Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Sanskrit Hindi Composition Bhag-1
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VIDYA S.Non- भूमिका। LIBRARY संस्कृत पढ़नेवाले विद्यार्थी यद्यपि व्याकरण आदि शास्त्रों के अनेक ग्रन्थ पढ़ जाते हैं परन्तु संस्कृत से हिन्दी और हिनी से संस्कृत में अनुवाद करने की बहुत ही अल्प सामर्थ्य रखते हैं। यदि उन को उक्त भाषाओं में से एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करने के लिये दो चार वाक्य भी दिये जायं तो उस की रीतियों के न जानने के कारण प्राय घबड़ा जाते हैं और यदि किसी प्रकार कुछ किया भी तो वह बहुधा अशुद्ध और प्रयङ्गत होता है। इस परम न्यूनता के दूर करने के लिये वाराणसीस्थ राजकीय संस्कृतविद्यालय के प्रधानाधिपति घिविधविद्याविचारवा- चस्पति विज्ञवर श्रीमान वेनिस साहेब महाशय के आज्ञानुसार मैंने इस यन्थ के बनाने का प्रारम्भ किया और इस का नाम अनुवाददीपिका रक्या । सम्पति इस का प्रथम भाग बन कर प्रकाशित हुआ है। इस भाग में संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं के बहुत से ऐसे विषय लिखे गये हैं जो उन भाषाओं के परस्पर अनुवाद करने में अत्यन्त उपकारक है । यदि इस के पढ़ने से संस्कृत के छात्रों का कुछ भी उपकार होगा तो में अपना परिम्नम सर्वथा सफल समझंगा।
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श्रीगणेशाय नमः॥ अनुवाददीपिका ॥ सोरठा। हिय धरि नन्दकुमार, छात्रन के उपकार हित। बरनत मति अनुसार, कछुक रीति अनुवाद की ॥ इस पुस्तक में संस्कृत से हिन्दी और हिन्दी से संस्कृत में उल्था करने की कुछ रीत काही.जायंगी । संस्कृत के पण्डित(छ कारक)मानते हैं(कती कम्मे करण सम्प्रदान अपादान और अधिकरण । परन्तु हिन्दी के वैयाकरण अपादान के आगे सम्बन्ध और अधिकरण के आगे सम्बोधन को जाड़ कर आठ कारक स्वीकार करते हैं। संस्कृत में तीन लिङ्ग हैं पुलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक- लिङ्ग । परन्तु हिन्दी में दो ही लिङ्ग हैं पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग । संस्कृत के नपुंसकलिङ्ग के शब्द बहुधा हिन्दी के पुलिङ्ग शब्दों में अन्तर्गत हो जाते हैं। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में शब्द के आगे (सात विभक्तियां जोड़ी जाती हैं, प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्था, पञ्चमी, पष्ठी, और सामी J संस्कृत में तीन वचन है (एकवचन द्विवचन और बहुवचन)। परन्तु हिन्दी में टो हो वचन है एकवचन और बहुवचन । हिन्दी में बहुवचन ही से कहीं दो पदार्थ और कहीं दो से अधिक समझे जाते है। जेसे । बालको पठतः । लड़के पढ़ते हैं।
बालकाः पठन्ति । लड़के पढ़ते हैं । यहां हिन्दी में बहुवचन से पहिले वाक्य में दो लड़के और दूसरे में दो से अधिक समझे जाते हैं। क्योंकि हिन्दी में द्विवचन नहीं होता । कहाँ २ द्वित्वकी स्पष्टता के लिये विशेष्य के साथ "दोनों" अथवा "दो" शब्द को नोड़ते हैं । जेसे बालको कीड़तः । दोनों लड़के खेलते हैं। अथवा दो लड़के खेलते हैं। ऐसे ही कहाँ २ बहुत्व की स्पष्टता के लिये "लोग" "सब" इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हैं। नेसे । ब्राह्मणा भुजते । ब्राह्मण लोग भोजन करते हैं। अश्या धावन्ति । घोड़े मव दौड़ते हैं। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में धातु दो प्रकार के होते ई सकर्मक और अकर्मक । सकर्मक उस धातु को कहते हैं जिस के व्यापार और फल भिन्न २ स्थानों में हों। जैसे। यचदत्तस्सयडुलान् पचति । यज्ञदत्त चावल पक्राता है । यहां पकाने का व्यापार यात काम यज्ञदत्त में है और उस का फल अर्थात् घायल का के.मल होना चावल में है। इस लिये संस्कृत में "प" और हिन्दी में "पकाना" दोनों धातु सकर्मक है। और जिस के व्यापार और फल दोनों एक होठोर रहते हैं उस धातु को अकर्मक कहते हैं। जैसे । बालकः शेते । लड़का सेता है। यहां सोने का व्यापार अथात् काम लड़के में है और उसका फल भी लड़के दो में है। इस लिये संस्कृत में "शी" और हिन्दी में “सेना" दोनों धागु प्रफर्मक है। संस्कृत में धातुओं को दश गणों में विभाग करते हैं। गण ये हैं। भ्यादि, अदादि, नुहोत्यादि, दिवादि, स्यादि तुदाटि, रुधादि, तनादि, गदि और धादि । धातु मिस गण के. भाटि में पढ़ा रहता है यह उसी के नाम से पुकारा जाता है। हिन्दी में ऐसा विभाग नहीं है।
जैसे संस्कृत में सकर्मक धातु के आगे कती और कर्म अर्थ में और अकर्मक धातु के आगे की और भाव अर्थ में लकार के स्थान में लिए प्रादि प्रत्यय स्थापन करके कर्तृवाच्य- तिङन्तक्रिया कर्मवाव्यतिङन्तक्रिया और भाववाच्यतिङन्तक्रिया बनाई जाती है तेसे ही हिन्दी में भी कर्तृप्रधानक्रिया कर्मप्रधान- क्रिया और भावप्रधानक्रिया बनती हैं। भेद इतना है कि हिन्दी में लकारों का विधान नहीं होता। संस्कृत में कतृवाच्यतिङन्तक्रिया के धातु तीन प्रकार के होते हैं। परस्मैपदी आत्मनेपदी और उभयपदी । जिन धातुओं के आगे परस्मैपद अर्थात् तिय आदि प्रत्यय स्थापन किये जाते हैं वे परस्मैपदी जिन के आगे आत्मनेपद अर्थात त आदि प्रत्यय जाड़े जाते हैं घे आत्मनेपदी और जिन के आगे दोनों प्रकार के प्रत्यय लगाये जाते हैं वे उभयपदी कहाते हैं। हिन्दी में ये भेद नहीं हैं। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में क्रिया के मुख्य काल तीन हैं वर्तमान भूत और भविष्य । वर्तमान उस काल को कहते हैं जिस की क्रिया का आरम्भ तो हुआ हो पर उस की समाति न हुई हो । जैसे । विष्णुमिचो लिखति । विष्णुमित्र लिखता है । इस से ज्ञात होता है कि विष्णुमित्र ने लिखने का प्रारम्भ तो किया है पर उस का लिखना अभी तक समान नहीं हुआ है । अर्थात् वह लिखता जाता है। भूत उस काल को कहते हैं जिस की क्रिया की समाग्नि हुई हो । जेसे । यज्ञदतोऽलेखीत् । यज्ञदत्त ने लिया । इस से समझ पड़ता है कि यज्ञदत ने लिखना समाप किया । भविष्य उस काल को कहते हैं जिस की क्रिया का प्रारम्भ होनेवाला हो। से। रामदतो लेखियति रामदत्त लिखेगा। इस से प्रकाश होता है कि रामदत लिखने का प्रारम्भ करेगा।
- " शब्द से संस्कृत में जहां कता का वाचक "युप्मद रहता है वहां कर्तृवाच्यतिङन्तक्रिया में मध्यमपुरुष जहां "अस्मद्" शब्द रहता है वहां उत्तमपुरुष और जहां उन दोनों से भिन्न कोई शब्द रहता है वहां प्रथमपुरुष होता है से ही हिन्दी में जहां कती का बोधक "तूं" शब्द रहता है वहां कर्तृप्रधानक्रिया में मध्यमपुरुष जहां “में" शब्द रहता है वहां उत्तमपुरुष और जहां उन दोनों से भिन्न कोई शब्द रहता हे यहां प्रयमपुरुष होता है। और दोनों भाषाओं में कता के अनुसार उक्त क्रियाओं के वचन होते हैं। अथात् संस्कृत में यदि कती एकवचनान्त हो तो क्रिया एकवचनान्त यदि कती द्विवचनान्त हो तो क्रिया द्विवक्ष- नान्त यदि कती बहुवचनान्त हो तो क्रिया बहुवचनान्त होती है। और हिन्दी में यदि का एकवचनान्त हो तो क्रिया एकवचनान्त यदि का बहुवचनान्त हो तो क्रिया बहुवचनन्त होती है। संस्कृत में कता के लिङ्ग के अनुसार कर्तृवाच्यतिइन्तक्रिया के रूप नहीं पलटते । परन्तु हिन्दी में विधिक्रिया को और. सम्भावनाक्रिया को और होना धातु की है, हे, हो, हूं इन चार क्रियाओंको छोड़ कर इतर सकल कप्रधान क्रियाओं के रूप बदल जाते हैं। जैसे । बालकः पठति । लड़का पढ़ता है। वालिका पठति । लड़की पढ़ती है। यहां संस्कृत में कती के लिङ्ग के अनुसार "पटति" क्रिया का रूप नहीं बदला । परन्तु हिन्दी में जहां पुल्लिङ्ग कती हे यहां "पढ़ता हे" और जहां स्त्रीलिङ्ग कता है वहां पढ़ती है" होगया । पहिला पाठ। कत्ता कारक। कता उसे कहते हैं जिस में व्यापार हो अर्थात् नो प्रधान- क्रिया को करे । जैसे। यज्ञदत्तः पचति । मजदत्त एकाता है - . एकवचन ( यहां यज्ञदत्त की है। क्योंकि पकाने का काम अर्थात् चल्हे में लकड़ी रखना इत्यादि उसी के अधीन है। संस्कृत में कर्तृवाच्यतिङन्तक्रिया और हिन्दी में कर्तृ- प्रधानक्रिया के कती के आगे प्रथमा विभक्ति जोड़ी जाती है । संस्कृ में प्रथमा विभक्ति के बहुधा विसर्ग आदि चिन्ह रहते हैं। परन्तु हिन्दी में उस का कोई चिन्ह नहीं रहता । जेसे । उक्त उदाहरण में संस्कृत में यज्ञदत शब्द के आगे विसर्ग चिन्ह है पर हिन्दी में उस का कोई चिन्ह नहीं है। कभी २ ने चिन्ह आता इस की व्यवस्था आगे लिखेंगे। संस्कृत में प्रथमा विभक्ति। द्विपंचन बहुपत्र स ओं प्रथम आदि पुरुषों के सर्वनाम ॥ संस्कृत में सद् युष्मद् और अस्मद् शब्द हिन्दी में यह तूं और में शब्द पुल्लिङ्ग 3. पु. सेः त्यम् अहम् में यह तूं. तो युवाम श्रायाम् बहु. घे दोनों यूयम् धयम ब तुम हम उपर लिखे हुए शब्दों में से संस्कृत में युप्मद और अस्मद् शब्द के रुप स्लीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में भी वैसे ही सस एक. एक- . सम दोनों हम दोनों ( ६ 1 होते हैं जैसे पुलिङ्ग में। हिन्दी में समस्त सर्वनामों के रूप पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग में समान होते हैं। स्त्रीलिङ्ग। HARY उत्तम पु. पुल्लिङ्गवत पुल्लिद्वत् . प्रथमपु. एकर. . धनुया वेदोनों . उत्सम पु प्रथम " सकय. " " यम. घातुर वे नपुंसकलिङ्ग मध्यमपु. तत् पुल्लिगायत घह द्विय ते धातुष. वे दोनों बहुधा तानि घहुयः संस्कृत में अस धातु । अदादि । परस्मैपदी । अकर्मक वर्तमान काल । लट् लकार । कर्तृवाच्यतिइन्तक्रिया । हिन्दी में होना धातु । अकर्मक । वर्तमान काल । कर्तृप्रधानक्रिया । संस्कृत में प्रथम आदि पुरुषों के फरस्मैपटसचा प्रत्यय । मध्यमपु. उत्तम पु तिए भिप् मि " " . - प्रथम . द्विय. तस मि थस यस घाय. क्रियाओं के रूप । प्रथम पु. मध्यम पु. उनम पु अस्ति असि अस्मि एकप. रथः on the lo ... है Lote द्विव. यदुवा हो यादव सन्ति यदया हो जैसे संस्कृत में उपर लिखी हुई क्रियाओं के रूप की के लिङ्ग के अनुसार नहीं पलटते वेसे ही हिन्दी में भी नहीं पलटते । इस लिये एक २ संस्कृत क्रिया के नीचे एक ही एक हिन्दी क्रिया लिखी गई हैं। क्याकि पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों में उन के रूप तुल्य होते हैं। संस्कृत पाक्य । पुलित। सोऽस्ति त्वमसि अहमस्मि तो स्त भावां स्वः ते सन्ति अयं स्मः स्त्रीलिङ्ग। सास्ति त्वमसि अहमस्मि युवां स्थः षयं स्मः मुवां स्थः यूयं स्थ ते स्तः श्रावां स्वः . ताः सन्ति यूयं स्थ ) यूर्य ग्य प्रथम पु. एकदा नपुंसकलित। तदस्ति त्वमसि अहमस्मि युवा ग्यः श्रायां स्वः तानि सन्ति वर्ष म्मः इन संस्कृत पाक्यों का हिन्दी में उल्था करो। संस्कृत में भू धातु । भ्वादि। हिन्दी में होना धातु । मध्यम पु. उत्तम पु. भवति भवमि भशामि होता है होता है होता हूं एकवा होती है हाती हूँ विप. भवतः भवथः भवाव: होते हो होती हो होती है भवामः होत हो होती हो होती है संस्कृत में अपर लिखी हुई क्रियाओं के रूप का के लिङ्ग के अनुसार नहीं बदलते । परन्तु हिन्दी में यदि कता पुलिङ्ग हो तो सक्रवचन क्रिया के पूर्वभाग के अन्त का आकार वैसा ही बना रहता है बहुवचन में उस को ए होजाता है। और यदि स्त्रीलिङ्ग हो तो एकवचन और बहुवचन दोनों में उस को दीर्घ ईकार होता है। इस कारण संस्कृत की एक एक क्रिया के नीचे हिन्दी को दो २ क्रिया लिखी गई हैं। एक पुलिङ्ग की दूसरी स्त्रीलिङ्ग की। पाकारधना में यथा उचित प्रयोग करना चाहिये । . , बार होते हैं यदुध , होती है मधः भवन्ति बाहुवा होते हैं बहुय. होती है . - ।
में होता हूं तुम होते हो हम होते हैं में होती हूं तुम होती हो हम होती हैं हिन्दी वाक्य। पुल्लिङ्ग। यह होता है तूं होता है वे दोनों होते हैं तुम दोनों होते हो हम दोनों होते हैं वे होते हैं स्त्रीलिङ्ग। वह होती है तूं होती है वे दोनों होती हैं तुम दोनों होती हो हम दोनों होती हैं वे होती हैं नपुंसक के बदले में पुलिङ्ग । यह होता है तूं होता है में होता हूं वे दोनों होते हैं तुम दोनों होते हो हम दोनों होते हैं वे होते हैं इन हिन्दी साक्ष्यों का संस्कृत में अनुवाद करो। संस्कृत में कृ धातु | तनादि । उभयपदी । सकर्मक । हिन्दी में करना धातु । सकर्मक । परस्मैपदी के रूप में प्रथम पु. मध्यपुर उत्तम पुः करोति करोषि करोमि करता है करता हूं करती है करती है करती हूं कुरुतः कुरुथः बहुधा करते हैं करते हो करते हैं तुम होते हो हम होते हैं एकच. करता है एकव - ( १० पाव फरती है घायः कुर्वन्ति घाय. यदुप. करती हो कुरुथ करते हो करती है। संस्कृत वाक्य । करती है कुर्मः फरते है करती है करते हैं फरती हैं. सा करोति ते कुरुतः स करोति त्यं करोपि अहं करोमि तो कुरुतः युया कुस्थः आवां कुर्यः ते फुर्यन्ति यूयं कुरुय ययं कुर्मः स्त्रीलिङ्ग। त्वं करोपि अहं करोमि युवां कुरुथः प्रायां फुर्वः ता: कुर्वन्ति यूयं कुस्थ वयं कुर्मः नपुंसकलिङ्ग त्वं करोपि अहं करोमि कुरुतः युवां कुरुथः प्रायां कुर्वः 'तानि कुर्वन्ति यूयं कुस्य इन संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में उल्या करो। संस्कृत में यध धातु । भ्वादि। आत्मनेपदी। अकर्मक । हिन्दी में बढ़ना धातु । अकर्मक ॥ संस्कृत में प्रथम आदि पुरुषों के आत्मनेपदसन्ना प्रत्यय । मध्यम पु थास् द्विव आताम् श्राथाम् वहि ध्वम् महि तत् करोति वयं कुर्मः प्रथम पु उत्तम पु.
. क्रियाओं के रूप प्रथमपु. मध्यम पुः उत्तम पु. एक- बढ़ता है बढ़ता है सकया बढ़ते हैं बढ़ते हैं . एधते एधसे. बढ़ता हूं बढ़ती है बढ़ती है बढ़ती हूं द्विष. एथेते एधेथे राधावहे पहुय. बढ़ते हैं बढ़ते हो बहुधा बढ़ती है बढ़ती हो बढ़ती हैं बदुध धन्ते एधध्ये राधामहे बहुधा बढ़ते हैं बढ़ते हो वदुषः बढ़ती है। बढ़ती हो बढ़ती हैं हिन्दी वाक्य । पुल्लिङ्ग । यह बढ़ता है तूं बढ़ता है ये दोनों बढ़ते हैं तुम दोनों बढ़ते हो हम दोनों बढ़ते हैं वे बढ़ते हैं हम बढ़ते हैं स्त्रीलिङ्ग। यह बढ़ती है तूं बढ़ती है वे दोनों बढ़ती है तुम दोनों बढ़ती हो हम दोनों बढ़ती हैं हम बढ़ती हैं नपुंसक के बदले पुल्लिङ्ग । वह बढ़ता है घे दोनों बढ़ते हैं तुम दोनों बढ़ते हो हम दोनों बढ़ते हैं वे बढ़ते हैं हम बढ़ते हैं में बढ़ता हूं . तुम बढ़ते हो में बढ़ती हूं वे बढ़ती हैं. तुम वढ़ती हो तूं बढ़ता है में बढ़ता हूं तुम बढ़ते हो ( . बन हिन्दी वाक्यों का संस्थत उत्था करो। अजन्त पुल्लिङ्ग शब्द। रामराम। अन्य दूसरा। अन्यः । अन्यो। न्ये। रामः । रामो रामा। अन्यतर-दो में से एक । राम। दोनों राम । राम । अन्यतरः । अन्यतरी । - सर्व-सब। न्यसरे। सर्वः । सवा। सर्प । इतर-दूसरा।' एक-एक। .इतरः । इतरी। इतरें। पूर्व-अगला । पुरष का। संख्यावाची नित्य एकवचनान्त। पूर्वः । पूर्वा । पूर्व । पूर्वाः । द्वि-दो ! मुनि-मुनि । मुनिः । मुनी । मुनयः। नित्य द्विवच.. पति-स्वामी। उभ-दो। पतिः। पती पतयः । सखि-मित्र । नित्य द्विवच- सखा । सखायो । सखायः । अनेक-कई एक । कति-के। कितने। अनेके। कति । नित्य बहुपच नित्य बहुवच- विन्तीन । सुधी-पण्डिा । सुधीः । मुधिया। मुधियः । नित्य बहुवच.. साधु:-सज्जन । कतर- दो में से कौन। साधुः । साधु । साधरः । कतरः । कतरी । कतरे । स्वयम्भ-अम्हा । कतम वहुतों में से कोन। स्वयम्भः । स्वयम्भुषो । स्वय- कतमः । कतमो। कलमे। ठमा । ।
( १३ दातृ-दाता। गो-बेल, स्त्रीलिङ्ग में गो-गाय गो। दाता । दातारी । दातारः । गोः । गावो । गावः । भ्रातृ-भाई। भ्राता । भ्रातरी । भातरः । धातु । स्त्रिह दिवा पर अकः प्रीति का सृज. तुदा. परस्मै.सक सिरजना । स्त्रियति । स्त्रिातः । नि. सृजति । सृजतः । सृजन्ति । ह्यन्ति । दा जुहो. उभय. सक =देना । विद, अदा. पर. सका जानना । ददाति । दत्तः । ददति । वेति । वित्तः । विदन्ति । जल्प. भ्वा. परस्मे. सका-बोलना। दिश. (उपपूर्वक) तुदा उभय सक- जल्पति । जल्पतः । जल्पन्ति । =उपदेश का। उपदिशति । चर.भ्वा-पर-सक-चलना । चरना । उपदिशतः । उपदिन्ति । चरति । चरतः । चरन्ति । संस्कृत वाक्य । रामाऽस्ति । सर्वो भवति अनेके सन्ति । मुनिः करोति । पतिरेधते । सखा नियति । कति मन्ति । सुधीर्वति । साधुरुपदि- शति । स्वयम्भूः सृजति । दाता ददाति भ्राता जल्पति । गोश्च. रति । रामो भवतः । मुनय उपदिशन्ति । साधवो जल्पन्ति । यो भवन्ति । दातार एधन्ते । सर्व सन्ति । पतयः स्निह्यन्ति । वो स्तः । सखायो भवतः । रामो कुरुतः । मुनी वित्तः । दातारी दतः। इन संस्कृत पाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो ॥ स्मरण रखना चाहिये कि भू आदि धातुओं के जो सत्ता अथात् होना आदि अर्थ लिखे हैं वे उपलदणमात्र हैं। स्थलधि- शेष में उन के और भी अर्थ होते हैं। जेसे । यागात स्वगा भवति । यज्ञ से स्वर्ग होता है । यहां भू धातु का अर्थ उत्पन्न होना है। ।
१४ ) बहुत स्थानों में उपसगी के योग से धातुओं के अर्थ बदल जाते हैं। जैसे । भू धातु का अर्थ होना है परन्तु प्र उपसर्ग के संबन्ध से उस का अर्थ समर्थ होना हो जाता है। जैसे । यज्ञदत्तः प्रभवति । यज्ञदत्त समर्थ होता है । इत्यादि । उपसर्ग। प्र-प्रकर्ष । आङ्-थोड़ा । अभिव्यामि । म. परा-विपरीत । उलटा । यादा। अप वियाग । त्याग। नि अत्यन्त । सम्भली भांति । अधि अधिकता । अतिशय । अनुपीछे। अपि भी । प्रश्न । प्रव-निश्चय । अनादर । अति-अतिशय । प्रशंसा । निम्-निषेध । निश्चय । मु=अच्छा । अत्यन्त । बिना श्रम । निर्-निषेध । निश्चय । बाहर उद-ऊपर । उत्कर्ष । होना) अभि-सम्मुख । चारों ओर से । प्रति सम्मुख । बदले में। दुष्ट । निषेध । निन्दा । परि-सत्र और । छोड़ कर । वि-बिगत । विशेष! उप-समीप । इन उपसगी के और भी पर्थ होते हैं वे आगे स्पष्ट होंगे। अव्ययम संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में बहुत है जिन में लिङ्ग संख्या और कारक के चिन्ह नहीं पाये जाते उन को अश्यय कहते हैं। जैसे । भ्यर-स्या । परलोक। पुनर-फिर । विशेष पन्सभीसर । चित सनतर-गुम हो। प्रासर-ममेरा। उच्चम् उंचा। यहा।
( अनेक रूप । सनत नित्य । राघरात । १५ ) नीचेस्नीचा । अल्प । छोटा । हेता कारण । शनेस्-धीरे २ । देर करके। इद्धा-प्रकाश । धक्-सत्य। धीरे २ । श्रद्धा स्पष्ट । निश्चय । सावात् । ऋते-छोड़ कर । बिना !. सामिप्राधा । जुगुप्सित । युगपद-एक ही काल में । वतिप्रत्ययान्त शब्द भी अध्यय श्रारात दर । समीप । होते हैं। नेसे । ब्राह्मणापत् । पृथक तषियवत । इत्यादि। विनीत सना ह्यस्-पिछला दिन। वस्-आगामी दिन। सनात) दिया-दिन । उपधा-भेद । तिरस्-अन्तर्धान । विशे। सायम सांग । दिन का अन्त । अनादर। घिरम-बहुत काल । अन्तरा-मध्य । विना । अन्तरेण छोड़ कर । विना । ध्यो-यहुत काल प्रल । शीध। जोपम-मुष । चुपचाए । सूप्णीम-चुपचाप । मौन । फम-जल । माथा । निन्दा । मुष। शमन्मुख । बाहर । बाहर का। सहसा अशंका परिचार मे। समया-समीप । मध्य । धिनाछोठ फर। 'नाना-अनेक । पिना। म्ययम्-पापही। म्यस्ति-माल । स्योकारमूध । पृथा व्यर्थ । निरर्थक । स्यधा-पितरों को देने में। नतम राता अलम-भूपए । यस । मामध्र्य । न-निषेध । पभाय । निवारयमिपंध। मनाक ईपत् घोड़ा। 1 अय। अधिम अवस् निकपा-समीप ।
- मा - यपट् अथ-अनन्तर । प्रारम्भ । प्रश्न श्रोषट् देवताओं को हविदीन में।. विकल्प । घाष्ट् श्राम-शीघ्र ! अल्प। अन्यत-अन्य। आम-स्वीकार । हां। अस्ति होना। प्रतान-ग्लानि । थकाहट । उपांशुम अप्रकाश उच्चारण । गोप्य । प्रशान् समान क्षमा-सहना । प्रतान् =विस्तार । विहायसा=आकाश । निषेध । दाया-रात। मा मृपा यह स्वरादि प्राकृतिगण हे मिर अर्थात् इस रूप के और भी मुधामध्यर्थ । जो शब्द मिले उन को भी पुरा-पहिले । पूर्व काल में। अव्यय जाना । जैसे। मियो मियम प्रकामम अतिशय । प्रायम्-बहुतायत से । बहुधा । भूयम्-फिर । मुहम-फिर फिर । धार धार । साम्प्रतम्-उचित । अव । प्रवाहकम-समान काल । उपर । परम् किन्तु । भाय्यदलम-बलात्कार से। सातास-प्रत्यक्ष अभीक्ष्णम-पुनः पुनः । अत्यन्त । माधि-सिका। सत्यम कुछ स्वीकार साकम् साय। मार्टम भागु ममम्-प्रणाम। संयत्-य। रिक छोड़ कर। अवश्यम्-निश्चय । धि-निन्दा । धिकारना । ठपारात। ॥ एक यकान्ता साया अन्योन्या कामम-स्यच्छन्दता । मागीय तरसा . चण्यदि। झटिति कुवित-बाहुल्य । प्रशंसा। झगितिशीघ्र । नेत-शङ्का । निषेध । विचार । समुच्चय सुष्ठ-अच्छा। चेत् यदि। दुष्ठुबुरा। सम्अच्छा। कच्चित्-प्रश्न । कु-निकम्मा । थोड़ा। यर-अमर्ष । निन्दा। आश्चर्या । असा-यथार्थ । शीघ्र । अनिश्चय। मिथु-दोनों। नह-प्रत्यारम्भ अस्तम्-विनाश । हन्त । हर्ष । खेद । कृपा । स्थाने-उचित। घाक्यारम्भ।' वरम् कुछ अच्छा। माकिर सुदि-शुक्ल पक्ष । माकीम छोड़ कर । यदि -कृप्या पक्षा नकिः इत्यादि। यावत् समग्रता | अवधि । परि- और । अर्थात् समुच्चय, अ- ताव माण । निश्चय । न्याचय, इतरेतरयोग, स-त्व-विशेष : वित्तई। माहार। [समुच्चय । द्वे-वितर्क। घा-विकल्प । उपमा। निश्चय । दान । अनादर । ह-प्रसिद्धि । तुम-तुकारना। अह-पूजा। सथाहि-देखा। सव-निश्चय । अनिश्चय । सलु-निधि ] धाश्यालङ्कार एवम् ऐसे ही। निश्चय । नूनम्-निश्चय । घिसक्के । किल-पाता। मिय्या । शश्वत-पुनःपुनःनित्यासाथ। म्म-भूतकाल मूषक । पादपूरण । कुपत-प्रश्न । प्रशंसा । श्रादह-प्रारम्भ । हिंसा। मिन्दा ।
~ + -- . -शीघ्र । जेसे । है सुकम- अतिशय । ( जो शब्द उपसर्ग विभक्ति और स्वर के तुल्य हो उनको भी अध्यय जानो । जैसे । अवदत्तम, यहां अव । अहं युः, अस्ति क्षीरा, यहां अहं और अस्ति । अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ ओ, यहां अकार आदि वर्ण, क्रम से उपसर्ग विभक्ति और स्वर के सदृश वस्तुतः उपसर्ग शिभक्ति और स्वर नहीं हैं। पशु-भली भांति । -शब्दों को भी अव्यय जानो। शुक्रम यथाकथा च अनादर ।. यत -हेतु। पाट् तता प्याट् आहोस्वित्-अयवा। सीम सब ओर से होना । सम्बोधन में। अनुक्रम-वितर्क । भाः शम्बद्-अन्तः करण । अनुकूलता। श्रये व-पादपूरण । सादृश्य । की नाई । घहिंसा विपरीत क्रम । पाद- तुल्य दिष्ट्या-आनन्द। प्रिय घाक्य । विपुः अनेक । चाटु/ एकपदे अकस्मात हम-घुड़कना। इव-सादृश्य । प्रातः इस से भी। अद्यत्वे- अब । मह चकार श्रादि भी प्राकृतिगण इति= कि । इस प्रकार से । है। अयात् इस रूप के और- समाप्ति । हेतु। जिन तद्धित प्रत्ययान्त शब्दों के आगे सब विक्ति न आये प्रयात् एषचन ही प्राधे उन को भी प्रत्यय कहते हैं। इन तद्धित । पुत कुत्सा निन्दा।
૧e प्रत्ययों का परिगणन कौमुदी में यों किया है। जेसा । तसिल प्रत्यय से लेकर पाशा के पूर्व तक । शस् प्रत्यय से लेकर "समासान्ता" के पूर्व तक । अम् । श्राम् । कृत्वसुच । सुच। धा । तसि । वति । ना नाज । उन में से थोड़े प्रसिद्ध शब्द नीचे लिखते हैं। कुतः कहां से 1 क्यों। अधुना अब । इस समय । यतः जहां से । क्योंकि । इदानीम- अब । ततः वहां से । उस से । तदानीम् तब । अत: यहां से । इस से । यहि-जब । इत:- इस से। यहां से । इधर । तहि तब । तो। बहुत: बहुतों से। कहि कब । परित: :-सब ओर से। परेद्यवि-दूसरा दिन अभितः दोनों ओर से । अद्य%ाज। कुचकहां । किस में । पूर्वेद्यः- पिछला दिन। यचजहां । जिस में । अन्येयुः- अन्य दिन। तर-वहां । उस में । उमयेद्यु:-दोनों दिन। अत्र-यहां । इस में। तथा उस प्रकार से । तेसे। यथा जिस प्रकार से। जैसे । बहुच बहुतां में। इह-यहां । इस में। इत्यम्-इस प्रकार से। ऐसे। क्व-कहां । फिस में । कथम-किस प्रकार से । कैसे। सदा बहुशः बहुत । सब काल में । नित्य । मेसे । बहुशो ददाति। एकदा-एक समय। बहुत देता है । इत्यादि। अन्यदा- अन्य समय में ।। अल्पश: थोड़ा। कदा-कव। किस समय । जेसे । अल्पशो ददाति ।। तदा तब । उस समय । थोडा देता है । इत्यादि । एतहि इस साल में । 'पादितः- आदिमें । पहिले। . सर्वदा - .
-
( २०
पृष्ठतः-पोछे।
मध्यत:-बीच में
अन्ततः अन्त में। पावत: दहिने । बांयें।
मंकारान्त और एजन्त जो कृत प्रत्यय वह जिस शब्ट के
अन्त में हो उस को भी अव्यय कहते हैं। जैसे । स्मारं स्मारम,
बार बार स्मरण करके । यहां स्मृ धातु से णमुल प्रत्यय हुआ है।
जीयसे, जीना । यहां जीव धातु से असे प्रत्यय है । पिवध्या
| पीना । यहाँ पा धातु से शध्ये प्रत्यय है।
का, तमुन और कसुन ये प्रत्यय जिन शब्दों के अन्त में
हो उन को भी अव्यय कहते हैं। जैसे । कृत्वा, करके । यहां कृधातु
से का प्रत्यय है ॥ उदेतो, उदय । यहाँ उत्पूर्वक इग् धातु
से तोसुन् प्रत्यय है । घिसृपः, गमन । यहाँ विपूर्वक सूप धातु
से कमुन् प्रत्यय है।
अव्ययीभाव समास को भी अव्यय कहते हैं। जैसे ।
अधिहरि, हरि मे। इत्यादि।
विशेषण और विशेष्य ।
जिस के कहने से किसी वस्तु में कुछ विशेष प्रयात् भेद
पाया जाय उसे विशेषण और जिस में वह विशेष पाया जाय
उमे विशेष्य कहते हैं। जैसे । नीलमुत्पलम् । काला फमल । यहां
| काला विशेषण चोर- कमन्न वियेय है। क्योकि काले के पहने से
कमल में विशेष स्थान और कमलों से भेद पाया जाता है।
विशेषण प्राय विशेष्य के पूर्य रहता है।
जहां कही केवल विशेषण रहता है यहां विशेष्य ऊपर
मे समझा जाता है । जेसे । भूखो दुःस्त्रमनुभवन्ति । मूर्ख दुष्ण
मागत है। यहां मनुष्य इस विशेष्य का अपर से वोध होता है।
संम्यूस और हिन्दी दोनों मापात्रों में प्राय जो लिम
। ( २१ ) वचन और विभक्ति विशेष्य में रहती हैं वेई लिङ्ग पचन और विभक्ति विशेषण में भी आती हैं जेसे । उत्तमः पुरुषः । अच्छा पुरुष । उत्तमा स्त्री । अच्छी स्त्री । उत्तमं कुलम् । अच्छा कुल । धनवान् मनुष्य । धनी मनुष्य । धनयन्ती मनुष्यो । दोनों धनी | मनुष्य । धनवन्तो मनुष्या: । धनी मनुष्य । सुन्दरो बालकः । | सुन्दर बालक । सुन्दरं वाककम् । सुन्दर बालक को । सुन्दरेण बालकेन । सुन्दर बालक से । इत्यादि । संस्कृत में जहां विशेषण और विशेष्य का समांस नहीं होता यहां उन दोनों के आगे बहुधा विभक्ति के चिहू रहते हैं। परन्तु हिन्दी में विशेष्य ही के आगे वे चिह्न रहते हैं विशेषण के आगे उन का लोप हो जाता है । जैसे । नीलमुत्पलमानय । काले कमल को लाओ । यहां संस्कृत में नील और उत्पल इन दोनों शब्दों के आगे द्वितीया विभक्ति के एकवचन के चिह्न हल मकार हैं। परन्तु हिन्दी में केवल कमल शब्द के आगे द्वितीया का चिह्न "को" हे। काला शब्द के आगे उसका लोप हे। हिन्दी.में काले को कमल को लाओ यह बेलना अशुद्ध है । हिन्दी मैं पुल्लिङ्ग विशेष्य का यदि आकारान्त विशेषण हो ता कती कारक की प्रथमा विभक्ति के केवल बहुवचन में और इतर सकल विभ- क्तियों के दोनों वचनों में विशेषण के अन्त प्राकार को एकार हो जाता है। जैसे । भला बालक । भले बालक । भले बालक को । भले बालकों को । मले बालक से । भले बालकों से इत्यादि । यदि स्त्रीलिङ्ग विशेष्य का प्राकारान्त विशेषण हो तो सब विमक्तियों के दोनों पधनों में विशेषण के अन्त प्राकार को दीर्घ ईकार होता है। और इस ईकार में विभक्ति के अपनों के कारण कुछ विकार नहीं होता । जेसे । अच्छी घोड़ी । अच्छी घोड़ियो । अच्छी घोड़ी को । प्रदीघोड़ियों को । अच्छीघोड़ी ( ) से । अच्छी घोड़ियों से । इत्यादि । हिन्दी में अच्छिा घोड़ियां यह घोलमा अशुद्ध है । एक पुल्लिङ्ग वा स्त्रीलिङ्ग विशेष्य . के जितने श्राकारान्त विशेषण होंगे उन सब के लिये.पूर्वेति नियम जाना । जैसे छोटा मोटा काला पिल्ला । छोटे मोटे काले पिल्ले । छोटे मोटे काले पिल्ले को। इत्यादि । छोटी मोटी काली लाठी। छोटी मोटी काली लाठियां । छोटी मोटी काली लाठी को इत्यादि । • आकारांन्त से भिन्न समस्त विशेषण ज्यों के त्यों बने रहते हैं उन में कुछ धिकार नहीं होता । जैसे । सुन्दर लड़का। मुन्दर लड़के । सुन्दर लड़के को । इत्यादि । क्रियाविशेषण जिस के कहने से किसी क्रिया अर्थात् काम में कुछ যিয় पाया जाय उसे क्रियाविशेषण कहते हैं । जेसे । अश्व: शोध धाति । घोड़ा शोध दौड़ता है। यहां शीघ्र इस के कहने से घोड़े के दोलने में शीघ्रता पाई जाती है। संस्कृत में क्रियाविशेषण में नपुंसकलिङ्ग और द्वितीया का रामवचन रखता है। जैसे । मन्दं प्रति । धीरे चलता है। मुस्यरं पठति । अच्छे स्यर से पढ़ता है । मधुरं हसति । मधुर हंसता है । उन्चेर्यदति उधे स्यर से योलता है। मुखं स्वपिति । मुष से सोता है । इत्यादि । उद्देश्य भार विधेय । जिस के विषय में कुछ विधान करते हैं यह उद्देश्य र जो विधान किया जाता हे पद विधेय कहलाता है । जेमे । मूर्यास्तपति । मूर्य सपता है । यहां मूर्य उडेश्य और उस का सपना विधेय है। मार्यो मन्टो भवति । मूर्य मन्द होता है। यहां मूर्य उद्देश्य और उस का मन्ट होना विधेय है। ब्राह्मणः - । शूद्रो भवति । ब्राह्मण शूद्र होता है। यहां ब्राह्मण उद्देश्य और उस का शूद्र होना विधेय है।' घाक्य में सर्वदा उद्देश्यबोधक पद पहिले और विधेयबी- धक पद उस के पीछे रहता है। अजन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । रमा लक्ष्मी । रमा नाम स्त्री । धेनु-टुधार गो रमा। रमे । रमा; । धेनुः । धेनू धेनवः । रमा । दोनों रमा । रमा । वधः-बहू । (सर्वा)। वधः । वध्यावध्वः । सर्वा सर्व । सः । (पि) तिम्रः। भ्रूः । भ्रुयो । भ्रवः । दुहित लड़की । वेटी। मतिः । मती मतयः । दुहिता । दुहित। । दुहितरः । नदी-नदी। स्वस बहन । भगिनी। नदी । नद्यो । नद्यः । स्वसा । स्वसारी स्वसारः । श्री लक्ष्मी । शोभा । यो स्वर्ग ! आकाश । श्री: । प्रियो । श्रियः । द्योः । द्यावा । द्यावः । स्त्री-स्त्री। नानाथ । स्त्री । स्त्रियो। स्त्रियः । न।। नायो नायः। कोप निर्मल-स्वच्छ । प्रसन्न-सन्तुष्ट। मति बुद्धि । . । लस. विपूर्यक- भ्या. पर. अकः- शो. स्फुर तुदा-पर-अक प्रकाराकः । भित हो. । यिलास का। स्फुरति । स्फुरतः । स्फुरन्ति । विलसति । बिलसतः । विल-वृध. भ्वा. प्रात्म. अका-बढ़ना । सन्ति। पर्द्धते । पद्धते । पढन्ते । .
रहना। ( २४ ) ट्ठप. दिवा- परस्मे. अक. प्रसन्न हो. क्रीड़, भ्वा- पर. अक खेलना। हृष्यति । कृप्यतः । हप्यन्ति । क्रीडति । क्रीडतः । क्रीडन्ति । पप.भ्या. आत्म. अक लजाना ।स्था भ्या. पर- अकरहना। खड़ा चपते। पपेत । चपन्ते । शुभ-भ्या. श्रात्म.क. - शोभित हो । रिति । तिष्ठतः । सिन्ति । शोभते । शोभते शोभन्ते । गम् भ्वा. पर. सन. चलना । गच्छति । गच्छतः । गच्छन्ति । संस्कृत वाक्य । सर्याः प्रसन्नाः सन्ति । रमा विलसति । मतिराशु स्फुरति । नदी शने१ते । श्रीरेधते । स्त्री कृप्यति । धेनुश्चरति । धूस्त्रपते। भूः शोभते । दुहिता क्रीडति । स्वसा तिष्ठति । द्योर्निर्मलास्ति । नौः शनेगच्छति । रमे तितः । मसयो बर्द्धन्ते । नद्यो निर्मला भन्सि । यिय: सोभन्ते । तिमः स्त्रियस्पिन्ति । बध्यो हप्यन्ति। स्यसारः क्रोडन्ति । नाश गच्छन्ति । तत्र स्त्रियो न सन्ति । पध्ये क गच्छतः। अहं तत्र गच्छामि । त्वं कुष तिष्ठसि । अहं तप सिष्ठामि । धेनवः त घरन्ति. इन संम्शत धाश्यों का हिन्दी में उत्या करो। अजन्त नमुमलिक शब्द । ग्रान-नाना (कतम) मानम् । चाने । चानानि । यतमम् । कसमे । फतमानि। धान । दोनों पान । जान । (अन्य) अन्यम् । अन्ये । पन्यानि । मम् । मरें। मालिश (अन्यतर) पन्यारत् । पन्यार। बन्य- करण । कतरे कतरादि। तरादि। (म)।
( २५) ! वारिजल मधुर- मीठा। . (इतर) वारि । वारिणि । वारीख । इतरत् । इतरे। इतराणि दधि-दही। (पूर्व) दधि 1 दधिनी । दधीनि । पूर्वम् । पूर्वे । पूर्वाणि । मधु- सहत । पुप्परस । मद्य । मधु । मधुनी । मनि । कोष। दुग्ध. दूध । संस्कृत वाक्य । ज्ञानमस्ति । सर्व मिथ्या भवति । कतरदस्ति । अन्यन्नास्ति। पूर्व स्तः । वारि निर्मलं भवति । दुग्धं दधि भवति । निर्मलानि जानानि शेरभन्ते । वारीणि शने?न्ते मधनि । मधुराणि सन्ति । दन धारयों का हिन्दी में उत्या करो। हलन्त पुल्लिङ्ग शब्द। दह-दूहनेवाला। धुक् । धुरा । दुहो। ढुंहः दूहनेवाला । दोनों दूहने नित्य बहुष- घाले । दूहनेवाले। अनड-बेल। अष्टा । अष्ट। अनड्वान् । अनड्वाहो। अन. नित्य यष्टुधव.. फिम कोन । क्या । चतुर-चार। कः । को।के। चत्वारः। कोन कोन दोनों । फोन । नित्य बहुवचनान्त। अयम् । इमो। इमे। नित्य बहुयच.. यह। ये दोनों । ये। पप-छ। पन आठ द्वाहः । पवन-पांच। इदम् यह।
1 . यसनो। अम्निमय-आग मथनेवाला । यः ।यो ! ये। अग्निमत् । अग्निमयो । मा । जो दोनों ना। अग्निमथः । एतद्- यह प्राचा-भली भांति चलनेवाला। एषः । एता । एते। माङ् । प्राचा प्राञ्चः। यह । ये दोनों । ये । प्राच-भली भांति पूजनेवाला । अदस्यह पह। माङ् । प्राचा । प्राञ्चः। असे।। अमू । अमी। उदद ऊपर गमन करनेवाला । यह । ये दोनों । ये । उदङ् ! उदचा । उदञ्चः। घह । दोनों । वे। महत्-बड़ा । श्रेष्ट । सम्राज- चक्रयतों। महान् । महान्तो । महान्तः । सम्राट् । सम्राड् । समाजो ! महिमन-महत्त्व । बड़ाई । सम्राजः। महिमा। महिमानी। महिमान:: भूभृत= पर्वत । राजा। यज्वन-यज्ञ करनेवाला । भूभृत् । भूभूतो । भूमृतः । यज्या । यज्वानो । यज्यानः । भयतः श्राप । युक्न जयान ! युवा । भवान् । भवन्तौ । मयन्तः । मुथा । युशना ! युवानः । धीमत् बुद्धिमान । राजन राना। धीमान् । धीमन्तो धीमन्तः। राजा । राजाने । राजानः । गछता चलता था। दण्डिन्- सन्यासी । दण्डधारी। गच्छन् । गच्छन्तो गच्छन्तः। दण्डी। दण्डिन । दण्डिनः। प्रगामा गान्त । पायन-राह । प्रशान् । प्रगामी । प्रशामः । पन्थाः । पन्यानो। पन्यानः । युध. पायम। वेधस् ग्रह्मा। भूत् । भुद । धुधी युधः । घेधा: । पेसा । धम: ।
विद्वस-पण्डित । गरीयान् । गरीयांसो । गरीयांसः । विद्वान् । विद्वांसी । विद्वांसः । पुमस-पुरुष । गरीयम् अस्यन्त भारी । श्रेष्ठ । पुमान् । पुमांसी । पुमांसः । धातु। 1 विचार का । शन्ति । नद- भ्वा. पर. प्रकः डकारना । सद- प्रपूर्वक. तुदा पर. अकः- नदति । नदतः । नदन्ति । प्रसन्न हो । निर्मल हो । शास-प्रदा-पर-सका शासन कः। प्रसीदति। प्रसीदतः । प्रसीदन्ति। शास्ति । शिष्टः । शासति । रक्ष. भ्वा. पर• सक-पालन क.। पलभ्वा पर प्रक-हिलना चलना। खति । रखत: । रक्षन्ति । चलति । चलत: । चलन्ति । भ्रम परिपूर्वक भ्वा उभ• अकः- मृश. विपूर्वक तुदा- पर. सकः भ्रमण करना। परिभ्रमति । परिभ्रमतः । विमृशति । विमृशतः । विमृ. परिभ्रमन्ति। वृत. भ्वा. प्रात्म. अका-होना । भुज रुधा. श्रात्मने सका-खाना। वर्तते । वर्तत । वर्तन्ते । भुः । भुनाते । भुजते । अहं भ्वा पर अकः= • पूजित होना। अर्हति । अर्हतः । अर्हन्ति । संस्कृत वाश्य। धुगस्ति । अनड्वान् नदति । सम्राट् शास्ति । भूभृन्न चलति । धीमान् विमृशति । गच्छन् भड़े। प्रशान्, भुपदिशति । अग्निमत्तिष्ठति । प्राइ शोभते । महानहति । महिमा. पर्द्धते । यज्वा हप्यति । युषा विलसति । राजा रक्षति । दण्डी परिभ्रमति । निर्मलः पन्थाः शोभत । वेधाः करोति । विद्वान् वेति । गरीयान् पूज्यो भाति । पुमान् वर्तते । चत्वारः पुमांस: सन्ति । पञ्च साधो भुजते । षट् शास्त्राणि वर्तन्ते । अष्टो दण्डिनो . प्रसीदति । प . - 3 प्राकाशा गच्छन्ति । तत्र कोऽस्ति । अयं विद्वानस्ति । यो वेति स करोति । सप क्रीडति । असा अपते । धीमन्तो राजानः सम्यक् शासति । विद्वांसः सर्वत्र पूज्या भवन्ति । अयं न चलामः । ते विम शन्ति । भावां रक्षापः । ते सर्वे पूज्याः सन्ति । त्वं क वर्तसे । घयं न परिभ्रमामः ॥. इन पाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। हलन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द दिव-आकाश । स्वर्ग। पाच-वचन । द्योः । दिवा । दिवः । पाक् । बाचो । वाधः ।, आकाश । दोनों आकाश । मजन्माला । मक । मग । मजेो । मजः । त्विष-दीप्ति । कान्तिा त्विट् । त्विड् । त्विषो। (किम्) का। के 1 काः। गिर-वाणी। गाः । गिरी । गिरः । इयम् । इमे । इमाः। आपद-विपत्ति । (यद) आपत् । श्रापदौ । आपदः । या। ये । याः । अप-जल । (मतद) ग्पा 1 मत । पता:। दिश्-दिशा। दिक । दिग् । दियो । दिशः । त्विषः । नित्य बहुयधः । (अदम्) असा । भम् । भमः ।
( २ ) धातु। सृ-प्रपूर्वक भ्वा-पर. अक -पेलना । नश-दिया-पर-प्रका-नष्ट हो । प्रसरति । प्रसरतः । प्रसरन्ति । नश्यति। नश्यतः । नश्यन्ति। भ्वा.पर अक. - मुमाना। सायति । सायतः । सायन्ति । संस्कृत वाक्य । • द्योः शोभते । वाक् प्रसरति । मङ्लायति । त्विट् स्फुरति । गोविलसति । आपनश्यति । दिशः प्रसीदन्ति । चतो दिशः सन्ति । इयं कास्ति । या दिङ्गिर्मला भवति सा शोभते । एषा गीर्म- धुरास्ति । असोक गच्छति । त्वं कासि ॥ रन वाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । (धार) जल। (श्रदस्) पाः । धारी। पारि। अदः । अमू । अमनि। जल । दोनों जल । जल। (चतुर) (धीमत) चत्वारि। धीमत् । धीमती। धीमन्ति । (किम्) (महत) किम । के । कानि। महत् । महती। महान्ति । (दम) इदम् । इमे । इमानि । जगत् । जगती । जगन्ति । (यद) धामन-गृह । स्थान । तेन । धाम । धामनी । धामानि । (एसद् जगत-संसार । यत् । ये। यानि । कम्मेन्=कर्म । काम । कारवार । कर्म । कर्मणी । कम्माणि । यसत् । यते । एतानि।
- ( ३० अहन दिन। हविस्-धृत आदि होम की वस्तु अहः । प्रहनी । अही। हरिः । इतिषी। इधषि । महानि। धनुस-धनुष । पप-जल ! दूध। धनुः । धनुषी । धपि । पयः । पयसी' पयांसि ।। संस्कृत वास्य। पाः गनिम्मलं भवति । धीमम् कुलं बर्द्धते । महद्धाम शोभते । जगनश्यति । काणि न प्रसरन्ति । अहर्षटुते । पयो मथुरमस्ति । अध हविनास्ति । धनुः स्फुरति । चत्वारि धामानि शोभन्ते । इदं किमस्ति । त्वं तत्र गच्छसि किम् । यदस्ति तद्ध- पति । इमानि दिनानि निर्मलानि सन्ति । एतत् किमस्ति । पदः पयो धर्तते। इन संस्कृत वाक्या का हिन्दी में उल्या करो। हिन्दी धाग्य । दोनों राम करते हैं । सब हैं। दोनों मुनि जानते हैं। दोनों दाता देते हैं। सब होता है। राम है। मित्र प्रीति करता है। स्वामी बढ़ता है। परिडत जानता है। ब्रह्मा सिरखता है। मुनि करता है। दोनों राम होते हैं । सम्जन उपदेश करता हादाला देता है। कितने हैं। तीन होते हैं। सञ्चन बोलते है। मुनि उपदेश करते हैं। भाई बोलता है । दाता बढ़ते हैं। घेल चरता है। स्वामी प्रीति करते हैं। दोनों मिरहते हैं। दुधार गो परती है । नाय धोरे २ चलती है। लनी पढ़ती २ टुधार गी कहां चरती है। सम प्रमत्र हैं। स्त्री प्रसन्न होती। मुद्धि गीध प्रकाय करती है। भामाश स्वछरे। रमा - - ( ३१ विलास करती है। नदी धीरे २ बढ़ती है । तीन स्तियां रहती हैं। नदियां स्वच्छ होती हैं । बहन रहती है । लक्ष्मी बढ़ती है। भों शोभित होती है। दोनों रमा रहती हैं। वह प्रसन्न होती हैं। यहां स्त्रियां नहीं हैं। लड़की खेलती है। बुद्धि बढ़ती है। बहन खेलती हैं। दोनों बहू कहां जाती हैं। में यहां जाती हूं । नाव चलती हैं । तूं कहां रहती है । में वहां रहती ई. । महत मोठे हैं । दूध दही होता है। ज्ञान धीरे २ बढ़ते हैं। स्वच्छ ज्ञान शोभित होते हैं। दही मीठे है। जल स्वच्छ होता है । सब झूठ होता है। दोनों में से कौन है। और कोन नहीं है। अगले दोनों हैं। परिडत जानता है । यन करनेवाला प्रसन्न होता है । चलता हुआ खाता है। राजा रता करता है । छ शास्त्र है। महत्त्व बढ़ता है। चक्रवर्ती शासन करता है। पण्डित उपदेश करता है । दूहनेवाला है । शान्त प्रसन्न होता है । वेल डकारता है । पर्वत नहीं हिलता । आग मथनेवाला खड़ा है । बुद्धिमान विचार करता है। दण्डी परिभ्रमण करता है । युषा विलास करता है । स्वच्छ राह शोभित होती है। पण्डित संघ ठोर | पूज्य होते हैं। ब्रह्मा करता है। मो जानता है वह करता है। अति श्रेष्ठ पूज्य होता है । पुरुष है । यहां कोन है। बुद्धिमान राजा भली भांति शासन करते हैं। हम दोनों रक्षा करते हैं। पांच सज्जन भोजन करते हैं। वे सब पूज्य हैं । यह खेलता । हम नहीं चलते । पाठ दंडी जाते हैं। धार पुरुष है । यह पण्डित है। यह लजाता है। वे विचार करते हैं । प्रेम पूजित होता है। भली भांति गमन करनेवाला शोभित होता है। हम भ्रमण नहीं करते । तं कहां है।
।
।
.
करो।
कान्ति प्रकाश करती है। विपत्ति नष्ट होती है । आकाश
शोभित होता है । धाणी विलास करती है । माला मुमासी है।
दिशा निर्मल होती हैं। पाणी फेलती है। यह कान है। चार
दिया है। जो दिशा निर्मल होती है वह शोभित होती है। तूं
फोन है। यह पायी मीठी है। यह कहां जाती है।
धनुष प्रकाश करता है। बड़ा गृह शोभित होता है।
जल मीठा है । तं यहां जाता है। क्या संसार नष्ट होता है ।
चार गृह शोभित होते हैं। जो है यह होता है। कारभार
नहीं फेलते । यह क्या है। जल धीर २ निर्मल होता है।
दिन बढ़ता है। ये दिन निर्मल हैं। बुद्धिमान कुल बढ़ता है।
यह क्या है । यह जल है। यहां होम की वस्तु नहीं है ।
पन वापा का संस्मत में
अनुवाद
हिन्दी शब्त ।
हिन्दी में हलन्त शब्द नहीं होते केवल स्वरान्त होते
है। हिन्दी शब्दों के अन्त में प्राय ये पाठ स्वर रहते हैं , श्रा,
रई, ठ, ऊ, ए, ओ,
हम ऊपर कह पाये है कि हिन्दी में दो ही लिङ्ग
पुलिस और स्त्रीलिङ्ग। हिन्दी में एकारान्त शब्दों को छोड़ कर जो
केवल पुलिग होते हैं शेष सफल स्वरान्त एद पुल्लिङ्ग और
स्वीति के भेद से प्रत्येक दो २ प्रकार के हैं।
हिन्दी में पुल्लिङ्ग शब्दों में से केवल दीर्घ आकारान्स
गन्द्रों के अन्त पाकार को कला कारक की प्रथमा विभक्ति के
बहुवचन में प्रकार होता है। और स्त्रीलिङ्ग शटों में से हस्थ
प्रकारात गम्टों के अना प्रकार को अनुमासिक एकार और दीर्घ
भाकाराना गटों के अन्त साकार को अनुनामिक आकार और
हस्व इकारान्स शब्दों के पन्त इकार के भागे यां और दीर्घ कारान्त शब्दों के अन्त ईकार को इस्य इकार और उसके भागे यां होता है। शेष समस्त पुलिस और स्वीलिङ्ग स्यरान्त गस्ट एकवचन और बहुवचन दोनों में ज्यों के त्यों बने रहते पथात् उन के पन्त स्वर में कुछ धिकार नहीं होता । जैसे ॥ पुल्लिक। बाम बालक लड़का लड़के मुनि मुनि माली माली साधु माधु भाल चौबे चोवे कोदो कोदो सीलिए। बातें गया गयां तिथि तिथियां मदो नदियां धेनु भात सरसों सरमों
३४
~
: हिन्दी के कई . एक वेगकरण कहते कि सीमित
दीर्घ प्राकारान्त शब्द के अन्त माक्षार को कला कारक
प्रयमा विभक्ति के बहुवचन में अनुनासिक नहीं होता किन्तु
एकषधन और बहुवचन दोनों में समान रूप होते हैं। यही
हमारा भी मत है॥
संस्कृत में कितने पुल्लिङ्ग शब्द ऐसे हैं जो आप तो दीर्घ
प्राकारान्त नहीं है पर प्रथमा विभक्ति के एकवचन में उन के
रूप विसर्ग महिला अथवा विसर्ग रहित दीर्घ भाकारात होते हैं।
से । चन्द्रमस् का चन्द्रमाः । राजन् का राजा । पितृ का पिता ।
सखि का सखा । इत्यादि । इन शब्दों के ये रूप हिन्टी में
पुल्लिङ्ग दीर्घ पाकारान्त शब्द गिने जाते हैं जिसे । चन्द्रमा ।
राणा । पिता । सखा । इत्यादि । इन पुल्लिङ्ग दीर्घ भाकारान्त
शब्दों के कती कारक की प्रथमा विभक्ति के बहुपचन में अन्त
पाकार को एकार नहीं होता। जैसे।
यवह.
बधुवध
चन्द्रमा
चन्द्रमा
राजा
पिता
विता
उपर कहे हुए संस्कृत शचों के सिवाय विशेष
फरके हिन्दी ही भाषा के कितने एक संवन्धिविशेषवाधक और
व्यक्तिविशेषधायक दीर्घ श्राकारान्त शट ऐसे हैं कि उन के भी
फती कारक की प्रथमा विभक्ति के बहुवचन में अन्त आकार को
मकार नहीं होता। बेमे । काका, माना, मामा, भैया, इत्यादि
और बुधुश्रा, मुधुपा, मोइना सत्यादि।
हिन्दी के कई एक वैयाकरण वर्तमान काल के दो भेद मानते हैं एक सामान्यक्रियासम्बन्धी दूसरा तात्कालिकक्रिया- सम्बन्धी । सामान्यक्रियासम्बन्धी उस वर्तमान को कहते हैं जिस की क्रिया का प्रारम्भ तो हुआ हो पर उस की समाप्ति न हुई हो परन्तु यह निश्चय न हो कि कती उस काल में उस क्रिया को करता हे वा नहीं । जेसे । यज्ञदत्त कौमुदी पढ़ता है। स से केवल इतना बोध होता है कि यज्ञदत्त ने कोमुदी पढ़ना भारम्भ किया है और अभी तक उस की वह क्रिया समान नहीं हुई है परन्तु यह निश्चय नहीं होता कि वह उस समय कौमुदी पढ़ रहा है या नहीं। तात्कालिक क्रियासम्बन्धी वर्तमान उस को कहते हैं जिस की क्रिया को कता उस क्षण में कर रहा हो । जेसे । यज्ञदत्त कोमुदी पढ़ रहा है । इस से प्रकाश होता है कि यतदन उस क्षण में कौमुदी पढ़ रहा है। संस्कृत में ऐसी क्रियाओं के अनुवाद में धातु के आगे शतृ पा शानच् प्रत्यय ना कर उस के आगे अस धातु की वर्तमानकालिक क्रियाओं को जोड़ देते हैं। जैसे । यचदत्तः कोमुदों पठन्नस्ति । इत्यादि । दूसरा पाठ। कर्म कारक कर्म उसे कहते हैं जिस में फल हो । जेसे । गुरुः शिष्य- पाठयति । गुरु शिष्य को पढ़ाता है । यहां शिष्य कर्म है । क्योकि पढ़ाने का फल उसी पर स्थित है। संस्कृत में कर्तृवाच्यतिङन्तक्रिया और हिन्दी में कर्तृ- प्रधानक्रिया के कर्म के आगे द्वितीया विभक्ति पाती है। संस्कृत में द्वितीया विभक्ति के प्राय इल मकार आदि बिहू रहते हैं। हिन्दी में उस का "को" चिहू है । जैसे। अपर लिखे हुये
-
।
उदाहरण में संस्कृत में शिष्य शब्द के आगे.हल मकार चिह्न हे
और हिन्दी में उसी शब्द के प्रागे को" विहे.
हिन्दी में यह नियम नहीं है कि कर्तृप्रधानक्रिया के
फर्म के आगे द्वितीया का चिटू अवश्य रहे । कभी रहता है
कभी नहीं । जेसे । तन्तुयाय: पटं धयति । जुलाहा कपड़ा
बीनता है । यहां हिन्दी में कपड़ा शब्द के आगे द्वितीया का
घिर नहीं है।
हिन्दी के कोई २ घेयाकरण लिखते हैं कि यदि अप्राणि
पाचक सना कर्म कारक हो तो उस के प्राण प्राय at" चिहू
नहीं पाता । जेसे । में चिट्ठी लिखता हूँ । इत्यादि । और यदि
व्यक्तियानक अधिकारिवाचक और कर्मकर्तृयापक सदा कर्म
कारक हो तो उन के आगे "को" चिह्न प्राता है। जैसे । मोहना
को बुलाओ। चौधरी को भेज देना । यह अपने दास को मारता
है। इत्यादि।
संस्कृत में द्वितीया विभक्ति ।
द्विच्छ
ओट
संस्कृत में भूत अनातन काल । परोक्ष क्रिया । लिट्
लकार । हिन्दी में सामान्यभूत काल ।
पिछली रात के पिछले दो पहर ओर अगली रात के
अगले दो पहर और इन चार पहरों के बीच का सारा दिन
इन्हीं आठ पहरों को अद्यतन कहते | और इन के बाहर का
काल अनद्यतन कहलाता है।
परोत किया उस क्रिया को कहते है जो यता को प्रत्यक्ष
न हुई हो।
चक्षुषः
शस्
" लिट् लकार के परस्मेपदसञकप्रत्ययों के स्थान में पल भादि आदेश । द्विवंच. गाल अतुस् उस -थल एस. बहुप्रय घ (अस् और ( 44 प्रथम पु. मध्यमपु. उत्तमपु. एकद. वभव था एम. वभूविथ. था थी बभूव था थी एकव' हुआ . एकय. विच. बभूवतुः वभूवयुः बभूषिय बड्यः थों थों म. वभूवः वभूषिम बभूध थे थों थों - . सबभूष तो बभूवतुः बभूवुः संस्कृत में अस् और भू रन दोनों धातुओं के रूप लिट् लकार में एक ही से होते हैं। इस लिये संस्कृत की एक र क्रिया के नीचे हिन्दी की चार क्रिया लिखी गई है। अपर की वो २ अस् धातु की क्रियाओं के पलटे में और नीचे की दो २ भू धातु की क्रियाओं के बदले में । संस्कृत वाक्य। पुल्लिा। त्वं बभूविथ भाई बभूव युवां बभूवयः आषां बभूविध यूयं बभूव वयं बभूषिम स्त्रीलिङ्ग। त्वं बभूविथ बभवतः युवां बभूवथः प्रायां बभूविध. सूयं बभूव वयं बभूविम नपुंसकलिङ्ग सद बभव त्वं बभूविथ युषां बभूवथः श्रावां बभूविव सानि बभूवुः यूपं बभूव वयं बभूविम इन संस्कृत पाक्यो का श्रम और भू दोनों धातुओं की क्रिया के अनुसार हिन्दी में अलग टल्या करो। (क) सा बभूव अहं बभूत्र ता बभूवुः श्रहं बभूष a बभूवतुः प्रथम पु. प्रथमपु. धमर्थ चकार चकर विव.
३६ रन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले हिन्दी की ये चार किया पाती हैं, किया, किये, की, की । इस का भेद आगे स्पष्ट होगा। स्मरण रखना चाहिये कि हिन्दी में यदि धातु अकर्मक हो तो भूत काल में कर्तृप्रधानक्रिया के कता के आगे प्रथमा विभक्ति का कुछ चिटू नहीं रहता। परन्तु यदि सकर्मक हो तो सामान्यभूत काल की क्रिया और उस के योग से बनी हुई इतर सकल क्रियाओं के कता के भागे प्रथमा विभक्ति का चिहू "ने" आता है। जैसे। यज्ञदत्तो बभूव । यज्ञदत्त हुआ। विष्णुमिपश्चकार । विष्णु मित्र ने किया। यहां हिन्दी में जहां धातु अकर्मक है यहां कती के आगे कुछ चिह नहीं है परन्तु नहां सकर्मक है यहां "ने" चिहू आया है। हिन्दी में पुल्लिङ्ग वा स्त्रीलिङ्ग शष्टों के एकवचन वा बहुपचन में जेसे रूप, "को" आदि विभक्तियों के योग में होते हैं वैसे ही "ने" के योग में भी होते हैं। जैसे । वालक ने। बालकों ने । लड़के ने । लड़कों ने । स्त्री ने स्त्रियों ने । इत्यादि । सर्वनामों की भी यही व्यवस्था जानो। "ने" के योग में प्रथम प्राटि पुरुषसम्बन्धी सर्वनामों के रूप ॥ । पुझिङ्ग । प्रध. उन्न. पु. मध्य. पु. पु. उस ने त्वम् तूं ने युवाम अहम् में ने -भावाम् हम दोनों ने षयम उन दोनों ने तुम दोनों ने ययम तुम ने उन ने। उन्हें ने ॥ इम ने ( ४० स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में पुल्लिङ्ग के तुल्य पानो । हम पीछे कह पाये हैं कि हिन्दी में कतप्रधानक्रिया के कम्मे के आगे द्वितीया का चिहू "को" कहीं रहता हे कहीं नहीं। यदि कर्म के आगे द्वितीया का चिह " को"न रहे और उक्त रीति के अनुसार कत्ती के आगे प्रथमा का चिहू "ने" आवे तो क्रिया के रूप कर्म के लिङ्ग और बचन के अनुसार होंगे की के नहीं। नेसे। कृष्णदतो विश्वामञ्चकार । कृष्णदत्त ने विश्राम किया। रामदत्तो विधामांश्चकार । रामदत्त ने विश्राम किये । यज्ञदत्तः प्रतिज्ञाञ्चकार । यज्ञदत्त ने प्रतिज्ञा की। विष्णुमित प्र. तिचाश्चकार । विष्णुमित्र ने प्रतिज्ञा की। यहां हिन्दी के प्रथम वाक्य में कर्म पुल्लिङ्ग और एकवचनान्त हे इस लिये क्रिया दीर्घ भाकारान्त, दूसरे वाक्य में कर्म पुल्लिङ्ग और बहुवचनान्त हे इस लिये क्रिया एकारान्त, तीसरे वाक्य में कर्म स्त्रीलिङ्ग और एक- वचनान्त है इस लिये क्रिया दीर्घ ईकारान्त, चोथे वाक्य में कर्म स्त्रीलिङ्ग और बहुवचनान्त है इस लिये क्रिया अनुनासिक दीर्घ ईकारान्त हुई है। ऐसे ही सर्वच जानो । यदि कर्म के आगे द्वितीया का चिहू "को" रहे और कती के आगे प्रथमा का चिहू "ने" भी आवे तो कर्म चाहे जिस लिङ्ग और जिस पचन का हो परन्तु क्रिया केवल दीर्घ अकारान्त होगी । जेसे । कृष्णदत्तः पुत्रं पाठयामास । कृप्पादत्त को पढ़ाया । रामदत्तः पुषान् पाठयामास । रामदत ने पुत्रों को पढ़ाया.। यजदत्तो दुहितरं पाठयामास । यज्ञदत्त ने कन्या को पढ़ाया । विष्णुमिचो दुहितः पाठयामास । विप्युमित्र ने कन्याओं को पढ़ाया । इत्यादि । हम ने जो पीछे कहा है कि हिन्दी में कतप्रधानक्रिया के रूप कता के लिङ्ग और वचन के अनुसार पलट जाते हैं उस ( ४१ का तात्पर्य यह है कि जहां कती के आगे "ने" चिहू नहीं रहता वहां क्रिया के रूप कता के लिङ्ग और वचन के अनुसार पलटते हैं और जहां ने बिहू रहता है वहां कही तो कर्म के लिङ्ग और पचन के अनुसार पलटते हैं और कहीं केवल दीर्घ आकारान्त होते हैं। हिन्दी में “लाना" "बोलना" इत्यादि कई एक सक- र्मक ঘাষ ऐसे हैं कि उन की सामान्यभूत काल को क्रिया और उस के योग से बनी हुई इसर क्रियाओं के भी कता के भागे प्रथमा का चिहू "ने" नहीं आता। जैसे । चाकर घोड़ा लाया। राम- वत वचन बोला । रीति के अनुसार करते तो होता 'धाकर ने घोड़ा लाया' । रामदत ने बचन बोला । परन्तु ऐसे पाक्य हिन्दी में प्रशुद्ध हैं । और जिन धातुओं के अन्त में चुकना पार साना धातु जोड़े जाते हैं उन की क्रियाओं की भी यही रीति है। जेसे । मे या धुका 1 में पढ़ सका । इत्यादि । संस्शत धाप । पुल्लिङ्क । त्यंचय पहंचकार । चकर युर्ण वायुः यूयं चक्र स्वीतिह साकार त्य चर्य पदंधकारापकर या पायुः सारथः सकार तो चक्रतः य पायो चय पयं चकूम तपः हो चतुः पापा चय सूर्य का (४२ ते वक्रतुः तानि च प्राधां चकृत वयं चकम नपुंसकलिङ्ग । तनकार त्वं चकर्थ अहं चकार । चकर युधां चक्र: यूयं चक्र इन प्रत्येक संस्कृत वाक्या में पुलिङ्ग स्त्रीलिङ्ग और नपुं- सकलिङ्गों के एकवचनान्त द्विवचनान्त और वहुवचनान्त कर्मवाचक पदों को जोड़ कर हिन्दी में उल्था करो । जेसे । स मनारयञ्चकार । उस ने मनोरथ किया । स मनोरथो चकार । उस ने दोनों मनोरथ किये । स मनोरथांश्चकार । उस ने मनोरथ किये । स प्रतिज्ञाञ्चकार। उसने प्रतिक्षा की। स प्रतिजे चकार । उसने दोनों प्रतिज्ञा को । स प्रतिज्ञाश्चकार । उसने प्रतिज्ञा की। स पुण्यञ्चकार । उसने पुण्य किया । स पुण्ये चकार । उस ने दोनों पुण्य किये । स पुण्यानि चकार । उस ने पुण्य किये । इत्यादि । (एध) . प्रथम पु. मध्यम पु. एक्या एकप. যথাস্ত্র बढ़ा बढ़ी एधाञ्जुनाथे राधाके बढ़ा बढ़ी राधाकाते बढ़े बढ़ों एघाञ्चक्रिरे बढ़े उत्सम एवाचक बढ़ा बढ़ी एघाचकृषहे बढ़े बढ़ी एधानुकृमहे बढ़े बढ़ों पधाकृट्वे बहुव. वढ़े 4. बाहुना बढ़ों बढ़ी वढ़ों (४३ ) वह बढ़ा में बका जानना चाहिये कि लिट् लकार में एध धातु के भागे कृ धातु के जोड़ने से उपर लिखे हुए रूप बनते हैं। ऐसे ही भू धातु के जोड़ने से एधाम्बभूष, एधाम्बभवतः, · राधाम्बभूवुः, इत्यादि, और अस् थातु के जोड़ने से एधामास, एधामासतुः, एधा- मामः इत्यादि रूप भी बनते हैं। हिन्दी धाक्य। पुस्लिा। तूं बढ़ा वे दोनों बढ़े , तुम दोनों बढ़े हम दोनों बढ़े हम बढ़े स्त्रीलिङ्ग। यह बढ़ी में बढ़ी के दोनों बढ़ी तुम दोनों बढ़ी हम दोनों बढ़ी घे बढ़ी हम बढ़ी नपुंसकलिङ्ग के बदले में पुलिस के सुल्प जाना। • रन हिन्दी वापयों का संस्थान में अनुवाद करो। संस्कृत में भूत पनद्यतन काल । लङ् लकार । हिन्दी में सामान्यभूत काल । (प्रम) के बढ़े तुम बढ़े सू बढ़ी तुम बड़ों + + प्रथम पु. पासीत पासी चामम् पाव चास्तम्म चाम्सम (४४ बहुधा थों थों श्रासन थे घाव. संस्कृत धाश्य। पुल्लिङ्ग । स प्रासी त्वमासी: प्रहमासम् सावास्ताम् युवामास्तम् भावामास्व त आसन यूयमाम्स घयमास्म स्त्रीलिङ्ग। सामीत् त्वमासी: प्रहमासम् युवामास्सम प्राधामास्व यूयमास्त घयमास्म नपुंसकनिन । सदासीत् त्वमासी: ग्रहमासम् युवामास्तम् भावामास्व तान्यासन् यूयमास्त षयमास्म स्न वाग्यो का हिन्दी में टल्या करो। (मू) मध्यम अभयत प्रभधम् ते आस्ताम् सा पाउन ते प्रास्तम् प्रथम उत्तम . " दुई- द्विव , अभवताम अभवतम् अभषात्र बधुवः । दुई मधुवः अभवन् बहुधा हुए अभवत प्रभवाम साभवत से अमत्रताम् ता अभवन संस्लत बाक्य। पुल्लिा । सोऽभवत त्यमभवः अहमभवम् तावभवताम् युवामभवतम श्रावामभषाव तेऽभवन् यूयमभवत धयमभवाम स्त्रीलिङ्ग। त्वमभवः अहमभवम् युवामभवतम् अवामभवाव यूयमभवत. वयममवाम नपुंसकलिङ्ग । तदभवत् त्वमभवः अहमभवम् ते अभवताम्. युवामभक्तम् तान्यभवन यूयमभवत षयमभवाम इन पाक्यों का हिन्दी में उत्या करो। (क) प्रथम पु. मध्यम पु. समपु. अकरोत अकरोः अकरवम् द्विधा अकुरुताम् अकुरुतम् अकुरुव अंकुर्म प्राधामभाव. . . मनुषच. अकुर्वन् - . रन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की वेई धार २ क्रिया पाती है जो इस धातु के लिट् लकार की क्रियाओं के पलटे में लिखी हैं। इस का भेद्र पूर्ववत चानो। संस्थत बाध्य । पुल्लिङ्ग सेोऽकरोत त्यमकरो: अहमकरणम् नावारुताम युवामकुरुतम भावामकुर्ष तऽकुर्वन् यूयमकुरुत वयमकर्म : स्त्रीलिङ्ग । साकरोत् त्वमकरोः अहमकरवम् युवामकुरुतम भावामकुर्व ता अर्षन् यूयमकुरुत चममकुर्म नपुंसकलित। सदकरोत त्वमकरो: अहमकरवम् तेःअकुरुताम् युधामकुरुतम आवशमकुर्व सान्यकुर्षन् यूयमकुरुत 'वयमकुर्म इन प्रत्येक संस्कृतं पाक्यों में भी इस धातु के लिष्ट लकार के वाक्यों के तुल्य पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग के एकवचनान्स द्विषचनान्स और वहुंचनान्स कम्मो को जोड़कर हिन्दी में उल्था करो। (रथ) ते अकुरुताम् मपु. मध्यमपु. '.इत्तम पु. एकवाय. संघात ऐचथाः. हिवा. ऐधेताम् : धेथाम् ম ইয়া धामाह नावमा धन्त ( " 1 मध्यमपु. प्रथम पु. एकच अभूत विषच. अभूताम् इन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की घेई क्रिया आती हैं जो इस धातु के लिट् लकार की क्रियाओं के नीचे लिखी है हिन्दी वाक्य पुलि। यह बढ़ा । रस्यादि । पूर्ववत् । संस्कृत में सामान्यभूत काल । लुइ लकार हिन्दी में सामान्य भूत काल । और उत्तम पु. अमका अभूतम् अमय बषयअभवन अभूत अभम लुङ् लकार में भी अस और भू दोनों धातुओं के रूप एकही से होते हैं। और इन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की उन्ही धार नियाओं को जानो जो इन धातुओं के लिट् लकार की क्रियाओं के नीचे लिखी गई हैं। संस्कृत वाश्या सोऽभूत त्वममः श्रामभूवम् ताभूताम् युशममतम श्रावामभूव तेमपन् यूयमभूत प्रयंमभम स्त्रीति । साभत . अहमभूषम अभूताम् युशेमभूतम् श्राशमभूय. यूयमभूत धयमममः : पुल्लिा P ता अमवन
५०
।
अध्यय है । इस कारण प्रथम वाक्य में लड़ और द्वितीय में लह
लकार पाया है। और उक्त रीति के अनुसार धातु के पहिले प्रका
आगम भी नहीं हुआ है।
मा भवतु । भविष्यति । इत्यादि उदाहरणों में माइ
अश्यय नहीं रहता किन्तु निषेधवाचक मा शष्ट रहता है। इस
लिये लोट् और तृट् लकारों को बाधकर लुङ् लकार नहीं होता।
अनन्त पुल्लिङ्ग शब्द ।
रामम् । रामो रामान् । कति ।
राम को। दोनों रामों को। सुधियम् । मुधियो । मुधियः ।'
रामों को।
साधुम । साधू । साधून ।
| सर्वम् । सा । सर्वान् । स्वयम्भवम् । स्मयम्भुवो।
चीन् ।
पूर्वम् । पूर्यो । पूर्वान् । दातारम् । दातारी ! दातुन ।
मुनिम् । मुनी । मुनीन् ।
पतिम् । पती । पतीन् । गाम् । गाधी गाः।
सखायम् । सघायो । सप्पीन् ।
प्रथम पाठ में लिखे हुए अनन्त पुलिङ्ग शब्दों में से
फतर शब्द से लेकर एसा शब्द पर्यन्स पांच शब्द शेष विभक्तियों
के सम पचनों में और एक शब्द एक वचनों में और द्वि और
उभ राद द्वियधनों में और अनेक शब्द वचनों में सर्व शब्द
के समान होते हैं। भात शब्द द्वितीया के महुवचनों से लेकर
समस्रा विभक्तियों के सभ पधनों में दातृ शब्द के समान होता है।
स्वयम्भुवः ।
भ्रातरम् । भ्रातरो।
पायी-पतित्रता।
दिलीप एक राजा का नाम
भारती-परस्वती।
धातु। पूजा चुरा. उभय. सका पूजना । पूजा करना । पूजयति । पूजयतः । पूजयन्ति । लिट् । पूजयमास । पूजयामासतुः । पूजयामासुः । लड्। पूजयत् । अपूजयताम् । अपजयन् । सस्कृत वाक्य । रामं पूजयमास मुनिः । हरिर्मुनिमपूजयत् । पतिमुपदि- शति साध्वी । सुग्रीवा राम सखायमकरोत् । ते सुधिरमपूजयन् । ते त साधु विदन्ति । स्वयम्भुव पतिकार भारती । याचका दातार गच्छन्ति । विष्णुमियो भातरमुपदिशति । दिलीपो गाम- पुजत् । साथषः पितर पूजयन्ति । इन वाक्यों का हिन्दी में उल्या की। संस्कृत में दुह आदि सोलह धातु ऐसे है कि उनके कर्म कारक के साथ जिन अपादान आदि कारको का सम्बन्ध रहता है यदि वे कारक अपादान आदि रूप से न समझे जाय तो वे भी कम हो जाते है । इसी से उन धातुओ को द्विकर्मक कहते हैं । और इन दूसरे को के आगे भी द्वितीया विभक्ति आती है। , धातु ये हैं दुह (दूहना), याध (मागना), पच (पकाना) दण्ड (दण्ड लेना), रुथ (घेरना , प्रच्छ (पूछना), चि (बटोरना), ब (कहना', शास (शिक्षा करना), जि(जीतना), मन्थ (मथना), मुष (चारा लेना), नी (ले जाना), ह (प्रास करना), कृप (लेजाना), यह (पहचाना) । क्रम से उदाहरण-गा दाग्धि दुग्धम् । गा से दूध दुहता । दातार यापते बस्ठम् । दाता से वस्त्र मामता है । सात- ५२ ) . 1 लानोदनं पचति । चावल से भात पकाता है । वेश्यान शतं टपड्यति । बनियों से सो (स्येये) दण्ड लेता है। गोष्ठमवरुण- दिगाम् । खरके में.गो को घेरता है। माणवकं पन्थानं पृच्छति । लड़के से राह पूछता है। वृक्षमचिनोति फलानि । पेड़ से फल बटोरता है। माणवकं धम्म व्रते । लड़के के लिये धर्म (की बातें) कहता है। पुर्च धम्म शास्ति । पुत्र के लिये धर्म (की बातें सिखाता है । शतं नयति देवदत्तम् । देवदत्त से सौ (रुपये) जीतता है । सुधां वीरनिवि मराति । क्षीर समुद्र से अमृत मयता है । देवदतं शतं मुष्णाति । देवदत्त से सौ (रुपये) चारा लेता है । याममंजां नयति । बकरी को गांव पर ले जाता है। हरति । प्राप्त करता है। कर्षति । ले जाता है । अथवा । वहति । पहुंचाता हे। इन टुह आदि सोलह धातुओं के समान अथवाले अन्य धातुओं के योग में भी यह कर्म सजा होती हे केवल इन्हीं के नहीं । जेसे । पलि भिवते घसुधाम् । वलि (राजा) से पृथ्वी मांगता है । माणयकं धर्म भापते । लड़के के लिये धर्म कहता है। यहां याच और ब इन दोनों धातुओं के समानार्थ भिक्ष और भाष धातु का प्रयोग है। ऐसे ही सर्वप जानो। जहां एक की किसी दूसरे कता को प्रेरणा करता है यहां उस प्रेरणा करनेवाले को प्रयोजक कता और जिसे वह प्रेरणा करता है उसको प्रयोज्य कती कहते हैं। संस्कृत में इस प्रेरणा रूप श्रर्य को प्रकाश करने के लिये धातु के आगे “णि" प्रत्यय बाड़ कर हिनन्त क्रिया बनाई जाती हैं। जैसे । यत्तदतो भयति । देवदत्तो यादतं भावयसि । यदत्त होता है। देवटत यज्ञदत्त को हो पाता है। यहां "भू" धातु की शुद्ध क्रिया "भवति". और विनन्त क्रिया "माययति" है। इसी से प्रयोज्य कर्ता को पश्यन्तायस्था का कत्ता और प्रयोजक कत्ती को व्यंन्सावस्या का ) कती भी कहते हैं। हिन्दी में इस णिजन्स क्रिया को प्रेरणार्थक क्रिया कहते हैं। विशेष इतना है कि हिन्दी में धातु के आगे विच प्रत्यय नहीं लाते। अंकभक धातु की अभयन्तावस्था का कत्ती एयन्तावस्था में कर्म हो जाता है। और इस प्रकार से अकर्मक धातु सक- मक हो जाता है। जैसे । पुन: शेते । माता पुर्व शाययति । र सोता है । माता पुत्र को सोलाती है। यहां अकर्मक "शी" धातु की अयन्ताघस्था का कता पुष गयन्तावस्था में कर्म हो गया है। यही विधि हिन्दी में भी जाना। सकर्मक धातुओं में से जिन धातुओं का अर्थ गमन ज्ञान अथवा भोजन हो और जिनका कर्म कारक शब्द हो इन्हीं धार प्रकार के धातुओं की अभयन्तावस्था का कती प्यन्तायस्था- में कर्म होता है औरों का नहीं। गमन अर्थ का उदाहरण माणयको याम गच्छति । देय- दतो माणयकं ग्रामं गमयति । लड़का गांष जाता है । देषदत लड़के को गांव लेजाता है। यहां प्रयन्तावस्था का कती मायापक ययन्तावस्था में कम्म हुआ है। यद्यपि "नी" (लेजाना) और "यह" (पहुंचामा) इन दोनों धातुओं का अर्थ भी एक प्रकार का गमन हे सथापि इन की प्रयन्तावस्था के फती ययन्तायस्या में फर्म नहीं होते। जेसे । देवदता भार नयति । यादतो देवदमेन मार नाययति । देवदत घोमा लेजाता है। यमदत देवदत मे बोझा लिया जाता है। विष्णुदतो मारं वदति । कृप्यदलो शिदोन भार वारयति । विष्णुदत बोझा पहुंचाता है। कृष्पदन विष्णुदत में भोका पर- बाता है। यहां दोनो भागों में परयंताशया के कती देण्टम . - 7. और विष्णुदत्त ण्यन्तावस्था में कर्म नहीं हुए । और इसी से इन के आगे द्वितीय विभक्ति नहीं हुई किन्तु तृतीया हुई। परन्तु यदि "ह" धातु का कता पशुप्रेरक हो तो संस्कृत में उसकी अश्यन्तावस्या का का यन्तावस्था में कर्म अवश्य होगा । जेसे पलीधट्टी यधान् वहन्ति । यज्ञदता घलीवट्टान यथान् पाहयति । बेल यष पहुंचाते हैं। यचदत्त बेलों से यय पहुंचाता है। यहां केवल संस्कृत में प्रय सावस्था के कती बेज़ एयन्तावस्था में कर्म हुए । क्योंकि यदत्त घेलरूपी पशुओं का प्रेरक है ज्ञान अर्थ का उदाहरण । माणवको धम्म वेति । देव- दतो माणवक धम्म वेदयति । लड़का धर्म जानता है। देषदत्त लड़के को धर्म बनाता है। भोजन अर्थ का उदाहरण । माणवक आदनं भर्त। यत्र- दतो माणकमोदनं भोजयति । लड़का भात खाता है । यत्र- दत्त लड़के को भात खिलाता है। यद्यपि "प्रद" और "बाद इन दोनों धातुओं का भी भोजन अर्थ है तथापि संस्कृत में रन की अश्यन्तावस्था का फती एयन्तावस्था में कर्म नहीं होता। जैसे । माणवक आदान- मति । यज्ञदतो माणवकेनादनमादयते । लड़का भात खाता है। यज्ञदत्त लड़के को भात खिलाता है। विष्णुमिगे मोदकं खादति। देवदना विम्युमिण मोदकं खादयति । विष्णमित्र लड्डू खाता है। देवदत्त विम्युमित्र को लड्डू खिलाता है। यहां केवल संस्कृत में भएयन्तावस्था के कती माशयक और विष्णुमित्र एयन्सावस्था में - कर्म नहीं हुए। ६. भक्ष धातु का अर्थ भी मोवन हे परन्तु यदि इस भोजन ।
| से किसी को कुछ पीड़ा पहुंचती हो तब तो इस धातु की अश्य- सावस्था के कता को कर्म सना होती है. अन्यथा नहीं। से । बलीवदाः सस्यं भक्षयन्ति । देवदत्तो चलीवदान सस्य भुस. यति । बेल (खेत का) अन्न घरते हैं। देवदत्त बेलों से खेत का अन्न घराता है । यहां केवल संस्कृत में भत धातु की अश्यन्ता- वस्था के कता बेल एयन्तावस्था में कर्म हुए हैं। क्योकि इस. भोजन से खेत के स्वामी अथवा हरे अन्नों को पीड़ा पहुंचती है। और जहां किसी को कुछ पीड़ा नहीं पहुंचती घछ कर्म सञ्चा भी नहीं होती । जैसे । माणवकोऽनं भवति । रामदत्तो माणवकेनान्नं भवयसि । लड़का अन्न खाता है । रामदत लड़के को अन्न खिलाता है। यहां संस्कृत में कर्म सञ्चा नहीं हुई । शब्द फर्मक का उदाहरण । विष्णुमित्रो वेदमति। यज्ञदत्तो विष्णुमिचं वेदमध्यापयति। विष्णुमित्र वेद पढ़ता है यज्ञदत विष्णुमिर को वेद पढ़ाता है। पूर्वोक्त गमन श्रादि अर्थवाले चार प्रकार के धातुओं से भिन्न सकर्मक धातुओं की अण्यन्तावस्था का कती एयन्तावस्था में कर्म नहीं होता। जैसे । रामदत्त आदन पचति । देवदत्तो रामदतेनादनं पापयति । रामदत्तं भात पकाता है। देवदत रामदत्त से भात पकवाता है । इत्यादि । यहां रामदत्त को कर्म संञ्जा नहीं हुई । जल्प" (बोलना) इत्यादि धातु और "दृश" (देखना) धातु की प्रपन्तावस्या का कती एयन्तावस्था में कर्म होता है। जेसे। पुणे धम्म जल्पति । देवदतः पुर्व धर्म जल्पयति । पुच धर्म कहता है। देवदत्त पुत्र से धर्म कहलाता है । भक्ता हरि पयन्ति । देवदंता भत्तान् हरि दर्शयति । भक्त हार का दर्शन करते हैं । देवदत्त भक्तों को हरि का दर्शन कराता है। भयन्तावस्था का कत्ता स्यन्तावस्था में कर्म हो जाता - । - F- . . कृष्ण की दोनों ओर । परितो रामम् । राम की सत्र और । समया यामम् । गाय के समीप । निकपा लङ्काम् । लङ्का के पास । पापिनम् । यापी के विषय में शोक । बुषित न प्रति भाति किञ्चत् । भूखे को कुछ नहीं जान पड़ता। "अन्तरा" और "अन्तरेण" इन प्रत्येक के योग में द्वितीया होती है। जैसे । अन्तरा त्वां माञ्च कमण्डलुः । इमार और तुम्हारे बीच में कमण्डल । अन्तरेण त्यां न सुखम् । तुम्हारे बिना मुख नहीं। जहां तृतीया का अर्थ प्रकाशित हो यहां अनु के योग में द्वितीया होती है. से । पर्वतमन्यसिता सेना । पर्वत के साथ मिली हुई सेना । जहां हीनता प्रकाशित हो यहां अनु और उप के योग में द्वितीया होती हैं । बेसे । श्रीमती विजयोनीमनु उप पा सर्वे राजानः । सब राजा श्रीमती विनायनी से छोटे हैं। जहाँ कोई बिहू, अथवा किसी विशेष अर्थात् भेद को प्राप कोई पदार्थ, अथवा अंश, अथवा बीप्सा, समझी जाय यहां प्रति, परि और अनु इन प्रत्येक के योग में द्वितीया होती है। चिहू का उदाहरण । असे पृवं प्रति विद्योतते विद्युत । घृत की और बिजली चमकती है । यहां वृक्ष के प्रकाश से बिजली का प्रकाशं जाना जाता है । इस लिये वृक्ष धिह है। किसी प्रकार अर्थात् विशेष को प्रर पदार्थ का उदाहरख । असे । विष्णु प्रति भक्तो यज्ञदत्तः । यज्ञदत्त विष्णु का भक्त । यहां यज्ञदत विष्णु की भक्ति को प्राप्त है। अंश का उदाहरण । जेसे । लक्ष्मी रि प्रति । विष्व की लक्ष्मी विष्णु का भाग है। .
घोप्सा का उदाहरण । जेसे । वं वृहं प्रति सिञ्चति ।
वृक्ष प्रति मोचता है।
ऐसे ही परि और अनु के योग में भी जाने।।
जहाँ गुण क्रिया और द्रष्य के साथ काल और पथ का
निरनार संयोग रहता है यहां काल और पथवाचक शब्द के
भागे द्वितीया विभक्ति आती है।
काल के उदाहरण । मासं कल्याणी 1 महीना भर अच्छी।
मासमधीते । महीना भर पढ़ता है । मासं गुडधाना | महीना
भर गुडधनिया । अर्थात् गुंड और भूना हुआ यव । इन संस्कृत के
उदाहरणों में कम से गुण क्रिया और द्रव्य के साथ मास रूप
काल का निरन्तर संयोग है।
पथ के उदाहरण । कोयं कुटिला नदी । कोस भर तक टेढ़ी
नंदी। कोशमधीते । कोस भर तक पढ़ता है । कोशं पर्वतः । कोस
भर तक पर्यत । इन संस्कृत के उदाहरणों में क्रम से गुण क्रिया
और द्रव्य के साथ कोस रूप पथ का निरन्तर संयोग है । इस
लिये द्वितीया विभक्ति पाई है।
जहां निरन्तर संयोग नहीं रहता वहां द्वितीया नहीं
होती। जैसे । मासस्य द्विरधीते । महीने में दो बार पढ़ता है ।
क्रोशस्यैकदेशे पर्वतः । कोस भर में थोड़ी दूर तक पर्वत ।
यद्यपि का, और तमुन्, ये प्रत्यय कृदन्त प्रकरण के हैं
तथापि का प्रत्ययान्त और तुमुन्प्रत्ययान्त शब्दों का यहां अधिक
काम पड़ता है इसलिये उन को यहीं लिखते हैं।
जिन दो श्रादि अनेक धातुओं का की एक ही हो उन में
से जा.धातु पूर्वकालिक क्रिया को कहे उस के आगे क्या प्रत्यय
जाता है। जैसे। स्नात्या व्रजति । स्नान करके जाता है। अर्थात्
- ५८ योग में कृष्ण की दोनों ओर । परितो रामम् । राम की सन और । समया मामम् । गाय के समीप । निकषा लङ्काम् । लङ्का के पास । पापिनम् । पापी के विषय में शोक । बुषितं न प्रति भाति किञ्चत् । भूखे को कुछ नहीं जान पड़ता। "अन्तरा" और "अन्तरेण" इन प्रत्येक के योग में द्वितीया होती है। जैसे । अन्तरा त्वां माञ्च कमण्डलुः । हमारे और तुम्हारे धौध में कमण्डल । अन्तरेण त्यां न मुखम् । तुम्हारे बिना सुख नहीं। वहां तृतीया का अर्थ प्रकाशित हो यहां अनु द्वितीया होती है। जैसे 1 पर्वतमन्वसिता सेना । पर्वत के साथ मिली हुई सेना । जहां हीनता प्रकाशित हो यहां अनु र उप के योग में द्वितीया होती है। असे । श्रीमतों विजयोनीमनु राजानः । सब राजा श्रीमती विजयिनी से छोटे हैं। जहां कोई चिहू, अथवा फ्रिसी विशेष अर्थात् भेद को प्राप्त कोई पदार्थ, अथवा अंश, अथवा धीपसा, समझी जाय यहां प्रति, परि और अनु इन प्रत्येक के योग में द्वितीया होती है। चिहू का उदाहरण । जेसे पृवं प्रति विद्योतते विद्युत वृक्ष की ओर बिजली चमकती है । यहां वृक्ष के प्रकाश में बिजली का प्रकाशं जाना जाता है । इस लिये वृक्ष चिर है। किसी प्रकार प्रथात विशेष को प्राप्त पदार्थ का उदाहरखा। से । विष्णुं प्रति भक्तो यज्ञदत्तः । यदत्त विष्णु का भक्त । यहां यज्ञदत्त विष्णु की भक्ति को प्रम है। अंग का उदाहरण । बेसे। लक्ष्मीरि प्रति । विष्य की लप्मी अर्थात् लक्ष्मी विष्णु का भाग है। "उप या सर्व : ॥
६१ - स्त्रियम् । स्थीम् । स्त्रियों . । तिसः ।। अजन्त स्त्रीलि शब्द। रमाम् । रमे । रमाः। रमाको । दोनों रमाओं को। स्तियः । स्वीः । '. रमायों को धेनुम् । धेन । धेनः । साम् । सबै सर्वाः । धूम् । बध्यो । वधः । भुवम् । भुषो । भुषः । मतिम् । मती । मतीः । दुहितरम् । दुहितरी । दुहितः । नदीम् । नदो।। नदीः ।। स्वसारम् । स्वमारी । स्वमः श्रियम् । नियो । नियः । । द्या।। याः । माघम् । नायो । भाषः । स्वसू शब्द के शेषरूप दुहित शब्द के समान जानो। कोष। निदाघ-मीम तु । धर्मन-धर्मशास्त्र जाननेशाला कैवतं । मलाह । . याम धाता दोन्धि । (नश) (वृध) याच-भ्या- उमयः द्विक-मांगमा दुई प्रदा उमयः द्विकार दूधना लिट् । ययाचे (चल) णिन् । नाशयति। णि । पालयति। पठ भ्वा. पर• सक.म्पढ़ना । सिच । बर्द्धमते। शिव । पाठयति। गुप• दिषा- पर. प्रक- -सूखना। मान. पुरा. उभ. सझा प्रादरफ। णिच । शोषयति । मानयति ।. मन. प्रथपूर्षक- दिवा- आत्म- पाल. धुरा उभ सका पालन का। सका अनादर क.. पालमति । अवमन्यते ।
(६० )
पहिले स्नान परता है तब जाता है। "ना" (महाना)
और "ज" (जाना) इन दोनों धातु का शक ही कानी ।
और उन में से स्ना धातु पूर्वकालिक क्रिया को प्रकाश बरला है।
स लिये स्वा धातु के भागे ला प्रत्यय आमा हे।
पीत्वा
प्रति । खा पोकर जाता है। यहां "भुज" (खाना) "" (पगेना)
ये दोनों धातु पूर्वकालिक क्रिया को प्रकाश करते हैं । लिमे
इन दोनों के प्रागे हा प्रत्यय पाया है।
जहां किसी ना भित्र पूर्णपद के साच हामत्यमान्स
का समास होता है यहां का को म आदेश होता है। जैसे प्रय
म्य । प्रणाम करके । महाप्र और नत्वा न दोनों का समास कुमा
है। ऐसे ही आदाय इत्यादि प्रयोग भी नाना ।
जहां नत्र के साथ समास होता है वहांका को य नहरे
होता । मे । प्रकृत्या । नहीं करके । यहां न के साथ समास
है। इस लिये का को य नहीं हुआ है।
जहां यक क्रिया के निमित्त कोई दूसरी क्रिया पास रताती
है यहां प्रथम क्रिया के पाचक धासु के भागे भविष्य अर्थ में
सुमुन् प्रत्यय आता है । नेसे । कृष्णं द्रष्टुं यत्ति । कृप्य को देखने
मासा है। यहां देखना क्रिया के निमित्त माना क्रिया निकटवता
है। इस लिये देखना क्रिया के याचक दृश धातु के चागे भविष्य
पर्य में सुमुन् प्रत्यय हुआ
जहां दो कम्मी में मे मक उद्देश्य और दूसरा विधेम है।
यहां हिन्दी में उद्देश्य के भागे "को" विभक्ति रहती है और
विधेय के भागे उस का लोप होता है. ले । मुगोवा राम
सस्त्रायं चकार । सुमोव ने राम के मिष बनाया । महो राम
उद्देश्य और मित्र विधेय है।
.
( ६३ ) . चतुरः । संस्कृत धाक्य । गुरुतानं ददौ । ज्ञानी सर्व मिथ्या जानाति । अन्यन्न वेट्वि । यारिदो पारि धर्यति । दधि मप्राप्ति मापिका । मधुकरो मनि पो। इन संस्थत वाश्यों का हिन्दी में अनुवाद करी । हलन्त पुल्लिा शष्ट । दुहम् । दुहे। । दुहः। इस को। इन दोनों को। इन को। दूहनेवाले को । दोनों दूहने यम् । यो । यानं । घालों को। दूहनेवालों को । जिस को। जिन दोनों को। जिन को। अनड्वाहम् । अनड्वाहो। अनडुहः । एतम् । एनम् । एतो । एन।। एतान् । एनान । इस को। इन दोनों को इन का। अमम् । अमू । अमन अटी । अष्ट। इस को। इन दोनों को। इन का। तम् । तो । तान् उस को। उन दोनों को । उनको। उस को । उसे । उन दोनों को । समाजम् । सम्रानो । सम्राजः । उन को। भूभृतम् । भूभृतौ । भूभृतः । त्या । युशम् । वाम् । भवन्तम् । भवन्तौ । भवतः । धीमन्तम् । धीमन्तौ । धीमतः । तुझे । तुम दोनों को। तुम को। गच्छन्तम् । गच्छन्तो। गच्छतः । माम् । मा । आशम् । नौ । प्रशामम् । प्रणामी । प्रथामः । “अस्मान् । नः। युधम् । धुधो । बुधः । मुझे । हम दोनों को । हम को। अग्निमथम् । अग्निमयो । अग्नि- कम् । को । कान i. किसको किन दोनों को। किनको। पञ्चम । माया । प्रायः । इमम् । एनम् । इमर । एनो । प्राशुम् । प्राञ्चो । प्राशुः । इमान । एनान् । उदश्चम् । उदञ्च । उदीयः। त्वाम युप्मान् । यः। - मथः। - ६२ . संस्कृत काश्य। हरिः क्षीरनिधिं रमा ययाचे। कुमतिः सां श्रियं नाश यति । विष्णुमिस्तिस्रो विद्याः पठति । विद्या मतिं घटुंयते । निदाघ: स्यल्पा नदी: शापयति । धर्मक्षः स्त्रियं नाधमन्यते । गोपालो धेनुं पयो देाग्धि । स्वयर्वधू धम्मै शास्ति । मदनमोहने। भ्रुवो चालति । रामदत्तो दुहितरं पाठयति । विष्णुमिरः स्वमारं मानयति इन्द्रोद्यां पालयति । केवती नावं चालयति । रन संस्कृत पाक्यों का हिन्दी में उत्या करो। अजन्त नघुमलिह शब्दः ।। जानम् । ज्ञाने ज्ञानानि । अन्यतरत्। अन्यतरे। अन्यतराणि ज्ञानको। दोनों घानों को। ज्ञानाको इतरत् । इतरें । इतरराणि । सर्वस् । सर्वे । सर्वाणि । पूर्वम् । पूर्वे । पूर्वाणि । कसरत् । कसर । कतराणि । पारिवारिणी । वारीणि । कतमत् । कतमे । कतमानि । दधि । दधिनी । दधीनि । अन्यत् अन्ये । प्रन्यानि । मधु । मधुनी । मधनि । सर्व शब्ट से लेकर पूर्व शब्द पर्यन्त सात शब्दों के रूप शेष विभक्तियों में पुल्लिङ्ग के समान होते हैं । ... । 1 . - काष। घारिद-मेय। मधुकरौरा।। धातु। (दा) मन्थ. या. पर. सका-मथना। लिट् ददो। मंशाति। जा-या. पर. सका-जानना । पा. भ्या, पर. सका-पीना । ..जानाति । लिट् । पप।। घृष. भ्वा. पर सका बरसना । यति ।
( । । - संस्कृत वाक्य । गुरुद्धानं ददो। ज्ञानी सर्व मिथ्या जानाति । अन्यन्न वेट्नि । वारिदो धारि घर्षति । दधि मयाति गोपिका । मधुकरो मधनि यो । इन संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। - हलन्त पुल्लिङ्ग शब्द । दुहम् । दुहो । 'दुहः । इस को। इन दोनों को इनको। टूहनेवाले को । दोनों दूहने यम् । यो । यानं । घालों को। दूहनेवालों को। जिस को।जिन दोनों को।जिन को। अनड्वाहम् । अनड्डाहो। अनडुहः । एतम् । एनम् । एतो । रानी। | चतुरः । एतान् । एनान् । पञ्च । - इस को। इन दोनों को। इन को। अगम् । श्रम । अधून । प्रष्ट अष्ट। इस को। इन दोनों को। इन को। तम् । तो । तान् उस को। उन दोनों को। उनको। उस को 1 उसे । उन दोनों को। समाजम् । सम्रानो । सम्राजः । उनको। भभृतमं । भूभृतो । भूभृतः । त्याम् । त्वा । युवाम् । वाम् । भवन्तम् । भवन्तो । भवतः । धीमन्तम् । धीमन्तो । धीमतः । तुझे । तुम दोनों को। सुंम को। गच्छन्तम् । गच्छन्तो। गच्छतः । माम् । मा । आधाम् । नौ । प्रशामम् । प्रगामी । प्रशामः । 'अस्मान् । नः। बुधम् । बुधो । बुधः । मुझे । हम दोनों को । हम को। अग्निमथम् । अग्निमयो । अग्नि- कम् । को । कान् । किसको किन दोनों को। किनको प्राञ्चम् । प्राञ्चो । प्रायः । इमम् । एनम् । इमो । एनो । प्राथम ! प्राञ्चो । प्राचः । इमान् । एनाम् । उदश्चम् । उदयो । उदीप: । - युष्मान् । । 1 मयः।
। ( ६४ ) महान्तम् । महान्तो । महतः । दण्डिनम् । दण्डिनो। दण्डिनः । महिमानम् । महिमानी। पन्थानम् । पन्थामो । पथः। महिम्नः । वेधसम् । वेधसा । वेधसः । यज्वानम् । यच्चानो । यज्वनः । विद्वांसम् । विद्वांसी । विदुषः । युशनम् । युवानो । यूनः । गरीयांमम्।गरीयांसा । गरीयसः । राजानम् । राजानो । राज्ञः । पुमांसम् । पुमांसा । पुंसः । भवत् शंस्ट और महत शब्द के शेष रूप कम से धीमत् शब्द और गच्छत् शब्द के सदृश होते हैं। काष । सामन्स छोटे राजा। गोष्यति वृहस्पति । धातु । है. पाड. पूर्वक भ्वा. उभः ३. अदा. पर. सक्र:=प्राप्त है। सका-पुकाराना । जाना । पाना। पाहुयति । भक्षा चुरा. उभ. सका-याना । शंसः प्रपूर्वक भ्या. पर. सकः- विच । भक्षयति । प्रशंसा क- । स्तुति कः ।। नि. भ्या. समः प्राह पूर्वक उभः लिट् । प्रयर्थः । सकःसेवा करना। जि. भ्या; पर. द्विमा जीतना । समाप्रयन्ते । जयति । अधिपूर्यक. अदा. प्रात्म• विश.अभि. निपूर्वक सुदा आत्मः-- भक.-बेठना । अध्यास्त अभिनिविशते। (गम्) अनुपूर्वक पीछे जाना। (मन) लिट् । अनुजगाम । पिच । लिट् । भाजयामासुः । दृ: सम पाइपूर्वक तुदा. बारमः प्रच्छ. तुदा. पर. दिक-म्पूछना। एति । . पेठना। 1 द प्रणामक.. -सकामादर करना। समाट्रियते । नमः प्रपूर्वक भ्या. एर. सका त्यज. परिपूर्वक भ्या पर. सकः- त्यागना । छोड़ना। लिट् । प्रणेमः । धरित्यजति । संस्कृत वाक्य । देवदत्ता गां दोग्धुं दुहमायति । यज्ञदत्तोऽनवाह सस्य भवति । स धतुरो वेदान पपाठ। मां त्वाश्चान्तरा, विष्णुः । सम्राजें सामन्ताः समाप्रयन्ते । भूभृतमध्यास्त यज्ञदतः । भवन्तं गोष्यति मन्ये सर्वविद्याविशारदम्। धोमन्तं श्रियः समाप्रयन्ते । धनं गन्छन्तं राम लक्ष्मणोऽनु अगाम । प्रशाम को न समाद्रियते। बुधं सर्वे समा- द्रियन्ते । अग्निमयत्विज पाहुयन्ति । य इन्द्रियाणि जयति समेघ महान्तं मन्ये । धार्मिको महिमानमेति । यज्वानं बुधाः प्रश- शंसुः । अषिवेकिन युवानं गर्वोऽभिनिषिशते। राजानं परितोऽमात्या- स्तिष्ठन्ति । गृहस्था दरिखना भोजयामासुः । नागरिक पन्यानं पृच्छति । देवा वेधसं प्रणेमुः। विद्वांस सर्वे श्राट्रियन्ते । गरीयांस को- ऽपि नाभिभवति । सुनिश्चला प्रकृति: पुमांसं कदापि न परित्यगति। इन संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में उल्या करो। हसन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द। दिवम् । दिवो । दिवः । श्माम् । एनाम् । इमे । एने स्वर्ग को । दोनों स्वगी को। इमाः । एनाः। स्वगों को। एताम् । एनाम् • रते। एने। ताम् । ते। साः। अमम् । अमू । अमः । बाचम् । थायो । पाधः । याम् । ये। याः। । एताः । एनाः। काम । के। का। + ( ६६ ) मजम् । म्रने।। मजः । श्रापदम प्रापदी । भापदः । त्विषम् । त्विषो । त्विपः। गिरम । गिरी। गिरः । : दिशम् । दिशो । दिशः । काप। रवि-मूर्य्य । धार्मिक-धर्म करनेवाला । धातु। पदन्ति । प्रपूर्वक भ्वा. आत्मा अक. भृ. जुही. पर. सक-धारण क. । प्रकाश का लङ् । प्रभाषर्षीत् । णिन् । प्रकाशयति । (चर) उत्पर्वक पद भ्वा. पर. सका-बोलना। णिच् । उच्चारयन्ति । कहना। तुः भ्व. पर. सका-सरना । पार होना । तेरना। लिट् । ततार। संस्कृत वास्य । मन्त्राने दिवं गच्छन्ति । रविश्चतम्रो दिश: प्रकाशयति । विद्वांसः सत्यां याचं पदन्ति । मालाकारः म्रनमकार्षीत् । दीपस्स्वि. पमभाषत । सधवो मधुरां गिरमुच्चारयन्ति । तृषितोऽपः पपो । धार्मिक प्रापद सप्तार । इन संस्कृत धाज्यों का हिन्दी में उल्या करो। हलन्त नमुमति शद। धा: । घारी । वारि। इदम् । एनत् । इमे । एने । जल को दोनों जनों को। इमानि । एनानि । सलों को। यत् । ये । यानि । चत्वारि। एतत् । एनत् । गते । एने । सत् । ते । तानि । सानि । सनानि किम् । के । कानि। प्रदः । प्रमू । श्रमनि।
) धीमत् । धीमती । धीमन्ति । अहः । अहनी । अही । महत् । महती। महान्ति । अहानि । जगत् । जगती जगन्ति ।। पयः । पयसी । पयांसि। धाम । धामनी । थाम्नी । हविः । हविषी । बीपि । धामानि । धनुः धनुषी धनंपी। कर्म । कर्मणी । कर्माणि । तत् शब्द से लेकर महत् शब्द पर्यन्त पाठ शब्द शेष विभक्तियों में पुल्लिङ्ग के सदृश होते हैं और जगत् शब्द महत शब्ट के धामन् शब्द गरिमन् शब्द के कर्मन् शब्द यज्वन शब्द के और पयस् शब्द वेधस् शब्द के तुल्य होते हैं। .. कोप। मानी अभिमानी। धातु। (पा) भज. रुधादि. पर. सक तोड़ना। पिवति । लिट् । बभज्ज । (गम) अधिपूर्वक हु. जुहोत्या. पर. सका हुनना । जानना। होम क.। अधिगच्छन्ति । जुहति । संस्कृत वाक्य । माणषको वाः पिबति । विद्वांसो धीमत कुलं समाप्रयन्ते । परिश्रमिणो महर्नमधिगच्छन्ति । ईश। जगत् पालयति । मानिनो निज धाम कदापि न त्यजन्ति । बुधाः सत् कर्म कुर्वन्ति । नि- दाघोहवर्द्धयति पयांसि वर्षन्त्यनिशं पयोदाः । ऋत्यिनो - बिर्जुहति । रामो धनुर्बभज । रन धाश्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। .
(
राम की
।
हिन्दी धास्य।
मुयोष ने राम को मित्र बनाया। सज्जन लोग पिता की
पूजा करते है विष्णुमित्र भाई को उपदेश करता है। मुनि ने
पूजा की । पतिव्रता (स्त्री) पति को उपदेश करती है
विष्णु ने मुनी की पूजा की । वे उस को समन जानते हैं।
उन्होंने पशिउत की पूजा की। याचक दाता के (पास) जात
हैं। सरस्वती ने ब्रह्मा को पति बनाया। दिलीप ने गो की पूजा
की
विद्या बुद्धि को बढ़ाती है । इन्द्र स्वर्ग का पालन करता
है। विष्णु ने वीर समुद्र से लक्ष्मी मांगी। धर्मशास्त्र जाननेवाला
स्त्री का अनादर नहीं करता । गुमाला धेनु से दूध दूहता
रामदत्त लड़की को पढ़ाता है । ग्रीष्म ऋतु छोटी नदियों को
सुखाती है दुर्बुद्धि सकल सम्पत्ति का नाश करती है। सास
बहू को धर्म सिखाती है। विष्णुमिप वहन का आदर करता
हे । मदनमोहन दोनों भेगों को फड़काता है । मलाह नाय
नेवता है । विष्णुमिप तीन विद्या पढ़ता है ॥
ज्ञानी सकल (जगत) को मिथ्या जानता है । मेघ पानी
घरसता है । भौरे ने फूल का रस पीया ! गुरु ज्ञान देता है।
में और कुछ नहीं जानता। गोपी दही मयती है ॥
लक्ष्मण बन जाते हुए राम के पीछे गये । हमारे और
तुम्हारे बीच में विष्णु हैं। में उसी को बड़ा जानता हूं जो
इन्द्रियों को जीतता है। गृहस्यों ने दण्डियों को भोजन कराया।
में पाप को जो सकल विद्याओं में निपुण हे बृहस्पति जानता
हूं। देवताओं ने ब्रह्मा को प्रणाम किया । परिडतां ने यज्ञ करा-
नघाले की प्रशंसा की । देवदत्त गो दूहने के लिये दूहनेशले को
.
) । - ( ६६ बुलाता है। छोटे राजा चक्रवर्ती की आसरा लेते हैं। पयित का आदर सब करते हैं। प्रशान्त (पुरुष) का प्रादर कोन नहीं करता । धार्मिक (पुरुष) बड़ाई पाता है । अविवेकी तरुण (पुरुष) में गर्ष प्रवेश करता है । यदत्त बेल से (खेत का) अन्न चराता है । ऋत्यिक लोग भाग मथनेवाले को बुलाते हैं । उस ने चारो वेद पढ़े । यज्ञदत पहाड़ पर बैठा है । लक्ष्मी बुद्धिमान के पास रहती हैं। राजा की धारा और मन्त्री रहते हैं। नगर निवासी से राह पूछता है । स्थिर स्वभाव, पुरुष को कधी नहीं छोड़ता । श्रेष्ठ (पुरुष) का तिरस्कार कोई नहीं करता। परिउत का आदर सब करते हैं। माली ने माला बनाई । यज्ञ करनेवाले स्वर्ग जाते हैं सजन मधुर वाणी बोलते हैं । सूर्य्य चारो दिशा प्रकाश करता है। दीपक ने कान्ति धारण की । पियासे ने पानी पीया । धार्मिक पुरुष विपत्ति के पार हुआ । पण्डित लोग सत्य घाणी बोलते हैं। ईश्वर भगत का पालन करता है। मेघ निरन्सर जल बरसते हैं। यगिडत लोग बुद्धिमान फुल का प्राश्रयण करते हैं। मांनी लोग अपने तेज को को नहीं छोड़ते । लड़का पानी पीता है। परिश्रमी (पुरुष) बहुत धन पाते हैं । ऋत्विक लाग होम की वस्तु हुनते हैं । यीम सतु दिन को बढ़ाती है। पपिडता लोग अच्छा काम करते हैं। राम ने धनुष तोड़ा। रन हिन्दी वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद करो। हिन्दी शब्द । हिन्दी में द्वितीया विभक्ति से लेकर सममी पर्यन्त मात विभक्तियों के एकवचनों में पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों प्रकार के शों के अन्त स्वर जों के त्यों बने रहते हैं भायात् न उन में ।
( 00 फुछ विकार होता है और न उन को कुछ आगम होता है। केवल श्राकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों के अन्त श्राकार को एकार होता है। और घटुवचनों में इस्य प्रकारान्त और दीर्घ श्राकारान्स शब्दों के अन्त स्यरों को अनुनासिकाकार और हस्य इकारान्त शब्दों के अन्त इकार के आगे यों और दीर्घ ईकारान्स शब्दों के अन्स ईकार को इस्य इकार और उस के आगे यों और हस्थ उकारान्त शब्दों के अन्त उकार के आगे ओं और टीर्घ अकारान्त शब्दों के अन्त कार को हस्य उकार और उसके आगे प्रो और पकारान्स और प्रकारान्त शन्दों के अन्त स्वरों के आगे ओं होता है। केवल प्राकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के अन्त श्राकार के भागे अनुनासिक मां का आगम होता है उस को भी नहीं होता। असे. पुल्लित। घालकको लड़के को मुनि को पषध बालकों को लड़कों को मुनियों को मालियों को माधुओं को भालुओं को माली को माधु को मान को चौधे को कोदो को चोयेषों को कोदोनों को स्त्रीलिङ्ग पासका गया को घालों को मेयायों को ( तिथि की नदी को तिथियों को नदियों को धेनुओं को धेनु को बहू को बहुओं को सरसों को सरसों को पूर्व लिखित चन्द्रमा राजा इत्यादि संस्कृत के और काका, बधा इत्यादि हिन्दी के शब्दों के रूप द्वितीया श्रादि सामी पर्यन्त सात विभक्तियों के दोनों पचनों में प्राकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के समान होते हैं। हिन्दी के काई २ धेयाकरण भूतकाल के छ भेद मानते हैं हेतुहेतुमदभूता, अपूर्णभूत, सामान्यभूत, पूर्णभूत, प्रामन्नभूत, और सन्दिग्धभूत। हेतुहे. ईधन पाता तो भात पकाता । एधश्चेदलप्स्यत पादनमपक्ष्यत् । अयू. भात पकाता था। आदनं पधन्नभूत् । सामा. भात पकाया । दिनमणवीत् । पूर्ण भात पकाया था । आदनं पकवानभूत् । पास. भात पकाया है। प्रोदनं पवधानस्ति । सन्दि. भात पकाया हो । कदाचिदोदनं पक्कयान स्यात तीसरा पाउ। करया फारका फरण उसे कहते हैं जिस के व्यापार प्रयास क्रिया के अनन्तर ही फती की क्रिया का फल सिद्ध हो। जेसे । व्याधी याणेन मृग हन्ति । ध्याध घाण से मृग को मारता है। यहां घ्याध के धनुय खोंचने श्रादि क्रिया से बाण में ऐसी गतिरूप क्रिया उत्पन्न hu २ होती है कि उस के अनन्तर ही कत्ती की क्रिया का फल अर्थात मृग का मरना सिद्ध होता है। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में करण के प्रागे तृतीया विभक्ति आती है । संस्कृत में तृतीया विभक्ति के प्राय "न" आदि चिहू है और हिन्दी में उस का "से" चिहू है जैसे ऊपर के उदाहरण में संस्कृत में बाण शब्द के अन्त में "एन" चिहू हे और हिन्दी में उसी शब्द के आगे "से" चिहू है। कहीं २ "करके " "के द्वारा" इत्यादि चिहू भी आते हैं। संस्कृत में अनुक्त कता के आगे भी तृतीया विभक्ति पाती है। संस्कृत में तृतीया विभक्ति । द्विय. भ्याम् संस्कृत में भविष्य अनद्यतन काल । लुट् लकार । हिन्दी में मविप्य फाल। लुट् लकार के प्रथम पुरुषमन्तक प्रत्यय के स्थान में डा प्रादि प्रादेश। पाय. बहुवा टा मि. और प्रथम पु भयिता होयेगा दावेगी मथितारी पिंग मध्यम पु. भयिसामि ोयेगा होगी भयितास्यः होगे उमम पु. मषितास्मि दागा . होऊंगी भवितास्व: गि ( . बहुवच होवेंगी होगी होवेंगी बहुवच. भवितारः भवितास्थ भक्तिस्मः बहुवध होवेंगे होवेंगे बहुवचः हावेंगी होगी होवेंगी लुट् लकार में भी अम् और भू दोनों धातुओं की क्रि- याओं के रूप एकही से होते हैं। परन्तु इन प्रत्येक क्रियाओं के नीचे जो हिन्दी की दो ही दो क्रिया लिखी गई हैं इस का कारण यह है कि अस धातु की वर्तमानकालिक और भूतका- लिक क्रियाओं को छोड़ कर इतर सकल क्रियाओं के बदले में हिन्दी की वेई क्रिया जोड़ी जाती हैं जो भू धातु की क्रियाओं के बदले में आती हैं। संस्कृत वाक्य ।. ते भवितारः पुलिस। स भविता त्वं भवितासि अहं भवितास्मि तो भविसारो युधां भवितास्थ: प्रायां भवितास्व: ययं भवितास्थ ययं भवितास्मः स्त्रीलिङ्ग। सा भषिता त्यं भषितासि अहं भधितास्मि ते भवितारो युधां भविसास्यः प्रायां भवितास्यः ता भवितारः यूयं भवितास्थ पयं भयितास्मः नपुंसक ति। सद् भविता त्वं भवितासि अहं भवितास्मि ते भवितारी युयां भपितास्यः प्रायां भवितास्यः सानि भवितारः यूयं भवितास्थ घयं भवितास्मः स्न संस्शत याक्यों का हिन्दी में उत्या फरी।
( ०४ प्रचमपु. एकत्र. करेंगी बया करेंगी ययः कर्तारः यदुरः करेंगे बहुध• करेंगी (कृ) मध्यम पु. उत्तम फती कत्तासि कास्मि करेगा करेगा करूंगा करेगी करेगी करूंगी विव कतारो कास्यः कतीस्वः करेंगे करोगे करेंगे करोगी कास्थ कतास्मः करोगे करोगी करेंगी हिन्दी वाक्य। पुलि। यह करेगा तूं करेगा ये दोनों करेंगे सुम दोनों करोगे हम दोनों करेंगे घे करेंगे स्त्रीलिङ्ग तूं करेगी में करूंगी वे दोनों फरेंगी तुम दोनों करोगी हम दोनों करेंगी करेंगी नपुंसक के बदले में पुल्लिह के समान नानो। एन हिन्दी धाश्पों का संस्कृत में अनुगाद फरो। (प) में करूंगा तुम करोगे क्षम करेंगे यह करेगी तुम करोगी हम करेंगी मध्यम पु. धितामे एस. गधिरा 'असम पु. गधिवादे ( ०५ एकव. बढ़ेगा एकता बढ़ेगी द्विव. एधितारी . बढ़ेगा बढुंगा बढ़ेगी बलूंगी एधितासाथे एधितास्यहे बाव बढ़ेंगे बढोगे बळेंगे बहुवः बढ़ेगी बढ़ोगी बढ़ेगी बहुवा एधितारः एधिताध्ये एधितास्महे बाबा बढ़ेंगे बढोगे बढ़ेंगे बहुधा बढ़ेगी बढोगी 'बळेंगी संस्कृत वाक्य । पुल्लिङ्गः। स एधिता त्वमेधितासे महमेधिताहे साधितारी युयामेधितासाथे प्राधामेधितास्यहे स एधितारः ययमेधिताध्ये वयमेथितास्महे स्त्रीलिङ्ग। सेधिता त्वमेधितासे अहमेधिताहे ते धितारी मुशमेधितामाथे ঘাটখিমাত্রই ता रचितारः यूयमेधिताध्ये घयमेधितास्महे नपुंसकलि। तदेधिता त्वमेधितासे মঘিমাই ते चितारों युवामेधितासाथे प्राधामेधितास्वहे सान्येधितारः यूयमेधिताध्ये पयमेधितास्महे नसंस्थत पाश्वों का हिन्दी में उल्या फरो। संस्कृत में समान्य भविष्यकाल । लट् लकार । हिन्दी में भभिप्यकाल .
) मध्यम पु. . . (अस् और भू) प्रथम पु. उनम पु. एकदः भविष्यति भषिध्यसि भविष्यामि दिवा भधिप्यतः 'भविष्ययः भविष्याव: मातुरः भविष्यन्ति भषिप्यथ भविष्यामः लट् लकार में भी प्रस् और भू दोनों धातुओं की क्रियाओं के रूप एकही से होते हैं। इन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले में हिन्दी की बेई दो २ क्रिया प्रांती हैं जो इन धातुओं के लुट् लकार की क्रियाओं के नीचे लिखी गई हैं। संस्कृत वाक्या पुल्लिङ्ग। स भविष्यति स्वं भषिप्यसि अहं भविष्यामि तो भयिप्यतः युयां भविष्यथः भाषां भविष्याव: से भविष्यन्ति यूयं भविष्यायः घयं भविष्यामः स्त्रीलिङ्ग । सा भविष्यति स्वं भधिप्यसि अहं भविष्यामि से भविष्यासः युध भषिध्ययः भाशी भविष्याव: सा भविष्यन्ति यूयं भविष्यय घयं भरिप्यामः नपुंसकलिङ । सद मयिष्यति त्य भविष्यसि अहं भधिप्यामि से भरिप्यतः मुर्श भविष्ययः या भयिप्यायः सानि भविष्यन्ति यूयं मयप्यय घयं मरिष्यामः नमसरा बापांक्षा हिन्दी में उत्या करी। म. मममपु. কবি फरिणाम करिप्यामि ) ~ शरिप्यामः। द्विषः करिथ्यतः करिप्यथः करिप्याय: बयः करिष्यन्ति জামেয়' इन संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की बेई दार क्रिया आती हैं जो इस धातु के लुट् लकार की क्रियाओं के नीचे लिखी गई है। हिन्दी धास्य । मुल्लिङ्गः। यह करेंगा । इत्यादि । पूर्वत (पथ ) उत्तम प्रधनापु सव. यधिध्यतः द्विव. राधिय्यत Rध्यम पु. राधिप्यसे राधिये एधियेथेः राधिध्याहे अदुव...रधिध्यन्त एधिध्यध्ये रधिप्यामहे इन संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की उन्हों क्रियाओं को जानो जो इस धातु के लट् लकार की क्रियाओं के बदले में खिखी गई हैं। संस्कृत वाश्य पुल्लिङ्ग। स मधिप्यले. सावधिप्यते सरधिप्यन्त त्वमेधिप्यसे अहमधि যমঘিইষ্ট श्रावामेषियावहे यूममे धेष्यध्ये परमेधिप्यामहे स्त्रीलि स्वमेधण्यसे अहमेधिये मुवामेधियेथे আ৯খিয়ায় सूयमेधिध्यध्ये वयमेधिप्यामहे सेधिपाते ले राधियेते ला पधिप्यसे ) আঘামঘিয়াই नपुंसकलिङ्ग। सदेधिप्पले त्वमेधिध्यसे अहमेधिध्ये से.राधिपते যুইঘিইষ্ট तान्ये धयन्से. যুমঘিযন্ত্র षयमधिप्यामहे रन संस्कृत धाग्यों का हिन्दी में उल्या करो। अजन्तपुल्लिङ्ग शब्द। रामेण । रामाभ्याम् । रामः । संख्या। सखिभ्याम् । सखिभिः । राम से ! दोनों रामों से । कतिभिः । रामों से। मुधिया । सुधीभ्याम् । सुधीभिः । मर्पण । साभ्याम् । सर्वेः । साधुना । सधुभ्याम् । साधुभिः ! विभिः। स्वयम्भुवा । स्वयम्भूभ्याम् पूर्षेण । पूर्वाभ्याम् । पूर्वः । स्वयम्भूभिः । मुमिना । मुनिभ्याम् । मुनिभिः । दाचा । दातृभ्याम् । दातृभिः । पत्या । पतिभ्याम् । पतिभिः । गवा । गोभ्याम् । गाभिः । कोण। वाली एक खान का नाम नन्दिनी वसिष्ठ की धेनु का नाम । संस्कृत धास्य। रामेण वाणेन हो याली । मुनिभिः पूजितो रामा दगड- कारण्यामिभिः । पत्या - सङ्गता सीता । सुयीयेण सख्या साई रामः समुद्रतटं जगाम । सुधीभिः शोभते ममा । दृष्टः साधुभिः कृतकृत्या भविष्यामि । स्वयम्भुग कृता सृष्टिः । दापा ममः पुण्यवान् कोऽपि नास्ति । दिलीप: नन्दिन्या गण पह धनं जगाम। न घान्या का हिन्दी में उल्या करी।। . - BE ) प्रकृत्यादि गण में पढ़े हुए शब्दों के आगे तृतीया विभक्ति अती है। जेसे । प्रकृत्या चाहः । स्वभाव से सुन्दर । इत्यादि । 'दिव" (खेलना ) धातु के करण के आगे द्वितीया और तृतीया दोनों विभक्तियां क्रम से आती हैं। जैसे । अक्षेर्दीव्यति । श्रतान् दीव्यति । पासों से खेलता है। यहां संस्कृत में दोनों विभक्तियां कम से आई हैं। यदि फल का लाभ सूचित हो तो काल और पथ के अत्यन्त संयोग में उन के आगे तृतीया विभक्ति श्राती है। मेसे। अहा क्रोशेन वा गङ्गाष्टकमधीतम् । एक दिन पा एक कोस में गङ्गाष्टक पढ़ा । यहां पढ़ना क्रिया के साथ काल और पंथ का अत्यन्त संयोग है। जहां फल की प्राप्ति नहीं रहती यहां तृतीया नहीं होती। जेसे । मासमधीतं नायातम् । महीने भर पढ़ा नहीं पाया । यहां संस्कृत में तृतीया नहीं हुई। संह शन्द और उसके समान अर्थवाले अन्य शब्दों के योग में अप्रधान (फर्ता आदि) के आगे तृतीया विभक्ति पाती है। जेसे । पुषेण सहागत; पिता । पुत्र के साथ पिता आया । यहां संस्कृत में पुप शब्द के आगे तृतीया विभक्ति पाई है। क्योकि पुत्र भागमम क्रिया का अप्रधान कर्ता है । ऐसेही साकम, सार्द्धम, १ समम, इत्यादि शब्दों के योग में भी जानो । बिना हीन इत्यादि शब्दों के योग में भी तृतीया होती है। जिस किसी फूटे टूटे घा टेढ़े मेढ़े असे अङ्गी में विकार पाया जाय उस अड्याचक शब्द के आगे सृतीया विभक्ति पाती है। जेसे । प्रणा काण: । प्रांख का काना । पादेन बना। पांध का लंगड़ा। यहां संस्कृत में तृतीया हुई है। - .
(
CO
यदि कोई पदार्थ किसी विशेष अर्थात् भेद को प्राम हुभा
हो और यह भेद किसी दूसरे पदार्थ से जाना जाय तो इस दूसरे
पदार्थ के वाचक शब्द के आगे तृतीया विभक्ति आती है। जेसे ।
जटाभिस्तापसः । जटाओं से तपस्यो । अर्थात् इस का तपस्वीपन
इस की जटाओं से जाना जाता है।
हेतु अर्थात कारणवाचक शब्द के आगे तृतीया विभक्ति
आती है । जेसे । दण्डन घट: । डंडे से (बना हुआ) घड़ा ।
पुण्येन दृष्टा हरिः । पुण्य से देखे गये हरि ॥
जो केवल क्रिया मात्र का कारण होता है और जिस में
पाप भी क्रिया रहती है उसे कारण कहते हैं। और ना गुण
क्रिया और द्रव्य इन तीनों का कारण होता है और जिस में
कोई क्रिया रहे या न रहे उसे हेतु कहते हैं ।
फल भी हेतु होता है। नेसे । अध्ययनेन वसति । पढ़ने
के लिये बसता है। यहां संस्कृत में तृतीया हुई ।
कहीं २ ऊपर से समझी हुई क्रिया भी कारक विभक्ति
का निमित्त होती है। जैसे । अलं अमेण । परिश्रम से मत ।
अर्थात तुम्हारे परिश्रम से कुछ होना नहीं है इस लिये परिश्रम
मत करो। यहां ऊपर से समझी हुई "होना" क्रिया का परिम्पम
करण हे इस लिये उस के आगे तृतीया विभक्ति पाई है।
जहां चास्य से निषिद्ध प्राचार सूचित हो वहां "
(देना) धातु के प्रयोग में चतुर्थी के अर्थ में तृतीया होती है।
जेसे । दास्या संयच्छते कामुकः । कामी (पुरुष) दासी को देशा
है। यहां संस्कृत में दासी शब्द के भागे चतुर्थो के बदले में
तृतीया विभक्ति हुई है।
जहां निषिद्धाचार नहीं सूषित होता यहां तृतीया नहीं किन्तु
चतुर्थों होती है। जैसे भााये संयच्छति। अपनी स्त्री को देता है।
"
( ८१ ) अनन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । रमया । रमाभ्यम् । रमाभिः । स्त्रिया । स्त्रीभ्याम् । स्वीभिः । रमा से। दोनों रमाओं से । धेन्वा । धेनुभ्याम् । धेनुभिः'। रमाओं से। यध्या । वधभ्याम् । बधभिः । सर्वया । सर्वाभ्याम् । सर्वाभिः । भूवा । भूभ्याम् । भूभिः । सिसृभिः । टुहिषा । दुहितृभ्याम् । दुहित- मत्या । मतिभ्याम् । मतिभिः । भिः । नद्या । नदीभ्याम् । नदीभिः । वा । द्योभ्याम् । द्योभिः । प्रिया । श्रीभ्याम् । श्रीभिः । नावा । नोभ्याम् । नाभिः । कोष। फन्दप-कामेदेव । । . धातु । . जि. भ्या. पर. द्विका जीतना । सूच. धुरा. उभ. स.-जनाना । जयति । सूचित का। मचि. धुरा. आत्मः सकः- सूचयन्ति । चुपके २ बतियाना। मन्त्रयते । संस्कृत वाक्य। रमया सेवितो विष्णः । तिसृभिः शक्तिभिः सोमन्ते राजा- नः । मत्या प्रक्ष्यातो यज्ञदत्तः । नदीभिः सिक्तो देशः । निया विभू- वितं गृहम् । स्त्रीभिस्त्रीन लोकान् जयति कन्दर्पः । धेन्या खाद- यति घासं गोपालः । अधूभिर्मन्त्रयते श्वः । भुया सूचयन्त्यथै धतुराः । दुहिता पविष कुलम् । यवा गच्छन्ति पक्षियः । नाया- तरन्ति नदी लोका::. - दून मंस्कृत वाक्यों का हिन्दी में टल्या करी । अजन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । ज्ञानेन । ज्ञानाभ्याम् । ज्ञाने: । वारिणा । पारिभ्याम् । वारिभिः । धान से। दोनों ज्ञानों से । दधा । दधिभ्याम् । दधिभिः । ज्ञानों से मधुना । मधुभ्याम् । मधुभिः । - . भृङ्गः । शुध. दिया. परं. अक. शुद्ध हो । शुद्धयति । संस्शा वाक्य। ज्ञानेन संसार तरन्ति शानिनः । न धारिणा शुद्धति चा. न्तरात्मा । दधा मिप्रित आदनः । मधुना मत्तो एन संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में उल्या करो। हलन्त पुल्लिङ्ग शब्द । दुहा । धुग्भ्याम् । धुग्भिः । तुझ से तुम दोनों से। दूहने वाले से। दोनों दूहने तुम से । घालों से। दूहने वालों से। मया । आवाभ्याम् । अस्माभिः । अनडुहा । अनभ्याम् । अन-मुझ से। हम दोनों से। हम से। केन । काभ्याम् । के। चतुर्भि: किस से । किन दोनों से। पञ्चभिः । किन से। । पङ्गिः । अनेन । एनेन ! श्राभ्याम् । अष्टभिः । अष्टाभिः। एभिः। तेन । ताभ्याम् । तेः। इस से । इन दोनों से | इन से। उस से । उन दोनों से । येन । थाभ्याम् । यः । उन से। उन्ही मे। जिस से । जिन दोनों से। त्यया । युवाभ्याम् । गुप्माभिः जिन से। । . .
( 1 । एतेन । एनेन । एताभ्याम् ! सते: । माघा । प्रारभ्याम् । माग्भिः । इस से । इन दोनों से। इन से । प्राचा 1 प्राभ्याम् । प्राभिः । अमुना । अमूभ्याम् । अमीभिः ! उदीचा । उदम्भ्याम् । उदभिः । इस से । इन दोनों से । इन से । महिना । महिमभ्याम् । महि- उस से। उन दोनों से उन से। मभिः । सम्राजा । सम्राड्भ्याम् । यज्वना । यज्यभ्याम् । यध्वभिः । सम्राभिः । यूना । युवभ्याम् युभिः । भूभृता । भूभृद्भ्याम् । भूभृद्धिः । राजा । राजभ्याम । राजभिः । धीमता । धीमद्भ्याम् । दण्डिना । दण्डिभ्याम् । धीमतिः । दपिडभिः । गच्छता । गच्छद्भ्याम् । पथा । पथिभ्याम् । पथिभिः । गच्छदिः । वेधसा। वैधाभ्याम् । धाभिः । प्रयामा । प्रशानभ्याम् प्रणाभिः। बिटुषा । विद्वद्भ्याम् । विद्धिः। युधा । भट्भ्याम् । भद्धिः । गरीयसा । गरीयोभ्याम् । गरी- अग्निमथा । अग्निमभ्याम् । योभिः । अग्निमदिः । पुंसा । पुम्भ्याम् । पुभिः । धातु। शक. दिम. उभा-सकना । फर्म में लट् । शक्यते । संस्कृत वाश्य। दुहा दोहयति गां रामदतः । अनदिदारयति यथान विष्णुमियः । समाजा पर विरोधी न फार्य: । भूभृद्धि पिया मही। धीमता शोभते फुलम् । सीतापि गध्धता पत्या गमिष्यति पनं महत् । अग्निमयाधिष्ठिता यप्रथाला । यन्यना जित: स्वर्गः । यूना घर्ष की शयते । दण्डिभिरपिता फागो ! राजभिः पायले मही। यिस्मीर: पथिभिः शेभते राजधानी । इत्यादि। इन संसार पापा का हिन्दी में इत्या करो।
( ८४ ) . 1 हलन्त स्त्रीलिङ्ग शद। दिया । युभ्याम् । युभिः। एतया। एनया । एताभ्याम् । आकाश से। दोनों पाकाशों एताभिः । से।आकाशों से। अमुया ! अमभ्याम् । अमूभिः । चतमृभिः । वाचा । वाग्भ्याम् । वाग्भिः । तया । ताभ्याम । ताभिः । सजा । सग्भ्याम् म्रम्भिः । कया। काभ्याम् । काभिः । त्विषा । त्विड्भ्याम् । विभिः। भनया। एनया । श्राभ्याम् । • गिरा । गीभ्याम् । गीर्भिः । पाभिः । आपदा । आपद्भ्याम् । आपद्भिः। यया । याभ्याम् । याभिः । अद्धिः। दिशा । दिग्भम् । दिग्भिः । कोप 1.तप्रवः। शरत् ऋतु अर्थात् कुमार और वाग्मी अच्छे बोलनेवाले. कातिक । धातु । द्युत- विपूर्यक-भ्वा- प्रात्म- अकस्सु. अदा. उभ- सक-= -स्तुति करा चमकना। विद्योतते । संस्कृत धा। निर्मलया दिया शोभते । शरत् । चतसृभिरवस्थाभिरा- क्रान्ता मानधी तनुः । घाचा जयन्ति चाम्मिनः । मजा विभूषिता भोगी । त्यिका विद्योतते रविः । देवा यथार्थाभिर्गोभिर्विष्णु तुष्टयः । प्रापतिः पीडितः साधुः । अद्विस्तृतः । प्राच्या दिश सड़तो रविः । 'रन संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। -
(
हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द ।
धारा । वायाम् । वार्मिः । प्रहा। अहोभ्याम् । अहोभिः ।
जलसे। दोनों बलोंमे । जलसेहविषा । हविभ्याम् । हविभिः ।
धनुषा । धनुभ्याम् । धनुर्भिः।
कोप ।
धनन्जय-अर्जुन
चतुर्भिः ।
धातु
सिद. तुदा. उभ. स. सीचना । हन् अदा- पर. मक-मारना ।
सिन्ति ।
लिट् । जघान ।
तृप. दिया. पर• अक: तृप्त हो.।
तृप्यन्ति ।
संस्कृत धाक्य ।
मेघावामिमहों सिञ्चन्ति। अहाभिः सह तापा धवृधे। हविषा'
तृप्यन्ति देवाः । धनञ्जयो धनुषा शिवं जघान । :
रन घाध्या का हिन्दी में उस्या करो।
हिन्दी वाक्य।
सभा की शोभा पगिडतों से होती है। राम अपने मित्र
सुग्रीव के साथ समुद्र तीर गये । में साधुओं के दर्शन से कृतार्थ
हाऊंगा। राम ने बाण से बाली को मारा। ब्रह्मा की बनाई सृष्टि।
दण्डकारण्यनिधासी मुनियों ने राम की पूजा की। दानी के
समान पुण्यात्मा कोई नहीं है। सीता (अपने) पति से मिली।
(राजा) दिलीप नन्दिनी गो के साथ बन गये।
गुआला धेनु को घास खिलाता है। नदियों से मौका
हुआ देश । पक्षी आकाश में गमन करते हैं। कामदेव स्त्रियों
के द्वारा तीन लोक नीतता हे । लक्ष्मी से सेयित विष्णु ।
सास बहुओं के साथ चुपके २ बात चीत करती है। तीन शक्तियों
CC एकत्त भ्याम ( ) संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में सम्प्रदान के भागे चतुर्थी विभक्ति पाती है। संस्कृत में चतुर्थी विभक्ति के बहुधा "य" इत्यादि चिहू रहते हैं। हिन्दी में उस का "को" चिहू है । जैसे उक्त उदाहरण में संस्कृत में विन शब्द के आगे "य" चिहू हे और हिन्दी में ब्राह्मण शब्द के आगे “को" चिहू है। बहुत स्थानों में के लिये" "के निमित्त" इत्यादि चिहू भी आते हैं। संस्कृत में चतुर्थी विभक्ति। द्विवचन बहुवचन भ्यम् संस्कृत में विधि आदि अर्थ । लिङ् लकार । हिन्दी में विधि और सम्भावना अर्थ । विधि श्रादि अर्थ येई-विधि, निमन्त्रणा, आमन्त्रणा सम्प्रश्न और प्रार्थना । विधि शब्द का अर्थ हे प्रेरणा । अर्थात् धाकर आदि नीच व्यक्ति को किसी काम में लगाना । जेसे । स कटं कुर्यात् । पर घटाई बनाये। निमन्तया शन्ट का अर्थ है नियोग करना । प्रयात् श्राद्ध भोजन श्रादि आवश्यक काम में दोहित अर्थात् नाती प्रादि को प्रवृत करना । जेसे । इह भयान् भुजीत । पाप यहां भोजन करें। आमन्त्रण शब्द का अर्थ हे यथेच्छाचार में अनुमति देना । जेसे । इध भयानामीत । आप चाहें यहां येठे। अधीष्ट गन्द का अर्थ है आदर पूर्वक प्रेरणा से । पुनमध्याः पयेशान् । श्राप (मेरे) पुत्र को पढ़ाये । सम्प्रश्न शब्द का अर्थ हे किमी धारा का निर्णय करना । जेसे । किं नु यलु भी व्याक- रणमधीयोय उस सर्वम् । क्या में व्याकरण पळू अयया न्याय- गास्ट । प्रार्थना गष्ट का अर्थ है मामा प्रयोत मांगना । मे। भो भोपनं लभेय । में भोजन पाई।
(अस) प्रथम पु. मध्यम पु. उत्तम पु' . एकवः स्यात स्याः .. द्विवः स्याताम् अयुवा होवें . . बहुधा होवें स्याम एकवा होवे हो होऊ स्यातम् स्याय हो होवें घवः स्य: स्यात स्याम हो होवें संस्कृत वाक्य । पुल्लिङ्ग। स्वं स्याः अहं स्याम् युवां स्यातम् श्रायो स्याम यूर्य स्यात षयं स्याम स्त्रीलिङ्ग सा स्यात् । ते स्यताम् । ताः स्युः । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुलिङ्ग के तुल्य जानो। नपुंसकलिन । तत् स्यात् । ते स्याताम् । तानि स्युः । मध्यम और उत्तम पुरुप में पुल्लिङ्गवत् । कपर लिखे हुये तीनों लिहों के शाक्पा का हिन्दी में उत्या करो। . स स्यात तो स्याताम् ते स्युः प्रथम पु. एकत्र. भवेत दिवः भवेताम् बायः भवेयुः मध्यम पुः भवः भवेतम् भवत उत्तम पु. भयेयम् भव भवेम (६० ) इन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के नीचे भी हिन्दी की उन्हीं। क्रियाओं को जानो जो इस लकार में " अस" धातु की क्रियाओं के नीचे लिखी गई है हिन्दी बाय। पुलि। वह होवे तूं हो दोनों होवें हम दोनों हा हम होवे ऐसे हो स्त्रीलिङ्ग में, और नपुंसकलिङ्ग के बदले में भी जाना । प्रत्येक धावां का संस्कृत में उत्या करो। (कृ) तुम दोनों हो वे हावे तुम हो प्रद्यम सम्पु उसमपु. पर करें पातुवः कुर्यः यम' करें पत्र• कुर्यात् पुर्य: फुर्याम् समयः फरे कर दिया फुफलाम फुगतम कुर्णव करो कुर्यात कुर्याम करो संस्कृत धाश्य। पुल्लिङ्ग । म कुर्यात् त्वं कुर्याः अहं कुमाम तो फुर्णताम् मुवां कुर्यातम् पायां कुर्याय ते कु: यूयं कुर्यत षयं कुर्याम स्त्रीलिङ्ग। मा फुयात् । ते फुर्याताम् । ताः कुर्य: । मध्यय और तम पुरुष में पुलिस के समान जानो !
( ६५ नपुंसकलिङ्क। तत् कुर्यात् । ते कुर्याताम् । तानि कुयुः । मध्यम और उत्तम पुरुप में पुल्लिा के समान जानी । प्रत्येक वाक्यों का इन्दों में उत्या (रथ) करो। प्रथम पु. मध्यम पु. उत्तम पु. . बढ़े बाया बढ़ें बाया बढ़ें . . में बहू एकत्र. एधेत एधेयाः एधेय पकव' यढ़े बढूं वि. एधेयाताम् एधेयाथाम "एधेयहि बढ़ो बढ़े बहुधा एधेरन् অষ্টম एधेहि बढ़ो बड़े हिन्दी धाक्य । पुल्लिङ्ग यह बढ़े तूं बढ़े वे दोनों बढ़ें तुम दोनों बढ़ा हम दोनों बड़े वे बढ़ें ऐसे ही स्त्रीलिङ्ग में, और नपुंसकलिङ्ग के बदले में भी जानो। प्रत्येक वाक्यों का संस्कृत में उल्या झरो । संस्कृत में आशिष अर्थ । लिङ् लकार । हिन्दी में विधि और सम्भावना अर्थ । (अस और भू) प्रथम पु. मध्यम पु. सम पु. एकय भूयात भूयाः भूयासम् वि भयास्ताम भयास्तम् भूयास्व अधुन भूयासः भूयास्त भयास्म तुम बढ़ो हम बढ़े इस लकार में भी अस और भू दोनों धातुओं की क्रियाओं के रूप तुल्य ही होते हैं। इन प्रत्येक क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की उन्हीं क्रियाओं को जानो जो विधि लिड् में अस धातु की क्रियाओं के नीचे लिखी गई हैं। विशेष इतना है कि वाक्य रचना में वाक्य के पूर्व "ईश्वर करे" इतना अधिक जाड़ दिया जाता है । जेसे । स सुखी भूयात् । ईश्वर करे वह सुखी होवे । इत्यादि । संस्कृत वाक्य । पुल्लिङ्ग । अहं भूयासम तो भूयास्ताम् युवां भूयास्तम् आवां भूयास्व यूयं भूयास्त स्त्रीलिङ्ग । सा भूयात् । ते भूयास्ताम् । ता भूयामुः । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुल्लिङ्ग के समान वाक्य होते हैं। नपुंसकलिङ्ग। तद् भूयात् । ते भूयास्ताम् । तानि भूयासुः । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुल्लिङ्ग के समान जाना। प्रत्येक वाक्यों में ईश्वर करें" यह वाक्य नाइकर हिन्दी में उत्याकरी। स भूयात त्वं भूयाः ते भूयासुः वयं भूयास्म : प्रथम पु. उत्तम पु. . मध्यम पु. एकया क्रियात क्रियाः क्रियासम् द्विपः क्रियास्ताम् क्रियास्ताम् क्रियास्व मथ क्रियामः क्रियास्त क्रियास्म इन प्रत्येक क्रियाओं के नीचे भी उन्हीं हिन्दी क्रियाओं को नोड़ो लो इस धातु के विधि लिङ् की क्रियाओं के नीचे लिखी गई है । और विशेष पूर्यवत् जाना ।
६३ में कई तुम करो हम करें प्रथम पु. उत्तम पु. हिन्दी वाक्य । पुल्लिङ्ग । यह करे तूं करे वे दोनों करें तुम दोनों करो हम दोनों करें वे करें इन प्रत्येक वाक्यों के आदि में ईश्वर करे यह वाक्य नोड़ दो। ऐसे ही स्त्रीलिङ्ग में, और नपुंसकलिङ्ग के बदले में भी जाना । प्रत्येक वाक्यों का संस्कृत में उल्या करो। (एच) मध्यम पु. एकपः एधिपीट एधिषीठाः एधिपीय द्विव. राधिपीयास्ताम् राधिपीयास्थाम् राधियोवहि धनुष राधिपीरन् एधियोध्यम् एधिषीमहि इन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की वेई क्रिया पाती हैं ना इस धातु के विधि लिङ् की क्रियाओं के नी लिखी गई है । और विशेष पूर्ववत् जानो। संस्य धाक्य । पुल्लिङ्ग । स एधिपोष्ट त्वमेधिषीष्ठाः अहमेधिपीय साधिषीयास्ताम् युवामधिपीयास्थाम् आवामेधिषीपहि त एधिपोरन यूयमेथियोध्वम् घणमेधिपीमहि स्त्रीलिङ्ग सेधिपोष्ट । से रधियीयास्ताम् । ता रधियोरन् । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुलिङ्ग के तुल्य घाक्या बाना ।
( E४ प्रथम पु. - नपुंसकलिङ्ग। सदेधिपोष्ट । ते रधिषीयास्ताम् । तान्येधिपीरन् । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुल्लिङ्ग के समान जानो । प्रत्येक वाक्पों का हिन्दी में अनुवाद करो। संस्कृत में पूर्वोक्त विधि आदि अर्थ | लोट् लकार । हिन्दी में विधि और सम्भावना अर्थ । (अस) मध्यम पु. उत्तम एकवा अतुं रधि असानि द्वितः स्ताम् स्तम् प्रसाय याच. सन्तु असाम इन प्रत्येक संस्कृत कियाओं के नीचे भी उन्हीं हिन्दी क्रियाओं को जानो नो इस धातु के विधि लिह की क्रियाओं के नीचे लिखी गई है। संस्कृत वाक्या पुल्लिङ्ग । सोऽस्तु त्वमेधि अहमसान तो स्ताम् युवा स्तम् यूयं स्त स्त्रीलिङ्ग । सास्तु । ते स्ताम् । ताः सन्तु । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुल्लिङ्ग के समान नाना। नपुंसकलिङ्क। सदस्तु । ते स्ताम् । तानि सन्तु । मध्यम और उत्तम पुरुष में पुल्लिङ्ग के तुल्य चानो। प्रत्येक वाक्यों का हिन्दी में उल्या करी । श्रावामसाव ते सन्तु घयमसाम भाशिष अर्थ के लोट् लकार में इस धातु की सकल क्रियाओं के रूप विधि अर्थ के लोट् लकार की क्रियाओं के रूपों के तुल्य होते हैं। केवल प्रथम और मध्यम पुरुष के एकवचन में "स्सात्" यह रूप विकल्प करके होता है। मध्यम पु. उत्तम प्रथम पु. सराव. भवतु द्विषः भवताम् भव . बहुपः भरन्तु मवस भवानि भवसम् भवाव भवाम इन प्रत्येक संस्कृत क्रियाओं के बदले में भी हिन्दी की बेई. क्रिया आती हैं जो " अस" धातु के विधि लिङ् की क्रियाओं के नीचे लिखी हुई हैं। हिन्दी बाक्य । पुल्लिङ्ग । यह होये । इत्यादि । इस धातु के विधि लिह में लिखे घायों के समान जाने।। प्रत्येक वाक्यों का संस्थत में उल्था करो। आशिप अर्थ के लोट् लकार में इस धातु की सकल क्रियाओं के रूप विधि अर्थ के लोट् लकार की क्रियाओं के रूपों के तुल्य होतेहैं केवल प्रथम और मध्यम पुरुष के एफपचन में एक पक्ष में "भवतात यह रूप होता है। प्रभपु. मध्यपु. • कुरु যুদ্ধ জান্ন इसम पु. फरपाणि करयास विधः कुरुलाम कुस्तम कुरुत करवाम पहुवः कर्वन्तु . त्वं कुरु तो कुरुताम इन प्रत्येक क्रियाओं के बदले में भी उन्हीं हिन्दी क्रियाओं | को जानो जो इस धातु के विधि लिङ् में लिखी गई हैं। संस्शत वाक्य पुल्लिङ्ग । स करोतु अहं करयाणि युधां कुरुतम् प्रायां करवाय ते कुर्धन्तु यूयं कुस्त घयं करयाम स्त्रीलिङ्ग । सा करोतु । ते कुस्ताम् । ताः कुर्वन्तु । मध्यम और उत्तम पुरुप में पुल्लिङ्ग के समान नाना । नपुंसकलिङ्ग। तत् करोतु । ते कुरुताम् । तानि फुर्घन्तु । मध्यम और उत्तम पुरुय में पुल्लिंग के तुल्य जानो। प्रत्येक वाक्यों का हिन्दी में उल्या करो। प्राथिप लोट् में प्रथम और मध्यम पुरुष के एकवचन में "कुरुतात्" यह रुप विकल्प करके होता है और शेष रूप विधि लोट् के रूपों के तुल्य होते हैं। (सध) उत्तम प्र. एकव. एधताम सधस्व गधे दिव. एधेताम् एघेथाम राधावहे यदुयः एचन्ताम् एधध्यम एधामहे इन प्रत्येक क्रियाओं के नीचे भी उन्हीं हिन्दी क्रियाओं को जानो नो इस धातु के विधि लिङ् की क्रियाओं के नीचे लिखी गई हैं। मध्यम पु.
हिन्दी वाश्य । पुल्लिङ्ग । यह बढ़े इत्यादि विधि लिङ् के तुल्य जानो। प्रत्येक धावा का संस्कृत में उल्या करो। अजन्त पुल्लिङ्ग शब्छ । रामाय । रामाभ्याम् । रामेभ्यः । सख्ये । सखिभ्याम् । सखिभ्यः । राम को । दोनों रामो को। कतिभ्यः । रामा को। सुधिये । सुधीभ्याम् सुधीभ्यः । सर्पस्मे । सवाभ्याम् । सर्वेभ्यः । साध । साधुभ्याम् । साधुभ्यः । चिभ्यः। स्वयम्भव । स्वयम्भूभ्याम् । स्यय- पूर्वस्मे । पूर्वाभ्याम् । पूर्वाभ्यः । 'मुनये । भुनिभ्याम् । मुनिभ्य: । दाये । दातृभ्याम् । दातृभ्यः । पत्ये । पतिम्याम् । पतिभ्यः । ग । गोभ्याम् । गोभ्यः । काप । भा-प्राणी वालतृण-घास म्भभ्यः । पर्याप्त पूरा धातु। (दा) पाशीर्लिङ् । देयात् । लड़। अदात् । विधिलिह । दद्यात् । (चर) पाइपूर्वक करना। विधिलिङ् । प्रारत। द्रुह दिया. पर. एक-अपकार विधिलिङ् । दुष्टोत् । संस्कृत याश्य। जनकः प्रीत्या रामाय मानकों ददौ । प्रग्या सध्या भूतेभ्यः मुर्य देयात् । विभ्यो देवेभ्ये नमः । कृष्यो भन्या मुनये ( - प्रासनमदात 1 पत्ये गच्छति । सख्ये सर्वदा हितमाचरेत् । सुधिये पानं धनं दद्यात् । साधुभ्य: कदापि न टुह्येत् । स्वयम्भुवे नमस्क- म्मः । स गाभ्यो वालतृण ददाति। कतिभ्यो ब्राह्मणेभ्यो भोजनं दद्याम् । इन वाक्यों का हिन्दी में उन्या करो। एक व्याकरण का मत है कि सम्पदान सञ्चा केवल उसी को नहीं होती जिस को कोई धातु दी जाय किन्तु इतर क्रियाओं के भी कम्मी के साथ जिन कारकों का संबन्ध किया नाय उन सब को सम्प्रदान सन्या होती है । जैसे। मजदत्तो देवत्ताय धातः कथयति । यन्त्रदत्त देवदत्त से बात कहता है। यहां कथन क्रिया के कर्मचाता. के साथ देवदत्त का सम्बन्ध किया जता है। इस लिये उसे भी सम्प्रदान सज्जा होती है। जिन धातुओं का अर्थ रुपना . अर्थात अच्छा लगना हो ठन के प्रयोग में जिस प्राणी को कोई घस्तु रुचे उसे सम्प्रदान सजा होती है। जैसे । देवदंताय रोचते मोदकः । देवदत्त को लड्ड अच्छा लगता है। यहां देवदत्त को सम्प्रदान सना हुई है। श्लाघ. (स्तुति क.) हु (छिपाना ) स्था (खड़ा रहना) शप (उराहन देना) इन धातुओं के प्रयोग में जिस प्राणी को कुछ बात जनाना हो उसे सम्प्रदान सञ्चा होती है। जैसे । गोपी स्मरात कृष्णाय श्लाघते । गोपी काम से (पीड़ित होकर ) कृष्ण की स्तुति करती है ! कृष्णाय हुते । कृष्ण को ( सौतों से) छि पाती है। कृष्णाय तिष्ठति । कृष्ण के लिये खड़ी रहती है। कृष्णाय शपते । कृष्ण को उराहन देती है। इन उदाहरणों में गोपी स्तुति आदि कामों में कृष्ण को अपना प्रेम मानसी है । इस लिये उसे सम्प्रदान संचा हुई है। णिजन्त “धू" (चराना) धातु के प्रयोग में उत्तम अर्थात् ऋण देनेवाने प्राणी को सम्प्रदान सुना होती है। जैसे ।
(8 देवदत्तो यज्ञदत्ताय शतं धारयति । देवदत्त यज्ञदत्त के सो (रुपये) धराता है । अर्थात् देवदत यज्ञदत्त का सौ रुपैयों का ऋणी है। यहां यज्ञदत्त को सम्प्रदान सना हुई है । " स्पृह" (चाहना) धातु के प्रयोग में जो घस्तु चाही जाय उसे सम्प्रदान सजा होती है। जैसे। यज्ञदत्तः पुष्येभ्य: स्पृहयति । यज्ञदत फूलों को चाहता है। यहां फूलों को सम्प्रदान सजा हुई है। जिन धातुओं का अर्थ क्रोध द्रोह ईया अयवा असूया हो उन के प्रयोग में जिस व्यक्ति पर कता का कोप हो उस को सम्प्रदान सजा होती है। जेसे । देवदत्तो यज्ञदत्ताय क्रुह्यति । देवदत्त यज्ञ- दत्त पर क्रोध करता है । विष्णुदत्तो यशवनाय द्रुह्यति । विष्णदत यजदत्त का द्रोह करता है । रामदत्तो यज्ञदत्ताय ईय॑ति । रामदत्त यज्ञदत से ईया रखता है । अर्थात् उस की सम्पति को देख नहीं सकता । कृष्णदत्तो यचदत्ताय असूयति । कृष्णदत यज्ञदत्त की अमूया करता है । अर्थात उस के गुणों में दोष प्रकट करता है। यदि क्रुध और दुह धातु उपसर्ग सहित हों तो उन के प्रयोग में जिस पर कती का क्रोध हो उस को सम्प्रदान सञ्चा नहीं होती किन्तु कर्म सना होती है । जेसे । देवदत्तो यज्ञदतमभिनु- द्धाति । देवदत्त यच्चदत्त पर क्रोध करता है। विष्णुदतो यज्ञदत्तम- भिद्रुह्यति । विष्णुदत्त यज्ञदत का द्रोह करता है। इन उदाहरणों में यज्ञदत्त को कर्म सजा हुई है सम्पदान सजा नहीं। और इसी कारण उसके प्रागे द्वितीया विभक्ति आई है। जहां राध और ईक्ष धातुओं का अर्थ शुभ और अशुभ फल का विचारना हो वहां उन धातुओं के उस कारक को समा- दान सज्जा होती हे निस के विषय में अनेक प्रश्न किये जायं । ।
- ( १०० से ! गर्ग: कृष्णाय राष्ट्रात ईदते वा । गर्ग मुनि कृष्ण के विषय में विचार करता है। अर्थात नन्द प्रादिकों के अनेक प्रश्नों को मुन कर शुभ और अशुभ फलों को विचारता है। जिस के प्रादि में प्रति प्रथा आङ उपसर्ग है। ऐसे शु (प्रति- ज्ञा क.) धातु के योग में प्रथम प्रेरणा करनेवाले को सम्प्रदान सजा होती है । जैसे । यदत्तो विप्राय गां प्रतिश्योति आशृणोति था। यचदत ब्राह्मण के लिये गो की प्रतिज्ञा करता है। यहां ब्राह्मण को सम्प्रदान सना हुई है । क्योकि यह पहिले यचदत्त को प्रेरणा करता है कि मुझे गो दो तब वह उसे गो देने की प्रतिज्ञा करता है। अनुपूर्वक और प्रतिपूर्वक “गृ" (स्तुति फरनेशले को प्रोत्साहन क.) धातु के उस कारक को सम्पदान सना होती है जो पहिली क्रिया का कता हो । जेसे । होरेऽनुगृणाति प्रतिग- | गाति । ( अध्वर्यु) स्तुति करनेवाले होता की प्रेत्साहना- करता है । अर्थात हवन करनेवाला पहिले स्तुति करता है सब अध्वर्यु उस की मातत्साहना करता है। परिक्रयण शब्द का अर्थ वेतन श्रादि के द्वारा किसी वस्तु को कुछ दिन के लिये अपने अधीन रखना है। इस परिक्रयण के लिये जो वेतन आदि दिया जाता है उस के गचक शब्द को सम्पदान सन्ना विकल्प करके होती है। जैसे । शतेन शताय धा परिक्रीतः । सो (रुपये) पर भाड़ा किया गया। यहां शत शब्द को सम्प्रदान सन्ना विकल्प करके हुई है । जब सम्प्रदान सना हुई तो उस के आगे चतुर्थी विभक्ति आई नहीं तो तृतीया हुई । जहां किसी एक वस्तु को उपकार के लिये कोई दूसरी वस्तु देखाई जाती है यहां ठस प्रथम वस्तु के वाचक शब्द के भागे चतुर्थी विभक्ति पाती है। जैसे । मुक्तये हरि भजति । मुक्ति - - 09 . ( 20124 के लिये हरि का भजन करता है। ब्राह्मणाय दधि । ब्रालय के लिये दही । इत्यादि । "कृप" (होना) धातु के और उस के समानार्थक इतर धातुओं के योग में भी उत्पन्न होनेवाले पदार्थ के आगे धतुर्थी विभक्ति पाती है। से । भक्तिीनाय कल्पते सम्पद्यते जायते । इत्यादि । भक्ति चान के लिये होती है। यहां भक्ति से चान उत्पन्न होता है । इस लिये ज्ञान के आगे चतुर्थों विभक्ति पाई है। उत्पात उसे कहते हैं जिस से गुम प्रथया अशुभ फल का ज्ञान हो। इस उत्पात से जो फल जाना जाता है उस के पाचक शब्द के आगे चतुर्यो विभक्ति प्राप्ती है। जेमे I पाताय कपिला विद्युत् । भूरे रंग को बिजली घायु के लिये होती है। अर्थात् भूरी बिजली के चमकने से नान पड़ा है कि पाय अधिक घहेगी। यहां धात शब्द के आगे चतुर्थी विभक्ति पाई है। हित शब्द के योग में चतुर्थो होती है । क्षेमे । ब्राह्मणाय हितम् । ब्रमण के लिये हित । जहां तुमुनन्त क्रिया आप तो न रहे परन्तु उस के निमित दूसरी क्रिया निकटवर्ती रहे ऐसे स्थल में उम तुमनन्त क्रिया के कर्म के भागे चतुर्थी विभक्ति श्रासी है। मे। पुष्येभ्यो याति । पुष्पाण्याइत यातीत्यर्थः । फूलों के लिये जाना है। पयार फलों को लाने के लिये जाता है। या "बात" यह समुनन्त क्रिय अपर से मममी जाती और उसके लिये याति"यह क्रिया नि- कटयों है । इस पयस्या में सुमनरा क्रिया के फर्म केगे चतुर्थी विभक्ति भाई है। म मेजो प्रत्यय विधान नियेमारी है जिन के अन्त में हो स्ने गन्दों के भागे थार्या विभक्ति पाती । । "मायरधनाश्य " 1 - ( ૨૦૨ हे जेसे । यागाय याति । यष्टुं यातीत्यर्थः । यज्ञ के लिये जाता है । अर्थात् यज्ञ करने को जाता है । यहां तुमुन् प्रत्यय के अर्थ में यज्ञ धातु के आगे घञ् प्रत्यय लाने से याग शब्द बना है। उस के आगे चतुर्थी विभक्ति पाई है। नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वथा, अलम, और वषट् इन | के योग में चतुर्थी विभक्ति आती है। जैसे । देवेभ्यो नमः । देवताओं को नमस्कार । प्रजाभ्य: स्वस्ति । प्रजाओं का कल्याण । आग्नये स्वाहा. अग्नि को घृत श्रादि वस्तु का दान । पितृभ्यः स्वधा । पितरों को पिघड आदि वस्तु का दान | अलं मल्लो मल्लाय । एक मल्ल दूसरे मल्ल के लिये समर्थ । इस नियम में अलं शब्द के कहने से जिन शब्दों का सामर्थ्य अर्थ हो उन सब का यहण होता है । इस लिये "हरिदत्येभ्यो ऽलं प्रभुः समर्थः" इत्यादि प्रयोग सिद्ध होते हैं । प्रभु आदि शब्द के योग में षष्ठी भी होती है । जैसे । भुवनत्रयस्य प्रभुः । तीन लोक का स्वामी । वषट् इन्द्राय । इन्द्र को हल्दिीन । यदि वाक्य से अनादर सूचित हो तो “मन " (मानना) धातु के प्राणिभिन्न कर्म के आगे चतुर्थी विभक्ति विकल्प करके आती है । जेसे । न त्वां तृणं तृणाय वा मन्ये । में तुझे तृण (भी) नहीं मानता । यहां मन । धातु के प्राणिभिन्न कर्म तृण के आगे चतुर्थी विभक्ति विकल्प करके हुई है। चतुर्थो के प्रभाव | में द्वितीया हुई है। गमन अर्थ वात्ने धातुओं के पथभिन्न कर्म के आगे द्वितीया और चतुर्थी दोनों विभक्तियां कम से आती है जैसे । याम यमाय धा गच्छलि । गावं पर जाता है। जहां कता का प्रकट व्यापार नहीं रहता यहां चतुर्थी नहीं होती बसे । मनसा यामं प्रगति। मन से गाय पर जाता है। - - १०३ । 1 । अजन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । रमाये । रमाभ्याम् । रमाभ्यः । स्त्रिये । स्त्रीभ्याम् । स्त्रीभ्यः । रमा को । दोनों रमाओं को। धेन्वे । धेनवे । धेनुभ्याम् । रमाओं को। धेनुभ्यः । सर्वस्य । सर्वाभ्याम् । सर्वाभ्यः । धध्ये । वधूभ्याम् । षधूभ्यः । तिभ्यः । भुवे । भुवे । भूभ्याम् । भूभ्यः । मतो । मतये । मतिभ्याम् । टुहिरे । दुहितृभ्याम । मतिभ्यः । दुहितृभ्यः । नये । नदीभ्याम् । नदीभ्यः । द्यवे । योभ्याम् । द्योभ्यः प्रिये । प्रिये । श्रीभ्याम् । श्रीभ्यः । नावे । नाभ्याम् । नोभ्यः । कोय। धातु । स्व. भ्या. आत्म. अनः रुचना । दाण-पूर्षक भ्याएर सान्देना। प्रयच्छन्ति । रोचते। क्रुध. दिवा. पर. अक कोप का। पद सम्पूर्वक दिवा. आत्म प्रकः= विधिलिङ् । अध्येत् । समर्थ होना । सिद्ध हो । यज. भ्या. उभ. सका यज का । सम्पद्यते । यजन्ति । 'संस्कृत वाक्य रमाये रोचते पद्धम् । मत्य सम्पद्यते विद्या । मेघा नदीभ्यो जलानि प्रयच्छन्ति । प्रिये शूजन जयन्ति राजानः । स्लोभ्यो न होत् । चालतणं धेनवे हितम् । यधभ्यः प्रातराशं दद्यात यो यजन्ति विज्ञाः । नावे तिष्ठति । बनवाव्या का हिन्दी में उत्या करी। प्रच्छा लगना।।
१०४ - अजन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । ज्ञानाय । ज्ञानाभ्याम् । ज्ञानेभ्यः । धारिणे । धारिभ्याम् । पारिभ्यः । ज्ञान के लिये । दोनों ज्ञानों के दधे । दधिभ्याम् । दधिभ्यः । लिये । ज्ञानों के लिये । मधुने । धुभ्याम् । मधुभ्यः । - धातु । - . स्पृहः पुरा. उभय. सक-चाहना । स्पृहयति । संस्कृत वाक्य । भक्तिीनाय कल्पते । धारिभ्य: कूपं गच्छति । द दुधाम् । मधुने स्यत्ति भृङ्गः । न धाया का हिन्दी में उल्या करो। हलन्त पुलिङ्ग शब्द । दुहे । धुग्भ्याम् ! धुभ्यः । मह्यम् । मे । प्रायाभ्याम् । नो । दूहनेशले को । दोनो दुहने- अस्मभ्यम् । नः । घालों को ! दूहनेवालों को। मुझे। हम दोनों को। हम को अनडुहे । अनहुभ्याम् । कस्मे । काभ्याम् । केभ्यः । अनहुभ्यः। किस को। किन दोनों को। चतुर्व्यः । किन को। पञ्चम्यः । अस्मे । अभ्याम् । एम्यः । पड्भ्यः । इस का। इन दोनों को इन का। अपभ्यः । भ्रष्टाभ्यः । यस्मे । याभ्याम् । येभ्यः । तस्मे । ताभ्याम् । तेभ्यः । जिस को। जिन दोनों को। उस को। उन दोनों को । उन को। जिन को। तुभ्यम् । ते। युवाभ्याम् । वाम् । सतस्मै । एताम्याम् । एतेभ्यः युप्मभ्यम् । वः। इस का। इन दोनों का। तुझे। तुम दोनों फो। तुम को। .इन को।
- १०५ ) । । अमुमे । प्रमभ्याम् । अमीभ्यः । प्राचे । प्राग्भ्याम् । प्राग्भ्यः । चूम को. इन दोनों को । प्राञ्चे । म ड्भ्याम् । प्राङ्भ्यः । इन.को। उदीचे । उदाभ्याम् । उदय: । उस को । उन दोनो को । महिम्ने । महमभ्याम महिमभ्यः । उन को। यन्चने । वभ्याम् यज्वभ्यः । सम्राने सम्राइभ्याम् गने । युभ्याम् । युभ्यः । सम्राड्भ्यः । राजे । राजभ्याम् । राजभ्यः । भूभृते। भूभृद्भ्याम् । भभूभ्यः । दण्डिना दपिडभ्याम् । दगिडभ्यः । धीमते।धीमद्भ्यम्। धीमद्भ्यः। पथे । पथिभ्याम् । पथिभ्यः । गच्छते गच्छदभ्याम् गच्भ्यः वेधसे । बेधाभ्याम् । घेधाभ्यः । प्रगामे । प्रशानभ्णम् । प्रणनभ्य। विटुपे । बिद्वद्भ्याम् । विद्वदभ्यः । बुधे । भुभ्याम् । भुभ्यः । गरीयसे। गरीयोभ्याम।गरीयाभ्यः । अग्निमथे। अग्निमदभ्याम् । पुंसे । पुमभ्याम् । पुमभ्यः । अग्निमदभ्यः । । । कोपा घेतन-चाकरी । प्रयात दुधाई । दशरथराम के पिता का नाम । धातु . कुप दिया. पर. प्रक+ोध का। लिट् । धुकोप । संशरा धाप । टुहे घरनं ददाति । अनहे घामं प्रयच्छति। ननुभयो दिक पालेभ्यो धलिं ददाति । ममाने का प्रयास मामन्ताः । गत भमभ्यरकोप ! धीमले रोवो शिया । विश्वामियमै गयो रामाय दशरय अभियं ददो। प्रगामे भानं प्रदेयम् । युधे दृष्येच थुद्धिमान् । पम्निमये दवियां ददाति । महिम्ने फन्पो रिया ( ૧૦૬ - 1 अमभ्यः । . यज्वने हितम् । शान्ताय यूने सुखम्भवति । राज्ञे स्वस्त्यस्तु । दण्डिने भिक्षा दद्यात् । उत्पथेन पथे गच्छति । घेधसे नमः । विद्वदम्यो हितमाचरेत् । गरीयसे उच्चमासनं दद्यात् । सद्भ्यः पुम्यो नमः । इन संस्कृन वाश्यों का हिन्दी में उल्या करो। हलन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । दिवे । शुभ्याम् । युभ्यः । श्रमप्ये । अभूभ्याम् स्वर्ग के लिये। दोनों स्वों के धाचे । धाम्याम् । वाम्भ्यः । लिये । स्वर्ग के लिये। मने । साभ्याम् । साम्यः । चतसृभ्यः । त्विये । त्विड्म्याम् । त्विड्भ्यः । तस्ये । ताभ्याम् । ताभ्यः । गिरे । गोभम गीर्यः । 'कस्य । काभ्याम् ! काभ्यः । आपदे । अपभ्याम्। आपदभ्यः अस्य । आभ्याम् । आभ्यः । यस्य । याभ्याम् । याभ्यः । दिशे । दिग्भ्याम् दिग्भ्यः । एतस्ये । एताभ्याम् । एताभ्यः । धातु । राधःपाइपूर्वक पुरा. पर सक. हु आङ्पूर्वक भ्वा. पर. सकः- -सेवा क.. ले आना। आराधयन्ति । प्राहरन्ति । संस्कृत वाक्य । . दिवे धम्ममाचरन्ति । मनोहराय वाचे देवतामाराधयन्ति । मने पुष्पाण्याहरन्ति । त्विषे तपश्चरन्ति । गिरे नमस्कुर्वन्ति । अधिवेक आपदे भवति । अभ्य: स्पृहयन्ति धासकाः ! ऐन्दो दिशे नमः । । । अभ्यः । इन संस्कृत बास्यों का हिन्दी में उल्या ।।
( १०० ) हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द ! धारे । वााम् । घाभ्यः । अहे। अहायाम् । अहोभ्यः । जल के लिये दोनों जलों के हविये । विभ्याम् । हविर्यः । लिये। जलों के लिये। धनुषे । धनुयाम् धनुभ्यः । चतुर्व्यः । . कोष । उनक-उल्ल पदी। - धातु । या अदा. पर. सका-जाना । याति । संस्मत वाक्य । . पाया याति । अहे कुप्यत्यत्नकः । हविय पयः । धनुवंशः । इन संस्कृत पाक्यों का हिन्दी में उल्या करो। हिन्दी वाक्य। कृप्य ने भक्ति से मुनि को प्रासन दिया । विद्वान को निवाहयोग्य धन देना चाहिये । जनक ने प्रेम से राम को जानकी दी। मित्र का सर्वदा हित करना चाहिये । पति के लिये 'जाती है । सज्जनों का अपकार कधी न करना चाहिये । यह 'गायों को घास देता है। हम ब्रह्मा को नमस्कार करते हैं। में के ब्राह्मणों को भोजन देऊ । ईश्वर सकल मरणयों को मुख दे। मेघ नदियों कोज जल देते हैं। कोमल तृण धेनु के लिये हित है 1 राजा लोग लगी के लिये शत्रुओं को जीतते हैं। विद्या धुद्धि के लिये होती है । लक्ष्मी को कमल अच्छा लगता है। स्त्रियों पर क्रोध नहीं करना चाहिये । पयिडत लोग स्वर्ग के लिये यज्ञ करते हैं। बहुओं को कलेऊ देना चाहिये। पानी (भरने) को कूत्रां पर लाता है । मोरा फूल के रम को चाहता है । भक्ति ज्ञान के लिये होती है । दही के लिये दूध 1 . १०८ .) इन्द्र ने पर्वता पर कोप किया । बुद्धिमान को चाहिये कि पण्डित का अपंकार न करे । दूहनेवाले को वेतन (दुहाई) देता है। धुद्धिमान को विद्या अच्छी लगती है । शान्त युया (पुरुष) को सुख होता है। दण्डी को भिक्षा देना चाहिये । चारों दिक्पालों (इन्द्र श्रादि) को पूजा देता है । (राजा) दशरथ ने विश्वामित्र के आश्रम पर जाते हुए राम को आशीर्वाद किया । छोटे २ राजा • चक्रवर्ती को कर देते हैं। प्राग मथने पाले को दक्षिणा देता है । पण्डितों का हित करना चाहिये । घेल को घास देता है। विद्या बड़ाई के लिये होती है । ज्ञान शान्त (पुरुष) को देना चाहिये । राजा का कल्याण हो । श्रेष्ठ (पुरुष) को ऊंचा आसन देना चाहिये । निकम्मी राह से अच्छी राह पर जाता है। यज्ञ करनेवाले को हित । सज्जन पुरुषों को नम- स्कार । ब्रह्मा को नमस्कार । (कवि.लोग) मनोहर पाणी (पाने) के लिये देवता की सेवा करते हैं । अविवेक विपत्ति के लिये होता है । स्वर्ग के लिये धर्म करते हैं। चातक (पक्षी) जल चाहते हैं। कान्ति के लिये तप करते हैं। उल्लू (पक्षी) दिन पर कोप करता है । धनुष के लिये बांस । गनी (भरने) के लिये जाता है। खीर के लिये दूध । । इन पाक्यों का संस्लंत में अनुवाद करो। हिन्दी शब्द । पुल्लिङ्ग सकवच. बहुवच बालक को-के लिये बालकों को-के लिये लड़के को-के लिये लड़कों को-के लिये मुनि को-के लिये मुनियों को-के लिये ।
११० ) . एकप. संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में अपादान के आगे पञ्चमी विभक्ति पाती है । संस्कृत में पञ्चमी विभक्ति के प्राय "बात" इत्यादि चिहू रहते हैं। हिन्दी में उसका "से" चिहू हे । जेसे । अपर लिखे हुए उदाहरणों में संस्कृत में ग्राम और अश्य शब्द के अन्त में "आत्" चिहू और हिन्दी में गावं ओर घोड़ा शब्द से परे "से" चिह्न संस्कृत में पञ्चमी विभक्ति । विश्व घवध उसि भ्याम् भ्यस संस्कृत में भूत और भविष्य काल । हेतुहेतुमदाव प्रादि लिङ् के निमितों में से कोई निमित्त । क्रिया की प्रसिद्धि गम्य- मान । टङ् लकार । हिन्दी में हेतुहेतुमद्भुत और भयिप्य कान ! भूत' काल का उदाहरण । यज्ञदत्त एधश्चेदलप्स्यतं; आदनमपक्ष्यत् । यदन ईधन पाता तो भात. पकाता । अर्थात् न धन पाया न भात पकाया । भविष्य काल का उदाहरण । सुवृष्टिश्चेदभविष्यत सदा मुभिक्षमभविष्यत् । अच्छी घृष्टि होवेगी तो सुकाल होवेगा। अ. थात् यदि अच्छी वृष्टि न होवेगी तो मुकाल भी न होवेगा। इन दोनों उदाहरणों में उत्तर २ क्रिया के साथ पूर्व २ क्रिया का हेतुहेतुमदाय संबन्ध है अर्थात् पहिली २ क्रिया कारण और पिछली २ क्रिया कार्य है । और दोनों उदाहरणों में | क्रिया की असिद्धि अर्थात् न होना प्रकाशित होती है। (अस और भू) प्रथम पु. मध्यम पुः उत्तम पु. अभयध्यत् होता अभविष्यम् , -अभविध्यः होता एफयच. एकयध एकवच होयेंगे होती होती होती होगा होगा हाऊंगा होयेगी होगी हाजंगी द्विय श्रमधिप्यताम् अभविष्यतम् अभवप्याय यायक्ष होते होते प्रवचः होतों होमों याचा होगे होगे यदुवच. हावंगी होगी होगी अनुमच. अभविष्यन् प्रभविप्यत प्रभविध्याम याचा होते यमुत्रध होती होतो होतो पायचा हेविंगे होगे यायच. होगी होगी होयेंगी टुङ् लकार में भी अम् और भू दोनों धातुओं को क्रियाओं के रूप एक ही में होते हैं। अपर लिखी हुई हिन्दी की चार २ क्रियाओं में से दो २ भूत काल और दो २ भविष्य फान की है मंत धाश्य । पुस्ति। सदभविष्यत् त्यवेदभविष्यः মহিমম মা স্বমহিমা, যন্ত্রশ্নেত্রিস আহামদ্রিাহ से घेदभविष्यन् यूयम्वेदनधित पादयिष्याम स्त्रीनि। मा घेदर्भाषण देदभदभविष्यताम् । तारदरियन्। शेष पलिया ।
( ११२ ) प्रथम पु. उत्तम पु. अकरिप्यम् एफयत. एकयच. . नपुंसकलिङ्ग तवेदमविष्यत् । ते चेदभविध्यताम् । तानि चेदभषिप्यन् । शेष पुल्लिङ्गवत् । इन प्रत्येक वाक्चे। में एक २ विधेय पद मिलाकर और फिर इन के साथ एक २ और पाय जोड़ कर हिन्दी में उल्था फरों । जैसे । स चेदार्मिकोऽभविष्यत, सुखमनप्स्यत । वह धार्मिक होता या होगा तो सुख पासा वा पायेगा इत्यादि । (कृ) मध्यम पु. अकरिष्यत् प्रकरिय: करता करता करता करती करती करती करेगा करेगा करूंगा करेगी करेंगी करूंगी द्विषच. अरिप्यताम् अकरिप्यतम् अकरिप्याय यदुपच. करते करते करते बहुवच. करता करतो बहुपत करेंगे करोगे करेंगे घायच. करेंगी करोगी करेंगी बदुपच अकरिष्यन् अकरियत प्रकरिप्याम • करते करते करते वायचा करतो करती करती करेंगे करोगे करेंगे बायचा करेंगी फरोगी करेंगी. एकवच एकवच. एकवच. करतों ११३ ) या करेंगे या करेंगे हिन्दी धाय । पुल्लिङ्ग। यदि यह करता यदि तूं करता वा यदि में करता था था करेगा करेगा करूंगा यदि वे दोनों करते यदि तुम दोनों मंद हम दोनों करते करते या करोगे यदि वे फरते पा यदि तुम करते का यदि हम करते या करेंगे करोगे करेंगे स्वील्लिङ्ग यदि यह फरती या यदि तूं फरती या यदि में करती या करेगी फरेंगी करूंगी यदि वे दोनों फरतों यदि तुम दोनों करती यदि हम दोनों करती या करोगी यदि वे करतों वा यदि तुम करतो था यदि हम करतों या करेंगी करोगी करेंगी नपुंसक के बदले में पुल्लिा के समान मानो। इन प्रत्येक हिन्दी पायों में एक २ फर्मयाचक पद मिलाकर और इन पाक्यों के साथ एक २ और पाश्य जोड़ कर संस्कृत में उल्था करो। जेसे । यदि यह धर्म करता था फरेंगा तो स्वर्ग जाता था जायगा । स घेदर्ममकरिष्मा, लदा स्वर्गम- गमिप्यर ! इत्यादि। (एध) प्रथम पु. मध्यम उत्तमपु. रोधिप्पत ऐधिमाया: धिये पढ़ता यसा बढ़ता पढ़ती पढ़ती पढ़ती घा करेंगी घा करेंगी एप.
११४ - एफय. एफय. . यदुध बढेगा चढ़ेगा वढूंगा बढ़ेगी बढ़ेगी वढूंगी द्विव. ऐधिप्येताम् ऐधिप्येथाम् ऐधिप्यारहि यायः बढ़ते बढ़ते बढ़ते घय. बढ़ती बढ़ती बढ़ती बहुवः तदेंगे बठोगे बढ़ेंगे बढ़ेगी बढोंगी बढ़ेगी संधिप्यन्त बाय' ऐधिप्यध्यम रोधिप्यामहि बहुव. बढ़ते बढ़ते बढ़ते बध. बढ़तों बढ़ती ਸ਼ਣੁ घाय. बढ़ेंगे बढ़ोगे बढ़ेंगे घटुवा बढ़ोगी बढ़ेगी संस्कृत वाक्य । पुल्लिङ्ग। स चेदेधिप्यत त्वचेदेधिप्यथाः अहञ्चदेधिप्ये ते। चेदेधिप्यताम् युपाचेधिप्येथाम् . यावाच्चैदेधिप्यावहि ते चेदेधिप्यन्त यूयञ्चेदेधिध्यध्यम् चयञ्चेदेधिप्यामहि स्त्रीलिङ्ग। सा चेदेधिप्यत । ते घेदेधिप्यताम् । साश्चेदेधिप्यन्त । शेष पुल्लिङ्गवत् । नपुंसकलित। सच्चेदेधिष्यत । ते चेदेधिप्येताम् तानि चैदैधिघ्यन्त । शेष पुल्लिङ्गवत् । रन प्रत्येक संस्कृत धान्यों का अस और भू धातु में कही हुई रीति के अनुसार उल्या करो।
( ११५ अजन्त पुल्लिङ्ग शम्द। रामात् । रामाभ्याम् । रामेभ्यः । सत्यः । सखिभ्याम् । सखिभ्यः । राम से । दोनों रामों से । कातिभ्यः । रामों से। मुधियः । सुधीभ्याम् । मुधीभ्यः । सर्वस्मात् । सर्याभ्याम् । सर्वेभ्य: । साधाः । सांधुभ्याम् । साधुभ्यः । स्वयम्भुः । स्वयम्भूभ्याम् । स्य- पूर्वस्मात् । पूर्वात् । पूर्वाभ्यामा यम्भूभ्यः। पूर्वेभ्यः । .दातुः । दातृभ्याम । दातृभ्यः । मुनेः । मुनिभ्याम् । मुनिभ्य: । गाः । गाभ्याम् । गोभ्यः । पत्यः। पतिभ्याम् । पतिभ्यः । विभ्यः । धातु। .भ्या. मात्मा सकः रक्षा कः । इ. अधिपूर्यकः प्रदा.भा.म. सक. -पढ़ना । भी- जुहो. पर. अकाहरना । पायते । अधीते । धिमेति । . संस्थत धारप । रामादृते न मुखम् । राजा मर्येभ्यो विप्रेभ्य: प्रनास्यायते । मुनेबिभेति । पत्युस्तरं भुते फुलपधः । सप्त्यरंगछुरा मग । मुधि- योऽधीते यचदतः । साधुभ्यो माधयः पृथयन्ति । भ्ययम्भूयः अवतयः प्रभयुः। दातुरधिकः पुण्यका कोऽपि मागि। गोटूरे रिष्ठ । नमस्सत पाश्य का हिन्दी में उन्या करो। स्मरण रखना चाहिये कि किमी प्रधि में झिमी यम् फा अलग होना चाहे यारारिक न मी हो चाहे केवल बुद्धि कल्पना तथापि उम पयधि के वाधक एट भागे पश्मी विकि पाती है। मे। सदनो सामादाति । यदम गार्थ में पता । सदों गाणं रूप प्राधि में मादा का सगोग पानषिक ..
( ११६ ) . है । परन्तु माथुराः पाटलिपुरम्य प्रायतराः । मथुरा के लोग पटने के लोगों से अधिक धनवान हैं। यहां पटने के लोगों से मथुरा के लोगों का अलग होना केवल बुद्धि कल्पित है। जिन धातुओं का अर्थ निन्दा निवृत्ति प्रथया असाय- धानी हो उन के कारक को अपादान सज्जा होती है। जैसे। पापाज्जुगुप्सते । पाप को निन्दा करता है । अधमाद्विरमति । अधर्म (कर) से निवृत्त होता है । धम्माल प्रमाद्यति धर्म ( करने ) में असावधान रहता है । जिन धातुओं का अर्थ भय अथवा रक्षा हो उन के योग में भय के कारण अपादान सज्ञा होती है। जैसे । चारादि- भेति । चार से डरता है । चारात घायते । चार से रक्षा करता है। इन उदाहरणों में भय के हेतु चोर को अपादान सजा हुई है। परा पूर्वक जि ( ग्लानि करना) धातु के योग में असह्य पदार्थ का अर्थात् जिसे कती न सह सकता हो उसे अणदान सजा होती है। जैसे अध्ययनात् पराजयते । पढ़ने से ग्लानि करता है । अर्थात् खिन्न होता है । यहां अध्ययन असह्य पदार्थ हे इस लिये उसे अपादान सज्जा हुई है। किपी, प्राणी को किसी ( अभिलपित ) यस्तु में प्रवृत होने.से रोकना वारण कहलाता है। जिन धातुओं का अर्थ वारथ हो उन के प्रयोग में अभिलषित पदार्थ को अपादान सना होती है। जैसे यवेभ्यो गां वारयति। गो को यत्र (खाने) से रोकता है। यहाँ यंव अभिलषित पदार्थ है इस लिये इस को. अपादान सना हुई है। जहां एक प्राणी किसी दूसरे प्राणी. से. ऐसे. स्थान में छिपा चाहे कि यह उसे न देख सके वहां उस दूसरे प्राणी को अपादान सन्ना होती. है। जैसे। देवदत्तानिलीयत: यज्ञदत्तः । यज्ञदत्त देवदत्त से. छिपता है । यहां देवदत्त को अपादान सना हुई है।
( १०५ प्रासा- जहां नियम पूर्वक विद्या का पढ़ना हो वहां पढ़ाने वाले को अपादान सञ्चा होती है । जेसे उपाध्यायादधीते । अध्यापक से पढ़ता है। यहां उपाध्याय को अपादान सजा हुई है। उत्पन्न होनेवाले पदार्थ के कारण को अपादान सञ्चा होती है। जैसे । ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते । ब्रह्मा अथवा ब्रह्म से प्रजा उत्पन्न होती हैं। यहां ब्रह्मा अथवा ब्रह्म को अपादान सञ्चा हुई है। जिस स्थान से कोई पदार्थ प्रकट होता है, उसे अपादान सजा होती है। जैसे। हिमवतो गङ्गा प्रभवति । हिमालय (पहाड़) से गङ्गा प्रगट होती है। यहां हिमालय को अपादान सजा हुई है। जहां क्का के स्थान में विहित ल्यप् प्रत्ययान्त शब्द का लोप हो अर्थात वह ऊपर से समझा जाय वहां कर्म और अधिकरण अर्थ में पञ्चमी विभक्ति आती है। जैसे । प्रासादात प्रेक्षते दमारुह्य प्रेक्षते इत्यर्थः । राजमहल से देखता है अर्थात् राज- महल पर चढ़ कर देखता है । आसनात पेक्षते । प्रासन उपविश्य मेक्षत इत्यर्थः । आसन पर से देखता है अर्थात् आसन पर बैठ कर देखता है । इन उदाहरणों में हवा के स्थान में विहित ल्या प्रत्ययान्त शब्द अर्थात् आरुह्य और उपविश्य इन दोनों शब्दों का लेप है इस लिये प्रासाद और आसन शब्दों के आगे क्रम से कर्म और अधिकरण अर्थ में पञ्चमी विभक्ति आई है। ऊपर से समझी हुई क्रिया भी कारक विभक्ति का निमित्त होती है। जैसे । प्रश्न ! कस्मात् त्वम् । तू कहां । उत्तर। नद्याः । नदी से। यहां, पागच्छामि। आता हूं। यह क्रिया ऊपर से समझी जाती है। जहां किसी अवधि से लेकर पथ अथवा काल की गणना होती है यहां उस अवधि के आगे पञ्चमी, पथ के आगे प्रयमा और सप्तमी, और काल के आगे सामी विभक्तियां आती हैं । जेसे । वनाद् - ।
( ११८ ) ग्रामो योजनं योजने वा । वन से गावं चार कोस पर है। कार्तिक्या प्राग्रहायणी मासे । फातिक की पूर्णिमा से अाहन की पूर्णिमा महीने भर पर रहती है। यहां वन और कार्तिकी पूर्णिमा अवधि हैं। अन्य, पारात, ऋते, दिक् शब्द, अञ्चतरपद, पाच, त्राहि, इन के योग में पञ्चमी विभक्ति आती है । अन्य शब्द में उस के समानार्थक और शब्दों का भी ग्रहण होता है। उदा० । अन्योदेव: दत्तात् । भिन्नो देवदत्तात् । धिलक्षण देवदत्तात् । इतरो देवदत्तात् । अर्थात् देवदत्त से भिन्न । पारात् शब्द के दो अर्थ है दूर और समीप । उदा० । आराद् देवदत्तात् । देवदत्त से दूर । श्राराद् यादत्तात् । यज्ञदत्त के समीप ऋते गुब्द का छोडना अर्थ है । उदा० । ऋते देवदत्तात् । देवदत्त को छोड़कर । दिक् शब्द से पूर्व आदि दिशा पूर्व आदि स्थान और पूर्व आदि समय में रहनेवाले पदार्थ समझे जाते हैं । उदा० । पूर्वी ग्रामात् । गांव से पूरब । उत्तरो ग्रामात् । गावं से उत्तर । चेचात पूर्वः फाल्गुनः । चेत से पहिले फागुन । फाल्गुनाटुत्तरश्चेवः । फागुन के पीछे चेत । अञ्चत्तरपद से वे शब्द समझे जाते हैं जिन के अन्त में अच धति हो । उदा० । प्राक् ग्रामात् । गांव से पूरन । प्रत्यग ग्रामात गावं से पच्छिम । आच और आहिन इन शब्दों में प्राच और अहि प्रत्ययान्त शब्द लिये जाते हैं । उदा० । दक्षिणा यामात । दक्षिणाहिं ग्रामात् । गावं की दक्खिन और । प्रभृति, प्रारभ्य, और वहि: इन शब्दों के योग में पञ्चमी होती है । भवात् प्रभृति आरभ्य वा सेव्यो हरिः । जन्म से लेकर विष्णु की सेवा करनी चाहिये । यमाद् यहिः । गावं के बाहर । जहां अप और परि का अर्थ वर्जन अर्थात् छोड़ना हो और पाङ् का आर्य मर्यादा अथवा अभिविधि हो वहां इन अध्ययों ૧૧: के योग में पञ्चमी विभक्ति आती है । जैसे । अप मयुरा पृष्ट देवः । परि मथुराया घृष्टो देषः । मयुरा को छोड़ कर देव बरसा। यहां अप और परि का अर्थ छोड़ना है इस लिये इन के योग में मथुरा शन्ट के आगे पञ्चमी विभक्ति आई है । आ पाटलिपुशद् घृष्टा देवः । पटने तक देव बरसा । प्रा मथुराया घृष्टा देवः । मथुरा को लेकर देव बरसा । यहाँ पहिले उदाहरण में प्रा का अर्य मर्यादा और दूसरे में अभिविधि है । इस लिये पाटलि. और मथुरा शब्द के आगे पञ्चमी विभक्ति श्राई है । अवधि को छोड़ कर मादा और अवधि सहित अभिविधि कहलाती है। जेसे । पहिले उदाहरण में पटने को छोड़ कर देय घरमा और दूसरे में मथुरा को लेकर बरसा। जहां किसी मुख्य पदार्य का प्रतिनिधि अयात उम के सदृश दूसरा पदार्थ प्रयत्रा प्रतिदान अयात् उस के बदले में किसी दूसरी वस्तु का दान दिखलाया जाय यहां इन प्रतिनिधि और प्रति दान रूप अर्य के प्रकार करनेवाले "प्रति" गन्द के योग में उन मुख्य पदार्थों के पाचक शन्दों के प्रागे पानी विभक्ति पाती है। जेसे । प्रयुनः कृष्णाम् प्रति । प्रद्युम्न कृष्ण के सदृश है। तिनेभ्यः प्रति यति मावान् । तिल के यदले में उड़द देता है। यहां प्रद्युम्नः रूप प्रतिनिधि और उड़द दान रूप प्रति दान के प्रकाशक " प्रति" शब्द के योग में मुख्य पदायों के पाचक कृप्य और लिल शब्दों के आगे पक्षमी विभक्ति जहां मण किसी क्रिया का कती न हो किन हेतु मार हो यहां उस के यापक राष्ट्र के प्रागे पशुमी मित पाती है। से पाद घर से कारण बांधा गया । पर्याच सो रूप परम लिये थे इस कारण यांया गया । नक्षा ~ १२० । ऋण का होता है वहां उस के अगे पञ्चमी नहीं किन्तु सृतीया विभक्ति पाती है। से 1 शतेन बन्धितः । मो रुपेयोने ( उसको) बंधाया। यहां ऋण बन्धन क्रिया का प्रयोजक कता है। हेतु वाचक शब्द के भागे पडुमी और तृतीया दोनों विभक्तियों आती हैं। जैसे । जाड्यात् जाडोन या बदः । जड़ता के कारण बांधा गया । पायिडत्यात पाण्डित्येन पा मुक्तः । पण्डिताई के कारण छूटा । पृथक्, विना, और नाना इन प्रत्येक के योग में तृतीया, पञ्चमी और द्वितीया विभक्तियां आती हैं। जैसे । पृथा देवदत्तेन देवदात्तात् देवदत्तं धा। देवदत से अलग। ऐसे ही विना और नाना के योग में भी जाना। करण कारक में प्रद्रव्य घाचक स्तोक, अल्प, कृच्छ और कतिपय शब्द के आगे तृतीया और पञ्चमी विभक्तियां पाती हैं । स्तोकेन स्तोकादा मुक्तः । थोड़े में छूटा । अल्पेन अल्पाढा मुक्त: । थोड़े में छूटा । कृच्छण कृच्छाद्वा मुक्तः । किसी प्रकार से छूट । फतिपयन कतिपयाद्वा मुक्तः । थोड़े में छूटा । वहां ये शब्द द्रव्य वाचक रहते हैं यहां केवल तृतीया विभक्ति पाती है। जैसे । स्तोकेन विषेण हतः । थोड़े विप से मारा गया। जिन अव्य पाचक शब्दों का अर्थ दूर और समीप है। उन के आगे द्वितीया पञ्चमी और तृतीया विभक्तियां आती हैं। जेसे । ग्रामस्य दूर दूरात दूरेण वा । गावं से दूर । यामस्यान्ति- कमन्तिकादन्तिकेन था । गाघ के.समीप । जहां वे शब्द द्रव्य याचक रहते हैं वहां ये विभक्तियां नहीं आता। से। दूरः धन्याः । दूर पथ ॥
( ૧૨૧ । 1 अनन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । रमायाः । रमाभ्याम् । रमाम्यः । स्त्रियाः । स्त्रीभ्याम् । स्त्रीभ्यः । रमा से। दोनों रमाओं से। धेन्या: । धेनाः । धेनुभ्याम । स्माओं से। धेनुभ्यः । सर्वस्याः । सर्याभ्याम् । सर्वाभ्यः । वया । यधूभ्याम् । पधभ्यः । तिभ्यः । भ्रवाः । भूयः भूभ्याम् । भूभ्यः । मत्या: । मतः । मतिभ्याम् । दुहितुः । दुहितृभ्याम् । भतिभ्यः । दुहित्भ्यः । नद्याः । नदीभ्याम् । नदीभ्यः । द्योः । योभ्याम् । द्योभ्यः । श्रियाः । श्रियः । श्रीभ्याम् । नायः । नोभ्याम् । नाभ्यः । श्रीभ्यः। धातु। (घृत) परापूर्वक। (स) अपपूर्वक। णिच । परावर्तयन्ति लोट् । अपसर । दुह. अदा. उभ- द्विकर्मः= पत. भ्या. पर. प्रक-गिरना। दूहना ।। "पतति । द्वाग्विा संम्मत धाश्य इये साध्यो रमायाः प्रति । मयिना न विद्या नद्या प्राराद यामः । निया शते न मुपम । म्ठीभ्यो मनः परायतं. यन्ति विजाः । धेनो: पणे दोन्धि । यधभ्य परसे न गृदगोमा । फुटिलाभ्यां भम्यां विभेति । टुहिगुम्योन्यो न दोनमोऽस्ता सर्पदानुकम्प्य: । द्योः पवति । नायोऽयारति । रन मतदाश्यों का हिन्दी में टल्या करो।
१२२ ) . धातु। अजन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द। ज्ञानात् । चानाभ्याम् । ज्ञानेभ्यः । धारिणः । धारिभ्याम् । वारिभ्यः । ज्ञान से। दोनों ज्ञानों से । दनः । दधिभ्याम् । दधिभ्यः । चानों से। मधुनः । मधुभ्याम् । मधुभ्यः । जन- मपूर्वक दिव. श्राम (दाण) प्रतिपूर्वक । अब उत्पन्न हो। प्रतियच्छति । प्रजायते । संस्कृत वाश्य ज्ञानादृते न मोतः । वारिभ्यो विना जीवितुं न शकुन्ति मत्स्याः । दो घृतं प्रजायते । मथुनो घृतं प्रतियच्छति । इन चाश्या का हिन्दी में अनुवाद करो। हलन्त पुल्लिङ्ग शब्द । दुहः । धुभ्याम् । धुभ्यः । मुझ से । हम दोनों से । हम से। दूहने वाले से । दोनों दूहने कस्मात् । काभ्याम् । केभ्यः । वालों से । दूहने वालों से । किस से । किन दोनों से। फिन से। अनहहः । अनडुभ्याम् । अस्मात । अभ्याम् । एभ्यः । अनडुद्भ्यः । इस से। इन दोनों से। इन से। चतुभ्यः । यस्मात् । याभ्याम् । येभ्यः । पञ्चभ्यः । जिससे। जिन दोनों से। जिन से। एतस्मात् । एताभ्याम् । एतेभ्यः। अपभ्यः । अमाभ्यः । इस से । इन दोनों से। इन से! तस्मात् । ताभ्याम । तेभ्यः । अमुप्माता अमभ्याम्। अग्रीभ्यः। उस से। उन दोनों से। उनसे। इस से। इन दोनों से । इन से। स्वत् । युवाभ्याम् । युप्मत् । .उस से । उन दोनों से । उन से। तुमसे । तुम दोनों से । तुम से । सम्राजः । सम्राड्भ्याम् । मत् । आधाभ्याम् । अस्मत् । सम्राइभ्यः । . पड्भ्यः ।
१२३ भूभृतः । भूभृद्भ्याम् । भमृद्भ्यः । महिम्नः । महिमभ्याम् । धीमतः । धीमद्भ्याम् । महिमभ्यः । धीमतः । যালয়লাম। মাস। गच्छतः । गच्छद्भ्याम् । यनः । युधभ्याम् । युवभ्यः । गच्छदम्यः । राजः । राजभ्याम् । राजभ्यः। प्रशामः । प्रशानभ्याम् । प्रशानभ्यः । दण्डिनः । दण्डिभ्याम् । बुधः । भुभ्याम् । मुभ्यः । दण्डिभ्यः ।' अग्निमथः । अग्निमभ्याम् । पथः । पथिभ्याम् । पथिभ्यः । अग्निमभ्यः । वेधसः । बेधाभ्याम् । वेधोभ्यः। प्रायः । प्रारभ्याम् । प्राग्भ्यः । विदुषः । बिद्वदभ्याम् । विद्वदभ्यः । प्रायः । प्राङ्म्यम् । प्राड्भ्यः । गरीयसः । गरीयाम्याम् । उदीचः । उदभ्याम् । उदभ्यः । गरीयोभ्यः । पुंसः । पुम्म्याम् । पुग्भ्यः । काप शकट -गाड़ी । छकड़ा । अभ्याहित-श्रेष्ठ अरणि अग्निमन्थनकाष्ठ। धातु। ग्रह प्रचा. उम. सका-लेना । जानि. प्रपदिया. श्रात्म. प्रक- पकड़ना। उत्पन्न हो। गृहाति। प्रजायन्ते । नी. अपपू. भ्या. उभ. सम= (स) अपपू । हट जाना । उतारना । टूर क. । अपसरशि अपनयति । (गम) अपयू. । दर छोना। पस. दिया. पर. प्रकडरना। अपगच्यामि। चस्यन्ति ।
१२४ संस्कृत पाश्च । दुहा दुग्धं गृह्णाति । अनडुहो भारमपनयति । समाजस्तस्यन्ति सामन्ताः । भूभृद्भ्यः सरितः प्रजायन्ते । धीमती विना न शोभते समा । गच्छतः शकठात् पतितः 1 प्रशमोऽन्यो न गरीयान् । भुभ्यो भूपतयोऽपि नाभ्यहिताः । अग्निमयोऽरणिं गृहति । महिना भ्रटः । यज्वभ्यो बिभ्यति देयाः । यूनः पूर्व घृढ श्रागतः । राजश्ते न कोऽपि प्रजापालनक्षमः । दण्डिनस्त्रस्यति श्वा । पयोपिसरति झाडाला । वेधसः प्रजाः मजायन्ते । गरीयसे। घिदु- पोऽध्येतव्यम् । अविवेकिनः पुंसः नीरपगच्छति । इन वाक्यों का हिन्दी में उल्या फरो । हलन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द दियः । युभ्याम् । द्युभ्यः । अमुष्याः । अमूभ्याम् । अमूभ्यः आकाश से। दोनों आकाशे से। पाच: । वाभ्याम् । वाम्याः । आकाशों से। सजः । सभ्याम् । सभ्यः चतस्तृभ्यः । त्विषः । त्विड्म्याम । त्विड्भ्यः । तस्याः । ताभ्याम् । ताभ्यः । गिरः । गीभ्याम् । गीभ्य: । कस्याः काभ्याम् । काभ्यः आपदा । आपभ्याम् श्रापद्भ्यः । अस्याः । याभ्याम् । याभ्यः । एतस्याः 1 एताभ्याम् । एवाभ्यः । दिशः । दिग्भ्याम् । दिभ्यः । । । . अस्याः । आभ्यः । श्राभ्यः । अभ्यः । काप। मकरन्द फूल का रस। कच्छपकछुआ। धातु । च्युतः भ्वा० पर. अका-मरना । च्योवन्ति संस्कृत वाक्य । दिवः पतन्ति तारकाः । म्रजश्च्यातन्ति मकरन्दाः । त्विपो विना न शोमते चन्द्रः । गिरो दूरे परं ब्रह्म 1 .आपदो मुक्तः अभ्यो बहिर्निस्सरन्ति कच्छपाः । प्राच्या दिशः प्रतीची याति रविः । इन वाक्यों का हिन्दी में उल्या करो। हलन्त नमुंसकलिङ्ग शब्द। धारः । वायाम् । पार्य: । अहः । अहोभ्याम् । अहोभ्यः । जंल से। दोनों नलों से । हविपः । हवियाम् । हविर्य: । जलों से। धनुपः । धनुाम् । धनुभ्यः । चतुभ्यः । संस्टात धाश्य। वार्य उन्मयः । अहः पृथग राच: । हविष उद्गते। गन्धः । धनुपो निर्गताः शराः। इन पाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। हिन्दी धाश्य। घेद ब्रह्मा से प्रगट हुए । कुलीन स्त्री पति के पीछे भोजन करती है । यह बात मेने। (अपने ) मिष से मुनी । राम के बिना सुख नहीं । पण्डित से पढ़ता है। राजा सफल चित्रों से प्रजाओं की रक्षा करता है । दाता से अधिक कोई पुण्यपान नहीं है। असज्जन सज्जनों से अलग होते हैं । वेल से दूर रहो । कन्याओं से बढ़कर और कोई दीन नहीं होता इस लिये उन पर सर्वदा कृपण रखनी चाहिये । विज्ञ लोग स्त्रियों में (अपने) मन को फेर लेते हैं। यह पतिप्रता म्ठी लक्ष्मी के धेनु से दूध दूहता है। नदी के समीप गाय । बहुओं के धिना घर की शोभा नहीं होती । धन के बिना मुष नहों। टेढ़ी मात्रा से डरता है। नाय पर से उत्तरता हे । भ्यर्य में गिरता है।
- (१२६ मछली जल के बिना नहीं जी सकता 1 दही से घी निकलता है । बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं होती । सहत के बदले में घी देता है। शान्त (पुरुष) से बढ़कर कोई श्रेष्ठ नहीं है । राजा को शेड़कर प्रजा पालन में समर्थ कोई नहीं है। छोटे २ राजा चक्र- घर्ती से डरते हैं। पण्डितों की अपेक्षा राजा भी श्रेष्ठ नहीं होते। देवता यज्ञ करने वालों से डरते हैं । बुद्धिमान के विना सभा की शोभा नहीं होती । चाण्डाल राह में से हट जाता है। आग मथनेवाले से प्राणि (मथने का काठ) लेना है। वेल पर से वोमा उतारता है । पहाड़ों से नदियां उत्पन्न होती है । दूहने वाले से दूध लेता है । चलते हुए छकड़े पर से गिरा । बड़ाई से रहित । जवान के पहिले बुढ़ा आया । कुत्ता दण्डी से डरता है । श्रेष्ठ पण्डितों से पढ़ना चाहिये । ब्रह्मा से प्रजा उत्पन्न होती है । अविवेकी पुरुष (के पास) से लक्ष्मी चली जाती है। क्रान्ति के बिना चन्द्रमा की शोभा नहीं होती । सूर्य पूरब दिशा से पश्चिम की ओर जाता है । आकाश से तारे गिरते हैं । परब्रह्म वचन के पथ से दूर है । माला से फूलों के रस टपकते हैं। कछुए पानी से बाहर निकलते हैं। विपत्ति से छूटा होम की वस्तु से उठा गन्ध । जल से उतराया कछुआ। धनुप से छूटे वाण । दिन से अलग रात । दून हिन्दी वाश्यों का संस्कृत में उल्या करो। हिन्दी शब्द। पुल्लिङ्ग । .वरच बालक से बालकों से लड़के से लड़कों से एकवच.
- ( १२० मुनि से माली से मुनियों से मालियों से साधुओं से भालुओं से चौवेओं से कोदे से भाल से . कोदो से स्त्रीलिङ्ग । बात से गेया से तिथि से नदी से धेनु से बालों से गयाओं से तिथियों से नदियों से धेनुओं से बहुओं से सरसों से सरसों से छठवां पाठ। सम्बन्ध । - पदार्थों की परस्पर सङ्गति अर्थात् मेल को मम्बन्ध कहते हैं। जैसे । देवदतस्य दासः । देवदत का दास । यहां देवदत्त और दास इन दोनों पदार्थों का आपस में स्वामित्य पर सेवकत्यं सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध प्राय दो पदार्थों में रहता है। जिन दो पदार्थों में सभ्यन्ध रहता है उन में से एक भेदक और दूसराभेदा कहलाता है। मे उक्त उदाहरण में देवदन भेदफ और दास भेद्य है। क्योकि, यदि"दास" इतना ही फहले तो यह भेद न जान पड़ता कि किस का दाम । परन्त! जय उम के माय - ( १३० यदि किसी सर्वनाम शब्द के साथ निमित शब्द अथवा उस के समानार्थक और किसी शब्द का प्रयोग रहे तो उन दोनों शब्दों के आगे प्रथमा आदि सय विभक्तियां पाती है। जैसे । कि निमितं घससि । केन निमित्तेन । कस्मे निमिताय । किस निमित से बसता है । इत्यादि। ऐसे ही। किं कारण यसति । को हेतुः किं प्रयोजनम् । किस कारण से बसता है । इत्यादि ।और यदि किसी सर्वनामभिन्न शब्द के साथ निमित्त शब्द अथवा उस के समानार्थक और किसी शब्द का प्रयोग रहे तो उन दोनों शब्दों के प्रागे प्रयमा और द्वितीया को छोड़ कर तृतीया आदि सकल विभक्तियां पाती हैं । जेसे । धनेन निमितेन नृपतिः सेव्यः । धनाय निमिताय नृपतिः सेव्यः । धन के निमित राजा की सेवा करनी चाहिये । इत्यादि । जिन शब्दों के अन्त में "प्रतसुच उस के समानार्थक और कोई प्रत्यय हो उन के योग में पञ्चमी को बाधकर पठी विभक्ति आती है। मे। ग्रामस्य दक्षिणतः । गांव के दक्खिन । यहां दक्षिणत: इस शब्द में दक्षिणा शब्द के प्रागे अतसुच प्रत्यय आया है । ऐसे ही । यामस्य पुरः । यांमस्य पुरस्तात् । गांव के पूरब । ग्रामस्य उपरि । ग्रामस्य उपरिवार । गांव के ऊपर । इत्यादि प्रयोग जानो। जिस शब्द के अन्त में ॥ एन प्रत्यय हो उसके योग में पञ्चमी को बाधकर द्वितीया और पष्ठी विभक्ति आती है। जेसे। दतिणेन याम यामस्य वा। गांव के पास ही दक्विन । यहां दक्षिणेन इस शब्द में दक्षिणा शब्द के आगे “शन" प्रत्यय आया है। और उस के योग में ग्राम शब्द के आगे द्वितीया और षष्ठी विभक्तियां आई हैं। बिन शब्दों का अर्थ दूर अथवा समीप हो उन के योग " प्रत्यय अथवा ( १३० . में पष्ठी और पञ्चमी दोनों विभक्तियां पाती हैं । जैसे । दूरं निकटं या ग्रामस्य ग्रामाद था। गांव से दूर घा निफाट । जहां चा धातु का अर्थ ज्ञान से भिन्न हो यहां उस के करण के आगे सम्बन्धमात्र की विषक्षा में प्णी विभक्ति आती है। जेसे । सर्पिशे मानीते । घी से प्रवृत्त होता है । यहां ना धातु का अर्थ प्रवृत होना है। इस लिये उस के करण सपैया (घी) के आगे तृतीया के बदले में पष्ठी विभक्ति आई है। स्मरणार्यक धातु, दय और ईश धातु इन के फर्म के आगे सम्बन्धमाव की विवक्षा में पठी विभक्ति पाती है। जेसे । मातुः स्मरति । माता का स्मरण करता है। सर्पियो दयते । घी देता है । जगत है। जगत का स्यामी होता है। जहां कृञ् धातु का अर्थ प्रतियत्र अर्थात् किसी वस्तु में कोई अपूर्व गुण उत्पन्न करना हो, यहां उस धातु के फर्म के पागे सम्बन्धमा की विवक्षा में पष्ठी विभक्ति पाती है। जैसे । राधोदकस्योपस्कुरुते । इंधन पानी में अपूर्व गुण उत्पन्न करता है अथात अग्नि के संयोग से उसे उष्ण करता है। यहां कुन धातु का अर्थ प्रतियव है। इस लिये उस के फर्म दक (पानी) के भागे पठी विभक्ति आई है। प्यर और सम्पूर्वक गिजन्त तप इन दोनों धातुओं को छोड़कर जिन रोगार्थक धाशुओं का फी भायः प्रयास भाग- प्रत्ययान्त शन्ट से योधित हो उन के कर्म के भागे मम्यन्धमार की पियक्षा में षष्ठीविभक्ति पाती है । सेमे । चोरस्य अति रोगः । रोग घर को रोगी करता है। यहां रोगार्थक रुन था का फनी मात्र प्रत्ययान्त रोग चन्द से योधित होगा। इसलिये उस के मम्मे चोर के प्रागे षष्ठी विभक्त गरे ।
1 । ( १२८ ) "देवदत्त का" यह प्रान्त पद कहा तो यह भेट ज्ञात हुआ कि देवदत नामक व्यक्ति का दास । भेदक को विशेषण और भेद्य को विशेष्य भी कहते हैं। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में भेदक के, आगे सम्बन्ध रूप अर्थ प्रकाश करने के लिये पष्ठी विभक्ति भाती है। संस्कृत में पटी विभक्ति के प्राय "स्य" इत्यादि चिहू हैं । और हिन्दी में उस के "का" "के""को" ये तीन बिहू हैं । जैसे उक्त उदाहरण में संस्कृत में देवदत्त शब्द के आगे " स्य" विह है और हिन्दी में उसी शब्द के आगे " का "चिह्न है । कहीं र थठी विभक्ति के बदले में सम्बन्धी शब्द का भी प्रयोग करते जैसे । देवदत सम्बन्धी दास । मंस्कृत में भेदा के लिङ्ग और बचन के अनुसार भेदक के आगे पष्ठी विभक्ति के चिहू में कुछ विकार नहीं होता। परन्तु हिन्दी में यदि भेद्य शब्द पुल्लिङ्ग हो और उस के आगे प्रथमा का एक वचन रहे तो भेदक के आगे पछी का चिह्न "का" श्रा- वेगा । नेसे । देवदत का लड़का । और यदि प्रयमा का बहुवचन अथवा द्वितीया श्रादि छ विभक्तियों का कोई वचन रहे तो भेटक के आगे पष्ठी चित्र "के" आवेगा । जैसे । देवदत्त के लड़के । देवदत्त के लड़को को 1 देवदत्त के लड़कों को । इत्यादि । यदि भेद्य शब्द स्त्रीलिङ्ग हो तो उस के आगे चाहे जिसः विभक्ति का जो वचन रहे सर्वच भेदक के आगे पटी विभक्ति का चिह "की" श्रावेगा । जेसे । देवदत्त की दासी । देवदत की. दासियां । देवदत्त की दासी को देवदत की दासियों को इत्यादि। संस्कत में षष्ठी विति। पथ. हम ओम् आम्
૧૨૯
अजन्त पुल्लिङ्ग शब्द।
रामस्य । रामयोः । रामाणाम् । सख्यः । सख्योः । सखीनाम् ।
राम का। दोनों रामो का । राम! का । कतीनाम् ।
सर्पस्य । सर्ययोः । सर्वपाम् । सुधियः । सुधियोः । मुधिंयाम् ।
पयाणाम्
साधाः । सोध्योः । साधनाम्
पूर्वस्य । पूर्वयोः । पूर्वेषाम् । स्वयम्भुवः । स्वयम्भुवोः । स्वयम्भु-
।
चाम् ।
मुनेः । मुन्योः । मुनीनाम् । दातुः । दावोः । दासूणाम् ।
पत्युः । पत्योः । पतीनाम् । गाः । गोः । गवाम् ।
संक्षत घाश्य।
रामस्य राजधान्ययाध्यासीत् । राजा सर्वस्य? । प्रयाणां
| वेदानामध्येता । मुनेः कमण्डलुः । पत्युः प्रिया । सप्ट्यगृहम् ।
सुधियां समुदायोऽय तिष्ठति । साधोपदेशः । स्वयम्भुवः सृष्टिः ।
दातुः पुण्यम् । गवां शाला ।
इन बास्यों का हिन्दी में उत्या करो।
यदि किसी शब्द के साथ हेतु शब्द का प्रयोग हो और
हेतु रूप अर्थ भी समझा जाय तो उन दोनों शब्दों के प्रागे पछी
विभक्ति आती है। जैसे । अन्नस्य हेतोर्वमति । अन्न हेतु से
बसता है । यहां अन्न शब्द के साथ हेतु शब्द का प्रयोग है।
और हेतु रूप अर्थ भी समझा जाता है। इस लिये अन्न और हेतु
दोनों शब्दों के आगे सृतीया के बदले में पष्टी विभक्ति पाई है।
यदि किसी सर्वनाम शट के साय हेतु राम्द का प्रयोग
हो और हेतु रूप प्रर्य भी समझा जाय तो उन दोनों शब्दों के आगे
यो और नृतीया दोनों विपक्तियां पाती हैं। जेमे । केन गुना
यमति । फम्य हेतोर्यसति । कम हेतु से वसता हे ।
( १३२ ) आशिप अर्थात् अभिलाष अर्थ के पाचक नाथ धातु फर्म के आगे सम्बन्धमा को विवक्षा में पष्ठी विभक्त आती हे जेसे । मर्पियो नायते । घी का अभिलाष करता है। अर्थात् घी मेरे पास हो यह चाहता है। यदि जास, नि और प्र पूर्वक इन, नाट, नाथ और पिष इन पांच धातुओं का हिंसा अर्थ हो तो इन के कर्म के आगे सम्बन्धमाप की विषक्षा में पष्ठी विभक्ति पाती है। जेसे। चार- स्योज्नासयति । चार की हिंसा करता है । हन धातु के पूर्व नि और ये दोनों उपसर्ग कहीं इकट्ठा कहाँ एक एक और कहीं उलट पुलट कर रहते हैं । जेसे । चौरस्य निग्रहन्ति । निहन्ति । प्रहन्ति । प्रणिन्ति । चार की हिंसा करना है । खलस्यो- नाटयति । खल की हिंसा करता दुपस्य की हिमा करता है । शो: पिनष्टि शुघु की हिंसा करता है । यदि वि और अध पूर्वक दृ धातु और पण धातु इन दोनों का अर्थ यही हो तो रन के फर्म के आगे सम्बन्धमा की घियता में षष्ठी विभक्ति पाती है । जूआ खेलने और बेचने पारीदने के काम में ये दोनों धातु समानार्थक हैं । जेसे । शतस्य ध्ययहरति पणते धा । सौ रुपयों का व्यवहार करता या जूमा पलता । जहां पुत्रोक्त धातु समानार्थक नहीं रहते यहां पठी नहीं होती। जैसे । शलाका ध्यत्रहरति । गलाकाओं को गिनता है। मान पणायते । ब्राह्मण की स्तुति करता है। यदि दिय धातु का भो अर्थ सूपा खेलना और बेचने परीदने का व्ययक्षार हो तो उस के भी फर्म के भागे पठी विमक्ति माताजेमे । गतस्य दीव्यत्ति । मौ रुपयों का ध्यपहार करता थामा पेलता है। काययति । दुष्ट .
( १३३ ) यदि दिव धातु उपसर्ग सहित हो तो उस के कर्म के प्रागे षष्ठी विभक्ति विकल्प करके आती है। जैसे । शतस्य शतं घा प्रतिदीव्यति । सौ रुपैयां का व्यवहार करता वा जुआ खेलता है । "कृत्वसुच" प्रत्यय अथवा उस के समानार्थक और किसी प्रत्यय के योग में समय रूप आधार के याचक शब्ट के आगे सम्बन्धमात्र की विवक्षा में पछी विभक्ति आती है। जैसे । पञ्च- कृत्वोऽहो भने। दिन भर में पांच वार खाता है । द्विर- हो भने । दिन भर में दो बार खाता है । यहां पञ्चकृत्वः इस शब्द में पञ्चन शब्द के आगे कृत्वसुच् प्रत्यय और द्विः स शब्द में ट्वि शब्द के आगे सुचप्रत्यय पाया हे और इन दोनों प्रत्ययों के योग में समय पर आधार के पाचक अहन शम्द के आगे पष्ठी विभक्ति पाई है। स्मरण रखना चाहिये कि वहां जहां सम्बन्धमा की विवक्षा में पष्ठी विभक्ति कही गई है यहां सर्वच यदि वह पियक्षा न हो तो उचित विभक्तियां प्रावेगी । जेसे। करण के आगे तृतीया इत्यादि । जिन प्रत्ययों को कृत सजा होती है वे जिन गन्दों के अन्त में हैं। उन के योग में कता और कर्म दोनों के पागे षष्ठी विभक्ति आती है। जैसे । ब्रह्मणः कृतिः । ब्रह्मा को रचना । जगतः कनी ब्रह्मा । जगम का रघने द्वारा ब्रह्मा । यहां कृत्मत्य- यान्त कृति और फने इन शब्दों के योग में कम से ब्रह्मन और जगत् शब्द के आगे पष्ठी विभक्ति पाई है। कृत्प्रत्ययान्स गष्ट के योग में प्रधान कम्मं के आगे षष्ठी विभक्ति विकन्प करके पाती है। जैसे । नेताग्यम्य ग्राम गामध्यं या। घोड़े को ग लेगानेशाला । यहां कृत्प्रत्ययान्न १३४ नेतृ शब्द के योग में अप्नधान कर्म ग्राम के आगे पष्ठी विभक्ति विकल्प करके आई है। जहां एक ही कृत् प्रत्यय के योग में कता और कर्म दोनों के आगे पष्ठी विभक्ति पाई जाय वहां केवल कर्म के आगे वह विभक्ति आती है फती के आगे नहीं। जैसे । आश्चर्या गवां दोहाऽगोपेन । गोप भिन्न (पुरुप के हाथ) से गोत्रों का दूहा जाना आर्यश्च है। यहां दोह शब्द में दुह धातु के आगे घज प्रत्यय हे उस के योग में अगोप और गो इन दोनों शब्दो के आगे पठी विभक्ति पाई थी परन्तु वह केवल गो के आगे हुई अगोप के श्रागे नहीं हुई। स्त्रियां क्तिन" इस सूत्र के अधिकार में जो अक और अकार प्रत्यय आते हैं उनके योग में उक्त नियम नहीं लगता। जेसे । भेदिका यज्ञदत्तस्य घटस्य यज्ञदत्त का घड़ा फोरना । यहां भेदिका शब्द में भिद धातु के आगे भाव अर्थ में पवुल प्रत्यय के स्थान में अक हुआ है । और चिकिपी देवदत्तस्य कटस्य । देवदत्त की घटाई बनाने की इच्छा । यहां चिकीपा शट में सन्नन्त कृ धातु के श्रागे भाय अर्थ में अफार प्रत्ययं आया है। इन दोनों उदाहरणों में उत्ता नियम नहीं लगा। प्रथात् केवल कर्म ही के प्रागे पष्ठी विभक्ति नहीं आई किन्तु फता और कर्म दोनों के प्रागे आई। चर्तमानकालिक क्त प्रत्यय के योग में षष्ठी विभक्ति पाती है। मे। राजां मस: । राजाओं से माना जाता । राज्ञां बुद्धः । राजाम से जाना पाता । गनां पूजितः । राजाओं से पूजा जाता। प्राधार रूप अर्थ के यादक क्त प्रत्यय के योग में पपी विभक्ति भाती है। जेसे । इदमेयामासितम् । यह इन के बैठने . - का स्थान । इदमेषां गतम् । यह इन के जाने का स्थान । इद. मे भुक्तम् । यह इन के भोजन का स्थान । लादेश, उ, उक, अव्यय, निष्ठा खलध और तृन इन के योग में पटी विभक्ति नहीं आती। लादेश प्रत्यय का उदा । ओदनं पचन । ओदनं पचमानः । भात पकाता हुआ। यहां लट् लझार के स्थान में कम से शत और शानच प्रत्यय आये हैं । उ प्रत्यय का उदा० । कटं चिकीर्षु: । स्वभाव ही से.चटाई बनाने की इच्छा रखने वाला । कन्यामलङ्करिणः । स्वभाव ही से कन्या का अलङ्कार करने वाला। यहां कम से उ और इप्पच प्रत्यय आये हैं। उ इस अक्षर से उ और इष्णुच दोनों प्रत्ययों का ग्रहण होता है। उक प्रत्यय का उदा० । देत्यान घातुको हरिः । स्वभाव ही से देत्यों का मारनेवाला हरि । यहां उकल प्रत्यध आया है। यदि कम ( इच्छा क.) धातु के आगे उकज प्रत्यय रहे तो षष्ठी का निषेध नहीं होता अर्थात् ष्ठी आती ही है। जेसे । दास्याः कामुकः । स्वभाव ही से द.सी का चाहने वाला । अव्यय का उदा० । कटं कृत्वा । चटाई बना कर । श्रे.दन भोक्तम् । भात खाने को । यहां कृत्वा और भक्तुिम ये दोनों अध्यय है। निष्ठा प्रत्यय का उदा० । विष्णुना हता देत्याः । देत्यान् हतधान विष्णः । विष्णु ने देत्यों को मारा । यहां कम से क्त और तयतु प्रत्यय आये हैं। इन्ही दोनों प्रत्ययों को निष्ठा कहते हैं। सलर्थ प्रत्यय का उदा० । ईपत्करः फटो भयता । घटाई बनाना श्राप को भुगम है। यहां खल प्रत्यय आया है । तृन् प्रत्यय का उदा० । तृन् प्रत्यय से शानन्, चानशा गत और सृन इन चार प्रत्ययों का ग्रहण होता है। जैसे। सोमं परमानः । सोमलता को पवित्र करने वाला । यहां गानन् प्रत्यय भाया है। प्रात्मानं मण्डप्रमान: । स्वभाव ही से आप को भूपित करने वाला । यहां ( ५३६ ) । चानश् प्रत्यय आया है । वेदमधीयन् । वेद पढ़ने घाला। यहां शतृ प्रत्यय आया है । लोकान् कती । स्वभाव ही से लोकों का रचने वाला । यहां तृन् प्रत्यय आया है। यदि द्विप धातु के आगे शतृ प्रत्यय रहे तो उस के योग में षष्ठी विभक्ति का निषेध विकल्प करके होता है । जैसे'। मुरस्य मुरं घा द्विएन् । मुर दैत्य से द्वेष रखने वाला । कपर लिखे हुए आदनं पचन इत्यादि उदाहरणों में कृत प्रत्यय ले योग में कता और कर्म के आगे षष्ठी विभक्ति पाई रही उस का निषेध हुआ भविष्य काल में विहित अक प्रत्यय, और भविष्य काल और अधमर्ण रूप अंर्य में घिहित इन प्रत्यय के योग में पष्ठी विभक्ति नहीं पाती। नेसे । कटं कारको जति ! घटाई बनाने घाला जाता है । यहां भविष्य काल में विहित एबुल प्रत्यय के स्थान में अक आदेश हुआ है । ग्राम गामी । गांव जाने वाला । यहां भविष्य काल में णिनि प्रत्यय आया है । शतं दायी । सौ रुपये देने वाला । यहां अधमर्ण रूप अर्थ में णिनि प्रत्यय आया है। अधमर्थ पण लेने वाले को कहते हैं। कृत्य प्रत्यय के योग में कता के प्रागे पष्ठी विभक्ति विकल्प करके पाती है । जेसे । त्वया तव घा कटः कर्त्तव्यः । तुझे चटाई धनाना चाहिये। तुला और उपमा इन दो शब्दों को छोड़कर इतर सकल तुल्यअर्थवाचक शब्दों के योग में तृतीया और षष्ठी विभक्ति पाती है। जैसे । देवदत्तस्य देवदतेन पा सुल्यः । देवदत्त के तुल्य । देषदत्तस्य देवदतेन पा सदृशः.। देवदत्त के सदृश । जहां सुला पया उपमा शब्द का योग रहता है यहां तृतीया नहीं पासी केवल पठी प्राप्ती है। नेसे । तुला उपमा वा कृष्णस्य नास्ति । कृष्ण की उपमा नहीं है। .
( १३० । 'जहां आशिष अर्थ समझा जाय यहां श्रायुप्यमद्रा भद्रा फुशल, सुख, अर्थ, और हित इन शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति विकल्प करके आती है । पक्ष में पष्ठी होती है । जेसे । आयुष्यं देवदत्ताय देवदत्तस्य घा भूयात् । ईश्यर करे देवदत्त को आयुष्य हो । ऐसे ही मद् भद्र आदि शब्दों के योग्य में भी जानो । यहां पायुप्य आदि शब्दों से उन के समानार्थक और शब्द भी समझे जाते हैं। जैसे । घिरजीवितं देवदत्ताय देवदत्तस्य या भूयात् । ईश्वर कर देवदत्त बहुत दिन जीए ॥ हिन्दी में कितने एक भेदायाचक शब्द ऐसे हैं कि पहें घे जिस लिग और जिस बधन के हो परन्तु उन योग में भेदक के आगे केवल "के" चिहू प्राप्ता है। जैसे। यह बालक रामदत्त के सदृश है । यह स्टी उस के अधीन है। इत्यादि । अजन्त म्बीलिङ्ग राम्च। रमायाः । रमयाः । रमाणाम् । स्त्रियाः स्त्रियाः । स्टोग्णाम् । रमा का । दोनों रमाओं का। धन्याः । धेनोः । धेन्योः । धेन- रमाओं का। सर्यस्याः सर्पयोः । मर्यासाम् । यध्याः । बध्योः पधूनाम् । तिसृणाम् । भुधाः । भुषः । भ्रयोः । भूणाम् । मत्याः । मते: । मत्योः । मती- दुहितुः । दुदिलीः । दुधिराणाम् । नाद्याः । नद्योः नदीनाम् । यो: । दायोः । द्याम् । थियाः । प्रिय: । नियोः । श्रीया- नामः । नायोः । नागम् । मा यियाम् । मस्त पापा रमा दिलामः । भूपति: सीमा प्रजानां पिता 1 शिप विद्यानां पारगः । मोः स्फति: । नया दधिपतो गमः । श्रियः । नाम् । भ्रयाम् । नाम् । ।
-~- १३८ ) पतिः । स्त्रीणामासितम् । रोचते मह्यं धेनूनां दोहः कृष्णेन । घध्याः पतिकुले स्थितिः समुचिता भुवः कम्पः । दुहितुर्धनं न माह्यम् । द्योनमल्यम् । नावो गुणवृक्षः । दून संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में उल्या करो । अलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । धानस्य । ज्ञानयोः । ज्ञानानाम् । दधः । दरोः । दमाम् । ज्ञान का ।दोनों चानी का । मधुनः । मधुनोः । मधूनाम् । जानों का। यारिणः । धारिणः । पारीणाम् । संस्कृत वाश्य । भक्तिजीनस्य कारणम् । वारिणा विभित्सा यज्ञदत्तस्य । दनः सारी घृतम् । मधुना ज्ञानम् । दून संस्कृत वाक्या का हिन्दी में उल्या करो। हनन्त पुल्लिङ्ग शब्द । दुहः । टुहोः । दुहाम्। तव । ते युधाः । वाम् । युप्मा- दूहने वाले का । दोनों दू- कम् । षः । हने वालों का । दूहने वालों तेरा । तुम दोनों का । तुम्हारा । का। मम । मे । आवयोः । नो । अनडुहः । अनडुहोः। अनडुहाम्। अस्माकम् । नः । चतुर्णाम् । मेरा । हम दोनों का । पशानाम् । हमारा। कस्य । कयोः । केपाम् । किस का । किन दोनों का। तस्य । तयोः । तेषाम् । किन का। उसे का। उन दोनों का। अस्य । अनया: । एनयोः । उनका। पाणाम् । अष्टानाम् । एषाम् ।
१३६ - । 'इन का। जिन का। 1 इस का । इन दोनों का । बुधः । बुधोः । बुधाम् । अग्नमयः । अग्निमयोः । यस्थ । ययाः । येषाम् । अग्निमथाम् । जिस का । जिन दोनों का । प्राचः । प्राचाः । प्राचाम् । माञ्चः । प्राशेः । प्राचाम् । एतस्य । एतयोः । एनयोः । उदीच: । उदीचाः । उदीचाम् । ऐतेषाम् । महिम्नः । ममिनः । महिनाम् । इस का । इन दोनों का । यज्वनः । यज्वनाः । यञ्चनाम् । इन का। यूनः । मनो: । यूनाम् । अमु य । अमुयोः । अमीपाम् । रातः । राजाः । राशाम् इस का इन दोनों का । इन का। दण्डिनः। दगडनाः । दण्डिनाम् । उस का । उन दोनों का। उनका पयः । पयोः । पयाम् । सम्राजः । समानाः । सम्राज्ञाम् । घे यसः । घेधाः । येधमाम् । भूभूषः । अमृताः । भूभृताम् । पिटुपः । बिटुपाः । दिटुपाम् । धीमतः । धीमताः । धमताम् । गरीयसः । गरीयसः । गरोस्माम् । गच्छतः । गच्छताः । गच्यताम् । पुंमः । घुमाः । पुंसाम् । प्रयामः । प्रयामाः । प्रगामाम् । संस्थत घश्य। दुही घेतनत् । अनहो बन्धनम् । फम्य होगी। सम्राना विजय: । भूभूमः रङ्गम् । धीमत ईश्वरः मेव्यः । गधा न किश्चिद दूरम् । प्रगाम आदरः कार्यः । युधेभानम् । अग्नि मय भासनम् । महिनो हे पंद्यां पढ़ति । ययना पुययम् । यूनः पोरूपम् । रामः पूजितः । दपिडनः फमण्डल: । पयो दधि- यतः परम् । येधसः सद्यः । शिदुग हितम् । गरीयसो मानः । पुंसो धर्मः। स्न प्रस्त शास्त्रों का हिन्दी में मया । 1 ( १४० - . अपाम् । हलन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । दियः । दिवोः । दिवाम् । एतस्याः । एतयोः । एनयोः । पाकाश का। दोनों प्राकाशों का। एतासाम् । आकाशों का। अमुष्याः । अमुयाः । अमूपाम् । चतरुणाम्। पाचः । घाचोः । चाधाम् । तस्याः । तयोः । तासाम् । मजः । सनाः । प्रजाम् । कस्याः । कयो । कासम् । त्विप: । त्वियोः । त्विषाम् । अस्याः । अनयाः । एनयाः । गिरः । गिरोः । गिराम् । आसाम् । आपदः । आपदोः । आपदाम् । यस्याः । ययाः । यासाम् । दिशः । दिशाः । दिशाम् । संस्कृत वाश्य । दिवो गुणः शब्दः । चाचा विस्तरः । स्रजः सूचम् । त्विष आप्रयः । गिरां पतिः। आपदां हन्ता । अपां तृपः । दिशां स्वामी । दुन संस्कृत वाश्यों का हिन्दी में उल्या करो। हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । चारः । घारो: । धाराम् । अहः । अहोः । अहाम् । जल का। दोनों जलों का। हविषः । हविपाः । हविषाम् । धनुषः । धनुषोः । धनुषाम् । चतुणाम् संस्कृत धाक्य। वारां निधिः । अहो विर्भत । हयिो गन्धः । धनुषः । सलों का प्रत्यक्षा । दून संस्कृत पादयों का हिन्दी में ठल्या करो। हिन्दी वाक्य। तीन वेदों का पढ़ने वाला। यहां परिखतों की मण्डली । १४१ . है। अयोध्या राम की राजधानी थी । मुनि का कमण्डल | साधु का उपदेश । राजा सत्र का स्वामी होता है। पति की प्यारी। ब्रह्मा की दृष्टि । बेलों की शाला । मित्र का घर । दाता का पुण्य । कृष्ण का गेो दूहना मुझे अच्छा लगता है। नदी के दक्षिन गाणं । राना (अपनी) सकल मनाओं का पिता होता है लक्ष्मी का विलास । तीन विद्याओं में पारङ्गत । लक्ष्मी का.स्वामी । वहू को (अपने) पति के घर रहना उचित है। स्त्रियों के बैठने का स्थान । बुद्धि को स्फूर्ति । नाव का मस्तूल । भों का हिलना । आकाश की निर्मलता। कन्या का धन नहीं लेना चाहिये। दही का सारांश घी । भक्ति ज्ञान का कारण होती है। सहत से प्रवृत्ति । यज्ञदत्त की वल के (सोते के ) फोरने की इच्छा। घड़ाई के लिये विद्या पढ़ता है। बुद्धिमान को ईश्वर की सेवा करनी चाहिये । दूहने वाले को चाकरी । युवा (पुरुष) की मनुसाई । पहाड़ की चोटी । दण्डी का कमण्डल । पण्डित का हित । शान्त (पुरुष) का आदर किया चाहिये । चक्रवर्ती का विजय । आग मथने धाले का श्रासन । राजा (के हाथ) से पूजा जाता । बेल का पगहा । यज्ञ करने वाले का पुण्य । राह की दक्खिन और खेत। चलने वाले को कुछ दूर नहीं है। किस कारण जाता है । पुरुष का धर्म । श्रेष्ठ पुरुष का सम्मान । ब्रह्मा के सदृश । माला का सूत । विपत्तियों का दूर करने वाला । आकाश का गुण शब्द है। जल से तृप । कान्ति का आधार । दिशाओं का स्वामी । पचन का विस्तार । वाणियों का स्वामी दिन में दो बार भोजन करता है। धनुष की डोरी. बल का निधि । होम की वस्तु का गन्ध । न वाक्यों का संस्था में उल्या की।
१४२ - - हिन्दी शब्द । पुल्लिङ्ग। एकपच. बालक का-के की लड़के का केकी मुनि का के की माली का केकी साधु का केकी भाल का केकी बहुवच. बालकों का केकी लड़कों का केकी मुनियों का केकी मालियां का केकी साधुओं का केकी भालुओं का के की चावओं का के की कोदाओं का के की चौबे का-के-की कोदो का केकी .स्विलित। बात का-के-की बातों का के-की गेया काके की गेयाओं का-के-की तिथि का-के-की तिथियों का केकी नदी काके की नदियों का केकी धेनु काके की धेनुओं का केकी बहुओं का केकी सरसों का-के-की सरसओं का के-को सातवां पाठ। अधिकरण कारक.. अधिकरण उसे कहते हैं ना की और कर्म के द्वारा उन दोनों की क्रियाओं का आधार हो । जैसे । देवदत्तो गृह श्रीदनं पच- ति । देवदत्त घर में भात पकाता है। यहां घर देवदत के द्वारा
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उसकी पकाना निया का आधार है। और यन्नदत्तः स्याल्यामोदनं
पति । यज्ञदत बटलाही में भात पकाता है। यहां बटलाही
भात के द्वारा उसकी पकना क्रिया का आधार है ।
जिस में कोई वस्तु रहे उसे आधार और नो रहे उसे
प्राधेय कहते हैं।
आधार तीन प्रकार का होता है औपश्लेषिक घेपयिक और
अभिव्यापक । औपश्लेषिक उस आधार को कहवे हैं जिस के
एक अंश में प्राधेय रहे । जेसे । यज्ञदतः कटे आस्ते । यज्ञदत्त
चटाई पर बैठा है। यहां चटाई औपश्लेषिक आधार है। क्योंकि.
यज्ञदत्त उस के एक भाग में रहता है। पयिक उस आधार को
कहते हैं जिस के विषय में आधेय हो। जेसे । मा इच्छास्ति ।
मोन के विषय में इच्छा है। यहां मोक्ष वेपयिक प्राधार है ।
क्योकि इच्छा उस के विषय में होती है। अभिव्यापक उस
आधार को कहते हैं जिस के सब अंशों में प्राधेय रहे । जेसे ।
तिले तेलमस्ति । तिल में तेल है। यहां तिल अभिव्यापक प्रा-
धार है । क्योकि तेल उसके सब अंशो में रहता है। कोई र
वेयाकरण सामीपिक नाम चाथा आधार मानते हैं। बसे। नद्यां
ग्रामः । नदी के समीप गावं है।
संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में अधिकरण के पागे
सामी विभक्ति आती है। संस्कृत में सप्रमी विभक्ति के प्राय "."
इत्यादि चिह्न है। और हिन्दी में उसका "में" चिह है । जैसे।
गृहस्ति। घर में है। इस उटाहरण में संस्कृत में गृह शब्द के
अन्त में ए चिहू है और हिन्दी में घर शब्द के आगे "में" चिष्ट्र
है। कहीं २" के विषय में" "पर" इत्यादि चिहू भी आते हैं।
संस्टत में सप्तमी विभक्ति ।
वि.
पाच
हि
( १४४ ) . अजन्त पुल्लिङ्ग शब्द। रामे । रामयोः । रामेषु । सत्यो । सस्योः । सखिपु। राम में। दोनों रामा में । रामो में। कतिषु । सर्वस्मिन् । सर्वयाः । पर्येषु । मुधियि । मुधियोः । सुधीपु । चिषु । साथ।। साध्योः साधुषु ।। | पूर्वस्मिन् । पूर्व । पूर्वयोः । पूर्वेषु । स्वयम्भुवि । स्वयम्भुवोः । 'मुनो । मुन्योः । मुनिपु । स्वयम्भूपु । पत्यो । पत्योः । पतिपु दातरि । दाशः । दातृषु । गघि । गयोः । गोषु । संस्कृत वाक्य । रामेऽनुरागः । सर्वस्मिन्नात्मास्ति । विषु लोकेषु विश्रुतः । मुनो भक्तिः । पत्यो प्रीतिः । सख्या स्नेहः । मुधियि प्रियवचनम् । साधा साधुः । दातरि याना । गवि दया । रन संस्कृत वायों का हिन्दी में अनुशाद फरो। दूर अन्तिक और इन के समानार्थक इतर शब्दों के आगे भी सप्तमी विभक्ति पाती है । जेसे । यामस्य दूरे । गाय से दूर । पामस्यान्तिके गांव के पास । ग्रामस्य निकटे गावं के समीप । जिस क्त प्रत्ययान्त शब्द के अनन्तर इन् प्रत्यय आवे उस के कार्मके प्राग सप्तमी विभक्ति पाती है। जैसे व्याकरणे उधोती देवदत्तः । व्याकरण पढ़ा हुआ देवदत्त । यहां क्त प्रत्ययान्त । अधीत शब्द के कागे इन् प्रत्यय पाया है। इस लिये ठस के कर्म के वाधक व्याकरण शब्द के आगे सामी विभक्ति आई है। साधु और असाधु इन दोनों शब्दों में से प्रत्येक के योग में सप्तमी विभक्ति आती है । जेसे । साधु: कृष्णा मातरि, असोधुमातुले । कृष्ण माता के लिये साधु और मामा (कंस) के लिये असाधु (थे)।
. ( १४५ यदि किसी क्रिया के फल के साथ उसके कर्म का सम्ब- न्ध हो तो उस फल के वाचक शब्द के आगे सप्तमी विभिक पाती है । जेसे । व्याधश्चर्मणि द्वीपिनं हन्ति । ध्याध चाम के निमित वाघ को मारता है। यहां मारना क्रिया के फल चाम के साथ उस के कर्म वाघ का समवाय सम्बन्ध है। इस लिये उस फल के पाचक चर्म शब्द के आगे सममी विभक्ति पाई है। यहां हेतुवाधक शब्द के आगे तृयीया पाई रही । जहां किसी एक पदार्य की क्रिया वे किसी दूसरे पदार्थ की क्रिया समझी जाय यहां उस प्रथम पदार्थ और उस की क्रिया के या चक शब्दों के आगे सप्रमो विभक्ति पाती । जेसे । गोयु दुहमानासु कृष्णदत्तो गतः । जब गाय दूही जाती थी कृष्णदत गया। यहां गायों की दूही जाना क्रिया से कृष्णदत्त को गमनं क्रिया समझी जाती है। इस लिये गाय के पाचक गे| शब्द और उन की क्रिया के वाधक दुह्यमान राष्ट दोनों के प्रागे सामी विभक्ति पाई है। जहां एक पदार्य की क्रिया से दूसरे पदार्य की क्रिया समझी जाय और उस प्रथम पदार्थ का अनादर भी भूचित हो यहां प्रथम पदार्य के पाचक शब्द के प्रागे पष्ठी और सप्तमी दोनों विमकियां पाती हैं। जैसे । रुदता रुदति या प्राधाजीरा । रोते हुए पुत्र आदिकों का अनादर फरके सन्यासी हो गया। स्वामी, ईश्वर, अधिपति, दायाद, साझी प्रतिम, भोर प्रमता इन शब्दों के योग में पष्ठी और सामी दोनों शिमतिणं पाती है। जेसे । गर्श गोप पा स्यामी । गोरों का स्वामी । गर्या गोषु पा ईश्वरः । गोमों का सिर । ग गाए या पधिपतिः । गोषों का अधिपति गशं गोपु या दायादः । गोषों का घंटणारा लेने पाता। गायां गोपु पा मादी । गौण का सायो । गो गोपु या प्रशिमः। । ।
. . ( १४६ गौओं का जामिन । गवां गापु वा प्रसूतः । श्रयात् गौओं ही को अनुभव करने के लिये उत्पन्न हुआ। यदि तत्पर होना अर्थ प्रकाशित हो तो प्रायुक्त और कुशल इन दोनों शब्दों में से प्रत्येक के योग में यष्ठी और सप्तमी दोनों विभक्तियां पाती हैं । नेसे । श्रायुक्तो हरिपूजनस्य हरि- पूजने वा। हरि की पूजा में आयुक्त अर्थात् नियुक्त। कुशला हरिपूजनस्य हरिपूजने घा.। हरि की पूजा में कुशल अर्थात् निपुण । जहां तत्पर होना अर्थ नहीं प्रकाशित होता वहां पष्ठी नहीं किन्तु केघल सामी पाती है। जैसे । आयुक्तो गोः शकटे । छकड़े में कुछ जाता हुआ बेल । यहां तत्पर ना अर्थ नहीं प्रकाशित है । इस लिये आयुक्त शब्द के योग में शकट शब्द के भागे केवल सामी विभक्ति आई है। जाति गुण अथवा क्रिया के द्वारा किसी समुदाय से गक वस्तु को अलग समझना निवारण कहलाता है। जिस समुदाय से निहारण हो अर्थात् एक वस्तु अलग समझी माय उस के घाचक शब्द के आगे पठी और सप्तमी दोनों विभक्तियां पाती हैं। जाति का उदा० । मनुष्याणां मनुष्येषु वा क्षत्रियः शूरतमः । मनुष्यों में लची बड़े शूर होते हैं। यहां पधियत्व नाति के द्वारा मनुप्य समुदाय से क्षत्री को अलग समझते हैं। गुण का उदा० । ग गोपु वा कृप्या बहुदीरा । गौओं में से काली गो बहुत दुधार होती है । यहां कृष्ण गुण के द्वारा गौ समुदाय से काली गो को अलग समझते हैं। क्रिया का उदा० । अध्वगानामध्वगेषु वा धावन् शीघ्रः । पथ चलने वालों में धावन शीघ्रगामी होता है। यहां दौड़ना क्रिया के द्वारा बटोही समुदाय से घावन को अलग समझते हैं। यदि प्रशंसा अर्थ प्रकाशित हो और प्रति, परि, और अनु
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इन अध्ययों में से किसी का-योग न हो तो साधु पार निपुण
इन दोनों शब्दों के योग में सामी विभक्ति पाती है। से।
'मातरि साधुः । माता के विषय में साधु । पितरि निपुणः । पिता
के विषय में निपुण । जहां प्रशंसा नहीं किन्तु यथार्थ कथन हो
६हां सप्रमी नहीं होती। जेसे । निपुयो राजे भृत्यः । राजा का
निपुण मृत्य । और जहाँ प्रति श्रादि का योग रहता है यहां भी
सामी नहीं होती । जैसे । साधुमातरं प्रति । माता के विषय
में साधु ।
प्रसित और उत्मक इन दोनों शब्दों में से प्रत्येक के योग
तृतीया और सममी दोनों विभाशयां पाती हैं। जेसे । प्रमिता
हरो हरिणा घा । हरि में सत्पर । उत्मको हरी धरिणा या ।
हरि में उद्योगी।
यदि किमी नवश्याच शब्द के आगे कोई प्रत्यय लाकर
उस का लोप लुप शब्द से किया जाय तो उस प्रत्यय के अर्थ के
पाचक शब्द के आगे अधिकरण अर्ध में एगीया और मामी दोनों
भिक्तियां प्राप्ती हैं। जेसे । मूलेन मूने था देयोमाघाइयेस् ।
मूल नगर में देवी का प्राशन करना चाहिये । यहां मूल गष्ट,
के प्रागे मूल नव युक्त फान प्रर्य में
का लोय "लुयशेरे" एम मूप में किया गया है । गम लिये
मून नव युक्त काल के यापक मूल गम्द के आगे नृतीया और
मामी दोनों विभक्तियां पाई है।
यदि कन्य प्रादि दी शक्तियों के घर में कोई ममय
यया पय रहे सो टम के पास गट से आगे मामी पर
पहमी दोनों विभक्तियां पाती हैं । मे। पा भगा देपदको
शादेशाद्वा भोता । देवदास पात्र भोजन फरके दो दिनों
केनर पायगा । या दो फनस्य शक्तियों के मध्य में कार
"अण
प्रत्यय लाकर ठम
१४८ )
है। और । इह स्थाय कोशे कोशाता लक्ष्यं विटाति । यह ( पुरुष)
यहां बेठा हुआ कोस भर पर लक्ष्य बेधता है । यहां कनृत्व
और कर्मत्व दो शक्तियों के बीच में पथ है। इस लिये क्रम
से यह और क्रोश दोनों शब्दों में से प्रत्येक के आगे सप्रमी और
पञ्चमी दोनों विभक्तियां आई हैं।
अधिक शब्द के योग में सप्तमी और पञ्चमी दोनों विभ.
क्तियां पाती हैं। जैसे । लोके लोकाद्वाधिको हरिः । लोक से
अधिक हरि।
जहां अधिकता प्रकाशित हो वहां उप इस अव्यय के
योग में जिस वस्तु से कोई वस्तु अधिक समझी जाय उस के
वाचक शब्द के आगे सामी विभक्ति आती है । जैसे । उप
परा? हरेर्गुणाः । हरि के गुण पराई सङ्ख्या से अधिक है । पराई
अन्तिम ससा का नाम है।
जहां स्वस्वामिभात्र सम्बन्ध प्रकाशित हो वहां अधि इस
अव्यय के योग में स्ववाचक और स्वामिवाचक दोनों शब्दें। के
आगे पारापारी सप्तमी विमति श्राती है । जैसे । अधि भुवि
रामः । पृथ्यी के राम । यहां स्व (धन) वाचक "भू" शब्द
के आगे सामी विभक्ति आई हे । अधिरामे भूः । राम की
पृथ्यो । यहां स्वामी यानक राम शब्द के आगे सप्तमी विभक्ति
अजन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द ।
रमायाम् । रमयोः । रमासु । मत्याम् । मतो । मत्याः । मतिषु ।
रमा में। दोनों रमाओं में । नद्याम् । नद्यो: । नदीषु ।
रमाओं में।
श्रियाम् । शियि । त्रियाः । श्रीयु ।
सर्वस्याम् । सर्वयोः । सामु । स्त्रियाम् । स्त्रियोः । स्वीयु
धेन्वाम् । धेनौ । धेन्वोः । धेनुयु ।
तिसृषु ।
१ ( १४६ ) षध्वाम् । वध्वाः । वधषु व । यवोः । घोषु । भ्रुवाम् । भुवि । भ्रवाः । भूपु । नाघि । नवोः । नोए । दुहितरि । टुहिचाः । दुहितृषु । धातु। रज्ज. अनुप. दिवा. उभय. अक- . प्रीति क.। . अनुरज्यन्ति। संस्थत पाश्य । रमायामुत्सुको हरिः । सास्ययस्यासु धर्ममाचरेत् । कवीनां मतो भारती तिष्ठति । नद्यां यामः । श्रियामनुरज्यन्ति लोकाः । स्त्रीपु सायी स्वर्ग गच्छिति । धेनुपु दुहामानास्यागतो देवदत्तः । धुषु सन्तुष्टासु श्रीरेधते । सम्रानो। भ्रयि फुटिलायां बग- द्विभेति । दुहितार नेहः । द्यवि परिभ्रमन्ति यहाः । नायि तिष्ठति। इन संस्कृत वाक्यों का हिन्दी में उल्या.करी। अजन्त नपुंसकलिङ्ग । चाने । चानयोः । ज्ञानेषु । घारिणि । वारिणः । पारिए। ज्ञान में। दोनों चानों में । ज्ञानी में। दनि । दधनि। दोः । दधिप मधुनि । मधुनोः । मधुषु । संस्कृत प्राश्य। ज्ञाने मुक्तिध्ययस्थिता । वारिणि पद्नानि चोभन्ते । दान घृतं तिष्ठति । मनि लब्यो भमरः । इन संस्शत पापा का हिन्दी में उत्या करो। इतन्त पुल्लिङ्ग राष्ट। दुहि । टुहोः । धु पनदि । अनहोः । अनहुन्म दूहने पाने में । दोनों वाहने चाएं । पालों में । दूहने वालों में । पञ्चम् ।
पट्। मत्सु। 1 - १५० ) भूभृति । भूभृताः । भूभृत्सु । अष्टस् । अष्टासु। धीमति । धीमतः । धीमत्सु । - तस्मिन् । तयोः । तेषु । गच्छति । गच्छत्ताः । गच्छत्सु । उस में । उन दोनों में उन में । प्रशामि । प्रशामाः । प्रशान त्वयि । युधयो: । युप्मासु । घुधि । वुधीः । भुत्सु । तुझ में। तुम दोनों में । तुम में। अग्निमथि। अनमयोः । अग्नि- मयि । आवयोः। अस्मासु मुझ में। हम दोनी में। हम में। प्राचि । प्राचाः । प्रातु । कस्मिन् । कयाः । केषु। प्राञ्चि। प्राञ्चोः । प्रत् प्राव किस में । किन दोनों में। किनमें। प्राइषु । अस्मिन् । अनयोः । एनयोः । या । उदीचि । उदीचाः । उदछु । इस में । इन दोनों में । इन में। महिम्नि । महिनोः । महिमम् । यस्मिन् । ययाः । येषु। यज्वनि । यन्वनाः । यज्वसु । जिस में। जिन दोनों में। जिन में। यूनि । यूना: । युवसु । एतस्मिन् । एतयोः । सनयोः । राजि । राजनि । राचाः । राजस . एतेषु। दण्डिनि । दण्डिना: । दण्डिषु । इस में। इन दोनों में। इन में। पथि । पथाः । पथिषु । अमुस्मिन् । अमुयोः । अमीषु । वेधसि । वेधसः । । वेधस्तु इस में। इन दोनों में। इन में | विपि । विदुपोः । विद्वत्सु उस में। उन दोनों में। उन में । गरीयसि । गरीयसा: । गरीयस्सु । सम्राजि । समानाः । सम्राट्सु । पुंसि । पुंसः । पुंसु । । . धातु। श्रम विपूर्वक दिवा. पर. अक. यस. निपूर्वक. भ्या पर. अकान विधाम का। बसना । विधाम्यति । निवसन्ति।
१५१ ) संस्कृत वाक्य । कृष्णे दुहि गावो बहुचीरा बभूवुः । शङ्करो ऽनहुहि.स्थितः । चतुर्पु वेदेवधीती । सम्राट्सु श्रीमती विजयिनी देव्यधिकप्रतापा । भूभृत्यु हिमालयोऽत्युमः । धीमति छापेऽध्यापकस्य परिप्रमः सप- लत्वमेति । गच्छत्सु धायन शीनः । प्रशाम्यनुरज्यति लोकः । युध्या. गच्छत्यभ्युतिठेत । अग्निमय्यग्नि मथति देया दृष्यन्ति । महिन्त्रि- फस्य नाभिलापः । यच्चनि प्रीति । यूनि पुत्र धनमानयन्ति विचाः । राजसु स्वामिनी श्रीमती भारतेश्वरी । दण्डिनि मृते तस्य दाहे। न भवति । पथि विलहिते विश्राम्यति पथिकः । वेसि भक्तिः । विदुषि पुषे हप्यति पिता । गरीयांस पुसि सद्गुणा निवसन्ति । दून संस्कृत पाश्यों का हिन्दी में टल्या करें। लन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द । दिधि । दियोः । टुपु । एतस्याम् । एतयोः । ग्नयोः । प्रकाश में। दोनों प्रकाशों में। प्रकाशों में। अमुप्याम् । प्रमुयाः । म चतस्यु। धावी । पाचौः । या । 'तस्याम् । तयोः । तासु । मनि । सनाः । मयु। फस्याम् । कयाः । काम । स्विपि । स्थियोः । त्यिम.। त्यि- अस्याम् । अनयोः । एनयोः । गिरि । गिरोः। गी। स्याम् । मयोः । यामु। श्रापदि । पापदाः । जापरम एसाम। - भामा हिगि । दियोः । दिए। मशत वाप। दिषि विद्योत्तन्ते तारकाः । चतस्प दिखायारो गजाः मन्स । पति निष्ठत धार्मिकाः । भनि म । चन्दम्य स्थिति . १५२ ) विकसन्ति कुमुदानि । गीपुस्वामी । श्रापदि धेर्यम् । श्रम निव- सन्ति जलजन्तवः । इन संसह वाक्यों का हिन्दी में उत्या करो। हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । पारि । घारो: । वार्षु ।। अहि। अहनि । अहोः। अहम् । जल में दोनों जलों में । जलों में 1 हविपि । हविषोः । हविष्णु । चतुर्यु । धनुषि । धनुषोः । धनुष्य । संस्कृत वाक्य । पारि तिष्ठन्ति मण्डूकाः । अहन्यग्निर्न शोभते । हविषि हुयमाने धिरभूत् । इन्द्रस्य धनुपि दृष्टिं ददाति । इन संस्कृत वास्यों का हिन्दी में अनुवाद करो। हिन्दी वाक्य । पति में प्रेम । सज्जन के लिये सज्जन । तीनों लोक में प्रसिद्ध । दाता से मांगना । राम में अनुराग । मुनि में भक्ति । आत्मा सर्वच है। मिप में स्नेह । बेल पर दया । पण्डित से प्रिय घचन। 'जब धेनु दूही जाती थों देवदत पाया । यह आकाश मैं घूमते हैं । लोग लक्ष्मी में अनुराग करते हैं । सम्र अवस्थाओं में धर्म करना चाहिये । स्त्रियों में पतिव्रता स्वर्ग जाती है। (घर में) बहू लाग सन्तु रहें तो लक्ष्मी वढ़ती है। नदी के समीप गांव । लक्ष्मी में उत्कष्ठित हरि । क्रवर्ती के भों के टेढ़ी होने पर संसार डरता है। नाव पर बैठा । कन्या में स्नेह । कवियों की बुद्धि पर सरस्वती रहती है। जल में कमल शोभित होते हैं ! फूल के रंस पर लुभाया भौरा । दही में.घी रहता है । मुक्ति ज्ञान पर भाम्पित है।
+ ( १५३ ) बुद्धिमान विद्यार्थी में अध्यापक का परिश्रम सफल होता है। बेल पर चढ़े महादेव । चर्तियों में श्रीमती विजयिनी देयी अधिक प्रताप रखती है। जब कृष्ण दूधने याले हुग गाय बहुत दूध देने लगा। विद्वान को पाते (देखकर ) उठना चाहिये। बड़ाई में किस की अभिलाषा नहीं होली र वेदों का पटने घाला । पहाड़ों में हिमालय प्रति ऊंचा है। लने वालों में धापन शीव्रगामी होता है । शान्त (पुरुष) में लेग अनुराग करते हैं। जब आग मथनेयाला आग मयता है देवता प्रसन्न होते हैं। श्रीमती भारतेश्वरी (सकल) राजाओं को स्यामिनी है । पुर युवा होने पर बुद्धिमान (पुरुष) पन में ले जाते हैं। दही के मरने पर उस का दाह नहीं होता । यत करनेवाले में प्रोति। पुष के परिडा होने पर पिता प्रसन्न होता है । श्रेष्ठ पुरुष में गुण बसते हैं। पथ समाप्त होने पर पथिक विनाम करता है। ग्रहा में भक्ति । चन्द्र के प्रकाथ में फुम दैनी के फूल फूलती है । भाकारा में तारा चमकते है। पानी में जल के बीच रहते हैं। विपति में धीरता । धार्मिक लोग (अपने ) पचन में गियर रही है। धार दिगाओं में धारदायी है। माला में मन । पाषी फा म्यामी। दिन में अग्नि की शोभा नही होती । रन्द के धनुष में दृष्टि देता है। बल में मेडम रहते हैं। (बाग में) होम की पमा हुने बाने पर पुष्टि हुई । नहिन्दीवाम्पी का मंजन में उन्दा परी। हिन्दी मद। पुस्ति। यानाम-पर सरके में-पर धानम-पर माने में-पर १५४ मुनि में-पर माली में-पर सांधु में-पर भाल में-पर मुनियों में-पर मालियों में-घर साधुओं में-पर भालुओं में पर चावेओं में-पर कोदाओं में-पर चौबे में-पर कोदों में-पर स्त्रीलिङ्ग। घात में-पर गया में-पर तिथि में-पर नदी में-पर बातों में-पर गयाओं में-पर तिथियों में-पर नदियों में-पर धेनुओं में-पर बहुओं में-पर- सरांओं में-पर धेनु में-पर सरसों में-पर पाठयां पा31 सम्बोधन । सम्बोधन का अर्थ अभिमुख करना है । असे । जब कोई पुरुपं अपने लड़के से कहता है कि "हे पुत्र त्वं व्याकरणं पठ । हे बेटा तूं व्याकरण पढ़ा तो यह उसको अपने अभिमुख करले व्याकरण पढ़ने की आज्ञा देता है । इस अभिमुख करने को सम्बो- धन पर जो अभिमुप्त किया जाय उसे सम्याध्य कहते हैं। संस्कृत और हिन्दी दोन भाषाओं में सम्बोध्य के धागे सम्बोधन अध में प्रथमा विमति भाती है । संस्कृति में इस प्रथमा के कहीं २ विसर्ग अदि चिहू रहते हैं। हिन्दी में इस का कहां भी कुछ चिहू नहीं रहता। संस्कृत और हिन्दी दोनों भाषाओं में सम्बोध्य के साथ सम्बोधन रूप अर्य के प्रकाश करने के लिये है, परे, इत्यादि शब्द जोड़े जाते हैं। जैसे। उक्त उदाहरण में हे शब्द है । कहीं नहीं भी जोड़े जाते । जेसे । राम मां पाहि। राम मेरी रक्षा करो। इत्यादि। अजन्त पुल्लिङ्ग शब्द। हे राम । हे रामौ । हे रामा: । हे सखे । हे सपायो । हेस. हे राम 1 हे दोन। रामा । खायः। हे रामा। हे सुधीः । हे मुधियों हे सर्व । हे सगे। हे सर्वे । धियः । हे पयः । हे साधा । हे साधू । हे साधरः । हे पूर्व । हे पू! । हे पूर्व। हे स्वयम्भः । हे स्ययम्भयो। पूर्याः । हे स्वयम्भुः । हे मुने । हे मुनी। हे मुनयः । हे दतः । हे दातारी । हे दातारः । हे पते। हे पती। हे पतयः। हे गा: । हे गाय।। हे गायः । कृष्ण मुकुन्द श्रादि शब्द राम शन्द के, मिग्य पाद- फारान्त गट सर्य गन्द के, पर प्रादि गद पूर्ण गन्द के, अग्नि ময়ি থি পাবি আর বি গল্প , বিক্ষ্যে প্রায় মাল আবহু साधु शब्द के, धात भादि शब्द दारा गम्द के समान होते हैं। पजन्त स्त्रीसिद राद। हे रमे। हे रमे। हे रमाः । हे मयें। हे भय। सियाः । हेरमा । हे दोनो रमाशे। तिनः । हे रमानी। मो। हे मत। मनमः ।
- ( १५६ ) हे नदि । हे नद्यौ । हे नद्यः । हे भूः । हे भूवो हे श्रीः । हे श्रियो । हे प्रियः । हे दुहितः । हे दुहितरी । हे हे स्ति । हे स्त्रिया । हे स्त्रियः । दुहितरः । हे धेनो । हे धेन. हे धेनवः । हे द्यो: । हे द्यावी । हे द्यायः । हे वधु । हे षध्यौ । है पध्यः । हे नाः । हे नांवो। हे नावः । दुर्गा आदि शब्द रमा शब्द के विश्वा श्रादि श्राबन्त शब्द सा शब्द के, श्रुति स्मृति आदि शब्द मति शब्द के, गोरी वाणी आदि शब्द नदी शब्द के तुल्य होते हैं। अजन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द । हे चान । हे जाने। हे ज्ञानानि । हे दधे । हे दधि । हे दधिनी । रे ज्ञान । हे देनी चानो । हे दधीनि । हे चानो। हे मधो । हे मधु । हे मधुनो। हे पारे । हे वारि । हे वारिणी । हे मधनि । हे बारीणि । धन धन पल इत्यादि शब्द ज्ञान शब्द के, अस्थि स.क्य অছি যত ঘি যz ঈ, ম আহি যত্ন নয় আর ঈ समान होते हैं। हलन्त पुल्लिङ्ग शब्द । हे धुक् । हे धुग । हे दुहो । हे पट् । हे अष्टों । हे अष्ट । हे दूहने बाले । हे दोनों दूहने हे सम ट् । हे सम्राडु । हे स. वाला । हे दूहने बालो। माला । हे समाजः । हे अनन् । हे अनवाहो । हे भूभृत् । हे भूभृतो • हे भूभृतः । हे अनड्वाहः । हे धीमन् । हे धीमन्तो । हे हे चत्वारः। धीमन्तः । 1 जानः । ( १५० ) हे गच्छन् । हे गच्छगन्तो। हे युवन् । हे युवानो । हे यु- हे गच्छन्तः । वानः। हे प्रशान् । हे प्रशामा। हे प्रशामः । हेराजन् । हे राजानो । हे रा- 'हे भुत । हे बुरे बुधः हे अग्निमत् । हे अनिमयो । हे दण्डिन् । हे दयिउनी । हे अनिमयः । हे दण्डिनः । है प्राङ् । हे प्राञ्च।। हे माञ्चः । हे पन्थाः । हे पन्यानो । हे प. | पूर्ववत् । हे उद। हे उदञ्चो । हे वेधः । हे वेधसो । बेधसः हे उदक्षः । हे विद्वान् । हे विद्वांसा । हे वि. हे महिमन् । हे महिमानी । द्वांसः । हे महिमानः । हे गरीयन् । हे गरीयांमा । हे हे यन्यन् । हे यज्वानो हे स गरीयांसः । ज्वानः । हे पुमन् । हे पुसांसी । हे पु. न्यानः। मांसः । हलन्त स्त्रीलिङ्ग शब्द। हे द्योः । हे दियो । हे दिवः । हे त्विट् । हे त्यिड् । हे त्यि. हे अफाग । हे दोनों पकायो। । हे त्यिपः । हे प्रकाश। हे गीः । हेगिरी। हे गिरः । हे घसम्रः। हे पापत् । हे दो । हे श्रा- धाक । हे याची पद:। हे थारः। हे.पः । हे सा । हे मग । हे नो । हेदिक । हे दिग। हे सजः। हे दिशो । दिगः। पुर् शब्द गिर गद के तुल्य होता है। । हे याग ~ १५८ . हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्द हे घाः । हे पारी । हे वारि ! हे अहः । हे अही। हे अहनी । हे जल । हे दोनों जला। -हे अहानी। हे जलो। हे हविः । हे हविषी । हे होषि । हे चत्वारि । हे धनुः । हे धनुपी। हे धनषि । घद्म शब्द धनुस् शब्द के समान आता है। हिन्दी शब्द। हिन्दी में सम्बोधन.की प्रथमा के एक वचन में पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों प्रकार के शब्द ज्यों के त्यों बने रहते हैं केवल आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों के अन्त आकार को एकार होता है। और बहुवचन में हस्य प्रकारान्त और दीर्घ प्रकारान्त शब्दों के अन्त स्वरों को कार, ओर हस्व इकारान्त शब्दों के अन्त ईकार के आगे यो और दीर्घ इकारान्त शब्दों के अन्त ईकार के हस्य इकार और उस के आगे यो, और ह्रस्व उकारान्त शन्दों के अन्त उकार के पागे आ, और दीर्घ सकारान्त शब्दों के अन्त उकार को हस्य उकार और उसके भागे ओ, और एकारान्त और ओका- रान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के अन्त श्राकार के प्रागे ओ मा आराम होता है। पुल्लिङ्ग घयच इचलक दे यालको हे लड़के हे लड़को हे मुनियो हेमाली हेमालियो . एकच. । हे मुनि
( १५६
)
हे साधु
हे भालू
हे चावे
हे साधुओ
हे भालुओ
हे चावायो
हे कोदोओ
हे कोदों
स्त्रीलिङ्ग ।
हे बात
हे गया
हे तिथि
हे नदी
हे धेनु
हे बाता
हे गैया
हे तिथि
हे नदिये
हे धेनु ग
हे बहुओ
हे सरसेना
हे सरसों
इति।