूप म इगित दिया है । स्वामी दयानन्द सरस्वती ने इमे प्रजा वाचक माना है ।। ६. अन्ध तम. प्रविशन्ति ये ऽविद्यामुपामते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रताः ।। अर्थ-(ये) जो (अविद्याम्) अविद्या की (उपासत) उपा सना करते है, [] (अधम्) घोर (तम) अधकार में (प्र विशति) प्रवेश करते हैं। (उ) नि सन्देह (ये) जो (विद्यायाम) विद्या में ईशोपनिषद् ] [७ (रता) मग्न हैं (ते) वे (इव) मानो (तत) उस से भी (भूय ) अधिक (तम ) अन्धकार मे [ प्रवेश करते हैं ] MEn टिप्पणिया-अन्ध तम—यह अधिकार मान दृष्टि का प्राच्दादक अनान स्पी अधकार अथवा कष्ट और आवागमन के चक्र में फ्मना है। विद्या--न विद्या अविद्या । यह विद्या तो नहीं है, परन्तु विद्या के सदृश उस को जाति जमी है । जसे ब्राह्मण ब्राह्मण तो नहीं होता परन्तु उस + समान मनुष्य जाति का होता है। यह अविद्या और विद्या क्या हैं ? इस मे विद्वाना का मतभेद है। स्वामी साराचाय इहे प्रमश कम और दवतानान का वाचर मानत है । म्वामी दयान - सरस्वती के मत म अविद्या 'अनित्य म निय, अशुद्ध म युद्व दस में सुख और अनात्मा गरीरादि म अात्मवृद्धि स्प अर्थात-नानादि गणरहित कारणस्प परमेश्वर से भिन्न जद वस्तु है और विद्या 'शब्द, अथ और इन के सम्बघ के जानने मान अत्रादिक प्राचरण है । उपासते-उप-+Vाम्-+लट प्रथम पुम्प बवचन । भूय --बहु+ईयमुन+पु मक लिंग द्वित या एक वचा । यह तम का विपण है। रता-/गम्-कन+ पुल्लिंग प्रथमा बहुवचन ।।६।। १०. अन्यदेवाहुनिद्ययान्यादाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणा ये नस्तद् पिचचतिरे ।। अर्थ-[आचार्य] (विद्यया) विद्या से (अयत ) और (एव) ही [ फल या कार्य ] (आहु) बताते है, [और] (अविद्यया) अविद्या से (अ यत्) पार [अर्थात् दूसरा ही फल या कार्य] (प्राहु ) बताते हैं (इति) यह (धोराणाम्) उन] विद्वानों से (शुशुम) सुनते हैं (ये) जो (तत) इस [ विषय ] को (क) हमे (विचधक्षिरे) बताते आए हैं ॥१०॥ टिप्पणिया-पाहु ---/ज से लट प्रथम पुरुप बहुवचन का वाल्पिक स्प है । पहले पाच-प्रथम पुरुष के तीन और मध्यम पुरप के

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65
[ वेदभारती
पहले दो वचनो मे लिट लकार के प्रत्यय लगते है और ब्र को प्राह हो
जाता है। शुश्रु म-~/धु, से लिट् उत्तम पुरुष बहुवचन । धोर-
धियम् ईरयति इति घोर ~बुद्धियों के प्रेरक विद्वान अध्यापन और
उपदशा । कालिदास ने लिखा है-'विकारहतो सति विक्यिन्त पा
न घेतासि त एव धोरा अर्थात् निविकारचित्त ज्ञानी--रागद्वेष आदि
से रहित यथाय वक्ता । रिचचक्षिरे--वि+च+लिट् प्रथम पुरुष
बहुवचन ॥ १०॥
११ विद्या चानिया च यस्तद् वेदोभय सह ।
अनिधया मृत्यु तीर्ला विद्ययामृतमश्नुते ।।
अर्थ-(य) जो (विद्याम्) विद्या (च) और (अविद्याम्)
अविद्या (तत) इस (उभयम्) जोडे को (मह) साथ-युगपत् (वेद)
जानता है, वह] (अविद्यया) अविद्या से (मृत्युम्) मृत्यु को (तीत्वा)
पार कर (विद्यया) विद्या से (अमृतम्) अमरता को (अश्नुत) प्राप्त
करता है॥ ११ ॥
टिप्पणिया-वेद-विद् + लट् प्रथम पुरुप एक वचन का
वकल्पिक रूप । तत्-दयानन्द सरस्वतो इसे विद्या और अविद्या के युग्म
का द्योतक न मान कर पृथक् लेते हुए इस का अथ 'ध्यानगम्य मम"
करत हैं। उभयम् से वे एक विद्या और अविद्या के युग्म का और दूसरे
इस तत-ध्यानगम्य मम का भाव लेते प्रतीत होते हैं । अविद्यया-
(दयान द)-दारीरादि जड पदाथसमूह से किए पुरुषाथ से, (शकर)-
अग्निहोनादि कम से । मृत्युम्-(दयानद)-मरणदु ख का भय,
(शकर) स्वाभाविक (व्यावहारिक) कम और ज्ञान । ती -V.
+पवा। विद्यया-(दयान द)-प्रात्मा और शुद्ध प्रत करण के
मयाग रूप धम से उत्पन हुए यथाथ दशनरूप विद्या से। अमृतम्-
(दयान द)-नाशरहित अपना स्वरूप या परमात्मा, (शबर)-
दव व भाव । अश्नुते-/अश्+लट प्रथम पुरुष एक वचन ॥११॥

ईशोपनिषद् ]
[८८
१२ अन्ध तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इस ते तमो य उ मम्भूत्या रता ॥
अ-(4) जो (असम्भूतिम्) असम्भूति की (उपासने)
उपासना करते हैं [वे] (अयम्) घोर (तम ) अन्धकार मे (प्रविनि)
प्रवेश करते हैं। (उ) नि मन्देह (य) जो (सम्भूत्याम्) सम्भूति में
(7) मग्न हैं (ने) वे (इव) मानो (तत ) उस से [भी] (भन )
अधिक (तम ) अन्धकार मे [प्रविष्ट होते हैं] ॥१२॥
टिप्पणिया-असम्भूति-(दयान द)-अनादि
अनुत्पन
म्त्व रजस और तमोगुरगमय प्रकृति स्प जड वस्तु (गवर)-कारण
कृति अथवा दामना और क्म वी वीज अव्याकृत नाम की
अनानामिया अविद्या । मम्भूति-(दयानन्द)- महत तन्वादि
स्वरूप से परिणाम को प्राप्त हुई मृष्टि (गवर)-हिरण्यगभ नामा
वायब्रह्म ॥१२॥
१३ अन्यदेवाहुः सम्भवाद् अन्यदाहुरमभवात् ।
दति
शुश्रु म
धीराणा ये नस्तद् पिचचक्षिरे ।
अय-[आचार्य] (सम्भवात) मम्भर से (नयन) और
(एव) ही (फ्ल या कार्य] (ग्राहु ) बताते है [ोर] (असभवान)
असम्भर से (प्रयत) श्रार [अर्थान दृमरा ही फल या कार्य] (प्राहु )
बताते हैं (इति) यह (धीराणाम्) [उन] विद्वानों से (गुश्रु म)
सुनते है, स्य) जो (न्त) इस विषय को (न ) हमे (विचचक्षिरे)
बतात अाए हैं ॥१३॥
टिप्पणिया-सम्भव-(दयान द)-मयोग जच काय (शकर)
काय ब्रह्म । अमम्भ-( दयानर) उपन
न होने दाना
मारए ॥१३॥

१०] [ वेदभारती १४. सम्भूतिं च विनाश च यस्तद्वदोभय सह । बिनाशेन मृत्यु तीर्खा सभृत्याऽमृतमश्नुते ।। अर्थ-(य ) जो (सम्भूतिम्) सम्भूति (च) और (ग्निाशम्) विनाश (तत) इन (उभयम्) दोनों को (सह) साथ (वेद) जानता है [नह] (विनाशेन) विनाश से (मृत्युम्) मृत्यु को (तोवा) पा कर के (सभूत्या) सम्भूति से (अमृतम्) अमरत्न को (अरन्ते) गप्त कर लेता है ॥१४॥ शावर भाष्य का भार-स्वामी शकराचाय ने विनाश का भाव काय ब्रह्म और अमृत का प्रकृतिलयरूप अमरत्व लिया है और मृत्यु को 'अधम और कामना प्रादि दोपा से उत्पन अनश्वय सम्भार को असम्भूति-अव्यक्तोपासना माना है । स्वामी शकराचाय का यह मत विचारणीय ही है, क्यो कि मूल मन न सम्भूति और विनाश का प्रयोग कर विना को असम्भूति का पयाय माना है। प्राचाय यहा ध्यारयान में पौर्वापय का व्यत्यय कर गए मालूम पटते है । दयानन्दभाष्य का अनुगद-~स्वामी दयानद सरस्वती का नाप्य कुछ भिन्न और वैशिष्टयपूण है । वह इस प्रकार है- 'हे मनुष्यो । (य) जो विद्वान् ( सम्भूतिम ) जिस मे सब पदाथ उत्पन होते उस काय म्प सृष्टि (च) और उस के गुण, कम स्वभावा को तथा (विनाशम) जिस मे पदाथ नष्ट होते उस कारण स्प जगत् (च) और उम के गण कम स्वभावो को (सह) एक साथ ( उभयम् ) दोना ( तत् ) उन काय और कारण स्वम्पो को (वेद) जानता है वह विद्वान् (विनाशेन ) नित्य स्वरूप जान हुए कारण के माथ ( मृत्युम ) शरीर छूटने के दुस स ( तीळ) पार हो कर (मम्भूत्या) शरोर इन्द्रिय और अत करण स्प उत्पन हुइ काय रूप धम में प्रवृत्त कराने वाली सृष्टि के साथ ( अमृतम् ) मोक्ष सुख को (अश्नुते) प्राप्त होता है। .

ईशोपनिषद् ] [ ६१ इम अनुवाद म दयानन्द ने सम्भूति का 'शाय स्प सृष्टि' विनाग 7 'कारणम्प जगत और अमृत फा मोक्ष सुख' अर लिया है।॥१४॥ १५ हिरण्मयेन पारेण मत्यम्यापिहित मुसम् । तच पूपन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।। अर्थ -( सत्यस्य ) सत्य का या परमामा के ज्ञान का (म्बम् ) मुध [ =म्प ] (हिरण्मयेन) [तीन प्रकाश के (पाग) अधरण से (अपिहितम् ) डा हुआ [छिपा हुआ ] है। हे (पन्) पोषक [ परमात्मन् ], (त्वम्) तुम (तत) उम [श्रापरण] । मत्यमा ) चाय स्वरूप को ( दृष्टये ) देखने के लिए ( अपावणु ) हटा दो [--योल गे] ॥१५॥ टिप्पणिया-हिरण्मयेन-हिरण्यस्य विचार हिरपयन निर्मित वा हिप-मयट । हिण्य क ना अब है- मोना औ २ तज ज्योति प्रकाश । मोना नो तेज प्रदान होता है। भाव यह है निसय के आगे चुधियान वाना असत्य वस्तुमा और प्रनोमना वा पदा पड़ा हुआ ह प्रत उस दखना सम्भव नही। पात्रेण/पा+प्टन् या जन् । रक्षा करन वा पीन कामायन । अत आच्छादन, टमन परदा । सत्यस्य--(सदर)-मानित्य मण्डलम्थ ब्रह्म (दयानन्द)- विना यथाय कारण । वस्नुत यहा ब्रह्म का वगगन प्रस्तुत है जो समस्त सृष्टि वा यथाय' कारण और सवत्र व्यापक है। परन्तु मानव उनके स्वम्प का साक्षासार करने म सामारिस प्रनाभन के कारण असमय रहता है। अपिहित-अपि +/घा+क्त। अनर बार अपि के 'अ हो कर "पिहित प भी मिलता है । पिधान और अपिधान भी इसी धानु म ल्युट प्रत्ययात है। मुखम्-पान के रूप म कल्पना परन पर इस का अभिधेय अथ सगत हो जायगा । इम वा लाक्षणिक उप- स्वम्प साधा और बट अथ द दता है। पूषन्-पूषन् से मम्बोचन कालाप वचन । ६२ ] वेदभारती एक वचन । पूपन् को ऋग्वद मे सूय का एक म्प माना जाता है, जिम 'मूत मे सूर्य की पोपप शक्ति है । प्राधिमौतिक अथ मे तो यह ठोक है परन्तु आध्यात्मिक अथ मे यह परमात्मा के पोषक स्वम्प को द्योतक है । अगले मात्र का भी यहा सकेत है। प्रकरण भी परमात्मा वणन का है, सूय का नहीं । सत्य ज्ञान करा कर ईश्वर मनुष्य को शार- पुष्टि देवा है । अपावृणु-अप+मा+Na+-लोट मध्यम पुरुष एक सत्यधर्माय-मत्यश्चासौ घमश्च तम्मै । परमात्मा हा यथार स्वरूप । साकर भाप्य ने इसे 'सत्यधर्गा उपामा' का द्योतक महा है--सत्य धम यस्य स । यह भाव भी उपयुक्त है। काण्वसहितान प्रक्ति म्वर के अनुसार यह बबाहि समास है। इस स्वर के अभी म पहला अथ अधिक ठोव जान पडता है। अनुवाद मे उम हो अपनाय गया है ॥१५॥ १६ पूपन्नेक यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत्ते रूप कल्पाणतम तत्ते पश्यामि । योऽसायमौ पुरुष. ॥ सोऽहमस्मि ॥१६॥ प्रथ-(पूषन् ) हे पोपक ( एक ) एक मात्र ऋषि, [ या अग्नि के समान तेजस्वी ] (यम) [ सर के ] नियन्ता (स्य ) उ पादक [ और प्ररक ] (प्राजापत्य) प्रजा के स्वामी [ परमात्मन् ] ( रश्मीन्) [ अपनी वधर प्रलोभन रूपी ] किरणों ( के प्रकाश ] को (व्यूह) हटा लो, (ममूह) [और उन्हें] समेट लो। (ते) तुम्हारा ( यत् )जो ( तेज ) प्रकाश और (पल्याणतमम् ) परम रयाण करने वाला (रूपम् ) स्वरूप है], (ने) तुम्हारे (तत) उम [स्वरूप] को (पश्यामि) देखना [ चाहता हू । (य) जो (असो) वह (अमो) वह (पुन्प) पुरुष है] [ अथवा, (असो) प्राण (प्रसौ) प्राण में (य) जो (पुरुष) पुरुप [है] (स ) वह (अहम्) परमात्मा [ही] (अस्मि) है ।।१६।। ] ईशोपनिषद् ] [६३ टिप्पणिया-एक F-काण्व सहिता मे 'एक स' पाठ है। ऋग्वद (८१६ । ४१ ) मे इद्र गे एक ऋषि और ईशान कहा है- अपिहि प्वजा अस्येक ईशान प्रोजसा । इद्र चोप्यसे वसु ॥" एकपि प्रश्नोपनिषट (२।११) में विश्व का सत्पति व्रात्य प्राण और मुण्डकोपनिषर (३।२।१०) में ब्रह्मनिष्ठ श्रोत्रियो द्वाग उपामित अग्नि है । यम-यम् (वश म करना, शासन वरना से) +4 या अच । सर्व-मू प्रेरित करना उत्प न करना से निपातन में मिद्ध होता है । इस सूय के समान प्रकाशमान अथ मे भी ले सकते है । > प्राजापत्य-प्रजापति एव प्राजापत्य स्वाथ मे प्यज प्रत्यय । रश्मीन्- उगादिम रश्मि को प्रश (व्याप्त करना) से बनाया गया है-जो सबन न्यापक है । रश्मि रस्सी को भी कहते हैं जो बाध लेती है । यहा भा ये ही भाव अभीप्ट है । ब्यूह समूह-वि और सम् पूर्वक Vत के नाट मध्यम पुरुष एक वचन के स्प हैं। भाव यह है कि अपने लाभनो का समेट कर हटा लो। एलोभन भी तो ईश्वर ने है वनाए है। साथ ही उपनिपदा का विचार है कि जिस पर परमामा कृपा करता है, वही उम क स्वस्प को देख सकता है.--'यमेवप वणुन तेन लान्तस्यप ग्राहमा वणुत तनू स्वाम् ।' असारसी पुरुष -शकर में मन में यह याति प अगा वाला प्रादित्यमण्डलम्थ पुरुष" का द्याता है । वम्सुन प्रसौ असो' पूर्व बणन का निदशक है--बह-जो उपर बरिणत हया है-वह । अथवा-अमौ-अमु प्राण का सप्तमी एक वचन का रूप है- पाण-प्राण में--प्रत्येक प्राण-प्राणी मे । अहम्- पर परम त्मा का पर्याय है म का वाचन मदनाम नहीं है । इमी अर म यह वाक्मुक्त, वामदेव व दान और गीता में प्रयुक्त हुअा है। अम्मि-ग्रह्म के अनुरूप नियापद है। अस्+सट् उत्तम पुरुष पद वचन ॥१६॥ शार भाष्य-स्वामी शराचाय का इम का अनुवाद कुछ मिन है-'ह जगत्पोपत्र सूय ! हे एकावी गमन करने वाले । हे यम शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृत ६४ ] [ वेदभारती (ससार का नियमन करने वाले) । हे सूय (प्राण और रम का गोपण करने वाले) हे प्रजापतिनन्दन । त् अपनी विरणा को हटा ले (अपन तेज को समेट ले) । तेरा जो अतिशय कल्याणमय स्प है उम म रखना है । यह जो प्रादित्यमण्डलस्थ पुस्प है वह म हूँ" ॥१६।। १७ नायुरनिलममृतमयेद भस्मान्त म्मर क्रतो स्मर कृनम्मर ।। अर्थ-[मेरा] (वायु) प्राण आदि वायु (अनिनम्) मगरण रूप वायु [और] (अमृतम्) अविनाशी कारण में (लीन हा रहा हे] । (अथ) और अर (इम्) यह [मेग] (शरीरम्) [पाञ्च भीनिक स्थूल] शरीर (भस्मान्तम्) भस्म होने वाला {अथवा भस्म होने तक रहने वाला है। (तो) हे कर्म करने वाले [मेर] जीर (1) ओ३म् (नामक परमात्मा) को (म्मर) याद करो (कृतम्) [अपने] किए हुए [कर्मो] को (स्मर) याद करो (अनो) हे कर्म करने वाले मेिरे] जीन, (स्मर) [ॐ को] याद करो (कृतम्) [अपने] कर्मों को (स्मर) याद करो ॥१७॥ टिप्पणिया-भार-स्वामी गक्राचाय ने इस म मुमूपु नी भविष्य मे हाने वाली स्थिति का चितन माना है। उन का अनुबाद यह है- 'अव मेरा प्रारण सर्वात्मक वायु रूप सूत्रामा को प्राप्त हो और यह शरीर भम्मावशेष हो जाय । ह मरे सकल्पात्मक मन । प्रब तू स्मरण कर अपने किए हुए को स्मरण कर, अब तू स्मरण कर अपन क्यि हुए को स्मरण कर। परतु ऐसा मानना विचारणीय प्रतीत होता है । इस से पहले मात्र में साधक परमात्मा के दरान के लिए उस मे प्रारना कर चुका है। वह उस दशन को प्राप्त कर इस मसार मे विदा हो रहा है । उस का विचार और अत काल का चितन इस म दिया है । इस चिनन से सासारिक मोह उसे नहीं सता सकेंगे । तो-मनु में सम्बाधन ईशोपनिषद् ] [ ६५ एक वचन । अतुम, अत कम करने वाला । ॐ-यह परमात्मा का सवयेष्ठ नाम माना गया है। यह अ, उ और म् के मेल से बना है । यह अव्यय पद है और वरणमाला को समम्त ध्वनियो को तथा ईश्वर के मव नामो को प्रभू त करने वाला है। मत्रों के अादि और अन्त में हम के उच्चारण की प्रथा है। इस प्रणव भी कहते हैं। इस का अकेले IT भी जप बताया गया ह । शकरमाव्य के मत मे यहा यह सत्य वन्प अग्निमानक ब्रह्म का द्योतक है। स्मर-/स्मृ + लोट् मध्यम म्प एक वचन ॥१७॥ १८. अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् पिण्यानि दन युनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठा ते नमउक्ति विधेम ॥ अर्थ-हे दिव) दिव्य स्वरूप (अग्ने) परमात्मन , (विश्वानि) सर (वयुनानि) स्मों [और ज्ञान] को (विद्वान्) जानते हुए [तुम] (अम्मा) इमं (राये) धन [-मोक्षधन की प्राप्ति के लिए] (सुपथा) उत्तम मार्ग से (नय) ले जाओ। (अस्मत) हम से (जुहुराणम्) कुटिल-घोर (एन) पाप को (युयोधि) दूर कर दो-हटा दो। हिम] (त) तुम्हारे लिए (भूमिष्ठाम्) पुष्पल माना मे [अत पुन पुन ] (नम उक्तिम्) प्रणाम के वाक्यों से (विघेम) परिचर्या (सेगा पर, अर्थात् बोल ॥१८॥ टिप्पणिया-अग्नं-अग्नि परमात्मा का भी नाम है। वह सब जगह विद्यमान है वह भी अग्नि के समान दाहन और प्रकाशन के गुगों से विशिष्ट है। इसे प्रग, अज् या अग्र+/नी से निश्क्त क्यिा जाता है । नय-नी+लोट मध्यम पुरुष एक वचन । सुपथा-अच्छे अस्मत्-अस्मद [ वेदभारती माग से । वेद के अनुरूप हो गीता ने भी मरने के बाद दो माग बताए हैं अधिर्माग और धूम्रमाग । पला उत्तम है और मोक्ष को ले जान वाला है । यहा उसी को और मकेत है । राये-२+चतुर्थो एक वचन (पुल्लिंग स्त्रीलिंग)। यह धन लौकिक नहीं है, पारलौकिक और आध्यात्मिक है । युनानि--निघण्टु मे प्रज्ञावाचर है, अत ज्ञान, शानभाष्य-नान और कम । विद्वान्-विद+गतृ+पुल्लिग प्रथमा एक वचन । जानता हा। युयोधि-/यु से लोट मध्यम पुरष एक वचन वदित प । आधुनिर इमे लिट लकारीय लोट कहते है। से पञ्चमी एक वचन । जुहुराण-Vव+कानध । एन-एनस द्वितीया एक वचा, नपु सब लिङ्ग। भूयिष्ठाम्-बहु+इप्ठन् +मा (स्त्रो०) । नमउक्तिम्--नमस उवित वचनम ताम् । प्रणाम अभि वादन आदि । विधम-विध (वदिक धातु)+विधि लिड उत्तम पुरप बहु वचन ॥ १८ ॥ भार--इस मात्र मे उपासक या नानी अपने ज्ञान और जीवन को चरम सीढी पर पहुच जाता है। प्रत वह परमेश्वर से मोनदान की प्राथना करता है । उम के माग की बाधाता को निराकृत करना चाहता है । ॥१८॥ उपसहार १२ यहा वाजसनयी महिना की उपनिषद-ईशापनिपत समाप्त हो जाती है । यह नाम इस उपनिषत् के मब से पहले पद ईशा' से मिला प्रतीत है । क्या कि इसे ईगा वास्योपनिषत्' भी कहत है। उपनिषदो के इस शात स्फूर्तिप्रद, प्रज्ञान-तिमिर नाशक यथाथ ज्ञान के व्याख्याता उपदेशा को पढ़ कर ही शोपन हावर न उपनिषदा यो जात्मा, जावन और मरण की शाति कहा था।

वेदभारती
पुत्व
-
परिशिष्टम्
भावप्रकाशिका सुधीरिणी
संस्कृत टीका
वेदमंत्राः
१. गायत्रीमत्रः
तत्सवितुर्वरेण्य भगो देवस्य धीमहि ।
धियो यो न प्रचोदयात् ॥
(ऋ० ३/६२/१०, सा० १४६२, य०३/३५, २२/६, ३०/२, ३६/३)
अय खलु मत्रो वेदाना सार इति जनाना विश्वास । अस्य
ऋपिर् गाथिनो विश्वामित्र । स्तोतार गायत्रीच्छन्दसि सवितु स्तुति
कृत्वा बुद्धिर्मणो शुद्धयर्थ प्रार्थना कुर्वन्ति-
वय भगवत' परमेश्वरस्य स्तोतारो भक्ता वा देवस्य द्योतमानस्य
सवितु सर्वस्य जगदादि भूतजातस्य उत्पादकस्य परमेश्वरस्य सूर्यस्य
वा तत् सर्वत्र प्रसिद्ध तत् वरेण्य-श्रेष्ठ कमनीय वा भर्ग तेज शक्ति
वा धोमहि-सतत चिन्तयाम । अस्मासु धारयाम इति वा । | परमेश्वर
न अस्माक सर्वेषा धिय बुद्धी कर्माणि च प्रचोदयात् शुभमार्गे
कल्याणपथे प्रेत्येत् नयेत् ।

२]
[ वे स्मारती
श्रय भाव - वय परमेश्वर ध्यायाम | सोऽस्मान् कल्याणमार्गे
प्रयेत ।
२. मद्रकामना
विश्वानि देव सवितर दुरितानि परा सुव ।
यद भद्र जमा सुव ।।
(ऋ०५/०२/५, २०३०/३)
अस्य मत्रस्य ऋषि ऋग्वेदे तु श्यावाश्व आत्रेय', पर यजुर्वेदे तु
नारायणो ऽस्ति । अस्मिन्नपि मरे सवितु स्तुति प्रार्थना च स्त ।
अत्रापि गायत्री छन्द ।
अस्मिन् मन्ने स्तोतार परमेश्वर प्रार्थयन्ते यत् तेषा पापानि
कष्टानि च नश्यन्तु, कल्याण च भवेत् हे देव प्रकाशमान वित
सर्वस्य जगदादि भूतजातस्य उपादक परमेश्वर सूर्य वा अस्माक
स^पा दुरितानि दुष्दाचरणानि दुखानि वा पर सुव दूरे प्रक्षिप,
नाशय इति भाव 1 यन् यत्किञ्चिद् अपि भद्र कल्याणकर स्यात् ।
समें वाञ्छित भद्र कल्याण सुख वा न अस्मभ्य सर्वेभ्यो भवद्भक्तेभ्य
मा सुव समन्तात् प्रापय-देहि ।
अय भाव --परमात्मा एव अस्माक दुखानि पापानि च
नाशयितु समर्थ, नान्य कश्चित् । अतएव स प्रार्थ्यते ।
३. दीर्घायुष्कामः
तच् चावहित पुरस्ताच्छुकनुचरन
पश्येम शरद शत रोवेम शरद शव
-

[ ३ प्र वेदमत्रा ] भरण्याम शरद शत प्र वाम शरद शतम्। मदीना स्याम शरद शत भ्यश्च शरद शतात् ॥ ( ऋ०७/६६/१६, य० ३६/२४) अस्य मत्रस्य ऋषिस्तु दध्यइ अाथर्वण । अस्य देवता सूर्य । छदश्च भूरिम् ब्राह्मी त्रिष्टुप् । अस्मिन् मत्रे सूर्य इति नाम्ना परमेश्वरस्य जानल्यमाना सर्वेपा कल्याणकारिणी सत्ता निर्दिश्य वर्षशत यावत् स्वस्थ जीवितु कामयते भक्ता । पुरस्तात् अग्रे । उपलक्षणमेतत् । अत सर्वत्र । तव सुप्रसिद्ध शुक्र दीप्तिमत् शीघ्रमेव सुखादिसम्पादक देदहित देवेभ्य समस्त- भूतजातेभ्यो हित फ्ल्याणकारि वक्षु परमात्मन स्वरूपम उद् चरन् व्याप्नोति । सर्वत्र वर्तते इति भाव । तस्य परमात्मनो ऽनुकम्पया वय मो शत शरद वर्षाणि यावत् जीवेम श्वामादिक धारयाम प्राणवन्त म्यामेति भाव । एवमेवाप्रेऽपि । दात शरद वर्षाणि शृणुयाम शब्दादीन आर्णयेम । शत शरद वर्षाणि प्रवाम सुष्ठ उपदेशादिक च्यवहारादिशन्द पायान् श्रावयाम । वय गत शरद शत वर्षान् प्रदीना स्वतन्ना स्याम तिष्ठेम । शरद शताव शतमरयाया र अपि भूय अधिक जीवेम, शृणुयाम, प्रबवाम स्याम च | मानवस्यायु अल्पम एव परन्तु यदि परमेश्वरस्य कृपा स्यात् तदेव सर्वमेतत्सम्भवति। अतएव तमेव प्रार्थयते जन । स च सर्वीपा कल्याण विदधाति । केचनार "सूर्यस्य भानुरित्यर्थ गृहीता 'सूर्यमेव प्रार्थयति जन' सूर्यश्च स्वसामर्थ्येन सर्नेपा कल्याण करोति'' इति मन्यन्ते । .

:२: चरैवेति रोहितस्यारण्ये सवत्सरचरणानन्तर भाविन हरिश्चन्द्रादीना त्तान्त दर्शयति- १. अथ हेति (मय) [ह रोहितस्य अरण्ये सवत्सर-वासानन्तरम् (ऐक्ष्वाकम्) इक्ष्वाकुवशोत्पन्न हरिश्चन्द्र (वरुणो) देवो रोगरूपेण (अग्राह)। तस्य] बरुणेन गृहीतस्य हरिश्चन्द्रस्य (उदर जज्ञे) जलेन पूरितम् उच्चून महोदरनामक रोगस्वरूपम् उत्पन्नम् । (तद् उ है) तद् अपि सर्वम् भरण्ये स्थितो (रोहित ) पुत्रो मनुष्यमुखात् (शुश्राव) [आकर्णयत् ] । श्रुत्वा च (स) रोहित पितर द्रष्टुम् (प्ररण्याइ) [वनाद] (ग्राम) [निवास, नगर वा] [एयाय] आजगाम । २. तमिन्द्र इति तिम्] आगच्छन्त रोहित मार्गमध्ये (इद्र) केनचिद् ब्राह्मण- पुरुषरूपेण [पर्यंत्य] प्राप्य [उवाच] इदम् उक्तवान् । [भनाभाताय] श्रा समन्ताच्छान्त आश्नान्त सर्वत्र पर्यटनेन आन्ति प्राप्त , तद्विपरीत अनाप्रान्त , एकत्र वनिवासशील , तादृशाय । तथाविधस्य पुरुषस्य (षी) बहुविधा सपत् (न) (मस्ति)। यद् वा-नाना-इति पदच्छेद । शान्ताय सर्वत्र पर्यटनेन भान्तस्य नाना श्री बहुविधा सपद् अस्ति इत्यनेन प्रकारेण । [६] (रोहित) क्य नीतिकुशलाना पुरुषाणा मुखात .

चरैवेनि ] (श्रु म) [शृएम ] | (वरो जन ) विद्यादिभि' श्रेष्ठोऽपि पुरुष (नृपन् पाप ) नृषु मनुष्येषु सीदति इति नृपत् । श्रेष्ठोऽपि बन्धुगृहेषु सर्वदा ऽवस्थित तै अवनात पापस्तुच्छो भवेत् । अतस्तव पितृगृहे वासो न युक्त । न चारण्ये चरतो मम सहायो नास्तीति शङ्कनीयम् । (इन्द्र) एव परमेश्वर एवं (चरत ) तव (सखा) भविष्यति । तस्मात् (चरैव) सर्वथा प्राण्ये चरस्व इत्येवमुवाच । एव बहुषु अपि पर्यायेषु द्रष्टव्यम् । तत्रेन्द्ररोहितयो सवादे प्रथम पर्याय दर्शयित्व द्वितीय पर्याय दर्शयति । ३-४. चरैवेति प्राह्मणस्वरूपस्य इन्द्रस्य वाक्य श्रुत्वा (ब्राह्मण ) अयम् अरण्ये (चरैव) इत्येव [मा] माम् अवोचत्] उत्तवानिति मनसि ब्राह्मणवाक्ये पहान्तम् आदर कृत्वा (द्वितीय] पुनरपि एक (सपत्तरम्) (अरण्ये) पार] चरित्या पश्चात् पितर द्रष्टु [स अरण्यात् प्रामम् एयाय] । प्राम (तम्) आगच्छ त पुनरपि (इद्र) [पुरुषरूपेण] ब्राह्मणरूपेण पर्येत्य] आगत्य एवम् (उवाच)। (चरत ) पर्यटन कुर्वत पुरुषस्य (जड घे) (पुष्पियो) भवत । यथा पुष्पयुक्नो वृक्ष शाम्बा लता वा अथवा सुगधोपेता सेव्या भवति, एव चरतो जड्घे श्रमजयेन सेव्ये भवत । तथैव (प्रात्मा) मध्यदेहो (भूष्णु) वर्धिष्णु (फलग्रहि ) आरोग्य- रूपफलयुक्तो भवति । यथा वर्धमानो वृक्ष कालेन फलानि गृहाति एव चरत पुरुषस्य बीनादिदीपनादिपाटवेन मध्यदेह आरोग्यरूप फल गृह्णाति । तथैवास्य चरत पुरुषस्य (सर्व) (पाप्मान ) सर्वपापानि (प्रपये) प्रष्टे तीर्थक्षेत्रादिमार्गे (अमेण) तत्तद्देवतादिदर्शने तीर्थयात्रादि- प्रयासेन (हता) विनाशिना सत (शेरे) शेरते शयाना इब भवन्ति ।

६ म] [ वेदभारती यथा शयाना पुरुषा स्वकार्य कृषिवाणिज्यादिक क्तु मशक्ता एव पुण्येन विनष्टा पाप्मानो नरक हातुम् अममर्था इत्यर्थ । सरमात् [एव] सर्वथा अरण्ये (चर), न पितु हे अवतिष्टस्व । तृतीय पर्याय दर्शयति- ५-६. चरैवेति वा इति (भग ) सौभाग्यम् (मासीनस्य) उपविष्टस्य (मारते) तथैव तिष्ठति न तु वर्धते । अभिवृद्धिहेतो उद्योगन्य अभावात् । (तिष्ठत') उपवेशन परित्यज्य उत्थापन -कुर्वत पुरुषस्य भग (ऊ) अभिवृद्ध उन्मुख तिष्ठति । कृषिवाणिज्याद्य द्योगस्य सभावितत्वात् । (निपद्यमानस्य) भूमी शयानस्य भग (शेरो) निद्रा रोति । विद्यमानधनरक्षादिचिन्ताया अप्यभावात् सर्वथैव विनश्यति । (चरत ) तेषु तेषु देशेषु अर्जनार्थ पर्यटन कुर्वत पुरुषस्य (भग ) सौभाग्य (चरति) दिने दिने वर्धते । तस्मात् त्व (चरैवेति) न त्वेक्त्र तिष्ठ । चतुर्थ पर्याय दर्शयति- चरैवेति 4 मेति चतत्र पुरुषस्य अवस्था । निद्रा, तत्परित्याग , उत्थान, सचरण चेति । ता च उत्तरोत्तरश्रेष्ठत्वात् कलिद्वापरनेताकृतयुग समाना । ततश्चरणस्य सर्वोत्तमत्वाचरैवेति । पञ्चम पर्याय दर्शयति- ६-१०. चरैवेति वै मा ब्राह्मण इति (चर) [व] एव पुरुष चिद् वृत्ताने (मधु) माक्षिक लभते । क्वचित् (स्वादु ) मधुरम् [उदुम्बरम्] उदुम्बरादिफलविशेष [विदति]

चरैवेति ]
I
लभते । एतदुभयम् उपलक्षणम् । तत्र तत्र विद्यमान भोगविशेष लभते ।
सत्र सूर्यो दृष्टान्त । (य) सूर्य सर्वत्र (चरन) [मपि] (न) (तन्दयते)
कदाचियतसो न भवति, तम्य (सूर्यस्य) (धे माण) श्रेष्ठत्व
जगद्वन्द्यत्व (पश्य) । तस्मात् (चव) ।
इत्थमिद्रकृतेन रोहितोपदेशेन चरतो रोहितस्य वजीरने पितु
आरोग्येच
ফাযমুন।
श्रेयोलाभ दर्शयति-
११. चरैवेति वोचदिति
षष्ठे सवत्सरे पूर्ववदरण्यसचारी म ह रोहित पंचिद् (ऋषि)
तस्मिन् (परण्ये) (उपेयाय) प्राप्तवान् । कीदृशमृषिमा (प्रजोगत-) नामक
[मौयवमिम] सुयवमस्य पुत्रम् (प्रशनया) (परीतम्) अनालाभेन
नुत्पीडितम् ।
प्रथाजीगरोहितयो सवाद दर्शयति-
१२-१६. तस्य हेति
(तस्य) अनोगतम्य [गुन पुग्छ
गुनोलाइन ]
शुन पुन्छादिमामका (य) (पुत्रा) (मासु ) । [२] पुत्रवन्तमूपि
रोहित (उवाच ।
हे (ऋपे) (३) तुभ्यम् (मह) गवा (शत) (दामि) यच्छामि ।
दत्त्वा (महम्) (एपा) पुत्रकाणा मध्ये (एपेन) केनचित् पुत्रेण (प्रा मान)
मद्देह वरुणात् (निकी) मूल्य दवा आत्मान मोचयामीति ।
एवम् उक्त (स ) अजीगत (ज्येष्ठ पुत्र) शुन पुच्छनामक हस्तेन
(निगृह्णान ) स्वसमीपे समाकर्षन् रोहित प्रत्येवम् (उबार)। तुभ्यमेक
पुनो दीयन (इम) [नु] शुन पुन्छ तु (न) ददामि । मम प्रियत्वाद् इति ।
सुनोप

भ3
[ भारती
ततो (माता) (कनिष्ठ) पुत्र हस्तेन गृहीत्वा एवमुवाच । (इम)
शुनोलागूल मम प्रियं (नो) (एव) सर्वथा न ददामीति । तत (ab)
उभौ मातापितरौ (मध्यमे) पुत्रे (शुन शेपे) दान (सपायापकनु )
अङ्गीकृतवन्तौ ।
१७. तस्य ह शमिति
तत (तस्य) अजीगतस्य (स) रोहितो गवा (शत) (दया) (त).
शुन शेपम् (भादाय) अवस्थित । तत (स) रोहितस्तेन शुन शेपेन सह
(परण्याव) स्वकीय (ग्राम) प्रति [एयाय] आजगाम ।
तदागमनादूर्ध्वकालीनं वृत्तान्त दर्शयति-
१८. स इति
(स) रोहित (पितरम्) [एत्य धागत्य एवम (उवाच)-हे (तत)
पितर् (हन्त) प्रावयोहर्ष सम्पन्न । (महम) (मनेन) शुन शेषरूपेण
मूल्येन (मात्मान) मद्देहे वरुणात् (निष्कोण) मूल्य हवा आत्मान
मोचयामीत्यर्थ ।
१६. स वरुणमिति
तथोक्ते (स) हरिश्चन्द्रो (वरुणम्) उपससार] उपेन्य (अनैन)
शुन शेपेन शाह्मणेन (स्वा) त्वा [य] यक्ष्यामि इत्युक्तवान् ।
२०. तथेति
स (ण) अपि (तथा) (इति) अङ्गीकृत्यैवम् उवाच । (क्षत्रियाद)
तब पुत्रा रोहिताद् अप्यय (ब्राह्मण) (भूयार) अभ्यधिक एव मम
प्रिय इति ।

चरैवेति ] [६ म २१. तम्मा इति उक्त्वा (तस्मै) हरिश्चन्द्राय कर्तव्यत्वेन (राजपूयम्) [प्रोवाच उपदिदेश च । स हरिश्चन्द्रो राजसूय प्रक्रम्य तस्य मध्ये [मभिषेचनीये] यो ऽयम् अभिपेचनीयारय एकाइ सोमयाग , तस्मिन् (तम्) (एतम्) शुन शेप पुरुष (पशुम) (मालभे) सवनीयपशुत्वेन आलब्धु निश्चित- वान् । [ऐतरेयब्राह्मणे ३३/३] :३: शतपथब्राह्मणे मत्स्यावतारेतिहासः अस्मिन्नाख्याने जलप्लावनस्य क्योपनिषद्धा । तदा मनु राजते स्म । जलप्लावने उस्थिते कश्चित् मत्स्य मनो साहाय्यमकरोत् , मनुश्च सुरक्षित पृथिव्या पुन मानवी प्रजा प्रावर्तयत् । मनु मत्स्य वान् मत्स्यश्च मनुम् । १ ह वै नियतमेव प्रसिद्वम इद् यत् कस्मिश्चिद् दिने प्रात उपसि एव सेवका मनवे वैवम्बताय राज्ञे मनवे। तादर्थे चतुर्थी। अवनेज्यते प्रक्षाल्यते हस्तादि अनेन इति अवनेग्य मुग्वादिप्रक्षालनाय उदक जलम माजहू, पानीतवत । यथा अवनजनाय प्रक्षालनाय इद जलम् पाणि म्या हस्ताभ्याम माहरन्ति गृहान्ति, एव तथैव तस्य मनो भवनेनिजानस्य मुखादिक प्रक्षालयत पाणी हस्तौ एक मत्स्य मीन मापदे प्राप्त । जले एको मीन आसीत्, स मनो हस्ते जलेन सह आगच्छत् इति भाव ॥१॥ २ स मत्स्य ह किल प्रस्मै राज्ञे मनवे वाचम् शब्दम् उवाद कथितवान्-मा मा बिभृहि पालय । त्वा त्वाम पारयिष्यामि रक्षघ्यामि तारयिष्यामि वा। मनु प्रश्नमरोत्-त्व मा मा मनु कस्मात् कष्टात् पारयिष्यसि रविष्यसि तारयिष्यसि वा इति । मत्स्य उद्तरत्-भविष्यति काले आगन्ता एक मौष जलप्लावन सर्वा समया इमा एता जगति

मरस्यावतारेतिहास ]
[ ११ म
वर्तमाना प्रजा प्राणिन पदार्थान् च नि:ढा नि शेपेण पूर्णरूपेण इत
कुचित नेति, नाशयिष्यति च । तत तस्मात् जलप्लावनात् त्वा
ar पारयितास्मि-क्षिध्यामि तारयिष्यामि वा इति ।
मनुरपृच्छत्-हे मत्स्य, ते तव मृति पालन पोपण च कय केन
विधिना मया फतव्या इति ।।२।।
३ समत्य हैं किल उवाच कथितवान् । यावन् यद। वे सुनिश्चित-
मिद यन् मादृशा प्राणिन क्षुल्लका तुद्रका अल्परा भवाम वर्तामहे
तावत् तदा न अस्माक सुज्ञातमिद यत् बह्वी बहुसख्याका नाष्ट्रा
नाशका हिंसका भवति वर्तन्ते । अत्र बहीति नाष्ट्रेति च उभे पदे
एस्वचनान्ते स्त | अथवा-यावत्-तावतो यस्मात्-तस्मात् इति
हेतुद्योतको एवार्थो स्याताम् । उत तथा च मत्स्य एक मीन मत्स्यम्
अन्य मीनम् एव अपि गिलति क्वलीकरोति । अत मा माम् भने स्वस्य
पुरत बुम्म्या मृत्तिकादिनिर्मिते कस्मिश्चित् लघौ घटे पात्रे वा बिभरासि
स्थापय पालय च ।
स मत्स्य अह यदा यस्मिन् दिने गले वा ताम् कुम्भी घटम्
अतिवध अतिक्रम्य दीर्घ भवामि, यदा मम शरीरम् कुम्भस्य शरीरात
अधिक भवेत् , प्रथ तदा क्यूं गत सात्वा भूमौ निर्भिद्य तस्या तस्मिन्
गत मा मा बिभरासि स्थापयित्वा पालय । स मत्स्य अह ताम् कपू,
गर्तमित्यर्थ । प्रतिवर्ष अतिक्रामेयम् अय तदा मा मा दीर्घ सजात
मत्स्य समुद्रम् जलनिधिम् मभ्यवहासि नय, तत्र च विसृज । सहि
तस्मिन् गले वे निश्चयेनैव अहम् मतिनाष्ट्र श्रीन नाष्ट्रान्
नाशयितृन् हिंसकाने इति, हिंसराना अगम्य भवितास्मि भविष्यामि ।
कश्चिदपि मा नाशयितु समर्थो न भविष्यतीति भाव ॥३॥

४ शश्वत् क्रमेण शीघ्रमेव भष महामत्स्य मास अभवत् यत स मत्स्य ज्येष्ठ बृहत्तम सर्गेभ्य प्राणिभ्य अधिक्तम शीघ्रतम वर्धते वृद्धिम् श्राप्नोत् । 'सर्व एव हि जलधरा अतिशयेन वर्धन्ते, स तु मत्स्यत्वादनाष्ट्रत्वाच बृहत्तम वर्धते' इति सायणाचार्यस्य व्याख्या । अय भाव -स मत्स्य असाधारण आसीत्, अत शीघ्रम् एव अवर्धत । अथ इदानीं यदा स मत्य मनुना समुद्र क्षिप्त तदा मस्य मनुम् अकथयन्- इतिथीम्-इयत्य तिययो यस्या सा, निर्धारिताया तिथौ इति भाव । अत्र तिथिनिर्धारण न विहित । समुद्र मत्स्य- क्षेपदिवसात् कतमो दिवसो ऽत्र अभिप्रेत इति तु न निर्दिष्टमस्ति । सायणमतेन-इयतीना दशाना द्वादशाना वा पूरणी इतिथी । शब्दो ऽय 'समाम्' इत्यस्य विशेषणम् । अमुकवर्षे इति भाव । तद स पूर्वोक्त पौष जलसमूह मागता उत्थास्यति । तत् सदा मा मा नावम् तरणिम उपकल्प्य निर्माय उपासास सेवस्व । नौका रिन्य मा सेवस्व, अथवा मा मत्स्यमेव नौकारूपेण प्रयुज्य ता नावम् उपासासै आश्रय । स त्व मनु प्राधे जलसमूहे उत्यिते प्रादु भूते सति नावम् नौकाम् मापद्यास आश्रयस्व, तत तदानी, तस्माद् प्रौघात वा त्वा वा मनु पारयितास्मि रतिप्यामि तारयिष्यामि च । इति ॥४॥ ५ स मनु त मत्स्यम् एव मत्स्यस्य निर्देशम् अनुस्य भृत्वा पालयित्वा समुद्रम् मभि उद्घौ मवजहार अत्यजत् । स मत्य झष मनवे यतिथी समा य वर्ष,तत् तस्मिन् समये परिदिदेश निर्दिष्टवान, ततिथी समाम्--तत्तिथियुक्ते वर्षे नावम् नौकाम् उपकल्प्य निर्माय उपासाञ्चक्र सेवमानोऽतिष्ठत् । स मनु औधै जलप्लावने उत्यिते समायाते नावम् तरणिम प्रापेदे आरूढवान् । त नाव मनु च स मत्स्यावतारैतिहास ] [ १३ म मनुना पालित मत्स्य झप मीनो वा उपपापुप्नुवै समीपे नौकाया अध आगन्छन् । मनु च तस्य मत्स्यस्य शृगे नाव नौकाया पास रज्जुम् प्रतिमुमोच नद्ववान्-अबध्नात् । तेन बद्धन पागेन मनुनौकाभ्या सह स मरस्य एतम् पुरोदृश्यमान सर्वतिम् उत्तर गिरिम् हिमालय नाम उत्तरस्थ पर्वत प्रति मधिदुद्राव मवेगम् प्रधिजगाम । सायण 'अतिदुद्राव' इति पठति । तत्रापि अयमेव अर्थ ॥५॥ ६ स मल्य ह बिलु उवाच-उवाद । त्ता त्वा वै नि सशयम् भगेपरम्-रक्षितवान् , अतारयमिति वा । इदानी त्व नाव तरणि वृशे द्र मे प्रतिबघ्नोष्व बधान। गिरी पर्वते ऽस्मिन् हिमालये सन्त वर्तमान वा त्वाम् उदक जलम् अत आतमध्ये गिरिमन्तरन्तर एव निर्भिद्य मा छेत्सीत् न नाशयिष्यति, अथवा अस्माद् देशाद् पृथक् न नेष्यति । यावर यावत् यावद् र यथा यथा वा उदक जल ममाया अधो गच्छेन् अवतरेत् , तावत् तावन् तावद् तावद् दूर, तथा तथा इति वा मन्वयसमसि-अनुक्रमेण अवसससि--अवतर। इति । स मनु ह बलु तावत् तावत् तावन् तावद् दूरे, तथा तथा वा अनु अबससप अनुक्रमेण अवानरन् । उत्तरस्य गिरे हिमालयस्य तद् एतद् प्रसिद्धमिद मनोरवतरणप्रदेशम् इदानीमपि 'मनोरवसर्पणम्' इति नाम्ना जानति रयापति च जना । इति । स मौघ तलसमूह ह वलु ता तत्काले वर्तमाना सर्वा मममा प्रजा प्राणिन निस्वाह नघटा अकरोत् । भय तदा इह अस्मिन् लोके मनु एवं एक एकल परिशिष सजीव सुरक्षितश्च अवशिष्ट ॥६॥ [शतपथब्राह्मणे १ ८. १. १-६] कामयमान शतपथब्राह्मणे मनोः प्रजातिः [ मत्स्यारतारेतिहासस्योत्तरार्धः] १. सोऽर्चन्छाम्यन्निति स जलप्लावनात् परिशिष्ट एकाकी मनु प्रजाकाम प्रजानि इन्छन् अर्चन देवान् पूजयन् श्राम्यन् तपश्चरन् कष्टान्यनुभवन् चचार न्यवसत् । निक्सन तन प्रजारामनायाम् अपि च पाक्यज्ञेन ईजे पाक्यज्ञम् अयजत् । तस्मिन् यज्ञे स अप्सु जलेषु प्राणरूपेषु । 'आपो वै प्राणा' इति शातपथी श्रुति । घृतमाज्यम् । दधि तीरज अम्लगुणयुक्त विकार । मस्तु दधिसार । श्रामिक्षा दवि जलम, अथवा दुग्धध्नो मिश्रित पेयपदार्थ -लप्सीति भाषायाम् । ताम् । इत्येतानि वस्तूनि । जुहवाञ्चकार अहौपीत्। तत तस्मात् अनुष्ठितात् पाक्रयज्ञात् सवत्सरे एकस्मिन् वर्षे व्यतीत एका योषित् मिश्रीभावात्मिका सम्बभूव सम्भूता प्रादुर्भूता | सा योषित् "पिब्द माना पाक्धर्मात्मिा । पिव क्षरणे । श्रा-दकारप्रत्यय तत्त्वेन साताद् आत्मगामिफलत्वाद् आत्मनेपदम् । पिवतेदकारप्रत्यययोगद् बत्वम्" इति भाष्यकार सायण । शरीरी पाक्यज्ञ इति अर्थ अत्र सगच्छते तराम् । घृतप्रभवाद् घृत सवन्ती इव उदेयाय उद्गता उदकादुस्थिता। एवञ्च सा सुस्निग्धा पिन्दमाना येन तस्य तस्या पदे घृत सन्तिष्ठने मनो प्रजाति स्म । यत्र यत्र सा पद न्यधात् तत्र तत्रैव घृतस्य चिह्नमभूत् । तया इडया च मित्रावरुणो कथमपि मग्माते सगतौ मिलितो। "प्राणा- पानौ मित्रावरुणो" इति 'प्राणोदानी मित्रावरुणो' इति च श्रुतिवच- नात् मित्रावरुणौ खलु प्राणापानो, प्राणीदानौ वा । ताभ्याम् इडाया सम्मेलनमभूत् ।।७।। २ वा हेति ताम् इडाम तो मित्रावरुणौ उचतु पृष्टवन्तौ-त्व का असि इति । इडा कथितवती-अह मनो दुहिता-पुत्री अस्मि । अथवा अह मनुना दुःखेन हिता प्राप्ता दोइनसामप्रीभूता वास्मि । एतच्छत्वा मित्रा वरुणौ पुनरूचतु-वमेव न कथय । त्व तु आवयो मित्रावरुणयो - प्राणापानयो दुहिता दोहनसामग्री असि एवमेव ब्रवक्थय । इडा तन स्वीकृतवती उवाच अवदत् च-न इति । अहमेव क्थयितु न पारामि न चाह्नो करोमि । यत य मनु एव माम् अनीतत पाकया कृत्वा अप्सु प्राणेषु धृतादिक हुत्वा उत्पादयामास, अहम् इडा तस्य ण्व मनो दुहिता अस्मि भवाम नेतरम्य कस्यचिद्, न युक्यो । तस्याम इटायाम् अपि तु अमी मित्रावरुणौ ईपाते गति कुलत । इडा अन्न- भूतास्ति, प्राणापानौ च अन्नात् जायते । अत एवेदमुक्तमिति प्रतिभाति न । अथवा-ईपाते शासन कुरुत-साधिकारी स्त इति भाव स्यात् । तद्वा तत् मित्रावरुणयो अधिसर वा जज्ञो जानाति स्म वा अथवा न न जज्ञो न जानाति स्म इति तु न जानीमहे । सा तु अति तो अतिक्रम्य तत् स्थान परित्यज्य इयाय गतवती । सा इडा मनुम मनुममीपम् प्राजगाम भागन्दत | १६ म] [ वैदभारता ३. ता ह मनुरिति मनु ताम् इड़ा दृष्ट्वा स्वाच पप्रच्छ-त्व का असि इति । मत्समीपे च स्मिर्थमागतवत्यसि । सा इडा उदतरत्-अह नव मनोरेव दुहिता दु खेन प्राप्ता दोहनसामग्रीभूता पुत्री अस्मि | मनु पुन पद-हे भगवति, त्व मम मनो दुहिता-दुखेन प्राप्ता दोहन सामग्रीभूता पुत्री इति यात्मान रथ कस्मात् कारणात् कथयसि । सा इडा अकथयन्-त्व या अमू ता पूर्वम् अप्सु जलेषु प्राणेषु धृतम् आज्य, दधि क्षीरज पदार्थविशेष, मस्तु दधिसाश्म, आमिक्षाम दुग्धदनो मिश्रणजनित पेयपदार्थ चेति आहुती बीपि अहौपी अजुहोत् , तत ताभ्य माम् अजीजनथा उत्पादयामास । सा अहम् आशी कल्याणकारिणी वा मगलभूता वा भद्राय कामो वा अस्मि । अत तातादृशी भद्रकारिणी मा मा यज्ञे प्रजोत्पादनमणि अवकल्पय अङ्गीकुरु-सहचरों-पत्नी कुरु । चेद् यदि वै असशय मा मा यज्ञे प्रजोत्पादनकर्मणि अवकल्पयिष्यसि सहधर्मचारिणी विधास्यास, प्रजया सन्तानेन पशुभि गवाश्वादिभि बहु समृद्ध भविष्यसि । बहो प्रजा पुष्क्लपशुसमूह च लफ्यसे इति भाव । याम उ या का चित् खलु आशिष कामनाम् पाशासिप्यसे अभिलषिस्थसि, सा आशी कामना ते तव सर्वा सममा समद्धिष्यते सिद्धा भविष्यति । इति अनेन इडाया आग्रहेण ताम् एतत् एताम इडा स मनु यज्ञस्य मध्ये सन्तानोत्पादने अवाकल्पयन् अगीकृतयान | एतद् एव यज्ञस्य तो फर्मणो मध्यमस्ति यत् प्रयाजानुयामयो अन्तरा मध्यम् अस्ति । "प्राणा व प्रयाजानुयाजा " अत प्राण्यो मध्ये धृतध्यादीनाम् आहुतिरेव यज्ञस्य मध्ये इडाया मनुद्वारा अवकल्पनमस्ति || मना प्रजाति ] तयार्चनिति प्रनाकाम सतान कामयमान स मनु तया इडया सह अर्चन दर्शपूर्णमासयो देवान् पूजयन् श्राम्यन् तप कुर्वन्, कष्टानि अनु- भवन इति भाव । चचार व्यवसत् गार्हस्थ्यजीवनलतण यज्ञमकरोत् । तया इडया सहधर्मचारिएया शक्तिभूतया वा स मनु इमा जगति विद्यमाना प्रजाति सति प्रजज्ञे उत्पादयामास, या इय मनो प्रजाति प्रजा पथ्यते स्मर्यते वा । जगति सर्ने जाता जनिष्यमारणा च स्त्रीपुरुषा मनो प्रजातित्वादेव मानवा उन्य ते । स मनु या का च आशिप भद्र कल्याण कामना वा वेनया लालसया आशास्त लब्धुमैच्छन् , सा आशी सर्वा सर्वथा अस्मै अस्य मनो कृते समाऱ्यात सफला सिद्धा वाभूत् । मनु सर्वान् कामान् तया इडया । महधर्मचारिएया प्राप्तवान् इति निष्कर्ष । अथवा याम् उ एनया इति पदन्छेद स्यात् । एनया इति इडाया द्योतक पदम् । एनया अनया इडया इति भाव ॥१०॥ ५. सैपैति निदानेन अनुसधानेन लक्षणैर्वा ज्ञायते यद एपा या मनो दुहिता आसीत् , अप्मु धृतादीनामाहुतिभ्य प्रपन्नया यया च मनु प्रजाति जनयामास, सर्वा च कामना लब्धवान् , मनुना च या यज्ञमध्ये अवल्पिता सा खलु यत् या इडा इति नाम्ना प्रसिद्धा। सा च इडा पात्ररथा सामग्री, पशवो वा । उक्तमस्ति शतपथब्राह्मणे असे अनुपमेव- पशवो वा इडा' इति, “स समवदायेडाम् । पूर्वाद्ध पुरोडाशस्य प्रशीर्य पुरस्ताद् ध्रुवायै निदधाति, ता' होने प्रदाय दक्षिणात्यति" इति च ।

१८ म]
[ वेदभारती
.
स जन य ह स्खलु एव विद्वान् जानन् इडया पुरोडाशादिना
चरति प्राणयक्ष मम्पादयति, एता मानवी प्रजाति प्रजा सतान
प्रजायते उत्पादयति, या मनु प्राजायत उत्पादयामास । वेनया
लालसया, अथवा उ खलु एनया इडया या का च आशिप कामना
भद्र वा प्राशास्ते कामयते सा कामना भद्र वा अस्मै जनाय सर्वा
सम्पूर्ण समृद्ध्यते पूर्णा सजायते ।।११।।
अस्मिन भागे ब्राह्मणकार सूचयति यद् श्राख्यानमिद यथार्थम्
घटितेतिहासरूपेण न पाह्यम् । अत्र रूपक्माश्रित्य इडाप्रयोगस्य
महत्त्वमेव प्रतिपादितमस्ति । इति ।
[शतपथवाहणे १. ८. १. ७-११]

:५: ऐतरेयब्राह्मणे शुनाशेपाख्याने वरुणस्य तितिक्षा १. अति (प्रथ) सम्प्रति । (एन) पुनार्थिन हरिश्चन्द्रम् (उवाच) नारद रथित शन्-हे हरिश्चन्द्र पुत्रप्राप्त्यर्थ त्व (राजान) जगत नियन्तार (वरुण) देवम् (उपधाद) प्रार्थयस्व-हे वरण, एताशी कृपा विधेहि । यया (मे) मम (पुत्र ) सूनु (जायनाम) उत्पद्यते । यदि अह पुत्र | लभेय, तर्हि (तन) पुत्रेण अह (त्वा) त्वा तुभ्य वरुणाय (यज) यक्ष्यामि बलिरूपेण उपाइरिष्यामि। २-५. तथेति हरिश्चन्द्र नारदस्य उपदेशानुमार क्तुं सहमति प्राशनाह- (तया) एवमेवाह रोमीति । (स) हरिश्चन्द्र (राजान) जात स्वामिन (वरुण) देवम् (उपससार) उपागच्छत् प्राधयामास च-(म) मम (पुत्र) (जायताम्) उत्पन्न स्यात् । श्रह (तेन) पुरेख (वा) त्वा लीकृत्य (यज) यज परिप्यामि । वरुणोऽपि तस्य प्रार्थना ममयमिम च स्वीकृत्य श्राह-(तपा) एवमस्तु । तव पुनो भविष्यति । एव (तस्य) हरिश्चन्दम्य (पुत्र ) सूनु (जज्ञ) उपद्यत । तस्य (नाम) (रोहित ) इति कृतमभूत्।

२० म] [ वरुणस्य मिति ६-२४. इदानी बहुमि. पर्याय वरुणस्य दक्ति हरिश्चन्द्रस्य प्रत्युक्तिश्च प्रतिपाद्य ते । प्रथम वरुण रोहितस्य बलि याचते, हरिश्च दृश्च व्याजेन केनचिद् समयमतिकामति । वरुणश्च रोहितस्य यौवन प्राप्तिपर्यन्त हरिश्चन्द्रम्य व्याजान शृण्वन् महते । इयमेवात्र वरुणस्य तितिक्षा | अन्न समानाना शब्दवाझ्याना व्याख्या पुन पुन न रता, एकवारमेव व्याख्यान प्रदत्त, सुगमत्वात् । ६-८. त होवाचेति हरिश्चन्द्रस्य पुत्रे जाते (स) वरुण (त) हरिश्चन्द्रमुवाच अकथयत्-(३) स्खलु (ते) तब (पुत्र) सुनु (मजनि) उत्पनो जात । (मनेन) पुत्रेण (मा) मा-मय (यजस्व) उपाहर । (स) हरिश्चन्द्र (ह) खलु (उवाच)-यदा यस्मिन् काले वै खलु पशु यन्ने उपाहरणीय जन्तु , अन्न बालक (निदश ) अतिक्रान्तानि दश दिनानि यस्मात् । स (भवति), जन्मनो दश दिनेभ्य पश्चादिति भाव । (प्रथ) तदा (स) पशु (मध्य ) यज्ञाह -यागयोग्य (भवति) जायते । अत अय बाला अपि-निदश (नु) खलु (प्रस्तु) भक्तु । (मथ) तदा (वा) तुभ्य (यजे) या परिष्यामि । उमण अगी अकरोत् - (सपा) एवमस्तु । अग बालक निर्दशो भवतु, तदा मदर्थ त यक्ष्यसि । ६-११. स हेति (स) रोहित निर्देश (मास) बभूव । यदा वा इति-अय भाव - हरिश्चन्द्र क्थयति मन्ये अशौचस्य दश दिनानि तु व्यतीतानि, वेदभारती ] [ २१ म पर दन्तानामभावे अस्य अवयवा न सम्पूर्णा । विक्लावयव न यागयोग्य । अत दन्ता आगन्छेयु , तदैव होतव्यो ऽय बालक । १२-२१. तस्य हेति (जज्ञिरे) उत्पन्ना जाता । (प्रश्न) जाता । लुडि रूपमिदम् । (पद्य ते) पतन्ति । अलीमा दन्ता पशो अगपूर्ति न कुर्वन्ति, अन ते पतन्तु । (पैदिरे) पद्धातोलिटि रुपम् , अपतन् । (प्रपत्मन) लुडि रुप तस्मादेव धातो, म एवार्थ । पुनर्जापत इति-पुनरुत्पन्नाना स्थिरत्वेन सपूर्णावयवत्वान् पशु मेध्य भवति । २२-२३ क्षत्रिय इति (क्षत्रिय ) राजयकुलोत्पन्न बालक । यद्यपि अय सम्पूर्णावयव सनात तथापि अय क्षत्रियपुत्र अस्ति । अत स्वजात्या अनुरुप (मानाहा) मनाह धनुनाण कवचादिरुप मभार धारयितु शीलम आचार यम्य स तथाविध भवतु । तदा स्वजात्युचितव्यापारमपूर्ता एव मेध्यत्वम् । अत रोहित (नुः क्षिप्रमेव सनाह प्राप्नोतु । २४-२७ स ह मनाहमिति (प्रात्) प्राप्तवान । शस्त्रा दधारणे स्मर्थ युबाभूत् । वरुणस्य रोहितयज्ञायानुरोधे स हरिश्च द्र राहित यष्टुमगीकृत्य तम् (माम प्रयामास) प्रामारयन , याच च । (तन) प्रिय पुत्र । उपलालनार्थ पुने पितृवाचिततशब्दप्रयोग इति सायणाचार्य ।पर तातवद् अय शब्द स्नेह्द्योता सम्बोधनशब्द् एव ! (प्रयम् एव वरुण (त्वा) रोहित (मह्य ) हरिश्चन्द्राय अनेन समयेन (अदा) दत्तवान्, यदह खरि जाते त्वया अस्मै यक्ष्य इति । त्वयि जाते तु मया यज्ञ न

२२ प्र]
[ वरुणस्य तितिमा
कृतम् । (हत) पर महद् दुखमिद यद् इदानी तु मया समय
अनुसतव्य । अत (मह) हरिश्चन्द्र (स्वया) रोहितेन (इम) वरूण
(यो) यक्ष्ये । यज्ञे तर बलिमस्मै प्रदाय प्रतिज्ञा पूरयिष्यामीति भाव ।
२८. स ह नेति
एतत् श्रुत्वा रोहित स्वलिदानाद् विभ्यद्, हरिश्चन्द्रस्य
वचन तिरस्कृत्य (ह) खलु (न) मयास्मै यज्ञ न करिष्यसि । नाह देव
प्रस्तावमुररीकरोमि । एवम् (उक्त्वा) क्थयित्वा (स) रोहित (धनु)
शरासनम् (मादाय) गृहीत्वा (मरण्य) वनम (उपातस्थौ) अगच्छत् ।
सन च (अरण्ये) वने स (सवत्सरम) एक वर्षे यावत् (पचार) अभ्रमत्
न्यवसत् वा । धनुर्महणमात्मरक्षाय एव ।
[इतो सिमा कथा पूर्वमेव "२ चरैवेति" इति
पाठे प्रत्ता वर्तते । तत्र द्रष्टव्या।]
[ऐतरेयबामणे ३३/२

४ तैत्तिरीयोपनिपदि शिक्षावल्ली 1 तपः -ऋत यथाशास्त्र किं किम् अनुष्टातव्यमिति प्रतिपादयति- यधाकर्त्तव्य बुद्वौ परिनिश्चितम् अर्थमिति शराचार्या । सत्यधारण मिति दयानन्दस्वामिन । नियमानुशासने इत्याधुनिका । वेदा, ईश्वरो वेति ब्राह्मणप्रन्या । स्वाध्याय प्रतिदिनम् अव्यवहित नि स्वार्थ- भावेन वेदादिशास्त्राणामध्ययनम् । प्रवचनम् अध्यापन ब्रह्मयज्ञो चा । एतानि मृतादीनि अनुष्ठेयानि इति वाक्यशेष । एव सर्वत्र वाक्यशेष उहनीय । सत्य च सत्यरचन यथाव्याख्यातार्थ वा। यथादृष्ट यथानुभूत यथाजात च सय भवति । तप कृन्छादि, क्लेश- सह्त्वमिति भाव । दम इन्द्रियजय । शम अत करणोपशम । अग्नय गार्हपत्यदक्षिणाहबनीयादिरूपा प्राधातव्या । अग्निहोत्र साय प्रात मन्त्रपूर्वम् अग्नी आहुतिप्रक्षेप । तद् होतव्यम् । अतियय विद्वास सदाचारिण हितकारिण अभ्यागता जना , ते पूज्या सत्कर्तव्या । मनुपस्य इदम् मानुप लौक्ति सव्यवहार । यथास्थिति यथाप्राप्त तत्सर्व कर्त्तन्यम् । प्रजा सतानोत्पत्ति कर्त्तव्या। प्रनन ऋतौ ऋतौ भार्याभिगमनम् । प्रजाति पौनोत्पत्ति । पुत्र गृहस्थर्मणि प्रजननाय निवेशयितव्य । एतानि सर्वाणि कर्माणि साध्यायप्रवचनाभ्या सह नित्य सम्पादनीयानि ।

२४ म] [ वैदभारती , - स्वामिशकराचार्य लिखति-"सर्जरते धर्मभियुक्तस्य स्वाध्याय प्रवचने यत्नतोऽनुष्ठेये इत्येवमर्थ सर्वेण सह स्वाध्यायप्रवचनग्रहएम् । स्वाध्यायाधीन ह्यर्थनानम्, अर्थशानायत्त च पर श्रेय , प्रवचन च तविस्मरणार्थ धर्मप्रवृद्ध्यर्थ च । अत स्वाध्यायप्रवचनयोरादर कार्य ।। सत्यमिति सत्यमेव अनुष्ठातव्यम् इति सत्यवचा राथीतर मन्यते । सत्यवचा सत्यमेव वच यस्य स , यथार्यरचन । अथवा सत्यवचा नाम रायीतर स्थीतरस्य गोत्र -वशीय रायीतराचार्य । तप इति तप एव कर्त्तव्यम् इति तपोनित्य पौरुशिष्टि उपदिशति । तपोनित्य तपसि नित्य तप पर । अथवा तपोनित्य इति नाम पौरुशिष्टि पुरुशिष्टस्य अपत्य पुमान् पोरशिष्टिराचार्य । स्वाध्यायप्रवचने एव अनुप्ठेये इति नायो मौद्गल्य प्रतिपादयति । नाक क सुखम् । न क्म श्रर दुखम् । न अर विद्यते यस्य स नाक सुखी जन । अथवा नाको नाम मुद्गलस्य अपत्य पुमान मौद्गल्य श्राचार्य । इदानीम तैत्तिरीयोपनिषत्कार प्रकरणमुपसहरन् स्वकीय मत ददाति-तत् स्वाध्याय हि एव तप । तत् प्रवचन हि एव तप । अत एते स्वाध्यायप्रवचने एव सर्वदा अनुष्ठेये | अय भाव --स्वाध्यायेन सर्व विषयाणा सत्यतपोदमशमादिकर्मणा ज्ञान भवति । प्रवचन च तदेव भवति यदा जन तत्सर्व स्वयमेव जीवने व्यवहारे च सम्पादयति यत्किमपि स उपदिशति । अत स्वाध्यायप्रवचनयो कृतयो सर्वाणि कर्माणि सम्पादितानि भवति । वैशद्यार्थ छात्राणा सुखावबोधायव विस्तरेण तत्तत्कर्मणा शब्दश उल्लेखो विहित आचार्येण । [इति नवमो ऽनुवाकः] 11 आचार्यानुशासनम् अस्मिन् अनुवा के प्राचार्य ब्रह्मशानात पूर्व नियमेन वर्तव्यानि श्रोतस्मातादिर्माणि उपदिशति । अनुशामत पुस्पमस्काराय भवति । सस्कृतस्य हि विशुद्धसत्त्वस्यात्मज्ञानमजमवोत्पद्यते इति स्वामि- शराचार्य। वेदम् ऋग्वेदादिकम् अनून्य अध्याप्य । आचार्य गुरु । मनुमतेन तु वेदस्य अध्यापयिता एवाचार्य भवति । अन्तेवासिन गुस्कुलनिवासिन शिष्यम् अनुशास्ति साररूपेण कर्त्तव्य व्यवहार- मुर्पा दति । सन्य यथाप्रमाणावगत वच वद हि । तथैव धर्मम् अनुष्ठेयानि धर्माणि अात्मथित्य वेदादिषु वर्णितानि घर व्यवहर । स्वाध्यायाद् अध्ययनात् मा प्रमद् प्रमादम् उपेक्षा मा पार्षी । प्राचार्याय गुरवे प्रियम् इष्ट धनम् श्राहृत्य ानीय समयं च कृतविवाह प्रजातन्तु प्रजाया प्रसर पालनपोपणे वा मा व्यवच्छेत्सी न मिधि । यथा वशर्मपरम्परे साधु प्रसरत तथैवाचरणीयम् । 'अनुत्पद्यमाने ऽपि पुत्रे पुत्रकाम्यादिमा तदुत्पत्तौ यत्न वर्तव्य इत्यभिप्राय' इति शक्राचार्य। सत्यात् न प्रमदितव्य सत्यस्य उपेक्षा न कर्त्तव्या । अन्नभाषण व्यवहारादिक न कर्त्तव्यमिति भाव । धर्मात् न प्रमदितव्य प्रमादो न कार्य । कर्तव्यानि कर्माणि इहलोके परलोके च स्थितियारकारिण ।

२६] [ वेमारत अध्ययनमा नित्यम् अव्यवहित च सम्पागानि । एस कुशलाद् श्रात्मरक्षार्थात् कर्मण न प्रदितव्यम् । ति मङ्गलम् ऐश्वर्य वा । तस्यै भूत्यै भूत्यर्थात् ऐश्वर्यार्थात् मगलयुक्ताद् वा कर्मणो न प्रमदितव्यम। स्वाध्यायप्रवचनाभ्या न प्रमदितव्यम् । स्वाध्याय प्रवचनम् अध्यापनम् उपदेशश्च । ते हि नियमेन दर्तव्ये । एवमेव देवपितृकार्याभ्या देवयज्ञान् पितृयज्ञात च न प्रमदितव्यम् । एतानि सर्वाणि पूर्वमुक्तानि कर्माणि नित्यमेव सम्पाचानि । मातृदेवो माता देवो यम्य स मातृदेव , मातु पूजा इति - भाव । तादृश भव त्या । एव पितृदेव पितु पूजन , आचार्यदेव श्राचार्यस्य पूजा अतिथिदेव अतिथीना सस्ता भव । एते सर्वदा एवं सकतव्या , ते पामुपदेशश्च पालनीय । यानि अपि च अन्यानि अनवद्यानि अनिन्दितानि शिष्टाचारादि लक्षितानि शिष्ट अभिनन्दितानि आहतानि च र्माणि स्यु , तानि त्वया सेवितव्यानि कर्त्तव्यानि । इतराणि निन्दितानि शिष्टजनै वृतान्यपि नो न सेवनी यानि । यानि अस्माकम् आचार्याणा सुचरितानि शोमनचन्तिानि सदाचारपरायणानि कर्माणि शास्ता नुहल नि सन्ति तानि एव त्वया उपास्यानि अनुष्यातव्यानि, नियमेन क्त व्यानि इति भाव । इणि अतो विपरीतानि मामास्मपि चरितानि नो न अनुकरणीयानि । ये के च विशेषगुणयुक्ता प्राचार्यत्वादिधमै विशेषिता अस्मत् अस्मत्त श्रेयास प्रशस्यतरा ब्राह्मणा वेदज्ञा ब्रह्मज्ञानिनो वा तव गृहे आगन्छेयु , तेपा स्वया आसनेन आसनदानादिना सकारेण 11 आचार्यानुगारनम् ] [ २७. प्रश्वसितव्य श्रम अपनेतन्य । सर्वधा अतिथिसत्कारपरायणो भव इति भाव । अथवा-गोष्ठ्ययादिषु एतादृशेभ्यो विद्वद्भय उच्चासनानि प्रदाय समुचित आदर करणीय । तेषामुन्नतो तेभ्य अनन्यसूयन् तपामुपदेशस्य सार गृहाण इति वा भाव स्यात् । किं च यन् किचिदपि देय तत् श्रद्धयैव दातव्यम् । अश्रद्धया श्रद्धाया अभावे ऽपि त्वयार्थिभ्य धनादिक देय दातव्यम् । अश्रद्धया अदेय किमपि न दातव्यम् । श्रिया विभूत्या स्वशक्त्यनुसारमेव देय दात म । ह्रिया लज्जया च देयम् । भिया भात्या अपि देयम् । * मविटा दयामैत्र्यादिकार्येण देयम् । यथास्यचिदपि स्यात् तथा दानमवश्य दातन्यम् , अन्यथा स्वयमेव-आत्मविभूतिफल सेवमान पापीयान भविष्यसि । । - अथैव वर्तमानस्य यदि कदाचिन् ते तब मनसि श्रोते स्मात वा कमणि वृत्ते वा आचारलक्षणे विचिक्त्सिा सशय स्यात् , ये तत्र तस्मिन् देशे काले च ब्राह्मणा वेदस्य ब्रह्मणो वा ज्ञातार बुधा । सम्मशिन विचारशीला । युक्ता वृत्ते वा अभियुक्ता स्वय प्रवृत्ता कर्मणि । आयुक्ता श्रपरप्रयुक्ता । अलूक्षा अक्षा अक रमतय प्रियाचरणा । धर्मकामा धर्मपरायणा , अन्येषा चापि धर्मे प्रेरका । स्यु भव तु । ते यथा येन प्रकारेण तत्र तस्मिन् कर्मणि वृत्ते प्राचारे वा वर्तेरन् व्यवहरेयु , तथैव त्वमपि वर्तेथा व्यवहरे । अथ अभ्यारयातेषु वेनचिद् अभ्युक्तेषु सदिह्यमानेन दोपेण सयोनितेषु कर्मसु वृत्तेषु च तथा वर्तथा व्यावहरे यथा तत्र तथाविधेपु कर्मसु प्रमाणभूता वेदशा ब्रह्मविद् विचारशीला कर्मवृत्तयो स्वय .

२८ मत
[ वैदभार
प्रवृत्ता अपरश्चापि प्रवर्तिता मधुरव्यवहरणशीला धर्मपरायणा
बरन व्यइरेयु ।
एप आदेश निधि । एप उपदेश पित्र्याचार्यादीना पुन
शिष्यादिभ्य अनुशासन शिक्षा वा अस्ति । एपा वेदोपनिषद् वेदस्ट
रहस्य सारो वा। एतद् एवं अनुशासन सस्कार नियमेन नित्य
पालनीया आज्ञा या । एव यथा पूर्वमत्र उक्त तथा सर्वम् उपासितब्र
सेवितव्य व्यवहर्तव्यम् । एव चैतद् उपास्य सर्वमिदम् अनिवार्यरूपेण
नियतमेव पालनीयम् । पुनर्वचनम् श्रादरार्थ बलाधानाय वा ।
इत्याचार्यानुशासनम् ।
[तैत्तिरीयोपनिषदि शिक्षाल्ल्याम् एकादशोऽनुपाकः

IF वेदमारती शब्दानुक्रमणिका [ पदों के आगे पहले पाठसया और उस के आगे सदर्भसख्या दी गई है। ] २२ ७८ ७७ मकायम भगान् मानय भग्निहोत्रम् मम्ने प्रजनि मजाजनत प्रजोजनया मज्ञन मतित्वेवेयाय मतिपय मनिनाष्ट्र प्रतिबंध ६।१२ ६|111 ६111) ७४ मनाश्रान्ताय अनुपश्यन मनुशासनम् अनुशास्ति मनूच्य अनन मन्त अन्तेवासिनम् मध तम भवससप मववसपासि ७११८ ५।२ ४॥२ (क) ४।३ (६) ५१४ ४॥२ (८) ६॥ ७18 मप ३१६ ७१४ ५ मय ७८ ७० ७.१५ ७.१५ माधान मदात् प्रदीना मधिदुद्राव मनवद्यानि मरसत मपापविद्धम् अपावृणु मपिहित मपीपरम अप्सु मभिपेचनीय मभूत्र १111 ४१ (७) २।२१ ५१३, ६५-७ ४६ म] [ वेदभारती ভাত ६111 ४।१८ मभ्यवहार मम्यवहासि मभ्याख्यातेषु ममी ७१६ ४३ (६) ६||१०-११ ४४२ (८) ४१३ (९) ७११ ४।१ (७) ७८ ३१ ७४ २०१७ ७४ ६||१०-११ ४।३ (६) ६५-७ ३११ ३१ मनाविरम् भस्मच्छेयास मस्मन् प्रस्मि प्रहम् महौषी प्रागन्ता माजह मात्महन भादाय मापद्यास मापेदे प्राप्नुवन प्रामन्त्रयामास प्रामिक्षा मालेभे मावृत মায়াদি भाशास्त माशी भास मासीन मासु ममृतम् पर्चन अर्थात अर्षत मलूका भवकल्पय मवद्य प्रवनेग्य भवनेजनाय पवनेमिजानस्य प्रवशिष्यते मवाकल्पयत् भविद्यया अविद्या प्रवोचत् मदगम् भशनया प्रश्नुते प्रसम्भव मसम्भूति भसावसो मसुर्या ७शा ३।१५ U'Y ५॥६ ४११ (७) २।२१ ७३ ४१३ (E) ४।४ (१०) ४१३ (६) ५३ २६ २११२ 11 ७११ २३ मा सुव प्रास्ते २।११ ७११ ७१३ ७/१२ १६ ७१३ माहतो माहत्य ४१३ (8) ६१-४ सन्दानुक्रमणिका ] [४७ म ३४ उवाचे इतिथीम इ, सर्वम् उवाद । इयाय ईग ईपाते २।२ ४।२ (क) ४११ (७) ७१ ४।२ () २३१, ७१५ १॥1 ३३३ रा ३२५ शा. २११ २१० ४१ (७) ऊचतु ऋतम् एकत्वम एवम् एक एतद एत्य एजन् उचरत् उत उत्तिष्ठन् उत्थिते उदच्यते २२ ३२ ४।२ (क) ६11 ७७ ७४ ७११६ ४१३ () २११८ ७.४ ७११८ ७४ १४ (१०) २।१ ६०१२ ७११७ ३२,४ २०१५ ६/121१०-११ उदरम् उदुम्बरम उदेमाय उपकल्प्य उपधाव उप यापुप्तुरे जरसहार उपससार एनन् एनया एयाय एवमुपासितव्यम् मोम् (5) मोघ कनिष्ठ कमविचिकित्सा ३१५ ७१८ २११६ ५१२ लि कवि २।३ ७८ ३३ ७.२ ७३ उपतस्यौ उसते उसासाचक्र उपासास उपास्यानि उपयाय कुम्भ्याम् दुर्वन दुशलान् कृतम् ६५-३ को मोह ७७ ७.१७ क्तो ४८ प्र] [ वेदभारती ३१३ ततिम् क्षुल्लका खात्वा गिलति चक्षु चचार चरत ३३ १111 २।३, ५६ २।२, ४ २१८ २१६ २।२ ७१ ७१ चरन बराति चरैव जगत् जगती जगत्याम जग्राह जजिरे जज्ञ जज्ञी जवीय जिजीविपेत् जीवेम जुगुप्सते जुहवाचकार जुहुराण ज्येष्ठ तदोघ ३२४ तन्तु ६१-४ तद्रयते २।१० तमसा ७३ २२१ तिष्ठत ૨૬ तीर्वा ७१११ ते ४१३ (६) स्यक्त ७१ ता । स्वमीपाते ४१२ (८) त्वा २११६ त्वा दत्वा २०१७ दधि ४१३ (8) दम ६1 दयान इभाज्य का अनुवाद ७१४ दुरितानि १। दयम् ६ देव १1111 देवपितृकार्य ६111॥५-७ देवस्य देवहितम् १1111 देवा ७४ द्वापर રાક धावत ७/४ ५४ २११, ५२ ४।२ (८) ७/४ ७२ १॥ ४।१ (७) ७११८ २।१४, ३४ भष तत् १३, २०१३ ३१५, ७४, ११ ।१८ मन्दानुक्रमणिका ] [ ४६ म पात्रेण १.1 ७१० पाप ७१५ २।२ २।४ ३।२,४ ३१२ ७.१८ ७१८ धीमहि धीर न नम उक्तिम् नय नाष्ट्रा निगृह्मान निदानेन निपद्यमानस्य निरुवाह পিল निर्दोढा किक्रोग भूषद् नो २११४ ४४ (११) રા पाप्मान पारयितास्मि पारविष्मामि पिदमाना पुरस्तात् पुष्पिण्यो पूपन् पेदिरे पौरुशिष्टि प्रचोदयात् प्रजज्ञ ini २१४ ७१५ ३१६ ५१३ १।। ४१४ (१०) ६11 प्रजन प्रजा २०१३ ।२ ६५-७ ६॥11 (३) ४११ (७) ५५ नोट १॥ ३१५ ६|111१-४ ६।। ८४ (१०) ३३५ १४ १३ (8) ६।। ६ पदे पद्यन्ताम् पद्यन्ते परा सुव परि दिदेगा परिभू परिशिति परीत पर्येत्य पशु पश्येम पाक्यज्ञन ७८ प्रजातन्तुम् प्रजाति प्रजातिम् प्रति मुमोच प्रपये प्रयाजानुपाजान् प्रवचन प्रश्वासितव्य प्राजापत्य प्राप प्राप्नोत्र प्रेत्य फलनहि २।११ २।२ । 111 ४११ (७) ७४ १४ १ - ५. म] [ वेदभारती ७५ ३१३ ३,४१३(६) शर ७.१ बह्वी बाह्यत बिभरासि विभृहि ब्रवाम भग भगवति भर्ग भवितास्मि १11 २६६ ४१३ (३) मा गृध मा छेत्सो मातरिश्वा मातृदेव मानुपम् माप्रमद मित्रावरूपी मुखम् मृत्यु मेध्य मौद्गल्य ७१५ ६1111५-७ ६॥ ६1111१-४ ४११ (७) भाव ७११५ ३।३ ६|15 11(२,४,७,६), ७३,६,१७,१८ ६|1118 भिया भुञ्जीथा ५।३ ६1. भूतानि ७७ य ५२ यजस्व यजा इति यजे २०१६ ५।११ २०२१ ३२५ यज्ञातुम् यतिथीम् सूत्यै भूय भूयश्च भूयान् भूयिष्ठाम भूष्णु भूति मृत्वा मधु मनीषी यम ६१-४ ६ ॥१-४ ७६ १1111 २।२० ७११८ २।४ ३२ ३१५ २०१० ७८ ४१३ () ४।३ (६) २।३, ३२, यापतिथ्यत यावत् युक्ता युयोधि ३३ ६111१०-११ ७.१८ ७ मया मस्तु मा रस्मोन् राजसूय २।२१ साब्दानुक्रमणिका ] राजानम् राथीतर राये लिप्यते वयुनानि वरुण वरेण्यम् वास्य विजानत विचचक्षिरे विजुगुप्सो विद्ध विद्यया विद्वान विधेम २२१९ ६11 ७१८ ७२ ७/१८ २११ १1 ७११ शश्वत् शाकरभाष्य -का भाव शान्ति शाश्वतीय शुभम् ७७ ७.१० सुन पुच्छ मादि शुधाव शुश्रुम शृणुयाम सेले ७१६ ७११४ ७शा० ७८ 11, ७८ ७८ २११२ २।१ २१२, ७१० १111 २।६ २।४ ६118 ४११ (७) २।१० ५६ ६118 ४११ (७) । ७१५ ७१११ ७१८ ७१८ ६।१०-११ श्राम्यन् श्रमाणम् वेदोपनिषत् व्यवच्छेत्सो व्याहृति 11१२ २।३,३११/५४ ६111१-४ १1 सवत्मरम् मविदा सजग्माते सजिहान सत्यधर्माय सत्यवचा सतम् सत्यस्य 111,२।१३, ७.२ ₹ ६1 २१८ १111 शतान् सम सनम् समधिष्यते समवायात् समा ३।६ ४।३ (६) दयान ७२ ७15 घरदः शतम् समाभ्य -. ७१६ समाम् समूह सपद्यते संपादयाचक्रतु सम्भव सम्भूति समशिन सर्वाणि मवितर सवितु साना सुपथा २०१६ ७.१३ ७१२ ६111१०-११ ७७ १५ सोयवसि २।११ जा१५ स्याम १५! स्वयभू स्वाध्याय ६॥ स्वामी दयान द का अनुवाद ६॥ स्वित ७१ २१, ३१ हता २।१० हि हिरण्मयेन ७/१५ है ७१८ ७१६ , • सह नाववतु । सह नौ मुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विपाव है ।। ॐ ॐ द्यौ शान्तिरन्तरिक्ष, शान्ति पृथिवी शान्तिराप शान्तिरोपधय शान्ति । वनस्पतय शान्तिर्विश्वे देवा शान्ति- ब्रह्म शाति सर्व शाति शातिरेव शाति सा मा शातिरेधि । * ॐ शाति शाति शाति ॥

इस पट्टी को पिन से या हल्का सा गोद लगाकर बन्द करे
बुफापोस्ट
पाठक की सम्मति और सुझाव
यहा १० पैसे का
टिकट लगाए
श्री सुबोध कुमार गुप्त, बी० ए०,
अध्यक्ष, पूवस्नातकीय अध्ययन विभाग,
भारती मन्दिर अनुस धानशाला,
पार-२, विश्वविद्यालयपुरी,
जयपुर-४

Vedbharti

Author
Gupta, Dr. Sudhir Kumar
Title
Vedbharti
File name
Vedbharti
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2012/04
Publisher
Jaipur, Bharti Mandir
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Government College, Kota
Classification
Devotional
DLI number
407661
Barcode
99999990303582.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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