Sanmati Library, Jaipur
Manonigrah-mantra
Front matter
ta chillllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllllpainting till G धन्यवाद GMDOMONDOMINJIDDIDDIN|Daluranemia ADDIMDIMINDANAOW'MHadithili MIDINIAT निम्न लिखित उदारचेता धार्मिक सज्जनोने इस ग्रंथकी निम्न लिखित प्रकार प्रतियों के प्रकाशनमें सहायता दी है, एतदर्थ हम उनको कोटिशः धन्यवाद देते हैं। प्रति १००० श्री , शांतमतीजी ( मांगूर ) १०० श्री आचार्य शांतिसागर ग्रंथमाला (छाणी) शांति धर्म ग्रंथमाला उदयपुर. FFille CHAUHD> <DIUEIPED-CISHND><lINDGITUAL-ClmeliRURDURepojim ourna><IINDAGIKIHIDACHRIORD-pluAHIDA १०० सेठ केशरीमळ गुलाबचंदजी सांभर १०० सेठ कुरीचंद मंगरजी सापला १०० सेठ प्यारचंद पूनमचंद रावत कल्याणपुर व्यवस्थापक श्री आचार्य कुंथुसागर ग्रंथमाला LemediDuildinl0100-MimesUIDAMID-Oil IDIDIDIOnly प्रस्तावला. . मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो। प्रास्ताविक सचमुचमें यह मन ही मनुष्यको संसारबंधन में फंसानेवाला है और उसीकी स्थिरता व निर्मलतामें यह आगा मोक्षसाम्राज्यका भधिपति होसकता है। यह मन अत्यंत चंचल है, सूर्यकिरण जहां पहुंच नही पाते हैं वहाँपर यह मन सहज ही पहुंच जाता है। संसारण भयंकरसे भयंकर विकार. के लिए यह कारण मनुष्य मनके द्वारा ही काम क्रोधादिक विकारों में पड़ता है, और स्वपर संक्लेशके लिए कारणीभूत क्रियापोंको करता है । स्वतःके संक्लिष्ट विचारोंके लिए यह मन ही कारण है। उसके विकृत होनेसे अनेक तरहसे अशुभ फाँका बंध होता है। जिससे यह आत्मा दीर्घ संसारी होता है एवं आत्मोन्नति नहीं कर सकता है। इसलिए महा पुरुषोंने कहा है कि शिरको मुंडानेके पहिले मन को मुंडाना चाहिए ! यदि मन नहीं मुंडाया, तो.शिरको मुंडानेसे भी कोई उपयोग नहीं होता है । मनके सर्व विकारोंको दूर करने से. फाम क्रोधादिक अपने आप दूर होते हैं । काम.. क्रोधादिकके दूर होनेसे आत्मपरिणाममें विशुद्धि होती है । आमपरिणामकी विशुद्धिसे मनुष्य स्वानंद साम्राज्यको पा लेता है । इसलिए. सबसे पाहिले आवश्यक है कि अपने मन को वशमें करने का यत्न करें । .
- । इंद्रियों का राजा मन जब वशमें होता है, उसकी लीला जब समाप्त होती है तब शेष इंद्रियें कुछ भी नहीं कर सकती हैं । श्री चारित्रचक्रवर्ति प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद आचार्य · शांतिसागर महाराज सदृश वंदनीय विभूति व उनके शिष्यगण धन्य जिन्होंने ऐसे प्रबल मनको अपने वशमें कर लिया है। यही कारण है उनकी वीतरागताको मात्रा बढती जाती है "श्री परमपूज्य, प्रातःस्मरणीय, 'विश्वबंध, विद्वच्छिरोमणि आचार्य कुंधुसागरजी महाराजने उस मनको वशमें कर अध्या- मिक जीवन में विशुद्धि प्राप्त की है। उनको अच्छी तरह स्वानुभव, गम्य विषय होगया है कि मनको वशमें किये बिना यह प्राणी मात्म राज्यको प्राप्त नहीं कर सकता है। इसलिए भव्य जीवोंके हितको लक्ष्यमें रखते हुएं पूज्यश्रीने इस ग्रंथका निर्माण किया है। विश्वोद्धार. : पूज्यश्रीको ज्ञान व वैराग्य इतना बढ़ गया है कि उससे असंख्य प्राणियों का उद्धार हो रहा है । बाल्यसे ही उत्तम संगति उत्तम संस्कार, योग्य माता-पिताओंका उपदेश, 'सद्गुरुओंका समागम होनेसे यह मनुष्य किस उच्च आदर्श पर पहुँच जाता है एवं लोकवंद्य होता है इसके लिए आचार्य श्रीका उदाहरण पर्याप्त है। अनेक भवोंसे जिन्होंने अभ्यास पूर्वक संसारके स्वरूप को अध्ययन किया वे ही संवेग और निर्वग भावनासे युक्त होकर लोकको भी सत्पंधका प्रदर्शन करते हैं। आचार्यश्रीक जीवनमें (५) प्रारंमसे ही अर्थात, बमचारी, शुलक व ऐक. महश श्रावकोत्तम अवस्थासे ही विश्व के उद्धार करने की चिंता हुई। उस समय मापने समाजमें वषाँसे फैले हुए कुसंस्कारोंको अपने उपदेशसे दूर किया, जो लोग स्वेच्छाचारी होकर अभक्ष्य भक्षण करते थे, संस्कार विहीन थे, धसे अपरिचित थे, देवदर्शनादि. नित्य नियासे भी विमुख थे.ऐसे मूळे गटफोंको मापने दगाई चित्त होकर गस्ता लगाया। हावा सरकारविधीनोंको आपने यज्ञोपवी. तादि संस्कारोंसे संस्कृत किया। कावा ही जनेतर हिंद मुसल- मान आदि भाइयोंने आपके उपदेशसे मध, मांस, मधु. भादि निध पदार्थीका एवं दुर्व्यसनोंका त्याग किया । विश्वविद्यार. दिगंबर अवस्थाको धारण करनेके बाद भापके ज्ञान य चारित्रमें इतनी निर्गमता.आई, जिससे धर्मकी मीकिक प्रभा- धना हो रही है । निर्मल चारित्रफ प्रभाषसे जो विशिध क्षयोपशम जन्य, अनुभव लोया के सामने आया तो. एक दम अज्ञान अंधकार दूर हुआ!..श्री परमपूज्य आचार्य, शांतिसागर महाराजके. संघमें आप परमप्रभाव साधु सिद्ध हुए। आपने अपने .. विद्वत्ता पूर्णः सुललित सुंदर मृदु वचनोंसे थोडे ही समयमें लोकको आकर्षित किया। जनता आपके उपदेशसे मुग्ध हुई । इस प्रकार, आचार्य, संवके साथ अनेक प्रांतीम विहार किया। गत कितने. दी, वर्षांसे आपश्रीका- गुजरात प्रति विहार हो रहा है। गुजरात प्रोतका . -- .. - ' (.६.). आपके विहारसे बहुत ही सुधार हुआ। धर्मकी विशिष्ट प्रभावना हुई । आपश्रीका उक्त प्रांतमें छोटेसे छोटे बडेसे बड़े ग्राम व नगर में विहार हुआ, और. प्रत्येक स्थानपर पूज्यश्रीका सार्वज- निक तत्वोपदेश हुआ। विश्ववंधत्व.. : इस पुण्य विहारमें गुजरातके कितने ही छोटे बडे शासक पूज्यश्रीके चरणोंके भक्त बने । सुदासना, अलुवा, पेथापुर, बळासना,: माणिकपुरा, मोहनपुरा, ओरान, हिम्मतनगर, टीवा, विजयनगर ' आदि · बहुतसे 'स्थानोंके शासक आपश्रीके परमभक्त हैं । सुदासनाके ठाकुर साहब श्री पृथ्वीसिंहजी बहादुर, युवराज कुंवर साहब रणजीतसिंहजी, लिंबोदारले ठा.सा. जगतसिंहजी, अलुषाके ठा. सा. अर्जुनसिंहजी, माणिकपुराके ठा. सा. प्रवीणसिंहजी, पिंडरडाके ठा. सा. रणजीतसिंहजी, विजय- नगरके ठा. सा. ने. ना. श्री हमीरसिंहजी बहादुर आदि पूज्यश्रीके दर्शनके लिए बहुत ही लालायित रहते हैं। एवं अपने राज्यों में भाचार्य संघका बहुत ही वैभवयुक्त स्वागत किया। एवं अपने राज्यों में आचार्यश्रीकी जयंती वैभवसे मनानेकी घोषणा की। साथ ही उक्तः दिनको अहिंसा-दिनके रूपसे मनाने की फरमान निकालकर उस दिन सरकारी छुट्टीकी घोषणा की। बडोदा राज्यमें संघको विशिष्ट स्वागत होकर राजकीय न्यायमंदिरमें हजारों जनता व खांस दिवान साहनकी उपस्थितिमें पूज्यश्रीका विश्वधर्मपर उपदेश हुआ। "यह बड़ोदा राज्यके इतिहासमें सुवर्णाक्षरोंमें लिखने योग्य है | .:. .
(७) ग्रंथनिर्माण. इसी प्रकार पूज्यश्री ने अपनी विद्वत्ता द्वारा जनताफा स्थायी उद्धार हो इस हेतुसे आजतक अनेक ग्रंथोंका निर्माण किया है । पूज्यवर्यने अभीतक उत्तमोत्तम तीसों ग्रंथोंका निर्माण किया है । वे ग्रंथ इतने लोकप्रिय हुए हैं कि भाचार्यश्रीके भक्तोंने उनको हजारों की संख्यामें प्रकाशित कर उनका प्रचार किया है । जैन जैनेतर सभी लोग बहुत दिलचस्पीसे उन ग्रंथोंका स्वाध्याय करते हैं। चातुर्मास व तीर्थोद्धार. पूज्यश्रीका चातुर्मास जहां भी हुआ है वहां अभूतपूर्व प्रभावना हुई है । आपके चातुर्मासका ही फल है कि गुजरातके कई तीर्थीका उद्धार हुआ है । तारंगा क्षेत्रमें विशाल मानस्तंभ व प्रतिष्ठा महोत्सव, इसी प्रकार पावागढ क्षेत्रमें विशाल मानस्तंभ व प्रतिष्ठा पूज्यश्रीके चातुर्मासके फलस्वरूप हुए हैं । इसी प्रकार जहेर, ईडर वगैरह स्थानके चातुर्मासमें भी बहुतसे महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं। अनेक स्थानमें वर्षों से आयां हुआ पर- स्परका वैषम्य पूज्यश्रीके उपदेशसे दूर हुआ । स्थान स्थान पर संगठन होकर समाज बहुत प्रेमसे कार्य करती है। पूज्यश्रीके पचनोंमें जादू जैसा प्रभाव है। उनके सुंदर मिष्ट हितमयं वचनों से पत्थर जैसा हृदय भी पिघल जाता है, सामान्य मनुष्योंकी बात ही क्या है. इसलिए सर्वत्र प्रेमका संचार होता है। विश्वकल्याण. इस. प्रकार पूज्यश्रीके दिव्य विहारसे भव्योंका महदुपकार .
(८) . . हो रहा है । अनेक साधु संत पूज्यश्रीफे संघमें रहकर आत्म कल्याण करने के लिए लालायित रहते हैं । इस समय पूज्यसंघका चातुर्मास डुंगरपुर मेवाडकी पुण्यभूमिपर हो रहा है। संघमें इस समय अनेक साधु, संत, सत्पुरुम मौजूद हैं जिनमें श्री परमपूज्य मुनिराज आदिसागरजी महाराज, मुनिराज अजितसागरजी महा- रान, आर्यिका धर्ममतीजी, आर्यिका विमलमतीजी, क्षुल्लक सीग- धरजी, क्षु. ज्ञानमतीजी, ब्र. विद्याधरजी, न, जिनदासजी, न. विमलदासजी, न. रिषभदासजी, ब्र. शांतमतीजी, ब्र.अजितमतीजी आदिके नाम विशेष उल्लेखनीय है । पूज्यश्रीफे दिव्य विहारसे इसी प्रकार लोकातिशायी प्रभावना हो यही कामना है। अनुवादक. इस ग्रंथका अनुवाद श्री धर्मरत्न पं. लालारामजी शास्त्रीने किया है । श्री. पंडितजीकी साहित्यसेवासे जैनसमाज अच्छी तरह परिचित हैं। ग्रंथमालाके प्रायः सर्व ग्रंथोंका अनुवाद उन्ही के द्वारा हुआ है। इस साहित्यसेवाके लिए हम उनके आभारी - | इसके अलावा जिन सज्जनोंने इसके प्रकाशनमें सहायता दी है उनके भी हम कृतज्ञ हैं। विनीत . ऑ. मंत्री-आचार्य कुंथुसागर ग्रंथमाला, मनोनिग्रहमंत्र- । 4. श्रीपरमपूज्य, तपोनिधि, विश्ववंद्य, विद्वच्छिरोमणि आचार्य श्रीकुंथुसागरजी महाराज.
卐 ! मनोनिप्रहमंत्र- . . श्री. ब्र..शांतमतीजी (ब्र.चिम्माकाबाई) मांगूर पूज्य श्री. १०८ अर्जिका माताजी धर्मपतीजी. 卐 धर्मपरायणा, विदुषीरत, धर्मशाला, श्री. ब्र. शांतमतीजीका परिचय, दक्षिण कर्नाटक प्रांतके प्रसिद्ध शहर बेलगांव जिल्हेमें (कोल्हापूरके पास) मांगूर नामका ग्राम है वहांपर ब्र. चिमकाबाई ( शांतमतीजी ) का जन्म हुआ। इनके पिताश्रीका नाम नाना झीरले तथा माताश्रीका शुभ नाम काशीवाई। ये दोनों ही पति-पत्नी बडे ही शांतस्त्रभावी व धर्मात्मा तथा परोपकारी सज्जन थे । इनके सुयोग्य सात संतानोंमें ४ पुत्ररत्न घ ३ कन्यारत हुए जो कि निग्नप्रकार है- [१] कल्लप्पा नाना झिरले, . २] गणपति नाना झिरले, [३] लक्ष्मीबाई झिरले, [४] श्रीमान् धर्मपरायण, धर्मनिष्ठ, गुरुभक्त भाऊ नाना झीरले, [५) 5. चिम्माकाबाई वर्तमान ब. शांतमतीबाईजी, [६] श्रीमती रत्नाबाई, [७] श्रीमान् रामय्या झीरले। इनमें से पहिले दो पुत्र तथा एक पुत्रीका स्वर्गवास होगया है । तथा हालमें दो पुत्र तथा दो पुत्री मौजूद हैं । सो उनमेंसे श्रीमती धर्मशीला, विदुषीरन, धर्मपरायणा, गुरुभक्त ब्र. चिम्माकाबाईजी [ वर्तमान नाम ब्रा. शांतमतीबाई] हमारी परिचय नायिका है । इनका शुभ विवाइ श्रीमान् भाऊ उपाशेके. साथ हुआ था। श्री चिम्माकाजीके पति बडे धर्मात्मा तथा परोपकारी सज्जन थे। परंतु दैवयोगसे उनका अकालमें ही वियोग हुआ।इसलिए श्री चिम्मक्काबाईजीको बाल्यकालमे ही वैधव्य प्राप्त हुवा । तथा बाल्यवस्थामें ही मातापितावोंके वियोगका भी असहनीय दुःख हुआ।
(":१.०. ) .. . घावमे नमक छिडकनेके समान यह पतिवियोगका दारुण दुःख पुनः उपस्थित हुआ । इस निर्दयी कालके क्रूर वज्राघातसे आहत चिमक्काबाई कर्मकी विचित्र गतिपर विचार करती हुई अपने भाई बहिनके पास ही रहने लगी। आपको बाल्यावस्थामें सत्संगति सुसंस्कार आदि मिलने के कारण आपका चित्त सदा धर्मध्यानमे लगता ' रहा, और शांत स्वभावसे युक्त होकर व्रत चारित्र आदिमें मग्न रहती थी। और प्रतिनित्य धार्मिक आचरण, सदा स्वाध्याय, 'शास्त्रंश्रवणं, साधुवोंका दर्शन तथा पात्रदान आदि कार्य बहुंत अनुरागसे करती थी। इस प्रकार धर्माचरणसे कितने ही दिन जाने के बाद पुण्योदयसे आपके गाममें स्व. श्री परमपूज्य विद्वद्वर्य १०८ आचार्य जयकर्तीि महाराज फा. ( दक्षिण ) शुभागमन हुआ तथा गुरुंधर्यके चारित्र तथा उनके तपप्रभावसे या सदुपदेशसे आपंको यथार्थ वैगग्य उत्पन्न दुआ और आजसे सात वर्ष पहिले उन पूज्यश्रीसे शुभ-मुहूर्तपर प्रतिमारूप ब्रह्मचर्य दीक्षा दीक्षित हुई। श्री पूज्य आचार्यश्रीके संघमें ही नहने के कारण धार्मिक कार्योंमें रुचिकी वृद्धि चारित्रमें निर्म- लता भी हुई। और आपने सदा तेलाव्रत उपवास, सामायिक स्वाध्याय आदि धार्मिक कार्य करते हुए समय व्यतीत किया । तथा आप यथा- शक्ति चतुर्विध दानमें अपनी चंचला-लक्ष्मीको सदुपयोग करती थी। ब्रा. शांतमतीबाईजीने' भारतके समस्त सिद्धक्षेत्रां भतिशय क्षेत्रोंकी यात्रा की है। यथाशक्ति पात्रदान आदिसे अपने हृदयको निर्मल बनाया है। तीर्थयात्रादि पवित्र कार्यों में आपने दो हजार रुपये व्यय किया है। सर्व धार्मिक कार्योंमें आपने लगभग ४ इंजार रु. को (११) (११) सदुपयोग किया है। आपको श्री परमपूज्य. धर्मपरायण, धर्मनिष्ठ, विदुषीरत्न, धर्मशीला श्री १०८ धर्ममूर्ती अम्मा अर्जिका धर्ममतीके संघमें रहते हुए ६ साल हुए हैं तथा आपने माताजीके पास याव. जीवनपर्यंत रहनेका नियम लिया है। भर्जिका माताजीके संघका शुभागमन ईडरके सन् १९४१ में चौमासेमें हुआ था। वहांपर.श्री परमपूज्य पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय विद्वद्वर्य जगद्वंच जगदुद्धारक नरेंद्रपूज्य व्याख्यानवाचस्पति कविवर्य चारित्रचूडामणि १०८ आचार्यशिरोमणि कुंथुसागरजी महाराजके चातुर्मासमें महाराजश्रीके सदुपदेशसे.ब्र. विद्याधरजीने दशलक्षणिक १० उपवास किया था । पारणाके समय व्र. शांतमतीजीने १०१.. रुपया आचार्य कुंथुसागर ग्रंथमालामे देकरके स्थाई समासद हुये तथा ४२५ रुपया मनोनिग्रह मंत्र व भावत्रयफलप्रदी के प्रकाशनमे दिया एवं कुल ५२५ का दान दिया। श्री महाराजश्रीके ईडरके चौमासे के समय संघमे श्री १०८ आचार्य कुंथुसागरजी महाराज तथा श्री १०८ आदि- सागर महाराज तथा तथा श्री १०८ अजितसागर महाराज तथा श्री १०५ ऐल्लक संभवसागरजी महाराज तया.१०८ सुधर्ममतीजी अजिंकामाता, वर्तमान श्री १०८ पूज्य धर्ममतीजी. माताजी तथा श्री १०५ज्ञानमतीजी. श्री १०५ विमलमतीजी तथा ब्र.चिमक्काबाई वर्तमान शांतमतीज़ीबाई तथा न. विद्याधरजी आचार्य कुंथुसागर संघ तथा ब्र. जिनदासजी. अ. सुमतीबाईनी तथा न. चमुबेन तथा छटी पतिमाधारी कांतीलाल भावनगर तथा छटी प्रतिमा- धारी शाहा चंचलबाई कर्मसद आदि १४ त्यागी विराजमान थे - (१२) इस चार्तुमासमे हजारो जैन अजैन जनताका आत्मकल्याण हुआ। पूज्यश्रीके ज्ञानबळ तथा तपोबलके प्रभावसे गुजराथके सभी छोटे बड़े राजाओंका शुभागमन 'हुवा। तथा श्रीमान सर सेठ हुकुमचंदजी तथा रा० ब० धर्मवीर श्रीमान् सेठ भागचंदजी साहब सोनी तथा गुरुभक्त सेठ गंभीरमलजी, सा. पांड्या, श्रीमान शेठ भोपजी शंभूरामजी, श्रीमान् शेठ पन्नालाल उमाभाई स्वे. जैन, आदि अनेक श्रीमान् गुरुवर्यके दर्शन के लिए पधारे थे तथा पूज्य श्रीके मधुर विद्वत्तापूर्ण सदुपदेशसे जैनसमाज प्रभावित होता था। इस सगय उक्त बाईजीका सरल स्वभाव, वासल्य, आतिथ्यभाव वगैरे अतीव प्रशंसनीय देखनेमें आये । बाईको समय धर्मध्यानमें ही ध्यतीत होता है। अन्य बहिनोंको 'आपका जीवन अनुकरणीय हैं। नं. शांतमतिजीका यह जीवन-परिचय संक्षेपमें वर्णन किया है। आशा है कि कमसे कम सभी विधवा बहिनें इससे अवश्य शिक्षा- ग्रहण कर अनुकरण करेंगी एवं अपने जीवनको सफल बनायेंगी। शांतमतीजीने यह ग्रंथ पूज्य अर्जिका माताजी धर्ममतीजीके ही खास उपदेशसे अपने ज्ञानवरणीय कर्मक्षयोपशमनार्थ निजद्रव्यसे प्रका- शित कराकर समस्त स्वाध्याय प्रेमियोंको ज्ञानोपार्जनका साधन उपस्थित किया हैं; एतदर्थ उनके हम कृतज्ञ हैं। निवेदक:- ब्र० विद्याधरजी, आचार्य कुंथुसागर-संघ, मु. डूंगरपुर. ..- - ..
॥ श्रीवीतरागाय नमः ॥ आचार्यवर्य श्रीकुन्थुसागर विरचित मनोनिग्रह मन्त्र । . 'धर्मरत्न' पं. लालारामजी शास्त्री विरचित सरल हिंदी भाषारीका सहित मंगलाचरण श्रीदं नत्वा जिनं भक्त्या सुखदान पूर्वसूरिणः । शुद्धौ शान्तिसुधौ च दीक्षाशिक्षावरप्रदौ ॥१॥ मनोनिरोधमंत्रोऽयं ग्रंथः स्वोक्षसौख्यदः । आबालवृद्धजीवानां चित्तसन्तापशान्तये ॥२॥ सर्वात्महितकत्रैव चित्ताक्षवशकारिणा । लिख्यते स्वात्मतुष्टेन कुंथुसागरसूरिणा ॥३॥ चन्द्रोज्वल अविकार चन्द्रमभके घरण नमि। मन निरोध हितकार टीका लिखू सुहावनी ॥ अर्थ- इस ग्रंथके प्रारंभमें मैं सबसे पहले भक्तिपू- वक भगवान जिनेन्द्रदेवको नमस्कार करता हूं। तदनंतर मोक्षसुख देनेवाले समंतभद्र आदि पूर्वाचायाँको नमस्कार करता हूं तथा शुद्ध हृदयको धारण करनेवाले दीक्षागुरु आचार्यचर्य श्रीशांतिसागर महाराजको नमस्कार और शद्ध : २ mamrindanmad animlain मनोनिग्रह-मंत्र link nirhma yama aurIs horsmidar हृदयको धारण करनेवाले शिक्षागुरु आचार्यवर्य श्रीसुधर्म- सागर महाराजको नमस्कार करता हूं। इस प्रकार मंगळा- चरण करनेके अनंतर समस्त जीवोंका हित करनेवाले इन्द्रिय और मनको वशमें करनेवाले अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें संतुष्ट रहनेवाळे ऐसे मुझ आचार्यचर्य श्रीकुंथुसा- गर स्वामीके द्वारा वालकसे लेकर वृद्ध पुरुषोंतक समस्त जीवोंके हृदयके संतापको शांत करनेके लिये स्वर्ग मोक्षके सुख देनेवाले इस मनोनिरोधमंत्र नामके ग्रंथका प्रारंभ किया जाता है। भावार्थ-इस संसारमें लक्ष्मी दो प्रकारकी मानी जाती है। एक अंतरंग लक्ष्मी और दूसरी बहिरंग लक्ष्मी। तथा सर्वोत्कृष्ट अंतरंग लक्ष्मी अनंतचतुष्टयरूप लक्ष्मी कहलाती है। अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंचमुख, और अनंतवीर्य ये आत्माके परमोत्कृष्ट चारौ गुण अनंतचतु- प्रय कहलाते हैं । बहिरंग लक्ष्मी वाइरसे दिखाई देनेवाली लक्ष्मी कहलाती है और समवसरणकी सर्वोत्कृष्टविभूति सर्वोत्कृष्ट बहिरंग कक्ष्मी कहलाती है। भगवान् जिनेन्द्रदेव इन दोनों प्रकारकी लक्ष्मीसे सुशोभित रहते हैं तथा अपने दिव्य उपदेश द्वारा इन्हीं दोनों प्रकारकी लक्ष्मीक प्राप्त करने का मार्ग दिखलाया करते हैं। इसीलिये वे परमलक्ष्मीको धारण करनेवाले और परमलक्ष्मीको देनेवाले कहलाते हैं । आचार्य श्री कुंथुसागरस्वामी अपने इस ग्रंथके प्रारंभमें मंगलाचरण करनेके लिये -
IAL UPATIN HI1JTAIt bulufen मनोनिग्रह-मंत्र murnupam
ऐसे भगवान् जिनेन्द्र देवको नमस्कार करते हैं। मं
शब्दका अर्थ पाप है और गल शब्दका अर्थ नाश करना
है । जो पापोंका नाश करदे, विघ्नोंको दूर करदे उसको
मंगल कहते हैं अथवा मंग शब्दका अर्थ सुख है और ल
शब्दका अर्थ देता है । जो सुखको देनेवाला हो उसको
मंगल कहते हैं । यह मंगल तीन प्रकार है। मानसिक
चाचनिक और कायिक । जो मंगल मममें किया जाता है,
मनमें ही पंच परमेष्ठीका स्मरण किया जाता है उसको
मानसिक मंगल कहते हैं । जो मंगल उच्चारण पूर्वक
वचनसे किया जाता है उसको वाचानक मंगल कहते हैं।
तथा शरीरसे नमस्कार करना, हाथ जोडकर मस्तकपर.
रखना और इस प्रकार भगवान् जिनेन्द्रदेवको नमस्कार
करना कायिक मंगल कहलाता है ।
भगवान् जिनेन्द्रदेवके अनंतर आचार्य महाराज
पूर्वाचार्यों को नमस्कार करते हैं । पूर्वाचार्योंको नमस्कार
करनेसे यह सिद्ध होता है कि आचार्य कुंथुसागर महाराज
इस ग्रंथमें जो कुछ लिखेंगे वह सब पूर्वाचार्योंके अनुसार
ही लिखेंगे । पूर्वाचार्योंने भगवान् जिनेन्द्रदेवके उपदेशा-
नुसार ही लिखा है । इस प्रकार यह शास्त्रपरंपरा
आवच्छिन्न रूपसे चली आ रही है।
आचार्य श्रीकुंथुसागर स्वामीने, अपनी गुरुभक्ति प्रगट
करनेके लिये अपने दक्षिागुरु और शिक्षागुरु दोनोंको
नमस्कार किया है। उनके दीक्षागुरु जगत्मसिद्ध परमशांत
४ MInsuTuy orladan गनोनिग्रह-मंत्र at myuminumanity I am आचार्यधर्य श्रीशांनिसागरस्वामी है और शिक्षासुरु परम तपस्वी और परम विद्वान् स्वर्गीय आचार्य श्रीसुधर्मसामर स्वामी है । यद्यपि आचार्य श्रीकुंथुसागरस्वामी और आचार्य श्रीसुधर्मसागरस्वामी दोनों ही आचार्यचर्य श्री शांतिसागर महाराजके शिष्य हैं तथापि विद्या प्राप्त कर- नेके कारण आचार्य श्रीकुंथुसागरस्वामी आचार्य श्री सुधर्मस्वामीको शिक्षागुरु मानते हैं। यह उनकी कृतज्ञता और उपकार स्मरण है। इस ग्रंथमें मनको वश करनेका उपाय बतलाया है। मनको वश करना ही मोक्ष वा अनंत सुखका कारण है । इसीलिए यह ग्रंथ सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ कहलाता है। आगे-मनोनिरोधका उपाय पूछने के लिए शिष्य प्रश्न करता है। प्रश्न-कथं चित्तनिरोधो मे क्रियते वद भो गुरो! अर्थ-हे भगवन् अब कृपा कर यह बतलाइये कि इस चिसका निरोध फिस प्रकार किया जाता है। उत्तर-यावरिकलाशा भवदा व्यथादा। परात्समूलान्न च नश्यतीह । केनाप्युपायेन मनो न ताव- निरुध्यते तापकरं हि नित्यम् ॥ ४॥ इस संसारमें यह आशा जन्म मरणरूप संसारको बढानेवाली है और नरक निगोदके महादुःख देनेवाली
IHIN INITIATIVIDugalIWALI मनोनिग्रह-मंत्र AIANTIL MInkariliyannil - ५
है । यह आशा जबतक समूल नष्ट नहीं होती तबतक
किसी भी उपायसे सदाकाल संताप उत्पन्न करनेवाले
मनका निरोध कभी नहीं हो सकता।
भावार्थ-यह संसारी पाणी सदाफाळ नई नई
आशाएं उत्पन्न करता रहता है । आशाएं कभी किसीकी
पूर्ण नहीं होती तथापि प्रत्येक क्षणमें नई नई अनेक
आशाएं उत्पन्न होती रहती हैं। ये आशाएं ही मनको
शांत नहीं होने देती। इन आशाओंके पीछे पीछे चलने
वाला पाणी सदाकाल अनेक प्रकारके दुःख भोगता
रहता है और चारों गतियों में परिभ्रमण करता रहता है !
कोई कोई समझदार पाणी यह जानता है कि ये आशाए
कभी किसी की पूर्ण महीं होती तथापि वह अपनीः
आशाओंको शांत नहीं करता। परंतु यह उसका दुर्भाग्य
है । क्यों कि यह सुनिश्चित सिद्धांत है कि जबतक मन
शांत नहीं होता, जबतक मनके संकल्प विकल्प वा आशा-
ऑकी परंपरा शांत नहीं होती तबतक मनका परिभ्रमण
शांत नहीं होसफता । तथा जबतक मनका परिभ्रमण शांत
नहीं होता तबतकं मनका निरोध करनेके लिये भाशा-
ओंका बंद होना वा मनमें उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकार
के संकला विकल्पोका बंद होना अत्यंत आवश्यक है।
इसलिये समस्त भव्यजीवोंको अपने मनमें उत्पन्न
होनेवाले संकल्प विकल्पोंको बंद करना चाहिये
तथा आशाओंकी परंपरा रोकनी चाहिए । मनको वशमें
,
11 MIMINA IMHINImmil ham मनोनिग्रह-मंत्र SIMMINm n}n 18INI TIMh UI
करनेका वा मनको निरोध करनेका यही सर्वोत्तम उपाय है।
आगे आचार्य इसी उपायको बतलानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।
मनोनिरोधस्य समासतो हि।
वाऽऽशाविनाशस्य विधिर्मयातः।
स्वमोक्षसिद्ध्यै प्रतिपाद्यते च ।
दृष्टांतरूपेण मनोहरेण ॥ ५॥
अर्थ-अत एव स्वर्ग-मोक्षकी सिद्धिके लिए मनोहर
मनोहर दृष्टान्तोंके द्वारा अत्यंत संक्षेपसे मनको निरोध
करनेकी विधि निरूपण करते हैं।
भावार्थ-आगेके श्लोकोंमें मनको निरोध करनेकी विधि
और आशाको नाश करनेकी विधि बतलाते हैं और वह
भी अनेक उदाहरण देकर बतलाते हैं ।
शीतोत्थदुःखहरणे ह्यनलप्रयोगः ।
सन्तापशांतिकरणे जलचन्दनादेः॥
रोगोपशांतिकरणेऽप्यगदोपचारो ।
वस्त्रादिशुद्धिकरणे पयसः प्रयोगः ॥६॥
शत्रोनिरोधकरणे हि बलप्रयोगः ।
क्षेत्रादिरक्षणविधौ वरवृत्तियोगः ॥
सद्विश्वशांतिकरणे. समतात्मबुद्धिः ।
पंचाक्षवहिशमने तपसः प्रयोगः ॥ ७॥
limdhanuined untymadult jmaniylndain मनोनिग्रह-मंत्र manmadurmined inlun hanim ७ द्रव्याभिवृद्धिकरणेऽर्चनदानधर्मों । द्वेषाग्निशांतिकरणेऽखिलविश्वप्रेम ॥ मानापमानहरणे स्वपदेऽनुरागो । विज्ञानलाभकरणे वरशिक्षकादेः॥ नद्यादिपारकरणे तरणेः प्रयोगो। वाऽऽरोग्यवृद्धिकरणे वरवैद्यसंगः । शीलाभिवृद्धिकरणे वरवृद्धसंगो। दुर्गंधदूरकरणे सुरभिप्रयोगः ॥ ९ ॥ स्वानन्दराज्यकरणे परमात्मबुद्धि-। स्त्रैलोक्यकीर्तिकरणेऽखिलविश्वसेवा । संसारासिंधुतरणे जिननाथसंगो। ग्रामादितीर्थगमने रथपादयोगः ॥१०॥ सर्वार्थसाध्यकरणे सकलैक्यभावः । कर्मारिनाशकरणे निजबोधबाणः ॥ पूर्वोक्तरीतिरिति सर्वजनप्रसिद्धा । स्वेष्टार्थसाध्यकरणे क्रियते हि भव्यैः॥११॥ ज्ञात्वेति शान्तिसुखदः सततं प्रसंगः। कार्यों निजात्मानरतस्य विरागिसाधोः ॥
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ma MINAINA MIn Hamila ann मनोनिग्रह-मंत्र Hakuta utualthya Aathindhit
नैराश्यनिष्टनिपुणस्य यतो भवेत्ते ।
'. ह्याशानिरोध इति वाऽपि मनोनिरोधः॥
अर्थ-जिस प्रकार शीतसे उत्पन्न हुए दुःखको दूर
करने के लिए अग्निका प्रयोग किया जाता है, जिस प्रकार
उष्णताका संताप शांत करने के लिए जल चन्दन आदिका
प्रयोग किया जाता है, जिस प्रकार रोगोंको शांत करने के
लिए औषधियों का उपचार किया जाता है, जिस प्रकार वस्त्र
शरीर आदिको शुद्ध करनेके लिए जळका प्रयोग किया
जाता है, जिस प्रकार शत्रुको रोकने के लिए अपने श्रेष्ठ बलका
प्रयोग किया जाता है, जिस प्रकार खेतकी रक्षा करने के
लिये कांटोंकी बाढ लगाई जाती है, जिस प्रकार
समस्त संसारमें शान्ति स्थापन करने के लिये अपनी
वुद्धि समतारूप की जाती है, जिस प्रकार पांचों इन्द्रिय
रूपी अग्निको शान्त करने के लिये श्रेष्ठ तपश्चरण किया
जाता है, जिस प्रकार धनादिककी वृद्धि के लिये भगवान्
जिनेन्द्रदेवको पूजा दान धर्म किया जाता है, जिस प्रकार
द्वेषरूपी अग्निको शांत करने के लिये समस्त संसारमै
प्रेम स्थापन किया जाता है, जिस प्रकार मान अपमानको
दूर करने के लिये अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें अनुराग
किया जाता है, जिस प्रकार ज्ञान प्राप्त करने के लिये श्रेष्ठ
उपाध्यायोंकी शरणमें जाया जाता है, जिस प्रकार नदी.
वां समुद्रको पार करनेके लिये छोटी बड़ी नावोंका.
tand antmand nhin amhind numundant मनोनिह-मंत्र undnummind anlmad animn am ९
प्रयोग किया जाता है, जिस प्रकार आरोग्यकी वृद्धि
करने के लिये उत्तम वैद्योंका समागम किया जाता है,
जिस प्रकार अपने ब्रह्मचर्यको पालन करने और उसकी
वृद्धि करनेके लिये वृद्ध पुरुषोंका समागम किया जाता है,
जिस प्रकार दुर्गंधको दूर करनेके लिये सुगंधित पदार्थोंका
प्रयोग किया जाता है, जिस प्रकार · अपने आत्मजन्य
आनंदको प्राप्त करनके लिये अपनी बुद्धि परमात्मामें
लगाई जाती है, जिस प्रकार तीनों लोकोमें अपती कीर्ति
फैलानेके लिये समस्त संसारकी सेवा की जाती है,
जिस प्रकार संसाररूपी समुद्रको पार करनेके लिए
भगवान् जिनेंद्रदेवके चरणोंकी सेवा की जाती है, जिस
प्रकार किसी ग्राम वा तीर्थको जानेके लिए रथ, घोडा वा
अपने पैरोंका प्रयोग किया जाता है, जिस प्रकार समस्त
पदार्थोंको सिद्ध करनेके लिए सब मनुष्योंके समानरूप
भाव बनाये जाते हैं, तथा जिस प्रकार कौंको नाश करने
के लिए अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपके यथार्थ ज्ञानका
वाण चलाया जाता है, इस प्रकार ये उदाहरण इस
संसार में प्रसिद्ध हैं, इनको सब लोग जानते हैं, और
भव्यजीव अपने इष्ट पदार्थोंकी सिद्धिके लिए इनको
काममें लाते हैं यही समझकर भव्यजीवोंको अपनी
आशाका नाश करनेके लिए और अपने मनको वशमें
करनेके लिए अपने आत्मामें लीन रहनेवाले और
निराशारूपी परमाणको · धारण करनेवाले वीतराग
Pomfarmins amin summinkam मनोनिग्रह-पत्र manmains amirmanmanumamm]
सुनियोंका समागम करना चाहिये । वीतराग मुनियोंकी
सेवा और संगति करनेसे आशाका भी निरोध होता है
और मनका भी निरोध होता है।
:: भावार्थ-इस संसारमें प्रत्येक कार्यके अनेक उपाय
होते हैं ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसके माप्त करने का कोई
उपाय न हो । देखो जब बहुत शीत पडता है तब लोग
अमि जलाकर शीतका दुःख दूर करते हैं, अग्नि
जलानेसे मकान गर्म हो जाता है और शीतका
दुःख सर्वथा दूर हो जाता है । अथवा रुई ऊन
वा रेशमके वस्त्र पहनकर वा ओढकर भी. शीतका
दुःख दूर कर लिया जाता है, अथवा धूपमें बैठकर
भी शीतका दःख दूर हो जाता है । इस प्रकार
शीतका दःख करने के लिये अनेक उपाय हैं। इसीप्रकार
उष्णताका संताप दूर करनेके लिये चन्दन लगाया जाता
है, चन्दन पिलाया जाता है, जल पिया जाता है..वा.
शीत औषधियोंका प्रयोग किया जाता है, वा पखासे
हवा की जाती है । इस प्रकार उष्णताका दुःख दूर करने के
किये अनेक उपाय किये जाते है। यदि किसी पुरुष गरे
कोई रोग हो जाता है तो उस रोगको दूर करनेके लिये
अनेक प्रकारकी औषधियां दी जाती हैं। ज्वर आनेपर
त्रिभुवन कीति देते हैं वायुको शांत करनेके किये गुग्गुल
सोंठ. आदिका प्रयोग करते हैं। दाहको शांत करने के
लिये अनार वा जीरा आदिका प्रयोग करते हैं इस प्रकार
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ITH HIMALAIMILAITIH HITam मनोनिग्रह-मंत्र Anandna TILAIMIM am! आयुर्वेदशास्त्रके अनुसार अनेक प्रकारकी औषधियोंका प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार वस्त्रोंको शुद्ध करनेके लिये जलसे धोते हैं रीठा वा क्षारभाग कगाकर धोते हैं शरीको जलसे शुद्ध करते हैं, मकानोंको चूनासे पोतते हैं, गोबरसे लीपते हैं वा जलसे धोते हैं, बर्तनोंको अग्निसे शुद्ध करते हैं, शत्रुओंको रोकनेके लिये अपने शारीरिक पलका प्रयोग करते हैं, मानसिक बलका प्रयोग करते हैं वा वाचनिक बलका प्रयोग करते हैं वा सैन्यबलका प्रयोग करते हैं अथवा धनवलका प्रयोग करते हैं वा कूटनीतिका प्रयोग करते हैं । खवोंकी रक्षा करनेके लिए कांटोंकी वाढ लगाते हैं मिट्टीकी वाढ लगाते हैं केतकी वा थूवरके पेड लगाते हैं इस प्रकार खतोंकी रक्षा करते हैं। समस्त संसारमें शान्ति स्थापन कर- नेके लिए समता बुद्धि धारण करते हैं. अर्थात् राग द्वेषका नाश कर देते हैं। शत्रुता वा मित्रता रागद्वेषसे ही.होती है रागद्वेषके दूर कर देनसे शत्रुताका नाश हो जाता है और संसारभरमें परमशांति स्थापन हो जाती है । इसी प्रकार पांचों इन्द्रियोंको दमन करने के लिए तपश्चरण किया जाता है ध्यान किया जाता है, अनेक प्रकारके उपवास किये जाते हैं वा समितियोंका पालन किया जाता है । इस प्रकार इन्द्रियोंको दमन करनेके अनेक उपाय हैं । धनादिककी वृद्धिके लिए भगवान् जिनेन्द्रदेवकी पूजा की जाती है । श्रेष्ठ पात्रोंको दान दिया जाता है वा रत्नत्रयरूप धर्मका पालन १२ unia HumIh amInkam मनोनिग्रह-मंत्र HIMSHIKHNA HARIH arpit tarimal anm किया जाता है । बिना धर्म पालन किये धनकी वृद्धि कभी नहीं हो सकती। धर्म पुरुषार्थ अर्थ पुरुषार्थका कारण है और अर्थपुरुषार्थ कामपुरुषार्थका कारण है । इस प्रकार धर्म, अर्थ, काम तीनों पुरुषार्थ अनुक्रमसे ही सेवन किये जाते हैं। इसीलिए धनकी वृद्धिके लिए जिन- पूना वा दानधर्म आदिके कारण बतलाया है। इसी प्रकार द्वेषको दूर करने के लिए संसारभरसे प्रेम करना बतलाया है। समस्त जीवोंसे समान प्रेम करनेसे कोई भी पुरुष द्वेष नहीं कर सकता, अथवा सबके साथ समान प्रेम करनेवाला पुरुष भी किसीसे द्वेष नहीं कर सकता। इस प्रकार द्वेषको दूर करनेके लिए सबके साथ समान प्रेम करना उपाय बतलाया है। इसी प्रकार मान अपमानको दूर करने के लिए अपने आत्माके शुद्धस्वरूप अनुराग 'करना, समस्त संसारसे संबंध छोडकर आत्मामें लीन होना वा वीतराग अवस्था धारण करना उपाय पतलाया है। जब यह जीव अपने आत्माके शुद्धस्वरूपको अपना समझ लेता है और आत्माके सिवाय अन्य समस्त राग द्वेषका त्याग कर देता है तब मान वा अपमानका ध्यान कभी नहीं हो सकता । मान अपमान तो आत्माका वि. कार और मोहनीय कर्मका कार्य है। इसलिए वह मोह- नीयके शांत होने पर वा आत्मामें कीन होनेपर ही नष्ट हो सकता है इसलिए आत्या अनुराग करना ही मान अपमानको दूर करनेका उपाय है। इसी प्रकार ज्ञान में . .
अत IAL-HIT JInHeaminalILMInkhan मनोनिग्रह-मंत्र ManmlIntelu utatuIMHAJIM १३ प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ उपाध्यायोंसे पढना ही कारण है आत्माके स्वरूपको जाननेवाले वा स्वपर विज्ञानको धारण करनेवाले उपाध्याय या अध्यापक ही श्रेष्ठ पाठक कहे जाते हैं तथा ऐसे ही पाठक आत्माका स्वरूप समझाते हुए ज्ञान विज्ञान की वृद्धि कराते रहते हैं। आत्मज्ञानके साथ भौतिक ज्ञान होना ही श्रेयस्कर है । आत्मज्ञामके विना केवल भौतिकपदार्थोंका ज्ञान होना अनेक पापोंका. कारण है । एवं आत्मज्ञानी अध्यापकोंसे ही विद्याध्ययन करना चाहिये । आत्म- शान और आत्मश्रद्धासे शून्य अध्यापकोंसे विद्या प्राप्त करना संसार समुद्रमें डूबना है । इसलिए विज्ञान प्राप्त करने के लिए सम्यग्दृष्टी अध्यापकोंका ही शिष्य बनना चाहिये । नदीको पार करने के लिए नावोंका प्रयोग किया माता है, समुद्रोंमें जानेके लिए जहाजोंका प्रयोग किया जाता है, अनेक नदियोंके पुल बना लिये जाते हैं इस प्रकार नद मदियोंको पार करनेके उपाय हैं । सदाकाळ आरोग्य बने र नेके लिए वा आरोग्यता बढानेके लिए वैद्योंका आश्रय लिया जाता है । वैद्योंकी अनुमतिसे ही भोजन पानका प्रबंध किया जाता है और इस प्रकार औषधि तथा पथ्य आहारके सेवनसे. आरोग्य की वृद्धि की जाती है । शील वा. ब्रह्मचर्य पालन करनेके लिए वृद्ध पुरुषोंकी संगति की जाती है, अथवा गुरुकुलमें रहा जाता है। गुरुओंके समीप रहना, उनकी आज्ञानुसार -
१४ untunitamite amak on मनोनिग्रह-मंत्र a tina mila nimal.THuskan
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चलना, उनकी सेवा करना आदि ब्रह्मचर्य पालन करने के
लिए सबसे उत्तम उपाय हैं । दुर्गधको दूर करनेके लिए
सुगंधित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। अनेक प्रकारके
सुगंधित पुष्पोंका इतर वा सार भाग निकालकर उसका
प्रयोग किया जाता है अथवा अनेक प्रकारके सुगंधित
चूर्गों का प्रयोग किया जाता है । इस प्रकार दुर्गधको दूर
करनेके लिए अनेक उपाय हैं। इसी प्रकार
शुदात्मजन्य आत्मसुखका राज्य करनेके लिये अपनी
बुद्धि परमात्मामें कीन की जाती है। जो आत्मा आठों
काँसे रहित सिद्ध अवस्थाको प्राप्त होगया है अथवा
घानिया काँको नाशकर अरहंत अवस्थाको प्राप्त हो
गया है उस आत्माको परमात्मा कहते हैं। ऐसे परमात्माकी
आराधना करना और जिस प्रकार परमात्माने अपने
घातिया और अघातिया कोका नाश किया है उसी
प्रकार अपने कर्माको नाश करनेके लिये प्रयत्न करना
तपश्चरण करना वा ध्यान करना, परमात्माको चितवन
करना वा अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपका चितवन करना
आदि आत्माके शुद्ध स्वरूपको माप्त करनेका उपायः है।
इसी उपायसे आत्मजन्य अनंतसुखकी प्राप्ति होती है ।
इसी प्रकार तीनों लोकों में अपनी कीर्ति फैलाने के लिये
समस्त संसारकी सेवा वा जीवोंका उपकार किया जाता
है। यद्यपि धर्मशाला बनवाना, विद्याध्ययनके सामान बना
देना, औषधालय खुलवादेना, - छात्रालय बनवा देना,
Iln amhin nmin armurn kaninanIn मनोनिग्रह-मंत्र Manun hamnhatrim Am १५ अन्नसत्र खोलदेना आदि कार्य भी कीर्ति के साधन हैं परंतु इन कार्योंसे होनेवाली कीर्ति थोडेसे प्रांतमें ही सीमित रहती है। क्यों कि इन कार्योंसे केवल ऐहिक मुखकी प्राप्ति होती है । जो महापुरुष आत्मजन्य सुखकी प्राप्तिके लिये सदुपदेश दिया दिया करते हैं वा भव्यजीवोंको मोक्षमार्गमें लगाया करते हैं उनके चरणकमलोंमें इन्द्रादिक देव भी आकर नम- स्कार किया करते हैं और ऊर्ध्व लोकतक कीर्ति फैलानेका सर्वोत्कृष्ट यही उपाय है । इसी प्रकार संसार- रूपी महासागरसे पार होने के लिए भगवान् जिनेन्द्रदेवके चरण कमलोंकी सेवा की जाती है। भगवान् जिनेन्द्रदेव स्वयं इस संसारमहासागरसे . पार हो गये हैं इसलिए वे ही भगवान् इस संसाररूपी समुद्रसे पार होनेका उप- देश दे सकते हैं । जो पुरुष स्वयं संसार में परिभ्रमण कर रहा है वह अन्य जीवोंको पार कैसे कर सकते हैं। भग- वान् जिनेंद्रदेव सर्वज्ञ वीतराग है । वीतराग और सर्वज्ञ होने के कारण वे यथार्थ तत्त्वोंका ही उपदेश देते हैं । इस- लिए.वे मोक्षमार्गका भी यथार्थ उपदेश देते हैं यही कारण है कि उनके उपदेशके अनुसार अपना आचरण करनेसे अवश्य ही मोक्षकी प्राप्ति होती है । इसीलिये आचार्योंने संसारसे. पार होनेके लिये भगवान् जिनेंद्रदेवकी सेवा करना और उनके उपदेशानुसार अपना चारित्रं पालन करना ही सर्वोत्कृष्ट उपाय बतलाया है । इसी प्रकार गादी
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१६. main.MAMHIMAMHIMAHIN मनोनिग्रह-मंत्र mammIMAntim Aamilyn mmsion
वा रथमें बैठकर एक गांवसे दूसरे गांवतक जाते हैं
अथवा तीर्थयात्रा करनेके लिये पैदल यात्रा करते हैं।
इस प्रकार एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेके लिये
घोडा, गांडी, हाथी आदि सवारियोंका प्रयोग किया
जाता है। इसी प्रकार समस्त कार्योको सिद्धिके लिये
समस्त समुदायकी एकता वा समस्त जीवोंके समान
परिणामोंका प्रयोग किया जाता है अर्थात् समस्त जीवोंके
परिणाम जब समानताको धारण कर किसी कार्यके लिए
उधत हो जाते हैं समस्त जीव मिलकर किसी भी कार्य
को करने में लग जाते हैं तब उस कार्यकी सिद्धि अवश्य
होती है। इसी प्रकार समस्त कोको नाश करने के लिये
आत्म-ज्ञानरूपी 'बाणका प्रयोग किया जाता है । विना
आत्म-ज्ञानके कर्मों का नाश कभी नहीं होता । जब यह
जीव अपने आत्माका यथार्थ स्वरूप जान लेता है तब
वह अपने आत्मासे भिन्न शरीर वा रागद्वेष मोह आदिका
स्वरूप भी जान लेता है और फिर अपने आत्मासे भिन्न
रागादिकका सर्वथा त्याग कर वा शरीरादिकका सर्वथा
त्याग कर वा शरीरादिकसे ममत्वका सर्वथा त्यागकर
अपने आत्माको सबसे भिन्न करलेने का प्रयत्न करता है।
कर्म भी आत्मासे भिन्न है। इसलिए वह अपने आत्माके
उत्तम क्षमा आदिक धर्म वा रत्नत्रयरूप धर्मके समस्त
कर्मों को नाशं कर डालता है। इस प्रकार कर्मोंका नाश
करनके लिए सम्यक्त्वपूर्वक होनेवाला आत्मज्ञान ही
in ataun hanimad only ammundean मनोनिग्रह-मंत्र lndhuluna torn.indiatimukum १७ कारण पडता है। इस प्रकार जो ऊपर अनेक उदाहरण बतलाये हैं वे सब उदाहरण सब लोगों में प्रसिद्ध हैं और समस्त भव्य जीव अपने अपने इष्ट कार्योंकी सिद्धिके लिये उन सब उदाहरणोंको काममें लाते हैं। इसी प्रकार उन भव्य जीवोंको अपनी आशाएं और मनका विरोध करने के लिये वीतराग निग्रंथ मुनियोंकी सेवा करनी चाहिये । जो वीतराग निग्रंथ मुनि अपने आत्मामें सदा कीन रहते हैं और अपने नैराश्य गुणमें सदा तत्पर रहवे हैं ऐसे मुनियोंकी सेवा करनेसे, उनकी आज्ञानुसार चल- नेसे और अत्यंत शान्ति और सुखको देनेवाले उनका समागम करनेसे, उनके समीप बैठने से, उनका उपदेश सुननेसे वा सतत उनके साथ रहनेसे आशाएं भी सब नष्ट हो जाती है और मनका भी पूर्ण रीतिसे निरोध हो नाता है। इसका भी कारण यह है कि वे भगवान मुनि- राज संसारके सुखोंसे परम विरक्त रहते हैं तथा अपने शुद्ध आत्माके स्वरूपमें लीन रहते हैं । जिस प्रकार कोई विद्यार्थी किसी विद्वान्की सेवा करता हुआ उनसे उनकी विद्याओं को ग्रहण कर लेता है उसी प्रकार कोई भी भव्य जीव उन वीतराग निग्रंथ गुरुओंकी सेवा करनेसे वा उन के समीप रहनेसे उनसे नैराश्य गुणको और अन्य समस्त पदार्थों की ओरस अपने मनको हटाकर केवळ अपने आ- स्मामें लीन होनेपर ध्यान गुणको ग्रहण कर लेता है। जिस १८ind namin anty kura hamlindamमनोनिग्रहं-मंत्र himnnmnhemlig himlin tarilyn anti प्रकार सेवा करनेसे धनी पुरुष धन देता है, विद्वान् पुरुष विद्या देता है,कलावान् पुरुष कलाएं सिखला देता है उसी प्रकार बीत राग मुनियोंकी सेवा करनेसे ध्यान और नैराश्य वा वैराग्य गुणकी प्राप्ति अवश्य होती है। ध्यान की प्राप्ति. होना ही मनका निरोध है और वैराग्य उत्पन्न होना ही आशाओंका नाश करना है। अतएव यह भले प्रकारसिद्ध हो जाता है कि वीतराग निग्रंथ मुनियोंकी सेवा करनेसे उनके समीप रहनेसे मनका निरोध अवश्य होता है तथा वैराग्यरूप भावना प्रगट होकर समस्त आशाएं नष्ट हो जाती है । आशाओंको नष्ट करने और मनका निरोध करनेके लिए यह सबसे उत्तम और साल साधन है। इस प्रकार अनेक उदाहरणोंद्वारा मनके निरोध करनेका उपाय बतलाया । आगे-फिर भी आशा और मनका निरोध करनेका उपाय बतलाते हैं। वस्त्रं वरं मलिनमेव वपुः प्रसंगाद् । हारोपि चन्दनचयः कुसुमस्य माला ॥ स्वानन्दसौख्यरहितो ललनाप्रसंगात् । सुज्ञोपि संगसहितो भवति प्रमादी ॥१३॥ दुष्टस्य संगकरणात्सुजनोपि पाप्मा । वेश्यादिसंगकरणाद्धनधर्महानिः ॥
I HAIDAMI MITHe hain मनोनिमाह-मंत्र aapheral artert serial tu १९ मद्यादिपानकरणात्मतिमानहानिः । क्षिप्रं घृतं भवति वा तरलं यथाग्नेः ॥१४॥ हिंसादियापकरणात्परलोकहानि-। रादिद्वेषकरणादिह लोकहानिः ॥ हास्यादिकर्मकरणाल्लघुता भवद्धि । मिष्टं पयोपि विकृतं लवणप्रसंगात् ॥१५॥ आशार्णवश्च तटमेति खलप्रसंगा। लाभो न कोपि भवतीति कदापि बुध्वा । नैराश्यसौख्यनिरतस्य मुनेः सुसंगः । कार्यों भवेत्तव यतः सकलार्थसिद्धिः॥ अर्थ-देखो इस संसारमें इस शरीरक संबंधस निर्मलवस्त्र भी मालिन हो जाता है तथा इसी शरीरके संबंधसे उत्तम हार भी मलिन हो जाता है, घिसे हुए चन्दनका समूह भी मलिन हो जाता है और इसी शरीर के संबंधसे पुष्पमाला भी मलिन हो जाती है । इसी प्रकार स्त्रियोंके संबंधसे. अत्यंत चतुर और ज्ञानी मनुष्य भी आत्मजन्य परम सुखसे. रहित हो जाता है और अत्यंत प्रमादी हो जाता है। इसी मकार दुष्ट पुरुषोंकी संगति करनेसे सज्जन पुरुष भी पापी हो जाते हैं, वेश्या आदि दुराचारिणी त्रियोंकी - .
२० lunmind vintbumundanmमनोनिग्रह-मंत्रntamin mhIMIMIn IWWmalni संगतिसे धन और धर्म दोनोंकी हानि होती है, मद्य, भांग आदि के सेवन करनेसे बुद्धि और मान दोनोंकी हानि होती है, अग्निके संबंधसे जमा हुआ घी भी शीघही पत्तला हो जाता है, हिंसा, झूठ, चोरी कुशील परिग्रह इन पांचों. पापोंक करनेसे चा इनमें से किसी एक पापके करनेसे पर- लोक नष्ट हो जाता है, ईष्या वा द्वेष करनेसे यह लोक नष्ट हो जाता है, किसीकी हसी करनेसे अपनी लघुता होती है और लवणके संबंधसे मांग दूध भी फटकर बिगड जाता है। इसी प्रकार दुष्ट पुरुषोंकी संगतिसे आशा रूपी समुद्र उमडकर किनारतक पहुंच जाता है तथा एन दुष्ट पुरुषोंकी संगतिसे कोई किसी प्रकारका काम नहीं होता । यही समझकर भव्यपुरुषों को इस संसार शरीर और भोगोंसे ममत्वका त्याग कर देना चाहिये और नैराश्य रूप सुखमें तल्लीन हुए मुनियोंकी संगति करनी चाहिये। ऐसे परम मुनियोंकी संगति करनेसे परलोक संबंधी समस्त कार्योंकी सिद्धि हो जाती है। भावार्थ-वस्त्र कैसा ही बहुमूल्य उत्तम पवित्र और स्वच्छ क्यों न हो तथापि एकबार पहन लेनेसे ही अप- वित्र और मलिन हो जाता है । यदि वही वस्त्र बार पार पहिना जाय तो वह अत्यंत मालन हो जानेके कारण घृणास्पद हो जाता है । इसी प्रकार एकबार पहिना हुआ: हार भी अपवित्र हो जाता है, इस शरीर पर लगा हुआ
Immmmmntamanna min aopndomमनोनिग्रह-मंत्र HAMIRnd ayumnMINMINIM२१
चन्दन भी अपवित्र और मलिन हो जाता है तथा गळेमें
पडी हुई पुष्पमाला भी उच्छिष्ट समझी जाती है। जो
पवित्र पुष्पमाळा भगवानके चरणारबिंदोंपर चढानके
लाई जाती है वह पुप्पमाग यदि एकपार भी सूंघ ली
जाप तो फिर वह भगवानके चरणोंपर चढानेके अयोग्य
और अपवित्र हो जाता है । कहने को तो यह मनुष्य शरीर
मोक्षका साधन है परंतु इसके संसर्ग मात्रसे समस्त पदार्थ
अपवित्र हो जाते हैं तथा निर्मल पदार्थ मलिन हो जाते
हैं। अतएव ऐसे इस शरीरसे ममत्वका सर्वथा त्याग कर
वीतराग निग्रंथ मुनियोंकी सेवा करना और सतत उनके
समीप रहना ही इस आत्माका कल्याण करनेवाला है।
इसीप्रकार स्त्रियोंका समागम करनेसे वा उनकी संगतिमें
रहनेसे आत्मजन्य परममुख नष्ट हो जाता है.।
स्त्रियोंकी संगतिमें रहनेवाला पुरुष अपने आत्माके
स्वरूपको भूल जाता है । पुण्य पापको भूल जाता है
और परमार्थको सर्वथा भूल जाता है । स्त्रियोंकी
संगति में रहनेवाला विद्वान् पुरुप भी अत्यंत प्रमादी
हो जाता है और अत्यंत मोहित होकर महा परिग्रही बन
जाता है। इससे सिध्द होता है कि स्त्रियोंकी संगति
करनेसे आत्माका पतन होता है उसका अकल्याण होता.
है और वह अनेक महा दुःखोंका पात्र बन जाता है। इस
लिए स्त्रियोंकी संगतिका सर्वथा त्यागकर वीतराग निग्रंथ.
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२२ Intrnima Hasna PaIHAHIM मनोनिग्रह-मंत्र In nimn mahmmmramme onm
मुनियोंकी सेवा करनी चाहिए और उन्हींकी संगतिमें
रहकर अपने आत्माका कल्याण कर लेना चाहिए । इसी
प्रकार दुष्ट पुरुषोंकी संगतिमें रहकर सज्जन पुरुष भी
महापापी बन जाते हैं। देखो कुम्हारकी लडकीके निमि-
तसे मुनि मायनंदि भी कुम्हारोंका काम करने लग गये
थे। इसी प्रकार हिंसक मनुष्योंकी संगतिसे यह मनुष्य
हिंसक बन जाता है, मद्य पीनेवालोंकी संगतिसे मथ पीने
लगता है, चोरोंकी संगतिसे चोर होजाता है. और जुआ.
रियोंकी संगतिसे जूआ खेलने लगता है । यही. समझकर
भव्य पुरुषोंको अपने आत्माका कल्याण करने और
आत्मध्यानकी प्राप्तिके लिए मुनियोंकी संगतिमें ही रहना
चाहिए । इसी प्रकार वेश्याओंकी संगति करनेसे यह
मनुष्य महा पतित और महा पापी हो जाता है । वेश्याकी
संगति करनेसे सेठ चारुदत्तको भी महा दुःख भोगने पडे.
थे। वेश्यायें अत्यंत अपवित्र अत्यंत घृणित और अत्यंत
निंदनीय होती हैं । जो पुरुष ऐसी वेश्याओं की
संगति में रहते हैं वे पुरुष भी अत्यंत अपवित्र, अत्यंत
घृणित, अत्यंत पतित और अत्यंत निंदनीय हो
जाते हैं। वेश्याओंकी संगति साक्षात् नरकका द्वार
इनकी संगतिसे धन भी नष्ट होता है और धर्म भी नष्ट
होता है । इसलिए ऐसी नीच संगतिका सर्वथा त्यागकर
प्रत्येक भव्य जीवको वीतराग निग्रंथ पुनियों की सेवा
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tumkamunkumlnd animalksymnakan मनोनिग्रह-मंत्र Manin amms harmrinku२३ करनी चाहिये आत्मकल्याण और यथार्थ सुखका यही सर्वोत्तम मार्ग है । इसी प्रकार मयका सेवन करनेसे अथवा मधके समान मोहित करनेवाले भांग, चरस, गांजा अफीम आदि मादक पदार्थों का सेवन करनेसे बुद्धि भ्रष्ट हो हो जाती है। और अपना मान, बडप्पन, प्रतिष्ठा आदि सब नष्ट हो जाते हैं । मादक पदार्थोंको सेवन करनेवाले पुरुष अपने आत्मका स्वरूप भूल जाते हैं। माता बहिन स्त्री आदि सघको भूल जाते हैं और माताको स्त्री वा स्त्रीको माता समझने लगते हैं। ऐसी अवस्थामें भला वे अपने मनका निरोध किस प्रकार कर सकते हैं तथा आत्माका कल्याण किस प्रकार कर सकते हैं। इसलिए ऐसे मादक पदार्थों का सर्वथा त्यागकर तथा आत्माको मोहित करनेवाले मोहनीय कर्मको नष्ट कर वीतराग निग्रंथ मुनियोंकी सेवामें रहना चाहिये । जिस प्रकार अनिके निमित्तसे जमा हुआ घी भी शीघ्र ही पतला हो जाता है । उसी प्रकार वीतराग निग्रंथ मुनियोंके संसर्गसे इस आत्माकी जडता अज्ञानता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है, तथा फिर यह आत्मा अपने आत्मकल्याणमें अवश्य लग जाता है। इसी प्रकार इस संसारमें हिंसा आदि पाप कर- नेसे पर लोक नष्ट हो जाता है। जो हिंसा करता है वह अवश्य ही नरक निगोदके दुःख भोगता है, तथा वहांसे निकलकर सिंह सर्प आदि की पर्यायें धारण करता हुआ
२४ me antrn min Damkunam मनोनिग्रह-मंत्र I amIn The namakamr malkant
फिर नरकादिकमें जा पडता है। इस प्रकार हिंसा करना
महा पाप है । अत एव हिंसादिक समस्त पापोंका त्याग
कर भव्य जीवोंको वीतराग निग्रंथ मुनियोंके ही आश्रयमें
रहना चाहिए । इसी प्रकार ईर्ष्या वा द्वेष करनेसे यह
लोक नष्ट हो जाता है । जिसके साथ ईष्या वा द्वेष किया
जाता है वह पुरुष भी अपने ईर्ष्या द्वेषके कारण उसको
अनेक प्रकारकी हानि पहुंचानेका प्रयत्न करता रहता है.
और इस प्रकार उन दोनोंके इस लोक संबंधी समस्त
कार्य नष्ट होते रहते हैं। इसलिए ई| वा द्वेषका सर्वथा
त्यागकर परम पवित्र मुनियोंके आश्रयमें रहना ही इस
आत्माका कल्याण करनेवाला है। जो पुरुष दूसरोंकी हंसी
करता है वह मनुष्य कभी न कभी अवश्य ही नीचा
देखता है। अत एव हंसी, शोक, रति, अरति, भय आदि
सबका त्याग कर वीतराग मुनियोंके समीप रहकर आत्म
कल्याण करना उचित है । जिस प्रकार लवणके निमि-
तसे मीठा दूध भी फटकर बिगड जाता है। उसी प्रकार
इस संसारमें रहनेवाले दुष्ट पुरुषोंके निमित्तसे आशारूपी
समुद्र उमडकर अपने किनारे तक आ पहुंचता है अर्थात
इस संसारमें रहनेमात्रसे अनेक आशाओंकी वृद्धि
होती रहती है। तथा उन संसारी प्राणियोंके निमित्तसे
इस जीवको सिवाय अनेक प्रकारके दुःखोंके रंचमात्र भी
सुख नहीं मिलता है । आशाएं कभी किसीकी पूर्ण नहीं
Her-keraltakarts-Introl arsink- मनोनिग्रह-Malrefemama.TIMInHILITakNI २५ होती प्रत्येक प्राणी प्रत्येक क्षणमें अनंत आशाएं उत्पन फरता रहता है और उनकी एक एक आशा इतनी पडी होती है कि उसके सामने इस समस्त संसारकी विभूति एक अणुके समान जान पडती है। फिर भला समस्त संसारके समस्त प्राणियोंकी आशाएं फिस प्रकार पूर्ण हो सकती हैं। यही समझकर आशामात्रका सर्वथा त्यागकर देना चाहिये और आत्माका सर्वोत्कृष्ट कल्याण करनेवाले परमनैराश्य गुणको धारण करनेके लिए तथा फिर यह मन कभी भी आशाओंकी ओर दीड न लगावे और वह मन सदाफाल अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन बना रहे इसके लिए परम वीतराग निग्रंथ मुनियोंके समीप रहकर उनकी सेवा करते रहना चाहिये । वीतराग निग्रंथ मुनियोंके समीप रहने और उनकी सेवा करनेसे इस लोक सम्बंधी समस्त कार्योंकी भी सिद्धि होती है और परलोक संबंधी समस्त कार्योंकी भी सिद्धि होती है। मुनियोंके आश्रयमें रहनेसे आशाएं सब नष्ट हो जाती है, नैराश्य गुण प्रगट हो जाता है और मनके समस्त संकल्प विकल्प छूटकर मन अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन हो जाता है। जब यह मन आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन हो जाता है तब शुद्ध आत्माके ध्यानकी प्राप्ति होती है और फिर उस ध्यानसे समस्त कर्मों का नाश हो जाता है तथा मुक्त अव- स्थाके अनंत मुख प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार मुनियोंकी ४ . . . २६ mmHIRAIMIn Amrinkamim AMD मनोनिग्रह-मंत्र MmmamalIn In Niya am] सेवा करनेसे परमोत्कृष्ट पदार्थकी प्राप्ति वा सिद्धि हो. जाती है । इसलिये समस्त भव्य जीवोंको अपनी इन्द्रियाँ और मन वश करने के लिये वीतराग निग्रंथ गुरुओंके ही समीप रहकर आत्म कल्याण करना चाहिये । आत्माके कल्याण करनेका सर्वोत्कृष्ट मार्ग यही है। आगे फिर भी अनेक उदाहरण देकर मनको वा. करनेके लिये उपदेश देते हैं। दृष्टं यथा न च विषे ह्यसुरक्षणत्वं । चौरे यथा सुजनता न खले नरत्वम् । निम्बे न वा मधुरता मृदुता न काष्ठे । वेश्याजने न कुगतौ शुचिता सुखत्वम् ॥१७॥ सिंहाहिवृश्चिकचयेऽपि दया न धर्मों। जारस्य नेत्रयुगले स्थिरता न वाते ॥. कामाग्निदग्धपुरुष समता न शत्रौ ॥ ह्यग्नौ रवौ हतमतौ कृपणे न शान्तिः ॥१८॥ आशाग्निदग्धमनुजे चलचित्तसाधौ । दृष्टो न कोऽपि सुगुणो हि तथेति बुध्वा ॥ नैराश्यसौख्यनिरतस्य मुनेः सुसंगः । कार्यों भवेदपि यतो हि.तवेष्टसिद्धिः ॥१९॥ - in atmintmlund atun MP मनोनिग्रह-मंत्रuntamin mh all intentindanm २७ अर्थ-जिस प्रकार किसी भी विषमें जीवोंके प्राणों की रक्षा करनेकी सामर्थ्य नहीं है, जिस प्रकार चोरमें सज्जनता नहीं है, दुष्ट मनुष्यों में मनुष्यपना नहीं है,नीमके धृक्षमें पधुरता नहीं है,काठमें कोमलता नहीं है वेश्याओंमें पवित्रता नहीं है,नरका- दिक कुगतियों में सुख नहीं है, सिंह, सर्प, बिच्छू आदि हिंसक जीपोंमें दया धर्म नहीं है, व्यभिचारी मनुष्योंके नत्रों में स्थिरता नहीं, या वायुमें स्थिरता नहीं है, कामरूपी अग्निसे जले हुए पुरुषोंमें समता नहीं है, और जिस प्रकार शत्रुमें, अग्निमें, सूर्यमें, हतबुद्धि पुरुप और कृपण मनुष्य में शांति नहीं है उसी प्रकार आशारूपी अग्निसे जिनका हृदय जल रहा है ऐसे मनुष्योंमें तथा जिनका हृदय चंचल हो रहा है ऐसे साधुओंमें कोई भी श्रेष्ठगुण दिखाई नहीं देते हैं यही समझकर नैराश्यगुणमें लीन रहनेवाले मुनियोंका ही समागम करना चाहिये । ऐसे मुनिराजोंकी संगति करनेसे वा उनकी सेवा करनेसे तुम समस्त भव्य जीवोंकी इष्ट सिद्धि हो सकती है। भावार्थ-संखिया,सिंगिया,धतूरा आदि विप कहलाते हैं। यद्यपि शुद्ध किये हुए संखिया सींगिया धतूरे आदिसे प्राणरक्षा होती है। परंतु शुद्ध किये हुए संखिया, सींगिया, धतूरे आदिको औषधियां कहते हैं। फिर उनको विष कोई नहीं कहता। विना शुद्ध किये हुए संखिया सींगिया , धतुरे आदि ही विष कहलाते हैं और इन विपोंमें प्राणोंकी
२८ pal arma InHMIn Im मनोनिग्रह-मंत्रlamin
रक्षा करनेकी सामर्थ्य कभी नहीं हो सकती । इसी प्रकार
चोरमें यदि सज्जनता हो तो वह कभी भी चोरी नहीं कर
सकता । क्यों कि लोग प्राण देकर भी धनकी रक्षा करते.
हैं इसलिए धन प्राणोंसे भी बहकर माना जाता है।
सज्जन पुरुष ऐसे प्राणके समान धनकी चोरी कभी नहीं
कर सकता अथवा जो ऐसे धनकी चोरी करता है वह
सज्जन कभी नहीं हो सकता । इसलिए चोरमें सज्जनता
कभी नहीं होती । इसी प्रकार दुष्ट मनुष्यों में दुष्टता होती
है मनुष्यता नहीं होती। यदि उनमें मनुष्यता हो और
वह मनुष्योचित कार्य करता हो तो वह दुष्टता कभी किसी
के साथ नहीं कर सकता । इससे सिद्ध होता है कि दुष्ट
मनुष्योंमें मनुष्यता कभी नहीं होती । इसी प्रकार नीमके
वृक्षमें, मधुरता नहीं होती, क्यों कि नीम कडवा ही होता
है । उसकी जड छाल गुद्दे लकडी मत्ते आदि सब कडवे
होते हैं, तथा सूखी लकडीमें कोमलता नहीं होती। सूखी
लकडी नवानेसे टूट जाती है परंतु नम्र नहीं होती। इसी
प्रकार वेश्यामि पवित्रता नहीं होती। क्यों कि वेश्याएं
व्यभिचारिणी होती है, और व्यभिचारिणी स्त्रियोंमें कभी
पवित्रता नहीं हो सकती । वेश्याएं और वेश्याओंकी
संगति करनेवाले पुरुषोंका सूतक पातक ही कभी नष्ट नहीं
होता । अतएव उनमें पवित्रता भी कभी नहीं हो सकती।
वेश्याएं सदाकाल मध मांस का सेवन करती हैं वा. मद्य:
IMA INT ]19 NIMATIMInAmमनोनिग्रह-मंत्र ManInIMNHIMINAINARM २९
मांस सेवन करनेवाले पुरुषोंकी संगति करती हैं या नीच
पुरुषोंकी संगति करती हैं इसलिये भी उनमें पवित्रता कभी.
नहीं हो सकती इसी प्रकार नरकमें सुख की प्राप्ति नहीं हो
सकती । नरकमें तो क्षण मात्रको भी कभी मुख नहीं
मिलता और न निगोदमें कभी जन्म मरणसे अवकाश
मिलता है । तथा पशुओंमें भी अनेक प्रकार के महादुःख
देखे जाते हैं। इसलिये इन कुगतियोंमें कभी. सुखकी
माप्ति नहीं हो सकती । इसी प्रकार सिंह, सर्प, बिच्छू,चीता,
वाघ भेडिया आदि घातक पशुओंमें न कभी दया. दिखाई
पढती है और न वे अधिकतररूपसे किसी धर्मका पालन
कर सकते हैं। इसलिये हिंसक पशुओंमें दया धर्म कभी
नहीं हो सकती । हिंसक पशु तो सदाकाल हिंसा करने
की ही खोजमें रहते हैं, इसलिये उनमें कभी भी दया धर्म
नहीं हो सकता। इसी प्रकार व्यभिचारी पुरुषके नेत्रों में
कभी स्थिरता नहीं हो सकती । व्यभिचारी पुरुषोंके नेत्र
सदाकाळ चंचळ रहते हैं। ऐसे पुरुष नवीन नवीन व्यभि-
चार करनेकी खोज में रहते हैं। इसलिये उनके नेत्रों में
स्थिरता कभी नहीं हो सकती। तथा वायु भी.
सदा चलती ही रहती है। वायु कभी भी स्थिर नहीं रह
सकती। इसी प्रकार जिस पुरुषका . हृदय कामसेवनकी
अग्निसे जल रहा है उसके हृदयमें समतारूप परिणाम.
कभी नहीं हो सकते । जिस पुरुषके हृदयमें काम सेवनकी
३० lut turnt almitrue katrint Emमनोनिग्रह-मंत्र tinalnmIN ITIH AamI MITHILA NI
इच्छा होती है उसका हृदय सदाकाल जलता रहता है
और उसमें नवीन नवीन इच्छाएं उत्पन्न होती रहती हैं।
इसलिए उस हृदयमें समता वा शांत घुद्धिका कभी प्रवेश
ही नहीं हो सकता । इसी प्रकार शत्रु कभी शान्त नहीं
होता. सूर्य अग्नि कभी शीतल नहीं होते कृपण कभी
शान्त नहीं होता और जिसकी बुद्धि मारी गई है उसके
हृदयमें कभी शान्ति नहीं होती । इस प्रकार अपर अनेक
पदाहरण बतलाये हैं और उनमें कहे हुए गुण कभी नहीं
होते । विषमें प्राणरक्षा, चोरमें सज्जनता, दुष्टमें मनुष्यता,
नीममें पधुरता, काष्ठमें कोमलता, वेश्याओंमें पवित्रता,
नरकमें मुख, हिंसक जीचोंमें दयाधर्म, व्यभिचारियों के
नेत्रोंमें और वायुपें स्थिरता, कामी पुरुषों में समता, और
शत्रु, सूर्य, अग्नि, कृपणं आदिमें शांति नहीं होती उसी
प्रकार आशारूपी अग्नि से जले हुए मनुष्योंमें कोई गुण नहीं
होता तथा चंचळ चित्तको धारण करनेवाले साधुमि
भी कभी कोई श्रेष्ठ गुण नहीं होता। यही समझकर
जो वीतराग . निग्रंथमुनि सदाकाल . नैराश्यगुणमें
कान रहते हैं ऐसे मुनियोंकी संगतिमें ही रहना
चाहिये। ऐसे महा मुनियोंकी संगतिमें रहनेसे उनकी
सेवा सुश्रूषा करनेसे वा 'उनकी आज्ञानुसार चळनेसे
नैराश्य गुण प्रगट होता है, मनका निरोध होकर ध्यान
की प्राप्ति होती है, ध्यानकी माप्ति हानेसे कर्मोंका नाश
. Antarns amrkn sihmla fatrakant मनोनिग्रह-मंत्र (Inanimn annindanhini nusk होता है और कर्मों का नाश होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार वीतराग मुनियोंकी सेवा करनेसे मोक्षरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि हो जाती है। और संसारमें यही सर्वोत्कृष्ट इष्ट पदार्थ है । यही समझकर भव्य पुरुषोंको सदाकाल वीतराग निग्रंथ मुनियोंके ही आश्रयमें रहना चाहिये । आत्माके कल्याण करनेका यही सर्वोत्कृष्ट मार्ग है। आगे कुसंगतिके त्याग करनेका उपदेश देते हैं। जिह्वापि जन्तोः सजलेव दृष्ट्वा । स्याद्भक्षयन्तं मनुजं च चिंचाम् ॥ छिन्दन्तमेवापि नरं च कन्दं । नेत्रं स्वभावात्सजलं यथा स्यात् ॥ २० ॥ च्युताः स्वभावाद्यपि केऽपि जीवाः । संसर्गतो मोहिनृणां कुनार्यः ॥ भूता भवन्त्येव च दुःखपात्रा । ज्ञात्वेति हेयो भुवि तत्प्रसंगः ॥ २१ ॥ अर्थ-जो मनुष्य इमली खा रहा है उसको देखकर दूसरे मनुष्योंकी जीभमें पानी उतर आता है। इसी प्रकार जो मनुष्य गाजर. सकरकंद आदिका . छेदन भेदन करता है उसको देखकर दूसरे मनुष्योंके नेत्रोमें -
३२ unkamla annapurnaimमनोनिग्रह-मंत्र Imamim annamlmadaminatml
: स्वभावसे ही जल आजाता है। इसीप्रकार जो मनुष्य
.' अपने स्वभावसे च्युत. होजाते हैं अथवा कामादिकसे मोहित
हुए मनुष्योंके संसर्गसे जो व्यभिचारिणी स्त्रियां अपने
स्वभावको छोड देती है वे पुरुष तथा स्त्रियां दोनो ही
: सदाकाल दुःखी होते रहे हैं और सदाकाळ होते रहेंगे।
'. यही समझकर इस संसारमें ऐसे मनुष्य व स्त्रियोंका संसर्ग
सदाके लिए छोड़ देना चाहिए ।
भावार्थ-इन श्लोकोंमें आचार्य यह दिखला रहे हैं
कि दुष्ट मनुष्योंकी संगतिसे तो दुःख होता ही है किंतु
जिस प्रकार इमली खानेवाले मनुष्यको देखनेमात्रसे
देखनेवालेकी जीभमें पानी आजाता है, उसी प्रकार दुष्ट
पुरुषोंके थोडेसे संसर्गसे ही महादुःखकी प्राप्ति होती है ।
देखो हीराकी कनी बहुत ही छोटी होती है तथा देखनेमें
भी अत्यंत सुंदर होती है तथापि पेटमें पहुंचनेपर वह
आंतोंको काटकर मनुष्यको मार देती है । इसी प्रकार
व्यभिचारी पुरुषोंकी संगतिसे कभी कभी शीलवती स्त्रियां
भी अपना शील खो देती हैं अथवा अपने शील स्वभावसे
च्युत हुए मनुष्य भी अपने शीलको खोकर महादुःखी
होते हैं । थोडेसे विषके संसर्गसे ही यह मनुष्य अपने प्राण
१. खो देता है । दुष्ट पुरुषोंकी संगतिसे कभी किसी प्रकार भी
सुख नहीं मिल सकता। अत एव भव्यजीवोंको सबसे पहले
दुष्ट मनुष्योंकी संगतिका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये ।
linkunthlndmintunanmum huntinum मनोनिग्रह-मंत्रHmul. mami animam ३३ जबतक. इस दुष्ट संगतिका त्याग नहीं होता तब तक यह जीव श्रेष्ठ मनुष्योंकी संगतिमें चा वीतराग निथ गुरुओं की संगतिमें कभी नहीं बैठ सकता तथा चीतराग निग्रंथ गुरुओंकी संगतिके विना यह जीव अपने मनको कभी वश नहीं कर सकता और मनको वशमें किये विना दुःखोंसे कभी नहीं छूट सकता अथवा कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकता । अत एव इन सब बातोंको समझकर भव्यजीवोंको सबसे पहले दुष्ट पुरुषोंकी संगतिका त्याग कर देना चाहिये और फिर निग्रंथ गुरुओंके शरणमें रहकर आत्मकल्याण कर लेना चाहिये । यही भगवान् जिनेन्द्र देवका सदुपदेश है। आगे फिर भी इसी बातको दिखलाते हैं- वस्तुखभावात्सहवासयोगाद् । यादृक् पदार्थाश्च नृणां समीपे ॥ भवन्ति भावा इति तादृशो हि । प्रोक्तं प्रमाणाद् गुरुकुन्थुनाम्ना ॥२२॥ अर्थ-जिन मनुष्योंके समीप जैसे पदार्थों का संबंध रहता है उन पदार्थों के संबंधसे उनके परिणाम भी वैसे ही हो जाते हैं। यह उन पदार्थोंका स्वभाव है, जिस प्रकार दुष्ट मनुष्योंके संबंधसे दुष्टता आजाती है उसी प्रकार
-
३४ uintaniun tilt turkunthan मनोनिग्रह-मंत्रmaamin mmun nimun dummadamh
वीतराग निग्रंथ गुरुओंके संबंधसे यह जीव जगत्पूज्य
जगदगुरु वन जाता है। यही समझकर प्रत्येक भव्य
जीवको अपनी संगति सर्वोत्कृष्ट रखनी चाहिये । संसार
की समस्त संगतियोंका त्याग कर परम वीतराग निग्रंथ
मुनियोंके आश्रयमें ही रहना चाहिये । वीतराग निग्रंथ
गुरुओका आश्रय साक्षात् मोक्षका साधन है। ऐसा..
आचार्यवर्य श्री कुंथुसागर स्वामी कहते हैं।
इति श्रीमदाचार्यप्रवर श्रीकुंथुसागरविरचिते
मनोनिग्रहमंत्रग्रंथे सत्पुरुषसमागम
फलवर्णनो नाम प्रथमोध्यायः ।
श्री परमपूज्य आचार्यवर्य श्री कुंथुसागर विरचित
मनोनिग्रहमंत्र.नामके ग्रंथकी
धर्मरत्न
पं. लालाराम शास्त्री विरचित सरल
हिन्दी भाषा टीकामें सज्जन पुरुषों
के.समागमके फलको वर्णन
करनेवाला यह पहला
अध्याय समाप्त |
tumkumlInInIHARIHA Amika Amमनोनिग्रह-मंत्र In Indian tream ३५ दूसरा अध्याय - आगे मनांनिरोध करने के लिए सर्वोत्कृष्ट योग्य विधि लिखते हैं। आशाग्नितापशमितुं यदि चेत्तवेच्छा रोर्बु तथा सपदि चित्तमपीह दुष्टम् स्वानन्दसौख्यनिरतस्य मुनेः प्रसंगः । कार्यों विहाय सकलं विषयं विवादम् ॥२३॥ अर्थ- हे भव्य ! यदि तू अपनी आशारूपी अग्निको शांत करना चाहता है और शीघ्र ही इस दुष्ट चित्तकी चंचलताको रोकना चाहता है तो तुझे सबसे पहले समस्त विषयोंको और विवादोंको छोडकर अपने आत्मजन्य सुखमें लीन रहनेवाले मुनियोंका ही समागम करना चाहिये। भावार्थ-यह बात पहले भी कह चुके हैं और भव्य जीचोंको और अधिक समझाने के लिए फिर भी कहते हैं कि यह आशा एक प्रकारकी अग्नि है, जिस प्रकारस अग्नि समस्त ईंधनको जला देती है उसी प्रकार यह आशा रूपी अग्नि भी संसारक समस्त प्राणियोंको जला रही है। इसी प्रकार यह मनकी चंचलता भी अनेक प्रकारकी मान-
३६ AT THREATESTHAT मनोनिग्रह-मंत्र AREAMIC
सिक व्यथाओंको उत्पन्न करती रहती है । अत एव यदि
भन्यजीव इन दोनों दुःखके कारणोंको दूर करना चाहते
हैं और आत्मजन्य सुखकी प्राप्ति करना चाहते हैं तो
उनको सबसे पहले समस्त विषय कपायोंका त्याग कर
देना चाहिये तथा समस्त प्रकारके वाद विवादोंका त्याग
कर देना चाहिये और संसारकी समस्त आशाओंका त्याग
कर तथा मनकी चंचळताको पूर्ण रीतिसे रोककर केवळ
अपने आत्मामें लीन रहनेवाले वीतराग निग्रंय मुनियोंके
ही आश्रयमें रहना चाहिये, उनकी ही सेवा सुश्रूषा करना
चाहिये और सदाकाळ उन्हीकी आज्ञाका पालन करते
रहना चाहिये । परम मुनियोंके सन्निकट रहनेसे आशाएं
भी सब नष्ट हो जाती हैं और यह चंचल मन भी अपने
आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन हो जाता है । आत्माके शुद्ध
स्वरूपमें मनके लीन होनेसे काँका नाश हो जाता है
और परम पुरुषार्थरूप मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है । अत एव
संसारके समस्त विषयोंका त्यागकर मुनियोंके आश्रयमें
वा उनकी सेवामें रहना ही सर्वोत्कृष्ट आत्मकल्याणका
मार्ग है। और यही प्रत्येक भव्यजीवको ग्रहण कर
लेना चाहिये।
आगे एक शिष्य अपने गुरुके सामने अपनी एक
शंका रखता है और वह इस प्रकार है।
Ind numnominaInHIMn मनोनिग्रह-मंत्र IIaLama NIA IMhannum ३७ निषिध्यते त्वया संगः केनचित्कथ्यतेऽपि को कथं मे दृश्यते रोधो मिथो बोधाय कथ्यताम्॥२॥ श्रीवितरागधर्मस्यानभिज्ञाः केचिदेव ये । मूच्छैव संगचिहुं को केवलं कथयन्ति ते ॥२५॥ तदर्थं नैव जानन्ति यतः कुर्वन्त्यनर्थकम् । केचिदन्येऽपि विद्वांसो ब्रुवन्तीत्यविवेकतः ॥ २६ ॥ भुंजन्ते संस्मृतौ सौख्यमुदासीनाः सदा यदि । कुर्वन्ति कर्मबंध न ह्येवं मतांतरं मतम् ॥ २७ ॥ स्वच्छन्दपक्षपुष्ट्यर्थ प्रचारं पापवर्द्धकम् । ... जन्ममृत्युजरामूलं कुर्वन्त्येव ह्यनर्थकम् ॥२८॥ यत्रातो तत्र लोकेऽस्मिन् हाहाकारः प्रदश्यते । सच्छान्त्यै सदुपायोऽयं लिख्यते धीमता ह्यधः॥२९॥ अर्थ-इस संसारमें कोई शिष्य कहता है कि हे भगवन् ! आप संग वा परिग्रहका निषेध करते हैं। परंतु वह परिग्रह किस प्रकार रुक सकता है, यह बात परस्पर सम- झनेके लिए बतलाइये । इस वीतरागः धर्मके स्वरूपको न जाननेवाले कितने ही लोग यद्यपि मूर्छा वा ममत्व बुद्धिको ही परिग्रहका लक्षण बतलाते है परंतु वे लोग इस
.
३८ unlimina amita amrika मनोनिग्रह-मंत्र mammi MammiNHAmTHyAmM
ममत्व बुद्धिका अर्थ नहीं जानते और इसीलिए वे, अनेक
प्रकारके अनर्थ करते रहते हैं। तथा कितने ही विद्वान्
पुरुष भी अपने मिथ्याज्ञान के कारण उस ममत्तबुद्धिका
अर्थ विपरीत पतलाकर अनर्थ करते हैं। वे कहते हैं कि
" यदि उदासीन होकर संसारके मुखौंका अनुभव किया
जाय तो उस मुखके अनुभव करनेसे कर्मोंका बंध कभी
नहीं होता। इस प्रकार वे विपरीत बुद्धिको धारण करने-
वाले विद्वान् लोग अपना एक मतान्तर स्थापन करते हैं।
तथा अपने उस स्वतंत्रपक्षकी पुष्टि करने के लिए वे जन्म
जरा मरण आदिको वढानेवाले और अनेक प्रकारके
पापोंकी वृद्धि करनेवाले इस नवीन मत्तका प्रचार करते हैं
और इस प्रकार अनेक प्रकारके अनर्थ उत्पन्न करने हैं।
परंतु जहां जहां ऐसे अनर्थ होते हैं वहां वहां हाहाकार
ही दिखाई देता है। अत एव उस हाहाकार और अनाँको
शान्त करनेके लिए. अत्यंत विद्वान् ऐसे आचार्य श्रीकुंथु-
सागर स्वामी नीचे लिखे अनुसार सर्वश्रेष्ठ उपाय बतलाते हैं।
भावार्थ-मूर्छा वा ममत्वबुद्धि . परिग्रहका चिह्न
है. यह बात तो ठीक है । परंतु उस मूर्छा वा ममत्व
बुद्धिका अर्थ समझना कठिन है । कोई कोई श्वेतांवर साधु
परिग्रह तो रखते हैं परंतु कहते यह हैं कि हम लोग जो.
परिग्रह रखते हैं उसमें ममत्वबुद्धि नहीं रखते। विना मम:
त्वके ही परिग्रह रखते हैं। इसीलिए हम लोगोंको उस
makarima DamInHLnman am मनोनिप्रह-मंत्र mmsamin nindmma amithlam ३९..
परिग्रह रखनेसे कोई किसी प्रकारका कर्मबंध नहीं होता।
और इसीलिए हम साधु लोग ( श्वेताम्बर साधु ) परि-
ग्रह रखते हुए भी अपरिग्रही साधु कहलाये हैं।" परंतु
आचार्य कहते हैं कि यह उनका अज्ञान है। तथा ऐसे
अज्ञानसे अनेक प्रकारके अनर्थ होते हैं। जहाँपर विषयों-
की आशा बनी रहती है और इन्द्रियोंका निग्रह नहीं होता
वहींपर परिग्रह रक्खे जाते हैं और जहाँपर परिग्रह होते हैं
वहांपर अनेक प्रकारके अनर्थ हाहाकाररूप अनेक प्रकारके.
दुःख और मानसिक पीडाएं हुआ करती हैं। वे दुःख
मानसिक पीडाएं वा अनर्थ न हो इसके लिए आचार्य
आगके श्लोकोमें उपाय बतलाते हैं ।
देहोऽपि में नैव भवेत्कदापि ।
सदा समं गर्भत एव वासी ॥
देहादिसम्बन्धिजनस्य लोकेऽ- ।
लंकारवस्त्रस्य कथाति कास्ति ॥ ३० ॥
ज्ञात्वेति देहादिधनस्य मोहं ।
त्यक्त्वात्मशुद्धिं कुरु विश्वशान्तिम् ॥
स्यात्ते यतो मुक्तिरमापि दासी ।
भावोऽस्ति सूरेर्वरकुंथुनाम्नः ॥ ३१ ॥
,
gro Imranylure namhintamhukhIn मनोनिग्रह-मंत्र unnamed nline nintenanBline num
1. अर्थ-देखो यह जीव जब गर्भ में आता है तभीसे
यह शरीर इस जीवके साथ रहता है। परंतु गर्भ अवस्थासे
ही साथ रहनेवाला यह शरीर अपना वा इस आत्माका .
कभी नहीं हो सकता। जब यह ऐसा सदासे साथ रहने
वाला शरीर ही अपना नहीं होता है तो फिर इस शरीरसे
संबंध रखनेवाळे माता, पिता, भाई, बहिन, स्त्री पुत्र आदि
अपने कब हो सकते हैं ? तथा वस्त्र अलंकार आदि सर्वथा
परपदार्थ अपने कब हो सकते हैं। अर्थात् अपने कभी
नहीं हो सकते । यही समझकर भव्य जीवोंको शरीर धन
आदि सबका मोह छोडकर अपने आत्माको शुद्ध करना
चाहिये । अपने आत्माको शुद्ध कर लेनेसे ही इस संसारमें
शान्ति प्राप्त हो सकती है और आत्माको शुद्ध कर लेनेसे
ही मोक्षरूपी लक्ष्मी अपनी दासी बन जाती है । ऐसा
आचार्यवर्य श्रीकुंथुसागर स्वामीका अभिप्राय है।
भावार्य-आचार्य ऊपर लिखी हुई शंकाका सपा-
धान करते हैं कि जब गर्भसे साथ रहनेवाला यह शरीर
अपना नहीं है तो फिर पत्र आदि बाह्य परिग्रह अपना
कैसे हो सकता है ? श्वेताम्बर साधु जो वस्त्रादिक परिग्रह
रखते हुए भी अपनेको - अपरिग्रही मानते हैं यह उनकी
अज्ञानता और · मिथ्याबुद्धि है । परिग्रह : रखनेसे
अहिंसा महाव्रत कभी नहीं पळ सकता। क्यों कि उन
चत्रों को धोना भी पडता है । यदि न धोये जायं तो उनमें
indanmindanmindanlmnk nirmanan मनोनिग्रह-मंत्र Malamma samundarIndam ४१ अनेक जीव पड़ जाते हैं और यह सब हिंसा उन वना- दिक रखनेवाले साधुओंको लगती है। इसलिए यही कहना पडता है कि श्वेताम्बर लोग परिग्रहका लक्षण मूर्छा वा ममत्वबुद्धि कहते हैं। परंतु उस ममत्व बुद्धिका यथार्य अर्थ नहीं समझते। यदि वे ममत्वबुद्धिका अर्थ समझते तो उन्हें शरीरसे भी ममत्व छोड देना चाहिये क्यों कि शरीर भी पर है जड है, पौद्गकिक है और आत्मासे सर्वथा भिन्न है । जब साधु लोग अपने शरीरसे भी मम- त्वका त्यागकर देते हैं फिर भला वे वस्त्रादिक परिग्रह किस प्रकार रख सकते हैं अर्थात् कभी नहीं रख सकते। अतएव साधु होकर वस्त्रादिक परिग्रह रखना अनर्थ है, हिंसाका प्रचार करना है और पापको बढाना है। . जो वीतराग निग्रंथ साधु तिळ तुप मात्र. भी परिग्रह नहीं रखते । और न कभी शरीरसे ममत्व रखते हैं। अपने शरीरसे भी ममत्वका त्यागकर केवल अपने आत्मामें तीन रहते हैं तथा रागद्वेषको नष्टकर आत्माको शुद्ध करनेमें लग जाते हैं ऐसे परमशांत वीतराग साधु अवश्य ही मोक्ष- रूप लक्ष्मीको प्राप्त करते हैं । ऐसा आचार्यचर्य श्रीकुंथुसा- गर स्वामीका सदुपदेश है। रागद्वेषको दूर करनेसे ही मूर्छा वा परिग्रहका त्याग होता है । जबतक रागद्वेष है तबतक परिग्रहका त्याग कभी नहीं हो सकता । अतएव भव्य जीवों को सबसे पहले रागद्वेषका सर्वथा त्यागकर ४२ n nimal Armype annivnkni मनोनिग्रह-मंत्र HAMRimal anthlm IVRImamelwalast शरीरसे भी ममत्वका त्याग कर देना चाहिये, और अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन होकर मोक्ष प्राप्त कर लेना चाहिये । अपने आत्माका कल्याण करनेके लिए यही सर्वोचम उपाय है। आगे फिर भी इसी बातको दिखलाते हैं। यत्र नो द्वेषरागाग्निदहनं वस्तुनो विना । स्वप्नेपि न वसेदुष्टः पंचाक्षविषयो भुवि ॥३२॥ यः परवस्तु गृह्णाति करोति तद्रति सदा ॥ अतो निश्चीयते रागी द्वेषी स दुःखभाग्नरः॥३३ अर्थ-जहांपर परिग्रहके सर्वथा अभाव होनेसे राग द्वेषकी जलन वा अग्नि नहीं है वहाँपर इस संसारमें ये दुष्ट पंचेन्द्रियों के विषय स्वप्न में भी कभी नहीं ठहर सकते। तथा जो मनुष्य पर पदार्थोंको ग्रहण करता है और उन पदार्थों में प्रेम करता है वह मनुष्य अवश्य ही राग द्वेषको धारण करता है और उस राग द्वेषके कारण महा दुखी होता है। ऐसा निश्चय करना पडता है । भावार्थ-परिग्रहका मूलकारण राग द्वेष है अथवा यों कहना चाहिए कि राग द्वेष ही परिग्रह है। जहां जहां राग द्वेष है वहां वहां ममत्व परिणाम अवश्य है। अथवा यों भी कह सकते हैं कि जहां जहां ममत्व परिणाम नहीं है वहां वहां राग द्वेष भी नहीं है वा जहां जहां पर राग.
.
imalmmit timindinmanmanshmमनोनिग्रह-मंत्र in InM Mintun im४३
द्वेष भी नहीं है वहां पर ममत्व परिणाम भी नहीं है।
इससे सिद्ध होता है कि राग द्वेष और ममत्व
परिणाम दोनों एक है। इसलिए ही आचार्यय राग द्वेष
को ही परिग्रह कहते हैं । तथा जहां पर राग द्वेष'
नहीं है वहांपर पंचेन्द्रियोंके विषय भी कभी नहीं
फटकते हैं । विना रागके पंचेन्द्रियोंके विषय कभी उत्पन्न .
ही नहीं हो सकते हैं । इसलिए रागद्वेषका त्याग करना
ही आत्माका कल्याण करना है । जो पुरुष अपने राग..
कारण परपदार्थोंको ग्रहण करता है, धन संपत्ति आदिको
ग्रहण करता है वा पुत्र,मित्र,कळत्र,भाई,माता, पिता आदिसे
राग रखता है उनको अपनाता है,वा किसीसे द्वेष कर उसकी
हानि करता है,उसको दुःख पहुंचाता है ऐसे मनुष्योंके राग
द्वेषकी तीव्रता अपने आप सिद्ध होता है, तथा ऐसे मनुष्य
उस तीव रागद्वेषके कारण नरक निगोद आदि कुगवियों में
अनेक प्रकारके महादुःख भोगते हैं। यही समझकर सबसे
पहले रागद्वेषको घटानेका और समता धारण करनेका
अभ्यास करना चाहिये। जितने जितने अंशमें रागद्वेष
घटता जाता है उतने ही उतने अशमें कर्मबंध घटता जाता
है। इस प्रकार अभ्यासके द्वारा जब समस्त राग द्वेषका
अभाव हो जाता है तब नवीन कर्मबंधका अभाव हो
जाता है और ध्यानके द्वारा पहळेके काँका सर्वथा नाश
होकर शीघ्र ही मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है।
४४ InHMIn NITI IRANI मनोनिग्रह-मंत्र infaman MIn HIROIRHATI आगे इसी विषयको स्पष्ट रीतिसे बतलाते हैं। येनांशेन च गृह्णात्यल्पवस्तु विषयादिकम् । तेनांशेन भवेत्तस्य रागो वा पूर्वकारणः ॥३४॥ यावांस्ततो ह्ययः पिंडस्तावान् वा स पिबेत्पयः । यथा वस्तु दहेन्नैव स्वस्थो वन्हिा कदापि कौ३५. पूर्वोक्तसत्यसिद्धांतं ज्ञात्वेति सौख्यदं सदा। गृह्णन्तु स्वहठं. त्यक्त्वा शान्तिोंके भवेद्यतः॥३६. अथ-देखो यह संसारी भन्यजीव थोडेसे इंद्रियाक विषयरूप पदार्थोंको जितने अंशमें ग्रहण करता है उतने ही अंशमें उसके रागका उदय समझा जाता है तथा वह रागका उदय उसके पहलेके. संचित. कर्मोंके उदयसे होता है । लोहका गोला जितना गर्म होता है वह पानीमें डालनेपर उतना ही पानी सोखता है । यदि वह गर्म नहीं होता तो वह पानी नहीं सोखता । जैसे अग्नि यदि अपने ही रूपमें बनी रहेगी किसी ईंधन आदिमें नहीं पडेगी तो वह अग्नि किसीको नहीं जला सकती। यह सिद्धांत समस्त जीवोंको सुख देनेवाला है तथा यही सिद्धांत यथार्थ वा सत्य है। इसीलिए प्रत्येक भव्यजीवको यह बात समझकर और अपना हठ छोडकर - इसी सत्य सिद्धांतको ग्रहण करना चाहिये । क्यों कि इस सत्य ruakaminant at In nimal NIWInHI: मनोनिग्रह-मंत्र HumInd anMIn Amrtmn im B५ सिद्धांतको ग्रहण करनेसे ही समस्त संसारमें शांति उत्पन्न हो सकती है। भावार्थ-लोहका गोला यदि अग्निमें तपाते तपाते अधिक गर्म हो जायगा तो वह जळमें डालनपर अधिक पानी सोख लेगा। यदि वही गोला थोडा गर्म हो थोडा ही पानी सोखेगा। यदि वह गर्म नहीं होगा तो वह थोडा सा भी पानी नहीं सोखेगा । इसी प्रकार यह जीव इंद्रि- योंके विषयोंको जितने अंशमें ग्रहण करता है उसके उतना ही राग समझा जाता है यदि वह इन्द्रियोंके विष- योंमें तल्लीन रहता है तो समझना चाहिये उसके रागकी अत्यंत तीनता है। यदि वह अनुक्रमसे विषयोंका त्याग करता जाता है तो समझना चाहिये कि उसके राग द्वेषकी भी कमी हो रही है । यदि वह विषयोंका सर्वथा त्याग कर देता है तो समझना चाहिए कि उसके राग द्वेषका सर्वथा अभाव होगया है। जिस प्रकार अग्नि पर ईंधन न डाला गया तो वह अग्नि वहींपर वुझ जाती है। फिर वह अग्नि किसीको जला नहीं सकती, इसी प्रकार विना राग द्वेषके यह जीव कभी किसी कालमें भी विषयोंको ग्रहण नहीं कर सकता अथवा यों समझना चाहिए कि जिस महापुरुषने विषयों का सर्वथा त्याग कर दिया है उसके राग द्वेषका सर्वथा अभाव है । यह सिद्धांत सर्वथा सिद्ध है। यदि भव्य जीवों को अपने आत्मामें परम शान्ति प्राप्त करना है तो उनको ४६ Mamin mmun nima lamमनोनिग्रह-मंत्र indianmusalammammi kith Im इस यथार्य सिद्धांत को जानकर अपना हठ छोड देना चाहिए ! और इसी सत्य सिद्धांतको ग्रहण कर राग द्वेष का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए । राग द्वेषका सर्वथा त्याग हो जानेसे विषयोंका सर्वथा अभाव हो जाता है, तथा विषयोंका अभाव होनसे कर्मबंधका अभाव हो जाता है और कर्मबंधका अभाव होनेसे शीघ्र ही मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। आत्माका यथार्थ कल्याण करने के लिए यह सबसे सरळमार्ग है। आगे सबका सारांश लिखते हैं। यावद् यथावत्स्वपरात्मनो हि । बोधो भवेद्वाखिलवस्तुनो न ॥ रतिः स्वधर्मेऽखिलदोषदूरे । न चात्मबाह्ये विषये विरक्तिः ॥ ३७ ।। तावत्किलाशापि भवेद् व्यथादा । मनोपि धावेद्भुवि यत्र तत्र । बोधो यदा स्यात् खपरमात्मनो हि । रतिः स्वधौ च परे विरक्तिः॥३०॥ आशा तदा नश्यति मूलतोऽपि। मनो बहिर्धावति नैव नृणाम् ।
Imamlin butwal nameterminatantn मनोनिग्रह-मंत्रindan manlmalayatimant ४७ ज्ञात्वेति कार्यः खपरात्मबोधः। परे विरक्तिश्च निजे रतिर्हि ॥ ३९ ॥ नश्यरिकलाशा भुवि सर्वथा हि भ्रमेन चित्तं हि बहिः पदार्थे । आशा प्रणाशाच्च मनोनिरोधात् । स्यान्मोक्षलक्ष्मीः सुखदा स्वदासी ॥४०॥ अर्थ-इस संसारमें जब तक अपने स्वरूपका और पर पदार्थोंका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, अथवा जबतक समस्त पदार्थोंका यथार्थ ज्ञान नहीं होता, तथा जबतक समस्त दोषोंसे रहित ऐसे अपने आत्माके यथार्थ स्वभावमें अनुराग नहीं होता और आत्मासे सर्वथा भिन्न ऐसे इंद्रियों के विषयोंसे सर्वथा वैराग्य उत्पन्न नहीं होता, तबतक महा दुःख देनेवाली अनेक आशायें उत्पन्न होती रहती हैं और तब तक यह मन भी इस संसारमें इधर उधर सर्वत्र भ्रमण करता रहता है । जब इस भव्यजीवको अपने आत्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जाता है तथा. आत्मासे भिन्न अन्य समस्त पदार्थोंका यथार्थ ज्ञान हो जाता है तथा अपने आत्माके शुद्धस्वरूपमें अनुराग उत्पन्न हो जाता है और आत्मासे भिन्न शरीरादिकसे सर्वथा वैराग्य उत्पन्न हो जाता है उस समय यह आशा सर्वथा नष्ट हो जाती ४८ whkam meanindramukanm मनोनिग्रह-मंत्र in In turmatmlwakarmilti kanut है और उस समय उन भव्यजीवोंका यह मन भी कहीं भी परिभ्रमण नहीं करता। यही समझकर भव्यजीवोंको अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपका तथा आत्मासे भिन्न अन्य समस्त पदार्थोंका यथार्थज्ञान उत्पन्न कर लेना चाहिये तथा आत्मासे भिन्न शरीरादिक परपदार्थोंसे ममत्वका सर्वथा त्यागकर सबसे विरक्त हो जाना चाहिये और अपने आत्माके शुद्धस्वरूपमें अनुराग उत्पन्न करलेना चाहिये । आत्माके शुद्धस्वरूपमें अनुराग करने और पर पदार्थोंसे विरक्त हो जानेके कारण फिर आशाएं सब नष्ट हो जाती हैं और मन भी बाह्यपदार्थों में परिभ्रमण नहीं करता । इस प्रकार आशाओंके नाश हो जानेसे और मनका निरोध हो जानेसे सुख देनेवाली मोक्षलक्ष्मी भी अपनी दासी चन जाती है। भावार्थ-मिथ्यात्वकर्मका तीव्र उदय आत्माके शुद्ध स्वरूपका ज्ञान नहीं होने देता और न: अन्य पदार्थोंका यथार्थ ज्ञान होने देता है ! तथा यही मिथ्यात्व न तो आत्माके शुद्ध स्वरूपमें अनुराग उत्पन्न होने देता है और न शरीरादिक पर पदार्थोसे वैराग्य उत्पन्न होने देता है ! 'जब काललब्धिके अनुसार दर्शनमोहनीय कर्मका उप- शम हो जाता है अथवा क्षय चा क्षयोपशम हो जाता है तब मिथ्यात्व, सम्पमिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति - ." -
Imaniamina sinfia nfia aryalamमिनोनिग्रह-मंत्र indantystutnumkumHIMALVIR ४६
मिथ्यात्व इन तीनों प्रकारके मिथ्यात्वका अभाव हो जाता
है तथा साथमें अनंतानुबंधी क्रोध, अनंतानुबंधी मान,
अनंतानुबंधी माया और अनंतानुबंधी लोभ इन चारो
अनंतानुबंधी कपायोंका भी अभाव हो जाता है । इस
प्रकार जब ऊपर लिखे हुए सातों काँका अभाव हो जाता
है तब आत्मामें एक प्रकारका प्रकाश प्रगट हो जाता है।
यद्यपि यह प्रकाश आत्मामें ही था तथापि वह ऊपर लिखी
मोहनीय कर्मकी सातों प्रकृतियोंसे ढका हुआ था। जिस
प्रकार बादलोंके हट जानेसे सूर्यका प्रकाश प्रगट हो जाता
है उसी प्रकार ऊपर लिखी सातों प्रकृतियोंके हट
जानेसे आत्माका अमूर्त प्रकाश प्रगट हो जाता है ।
जिस प्रकार किसी अंधेरे में बैठे हुए मनुष्य को
अपने परायेका ज्ञान नहीं होता और फिर प्रकाशके
आजानेपर अपने पदार्थको पहिचानकर अलग कर लेता
है और परपदार्थोंको अलग कर देता है, उसी प्रकार
ऊपर लिखी हुई मोहनीय कर्मकी प्रकृतियोंके अभाव हो
जानेसे जो आत्माके यथार्थ स्वरूपका प्रकाश झलकता है
उस प्रकाशसे उस भव्यजीवको स्वपरभेदविज्ञान उत्पन्न
हो जाता है। स्वपर भेदविज्ञानका अर्थ अपने पदार्थों का
और पर पदार्थोंको भिन्न भिन्न पहचान लेना है। जब
यह भव्यजीव उस सम्यग्दर्शनरूपी . प्रकाशके कारण
अपने आत्माके यथार्थ. स्वरूपको पहिचान लेता है उसी
५० ladakind na minutmमनोनिग्रह-मंत्रmharihin numnamin southa nil समय वह आत्मासे भिन्न शरीरादिक परपदार्थों को भी पररूप ही पहिचान लेता है। तदनंतर वह भव्यजीव अपने आत्माके यथार्थ स्वरूपको ग्रहण कर उसमें अनुराग करने लगता है और शरीरादिक परपदार्थोसे विरक्तं होकर उनका सर्वथा त्यागकर देता है। जब यह भव्य : जीव परपदार्थोंका सर्वथा त्याग कर देता है तब उसकी आशाएं भी सब छूट जाती हैं और उसका मन भी अन्य समस्त. परपदार्थों से हटकर अपने ही आत्माके शुद्धस्वरूपमें लीन हो जाता है। इस प्रकार एक सम्यग्दर्शनके प्रगट होनेसे: ही समस्त आशाओंका त्याग और मनका निरोध एकसाथ हो हो जाता है। आशाओंका त्याग होने और मनका निरोप होनेसे आगामी काँका बंध नहीं होता. तथा मनके.एकाग्र हो जानेसे ध्यान प्रगट हो जाता है और उस ध्यानके द्वारा पिछले संचित हुए समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार काँके नाश हो जानेसे मोक्षकी माप्ति हो जाती है और फिर. यह आत्मा अनंतानंत काळतक अनंत : और अक्षय सुखका अनुभव करता रहता है। अत एव समस्त भव्य- जीवोंको सबसे पहले मोहनीयकर्मको नाश कर सम्यग्दर्शन प्रगट कर लेना चाहिये और फिर आशाओंको नष्ट कर मनका निरोध कर लेना चाहिए। आशाओंका अभाव होने और मनका निरोध होनेसे शीघ्र ही मोक्षकी प्राप्ति होती है। यही आत्मकल्याणका सर्वोत्कृष्ट मार्ग है।
. - InInIMIn Amrina mun NITInIMIMमनोनिग्रह-मंत्र HAMIR MINIMINAIM ५१ आगे फिर भी उदाहरण देकर इस विषयको बतलाते हैं। स्वस्थः स्वभावाद्धि तथेति तिष्ठेत् । स्वात्मात्मना स्वात्मनि चात्मनो हि ॥ स्वानन्दसिंधोश्चं पयःप्रवासी । चिद्रूपमूर्तिः सरसीव हंसः ॥ ४१ ॥ निश्चीयते ह्येव ततः स्वभावाद् । यथा प्रसंगो भुवि यस्य जन्तोः । तथा स्वभावेन भवेत् स जीवो। ज्ञात्वति कार्यः शिवदश्च संगः ॥ ४२ ॥ . अर्थ-जिस समय यह जीव रागद्वेषका सर्वथा त्यांग कर देता है, उस समय जिस प्रकार किसी महासरोवरके किनारे पर बैठा हुआ हंस शोभायमान होता है उसी प्रकार शुद्ध चैतन्यस्वरूप यह आत्मा अपने ही आत्माके द्वारा अपने ही आत्माके अपने ही स्वभावमें स्वभावसे ही स्वस्थ होकर ठहर जाता है। उस समय यह आत्मा अपने आत्माके शुद्ध स्वभावरूपी महासागरके जलंपर निवास करता हुआ सरोवरके किनारे पर बैठे समान सुशोभित होता है । इस प्रकार ऊपर लिखे हुए. समस्त 'कथनसे यह बात अच्छी तरह समझमें आजाती है कि जिस जीवकी जैसी संगति रहती है वह जीव वैसे ही हुए इसके ५२ ANTIL MITIHINITIn मनोनिग्रह-मंत्र HAMIR MInH IMMy InITI Iny स्वभावको धारण कर लेता है। यह स्वाभाविक बात है। यही समझकर भव्यजीवोंको मोक्ष प्राप्त करानेवाले वीत. राग निग्रंथ मुनियोंकी संगतिमें ही रहना चाहिये । भावार्थ-जो पुरुष जैसी संगतिमें बैठता है वह वैसा ही बन जाता है । जो मनुष्य जुआरियोंमें बैठता है वह जुआरी हो जाता है, जो चोरोंकी संगतिमें रहता है वह चोर हो जाता है, जो भले आदमियोंकी संगतिमें रहता है वह भला मनुष्य हो जाता है और जो साधुओंकी संग- तिमें रहता है वह साधु हो जाता है । यह एक स्वभाविक बात है । जो मनुष्य वीतराग निग्रंथ मनियोंकी संगति करता है वह उन्हींके समान समस्त क्रियाओंके करनेका प्रयत्न करता रहता है । मुनिराज जिस प्रकार ध्यान करते हैं और जिस प्रकार स्वाध्याय आदि करते हैं उसी प्रकार वह उनकी संगतिमें रहनेवाला मनुष्य भी. स्वाध्याय .. वा ध्यान करनेका प्रयत्न करता है। तथा मुनिराज जिस प्रकार अपने आत्माके द्वारा अपने आत्माको अपने ही आत्मामें लीन करनेका प्रयत्न करते हैं, उसीप्रकार वह शिष्य भी अपने आत्माको अपने ही आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन करनेका प्रयत्न करता है । तथा मुनिराज जिस प्रकार अपने शुद्धात्मजन्य सुखरूपी महासागरमें निमग्न रहते हैं उसी प्रकार वह शिष्य भी अपने शुद्धा- स्मजन्य सुखका अनुभव करने लगता है। इस प्रकार - Muniya ministen am मनोनिग्रह-मंत्र Antarman gunakarmind.stInfull ५३ मुनियोंकी संगति करनेसे यह आत्मा ध्यान तपश्चरण आदिके द्वारा अपने समस्त कर्मों को नष्ट कर सिद्ध अव- स्था प्राप्त कर लेता है । यही समझकर समस्त भव्य जीवोंको अपने आत्माका कल्याण करने के लिए वीतराग निर्गय मुनियोंकी ही संगति करनी चाहिये । आगे मुनियोंकी संगतिका फल दिखलाते हैं । निग्रंथवद्वा स निजात्मनिष्ठः । स्वात्मा यतस्ते जिनवत्पवित्रः॥ भवेकिलाचार्यवरस्य भावः। श्रीकुंथुनाग्नः सुखदस्य चास्ति ॥ १३॥ अर्थ-वीतराग निग्रंथ मुनियोंकी संगति करनेसे भव्य जीवोंका यह पवित्र आत्मा उन वीतराग निग्रंथ मुनियोंके ही समान अपने आत्मामें लीन हो जाता है और भगवान् जिनेंद्रदेवफे समान अत्यंत पवित्र हो जाता है । ऐसा मुख देनेवाले आचार्यवर्य श्रीकुंथुसागरके भाव हैं तथा यही उनका उपदेश है। भावार्थ-जिस प्रकार वीतराग निग्रंथमुनि सदा- काळ अपने आत्मामें लीन रहते हैं उसी प्रकार उनका संगतिमें रहनेवाला शिष्य भी उनके उपदेशानुसार अपने आत्मामें लीन होनेका अभ्यास करता है और फिर - ५४ name.lu tamnnymamtamn मनोनिग्रह-मंत्र indannis hnimtnmimaniumnaanum ] अभ्यास करते करते उन मुनियोंके समान ही अपने आत्माके शुद्धस्वरूपमें लीन हो जाता है। तथा जिस प्रकार बे मुनिराज घातिया कोको नष्ट कर अरिहंत अवस्था. प्राप्त कर लेते हैं उसी प्रकार वह शिष्य भी ध्यान तपश्चरणके द्वारा अपने घातिया कर्मोंको नष्ट कर अरिहंत अवस्था प्राप्त कर लेता है. । और. यही आत्माका परम कल्याण है। इस प्रकार समस्त भव्यजीवोंको मुख देनेवाले आचार्यवर्य श्री कुंथुसागर महाराजके भाव हैं । यही समझकर समस्त्र भव्यजीवोंको वीतराग मुनियोंकी संगतिमें ही रहनेका प्रयत्न करते रहना चाहिये। आगे मनके निरोध करने का उपाय बतलाते हैं। द्वेषाच्च रागाच्च मनोगतिर्वा । भवेत्सदा वा खल्लु यत्र तत्र ॥ शत्रौ च मित्रे विषयेऽक्षजे वा। तयोनिरोधादि मनोनिरोधः ॥४॥ अर्य-इस मनकी गति रागद्वेषके कारण ही शत्रु मित्र वा इंद्रियों के विषयों में अथवा अन्य अनेक संकल्प विक- ल्पोंमें होती रहती है । यदि इन राग द्वेष दोनोंका सर्वथा त्याग कर दिया जाय तो मनकी गति भी अवश्य रुक जाती है और इस प्रकार सहज रीतिसे मनका निरोध हो जाता है।
Pm Anne hind mystekem मनोनिप्रह-मंत्र Mhad amamymlma nonwnkanimal an ५५. भावार्थ-यह निश्चित सिद्धांत है कि मनका भ्रमण राग द्वेषके कारण ही होता है । विना राग द्वेषके मनका भ्रमण कभी नहीं हो सकता। यदि राग द्वेषका सर्वथा त्याग कर दिया जाय वो मनका निरोध अवश्य हो जाता । अत एव मनका निरोध करनेके लिये राग द्वेषका त्याग अवश्य कर देना चाहिये । तथा रागद्वेपका त्याग मुनि- योंकी समीप रहने से ही हो सकता है। अत एव मनका निरोध करनेके लिये मुनियोंकी संगतिमें रहना ही सर्वोत्तम उपाय है। आगे इसी विषयको स्पष्टरीतिसे लिखते हैं। रागं च द्वेषं निखिलं विहाय । निग्रंथसंगाच्च तदाश्रयाद्वा ॥ चित्तं स्वकीयं जिननाथशास्त्रे । वा सप्ततत्त्वस्य विवेचने वा ॥४५॥ शुद्धस्वरूपे च निजात्मनो वा। जिनस्य सिध्दस्य यतेश्च सूरेः । श्रीपाठकानां चरणारविन्दे। क्षमादिधर्मे वरभावनायाम ॥ ४६॥ श्रीवीतरागे च निजात्मभावे । व्रते चरित्रे समितौ च गुप्तौ।
५६ihnhin namhinmunam मनोनिग्रह मंत्र Im Li10th LAHURIMLILA करोति लीनं ववशीकृतात्मा । तस्यैवः भव्यस्य मनोनिरोधः ॥४७॥ अर्थ-जो भव्यजीव चीतराग निग्रंथ मुनियोंकी संगति करनेसे अथवा उनके आश्रयमें रहनेसे अपने समस्त रांगद्वेषका त्याग कर देता है । और फिर अपने मनको भगवान् जिनेंद्रदेवके कहे हुए. शास्त्रोंके स्वाध्याय करनेमें लगा लेता है, अथवा जीवादिक सातों तत्त्वोंके यथार्थ स्वरूपका विवेचन करनेमें लगा लेता है, अथवा अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लंगा लेता है अथवा श्री अरिहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय और साधुओंके चरणारविंदमें लगा लेता है, वा उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों में लगा लेता है, अथवा अनित्यादिक बारह भावनाओंके चितवन करने में लगा लेता है अथवा अपने आत्माके वीतराग परिणाम में लगा लेता है, वा व्रत, समिति, गुप्ति, चारित्र आदिमें लीन कर लेता है इस प्रकार जो अपने आत्माको वश करनेवाला भव्य जीव अपने पनको ऊपर लिखे कार्यों में लगा लेता है उस भव्यजीवके मनका निरोध अवश्य हो जाता है। भावार्थ-मनको निरोध करनेका सबसे सरल उपाय यह है कि सबसे पहले मन की चंचलताके कारण रागद्वेष को दूर करना चाहिये । यह बात lund unlearny Indanlmndant मनोनिप्रह-मंत्र Imdmlha urmindamyund antram ५७ पहले भले प्रकार घतला चुके हैं कि रागद्वेष का अभाव मुनियों के आश्रय में ही हो सकता है। इसका भी कारण यह है कि मुनिराज वीतराग होते हैं उनके राग- देषका सर्वथा अभाव होता है । अतएव उनकी संगतिमें रहनेसे वा उनके आश्रयमें रहनेसे शिष्योंका राग द्वेष भी दूर हो जाता है । राग द्वेषके दूर होनेसे मनकी चंचलता दूर हो जाती है तथा मनकी चंचलता. दूर होनेपर उस ..मनको फिर भगवान् जिनेन्द्रदेवके कहे हुए शास्त्रोंके स्वाध्याय करनेमें लगाना चाहिये । शास्त्रोका स्वाध्याय करनेमें - मन वचन काय तीनों लग जाते हैं । इसलिए स्वाध्याय करनेसे मनकी चंचल गति रुक जाती है और मन वशमें हो जाता है वा मनका निरोध हो जाता है, इसी प्रकार आत्माका स्वरूप चितवन करनेसे वा पुद्गला- दिक परपदार्थों का स्वरूपचितवन करनेसे भी मनका निरोध हो जाता है। अब यह जीव किसी भी तत्त्वका चितवन करता है तब वह.मन अन्य समस्त चितवनको छोड देता है और उस जीवादिक पदार्थ के चिंतवन करनेमें ही लग जाता है । अन्य समस्त चितवनोंका त्याग कर किसी एक पदार्थके चिंतन करनेमें ही मनको लगा देना मनका निरोध करना है। इसी प्रकार अरहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु .परमेष्ठीके चरणारविंदोंमें अपने मनको लगाना भी मनका निरोध करना है। इन
५८.nahaniun nitiun tamininuininm मनोनिग्रह-मंत्राani ani m
पांचों परमेष्ठियोंकी पूजा स्तुति करना वा उनके गुणों का
स्मरण करना मनका निरोध करना है । पूजा. स्तुति वा
गुणस्मरण करने में भी मन अन्य सब चितवनोंसे हटकर
पंच परमेष्ठीके गुण स्मरण करनेमें ही लग जाता है और
यही मनका निरोध है। अथवा अपने मनको अपने
आत्माके शुद्ध स्वरूपके चितवन करनेमें लगाना चाहिये।
शुद्ध स्वरूपका चितवन करना भी मनका निरोध है।
'अथवा उत्तम क्षमा मार्दव आदि दशधर्मों के स्वरूपका
चितवन करनेमें मनको लगाना चाहिये । अथवा अनित्य
अशरण आदि बारह भावनाओं के चितवन करनेमें अपने
'मनको लगाना चाहिये । धर्म और भावनाओंके चितवन
करनेसे मनका निरोध अच्छी तरह हो जाता हैं। अथवा
अपने आत्माके वीतराग भावों में अपने मनको लगाना
चाहिये । आत्माके वीतराग भाव ही सर्वोत्कृष्ट भाव है
और उनमें मनको कीन करना मनका सर्वोत्कृष्ट निरोध
है । अथवा व्रत समिनि गुप्ति वा चारित्रमें मनको लगा-
नेसे मनकी अन्य गति सर्वथा रुक जाती है और वह
मन एकाग्ररूपसे उसीमें कग जाता है। मनका एकाग्र
रूपसे किसी एक पदार्थ में लग जाना ही मनका निरोध
है। इसप्रकार मनके निरोध करनेके लिये अनेक उपाय
हैं । यदि उन समस्त उपायोंका सारांश बताया जाय
तो यही कहना चाहिये कि मनका निरोध करने के लिये
True aruma RunalIMDIHANUN मनोनिग्रह -मंत्र MAIHA MINIMIMIMHAm५९ मनको पर पदार्थों से इटालेना चाहिये तथा उसे अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन कर लेना चाहिये । जो भव्य पुरुष मुनियोंके आश्रयमें रहकर सबसे पहले मुनियों के समान राग द्वेषको दूर कर वीवराग हो जाता है और फिर वह अपने मनको आत्माके शुद्ध स्वभावमें लगाता है अथवा ध्यान तपश्चरण, व्रत चारित्र समिति गुप्ति आदि: में लगाता है उस भव्य जीवका मन अवश्य ही निरुद्धः हो जाता है । इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। आगे प्रकारान्तरसे मनको निरोध करनेका उपाय बतलाते हैं। स्वस्वविषये चरतामिन्द्रियाणां कदम्बकम् । वशं कृत्वा सुधी दक्षः करोति स्ववशं मनः ॥४८॥ अर्थ-ये इन्द्रियां अपने अपने विषयोंकी ओर दौडती हैं। इसलिये जो चतुर और बुद्धिमान पुरुष अपने अपने विषयोंमें दौटने वाली इन समस्त इन्द्रियोंके समू- हको वशमें कर लेता है वह मनुष्य अपने मनको भी अवश्य वश कर लेता है। भावार्थ-इन्द्रिया पांच हैं। स्पर्शन रसना घ्राण चक्षु और श्रोत्र । स्पर्शन इन्द्रिय स्पर्शको ग्रहण करती है। शीत. उष्ण, हळका, भारी, कोमळ, कठोर, रूखा, चिकना ये : भाठ प्रकारके स्पर्श हैं। स्पर्शन इन्द्रिय इन्ही स्पर्शरूप विषयोंमें कगी रहती है। सदाकाळ इन्हींको ग्रहण करने में ६०kmeenamuak anmun inmHIM AME मनोनिग्रह-मंत्र lmannimi.imsalmanimilaim लगी रहती है। खट्टा, मीठा, कडवा, चर्परा, कषायला, ये पांच रस हैं । रसना इन्द्रिय सदाकाल इन्हीं विषयोंकों ग्रहण करने में लगी रहती है । घ्राण इन्द्रिय गंधको ग्रहण करती है । गंधके दो भेद हैं। एक सुगंध और दूसरों दुगंधा घाण इन्द्रिय इन्हींको ग्रहण करती रहती है। चक्षु इन्द्रिय रूपको ग्रहण करती है। लाल पीला नीला सफेद और काला ये रूपके पांच भेद हैं। चक्षु इन्द्रियं इन्हीं रूपोंमें लगी रहती है । श्रोत्र इन्द्रिय शब्दको ग्रहण करती है शब्दोंके साक्षर अनक्षर भादि अनेक भेद हैं। अथावा सितार, सारंगी, ढोल मृदंग, वंशी प्रतिध्वनि आदिके भेदसे होनेवाले शब्दोंके अनेक भेद हैं। उन सबके सुननेमें करण इन्द्रिय कगी रहती है। तथा मन इन सबके साथ लगा रहता है। यद्यपि असेनी जांचोंके ये इन्द्रिया विना मनके भी अपना काम करती हैं परंतु सेनी जीवोंकी इन्द्रियां मनके साथ अपने विषयोंका अनुभव करती है। इसलिए जो चतुर और बुद्धिमान् सबसे पहले इन पांचों इन्द्रियोंको अपने अपने विषयोंमें नहीं जाने देना उनको रोक कर अपने आत्मामें लीन कर लेता है उस महापुरुषका मन भी. अवश्यं रुक जाता है । जब वह मन इन्द्रियों के विषयोंसे हट जाता है. तब उसको कोई अन्यकार्य न रहने के कारण वह अपने आप अपने आत्मामें लीन होता है। अथवा उत्तमक्षमा आदि आत्माके धर्मों में लीन होता है वा बारह भावना-
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in alInIoT ImaalTHIndnyu मनोनिग्रह-मंत्र Manmint numanmiminal anthyalam६.१
ओंके चितवन करनेमें लग जाता है । अथवा ध्यानमें लग
जाता है । तथा इस प्रकार वह अन्य सब चितवनोंसे इंट
कर वह अपने आत्मा वा आत्माके किसी धर्ममें लग
जाता है । इसीको पनका निरोध कहते हैं ।
यहांपर इतना और समझ लेना चाहिये कि 'जब
इन्द्रियोंके, विषय रुक जाते हैं अर्थात् इन्द्रियां सब वशमें
हो जाती हैं तव आशा भी अपने आप नष्ट हो जाती
है । आशा तो इन्द्रियोंके पीछे , लगी रहती है ।
जो इन्द्रियोंका निग्रह हो जाता है : तब भला
आशा कहां ठहर सकती है और जब आशा ही
नहीं रहती सव मनकी गति कैसे हो सकती है.।. इसलिये
यह अपने आप सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रियोंका निग्रहः
कर लेनेसे वा इन्द्रियोंके वश कर लेनेसे आशाएं भी अपने
आप नष्ट हो जाती हैं और मनका निरोध भी अपने.
आप हो जाता है अत एव मनका निरोध करनेके लिये
सबसे पहले इन्द्रियोंका निरोध कर लेना चाहिये । मनको
निरोध करनेका यह सबसे अच्छा उपाय है ।
भागे इन्द्रियां और मनको वशं करनेका 'फल,
दिखलाते हैं।
इन्द्रियाणि मनः कृत्वा स्ववशं च निजात्मनि।
तिष्ठेद्यः शुद्धचिद्रूपः सोऽवश्यं मोक्षभाग्भवेत्॥४९॥
६२al In auntt komin ID मनोनिग्रह-मंत्र 1m nIyTI TIWARIDWIn MBIHAatm अर्थ-जो शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा अपनी समस्त इन्द्रियोंको और मनको वशमें करके अपने शुद्ध आत्मामें कीन हो जाता है वह महापुरुष अवश्य ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है। 'भावार्थ--यह पहले बतला चुके हैं कि इन्द्रियोंको वशमें कर लेनेसे. मन अपने आप वशमें हो जाता है तथा जब मन वशमें हो जाता है तब यह आत्मा अपने आप अपने आत्मा लीन हो जाता है। क्यों कि यह आत्मा मनके द्वारा वा इन्द्रियोंके द्वारा ही सर्वत्र भ्रमण करता था। जब इंद्रियां और मन ही अपने वशमें होकर अत्यंत शांत हो जाते हैं तव यह आत्मा अवश्य ही अपने ही आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन हो जाता है। तथा तथा जो आत्मा अपने आत्माके शुद्ध स्वरूपमें लीन हो जाता है । वह उस ध्यानके द्वारा अपने समस्त कर्मोंको नष्ट कर अवश्य ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है । इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है,। आगे सबका सारांश बतलाते हैं। रागद्वेषविनाशाच्च मनोऽवश्यं निरुध्यते। मनोनिरोधादखिलं कर्मव्यूहो विनश्यति ॥५०॥ कर्म नाशाद्भवेन्मोक्षो मोक्षेऽनन्तसुखं भवेत् । तस्मान्मुमुक्षुभिः कार्यं रागद्वेषविनाशनम् ॥५१ •.
indaiundain namamm मनोनिग्रह-मंत्र in animal milam nimalmamlnidam ६३
अर्थ-रागद्वेषका नाश होनेसे मनका निरोध अवश्य
हो जाता है, तथा मनका निरोध होनेसे कौंका समूह
अवश्य नष्ट हो जाता है । इस प्रकार समस्त काँका नाश
होनेसे मोक्षकी प्राप्ति अवश्य हो जाती है और मोक्ष प्राप्त
होनेपर अक्षय अनंतसुख प्राप्त हो जाता है । अत एव
मोक्षार्थी बुद्धिमान् पुरुषोंको सबसे पहले राग और द्वेष इन
दोनोंका नाश करना चाहिये।
भावार्थ-इस संसारमें समस्त दुःखोंकी जड राग
द्वेष है । राग द्वेषके कारण ही यह जीव चारों गतियोंमें
परिभ्रमण करता रहता है । संसारके समस्त पाप इन राग
द्वेषसे ही उत्पन्न होते हैं । यदि राग द्वेष नष्ट हो जाय तो
फिर कोई भी पापं कभी उत्पन्न नहीं हो सकता । राग
द्वेषके नष्ट होनेसे मोह मद काम आदि आत्माके समस्त
विकार नष्ट हो जाते हैं। तथा फिर यह आत्मा पूर्ण
रूपसे निर्विकार होनेसे इन्द्रियोंका निग्रह भी हो जाता
है। तथा इन सब कारणोंके मिलनेसे उस महापुरुषके.
समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं। और समस्त काँका नाश
होना ही मोक्ष है । इस प्रकार रागद्वेष के नाश हो जानेसे
यह आत्मा सदाकाल तक अक्षय अनंत मुखका अनुभव
करता रहता है। इस प्रकार परम पावनं मुनिराजोंके
आश्रयमें रहनेसे इस आत्माका कल्याण बहुत ही सरल
रीतिसे हो जाता है।
६४ undnumtamin ammamm मनोनिग्रह-मंत्र indanmun urmirmatmlna harulina hal आगे इस ग्रंथक पढनेका फल दिखलाते हैं। ग्रंथं ह्यमुं यः पठतीति भक्तया । ह्याशा प्रणाशीति मनोनिरोधी ॥ स्याधर्ममूर्तिः स च विश्वबंधुः। संएवं गच्छद्धि शिवं कृतार्थी ॥५२॥ अर्थ-जो पुरुष भक्तिपूर्वक, इस ग्रंथका पठन 'पाठन करता हैं उसकी आशा भी संब नष्ट हो जाती हैं और उसके मनका निरोध भी अवश्य हो जाता है। तथा वह पुरुष धर्मकी मूर्ति बन जाता है, समस्त संसारका कल्याण करनेवाला संसार भरका बंधु बन जाता है, कृत कृत्य हो जाता है और अंतमें वह अवश्य ही मोक्षमें जा विराजमान होता है। भावार्थ-इस ग्रंथमें मुनियोंकी संगति करने, राग द्वेषको दूर करने, मनका निरोध करने और मोक्ष प्राप्त करानेका उपाय बतलाया है। जो पुरुष इसको, पढकर इससे लाभ उठाना चाहता है, उसको मुनियोंकी संगति अवश्य करनी चाहिये मुनियोंकी संगतिसे उसका रागद्वेष भी नष्ट हो जाता है, मनका निरोध भी हो जाता है और अंतमें. मोक्ष की प्राप्ति भी अवश्य हो जाती है। यही. इस ग्रंथके पढनेका अंतिम फल है ।
PHH DAHAMHIMP मनोनिग्रह-मंत्र Htterminant gawakeMING Atment ६५.' आगे आचार्य इस ग्रंथको पूर्ण कर आशीर्वाद देते हैं। आचन्द्रसूर्य सुखशान्तिपानं ।। ग्रंथः सदायं भुवि कारयन्सताम् ॥ श्रीपार्श्वनाथोपि सदेति जीयाद् । भावोस्ति सूरेर्वरकुंथुनाम्नः ॥ ५३ ॥ अर्थ-यह मनोनिग्रह नामका ग्रंथ इस संसारमें नपतक सूर्य चन्द्रमा है तपतक भव्यजीवोंको सुख और शान्तिका पान कराता हुआ सदाकाल जीवित रहे । तथा भगवान् पार्श्वनाथ स्वामी भी सदाकाल जयवंत रहे ।ये ही आचार्यवर्य श्रीकुंथुसागर स्वामीके भाव हैं । भावार्थ- भाचार्य वर श्रीकुंथुसागर स्वामी इस ग्रंथको पूर्णकर आशीर्वादात्मक अंतिम मंगलाचरण करते हैं और कहते हैं कि जिन भगवान् पार्श्वनाथ स्वामी समीप तथा उन्हीं के आश्रयमें उन्हींके जिनालयमें रहकर यह ग्रंथ पूर्ण हुआ है। इसलिए वे भगवान् पार्श्वनाथ स्वामी इस संसारमें जबतक सूर्य चंद्रमा है तबतक जयवंत बने रहे । तथा यह ग्रंथ भी तबतक ही भव्यजीवोंको मुख और शान्तिको पान कराता हुआ, मोक्षमार्ग दिखलाता हुआ और अनेक भव्यजीवोंको मोक्षमार्गमें लगाता हुआ जयवंत बना रहे।
६६.maamin umlun romint non मनोनिग्रह-मंत्र indanmad amma niyAnd yogindain
इति श्रीमदाचार्य प्रवर श्रीकुंथुसागरसूरि विरचिते
मनोनिग्रहमंत्रग्रंये मनोनिरोधोपाय
वर्णनो नाम द्वितीयोध्यायः
इस प्रकार श्रीमान् आचार्यवर्यश्री कुंथुसागर विरचित
मनोनिग्रहमंत्र नामके ग्रंथकी 'धर्मरत्न' पं.लालाराम
शास्त्री विरचित सरल हिन्दी भाषा टीका
मनके निरोध करने का उपायको वर्णन
करनेवाला यह दूसरा अध्याय
स-मा---हु-आ।
?
Mumma amIMANIA HIMIRMImमनोनिग्रह-मंत्र ITIHASymn namundnu ६७
लौकिकशांति मंत्र।
इस ग्रंथमें अभीतक पारमार्थिक रूपसे आत्मशांति
किस प्रकार हो सकती है ? अत्यंत चंचलस्वरूप मनको
किस प्रकार वशमें कर सकते हैं ! इस विषयका वर्णन
किया गया है । क्यों कि मनके द्वारा ही यह आत्मा
संसार बंधन में पडकर अशांतिमय जीवनको व्यतीत
करता है । इसलिए अलौकिकशांति अर्थात् आत्मो-
भतिके लिए मनका निग्रह करना आवश्यक है । अब
यहाँपर आचार्य यह पतलाते हैं कि मनको भी निरोध
करने के लिए एवं लौफिक शांतिके लिए भी कुछ मंत्र हैं,
जिनका जप करनेसे लौकिकशांति बनी रहती है और
परंपरासे अलौकिक शांति भी मिलती है।
उन मंत्रोंको जपनेके विधिसहित नीचे दिया जाता है।
१ सर्वसिद्धि मंत्र
'ॐ ह्रां ह्रीं हूं ह्रौं ह्रः नमः
.
।
इस पत्रको एकांतमें स्थिरचित्त होकर प्रतिदिन एक
हजार प्रमाणसे एक महीने पर्यंत जप करें। इससे सर्व
इच्छित कार्यकी सिद्धि होगी।
, - 2- ६८ ma numakarmiynkannuTu am मनोनिग्रह-मंत्रIHDolm mm Lamua !NNIWI AM २ सर्व शांतिकरमंत्र 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा इस मंत्रको एकांतमें बैठकर स्थिरचित्तसे प्रतिनित्य १०० वार जपनेसे घरमें सर्व तरहकी शांति रहेगी। ३ आरोग्य मंत्र ".ॐ" इस वीजाक्षर मंत्रको एकांतमे एकाग्रता.व शांखिसे ३०० चार प्रतिनित्य जप करनेसे लौकिक सर्व -प्रकारका आरोग्य व स्वास्थ्य बना रहेगा। सर्व ऋद्धिसिद्धि मंत्र। ॐ चंद्रप्रभ प्रभाधीश चंद्रशेखर चंद्रप्रभ चंद्रबीज नमोस्तु ते। ॐ हीं श्री चंद्रप्रभ ही श्री कुरु कुरु स्वाहा इस मंत्रको अर्धचंद्राकार यंत्रमें पूर्णिमाके दिन चंद्रो. दयके समय भोजपत्रपर अनारकी कलम प अष्टगंधकी साईसे लिखें। फिर तीन रात्रीतक मूलमंत्रका जाप करें। बब उसकी सिद्धि होगी। इस सिद्धयंत्रको पासमें रखनेसे सुख, शांति, यश, धनकनक आदिकी वृद्धि होगी, दुष्टयह राक्ष- सादिकका भय जरा भी नहीं होगा। नोर-इन सब मंत्रोंके. जप करते समय चित्तस्थिरता शांति, मनवचनकाविशुद्धि, निर्भयता आदि बातोंकी अत्यंत आवश्यकता है। " ... .
Imo nminutnyms.yamInHIM मनोनिप्रह-मंत्र Imalinmun amindanmint ipniytun ६९ अथ प्रशस्तिः आगे आचार्य अपनी प्रशस्ति लिखते हैं और उसमें भी अपनी कृतज्ञता प्रगट करते हुए ग्रंथ निर्माणका - हेतु बतलाते हैं। श्रीशान्तिसिंधोः सुखशान्तिमूर्ते-। ीक्षागुरोरेव कृपाप्रसादात् ॥ विद्यागुरोरेव सुधर्मसिंधो-। ग्रंथो मयायं शिवदः पवित्रः ॥ ५४॥ अबालवृद्धादि मनःप्रशान्त्यै । स्वानन्दतुष्टेन दिगम्बरेण.॥ श्रीकुंथुनाम्नात्मरतेन नित्यं । भक्त्या प्रणीतोस्ति न तु प्रसिध्यै ॥ ५५॥ अर्थ- सदाकाल अपके आत्मामें लीन रहनेवाले तथा परम दिगम्बर अवस्था धारण करनेवाले और अपने आत्मजन्य आनन्दमें संतुष्ट रहनेवाले ऐसे मुझ आचार्यवर्य श्रीकुंथुसागर स्वामीने सुख और शांतिकी मूर्ति ऐसे मेरे दीक्षागुरु आचार्यवर्य श्रीशांतिसागर स्वामी-
७० ANIMLMI ANANIYA INDIAID मनोनिग्रह-मंत्र MIn HITHIN MIMIRMINA HIJHIM ANI
की कृपा और उनके प्रसादसे तथा मेरे विद्यागुरु आचार्य-
वर्य श्रीसुधर्मसागर महाराजकी कृपा और उनके प्रसादसे
बाळक वृद्ध आदि सबके मनको शांत करनेके लिए भक्ति
पूर्वक इस ग्रंथको निर्माण कर पूर्ण किया है। यह ग्रंथ
मोक्ष देनेवाला है और परम पवित्र है । मैने यह ग्रंथ अपनी
किसी प्रसिद्धिके लिए नहीं लिखा है।
आगे आचार्य अपनी लघुता दिखलाते हैं
भवेत्वचित्कदाचिन्मे ग्रंथेऽस्मिन् स्खलनं यदि ।
अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा मुनयः शोधयन्तु वै ॥५६॥
अर्थ-यदि इस ग्रंथमें मेरे अज्ञानके कारण वा किसी
प्रमादके कारण कदाचित् किसी स्थानपर. कुछ भूल हो
अक्षर मात्रा कम हो वा भावमें कुछ अंतर हो तो कपाल
मनियोंको शुद्धकर लेना चाहिये ।
आगे आचार्य इस ग्रंथकी रचनाका काल और स्थान
लिखते हैं।
चतुर्विंशतिसंख्याते मोक्ष प्राप्ते च सन्मतो ।
कार्तिक पूर्णिमायां च ह्यष्टषष्ट्यधिके शते ॥५॥
हिम्मतसिंहभूपेन रक्षिते न्यायशालिना।
ईडरे पत्तने स्थित्वा पार्श्वनाथजिनालये ॥ ५८ ॥
७१mManIM MHINind MRIMAHI मनोनिग्रह-मंत्र Imamnn armanMMH DWIMAINM
धीमता स्वात्मतुष्टेन कुंथुसागरसूरिणा।
ग्रंथोऽयं लिखितः श्रीदो जीयादाचन्द्रतारकम्॥५९
अर्थ-श्रीमहावीर स्वामीके मोक्ष प्राप्त होनेके अनंतर
चौवीससौ अहसठवें वर्षमें कार्तिक शुक्ल पूर्णमासीके दिन
न्यायशीक राजा हिम्मतसिंहके राज्यान्तर्गत ईडर नगरके
श्रीपार्श्वनाथ चैत्यालयमें बैठकर अत्यंत बुद्धिमान और
अपने आत्मामें लीन रहनेवाले आचार्य श्रीकुंथुसागर
स्वामीने यह ग्रंथ निर्माणकर पूर्ण किया है । ऐसा यह
ग्रंथ इस संसारमें जब तक सूर्य चन्द्रमा हैं तबतक जीवित
और जयशील बना रहे ।
समाप्त
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श्रीआचार्य कुंथुसागर ग्रंथमालाके स्थायिसदस्य, ५३चंदुलाल मणिलाल कोठारी ईडर) ६९ सेठ मणिलाल केवलजी देवळ ५४कोदरलाल गुलाबचंद मोडासिया ७०गांधी लिलाचंद फतेहचंद जादर देरोल ७१ सेठ तेजपालजी छावडा कोछोर ५५ मगनलाल फेवलदास ७२ सेठाणी सुखराणीजीबाई खुरई ५६ अमृतलाल तलकचंद ॥ ७३ न. सुमतीबेन વોલીના ५७ नेमचंद नानचंद गांधी ७४ शा. भोगीलाल साबळी शहा पन्नालाल अखेचंद ७५ दि. जैन मंदिर जांबुडी ५८ दोशी निहालचंद तलकचंद ७६ सेठ जीवराज हिराचंद आळंद विजयनगर ७७ दि. जैन मंदिर दाबोल २५९ स. सि. गणपतलालजी खुरई ७८ शा. फूलचंद ताराभाई पादरा ६० शाह पन्नालाल रतनलालजी ७९ दि. जैन मंदिर गटोडा ओबरी ८. न. विद्याधरजी आ. संघ ६१ स. दि. जैन पंच जुना मंदिर ८१ दि. जैन मंदिर बदराढ सागवाडा | ८२ श्री शहा मगनलाल नानचंद .६२ सेठ रामचंदर सुबालालजी सोनासन वरंगल ८३ मगनलाल पन्नालाल ६३ स. दि. दसाहुमड जैनपंच तलाटी दाहोद पालोदा रतनबाई दोशी रेवचंद ६४ थीभाचार्य कुंथुसागर मगनलालनी विधवा ननंदपूर सरस्वती भवन नवागाम ८५ सेठ गणेशलालजी उदयपुर ६५ दि. जैन मंदिर सरस्वती ८६ भट्टारक यशकीर्तिजी महाराज ऋषभदेव ६६ सेठ लूणकरण मदनमोहनजी ८७ दि.जैन पंच केसरिया उज्जैन रेवचंद रवचंद रखियाळ ७ सर सेठ हुकुमचंदजी .. इंदौर ८९ गांधी उगरचंद फुलचंद ६८ सेठ नंगजी अमरचंदजी देवल | ९० , शहा रेवचंद खेमचंद, ८४ भवन पनागर