Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur

Granth-pariksha Bhag Iii

Mukhtar, Shri Yukt Pandit Jugalkishor · 2011/03

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"अन्ध-समीक्षा तृतीय भाव अर्थात सोमसेन निर्माचार, धर्मपरीक्षा (श्वेताम्बरी), अकलंक- प्रतिष्ठापाठ और पूज्यपाद-उपासकाचारके परीक्षा-लेखोंका संग्रह । जयपुर लेखक- श्रीयुत पंडित जुगलकिशोर मुख्तार सरसावा जि. सहारनपुर [अन्य परीक्षा प्रथम द्वितीय माग, उपासनातत्त्व, जिनपूजाधिकार-मीमांसा, विवाहसमुद्देश्य, विवाह-क्षेत्र-प्रकाश, स्वामीसमन्तभद्र (इतिहास), वीर-पुष्पांजलि, जैनाचार्योका शासनभेद, आदि अनेक ग्रन्यों के रचयिता, और जैनहितैपी आदि पत्रोंके भूतपूर्व सम्पादक प्रकाशक- जैन-नन्ध-रत्नाकर कार्यालय, हीरावाग, पो० गिरगांव-चम्बई । गादों, सं०, १९८५ विक्रम सितम्बर, सन् १९२८ मूल्य २॥)

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मनमल वारलीवाल
जैन-प्रत्य-रत्नाकर कार्यालय
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गुमन
बार दर्गाप्रगाद
दुर्गाना
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भूमिका। वांका जल जिस शुद्ध रूपमें वरसता है, उस रूपमें नहीं रहता; आकाशसे नीचे उतरते उतरते और जलाशयोंमें पहुँचते पहुँचते वह विकृत हो जाता है और इसके बाद तो उसमें इतनी विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि उनके मारे उसके वास्तविक स्वरूपका हृदयंगम कर सकना भी दुष्कर हो जाता है। फिर भी जो वस्तुतत्त्वके मर्मज्ञ हैं, पदा- थोंका विश्लेषण करनेमें कुशल या परीक्षाप्रधानी हैं, उन्हें उन सब विकृतियोंसे पृथक वास्तविक जलका पता लगानेमें देर नहीं लगती है। परमहितपी और परम वीतराग भगवान् महावीरकी वाणीको एक कविने जलवृष्टिकी उपमा दी है, जो बहुत ही उपयुक्त मालूम होती है। पिछले ढाई हजार वर्षांका उपलब्ध इतिहास हमें बतलाता है कि भग. वान्का विश्वकल्याणकारी समीचीन धर्म जिस रूपमें उपदिष्ट हुआ था, उसी रूपमें नहीं रहा, धीरे धीरे वह विकृत होता गया, ज्ञात और अज्ञातरूपसे, उसे विकृत कर- नेके बराबर प्रयल किये जाते रहे और अब तक किये जाते हैं । सम्प्रदाय, संघ, गण, गच्छ, आम्नाय, पन्थ आदि सब प्रायः इन्हीं विकृतियों के परिणाम हैं । भगवानका धर्म सबसे पहले दिगम्बर और श्वेताम्बर दो सम्प्रदायोंमें विभक हुआ, और उसके बाद मूल, यापनीय, द्रविड़, काष्ठा, माथुर, आदि नाना संघों और उनके गणों तथा गच्छोंमें विकृत होता रहा है। यह असंभव है कि एक धर्मके इतने भेद प्रभेद होते जायें और उसकी मूल प्रकृतिपर विकृतियोंका प्रभाव नहीं पड़े। यद्यपि सर्वसाधारण जन इन सम्प्रदायों और पन्योंके विकारसे विकृत हुए धर्मका वास्तविक शुद्ध स्वरूप अवधारण नहीं कर सकते हैं, परन्तु समय समयपर ऐसे विचारशील विवेकी महात्माओंका जन्म अवश्य होता रहता है जो इन सय विकारोंका अपनी रासायनिक और विदलेपक बुद्धिसे पृथकरण करके वास्तविक धर्मको स्वयं देख लेते हैं और दूसरोंको दिखा जाते हैं। जो लोग यह समझते हैं कि वर्तमान जैनधर्म ठीक वही जैनधर्म है जिसका उप- देश भगवान् महावीरकी दिव्यवाणीद्वारा हुआ था, उसमें जरा भी परिवर्तन, परिवर्तन या सम्मेलन नहीं हुआ है-अक्षरशः ज्योका त्यों चला आ रहा है, उन्हें धर्मात्मा या श्रद्वाल भले ही मान लिया जाय; परन्तु विचारशील नहीं कहा जा सकता । यह संभव है कि उन्होंने शानोंका अध्ययन किया हो, वे शास्त्री या पण्डित कहलाते हों; परन्तु शाष्ट्र पढ़ने या परीक्षायें देनेसे ही यह नहीं कहा जा सकता है कि वे इस विषय में कुछ गहरे पैठ सके हैं । जो लोग यह जानते हैं कि मनुष्य रागद्वेपसे युक्त हैं, अपूर्ण हैं और पर देश-कालका कल्पनातीत प्रभाव पड़ता है, वे इस यातपर कभी विश्वास नहीं करेंगे । उन- -- कि ढाई हजार वर्षके इतने लम्बे समय, इतने संबों और गण-गच्छोंकी खींचातानी में पड़ कर भी उनके द्वारा भगवान्के धर्ममें जरा भी रूपान्तर नहीं हुआ है। हमारे समाजके विद्वान् तो अभी तक यह माननेको भी तैयार नहीं थे कि जना- चार्यों में भी परस्पर कुछ मतभेद हो सकते हैं। यदि कहीं कोई ऐसे भेद नजर भाते धे, तो वे उन्हें अपेक्षाओंकी सहायतासे या उपचार आदि कह कर टाल देते थे; परन्तु अव 'ग्रन्यपरीक्षा के लेखक पण्डित जुगल किशोरजी मुख्तारने अपनी सुचिन्तित और सुपरीक्षित 'जैनाचार्योंका शासनभेद' * नामकी लेखमालामें इस बातको अच्छी तरह स्पष्ट कर दिया है कि जैनाचार्यों में भी काफी मतभेद थे, जो यह विश्वास करनेके लिए पर्याप्त है कि भगवानका धर्म गुरुसे अब तक ज्योंका त्यों नहीं चला आया है और उसके असली रूपके सम्बन्धमें मतभेद हो सकता है। संसारके प्रायः सभी धर्मों में रूपान्तर हुए हैं और वरावर होते रहते हैं। उदाहरणके लिए पहले हिन्दू धर्मको ही ले लीजिए । बटे बड़े विद्वान् इस चातको स्वीकार करते हैं कि जैनधर्म और बौद्धधर्मके जबर्दस्त प्रभावों में पढ़कर उसकी वैदिकी हिंसा' लुप्तप्राय हो गई है और वैदिक समय में जिस गौके बछड़े के मांससे ब्राह्मणोंका अतिथिसत्कार किया जाता था, (महोजं वा महोक्ष वा श्रोत्रियाय प्रकल्पयेत् ) वही आज हिन्दु- ओंकी पूजनीया माता है और वर्तमान हिन्दू धर्ममें गोहत्या महापातक गिना जाता है। हिन्दू अव अपने प्राचीन धर्मग्रन्थों में बतलाई हुई नियोगकी प्रथाको व्यभिचार और अनुलोम-प्रतिलोम विवाहांको अनाचार समझते हैं। जिस चौद्धधर्मने संसारसे जीव- हिंसाको उठा देनेके लिए प्रवल आन्दोलन किया था, उसीके अनुयायी तिव्यत और चीनके निवासी आज सर्वभक्षी बने हुए हैं-चूहे मुछ्दर, कीड़े व मकोड़े तक उनके लिए अखाद्य नहीं हैं ! महात्मा बुद्ध नीच ऊँचके भेदभावसे युक्त वर्णव्यवस्थाके परम विरोधी थे; परन्तु आज उनके नेपालदेशवासी अनुयायी हिन्दुओंके ही समान जातिभेदके रोगसे ग्रसित हैं । महात्मा कबीर जीवन भर इस अध्यात्मवाणीको सुनाते रहे कि- जात पाँत पूछे नहिं कोई, हरिको भजै सो हरिका होई। परन्तु आज उनके लाखों अनुयायी जातिपाँतिके कीचड़में अपने अन्य . पड़ौति- योंके ही समान फँसे हुए हैं। इस ऊँच-नीचके भेदभावकी वीमारीसे तो सुदूर यूरोपसे आया हुआ ईसाई धर्म भी नहीं बच सका है। पाठकोंने सुना होगा कि मद्रास प्रान्तमें ब्राह्मण ईसाइयोंके गिरजाघर जुदा और शुद्र ईसाइयोंके गिरिजाधर जुदा है और वे एक दूसरेको घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं। ऐसी दशा में यदि हमारे जैनधर्ममें देशकालके प्रभा- * यह लेखमाला अव मुख्तारसाहवके द्वारा संशोधित और परिवर्द्धित होकर जैन- ग्रन्थरत्नाकर कार्यालय बम्बईद्वारा पुस्तकाकार प्रकाशित हो गई है।

३ से और अपने पड़ौसी धमाके प्रभावसे कुछ विकृतियाँ घुस गई हों, तो इसपर किसी. को आश्चर्य नहीं होना चाहिए । इन विकृतियों में कुछ विकृतियाँ इतनी स्थूल हैं कि उन्हें साधारण बुद्धिके लोग भी समझ सकते हैं । यथा- जैनधर्मसम्मत वर्णव्यवस्थाके अनुसार जिसका कि आदिपुराणमें प्रतिपादन किया गया है, प्रत्येक वर्णके पुरुष अपनेसे यादके सभी वर्गोंकी कन्याओंके साथ विवाह कर सकते हैं, बल्कि धर्मसंग्रहश्रावकाचारके अनुसार तो पहलेके तीन वर्षों में परस्पर अनुलोम और प्रतिलोम दोनों ही क्रमोंसे विवाह हो सकता है और पुराणप्रन्योंके उदाहरणोंसे इसकी पुष्टि भी होती है *; परन्तु पर्तमान जैनधर्म तो एक वर्णको जो सैकड़ों जातियाँ बन गई हैं और जैनधर्मका पालन कर रही हैं, उनमें भी परस्पर विवाह करना पाप बतलाता है और इसके लिए उसके बड़े बड़े दिग्गज पण्डित शास्त्रोंसे खींच तानकर प्रमाण तक देनेकी धृष्टता करते हैं । क्या यह विकृति नहीं है ? २-भगवजिनसेनके आदिपुराणकी ‘वर्णलाभक्रिया' के अनुसार प्रत्येक अजै- नको जैनधर्मकी दीक्षा दी जा सकती है और फिर उसका नया वर्ण स्थापित किया जा सकता है, तथा उस नये वर्णमें उसका विवाहसम्बन्ध किया जा सकता है । उसको उसके प्राचीन धर्मसे यहाँ तक जुदा कर डालनेकी विधि है कि उसका प्राचीन गोत्र भी बदल कर उसे नये गोत्रसे अभिहित करना चाहिए । परन्तु वर्तमान जैनधर्मके ठेके. दारोंने भोली भाली जनताको सुधारकोंके विरुद्ध भड़काने के लिए इसी घातको एक हथि- यार बना रक्खा ह कि देखिए, ये मुसलमानों और ईसाइयोंको भी जैनी बनाकर उनके साथ रोटी-बेटी व्यवहार जारी कर देना चाहते हैं । मानो मुसलमान और ईसाई मनुष्य ही नहीं हैं। क्या यह विकृति नहीं है ? क्या भगवान् महावीरका विश्वधर्म इतना ही संकीर्ण था ? लब्धिसारकी १९५ वी गाथाको टीकासे स्पष्ट मालूम होता है कि म्लेच्छ देशसे आये हुए म्लेच्छ पुरुष भी मुनिदीक्षा ले सकते थे और इस तरह मुक्तिप्राप्तिके अधिकारी बनते थे। विषयको अच्छी तरह समझनेके लिए पंडित जुगलकिशोर मुख्तारकी लिखी हुई 'विवाहक्षेत्रप्रकाश' नामकी पुस्तक और मेरा लिखा हुआ 'वर्ण और जातिभेद ' नामका निबन्ध देखिए । यह निबन्ध शीघ्र ही प्रकाशित होनेवाला है । + म्लेच्छभूमिजमनुष्याणां सकलसंयमग्रहणं कथं संभवतीति नाशंकितव्यं । दिग्वि- जयकाले चक्रवर्तिना सह आर्यखण्डमागतानां म्लेच्छराजानां चकवादिभिः सह जात- वैवाहिकसम्बन्धानां संयमप्रतिपत्तेरविरोधात् । अथवा तत्कन्यकानां चक्रवर्त्यादिपरिणीतानां गर्भेपूत्पन्नस्य मातृपक्षापेक्षया म्लेच्छव्यपदेशभाजः संयमसंभवात् तथाजातीयकानां दीक्षाहत्वे प्रतिषेधाभावात् ॥ १९५ ॥ पृष्ठ २४१.! . .

३-सारत्रयके प्रसिद्ध टीकाकार जयसेनहरिके कथनानुसार सत्-शूद्र भी मुनि- दीक्षा ले सकते हैं * । परन्तु वर्तमान जैनधर्म तो शूद्रोंको इसके लिए सर्वथा अयोग्य समझता है । शूद्र तो खैर बहुत नीची दृष्टिसे देखे जाते है; परन्तु उन दक्षिणी जैनियों के भी मुनिदीक्षा लेने पर कोलाहल मचाया जाता है जिनके यही विधवाविवाह होता है। उदार जैनधर्मपर इस प्रकारकी विकृतियाँ क्या लाञ्छनस्वरूप नहीं है ? जैसा कि प्रारंभमें कहा जा चुका है, इन विकृतियोंको पहिचान करके असली धर्मको प्रकाशमें लानेवाली विभूतियाँ समय समय पर होती रहती है। सारत्रयके कर्ता आचार्य कुन्दकुन्द ऐसी ही विभूतियोंमसे एक थे। वर्तमान दिगम्बर संप्रदायके अधि- कांश लोग अपनेको कुन्दकुन्दकी आम्नायका बतलाते हैं । मालूम नहीं, लोगोंका कुन्द- कुन्दाम्नाय और कुन्दकुन्दान्वयके सम्बन्धमें क्या खयाल है; परन्तु मैं तो इसे जैनधर्ममें उस समय तक जो विकृतियाँ हो गई थी उन सबको हटाकर उसके वास्तविक स्वरूपको आविष्कृत करके सर्व साधारणके समक्ष उपस्थित करनेवाले एक महान् आचार्यके अनु- यायियोंका सम्प्रदाय समझता हूँ। भगवान् कुन्दकुन्दके पहले और पीछे अनेक बड़े बड़े आचार्य हो गये हैं, उनकी आम्नाय या अन्वय न कहलाकर कुन्दकुन्दकी ही आनाय या अन्वय कहलानेका अन्यथा कोई वलपत्कारण दृष्टिगोचर नहीं होता है । मेरा अनुमान है कि भगवत्कुन्दकुन्दके समय तक जैनधर्म लगभग उतना ही विकृत हो गया था, जितना वर्तमान तेरहपन्थके उदय होनेके पहले भट्टारकोंके शासन-समयमें हो गया था और उन विकृतियोंसे मुक्त करनेवाले तथा जैनधर्मके परम वीतराग शान्त मार्गको फिरसे प्रवर्तित करनेवाले भगवान् कोण्डकुण्ड ही थे। परन्तु समयका प्रभाव देखिए कि वह संशोधित शान्तमार्ग भी चिरकाल तक शुद्ध न रहा, आगे चलकर वही भट्टारकोंका धर्म वन गया। कहाँ तो तिल-तुष मात्र परिग्रह रखनेका भी निषेध और कहाँ हाथी घोड़े और पालकियोंके ठाठवाट ! घोर परिवर्तन हो गया ! जव कुन्दकुन्दान्वयी शुद्ध मार्ग धीरे धीरे इतना विकृत हो गया-विकृतिकी पराकाष्ठापर पहुँच गया, तव कुछ विवेकी और विश्लेषक विद्वानोंका ध्यान फिर इस ओर गया और जैसा कि मैंने अपने 'वनवासियों और चैत्यवासियोंके सम्प्रदाय या तेरह- पन्य और वीसपन्थ' +शीर्पक विस्तृत लेखमें वतलाया है, विक्रमकी सत्रहवीं शताब्दिमें स्वर्गीय पं० वनारसीदासजीने फिर एक संशोधित और परिष्कृत मार्गकी नीव डाली, जो पहले 'वाणारसीय' या 'बनारसी-पन्य' कहलाया और आगे चल कर तेरहपन्थके - * ...एवं गुणविशिष्टपुरुपो जिनदीक्षाग्रहणे योग्यो भवति । यथायोग्यं सच्छूद्राद्यपि -प्रवचनसारतात्पर्यवृत्ति, पृष्ठ ३०५ । + देखो, जैनहितषी भाग १४, अंक ४ ।

नामसे प्रसिद्ध हुआ है । इस पन्यने और इसके अनुयायी पं० टोडरमल्लजी, पं० जयच न्दजी, पं० दौलतरामजी, पं० सदामुखजी, पं० पन्नालालजी दूनीवाले आदि विद्वानोंने जो साहित्य निर्माण किया और जिस शुद्धमार्गका प्रतिपादन किया, उसने दिगम्बरसम्प्र. दायमें एक बड़ी भारी क्रान्ति कर डाली और उस क्रान्तिका प्रभाव इतना वेगशाली हुआ कि उससे जैनधर्मके शिथिलाचारी महन्तों या भट्टारकोंके स्थायी समझे जानेवाले सिंहासन देखते देखते धराशायी हो गये और कई सौ वाँसे जो धर्मके एकच्छत्रधारी सम्राट् बन रहे थे, वे अप्रतिष्ठाके गहरे गढ़ेमें फेंक दिये गये। भट्टारकोंका उक्त विकृत मार्ग कितना पुराना है, इसका अनुमान पण्डितप्रवर आशा. घरद्वारा उद्धृत इस वचनसे होता है- पण्डितैर्मएचारित्रः पठरैश्चतपोधनः। शासनं जिनचन्द्रस्य निर्मलं मलिनीकृतम् ॥ अर्थात् भ्रष्टचरित्र पण्डितों और वठर साधुओं या भट्टारकोंने जिन भगवान्का निर्मल शासन मलीन कर डाला। पं० आशाधरजी विक्रमकी तेरहवीं शताब्दिके अन्तमें मौजूद थे और उन्होंने इस श्लोकको किसी अन्य ग्रन्थसे उद्धृत किया है । अर्थात् इससे भी यहुत पहले भगवान् महावीरके शासनमें अनेक विकृतियाँ पैठ गई थीं। तेरहपन्यके पूर्वोक मिशनने जैनधर्मकी विकृतियोंको हटाने और उसके शुद्ध स्वरूपको प्रकट करनेमें जो प्रशंसनीय उद्योग किया है, यह चिरस्मरणीय रहेगा । यदि इसका उदय न हुआ होता, तो आज दिगम्बर जैनसमाजकी क्या दुर्दशा होती, उसकी कल्पना भी नहीं हो सकती है । वागड़ प्रान्तमें दौरा करनेवाले बम्बई जैन प्रान्तिक समाके एक उपदेशकने कोई १०-१२ वर्ष हुए मुझसे कहा था कि कुछ समय पहले यहाँके श्रावक शास्त्रत्वाध्याय आदि तो क्या करेंगे, उन्हें जिन भगवान्की मूर्तिका अभिषेक और प्रक्षाल फरनेका भी अधिकार नहीं था। महारकजीके शिष्य पण्डितजी ही जब कभी आते थे, यह पुण्यकार्य करते थे और अपनी दक्षिणा लेकर चले जाते थे। कहते थे, तुम बाल-बचोंवाले अब्रह्मचारी लोग + मुप्रसिद्ध श्वेताम्यर साधु श्रीमेघविजयजी महोपाध्यायने अपना 'युक्तिप्रबोध नामका प्राकृत अन्य स्वोपज्ञ संस्कृतटीकासहित इस 'वाणारसीय' मतके राण्डनके लिए ही विक्रमकी अठारहवीं शताब्दिके प्रारंभमें बनाया था-"चोच्छं सुयणहितत्यं पाणारसियस्स मयमेयं ।'-मुजोंके हितार्थ चाणारसी मतका भेद कहता हूँ । इस प्रन्यमें इस मतकी उत्पत्तिका समय विक्रमसंवत् १६८० प्रकट किया है । यथा- सिरिविक्कमनरनाहागपाहिं सोलहसपहियासेहिं । असि उत्तरोई जायं वाणारसिअस्स मयमेयं ॥ १८॥ --- , । भगवान्की प्रतिमाका स्पर्श कैसे कर सकते हो ? और यह तो अभी कुछ ही वाँकी वात है जव भट्टारकोंके कर्मचारी श्रावकोंसे मारमारकर अपना टैक्स वसूल करते थे तथा जो श्रावक उनका वार्षिक टैक्स नहीं देता था, वह बँधवा दिया जाता था हम आज भले ही इस वातको महसूस न कर सकें; परन्तु एक समय था, जब समूचा दिगम्बर जैन समाज इन शिथिलाचारी साथ ही अत्याचारी पोपोंकी पीडित प्रजा था और इन पोपोंके सिंहासनको उलट देनेवाला यही शक्तिशाली तेरहपन्य था। यह इसीकी कृपाका फल है, जो आज हम इतनी स्वाधीनताके साथ धर्मचर्चा करते हुए नजर आ रहे हैं। तेरहपन्थने भट्टारको या महन्तोंकी पूजा-प्रतिष्टा और सत्ताको तो नष्टप्राय कर- दिया; परन्तु उनका साहित्य अव भी जीवित है और उसमें वास्तविक धर्मको विकृत कर देनेवाले तत्त्व मौजूद है। यद्यपि तेरहपन्थी विद्वानोंने अपने भाषाग्रन्थोंके द्वारा और ग्राम ग्राम नगर नगरमें स्थापित की हुई शास्त्रसभाओंके द्वारा लोगों को इतना सजग और सावधान अवश्य कर दिया है कि अब वे शिथिलाचारकी बातोंको सहसा माननेके लिए तैयार नहीं होते हैं और वे यह भी जानते हैं कि भेपी पाखण्डियोंने वास्तविक धर्मको बहुतसी मिथ्यात्वपोपक वातोंसे भर दिया है; फिर भी संस्कृत ग्रन्थोंके और अपने पूर्व कालीन बड़े बड़े मुनि तथा आचार्योंके नामसे वे अव भी टगाये जाते हैं। बेचारे सरल प्रकृतिके लोग इस वातकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि धूर्त लोग आचार्य भद्रबाहु, कुन्दकुन्द, उमास्वाति, भगवजिनसेन आदि बड़े बड़े पूज्य मुनिराजोंके नामसे भी ग्रन्थ वनाकर प्रचलित कर सकते हैं ! उन्हें नहीं मालूम है कि संस्कृतमें जिस तरह सत्य और महान् सिद्धान्त लिखे जा सकते हैं, उसी तरह असत्य और पापकथायें भी रची जा सकती हैं ! अतएव इस ओरसे सर्वथा निश्चिन्त न होना चाहिए। लोगोंको इस संस्कृतभक्ति और नामभक्तिसे सावधान रखनेके लिए और उनमें परीक्षाप्रधानताकी भावनाको दृढ बनाये रखनेके लिए अब भी आवश्यकता है कि तेरहपन्यके उस मिशनको जारी रक्खा जाय जिसने भगवान् महावीरके धर्मको विशुद्ध बनाये रखनेके लिए अव. तक निःसीम परिश्रम किया है। हमें सुहृद्वर पण्डित जुगल किशोरजी मुख्तारका चिर कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने अपनी 'ग्रन्थ परीक्षा' नामक लेखमाला और दूसरे समर्थ लेखों- द्वारा इस मिशनको वरावर जारी रक्खा है और उनके अनवरत परिश्रमने भट्टारकोंकी गद्दियोंके समान उनके साहित्यके सिंहासनको भी उलट देने में कोई कसर वाकी नहीं . रक्खी है। लगभग १२ वर्षके वाद 'ग्रन्थपरीक्षा' का यह तृतीय भाग प्रकाशित हो रही है जिसका परिचय करानेके लिए मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ। पिछले दो भागोंकी . अपेक्षा यह माग बहुत-बदा है, और यहीं सोचकर यह इतने विस्तृत रूपमें लिखा गया है. कि अब इस विषयपर और कुछ लिखनेको आवश्यकता न रहे। भट्टारकी साहित्यके प्रायः सभी अंग प्रत्यंग इसमें अच्छी तरह वधाइकर दिखला दिये हैं. और जैनधर्मको विकृत करनेके लिए. भट्टारकोंने. जो जो जघन्य और निन्या प्रयत्न किये हैं, वे प्रायः सभी इसके द्वारा सष्ट हो गये हैं। 'मुख्तारसाहक्ने इन लेखोंको, विशेषकरके सोमसेन त्रिवणांचारकी परीक्षाको, कितने परिश्रमसे लिखा है और यह उनकी कितनी बड़ी तपस्याका फल है, यह बुद्धि- मान् पाठक इसके कुछ ही पृष्ठ पढ़कर जान लेंगे । मैं नहीं जानता हूँ कि पिछले कई सौ वोंमें किसी भी जैन विद्वानने कोई इस प्रकारका समालोचक अन्य इतने परिश्रमसे लिखा होगा और यह यात तो विना किसी हिचकिचाहटके कही-जा सकती है कि इस प्रकारके परीक्षालेख जैनसाहित्यमें सबसे पहले हैं और इस यातकी सूचना देते हैं कि. जैनसमाजमें तेरहपन्यद्वारा स्थापित परीक्षाप्रधानताके भाव नष्ट नहीं हो गये हैं। वे अब और भी वेजीके साथ बढ़ेंगे और उनके द्वारा मलिनीकृत जैनशासन फिर अपनी प्राचीन निर्मल. ताको प्राप्त करने में समर्थ होगा। विद्वज्जनवोधक आदि प्रन्योंमें भी भट्टारकोंके साहित्यकी परीक्षा की गई है और उसका खण्डन किया गया है; परन्तु उनके लेखकोंके पास जाँच करनेकी केवल एक ही कसौटी थी कि अमुक विधान वीतराग मार्गके अनुकूल नहीं है, अथवा वह अमुक बड़े आचार्यके मतसे विरुद्ध है और इससे उनका खण्डन बहुत जोरदार न होता था; क्योंकि श्रद्धाल फिर भी कह सकता था कि यह भी तो एक आचार्यका कहा हुआ है, अथवा यह विषय किसी ऐसे पूर्वाचार्यके अनुसार लिखा गया होगा जिसे हम नहीं जानते हैं। परन्तु ग्रन्थ-परी- क्षाके लेखक महोदयने एक दूसरी मलयपूर्व कसौटी प्राप्त की है जिसकी पहलेके लेख- फोंको कल्पना भी नहीं थी और वह यह कि उन्होंने हिन्दुओंके स्मृतिप्रन्यों और दूसरे फर्मकाण्डीय प्रन्योंके सैकों श्लोकोंको सामने उपस्थित करके यतला दिया है कि उक प्रन्योर्मसे पुरा चुरा कर और उन्हें तोड़-मरोडकर सोमसेन आदिने ये अपने अपने 'मान- मौके पुनये तैयार किये हैं। जाँच करनेका यह ढंग बिल्कुल नया है और इसने जैन- धर्मका तुलनात्मक पद्धति से अध्ययन करनेवालोंके लिए एक नया मार्ग खोल दिया है। ये परीक्षाटेस इतनी सावधानीसे और इतने अफाट्य प्रमाणों के मापारसे लिये गये हैभिमीतक उन लोगों की बोरसे जोकि निवनांचारादि महारकी साहित्यके परम पुरस्कृती और प्रचारक है, इनकी एक पंफिका भी मण्डन नहीं किया गया है और न अप इसकी माशा ही है । प्रन्यपरीक्षा के पिछले दो मागोंको प्रभावित हुए ठगमग एक युग (१२ वर्ष) पीत गया। उस समय एफ दो पम्हितमन्योन इधर उधर पोषणायें की थी कि हम उनका राग्न लिरोंगे; परन्तु ये अय तक लिरा ही रहे हैं। यह तो असंभव है कि टेसोका खण्डन लिखा जा सकता और फिर भी पण्डितोंका दलका दल चुपचाप बैठा रहता; परन्तु वात यह है कि इनपर कुछ लिखा ही नहीं जा सकता। थोड़ी बहुत पोल होती, तो वह ढंकी भी जा सकती; परन्तु जहाँ पोल ही पोल है, वहाँ क्या किया जाय ? गरज यह कि यह लेखमाला प्रतिवादियोंके लिए लोहे के बने हैं, यह सब तरहसे सप्रमाण और युक्तियुक्त लिखी गई है। मुझे विश्वास है कि जैनसमाज इस लेखमालाका पूरा पूरा आदर करेगा और इसे पढ़ कर जैनधर्ममें घुसे हुए मिथ्या विदवासों, शिथिलाचारों और अर्जन प्रवृत्तियोंको पहिचाननेकी शक्ति प्राप्त करके वास्तविक धर्मपर आरूढ़ होगा। मेरी समझमें इस लेखमालाको पढ़कर पाठकोंका ध्यान नीचे लिखी हुई बातोंकी ओर आकर्पित होना चाहिए:- १-किसी अन्यपर किसी जैनाचार्य या विद्वानका नाम देखकर ही यह निश्वय न कर लेना चाहिए कि वह जैनप्रन्य ही है और उसमें जो कुछ लिखा है वह सभी भगवानकी वाणी है। २-भट्टारकोंने जैनधर्मको बहुत ही दूपित किया है। वे स्वयं ही भ्रष्ट नहीं हुए थे, जैनधर्मको भी उन्होंने भ्रष्ट करनेका प्रयत्न किया था। यह प्रायः असंभव है कि जो स्वयं भ्रष्ट हो, वह अपनी भ्रष्टताको शास्त्रोक्त सिद्ध करनेका कोई स्पष्ट या अस्पष्ट प्रयत्न न करे। ३-भट्टारकोंके पास विपुल धनसम्पत्ति थी। उसके लोभसे अनेक ब्राह्मण उनके शिष्य बन जाते थे और समय पाकर वे ही भट्टारक वनकर जैनधर्मके शासक पदको प्राप्त कर लेते थे। इसका फल यह होता था कि वे अपने पूर्वके ब्राह्मणत्वके संस्कार ज्ञात और अज्ञात रूपसे जैनधर्ममें प्रविष्ट करनेका प्रयत्न करते थे। उनके साहित्यमें इसी कारण अजैन संस्कारोंका इतना प्रावल्य है कि उसमें वास्तविक जैनधर्म विल्कुल छुप गया है। ४-सुना गया है कि भट्टारक लोग ब्राह्मणोंको नौकर रखकर उनके द्वारा अपने नामसे ग्रन्थरचना कराते थे। ऐसी दशामें यदि उनके साहित्यमें जैनधर्मकी कलई किया हुआ ब्राह्मण साहित्य ही दिखलाई दे, तो कुछ आश्चर्य न होना चाहिए। ५-इस वातका निश्चय करना कठिन है कि भट्टारकोंके साहित्यका कबसे प्रारंभ हुआ है; इसलिए अव हमें इस दूधसे जलकर छाँछको भी फूंक फूंककर पीना चाहिए। हमें अपनी एक ऐसी विवेककी कसौटी वना लेनी चाहिए जिसपर हम प्रत्येक ग्रन्यको कस सकें। जिस तरह हमें किसी बड़े आचार्यके नामसे भुलावेमें न पड़ना चाहिए, उसी तरह प्राचीनताके कारण भी किसी ग्रन्यपर विश्वास न कर लेना चाहिए। - ६-संस्कृतके विद्यार्थियों, पण्डितों तथा शास्त्रियोंका ध्यान इन लेखमालाओंक द्वारा तुलनात्मक पद्धतिकी ओर आकर्षित होना चाहिए और उन्हें प्रत्येक विषयका अध्ययन खूब परिश्रमसे करनेकी आदत डालनी चाहिए। ये परीक्षा लेख बतलाते हैं कि परिश्रम करना किसे कहते हैं। -अभी जरूरत है कि और अनेक विद्वान् , इस मार्गपर काम करें। महारकोंके रचे हुए कथाप्रन्य और चरितप्रन्य बहुत अधिक हैं। उनका भी वारीकीसे अध्ययन किया जाना चाहिए और जिन प्राचीन ग्रन्योंके आधारसे वे लिखे गये हैं, उनके साथ उनका मिलान किया जाना चाहिए। भट्टारकोंने ऐसी भी वीसों कथायें स्वयं गढ़ी हैं जिनका कोई मूल नहीं है। अन्तमें मुहद्धर पण्डित जुगल किशोरजीको उनके इस परिश्रमके लिए अनेकशः धन्यवाद देकर मैं अपने इस वक्तव्यको समाप्त करता हूँ। सोमसेन त्रिवर्णाचारकी यह 'परीक्षा उन्होंने मेरे ही भामह और मेरी ही प्रेरणासे लिखी है, इस लिए मैं अपनेको सामाग्यशाली समझता हूँ। क्योंकि इससे जैनसमाजका जो मिथ्याभाव हटेगा, उसका एक छोटासा निमित्त मैं भी हूँ। इति । मुलण्ड (ठाणा) मादकृष्ण २, सं० १९८५ निवेदक- नाथूराम प्रेमी।

विषय-सूची ... .. ... , विषय पृष्ठ १ भूमिका १ से९ २ सोमसेन-त्रिवर्णाचारकी परीक्षा ... १ से २३६ प्राथमिक निवेदन ग्रंथका संग्रहत्व अंजैन ग्रंथोसे संग्रह प्रतिज्ञादि-विरोध-भगवजिनसेनप्रणीत आदिपुराणके विरुद्ध कथन ४९ ज्ञानार्णव ग्रंथके विरुद्ध कवन दूसरे विरुद्ध कथन-(देव, पितर और ऋपियोंका घेरा, २ दन्तधावन करनेवाला पापी, ३ तेल मलनेकी विलक्षण फलघोषणा, ४ रविवार के दिन नानादिकका निषेध, ५ घरपर ठंडे जलसे स्नान न करनेकी आज्ञा, ६-८ शूद्रत्वका अद्भुत योग, ९ नरकालयमें वास, १० नमकी विचित्र परिभापा, ११ अधौतका अद्भुत लक्षण, १२ पतिके विलक्षण धर्म, १३ आसनकी अनोखी फलकल्पना; १४ जूठन न छोड़नेका भयंकर परिणाम, १५ देवताओंकी रोक थाम, १६ एक चत्रमें भोजन-भजनादिपर आपत्ति, १७ सुपारी खानेकी सजा, १८ जनेऊकी अजीव करामात, १९ तिलक और दर्भके वधुए, २० सूतककी विडम्बना, २१ पिप्पलादि पूजन, २२ वैधव्ययोग और अर्क- विवाह, २३ संकीर्णहृदयोद्वार, २४ ऋतुकालमें भोग न करनेवालोंकी गति, २५ अश्ली- लता और अशिष्टाचार, २६ त्याग या तलाक, २७ स्त्री-पुनर्विवाह, २८ तर्पण श्राद्ध और पिण्डदान ।) उपसंहार २३४ ३ धर्मपरीक्षा (श्वेताम्बरी)की परीक्षा २३७ ४ अकलंक-प्रतिष्ठापाठकी जाँच २५४ ५ पूज्यपाद-उपासकाचारकी जाँच २६० ग्रन्थ परीक्षा। (तृतीय भाग) :-सोमसेन-त्रिवर्णाचार की परीक्षा . छ वर्ष हुए मैंने 'जैन हितैषी' में 'अन्य परीक्षा : नाम की एक लेखमाला निकालनी प्रारम्भ की थी, कु जो कई वर्ष तक जारी रही और जिसमें (१). उगास्यामि श्रावकाचार (२) कुन्दकुन्द श्रावका- चार ('३.) जिनसेन त्रिवर्णाचार, (४) भद्र- बाहु संहिता और (५:) धर्म परीक्षा (श्वेताम्बर ) नागक प्रयों पर: विस्तृत मालोचनात्मक:निबन्ध लिखे गये और उनके द्वारा, गहरी खोज तथा जाँच के बाद, इन, ग्रंथों की असलियत को खोल कर सर्व साधारण के सामने रखा गया और यह सिद्ध किया गया कि ये सब. * कलंफ-प्रतिष्ठा पाठ, नेमिचन्द्र संहिता (प्रतिष्ठा तिलक) और पूज्यपाद-उपासकाचार नाम के प्रन्यों पर भी छोटे छोटे लेख लिये गये, जिनका उद्देश्य प्रायः ग्रन्य फर्ता और अन्य के निर्माण- समयादि:पिपयक नासमझी को दूर करना एा और उनके द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि ये प्रन्य क्रमशः तत्वार्थ राज्यार्तिक के कती भट्टाकलंदिप, गोम्मटसार के प्रणेता धान मिचन्द्र सिद्धान्तचायती और मपाधसिद्धि के रचयिता श्री पूज्यपादाचार्य के बनाये हुए नदी।

, [२ ] ग्रंथ जाली तथा बनावटी हैं और इनका अवतार कुछ तुद् पुरुषों अथवा तस्वर लेखकों द्वारा आधुनिक भट्टारकी युग में हुआ है। इस लेखमाला ने समाज को जो नया सन्देश सुनाया, जिस भूल तथा गफलत का अनुभव कराया, अन्धश्रद्धा की जिस नींद से उसे जगाया और उसमें जिस विचारस्वातंत्र्य तथा तुलनात्मक पद्धति से ग्रंथों के अध्ययन को उत्तेजित किया, उसे यहाँ बतलाने की जरूंरत नहीं है, उसका अछा अनुभव उक्त लेखों के पदने से ही सम्बंध रखता है। हाँ इतना जरूर बतलाना होगा कि इस प्रकार की लेखमाला उस वक्त जैन समाज के लिये एक बिलकुल ही नई चीज़ थी. इसने उसके विचार वातावरण में अच्छी क्रान्ति उत्पन्न की, सहृदय विद्वानों ने इसे खुशी से अपनाया, इसके अनेक लेख दूसरे पत्रों में उद्धृत किये गये, अनुमोदन किये गये, मराठी में अनुवादित हुए और अलग पुस्तकाकार भी छपाये गये * । स्थाद्वादवारिधि पं० गोपालदासजी वरैय्या ने, जिनसेन त्रिवर्णाचार की परीक्षा के बाद से, त्रिवर्णाचारों को अपने विद्यालय के पठनझम से निकाल दिया और दूसरे विचारशील विद्वान् भी उस वक्त से बराबर अपने कार्य तथा व्यवहार के द्वारा उन लेखों की उपयोगितादि को स्वीकार करते अथवा उनका अभिनंदन करते आ रहे हैं। और यह सब उक्त लेखमाला की सफलता का अच्छा परिचायक है। उस वक्त-जिनसेन त्रिवर्णाचार की परीक्षा लिखते समय मैंने यह प्रगट किया था कि 'सोमसेन-त्रिवर्णा- चार की परीक्षा भी एक स्वतंत्र लेख द्वारा की जायगी। परंतु खेद है कि अनवकाश के कारण इच्छा रहते भी, मुझे माज तक उसकी परीक्षा , * बम्बई के जैन ग्रन्धरत्नाकर कार्यालय ने 'प्रन्थ परीक्षा' प्रथम भाग और द्वितीय भाग नाम से, पहले चार ग्रन्थों के लेखों को दो भागों में छाए र प्रकाशित किया है और उनका लागत मूल्य क्रमशः छह मान तथा चार पाने वा ।

- परंतु कुछ लिखने का कोई असर नहीं मिल सका । मैं उस वक्त से बराबर ही दूसरे जसरी कामों से घिरा रहा हूँ। आज भी मेरे पास, यद्यपि, इसके लिये काफी समय नहीं है--दूसरे अधिया जरूरी कामों को देर या देर सामने पड़ा हुवा है और उसकी चिंता हृदय को व्यथित कर रही है- अर्से से कई मित्रों का यह लगातार पाना चल रहा है कि इस त्रिवर्णाचार की शीघ्र परीक्षा कीजाय । वे भान कल इसकी परीक्षा को खास तौर से आवश्यक महसूस कर रहे हैं और इसलिये भाज उसी का यत्किंचित् प्रयत्न किया जाता है। इस त्रिवर्णाचारका दूसरा नाम 'धर्म-रसिक' ग्रंप भी है और यह सेरह अध्यायों में विभाजित है। इसके कर्ता सोमसेन, यद्यपि, अनेक पद्यों में अपने को 'मुनि', 'गणी' और 'मुनीन्द्र' तक लिखते हैं * परन्तु वे वास्तव में उन माधुनिक भट्टारकों में से थे जिन्हें शिपिलाचारी और परिमहधारी 'साधु अथवा श्रमणामास याहते हैं। और इसलिये उनके विषय में बिना किसी संदेह के यह भी नहीं कहा जा सकता कि वे पूर्णरूप से श्रावक की ७ वी प्रतिमा के भी. धारक थे। उन्होंने अपने को पुष्कर गच्छ के भधारक गुणमदसूरिका पट्टशिष्य लिखा है और साथ ही महेन्द्रकीर्ति गुरु का जिस रूप से उल्लेख किया है उससे यह जान पड़ता है कि इनके विद्या गुरु थे । भट्टारक सोमसेनजी कब हुए हैं और उन्होंने किस सन् सम्बत् में इस ग्रंथ की रचना की है, इसका अनुसन्धान करने के लिये कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं है। स्वयं भट्टारकजी ग्रंप के अंत में लिखते हैं- . -- *वधा:- "श्रीमहारक सोमसेग मुनिभिः "॥२-१९५॥ ...धीमहारक सोमसेन गणिना"||४-२१७ ॥ :"पुण्याश्लिीः सोमसेनैर्मुनीन्दैः॥ -११८ ।।

[४] अब्दे तत्वरसर्तुचन्द्रकलिते श्रीविक्रमादित्यजे मासे कार्तिकनामनीह धवले पक्ष शरत्संभवे । वारेभास्वति सिद्धनामनि तथा योगेसुपूर्णातिथौ । नक्षत्रेऽश्विनिनान्नि धर्मरसिको अन्यश्च पूर्णीकृतः ॥२१७॥ अर्थातू-यह धर्म रसिक ग्रंथ विक्रम सं० १६६५ में कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा को रविवार के दिन सिद्ध योग और अश्विनी नक्षत्र में बनाकार पूर्ण किया गया है । इस ग्रंथ के पहले अध्याय में एक प्रतिज्ञा-वाक्य निम्न प्रकार से दिया हुआ है- यत्प्रोक्तं जिनसेनयोग्यगणिभिः सामन्तभद्रैस्तथा सिद्धान्तेगुणभद्रनाममुनिभिर्भट्टाकलंकैः परैः श्रीसूरिद्विजनामधेय विवुधैराशाधरैर्वाग्वरैः स्तद्दृष्ट्वा रचयामि धर्मरसिकंशास्त्रंत्रिवर्णात्मकम् ॥६॥ अर्थात्-जिनसेनगणी, समंतभद्राचार्य, गुणभद्रमुनि, भट्टाकलंक, विबुध ब्रह्मसूरि और पं० आशाधर ने अपने २ ग्रंथों में जो कुछ कहा है उसे देखकर मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य नाम के तीन वर्षों का प्राचार बतलाने वाला यह 'धर्मरसिक' नामका शास्त्र रचता हूँ। ग्रंथ के शुरू इस प्रतिज्ञा वाक्य को देखते ही यह मालूम होने लगता है कि इस ग्रंथ में जो कुछ भी कथन किया गया है वह संत्र उक्त विद्वानों के ही वचनानुसार-उनके ही ग्रंथों को देखकर-किया गया है । परन्तु ग्रंथके कुछ पत्र पलटने पर उसमें एक जगह ज्ञानार्णव ग्रंथ के अनुसार, जो कि शुभचंद्राचार्य का बनाया हुआ है, ध्यान का कथन करने की और दूसरी जगह भट्टारक एकसंधि कृत संहिता (जिनसंहिता) के अनुसार होमकुण्डों का लक्षण कथन करने की प्रतिज्ञाएँ भी पाई - - में जाती हैं । यथा- [५] " ध्यान तावदहं वदामिविदुपांज्ञानार्णवे यन्मतम्॥१-२८ ॥" " लक्षण होमकुण्डानां वक्ष्ये शास्त्रानुसारतः। भट्टारकैकंसधेश्च दृष्ट्वा निर्मलसंहिताम् ॥४-१०४ ।। इसके सिवाय कहीं २ पर खास तौर से ब्रह्मसूरि, अथवा जिन- सेनाचार्य के महापुराण के अनुसार कथन करने की. जो पृथक रूप से प्रतिज्ञा या सूचना की गई है उसे पहली प्रतिज्ञा के ही अंतर्गत अथवा उसी का विशेष रूप समझना चाहिये, ऐसी एक सूचना तथा प्रतिज्ञा नीचे दी जाती है श्रीब्रह्मसूरिद्विजवंशरत्नं धीजैनमार्गप्रधिबुद्धतत्वः धातु तस्यैचचिलोक्पशासंशतपिशपान्मुनिप्लोमसेनः॥३-१५० जिनसेनमुनि नत्वा वैवाहविधिमुत्सवम् । घयपुराणमार्गेण लौकिकाचारसिद्धये ॥ ११-२॥ इन सब प्रतिज्ञा वाक्यों और सूचनाओं से ग्रंथ कर्ता ने अपने पाठकों को दो बातों या विश्वास दिलाया है- (१) एक तो यह कि, यह त्रिवर्णाचार कोई संग्रह ग्रंथ नहीं है बल्कि भनेक जैनप्रपों को देखकर उनके आधार पर इसकी स्वतंत्र रचना कीगई है।* (२) दूसरे यह कि इस ग्रंथ में जो कुछ लिखा गया है वह उक्त जिनसेनादि दहा विद्वानों के अंनुसार तथा जैनागम के अनुकूल अन्य के नाम से भी यह कोई संग्रह अन्य गालम नदी दोता और न इसकी संधियों में दीसे संप्रद अन्य प्रकट किया गया है। एक संधि नमूने के तौर पर इस प्रकार -- इति धी धमासिक शारने प्रियांचार निरूपके भट्टारक धी सीमसेन पिरनिते सानवस्त्राचमन संध्या तपंण वर्णनो नाम सूती. पोजमापः।

[६] लिखा गया है और जहाँ कहीं दूसरे (शुभचन्द्रादि) विद्वानों के पंपा- नुसार कुछ कहा गया है वहाँ पर उन विद्वानों अथवा उनके ग्रंथों का नाम देदिया गया है। - परन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है । ग्रंथ को परीक्षा दृष्टि से अवलोकन करने पर मालूम होता है कि यह ग्रंथ एक अच्छा खासा संग्रह ग्रंथ है, इसमें दूसरे विद्वानों के ढेर के ढेर वाक्यों को ज्यों का त्यों उठा कर या उनमें कहीं कहीं कुछ साधारणसा अथवा निरर्थकसा परिवर्तन करके रक्खा गया है, वे वाक्य ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय को पुष्ट करने के लिये 'उक्तं च श्रादि रूप से नहीं दिये गये, बल्कि वैसे ही ग्रंथ का अंग बना कर अपनाये गये हैं और उनको देते हुए उनके लेखक विद्वानों का या उन ग्रंथों का नाम तक भी नहीं दिया है, जिनसे उठाकर उन्हें रक्खा है ! शायद पाठक यह समझे कि ये दूसरे विद्वान् वेही होंगे, जिनका उक्त प्रतिज्ञा-वाक्यों में उल्लेख किया गया है। परन्तु ऐसा नहीं है. उनके अतिरिक्त और भी बीसियों विद्वानों के शब्दों से ग्रंथ का कलेवर बढ़ाया गया है और वे विद्वान् जैन ही नहीं किन्तु अजैन भी हैं। अजैनों के बहुत से साहित्य पर हाथ साफ़ किया गया है और उसे दुर्भाग्य से जैन साहित्य प्रकट किया गया है, यह बड़े ही खेद का विषय है ! इस व्यर्थ की उठा धरी के कारण ग्रंथ की तरतीब भी ठीक नहीं बैठसकी-वह कितने ही स्थानों पर स्खलित अथवा कुछ बेढंगेपन को लिये हुए होगई है और. साथ में पुनरुक्तियाँ भी हुई हैं । इसके सिवाय, कहीं २ पर उन विद्वानों के विरुद्ध भी कयन किया गया है जिनके वाक्यानुसार कथन करने की प्रतिज्ञा अथवा सूचना की गई है और बहुतसा कथन जैन सिद्धांत के विरुद्ध अथवा जैनादर्श से गिरा. हुआ भी इसमें पाया जाता है। इस तरह पर यह ग्रंथ एक बड़ा ही विचित्र ग्रंथ जान पड़ता है और ' कहीं की ईट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुनबा जोड़ा' पासी कहावत को भी कितने ही अंशों में चरितार्थ करता है । यद्यपि यह ग्रंथ उक्त जिनसेन त्रिवर्णाचारादि की तरह का जाली ग्रंय नहीं है- इसकी रचना प्राचीन बड़े प्राचार्यों के नाम से नहीं हुई-फिर भी यह अर्धजाली जरूर है और इसे एक मान्य जैन ग्रंथ के तौर पर स्वीकार करने में बहुत बड़ा संकोच होता है। नीचे इन्हीं सब बातों का दिग्दर्शन कराया जाता है, जिससे पाठकों को इस अन्य के विषय में अपनी ठीक सम्मति स्थिर करने का अवसर मिल सके। सब से पहले मैं अपने पाठकों को यह बतला देना चाहता हूँ कि उक्त प्रतिज्ञा पत्र नं. १ में जिन विद्वानों के नाम दिये गये हैं उनमें 'भट्टाकलंक' से अभिप्राय राजवार्तिक के कर्ता भट्टाकलंक देव से नहीं है बल्कि अकलंक प्रतिष्ठापाठ (प्रतिष्ठातिलक ) आदि के कर्ता दूसरे भट्टाकलंक से है जिन्होंने अपने को : भट्टाकलंकदेव' भी लिखा है और जो विक्रम की प्रायः १६ वीं शताब्दी के विद्वान थे। और 'गुणभद्र मुनि संभवतः येही भट्टारक गुणभद्र जान पड़ते हैं, जो ग्रंथ फर्ता के पट्ट गुरु थे । गुणभद्र महारक के बनाये हुए 'पूजाकल्प नामक एक ग्रंथ का उल्लेख भी 'दिगम्बर जैन ग्रंथकर्ता और उनके ग्रंथ नामक सूची में पाया जाता है । होसकता है कि इस ग्रंथ के आधार * इस त्रिवर्णाचार में जिनसेन आदि दूसरे विद्वानों के पाश्यों का जिस प्रकार से उल्लेख पाया जाता है, उस प्रकार से राजयार्तिक के कर्ता भट्टाकलंक देव के यनाये हुए किसी भी ग्रंथ का प्रायः कोई उल्लेख नहीं मिलता। हाँ, अकलंक प्रतिष्ठापाठ के कितने ही कंथनों के साथ त्रिवर्णाचार के कथनों का मेल तथा सादृश्य जरूर है और कुछ पधादिक दोनों ग्रंथों में समान रूप से भी पाये जाते हैं। इससे उक्त पध में 'भट्टाकलंक' पद का पाच्य क्या है, यह बहुत कुछ स्पष्ट होजाता है।

- [८] पर भी प्रश्न त्रिवर्गाचार में कुछ यापन किया गया हो और इसके भी वाक्यों को बिना नामक उठा कर नया गया। परनु मुने गुणभद्र मुनि के किसी भी मंच काय इस यादिल को जाँचने का अवसर नहीं मिल सका और इसलिये मे च विषय काय कोई उल्लेख नहीं कर सगा । बासी चार विद्यागों में से जिनसेनाचार्य तो 'श्रादिपुरागा के पाती, स्वामी समन्तभद्र रत्नकरण्डक' धारकाचार के प्रणेता, पं. भाशावर 'सागार चमत'शादि यो रचयिता भीर विबुध ग्राममरि 'नामसरि-निवर्याचार धावा 'जिनसंहितासारोद्वार के विधाता हुए, जिसका दूसरा नाम तिहासिलय' भी है । शाशाधर की तरह ब्रह्मसूरि भी गृहस्थ विद्वान थे और उनका समय विक्रम की प्रायः १५वीं शताब्दी पाया जाता है। ये जैन धर्मानुयायी बामण थे। सोमसेन ने भी 'श्रीब्रह्मासूरिद्विजवंशरवं','ब्रह्मसूरिसुविप्रेण,' 'श्रीब्रह्मसूरिवरविप्रकवीश्चरण' नादि पदों के द्वारा इन्हें ब्राह्मण वंश का प्रकट किया है। इनके पिता का नाम 'विजयेन्द्र' और माता का 'श्री' था । इनके एक पूर्वज गोविन्द गट्ट, जो चेदान्तानुयायी ब्राह्मण थे, स्वामी समन्तभद्र के 'देवागा' स्तोत्र को सुनकर जैनधर्म में दीक्षित होगये थे। उसी वक्त से इनके वंश में जैनधर्म की बराबर मान्यता चली आई है, और उसमें कितने ही विद्वान हुए है। ब्रह्मसूरि-त्रिवर्णाचार को देखने से ऐसा मालूम होता है कि ब्रम- सूरि के पूर्वज जैनधर्म में दीक्षित होने के समय हिन्दूधर्म के कितने ही संस्कारों को अपने साथ लाये थे, जिनको उन्होंने स्थिर. ही नहीं रक्खा बल्कि उन्हें जैन का लिबास पहिनाने और त्रिवर्णाचार जैसे ग्रंथों द्वारा उनका जैनसमाज में प्रचार करने का भी आयोजन किया 1 । संभव है देश-काल की परिस्थिति ने भी उन्हें वैसा करने के लिये ahol +देखो उक्त 'जिनसंहितासारोद्धार' की प्रशस्ति।

" [६] मजबूर किया हो-उस वक्त ब्राह्मण लोग जैन द्विजों अथवा जैनधर्म में दीक्षितों को 'वर्णान्नः पाती और संस्कारविहीनों को 'शूद्र' तक कहते ये याश्चर्य नहीं जी यह बात नव दीक्षितों को-खास कर विद्वानों को- असह्य हो उठी हो और उसके प्रतीकार के लिये ही उन्होंने अथवा उनसे पूर्व दीक्षितों ने उपर्युक्त श्रायोजन किया हो।परंतु कुछ भी हो, इसमें संदेह नहीं कि उस वक्त दक्षिण भारत में इस प्रकार के साहित्य की-संहिता शास्त्रों, प्रतिष्ठा पाठों और त्रिवर्णाचारों की बहुत कुछ सृष्टि हुई है । एक संधि भं० जिन संहिता, इन्द्रनन्दि संहिता, नेमिचंद्र * संहिता, भद्रबाहु संहिता, आशाधर प्रतिष्टापाठ, अकलंक प्रतिष्ठा पाठ और-जिनसेन त्रिवर्णाचार शादि बहुत से ग्रंथ उसी वक्त के बने हुए हैं। इस प्रकार के सभी उपलब्ध ग्रंथों की सृष्टि विक्रम की प्रायः दूसरी सहस्राब्दी में पाई जाती है-विक्रम की पहली सहस्राब्दी (दसवीं शताब्दी तक) का बना हुआ वैसा एक भी ग्रंथ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ- और इससे यह जाना जाता है कि ये ग्रंथ उस जमाने की किसी खास हलचल के परिणाम हैं और इनके कितने ही नूतन विषयों का, जिन्हें खास तौर से लक्ष्य में रखकर ऐसे ग्रंथों की सृष्टि की गई है, जैनियों के प्राचीन साहित्य के साथ प्रायः कोई सम्बन्ध विशेष नहीं है । अस्तु, ग्रन्थका संग्रहत्व। (१) इस त्रिवर्णाचार में सबसे अधिक संग्रह यदि किसी ग्रंप का किया गया है तो वह ब्रह्मसूरि का उक्त त्रिवर्णाचार ही है । सोमसेन ने अपने त्रिवर्णाचार की श्लोक संख्या, ग्रंथके अंत में, २७०० दी है और यह संख्या ३२ अक्षरों की श्लोक गणना के अनुसार # नेमिचंद्र संहिताके रचयिता 'नेमिचंद्र' भी एफ गृहस्थ विद्वान थे और चे ब्रह्मरि के भानजे थे।देखो 'नेमिचंद्र संहिता की प्रशस्ति प्रथया जन हितैषी के १२ भाग का अंक नं०४-५, - . २ . [१०] जान पड़ती है। परन्तु वैसे, ग्रंथ की पद्य संख्या २०४६ है और बाकी का उसमें मंत्र भाग है जो ५५० या ६०० श्लोकों के करीब होगा । कुछ अपवादों को छोड़ कर, यह सार। मंत्र भाग ब्रह्मसूरि- त्रिवर्णाचार से उठाकर-ज्यों का त्यों अथवा कहीं कहीं कुछ बदलकर- रक्खा गया है। रही. पद्यों की बात, उनका जहाँ तक मुकाबला किया गया उससे मालूम हुआ कि इस ग्रन्थ में , ६९ पद्य तो ऐसे हैं जो प्रायः ज्यों के त्यों और. १७७ पद्य ऐसे हैं जो कुछ परिवर्तन के साथ ब्रह्मसूरि त्रिवर्णाचार से उठा कर रक्खे गये हैं । इस तरह पर ग्रंथ का कोई एकतिहाई भाग ब्रह्मसूरि त्रिवर्णाचार से लिया गया है और उसे जाहिर में अपनी. रचना प्रकट किया गया है । इस ग्रन्थः संग्रह के कुछ नमूने इस प्रकार हैं :- (क)ज्यों के त्यों उठाकर रक्खे हुए पद्य । सुखं वांछन्ति सर्वेऽपि जीवा दुःख न जातुचित् । तस्मात्सुर्खेपिणो जीवाः संस्कारायाभिसम्मताः ॥२-७ ।। एवं दशाहपर्यन्तमेतत्कर्म विधीयते । पिंड तिलोदकं चापि कर्त्ता दद्यात्तदान्यहम् ॥ १३-१७६ ॥ इन पथों में से पहला पद्य ब्रह्मसूरि-त्रिवर्णाचार का ५वाँ और दूसरा पद्य उसके अन्तिम पर्व का १३६ वाँ पद्य है । दूसरे पद्य के भागे पीछे के और भी पचासों पद्य ब्रह्मसूरि-त्रिवर्णाचार से ज्यों के त्यों उठाकर रक्खे गये हैं। दोनों ग्रन्थों के अन्तिम भाग ( अध्याय तया पर्व ) सूतक प्रेतक अथवा जननाशौच और मृताशौच नामके प्रायः एक ही विषय को लिये हुए भी हैं। (ख) परिवर्तन करके रक्खे हुए पद्य । कालादिलब्धितः पुंसामन्तःशुद्धिः प्रजायते । मुख्यापेक्ष्यातु संस्कारो वाह्यशुद्धिमपेक्षते ।। २-८ ।

[१] चतुर्थे दिवसे जायात्मात!सर्गतः पुरा । ' पूर्वी घटिकापट्कं गोसर्ग इति भापितः ॥ १३-२२ ।। शुद्धामर्तुश्चतुर्थेऽतिभोजने रन्धनेऽपिधा। देवपूजा गुरूपास्तिहोमसेवासु पंचमे ॥ १३-२३ ॥ ये पद्य ब्रह्मसूरि-त्रिवर्णाचार के जिन पद्यों को परिवर्तित कारको बनाये गये हैं ये क्रमश: इस प्रकार हैं- अन्तःशुद्धिस्तु जीवानां भवेत्कालादिलन्धितः । एपामुख्यापिसंस्कारे वाह्यशुद्धिरपेक्षते ॥ ७ ॥ रजस्वलाचतुर्थऽन्हि मायादोसर्गतः परं । पूर्वाह्न घटिकापट्कै गोसर्ग इति भापितः ।। ८-१३ ॥ तस्मिन्नदनि योग्या स्यादुदश्या गृहकर्मणि । देवपूजा गुरूपास्तिहोमसेवासु पंचमे 12-१४ ॥ इन पद्यों का परिवर्तित पद्यों के साथ मुकाबला करने से यह सहज ही में मालूम हो जाता है कि पहले पद्य में जो परिवर्तन किया गया है उससे कोई अर्थ-भेद नहीं होता, बल्कि साहित्य की दृष्टि से वह कुछ घटिया ज़रूर हो गया है । मालूम नहीं फिर इस पद्य बदलने का क्यों परिश्रम किया गया, जब कि इससे पहला 'सुरवं- वांछन्ति' नाम का पद्य ज्यों का त्यों उठाकर रक्खा गया था ! इसे भी उमी तरह पर उठाकर रख सकते थे। शेष दोनों पद्यों के उत्तरार्ध ज्यों के त्यों हैं, सिर्फ पूर्वार्ध बदले गये हैं और उनकी यह तबदीली बहुत कुछ भद्दी जान पड़ती है । दूसरे पद्य की तबदीली ने तो कुछ विरोध भी उपस्थित कर दिया है-ब्रह्मसूरि ने चौथे दिन रजखला के स्नान का समय पूर्वाह की छहबड़ी के बाद कुछ दिन चढ़े रक्खा था; परन्तु ब्रह्मसूरि के अनुसार कायन की प्रतिज्ञा करने वाल सोमसेनजी ने. अपनी इस तबदीली के द्वारा गोसर्ग की उक्त छंह घड़ी से पहले रात्रि में ही उसका विधान .

- . [ १२] कर दिया है ! इससे इन पधों के परिवर्तन की निरर्थकाता स्पष्ट है और साथ ही सोगसेनजी की योग्यता का भी कुछ परिचय मिल जाता है। (ग) परिवर्तित और अपरिवर्तित मन्त्र । इस ग्रन्थ के तीसरे अध्याय में, एक स्थान पर, दशदिक्पालों को प्रसन्न करने के मन्त्र देते हुए; लिखा है:--- ततोऽपि मुकुलित करकुड्मलः सन् " ॐनमाईते भगवते श्री शांतिनाथाय शांतिकराय सर्वविघ्नप्रणाशनाय सर्व- रोगापमृत्युविनाशनाय सर्व परत शुद्रोपद्रवविनाशनाय मम सर्वशान्तिर्भचतु" इत्युपार्य- इसके बाद-'पूर्वस्यां दिशि इन्द्रः प्रसीदतु, श्राग्नेयां दिशि अग्निः प्रसीदतु, दक्षिणस्यां दिशि यमः प्रसीदतु' इत्यादि रूप से वे प्रसन्नता सम्पादन कराने वाले दसों मन्त्र दिये हैं। ये सब मन्त्र वेही हैं जो ब्रह्मसूरि-त्रिवर्णाचार में भी दिये हुए हैं, सिर्फ़ 'उत्तरस्यां दिशि कुचेरःप्रसीदतु' नामक मन्त्र में कुवेर: की जगह यहाँ यक्षः' पद का परिवर्तन पाया जाता है । परन्तु इन गन्त्रों से पहले 'ततोऽपिमुकुलितकरकुड्मलः सन्' और 'इत्युचार्य' के मध्य का जो मंत्र पाठ है वह ब्रह्मसूरि त्रिवर्णाचार में निम्न प्रकार से दिया हुआ है। ॐ नमोहते श्रीशांतिनाथाय शांतिकराय सर्व शांतिर्भवतु स्वाहा । * - * इस मंत्र में जिन विशेषण पदों को बढ़ाकर इसे ऊपर का रूप दिया गया है उसे सोमसेनजी के उस विशेष कथन का एक नमूना समझना चाहिये जिसकी सूचना उन्होंने अध्याय के अन्त में निम्न पद्य द्वारा की है.- श्री ब्रह्मसूरि द्विजवंश रत्नं श्री जैनमार्ग प्रतिबुद्धतत्वः । वाचतु तस्यैव विलोक्य शालं कृतं विशेषान्मुनिसोमसेनैः ॥

. [ १३ ] इस प्रदर्शनासे यह स्पष्ट जाना जाता है कि सोगसेनजी इन क्रिया मंत्रों को ऐसे आर्य मंत्र नहीं समझते थे जिनके अक्षर अँचेतुले अथवा गिने चुने होते हैं और जिनमें अक्षरों की कमी बेशी शादि के कारण कितनी ही बिडम्बना होजाया करती है अगवा यों याहिये कि यथेष्ट फल संघाटेत नहीं होसकता । वे शायद इन मंत्रों को इतना माधारण समझते पे कि अपने जैसों को भी उनके परिवर्तन या अधिकारी मानते थे । यही वजह है जो उन्होंने उक्त दोनों मंत्रों में और इसी तरह और भी बहुत से मंत्रों में अपनी इच्छानुसार तबदीली अथवा न्यूनाधिकता की है, जिस सबको यहाँ बतलाने की भावश्यकता नहीं है । मंत्रों का भी इस ग्रंथ में कुछ ठिकाना नहीं-अनेक देवताओं के पूजा मंत्रों को छोड़कर, नहाने, धोने, कुल्ला दाँतन करने, खाने, पीने, वस्त्र पहनने, चलने फिरने, उठने बैठने और हगने मूतने आदि वात बात के मंत्र पाये जाते हैं-मंत्रों का एक तुलसा नजर आता है और उनकी रचना का ढंग मी प्रायः बहुत कुछ सीधा सादा तथा आसान है। ॐ, ही, अहं स्वाहा श्रादि दो चार अदर इधर उधर जोड़ कर और कहीं कहीं कुछ विशेषण पद भी साथ में लगाकर संस्कृत में वह बात कहदीगई है जिस विषय का कोई मंत्र है । ऐसे कुछ मंत्रों का सारांश यदि हिन्दी में दे दिया जाय तो पाठकों को उन मंत्रों की जाति तथा प्रकृति धादि के समझने में बहुत कुछ सहायता मिलेगी। अतः नीचे ऐसे ही कुछ मंत्रों का हिन्दी में दिग्दर्शन कराया जाता है- १ऊँ ही, हे यहाँ के क्षेत्रपाल ! क्षमा करो, मुझे मनुष्य जानो, इस स्थान से चले जाओ, मैं यहाँ मल मूत्र का त्याग करता हूँ, स्वाहा । २ ऊँ. इन्द्रों के मुकुटों की रत्नप्रभा से प्रक्षालित पाद पम आई- तभगवान को नमस्कार, में शुद्ध.जल से पैर धोता हूँ, स्वाहा । ३ ॐ ही ई .::,मैं हाथ धोता हूँ, स्वाहा । - " . [ १४ ] ४ ॐ ह्रीं क्ष्वी झवीं, मैं मुँह धोता हूँ, स्वाहा । ५ ऊँ परम पवित्राय, मैं दन्तधावन (दाँतन कुल्ला) करता हूँ, स्वाहा । ६ ऊँ ह्रीं श्रीं क्लीं एँ अहं असित्राउसा, मैं स्नान करता हूँ, स्वाहा । ७ ॐ ही, संसार सागर से निकले हुए अर्हन्त भगवान को नमस्कार. मैं पानी से निकलता हूँ, स्वाहा । ८ ॐ ह्रीं ६वी झवीं अहं हं सः परम पावनाय, मैं वन पवित्र करता हूँ. स्वाहा । ऊँ, हे श्वेतवर्ण वाली, सर्व उपद्रवों को हरने वाली, सर्व महाजनों का मनोरंजन करने वाली, धोती डुपट्टा धारण करने वाली हं झं वं मं स तं में धोती डुपट्टा धारण करता हूँ स्वाहा १० ॐ भूर्भुवः स्वः असिआउसा, मैं प्राणायाम करता हूँ, स्वाहा । ११ ऊँ ही ...,मैं सिरके ऊपर पानी के छींटे देता हूँ, स्वाहा । १२ ॐ ....मैं चुल्लू में पानी लेता हूँ, स्वाहा । १३ ॐ हीं ,मैं चुल्लू का अमृत ( जल ) पीता हूँ, स्वाहा । ११ ऊँ ही अहं, मैं किवाड़ खोलता हूँ, स्वाहा । १५ ऊँ ह्रौं अह मैं द्वारपालको(भीतर जाने की सूचना देताहूँ,स्वाहा । १६ ॐ ह्री, अहं ,मैं मंदिर में प्रवेश करता हूँ. स्वाहा । १७ ॐ ही, मैं मुख वस्त्र को उघाड़ता हूँ, स्वाहा । १८ ॐ ह्री, अहँ, मैं यागभूमि में प्रवेश करता हूँ, स्वाहा । १९ ऊँ ही, मैं बाजा बजाता हूँ, स्वाहा । २० ॐ ही...मैं पृथ्वी को पानी से धोकर शुद्ध करता हूँ, स्वाहा । २१ ॐ हीं अहं क्षां ठ ठ, मैं दर्भासन बिछाता हूँ, स्वाहा । २२ ऊँ ही अहं निस्सही हूँ फट में दर्भासन पर बैठता हूँ, स्वाहा । २३ ऊँ हाँ ही हूँ ह्रौं हुः, श्री अहंन्त भगवान को नमस्कार, शुद्ध जल से बरतन धोना हूँ, स्वाहा । मैं . . [१५] २४ ॐ ही अई."मैं पूजा के द्रव्य को धोता हूँ स्वाहा। .२५ ॐ हीं अई.....,मैं हाथ जोड़ता हूँ. स्वाहा । २६ ऊँ ही स्वस्तये. मैं कलश उठाता , स्वाहा ! २७ ॐ ॐ ऊरं रं मैंदर्भ डालकर आग जलाता हूँ स्वाहा। २८ ॐ ही में पवित्र जलसे द्रव्य शुद्धि करता हूँ, स्वाहा । २२. ॐ ही, मैं कुश ग्रहण करता हूँ. स्वाहा । ३० ॐ ही, मैं पवित्र दक को सिर पर लगाता स्वाहा । ३१ ॐ ही..., मैं बालक को पालने में मुलाता हूँ, स्वाहा । ३२ ऊँ ही अहं थसिंपाउसा, मैं बालक को बिठलाता हूँ. स्वाहा । ३३ ॐ ही श्री अहं, मैं बालक के कान नाक बांधता हूँ, असि आ उसा स्वाहा । ३४ ॐ मुक्ति शक्ति के देने वाले अईन्त भगवान को नमस्कार में वालक को भोजन कराता हूँ ...स्वाहा ! मैं बालक को पैर धरना सिखलाता हूँ, स्वाहा। 2 प्राय: ये सभी मंत्र ब्रह्मसूरि-त्रिवर्णाचार में भी पाये जाते हैं और वहीं से उठाकर यहाँ रक्खे गये मालूम होते हैं । परंतु किसी २ अक्षरों की कमी बेशी अथवा तबदीली जरूर पाई जाती है और इससे उस विचार को और भी ज्यादा पुष्टि मिलती है जो ऊपर जाहिर किया गया है । साथ ही, यह मालूम होता है कि ये मंत्र जैन. समाज के लिये कुछ अधिक प्राचीन तथा रूढ नहीं है और न उसकी व्यापक प्रकृति या प्रवृत्ति के अनुकूल.ही जान पड़ते हैं। कितने ही मंत्रों की सृष्टि उनकी नदीन कल्पना--भट्टारकी युग में हुई है और यह बात आगे चलकर स्पष्ट की जायगी। (२)पं० श्राशावर के प्रयों से भी कितने ही पद्य, इस त्रिवर्ण- पार में, विना नाम धाग के संग्रह किये गये हैं। छठे अध्याय में २२ 1 ३५ ॐ :

[१६] और दसवें अध्याय में १३ पद्य सागार धर्मामृत से लिये गये है। इनमें से छठे अध्याय के दो पद्यों को छोड़कर, जिनमें कुछ परिवर्तन किया गया है, शेष ३२ पद्य ऐसे हैं जो इन अध्यायों में ज्यों के त्यो उठाकर रक्खे गये हैं । अनगारधर्मामृत से भी कुछ पद्य लिये गये हैं. और आशाधर-प्रतिष्ठापाठ से भी कितने ही पद्यों का संग्रह किया गया है। छठे अध्याय के ११ पद्यों का प्राशाधर-प्रतिष्ठा पाठ के साथ जो मुका- बला किया गया तो उन्हें ज्यों का त्यों पाया गया । इन पद्यों के कुछ नमूने इस प्रकार हैं:- योग्य कालासनस्थानमुद्रावर्तशिरोनतिः । विनयेन यथाजातः कृतिकर्मामलं भजेत् ॥१-६३ ॥ : किमिच्छकेन दानेन जगदाशा प्रपूर्य यः । चक्रिभिः क्रियते सोऽद्यझो कल्पदुमो मतः ॥६-७६ ॥ जाती पुष्पसहस्त्राणि जप्त्वा द्वादश सदृशः। विधिनादत्त होमस्यः विद्या सिद्धयति वर्णिनः ॥ ६-४ ॥ इनमें से पहला पद्य अनगारधर्मामृत के ८वें अध्याय का ७८ वाँ, दूसरा पद्य सागारधर्मामृत के दूसरे अध्याय का २८ वाँ और तीसरा पद्य आशाधर-प्रतिष्ठापाठ ( प्रतिष्ठासारोद्धार .) के प्रथमाध्याय का १३ चा पद्य है । प्रतिष्ठापाठ को अगले नं० १४से २४ तक के पद्य भी यहीं एक स्थान पर ज्यों के त्यों उठाकर रक्खे गये हैं। जीविते मरणे लाभेऽ लाभे योगे विपर्यये। यन्ध्यावरौ सुख दुःखे सर्वदा समता मम ॥ १-६॥ यह अनगारधर्मामृत के आठवें अध्याय का २७ वाँ पद्य है। इसका चौथा चरण यहाँ बदला हुआ है-'साम्यमेवाभ्युपैम्यहम्' की जगह 'सर्वदा समता मम ऐसा बनाया गया है। मालूम नहीं इस परिवर्तन की क्या जरूरत पैदा हुई और इसने कौनसी विशेषता . [१७] उत्पन्न की ! बल्कि नियतकालिक सामायिक के अनुष्ठान में 'सर्वदा' शब्द का प्रयोग कुछ खटकता जरूर है । मद्यमांसमधून्युज्झत्पंचक्षीरफलानि च । अटैतान गृहिणां मूलगुणान् स्थूलवधाद्विदुः॥ ६.१६४ ॥ यह पद्य सागर-धर्मामृत के दूसरे अध्याय के पद्य नं० २ और नं० ०३ बनाया गया है। इसका पूर्वार्ध पंद्य नं. २ का उत्तरार्ध और उत्तरार्ध पच नं० ३ का पूर्वार्ध है । साथ ही स्थूलवधादि वा' की जगह यहाँ ' स्थूलवधाद्विदुः' ऐसा परिवर्तन भी किया गया है । सागार-धर्मामृत के उक्त पद्य गं. २ का पूर्वाध है 'तत्रादौ श्रद्दधज्जैनीमाज्ञां हिंसामपासितुं' और पद्य नं० ३ का उत्तरार्ध है 'फलस्थाने स्मरेद् द्यूतं मधुस्थान इहैव धा। ये दोनों पद्य १० वें अध्याय में ज्यों के त्यों उद्धृत भी किये गये हैं और यहाँ पर अष्टमूल गुणों का विशेष रूप से कथन भी किया गया है, फिर नहीं मालूम यहाँ पर यह अष्टमूल गुणों का कथन दोबारा क्यों किया गया है और इससे क्या लाभ निकाला गया। प्रकरण तो यहाँ त्याज्य शन भयवा भोजन का था-कोल्हापुर की छपी हुई प्रति में 'श्रथ त्याज्या- नम्' ऐसा उक्त पय से पहले लिखा मी है-और उसके लिये इन पाठ वातों का कथन उन्हें अष्टमूल गुण की संख्या न देते हुए भी किया जा सकता था और करना चाहिये था-खासकर ऐसी हालत में जब कि इनके साग का मूलगुण रूप से आगे कथन करना ही था। इसके सिवाय दूसरे 'रागजीयवधापाय' * नामक पध में जो परिवर्तन किया गया है यह बहुत ही साधारण है। उसमें 'रात्रिभक्तं' की जगह 'रात्रीमुक्ति' बनाया गया है और यह बिलकुल ही निरर्थक परिवर्तन जान पड़ता है। * यह सागार-धर्मामृन के दूसरे अध्याय का १४ या पद्य है और सांगसंग-प्रियांचार के छठे अध्याय में नं० २०१पर दर्ज है।

[१८] ( ३ ) इस ग्रंथ के दसवें अध्याय में साकारण्ड-श्रावकाचार के 'विषयाशावशातीता' आदि साट पद्य तो ज्यों के त्यों और पाँच पद्य कुछ परिवर्तन के साथ संग्रह किये गये है। परिवर्तित पद्यों में से पहला पद्य इस प्रकार है। पायांग: पालितं शुद्धं सम्यक्त्वं शिवदायकम् । न हि मंत्रोऽक्षरन्यूगो निहन्ति विषयेनाम् ॥ २८ ॥ यह पद्य स्नकरण्ड श्रावकाचार के २३ में पद्य रूपान्तर है। इसका उत्तरार्ध तो वही है जो उक्त २१ वें पद्य का है, परन्तु पूर्वार्ध को बिलकुल ही बदल डाला है और यह तबदीली साहित्य की दृष्टि से बड़ी ही भद्दी मालूम होती है । रत्नकरण्ड श्रावकाचार के २१ वे पचका पूर्वार्ध है- नाहीनमलं छेत्तुं दर्शनं जन्मसन्ततिम् । पाठकजन देखें, इस पूर्वार्ध का उक्त पद्य के उत्तरार्ध से कितना गहरा सम्बन्ध है । यहाँ सम्यग्दर्शन की अंगहीनता जन्मसंतति को नाश करने में असमर्थ है और वहाँ उदाहरण में मंत्र की अक्षरन्यूनता विषवेदना को दूर करने में अशक्त है-दोनों में कितना साम्य, कितना सादृश्य और कितनी एकता है, इसे बतलाने की जरूरत नहीं । परन्तु खेद है कि भट्टारकाजी ने इसे नहीं समझा और इसलिये उन्होंने रत्न के एक टुकड़े को अलग करके उसकी जगह काच जोड़ा है जो बिल. कुल ही वेमेल तथा बेडौल मालूम होता है । दूसरे चार पद्यों की भी प्रायः ऐसी ही हालत है-उनमें जो परिवर्तन किया गया है वह व्यर्थ जान पड़ता है । एक पद्य में तो 'महाकुलाः' की जगह उत्तम कुलाः' बनाया गया है, दूसरे में 'ज्ञेयं पाखण्डिमोहनं को 'ज्ञेया- पावण्डिमूढता' का रूप दिया गया है, तीसरे में 'स्मयमाहुर्ग- तस्मया' की जगह 'श्रीयते तन्मदाष्टकम्' यह चौथा चरण कायम किया गया है और चौथे पध में दिव्यशरीरं च लभ्यन्ते' [१६] के स्थान पर 'विद्यन्ते कामदा नित्यम्' यह नवीन पद जोड़ा गया है शौर इसरो मूलका प्रतिपाद्य विषय भी कुछ कम होगया है । ( ४ ) श्रीजिनसेनाचार्यप्रणीत आदिपुराण से मी कितने ही पद्य उठाकर इस ग्रंथ में रखे गये हैं, जिनमें से दो पद गमूने के तौर पर इस प्रकार हैं... व्रतचर्यामहं वक्ष्ये क्रियामस्योपविभ्रतः।.. फट्यूहरः शिरोलिंगमनूचानम्रतोचितम् ॥ ६-६७ ।। वस्त्राभरणमाल्यादिग्रहणं गुर्वनुक्षया । शस्त्रोपजीविवयवद्धारयच्छस्त्रमप्यदः ।। ६-६० ।। इनमें से पहला पच तो भादिपुराण के ३८ वे पर्व का १०१ वाँ पद्य है-इसके आगे के और भी कई पद्य ऐसे हैं जो ज्यों के त्यों उठाकर रखे गये हैं और दूसरा उसी.पर्व के पद्य नं० १२५ के उत्तरार्ध और नं० १२६ के पूर्वार्ध को मिलाकर बनाया गया है । पद्य नं० १२५ का पूर्वार्ध और नं. १२६ का उत्तरार्ध क्रमशः इस प्रकार हैं- कृतद्विजार्चनस्यास्य घतावतरणोचितम् ।। पृ० १२५ ॥ खवृत्तिपरिरक्षार्थ शोभाथै चास्य तद्ग्रहः ॥ उ० १२६ ॥ मालूम नहीं दोनों पद्यों के इन अंशों को क्यों छोड़ा गया और उसमें क्या लाभ सोचा गया । इस व्यय की छोड़ छाड़ तथा काट छाँट का ही यह परिणाम है जो यहाँ व्रतावतरण क्रिया के कथन में उस सार्व- कालिक व्रत का कथन छुट गया है जो आदिपुराण के 'मद्यमांस परित्यागः' नामक १२३ वें में दिया हुशा है * । और इसलिये * 'यतायतरणं चंदं से पहले श्रादिपुराण का यह १२३ वा पद्य इस प्रकार है- मद्यमांसपरित्यागः पंचोदुम्बरपर्जनम् । हिंसादिविरतिश्चास्य व्रतं स्यात्सार्यकालिकम् ॥ पद्य [२०] उक्त ८० वे पथ से पहले आदिपुराण का जो १२४ वाँ पद्य उधृत किया गया है वह एक प्रकार से बढेगा तथा यासंगत जान पड़ता है वह पद्य इस प्रकार है- बतायतरण चंद गुरुसाक्षिरतार्चनम् । वत्सरात् द्वादशादूर्वमथवा पोडशात्परम् ॥६-७६ ॥ इसमें 'इदं' शब्द का प्रयोग बहुत खटकता है और वह पूर्व कपन को 'तावतरण किया का कथन बतलाता है परन्तु अन्य में वह 'व्रतचर्या' का कथन है और 'बतचर्यामहं वक्ष्ये' इस ऊपर उद्धृत किये हुए पद्य से प्रारम्भ होता है। अतः भट्टारकजी की इस काट छाँट और उठाई धरी के कारण दो क्रियाओं के कथन में कितना गोलमाल होगया है, इसका अनुभव विज्ञ पाठक स्वयं कर सकते हैं और साथ ही यह जान सकते हैं कि भट्टारकाजी काट छाँट करने में कितने निपुण थे। (५) श्रीशुभचन्द्राचार्य--गणीत ' ज्ञानार्णव ' ग्रन्थ से भी इस त्रिवर्णाचार में कुछ पद्यों का संग्रह किया गया है। पहले अध्याय के पाँच पद्यों को जाँचने से मालूम हुआ कि उनमें से तीन पद्य तो ज्यों के त्यों और दो कुछ परिवर्तन के साथ उठा कर रक्खे गये हैं । ऐसे पद्यों में से एक एक पद्य नमूने के तौर पर इस प्रकार है: चतुर्वर्णमय मंत्रं चतुर्वर्गफलप्रदम् । चत्तूरात्रं जपेद्योगी चतुर्थस्य फलं भवेत् ॥ ७५ ॥ विद्यां षड्वर्णसंभूतामजय्यां पुण्यशालिनीम् । जपन्यागुक्तमभ्येति फलं ध्यानी शतत्रयम् ।। ७६ ॥ ये दोनों पद्य ज्ञानापर्व के ३८ वें प्रकरण के पद्य हैं और वहाँ क्रमशः नं० ५१ तथा ५० पर दर्ज हैं. यहाँ इन्हें आगे पीछे उद्धृत किया गया है । इनमें से दूसरा पद्य तो ज्यों को त्यों उठा कर रक्खा

Granth-pariksha Bhag Iii

Author
Mukhtar, Shri Yukt Pandit Jugalkishor
Title
Granth-pariksha Bhag Iii
File name
Granth-pariksha Bhag Iii
Text
OCR done
Citation
1928
Published
2011/03
Publisher
Mumbai., Jain Granth-ratanakar Karyalay Heerabhag
Language
Sanskrit
Pages
33
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550769
Barcode
4990010031576.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
L3VPsKBROhS
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