Sanmati Library, Jaipur

Samayik Path

Jayachandra · 2009/11

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प्रस्तावना जिन धर्म एक ऐसा अपूर्व रसायन मुश अलभ्य टलंपक वस्तु है कि जिसका मिलना उन्हीं भाग्यशीलोंके आधीन है कि जो स्वाभाविक भावुकताके अधिकारी है । जिस धर्मकी आशिक उपलब्धिकामी दर्शन भव्यात्मक पवित्रतामें ही है । उसके अभावमें विद्या तथा तपस्या जिस उद्देश्यसे सपरिश्रमभी जो की जाती है वे सब उस उद्देश्यकी माषनामें विफल मनोरथ ही है। यद्यपि अन्य सभी धर्मवादी अपने कर्तव्यका मुख्य सीमास्थल उसी रूपसे वचनात्मक पद्धति द्वारा- भलेही वर्णन करें परतु विपक्षपरीक्षकतामें परस्पर विपक्षता होनेसे स्वर्ण पीत- लके समान विमिन्नता अवश्यही होगी । जिस तरह ऊपरके दृष्टान्तमें पीत साव्य है फिरभी उसमें जो वास्तविक ग्राह्यता है वह मुवर्णीय है । इसी दृष्टिले शब्द समानतामें धर्म धर्म यह शब्द सर्वत्र साम्प्रिदायिकताओंमें लागू है तथापि उसकी सुवर्णता एक ऐसी सार्व साम्प्रिदायिकतामें है जो उस धर्मकी सुवर्णीय व्याख्याका खास एक केन्द्र स्थल है । उस स्थलकी वास्तविक प्राप्ति जिस व्यक्ति विशेषको हुई है वही महात्मा भावुकके फलका अधिकारी हुआ है । और उसीका इस निरुक्तिद्वारा जैन यह नियुक्तिक ( वास्तविक ) नाम हैं । अथवा जिसने क्रोधादि ममस्त वैमाविक ( विकृत ) धमाको जीत लिया है वह जिन उसका जो धर्म वह जिनधर्म और उसका सच्चा अनुयायी जैन । यह जिनधर्म आत्माकी स्वाभाविक परिणति होनेसे अनादिकालीन आत्माके समान अनाटिकालीन है तथा उसके धारक जैन भी ससारमें अनादि कालसे है। क्योंकि न धर्मो धार्मिकैविना, यह अटल सामतमद्रीय वाक्यही धर्म और धर्माकी सयुक्तताका निर्देशक है। मोहक सामारिक प्रवृत्तिके कारण जिस जिस समय इस धर्मका हाल होता है उस उस समय सर्वत्र तीर्थकर परमात्मा जिनद्वारा इस धर्ममें नवीन जागृति उप- स्थिति होती है अतः इस जागतिकी अपेनाही तीर्थकर मूलस्थापक माने जाते इस हुडावसार्पणी कालमें इम धर्मके प्रथम प्रवर्तक नुपम जिन इस भरत क्षेत्रमें हुए। इसी तरह तेवीस तीर्थकर और हुए उनम अन्तिम तीर्थंकर महा- वीर जिन हुए। उन्हींके धर्मानुयायी आजकलके जैन इन आर्यावर्त भरतनेत्रमें थोडी संख्याम कुछ टेसे जाते हैं वह सिर्फ कालढोपजन्य लीला है जो कुछ २ सर्वसाधारणकी दृष्टिम ये जैन दो संख्यामें विभक है एक दिगम्बर दुसरे श्वेताम्बर, इनमेंसे ऐतिहासिक दृष्टिसे यदि विचार किया जाय तो मूलकता और असलिय एक दिगम्बर सप्रदायमें है । इस सप्रदायमें जो मूल सघता है वह इसी उद्देश्यकी सूचक है । भद्रवाह श्रुतकेवली तथा उनके अनन्य भक्त मौवाय प्रथम चद्रगुप्त सम्रादके अन्तकालके कुछ समय बाद गैथिल्य साधुवर्गके द्वारा श्वेताम्बर सप्रदायिकी उत्पत्ति हुई । उसमें उस धर्मके मुआफिक साधुचर्या सरल होनेसे वैसे (श्वेत पटधारी ) साधु आज कल भी देखे जाते है। उनमें मूल दिगम्बर सम्प्रदायसे अलग होनेके वाद अपनी स्मृति तथा धारणाके मुआफिक शास्त्र तथा प्रवृत्तियोंकी रचना त्ति जो कुछ देखनेमें आती है उसमें दिगम्बर संप्रदायिसे बहुत फर्क पाया जाता है। परंतु उनके मुआफिक जो आवश्यकादि कर्तव्य तथा और जो क्रिया है उनकी प्रवृति जैसी पाई जाती है वैसी सर्व साधारणकी अपेक्षा दिगम्बर सप्रदायमें देखने में नहीं आती उसका कारण पदस्थकी प्रधानता है। इस कलिकालके दोष दिगम्बरीय साधु सख्या बहुतही कम इनी गिनी नजर आती है तथा प्रतिमाधारियोंकी संख्या भी बहुत कम है परतु जो कुछ सख्या है उस सवमें अपने पदस्थके मुआफिक आवश्यक क्रियाओंका पालन पूर्ण रीतिसे होता है। तथा दूसरे पाक्षिक श्रावक भी अपनी शक्तिके मुआफिक करते हैं। परंतु सामायिकादि पइ आवश्यकका प्रधान रीतिसे आचरण जैसा दि. मुनिवर्ग तथा नैष्ठिक श्रावक वर्गमें है वैसा पाक्षिकमें तथा नैष्ठिकके प्रथम द्वितीय पदमें नहीं है। परंतु इसका यह मतलब नहीं है कि वहा यह आचरणही नहीं। आचरण अवश्य है परंतु प्रधान गौणका भेद अवश्य है । नैष्ठिक श्रावकके तृतीय दर्जेसे लेकर मुनिपर्यंत पदस्थ मुआफिक पडावश्यककी प्रधानता है और उससे नीचे दर्जेमें गौणता है । इसी तरह देवपूजा, गुरु-उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान, ये छह कर्म गृहस्थके साधारण रीतिसे वर्णन किये हैं परतु इनमें भी गृह- स्थके लिये देवपूजा, गुरु उपासना तथा दान इनपर कुछ जादा आवश्यकता उनके पदके मुआफिक है औरों में तथा इनमें पदके मुआफिक सर्वकी प्रधानतासे योजना है । इसी तरह सामायिकादिमें भी नीचेसे लेकर अपने पदके मुआफिक उत्कर्षता है। न कि नीचे दर्जे में तो अभाव हो और ऊपर विधानता हो ऐसा नहीं। १ देवपूजागुरूपास्तिः स्वाध्याय संयम तपः दान चेद् गृहस्याना पर कमांगि दिने दिने ।

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किंतु अपने अपने दर्जे के मुआफिक शास्त्र सम्मत सव दोंमें वैसा विधान है।
और वे अवश्य कर्तव्य है इस लिये उनका नाम आवश्यक है।
मूलाचार प्रणीत आवश्यकी निरुक्ति ।
ण वसो वसो अवसस्स कम्ममावासयन्ति वोद्धव्वा ।
जुत्तित्ति उवायत्ति य णिरवयवा होदि णिगुत्ती ॥ ५१५॥
मूलाचार
जो क्रोधादि कषाय तथा रागद्वेषादि वैभाविक परिणतिके वशीभूत (आधीन)
नहीं है वह अवश है उसका जो कर्तव्य (आध्यात्मप्रवृत्तिरूप आचरण) वह
आवश्यक है।॥
इस गाथाके पूर्वार्द्धम आवश्यक शब्दका निरुक्ति शब्दार्थ कहकर नियुकि
शब्दका भी निरुकि' द्वारा अर्थ इस प्रकार किया है ।। ५१५ ॥
युक्ति उपायका नाम है और जो निरवयव अर्थात् पूर्ण युक्ति (उपाय ) सो
नियुक्ति है अर्थात् आवश्यकके पूर्ण उपाय सो आवश्य नियुक्ति है ।
आवश्यकके पूर्ण उपाय छह है।
सामाइय चउवीसत्थव वंदणयं पडियमणं ।
पञ्चक्खाणं च तहा कामओ सग्गो हवदि छहो ॥ ५१६ ॥
मूलाचार ।
सामायिक १ चतुर्विंशतिस्तव २ वदना ३ प्रतिक्रमण ४ प्रत्याख्यान ५
कायोत्सर्ग ६ इस प्रकार ये छह आवश्यक नामसे प्रसिद्ध हैं।
नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र काल, भाव, इन छह निक्षेपोंद्वारा मूलाचार तथा
प. आशाधरजी कृत अनागार धर्मामृत प्रथमें सामायिकादिके कथनका विधान है
सामायिक क्रियामें जैसे-
शुभेऽशुभे वा केनापि प्रयुक्त नाम्नि मोहतः।
स्वमवाग्लक्षणं पश्यन्न रतिं यामि नाऽरतिम् ॥ २१ ॥
अध्याय ८ अनागार धर्मामृत ॥
१ जरूरी कर्तव्य भी आवश्यक शब्दका अर्थ है । जैसा कि अनागार घमा.
मृतमें कहा है-
यद्याध्यादिवशेनापि क्रियतेऽक्षावशेन तत् ।
आवश्यकमवश्यस्य कर्माहोरात्रिक मुनेः ॥ १६ ॥

अज्ञानमे उच्चारित-शुभ तथा अशुभ नाममें रागद्वेपका त्याग वा साम्यभावश नाम सामायिक इत्यादि। इसी तरह अन्य आवश्यकोंके साथ भी नामाटि निक्षेपका अनागार धर्मामृतमें विधान है ।। सामायिकरा मामान्य लक्षण मूलाचारमें इस प्रकार है- सम्मत्तणाणसंजमतवेहिं जं तं पसत्थ समगमगं । समयंतु तं तु भणिदं तमेव सामाइयं जाणे ॥ ५१८॥ सम्यक्त्व ज्ञान सयम और तप इनके माय जीवकी भले प्रकार प्राप्ति अर्याद जीवकी इन चारों स्वरूप अवस्था है उसीका नाम समय है और समयका ही नाम सामायिक है ॥ अथवा सामायिक शब्दके चौगिक और भी बहुतसे अर्थ है। जैसे कि-समय नाम आत्माका है उनके धर्मका नाम सामाविक है। अथवा शुद्धात्म-परिणति तथा तदर्य किया, अथवा भले प्रकार गमन तथा उम निमित्त किया नाम भी सामायिक है ॥ तथा जीवन मरण लाभ अलाम इष्ट अनिष्ट पदार्थ सयोग तथा इष्ट अनिष्ट कर्म । नुत-दुःस शत्र-मित्र वा भगिनी-भायाँ- दिम रागद्वेष निवृत्ति पूर्वक वास्तविक मान्यताका नाम भी सामायिक है अथवा समय नाम द्वादशाग न शास्त्रका भी है उनकी प्राप्ति तथा उनकी श्रद्धा तथा भावनाल्प परिणतिका नाम भी सामायिक है । तथा साम्यभावके निमित्त जो पाठ है उसका नाम भी मामायिक है-इस प्रकार मामायिकके अथकारोंने अनेक अर्थ किये है। वे सब ही आत्मशुद्धिके योधक है । तया सामायिकके कोन कैसे व्यक्ति अधिकारी है तथा किन २ कारणोंसे सामायिक स्वरूपमें परिस्थिति रह सकती है तथा किन कारणों से सामायिक्ने प्रवृती होती है इत्यादि योग्य २ स्थलोंमे जहा जैसा चाहिये वहा वैसा वर्णन मिलता है। मामायिस्का वर्णन हमारे यहा चार स्थलोंमें मिलता है। वे स्थल चार ये है :- श्रावकके १२ व्रतोंमे पहिला शिक्षा व्रत १ श्रावककी ११ प्रतिमाओमसे तीसरी प्रतिमा २ पाच प्रकारके चारित्रोंमसे पहला चारित्र ३ षडावश्यकॉमे प्रथम आवश्यक ४ १जीविते मरणे लाभेलामे योगे विपर्यये। बन्धावगै सुखे दुःखे साम्यमेवाभ्युपैम्यहम् ॥ २७ ॥ अनागार धर्मामृत, अध्याय ८ - (१) शिक्षाप्रतमें जो सामायिक है उसका स्वामी समतभद्ने ६ सहस्थलॉन विमक कर समाप्त किया है। जैसे कि स्वरूप १ विवि २ सार्थकता : परीपह उपसर्गके सहनकी शक्ति ४ तथा विचार करने योग्य पदार्य ५ और पच अती- चारका त्याग ६इन लोकोम सामायिक सम्बवि सर्व वर्णन है उसी प्रकार अन्य प्रथकारोंने भी सक्षेप तथा विस्तृत रूपमें वर्णन किया है। पुरुषार्थ मिथुपायमें सामायिकका लक्षण करते हुए सामायिकको तत्वज्ञानमे कारण बतलाया है जैसा कि १४८ के चढमें है। तथा सामायिककी सार्थकताम भी रत्नकरड श्रावकाचारके समान धावकको औपचारिक महाव्रती वर्णन किया है जैसा कि १५० वी आर्यामें है। इसी तरह सागार धमांमृत वगेर में खूब स्पष्टतासे वर्णन है। (२) प्रतिमात्यलमे तीसरे मामायिक प्रतिमा बारीका वर्णन रलकरढ श्राव- काचारमें इस प्रकार है- चतुरावर्तत्रितयश्चतु प्रणामस्थितो यथा जातः । सामायिको द्विनिषद्यस्त्रियोगशुद्धस्त्रिसंध्यमभिवन्दी ॥१३९॥ चारों दिशाओंमें तीन तीन आवर्त और चार प्रणाम सहित तथा वाद्य और आभ्यन्तर उपाधि रहित दो आसन ( पद्मासन तथा वइगासन ) सहित मन वचन कायरूप योगत्रय शुद्ध तीनों सध्याओंमें वन्दना करनेवाला सामायिक प्रति- माघारी धावक है ॥ १३९ ।। इस दर्जेमें नीचेके दर्जेसे सामायिककी उत्कृष्टता ऐसी है कि यहा यह अवश्य कर्तव्य है वज्रपात सरीखी विपत्ति आनेपर भी सामायिक सम्बधि क्रियासे विमु. खता नहीं होती तथा इस पदके मुआफिक पूर्ण दृढता रहती हैं। इससे ऊपरके दर्जेमें और भी उत्तरोत्तर दृढता तथा प्रकर्पता है। (३) पांच प्रकारके चारित्रम जो सामायिकका विधान है वह वहा पर मुख्य- तासे सवरका कारण है क्योंकि वीतरागताका विशेष कारण होनेसे परमशुद्धताका नियामक है तथा चारित्रान्तरगत जो उसका विधान हे वदि की प्रधान- तासे है। ( ४ ) आवश्यकों में जो सामायिकका विधान है उसका प्रयोजन यह है कि मुनि तथा श्रावकको अपने २ पदमे पूर्णरूपसे स्थित करनेमें कारण है अत: इसका १ रत्नकरह श्लोक न. ९७ से १०५ तक.

६ । - अवश्य कर्तव्यरूपसे धारण करना जरूरी है ऐसा ही सवध दूसरे वदन आदि आवश्यके साथ है। यहा सामायिककी दृढताके लिये अनेक प्रकारके भावुक सामायिक पाठ पढ़े जाते हैं जिससे कि सामायिककी तरफ विशेप प्रवृत्ति होती है तथा दृढ़ता होती है। जैसे कि प्रस्तुत यह सामायिक पाठ है । तथा श्री अमितिगति आचार्यकृत संस्कृत पाठ है तथा और भी अनेक भाषाओंमें पाठ है । तथा प्राचीनप्रथों में भी ऐसे पाठ मिलते हैं जैसे कि मूलाचारमें- जो समो सवभूदेसु तसेसु थावरेसु य । तस्स रागो य दोसो य वियर्डि ण जणेति दु॥५२६॥ मूलाचार त्रस और स्थावर ऐसे सर्व प्राणियों में जो वाधारहित सम परिणाम करता है उसके राग और द्वेप विकारको नहीं उत्पन्न करते अर्थात् उसीके सामायिक स्थिर रहता है। इसी रीतिसे अनागार धर्मामृतमेंभी ऐसे पाठ है जैसेकि- सर्वसत्वेषु समता सर्वेम्वाचरणेषु यत् । परमाचरणं प्रोक्तमतस्तामेव भावये ॥३४॥ । अध्याय ८ सर्व प्राणियों में जो समता है वह सर्व आचरणों में उत्कृष्ट माचरण कहागया है अतःउसीकी भावना करू ॥ ३४ ॥ इस लोकमें सामायिक सम्बधि प्रायता तथा दृढ़ताके निमित्त विशेष वर्णन है । मैत्री में सर्वभूतेषु वैरं मम न केनचित् । सर्वसावधविरतोऽस्मीति सामायिकं श्रयेत् ॥ ३५ ॥ सम्पूर्ण प्राणियोंसे मेरी मित्रता है वैर किसीके साथभी नहीं है इसी हेतुसे मैं सर्व पापोंसे रहित हा। इसीलिये आपभी सामायिकका आश्रय लो ।। ३५ ॥ भावार्थ-सर्वपापोंकी निवृतिमें कारण सामायिक है इसलिये उसका धारण करना अवश्य कर्तव्य है। गृहस्थभी यदि सामायिकको पूर्ण रीतिसे धारण करें तो वह महाव्रती मुनिके समान है यह सर्व आचारप्रथोंमें कहा गया है. । अर्थात् जो फल मुनियोंको प्राप्त होता है । वैसा तथा वह फल परपरायसे गृहस्थको भी (प्रम महाव्रत सम्बधि ७ मिलता है। विधिपूर्वक सामायिकके धारक गृहस्थका विशेष माहात्म्य मूला- चारमें इसप्रकार वर्णन है । सामाइए कदे सावए ण विद्धो ममो अरण्णम्मि । सो य मओ उद्धादो ण य सो सामाइयं फडिओ ॥ ५३२ ॥ मूलाचार । वनमें श्रावकके सामायिक करनेपर शिकारियों ( हिंसकों ) द्वारा पशुवध नहीं होता अर्थात् पशुवर्ग त्रासको प्राप्त नहीं होते । और वह पशुवर्ग भी उद्धत (क्रूर ) नहीं रहते कि जिससे सामायिकम विघ्न हो अथांत् श्रावकके सामायिक करते समय सभी पशु पक्षी क्रूरभाव छोड़कर शान्त हो जाते है । यह इस सामायिकका ऐहिक चमत्कार है ॥ सामायिकका अन्य पच आवश्यकोंके साथ भेदाभेदीकरण जिस प्रकार पात्र विशेषकी अपेक्षासे सामायिक और छेदोपस्थापना रूप चारित्रका तीर्थकरोंने जुदा २ उपदेश दिया है उसी प्रकार आवश्यक क्म भी भेद तथा अभेद विवक्षासे भेदाभेदात्मक है । और जैसे अहिंसाव्रतके अलावा अन्य चार व्रत भी अहिंसा स्वरूप हैं तथा चारित्र और आवश्यकभी भेद विवक्षासे ५ और ६ भेद रूप क्रमसे हैं और अभेद विविक्षासे एक सामायिक रूप हैं। क्योंकि प्रथकारोंकी आर्थिक कथन शैलीसे यही निर्णय होता है कि अन्य सव सामायिककेही परिकर हैं और उन सवका विधान सामायिकमें अमिरुचि, दृढता तथा स्थिरताके लिये है। इसी हेतुसे अन्य आवश्यक भी सामान्य रीतिसे सामायिक नामसे कहे जा सकते हैं तथा कहे जाते हैं। जैसे कि पडित महाचद्रजीकृत एक भापा सामा- यिक पाठ मूलचद्र कशनदासजी कापड़िआके प्रेसमें सूरतसे प्रकाशित हुआ मिलता है और उसका गुजराती अर्थ प. नदनलालजी चावली (आगरा) द्वारा किया हुआ है । उसमें पाठ तो प्रतिक्रमण वगैर सभी है परंतु नाम सामायिक पाठ । १ वावीसं तित्थयरा सामायिय संजमं उवदिसंति । छेदुवठावणियं पुण भयवं उसहो य वीरो य ॥ ५३३ ॥ मूलाचार । आदि और अतिम जिनने छेदापस्थापनाका और वाकीके तीर्थंकरोंने सामा- यिकका उपदेश दिया।

है। फिर भी पहले प्रतिक्रमण कर्मका पाठ है सामायिक कर्म तो तीसरे नम्बरपर है । इससे प्रतीत होता है कि अन्य आवश्यक सामायिकके साधन होनेसे सामायिक नामसे भी कहे जाते है फिर उनमे जैसा क्रम हो वैसाही ठीक कहा जा सकता है । परतु जहा भेद दृष्टिसे व्यवस्था है वहा वह ही क्रम है जो कि मूलाचारकी गाथासे लिख चुके हैं तथा यही क्रम प. आगाधरजी प्रणीत अनागार धर्मामृतमे भी पाया जाता है। जैसे कि- सामायिकं चतुर्विंशतिस्तवो वंदना प्रतिक्रमणम् । प्रत्याख्यानं कायोत्सर्गश्चावश्यकस्य षड्भेदाः ॥ १०॥ अध्याय छह आवश्यकोंका संक्षेपतासे स्पष्टीकरण । १) सामायिक-समता तथा समय सम्बन्धिकृत्य, ( पूर्व वर्णित अर्थ) (२) चतुर्विशतिस्तव-जिन्होंने पूर्ण समयभाव ( आत्मधर्म या समता) प्राप्त कर ली है अर्थात् जिन्होंका आत्मभावके ऊपर पूर्ण अधिकार है ऐसे साम्य- भावके स्वामी वृषभादि वर्तमान चौवीस तीर्थकर तथा भूत भविष्यत् कालकी अपेक्षासे अनतानत तीर्थकरोंकी स्तुति भक्तिपूर्वक जिसमें वर्णित हो वह चतु- विंशतिस्तव है ।। उसका विशेष स्वरूप प. अशाधरजीकृत अनागार धर्मामृतमें इस प्रकार है- कीर्तनमहत्केवलिजिनलोकोद्योतधर्मतीर्थकृताम् । भक्त्या वृषभादीनां यत् स चतुर्विंशतिस्तव. पोढा ॥३७॥ अध्याय८॥ जो जन्मजरामरणस्वरूप ससारशत्रुको नाशकर त्रिलोकवद्य पूर्ण आर्हन्त्य पदको प्राप्त हुए तथा समस्त द्रव्य पर्यायोंको एक कालीन प्रत्यक्ष करनेवाले केवल ज्ञानको जिन्होंने प्राप्त किया और ससारके कारण रागद्वेपपरिणतिरूप अनतानुवधी क्रोधादि १६ सोलह कषाय तथा नव हास्यादि नोकपायोंको जीतकर जो पूर्ण जिन भावको प्राप्त हुए, और नाम आदि ९ नवलोकके भावतासे द्योतक १ णाम ठवणं दव्वं खेत्तं चिण्हं कसाय लोओ य । भवलोग भावलोगं पजयलोगो य णादव्वो ॥ ५४१ ॥ मूलाचार । - अर्थात् जाननेवाले तया वर्मतीयके प्रवर्तक पम जिन आदि ०४ तीर्थकरोका -तया अनतानंत चोवीसियोका भक्तिमार्गसे कयन (स्तवन) चतुर्विशति स्तव है और वह नाम स्थापनाटि ६ छह निक्षेपोंके भेदसे, छह प्रकार है । इन छहोनेसे नामादि पाच प्रकारका चतुविशति सब व्यवहार नयसे है और परमार्थने केवल भावस्तव है। जैसा कि अनागार वामृतमें कहा है- स्युर्नामस्थापनाद्रव्यक्षेत्रकालाश्रयाः स्तवाः । व्यवहारेण पञ्चार्थादेको भावस्तवोऽहताम् ॥ ३८॥ अध्याय ८॥ नामादि निक्षेपों द्वारा कथित चतुर्विगतिस्तत्रमें नामस्तव यथा- अष्टोत्तरसहस्रस्य नानामन्वर्थमहताम् । वीरान्तानां निरुक्तं यत्लोऽत्र नामस्तवो मतः ॥ ३९ ॥ अनागार धर्मामृत अ ८ आदिनाथस्वामीसे लेकर महावीर पर्यंत चौवीस तीर्थंकरोंके एक हजार आठ नामोंका अन्वर्थक कथन नामस्तव है । जैसे-श्रीमान् स्वयंभू वृपभ इत्यादि इसी प्रकार स्थापनास्तवादिका लक्षण भी अनागारधर्मामृतमें है । उनमें चिन्ह गुण रग रेखादि लक्षणो द्वारा सर्व प्रकारकी स्तुति है। इससे अभिमानका त्याग होकर विनय गुण प्रगट होता है तथा परणामोंसे विषमता अलग होती है और आत्म गुण मुख्य ममता प्रगट होती है। शुभअशुभ नामका नाम नामलोक १ कृत्रिम तथा अकृत्रिन जो कुछ मो स्थापनालोक २ छह द्रव्यों के समूहका नाम द्रव्यलोक ३ और प्रदेशमहित ऊर्द्धलोक मध्य अध. लोकका नाम क्षेत्रलोक ४ द्रव्यगुणपयायोंका आकार सो चिन्हलोक ५ उदयरूप क्रोवादि कषाय कषायलोक ६ नरकादिचार योनियोमे अपनी पर्या- यको प्राप्त जीव-भवलोक ७ तीन रागद्वेपादि भावलोक ८ पयांयलोक-द्रव्यगुण १ क्षेत्र २ भवानुभाव ( आयु) ३ भाव (परिणाम) ४ के भेदमे ४ चार प्रकार है। ९॥ इसमे जीवादि द्रव्यके ज्ञानादि गुण-द्रव्यगुण पर्याय १ रत्नप्रभा जवू- द्वीप ऋजुविमान आदि-क्षेत्र पर्याय २ आयु सम्बधि जगन्यमध्य उत्कृष्ट कल्पना- भवानुभव ३ कर्म के ग्रहण तथा त्याग करनेने समर्थ असम्ध्येयलोक प्रमाण शुभा- शुभ जीवके भाव-भावपर्याय ४ १० । (३) वदन-पूज्य अरहतादिमें किसी एक परमेष्ठीके निमित्त आत्म परि- णामकी विशुद्धतासे नमस्कारादिस्वरूप जो विनय किया है वह वंदन है इसके भी नामादिके भेदसे छह भेद हैं। परिणाम विशुद्धि-कृतिकर्म, चितिकर्म, पूजा- कर्म, विनयकर्म, स्वरूप क्रियाओंसे होती है। विनयके लोकानुवृत्ति १ अर्थनिमित्त २ कामतंत्र ३ तथा भय ४ मोक्ष ५ इस प्रकार पच भेद हैं जिनका कि मूलाचार अनागार धमांमृतमे अच्छी तरह विवेचन है । इन पाचोंमें मोक्षविनय प्रशस्त है और वदन अधिकारमें उसीको लिया है। और वह अनाहत आदि ३२ दोपोरहित पालन किया जाता है तब निर्दोष शुद्ध अखडिताको प्राप्त करता है। इन वदन आवश्यकके-लेक्षण, भेद, वद्य, अवद्य, अधिकारी, अनधिकारी, आदिका खुलासा, धर्मामृत, मूलाचारमें सविस्तृत हैं। यह आवश्यक भी मदो- द्धत्यका नाशक होकर नम्रता पैदा करता है जो कि साम्यभावकी सहकारिणी है। (४) प्रतिक्रमण--जिसके द्वारा अनात्म भावसे आत्मभावमै पुन. प्राप्तिहो, अथवा प्रमोदजन्यदोष जिसके द्वारा निवृत्त हों या जो अतीचारका सशोधक हो वह प्रतिक्रमण है। सस्कृतमे इस शब्दकी विग्रह निरुक्ति-प्रतिक्रम्यते येन, ऐसी होती है । उसका अभिप्राय यह होता है कि-टे हुए स्थानमें जिसके द्वारा वापिसी (पुन. प्राप्ति) हो अर्थात् पूर्वगृहीत स्वाभाविक स्थानका किसी कारण त्याग होनेपर भी फिर उसी स्थानकी प्राप्ति जिसके द्वारा हो वह प्रतिक्रमण है । उसीका अर्थ प्रमोद प्राप्त दोषोंका जिसके द्वारा नाश हो । इत्यादि प्रतिक्रमणके अर्थ हो १ कर्म नाशक क्रिया २पुण्य संचय ३ पूजानिमित्त माला चंदन वगैरः पवित्र वस्तु समर्पण ४ शुश्रूषा आदि. ५ वंदना नतिनुत्याशीर्जयावादादिलक्षणा। भावशुद्धथा यस्य तस्य पूज्यस्य विनयक्रिया ॥ ४६॥ अनागार धर्मामृत अ.८ ६-प्रमादप्रातदोषेभ्यः प्रत्यावृत्य गुणावृतिः । स्यात्प्रतिकृमणा यद्वा कृतदोषविशोधना ॥ प्रसादजन्य दोषोंसे हटाकर गुणोंमें वापिस करना, या किये हुए अपराधोंकी शुद्धि करना-प्रतिक्रमण है। इसे गुणावृति तथा विशोधना भी कहते है।

eM जाते है । और वह प्रेतिक्रमण दडक ( पाठ विशेष ) आदिके आठ विकल्पोंके द्वारा किया जाता है। और इसकी प्रवृति सामायिकादिके समान नामाटिसे ६ छह प्रकार है इस लिये यह भी छह भेद स्वरूप है। और वह दिवस रात्रि आदि सात निमित्तरूप है। इसका लक्षण अनागार धर्मामृतमें इस प्रकार है- अहर्निशापक्षचतुर्मासान्देयोत्तमार्थभूः । प्रतिक्रमस्त्रिधाध्वंसोनामाद्यालम्बनागस ॥ ५७ ॥ अध्याय ८॥ दिन, रात्रि, पक्ष, चतुर्मास, वर्ष, ईर्या, और यावज्जीव, इन सातके आश्रय नाम आदि निमित्तजन्य अपराधोंका मन वचन काय द्वारा नाश प्रतिक्रमण है। ।। ५७ ॥ नामादि द्वारा उत्पन्न हुए दोषोंकी प्रतिक्रिया किम प्रकार होती है इसका खुलासा ५९-६० के श्लोकोंसे इस प्रथद्वारा हो जाता है मूलाचारमें भी इसको वर्णन इसी प्रकार है। और यहा करण आधिकरण रूप प्रतिक्रमणके समान कर्ता और कर्म कारकका भी वर्णन लक्षण रूपसे किया गया है। जैसे- स्याप्रतिक्रमकः साधुः प्रतिक्रम्यं तु दुप्कृतम् । येन यत्र च तच्छेदस्तत्प्रतिक्रमणं मतम् ॥ ६१ ।। १ 'पडिकमामि भते' इत्यादि प्राकृत पाठ जो कि इस पुस्तककी आदिमें है। तथा संस्कृत पाठ-ईपिथे प्रचलिताद्य मया प्रमादादित्यादि अनेक पाठ अनेक भाषामें कहे गये हैं। २ प्रतिक्रमणं प्रतिसरणं परिहरणं धारणा निवृत्तिश्च । निन्दा गर्दा शुद्धिश्चामृतकुम्भोन्यथापि विपकुंभाः ॥६३|| अनागार धर्मामृत दडक पाठ विशेषका पढना सुनना-प्रतिक्रमण, गुणोंमे प्रवृति-प्रतिसरण, दोषोंसे निवृत्ति-प्रतिहरण, चित्तका स्थिर करना-धारणा, विरुद्ध मनोवृत्तिका रोकना, किये हुए दोषोंकी ( मैने बुरा किया ) ऐसी भावना भाना-निंदा, उन्हीं दोषोंको गुरुके समीप निवेदन करना हो, और प्रायश्चित्तादि द्वारा आत्माको शुद्ध करना-शुद्धि, ये सर्व अमृतके समान है क्यों कि आत्म शुद्धिके कारण है अन्य विष घट तुल्य हैं।

१२ - । प्रतिक्रमण करनेवाला साधु प्रतिक्रमक "कत्ता, और प्रमादजन्य अतीचार रूप पाप" प्रणिक्रम्य, कर्म है जिस क्रियासे तथा जिस क्रियामें दोपोंका परित्याग हो वह प्रतिक्रमण है। ऐसाही विचार अन्य आवश्यकोंमें रूपान्तरसे है। इसके द्वारा दोष निवृत्ति होनेसे आत्मा आत्मस्वरुपका लाभ कर परम सामायिकी होता है इस कारण अभंद विवक्षासे इसको सामायिक भी कहते है । इसी हेतु जो प्रतिक्रमण पाठ है वह सामायिक पाठ भी कहा जाता है । यही नियम अन्य आवश्यकोंके साथ भी है । और इसी नियमका निर्वाह इस प्रस्तुत सामायिक पाठमें है । क्योंकि इसमें स्तवन वदन प्रतिक्रमणादि सभी पाठ होने पर भी इस पुस्तकका नाम पडित जयचद्रजी सरीखे विद्वानाने सामायिकपाठही लिखा है । और वह युक्तिमार्गसे समुचितही है ॥ (५) प्रत्याख्यान त्याग वृत्तिका नाम प्रत्याख्यान है । उसमें किस पदा- र्थका त्याग कोंन करता है इसका वर्णन अनगार धामृतमें इसप्रकार है- सावद्येतरसचित्ताचित्तमिथोपींस्त्यजेत् । चतुर्धाहारमप्पादिमध्यान्ते स्वासयोत्लुकः ॥ ६८ ॥ अध्याय ८1 प्रत्याख्यानके ग्रहणसमय तथा मध्य और अन्तसमय. जिन तथा गुरु आज्ञाद्वारा उत्साही (साधु ) हिंसादि अपराधसे सदोष या निर्दीप, सचित्त अचित्त तथा मिश्र सर्व प्रकारके परिग्रह और भोजनका त्याग करता है । इसमे त्यागका नाम प्रत्याख्यान, परिग्रहादि प्रत्याख्येय, और त्याग करनेवाला प्रत्याख्याता, इसप्रकार प्रतिक्रमणके समान कारक चतुष्टयका वर्णन है। नामादि छह निक्षेपोंकी अपेक्षा प्रत्याख्यानका लक्षण- निरोध्दुमागो यन्मार्गच्छिदो निर्मोक्षुरज्झति । नामादीन् षडपित्रेधा तत्प्रत्याख्यानमामनेत् ॥ ६५ ॥ मोक्षका इच्छुक अपराधके रोकनेके लिये रत्नत्रयके विरोधी नामादि छहका जव त्याग करता है तब वह त्याग प्रत्याख्यान कहा जाता है ॥६५॥ अनागार धर्ममृत, अध्याय ५. प्रत्याख्यानमे अन्य उपाधियोंके त्यागके साथ उपवासकी विशेषतासे प्रधा- नता है । और वह सार्थक-अनागत, अतिक्रमण आदि दशभेदों सहित विनयादि चतुष्ककर शुद्ध मोक्षार्थी साधुद्वारा यथाशक्ति पालन किया जाता है। १ प्रतिक्रमणका अनागत आदि दश भेद तथा विनयादि चनुष्का क्यन मूलाचार तथा अनागार वामृतमें विस्तारसे वर्णित है । नाका लगानेपर उनका वर्णन फिर कभी किया जायगा । भूमिका बढ जानेके हेतु यहा नहीं किया है । इनके द्वारा सर्व प्रकारकी लालमाका न्याग होनसे मान्यभावल्प आन्ना- तिमें दृढता होती है। यह अन्य आवश्यकोंके ममान मुनियोंद्वारा प्रधानतासे अवश्य कन्यतान्पने पालन किया जाता है और श्रावकोंके भी अपने पढके मुआफ्कि स्वय कर्तव्य है। इसके पाठमें त्याग वृत्तिके उद्बोधक उन भावोंका कयन है कि जिनके पढन मुन- नेसे त्याग भावकी जागृति नया त्याग भावम स्थिरता होती है। अन्य आव- व्यक पाठोंम भी ऐसी ही शैली है जिनका कि कुछ कुछ रहेख हमने भूमिकाने कहीं २ यथा स्थान किया है । विशेष ज्ञानके लिये दि जैन संघटाने आवश्यक विषयक अनेक ग्रन्थ है जिनका कि वास्तविक मुकाविला यथार्यगतिसे कहीं भी नहीं है। ( ) कायोत्सर्ग-शरीर सम्बन्धि त्यागका नाम कायोत्सर्ग है इसका असली अर्थ कायसम्बधि ममत्वपरिणामका त्याग है जैसा कि आशावरजीने अनगार धर्मामृतम प्रमाणरूपसे कहा है- ममत्वमेव कायस्थं तात्स्थ्यात् कायोऽभिधीयते। तस्योत्सर्गस्तनूत्सों जिनविम्बाकृतेर्यतः ॥ गरीरस्थित ममत्वही शरीरस्वरूप होनेसे काय कहा जाता है टमके त्यागका नाम कायोत्सर्ग है और वह जिनप्रतिमाकी आकृतिके समान माधुके होता है। कायोत्सर्गका धारक सर्व प्रकारले परीपह तथा उपनगो सहता है जैसा कि कहा भी है- अनगार धर्मा. अध्याय ८॥ व्युत्सृज्यदोषान् निश्शेषान् सद्धयानी स्यातनून्सृती। सहेताप्युपसर्गोरुन् कमैंचंभिद्यतेतराम् ॥ ७ ॥ कायोत्सर्गमें श्रेष्ट ध्यानी सम्पूर्ण बाह्य अभ्यन्तर उपाधिजन्य दोपोंगे टोटकर सर्व प्रकारके दैविक आदि उपसर्ग तथा परीषदोंको महन करता हुआ ही अनेक ---घोटक, लता, स्तंभ, आदि १८ दोष कायोलनके अतीचार ।

- १४ प्रकारके कर्मविकारोंका अतिशय कर नाश करता है । इन कायोल्लगमें चर्म और शुल्कध्यानका चितवनही प्रधानतासे होता है । उनी कारण आत्मा विशेषनासे कर्म निर्जरा करता है। यह भी अन्य आवश्यकोंके समान नामादि भेदसे कारक चतुष्पक माय भूला- चार अनगार धर्मामृतमें सामोपागतासे वर्णन किया गया है । और उसका विधि- 'विधान भी वहा पूर्ण रूपसे है । इसको पूर्ण रूपसे वही शक्तिशाली धारण कर सकता है कि जिनका गरीर पर पूर्ण कावू है। इसके धारणका प्रमाण उलट मध्यम जपन्यके भेदसे तीन प्रकार है और वह देवतिकादि प्रतिक्रमणमें अनेक भेदरूप उथान प्रमाणोंसे वर्णित है। जघन्यमें इसका प्रमाण अन्तर्मुहूर्त है । उत्कृष्ट में एक वर्षका प्रमाण है मध्यने अनेक विकल्पस्वरूप है। उवास गणना नमस्कार भत्रके दो चरण चितवनरूपने शास्त्रम की गई है । और वे (श्वालोट्वास ) कहा पर कितने है टन सयका प्रमा- णरूपसे कथन मूलाचार वगैर. ग्रन्थोंमें विस्तारसे किया गया है। इस विग्रहात्मक अर्धके अलावा कायोत्सगंके और भी विप्रहमागसे अन्य- यात्मक ( यौगिक ) अर्थ होते है जैसे कि कायकी, उत्-उत्कृष्ट, नर्ग-रचना, जिन पद्मासन मयूरासन कुक्कुटादि ८४ चौरासी आमनों द्वारा हो यह कायोमर्ग है। अथवा-कायकी उत्-उत्कृष्ट प्रत्याख्यानादि गुणों के लिये जोमर्ग-रचना सो भी कायोत्सर्ग । इन दो अर्थोंसे यह स्वत.सिद्ध है कि कायोत्मग नासन भेदसे अनेक प्रकार है तथा आवश्यक गुणोंकी सिद्धिके लिये किया जाता है। इसके पाठकी भी रचना ऐसे शब्दोंमे है कि जिमके पटने मुननेते कायोत्लगाँसी कायोत्सर्गता सफल होती है इसी हेतु इसके पाठका पढ़ना सुनना अवश्य कर्तव्यों परिगणित है। इस आवश्यकसे धीरता, दृढता, गंभीरतारूप आत्मशक्ति पैदा होती है और आलस्य जड़ताका प्रभाव होता है तथा ममताका सर्वथा अभाव होकर समताकी प्राप्ति होती है। जैन सम्प्रदायमें आत्मशुद्धिके निमित्त जिस प्रकार छह आवश्यक पाठ नियुक (अखंड उपाय) माने गये हैं वैसे अन्य सप्रदायवाले भी अपने मतानुसार सध्या वगैरःको अवश्य कर्तव्य मानते हैं तथा जैन जैनेतर सभी अपनी २ । विधिके मुआफिक सम्प्रदाय सूचक कर्तव्य समझकर भी पालते है । परनु मरके यहां उद्देश्य आत्मशुद्धि तथा अपराधक्षान्ति है। दिगम्बर सम्प्रदायम आवश्यकोंके साथ जो नियुक्ति शब्दका सम्बन्ध पाया जाता है और वह मुनि धर्म प्रल्पक अति प्राचीन मूलाचार प्रथमें विशुपतासे है उसका अभिप्राय यही है कि "ये आवश्यक मुनि धर्मकी साधनाने अखद उपाय है इममें कुतकको अवकाश नहीं किंतु सर्वयुक्ति सिद्ध येही अक्थ्य कर्तव्य- तासे आवश्यक है" । इस अर्थकी यह पूर्ण शक्ति नियुकि शब्दम है। श्वेताम्बर सम्प्रदायने तो इस शब्दसे इतना ममत्व जनाया है कि प्रथका नाम भी आवश्यकनियुक्ति या नियुक्ति रख लिया । उसमें मूलाचारको जो गाया ये विकल तथा पूर्ण रूपमे मिलती है यह कुछ विशेषताको सूचक है । आवश्यक नियुक्तिके प्रथकता जो भद्रबाहु स्वामी उनके यहा माने जाते है वह भी आचारागादि सूत्रके कर्ता सुधर्माचार्यके समान है । क्यों कि उनके यहा ऐसा कथन है कि महावीर स्वामीके २०० वर्यवाद जिन सूत्रके संग्रह करनेके लिये पहली समति पटनाम वैठी थी उस समय अग छिन्न हो गये तथा वह संग्रहीत भी दुष्कालादि पढ़नेके सवव बहुत कुछ छिनमिन हो गया था। जो कुछ अवशिष्ट रहा उसका उद्धार वलागाम ( वल्लभी) मे देवर्धिगगीने किया इसमे यह तो स्पष्ट है कि जो सूत्र उनके यहा मिलते हैं वे खास सुधर्माचार्यक नहीं होकर भी सुधर्माचार्य कृत कहे जाते है । ऐसाही निरुक्ति तया भगवाहुका भी सबंध हो तो आश्चर्य नहीं तथा मूलाचारके गाया भी वहा दीखते है तो इसमें भी आश्चर्य नहीं क्योंकि वहा ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि नवीन फ्रान्तिमें प्राचीनताके प्रायः बहुत अश भी पाये जाते हैं । भापाविपयक विचार दि. जैनधर्मका पूर्ण शास्त्र साहित्य तो द्वादमागताही था परंतु उसीया आशिक साहित्य संस्कृत और मागधी प्राचीन भाषामें जो उपलब्ध है वह पूर्ण प्रमाण कोटिमें है तथा कनडी और तलिंग भाषाका जो साहित्य है वह भी प्राचीनताके नातेसे भी वैसाही मान्य है जैसा कि सस्कृत और प्राकृत शास्त्र १ जनमित्र अक १९ चैत्रवदि ७ सप्तमी स. १९८० विक्रम वीर सं. २४५० के पृष्ठ ३०७ में पुरातत्व त्रैमासिक लेखका विषय ।

१६ साहित्य मान्य है क्योंकि यह भी साहित्य उन्हीं अपियोंने लिखा है कि जो सस्कृत और मागधीके पूर्ण ज्ञाता होकर भी देशमापाओंके पूर्ण रूपमे जानकार थे। इस लिये हमारे हिसायसे चारोंही भापाके गान प्रमाणकोटिमें चगवर है । तथा उनका जिन २ हिंदी मरेठी गुजराती वगैर देशभाषाओं में साराग है वह भी हमारे लिये मान्य है । आवश्यक विषयक जो हमारे यहा पाठ सस्कृत वगैरः प्राचीन भाषाओंमे उपलब्ध है वे तो हमारे लिये बीजाक्षरसी मान्यताके ममान हैं । तथा जो भाषापाठ है वे भी विशेष विद्वानोंकी भावपूर्ण कृति होनेसे हमारे लिये हितावह है। पूर्णता और विकलता। दिगम्बर सम्प्रदायके समान वेताम्बर सम्प्रदायमें भी आवश्यमोंकी संख्या तो छह मेदरूपही मानी है परतु उनके भीतरी भेदोमे कहीं २ विकलता है जैसे कि प्रतिक्रमण नामक आवश्यकके श्वेताम्बर संम्प्रदायम पाच भेद है और दिगम्बर संप्रदायमे यावजीविक ( उत्तमार्थ) और ऐापथिक दो मेद और हैं इस कारण यहा सात ७ भेद है । ये दो भेद सामिल होनेपरही पूर्ण प्रतिक्रमण होता है अन्यथा विकलतामे विकलही है । इसी प्रकार और भी वहात्वरूप कथन विधि वगैरहम विकलता है उसका वारीकीसे विचार करनेपर ज्ञान हो सकता है। क्रमभेदमें यथार्थता कहां। दिगम्बर सम्प्रदायमे पाचमा आवश्यक प्रत्याख्यान और छहा कायोत्सर्ग है। श्वेताम्बर सम्प्रदायमें इससे विपरीत है अर्थात् पाचमा कायोत्सर्ग और छठा प्रत्याख्यान है । ये दोनों क्रम अपनी २ सम्प्रदायमें मान्य है परतु इनमें यथार्थ कौन और विपरीत कौन है जब इस प्रकारका विचार उपस्थित होता है तब उसके निर्णय करनेके लिये हमको निष्पक्ष दृष्टिसे वैसे साधनोंका आयोजन करना चाहिये जिसमें कि ध्येयकी यथार्थ सिद्धि हो । प्रत्याख्यानके लक्षण, सचित्त अचित्त उपाधि तथा आहारके ममत्व विषयक त्यागका विधान है और कायोत्सर्गमे शरीर सम्वन्धिममत्वके त्यागका विधान है और शरीरममत्वका त्याग अन्य उपाधियोंके त्याग पूर्वकही होता है। इस कारण प्रत्याख्यान पूर्वकही कायोत्सर्ग सिद्ध होता है। प्रत्याख्यान सर्व पदार्थका त्याग होकर भी शरीर सम्बधि ममत्वका वैसा त्याग नहीं था सो वह कायोत्सर्गमे आकर वैसा उत्कृष्ट त्याग हो जाता है कि अनेक उपसर्ग परीपह आने पर भी आत्मस्वरूपसे नहीं चिगता । इस कारण दिगम्बर सप्रदायका जो कम है वही निप्पक्ष दृष्टिने यथार्थ है। आवश्यकोंके मूलभेद सर्व आवश्यकोंमे मुख्य भेद द्रव्य, भाव रूपसे जो वर्णित है उसका हेतु यही है कि इन दो भेदोंमे एक की भी कमी हो तो वह आवश्यक ही नहीं। क्योंकि भावके विना द्रव्य निष्प्रयोज है और द्रव्यके विना भाव भी ठहर नहीं सकता क्योंकि वह भावम प्रधान साधन है तथा इनमे व्यवहार और पारमार्थिक जो भेद पाया जाता है उसका भी यही हिसाव है कि एक दूसरेके अभावमै मूल द्रव्यही नहीं रहता। यह क्रम जैन पदार्थोंमे सर्वत्र पाया जाता है उसका हेतु यही है कि पदार्थका स्वरूप ऐमा ही है इस लिये ऐसा वर्णन करनेसेही पदार्थका वर्णन सागोपाग स्वरूप होता है। कुछ विशेप वक्तव्य । प जयचद्रजी छावड़ाने पाहुड आदि अन्य ग्रयोंके समान इम प्रथकी भी देशभाषा कर जैन समाजका वड़ा उपकार किया है । आपने किन किन ग्रयोंपर टीका की है तथा आप कैसे विद्वान् थे और कहाके थे इत्यादि वर्णन हम इस ग्रथमालासे प्रकाशित-आप्तमीमासा, प्रमेयरलमाला (परीक्षामुख ), अष्टपाहुड ग्रयोंकी भूमिकामे कर चुके हैं वहासे पाठक महाशय जानें । यह सामायिक पाठ संग्रह प्रथ है और इसमे पाठ विशेप होनेसे प. जयचद्र- जीने २४ स्थलों में विभक्त किया है यद्यपि उन स्थलोंके खास तौर पर नाम नहीं दिये हैं तथापि वहा २ के पाठसे उस २ स्थलका नाम पढनेवालोंको मालूम पर जाता है। यही प्रथ गुजराती अर्थ सहित भावनगरके दिगम्बर सघकी तरफमे प्रकाशित हो चुका है। इसमे जीवादि तत्वस्वरूप और सिद्ध पूजा ये पाठ और भी जादा है इस प्रथका संग्रह कव किसने किया इस विषयका निश्चय न तो गुजराती अर्यके सामायिक पाठसे होता है और न प. जयचंद्रजी साहबने इस विषयमे कुछ लिखा है इस लिये इसके सग्रहमे हमारी सिर्फ ऊहापोहरूप कल्प- ना ही रह जाती है। समाजमे इस समय हमारे यहाके कई एक पाठ प्रकाशित हुए प्रचित है। उनमे तीन पाठ हमारे पास माई राजमलजी वड़जात्याने गिरनारजी वगैर की १८ - यात्रा जाते समय इस प्रयकी भूमिका वनवानेके निमित्त पालीतानासे भेजे है। उनमेसे एक, अमितगति जी आचार्य कृत सस्कृतमें है जिसका कि न. शीतल- प्रसादजी द्वारा किया हुआ अनुवाद है और दूसरा प. महाचद्रजीकृत भाषा सामायिक पाठ है । जिसपर प. नदनलालजी चावली (आगरा) द्वारा किया हुआ गुजराती अर्थ है । और तीसरा यही भावनगरकी तरफमे प्रकाशित हुआ गुजराजी अर्थ सहित है। इस प्रथमे कहीं २ प. जयचद्रजी द्वारा अनुवादित सामायिकपाठमे जादा कम पाठ है उसका निर्णय दोनों प्रय मन्मुस रखर हो सकता है फिर भी विशेष सुभीते के लिये हमने भी खुलासा कर इसी भूमिका साथ लगा दिया है। और वह यह है- गुजराती अर्थसहितका जादा पाठ पृष्ठ-(१) निस्संगोऽहं जिनानां सदनमनुपमं विपरीत्येक भक्त्या । स्थित्वा गत्वा निपिद्धथुचरणपरिणतोऽन्तः शनैर्हस्तयुग्मम् । भाले संस्थाप्य वुद्धयाममदुरितहरं कीर्तये शक्रवंद्यम् निद्रादूरं सदाप्तं क्षयरहितममुं शानभानु जिनेन्द्रम् ॥१॥ पृष्ठ-(१२) सिद्धेभ्यो निहितार्थेभ्यो वरिटेभ्यः कृतादरः। अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थ नमस्कुर्वे पुनः पुनः ॥ ६॥ आई मंगलकरणे सिस्सा लहुपारया हवंतित्ति । मन्भेअंबुच्छित्ती, विज्जाविज्जफलं चरमे ॥ ७ ॥ पृष्ठ-(१६) णमोकार, पंक्ति ७। पृष्ठ-(१८) ॐ नमः परमात्मने नमोनेकान्ताय संताय थोस्सामिहं । पंक्ति३॥ पृष्ठ-(३६) देवा सुरेन्द्रनरनागसमर्चितेभ्यः पापप्रणाशकरभव्यमनोहरेभ्यः। घंटाध्वजादिपरिवारविभूषितेभ्यो, नित्यं नमो जगति सर्वजिनालयेभ्यः ॥५॥ १ इसी सस्कृत पाठके ऊपर इनने हिंदी भाषामे भी छदोवंध रचा है जोकि सार्थक सस्कृतके साथ प्रकाशित हो चुका है।

६ पं. जयचंद्रजीकृत देशभापाका जादा पाठ । पृष्ठ-(१४) बत्तीस दोषोंके अर्थ सहित नाम (देशमापामें) पृष्ठ-(५२) थोस्सामीत्यादि पूर्वोक्तं पठनीयम्, पक्कि १० । पृष्ठ (५७) व्युत्सृज्यदोपानिःशेपान्-इत्यादि १ छदसे लेकर- चोधिसमाधिविशुद्धि; इस छठी आर्यातक ६ छंट । पृष्ठ (५९) इच्छामि भंते-इत्यादि समाधि पाठ । सामायिक वगैर करनेकी विधि शास्त्रोंके उन २ स्थलोंमें मिलती है, जहाँ कि उसका प्रकारण है। तथा सामायिककी विधि ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजीने हिंदी अर्थसहित संस्कृत पाठमें लिखी है और भावनगरसे प्रकाशित हुए गुजराती अर्थ सहित इसी पाठ सग्रहमे सामायिक और कायोत्सगकी विधि गुजराती में लिखी है पाठक गण वहासे जान सकते है। निवेदन । सभव है कि अज्ञान तथा प्रमाद जन्य दोषके कारण इस पुस्तकके सशोधन तथा भूमिकामे बहुतसी त्रुटिया रह गई होंगीं । क्योंकि छद्मस्य दशामे ऐसा होना सभव है । अतः पाठक गण नीरसदोपभावको छोडकर गुणपय पानमें राजहसीय वृत्ति चरितार्थ कर हमे क्षमादान प्रदान करेंगें। इस भूमिकाके वननेमे हमारे मित्र राजमलजी वद जात्या जो कि इस सस्थाके मत्री हैं, उनकी प्रेरणा तथा पुस्तकें भेजनेरूप साहाय्यसे हम कृत कार्य हुए है अत. हम उनके आभारी हैं और हम उम्मेद है कि आपके उत्साह तथा परि- श्रमसे यह सस्था योग्य समृद्धिका लाभ करेगी ॥ मिति चैत्रवदि ११ सोमवार स. २४५० वीर और १९८० वि. ता. ३१-३-१९२४ ई.। निवेदक-रामप्रसाद जैन, फिलहाल पम्बई. (जटोमा (आगरा) निवासी)

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ॐ श्रीपरमात्मने नमः । जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत भावचनिकासहित सामायिक पाठ । म दोहा। आदि अपम सनमति चरम तीर्थकर चउवीस । सिद्धमुरि उवाय मुनि नमूं धारि कर सीस ॥१॥ जिनवानी जिनधर्म फुनि चैत्य चैत्यके धाम । सब मिलि गिनि नवदेवता करिये सदा प्रणाम ॥२॥ सामायिकको पाठवर पढ़ियो बहु मुनि राज । ताकी भाषा देशमय करूं स्वपरहित काज ॥३॥ ऐसे मगलपूर्वक प्रतिज्ञा कार अभिप्रेत प्रयोजन प्रगट करिये है- मुनिपदवी लेते प्रतिज्ञा कर है, जो मै सर्वपाप रहित जो सामायिक चारित्र ताहि अगीकार करू हू तापीछे आहार विहार उप- शादि प्रवृत्तिरूप होय तब छेटोपस्थापना चरित्ररूप होय है जाने व्यव- हार ऐसाही है। जो गृहस्थ अवस्थावि सर्व पापन्थप प्रवृत्ति थी २ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत ताते विरक्त होय. सर्व पापके त्याग किये परतु जेते सरागभाव है तेते पुण्यरूप प्रवृत्तिका आलवन है, परम वीतराग चारित्रका उद्यमहै सो ताकै अर्थ तीन सध्या प्रभात मध्याह्न अपराह्न विष उत्कृष्ट छह छह घड़ीका नियमकरि आहार विहार उपदेशादि क्रियाते निवृत्त होय एकात- स्थानमै वैठि अपने शुद्ध आत्मस्वरूप सन्मुख होय अन्य जे शुद्धआ- मस्वरूपरूप अहैत सिद्ध तथा शुद्धात्माका ध्याता आचार्य उपाध्याय साधु ए पच परमेष्टी तिनिका स्मरण ध्यानपूर्वक पाठ वा अपनी प्रवृत्ति- विषै उपजे पाप तिनिका प्रतिक्रमण आदिक है ताका पाठ पढे है। तहा प्रथम तो एकात स्थानक बैठे । ता पीछे प्रवृत्तिमै दोप लागे होय ताका वृथाकरणरूप प्रतिक्रमणपाठ हैं । ता पीछे सर्वराग द्वेपन रहित जो समता भाव कहिये सामायिक ताका पाठ है। तापीछे चतुर्विंश- ति तीर्थकरिनिका स्तवन तथा वंदनाफा पाठ है । तापी, स्वाध्याय तथा कायोत्सर्गका पाठ है, इत्यादि। ऐसे घट आवश्यक रूप मुनिराज नियमते नित्य प्रवत है, सो पाठ प्राकृत वचन है, ताकी देश भाषा- मय वचनिका लिखिये है । ताकू वांचि मदबुद्धी भव्यजीवहू अर्थ समझे तब सामायिककी विधिका स्वरूप जानि याविपै प्रवर्तनकी रुचिकर ऐसा प्रयोजन है। तहां प्रतिक्रमणका पाठ ऐसा है- पडिकमामि भंते इरियावहियाए विराहणाए अणागुत्ते अड्गमण णिग्गमणे ठाणे गमणे चंकमणे पाणुग्गमणे विज्जुग्गमणे हरिदुग्ग- मणे उच्चारपस्सवणखेलसिंहाणाय वियडिपइहावणियाए जे जीवा एइंदिया वा वेइंदिया वा तेइंदिया वा चउरिदिया वा पंचेंदिया वा णोल्लिदा वा पेल्लिदा वा संघट्टिदा वा संघादिदावा उद्दाविदा वा परिदाविदा वा किरिच्छदा वा लेसिदा वा छिदिदा वा - भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । or भिंदिदा वा ठाणढो वा ठाणचंकमणटो वा तस्स उत्तरगुणं तस्स पायछित्तकरण तस्स विसोहिकरणं जाव अरहताणं भयवंताणं णमोकार करेमि ताव कायं पावकम्म दुच्चरियं वोसरामि । जयंअहं णमो अरहंताणं इत्यादि जाप्य ॥ ९ ॥ यहु प्राकृत पाठ है। याका अर्थ-भंते कहिये है भगवन् ! पडिकमामि कहिये में किये दोपका निराकरण करूहू । कैसाहू मैं-अणागुत्ते कहिये मन वचन कायकी गुप्तिरहितहूं । अब किये दोप कहा ? सो कहे है- विराधनासहित जो ईर्यापथकी क्रिया ताविप, अतिगमन होतें, निर्गमन होते, बैठते, गमन करते, पदविक्षेप करतें, प्राणीनि ऊपरि गमन करते, वीज जपरि गमन करते हरित वस्तु अपरि गमन करते. मल मूत्र खंखार नाक मलविकृति उपकरण कमडल आदिक क्षेपते, जे जीव एकेद्रिय वेइद्रिय तेइद्रिय चतुरिंद्रिय पचेंद्रिय कू अपने स्थानक जाते रोक्या वा प्रेर्या वा परस्पर भेलाकार पीड्या वा एकठा किया वा मान्या वा परितापित किया वा कतया चूर्ण किया छेद्या भेद्या हो, अपने स्थानक वैठेनिकू तया स्थानकतै अन्यस्थानक जातेनिक; ऐसैं, विराधना होते तिस दोषका उत्तरगुण कहिये निराकरण करण हारा उत्कृष्ट गुण तथा प्रायश्चित्तरूप तथा तिस दोसका शोधन करण हारा जो अरहत भग- वंतका नमस्कार जेतै करंडू तेतैं पापका उपजावन हारा दुराचारसहित जो यह मेरा काय ताहि छोड़ह, यातै ममत्व छोडूहू । ऐसे कहिकरि जय अर्ह णमो अरहताणं " इत्यादि जाप्य ९ करें । ऐसा प्रथम स्थल है ॥ १ ॥ पज्जुवास" यह पाठ मुद्रित दशभक्तिनामक पुस्तकमें अधिक है २ यहासे यह प्राकृतपाठ मुद्रित "ईशभक्तिम" नहीं है। १ ४ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावडाकृत आगे इसही अर्थका समुदायरूप श्लोक पढे है:- ईयापथे प्रचलताऽध मया प्रमादा- देकेंद्रियप्रमुखजीवनिकायबाधा । निर्वतिता यदि भवेदयुगांन्तरेक्षा मिथ्या तदस्तु दुरितं गुरुभक्तितो मे ॥ याका अर्थ-र्यापथ चालता मै जूडा प्रमाण विना देख्यां प्रमादत एकेद्रियादि जीव समूहकी बाधा करी होय ताका मेरै पाप पंच परम गुल्की भक्तित मिथ्या होड ॥ आगें कहे है जो गमन करते हिंसा भई है ताते मामायिक रूप निमिक्तकरि गमनका त्याग कलं हू,- श्लोक। आर्या करचरणतनुविधातादटतो निहतः प्रमादतः प्राणी । ईर्यापथमिति भीत्या मुञ्चे तद्दोपहान्यर्थम् ॥ याका अर्थ-मैं हस्त पाद शरीरके विवाततै चालते प्रमाद- थकी जीव हत्या ताका भयतै तिस दोपकी निवृत्तिकै अर्थ ईर्या पथकू छोडूं हू। भावार्थ-गमनकू छोड़ि निश्चल बैठू हू॥ आगे ईर्यापथका आलोचना प्रतिक्रमणका पाठ है.. इच्छामि भंते इरियावहियस्स आलोचे-पुन्चुत्तरदक्षिणप- च्छिमचउदिसु विदिसासु विहरमाणेण जुगंतरदिहिणा दट्टव्वा डवडवचरियाए पमाददोसेण पागभूदजीवसत्ताणं उवधादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमण्णिदो तस्स मिच्छा मे दुक्कडं ॥ १-मुद्रित दशभकिनामक प्रतिमें ' भव्वेण ' इतना पाठ इसके आगे और है। - भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । याका अर्थ-भते कहिये है भगवन् ! ईर्यापथकी आलोचना करनेकू चाह हू-मोके पूर्व उत्तर दक्षिण पश्चिम इनि च्यारि दिशा निविपै तथा च्यारि विदिशानिविप जूढा प्रमाण देखि चालणा योग्य है सो मै जैसे तैसे विना देख्या ठवक टवक उतावला चालवात प्रमाद दोपते प्राणी भूत जीव सत्त्व, प्राणी कहिये विकलत्रय, भूत कहिये वनस्पति कायिक, जीव कहिये पचेद्रिय, सत्व कहिये पृथिवी अप तेज वात कायिक, इनिका उपघात कहिये पीडा करी होय तथा कराई होय तथा करताकू भला जाण्या होय ताका पाप मेरे मिथ्या होहु । ऐसा दूसरा स्थल है ॥ २॥ आगै शान्तभावकै अर्थि शातिपाठका अष्टक पढ़े है शार्दूलविक्रीडितछन्द । न स्नेहाच्छरणं प्रयाति भगवन् ! पादद्वयं ते प्रजा हेतुस्तत्र विचित्रदुःखनिचयः संसारघोरार्णवः । अत्यतस्फुरदुग्ररश्मिनिकरव्याकीर्णभूमंडलो ग्रैष्मः कारयतीन्दुपादसलिलच्छायानुराग रविः ॥१॥ याका अर्थ हे भगवान् । प्रजा कहिये लोक है ते तुम्हारे चर- गजुगलकै शरण आवै है ते स्नेहथकी न प्राप्त होय है, तो इहा काहे ते आवै है ताका कारण कहे है-जो विचित्र कहिये अनेक प्रकार है दुःखका समूह जामै ऐसा जो ससाररूप भयानक समुद्र सो कारण है, याके दुःखके पीडे तुम्हारे शरण आवै है । इहा दृष्टात कहें है. जैसे अत्यंत फैलते जे तीन किरण तिनिका जो समूह ताफरि व्याप्त किया है पृथिवीमडल जाने ऐसो ग्रीष्मकालको सूर्य है सो चद्रमाके किरण तथा जल तथा छाया ताविप अनुकरण करावे है ।

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जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रर्जा छाबडाकृत
भावार्थ-श्रीअरहंत भगवान् अन्तरंगमैं तो अनंत चतुष्टयादि गुण-
निकरि अर बाह्य शरीरकी आकृतिकरि शातिलप है, अर और प्रागी
संसारके दुःखनिकरि तप्तायमान हैं तो वैसा अरहंतका दर्गन स्मरण
ध्यान करै तौ गात परिणाम होय तातें सामायिक करताह शातभाव के
अर्थ अरहतका शरण ले है ॥ १ ॥
क्रुद्धाशीविपदष्टदुर्जयविषज्वालावलीविक्रमा
विद्याभेपजमंत्रतोयहवनर्याति प्रशांतिं यथा ।
तद्वत्ते चरणारुणांबुजयुगस्तोत्रोन्मुखानां नृणां
विघ्नाः कायविनाशकाश्च सहमा शाम्यंत्यही विसयः॥२॥
याका अर्थ हे भगवन् ! तुमारे चरणकमलका युगलन तोत्रके
अर्थ सन्नुख भये मनुष्यनिके कायकू विनान नरणहारे जे वितते
शीघ्रही विलय जाय हैं, यह बडा आश्चर्य है: इहां उपमा कहे है जैसे
क्रोधसहित जो आशाविप नहिये सर्व तारि डल्य जो पुत्य ना
दुर्जय जो विषकी जालावलीको सामर्थ्य तो विद्या कहिये मुद्रा मंडला-
दिक क्रिया तथा ओषधि तथा मत्र तथ जल तथा होन इत्यतिककार
क्षय जाय है तेसैं विघ्न क्षय होर है। भावार्य-ल उपचारनिनिमें
वीतरागका नाम स्मणर ध्यान उत्तम है तातें सामायिकना कर्ताह अपर्ने
सामायिककी सिद्धिक अर्थि शरीर तथा परिणाम स्थिरता चाहता स्तोत्र
पढ़े है तिनि जिनेंद्रके स्तोत्र मत्रनित सर्व विन विछ्य होर हैं ॥२॥
संतप्तोत्तमकांचनक्षितिघरश्रीस्पर्द्धिगौरघुते !
पुंसां त्वचरणप्रणामकरणात् पीडाः प्रयांति अयम् ।
उघद्भास्करविस्फुरत्करशतव्याघातनिष्कासिता
नानादेहिविलोचनद्युतिहरा शीघ्र यया शर्वरी ॥३॥

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ७ याका अर्थ-ताया शुद्ध सुवर्णसारिखा जो मेरुगिरि ताकी शोभासारिखी गौरी उज्ज्वल है देहकी दीप्ति जिनिकी ऐसे जे अरहत भगवान ताका सबोधन हे भगवन् । तुमारे चरणनिकू प्रणाम करनेंत पुरुपनिकी पीडा क्षय जाय है । इहा उपमा कहै है-जैसे उगता सूर्यके फैलते जे किरणनिके सैकडे तिनिका घातकरि निकासी हुई अनेक प्राणीनिके नेत्रनिकी युतिकू हरणहारी रात्रि जो है सो विलय जाय है तेसै पीडा विलय जाय है । भावार्थ श्री अरहत भगवान्के नमस्कारादिक ते अन्तरग बाह्य पीडाका अभाव होय है तातें सामा- यिकका कर्ता अपने निर्खेद सामायिककी सिद्धिकै अर्थ नमस्कार कर है ॥ ३ ॥ त्रैलोक्येश्वरभंगलब्धविजयादत्यंतरौद्रात्मका नानाजम्नगतान्तरेपु पुरतो जीवस्य संसारिणः । को वा प्रस्खलतीह केन विधिना कालोपदावानला- न स्याच्चत्तव पादपद्मयुगलस्तुत्यापगावारणम् ॥४॥ याका अर्थ हे भगवन् ! जा जगतविपैं कालरूपी तीव्रदावा- नल अग्नि है सो कैसाक है-तीन लोकके स्वामी इन्द्र धरणेन्द्र चक्रवर्ती जे है तिनिका भगकार पाई है जीति जाने, बहुरि कैसाक है अत्यन्त रौद्र भयानक है स्वरूप जाका ऐसा अग्निका तुमारी स्तुति रूपी नदी कार निवारण जो न होय तौ या आगे ससारी जीव के अनेक जन्मके सैकडे हैं तिनिवि कौन प्रकारकरि कौन जीव बचे, सदा भस्मही होवो करै । भावार्थ-यहु भगवानकी स्तुतिही प्राणीकू जन्ममरण तैं रहित करै है तातें सामायिकका कर्ता याहीकू वार वार पढ़ है ॥ ४ ॥ लोकालोकनिरंतरप्रविततज्ञानकमूर्ने ! विभो! नानारत्नपिनद्धदंडरुचिरश्वेतातपत्रत्रय ! - ८ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावदाकृत त्वत्पाद्यपूतगीतरवतः शीघ्रं द्रवंत्यामया दर्याध्मातमृगेंद्रभीमनिनदाद्वन्या यथा कुंजराः ॥ ५ ॥ याका अर्थ-हे विभो । कैसे हो तुम-लोक अलोक विर्षे अत- रहित फैल्या जो ज्ञान ताहिकी एक मूर्ति हो, वरि कैसे हो अनेक रत्ननिकरि रच्या है ढड जाके ऐसा जो देर्दाप्यमान श्वत छत्रका त्रय सो तुमारै पाइये है ऐसे हो, आर तुमारे चरण युगलका पवित्र गीत कहिये स्तवन जोहे ताका जो शब्द तात ' आमया 'कहिये रोग जे है ते शीघ्रही जाते रहे है । इहा उपमा कह है: जैसे गर्वका भय गाज्या जो सिंह ताके भयानक शब्दत वनके हस्ती नाजि जाय तैसें रोग पलाय जाय है । भावार्थ-भगवानके स्तवनत गेगी जाते रहै हैं तातै सामायिकका कर्ता वर्तमानमै गातभावी सिद्धिकै अर्थि आगामी संसार रोगकी निवृत्तिकै अर्थि स्तोत्र पढे है ॥ ५ ॥ दिव्यास्त्रीनयनाभिरामविपुलश्रीमेरुचूडामणे ! भास्वद्धालदिवाकरद्युतिहरप्राणीटभामण्डल ! | अव्याबाधमचिंत्यसारमतुलं त्यक्तोपमं शाश्वतं । सौख्यं त्वच्चरणारविन्दयुगलस्तुत्यैव संप्राप्यते ॥ ६ ॥ याका अर्थ-हे भगवन् । कैसे हो तुम-उत्तम स्त्रीनिके नेत्र- निकू प्यारा बडी शोभा करि संयुक्त मेरुके समान चूडामणि हौ: बहुरि देदीय्यमान ऊगता सूर्यकी द्युतिकू हरण हारा प्राणीनिकू प्यारा ऐसा तुमारा देहकी दीप्तिका मडल है ऐसे हौ; अर जामै वाधा नाही, तथा चिंत वनमें नहीं आवै ऐसा है सार जामे तथा जाकै तुल्य और नाही याहीत उपमारहित तथा शाश्वता अविनाशी ऐसा सुख तुमारे चरणकमलका युगलकी स्तुतिही करि पाइये है, अन्य कारण ते नाही पाइये है। , वचनिकासहित सामातिक पाठ । भावार्थसामायिकका कर्ता वर्तमानमै समता भावरूप मुख तथा आगामी मोक्षसुख चाहें हैं सो ऐसा मुख वीतरागकी स्तुतिही करि पाइये हे ताते याहीक वारवार यादि करे है ॥३॥ यावन्नोदयते प्रभापरिकरः श्रीभास्करो भासय- तावद्धारयतीह पंकजवनं निद्रातिभारश्रमम् । यावत्त्वञ्चरणद्वयस्य भगवन् ! न स्यात्प्रसादोत्य- स्तावजीवनिकाय एप वहति प्रायेण पाप महत् ॥७॥ याका अर्थ-हे भगवन् । जेते तुमारे चरणयुगलका प्रसादका उदय न होय है तथा तुमारा स्वरूपकी यथार्थ श्रद्वा जेते न होय है तेते यहु ससारके प्राणीनिका समूह बाहुल्यपणे बडे पापकू लिये वहे है । इहा दृष्टान्त कहै है, जैसे जेते मूर्य प्रकाश करता सता उदय न होय तेते या लोकवि कमलनिका वन निद्राथप अतिभार खेद धार है प्रफुल्लित न होय है तैमै ये प्राणी मिथ्यात्व अज्ञानकरि मृढ हुये ऐसे पाप प्रवत्त है । भावार्थ-सामायिकका कर्ता भग- वानका स्वरूप जानि श्रद्धावान भया है ताका आनट पाया है जाते जैतै भगवानका स्वरूप न जान्या तेते पापाचरणरूप प्रवर्त्या, अब तुमारा स्वरूप जान्या सो मेरे पाप नाहीं रहेगा, ऐसा जानि ऐसे स्तुतिका वचन पढे है ॥ ७ ॥ शान्ति शान्तिजिनेन्द्र ! शान्तमनसस्त्वत्पादपद्माश्रया- संप्राप्ताः पृथिवीतलेषु बहवः शान्त्यार्थिनः प्राणिनः। कारुण्यान्मम भाक्तिकस्य च विभो ! दृष्टिं प्रसन्नां कुरु त्वत्पादद्वयदेवतस्य गदतः शान्त्यष्टकं भक्तितः ॥८॥ याका अर्थ है शान्तिनाथजिनेन्द्र ! घणे ही शान्तिके अर्थी- ।

१० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत प्राणी या पृथिवीतलके विपै तुमारे चरणकमलका आश्रयतै शात है मन जिनका ऐसे भये सते शातिकू प्राप्त भये है ताम हे विभो ! तुमारे चरणयुगल तेहि भये इष्ट देव तिनिकी भक्ति थकी गान्तिका अष्टक स्तोत्र पढता जो मै भक्त ता जपरि प्रसन्न दृष्टि करो, मेरो भी बाह्याभ्यतर शांतिकू करो । भावार्थ-जहा शातिक पौष्टिकादिक भले कार्य है तहा शातिनाथ ऐसा नाम धारक जो सोलमा तीर्थकर ताका स्मरण ध्यान स्तोत्र पूजाका अधिकार है ताते सामायिककर्ता हू अपने बाह्याभ्यतर शातभावका अर्थी शान्तिनाथनामा तीर्थकरहिका अष्टक पढे तथा शान्तिके कर्ता सर्वही तीर्थकर है तात सर्वही का स्तोत्र जानना ॥ ८ ॥ ऐसें तीसरा स्थल है ॥ ३ ॥ आगै सामायिककी प्रतिज्ञा करे है, तहा प्रथम इटक नमस्कार करै है:- नमःश्रीवर्द्धमानाय निधूतकलिलात्मने । मालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥१॥ याका अर्थ-श्रीवर्द्धमान कहिये अतिम तीर्थकर तथा सर्वहि अरहत, सो कैसें 2 श्री कहिये लक्ष्मी अंतरग तो अनतचतुष्टय अर चाह्य समवससारणादिक ता सहित जो वर्द्धमान अतिम तीर्थकर तथा अंतरहित वुद्धिकू प्राप्त भये सर्वहि अरहत तिनिकै अर्थ नमस्कार होहू । कैसा है भगवान् ! उडाये हैं पाप जिनिने ऐसा है आम कहिये स्वरूप जिनिका, बहुरि कैसे है जिनिकी केवळज्ञानरूप विद्या अलोक- सहित जो तीन लोक तिनिक प्रतिबिंबित करनेक आरसेवत् है कि प्रकासै है ॥ १ ॥ जिनेन्द्रमुन्मूलितकर्मवन्धं प्रणम्य सन्मार्गकृतस्वरूपम् ।

वचनिकासहित सामायिक पाठ । - अनन्तबोधादिभवं गुणोपं क्रियाकलापं प्रकटं प्रवक्ष्ये ॥२॥ याका अर्थ-उपाडे हैं कर्मवध जिहि, बहुरि समीचीन मार्गका प्रकट किया है स्वरूप जिहि, वहरि अनतज्ञानादिककी है उत्पत्ति जिनिकै, बहुरि गुणनिके समूह है ऐसे जिनेन्द्रकू नमस्कार करि क्रिया- कलाप कहिये सामायिक विगै क्रिया चाहिये ताका समूहकू प्रगटपण कहूगा, ऐसी प्रतिज्ञा है ॥ २ ॥ अवे प्रथमही कहा कर मो कहै है.. खमामि सन्यजीवाणं सव्वेजीवा खमंतु मे । मिती मे सबभूदेसु वेरं भज्झ ण केणवि ॥ ३ ॥ याका अर्थ-मैं सर्व जीवनिक क्षमा करू हू, सर्वही जीव मेरे ऊपरि क्षमा करो, मेरे सर्व प्राणीनित मैत्रीभाव है, मेरा बैर काहूसूभी नाही है । ऐसे सर्व प्राणीनिकू आप समान जानि मैत्रीभाव करै ॥३॥ वहरि कहै है;- गगधं पदोस च हरिसं ढीणभावयं । उस्सुगत्त भयं सोगं रदिमरदिं च वोसरे ॥४॥ याका अर्थ-मैं रागकरि परद्रव्यसू सबध तथा द्वेप तथा विपयादि "वि हर्प तथा विपयादि निमित्त दीनभाव तथा मानकपायतै भया उद्धत भाव तथा भय तथा इष्टवियोगका गोक तथा भले भोजनादिक मिले रतिभाव तथा बुरे मिले अरतिभाव तथा ऐसे सर्वही भावनिकू छोड़ हूँ। ऐसे सर्व परद्रव्यनि ते राग द्वेप हर्पविपाट भाव छोडै ॥ ४ ॥ बहुरि पहले किये ऐसे भाव तिनिका प्रतिक्रमण कर है: हा दुइ कयं हा दुइ चिंतियं भासियं च हा दुई । अंतो अंतोउज्झमि पच्छत्तावेण वेयंतो॥१॥ १ उज्ज्वलामि।

जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत दव्वे खेत्त काले भावे य कढावगहमोहणय । जिंदणगरहणजुत्तो मणवचिकायेण पडिकमगं ॥२॥ याका अर्थ-हाय मै दुष्ट कहिये दोषसहित खोटा कार्य काय करि किया होय, दुष्ट मन करि चितवन किला होय दुष्ट वचन कार कया होय, तिनिका पछतावा कार वेढतासता माही माही दाहक प्रात होजहू॥ द्रव्य क्षेत्र काल भाववि किया अण्णवका नोधनहारा मन वचन कायकरि प्रतिक्रमण करहू । कैसा हुवा कलहू अपनी गर्दा कहिये भगवानके निकट दोप कहना अर निंदा कहिये अपने दोर आपही यादिकरि पछतावा करणा, ऐसे निढा गर्दा करि सहित हवासना प्रति- क्रमण करहु ॥ ऐसे प्रतिक्रमण को अथ कृत्यप्रतिज्ञा । भगवन्नमोऽस्तुते एपोऽह देव- वदनां कुर्यामिति सामायिकस्वीकारः । याका अर्थ-अथानतर कृत्य कहिये करने योग्य जो सामायिक ताकी प्रतिज्ञा ऐसे हैं -हे भगवन् ! तुमारे अर्थ नमस्कार कल. यत् मैं देववंदना करडू । ऐसे उच्चारणकार सामायिक अंगीकार कर है । ऐसे चौथा स्थल है ॥ ४ ॥ आगै जो करने योग्य है सो कहे हैं। तहा प्रथमही सामायिकका स्वरूप कहै है:- श्लोक-समता सर्वभूतेषु संयमः शुभभावना। आर्तरोद्रपरित्यागस्तद्धि सामायिकं तम्॥१॥ याका अर्थ-जहां सर्व जीवनिवि तो समताभाव जो जैसा मैं हूं तेसैंही सर्व जीव हैं राग द्वेप करने योग्य कोजही नाहीं ऐसा भाव, वहार सयम कहिये इन्द्रियविषयका परिहार तथा प्रागिपीडाका परिहार १ भीतर।

वचनिकासहित मामायिक पाठ । १३ जाम पाइये. वहरि शुभभावना कहिये परका उपकार वीतरागी भक्ति जिनवाणीका अध्ययन शुद्धान्मस्वरुपका स्मरण ध्यान ससारस् निवृत्त होनेके परिणाम द्रव्यादिक शुभकार्यनिविप लगावनां ऐसे वारवार भावना होय. बहुरि आर्तव्यान रौद्रध्यानका परित्याग होय, जाकृ सामायिक नाम व्रत कहिये ॥ १॥ आगै मगलंक अर्थि नमस्कार करे है,- श्लोक-सिद्धं संपूर्णभव्यार्थ सिद्धः कारणमुत्तमम् । प्रशस्तदर्शनज्ञानचारित्रपतिपादनम् ॥१॥ सुरेन्द्रमुकुटाश्लिष्टपादपद्मांशुकेसरम् । प्रणमामि महावीरं लोकत्रितयमंगलम् ॥ २ ॥ इनिका अर्थ-मै सामायिक कर्ता जोहू सो महावीर अतिम तार्थकर है ताहि नमस्कार कल , कैसे है-सिद्ध है जिनिकै सर्व अभिप्रेत निष्पन्न भये है, बहुरि सपूर्ण किये हैं भव्य जीवनिके प्रयो- जन जिनि, बहरि सिद्धि नो मोक्ष ताके उत्तम कारण है, बहुरि सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रके प्रतिपादन करण हारे है, वहुरि सुरेन्द्रके मुकटकरि आलिंगित है चरणकमलका किरणरूप केसर जिनिका, बहुरि तीन लोकविपै मगलरूप है, तथा मगलके कर्ता ऐसे हैं । ऐसे मगलकरि मगल करनेका प्रयोजन कह है, श्लोक-आदौ मध्येऽवसाने च मंगलं भापितं बुधैः । तजिनेन्द्रगुणस्तोत्रं तदविघ्नप्रसिद्धये ॥१॥ याका अर्थ—पडित पुरुषा कार्यकी आदिविपै तथा मध्यवि तथा अतविपें मंगल करना कह्या है सो ऐसा मगल जिनेन्द्रके गुणनिका स्तोत्र है तिसकू कार्यको निर्विघ्नपणे सिद्धिक आर्यि करिये है ।। -- १४ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत विघ्नाः प्रणश्यति भयं न जातु न क्षुद्रदेवाः परिलंघयन्ति । अर्थान् यथेष्टॉश्च सदा लभन्ते जिनोत्तमानां परिकीर्तनेन ॥ याका अर्थ-जिनोत्तम भगवान्के स्तोत्रकार 'विघ्नाः' कहिये आरभ्या कार्यके घातक विघ्न ते नागकू प्राप्त होय है, बहुरि भय कदा- चित् भी नाहीं होय हैं, बहुरि नीच देव उपद्रव नाहीं करें है, बहुरि जैसी वाछा होय तैसीही वस्तु सदा पात्र है तातै सामायिककर्ताह मगल कियाहै ॥ ऐसे पाचवा स्थल कह्या ॥ ५॥ आगै कृतिकर्मका स्वरूप कहै है, दुउण्णदं जहाजादं वारसावत्तमेव य । चदुस्सिर तिसुद्धिं च किरियम्म पउंजदे ।। याका अर्थ-यथाविधान नमस्कार होय, बहार बारह आवर्त, बहुरि च्यारि शिरोन्नति, मन वचन कायकी शुद्धता, ऐसै कृतिकर्म कीजिए ।। आगै कृतिकर्मकी शुद्धताकू दृढ करै है, गाथा-किरियम्मं पि करंतो ण होदि किरियम्मणिज्जराभागी । वत्तीसाणण्णदरं साहुटाणं विराहतो ॥ याका अर्थ-जो साधु कृतिकर्म करै है तथापि जे बत्तीस दोप है तिनिमैसू एक दोपभी लगावै है तो कृतिकर्मका फल जो निर्जरा है सो न पावै है, तातै बत्तीस दोप टालि कर तब शुद्धता होय यथार्थ फल पावै ॥ इहा बत्तीस दोषनिके नाम तथा स्वरूप लिखिये है, जो कृतिकर्म, आदरविना करै ताकू अनादर दोप कहिये १ जो गर्वकरि उद्धत होय वचनिकासहित सामायिक पाठ । १५ कर सो स्तब्ध टोप है २ जो परमेष्ठीनिकै अतिनिकट वैठि करें सो प्रविष्टढोप है ३ जो हाथ गोडा स्पर्शन करता करे सो परिपीडन दोप है ४ जो चलाचल भया तथा सशयवान भया करे सो दोपायुतदोप है ५ जो हाथका अगूठा ललाट देशमै धारि को सो अकुशित टोप है जो कडिकू काछिवाकीसी चेष्टा करता करें सो कच्छपरिंगिन दोप है ७ जो दोज पार्श्वकरि बढना करें, अध्यमेठकी 2 ज्यों कडिक करि करें सो मत्स्योद्वर्त्तदोप है ८ जो आचार्याटिकनिकी वढना दुष्ट परिणाम करि करे सो दुष्ट टोप है ९ दोऊ हाथ वाधि करि अथवा हाथनि करि छाती स्पर्शता अथवा गोडा स्पर्शिकार करें सो वेदिकाबद्ध ढोप है १० जो मरण आदिका भय करि वढना कर सो भयढोप है ११ जो गुरु आदिकतै ढरपता वढना कर अतरगमै परमार्थ नहीं सो वीभत्स ढोप है १२ जो ऐसा अभिप्राय करें जो मै वदना करूंगा तो च्यारि प्रकारका सघ मेरा भक्त होय ऐसे अभिप्राय ते करै सो ऋद्धिगोरव टोप है १३ जो अपना माहात्म्य प्रकट करनेकू वदनादिक करे ताकै गौरवदोप है १४ जो गुरु आदिक न जाने ऐसे छिपि चोरकी ज्यों वदना करें ताकै स्तेनित दोप है १५ जो देव गुरु ते प्रतिकूल होय वदना करें ताके प्रतिनीत दोप है १६ जो अन्य तै कलह करि क्षमाया विना वन्दना करें ताकै प्रदुष्ट ढोप है १७ जो अन्यकृ तिरस्कार करि तथा अन्यकृ भय उपजाय वढना कर सो तर्जित ढोप है १८ जो मौन छोडि बोलता वढना करै ताकै शब्द दोप है अथवा याका नाम शाठ्य टोपभी है सो मायाचारीम् करे ताकू गाठ्य कहिये १९ जो आचार्याटिकका अपमान करै सो होलित दोष है २० जो कटी हृदय ग्रीवा देशकू भंगकरि अथवा ललाट के त्रिवली पाडि वदना करें ताकै त्रिवलित दोप है २१ जो दोऊ हाथनिकरि मस्तककू स्पर्शता तथा गोडामै मस्तककरि १६ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रजी छावदारुत कर दे वढना करे ताक कुचितढोप है २२ जो आचार्यादिक देखता होय तव तो भलैप्रकार वदना अर न देखता होय तो जैसे नम कर टत उन देखता जाय ऐसे करे ताके दुष्टोप है २३ जा आचार्याटिकन दोस ऐसी जायगा वैठि वदना कर अथवा भूमिक नीक देरया बिना कर आचार्याटिककै पीछे बैठि कर नाक अदृष्टदोष है २१ जो नंबक कळू प्रसन्न कर ऐसा अभिप्राय हाय मब मेरा दोष न देख दिन वदना करे सो सधकरमोचन टोप है २५ जो उपकरणादिक पाय वदना करे ताकै आलव्य दोप है २६ जो उपकरणादिकका बाछाकरि ताकै अर्थ वढना कर ताके अनालन्ध दोपहै २७ जो पाठ तथा ताका अर्थ ताका काल ताका परिणाम इनिकरि रहित वदना करे नाक हीन दोप है २९ जो बदना स्तोककालमै करि पीछ ताकी चूलिका बटन काल लगावै ताकै उत्तरचूलिक दोष है २९ जो पाठक व्यक्त न पड़े तथा अगुल्यादि हुकारादिककी समस्या करता बढना को नाकै मकटोप है ३० जो पाठ कलकलाट शब्द करि पढे अन्यका अन्न जाकर न सुन्या जाय ऐसे करें ताकै दर्दुरटोप है ३१ जो एक जायगा बैठि हाथ जोडि सर्वकू माय बढना कर, अथवा अतिसचा पचमस्वरकरि करै ताकै चूलिप्लुत दोपहै ३२ ऐसे बत्तीस दोप है । दनि टालि सामायिकमै वदनादिकक्रिया करे ताकै निर्दोष कृतिकर्म होय है । ऐसे छठा स्थल है ॥ ६॥ आगै कहै है-कृतिकर्म ऐसे करना; गाथा-तिविह तियरणसुद्धं मयरहियं दुविहठाणपुणरुत्तं । विणयेण कमविसुध्दं किदिकम्मं होदि कायव्वं ॥ याका अर्थ-त्रिविध कहिये शब्द अर्थ तथा दोऊकरि शुद्ध अथवा मन वचन कायकी शुद्धता मढकरि रहित पद्मासन तथा कायो- भापावचनिकामहित सामायिक पाठ । १७ सर्ग दोय आसनकार विनयसहित पूर्वाचार्यनिकी परिपाटीके अनुसार कृतिकर्म करे सो पुनरक्त कहिये क्रिया प्रति फेरि फेरि करै । अथवा टोय नमस्कार वारह आवर्त च्यारि शिरोनति अथवा प्रतिक्रमण स्वाध्याय बढना तथा पचनमस्कार ध्यान चतुर्विगतिस्तवकी शुद्धताकार, त्रिकरण शुद्ध कहिये कृत कारित अनुमोदनाकी शुद्धताकारे करे ॥ आगै कृतिकर्मकी शुद्धतानिमित्त विशेष कहै है,- श्लोक-योग्यकालासनस्थानमुद्रावर्त्तशिरोनतिः । स्नियेन यथाजातः कृतिकर्मामलं भजेत् ॥ याका अर्थ-कृतिकर्मके योग्य है काल आसन स्थान मुद्रा आवर्त शिरोनति जाकै असा जो नग्न दिगम्बर साघु सो निर्मल कृति- कर्म सेवें ॥ बहुरि कह है;- श्लोक-स्नपना स्तुतिजपान् सामर्थ्य प्रतिमार्पिते । युंज्या यथाम्नायमाद्याहते सकल्पितेर्हति । याका अर्थ-सामायिक करनहारा कहै है-मैं साम्यभावकै अर्थ प्रतिमावि स्थापित जो अरहत ताका स्नपन पूजा स्तुति जप यथाम्नाय करूंडू, बहुरि प्रतिमा न होय तो सकल्प मानि भावनिवि और कल्पि, ताविप॑ स्नपन विनय पूजा स्तुति जप कबहू । भावार्थ-अर्हन्त वीत- रागकी शान्त मूर्ति साम्यभावका कारण है तातें ताका स्नपनपूजनादि उचित है सो सामायिकका कर्ता भावपूर्वक कर है ॥ आर्ग:सामायिका फलकी महिमा कहै है, एकत्वेन चरनिजात्मनि मनो वाकायकर्मच्युते. कैश्चिद्विक्रियते न जातु यतिवद्यद्भागपि श्रावकः । २ १८ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत येनार्हच्छुतलिंगवानुपरिमग्रैचेयकं नीयते भव्योऽप्यद्भुतवैभवेत्र न मजेत सामायिक कासुधीः ॥ याका अर्थ-इस समयिकका करण हारा श्रावकभी मन वचन कायकी चेष्टारहित जा समै अपने आत्मस्वरूपविपै मुनिराजकाज्यों एकाग्रपणे लीन होय ता समै कोई देव दानवादि उपद्रवके करणहारेहू न चलाय सकै है, ऐसा निश्चल भाव होय है, बरि घणा कहा कहिये जो अभव्य भी द्रव्यलिगधारक मुनि होय सामायिककू करें तो आश्चर्य कारी है विभव जामै ऐसे नवमां गैत्रेयकताई पहुंचे है. सो ऐसे सामा- यिकविषै कौन सुबुद्धी यत्न न करें ? अवश्य करही करै । बहुरि सुबुद्धि हुवा थका भी न करें तो जाणिये याका भला होणा निकट आया नाही॥ ऐसे सातवा स्थल है ॥ ७॥ आगै करने योग्य कार्यकी विनती करै है; अथ कृत्यविज्ञापना:--भगवन् ! नमोस्तु प्रसीदन्तु प्रभु- पादाः वदिष्येऽहमिति, एपोऽहं तावत् सर्वसावद्ययोगविरतोऽस्मि । याका अर्थ-अथानतर करने योग्यकी वीनती करै है-हे भगवन् ! तुमारै आर्थ नमस्कार होहु । प्रभुके चरण मेरे ऊपरि प्रसाद करौ, मैं वदना करूगा । ऐसें वीनती कर पीछे कहै है:-जो मै प्रथ- मही समस्त पापयोग तै विरक्तहू । आगै कायोत्सर्गकी प्रतिज्ञा करै है;- अथ पौर्वालिकदेववन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्ष- यार्थ भावपूजावन्दनारतवसमेतं श्रीचैत्यभक्तिकार्योत्सर्ग करो- म्यहम् ।

भापावचनिकासहित नामायिक पाठ। १९ याका अर्थ-अशनतर प्रभातकी देवनदनाविर्य पूर्वाचार्यनिकी अनुक्रम परिपाटी कार नमस्त कर्मके नागनिमित्त भाव पूजा वदना स्तवनसहित श्री चैचमनिका ममरका कायोसर्गक मैं कलह ।। ऐनै अट्वा बन्द है।॥ ८ ॥ आगे कृतिकर्मवढना फैर है,- णमो अग्हंताणं णमो मिद्वाणं णमो आइरीयाणं । णमो उवज्झायाणं णमो लोग मव्वसाहणं ।। चनारि मंगलं अग्हंतमंगलं सिद्धमंगलं माह मंगलं केवलि पणणात्ती धम्मो मंगलं ॥ चनारि लोगोत्तमा अरहंत लोगोत्तमा मिट लोगोत्तमा माह लोगोत्तमा केवलिपण्णनो धम्मो लोगोनमा । चनारि मग्ण पन्चजामि अहंतसरण पन्चजामि मिद्धमरण पवजामि माहुमग्ण पन्यजामि केवलि- पण्णत्तो धम्मोमरणं पवन्जामि ॥ अढाइजदीबढोसमुहेसु पण्णाग्यमम्मभूमीमु जाव अरहं- ताणं भयवंताण अदीयगणां निन्ययगणं जिणांणं जिणोत्तमाणं केवलियाण सिद्धाणं युद्धाणं परिणिबुदाणं अंतवडाणं पारय- डाणं धम्माइरियाणं धन्मदमयाणं धम्मणायगाणं धम्मवरचा- उरंगचक्वीण देवाहि देवाणं णाणाणं ढंगणाणं चरित्ताणं सदा करेमि किरियम्मं । कमि भने मामायं सबसावज्जजोग पञ्च- क्खामि जावजी निविहण मणमा चिसा कायण ण करेमि ण कारामि अण्णंपि करताणं ण म मणुमण्णामि। तस्म भंते अइचार पडिपमामि जिंदामि गरहामि अप्पाणं जाव अरह- नाणं भयवंताणं पज्जुवासं करोमि ताव कायं पावकम्मं दुचरियं २० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रर्जा छाबडाकृत वोसरामि । जय अहं णमो अरहंताणं जाय्य दीयंते उच्छ्वा- साः २७ याका अर्थः-अरहतनिकै अर्थ नमस्कार होद, सिद्धनिकै आर्थि नमस्कार, आचार्यनिकै अर्थ नमस्कार, उपाध्यायनिक आर्य नमस्कार, सर्वसाधुकै अर्थ नमस्कार । बहुरि ये च्यारे मगलरूप होय ताकू मगल कहिये । 'म' कहिये पाप ताकू गाले तथा 'मंग' कहिये सुख ताकू दे ताहि मगल कहिये सो अरहत मगल है, सिद्ध भगठहै, साधु मगल है, केवलीका भाष्या धर्म मगल है । बहुरि च्यारिही लोक- वि. उत्तम है, उत्तम वाकू कहिये जाके अनत ज्ञान दर्शन सुख वार्य होय तथा जे तिनिके साधक होय तथा जाके निमित्तते ते अनत चतुष्टय पाइये; तहा अरहत लोकविय उत्तम है, सिद्ध लोकवि उत्तम है, साधु लोकविपै उत्तम है एहू अरहत सिद्धकू अनुचरें हैं अनत चतुष्टयकू साव है, केवलीका भाप्या धर्म लोकविर्षे उत्तम है याके सेवनतै अनन्त चतुष्टयकी प्राप्ति होय है । बहुरि मैं इनि च्यारिनिकै शरण प्राप्त हू; अरहतनिकै सरण प्राप्त हू, सिद्धनिकै सरणें प्राप्त हू साधुनिकै सरणै प्राप्त हू, केवलिप्रणीत धकि सरणै प्राप्त हू, अवि- नाशी पटकू एही शरणा प्राप्त करेगा । बहुरि अढाई द्वीप, दोय समुद्र, पदरा कर्मभूमिविर्षे जेते अरहत भगवत आदि धर्मकर्ता, तीर्थकर्ता, जिन, जिनोत्तम, केवली, सिद्ध, बुद्ध, निर्वाणप्राप्त, अतकृत संसारतें पार करणहारे, धर्मके आचार्य धर्मके उपदेशक, धर्मके च्यारि श्रेष्ठ अनुयोगरूप सेना ताके चक्रवर्ती, देवनिकै अधिदेव, ज्ञान, दर्शन, चीत्र इनि सर्वानके आर्यि कृतिकर्म कहिये वनदादिक क्रिया फरू हू । बहुरि हे भगवन् ! सामायिक करू हू, सर्वणपयोगका त्याग करू हू, ने” जीवू जैसे मन वचन काय करि न करू न कराऊ न नायक, धर्मकी

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ ।
२१
अन्य करतानं भलो जागूं । बहुरि हे भगवन् ! ताके अतिचारका
प्रतिक्रमण करूं हू आपाकू निंदू हू, जेते अरहत भगवतकी उपासना
करूं हू, पापका उपजावना कुचेष्टाका करनहारा यह काय ताहि त्यागू
हु याका ममत्व छोई हू। ऐसै पढि बहार "जय अह णमो अरह-
ताणं" इत्यादि सत्ताईस श्वासोश्वाससमे नव जाप्य करें ।
ऐसे नवमा स्थल है ॥९॥
अथ चौवीस तार्यकरनिका स्तवन पाठ है-
माथा-थोस्सामिहं जिगवेर तित्थयरे केवली अर्णतजिणे ।
गरपवरलोयमहिए विहुयरविमले महप्पण्णे ॥ १ ॥
याका अर्थ-मैं जिनवरनिकू स्तवूगा, कैसे है वे तीर्य जो धर्म
ताके करणहारे है, बरि केवल ज्ञानविराजमान है, बहुरि अविनाशी है,
कर्मशत्रुके जीतनहारे हैं, वहार मनुष्यनिमै उत्कृष्ट लोकनिकरि पूज्य है,
बहुरि उडाया है कर्मरूप रजका मल ज्या, बहुरि पूज्य है ज्ञान आत्मा
जिनिका ऐसे है ॥ १॥
गाथा-लोकस्सुज्जोययरे धम्मं तित्थंकरे जिणे वंदे ।
अरहते कित्तिसे चउवीसं चेव केवलिणो ॥२॥
याका अर्थ-लोकके उद्योत करणहारे धर्म तथा तीर्थ कहिये
आगम ताके का जिन अरहत केवली चउवीस तिनिका स्तवन
करूगा ॥२॥
गाथा-उसहमजियं च वंदे संभवममिणंदणं च सुमइं च ।
पोमप्पहं सुपासं जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥३॥
सुविहिं च पुप्फयंत सीयल सेयंस वासुपुजं च ।
विमलमणंतं भयवं धम्म संतिं च वंदामि ॥४॥

२२
जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावदाकृत
कुंथु च जिणवरिंदं अरं च मल्लिं च सुब्बयं च णमि ।
वंदे अरिदृणेमिं तह पास वड्डमाणं च ॥५॥
इनिका अर्थ-वृपभ अजितकू वह बहार नभव अभिनदन
वहार सुमति वहरि पद्मप्रभ सुपार्य बरि चन्द्रप्रभ निन इनिकं वद ।
बहुरि सुविधि है द्वितीय नाम जाका ऐसा जो पुपरन्त बहीर शीतल
श्रेयास वासुपूज्य बहुरि विमल अनत भगवान् वर्भ शानि इनिहिं बहू हू
बहुरि कुंथु जिनवरेन्द्र बहुरि अर मल्लि मुनिसुव्रत नमि अरिष्टनेमि तथा
पार्श्व वर्द्धमान इनिहि वडू हू ॥३-४-५॥
गाथा-एवं मए अभित्थुया विहुयग्यमला पहीणजरमरणा।
चवीसं पि जिणवरा तित्थयरा मे पसीयंतु ॥ ६॥
याका अर्थ-या प्रकार मेरे स्तवन विषय किये जे चवीस
तीर्थकर जिनवर ते मेरे परि प्रसन्न होहु, कैसे है-दूर किया है कर्म-
रज़रूप मल जिनिनै बरि नष्ट भये है जरा मरण जिनिके ऐसे हैं ।।
गाथा-कित्तिय वंदिय महिया एदे लोगोत्तमा जिणा सिद्धा।
आरोग्गणाणलाहं दितु समाहिं च मे बोहिं ॥७॥
याका अर्थ-ए लोककै विपै उत्तम प्रसिद्ध जिनि में स्तव्या
वंद्या पूज्या मोकू आरोग्य, ज्ञानका लाभ, समाधि रत्नत्रयकी प्राप्ति
घो॥७॥
गाथा-चंदेहि णिम्मलयरा आइच्चेहि अहियपहा सत्ता ।
सायरमिव गंभीरा सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ८॥
याका अर्थ-चन्द्रमाते भी अतिनिर्मल, सूर्यते अधिक प्रकाशमान
समुद्रसारिखे गभीर ऐसे सिद्ध कहिये आत्मस्वरूपकी जिनिकै सिद्धि भई
ते मेरै ताईभी सिद्धि कहिये मोक्ष द्यो ॥ ८॥

भापावचनिकासहित मामायिक पाठ । स दगया स्थल है ॥ १० ॥ श्लोका-यावन्ति जिनचत्यानि विद्यन्तं भुवनत्रये । तावन्ति मततं भक्त्या त्रिःपरीत्य नमाम्यम् ।। याका अर्थ-तीन भवनविष नेता जिनप्रतिमा विद्यमान हे तिनिक भक्तिकरि निरन्तर नम ह ।। हरिणीछन्द । जयति भगवन हेमांभोजप्रचारविजृमिता- वमरमुकुटच्छायोगीणप्रभापरिचुम्बितौ । कन्छुपहढया मानोबान्ताः परस्पग्वैरिणो विगतकलुपाः पादौ यस्य प्रपत्र विशश्वसुः ॥१॥ याका अर्थ-भगवन् नर्वोकृष्टनाकार बनें है जाके चरणयुगल आयकार जिनिक परम्पर घर पाइये से बहुरि कलुप है हृदय जिनिका अभिमानकरि उद्त ऐने प्राणी भी कलपवैरभावरहित हुवा संता विश्वास प्रान होर है, कैसे है चरणयुगल-सुवर्णमय कमलनिपरि प्रचार-कन्नेतरि मुगयमान है बहरि देवनिके मुकुटनिकी छायासबधी उदय भई जो प्रभा ताकी स्पा है। भावार्थ-देव नमस्कार करें हैं। तदनु जयति श्रेयान धर्मः प्रबुद्धमहोदयः कुगतिविपथक्वेगायोऽसा विपागयति प्रजाः । परिणतनयस्यांगीभावाद्विविक्तविकल्पितं भवतु भवतस्त्रात त्रेधा जिनेन्द्रवचोऽमृतम् ॥२॥ याका अर्थ-तहा पीछ कह है-कल्याणरूप वहरि प्रकर्पपणे वव्या है महोदय जात ऐसा जो धर्म सो मर्वोत्कृष्टरूप वर्तों, कैसा है- कुगतिका मार्ग तें भया जो ग्लेग नातै प्रजाकू छुडाव है बरि जिनेन्द्रके २४ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत वचनरूप अमृत है सो संसारत रक्षा करनहारा होद केसा है-पुष्ट ने द्रव्यार्थिकपर्यायाथिकनयल्प भग तिनिके अंगीभावत भदप त्रित है, वहार अक्षर पद वाक्य ते तीन प्रकार है. अथवा अर्थपद प्रमाणपट मध्यपद भेटते तीन प्रकार है. अथवा अग पूर्व प्रकीर्णक भेदते तीन प्रकार है। तदनु जयताजेनी वित्तिः प्रभंगतरंगिणी प्रभवविगमधोव्यद्रव्यस्वभावविभाविनी । निरुपमसुखस्येदं द्वारं विघटय निर्गलं विगतरजसं मोक्षं देयान्निग्त्ययमव्ययम् ॥ ३ ॥ याका अर्थ-तहा पीछे कहै है-जिनगजकी, वित्ति कहिये केवल- ज्ञानरूप संवेदन सो जयवतो प्रवर्तो. बहीरे हम अनुपम मुखका द्वार उघाडी अरु नहीं है ज्ञानदर्शनावरणम्प रज जाम, बहीर नहीं है अंतरायरूप आगल जाम, बद्धरि अविनश्वर बहरि अब्धय कहिये हानि ते रहित ऐसा मोक्ष द्यो केसी है कंवलज्ञानल वित्ति-अनेक वनिकी कल्लोलरूप तरंग जामै पाइये है, वहरि उत्पाद व्यय त्रीवरूप जो द्रव्यस्वभाव ताकी प्रकाशनहारी है ॥३॥ ऐसे ग्यारमा स्थल है ॥ ११ ॥ आगे नव देवताकू क्रमलप नमस्कार करे है- आर्या-अर्हसिद्धाचार्योपाध्यायेभ्यस्तथा च साधुभ्यः । सर्वजगद्वंद्येभ्यो नमोऽस्तु सर्वत्र गर्वेभ्यः ॥ १॥ याका अर्थ-अरहत सिद्ध आचार्य उपाध्याय बहीर तेसैही साधु सर्व क्षेत्र कालविषै हैं तिनि सर्वानकै अर्थ नमस्कार हो, कैसेहैं-सर्व जगतकरि वदिवे योग्य हैं।

भापावचनिकासहित मामायिक पाठ । २५, आर्या-मोहादिगदोपारिघातकेभ्यः मढा हतरजोभ्यः । विरहितरहस्कृतेभ्यः पूजाहेभ्यो नमोऽहंद्यः ॥ याका अर्थ-अरहतनिकै अर्थ सदा नमस्कार होह, कैसे है मोह गग हूँपाटिक नर्व दोर तेहि भये गर तिनिके घातक है, वहरि हुण्या हे गज ' कहिये ज्ञानदर्शनावग्ण जिन्होंने, बहार दूर भया है रहस्कृत कहिये अन्नगयकर्म जिनिक. बीर पूजायोग्य है ।। आर्य-क्षांन्याऽर्जवाऽऽदिगुणगणसुमाधनं मकललोकहितहेतुम् । शुभधामनिधातारं वन्दे धर्म जिनेन्द्रोक्तम् ।। याका अर्थ-जिनेन्द्रका भाया धर्मका में वह, कमा है क्षमा आर्जव आदि जे गुणनिक समूह तेही हे भले मावन जाकै. वहरि समस्त लोकका हितका कारण है, बरि शुभ धाम जो स्वर्ग मोक्ष तिनिविष स्थापन हारा है । आर्या-मिथ्याजानतमोवृतलोककज्योतिरमितगमयोगी । मांगोपांगमजेयं जनं वचनं मदा वन्दे ।। याका अर्थ में मिनराजके वचननिक सदा बदह, केस हे मि- ध्याज्ञानरूप अधकारकरि आवन्या जो लोक ताके प्रकाशनेक अद्वि- तीय ज्योति है, बरि अनत नानका उपजावनहारा तथा अमित ज्ञान जो श्रुतज्ञान नाका सबध कग्नहाग है. बरि अग प्रकीर्णक महित है, बरि अन्यवाटीनिकीर अर्जात है ॥ आर्या-भवनविमानज्योनिय॑न्तग्नरलोकविश्वचैत्यानि । त्रिजगदभिवंदितानां त्रेधा वन्दे जिनेन्द्राणाम् ।। याका अर्थ-भवनवासी कापवासी ज्योतिषी व्यन्तर इनि देव- निकें विमाननिविप तथा मनुष्यलोकविर्य जे जिनेश्वरकी प्रतिमा है २६ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत तिनिकू मन वचन काय करि मै वन्दू हू, कैसी है-तीन जगतकरि वन्दनीक हैं। आर्या-भुवनत्रयेऽपिभुवनत्रयाधिपाभ्यर्च्यतीर्थकर्तृणाम् । वन्दे भवानिशान्तत्यै विभवानां मालपालीस्ताः ॥ याका अर्थ-तीन भवनविर्षे जे तीन भवनका स्वामी इद्र धरणेंद्र चक्रवर्ती तिनिकरि पूज्य अर ससारकरि रहित ऐसे तीर्थकर है तिनिके चैत्यालयनिकी पक्ति प्रसिद्ध है तिनिहीकू ससाररूप अग्निका शान्तिकै आर्थि वदू हूँ ॥ आर्या--इति पंच महापुरुषाः प्रणुता जिनधर्मवचनचैत्यानि । चैत्यालयाश्च विमला दिशन्तु बोधि वुधजनेटाम् ॥ याका अर्थ-ऐसे पच परमेष्ठी जिनधर्म जिनवचन जिनप्रतिमा निर्मल जिनमदिर नव देवतानिक मै नमस्कार किया तो मोहि वोधि कहिये सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रकी प्राप्ति यो, कैसी है वोधि पडितलोक निकै इष्ट ॥ ऐसै बारमा स्थल है ॥ १२॥ आगै जिनेन्द्रके प्रतिमा वा मदिर तिनिका विशेप वर्णन कर नमस्कार करै है,- काच्या - अकृतानि कृतानि चाअमेय- युतिमन्ति द्युतिमत्सु मन्दिरेषु । मनुजामरपूजितानि वन्दे प्रतिबिंबानि जगत्रये जिनानाम् ।। १॥

भाषावचनिकासहित सामायिक पाठ । २७ याका अर्थ---तीन जगतमें उद्योतसहित मन्दिरनिविर्षे अकृत्रिम तया कृत्रिम अमरजादिक गुतिसहित मनुष्य देवनिकरि पूज्य जिने- श्वरके प्रतिबिंब है तिनिकू मैं वह हू ।। १ ।। द्युतिमंडलभामुरागयष्टी- भुवनेयु त्रिपु भूतये प्रवृत्ताः। वपुपाप्रतिमाः जिनोत्तमानां प्रतिमा' प्रांजलिास्मि वन्दमानः ॥२॥ याका अर्थ--- जिनेवाकी में प्रतिमा तिनिळू वदता सता हस्त अगुद्धि जोड़ ह. कमी है प्रतिमा-मामदलकरि देदीप्यमान है शरीरयष्टि जिनिकी, बर फैली है-नीन भवनक विप प्राणीनिक सपदाकै आर्थि अनादित प्रवर्ती है बरि की ह-गर्गरकार इनि नमान और नाही है अथवा जिनेवरके गरीरसमान है ॥२॥ विगतायुधविक्रियाविभूपाः प्रकृतिस्थाः कृतिनां जिनेश्वगणां । प्रतिमा प्रतिमागृहेषु कान्त्याऽ- प्रतिमाः कल्मपशान्तयेऽभिवन्दे ॥ ३ ॥ याका अर्थ-मे जिनेश्वरकी प्रतिमा जिनमदिरनिविप है तिनिक पापको गांतिक आध बढ ह, कमी है-नाही है आयुध तथा विकार तथा आभूपण जिनिकै बरि कमी है-जैसे जिनेश्वर स्वभाव विर्षे तिष्ट है, तैसे स्वभाव विही तिष्ट है बहार कान्तिकरि इनि समान और नाही ॥३॥ १ मर्यादारहित।

२८ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पीडत जयचन्द्रजी छावडाकृत कथयन्ति कषायमुक्तलक्ष्मी परया शान्ततया भवांतकानाम् । प्रणमामि विशुद्धये जिनानां प्रतिरूपाण्यभिरूपमृतिमंति ॥ ४ ॥ याका अर्थ-जिनश्वरके प्रतिविव कसे है ? जैसा जिनेश्वरका रूपहै तैसेही मूर्तिमान है सो जिनि जीवनिकै ससारका अत आया है तिनिकू उत्कृष्ट शातपना करि कपायनिका अभावरूप जो आत्माकी सपदा ताहि दिखावैहै ऐसेहै तिनिकू मै नमस्कार करूं हू. भावनिकी विशुद्धताकै अर्थि ॥ ४ ॥ यदिदं मम सिद्धभक्तिनीतं सुकृतं दुष्कृतवमरोधि तेन । पटुना जिनधर्म एव भक्ति- भेवताज्जन्मनि जन्मनि स्थिरा मे ।। याका-अर्थ-जो मैं जिनेश्वरका विवनिकी भक्ति तथा सिद्धभ- क्तिकरि पापमार्गका रोकनहारा पुण्य पाया है ताकरि मेरै जन्म जन्म- विर्षे जिनधर्मविही दृढ भक्ति होहु, यहु फल बाळू हू अन्य कछु नाहीं चाहू हू॥ ऐसें तेरमा स्थल है ॥ १३ ॥ आगैं जैहा जहा चैत्यकहिये जिनेश्वरकी प्रतिमाहै तिनिकू स्तवै है- श्लोक-अर्हतां सर्वभावानां दर्शनज्ञानसंपदाम् । कीर्तयिष्यामि चैत्यानि यथाबुद्धिविशुद्धये ॥१॥ याका अर्थ-अरहतनिकी प्रतिमानिका मैं मेरी बुद्धिसालं कर्म- मल पखालनिकै अर्थि स्तवन करू हू, कैसे हैं अरहत-सर्व पदार्थ-

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ।
२९
निके ज्ञात हि अथवा सकल चरित्र जिनिक पाइये हैं, वहरि दर्शन
ज्ञान है सपदा जिनिकै ॥१॥
श्लोक-श्रीमद्भावनवासस्थाः स्वयं भासुरमूर्तयः ।
चंदिता नो विधेयासुः प्रतिमाः परमां गतिम् ॥२॥
याका अर्थ-गोभायमान भवनवासानिके भवननिवि प्रतिमा है
ते वदे संते मेरै मोक्षमार्ग करी, कैसी है-स्वयमेव देदीप्यमान है मूर्ति
जिनिकी ॥२॥
श्लोक-यावन्ति सन्ति लोकेऽस्मिन्न कृतानि कृतानि च ।
तानि सर्वाणि चैत्यानि बन्दे भूयांसि भूतये ॥३॥
याका अर्थ-या लोकवि जैते अकृत्रिम कृत्रिम जिनवित्र हैं
तिनि सर्वनिळू मै सपदाकै अर्थ व हू, कैसे है प्रचुर हैं बहुत हैं ॥३॥
श्लोक--ये व्य तरविमानेषु स्थेयांसः प्रतिमागृहाः ।
ते च संख्यामतिक्रान्ताः संतु नो दोपशान्तये ॥४॥
याका अर्थ-जे व्यन्तरनिके विमाननिविर्षे जिनेश्वरकी प्रतिमाके
मदिर सासते असाल्याते है ते हमारे दोनिकी शान्तिकै अर्थि होहु ॥४॥
श्लोक-ज्योतिषामथ लोकस्य भूतयेऽद्भुतसंपदः ।
गृहाः स्वयंभुवः संति विमानेषु नमामि तान्॥५॥
याका अर्थ-अब ज्योतिषी देवनिके विमाननिवि सासते भग-
वानके चैत्यालय है तिनहि सपदाफै अर्थ नमस्कार कल हू, कैसे हैं-
अद्भत है संपदा निनिमें ।। ५॥
श्लोक-वन्दे सुरकिरीमग्रमणिच्छायाभिषेचनम् ।
याः क्रमैरेव मेवंते तदर्चालब्धिसिद्ये ॥६॥

३० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत
याका अर्थ-वैमानिक देवनिके मुकुटनिकी मणिकी दीप्तिकरि
स्नपन जिनिका होत है, तिस अभिषेककू जे प्रतिमा अपने चरणनि-
करि सेवै है ग्रहण कर है तिनि प्रतिमानिक मुक्तिकी प्राप्तिकै अर्थि मैं
वन्दूहू ॥६॥
श्लोक-इति स्तुतिपथातीतश्रीभृतामहतां मम ।
चैत्यानामस्तु संकीर्तिः सर्वास्रवनिरोधिनी ।। ७॥
याका अर्थ-ऐसे अरहंतनिके विवनिकी स्तुति मेरै सर्व कर्मके
आस्रवकी रोकनहारी होहु, कैसे है अरहत-स्तुतीके मार्ग करि अतीत जो
लक्ष्मी ताहि धारण किये है । भावार्थः-निनिकी लक्ष्मी स्तुतिके वर्ण-
नमैं न आवै है ॥ ७॥
ऐसै चौदमा स्थल है ॥ १४ ॥
आगै अरहंत भगवतकू तीर्थकी उपमाटे स्तुति करै है-
स्कन्दछन्द।
अर्हन्महानदस्य त्रिभुवनभव्यजनतीर्थयात्रिकदुरितम् ।
प्रक्षालनैककारणमतिलौकिककुहकतीर्थमुत्तमतीर्थम् ॥१॥
लोकालोकसुतत्वप्रत्यववोधनसमर्थदिव्यज्ञान-।
प्रत्ययवहत्प्रवाहं व्रतशीलामलविशालकूलद्वितयम् ॥ २॥
शुक्लध्यानस्तिमितस्थितराजद्राजहंसराजितमसकृत्-।
खाध्यायमन्द्रघोष नानागुणसमितिगुप्तसिकतासुभगम् ॥३॥
क्षान्त्यावर्तसहस्रं सर्वदयाविकचकुसुमविलसल्लतिकम् ।
दुःसहपरीषहाख्यद्रुततररंगत्तरंगभंगुरनिकरम् ॥ ४ ॥
व्यपगतकषायफेनं रागद्वेषादिदोषशैवलरहितम् ।
अत्यस्तमोहकर्दममतिदूरनिरस्तमरणमकरप्रकरम् ॥ ५ ॥

भाषावचनिकामहित सामायिक णठ । ३१ ऋपिवृपभस्तुतिमंद्रोद्रेकितनिर्घोपविविधविगध्यानम् । विविधतपोनिधिलिन मानवमवग्णनिर्जगनिःवणम् ।।६।। गणधरचक्रधरेन्द्रप्रभृतिमहामव्यपुंडरीकः पुरुषः । बहुभिः स्नानं भक्तत्या कलिफलुपमलापकर्षणार्थममेयम् ।।७।। अवतीर्णवतः मातुं ममापि दस्तग्ममस्तदुरितं दृग्म् । व्यवहरतु परमपावनमनन्यजय्यस्वभावभावगंभीग्म् ।।८।। इनिका अर्थ-अरहत भगवतका मार्ग उत्तम तीर्थ है सो गणधर चक्रवर्ती इन्द्र आदि बडे पुरुप घणेनिकरि पापम्प मलधोवनेक अर्थ भक्ति ते स्नान करने योग्य है, सो स्नान करनेक प्रवा जो में नो मेरैभी दुर्निवार समस्त पापनिक दूरि करौ, कसा है तीर्थ-नार्थयात्री जो तीन जगतके भव्यप्राणी तिनिक पापके पखालनेक अद्वितीय कार- ण है, वहुरि लौकिक प्रसिद्ध नीर्यनिक उलवि वर्ते है, वहरि लोक अलोकका यथार्थ स्वरूपकू भिन्न जाननेक समर्थ जो दिव्य कंवलज्ञान सोही वहता है निरतर प्रवाह जाम, बरि व्रत शील कहिये मूलगुण उत्तरगुण तेही है निर्मल बडे टोय तट जाकै, वहरि शुरुध्यान नही भये निश्चल निष्ठे सोहते राजहंस तिनिकरि सोहे है, बदरि निरन्तर होते जे स्वाध्यायपाठ तेही है मुन्दर शब्द जहा, बीर अनेक गुण समिति गुप्नि सोही भई सिकता ताकरि मुन्दर है. बद्री क्षमारपी आवर्तके हैं सहस्र जाम, बहरि सर्व प्राणी निकी दया सोही फल- निकरि सोहती वेली तासहित है, बरि दुर्धर परीपहनामा जे चवट फैलता तरग तिनिकार भगुर है सघात जहा, बहरि नष्ट भया है कपा- यरूपी झाग जहा, बहुरि रागद्वेपादि अगलते रहित है. वीर नष्ट भया है मोहन्यपी कीच जहा, बहार दूरि गये हे मरणस्य मकरनिक समूह जाते, वहरि बडे बडे अपीश्वरनि करि करी जे मनुनि दिनिका

३२ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत
उत्पन्न भया जो सुन्दर शब्द सो ही है अनेक पखीनिका बोलना जहा,
बहुरि अनेक प्रकारकं तपके निवान जे मुनिराज तेही है पुल जहा
जिनिके आश्रय जात्री है, वहरि आस्त्रवका सबर सहित निर्जरा सोही
हैं नीझरणे जहा, बहुरि परमपवित्र है, बहुरि काहकरि जीत्या न जाय
ऐसा जो स्वभावभाव ताकरि गभीर है जडा है । ऐसा उत्तम तीर्थ ही
भव्यनिकू तारे है, अन्य कहनेके तार्थ हैं; अतरात्माका पापम्प मल
अन्यतीर्थनित धोया न जाय है ॥ १-८ ॥
ऐसे पदरमा स्थल है ॥ १५ ॥
आगै जिनेन्द्रके रूपकी स्तुति करै है;-
पृथ्वीछंद ।
अताम्रनयनोत्पलं सकलकोपवन्हेजयात्
कटाक्षशरमोक्षहीनमविकारतोद्रेकतः ।
विपादमदहानितः प्रहसितायमानं सदा
मुखं कथयतीव ते हृदयशुद्धिमात्यंतिकीम् ॥१॥
याका अर्थ है जिनेन्द्र | तुमारा मुख है सो तुमारी हृदयकी
अत्यंत शुद्धताकू कहै है, कैसा है-क्रोधरूपी अग्निके समस्त जीतनें तें
रक्ततारहित है नेत्र जामैं, बहुरि विकारके उढयके अभाव तैं कटाक्षरूपी
वाणनिके छोडनेंकरि. रहित है, बहुरि विवाट तथा मदकी हानि तें
निरन्तर प्रसन्न है ॥ १॥
निराभरणभासुर विगतरागवेगोदयात्
निरम्बरमनोहरं प्रकृतिरूपनिर्दोपतः ।
निरायुधसुनिभयं विगतहिंस्यहिंसाक्रमात्
निरामिषसुप्तिमद्विविधवेदनानां क्षयात् ॥ २॥

मापावचनिकासहित मामायिक पाठ । ३३ मितस्थितनखांगज गतग्जोमलस्पर्शनं नवाम्बुरुहचन्दनप्रतिमदिव्यगंधोदयम् । रवीन्दुकुलिशादिठिव्यबहुलक्षणालंकृतं दिवाकरमहसभामुरमपीक्षणानां प्रियम् ।। ३ ।। हितार्थपरिपंथिभिः प्रबलरागमोहादिभिः कलंकिनमना जनो यदभिवीक्ष्य गोशुध्यते । सदाभिमुखमेव यज्जगति पश्यतां सर्वतः गरहिमलचन्द्रमंडलमित्रोत्यितं दृश्यते ।। ४ ।। तदेतदमरेश्वरप्रचलमौलिमालामणि- स्फुरस्किरणचुंबीयचरणारविन्दद्वयम् । पुनातु भगवजिनेन्द्र ! तव रूपमन्धीकृतं जगत्सकलमन्यतीर्थगुरुरूपदोपोदयः ।। ५ ॥ इनि च्यारि काव्यनिका अर्थ-हे भगवन् ' सो यहु तुमारा रूप सकल जगतकृ पवित्र करो, कैसा है-अन्यमतके गुरुनिका जो सटोप लप सोही भया रात्रिका उदय ताकरि आधा कीया है, सो तुमारा रूप कैसा है-जाक यह जन हितके नाश करनहारे जे राग- द्वेष मोहादिक तिनिकरि कलकसहित मलिन मन सोहू सन्मुख होय देखिकर कलकन रहित होत है, अर जे सदाही सन्मुख होय सर्वांग देखने है तिनिक तो गरदऋतुका निर्मट चन्द्रमाके विवका उदयवत् आल्हादित करनहारा देखिये है, कैसा है यह रूप-दूरिभया जो रागका उदय तातै विनाही आभूषण देदीप्यमान है, वहुरि कैसा है-स्वभावहीत यथा जातरूप निर्दोष है तात बिना वनही मनोहर है, बहुरि दूरि भई जो हिंसनयोग्य तथा हिंसाकी परिपाटी ताने विनाही ३ ३४ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावडाकृत आयुध भयरहित है, वहुरि अनेक प्रकार जे वेदना क्षुधा आदि रोग तिनिका नाशतें विना भोजन तृप्तिसहित है। भावार्थ--आनदेवकी लोक वस्त्र आभूपण शस्त्र आदिकरि शोभा बणाय देखि खुसी माने है, अर तुमारा रूप तिनि विनाही आनन्द उपजाव है, आनदेव क्षुधादि- करि पीडित हैं तिनिकू मूढलोक मास आदिका बलि दे तृप्त कर है, तुम सर्व वेदनाते रहित हो तातै स्वयमेव तृप्त हौ । बहुरि कैसा है-नाही वधैं हैं नख केश जाकै, बहुरि गया है रजमलका स्पर्श जामैं, बहुरि नवीन कमल तथा चन्दन सारिखा है सुदर मुगधका उदय जामै, बहुरि सूर्य चंद्रमा वन आदि जे प्रशस्त घणे जे चिह्न तिनिकरि शोभायमान है, बहुरि हजारनि सूर्य सारिखा देदीप्यमान है तोऊ नेत्र- निकू प्यारा है। ऐसै सोलमा स्थल है ।। १६ ।। आगै समवसरणकी महिमापूर्वक श्रीचन्द्रप्रभस्वामीकी स्तुति करै है;- स्रग्धराछंद । मानस्तंभा:सरांसि प्रविमलजलसत्खातिका पुप्पवाटी प्राकारो नाट्यशालाद्वितयमुपवनं वेदिकान्तर्वजाद्याः शालः कल्पद्रुमाणामुपरि वृतिवनं स्तूपहावली च, प्राकारः स्फाटिकोऽन्तनृसुरमुनिसभा पीठिकाग्रे स्वयंभूः ॥ गका अर्थ-ऐसे समवसरणविगै स्वयभू कहिये भगवान् सो विरा- जमान है, जहा च्यारि कोट है तामै दूसरे कोटके च्यार दिशा च्यार दरवाजोनकै निकट च्यार उचे मानस्तभ है तिनिकू देखे मानी जीवनिका मान नसि जाय है, वहुरि तिनिके निकट सर है बावडी हैं ताकै आगै निर्मल जलकी भरी खाई है ताकै निकट भापावाचनिकासहित सामायिक पाठ । ३५ झलवाडी है ताकै आगै कोट है, सुवर्णमयी ताके, दरवाजेनिकी दोज ओर नृत्यशाला है तहा देवागना नृत्य करै है, ताकै निकट सुंदर वाग है तामै अशोक चपा सप्तच्छद आम्र ये वृक्ष हैं, ताकै आगै वेदी कहिये विना कागुरा कोट सारिखी भीति है, ताकै निकट एकसौ आठ एकसौ आठ तो बडी धजा है, ताकै विचि विचि एकसौ आठ एकसौ आठ छोटी ध्वजा है, ताके आगे रूपामयी कोट है ताके आगै वेदीसहित कल्पवृक्षनिका वन है, ताके आगे रत्नमयी स्तूप ताके आगें महल- निकी पक्ति हैं तहा देव रमै है, ताकै आगै स्फटिकमणिमयी कोट है, ताकै मध्य मनुष्य देव मुनिनिकी वारह सभा है ताकै मध्य तीन पीठ है ताविप वेदीपर भगवान् स्वयभू विराजै हैं । श्लोक-नताखण्डलमालीनां यत्पादनखमण्डलम् । खण्डेन्दुशेखरीभूतं नमस्तस्मै स्वयंभुवे ।। याका अर्थ-तिस स्वयभू भगवान्कै अर्थि हमारा नमस्कार होहु जाके चरणनिके नख सोही भया चन्द्रमाका मडल सो नमे जे इन्द्र तिनिके मस्तकनिकै वि मुकुटवत् होता भया । भावार्थ-जाकू इन्द्र नमस्कार करै हैं ताक हमारा नमस्कार पहुचो । कोई अन्यमती स्वयभ् रुद्रक कहै है ताके भालवि चद्रमाका चिह्न कहै है सो साचा स्वयभू यह भगवान् है जाकू इन्द्र नमै हैं सो प्रभुके चरणके नखनिक युतिका मडल इन्द्रनिकै मुकुटवत् होय है ।। आगै चन्द्रप्रभस्वामीकी पचकाव्यमै स्तुति है- चन्द्रप्रभ चन्द्रमरीचिगौर चन्द्र द्वितीयं जगतीव कान्तम् ।

६ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावडाकृत वंद्येभिवंद्यं महतामृपीन्द्र जिन जितस्वान्तकपायवन्धम् ॥ १॥ यस्यांगलक्ष्मीपरिवेपभिन्नम् । तमस्तमोरेवि रश्मिभिन्नम् । ननाश बाह्यं बहु मानसं च ध्यानप्रदीप्ततिशयेन भिन्नम् ॥ २ ॥ स्वपक्षसौस्थित्यमदावलिप्ता वाकसिंहनादैविमदा बभूवुः। प्रवादिनो यस्य मदागंडा गजा यथा केसरिणो निनादैः ॥ ३॥ यः सर्वलोके परमेष्ठितायाः पदं वभूवाद्भुतकर्म तेजाः। अनन्तधामाक्षरविश्वचक्षुः समेतदुःखक्षयशासनश्च ॥ ४ ॥ स चन्द्रमा भव्यकुमुदतीनां विपन्नदोषाभ्रकलंकलेपः। व्याकोशवाङ्न्यायमयूखमाल पूयात्पवित्रो भगवान् मनो मे ॥५॥ इनिका अर्थ-मै सामायिकका कर्ता हूँ सो चन्द्रप्रभस्वामी आठम तीर्थकर परमदेव ताहि बंदूहू । कैसा है-चद्रमाकी किरणसारिखा गौर- वर्ण है, भावार्थ बाह्य तौ श्वेतवर्ण शरीर है अतरग रागादिविकाररहित शुद्ध आत्मारूप उज्वल है, बहुरि जगतविौं मानू दूजा चद्रमाही, भावार्थ गत विर्षे आल्हाद उपजावै है, बहुरि कान्त है, भावार्थ- जैसैं स्त्रीकै भाषावाचनिकासहित सामायिक पाठ । ३७ भगर कात है तैसे जगतके पति है अथवा कान्त कहिये सुन्दर नग- तकू प्रिय है, बहुरि महत पुरुप इन्द्र चक्रवर्ती आदिकरि वदिवेयोग्य है, बहुरि कैसे है-ऋपि जे ऋद्धिधारी मुनि गणधर आदिक तिनिविर्षे चंद्रवत् है, बहारे जिन है कर्म शत्रुकू जीत्या है; बहुरि स्वान्त कहिये अन्तरङ्ग मन ताविप॑ तिष्ठता जो कपायल्प शत्रु ताकू जीत्या है, भावार्थ- द्रव्यकर्म भावकर्मक जीत्या है याही तें जिन नाम है । बहुरि कैसा है- जाके अगकी लक्ष्मी कहिये प्रभा ताका परिवेप कहिये मडल ताकार भिन्न कहिये भेद्या जो अधकार सो जैसे सूर्यके किरणकरि अधकार दूर हाये है तैसे तो बाह्यका अधकार दूरिभया है। बहुरि ध्यानरूप दीपकके अतिशयकरि अतरग मन सवधी अज्ञानरूप अधकार सो दूरि भया है, भावार्थ-व्यानके प्रभाव करि केवलज्ञान उपन्या है ताकरि समस्त पदार्थ प्रकट प्रतिभासे है; वहरि कैसा है-जाके वचनरूप जो सिंहका गर्जन ताकार अन्यवादी रूप हस्ती ते जैसे केसरी सिंहके गाजनेकरि वनके हस्ती मदरहित होय नैसै मदरहित भयेहै, कैसे हैं अन्यवादी-अपनी जो पक्ष ताका दृढपनाकरि मदते गर्वित होय रहे है, वहरि कैसे है वनहस्ती--मढकार आति है गडस्थल कपोल जिनिके । बहुरि कैसा है चद्रप्रभस्वामा-सर्व लोकविपै परमेष्ठीपनाका जो पद ताकू पाया है, काहेत ? जाते अद्भुत कर्म कहिये तीर्थकरनाम प्रकृति ताका है तेज कहिये प्रताप जिनिकै, बहुरि अनत है धाम कहिये प्रकाश जाका ऐसा अविनाशी विश्व कहिये समस्त देखनेवाला केवल ज्ञानरूप है नेत्र जाकै, बहुरि कैसा है--समत कहिये सर्व प्रकारक जे ससारसंवधी दुःख ताका क्षय जातें होय ऐसा है शासन कहिये मत आना उपदेश जाका ऐसा है । सो चन्द्रप्रभ भगवान मेरे मनकू पवित्र करौ, कैसा है- भव्यजीवरूपी जे कुमुद तिनिकू चन्द्रमासमान है, भावार्थ- भव्य ३८ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत जीवनिके मनकू आल्हाद उपजा है, वहरि कैसा है--विगाड्या है दोषरूप वादलेका कलक लेप जाने जैसे चद्रमा रात्रिविय वाढलेसवधी अधकार दूरि कर है तसे ॥ ऐसे सत्रहमा स्थल है ॥ १७ ॥ आगै चौवीस तीर्थकरनिकी जयमाल है;- वत्ताणुटाणे जणुधणदाणे पड़पोसिउ तुहु खत्तधरु । तव चरणविहाणे केवलणाणे तुहु परमप्पर परमपरु ।। याका अर्थ हे भगवान ! तुम कैसे हो तुमारा वर्तानुष्टान कहिये गर्भते लगाय राजपर्यन्त तामै तुमनें लोकनिक धनका दान दीया रत्न वरपे तथा राजनिकू पोपे, बहुरि तुमारा तपश्चरणविधानकै विर्षे तथा केवलज्ञानकै विपै तुम परमपद कहिये शुद्ध आत्मपटकू प्राप्त भये, पीछै निर्वाणकू प्राप्त होय परमात्मा भये, ऐसे हौ। जय रिसह रिसीसरणमियपाय । याका अर्थ-हे पभ ! तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम-फपी- श्वर कहिये ऋद्धिधारी मुनि गणधरादिक तिनिकरि नमित है चरण तुमारा। जय अजिय जियंगयरोसराय ॥ याका अर्थ-हे अजित । तुम जयवंत होहु, कैसेहो तुम जीते हैं राग द्वप जिनुन, ऐसे हो । जय संभव संभवकयविओय । याका अर्थ है सभव | तुम जयवंत होह, कैसेहो तुम--संभव कहिये संसारमैं जन्म ताका कियाहै वियोग जिनूनैं, ऐसे हो ।

भागावचनिकासहित सामायिक पाठ । ३९ जय अहिणंदण गंदियपओय ॥ याका अर्थ-हे अभिनन्दन । तुम जयवत होहु, केसे हो तुम नदित कहिये वधायाहे प्रयोग कहिये ध्यानका प्रयोग जिनून । जय सुमह मुमयसम्मयपयास । याका अर्थ हे मुमति ! तुम जयवत होहु, कैसेही तुम सम्यग् ज्ञानकार ममीचीन मत जो स्याहाट निर्वाधमार्ग ताका है प्रकाश जाते। जय पउमप्पह पउमाणिवास याका अर्थ-हे पद्मप्रभ ! तुम जयवत होहु. कैसेहो तुम पना कहिये लक्ष्मी ताके निवास हो, वाह्य अभ्यतर लक्ष्मी तुमवि वर्म है। जय जयहि सुपास सुपासगत्त । याका अर्थ-हे मुपार्श्व । तुम जयवंत होहु जयवत होहु इहा 'जय' पट टोय वार है, कैसे हो तुम-निश्चयकरि भलं पावनिकरि सहित है शरीर तुमारा । इहा ऐसाभी अर्थ जानना जो जिनिका निकट रहनवालेनिका रक्षा करनेवाला जिनिका देहहै तातै सुपार्श्व देह है। जय चंढपह चंदाहवत्त ॥ याका अर्थ हे चन्द्रप्रभ | तुम जयवत होह, कैसे हो तुम चन्द्र- माकी आमाकू घर है मुख जिनिका, देखनेवालिकै आनद उपजावे है । जय पुष्पदंत दंतंतरंग। याका अर्थ-हे पुष्पदन्त ! तुम जयवत होह, कैसे हो तुम दत कहिये दम्य है अन्तरग कहिये मन जिनू । जय सीयल सीयलवयणभंग ।। - ४० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबड़ाकृत । । याका अर्थ हे शीतल ! तुम जयवत होहु, कसे हो तुम शतिल हैं वचननिके भग जिनिके। भावार्थ-स्याद्वाढ सप्त भगन्दप वचनके सुननेका फल वीतरागता है। जय सेब सेयकिरणोहसुज्ज । याका अर्थ- हे श्रेय ' तुम जयवत होहु. कैसे हो तुम -श्रेय कहिये कल्याणरूप जे किरण तिनिका समूह तिनिकू धारें मूर्यसमान हो, तुमारै पच कल्याण आदि अनेक कल्याण पाइये है। जय वासुपुज्ज पुज्जाण पुज्ज ।। याका अर्थ-हे वासुपूज्य | तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम- पूज्यनिकै विर्षे पूज्य हो, लोकमें इद्रादिक पूज्य है मोक्षमै गणधरादिक पूज्य हैं तिनिमै तुम सर्वोत्कृट पूज्य हो, तुमकू ते भी पूजें है । जय विमल विमलगुणसेणिठाण । याका अर्थ-हे विमल ! तुम जयवत होहु, कैसेहो तुम विमल कहिये निर्मल हो निर्मल गुणनिकी पंक्तिके स्थान हो अथवा गुणश्रेणी निर्जराके स्थानक हो। जय जय हि अणंताणतणाण ।। याका अर्थ-हे अनत | तुम जयवंत होहु तुम जयवत होहु, इहां 'जय'शब्द दोयवार है, कैसे हो तुम-तुमारै अनत ज्ञान है ।। जय धम्म धम्मतित्थयरसंत । याका अर्थ है धर्म! तुम जयवंत होहु, कैसे हो तुभ वर्मरूप तीर्थ ताके करनहारे बडे महत पुरुष हो। जय संति संतिविहियाववत्त ।

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ४१ , 4. याका अर्थ हे गाति ! तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम- गातिकी विधिकू प्राप्त करनेवाला है मुख तुमारा ऐसे हो अथवा गातिकी विधि ही है आतपत्र कहिये छत्र जाकै, ऐसा भी अर्थ है ।। जय कुंथु कुंथुपहुअंगिसदय । याका अर्थ-हे कुथु | तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम कुथु, आदि जे सर्व प्राणी तिनिविपै दयासहित हो । जय अर अरमाहरविहियसमय ।। याका अर्थ-हे अर ' तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम अरमा कहिये दरिद्रताका हरनेवाला रच्या है समय कहिये मत जिनि. ऐसेहो । भावार्थ-संसाररूप दरिद्रकू हरि मोक्षलक्ष्मी करै ऐसा तुमारा मत है ।। जय मलि मल्लियादामगंध । याका अर्थ-हे मल्लि ! तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम मल्लि- का कहिये मालती ताकी जो दाम कहिये माला ता सारिखा है गध तुमारा | भावार्थ-जिनका शरीर अतिसुगध है तथा जिनिकी वचनरूप वासना सर्वजगतकू प्रिय है । जय मणिसुन्वय सुन्वयणिबंध ।। याका अर्थ है मुनिमुव्रत | तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम मुव्रत कहिये भला चारित्र ताका है प्रवध जिनिकै । जय णमि णमियामरणियरसामि । याका अर्थ-हे नमि | तुम जयवत होह, कैसे हो तुम नमाये हैं अमर कहिये देव तिनिके समूहके स्वामी इंद्र जिनिनै । भावार्थ- इंद्र आय जिनिकै पाय परें है। .

४२ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावडाकृत जय णेमिधम्मरहचक्कणेमि ॥ याका अर्थ हे नेमि । तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम धर्मरूप रथके चलावने हारे नेमि कहिये पूठे सारिखे हो । जय पास पासछिंदणकिवाण । याका अर्थ हे पार्श्व ! तुम जयवत होहु, कैसे हो तुम पासके छेदनेंकू कृपाण कहिये खङ्ग तथा छुरि सारिखे हो । जय बढमाण जसवढमाण ॥ याका अर्थ-हे वर्द्धमान ! तुम जयवत होहु, कैसे हो यशकरि बर्द्धमान हो । भावार्थ-श्रीवर्द्धमानस्वामी अतिम तीर्थकर है तिनिका यश अबताई प्रवर्ते है ॥ घत्ता। इय जाणिय णामहिं दुरियविरामहि परहिं णमियसुरावलिहिं । अणिहणहिं अणाइहिं समयकुवाइहिं पणविवि अरहंतावलिहिं ।। याका अर्थ-एते अरहतनिकी मालाके नामनिकरि तिनिकू जानि नमस्कार करू हू, कैसे हैं नाम-दुरित कहिये पाप ताका है अत जिनि करि, बहुरि पर कहिये उत्कृष्ट है अथवा 'पर' शब्द अन्यका वाच- कभी है यातै पर कहिये अतीत अनागत चौवीसीकू भी नमस्कार जानना ऐसैं अनादिनिधनभी विशेषण है, बहार नमाई है देवनिकी 'पाक्त जिनिनें, बहुरि अविनाशी हैं, बहुरि अनादिके है, ये चउवीस तीर्थकर सख्याकरि एक अवसर्पिणी तथा उत्सर्पिणी कालवि4 एतेही होय, तातै सख्याकरि अनादि, विशेषण सभवै है, बहुरि निराकरण कियेहैं कुवादि ज्या ऐसे हैं।

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ४३ इहा ऐसा जानना जो ए चौर्डस तीर्थकरनिके नाम विशेषणसहित कहे तिनिकू वदना करी सो सढी करितो न्यारे न्यारे नाम हैं ही, अर सार्थक नयकरिये तब एक एक नयके चौईमूही विशेषणसहित नाम सभ हैं, स्याद्वादमतमै विरोध नाही है । ऐसें चौईस तीर्थकरनिकी जयमाल पढे । यह अठारमा स्थल है ॥ १२ ॥ आगे चैत्य चैत्यालयनिकी भक्ति है,- काव्य-वर्षेषु वर्षान्तरपर्वतेषु नन्दीश्चरे यानि च मन्दिरेषु । यावन्ति चैत्यायतनानि लोके सर्वाणि वन्दे जिनपुंगवानाम् ॥ १॥ याका अर्थ-मैं सामायिकका करनहारा हु सो जिनप्रधानके सर्वही चैत्यायतन कहिये चैत्यालय हैं तिनिकू बदू हू, ते कहा कहा है-वर्ष कहिये क्षेत्रनिवि, बहार वर्षान्तर कहिये कुलाचलनिविपैं. बहुरि नन्दी- श्वर द्वीपविर्षे, बहुरि पच मेरुनिविर्षे जे ते जिनभगवानके चैत्यमदिर- हैं तिनिक् वदू है" अवनितलगतानां कृत्रिमाकृत्रिमाणां वनभवनगतानां दिव्यवैमानिकानाम् । इह मनुजकृतानां देवराजार्चितानां जिनवरनिलयानां भाववोऽहं स्मरामि ॥२॥ याका अर्थ-मैं सामायिकका कर्त्ता इ सो जिनवरके चैत्यालय हैं तिनिकू भाव ते स्मरण करू हू, ते कहा कहा हैं-कृत्रिम तथा अकृत्रिम या पृथ्वीतलमैं हैं तथा व्यतरनिके निवासनिमैं तथा भवनवासीनिके निवा- .

४४
जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत
सनिमै तथा दिव्य वैमानिक जे कल्पवासी तिनिके निवासनिमै, बहुरि
इस मध्यलोकमै मनुष्यनिके किये है, बहुरि देवराज कहिये इन्द्र तथा देव
अर राजा कहिये मनुष्यनिका राजा तिनिकरि पूजनीक है; ऐसे सर्वकू
यादि करि बदू है ॥
शार्दूल विक्रीडितछंद ।
जंबूधातकिप्पुकरार्द्धवसुधाक्षेत्रत्रये ये भवा-
श्चन्द्रांभोजशिखंडिकण्ठकनकप्रावृधनाभा जिनाः ।
सम्यग्ज्ञानचरित्रलक्षणधरा दग्धाष्टकर्मेन्धना
भूतानागतवर्तमानसमये तेभ्यो जिनेभ्यो नमः ॥ ३ ॥
याका अर्थ-सामायिकका कर्ता कहै है-जो तिनि जिन काहये
तीर्थकरनिकै अर्थ मेरा नमस्कार होह, कैसे है ते-जबूद्वीप धातकीखड-
द्वीप पुष्करार्द्धद्वीप इति अढाई द्वीपका पृथ्वीका क्षेत्र है ताविषै अती-
तकाल अनागतकाल वर्तमानकालविपै जे भये हैं; बहुरि कैसे
है-चद्रमा, अभोज कहिये रक्तकमल शिखडिकठ कहिये मोरका
कठ, सुवर्ण, अर वर्पा कालका मेघ तिनिकी है आभा कहिये
शरीरका वर्ण जिनिका बहुरि सम्यग्दशन ज्ञान चारित्र लक्षणकू
धार है, बहुरि दग्ध कीये है अष्टकर्म जिनिनै ऐसे है । भावार्थ-इहां
जिनकी प्रतिमा रचिये है ते तीर्थकर है तिनिकू विचारि नमस्कार किया
है ते पचवर्णके शरीरके धारक है, सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्ररूप मोक्ष-
मार्गमै प्रवर्ति मोक्षमार्ग प्रवर्ताय आप अष्टकर्मनिका नाश करि निर्वा-
णकू प्राप्त भये हैं, तिनिकी पच वर्णकी प्रतिमा स्थापि पूजिये हैं,
तिनिकू तीन काल विर्षे अढाईद्वीपमैं भये तिनि सर्वहांकू नमस्कार
,
किया है ॥३॥

भाषावचनिकासहित सामायिक पाठ । ४५ श्रीमन्मेरौ कुलाद्रौ रजतगिरिवरे गाल्मलौ जंबुवृक्ष वक्षारे चैत्यवृक्षे रतिकररुचिके कुंडले मानुपांके । इप्वाकारेंऽजनाद्रौ दधिमुखशिखरे व्यन्तरे स्वर्गलोके ज्योतिर्लोकेऽभिवन्दे भुवनमहितले यानि चैत्यालयानि ॥४॥ याका अर्थ-मै सामायिकका कर्ता जे एता जायगा जिनेश्वर देवके चैत्य कहिये प्रतिमा हैं तिनि सर्वनिकू वह तिनिके सन्मुख होय स्तुति करूहू, ते कहा कहा है-श्रीमत् कहिये सोभायमान जे पचमेरु है तिनिवि हैं, वहरि कुलाचल पर्वतनिविपै हैं, वहुरि रूपाचल जे विजयार्द्ध पर्वत तिनिविपै हैं, बहुरि शाल्मली अर जवू इनि वृक्ष निविर्षे हैं, वहुरि वक्षारपर्वतनि विपै बहुरि केई जायगा चैत्यवृक्ष है तिनिविप हैं। वहरि रतिकर पर्वत नदीश्वरके हैं तिनिविर्षे हैं, बहुरि रुचिकगिरि विपै हैं, बहुरि कुडलगिरि वि4 है, बहुरि मानुपोत्तर पर्वत विपै हैं, बहरि इष्वाकार पर्वतनि विर्षे है, वहरि अजनगिरि नदीवरकेनिविपैं है वहरि दधिमुख पर्वत नदीवरके है तिनिके शिखर विर्षे हैं, वहुरि व्यतरलोक विप है, वहरि ज्योतिपी देवनिके लोकत्रिपै है, वहुरि भवन वासीनिके महीतल विप है । ऐसें जेते है सर्वविक् तिनि सर्वहींकू व स्तबू हू ॥४॥ द्वी कुन्देन्दुतुपारहारधवला द्वाविन्द्रनीलोप्रभौ द्वौ वधूकसमप्रभौ जिनवृपो द्वौ च प्रियंगुप्रभौ । शेपाः पोडश जम्नमृत्युरहिताः संतप्तहेमग्रमा- : स्ते संज्ञानदिवाकराः सुग्नुताः सिद्धि प्रयच्छतु नः ॥५॥ याका अर्थ-सामायिकका कर्ता कहै हैजे तीर्थकर सम्यग्जान जो केवलज्ञान तिसरूप सूर्य सारिखे हैं, देवनिकरि नमर्ने .

४६ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत योग्य है ते हमकू सिद्धि कहिये सर्व प्रयोजनकी सिद्धिन्य जो मोक्ष ताहि यो, कैसे है--दोय तो कुछ के पुष्प तथा चद्रमा तथा पाला तथा ष्फटिक मोतिनका हार तिन सारिन्व श्वेतवर्ण है, बहुरि टोय इद्रनी लमणिकी प्रभासारिखे है, वहरि दोय वधूक कहिये मिझन्याका फूल तिन समान प्रभाव धरै है. वहरि दोय प्रियगुको प्रभा नारिख है व वासी सोलह ताये सोनातारिखी प्रभाकू व है, कैसे है-जन्ममरणकरि रहितहैं बहुरि कैसे है जिनाभ कहिये तीर्थकर है: यह विशेषण द्विवचनरुप है सो आठकै लगावणा, नोलहका विशेषण जुदा है ही । भावार्थ-वर्तमान चौईसीके गरीरकी प्रभाका वर्णन करि प्रार्थना करी है । तहां चन्द्रप्रभ पुष्पदत तो श्वेतवर्ण शरीर है. बहुरि पार्श्व गुणवं ये दोऊ नीलवर्ण हैं, बहुरि पद्मप्रभ वासुपूज्य ये दोज रक्तवर्ण है. वहरि मुनिनुतनाथ नेमिनाथ ये दोऊ श्यामवर्ण है, बहार सोलह मुवर्ण वर्ण है ॥ ५॥ ऐसे उगणीसमा स्थल है ॥१९॥ आगे चैत्यभक्ति का प्राकृतपाठहै इच्छामि भंते चेइयभत्ति काओसग्गो को तस्सालोचओ, अहलोय तिरियलोय उट्टयलोयम्मि किमाकिहिमाणि जाणि जिणचेझ्याणि ताणि सव्वाणि तीसु वि लोयेसु भवणव्यंतरजो इसियकप्पवासीयत्ति चउबिहा देवा सपरिवारा दिव्वाह गंधहि दिव्वेहिं घुप्फेहि दिव्वहिं धूवेहिं दिव्वेहि चुण्णेहिं दिब्बेहि वासेहिं दिव्वेहि हाणहिं णिच्चकालं अचंति पुज्जंति बंदंति णमस्संति अहमवि इह संतो तत्य संताई णिचकालं अंचेमि पूजानि बंदामि णमंसामि दुक्खक्खउ कम्मक्खउ बोहिलाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिगगुणसंपनि होडु मज्झ ।

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ४७ याका अर्थ-भते कहिये हे भगवन् ! मैं सामायिकका कर्ताह सो वैत्यभक्तिकू इच्छू हु, तिससबधी कार्योत्सर्ग कीया ताकी आलोचन करू हू । इस अधोलोकमैं तिर्यगलोकमैं उर्ध्वलोकमै कृत्रिम अकृत्रिम ने जिनके चैत्य प्रतीमा है-तिनि:सर्वनिकू तीन लोकविपै भवनवासी वा यतर ज्योतिपी कल्पवासी ऐसे -च्यारि प्रकारके देवपरिवारसहित दिव्यगध- करि दिव्यपुष्पनिकरि दिव्य धूपनिकरि दिव्य चूरणकरि दिव्य वासकार दिव्य अभिपेककरि नित्यकाला अचें है पूजै है वदै है नमस्कार करें हैं तिनि चैत्यनिकू मैंर्भा इहा बैठा ते तहा तिष्ठै है तिनिकू नित्यकाल अयूँ हू पूजू हू वदू हू नमस्कार करू हू, तिनिकी पूजा वदनतै मेरा दुःखका क्षय होड, बोधिका लाभ होहु, सुगतिविष गमन होड, समाधिसहित मरण होहु, तिनिके गुणनिकी प्राप्ति होहु ।। ऐसैं चैत्यभक्तिका वीसवा अधिकार है ॥ २० ॥ आरौं पचगुरुभक्ति करै है- अथ पालिकदेववंदनायां पूर्वाचायानुक्रमेण सकलकर्म- क्षयार्थः भावपूंजावदनास्तवसमेतं; श्रीपंचगुरुभक्तिकायोत्सर्ग करीम्यहम् । णमो अरहंताणं इत्यादि, ततः थोस्सामि'' इत्यादि पठनीयम् । अर्थ-अर्थ कहिये औठा आरौं प्रभातसवधी देववढनाविषै पूर्वाचा- यनिके अनुक्रमकरि सकलकर्मके भय होनेकै आर्थ: भावपूजा वडना स्तवन सहित श्रीपचगुरुभक्तिसवधी कायोत्सर्ग मै करूं हू। ऐसे पढि पीछे “णामो अरहताण' इत्यादि पहलै कया था तिस विधानसू जाप्य फर, पीछे " थास्सामि" इत्यादि पहलें कह्या या सो पाठ पढे ॥ -- ४८ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्री छावड़ाकृत श्लोक-प्रतिहार्जिनान् सिद्धान् गुणैः मूरीन् सुमातृभिः। पाठकान् विनयैः साधून योगांगैश्वाष्टभिः स्तुवे ॥१॥ याका अर्थ-जिन जे अरहत तीर्थकर तिनिकू तो आठ प्रतिहार्यकरि स्तवू हू, बहुरि अष्ट गुणनिकरि सिद्धनिकू स्तबू हू, वरि पच समिति तीन गुप्ति ए अष्ट प्रवचनमाता है तिानकरि आचार्यनिक स्तबू ह, बहुरि अष्टागविनयकरि उपाध्यायकू स्तवृ हू, बहुरि यम नियमादिक अष्ट योगके अगनिकार साधुनिकू स्तवू हू । ऐसे पचपरमेटीका स्तवन करै, इनिकी स्तुति पढे ॥ १॥ सो कहै है; मणुयणाइंदसुरधरियछत्तत्तया पंचकल्लाणसोक्खावलीपत्तया । दंसणं णाण झाणं अणंतं बलं ते जिणा दिंतु अम्हं बरं मंगलं ॥१॥ याका अर्थ-ते जिन अरहतः हमकू वर कहिये श्रेष्ट मगल द्यो कैसे हैं ते मनुष्य नागेन्द्र सुर इनितीन लोकके प्राणीनिकरि धेर हैं तीन छत्र जिनिकै, भावार्थ-अपने स्वामी मान है, प्रभु ए तीन लोकके पति है ऐसैं जिनके तीन छत्र हैं ते जनावें है बहुरि गर्भजन्म तप ज्ञान निर्वाण ए पाच कल्याण तिनिसबधी जो सुखकी आवली ताकू प्राप्त भये हैं, भावार्थ-पाचूही कल्याणकमै इद्रादिक आय वडा उत्सव करें हैं, बहुरि दर्शन ज्ञान अरु ध्यान कहिये सुख अरवीर्य ए अनत जिनिकै पाइये है, ऐसे हैं ॥ १ ॥ १ अस्मभ्यम् भापावचनिकासहित सामायिक पाठ। ४९ जेहिं झाणम्गिवाणेहिं अइदड्डयं जम्मजरमरणणयरत्तयं दद्वयं । जेहिं पत्तं सिवं सासयं ठाणयं ते महं दितु सिद्धा बरं णाणयं ॥ २ ॥ याका अर्थ-ते सिद्ध परमेष्ठी मोकू वर श्रेष्ठ ज्ञान द्यो, कैसे है ते जिन-व्यानरूप अग्नि वाणकार बडे जोर ते जन्म जरा मरण ए तीन नगर इग्ध किये बहुरि, सासता स्थानक जो मोक्ष सो पाया है, ऐसे है ॥२॥ पंचहाचारपंचग्गिसंसाहया वारसंगाइमुयजलहि अवगाहया । मोक्खलच्छी महंती महंते सया मृरिणो दितु मोख्खंगया संगया ॥३॥ याका अर्थ-ऐसे आचार्य परमेष्ठी मोकू बड़ी मोक्षलक्ष्मी द्यो, कैसे है ते-पच प्रकार आचार सोही भई पचाग्नि ताक् भलै प्रकार साधनेवाले है, भावार्थ-दर्शन ज्ञान चरित्र तप वीर्य ए पच आचार हैं, तिनिकू पचाग्निकी उपमा दई सो लोकमैं पचाग्नितपतकू तपसी कहैं है ताकी अपेक्षा अलकाररूप है, बहुरि कैसे हैं-बारह अगरूप श्रुत सोही भया समुद्रजल ताके अवगाहनेवाले हैं, भावार्थ-शास्त्रका ज्ञान जिनिक गुरु आम्नाय पूर्वक पूरण होय तेही आचार्य होय है विना गुरु आम्नाय शिक्षा देतो विपर्यय होय है ताने शास्त्रज्ञान युक्त है यह विशेषण किया है, वहुरि मोक्षकी जो अगता कहिये एकटेश कर्मनिर्जरा ताकू सदा प्राप्त भये है, ऐसे है ॥३॥ घोरसंसारभीमाडवीकाणणे तिक्खवियरालणहपावपंचाणणे ।

५० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत णमग्गाण जीवाण पहदेसया बंदिमो ते उवज्झाय अम्हे सया ॥४॥ याका अर्थ हम सामायिकके कर्ता हैं ते ऐसे उपाध्याय पर- मेष्टीकू सदा व. है, कैसे है-बड़ा ससाररूप भयानक भ्रमण करावने- वाला जो उद्यान ताविपै भूल्या है मार्ग ज्या ऐसे जीवनिक मार्गका बतावन हारे हैं, कैसा है ससारवन-तीक्ष्ण विकराल नख जाके पाइये ऐसा पापरूप पचानन कहिये सिंह जामै विद्यमान है, भावार्थ-जाम पापरूप सिंह वसै है. ऐसे ससाररूप वन विपे मिव्यामार्गमै नमते जे जीव तिनिक मोक्षमार्गका उपदेशकरि राह लगा है ।। ४ ।। उग्गतवचरणकरणेहिं खीणंगया धम्मवरमाणसुकेकमाणं गया । णिभरं तवसिरियसमालिगया माहवो ते महं मोक्खपहमग्गया ॥५॥ याका अर्थ-ऐसे साधु परमेष्टी है ते मेरे ताई मोक्षमार्गके दि- खावनहारे होड, कैसे हैं-उग्र तपश्चरणके करनेकरि क्षीण भया है, अग जिनिका, बहुरि बम श्रेष्ट धान तथा एक शुरुवानकू प्राप्त भये हैं. वहुरि तपलप लक्ष्मीकरि आलिगित हैं युक्त है ।। ५॥ एण थोत्तेण जो पंचगुरु वंदए गुरुयसंसारघणवल्लि सो छिदए । लहइ सो सिद्धिसोक्खाई बहुमागणं कुणइ कम्मेंधणं पुंजपज्जालणं ॥६॥ याका अर्थ-इस स्तोत्रकरि जो पुरुष, पच परमेष्ठी गुरुकू वदै सो पुरुप जो बडी ससाररूप सघनवेलि ताकू छेदै है, बहुरि सो सिद्धि भापावचनिकासहित सामायिक पाठ। ५१ कहिये मोक्ष ताके सुखनिकू पाव है, वहुरि वहुमान जैसें होय तैसे, भावार्थ-पहले इद्रादिकपद पाय मोक्षपद पात्र है, वहुरि मोनके प्रति- पक्षी जो कर्मरूप इधन ताके पुजकू दग्व करें है ॥ ६ ॥ घत्ता। - अरुहा सिद्धायरिया उवाया साहु पंचपरमेही । एदे पंच णमोकारा भवेभवे मम सुहं दितु ।। याका अर्थ-अरहत सिद्ध आचार्य उपाध्याय साधु ए पच पर- मेष्टी है तिनिके नमस्कार है ते भवभवविप मोकू मुख द्यो । ऐसे सामायिकके कर्त्ताकी प्रार्थना है- इच्छामि भंते पंचगुरुमहाभत्तिकाउस्सग्गोको तस्सालोचेउं । अहमहापाडिहरसंजुत्ताणं अरहंताणं, अगुणसंपण्णाणं उडलोय- मत्थयम्मि पछियाणं सिद्धाण, अपवयणमाउसंजुत्ताणं आइ- रियाणं, आयारादिसुदणाणोबदेसयाणं उवज्झायाणं, तिरयण- गुणपालणरयाणं सब्यसाहण, णिचकालं अंचमि पूजेमि चंदामि णमंसामि । दुक्खक्खओ कम्मक्खनो बोहिलाहो मुगगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं ॥ याका:अर्थ-भते कहिये हे भगवन् ! पचगुरु भक्तिक इच्छु है इसके आर्थ कायोत्सर्ग किया है तिसकी आलोचन करू हू । आठ महा प्रतिहार्यनिकरि जे अरहत, बहुरि आठ गुणकरि संयुक्त अर ऊर्ध्व- लोकके मस्तकपरि तिष्टं ऐसे सिद्धपरमेष्टी, बहुरि तीन गुप्ति पाच समिति ये आठ प्रवचनमाता तिनिकरि सयुक्त आचार्य परमेष्टी, बहुरि आचाराग आदि श्रुतज्ञानका उपदेश करनहारे ऐसे उपाध्याय परमेष्ठी, बहुरि दर्शन ज्ञान चारित्र ए तीन रत्न तेही भये गुण तिनिके पालन- ५२ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत विौं रक्त ऐसे साधु, परमेष्ठी, तिनिकू सदाकाल में सामायिकका कर्ता अयूँ हू, बंदूहू, नमस्कार करू हु । मेरा दुःखका क्षय होड़, कर्मका क्षय होहु, वोधिका लाभ होहु सुगतिविपै गमन होह, समाधिमरण होह, जिनके गुणनिकी प्राप्ति होहु । ऐसें सामायिकका कर्ता भक्तिपाठ पढि प्रार्थना करै है ॥ ऐसे एकवीसवा स्थल हे ।।२१।। आगै शान्तिभक्ति पंढ है- अथ पौर्वाल्लिकदेववन्दनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्म- क्षयार्थ भावपूजावंदनास्तवसमेतं श्रीशांतिनाथभक्तिकायोत्सर्ग करोम्यहम् । णमो अरहताणमित्यादि ततः थोस्सामीत्यादि पूर्वोक्तं पठनीयम् । याका अर्थ-अथ कहिये अब प्रभातसबधी देवनदनावि, भावार्थ प्रभातसबधी सामायिक करे तिसकाल पूर्वाचार्यनिके अनुक्रम कहिये परिपाटीकरि समस्त कर्मनिके क्षयकै अर्थ भावपूजा बंदना स्तवन सहित श्रीशातिनाथभक्ति कायोत्सर्ग मै कल हूँ। ऐसैं पढि पीछे "णमो अरहताण" इत्यादि पाठ पुढे कहा है सो पढे ॥ आर्गे शान्तिपाठ पढे है- शान्तिजिनं शशिनिर्मलव शीलगुणवतसंयमपात्रम् । अष्टशतार्चितलक्षणगात्रं नौमि जिनोत्तममवुजनेत्रम् ॥१॥ याका अर्थ-मै सामायिकका कर्ता शान्तिनाथ तीर्थकरकू नम- स्कार करू हू, कैसे हैं-चन्द्रमासारिखा निर्मल है मुख जाका बहुरि

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ।
५३
शील कहिये उत्तर गुण अर गुण कहिये मूलगुण तेही भये व्रत
तिनिका पात्र है, बहुरि एकसौ आठ शरीरके लक्षण तिनिकरि सहित है
गात्र कहिये शरीर जाका, बहुरि जिन जे गणवरादिक तिनिविर्षे उत्तम
है, वहरि कमलसारिखे है नेत्र जाके ऐसा है ॥ १ ॥
पंचममीप्सितचक्रधराणां
पूजितमिन्द्रनरेन्द्रगणैश्च ।
शान्तिकरं गणशान्तिमभीप्सुः
पोडशतीर्थकरं प्रणमामि ॥२॥
याका अर्थ-मैं सोलमा तीर्थकर श्रीशान्तिनाथकृ नमस्कार प्रणाम
कस्तू, कैसा है-कहे जे बारह चक्रवर्ती तिनिम पाचमा चक्रवर्ती है,
बहुरि इन्द्र नरेन्द्र तिनिके समूहकार पूजनीक है, बहुरि शान्तिका
करनहारा है, बहुरि मे कैसा इ-च्यार प्रकार सबकै शान्तिका इच्छुक हूं।
भावार्थ-सोलहमा तीर्थंकर श्रीशातिनाथाजन है, सो इहा तिसकूँ नम-
स्कार करनेका प्रयोजन यह है -सामायिककर्ता अपनें तथा संघकै
शाति कुशल चाहै है सो 'शाति' ऐसा नाम धारक शातिजिन है ति-
सकू यादि कार शान्तिकै अर्थ नमस्कार किया है। परमार्थतै सर्वही
तीर्थकर समान है शान्तिके कर्ता है शान्तिनाम सर्वहीका है, ऐसे
जानना ॥ २ ॥
पुनः--
दिव्यतरुः सुरपुप्पमुवृष्टि-
दुन्दुभिरासनयोजनधोपौ।
आतपवारणचामरयुग्मे
यस्य विभाति च मण्डलतेजः ॥३॥

ay
जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत
याका अर्थ-जिस शान्तिजिनकै आठ प्रातिहार्य सोभै हैं,
कौन-दिव्यतरु कहिये सुन्दर अशोकवृक्ष, देवनिकरि करी पुष्पवृष्टि,
दुंदुभि वादित्र, सिंहासन, दिव्यध्वनि, छत्र, चामरका• युग्म, भामण्डल,
ऐसे प्रातिहार्य है ॥ ३॥
तं जगदर्चितशान्तिजिनेन्द्र
शान्तिकरं शिरसा प्रणमामि ।
सर्वगणाय तु यच्छतु शान्ति
मामरं पठते परमां च ॥ ४ ॥
याका अर्थ-तिस जगतकरि पूजित शान्तिजिनेन्द्रकू मैं मस्तक-
कार प्रणाम करूहू, कैसा है-शान्तिका करनहारा है वहरि सो शान्ति-
नाथ जिनेन्द्र सर्वसघकू शाति यो बहुरि मेरै ताई उत्कृष्ट शांति चो,
कैसा हू मैं-तिस पाठवू पढताहू, भावाथ-मै शातिपाठ पडू सो मोकू
उत्कृष्ट शाति वीतरागता द्यो॥ ४ ॥
येऽभ्यर्चिता मुकुटकुण्डलहाररत्नैः
शक्रादिभिः सुरगणैः स्तुतपादपद्माः।
ते मे जिनाः प्रवरवंशजगत्प्रदीपा-
स्तीर्थकराः सततशान्तिकरा भवन्तु ॥५॥
याका अर्थ ते सर्वही तीर्थकर मेरै निरन्तर शातिके करनहारे
होहु, कैसे है ते-इंद्रकू आदि देकार देवनिके समूहनिकार जिनिके
चरण कमल स्तवन कीये गये हैं, कैसे है इद्र आदिक-मुकुट कुडल
हार रत्न जिनिकै पाइये है, बहुरि ते तीर्थकर कैसे है-बडे उत्तम
जिनिके वश हैं तिनिके तथा जगतके प्रकाश करनहारे दीपकसमान
हैं, ऐसे हैं ॥५॥

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ५५ pher मपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्रसामान्यतपोधनानाम् । देशस्य राष्ट्रस्य पुरस्य राज्ञः करोतु गान्ति भगवान् जिनेन्द्रः ॥ ६ ॥ याका अर्थ-जिनेन्द्र भगवान् है सो भलैप्रकार पूजाके करनहारे- निके, बहुरि यीश्वरनिकै, बहुरि सामान्य तपोधन माधुनिकै, बहुरि देशकै, बहुरि राष्ट्र कहिये राजाकी हडके, बहुरि नगरकै बहुरि राजाकै शाति करों। भावार्थ-सामायिकका कर्ता नहीक शाति चाहै है ॥ ६ ॥ अशोकवृक्षः सुरपुप्पवृष्टि- दिव्यध्वनिश्चामरमासनं च। भामंडलं दुंदुभिरातपत्रं सत्यातिहार्याणि जिनेश्वराणाम् ।। ७॥ याका अर्थ-जिनेश्वरनिके ए भले प्रातिहार्य है-अशोक वृक्ष है, देवनिकृत पुष्पवृष्टि है, दिव्यध्वनि है, चामर है, सिंहासन है, भामंडल है, दुहुभिवादित्र है, छत्र है, ऐसे आठ प्रातिहार्य है ।। ७ ।। क्षेमं मर्वप्रजानां प्रभवतु बलवान् धार्मिको भूमिशालः काले काले च सम्यग् विग्चतु मघवा व्याधयो यांतु नाशम् । दुर्भिक्षं चौग्मारीक्षणमपि जगतां मा स्म भूज्जीवलोके जैनेन्द्रं धर्मचक्र प्रभवतु सततं सर्वसौख्यप्रदायि ॥ ८ ॥ याका अर्थ-सर्व प्रजाक क्षेम कुशल होहु राजा भूमिका पालक वर्मात्मा अरु बलवान् प्रभावसहित होड, वर्षाकालविय मेव भलप्रकार बरसो, प्रजाकी न्यावि रोग नाशकू प्राप्त होड, प्रजाविये दुर्भिक्ष तथा जयपुरनिवासी स्वर्गीय पंडित जयचन्द्रर्जा छाबड़ात चौर मारी तग मनका भय अणमात्रभी मति होहु. इस जीवलोचविय जिनेश्वरका दयारूप धर्मत्रक है सो निरंतर प्रभातहिन वर्ती, केताहे धर्म-सर्वग्राणीनिकू नुखका देने वाला है ।। ८ ॥ अध्वस्तवातिकर्माणः केवलबानभास्कगः । कुर्वन्तु जगतः शान्ति वृपभाषा जिनम्बगः ।। याका अर्थ-ऋपमआदि जिनेश्वर तीर्थकर पग्न देव है ते जगतकै शान्ति करो, केते हैं नाग की है-थानिकर्म ड्या. बहार केवलानलप सूर्य हैं, ऐसे हैं ॥ ९ ॥ अत्र चतुर्विशति तीर्थकर भक्तिना पाठ है. इच्छामि भंते चउवासतित्ययम्भत्तिकाउम्मन्गो को तस्मा- लोचे । पंचमहाकल्लागसंपण्णाण अहमहापाडिहेन्महियाणं चउ- तीस अतिसयविसेससंजुत्ताणं बनीसदविंदमणिमउडमत्ययमहि- याणं बलदेववासुदेवचकहररिसिमुणिजइअणगारोवगृढाणं थुइमय- सहस्मणिलयाणं उसहाइबीचपच्छिममंगलमहापुरिमाणं णिच्च- कालं अंचेमि पृजेमि बंदामि णाममामि. दुक्खक्खओ कम्म- क्खओ बोहिलाहो मुगगमणं ममाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं ।। याका अर्थ-हे नगवान् ! चौर्वात तीर्थानिनी भत्तिइच्छं रु. इसकै आर्थि नायोत्सर्ग किग निना अन्दोचना करई। ते नायकर यम आदि महावीर अत नंगलदप महान्य पत्र कल्यानि करि युक्त आठ महाप्रातिहानिकार सहित चैतील अतिवाय विशेष संयुक्त, कल्पवासी वारह नवनवाती, दस व्यंतर आठ ज्योतिषी दोय ऐसें वतीस इत्रनिके मणिनई नुकुलनिसहित मस्तननिकारि पूजित,

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ ।
५७
बहुरि बलभद्र नारायण चक्रवर्ती तथा ऋपि यति मुनि अनगार इनिकी
सभाकीर वेढित स्तुतिके सैकडा हजारनिके ठिकाणे ऐसे तीर्थकरनिकू
मैं सदाकाल अयूँ हू पूजूहूं बहू नमस्कार करूंहूं। मेरे दुःखका
क्षय होहु, कर्मका भय होहु, बोषिका लाभ होहु, सुगतिविऐं गमन
होड, समाधिमरण होहु, तिनिके गुणनिकी प्राप्ति होहु ॥
ऐसे बाईसवा स्थल है ॥ २२ ॥
आगै समाधिभक्ति पढ़े है,
अथ पौर्वाहिकदेववंदनायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्ष-
यार्थ पूजावंदनास्तवसमेतं श्रीचैत्यपंचगुरुशान्तिभक्तीवि-
धाय तद्वीनाधिकत्वादिदोपविशुद्धयर्थ आत्मपवित्रीकरणार्थ
श्रीसमाधिभक्तिकायोत्सर्ग करोम्यहम् । णमो अरहंताणमि--
त्यादि जाप्यं ।। ९॥
याका अर्थ-अव प्रभातमधी देवबदनाविय पूर्वाचार्यानिके अनु-
क्रमकरि समस्तकर्मके नागक आर्थि भाव पूजा वंढनाम्तवसहित श्रीचे-
त्यभक्ति पत्रगुरुभक्ति गातिभक्ति करि अर अत्र तिस हीनाविक ढोपकी
विशुद्धताके आर्य आत्माके पवित्र करनेक आर्थि श्रीसमाविभाक्तिका
कायोत्सर्ग मै कल है। ऐसे प्रतिज्ञाकार णमोकारमत्रके नव
जाप्य करै ।
श्लोक-व्युत्सृज्य दोपान्निःशेपान् म ध्यानी स्यात्तनुस्तुता ।
महेतायुपमादीन् कमैव भिवतेतगम् ॥ १॥
याका अर्थ-सो सामायिकका कर्ता समस्त ढोपनिकू छोडि
अर व्यानी होय कार्यान्सर्गविपै उपसर्गभी आवे तो टलं नाही।
ऐसे अतिशयकरि कर्मकी निर्जरा कर है ॥ १ ॥

५८ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छावड़ाकृत पापका नि श्लोक-ध्यानाशुशुक्षिणाविढे मनऋत्विक्समाहिताः । स्वकर्मममिधो भावसर्पिपा जुहुमोऽधुना ॥ २ ॥ याका अर्थ-सामायिककर्ता ऐसे भाव-जो हम अब ध्यान रूप श्रेष्ठ अग्निविप अपने कर्मरूप समिव कहिये ईबनक भावन्प घृतकरि होम है, कैमे है हम-मनरूप ऋत्विक् कहिये होम करनेवाला ताकरि सहित है । लौकिकमै कहै है-जो यज होम करे ताका पाप कटे है मो सामायिककर्ता कहै है-जो हम समाधिम्प यन होम कर है. काटनेवाला यह है ॥२॥ श्लोक-अहमेवाहमित्यात्मज्ञानादन्यत्र चेतना। इदमस्मि करोमीदमिदं भज इति क्षये ॥३॥ याका अर्थ-मै सामायिकका कर्ता समाधिरूप भया मता सोही मै हू" ऐसे आत्मज्ञानते अन्यवस्तुविप मेरी चेतना अनुभवनकू नाही लगाजहू, अन्यविर्षे' यह मै कल्हू यह म भोगजहू ऐसे भाव न करूहू । भावार्थ.-पर विप ममत्त्व की भोक्तापणाकी बुद्धि छोडि अर ज्ञानचेतनाकू अनुभवूहू, ऐसे समाधि लगावै ॥ ३ ॥ श्लोक-अहमेवाहमित्यन्त ल्पसंपृक्तकल्पनाम् । त्यक्त्वाऽवाग्गोचरज्योतिः स्वयं पश्यामि शाश्वतम् ॥४॥ याका अर्थ-मै सामाधिकका कर्ता “ अहमेवाह " कहिये मै हू सो ही मैं हू । ऐसें अन्तर्जल्पकार मिली कल्पनाकू छोडि अर वचन के अगोचर ज्योति है ताहि आपै आप देखू हू जैसा है ज्योति-सासता है जाका कबहू विनाश नाही । भावार्थ-" मैं " ऐसी भी अक्षररूप अन्तर्जल्पकी कल्पनाकू छोडि वचन अगोचर आपाळू आप देखें है. यह समाधि हैं ॥ ४ ॥ १ 'यह में हूं, ऐसा 'इदमल्मि का अर्थ और होना चाहिये ।

- मापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ५९ श्लोक-अमुह्यन्तमरज्यंतमद्विपंतं च यःस्वयम् । शुद्धे निधत्ते स्वं शुद्धमुपयोग स सिध्यति ॥५॥ याका अर्थ-जो पुरुप अपने उपयोग कू मोह राग द्वेपरूप न होते कू अपने शुद्ध आत्मविर्षे आपही करि धोरे है लगावै है सो 'सिद्धिक प्राप्त होय है ॥ ५॥ आर्या-बोधिसमाधिविशुद्धिस्वचिदुपलब्ध्युच्छलत्प्रमोदभराः । ब्रह्म विदंति परं ये ते सदुरवो मम प्रसीदन्तु ॥ ६ ॥ याका अर्थ ये मुनि बोधि कहिये सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र की एकता सो ही भई समावि तिस स्वरूप जो विशुद्धिरूप अपना चत- न्यकी उपलब्धि ताकरि उछलता जो प्रमोट कहिये हर्ष ताका भर कहिय समूह जिनिक ऐसे हैं ते परम ब्रह्म जो शुद्ध आत्मा ताकू अनुभवें हैं ऐसे सद्गुरु मेरे जपरि प्रसन्न होहु ।। अव समाविभक्ति पड़े है - इच्छामि भंते समाहिभत्तिकालस्सग्गो को तस्सालोचेडे, रयणत्तमरुवपरसप्प आण लक्खणसमाहि सव्वकालं अंचेमि इत्यादि । याका अर्थ-हे भगवन् । में समाधि भक्तिक इच्छं हूँ तिसके आर्थ कायोत्सर्ग कीया ताकी आलोचना करू दू, रत्नत्रयरूप परमा- स्माका ध्यान सो है लक्षण जाका ऐसा समाविकू सर्वकाल अयूँ ह पूजू हू वह नमस्कार करू हू मेरे दुखका भय होहु कर्मका भय होहु बोधिका लाभ होहु समाधिमरण होहु जिनके गुणनिकी सपत्ति हांड्ड ।

६० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत ऐसै तेईसवा स्थल है ॥ २३ ॥ अथेष्ट प्रार्थना। प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नमः । शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः संगतिः सर्वदायेंः सद्वृत्तानां गुणगणकथा दोपवादे च मानम् । सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चाऽऽत्मतत्त्वे । संपद्यन्तां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्गः ॥१॥ याका अर्थ-अब इष्टकी प्रार्थना कर, है;-प्रथमानुयोग, करणा- नुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग इनकृ नमस्कार है । ऐसे शास्त्रनिका तो मेरे अभ्यास होहु, बहुरि जिनपतिकू नुति कहिये नमस्कार होहु, बहुरि सदा आर्यपुरुपनि सहित सगति होहु, बहुरि समीचीन आचरणके धारक पुरुपनिक गुणनिक समूहकी कथा होहु, बहुरि दोषके वाद विपे मौन होह, बहुरि सर्व प्राणीनिक प्यारा अर हितरूप वचन प्रवत्ता बहुरि आन्मतत्ववियु भावना होह; मेरें जेरौं मोक्ष न होय तेतै भवभववि एते प्रवत्ता । ऐसें इष्ट प्रार्थना करी। पुन:- आर्या-तव पादौ मम हृदये मम हृदयं तव पदद्वये लीनम् । तिष्ठतु जिनेन्द्र ! तावत् यावनिर्वाणसंप्राप्तिः ।। याका अर्थ-हे जिनेन्द्र ! जेतै मेरे निर्वाणकी प्राप्ति न होय तेतै तुमारे चरणयुगल मेरे हृदयविपै तिष्टै, बहुरि मेरा हृदय तुमारे चरणयुगलविपै लीन तिष्ठौ ॥ गाथा-अक्खरपयत्थहीणं मत्ताहीणं च जंमए भणियं । तं खमहु णाणदेवय मज्झ य दुक्खक्खयं दितु ।।

भाषावचनिकासहित सामायिक पाठ । याका अर्थ-हे ज्ञानदेव जिनेन्द्र ! जो मैं या भक्तिविपै अक्षर पढ अर्थकार हीण कह्या होय, मात्राकरि हीण होय तो तुम क्षमा किजियो चहरि मेरा दुःख क्षय कीजियो, यह प्रार्थना है ॥ नमोऽस्तु, श्रीआचार्यदेववंदनायां सिद्धभक्तिकायोत्सर्ग क रोम्यहम् जाप्यं ९॥ सम्मत्त गाण दंसण वीरिय सुहुमं तहेव अवगहणं । अगुरुलहुमन्वावाहं अगुणा होति सिद्धाणं ॥१॥ तवसिद्धे णयसिद्धे संजमसिद्धे चरित्तसिद्धे य । णाणम्मि दंसणम्मि य सिद्धे सिरसा णमंसामि ॥२॥ याका अर्थ-सामायिकका की कहै है-जो मेरा नमस्कार होड श्रीआचार्यवदनाविपैं सिद्धभक्तिकायोत्सर्ग करू हू । ऐसे पढि णमो- कारमत्रका नव जाप्य करै है। पी, सिद्धस्तवनका पाठ--- सम्यक्त्व, ज्ञान, दर्शन, वीर्य, सूक्ष्म तैसेही अवगाहना, अगुरुलघु अन्यावाध ए सिद्धनिके आठ गुण हैं ॥१॥ मैं सिद्धनिकू मस्तककरि नमस्कार करूं हू, कैसे हैं-तपकरि सिद्ध हैं, नयकरि सिद्ध हैं, सयमकरि सिद्ध हैं, चारित्रकरि सिद्ध है, वहुरि ज्ञानविषै सिद्ध है, दर्शनविपैं सिद्ध है । भावार्थ-जाकै सिधि भई होय ताकू सिद्ध कहिये सो लौकिकमे अनेक कार्यकरि सिद्ध कहावें है, सो मैं तो इस गाथामै कहे तप नय सयम चारित्र ज्ञान दर्शन इनिकी सिद्धि करै तिसकू नमस्कार करू हू॥ , पुनः- ६२ जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रजी छाबडाकृत ! नमोऽस्तु, आचार्यदेववंदनायां श्रुतभक्तिकायोत्सर्ग करो- म्यहम् जाप्यं ९॥ कोटीशतं द्वादश चैव कोट्यो लक्षाण्यशीतिस्त्र्यधिकानि चव । पंचाशदष्टौ च सहस्रसंख्य- मेतच्छ्रुतं पंच पदं नमामि ॥१॥ गाथा-अरहंतभासियत्थं गणहग्देवेहि गुंथियं सम्म । पणमामि भत्तिजुत्तो सुदणाणमहोवहिं सिरसा ॥२॥ इनिका अर्थ-सामायिकका कर्ता कहै है मेरा नमस्कार होहु । आचार्य वदना वि मै श्रुतका कायोत्सर्ग कसं है, ऐसे कहिकरि णमा- कारमंत्रका नव जाप्य करें पीछे स्तवन पढे ! मै श्रुत जो द्वादशागलप सर्वज्ञकी वाणी तान नमस्कार करू , यह वाणी अक्षररूप के पद सहित है ? सो कहै है-एक सौ बारह कोडि तियासी लाख अठावनहजार पाच एते पद है, भावार्थ-पद तीन प्रकार है, एक तौ विभक्ति पढे है ताका विधान व्याकरण ते जानना बहुरि एक प्रमाण पद है सो श्लोकरूप छद बर्तास अक्षरका होय है, बहुरि एक मध्यमपद है ताके वत्तीस अक्षरलप श्लोक-इक्यानव कोडि आठ लाख चारासी हजार छहसै साडा इकईस ऐसे मध्यपट उपरि कहे तेते श्रुतज्ञान द्वादशागके जाननें ॥ १ ॥ बहुरि कहै है-अरहतकरि भापित जामै अर्थ है, बहुरि गणधर देव- निकरि भलैप्रकार गूंथ्या है ऐसा श्रुतज्ञानरूप समुद्रकू मे भक्तिकरि युक्त इवा सता मस्तककरि प्रणाम करूं हू ।। आगै आचार्यभक्ति करै है, भापावचनिकासहित सामायिक पाठ। ६३ नमोऽस्तु, आचार्यवन्दनायां आचार्यभक्तिकायोत्सर्ग करोम्य- हम् । जाप्यं ९॥ अर्थ-सामायिककर्ता कहें है-मेरा नमस्कार होहु, मै आचार्यकी वंदनाविप आचार्यभक्तिका कायोत्सर्ग करू इ। ऐसे कहि णमोकार- मत्रका नव जाप्य करे है। पीछे स्तवन पढे- आर्या-श्रुतजलाधिपारगेभ्यः खपरमतविभावनापटुमतिभ्यः । सुचरिततपोनिधिभ्यो नमो गुरुभ्यो गुणगुरुभ्यः ॥ याका अर्थ-सामायिकका कर्ता कहे है-जो मेरा गुरुनिक अर्थि नमस्कार होड, इहा गुरुशब्दकरि दीक्षा शिक्षादायक आचार्य जानने कैसे है गुरु-स्वमत अर परमतके जाननेविपै प्रवीण है बुद्धि जिनकी, वहुरि शास्त्ररूपी समुद्रके पारगामी है, वहुरि सम्यक्चरित्र अर तपके निधान है, वहरि आचार्यके गुणनिकरि युक्त है ।। गाथा-छत्तीसगुणसमग्गे पंचविहाचारवरणसंदरिसे । सिस्साणुग्गहकुसले धम्माइरिए सदा वंदे ।। याका अर्थ-ऐसे वर्माचार्यनिकू मै वदृहू, कैस है-छत्तीस गुण आचर्यके है तिनिकरि पूरण है, बहुरि पचप्रकार आचारक करणेवि जिनिक सम्यग्दृष्टि है, भावार्थ-पच आचारके करने करावनेंविपै जि- निका प्रवर्तना है, वहुरि शिष्यनिके उपकार करणेविपै प्रवीण है, ऐसे है। इहा पडावश्यक दशलक्षण वर्म बारह तप तीन गुप्ति पच प्रकार आचार, ए छत्तीस गुण जाननें । गाथा-गुरुभचिसंजमेण य तरति संसारसायरं घोरं। छिण्णंति अहकर्म जम्मं मरणं न पावंति ।। ॥

२० जयपुरनिवासी स्वर्गीय पडित जयचन्द्रर्जा छाबडाकृत याका अर्थ-यह प्राणी गुरुभक्तिसहित सयमकरि घोर ससार सागरकू तर है, अष्टकर्मकू छैठे है, फेरि जन्म मरण न पाये है भावार्थ-गुरुभक्ति विना सयम मोक्षका कारण नाही है || ये नित्यं व्रतहोममंत्रनिरता ध्यानाग्निहोत्राकुलाः पटकर्माभिरतास्तपोधनधनाः साधुक्रियाः माधवः। शीलप्रावरणा गुणग्रहरणाश्चन्द्रार्कतेजोधिका मोक्षद्वारकपाटपाटनभटाः प्रीणंतु मा साधवः ।। याका अर्थ-ऐसे साधु आचार्य हैं ते मात्र नुप्ति करो, कैसे है जे-व्रत कहिए पच महाव्रत पच समिति तीन गुति तेही भये मत्र होम तिनिविपैं तो निरन्तर लीन है, बहुरि ध्यानन्स अग्निहोत्र विपै तत्पर है, बहुरि पढावश्यककर्मविपै निन्य सन्मुख है बार बारह प्रकार तप सोही हैं धन जिनिके ऐसे तपोधनमुनि तेही है धन जि- जिकै, भावार्थ-जिनि आचार्यानकै मुनि है तेही परिवार है. धन है वहरि पच आचार क्रियाविप प्रवीण है बहुरि शील है उज्ज्वल वस्त्र जिनिक, वहरि सम्यग्दर्शनादि गुण है गस्त्र जिनिकै, बहुरि चन्द्रमा सूर्यका तेज प्रकाशत अधिक है प्रकाश जिनिकै, बहुरि मोक्षके द्वारका कपाटके उघाडनें विपै वडे सुभट है, ऐसे है। भावार्थ-लौकिकमै प्रवीण होय ब्राह्मण आदिकू आचार्य माने है सो ब्राह्मण मत्र होमविपै अग्निहोत्री होय पट्कर्म यज्ञकू जानता होय ताकी क्रिया में निपुण होय तपस्वी होय उज्ज्वल वस्त्र धरै जीवनिके घातक शस्त्र भी धारै प्रतापी होय ऐसा होय सो स्वर्गका द्वार उघाडै सो इहा तिसका निपेध के आर्थि अलकाररूप वर्णन है । जो ऐसे आचार्यके गुण हैं तिनिकू धौर सो आचार्य है, लौकिक माने सो नाही है, ऐसा आशय जानना ॥

भापावचनिकासहित सामायिक पाठ । ६५ श्लोक-गुरवः पातु नो नित्यं ज्ञानदर्शननायकाः । चरित्रार्णवगंभीरा मोक्षमार्गोपदेशकाः ।। याका अर्थ-ऐसे गुरु हैं ते हमकू सदा पालि रक्षा करो कैसे है- ज्ञान दर्शनके नायक हैं आप तिनिकरि युक्त है परकू प्राप्त करै है, वहरि चारित्रकरि समुद्रकी ज्यो अथाह है, बहुरि मोक्षमार्गके उपदेश करन-हारे है॥ ऐसें चाईसमा स्थल है ॥२४॥ ऐसै पूर्वाचायनिकरि कीया सामायिकका पाठ है सो मुनि त्रिकाल सामायिक करै है त्रिकाल पढे है । अर श्रावकभी सामायिक कर है सो श्रावकका पाठ अन्य है अर यह पाठभी पढे तो ढोप नाही, स्तुतिपाठ जो पढे सो ही श्रेष्ठ है । ऐसें जानना ।। दोहा। मैं बंदू अरहंत• सिद्ध मूरि उवझाय । साधु सकल मंगल करन सामायिक सुखदाय ॥१॥ ऐसे सामायिक पढयो सार जानि मुनिवृंद । धर्मराग मति अल्प फुनि भाषामय जयचंद ॥२॥ इति श्रीसामायिकपाठकी वचनिका समाप्त । , शुभम् ।

Samayik Path

Author
Jayachandra
Title
Samayik Path
File name
Samayik Path
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2009/11
Publisher
Bombay, Jain Granthamala Samati
Language
Sanskrit
Pages
86
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344295
Barcode
99999990234167.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
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