Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Shri Brahtakalp Sutram Satikam
Front matter
प्रकाशक- सम्यक ज्ञान प्रचारक मंडल" (त्रिपोलिया) जोधपुर कम्पोन छपाई वाइडिंग कागज टाइटल लागत ५०० प्रति ४५७||) रुपये ७८). ५७). " २६२॥" २५)" :: कुल ९१०). मुद्रित श्री दुर्गाप्रसाद दुर्गा प्रेस धानमण्डी, अजमेर ।
प्रबन्धक के दो शब्द P , वह लक्ष्य रहित, अनियन्त्रित जीवन, जीवन नहीं, महद्भावों से भरा अनुशासित एवं संयत जीवन ही आदर्श-मानवीय-जीवन है। जो, मनुष्य जीवन जैसे अनमोल, दुर्लभ जीवन को पाकर भी अपनी उद्दाम-लालसा, विषय-तृष्णा तथा क्रोधादि- कपाय भावों पर नियन्त्रण नहीं रखता, दुर्विचारों का उपशमन नहीं करता, भला भी क्या मानव कहाने का अधिकारी है ? उससे तो वे पशु पक्षी आच्छे, जो अज्ञानता की दशा में भी पापातिरेक से बचे रहते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनकी महत्ता उनके शुभाचरणों के द्वारा ही कुन्दन की तरह तपकर निखर पायी । शास्त्र, पुराणों में उनके अलौकिक पाच- रणों का महत्वपूर्ण दिग्दर्शन है, जो भावी पीढ़ी के पथ प्रदर्शन के लिये प्रकाश-स्तम्भ फी तरह चिरकाल से चमकता रहा है। "वृहत्कल्प” उन्हीं आदर्श पुरुषों के कर्तव्यों का परिचायक शान है, जिसमें दिखाया गया है कि उभयलोक कल्याण कासियों को कैसे चलना, ठहरना, खाना, पीना, आना, जाना, तथा लोक समुदाय के संग व्यवस्थित व्यवहार पूर्वक जीवन यापन करना चाहिए । यद्यपि बृहत्कल्प का प्रणयन साधु वर्ग के निमित्त फिर भी हम संसारी मानव इस में प्रतिपादित अनुशासनात्मक तरीके से अपनी मात्मा का अभ्युदय कर जीवन को सफल बना सकते हैं। पूज्य श्री ने इस सूत्र का अनुवाद आज से बहुत पहले हो सम्पादित कर दिया था, किन्तु इसी बीच दूसरे सूत्रों के प्रकाशन होते रहने से इसके प्रकाशन का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इस वर्ष मेड़ता. चातुर्मास में " सम्यक ज्ञान प्रचारक सण्डल." (जोधपुर ) के कुछ उत्साही एवं आगमप्रेमी सजनों की राय इसको प्रकाशित कर देने की हुई । संयोग से उस लमय श्रीमान् "सरदारनाथजी मोदी एडभोट जोधपुर है , (आ) वहां उपस्थित थे। उन्होंने इसके प्रकाशन का द्रव्य भार अपने ऊपर उठा लिया। तदनुसार इसके प्रकाशन का कार्य मुझपर सौंपा गया, और बड़ी मिहनत के बाद अल्प समय में ही में इसको प्रकाशित करवा रहा हूँ। इसलिये इसमें त्रुटियों का रह जाना असंभव नहीं । हां, यह कहने में मुझे कुछ भी संकोच नहीं कि जितना भी प्रयास में कर सकता था करने में नहीं चूका, फिर भी पृष्ट ४० के २१ वी पंक्ति में 'कप्पइ' की जगह 'नो कप्पइ' तथा पृष्ठ ४० " ऽऽवश्यायेषु में ये छूट गया है। ऐसे विन्दु, विसर्ग या मात्रा अथवा अक्षर जो भी दृष्टिदोप अथवा मुद्रण यन्त्र द्रोप से छूट गएँ हों पाठक उन्हें सुधारकर पढ़ें। प्रकाशन की सारी जिम्मेदारी मुझपर है, इसलिए इसकी समस्त त्रुटियों का जिम्मेदार मैं हूँ । आशा है विज्ञ पाठक मानवीय अन्तःकरण की दुर्बलताओं को ध्यान रखते हुए मुझे क्षमा करेंगे। अंत में मैं उन सब सज्जनों का आभारी हूँ जिनके सहयोग से इस काम को पूरा कर पाया हूँ। विनीत शशिकान्त झा, 'शास्त्री' व्याकरणाचार्य - प्रकाशन सहायक का संक्षिप्त परिचय - : , मरुधरा में जोधपुर चिर अतीत से लेकर इस क्षण तक अपनी कतिपय विशेष ताओं के कारण सुप्रसिद्ध. रहा है। यहां के नागरिकों में एक बड़ी संख्या जैन धर्मा- घलम्बी ओसवालों की हैं जो शिक्षा एवं राजकारिणी के क्षेत्र में जोधपुर ही नहीं अपितु राजस्थान भर में काफी ख्यात रहे हैं। इसी ओसवाल वंश की मोदी शाखा में इस सूत्र के प्रकाशन सहायक श्री सरदारनाथजी साहब का शुभ नन्म हुआ। आपके पिता श्री सुजाननाथजी मोदी हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के अच्छे विद्वान थे। और र इसी आनुवंशिक संस्कार के फलस्वरूप सरदारनाथजी साहब १८ वर्ष की छोटी उम्र में ही वकालत की परीक्षा पास कर गए । सं०१८७५ में सुजाननाथजी साहब ने. परबतसर में अपनी इह लीला समाप्त की, जन सरदारनाथजी की उम्र केवल २१ वर्ष की थी। आपके ऊपर एक बड़े परिवार का भार आ पड़ा और आपने उसे बड़ी दक्षता के साथ माथे चढ़ाया। कुछ दिन भी नहीं बीतने पाये कि मारवाड़ में प्लेग और मलेरिया का दौरा प्रारम्भ हुआ। जिसमें आपकी धर्मपत्नी तथा दो लड़के एवं अन्य कतिपय स्नेही स्वजन चल बसे । यद्यपि यह घटना बड़े बड़े संगदिलों को को भी घबरा सकती थी, किन्तु आपने इस आकस्मिक दारुण दु ख को बड़े धैर्य से सहन किया और अपनी दुनियादारी में कोई आंच नहीं लगने दी । एक साधारण. मुनीमी से लेकर जोधपुर राज्य के ख्यातिनामा वकील के रूप में आप अपना कार्य सम्पादन करते रहे हैं । दृढ़ अध्यवसाय तथा अटूट लगन से श्रापने अच्छी सम्पत्ति भी उपार्जन करली है। भीवालिया में वैज्ञानिक यन्त्रों से आपकी देख रेख में चलने वाला कृषि कार्य जोधपुर के कृपि-क्षेत्र का एक जीता जागता उदाहरण है। आप जोधपुर के " रतन श्रावक मण्डल" के उप-प्रधान मन्त्री २ तथा समाजमें आपकामादरणीय स्थान है।
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(ई)
श्राप एक परिश्रमी तथा दूरदर्शी व्यक्ति हैं । जैनधर्म में आपकी अटूट प्रास्था
तथा विश्वास है । श्राप हर काम को पूर्ण मुस्तैदी तथा लगनसे करते हैं, यही कारण है
कि आपने अपने जीवन में काफी प्रगति भी करती है। आपने द्रव्य दानसे इस सूत्र
को प्रकाशित करने में मण्डल की मदद की है। अतः मण्डल की ओर से में
श्रापको धन्यवाद देते हुए शासनदेव से प्रार्थना करता हूं कि वे आपकी इस उदार
तथा पार्मिक भावना को सफल यनाए रहें।
विनीत
शशिकान्त 'झा' शान्त्री
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प्राकथन: जैन शास्त्रों को प्रमुख चार भागों में बांटा गया है अंग, पांग, मूल और छेद । उन में वृहत्कल्प का स्थान भी छेद सूत्र में एक है। आगमों में विभिन्न जगह 'दसा कप्पयवहाराणं उद्देलण कालेणं ऐसा निर्देश आता है, जिसमें दशाश्रुत स्कंध के साथ वृहत्कल्प का भी कल्प के संकेत से उल्लेख किया गया है । ज्ञात होता है कि इसका पूर्व नाम कल्पसूत्र ही दक्खा गया हो, क्योंकि वृत्तिकार आचार्य मलयगिरि भी इसी नाम से परिचय देते हैं। स्थानांग और आवश्यक आदि में कल्प नाम का उल्लेख होते हुए और वृत्ति में भी कल्प नाम से परिचय होते हुए इसको बृहत्कल्प नाम से क्यों कहा जाता है, 'निगूढाशयां हि प्राचार्याः ऐसा होने पर भी यथासाध्य कारंण का पता लगाना चाहिये । संस्कृत में एक नियम है कि--'संभव व्यभिचारा. भ्यास्याद्विशेषणमर्थवत' विशेषण का संभव हो या उसके बिना दोष छाने की संभावना हो, तभी विशेषण की नाम के साथ सार्थकता होती है। इस दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि बृहत्कल्प और दशाभुतस्कंध का पयूषण-कल्प जिसको आज कल्पसूत्र के नाम से कहते हैं, दोनों को यदि एक ही नाम से कहा जाय तो ग्रंथ का सही परिचय प्राप्त नहीं होगा। अतः अावश्यकता हुई दोनों में विशेपण देने की । कल्प सूत्र के अन्तिम भाग समाचारी में भी कुछ कल्याकल्प का भेद दिखाने को उल्लेख किया है और इसमें उसी का विस्तृत विचार है.-संभव है इसी दृष्टिकोण को लेकर मध्यकाल के आचार्यों ने इसका नाम बृहत्कल्प रखा हो। सामग्री के अभाव और समय की कमी से यहां अभी यह निर्णय नहीं कर सकते कि बृहकल्प नाम की प्रसिद्धि कब से हुई। कर्ता- प्राप्त सामग्री के अनुसार बृहत्कल्प सूत्र के कर्ता श्रुतकेवली भद्रबाहु माने गये हैं। श्राचार्य मत्तयनिरि कहते हैं कि-अथ का सूत्रमकार्षीत ! को या नियुक्तिं ! को घा .. भा,म् ? इति, उच्यते-इह पूर्वषु यद् नवमं प्रत्याख्यानं नामक पूर्व तस्य यत् तृतीय- माचाराख्यं वस्तु तस्मिन् विंशतितमे प्रामृते मूलगुणेबूत्तरगुणेषु चापराधेषु दशविध- मालोचनादिकं प्रायश्चित्तमुपवर्णितम् । कालक्रमेण च दुपमानुभावतो धृति-बल वीर्य- वुद्ध्या-ऽऽयुः प्रभृतिषु परिहीयमानेषु पूर्वाणि दुरवगाहानि जातानि, ततो 'मा भूत- प्रायश्चित्त व्यवच्छेदः-इति साधूनामनुग्रहाय चतुर्दशपूर्वधरेण भगवता भद्रबाहुस्वा- मिना कल्पसूत्र व्यवहार सूत्रं चाकारि, उभयोरपि च सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिः । इमे अपि च कल्प--व्यवहार सूत्र सनियुक्ति के अल्पग्रंथतया महार्थत्वेन च दु.पमानु भावतो होयमानमेधा-ऽऽयुरादि गुणानामिदानीन्तनजन्तूनामल्नशक्तीनां दुर्ग दुखधारे जाते, ततः सुखग्रहण-धारणाय भाध्यकारो भाष्यंकृतवान् , तच्च सूत्रस्पर्शिक- नियुक्त्यनुगतमिति सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिर्भाष्य चैको ग्रंथो जातः। टी. रचना का उद्देश्य- टीकाकार आचार्य मलयगिरि ने कहा है कि पूर्व का यह प्रायश्चित भाग नष्ट नहीं होजाय इसलिये भद्रबाहु ने इसकी रचना की । किन्तु कुछ गहराई से सोचने पर -मालूम होगा कि छेद सूत्र की रचना का उद्देश्य विभिन्न देशकाल में होने वाले साधु साध्विओं की परिस्थिति वश उलझी समस्या को सुलझाना और मोह, अज्ञान एवं प्रमाद आदि से लगने वाले दोपों से संयम की रक्षा करना भी है। यह सर्व विदित बात है कि साधु भी शरीरधारी प्राणी है । काम, क्रोध लोभादि उसके साथ भी लगे हैं । यद्यपि वह इनको आश्रय नहीं देता और न उदय को टिकाने का ही यत्न करता है, फिर भी छ8 से ११ वें गुणस्थान तक लाख प्रयत्न करने पर भी इनका समूल नाश नहीं होता। इन छ दों में वह अपने प्रयत्न के वल पर इनको मन्द, मन्दतर, मन्दतम बना लेता है, और इग्यारवें पहुँचकर तो उसको 'भस्माच्छन्न आग.की तरह हत शक्ति कर देता है। किन्तु अधिकता से प्रमत्तदशा के प्रथम स्थानपर रहने वाले साधु साध्वियों के लिये तो सदा कपाय का खतरा बना रहता है। उनके लिये निर्मोह और वीतरागता का आदर्श वांछनीय होकर भी प्राप्त नहीं है । उनका शरीर और संघ से प्रेम सम्बन्ध टूटा नहीं है । शरीर, संगी और संयम की रक्षा के लिये आहार, वस्त्र, पात्र, स्थान आदि साधनों की समय समय पर आवश्यकता होती है। अतः उत्सर्ग और अपवाद के कथन से मुनि धर्म की रक्षा और शुद्धि करना इसका प्रधान उद्देश्य समझना चाहिये। 1 (ए) शास्त्र के अधिकारी- प्राचीन समय की एक मर्यादा है कि अयोग्य को ज्ञान नहीं देना चाहिए यदि कोई प्राचार्य ज्ञान दान में योग्याऽयोग्य का विचार नहीं करे तो शास्त्र ने उसे दोपभागी माना है । आवश्यक सूत्र में इसको " सुट्ठु दिन्नं " नामक ज्ञानका अतिचार कहा स्थानांग के तीसरे स्थान में कहा है कि अविनीत १ रसलोलुपी २ और कलह का उपशमन नहीं करने वाला तीव्र कषायवान ये ३ वाचना देने योग्य नहीं हैं। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान तो पापी को धर्मी बनाता और दुर्जन को भी सज्जन करता है फिर इसके लिये ऐसा परहेज क्यों ? बात यह है कि ज्ञान दो प्रकार का है एक ग्रहण शिक्षा रूप दूसरा सेवन रूप । इनमें पदार्थ ज्ञान एवं उत्सापिवाद की शिक्षा वाला जो प्रथम ज्ञान है उसके लिये अधिकारी का विचार आवश्यक है। अाज भी अणु विज्ञान आदि के तत्व गुप्त रक्खे जाते हैं, कारण उनके दुरुपयोग की आशंका रहती है। इसलिये भाष्यकार कहते हैं कि-शास्त्र के रहस्यों को जो 'साधारण में प्रगट करता और अपवाद पद का गल्ल उपयोग करता है। वैसे ज्ञान- दर्शन-चारित्र की शिथिल प्रवृत्ति वाले को ज्ञान देना दोष का हेतु हैं। ऐसे अपात्र में शास्त्र ज्ञान देने वाला चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण करता है। इसलिये कल्पशास्त्र का ज्ञान देने के लिये निम्न गुग देखने चाहिये कहा है-- अरहस्संधारण, पारएय, असढ़करणे तुलासमें सनिते । पालणा दीवणाय, आराहणं छिन्न संसारी । ६४६ । अर्थात् जो गम्भीर रहस्य को धारण करने वाला है, प्रारम्भ किये Qत को बीच में नहीं छोड़ता, छल और अहंकार से दूर तथा तुला के समान राग द्वाप रहित समवृद्धि वाला है, जितेन्द्रिय है उसको देना चाहिये, जिससे भगवत्कथित कल्प की आराधना हो । अथवा जो शास्त्र कथित विधि का पालन करे उसको देना चाहिये । ऐसा करने से मार्ग की दीपना होती है। शास्त्रान्तर से तुलना- वृहत्कल्प की शास्त्रान्तर से दो प्रकार की तुलना हो सकती है, एक शब्द से और दूसरी अर्थ से । यहां आर्थिक तुलना समयाभाव से नहीं कर थोडीसीः शाब्दिक तुलना ही की जायगी । भगवती, व्यवहार और स्थानांग सूत्र में तुलना के स्थल मिलते हैं। जैसे-चतुर्थ स्थान के मांदि में -तो. अंगुग्धाइया प० त० हत्थकम्म ( माग-से समानुपापा : २० र पर १३ सूत्रों का तृतीय उदेश में पूर्ण साम्म । स्थानांग की विशेषता माई कि उसके पंचम स्थानीय प्रकार का अातिक बनाया है, जो कि--न गुम्बा करेमागे १. गहुग पाडलबमाणे २, रामोशाजमा महिमा ४, रायपिंई मुंजमा ११ द्वितीय उद्देशके अंतिम दो सूत्रों का पंचम स्थान के दशक कप निगंयाणा निमांधील वा पंच वयाई धारितय "सूत्र में पूर्ण साम यहां 'इमाई पद नहीं है। चतुर्थ उद्देश के ३२ चे सूत्र के साथ पंचम स्थान द्वितीय उद्देश के शादि सत्र प्रायः मान्य है। वहाँ 'कामिया के स्थान पर मान का प्रगत। अयवाद में स्थानांग की विशेषता है, वहां पांच कारण बताये है। जैसे कि- पंचहि ठाणेहि कम्पनि, तं भवसि वा १ दुभिरसिया २, पश्यदेजवरणकोई ३, उदयोतिषा एज्जमारणंति महनावा. अरणारिएलु ५।" छ8 उद्देश के प्रवचनादि चार सूत्र भी स्थानांग के छठें स्थान में मिलते हैं। दुर्ग प्रश्न के निर्णय निर्गथि दुग्गंलिया विसर्गनिया' प्रादि सूत्रों का स्या- नांग पंचम स्थान के द्वितीय उद्देश और छठे स्थान में साम मिलता है। अर्थ की तुलना के लिये श्राचासंग श्रादि अन्य शाल सी तुलना स्थान हो सकते है। वृहत्यल्प के टीका ग्रन्य और संस्करण भद्रबाहु स्वामित नियुक्ति के अतिरिक्त एक संबढामगरणीत प्राकृत माध्य है जो गाथा बद्ध है। प्राचार्य मनयगिरि ने कहा है कि- "बहार्शिकनियुक्तिमा चैको ग्रन्थो जातः । नियुक्ति और भाप्प का पृथकारण करना कठिन हो गया है। क्षेम कीर्ति के उल्लेख से चूर्णि का होना भी पाया जाता है। फिर प्राचार्य मलयगिरि ने इस पर संस्कृत टीका की है, जो पूर्ण उपलब्ध नहीं होती, प्राचार्य क्षेमकीर्ति कहते हैं कि--तदपि कुतोऽपि देतोविदानी परिपूर्ण नावलोक्यत इति परिमाव्यं मन्दमति मौलिनाऽपि मया गुरूपदेश निश्रीकृत्य श्री मलयगिरि विरचित विवरणादूचं विवरीतुमारभ्यते ।" इससे ज्ञात होता है कि मलयगिरिकृत टीका का जो भाग उपलब्ध नहीं है, उसी की हेमकीर्ति ने पूर्ति की है। पूर्वाचार्यों ने (श्री) कुछ टवार्थ भी किये हैं। उपरोक्त नियुक्ति, भाष्य और टीका सहित संपूर्ण ग्रन्थ "आत्मानन्द जैन सभा भावनगर" से ६ भागों में प्रकाशित हुआ है। मुद्रित माध्य के साथ लगे हुए लघु विशेषण से यह अनुमान सहन होता है कि बृभाष्य भी होना चाहिये। इसके अतिरिक्त डा. जीवराज छेजाभाई ने गुजराती अनुवाद सहित अहमदाबाद से भो १ संकरण निकाला है। बाल ब्रह्मवारी शास्त्र विशारद पूज्य श्री अमोलक ऋपिजी महाराज द्वारा इसका हिन्दी अनुवाद भी किया गया है जो हैदराबाद दक्षिण से प्रकाशित हुआ है। आगम मन्दिर पालीताणा और मुनि जिन विजयजी द्वारा मूल संस्करण भी निकाले गये हैं। हमारा संपादन कार्यः पाठक सोचेंगे कि वृहत्कल्प सूत्र के २-३ संस्करण पहले निकल चुके हैं और एस० एस० जैन का० भी आगम वत्तीसी में इसको निकालना चाहती है। फिर यह अलग प्रयन्न क्यों ? किन्तु बात ऐसी नहीं है, आजतक के छपे हुए से इसमें विशिष्टता है। हिन्दी और गुजराती के अतिरिक्त संकृत टीका के साथ शुद्ध संस्करण अभीतक कोई प्रकाशित नहीं हुआ है। भावनगरसे प्रकाशित वृहत्कल्प सूत्र- भाष्य विशालकाय ६ भागों में है, जिसले सभी जिज्ञासुओं के लिये वह सुलभ नहीं हो सकता। अतः अाज से १० वर्ष पहले स्व० सौभागम नजी ढड्डा अजमेर वालों के भंडार से प्राप्त इसकी हस्तलिखितप्रति जो संस्कृत टीका सहित थी जीर्ण शीण दशा में होने से उसका रक्षण भी कठिन था, दक्षिण चातुर्मास में प्रतिलिपि करवाई गई :संशोधन के लिये गवेपणा करने पर भी कोई अन्य प्रति नहीं मिली, किन्तु प्रयत्न जारी रहा। जब मुनि श्री पुण्यविजयजी द्वारा संपादित बृहत्कल्प भाष्य से मिलान करना प्रारम्भ किया तव सहसा बृहद् वृत्ति के अङ्गरूप यह टीका भी उसमें प्राप्त होगई। अभिलाषा की पूर्ति के साधन पाकर बड़ी प्रसन्नता हुई। वाद उपयुक्त टिप्पण, शब्दकोश और अर्थ भी तय्यार किया गया। इसी बीच जिनागम प्रकाशन समिति व्यावर से कुछ आगमों के मूल संशोधन के लिये कहा गया। भागमःसंशोधन के उस परम पुनीत कार्य में ६ सूत्र लिये गये, जिनमें वृत्कल्प का भी एक स्थान था । अतः आगम मंदिर पालीताणा और भाष्य की प्रति से इसका संशोधन किया गया.! शब्दार्थ के लिये यह उचित प्रतीत हुआ कि संपूर्ण नहीं देकर कुछ लार भाग ही दिया जाय । इस प्रकार वर्गो के प्रश्न और विभिन्न , (भौ) संस्करण एवं विद्वान मुनियों के परामर्श को ध्यान में रख कर कार्य किया गया है। विशेष कर नाचार्य जैन धर्म दिवाकर पृष्य श्री प्रात्मारामजी म० तथा कवियर उपाध्याय पं० श्री अमरचन्दजी म० के विचारों का अधिक सहयोग मिला है। एतदर्थ उन सब ग्रन्थकार और माननीय मुनिवरों का सादर स्मरण करना भी मेरा कर्तव्य हो जाता है। संशोधन आदि में सावधानता रखते हुए भी छमस्थता यश कुछ त्रुटियां रहना संभव है। जिसके लिये 'चायविक्खलियं न चा नतं उबाइसे मुणी' इस श्रागम पंचन के अनुसार गीतार्थ मुनि- 'क्षन्तु महाः त्रुटियों के लिये क्षमा कर भविष्य के लिये मार्ग दर्शन करेंगे। इत्यलम्... प्राचार्य हस्तिमन्लो मुनिः वृहत्कल्प परिचय बहिरंग में इसका मूल भद्रबाहुकृत होने से प्राकृत भाषा में है। जिलको उद्देशकों में बांटा गया है। उनमें कुल ८१ अधिकार हैं । प्रथम उद्देश में ५१, दूसरे में २५, तीसरे में ३१, चतुर्थ में ३७, पंचम में ४२, और छ8 में २० कुल २०६ सूत्र हैं। साथ ही वृहट्टीका से सौभाग्यसागरसूरि द्वारा उद्धृत- सुबोधा. टीका भी है। विशिष्ट शब्द कोश और टिप्पण, पाठान्तर आदि से परिशिष्ट सजाये गये हैं। प्रथम उद्देशक में-२४ अधिकार हैं, पहले प्रलंबाधिकार है, जिसमें कहा गया है. कि ताल एवं केला आदि प्रलंबफल साधु. साध्वियों- को कैसा लेना और कैप्ता नहीं लेना। कच्चा हो तो साधु साध्वियों को विना कटा लेना नहीं कल्पता कटा हुआ ले सकते हैं। साधुओं के लिए पक्के ताल प्रलंब का निपेध नहीं किन्तु साध्वी उसे भी विधि पूर्वक कटे होने पर ले सकती है। अन्यथा नहीं । दूसरा मास कल्पाधिकार-इसमें कहा है कि वर्षाकाल के अतिरिक्त साधु १मास और साध्वी २ मास एक गांव में रह सकते हैं। यदि गांव वाहर भीतर आदि रूप से दो भागमें हो तो द्विगुण कालतकरह सकते हैं, किन्तु उस समय जहां रहते हों उसी हिस्से से भिक्षा लेनी चाहिए ।तीसरे अधिकार में साधु साध्वियों के एक गांव में एकत्र रहने का विचार है। जो गांव एक ही द्वार वाला हो, जहाँ उसीसे निकलना और प्रवेश करना हो वहां दोनों को एक साथ रहना. निषिद्ध है। भिन्न मार्ग होने पर रह सकते हैं। चौथे उपाश्रय अधिकार में साध्वियों के लिये बाजार या गली के मुंह पर ठहरता निषिद्ध कहा है। साधु वहां ठहर सकते हैं। साध्वियां खुले मकान में बिना आवरण किये नहीं ठहर सकती, साधुः रह सकते हैं। पंचम अधिकार में बताया है कि यहि मिट्टी का भांड लेना आवश्यक हो तो साध्वियां सकड़े मंह के अरहट की घडी जैसा भांड ले सकती हैं किन्तु साधु वैसा नहीं ले सकता । ठे. अधि. कार में साधु साध्वियों को वस्त्र की चिलिमिलिका मच्छरदानी-रखने की अनुमति दी गई है। सप्तम अधिकार में कहा है कि पानी के किनारे साधु साध्वियों को १७ काम नहीं करना चाहिए, जैसे-खडे रहना, वैठना, सोना और खाना, पीना, स्वा. ध्याय श्रादि। आठवें अधिकार में चित्रवाले घर में साधु साध्वियों के लिये ।
(यः) ठहरना निषिद्ध कहा है। क्योंकि यहां ज्ञान ध्यान में विक्षेप हो सकता है. अतः साधु साध्वियों को चित्र रहित स्थान में ठहरना चाहिो । नवमें अधिकार साधिओं के शील रक्षण की दृष्टि से कहा है कि उन्हें शय्यादाता की देख रेख में ही रहना चाहिए । साधुओं के लिये ऐसा नियम नहीं है । दशमें अधिकार में कहा गया है कि साधु को सागारिक उपाश्रय में नहीं रहना चाहिये, किन्तु सागारिक रहित स्थान में रह सकते हैं। फिर स्पष्ट कर इसी बात को इयार अधिकार में कहा है-साधु स्त्री वाले उपाश्रय में नहीं रहे । पुरुप वाले घर में रह सकते हैं । ऐसे साध्वियों के लिये पुरुष सागारिक का निषेध और स्त्री वाले स्थान की अनुमति समझनी चाहिए । बारहवें अधिकार में कहा है कि जहां न्त्री श्रादि का प्रतिबन्ध हो वहां साध्वियां रह सकती हैं, साधु नहीं । १३वां अधिकार-जहां घर में होकर अाना जाना पडता हो उस जगह साधु नहीं रह सकते, साध्वियां स्थानाभाव से रह सकती हैं । १४ चे अधिकार में कहा है कि साधुओं को क्रोध नहीं रखना चाहिये कभी कलह-बोलना-हो जाय तो अविलम्ब क्रोध का अन्त कर लेना चाहिये। कारण प्रशमभाव ही संयम का सार है। १५ में अधिकार में बिहार का विचार है: वर्षा काल में बिहार का निषेध और शेप काल में अनुमति है । ६ ३ अधिकार में साधु सावित्रों के लिये दो विरोधी राज्यों में परस्पर शङ्का हो इस प्रकार जल्दी गमना- गमन करने का निपेय है। १७ का अधिकार अवग्रह का है, इस में कहा है कि भिक्षा के लिये घरमें गये हुए या स्वाध्याय और बहिभूमि जाते समय कभी गृहस्थ चल पात्रादि से निमन्त्रण करे तो साधु साध्वी का कर्तव्य है कि वे आचार्य एवं प्रवर्तनी की निश्राय से लावें और उनकी अनुमति पाकर ही ग्रहण करें। १८ वें से २१ वे तक चार अधिकार में रात्रि के निषिद्ध कार्यों का वर्णन किया गया है। पहले में कहा गया है कि रात या विकाल में चारों आहार ग्रहण नहीं करे, केवल दिन को देख्ने हुए शय्या-संतारक रात में ले सकते हैं। ऐसे रात या विकात में साधु, साध्वी बच भी नहीं ले सकते, अपना चुराया गया बन चदि रात में लाया गया हो तो वह ले सकते हैं। फिर-रात में एक गांव से दूसरे गांव बिहार करना भी नहीं कल्यता ! २२ चे अधिकार में जीमणवार में जाने का निपेव है। २३ चें अधिकार में कहा है कि साधु साध्वियों को शारीरिक कारण या स्वाध्याय के लिए रात्रि में उपाय के बाहर जाना हो तो, अनुकूलतानुसार १-२ दो को साथ लेकर जाना चाहिए । २१ ३ अधिकार में विहारक्षेत्र बताया गया है, पूर्व में अंग और -- - - (क) मगध, दक्षिण में कौशाम्बी, पश्चिम में स्थूणा और उत्सर में कुणाला देशत्क अार्य : क्षेत्र कहा गया है। उद्देश २--दूसरे उद्देश में ७ अधिकार हैं । प्रथम उपाश्रयाधिकार जिसमें खास तौर से १२ सूत्रों के द्वारा यह बताया गया है कि कैसे उपाश्रय में उतरना और कैने में नहीं । पहले कहा है कि जहां शालि अादि के बोज विखरे हों वहां नहीं ठहरना चाहिए, जहां मद्य के घड़े रखे हों और ठंडे या गर्म जल के घडे भरे रहते हों, वहां भी साधु साथी के लिये ठहरना निपिद है। जिस घर में रात भर आग जलती हो या दीपक रात भर जलता रहे, वहां भी साधु साचिओं को नहीं ठहरना चाहिए । उपाश्रय की सीमा में घृत, गुड़ और मोदकादि खाद्यपदार्थ विखरे. हों वहां भी नहीं ठहरना चाहिए। साध्वियों के लिये सार्वजनिक धर्मशाला-मुसाफिर खाना-में एवं खुला घर या वृक्ष के नीचे ठहरना निषिद्ध है। साधु ऐसे स्थान में ठहर सकते हैं। दूसरे अधिकार में शय्यातर दिड का विचार है । यदि किसी मकान के एक से अधिक स्वामी हों तो उनमें से एक को शय्यादाता बनाकर शेष घर की मिक्षा ले सकते हैं। शय्यातर का पिंडः बाहर निकलने पर भी कर लिया जा सकता है, बताया गया है । ३-१-५ म अधिकार में, जो भोजन शय्यातर के यहां दूसरे का अाया हो, या शय्यातर के यहां से भेजा गया हो, तथा उसके पूज्य-मान- नीय-पुरुप के लिये बनाया गया हो, उसको किस प्रकार ग्रहण करना, कहा गया है। छठे अधिकार में कहा है कि साधु पांच प्रकार के वस्त्र धारणकर सकते हैं। जंगमज-ऊन, रेशम आदि १, अलसी २, सणसूत्रः ३, कपास और वृक्ष की छाल के. वल्फल ४-५ । सात में अधिकार में पांच प्रकार के रजोहरण बताये हैं-१ ऊनका २ ऊंट की जट का ३ सणका ४-५ कुटे हुए घास और मुख का । ३-तीसरे उद्देशक--में १६ अधिकार हैं। प्रथम अधिकार में कहा है कि जहां साधु रहते हों उस स्थान पर साध्वी को और साध्वी के यहां साधु को बिना कारण जाना नहीं । दृसरे अधिकार में सकारण चमड़ा लेने का विचार है। तीसरे अधि- कार में कहा है कि साधु साध्विओं को अंखण्ड, याने बहुमूल्य वस्त्र नहीं रखना, आवश्यकता से टुकड़ा रख सकते हैं । चतुर्थ अधिकार में कहा कि साधु कच्छा नहीं रक्खें, साध्वियां रख सकती हैं। पंचम अधिकार में भिक्षा के लिये गयी. हुई साध्वी को वन की आवश्यकता हो तो लाने की विधि बताई गई है। षष्ठ अधिकार में सर्व प्रथम दीक्षा लेने वाले साधु साध्वी के लिये उपकरण का विचार है। सप्तम . ..
(ख) अधिकार में कहा है कि शीतकालके आरंभ में अर्थात् चातुर्मासके अन्तमें वन ग्रहण कर सकते हैं । वर्षा के प्रारंभ (चातुर्मास) में नहीं। ८-९ और १० में कहा है कि वस्त्र ग्रहण, शय्या ग्रहण और चन्दन छोटे बड़े के क्रम से ही करना चाहिये। ११ वें १२ वें अधिकार में गृहस्थ के घर पर साधु साध्वियों के लिये ठहरना और व्याख्यान का निपेध है, अपवाद भी बताया गया है । १३ चे अधिकार में पाट आदि पाडि- हारिक शय्या संथारा के देने की विधि कही गई है। १४ वें अधिकार में शया वापिस देते समय दूसरे साधु आ जाय तो अवग्रह की विधि बतलायी गई हैं। १५ वे अधिकार में कहा है कि गांव के बाहर सेना पड़ा हो तो भिक्षा के लिये वहां जाकर रात में नहीं रहना चाहिये । १६ चे अधिकार में साधु साध्वियों के लिये गांव के चारों ओर ५-५ कोश का अवमह लेकर रहने का विधान है। ४-चतुर्थ उद्देश-में १६ अधिकार हैं। प्रथम द्वितीय और तृतीय अधिकार में क्रमशः तीन प्रकार के अनुद्घातिक, पारांचित और अनवस्थाप्य प्रायश्चित के कारण कहे गये हैं। चतुर्थ अधिकार में कहा है कि तीन प्रकार के मनुष्य दीक्षा, मुंडन, शिक्षा, उपस्थापन, संभोग और संवास के अयोग्य है। पंचम अधिकार में अविनीत आदि तीन प्रकार के पुरुपों को वाचना के अयोग्य और विनीत आदि को वाचना योग्य कहा है। पष्ठ अधिकार में दुष्ट, मूढ आदि तीन प्रकार के मनुष्य को दुर्योध्य और अदुष्ट आदि को सुखबोध्य कहा है । सप्तम अधिकार में कहा है कि कष्ट में ग्लानि पाते हुए साधु को साध्वी एवं साध्वी को साधु आवश्यकता समझकर सद्भाव से सकारण सहारा दे तो आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता। अष्टम अधिकार में कहा है कि काल या क्षेत्र की-पहर तथा कोश रूप-मर्यादा का उल्लंघन कर श्राहार आदि का उपभोग करने से साधु साध्वी प्रायश्चित के अधिकारी होते हैं। नवमें अधिकार में आकस्मिक कोई अनपणीय घस्तु आजाय तो साधु को क्या करना चाहिये, यह बताया गया हैं। दशम अधिकार में कल्पस्थित और अकल्प. स्थित साधु के लिये बौदेशिक आहार की विधि कही गई है। एकादश अधिकार में साधुगणावच्छेदक और आचार्य आदि के गणान्तर करने की विधि बतलाई है। १२ वें अधिकार में कदाचित् किसी साधु का अाकस्मिक निधन हो जाय और साधु परठना चाहे तो उसकी विधि बतलाई है। तेरहवें अधिकार में कहा है कि कदाचित् मोहोदय से साधु का किसी के साथ कलह हो जाय तो तत्काल उसका उपशमन करना चाहिये, बिना शान्त किये भिक्षा आदि के लिये जाना नहीं कल्पता। - (ग) चौहदवें अंधिकार में परिहार तप वाले के साथ कैसा व्यवहार किया जाय, यह घताया गया है । पन्दरहवें अधिकार में कहा है कि गंगा, यमुना जैसी पांच बड़ी नदियां एक मास २-३ बार उतरना नहीं करता। कैसी दशा में उतर सकते यह भी दिखाया है। १६ वें अधिकार में बताया कि घास आदि का कच्चा घर यदि निर्जीव हो तो कितनी ऊंचाई होने पर वहां मास कल्प या वर्षाकाल रह सकते हैं। पंचमोद्देश-प्रथम अधिकार में कहा है कि साधु साध्वी को यदि स्त्री पुरुष के रूप में कोई देव देवी ग्रहण करे और वे उनको अच्छा समझे तो प्रायश्चित के अधिकारी होते हैं। दूसरे अधिकार में बताया है कि कोई साधु कलह करके दूसरे गण में जावे तो वहां कोमल वचनों से शान्त कर उसे फिर मूल गण में भेज देना चाहिये आदि। तीसरे अधिकार में प्रातःकाल या सायंकाल भोजन करते समय यदि मालूम हो जाय कि मूर्य उदय नहीं हुआ अथवा अस्त हो गया है, तो क्या करना चाहिये, बताया है। चौथे अधिकारमें रात्रि या विकाल में कंठ के नीचे से गुचलका जाय तो उसकी विधि कही गई है। पंचम अधिकार में बीज या जन्तु उपर से पात्र में गिर जाय तो किस प्रकार करना चाहिये, बताया गया है। छ?' अधिकार में- भोजन में सचित्त जल की बंद गिर जाय तब उसके उपयोग की विधि कही गई है। सप्तम अधिकार में साध्वी के व्रत रक्षा का विचार है, उसके लिये निम्न बातों का निषेध है- एकाकिनी होकर भिक्षा, जंगल और ग्रामानुग्राम विहार करना । २ वस्त्र रहित रहना, ३ अपात्र होना, ४कायोत्सर्ग में देह का भान भूलना, ५ गांव के बाहर खड़े आतापना लेना, ६ स्थानायत श्रासन से रहना, ७ एक रात्रि की पडिमा कायोत्सर्ग रूप. करना, ८ निपद्या प्रासन करना, ६ उकडू आसन से वैठना, १० वीरासन से बैठना, ११ दंडासन करना, १२ लकडासन करना, १३ उलटे मुंह सोना, १४ सीधे सोना, १५ आम्रकुबजासन करना; १६ एक पार्श्व से अभिग्रह कर लेटना, ये कार्य साध्वी को नहीं करने चाहिये । : साधु की तरह साध्वी को आकुंचन पट्ट धारण करना, पीछे तकिये-सहारेदार- श्रासन पर बैठना, दोनों वाजू खुट्टीदार पट्ट पर बैठना, नालवाला तुम्बा रखना खुली दंडी का. रजोहरण धारण करना, पुजनी में दण्डी रखना ये बातें भी साध्वियों के लिये निपिद्ध हैं। अष्टम अधिकार में मोक प्रतिमा का विचार है। नवम अधिकार में रात में रहे हुए आहार के सेवन का निषेध हैं। लेप भी रात में ।
(घ). रक्खा हुआ गाढ कारण बिना निषिद्ध है। ऐसे वासी रक्खे हुए घृत आदि को मालिश भी निषिद्ध है । दशचे अधिकार में परिहार तप वाले के व्यवहार की विधि कही गई है। १९ वें अधिकार में कहा है कि निस्सार आहार पाकर साध्वी निर्वाह नहीं कर सके तो दूसरी बार भी भिक्षा को जाना कल्पता है । षष्ठ उद्देश--प्रथम अधिकार में छः प्रवचन कहे हैं-जैसे १ हंसी आदि से झूठ घोलना, २ अवहेलना करना, ३ खिसताने वाले वचन ४ कठोर वचन ५ गृहस्थ जैसे अपशब्द, ६ शान्त कलह को उत्तेजित करने वाले वचन ये अवाच्य हैं । दूसरे अधिकार में-हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, अपुरुपवचन और दास वचन रूप छः प्रायश्चित के स्थान कहे गये हैं। तीसरे अधिकार में चार सूत्रों से कहा गया है कि साधु साध्वी के पैर में कांटा, कील आदि लग जाय एवं अांख में रज कण या जन्तु गिर जाय और वे निकाल नहीं सके तो आवश्यकता से साधु का साध्वो तथा साध्वी का साधु निकाल सकते हैं। किन्तु यह विशेष प्रसंग का सूत्र है। चौथे और पांचवें अधिकार में कहा है कि १२ कारणों से साधु साध्वी का स्पर्श करते हुए आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते। जैसे दुर्गादि भूमि में साध्वी का पैर फिसलता हो, कीचड आदि में फिसलती हो, २ नौका पर चढनी या उतरती हो, ३ भय आदि से विक्षिप्त चित्त हो, ४. कामादि से दीत चित्त हो, ५ भूतप्रेतादि बाधा से वेभान हो, ६ उन्मत्त हो, ७ उपसर्ग से व्या- कुल हो, ८ क्रोध या कलह से अनुपशान्त हो, ९ प्रायश्चित से भयभीत हो १०, भक्त. प्रत्याख्यान बाली हो ११ अर्थजात से चिन्तित हो १२, तो साधु पकड सकते एवं सहारा दे सकते हैं। छ? अधिकार में ६ बातें संयम को निस्सार बनाने वाली कही गई हैं । अन्त में कल्प की ६ स्थितियां बताई गई है । छद्मस्थ साधक के कल्पमात्र का इल में समावेश कर दिया गया है। .. .
बृहत्कल्पसूत्रस्यानुक्रमणिका प्रथम उद्देशकः " -- ५ ":": " सूत्र १-५. प्रलम्ब प्रकृतम् पृष्ठ : १-२ निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयक.म्-अभिन्न-आमताल प्रलंव सूत्रम् भिन्न भिन्न-भिन्न पक्कताल प्रलम्बसूत्रम ४. अभिन्न पक्वताल प्रलम्ब सूत्रम् भिन्न ६-६ मासकल्पप्रकृतम् ३- ५ ६-७ निर्ग्रन्थ विषयके मास कल्प सूत्रे ८-९ निम्रन्थी विषयक १०-११ वगड़ा प्रकृतम् १०-११ निग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयके वगडा सूत्रे १२-१३ आपणगृहरथ्यामुखादि प्रकृतम् ५- ६ १२ निर्ग्रन्थी विपयकम् अापण गृहरथ्या मुखादि सूत्रम् निम्रन्थ १४-१५ अपावृत्तद्वारोपाश्रय प्रकृतम् निर्ग्रन्थी विपयकं अपावृत द्वारो पाश्रय सूत्रम् निर्ग्रन्थ १६-१७ घटीमात्रक प्रकृतम् ६-७ १६ निर्ग्रन्थी विषयकम घटी मात्रक सूत्रम् निर्ग्रन्थ १८ चिलिमिलिका प्रकृतम् . निन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं चिलिमिलिका सूत्र १३ " wr 11 " (च) १६ दकतीर प्रकृतम् निम्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं दकतीर सूत्रम् २०-२१ चित्रकर्म प्रकृतम् २० निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं सचित्र कर्मोपाश्रय सूत्रम् २१ अचित्र २२-२४ सागारिक निश्रा प्रकृतम् २२-२३ निर्ग्रन्थी विषयके सागारिक निश्रा सूत्रे निम्रन्थ विषयकं सागारिक निश्राऽनिश्रा सूत्रम् २५-२६ सागारिकोपाश्रय प्रकृतम् निर्ग्रन्थ-निर्गन्थी विषयकं सागारिकोपाश्रय सूत्रम् २६ निर्ग्रन्थ-विषयकं स्त्री सागारिकोपाश्रय सूत्रम् ८ 2- २७ , पुरुष २८ " " 8 निर्ग्रन्थी, ૨૬ स्त्री सागारिकोपाश्रय सूत्रम् ३०-३१ प्रतिबद्ध शय्या प्रकृतम् ३० निग्रन्थ विषयकं प्रतिबद्ध शय्या सूत्रम् ३१ निर्मन्थी ३२-३३ गृहपति कुलमध्यवास प्रकृतम् ३२ निर्ग्रन्थ विषयकं गृहपति कुल मध्यवास सूत्रम् :- ३३. निर्ग्रन्थी व्यवशमन प्रकृतम् :: भिक्षु विषयकं व्यवशमन सूत्रम् ३५-३६ चार प्रकृतम्: निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयके चार सूत्रे ३७ वैराज्य विरुद्ध राज्य प्रकृतम् ३७ निर्ग्रन्थ निम्रन्थी विषयकं वैराज्य विरुद्ध राज्य सूत्रम् " ": 8-१.
(छ ११-१२ ३८-४१ अवग्रह प्रकृतम् ३४-३६ निर्घन्य विषयके वस्त्राद्यवग्रह सूत्र ४०-४१ निर्गन्थी १३ १३ १३ ४५ १३ ४२-४३ रात्रिभक्त प्रकृतम् ४२ ४३ निर्ग्रन्थ निम्रन्थी विषयके रात्रि भक्त सूत्रे ४४ रात्रिपनादि ग्रहण प्रकृतम् ४४. निम्रन्थ निग्रन्थी विषयकं रात्रि ववादि ग्रहण सूत्रम् ४५. हरियाहहिया प्रकृतम् निम्रन्य निर्गन्थी विषयकं हरियाहडिया सूत्रम् ४६ श्रध्व प्रकृतम् निग्रन्थ निम्रन्थी विषयकम् अध्य सूत्रम् १७ सङ्खडि प्रकृतम् निम्रन्थ निन्थी विषयकं सञ्जडि सूत्रम् ४८-४६ विचार भूमि विहार भूमि प्रकृतम् निग्रन्थ विषयकं विचार भूमि विहार भूमी सूत्रम् ४६ निग्रन्थी ५०-५१ ५०-५१ निर्ग्रन्थी विपकम् ार्य क्षेत्र सत्रम् १४ ४७ १४ आर्यक्षेत्र प्रकृतम् १५ द्वितीय उद्देशकः १-१२ उपाश्रय-अधिकारः १-३ . निर्गन्ध निम्रन्थ्युपायोपघात विषयाणि बीज सूत्राणि पृष्ठ १७-२१ ४ 1- विषयकं विकट सूत्रन् विषयकम् उदक सूत्रम् विषयकं ज्योतिः सूत्रम् (ज) ७ " प्रदीप सूत्रम् ८-१० " विषयाणि पिण्डादि सूत्राणि ११ निग्रन्यी विषयम् प्रागमन गृहादि सूत्रम् १२ निन्थी १३-१६ सागारिक पारिहारिक-अधिकारः २१-२२ १३ सागारिक पारिहारिक सूत्रम् निम्रन्थ निम्रन्थी विषयम् अनिहत सागारिक पिण्ड सूत्रम् १५-१६ विषये निहत सूत्रे १७-१८ ग्राहृतिका निह तिका-अधिकारः २२ १७ निन्ध निर्ग्रन्थी विपयकम् अाहतिका सूत्रम् १८ निर्हतिका सूत्रम् १० निग्रन्थ निग्रन्थी विषयकं अंशिका सूत्रम् २०-२३ पूज्य भक्त उपकरण अधिकारः २३-२४ २०-२३ निम्रन्थ निग्रंन्धी विषयाणि-पूज्यभक्तोपकरण सूत्राणि २४ २४ निम्रन्थ निम्रन्थी विषयकम् उपधि सूत्रम् रजोहरण-अधिकारः निर्गन्ध निर्गन्थी विषयकं रजोहरण सूत्रम् अंशिका प्रकृतम् उपधि प्रकृतम् पृष्ट तृतीय उद्देशकः १-२. उपाश्रय प्रवेश प्रकृतम् निर्ग्रन्थ विषयकं निग्रन्ध्युपाश्रय प्रवेश सूत्रम् निम्रन्थी विषयकं निम्रन्थोपाश्रय " चर्म-अधिकार निन्थी विषयक सलोम चर्म सूत्रम् २ - " २५-२६ ३ (झ) 3. अकृत्स्न" ७ २६. ७ " २६-२७ २७ २७ निर्ग्रन्थ निर्गन्थ-निम्रन्थी विषयकं कृत्स्न चर्म सूत्रम ". कृत्स्नऽकृत्स्नावस्त्र-अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कृत्स्नाऽकृत्स्न वस्त्र सूर ८-8 भिन्ना-ऽभिन्न वस्त्र अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् अभिन्न वस्त्र सूत्रम् भिन्न १०-११ अवग्रहानन्तकाऽवग्रह पट्टक-अधिकारः १०. निम्रन्थ विषयकम् अवग्रहानन्तका-ऽवग्रह पट्टक सू० ११ निम्रन्थी १२ निश्रा-अधिकारः १२ निम्रन्थी विषयकं निश्रा सू० १३-१४ त्रिचतुः कृत्स्न-अधिकारः १३ निर्ग्रन्थ विषयकं त्रिकृत्स्त स० १४ निग्रन्थी विषयकं चतुः कृत्स्न सू० .१५ समवसरण-अधिकारः १५ निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं समवसरण स० वस्त्रपरिभाजन-अधिकारः निर्यन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं वस्त्र परिभाजन स० १७ शय्या संस्तारक परिभाजन-अधिकारः १७ निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं शय्या संस्तारक.परिभाजन स० १८ कृतिकर्म-अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कृतिकर्म सू० १8 अन्तर गृहस्थानादि-अधिकारः १६. निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् अन्तर गृहस्थानादि सू० २०-२१ अन्तर गृहाख्यानादि-अधिकारः २८ .२८-२६ २६ . २६ २६ २६ ३० ३१ ३२-३३ (ब) २०-२१ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विपयके अन्तर गृहाख्यानादि स० २२-२४ शय्या संस्तारक-अधिकारः २२-२४ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विपयाणि शय्यासंस्तारक सू० २५-२६ अवग्रहाधिकारः २५-२६ निर्ग्रन्थ विषयाणि अवग्रह स० ३० सेनाधिकारः ३० निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं सेना सू० ३१. क्षेत्रावग्रह प्रमाण अधिकारः ३१ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् क्षेत्रावग्रह प्रमाण स० ३४ " चतुर्थ उद्देशकः अनुद्घाति-अधिकारः १ ३५ १ २ ३५. २ ३ 1 अनुद्धाति प्रकृतम् पाराश्चिक-अधिकारः पाराञ्चिक स० अनवस्थाप्य-अधिकारः अनवस्थाप्य सू० :: पड्विध सचित्त द्रव्य कल्प-अधिकारः सचिंत्त द्रव्यकल्प विपय कम् प्रव्राजना सू० मुण्डापना सू० ३ 1 " ४ ५ " ६ ७ शिक्षापना सूत्रम् उपस्थापना सूत्रम् सम्भोजना सूत्रम् संवासना सूत्रं च (ट) १०-११. ३६-३७ " ३७-३८ " ७ वाचनाधिकारः १० चाचना विषयम् अविनीतादि सूत्रम् ११ विषयं विनीतादि सूत्रम् १२-१३ संज्ञाप्य-अधिकारः १२ दुःसंज्ञाप्य सूत्रम् १३ सुसंज्ञाप्य १४-१५ ग्लान-अधिकारः १४ निर्ग्रन्थी विषयकं ग्लान सूत्रम् निर्यन्य १६-१७ काल क्षेत्रातिक्रान्त-अधिकारः १६. निम्रन्थ-निम्रन्थी विषयकं कालातिक्रान्त सूत्रम् क्षेत्रातिकान्त. १८ अनेपणीय-अधिकारः १८ निम्रन्थ विषयकम् अनेपणीय कल्पस्थिता-ऽकल्पस्थिति-अधिकार: १६ कल्पस्थिता-ऽकल्पस्थित.. २०-२८ गणान्तरोपसम्पत्प्रकृतम् २० .. भिक्षु विषयकं गणान्तरोपसम्पत्सूत्रम २१ गणावच्छेदक विषय २२ प्राचार्य उपाध्याय विषयं २३. भिनुविपयं सम्भोग प्रत्यायिक गणावच्छेदक विषयं संभोग प्रत्ययिक २५ आचार्यउपाध्याय २६ भिक्षु विषयकम् अन्याचार्योपाध्यायोद्देशन सूत्रम्, गणावच्छेदक विपयम्' ३८-३९ " il ". ३६-४३ २४ आचार्य उपाध्याय .. २8 विष्वग्भवन-अधिकारः १ (ठ) २६ भिक्ष, विषयकं विष्वग्भवन सूत्रम् AW अधिकरण प्रकृतम् ४४. ४५ ". ४५-४६ भितुं विषयकम् अधिकरण सूत्रम् परिहारिक-अधिकारः ३१ भिक्षु विषयकं परिहारिक सूत्रम् ३२-३३ महानदी-अधिकारः ३२-३३ निग्रन्थ-निम्रन्थी विषयकं महानदी सूत्रे ३४-३७ उपाश्रय विधि अधिकारः ३४-३५ निर्गन्थ-निर्गन्धी विषयकम् ऋतुबद्धोपाश्रयविधि सूत्र द्वयम् ३६-३७ विपयक वर्षावासोपाश्रयविधि सूत्रद्वयम् " " ४६-४७ ४८ पञ्चम उद्देशकः १-४ ब्रह्मापाय-अधिकारः निग्रन्थ ब्रह्मापाय विषयकं देव स्त्री सूत्रम् २ देवी स्त्री निग्रंथी १ ३ ४ देवी पुरुष । देव पुरुष अधिकरण प्रकृतम् " ४६ ४ -- "४६-५० ६ ५ भिक्षु विषयकम् अधिकरण सूत्रम् ६-8 संस्तृत निर्विचिकित्स अधिकार भिक्षु विषयकं संस्तृत निर्विचिकित्स सूत्रम् विचिकित्स , असंस्तृत निर्विचिकिस्श्र सूत्रम् विचिकित्स. " ६ ": " (इ) . उद्गार-अधिकारः ५१ १. ५१ ५१-५२ १० निग्रन्थ-निर्गन्धी विषयकम उद्गार सूत्रम् आहार विधि-अधिकारः ११ निम्रन्थ विपयकम आहारविधि सूत्रम् १२ पानक विधि प्रकृतम् १२ निम्रन्थ विषयकं पानक विधि सूत्रम् १३-३६ ब्रह्मरक्षा-अधिकारः १३ निन्थी विषयकम् इन्द्रिय सूत्रम् १४ श्रोतः " एकाकि ५२-५५ १६ अचेल अपात्र १८ " १९ २० व्युत्सृष्टकाय" आतापना. " स्थानायत् " " २२ निपद्या सूत्रम् २४ २६ प्रतिमास्थायि सूत्रम २३ उत्कटुकासन सूत्रम् वीरासन, २५ दण्डासन लगण्डशायि सूत्रम् २७ अवाड्मुख उत्तान २६ अाम्र कुञ्ज एक पार्श्वशायि सूत्रं च निम्रन्थ निन्थी विषयकम आकुञ्चन पट्ट सूत्रन ".. सावश्रयासन " : सविपाण पीठ फलक सूत्र सवृन्ताला सू० सवृन्त पात्र केसरिका सू० दारुदण्डक स.. --- २ ३३ ३४ " A ३६ (ढ) " ५५-५६ मोक-अधिकारः निम्रन्थ निम्रन्थी विषयकं मोक सू० ३८-४० परिवासित-अधिकारः निम्रन्थ-निग्रन्थी विषयकम् आहार सू० ३६ आलेपन सू० म्रक्षण सू० ४१ व्यवहार-अधिकारः ४१ परिहार कल्पस्थित भिक्षु विषयं व्यवहार सू० पुलाक भक्त-अधिकारः ४२ निन्थी विषयकं पुलाक भक्त सू० ४० " ५६-५७ ४२ ५७ २ २ पष्ठ उद्देशकः वचन अधिकारः पृष्ठ निन्थ निम्रन्थी विषयकं वचन सू० प्रस्तार--अधिकारः ५८-५९ प्रस्तार सू० ३-६ कएटकाधु द्धरण-अधिकारः निम्रन्थ सम्बन्धि कण्टकाद्युद्धरण विपयकं पाद सू० प्राण-वीज-रज आंद्युद्धरण विषयकम् अक्षिसूत्रम निम्रन्थी काण्टकायुद्धरण विषयकं पाद सू० प्राण-वीजााद्धरण विपक्रयकम अक्षि सू० दुर्ग:अधिकारः ६०-६१ निम्रन्थी विपयं दुर्ग:सू० पक सू० " ५९-६० ३ ४ ६ . 1. G नौ स० (ण) ६१-६३ १०-१० क्षिप्तचित्तादि-अधिकारः १० निम्रन्थी विपयं क्षिप्तचित्ता स० ११ दीप्तचित्ता स० १२ यक्षाविष्टा सू० १३ उन्माद प्राप्ता सू० " उपसर्ग प्राप्ता सू० साधिकरणा सू० १५ १६ " सप्रायश्चित्ता स० भक्त पान प्रत्याख्याता सू० अर्थजात स. परिमन्थ-अधिकारः १० १६ " ६३-६४ परिमन्थ प्रकृतम् १६ २० कल्पस्थिति अधिकारः " ६४-६५ कल्पस्थिति सूत्रम् प्रथम परिशिष्टम् द्वितीयं परिशिष्टम् तृतीयं परिशिष्टम् चतुर्थं परिशिष्टम् - पञ्चमं परिशिष्टम् शब्दकोपः पाठभेदः प्रति परिचय विशेपनामानि टिप्पणम् पृष्ठ ६६-१०२ १०३-१०६ १०७-१०८ , १०६-१११ १५२-११३ " -- 業 ॐ ॥श्री। ॥ श्री बृहत्कल्प सूत्रंसटीकम् । LER024 टीकाकारस्य मंगलविधानम्- . येपो सदागमविकाशविधी विधित्सा, जन्मादिभीतभविनामभयप्रदित्सा । जात्यादिमानमदमत्तजनेपुकुत्सा, तीर्थङ्करास्त इह नो भुवि शङ्कराःस्युः।।१।। सतां कल्प्याऽकल्प्येप्रकृतिजनिते वस्तु निवहे, निवृत्त्य संशीतेः प्रवचनविदा कल्पितमिदम् । सुसूत्रं कल्पाख्यं विवृतिसहितं सल्लिपिमयं, प्रकुर्वेऽसद्गर्वोलिपिकृतिकलायामचतुरः ॥२॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीणं वा आमेतालपलंवे अभिरणे य पडिग्गाहित्तए ॥१॥ टीका-नोक-नोकल्पते निर्ण-निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां वा 'श्रामे आमं ताल- मलम्ब अभिन्न प्रतिग्रहीतुमिति योजना । अथ पदार्थः-नोकल्पते-नो समर्थी
प्रथमोद्देशकः
भवति न युज्यते इत्यर्थः निर्ग्रन्थानां-साधूनां, निग्रन्थीनां-साध्वीनां किम् ?-आमं-
अपक्वं-तातो-वृक्ष विशेषः तत्रभवं ताल-तालफलं, प्रकर्पण-लंबते इति प्रलंब,
अभिन्न-द्रव्यतोऽविदारितं, भावतोऽव्यपगतजीवं, किमित्याह-पडि०-प्रतिग्रहीतुम्-
आदातुमितिपदार्थः । प्रलम्बं द्विधा-सूल प्रलम्बं ताल प्रलम्वं वा, मूल प्रलम्ब-
डिड्डियादि, तान प्रलम्ब-सल्लको प्रभृतयः ॥ १॥
मूल-कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा आमे ताल पलंचे भिन्ने
पडिगाहित्तए ॥ २ ॥
टीका-( कल्पन्ते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा आमानि-अपक्कानि ताज
प्रलम्बानि-फलानि भिन्नानि-खंडशः कृतानि प्रतिग्रहीतुम् ) कप्प०-अस्य व्याख्या
प्राग्वत् , नवरं 'भिन्न-भिन्न-भावतोव्यपगतजीवं, द्रव्यतो भिन्नमभिन्नं वा तृतीय
चतुर्थ भंगवीत्यर्थः ॥ २ ॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाणं पक्के ताल पलंवे भिन्ने वा अभिन्ने वा
पडिगाहित्तए ।॥ ३॥
नो कप्पइ निग्गंथीणं पक्के ताल पलवे अभिन्ने पडिगाहित्तए ॥ ४ ॥
कम्पइ निग्गयीणं पक्के ताल पलंबे भिन्ने पडिगाहित्तए, सेवि य विहि-
भिन्ने, नो चेव-णं अविहि-भिन्ने ॥ ५ ॥
टीका--एतानि त्रीणि सूत्राणि समकमेव व्याख्यायन्ते--"कप्प०-कल्पते नि०-
निम्रन्थानां पक्के--पक्वं ताल प्रलम्बं द्रव्यतोभिन्नमभिन्न वा प्रतिग्रहीतुम् ॥ ३ ॥
नो क०--नोकल्पते निम्रन्थीनां प०-पक्वं ताल प्रलंवं अ०-अभिन्नं १०--प्रतिग्रही-
तुम् ॥ ४ ॥ क० कल्पते नि०--निम्रन्थीनां पक्कं-- पक्वं ताल प्रलम्बं मि०--
द्रव्यतोभिन्न प्रतिग्रहीतु सेवि--तदपि वि०--विधिभिन्नं--विधिना' चक्ष्यमाण
लक्षणेन भिन्न--विदारितं नो०-- नचअविधिभिन्न.'णं वाक्यालकारे ॥ ५॥
.
१-अविधिना विधिना च भिन्नस्य प्ररूपणा क्रियते तत्र यत्-चिटादिकं विदार्य जवफालिरूपांः पेश्यः
कृतं तद् ऋजुक भिन्नन् यत् तु पेश्यः कृत्वा पुनः इलक्ष्णश्लक्ष्णतरादिभिः खण्डैरनेकशदिछत्त्वा तथा
कृतं यथा भूयस्तदाकारं कर्तुं न पायते, तदेवं विधं विषमकुट्टभिन्न मुच्यते, विषमैः-पुनस्तथा कर्तुमशक्यः
कुहै।-इलक्ष्या खण्डेभिन्नमिति व्युत्पत्तेः । एतच्च विधिभिन्नम् ।
मंग चाऽविधिभिन्ने ते स दीपा द्रटच्या वेऽभिन्न देवीस्टान्तेन वर्णितः ॥ १० ॥ ५५॥
बृहत्कल्पसूत्रम् मूल-से गामंसि वा नगरंसि वा खेडंसि वा कब्बडंसि वा मडवंसि या पट्टणंसि वा आगरंसि वा दोणमुहंसि वा निगमंसि वा रायहाणिसि वा आसमंसि वा संनिससि वा संवाहंसि वा घोससि वा अंसियंसि वा पुडभेगणसिः वा सुपरिखेसि अबाहिरिमंसि कप्पइ निगंथाणं हेमंत गिम्हासु एग माम बत्थए ॥ ६॥ टीका--से--से शब्दो मागधदेश प्रसिद्धः अथ शब्दार्थः, गा०--ग्रामेवा न०- नकरे वा खेल-खेटे वा कर कटे वा म०--मडंवे वा ८० -पत्तने वा आ०--आकरे वा दो०--द्रोणमुखे वा नि०- निगमे वा रा--राजधान्यां या आ- आश्रमे वा संनि:--संनिवेशे वा सं०- संबाधे वा घो०-घोपे वा अं०--अंशिकायां वा पु०- पुट भेद्ने वा गा--यत्रं गवादीनां कराः सन्ति (गम्यो गमनीयो वा, अष्टादशाना कराणामिति, ग्रसते वा बुद्ध यादीन गुणान् इति, ग्रामः) नास्ति--नविद्यतेऽत्राष्टादश- कराणामेकोऽपि करः इति नकरम् , खेटं-पुन— लीप्राकारपरिक्षिप्तम् । कटं तुं कुनगरमुच्यते, मडम्वं नाम यत्सर्वतः--सर्वासुदिक्षुछिन्न--अर्द्ध : तृतीय . गव्यूत मर्यादायामविद्यमान ग्रामादिकमिति भावः, अन्ये तु व्याचक्षते--यस्य पार्श्वतोऽर्द्ध तृतीय योजनान्तर्यामादिकं न प्राप्यते तन्मडम्बम् । पत्तनं द्विधा जल पत्तनं स्थल पत्तनञ्च, यन्त्र जलपथेन नावादिवाहनारूढ़ भाण्डमुपैति तज्जल पत्तनं, यथा द्वीपम् ! यत्र तु स्थल पथेन शकटादौ स्थापितं भाण्डमायाति तत्स्थलपत्तनं यथा अानन्दपुरम् । अथ आकरायः यत्र पापाणधातु धमनादिना लोहमुत्पाद्यते स अय आकरः, आदि शब्दात् ताम्ररूप्यका प्या) द्याकर परिग्रहः । दो०- यस्यतु जल पथेन स्थल पथेन च द्वाभ्यामपि प्रकाराम्यां भाण्डमुपागच्छति तद् द्रोण मुखम् (द्वयोः पथोमुखमिति निरुक्त्या) उच्यते; तच्च भृगुकच्छं ताम्रलिप्तो वा । निगमं नाम यत्र नैगमा:--वाणिजकविशेषास्तेषां वर्ग:--समूहो. वसति, अतएव निगमे भवा नैगमा इति व्यपदिश्यते । यत्र नपरादौ राजा परिवसति सा राजधानी । आश्रमो-यः प्रथमतस्तापसादिभिरावासितः, पश्चादपरोऽपिलोकस्तत्र गत्वा च. सति, नि:--निवेशो नाम--यत्र सार्थ आवासितः, आदिग्रहणेन ग्रामो वा अन्यत्र प्रस्थितःसन् यत्रान्तरावासमधिवसति, यात्रायां वा यतो लोको यत्र तिष्ठति एष सर्वोऽपि निवेशः । ('संवा० गाथा'.) सं०--संबाधोनाम--यत्र कृषीवल लोकोऽन्यत्र कर्षणंकृत्वा वणिग्वर्गो घा वाणिज्यं कृत्वा अन्यत्र पर्वतादिषु विपमेषु स्थानेषु . .
प्रथमोद्देशकः - 'संवोढुम्' इति कणादिकं समुह्य कोष्ठागारादौ च प्रक्षिप्य वसति (सः संबाधः ) । तथा घो०-घोषस्तु गोकुत्तमभिधीयते । अंc--अंशिका--यत्र ग्रामस्यार्द्धम, आदि शब्दात् त्रिधागो वा चतुर्भागो वा गत्वास्थितः सा ग्रामस्यांश एव अंशिका । (गा० - नाणा० ) पुड०-- नाना प्रकाराभ्यो दिग्भ्य भागतानां भाण्डानां--कुङ्कुमादीनां पुटा यत्र-विक्रयार्थ भिद्यन्ते तत् पुटभेदनम्-उच्यते । (केपाञ्चित्मतेन 'संकरंसि वा इत्यधिक पदं पठितव्यम् । सङ्घरोनाम किञ्चिद् प्रामोऽपि खेटमपि आश्रमोऽपीत्यादि) सपरि०-सपरिक्षेपे--वृत्यादिरूप परिक्षेपयुक्ते, अवा. 'अवाहिरिके--बहिर्भवा बाहिरिका [अध्यात्मादिभ्य इकण , सिद्ध ६-३-७5 इति इकण प्रत्ययः ] प्राकार बहिर्वतिनी गृह पद्धतिरित्यर्थः, न विद्यते बाहिरिका यन्त्र तद् अवाहिरिकं तस्मिन् कल्पते निम्रन्थानां 'हेमन्त ग्रीष्मे --ऋतु बद्ध कान सम्बन्धियु अष्टसु मासेवित्यर्थः, एक मासं वस्तुं-अवस्थातुम्, वा शब्दाः सर्वेऽपि विकल्पार्थाः स्वगतानेक भेद सचका चा द्रष्टव्याः इति सूत्र समासार्थः । मृल-सेगामंसि वा जाच रायहाणिसि वा सपरिक्खेचंसि सवाहिरि- यसि कप्पइ निग्गंथाणं हेमंत-गिम्हासु दोमासे-वत्थए। अंतो एग मासं, बाहिं एगं मासं । अंतोवसमाणाणं अंतोभिक्खायरिया, बाहिं वसमाणाणं बाहिंभिक्खायरिया ॥ ७ ॥ टोका-( अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा वृत्यादिरूप-परिक्षेपयुक्ते सपरि- क्षेपे ) सबाहिरिके-प्राकारबहिर्वति गृहपद्धतिरूपया पाहिरिकया सहिते कल्पते निम्रन्यानां हेमन्त-ग्रीष्मेपु द्वौ मासौ वस्तुम् । कथमित्याह अन्तः-प्राकाराभ्यन्तरे एक मासं, बहिः-वाहिरिकायामपि-एक मासम् । अन्तर्वसतासन्तर्भिक्षाची, बहि- घसतां पहिर्भिक्षाचर्येति ।। ७ ।। मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा सपरिक्खेचंसि अबाहिरियसि कप्पड़ निग्गंथीणं हेमंत-गिम्हासु दोमासे वत्थए ॥८॥ टोका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । (अथ ग्रामे वा यावद् राजधान्यां या सपरि- क्षेपे ) नवरम् (विशेषः ) अबाहिरिकेक्षेत्र कल्पते निर्ग्रन्थीनां हेमन्त ग्रीप्मेणु द्वौ मा. साँचस्तुमिति । ८ !३ बृहत्कल्पसूत्रम् - मूल-से गामंसि वा जावरायहाणिसि वा सपरिक्खेसि सवाहिरियसि कप्पड़ निग्गंथीगणं हेमंत-गिम्हासु चत्तारि मासे वत्थए,-अंतो दो मासे, बाहिं दो मासे, अंतो वसमाणीपं अंतोभिक्खायरिया बाहिं वसमाणीणं वाहि भिक्खायरिया।।४। टीका-अस्य न्याख्या प्रारवत् । (अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा सपरिक्षेपे) न वरम् (विशेषः ) सबाहिरिके क्षेत्र -अन्तद्वो मासौ बहिौंमासौ-इत्येवं चतुरो मासान् निर्ग्रन्थीनां वस्तुं कल्पते इति (अन्तर्वसन्तीनामन्तर्भिक्षाचर्या, बहिर्वसन्ती नां वहिभिक्षाचर्या)।।४। वृत्तरत्र प्रथम खण्डं पूर्तिमगात् । मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा एगवगड़ाए एग दुवाराए एग निक्खमणपवेसाए नो कप्पड़ निग्गंथाण य निग्गंथीण य एगत्तत्रो वत्थए । १०। दीका-से गामंसिक-से-अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा यावत् करणात नंगरे वा खेडे वा इत्यादि पद परिग्रहः । एगवगड़ाके०-वगड़ो नाम परिक्षेपः पर्वत प्राकारादिः तेन एकेन परितितो ग्राम एकवगड़ इति उच्यते । एगदु०- एक द्वारे-एक निष्क्रमण प्रवेशके च क्षेत्र नं. कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनाश्च एकतो मिलितानां वस्तुम-अवस्थातुम्-इति सूत्रार्थः ॥ १० ॥ मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा अभिणिवगड़ाए अभिणि दुवाराए वा अभिणिक्खमण पवेसाए कप्पइ निग्गंथाण य निग्गंथीण य एगत्त उवत्थए ॥ ११ ॥ दीका-से गामंसिवा-यावत् राजधान्यां वा अभिनिवगड़ाके " निपातानाम- नेकार्थत्वात-अभीत्यनेकानीति नियतावग़ड़ापरिक्षेपा यत्र तत् अभिनिवगडाकं तत्र, एवं अंभिनिद्वारके-अभिनिष्क्रमण प्रवेशके च कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्गन्थीनां- च वा एकतो वस्तुम् इति सूत्रार्थः ॥ ११ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं आवणगिहसि वा रत्थामुहंसि वा सिंघाड़गंसि वा तियं(क)सि वा चक्कंसि वा चच्चरंसि वा अंतरावणंसि वा वत्थए।१२।
६ प्रथमोशकः पथे वा- -- टीका-नो कप्पइ निग्गंधीणं आव० नो कल्पते निम्रन्थीनां श्रापणगृहे बा; संशया मुखे वा, शृंगाटके वा, त्रिके वा पन्थचतुष्के वा चत्वरे वा, अन्तरापणे वा वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १२ ॥ मूल-कप्पड़ निग्गंथाणं-श्रावणगिहंसि वा जाव अंतरावणसि वा बत्थए ।। १३ ॥ टोका--कप्पइ निग्गंधाणं-- अस्य व्याख्या प्राग्वत् (कल्पते निम्रन्थानां आपण गृहे वा, रथ्यामुखे बा, शृंगादके वा, त्रिके वा, चतुप्के वा, चत्वरे--महा- -अनेके पन्थानः सम्मिलन्ति तत्र, अन्तरापणे वा वस्तु मिति ।। १३ ।। मूल--नो कप्पइ निग्गंथीणं अवंगुय दुवारिए उवस्सए वत्थए, एगं पत्यारं अंतो किच्चा-एग पत्यारं वाहिं किच्चा-ओहाडिय चेलचिल- मिलियागंसि एवं णं कप्पड़ वत्थए ।॥ १४ ॥ टीका--नो कप्पइ--नो कल्पते निम्रन्थीनां--प्रतिनीनां अपावृतद्वारके- उद्घटितद्वारे उपाश्रये वस्तुम् । सकपाटोपायालाभे तु तत्राऽपि वसन्ताभिः इत्थं विधिविधेया---एक प्रस्तारक---कदं अन्त:--प्रतिश्रयाभ्यन्तरे कृत्वा एक प्रस्तारं-कटं बहिः कृत्वा ततोऽवघाटित चेलचिलमिलिकाके--अवघाटिता बद्धा चिलसिलिका यत्रस तथा ईश उपाश्रये एवमनन्तरोक्तेन विधिना (णं) इति वाक्यालंकारे कल्पते वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १४ ॥ सूल--कप्पइ निरगंथाणं अवंगुय-दुवारिए उबस्सए वत्थए ॥१५॥ टीका-कप्पइ--कल्पते . निम्रन्थानां--अपावृत द्वारे.. उपाश्रये वस्तमिति सूत्रार्थः ॥ १५॥ मूल-कपइ निग्गंथीणं अंतोलित्तयं घडिमत्तयं धारित्तए वा परि- हरित्तए वा ॥१६॥ टोका--कप्पइ--कल्पते निर्ग्रन्थींना--ब्रतिनीनां अन्तर्लिप्तंघविमात्रक--घटी संस्थानं मृण्मय भाजन विशेष धारयितुं वा परिहत्तुं वा । धारयितुं नाम स्वसत्तायां स्थापयितुम् परिहा--परिभोक्तुम् एष सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं अंतोलित्तयं घडिमत्तयं धारित्तए वा परि- हरित्तए वा ।। १७॥
वृहत्कल्पसूत्रम्
टीका-नोकप्पइ-अस्य व्याख्या पूर्ववत् (नो कल्पते निम्रन्थानां अन्तर्लिप्त
घटिमात्रकं धारयितुं वा परिहतु वा ) ।। १७ ।।
मूल-कप्पइ-निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा चेल चिलमिलियं धारित्तए
वा परिहरित्तए वा ॥ १८ ॥
टीका--कप्पइ-कल्पते निम्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा चेल चिलमिलिका
धारयितुवा परिहतु वा एष सूत्रार्थः, वस्त्र-रज्जु-कट-कल्क-दण्डभेदात् पञ्च विधां
चिलमिलिकां वक्ष्यते तत्कथं सूत्रं चेलचिलमिलिकाया एव ग्रहणम् ? इत्याह-चेतन्त
चन रज्वादीनां मध्ये वहुतरोपयोगित्वात् प्रधानतरम् तस्यैव सूत्रे ग्रहणं कृतम् ,
नान्यासां रज्जुचिलमिलिकादीनाम् ॥ १८ ॥
मूल-"नो कप्पह निग्गंशाण वा निग्गंथीण वा दगतीरंसिचिद्वित्त-
ए बा निसीइत्तए वा तुयट्टित्तए वा निदाइत्तए वा पयलाइत्तएवा असणं वा
पाणं वा खाइमं वा साइमं वा आहारं आहारित्तए वा उच्चारं वा पास-
वणं वा खेलं वा सिंघाणं वा परिहवित्तए वा, सज्झायं वा करित्तए धम्म
जागरियं वा जागरित्तए ( झाणं चा झाइत्तए) काउस्सग्गं चा ठाणं वा
ठाइत्तए ॥ १६॥
टीका-"नोकप्प०-नोकल्पते निम्रन्थानां चा निर्ग्रन्थीनां वा दुक तीरे-उदकोप
कण्ठे स्थातुं वा-उर्ध्वस्थितस्यासितुं वा, निपत्तु उपविष्टस्यस्थातुं, त्वग्वर्तयितुं वा
दीर्घकार्य प्रसारयितुं । निद्रापितु सुखप्रतिबोधावस्थया निद्रयाशयितुं प्रचलायितु
वा स्थितस्य स्वप्तुं 'अशनं वा पानं वा खादिमं वा स्वादिमं वा आहारयितं
वा, उच्चारं वा प्रस्रवणं वा खेलं वा, सिंघानं वा परिष्ठापयितु वा स्वाध्यायं वा,
वाचनादिकं कत्तुं धर्म जागरिकां वा धर्मध्यानलक्षणां जागरयितु-कर्तुम, धातूनाम-
नेकार्थत्वात् अत्र पाठान्तरम् । झाणं वा झाइत्तए-धर्मध्यानमनुसत्तुं इति कायो-
त्सर्ग वा चेष्टाभिभवभेदात् द्विविधकायोत्सर्ग लक्षणं स्थानं स्थातुं कर्तुं इत्येष.
सूत्रार्थः ॥ १६ ॥
मूल--नो कप्पड़ निग्गंथाण चा निग्गंथीण वा सचित्त कम्मे उवस्सए
बत्थए॥ २० ॥
टीका--नो. कप्प-नो कल्पते. निग्रन्थानां निग्रन्थीनां वा सचित्रकर्मणि--
चित्रकर्मणासंयुक्ते उपाश्रये वस्तुम् ॥ २० ॥
प्रथमोद्देशकः " मूल-कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा अचित्त कम्मे उबस्सए पत्थए ।॥ २१ ॥ टीका- - कप्प:-कल्पते निर्ग्रन्यानां निर्ग्रन्थीनां चा चित्र कमरिण - उपाश्रये वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ २१ ॥ मूल-~-नो कप्पड़ निग्गंथीणं सागारिय-अणिस्साए वत्थए ॥२२॥ टोका--नो कप्प०-नोकल्पते निर्ग्रन्थीनां सागारिकाऽनिश्श्रयाः शयातरे- णाऽपरिगृहीतानां वन्तुमिति ।। २२ ॥ मूल-कप्पइ निम्गंथीणं सागारिय णिस्साए वत्थए ।॥ २३ ॥ टीका कप्प..-कल्पते निर्गन्धीनां सागारिकनिश्रया- शय्यातरेणपरिगृही- तानां चम्तुएप-सूत्रार्थः ।। २३ ।। मूल---कप्पइ निग्गंथाणं सागारिय णिस्साए वा अणिम्साए वा पत्थए ।॥ २४॥ टीका--कप्पा--कल्पते निग्रंन्यानां सागारिक निश्या वा अनिश्रया वा वस्तु- मिति ।। २४॥ मूल--नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गथीणं वा सागारिय उवस्सए चत्थए ।॥ २५॥ टोका-नोकप्पइ-नोकल्पते निर्गन्यानां वा निन्थीनां वा सागारिक द्रव्ये उपाश्रये--यत्र सागारिकस्य व्यं वस्त्रालंकारादिकं तिष्टति तत्र वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ २५॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अप्पसागारिए उवस्सए त्थए।॥ २६ ॥ टोका-कप्प०--इति सूत्रसुगमम्--इदंसूत्र वृत्तौ न दृश्यते (कल्पते निर्ग- न्यानां वा निम्रन्थीनां वा अल्पसागारिके उपाश्रये वस्तुम् ।। २६ ।। मूल-नो कप्पड़ निग्गंथाणं इत्थीसागारिए उचस्सए वत्थए ॥२७॥ टीका-नो कप्पह-इत्यादि-अस्यसूत्र चतुष्टयस्य व्याख्या--नों कल्पते-निर्ग: न्यानां स्त्री सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ।। २७ ।। १ बृहुत्कल्पसूत्रम् मूल-कप्पइ निग्गंथाणं पुरिस सागारिए उबस्सए वत्थए ॥२८॥ टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थानां पुरुष सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ॥ २८ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं पुरिस सागारिए उवस्सए वत्थर ॥२६॥ टीका--नो कप्प-नोकल्पते निर्ग्रन्थीनां पुरुष सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ||२६॥ मूल-कप्पइ निग्गंथीणं इत्यि सागारिए उवस्सए वत्थंए ॥३०॥ टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थीनां स्त्री सागारिके उपाश्रये वस्तुमिति सूत्र चतुष्ट- याक्षरार्थः ॥ ३०॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं पडिबद्धाए सेज्जाए वत्थए ॥३१॥ दीका--नो कप्पइ-नो कल्पते निग्रन्थानां प्रतिबद्धशय्यायां-द्रव्यतो भावतश्च प्रतिबद्धे उपाश्रये वस्तुमिति सूत्रार्थः ।। ३१ ।। मूल-कप्पइ निग्गंथीणं पडिबद्धाए सेज्जाए वत्थए ।॥३२॥ टीका--कप्पइ-अस्य व्याख्या प्राग्चत् (कल्पते निम्रन्थीनां प्रतिबद्धायां शय्यायां वस्तुम् ) ॥ ३२ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं गाहावइ कुलस्स मझ मज्मे णं गंतु वत्थए ॥३३॥ टीका--नो कप्पइ-नो कल्पते निम्रन्थानां गृहपति कुलस्य मध्ये मध्ये गत्वा यत्र निर्गम प्रवेशो क्रियते तत्र उपाश्रये वस्तुम् । उपलक्षणमिदम्-तेन गृहस्थाः यत्र संयतो- पाश्रयस्य मध्ये मध्ये निर्गच्छन्ति प्रविशन्ति वा तत्राऽपि न कल्पते-वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३३ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथीणं गाहावइ कुलस्स मज्झं मझेणं गंतु वत्थए।३४॥ टीका--कप्पइ-अस्य व्याख्या प्राग्वत् ( कल्पते निर्मन्थीनां) गाथापति कुलस्य मध्ये मध्येनगत्वा वस्तुम् ॥ ३४ ॥ मूल-भिक्खू य अहिगरणं कट्टु तं अहिगरणं अविनोसविता प्रवि- अोसविय पाहुड़े इच्छाए परो आढाएज्जा, इच्छाएं परों नो आडाएज्जा, इच्छाए परो अमुट्ठज्जा, इच्छाएं परो नो अमुट्ठज्जा, इच्छाए पशे चंदेज्जा, इच्छाए परो नो वंदेजा, इच्छाएं परों संभुजेज्जा, इच्छाए परो न प्रथमोदेशकः , संभुजेज्जा, इच्छाए परो संत्रसेज्जा, इच्छाए परो नो संवसेज्जा, इन्छाए परो उवसमेजा इच्छाए परो नो उसमेजा, जो उबसमइ तस्स अस्थि पारा- हणा जो न उबसमइ तस्स नत्थि आराहणा, तम्हा अप्पणा चेत्र उपसमि- यव्वं । से किमाहु भंते! उत्रसम सारं खु सामन्नं ।।३।। टीका--भिक्खूयः-भिक्षुः-सामान्य साधुः च शब्दस्यानुक्तसमुच्चयार्थत्वात्- प्राचार्योपाध्यायावपि गृह येते, अधिक्रियतेनरकगतिगमनयोग्यताप्राप्यते-आत्माऽनेन इति अधिकरणम्,-कलहः प्राभृतमिति एकार्थाः, तत्कृत्वा तथाविध द्रव्य क्षेत्रादि साचिव्यात् पापवृहि तत् कपाय मोहनीयोदयात् द्वितीय साधुना सह विधाय तत्- स्वयं अन्योपदेशेन वा परिभाव्य तस्यैहिकामुष्मिकापायबहुलं वा. तद्धिकरणं- विविधैः-अनेकप्रकारैः स्वापराधप्रतिपत्तिपुरस्सरं मिथ्या-दुष्कृत प्रदानेन अव- शमय्य-उपशमं नीत्वा ततो विशेषेणावसायितं--अवसानानीतम् प्रामृतं--कलहो येन स व्यवसायित प्राभृतो उत्सृष्ट कलहो भवेत्, किमुक्तं भवति ? गुरु सकाशे स्व- दुश्चरितमालोच्य तत्प्रदत्तं प्रायश्चित्तञ्च यथावत् प्रतिपद्यते यः तत् अकरणायाभ्यु- त्तिष्ठेत्--आह येन तदधिकरणं उत्पन्नं स यदि उपशान्यमानोऽपि नोपशामयति ततः कोविधिरित्याह-इच्छाए परो-इत्यादि सूत्र-इच्छया यथा स्वरुच्या परं आद्रियते (प्रागिव संभापणादिकमादरं कुर्यात् वा नवा इतिभावः ) एवमिच्छयापर: तमभ्युत्तिष्ठेत , इच्छया परो, वन्देत् वा इच्छया परो न वन्देत, इच्छया परः तेन साधुना सह सम्भुञ्जीत-एक मण्डले भोजनादान ग्रहणं संभोग वा कुर्यात् , इच्छया परोन सम्भुञ्जीत, इच्छया परः तेन साधुना सह संवसेत् , सम्-एकीभूय एकत्र उपाश्रये वसेत , इच्छयापरोन संवसेत् , इच्छया पर उपशाम्येत् इच्छया परः नोपशाम्येत् परं यः उपशाम्यति-कपायतापापगमेन निवृतोभवति तस्याऽस्ति सम्यक् दर्शनादीना- माराधना, यस्तु नोपशाम्यति तस्य नास्ति तेपामाराधना तस्मात्-एवं विचिन्त्य यात्मना एव उपशमितव्यम्-उपशमः कर्त्तव्यः । शिष्यः प्राह से किमाहुभते ? अथ किमत्र कारणमाहुः भदन्त ? परं कल्याण योगिनः तीर्थंकरादयः, सूरिराह-उव०- उपशम सारं श्रामण्यं तस्मात् विहीनस्य निष्फलतया विधानात्, उक्तञ्च दशवै- कालिक निर्युक्तौ “सामन्नमनुचरन्तस्स, कसाया जस्स उकडा होइ, मन्नामि उच्चु पुफ्फ व निफ्फलं तस्स-सामन्नं । इति सूत्रार्थः ।। ३५ ॥ , वृहत्कल्पसूत्रम् मूल--नो कप्पइ. निरगंथाण वा निग्गयीण वा वासावासासु चरित्तए ॥ ३६॥ 'टीका-नो कप्पइ-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा वर्पोपलक्षिता वर्षा वर्ष- वर्षा तासु चरितुम ।। ३६॥ ['चर, गति भक्षणयोरिति धातोर्गत्यर्थीगृह्यते' ] ग्रामानु- ग्रामं पर्यटितुम-इत्यर्थः । यद्वा भक्षणार्थोऽपि गृह्यते, तथाहिभक्षणं समुद्देशनं तच्च यथा ऋतुबद्धे साधूनां, तथा वर्षासु कर्तुं नो कल्पते । तदानी हि चतुर्थभक्तादि प्रत्याख्यान परायणैर्भवितव्यम् । विकृतीनां चाऽभीषणग्रहणं न कर्तव्यमिति सूत्रार्थः ॥ ३६ ।। मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु चरि- त्तए॥३७॥ टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा हेमन्त ग्रीष्मयोरष्टासु ऋतुबद्धमासेषु चरितुं-यामानुग्रामं पर्यटितुम् इति सूत्रार्थः ।। ३७ ।। मूल--नो कप्पड़ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा वेरज्ज विरुद्ध रज्जंसि सज्ज गमणं सज्जआगमणं सज्ज गमणागमणं करित्तए । जो खलु निग्गंथो चा निग्गंथी वा वेरज्ज विरुद्ध रज्जंसि सज्जं गमणं सज्ज आगमणं सज्ज गमणागमणं करेइ, करं (रिं)तं वा साइज्जइ, से दुइओ वि वीतिकममाणे श्राव- जइ, चाउम्मासियं परिहार ठाणं अणुग्धाइयं ।। ३ ।। टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वैराज्यविरुद्ध राज्ये-यत्र राज्ये पूर्वपुरुष परम्परागतं वैरं तद् वैराज्यमुच्यते । यत्र तु वणिजां शेषजनपदस्य च निस्सञ्चारं कृतं-गमनागमन निषेधो विहितः, ततः वैराज्यविरुद्ध उच्यते, तत्र सद्यस्त- त्कालंगमनम् , सद्य आगमनम् , सद्योगमनागमनं कर्तुम् , 'जो'-यः खलु निम्रन्थो वा निर्ग्रन्थी वा वैराज्यविरुद्धराज्ये सद्योगमनं सद्य आगमनं, सद्योगमनागमनं करोति, कुर्वन्तं वा आस्वाद्यति--अनुमोदयति, स 'द्विधाषि' तीर्थकृतां राजश्च सम्बन्धिनी-- माज्ञामतिक्रामन् प्रापद्यते.. प्राप्नोति चातुर्मासिकं परिहारस्थानमनुद्घानिक चतुर्गुरुकमित्यर्थः, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ३८ ।। मूल--निग्गंथं च णं गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविट्ठ कई वत्येण वा पडिगहेण या कंबलेण वा पाय-छपेग वा उपनि नतिजा, १२ प्रथमोद्देशकः कम्पइ से सांगारकडं गहाय आयरियपायमूले ठवित्ता दोच्चपि उग्गह अणुएणवित्ता परिहारं परिहरित्तए ॥ ३१ ॥ टीका-"निम्रन्थं पूर्वोक्तशब्दार्थं च शब्दोऽर्थान्तरोपन्यासे, 'रणं, इति वाक्या. लक्कारे, गृहस्य पतिः-स्वामी गृहपतिः, तस्य कुलं-गृहं 'पिण्डपात प्रतिज्ञया' पिण्ड:- श्रोदनादिः, तस्य पात:-पात्रे प्रवेशः, तत्प्रतिज्ञया-तत्प्रत्ययमनुप्रविष्टं कश्चिद् उपा- सकादिर्वस्त्रेण वा प्रतिग्रहेण वा कम्बलेन वा पात्रप्रोञ्छनेन वा उपनिमन्त्रयेत् । वस्त्र सौनिकमिहगृह्यते,प्रतिग्रहः-पात्रम्, कम्बलम्-ओर्णिकः कल्पः, पात्रशब्देन तु पात्रवन्ध पात्र केसरिका प्रभृतिकः पात्र निर्योगः, प्रोञ्छन शब्देन तु रजोहरणमुच्यते । श्राहच चूर्णिकृत्-"पायगहणेणं पायभंड्यं गहियं । पुछणं रयहरणंति ।" ततश्च पात्रं च प्रोञ्छनं चेति पात्रोञ्छनमितिः समाहारद्वन्द्वः । एतैः उप-सामीप्ये आगत्य निमन्त्रयेत् । उपनिमन्त्रितस्य च 'से, तस्य निर्ग्रन्थस्य 'साकार कृतं', आचार्यसत्क- मेतद्वनन मम, अतो. यस्मै ते दास्यन्ति, अन्यस्मै वा मावा, अात्मना वा परि- भोक्ष्यन्ते, तस्यैतद्भविष्यति, इत्येवं सविकल्पवंचन-व्यवस्थापितं सद्गृहीत्वा तत प्राचार्य पादमूले तद्वस्र स्थापयित्वा यदि ते तस्यैव साधोः प्रयच्छन्ति, तदा द्वितीयमप्यवग्रहम् , एकतावद् गृहस्थादवग्रहोऽनुनापितो द्वितीयं पुनराचार्यपाद मूलावग्रहमनुज्ञाप्य धारणा-परिभोगरूपं द्विविधमपि परिहारं तस्य वनस्य 'परिहाँ, धातूनामनेकार्थत्वाद् आचरितु कल्पते, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ३९ ।। मूल-निग्गंथं च णं वहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्खंतं समाणं केइ वत्थेण वा पडिग्गहेण वा कंवलेण वा पायपुंछणेण वा उव- निमंतेज्जा, कप्पइ से सागारकडं गहाय आयरिय पायमूले ठवित्ता दोच्चंपि उग्गहमणुनवेत्ता परिहारं परिहरित्तर ॥ ४० ॥ .' टीका-"निग्गंथं च एं वहिया-अस्य व्याख्या प्रागवत् , नवरं-'वहिः विचार- भूमौ-संज्ञासु, विहार भूमौ वा स्वाध्यायभूमिकायाम् ॥ ४०॥.. मूल-"निम्नथिं च णं गाहावइकलं पिंडवायं पडियाए अणुप्पविट्ठ केइ वत्थेण वा पडिग्गाहेण वा कंबलेण वा पायपुछरोण वा उवनिमंतेज्जा, कप्पड़ से सागारकंडं गहाय पबत्तिणि-पायमूले ठवित्ता दोच्चंपि उग्गह- मणुगणवित्ता परिहारं परिहरित्तए । ४१ ।। ...
बृहत्वल्पसूत्रम् १३ -- मूल-"निग्गंथिं च णं बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निखंति समाणिं केइ वत्थेण वा पडिग्गहेण वा कंवलेण वा पायपुछणेण वा उव- निमतेज्जा, कप्पड़ से सागारकडं गहाय पवत्तिणि पायमूले ठवेत्ता दोच्च- पि उग्गहमणुएणवित्ता परिहारं परिहरित्तए ॥ ४२ ॥ टीका-सूत्र द्वयस्याऽपि व्याख्या प्राग्वत् ।। ४१-४२ ।। मूल-नो कप्पइ. निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा राम्रो वा वियाले वा असणं वा पाणं वा खाइमं वा पडिगाहित्तए । ४३ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा रात्रौ या. विकाले वा 'अशनं वा, श्रोदनादि पानं वा, आयामादि, 'खादिमं वा' फलादि 'स्वादिमं वा' शुण्ठ्यादि प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राक्षरार्थः ॥ ४३ ॥ मूल-नऽन्नथ एगेणं पुब्वपडिलेहिएणं सेज्जासंथारएणं ॥ ४४॥ टीका-योऽयमुपयुक्तः प्रतिषेधः स एकस्मात् पूर्व प्रत्युपेक्षितात-शय्या संस्तारका- दन्यत्र । इहाऽन्यत्र शब्दः परिवर्जनार्थः । यथा-अन्यत्र द्रोणभीष्माभ्यां सर्वेयोधाः पराङ्मुखाः । द्रोण भीष्मौवर्जयित्वा, इत्यर्थः । ततश्चैकं शय्यासंस्तारकं ( पूर्व प्रति लेखितं-दिवा दृष्ट) विहायाऽपरं किमपि रात्रौ ग्रहीतुं न कल्पते । इति सूत्र संक्षे.. पार्थः ॥ ४५ ॥ मूल-नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा रायो वा वियाले वा त्यं वा पडिग्गहं वा कंबलं वा पायपुंछणं वा पडिगाहित्तरः ॥ ४५ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा रात्रौ वा.विकाले वा वस्त्र वा प्रतिग्रहं वा कम्बलं वा पाइप्रोञ्छनं वा.प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राक्षर गमनिका ।। ४३ ॥ मूस--नऽन्नत्थ एगाए हरियाहडियाए । साविय परिभुत्ता. वा धोया वा रत्ता वा घट्टा वा मट्ठा वा संपधूमिया वा ॥ ४६॥ टीका--न कल्पते रात्रौ वस्त्रादिकं ग्रहीतुं इत्युक्तम् । अन्यत्रैकस्या हताहतिकाया हरिताऽऽहतिकाया वा। तत्र पूर्वहृतं पश्चादाहृतम्-आनीतं वस्त्रं हृताहृतम्, तदेव हताहृतिका स्वार्थे क प्रत्ययः । प्रतिवर्तन्ते स्वार्थिक प्रत्ययाः प्रकृत लिङ्ग वचनानि, इति ."
१४ प्रथमोद्देशक: चचनात् अत्र रूदितः स्त्रीलिङ्ग निर्देशः । एवं हरितेपु-वनस्पतिवाहतं हरिताहत वस्त्रम्, तदेव हरिताहतिका । सापिच हताहतिका परिमुक्ता' परिधानादी व्यापा. रिता 'धौता' अप्कायेन प्रक्षालिता 'रक्ता विचित्रवर्णकैरुपरजिता घृष्ठा घटकादिना घट्टिता, 'मृष्टा' सुकुमारीकृता 'सम्प्रधूमिता' धूपद्रव्येण समन्ततः प्रकरण धृपिता। वा शब्दाः सर्वेऽपि विकलार्थाः। एवं विधापि सा स्वीकर्तव्या, न पुनरसाधु प्रायोग्या कृति कृत्वा परिहर्तव्येति सूत्रार्थः ॥ ४३ ।। मूल-नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निमगंथीण वा रायो वा वियाले वा श्रद्धाण गमणं एत्तए ॥४७॥ . - टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा रात्री वा विकाले चा अध्य- गमनम् एतु-गन्तुमितिसूत्रार्थः ॥ ४७ ॥ मूल-( नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा) संखडिं. वा संखडि पडियाए एत्तए ॥४८॥ टीका--संखडिं वा, इति वा शब्दात् “न कल्पते" इत्यादि पदान्यनुवर्तनी- यानि । तद्यथा--न केवलमध्वानं रात्री वा विकाले वा गन्तु न कल्पते किन्तु संखडिमपि रात्रौ वा विकाले वा सङ्कडिप्रतिज्ञया 'एतु गन्तु न कल्पते । एप सूत्र- संक्षेपार्थः । ( सम्-इति सामस्त्येन खण्ड्यन्ते-बोट्यन्ते जीवानां-वनस्पतिप्रभृतीना- मायूपि प्राचुर्येण यत्र. प्रकरणविशेषे सा खलु सङ्घडिरित्युच्यते, तां सङ्घडिं 'तत्प्रतिज्ञया' सङ्घडिमपि गन्तुन कल्पते)॥४८॥ : मूल-नो कप्पइ निग्गंथास एगाणियस्स रात्री वा वियाले वा बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा। कप्पड़ से अप्पविझ्यस्स वा अप्पतझ्यस्स वा राम्रो वा वियाले वा बहिया बियार भूमि वा विहार भूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा ॥ ४६ ।। टीका-नो कल्पते निम्रन्थस्य साधोरेकाकिनो रात्रौ वा विकाले वा बहिर्विचार- भूमि वा विहारभूमि वा उद्दिश्य प्रतिश्रयाद् निष्क्रमितु वा प्रवेष्टुवा। कल्पते से- बृहत्कल्पसूत्रमे १५ तस्य निग्रन्थस्यात्मद्वितीयस्य वा आत्मतृतीयस्य वा रात्रौ वा विकाले वा बहिर्विचार भूमि वा विहार भूमि वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टु वेति सूत्र समासार्थः ॥ ४६ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीर एगाणियाए राम्रो वा वियाले वा बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्वमित्तर वा पविसित्तए वा । कप्पड़ से अप्प विड्याए वा अप्पतइयाए वा अप्प चउत्थीए वा राम्रो वा वियाले वा बहिया वियार भूमि वा विहार भूमि वा निक्खमित्तए वा पविसि- त्तए वा ॥ ५० ॥ टीका-अस्य सूत्रस्य व्याख्या प्रागवत् , नवरं केवलं प्रमाणे निर्ग्रन्थेभ्यो निम्रन्थीनां नानात्वम् । निर्ग्रन्थानां द्वयोस्त्रयाणां वा निर्गन्तु कल्पते । निम्रन्थीनान्तु द्वयोस्ति- सृणां चतसृणां वा इत्ययं संख्याकृतो विशेषः । ये च स्तेनाऽऽरक्षिकाद्यो दोषाः पूर्व सूत्रे यतीनामेकाकिनिर्गमने प्रोक्ताः। त एवार्याणामपि सविशेषतरास्तरुणा- धुपद्रवसंहिता मन्तव्याः ।। ५० ।। । मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पुरथिमेणं जाव अंग- मगहाप्रो एत्तए, दक्षिणेणं जाव कोसंबीओ एत्तए, पञ्चत्थिमेणं जाव थूणा विरुयाओ एत्तए, उत्तरेणं जावः कुणाला विसयाओ एत्तए, एताव ताव कप्पड़ । एताव ताव पारिए खेचे । णो से कप्पइ एत्तोवाहि । तेण परं जत्थ नाण दंसण चरित्ताई उस्सप्पंतित्तिमि ।। ५१ ॥ कप्पे पढ़मो उद्देसो । टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा पूर्वस्यां दिशि यावद्ङ्गमगधान् एतुं- विहर्तुम् । अङ्गो नाम चम्पा प्रतिवद्धो जनपदः । मगधो राजगृह प्रतिवद्धोजनपदः । दक्षिणस्यां दिशि यावत् कौशाम्बीमेतुम् । प्रतीच्यां दिशि स्थूणाविपत्रयावदेतुम् । उत्तरस्यां दिशि कुणाला विषयं यावदेतुम् । [ सूत्रे पूर्व दक्षिणादिपदेभ्यस्तृतीया निर्देशो लिङ्गव्यत्ययश्च प्राकृतत्वात् ] एतावत् तावत् क्षेत्रमवधीकृत्य विहाँ कल्पते । कुतः १ इत्याह-एतावत् तावत् यस्मादायक्षेत्रम् । नो 'से, तस्य निर्ग्रन्थस्य निम्रन्थ्या या कल्पते 'अतः, एवंविधादार्यक्षेत्राद्वहिविर्तुम् । ततः परं बहिर्देशेषु "अपि 1 . .
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प्रथमोदशतः-
सम्प्रतिनृपत्ति कालादारभ्यः यत्र ज्ञान दर्शन चारित्राणि 'उत्सर्पन्ति, स्फातिमासा.
द्यन्ति तत्र विहर्तव्यम् । 'इति, परिसमाप्ती, नवीमीति तीर्थकर गणधरोपदेशेन
न तु स्वमनीपिकया इति सूत्रार्थः ।
प्रथम उद्देशकः समाप्तः
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अथ द्वितीय उद्देशः प्रारभ्यते-
मूल---"उवस्मयस्स अंतोवगडाए सालीणि वा वीहीणि वा मुग्गाणि
वा मासाणि वा तिलाणि वा कुलत्थाणि वा गोधूमाणि वा जवाणि वा
जवजवाणि वा उक्वित्ताणि वा विक्खित्ताणि वा विइकिन्नाणि वा विप्प-
किन्नाणि वा, नोकप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए॥१॥
टीका-उपाश्रयस्य या 'अन्तर्चगडा, वगंडाया-अभ्यन्तरम' तच प्रतिश्रयमध्यं
वा स्यात् प्राङ्गणं वा । तत्र 'सालीणि वत्ति शालिबीजानि वा, 'वीहीणिव' ति
प्रीहिबीजानि वा, एवं मुद्ग-माप-तिल-कुलत्थ-गोधूम-[ यव ] यवयवैरपि तत्त-
बीजान्युच्यन्ते, यवयवाः-यव विशेपास्तद्वीजानि वा । एतानि बीजानि यत्रोपाश्रये
उत्क्षिप्तानि चा विक्षिप्तानि वा, व्यतिकीर्णानि वा, विप्रकीर्णानि वा, तत्र नो कल्पते
निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथालन्दमपि वस्तुम् । इह यथालन्दं विधा-जघन्य
मध्यममुत्कृष्टं च । यावता कालेन उदकाोहस्तः शुष्यति तज्जघन्यम् । पञ्चरात्रिन्दि-
वान्युत्कृष्टम् । तयोरपान्तराले सर्वमपि मध्यमम् । अत्र जघन्य मध्यमयोः सूत्रा-
वतारः । अपि शब्दः सम्भावनायाम् । जघन्यमपि मध्यममपि वा थथालन्द नों
कल्पते वस्तुम् , किम्पुनरुत्कृष्टम् ? इति भावः । अत्र चोरिक्षप्तादीनि पदानि भाष्य-
गाथयैव व्याख्यास्यन्त इति नात्र व्याख्यातानीति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १ ॥
मूल-अहपुणं एवं जाणिज्जा-नो उक्खित्ताइ नो विक्खित्ताईनो
विइकिएणाई नो विपकिरणाई रासिकडाणि वा पुंजकडाणि वा भित्तिक-
डाणि वा कुलियोकडाणि वा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा पिहिताणि वा,
कप्पइ निम्गंथाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु वत्थए ॥२॥
द्वितीयोद्देशकः टीका-अथ पुनरेवं जानीयात्-'तानिशाल्यादीनित्रीजानि तत्रोपाश्रये नो उत्क्षिप्तानि, नो विक्षिप्तानि, नो विकीर्णानि, नो विप्रकीर्णानि, किन्तु राशीकतानि चा, पुञ्जीकृतानि वा, भित्तिकृतानि वा, कुलिकाकृतानि वा, लाञ्छितानि बा, मुद्रितानि वा पिहितानि वा, तत एवं कल्पते नियन्यानां वा निम्रन्थीनां वा, हेमन्त- ग्रीष्मेषु वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ २ ॥ मूल-अहपुण एवं जाणिज्जा-नो रासिकडाइ नो पुजकलाई नो भित्तिकडाईनो कुलियकडाई कोहाउत्ताणि वा पल्लाउत्ताणि वा मंचा उ- ताणि वा माला उत्ताणि वा ओलित्ताणि वा लित्ताणि वा पिहियाणि चा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा कम्पह निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चासावासं वत्थए ॥ ३ ॥ टीका-अथ पुनरेवं जानीयात्-नो राशीकृतानि नो पुजीकृतानि नो भित्तिकृतानि नो कुलिकाकृतानि; कोष्ठागुप्तानि वा पल्यागुप्तानि वा, मञ्चा गुप्तानि वा, माला- गुप्तानि वा अवलिप्तानि वा लिप्तानि वा पिहितानि वा लाञ्छितानि वा मुद्रितानि चा। तत्र कोष्ठे-कुशूले आगुप्तानि-प्रक्षिप्यरक्षितानि कोष्ठाऽऽगुप्तानि । एवमुत्तर- त्रापि भावनीयम् । नवरं-'पल्यं-वंशकटकादिकृतो धान्याऽऽधारविशेषः, मञ्चः- स्थूणानामुपरिस्थापित वंशकादिमयो लोकप्रसिद्धः, मालकः-गृहस्योपरितनोभागः, 'अवलिप्तानि, नाम द्वारदेशे पिधानेन सह गोमयादिना कृतोपलेपानि, लितानि- मृत्तिकया सर्वतः खरण्टितानि, पिहितानि-स्थगितानि 'लाञ्छितानि-रेखाऽक्षरा- दिभिः कृतलाञ्छनानिमुद्रितानि, मृत्तिकादिमुद्रायुक्तानि । एवं विधेयु धान्येषु कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वर्षावासं वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३ ॥ मूल-"उवस्सयस्स अंतोवगडाए सुरावियडकुमे वा सोवीरय बियड- कुंभे वा उवनिक्खित्ते सिया, नो कप्पई निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उवस्सयं पडिलेहंमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पड़ एंगरायं वा दुरायं वा वत्थए । जे तत्थ एगरायाो वा दुरायाो वा परंवसई से संतरा छेए वा परिहारे वा ॥४॥ - टीका-सुराविकटं-पिष्टनिष्पन्नम्, सौवीरक विकटतु-पिष्टवज्जैर्मुडादिंद्रव्यनिष्पन्नम्। ततः सुरा विकटकुम्भो वा सौवीरक विकंटकुम्भो वा यत्रोपाश्रयस्याऽन्तर्वगडायामुः वृहत्कल्पसूत्रम् १६ " पनिक्षिप्तः स्यात्-तत्र नोकल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथालन्दमपिकालं. वस्तुम् 'हुरत्या-य, त्ति देशीपदं बहिराभिधायकम् । च शब्दो वाक्यभेदद्योतकः, ततोऽयमर्थः-अथ वहिरन्योपाश्रयं प्रत्युपेक्षमाणोऽपि नो लभेत, ततएवं "सेट तस्यः साधोः कल्पते एकरात्रं वा द्विरानं वा तत्र वस्तुम् । यस्तत्रैकरात्राद्वा द्विरात्राद्वार 'परम, ऊ व वसति 'से' तस्य संयतस्य, स्वान्तरात , स्वकृतं यदन्तरं-त्रिरात्र- चतूगत्रादिकालावस्थानरूपं तस्मात् 'छेदो' वा पञ्चरात्रिन्दिवादिः, 'परिहारो, वा मासजघुकादिस्तपोविशेषो भवतीति सूत्रार्थः ॥ ४ ॥ मूल-उवस्सयस्स अंतोवगडाए सीओदग वियडकुमे वा उसिणो- दंग विषडकुमे वा उवनिक्खित्ते सिया, नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण चा अहालंदमविवत्थए । हुरत्या य उवस्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पड़ एगरायं वा दुरायं वा वत्थए । जे-तत्थ एगरायाओ. वा दुरायाओ वा परं चसइ से संतरा छए. वा परिहारे वा ॥५॥ टोका-अस्य व्याख्या पूर्छचत्, नवरं-विकृतं-शीतोष्णादि शस्त्रेण विकार प्रापितं, प्राशुकीकृतमित्यर्थः । शीतोदकं च तद् विकृतं च. शीतोदक विकृतं तस्य कुम्भः-घटः । एवमुष्णोदक विकृतकुम्भोऽपि ॥ ५ ॥ मूल-- उबस्सयस अंतोवगडाए सब्बराइए जोई झियाएजा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उव-- स्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पइ एगरायं वा दुरायं वा वस्थए । जे तत्थ एगरायायो वा दुरायाअो वा परं वसइ से संतरा छेए वा. परिहारे वा ॥ ६ ॥ टीका-व्याख्या प्राग्वत्, नवरं सार्वरात्रिकं 'ज्योतिः, अग्नियंत्रोपाश्रये 'ध्यायेत्',.. धातूनामनेकार्थत्वात् प्रज्वलेत् तत्र साधु साध्वीनां वस्तुं न कल्पते ॥ ६ ॥ मूल-उवस्सयस्स अंतोवगडाएं सचराइए. पईवे दिप्पेज्जा, नो: कप्पइ निग्गंथाण वा निमगंथीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उवस्सयं पडिलेहमाणे नो लभेज्जा, एवं से. कप्पड़ एगरायं वा दुरायं वा: वत्थए । जे तत्थ परं एगरायाश्रो वा दुरायाओ वा वसइ से संतरा छेए वा परिहारे वा ।।७।।
द्वितीयोदेशकः टीका-व्याख्यानं ज्योतिःसूत्रवत् ॥ ७॥ मूल--उवस्सयस्स अंतोषगडाए पिए वा लोयए वा खीरे वा दहि वा नवणीए वा सप्पि वा तेल्ले वा फाणियं वा पूर्व वा सक्कुली वा सिहरिणी वा उक्खित्ताणि वा विक्खित्ताणि वा विइकिन्नाणि वा विप्प- इन्नाणि वा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गथीण वा श्रहालंदमवि वत्थए।।८|| टीका-उपाश्रयस्यान्तर्वगडायां पिण्डको वा, लोचकं वा, क्षीरं बा, दधि वा, नवनीतं वा, सर्पिा, तैलं वा, फाणित्तं वा, पूर्व वा, शकुलिका वा, शिखरिणी वा, एतान्युत्क्षिप्तानि वा, विक्षिप्तानि वा, व्यतिकीर्णानि वा, विप्रकीर्णानि वा भवेयुः, नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रंथीनां वा यथालन्दमपि वस्तुमिति सूत्रार्थः ।। ८ ।। मूल-ग्रह पुण एवं जाणेज्जा-'नो उक्खित्ताईनो विक्खित्ताईनो विइकिरणाईनो विप्पकिएणाई रासिकहाणि चा पुंजकहाणि वा भित्ति- कडाणि वा कुलिया कडाणि वा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा पिहियाणि वा कप्पइ निग्गंथाण चा निग्गंधीण वा हेमंत गिम्हासु वत्थए ।। 8 ।। टीका-अस्य व्याख्या प्रागवत् , नवरं यन्त्र पिण्डादीनि राशीकृतादिरूपाणि तत्र गीतार्थानां कल्पते ऋतुबद्धे वस्तुमिति सूत्रहृदयन् ॥ ४ ॥ मूल-अह पुण एवं जाणिज्जा-'नो रासिकडाईजाब नो भित्तिकडाई कोहाउत्ताणि वा पल्लाउत्तारण वा मंचाउत्ताणि वा मालाउत्ताणि वा ओलित्ताणि वा विलित्ताणि वा कुभिउत्ताणि वा करभिउत्ताणि वा लछियाणि वा मुदियाणि वा पिहियाणिवा कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गयीण या वासावासं चत्थए ॥ १० ॥ दीका-श्रस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरं-कुम्भी-सुखाऽऽकारा कोष्ठिका, करभी- घट संस्थान संस्थिता, तयोरागुप्तानि-प्रक्षिप्य रक्षितानि कुम्भ्या गुप्तानि, करस्या गुप्तानि चा।॥ १०॥ मूल-नो कप्पङ निम्गंथीणं अहे. आगमणगिहंसि वा वियडगिहसि वा घुसीमूलंसि वा रुक्खमूलंसिवा अभावगासियंसि वा वत्थए । ११ ।। टीका-इह निग्रन्थ निग्रन्थीनां सामान्यतः सदोषा उपाश्रया उक्ताः । अथ केव- लानामेन् निन्थीनामभिधीयन्ते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्य व्याख्या-अध;
बृहत्कल्पसूत्रम् २१ - . शब्द इह अवशब्दार्थे। पथिकादीनामागमनेनोपेतं तदर्थ वा गृहमागमनगृहम् । विवृत्तम्- अनावृतं गृहं विवृतगृहम् । वंसीमूलं नाम-गृहाद् बहिः स्थितमलन्दकादिकम् । वृक्ष- मूलं तु वृक्षस्य-सहकारादेमूलम्-अधोभागः । अभ्राकाशमाकाशमुच्यते । एतेषु प्रतिश्रयेनु-निर्ग्रन्थीनां वस्तुन कल्पते, इति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ ११ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाणं अहे आगमणगिहंसि वा वियडगिहंसि वा वंसीमूलंसि वा रुक्खमूलंसि वा अभावगासियंसि वा वत्थए ।। १२ ।। दीका-अस्य प्रागवद् व्याख्या ॥ १२ ॥ मूल-एगे सागारिए पारिहारिए-दो तिन्नि चत्तारि पंच सागारिया पारिहारिया, एगं तत्थ कप्पागं ठवयित्ता अवसेसे निन्विसेज्जा ॥ १३ ॥ टीका-एकः सागारिकः-वसतिस्वामी. परिहार-परित्यागमईतीति व्युत्पत्त्या पारिहारिकः, भिक्षाग्रहणे परिहर्तव्य इत्यर्थः । यथा चैकः सागारिकः पारिहारिकः तथा द्वौ त्रयश्चत्वारः पञ्चसागारिकाः पारिहारिकाः, न तेषांबहूनामपि गृहेषु प्रवेष्टव्य- मितिभावः । अथ सूत्रेणैव सूत्रमपवदति-एगं तत्थ कापागं, इत्यादि । बहुजनसाधा. रणे देवकुलादौ स्थिताः 'तत्र, तेषु बहुषु सागारिकेषु मध्ये येन सागारिकतया स्थापि- तेन शेषगृहेषु प्रवेष्टु कल्पते, तमेकं कल्पकं स्थापयित्वा शेषेषु सागारिककुलेषु निर्वि- शेयुः-प्रविशेयुरिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १३ ॥ मूल-नो कप्पइ निगंयाण वा निग्गंथीण वा सागारियपिंडं बहिया अनीहडं असंसट्ठ वा संसट्ठ वा पडिग्गाहित्तर ॥ १४ ॥ टीका-नों कलाते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा सागारिक पिण्डं बहिर्वाटकात अनिह तम् , अनिष्क्रामितम् 'असंसृष्ट' वा अन्यदीय पिण्डैः सहाऽऽमीलितं, संसृष्ट वा अन्यदीयपिण्डैः समं मीलितं प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ॥ १४ ॥ मूल---"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निमगंथीण वा सागरियपिंडं वहिया नीहडं असंसट्ठ पडिग्गाहित्तए । कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागारियपिंडं बहिया नीहडं संसट्ठ पडिग्गाहित्तए ।। १५ ।। टीका-अस्य व्याख्या प्रागवत् । नवरं सागारिक पिण्डो वाटकाद् बहिनिष्का. मितोऽपि 'असंसृष्टः' अन्यपिण्डैः समममीलितो न कल्पते. संमृष्टस्तु कल्पते इति । मूल-"जो खलु निग्गंथो वा निग्गंथी वा सागारियपिंडं बहिया रे २२- द्वितीयोद्देशक: : . नीहडं असंसट्ठ संसह करेइ, करेंतं वा साइज्जइ, से दुहयो बीहकममाणे आवज्जइ चाउम्मासिओं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥ १६ ॥ टीका-यः खलु निर्ग्रन्थो निर्ग्रन्थी वा सागारिक पिण्डं बहिनिर्गतमसंसृष्ट संस्कृष्टं करोति कुर्वन्तं वा स्वादयति-कारयति कुर्वन्तमनुमन्यते वेत्यर्थः, स 'द्विधा, लौकिक लोकोत्तरिकमेहाद् द्विप्रकारां मर्यादा व्यतिक्रामन् अापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्था- नमनुद्घातिकम्, चतुरो गुरुमासानित्यर्थः । एष सूत्र संक्षेपार्थः ।। १६ ।। मूल-"सागारियन्स आहडिया सागारिएण पडिरगहिया, तम्हा दावर नो से कप्पड़ पडिग्गाहितए । सागारियरस आहडिया सागारिएण अपडिग्गहिया, तम्हा दावए एवं से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥ १७ ॥ टीका-'ग्राहृतिका, प्रहेणकं सा सागारिकस्य गृहे कुंतोऽपि गृहान्तरादागता, सा च सागारिकेण 'प्रतिगृहीता, स्वीकृता 'ततः तस्या मव्यात् दद्यात, नो से, तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुम् । सागारिकस्याहृतिका सांगारिकेण 'अप्रतिगृहीता, न ... स्वीकृता तस्या मध्यात् दद्यादेवं 'से, तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १७ ॥ मूल-"सागारियस्स नीहडिया परेण अपडिग्गहिता, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए । सागारियस्स नीहडिया परेण पडिग्गहिया, तंम्हा दावए एवं से कप्पड पंडिग्गाहित्तए । १८ ।। टीका-व्याख्या प्राग्वत्, नवरं सागारिक द्रव्यं यदन्यत्रनीयते सा निहति- केयुच्यते । सा यस्य समोये प्रेपिता तेनाऽप्रतिगृहीता न कल्पते प्रतिगृहीता तु कल्पते ॥ १८ ॥ मूल--"सागारियस्स अंसियाओ अविभत्तानो अब्बोच्छिन्नांनो अधोगडायो अनिज्जूढाओ, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए। सागारियस्त अंसियाओ विभत्तानो वोछिन्नायो दोगडात्रो निज्मूढाओं, तम्हा दावए एवं से कमइ पडिगाहित्तए ॥ १६ ॥ टीका-सागारिकस्य या अंशिका तस्या अन्येपामंशिकाभ्योऽचिभक्तायां अव्य- वच्छिन्नाया अव्याकृताया अनि ढाया मध्यात् कश्चिद्भक्तपानं दद्यात, नो.से-तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुम् । सागारिकस्यांऽशिका विभक्ता अवच्छिन्ना याकता :
बृहत्कल्पसूत्रम् निगूढा च यस्माद् राशेर्भवति तस्माद् दद्याद्, एवं 'से, तस्य कल्पते प्रतिग्रहीतु- मिति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १६ । मूल-"सागारियम्स पूयाभत्ते उद्देसिए चेहए पाहुडियाए, सागारि- यस्स उवगरणजाए निट्ठिए निसट्ठ पाडिहारिए, तं सागारियो देज्जा सागारियस्स परिजणो देज्जा, तम्हादावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए।॥२०॥ - व्याख्या-सागारिकस्य ये पूज्याः-स्वामिकलाचार्यादयः, तदर्थं भक्तम्-अश- नादि पूज्यभक्तम्, - तच्चोद्देशः-सङ्कल्पः तेन निवृत्तमौदेशिका, तानेव पूंज्यानुद्दिश्य कृतमित्यर्थः । ततस्तेपामेव प्राभृतिकायां चेतितं ढौकनीकृतम् उपनीतमितिभावः । तथा सागारिकस्य उपकरणजातं चत्रं कम्बलादिकं पूज्यानामर्थाय 'निष्ठितम्, निष्पादितम् । ततः 'निसृष्ट, पूज्येभ्यः प्रदत्तम् । 'तच, भक्तमुपकरणं वा तेभ्यः प्राति- हारिक दत्तम् , मुक्तावशेष सदिदं भूयोऽप्यस्माकं प्रत्यर्पणीयमिति भावः । तद् एवं प्रकारं संयतानां सागारिको वा यात्, सागारिकस्य परिजनो वा दद्यात् किंकल्पते ? नत्रा ? इत्याह-तस्मात् पूज्यभक्तात् पूज्योपकरणाद्वा प्रातिहारिकाद् यात्, परं न कल्पते प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ।। २० ।। मूल----'सागारियस्स पूयाभरे उद्देसिए चेइए जाव पाडिहारिए, तं नो सागारिओ देज्जा नो सागारियस्स परिजणो देज्जा, सागारियस्स पूया देज्जा, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥ २१ ॥ व्याख्या-प्रागवत् नवरम्-अत्र न सांगारिको न वा सागारिकभ्य परिजनोद्यात् किन्तु सागारिकस्य 'पूज्यः, सम्बन्धि स्वाम्यादिव्यात्, तथापि न कल्पत, प्रातिहारिक- तया दत्तमिति कृत्वा सागारिक पिण्डत्वात् ।। २१ ।। मूल-"सागारियस्स पूयाभचे उद्देसिए चेइए पाहुडियाए सागारि- यस्स उवगरणजाए निट्ठिए निसटु अपाडिहारिए तं- सागारियो देह सागारियस्स परिजणोदेइ तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥२२॥ टीका-अयमप्रातिहारिकतया सागारिक पिण्डो न भवति, परं सागारिकस्तत्प- रिजनो वा दातीति कृत्वा प्रक्षेपकादि दोष सद्भावान्न कल्पते ।। २२ ।। मूल-"सागारियस्स पूयाभचे जाव अपाहिहारिए, तं नो सागारि- द्वितीयोदेशका श्रोदेइ, नो सागारियस्स परिजणो देइ सागारियस्स पूयादेइ, तम्हा दावए एवं से कप्पइ पडिगाहित्तए ॥ २३ ॥ टीका-अत्र सागारिकेणादृष्ट तत्पूज्योऽप्रातिहारिकंदवातीति कल्पते, परं द्वितीय- पदे, नोत्सर्गतः ।। २३ ॥ मूल-"कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाई पंच वत्थाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा, तं जहा जंगिए भंगिए साणए पोत्तए तिरी- डपट्टे नामं पंचमे ॥ २४ ॥ टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा इमानि पञ्चवस्त्राणि धारयितुवा परिग्रहे धतुं परिहतुं वा परिभोक्तुम् । तद्यथा जगमाः-प्रसाः, तवयव निष्पन्न जाङ्गमिकम्, सूत्रे प्राकृतत्वाद्-मकारलोपः, भङ्गा-अतसीतन्मयं भाङ्गिकम्, सन- सूत्रमयं सानकम, पोतक, कासिकम्-तिरीट:-वृक्षविशेषस्तस्य यः पट्टो वल्क- लक्षणस्तन्निष्पन्नं तिरीट पट्टकं नाम पञ्चमम् । एष सूत्र संक्षेपार्थः ।। २४ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाई पंच रयहरणाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा, तं जहा-उरिणए उट्टिए साणए वच्चा- चिप्पए मुंजचिप्पए नाम पंचमे ॥ २५ ॥ त्तिवेमि विइनो उद्देसश्रो । टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्यीनां वा इमानि पञ्चरजोहरणानि धारयितु या परिहतुं वा । 'तद्यथा, इति उपप्रदर्शनार्थः । और्णिकम् ऊरणिकानामूर्णाभिनि- वृत्तम् , 'औष्ट्रिकं, उष्ट्ररोमभिनित्तम् , 'सानकं, सनवृक्ष वल्काद्जातम, वच्चक:- तृणविशेपस्तस्य चिप्पका-कुट्टितः-त्वग्रूपः तेन निष्पन्नं वच्चक चिप्पकम, मुञ्जः- शरस्तम्बस्तस्य चिप्पकाद् जातं मुञ्जचिप्पकं नाम पश्चममिति सूत्रार्थः ।। २५ ।। . इति द्वितीयोदेशकः
अथ तृतीय उद्देशः
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मूल--"नो कप्पइ निग्गंथाणं निग्गंथीणं उवस्सयंसि चिट्टित्तए का
निसीइचए वा तुयट्टित्तए वा निदाइत्तए वा. पयलाइचए वा असणं वा
४ आहार आहारित्तए, उच्चारं वा पासवणं वा खेलं वा सिंघाणं वा
परिदुवित्तए, सज्झायं वा करित्तए, झाणं वा झाइत्तए, काउस्सरगं वा
ठाणं वा ठाइनए ॥ १ ॥
टीका--"नो कल्पते निम्रन्थानां निर्ग्रन्थीनामुपाश्रये स्थातु या निषत्तुं वा त्वग.
वर्तयितुवा निद्रायितुवा प्रचलायितु वा अशनं वा पानं वा खादिम वा स्वादिम
वा चतुर्विधमप्याहारमाहर्तुम्', उच्चार वा प्रस्रवणं वा खेलं वा सिंघाणं वा
परिष्ठापयितुम् , स्वाध्यायं वा कर्तुम, ध्यानं वा ध्यातुम्, कायोत्सर्ग वा स्थानं स्थातु-
मिति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १ ॥
मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं निग्गंथउबस्सयंसि चिट्टित्तए वा जाव
काउस्सग्गं वा ठाणं ठाइसए ॥ २ ॥
टीका--यथा निम्रन्थानां निम्रन्थ्युपाश्रये गमनादिकं कर्तुं न कल्पते तथा तासा-
मपि निम्रन्थीनां यति निलये निर्ग्रन्थोपाश्रये निष्कारणे गमनादिकं कर्तुं न कल्पते ।
एतदर्थप्रतिपादनार्थमिदंसूत्रमारभ्यते । अत्र. च यत् प्रायश्चित दोषजालादि-
पूर्व सूत्रोक्त 'यत्र' निष्कारणंगमनादौ युज्यते तत्र तद् 'ज्ञयं' स्वबुध्याऽभ्यूब
ज्ञातव्यम् ] ॥२॥
मूल--नो कप्पइ निग्गंधीणं सलोमाई चम्माई अहिवित्तए ॥ ३ ॥
तृतीयोद्देशकः टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थीना सलोमानि चर्माणि 'अधिष्ठातुं निषद्नादिना परिभोक्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३॥ मूल-कप्पड़ निग्गंथाणं सलोमाई चम्माई अहिद्वित्तए सेविय परिभुत्ते नो चेत्र णं अपरिभुत्ते, से विय पाडिहारिए नो चेवणं अप्पडिहारिए, से वि य एगराइए नो चेव णं अणेगराइए ॥४॥ टीका--कल्पते निर्ग्रन्थानां सलोमानि चर्माणि 'अधिष्ठातुं' परिभोक्तुम् । तत्रापि यञ्चर्म परिभुक्तं तदेव ग्राह्य नापरिभुक्तम् । तदपि च प्रातिहारिक नाप्रातिहारिकम् तदपि चैकरात्रिकं नैवानेकरात्रिकमिति सूत्रार्थः ॥ ४ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा कसिणाई चम्माई धारिए वा परिहरित्तए वा ॥ ५॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा कृत्लानि वर्णप्रमाणादिभिः प्रतिपूर्णानि चर्माणि धारयितुं वा परिहतुं वेति सूत्रार्थः ॥ ५॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अकसिणाई चम्माई धारित्तए वा परिहरित्तए वा ॥ ६ ॥ टीका--कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा [अकृत्स्नानि ] चर्माणि धारयितुं वा परिहतुं चा इति सूत्रार्थः ॥ ६॥ मल-नो कप्पइ निग्गंयाण वा निग्गंथीण वा कसिणाईचत्थाई धारि- चए वा परिहरित्तए वा । कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गयीण वा अकसिणाई चत्याई धारित्तए वा परिहरित्तए वा ॥७॥ टीका--"नो कप्पइ' त्ति आर्षत्वादेकवचनम् नो कल्पन्ते निग्रन्थानां या निर्ग्रन्थीनां वा कृत्नानि सकल कृत्स्नादि रूपाणि वस्त्राणि 'धारयितुवा' परिग्रहे धतु 'परिहतुं वा' परिभोक्तम् , अकृत्स्नानि तु कल्पन्ते, इति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥७॥ मूल-"नोकप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा अभिन्नाई वत्थाई धारित्तए वा परिहरिशए वा ॥ ॥ टीका--नोकल्पते निम्रन्धानां वा निग्रन्थीनां वा' अभिन्नानि, अच्छिन्नानि घस्राणि धारयितुवा परिहतु वेति ।। ८ ।।
वृहत्कल्पसूत्रम्,
मूल-कप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा भिन्नाई वत्थाई धारितए
चा परिहरित्तए वा ॥ ६ ॥
टीकः अस्य व्याख्या प्रागबत्. (कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा भिन्नानि
छिन्नानि वनारिस धतुं वा परिभोक्तं वा) ॥ ६ ॥
मूल-नो कप्पई निग्गंथाणं उरगहणंतर्ग. या उग्गहपट्टगं वा धारित्तए
वा परिहरित्तए वा।।१०।।
टोका-नोकल्यते सिन्धानाम् 'अवग्रहाऽजन्तक. या गुह्य देशपिधान-
वस्त्रम् ‘अवग्रहपट्टक वा' तस्येवाच्छाइकपट्ट धारयितु वा परिहर्तुं वा इति सूत्र-
संक्षेपार्थः । १०।।
मूल-कापड निग्गंधीणं, उग्गहणतगं वा उग्गहपट्टगं वा धारित्तए वा
परिहरित्तर वा।।११।।
टीका--अस्य व्याख्या प्रागवत् ॥ ११ ॥
मूल-निगंथीए अ गाहावइकुलं पिंडवाय. पडियार अणुप्पविट्ठाएः
' चेलटठे समुपज्जेज्जा, नो से कप्पइ अपणो नीसाए चेनं पडिग्गाहित्तए,
क पई से पात्तिणि नीसाए चेनं पडिग्गाहित्तए । नो य से. तत्थ पवत्तिणी
सामाणा सिया जे तत्य सामाणे आयरिए वा उअज्झाए ना पवित्ती वा
थेरे वा मणी वा गणहरे वा गणावच्छेहए वा जं चऽनः पुरो कट्ट
विहरई कप्पड़ से तन्नी साए चेनं पडिग्गाहित्तए ॥ १२ ॥
टीका-निर्ग्रन्थ्या गृहपंतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञया अनुप्रविष्टायाश्च.लेनाऽर्थः-
प्रयोजनं चेलार्थः स समुत्पद्यत, नो से, तस्याः कल्पते श्रात्मनो निश्रयाँ चेलं. प्रति..
ग्रहीतुम्, किन्नु कल्पते 'से' तस्याः प्रवर्तिनी निश्रया चेलं प्रतिपहीतुम् । अथ तत्र नः
प्रवर्तिनो 'सामाणा' सन्निहिता ततो यस्तत्राचार्यो वा उपाध्यायो वा प्रवर्ती वा
स्थविरो वा गणीवा गणधरो वा गणावच्छेदको वा सनिहितो भवेत् । 'गणी' गणा-
धिपतिराचार्यः, 'गणधर' संयतीपरिवर्तकःशेषाः सर्वेऽपि प्रतीताः। एतेषां निश्रया
यं वा 'अन्य' गीतार्थ साधु पुरतः कृत्वा विहरति तनिश्रया कल्पते से तस्याश्चलं..
प्रतिग्रहीतुर्मिति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १२ ॥
२९ तृतीयोदेशकः मूल-निग्गंथस्स तपढमयाए संपव्वयमाण स्स कप्पइ रयहरण मोच्छग पडिग्गहमायाए तिहि कसिणेहिं वत्येहि आयाए संपव्वइत्तए । से अ पुयोवठ्ठिए सिया एवं से नो कप्पइ रयहरण पडिग्गह गोच्छय मायाए तिहिय कसिगेहि बत्येहि अायाए संपचहत्तर । कप्पड़ से अहा, परिग्गहियाई वत्याई गहाय आयाए संपवइत्ता ॥ १३ ॥ टोका--निर्ग्रन्थस्य तत्प्रथमतया सम् इति सम्यग् , प्रकण पुनरनङ्गीकार लक्षणेन जतो-गृहवासान्निर्गच्छतः संप्रव्रजतः कल्पते रजोहरण गोच्छक-प्रतिग्रह- मादाय त्रिभिः कृत्स्नैर्वस्त्रैरात्मना सम्प्रव्रजितुम् । इह रजोहरण ग्रहणेन मध्यमोपधिः, गोच्छक ग्रहणेन जघन्योपधिः, प्रतिग्रहप्रहणेनोत्कृष्टोपधिः सर्वोगृहीतः, ततोऽयमर्थ:- नघन्य मध्यमोत्कृष्टोपधि निष्पन्ना ये त्रयः कृत्स्ना:-प्रतिपूर्णा वस्त्र पात्र प्रत्यवतारा. स्तरात्मना सहितैः प्रव्रज्या ग्रहीतु कल्लते । ‘से या ति च शब्दोऽथ शब्दार्थः, अथाऽसौ प्रत्याप्रतिपत्ता पूर्वम् उपस्थितः-दीक्षितः स्यात् ततो नो कल्पते 'से तस्य पूर्वोपस्थितस्य रजोहरण गोच्छक प्रतिग्रहमादाय त्रिभिः कृत्स्नैर्वस्त्ररात्मना सम्प्रव्रजितुम् । किन्तु कल्पते 'से' तस्य 'यथापरिगृहीतानि क्रीतकृतादिदोषरहितानि घनाणि गृहीत्वा प्रात्मना संप्रत्रजितुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १३ ॥ मूल-निग्गंधीर णं तप्पढमयाए संपव्ययमाणीए कप्पड़ से रयहरण- गोच्छग-पडिग्गहमायाए चउहि कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपव्वइत्तए । साय पुबोवडिया सिया एवं से नो कप्पइ रयहरण गोच्छग पडिग्गह मा- चाए चउहिं कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपव्वइत्तए कप्पड़ से अहापरिग्गहि- एहिं वत्थेहिं पायाए संपन्चइत्तए ॥ १४ ॥ टीका -अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरं निर्ग्रन्थ्याश्चतुर्भिः प्रत्यक्तारैः सहितायाः प्रजितुं कल्पते इति विशेषः ॥ १४॥ : . : मूल नो कप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा पढमसमोसरणुदेसपत्ताई घेलाई पडिग्गाहित्तए । कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा दोच्च समो- सरणुद्दे सपत्चाई चेलाई पडिग्गाहिलए ॥१५॥ टीका-"नो कम्पत्ति आर्पत्वादेकवचनम्-नो कल्यन्ते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां था प्रथमसमवसरणे-वाकाज्ञे उद्देश:-क्षेत्रकालविभागस्तं प्राप्तानि प्रथम समवसर- बृहत्कल्पसूत्रम् २६ णोद्देश प्राप्तानि 'चेलानि वस्त्राणि प्रतिग्रहीतुम् । किमुक्त भवंति ?--इह साधवो यत्र वर्षावासं चिकीर्पवस्तत् क्षेत्रं यावद् नाद्यापि प्राप्नुवन्ति, प्राप्ता वा परं नाद्या. प्याषाढ पूर्णिमा लगति, तावत्कल्पन्ते वस्त्राणि प्रतिग्रहीतुम् । अथ वर्षावास प्रायोग्य क्षेत्र प्राप्ताः, आपाढ पूर्णिमा च सञ्जाता तत इयन्तं क्षेत्र कालविभागं प्राप्ताणि वस्त्राणि न कल्पन्ते । द्वितीय समवसरणोद्देशप्राप्तानि तु कल्पन्ते । इति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १५॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निरगंथीण वा अहाराइणियाए चेलाई पडिग्गाहित्तए ॥ १६॥ टीका- कल्पते निग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथारानिक यो यो रानिक:- भावरत्नैरधिकस्तदनतिक्रमेण चेलानि प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ।। १६ ।। मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए सेज्जासंथारए पडिग्गाहित्तए ॥ १७॥ टोका कल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां या यथारत्नाधिकं शय्यासंस्तारकान् प्रतिग्रहीतुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १७ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण या अहासइणियाए किकम्म करितए ॥१८॥ टीका- कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा यथारानिकं, यो यो रत्नाधिकस्त- दनतिक्रमेण कृति कर्म कर्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १८ ।। मूल-नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गयीण वा अंतरगिर्हसि चिट्ठि- तए वा निसीइए वा जाव काउस्सग्गं वा ठाणं ठाइत्तए । अह पुण एवं जाणिजा-वाहिए, जराजुरणे तवस्सी दुबले किलं ते मुच्छिज्ज वा पवडिज वा, एवं से कम्पइ अंतरगिहंसि चिट्ठित्तर वा जाव ठाणं ठाइत्तए॥ १६ ॥ टीका--नों कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा 'अन्तरगृहे' गृहस्य गृहयो अन्तराले [ राजदन्तादित्वाद् शार्पत्वाद्वा अन्तर शब्दस्य पूर्वनिपातः ] स्थातुवा निपत्तुं बा यावत्करणात् त्वग्वर्तयितुवा, निद्रायितुवा, अंचलायितुवा, अशनं वा, पानं वा, खादिमं वा, स्वादिमं वा (आहारम् ) आहर्तुम । उच्चार वा प्रस्रवणं चा खेलं वा सिवानं चा परिष्ठापयितुम् , स्वाध्यायं वा कर्तुम् , ध्यानं वा ध्यातुम् , 4 . 2.
तृतीयोद्देशकः 8 "काउस्सग्ग" ति कायोत्सर्गलक्षणं वा स्थानं 'स्थातु: कर्तुम् । सूत्रणवाऽपवाद दर्शयति-अथपुनरेवं जानीयात्-'वाहिए, इत्यादि व्याधितः-ग्लानः, जराजीर्णः-- स्थविरः, 'तपस्वी' क्षपकः दुर्बलः-जानत्वादधुनवोत्थितोऽसमर्थ शरीरः, एतेपां मध्यादन्यतमस्तपसा भिक्षाटनेन वा क्लान्तः-परिश्रान्तः सन् मूछेद्वा प्रपतेद्वा, एवं कारणमुद्दिश्य कल्पते अन्तरगृहे स्थातु वा यावत् कायोत्सर्ग वा कर्तुमिति सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिहंसि जाव चउगाहं वा पंचगाहं वा आइक्खित्तए वा विभावित्तए वा किट्टित्तए वा पवेइत्तए वा, नऽनत्य एगणाएण वा एगवागरणेण वा एगगाहाए वा एग सिलोएण वा, से वि य ठिच्चा नो चेव णं अडिच्चा ॥ २० ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थातां वा निर्ग्रन्थीनां वा अन्तर गृहे यावत् चतुर्गाथं वा पञ्चगाथं वा-आख्यातुवा विभावयितुवा कीर्तयितुवा प्रवेदयितुं वा । एतदेवाप- वदन्नाह-'नऽन्नत्थ' इत्यादि 'न कल्पते' इति-योऽयं निषेधः स एकज्ञाताद्वा एक व्याकरणाद्वा एक गाथाया वा एक श्लोकाद्वा अन्यत्र मन्तव्यः । [सूत्रे च पञ्चम्याः स्थाने तृतीया निर्देशः प्राकृतत्वात् ] तदपि च एक ज्ञातादि व्याख्यानं स्थित्वा कर्तव्यम् , नैव 'अस्थित्वा' भिक्षां पर्यटतोपविष्टेन वा इति सूत्रार्थः ॥ २० ॥ मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिर्हसि इमाई पंच महव्वयाई सभावणाई आइक्खित्तए वा विभावितए वा किट्टित्तए वा पवेयत्तए वा, नऽनत्थ एगनाएण वा.जाव सिलोएणं वा, से वि य ठिचा नो चेवणं अठिच्चा ॥ २१॥ टीका---अस्य व्याख्या प्राग्वत् ; नवरम् इमानि' स्वयमनुभूयमानानि पंच महा- व्रतानि सभावनानि-प्रतिव्रतं भावना पंचक्र युक्तानि आख्यातुवा, विभावयितुवा कीर्तयितुवा प्रवेदयितु वा न कल्पन्ते । आख्यानं नाम-साधूनां पंचमहाव्रतानि पंचविंशतिभावनायुक्तानि पटकायरक्षणसाराणि भवन्ति 'इति सामान्यकथनम् ।। विभावनंतु प्राणातिपाताद्विरमणं. यावद् परिग्रहाद्विरमणमिति । भावनास्तु- "इरियासमिए सयाजए? इत्यादि गांथोक्तत्वरूपाः । पटकायास्तु-पृथिव्यादयः । कीर्तनंनाम--"या प्रथमत्रतरूपा अहिंसा सा भगवती सदेवमनुजाऽसुरस्य लोकस्य. ..
बृहत्कल्पसूत्रम् ३१ पूज्या, द्वीपः, त्राणं शरणं गतिः, प्रतिष्ठेत्यादि, एवं सर्वेषामपि प्रश्नव्याकरणोक्तान, गुणान् कीर्तयति । प्रवेदनं तु-महाव्रतानुपालनात् स्वर्गोऽपवर्गो वा प्राप्यते इति लाभकथनम् ) इति सूत्रार्थः ॥ २१ ॥ मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंधीण वा पाडिहारियं सिज्जा- संथारयं आयाए अपडिहट्ठ संपव्वइत्तए ॥ २२ ॥ टीका-नो कल्पते निम्रन्थानां वा निर्ग्रन्थींनां चा प्रतिहरणं-प्रतिहारः-प्रत्यर्पणं तमहतीति प्रातिहारिक, शय्याचसाङ्गीणा, संस्तारक:-अर्द्धतृतीयहस्तमानः, शय्यासंस्तारकं तदु 'आदाय' गृहीत्वा कार्यसमाप्तौ 'अप्रतिहृत्य' प्रत्यर्पणमकृत्वा सम्प्रव्रजितु-ग्रामान्तरं विहर्तु मिति सत्रार्थः ।। २२ ॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागारिय संतियं सेज्जासंथारयं आयाए अविकरणं कट्ठ संपवइत्तए ॥ २३ ॥ टीका--नोकल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा सागारिकः-शय्यातरस्तस्य सत्कं शय्यासंस्तारकम् आदाय-गृहीत्वा 'अविकरणं कृत्वा, अविकरणं नाम-यत् साधुना करणंकृतम्-तृणानां प्रस्तरणं कम्बिकानों वन्धन फलकस्यस्थापनम् , तद् अनपनीय संप्रव्रजितु विहतु मिति सूत्रार्थः ।। २३ ॥ मूल-"इह खलु निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पाडिहारिए वा सांगा- रियसंतिए वा सेज्जासंथारए विप्पणसिज्जा से य अणुगवेसियव्ये सिया, से अ अणुगवेस्समाणे लभेज्जा तस्सेव पडिदायव्ये सिया, से अ अणुगवेस- माणे नो लभिज्जा एवं से कप्पह दोच्चपि उग्गहं अणुनवित्ता परिहारं परिहरित्तए ।। २४ ।। टीका--इह अस्मिन् मौनीन्द्र प्रवचने स्थिताना 'खलु' वाक्यालकारे, निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा प्रातिहारिको वा सागारिकसत्को वा शय्यासंस्तारकः 'विप्रणश्येत्' विविधैः प्रकारे प्रकर्षेण रक्ष्यमाणोऽपि नश्येत् , सच 'अनुगषयितव्यः' विप्रणाशान- न्तरम् पृष्ठत एव गवेपयितव्यः । स्याद्-भवेत् सचानुगवेष्यमाणो लभ्येत तस्यैव संस्तारक स्वामिनः प्रतिदातव्यः-प्रत्यर्पणीयः । स्यात् स चानुगवेष्यमाणो न लभ्येत तत एवं 'से' तस्य कल्पते 'द्वितीयमप्यवग्रहमनुज्ञाप्य' एक तावत्प्रथमं यदा गृहीत. स्तदाऽनुज्ञापितः, ततो विप्रणष्टः सन् गवेष्यमाणोऽपि यदा न लब्धः, तदा संस्तारक ३२ तृतीयोदेशकः " स्वामिनः कथिते सति यदसावन्यं संस्तारकं ददाति, यद्वा स एव संस्तारक स्वामिना मृग्यमाणोलब्धः, ततस्तद्विपयं द्वितीयमवग्रहमनुज्ञाप्य 'परिहार धारणा-परिभोग- लक्षणं 'परिहतु धातूनामनेकार्थत्वाकर्तु मितिसूत्रार्थः ।। २४ ।। मूल-"जदिवसं समणा निग्गंया सिजासंथारयं विप्पजहंति, तदिवसं अवरे समणा निगंथा हव्यमागच्छिज्जा सच्चेव उग्गहस्स पुवाणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ।। २५ ॥ टीका--जदिवसं, [ इतिप्राकृतत्वात्सप्तम्यर्थे द्वितीया ] ततो यस्मिन् दिवसे. श्रमणा निर्ग्रन्थाः शय्या च वसतिः, संस्तारकश्च-तृणफलकात्मकः शय्यासंस्तारकम् । अत्र शय्याग्रहणेन ऋतुबद्धः कालः सूचितः, संस्तारकग्रहणेन तु वर्षाकालः, अथवा कारणजाते ऋतुबद्धेऽपि संस्तारको गृह्यते, इतिकृत्वा संस्तारक ग्रहणेन द्वावपि गृहीती, ततो मासंकल्पे, वर्षावासे वा पूर्णे शय्यां संस्तारकं वा यस्मिन् दिवसे पूर्वस्थिताः साधवः 'विप्रजहति' परित्यजन्ति, तदिवस एवाऽपरे श्रमणा निम्रन्था- स्तत्र क्षेत्रे 'हव्य' शीघ्रमागच्छेयुः, ततः सैवाऽवग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्ठितिः। किमुक्तं भवति ?--"य एव ततः क्षेत्रान्निर्गतास्तेषामेवाऽवग्रहे तत् क्षेत्रम् , येतु तदिवसमन्ये आगतास्ते क्षेत्रोपसम्पन्ना इति कृत्वा यत् तत्र सचिंत्तादिकं तत् पूर्व- स्थितानामाभाव्यम् । कियन्तं कालं यावद् ? इत्याह--"अहालंदमवि उग्गहे" इह यस्यां वेजायां ते साधवो निर्गताः तावती वेलां यावद् द्वितीयेऽप्यहि तेपामेवाऽवग्रहो. भवतीतिवक्ष्यते, ततः 'यथालन्दम् इहाऽष्टपौरुषीप्रमाणं मध्यमं गृह्यते, एतावन्तमपि कालं तदीय एवावग्रहे तत् क्षेत्र , अतो यद्यागन्तुकास्तत्र सचित्ताऽदिग्रहणंकुर्वन्ति, तदा साधर्मिकस्तैन्यप्रत्ययं प्रायश्चित्तमापद्यन्ते । अत्र तु सचित्तेनाऽधिकार इति सूत्रार्थः ॥ २५॥ मूल-"अस्थि या इत्थ केइ उवस्सय परियावन्नए अचित्ते परिहरणा- रिहे सच्चेव उग्गहस्स पुव्याणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ॥२६॥ टीका--अम्ति च 'अत्र' अनन्तरसूत्र प्रस्तुते प्रतिश्रये किम् ? 'किञ्चिद्' आहाराऽर्थजातादिकं गृहस्थसत्कम् उपाश्रये पर्यापन्न-विस्मृतं परित्यक्त वा उपाश्रय- पर्यापन्न 'अचित्तं प्राशुकम् 'परिहरणाह, साधूनां परिभोक्त योग्यम्, तत्र सेवाव: अहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्ठति, तत्रोपाश्रये तिष्ठद्भिः पूर्वमेव 'अनुजानीत प्रायोग्यमइत्येवं 'यन्वग्रहोऽनुज्ञापितः सैवानुज्ञापना, पश्चादुपाश्रय पर्यापन्नग्रहणे व्यवतिष्ठते न वृहत्कल्पसूत्रम् . पुनर भितवमनुज्ञापनं कर्तव्यमितिभावः । कियन्तं कालमित्याह--"यथालन्दमपि मध्यमलन्दमात्रमपि कालं यावद्द्वग्रह इतिसूत्रार्थः ।। २६ ।। मूल-"सेवत्थुसु अच्वावडेसु अव्वोगडेसु अपरपरिग्गहिएसु अमर परि- गहिए सच्चेव उग्गहस्स पुव्वाणुगणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उम्गहे ।२७॥ दीका- से, तस्थं निम्रन्थस्य वास्तुपुर गृहेषु, कथम्भूतेषु ? 'अव्याप्तेषु शंटित-- पतिततया व्यापार विरहितेषु 'अव्याकृतेपु' दायादादिभिरविभक्तपु अथवाऽतीत काले केनाऽप्यनुज्ञातमितिनज्ञायते यत् तद् अव्याकृतं तेषु, तथा 'अपरपरिगृहीतेषु' पर:-अन्यैरनधिष्टितेषु 'अमरपरिगृहीतेषु'-देवैः स्वीकृतेषु, सैवावग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना निष्ठति यथालन्दमध्यवरहे । किमुक्त भवति ?-यावन्तं कालं तानि वास्तूनि तेषां पूर्वस्वामिनामवग्रहे वर्तन्ते तावन्तं कालं सैव पूर्वानुज्ञा तिष्ठति, न पुनभूयोऽप्यव- ग्रहोऽनुज्ञापनीय इति सूत्रार्थः ॥ २५ ॥ मूल-"से पत्थुसु वावडेसु बोगडेसु परः परिग्गहिएसु भिक्खुभाँवस्त अद्याप दोच्चं पि उग्गहे अणुगणवेयवे सिया अहालंदमवि उग्गहे ॥२८॥ टीका--से, तस्य निर्ग्रन्थस्य वास्तुषु-गृहेषु व्यापृतेपु-व्यापारयुक्तेषु वहमान केवित्यर्थः व्याकृतेपु-दायादादिभिविभक्तेयु 'परपरिगृहीतेषु अन्यवंशीयरधिष्टितेषु भिक्षुभावस्यार्थाय-भिक्षुभावो नाम ज्ञान-दर्शन-चारित्राणि तृतीय व्रतादिकं वा, त भिक्षुशब्दस्य परमार्थत्वेन रूढत्वात् । सभिक्षुभावः परिपूर्णो भूयादित्येवमर्थं ये साधवः पश्चादागच्छन्ति, तैर्द्वितीयमपि चारमवग्रहोऽनुज्ञापयितव्यः स्याद् 'यथा- लन्दमपि जघन्यलन्द मात्रमपि कालमवग्रहे तत्राऽवस्थाने इति सूत्रार्थः ।। २८ ।। मूल-"से अणुकुड्डेसु वा अणुभित्तीसु वा अणुचरियासु वा अणुफरि- हासु वा अणुपंथेसु वा अणुरासु वा सच्चे उग्गहस्स पुत्राणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ।। २६ ।। टीका--से-तस्य निग्रन्थस्य अनुकुझ्य पुवा, कुड्यसमीपवर्तिपु वा प्रदेशेषु, एवम् - अनुभित्तियु वा, अनुचरिकासुवा, अनुपरिखासु वा, अनुपथेषु वा अनुमर्यादासु वा ! . अत्रचरिका नगर प्राकारयोरपान्तराले हस्ताष्टक प्रमाणो मार्गः, परिखा-खांतिका, मर्यादा-सीमा शेपं प्रतीतम् । एतेषु सैवावग्रहस्य . पूर्वानुज्ञापना तिष्ठति यथालन्द- मपि कालमवग्रहः इति सूत्रार्थः ।। २६ ।।.. तत्रैव तृतीयोद्देशकः मूल-"से गामस्स वा जाव रायहाणीए वा वहिया सेएणं सन्निविट्ठ पेहाए कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तद्दिवसं भिक्खायरियाए गंतु पडिएत्तए । नो से कप्पइ तं स्यणि तत्थेव उवाइणा वित्तए । जो खलु निगंथो वा निग्गंथी वा तं रयणि तत्थेव उवाइणाइ, उवातिणंतं वा साइ- ज्जति, से दुहतो वि अइक्कममाणे आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्धाइयं ॥ ३०॥ टीका-से शब्दोऽथ शब्दाऽर्थे । अथ ग्रामस्य पा यावद् राजधान्या वा, याव- रकरणात् नगरस्य वा खेटस्य वा इत्यादि परिग्रहः, एतेषामन्यतरस्य बहिः 'सेना' राज्ञः स्कन्धावारं रोधकं कृत्वा सन्निविष्टं 'प्रेक्ष्य' दृष्ट्वा कल्पते निर्ग्रन्थानां या निम्रन्थीनां वा तदिवसं भिक्षाचर्यायां गत्वा प्रत्यागन्तुम् । नो-नैव 'से' तस्य विवक्षि- तस्य भिक्षोः कल्पते तां रजनी तत्रैव सेनायाम् उपादातुम्-अतिक्रामयितुम् । यः खलु निर्ग्रन्थो वा निग्रन्थी. वा ता रजनी तत्रैवोपाददाति, उपाददतं का स्वादयति स द्विधाऽप्यतिक्रामन् -जिनसीमानं राज सीमानं च विलुम्पन आपद्यते चातुर्मासिक परिहारस्थानमनुद्घातिकमिति सूत्रार्थः ॥ ३० ॥ मूल-'से गामंसि वा जाव संन्निमसि वा कप्पइ निग्गंथाण वा निग्ग- थीण वा सव्वश्रो समंता सकोसं जोयणं उग्गहं श्रोगिरिहत्ताणं चिट्टित्तए ॥ ३१॥ तिमि तइओ उद्देसो । टीका-"अथ प्रामे वा नगरे वा यावत् सन्निवेशे वा कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्र- न्थीनां वा 'सर्वतः सर्वासुदिक्षु 'समन्तात्-चतसृष्वपि विदिक्षु सक्रोशं योजनमवग्रह- मवगृह्य स्थातुमिति सूत्रार्थः ॥ ३१ ॥ इति तृतीय उद्देशकः A समाप्तः
अथ चतुर्थ उद्देशकः
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मूल--" तो अणुग्धाइया पन्नत्ता, तंजहा-'हत्थकम करेमाणे,
मेहुणं पडिसेवमाखे, राइभोयणं भुजमाये ।। १ ।।
टीका-त्रयः त्रिसंख्याकाः अनुद्घातिकाः, उद्घातो नाम “अद्वेण छिन्नसेस
(गा ) इत्यादिविधिना भागपातः सान्तरदानं वा उद्घातः, स विद्यते .येषु.
ते उद्घातिकाः, तद्विपरीता अनुद्घातिकाः प्रज्ञप्ताः-तीर्थकरादिभिः प्ररूपिताः ।
'तद्यथा' इत्युपप्रदर्शनार्थः । हन्ति हसति चा मुखमावृत्यानेनेतिहस्तः-शरीरैकदेशो
निक्षेपाऽऽदानादि समर्थः तेन यत् कर्म क्रियते तत्-हस्तकर्म, (विषयाऽसेवनरूपं)
तत्कुर्वन् । तथा स्त्रीपु सयुग्मं मिथुनमुच्यते, तस्य भावः कर्म वा मैथुनम्, तत् प्रतिसेव.
मानः । तथा रात्रौ भोजनम्-अशनादिकं भुञ्जानः । एप सूत्रार्थः ।। १ ।।
मूल- तो पारंचिया पन्नचा, तंजहा-दुट्ठ पारंचिए, पमत्ते
पारंचिए, अन्नमन्नं करमाणे पारंचिए ॥२॥
टीका--(शोधिः शुद्धिढिविधा-तपोऽही, छेदाऽर्वाच, तपोऽहशिोधिः खलु
पूर्वसूत्रे प्रोक्ता, अथेदानी छेदाहोऽभिधीयते । सचच्छेदो द्विधा-देशतः सर्वतश्व, तत्र
देशच्छेदः पञ्चरात्रिन्दिवादिकः परमासान्तः । सर्वच्छेदः 'मूलादिः' मूला-ऽनव-
स्थाप्य-पाराश्चिक भेदात् त्रिविधः । अत्रसर्वच्छेदः-पाराञ्चिकलक्षणोऽधिक्रियते-
"अथास्य सूत्रस्य व्याख्या- त्रयः पाराश्चिकाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-दुष्टः पाराञ्चिका,
प्रमत्तः पाराश्चिकः 'अन्योऽन्यः परस्परं मुखपायु प्रयोगतः प्रतिलेचना कुण
पाराञ्चिक इति सूत्र समासार्थः ॥ २॥
चतुर्थीदशक: , मूल--" ततो अणवठ्ठप्पा पण्णत्ता, तंजहा-साहम्मियाणं तेगणं करमाणे, अन्न धम्मियाणं तेएणं करेमाणे, हत्थादालं दलमाणे ।। ३ ।। टीका--त्रयः-'अनवस्थाप्याः-तत्क्षणादेव व्रतेपु अनवस्थापनीयाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-'साधर्मिकाः-साधवस्तेषां सत्कयोस्कृतोपधेः शिष्यादेर्वा स्तन्यं चौर्य कुर्वाण:। अन्यधार्मिकाः-शाक्यायो गृहस्था वा तेषांसत्कस्योपध्यादेः स्तन्यं कुर्वन् । तथा हस्तेनाऽऽताडनं हस्तातालः, [ सूत्रे च तकारस्य दकारतिरांपत्वात् ] तं दलमाणे- दत्-यष्टिमुष्टि लकुदादिभिरात्मनः परस्य वा प्रहरन्निति भावः । अथवा-'हत्थालं' इतिपाठः, हस्तालम्ब इब हस्तालम्बः-अशिवादि प्रशमनार्थमभिचारुक मन्त्रांदि प्रयोगः तं 'दलमाणे' कुर्वन् , यद्वा 'अत्यादाणं दलमाणे' इति पाठः, तत्र अर्थाऽऽ- दानम्-अर्थोपादानकारणमटाङ्गनिमित्त ददत्-प्रयुजानः एप सूत्रसंक्षेपार्थः ।। ३ ॥ मूल-" तो नो कप्पति पत्र्याक्त्तिए, तंजहा-पंडए, बाइए,की।।४।। टीका--त्रयो नो कल्पन्ते प्रव्राजयितुम् । तद्यथा-पण्डकः-नपुसकः । वातिको नाम यदा स्वनिमित्ततोऽन्यथा वा मेहनं कापाथितं भवति, तदा न शक्नोरिवेद धारयितु यावन्न प्रतिसेवा कृता (तथाविधः) क्लीवः-असमर्थः सच दृष्टि क्तीवादि- लक्षणः । एप सूत्रार्थः ॥ ४॥ मूल--" एवं मुंडावित्तए, सिक्खा बित्तए, उबट्टावित्तए, संभुजित्तए, संवासित्तए, ।। ५।६।७।८।।। टीका-यथते पण्डकादयस्वयः वाजयितुन कल्पन्ते एवमेते-एवं कथञ्चित्- छलिसेन प्रभाजिता अपि सन्तः 'सुण्डापंथितु, शिरोलीचेन लुऋितुन कल्पन्ते ।। एवं शिक्षापयितुं प्रत्युवेक्षणादि सामाचारी ग्राहयितुम् । उपस्थापयितु-महाव्रतेषु रुमवस्थापयितुन । सम्भोक्तुम , एक मण्डली समुद्देशादिना व्यवहारयितु। संवासथि- तुम्-अात्मसमीपे भासवितुमिति सूत्रार्थः ॥ ५। ६.। ७ । ८ । ६ ॥ " तो नो कप्पंति वाइतए, तंजहा- अविणीए, विगई- पडिबद्धे, अवियोसषियपाहुडे ।।१०।। मूल-"तो कप्पंति वाइत्तए, तंजहा-विणीए, नो विगईपडिबद्ध विनोसवियपाहुडे ॥ ११ ॥ दीका--त्रयो नो कपन्ते वाचवितु-सूत्र पाठवितुमर्थ या नावयितुम् । तद्यथा -- ।
वृहमाल्लसूत्रम् ... । अविनीतः-सूत्राऽर्थदातुचन्दनादि विनयरहितः । विकृतिप्रतिवद्धः-घृतादिरस विशेप- गृद्धः-अनुपधानकारीति भावः । अव्यवशमितम्-अनुपशान्तं प्राकृतमिव प्राभृतं- नरकपाल कौशलिक तीव्रक्रोधलक्षणं यस्याऽसौ-अव्यवशमित प्राभृतः ॥ एत- द्विपरीतास्तु त्रयोऽपि कल्पन्ते वाचयितुम् । तद्यथाविनीतो नो विकृति प्रतिबद्धो व्यपशमितप्राभृतश्चेति सूत्रार्थः ॥ १० ॥ ११ ॥ मूस-'तो दुस्सनष्पा पन्नता, तं जहा-दुड्ढ़े, मूढ़े, बुग्गाहिए ॥१२॥ टीका--त्रयः दु खेन-कृच्छेण संज्ञाप्यन्ते-प्रतिवोध्यन्ते, इति दुःसंज्ञाप्याः प्रज्ञप्ता। तद्यथा--'दुष्टः-तत्वं प्रज्ञापकं वा प्रतिद्व पचान् स च अप्रज्ञापनीयः हूँघेणो- पदेशाऽप्रतिपत्तः एवं मूढो-गुणदोपाऽनभिज्ञः । व्युद्ग्राहितोनामकुप्रज्ञापक दृढीकृत विपरीतावबोधः । एप सूत्रार्थः ॥ १२ ॥ मूल--"तो सुसण्णप्पा पन्नचा, तंजहा-'अदु?, अमूढे, अबुग्गी- हिए ॥ १३ ॥ टीका--त्रयः सुसंज्ञाप्याः-सुखं प्रज्ञापनीयाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-अदुष्टोऽमूढोऽव्यु- ग्राहितच तिः ।। १३॥ मृल-"निग्गंथि च णं गिलायमाणि पिता वा भाया वा पुत्तो वा पलिस्सएज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुणपडिसेवणपशा, आदज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥ १४ ॥ मूल-निगंथं च णं गिलायमाणं माया वा, भगिणी वा, धूतावा पलिस्सएज्जा, तं च निगंथे साइज्जेज्जा, मेहुण पडिसेवणपचे आवज्जड़ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्धाइयं ।। १५ ॥ टीका-विग्रन्थी प्रागुक्त शब्दार्थाम् च शब्दो वाक्यान्तरोपन्यासे, 'ण' इति वाक्यालकारे 'गिलायमाणि, इति ग्लायन्ती (ग्लै -हर्पक्षये,) शरीरक्षयेण हर्पक्ष्य मनुभवन्ती, पिता वा, भ्राता वा, पुनो वा निग्रन्थः सन् ‘परिष्वजेत, प्रपतन्ती धार- यन् , निवेशयन् , उत्यापयन् वा शरीरे स्पृशेत् , 'तं च, भुरुषपर्श सा निम्रन्थी मैथुन प्रतिसेवन प्राप्ता स्वादयेत्-अनुमोदयेत् तत आपद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थान मनुद्घातिकम् । एवं निर्ग्रन्थ सूत्रमपि व्याख्येयम, नवरं मातावा, भगिनी वा, दुहिता ३८ ५. बतुर्थीदेशकः चा परिजेत् (तं च निर्ग्रन्थः अनुमोदयेन ततः मैथुन प्रतिसेचना प्राप्तः-प्रापद्यते चातुर्मासिकं परिहार स्थानमनुद्धातिकम ), एष सूत्रार्थः ।। १४ ।। १५ ।। मूल-'नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा असणं वा पाणं वा, खाइमं वा, साइमं वा, पढमाए पोरिसीए पडिग्गाहिता पच्छिम पोरिसि उचाइणाविचए । से य आहच उवाइणाविए सिया तं नो अपणा भुजिज्जा, नो अन्नेसिं अणुप्पएज्जा, एगते बहुफासुए थंडिले पडिलेहिता पमज्जित्ता परिट्टवेयव्ये सिया । तं अप्पणा मुंजमाणे अन्नेसिं वा दलमाणे आवज्जइ चाउम्नासियं परिहारट्ठाणं उग्धाइयं ।। १६ ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा २ असणं वा ४ परं अद्ध जोयण मेराए उबायणाविचए । से य आहच्च उवाइणाविए सिया, तं नो अप्पणा भुजिज्जा नो अन्नेसि अणुप्पएज्जा एगते. बहुफासुए थंडिले पडिलेहिता पमज्जित्ता परिट्ठवियब्बे सिया। तं अप्पणा भुजमाणे अन्नेसि वा दलमाणे आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं उग्धाइयं ॥ १७॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा अशनं वा, पानं वा, खादिम वा, स्वादिमं वा, प्रथमायां पौरुष्यां प्रतिगृह्य पश्चिमां पौरुषीम् ‘उवाइणावित्तए त्ति, उपानाययितु-सम्प्रापयितुमिति । तच्च "आहञ्च, कदाचित उपानायितं स्यात् , 'तद्, अशनादिकं नात्मना भुजीत, नवा अन्येषां साधूनामनुप्रदद्यात् । किम्पुन- स्तर्हि विधेयम् ? इत्याह-एकान्ते बहुप्राशुके स्थरिडले प्रत्युपेक्ष्य-चक्षुषा प्रमृज्य-रजो- हरणेन परिष्टायथितव्यं स्यात् । तद् प्रात्मना भुञ्जानोऽन्येषां वा दान श्रापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानमुद्घातिकम् ॥ एवं क्षेत्रातिक्रान्त सूत्रमपि वक्तव्यम्- नवरम्-अर्द्धयोजनलक्षणाया मर्यादाया अतिक्रामयितुमशनादिकं न कल्पते । स्यात् तदुपानायितं (उपानाययितः) भवेत् , ततो यः स्वयं तद् भुङ्क्तेऽन्येषां वा दाति तस्य चतुर्लघुकमिति सूत्रद्वयार्थः ।। १६॥ १७ ।। मूल-"निगथेण य गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए अणुप्पविट्ठणं अन्नयरे अचिचे अणेसणिज्जे पाणभोयणे - पडिग्गाहिए सिया, अत्थि या इत्थ केइ सेहतराए अणुवट्ठावियए, कप्पड़ से तस्स दाउ (वा)अणुप्पदाउ वा, नत्थि या इत्थ केइ सेहतराए, अणुवढावियए तं नो अप्पणा भुजेजा, ततः वृहत्कल्पसूत्रम् ३६ नो अन्नेसिं दावए, एगते बहुफासुए यएसे पडिलेहित्ता पमज्जित्ता परि- द्ववेयब्वे सिया ॥ १॥ टीका-निर्ग्रन्थेन च गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञयाऽनुप्रविष्ट न 'अनतरे त्ति' उद्गमोत्पादनैपणादोषाणामन्यतरेण दोपेणदुष्टम् 'अषणीयम्' अशुद्धम्, 'अचित्तं निर्जीवं पानभोजनमनाभोगेन प्रतिगृहीतं स्यात' तच्चोत्कृष्ट न यतः ततः परित्यक्त शक्यते; अस्ति चात्र कश्चित् 'शैक्षतरकः, लघुतरः अनुपस्थापितकः, अनारोपित- महाव्रतः, कल्पते 'से' तस्य निर्ग्रन्थस्य तस्मै शैज्ञाय दातुमनुप्रदातुवा । तत्र दातु- प्रथमतः, 'अनुप्रदातुम्-तेनाऽन्यस्मिन्न षणीये सति पश्चात् प्रदातुम् । अथ नास्त्यत्र कोऽपि शैक्षतरकोऽनुपस्थापितकस्ततस्तद् 'नैवात्मनामुञ्जीत नवाऽन्येषां दद्यात्' किन्तु एकान्ते बहुप्रासुके प्रदेशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य च परिष्ठापयितव्यं स्यात् । इति सूत्रार्थः ॥ १८ ॥ मूल-"जे कडे कप्पट्टियाणं कप्पड़ से अकप्पट्टियाणं, नो से कप्पड़ कप्पट्ठियाणं । जे कडे अकप्पट्ठियाणं णो से कप्पइ कप्पट्ठियाणं, कप्पड़ से अकप्पट्ठियाणं । कप्पे ठिया कप्पट्ठिया, अकप्पे ठिया अकप्पट्ठिया ॥१६॥ टीका-यद् अशनादिकं 'कृतं, विहितं कल्पस्थितानामर्थाय कल्पते तद् अकल्प- स्थितानाम् । नों तत् कल्पते कल्पस्थितानाम् । "इहाऽचेलक्यादौ दशविधे कल्पे ये स्थितास्ते कल्पस्थिता उच्यन्ते पञ्चयांमधर्मप्रतिपन्ना इति भावः । ये पुनरेतस्मिन् कल्पे सम्पूर्णे न स्थितास्तेऽकल्पस्थिताः, चतुर्यामधर्मप्रतिपत्तार इत्यर्थः। ततः पञ्चया- मिकानुद्दिश्यकृतं चतुर्यामिकानां कल्पते; इत्युक्त भवति । तथा यद् 'अकल्पस्थितानां चतुर्यामिकानामर्थाय कृतं नोतत्कल्पते, कल्पस्थितानां पञ्चयामिकानां किन्तु कल्पते तद् 'अकल्पस्थितानां चतुर्यामिकानाम् । अत्रैव व्युत्पत्तिमाह-'कल्पे अचेलक्यादौ दशविधे स्थिताः कल्पस्थिताः। अकल्पे अस्थितकल्परूपे स्थिता अकल्पस्थिताः। एष सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-"भिक्खू य गणाश्रो अवकम्म इच्छेज्जा अन्नं गणं उवसंपज्जि- ताणं विहरित्तए, नो से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा, उवज्झायं वा पवत्तिं वा, थेरं वा, गणि वा, गणहरं वा, गणावच्छेइयं वा अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरिशए । कप्पड़ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जावगणा- पाद् 'अवक्रम्य- चतुर्थशिक: वच्छेइयं या अन्नं गणं उपसंपडिजचाणं विहरिचए- ते य से वियरेजा एवं से कप्पड़ अन्नं गणं उवसंपज्जिताणं विहरितए ते य से नो वितरेजा एवं से नो कप्पइ अण्णं गणं उवसंपज्जित्ताणं विहरितए ॥ २० ॥ इच्छेद्-अभिलषेदन्यं गणमुपसम्पद्यविहर्तुम्। नो से-तस्य भिक्षोः कल्पतेऽनापृच्छ वाऽऽ चार्य वा उपाध्यायं वा प्रवर्तकं वा, स्थविरं वा गणिनं बा, गणधरं वा, गणावच्छेदकं वा अन्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । कल्पते से-तस्य भिक्षोराचार्य वा यावत्करणादु पाध्यायं वा प्रवर्तिनं वा स्थविरं वा गणिनं वा गणधरं वा गणावच्छेदकं वा- ऽऽवृच्छ यान्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । ते चाऽऽचार्यादय आपृष्टाः सन्तस्तस्यान्य- गणगमनं वितरेयु:-अनुजानीयुः, तत एवं तस्य कल्पतेऽन्यं गणमुपसम्पद्यविहर्तुम् । ते च तस्य न वितरेयुस्ततो नो कल्पते तस्याऽन्यगणमुपसम्पद्य विहर्तुमिति सूत्रार्थः।२० मूल-"गणावच्छेइए य गणाअो अक्कम्स इच्छेज्जा अएणं गणं उवसं- पज्जिचाणं विहरिशए, नो कप्पड़ गणावच्छेइयस्स गणावच्छेइयत्तं गिक्खिविचा अण्णं गणं उपसंपञ्जित्ताणं विहरिचए, णो से कप्पड़ अणा- पुच्छित्ता आयरियं वा जाव अन्न गणं उपसंपजित्ताणं बिहरित्तए, कप्पड़ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जावं विहरित्तए । तेच से वितरंति (यरेज्जा) एवं से कप्पड़ जाब विहरित्तए तेय से नो वितरंति (यरेज्जा) एवं से नो कप्पड़ जावविहरित्तए ॥ २१ ॥ मूल-"आयरिय उज्झाए य गणाओ अवकम्म इच्छेज्जा अन्न गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए, कप्पड आयरिय उवज्झायस्स आयरिय उव- ज्झाय णिविखवित्ता अएणं गणं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । णो से कप्पइ अणापुच्छिता आयरियं वा जाव अन्नं ग़णं उवसंपज्जित्ताणं विहरि- त्तए । कप्पति से आपुच्छित्ता जाव विहरिशए । ते य से वितरंति, एवं से कप्पति अन्नं गणं उवसंपज्जित्ताणं विहरिचए। ते य से णो वियरंति एवं से णो कप्पति अन्नं गणं उपज्जित्ताणं विहरित्तए ॥२२॥ टीका-अस्य सूत्रं द्वयंस्य प्रागवद् व्याख्या, न वरम् --गणावच्छेदकत्वमाचा- योपाध्यायत्वं च निक्षिप्य गन्तव्यमितिविशेपः ।। २१ ।। २२ ।। .
बृहत्कल्पसूत्रम् मूल-"भिक्खू य गणाश्रो अबक्कम्म इच्छेचा अन्नगणं संभोग पडि- याए उत्रसंपजिजचाणं विहरित्तए । नो से कप्पइ अणापुच्छिशा पायरिय वा जाब अन्न गणं संभोगपडियाए उघसंपजिजचाणं वित्तिए, कप्पइ से आपुच्छित्ता पायरियं वा जाब विहरितए । ते च से बियरेज्जा एवं से कप्पड़ जाव हिवरत्तए, ते य से नो वियरेन्जा एवं से नो कप्पइ जाब वि- हरिए । जत्थुचारियं धम्मविणयं लभेजा एवं से कप्पइ अन्न गणं संभोग- पडियाए उवसंपजिजताणं विहरितए, जत्थुत्तरियं धम्म विणयं नो लभेज्जा एवं से नो कप्पड अन्न गणं जाब विहरित्तए ।। २३ ।।.. टीका--व्याख्या प्रागवत् । नवर-संम्भोगः-एक मण्डल्या समुद्देशनादिरूपः, तलत्ययं तन्निमित्तम् । जत्थुत्तरियं, इत्यादि-'यत्र' गच्छे उत्तरं-प्रधानतरं 'धर्मविनयं- (स्मा) स्मरणावारणादिरूपां धार्मिकी शिक्षा लभेत; एवं 'से' तस्य कल्पते अन्यं गण मुपसम्पद्य विहतम् । यत्रोत्तरं धर्मविनयं नो लभेत, एवं 'से' तस्य नो कल्पते उप- सम्पद्य विहर्तुमिति सूत्रार्थः ।। २३ ।।. मूल-"गणावच्छेइए य गणाप्रोप्रवक्कम्म इच्छेज्जा अन्नगणं संभोग- पडियाए उवसंपज्जित्ताणं बिहरित्तए । णो से कप्पति गणावच्छेइयत्त अणि- क्विवित्ता संभोगपडियाए जाब विहरिचए, कप्पति से गणावच्छेइयत्तं. मिक्खिवित्ता जाव विहरित्तए । णों से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा जाब विहरित्तए, कप्पड़ से आपुच्छित्ता पायरियं वा जाव विहरित्तए । ते- य से बितरंति एवं से कप्पइ अन्नगणं संभोगपडियाए जाव विहरित्तए, ते य से नो वितरंति एवं से णो कम्पड़ जाव विहरित्तए । जत्थुत्तरियं धम्म- विणयं लभेजा एवं से कप्पति अन्नं गणं संभोगपडियाए जाव विहरित्तए जेत्युत्तरियं धम्मविणयं नो लभेज्जा एवं से णो कप्पड़ जाब विहरित्तए ।२४। मूल-आयरिय उवज्झाए य गणाओअवस्कम्मः इच्छेज्जा अन्नं गणं संभोगपडियाए जाब विहरिजए,णों से कप्पइ अायरिय उवज्झायचं अणि- विखविता अरणं गणं संभोग पडियाए जाब विहरित्तए, कप्पड़ से आयरिय उबझायत्तं णिक्विवित्ता जाब विहरित्तए । णों से कप्पइ प्रणायुच्छिता आयरियं वा जाप विहरित्तए, कप्पति से आपुच्छित्ता पायरियं वा जाव चतुर्थोदशकः विहरितए । ते य से वितरंति एवं से कप्पति जाब विहरित्तए, ते य से गो वितरंति एवं से णो कप्पति जाब विहरित्तए । जत्युत्तरियं धम्मविणयं लभेजा एवं से कप्पड़ जाव विहरित्तए। जत्युत्तरियं धम्मविणयं नो लमे जा एवं से रणो कप्पति जाब विहरित्तए ॥ २५ ॥ टीका--अस्य सूत्रद्वयस्य व्याख्या पूर्ववत् ।। २४ । २५ ॥ मूल-"भिक्खू य इच्छिज्जा अन्नं आयरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, नो से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्नं आयरिय उत्रज्झायं उद्दिसावित्तए । कप्पइ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाय मणावच्छेइयं वा अन्नं पायरियं उबमायं उद्दिसावित्तए । ते य से विय- रिजा, एवं से कप्पइ अन्नं पायरिय उवमायं उद्दिसावित्तए । ते य से नो वियरेज्जा एवं से नो कप्पइ अन्नं आयरिय उवज्झायं उदिसावित्तए । नो से कप्पइ तेसि कारण अदीवित्ता अन्नं पायरिय उवझायं उद्दिसावित्तए, कप्पति से तेसिं कारणं दीवित्ता अन्नं आयरिय उवज्झायं उदिसावित्तए ॥ २६ ॥ टीका- व्याख्या प्रागवत् । नवरम्-अन्यम्-प्राचार्योपाध्यायमुद्देशयितुम् प्राचार्यश्च : उपाध्यायश्च-इत्याचार्योपाध्यायम्-( समाहारद्वन्द्वः,) यद्वा प्राचार्य- युक्त उपाध्याय प्राचार्योपाध्यायः (शाकपार्थिववत्-मध्यमपदलोपी समासः) प्राचार्योपाध्यायावित्यर्थः, तावन्यावुद्देशयितुमात्मनइच्छेत् । ततो...नो. कल्पते अनापृच्छयाऽऽचार्य वा यावद् गणावच्छेदकं वा इत्यादि प्रागवद् द्रष्टव्यम् । तथा न कल्पते तेपाम्-आचार्यादीनां कारणम् 'अदीपयित्वा, अनिवेद्य अन्यमाचार्योपा. ध्यायम् 'उद्देशयितुम्' आत्मनो गुरुतया व्यवस्थापयितुम् ‘कारणंदीपयित्वातु कल्पते।' एप सूत्रार्थः ।। २६॥ मूल-"गणावच्छेइए य इच्छिज्जा अन्न आयरिय उवज्झायं उद्दिसा- वित्तए, नो से कप्पइ गणावच्छेइयत्तं अनिक्विवित्ता अन्नं आयरिय उवज्झायं उदिसावित्तए, कप्पड़ से गणावच्छेइयचं निक्खिवित्ता अन्न श्राय- रिंग उवज्झायं उदिसावित्तए । नो से कप्पड़ प्रणापुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेद्यं वा अन्नं पायरिय-उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पड़ से प्रापुच्छित्ता जाव उद्दिसावित्तए । नो से कप्पति तेसि कारणं अदीवित्ता
बृहत्कल्पसूत्रम्
अन्न आयरिय-उज्झायं उद्दिसावितए, कप्पड़ से तेसि कारणं दीवित्ता
अन्न जाव उद्दिसाविचए ॥ २७॥
मूल-पायरिय उवज्झाए इच्छिज्जा अन्न आयरिय उवज्झायं उद्दि-
सावित्तए, नो से कप्पइ आयरिय उवज्झायत्त अनिक्खिवित्ता अन्न श्राय-
रिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पड़ से आयरिय उवज्झाय निक्खिवित्ता
अन्न आयरिय उपन्झायं उदिसावित्तए । णो से कप्पति अणापुच्छित्ता
पायरियं वा जाच गावच्छेइयं वा अन्न आयरिय उवज्झायं उद्दिसावि-
त्तए, कप्पति से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्न
श्रायरिय-उज्झाय उद्दिसावित्तए । ते य से वितरंति एवं से कप्पति
जाव उद्दिसावित्तए, ते य से णो बियरं ते एवं से नो कप्पड़ जाव उद्दिसा-
विचए । णो से कप्पड़ तेसि कारणं अदीवित्ता अन्न आयरिय-उवज्झाय,
उद्दिसावितए, कप्पड़ से तेसि कारणं दीविता जाव उद्दिसावित्तए ॥२८॥
टीका- अस्य सूत्रद्वयस्य व्याख्या प्राग्वत् ।। २७ ॥ २८ ॥
मूल-भिक्खू य राम्रो वा वियाले वा श्राहच्च वीसुभिज्जा, तं च
सरीरगं केइ वेयावच्च करे भिक्खू इच्छिज्जा एगते बहुफासुए पएसे परिदृ-
वित्तए, अत्थियाइत्थकई सागांरियसंतिए उवगरणजाए अचित्ते परिहरणा-
रिहे, कप्पड़ से सागारिकर्ड गहाय तं सरीरगं एगते बहुफासुए पएसे परिङ्क-
वित्ता तत्थेव उवनिक्खिवियव्वे सिया ।। २8 ।।
टीका--भिक्षुः च शब्दादाचार्योपाध्यायौ वा. रात्रौ वा विकाले वा 'पाहा
कदाचित्-विष्यग् भवेत्-जीव शरीरयोः पृथग भावमाप्नुयात्-म्रियत इत्यर्थः । तक
शरीरकं कश्चिद् वैयावृत्यकरो भिक्षरिच्छेत् 'एकान्ते' विविक्ते 'बहुप्राशुके कीटकादि-
सत्वरहिते प्रदेशे परिष्ठापयितुम् । अस्ति चार किञ्चित्सागारिक सत्कम् 'अचित्तो
निर्जीव 'परिहरणाह-परिभोगयोग्यमुपकरणजातं-वहनकाष्ठमित्यर्थः। कल्पते 'से?
तस्य भिक्षोस्तत्काष्ठं सांगारिक कृतं-सागारिकस्यैव सत्कमिदं नास्माकम् , इत्येवं
गृहीत्वा तत्-शरीरमेकान्ते बहुप्राशुके प्रदेशे परिष्ठापयितुम् ! तच परिष्टाप्य यतो
गृहीतं तत् काष्ठं तत्रैवोपनिक्षेप्तव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥ २६ ॥
४४. चतुदेशक: मूल-भिक्खू य अहिकरणं कठ्ठ तं अहिगरण अविनोसविता नी से कप्पइ गाहावइकुलं भत्ताए वा पाणाए वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा बहिया बियार भूमि वा विहार भूमि वा णिक्खमित्तए वा पविसित्तए वा गामाणुगामं वा दूइजिजलए, गणातो. वा. गणं संकमित्तए, वासावासं चा वस्थए । जत्थेव अप्पणो आयरिय उज्झायं पासेज्जा बहुम्मुर्य वभागम तस्रातिए आलोइज्जा पडिकमिज्जा निदिज्जा गरहिज्जा विउज्जा विसोहेज्जा अकरण वाए अन्मुट्ठिज्जा आहारिहं तबो कम्म पायच्छि पडिबज्जेज्जा । से य सुरण पठविए. पाइअव्वे सिया, से य सुरण नो पविए नो आइतव्ये सिया, से य सुएण. पठविज्जमाणे नो आइयई से निहियव्ये सिया ॥ ३० ॥ टीका--भिक्षुः प्रागुक्तः च शब्दादुपाध्यायादिपरिग्रहः अंधिकरणं-कलहं कृत्वा नो कल्पते तस्य तदधिकरणमव्यवशमय गृहपतिकुलं भक्ताय वा पानाय वा निष्क्रमितु' वा प्रवेष्टुं वा 'थहिर्विचारभूमौ वा विहारभूमौ दा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टवा, प्रामानुप्रामं वा द्रोतुं-विहर्तुम् । गणाद्वा गणं संक्रमितुम् । वर्षावासं वा वस्तुम्। किन्तु यत्रैवात्मन आचार्योपाध्यायं पश्येत् , कथम्भूतम् ? बहुश्रुतं छेद्ग्रन्थादिकुशलं, बह्वागमम्-अर्थतः प्रभूतागमम् । तत्र तस्थान्तिके 'आलोचयेत्' स्वापराधं वचसा प्रकटचेत् प्रतिक्रामेत्-मिथ्यादुष्कृतं तद्विषये यात्, 'निन्द्याद् आत्मसाक्षिकंजुगुप्सेत, गहेत-गुरुसाक्षिकं निन्द्यात् । इङ् च निन्दनं गर्हणं वा तात्त्विकं तदा भवति यदा तत्करणतः प्रतिनिवर्तते तत आह-यावर्तेत, तस्मादपराधपदाद् -निवर्तेत। यावृत्तावपिकृतात्पापात् तदामुच्यते यदाऽऽत्मनोविशोधिर्भवति, ततश्राह-"आत्मानं विशोधयेत् , पापमलरफेटनतो निर्मलीकुर्यात् । विशुद्धिः पुनरपुनः करणतायामुपपद्यते ततस्तामेवाऽऽह-"अकरणता-अकरणीयता तया अभ्युत्तिष्ठत् । पुनरकरणतया अभ्युत्थानेऽपि विशोधिः प्रायश्चित्तप्रतिपत्या भवति, तत आह-'यथाऽहम्' यथा- योग्यं तपः कर्म प्रायश्चित्तं प्रतिपद्येत । 'तच्च' प्रायश्चित्तमाचार्येण 'भुत्तेन श्रुतानु- सारेण यदि 'प्रस्थापित प्रदत्तं तदा 'आदातव्यं ग्राह्य स्याद् भवेत्, अथ श्रु तेन न प्रस्थापितं तदा नादातव्यं स्यात् सच श्रालोचको यदि श्रुतेन प्रस्थाप्यमानमपि तत् प्रायश्चित्तं 'ना ददाति-न प्रतिपद्यते ततः सः 'नियू हितव्यः, 'अन्यत्र शोधिंकुरुष्व' इति निषेधनीयः स्यादिति सूत्रार्थः ।। ३ ।। .
बृहत्कल्पसूत्रम् ' . , मृल-परिहार कप्पट्ठियस्स णं भिक्खुस्स-कप्पड आयरिय उवज्झाएर्ण तद्दिवस एगगिहंसि पिंडवायं दवावित्तए, तेण परं णो से कप्पइ असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा दाउ वा अणुप्पदाउ वा । कप्पइ से अन्न- परं चेयावडियं करित्तए, तंजहा-उठावणं वा, निसियावणं वा, तुपट्टा- वणं वा; उच्चार पासवण-खेल-सिंघाण विगिचणं वा विसोहणं वा करि- तए। अह पुण एवं जाणिजा-छिन्नावाएसु.पंथेसु अाउरे झिझिए: पिवासिए, सवस्सी, दुबले, किलंते मुच्छिज्ज पकडिज्ज वा एवं से कप्पइ असणं. वा ४ दाउंबा अणुप्पदाउवा ।। ३१ ॥ टीका- परिहार कल्पस्थितस्य भिक्षोः कल्पते प्राचार्योपाध्यायेन 'तदिवसम' इन्द्रमहाद्युत्सवः दिने एकस्मिन् गृहे. 'पिण्डपात', विपुलमवगांहिमादि। भक्तलाभ दापयितुम् । ततः परं से तस्य नो कल्पते अशनं वा. पानं वा, खादिम वा. स्वादिमं वा दातुमनुप्रदातुवा। तत्र दातुमेकशः, अनुप्रदातु पुनः पुनः। किन्तुः कल्पतेः 'से तस्य परिहारिकस्यान्यतरदः वैयावृत्त्यं कर्तुम् । तद्यथा--"उत्थापनं वा निषादनं वा त्वग्वपिन वा उच्चार प्रस्रवण खेल सिंङ्घानादीनां च विवेचनं वा-परिष्ठापनं 'विशोधनं वा' उच्चारादिखरण्टितोपकरणादेः प्रक्षालनं कर्तुम् । अथ पुनरेवं जानीयात्-छिन्नापातेपु, व्यवच्छिन्न गमाऽऽगमेषु पथिषु:अातुरः ग्लानः 'झिमितः बुभुक्षातः पिपासितः तृषितो न शक्नोति विवक्षितं ग्रामंप्राप्तुम् , अथवा ग्रामादावपि तिष्ठतां सः तपस्वी पष्ठाऽष्टमादिपरिहारतपः कर्मकुर्वन् दुर्वलो भवेत् , ततो भिक्षाच. र्यया क्लान्तः सन् मूछेद्वा प्रपतेद्वा एवं से-तस्य कल्पते अशनादिकं दातुमनु:- प्रदातुवा एष सूत्रार्थः ।। ३१ ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाओ पंच महएण- वाओ महानदीओ उद्दिट्ठाओ. गणियाओ.बंजियाश्रो अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तए वा संतरित्तए वा । तं जहा-गंगा, जउणा, सरऊ, कोसिया, मही ॥ ३२ ॥ टीका-नो कल्पते, न युज्यन्ते, सूत्रे एक वचननिर्देशः प्राकृतत्वात् निर्ग्रन्थानां वा वा निम्रन्थीनां वा इमाः-प्रत्यक्षासन्नाः पञ्च महार्णवा-बहूदकतया महार्णवकल्पा: महासमुद्रगामिन्सो वा महानद्यः-गुरुनिम्नगाः उद्दिष्टाः सामान्येनाऽभिहिता. यथा ४६ चतुर्देिशकः महानद्य इति गणिता यथा पञ्चेति 'व्यखिताः' व्यक्तीकृता यथा गडेंन्त्यादि 'अन्तर मध्ये मासस्य द्विकृत्वो वा विकृत्वो वा उत्तरीतं वा-बाहुजंघादिना सन्तरीतुं वा- नावादिना। तद्यथा गना, १ यमुना,२ सरयू , ३ कोशिकी,४ मही, ५ एप सूत्रार्थः॥३२॥ मूल-"अह पुणएवं जाणिजा-एरावइ कुणालाए जत्थ चकिया एगं पाय जले किच्चा एग पाय थले किच्चा एवरह कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरितए वा संतरित्तए वा जत्थ एवं नो चकिया एवण्हं नो कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरितए वा संतरिचए वा ।। ३३ ॥ टीका --अथ पुनरेवं जनीयात--ऐरावती नाम नदी कुणालाया नगर्याः समीपे जंवार्द्ध प्रमाणेनोवधेन वहति तस्यामन्यस्यां वा यत्रैवं "चकिया-शक्नुयादुत्तरीतुमिति शेषः । कथम् ? इत्याह-एक पादं जले कृत्वा, एक पादं 'स्थले' आकाशे कृत्वा 'एवण्ह इंति वाक्यालङ्कारे,यत्रोत्तरीतुं शक्नुयात् नत्र कल्पतेऽन्तर्मासस्य द्विकृत्वो वा त्रिकृत्वो घा उत्तरोतुं-लंघयितुं सन्तरीतुं वा भूयः प्रत्यागन्तुम् । यत्र पुनरेवमुत्तरीतुं न शक्नु- यात् तत्र नो कल्पतेऽन्तर्मासस्य द्विकृत्वो वा विकृत्वो बोत्तरीतुं पा सन्तरीतुवा। इति सूत्रार्थः ।। ३३ ॥ मूल-"से तणेसु वा तणपुंजेसु वा पलालेसु वा पलालपुजेसु वा अप्पंडेसु अप्पपाणेसु अप्पवीएसु अप्पहरिएसु अप्पुस्सेसु अप्पुत्तिंग पणग दगमट्टिय मक्कडगसंताणएसु अहेसवण मायाए नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उबस्सए हेमंत गिम्हासु वत्थए॥ ३४ ॥ मूल-"से तणेसु वा जाव संताणएसु उप्पिसवणमायाए कप्पइ निग्गं- थाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उवस्सए हेमंत गिम्हासु वत्थए ॥३५ ।। मूल-"से तणेसु वा जाव संताणएसु अहेरयणी मुक्कमउडेसु नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तह पगारे उवस्सए वासावासं वत्थए ॥३६।। मूल-"से तणेसु वा जाव संताणएसु उपिपरयणीमुक्कमउडेसु कप्पड़ निग्यंथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उबस्सए वासावासं वत्थए ॥३७॥ टीका--अथ तृणे वा तृणपुजेयु वा पलाले' वा पलाल पुजेषु वा अल्लारडेपु, बृहत्कल्पसूत्रम् .. अल्पप्राणेषु अल्पचीजेषु अल्पहरितेषु अल्पाऽवश्याधु-अल्पोत्तिष पनक दक मृत्तिका मर्कट सन्तानकेषुः । इहाऽण्डकानि पिपीलिकाऽऽदीनाम् । प्राणाः-द्वीन्द्रियादयः, बीजम्-अनङ्कुरितम् , तदेवाऽङ्कुरितोद्भिन्नं हरितन , अवश्यायः-स्नेहः-उत्तिङ्गः- कीटिकानगरम् , पनकः-पञ्चवर्णः साङ्कुरोऽनकुरो वा अनन्त वनस्पति विशेषः, दक- मृत्तिका-सचित्तो मिश्रो वा कर्दमः, मर्कटकः-कोलिकस्तस्य सन्तानकं जालकम् । अल्पशब्दश्चेह सर्वत्राऽभाव वचनः, ततोऽण्डरहितेषु प्राणरहितेषु इत्यादि मन्तव्यम् , अहेसवणमायाए, इति-अधः श्रवणमात्रया-श्रवणयोरधस्तात्-यत्र छादन तृणादीनि भवन्ति तथा प्रकारे उपाश्रये नो कल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा हेमन्त ग्रीमेपु वस्तुम् अष्टावृतुबद्धमासान् इत्यर्थः ।। एवं प्रतिषेध सूत्रमभिधाय प्रपञ्चितज्ञविनेयाऽनुग्रहाऽथ विधिसूत्रमाह-अथ तृणेषु वा यावदल्प सन्तानकेषु उपरिश्रवण मात्रया युक्तेषु तथाविधोपाश्रये कल्पते हेमन्त ग्रीष्मेषु वस्तुम् । एवमृतुबद्ध सूत्रद्वयं व्याख्यातम् । अथ वर्षा वास सत्रद्वयं व्याख्यायते-अथ तृणेषु वा तृणपुजेषु वा यादल्प० सन्तानकेषु "अधेरयणी मुक्क मउडेसु" इति अञ्जलिमुकुलितं वाहुद्वयमुच्छ्रितं मुकुट उच्यते सहस्तद्वय प्रमाणः । रनिभ्या-हस्ताभ्यां मुक्ताभ्याम् उच्छिताभ्यां यो निामतो मुकुटः .स रनिमुक्त मुकुटः, एतावत्प्रमाणमधस्तादुपरि च यत्राऽन्तराल ने प्राप्यते तेष्वधोरनिमुक्त मुकुटेपु तृगादिपु न कल्पते वर्षावासे वस्तुम् ॥ अथ तृणेषु वा यादल्प० सन्तानकेषु उपरि. रनि मुक्त मुकुटेषु यथोक्त प्रमाणेषु मुकुटोपरिवर्तिषु संस्तारके. निविष्टस्य साधोरर्द्ध तृतीय हस्ताद्यपान्तरालयुक्तेषु-इत्यर्थः। ईदृश्यां वसती कल्पते वर्षावासे वस्तुमिति सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ३४ ॥ ३५॥ ३६ । ३७ ।। इति कल्पसूत्रस्य सटीकस्य चतुर्थ उद्देशः समाप्तः ॥
अथ पचम उद्दशकः मूल-"देवे च इत्थिरूवं विउवित्ता निग्गथं पंडिग्गाहिज्जा तं च निग्गथे साइज्जेज्जा, मेहुण पडिसेवणप्पत्त थावज्जइ चाउम्मासियं परि- हारहाणं अणुग्घाइयं ।। १ ।। मृल-"देवी य इत्थीरूवं विउवित्ता निरगंथं पडिगाहिज्जा, तंच निगथे साइज्जेज्जा मेहुणपडिसेवणप्पत्तः श्रावज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं अणुग्घाइयं ॥२॥ मूल-'देवी य पुरिसरूवं विउव्वित्ता निग्गंथि पडिग्गाहेज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुणपडिसेवणप्पत्ता आवज्जइ चाउम्मासियं अणुग्याइयं ॥ ३॥ मूल-'देवे य पुरिसरूवं विउवित्ता निग्गथीं पडिगाहिज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जिज्जा, मेहुण पडिसेवणपत्ता पावज्जइ चाउम्मासियं अणुरघाइयं ॥ ४ ॥ टीका-देवश्च खी रूपं विकुळ निर्ग्रन्थं प्रतिगृहणीयात् , तच्च निम्रन्यो मैथुन प्रति सेवनप्राप्तो यदि स्वादयेत्-अनुमोदयेत् तत प्रापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानम् अनुद्घातिकम् ॥ १ ॥ एवं द्वितीयसूत्र-देवी स्त्रीरूपं विकुळ निर्ग्रन्थं प्रतिगृह्णीयादित्याद्यपि मन्तव्यम् ।। तृतीय सूत्रम्-देवी पुरुपस्यरूपं विकुळ निर्ग्रन्थी प्रतिगृहणीयात् , तच्च निग्रन्थी स्वादयेत् , मैथुन प्रतिसेवन प्राप्ता प्रापद्यते चातुर्मासिकमनुद्घातिक स्थान ॥३॥ .
बृहत्कल्पसूत्रम्.. ४ टीका--एवं देवः पुरुपरूपं विकु निम्रन्थीं प्रतिगृहणीयादित्यायपि चतुर्थसूत्रं घक्तव्यम् । एवं सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ४ ॥ मूल-"भिक्खू य अहिगरणं कट्ठ तं अहिगरणं अवियोसवित्ता इच्छि- ज्जा अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए, कप्पइ तस्स पंचराइंदियं छेयं कट्ट, परिनिवाविय परिनिव्यात्रिय दोच्चं पि.तमेव गणं पडिनिज्जाएअव्वे सिया, जहा वा तस्स गणस्स पत्तियं सिया ।। ५ ।। टीका--भिनुः-च शब्दादाचार्य उपाध्यायों वाऽधिकरणं कृत्वा तदद्धिकरण- मव्यवशमय्य इच्छेद् अन्य गणमुपसम्पद्य वितुम् । ततः कल्पते 'तस्य अन्यगण- मुंघसंक्रान्तस्य पञ्चरात्रिन्दिवं छेदं कर्तुम् । ततः परिनिर्वाप्य परिनिर्वाप्य-कोमल वचः संलिलसेकेन कपाषाग्नि सन्तप्त सर्वतः शीतलीकृत्यः द्वितीयमपिवारं तमेवगणं स प्रतिनियतिव्यः, नेतव्यः स्यात् । यथा वा तस्य गणस्य प्रीतिकं स्यात् तथा कर्तव्यम् ।। एप सूत्रार्थः ।। ५ ।। मूल-"भिक्खू य उग्गय वित्तीए अणथमिय संकप्पे संथडिए निवि- तिगिच्छे असणं वा ४ पंडिग्गाहित्ता आहारं आहारेमाणे अहपच्छा जा- णिज्जा-अणुग्गए सरिए अत्यमिए वा, से जं च मुहे जं च पाणिसि जं च पडिग्गहे तं विगिचमाणे वा विसोहेमाणे वा नो अइक्कमइ, तं अप्पणा भुजमाणे अण्णेसि वा दलमाणे राइभोयण पडिसेवणप्पत्त प्रानज्जइ चाउम्मासिगं परिहारहाणं अणुग्धाइयं ॥ ६॥ (१) मूल-"भिक्खू य उग्गय वित्तीए, अणथमिय संकप्पे संथडिए, विति- गिच्छासमावन्ने असणं वा ४ पडिग्गाहित्ता. आहारं आहारमाणे जाव अन्नेसि वा दलमाणे राइभोयण पडिसेवणप्पत्ते श्रावज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्धाइयं ।। ७ ।। (२) मूल-"भिक्खू यः उग्गयवित्तीए अणथमियसंकप्पे असंथडिए निधि- तिगिच्छे असणं वा ४ पडिगाहित्ताः आहारं आहारेमाणे जाव अन्नेसिवा दलमाणे राइभोयण पडिसेमणप्पत्त श्रावज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाण अगुवाइयं ॥ ६॥ (३) .
पंचमोदेशका . . मूल-"भिवख य उग्गयवित्तीए अणथमियसंकष्ये असंथहिर घि- इगिच्छासमावन्ने असणं वा ४ पडिगाहिता आहारमाहारेमाणे जात्र अन्नेसिं गा दलमाणे राइभोयगण पडिलेवणप्पचे श्रावनइ चाउम्मासि परिहारहाणं अणुग्धाइयं ।। ३ ।। (४) टीका-भिक्षुः पूर्वहितः, चशब्दादाचार्य उपाध्यायश्च परिगृह्यते, उद्गंत अादि. त्ये वृत्तिः-जीवनोपायो यस्य. स उद्गतवृत्तिकः, पाठान्तरं वा-उग्गयमुत्तीए त्ति, मूर्तिः शरीरम् , उद्गते रसौ प्रतिभयावग्रहाद बहिः प्रचारवती मूर्तिरस्य इति उद्गतमूर्तिकः-मध्यमपदलोपी समासः । अनातमिते सूर्ये सङ्कल्पो-भोजनाभिलापो यस्य सोऽनस्तमित सङ्कल्पः । संस्तृतो नाम-समर्थम्तदिवसं पर्याप्त भोजी वा । नि- व्यितिगिछे इति विचिकित्सा चित्तविप्लुतिः-सन्देह इत्येकोऽर्थः, सा निर्गता यस्मात् स निर्विचिकित्सः-उदितोऽनस्तमितो वा. रविरित्येवं निश्चयवान् इत्यर्थः । एवंविध विशेषणयुक्तोऽशनं चा पानं वा खादिमं वा स्वादिमं वा प्रतिगृह्य आहारम् श्राहरन्। भुञ्जानोऽथ पश्चादेवं जानीयात्-अनुद्गतः सूर्योऽस्तमितो वा । एवं विज्ञाय 'से' तस्य यच्च मुखे प्रतिक्षिप्तं यच्च पाणावुत्पाटितं यच्च प्रतिग्रहे स्थितं तद् विविञ्चन् वा (विविचन् वा) परिष्टापयन् 'विशोधयन् वा निरवयवं कुर्वन् 'नो' नैव भगवतामाज्ञा मतिकामति । तद् अशनादिकम् अात्मना भुञ्जानोऽन्येपां वा दानो रात्रिभोजन- प्रतिसेवन प्राप्त आपद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकम् ॥ ६॥ १॥ एवमपरमपि सूत्र त्रयं मन्तव्यम् । नवरं द्वितीय सूत्रे-संस्तृतो-विचिकित्सा- समापन्नश्च यो भुक्ते । विचिकित्सा-समापन्नो नाम 'किमुदितोऽनुदितो वा रविः ? अथवा-अस्तमितोऽनस्तमितो वा ?, इति सन्देहदोलायमानमानसः । एवं भुञ्जा- नस्य अन्येषां वा वानस्य चतुर्गुरुकम् ॥ ७ ॥२॥ तृतीय सूत्रे 'असंथडिय' इति 'असंस्तृतः' अध्यप्रतिपन्नः क्षपको ग्लानो वा भण्यते, स निर्विचिकित्सः, नियमादनुद्गतोऽस्तमितो वा रविः इत्येवं निस्सन्देहं जानानो ? (जानन् ) यदि भुक्ते तदपि चतुर्गुरुकम् । शेपं प्रथम सूत्रवत् ॥ ८॥ ३ ॥ चतुर्थ सूत्रे-असंस्तृतो विचिंकित्सासमापन्नश्च यो भुक्ते स पापद्यते चातु- औसिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकम् ।। एप सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ६॥ ४ ॥ मूल-"इह खलु निगंथस्स वा निग्गंथीए वा राम्रो वा चियाले वा बृहत्कल्पसूत्रमः .. तं. सपाणे सभोयणे उग्गाले आगच्छेजा, तं. विगिंचमाणे वा विसोहेमाणे वा नो अकमइ । तं उग्गिलित्ता पचोगिलमाणे राइभोयण पडि सेवणप्पचे आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अनुवाइयं ।। १० ।। टीका--इह, अस्मिन् मौनीन्द्र प्रवचनें ग्रामादौ वा वर्टमानस्य 'खलुः, वाक्या. लकारे निर्ग्रन्थस्य या नियन्या वा रात्रौ वा. विकाले वा सहपानेन सपानः सह भोजनेन सभोजन उद्गार श्रामच्छेन् । किमुक्त भवंति ? सिक्थ विरहितमेकं पानीयमुद्गारेण सहा गच्छति, कूर सिक्थं वा केवलमागच्छति, कदाचिदुभयंका। तमुद्गारं विविञ्चन् चा सकृत्परित्यजन् 'विशोधयन् वा बहुशः परित्यजन् नो श्राज्ञामतिकामति' तमुद्गीर्य 'प्रत्यबगिज़न्' भूयोऽम्यास्वादयन् श्रापद्यते चातुर्मा- सिकं परिहारस्थानमनुघातिक्रमः । एप सूत्राऽर्थ. ।। १० ।।. मूल-"निग्गंथस्स य गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए. अणु-पविट्ठस्स अंतोपडिग्गहंसि पाणाणि वा बीयाणि वा रए वा परियावज्जेजा, तं च संचाएइ विगिचित्तए वा विसोहित्तए वा, पुवामे... लाइया विसोहिया तो संजतामेव भुजेज्ज वा पिएज्ज वा । तं च नो संचाएइ विगिचित्तर वा विसोहित्तए वा तं नो अप्पणा भुजेजा नों अन्नेसि दावए एगते बहु- फासुए परसे पडिलेहिता पमजित्ता परिद्ववियव्ये सिया ॥ ११ ॥ टीका--निर्ग्रन्थस्य गृहपतिकुलं पिण्डातप्रतिज्ञयाः अनुप्रविष्टस्याऽन्तः प्रतिग्रहे प्राणा वा बीजानि वा रजोवा परि-समन्तादापतेयुः। तच्च प्राणादिक यदिशक्नोति विवक्तं वा विशोधयितुवा ततः-'तत्प्राणादिजातादिकं लात्वा-हस्तेन गृहीत्वा विशोध्य २-सर्वथैवापनीय ततः संयत प्रयत्नर एव भुञ्जीत वा पिवेदाः। तकन शक्नोति विवेक्तुं वा विशोधयितुवा तन्नात्मना भुञ्जीत, नवाऽन्येषां दद्यात्, एकान्ते वहुप्राशुके प्रदेशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य परिष्ठापयितव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥१९॥ मूल-"निग्गंथस्स य गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविट्ठस्स अंतोपडिग्गहगंसि दए वा दगरएवा दगफुसिए वा परियावज्जेज्जा, से य उसिगे भोयणजाते भोचव्वे सिया, से य. सीए भोयरणजाते तं नो अप्परता भुजेझा, नो अन्लेसिं दावए, एगते बहुफासुए पदेसे परिदृवेयन्त्र सिया॥१२॥ किन्तु पंचगोद्देशक: + .. टीका -निर्ग्रन्थस्य गृहपतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञयाप्रविष्टस्यान्तःप्रतिग्रहे भक्त. पानमध्ये 'दुकं वा' प्रभूताप्कायरूपं टुकरजो वा, उदकविन्दुः ‘दकस्पर्शितं वा, उदकशीकराः पर्यापतेयुः। तचोष्णं भोजनजातं ततो भोक्तव्यंस्यात् । अथ शीतं तद् भोजनजातं ततस्तन्नात्मना भुञ्जीत, नान्येपांदयात, एकान्ते बहुप्राशुके प्रदेश परिष्ठापयितव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥ १२ ॥ मूल-निग्गंथीए राम्रो वा चियाले वा उच्चारं वा पासवणं वा विगिच माणीए वा विसोहमाणीए वा अन्नयरे पसुजाइए वा पक्खिजाइए वा अन्नयरं इंदियजायं परामुसेज्जा, तंच निग्गंथी साइज्जेज्जा, हत्थकम्म पडिसेवणप्पत्ता भावज्जइ मासियं अणुग्धाइयं ॥ १३ ॥ मूल-निग्गयीओ रात्री बा बियाले वा उच्चारं वा पासवणं वा विगिंचमाणीए वा विसोहेमाणीए वा भन्नयरे पसुजाइए वा पक्खिजाइ- ए वा अन्नयरंसि सोयसि ओगाहिज्जा, तंच निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुण- पडिसेवणप्पत्ता यज्जइ चाउमासियं अणुग्याइयं ॥ १४ ॥ टीका-निर्मथ्या रात्री चा विकाले वा उच्चारं वा प्रलवणं वा विविचिन्त्या वा विशोधयन्त्या वा अन्यतरः पशुजातीयो वा वानरादिकः पक्षिजातीयो वा, मयूरादि- कोऽन्यतरदिन्द्रिय जातं 'परामृशेत् ,स्पृशेत् , सा च निर्ग्रन्थी तं च स्पर्श स्वादयेत्- सुन्दरोऽस्य स्पर्श इत्यनुमन्येत, हस्तकर्म प्रतिसेवन प्राप्ता आपद्यते मासिकमनुद्- घातिक स्थानम् । इह निर्ग्रन्थीनां परिहारतपों न भवतीतिः कृत्वा परिहारट्ठारणं इतिपदं न पठनीयम् ॥ एवं द्वितीयसूत्रमपि व्याख्येयम् । नवरम्-स्रोतसि-योन्यादौ वानरादिरवगाहेत । साच मैथुन प्रतिसेवनप्राप्ता यदि स्वादयेत् ततम्चतुर्गुरुकमिति सूत्रार्थः ॥ १३ ॥१४॥ मूल-नो कप्पई निग्गंथीए एगाणियाए गाहावइकुलं पिंडवाय पडि- याए निक्खभिलए वा पविसित्तए चा, बहिया बियार भूमि वा बिहारभूमि वा निक्वमित्तर वा पविसित्तए वा एवं गामाणुगाम वा दुइज्जित्तए वासा- यासंवा वत्थए ।। १५ ।। टीका-नो कल्पते निग्रन्या एकांकिन्या गृहपतिकुल पिण्ड्यात प्रतिज्ञया निष्क्र.
बृहत्कल्पसूत्रम् ५३ मितुवा प्रवेष्टुवा वहिर्विचारभूमौ वा विहारभूमौ:चा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवा प्रामानुपाम वा. द्रोतु-विहर्तुम् वर्षावासं वा वस्तुमिति सूत्राऽर्थः ॥ १५ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए अचेलियाए हु (हो) तए ॥ १६॥ टीका-नो कल्पते निन्थिया अचेलिकाया चस्तरहिताया भवितुमिति एषसूत्रार्थः।१६। मूल-नो कप्पइ निग्गंधीए अपाइयाए हुतए ।। १७ । टीका-नो कल्यतें निम्रन्थ्या अपात्रायाः-पात्र रहिताया भवितुमिति सूत्रार्थः ।१७। मूल-नो कप्पड़ निग्गंथीए चोसट्टकाइयाए हुतए ॥ १८ ॥ टीका-नो कल्पते निम्रन्थया व्युत्सृष्टकायिकायाः-परित्यक्तदेहाया भवितुमिति सूत्रार्थः ।। १८ ॥ मूल- नोकप्पइ निग्गंथीए चहिया गामस्स वा जाव सन्निवेसस्स वा उदं चाहायोपगिझिय पगिझिय सूराभिमुहीए एगपाइयाए ठिच्चा आयावणाए आयावित्तए । कप्पइ से उवस्सयस्स अंतोवगडाए संघाडिपडिवद्धाए पलं- विय वाहियाए समतल पाइयाए ठिच्चा आयावरणाए. अायावित्तए ॥१६॥ टीका-नो कल्पते निग्रन्थ्या बहिमस्य वा यावत्संनिवेशस्य वा ऊर्द्ध वम्- ऊर्द्ध वाऽभिमुखौ बाहू प्रगृह्य-प्रगृह्य प्रकर्षण गृहीत्वा-कृत्वेत्यर्थः । सूर्याभिमुख्या एक पादिकायाः, एकंपादमुर्द्ध वं कृत्वाऽऽकुच्य च अपरमेकं पादं भुविकृतवत्या एवंविधायाः स्थित्वाऽऽतापनयाऽऽतापयितुम् । किन्तु कल्पते से-तस्या उपाश्रयस्याऽन्तर्वगडायां ( सवाटी प्रतिबद्धायाः) प्रलम्बित वाहायाः समतल पादिकायाः स्थित्वा आताप- नया आतापयितुमिति सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए ठाणाइयाए हुतए ॥ २० ॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीए पडिमट्ठाइयाए हुतए ॥ २१ ॥ मूल-"एवं ने सजियाए ॥ २२ ॥ उक्कुडुगासणियाए ॥२३।। वीरा- सणियाए ॥२४॥ दंडासणियाए ||२लगंडसाइयाए ॥२६॥ ओमंथि- याए ॥२७॥ उत्ताणियाए॥२८॥ अंवस्तुज्जियाए॥२६॥ एगपासियाए।३० टोका-नो कल्पते-निर्ग्रन्थ्याः स्थानायताया भवितुम् ॥ २०॥ एवं प्रतिमास्था. यिन्याः । नेपछिकायाः। उत्कटिकासनिकायाः । वीरासनिकायाः। दण्डासनिकायाः। .
पंचमोद्देशक: लगण्डशायिन्याः। अवाङ मुखायाः। उत्तांनिकायाः । आम्रकुन्जिकायाः । एक- पार्श्वशायिन्याः ॥ इति सूत्राक्षरार्थः ॥२१-२२-२३-२४-२५-२६-२७-२८-२६-३०॥ मूल-"नो कप्पड निरगंथीणं आकुञ्चणपट्टगं धारित्तए वा परिहरि- त्तए वा ! कप्पइ निग्गंथाणं प्राङचणपट्टगंधारित्तए वा परिहरित्तए वा।३१ टीका-"नो कल्पते निग्रन्थीनाम् आकुञ्चनपट्ट-पर्यस्तिकापट्ट धारयितुवा परि- हर्तुं वा । कल्पते निर्ग्रन्थानामाकुञ्चनपट्ट धारयितु वा. परिहत वेति सूत्रार्थः ॥३१॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीणं साबस्सयंसि आसणंसि आसइत्तए वा तुयट्टित्तर चा । कप्पइ निग्गंथाणं सावस्सयंसि पासणंसि आसइत्तए वा तुयट्टित्तएवा ॥३२॥ टीका--सावश्रयं नाम-यस्य पृष्ठतोऽवष्टम्भो भवति, एवंविधे आसने निम्रन्थीनां नोकल्पते प्रासितुवा वरवर्तितु वा । कल्पते निर्ग्रन्थानां सावश्रये आसने श्रासितुवा स्वग्वर्तितुवा । निग्रन्थ्यस्तु ताशे आसने यदि उपविशन्ति शेरते वा तदा त एव गर्वादयो दोपाश्चतुगुरुच प्रायश्चित्तम् । द्वितीयपदेऽल्पसागारिके स्थविरा ग्लाना वा उपविशेयुः । निम्रन्थानामपि न कल्पते । यदि उपविशन्ति तदाचतुर्लधु । सूत्रंतु कार- -णिकम् । तदेव कारणमाह--"सावस्सए इत्यादि पश्चार्द्धम् । यो वृद्धाचार्यः सः 'पूर्वकृते' गृहस्थैः स्वार्थ सम्पादिते सावश्रयेऽप्यासने उपविष्टः 'असागारिके एकान्ते वाचयेत् विनेयानां वाचनां दद्यात् ।। ३२ ॥ : मूल-"नो कप्पड निग्गंथीणं सविसाणंसि पीढंसि वा फलगंसि वा श्रासइत्तए वा तुयट्टित्तए वा । कप्पइ निग्गंथाणं सविसाणंसि पीसि वा फलगंसि वा आसइत्तए वा तुयट्टित्तए वा ॥३३ ।। टीका--सविपाणं नाम-यथा कपाटस्योभयतः शृङ्ग भवतः एवं यत्र भिसिकादौ पीठे फलके वा विषाणं शृङ्ग भवति तत्र निर्ग्रन्थीनामासितु वा शयितु वान कलते । निम्रन्थानां तु कल्पते । निर्ग्रन्थास्तु सविपाणे पीठे फलके वा यापविशन्ति शेरते वा तदा चर्तुगुरु आज्ञादयश्च दोपाः ।। ३३ ।। मूल-नो कम्पइ निग्गंथीणं संवेटयं लाउयं धारित्तए वा परिहरित्तए चा। कप्पइ निग्गंथाणं सर्वेटयं लाउयं धारित्तए वा परिहरित्तए वा ॥३४॥ टीका-अस्य व्याख्या सुगमा । नवरम्-'संवेंटियं नालयुक्तमलावुकं तन्निग्रन्थीनां न कल्पते । निम्रन्यानान्तु कल्पते ।। ३४ ॥ .
बृहत्कल्पसूत्रम् ५५ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं सवेंटियं पायकेसरियं धारित्तए वा परिहरि- तए वा । कप्पइ निगंथाणं सर्वटियं (टया) पादकेसरियं (रया) धारित्तए वा परिहरित्तए वा ।। ३५ ॥ टीका-नो कल्पते निग्रन्थीनां सवृन्तिका पादकेसरिका' धारयितुवा परिहतुवा । कल्पते निर्ग्रन्थानां सवृन्तिका पादकेसरिका. धारयितुं वा परिहतु वा ॥ ३५ । मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं दारुदंडयं पायपुछणं धारित्तए वा परि- हरित्तए वा । कप्पइ निग्गंथाणं दारुदंडयं जाव परिहरित्तए वा ॥ ३६ । टीका--यत्र दारुमयस्य दण्डस्याग्रभागे ऊणिका दशिका वध्यन्ते. तद् दारुद- एडकं पादप्रोञ्छनमुच्यते । तद् निर्ग्रन्थीनां न कल्पते । निर्ग्रन्थानां तु कल्पते ।। ३६ ।। मूल-नो कप्पड निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अन्नमन्नस्स मोयं प्राइ- यत्तए वा आइमित्तए वा नन्नत्थ गाढाऽगाढेसु रोगायंकेसु ॥ ३७॥ टीका-नो कल्पते निग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा अन्योन्यस्य-परस्परस्य मोकमा-. पातु वा आचमितुवा । किं सर्वथैव ? न, इत्याह-गाढाः-अहि-विप-विसूचिका- दयः अगाढाश्च, ज्वरादयो रोगातङ्कास्तेभ्योऽन्यत्र व कल्पते, तेषु तु कल्पते, इत्यर्थः । एप सूत्रार्थः ॥ ३७॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासियस्स आहार- स्स.जाव तयप्पमाण मित्तमवि भूइप्पमाण मित्तमवि बिंदुप्पमाण मित्तमवि आहारं आहारित्तए, नन्नत्थ आगाढेसु रोगायकेसु ॥ ३८ ॥ टीका--तो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा परिवासितस्य, रजन्यां स्था- पितस्याहारस्य मध्यात् त्वक प्रमाणमात्रमपि भूति प्रमाणमात्रमपि बिन्दु प्रमाण मात्रमपि यावदाहारमाहर्तुम् । इह त्वक् प्रमाणमात्रं नाम-तिलतुषत्रिभागमात्रम् तच्चाशनस्य घटते, भूति ( भस्म) प्रमाणमात्रं सक्तुकादीनां नेयम् । बिन्दु प्रमाण मात्रं पानकस्य । इदमेवाऽपवदति-आगाढेभ्यो रोगाऽऽतथे पोऽन्यत्र न कल्पते । तेषु पुनः कल्पत इति सूत्रार्थः ॥ ३८ ॥ १ पादकेसरियाणाम उहरयं चीरं । मसईएचीराणं दारुएवज्झति । इति चूर्णिः । २ यत्राभिनवसङ्कटमुखे मलावुनि हस्तो न माति तस्यालाखुनोगदउच्चत्वं तरप्रमाणो दण्डः क्रियते, तस्यांना : भागे बदाया प्रत्युपेञ्चणिका सा पादकेसरिका सन्न्ता भण्यते । वृ० टी० ५६ पंचमोहेशकः मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासिएणं आलेवण जाएणं (गायाई) आलिंपित्तए वा विलिंपित्तए वा नन्नत्थ आगाडेहि रोगा- यंकेहिं ।। ३६ ।। टीका--नो कल्पते निग्रन्यानां वा निर्यन्थीनां वा परिवासितेनाऽऽलेपनजातेन 'श्रालेपयितु' चा ईपल्लेपयितुवा, विलेपयितुवा-विशेपेण लेपयितुचा नाऽन्य- प्राऽऽगाढेभ्यो रोगाऽऽतकेभ्य इति सूत्रार्थः ॥ ३६॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासिएणं तेल्लेण वा घएण वा नवणीएण वा वसाए वा गायं अभंगित्तए वा मक्खित्तए वा नन्नत्थ गाढागाडेहि रोगायंकेहिं ।। ४० ॥ टीका--नो कल्पते परिवासितेन तैलेन वा घृतेन वा नवनीतेन वा वसया वा गात्रम् 'अभ्यङ्गितुवा, बहुकेन तैलादिना, म्रक्षितु वा-ग्वल्पेन तैलादिना, नान्यत्र गाढाउंगाढेभ्यो रोगातकेभ्यः तान् मुक्त्वा न कल्पते । दोषाश्चात्र त एव सञ्चयायो मन्तव्याः॥४०॥ मूल-"परिहार कप्पट्ठिए भिक्खू बहिया थेराण चेयावडियाए गच्छे- ज्जा, से य ाहच्च अइकमज्जा, तं च थेरा जाणेज्जा, अप्पणो आग- मेणं अन्नेसि वा अंतिए सोमोचा तो पच्छा तस्स अहालहुस्सए नाम बवहारे पट्टवियव्वे सिया ॥ ४१ ।। टीका-परिहार कल्पस्थितो भिक्षुः वहिः अन्यत्र नगरादौ स्थविराणान , श्राचार्याणामादेशेन वैयावृत्य(त्या)थं गच्छेत् , किमुक्तं भवति ? अन्यस्मिन् गच्छे केपां- चिदाचार्याणां वादी-नास्तिकांदिक उपस्थितः, तेषां च नास्ति वादलब्धिसम्पन्नः, ततस्ते येषामाचार्याणां स परिहारिकस्तेषामंन्तिके संघाटकं प्रेषयन्ति, सचं संघाटको व्रते-वादिनं कमपि मुत्कलयत । एवमुक्ते ते-आचार्याः परिहारिक परवादि निग्रह- क्षमं मत्वा तत्र प्रेषयन्ति। ततस्तदादेशादसौ परिहार तपो वहमान एव तत्र गच्छेत् । इदंच महत्प्रवचनस्य-वैयावृत्यं यद् अग्लान्या परंवादि निग्रहणम् । ततस्तदर्थं गतः स पारिहारिंकः पाहच्च; कदाचित् अतिक्रामेत् , पाद्धावनादिकं प्रतिसेवेत, तच्च प्रतिसेवनं 'स्थविराः मौलाचार्या आत्मनः आगमेन' अवध्याचतिशयज्ञानेन , .
वृहत्कल्पसूत्रैम अन्येषां वाऽन्तिके श्रुत्वा जानीयुः ? ततःपश्चात् तत्परिज्ञानाऽन्तरं तस्य पारिहारि- कस्य 'यथालघुस्वको नाम, स्तोक प्रायश्चित्तरूपो व्यवहारः प्रस्थापयितव्यः स्यादिति सूत्रार्थः ॥ ४१ ॥ मूल-"निग्गंथीए य गाहावइकुलं पिंडवायपडियाए अगुप्पविहाए अन्नयरे पुलागभत्ते पडिग्गाहिए सिया, सां य संथरिंज्जा, कप्पइ से तदि- वसं तेणेष भत्तठेणं पज्जोसवित्तए, नो से कप्पइ दोच्चपि गाहावइकुलं पिंडयाय पडियाए पविसित्तए, सा य नो संथरेज्जा, एवं से कप्पइ दोच्चं पि गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए पविसिचए ॥ ४२ ॥ टीका--निर्यन्ध्या गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञयाऽनुप्रविष्टया 'अन्यतरद्' धान्य गन्ध-रसपुलाकानां-वल्ल विकट दुग्धादिरूपाणामेकतरं पुलाकभक्त प्रतिगृहीतं स्यात्, साच तेनैव भुक्तेन 'संस्तरेत्' दुर्भिक्षाद्यभावात् -निर्वहेत् , ततः कल्पते तस्यास्तदिवसे 'संक' तेनैव भक्तार्थेन 'पर्युषितुम' निर्वाहयितुम् । नो से-तस्याः कल्पते द्वितीयमपिवारं गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रवेष्टुम् । अथ सानसंस्तरेत् , ततः कल्पते तस्या द्वितीयमपि वारं गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रवेष्टु मिति सूत्रार्थः ।। ४२ ॥ "इति बृहत्कल्पसूत्रस्य पञ्चमोद्देशकः समाप्तः معه टीका--कप्पस्स-कल्प:-साधुसमाचारः, तस्य सम्बन्धिनः तद्विशुद्धिकारणत्वात् प्रस्ताराः-प्रायश्चित्तरचना विशेषाः षड्विधाः प्रज्ञा अथ षष्ठ उदेशकः भूल-"नो कप्पड निरगंथाण वा निगंथीण वा इमाई छ अवयणाई वइत्तए, तं जहा-अलियदयणे १ हीलियबयणे २ खिसियवयणे ३ फस- चयणे ४ गारत्थियवयणे ५ 'विउसवियं वा पुणो उदीरित्तए ॥ १ ॥ टोका--पञ्चमोद्देशकस्यादिसूत्रं उक्त प--"देवःः लोरूपं कृत्वा साधु भोग- निमन्त्रयेत् सच तान् भुक्त वा गुरुसकाशमागत आलोचयेत-दिव्य गैः "छन्द्रितः निमन्त्रितोऽहं परं मया ते भोगा नेप्सिताः 'इति एवं गौरवेण कश्चिदलीकं वदेत् । अत इदं पप्ठोद्देशकस्यादिसूत्रमारभ्यते । अनेन सम्बन्धेनायातस्यास्य व्याख्या- 'नोकप्प०? इति वचनव्यत्ययात्--नो कल्पन्ते. निर्ग्रन्थानां निर्यन्धीनां वा इमानि प्रत्यक्षाऽऽसन्नानि पडिति-पटसंख्याकानि अवचनानि-नत्रः कुत्सार्थत्वात् अप्रशस्तानि वचनानि वदितु-भाषितुम् । तद्यथा-अलीकवचनं १ हीलितवचनं २ खिसिनवच- नं ३ परुपवचनं ४ आगारिणो (आगारंस्थिताः)गृहिण:-तेपांवचनं ५ व्यवशर्मितं वा, उपशमितमधिकरणं पुनर्भूयोऽप्युदीरयितुन कल्पते इतिप्रक्रमः । अनेन व्यवशमितस्य पुनरुदीरणवचनं नाम पष्ठमवचनमुक्तम् इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १ ॥ मूल-"कप्पस्स छ पत्थारा पन्नत्ता, तं जहा-'पाणाइवायस्स वायं वयमाणे १ मुसाबायस्स वायं वयमाणे २ अदिन्नादाणस्स वायं वयमाणे ३ अविरइय वायं क्यमाणे ४ अपुरिस वायं वयमाणे ५ दासवायं वयमाणे ६ इच्चेते कप्पस्स छ पत्थारे पत्थरेत्ता सम्म अप्पडिपूरेमाणे तवाणपचे सिया।। २॥ - १-विमओसवियं आ० भा० । २-मविरक्ष्या मा०भा०। 12 बृहत्कल्पसूत्रम् पातस्य वादं वाती चाचं वा वदति साधौं प्रायश्चित्तप्रस्तारो भवतीत्येकः ।। १ ।। मुपा०-एवं मृषावादस्य वादं वदति द्वितीयः ।। २।। अंदि०-अदत्तादानस्य वार्द चदति तृतीयः ॥ ३. ॥ अवि:- श्रविरनियते यद्वा न विद्यते विरतिरस्याः सा अवि. रतिका स्त्री सेचारूपं तद्वादं वदति चतुर्थः ॥४॥ अपु०-अपुरुषः-नपुंसकः तद्वाद चति पञ्चमः ।। ५ ।। दास-दासंवाद वदति षष्ठः ॥ ६॥ इच्चेते-इतीति उपदर्शने-एवं प्रकारान् एतान् पट कल्पस्य पत्थः प्रस्तारान् । प्रायश्चित्तरचनाविशेषान् मासगुर्वा- दयः पारश्चिकपर्यन्ताः (तान ). पत्थरे-प्रस्तीर्य । अभ्युपगमनम् ( अभ्युपगम्य ) आत्मनि प्रस्तुतान् विधाय प्रस्तारथिता वा अभ्याख्यान दाता साधुः सम्यगप्रतिपूर- यन् , अभ्याख्येयार्थ त्यासद्भूततया अभ्याख्यान समर्थनकर्तुमशक्नुवन् । तस्यैव प्राणातिपातादिकर्तुग्चि स्थान प्राप्तः तत् स्थान प्राप्तः स्यात् , प्राणातिपातादिकारीच दण्डनीयो भवेत् इति भावः । अथवा प्रस्तारान् प्रस्तीर्य विरचय प्राचार्येण अभ्याख्यान दाता अप्रतिपूर्यन् अपराऽपर प्रत्ययवचनस्तमर्थ सत्यमकुर्वन् 'तहाण- तत्स्थान प्राप्तः कर्तव्य इति शेपः । यत्र प्रायश्चित्तपदे विवमानोऽवतिष्ठते-न पदान्तर- मारभ्यते तत्पदं प्रापणीय इतिभावः। एप सूत्रार्थः ।। २।। मूल-"निग्गंथस्स य अहेपार्यसि खाणू वा कंटए वा हीरे वा सको वा परियावज्जेज्जा, तं च निग्गथे नो संचाएज्जा नीहरित्तए वा विसोहेशए वा, तं च निग्गंथी नीहरमाणी वा विसोहेमाणी वा णाइक्कमइ ।। ३ ।। मूल-"निग्गंथस्स य अच्छिसि पाणे वा बीए वा रए वा परियावज्जे- ज्जा, तं च निग्गंथो नो संचाएंज्जा' नीहरिशए वा विसोहेचए चा, तं. निग्गंथी नीहरमाणी वा विसोहेमाणी वा णाइक्कमइ ।। ४ ।। मूल-"निग्गंथीए य अहेपायंसि खाणू वा कंटए वा हीरे वा सक्करे वा परियावज्जेज्जा, तं च निग्गंथी नों संचाएज्जा नीहरितए वा विसो- हित्तए वा, तं च निगंथे नीहरमाणे वा विसोहेमाणे वा माइक्कमइ ।।५।। मल-"निग्गंथीए य अच्छिसिपाणे वा बीए वा रए वा परियावज्जे- ज्जा तं च निगंथी नो संचाएंइ नीहरित्तए वा विसोहिलाए वा तं च निग्गंथे नीहरमाणे वा विसोहेमाणे वा णाइक्कमइ ।। ६ ।। -टाविरति:-अनम, यहान विद्यते विरतिरस्मा सा मविरतिका ती आ भी। २-संवाए इ. लि. ३ - हीरए भा० भा।
पष्टोद्देशक -- अस्य सूत्र चतुष्टयस्य व्याख्या- टीका--निगा--निर्ग्रन्थस्य अधः पादे-पादतले स्थाणुर्चा कण्टको या होगे वा काचविशेपो चा शर्करा वा पर्यापतेत्-अनुप्रविशेत , "तंच नि-तच कराटकादिक निम्रन्थो न शह यातनीह वा-निष्काशयितुं वा विसोः-विशोधयितुं वा-निश्शेष- मपोतुम्"तंच नि-तच निर्ग्रन्थी निहरन्ती वा विशोधयन्ती वा नातिकामति आशा- मिति गम्यते, इति प्रथम सूत्रम् ॥ ३ ॥ टीका--निर्ग-निर्ग्रन्यस्य 'अच्छि' अदिण-लोचने प्राणाबा मशकादयः सूक्ष्माः 'वीए'-- वीजानि वा सूक्ष्माणि श्यामाकादीनि 'रएवा' रजो वा-सचित्तमचित्तं वा पृथ्वीरजः, 'परित-पर्यापतेत्-प्रविशेन्, तज्ञ प्राणादिकं निन्थो न शक्नुयात. नीहत मित्यादिनाग्वत् ॥ ४॥ दीका--(तृतीय चतुर्थ सूत्रे निम्रन्थी विपये एवमेव व्याख्यात्तव्ये ) इति सूत्र चतुष्टयार्थः ।। ५॥ ६ ॥ सुल-निग्गथे निग्गंथीं दुग्गंसि वा विसमंसि वा पव्वयंसि वा 'पक्ख- लमाणिवा पबडमाणि वा गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा माइक्कमइ १७. दीका--अस्य सूत्रन्नयस्य व्याख्या--- निम्रन्यो निन्थी दुर्गे वा विपमें वा पर्वते बा, त्रिविध च भवति दुर्ग तद्यथा-वृक्षदुर्ग श्वापददुर्ग, मनुषपदुर्ग च । गुवृक्षरतीवगहनतया दुर्गमम् यत्र वा पथि वृक्षः पतितस्तवृक्षदुर्गम् । यत्रध्यान- सिंहादीनांभयं तत्-श्वापदुर्गम् । पत्रम्लेच्छबोधिकादीनां मनुष्याणां भयं तद्- मनुष्यदुर्गम् । एतेषु त्रिवपि दुर्गेयु यदि निष्कारणे निग्रन्थी गृह्णाति अवतन्वते वा तदाचतुर्गुरु । त्रिविधञ्चभत्रति विषमम्-भूमिविपमम, श्वापद विषमम्, मनुष्यविषम- च । भूमिवियमं नाम गर्तापापाणाद्याकुलो भूभागः, श्वापद्मनुष्यविपमें तु बापदमनुष्यदुर्गवाये । अत्र भूमिविपमेणाधिकारः, पव० पर्वतपदं अतीतत्वात् न व्याख्यातम् 'पक्खलमाण'-प्रकर्षण स्खलन गत्यागच्छन्ती भूमौ असम्प्राप्तां वा पतन्ती पतितुकामामित्यर्थः । पद०--प्रकर्पण भूमौ सयैरपिगात्रैः पतन्ती, 'गिरह-बाहादायङ्ग गृहह्मन् वा, अवलम्बमानो वा बाहादौगृहीत्वा ६-याबुलमानि आय मा.
वृहत्कल्पसूत्रम् ६१ धारयन् अथवा गृहान् सर्वाङ्गीणां धारयन् , अवलम्बमानो देशतः करेण गृह्णन्- सायन् इत्यर्थः-नातिकामति स्वाचारमाज्ञां वा इति प्रथम स्त्रम् ।। ७ ।। मूल-"निग्गथे निग्गंथीं सेयंसि वा पंकं सिवा पणगंसि वा उदयंसि चा ओकसमाणिं या अोवुज्झमाणिं वा गिरोहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाकक्षमई |॥ ८॥ टीका- व्याख्या पूर्ववत्-'नवरम्-सेयं-सेको नाम पङ्कपनके वा सजजे यत्र निमज्ज्यते तन्न वा, पंक-पङ्कः कर्दमः, तत्र वा, पनको नाम आगन्तुकः प्रतनुद्वरूपः कदम एवं तन्न धा, उदकं-प्रतीतम् , तत्र वा, उकसमा०-अपकसन्तीं वा पङ्कपनकयोः परिहसन्हीं अोबुझ-अपोह्यमानांवा, सेकेन-उद्केन वा नीयमानां गृहणन् वा अष- लम्बमानो वा नातिकामति ॥ ८॥ भूल-"निग्गंथे निग्गंथिं नाव 'आरोहमाणिं वा उरोहमाणिं वा गि- रहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ।। ६ ।। टीका--तृतीय त्रे निर्ग्रन्थीमेव नावम् पारोह०-आरोहन्तीम् (प्रारूढमानाम् ) उरो अवरोहन्तीम्-नाव्युत्तरमाणाम , गिरह-गृह्णन् वा अवलम्बमानो वा नाति- कामति, इति सूत्रार्थः ॥ ६ ॥ . मूल-"खित्तचित्रं निग्गथिं निग्गंथे गिण्हमाणे वा अक्लबमाणे वा नाइक्कमड़ ॥ १०॥ दीका--खित्तचित्तं ति-क्षिप्तं-नष्टं रागभयाऽपमानै श्चित्तं यस्याः सा क्षिप्तचित्ता, ताम् निम्रन्थीं वा निम्रन्थोगृहणानो वा अवलम्बमानो वा नातिक्रामत्याज्ञामिति सूत्रार्थः ॥ १० ॥ मूल-"दित्तचित्तं निग्गथि निग्गंथे गिरोहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ ११ ॥ टीका--दित्त०-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , 'नवरम्'-दीप्तचित्ता-लाभादिनदेन पर.. वशीभूतहृदया ताम् ।। ११ ॥ । ५-परिहासन्ती मा० भा० । २-गाइभमाणि वा औरुभगापि वा मा० मा ।
पप्रारंशक: mA - मृल-"जस्खाइट्ठ निग्गंथि निग्गंथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा लावक्रमइ ॥ १२॥ टीका--जक्खा०-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम्-यक्षाविष्टाम्-यक्षो देवता- पूर्वसंस्तुतादिः । तेनाधिष्ठिताम', इति ॥ १२ ॥ मूल-उम्मा यपत्रं निग्गंथि निग्गये गिराह नाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ।। १३ ।। उत्सग्गपत्रं निगथि निग्गंथे गिराहमागे चा अवलंब- माणे वा नाइक्क्रमइ ॥ १४ ॥ टोका--अस्य सूत्रद्वयस्य व्याख्या प्राग्यत् । नवरम्-उन्माप्राप्ताम् ॥ १३ ॥ उवसग्ग-उपसर्गप्राप्ताम् ।। १४ ॥ मूल-"साहिगरणं निग्गंथि निग्गंथे गिण्हमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमड् ॥ १५ ॥ टीका-साहि०-अस्य व्याख्या प्राग्वत्, अंत्र भाष्यम्-उप्पन्ने इति संयत्या गृहस्थे- नसममधिकरणे उत्पन्ने द्विविधमतिक्रमं दृष्ट्वा तस्याधिकरणस्य व्यवशमनं कर्तव्यम् किमुक्त भवति ? स गृहस्थोऽनुपशान्तः सन् तस्याः संयत्याः संयमभेदं जीवितभेदं चेति द्विविधमतिक्रमं कुर्यात् , तदुपशमयितव्यमधिकरणम् । कथमित्याह-यस्तस्याः संयत्याः प्रतिपक्षो गृहस्थः तस्य प्रथमतः कोमलवचनैरनुशासनं कर्तव्यम् । तथा- प्यतिष्ठति भीपणं-भापणं कर्तव्यम , तथाप्यभिभवतो निरु भणं यस्य या लब्धि- स्तेन तया निवारणं कर्तव्यम् ।। १५ । मूल-"सपायच्छिवं निग्गंथि निग्गंथे गिण्हमाणे चा अवलंबमाणे वा माइक्कमइ ।।१६।।.. टीका--सपाय-अस्य व्याख्या प्राग्वत, नवरम्-सा सप्रायश्चित्ता तत्प्रथमतायां प्रथमतः प्रायश्चित्ते दीयमाने भयेन-कथमहमेतत्प्रायश्चित्तं वक्ष्यामि ? इत्येवं रूपेण विषण्णा भवेत् , यदि वा प्रायश्चित्तं वहन्ती तपसा क्लान्ता भवेत् , तत्रेयं यतना- पायच्छित्ते दिएणे, भीताए विसजणं किलंताए । अणुसद्धिं वहतीए, भएण: खित्ताइतेइच्छं ।। प्रायश्चित्ते दत्ते यदि विभेति ततस्तस्या भीतायाः क्लान्तायाश्च विसर्जन, प्रायश्चित्त नुत्कलं क्रियत इत्यर्थः ॥ अथ वहन्ती क्लाम्यति ततस्तस्या वहन्त्या अनुशिष्टिीयते यथा मा भैपीः बहुगतं स्तोकं निधति; यदि वा वयं साहा.
बृहत्कल्पसूत्रम् . व्यं करिष्याम इति । अथैवमनुशास्य माणाऽपि भयेन क्षिप्तचित्ता भवति ततस्तम्या: चैकित्स्य-चिकित्सायाः कर्म कर्तव्यम् ॥ १६ ॥ मृल-"भत्तपाण पडियाइक्खियं निग्गंथि निग्गथे गिरोहमाणे वा अच- लंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ १७ ॥ टोका--भत्नपाण-'अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम् भक्त च पानं च भक्तपाने ते प्रत्याख्याते यत्रा सा तथोक्ता । क्तान्तस्य परनिपातः सुखादिदर्शनात् ॥ १७ ॥ मूल-"अट्ठजायं निग्गंथि निग्गंथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा णाइक्क्रमई ॥ १८ ॥ टीका--'अट्ठजा-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । साम्प्रतम् अर्थज़ातशब्द व्युत्पत्ति- प्रतिपादनार्थमाह--अट्ठरणत्ति-अर्थेन-अथितया संजातं कार्य यया । यद्वा अर्थेन- द्रव्येण जातम् उत्पन्न कार्य यस्याः सा अर्थजाता गमकत्वादेवमपि समासः । उपल- क्षणमेतत् , तेनेवमपि व्युत्पत्तिः कर्त्तव्या-'अर्थः प्रयोजनं जातोऽस्या इति अर्थजाता । कथं पुनरस्या अवलंबनं क्रियते ? इत्याह तां पुनः प्रथमव्युत्पत्तिसूचितां संयम भावात् चाल्यमानाम् द्वितीय तृतीय व्युत्पत्तिपक्षे तु द्रव्याऽभावेन प्रयोजनाs निष्पत्या वा सीदन्ती समवलंवेत-साहाय्यकरणेन सम्यग् धारयेत्, उपलक्षणत्वाद् गृह गीयादपि ॥ १ ॥ मूल-"छ कप्पस्स पलिमंथू पएणत्ता तंज्जहा कुकुइए संजमस्स पलि- मंथू १ मोहरिए सच्चबयणस्स पलिमंथू २ तितिणीए एसणागोयरस्स पलिमंथ३ चक्खूलोलुए इरियावहियाए पलिमंथ४ इच्छालोभए मुत्तिमग्गस्स पलिमंथू ५ भिजा. नियाणकरणे मोक्खमग्गस्स पलिमंथू ६ सव्वत्थ भगवया अणि- याणया पसत्था ।। १ ।। टीका--छकप्यस्त ०- पडिति पटसंख्या काप-कल्पस्य-कल्पाध्ययनोक्त साधुसमा- . चारस्य परिः-सर्वतो मथ्नन्ति विलोडयन्ति ( इति) परिमन्यवः, उणादित्वान- 'उ' प्रत्ययः । पाठान्तरेण परिमन्था वा व्याघातकाः इत्यर्थः । प्रज्ञप्तास्तीर्थकरादिभिः प्रणीताः, तद्यथा कुकु-कुचणअवस्यन्दने इतिवचनात् कुत्सितम्-अप्रत्युपेक्षि- . अजायम्मि आ० भा० । २ भुजो मार भा।
पाटोदेशका तत्वादिना, कुचितम् अवस्यन्दितं यस्य स कुकुचितः स एव प्रज्ञादिदर्शनात म्याधिकारण प्रत्यये कौकुचितः, कुकुचा वा अवस्यन्दितं प्रयोजनमस्येति कौकुचिकः, ससंयमस्य पृथिव्यादिर क्षणरूपन्य परिमंथो व्याघातकारी ॥१मोहरी-मुलं-प्रभूत भापणाति- शायिवदनमस्यास्तीति, मुखरः स एव मोखरिको बहुभाषी । बिनवादेराकृतिगणत्या. दिकन् प्रत्ययः । यद्वा मुखेन अरिमावहतीति व्युत्यच्या निपातनान्मोखरिकाः, सत्यवचनस्य मृपावाद विरतेः परिमन्थुः । मौखर्व सक्ति मृपावाद सम्भवात् ॥ २ ॥ चक्खु-चक्षुपा लोलःचञ्चलो यद्वा चक्षुः लोलंयस्य स चक्षुलोलः सन् स्तूप देवकुलादीनि विलोकमानो ब्रजति, ईर्यागमनम्-तस्याः पन्थाः ईपिथः तत्रभवा या समितिः सा ऐपिथिकी-ईयर्यासमितिः, तस्याः परिमन्थुर्भवति ।। ३ ।। तितिणि-तिन्तिनीकः- अाहाराद्यभावे खेदात् , यत्किञ्चनाभिधायी, स एपणा-उद्गमादिदोपविमुक्त- भक्तपानादिगवेपणारूपा तत्प्रधानो यो गोचरः गौरिव मध्यस्थतया भिक्षार्थचरणं स एपणागोचरः, तस्य परिमन्युः, सखेदो हि अनेषणीयमपि गृहणाति इतिमावः ॥४॥ इच्छालोभ-इच्छा अभिलापः संचासौ लोभश्च इच्छालोभः महालोमः-इत्यर्थः, यथा निद्रा निद्रा महानिद्रा इति, सचइच्छालोभः-अधिकोपकरणादि मेलन लक्षणः मुक्ति मार्गस्य-मुक्ति-नि:परिग्रहत्वम्, अलोभतेत्यर्थः, सैव निवृत्तिपुरस्य मार्ग इच मार्गः, तस्य परिमन्युः ॥ ५॥ भिज्जत्ति मा लोभः तेन यत् निदान करणं देवेन्द्र चक्रवादिविभूति प्रार्थनम् , तन्मोक्षमार्गस्य सम्यग्दर्शनादिरूपस्य परिमन्थुः । आर्तध्यान चतुर्थभेदरूपत्वात् । भिजाग्रहणेन यत् अलोभस्य भव निर्वेदमार्गानुसा- रितादि प्रार्थनं तन्न मोक्षमार्गस्य परिमन्थुरित्यावेदितं प्रतिपत्तव्यम् ॥६॥ ननुत्तीर्थ- करत्वादि प्रार्थनम्, न राज्यादिप्रार्थनवत्-दुष्टम , अतस्तद्विपयं निदानं मोक्षस्य परि- मन्थुर्नभविष्यति ? नैवत्र, यताह-"सव्वत्थ०-इत्यादि । सर्वत्र तीर्थ करत्व-चरमदे- हत्यादि विपयेऽपि” आस्तां राज्यादौ । अनिदानता-अप्रार्थनमेव भगवता-समग्रेश्चर्या. दिमताश्रीमन्महावीरस्वामिना 'पसत्थेत्ति' प्रशंसिता-श्लाघिता, एष सूत्रार्थः ॥ १६ ।। मूल-छबिहाकप्पट्टिईपन्नता, तंजहा-सामाझ्यसंजयकप्पट्टिई १, छेओ- वडावणिय संजयकापट्टिई २, निविसमाणकापट्टिई. ३, णिविट्ठकाइये कप्पडिई ४, जिणकप्पट्टिई ५, थेरकप्पढिई ६, तिमि ॥२०॥ सिरि कप्ये बडोद्देसको समत्तो।
सृहत्कल्पसूत्रमः " टीका छबिहा कप्प०,-पड्विधा-पटप्रकारा कल्पे कल्पशास्त्रोक्त साधुसमाचा- रेस्थितिरवस्थानं कल्पस्थितिः, कल्पस्य वा स्थितिः-मर्यादा-कल्पस्थितिः प्रज्ञप्ता- तीर्थकरगणधरैः प्ररूपिता । तद्यथा-इति उपन्यासार्थः । सामा०-'सामायिक संयत कल्पस्थितिः समो-राग द्वापरहितः, तस्य श्रायः-लाभो ज्ञानादीनां प्राप्तिरित्यर्थः, समाय एवं सामायिक सर्वसावद्ययोगविरतिरूपं, तत्प्रधानाः ये संयता:-साधवः, तेषांकल्पस्थितिः सामायिक संयत कल्पस्थितिः। १। छेदो० तद्यथा-पूर्वपर्यायच्छेदेन उपस्थापनीयमारोपणीयं यत् तत्-छेदोपस्थापनीयम् ,व्यक्तितो महाव्रतारोपणमित्यर्थः, तत्प्रधाना ये संयताः, तेषां कल्पस्थितिः, छेदोपस्थानीय संयतकल्पस्थितिः । २ । निवि---निर्विशमानाः-परिहार विशुद्धि कल्पं वहमानाः तेषां कल्पस्थितिः निर्वि- शमान कल्पस्थितिः ॥३॥.. . - णिवि०-निर्विष्टकायिका नाम-यः परिहार विशुद्धिकं तपो व्यूढम्, निर्विष्टः आसेवितो विवक्षित चारित्रलक्षणःकायोयस्ते निर्विष्टकायिका इति व्युत्पत्तेः, तेपां कल्पस्थितिः, निर्विष्टकायिक कल्पस्थितिः ॥४॥ जिणक०-जिनाः-गच्छनिर्गता:- साधुधिशेपाः, तेषां कल्पस्थितिः-जिनकल्लस्थितिः ।। ५॥ थेरक०-स्थविरा-श्राचा- यदियो गच्छातिवद्धाम्तेषां कल्पस्थितिः स्थविरकल्पस्थितिः ॥ ६॥ इति-अध्ययन परिसमाप्तौ । ब्रवीमीति-तीर्थकर गणधरोपदेशेन सकलमपि प्रस्तुत शास्त्रोक्त फल्पा- ऽकल्पविधि भणामि न पुनः स्वमनीषिकया इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। २० ।। इति बृहत्कल्पसूत्रस्य पष्ठ उद्देशकः समाप्तः ।। १.रागादिदोषरहितः।
* श्री बृहत्कल्पसूत्रस्य परिशिष्टानि
---: परिशिष्टानुक्रमणिका
-शन्द कोषः
-पाठ भेदः
१--प्रथमं परिशिष्टम्-
२--द्वितीयं परिशिष्टम्-
३-तृतीयं परिशिष्टम्-
४-चतुर्थं परिशिष्टम्-
५---पंचमं परिशिष्टम् -
-प्रति परिचयः
-विशेष शब्द सूची-
-टिप्पणम्
प्रथमं परिशिष्टम् श्रीवृहत्कल्पसूत्रस्य-उद्देशकानुसारी अकारादिवर्ण क्रमेण शब्दार्थनिर्देशः . य उद्देश- सूत्र- १-३ '.. शब्द- अमिएणे अंसि अंसि अबाहिरियंसि अंतो. अंतो भिक्खायरिया अंतोवसमाणीणं अभिणिवगड़ाए अभिगिदुवाराए अभिणिक्खमणपवेसाए ११ ११ ११. अर्थ- विधि से न काटे गए, माम का प्राधा, चौथाई भाग जो ग्राम आदि से बाहर न हो भीतर भीतर गोचरी करना भीतर में वसती हुई अनेक-श्रावरणःचाले अनेक द्वारवाले निकलने व प्रवेशकरने के. दरवाजावाले दूकान के भीतर उपाश्रय के भीतर खुले द्वारवाले भीतर में लीपा हुआ भोजन चित्ररहित (गृह) शरवातरसे ग्रहण न किया गया गृहपत्ति की थोड़ी वस्तु सहित कलह .. विना उपशमन किए १३ अंतरापर्णसि अंतोकिच्चा १४:१५.. अंवगुयदुबारिए १६-१७ अंतोलित्तयं १६ असनं अचित्तकाम्मे -४ अारिणरसाए २६. अप्पसागारिए अंहिगरगां अवियोसवित्ता or ७२ शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- २ ३५ अस्थि १ आत्मा से (स्वयं) आदर के लिए खड़ा होवे उल्लंघन करता हुआ १ गुरु प्रायश्चित्त १ ३६ प्रवेश किए हुए १ श्रनुज्ञा लेकर M or ४६ ५१ १-४ ४ २ ११-१२ आप्पणा अमुना श्रइकममाणे अणुग्घाई अणुप्पविट्ठ अणुएणवित्ता प्रद्धारण गमरणं अप्प विइयस्स अप्प तइयस्स अंग अंतोवगड़ाए प्रहालंदमवि अभावगासियंसि अवसेसे अनीहरं असंसट्ठ अपडिग्गदिया अनिज्जूढ़ाओ अविभत्ताओ अव्योच्छिन्नाओ अध्योगढ़ायो अंसियाओ अपाडिहारिए अहिट्टित्तए अणेगराइए अपरिभुत्ने १३ २ १४-१५ १७-१८ मार्ग में जाना आत्मा ही है दूसरा आत्मा ही है तीसरा चम्पा नगरी से सम्बन्धित देश दरवाजे के भीतर का भाग थोड़ाकाल भी मध्य की खुली जगहों में बाकी बचे गृहों में नहीं लेगए, नहीं निकाले गए न मिला हुआ नहीं ली हुयी वस्तु नहीं ढंकी हुई पृथक नहीं की हुई. निश्चित न की हुई विशेष रीति से प्रकट न की गई अंशिका (हिस्से की चीज़) अप्रातिहारिक बैठक में काम लेना कई राते (रात्रियों) उपयोग में न लाए हुए १६ १६ १६ -१६ २२-२३ प्रथम परिशिष्टम ७१.. उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- पीछे लौटाकर न देने योग्य जो समस्त रूप नहीं हो छाखण्ड अप्पडिहारिए श्रकसिणाई अभिषणाई १२ अणुप्पविट्ठाए १४ अहापडिग्गहिपहिं १६,१७,१८ आहाराइंणियाए भीतर गयी हुई लिए हुए वस्त्रों के अनुसार 'गुणों की अपेक्षा छोटे बड़े के क्रम से १६, २० २० अंतरगिहंसि अठिचा अपडिइट टु अविकरणं २२ घर के भीतर (नहीं ठहर कर) विना खड़ेरहे पीछे पहुँच ये बिना.. यथा स्थान रखना या विखरे-- को समेटना विना आज्ञा लिए खोजने योग्य खोजा जाता हुआ यथालंद काल प्रमाण, तीन- २४ २४. श्रगुण्णवित्ता अणुगवेसियव्ये अणुग़वेस्समाणे अहालंद- २४ प्रकार का २५ अवरे अगरपरिग्गदिए अव्यावडेसु २७ दूसरे देवों से गृहीत ले जाना लाना आदि व्या- पारों से रहित भाग के अनुसार नहीं वांटे हुए दूसरों से ग्रहण नहीं किए. उसके लिए (तदर्थ) आज्ञा लेनी चाहिए भीत के समीपवर्ती प्रदेश में. २७ अव्योगडेसु अपरपरिग्गहिए अट्टाए अणुण्णवेयने अणुकुसु २७ २६.
शर्मनकापः उद्देश- सूत्र- - ३ श्रणुचरियासु अर्थ- नगर गृह और नगर कोट के- मध्य का मार्ग. ३ अणुभित्तिसु अगुफरिहासु अणुपंथेसु अणुमेरासु अन्नमन्नं ४ २ परिखा-खाई के समीप मार्ग के समीप प्रामनगर की सीमा के समीप परस्पर तत्काल. व्रत में नही रखने योग्य पर धर्म वाले का तीव्रतर क्रोध जिसका शान्त ४ अणवठ्ठप्पा ४ ३. अन्नधम्मियाणं अविओसवियपाहुडे ४ ४ ४ १३. अविणियः अमूढ़े अदुठे अविनीत जो मूढ़ न हो गुरुजनों के प्रति द्वष नहीं-- ४ १३ करने वाला अवुग्गाहिए ४ .१४ ४ १६ ४० ४ उलटमार्ग पर न ले जाया गया हो यहा प्रायश्चित ... दूसरों को देवे श्रात्मा से स्वयं आधा योजन की मर्यादा से निर्जीव महाव्रतों में नहीं लाए गए नहीं लेने योग्य-सदोप आहार पीछे देने के लिए आचलक आदि दश प्रकारके साधु 2. श्रणुग्बाइयं अगुप्पएज्जा अप्पणा श्रद्धजोयणमेराए अचित्ते अगुवटावियए अणेसणिज्जे अणुप्पदा अकप्पडियारणं १८ ४ १८ १८. १८ १६ प्रथमं परिशिष्टम् उद्देश- सूत्र- शब्द- - २०, २२ ४ २४-२८ २८ .. ४ अवकम्म अरणं ( अन्नं) अनिक्खिवित्ता अदीवित्ता अकरण्याएं अंतोमासस्स अप्पंडेसु अप्पधीएम अप्पुस्सेसु अप्पहरिएसु अप्पपाणेसु अप्पुत्तिंगपणगद्गमट्टिय ३४ 20 ३४ अर्थ- थाहर निकलकर दूसरे बिना त्याग. विना समझाए नहीं करने के लिए मास.के भीतर अल्प अंडा वाले अल्प वीज वाले अल्प अोल वाले (तुषारयुक) अल्प हरित वाले. अल्प प्राणिवाले अल्म कीटक नगरा पांच वर्ण- का पनक आदि शमन करके या शान्त. करके बाद (तदनन्तर) सूर्य के उदय न होने पर सूर्य के अस्त होने पर दूसरों को उल्लंघन करता है सूर्य के रहते भोजनकी इच्छा रखने वाले अथवा पर्याप्त आहार नहीं मिलने से पुनः भोजन की इच्छा वाले परिग्रह के भीतर वख रहित पात्रों से रहित साध्वी अबिओसवित्ता ग्रह co अगुग्गए प्रथमिए अन्नेसिं. अइक्कम अणत्यमियसंकप्पे ११ १६ अंतोपडिग्गहसि अचेलियाए अपाहयाए शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- - - शब्द- अंयजियाए ५ ५ ३७ ५ ४० अर्थ- श्राम्रकुग्जिका नाम श्रासन मे एक दूसरे का शरीर में मालिश करना समीप में प्रायश्चित्त विशेष (पाद धावन श्रादि कर्म से) उल्लंघन करे ५ अन्नमन्त्रस्त अभंगित्तए अंतिए अहालहुस्सए अइक्कमेन्जा ४१ ४१ ४१ ५ ५ ४२ कोई एक ६ अन्नयरे अवयणाई अलिय वयणे अविरइय अपुरिसवाय अदिनाहाण अपडिपूरेमाणे अच्छिसि अहेपायंसि अवलंबमाणे न वोलने योग्य वचन मिथ्या वचन अविरति-स्त्रीसेवा के बाद नपंसक के समान बोलना किसी के दिए विना लेना सत्य न करता हुआ. . ur २ ur ४ श्रांख में ६ : ७-८-६ पैर के नीचे पकड़ता हुआ (आधार देता हुआ) किसी कार्य के वशीभूत किसी भी फल की चाह नहीं करना १८ अंटुजायं अणियाणताः १३ (आ) श्रामे १ आगरंसि आसमंसि. कच्चे श्राकर अर्थात् खान में आश्रम अर्थात् साधुओं के मठ में प्रथम परिशिष्टम् or अर्थ- दूकान के घर में आदर करे पालन करना प्राप्त करता है। आना पार्यक्षेत्र पथिकों के आने के गृह में सन्देश (उपहार) कहने को लेकर श्रा कदाचित्-लाकर पूछकर प्राचार्य को प्राचार्य और उपाध्याय को अपने अपराध को वचन से प्रकट करे यथा योग्य-अपराध के अनुकूल लेता है 104 उद्देश- सूत्र- १३ श्रावणगिर्हसि पाढ़ाएज्जा ३५ आराहणा ३८ आवज्जई. प्रागमणं ५१ आरिए खेते ११ प्रागमण गिर्हसि १७. पाडिया २० श्राइक्खित्तए २२ प्रायाए २५ प्रागच्छिज्जा १६ २३-२७ आपुच्छित्ता २३ आयरियं २७ पायरिय उवमायं ३० बालोइजा श्राहारिह ३० आइयइ ३० आइतव्ये. ४ ३. पाउरे आहारं श्राहारगाणे १९ आयावणाए ५ श्रायावित्तए श्राकुंचण पट्टगं ५ श्रास इत्तए पासणंसि पाहच्च ग्रहण करने योग्य बीमार पड़ा ७ चतुर्विध भोजन भोजन करते हुए आतापना से अातापना लेने को वन विशेष ३१ वैठने को प्रासन १९ शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- ५ ३७ ५ ५. ३७ ३७ ५ अर्थ- पीने को पाचमन को पचर श्रादि रोगों का श्रातक भय चतुर्विध श्राहार के लेप के साधनों से श्रालेपन करने को अवधि श्रादि अतिशयज्ञान से चढ़ती हुई आइयत्तए श्राइमित्तए श्रागादेस आर्यकेतु श्राहारस्स श्रालेवण जाएण श्रालिंपित्तए आगमेणं पारोहमागि ५ ५ ३९ ४१ ६ ६ (६) १ एक इक्क इत्थी सागारिए २७ इच्छाए इमाई ३ २४ः स्त्री गृहस्वामिनी घाले अपनी इच्छा से ये-आगे कहे जाने वाले यहां-इसमें यहां चाहे-इच्छा करे ३ १८ इत्य २० २६ इच्छा करें ये इच्छेन्जा इच्छिज्जा हमाओ इरावद इत्थील इञ्चेते इंदियजायं इरियाबहियाएं ऋच्छाजोलट १ नदी विशेष (इरावती) स्त्री स्वरूप को ऐसे, ये, इतने इन्द्रिय विशेष को जाने आन रूप-समिति के इच्छा से लालची १३ ६ १६ प्रथा परिशिष्टम (उ) उद्दश- सूत्र- शब्द- अर्थ- .. .. ११ उपत्थए. १ ३६ १४ उपस्सए १६. उच्चारं ३५ उपसमियञ्च उवसमेज्जा. उचस्लम जवसमसार उग्गह उपनिर्मतेज्जा उत्तरेणं ५१ उस्संपति उक्खित्ताणि उक्वित्ताई उवगरणजाए उट्टिए २४ उरिगए उम्गहणंतगं १० उगह पट्टगं १२ उवझाए घसने को उपाश्रय में मलोत्सर्ग उपशान्त करने योग्य उपशान्त हो उपशान्त होता है उपशम ही सार रूप है अपने उपयोग में लेने को लेने आदि की प्रार्थना करे उत्तर दिशा में बढ़ते हों, वृद्धिंगत हों फेंके हुए छींटे गए, फेंके गए उपकरणजात-भण्डोपकरण आदि ऊंट के रोमसे बने हुए ऊनों से बने हुए गुह्य देशको ढकने वाला वन अवग्रहानन्तक को ढकने वाला उपाध्याय श्रवग्रहके-लिए हुए उपाश्रय आदि के निवास करके स्वीकार करता निवास से स्वीकार करने योग्य निवास पूर्वक बिताते हुए महाव्रतों में लाने योग्य ta ૨૪ २ ३ । २५ उज्गहस्स ३: ३० ३. उघाइपाइ उवाइणाबित्तए स्वातिणतं . उचट्टावित्तए उत्रपजिता. ... .- प्राप्त करके शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- S ४ २१ २६ CC ४ ४ ३१. 'ठाना ४ ३२ ४ ३५ ६ ५ ६ ५ १० उगगाले १० ५ १२ गर्म हुए उवायत्तं उपाध्याय पदको उदिसावित्तए दूसरे प्राचार्य श्रादि को उद्देश करना ध्वनिक्खिवियो रखने योग्य उद्धावणं उत्तरित्तए तैर कर परतीर जाने को उदिट्टाओ सामान्यतया कही गयी उपिसवण अपर कर्ण प्रदेश तक ऊंचाई उपिरयणी मु० मुट्ठी बांधकर ऊपर उठाएहाथ वाले उपाश्रयमें उग्गय वित्तीए सूर्योदय के बाद ही जीविका करने वाले उग्गय मुत्तीए सूर्योदयके याद उपाश्रयके बाहर दिखनेवाले नाए हुऐ पदार्थ पीछे महमें लाना एग्गिलित्ता पीछे कण्ठ के नीचे उतार कर उसिणे ऊपर उक्कुडुगासणियाए उकडू आसन विशेष से वैठने वाली उत्ताणियाए पीठ के आधार से सोना उदीरित्तए पुनः उद्दीपित करने को उद्गसि जलमें उरोहमाणी नीचे उतरती हुई उम्मायपत्तं उन्माद-चित्त विकार में पड़ी अवसंरगपत्तं बाधा विशेष को पाई हुई (ए) एग एक एगदुवाराए एक द्वारवाले पगनिक्खमणापवेसाए " भीतर आने जाने के एक मार्ग पाले पगत्तो अकेलेपन से १६ ५ २८ w . ur our .९ w १३ or ६ १ १ १० प्रथमं परिशिष्टम - उद्देश- सूत्र- एगणं अर्थ- एक के सिवाय ४४ ४६ एक जाने को एत्तए एगाणियत्स एगाणियाए एत्तोबाहिं अकेले का अकेली का इनसे बाहर ५१ एताव एत्तए एगरायं एगरायात्रों २ इतने जाने को एक रात पर्यन्त एक रात से अधिक एक रात के लिए एकज्ञात-सूत्र विशेष ७ ४ एगराहए • . एक व्याकरण 0 0 0 २० २६ एगणाएग एगवागरणेरण एग गाहाए एग सिलोएण एगते एवरह एंगगिर्हसि एराव एगपाइयाए एगपासियाए ४ ४ ३० ३१ ३३ १६ एक गाथा एक श्लोक एकान्त देश में इस प्रकार एक घर में : इरावती नाम की नदी. एक पैर पर एक पार्श्व-बाजू से उद्गम आदि दोप रहित भक्त पान की गवेपणा (ओ) बांधो गयी .. गाढ़े लीपे गए-पोते गए ऊन के बने लेकर ३० १६ एसणा १४. श्रोहारिय पोलित्ताणि श्रोएिणए. ओगिरिहत्ताएं ३०
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प्रथम परिशिष्टम् ८१. उद्देश- सूत्र शब्द- करमाणे ४ ४ कीवे १९ कप्पट्टिय १६ कडे किच्चा अर्थ- करता हुआ नपुंसक अचेलक्य आदि कल्पों में स्थित ४ किया हुआ. occ करके 67 कप्पत्स ६ कुकुइए . or ५ १६ खेडसि खेलं खाइम * : खु खेते खीरे खिसिय कल्प साधु समाचार का कौकुचिक पृथ्वी काय की रक्षा नहीं करने वाला (ख) छोटे गांव में • कफ को चार आहारों में एक उपदर्शक क अव्यय प्रदेश में दृध खिसला कर कहा गया स्थाणु-ठूठ राग, भय, अपमान से विक्षिप्त हुई (ग) गांव में गृहस्वामी गृहस्वामी के परिवार का जाने के लिए MAM खाणू खित्तचित्तं थ १ ३३ गामंसि गाहावई गाहावंइ कुलस्स गंतु गमणं गमणागमणं गहाय गमणं एत्तएं जाना ३७. ३६ जाना आना लेकर मार्ग गमन प्राप्त करने को ४७
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प्रथम परिशिष्टम् ६३ उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- मडिमत्तयं घड़े के रूप में मिट्टी का पान ४६ घट्टा घिसे गए-चिकने किए घएण घृत से (च) चत्तारि चार चउक्कासि जहां चार मार्ग मिले हों १२ चचरंसि चेज चिलमिलियागंसि ‘चत्र की चिलमिलिका चिट्टित्तए ठहरने को ३६-३७ चरित्तए करने को १२. चत्वर-चौक or १ ४०. पुनः, और उपहार रूप में पहुँचाए गए कूटी हुई त्वचाओं से बना चमड़े-सृगचर्म आदि ३. चेइए २५ चिएए. ३-१५ चम्माई १२ चेलं १२. चेल? चउहि चउगाह २७ चिट्ठह ३३. चक्किया चक्खूलोलए चन को चन के लिए WWWW चारों से चार गाथाएं ठहरता है करस सके अखि से चंचल (छ) छेद में जहां लोगों का गमनागमन नहीं है ऐसाबाई छेद को म की संख्याएं ४ छोए छिन्नावाएसु छेयं ६४ शवकोप: w उद्देश- सूत्र- अर्थ- १६ छव्यिहाँ छ: प्रकार के छेउयट्ठावणिय कप्पट्टिइ-छेदोपस्थापनीय कल्पस्थिति २० ५१ जत्थ १ जावा १ जहां उसकी अवधि लेकर जय-धान्यविशेष धान्यभेद जो ज्योति-दीपक. जाङ्गमिक त्रस प्राणीके अवयवोस वनामा जाने बुढापे से थके जिस दिन में ६ २ १६ १६ जवानि जव जवानि ने जोई जंगिए जाणिज्जा जराजुएणे: जविर्स जोयणं जाउंगा जले जं जक्खाइट्ठ जिण क.प्पट्टिइ, नागरित्तए ३ ३ . ३१ एक योजन २२ ४ ६ १२ ६ ६ ६. यमुना जलमें जिसको यक्षों से प्राविष्ट जिनकल्पस्थिति जागते रहने को क) ध्यान चिन्तन करने को सुधा से पीड़ित हुआ (3) रखकर ३ झारा माइत्तए झिझिए ३१ ४० ठवित्ता ठाणे श्रानुत्त पर :
प्रथम परिशिष्य .. उद्देश- सूत्र-- ठाइत्तए शब्द:- १६ ठिया ठिबा ठापाइयाए. ५ अर्थ- बैठने को स्थिर रहने वाले ठहर कर श्रासन विशेष (त) साल वृक्ष का फल: : जहां तीन मार्ग मिले हो इसलिए . ताल पलबे ३५. तिकसि सम्हा तेणं परं उससे बाहर १ . ५१ १ १२ ताप तिलानि तिरीडपट्टी तन्नीसाए तप्पढ़मयाए तिहिं तघरसी: तदिवसं. १३ १३. १६ २५ तात्काल, तावत् अवधि 'तिल तिरीट वृक्ष की त्वचा से बना पत्र उनके नेसराय में. घही प्रथमवार हो तीनों तपस्या करने वाले. उस दिन में ही घहां तीन गिने हुए जैसे कि चोरी करता हुआ उन आचार्य उपाध्यायों को तप रूप क्रिया को त्वग्वपिन-सुलाना तीनधार तस्थ तो ४ तंजहा ४ ४ २६. ३१ तेएणकरेंमाणे तेसिं तयोकम्म तुंयट्टापणं तिक्खुत्तो तिरिण तणेसु ३२ ३२. ४ ४ . तणों के ऊपर ८६ शब्दकोपः m अर्थ- १४ उद्देश- मूत्र- तहप्पगारे ३२ तुचद्वित्तए ३२ तयापमाणमित्त तेल्लेण ५ उसके समान सोने को तिल तुष मात्र भी तेल से ५ ५ ५. ४१ तरस उसका, उसको ४१ तोपच्छा उसके पीछे ५ ४२ उसे ही तेणेव तहाणपसे २ ६ ६ हिंसाकारी के समान बना हुश्रा उसको तं C ( 2 ) or थूणा विसयाओ स्थूण देश से स्थविर-वृद्ध ४ છેર १६ ३३ धेरे थंडिजे थले धेराण थेरकप्पट्टि थाह्य प्रदेश स्थल में ४ ५ ४१ गच्छ स्थित रत्नाधिक वृद्ध साधु के स्थविर कल्पस्थिति २० ६ १६ १ १ द्रोणमुख अर्थात् जल थल दो मार्ग घाला जलाशय के किनारे दक्षिण दिशा में ५१ श्रद्धा-सम्यक्तत्व २ ७ दोणमुहंसि. दगतीरंसि दक्खिणेणं दसण दुरायं दिपेजा दहि दो दुहओ दो राते २ जलाए दही- दो संख्या दोनों की १३ प्रथम परिशिष्टम् . अर्थ- - देखें देता है २ ४ ४ दुष्ट पारश्चिक देते हुए ४ - ४ उद्देश- भूत्र शब्द- ૨. २१ देजा देह दुढे रंपिाचए दलमाणे १२ दुड्ढे १२ दुस्सन्नप्पा दीवित्ता ४ ३० दुइज्जित्तए वावित्तए ४ ३२ दुबले ३१ ३२ दुक्खुत्तो देवे दोच्च ૧૨ दुए १२ 'दगरए १२ द्गफुसिए १२ दावए २६ दारुदंडयं दासवाय दा १ दुष्ट-तत्त्व वेत्ताओं पर भी द्वाप रखने वाला दुःसंज्ञाप्य-दुःख से समझाने योग्य प्रकट कहकर जाने को दिलाने को दुबले देने को दोबार देव दूसरे वक्त भी उदक-जल जल के कण जल से छूए गए देवे-दिलावे लकड़ी के डंडे नौकरों के समान कथन को (ध) ५ धारण करने को १६ धरित्तए धम्मजागरियं धोया धूता धम्मविण्य धर्म सम्बन्धी जागृति धुले हुए १. ४ १५ लड़की ४ २३. धर्म सम्बन्धी शिक्षा शन्द्रकोपः (न) अर्थ- १ ६ wr बड़ा शहर व्यापारी निवास सोने को नहीं है दूसरी जगह नहीं प्रवेश करे, उपभोग में ले निकलते हुए लेगया हुआ २ २ मकान मालिक का अन्यत्र गया द्रव्य बनाया गया - ३ उद्देश- सूत्र- शब्द- नगरंसि निगमंसि १९ निदाइत्तए १ ३५ नत्थि .४४ तन्नत्थ २ १३ निव्विसेज्जा २ १३ निक्खं १६ नीहडं १८ नीहडिया २ २० निटिए २ २० निसट्ठ निसीइत्तए १२ नीसाए ४ २२-२७ निक्खिवित्ता निदिजा ३० निज्जूहियने निसिप्रावणं १० निग्गंथस्स निग्गंथीए . तिक्खमित्तए नेसजियाए ४२ नवणीएण ३ नीहरित्तए नी नीहरमाणी ६ नियितिगच्छे भेजा गया, दिया गया वैठने को ने.सराय में रखकर, उतारकर आत्म साक्षिक निन्दा करे अपने गच्छ से बाहर करने योग्य वैठाना ४ साधु का साध्वी का ५ १५ बाहर निकलने का ६ निषद्या-आसन विशेष से मक्खन से निकालने को नहीं निकालती हुई. सन्देह रहित w os प्रथमं परिशिष्टम् ह - नौका परं to- २० पके हुए w पुट भेवणंसि १ उद्देश- सूत्र शब्द-- अर्थ- नाचं १५ निग्गंथिं साध्वी को १६ नियाणकरणे फलों की आशा करना निविसमाणकप्पट्टि निर्विशमानों की कल्पस्थिति (५) पक्के पट्टणंसि पत्तन-नगर का भेद कुंकुम आदि के पट्टे खुलने का स्थान परिक्खेत्रसि दीवाल आदि के घेराव में १४. पत्थाएं कट-चटाई १६. पग्रलाइत्तए निद्रा लेने के लिए पुरिस सागारिए पुरुप, गृह स्वामी युक्त ३१ पडिबद्धाए द्रव्य और भाव से बंधे हुए ३५. परो दूसरे पडिग्गहेण पात्रों से पायपंछणेण पात्र साफ करने के वस्त्र से ४१. पवित्तिणिपायमूले. प्रवर्तिनी के चरण पर ४४ पुत्र पडिलेहिएण पहले प्रतिलेखन किए हुए ४६ परिभुत्ता परिभोग में लाई हुई ५० पविसित्तए प्रवेश करने को पुरथिमेणं पच्चत्यिमेणं पश्चिम दिशा में पुंजकडाणि पिहियाणि २ ३ पल्लाउत्ताणि ऊंचे करके रक्खे हों उससे अागे पडिलेहमाणे १ १ . ५१ पूर्व दिशा में ढेर किए हुए ढके हुए परं.. प्रतिलेखन करता हुआ शन्द्रकोपः ८ ४ कई के को हुए ३ १ or ३ سم उद्देश- सूत्र- अर्थ- पडव दीपक पूर्व मालमा विडय सादरक समान नाम पृया परिजनो परिजन-गदुम्यो ३ पडिमाहितए पंचमे ঘাণৰ पोत्तए परिचित्तए परठन को पासवणं लघुनीति ३ पाड़िहारिए पीछे देने को १० परिहरित्तए लागने को १२ पिंडवाय पडियाए आहार ग्रहण की इस्लाम ૨ पवित्ती সন্তক १२ पुरो आगे १२ पवित्तिणिनीसाए प्रवर्तिनी के नेसराय से पुचोवष्टिया पहले उपस्थित होने वाली १५ पढ़मसमोसरणुद्देसपत्ताई पहले वर्षावासके देशकाल विभागसे मिलेहुए १६ पचडिज गिरकर. २० पवेइत्तए अच्छी तरह समझाने को पंच पांच संख्या में २१ पूयाभत्ते पूज्य के लिए किया गया आहार २१. पाहुडियाए उन्हीं के लिए भेजे गए पडिदायव्चे पीछे देना चाहिए परिहारं धारणा-परिभोगरूप पुवाणुएणवणा प्रथम ली हुई श्राज्ञा ३ २६ परिहरणारिहे साधुओं के उपभोगने योग्य ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ प्रथमं परिशिष्टम ६१ ३० ac उद्देश- सूत्र-- शब्द- २६ परियावन्नर पडित्तए ३० पेहाए पडिसेवमाणे पगत्तेपारंचिर पंडए ४ पच्चावित्तए ११ पडिबद्धे ११ पाहुडे १२ पन्ना १४ पलिसएन्जा पिता पुत्तो पडि हित्ता ४ १६ पमन्जित्ता १६ पढ़माए पोरिसीए ४ पच्छिमं १६ पानं परिहारदाणं ४. १७-१८ परिवियचे पाण भोयणे १५ पडिग्गाहिए २६ परिटुवित्ता पट्टविए पटुविजमाणे ३० पासेज्जा अर्थ- भूले हुए या छूट गए लौटकर आने को देखकर प्रतिसेवना करता हुश्री प्रमादी पारंञ्चिक नपुंसक दीक्षित करना घृतं आदि विकृति में लोलुपी कोध कहे गए है आलिंगन करे घाप पुत्रं प्रतिलेखना करके प्रमार्जन करके पहली पोरसी में अन्तिम जल (अचित्त) परिहार स्थान (प्रायश्चित्त विशेष ) परठना चाहिए आहार पानी लिए गए परटकर दिया गया हो दिया जाता हुमा भी १४ १६ १८ ६२. शब्दकोपः उद्देश- सूत्र- . ३० ४ ३० ४ . ४ ४ ४ ३१ ३१ ३१ ३१ ३३ ३३ ३४ ४ ४ शब्द- अर्थ- पायच्छित्तं प्रायश्चित्त को पडिमिज्जा पाप स्थान से पीछे लौटे पागाए जल के लिए पिंडवायं आहार को पिवासिए प्यासा परिहार कप्पट्टियरस परिकल्प में स्थित साधु को पंथेसु मागों में पुग फिर पायं पैर को पलालेसु पुयालों में पराग पनक-पांच वर्णवाला बनस्पतिकाय जीव पच्चोगिलमागणे पीछे गिलते हुए पएसे प्रदेश-क्षेत्र में पिवेज्ज पीवे-पान करे पसुजाइए पशुजातिवाला पविखजाइए पक्षीजातिबाला परामुसेज्जा स्पर्श करे पगिजिमय पगिझिय ऊपर करके ऊपर करके पतांत्रिय वादियाए हाथों को फैलाने वाली पडिमट्ठाइयाए पडिमा अासन विशेष से बैठने वाली पीटसि पीट के ऊपर पादकेसरिका-आसन विशेष पारियासियरस वासी-पर्यपित पच्छा पुलागभत्तए पुलाकभक्त पनोसविताए निर्वाह करें पडिगाहिला ग्रहण करे ५ ११ १३ 裝 १३ ५ ५ १६ ५ २१ ५ -३३ ५ पाद केसरिका ५ उसके बाद ४१ ४२ ५ ४२ १ ।
प्रथमं परिशिप्रम् ६३ उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- +- ४ .. w w w w w w w w w ८ १९ पाणाइवाय प्राणातिपात-हिंसा पत्थरा प्रायश्चित्त रचना विशेष पायंसि पैर में परियावज्जेन्ना श्राकर गिरे पुरिस एवं पुरुप के रूप को पंचराइदियं पांच दिन रात पाणे कोई प्राणी पव्वयंसि पहाड़ पर पक्खलमाणि फिसलती हुई पवडमाणि पड़ती हुई पणगंसि वारीक कीचड़ (जलयुक्त) पंकसि गाढ़े कीचड़ में पतिमा व्याघात करने वाले छ दोष पसत्या प्रशस्त-उत्तम है (फ) फाणिए फेणी-फटे दूध के बने फासुए प्रासुक-निर्जीव फलगंसि फलक (तख्ता) फरुसवयणं कठोर-वचन (च) बाहर बाहिभिक्खायरिया बाहर ही गोचरी करनी बाहिरियसि बाहर वाले उपाय में बहिया बाहर वीहीणि व्रीहि-शाल्यादि धान्य वहु फासुए सर्वथा निर्जी १९ .. ४ २६ -- ५ २३ वाहिं tor १ ४० १. ४ २९ .
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प्रथम परिशिष्टम् ६५. उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- १ ४ or ४ ६ मास एक मास तक १३ मझमझेण चीच बीच से ४६ मट्ठा चिकने किए गए मगहायो मगध देश से मुग्गाणि मुंग मासाणि उड़द मुद्दियाणि रेखांकित-चिह्नांकित मंचा उत्ताणि मंच पर रक्खे गए माला उत्तागि माले पर रक्खे हुए मुंज चिप्पए मुंज की वनी पूजनी १६ मुच्छिज्ज मूच्छित होवे मेहुणं स्त्री पुरुष का संयोग मुंडावित्तए लोच करवाने को १२ मृढ़े जड़ बुद्धि वाला १५ माया माता ६२ मही नदी विशेष का नाम ३२ महराणवायो समुद्रसी बड़ी ३२. महाणदीओ बड़ी नदियां ३२ मुक्कमउडेसे मुक्त मकुट मुहे. मेहुणपडिसेवणापत्ता मैथुन सेवना को प्राप्त करती हुई मोयं लघुनीत ४० मस्विचए बहुत चिकना बनाने को मुसावायरस असत्य वचन १६ मुत्तिमग्गस्स मुक्ति मार्ग के १९ मोहरिए मौखरिक-बहुत बोलने वाला ५ ४. ४ ४ ४ ४ मुख में ५ ३७ शंश्वकोपः ६ कटे हुए ७ ३५ or or २ उद्देश- सूत्र- अर्थ- ४ ३० बहुम्सुए घहुसूत्री या बहुश्रुत ३० बब्भागमं अनेक आगमों के जानकार- ११ धीयाणि धीज-धान्य आदि ५ १६ वाहायाः फैलाए हाथ वाली ५ ४१ बहिया बाहर के नगर में ४ धीए बीज (भ) भिन्न भिक्खायरिया गोचरी करनी भंते ? भगवन् ? ३५ भिक्खू.. साधु १० भित्तिकडाई भीत बनाए गए २४ भंगिए अलसी से बने हुए वक्ष भिनाई फाड़े गए ४ १-१६ भुंजमाणे भोजन करते हुए भाया भाई भगिणी बहिन भुंजिना भोजन करे ३० भत्ताए. श्राहार के लिए ५ १२ भोयणजाए श्राहार की चीज ५ १२ भोत्तवे श्राहार करना चाहिए भूयप्पमाणमित्तमधि चुटकी भर भी भूति-भस्म, १२ भक्तहणं उसी पुलाग भक्त से १७ मत्तपाणपडियाइक्खियं आहार पानी त्यांगने वाली साध्वी को भुजो भुनो फिर फिर कर (म) सड़यसि दाई योजन के भीतर ग्राम रहित स्थान m ६ १४ ४ . ५ ६ ६ प्रथम परिशिष्टम् w उद्देश- सूत्र- शब्द- - अर्थ- मासं . १३ . ४६ २ or २ २ ३ मझमझेण मट्ठा मगहाओ मुग्गाणि मासाणि मुद्दियाणि मंचा उत्ताणि माला उत्ताशि मंज चिप्पए मुच्छिज्ज मेहुणं मुंडावित्तए मृढ़े एक मास तक बीच बीच से चिकने किए गए मगध देश से मूग उड़द रेखांकित-चिह्नांकित मंच पर रक्खे गए माले पर रक्खे हुए मुंज की बनी पूंजनी मूच्छित होवे स्त्री पुरुष का संयोग लोच करवाने को जड़ बुद्धि वाला ૨ २ ** ३ १. ४ ५ - ४ १२ दे - ४ माया माता ४ ४ ४ ३२ ५ ur मुख में ५ ३२ मही नदी विशेष का नाम ३२ महराणवाओ समुद्रसी बड़ी ३२. महाणदीओ बड़ी नदियां मुक्कमउडेसे मुक्त मकुट मुंहे मेहुणपडिसेवणप्पत्ता मैथुन सेवना को प्राप्त करती हुई मोयं लघुनीत ४... मक्खित्तए वहुत चिकना बनाने को २. मुसावायस्स १६ मुत्तिमग्गस्स मुक्ति मार्ग के मोहरिए मौखरिक-बहुत बोलने वाला ६ असत्य वचत १ ९ .
ह शब्दकोषः - (र) अर्थ- राजा के निवास युक्त नगर गली के द्वार पर ६ : राज्य में रात में १ उद्देश- सूत्र शब्द- १ रायहणिसि १२ रत्थागखंसि रज्जसि ४३ राओ ४६ रत्ती २ रासिकडाणि २ १२ रुक्खमूलसि रयहरणाई रयणि राई भोयणं ३७ रोगायकसु रंगी गई लाल की गई इकट्ठ किए गए २ वृक्ष के नीचे P २४ रजोहरण-पूजनी ३ रात में ४ रात में खाना हैजा आदि रोग, सर्प विष आदि आतंकोंमें ४ ए रजकरण .६. लोयए संछियाणि लित्ताणि लभेज्जा २ १० ५. १२ ६६ लाइया लगंडसाइयाए ५ (ल) लोचक-दही का बना पदार्थ चिह्न विशेष से युक्त लिपे गए लाभ करे-पावे हाथ से लाकर लगंड-आसन विशेप से सोने वाली अलावुक-तुवीपात्र (व) विधि पूर्वक काटे गए अनेकार्थक-अथवा वसने को वसते हुए को लाउयं १ विहिभिन्ने १ वा वत्थए ६ ६ वसमाणाणं प्रथमं परिशिष्टम् अर्थ- वन्दना करे है उद्देश- सूत्र शब्द- चंदेज्जा वासावासासु वीतिकाममाणे १ वेरज्ज ३८ विरुद्ध रज्जसिः वत्थेरण वर्षावास याने चातुर्मास में राजा व तीर्थंकर की योज्ञा परस्पर विरोध वाला राज्य किसी कारण से लड़ने वाले राज्य में १ or ३६ वख से ४ वसई ४ ૨ १० १२ १२ चाले. में १६ १६ चगडाए. विक्खित्ताणि विह किरणागि चिप्पइनाणि विलित्ताणि वसीमूलंसि वियडगिहंसि. विभत्ताओ वोच्छिन्नाश्रो वोगडायो वस्थाई वच्चाचिपए विभाबित्तए विप्पणसिजा विप्पजहंति वत्थुसु वाईए. विगई पडिबद्ध विणीए वसता है उपाश्रय के भीतरी भाग विखरे हों फैले हुए विशेष रीति से फैले विशेष रीति से लिपे हुए घंशी-वृक्ष विशेष के नीचे खुले द्वार घर पृथक किए हुए बिना परिमाण किए कहे गए वस्त्र वच्चक की त्वचा से बना हुआ रजोहरण समझाने को खो जाय या गुम हो जाय त्यागते हैं वस्तुओं में वार्तिक-तुच्छ प्रकृति घृत आदि में लोलुपी विनीत चाचना देने के लिए T २ २५ mm २८. ४ ४ ४ १० १२ ११. ४ वाइत्तए शब्दकोषः अर्थ- - ४ ४ oC ४ ४ ४ ४ उद्देश- सूत्र- शब्द- ४ १२ बुग्गाहिए उलटा समझाया गया २३ विहरित्तए विहार करने को २६ चियरज्जा देवें वितरीति देते हैं २९ वियोले विकाल में प्रतिकूल काल में २९ बीसुमिज्जा शरीर त्याग करे वेयावच्चकरे साधु सेवा करने वाले ४ ३० बिजटूजा उस अपराध स्थान से पीछे हटे ४ ३० विसहिज्जा विशुद्ध करे ३१ वेयावडियं व्यावच-सेवा कार्य को ४ ३१ विगचणं पृथक करना ३२ विसोइन विशुद्ध करना ३२ वजियाओं प्रकट की गई विउव्धिता विकुर्वणा करके विगिंचिमाणे वाहर डालते हुए वितिगिंछा विचिकित्सा सन्देह ११ विगिचित्तए ११ विसोहित्तए शुद्ध करने को विसोहिया शुद्ध किए गए ५ १३ विसोमाणीए शुद्ध करती हुई १३ विनिमाणीए बाहर डालती हुई १५ विहारभूमि-स्वाध्याय भूमि १५ विचारभूमि संज्ञा भूमि १८ वोसहकाइयाए कायोत्सर्ग-देहभान भुलाती हुई वीरासणिवाए वीरासन से बैठने वाली विटुपमाणमित्तमवि बूंद मात्र भी ५ ३६ विलिंपित्ता विलेपन करने को १ ६ ६ ५ ५ पृथक करने को विचार भूमि ५.
प्रथमं परिशिष्टम् 5.६६ उद्देश- भूत्र- शब्द- अर्थ- ५ w ६ ६ । समाणी ४० घसाए घसा-चिकनी चीज ४१ घवहारे व्यवहार ४१ बेयावडियाए पावच के लिए वइत्तए बोलने को विउसंवियं शान्त होने वाले को. वयमाणे घोलते हुए चायंवरमाणे सूपा, हिंसा आदि को योलता हुआ विसमंसि विषय ( कंचनीच) (स ) होती हुई संनिसंसि यात्रा का ठहराव, स्थान संवाहसि साधन रखने का स्थान सपरिक्खेचंसि परिक्षेप-आवरणं से युक्त सबाहिरियंसि बाहरी भूभि से युक्त १३ सिंघाडगसि शृंगाटक में १६ सिंघाणं नाक का मन १६ साइम स्वादिम १६ समायं स्वाध्याय को सचित्त कम्मे सचित्र उपाश्रय में २३ सागांरिय निस्साए गृह स्वामी के नेसराय में. २४ सागारिय उवस्सए । गृह स्वामी के द्रव्य सहित ३१. सेन्जाए पाश्रय ३५ संघसेज्जा एक साथ रहे समुन्जेज्जा एक साथ पाहार करे सासरणं श्रामण्य-श्रमण, धर्म ३६ सद्यः-तत्कान है १.. २० १ or सम्ज १०० शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- - यह भी १ १ १ २ १ ४ २ शब्द- अर्थ- सागारकई गृह स्वामी का किया हुआ ४०-४२ समाणं होते हुए-निकलते हुए सावि ४६ संपधूमिया खुशबूदार बनाया गया ४८ संखडि पडियाए संखडी की इच्छा से सालीणि धान-चावल वाला संतरा अपने किए हुए दो तीन रात ठहरना रूप ४ सुराधियडकुमे सुरा से विकृत कलश सोवीरय वियडकुमे विकृत जल के कुभ सिरोदग वियडकुमे शीत जल के कुभ सनराइए रात भर सम्पि घृत सक्कुली মালদুঙ্গা सिहरिणी श्रीखण्ड (खाद्य विशेष) १५ संसटुं दूसरे भोजन से सम्मिलित सागारिय पिंड गृह स्वामी का भोजन: साइज्जह आस्वाद लेवे सागारिएए गृहस्वामी ने २ २ " २ २ ८ २ २ से तस्य-उसका ३ ४ साराए सरण से बने हुए सलोमाई लोम के साथ संघिय और वह भी १२ सामाणा विद्यमान हो 1३ संपन्चमाणस्स सम्धक प्रवज्या लेता हुया. १३-२३ संपव्यहत्तए दीक्षा लेने को, विहार करने को समोसरणुद्देन पसाई प्रथम वर्षावास के क्षेत्रादि र उद्देश्य को पान वाली ३ ३ प्रथमं परिशिष्टम् १०१ - - उद्देश- सूत्र- शब्द- सभावणाई समगणा सिज्जासंथारये २६. सच्चेच सेएणं ३० सन्निविटुं ३१ 'संन्निवसंसि सव्वो ३१ समंता सकोसं ३ साहम्मियाणं ४ सिक्खावित्तए संभुजित्तए ५ संघासित्तए १३.. सुखएगप्पा १८ सेहतराए २३ संभोगवडियाए २६ सागारिय संतिए २६. सरीरगं. ३० संकमित्तए ४.३० सुंएण ३२ सरऊ. ४ ३३ संतरित्तए सुरिए. समावन्ने १० सभोयणे सोयसि १६ सूराभि मुहीप: अर्थ- भावनाओं के साथ साधु उपाश्रय संस्तारक होने पर ही सैन्य-सेना उतरा है हाट अथवा पेठ में चारों ओर से अच्छी तरह कोश कोशभर साधर्मिकों के पढ़ाने के लिए एक मण्डल में भोजन कराने को साथ रखने के लिए सुख से समझाने योग्य छोटे साधु cococ. ccccc .c एक साथ भोजनादि के निमित्त से गृहस्वामी की मुख्यता में शरीर को एक गण से दूसरे गण में संक्रमण करनेको सूत्र से-शास्त्रानुसार सरयू नामकी नदी पार उत्तरने के लिए सूर्य के पाने पर ५ भोजन के साथ गुह्य अङ्ग में सूर्य के सामने में ५ १०२ शतकीप: उद्देश- सूत्र- - १६ ३१ ५ ५ ३४ ४१ ४२ ५ ४२ . २ w ६ AN w शब्द- अर्थ- समतलपाझ्याए समानता से दोनों पैर रखकर संघाडि पडिवद्धाए अपने गच्छ में बंधी हुई सावस्सगंसि -पीठ देने के आत्तम्बन-के साथ सविसासि सींग के समान अवयव युक्त सवेंटगं डेंट लगे (अलावू). सुच्चा सुनकर संथरिजा निर्वाह कर सके सिया कदाचित् ( यदि). सम्म सम्यग-अच्छी तरह संचाएज्जा समर्थ होवे सक्करे छोटी कंकड़ी सेयंसि जलके साथ कीचड़ में साहिगरणं किसी गृहस्थ से विरोध करने वाली-साध्वी सपायच्छित्तां प्रायश्चित्त पायी हुई साध्वी सामाइयसंजय कप्पट्टिइ-सामायिक संयत कल्पस्थिति (ह) हेमंत गिम्हासु हेमन्त ग्रीष्म में इरिया हडियाए हताहतिका को बाहर-दूसरे उपाश्रय के इत्वकम्म हत्यादालं परताड़न चा स्वयं मारन साथ या शीघ्र होने को होलिय चयणे निन्दित वचन हारे कील-छोटी टकडी ६ १५ w w. २० १ ur ४६ २ ५ हुरत्या ४ खराब चेष्टा ४ ar ४ ३ हव्यं १६ ६ ६ परिशिष समाया।
द्वितीयं परिशिष्टम् पाठभेदः १ ६ । उद्देश- सूत्र- आगम मन्दिर प्रति संशोधित प्रति संनिवेसंसि (सं०) निवेसंसि (आ० टी०) १४ श्रोहाडियचिलिमिलिया, श्रोहाडिय चेल) चिंलिमिलिया १८ माहरेत्तए माहारित्तए २२ सागारियं २६. सागारिए चाए (चरित्तए) २८ करेत्तए करित्तए दुहओ- वि य ४३ नन्नत्थ नऽन्नत्थ २. घट्टा घट्टा विहारभूमि वा विद्यार- पियारभूमि वा विहारभूमि वा भूमि वा थुणाविसयाओ थूणाविसयायो श्रोकिरणाणि उक्खित्ताणि विक्खिण्णाणि विक्खित्ताणि वसेज्जा वसई पडिग्गहिता पडिग्गहिया देह देज्जा कप्पइ० पडिग्गाहेत्तए बद्धाचिप्पए बच्चाचिप्पए मुजचिप्पिएवि मुजचिप्पए ४. " २ २६ ३० " " शनकोपः ३ १ उद्देश- सूत्र- प्रा० म० उदेसों श्रीसइत्तएवा करेत्तए निग्गल्याणं उव. आसइत्तए परिभूत अपरिभूत्ते ११ चेलाई २ संशोधित उसयो चिट्टित्त एवा x निग्गंथ उव०. चिद्वित्तएवा. परिश्ते अपरिभुत्ते चेलं निग्गंथस्स सेज्जासंथारए " ४ १२ नि० य १३ सेज्जासंथारयं " १८ X श्रासइत्तए करेत्तए x जजरिए x " २२ अविकरणं २४ x ४ ? अहिगरणं च णं वीइक्कगमाणे तेन्न परधम्मियाणं हत्यायालं सुस्मन्नपा एगन्तमन्ते चमत्थं पएसे पएसे श्रणापुच्छिताणं क्यावञ्चकरा एगंतमत विअइक्कममाणे तेएणं अन्नपम्मियारणं इत्यादालं सुसरगप्पा एगन्ते " " ६१ x x थंडिले श्रणापुच्छित्ता वेयावच्चकरे एगते. २८ " द्वितीयं परिशिष्टम् १८५ . " " ४ आइयइ से " " . - ". k1 ५ उद्देश- सूत्र- आ० म० संशोधित सागार कर्ड सागारिकर्ड २५ भिक्खूनो से कप्पड़ x गामाणुगाम गामाणुगामं वा गणाओ गणाओ वा २५ श्राइयह २६ ज्वझायाणं उवज्झाएणं तवस्सी झिभिए झिझिए पिवासिए पिवासिए, तवस्सी. २८ मट्टियमक्कड मट्टियमक्कडग अहेसेवण मायाए अहेसवण मायाए उर्दियसेवण मायाएं उपिसवण मायाए राइंदियाई राइंदियं परिणिव्वविय परिणिवाविय निविइगिच्छासमा- निविदगिच्छे वएणणं ११ से पाणं वा बीए पाणाणि वा बीयाणि या तो तं शालोइय लाड्या विसोहिय. चिसोहिया परिभोत्तव्वे 'भोत्तव्वे नोउसिणे x १३ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं-मासियं भत्ताए वा पाणाय वा पिंडवाय पडियाए सूराभि मुहाए सूराभिमुहीए २२ नेसिज्जियाए नेसजियाए ३८ चिट्टित्तएवा निसीइत्तएवा. ४ . - १०६ पाठभेदः संशोधित " उद्देश- सूत्र- श्रा० म० ४८ आइत्तए वा ३६ आलिम्पित्तए चा आगाढानागाढेहि गायाई ४० मक्खेत्तए वा भ ... आइयत्तए वा आलिपित्तए वा- गादेहि गायं मक्खित्तए वा गाढागाडेहि ४० " " ४० श्रागाढ़ा नागाहिं X w 10 उदीरित्तए ३ " खारा. तं च प णं उदीरत्तए खाणुए तं. गेरहमाणे. तिन्तिगिए मोक्खमम्गस्स छविहा " १६ १६ गिण्हमाणे : तिन्तिणीए. मुत्तिमग्गस्स छव्विहो ॥ द्वितीयं परिशिष्टं समाप्तम् ।।
ततीयं परिशिष्टम् प्रतिपरिचयः १--श्री वर्द्धमान जैन आगममन्दिर, पालीताणा से प्रकाशित एवं तपो. गच्छीय श्री सागरानन्द सूरि द्वारा संशोधित प्रति । इसमें प्राचीन प्रतियों से पाठ संशोधित है, किन्तु अधिकांश जगह ० विंदु देकर पाठ संकोच किया गया है एवं कई जगह पाठ छुट भी गए हैं। कहीं पदों के क्रम में परिवर्तन हो गया है। बीच २ में पाठान्तर व अन्य प्रतियों में प्राप्त नहीं होने पर भी अपनी ओर से संशोधित पाठों को ( ) कोष्ठक में दिए हैं। सूत्राकों के साथ स्थान २ पर नियुक्ति व भाष्य गाथाओं के अङ्क भी दिए गए हैं। पत्र सं. ८-६ है। प्रति लम्बेसाइज पत्रा- कार में मुद्रित है। २--नियुक्ति लघुभाष्य वृत्युपेत बृहत्कल्पसूत्र--यह श्री आत्मानन्द जैन सभा, भावनगर से प्रकाशित एवं मुनि श्री चनुरविजयजी पुण्यविजयजी द्वारा संपादित प्रस्तुत सूत्र सम्पादन में मुनि श्री ने विविध प्रतियों से-जिनमें ताड़पत्रीय प्रति भी सम्मिलित है-श्रम पूर्वक मूलपाठ एवं टीका का संशोधन किया है। सूत्र ६- भागों में पूर्ण हुअा है-जिनमें से ५ अभी उपलब्ध हैं। पाठ प्रायः: शुद्धः है । संशोधन में इस प्रति को मुख्यता से प्रामाणिक माना गया है। ३--हस्तलिखित प्रति--यह प्रति स्वर्गीय ढढ्ढा सौभागमलजी के ज्ञानभंडार. की सावचूरि (सटीक ) प्रति है जो कि वर्तमान में पूज्य श्री हस्तिमल्लजी महाराज. साहेब की निश्राय में है। इसके पाठ आत्मानन्द सभा, भावनगर से सुद्रित सभाम- बृहत्कल्पसूत्र से अधिकांश मिलते हैं। प्रति त्रिपाठी होने से बीच में मून और ऊपर नीचे टीका दी गई है । लिपि. साधारणतया सुवाच्य है। संशोधन में इस प्रति का संकेत 'ह' प्रति रक्खा है। पत्र सं०१८ है। प्रति पृष्ठ में मूल और टीका को मिलाकर २३, से २५ पंक्तियों के लगभग अनुपात हैं। अधिकांश पाठ शुद्ध हैं। यह है। के प्रतिपरिचयः प्रति १८ वीं शताब्दी के एक मुनिराज की लिखी हुई है। इस प्रति के अंत में प्राय- श्चित का यंत्र और भाषा में प्रायश्चित के विधान चूर्णि पर से लिखे हुए हैं । मूल- पाठ के अंत में प्रशस्ति-लेख निम्न प्रकार है:- "संवत् १७५१ वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्ष ६ दिने पीपाड़ ग्राममध्ये ऋष ५ जीवराजजी पूज्य तत् शिष्येण ऋप सुरत्राणेन लिपिकृतं स्वात्मार्थम् पठनार्थं । शुभं भवतु । कल्याणमस्तु । श्री श्री ।। ॥ तृतीयं परिशिष्टं समाप्तम् ।। .
चतुर्थं परिशिष्टम् बृहत्कल्प सूत्र वृत्यन्तर्गतानि विशेष नामानि विशेषनाम कस्य निर्देश स्थलम् उ० सू० ताल. फलस्य no '. : फलस्य १ फलस्य फलस्य १ जनपदस्य, १ नगरस्य पलंब डिडियादि सल्लकी गाम श्रानन्दपुर भृगुकच्छ ताम्रलिप्ती श्रावणगिह चिलमिलिका द्रोण. भीष्म अंग नगरस्य नगर्याः स्थानविशेषस्य यत्र विशेषस्य कलाचार्यस्य १ १ १ १-टीका १-टी० :६ ६-टी० ६-टी० ६-टी० १२ '. १४ ४४-टी० १ ४४-टी० देश विशेषस्य. ५१ मगह कोसंबी १ १ १ ५१ . १ थूणा कुणाल साली धीही धान्य विशेषस्य ११० विशेष शब्द सूची विशेषनाम निर्देश स्थलम् गोधूम २ जत्र 10 जवजव मुद्ग २ " २ वन विशेफ्स्यः २४. . " २४ " २४ २ २४ तिल कुलत्थ लोयए जंगिए भंगिए सानए पोत्तए मुंजचिप्पए उष्ट्र पायरिय उवमाय पवित्ती : थेरे गणी गणहरे गणावच्छेइए पारंचिय पशु विशेषस्य २५ साधोविशिष्टपदस्य ३ १२ in १२ ३ १२ १२ " ३ ३ ANN १२ १२. प्रायश्चित्त भेदस्य 10 श्रणपट्टाप ४ ३ गंगा नया: जदया રૂર कोलिना ४ चतुर्थं परिशिष्टम १११ विशेपनाम: निर्देश स्थलम् देशस्य 20 नद्याः ४ नद्याः ४ ३३ २२-टी० आसनविशेपस्य ५ कुणाल मही एरावई नेपछिका उत्कटिका वीरासनिका दण्डासनिका अाम्रकुब्जिका तिल्ल " ५ २९ ... " २६ तैलस्य साविशेपस्य घय ५ ४०० नवनीय ५ ४० वसा ५ ४० २ पाणोइवाय मुपावाय अदिन्नादान अभ्यङ्गविशेषस्य हिंसायाः मृपावादस्य चौर्यग्रहणस्य २ ॥ चतुर्थ परिशिष्टं समाप्तम् ।।
पंचमं परिशिष्टम् टिप्पणम् १-वंशी मूलं- यो गृहाद् बहिाराप्रवर्ति स्थंडिकारूप अलिंदकः, या वा 'अपसारिका' पटा. लिका, कुत्र ? इत्याह-गेहस्य पार्श्वे वा पुरतो वा पृष्टतो वा तवंशीमूलं नाम गृहम् । २-सागारिक पिण्डः सागारिक इति शय्यातरः, उपाश्रय दाता इत्यर्थः । तस्य पिण्डः सागारिक- पिण्डः । शय्यातर पिंड ग्रहणे पाचायैर्विविधा दोषाः प्रदर्शिताः । तेषु प्रथमस्तीर्थ- कराणामाज्ञाखण्डनं द्वितीयः प्रत्यासन्नतया पुनः पुनर्भिक्षा ग्रहणे आहार शुद्ध्यभावः, तृतीयः लोलुपता वृद्धिः शय्यादायकेन मुनीनां सर्वा भिक्षादि व्यवस्था विधेया इति शंकया शय्या दुर्लभा भवेत् इति चतुर्थः । अतश्च मुनिभिः शय्यातर पिण्डो न प्रायः । वृत्तिकारेण पूर्व तावत् कः सागारिकः कदा व शय्यातरो भवति, कतिविधः शय्यातर पिण्डः? इति प्रपञ्चितस्तत्र प्रथमं कः सागारिकः इति प्रदर्शयति-- सेन्जायरो पभूवा, पभू संदिट्ठो व होइ कायव्यो । एग मणेगे व पभू, पभु संदिद्वे वि एमेव ।। शय्यातर: प्रभुर्वा प्रभु मन्दिष्टो वा कर्त्तव्यो भवति । तत्र प्रभुः-उपाश्रय स्वामी । प्रमु सन्दिष्टस्तु तेनैव प्रभुणा यत् कृत प्रमाणतया निर्दिष्टः । यः प्रभुः स एको वा स्यादनेको धा, प्रभु सन्दिष्टोऽपि 'एवमेव एकोऽनेको वा भवति । फदा सागारिको भवति ? एतस्य बहुविध प्रतिवाक्यमस्ति तद्यथा-कश्चिद्वदति- क्षेत्रे प्रत्युपेक्षिते सति यदा प्रतियोऽनुज्ञापितस्तदा सागारिको भवति । अन्यो व्रते. यदा तय गृहस्वागणं प्रविष्टाः । अपरो भत्ति-यदा वसतिम् 'अतिगताः, प्रविष्टा । कत्रिदाह-यदा स्वाध्यायः कर्तुमारब्धः । एवं पञ्चदशमतान्निदर्य आचार्यः श्राहि- - पंचमं परिशिष्टम ११३ . शति-एते सर्वेऽप्यनादेशाः कुतः ? इत्याह-अनुज्ञापितावग्रहादिपु निक्षिप्तान्तेषु दिव- सत-एव व्याघातो भवेत् , व्याघाताच्चान्यां वसतिमन्यद् वा क्षेत्रंगताः ततः कस्या- सौ शय्यातरो भवतु ? आवश्यकादिषु च चतुर्थयाम-पर्यन्तेपु वसति व्याघातेन घोधिकस्तेनादि भयेन चाऽन्यत्र संक्रामतां कस्य शय्यातरो भवितुमर्हति । श्रादेशः पुनरयं-"निर्व्याघाते" व्याघाताभावे यद्यन्या वसति न गताः तत्रैव रात्रावुपिता- स्ततो भजना कर्तव्या । स वा शय्यातरो भवेत् इतरो वा अन्य उभयं वा । अन्यत्र स्थाने सुप्त्वा 'चरम' प्राभातिकमावश्यकमन्यत्र कुर्वन्ती तदा यस्यावग्रहे रात्री सुप्ता यदवहे च प्राभातिक प्रतिक्रमणं कृतं तौ द्वावपि शय्यातरौ भवतः । इदं प्रायः सार्थादियु सम्भवति, आदि शब्दात् चौरावस्कन्द भयादि परिग्रहः । इतरथा तु ग्रामादिपु वसतां भजना' विकल्पना । . प्रथ कतिविधः शय्यातर पिण्ड: ? तंत्राऽह-द्विविधो वा चतुर्विधो वा पड़ विधो या अष्टविधो वा द्वादशविधो वा शय्यातरस्य पिण्डो भवति । तद्विपरीतः 'पुन:: 'अपिण्डः शय्यातर पिण्डो न भवति । द्विविधः-शय्यातरपिण्डः-आहार उपधिश्च । "बिदु" त्ति द्विगुणितौ द्वौ-चत्वारो भवन्तीति कृत्वा चतुर्विधः शय्यातर पिण्ड: पुन- रथम्-अन्नं पान औधिकोपकरणं औपग्रहिकोपकरणंचेति । तथा अशनादयश्चत्वारः औधिकोपधिः औपग्रहिकोपधिश्चेति पड्विधः । अन्नं पानं वन पात्रं 'शूच्यादय.' शूची-पिप्पलक-नख रदनिका-कर्ण शोधन रूपाश्चत्वार इत्यष्टविधः । तथाऽशना- दीनि वनादीनि सूच्यादीनि चेति त्रीणि चतुष्कानि द्वादश भवन्ति । तद्यथा-अशनं १ पानं २ खादिमं ३ स्वादिमं ४ वस्त्र ५ पानं ६ कम्बलं ७ पादप्रोच्छनं = सूची ९ पिप्पलको १० नखच्छेदनकं ११ कर्ण शोधनकं १२ चेति । तृण डगल-क्षार-मल्लक-शय्या-संस्तारक-पीठ-लेपाः, आदि शब्दात् कुट- मुखादिकं च एष शय्यातर पिण्डो न भवति । यदि च शय्यातरस्य पुत्रादिः शैक्षो वस्त्र-पात्र सहितः प्रद्रजितुमुपतिष्ठते तदा स सागारिक पिण्डो न भवति, अतः कल्पते सोपधिरप्यसौ प्रव्राजयितुम् । टी० ३-कुलिका कृताणि-इत्यादिः- कुलिका-कुड्यमुच्यते, ततः कुलिकाकृतानि नाम कुड्यालीनानि कृत्वा स्थापि- सानि । मृपिंडादि निर्मितं कुड्यम् ।
टिप्पणम् .... सौवीर विकट-द्राक्षा-खजूरादिभिव्यनिष्पाद्यत्ते तद् मद्यं सौवीरविकटम् । सीअोद्ग वियड-विकृतं शीतोष्णादि शस्त्रेण विकारं प्रापितम, प्राशुकीकृत- मित्यर्थः । तत्र प्रथमभंगे उष्णोदकमेवशीतीभूतं तन्दुलधावनादिकं वा । तृतीय भंगे. घणोदकमुद्धृतत्रिदण्डम् । पाडिहारिय--भुक्तोहरितं भूयोऽस्माकं प्रत्यर्पणीयमिति यत् प्रतिज्ञातं तत्- प्रातिहारिकम् । अनुद्घातिक:- अनुद्घातिकः-न विद्यते उद्घातो लघुकरणलक्षणो यस्य तपोविशेपस्य तद्- नुद्घातं यथाश्रुतदानमित्यर्थः । तद् यस्य प्रतिसेवाविशेपतोऽस्ति सोऽनुद्घातिकः । तपोगुरुप्रायश्चित्ताहोऽनुद्घातिक उच्यते। अथवा-उद्घातो नाम भागपातः सान्तरहानं वा स विद्यते यस्मिन्-असावुद्- घातिकस्तद्विपरीतोऽनुद्घातिकः । तपोगुरुप्रायश्चित्ताऽहे । त्रयोऽनुद्घातिकाः प्रज्ञप्ताः । उद्वातो नाम भागपातः। सोऽस्त्येषु त उद्घा- तिकाः, तद्विपरीता अनुद्घातिकाः । तपोगुरुप्रायश्चित्तस्थानमपि-अनुद्घातिकमुच्यते, तन्मासिकं, चतुर्मासिकम् , पारमासिकादिभेदाबहुविधम् । - ५-पारश्चिक:- पारश्चिक इति दशम प्रायश्चित्तस्थानम् । अस्यार्थः-पारं-तीरं गच्छति येन प्रायश्चित्तेनाऽऽसेवितेन तत् पारञ्चिकम् । पारं पुनः संसार समुद्रस्य तीरभूतम, अने- नासेवितेन साधुर्मोन गच्छतीति भावः । यद्वा शोधेः पारं- पर्यन्तमञ्चति यत् तद् पाराम्बिकम् , अपश्चिगं प्रायश्चित्तमित्यर्थः। ततो येन तपसा पारं प्रापितेन अच्यते श्री श्रमरणसंघेन पूज्यते तत् पाराञ्चिकं पाराञ्चितं वाऽभिधीयते तद्योगाद् साधुरपि पाराश्चिकः । पाराश्चिकः समासेन द्विविधः, तद्यथा-बाशातना पाराञ्चिकः प्रतिसेवि- যাদি। अतिसेवना पाराश्चिकः सूत्रोक्तः निप्रकारः। श्राशातनो पाराश्चिको जघन्येन पंचमं परिशिष्टम ११५ : परमासान् उत्कर्वतश्च द्वादश मासान् भवति । एतावन्तं कालं गच्छान्नि! ढः- चहिभूतम्तिष्ठति । प्रतिसेवना पाराञ्चिको जघन्येन सम्वत्सरं उत्कर्षतो. द्वादश वर्षाणिनियूद आस्ते । सच कारणे यथोक्तकालादर्वागपि गच्छं प्रविशतीति भावः अथ के पुनः पाराञ्चिकमहन्तीति प्रदर्शयति आचार्यः संहननं वज्रऋषभनाराचम्, वीर्य- धृत्या वनकुड्य समानता, आगमः- जघन्येन नत्रम -पूर्वान्तर्गतमाचाराख्यं तृतीय' वस्तु उत्कर्पतो दशमपूर्वमसम्पूर्णम, रच सूत्रत्तोऽथत्तश्च यदि परिजितं भवति, एतैः संहननादिभिर्विधिना च तदुचित समाचारेण यः “समप्रः सम्पूर्णः । 'तपरची- नाम सिंह निकोडितादि तपःकर्मभावितः । निग्रहयुक्तः इन्द्रिय-व.षायाणां निग्रह- समर्थः । 'अपचन सारेऽभिगनार्थ. परिणामित प्रवचन रहस्यार्थ इति । किञ्च-यस्य गच्छान्नियू दस्य हिल पत्रिभागमात्रोऽपि नियू ढोऽहम्' इत्यशुभी भावों न विद्यते स नियूहिणाया: 'अर्हः योग्यः । शेषश्य एतद्गुण विकलस्य नियूदणा नाऽस्ति, न कर्तव्येत्यर्थः । एतैः-संहननादिभिर्गुणैः सम्पयुक्तः पाराञ्चिकाई स्थानप्राप्नोति । यः पुनरेतद्गुण विप्रमुक्तः ताशे' पाराचिनापत्ति प्राप्तेऽपि मूमने प्रायश्चित्त .. . 1 भवति । ६-अनवस्थाप्यम्- अनवस्थापरम -'यो हिआसेवितातिचार विशेपः सन्-अनाचरित तपोविशेषः तद्दोषोपरतो महाव्रतेषु ना .स्माते-नाधिक्रियते-असौ महानतेषु स्थापनाऽयोग्यः । नवमं वा प्रायश्चित्तस्थानम्अनवस्थाप्यमभिधीयते । ७-सम्भोग वृत्ति:- समान-समाचाराणां साधूनां सहभोजनं संभोगः । सच 'उपध्यादि भेदाद् द्वादशधा, तथाचाह--"दुवालसविहे संभोगे पएणतो, तं जहा- 'उबहिसुश्र भत्तपाणे अंजली परगहेत्तिय । दायणे य विकाए य, अमुट्ठाणेति आवरे ।। किइकम्मस्स य करणे, वेयावच्चार तेइ य । समोसरणं संनिसिज्जा य, कहाए य पबधणे ।। १ ।। समः ॥ २ . परस्परं वस्न पात्राद्युपधीनां भक्त पानयोश्च आदानप्रदानं साम्भोगिकस्या साम्भोगिकेनैव भवति, श्रुसिम्बन्धेतु सम्भोगिकस्य, प्रत्यसाम्भोगिकस्य बोपसम्पन्चस्य टिप्पणम् श्रुतस्य वाचना प्रच्छनादिकं विधिना कुर्वन्शुद्धएव । ४ अञ्जलिप्रग्रहः-वन्दनादिकम् । तथाहि 'साम्भोगिकानाम् अन्यसाम्भोगिकानां वा संविग्नानां चन्दनकं प्रणामः- सोऽञ्जलिप्रग्रहः' अर्थात् नमः क्षमाश्रमणेभ्य इति भणनम् । आलोचना-सूत्रार्थ- निमित्त निषद्याकरणं च कुर्वन् शुद्धः। ५ दानं-साम्भोगिकः--साम्भोगिकाय घनादिभिः शिष्यगणोपग्रहासमर्थे साम्भोगिके । अन्यसाम्भोगिकाय वा शिष्यगणं यच्छन , शुद्धः । ६ निकाचन-शय्योपध्याहारैः शिष्यगणप्रदानेन स्वाध्यायेन च साम्भोगिकः साम्भोगिकं निमन्त्रयन् शुद्धः । ७ अभ्युत्थानम्-श्रासनत्यादिरूप सत्कारः-अयमपरं सम्भोगासंभोगस्थानम् । कृतिकर्म-वन्दनकम् । ९ वैयावृत्यम् आहारोपधि दानादिना प्रश्रवणा पात्रक काद्यर्पणादिना अधिकरणोपशमनेन साहा- य्यदानेन वा उपष्टम्भकरणम्--उपकारकरणमित्यर्थः । १० समवसरणम्-व्याख्या- नादिपु यत्र बहवः साधवो मिलन्ति तत् समवसरणम् । ११ सन्निषद्या-एकस्मिन्न । वाऽऽसने सहोपवेशनम् । १२ कथाप्रवन्धः-बादादिकथानां धर्मकथाया वा सहेव करणम इति संक्षेपार्थः, विस्तरार्थस्तु सम्प्रदायादवलेयम् । " ८-स्थानायतिकाऽऽदिः- - स्थानायतं नाम ऊर्द्ध वस्थान रूपमायतं स्थानम् , तद्यस्यामस्ति सा स्थाना- यतिका । प्रतिमास्थायिन-प्रतिमया एक रानिक्यादिकया कायोत्सर्ग विशेषेणैव तिष्ठती. त्येवंशीलो यः स प्रतिमास्थायी। निपद्या-निपदनं निपद्या उपवेशन प्रकारः-सच उत्कुटुक-गोदोहिक-समपादपुत पर्व-अद्धपर्यफू भेदैः पञ्चविधाः । वीरासनं नाम यथा सिंहासने उपविष्टो भून्यस्तपाद श्रास्ते तथा तस्यायनयने जनेऽपि सिंहासन इय निविष्ठो मुक्त जानुक इव निरालम्यनेऽपियद् श्रास्ते । दुष्कर- चैतत् , अतएव वीरस्य साहसिकस्यासनं वीरासनमुच्यते, तद् अस्या अस्ति-इति यारासनिका।
पंचमं परिशिष्टम् हैं-पुलाक- तिविहं होइ पुलागं, धरणे गंधे य रसपुलाए य । चउगुरुगाऽऽयरिआई, 'समणीणुद्धद्दरगहणे ॥ त्रिविध पुलाकं भवति, तद्यथा-धान्यपुलाकं, गन्धपुलाकं रसपुलाकञ्च । अथ त्रीण्यपि धान्यपुलाकादीनि व्याचष्टे-- निप्फावाईधरणा, गंधे वा दिगपलंडु लसुणाई । खीरं तु रस पुलाओ, चिचिणिदक्खारसाईय ॥ निष्पावा वल्लास्तदादीनि धान्यानि पुलाकम् । तथा 'वाइग' विकटं, पलाण्डुल- शुने च प्रतीते, तदादीनि यानि उत्कट गन्धानि तद्गन्ध पुलाकम् । यत् पुनः क्षीरम् , ये च चिश्चिणिकाया गोस्तनिकाया रसो वा आदिशव्दादपरमपि यद् मुक्तमति- सारयति-तत्सर्वमपि रसपुलाकम् । अथ किमर्थमेतानि पुलाकान्युच्यन्ते ? इत्याह-- श्राहारिया असारा, करेंति वा संजमाउ णिस्सारं । निस्सारं च पवयणं, दद्रुतस्सेबिणि विति ॥ इह पुलाकमसारमुच्यते, तत श्राहारितानि बल्लादीनि यतोऽसाराणि सन्ति ततः पुलाकानि भण्यन्ते । संयमाद्वा संयममङ्गीकृत्य यतः क्षीरादीनि निस्सारां सावीं कुर्वन्ति, ततस्तान्यपि पुलाकानि, प्रवचनं वा निस्सारं, तेषां विकटादीनां सेवनशीलां संयतीं दृष्ट्वा जना त्रु वते ततस्तानि पुलाकान्युच्यन्ते । कल्पस्थितिः- कल्पः-श्राचार मर्यादा, सच जिनकल्प, स्थविरकल्पस्थितकल्पाऽस्थितकल्प भेदाबहु प्रकारः । शास्त्रोक्त प्रलम्बादिरूपो वा, तस्य समासतः षट् प्रकारा स्थिति:- मर्यादा भवति, अत उक्तं षड्विधा कल्पस्थितिः। सामायिक संयत कल्पस्थिति:- भरतैरावत क्षेत्रे मध्यवर्तितीर्थकृतां विदेह जिनानाचशासने सामायिक- * संघमो भवति, तस्य कवस्थितिः-सामायिक संयत कल्पस्थितिः, अत्र चाऽयं विशेप:- .११८ टिप्पणम सामायिकसंयमे हि चत्वारि नियतकल्पा: पडनियत कल्पाश्च भवन्ति । तत्र शय्यातर- पिण्ड-चतुर्याम-पुरुष ज्येष्ठकृतिकर्मरूपो चतुर्धानियतकल्पो वेदितव्यः । छेदोपस्था- पनीयं नाम पत्र संयमे पूर्वपर्यायस्य : छेदेन व्रतेपूपस्थापनम्-अारोपणं क्रियते तत्छेदोपस्थापनकम, तद् द्विधा सातिचार निरतिचारञ्च । त: निरतिचारं यद् इत्वर- सामायिकस्य शिष्यस्य-अारोप्यते । पार्श्वनाथ साधो पञ्चयामधर्मप्रतिपत्तौ । सातिचारम्-यन्मूलप्रायश्चितवतः--साधोभवति -साधोभवति । यथाचोक्तम्--परियायस्सछेओ, जत्थोवढानणंवएसुचछेदे । छेनोयडायणमिह तमणइयारेतरं दुविहं ।। सेहम्स निरइयारं तित्यंतर संकमेव तं होज । मूल गुंग घाइणो सा, इयारसुभयं च ठियकप्पे । सातिचारछेदस्य प्रथम-जिनशासने संवत्सररूपोत्कृष्टा तपोभूमिः, मध्यम तीर्थ- करतीर्थेऽष्टमासिकी, 'श्रीवीरतीर्थे च परमासिकी ज्ञातव्या। छेदोपस्थापनीयस्य दशधा कल्पस्थितिः, तद्यथा- आचेलक्कुद्देसिय-सिज्जायर-रायपिंड-कितिकम्मे । वत-जेड-पडिक्कमणे-मासं पज्जोसवण कप्पे । श्राचेलक्यम् १ प्रौदेशिक २ शय्यातरपिण्डः ३ राजपिण्डः ४ कृतिकर्म ५ व्रतानि ६ ज्येष्ठः । पुरुप ज्येष्ठो धर्मः ७ प्रतिक्रमणं ८ मासकल्पः ६ पर्युषणकल्पश्च सर्वेप्येतेकल्पाः प्रथम चरम जिनयोस्तीर्थे नियमतो भवन्तिः। ६ निविंशमानादि:- प्रथम चरम तीर्थकृच्छासने यदा केचिन्मुनयः परिहार विशुद्धिकल्पं प्रविशन्ति तेषां कल्पस्थिति:-निर्विशमानकल्पस्थितिः, अनचायं विधिः-तीर्थकृतां पादमूले ये विद्वांसः प्रस्तुतं कल्पं प्रतिपन्नास्तःएवाऽन्यास्तत्र कल्पे स्थापयन्ति । इदमत्रहृदयम् -.. इयमवाऽस्य कल्पस्य स्थितिर्चत् तीर्थकर समीपे वाऽमुंप्रतिपद्यन्ते, तीर्थंकर समीप- प्रतिपन्न साधु सकाशे चा, नाऽन्येपाम् । जघन्यतः सातिरेकाष्ट्रव थे प्रव्रज्यां गृहीत्वा विंशतिवरधीत-दृष्टिवादाः, परिणिपित ज्ञान-दर्शन-चारित्राः, जघन्यतोऽपि नवपूर्वविदः धृत्यादिगुणयुक्तास्ते कल्पमहन्ति । त्रिपुगणेषु अघन्येन सप्तविंशति पुरुपा भवन्ति, प्रत्येकस्मिन गणे नवभिः मुनिभिः